विकिपुस्तक
hiwikibooks
https://hi.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0
MediaWiki 1.46.0-wmf.24
first-letter
मीडिया
विशेष
वार्ता
सदस्य
सदस्य वार्ता
विकिपुस्तक
विकिपुस्तक वार्ता
चित्र
चित्र वार्ता
मीडियाविकि
मीडियाविकि वार्ता
साँचा
साँचा वार्ता
सहायता
सहायता वार्ता
श्रेणी
श्रेणी वार्ता
रसोई
रसोई वार्ता
विषय
विषय चर्चा
TimedText
TimedText talk
मॉड्यूल
मॉड्यूल वार्ता
Event
Event talk
हिंदी कथा साहित्य/रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "दूसरी आज़ादी"
0
11512
83053
2026-04-27T03:52:27Z
Ramnathshivendra
15902
" रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "दूसरी आज़ादी" {{db-spam}} रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "दूसरी आज़ादी " [[File:Dusary azadi jpg.jpg|thumb|यह कवर चित्र मेरे उपन्यास का चित्र है]] File:Ramnathshivedra2025Rnat1946.pdf|thumb|created by me in..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
83053
wikitext
text/x-wiki
रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "दूसरी आज़ादी"
{{db-spam}}
रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "दूसरी आज़ादी "
[[File:Dusary azadi jpg.jpg|thumb|यह कवर चित्र मेरे उपन्यास का चित्र है]]
[[File:Ramnathshivedra2025Rnat1946.pdf|thumb|created by me in a seminar]]
दूसरी आज़ादी
उपन्यास
रामनाथ शिवेन्द्र
प्रथम संस्करण
रामनाथ शिवेन्द्र
मूल्य :
संस्करण: प्रथम 2025
आवरण :
शब्द संयोजन-असुविधा
अक्षर घर, हर्ष नगर,
राबर्ट्सगंज, सोनभद्र..231216
मोबाइल..7376900866
मुद्रक :
Pilgrims publishing, b.27/98 A-8, Durgakund, varanasi, 221010
अपनी बात
दूसरी आज़ादीका कथानक उन हसीन सपनों से उपजा है, जो सन् 1857 से लेकर 1947 से होते हुए आज़ादी मिलने के बाद तक मेरे मन में लगातार अंखुआते रहे हैं। आज़ादीमिलते ही हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, सभी को रोटी और मकान मिल जाएगा, पर सपना तो सपना वह भला कैसे जमीन पर उतरे?
आज़ादी के समय और काफी बाद तक सोनभद्र मीरजापुर जनपद का एक भूभाग रहा है, जिसे कैमूर का दक्षिणांचल कहा जाता रहा है। अंग्रेजों के समय यह हिस्सा अनुसूचित हिस्सा था, जहां केवल फौजदारी के कानून लागू थे तथा राजस्व और दीवानी के कानून यहां की परम्पराओं पर आधारित थे। आज़ादी मिलते ही यहां के पारम्परिक कानूनों को समाप्त कर दिया गया। अब तो सोनभद्र एक अलग जनपद है, जहां देश-प्रदेश के सारे कायदे कानून लागू हैं। तमाम औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, ऊंची-ऊंची चिमनियां हैं तो लाखों की संख्या में विस्थापित भी हैं। इनके अलावा कुछ स्वतंत्राता संग्राम सेनानी भी हैं तथा बाकियों के परिजन भी हैं। उनसे मिल कर आज़ादी की जो तस्वीर उभरती है तथा दूसरी आज़ादी तक का चित्रा प्रस्तुत करती है वही दूसरी आज़ादी उपन्यास का कथानक है। वैसे यह अचरज नहीं है कि सोनभद्र के 57 प्रतिशत भू-भाग पर वन विभाग काबिज है और भूमिधारिता का औसत प्रति व्यक्ति एक बीघे से भी कम है। खाद्यान्न की कुल उपलब्धता पांच सौ ग्राम तक भी नहीं है। वन विभाग की क्रूर जमीन्दाराना गतिविधियों के दंश और प्रताड़ना को देख कर कोई भी शब्द-योगी सभ्य समाज की आरोपित मर्यादाओं के प्रति निष्ठुर हो जायेे तो अचरज की बात नहीं।
सोनभद्र में आपात-काल के काले कारनामों का तांडव, जिसका मैं गवाह और भुक्तभोगी भी था, उसे जस का तस सहपुरवा उपन्यास में मैंने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भूमि-वितरण के सवाल पर उपन्यास की दलित नायिका सुमिरिनी जिस तरह से राज-व्यवस्था व सवर्ण समाज से मुठभेड़ करती है और वह भी आपात-काल के दौर में जब दलित साहित्य का कहीं अता पता तक नहीं था, एक विचारणीय मामला है। वन-प्रबन्धन के खिलाफ संघर्ष करती बसमतिया जो आदिवासी महिला है तथा मेरे उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ की नायिका है उसके संघर्षों को उल्लिखित करना गलत न होगा। वह वन-प्रबन्धन से टकराती है फलस्वरूप उसे जेल भिजवा दिया जाता है।
मैं आभारी हूं मनीष प्रकाशन का जो इस उपन्यास को दुबारा प्रकाशित कर रहे हैं जिसके लिए पहले प्रकाशक आ.रामानन्द तिवारी जी ने सहर्ष अनुमति प्रदान कर दिया है।
दुनिया का सन्दर्भ छोड़ भी दें तो कम से कम आज़ाद और जनतांत्रिक भारत में वर्ण, स्त्राी और सम्पत्ति के सवाल सबसे बड़े सवाल हैं, जिनसे साहित्यकर्मी लगातार टकराते रहे हैं। हालांकि यह सच है कि इन सवालों से टकरा रहे कुछ नामवर और विशिष्ट (जो खुद को साबित कर सकें) लोगों के अगल-बगल ही साहित्य का भूगोल घूम रहा है, वही आलोच्य विषय हैं तो आलोचना भी, वही कथाकार हैं तो कथानक भी, वही पाठ हैं तो पाठ्य विषय भी। वे ही अखंडित हैं और विखंडित भी, वे ही पाठ को विखंडित कर दूसरा पाठ रचते हैं तो दूसरे पाठ को पहले पाठ पर चिपकाते भी हैं। कहा जाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य के कुछ लोग ही नियामक हैं, ब्रह्म हैं तथा साहित्य के प्रजनन-श्रोत व माध्यम भी। बताइये ऐसे कठिन समय में साहित्य के रंग महल में जिसका रूप संसद की तरह है, उसमें हासिए पर पड़ा कोई अदना कैसे दाखिल हो सकता है? फिर कठिन परिवेश में जी रहे शोषित, यातनाग्रस्त, प्रताडित वर्ग-समाज के द्वन्द, अन्तर्द्वन्द, उनका जीवन किस तरह अभिव्यक्ति हासिल कर सकता है वह भी यथार्थ ढंग से। जाहिर है यथार्थ का यथार्थ महज कल्पना है।
वैसे आज के समय का बाजारवाद, उपभोक्ता संस्कृति, वैश्वीकरण, अणुबम संस्कृति सामाजिक वानिकी को चाहे जिस भांति क्षतिग्रस्त करे, पर एक बात खुले रूप से प्रकट हुई है वह है अपनी पीठ ठोंकने की कला। हम सभी आत्म-मुग्ध हैं तथा अपने अपने वांक्षित शिखरों की तलाश में हैं। आज भी हम सम्पत्ति व स्त्राी के सवाल पर किसी प्राच्यवादी की तरह ही सोच रहे हैं और खुद को परिवर्तित होने से बचा रहे हैं। आज़ादी के बाद भी मैं भूमि-प्रबन्धन को बड़ा मुद्दा मानता हूं। आप भले हवाई हों, आकाशचारी हों, पर पैर तो जमीन पर उतारेंगे ही। मैं समझता हूं कि न्याय, किसके लिए न्याय? किसके लिए कानून? किसके लिए किताबें, किसकी आज़ादी इस पर बहस होनी चाहिए। दूसरी आज़ादी में कुछ इसी तरह की बहस से आप रूबरू होंगे। आशा है उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा, यदि आप निराश होते हैं तो मुझे क्षमा करें। छोटन के अपराध को गंभीरता से नहीं लिया जाता। दूसरी आज़ादी उपन्यास की सगुण या निर्गुण आलोचना के लिए आपकी प्रतीक्षा में।
रामनाथ शिवेन्द्र
अक्षर घर, हर्ष नगर, पूरब मोहाल,
रार्बट्सगंज (सोनभद्र) 231216
मो..7376900866
टूटता इतिहास
जो होना था, हो चुका था, इस होने और हो चुकने के बीच रणविजय, उलझे हुए थे। वे समझ पाने में असमर्थ थे कि उन्हें अपनों से अपेक्षा रखनी चाहिए कि नहीं, फिर उनका गुनाह क्या था, ऐसी विषम स्थिति की तो उन्होंने कल्पना तक नहीं किया था कि ऐसा भी हो सकता है!
एक दिन वे अकेले हो जायेंगे, अपने में डूबा हुआ, बाहर निकलने के लिए किसी गलियारे की तलाश करता, लेकिन बाहर निकल कर जाना कहां? हर ओर धुआं ही धुआं, आग ही आग, मार-काट, खून-खराबा। वे लान में बैठे हुए थे सुबह की नरम धूप भी उन्हें जला रही थी, जैसे आग में से तप कर आ रही हो। सामने दीख रहे फूलों की सुगन्ध का कहीं पता नहीं था, वहां धमाके थे, बमों की गर्जनायें थीं। नारियलों के पौधे हिलते तो वे सिहर उठते, भीतर से सवाल उठता...कृकृ
‘क्यों रणविजय अब क्या करोगे?’
उन्हें अपने मनुष्य होने तथा मनुष्य बने रह सकने पर सन्देह हुआ। उन्होंने अपने हाथों को देखा, उसे इधर-उधर झटका दिया, उनमें पहले वाली ही ऊर्जा थी, वे फावड़ा, कुल्हाड़ी कुछ भी चला सकते थे, सामने से आ रहे बाघों को मार सकते थे तथा एक ही हाथ से रायफल दाग सकते थे। हाथ तो ठीक ठाक है, पूरी तरह दुरुस्त और स्वस्थ।
वे फौरन कुर्सी से उठ खड़े हुए, लान में टहलने लगे, एक तरफ से दूसरी तरफ तक, अगल-बगल देख कर उन्होंने दौड़ना शुरू किया, गोया वे टहल सकते हैं, दौड़ सकते हैं, विपरीत परिस्थितियों में आगे या पीछे भाग कर खुद को बचा सकते हैं। दौड़ते हुए ही उन्होंने महल देखा, महल सामने पूरी लम्बाई-चौड़ाई में खड़ा था, उन्हें घूरता हुआ। उसके बुर्ज, उसकी छतें, सारी चीजें उन्हें घूरती हुई दिख रही थीं, जैसे वे भी पूछ रही हों, क्यों रणविजय अब क्या करोगे?
रणविजय उत्तरहीन थे। वही रणविजयकृजो स्वतंत्राता संग्राम के बारे में सोचा करते थे। राजनीति के आचरण के बारे में तर्क किया करते थे। राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय विषयों के बारे में मित्रों से बहसें किया करते थे। गान्धी के अहिंसा के पक्ष में किसिम-किसिम के भारतीय मानस की चर्चा किया करते थे तथा उन रास्तों का विरोध किया करते थे, जो स्वतंत्राता हासिल करने के लिये युद्ध व हिंसा की पैरवी करते थे। हजारों साल की भारतीय गुलामी पर उनके तर्क विस्मयकारी थे, मानते थे कि भारतीय मन पूरी तरह मोह और माया से मुक्त आध्यात्मिक रहा है, वहां भौतिकता व इहलौकिता का रंच मात्रा प्रभाव नहीं, जैसा कि अरबियों व ब्रिटिशियर्सों का हुआ करता है। मोह ग्रस्तता, कुंठित स्वार्थ तथा घृणित इहलौकिकता से पूर्ण। सारा कुछ अपने लिए तथा अपने को समाज पर आरोपित करता हुआ, सामाजिक होने तथा सामाजिकता का विभत्स प्रदर्शन। वही रणविजय निरुत्तर थे, वे महल की तरफ न देख सके, उन्होंने आंखें फेर लीं तथा लान के फूलों पर केन्द्रित कर लिया।
उनकी आंखें फूलों की तरफ केन्द्रित न रह सकीं, उन्हें फिर महल की दीवारों की तरफ लौटना पड़ा, उन्हें जान पड़ा कि महल कोई साधारण पनाहगाह नहीं, यहां विशेष किस्म के इतिहास का निर्माण होता है। यह किसी उत्पादन इकाई की तरह है, यहां सत्ता की नस्लें पैदा होती हैं, नस्लों की पहले कल्पना की जाती है, फिर उसे गढने व रचने का काम शुरू होता है। यहां युद्ध की भूमिका ही नहीं, उसके एकतरफा लाभकारी गुणों को रेखांकित किया जाता है। सेनायें इन्हीं महलों के इरादों पर अपना नाच नाचती हैं, उनका नृत्य खून से सने जमीन पर होता है, जहां सिर अलग ढंग से तथा धड़ अलग ढंग से अपनी युद्धगत भागीदारी की पहचान कराते हैं। एक बारगी उन्हें झटका लगा, वे आहत हुए फिर उन्हें लगा कि कोई अदृश्य ताकत है, जो उनका जीवन की खुशियों को बहुत ही निर्ममता से छीन रही है पर वहां कोई ऐसी ताकत नहीं थी, जो उन्हें लान के फूलों, पौधों या पीछे मुस्करा रहे महल की तरह दीखती। पर वे तो वर्तमान जो भविष्य बना हुआ था, उसकी निर्मम कल्पना में फंसे हुए थे। उनके सामने कल जो बीत चुका था, एक पुरानी कल्पना जिस पर कालिख पोती जा चुकी थी, और कल जो आने वाला था, वह उन्हें आतंकित कर रहा था कि तुम्हारा भविष्य गहरे कुंए में जा गिरा है और तुम एक अंधे भविष्य के आदमी हो। जहां सूरज उगता है, चांद खिलता है, मौसम हंसता-गुनगुनाता है, रिमझिम बदरियां दिल-दिमाग को बसन्ती बनाती है, फिर भी उन्हें तुम न देख सकते हो, न महसूस कर सकते हो। फिर तो उन्हें लगा कि वे अपनी आंखें खो चुके हैं, उन्हें कुछ नहीं दिख रहा, तभी किसी मुलायम सी हवा ने उन्हें सहलाया...कृ
वे ठीक-ठाक ही नहीं, इतना ठीक-ठाक थे कि अपना होना बचा सकते थे तथा वह सब तौर-तरीका आजमा सकते थे, जो ठीक-ठाक होने के लिए समय और समाज द्वारा प्रस्तावित थे। तरीके दो थे या तो भागो या तो परिस्थिति का मुकाबिला करो। दोनों तरीके युद्धकालीन थे। भागने वाले तरीके में जमीन पर लेट जाना भी था। वे क्या करें, भागें और जमीन पर लेट कर इच्छा मृत्यु का प्रयास करें या आगे बढ़ें और हत्या, प्रति हत्या करें, विजेता के गौरव से आत्ममुग्ध हों। वे आत्म-लीन हो उठे, आाखिर क्या करें? वे गुनने लगे जैसे उनके मन के गहरे में विषम स्थितियों के सापेक्ष समाधान हों। पर वहां भी तूफान थे। तूफानों में तर्क थे, एक दूसरे की विपरीतता को प्रभावित करते।
अचानक उन्हें लगा कि वे विजेता नहीं बनना चाहते, वे हिंसा, प्रतिहिंसा से अपना भविष्य संवारना नहीं चाहते। किसी सन्त की तरह उन्होंने विचारा..
‘उन्हें किसी का जीवन छीनने का क्या अधिकार?’लेकिन यदि उनका अधिकार छीना गया हो फिर!
फिर तोकृवे उलझ गये, अधिकार का मामला जटिल था। इतना जटिल, उन्होंने उसे ज्यों का त्यों छोड़ दिया इस मुद्दे पर उनके ज्ञात दार्शनिकों ने भी उनकी मदद नहीं की। भारतीय दार्शनिक तो किसी अधिकार की कल्पना तक नहीं करते। ले देकर उनके सामने महाभारत का उदाहरण था...सूई की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा, दुर्योधन का यह दुराग्रही फैसला महाविनाशकारी युद्ध को आमंत्रित करता है, वे कांप उठे, उनके साथ कोई नहीं, यदि साथ में कृष्ण होते, फिर वे सोचते। नहीं! महाभारत महज एक कल्पना है, संपत्ति के अधिकार के लिए युद्ध की अनिवार्यता को प्रमाणित करता, पर मन के गहरे में घुस चुके प्रबोधन आसानी से पिन्ड नहीं छोड़ते, वे धुआं-धुआं हो उठे।
‘सूई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा’ दुर्योधन का कल्पित चेहरा उनके सामने जीवन्त हो उठा और वह चेहरा भी जब वह सारा कुछ हार चुका होता है, अपने सभी भाईयों को घृणित अभिमान के युद्ध में गवां चुका होता है। उन्हें लगा कि वह युद्ध एक ऐसा विवादास्पद युद्ध था, जिसमें सभी पराजित होते हैं, कृष्ण अपनी कूटनीति में हारते हैं और दुर्योधन को ऐतिहासिक सन्तुलन के लिए राजी नहीं करा पाते। युधिष्ठिर अपने सच से पराजित होते हैं, अर्जुन, कर्ण से हारते हैं तथा कृष्ण जैसे देव रूप से अपना रथ हंकवाते हैं। कुन्ती अपनी गोपनीय सच को छिपाने में इतनी कमजोर हो जाती है कि उसे कर्ण को पांडवों के पक्ष में युद्ध करने के लिए सहमत करने का प्रयास करना पड़ता है, तो उस युद्ध का कोई विजेता नहीं, सभी पराजित होते हैं।
नहीं! नहीं, उन्हें किसी भी युद्ध को आमंत्रित नहीं करना, उन्हें जय-पराजय दोनों में से कोई भी स्वीकार्य नहीं, फिर क्या होगा, भइयाराजाने तो उन्हें महल से निर्वासित होने का आदेश दे दिया है। भइयाराजाके आदेश का अनुपालन या सबल प्रतिरोध, आखिर क्या करना है उन्हें!
‘आदेश का अनुपालन ही ठीक होगा’ यह उनके मन की गुफा में छलछलायाकृकृअचानक रणविजय ने समय के साथ हस्तक्षेप किये जा सकने वाले विचारों में से एक का चुनाव किया, यह उनके लिए खुशी प्रदान करने वाला क्षण था। ऐसा इसलिए कि उन्होंने आदेशों का अनुपालन ही अब तक सीखा था, बड़ी अम्मा रानी यही सिखाया करती थीं उन्हें। लेकिन उन्हें आदेश के अनुपालन के बाबत उचित अनुचित का ख्याल नहीं रखना चाहिये क्या! विवेक भी तो कुछ होता है इसके आगे रणविजय विचारों के अंधेरे में कहीं खो गयेकृ
एक उलझन भरी मनःस्थिति, ऐसी स्थिति जो दीखती स्पष्ट, पर वह दीखने का आभास ही होती।
उनकी खुशी क्षण-भंगुर थी, जैसे आई वैसे लौट गई।
रणविजय को अपना जीवन खुरचने लगा, जिसे उन्होंने गांधी के चरणों पर चढ़ा दिया था। गांधी के दिशा निर्देशों से कौन सी शिक्षा उन्होंने हसिल किया है..कृ सविनय अवज्ञा यह है कि नहीं, वे धरना और सत्याग्रह करते रहे कि नहीं, ब्रिटिश कानूनों की अवज्ञा करते रहे हैं कि नहीं!
हां ऐसा तो है फिर तो भइयाराजाके सामने उन्हें हाजिर होना होगा आखिर उनका अपराध क्या है? यह तो बतायें भइया राजा।
रणविजय ने पारिवारिक संस्कारों से बाहर निकल कर समय की आवश्यकतानुसार कुछ करने के लिए सोचा कि चुपचाप होकर निर्वासित हो जाना, अपना अधिकार छोड़ देना, कायरता होगी। इस महल, महल के इर्द-गिर्द वाली सारी संपदा पर उनका भी अधिकार है, केवल भइयाराजाका ही नहीं। फिर तो बंटवारा कराना होगा!
बंटवारा के बारे में सोचते गुनते ही रणविजय का मस्तिष्क तनाव से भर गया। एक बंटवारा तो उन्होंने देखा है, खून के सैलाबों और लाशों से पटी धरती का, भारत और पाकिस्तान का। एक देश को दो हिस्सों में बंटता हुआ। बंटा भी क्या, केवल धड़, सिर तो अपने-अपने स्थान पर बने रह गये, सिरों ने ही अपने अपने हिस्से की धरती का चुनाव किया था। पहली बार उन्हें लगा कि बंटवारे के लिए धर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। समाज का अपना कोई सिर नहीं होता..समाज तो एक अद्भुत गठबन्धन होता है, जो गिने-चुने सिरों के नेतृत्व में चला करता है। शायद भारत न बंटा होता, यदि वह कुछ चुनिन्दा सिरों का नेतृत्व न स्वीकारता। बंटवारे से हुआ क्या? क्या संस्कृति और सभ्यता की प्राचीन समरसता खंडित नहीं हुई! तो महल का बंटवारा क्या सभ्यता और संस्कृति का बंटवारा नहीं होगा? उस खून का बंटवारा नहीं होगा, जो उनके और भइयाराजाकी नसों में धारा-प्रवाह दौड़ रहा है। वही होगा...कृ
रणविजय अपनी सोच कुछ आगे बढ़ा पाते कि एक छोटी सी चिडिया उड़ती हुई उनके सामने से निकली, जो उनकी आंखों के इतना करीब से गुजरी कि उन्हें सिर को झटका देना पड़ा। चिड़िया उनका ध्यान तोड़ कर गुलाब के पौधे पर जा बैठी। वह वहां आश्वस्त थी और चीं चीं कर रही थी। यह उसकी अपनी भाषा थी, जिसमें उसका सुख-दुख था या गुलाब के खूबसूरत फूलों की प्रशंसा, रणविजय चिड़िया के अस्तित्व के बारे में सोचते हुए भावुक हो उठे। तथा चिड़िया का चहचहाना सुनते रहे तथा यह भी निश्चित करते रहे कि वे चिड़िया नहीं हो सकते, उसकी तरह चहचहा नहीं सकते।
सुबह होते ही वे लान की तरफ निकल आये थे, फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रह गया था कि उनके साथ कोई दूसरा भी है। उनके साथ पढने वाली लड़की ने जिद्द किया था कि वह गांव देखना चाहती है। भारत तो गांवों का देश है, गांव देखना भारत को देखना होगा। उसने मजबूत तर्क दिया था। रणविजय जानते थे कि भारत के गांव दीखते सरल व सीधे हैं, पर होते काफी जटिल हैं। हालांकि लडकी भारत की ही थी। एक दो बार ही अपने डैड के साथ इंग्लैंड जा पाई थी तथा दो भिन्न-भिन्न तहजीबों में पल-बढ़ रही थी, ऐसी सूरत में वह मानसिक रूप से काफी परिपक्व भी होने लगी थी। कभी-कभी वह उन उत्तरों की चाहना करने लगती, जो उसके डैड या मम्मी ही दे पाते। पर वह पूछती नहीं, उसे उत्तरों को सवाल में बदलना बेतुका और अनावश्यक जान पड़ता। इसीलिये वह डैड और मम्मी के रिष्श्तों को स्वीकार कर चलती। मम्मी के साथ मम्मी की तरह, डैड के साथ डैड की तरह रहना उसकी आदत बन गई थी।
रणविजय का महल गांव में था, पर गांव महल में नहीं था। वहां दिल्ली जैसे शहरों की आधुनिकता थी। गांव महल की संस्कृति ही नहीं हवा से भी काफी दूर था। महल की शान्ति, महल का सुख, उसका वैभव, हालांकि गांवों की सांसों पर ही टिका था। फिर भी ऐसा नहीं था कि महल की दीवारों पर गांवों की गरीबी और यातना के चकत्ते उभरते। गांवों की भूख महल में दाखिल हो कर रोटी का टुकड़ा पा जाती या कोई बीमारी अपना दवा इलाज करा पाती, ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता। रणविजय की मित्रा लडकी महल में आकर अचरज पीने लगी थी क्या ऐसा भी संभव है? लेकिन उसे मालूम था कि महल राजाओं के होते हैं, गरीबों के नहीं। गरीबों के बारे में उसे सुनी-सुनाई बातें मालूम थीं, महल में आकर वह कहीं खो गई थी।
रणविजय की मित्रा लडकी सुबह देर से उठती, दैनिक क्रियायें निपटाती, फिर अखबार पढ़ती। उसने देखा कि रणविजय महल में नहीं हैं। किसी नौकर ने बताया कि छोटे भइया लान में बैठे हुए हैं, फिर लडकी लान की तरफ निकल आई। लान की तरफ आते समय भाभी रानी मिली थीं, जो एक आधुनिक महिला थीं, गहनों से लदी, वे चलती तो छन-छन की आवाज होती। लडकी को अच्छा लगता। चेहरे पर कुटिलता नहीं थी, होंठ हमेशा मुस्कराहट पीते रहते, कुल मिलाकर लडकी भाभी रानी से प्रभावित थी, हालांकि उसकी मम्मी भी एक प्रभावशाली महिला थीं पर उनके चेहरे से सादगी फूटती और भाभी रानी के चेहरे पर हुकूमत नाचती रहती, वैभव थिरकता रहता। उसे भी भाभी रानी की तरह ही महल में रहना होगा, सोचते- सोचते वह लान तक चली आई।
यहां क्या हो रहा है भाई! किसी कविता की रचना तो नहीं की जा रही? उसने पूछा और रणविजय के पास बैठ गई।
कुछ नहीं, सोच रहा था कि दिल्ली निकल लिया जाय, छोटा सा उत्तर दिया रणविजय ने।
क्यों शिकार पर नहीं चलना क्या? पूछा लडकी ने।
नहीं, सरकार ने पाबन्दी लगा दिया है, रणविजय ने उससे कहा।
कैसी बातें करते हो, डैड ने बताया था कि राजाओं की रियासतों वाली सारी सुविधायें बहाल कर दी गई हैं, उनकी जमीनों एवं अन्य संपदाओं का बाजार दर के अनुसार मुआवजा मिलेगा। डैड तो बोल रहे थे कि जमीनदारियां व रियासतें छीनी नहीं गई हैं, बल्कि सुविधाजनक समझौते किये गये हैं ताकि अमन-चौन बना रहे, चलो आज शिकार पर चलते हैं।कृ
‘नहीं, लिली नहीं, बच्चों की तरह जिद नहीं करते, भइयाराजाने भी शिकार पर जाने के लिए मना किया हुआ है। रणविजय ने उदास होकर कहा।’
पर लिली तो जिद पर अड़ी थी, उसे शिकार पर निकलना ही था, उसके डैड अब शिकार पर नहीं जाते, उनके पास हथियार भी नहीं। दिल्ली से वह शिकार करने का रोमांच देखने के लिए ही आई थी। लिली रणविजय के पास से फुदकी और सीधे जा पहुंची भाभी के पास।
‘भाभी रानी, आपसे कुछ कहना है,’ कहते हुए लिली उनसे चिपक गई।
‘बोलो क्या है? दुलार भर कर पूछा भाभी ने।
उसने ठुनक कर कहाकृ‘हम शिकार पर निकलना चाहते हैं, पर रणविजय नहीं जा रहे।’
‘तुम दोनों आपस में बातें कर लो, मैं बोलती हूं छोटे भइया को।’
यह कहते हुए भाभी रानी लान तक आईं, उन्होंने रणविजय से बातें की, पर रणविजय तो खामोश बैठे रहे, जैसे उन्हें कुछ सुनाई ही न पड़ रहा हो या जानबूझ कर सुनना ही न चाह रहे हों, परकृभाभी रानी तो उन्हें सुनाने के लिए ही आई थीं कि वे सुनें और लिली के साथ शिकार पर निकलें।
‘नहीं भाभी रानी! मुझे दिल्ली निकलना है और फिर शिकार का मूड भी नहीं, वैसे भी नई सरकार ने शिकार करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, अब जंगल भी अपना नहीं है।’
‘तो क्या हुआ! हमारे पास तो सरकारी पास है, पिछले हफ्ते ही भइयाराजाशिकार पर निकले थे। भाभी रानी ने समझाने और राजी करने की हद तक रणविजय को समझाया, पर रणविजय कहां समझने वाले थे, फिर भाभी रानी ने लिली को ही आश्वस्त कियाकृ
‘जाने दो लिली, दुबारा आना, फिर हम भी निकलेंगे शिकार पर, लम्बा समय गुजर गया है शिकार पर गये हुए।’ भाभी रानी ने लिली को किसी बच्चे की तरह विषयान्तरित किया।
रणविजय का शिकार पर न निकलना, भाभी रानी के सन्देह को पक्का कर गया। भाभी रानी देख रही थीं कि जबसे महाराज ने रणविजय को भला बुरा कहा है, तब से उनका चहकना बन्द है। उन्होंने खुद को अपने में समेट लिया है। लेकिन भाभी रानी यह नहीं जानती थीं कि भइयाराजावास्तव में उन्हें महल से निर्वासित ही करना चाहते हैं, वे तो उसे सामान्य सी परिघटना ही मान रही थीं कि भाइयों में ऐसा होता रहता है, सामान्य अनुशासन के तहत। पर मामला इतना ही नहीं था, भले ही भाभी रानी को आगे क्या होगा? नहीं मालूम था। लेकिन उन्हें यह तो मालूम ही था कि भइयाराजाने लिली के बारे में ही रणविजय से कहा-सुना था।
लिली यानि उस अंग्रेज की लडकी, उसी दासी की पुत्राी जिससे उस अंग्रेज ने भारतीय रीति-रिवाज के अनुसार विवाह रचाया था। भाभी रानी उस अंग्रेज के बारे में पहले से ही जानती थीं, उन्हें बड़ी अम्मा रानी ने बताया था कि वह अंग्रेज, तब एक बहुत बड़ा हाकिम था। उस समय हर ओर अंग्रेजों की हुकूमत थी। अंग्रेज हाकिम से महाराज की काफी पटरी थी, वह जब भी शिकार पर जाता, महाराज को साथ लिये रहता। वह महाराज को उनकी शक्ल सूरत देख कर राजा ही समझता, पर वे राजा नहीं थे।
अंग्रेज हाकिम इतना ताकतवर तथा प्रभावशाली था कि वह जिसे चाहता राजा बनवा देता, खास तौर से ऐसे लोगों का जो मुगलों के विरोध में थे। उसी अंग्रेज हाकिम ने भइया को भी राजा बनवा दिया। राजा बनवाने के पहले वह यहां आया था, उसे आमंत्रित किया गया था। बड़ी अम्मा रानी उस किस्सा को काफी हास्यास्पद अंदाज में बतातीं।
रामदयाल के पिता एक प्रभावशाली आदमी थे तथा मुगलों के यहां वजारत का काम किया करते थे, यह सारा कुछ उन्हीं का किया कराया था। जब अंग्रेज हाकिम के यहां आया तथा उसका स्वागत सत्कार किया जा रहा था उस समय रामदयाल के पिता, हाकिम के साथ-साथ थे तथा यह सुनिश्चित कर रहे थे कि कहीं से कुछ गड़बड़ न हो जाय।
गड़बड़ तो कुछ होना ही नहीं था, अंग्रेज हाकिम का जोरदार स्वागत सत्कार किया गया। रात में आदिवासी नृत्य आयोजित किया गया। दासी, जो तब दासी थी, बहुत बढिया नष्त्य भी करती थी। वह आदिवासी गांवों की रहने वाली थी, मूल रूप से वह आदिवासी नहीं थी, पर आदिवासियों के साथ रहते रहते उन्हीं के संस्कारों में ढली हुई थी। आदिवासी औरतों ने उसे पकड़ लिया तथा इतना मजबूर किया कि उसे नाचना पड़ा। फिर तो उसने खूब खुल कर नृत्य भी कियाकृयह भूल कर कि वह नृत्य कर रही है। दरअसल उसका नृत्य काफी प्रभावशाली था, हालांकि आदिवासी नृत्य ‘करमा’ एक समूह नृत्य होता है, जिसमें स्त्राी-पुरुष दोनों पंक्तिबद्ध होकर एक दूसरे का हाथ पकड़, थोड़ी सी गर्दन झुका कर मानो वे जमीन देख रहे हों, एक निश्चित गोलाई में ही थिरकते हैं। उनके थिरकने से पैरों की घुंघरु, हाथों के कंगन बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मधुर स्वरों में बजने लगते हैं। घुंघरुओं का छन-छना छन-छन इतना प्रभावकारी होता है कि किसी को भी प्रभावित कर सकता है। लिली की मां थी कि वह नृत्य में मगन थी थोड़ा सा नशे के सुरूर में थीं, हालांकि दारू तो सभी नाचने वालियों ने भी पिया था। बिना दारू पिये, करमा नाचना मुश्किल है।
नृत्य देखने वाले भी दारू के नशे में डूबे थे, उन्हें हर तरफ चांद तारे दिख रहे थे, उनके दिल बरसात के रिम-झिम से भरे हुए थे। अंग्रेज हाकिम दारू पीने के बाद भी काफी संयत था तथा उसे मालूम था कि वह मेहमान ही नहीं, एक ऐसा हाकिम है, जिसकी कलम ‘राजा और प्रजा’ बनाया करती है। वैसे भी उसे संयत तो रहना ही था क्योंकि उसी को वहां सारे लोग देख रहे थे। उसे अपनी मर्यादा का पूरा ख्याल था, जिसे वह पूरी तरह बचाये हुए था।
अंग्रेज हाकिम नृत्य देखने में इतना मगन था कि उसके सामने की रखी दारू की गिलास भी खाली नहीं हुई। सामने जो खास तौर से फ्राई की गई मछली रखी गई थी जिसे बंगाल से मंगवाया गया था, वह प्लेट भी आसमान ही ताकती रही। रामदयाल के पिता ने एक दो बार अंग्रेज हाकिम से आग्रह भी किया जिसे वह विनम्रता से टाल गया। वह तो नृत्य की तरफ था, खास तौर से लिली की मां की तरफ। जो समूह में थी, उसके साथ दस और लड़कियां थीं, नौजवान आकर्षक देह वाली वैसे उनके चेहेरे के रंगों में फूलोंवाला आकर्षण नहीं था। फिर भी ऐसा नहीं था कि उनमें पुरुष मन उद्वेलित करने का चुम्बकत्व नहीं था। लोग बाग नृत्य की तरफ खिंचे हुए थे, अंग्रेज हाकिम था कि वह लिली की मां की तरफ एकटक था। उसे लगता कि वह अकेली नृत्य कर रही है और समूह है कि उसमें महज सहभागिता कर रहा है। उसके भारतीय ज्ञान ने उससे कहलवाया कि वह नृत्य की देवी है।
करमा के गायन और नृत्य की संयुक्तता से अंग्रेज हाकिम काफी प्रभावित था। कुछ देर के लिए तो वह भावुक हो उठा, फिर तो उसे लगा कि वह कुर्सी छोड़ चुका है और लिली की मां का हाथ पकड़ कर उसी की तरह थिरकने लगा है। पर उसने खुद को दृढ़ किया कि उसे आम लोगों के बीच अपनी निश्छल भावुकता को रोकनी चाहिए, वह अधिकारी है उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। वस्तुतः उसने खुद को रोक लिया और भूनी मछली के साथ एक घूंट दारू भी पिया। अब वह ठीक था तथा हाकिम होने के प्रभाव को बचाये हुए था। फिर भी उसके मन के गहरे में लिली की मां तैरने लगी थी, खजुराहों की नग्न मूर्तियों की तरह। अंग्रेज हाकिम ने खजुराहों की मूर्तियां देखा था, जो किसी भी कोमल मन की उदात्तता बहुत ही मीठे ढंग से खींच लिया करती हैं। आदिवासी नृत्य करने वाली लड़कियां धीरे-धीरे खजुराहों की मूर्तियों में परिवर्तित होने लगीं, फिर तो अंग्रेज हाकिम के लिए वहां रुकना कठिन हो गया। वह सीधे विश्राम कक्ष में जा पहुंचा।
पीछे-पीछे रामदयाल के पिताजी थे, फिर जाने क्या हुआ कि अंग्रेज हाकिम उसी रात वहां से वापस हो लिया, इसे अपशगुन माना गया कि कहीं हाकिम नाराज तो नहीं हो गया? पर वह नाराज नहीं था। यह बात दूसरे दिन मालूम हुई, जब रामदयाल के पिता उससे मिले। फिर तो लिली की मां व उसके माता-पिता से उन्होंने बातें की कि अंग्रेज हाकिम उनकी लड़की से शादी करना चाहता है और यह भी कि अब वह इंग्लैण्ड वापस नहीं लौटेगा।
वहां तो सभी अचरज में थे कि इतना बड़ा हाकिम करने क्या जा रहा है? एक आदिवासी लड़की से शादी! भइयाराजाभी अचरज में थे, पर जो होना था वह होने के लिए समय का अनुकूलन कर रहा था। लडकी के मां बाप तो बहुत खुश थे, उन्हें केवल चिन्ता इस बात की थी कि वे दुबारा अपनी लडकी से न मिल सकंेंगे, पर उन्हें आश्वस्त किया गया कि ऐसा नहीं होगा तथा उनकी यह बात भी मान ली गई कि शादी आदिवासी परंपरा के अनुसार ही होगी।
अंग्रेज हाकिम ने वैसा ही किया भी तथा लडकी के मां बाप के लिए एक गांव भी खरीद दिया, जो पड़ोसी रियासत में पड़ता था। अंग्रेज हाकिम आदिवासियों की परंपरा से मनोवैज्ञानिक रूप से खुद को जोड़ नहीं पा रहा था कि जब तक लिली की मां गर्भवती नहीं होगी, शादी नहीं हो सकती। वस्तुतः वैसा ही हुआ, लिली की मां अंग्रेज हाकिम के साथ रहने लगीं, जब गर्भवती हुईं तभी उसकीष्शादी का आयोजन किया गया। पड़ोस की दोनों रियासतों ने मिल कर जंगल में ही जहां उसके मां बाप के लिए गांव खरीदा गया था,वहीं शादी का प्रबन्ध किया। अद्भुत आयोजन था। मयूर के पंखों और जंगली फूलों से सजा हुआ, आदिवासी लिबास में अंग्रेज हाकिम अद्भुत एवं आकर्षक लग रहा था, बड़ी अम्मा रानी भी शादी में श्शामिलथीं।
भाभी रानी ने लिली को आश्वस्त ही नहीं किया, वरन उसे अपने साथ लान से वापस महल में लौटा ले आईं। रणविजय भी भाभी रानी के साथ ही वापस हुए, पर उनका महल में दाखिल होना महल से निर्वासित भी होना था। महल का बंटवारा सामान्य न होगा! ऐसा सोच कर वे कांप उठे तथा सोचने लगे कि कल ही दिल्ली निकल चलना होगा। भाभी रानी लिली के साथ थीं तथा कोशिश कर रही थीं कि दासियों वाली गंध जो लिली में चिपकी होगी, उसे वे पकड़ें। पर वहां तो दूसरी गन्ध थी ऐसी गंध जो भाभी रानी के पास तक न थी, अंग्रेजी मेमों के साथ होकर वे देसी हो जाती थीं किसी बंसवारी से निकलती हुई, लिली थी कि उससे बंसवारियां तथा जंगल की सरसराहटें गायब थीं। भाभी रानी को हालांकि लिली ने गहरे तक प्रभावित किया, फिर भी वे मान कर चल रही थीं कि भइयाराजाइसे उनकी देवरानी तो नहीं बनाएंगे, फिर क्या होगा, इसका? ये दोनों तो स्त्राी-पुरुष की सारी वर्जनायें तोड़ एक दूसरे में अर्न्तलयित हो चुके हैं।
भाभी रानी, भइया राजा, रणविजय अंग्रेज हाकिम, दासी और लिली इन सबके अलावा पूरी खामोशी के साथ अपनी भव्यता व विलक्षणता बचाये हुए महल खड़ा था वही महल, जहां इतिहास जन्मता है। रणविजय महल में किसी अजनबी की तरह रात भर गुजार सके, रात भर उन्हें दीखता रहा कि इतिहास टूट रहा है, खंड-खंड होकर बिखर रहा है। पास में सोई लिली ऐसी सोई हुई थी, जैसे उसके सपने भी नींद में चले गये हों।
सत्ता का खेल
रणविजय लडकी के साथ दिल्ली लौट आये। लडकी के पिता ने रणविजय से उनके भइया के बारे में पूछा। लडकी का पिता, जो उस समय अंग्रेजों का प्रशासनिक अधिकारी था, उसी ने रणविजय के भाई को राजा बनवाया था तथा राजा बनवाये जाने वाले अंग्रेजी कानूनों की उन धाराओं का प्रयोग किया, जो प्राधिकृत अधिकारी को अधिकृत करता था कि वह जैसा उचित समझे, विवादास्पद स्थितियों में फैसला ले। हालांकि उस समय ऐसा नहीं था कि रेजीडेन्ट मनमानी कर सकता था। फिर वारेन हेस्टिंग्स पर चलाया गया महाभियोग का मामला सभी सक्षम अधिकारियों के लिए केवल पाठ ही नहीं, दिशा निर्देश भी था कि रेजीडेन्ट भी मुकदमे में फंस सकता है।
रणविजय के भइयाराजाके क्षत्रा चंवरधारी हो जाने के बाद मृतक राजा की विधवायें चुप तो नहीं बैठतीं, वे वायसराय के यहां फरियाद लेकर हाजिर होतीं, फिर वायसराय जाने क्या करता! वह किन कानूनी सूत्रों का प्रयोग करता तथा अंग्रेजी कानूनों को रानियों की गोदी में किस तरह बिठाता सारा कुछ होने और न होने की संभावनाओं का आधार होता। वैसे कुछ हुआ नहीं, क्योंकि मृतक राजा की रानियां भी अपनी-अपनी स्थितियों के कारण मतभिन्नताओं की शिकार थीं। विवाहित रानी पुत्राविहीन थी तथा दूसरी रानी जातिगत शुचिता के सवाल पर विवाहित रानी का दर्जा हासिल कर पाने में असफल रही थीं, मृतक राजा भी दूसरी रानी की तरफ ही अपना सिर झुकाये हुए वह सब हासिल करने के लिए लालायित रहा करता था, जो उसकी सुप्त दैहिक ऊर्जा को काल्पनिक ढंग से उर्जस्वित कर सकें।
अंग्रेज हाकिम ने बहुत ही सहजता से पूछा..कृकृ
‘क्यों रणविजय! तुम्हें भइयाराजाने महल से निकाल दिया, आखिर क्यों?’
‘मुझे नहीं मालूम कोई ऐसा कारण भी नहीं था जिसके कारण मुझे महल से निकाला जाता। मैंने भइयाराजाकी कभी अवज्ञा भी नहीं किया, मैं तो उन्हें पिता तुल्य समझता हूं।’
‘यही होता है रणविजय, समय बदल चुका है, नहीं तो वह तुम्हारी हत्या भी करवा सकता था। संभवतः उसने तुम्हारा भविष्य पढ़ लिया है, और तुममंे राजा जैसा बन जाने के गुणों का आकलन कर लिया है। लेकिन यह तुम्हारे लिए अच्छा हुआ, अब तुम खुली हवा में अपनी सांसें ले सकते हो, सूरज की नर्म किरणों से बतिया सकते हो तथा अपनी मनुष्यता बचाने के लिए खुद से संघर्ष कर सकते हो।’
अंग्रेज हाकिम ने रणविजय को समझाया जैसे कोई दार्शनिक हो या कोई सन्त। लेकिन वह जानता था कि भाइयों में बंटवारा न हो, यह कुछ कुछ आरोपित जैसा होता है वैसे भारतीय समाज में बंटवारे को घृणित माना जाता है, जिसका रूप आन्तरिक कम दिखावटी अधिक होता है। किसे सत्ता प्रमुख बनना रुचिकर न लगेगा? सो अंग्रेज हाकिम ने रणविजय को महल से निकाले जाने को महज एक साधारण सी स्वाभाविक घटना माना जिसका घटना संभाव्य था। बावजूद इसके अंग्रेज हाकिम उलझन में था क्योंकि रणविजय के भइयाराजाकी ‘इस्टेट’ बहुत छोटी न थी। गुलामी के दौर में उस इस्टेट की अधिरचना औसत से बड़ी थी, तो क्या रणविजय को कुछ भी हासिल न होगा?
‘निश्चित रूप से रणविजय को ‘इस्टेट’ संपदा का आधा भाग मिलेगा निश्चित मानकर अंग्रेज हाकिम अपने दूसरे काम में लग गया।’
रामदयाल जब महल पहुंचे तब उन्हें वहां बताया गया कि रणविजय दिल्ली जा चुके हैं तथा भइयाराजाने उन्हें महल से निर्वासित कर दिया है।
‘आखिर क्यों? जानना चाहा था रामदयाल ने, पर महल से उन्हें कौन उत्तर देता। भइयाराजाप्रदेश की राजधानी जा चुके थे, वहां उन्हें जमीनदारी बांड के बाबत कई काम निपटाना था। महल की देख-रेख, सुरक्षा व प्रबन्ध करने वाला एक अधिकारी था, जो शक्ल सूरत व आज्ञाकारिता के हिसाब से मुगलिया काल का जान पड़ता था। हालांकि उसका पहनावा आधुनिक था, उसकी देह एक पैन्ट और झूलने वाली शर्ट से ढंकी हुई थी तथा वह पैर दबा कर चलने वाला आदमी था, जिसके जूते की टप-टप गायब थी। मुगलिया काल जैसा यह आदमी दौड़ा-दौड़ा हांफता हुआ महल के संवाद कक्ष तक आया कि रामदयाल जी आये हुए हैं और बैठे हैं। वैसे रामदयाल के जीप की गर्जना चारो ओर पहले ही पसर चुकी थी, पर मुगलिया काल जैसे उस आदमी को जीप की गर्जना न सुनाई पड़ी थी, वह उस समय किसी काम में काफी व्यस्त था। सो, उसके कान इस लायक न थे कि किसी आवाज की पहचान बना सकें।
रामदयाल की जीप आज के हिसाब से खटारा थी, जो पेट्रोल से चला करती थी तथा कभी कभी उसे स्टार्ट करने के लिए धक्का भी देना पड़ता था, फिर भी यह था कि उस समय जीप से चलना महत्वपूर्ण बात थी, घोड़ों व रथों वाला जमाना पीछे की तरफ लौट रहा था। रामदयाल की खास विशेषता थी कि उन्हें देख कर या बातचीत कर अनुमान करना मुश्किल था कि वे ब्राह्मण हैं तथा ब्राह्मण होने को बचाना चाहते हैं। वे साफ-साफ तो नहीं पर बगल से देखने पर राणा प्रताप के वंशज दीखते थे। गोरे चिट्टे, लम्बी मूंछों वाले, किसी अतिरिक्त रोब-दाब वाले आदमी की तरह। उनके पिता भी प्रभावकारी शक्लसूरत वाले जिन्दा आदमी थे, अंग्रेज हाकिम उनसे मिल कर महसूसते कि वे किसी राजा की चमक से चमक रहे हैं तथा इतिहास की हुकूमती मादकता व उन्माद में सराबोर हैं।
रामदयाल की प्रारंभिक पढ़ाई लिखाई रणविजय के साथ ही अंग्रेजी स्कूल में हुई थी, सो वे अच्छी अंग्रेजी बोलते तथा अंग्रेजी रहन-सहन में रहते। घर जाने पर उनकी मां जबरदस्ती उन्हें संस्कृत के श्लोक रटवातीं तथा समझातीं कि संस्कृत देवभाषा है। देवताओं की सारी प्रार्थनायें संस्कृत में है जिन्हें याद रखना बहुत आवश्यक है। मां की बातें रामदयाल के लिए प्रभावकारी होतीं तथा वे पूजा अर्चना वाले श्लोकों को रटने की कोशिश भी करते। यह तो बाद में हुआ कि उन्हें श्लोकों के प्रभाव पर सन्देह होने लगा तथा वे देवताओं के होने और न होने पर विचार करने लगे, खास तौर से तब जब वे भारत के इतिहास में घुसना चाहे, एक ऐसा इतिहास जिसे वे कालेज में पढ़ा करते थे, फिर तो उनके सामने इतिहास की दो तस्वीरें थीं, एक थी जिस पर अंग्रेज रंगा पुता था। दूसरी थी-मुगलों के चेहरों वाली। राज्यों की सुरक्षा तथा संप्रभुता के सवालों पर, रामदयाल इतिहास में से सुरक्षा प्रबन्धन के बारे में कुछ खोजना चाहते तथा खुद को आश्वस्त करना चाहते कि युद्धकालीन भारत में राजपुरोहितों या ज्योतिषियों की भूमिकायें कैसी थीं? वे निराश हो जाते, उन्हें वहां कुछ भी ऐसा न मिलता, जो याद करने लायक होता। उन्हें मां द्वारा याद कराये गये श्लोक भी अप्रभावित छोड़ते तथा किसी देवता की प्रतिमा के सामने श्लोकों का सस्वर पाठ करना, उन्हें निराशा की या असहायता की आत्म-स्वीकृति जैसा जान पड़ता, नीरस व उबाऊ।
रणविजय रामदयाल को राज-परिवार का एक ऐसा सदस्य जान पड़ते थे एकदम सहज व सरल जो साधारण लोगों में भी समाज के लिए भला करने की योग्यताओं व क्षमताओं को देखता है तथा अपने हितैषियों के हितों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाता है। बचपन से ही रामदयाल रणविजय से प्रभावित थे। जब रणविजय को महल से बेदखल करने की खबर उन तक पहुंची, वे महल आ धमके, गनीमत थी कि भइयाराजामहल में नहीं थे, यदि वे होते तो शायद रामदयाल अपना संतुलन गवां बैठते और वह सब कर जाते जो राज-परंपरा के विपरीत होता तथा राज-मंत्राी के परिवार की मर्यादाओं का भी उलंघन करने वाला होता। रामदयाल तो कभी भी ‘इस्टेट’ से बतौर अधिकारी नहीं जुड़े थे पर उनके पिता की इस्टेट के लिए की जाने वाली सेवायें कभी काफी महत्वपूर्ण हुआ करती थीं। हालांकि भइयाराजाउन्हें इस्टेट के साथ जोडना चाहते थे, पर रामदयाल दूरदर्शी थे, उन्हें भारतीय राजनीति के उथल-पुथल का आभास था, वैसे उनकी उस समय वह उम्र नहीं थी जो भविष्य का अनुमान करने में सहायक होती है। वे गांधी जी के सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा में भाग लेते, गिरफ्तार होते तथा विशेष किस्म की राजनीतिक सक्रियताओं के चलते रामदयाल का विश्वास काफी मजबूत हुआ था कि भारत से अंग्रेजी सरकार की विदाई सुनिश्चित है, सिर्फ तारीख नहीं मालूम कि वह कौन सा दिन होगा, उस दिन पछुआ हवा होगी या पूर्वा। चांद अपने असली रूप में होगा या बदरियों में छिपा हुआ होगा पर एक दिन सारा आकाशा हमारा होगा, हम अपने आकश के भीतर होंगे।
संवाद कक्ष में बैठे-बैठे रामदयाल बीते समय में उतर चुके थे, उन्हें रणविजय के मासूम चेहरे ने अस्त-व्यस्त कर दिया था। उन्हें मुगलिया काल जैसे महल के व्यवस्थापक ने अपनी ओर खींचा। उसने रामदयाल के चरणों पर अपना माथा रखा जो एक सामान्य व्यवहार था लेकिन रामदयाल मुगलिया काल जैसे आदमी के इस व्यवहार से अप्रभावित थे। उन्होंने सीधे पूछा- क्यों क्या हुआ? भइयाराजाने रणविजय को महल से क्यों निर्वासित कर दिया?
‘मुझे नहीं मालूम सरकार! हां रानी मां सुबह कह रही थीं कि छोटे भइया जिस लडकी को अपने साथ यहां लाये थे, वह ‘दोगली’ थी। किसी दासी की जाया, वह भी अंग्रेज द्वारा, शायद उन्होंने उससे शादी भी कर लिया है, रियासत का मान-सम्मान गिरा दिया है। छोटे भइया ने, मुगलकालीन जैसे आदमी ने रामदयाल को वह सब बताया जितना वह जानता था। उसके आगे क्या था, उसे न तो मालूम हो सकता था और न ही मालूम था।
रामदयाल संवाद कक्ष में बैठे थे, एकदम खामोश, जैसे कुछ गंभीर विचार कर रहे हों। मुगलकालीन जैसा आदमी उनके सामने ऐसे खड़ा था, जैसे उसका खड़ा होना उससे छीना जा चुका हो। रामदयाल महल के लिए खास रिष्श्तों वाले प्रभावकारी आदमी थे। बिना असलियत जाने महल से लौटना उन्हें पिन्ड छुड़ाने जैसा जान पड़ा, उन्होंने मुगलकालीन जैसे आदमी को आदेशित कियाकृ
‘जाओ! भाभी रानी से बोलो कि रामदयाल भेंट करना चाहते हैं।’
मुगलकालीन जैसा आदमी रामदयाल के आदेश पर जितना तेजी से महल में जा सकता था, चला गया।
थोड़ी देर में भाभी रानी संवाद कक्ष में थीं अपने उसी स्थान पर बैठी हुई जो भइयाराजाके साथ बैठने पर उनके लिए हुआ करती थी। मेहमानों के स्थान पर रामदयाल पहले से बैठे हुए थे।
रामदयाल ने भाभी रानी को अपनी तरफ से आशीर्वाद दिया फिर भाभी रानी ने उनका रियासती अभिवादन किया, जो सामान्य दुआ-सलाम या हलो-हाय से काफी भिन्न था तथा साबित करता था कि दुआ-सलाम जैसी क्रियाओं में भी काफी असमानतायें होती हैं। वहां समानताओं के तत्व ढूंढना काफी बेवकूफी होगी। ण्क आम आदमी का दुआ-सलाम और एक राजा का एकदम अलग अलग।कृ
भाभी रानी संवाद कक्ष में ज्यों ही हाजिर हुईं, उनके साथ ही साथ रामदयाल के लिए नाश्ते का थाल लिए दासी भी उपस्थित हुई। रामदयाल के लिए शाही नाश्ते का कोई खास मतलब न था, क्योंकि वे उन्हीं नाश्तों के सहारे अपनी उम्र बढ़ा रहे थे। पर यह था कि जब वे अपने घर में होते, तब इस तरह का अदब न देखते, जबकि उनके यहां भी दासियां थी, नौकर चाकर थे पर यह अदब कहां? वे तरस तरस जाते फिर भी महसूसते कि यह सारा कुछ दिखावटी है जिसका कोई मतलब नहीं।
‘राजा भइया कहीं गये हैं क्या’ पूछा रामदयाल ने।
‘हां पहले लखनऊ फिर दिल्ली जायेंगे,’ भाभी रानी ने छोटा सा उत्तर दिया।
‘किसलिये, कुछ बताया नहीं?’
‘कब तक आयेंगे?’
‘बोले थे आठ-दस दिन लग जायेंगे।’
असल सवाल जो रामदयाल पूछना चाहते थे उनके मन में कस-मसा रहा था। आखिर कैसे पूछें, कहीं भाभी रानी उन्हें रणविजय का मददगार न समझ लें। समझ लेंगी तो समझ लें, वे रणविजय की मदद निश्चित रूप से करेंगे, फिर रणविजय के लिये किसी न किसी दिन आमने सामने तो होना ही होगा। रामदयाल ने अतिरिक्त पारंपरिकता से भाभी रानी से पूछा।
‘भाभी रानी एक बात पूछूं, चारों ओर चर्चा है कि छोटे भइया को महल सेकृ जाने क्या गुन कर रामदयाल ने खुद को रोक लिया, फिर बाद में सवाल पूरा किया कि उन्हें निर्वासित कर दिया गया है।
‘ऐसा कुछ तो नहीं। सिर्फ महाराज ने उन्हें डांटा फटकारा था, गुस्से में कहा था निकल जाओ महल सेे।’
हुजूर को गुस्सा आ गया था उस लडकी को देख कर, आपको तो मालूम है न उस अंग्रेज के बारे में, जिसने रियासत की एक दासी से विवाह रचाया था, जाने उस अंग्रेज को क्या दिखा था उस दासी में, चाहता तो उसे राजकुमारियां मिल जातीं, भाभी रानी ने कुछ ऐसे बताया जैसे बताना भी घृणा की बात हो।
रामदयाल के दुबारा पूछने पर जोड़ाकृ‘वह लडकी उसी दासी की थी देखो तो जैसे कोई मेम हो उसके परिवार के लोग पड़ोसी रियासत में रहते हैं, दासी के भाई वगैरह तो हैं ही।’
भाभी रानी ने आह भर कर जोड़ा ‘भला बताइए दासी की लडकी से शादी! महाराज, हुजूर कैसे सहन करते, आखिर परिवार भी तो कुछ होता है कि नहीं? आप ही बतायें पंडित जी!’
‘तो क्या मतलब उसकी सजा निर्वासन है? रामदयाल ने प्रतिसवाल किया फिर अपने स्थान से उठ खड़े हो गये, जैसे उन्हें कुछ याद आ गया हो, संवाद कक्ष के चारों ओर घूमने लगे। संवाद कक्ष एक बहुत बड़ा हाल था जिसकी फर्श संगमरमर की थीं, दीवारें शीशम की लकड़ी के नक्काशीदार पटरों से ढंकी थी, कहीं भी चेहरा देख लो, हूबहू दिखता, पटरों के जोड़ कहीं नहीं मालूम होते। फर्श पर जगह जगह भूसा भरे शेर और चीते थे, हिरन के खाल हर तरफ कलात्मक ढंग से बिछी थी। भूसा भरे शेरों और चीतों के पाससे गुजरना विस्मयकारी होता पर डरावना कत्तई नहीं अलबत्ता वैभव की गुदगुदियां भीतर कहीं उठतीं तथा खुद बखुद समाप्त हो जातीं, वैभव को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर देतीं जैसे कभी भी उसे क्षत-विक्षत या लूटा जा सकता है, सार्वजनिकता में परिवर्तित करने के लिये।
रामदयाल संवाद कक्ष के पूर्वी हिस्से से होते हुए सीधे दक्षिणी हिस्से के पास पहुंच कर रुक गये, वह एक चमचमाती सपाट दीवार थी, उस दीवार पर रामदयाल चमकने लगे, उनकी पैंट और शर्ट ने दीवार पर अपना रंग चढ़ाया, जिसे रामदयाल ने नहीं देखा, वे तो कुछ दूसरा ही देख रहे थे। दीवार के ऊपरी हिस्से पर उनकी आंखें जमीं थी। वहां जहां इस्टेट के भूतपूर्व महाराजाओं, महारानियों के तैलचित्रा बहुत ही कलात्मकता से व्यवस्थित किये गये थे। चारो ओर चित्रों की पूरी श्रृंखला ही फैली हुई थी। दीवार पर लगभग पांच छह सौ साल का इतिहास महाराजाओं के चित्रों के साथ चिपका हुआ था। पांच छह सौ साल कम नहीं होते, एक ही कुल एक ही गोत्रा, सिर्फ चित्रा बदलते गये, इस्टेट जो पहले थी वही लगातार सन् ४७ तक। चित्रों का बदलना ही तब का इतिहास था। पिता के स्थान पर चाचा या चाचा के स्थान पर भतीजा इससे राज-परंपरा नहीं बदलती। रामदयाल को इस्टेट के बारे में क्या नहीं मालूम सो वे दीवार पर टंगे सारे चित्रों को लापरवाही से देखते हुए आगे निकल संवाद कक्ष के दाहिनी दीवार के पास रुके हुए थे। दीवार पर किसी महारानी का चित्रा टंगा हुआ था। चित्रा के नीचे महारानी का नाम लिखा था साथ ही साथ उनका जन्म और बलिदान भी उल्लिखित था।
भाभी रानी, रामदयाल को लगातार देख रही थीं तथा कोशिश कर रही थीं कि वे समझ सकें आखिर वे रानियों एवं महाराजाओं के चित्रों को क्यों देख रहे हैं? लेकिन उनके लिए समझना आसान न था, क्योंकि उनका काम किसी रहस्य जैसा था। बात छोटे भइया की और महाराजाओं के चित्रा दोनों में रिष्श्ता न बन पा रहा था।
रामदयाल महारानी के चित्रा के नीचे महज कुछ देर के लिए ठहरे, फिर उन्होंने भाभी रानी को बुलाया, भाभी रानी भी चित्रों के नीचे थीं।
‘इन्हें देखिए भाभी रानी! ये मुगलों से लड़ते हुए बलिदान हुई थीं। तब इनका किला यहां नहीं था, यहां से ठीक दक्षिण की तरफ जो पहाड़ों की श्रृंखला दिखाई देती है उन्हीं पहाड़ों के बीच कई मील लंबा चौड़ा क्षेत्रा है, जहां आज भी खंडहर दिखते हैं, जगह जगह मूर्तियां मिलती हैं। वह एक खूबसूरत क्षेत्रा है। पर उसे यहां के लोग मनहूस इलाका मानते हैं। बाद में इस इस्टेट के अधिपतियों ने उस स्थान को छोड़ दिया तथा यहां महल बनवा लिया।’
महारानी विधवा हो गई थीं, महाराज एक दिन के लिए बीमार हुए और स्वर्गवासी हो गये। मुगलों ने आज के उत्तर प्रदेश की रियासतों को कई तरफ से घेर रक्खा था। राजपूत रियासतें एक पर एक मुगलों की अधीनता में चली जा रही थीं, कुछ राणाप्रताप जैसे गिने चुने लोग मुगलों से टकरा रहे थे। महाराज हुजूर ने भी फैसला किया हुआ था कि वे मुगलों की अधीनता में राजसी वैभव का लाभ न उठायेंगे। महाराज के स्वर्गवास के तत्काल बाद मुगलों ने इस्टेट पर हमला बोल दिया, रानी ने उनका मुकाबला किया तथा मुगलिया सेना को पहाड़ी के दक्षिणी हिस्से की तरफ पन्द्रह दिनों तक हिलने न दियाकृलेकिन मुगलिया सेना तो युद्ध को जीत में बदलने के लिए हर तरह के षडयंत्रों के लिए तत्पर थी। मुगल सेनापति ने रानी के भाई को मिला लिया, जो कबीले का सरदार था तथा स्वर्गीय महाराज से हर हाल में बदला लेना चाहता था, पर महाराज तो थे नहींकृसो उसने मुगलों से समझौता किया कि रानी जो उसकी बहन थी, उसकी हत्या नहीं होनी चाहिए तथा उसे राजा बनाया जाएगा।
कबीले का सरदार रानी को समझाने बुझाने के लिए अपनी बहन से मिला, बहन रानी ने साफ साफ इनकार कर दिया कि ऐसा संभव नहीं। भाई नाराज होकर वापस चला गया। उसी की योजनानुसार रानी पर हमला किया गया और रानी का बलिदान हुआ, उसके बाद महारानी का भाई जो कबीले का सरदार था, उसे मुगलों ने इस्टेट का राजा बना दिया।
भाभी रानी देखिए! उसका चित्रा वह है, महारानी के बगल वाला, उसने तीस साल तक इस इस्टेट पर हुकूमत किया, अब आप ही सोचें, इस इस्टेट के पांच छह सौ साल के इतिहास में कौन दासी का पुत्रा है, कौन किस कबीले का, कौन रानी राजपूत वंश की है और कौन दूसरे वंश की? कैसे निश्चित किया जा सकता है।
भाभी हुजूर चित्रा देखतीं रह गईं। वे जब से महल की महारानी बनी हैं तब से उन्होंने कभी दीवार पर टंगे चित्रों की श्रृंखलाओं को ध्यान से नहीं देखा था। वे तो इस्टेट के वैभव से अभिभूत थीं, उन्हें क्या पड़ी जो दीवार पर टंगों चित्रों की छान-बीन करतीं। रामदयाल द्वारा दी गई जानकारी ने उन्हें चोटिल किया तथा वे खुद से पूछ बैंठीकृ‘तो क्या महाराज आदिवासी कबीला के वंशज हैं? इतना ही नहीं वे थोड़ा आगे बढ़ कर खुद पर भी सन्देह करने लगीं।
‘वे ही राजपुतानी हैंें कैसे प्रमाणित किया जा सकता है?’
भाभी रानी जाति गोत्रा के ऐतिहासिक मिश्रण से उलझ गईं। राजकुमारी से लेकर महारानी बनने तक वे कोख की शुचिता को वंश का आधार मान रही थीं सारा कुछ भहरा चुका था, एकदम से खंड-खंड टूटा हुआ, उन्हें तो बचपन से ही सिखाया गया था कि सती होना पवित्रा कार्य है तथा मृतक की आत्मा की शान्ति का सर्वोत्तम उपाय पर अब वह टूट चुका था। वे तमाम रानियों को जानती हैं, जिन्होंने वैधव्य स्वीकारा है, अपना जीवन जी रही हैं, वैसे अब जमाना युद्धों वाला भी नहीं है।
भाभी रानी ने महसूसा कि छोटे भइया ने कोई गलत काम नहीं किया है, दासी की पुत्राी है तो क्या पढ़ी-लिखी, सुघड़ कन्या है, फिर लडकी में क्या दोष पर महाराज को समझाना उनके वश का नहीं, उन्होंने रामदयाल से अपनी स्थिति के बारे में स्पष्ट बताया कि वे छोटे भइया और महाराज के मामले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, आप महाराज से ही बातें करें।
रामदयाल जानते थे कि इस्टेट की महारानियों की सीमायें महज श्रृंगार पटार तक ही हैं तथा एक अच्छा उत्तराधिकारी को पैदा करना, उसे गढना तथा रचना, इससे अधिक नहीं, फिर ये भाभी रानी तो वैसे भी काफी अन्तर्मुखी हैं, अपने में खोयी, समाई तथा अपना अस्तित्व तलाशती-गढ़ती।
रामदयाल भाभी रानी से आदेश लेकर महल से निकले। बाहर उनकी जीप खड़ी थी तथा ड्राइवर जीप पर तैनात था। ड्राइवर ने जीप स्टार्ट किया, रामदयाल उस पर सवार हुए, फिर जीप दौडने लगी। जीप महल की घेरेबन्दी से बाहर होती जा रही थी पर, रामदयाल महल में चलने वाले षडयंत्रों, दांव-पेंचों में उलझते जा रहे थे।कृ
‘कहीं भइयाराजाकी यह कोई चाल तो नहीं, वैसे रियासतें तो अब भारतीय गणतंत्रा में विलीन हो चुकी हैं, फिर भी अभी बहुत कुछ बाकी रह गया है जो राजाओं के अधीन है। उन्हें मालूम भी नहीं कि रणविजय की अब कानूनी स्थिति क्या है? लगता है कानूनी कार्यवाईयों को देखना होगा, पर इसके पहले रणविजय से मिलना आवश्यक है।
रामदयाल महल से निकल चुके थे, फिर भी रणविजय के महल से निर्वासन किए जाने के बारे में काफी चिंतित थे। अब उनके सामने अतीत वाली चिन्तायें न थीं, जो खास तौर तरीके से चला करती थीं, राजाओं और राजाओं के बीच, एक दूसरे को बरबस पराजित व अपमानित करने का षडयंत्रा, पूर्ण युद्ध कभी कोई मुद्दा, तो कभी कोई मुद्दा। युद्ध को व्यापार की तरह संचालित करना अब रामदयाल को सिर्फ मूर्खता लगती, वैसे भी रामदयाल राजमहलों और राजाओं के आस-पास भौरों की तरह मंडराते रहने के बाद भी खुद को पुनर्निर्मित कर रहे थे। कांग्रेस पारटी के सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा जैसे कार्यक्रम उन्हें मानसिक रूप से परिपक्व बना रहे थे।
‘अंग्रेजों वापस जाओ पहले तो उन्हें समझ में ही नहीं आया आखिर क्यों? क्योंकि अंग्रेज भारत में तब बतौर राजा उन्हें कहीं नहीं दीखते थे। भारत के सभी इस्टेटों पर भारतीय लोग ही राजा बने हुए थे, वह तो बाद में उन्हें समझ में आया कि यह जो राजाओं की प्रजाति है, इसकी आवश्यकता किसी भी रूप में नहीं, न ही प्रातिक रूप से और नहीं ऐतिहासिक रूप से।’
रामदयाल खुद से पूछते फिर... किसे जाना है? अंग्रेजों को या राजाओं को, दोनों को, बाद में हंसने लगते और गांधी के रंग-रूप में उतर जाते, मोटा सा चश्मा, एक छड़ी, आधी अधूरी धोती, एक सामान्य देहयष्टि वाला आदमी, जो प्रथम द्रष्टया किसी का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच सकता। दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैण्ड से लौटा एक बैरिस्टर, आत्मविश्वास से भरा, जिसने पहली बार सोचा कि अंग्रेजों को वापस भेजा जा सकता है। जाने क्या मजबूरियां थीं कि पहले किसी भी ने नहीं सोचा कि वर्तमान को बदला जा सकता है और शायद अब समय आ गया है लोगों में यकीन जमा है कि अंग्रेजों को अपने देश से भगाया जा सकता है। अब तो राजा महाराजा भी गांधी का साथ देने लग हैं, यह बहुत अच्छा है कि अंग्रेजों के खिलाफ राजा महाराजा भी जनता के साथ मिल कर कार्य करेंगे। अंग्रेजों के जाने के बाद वे सामाजिक भेद-भाव ही नहीं, आर्थिक असमानता को मिटाने का भी प्रयास करेेंगे लेकिन भइया राजा!
भइयाराजातो निहायत स्वार्थी निकले, वह लडकी तो उसी अंग्रेज की थी, जिसने अंग्रेजी कानूनों को शिथिल करते हुए उन्हें राजा बनवाया था। वे विधान सभा सदस्य भी कैसे बन गये? भले ही आला कमान ने उन्हें टिकट दे दिया था फिर भी हार की संभावना तो थी ही। मैंने जो किया उनकी जीत के लिए किया ही, रणविजय तो खाना-पीना और आराम तक भूल गये थे कि किसी भी तरह भइयाराजाको चुनाव जितवाना है।
‘विधान सभा सदस्य बनते हीभइयाराजाने महल से निकाल दिया रणविजय को। रामदयाल भले ही आश्वस्त थे कि रणविजय की भागीदारी इस्टेट की सत्ता में सुनिश्चित है, फिर भी वे सत्ता के इस आधुनिक खेल से परेशान थे। सत्ता का यह आधुनिक खेल पहले के सत्ता खेलों से अच्छा है, क्योंकि उस जमाने में तो रणविजय को सत्ता के रास्ते से ही हटा दिया जाता अभी तो वे सत्ता के रास्ते पर ही हैं।’
हमारा रास्ता
रामदयाल दिल्ली न जा पाये, उन्हें रणविजय की तरफ से कोई सूचना भी न मिली। वैसे रामदयाल यकीन न कर पा रहे थे कि रणविजय ने शादी कर लिया होगा, एकदम गुप-चुप तरीके से, कम से कम उन्हें तो बुलाया ही होता, भले ही वे शादी वहीं दिल्ली से ही करते।
एक दिन महल का एक खास आदमी रामदयाल से मिला। वह आदमी भइयाराजाका काफी विश्वसनीय था, इतना श्ष्विसनीय कि भइयाराजाके दोनों चेहरों का वह गवाह था, बाहर से जितना बाहर दिखते भइयाराजाउतना ही अन्दर से अन्दर दिखते। वह आदमी भइया के बाहर और भीतर दोनों का बराबर साक्षी था, पता नहीं वह आदमी रामदयाल में क्या देखता कि वह भइयाराजाके बारे में बताता जरूर, वैसे भी एक आदमी कितना मन को दबा कर रखने की ताकत रख सकता है, जब वह केवल दर्श्षक हो तथा निर्देशित भी कि कहीं बात न खुले।
रामदयाल बातों को दबा कर रखने के मामले में उस आदमी के लिए काफी विश्वसनीय थे। उस आदमी ने महल का रहस्य खोला। लड़की को तो बहाना बनाया था महाराज ने असल बात तो भविष्य पर टिकी है। यानि कि रियासत व जमीनदारी क्या टूटी महाराज ने, कानून का खेल आरंभ कर दिया। तत्कालीन कलक्टर जो भारतीय मूल का अंग्रेज था, उसने महाराज का साथ दिया। सीर खुद के नाम व डोमेन इस्टेट की संपदाओं को महाराज ने अपने लोगों के नाम करवा लिया तथा महज दो गांवों को रणविजय के हवाले किया, महल व महल की सम्पत्ति तथा बनारस और लखनऊ वाली हवेलियां महाराजा की।
स्वतंत्राता के बाद से ही महाराज कांग्रेसियों के अगल-बगल मंडराने लगे थे। जिस दिन प्रथम स्वतंत्राता दिवस का आयोजन दिल्ली में था, पंडित जवाहर लाल नेहरु को तिरंगा फहराना था, उस दिन महाराज दिल्ली जा पहुंचे थे। दिल्ली जाने के पहले उन्होंने अपने विश्वसनीय एक दूसरे महाराजा से संपर्क साधा था। उक्त महाराजा दिमाग का भी महाराजा था तथा १९३५ से ही वह पंडित जवाहर लाल नेहरु के अगल-बगल तिजोरी लेकर खड़ा रहा करता था। उसकी तिजोरी का काम १९४२ के समय आया, अंग्रेजों भारत छोड़ो यह एक असाधारण ऊर्जा वाला आन्दोलन था। बम्बई वाले अधिवेशन की भीड़ रुपयों के कुशल प्रबंधन के कारण थी वर्ना उस समय भी स्वतंत्राता जिसे चाहिये थी वह जमात तो चुपचाप नमक-रोटी के जोगाड़ में थी। उसकी अधिकतम आकांक्षायें, अपनी पीठ बचाने की होती थी कि उस पर आंदोलन, सत्याग्रह, इंकलाब जिन्दाबाद चाहे जो लिख दिया जाय ठीक, लेकिन जूतों, डंडों, बेंतों की मार न पड़े। पीठ बची रहेगी फिर तो आतों को समझाया जा सकता है कि सुबह होगी ही फिर भूख को भूखा न रहने देंगे। स्वतंत्राता दिवस की तारीख दूर थी और महाराजा ने रामदयाल से भी कहा था दिल्ली चलना है पर रामदयाल को तो नोआखली दिख रहा था, उन्होंने रणविजय से बात कर लिया था। रणविजय भी तैयार थे। उस समय औसत बुद्धि के लोग, जो राजनीति में थे उन्हें यह बात साफ तौर पर मालूम थी कि संभव है कि प्रथम स्वतंत्राता दिवस समारोह में गांधी जी उपस्थित न रहें, नोआखली में हो रहे दंगों से गांधी जी चिन्तित थे। वैसे रामदयाल राजनीतिक चिन्तन के पुरोधा नहीं थे, पर कांग्रेस पारटी संयुक्त होते हुए भी कितने टुकड़ों में बंटी हुई थी इसे वे समझते थे। गरम दल व नरम दल के अलावा उस समय कांग्रेस पारटी में भी कुछ ऐसे आत्मजीवी लोग थे, जो कांग्रेस को अपनी जेब में रखकर चलना और चलाना चाहते थे।
कांग्रेस पारटी को लेकर गांधी जी स्पष्ट थे कि इसकी राजनीतिक जिम्मेदारी समाप्त हो चुकी है, इतना ही नहीं, कांग्रेस के लिए अपनी आवश्यकता पर भी महात्मा गांधी जी को कोई दुविधा न थी। सो, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि नोआखली जाना ही है। नोआखली के दंगे यदि नहीं रुके तो न तो देश बचेगा और न ही यह साबित हो सकेगा कि भारतीय अपना देश चला सकते हैं, फलस्वरूप एक बार फिर गुलाम होने की हमारी अनिवार्यता सिद्ध हो जाएगी। यह साबित हो जाएगा कि हम भारतीय नहीं, मुसलमान और हिन्दू हैं और हमें एक नहीं दो देश चाहिए ही वैसे गांधी जी यह अच्छी तरह से जानते व मानते थे कि भारतीय समाज पहले भी अखंड था और आज भी है, पर जो यहां का अगुआ वर्ग है, वह भले ही देश की स्वतंत्राता के सवाल पर कन्धे से कन्धा मिला कर सटा दीख रहा, पर ऐसा है नहीं, अगुआ वर्ग पूरी तरह विभक्त था, स्वतंत्राता आन्दोलन में श्शामिलहोते हुए भी वह अपने-अपने अनुरूप की स्वतंत्रातायें देख रहा था।
रामदयाल ने कांग्रेस पारटी की शीर्षस्थ गतिविधियों के निर्धारण में कभी हिस्सा नहीं लिया, न ही उन्हें ऐसा अवसर मिला क्योंकि वे ऐसे कांग्रेसी के शीर्षस्थ लोगों को अखबारों में, मीटिंगों में या मंचों पर ही देख पाते थे। एक दो बार उन्होंने कोशिश किया था कि वे नेहरु जी के आमने सामने हो जायें तथा उनका बोलना, समझाना, हंसना, यानि चेहरे की सारी क्रिया-प्रतिक्रियाओं को अपनी आंखों से देख लें फिर समझने की कोशिश करें कि उनके व्यक्तित्व में ऐसा क्या कुछ है, जो उन्हें अद्भुत तथा अनिवार्य बनाता है। जो उन्हें लाखों, करोड़ों में एक बनाता है। पर उन्हें मजबूत प्रयास के बाद भी मौका नहीं मिला।
नेहरु जी इलाहाबाद आये, आनन्द भवन में रुके और फिर दिल्ली चले गये। रामदयाल इलाहाबाद से नेहरु मिलन की आकांक्षा लिए वापस लौट आये, फिर भी वे निराश नहीं हुए। दूसरी बार अवश्य मिलूंगा। वे इलाहाबाद तो आएंगे ही। नेहरु जी दूसरी बार इलाहाबाद लगभग छह माह बाद आये। उस दिन रामदयाल की बहन की शादी थी, पिता रोकते रह गये, जो तब जर्जर हो गये थे, अब गये तब गये। पर रामदयाल कहां मानने वाले थे। वे तो नेहरु की राजनीतिक हैसियत में सराबोर थे, एक ऐसी मजबूत हैसियत जो अंग्रेजी वायसराय की जुबान छीन लेती हो, उसके दिमाग से अंग्रेजी राजनीति के घृणित षडयंत्रों को निकाल फेंकती हो। बुद्धि, विवेक, समझ और ज्ञान का सन्तुलित उपयोग करने की नेहरु की ताकत पर रामदयाल झूम-झूम जाते। उन्हें नेहरु से मिलना था तो मिलना था। वे बहन की शादी छोड़ इलाहाबाद जा पहुंचे। इस बार रामदयाल आश्वस्त थे कि वे भारत के राजनीतिक सूरज के सामने होंगे। उन्होंने कुछ अतिरिक्त प्रबन्धन भी किया था, वे विश्वविद्यालय के एक भूतपूर्व प्रोफेसर के साथ हो लिये थे जिसने उन्हें राजनीति शास्त्र पढ़ाया था तथा प्रोफेसरई छोड़ कर कांग्रेस पारटी का होल टाइमर हो गया था और नेहरु के काफी करीब माना जाता था तथा वह खुद कहता भी था कि
‘नेहरु की मिलनसारिता की नकल जिस किसी ने नहीं किया, समझ लो, उसकी आधी जिन्दगी खत्म।’
नेहरु जी इलाहाबाद आये। तकरीबन अड़तालीस घंटे उनका आनन्द भवन, उनके होने से किसी महल जैसा गन्ध छोड़ता रहा, रामदयाल, प्रोफेसर के साथ उसकी गन्ध पीते रहे, सूरज की धूप जमीन पर उतराती रही, हवा के झोकें, रामदयाल का पसीना सुखाते रहे। आनन्द भवन की प्रागंण भीड़ पर भीड़ अपने में श्शामिलकरता रहा फिर एक क्षण ऐसा आया कि तिरंगा वाली नेहरु की कार फुर्र से निकल गई। रामदयाल कार का गुरगुराना सुनते रहे, फिर भीड़ की बोली भी ‘नेहरु जी चले गये।’ रामदयाल प्रोफेसर की बताई विशेषता मिलनसारिता का अर्थ निकालते रहे। एक अर्थ तो यही था कि कोई बहुत जरुरी काम आ गया होगा, दूसरा अर्थ था, हजारों की भीड़ आखिर वे किस-किस को समय देते चौबीस घंटे में कुल चौदह सौ चालीस मिनट ही तो होते हैं। भले ही वे देश के जन प्रतिनिधि हैं, पर यह कहां संभव है कि पचास-साठ करोड़ की आबादी से मिल सकें। रामदयाल ने खुद को समझाया तथा आश्वस्त किया कि उन्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि उनके नेता की मिलनसारिता जरुरी या गैरजरुरी के चुनाव पर टिकी हुई है तथा समाज को चलाने वाले लोग किससे मिलना है, किससे नहीं मिलना है, का चुनाव करते हैं।
रामदयाल उलझ गये थे। घर जा कर क्या बतायेंगे?बहन की शादी में भी श्शामिलनहीं हुए, पिताजी क्या कहेंगे? गनीमत थी कि साथ में रणविजय नहीं थे। कांग्रेस में होना तब गौरव की बात थी और उस गौरव को रामदयाल ने खुद तोड़ा था, आखिर उन्होंने नेहरू से मिलने का प्रोग्राम ही क्यों बनाया? उनका दर्शन तो वे मीटिंगों, अखबारों में कर ही लिया करते थे। अचानक उन्होंने किसी दार्शनिक की तरह सोचा...देश के अगुआ का दर्शन ही महत्वपूर्ण है और यही व्यावहारिक भी और आमने-सामने होना तथा अपना दुख-सुख बताना, यह तो कल्पना की बातें हैं और पूरी तरह निर्मूल। फिर भी रामदयाल को कांग्रेसी होने के गौरव को तो बचाना ही था, गौरव बचाने के लिए झूठ का सहारा लिया जाना ही उचित होगा, यह एक ऐसा झूठ होगा, जिससे किसी का अहित नहीं, यदि अहित होता फिर तो झूठ झूठ ही रहेगा। यह भी था कि नेहरु का कद भी तो मिलनसारिता के गुण से बढ़ेगाकृवर्ना यह तो किसी भी काल का सच हो सकता है कि जितना असंभव है वायसराय से मिलना उससे कम असंभव नहीं नेहरु जैसे अपने नेताओं से मिलना।
रामदयाल भीतर-भीतर टूट चुके थे, उन्हें कांग्रेसी राजनीति की सहभागिता पर सन्देह होने लगा था, कहीं यह ऐसा प्रोजेक्ट तो नहीं जो सत्ता बदल के बाद दूसरा रास्ता अख्तियार कर ले और वही सब करना शुरु करे, जिसे अंग्रेज कर रहे थे। बहरहाल रामदयाल मन-मसोस कर इलाहाबाद से लौट आये। उनका घर उनकी प्रतीक्षा में था। घर जो सामान्य सी किसी हवेली का आभास देता था, उसकी दीवारों, मुंडेरों, बुर्जों, सामने के पेड़, पौधों इतना ही नहीं हवेली के गेट तक, बहन की शादी का उत्सव थोड़ा सुस्ती के साथ ही पर नाच रहा था। रामदयाल की जीप हवेली में दाखिल हुई।कृबहन की विदाई हो चुकी थी। बहन रामदयाल से उम्र में काफी छोटी थी और वे उसे बहुत प्यार करते थे, घर में बहन की अनुपस्थिति ने घातक एकान्त पैदा किया हुआ था, पिता जी बीमार थे, वैसे उम्र भी उनकी काफी थी, मां का स्वर्गवास हो चुका था, घर में रिश्तेदार औरतें तो थीं, पर उनके होने की चहक गायब थी। हो सकता है कि रामदयाल को खंडित मन की अप्रत्यक्ष अनुभूति से ऐसा महसूस हो रहा हो, ऐसा था भी, अब उस स्थिति का स्वीकार ही उनके लिये विकल्प था। उनकी पत्नी रिष्तेदार औरतों के साथ थीं। रामदयाल के लिए मुश्किल था पत्नी के सामने होना, जब कि पिता जी को वे अपनी राजनीतिक सक्रियता के लाभकारी गुणों से प्रभावित कर सकते थे। पत्नी को क्या समझाते!कृपत्नी तो वैसे भी सत्याग्रह, आन्दोलन, घेराव, फिर जेल वगैरह को घटिया काम मानती थीं।
‘ये सब काम या तो मूर्खों के हैं या उनके जिनके पास दूसरे काम नहीं। वे साफ बोलतीं... पिता जी वृद्ध हैं, आपको जमीनदारी का काम देखना चाहिए ठीक है जमीनदारी छोटी ही सही, पर है तो कुछ। टूटने के बाद भी कम से कम दो गांव तो बच ही गये हैं, जो सीर खुद काश्त हैं उन पर हमारी खेती-बारी होती है।’
रामदयाल की पत्नी उस जमाने के अनुसार काफी पर्दे वाली, सुघड़ महिला थीं, बोलचाल में अर्थों को चूस कर बोलती थीं, ताकि बोली गई बात जमीनदारी की विशेष किस्म वाली तहजीब से बाहर न हो जाय फिर भी मन के भावों को कितना दबातीं, उन्हें रामदयाल पर काफी गुस्सा आता, वे अपने भइया का हवाला देतीं..कृकृ‘भइयाराजाकी एक बीघा जमीन भी नहीं निकाल पाई सरकार, आखिर सरकार में भी तो वही लोग हैं जिन्हें अपनी जमीन हर हाल में बचाना चाहते हैं।’
रामदयाल का कांग्रेसी होना उनकी पत्नी के लिए गौरव की बात न थी, वैसे गौरव की बातें उनमें कुछ थीं, जिससे उनकी पत्नी पोर-पोर सराबोर रहा करती थीं, जैसे यही कि वे अपनी आंखों में चांद की खूबसूरती का बांया-दांया नहीं उतारते थे, भइयाराजाकी तरह। भइयाराजातो लगता ही नहीं भाभी जी को कुछ समझते हैं, जबकि इतनी खूबसूरत और नाजुक हैं कि पूछो नहीं, ताज्जुब होता है उन्हें बच्चे कैसे हो गये? भइयाराजाकी जगह कोई दूसरा होता तो जीवन भर के लिए भाभी के कमरे में खुद को कैद कर लेता, वही बसन्त, फागुन और सावन की रिम-झिम पीता, पर भइयाराजाहैं कि बंदरियों के आवारापन में डूबे रहते हैं।
रामदयाल की पत्नी खबर सुनते ही कि ‘पंडित जी आ गये हैं,’ फौरन उनके पास आ गईं। दाई ने एक बाल्टी पानी और परात पंडिताइन के सामने रख दिया। पंडिताइन ने पंडित जी का पैर धोया, धोया क्या पानी पैरों पर डाला ही था कि दासी ने पंडिताइन को वहां से अलग कर दिया, बड़े घरों के नियम इतना ही अनुमति देते हैं यानि की संस्कार बचा लो, पैर तो दाई ही धोएगी और उसे धोना ही था। पंडिताइन, रामदयाल या कि पैर धोने वाली दाई, इनमें से कोई भी नहीं जानता था कि बाहर से आने वालों के पैरों को धोने का क्या प्रयोजन है? बस पैर धोना है, वह भी साफ परात में, हैसियत के अनुसार परात चांदी या पीतल की हो सकती है, पर सोने की नहीं। सोने की परात में पैर नहीं धोया जाता।
नाश्ते के बाद पंडिताइन ने पूछा...कृकृ
‘क्यों पंडित जी मुलाकात हो गई नेहरु जी से, कैसे हैं? अंग्रेजों की तरह या गान्धी की तरह लंगोटी वाले या राजा महाराजा की तरह शेरवानी वाले।’
‘बहुत अच्छे आदमी हैं, वे पूछने लगे...स्वतंत्राता दिवस के दिन तुम दिल्ली नहीं आये? कहां चले गये थे।’
रामदयाल ने अपना कद बचाने के लिए पत्नी से पहली बार झूठ बोला, उन्हें दूसरी बार भी झूठ बोलना था। दूसरी बार का झूठ स्वतंत्राता के बाद का झूठ था, पहला झूठ तो गुलाम आदमी का था, पर दूसरा झूठ स्वतंत्रा आदमी का था। एक ऐसे आदमी का जिसकी जमीन, आकाश, हवा, पानी सारा कुछ अपना था, मजे की बात यह कि दिमाग भी अपना था, दूसरी बार का झूठ राजनीतिक रसायन में से पक कर निकला था, जिस पर उनकी पत्नी ने भी अफसोस किया था। रामदयाल ने पत्नी को बताया कि नेहरु जी ने उन्हें देखते ही गले लगा लिया।कृमुख्यमंत्राी वगैरह सभी भौचक थे, फिर पूछा...
‘मंत्रिमंडल में कौन सा विभाग मिला है तुम्हें?’
‘मैं विधायक नहीं हूं सर।’
अचरजा गये नेहरू जी... ‘क्यातुम विधायक नही हों, तुम्हें टिकट नहीं मिला?’ पूछ कर नेहरू जी मुख्यमंत्राी की तरफ देखने लगे, मानो उनकी आंखें मुख्यमंत्राी को भस्म कर देंगी, मुख्यमंत्राी तो पसीने में डूब गये।
‘मैंने ही टिकट नहीं लिया सर, मैं तो पारटी वर्कर हूं पारटी का काम देख रहा हूं, यही काफी है सर।’
मेरा उत्तर सुनकर नेहरु जी ने मुख्यमंत्राी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को निर्देशित किया कि ‘इसे किसी भी तरह विधान परिषद में ले आओ।’
इस दूसरे झूठ का जादुई प्रभाव केवल रामदयाल की पत्नी पर ही नहीं, सभी पर पड़ा। प्रभाव तो पड़ता ही, क्योंकि जिले स्तर पर रामदयाल अपने आप में, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा ही नहीं, नमक आन्दोलन भी थे। यदि वे न होते तो शायद जिला उदास खामोशी पी रहा होता और अंग्रेजों के बूट हर तरफ खट, खट कर रहे होते। उनके जीवन में एक झूठ ऐसा भी था, जो था पूरी तरह सच पर उसके बारे में उनकी पत्नी तक नहीं जानतीं, सिवाय रणविजय के, न ही उस झूठ की चर्चा उन्होंने कभी किसी से किया क्योंकि उस झूठ का जो सच था कांग्रेस पारटी के लिए कोई मतलब नहीं था। भारत में तिंरगा फहराया जाने वाला था और पाकिस्तान में चांद। उस झूठ का सच था कि रामदयाल नोआखली में गांधी जी के साथ थे, रणविजय भी उनके साथ थे। नोआखली में गांधी जी के साथ वालों में कुछ थोड़े से लोग थे, जिनके चेहरों पर कांग्रेस पारटी का लक्ष्य और स्थिति दोनों दीखती थी, सबसे मजेदार यह था कि सभी लोग राजनीतिक ताप से तपे हुए सुखों से स्वअर्जित निर्वासन में थे। सभी के दिलों में गांधी की लंगोटी और छड़ी का राज था। किसी के मन में यह सवाल नहीं था कि दिल्ली में क्या हो रहा होगा, नेहरु जी ने राष्ट्रीय ध्वज किस तरह से फहराया होगा, उन्होंने उस समय क्या पहनना था? उस कपड़े का रंग क्या था, शाही बग्गी से सभा स्थल पहुंचे या किसी विदेशी कार से।
प्रथम स्वतंत्राता दिवस का अभिनव महोत्सव नोआखली के हिंसा से काफी दूर था। गांधी जी की राजनीतिक उपलब्धि दिल्ली में रह गई थी और उनका महात्मा शरीर लाषों के बीच, नोआखली में। गांधी जी वहां अशरीरी बन गये थ यानि विदेह, किसी बात का भय नहीं, उनका ‘अभय’ रूप देखते बनता, कहीं से गोली आ सकती है, कोई खुंखरी भोंक सकता है और उन्हें को लाश में बदल सकता है।
रामदयाल का मन गांधी जी के महात्मा और दार्शनिकता में उलझा हुआ था, वे गांधी जी के साथ चलते, आगे बढ़ते पर फंसे जाते कि गांधी जी महात्मा हैं या दार्शनिक। रणविजय सीधी सोच में थे, जिसमें किसी वक्रता के लिए स्थान नहीं था। गांधी जी योद्धा हैं, भय जीतने वाले उन्होंने रामदयाल को सुझाया...
‘योद्धा न होते तो वे दिल्ली में होते, देश को स्वतंत्राता दिलाने के एवज में मालायें पहन रहे होते, हाथ उठाकर सभी का अभिवादन स्वीकार कर रहे होते। किसी कल्पित देवता की मुद्रा धारण कर सभी को आषीर्वाद दे रहे होते पर ऐसा कुछ भी नहीं, गांधी जी तो नोआखली में हैं इस जोश के साथ...
‘या तो मेरी हत्या करो या यह दंगा बन्द करो।’
गांधी जी का नोआखली में होना ही प्रमाणित करता था कि देश का बंटवारा अपरिहार्य नहीं था। देश बंट जाने के बाद यह दंगा भी कोई हल नहीं निकाल सकता और न ही यह किसी गहरे असन्तोश या दुख की अभिव्यक्ति ही हो सकता है, दंगा सिर्फ दंगा होता है जो दहशत और खूनखराबा पर टिका होता है।
रामदयाल ही नहीं रणविजय ने भी नोआखली की यात्रा को झूठ में बदल दिया था। उन लोगों ने अपने नजदीकियों तक को नहीं बताया था कि वे लोग गांधी जी के साथ थे, शायद सबसे महत्वपूर्ण मामले नोआखली के अलावा और भी थे, फिर कांग्रेस पारटी के सत्तारूढ़ हो जाने के बाद गांधी जी के सहारे किसी विशेष लक्ष्य को हासिल भी तो नहीं किया जा सकता था सो नोआखली यात्रा की चर्चा करना बुद्धिमता नहीं थी, अपने लोग दहशत में होते, खास तौर से रामदयाल की पत्नी, उधर रणविजय के भइया हुजूर। फिर यह भी था कि ये लोग बहाना बना कर घर से बाहर निकले थे कि दिल्ली जाना है।
बहरहाल समय काफी पीछे जा चुका है जिसका कोई खास मतलब नहीं, भइया तो कांग्रेसी बन कर सत्ता सुख बहाल रखना चाहते हैं और उन्होंने ऐसा कर भी लिया है जैसा कि भइया का आदमी बता ही रहा था। रणविजय का क्या होगा? श्शीघ्रही वे दिल्ली जायेंगे, लेकिन कम से कम एक सप्ताह बाद।
इस बीच वे कचहरी जाकर मालूम करेंगे कि भइयाराजाने किया क्या?
रामदयाल किसिम किसिम के मन्सौदों को बनाते बिगाड़ते इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पहले रणविजय व भइया हुजूर के हिस्सों के कानूनी स्थितियों को सही ढंग से जान तो लिया जाये...कृ
महाराजा के आदमी के वापस होने के दूसरे दिन रामदयाल जिला कचहरी में थे। ‘इस्टेट’ की संपदा का कागजी मुआयना करते, दूसरे दिन रामदयाल तहसील व कलक्टरी से इस्टेट की परिसंपत्तियों की पक्की नकलें निकलवा सकंे। इस सन्दर्भ में रामदयाल को जिला कलक्टर से भी मिलना पड़ा।
जिला कलक्टर रामदयाल के राजनीतिक आभा मंडल से परिचित था। कलक्टर अचरज में था कि रामदयाल महाराजा की संपत्तियों के बारे में जानकारी क्यों कर रहे हैं। उसे सन्देह ने जकड़ लिया जरूर कहीं गड़बड़ है? कहीं रामदयाल अपनी जांच को सरकार के पास तो न भेजेंगे?
कलक्टर ने ससन्देह रामदयाल से पूछा...कृकृ
‘इस्टेट की परिसंपत्तियों की निकलें किस लिए ले रहे हैं?’
रामदयाल ने नकल लेने का असल कारण कलक्टर को बताया फिर तो कलक्टर हंसने लगा और अपनी बात पर अड़ गया।
‘रणविजय जी तो महाराजा के सगे भाई नहीं!’
चकरा गये थे रामदयाल ‘मैं कुछ समझा नहीं, हां हां, शायद!
इतना बोल कर कलक्टर रुक गया, बड़ों की बातें थीं, उनकी बातें भी बड़ी होती हैं। पता नहीं वह जो जानता है या जिसे महाराजा ने बताया है, वह कितना प्रभाव और कैसा प्रभाव डाले, पर रामदयाल के कान और दिमाग दोनों कलक्टर की तरफ ही थे, भइयाराजाने बिना कलक्टर के संज्ञान के घपला तो न किया होगा। वह जानता ही होगा सचाई। उन्होंने कलक्टर को प्रेरित किया..कृ
अरे बोलिए तो! कैसा वे?
कलक्टर ने फिर बताया कि रणविजय तो शायद दूसरी मां के हैं, पहली के तो महाराजा ही हैं, शायद वह विवाहित भी नहीं थीं। केप्ट थीं महाराजा के पिता की।कृ
अब रामदयाल का दिमाग अपने कान के भीतर था जहां कलक्टर का कहा हुआ सारा कुछ अपने मूल रूप में था, एक दूसरे से लड़ता-झगड़ता, एक दूसरे को धकियाता गरियाता।कृ
कौन असल, कौन नकल, कौन विवाहित, कौन अविवाहित क्या कह रहा है कलक्टर?
रामदयाल तो एकदम से खामोश हो गये।कृकलक्टर का बताना उनकी जानकारी में न था। वे दोनों औरतों को अम्मा हुजूर ही संबोधित किया करते थे, वे ही नहीं भइयाराजाव रणविजय भी अम्मा रानी ही पुकारा करते थे, यह बात अलग थी कि बड़ी अम्मा रानी छोटी अम्मा रानी से उम्र में काफी बड़ी दिखती थीं, उतनी ही बड़ी जितनी कि भइया हुजूर रणविजय से जान पड़ते हैं। महल की दीवारें भी जानती हैं कि रणविजय भइयाराजाके भाई हैंकृफिर यह कलक्टर क्या कह रहा है?
रामदयाल ने खुद को कलक्टर की बात से दूसरी तरफ मोड़ा-‘मुझे नकलें कब तक मिल सकेंगी उन्होंने पूछा...कृ
‘कल शाम तक तो अवश्य मिल जाएगी, कलक्टर ने संक्षिप्त उत्तर दिया। रामदयाल के खामोश हो जाने से कलक्टर भी सन्देहों से घिर गया जाने क्या सच हो फिर उससे क्या मतलब? दोनों भाई आपस में निपटें, उसको यहां रहना तो है नहीं।
दो दिन बाद रामदयाल को सारी नकलें मिल गईं, नकलें स्पष्ट थीं जितना कि भइयाराजाका घपला स्पष्ट था। उन्हें भइयाराजाके चेहरे पर षडयंत्रा और कूट चाल की रेखायें दिखीं, फिर उन्हें ख्याल आया राजा बनाये जाने का किस्सा जिसे उनके पिताजी बताया करते थे। पिता जी ने तो यह भी बताया था कि उक्त अंग्रेज हाकिम यदि सहमत न होता तो भइयाराजाजौनपुर के शर्की वाले नबाबों के शरणागत हो जाते। भइयाराजाने निश्चित कर लिया था कि उन्हें हर हाल में राजा बनना है, चाहे अंग्रेज बनाये या मुगल, राजा बनने के लिए यदि उन्हें मुसलमान भी बनना होता तो भी वे बन जाते। क्या रखा है धर्म में? राजा तो राजा, वह न मुगल होता है और न अंग्रेज सिर्फ राजा होता है बिना जाति और धर्म वाला एक शासक।
‘धर्म का सहारा मूर्ख लिया करते हैं और उसी में जीवन की सारी क्रियाओं को व्यवस्थित करते हैं, धर्म का प्रभाव जो साफ तौर से दीखता है वह केवल शोषितों में दीखता है, वही प्रभाव राजाओं के पास फटकता तक नहीं। अकबर और राणा प्रताप में धर्म कहां है? वे राजा थे और राजा बने रह सकने के लिये युद्धरत थे।’
रामदयाल घर की तरफ वापस हो रहे थे, पर घर उनसे काफी दूर भागा जा रहा था। घर, परिवार, नाते रिष्तेदार क्या सभी अपने में डूबे हुए होते हैं, आखिर ऐसा क्यों किया भइयाराजाने? रणविजय ने तो कभी अपना हक हकूक मांगा नहीं था, न ही वे कभी मांगते, फिर ऐसी कौन सी दिक्कत थी जो उन्होंने यह सब किया। रामदयाल अपने में डूब गये, ये साली जगह-जमीन किसी को भी भ्रष्ट बना सकती है। संपत्ति का मामला व्यक्तित्व के शुचिता के सवाल को काफी उलझा हुआ और विवादास्पद ही बनाती है।
घर आने पर रामदयाल को मालूम हुआ कि भइयाराजामहल पर आ गये हैं, उनके साथ प्रदेश का एक मंत्राी भी आया हुआ है। रामदयाल ने भइयाराजासे मिलने का कार्यक्रम बाद के लिए निश्चित किया और अपने घरेलू काम में लग गये।
घरेलू कामों में संलिप्त हो जाना, रामदयाल के लिए रणविजय की समस्याओं से विस्थापन का माध्यम न बन सका। भइयाराजाका सारा कारनामा उन्होंने अपनी पत्नी से बताया ताकि उन्हें कुछ राहत मिल सके फिर भी वे परेशान परेशान थे, उनके सामने रणविजय का मासूम चेहरा आ खड़ा होता...क्या होगा बेचारे का जितना रामदयाल परेशान होते, उतना ही भावुक हो जाते, भावुक होने के बाद वे रास्ते जो रणविजय को राहत दे सकते थे बुरे लगने लगते। विवश हो कर रामदयाल को स्वीकार करना ही पड़ा कि वे किसी भी स्थिति में रणविजय के साथ अन्याय नहीं होने देंगे आखिरकार यही तो सिखाया है कांग्रेस पारटी ने कि अन्याय का विरोध करो, अन्याय करने वाले चाहे अंग्रेज हो या अपने ही लोग। एकबारगी रामदयाल के हाथों की भाषा बदल गईं, वे उठ गये, मुठ्ठियां बन्द हो गईं, फिर वे सावधान हुए...
‘नहीं, नहीं ऐसा नहीं, हमारा रास्ता खून बहाना नहीं, पर सिर झुकाना भी तो नहीं।
आधा भारतीय
रणविजय दिल्ली लौट आये थे पर अब दिल्ली उन्हें ठीक-ठाक नहीं लग रही थी। कांग्रेसी सरकार, सरकार के जाने व माने जाने के विभ्रमों से मुक्त थी। देश का पहला आम चुनाव सम्पन्न हो चुका था। कांग्रेस पारटी के प्रमुख विरोधी चुनावी युद्ध का पराजय स्वीकार कर राजनीति की खोलों में समा चुके थे। गोया राजनीति का असल काम हो चुका था। इसी दिल्ली में रणविजय थे, इसी दिल्ली में वह लोकसभा थी जहां चुने हुए सांसद बैठते थे और कानूनों के अमल आदि पर बहसें किया करते थे, पर रणविजय को इसका आभास तक न होता था। अगर वे अखबार पढने के आदी न होते तो उन्हें यह भी मालूम न होता कि कब और कैसे भारत का संविधान लिख गया।
अब वे समझने लगे थे कि राजनीति एक गंभीर कार्यवाई है, केवल हड़ताल, आन्दोलन, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा वगैरह ही नहीं। पढ़ाई के दिनों में अपने मित्रा छात्रों से वे बहस किया करते थे कि, भारत का संविधान राष्ट्रपति प्रणाली के अगल-बगल का होना चाहिए, लेकिन ऐसा न हुआ, संविधान प्रधानमंत्राी के आगे-पीछे का बना और राष्ट्रपति को प्रतीकात्मक सत्ता मिली। इतना अवश्य हुआ कि इंग्लैण्ड की तरह अब यहां कोई राजा, रानी या महाराजा, महारानी नहीं।कृ
वैसे भी रणविजय अपने आप में डूबे हुए उन विकल्पों की तलाश कर रहे थे, जो उन्हें इस लायक बनाते कि वे अपनी ज़िन्दगी गुजार लेते। यह तो उन्होंने निश्चित ही कर लिया था कि अब वे रियासत की तरफ कभी नहीं लौंटेगे। एकदम साफ-साफ तो नहीं पर कुछ-कुछ बहुत पहले से ही उन्हें आभास होने लगा था कि भइयाराजाकी नियति में अपना हित बहुत तेजी से प्रभावी होता जा रहा है।
तब बड़ी अम्मा रानी जीवित थीं। बड़ी अम्मा रानी ने ही उन्हें बताया था कि जब वे दो साल के थे तभी उनकी अम्मा रानी का स्वर्गवास हो चुका था तथा उसके साल भर बाद ही पिताजी महाराज भी जीवित नहीं रहे। उस समय भइयाराजाकी शादी नहीं हुई थी। वे बीस साल के आस-पास के थे। पिता जी महाराज के बाद बड़ी अम्मा रानी ही जागीरदारी का काम-धाम देखा करती थीं। भइयाराजाराजा बनने के पहले से ही अम्मा रानी के मन की टोह लिया करते थे, क्यों रणविजय का क्या होगा?
बड़ी अम्मा रानी उन्हें डांटा करती थी...कृकृ
‘चुप कर, कुछ तो शर्म कर, आखिर वह भी तुम्हारे पिता महाराज का ही लडका है।’
स्वतंत्राता मिलने के पहले ही बड़ी अम्मा रानी परिवार छोड़ र्गइं, इधर स्वतंत्राता मिली, उधर भइयाराजाइस्टेट की संपदा बचाने में लग गये, इस दौरान कई ऐसे मौके आये जब रणविजय ने महसूसा कि भइया एक भी समय में अपनी दोनों आंखों का इस्तेमाल अलग-अलग लक्ष्यों के लिए कर सकते हैं। एक बार ऐसा मौका आया था कि रणविजय ऊंची शिक्षा के लिए इंग्लैंड जा सकते थे। अंग्रेज हाकिम ने भी सुझाया था तथा वह भइयाराजासे विदेश जाने के बाबत सम्पर्क करना भी चाहता था पर उसे रणविजय ने रोक दिया था। फिर अंग्रेज हाकिम ने अपनी लड़की को ही अकेली भेज दिया था विदेश। भइयाराजाने रणविजय को भारत में होने की अनिवार्यता बता कर विदेश जाने से रोक दिया था ‘क्या होगा वहां जाकर कोई नौकरी तो करनी नहीं।’
उस समय रणविजय के लिए बहुत मुश्किल था भइयाराजाकी पक्षपातपूर्ण नियति को समझ पाना। वे भइयाराजाकी सलाह में अपना हित देख व मान कर चुप हो गये थे। लेकिन अब तो सारी बातें स्पष्ट होती जा रही थीं, उन्हें इस तरह का अनुमान नहीं था कि भइया उन्हें महल व इस्टेट से निर्वासित कर देंगे, महल से निर्वासित होने के बाद रणविजय बीते समय में जा चुके थे। पीछे का अच्छा-बुरा सामने था जिसे वे समीक्षित कर रहे थे। उन्हें बड़ी अम्मा रानी का ध्यान आया, वास्तव में वे एक ‘देवी’ थीं। तीन चार दिनों के बाद ही वे सामान्य हो पाये, वैसे अंग्रेज हाकिम उन्हें बार-बार समझाता रहा कि चाहो तो नौकरी कर लो अभी उसकी पकड़ प्रशासन पर कम नहीं है।
पर रणविजय को तो नौकरी करना ही नहीं था, वे चाहते तो अंग्रेज हाकिम के साथ ही काम करना शुरू कर देते। उसका काम हालांकि रुपया बनाने वाला काम नहीं था, पर था सम्मान वाला। अंग्रेज हाकिम उस समय गीता और रामचरित मानस का अंग्रेजी अनुवाद कर रहा था। उसे प्रशासनिक सेवा में होने के कारण उसे इतना पेंशन मिल जाता था कि उसका समय हंसते हुए गुजर सकता था। उसने इंग्लैण्ड की अपनी संपदा को भाइयों में आवंटित कर दिया था तथा पूरी तरह भारतीय बन जाने का संकल्प लेकर भारत में रुक गया था। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि वह साल भर के लिए काशी प्रवास करे तथा खजुराहो दुबारा जाये, फिर वहां काले पत्थरों पर उकेरी गई काली प्रतिमाओं से खुला संवाद करे। पहली बार जब वह खजुराहो गया था, तब उसे ऐसा कुछ महसूस हुआ था कि पत्थरों की मूर्तियों के मूक संवादों की मानसिक भाषा होती है, जिसकी कोई लिपि नहीं होती। वह भाषा चाक्षुस-संवेदना की अभिव्यक्ति होती है। अब उसे लगता है कि खजुराहो जाना चाहिये, खजुराहो को देखना भारतीय अतीत का खुला साक्षात्कार होगा।
अंग्रेज हाकिम ने, हालांकि प्रशासनिक सेवा और इंग्लैण्ड दोनों छोड़ दिया था, फिर भी वह आर्थिक रूप से औसत से अधिक मजबूत था। वह दुनिया के चर्चित अखबारों में आर्टिकल लिखता, आर्टिकिल्स के विषय मुख्यतया राजनीतिक होते, जिसका सन्दर्भ भारतीय होता। अखबारों में लेख लिखना उस समय भी रुपया कमाने का सन्तोषजनक आधार नहीं था फिर भी काम चलाऊ तो था ही। प्रशासनिक सेवा के दौरान ही उसने मन बनाया था कि वह अपने भारतीय अनुभवों पर कोई किताब लिखेगा, पर ऐसा नहीं कर पाया। एक बार तो उसने प्रयास भी किया था, उसने भारतीय उदारता और सहनशीलता को अपने लेखन का आधार बनाया, तभी उसे झटका लगा कि भारतीय समाज तो अपनी सारी इच्छाओं, आकांक्षाओं की पूर्ति की कामना किसी दैवीयता की जादुई ताकत से हासिल करना चाहता है, युद्ध और विवाह, जन्म और मृत्यु, हानि और लाभ सारा कुछ दैवीय। वह उलझ गया कि फिर ऐसी मनःस्थिति में मनुष्य कहां है? उसके हस्तक्षेप क्या हैं? फिर तो वह किताब प्रारंभ ही नहीं कर सका।
प्रशासनिक सेवा के दौरान डायरी लिखना अंग्रेज हाकिम ने अपनी आदत बना लिया था। वह डायरी अंग्रेजी की काव्यमय भाषा में लिखता, मानो कोई कविता लिख रहा हो। उस दौर के सत्याग्रहियों, जेल यात्रियों को वह गंभीरता से देखता फिर अर्थ निकालता कहीं ये लोग भेड़ें तो नहीं, क्योंकि गांधी, नेहरु जैसे लोग कहीं होते, आन्दोलन प्रदर्शन कहीं होता, क्या ऐसी भी शिक्षा हो सकती है, या जागरुकता कि बिना किसी नेतृत्व के भी आन्दोलन हो, ऐसी अद्भुत स्वस्फूर्तता फिर उसे लेनिन ख्याल आते कि स्वस्फूर्तता यदि नियंत्रित व निर्देशित नहीं है, फिर तो किसी भी क्षण वह अराजक हो सकती है।
फिर तो अंग्रेज हाकिम किसी चिन्तक की तरह गंभीर हो जाता तथा गांधी जी की दूरदर्शिता से प्रभावित हो जाता ‘तभी गांधी जी ने स्वतंत्राता आंदोलन पर हिंसा का प्रतिबन्ध लगाया हुआ था। अगर स्वतंत्राता आन्दोलन में हिंसा की धारा चल रही होती, फिर तो बहुभाषी, बहु सांस्कृतिक, बहु धार्मिक भारत में आंदोलन का स्वरूप बहुत ही भयानक व आक्रामक होता।’
फुर्सत के समय अंग्रेज हाकिम अपनी डायरी उलटता-पुलटता। डायरी में दर्ज उन राजनीतिक कार्यवाईयों के अपवादों को देखता, जो आम तौर से ऐसे लोगों द्वारा किये जा रहे होते जो राजनीति से कोसों दूर होते, उसने एक दो बार सत्याग्रहियों से व्यक्तिगत रूप से पूछा भी था, कुछ सवाल उसने रट लिए थे जिसे वह रुक रुक कर सत्याग्रहियों की बोली में पूछ सकता था...कृ
‘आप लोग सड़क पर काहे लेटे हो?’
‘आज़ादीलेकर ही रहेंगे, का नारा क्यों लगा रहे हो?’
‘क्या तुम्हारे पास करने के लिए दूसरे काम नहीं?’
अंग्रेज हाकिम सत्याग्रहियों के उत्तर सुन कर उनके मुंह ताकता रह जाता। सत्याग्रही जोश और उत्साह से भरे होते, उनके चेहरे से जेल जाने की यातना गायब होती। वहां देश के लिए काम करने की उमंग होती, पर वे सत्याग्रह का मतलब सिर्फ रटा-रटाया बताते कि यह सब जो वे कर रहे हैं, देश की आज़ादीके लिए कर रहे हैं।देश के बारे में उनकी जानकारी सिर्फ इतनी होती कि एक किनारे हिमालय है तो दूसरे किनारे समुद्र, इससे अधिक कुछ नहीं। फिर वे अपनी रियासत के बारे में बताने लगते। सत्याग्रहियों को भारत के तीर्थस्थानों की जानकारी अधिक होती, वे उनके बारे में खूब-खूब बताते।
‘आज़ादीका मतलब क्या होता है? पूछने पर वे बताते कि यहां से गोरी चमड़ी वाले चले जायें, वे हमारे राजा नहीं, फिर वे हमारे देश में क्यों है?’
‘गुलामी के बारे में भी वे कुछ न बताते, पर इतना बताते कि हम आजाद हो जायेंगे तो हमारी जमीन होगी, हमें लगान न देना पड़ेगा, हमारे बच्चे स्कूलों में पढ़ेगे, हमें रोजगार मिलेगा, हमारे देश का रुपया बाहर नहीं जायेगा, हमसे बिना पारिश्रमिक कोई काम न कराएगा, बेगार से हमें मुक्ति मिलेगी।’
अंग्रेज हाकिम सत्याग्रहियों के कल्पित राजनीतिक चाहनाओं के बारे में विचार करने लगता, क्या ऐसा संभव हो सकता है? ब्रिटिशियर्स तो एक न एक दिन यहां से चले ही जाएंगे, ब्रिटिष्श साम्राज्यवाद का अन्त प्रारंभ हो चुका है, पर क्या जब भारतीय सत्तारुढ़ हो जायेंगे, वे कुछ कर पायेंगे इन सत्याग्रहियों के लिए। वह कांग्रेस पारटी के उन अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों से मिलता जो अच्छे घरानों से होते फिर तो अंग्रेज हाकिम को निराश होना पड़ता क्योंकि अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग अंग्रेजियत में रंगे होते तथा मूल्यांकन कर रहे होते कि कांग्रेस पारटी का भविष्य क्या है? १९४२ के बाद तो साफ-साफ दीखने लगा कि अंग्रेजों को जाना है, ऐसी स्थिति में जो कभी अंग्रेजों के आगे-पीछे परछाई की तरह होते, वे कांग्रेस पारटी में शामिल होने लगे थे। अंग्रेज हाकिम बुद्धिजीवियों एवं संभ्रान्तों के इस तात्कालिक बदलाव को अपनी डायरी में नोट करता...कृकृ
‘सत्ता सुख से बड़ा कोई सुख नहीं सुविधा-भोगियों का सूत्रा वाक्य।’
अंग्रेज हाकिम अब बदले हुए भारत में था, एक ऐसे भारत में जो भारतीयों का था, जिनकी अपनी सरकार थी, जिनका अपना दिल-दिमाग था, हाथ पैर और मुंह भी। गुलामी के दौर में तो सारा कुछ बन्धा हुआ गिरफ्तार जैसा था। अंग्रेज हाकिम रणविजय व अपनी पुत्राी के लिए परेशान नहीं था, उसे यकीन था कि दोनों मिलकर विपरीत परिस्थितियों को संतुलित कर लेंगे। वे जीवन जीने की समझ रखते हैं तथा अपने व्यक्तित्व निर्माण के लिए पूरी क्षमता के साथ तत्पर भी हैं। बावजूद इसके अंग्रेज हाकिम परेशान था, उसकी दासी पत्नी बीमार रहने लगी थी। सो जीवन से निराश भी। उसे एक ही बात सूझती, देवी देवताओं के दर्शन, तीर्थयात्रा और गंगा स्नान। अंग्रेज हाकिम जानता था कि भले ही उसकी पत्नी उसके साथ है पर उसके संस्कार पूरी तरह हिन्दू औरतों वाले बचे हुए हैं। वैसे वह भी ऐसी इच्छा नहीं रखता कि उसकी पत्नी धर्म के पाखंडों से बाहर निकले, यदि उसे उसमें मानसिक शान्ति हासिल होती है तो वह चाहे जैसा करे। घर के एक कोने में उसकी पत्नी ने लकड़ी का छोटा सा शिवालय बनाया हुआ है, उसमें किसी देवी की प्रतिमा स्थापित थी।
लिली की मां के रूप में पत्नी को पुकारना अंग्रेज हाकिम को भला लगता था। इसमें उसे दोहरा सुख मिलता था, इसी बहाने वह लिली को भी पुकार लेता था। पत्नी सुबह उठती, स्नान करती, बाहर लान में से फूल चुनती, फिर लकड़ी के ष्शिवालय के पास जाकर जमीन पर बैठ जाती, फूल चढ़ाती और कुछ बुदबुदाती। अंग्रेज हाकिम इस दृश्य की तुलना चर्च में किये जाने वाले प्रार्थनामय दृश्यों से करता, जहां सारा कुछ बिना किसी अतिरिक्त क्रिया के संचालित किया जाता है। जब कि उसकी पत्नी कम से कम आधा घंटा तक शिवालय के पास बैठती उसकी आंखें बन्द होतीं, होठों से बुदबुदाहटें निकलतीं अन्त में वह घुटनों के बल होकर अपनी देह किसी गठरी की तरह बनाती और माथा शिवालय के चौखट पर टेक देती। ऐसा करना नमाज वाली क्रिया से थोड़ा भिन्न होता, पर होता कुछ उसी तरह ही। अंग्रेज हाकिम हिन्दू, इस्लाम और ईसाई धर्मों के धर्माचरण वाले कर्मकांडों में उलझ जाता, फिर उसे समझ में नहीं आता कि यह जो आस्था का मामला है, आखिर है क्या? उसकी मां भी तो चर्च जाया करती थी, रविवार के दिन चाहे कितने ही दूसरे जरूरी काम हो, पर उसकी ममा घर नहीं रुका करती थी, उसके संकोची डैड को फटकारा करती थी कि चर्च नहीं जा रहे?
अंग्रेज हाकिम का परिवार आस्थावादी परिवार था तथा एक ऐसे ईश्वर की कल्पना किया करता था, जो सभी के दुखों, पापों का निवारण करने में समर्थ था। मां अक्सर उसे समझाती ‘प्रभु यीशु’ ही सभी पापों के लिए क्षमा दान दे सकता है।’ बचपन में वह भी समझता था कि वह पापी है, सारी दुनिया पापी है, यह तो बाद में उसे स्पष्ट होने लगा कि कल्पित पाप का स्वीकार उसे कुंठित बना कर जीवन जीने के प्रति निराश बना देगा, लेकिन पहले तो जैसे उसकी ममा समझाया करती थी, वैसा ही वह समझा करता था। ज्यों ज्यों वह मानसिक रूप से मजबूत होता गया, त्यों त्यों वह आस्थावाद को गंभीरता से विश्लेषित करने लगा। उसके कारण भी थे। जब वह पांच साल का था तथा एक बोर्डिंग स्कूल में प्रारंभिक षिक्षा ले रहा था, ठीक उसी समय उसकी ममा ने उसके डैड के एक मित्रा के साथ अपना घर बसा लिया। डैड का मित्रा एक धनी आदमी था तथा धार्मिक अनुष्ठानों का प्रबल समर्थक था, वह भी ममा की तरह हर रविवार चर्च जाता तथा चर्च के पादरियों के साथ समय गुजार कर प्रदर्शित करता कि वह प्रभु यीशु का परम विश्वासपात्रा है। वह अक्सर उसकी ममा के साथ घर आता तथा काफी समय तक ‘न्यू टेस्टामेन्ट’ के बाबत बातें करता। उसके डैड का विश्वास ममा पर तमाम सन्देहों से मुक्त था, सो वे आश्वस्त रहते कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला जो उसकी ममा और उनको एक दूसरे से अलग कर दे फिर किसी कानूनी कार्यवाही को संपादित कर तलाक लेने की आवश्यकता पड़े। पर हुआ ऐसा ही, लेकिन इसके पहले डैड ने ममा को काफी समझाया और अंग्रेज हाकिम को आधार बनाया..कृ
‘हम अपने लड़के को एक दूसरे से अलग कर मानसिक रोगी बना देंगे’
अंग्रेज हाकिम अपने डैड से अक्सर ममा के बारे में पूछा करता, उसके डैड ममा के बारे में बहाना बनाने वाली कोई झूठी कहानी रच देते, फिर वह बचपना में खो जाता। लम्बे समय बाद उसे असलियत मालूम हुई कि उसकी ममा किसी दूसरे के साथ रहती है तथा दो बच्चों की मां है। अब उसकी ममा किसी दूसरे शहर में रहती है। बाद में अंग्रेज हाकिम विचारने लगा था कि आस्थावादी उसकी ममा आखिर किस पाप की क्षमा याचना प्रभु यीशु से कर रही थी? उस पहले पाप की, जिसे उन्होंने उसके डैड से अर्जित किया था या उस पाप की, जो वे उसके डैड के मित्रा के साथ आयोजित करने वाली थीं तथा आयोजित कर भी चुकी थीं?
ममा के आस्थावादी व्यवहार ने अंग्रेज हाकिम को खंडित कर दिया था। शायद वह खंडित नहीं भी होता यदि उसके परिवार की ऐसी परिस्थितियां होती जो तलाक के दायरों को पूरा करतीं, फिर तो उसके ममा का तलाक लेना एक आवश्यक कार्य हो जाता तथा वह डैड की कमियों के बारे में गंभीर होता पर ऐसा था नहीं। उसके डैड तो सद्भाव और प्रेम के अतिरिक्त उर्जा वाले साधारण आदमी थे। सामान्य जीवन धारा में चलना उनकी आदत थी।
भारत आने के बाद अंग्रेज हाकिम ने अपनी मानसिक गतिविधियों को काफी रूपान्तरित कर लिया था। खास तौर से पारिवारिक संबंधों के बारे में। वह जहां जाता, भारतीय औरतों के निश्छल समर्पण को देख कर अविभूत हो उठता। भारतीय अधिकारियों की पत्नियों से भी उसका मिलना-जुलना होता था, वह उनमें एक पवित्रा रिष्श्ता पाता, जो आरोपित जैसा जान न पड़ता, औरतें अपने पतियों की तरफ भावनात्मक ही नहीं, मन की सभी स्थितियों के साथ प्रभावित दीखतीं, जब कि वे किसी प्रेम के कारण विवाहित न होतीं, उनकी शादियां ऐसे पुरुषों से हुई रहतीं जो एक दूसरे को शादी के पहले जानती तक नहीं थीं।
ऐसा नहीं था कि अंग्रेज हाकिम भारतीय औरतों के काले पक्षों के बारे में विचार नहीं करता था, औरतों की पुरुष निर्भरता से उसे घिन थी, उसका मानना था कि औरतों का भी पति के अलावा सामाजिक हस्तक्षेप के मामलों में पर्याप्त दखल होना चाहिए। लेकिन वह अंग्रेजी खुलेपन को भी ठीक नहीं मानता था। जिसे उसने बालिग होने से लेकर भारत आने के पहले तक अपने देश में देखा था। उसे अपने देश का विवाहेत्तर संबंध उतना ही खटकता था जितना कि किसी भारतीय को खटकता है। इस मामले में वह भारतीय मानस का प्रतिनिधित्व करता था, यही कारण था कि उसने निश्चित कर लिया था कि वह विवाह ही नहीं करेगा या करेगा तो किसी भारतीय औरत से ही, जो आधुनिकता की हवाओं में बहने वाली न हो।
अंग्रेज हाकिम अपने विवाह के योग्य औरत के चुनाव से काफी खुश था। वह घर आता, पत्नी उसका इन्तजार करती मिलती। वह पत्नी की सतर्क निगरानी से प्रसन्न होता, क्योंकि वह उसका सोना, खाना, जागना सारा कुछ देखती रहती। क्या खाना है, कब सोना है, इसका निर्णय करना उसकी आदत थी। इसके अलावा अंग्रेज हाकिम ने महसूस किया कि उसकी पत्नी देह की थकान दूर करने की कलाकार है। वह आरामदायक मालिश करती तथा घर के सारे कामों को बहुत ही सावधानी से निपटाती। भारतीय औरतों के ऐसे व्यवहारों से अंग्रेज हाकिम पहले कत्तई वाकिफ न था, सो उसे यह सब आश्चर्य जैसा जान पड़ता। वह कभी कभी भारतीय शास्त्रों की सूक्तियों में उलझ जाता फिर सोचने लगता कि क्या ऐसी औरतों को ही ‘लक्ष्मी’ कहा गया है। ऐसी स्थितियों में उसका अंग्रेजी मन प्रभावी हो जाता, फिर वह भारतीय औरतों के प्रति संवेदित हो जाता। कुछ भी हो भारतीय औरतों का आत्म-निर्भरता के प्रति उन्मुख न होना प्रशंसनीय नहीं है। घर का सारा काम निपटाना, पति की देखभाल करना, बच्चों की परिवरिश करना, यह सारा कुछ पुरुष के पक्ष में जाता है पर ऐसा करने में भारतीय औरतों का अपना पक्ष क्या है?
अंग्रेज हाकिम अपनी पत्नी के साथ था रणविजय की प्रतीक्षा कर रहा था कि वो डाक्टर के साथ आ रहे होंगे, उनके साथ लिली भी थी। इस दौरान कई बार उसने अपने को रोका...कृ
‘नहीं रणविजय के बारे में पत्नी को कुछ नहीं बताना, जाने उसकी कैसी प्रतिक्रिया हो, हो सकता है उसकी परेशानी काफी बढ़ जाये जो ठीक न होगा।’
रणविजय कुछ देर में डाक्टर के साथ वापस लौटे। डाक्टर ने लिली की मां का परीक्षण किया। मेडिकल जांच की सारी रिपोर्टस् आ गई थीं, डाक्टर को सन्देह था कि लिली की मां को टी. वी. हो सकती है, क्योंकि वे सामान्य से अधिक खांसती तथा उन्हें सासें लेने में भी तकलीफ होती। जब खांसती तब कफ भी आता, सामान्य रूप से वे कमजोर हो गई थीं तथा कई-कई बच्चों वाली मां की तरह बुढ़ापा धारण किये हुए पर ऐसा नहीं था वे सिर्फ लिली की मां ही बन पाई थीं।
मेडिकल जांच रिपोर्ट लिली की मां के लिए ठीक थीं तथा उन्हें टी. वी. नहीं थी। मलेरिया और मियादी बुखार के बिगड़ जाने के कारण उन्हें खांसी आने लगी थी तथा सांस की तकलीफ बढ़ गई थी, वैसे इस्नोफीलिया भी कुछ बढ़ा हुआ था। रिपोर्ट देख कर डाक्टर प्रसन्न था तथा उसे अपने ऊपर विश्वास हुआ था कि वह लिली की मां को श्श्शीघ्रही स्वस्थ कर सकता है। उसके द्वारा प्रस्तावित दवाइयां काफी ताकत वाली होंगी तथा श्श्शीघ्रही उनके स्वास्थ्य को वापस लौटा लायेंगी।
डाक्टर ने कुछ अपने पास से दवाइयां दीं तथा बाकी के लिए पुर्जा लिख दिया।
डाक्टर के जाने के बाद अंग्रेज हाकिम सामान्य हो पाया, वर्ना वह तो विचार कर रहा था कि लिली की मां की हालत ठीक नहीं, वैसे भी लिली की मां के लिए अस्पताल में भर्ती होना एक घिनाने वाला काम होता। वे तो सिर्फ यही कामना करतीं कि एक बार काशी हो लें और बाबा विश्वनाथ का दर्शन तथा गंगा स्नान कर लें। इसके अलावा वे लिली और रणविजय के बारे में चितिंत रहती कि वे कुछ ऐसा काम-धाम पकड़ लेते, जिससे उनका गुजारा हो जाता, क्योंकि उन्हें इस बात का अन्दाजा था कि रणविजय लिली के साथ अपनी इस्टेट में न रह पायेेंगे। वहां उन्हें घृणा व उपेक्षा ही मिलेगी। वे भाभी रानी और महाराज के विचारों से वाकिफ थीं कि वहां केवल कुल और गोत्रा का खेल खेला जाता है, इसके अलावा जो दूसरे किस्म के खेल महल के भीतर चलते हैं, उस पर बेहया से बेहया भी शरमा कर अपनी आंखें बन्द कर ले।
मन ही मन अंग्रेज हाकिम ने पक्का कर लिया था कि वह पत्नी के साथ काशी जाएगा तथा वहीं से एक बार फिर खजुराहों के लिए निकलेगा। एक बार उसके मन में आया कि वह रणविजय के भइया, भइयाराजासे भी मिल ले तथा रणविजय के बारे में बात करे। उसके सामने फिर तो विगत ही आ खड़ा हो गया, जैसे वह अब भी अंग्रेजों का प्रशासनिक अधिकारी हो तथा राजा बनने के निरकुंश अधिकारों का उपयोग करने वाला। उसके सामने रामदयाल के पिता का चेहरा जग-मगाया, जिनकी पैरवी पर उसने रणविजय के भाई को राजा की उपाधि दिलवाया था। तो क्या उसे भूल जायेंगे रणविजय के भइया राजा? उसने तो उन्हें राजा बनवाने के उपलक्ष्य में कुछ अतिरिक्त लिया भी नहीं था जो सदैव लिया जाता रहा है।कृ
अंग्रेज हाकिम ने अपनी भावुकता को तत्काल नियंत्रित किया तथा भारतीय राजाओं के चरित्रा में वह सब तलाशने लगा जो कभी अतीत की बातें थीं, जो कह दिया, कह दिया राजाओं की बातों में निश्छलता होती थी तथा सच्चाई भी, पर अब ऐसा नहीं। अब तो राजा सिर्फ इसका ख्याल रखता है कि वह हर हाल में राजा बना रहे इसके अलावा कुछ भी नहीं, उसे सिन्ध के राजा दाहिर का ख्याल आया जब उसे अपनी इस्टेट बचाने के लिये अपनी बहन से ही शादी करना पड़ा था, कुछ इसी तरह के ऐतिहासिक अपवाद उसके सामने एक के बाद एक नाचने लगे, फिर तो वह भूल गया कि राणा प्रताप और टीपू सुल्तान भी तो राजा ही थे, उन्होंने ऐसा तो नहीं किया जो समय को कलंकित बनाता। भारतीय राजाओं के अतीत से बाहर निकल कर अंग्रेज हाकिम वर्तमान में उतर आया तथा निश्चित किया कि वह रणविजय के भइयाराजासे नहीं मिलेगा। किसी कड़वे यथार्थ का सामना भावुकता या कल्पना से नहीं किया जा सकता।
अंग्रेज हाकिम यह भी नहीं चाहता था कि रणविजय के मामले को भविष्य के हवाले कर दिया जाय सो उसने रणविजय को अकेले में बुलाया...कृ
‘साफ साफ बताना रणविजय, इस्टेट के बारे में क्या करना है, उसने पूछा।
‘कुछ नहीं डैड!’ रणविजय ने संक्षिप्त उत्तर दियाकृ
‘क्या तुम समझ रहे हो कि क्या कह रहे हो?’ उसने पूछाकृ
‘हां तभी तो!’
‘तभी तो क्या?’
‘यही कि न मुझे इस्टेट की तरफ जाना है और नहीं वहां से कुछ लेना है।’
‘तुम अपना अधिकार छोड़ कर बहुत बड़ी गलती कर रहे हो तथा एक आदमी को और अन्याय करते रहने देने के लिये मौका दे रहे हो। क्या तुमने सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा से यही सीखा है कि खुद को उचित हस्तक्षेपों से निरस्त कर दो अंग्रेज हाकिम ने व्यंग्यात्मक लहजे में रणविजय को चेताया।’
‘ऐसा नहीं है डैड! मैं न तो भगोड़ा हूं और न ही कायर तथा अपनी जिम्मेवारियों से उदासीन भी नहीं, लेकिन मैं समझता हूं कि मैं इस योग्य नहीं कि खून के चकत्तों पर पांव रख कर आगे बढ़ूं तथा जीवित आदमी को लाश में बदलूं।’ कह कर रणविजय चुप हो गये, उन्होंने अपनी आंखें जमीन पर गड़ा दीं।
‘लेकिन अब ऐसा क्या है, अब तो भारत आजाद है, यह जमाना युद्धों वाला भी नहीं। कानूनी ढंग से भी किसी संपदा का बंटवारा संभव है। चाहे इस्टेट का मामला हो या किसी दूसरे कार्य व्यवसाय का’कृ अंग्रेज हाकिम ने जोड़ा।
‘लेकिन मुझे ऐसी संपदा चाहिये ही नहीं डैड! जिसमें धोखा, कपट, छल वगैरह की गन्ध आती हो, यह सब तो आप अच्छी तरह से जानते हैं कि इस्टेट कैसे बनते बिगड़ते हैं। भइयाराजाको तो आपने ही महाराज बनवाया था। क्या उन्हें नहीं मालूम कि लिली आपकी एकमात्रा लड़की है। मुझे किसी ऐसी संपदा में हिस्सा नहीं चाहिए, जो जन्म से पहले ही खून से लथ-पथ हो।’
रणविजय की उम्र और इस तरह की बातें, अंग्रेज हाकिम हालांकि ताल-मेल न बैठा पाया फिर भी उसने गंभीरता से स्वीकारा कि रणविजय ठीक कह रहा। आखिर उसने ही क्यों शानदार नौकरी छोड़ा? चाहता तो रिटायर होने तक करता रहता, पर उसने मन को नियंत्रित करना लिली की मां से सीख लिया था। वह खुश-खुश था कि रणविजय के पास महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करने की श्शक्ति है। उसने अपनी आंखें रणविजय पर टिका दीं, लगता है रणविजय आधा भारतीय है, नहीं तो सम्पदा हासिल करने के लिए अमर्यादित व्यवहार करना, इसने भी सीख लिया होता जो यहां सामान्य सी बात है।
आत्म हन्ता
वैसे रणविजय ने इस्टेट की संपदा में हिस्सा नहीं लेने का संकल्प तो ले लिया था पर संपदा सुख की अनुभूतियों एवं अंधकार पूर्ण भविष्य के बीच चलने वाले मनोवैज्ञानिक द्वन्द्व उन्हें आश्वस्त नहीं रहने दे रहे थे। वे लिली के साथ उसके मां बाप के आवास पर ही रह रहे थे जो उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उनकी ऐसी स्थिति भी नहीं थी कि कहीं दूसरा ठिकाना बना लेते। अंग्रेज हाकिम और लिली की मां को रणविजय हर तरह से प्रसन्न रखने की इच्छा रखते। वैसे उनके यहां अभाव भी नहीं थे क्योंकि उन लोगों ने अपने जीवन स्तर को औसत भारतीय के आस पास का बना लिया था। अंग्रेज हाकिम के भारतीय प्रेम को देख कर भारत सरकार ने उसे भारतीय नागरिकता भी प्रदान कर दिया था जो था तो अस्थायी पर उसकी कानूनी प्रवृत्ति स्थायी होने की थी। अंग्रेज हाकिम रुपया बनाने या रुपयों पर बैठ कर मनोवैज्ञानिक सुखानुभूतियों में डूब कर अपनी पीठ ठोकने वाला आदमी न था, वह सामान्य रूप से अपने पेट को नाप कर तथा आंतों की गति के अनुकूल ही रुपये की जरुरत का निर्धारण करता फिर फटा-फट कई लेख वगैरह तैयार करता या अनुवाद के काम में लग जाता।
अंग्रेज हाकिम के काम में लिली और रणविजय दोनों अपनी क्षमता के साथ सहायता करते। उन दिनों भारत में रूसी राजनीतिक साहित्य की बहुत मांग थी। अंग्रेज हाकिम रुसी साहित्य का अंग्रेजी अनुवाद करता, फिर रणविजय और लिली मिलकर अंग्रेजी का हिन्दी अनुवाद कर डालते। हिन्दी अनुवाद को प्राथमिकता के आधार पर रूसी दूतावास रूस भेजवा देता था, दूसरे उपायों के जरिए प्रकाशित करवाता था। अंग्रेजी अनुवाद, यूरोप के देशों के लिए आवश्यक होते। यूरोपीयदेशों में लेनिन वगैरह की रचनाओं का पाठ अचरज भरी धारणाओं से किया जाता तथा उसका आशय प्रजातंत्रा के कल्याणकारी प्राविधानों पर चस्पा किया जाता। प्रजातंत्रा की निर्वाचित संस्थायंे उस पर विचारण करतीं, फिर उसके अनुसार नियमों में संशोधन करतीं जिससे कि जनता में यह भ्रम स्थायी तौर पर बना रहे कि सर्वहारा की तानाशाही वाली सरकार से हर हाल में जनता द्वारा चुनी गई सरकार बहुत भली होती है। अंग्रेज हाकिम जो कमाता, कमाता ही रणविजय और लिली भी कमा लेते तथा उसमें संतुष्ट रहते।
रणविजय को भी कोई खास आर्थिक दिक्कत न थी, वे उस जमाने में भी कार से चलते। तब दिल्ली भी कारों से अटी-पटी न थी, सडकों का कालापन तब चांदनी चौक, बहादुरष्शाह जफर मार्ग, दरियागंज, लाल किला के आस-पास अच्छी तरह से देखा जा सकता था, आज की तरह से नहीं कि सड़क कहीं नहीं दिखती सिर्फ कारों की छतें ही दीखती हैं। कार अंग्रेज हाकिम की थी, उसे एक मुसलमान दोस्त ने दिया था जो किसी नबाब का लडका था। उसकी पढ़ाई-लिखाई इंग्लैण्ड में हुई थी। उसने आखिरी पढ़ाई उस कालेज में किया था जिसमें अंग्रेज हाकिम भी पढ़ा था। उससे अंग्रेज हाकिम की पहली मुलाकात दिल्ली में अंग्रेजी सरकार के एक कार्यालय में हुई थी जहां वह अपने काम के सिलसिले में आया था। अंग्रेज हाकिम ने उसके काम के लिए अपने स्तर से प्रयास किया था, उसे सफलता मिली थी, फिर तो वह अंग्रेज हाकिम का दोस्त ही बन गया था।
उसका नाम था तो बहुत बड़ा, जो पुकारने में थोड़ा अट-पटा लगता था, सो अंग्रेज हाकिम उसे सिर्फ मुजफ्फर नाम से ही पुकारता था। मुजफ्फर अंग्रेजी मिजाज का नौजवान था तथा अंग्रेजी लिबास में ही रहता था, वह एक सफाई पसन्द आदमी था तथा प्रतिदिन दूसरा लिबास पहनता था, वह लम्बी टाई की जगह गले की टाई बांधता तथा किसी कम्युनिस्ट की तरह ऐसी घनी मूंछे रखता कि उसका मुंह, मूंछ के कड़े बालों से ढंका रहता, गोरा होने के कारण भद्दी सी दीखने वाली मूंछ उसके चेहरे के प्रभाव को कम नहीं कर पाती, उसका आकर्षण बना रहता। उसकी बोल-चाल से अंग्रेज हाकिम काफी प्रभावित रहता, क्योंकि उसकी अंग्रेजी में काफी भिन्नता होती, जो सामान्यतया भारतीयों में व्यवहृत नहीं थी, क्योंकि दूसरे भारतीय जिस अंग्रेजी को बोलते उसमें होता तो सारा कुछ ठीक ठाक, पर अंग्रेजी समाज के लोक-राग का अभाव होता।
मुजफ्फर जब अंग्रेज हाकिम को प्यार से डार्लिंग कहता तब अंग्रेज हाकिम झूम-झूम जाता, फिर वह उसे स्वीटी पुकार कर गले से लिपटा लेता। एक अद्भुत दृश्ष्य होता उस समय। मुजफ्फर के पिता नबाब साहब का इन्तकाल १९४२ के आस-पास इंग्लैण्ड के एक अस्पताल में हो गया था, तब से मुजफ्फर इंग्लैण्ड में ही अम्मी के साथ रहने लगा था। बीच-बीच में भारत आता था और अक्सर दिल्ली में ही रहता था। अंग्रेज हाकिम के नौकरी छोडने के बाद के दिन तो मुजफ्फर के साथ ही बीतते थे। वह भी जब दिल्ली आता तब पहला काम यही करता कि अंग्रेज हाकिम से मिलता तथा लिली की मां के साथ घुल-मिल जाता। लिली की मां उसे खूब खूब स्नेह देती तथा महसूसती कि वह किसी अपने की गंध में है जो उससे बिछुड़ गई थी, क्योंकि वह चाह कर भी अपने मां बाप, भाई के घर नहीं जा पाती थी। मां-बाप की मृत्यु के बाद तो उसके लिए अपने जन्म स्थान का कोई विशेष अर्थ ही नहीं रह गया था।
अंग्रेज हाकिम को मुजफ्फर का भारत में न होना काफी अखरता है। वह ऐसी स्थिति में भी नहीं कि मुजफ्फर से मिलने के लिए इंग्लैण्ड की यात्रा करे। भारत विभाजन के समय मुजफ्फर को अंग्रेज हाकिम ने जाने कितनी बार समझाया था कि वह भारत में ही रहे, पाकिस्तान जाने का संकल्प छोड़ दे, पर ऐसा सम्भव न हो पाया। मुजफ्फर की अम्मी और बेगम दोनों भारत में रहने के लिए सहमत नहीं थीं, संयोग से दोनों लाहौर की थीं और लाहौर को हर हाल में पाकिस्तान का हिस्सा होना था। मजबूर होकर मुजफ्फर को भी पाकिस्तान की नागरिकता स्वीकारनी पड़ी। फिर तो उसे भारत के अन्दर आने वाली तमाम संपदाओं को औने-पौने दाम में बेचना पड़ा। पाकिस्तान जाने के पहले मुजफ्फर ने दो काम अंग्रेज हाकिम के हित में किये, हालांकि अंग्रेज हाकिम चाहता था कि वह इंग्लैण्ड की अपनी संपदा मुजफ्फर के नाम से कर दे, पर वह भारतीय मिजाज का सधा आदमी था तथा उस प्रवृत्ति का था जो सामान्यतया भारतीयों में ही दिखती है कि शुभचिन्तकों को दी जाने वाली संपदाओं का मूल्य या अदला-बदली नहीं करना। भारतीय इसे अपना नैतिक दायित्व मान कर आत्ममुग्ध होते हैं। अंग्रेज हाकिम था कि वह इस प्रवृत्ति से बिल्कुल अलग था, वह दान या भीख को गलत मानता था तथा समझता था कि उपहार भी इसी कोटि के होते हैं, सो वह इंग्लैण्ड की अपनी संपदा मुजफ्फर के हवाले अदला-बदली के रूप में करने का इच्छुक था दान के रूप में नहीं।
मुजफ्फर था कि उसे हर हाल में विशेष उपहार अंग्रेज हाकिम को देना ही था। सो उसने दिल्ली में स्थित एक पुरानी हवेली जिसे मुजफ्फर ने ठीक ठाक कराया हुआ था तथा दिल्ली प्रवास में उसमें रहा करता था, उसके अगले हिस्से को लिली के नाम कर दिया तथा पिछले हिस्से को जो मुजफ्फर के कर्मचारियों के आवास थे तथा वे भारत में रहना चाहते थे, उनके नाम आवंटित कर दिया। भारत से जाते जाते मुजफ्फर ने हवेली के अगले हिस्से और पिछले हिस्से के बीच एक विभाजक दीवार भी चुनवा दिया, ताकि बाद में किसी भी तरह की उलझन न रहे।
मुजफ्फर ने भारत छोडने के पहले अंग्रेज हाकिम को इतना प्रेरित किया कि उसे मुजफ्फर की हवेली में अपना सारा सामान समेटना पड़ा। हवेली में आकर अंग्रेज हाकिम की भावुकता ने उसे परेशान कर दिया। उसे महसूस होता कि उसका समय उससे छीन लिया गया है तथा एक ऐसे इतिहास में कैद कर दिया गया है, जो अपनी सफेदी पूर्ण राजनीतिक कार्यवाहियों के लिए नहीं जाना जाता, जितना अपने कालेपन की शोक-प्रवृत्तियों व दमनकारी व्यवहारों के कारण जाना जाता है। फिर भी उसे हवेली में ही रहना था तथा अपनी आदतों को हवेली की आदतों से बचाना था।
एक दिन मुजफ्फर हवेली पर आया और बताया कि वह पहले इंग्लैण्ड, फिर वहां से पाकिस्तान जाएगा तथा प्रथम पाकिस्तानी स्वतंत्राता महोत्सव में भाग लेगा। उसे वहां से निमंत्राण भी मिल चुका है तथा पाकिस्तान में रहने व बसने का अपना लक्ष्य उसने भारतीय अधिकारियों को भी बता दिया है। उसी दिन वह इंग्लैण्ड चला भी गया तथा अपनी कार अंग्रेज हाकिम के हवाले कर गया। अब अंग्रेज हाकिम करे क्या? क्या करे कार का? मुजफ्फर ने कार का सारा कागज अंग्रेज हाकिम के नाम बनवा दिया था।
अंग्रेज हाकिम के पास एक पुरानी कार थी, जो छोटी थी तथा उसमें तेल का खर्च कम था। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार उसने खरीदा था तथा इस कार की तुलना में वह किसी ऐसी कार के बारे में सोच भी नहीं सकता था, जैसी मुजफ्फर की थी, ज्यादा तेल पीने वाली लम्बी और बड़ी। पुरानी खरीदने का एक कारण यह भी था कि अंग्रेज हाकिम कुशल मिस्त्राी भी था तथा कार बिगडने पर वह पहले खुद ठोंक-ठाक करता तथा भारतीय मिस्त्रिायों की तरह कार में नया सामान लगाने से परहेज करता।
अंग्रेज हाकिम अपनी पुरानी कार से ही कहीं आता जाता पर रणविजय मुजफ्फर की कार से ही चलना चाहते जब किसी महत्वपूर्ण के यहां जाना होता। एक तो वह नई थी तथा दिल्ली के लिए स्टेटसिम्बल थी। मुजफ्फर की कार से चलने पर रणविजय को मुलायम आयवस्ति का आभास होता कि लोग यह नहीं समझ पायेंगे कि वे राज्य के निर्वासन में हैं तथा अपने अधिकारों का समर्पण करने वाले कायर आत्म-हन्ता हैं।
एक दिन मुजफ्फर की कार से रणविजय रूसी दूतावास जा रहे थे, साथ में लिली थी। किसी रुसी किताब का हिन्दी अनुवाद दूतावास के अधिकारियों को दिखाना था। रास्ते में लिली ने रणविजय को रोका-‘चलो कहीं काफी पीते हैं।’
फिर वे किसी रेस्ट्राँ के सामने थे। रेस्ट्राँ अपने समय की आधुनिकता में था तथा उसकी पुरानी आधुनिकता की पहचान पूरी तरह गायब थी, जब कि वह रेस्ट्राँ 1875 का था। उसके मुख्य दरवाजे के ऊपर निर्माण काल सफेद संगमरमर पर अंग्रेजी में लिखा हुआ था। गोया उस काल का जब अंग्रेज भारत के लिए किसिम किसिम के कानूनों को अंग्रेजी रंग में बनाने लगे थे। वैसे रेस्ट्राँ ठीक था, उसमें बैठने के लिए पर्याप्त जगह थी, कुर्सियां मेज वगैरह सभी काले रंग के प्रभाव में थीं, जो विशेष लकड़ी का निर्मित होने का आभास दे रही थीं। रेस्ट्राँ में पच्चीस तीस के आस पास बैठे हुए लोग थे, जो भारतीय कम अंग्रेज ज्यादा लग रहे थे, क्योंकि उनमें अधिकांश अंग्रेजी लिबास में थे तथा अंग्रेजी में बतिया रहे थे। उनकी बात-चीत में राजनीति थी तथा नेहरु हर दूसरे वाक्य से जुड़े होते। उनमें गांधी को सुनना असंभव होता। वहां गॉधी कहीं थे भी नहीं।
रणविजय लिली के साथ रेस्ट्राँ में दाखिल हुए और काफी का आदेश दिया, वह भी काली। लिली रेस्ट्राँ के लिए किसी विषय में बदल गई थी, यह रणविजय या लिली दोनों को कुछ देर बाद मालूम हुआ। जब दोनों काफी पीने लगे तथा अनुवाद वाली किताब के बारे में चर्चा करने लगे। दरअसल चर्चा तुलनात्मक थी, सन्दर्भ रूस का था तथा बातचीत भारत की। लेनिन ने ‘स्वस्फूर्तता’ के बारे में जो सिद्धान्त बनाये थे या जिस सामाजिक जागरुकता को उन्होंने स्वस्फूर्तता माना था, क्या उसी की तरह ही ‘स्वस्फूर्तता’ भारतीय स्वतंत्राता-संघर्ष में भी थी?
लिली ने यही जानना चाहा था रणविजय से। रणविजय एकबारगी खामोश हो गये थे, उन्हें नहीं सूझ रहा था कि उसका उत्तर हां है या नहीं, क्योंकि लिली अपने सवाल को आगे तक ले जाती जिसमें ‘हां’ के लिए भी और ‘ना’ के लिए भी उत्तर देना होता। रणविजय ने लिली को हिंसा और अहिंसा जैसे रास्तों में ले जाकर उलझा दिया और बताया कि जो सवाल तुम पूछ रही हो, इसे दो तरीके से पूछ सकती हो...
लिली ने रणविजय को तत्काल रोका...कृ‘वह कैसे?’
रणविजय ने लिली को उत्तरित किया कि एक तो इसी तरह जैसे तुमने पूछा है, दूसरा थोड़ा क्या बहुत अधिक भिन्न है, वह यह कि मान लो, तुम्हारे हाथ में रायफल है और सवाल पूछ रही हो, अब कल्पना करो कि जब रायफल की नाल किसी की तरफ हाथ भर के फासले पर हो फिर उसका जबाब क्या होगा?
‘क्या जबाब देने वाला आदमी रायफलधारी आदमी की ताकत के बारे में विचार नहीं करेगा? यदि विचार करेगा फिर तो उसका जबाब रायफलधारी के इच्छानुकूल ही होगा ताकि उसका जीवन यूं ही या अचानक न समाप्त हो जाये।’
काली काफी के साथ लिली और रणविजय दोनों अपनी चर्चा में खोये हुए थे कि बगल वाले आदमी ने रणविजय को अपनी तरफ खींचा...
‘क्या आप उत्तर प्रदेश से हैं? किसी तरह उस अपरिचित आदमी ने हिन्दी के शब्दों को जोड़ कर उच्चारित किया। उसके बोलने के तौर तरीके से रणविजय और लिली दोनों को आसानी हुई, फिर वे समझ सके कि अपरिचित आदमी गैर हिन्दी भाषी किसी दक्षिणी क्षेत्रा का है। रणविजय और लिली की साफ हिन्दी से गैर भाषी भी अनुमान कर सका था कि ये दोनों उत्तर प्रदेश जैसे हिन्दी प्रदेश के ही होंगे।कृ
‘हां, हम लोग उत्तर प्रदेश से ही हैं’ रणविजय ने अपरिचित को बताया तथा पुरानी चर्चा को आगे बढ़ाया, पर दक्षिणी क्षेत्रा का आदमी तो एकटक था रणविजय की तरफ, उसे कुछ और पूछना था, उसने दुबारा रणविजय को अपनी तरफ आकर्षित किया और पूछा...कृ
‘तब तो आप करपात्राी जी महाराज को जानते होंगे, जो हाथ को ही पात्रा मानते हैं तथा उसी पर भोजन रख कर खाते हैं।’
रणविजय ने थोड़ा रुक कर मुंह से निकलने वाले उत्तर को सायास बदला और उससे पूछा...कौन करपात्राी जी महाराज?
वही जिनका बनारस में धर्मसंघ नाम का एक अच्छा आश्रम हैकृअपरिचित ने बताया।
अच्छा! वही करपात्राी जी! जो अछूतों के मन्दिर प्रवेश के खिलाफ हैं, वे भी बनारस में रहते हैं कहीं, मैं उन्हें नहीं जानता। रणविजय ने अर्थहीन उत्तर अपरिचित आदमी की तरफ उछाला और काफी का आखिरी घूंट पेट में उड़ेला, जैसे वह कसैली हो। हद हो गई ये लोग जो आश्रम की अथाह पूंजी में गोता लगा रहे हैं इन्हें सभी जानते हैं और इनके बारे में पूछते हैं, पर कोई प्रेमचन्द, प्रसाद, कबीर के बारे में नहीं पूछता,भारतेन्दु का तो यहां नाम लेवा भी नहीं। रणविजय घिना गये, जैसे सारी काफी हलक से बाहर आ जाएगी।
स्वस्फूर्तता वाली चर्चा फिर वे कार में चलते हुए पूरी कर पाये। किसी तरह लिली आश्वस्त हो पाई कि रूस की स्वस्फूर्तता और भारतीय स्वस्फूर्तता में रास्तों की शुचिता का अन्तर था। फिर भी लिली का भ्रम ताजा ही बना रह गया कि बन्दूक के सामने बलिदान का क्या मतलब? लिली बन्दूक और बलिदान में उलझ गई, उसके सामने रूस के राजनीतिक बदलाव का मुकम्मल सांचा था, खून से लथपथ बारूद में झुलसा, बन्दूकों की भाषा बोलता, समझता समाज। हालांकि उसने किताबें ही पढ़ी थी, जिनमें अपनी पूरी राजनीतिक सैद्धान्तिकी के साथ बोलशेेविक दर्ज होते थे तथा मेनशेविकों की गद्दारियां एवं पथ-भ्रश्टता भी घृणित तरीके से विश्लेषित होती थीं। उन्हीं किताबों में से एक किताब थी, जिसके हिन्दी अनुवाद की पांडुलिपि वे रूसी दूतावास ले जा रहे थे।
बन्दूक और बलिदान की चर्चा फिर कभी, पर उसे अचरज था कि रणविजय ने रेस्ट्राँ में उपस्थित अजनबी से झूठ क्यों बोला, उसकी जरूरत क्या थी? क्योंकि करपात्राी जी को तो वह जानता है, मम्मी अक्सर वहां जाने की बातें करती हैं, रणविजय से पूछा भी था एक बारकृ
लिली ने रणविजय को टोका...‘क्या तुम वास्तव में करपात्राी जी को नहीं जानते?’
‘जानता हूं फिर भी मैंने प्रति सवाल किया था, कौन करपात्राी जी?’ तुम यही जानना चाहती हो कि ऐसा मैंने क्यों किया, करपात्राी जी का जानना किस लिए छिपाया?’
इसलिए कि इन बाबा और महाराजाओं जैसे लोगों का नाम बाहर संक्रामक रोग की तरह फैल जाता है, सो यह पूछना आवश्यकथा कि कौन करपात्राी जी? यदि वह अपरिचित थोड़ा भी समझदार हुआ फिर तो उसे समझ लेना चाहिए कि जब उत्तर प्रदेश के लोग ही करपात्राी जी को नहीं जानते तो उनकी कैसी महत्ता?
लिली रणविजय का स्पष्टीकरण सुन कर हंसने लगी, ‘गोया तुम किसी का कद छिपाने की कला जानते हो।’
रणविजय भी हंसने लगे। कार चलाते हुए रणविजय ने लिली को किसी की पद प्रतिष्ठा के फैलने के उन कारणों को बताया जो पूरी तरह अवास्तविक और झूठे होते हैं। दर असल किसी बड़े या चर्चित के साथ अपने जुड़ावों की प्रामाणिकता में आदमी इतना कुछ बोल जाता है जिसका कोई मतलब नहीं होता और वह उस व्यक्ति का प्रचारक-प्रसारक बन जाता है। जैसे मैं यह कहूं कि कशी नरेश को जानता हूं, उनसे हमारे दादा के संपर्क हैं, तो मुझे यह आश्वस्ति मिलेगी कि काशी नरेष की तरह मैं भी बड़ा हो चुका हूं, तो बेहतर यही है कि कहूं जानता ही नहीं जो सचाई है, काशी नरेश या करपात्राी जी को मेरे जैसा आदमी जान भी कैसे सकता है? नाम जानना तो जानना नहीं है नऽ।कृ
एक बार फिर हंसते हुए लिली ने सुझाया ‘तुम्हें तो साइकोलाजिस्ट होना चाहिए था, मन से खेलने वाला तुम राजनीति में क्यों चले आये, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, जेल और प्रतिदिन हल्ला, अवांक्षित शोर व आन्तरिक उर्जा का दोहन, फिर अपनी पीठ पर साम्राज्यवादी दमन की कहानियां लिखवाना।’
नहीं, ऐसा नहीं है लिली! जो तुम विचारती हो उसका भी अपना कारण है क्योंकि तुम मानती हो कि दुनिया से बन्दूकंे नहीं गायब हो सकतीं, नागाशाकी और हिरोशिमा हर जगह है।
लिली अपने तर्कों पर दृढ़ थी, उसे रणविजय के तर्क सन्तुष्ट न कर पाते, चाहे वे जितना आधार प्रस्तुत करते। लिली मान कर चलती कि बारूद और एटमबम पर बैठी दुनिया, उसी से किसी दिन समाप्त हो जाएगी, वैसे वह बारूद पुलिस तथा सेना को भी एक इकाई मानती तथा स्पष्ट करती कि बारूद में जीवनहीनता होती है और सेना तथा पुलिस में जीवन होते हुए भी जीवन का इनकार होता है तथा एक ऐसी बारूदी आज्ञाकारिता होती है जिसके लिए पुलिस तथा सेना के पेट और स्वास्थ्य का ख्याल रखा जाता है। लिली स्पष्ट करती है सेना तथा पुलिस से भी बारूद जैसा काम लिये जाने की संभावना बराबर सुरक्षित रहती है। ऐसी स्थिति में बारूद का प्रतिद्वन्दी बारूद, सेना की सेना, पुलिस की पुलिस, पर रणविजय, सेना और पुलिस को बारूद जैसा न मानते तथा विश्वास करते कि सेना की प्रवृत्तियां हर हाल में यांत्रिक नहीं होतीं, उसमें भी संवेदनशीलता तथा विवेकयुक्तता का रसायन होता है।
रणविजय ने अपने समर्थन में एक लघु कहानी सुनाना चाहा लिली को कि रूसी दूतावास सामने आ गया। लिली और रणविजय दोनों दूतावास में दाखिल हुए। अनुवाद की टाइप की हुई पांडुलिपि रणविजय ने रूसी अधिकारी को सौंपा। रूसी अधिकारी ने रणविजय को अंग्रेजी अनुवाद वाली दूसरी दो किताबें भी दिया तथा आग्रह किया कि उनके अनुवाद का काम रणविजय जल्दी निपटा दें। उस विशेष रूसी अधिकारी से मिल लेने के बाद रणविजय दूतावास में ही एक ऐसे भारतीय से मिले, जो हर तरह से भारतीय था पर उसका दिमाग पूरी तरह रूसी था। उसकी आंखों में रूसी वैभव का पानी था तथा उसके हाथों की विशेषता थी कि वे पूरी तरह पराश्रयी थे। वह अपने हाथों का इस्तेमाल तभी करता था जब उसके पास खरीदे गये हाथ नहीं होते थे, वह अपने नियंत्राण में पैसे के बल पर कई जोड़ा मजबूत हाथ नौकरों के रूप में हरदम रखा करता था।
रूसी दूतावास में रणविजय से वह भारतीय बहुत ही गर्मजोशी से मिला। वैसे वह हंसमुख आदमी था। उसके हंसमुख होने में उसका चेहरा भी काफी सहयोग करता था। उसके पतले-पतले होंठ थे तथा उनसे नाक की दूरी औसत से कम थी। उसके हंसने में कौतुकपूर्ण विशेषता ये थी जैसे उनकी अलग से कोई जुबान हो या कोई संगीतमय भाषा ही हो। सब कुछ के बावजूद उसकी हंसियों में रीतिकालीन या चलताऊ हास्य वाली कविताओं का पूरी तरह अभाव था, यही कारण था कि उसके व्यक्तित्व से गंभीरता फूटती थी तथा प्रथम द्रष्टया आभास होता था कि यह आदमी संवेदनाओं और भावनाओं को जूते से दबा कर रखता है। उसकी हंसियां जो एक स्वाभाविक क्रियायें थीं, उनमें यह ताकत नहीं थीं कि वे बुद्धि के कुशलतम और व्यावहारिक उपयोग से उसे किसी भी तरह रोक पातीं। उसकी यही विशेषता रूसी विद्वानों को भाती थीं, इसीलिए उसे रूसी दूतावास में उसके द्वारा प्रस्तावित मानदेय पर ससम्मान रखा गया था। रूसी दूतावास उसके द्वारा सुझाई गई रूसी किताबों खासतौर से वाम राजनीतिक व साहित्यिक किताबों का अनुवाद करवाता, फिर उसका काम होता हिन्दी अनुवादों को जांचना। वैसे वह बारीक बुद्धि वाला आदमी था तथा अनुवाद की गई किताबों को गंभीरता से देखता।कृ
‘कब आये रणविजय? सुना अपनी ‘इस्टेट’ की तरफ गये थे?’ उस आदमी ने पूछा
‘हॉ गया था पर वहां से बहुत पहले ही लौट आया था’
‘तुम्हें तो रूसी किताबें काफी चोटिल करती होंगी!’ दुबारा उसने रणविजय को छेड़ाकृ
‘हां करती तो हैं, क्योंकि रूसी किताबों का यहां व्यावहारिक प्रयोग नहीं हो सकता जब कि भाषण वाले मार्क्स और लेनिन की यहां कमी नहीं, आप भी तो कुछ नहीं कर रहे। रणविजय ने रूसी दिमाग वाले भारतीय को थोड़ा चोटिल कियाकृफिर वह पलट गया किसी कुशल बाजीगर की तरह। उसने लिली की तरफ अपना ध्यान मोड़ा और लिली से पूछा...‘सुना तुम भी इस्टेट गई थी!’
‘हां गई तो थी’
‘कैसी लगी इस्टेट?’
‘इस्टेट कहां देख पाई, सिर्फ महल देखा जिस पर कथित पराक्रम का इतिहास लिखा हुआ था, पर महलों की भाषा से मैं परिचित नहीं, सो महल में गूंगी और बहरी बनी रह गई।’
रूसी दिमाग वाला भारतीय सकपका गया, क्या कह रही लिली? इतिहास की भाषा जो बहुरुपिया की तरह अपना रंग बदला करती है उसे समझना आसान है क्या?रूसी दिमाग वाला भारतीय फिर रणविजय की तरफ मुड़ा और प्रशासनिक भाव लिए रणविजय को बताया। उसने रणविजय और लिली द्वारा अनुवादित दोनों किताबों को प्रकाशित करने की स्वीकृति अपने स्तर से दे दिया है तथा वे साल के अन्त तक प्रकाशित भी हो जायेंगी।
रणविजय और लिली देर शाम तक अपने आवास पर पहुंचे। आवास पर रामदयाल आ चुके थे तथा लिली की ममा से उनके कमरे में बतिया रहे थे। लिली के डैड कहीं बाहर निकले हुए थे। लिली की मां पहले जैसी अस्वस्थ नहीं थीं तथा आराम से रामदयाल से हाल चाल पूछ रही थीं। रामदयाल को देखते ही रणविजय उर्जस्वित हो उठे, जैसे पूरी इस्टेट उनके भीतर हाजिर हो गई हो तथा इस्टेट होने न होने के जो अन्तर्द्वन्द्व थे वे स्वतः समाप्त हो चुके हों। फिर तो रणविजय रामदयाल से लिपट गये और लिली उन्हें दुआ सलाम कर किचन जा पहुंची।
उस समय रामदयाल और रणविजय को लिपटा हुआ देख कर कट्टर से कट्टर भारतीय भी भ्रम पीने लगता कि क्या रणविजय ‘इस्टेट’ में अपना हिस्सा न लेकर किसी आत्महन्ता की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं तथा रामदयाल जैसा मित्रा उन्हें समझा भी नहीं पा रहा है।
पर रामदयाल रणविजय को क्या समझाते, वे कोई गंवार तो थे नहीे, पढ़े-लिखे थे राजकुमार थे सो वे बहुत कुछ विचार कर चुप थे और समय की चाल तजबीज रहे थे कि जब समय बदलेगा फिर वे रणविजय के बारे में निर्णय लेंगे।
समय की अभिव्यक्ति
रामदयाल का दिल्ली आना सिर्फ रणविजय के लिए था। वे महल भी गये थे, तब तक प्रदेश का मंत्राी लखनऊ लौट चुका था। भइयाराजासे रामदयाल की हुई बातें काफी नीरस तथा क्रोधित करने वाली थीं।
भइयाराजाकिसी भी सूरत में रणविजय को अपना भाई मानने के लिए तैयार नहीं थे। कलक्टर की कही सारी बातें भइयाराजाके पेट से बाहर आने लगीं। रामदयाल को काफी बुरा लगा तथा उनके पास भइयाराजाकी बातों को उन्हीं के मुंह पर चस्पा करने के लिए मर्यादाहीन रास्ता पकडने का ही तरीका बचा हुआ था, जिसे वे पकडना नहीं चाहते थे, क्योंकि यह उनके स्वभाव के विपरीत था। सो, वे भइयाराजाकी सारी बातें सुनकर बिना किसी प्रतिक्रिया के वापस हो लिए।
रामदयाल का महल से वापस होना काफी दुखभरा था तथा उस पवित्रा विश्वास का टूटना था जिसे रामदयाल ने अपने पिता से तथा खुद के अनुभवों से हासिल किया था। लेकिन जो टूटना था, उसे तो टूटना ही था। महल किसी भी विश्वास को कपोल कल्पना में तब्दील कर सकते हैं तथा संपत्ति व सत्ता हासिल करने के लिए कोई रास्ता घृणित नहीं होता, यह सब रामदयाल जानते थे फिर भी उनका अटूट विश्वास भइयाराजापर था कि चाहे जैसी भी विपरीत स्थितियां हो भइयाराजादूसरे राजाओं की तरह स्वार्थी नहीं, वैसे भी उन्हें कभी भी ऐसा मौका नहीं मिला था कि भइयाराजाको आग में से गुजरता देखते फिर समझ बनाते कि वे जले कि नहीं।
रामदयाल को वैसे यह मालूम था कि रणविजय की मां दूसरी थीं जो भइयाराजाकी मां नहीं थीं, भले ही वे अविवाहित रही हों पर थीं तो उनके बाप के साथ ही, उसी महल में उनका निधन हुआ, राज-व्यवस्था के तहत उनका दाह संस्कार हुआ। खुद भइयाराजाके पिता ने चिता में आग लगाया और तेरह दिन तक शोक मनाया। तब भइयाराजाके पिता महज जागीरदार थे, यदि राजा होते फिर तो राज द्वारा अधिकृत व्यक्ति दाह देता तथा मृत्यु संस्कार करता क्योंकि राजा को ऐसा नहीं करना चाहिए। माना जाता है कि छत्रा-चंवरधारियों को एक सामान्य व्यक्ति की तरह न शोकातुर होना चाहिए और न ही प्रसन्न। यदि ऐसा हुआ फिर तो राजा जो देवता होता है वह पक्षपाती हो जाएगा। जबकि उसे पूरी जनता का संरक्षक होने जैसा व्यवहार करना चाहिए जिसमें पूरी तरह निर्पेक्षता हो।
अब कह रहे हैं कि रणविजय मेरा भाई ही नहीं, भइयाराजाके स्थान पर यदि कोई दूसरा होता तो शायद इस तरह की निकृष्ट बात कभी नहीं करता। वह मां के साथ साथ बाप को बाप समझता। रामदयाल को भइयाराजाके दोहरे चरित्रा पर काफी घिन हुई और वे तत्काल घिना गये जैसे भइयाराजाका चेहरा देखना भी प्रायश्चित हो। रामदयाल का भइयाराजा से जुड़ाव उनके पिता के जमाने से था, एक दूसरे से मिला-जुला, लोग सराहना करते कि संबंधों का निर्वाह करना रामदयाल के पिता ही नहीं वे भी अच्छी तरह से जानते हैं। वैसे भी रामदयाल का सामाजिक और राजनीतिक जीवन दाग वाला नहीं था, वे एक साफ आदमी थे तथा साफ काम करते थे।
समझना आसान नहीं कि भइयाराजाकैसे आदमी हैं? आदमी हैं भी या नहीं, कौन पूरे भारत की बादशाही मिल रही? जमीनदारी टूटेगी, दान और दहेज के नाम पर आखिर कितने गांव बचा पायेंगे, ठीक है हाईकोर्ट में मुकदमा दाखिल हो गया है कि कम से कम तीन सौ गांव जो जंगलों के समीपवर्ती हैं, जहां उनकी जमीनदारी नहीं थी, वे गांव उनकी अम्मा रानी को खोइछां (कन्यादान) के रूप मेें प्राप्त हुए थे, अम्मा हुजूर के पिता महाराज ने विदाई में दिया था। साथ ही साथ यह भी था कि उन गांवों की जमीनों के कागजात भी कभी तैयार नहीं किये गये थे। सो वहां की जमीनदारी नहीं टूटनी चाहिए।
रामदयाल उलझ गये थे, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि भइयाराजाऔर रणविजय के बीच उनकी भूमिका किस तरह की होगी? वे दिल्ली तो महल से वापस होने के बाद ही चले जाते पर राजनीति के स्थानीय जालों में उलझे थे। दर असल हुआ यह था कि उत्तर प्रदेश की कांग्रेसी सरकार बनते ही जिले में पारटी के विभिन्न पदों के बाबत आपसी संघर्ष काफी बढ़ चुके थे, अधिकांश चाहते कि उन्हें ही पारटी का अध्यक्ष बनाया जाय। किन्ही कारणों से निष्पक्ष चुनाव में विश्वास करने वाली पारटी दो तीन सालों से पारटी का चुनाव रोके हुई थी। जिला कांग्रेस पारटी के अध्यक्ष वगैरह को लखनऊ के कांग्रेसी दिग्गज मनोनीत कर देते, फिर मनोनीत अध्यक्ष का पूरे जिले में दब-दबा बढ़ जाता प्रशासन और नागरिक दोनों क्षेत्रों में। लोग समझते कि अध्यक्ष जी का प्रभाव यदि राजधानी में नहीं होता फिर वे कैसे अध्यक्ष बनाये जाते। वस्तुतः उन दिनों कांग्रेस पारटी का अध्यक्ष जिला स्तर पर प्रशासन का कान ऐंठने वाला हुआ करता था। वह मौके गर मौके प्रषासन का कान ऐंठता तथा जिस तरफ चाहता प्रशासन के आलाहाकिमों की गर्दनें उस तरफ घुमा देता। आलाहाकिमों को फिर जिले की समस्याएं दीखने लगतीं। इस बार जिले का अध्यक्ष एक ऐसा आदमी था जो पहले दिल-दिमाग से समाजवादी था तथा वह आज़ादीके पूर्व तक समाजवादी ही था।
आज़ादीके पहले पुरानी कांग्रेस सोशलिस्ट पारटी का सम्मेलन नासिक में हुआ था। वहां सोशलिस्टों ने निर्णय लिया था कि कांग्रेस सोशलिस्ट पारटी को कांग्रेस पारटी से अलग रखा जाय और वही हुआ लेकिन कुछ सोशलिस्ट पारटी के फैसले के विरोध में थे सो वे सीधे तौर पर कांग्रेस से जुड़ गये। पारटी के उस फैसले का विरोधी जिले का अध्यक्ष भी था क्योंकि वह अशोक मेहता के अगल-बगल, आगे-पीछे घूम कर आत्मतुष्ट हुआ करता था और अशोक जी थे कि वे कांग्रेस में बने रहना चाहते थे तथा उनका मानना था कि कांग्रेस पारटी के कार्यक्रमों को ही इतना प्रभावी और परिणामकारी बनाया जाये कि कांग्रेसी सरकारों का रूप समाजवादी हो जाये। यह बात अध्यक्ष को जंच गई थी सो वह कांग्रेस में ही बना रह गया था।
रामदयाल जब गांधी जी के साथ नोआखली में थे, तब रणविजय ही नहीं जिला कांग्रेस का अध्यक्ष भी वहां था और गांधी जी ने नोआखली में अपनी एक सहयोगिनी को वहां भेजा था। वह एक निर्भीक महिला थीं तथा व्यावहारिक इतनी कि विरोधियों तक को प्रभावित कर लिया करती थीं। उन्होंने नोआखली में आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया कि जब तक यहां खून का एक बूंद भी सड़क पर गिरेगा, वे आमरण अनशन नहीं तोड़ेंगी। जिले का कांग्रेसी अध्यक्ष रामदयाल और रणविजय तीनों जन उनके साथ थे। इतना ही नहीं ये तीनों जन गांधी जी के साथ कलकत्ता भी आये, क्योंकि वहां भी दंगे आरम्भ हो चुके थे।
कलकत्ता जो भाई-चारे और सद्भावना का शहर था, हिंसक और आक्रामक हो उठा था। वहां बदले की भावना हर तरफ आंधी की तरह फैल चुकी थी। कुछ ही सप्ताह बाकी थे कि दिल्ली में स्वतंत्राता दिवस का जश्न मनाया जाने वाला था। दिल्ली के जश्न में ष्शामिल होने वाले महत्वाकांक्षियों के लिए कलकत्ता में हो रहे खून-खराबे का कोई अर्थ नहीं था, न तो राजनीतिक स्तर पर और न ही संवेदनात्मक स्तर पर। वे दिल्ली के लाल किला व राष्ट्रपति भवन के अगल बगल मंडरा रहे थे तथा जोगाड़ में थे कि स्वतंत्राता के लड्डू उनके हाथ में भी आ जायंे, वे भी किसी सरकारी विभाग की अध्यक्षता हथिया लें। उस समय कुछ हासिल कर सकने की बदरियां तो दिल्ली में थी हीं, जिनसे अंग्रेजों ने नाता तोड़ लिया था। अब देश का सारा कायदा कानून, पद, गरिमा, वैभव, धन दौलत भारतीय पंजों में था, फिर कौन देखे कि कलकत्ता में क्या हो रहा? गांधी जी बेचैन थे, उनका सारा राजनीतिक दर्शन खंड-खंड होकर बिखर रहा था। उनकी आध्यात्मिक पवित्राता को भारत के उनके कुछ अनुयायी अपने निहित स्वार्थों से विश्लेषित कर रहे थे तथा हाथ में आई सत्ता पर काबिज होने के प्रयासों में लगे थे। गांधी जी कलकत्ता की बिगड़ती हालत जानकर सीधे कलकत्ता आ गये और ‘सोदपुर’ के आश्रम में जम गये। उनके लिए १५ अगस्त १९४७ का प्रस्तावित स्वतंत्राता दिवस उतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना कि कलकत्ता के दंगों का समापन। गांधी जी अगस्त के दूसरे सप्ताह तक सोदपुर आश्रम में, प्रार्थना सभायें करते रहे तथा लोगों को समझाते बुझाते रहे। इस दौरान रामदयाल गांधी जी के पीछे-पीछे सोदपुर आश्रम आ गए थे, जब कि कांग्रेसी अध्यक्ष और रणविजय ये दोनों लोग गांधी जी की सहयोगिनी के साथ नोआखली ही रुक गये थे। कांग्रेसी अध्यक्ष कलकत्ता रणविजय के साथ उस दिन आया, जिस दिन डा. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में एक विशाल जुलूस निकाला गया था। उस दिन गांधी जी बलिया घाट में थे तथा दंगा शान्ति के उपायों में सक्रिय थे। उनके शान्ति उपायों को शान्ति यज्ञ का नाम दिया गया था। शान्ति यज्ञ का ही प्रभाव था कि कलकत्ता मशाल जुलूस के जलते मशालों से जगमग करने लगा। क्या हिन्दू क्या मुसलमान क्या औरतें क्या पुरुष, लड़के और लड़कियां भी।
ऐसा अद्भुत जुलूस रामदयाल ने कभी नहीं देखा था, रणविजय और कांग्रेसी अध्यक्ष तो जैसे किसी कल्पनालोक में थे। मारवाड़ियों की अकूत दौलत और बंगाली भद्रजनों के शहर कलकत्ता में उस समय अंग्रेजों की पहचानों को खोजना मूर्खता होती। वहां था भी नहीं कुछ, जिस अंग्रेजी धूर्तता और धोखों से कभी यह शहर अट-पटा हुआ करता था। वहां बनारस वाली निश्चिन्तता और शान्ति की हवा बह रही थी, और मशाल जुलूस में दंगे की घृणित मनोवृत्तियां तेल के साथ जल रही थीं। शहर के मुहल्ले दर मुहल्ले आपस में जुड़ते जाते, सभी के हाथों में जलते मशाल होते, जुलूस अपने में डूबा हुआ शान्ति और सद्भावना की प्रार्थना करता और मनुष्यता का शाश्वत अर्थ महसूसता हुआ गली दर गली घूम रहा था, लोग बाग जो जुलूसों में नहीं थे, वे अपने घरों से जुलूस का सन्देश पढ़ते-गुनते कि आदमी न तो मुसलमान होता है और न ही हिन्दू, वह जन्मता तो सिर्फ आदमी ही है, कहीं न कहीं हमारी सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में खोट है जो हमें हिन्दू या मुसलमान बना देती है, फिर प्रारंभ हो जाता है हिन्दू और मुसलमान होने का खेल, कुछ अतिवादी दंगे को भी खेल जैसा खेलने लगते हैं तथा विजेता होने के विनाशकारी गौरव हासिल करने में खून बहाने लगते हैं।
रामदयाल, रणविजय और कांग्रेसी अध्यक्ष तीनों जुलूस में शामिल थे। जूलुस को हर जगह, सम्मान मिला, चाहे मुहल्ले, मुसलमानों के थे या हिन्दुओं के, राममनोहर लोहिया जैसे लोग हाथ में मशाल लिए जुलूस के आगे-आगे थे। बंगाल के मुख्यमंत्राी का समर्थन भी जुलूस के साथ चल रहा था, नहीं तो जाने क्या होता?
कहा जाना चाहिए कि समय ठीक था, कम से कम रणविजय के लिए। बलिया घाट में गांधी जी का शान्तियज्ञ चल रहा था। उनकी सुबह प्रार्थना सभा होती। उसके ठीक बाद गांधी जी प्रार्थना सभा को अश्रुपूरित भषा में संबोधित करते प्रार्थना सभा में हर तरफ गांधी की विनम्र प्रार्थना सभी को संवेदित किये रहती, सभा गांधी को देखती, गुनती तथा गांधी को राजनीतिक निरीहता को समझती फिर उनके आध्यात्मिक मन का हिस्सा बन जाती जहां राजनीति का व्याकरण पूरी तरह प्रभावहीन होता। प्रार्थना सभा के तुरन्त बाद गांधी जी सभा को संबोधित करने ही वाले थे कि...कृ
कई धमाके एक साथ हुए, कुछ नौजवान लड़के गांधी जी के विरोध में नारा लगाने लगे फिर क्या था प्रार्थना सभा बिखर गई, लोग जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे, गांधी जी को प्रार्थना सभा के लोगों ने अपने घेरे में ले लिया। धमाका करने वाले नौजवान धमाका के बाद भागने में सफल भी हो गये, सभा के बाहर रणविजय छट पटा रहे थे, वे धमाके की चपेट में आ गए थे, पूरी सभा में मौत जैसा सन्नाटा छा गया।
रणविजय का एक पैर जख्मी हो गया था फिर भी वे होश में थे, गांधी जी ने उन्हें देखा, उनकी आंखें आंसू न रोक पाईं उन्होंने रणविजय को उठा लिया तत्काल खुद को संयमित किया, किसी तरह गांधी जी उपस्थित लोगों को समझा पाये कि ‘यह सब तो होगा ही ताकि हम शान्ति स्थापित करने में असफल हो जायें।’
राममनोहर लोहिया कलकत्ता में ही थे, उन्होंने रणविजय के इलाज की व्यवस्था की तथा उन्हें अपने किसी दोस्त के यहां ठहरवा दिया। रामदयाल रणविजय के साथ हो लिए, भला वे रणविजय को कलकत्ता छोडकर वापस कहां आने वाले थे?
कांग्रेसी अध्यक्ष गांधी जी के आमरण अनशन तक कलकत्ता रहा, फिर वह पटना से होते हुए दिल्ली चला आया था, दिल्ली भी अशान्त हो गई थी। गांधी जी का आमरण अनशन जो सीधे तौर पर उपवास था, उसका अच्छा प्रभाव पड़ा, पर दिल्ली जो प्रथम स्वतंत्राता समारोह की दर्शक थी, उससे स्वतंत्राता की खुशियां छिन चुकी थीं, वहां खून बह रहा था, वही खून जिसे बचाने के लिए गांधी जी ने स्वतंत्राता संग्राम के दिनों में अहिंसा का रास्ता चुना था। दिल्ली में सहयोग सद्भाव के स्थान पर असहयोग सत्याग्रह के स्थान पर दुराग्रह वह भी धार्मिक राजनीतिक नहीं, सविनय अवज्ञा के स्थान पर रक्त रंजित अवज्ञा सारा कुछ प्रारंभ हो चुका था। कांग्रेसी अध्यक्ष गांधी जी की दुर्दान्त हत्या के एक माह पहले ही वापस लौट चुका था, उधर कलकत्ता से रामदयाल रणविजय के स्वस्थ होने के बाद लौटे। कांग्रेसी अध्यक्ष हर दूसरे, तीसरे माह दिल्ली जाया करता था। पहले तो उसने प्रयास किया था कि उसे संविधान सभा का सदस्य बना दिया जाय, बाद में उसने प्रयास करना आरंभ किया था कि उसे विधायकी का टिकट मिल जाये पर उसे मिला कुछ नहीं, किसी तरह उसे जिले की कांग्रेस पारटी की अध्यक्षी ही हासिल हो पाई। लेकिन वह चयनित अध्यक्ष नहीं था, उसे मनोनीत किया गया था। रामदयाल और रणविजय भी उसे अध्यक्ष के पद पर देखना चाहते थे यह भूल कर कि वह महत्वाकांक्षी अधिक है तथा उसके राजनीतिक सपने काफी रंगीन व मोहक हैं, जिनमें जनता के साथ जुड़ कर काम करने के लिए केवल सूनापन है।
इधर के सालों में कांग्रेसी अध्यक्ष पारटी की अन्दरूनी कलह से परेशान था। उत्तर प्रदेशके कांग्रेसी अध्यक्ष से जिले के कांग्रेसी काना-फूसी कर रहे थे किकृ‘वह सोशलिस्ट है तथा उसकी आस्था न तो कांग्रेस पारटी में है और न ही नेहरु में, आज भी वह सोशलिस्टों की जमात में सक्रिय है, उसकी डा. लोहिया से पटरी है।’
उसकी शिकायत तो पहले कानाफूसी में थी, लेकिन जब उत्तर प्रदेश की कांग्रेसी सरकार का गठन हो गया फिर तो कानाफूसी किसी आक्रामक शोर में बदल गई। वैसे भी विधायकी का टिकट हासिल करने में कांग्रेसी अध्यक्ष की ताकत का बंटाधार हो चुका था, उसके स्थान पर एक ऐसे आदमी को टिकट दे दिया गया था, जो प्रदेश के कांग्रेसी अध्यक्ष के काफी नजदीक था। कांग्रेस अध्यक्ष के पसन्द की दूसरी जगह थी ‘भइयाराजाकी कांस्टीच्युयेसी,’ जहां से भइयाराजाने टिकट हासिल कर लिया था। वैसे वह भइयाराजाके टिकट की खिलाफत भी नहीं करता, क्योंकि भइयाराजाका खजाना अंश मात्रा ही सही उसके काम आता था। जिले के कांग्रेसी राजनीतिक ताकत सूंघने में चतुर थे, उन्हें मालूम था कि उनका अध्यक्ष प्रदेश की पारटी या सरकार दोनों में उल्लेखनीय ताकत नहीं रखता तथा उसकी श्शक्ति के श्रोत सूख चुके हैं, फिर वह किस काम का?
ऐसी स्थिति में कांग्रेसी अध्यक्ष का विरोध होना बहुत ही सहज था, उसने रामदयाल को पकड़ा उस समय रणविजय दिल्ली में थे, उसने भइयाराजाका भी सहयोग चाहा, पर भइयाराजाउसका सहयोग करके खुद को फंसाना कैसे स्वीकारते? रामदयाल ने कांग्रेसी अध्यक्ष का साथ दिया तथा एक बार फिर उसे पद दान मिला। बाद में रामदयाल दिल्ली के लिए निकल पाये। क्योंकि रणविजय का मामला उनके लिए काफी महत्वपूर्ण था।
महल अपने कागजी काम निपटाने में मशगूल था, उसका मानना था कि कांग्रेसी होने के कारण उसके मुकदमे का रूख जीत के रूप में बदल सकता है। रामदयाल ने महल के सूत्रों से उन दिनों काफी संपर्क बढ़ा लिया था, ताकि वहां की खबरें उन्हें मिलती रहें। रामदयाल के लिए यह अचरज था कि भइयाराजाने उनसे कभी सम्पर्क नहीं किया, वर्ना पहले तो जुकाम होने की दवा के बारे में भी पूछा करते थे। शिकार वगैरह पर निकलते समय साथ में रामदयाल का न होना भइयाराजाको काफी अखरता था। रामदयाल भइयाराजाके मानसिक बदलाव को खूब समझने लगे थे, पर करते क्या? रणविजय तो दिल्ली में थे, दिल्ली आये तो फिर लौटे नहीं।
दिल्ली आने पर रामदयाल यह भूल गये कि वे दिल्ली में हैं। उन्हें लगा कि वे अपने घर में हैं तथा वहां रहने वाले सारे लोग उनके अपने हैं। लिली की ममा की आत्मीयता से वे काफी प्रसन्न थे, उन्हें लिली की ममा एक संस्कारित महिला जान पड़ीं, जब कि वे जानते थे कि वे आदिवासी परिवार समूह से हैं, जहां संस्कार की जड़ें कथित सभ्य समाज से अलग हैं। इसलिए उन्हें लिली की ममा की आत्मीयता देख कर काफी ताज्जुब हुआ। दूसरी तरफ लिली के डैड रामदयाल को पूरा आदमी जान पड़े, वर्ना वे तो मान कर चल रहे थे कि वे कम से कम आधा अंग्रेज तो होंगे ही, लेकिन लिली के डैड तो एक ऐसे आदमी थे, जिनके दिल-दिमाग से संस्कृतियां प्रशिक्षित होती हैं।
जिस दिन रामदयाल दिल्ली पहुंचे थे उस रात तो रामदयाल और रणविजय बातें करते ही रह गये थे, समझ में नहीं आया कि कब रात जमीन पर उतरी और फिर आसमान में टंग गई। रात को तो आसमान में टंगना ही था, नहीं तो सूरज जाने क्या करता?
रामदयाल ने महल का सारा किस्सा रणविजय को बताया, सिवाय उस बात के कि भइयाराजारणविजय को भाई ही नहीं स्वीकारते। यही बात कलक्टर ने भी उनसे बताया था। आखिर कैसे कहते इस बात को रामदयाल? चाहे बात सही रही हो या गलत, क्योंकि यह तो सच था कि दोनों भाइयों के बाप तो एक ही हैं। सो वे इस बात को दबा लिये थे।
इस्टेट के बंटवारे को लेकर रणविजय का रुख सकारात्मक नहीं था, जबकि रामदयाल का पक्ष बंटवारा था। बंटवारे के प्रति खामोशी या लापरवाही ठीक नहीं होगी भइयाराजाकी बेइमानी से पर्दा हटाना हर हाल में आवश्यक है पर रणविजय ने तो जैसे अपना मुंह सिल लिया था, आंखें फोड़ ली थीं एवं हाथों में हथकडियां पहन रखी थीं।
रामदयाल के लिए रणविजय का यह दूसरा रूप था। एक ऐसा रूप जो अवांक्षित त्याग को भी नैतिकता का मानक समझता है तथा दूसरा रूप जो था, वह तो था ही जिसे रामदयाल खूब महसूसते थे।
रामदयाल नैतिकता के पक्षधर थे, पर ऐसी नैतिकता की नहीं जो अवांछित व निहायत गैर जरूरी हो। लिली के डैड भी रामदयाल के विचारों के थे। पर लिली की ममा पूरी तरह रणविजय के फैसले के साथ थीं। उन्हें लगता कि लिली और रणविजय की इस्टेट की तरफ की वापसी कई तरह के विवादों को उपजा सकती है। वहां का सामाजिक मन जाति बिरादरी की संकीर्ण धाराओं में गुंथित है, वे हरदम सवाल दर सवाल खड़ा करेंगे कि लिली यह तो वह, लिली की ममा यह तो वह। अब उन्हें क्या मालूम कि भइयाराजापहले से ही रणविजय पर आरोप लगा रहे हैं कि वे उनके सगे भाई नहीं तथा दूसरी मां के है। इस तरह से लिली की ममा का सोचना ठीक था।
रणविजय का निर्णय किसी हठ की तरह था, जिसने रामदयाल को उद्वेलित किया था...कृवे मन के गहरे में उतरे ‘कहीं रणविजय को अपनी सच्चाई मालूम तो नहीं?’ जिसे भइयाराजारणविजय पर आरोपित कर रहे हैं। हो सकता है कि रणविजय मानसिक रूप से अपने सच के कारण अपमानित महसूस कर रहे हों कि बंटवारे की किसी कोशिश के साथ असली और नकली का तथ्य सभी के सामने आ जाएगा, फिर तो उन्हें ‘दोगला’ होने के राजवंश्ीय अपमान का शिकार होना पड़ेगा, किसिम किसिम की बातें लोगों के सामने जाएंगी निश्चित रूप से रणविजय जातिगत शुचिता जो एक आरोपित झूठ होता है, उसी में फंसे हुए है। सही अर्थों में दोगला कोई कैसे हो सकता है, दोगला का अर्थ जो समाज में प्रभावी है वही गलत है, रामदयाल सामाजिक मानस पर घिना उठे, वाह रे समाज!
‘मां तो सिर्फ मां होती है, वह न किसी जाति की होती है न धर्म की, औरत होने के कारण संतति के जन्म से अपना मानसिक पारितोषिक हासिल करने वाली चाहे वह संतति, विवाहित होकर हासिल करे या बिना विवाहित हुए ही, यह उसका अधिकार है विवाह को स्वीकारे या अस्वीकारे।’ ‘यह एक घृणित मामला है, कम से कम भइयाराजाको तो बुद्धि से काम लेना चाहिए था, उन्होंने घृणित ऐतिहासिक प्रवृत्तियों को दुहरा कर, अपना वर्तमान विवादास्पद बना दिया है।’
रामदयाल ने रणविजय को अपनी पूरी बौद्धिक क्षमता के साथ समझाने का प्रयास किया कि आज का समाज कानूनी समाज है, यहां कानून से ऊपर कोई नहीं और कानून का पक्ष उनके साथ है, उन्हें कुछ अतिरिक्त नहीं करना पड़ेगा, पर उनका रणविजय को समझाना अर्थहीन था। रणविजय थे कि खुद को या तो भाग्य के हवाले कर रहे थे या आत्महीनता के रोगी हो रहे थे। चाहे कुछ भी हो रामदयाल ने अपने को उस तरफ मोड़ा, जो सामान्यतया किसी चुप्पी की तरह सारहीन होता है। उनसे क्या मतलब? ‘रणविजय चाहे अपना पक्ष देखें न देंखे।’
लिली रणविजय की तुलना में आधुनिक थी, उससे उसकी पुरातनता गायब थी, रामदयाल ने महसूसा कि लिली रणविजय को हालांकि विवश नहीं कर रही, कि वे इस्टेट का अपना हिस्सा न छोड़ें, पर कहीं न कहीं रणविजय की अर्थहीन चुप्पी से वह परेशान थी। अपने अधिकारों को किसी नैतिकता के जाले में फंसाकर समझना कि माया-मोह से मुक्ति मिल गई और निःस्वार्थी होने का गौरव हासिल हो गया, यह एक किस्म का मनोरोग ही कहा जा सकता है। लिली का मानना था कि रणविजय का बंटवारे के यथार्थ से अस्वीकार उन्हें समय से टकराने की क्षमता का सम्यक उपयोग भी न करने देगा। वैसे बंटवारा रणविजय का व्यक्तिगत मामला है, ऐसी स्थिति में रणविजय पर दबाव बनाना मूर्खता के सिवा कुछ और नहीं।
लेकिन मैं किसी न किसी समय इस्टेट की तरफ आऊंगी जरूर, वह तो बहुत ही अच्छा हुआ कि जब महल में मैं थी मुझे कुछ न मालूम चला, रणविजय ने खामोशी साध लिया और मैं भाभी रानी के दुलार में उलझी गई थी। वैसे मुझे बार बार यह आभास हो ही जाता था कि महल की दीवारें जितनी मजबूत हैं, इसमें रहने वाले उतने ही कमजोर और लुज-लुज हैं। यहां की सारी चीजें और बातें सड़ान्ध फैलाने वाली है। सड़े हुए लोगों के बीच रहने वाला ताजा आदमी पहले बासी होगा फिर एक दिन सड़ जाएगा। मैं तो शिकार पर जाने के लिए जिद कर रही थी तथा वहां सारा कुछ किसी उत्सव की तरह महसूसना चाहती थी पर बच गई। वह जगह तो ऐसी है जहां सिर्फ और सिर्फ शोक मना कर आत्मदाह करने की कोशिश ही की जा सकती है कि सारा कुछ खत्म हो चुका है, न कुछ करने के लिए शेष है और न ही किसी अच्छी या बुरी कल्पना में ही डूबने लायक। निर्मम-मृत्यु शोक में डूबा हुआ जीवन, आक थू! यह भी कोई बात है?
रामदयाल ने लिली से खूब बातें की तथा समझने की कोशिश, कि लिली रणविजय का संपूरक है कि नहीं तथा पढ़ा- लिखा अंग्रेजी डैड और अश्क्षिित ममा के द्वन्दों का कोई रूपक तो नहीं, पर वह तो समय की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी, उत्साह और उमंग से पूर्ण, एक ताकतवर महिला। वे रणविजय में खो गये,
‘यह जितना चुप्पी पीने वाला दिखता है उससे अधिक वक्ता है, अपने अन्तर्मन से बतियाने वाला तभी तो लिली का चुनाव कर पाया।’
एक औरत दिल्ली में
रामदयाल दिल्ली जाकर महसूसने लगे कि वे आजाद दिल्ली देखें कि अब गुलामी के आतंक हैं कि नहीं, यहां की सडकों, गलियां और मकानों में से गुलामी की डायन की भयानक आवाजें अब नहीं निकलती होंगीकृअब तो हर जगह बसन्ती हवा बहती होगी, आंखों में रस-भरी बदरियां थिरकती होंगी और लोग होंगे कि अपने द्वारा प्रायोजित कर्तव्यों को पूरी स्वतंत्राता के साथ निपटा रहे होंगे।
रणविजय ने मुजफ्फर की कार निकाली, जो वास्तव में एक खूबसूरत और आकर्षक कार थी। रामदयाल की खटारा जीप अगर उसके साथ खड़ी हो जाये फिर तो कार का रंग ही फीका पड़ जाय। रामदयाल कार देखते ही रह गये, अन्ततः उन्होंने पूछ ही लिया ‘कब खरीदी?’
‘खरीदी नहीं यह कार, भारत विभाजन का पुरस्कार है और यह मकान भी जो कभी हवेली थी नवाब मुजफ्फर की बताया रणविजय ने।
‘विभाजन का पुरस्कार! समझा नहीं।’
समझने लायक इसमें है भी क्या? फिर रणविजय ने पूरा किस्सा सुनाया जो मुजफ्फर से जुड़ा हुआ था, जो भारत विभाजन की त्रासदी था, क्योंकि मुजफ्फर पाकिस्तान जाना नहीं चाहता था। यदि मां और बेगम की जिदों के प्रति वह लापरवाह हो जाता फिर तो यहीं रह जाता।
अंग्रेज हाकिम तो इस कार पर कभी बैठता ही नहीं था, कार देखते ही वह मुजफ्फर में खो जाता सोचने लगता कि मुजफ्फर ने उसे उपहार देकर तमाचा मारा है। रणविजय कार में बैठते, उसे चलाते तथा मुजफ्फर को याद करते कि निराश व हताश आदमी जो कर सकता है वही किया मुजफ्फर ने, सो निराशा के कर्तव्य का सम्मान किया जाना चाहिए जिसमें किसी प्रतिफल की चाहना ही नहीं होती।
रणविजय ने कार का फाटक खोला और रामदयाल के लिए इशारा किया कि वे चलायेंकृरामदयाल ने इनकार कर दिया ‘नहीं उनके वश का नहीं, वे कार नहीं चला सकते, यह दिल्ली है, जो सभी को अनुमति नहीं देती कि कोई ऐरा गैरा उसकी सड़कों पर कार दौड़ाये।’
विवश होकर रणविजय ड्राइविंग सीट पर बैठे और रामदयाल उनकी बगल वाली सीट पर। दिल्ली की सड़क पर मुजफ्फर की कार दौडने लगी जो सीधे संसद भवन की तरफ जा रही थी, पाकिस्तान में होती तो वहां की संसद भवन की तरफ जाती। वैसे पाकिस्तानी या भारतीय समय पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा था, केवल इतना हुआ था कि दंगे रुक गये थे, दंगों के व्यापारी अपनी-अपनी खोलों में दुबक लिये थे। आम जनता जो स्वतंत्राता के रंगीन सपनों में डूबी हुई थी वह फिर आज़ादीके बाद दूसरे सपनों में डूब गई कि अब हर तरफ प्रकाश ही प्रकाशहोगा,देश के कोने-कोने में रोटियां बिखरी हुई मिलेंगी, भूख को भी अपनी आत्महत्या की तैयारी करनी पड़ेगी। कार सीधे संसद भवन जा पहुंची, बिना किसी जाम या सडक पर होने वाली दूसरी यातनाओं के न कहीं ट्रैफिक पुलिस वालों ने कार रोका, न हीं किसी थाने के दरोगा ने। यहां तक कि कोई उचक्का भी नहीं मिला जो कार रोकता तथा कार में सवार होकर रणविजय की कनपटी पर रिवाल्वर लगा देता फिर किसी तानाशाह की तरह गुर्राता...कृ
‘घुमाओ कार, उस तरफ जहां अंधेरा हो और तुम दोनों को लूटा जा सकता हो तुम्हारे पास ऐसी हैसियत नहीं जो इस तरह की कार पर चलो।’
कुछ भी नहीं हुआ। कार संसद भवन के पास थी अपनी विशेष गरिमा के साथ जैसे किसी शौकीन मंत्राी की हो। संसद उस समय स्थगित थी, वहां भयानक किस्म का सूना-पन था। रामदयाल की चाहना थी कि वे स्वतंत्रा संसद की कार्यवाही देखें तथा समझने की कोशिश करें कि वहां कानून कैसे बनाये जाते हैं, वहां की होने वाली बहसों का रूख क्या होता है? लेकिन संसद सत्रा तो स्थगित था, ऐसी स्थिति में यही समयानुकूल था कि वे लोग अपने क्षेत्रा के सांसद से ही मिल लें। फिर वे लोग सांसदों के आवासों की तरफ थे यह पूछते हुए कि यू. पी. के सांसद किधर रहते हैं।
सांसद जी अपने आवास पर हैं कि नहीं यह दुविधा थी, यानि हो भी सकते हैं और नहीं भी, हो सकता है अपने स्थाई आवास पर हों, क्योंकि उनका जुड़ाव दिल्ली से काफी पुराना है। उनके बाप दादा दिल्ली के प्रभावशाली लोगों में थे, अंग्रेजों के जमाने में अंग्रेजी कानून पीछे चला करता था और उनके पुरखे उसके आगे-आगे। उन्हें जम्हाई आती थी तो आला हाकिम नींद में चले जाते थे। लेकिन सांसद ने 1942 में ही अपनी खानदानी परंपरा को लतिया दिया और गांधी जी की लंगोटी और छड़ी को जमाने का ब्रह्मास्त्रा मान लिया कि अंग्रेजों के पास इसका विकल्प नहीं।
सांसद जी तो चाहते थे कि उन्हें दिल्ली के पड़ोसी प्रदशों से ही टिकट मिले पर वे इस दौड़ में काफी पीछे पड़ गये, क्योंकि बहुत सारे लोग थे जो दिल्ली अपनी पीठ पर खाद की बोरी की तरह बांध कर चला करते थे, आवश्यकता पड़ने पर खाद की बोरी भी दिया करते थे, इस मामले में सांसद थोड़ा कमजोर था, वह जब समझता कि बोरी खोलनी चाहिए तभी देखता कि वहां खुली हुई तमाम बोरियां हैं। फिर वह अपने में डूब जाता कि राजनीति में अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है फिर वह राजनीति का पहाड़ा याद करने लगता।
मालूम हुआ कि सांसद जी आवास पर नहीं हैं, लेकिन बहुत ही कम समय पर वे आवास पर होंगे। आवास पर एक जरूरी बैठक है जो एक घंटे बाद प्रारंभ होगी, उनके क्षेत्रा के कलक्टर भी उसमें शामिल होंगे।
रामदयाल असमंजस में पड़ गये, क्योंकि कलक्टर का ट्रांसफर नहीं हुआ था, वही कलक्टर था जिसने भइयाराजा की बातें बताया था। क्या हुआ यदि वही है तो वह रणविजय को अच्छी तरह जानता पहचानता है। हां उसे सन्देह हो सकता है कि शायद मैंने उसकी बातें जो भइयाराजाके बाबत थीं रणविजय को बता दी हों, लेकिन रामदयाल असमंजस से श्शीघ्रबाहर निकल लिये।कृ
रणविजय की किसी से मिलने की योजना नहीं थी। वे रामदयाल के साथ थे, उनके सामने कोई दूसरा आवश्यक काम भी नहीं था, सो वे समय दे सकते थे तथा सांसद की प्रतीक्षा कर सकते थे। रामदयाल के लिए भी प्रतीक्षा करना ही उचित था। सांसद आवासों के पास में ही एक चायखाना था, जो स्वतंत्राता की लहर से प्रभावित जान पड़ता था। चायखाना बहुत हसीन नहीं था फिर भी बदसूरती से ऊपर था। वहां बैठे लोग खादी के कपड़ों में थे, कुछ के सिर नहीं दीखते थे, उनके सिरों पर आड़ी तिरछी गांधी टोपियां थीं तथा सिरों का गंजा-पन नहीं दीख रहा था। सारे लोग अपनों जैसे जान पड़ रहे थे।
चाय का दूकानदार एक वाचाल आदमी था, वह बात-बात पर बक-बक करता तथा किसी भी बात को काफी खींचता। उसके पास राजनीतिक व्यवहार की चंचल भाषा थी, उसने रामदयाल और रणविजय को देखते ही आमंत्रित किया...
‘आइए सर! आइए सर आपका स्वागत है,’ इतना वह बोल ही पाया था कि दो जन और आ गये जो खादी के कुर्ता-धोती में थे, उनके सिर खाली थे, वहां टोपियां नहीं थीं, सामान्यतया वे लोग नव गान्धीवादी दिख रहे थे जो गान्धी टोपी को किसी बोझ की तरह समझते थे।
दूकानदार ने अपनी बोली को आगन्तुकों के अनुसार बदलाकृ
‘आइए पधारिए महोदय! आपका स्वागत है।’
‘बोलिए क्या सेवा करूँ?’ इसी तरह दूकानदार सभी से पूछता था। तथा खुद सामने खड़ा हो जाता था। उसकी विशेषता थी कि वह भी खादी के कपड़े में लिपटा हुआ था, उसे कुर्ता पाजामा में देखना अच्छा अनुभव था। रामदयाल ने दिल्ली आते समय अपना पैंन्ट शर्ट उतार दिया था, अक्सर वे यही करते थे। लेकिन रणविजय पहनावे को नकल मानते थे वे नहीं समझ पाते थे कि व्यक्तित्व निर्माण में भूषा की कितनी जरूरी भूमिका है। उन्हें सहज लगता सो वे अंग्रेजों की तरह शर्ट और पैंट पहनते, वैसे भी उन्हें धोती पहनना नहीं आता था। उनका सोचना था कि धोती टांगों को नहीं ढंक पाती, सो नंगी टांगे भद्दी दीखती हैं।
विदेशी कपड़ों से रामदयाल तथा रणविजय दोनों को नफरत थी, सो वे लोग कांग्रेस में शामिल होने के बाद से ही खादी पहनने लगे थे। रणविजय भी खादी में ही थे फिर भी दूकानदार नहीं समझ पाया कि वे कांग्रेस के कार्यकर्त्ता हैं, उसने समझा कि रामदयाल जैसे नेता के साथ कोई अधिकारी है तथा वह नेता जी को चाय पिलाने के लिए यहां आया है, सो उसने सर संबोधित किया नहीं तो महोदय कहता-वैसे स्वतंत्राता के बाद दिल्ली में महोदय और मान्यवर तथा श्रीमान् जैसी हिन्दी, संसद भवन ही नहीं कार्यालयों तक में घुस चुकी थी, जो कभी सर हिज हाईनेस जैसे अंग्रेजी विशेषणों से दबे हुए थे। यह अच्छी शुरूआत थी जो स्वतंत्राता के बाद महसूस की जाने लगी थी।
चायखाने में अंग्रेजी साम्राज्यवाद की गन्ध कहीं नहीं थी, जो एक अच्छी बात थी फिर भी यह तो था ही कि वहां गांवों के कीचड़ और गोबर माटी या सावन की पहली वारिश वाली मिट्टी की सोन्धी गंध भी नहीं थी, वहां स्वतंत्राता का ताजा वर्तमान था, मुस्कुराता हुआ, जो गुलामी के लम्बे संघर्षों के बाद हासिल हुआ था।
रामदयाल ने काफी पीते हुए रणविजय को स्वतंत्राता की उपलब्धियों की तरफ खींचा...कृ ‘अब तो हम स्वतंत्रा है?’ शायद यह स्वतंत्राता हमें इस लायक बना दे कि हमें आदमी होने पर शर्म न महसूस हो’
‘संभव है,’ रणविजय ने बताया, लेकिन खतरे भी कम नहीं क्योंकि स्वतंत्रा रहना हमारी आदत नहीं, हमें हमेशा एक चतुर चरवाहे की आवश्यकता रहती है, कि हमें वह किसी मजबूत डंडे से हांकता रहे।’
‘हां ऐसा तो है आज भी हम चरवाहों की ऐसी नस्लें नेता व अधिकारी के रूप में हर जगह देख सकते हैं।’
इसी तरह की ढेर सारी बातें रणविजय और रामदयाल ने कीं, और पता ही नहीं चला कि एक घंटा गुजर गया ‘अब तो सांसद जी आ गये होंगे।’
‘हां आ तो जाना चाहिए’
चलिए चला जाय कहते हुए रामदयाल ने चाय के दूकानदार से पूछा..कृकृ ‘कहिए मान्यवर! कितना भुगतान करने के बाद हम अपने को मुक्त समझें।’
‘केवल काफी ही तो ली है आप लोगों ने, सिर्फ एक रुपया, यानि कि दो अठन्नियां मांग कर दूकानदार रामदयाल की तरफ देखने लगा, जैसे पूछना चाह रहा हो कि कहां से पधारे हैं, दिल्ली आने का उद्देश्य क्या है? लेकिन उसने कुछ पूछा नहीं।
कुछ देर बाद रामदयाल और रणविजय सांसद आवास पर थे। सांसद का आवास दूसरे तल्ले पर था, वह एक छात्रावास जैसा स्थान था। छात्रावासों वाली चहल-पहल वहां थी पर सादगी भी कम न थी यानि लम्बाई में फैला हुआ, जिसमें कमरे दर कमरे। वहां बताया गया कि सांसद जी कलक्टर के साथ मीटिंग में हैं।कृ
रामदयाल ने बताने वाले को अपना नाम बताया...कृकृ
‘जाओ बोलो, हमारे पास अधिक समय नहीं तुरन्त सांसद जी बाहर आयें, उन्होंने रामदयाल का अभिवादन किया और रणविजय का भी।
‘अरे आप लोग यहां, भीतर आ जाना चाहिए था’
‘भीतर जाना आसान बनायेंगे तब न ये सज्जन फिर पहरेदारी काहे कर रहे हैं?’
भीतर कलक्टर था कलक्टर भइयाराजा के हाई कोर्ट वाले मुकदमे के संबंध में आया था। उसे सांसद जी से जानना था कि वह सरकार को किस तरह का उत्तर दे, हाई कोर्ट ने राजस्व सेक्रेटरी और मंत्राी जी को जवाबदेही के लिए निर्देशित किया है। अभी तक उस विवादास्पद परिक्षेत्रा में जमीनदारी विनाश अधिनियम लागू नहीं किया गया है।
कलक्टर को यह अनुमान नहीं था कि वह जब सांसद जी के यहां होगा, ठीक उसी समय रामदयाल और रणविजय भी वहीं आ जायेंगे। ये दोनों जन कांग्रेस पारटी के प्रभावकारी व आक्रामक लोग थे तथा हमेशा महसूसते थे कि सरकार उनकी है तथा अधिकारी गण मात्रा कर्मचारी हैं व उन्हें आज्ञाओं के अनुपालनों की विशेषज्ञता हासिल है। रामदयाल और रणविजय को देख कर कलक्टर प्रथम द्रष्टया सकपकाया जैसे उसकी कोई चोरी पकड़ी गई हो, पर सांसद जी तो तटस्थ थे, उनके चेहरे पर पद की दृढ़ता थी। सांसद जी ने कलक्टर को उकसाया...कृ
‘आप बात जारी रखें, आखिर सरकार क्या चाहती है? भइयाराजा भी कांग्रेसी विधायक हैं फिर सरकार उनके विपरीत तो कुछ करेगी नहीं।’
‘यही तो समस्या है सांसद जी! राजस्व मंत्राी जी ने साफ-साफ कहा है कि उत्तर प्रदेश का कोई भी क्षेत्रा जमीनदारी विनाश की कार्यवाही से नहीं बचना चाहिए, चाहे वह क्षेत्रा भइयाराजा का ही क्यों न हो।’
‘आखिर कैसे करेंगे वहां जमीनदारी विनाश? जब वहां ‘रिकार्ड आफ राइट्स’ ही नहीं तैयार किये गये हैं।’
‘हां यही सबसे बड़ा इस्सू है।’
रामदयाल और रणविजय ओढ़ी हुई खामोशी में थे। उन्हें क्या पड़ी जो कुछ बोले-लेकिन सांसद जी खामोश नहीं थे उन्होंने पूछा...कृकृकृ
‘वहां फारेस्ट का क्या हुआ? एक दिन डी.एफ.ओ. आया था, बोल रहा था आपकी तरफ से कोई आदेश जारी नहीं हुआ, नहीं तो फारेस्ट का सीमांकन हो गया होता।’
‘सीमांकन तो राजस्व भूमि का भी होना है, माननीय मुख्यमंत्राी जी का मौखिक आदेश है कि सीमांकन का काम वन विभाग को ही दे दिया जाय।’
‘भाई! आप देख लीजिए, जमीन का मामला काफी पेचीदा होता है, राजस्व भूमि का सीमांकन तो राजस्व मंत्राी जी को कराना चाहिए आप करायें, आप राजस्व के सर्वेसर्वा हैं।’
‘लेकिन कैसे? मुख्यमंत्राी जी चाहें तब न। कलक्टर ने अपनी विवशता बताया’
बोलिए! आप मुझसे किस तरह की अपेक्षा करते हैं, प्रदेश सरकार के मामलों में मैं कुछ भी न कर पाऊँगा। मैं अपनी सीमायें जानता हूँ। आप वहीं किसी से संपर्क करें। नहीं तो जैसा राजस्व मंत्राी जी कह रहे हैं वहीं करें, हाई कोर्ट तो किसी को छोडने वाली नहीं।
थोड़ी देर में कलक्टर चला गया फिर सांसद जी ने रामदयाल और रणविजय को घेरा। कलक्टर ने सांसद जी को मीटिंग के पहले ही बता दिया था कि भइयाराजा रणविजय को इस्टेट में कुछ नहीं देने वाले। सांसद जी को अचरज लगा था, नहीं ऐसा नहीं होगा। कलक्टर के जाने के बाद सांसद ने सारा कुछ साफ-साफ बता दिया कि वह अब अपने स्तर से भइयाराजा का पक्ष लेने वाला नहीं।
रामदयाल और रणविजय मना करते रह गये कि वे लोग कल दुबारा आ जाएंगे पर सांसद कहां मानने वाला था फिर वे लोग सांसद के स्थायी आवास पर थे। आवास किसी भव्य ईमारत की रूप में कम से कम एक एकड़ की जमीन पर खड़ा था। भवन के आगे-पीछे अगल-बगल चारों तरफ खाली जमीन थी जो पानी और आदमियों के श्रम की बदौलत किसी पार्क का आभास देती थी। आवास के अगल-बगल फूलों की मुस्कुराहटें बिखरी हुई थीं, जो कलियां थीं, उनका कौमार्य भी देखने लायक था। उन्हें देख कर साफ लगता था कि श्रम की खरीद का उपयोग कुशलता से किया गया है। रणविजय और रामदयाल के लिए भी सांसद का आवास अद्भुत लगा किसी खूबसूरत महल को लजवाता हुआ। कोई भी सामान्य आदमी उस भवन को देख कर महल या हवेली ही कहता, पर उसका नाम हवेली नहीं था, क्योंकि उसे किसी राजा ने नहीं बनवाया था वह व्यवसायी का था।
रामदयाल और रणविजय का सांसद ने खूब स्वागत किया। खाना खिलाने के बाद ही सांसद ने उन लोगों को छोड़ा। तथा आमंत्रित किया कि जब संसद का सत्रा प्रारंभ हो वे लोग एक बार फिर आवें। रणविजय को तो उसने उलाहा भी, आप यहीं हैं और कभी भी नहीं मिले। अगला आम चुनाव भी आ गया, और आप लोगों ने यह नहीं महसूसा कि अपने सांसद से मिलना चाहिए। रामदयाल ने सांसद से साफ बताया कि कौन बिना किसी काम के दिल्ली आये। हां रणविजय को आते रहना चाहिए वे यहीं रहते हैं।
सांसद से भइयाराजा और रणविजय के बटवारे के बारे में कोई बात नहीं हुई। रणविजय को तो बात करना ही नहीं था और रामदयाल ने बंटवारे को अपने मन से बाहर निकाल दिया था कि अब उसके बारे में कुछ भी नहीं सोचना।
रामदयाल की उत्सुकता थी कि वे बनारस के बारे में सांसद से पूछें। राममनोहर लोहिया वाले समाजवादी दल के नेतृत्व में हरिजनों ने जो विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश किया था, कई समाजवादियों को लाठियां लगी थीं, बनारस के राजनारायण को काफी चोटें आई थीं, उनकी एक टांग टूट गई थी। बनारस में हिन्दू बनाम अहिन्दू का मुद्दा उठ खड़ा हुआ था। एक आश्रमी सन्त ने दूसरा विश्वनाथ मंदिर बनवाने की घोषणा की थी। क्या बनारस की वह घटना संसद में भी उठी? फिर संसद का क्या रूख है उसके बारे में? ये जो हिन्दू और अहिन्दू का मामला है आखिर कब तक चलेगा? अब गांधी जी भी तो नहीं रहे जो हरिजनोद्धार कार्यक्रम चलायेंगे। स्पृश्य और अस्पृश्य का मामला आज तो कांग्रेस पारटी की सूची से गायब है। पर जाने क्या सोच कर रामदयाल ने सांसद से बनारस की घटना के बारे में कुछ भी नहीं पूछा।
वैसे भी सांसद क्या बताता? वह एक व्यवसायी था तथा राजनीतिक पद सांसद का उपयोग अपने व्यवसाय के हित में करने के लिए पारटी में आया था। वह एक चालाक आदमी था तथा राजनीति के आधार स्तम्भों जो टिकट वगैरह या मंत्राी आदि बनाया करते हैं उनकी आंखों में धूल झोंक सकता था तथा अपने राजनीतिक समर्पण को हसीन बना सकता था कि लोग हसीनी पर झूम-झूम जाते। वही हुआ, उसे पारटी का टिकट मिला और वह अब सांसद है, यही हाल विधान सभा का भी था। रामदयाल विधान सभा के कुछ सदस्यों को देख कर महसूस करने लगे थे कि विधान सभा में दो तरह के चेहरों का जमावड़ा है, एक चेहरा तो उन लोगों का है जिसे अंग्रेजी जेलों की यातनाओं ने बनाया है दूसरा चेहरा उन लोगों का है जो अंग्रेजों के तलवे चाटा करते थे। जेल छाप कांग्रेसी आज जहां भी है, जिस हाल में है, उनकी जेब में यातनादाई कोई न कोई जेल अवश्य है, लेकिन तलवाचाट कांग्रेसियों की बात दूसरी है उनके दिल दिमाग में किसी मजबूत सत्ता प्रभु के दोनों हसीन तलवे ही हैं। वे लगातार कोशिश में रहते हैं कि उन्हेें मौका मिले फिर वे तलवा चाटना प्रारंभ करें। चिकने तलवे तो हर काल में होते ही हैं। ये तलवे मुगल काल में जितने महत्वपूर्ण और परिणामकारी थे, उतने ही अंग्रेजी काल में भी। आज़ादीके बाद भी उनकी ताकत में किसी तरह की कमी नहीं आई, बल्कि तलवा चाटना काफी सुविधाजनक भी हुआ कि हर आमोखास को आज़ादीहै कि वह तलवा चाटे और वर्तमान को अपने अनुकूल बनाये। संसद की तरफ आने और सांसद से मिलने की योजना रामदयाल ने बनारस की घटना मन्दिर में हरिजन प्रवेश के मुद्दे को विस्तार से जानने के लिए ही बनाया था पर सांसद से मिलने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि उस सांसद से क्या पूछना? जिसने जेल नहीं देखा, बर्फ की सिल्ली पर जिसे लिटाया नहीं गया, किसी अंग्रेजी सिपाही ने अपने डंडे से जिसकी पीठ और खोपड़ी का भूगोल ही नहीं नापा, वह क्या बताएगा बनारस की घटना के बारे में, एक ऐसी घटना जो कांग्रेस पारटी ही नहीं, सरकार को भी किसी राजनीतिक मजाक में तब्दील कर रही हो कि देखो! तुम्हारे गांधी कहां हैं? उनका हरिजनोद्धार कहां हैं? नागरिक समानता कहां है?
बहुत कुछ विचार कर रामदयाल ने खुद को रोक लिया था और सांसद से कुछ नहीं पूछा था। सोचा अवश्य था कि दिल्ली से लौटने के बाद वे गांधी जी की तर्ज पर सामूहिक भोज का आयोजन अवश्य करेंगे तथा गन्दी बस्तियों की सफाई का भी। उन्होंने बनारस की घटना पर रणविजय से विस्तार से बातें की, रणविजय ने आश्वासन भी दिया कि वे और लिली, दोनों उसमें शामिल होंगे।
रणविजय को सांसद का व्यवहार काफी शालीन और शिष्टता पूर्ण लगा जबकि वह धन दौलत की परतों से ढंका हुआ था वहीं रामदयाल को सांसद के व्यवहार में अंग्रेजी नाटकीयता दिखी थी जो आज्ञाकारिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धतायें प्रदर्शित कर रही हो। फिर भी सांसद एक व्यावहारिक आदमी, उन लोगों को जान पड़ा था जो व्यवहार को भी रुपयों में बदल सकने की क्षमता रखता हो।
गांधी जी के समाधि स्थल पर जाने का प्रोग्राम दूसरे दिन था, लिली और उसके डैड को भी वहां आना था, सो रणविजय सीधे घर पर आ गये। लिली और उसके डैड, किसी काम से निकले थे। लिली की ममा घर पर थीं तथा रणविजय और रामदयाल की प्रतीक्षा कर रही थीं। उनके स्वास्थ्य में सन्तोषजनक सुधार था। घर पहुंचते ही उन्होंने रामदयाल को टोका...कृ
‘पंडित जी! कहां देर कर दी आप लोगों ने?’
लिली की ममा रामदयाल को पंडित जी ही पुकारतीं। उनके पुकारने में गांव होता, पंडितों को खास तौर से दिया जाने वाला सम्मान होता। रामदयाल ने महसूसा कि लिली की ममा से गांव अलग नहीं हुआ है। उनका अतीत अपने चुनी हुई अच्छाइयों के साथ उनके पास है। रामदयाल ने लिली की ममा को रोका भी कि ‘मुझे रामदयाल ही पुकारा करें, मुझे काफी भला लगेगा, उससे आपकी निश्छल आत्मीयता मेरे साथ होगी जो लिली और रणविजय को उपलब्ध है।’
‘नहीं, आत्मीयता तो आपके साथ है ही, वह आपकी है, लेकिन पंडित जी पुकार कर मुझे लगता है कि मैं किसी अपने को संबोधित कर रही हूं जो आदमी को आदमी समझता है, जाति बिरादरी वाला नहीं।’
‘आप लोग खाना तो खा लीजिए, फिर उन्होंने रणविजय से कहा कि इन्तजाम करवा दीजिए लिली की ममा पूरी तरह स्वस्थ होतीं तो शायद खाना खुद परोसतीं, पर उन्हें मनाही है कि अभी सात-आठ दिन तक और उठना-बैठना बन्द रखें। सो उन्होंने रणविजय को सहेजा।कृ
वे लोग तो पहले से ही खाना खा कर आये थे फिर भी रणविजय ने रामदयाल को पुकारा। वे ना, नू करते रहे पर रणविजय और लिली की ममा का आग्रह ठुकरा नहीं सके।
डाइनिंग टेबुल पर देहाती थाली में खाना रखा था, खाना पूरी तरह ब्राह्मणी था, पूडियां, कचौडियां, कोहड़े की सब्जी, मिर्च और नमक, साथ में खटाई भी, खाना देख कर रामदयाल अचरज में थे, रात में भी पूडियां कचौडियां और दिन में भी, लिली की मां अभी तक भूली नहीं है कि ब्राह्मण कच्चा खाना, चावल दाल, रोटी वगैरह सभी बिरादरी वालों के यहाँ नहीं खाते।कृ
रामदयाल खाना देख कर ठिठके थे, एक तो बहुत अधिक था, तथा दूसरा उन्हें सीधे तौर पर ब्राह्मण बनाया जा रहा था जिसे वे कब का भूल चुके थे। वे अपने को ब्राह्मण मानते भी नहीं थे तथा कर्म-कांड के किसी आडम्बर का निर्वाह भी नहीं करते थे, वे खुद को कुजात मानते जिसकी कोई जाति ही न हो, वे रणविजय को देखने लगे।
रणविजय तो जानते थे कि रामदयाल ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मण नहीं हैं और उन्होंने उनके खाने के बारे में ममा से कुछ कहा भी नहीं था। ममा ने अपनी मर्जी से ही ऐसा बनवाया होगा। रणविजय ने अपनी सफाई दी तब रामदयाल ने खाना आरंभ किया कि वे ममा से बोलेंगे।
लेकिन ममा क्या बतातीं कि उन्होंने पूडियां क्यों बनवाई, उन्हें तो पूडियां ही बनवाना था, वे अपना धर्म नहीं बिगाडने वाली थीं, उन्होंने दिल्ली में रहते हुए भी खुद को परिवर्तित नहीं किया था, वे गांव की थीं, गांव उनके भीतर था, जैसे गांव कोई स्वर्ग हो, जिसे ब्राह्मणों का संरक्षण मिलता हो, जो देवताओं के प्रतिरूप होते हैं, ब्राह्मण कच्चा खाना खाएगा तो सृष्टि का नाश हो जाएगा, उन्हें अपनी नहीं सृष्टि बचाने की चिन्ता थी, वे कर्मकांडों में डूबी हुई विवेक व बुद्धि का न उपयोग करने वाली ऐसी महिला थीं जो दया की पात्रा थीं, निश्छल, विकार रहित गांवों की दूसरी औरतों की तरह।
खतरनाक आदमी
रामदयाल रोपित पंडित-पना में रात भर डूबे रह गये थे। उन्हें लिली की ममा द्वारा बनवाई गई पूड़ियों ने रात भर सोने नहीं दिया। पूड़ियां कड़ाही में छनती रहीं तथा हजारों साल का ब्राह्मणवाद उनकी आंखों में उछलता-कूदता रहा। क्या वस्तुतः ब्राह्मणवाद ही जांत-पात का विभाजन करता है? स्पृश्य अस्पृश्य बनाता है, खाना छुआता है, पानी छुआता है, मन्दिर छुआता है? रामदयाल ब्राह्मणवाद के चिन्तन में जो उलझे तो उलझे ही रह गये। मनुस्मृति उनके लिए सहज और सुलभ किताब थी उन्होंने मन बनाया कि वे उसे अवश्य पढ़ेंगे, ब्राह्मण ग्रन्थों को तो वे हासिल भी नहीं कर सकते तथा वेदों की रहस्यात्मकता व उसके रूपकों को समझना उनके वश का नहीं।
किताबों के अलावा रामदयाल के लिए सामाजिक संरचना का ताना-बाना था जिसे वे पढ़ व गुन सकते थे तथा उस ताने-बाने में से एक ऐसा आदमी निकाल सकते थे जो सिर्फ आदमी हो, न छूत न अछूत, न हिन्दू न मुसलमान। ऐसा करना रामदयाल के लिए अपनी पुनर्निमिति होती। वे ऐसा कर भी रहे थे उन्हें अपना बचपन याद आया।
मां हमेशा संस्कृत के श्लोकों को रटवाती, खास तौर से प्रार्थनाओं में काम आने वाले श्लोकों को, वे उन्हें रटना नहीं चाहते, उनके लिए किसी प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं था। मां डांटती, फटकारती, ‘तू ब्राह्मण है, तुझे श्लोक भी याद नही’ं उन्हें लगता कि मां ब्राह्मणों को परिभाषित कर रही है कि जिसे श्लोक याद होता है वही ब्राह्मण होता है।
रामदयाल श्लोकों की दुनिया से बाहर थे तथा ऐसे लोगों को देख रहे थे जो श्लोकों से बाहर रहते हुए भी सामाजिक अन्तरविरोधों से टकरा रहे थे।
‘तूं जनेऊ नहीं पहनता, तथा खान-पान में भी वही सब करता है जो ब्राह्मणों को नहीं करना चाहिए, तुम्हारे पिता कम से कम इसका तो ध्यान रखते हैं।’
रामदयाल की मां अक्सर इसी तरह के निर्देश जारी करतीं तथा एक ऐसे भगवान का डर पैदा करतीं जो अपनी उचित पूजा-अभ्यर्थना न होने के कारण कुपित हो सकता है जिसका परिणाम भयानक से भयानक हो सकता है।
रामदयाल अपनी मां को समझने की कोशिश करते। उनकी मां उदार और आश्वस्त मां थी। उनका अधिकांश समय ऐसी प्रार्थनाओं में गुजरता जो संस्कृत के शब्द समूह होते। उन्हें मां अच्छा स्वर देतीं जो कर्णप्रिय होते, कभी-कभी तो अपने अर्थ खोते हुए पर वे मां की उस आध्यात्मिक उत्साह को विश्लेषित न कर पाते कि वे ऐसा क्यों करती हैं। उनकी पत्नी भी मां से कम नहीं, वह भी मां की परंपरा की विशेष उत्पाद जैसी थीं तथा प्रार्थनाओं से अपना जीवन संवारने का सपना देखती थीं। रामदयाल ने पत्नी के उत्साह को कभी रोका नहीं यह मान कर कि इससे नुकसान भी क्या है?
लेकिन एक दिन समय पलटा, उन्होंने देखा कि कुछ थालियां रसोई से बाहर निकाली जा रही हैं तथा बाहर वहां रखी जा रही थीं, जहां पहले से ही कई थालियां थीं, बाहर रखी हुई थालियां, उनके काम आती थीं, जिनकी जातियां सामाजिक रूप से अछूतों की श्रेणी की होती थीं तथा वे उनकी खेती का काम किया करते थे। दरअसल हुआ यह था कि रामदयाल का एक मित्रा बम्बई से आया हुआ था तथा वहां वह अम्बेडकर की नीतियों के प्रचार-प्रसार का काम करता था, वह एक अच्छा विचारक था तथा आदमी के पक्ष में बोलता था। वह भी उत्तर प्रदेश का ही रहने वाला था, पेट के लिए बम्बई रहता था तथा किसी कारखाने में फोरमैन था। रामदयाल ने पत्नी को सूचित नहीं किया कि उनका मित्रा किस जाति का है, सो खाना रसोई की थाली में ही परोसा गया। दूसरे दिन वही थालियां रसोई से बाहर निकाल कर फेंक दी गईं ज्योंही उनकी पत्नी को मालूम हुआ कि उनका मित्रा अछूत बिरादरी का था।कृ
रामदयाल अपना गुस्सा न रोक सके फिर तो घर में हंगामा हो गया, एक ऐसा हंगामा जो उस समय किसी को भी हसा सकता था तथा पत्नी का पक्ष मजबूत हो सकता था।
‘आखिर क्या बुरा किया थाली बाहर निकाल कर, लेकिन रामदयाल अपने फैसले पर दृढ़ थे तथा अपने घर में ही टकरा रहे थे जो सामान्यतया मुश्किल काम होता है।’
रामदयाल ने अनशन प्रारंभ कर दिया कि वे अन्न और जल नहीं ग्रहण करेंगे।’
एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन, पांच दिन गुजर गये, उन्हें मुश्किल जान पडने लगा कि वे अनशन की दृढ़ता संभाल नहीं पायेंगे, कहीं न कहीं से वे कमजोर होने लगे, लेकिन फिर भी वे अपने फैसले को टूटने से बचाने में सफल रहे। साथ ही साथ वे अपनों की पहचान करने में भी लगे थे कि उन्हें कौन संभालने आ रहा? पत्नी थीं कि वह उनके अगल-बगल मँडराती रहतीं, वह अपनी वेदना को आंखों से स्पष्ट करतीं, भरी-भरी आंखें साफ साफ संस्कारगत विवशताओं को स्पष्ट करतीं, पर उनकी विवशताओं का वहां कोई पाठक नहीं था। वहां तो उन्हीं की तरह का थोड़े भिन्न किस्म का रचनाकार था, रामदयाल के रूप में, और वे पत्नी की संस्कारगत विवशताओं को पढ़ कर अपने फैसले को स्वतः गलत तो न साबित करते और अनशन तोड़ देते।
पांचवां दिन रामदयाल के लिए काफी हास्यास्पद था। पहले के चार दिन तो यूं ही गुजर गये, कुछ उल्लेखनीय नहीं हुआ पर पांचवा दिन!कृपांचवां दिन तो ऐसे आया जैसे वह खुद ही तर्कशास्त्राी हो, रामदयाल के संस्कार-द्रोही साबित करता। रामदयाल के ससुर ही नहीं, फूफा और बहनोई भी सभी सामने थे, सभी ब्राह्मण थे तथा ब्राह्मण होने के गौरव से पूर्ण भी। वे संस्कारी ही नहीं, संस्कारों को बचाये रखने के प्रयासों वाले लोग थे। उनके ससुर ने रामदयाल को खूब खूब लताड़ा, वे फटा फट श्लोक पढ़ते फिर अर्थात...यह तो वह, ‘गोया वे श्लोकों द्वारा पुष्ट करते कि छूआछूत का व्यवहार करना धर्म की रक्षा करना होता है।’
रामदयाल के पास अपने ससुर के श्लोकों के विपरीत अर्थों वाले श्लोकों का अभाव था। शायद हैं भी नहीं, उनके पास कबीर और रैदास के कुछ दोहे थे, जिनका वजन ससुर द्वारा उद्धृत किए गये श्लोकों से काफी भारी था, पर वे संस्कृत जैसी देव-भषा में नहीं थे। सो ससुर का पक्ष वहां उपस्थित ब्राह्मणी संस्कारों के अनुपालकों के लिए काफी महत्वपूर्ण था। पर रामदयाल तो उस समय उन पंडितों से कोई विमर्श ही नहीं करना चाहते थे। क्योंकि वे जानते थे कि पंडित रटन्तू होता है, वह मूर्ति-पूजा के साथ-साथ किताबें ही नहीं व्यक्ति को भी पूजने लगता है। वे चुप थे तथा चुप्पी को लगातार बचाये हुए थे, लेकिन कब तक चुप रहते, उन्होंने थोड़ा गुस्से में कहा...कृकृ.
‘भोजन करना न करना उनका अपना मामला है, इससे किसी से क्या मतलब? मेरा मानना है कि ब्राह्मण कभी भी कर्म-कांडी संस्कारों से खुद को नहीं बचा पाएगा, यदि उसे बचना है तो ब्रह्म-रूपी समाज से सीखना होगा जिसे कर्मकांडी ब्राह्मणों ने कई विनाशकारी खानों में बांटा हुआ है।’
‘कम से कम मेरे घर में तो ऐसा नहीं चलेगा, मेरे लिए कोई छूत या अछूत नहीं है। मेरे अनशन तोडने का एक ही आधार हो सकता है कि इसी घर में मेरे गांव के सारे अछूत, मेरे साथ भोजन करें और आप लोग भी उसमेें शामिल हों नहीं तो मुझे अपनी मौत स्वीकारने दीजिए। ब्राह्मण तो वह है जो मनुष्यता को जाने, किसी किताब को नहीं, ब्राह्मण का आचरण ही किताब है।
रामदयाल के बैठका में बैठे उनके सभी रिश्तेदार चकित थे, ‘ऐसा तो कोई पतित ही बोल सकता है।’ रिष्श्तेदार उनकी पतनशीलता को निन्दनीय ही नहीं हास्यास्पद भी समझ रहे थे पर रामदयाल अड़ गये तो अड़ गये, उनकी पत्नी को अपने पति की सारी शर्तें स्वीकार्य थीं, सो वही हुआ जैसा वे चाहते थे।
लेकिन ब्राह्मणों की जमात ने उन्हें जाति से बाहर कर दिया, वह तो बाद में कुछ ऐसा हुआ कि धीरे-धीरे एक एक ब्राह्मण उनसे जुडने लगे फिर तो अब किसी को कोई एतराज नहीं कि उन्होंने कभी क्या किया था? रणविजय रामदयाल के परिवर्तित एवं नये ढंग से निर्मित होते व्यक्तित्व से परिचित थे लेकिन लिली की मां को क्या पता कि वे सिर्फ नाम के ब्राह्मण हैं उसे ओढ़ते-बिछाते नहीं, तथा एक मनुष्य की तरह रहते हैं। अपने दिमाग को ब्राह्मणी कर्म-कांड व पाखंड की कोई किताब नहीं बनाते जो साफ तौर से भेदभाव की अप्राकृतिक वर्जनाओं के सूत्रों को अभिव्यक्त करती हों।
दूसरा दिन फुर्सत वाला था, उसमें किसी प्रस्तावित काम का तनाव न था। वह साफ-साफ था तथा उसका उपयोग बकाया कामों के लिए भी किया जा सकता था। रणविजय ने अपने मित्रा के स्वागत के लिए अपने सारे कामों को स्थगित कर दिया था। सुबह उठते ही सूरज की किरणों के साथ रणविजय लिली के मां के कमरे में घुसे, यह मानकर कि वे जग चुकी होंगी तथा लिली के डैड दिन भर के कामों का ब्योरा निश्चित कर रहे होंगे।
लिली की ममा जग चुकी थीं तथा खाना बनाने वाली को सुबह के नाश्ते का मेनू बता रही थीं, कचौडियां बनाओ, उरद की दाल का आटा है, उसे भिगो लो फिर उसमें जीरा, इलायची, नमक, मंगरइल और जवाइन, सारा कुछ मिला लो। मिलाते समय सारा समान दिखा लेना, थोड़ा भी कम अधिक हुआ तो स्वाद बिगड़ जाएगा, खीर तो जैसा बनाती हो, वैसी ही बनेगी ही। मालपूआ वाली सूजी को दूध में भिगो लेना तथा नरम आंच पर उसे छानना।
रणविजय उस समय ममा की श्रद्धात्मक तत्परता से अविभूत थे कि अभी भी अतिथि का सम्मान कायम है। सो वे ममा के निर्देशों को जो वे खाना बनाने वाली औरत को बता रहीं थी ध्यान से सुनने लगे थे।
रणविजय ने मेनू सुनकर, लिली की मां को रोका।कृ
‘नहीं! ममा, आप नहीं जानतीं कि रामदयाल जी सिर्फ ब्राह्मण ही नहीं, वे एक भले आदमी हैं तथा भेद-भाव, छुआ-छूत जैसी बिमारियां उनमें नहीं। लगातार पूडियां खाकर वे परेशान हैं, कल तो खाना ही नहीं चाहते थे, कह रहे थे कि ममा ऐसा काहे सोचती हैं। वे सादा खाना खाएंगे, रोटी, दाल, चावल, अगर सत्तू वाली बाटी नाश्ते में हो तब फिर क्या कहने?
अरे! पूडियां नहीं कचौडियां बन रही हैं, उरद की दाल वाली, मीठी-मीठी चटपटा लिए, जलेबियां बाजार से आ जाएगीं। लिली की मां ने बताया और आश्चर्य किया क्या वे जात-पांत नहीं मानते, वैसे यह बहुत अचरज वाली बात है।
लिली के डैड, उस समय योगासन कर रहे थे। वे नंगे बदन तो न थे पर देह का आधा हिस्सा आर.एस.एस. के कैडरों की तरह खुली हवा में था। सघन सफेदी वाली देह पर खाकी की हाफ पैंट अच्छी लग रही थी, ऊपर की शर्ट जो कम्युनिस्टों के सुरक्षित लाल रंग की थी, वह तो अपने अच्छा होने से अधिक अच्छा थी, देखने में था कि वहां अच्छा के सिवाय भद्दे के लिए कोई स्थान न था। साठ के आस-पास वाले लिली के डैड पचासा के भीतर जान पड़ रहे थे जैसे उनकी उम्र आगे बढने की जगह पीछे की तरफ भाग रही हो। वे योगासन का अभ्यास पूरा करके सीधे उस तरफ आये जहां लिली की ममा और रणविजय थे। उन्होंने हस्तक्षेप किया..
‘काहे का मन्सौदा बन रहा है भाई! मैं भी तो जानू! क्यों लिली की ममा! लिली कहां हैं? वह तो अभी नींद में होगी, रात में दो बजे तक पढ़ेगी और सुबह दस बजे जगेगी। उसे जगाओ रणविजय!’
अंग्रेज हाकिम ने रणविजय से फिर पूछा... रामदयाल जी को दिल्ली नहीं घुमा रहे हो क्या? बातें जारी थीं, फिर यह भी था कि रामदयाल ने ब्राह्मणी संस्कारों से खुद को मुक्त कर लिया है। अंग्रेज हाकिम जानता था कि रामदयाल के पिता भी, हालांकि वैभव पीने वाले आदमी थे पर थे काफी सरल और सहज, वे अप्राकृतिक शान,शौकत के प्रदर्शन से परहेज करते थे।
‘फिर तो वही संस्कार रामदयाल का भी होगा!’
जमीनदारी टूटने के बाद, अब उनकी क्या हालत है? राजस्व का सहारा तो छिन गया!
‘सारा राजस्व सीधे सरकारी खजाने में जमा होता होगा? क्या उन्होंने आमदनी का दूसरा क्षेत्रा पकड़ा है?
कई तरह के सवाल अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल के बारे में रणविजय से एक साथ पूछा। रणविजय ने अंग्रेज हाकिम को सारा कुछ बताया भी ‘नहीं रामदयाल का दिमाग तिजोरी संस्कति और रोब-दाब की तपन से बाहर है, वे रुपयों के बिस्तरों पर सोने वाले नही हैं, न ही डंडों व बन्दूकों की भषा में अपने व्यक्तित्व का दमनकारी प्रचार-प्रसार करते हैं, सो उन्होंने जान-बूझ कर, नोटों, चांदी व सोने के दूसरे आर्थिक परिक्षेत्रों से खुद को कभी नहीं जोड़ा। उन्होंने अपनी क्षमता का उपयोग सामाजिक कार्यों के संपादन की तरफ केन्द्रित किया हुआ है, लोगों के बीच रहना, उनके दुख दर्दों को बांटना तथा कामना करना कि सभी को दो जून का खाना तो अवश्य मिले।’
लिली की ममा ने रणविजय को फिर महल का सारा हाल सुनाया जहां उन्होंने पांच साल तक अपनी मां के साथ काम किया था। अंग्रेज हाकिम महल की बाहरी क्रिया-प्रतिक्रियाओं से तो वाकिफ था, पर महल के भीतर की दुनिया से वह परिचित नहीं था। रणविजय हालांकि महल के थे, महल में ही उनकी परिवरिश भी हुई थी फिर भी उन्हें महल की भीतरी रहस्यमय दुनिया का पता नहीं था।
महल में एक से एक रहस्य थे जो महल की दीवारों से बाहर नहीं जा पाते थे। सारे रहस्य वहीं जन्म लेते और घुट-घुट कर मर जाते। लिली की ममा ने यह भी बताया कि महल का भविष्य निश्चित रूप से किसी न किसी ब्राह्मण के दिमाग से जुड़ा होता है, वह ब्राह्मण महल के लिए देवता जैसा होता है तथा खुद को ज्योतिषी कहलवाना प्रतिष्ठा परक मानता है।
एक बार महल का ज्योतिषी आया और उसने भइयाराजा की कुंडली देखा जिसे उसने ही बनाया हुआ था और घोषित किया कि किसी न किसी दिन भइयाराजा ‘राजा’ अवश्य बनेंगे, वही हुआ भइयाराजा ‘राजा’ बन ही गये। भइयाराजा के राजा बनने के पहले उसी ज्योतिषी ने तुम लोगों के पिता को बताया था कि वे भी राजा बनेंगे, पर वे कभी राजा नहीं बन पाये। उस समय लिली की ममा काफी छोटी थीं, पर इतनी बड़ी थीं कि उन्हें सारी बातें याद थीं, तुम लोगों के पिता को राजा बनने के लिए ज्योतिषी ने कई तरह के क्रिया-कर्म को बताया था, जिसमें एक क्रिया ऐसी थी जो काफी हास्यास्पद और घृणित थी। लिली की ममा की मां तो उस क्रिया को हस-हस कर बतातीं तथा कहा करती थीं कि बड़े लोग अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग न करके बहुत ही घृणित तरीके से किसी ब्राह्मण को अपना सारा कुछ मान लेते हैं, जाने क्यों वे ज्योतिषियों पर यकीन करते हैं तथा वे जैसा जैसा कहते हैं, वही करते हैं। ज्योतिषी ने तुम लोगों के पिता को बताया था कि वे महल में किसी अनजान लडकी को ले आयें, जिसकी उम्र सोलह साल से कम हो। लेकिन दिन में नहीं रात में। रात भी पूरी काली हो, अमावस्या वाली, महीना चैत्रा का हो, महल से निकलते समय कोई उन्हें न देख पाये। जिस घोड़े से जांये वह एकदम काला हो, उस पर किसी दूसरे रंग के चकत्ते न हो। काली रात में ही उस लडकी को महल में लाना होगा, जाते समय शरीर पर कपड़े भी काले हों।
ज्योतिषी ने यह भी निर्देशित किया कि वह उस दिन महल पर ही होगा तथा कुछ दूसरे तरह का अनुष्ठान करेगा।
लिली की ममा उस रहस्यमय किस्से को तोड़-फोड़ कर बताने लगीं। किसी कुशल वाचक की तरह कि उसकी रहस्यात्मकता पूरी तरह सुरक्षित रहे। मां बताती थीं कि चैत्रा की अमावस्या के दिन ज्योतिषी महल पर आया, उसका जोरदार स्वागत किया गया। उसके द्वारा किये जाने वाले अनुष्ठान को गोपनीय रखना था, सो उनकी मां का चुनाव किया गया, लिली के ममा की मां रणविजय के पिता महाराज की खासम खास थीं, वे उन पर विश्वास करते थे।
मां ने ही ज्योतिषी के लिए अनुष्ठान में काम आने वाले सामानों को जुटाया, जैसे काली गाय का घी, दूध, उसका गोबर व मूत्रा, इसके अलावा काला तिल, कौए की पांख तथा काले घोड़े की नाल। ज्योतिषी ने रात में अनुष्ठान आरंभ किया। वह अपने साथ मानव खोपड़ी का एक कंकाल रखे हुए था। कुछ दूसरे किस्म की हड्डियां भी थीं, जिसे पहचानना मुश्किल था कि वे किसी जानवर की थीं या मनुष्य की। ज्योतिषी ने महल के बाहर वाले आँगन की जगह अनुष्ठान करने के लिए पहले ही निश्चित कर दिया था। वहां की मखमली घासों की सफाई करके दो चारपाई का स्थान बना लिया गया था। जमीन की काली गाय के गोबर से पुताई कर दी गई थी, वहीं छोटा सा हवन कुंड भी बना दिया गया था। ज्योतिषी ने जब प्रस्तावित क्रिया कर्म करना प्रारंभ किया ठीक उसी समय महाराज महल से बाहर निकले, उस समय वे काले कपड़े में किसी प्रेत जैसा दीख रहे थे। कुछ देर बाद जाने कहां से एक लडकी को घोड़े पर बिठा कर महाराज महल ले आए।
अब लडकी महल में थी। जिस समय महाराज को महल के एक गुप्त कमरे में लडकी के साथ होना और सोना था तथा ठीक तीन बजे ही हवन कुंड पर आकर ज्योतिषी के निर्देशानुसार हवन करना था। उसी समय ज्योतिषी को भी एक ऐसी लडकी के साथ होना और सोना था जो मासिक धर्म के शारीरिक व्याकरण की जानकार न रही हो। ऐसी अबोध लडकी ज्योतिषी के साथ पहले से ही थी। ज्योतिषी नाम से ज्योतिषी था तथा स्वघोषित एक ऐसा श्शक्तिषाली था जिसके द्वारा निर्देशित क्रियायें करने पर कोई अपना भविष्य अपने अनुकूल बना सकता था। गोया वह एक तांत्रिक था जो भविष्य को नियंत्रित कर सकता था। वह ज्योतिषी रूपी तांत्रिक खान-पान में विशेष ध्यान रखता था। उसका खाना धुली लकड़ी की आंच से पकता था तथा वह किसी का छुआ खाना नहीं खाता था। उसी की तरह से बहुत सारे ब्राह्मणों को लिली की मां ने महल में रहते हुए देखा था, सो वे डरा करती थीं कि भविष्य का नियंत्राक ब्राह्मण पर्याप्त सेवा न किये जाने पर श्राप दे सकता है। सो वे रामदयाल की सेवा का हर संभव ख्याल रख रही थीं।
रणविजय को महल में रहते हुए भी यह वृत्तान्त न मालूम था, महल की कहानियों का यह गोपनीय हिस्सा था। रणविजय तो यह भी नहीं जानते थे कि उनकी मां कौन थीं? लिली की ममा के बताने पर मालूम हुआ कि रणविजय की मां वही अज्ञात लडकी थी, जो उनके पिता द्वारा महल में लाई गई थीं। जिनका जीवन महल में कैद होकर रह गया था, उन्होंने महल के बाहर हवा, पानी, धूप, कुछ नहीं देखा था। वे मां भी बन गई, उनके पिता फिर भी राजा नहीं बन पाये, लिली की मां जब भी उस किस्से का ख्याल करती हैं, हंसी से लोट-पोट हो जाती हैं।
हालांकि उस समय यह अनावश्यक था बताना कि महल की रहस्यात्मकता में सारा कुछ खोया रहता है, वहां जो होता है वही और उतना ही नहीं होता, कभी-कभी तो होने के ठीक विपरीत भी होता है। ऐसा होता है जिसके गवाह महल की मजबूत दीवारें होती हैं, दीवारों में ईंट की चुनाई ही नहीं, वफादारों की आज्ञाकारिता भी चुनी होती हैं तथा उनकी विशेषता होती है महल के रहस्यों को और रहस्यमय बनाना।
महल की कुलबुलाती रहस्यमयता लिली की ममा को तभी से हिलाने व झकझोरने लगी थी जबसे उन्होंने सुना था कि रणविजय को महल से निर्वासित कर दिया गया है। वे सोचने लगीं थीं कि रणविजय को सारा कुछ बता देना चाहिए, संभव है उनको अपने बारे में तथा अपनी मां के बारे में कुछ भी मालूम न हो। भइयाराजा को तो उनकी अम्मा रानी ने सारा कुछ बता ही दिया होगा, तभी तो उन्होंने रणविजय को महल से निर्वासित करने का फैसला लिया है। लेकिन रणविजय को कौन बताता, उनकी अम्मा रानी तो बहुत पहले ही मर गई थीं जब रणविजय बहुत ही छोटे थे। यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि रणविजय के पिता महाराज उनकी मां का काफी सम्मान करते थे तथा कभी भी उन्होंने उन्हें दूसरी रानी नहीं समझा, जैसा कि आम तौर पर हुआ करता है। रणविजय की अम्मा भी गजब की महिला निकलीं, वे भइयाराजा की अम्मा रानी का काफी ख्याल रखतीं, खुद उनके सिर पर तेल मालिश करतीं तथा सारा श्रंृगार-पटार भी, उनके आदेश के अनुपालन में हर समय खड़ी रहतीं।
‘तो सत्तू की बाटी में क्या है? पक जाएगी, बाटी का सारा सामान जाकर ले आओ, पुरानी दिल्ली के पास ही कहीं मिलेगी, थोड़ी उपलियां भी ले लेना, मैं अब ठीक हो गई हूं बना दूंगी।’ अंग्रेज हाकिम बाटी का स्वाद जानता था, जिसे राजा- महाराजा भारतीय खाने के रूप में कई बार उसे खिला चुके थे, लेकिन नौकरी छोडने के बाद फिर उसे बाटी खाने का मौका नहीं मिला। उसने भी बाटी प्रस्तावित किया।
बाटी का सारा सामान आ गया फिर बाटी बनी, लिली की ममा ने अपने सामने ही बाटियां बनवाया, सभी ने खाया, बाटियां ठीक बनी थीं, पूरी की पूरी घी में डूबी हुई, साथ में आलू, टमाटर और भंटे का भरता, रामदयाल को जान पड़ा कि वे अब पीछे की तरफ लौट आये हैं तथा ब्राह्मण-पना जो उनकी देह से चिपका हुआ था, गोइठे की आंच में जल चुका है। सामने ही बैठी हुई थीं लिली की ममा, लिली भी तैयार होकर वहीं बैठ गई थी। सामने गोइठे का ‘अहरा’(भठ्ठी) जल रहा था, उसकी धुंधुआती आग अपनी रफ्तार में थी, बाद में उसमें तपिश ही बची रह गई थी, जिसे गोल-गोल बांटिया पूरी ताकत से सोख रही थीं।
रामदयाल को अपनी मां का ख्याल आया, उन्होंने पाया कि लिली की ममा और उनमें कोई उल्लेखनीय फर्क नहीं, लेकिन जो छुआछूत का फर्क था वह यहां नहीं दिख रहा, वही स्नेह, वही दुलार, खाना बनाने वाली औरत ही बांटियां पका सकती थी फिर भी लिली की ममा बाटियां पका रही थीं। लिली ने खाना परोसने का इन्तजाम किया तथा भर्ता बनाया, गोया यह केवल आधुनिक ही नहीं रामदयाल ने लिली को किसी अचरज जैसा देखा और पूछाकृ‘खाना वगैरह बना लेती हो क्या?’
‘हां और नहीं तो क्या? ममा बचपन से ही सिखाया करती थी कि आत्मनिर्भर बनो, पैरासाइट नहीं, खाना पकाना आत्म-निर्भरता के पहले पाठ की तरह मुझे जान पड़ता है। खाना तो डैड भी अच्छे से बना लेते हैं, खास तौर से अंग्रेजी खाना, लेकिन वे अब भारतीय खाना ही खाना चाहते हैं।’
महात्मा गांधी की समाधि पर रामदयाल, रणविजय, अंग्रेज हाकिम और लिली दूसरे वक्त पहुंचे। मौसम सुहाना था, बादलों के चकत्ते आसमान पर साफ-साफ चिपके हुए थे। दिल्ली की प्रभुसत्ता की संप्रभुता आसमान में कहीं नहीं दीख रही थी, वहां प्रकृति का रहस्यमय खेल चल रहा था। बादल का एक टुकड़ा तेजी से आता, सामने के कमजोर टुकड़े को निर्वासित कर खुद वहीं जम जाता, कहीं से थोड़ी जगह बचती उसमें सूरज अपनी आधी अधूरी ताकत के बल पर दाखिल हो जाता। गांधी जी की समाधि के ठीक ऊपर बादल का मटमैले रंग वाला एक चकत्ता आसमान पर था और नीचे गांधी जी की समाधि थी। समाधि के ठीक सामने किसी पर्यटक की तरह रामदयाल और रणविजय खड़े थे। अंग्रेज हाकिम लिली को गांधी जी के बारे में बता रहा था, कि उनके बारे में अंग्रेजी सरकार क्या सोचा करती थीकृ
दुनिया का सबसे ‘खतरनाक आदमी’, जो जेल और बन्दूक से नहीं डरता था, जिसके लिए धन दौलत और वैभव किसी काम का नहीं, जिसका व्यक्तित्व किसी संगठन और फौज से बड़ा था, जो खुद अपने आप में एक महादेश ही नहीं संस्कृति और सभ्यता भी था।’
रामदयाल और रणविजय तो समाधि स्थल तक पहुंच कर नोआखली की भूल रही स्मृतियों में खोये हुए थे तो क्या गांधी जी के साथ उनके विचारों की भी प्रायोजित हत्या की जा रही है?
कहीं आप कामरेड तो नहीं!
गांधी जी के समाधि स्थल पर रामदयाल के बीते दिन उन्हें चिढ़ाने लगे, जब कि रणविजय भविष्य के सपनों में थे। उधर अंग्रेज हाकिम लिली के सामने स्वतंत्राता संग्राम के उन हस्तक्षेपों को प्रस्तुत कर रहा था जो गांधी जी की उपयोगिता को ऐतिहासिक आवश्यकता बनाते थे।
रामदयाल अपने नाम के पहले पंडित शब्द का प्रयोग नहीं किया करते थे, उन्हें वह शब्द चिढ़ाता था। हाल के दो तीन सालों में इस शब्द ने उन्हें कई बार बौना बनाया था, खास तौर से जब वे जनता के बीच में हुआ करते थे। एक दो बार जब वे कुछ स्थानों पर केवल पंडित होने के कारण ही बुलाए गए थे तथा पंडित यानि कि ब्राह्मण होने के कारण उनकी विदाई किसी अनुष्ठानिक ब्राह्मण की तरह की गई थी, तब उन्हें काफी अपमान महसूस हुआ था। एक तो वे किसी अनुष्ठान की वास्तविकता पर यकीन नहीं करते थे, दूसरा था कि वे अनुष्ठान की किसी क्रिया को जानते भी न थे। उन्हें जो आमंत्राण दिया गया था, उसका कारण सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मण होना था। इस प्रकार रामदयाल के लिए पंडित शब्द केवल शब्द भर ही नहीं रह गया था वह छुत-अछूत, स्वीकार्य-अस्वीकार्य का मानक भी बन गया था। जब कि व्यावहारिक रूप से वे सिर्फ एक आदमी भर थे, प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद, जो अन्य जीवों के मुकाबिले बुद्धि व विवेक वाला होता है।
रामदयाल ने महात्मा गांधी की समाधि को साक्षी मानकर, भीतर-भीतर संकल्प लिया कि वे जाति सूचक शब्दों का प्रयोग कभी नहीं करेंगे चाहे जो भी हो। दूसरी ओर रणविजय थे कि भविष्य के लिए कुछ नया करने के लिए सोच रहे थे। किताबों के अनुवाद के अलावा वे नया क्या कर सकते थे! यह उनके लिए स्पष्ट नहीं था। महात्मा गांधी की समाधि पर फूल वगैरह चढ़ाने के बाद उन लोगों ने महात्मा गांधी की प्रार्थना दुहराया। प्रार्थना दुहराते ही मौजूदा कांग्रेस पारटी और सरकार जो कांग्रेस की ही थी दोनों बिल्कुल अलग-अलग जान पड़े। कांग्रेस पारटी की कार्य संस्कृति से जनान्दोलन जैसी बातें बाहर होने लगी थीं, उनमें सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे कार्यक्रम नहीं थे, केवल सरकार थी, सरकारी घोषणाएं थीं, सरकारी घोषणाओं में बेरोजगारी का समापन था, सबको शिक्षा का नारा था तथा समाज को समानता के दर्जे पर पहुंचाने की कर्णप्रिय बातें थीं। सरकार के मुकाबिले पारटी कहां थीं, पारटी क्या करने वाली थी, यह सारा काम धाम संसद सदस्यों या विधानसभा सदस्यों को टिकट देने तक सिकुड़ चुका था। कांग्रेस पारटी के विपक्षी थे कि वे लगातार कांग्रेस पारटी पर आरोप दर आरोप लगा रहे थे।
गांधी जी की समाधि जो कांग्रेसी संघर्ष की गाथा थी तथा अपने भीतर एक ऐसे आदमी को समेटे हुई थी जो पूरा के पूरा आंदोलन था, जो अंग्रेजी साम्राज्य के समापन का अहिंसक हथियार था। उनकी समाधि अन्य समाधियों की तरह समय की भयानक चुप्पी में थी तथा वहां वही माहौल था जो किसी पूज्य स्थान का होता है, जहां पूजा ही आवश्यक होती है, कुछ भजन हो जाये, कुछ फूल चढ़ा दिये जायें, मात्रा इतना ही।
समाधि गांधी जी की थी, जैसे उनकी यादें और उनकी शिक्षाओं को वहां किसी इतिहास में डूबे रहने के लिए दफना दिया गया हो। रामदयाल के लिए वहां की स्थिति काफी कष्टकर थी, वहां की चुप्पी निराश व हताश करने वाली थी, उन्हें लगा कि गांधी जी के क्रान्तिकारी विचारों को यहां दफना दिया गया है। वे एक छोटे आदमी हैं सो पूरे देश के बाबत क्या कर सकते हैं? उनकी कार्यक्षमता भी इतनी नहीं कि वे गांधी के विचारों को देश स्तर पर व्यवहृत करने के लिए प्रयास कर सकें। उन्हें लगा कि गांधी इस खूबसूरत समाधि स्थल तक सिमटा दिये गये हैं, एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब वे कहीं भी न रहेंगे।
रामदयाल ने मानसिक तौर पर अपना माथा पीट लिया और फैसला लिया कि वे अब खामोश नहीं रहेंगे। अपने क्षेत्रा के लिए जितना संभव हो सकता है करेंगे। जिले के कांग्रेसियों में रणविजय व रामदयाल ही ऐसे लोग थे जो स्वतंत्राता संग्राम के लिए मिलने वाली धनराशि जो पेंशन के रूप में थी, लेने से इन्कार कर दिया था। कलक्टर को लिखित रूप से दे दिया था कि उन्हें पेंशन की आवश्यकता नहीं, जब कि बहुत सारे ऐसे थे जो पेंशन लेने के लिए रात-दिन एक किए हुए थे। स्वतंत्राता संग्राम के दिनों में ऐसे लोग भी थे जो अपराधों को अपना व्यवसाय माना करते थे, उन्हें भी पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जेल भेजा था उनकी पीठ पर भी स्वतंत्राता संग्रामी होने की मुहर लगी थी। वे हर जायज नाजायज तरीका अख्तियार कर पेंशन के हकदार बन चुके थे, रामदयाल ने ऐसे गलत कामों का विरोध करना चाहा था पर न कर पाये थे, लोगों का कहना था किसी की रोजी-रोटी चल रही तो आप आड़े क्यों आ रहे, फिर तो वही हुआ जो लोग चाहते थे।
गांधी जी की समाधि से ज्योंही वे लोग लौटना चाहे, ठीक उसी समय सौ डेढ़ सौ लडकों और कुछ सयाने लोगों का एक जत्था, समाधि स्थल तक आ धमका। जत्था क्रान्तिकारी नारा लगा रहा था, ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं,’ ‘धन-धरती बंट कर रहेगी,’ इसी तरह बहुत कुछ था जत्थे के नारों में, जत्था, एक संयमित जत्था था जो कतारबद्ध था, जो पंक्तियों में बंटा हुआ। अंग्रेज हाकिम लिली, रणविजय और रामदयाल, पास वाले पार्क में एक ऐसी जगह बैठ गये, जहां से जत्थे की गतिविधियों को देखा जा सकता था।
जत्था आन्दोलन की गरिमा से भरा हुआ था। सारे लोग एक दूसरे से बढ़ कर थे। उनके कपड़े भिन्न-भिन्न थे पर अधिकांश चमकदार कुर्ता-पाजामा में थे, उनके सिरों से गांधी टोपियां गायब थीं फिर भी उन्हें देखना उस आभास को देखना था जो उन्हें नेता बनाते थे। अन्तर सिर्फ यह था कि वे नेताओं की नई नस्ल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनमें एक नौजवान लडका नारा लगाता फिर पूरा जत्था उसे उसी स्वर तान में उस नारे को दुहराता। अंग्रेज हाकिम को ही नहीं रणविजय, रामदयाल व लिली, सभी को वह प्रदर्शन ऊर्जा से भरपूर लगा, फिर भी सन्देह हुआ और सवाल भी क्या प्रदर्शन को अपना लक्ष्य हासिल हो सकेगा?
जत्था गांधी जी की समाधि तक आकर पंक्तिबद्ध होकर अगल-बगल, आगे-पीछे बैठ गया। जत्था पांच मिनट के लिए मौन में चला गया। जत्थे में से एक आदमी उठा, उसके हाथ में एक पर्चा था, उसने पर्चा पढना आरंभ किया।कृ
परचा एक शपथ पत्रा था, जिसका आशय था कि वे समाज और सरकार दोनों को बदलने का काम पूरी निष्ठा के साथ करेंगे। परचे में सरकार पर हमला था कि हमें इस सोई हुई सरकार को जगाना है, सरकार के पास कान ही नहीं, उसे नहीं मालूम कि सरकार देश के संविधान की अवज्ञा कर रही है। मूलाधिकारों को ठुकरा रही है।
परचे के अन्त में घोषणा थी...कृकृ
घोषणा में था कि पूरा जत्था गांधी जी की समाधि स्थल पर तब तक बैठा रहेगा जब तक सरकार उसे आश्वस्त नहीं करती कि पांच एकड़ की जोत का राजस्व नहीं लिया जायेगा तथा उतनी सीमा तक का राजस्व संग्रहणीय नहीं है, इसके साथ ही इस बात पर भी जोर था कि किसानों व भूमिधारियों द्वारा किये जाने वाले जन-सत्याग्रहों, जन-आन्दोलनों व जन-प्रदर्शनों को सरकार लाठी-डंडे की ताकत से नहीं रोकेगी तथा सरकार हर हाल में अपने प्रदर्शन व अपने कार्य-व्यवहार से साबित करेगी कि वाणी की स्वतंत्राता हर हाल में सुरक्षित रहेगी।’
परचा पढने वाले ने घोषणा के बाद पांच-पांच लोगों का जत्था बनाया जो समाधि स्थल पर अनशन पर बैठ गया। इस नारे के साथ कि आमरण अनशन तब तक नहीं तोड़ा जाएगा जब तक जत्थे की मांगें मान नहीं ली जातीं। बहुत लम्बे अंतराल के बाद अंग्रेज हाकिम पुराने भारतीय शासन के चरित्रा को देख रहा था, एक ऐसे भारतीय शासन का जो बदलने की इच्छाश्शक्ति ही नहीं रखता, तभी तो यह प्रदर्शन। वह अंग्रेजी साम्राज्यवाद की दमनकारी सरकारी कार्य पद्धति में कहीं खो गया। भारत ने अपने आप को फिर क्या बदला? क्या केवल सरकार ही बदली है सरकार का चरित्रा नहीं? अंग्रेज हाकिम के लिए ही नहीं, रणविजय और रामदयाल के लिए भी यह दुखद स्थिति थी।
जत्थे के लोग बिहार के थे, वहां की प्रान्तीय सरकार ने किसानों के शान्तिपूर्ण प्रदर्शन पर लाठीचार्ज करवाया, सैकड़ों को जेलों में ठूस दिया, घायलों की चिकित्सा भी नहीं करवाया, पांच दिन बाद जेल में बन्द किसानों की रिहाई की गई, लेकिन तीन किसान नेताओं को कहां बन्द रखा गया है, इसके बारे में कोई खबर नहीं।
स्वतंत्रा भारत में होने वाली इस घटना ने भारत की स्वतंत्राता को संदिग्ध बना दिया था। जत्थे के लोग जब अनशन पर बैठ रहे थे तभी रामदयाल को जान पड़ा था कि उन्हें भी जत्थे के साथ हो लेना चाहिए पर यह क्षणिक भावुकता थी सो उन्होंने खुद को उससे विस्थापित किया और सीधे रणविजय से पूछा...‘कैसा लग रहा है? अभी भी हम 1947 के पहले वाले भारत के हैं।’
‘हां, बिल्कुल वैसे ही’
अंग्रेज हाकिम ने हस्तक्षेप करते हुए जोड़ा...कृकृ
‘शायद बाद में, स्वतंत्राता के लम्बे अन्तराल के बाद महसूस होने लगे कि पुराना भारत ही ठीक था। आओ चला जाये, लिली की ममा प्रतीक्षा कर रही हांेगी, शायद डाक्टर भी आया हो।’
गांधी समाधि-स्थल के बाहर मुजप्फर की कार थी, प्रतीक्षा करती हुई, वे सभी लोग कार तक आये, उसमें सवार हुए, फिर कार चल पड़ी।
लिली की ममा प्रतीक्षा करतीं मिलीं। वे बाहर लान में बैठी हुई थीं। हवेली के पीछे के घरों की दो औरतें उनके साथ बैठी हुई थीं। वे इस्लाम मानने वाली थीं तथा बतिया रही थीं कि वे पाकिस्तान जाना चाहती हैं, जहां उनके रिष्तेदार हैं। एक का दामाद वहां रहता था, दूसरी का वहां मायका था, पर बीजा नहीं बन रहा। बनेगा भी तो काफी रुपया लगेगा जो उनके पास नहीं। नबाब साहब के जाने के बाद उनके मर्द बेकार हो गये हैं किसी तरह से सड़क के किनारे ठेला लगाते हैं, ठेले पर ही कबाब वगैरह बनाते हैं, बिक्री इतनी हो जाती है कि दो जून का खाना मिल जाये, इससे अधिक नहीं।
उन औरतों में एक मुखर थी, उसने लिली की ममा से निवेदन किया कि उसे यदि उनके यहां झाड़ू पोछा, बर्तन वगैरह मांजने का काम मिल जाता तो ठीक होता। यह मुहल्ला हिन्दुओं का है, यहां हमसे यह सब काम कोई नहीं लेगा। नवाब साहब के जमाने में तो उसका मर्द उनकी रसोई संभालता था, नवाब साहब ही नहीं छोटे नवाब साहब भी अक्सर कहतेकृ‘जुम्मन तुम्हारे हाथ में जादू है, गजब बनाते हो चिकन बिरियानी।’
उनके जमाने में हम लोगों की गृहस्थी चल जाती थी, साल में दो तीन बार कपड़ा मिला करता था। मेहमान वगैरह आते तो जाते समय बख्शीस दे जाते, अब तो सारा कुछ सपना सपना है।
दूसरी औरत थोड़ा कम बोलने वाली थी, उसका अपने मायके वालों से मिलने वाला सहयोग बन्द हो चुका था। जब पाकिस्तान नहीं बना था तब की बात दूसरी थी, अब कौन आये, कौन जाये, नहीं तो बहुत दूर नहीं था, गोरखपुर पार करो, वाघा के बगल से वहां हो लो। उसके मायके वाले हर समय सहयोग करने के लिए तैयार रहा करते थे। लिली की ममा ने उन औरतों में अपना घर देखा, वे भूली नहीं है अभी तक। सत्राह-अठारह साल उनके गांव में ही गुजरे हैं। अक्सर चूल्हा नहीं जलता था, अकाल पड़ जाने पर तो बहुत ही मुश्किल होता था। उनके पिता (बपई) एक बुद्धिमान और तेज आदमी थे। उनका घर सरकारी जंगल में पड़ता था तथा भइयाराजा की इस्टेट ठीक उसके बगल में थी, समझना मुश्किल था कौन सरकारी जंगल है, कौन भइयाराजा की इस्टेट का।
महीने-दो महीने तक का खाना-पीना महुआ से चल जाता था। तेन्दू की पत्ती का सीजन आने पर, पूरा घर पत्ती तोड़ता, सौ-सौ पत्तियों का बंडल बनाता था, फिर उसे ठीकेदार खरीद लेता था, प्रतिदिन का हिसाब बस खाने भर का होता था। रुपयों की अधिक जरूरत पडने पर, बर-बिमारी में, बपई, साखू का पेड़ काट गिराता था, उसे जंगल में ही कहीं छिपा देता था। जंगल दारोगा पेड़ की बिक्री का आधा रुपया लिया करता था। बपई ऐसा तभी करता था, जब रुपयों की जरूरत पड़ती थी।
लिली की ममा को अपना विगत साफ-साफ दिखने लगा, ऐसा विगत जहां सपने केवल चूल्हे तक सिमटे हुए थे, जिनका आकार मोटी-मोटी रोटियों की तरह होता था गन्ध सोन्धी और मुलायम जिनका रिश्ता आंत से होता था। बकाया सारे सपने जंगलों से बाहर थे, वे कभी-कभार विशेष मेहमान की तरह आया करते थे, जंगल की हवा पीते, हरियाली सोखते, फिर लौट जाया करते।
आज़ादीके बाद भी सपनों के रूप और स्वभाव में कोई फर्क नहीं आया, फर्क इतना हुआ कि राजा के अलावा दूसरे भी जंगल की हवा पीने लगे, जंगल की खूबसूरती और उसकी शान्ति पर अपने-अपने दांत और बघनखा धसाने लगे। जंगलों का कटान इतना होने लगा कि अब हर तरफ खुत्थ ही दीख पड़ते हैं। किसी तरह भइयाराजा के यहां बपई को शरण मिल गई, फिर तो पूरा परिवार भइयाराजा का होकर रह गया, ऐसा नहीं होता शायद...पर हुआ।कृ
हुआ यह कि एक दिन भइयाराजा शिकार पर निकले थे, खबर थी जंगल में सफेद बाघ आया है, वह आदमखोर हो गया है। भइयाराजा फौरन जंगल में। बहुत ऊंचाई पर एक मंच बनाया गया, उसे झाडियों और पत्तों से ढंक दिया गया, ताकि मंच पर बैठे लोग न दीख पड़े। मंच नदी के किनारे बनाया गया जहां जंगली जानवर सुबह और शाम पानी पीने के लिए आया करते थे। लिली की ममा के बपई मचान बनाने तथा हांका करने में माहिर थे। कलक्टर भी जब जंगल आता उन्हीं की खोज होती बाघ का शिकार करवाने के लिए ।
मचान बन गया, भइयाराजा रायफल के साथ मचान पर बैठ गये, उनके साथ दो तीन और लोग थे, जिनमें लिली की ममा का बपई भी था। बाघ मचान के पास से गुजरा फिर धांय धांय, लगातार तीन फायर बाघ सामने जमीन पर छटपटाया फिर मर गया, उसकी चीखें हवा में घुल गईं मचान पर बैठे लोगों के लिए यह खुशी पीने वाली बात थी तथा अभिमान में गोता लगाने वाली भी कि बाघ मारा गया। भइयाराजा के लिए तो यह था कि उन्होंने अभूतपूर्व कारनामे का गौरव हासिल कर लिया है, उनकी जानकारी में पचास बाघ मारने वाला कोई दूसरा राजा उनके क्षेत्रा में न था, वह भी एक ऐसा राजा जो पहले जागीरदार था। अब उनके महल में दाखिल होने वाला यह पचासवां बाघ होगा। किसी कलाकार से वे बाघ का चमड़ा उतरवायेंगे तथा खाल में बरीक किस्म की रूई भरवाएंगे। मचान पर वे बैठे न रह सके, खुशी का आवेग इतना बढ़ा कि वे फटाका मचान से नीचे उतर आये। लिली की ममा का बपई भी उतरा, वे सभी लोग बाघ के पास थोड़ी दूरी पर थे, यह सुनिश्चित करने के लिए कहीं बाघ जीवित तो नहीं।
बाघ जीवित नहीं था। बांस के लम्बे डंडे से बाघ को दूर से हिलाया डुलाया गया। बाघ अपना जीवन जी चुका था तथा उसकी साहस पूर्ण हिंसक क्रियाशीलता समाप्त हो चुकी थी अब वह एक लाश भर था जिसके पास कुछ नहीं होता, न अतीत, न वर्तमान, न भविष्य। भइयाराजा का वर्तमान और भविष्य दोनों कथित बहादुरी से पूर्ण होने वाला था तभी, एक भयानक दहाड़ और हमला।
लिली की ममा का बपई, खुशी पीने वाला आदमी न था। वह जंगल की पशुचर संस्कृति जानता था कि इस बाघ का जोड़ा कहीं आस-पास ही होगा, वह इस समय भी या कभी भी आ सकता है, वह अपने साथी की गन्ध अवश्य पियेगा फिर वह सब करेगा, जिसे बदला कहा जाता है। उसने अपनी बन्दूक से धांय-धांय किया, हालांकि उस समय उसकी आंखों की रोशनी में अंधेरा घुस गया था, जो बाघ के हमले के डर के कारण था। उसका निशाना ठीक था, गोली ने बाघ को जमीन पर पटक दिया, तभी भइयाराजा ने रायफल से दो फायर उस पर दाग दिया जो रायफल में बचे हुए थे।कृ हालांकि वे बाघों के जोड़े के अप्रत्याशित हमले के कारण भयभीत थे, अपने भय को उस समय दबाने में सफल हो गये थे कि राजा को डरपोक नहीं होना चाहिए, लोगों तक गलत संदेश पहुंचता है।
यह दूसरा बाघ, भइयाराजा के लिए उनके शिकार का इक्यावनवां बाघ था तथा लिली की ममा के बपई के लिए जीवन निर्वाह का सुविधाजनक साधन लेकर आया था। भइयाराजा ने लिली की ममा के बपई को गले लगा लिया और खूब तारीफ कीकृफिर तो वही हुआ, जो राजाओं के किस्सों कहानियों में हुआ करता है। लिली की ममा के बपई को महल का खास आदमी और महल के भीतर की खास औरत उनकी अइया को बना दिया गया। काम वही, आम मजूरों से थोड़ा ऊपर, थोड़ा कम पसीना पीने वाला, पांच बीघा जमीन और एक छोटा सा मकान भी दिया गया जो महल के पास पास था। महल में दाखिला मिल जाने के बाद खाने-पीने की दिक्कतें न थीं, बर-बिमारी का झमेला भी नहीं था। वहां की दिक्कतें दूसरे किस्म की थीं जो काफी आरामदायक थीं। वहां अपनी नींद तथा हसियां पराया हो गई थीं, उन्हें महल के अनुशासन(प्रोटोकाल) में शामिल रहना पड़ता था। उतना ही सोओ, जितना महल चाहता, उतना ही हसो जिससे महल की दीवारों पर हसियों के चकत्ते न उभरें यानि नींद भी महल की, हसी भी महल की तथा आराम भी महल का।
लिली की ममा को सारा कुछ याद है, जो काफी पीछे छूट चुका है। पेट के लिए क्या नहीं करना पड़ता! महल और हवेलियां किसी पनाहगाह की तरह केवल आंतों को ठीक रख सकती हैं, पर वहां नींद को नींद नहीं आती, आंसू के लिए आंखों में जगह नही होती, मन और दिल में कोई मयूर नहीं नाच सकता। सारी भावनायें महल की बन्दी हो जाती हैं। लिली की ममा ने आह भरा...फिर उन दोनों औरतों से बोली ंठीक है आप लोग मेरे यहां काम किया कीजिये मुझसे जो कहेंगी महीने का, वह हम दिया करेंगे, मर्दों को वही करने दीजिए जो कर रहे हैं।कृ क्या कोई कार चलाता है आप लोगों के यहां उन्होंने पूछा...कृ
‘हां असरफ के अब्बू चलाते हैं’ उनमें एक औरत ने बताया
‘फिर तो उन्हें भेजिए, साहब से बातें कराते हैं’
रणविजय और अंग्रेज हाकिम के आने के बाद दोनों औरतें जाने को हुईं लेकिन उन्हें लिली की ममा ने जाने नहीं दिया ‘चाय पीकर जाइए।’
रामदयाल और रणविजय लिली की ममा के साथ बाहर ही बैठ गये तथा लिली अपने कमरे की तरफ चली गई। अंग्रेज हाकिम को कहीं जाना था सो वह केवल चाय पीने तक सभी के साथ था, फिर कहीं चला गया देर रात तक आने के लिए।
दोनों औरतों के बारे में रामदयाल ने लिली की ममा से पूछा...
‘वे कौन थीं? रणविजय तो जानते ही थे कि ये लोग हवेली के पीछे रहते हैं पर पूरी तरह से नहीं, न ही उन्होंने कभी उनसे बात-चीत ही किया था।कृ
लिली की ममा ने रामदयाल को उन औरतों के बारे में बताया फिर तो रामदयाल एक बार फिर भारत-पाक बंटवारे के सन्दर्भों में उलझ गए, जैसे धूमिल होते दृश्य फिर ताजे हो रहे हों। उन्हें समझ में आया कि वे ही समाज के लिए क्या कर रहे, स्वतंत्राता मिलते ही क्या वे खुद स्वतंत्राता की वसन्ती हवाओं में नहीं खो गये? पारटी की ओर से किसी कार्यक्रम का न तो निर्देश मिलता था और न ही अपने स्तर से जिला कांग्रेस कमेटी ही कुछ किया करती थी। पारटी ने तो जमीनदारी विनाश अधिनियम को, अधिनियम की मंशा के अनुरूप भी लागू करवाने का प्रयास नहीं किया। केवल इतना ही हो सका कि भारत का हिन्दू बहुल क्षेत्रा, भारत के हिस्से में बचा रह सका, लेकिन पाकिस्तान तो एक नया राष्ट्र बन ही गया, आखिर किस लिए? क्या केवल इसलिए कि कुछ लोग प्रधानमंत्राी मुख्यमंत्राी, मंत्राी, सांसद व विधायक बन जांये। वे तो तब भी बनते, अंग्रेजी सरकार में भी बन सकते थे, हां मामला प्रधानमंत्राी बनने का था, वह कौन बनता? अब तो दो प्रधानमंत्राी हैं, दो सरकारें हैं, दो देश हैं दो संसदें हैं। लेकिन जिनका एक हाथ भारत में है तथा दूसरा पाकिस्तान में, उनको क्या मिला? वे आज भारत में रो रहे हैं, आंसू पाकिस्तान में गिर रहे हैं।कृजाने कितने बदकिस्मत इन औरतों की तरह भारत में हैं या पाकिस्तान में है, कौन बताये?
‘तो ये औरतें पाकिस्तान जाना चाह रही हैं अपने रिष्तेदारों से मिलने?’ रामदयाल ने लिली की ममा से पूछा...
‘हां लेकिन बीजा नहीं बन रहा बता रहीं थी सब।’
‘हां ऐसा ही है जबसे कष्मीर का मामला उलझा है तभी से, काफी जांच पड़ताल होती है, उस कार्यवाही को पूरा कर पाना काफी कठिन है। फिर खर्चा भी खूब लगेगा, कहां से जुटा पायेंगे ये लोग।’
रामदयाल ने लिली की मां को बताया।
लेकिन उनके लिए इतना सब बताना उन्हें भावुक बनाने वाला था कि आदमी देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर किसी बाड़े में रहने वाले पशुओं की तरह ही रह सकता है, इससे अधिक की आकांक्षा करना मूर्खता होगी।
‘यानि देशों की भौगोलिक सीमायें बाड़ों की तरह हैं?’
रामदयाल ने खुद से सवाल पूछा...कृसवाल का उत्तर उनके पास था जा ेदेश की सीमाओं के नियंत्राण को परिभाशित करता था।
‘भीतर से रणविजय और लिली दोनों साथ निकले। लिली रामदयाल के पास बैठ गई, उसने धीरे से पूछा...
‘भइया आप दिल्ली और कहां कहां देखना चाहते हैं? हम लोगों ने खुद को अपने-अपने कार्यों से मुक्त कर लिया है, अब हम अपना समय आपके हवाले करते हैं? क्या आप पुराना किला देखना चाहेंगे या और कोई दूसरा स्थान?’
लिली रामदयाल से सवाल पूछ कर उन्हें देखने लगी कि वे उत्तर दें फिर दूसरे दिन का प्रोग्राम बने। रामदयाल लिली की आत्मीयता के साथ थे, उन्होंने दिल्ली देखने के बारे में बताया जो जितना सवाल था उतना सुझाव भी।
‘तुम जहां सोचो, चलेंगे, मैं भी तो जानूं कि तुम दिल्ली को कैसे दिखाना चाहती हो, मुझे भी लौटने की जल्दी नहीं, वैसे मेरी इच्छा है कि मैं यहां वह सब देखूं जो किसी भी इतिहास के हिस्सा नहीं है।’
लिली ने रामदयाल की बात को समझने के लिए पूछा...
‘यह इतिहास का हिस्सा क्या है?’
‘तुम इतिहास नहीं जानती-समझती क्या?’
‘समझती तो हूं। समझती हूं कि यहां कभी मुगलों व अंग्रेजों का इतिहास था, उसके पहले आर्यों और बौद्धों का, सनातनियों का, पर इतिहास का हिस्सा, नहीं समझती?’
‘आर्य बौद्ध, हिन्दू, मुगल और अंग्रेज, ये सारे के सारे इतिहास के ही तो हिस्से थे लेकिन क्या ये सत्ता-समूह पूरे भारत का इतिहास थे? इनकी कहानियों में पूरा भारत था, चूल्हे चौके थे, झोपड़ी थी, खलिहान था या तुम्हारी हवेली के पीछे रहने वाले जुम्मन मियां और असरफ के अब्बा थे, तुम्हारी दाई जो तुम्हारे घर का काम संभालती है, उसके घर वाले थे? हां इतिहास मेंकृलोगों के प्रतिस्पर्धात्मक बदला पूर्ण युद्धों ने लोगों को विस्थापित व बर्बाद अवश्य किया है। किसी को दुलारा या सहलाया नहीं है।’
‘समझ गई! आप क्या देखना चाहते हैं? रूसी किताबों का अनुवाद करते-करते मैं भी कुछ-कुछ समझने लगी हूं, बुरा न मानें तो एक बात पूछूं...’कृ
‘पूछा’े
‘कहीं आप कामरेड तो नहीं!’
रामदयाल सोच में पड़ गये लिली को क्या बतायें?
और बाल-बुतरू
रामदयाल कामरेडों के बारे में वही विचार रखते थे जो सामान्यतया स्वतंत्राता संग्राम के दिनों में हर तरफ फैले हुए थे। उनमें एक तो यही था कि कामरेडों ने भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के कार्यों में सहयोग किया था, दूसरा था कि कामरेड राजनीतिक रूप से हिंसक क्रांति का समर्थन करते हैं। सो उन्हें यह स्वीकार्य नहीं था कि कोई उन्हें कामरेड कहे क्योंकि वे राजनीतिक बदलावों को शान्तिपूर्ण रास्तों से करना ठीक समझते हैं, उनके पास गांधीवाद था उसके रास्ते थे इसके किसी दर्शन की जरूरत नहीं थी उन्हें, मन में अटल विश्वास था कि मन बदलेगा, देश बदल जाएगा, देश बदल भी गया था, स्वतंत्राता हासिल हो चुकी थी, गांधी जी का जनतांत्रिक विरोध सफल हो चुका था।
रामदयाल समझ रहे थे कि लिली ने उनसे यह क्यों पूछा कि आप कामरेड तो नहीं। लिली क्या कोई भी लिली की तरह ही पूछता क्योंकि वे भी तो उसी वर्ग के विकास और इतिहास का अनिवार्य हिस्सा होने, बनने के बारे में सोचा करते हैं जिस वर्गहित के लिए कामरेड बन्दूक उठाते हैं, लेकिन वे बन्दूक की नाल से परिवर्तन का इतिहास लिखना पसन्द नहीं करते। उन्हें महसूस होता है कि उसमें आतंक और भय के छन्द होते हैं, ऐसी सूरत में कोई कामरेड अपनी मनुष्यता का ही दुश्मन हो जाता है लेकिन कभी-कभी वे काफी चिन्तित भी हो जाते हैं जब उन्हें समाज के विकसित ताकतों की निष्ठुरताओं का सामना करना होता है फिर तो उन्हें महसूस होता कि विकसित ताकतों को प्रार्थनाओं, अभ्यर्थनाओं वगैरह से निष्ठुर-हीन नहीं बनाया जा सकता।
रामदयाल ने अनमने भाव से लिली को बताया...कृ
‘हां हां, मैं कांग्रेसी कामरेड हूं मानूंगा नहीं पर मारूंगा भी नहीं’
लिली खिल-खिलाई, रामदयाल का जवाब ही खिल-खिलाने वाला था, पर था काफी रहस्यपूर्ण। ऐसा नहीं था कि लिली राजनीति की वाममार्गी धारा और दक्षिणमार्गी धारा को समझती नहीं थी। वह समझती थी कि रामदयाल क्या कह रहे हैं, ‘मानूंगा नहीं और मारूंगा भी नहीं’ एक छोटे से सूत्रा वाक्य के जरिए।कृ
उसे ख्याल आया, एक बार रणविजय भी आन्दोलन की स्वस्फूर्तता के बारे में उसे उलझा चुके थे, तब उनसे लिली ने कहा था कि, अनशन, हड़ताल, सत्याग्रह वगैरह आत्म-हन्ता प्रयास भर हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। इसीलिए गांधी जी के सारे कार्यक्रम अब सिकुड़ चुके हैं, आखिर कौन है जो अनशन करके खुद की आत्महत्या करना चाहेगा? लिली ने रणविजय से हुई बात-चीत के बारे में सोचा पर रामदयाल से उस बात को आगे नहीं बढ़ाया। उसने रामदयाल की सहमति में सिर हिलाया...कृ
‘आप ठीक कह रहे हैं क्योंकि आज का कांग्रेसी तो सनातनी होता जा रहा है।’
‘रणविजय तब तक पूरी तरह खामोश बैठे हुए थे और लिली की तार्किकता का आनन्द ले रहे थे। उन्हें अच्छा लग रहा था कि लिली ने राजनीतिक सवालों पर रामदयाल से बातें करने का तरीका सन्तुलन पूर्ण बना लिया है, जब कि वह सामान्यतया ऐसा नहीं करती, कम से कम उनके साथ और अपने डैड के साथ। वह झल्लाहट के साथ आक्रामक हो जाती है तथा साफ-साफ कहती है कि...
‘बहस करना और अपने विचारों को किसी किताब के अनुरूप बना लेना दोनों काम खाते-पीते लोगों के हैं, जो पराश्रयी होते हैं, जो अपना काम भी दूसरों से करवा कर सम्मानित महसूस करते हैं।’
रणविजय की इच्छा हुई कि वे लिली को छेड़ें और पूछें क्या होता है सनातनी कांग्रेसी लेकिन वे न पूछ सके क्योंकि बात आगे तक रबर की तरह बढ़ सकती थी, जबकि समय काफी गुजर चुका था। रामदयाल को थोड़ा आराम भी चाहिए था शाम का अन्धेरा बढने लगा था। लिली की ममा अपने कमरे में जा चुकी थीं। रणविजय ने रामदयाल के आने के बाद ही प्रोग्राम बना लिया था कि उन्हें अनुवाद का काम दिखायेंगे। सो बहस आगे बढ़ा कर पहले से विचारित काम को स्थगित करना ठीक न होगा।कृ
रणविजय ज्योहीं रामदयाल और लिली के साथ, अपने अध्ययन कक्ष की तरफ जाने के लिए सोचे तभी चाय आ गई। चाय के साथ पकौडियां थीं, गरम-गरम, देहात वाली, प्याज और पुदीने के साथ, टमाटर की चटनी, जरूरत भर की कड़वी, पकौडियां रामदयाल को भा र्गइं, थोड़ी और होतीं... वे सोच ही रहे थे कि पकौडियों की दूसरी खेप भी आ गई। रामदयाल दिल्ली में थे, पर वहां दिल्ली नहीं थी, दिल्ली होती तो पकौडियों की दूसरी खेप न आती, बड़े घरों में ऐसा नहीं होता, कम से कम बौने से शहर में भी। लिली की ममा ने अंग्रेज हाकिम के साथ रहते हुए भी गांव बचाया हुआ है। पकौडियां लाने वाली से रामदयाल ने पूछा...
‘किसने बनाया है, तूने ही नऽ’
‘नहीं, ममा ने!’ उसने बताया।
दाई एक जवान औरत थी उसके काले जिस्म से उसकी आत्मनिर्भरता की चमक फूट रही थी। वह कम बोलने वाली थी तथा जो भी, जितना भी बोलती, तौल कर बोलती। अपने काम से काम रखती।
उसने पकौडियां परोसा और सीधा भीतर चली गई। रामदयाल पकौडियां खा कर बनारसी मौज-मस्ती में डूब गये, जैसे सडक के किनारे खड़े हों और दनादन पकौडियां मुँह में डाले जा रहे हों। चाय भी ठीक बनी थी, दूध वाली जो अलग-अलग थालियों में लाई गई थी। पहले दिन तो चाय कन्टेनर में आई थी, चीनी, दूध अलग, चाय का लीकर भी अलग। लिली ने चाय परोसा था उस दिन। रामदयाल को ऐसी चाय ठीक नहीं लगती, सारा कुछ पहले मिलाओ, घोलो फिर पियो, तब तक ठंडी हो जाती है चाय।
रणविजय, लिली और रामदयाल, चाय के बाद अध्ययन कक्ष तक साथ-साथ आये। अध्ययन कक्ष, बाहरी बरामदे वाले गलियारे से जुड़ा था। अध्ययन कक्ष एक बड़ा सा कमरा था, कमरा मुगलिया भवन संस्कृति का नमूना था। छत के नीचे दीवार के ऊपर का प्लास्टर नक्कासीदार था। छत के बीचो-बीच कलात्मक नमूना था, जो ध्यान खींचता था। दीवार का रंग हल्का पीला था, जो रोशनी पडने पर चमकता था। कमरे में अलग-अलग कोने में तीन कुर्सियां और तीन मेजें थीं, जो शायद लिली, रणविजय और अंग्रेज हाकिम के लिए थीं। अंग्रेज हाकिम की मेज थोड़ी दूरी पर थी। रामचरित मानस का कुछ अंग्रेजी भषानुवाद वहीं पड़ा था। रणविजय ने उसे उठाया और रामदयाल को दिया।
रामदयाल देखने लगे। अनुवाद बालकांड का छोटा हिस्सा था। रामदयाल अंग्रेजी के भषानुवाद में डूब गये, उन्हें खूब खूब अच्छा लगा। फिर उन्होंने पूछा
‘डैड ने हिन्दी कब सीखी?’
सीखी नहीं, अब भी सीख रहे हैं, रणविजय उन्हें सिखाता है,कृलिली ने उन्हें बताया।
रणविजय! उन्हें अचरज हुआकृवैसे रणविजय की हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ठीक है, मेरी अंग्रेजी तो रामभरोसे है, हिन्दी को संस्कृत से ठीक कर लेता हूं।
‘तुम्हारी हिन्दी कैसी ही लिली?’ उन्होंने पूछा
‘रणविजय से अच्छी है भइया।’
‘अच्छा! उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया,’ तभी रणविजय बोल पड़ेकृ
‘कुछ तो शर्म करो लिली।’
‘इसमें शर्म की क्या बात है, ठीक है तुमने मेरी हिन्दी में मदद की है, लेकिन भाषा सीखने में नहीं, केवल व्रज और अवधी की कविताओं को ही मैंने तुमसे पढ़ा है। निराला, प्रसाद जी को तो मैं समझ ही लेती हूं।’
‘चलो ठीक है, मान लेता हूं, इसी साल तुम्हें पी.एच.डी. की थीसिस जमा करना है, मेरी सहायता न लेना।’ रणविजय ने लिली को धमकियाया
‘सहायता क्यों नहीं लूंगी, तुम हो काहे के लिए, तुम्हारे साथ जो करना पड़ता है, अगर वैसा ही सुपरवाइजर के साथ करूं तो क्या वह मेरी थिसीस नहीं लिख देगा?’
रामदयाल हसने लगे पर रणविजय तो जैसे मजाक के मूड में थे।कृ
‘अच्छा तो लिखवा लेना थिसिस! उसे गोली नहीं मार दूंगा, केवल महल छूटा है, उसका संस्कार नहीं।’
लिली, अपनी कुर्सी से उठी, सीधे सामने वाली आलमारी तक गई, उसने आलमारी खोला, टाइप शुदा कागज निकाला उसे रामदयाल को थमा दिया।
‘भइया देखिए...कृ‘यह हिन्दी अनुवाद मैंने किया है, अंग्रेजी से। मार्क्स की किताब से, ‘मुद्रा’ पर उनके लेख का, रामदयाल अनुवाद देखने लगे, फिर तो वे पूरा पढ़ ही गये।कृ
वह एक जटिल निबन्ध था जो सामाजिक संबंधों को मुद्रा के द्वारा नियंत्रित होने की व्याख्या करता था। सांस्कारिक, व्यावहारिक व मानवीय संबंध नहीं, सारे संबध, आदमी और आदमी के बीच मौद्रिक होंगे, आदमी मूल्य होगा और वह बिकेगा, संबंध, नैतिकता, ईमानदारी, सारा के सारा बिकेगा।’
रामदयाल अनुवाद पढ़ कर सोचने लगे, उन्होंने मार्क्स तथा लेनिन को कभी पढ़ा नहीं था। मार्क्स के बारे में फैलाई गई अफवाहों को ही वे सुने थे। ‘वर्नस्टीन’ जैसे विचारकों के सन्तुलनवादी कुछ लेखों को उन्होंने अवश्य पढ़ा था। कांट, हीगल, हाब्स, रूसो के विचारों से भी वे वाकिफ थे पर केवल कामचलाऊ स्तर पर। उन्हें किसी भी विदेशी विचारक के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी। मार्क्स तो साफ-साफ अलग था उनके पाठन से।कृ
‘मार्क्स की इस किताब को कल खरीद दो लिली, मैं अब पढ़ूंगा उसे। पहले तो मैं मार्क्स के विचारों से घृणा करता था कि वह बारूद और बन्दूक का समर्थन करता है, हर जगह आग लगाना चाहता है।’
‘कल तो हम लोग निकलेंगे ही, उस तरफ जो इतिहास के हिस्से नहीं हैं, रास्ते में किताब खरीद ली जाएगी, कनाट प्लेस पर मिल जाएगी, काफी हाउस के पास, लिली ने रामदयाल को बताया।’
अध्ययन कक्ष में वार्तालाप का ऐसा दौर चला कि रात के दस बज गये, बीच में दो बार चाय भी आई, तभी अंग्रेज हाकिम आ धमका। पूरी मंडली को अध्ययन कक्ष में देख कर उसने टोका...
‘अभी खाना-पीना नहीं हुआ क्या?’
‘अभी नहीं,’ यह लिली थीकृ
अंग्रेज हाकिम, रामदयाल को पंडित कहा करता था, उसने पंडित कह कर उन्हें संबोधित कियाकृ
‘पंडित जी! आप लिली से बहस न कीजिएगा, यह विषय को उलझाने में माहिर है।’
‘नहीं, ऐसा तो नहीं, बहुत सार्थक बहस करती है रामदयाल ने अंग्रेज हाकिम को बताया, साथ ही साथ निवेदन भी किया कि वे उन्हें पंडित जी न कहा करें, वे सिर्फ रामदयाल हैं।’
ऐसा क्यों? पूछा अंग्रेज हाकिम ने
बस यूं ही, भला नहीं लगता, रामदयाल बताकर गंभीर हो गये, जो अंग्रेज हाकिम के लिए किसी घोषणा पत्रा की तरह था।कृ
कोई भी प्रगतिशील विचार का आदमी, खुद को जातियों में नहीं बांटेगा। जातियों में बटा भारत अपना समभाव व सहकार खोता हुआ दीखता है। अंग्रेज हाकिम ने सोचा और बात का क्रम बन्द कर दिया।
अचानक जैसे उसे कुछ याद आ गया हो, फिर उसने पूछा...कृ
‘क्यों लिली! रामदयाल जी को तूने मेरा अंग्रेजी अनुवाद, रामचरित मानस वाला दिखाया कि नहीं?
‘दिखा दिया डैड, भइया ने उसे काफी सराहा भी।’
‘अच्छा! अब इस कमरे को छोड़ो, खाना-पीना खाओ, क्यों खाने के पहले कुछ.उन्होंने रामदयाल की तरफ इशारा किया।कृ
‘नहीं डैड! नहीं, रामदयाल समझ गये कि डैड, दारू के लिए पूछ रहे हैं।कृ
फिर तो रात का खाना-पीना और सोनाकृतथा दूसरे दिन के सुबह की प्रतीक्षा करना। दूसरा दिन आया, सुबह की नरम धूप के साथ, पिछले दिन के प्रस्तावित कार्यक्रम के साथ।कृजिसे रामदयाल ने सुझाया था, यानि उस तरफ की यात्रा जो हो तो दिल्ली में ही पर वह क्षेत्रा इतिहास का हिस्सा न हो।
आखिर ऐसा कहां हो सकता है? लिली समझते हुए भी उत्सुक थी कि देखिए भइया कहां चलते हैं? मुजफ्फर की कार उसकी यादों के साथ सडक पर दौडने लगी। रणविजय स्टेयरिंग पर थे और लिली रामदयाल के साथ पिछली सीट पर।
दिल्ली की सडकें कम होने का नाम ही न लें, मुहल्ले मुहल्ले दर गुजरने लगे, जामा मस्जिद, लाल किला, सभी गुजर गये, कार बढ़ती जा रही थी। दिल्ली की बड़ी-बड़ी ईमारतों की परछाइयां कार पर पड़ती, कार उन्हें रौंद कर आगे बढ़ जाती, सडकें एक दम काली, पूरी लम्बाई में फैली, अगल-बगल दूकानों की कतारें, सभी बन्द, वे दस बजे के आस-पास खुलतीं फिर किसी शहर में तब्दील होतीं, दूकानों से सामान निकलते, नोटें जो आजाद भारत की थीं, सामानों के बदले दूकानों के मनी बाक्स में समा जातीं, लेकिन रामदयाल को तो वहां जाना था, वह देखना था जो किसी इतिहास के हिस्सा न थे, यानि वहां न दूकानें होतीं, न सामान होता, न अस्पताल होता, न स्कूल होते, आदमी होते, आदमियत होती, पर उनके चेहरों पर किसी सरकार की परछाईं तक न होती।कृ
कार बढ़ती जा रही थी, दिल्ली का वह हिस्सा जो दिल्ली को दिल्ली बनाता था, वह काफी पीछे छूट चुका था, पर इतना नहीं कि वहां दिल्ली की सरकार न होती, रामदयाल ने कार रुकवाया।
रोकिए रणविजय जी!
‘यहीं’
‘हां’
कार का ब्रेक लगा, कार रूक गई, लिली ने कार के शीसे से बाहर देखा। वहां कुछ न दिखा, था भी नहीं कुछ, खेतों का समूह था, खेत थे मेड़ों से बन्धे हुए, उनकी लम्बाई-चौड़ाई मजबूत मेड़ों से बांधी गई थी। कहीं-कहीं छायादार पेड़ दीखते। कुछ मेड़ों पर बबूल के पेड़ थे, कहीं-कहीं नीम दीख रही थे, खेत समतल थे, उन पर फसलों के शिनाख्त थे, फसलें काट ली गई थीं। रामदयाल कार के दाहिनी ओर देख रहे थे जब कि लिली बायें तरफ, लिली को क्या दिखता जो दिखता वह उसका देखना होता, जबकि रामदयाल का देखना लिली के देखने से अलग था जिसे रामदयाल देख रहे थे। रामदयाल के देखने में तमाम कच्चे मकान थे, कुछ झोपड़े थे, एक छोटी सी बस्ती थी, दिल्ली से महज चालीस-पचास किलोमीटर दूर, यहां दूसरी दिल्ली थी, जो पहले भी रही होगी।कृइस दूसरी दिल्ली का अस्तित्व पृथ्वीराज चौहान के जमाने में था कि नहीं, यहां लार्ड माउन्टबेटन और उसकी बेगम के पवित्रा पांव पड़े थे कि नहीं-यही जानना और देखना था रामदयाल को।
रामदयाल ने बस्ती देखा और कार रुकवा दिया।कृ
कार से उतरने के बाद, रणविजय ने अगल-बगल देखा कार जाने लायक पतला रास्ता भी नहीं दिखा, वहां पगडंडियां थीं एक दूसरे को काटती हुई। मुख्य मार्ग पर भी कुछ मकान थे जिनकी उपस्थिति काफी विरल थी, रामदयाल ने इशारा किया कि उस बस्ती की तरफ चलना है।कृ
बस्ती मुश्किल से दो तीन सौ मीटर पर थी।कृलिली का उत्साह बढ़ता जा रहा था तथा वह गुनने लगी थी कि भइया भी अजीब इच्छाओं के मालिक हैं, रणविजय तटस्थ थे। वे रामदयाल को अच्छी तरह जानते थे कि रामदयाल अपनी भावुकता को यथार्थ में तब्दील करने की क्षमता रखते हैं। एक बार तो उन्होंने अपना खलिहान ही गरीबों में आधा-आधा बांट दिया था, तब उनके पिताजी जीवित थे, सुनते ही वे क्रोधित हो गये थे। इकलौता होने के कारण उनकी मां रामदयाल के साथ हुआ करती थीं।कृ
‘क्या हुआ? बांट दिया तो बांट दिया’
जो मजूरी होती, उससे अधिक दे देता, इकतीस बोझ गेहूं के बदले एक बोझ की मजूरी देनी थी, पच्चीस बोझ पर एक बोझ दे देता, बीस पर दे देता, यह क्या कि आधा-आधा बांट दो मजदूरी के बदले।कृरामदयाल के पिता ने उन्हें काफी भला-बुरा कहा। मजूरों ने सारा कुछ सुनाकृफिर सम्मिलित होकर उनके पिता से कहा...कृकृ.
‘सरकार! हमारा जितना हक होता है उतना ही दीजिए, सारा गेहूं खलिहान में पड़ा है, कोई भी मजूरा ले नहीं गया है।’
‘नहीं तुम लोग आधा ले जाओ, जो दे दिया, दे दिया, इन्हें हल्ला करने दो।’कृ रामदयाल ने जोर देकर तेज आवाज में कहा।कृलेकिन मजूर तो मजूर, मजूरी मिल जाय, इसी में खुशियां पीने वाले, वे नाजायज मजूरी हराम समझ कर, बांटा हुआ बोझ, उस जगह फेंकने लगे जहां रामदयाल के बोझ थे।कृ
लेकिन रामदयाल भी कम न थे, उन्होंने धमकी दी, यदि तुम लोग आधा नहीं ले गये और पिताजी का कहना मान लिए तो मैं खलिहान ही आग के हवाले कर दूंगा।
रामदयाल की धमकी काम कर गई, बोझ आधा-आधा बंट गये।
तो रामदयाल अपनी जिदों के आदमी हैं, रणविजय जानते थे, सो उनकी तरफ ही बढ़ रहे थे, वे रास्ता चलते हुए आगे-आगे थे, लिली बीच में, पीछे रणविजय। बस्ती में बरगद का एक छायादार पेड़ था, उसके नीचे मिट्टी का एक चबूतरा था, चबूतरे पर कुछ लोग बैठे हुए थे।कृ
उनमें एक अधेड़ था तथा तीन जवान थे, वे चबूतरे पर चौपड़ का खेल खेल रहे थे, गिट्टियां बिछी थीं।कृ
‘क्या हो रहा है भाई।’ पूछा रामदयाल ने
‘क्या किया जाय, चौपड़ खेल रहे हैं’
अधेड़ आदमी भारतीय आचार-विचार जानने वाला था, उसने सभी को नमस्कार किया और पूछा...
‘किससे मिलना है साहब! रघुवर तो दिल्ली गया है।’
‘हमारा काम आप सभी लोगों से है! लेकिन रघुवर दिल्ली काहे गये हैं, वहां काम करते हैं का? प्रति सवाल किया रामदयाल ने
अरे नाही सरकार! गरीबों को काम कहां मिलता है, काम तो पढ़े-लिखों को मिलता है, हम लोग निरक्षर, हमारे लिए लिखा-पढ़ा भैंस माफिक। असल में यह है कि दो तीन दिन से एक नेता जी लगातार आ रहे हैं मेरे गॉव में। कल भी आये थे। संसद भवन पर धरना प्रदर्शन करना है। किसान-आन्दोलनकारियों को कहीं मारा-पीटा गया है। उसी सिल-सिले में रघुवर वहां गया है, देखिए क्या रेट तय होता है परदर्शन में जाने का?
कैसा रेट? पूछा लिली ने
एक- दो दिन तो लगेगा न, वहां जाने वाले पेट बांध कर तो जायेंगे नहीं, मजूरी से अधिक नहीं मिला तो उसमं जाने से क्या फायदा? कौन डंडा खाये!कृफिर रघुवर तो भीड़ जुटाने का ठीका लेता है। जितना आदमी चाहिए उतने लोगों की प्रतिदिन की मजूरी दो और भोजन-पानी का खर्चा अलग से। अपने साधन से ले चलो फिर काम हो जाने पर पहुंचा दो। सारा रेट पहले से तय न करो तो बाद में नेताजी लोग झगड़ा करने लगते हैं।
लेकिन एक बात है साहब! कांग्रेसी ले जाते हैं तो अधिक रुपया देते हैं वह भी बिना मांगे। इस बार जो नेताजी आये थे, वे शायद जनसंघ के थे, बोल रहे थे कि उनकी पारटी हिन्दुओं वाली है देखो ये लोग कितना देते हैं?
अधेड़ आदमी रघुवर को दिल्ली जाने का लक्ष्य बता कर चुप हो गया, फिर पूछा...कृ
‘आप लोग किस पारटी के लिए आए हैं?’
‘हम लोगों की कोई पारटी नहीं, हम लोग आप लोगों से मिलने आये हैं।’
अरे साहब! काहे मजाक कर रहे हैं, गरीबों से कौन मिलता है? साफ साफ बताइए कहीं कोई दूसरा काम तो नहीं!कृ
तभी एक नौजवान बोला, जो अधेड़ के साथ खड़ा था...
वह बस्ती यहां से दो किलोमीटर दूर है, बगल वाली पगडंडी वहां तक पहुंचा देगी, अधेड़ ने बस्ती के बारे में बतायाकृ
कैसा दूसरा काम? रणविजय, रामदयाल और लिली तीनों नहीं समझ पाये, रणविजय ने पूछा।
अरे साहब! क्या बतायें? उस बस्ती की लड़कियां दिल्ली जाती हैं, वहीं रात, दो रात गुजारती हैं, काफी कुछ कमा कर लौट आती हैं।कृ
‘अरे नहीं भाई, ऐसा काम हम लोगों का नहीं, आइए बैठते हैंकृपानी पिलाइए।’ रामदयाल ने पानी मांगा और चबूतरे पर बैठ गये, साथ में लिली और रणविजय भी।
पानी गुड़ के साथ आया, वे लोग पानी पीये फिर बात आगे बढ़ी। आगे काफी दूर तक कि वे लोग दस पन्द्रह साल से प्रदर्शन, घेराव, सत्याग्रह जैसे काम कर रहे हैं। पहले अंग्रेजों के जमाने में, कम से कम सात आठ बार साल में उन्हें काम मिल जाता था, पर आज-कल काफी मन्दी है। अपनी सरकार बन गई है सो प्रदर्शन वगैरह नहीं होते, ऐसे में हमलोग बेकार हो गये हैं। बीच में चार-पांच साल तो एकदम बेकार हो गये थे, काम नहीं मिलता था।कृइधर दो-तीन साल से काम मिलने लगा है, अब कुछ कुछ काम चल जा रहा है।
किस-किस पारटी का काम मिल जाता है आप लोगों को? पूछा लिली ने, जो उस समय काफी गंभीर बनी हुई थी, कुछ-कुछ गहन विचारण करती...‘ऐसा भी होता है।’
‘कांग्रेस, कम्युनिस्ट और जनसंघ का, काम अक्सर मिलता रहता है। एक बार हम लोगों को अम्बेडकर की पारटी का भी काम मिला था, जो केवल खाना, नाश्ता पर था, क्योंकि वह गरीबों की पारटी थी बेचारे कहां से रुपया देते!’कृ
‘कैसे पता चला आप लोगों कि वे गरीबों की पारटी के थे?’ उस आदमी से दुबारा पूछा लिली नेकृ
‘गरीबों को गरीब नहीं पहचानेगा फिर कौन पहचानेगा साहब? उनके चेहरे खुरदुरे और झुलसे होते हैं,’ बताया अधेड़ आदमी ने।
सभी लोग चबूतरे पर बैठ गये। चबूतरा गोबर से पुता था, कुल मिलाकर वह साफ जगह थी। थोड़ी देर में बस्ती की औरतें भी आ गईं। औरतों के चेहरे, काम की थकान के कारण धुआंसे थे, उन पर वह चमक नहीं थी जिसे उम्र चमकाया करती है। चेहरे की प्राकृतिक सुन्दरता गायब थी, रामदयाल के लिए यह कोई अचरज न था पर लिली के लिए.. तो अचरज था ही
उसने कुछ औरतों की उम्र भी पूछा।कृएक का चेहरा जवान होती लडकी का था। उसकी गोदी में एक बच्चा था, लिली ने उससे जाना
‘तुम्हारी उम्र क्या है?’
‘सत्राह साल’
‘कब शादी हुई तुम्हारी?’
‘दो साल पहले’
लिली खुद तीस के आस-पास थी, दो चार साल बड़े होंगे रणविजय। तीन साल पहले उसने रणविजय से सिविल मैरेज किया था।
अभी बच्चा नहीं चाहिए ऐसा मान कर चलती है, उम्र की हिफाजत करना है उसे, बहुत सारे काम करने हैं। लिली ने एक बार फिर जवान होती लडकी को देखा, वह सहमी हुई थी, अपने में खोई, जाने क्या सोच कर उसने लिली से प्रति सवाल किया...कृ
‘आपकी उम्र क्या होगी बहन जी?’
उन्तीस साल
ष्आपकी शादी नहीं हुई का? माथे पर सिन्दूर न देख कर लडकी ने पूछा...कृ
‘हो चुकी है’
‘और बाल-बुतरू!’ अधेड़ औरत ने पूछा जो लिली के सामने खड़ी थी। रणविजय और रामदयाल किसी तरह हसना रोक सके।
‘अभी नहीं लिली ने बताया।’
‘कोई गड़बड़ी है का ‘देहियां’ में?’ जवान होती लडकी ने पूछाकृ
‘नहीं’
लिली को बाथरूम जाने की आवश्यकता महसूस हो रही थी, पर वह किधर जाये, सामने बाथरूम जैसी कोई जगह नहीं दिख रही थी। वह चबूतरे से उठी, जवान होती लडकी को इशारा किया, फिर दोनों साथ-साथ आगे बढ़ गईं। वे दोनों एक झोपड़ी के पीछे गईं, वहां निखालिस एकान्त था, वहीं लिली एक जगह बैठ गई।
जवान होती लडकी विचार कर रही थी कि वह अवश्य पूछेगी बहन जी से कि बाल-बुतरू क्यों नहीं हो रहे? लिली आई फिर भी जवान होती लड़की नहीं पूछ पाई उससे, वह शर्म में डूब गई भला यह भी पूछने की बात है!
रामदयाल और रणविजय ने चबूतरे पर बैठे लोगों से बस्ती का सारा हाल तब तक जान लिया था कि प्राइमरी स्कूल, बस्ती से दस किलोमीटर दूरी पर है, दवाई के लिए बीस किलोमीटर जाना पड़ता है, वहीं थाना भी है, बस्ती में केवल रघुवर ही कक्षा दो तीन तक पढ़ा हुआ है, बस्ती में कुल अस्सी लोग हैं। उन लोगों के पास खेत नहीं, उनके घर भी दूसरे की जमीन में हैं। जमीन, सामने वाले गांव के पंडित जी की है।
बस्ती में सूरज था, उसकी चहक थी, चांद था, उसकी नाजुक किरणें थीं, हवा का आना-जाना जारी था, बस्ती का आकाश था, उसके बादल थे, उसकी बारिश थी। पर वहां वह नहीं था जो इतिहास जैसी चीज होता है, लिली ने रामदयाल को देखा, चाहा कि वह उनकी निश्छल भावुकता पकड़े, रणविजय तो स्थित-प्रज्ञ थे, लिली ने संबोधित किया रामदयाल को...कृकृ.
‘भइया इन लोगों का वर्तमान मारा जा चुका है, भला ये इतिहास का हिस्सा कैसे बनेंगे?’
कैसा इतिहास रे!
इतिहास के हिस्सों से दूर वाली बस्ती से रामदयाल, रणविजय और लिली, दोपहर के आस-पास निकले। लौटते समय रामदयाल को मार्क्स की किताब ‘आर्थिक व दार्शनिक पांडुलिपियां’ खरीदना था। लिली को भी भूला नहीं था। मुजफ्फर की कार, सड़क के किनारे खड़ी थी। सभी लोग कार तक आये। बस्ती का वह आदमी भी साथ में कार तक आया जो अधेड़ था। सडक तक आते-आते रघुवर दीख गया वह साधारण शक्ल सूरत वाला आदमी था, उसका पहनावा बस्ती के स्तर से थोड़ा ऊंचा था। अधेड़ आदमी ने रघुवर को आवाज दिया, वह सीधे सडक पर दक्षिण की ओर जा रहा था, कार का मुंह भी दक्षिण की तरफ ही था। उसने रामदयाल की टीम की तरफ तब ध्यान दिया जब अधेड़ आदमी ने उसे जोर से आवाज दिया।
रघुवर का काम हो गया था, उसे दूसरे दिन ही प्रदर्शन के लिए भीड़ जुटाने का ठेका मिल गया था सो वह खुश था तथा खुशियों की गाढ़ी चमक उसके चेहरे पर साफ-साफ थी। उसे काम की जल्दी थी तथा दूसरी बस्तियों में भी जाना था जिससे वह अधिक से अधिक आदमियों को जुटा सके। अधेड़ आदमी ने रघुवर का परिचय, रामदयाल की टीम से कराया। पूछने पर उसने बताया कि प्रदर्शन संसद भवन पर होगा, पर जुलूस गांधी जी की समाधि से चलेगा।
‘लगता है वही लोग हैं जो गांधी जी की समाधि स्थल पर मिले थे।’
रामदयाल ने रणविजय को सुझाया...रणविजय ने भी हामी भराकृ
‘तब तो देखना चाहिए क्या होता है संसद भवन के सामने स्वतंत्राता के बाद इस तरह का सरकार विरोधी प्रदर्शन कभी देखने का मौका नहीं मिला, रणविजय ने बात जोड़ा।कृ
लिली मुंह दाबे खड़ी थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो जाएगा प्रदर्शन से? वह प्रदर्शन के बाबत कुछ जानना भी नहीं चाहती थी, फिर भी उसने सोचा कि वह भी देखेगी कि क्या होता है प्रदर्शन में? स्वतंत्राता संघर्ष वाले तरीकों से कुछ अलग या उसी तरह। पहले तो विदेशियों के खिलाफ नारा लगता था अब किसके खिलाफ लगेगा? यह देखना विस्मयकारी तो होगा ही।
कुल कितने आदमियों को जुटाने का ठेका मिला है।’ रामदयाल ने रघुवर से पूछा
‘डेढ़ हजार आदमियों का साहब!’
‘रुपया कब मिलेगा?’
‘आधा मिल गया है,’
‘आधा कब मिलेगा?’
‘प्रदर्शन के बाद’कृ
फिर रघुवर बताने लगा कि उसे पांच हजार आदमियों को जुटाने का ठेका मिलता पर एक आदमी और आ गया, वह दिल्ली शहर की झुग्गी झोपड़ी का आदमी था, उसने दिल्ली से ही आदमियों के प्रबन्ध का ठेका ले लिया। वहां के आदमी पैदल ही गांधी जी की समाधि तक पहुंच जायेंगे, मेरे यहां के लिए तो ट्रकें भेजनी पड़ेगीकृया फिर रेल से जाना होगा। रघुवर का चेहरा, बताते-बताते काफी कुछ उतर सा गया, फिर भी वह मस्त-मस्त था। कई वर्षों बाद उसे ठेका मिला था।
देश की संस्कृति किस तरफ जा रही? रामदयाल को इस तरह के सवाल अक्सर परेशान करते हैं। वे इन सवालों से खुद को जितना दूर ले जाना चाहते उन्हें लगता कि सवाल उन्हें किसी विषधर की तरह काटने लगते हैं, उन्होंने खुद को नियंत्रित किया और लिली से कहा...कृ
‘चलो लिली वापस हो लें और इतिहास की गुफा में समा जांये, उस दिल्ली में जहां इतिहास संवरता है। फिर मुजफ्फर की कार सड़क पर दौडने लगी।कृ रास्ते मेें मार्क्स की किताब खरीदी गई, एक जगह सभी लोगों ने चाय पी और फिर अंग्रेज हाकिम के आवास पर।कृ
दोपहर का खाना-पीना हुआ, खाना सामान्य था जिसमें देहाती पुट अधिक था, चावल-दाल, रोटी-सब्जी और सलाद, एक चीज विशेष थी जो रामदयाल को काफी रुचती थी, वह थी कढ़ी, दही से तैय्यार की हुई।कृरामदयाल भोजन के साथ संलग्न आत्मीयता के स्वाद में थे। लिली की ममा खाना खाते समय सामने बैठी थीं, उन्होंने कढ़ी के बारे में पूछा...कढ़ी कैसी बनी है रामदयाल जी?
‘बहुत स्वादिष्ट बनी है ममा! रामदयाल ने कढ़ी की बरी मुंह में डाल कर बताया, अभी तक गांव-गिरांव का खाना आपको भूला नहीं है! पूछा रामदयाल नेकृ
अरे! कुछ नहीं भूला है भइया! लिली अपनी जगह से चहकी, वह रणविजय के पास ही बैठी थी, अंग्रेज हाकिम रामदयाल के पास बैठा था..उसने भी...कृ
‘मुझे भारतीय खाना काफी रुचता है, खास तौर से कढ़ी, फ्राई की हुई दाल, मसालेदार सब्जी और आलू-मूली के पराठे तो जितना खाओ, कम ही लगता है, इच्छा बनी रहती है।’
आज कहां-कहां घूमना हुआ? पूछा लिली की ममा नेकृ
ममा! न पूछो...कृ ‘भइया दिल्ली के बाहर एक बस्ती में गये थे, जो गरीबों की थी, भइया का मानना है कि वहां इतिहास नहीं होता लिली ने स्पष्ट किया।कृ
कैसा इतिहास रे! कोई खतरनाक चीज है क्या? जो वहां होता तो दिक्कत होती। लिली की ममा ने बहुत ही भोलेपन से रामदयाल से पूछा।कृ
‘नहीं ममा! मुझे दिल्ली नहीं देखना था, सो गांव की तरफ चला गया। गरीबों का इतिहास नहीं होता न, वे गरीब, उनके बाप-दादे गरीब, उनकी हर पीढ़ी गरीब रामदयाल ने छोटा सा उत्तर दिया।
इतिहास क्या है रामदयाल जी? कोई खाने-पीने वाली चीज है क्या? लिली की ममा ने सहजता से पूछा, जिससे साबित होता था कि लिली की ममा बौद्धिक तात्विकता से जैसे अब भी काफी दूर हैं तथा एक ऐसी जमात का प्रतिनिधित्व कर रही हैं जिसका इतिहास से कुछ लेना-देना नहीं होता।
इतिहास मतलब कहानी, आपको करमा की कहानी याद है न ममा! पूछा रामदयाल ने, फिर थोड़ा रुक कर ममा को याद दिलाते हुए...कृ
वही करम और धरम वाली कहानी
लिली की ममा का चेहरा हसा...कृ‘हां हांकृभला वह कहानी कभी भूलेगी पूरा सात दिन का व्रत होता है, करम के पेड़ की पूजा होती है फिर नाच...कृ
नाच कहते ही लिली की ममा शरमा गईं और उन्होंने अंग्रेज हाकिम की तरफ आंखें घुमाया, जैसे मजाक करना चाहती हों...कृ
नाच अच्छी लगती है नऽ, अंग्रेज हाकिम भी कम न था...कृ
‘तुम तो आदिवासी नहीं फिर तुमने करमा नाच क्यों सीखा?’
‘आदिवासी गांव में रहती थी। वहां करमा न सीखती तो क्या भांगड़ा सीखती, तुम्हारे क्लब में जाकर किसी से कमर पकड़वाती फिर नाचती...’
‘तभी तो नहीं गई कभी! लिपटी रह गई छह मीटर की साड़ी में,’ अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा को छेड़ा।कृ
‘तुम्हें अच्छी नहीं लगती क्या, नंगी हो जाऊं,’ लिली की ममा ने हसोड़ा प्रतिवाद किया।कृ
‘अरे लिली की ममा! नहीं, नहीं ऐसा नहीं, साड़ी में तो तुम देवी लगती हो। तो इतिहास कुछ नहीं, बाप दादों की कहानी ही इतिहास होता है, वह भी सबका नहीं, राजाओं-महाराजाओं का। मेरा, तुम्हारा, रामदयाल थोड़ा आगे जाकर रणविजय का भी कोई इतिहास नहीं, कोई कहानी नहीं, भले ही रणविजय, राजा का भाई है तो क्या हुआ? इतिहास तो उनका होता है जिनकी पुतलियां दिल्ली, अवध, जयपुर, जोधपुर, हैदराबाद, बीकानेर, ग्वालियर, मैसूर आदि को नचवाया करती हैं।’
‘अब समझी...साफ बोलो न इतिहास माने राजा व रानी की कहनी। मेरी अइया अक्सर किसी राजा की कहानी सुनाती थी।कृजिसमें एक महल होता तथा उसके कुछ किस्से होते थे, चार-पांच साल महल में रही हूं, उसकी दीवारों से बोली बतियायी हूं।
तब तो मैं इतिहास जानती हूं रामदयाल जी! लिली की ममा ने सगर्व बतायाकृ
खाना खाते समय बस्ती के बारे में बातें होती रहीं तथा अंग्रेज हाकिम सारा कुछ गुनते हुए सुनता रहा। उसे कुछ आश्चर्य भी हुआ कि प्रदर्शन के लिए किराये के आदमियों का इन्तजाम स्वतंत्राता संग्राम के समय में भी किया जाता था और आज कल भी किया जा रहा है। प्रदर्शन में भाग लेने वाले आदमियों के आने-जाने की सुविधायें पहले भी दी जाती थीं, पूरी की पूरी ट्रेन भरी होती थी उनसे, टिकट के स्थान पर सभी के हाथ में पंपलेट होता, मुंह में नारे होते, एक उत्साही भीड़ होती, भीड़ के सामने टी. सी. बौका बना खड़ा रहता, उसे अपनी कानूनी श्शक्तिहीनता महसूस होती तथा फालतू कमाई का अभाव भी।
‘मार खाना ही होगा?’ ऐसी स्थिति में सरकार सुरक्षा नहीं दे सकती टी. सी. अन्तःमन के समयानुकूल फैसले को सुनता तथा निर्जीव माफिक प्रदर्शनकारियों की उर्जायुक्त भीड़ का अवलोकन करता रहता। अपने देवता की मनौती करता कि वह सकुशल बचा रहे, भीड़ टिकट ले तो ठीक न ले तो ठीक।कृ
अंग्रेज हाकिम के पास प्रशासनिक कार्य संस्कृति का सारा लेखा-जोखा था। उसके जमाने में जो धरना-प्रदर्शन वगैरह हुआ करते थे, उनमें स्व-स्फूर्तता हुआ करती थी और ऐसा नहीं था कि किराये के आदमियों का इन्तजाम किया जाता था अपने आप जनता प्रदर्शन में भाग लिया करती थी।
‘तो क्या ऐसा है?’ अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल से पूछा।कृ
‘हां डैड ऐसा ही’ मुझे भी पहले न मालूम था।कृ
यही तो यहां की त्रासदी है, कभी-कभी तो मुझे लगता है कि यहां कभी भी विरोध का इतिहास ही नहीं था, जो था सारा कुछ युद्धों का विवरण भर था, छोटे-छोटे किस्सों में विभक्त, एक राजा दूसरे राजा को मारता काटता, जनता त्रास्त और खामोश, दमन के लिए मजबूर।
खाना खत्म हो चुका था, लिली की ममा अपने कमरे में चली गईं। दूसरे दिन का प्रोग्राम था प्रदर्शन देखना, जो संसद भवन के सामने होना था। लिली की ममा के साथ अंग्रेज हाकिम भी उसी तरफ गया। अध्ययन कक्ष की तरफ लिली रणविजय और रामदयाल आये और बैठ गये।
ये सभी लोग अध्ययन कक्ष में बैठे ही थे कि अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल को पुकारा...कृ
फिर रामदयाल उनके कमरे में थे। अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल को वह शिवालय दिखाया जिसे अंग्रेज हाकिम ने खुद बनाया था। शिवालय लकड़ी का बना था जो तीन फीट ऊँचा तथा चार फीट के घेरे में था। शिवालय एक चौकोर लकड़ी पर अवस्थित था। शिवालय के चारों ओर दो ईंच का घेरा था, जो बाउन्ड्री जैसा दिखता था। दो इंच की ऊँची दीवार भी बनाई गई थी, जो लकड़ी की चिकनी पट्टी थी। पूरा शिवालय गहरे चमकदार काले रंग का था जो शीशम की लकड़ी से बनाया गया था। शिवालय के भीतर शिवलिंग स्थापित किया गया था। शिवालय के बाहर चारो ओर एक-एक मूर्तियां चिपकाई गई थीं, मूर्तियां भी लकड़ी की ही निर्मित थीं।
शिवालय को देखना अद्भुत था। शिवालय में कुछ फूल पड़े थे जो मुरझा गये थे। कमरे के एक खास कोने में व्यवस्थित ढंग से, एक ऊँची चौकी पर शिवालय रखा हुआ था जिससे कमरे की खूबसूरती तथा सुविधा दोनों अप्रभावित थीं। शिवालय के बाहर परदे लगे थे, परदे चारो तरफ से थे, सो प्रथम द्रष्टया शिवालय दीखता नहीं था परदा हटाने पर ही शिवालय देखा जा सकता था।
लिली की ममा ने रामदयाल को शिवालय निर्माण की पूरी कथा बताया।पहले तो नहीं, बाद में जब यह निश्चित हो गया कि यहीं रहना है फिर शिवालय बना। पूरे दस दिन लगे थे। शिवालय बनाने के लिए आरी, रुखानी, बसुला सभी सामान खरीदा गया, खजुराहो की तरह ये बाहरी मूर्तियों को बनाना चाहते थे जो एक मुश्किल काम था। फिर भी इन्होंने बिना थकान के पूरा किया, मैंने इनसे कहा था
‘कहीं से खरीद लीजिए या किसी मिस्त्राी से बनवा लीजिए’
‘नहीं माने...मैं ही बनाऊँगा।’कृ
शिवालय बन जाने के बाद पूजा-पाठ हुआ, शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की गई बाद में मैंने कहा था कि ‘अकेले शिवालय ठीक नहीं, आप अपने धरम का भी कुछ बनवा लीजिए मैं तब ईसा मसीह के बारे में नहीं जानती थी। लेकिन ये तो धरम करम मानते नहीं।’कृ
‘तुम्हारे देवता ही हम दोनों की रक्षा करेंगे।’कृ
मुझे हसी आ गई थी, ‘अब समझने लगी हूं कि इनका मन धरम से काहे उठ गया?’
‘एक बात पूछूं ममा, डैड भी यहीं हैं’कृ रामदयाल ने पूछा
‘ये आपकी बोली समझ लेते थे, और आप भी इनकी बोली’कृ
‘दोनों जन हसने लगेकृफिर अंग्रेज हाकिम बोला...कृ
‘कुछ महीने तक हम दोनों देह भर थे, देह की भाषा ही हम दोनों समझते थे। शायद हमारी स्थिति वही थी जब आदमी के पास भाषा नहीं थी, सिर्फ ध्वनियां थीं, तरंगे थीं, इशारे थे...अद्भुत था वह समय।’कृ
हमारी भाषाहीनता ने कमाल का काम किया.. हम दोनों को अच्छी तरह से समझने का मौका दिया, पिछला समय याद कर मैं रोमांचित हो जाता हूं।कृ
मुझे थोड़ी-थोड़ी हिन्दी आती थी। प्रशासनिक सेवा की ट्रेनिंग में जो सिखाई गई थी, पर वह काफी अपर्याप्त थी।कृहम खुद को अभिव्यक्त नहीं कर पाते थे लेकिन देह सारा कुछ स्पष्ट कर देती थीकृफिर आंखें बकिया सारा कुछ बता दिया करती थीं।आंखें तो अनुवादक का काम करतीं थीं, मैं तो अक्सर इनकी आंखें देखता..उनमें कभी चिठ्ठियां तैरती थीं तो कभी-कभी अभिज्ञान शाकुन्तलम के मर्मस्पर्शी संवाद...’कृ
‘अरे! अब तो चुप रहिए,कृबच्चों के सामने ऐसी बातें, लिली की ममा ने अंग्रेज हाकिम को झिडका।कृ
‘बच्चों से क्या छिपाना? यह सब तो किताब में छपेगा, बच्चे क्या उसे न पढ़ेंगे?’ अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा को रोकाकृ
‘किताब पूरी हुई कि नहीं डैड?’ रामदयाल ने जानना चाहाकृ
पूरी हो गई है प्रकाशक के पास पड़ी हुई है।
रामदयाल अंग्रेज हाकिम को देखने व महसूसने में लगातार थे। अद्भुत आदमी है, चीजों को उसकी गहनतम बारीकी से मूल्यांकित करता है। लिली की ममा की दूसरी बोली, हाकिम की दूसरी...ऐसा संपर्क, जहां बोली का कोई मतलब न होकृ गजब गुजरा होगा वह समय अविस्मर्णीय, किताब भी ठीक ही कंपोज हो गई होगी।
रामदयाल ने पूछा...‘कब तक प्रकाशित हो जाएगी?’
एग्रीमेन्ट वगैरह हो गया है, अग्रिम रायल्टी भी मिली है कुछ, छपेगी ही अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल को बताया।
फिर रामदयाल अपने कमरे में चले आये, जहां लिली और रणविजय किसी विशेष विषय के तर्क में उलझे हुए थे। लिली मानने के लिए तैयार नहीं थी कि भारतीय लोकतंत्रा में सभी को समानता हासिल हो जाएगी। कानूनी समानता के बावजूद आर्थिक असमानता में कभी भी संकुचन नहीं होगा, आर्थिक निष्ठुरतायें और बढ़ेंगी।
रणविजय लिली की बातें स्वीकारते हुए, उसे उलझाते कि फिर क्या होगा, लोकतंत्रा नहीं तो फिर क्या? क्या सर्वहारा की तानाशाही, फौजी या सम्राटों वाली?
रणविजय बौद्धिक विमर्शों के योद्धा थे, वे विमर्श को गति देने के जरूरी तर्क तलाश लेते, उन्होंने, लिली को लोकतंत्रा और तानाशाही को परोस दिया। दोनों में ही तो जनता की भागीदारी होती है।
रामदयाल के कमरे में दाखिल होते ही लिली ने जान बूझ कर खुद को रोक लियाकृलेकिन रामदयाल ने सुन लिया था कि बहस लोकतंत्रा और सर्वहारा की तानाशाही में फंसी पड़ी है, उन्होंने तत्काल लिली को टोका...कृ
‘कैसी तानाशाही, कैसा लोकतंत्रा?’
‘जहां तक मैं समझता हूं कि वही बात सही है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे, बुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा।’
लिली चहक उठीकृ‘ठीक कह रहे हैं भइया आप।’
क्या ठीक कह रहे हैं? मूर्खों के पास भले ही ज्ञान न हो पर ताकत तो होती है नऽ, और ताकतवर ही सरकार चलाता है। रणविजय ने प्रतिवाद किया फिर ज्ञान का क्या मतलब?
कैसी ताकत? देह की,कृवह क्या करेगी एटम बमों के आगे एटम बम भी तो बौद्धिक उत्पाद ही हैं... रामदयाल ने प्रति तर्क दियाकृ
क्या करेगा एटम बम? एटम बम बनाने व विस्फोट करने वाले फिर कहां रहेंगे, उनके ऐश्वर्य, वैभव, ज्ञान, शान व अभिमान वगैरह आखिर किसके ऊपर रहेंगे, उन्हें भी मूक-बधिर और अन्धी जनता चाहिए ही चाहिए, यह उनकी स्वार्थपूर्ण जिम्मेवारी है कि बहुसंख्यक गरीबों को किसी भी तरह जीवित रखें। रणविजय ने अपना पक्ष रखा।कृ
लिली चुपचाप सारा सुन रही थी तथा दोनों मित्रों की बौद्धिक प्रतिभा का मूल्यांकन भी कर रही थी। उसे आशंका भी थी कि बहस का रुख तिक्त और कड़ुआ न हो जाये, क्योंकि बौद्धिक एक दूसरे के स्वीकार से अलग होते हैं।
उसने रणविजय को रोकाकृ
‘आप लोग क्या प्रोग्राम बना रहे हैं? कल संसद भवन तक चलना है कि नहीं, प्रदर्शन देखना है नऽ।’
‘हां भाई! वहां तो चलना ही है, स्वतंत्राता के बाद का प्रदर्शन है, देखना है नेता जी लोग क्या-क्या तर्क गढ़ते हैं, मजबूत और समर्थ तर्क तो सरकार के पास हैं ही, उनके खंडन कैसे हो रहे हैं, देखना और सुनना है, क्यों रामदयाल जी! पूछा रणविजय ने।
सोच रहा हूं कल निकल चलूं, तीन दिन हो गये रामदयाल ने घर वापस लौटने के लिए कहाकृ
भइया! यह क्या कह रहे हैं आप, अभी नहीं। मुजफ्फर अंकल इसी सप्ताह आने वाले हैं, उनसे मिल कर आपको खुशी होगी तथा उनका भारतीयपना देख कर दुख भी कि क्या वे पाकिस्तान में रह सकते हैं, जहां सैनिक तानाशाही है,जहां लोकतंत्रा खत्म हो चुका है।’ लिली ने रामदयाल से दिल्ली में रूकने के लिए आग्रह कियाकृ
रणविजय ने भी लिली का समर्थन किया... ‘अभी नहीं जाना आपको, इस समय खेती-किसानी का काम भी नहीं।’कृ
‘अभी तो भइयाराजा के बारे में पूरी बातें भी नहीं र्हुइं, क्या हो रहा है जमीनदारी वाले मुकदमे में?’
‘जमीनदारी नहीं टूटी नऽ’ पूछा रणविजय नेकृ
‘हाई कोर्ट में अटका पड़ा है, नम्बर आने पर मुकदमा खुलेगा फिलहाल जमीनदारी तोडने का काम रुका हुआ है। रामदयाल ने बताया और लिली को संबोधित किया...’कृ
‘चलो कल प्रदर्शन देख आते हैं, किराये के आदमी वहां क्या करते हैं?’
‘हां अब यह ठीक होगा’कृलिली ने जोड़ाकृ
लिली पहले कभी रामदयाल से नहीं मिली थी। कभी-कभी रणविजय रामदयाल की चर्चा किया करते थे। लिली समझती कि रणविजय तो हर किसी की तारीफ करते हैंकृउनकी आदत किसी में खोट देखने की है ही नहीं।
‘भइयाराजा को तो देवता मानते थे, उनका देवता होना स्पष्ट था। पूंजी का स्वार्थपूर्ण आग्रह किसी की भी आदमियत छीन लिया करता है।’
रामदयाल में लिली किसी पूर्ण आदमी को देख रही थी, जो खुद को सामाजिक आवश्यकता के अनुरूप निर्मित करने का प्रयास कर रहा हो। वे संबंधों की गंभीरता को समझने वाले आदमी हैं, इसीलिए उनका व्यवहार अतिरिक्त आकर्षण युक्त है।कृलिली चाहती थी कि रामदयाल जी कुछ अधिक दिन तक दिल्ली प्रवास करें, अभी तो उसने कांग्रेसी राजनीति की आधुनिक गतिविधि पर बातें ही नहीं की।
रामदयाल से मिलकर लिली रणविजय की बातों को ठीक मानने लगी थी, जो उन्होंने रामदयाल के बारे में बताया था। रणविजय भी लिली की सोच वाले थे, किसी भी तरह रामदयाल को रोके रखना है कम से कम एक सप्ताह तक। मुजफ्फर के भारत आने का प्रोग्राम पक्का था। मुजफ्फर ने जिन्ना साहब की मृत्यु के बाद ही पाकिस्तान छोड़ दिया था। वैसे भी मुजफ्फर का कारोबार इंग्लैण्ड में फल-फूल ही रहा था। कारोबार का मामला जो था, वह था ही मुजफ्फर के लिए। पाकिस्तान बन जाने के बाद मुजफ्फर महसूस करने लगा था कि वहां की हवा में जनता की सांसें नहीं, वहां का मौसम, महलों और हवेलियों में बन्द हो चुका है। सडकें जो गांवों को जोड़ती हैं, उस पर सभी नहीं चल सकते, जो चलना चाहते हैं, उनके पास दूसरे का सीना छलनी करने की ताकत भी होनी चाहिए। अगर ताकत नहीं तो जहां है वहीं बन्द रहें और ताकतवरों की प्रार्थनाएं करते रहें।
लिली चाहती थी कि मुजफ्फर अंकल से रामदयाल की भेंट अवश्य हो सो वह आरूढ़ थी कि उन्हें दिल्ली से तब तक वापस न होने देगी जब तक मुजफ्फर अंकल भारत आ नहीं जाते। रामदयाल के लिए कठिन था लिली के आग्रह को ठुकराना। मुजफ्फर का लिली, लिली की ममा और लिली के डैड की जुबान पर थिरकना इसने अतिरिक्त चाहना पैदा कर दी थी रामदयाल के मन में। सो वे लिली का आग्रह स्वीकार कर लिए। अगले दिन संसद भवन तो जाना ही था प्रदर्शन देखने के लिए।कृरणविजय भी खुश-खुश थे कि लिली रामदयाल में काफी रुचि दिखा रही है। यह अच्छी बात है, अब रामदयाल के दिल्ली प्रवास का बोझ उनके सिर पर नहीं होगाकृपहले तो रणविजय असमंजस में थे, जाने क्या सोचे लिली के डैड और उसकी ममा क्योंकि रणविजय ससुराल को ससुराल ही समझते थे जहां रुकने, ठहरने की बंधी बंधाई सीमा है, उससे थोड़ा बहुत भी अधिक नहीं, सो वे हर कदम संभाल कर उठाते, और संभाल कर ही नीचे जमीन पर रखते।
रणविजय ने अपने रहने का प्रबंध कहीं दूसरी जगह कर लिया होता पर लिली के डैड और ममा दोनों ने रोक दिया।कृ
‘क्या यहां तकलीफ है? लिली की ममा ने पूछा था रणविजय सेकृ
अंग्रेज हाकिम ने तो आरोप ही लगा दिया था उन पर...कृ
‘बाप होने का मेरा हक क्यों छीनना चाहते हो रणविजय?’
रणविजय उत्तरहीन थे, तत्काल उन्हें कोई उत्तर न सूझा, उत्तर था भी नहीं, संवेदनाओं से सने सवालों के उत्तर कठोर से कठोर आदमी के पास भी नहीं होते रणविजय तो वैसे भी भावुक आदमी थे। उनकी भावुकता ही उनसे ससुराल और घर का फर्क करा रही थी, जिसे उन्होंने अपनी उम्र में जिया था। दोस्त, दुश्मन, हित-अहित, अपना-पराया सारा कुछ उन्होंने समाज से ही जाना था, अब अपने स्तर से भी कुछ समझने लगे हैं कि ये सारे संबंध वैसे नहीं जैसे दीखते हैं। भइयाराजा एक मजबूत उदाहरण हैं, और संबंधों की व्याख्या भी। वे ताकतवर हैं और साबित कर सकते हैं कि कौन असली है कौन नकली? पर मुझे तो पिता महाराज को देखना है जिन्होंने मेरी मां को असली रानी से कम नहीं समझा व माना।कृ
रणविजय को ऐसी स्थिति में लिली का घर कहां छोडना था, दो साल से इसी हवेली में रह रहे हैं, उन्हें आभास तक नहीं हुआ कि हवेली उनकी नहीं, लिली की ममा की आंखों में अलग-अलग मानकों वाली पुतलियां हैं, लिली के डैड भीतर से कुछ बाहर से कुछ हैं। जैसा अपने लोग हैं।
‘कहीं रामदयाल तो नहीं सोच रहे कि यह रणविजय का घर नहीं? रणविजय ने यह जैसे ही विचारा वैसे ही पूछ लिया रामदयाल से। सीधे तो पूछ नहीं सकते थे उनसे,कृथोड़ा घुमावदार सवाल कियाकृ
यहां भला नहीं लग रहा क्या आपको?
भला! कैसा भला? घर में भला के अलावा भी कुछ होता है क्या? रामदयाल ने बताया रणविजय को
साथियों
रणविजय और रामदयाल के लिए रात का कोई विशेष अर्थ नहीं था, कब रात ने जमीन पर अपने नाजुक पैर उतारे और उन्हें कैसे समेट लिया, सूरज की किरणों ने उसको लील लिया, उन्हें कुछ भी पता नहीं, लिली रात में एक दो बार रणविजय को अपने शयन कक्ष से निकल कर देख लेती कि वहां क्या चल रहा? दो मित्रा अपनी मित्राता के किन टापुओं पर उतर रहे, कैसे-कैसे मनोरमों, आकर्षणों को अपनी चर्चा का विषय बना रहे, कमरे के बाहर तक लिली आती, कुछ सुनती, कुछ अनुमान करती फिर अपने कमरे की तरफ वापस हो लेती और निर्णय लेती कि रणविजय को इस समय छेडना ठीक नहीं, यदि वह उन्हें बुलाती है तो यह व्यावहारिक न होगा।कृवैसे भी रणविजय आज-कल खुद को समय के साथ संतुलित नहीं कर पा रहे।कृ
लिली ने देखा कि दोनों मित्रा गुजरे दिनों, सालों के पन्ने खोले बैठे हैं, कुछ भीगे हुए, कुछ फटे हुए, और कुछ ऐसे जैसे ताजे हों, एक-दो दिन के लिखे हुए। बीते समय के लिखे पन्ने दोनों मित्रों के साथ थे, रामदयाल के यहां वैसे कुछ खास नहीं था, जो था वह पूरी तरह राजनीतिक दशा और दिशा का था कि उन्हें अगला चुनाव किसी भी स्थिति-परिस्थिति में लड़ना है, चाहे पारटी टिकट दे या न दे, इस बार तो वे मान गये, उनका जायज हक उनसे छीन लिया गया। पर रणविजय की स्थिति रामदयाल से कई मायनों में काफी भिन्न थी। उनका हक-हकूक छीनकर उन्हें सर्वहारा बनने के लिए विवश कर दिया गया था।कृ
अगर उन्हें लिली न मिली होती तो...पता नहीं कैसे लिली जैसी जागरूक महिला ने उन्हें अपना प्यार दिया।
इतना सुनते ही लिली वहीं ठहर गई...देखो आगे क्या बातें होती है? लिली ने समय देखा, दो पार हो रहा था।कृ
‘अब तक मैं सड़क पर होता रामदयाल जी, फटाफट नौकरी कहां मिल जाती?’ सर्वहाराओं के बारे में सोचना-विचारना अलग बात है, सर्वहाराओं की तरह बन जाना, रहना, अलग। बहुत मुश्किल है धन व वैभव के सुखों से अलग होना या उसे स्वेच्छया छोड़ देना मजबूरी चाहे जैसा कराये।
लिली कमरे के बाहर से सारा कुछ ऐसे सुन रही थी जैसे वह रामदयाल और रणविजय के आमने-सामने हो, उसे साफ-साफ रणविजय का आंसुओं से भीगा चेहरा दीख रहा था, उसने सोचा भी, क्या रणविजय अपनी भावुकता रोक पाने में कमजोर हैं? उन्हें समय के साथ टकराने का साहस रखना चाहिए शायद ऐसा इस लिए नहीं कि उनसे सारा कुछ छीन लिया गया है। उन्हें क्रूर धोखा दिया गया है।
लिली की ममा और डैड दोनों जन उन्हें लड़के जैसा मानते हैं, बहुत ही अच्छे लोग हैं। वे तो बाहर रहने का प्रबन्ध करना चाहते थे, उन्होंने कहा भी था, पर लिली के डैड और ममा ने उन्हें रोक दिया। उसे कोई अतिरिक्त उदारता और स्नेह वाला आदमी ही रोक सकता है।
उन्हें यहां सारी सुविधायें हैं, वे कार से चलते हैं, घर का सारा खर्च लिली के डैड चलाते हैं, वे अपना खर्च अनुबाद के काम से निकाल लेते हैं, पहली बार तो गजब हो गया, उन्हें अनुबाद का थोड़ा सा नकद भुगतान मिल गया था, साथ में लिली भी थी, डैड घर पर थे उन्होंने कार खड़ी की, सीधे डैड के कमरे में...कृ
‘पारिश्रमिक मिला है आज,’ कहते हुए उन्होंने भुगतान डैड को थमा दियाकृ
डैड तो रुपया देखकर कहीं खो गये,
‘नहीं-नहीं लो इसे रखो! पहले पारिश्रमिक का उत्सव मनाओ, पाओगे कि उत्सव के एक-एक क्षण परिश्रम की गन्ध में सने हैं और उसके सुवास से तुम्हें दुगुनी-तिगुनी ताकत हासिल हो रही है।’
लिली सारा कुछ सुनकर दृढ़ न रह सकी, पहली बार वह सुन रही थी किसी निर्वासित का बयान।कृएक ऐसे आदमी का बयान जो पांच साल पहले हर तरह से एक मजबूत आदमी था और दिल्ली में सिर्फ इसलिए निवास कर रहा था कि वह अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर ले। राजनीति के खिलाडियों से उसके संपर्क काफी घने थे। चाहता तो वांक्षित हासिल उसके साथ होता लेकिन राजनीति में भी वह सूफी ही बना रहा। लिली सीधे अपने कमरे में चली आई और बेड पर निर्जीव सा पसर गई।
रणविजय पर अतिरिक्त ध्यान देना होगा तथा उसे उत्साहित करना होगा कि जीवन तब जीवन होता है जब उसे उचित हस्तक्षेपों के साथ जिया जाये, लिली ऐसा सोच ही रही थी कि रणविजय चले आये। उसने जागते हुए सोना ओढ़ लिया। रणविजय ने लिली को सोया हुआ जान कर, उसे जगाना उचित न समझा। हालांकि उस समय लिली का जागा हुआ होना उनकी आवश्यकता थी फिर भीकृ
लिली तो जागी हुई थी, वह समझ सकती थी कि समय का संकेत किस दिशा में है? रणविजय उसे जगायें या न जगायें। ऐसी मनःस्थिति में वे खुद अभिव्यक्त न होना चाहेंगे और न ही मानसिक तरंगों को दूसरी तरफ मोड़ने का जबरिया प्रयास भी करेंगे। लिली ने महसूसा कि उसे दमित इच्छाओं का खेल खेलना चाहिएकृफिर तो उसने उत्तेजक करवट लिया और अपने हाथों को सीधे रण्विजय के ऊपर फेंका। रण्विजय उस समय छत की तरफ एकटक थे। लिली के हाथों में तेज झटकन थी। रणविजय सो जाने की कोशिश में थे फिर भी उनकी आंखों को जो देखना चाहिए या नाइट बल्ब की हल्की रोशनी में जो दिख सकता था, देख रही थीं। उन्होंने लिली के मुलायम हाथों का मुलायम झटका महसूसा, जो उत्तेजक किस्म का था। इसके बाद तो लिली रणविजय की देह के संग ऐसा संयुक्त हो गई कि वहां दो देहों, दो तरह की सांसों वगैरह का कोई प्रयोजन नहीं था।
दमित इच्छाओं को आमंत्रित कर लेने के बाद खेल के प्रारम्भ होने और न होने के बीच जो फासला था, थोड़ी ही देर में वह फासला फासला न रह गया फिर तो वहां एक रूप, एक चरित्रा और एक गुण का ही समय बच रहा था, और वह समय, उस समय का एक-एक कतरा, रणविजय के लिए आश्वस्ति दायक था कि जीवन में सिर्फ हताशायें ही नहीं होतीं, वैसे रणविजय के लिए अपनी हताशाओं की अभिव्यक्ति आवश्यक थी। रामदयाल से कोई दूसरा उनका खास था भी तो नहीं, केवल लिली थी। उसके सामने वे खुल सकते थे पर लिली उनके लिए एक कमजोर महिला थी जाने उस पर कैसा प्रभाव पड़े, समान्यतया औरतें कमजोर आदमी में रुचि नहीं लेतीं। पर लिली ऐसी न थी, वह भी अनायास मिले उत्तराधिकार को अपना अधिकार मान कर मूर्खता ओढने-बिछाने का सपना नहीं देखती थी।
रात बची हुई थी, लेकिन उसका बचना काफी कमजोर था, और नींद थी कि रणविजय की आंखों से लजा रही थी जो लिली के यहां से भाग ही चुकी थी। सो बातों ने अपनी धारा पकड़ ली, लिली ने प्रारंभ किया...कृ
‘रात गुजार दी आप लोगों ने बातें करते हुए’
‘हां गुजर तो गई’ बताया रणविजय ने।
‘कैसी बातें थीं जिसे रात ने बन्दी नहीं बनाया, निश्चित ही बातें ताकतवर रही होंगी’ पूछा लिली नेकृ
नहीं ऐसा कुछ नहीं, बातें काफी कमजोर थीं, क्योंकि कमजोर आदमी की थीं, मैं ही बतियाता रहा रात भर, तारीफ करनी चाहिए रामदयाल की, उन्होंने उकताहट नहीं दिखाया, गंभीरता से सुनते रहे मेरा अनाप-सनाप।
रणविजय ने लिली को बातों की प्रकृति के बारे में बताया।कृ
‘हूं, ऐसा, मैं भी तो जानूं कुछ। आप दोनों के बीच कमजोर आदमी कहां से चला आया? अगर आपको महसूस हो कि मैं आपके लिए गंभीर हूं तो आपको मुझसे कुछ छिपाना नहीं चाहिए यह लिली थी अपनी गंभीर आद्रता के साथ।कृ
ऐसा कुछ भी नहीं लिली! तूं सारा कुछ जानती है कि मुझे या साफ कहो तो हमें किसी पनाहगाह की तलाश करना ही चाहिए, डैड या ममा से अलगकृ रणविजय ने बात का खुलासा किया।
बस इतनी सी बात,कृफिर तो मैं समझती हूं कि इस कार्य में हताषा के लिए कोई स्थान नहीं। क्यों मैं गलत तो नहीं कह रही? पूछा लिली नेकृ
नहीं मैं हताश नहीं हंू, डैड से पूछ लूं फिर कोई अखबार ही पकड़ लूं व्यवसाय के लिए तो पूंजी चाहिए सो उसे नहीं कर पाउंगा।कृ
अखबार क्या बुरा है? पी.एच.डी. के बाद मुझे कोई कालेज तो मिल ही जाएगा।कृएक दिन रूसी दूतावास में रूसी दिमाग वाला आपका कामरेड दोस्त बोल रहा था जो कुर्ता धोतीवाला है। हम दोनों के खर्च ही कितने पड़ेंगे, अभी क्या दिक्कत है, डैड तो हैं ही, उन्हें किसी दूसरे को कुछ देना तो है नहीं, लिली ने रणविजय को आश्वस्त कियाकृ
रोशनदान पर सुबह की धमक पड़ चुकी थी, बाहर अंधेरे का हल्का कतरा भी नहीं, लिली ने रोशनदान देखा...कृ
‘अब कमरे से बाहर निकलना चाहिए दाई आ चुकी होगी, चाय लाने वाली होगी।’कृ
सुबह होने का अनुशासन लिली के दिमाग पर चढ़ गया। रणविजय ही नहीं लिली और उसके डैड भी सुबह के अनुशासन के प्रति सतर्क रहा करते थे। रामदयाल तो वैसे ही अनुशासन प्रिय आदमी थे, वे सुबह ही नहीं, रात के अंधेरे में भी अनुशासित रहते तथा मन के अन्तःपुर में जरूरी अंधेरा या उजाला ही घुसने देते।कृ
वस्तुतः दाई आ चुकी थी, उसने विस्तर वाली चाय बना लिया था, सिर्फ कमरे दर कमरे पहुंचाना बाकी था।
सुबह का प्रोग्राम पहले से ही निश्चित था कि प्रदर्शन देखने जाना होगा सो जल्दी तैयार होकर निकलना था।
जबसे रामदयाल आये हैं, रणविजय उन्हीं के साथ चाय पीते हैं, वे सीधे उनके कमरे की तरफ चले गये।
लिली ने अपने शयनकक्ष में चाय पिया, दाई ने डैड और ममा को चाय पहुंचा दिया था तथा रणविजय और रामदयाल को भी।कृ
चाय पीते समय ही हाकर ने अंग्रेजी का एक अखबार अतिथि कक्ष की खिडकी से भीतर फेंका, उसके साथ पत्रिका जैसी एक चीज थी...कृ
रणविजय ने अखबार का बंडल उठाया, साथ-साथ पत्रिका भी। पत्रिका नई थी, पहले उन्हांेने उसे कभी नहीं देखा था। पत्रिका ठीक-ठाक थी, नाम भी ठीक था ‘मैनकाइन्ड’ हैदराबाद से प्रकाशित। संपादक राममनोहर लोहिया थे। लोहिया का नाम तब रणविजय और रामदयाल दोनों के लिए अज्ञात नहीं था। रणविजय भी लोहिया की राजनीतिक समझ से प्रभावित होने लगे थे। रामदयाल तो बनारस वाले हरिजनों के मन्दिर प्रवेश की लोहिया की आन्दोलनात्मक घटना से ही प्रभावित थे, क्योंकि वह कार्यक्रम राजनीतिक कम मानसिक ज्यादा था। छूत-अछूत को परिभाषित करने वाला तथा कांग्रेसी सरकार की गान्धीवादी प्रतिबद्धताओं को साफ-साफ स्पष्ट करने वाला। जानने को तो उस घटना के बारे में रणविजय भी जानते थे पर उन्होंने उसे गंभीर राजनीतिक कार्यवाही नहीं माना था। रणविजय खास तौर से लोहिया से तब प्रभावित हुए थे जब लोहिया को गिरफ्तार किया गया था नहर वाले आन्दोलन में। तत्कालीन उत्तर प्रदेश की सरकार ने नहर का रेट (पनिकढ़) बढ़ा दिया था और लोहिया ने उस मुद्दे को आन्दोलन के जरिए उभार दिया था। स्वतंत्रा भारत में किसानों का वह पहला आन्दोलन राजनीतिक दृष्टिसे काफी महत्वपूर्ण था जिसमें हजारों किसानों की गिरफ्तारी हुई थी।
पहले तो रणविजय को महसूस होता था कि लोहिया आसमान में कुछ ठोस शब्दों के सहारे छेद करना चाहते हैं, उनका नारा ‘जेल, फावड़ा, वोट’कृबाहरी और भीतरी जनतंत्रा या वाणी की स्वतंत्राता हो, सारे के सारे दुनिया के मजूरों एक हों जैसे थोथे आह्वान भर जान पड़ते हैं।
‘कौन सी पत्रिका है?’ रणविजय से पूछा रामदयाल ने
‘मैनकाइन्ड है लोहिया की’कृ
अंग्रेजी में! हिन्दी का पक्षधर और पत्रिका अंग्रेजी में!
अंग्रेजी के पाठक ज्यादा हैं इसीलिए शायद।
हिन्दी में वे ‘जन’ नामक पत्रिका निकालते ही हैं।कृ
देखूं तो रामदयाल ने पत्रिका रणविजय से मांग लिया। रणविजय अखबार पलटने लगे। अखबार पारंपरिक मिजाज का था, जहां-जहां वायसराय और अंग्रेजी सरकार की चर्चा प्रकाशित होती थी, वहां वहां तत्कालीन प्रधानमंत्राी चस्पा हो गये थे तथा बाकी जगहों पर देश और प्रदेश की सरकारें थीं। कहीं कहीं मुख्यमंत्राी और राज्यपाल आदि भी थे। हत्याओं, बलात्कारों, लूटों, दुर्घटनाओं की खबरें भी पहले की तरह यथा-स्थान थी। अखबार में पढने लायक जो लेख था वहां पहुंच कर रणविजय ठहर गये थे। रणविजय की आंखें लेख पर थीं।
मैनकाइन्ड पत्रिका रामदयाल के हाथ में थी जो अपनी भाषा तथा स्पष्टता में काफी भिन्न थी। कांग्रेसी सरकार का राजनीतिक पक्ष साफ तौर से पत्रिका में परिभाषित था कि सरकार केवल सरकार है, यह जनता की सरकार नहीं है। पत्रिका में एक लेख ऐसा भी था जो पंचायत से लेकर विश्व सरकार और विश्व नागरिकता की संभाव्यता के तर्कपूर्ण विमर्शों से भरा था कि कैसे ग्राम पंचायतें अपने शासन को चलाते हुए, जिला शासन और फिर प्रदेश तथा देश के शासन के साथ सार्थक सहयोग व भागीदारी कर सकती हैं।
रामदयाल पत्रिका का पढना जारी न रख सके उन्हें आन्तरिक कुलबुलाहट होने लगी फिर उन्होंने रणविजय को अपनी तरफ प्रभावित किया...कृ
‘यह तो बहुत ही सार्थक राजनीतिक पत्रिका है भाई।’
‘इसके कई लेख पढने लायक हैं।’
साहसपूर्ण है, स्वतंत्रा जनतंत्रा या लोकराग को व्याख्यायित करती, इसकी एक प्रति मुझे भी चाहिए, इसकी सदस्यता का रुपया आज ही एम.ओ. कर देना है।कृ
रणविजय ने पत्रिका ले लिया, उन्होंने सरसरी तौर पर उसे देखा उन्हें महसूस हुआ कि इसे गंभीरता से पढना, गुनना होगा। अब रणविजय भी डा. लोहिया को गंभीरता से महसूसने लगे थे कभी कभी उनके बयान वगैरह अखबारों में छपा करते थे। जो बहु-अर्थी जैसे जान पड़ते थे, जैसे ‘भूमि सेना जेल, फावड़ा और वोट’ पर बाद में उन्हें जान पड़ा था कि ‘भूमि सेना’ का गठन किसी भी लोकप्रिय सरकार का लोकप्रिय कार्यक्रम हो सकता है तथा हजारों, लाख एकड़ परती, ऊसर, बंजर भूमि को कृषि योग्य भूमि में बदला जा सकता है तथा एक ऐसे वर्ग समाज को भूमिधारी बनाया जा सकता है जिनके पास अपने आवास तक के लिए जमीन नही हो, इसके बावजूद रणविजय खुद को आश्वस्त न कर पाते कि वर्ण-समाज में आखिर वर्ग-संघर्ष क्यों नहीं होगा? वर्ग-संघर्ष की अवधारणा का मुद्दा रणविजय के लिए चिन्तन के स्तर पर इतना प्रभावकारी था कि उन्हें लोहिया के राजनीतिक सुझाव विचलित न कर पाते लेकिन उनके लिए मुश्किल हो जाता कि वे किसे ठीक मानें। उन्हें वह याद क्रोधित कर देती कि कामरेडों ने स्वतंत्राता संग्राम के समय अंग्रेजों की मदद की थी। वर्ग-संघर्ष बनाम वर्ग-सन्तुलन का द्वन्द उनके भीतर चलता रहता। वे मानकर चलते कि भारतीय कामरेडों ने स्वतंत्राता संग्राम में भाग न लेकर अंग्रेजों का साथ दिया था, यह भारतीय कामरेडों की गलती थी न कि वर्ग-संघर्ष की। लेकिन यह जो वर्ग-सन्तुलन का मामला है, जिसे डा. लोहिया व्याख्यायित कर रहे हैं क्या यह इसलिए है कि रक्तपात न हो, लोगों का खून न बहे।कृ
पत्रिका का कुछ हिस्सा देख कर रणविजय ने विचार किया...कृ
‘लोहिया को पढना, संवेदना के स्तर पर खुद की कार्य क्षमता व इच्छा शक्ति को समीक्षित करना है।’
ऐसा ही जान पड़ रहा है। रामदयाल ने रणविजय को स्वीकारते हुए पूछा...कृ
अरे! भाई संसद भवन कब चलना है! लिली नहीं दिखी अभी सो रही है क्या?
तभी लिली आ धमकी, लिली यहीं है आपके पास। आप लोग चाहें तो रात की बाकी नींद पूरी कर लें, फिर चलेंगे लिली ने जोड़ा।
अरे! नहीं काफी देर हो जाएगी रामदयाल ने सुझायाकृ
आप लोग जल्दी तैयार हो लें। रोटी और लौकी की सब्जी का नाश्ता लेकर चलते हैं, डैड से भी पूछ लेती हूं वे चलेंगे क्या? लिली कहते हुए डैड और ममा के कमरे की ओर वापस हो ली।कृ
लिली के डैड को कहीं दूसरी जगह जाना था, सो वे संसद भवन तक नहीं जा सकते थे। रणविजय, रामदयाल और लिली ही संसद भवन के लिए निकले। किसानों, मजूरों का प्रदर्शन तब तक बीच रास्ते में कहीं फंसा पड़ा था। संसद भवन के सामने सन्नाटा था। रामदयाल ने कोशिश किया कि वे उस सन्नाटे में से एक ऐेसे भारत को बाहर निकालें, जो पन्द्रह अगस्त सैंतालिस के पहले का था। पर यह तो उनकी सोच का ही हिस्सा था वास्तविकता जो थी वह सामने थी कि वहां सन्नाटा था, अब सन्नाटे में से चाहे जो जैसा समझे निकाले।
संसद भवन की दाहिनी ओर कुछ लोग थे, जो मंच वगैरह बनाने की तैयारी में थे, पास में ही दरियां वगैरह रखी हुई थीं। उन लोगों ने बताया कि प्रदर्शन का मार्च प्रारंभ हो गया है जो घंटे दो घंटे में यहां आन पहुंचेगा, यहां भाषण होंगे, बताया जाएगा कि देश की तस्वीर कैसी है? और कैसी बनाने का वादा किया गया था।
रामदयाल ने घड़ी देखा..दिन के ग्यारह पार हो रहा था।कृ
रणविजय ने मंच बनाने वालों से प्रस्तावित किया...संसद का सत्रा प्रारंभ होने पर प्रदर्शन करना चाहिए था अभी तो संसद खामोशी में है।
हम लोग कुछ नहीं जानते प्रदर्शन के बारे में हमें तो मजूरी मिलेगी। हम टेन्ट ष्शामियाने वाले की तरफ से हैं।कृ
एक नेता जी हैं, वे यहां अभी आये थे, वे आ ही रहे होंगे, आप उनसे बातें करें।
लिली मौजूदा समय की राजनीतिक कार्यवाहियों के बारे में गुन रही थी, सो गंभीरता से सारा कुछ देख रही थी। उसके लिए था कि चलो कुछ तो हो रहा। सन्नाटा किसी भी लोकतंत्रा के लिए ठीक नहीं होता।
संसद भवन की भव्य अंग्रजी जमाने वाली ईमारत, उसकी महराबें, घुमावदार घेरे, एक प्रभावकारी संरचना, भवन निर्माण कला और धन का बुद्धिमत्ता पूर्ण उपयोग किसे प्रभावित नहीं करेगा? पर क्या वहां वैसे ही कानून भी गढ़े जाते हैं जो जनता के हितों की हिफाजत करते हैं, यही सोच रहे थे रामदयाल रणविजय और लिली भी, फिर वे खुद अपने आपको कोसते...कृ
‘कि उनके सोचने का तरीका ही कसैला है, हर चीज में उन्हें नकारात्मकता ही दीखती है, जो है जैसा है, उसके प्रति वे तटस्थ नहीं रह पाते।’कृ
आप संसद भवन के भीतर गये हैं कि नहीं? रामदयाल से पूछा रणविजय ने।
कहां मौका मिला? अंग्रेजों के जमाने में संसद भवन में जाना काफी मुश्किल था, बाद में कभी उस इच्छा से दिल्ली आया ही नहीं। इच्छा है कि एक बार वह स्थान देखूं, जहां से भगत सिंह ने बारूद का गोला फेंका था और कोई मरा नहीं था। रणविजय को बताया रामदयाल ने।
‘मैं भी नहीं दाखिल हो सका हूं उसके अन्दर रणविजय ने अपने बारे में बताया।’कृ
‘इसमें क्या रखा है? जब चाहें देख लिया जाएगा, इस बार सत्रा चालू होने दीजिए, भइया आप भी आइयेगा तब, साथ ही देखा जाएगा, लिली ने रामदयाल से कहा।कृ
‘हां आऊंगा जरूर, बतौर सांसद तो उसमें घुसना असंभव है, बतौर दर्शक ही देख लिया जायेकृजैसे कि हम ‘भारत’ देख रहे हैं, नक्शा फैला लिया, देख लिया सारा कुछ नदियां, पहाड़, शहर, महाशहर उस तरह भी देखना कम रोमांचक नही होगा।कृ
रामदयाल ने अपनी विवशता व्याख्यायित किया।कृ
चलिए क्या हुआ? हम गणेशिया संस्कृति के लोग हैं। गणेश देवता, देवताओं की दौड़ में थे, देवताओं के पास तेज दौडने वाली सवारियां थीं, गणेश जी के पास चूहा था, चूहा कितना दौड़ता! उन्होंने चूहे की सवारी किया और अपने पिता महाराज की ही परिक्रमा करने लगे। देवताओं को काफी अचरज हुआ, पूरे रास्ते पर चूहे के पैरों के निशान मिलते। गणेश आगे निकल गया क्या?
गणेश उस प्रतियोगी परिक्रमा में सबसे आगे निकल गये थे। हम लोगों को ऐसा ही मान लेना चाहिएकृक्योंकि हमारी सीमायें सीमित हैं, पूरी तरह मापित। रणविजय ने रामदयाल का समर्थन किया कि एक औसत भारतीय के लिए अपना भारत केवल गणेश परिक्रमा की तरह ही देख पाना संभव है? और अपनी तमाम सक्रियताओं के साथ भारतीय होने का यही स्वादिष्ट भ्रम पीते रहना होगा।
जब तक प्रदर्शनकारी अपने प्रदर्शनों के साथ संसद भवन नहीं आ जाते, तब तक का समय रामदयाल, रणविजय और लिली के लिए किसी तरह गुजार लेने जैसा था। यानि कि ऐसे कार्य-योजना हीन समय का उपयोग चाय पीने और किसी लुभावने गप-शप के लिए किया जा सकता है फिर तो लोग उस चाय वाली दूकान की तरफ बढने लगे, जो वहीं पास में थी।
संसद भवन के आस-पास का इलाका केन्द्रीय राजधानी का अधिग्रहित क्षेत्रा था, उसकी विशेषता थी कि वहां देश के पूंजीपतियों के कब्जों से वह क्षेत्रा मुक्त था, उन पूंजीपतियों से भी जिन्होंने स्वतंत्राता संग्राम में अपनी तिजोरियां खोल रखा था, ऐसा क्यों था? यह समझ पाना रामदयाल और रणविजय दोनों के लिए मुश्किल था।
मुश्किल इसलिए था कि कांग्रेसी सरकार दो नावों पर चल रही थी, उसका पहला आधा हिस्सा पूंजीवादी था, यानि गर्दन के ऊपर सरकार का रंग-रूप पूंजीवादी दिखावटी उदारता, दया, प्रेम, लाभ व क्रूर निजी सुविधा, भोग-विलास वाला था तो नीचे का दूसरा हिस्सा नंगे पांव चलने वाला भी था। गनीमत थी कि संसद भवन के प्रभावित परिक्षेत्रा पर पूंजीपतियों का कब्जा नहीं था यह अचरज की बात थी। लिली तो अपने दिमाग को थपकियां देकर सुला चुकी थी, उसने खुद को प्रदर्शन देखने तक सीमित कर लिया था, वह उसमें से आह्लादकारी प्रसन्नताओं को पकड़ने के लिए ही उत्सुक थी ‘चलो कुछ तो हो रहा खामोशी पीने से तो कुछ भी न होगा?’
बहुत दूर जाने के बाद चाय की दूकान मिली जो एक छोटे से गोमटीनुमा वाले कमरे में थी, वह कमरा सरकारी था और ठेके पर आवंटित किया गया था। दूकानदार ने उसे ठेकेदार से किराये पर लिया था। ठेकेदार दिल्ली का था जिसने नई दिल्ली क्षेत्रा के ऐसे कई सरकारी दूकानों का साझा ठेका लिया था, वह किसी नामी कांग्रेसी का पुत्रा था, जिसका दिल्ली नगर निगम और केन्द्रीय सरकार पर काम चलाऊ प्रभाव था।
दूकानदार गाढ़ी होती रेखों वाला नौजवान लडका था, जो हसियों को अपने मोटे होठों के भीतर रखता था, दूकान के भीतर और बाहर दोनों तरफ ‘सर’ ही ‘सर’ था क्या दें सर? दूकानदार ने पूछा।
रणविजय ने दूकान का सामान देख कर पूछा..‘क्या क्या है तुम्हारे पास?’
दूकानदार फर्राटा सामानों की सूची बांच गया। जिसका अर्थ था यहां भूखे नहीं आते कि पूड़िया मिलेंगी, यहां खाते-पीते लोग ही आते हैं, चाय, काफी, बिस्किट क्या नहीं है? यहां सिगरेट और पान भी है, खैनी नहीं मिलेगी।कृ
‘चाय दो और बिस्किट भी’ लिली ने मांग कियाकृ
चाय पीते समय ही दूकान में आवाज आने लगी...कृ
‘इन्कलाब जिन्दाबाद! इन्कलाब जिन्दाबाद, संघर्ष हमारा नारा है, धन-धरती बंट कर रहेगी, हमें हमारा हक दो, यह देश हमारा भी है, जैसे कानफोड़ू नारों की आवाजें साफ-साफ थीं, लिली, रामदयाल और रणविजय को सारे नारे प्रभावित करने लगे थे कि लोकतंत्रा की यही सबसे बड़ी ताकत है।
कुछ देर में प्रदर्शन और प्रदर्शन की भीड़ दिखने लगी थी, अनुमान करना आसान हो गया था कि भीड़ कितनी है? यह भी कि भीड़ में जो भीड़ है, वह भी कैसी है?
भीड़ अनुशासित थी, पर नारे अवज्ञाकारी थे, सीधे सीधे सरकार की बदनीयती को साबित करते। यही अपेक्षा भी की जा सकती थी प्रदर्शन से। प्रदर्शन के साथ ही रणविजय, रामदयाल और लिली भी चलने लगे।कृप्रदर्शन के सारे लोग सड़क पर थे, पहचानना कठिन था कि कौन नेता है कौन अनुयायी? सभी नेता और अनुयायी दोनों लग रहे थे।
संसद भवन के सामने पहुंच कर जहां मंच वगैरह बनाया गया था, भीड़ किसी बड़ी सभा में बदल गई, चार पांच हजार वाली सभा जैसी। कुछ लोग मंच पर बैठ गये, जो पहनावे से नेता दिखते थे, मंच के पास एक माइक भी खड़ा था...कृ
फिर एक नेता खड़ा हुआ उसने माइक थामा, संबोधित किया
‘साथियों’
दूसरे दिन की सुबह
प्रदर्शन की भीड़ खामोशी ओढ़ कर मंच के सामने बैठी थी। उनका बैठना व शान्त रहना और मंच से संबोधित किये जाने वाले संबोधनों को सुनना तब उनके लिए किसी जरूरी काम की तरह था भले ही भीड़ या प्रदर्शन के यायावर दर्शक रामदयाल, रणविजय और लिली जैसे लोग प्रदर्शन का अर्थ विपरीत प्रभावों वाला लगा रहे हों।
मंच पर खड़ा नेता ‘साथियों’ माफिक प्रिय संबोधन से आगे निकल कर प्रदर्शन को आश्वस्त करना चाहा कि मुख्य वक्ता किसी जरूरी काम से कहीं फंस गये हैं वे शीघ्र ही यहां आने वाले हैं, उनके यहां उपस्थित होने तक हमें कार्यक्रम प्रारंभ रखना है। फिर उसने प्रदर्शन क्यों को किसी प्राध्यापक की तरह व्याख्यायित किया जिसका अर्थ था कि बिहार की कांग्रेसी सरकार हर वह काम कर रही जो किसान व मजदूर विरोधी हैं। नेता ने कोई उदाहरण न देकर कि वस्तुतः बिहार की कांग्रेसी सरकार क्या कर रही? भीड़ पर ही यह जिम्मेवारी सौंप दी कि आप समझते हैं कि बिहार की सरकार जनता की सरकार नहीं है, यदि जनता की सरकार होती तो ‘पांच एकड़ भूमि’ तक का राजस्व माफ कर दिया गया होता। भूमि आवंटन हुआ होता, सीलिंग लगाई गई होती, बेरोजगारों को रोजगार दिया गया होता।’
रामदयाल, रणविजय और लिली रघुवर को देख रहे थे कि वह कहां है? चार-पांच हजार के सामूहिक जत्थे में रघुवर का दिखना छिप गया था, छिप तो वह अधेड़ आदमी भी गया था जो बस्ती में उन्हें मिला था।
मंच से भाषण प्रारंभ था, मंच पर अभिव्यक्ति का ताप धीरे-धीरे फैलने लगा था। एक नेता, दूसरा नेता फिर तीसरा नेता, तभी मंच से घोषणा हुई कि प्रमुख नेता जी आ गये हैं, जिनकी सद्प्रेरणा से यह प्रदर्शन आयोजित किया जाना संभव हो सका है। भीड़ ने तालियां थप-थपाया, फिर जोरदार नारा लगायाकृऐसा नारा कि यदि संसद भवन की दीवारों में मानवीय संवेदनशीलता होती तो दीवारें भी नारा लगाने लगतीं। प्रदर्शन देखने वालों ने भी नारा लगाया,भाषण चलता रहा, नेता बदलते रहे, भाषण के प्रति प्रभाव एक,सामान्य लोगों की विचारधाराओं का घोल कि सरकार द्वारा संतोषजनक जैसा कुछ भी नहीं किया जा रहा।कृ
रामदयाल और रणविजय के लिए उस प्रदर्शन का सबसे महत्वपूर्ण भाग था कि उसमें भाग लेने वाले देश स्तर के कुछ नामी-गिरामी नेता भी थे। सामान्यतया ऐसा ही हुआ करता है बिना किसी बड़े और प्रभावी नेता के ऐसे प्रदर्शन आयोजित नहीं किये जाते कम से कम दिल्ली में। यह एक महत्वपूर्ण बात थी, किराये पर जो प्रदर्शनकारी शामिल थे, उनके कारण प्रदर्शन की गुणवत्ता काफी बढ़ गई थी। वैसे भी प्रदर्शन के लिए भीड़ ही तो चाहिए होती है। रामदयाल, रणविजय और लिली ने भी देखा कि उस समय रघुवर किसी नेता की तरह दिख रहा था। सफेद, चमचम कुर्ता,पायजामा, काली जैकेट, इस्त्राी किया हुआ। वह भीड़ में से उठता, अगल- बगल, आमने-सामने देखता फिर रटा-रटाया नारा लगाता। भीड़ में पंक्ति बद्ध बैठे उसके साथी उसी नारे को दुहराते।
रघुवर ने रामदयाल को जब पहचाना तभी भीड़ में से बाहर निकल आया।कृ
रामदयाल को नमस्कार किया नमस्कार साहब! आप लोग भी आ गये हैं, उसने पूछा...कृ
‘हां, तुम्हारा प्रदर्शन देखना था।’कृरामदयाल ने उसे बताया
‘अरे! यह प्रदर्शन क्या है साहब? कम्युनिस्टों का प्रदर्शन देखते तो कहतेकृ उसमें हमलोगों को मजा आता है, बहुत जोरदार होता है।’ रघुवर ने रामदयाल को बतायाकृ
‘क्यों उसमें क्या होता है?’ पूछा रामदयाल नेकृ
‘उसके नारे गरीबों के होते हैं, नेता गरीबी, बेरोजगारी पर भाषण देते हैं तथा प्रदर्शन में शामिल लोगों को सम्मान देते हैं, एक साथ खाना खाते हैं, सोते हैं। वैसा भाई-चारा इस प्रदर्शन में कहां? अभी तक लाई-चना भी नहीं मिला, दोपहर खतम होने वाली है।’
‘कब तक चलेगा प्रदर्शन?’ उससे पूछा रामदयाल नेकृ
‘देखिए शायद तीन-चार बजे तक चले। रघुबर ने उन्हें बताया और रामदयाल से क्षमा मांग कर श्रोताओं की भीड़ का हिस्सा बनने के लिए चला गया।कृ
रामदयाल और रणविजय को मंच, प्रदर्शन, नेताओं के भाषण, मौजूदा सरकार, ताजा संविधान, बिहार के किसानों की गिरफ्तारी सारा कुछ किसी प्रायोजित नाटक की तरह जान पड़ रहा था, ऐसा ही होता आया है, और शायद ऐसा ही होता रहेगा, सत्ता का खेल किसी कौतुक से कम नहीं। पर लिली के लिए कुछ उल्टा था, उसे सारा कुछ संभावनापूर्ण दिख रहा था, उसे प्रदर्शन जैसा प्रजातांत्रिक हस्तक्षेप अच्छा लग रहा था, कल क्या होगा से उससे वह काफी पीछे थी, उसका सोचना था जो हो रहा है, वह होते रहना चाहिए।
प्रदर्शन को संसद भवन से होते हुए राष्ट्रपति भवन तक जाना था। प्रदर्शनकारियों के दिल-दिमाग में यह बात बहुत मजबूती से बैठी हुई थी कि राष्ट्रपति जी बिहार के हैं, अपने हैं, अपनों के आंसू देख उनकी आंखें भी छल-छला जाएंगी, फिर तो हुकूमत की कलम वही लिखेगी जो बिहार के लोग चाहते हैं।कृ
अब हुकूमत के खेल में राष्ट्रपति जी से बड़ा कौन है?
प्रदर्शनकारियों के पास भाषाई कला तो थी नहीं जो बड़ा को ताकतवर से जोड़ते पर मतलब वही था लेकिन प्रदर्शन में शामिल बुद्धिजीवी किस्म के लोग तो जानते ही थे कि भारत का राष्ट्रपति महज मर्यादापूर्ण सत्ता प्रमुख होता है, उसके हाथ में सत्ता के हथियार नहीं होते, सारा कुछ प्रधानमंत्राी जी की मुठ्ठी में बन्द होता है... वे चाहें तो मुठ्ठी खोलें या बन्द रखें। मंच से बार बार राष्ट्रपति जी का नाम धुंआ की तरह उठता और हवा में विलीन हो जाता, प्रदर्शनकारी प्रजातांत्रिक हस्तक्षेप का धुंआ देखते, जो उनकी तरफ भी कुछ समय के लिए आता फिर कहीं खो जाता।
रामदयाल दिल्ली में हो रहे इस प्रदर्शन को सैंतालिस के पहले वाले प्रदर्शनों से जोड़ रहे थे, आखिर कितनी समानता है इनमें?
पर समानता न थी समानता होती भी कैसे?कृतब शासक अंग्रेज थे और अब लोग अपने हैं जो शासन-प्रषासन की पलंग पर सोये, बैठे हैं।
‘सरकार में बैठों के विरोध में आखिर कोई क्या बोलेगा? उन्हें विदेशी तो न कहेगा।’
मंच से एक तेज तर्रार नौजवान नेता का भाषण चल रहा था, उसका भाषण काफी आक्रामक था तथा उसके भाषण में शास्त्राीय शिष्टता का ही नहीं व्याकरण की सांख्यिकी का भी अभाव था, वह आंकड़ा प्रस्तुत कर रहा था और उसके जरिये साबित करना चाहता था कि बिहार काफी पिछड़ा क्षेत्रा है, उसे पहले बंगाल ने लूटा और अब केन्द्र लूट रहा है।कृ
रामदयाल रणविजय और लिली तीनों को उस नेता में जनतंत्रा की आंच काफी तेज महसूस हुई... यह आगे बढ़ेगा तीनों की यह सम्मिलित सोच थी।प्रदर्शन के प्रमुख नेता मंच पर विराजमान हो चुके थे पर उनका भाषण तो अन्त में ही होना था।कृ
‘भाषण शायद लम्बा चले लिली ने आशंका जाहिर की’कृ
‘वह तो चलना ही है, बहुत सारे लोग मंच पर विराजमान हैं, कितना अच्छा लग रहा है कांग्रेसी तो अपनी पीठ ठोंक रहे हैं कि उनसे अच्छा कोई नहीं, अब वे अपना चेहरा देखें, इस विरोध प्रदर्शन के आइने में, रणविजय और रामदयाल, कहीं न कहीं कांग्रेसी हुकूमतों से असन्तुष्ट थे, क्योंकि कांग्रेसी हुकूमतें भी अपने चरित्रा और व्यवहार में अंग्रेजी हुकूमत की नकल बनती जा रही थीं। वही नौकरशाही, वही दमन, वही पुलिस अत्याचार आखिर क्या बदला? कुछ नहीं।
रामदयाल के लिए दिल्ली का कथित वैभव आसमान में टंगी हुई खुशियों की तरह था। वहां गांवों की गलियां, गोबर और कीचड़ के लिए कुछ भी न था। वहां एक अलग किस्म की दुनिया थी जिस दुनिया में पांव रखने भर की जमीन गांव वालों के लिए न थी। रामदयाल अपने जिले के बारे में सोच रहे थे तथा प्रदर्शन से प्रेरणा ले रहे थे कि जमीनदारी विनाश के कानूनों को सही तरीके से लागू करवाने के सन्दर्भ में कुछ किया जा सकता है। रणविजय के बारे में तो कुछ करना ही नहीं है, क्योंकि वे खुद कुछ करना नहीं चाहते। वैसे रणविजय अच्छा नहीं कर रहे।कृ
‘अब चला जाये’ रामदयाल ने रणविजय को सुझायाकृ
‘लिली भी वापस होना चाहती थी, हां अब यहां क्या देखना।’
फिर तो मुजफ्फर की कार सडक पर दौडने लगी। रास्ते में ही रामदयाल ने अपने घर वापस होने की बात की... यार! कई दिन हो गये।
‘अभी नहीं, कुछ दिन और रुकिए, क्या यहां ठीक नहीं लग रहा?’ कहा लिली ने।
‘ऐसा नहीं, इस समय मुझे वहां होना चाहिए, जमीनदारी टूटने के काम पर।’ वहां काश्तकारों को जमीनों पर कब्जे नहीं मिल रहे। राजा भइया का मुकदमा भी तो उच्चतम न्यायालय में अन्तिम चरण में है, कलक्टर ने रिपोर्ट लगा दिया होगा।’
रामदयाल ने वापस होने का स्पष्टीकरण दिया।कृ
‘फिर भी नहीं जाना है आपको’ रणविजय कार चला रहे थे, बोलेकृ
‘दो चार दिन और रुकिए...’ लिली ने अपनी तरफ से जोड़ाकृ
रामदयाल असमंजस में थे, क्या करें, क्या न करें, उनके लिए कठिन था आग्रह ठुकराना, आखिर किसी न किसी दिन तो जाना ही होगा, वे सोचने लगे और खामोश हो गये।
रास्ता तो लम्बा होता नहीं, कार चलने में लगातार थी, सड़क की लम्बाई कम होती चली गई और मुजफ्फर की हवेली पास आती गई।
अंग्रेज हाकिम घर पर था, बाहर लान में बैठा हुआ, उसके साथ आधुनिक लिबाश में लिपटा एक दूसरा आदमी था, जो किसी रईस जैसा दीख रहा था, वह सिगरेट फूंक रहा था, लान के फूल-पौधे उस समय पूरी तरह खामोश थे, हवा थी कि वह उस समय गुम गई थी।कृ
रणविजय ने कार रोका।कृ
रणविजय और लिली दोनों उस दूसरे आदमी की तरफ, पीछे-पीछे रामदयाल दुआ सलाम...कृ
‘कैसी हो लिली और रणविजय तुम’कृउस आदमी ने पूछाकृ
‘ये रामदयाल जी हैं, रणविजय के दोस्त! आप हैं... मुजफ्फर अंकल’ लिली ने परिचय करायाकृ
रामदयाल ने अभिवादन उनका किया।कृ
लान में कुर्सियां थीं, जिस पर सभी लोग विराज गये, उस आदमी ने सभी को बैठने के लिये कहा।
फिर रामदयाल से परिचय का सिलसिला... परिचय अंग्रेज हाकिम ने कराया कि ये रणविजय के इस्टेट के हैं।
मुजफ्फर पाकिस्तान से लौट कर आया है और इंग्लैण्ड जाने का प्रोग्राम है। उसके अम्मी का निधन हो चुका है, पाकिस्तान की राजनीति अब बन्दूकों के कर्कश धमाकों में उलझ गई है, वहां कोई उन्हें घास नहीं डालता, खासतौर से जो लोग भारत से पाकिस्तान गये हैं। उसका सारा कारोबर घाटे में जा रहा है। पाकिस्तानी सरकार समझती है कि वह हिन्दुस्तानी है।
रामदयाल के बारे में जानकर मुजफ्फर का चेहरा खिल-खिला गया पर रणविजय के बारे में सुनकर कि उसके बड़े भाई भइयाराजा रणविजय का हिस्सा हड़प रहे हैं उसे दुख हुआ। पर मुजफ्फर धीर गंभीर बना रहा तथा चेहरे पर उभरने वाले तनावों को रोकता रहा।
रामदयाल को मुजफ्फर ने काफी गहरे तक प्रभावित किया और उसने अपने बारे में सारा कुछ बताया जिसे किसी विश्वसनीय से ही बताया जा सकता है। रामदयाल को आश्चर्य हुआ, ऐसा भी हो सकता है!
आखिर मुजफ्फर अंकल पाकिस्तान में क्यों नहीं रहना चाहते और भारत आना चाहते हैं। क्या हो रहा है पाकिस्तान में? इस बाबत रामदयाल के पास विशेष जानकारी न थी। कुछ जो वे जानते थे, वे बातें हवा में घूमने-टहलने वाली थीं सो वे मुजफ्फर की बातों में रुचि लेने लगे थे। रामदयाल ने सारी बातों का अर्थ निकाला..‘हुकूमत सिर्फ हुकूमत होती है इस पर इन्द्रधनुष के रंग नहीं चढ़ा करते। हुकूमती करतबों में चांद या सूरज कुछ भी दिखे उस पर बन्दूकों से निकली बारूद व गोलियों के गाढ़े दाग चस्पा रहते हैं।’
मुजफ्फर से रामदयाल का मिलना किसी ऊबड़-खाबड़ पहाड़ की यात्रा करना था और कल्पना करना था कि पहाड़ के कठोर पत्थरों पर किस किस्म के फूल या सब्जियां उगाई जा सकती हैं। पहाड़ जैसी होतीं मुजफ्फर की अपनी कहानियां भी इतनी कठोर हो चुकी थीं कि उन्हें तराश कर काम लायक कोई चीज नहीं बनाई जा सकती थी।
मुजफ्फर और रणविजय में कई तरह की समानताएं थीं जो दोनों के व्यक्तित्व को रच रही थीं। मुजफ्फर मुल्क के बंटवारे का प्रतिफल था तो रणविजय भी बंटवारे के ही उत्पाद थे। दोनों अपनी परिस्थितियों से लड़ने के विरुद्ध थे। दोनों के अपने-अपने आदर्श थे जो समरूप थे। मुजफ्फर अपनी मां और पत्नी की आग्रही धार्मिक जिदों के कारण पाकिस्तान का नागरिक बना था तो रणविजय अपनी मां का दंश झेल रहे थे कि उनकी मां रणविजय के पिता महाराज की रानी नहीं रखैल थीं। अजीब दुनिया है, अजीब हैं लोग, स्वार्थों के गटर में स्वर्ग तलाशने वाले। रामदयाल की आंखें मुजफ्फर से मिलकर पहले तो नम हुईं, उसके कोनों में बूंदे छलछलाईं, पर तुरन्त ही उनकी आंखों का रंग बदल गया, उसे लाल-लाल डोरों ने घेर लिया, रामदयाल भीतर ही भीतर बुदबुदाये...कृ
कितना भागोगे? कहां भागोगे? हर जगह तुम्हारा यथार्थ तुम्हें चीर कर फाट-फाट करता रहेगा लेकिन वे मुजफ्फर के लिए तो कुछ कर नहीं सकते थे यहां तक कि उसके पाकिस्तानी होने के कारण न उसकी पीठ सहला सकते थे, न ही उसकी आंखों में झांक सकते थे। रही बात मुजफ्फर को वैभव का प्रसाद खिलाने का तो वह भी नहीं, रणविजय के लिए वे बहुत कुछ करने जैसा कर सकते थे तथा उनका करना करने जैसा मालूम भी होता पर रणविजय तो आत्म-विस्थापन में थे तथा अपना जीवन किसी गलियारे या गुफा से निकाल कर खुले आसमान के नीचे गुजारने के लिए प्रतिबद्धता दिखा रहे थे जो हर तरीके से पलायन था। वैसे भी कहीं खुलापन नहीं।
समय सभी को सिखाता है यही एक सरल समाधान था जिस पर रामदयाल टिके हुए थे तथा प्रतीक्षा करो की धारणा पर चल रहे थे। रणविजय किसी न किसी दिन अपने पलायन के बाबत गंभीरता से सोचेगा और अपनी इस्टेट की तरफ वापस लौटेगा।
अंग्रेज हाकिम और मुजफ्फर जब कहीं घूमने निकल गये फिर लिली की ममा ने मुजफ्फर के बारे में सारा कुछ खुल कर बताया कि वह एक भावुक आदमी है, रणविजय और लिली भी मुजफ्फर को भावुक मानते थे जो भारत-पाक विभाजन का शिकार है।
मुजफ्फर ने लिली के ममा को पहले ही बता दिया था कि वह पाकिस्तान में नहीं रहेगा, वहां की सारी सम्पदा बेच देगा और एक ऐसे देश में रहने की योजना बनाएगा जहां उसे कम से कम केवल मुसलमान तो न समझा जाएगा, आदमी समझाा जायेगा।कृ
अंग्रेज हाकिम ने मुजफ्फर को समझाया था कि इंग्लैण्ड या अमेरिका में तुम रह और बस सकते हो पर मुजफ्फर ने इनकार कर दिया था वहां नहीं रहना। भारत से चले जाने के बाद भी अंग्रेजों की आंखों में हुकूमत का खारा पानी भरा है कि वे शासक थे और भारतीय उनके गुलाम थे इसी से मिलती-जुलती बातें अमेरिकनों में भी हैं।
और मुझे अंग्रेजों या अमेरिकनों के सामने मनुष्यों की पिछड़ी प्रजाति का होना कबूल नहीं वैसे मुजफ्फर निर्णय नहीं कर पाया था कि उसे किस देश में रहना है, केवल इतना था कि पाकिस्तान में नहीं रहना।
मुजफ्फर के आने से अंग्रेज हाकिम की हवेली खुशियों से झूमने लगी थी, अंग्रेज हाकिम तो इतना प्रसन्न था जैसे उसे उसका सारा भूला हुआ वापस मिल गया हो। लिली की ममा के पांव कभी किचन की तरफ होते तो कभी बैठक की तरफ तो कभी लान की तरफ। आंखें हमेशा सतर्क व सावधान देखती, तलाशती कहीं कोई कमी न रह जाये, लान में फूलों की कतारें हों या गमले जो रखे हुए थे लिली की ममा सभी पर निगाह दौड़ाती, कमी निकल जाये तो तुरन्त ठीक करा दिया जाय।
मुजफ्फर के आने के बाद ही लिली की ममा ने हवेली के थोड़े से हिस्से में रहने वाले, उस रसोइयां को भी बुलवा लिया था जो कभी मुजफ्फर का खास हुआ करता था। वह जानता था मुजफ्फर के खाने-पीने के बाबत।कृ
अंग्रेज हाकिम तो मुजफ्फरमय हो चुका था, पहचानना मुश्किल होता कौन मुजफ्फर था कौन अंग्रेज हाकिम। रात के गदराते ही दोनों टेबुल और कुर्सियां से चिपक गए, टेबुल पर नवाबी गिलासें चमकने लगीं तथा मुगलिया सुराही भी दारू से भरी। बातें और दारू दोनों आपस में घुल गईं। लिली की ममा दोनों की निगरानी में, दोनों की सेवा में चाहिये क्या? कबाब, काजू की नमकीन, फ्राई मछलियां उबले अंडे, बकरे की भूनी कलेजी वगैरह।
दोनों दोस्त अपने को एक दूसरे में बदलते रहे, एक कोशिश करता कि दूसरा बदल जाये फिर दूसरा कोशिश करता कि पहला बदल जाये। मुजफ्फर ने अंग्रेज हाकिम से सीधे पूछा... जब कि वह नहीं पूछना चाहता थाकृ
‘आखिर तुमने जीवन गुजारने के लिए भारत को क्यों चुना?’
इसलिए कि हजारों साल की गरीबी व शोषण के बाद भी लोग एक दूसरे पर विश्वास करते हैं तथा दुखों, यातनाओं को साझा बनाते हैं, केवल कुछ अपवादों को छोड़ कर अंग्रेज हाकिम मुजप्फर को बताते बताते धुआंसा हो गया उसे अपना घर परिवार याद आया, उसने घर की कहानी मुजफ्फर को कभी नहीं बताया था न ही बताने की आवश्यकता थी।
मुजफ्फर को पहले भी अचरज लगा था कि यूरोप का कोई जागरूक आदमी भारत में बसे। भारत या एशिया के लोग तो वहां जाकर बसना स्वर्ग में बसना मानते हैं। स्वयं मुजफ्फर भी पाकिस्तान में दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर नहीं रहना चाहता।
अंग्रेज हाकिम को मालूम था कि मुजफ्फर पाकिस्तान में क्यों नहीं रहना चाहता? मुजफ्फर ने अंग्रेज हाकिम को पहले ही बता दिया था कि अम्मी नहीं चाहतीं। अम्मी का तो बहाना था दरअसल उसकी पत्नी खुद नहीं चाहती कि वह एशिया में कहीं रहे। इंग्लैण्ड में रह कर पूरी तरह अंग्रेजिन बन गई है।
उसके मुंह से अंग्रेजी संस्कृति की सांसें निकलती है, आंखों में वहां का खुलापन तैरता है। देह पर स्वतंत्रातायें ही नहीं स्वच्छन्दतायें उछला-कूदा करती हैं। उसे लगता है कि वह पूरी औरत है साबूत फिर उसे लगता है कि उसके भीतर पैठ रखने वाली औरत कहीं दूर खड़ी होकर उसे घूर रही है, जो बार-बार सुझाव दे रही है कि तुम मर्दों से ऊपर की चीज हो। मुजफ्फर ने अपनी पत्नी के बारे में अंग्रेज हाकिम को कभी बताया भी था कि उसकी बेगम ने खुद को परिवर्तित कर लिया है और औरतों की जमात में अद्भुत बनने के सारे उपायों में लग गई है। उसकी तत्परताएं किसी साधना से कम नहीं, वह खुद अपना आदर्श है और उस आदर्श का प्रयोजन भी। परंपराओं, संस्कृतियों, रीति रिवाजों को उसने अपनी चर्या में जानबूझ कर अनुपस्थित कर दिया है तथा खुद जिस तरह से उपस्थित है, वैसी परिस्थितियां पाकिस्तान ही नहीं पूरे एशिया में नहीं।
मुजफ्फर लिली की ममा को देखता तो देखता रह जाता।
ओफ इतना महान समर्पण? सारी बातों पर निगाह, खाना, पीना, सोना, पहनना, आना, जाना मुजफ्फर ने अपने नबाबी परिवार में लिली की ममा जैसा किसी को न देखा, हां केवल दादी अम्मा थीं जो छोटे-बड़े सभी की परवाह करतीं पर शान-ष्शौकत, दाई, सेवक, पान में केशर न हो तो पनडिब्बा बाहर। गहनों का रूप नहीं, वजन देखतीं तौलतीं, रत्नों में जड़ी रहतीं।
मुजफ्फर, अंग्रेज हाकिम के चेहरे पर उसके भाग्य को खिल-खिलाता पाता। अच्छा किया जो आदिवासी लड़की से शादी किया। अंग्रेजिन या राजकुमारी होती तब जाने किस तरह से दिल-दिमाग, मौसम, हवा पानी, चांद सूरज से अपना रिश्ता बनाती? कब मुठ्ठियां बांधती कब दांत किटकिटाती और कब आंखों में अंगारे भर लेतीं।
अंग्रेज हाकिम से बतियाते हुए मुजफ्फर खुद से भी बतियाता रहा। रात का समय दोनों दोस्तों की बातों में उलझ गया था। पूरी हवेली सो गई थी पर वह कमरा, उसकी छत, खिड़कियां दोस्तों की गुफ्तगू से झूम रहे थे।कृनींद ने जब दोनों को परेशान करना शुरू किया फिर वे वहीं पसर गये, उनके भविष्य उन्हें सहलाने लगे... जागो! गुजरा वापस नहीं होता। दूसरे दिन की सुबह उनकी प्रतीक्षा में थी, उसी ने उन्हें जगाया भी।
धरती का नाच
मुजफ्फर कुछ दिनों के लिए ही भारत आया था। उसे भारत और पाकिस्तान दोनों छोडना था। भारत तो पहले ही छोड़ चुका था। पाकिस्तान में उसे वह खुशबू नहीं मिली जो ताकत देती और आदमी तथा आदमी के फर्क को मिटा देती। वहां धार्मिक जड़ताओं व सत्ता की क्रूरताओं की हवा खेत-खलिहान, घर व कार्यालय, नागरिक व सेना सभी जगहों पर पसरी हुई थी। वहां की सांसों में कहीं भी जिन्ना न थे, भारत की तरह, यहां भी गांधी का सत्य, अहिंसा, सहकार, अतीत के दुखद प्रसंग बन चुके थे मात्रा यह था कि एक थे ‘गांधी’ वहां था एक थे ‘जिन्ना’ और अंग्रेजों का द्विराष्ट्रवाद दोनों जगह स्थापित व मान्यता प्राप्त कर चुका था।
मुजफ्फर के भारत छोड़ देने के बाद रामदयाल अपने गांव लौट आये। गांव पहले की तरह जस के तस न थे। पूरे इलाके में जमीनदारी के खत्म किये जाने की बयार थी। छोटे किसानों ने अपनी पीठ थप-थपाना शुरू कर दिया था कि वे अब जमीन वाले बन जायेंगे। उनका अपना मकान होगा, अपना खेत होगा, पोखरे के पानी पर उनका हक होगा। जंगल से महुआ बीन सकेेंगे तथा जलावन के लिए जंगल से सूखी लकडियां भी ला सकेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, गुलामी जैसी हालत फिर भी बनी रही, उन्हें न खेत मिले और न कोई दूसरे अधिकार जो जंगल, परती और बंजर भूमि के बाबत होते जिस पर उनका अधिकार होता।
रामदयाल को मालूम था कि केवल कागज़ी आज़ादीमिली है, अंग्रेज चले गये हैं, देसी हुकूमत बन गई है, पर लोगों का मन नहीं बदला है। मन वही पुराना है सामन्ती और शोषण वाला, गरीबों का खून चूसने वाला। देशी रियासतें, जमीन-जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर से अपना अधिकार नहीं छोड़ने वाली। रणविजय के भइया ने तो जमीनदारी तोड़ने की प्रक्रिया को ही बाधित कर दिया है। आधे से कुछ कम गांवों के बाबत उन्होंने मुकदमा दाखिल कर दिया है, वहां जमीनदारी तोड़े जाने के काम को न्यायालय ने रोक दिया है। बकिया आधे गांवों में भी पुश्तैनी जोतदारों को जमीन पर हक नहीं मिल रहे।
रामदयाल गांव पर आकर किसी लाश की तरह बनने लगे। दिमाग पर जोर देते तो वह गायब हो जाता, कुछ सोचना चाहते तो वह छिन जाता, पुराने सपनों का हिसाब किताब करते तो वे भी स्मृति में न आते। खालीपन ऐसा कि उन्हें महसूस होता कि वे होते हुए भी नहीं हैं और जो हैं, उसके होने का तो सवाल ही नहीं।
उथल-पुथल में दो दिन गुजरा, तीन दिन गुजरा, पूरा सप्ताह निकल गया। वे विचारने लगे आखिर ऐसा किस लिए हो रहा? उनकी पत्नी भी चिन्तित, एक दिन उन्होंने उनसे पूछा...
आप दिल्ली से वापस जब से आये हैं, तब से मुझे लग रहा है कि आप काफी चिन्तित और व्यथित हैं, आखिर ऐसा क्या हुआ? कुछ तो बतायें क्या वहां रणविजय और लिली से खटपट हो गई?
नहीं नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुआ वहां। वहां तो मुझे जान पड़ा कि मैं अपने घर में हूं। अपने सगों के साथ। किसी तरह का अलगाव नहीं, अपनापा ऐसा जो मन के गहरे में जगह बना ले, उसके सभी कोनों को अपने में डुबो ले रामदयाल ने पत्नी को बतायाकृ
फिर आप उदास क्यों है? क्या सोच रहे हैं? पत्नी ने पूछा।
रामदयाल पत्नी को क्या बताते? क्या समझाते? कि वे जो सोच रहे हैं, जिसके लिए चिन्तित हैं, उनका समाधान भी वे ही खुद हैं। उन्हें अगले रास्ते के बारे में निर्णय लेना है। रणविजय तो चले गये अपने भाई से कुछ मांगा नहीं, न ही अपने हक के लिए उनसे संघर्ष करने जा रहे, लेकिन यहां के किसानों, मजदूरों का क्या होगा? भइयाराजा तो उन्हें कुछ नहीं देने वाले, सारा कुछ हड़प लेना चाहते हैं। रियासत के सारे जोतदार परेशान हैं, उन्हें अभी तक उनकी जोतों पर हक नहीं मिला, जमीन के कागजात मिलने का तो सवाल ही नहीं। दिल्ली से लौटने के बाद रामदयाल लगातार गांव-गांव घूमे। गांवों में हर तरफ मुर्झाये, यातनादायी चेहरे, गहरे तक धंसी आंखें, हकलाती जुबानें, जुबानें कुछ इस तरह...कृकुछ नहीं मिला, खाने के लिए अनाज तो मिल नहीं रहा, जमीन क्या मिलेगी? लेखपाल आया था, बोल रहा था सारी जमीनें जंगल विभाग को सरकार ने दे दिया है। राजा के हाथ से जो थोड़ा बहुत निकला, वह भी।
रामदयाल गांवों में जाते, गांवों की भीड़ दो हाथों, दो पैरों वाली, एक मुंह के साथ उनके साथ बैठ जाती, उन्हें अपनी गरीबी में डुबो देती तथा जीवन जीते रहने की यातनादायी परिस्थितियों में धकेल देती। रामदयाल चिन्तित हो उठते और अपनी भूमिका को लेकर काफी परेशान भी। गांधीवादी होने के नाते, उन्हें क्या करना चाहिए, उनका जनता के लिए तात्कालिक कर्म क्या होना चाहिए उनकी समझ में न आता। स्वतंत्राता मिल जाने के बाद कांग्रेस पारटी किसी आश्वस्ति की खोल में लगातार दुबकती जा रही थी, सामाजिक व राजनीतिक हस्तक्षेपों के बारे में वहां निर्णय व कार्यक्रम नहीं थे।
भइयाराजा की रियासत में स्वतंत्राता की गन्ध न थी, न ही वहां जमीनदारी विनाश के लक्षण थे। रामदयाल ने रियासत के बारे में प्रदेश के कांग्रेसी आलाकमान को सूचित किया तथा एक प्रतिनिधि मंडल लेकर उनसे मिले भी, पर प्रदेश की कांग्रेसी राजनीति में किसी तरह का बदलाव नहीं आया। रामदयाल के सामने कुछ करने का रास्ता न था, सो वे गुप-चुप थे तथा खुद को खंगालने की कोशिश में थे कि कोई रास्ता निकले फिर उस पर आगे चला जाये।
रास्ता तो निकलना ही था, सत्याग्रह, धरना, प्रदर्शन का। फिर क्या था पूरी रियासत धरना, प्रदर्शन से गर्म हो उठी। रियासत के भूमिहीनों में एकता आने लगी भूमि हकदारी-मोर्चा का गठन हो गया और गांव-गांव मोर्चे की समितियां भी बन गईं।
रामदयाल का यह रास्ता रियासत के बड़े-छोटे, मझोले जमीनदारों को भी खटकने लगा तथा भइयाराजा तो रामदयाल से खार ही खा गये। अरे रामदयलवा की इतनी हिम्मत जो मेरी रियासत में बवाल मचाये।
भइयाराजा ने रामदयाल को एक दिन महल पर बुलवाया। सन्देह वाहक वही आदमी था जो मुगलकालीन आदमी जैसा दिखा करता था। रामदयाल अपने गांव से काफी दूर किसी आदिवासी बस्ती में थे। मुगलकालीन जैसा आदमी उस बस्ती में पहुंचा और भइयाराजा का संदेश रामदयाल को दिया कि महाराज आपसे मिलना चाहते हैं।
आखिर क्यों? मुगलकालीन आदमी से रामदयाल ने पूछाकृ
‘मुझसे मिलने की क्या जरूरत?’
मुझे नहीं मालूम मुगलकालीन जैसा आदमी संक्षिप्त सा उत्तर देकर खामोश हो गया। दरअसल उसे मालूम भी होता तो कैसे? वह लगातार रामदयाल का चेहरा देखने में था कि वहां कोई उत्तर होगा जिसे रामदयाल देंगे, भइयाराजा से मिलना है कि नहीं। पर रामदयाल के चेहरे पर मुगलकालीन आदमी द्वारा भइयाराजा के दिये गये संदेश का कुछ असर न था।
मुगलकालीन आदमी ऐसी स्थिति में रामदयाल को बस्ती वालों से घिरा देखा। महुआ के पेड़ के नीचे, यही कोई दो तीन सौ स्त्राी-पुरुषों की भीड़ जो रामदयाल को घेरे हुए बैठी थी। मुगलकालीन आदमी ऐसी स्थिति में रामदयाल को देख कर घबरा गया, ऐसा नहीं हो सकता वह कोई घृणित सपना देख रहा, ठीक है रामदयाल राजा नहीं, पर रियासत के बड़े जमीनदारों में तो हैं ही। इन जंगलियों के साथ जमीन पर बैठना, न दरी न बिछावन, न मसलन्द न गद्दा और फिर ये जंगली, बसाने व छुआने वाले, रामदयाल के साथ अगल-बगल, मानो उनकी देह पर चढ़ जायेंगे।
मुगलकालीन जैसे आदमी को सारा कुछ किसी धोखे जैसा जान पड़ा, क्या एक जमीनदार इतना बदल सकता है? कोड़े मारने वाला, घोड़े से लोगों को रौंदने वाला, बहू-बेटियों की अस्मत लेन ेवाला। एक बार फिर मुगलकालीन जैसे आदमी ने रामदयाल को देखा।
मुगलकालीन जैसे आदमी को कुछ नहीं दिखा, रामदयाल ग्रामीणों के साथ आश्वस्त बैठे थे, उसी तरह जिस तरह कोई दूसरा बैठता जो उनका भला चाहता है। मुगलकालीन आदमी चकरा गया, ऐसा तो होता नहीं लगता है यहां कोई गहरा धोखा है जिसे वह नहीं समझ पा रहा। वह समझ भी कैसे सकता है? उसके पास समझने की ताकत नहीं।कृ
मुगलकालीन आदमी ने अन्तिम रूप से जानने का प्रयास किया कि रामदयाल जी भइयाराजा से मिलने के लिए कब आ रहे हैं? लेकिन रामदयाल ने उसके सवाल को टाल दिया, फिर मुगलकालीन आदमी वापस लौट आया और भइयाराजा को बस्ती का हाल-अहवाल बता दिया।
भइयाराजा को यह बात मालूम थी कि रामदयाल जमीनदारी तोड़े जाने के प्राविधानों को ठीक से लागू करवाने के लिए जनता से संपर्क साध रहे हैं। दूसरे किस्म के थोड़े औसत दर्जे के जमीनदारों को भी रामदयाल का जन-संपर्क अभियान अखरने वाला था, सो वे भइयाराजा के निरन्तर संपर्क में रहते हुए, निगरानी कर रहे थे कि रामदयाल कर क्या रहे हैं?
रामदयाल के लिए जनसंपर्क का मुद्दा तो गौण था उसे उन्होंने बाद में प्रारंभ किया। पहले उन्होंने जो काम किया वह अद्भुत था। उनकी पत्नी और रिष्तेदार ही आमने-सामने हो गये...कृ
यह क्या कर रहे हैं आप? सारी जमीनों का पट्टा क्यों कर रहे हैं? उनके अपने लोगों ने रामदयाल के सामने सवाल रखा।कृ
रामदयाल ने अपनों के सवालों को बहुत हल्के से लिया।कृ
‘जो करना चाहिए, वही कर रहा हूं, जमीनें जिनकी हैं उनको दे रहा हूं।’
‘तो क्या ये सारी जमीनें उनकी हैं, उनके नाम से हैं, वे मालिक हैं? रामदयाल के साले ने, जो खुद जमीनदार था कड़ा प्रतिवाद किया। साले के साथ उनकी पत्नी थीं, उन्होंने भी जोड़ा...कृ
‘हरिष्चन्द्र हैं सारा खैरात बांट देंगे, कोई क्या कर लेगा इनका?’
रामदयाल अपनों के प्रतिरोधात्मक मोर्चे से सचेत थे, उन्हें मालूम था कि जब वे जमीन का आवंटन करने लगेंगे तब उनका उनके घर में ही विरोध होगा, सभी सामने आ जाएंगे वही हुआ। सभी सामने थे, एक ओर पत्नी, दूसरी ओर साला, चाचा, चचा-जात भाई और मामा वगैरह। सभी को महसूस हो रहा था कि रामदयाल पगला गये हैं, एक बार पहले भी पगला कर आमरण अनशन पर बैठे थे, गांव के सारे अछूतों को साथ में खाना खिलवाया था। छूत-अछूत का फर्क मिटा रहे थे। इस बार भी पहले की तरह ही कुछ कर रहे हैं। सरकार को जितनी जमीन निकालनी होगी, सरकार निकाल ही लेगी फिर यह सब करने की क्या आवष्यकता? रामदयाल ने अपनों को ललकारा...
‘तो क्या जमीन आपकी है? मेरी है, किसी जमीनदार की है, किसी राजा की है? जमीन आपने पैदा किया, समतल किया, खेती किसानी लायक बनाया, कुछ किया आपने जमीन के लिए? यदि नहीं फिर आप जमीन के मालिक कैसे? कुछ भी नहीं है आपका, आप लोगों से तो जीवन जीने की स्वतंत्राता भी छीन लेनी चाहिए। लेकिन उल्टा होता रहा आज तक जिसे जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए वही गुलाम है, अछूत है, शोषित और गरीब है।’
‘और आप हैं कि अय्याशी कर रहे हैं, छत्रा-चंवरधारी बने हुए हैं, महलों में रहते हैं, प्रकृति के सारे संसाधनों के मालिक हैं। एक बात सुन लीजिए और आखिरी बात कि जमीन का आवंटन हो कर रहेगा, मुझे कोई नहीं रोक सकता।’
रामदयाल का साला एक जटिल आदमी था उसने तुरन्त प्रतिवाद किया...कृ
‘ठीक है जमीन का आवंटन कीजिए पर यह तो समझायें कि आपकी जमीन और जमीनदारी कहां है? क्या यह जमीन जिसका आवंटन आप कर रहे हैं, वह आपकी है, उसे आपने बनाया, आप तो महज प्रबन्धक हैं, मालिक नहीं फिर कैसे बांटेंगे आप? और आपको जमीन बांटने भी नहीं दिया जाएगा।’
रामदयाल अपने कहे जाने वालों के चेहरों में खो गये, वहां उत्तराधिकार की मोटी पर्तें जमी थीं। उनमें कोई ऐसा नहीं था जो अपने श्रम और अक्ल का ब्योरा दे सकता था। सभी बाप-दादों के सुरक्षित अधिकारों के वारिश थे। पीढ़ी दर पीढ़ी सरकने वाली संपत्तियों के मालिक थे, उसी को कोई थोड़ा बढ़ा रहा था तो कोई घटा भी रहा था। रामदयाल का साला उनमें न था। उसने तत्कालीन गुणा-गणित से बाप की मिली जमीनदारी को थोड़ा बढ़ा भी लिया था तथा स्वतंत्राता के बाद टूटने वाली जमीनदारी का कुछ भाग बचा लेने की कोशिश में था। इसके लिए वह सरकारी अहलकारानों से संबंध भी बना रहा था।
रामदयाल ने साले का चेहरा देखा, वहां आदमी की सूरत न थी, आदमी के रूप में वहां कोई आक्रामक था जो सिर्फ अपने लिए जीता और मरता है। रामदयाल को घिन आई-आखिर इसे क्या परेशानी है? मैं जमीन अपने पास रखूं या उसका कुछ और करूं यह क्यों परेशान है? रामदयाल को साले पर गुस्सा आया, पत्नी भी साले के साथ थीं।कृ
‘तुम यहां मेहमानी करने आये हो या गुण्डागिरी, तुमसे क्या मतलब? मैं अपना लाभ-हानि समझता हूं, अब ज्यादा बकवास न करो सीधे फूट लो यहां से, नहीं तो धक्के मार कर भगा दूंगा।’
अचानक रामदयाल को आक्रामक होना पड़ा, जबकि उनका यह स्वभाव न था। फिर तो दूसरे भी सहम गये और वापस हो लिये। रामदयाल की पत्नी तो अपना मुंह लेकर वापस हो लीं। कहां तो उन्होंने मन्दिर और धर्मशाला बनवाने के लिए सोचा था, उसके बाद बहुत बड़ा यज्ञ करवाने का भी संकल्प लिया था कि दिल्ली से लौटने के बाद काम शुरू हो जाएगा कहां ऐसा हो रहा, सारी जमीनें बांटी जा रही हैं। रामदयाल ने पत्नी से कहा भी था कि दिल्ली से वापस आने के बाद मन्दिर और धर्मशाला निर्माण का काम प्रारंभ करा दूंगा।
रामदयाल दिल्ली से वापस होते ही जमीन आवंटन के काम में लग गये, कुछ दिन तो उदास-उदास से थे जब थोड़ा ठीक हुए तो गांव-गांव मीटिंग और जमीन का आवंटन।
उनसे कौन पूछे मन्दिर और धर्मशाला के निर्माण का क्या हुआ?
रामदयाल की पत्नी, पति के कामों को सीधे रूप से रोक नहीं सकती थीं। आमने-सामने की बहस और प्रतिरोध दोनों उनके वश में नहीं था और न उन्हें विरोध या समर्थन की नैतिकता का ही व्यावहारिक ज्ञान था। उन्हें सीख में मिली थी पति की आज्ञाकारिता, आंख मूंद कर उसका समर्थन और वैसा ही वे कर रही थीं। हालांकि रामदयाल जो कर रहे थे, जिस मिजाज से कर रहे थे, सारा कुछ अपवाद जैसा था, सामान्यतया अपनी कही जाने वाली संपत्ति का बंटवारा या आवंटन कोई नहीं करता।
रामदयाल की पत्नी ने अपने भाई को बुलाया था कि वह उनके पति को समझा-बुझा लेगा पर उसे तो रामदयाल ने फटकार दिया।
‘मैं समझता हूं कि मैं क्या कर रहा हूं और मैं यह भी समझता हूं कि मुझे क्या करना चाहिए, यह बात अलग है कि सभी नहीं समझ पा रहे कि मैं क्या और क्यों कर रहा हूं, जिसमें तुम भी हो, मेरा साला तथा और दूसरे रिष्तेदार भी।’
रामदयाल की पत्नी ने निर्विकार प्रतिबाद किया...कृ
‘हां हां मैं क्या समझूंगी, मेरे पास समझने के लिए है ही क्या? अब तक तो आपको ही समझने में उलझी रही और खुद को भी न समझ पाई, अब जब खुद को समझना चाह रही हूं, तो सारा कुछ अबूझ हुआ जा रहा, एक में एक उलझा हुआ। यदि कुछ कहना भी चाहूं तो बहुत कुछ अनकहा रह जाएगा। दूसरों को अपना बना लेना अच्छी बात है लेकिन अपनों को पराया बनाना इसे क्या कहेंगे अच्छा या बुरा।
रामदयाल की पत्नी ने फिर खुद को नियंत्रित कर लिया और औरतपना में कहीं खो गई कि औरतों को सलाह मशविरा से दूर रहना चाहिए तथा सिर्फ और सिर्फ पति की सेवा में पूरा जीवन खपा देना चाहिए। उन्होंने खुद को समझा-बुझा भी लिया कि आगे है ही कौन न कोई लड़का, न लड़की। सारी जायदाद किसी दूसरे के पास ही तो जाएगी,कृउन्होंने अपने देवता को कोसा...कृ
‘क्या हो जाता यदि कोई सन्तान दे देते, फिर तो ऐसे दिन न देखने पड़ते कोई सन्तान होती तब तो वे भी सोच विचार करते और खुद को रोकते, सारी पूजा बेकार गई, जाने कब से पूजा-अर्चना कर रही हूं, सुबह-शाम आरती, मंत्रों का पाठ।’
रामदयाल फिर तो एक ऐसे ताकतवर आदमी में बदल गये जिसे पारिवारिक जकडनें जकड़ नहीं पातीं और न संवेदनायें ही रगड़ पाती हैं। वे अकड़ कर अपनी जमीन के आवंटन के काम में लग गये। अपनी जमीनदारी की सारी जमीनों का आवंटन उन लोगों में कर दिया जो उस पर जोत-कोड़ पुश्त-दर पुश्त से करते चले आ रहे थे। अपने रिहायशी गांव की करीब सौ बीघा जमीन उन्होंने अपने खान-खर्च के लिए छोड़ दिया, जिस पर उनकी खेती-बारी हुआ करती थी। आम, आंवला और कटहर के बगीचों को उन्होंने आवंटन से अलग रख दिया।
इतना बहुत है एक दिन साहचर्य के मनोरम क्षणों में रामदयाल ने अपनी पत्नी को आध्यात्मिक गुद-गुदियों से गुद-गुदाया...कृ
‘देखो! कोई कुछ न लेकर आता है और न लेकर जाता है। किसी का कुछ भी नहीं होता, जिसे अपना होना समझा जाता है खासतौर से संपत्ति के बारे में वह तो अपना होता ही नहीं। सूरज, चांद, तारे, इनमें जितना डूबो, जितना चाहो डूबो, डूबते चले जाओ, फिर निकलो हाथ में कुछ नहीं होगा। धरती भी किसी की नहीं, लेकिन उनकी है जो धरती को हरा-भरा रख सकें, धरती का श्रंृगार कर सकें, किसी दुल्हन की तरह उसे सजा सकें, लाल-लाल होठों वाली, हरियाली की मादकता में डूबी हुई आंखों वाली।’
पत्नी अवाक, सारा सुनती रहीं, बिना कुछ बोले, धरती की तरह, धरती किसी से बोलती बतियाती नहीं, वे तो परती हो चुकी थीं, जिस पर कुछ उगता नहीं, एक ही काम, सूरज को ताकते रहना, बारिश में भीगते जाना। भीग भी चुकीं थीं काफी हद तक फिर भी सूखापन था। धीरे से उन्होंने जोड़ा...कृ
‘मन के सुखों के लिए सूख जाना क्या यह अच्छा होगा। लुट जाना अलग बात है लुटा देना अलग। धन दौलत जमीन लुटा सकते हैं आप! क्या तन और मन भी लुटा पायेंगे, फिर किस-किस को लुटायेंगे? मुझे तो पता ही नहीं क्या करने जा रहे हैं आप! सिर्फ इतना पता है कि मैं रुक सकती हूं आपको रोक नहीं सकती।
रामदयाल को लगा कि उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है। प्रभा को संज्ञान में लेना चाहिए था, उन्होंने पत्नी को समझाया...
‘नहीं प्रभा! ऐसी बात नहीं, तुम रोक सकती हो। मुझ पर विश्वास करके तुम्हें लज्जित नहीं होना चाहिए। जमीनदारी का आवंटन तो मुझे करना ही था। सारा कुछ लूटा हुआ था, खून से लथपथ उसे तो लुटाना ही था, सिर्फ उनको जो उसके हकदार थे। जो धरती का श्रृंगार कर सकते हैं और मन की परती को हरा-भरा रखने की कोशिश भी। इस बारिश में तुम सूखे मुर्झायें चेहरों पर धरती का नाच देख कर नवयौवना न बनी तो मेरा नाम भी रामदयाल नहीं।’कृ
फिर रामदयाल ने पत्नी को आकस्मिक ढंग से अपने में डुबो लिया। उन्हें जान पड़ा कि पत्नी के मिजाज को बदल चुके हैं
समय के पहले
रामदयाल पारिवारिक उत्तरदायित्वों के प्रति लापरवाह नहीं थे। न्यूनतम आवश्यकताओं और जरूरी आवश्यकताओं का फर्क वे दिल-दिमाग से किया करते थे और वे समझते थे कि जीवन जीने के लिए बिना आर्थिक निष्ठुरताओं के भी उनके पास बहुत कुछ है और औसत तरीके का जीवन वे जी सकते हैं, जिसके लिए अतिरिक्त हाथ पैर और दिमाग मारने की आवश्यकता नहीं। हालांकि उनकी पत्नी प्रभा देवी ऐशो-आराम की धारा में बहने वाली महिला थीं, उनका ठाट-बाट, रहन-सहन जमीनदारी वाला था। उनकी आध्यात्मिकता में यह बात अवश्य थी कि प्रत्यक्ष रूप से किसी का नुकसान नहीं करना पर यह भी था कि जगह-जमीन, संपदा का मामला सारा कुछ परमात्मा का दिया हुआ है, वही किसी को रंक और किसी को राजा बनाता है तथा उनकी जमीनदारी परमात्मा की देन है फिर इसे किसी को बांटने की क्या आवष्यकता? प्रभा देवी ने पूरी कोशिश की कि रामदयाल जमीन का आवंटन न करें, उन्होंने भइयाराजा का हवाला भी दिया...
‘रणविजय तो भइयाराजा के सगे भाई हैं, वे रियासत में हिस्सा भी रणविजय को नहीं दे रहे। पूरी रियासत अपने नाम करा लिया। जमीनदारी भी नहीं तोडने दे रहे, मुकदमा दाखिल कर दिया है और एक आप हैं कि सारा कुछ बांटे जा रहे हैं? आखिर इसका क्या मतलब?
रामदयाल भी पहले ऐसे नहीं थे। पढ़ाई-लिखाई से लेकर सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा के कार्यक्रमों के पहले तक वे भी अपने में गोता लगाने वाले तथा अपना संसार बनाने वाले उसमें से हसियां तथा मनोरमों को हासिल करने वाले मिजाज के थे पर बाद में धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगे। उन्हें गांधीजी ने काफी हद तक प्रभावित किया फिर बाद में अंग्रेज हाकिम ने। मौजूदा सामाजिक संरचना के उलझे हुए जालों पर उन्होंने गंभीरता से विचार किया फिर महसूस किया कि वे जमीनदार होते हुए भी हवा में टंगे हुए हैं, जिसका कोई अस्तित्व नहीं। उनका सोचना था कि धन, दौलत, जमीन, जायदाद की उत्फुल्लताओं ने उनकी मनुष्यता को काफी हद तक लील लिया है और वे एक निष्ठुर आदमी में बदलते जा रहे हैं।
दिल्ली प्रवास के दौरान ही उन्होंने निर्णय ले लिया था कि उन्हें गांव वालों के लिए कुछ करना है। सरकार ने भी जमीनदारी तोडने का काम प्रारंभ कर दिया था। उन्हें कांग्रेसी सरकार का यह काम जनता का काम जान पड़ा था तथा वे हर स्तर से गांव आकर इस काम से जुड़ गये थे।
रामदयाल ने पत्नी को भी खूब समझाया। वेद, पुराण, उपनिषद आदि ग्रन्थों का हवाला दिया कि ईश्वर भी मनुष्यों की बराबरी का समर्थन करता है, वह आदमी और आदमी में फर्क नहीं करता। आदमी और आदमी के बीच यह जो असमानता है, फर्क है, दूरी है वह सब मानवीय निष्ठुरताओं और क्रूरताओं के कारण है।
‘तो आप इस फर्क को मिटा देंगे, अपना लुटा कर या खुद को मिटा कर, क्या यह आत्महत्या की एक प्रवृत्ति नहीं। हां निष्ठुरतायें और क्रूरतायें तो बहशी हैं इनसे बचना अच्छी बात है लेकिन खुद को मिटा देना और मिटते हुए पर मल्हार तो आप ही गा बजा सकते हैं, दूसरा नहीं।’
रामदयाल की पत्नी ने रामदयाल का न केवल व्यावहारिक स्तर पर वरन् तार्किक स्तर पर भी खूब विरोध किया, पर उसका असर उन पर न था, रामदयाल को जो करना था वे कर रहे थे, उसी के अनुसार वे अपनी उदारताओं की जाल गांव-गांव फैला रहे थे। उनका समझना था कि वे जमीन के आवंटन के द्वारा अपने बोझ का आवंटन कर रहे हैं, न कि किसी के प्रति दया या उपकार। उन्होंने पत्नी को अपनी इस समझ से परिचित भी कराया...
‘देखो प्रभा! जमीनदारी का प्रबंधन मेरे जैसे आदमी के लिए बोझ है।वैसे भी इतनी सारी जमीनों की हरियाली जैसी उर्वरता पर सिर्फ मेरा हक व अधिकार... मुझे तो जान पड़ता है कि यह अन्याय है, उस पर की जा सकने वाली खेती-बारी के साथ।’
पर यह सब उनकी पत्नी प्रभा देवी की समझ से बाहर था। समझ से बाहर इसलिए कि उनका मालिकाना टूट रहा था। एक ऐसा मालिकाना जिसे वे जन्म से ही चूस रही थीं और जमीनदार बन कर जमीनदारी की परजा पर मालिकाना का रोब-दाब गांठा करती थीं। एक भयानक किस्म का अन्तर खड़ा था जो उन्हें मालिकिन बनाता था और परजा को एक तरह से उनका दास या गुलाम।
प्रभा देवी के लिए जमीनदारी का मामला उनके मालिकाना जैसे व्यक्तित्व का निर्माण कर्ता था, जो परजा या अन्यों से उन्हें कथित श्रेष्ठता के अलग खानों में रखता था। दूसरी तरफ रामदयाल थे कि वे उनकी कुछ सुनने वाले नहीं थे, सो वे थक-हार कर बैठ गई।
प्रभा देवी का लालन-पालन जमीनदारी परिवेश वाला था। एक ऐसा जमीनदार परिवार जो जितना गांव की जमीनदारी की अप्राकृतिक वैभवों का सुख पीता था उतना ही शहर की आधुनिकताओं में भी आकंठ डूबा रहता था। प्रभा देवी की शिक्षा-दीक्षा मिशनरी स्कूल और कालेज वाली थी तथा वेद-पुराण और तमाम संस्कृत ग्रन्थों की पढ़ाई-लिखाई घर पर हुई थी। प्रभा देवी घुड़सवारी करतीं तथा अपने पिता के साथ शिकार पर भी निकलतीं। गोया उनका व्यक्तित्व निर्माण ऐसा नहीं था जैसा कि रामदयाल के परिवार में आकर दिखा करता था। रामदयाल के यहां आकर प्रभा देवी परदे वाली बन गई थीं तथा परदे की सारी परंपराओं में सरोबार हो चुकी थीं फिर भी जमीनदारी के प्रबन्धन में पर्याप्त हस्तक्षेप रखती थीं। रामदयाल को प्रभा देवी की प्रबन्धकीय कुशलता गहरे तक प्रभावित करती थी। वे भी अन्य बातों के अलावा प्रभा देवी के साहचर्य सुखों को अभूतपूर्व मानते तथा उनके साथ चांद-तारों का खेल आन्तरिक मन-मिजाज से खेलते।
प्रभा देवी इधर रामदयाल से काफी दूरी बना कर चलने लगी थीं, उन्हें लगने लगा था कि वे अकेली हैं तथा उन्हें अकेली ही समय की लकीरों को छोटा-बड़ा करना है। प्रभा देवी कहीं न कहीं भइयाराजा की जमीनदारी वाली शैली से प्रभावित थीं, वे ठीक कर रहे हैं राड़-रहकारों को जमीन का आवंटन करके क्या मिलेगा, भइयाराजा ने जमीनदारी न तोड़े जाने का जो मुकदमा दाखिल कर दिया है, अच्छा किया है। लेकिन उन्हें इस बात की तकलीफ थी, कि भइयाराजा ने रणविजय का हिस्सा हड़प कर गलत किया है, भाई का हक उन्हें दे देना चाहिए था।
प्रभा देवी ने एक दिन हवेली का सारा कारबार ठप्प कर दिया और इस बात के लिए अड़ गईं कि मन्दिर और धर्मशाला का जब तक निर्माण नहीं होगा आगे का कुछ भी काम नहीं होगा। रामदयाल जानते थे कि प्रभा इससे आगे भीं जा सकतीं हैं। ऐसी स्थिति में रामदयाल ने भइयाराजा के खिलाफ किये जाने वाले सत्याग्रह व आन्दोलन के काम को तत्काल स्थगित करके मन्दिर तथा धर्मशाला के निर्माण के कार्य में लग गये।
उधर भइयाराजा की रियासत में अभिनव किस्म का आन्दोलन सुलगने लगा। आन्दोलन की जड़ में था रामदयाल द्वारा किया जाने वाला भूमि-आवंटन, जो एक उदाहरण बन गया था। अम्बेडकर वादी एक दलित नेता महाराष्ट्र की नौकरी छोड़ कर अपने गांव आ चुका था। पहले तो उसने सोचा था कि वह रामदयाल से मिलेगा और भइयाराजा के खिलाफ चलाये जा सकने वाले आन्दोलन की संभावना पर सलाह-मशविरा लेगा। अम्बेडकर वादी दलित नेता अपने गांव आया, क्षेत्रा में घूमा लोगों से संपर्क किया फिर उसे मालूम हुआ कि कांग्रेस पारटी का जमीनदारी विनाश कार्यक्रम क्षेत्रा के जमीनदारों तथा संभ्रान्तों के लिए निहायत कष्टकर और विनाश करने वाला है सो वे लोग जो गांधी के सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे कार्यक्रमों में हिस्सा लिये थे और जेल की यातना भी झेले थे, वे लोग धीरे-धीरे कांग्रेस पारटी से दूरी बनाने लगे थे सो जमीनदारी विनाश का सरकारी कार्यक्रम शिथिल ढंग से चल रहा था, इतना ही नहीं, उसमें भौतिक कब्जों को भी कानूनी स्थान नहीं मिल रहा था। सरकारी अहलकार जमीनदारी विनाश अधिनियम के प्राविधानों का अलग ढंग से व्याख्या कर रहे थे, उन्हें ऐसा करने के लिए पर्याप्त अवसर भी था। भइयाराजा की पूरी रियासत अनसर्वेड थी और जमीन के मालिकाना के जिनके पास कागजात थे भी उसकी प्रमाणिकता पर सन्देह भी था। अधिकारी और अहलकारान ऐसी स्थिति का लाभ धन कमाने के लिए उठा रहे थे। अम्बेडकर वादी दलित नेता ने देखा कि सामान्य प्रक्रिया की तरह चलने वाला यह जमीनदारी विनाश का कार्यक्रम यहां के गरीबों दलितों व भूमि-जोतकों को कुछ लाभ न दे सकेगा। उसे कुछ अलग ढंग से इस सवाल पर जनमत को जागृत करना होगा।
अम्बेडकर वादी दलित नेताने अपने पुराने मित्रा रामदयाल से भी मुलाकात नहीं की। उसे जो कुछ भी करना होगा अकेले करेगा, हो सकता है रामदयाल उसका साथ न दें क्योंकि वे भी जमीनदार हैं और अपनी जमीन गंवाना नहीं चाहेंगे।
अम्बेडकर वादी दलित नेता ने अपना माथा तब पीट लिया जब उसे मालूम हुआ कि रामदयाल ने अपनी जमीनदारी की जमीनों का आवंटन खुद कर दिया है। रामदयाल ने स्थानीय कलक्टर को दबाव में लिया, उसका दौरा क्षेत्रा में करवाया तथा गांव-गांव जाकर भूमि-जोतकों की सूची बनवाया। रामदयाल के पास भी एक सूची थी जिसके आधार पर वे जमीनों को बटाई पर काश्तकारों को आवंटित किया करते थे। राजस्व विभाग के अहलकारों द्वारा जब अन्तिम रूप से सूची बना ली गई फिर उसे रामदयाल ने देखा और भूमि जोतकों से ही उस सूची की तस्दीक भी कराया।
अम्बेडकर वादी दलित नेता तो चकराया हुआ था उसे अचरज जैसा लग रहा था कि क्या कोई व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है जो अपनी जमीनदारी का खुला आवंटन उसके जोतकों के हित में करे? एक बार तो उसे झटका जैसा लगा क्योंकि प्रारंभ में उसे जान पड़ा था कि उसे रामदयाल से भूमि आवंटन के सिल-सिले में नहीं मिलना चाहिए सो महाराष्ट्र से आकर वह रामदयाल से नहीं मिला और अकेले ही गांव-गांव घूमने लगा। उस समय राजस्व कर्मचारी जमीनदारी तोड़ने की कार्यवाहियों में लगे थे।
अम्बेडकर वादी दलित नेता ने भी अपने स्तर से भूमि जोतकों की सूची बना लिया था इस काम के लिए उसे अन्य सहयोगी भी मिल गये थे जो पढ़े-लिखे तो कम थे पर दिमाग से तेज थे तथा बातों को उतना समझ लेते थे जितना कि कोई पढ़ा-लिखा भी समझता।
अम्बेडकर वादी दलित नेता के सामने एक दिन अचानक कोई आफत आन खड़ी हो गई जिसकी उसे कल्पना तक नहीं थी। दरअसल हुआ यह कि अम्बेडकर वादी दलित नेता भइयाराजा की रियासत का निवासी था, वह उन्हीं की रियासत में जमीनदारी विनाश के कार्यक्रमों की निगरानी कर रहा था, इसी दौरान एक खबर हवा की तरह फैली कि भइयाराजा के दो सौ गांवों की जमीनदारी विनाश के कार्यक्रम पर उच्च न्यायालय ने रोक लगा दिया है। अदालत का जब तक अगला आदेश पारित नहीं हो जाता तब तक भइयाराजा के दो सौ गांवों में जमीनदारी विनाश की कार्यवाहियां स्थगित रहेंगी। खबर सुनकर अम्बेडकर वादी दलित नेता परेशान हो गया अब वह आगे क्या करे? महाराष्ट्र की जमी जमाई नौकरी भी उसने छोड़ दिया, यहां अदालत द्वारा जमीनदारी विनाश की कार्यवाही स्थगित किए जाने के बाद वह कहां जाये, किसी दूसरे क्षेत्रा में उसकी जान-पहचान भी नहीं। भइयाराजा की इस्टेट का तो वह मूल निवासी है, उसकी जाति की आबादी भी सत्राह अऋारह प्रतिशत से अधिक है, सभी पहचानते व जानते हैं, जो नहीं भी जानते वे पहचान जाएंगे, इस क्षेत्रा में वह जनतांत्रिक मोर्चा बना सकता है, यहां के जमीनदारों व बड़े जोतदारों से टकरा सकता है, लेकिन किसी अपरिचित अनचीन्हे क्षेत्रा में तो यह काफी मुश्किल होगा।
अम्बेडकर वादी दलित नेता जितना प्यारा आदमी था उसका नाम भी प्यारा था और यह प्यारा उसके नाम से जुड़ा था फर्क था कि वह बाद में था, पहले राम आता था, दोनों जोड़ देने पर वह रामप्यारे में बदल जाता था। तो इस प्रकार नाम से वह रामप्यारे था और काम से अम्बेडकर वादी-अम्बेडकर वादी जैसी उपाधि उसे गांधीवादी की तर्ज पर जनता द्वारा उसकी राजनीतिक सोच के आधार पर मिली थी। वैसे कुछ अन्य विचारों के लोग मजाकिया लहजे में उसे अम्बेडकर वादी की उपाधि से ही संबोधित करते जिसे वह बुरा नहीं मानता अपने लोगों से अक्सर वह कहता...
‘आज भले ही अम्बेडकर देश की मौजूदा राजनीति में हासिए पर हों पर कल उनका है, जब लोग उनके सिद्धान्तों और राजनीतिक आचरणों पर अगला कदम उठाने में उत्फुल्लित होंगे?’
रामप्यारे हालांकि उन दलित नेताओं की तरह नहीं था जो राजनीतिक सिद्धान्तों को चिन्तन की तरह दिमाग की सुरंग में दबा कर सजा कर रखा करते हैं और किसिम-किसिम के वार्तालापों, संवादों, गोष्ठियों, सेमिनारों वगैरह में सजावटी सूत्रों की तरह प्रस्तुत किया करते हैं। रामप्यारे राजनीतिक सिद्धान्तों के मामलों में सहज था तथा सिद्धान्तों की असहजता से बच कर चलता था। वह तात्कालिकता के कर्म को दूरगामी लक्ष्यों को पाने का धर्म समझता था तथा इसी मर्म पर चलते हुए वह अपने गृह जनपद में था ताकि कुछ ऐसा कर सके जिससे वंचितों उपेक्षितों व शोषितों को उनका अधिकार हासिल हो सके।
कहते हैं सोचा हुआ उसी रूप में घटित हो जाये, ऐसा संभव नहीं होता, रामप्यारे ने भी सोचा कुछ था और समय उसकी सोच पर अदालत का स्थगन लिख चुका था। सो वह कुछ समय के लिए पहाड़ जैसा जड़ बन चुका था, करने के लिए उसके पास कोई सकारात्मक कार्यक्रम न थे लेकिन समय तो नई-नई सीखें लेकर आता है। रामदयाल द्वारा किया जाने वाला भूमि-आवंटन उसके लिए सीख थी और इसी सीख से निकली हुई दूसरी सीख थी कि भूमि-जोतकों को इस काम के लिए जागरूक किया जाना चाहिए कि वे जमीन पर से अपना कब्जा दखल न छोड़े तथा सरकार व प्रशासन पर दबाब बनाये जाने की आवश्यकता है कि प्रशासन भूमि-जोतकों के कब्जा दखल को जमीन के कागजातों में दर्ज करे। रामप्यारे अपने जैसे सहधर्मा साथियों के साथ गांव-गांव जाता, भूमि-जोतकों की सूची बनाता। ऐसा करने में उसे कुछ अचरज जैसा जान पड़ा। अचरज इसलिए कि लगभग सभी गांवों में कुछ ऐसे भूमि-जोतक मिल जाते जो जाने कितने पुश्त से जमीन पर खेतीबारी करते चले आ रहे थे पर वे कानूनी रूप से सिर्फ बटाईदार की हैसियत रखा करते थे, वह भी सिर्फ स्थानीय राजा के कागजातों में। अंग्रेजी सरकार से उनका रिश्ता न था।
एक बार अंग्रेजी सरकार ने जमीन पर सुपुर्दगार बनाने की योजना चलाया था। उस योजना का लाभ भी दलितों को नहीं मिल पाया। अंग्रेजी अहलकारों तथा स्थानीय जमीनदारों ने उन्हीं लोगों को सुपुर्दगार बनवाया जिन लोगों ने सुपुर्दगार बनने के लिए काफी रुपया खर्च किया।
रामप्यारे गांव के ऐसे लोगों से मिलता तथा उन्हें आश्वस्त करता कि जमीनदारी तो किसी न किसी दिन अवश्य टूटेगी क्योंकि कांग्रेसी सरकार तथा कांग्रेस पारटी के लिए जमीनदारी तोडना प्रतिष्ठा का सवाल है। सहभागी प्रशासन तथा प्राकृतिक संसाधनों पर सभी का बराबर हक, इसी नारे के आधार पर देश की जनता गांधी और कांग्रेस के इशारे पर नाच रही थी। जगह-जगह स्वस्फूर्त धरना, सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा चल रहा था सो प्रदेश की मौजूदा कांग्रेसी सरकार भी परेशान परेशान थी। न्यायालय के स्थगन आदेश ने जमीनदारी विनाश के सारे कार्यक्रमों को बाधित कर दिया था। कांग्रेसी सरकार न्यायालय में हाजिर होकर स्थगन आदेश निरस्त किये जाने के बारे में प्रार्थनापूर्ण दलीलें दे चुकी थी पर वहां तो सन्नाटा था सारा कुछ कानून की लम्बी तथा यातनापूर्ण प्रक्रियाओं में फंसा पड़ा था। ऐसे विपरीत समय में सिर्फ जागरूकता व सावधानी के बाबत ही सार्थक प्रयास किये जा सकते थे कि भूमि-जोतकों का किसी भी तरह से अहित न हो। रामप्यारे इसी प्रयास में लगा था और इसके लिए वह एक दिन रामदयाल से भी मिला पुरानी बातों को छोड़ कर कि रामदयाल भी तो जमीनदार हैं। उसे उनके द्वारा किया जाने वाला भूमि-आवंटन का काम निष्ठुरताओं तथा क्रूरताओं से अलग होकर मनुष्य बने रहने वाला लगा।
बातचीत के दौरान रामप्यारे ने रामदयाल को अपनी वर्णगत व वर्गगत भावना के बारे में बताया भी। ‘भइया! ऐसा है कि मैं आपसे पहले ही मुलाकात करता लेकिन मेरा मानना था कि अच्छा मित्रा होना अलग बात है और मित्रा का साथ देना दूसरी बात। वह भी ऐसी स्थिति में जब मित्रा का काम वर्गीय व वर्णीय हितों के विपरीत हो। मैं जमीनदारी टूटने की उत्फुल्लता में कुछ ज्यादा ही एकतरफा हो गया था और आपको सिर्फ जमीनदार मानने लगा था, आदमी नहीं जो परिस्थितियों के मनन द्वारा मन बनाता है, समय भांप कर रास्ता नापता है।’
रामदयाल खामोशी से पूरी होश के साथ रामप्यारे को सुन रहे थे। अनुचित व उचित के बीच रामप्यारे का चित्त जिस तरह निर्मित हो रहा था और उसने नौकरी छोड़ कर जन के लिए अपना मन और तन सौंप दिया था, धन तो था ही नहीं, रामदयाल को अच्छा लगा, दिल को गुदगुदाने वाला। रामदयाल ने रामप्यारे को आश्वस्त किया।
‘ऐसा ही होता है रामप्यारे! धन व संपत्ति का मामला सिर्फ सुखों व भोगों का ही नहीं है, यह एकाधिकार व विशेषाधिकार का होता भी है जो आदमी को अहंकारी बनाता है। चलो मिल कर कार्यक्रम बनाते हैं जिससे जनता लाभान्वित हो सके।
फिर रामदयाल ने कहा...कृकृ
‘तुमने खुद को समय के पहले तैयार कर लिया, यह खुशी की बात है रामप्यारे! मैं तुम्हारे कार्यक्रम के साथ हूं पर अभी नहीं कुछ समय बाद फिलहाल तो दूसरे काम में व्यस्त हूं।’
रामप्यारे, रामदयाल से मिल कर खुश खुश लौटा, उसे लगा कि कुछ ऐसे होते हैं जो दूसरों के लिए भी सुगम रास्ता बना देते हैं।
उफनती नदी
रणविजय और लिली दोनों किसी मर्यादापूर्ण उदाहरण में लगातार तब्दील होते जा रहे थे। अंग्रेज हाकिम उनके बदलावों की रागात्मकता का गहरे से मूल्यांकन करता और झूम झूम जाता।
जीवन मन और तन के खेलों का समन्वय व सन्तुलन ही तो है अंग्रेज हाकिम लिली की ममा को देखता और भीतर से कह उठता। अंधेरे और उजाले के बनावटी पर्दे को हटाकर वह लिली की ममा को चूमने लगता जबकि लिली की ममा अंग्रेज हाकिम को रोकती और उलाहती जिसका आशय होता... ‘उम्र और उत्तेजना में कुछ फर्क तो किया करो।’ अंग्रेज हाकिम तमाम वर्जनाओं से बाहर निकल कर सिर्फ इच्छाओं की तात्कालिक क्रीड़ा का नायक बन जाता और समझता मन से पार जाने के लिए इससे सुगम रास्ता दूसरा नहीं फिर लिली की ममा को रणविजय और लिली के सुन्तलित संबंध के बारे में बताता।
लिली की ममा भी खुश खुश थीं। उन्होंने तो पहले ही ताड़ लिया था कि रणविजय और लिली दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं। दोनों में से किसी एक को अलग से देखना पहचानना मुश्किल होगा पर समय की गति का तो कोई नियंत्राक नहीं होता। समय के साथ घटनायें जुड़ी होती हैं और इनका जुड़ाव कहीं बसन्तनुमा दीखता है तो कहीं पतझड़ जैसा। ऐसा ही हुआ लिली और रणविजय की खुशनुमा जिन्दगी में ऐसा पतझड़ आया कि सारा कुछ हवा के झोंके में उधरा गया।
लिली की ममा और अंग्रेज हाकिम दोनों परेशान। अंग्रेज हाकिम ने लिली से पूछा भी...कृ
‘क्या हुआ लिली, आजकल तुम बदली-बदली सी दीख रही हो। तुम्हारे चेहरे पर रात की धुंध दीखती है सुबह की ताजगी नहीं।’
‘नहीं डैड! ऐसा कुछ भी नहीं। चेहरा तो बदलता रहता है। दिन और रात से चेहरे का कोई नाता नहीं, मैं जैसी थी, वैसी ही हूं। एकदम अपरिवर्तित किन्तु जड़ व स्थिर नहीं। मैं पहले भी अपने होने की तलाश अपने भीतर कर रही थी और आज भी कर रही हूं, चाहती हूं आजीवन मैं ऐसा ही करती रहंू। जाने कैसे आपको फर्क दीख रहा?
‘रणविजय भी तो बुझा-बुझा सा है। तुम दोनों की चहकें, चुलचुलाहटें घर के भीतर कहीं नहीं। कब तुम आती हो कब रणविजय आता है, उसकी आहट तक नहीं होती। हमारी घबराहट यही है कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम दोनों सन्तुलन को बन्धन समझ रहे। आखिर क्या बात है? कुछ तो है जो हमलोगों से छिपाया जा रहा है।
‘क्या छिपाना और क्या दिखाना है डैड? सारा कुछ खुला-खुला सा है, बोलता-बतियाता लेकिन तौलता हुआ, मैं नहीं चाहती कि रणविजय आहत हो और मेरे मातहत रहे पर मैं भी उसके मातहत नहीं रह सकती। मेरे सपने हैं जिन्हें पूरा करने की पूरी कोशिश मुझे करनी है और रणविजय के भी मेरी तरह के सपने हैं, आजाद। भला यह कैसे संभव है कि हम दोनों के एक ही सपने हों, एक ही रंग रूप और गुण वाले। मैं नहीं चाहती कि रणविजय के रंगीन सपनों से छेड़-छाड़ करूं, ऐसा उसे भी करना चाहिए पर वह तटस्थ नहीं, वह मेरे सपनों को मरोड़-मरोड़ कर तोड़ रहा है।’
कहते कहते लिली रूआंसा हो जाती है। आंखें छल-छला जाती हैं। अंग्रेज हाकिम लिली को सहारा देता है फिर समझाता है...
‘भावुकता से बाहर निकलो लिली। सपनों के चुनाव से मन को तनाव में डालना ठीक नहीं। चुनने को तो कुछ भी चुन सकती हो पर गुनना भी जरूरी है। ऐसा चुनाव भी क्या जो तनाव पैदा करे और समय को कुसमय में बदल दे।’
लिली तो जैसे सतर्क थी, उसे पता था कि डैड उसकी समझ को बदलने के लिए क्या-क्या समझा सकते हैं और ममा भी। कोई नहीं चाहेगा कि उसकी दूरी रणविजय से कुछ इस तरह बढ़ जाये कि दोनों किसी स्वतंत्रा इकाई में तब्दील हो जायें। जबकि यही क्रूर सच था। दोनों संबंधों के आर-पार थे किसी नदी के दोनों किनारों की तरह एक दूसरे से अलग बीच में बाढ़ का उफनता पानी जाने किस तट को तोड़े। लिली समझती कि वह अपनी धडकनों और सांसों का सहला और उन्हें सुरक्षित रखने की सायास कोशिश कर रही है जबकि रणविजय उनसे छेड़-छाड़ कर रहा, उन्हें तोड़ रहा और जिसे जोडना चाह रहा है वह तो पहले से ही टूटा हुआ और खंडित है। टूटे हुए को क्या जोडना और क्या तोडना? लेकिन रणविजय नहीं समझ रहा। वह समझ रहा कि दुनिया बदल डालेगा जैसा चाह रहा वैसा पर कैसा? इसकी पतली समझ भी नहीं।’
लिली रणविजय को जाने कितनी बार समझा चुकी है कि खुद को बदल डालना जब सहज और सरल नहीं फिर समाज को, दुनिया को बदल डालना यह कैसे संभव है? ये सब तो जन्म से ही मरे हुए सपने हैं। इनके साथ एक कदम भी चलना बेवकूफी है ऐसी कठिन स्थिति में तुम जीते हुए जागृत वर्तमान को पोस्टमार्टम घर में क्यों भेज रहे हो? आत्म-हन्ता बनने की तुम्हारी किसी क्रिया-प्रतिक्रिया का कम से कम मैं तो भागीदार नहीं बन सकती।’
रणविजय रहन-सहन में जितने सरल थे वैचारिक मुद्दों पर उतने तरल नहीं, वे कल को आज की संभावनाओं से काफी दूर रखा करते थे और मानते थे कि यह जो आज है कल का बिगड़ा हुआ रूप है जो आने वाले कल की भी दुर्गति ही करेगा। ऐसी सूरत में जो आज है उससे मुठभेड़ करते रहने की आवश्यकता को नकारना बेवकूफी और जिम्मेवारियों से अर्थहीन पलायन के सिवाय कुछ नहीं। रणविजय अपने तर्कों से लिली के वैचारिक झुकावों को समय की आवश्यकता से जोडना चाहते और उसे समझाते...कृकृ
‘अपने लिए जीवन की प्रसन्नताओं, आकांक्षाओं को हासिल कर लेना या उसके लिए प्रयास करना यह जीवन को एकतरफा बनाना है तथा यह आत्म विस्तार का एक रूप है जो मनुष्य की संघर्षपूर्ण सचेतनता को लील जाता है। हमारी जिम्मेवारियां जितना अपने प्रति हैं उससे कम समाज के प्रति नहीं। हम अपनी पीठ पर कथित महिमाओं, गरिमाओं की पालिश भले ही चढ़ा लें पर अपना चेहरा सर्वग्राही नहीं बना सकते जिससे दूसरे भी मुहब्बत करने लगें तथा समझें कि अपना आदमी है।’
लिली तो जैसे आश्वस्त थी कि वह जो सोच रही उससे इतर दूसरी कोई सोच नहीं हो सकती। उसे मौका मिला है रूस जाने का, वहां काम करने का, वहां के राजनीतिक साहित्य का अनुवाद करने का, अच्छे वेतन और अच्छी सुविधाओं के साथ अब इसके आगे उसे क्या पाना?
एक दिन रूसी मिजाज का जो वह भारतीय कामरेड रूसी दूतावास में उससे मिला था, उसने भी यही सुझाया था कि रूसी सरकार का यह प्रस्ताव कभी न ठुकराना। उस दिन लिली तो जैसे चकरा गई थी यह आदमी क्या कह रहा?
लिली जानती थी कि रूसी सरकार गिने-चुने लोगों को ही सरकारी प्रकाशन संस्थान से जोड़ती है। वहां काम पाना आसान नहीं। एक से एक प्रतिभाशाली, चाहे वे जिस क्षेत्रा के हों, साहित्य, विज्ञान, कला किसी के भी मुंह बाये खड़े हैं और अपने-अपने देवता की मनौती कर रहे हैं, लेकिन सभी को तो वहां काम नहीं मिल रहा।
रणविजय जाने किस मिट्टी का बना है? कहता है...कृकृ
‘लिली! मुझे तुम्हारे चुनाव पर कुछ नहीं कहना। तुम जैसा चाहो निर्णय ले सकती हो लेकिन यह तुम्हारा निर्णय एकतरफा होगा, सिर्फ अपने लिए। क्या तुम्हें नहीं सोचना चाहिए ममा और डैड के बारे में। उन्हें तुम्हारे सहारे की आवश्यकता है फिर तुम रूस कैसे जा सकती हो।’
‘आखिर मैं उनके लिए कर क्या कर सकती हूं? क्या मैं संबंधों की भावुकता में सुनहरे अवसर को छोड़ दूं और अपने भविष्य को बन्धक बना दूं।’
लिली तो फैसला ले चुकी थी कि उसे रूस जाना है तो जाना है और सुनहरे अवसर की उपलब्ध खुशियों में पोर-पोर डूब जाना है।
रूसी दिमाग के भारतीय कामरेड ने लिली के रूस जाने के फैसले को सराहा था...
‘मुझे उम्मीद थी कि तुम इस अवसर को नहीं ठुकराओगी। पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है, समय सारी बातों को याद करने के सारे निशानों को मिटा देता है। संबंधों में अवसर की सुगन्ध होनी चाहिए और जब दुर्गन्ध आने लगे तो उससे बाहर होना ही ठीक होता है।’
लिली ने रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड की बातों को किसी मंत्रा माफिक समझा था। उस समय उसके लिए यह समझना सरल न था कि उसका पक्ष क्या है और विपक्ष क्या है? वह तो मात्रा इतना समझ रही थी कि वह एक ऐसे मुल्क में जा रही जहां आदमी और आदमी के बीच की सारी दूरियां समाप्त की जा चुकी हैं और प्राकृतिक किस्म का साम्य स्थापित किया जा चुका है, साथ ही साथ ऐसी राजनीतिक परिस्थितियां निर्मित की जा चुकी हैं जहां मानव का मानव के प्रति किसी भी तरह का दुराचार अंखुआ ही नहीं सकता।
लिली अपने फैसले पर आश्वस्त थी कि वह जो करने जा रही उसे वैसा ही करना चाहिए। रणविजय ने हालांकि उसे समझाया था कि डैड और ममा की देखभाल भी तो करना आवश्यक है ऐसी सूरत में तुम्हारा रूस जाना ठीक न होगा पर लिली ने रणविजय की बात पर कत्तई ध्यान नहीं दिया और अपने फैसले पर डटी रही। रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड ने सबसे पहले लिली का पासपोर्ट बनवाया फिर रूसी बीजा। पासपोर्ट बनवाने के लिए भी लिली ने रणविजय या अंग्रेज हाकिम से कुछ नहीं कहा, सारा कुछ खुद और रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड के सहयोग से किया। लिली का पासपोर्ट बन जाने के बाद अंग्रेज हाकिम को मालूम हुआ कि लिली रूस जा रही, उसे भी लिली ने कभी नहीं बताया। जबकि पहले छोटी सी छोटी बात भी खिल खिला कर अंग्रेज हाकिम को बताया करती थी।
ष्डैड हमने यह किया, डैड हमने वह किया, कल हिन्दी कथा साहित्य वाले सेमिनार में हमने अपना पक्ष रखा जो सराहा गया। अब दिल्ली से बाहर भी मुझे सेमिनारों में आमंत्रित किया जाता है। अंग्रेज हाकिम के लिए लिली का रूस जाना एक सामान्य सी घटना थी। पढ़ी-लिखी है, समझदार है, अपने पक्ष के साथ मजबूती से खड़ी रह सकती है तथा उसे क्या करना है और क्या नहीं करना है, इस पर विवेक पूर्ण निर्णय ले सकती है। अभी रूस, कल अमेरिका फिर कहीं जा सकती है फिर भी अंग्रेज हाकिम चिन्तित और व्यग्र था... कृ
‘आखिर इसे लिली ने बताया क्यों नहीं? क्या मैं उसे रोकता, और कहता कि रूस न जाओ, यहीं इसी देश में अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करो या तो पारंपरिक रास्ते पर चलते हुए किसी एकेडेमी में स्थान बना लो या किसी नये रास्ते की यात्राी बनो।
आखिर क्यों नहीं बताया लिली ने? एक दिन अंग्रेज हाकिम ने लिली से पूछा.कृ‘क्यों लिली तूं रूस जा रही क्या?’
‘हां डैड’
‘कभी बताया नहीं?’
‘पहले कन्फर्म नहीं था’
‘कन्फर्म हो गया?’
‘हां अगले सप्ताह जा रही हूं, कागजात बन गये हैं।’
‘काम क्या है?-
‘वहां के सरकारी प्रकाशन संस्थान में मुझे हिन्दी विभाग का प्रमुख बनाया गया है।’
‘अच्छा! यह तो खुशी की बात है। तुम्हारे साथ रणविजय भी तो जा रहा होगा!
‘नहीं डैड वह नहीं जा रहा।’
‘तंू अकेली जा रही या और कोई?’कृ
‘एक आदमी और है डैड, वह हिन्दी साहित्य का बहुत बड़ा आदमी है, खांटी कामरेड।’
‘कौन है वह? कहीं नामदेव तो नहीं!’
‘हां वही डैड, उन्हीं के सहयोग से मुझे यह प्रस्ताव मिला।’
‘रणविजय ने भी कोशिश किया था क्या?’
‘नहीं डैड! वह देश नहीं छोडना चाहता, उसके लिए यहां की काली मिट्टी और नदियों का मटमैला पानी काफी प्यारा है। वह तो मुझे भी रोक रहा, और बता रहा कि दुनिया को आंखें मूंद कर देखो, खाली हाथ परचम लहराओ और भूखे पेट लाल सलाम बोलो...कृकृ
‘तो क्या वह तुम्हारे साथ जा सकता है, ऐसी सुविधा है?’
‘हां, शादीशुदा लोगों को इस तरह की सुविधा मिलती है।’
‘फिर तो उसे जाना चाहिए।’
अंग्रेज हाकिम इससे अधिक लिली से क्या पूछता? पूछना भी क्या था। रणविजय को अंग्रेज हाकिम अच्छी तरह से जानता था कि उसे देश नहीं छोडना। वह इसी देश में रह कर कुछ ऐसा करना चाहता है जिससे यहां का चेहरा बदल सके और लोग खुद को बदलना सीख सकें। अंग्रेज हाकिम ने फिर भी रणविजय से पूछा...
‘तुम लिली के साथ रूस नहीं जा रहे क्या?’
‘नहीं डैड! वहां मेरे लिए कोई आकर्शण नहीं।’
‘क्यों! वहां तो मार्क्स चप्पे-चप्पे पर दीख रहे हैं। वहां तो मार्क्स के विचारों की बदरियां हैं और बदलाव के इन्द्रधनुष हर तरफ बिखरे पड़े हैं।’
‘सब कहने की बातें हैं डैड! यदि आप व्यंग्य नहीं कर रहे तो आप भी समझते हैं कि वहां क्या हो रहा है। सरकार विरोधी एक-एक आदमी को चुन-चुन कर मारा जा रहा, यातना-शिविरों में भेजा रहा। साइबेरिया को निर्वासितों का कैम्प बना दिया गया है। मुझे नहीं जाना वहां! मेरे लिए यहीं ढेर सारे काम हैं और मैं इसी देश में खुशियों की तलाश कर सकता हूं फिर वहां किस लिए जाना? वैसे भी मार्क्स की बन्दूकें मेरे किसी काम की नहीं, मैं हिंसा में विश्वास नहीं करता। सहनशीलता और विचारों की दृढ़ता मेरे लिए किसी असलहे से कम नहीं।’
अंग्रेज हाकिम ने लिली का रूस जाना किसी विशेष संदर्भ में नहीं लिया, न ही उसने सोचा कि वह भारत में अकेला हो जाएगा, उसकी बुढ़ौती किस तरह कटेगी। किसी थके हारे भारतीय की सोच से अंग्रेज हाकिम बाहर था। वह अपने लिए लिली की मुक्तता को बाधित नहीं कर सकता था और न ही रणविजय पर दबाब बना सकता था कि वह भी लिली के साथ रूस जाये। पारिवारिक संबंधों की सोच अंग्रेज हाकिम के लिए भिन्न किस्म की थी जहां किसी भी सदस्य की मुक्तता के लिए किसी भी तरह की वर्जना न थी। अंग्रेज हाकिम मान कर चलता था कि लिली या रणविजय अपने लिए जिस रास्ते का चुनाव करेंगे नाप-तौल कर करेंगे। पर लिली की ममा की सोच अंग्रेज हाकिम से अलग थी। उन्होंने लिली को समझाया...कृकृ.
‘तूं अकेली रूस जा रही, तेरे साथ रणविजय नहीं जा रहा?’
‘हां ममा, वह नहीं जा रहा।’
‘क्यों?’
‘मुझे नहीं मालूम’ एक मायूस उत्तर लिली ने उन्हें दिया
‘तुझे नहीं मालूम! क्या कह रही तूं फिर किसे मालूम?’
‘हां ममा! मुझे नहीं मालूम।’
तो मालूम करो और वह नहीं जा रहा तो तूं वहां क्यों जा रही अकेली?’
‘मैं नहीं मालूम कर सकती, और मुझे जाना है तो जाना है।’
‘डैड से बाते कर लीं।’
‘हां’
‘उन्होंने तुम्हें रोका नहीं’
‘नहीं’
‘कुछ बोले’
‘नहीं, सिर्फ पूछा...’
लिली की ममा ने अन्त में लिली से साफ साफ कहा...
यदि तुम रूस जाना ही चाहती हो तो रणविजय को भी साथ ले लो, वहां अकेली न जाओ। ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रही कि तुम्हारे साहस और दृढ़ता पर मुझे शक है। सिर्फ इसलिए कि रणविजय यहां और तू वहां यह ठीक नहीं। मैंने पहले ही तुझे रोका था कि शादी में जल्दी न करो। कुछ बन जाने के बाद रिश्ते में बंधती तो ठीक था। अब तो बंध चुकी हो और इसी बंधाव के कसाव के सहारे ही तुम्हें आगे बढना चाहिए।
लिली को तो ममा का सारा कहा-सुना अनसुना ही करना था और वही करना था जो उसने सोचा था। लिली अपने फैसले पर दृढ़ थी। रणविजय से शादी के जुड़ाव में भी उसने विचारों के कसाव को देखा था जैसा सोचा वैसा पाया और रणविजय को अपने से जोड़ लिया। लेकिन ममा...वह तो इतना ही सोच सकती है, साधारण सी घरेलू महिला की पत्नी को पति के साथ रहना चाहिए अलग नहीं, क्या तब भी जब पति साथ न रहना चाहे और सिर्फ अपने मन की करे। जुड़ाव तो तन और मन दोनों का होना चाहिए। रणविजय मेरे बारे में कहां सोच रहा? फिर मैं उसके बारे में क्यों सोचूं, क्या वह मेरे साथ नहीं रह सकता? कहीं मेरी प्रतिभा उसके जलन का कारण तो नहीं।
लिली की ममा का उसे समझाना आसमान में तीर मारना था फिर लिली की ममा ने खुद अपना मुंह सिल लिया। जो होना होगा वह होगा ही और जो होगा, वह भी ठीक ही होगा ऐसा मानकर लिली की ममा अपने में कहीं खो गईं फिर उन्होंने रणविजय को ही समझाया और पूछा...कृकृ
‘तूं ही लिली के साथ क्यों नहीं चले जाते, तूं यहां और लिली वहां ऐसे रहना ठीक नहीं।’
‘नहीं ममा मुझे नहीं जाना। मैं लिली के लिए कोई व्यवधान नहीं बनना चाहता। उसे अकेली चलना है और आगे बढना है, मैं उसके लिए किसी काम का नहीं। काम का होता तो वह मुझे छोडकर कहीं भी नहीं जाती। उसे न तो मेरा हाथ चाहिए न ही साथ। वह इस समय ऐसी स्थिति में नहीं कि अपनी प्रसन्नताओं के लिए पीछे छूट जाने वाली अप्रसन्नताओं का लेखा-जोखा करे।’
रणविजय तो बहुत पहले ही जान चुके थे कि लिली अपने आकाश की सीमाएं बढ़ा कर असीम हो जाना चाहती है। वह अपनी मुक्तता के लिए किसी भी निर्णय तक जा सकती है उसने खुद को पुनर्विचार से अलग कर लिया है फिर भी रणविजय ने लिली को रोका था...कृकृ
‘लिली! इस समय तुम्हारी आवश्यकता इस देश को है, यहां के समाज को है, मुझे है, मेरी तरह से ढेर सारे लोगों को है। देश आजाद हुआ है लेकिन आज़ादीकी गन्ध कहीं भी नहीं। वही बसाती राजनीतिक बदबू। हमें लोगों के साथ जुड़कर उनकी आज़ादीके लिए काम करना होगा। लोकतंत्रा व लोकराज की स्थापना का काम हमें अपनी उपलब्धियों से जोडना चाहिए।’
रुक जाओ लिली, रुक जाओ। पढ़ाई के दिनों के सपनों के लिए उन संकल्पों और वादों के लिए जिसने मुझे तुमसे जोड़ा था। याद करो वह सुबह। आज़ादीमिलने के ठीक दूसरे दिन वाली। क्या हमारी आंखों ने उगते सूरज में भारत का मानचित्रा नहीं देखा था? क्या हम सूरज की मनभावन लालिमा में खो नहीं गए थे और ऐसा महसूस नहीं हुआ था कि हम कालिमा से बाहर हैं और कालिमा मुक्त समाज बनाने का संकल्प हमने नहीं लिया था।
रणविजय सारा कुछ याद कराते रह गये थे लिली को, पर लिली खामोश थी, उसे तो सारा कुछ भूल जाना था। वह याद की बुनियाद पर खड़ी नहीं होना चाहती थी। आखिरी उत्तर के लिए रणविजय ने ही लिली से पूछा...कृकृ
‘तो क्या तुम रूस जाने वाले अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं कर सकती?’
पलंग पर रणविजय के साथ लेटी हुई लिली ने पलंग का किनारा पकड़ लिया और मुलायम सा चादर मुंह पर ढांप लिया, फिर तो बीच में जो खाली जगह थी उफनती नदी की तरह हरहराने लगी। रणविजय पलंग के एक किनारे पसरे-पसरे सोचने लगे उस पार जाना जोखिम भरा भी हो सकता है। कमरे में रोशनी थी, रणविजय ने स्विच बन्द किया और नींद में जाने की कोशिश करने लगे लेकिन वहां नींद न थी, न ही वहां गुदगुदियों वाली स्मृतियां थीं, जो थीं उनका मुंह ढंपा था, तन सिकुड़ा था और दिल था कि मुर्दा बन गया था। लेकिन वहीं खुले में रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड मुस्कुरा रहा था और पूछ रहा था...कृकृ
‘क्यों ककामरेड रणविजय! क्या चुनना चाहोगे लिली या भारत। उस समय उफनती नदी के पार जाना रणविजय के लिए कठिन था।
समय के साथ
अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा लिली को जितना समझा सकते थे, समझा चुके थे कि यदि तुम्हें रूस जाना है तो रणविजय को भी साथ ले लो। लिली तो जैसे दृढ़ थी कि उसे वह सब नहीं समझना और न उनके समझााये पर एक कदम भी चलना जो उसे समझाया जा रहा है। साथ ही साथ उन लोगों ने रणविजय को भी समझाया था कि यदि लिली नहीं रुक रही और रूस जाने का कार्यक्रम नहीं स्थगित कर रही तो तुम ही उसके साथ चले जाओ, पर रणविजय भी कत्तई तैयार न थे कि उन्हें लिली के साथ रूस जाना है।
रणविजय हाल के कई महीनों से देख रहे थे कि लिली कामरेड नामदेव को अपना पूरक समझने व मानने लगी है। रणविजय ने देखा कि लिली का शोध कार्य पूरा हो चुका है। उसका शोध पूरा कराने के लिए रणविजय पहले से ही तैयार थे पर लिली ने रणविजय से किसी तरह का सहयोग लेने के बजाय, शोध संबंधित, बात भी नहीं की। सारी सामग्री का विश्लेषण व व्याख्या खुद किया और कहीं आवश्यकता पड़ी तो नामदेव का सहयोग लिया।
चार पांच महीनों में लिली ने शोध कार्य का अन्तिम लेखन पूरा कर लिया था। इस दौरान वह घर पर अक्सर देर रात तक आती और सुबह ही रूसी दूतावास निकल जाती। लेखन का सारा कार्य वह रूसी दूतावास जाकर पूरा करती। किसी दिन अति उत्साह में लिली ने रणविजय से कहा था...
उसके शोध का अनुवाद दूसरी भाषाओं के अलावा रूसी में अवश्य ही होगा। वैसे आशा है कि अंग्रेजी में भी होगा। नामदेव जी ने आश्वस्त किया है.. शोध स्वीकृत हो जाने के बाद वे हिन्दी के अच्छे प्रकाशक से छपवा देंगे। एक दिन तो उन्होंने एक नामी प्रकाशक से मिलवाया भी था। प्रकाशक एक अच्छा आदमी था, उसकी बातें सरस थीं और उसने मेरी तारीफ करते हुए कहा भी...
‘लिली जी! आप उपन्यास अच्छा लिख सकती हैं। ऐसा उपन्यास जिसमें नर-नारी के संबंधों की सरसता, भावुकता, विद्रूपता और विडम्बनाओं का यथार्थ परक लेखा जोखा हो।’कृ
‘अरे नहीं! मैं उपन्यास न लिख पाऊंगी, उपन्यास लिखने के लिए उपन्यास बनाना पड़ेगा जबकि मैं एक छोटी सी कहानी या लघुकथा भी नहीं हूं। लिली ने प्रकाशक के सामने अपना पक्ष रखा।
प्रकाशक के संस्थान पर तो लिली किसी उत्तेजना पुंज की तरह थी जिसे प्रकाशक और नामी विचारक कामरेड दोनों परख रहे थे और सोच रहे थे कि लिली की आंखों में गरिमा और महिमा की ललचाई परतें अवश्य होगी। कामरेड नामदेव ने लिली को प्रोत्साहित किया।
‘नहीं लिली जी! ऐसी कोई बात नहीं। कोशिश ही रास्ते का निर्माण करती है। वैसे भी उपन्यास या कहानी है क्या? जो मन की हलचलें हैं, कहीं गहरे में फंसी पड़ी उसे बाहर निकालना और जो बाहर है, खुशबू या दुर्गन्ध उनमें सन्तुलन स्थापित करना, दुर्गन्ध की जगह खुशबू में डूब जाना और अपने होने को उससे जोड़ लेना। बाहर और भीतर दोनों में आवाजाही को बनाये रखना ही तो लेखन है, रही कला की बात, वह तो अभ्यासों से सहज ही हासिल हो जाती है।’
‘तो ऐसा नहीं है कि आप नहीं लिख सकतीं, आप लिखना तो शुरू करें, कोई जन्म से रचनाकार नहीं होता, रणविजय लिली के उत्साही संवाद में गोता लगाना चाहते तो भी नहीं लगा सकते थे। फिर भी उस समय लिली के उत्साहों पर चांद की स्वच्छता बिठाना आवश्यकथा। फिर रणविजय ने लिली को उत्साहित किया
‘हां ठीक तो कह रहा था प्रकाशक और कामरेड नामदेव भी। निश्चित रूप से तुम्हें लेखन की ताजगी भरी दुनिया का नागरिक होना चाहिए और शब्दों के जनतंत्रा का अगुआ भी लेकिन वे दोनों जो तुममें रुचि ले रहे हैं, उसके कारणों को समझना, मैं समझता हूं आवश्यक होगा जिससे अकारण तुम किसी सुविधा के लिए दुविधा में न पड़ जाओ।’
लिली अचानक आवेश में आ गई।कृकृ
‘जानते हो क्या कह रहे हो तुम। यदि जान कर कह रहे हो तो इसका मतलब अपनी सीमा बता रहे हो कि कितने संकुचित और शक्की हो तुम।’
कैसी सुविधा और काहे की दुविधा। क्या वे मेरी प्रतिभा का मूल्यांकन नहीं कर सकते और मैं प्रतिभाशाली नहीं सिर्फ प्रतिमा हूं कोई। एक ऐसी प्रतिमा जिसका आकार तुमने गढ़ा हो और उसी आकार के भीतर मुझे अपनी आकांक्षाओं को सदैव दूध पिलाते रहना है।’
रणविजय को लिली की हमलावर प्रतिक्रिया का पक्का अनुमान था कि वह कच्चे दूध की तरह उबल जाएगी और जाने क्या क्या कहेगी जिसका असल बात से रिश्ता न होगा। रणविजय ने बहुत ही तरलता से लिली को सफाई दिया भलाई भी इसी में थी रणविजय की।
‘नहीं मैं ऐसा तो नहीं कह रहा। मैं सिर्फ और सिर्फ यह कह रहा कि कोई कारण तो होना चाहिए आखिर वे तुमसे लिखने-पढने, रचनाकार बनने का पवित्रा प्रस्ताव क्यों दे रहे जब कि जाने कितने रचनाकार जगह-जगह ठोकर खा रहे हैं, प्रकाशक उन्हें घास तक नहीं डाल रहे। रही नामदेव की बात तो कौन नहीं जानता कि वह रचना को जितनी लापरवाही से झटक देता है, उसे कभी नहीं पढ़ता न ही उस पर कुछ लिखता है, उतनी ही सावधानी से रचनाकार को पकड़ लेता है खास तौर से.... आगे नहीं बोल पाये, जो बोलना था उसे चबा गये।
‘बहरहाल तुम्हें जो भला लगे वैसा करो।’
यह रणविजय का लिली से आखिरी बार संवाद था और रणविजय ने पक्का मान लिया था कि लिली ने अपनी आन्तरिक और बाहरी आज़ादियों का मन व चित्त माफिक विस्तार कर लिया है। उस मुक्त विस्तार में रणविजय के लिए पांव रखने भर की भी खाली जगह नहीं है। स्थिति इतनी बदल गई कि एक ही पलंग एक ही कमरा, एक ही परिस्थिति फिर भी लगता की कोई निगरानी कर रहा। लिली कमरे में आती एक ओर पसर कर सांसंे छोडने लगती और रणविजय सांसों का उडना देखते। सांसे छत से टकरातीं और लौटतीं फिर रणविजय को गुद-गुदातीं और संबंधों की कसमें देतीं...
रणविजय नर-नारी के मान्य संबंधों में उतर जाते और ज्योंही किसी जागरूक और अभ्यर्थी नर में बदलते लिली को मादा से ऊपर पाते नर में तब्दील होता हुआ एक स्वयं निर्मित।
‘छोड़ो भी, बहुत थक गई हूं, प्लीज सोने दो।’
रणविजय के लिए मुश्किल हो जाता, समझना कि लिली क्या कह रही? अपने होने से इनकार या स्वीकार, अगर स्वीकार फिर इनकार किसका। उन्हें लगता कि वे ही कहीं खो गये हैं। वे यहां इस कमरे में हैं भी और नहीं भी। दिन बीतने लगा, बीत-बीत कर महीना बनने लगा और एक दिन सारा कुछ धुंआ-धुंआ बन गया। लिली के साथ बिताये गये दिनों और रातों ने अपनी आकृति बदल ली, रणविजय उनमें तलाश करने लगे कि वे वादे कहां हैं? वे आश्वासन कहां हैं, वे सहयोग और साथ चलने के इरादे कहां हैं। लिली ने रणविजय से साफ कहा...
‘रणविजय तुम्हें समझना चाहिए कि सामयिक स्थितियों का समय के साथ बदलना असंभव नहीं। बदलती हुई सोचों व बदलती हुई स्थितियों के साथ सन्तुलन बनाये रखना ही पारस्परिक संबंधों को मजबूती प्रदान कर सकता है और मुझे लगता है कि हम जुड़ाव से हटकर किसी अलगाव की तरफ बढ़ रहे हैं। तुम्हें लगने लगा है कि मैं तुमसे अलग होकर कामरेड नामदेव के साथ को सहलाने-दुलारने लगी हूं।’
‘रणविजय ने सीधा सा सवाल लिली से पूछा... ‘क्या ऐसा नहीं है? मैं स्वीकारता हूं कि मैं मूर्तिकार नहीं, किसी की मूर्ति गढ़ नहीं सकता, अपनी मूर्ति भी नहीं पर कामरेड नामदेव तो सफल और प्रसिद्ध मूर्तिकार है, वह किसी भी ऐरे-गैरे की मूर्ति गढ़ कर दुनिया के साहित्यिक भूगोल पर चिपका सकता है। इसके कई उदाहरण हैं जो दिल्ली की सड़कों पर, विश्वविद्यालयों आदि में दीख जाते हैं।’
‘क्या वह तुम्हारी मूर्ति नहीं गढ़ रहा, तुम्हारे चेतन और अवचेतन को सम्मोहित नहीं कर रहा फिर क्या है ऐसा तुम्हारे पास जिसे तुम अपना बता सको, जिसकी सुरक्षा के लिए जी जान लगा दो।’
लिली रणविजय के इस अप्रत्याषित सवाल पर सतर्क न थी। उसे आभास तक न था कि रणविजय उस पर इस तरह का आरोप लगा सकता है। उसके पास जबाब न थे आखिर इतने समय से वह रणविजय से दूरी बना कर क्यों चल रही और न ही उसके पास साहस था कि वह फटाका कह देती... ‘हां मैं कामरेड नामदेव का हिस्सा हूं, लेकिन सच यही था। वह कामरेड नामदेव का लगातार हिस्सा बनती जा रही थी पर ऐसा हिस्सा नहीं जो पति-पत्नी के अन्तरसंबंधों में बदल जाय पर लिली को महसूस होने लगा था कि कामरेड नामदेव का साथ उसके साथ बोलना, बतियाना, हसना, घूमना, टहलना अतिरिक्त ऊर्जा से भरा हुआ होता है जो देह के पार है तो देह के भीतर भी। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं जिससे दैहिक पवित्राता लांक्षित होती हो। पर रणविजय जाने कैसा महसूस रहा, कहते हैं संवादहीनता बहुत खतरनाक होती है, पर रणविजय के लिए तो संवाद हीनता ही ठीक-ठाक थी। लिली खुल चुकी थी और बता चुकी थी कि उसे करना क्या है? रणविजय सोच रहे थे बेमतलब उन्होंने लिली को छेड़ा, सारा कुछ पर्दे में रहता तो ठीक था। एक तरह से रणविजय ने अपने मन को सन्देहों से बाहर निकालने के लिए ठीक किया। उन्होंने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया और लिली से दूर रहने की कोशिश करने लगे। थोड़े लम्बे अन्तराल के बाद ही सही रणविजय ने मन को साध लिया।
मन को साध लेना और किसी निश्चय से बांध लेना ही रणविजय ने अपने अनुकूल समझा। लिली यदि अपनी कल्पित स्वतंत्राताओं को हासिल करने के लिए कोई फैसला ले रही फिर उन्हें किसलिए हस्तक्षेप करना, उस हस्तक्षेप का मतलब क्या होगा?
और एक दिन लिली कामरेड नामदेव के साथ रूस उड़ गई। अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा ने लिली को एयरपोर्ट तक छोड़ा। रणविजय भी एयरपोर्ट तक गये थे, कार वही चला रहे थे। बगल में अंग्रेज हाकिम बैठा था और पीछे लिली तथा उसकी ममा। अंग्रेज हाकिम रणविजय और लिली दोनों को तजबीज रहा था कि दोनों के अन्तर-संबंधों में कहीं अपनापा नहीं दिख रहा। दोनों जैसे दो ध्रुव हों एक दूसरे से अलग और खुद को नकारते हुए कि दोनों कभी संयुक्त आकांक्षाओं के थे।
अंग्रेज हाकिम ऐसी विषम स्थिति देखकर झुंझला गया आखिर यह क्या हो रहा? तभी एयरपोर्ट पर कामरेड नामदेव पहुंचा। वह एक खूबसूरत और लगभग नई कार से आया था। लिली कामरेड नामदेव को देखते ही उस तरफ आगे बढ़ गई, जिधर नामदेव था। दोनों ने बातें की और फिर दोनों एयरपोर्ट की कानूनी औपचारिकताओं को निपटाने लगे। इसी बीच लिली ने कामरेड नामदेव का परिचय अपने डैड और ममा से भी कराया।
कामरेड नामदेव एक हंसमुख आदमी था उसने निश्क्रिय पड़े रणविजय से बात की और सुझाया कि तुम्हें भी रूस चलना चाहिए था। लिली के साथ तुम्हें भी अनुमति मिल जाती फिर वहां काम भी ढेर सारे थे। चलते तो ठीक रहता खैर कोई बात नहीं तुम जब भी वहां आना चाहोगे आ सकते हो, कोई परेशानी न आएगी।
रणविजय भी विपरीत परिस्थितियों को अनुकूलित करने में कलाकार थे। उन्होंने कामरेड नामदेव को आश्वस्तकिया, जो व्यंग्य था तो सच भी था।
‘आप जब लिली के साथ जा ही रहे हैं फिर मेरा जाना आवश्यक नहीं, लिली दुधमुंही तो नहीं जिसे संभालना पड़ेगा।’
‘नहीं ऐसा नहीं तुम चलते तो ठीक रहता। एक नई दुनिया, नये खिलखिलाते सपने, आज़ादीमें सरोबार एक दूसरे को गुदगुदाते। रूस को देखना, मानवीय मुक्तताओं को देखना होगा। तुम्हारा साथ अच्छा लगता पर जाने क्यों तू नहीं जा रहे चिपके रहना चाहते हो भारत से। यहां क्या है, दलबन्दी जाति और धर्म की जकड़न। मानवीय रिश्तों में पवित्राता तक नहीं।’
हवाई यात्रा की कानूनी औपचारिकताओं के बाद लिली कामरेड नामदेव के साथ रूस के लिए किसी चुनमुन चिरैय्या माफिक उड़ गई और रणविजय उसका उड़ना काफी देर तक देखते रह गये फिर उन्होंने अपनी भावुकता को दबाया।
आखिर वे क्यों बिफरे लिली के इस फैसले पर, जब तक उसे भला जान पड़ा वह साथ थी ही अब दूर जा रही, कोई नया राजमार्ग बना रही तो बनाये, आखिर वह भी तो अपना भविष्य सुरक्षित करना चाह रही होगी। फिर यह कैसी भावुकता है जो एकतरफा और एकांगी है लेकिन एक बात रणविजय को परेशान कर रही थी कि लिली एक कमजोर और भयभीत महिला क्यों बनती जा रही? वह कैसे कमजोर हो गई? वह बचपन से साहसी रही है और अपने पक्ष के प्रति काफी सतर्क लेकिन लगता है कि वह डरी हुई है। काहे का डर? समाज का, संबंधों का, किसका? उसे ईमानदारी से स्वीकारना चाहिए था कि वह कामरेड नामदेव के साथ है। ऐसा न स्वीकार कर वह धोखा और वादाखिलाफी क्यों कर रही?’
नर-नारी संबंधों में रणविजय एक दूसरे की वादाखिलाफी और धोखे को काफी बुरा मानते। बकिया संबंधों पर वे कत्तई विचार न करते और मानते कि सभी को अपनी चाहनाओं के अनुसार बदलते रहने का हक है।
अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा दोनों के लिए लिली का रूस जाना महज एक सामान्य सी घटना थी लेकिन एयरपोर्ट पर जो कुछ उन्होंने देखा उनके लिए काफी चिन्ताजनक था। एयरपोर्ट से लौटकर रणविजय कहीं निकल गये थे। आवास पर केवल अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा ही थे। अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा से जानना चाहा...
‘तुम्हें कैसा लगा? रणविजय और लिली दोनों ने बातें तक नहीं की, कम से कम लिली को तो पहल करना चाहिए था। लगता है दोनों के रिश्तों में दरार आ गई है।’
‘हां मुझे भी ऐसा ही महसूस हुआ। चार पांच महीनों से दोनों खोये खोये से दीख रहे थे। दोनों की चहचहाहटें गायब थीं। दोनों घर कब आते, कब निकल जाते, मालूम न चलता। मैं तो तभी से परेशान परेशान हूं।’
‘हां मैं भी ऐसा ही महसूस रहा था पर क्या किया जाना चाहिए और क्या किया जा सकता था, मेरी समझ में न आया। मैंने तो उसे पति-पत्नी के बीच होने वाली या हो जाने वाली सामान्य सी बातें माना। समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। पर लगता है दोनों विपरीत धाराओं और दिशाओं की तरफ बढ़ चुके हैं। उन्हें पहले की स्थिति तक लौटा लाना शायद अब संभव नहीं होगा।’
‘लिली को धीरज से काम लेना चाहिए था लेकिन यह भी तो हो सकता है कि लिली अपने प्रति सतर्क हो और सिर्फ काम के लिए रूस गई हो।’
‘संभव है कामरेड नामदेव से उसकी सिर्फ मित्राता ही हो लेकिन...’कृ
अंग्रेज हाकिम रुक गया आगे नहीं कह पाया कुछ। मित्राता तो मन मिलने पर ही होती है और जब मन मिल जाता है फिर तो तन अछूत नहीं रह सकता। बहुत मुश्किल होगा मन के मिलान के बावजूद भी तन को तनेन रखना। अंग्रेज हाकिम अपने भीतर उतर गया और खुद को आश्वस्त किया आखिर वह क्या कर सकता है। लिली और रणविजय को केवल समझा ही तो सकता है, समझना और सतर्क रहना तो उन दोनों का ही काम है। उसने दोनों को समझाया भी था। पर समझे हुओं को समझाना लगभग असंभव होता है।
अंग्रेज हाकिम हालांकि पति-पत्नी के बीच होने वाले इंकार और स्वीकार को निहायत व्यक्तिगत प्रवृत्ति मानता था पर कहीं न कहीं यह भी मानता था कि हर रिश्ते की पवित्राता ही उसका गुण होती है और ईमानदारी उसे गति प्रदान करती है। अंग्रेज हाकिम ने महसूस किया कि लिली और रणविजय ने एक दूसरे को सतर्कता से नहीं समझा। यदि समझा होता तो दोनों को चिन्ता होनी चाहिए थी कि चित्त साफ रखना है और अपने पक्ष को साफ-साफ बता देना है, लेकिन ऐसा न हो पाया दोनों अपनी-अपनी गुफा से बाहर निकल कर झांक भी न सके जो बहुत बड़े फांक का कारण बन गया।
रणविजय मुजफ्फर की हवेली पर देर रात तक आये। उन्होंने देखा कि लिली के डैड और ममा दोनों उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। अंग्रेज हाकिम ने पूछा भी...
‘कहां देर कर दी?’
‘हां डैड देर हो गई, थोड़ा काम था, शहर में रुक गया था। आप लोग अभी सोये नहीं। मैं तो आ ही जाता।’
रणविजय अंग्रेज हाकिम को बताकर सीधे अपने कमरे की ओर चले गये। कमरा खामोश था उसकी खामोशी हर तरफ डराती हुई पसरी थी। कमरे में भूत था, वर्तमान का कहीं अता-पता नहीं, भविष्य तो मुर्दा पड़ा था। रणविजय के सामने महज आज का नहीं कल का सवाल खड़ा था। स्मृति के सहारे समय को गुजारना कठिन होगा। रणविजय ने किसी तरह पहना हुआ उतारा और सामान्य कपड़ों में हो गये फिर ममा और डैड की तरफ वापस आये।
लिली की ममा तब किचन में थीं और रणविजय के लिए खाना गर्म कर रही थीं। रणविजय ने ममा को रोका...
‘ममा यह क्या कर रही हैं, खाना मैं गरम कर लेता, आपको आराम करना चाहिए कहते हुए रणविजय ने ममा का हाथ पकड़ लिया।’
‘नहीं ममा नहीं, मैं खाना निकाल लेता हूं और रणविजय ने खाना निकाला। जब तक रणविजय खाना खाते रहे तब तक लिली की ममा रणविजय के साथ बनी रही।
रणविजय अपने कमरे में जा कर पसर गये। नींद में डूबना चाहे पर वहां नींद न थी। नींद तो लिली के साथ हवाई जहाज से उड़ गई थी। रणविजय को जीवन जीने की दूसरी धारा का अनुभव करना था तदनुसार खुद को ढालना था। लेकिन यह आसान न था। वे सोच भी नहीं सकते थे कि लिली किसी दिन उनके लिए अन्धकारों से भरी दुनिया छोड़ कर अपने लिए किसी सुरक्षित तथा मनमाफिक उजालों की तरफ बढ़ जाएगी। वे सोच भी नहीं सकते कि जब लिली नहीं फिर दूसरी कोई। कौन होगी वो? होगी भी तो क्या गारंटी कि लिली न बन जाएगी और कल्पित मुक्तता की यात्रा पर न चल देगी।
रात जो गुजरने के लिए आई थी गुजर गई। सुबह ने रणविजय की अधढपी आंखें खोला फिर वे डैड और ममा के कमरे की तरफ चले गये। अंग्रेज हाकिम व्यायाम से खाली हो चुका था तथा भारतीय अनुभवों पर लिखी किताब का प्रूफ देख रहा था।
‘डैड प्रूफ आ गया क्या? पूछा रणविजय ने,’
‘हां कई दिन हो गये, लिली को तो मालूम था।’
‘प्रूफ में कुछ बदला तो नहीं।’
‘नहीं, मुझे ही कुछ बदलना है अंग्रेज हाकिम ने रणविजय को बताया और सोचने लगा क्या उसे अपने पारिवारिक मुद्दों को भी किताब में उठाना चाहिए? लिली और रणविजय, मैं और लिली की ममा। अलग अलग से पसरे हुए संबंध, ठंडा और गरम, उदार व क्रूर, सहनशील और हमलावर। अंग्रेज हाकिम ने अचरज भरी दृष्टि से रणविजय को देखा और पूछा...
‘तुम ठीक हो रणविजय! मैं समझता हूं कि तुम व्यवस्थित रहने की रीति जानते हो और किसी भी कुरीति से खुद को बचा सकते हो।’
रणविजय अंग्रेज हाकिम को क्या बताते? कि वे व्यवस्थित हैं, जैसा सोचा नहीं था वैसा हुआ।
भइयाराजा की बात नहीं माना, उन्हें नाराज किया और लिली ने भी मुझे अकेला छोड़ दिया। रणविजय अन्तर्मन से निकले ....‘हां डैड, मैं ठीक हूं, व्यवस्थित ही नहीं, समय में और समय के साथ उपस्थित हूं लेकिन चिन्तित भी, कहीं लिली किसी जाल में न उलझ जाये। उसका साथ समय दे न दे और वह समय के साथ चल पाये न चल पाये, आवश्यक सतर्कता में कमी रह जाय, कुछ कहा नहीं जा सकता। नामदेव बहुरूपिया और बहेलिया भी तो है।’
तुम ठीक हो न
लिली के रूस उड़ जाने के बाद रणविजय की चर्या में काफी बदलाव आ गया था। वे देर रात तक घर आने लगे तथा महसूसते थे कि उन्हें अपने लिए कोई ठिकाना बना लेना चाहिए अब लिली भी नहीं फिर उसके घर में क्या रहना। रणविजय के लिए ये उथल-पुथल वाले दिन थे। वे चांद देखते, उन्हें लगता कि वहां दाग है और अन्धेरा उसे लील रहा है। सुबह की नरम-नरम किरणें भी उन्हें तपाने लगतीं कोई न कोई उलाहना देतीं। क्या कर रहे हो आखिर? कब तक परजीवी बने रहोगे। एक बार तो उन्हें लगा कि वे अपनी इस्टेट की तरफ लौट जायें और भइयाराजा से सारा हिसाब किताब कर लें पर उन्होंने खुद को रोका, नहीं! इस्टेट की तरफ अब नहीं लौटना।
एक दिन रणविजय रूसी दूतावास पर थे, अनुवाद किये गये कुछ कामों के पारिश्रमिक का हिसाब-किताब करना था वहीं एक दूसरा कामरेड मिला। उसने रणविजय को अपने बारे में तथा अपने द्वारा चलाये जा रहे अभियान के बारे में बताया।
जब तक ‘किसान क्रान्ति’ नहीं होगी तब तक सामाजिक व्यवस्था में बदलाव न आ पाएगा। ऐसी क्रांति का आरंभ बंगाल में किया जा चुका है। देश के नामी-गिरमी अधिकांश बुद्धिजीवी अपना व्यक्तित्वांतरण करके उस क्रान्ति में शामिल हो रहे हैं। आप भी चलिए एक नई दुनिया जो सार्थक प्रयासों तथा वैचारिक प्रतिबद्धताओं से संभव है, आपकी भागीदारी उसमें आवश्यक है।
रणविजय ने उस नये कामरेड से साफ इनकार कर दिया था...कृकृ
‘नहीं मैं ऐसी किसी कार्य-योजना का सहभागी नहीं हो सकता जिसमें बन्दूकें समाज का राजनीतिक व सामाजिक इतिहास लिखती हों और समाज के लिए बारूद की गन्ध पीना अनिवार्य कर दिया जाये।’
रणविजय आने वाले समय से सन्तुलन स्थापित करने के प्रयास में थे कि रोजी-रोटी का अपना अलग इन्तजाम होना चाहिए। अब अंग्रेज हाकिम के सहारे रहना ठीक नहीं। इस बाबत उन्हें अपने जिले के सांसद का ख्याल आया जिससे उनकी अच्छी जान पहचान थी। सांसद ने रणविजय को आश्वस्त भी किया कि वह अपने स्तर से प्रयास करेगा।
सांसद का प्रयास सार्थक हुआ और रणविजय को दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कालेज में प्रध्यापकीय मिल गई। वेतन भी ठीक ठाक था। उन्हें वहां इतिहास का प्राध्यापक बनाया गया वह भी खासतौर से आधुनिक इतिहास का। उन्हें स्नातक और परास्नातक स्तर के छात्रों को पढ़ाना था।
रणविजय के लिए नौकरी मिलना काफी सुखद था। सुखद इसलिए कि वे एकान्त से बाहर निकल गये नहीं तो खाली बैठे दिन रात सोचते रहना, क्या करना है और क्या नहीं करना है? कभी कुछ सोचते गुनते तो कभी कुछ और निश्चित न कर पाते कि करना क्या है?
अंग्रेज हाकिम को जब मालूम हुआ कि रणविजय को स्थायी जैसी नौकरी मिल गई है तो वह भी खुश हुआ। उसने बातचीत के दौरान कहा भी...कृकृ
‘रणविजय तुमने अच्छा किया जो अघ्यापन पकड़ लिया। लिली भी कहीं न कहीं यहां ही अच्छा काम पा जाती। अभी तो आज़ादी की हवा है। साहित्य, संस्कृति, कला, विज्ञान तमाम क्षेत्रों में इस देश को अपना सांचा अलग ढंग से बनाना है जिसके लिए काम के अवसरों में काफी बढ़ोत्तरी की आवश्यकता होगी। कहीं भी काम मिल सकता था।’
अंग्रेज हाकिम अनुभवों से पका हुआ आदमी था फिर उसने बहुत नजदीक से विकसित और कथित रूप से सभ्य कहे जाने वाले लोकतांत्रिक, तानाशाही या साम्यवादी परंपराओं वाले देशों के राजनीतिक प्रबंधन को देखा था। उसे पता था कि सत्ता-प्रबन्धन से जुड़े तमाम नामी-गिरामी लोग कैसे-कैसे यांत्रिक होते चले जाते हैं। उसने पाया था कि दौरान कलक्टरी वही खुद कितना बदल गया था। आज़ादीके पहले की वह घटना उसे आज भी अच्छी तरह से याद है जब वह सगुण मानवीयता छोड़ कर अंग्रेजी सरकार के आदेशों के अनुपालन में किसी मशीन माफिक बदल गया था। वह तब किसी जिले का कलक्टर था। अंग्रेजों भारत छोड़ो का दौर था। पूरे देश में कांग्रेस के सत्याग्रही धरना-प्रदर्शन और सत्याग्रह कर रहे थे। इसी दौरान खबर आई कि गान्धी जी भी धरना, प्रदर्शन में हिस्सा ले सकते हैं, किसी तरह से कांग्रेस के प्रदर्शन को रोकना है और अवरोध पैदा करना है लेकिन ऐसा भी न जान पड़े कि अंग्रेजी सरकार बाधा पहुंचा रही।
कांग्रेस के धरना-प्रदर्शन को रोकना मुश्किल काम था। जनता जो राजनीति का क ख ग भी नहीं जानती थी वह भी बिना हिसाब लगाये कि होगा क्या, स्वस्फूर्त ढंग से कांग्रेसी स्वयंसेवकों के साथ थी। अंग्रेज हाकिम संकट में था। वह ऐसा क्या करे जिससे सत्याग्रह और धरना का काम बाधित हो जाये और सरकार पर दाग भी न लगे।
बहरहाल अंग्रेज हाकिम प्रदर्शन और धरना तो न रोक पाया लेकिन वह स्थान अवश्य बदलवा दिया जहां प्रदर्शन किया जाना था। वैसे उसे सरकारी निर्देश था कि वह चाहे तो कांग्रेस के विरोधी मुस्लिम लीग के नेताओं की सेवायें हासिल कर सकता है और कहीं भी किसी तरह से दंगे के विकल्प को भी चुन सकता है। पर अंग्रेज हाकिम जानता था कि मेट्रोपोलेटिन शहरों जैसा बनते इस शहर में स्पष्ट रूप से आज़ादीके सवाल पर मुस्लिम लीग वालों और कांग्रेसियों में किसी भी तरह की व्यवहारिक भिन्नता नहीं है, भले ही राजनीतिक भिन्नतायें हैं। सो अंग्रेज हाकिम के लिए ‘अंग्रेजों द्वारा दंगा कराने जाने वाले सधे हुए फार्मूल’े को आजमाना कठिन था।
अंग्रेज हाकिम उन दिनों अंग्रेजी राज-व्यवस्था पर आंख मूंद कर चलने वाला अधिकारी था, उसके लिए यह समझना अनावश्यक था कि वह एक प्रशासनिक अधिकारी के अलावा भी कुछ ह ैजिसका अपना विवेक है, चित्त है और चिन्तन है। उसे उस समय जान पड़ता कि सरकार सरकार होती है, उसका आदेश सभी प्रशासनिक अधिकारियों कोे अनिवार्य रूप से पालन करना चाहिए।
अंग्रेज हाकिम ने इस संबंध में एक काम किया। जिस रेल से गांधी जी यात्रा कर रहे थे, उस रेल को ही कहीं दूर दराज के इलाके में रोकवा दिया और उतनी देर तक रोकवा दिया जितनी देर तक प्रदर्शन का चलते रहना असंभव हो जाये।
अंग्रेज हाकिम अब महसूसता है कि वह नौकरी के समय कितना यांत्रिक हो गया था। अपनी तरह वह सत्ता-प्रबन्धन से जुड़े हर व्यक्तियों के बारे में सोचता कि सभी को यांत्रिकता का शिकार बनना ही पड़ता है। सरकार के नेटवर्क में किसी मछली की तरह फंस कर सरकारी आदेशों का क्रियान्वयन ही उसका धर्म और कर्म हो जाता है।
अंग्रेज हाकिम ने लिली के बारे में सोचा, उसे रूस नहीं जाना चाहिए था वहां उसे क्या मिलेगा? सत्ता-प्रभुओं की यांत्रिकता, दंड- विधान की जघन्य क्रूरतायें, स्वतंत्राता, समानता और मानवाधिकार के नाम पर निष्ठुर वर्ग विभाजन और कल्पित वर्ग-समूहों का निर्माण।
अंग्रेज हाकिम को आज भी याद है वह दिन, जब उसने मन से स्वीकारा था कि भारतीयों को एक न एक दिन आज़ादीमिल कर रहेगी और अंग्रेजी शासन को यहां से उजडना ही होगा। गान्धी जी जब उसके शहर में आये तब उसे मालूम हुआ कि वे उससे मिलेंगे। अंग्रेज हाकिम अचरज में यह क्या सुन रहा? क्या गांधी जी उसके कैम्प कार्यालय पर आ रहे, सूचना देने वाले से उसने कई बार पूछा क्या तुम्हारी सूचना सच है। फिर तो अंग्रेज हाकिम कैम्प कार्यालय छोड़ कर गांधी जी के पास चला गया जहां गांधी जी रुके हुए थे।
कुछ देर में वह बापू के सामने था...
बापू ने अंग्रेज हाकिम को धन्यवाद दिया,
आपकी उदार कृपाऔर सहयोग से कल का धरना, प्रदर्शन और सत्याग्रह सफल हो सका। मुझे तो लगता है कि आप पहले नेक इन्सान हैं बाद में हाकिम। एक ऐसा हाकिम जो सरकार की संप्रभुता बचाये तो व्यक्ति की संप्रभुता भी सुरक्षित रखने का प्रयास करे।
अंग्रेज हाकिम तो कठ्ठ, बापू क्या कह रहे, उसने ऐसा कुछ नहीं किया अलबत्ता उसने रेल में ही बापू को रुकवा दिया। उन्हें यहां आने नहीं दिया। फिर भी बापू प्रतिक्रिया से बाहर।
अंग्रेज हाकिम पहली बार गांधी जी के सामने हुआ था तथा पहली बार ‘व्यक्ति की संप्रभुता’ के महत्व को सुन रहा था। उसे तो पढ़ाई-लिखाई से लेकर नौकरी मिलने तक यही सिखाया गया था कि राष्ट्र ही संप्रभुता सम्पन्न होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो गुलाम या दास होते हैं। अंग्रेज हाकिम के लिए व्यक्ति की संप्रभुता का मुद्दा सोच के स्तर पर बहुत बड़ा था आखिर उसने अब तक इस पर विचारा क्यों नहीं कि व्यक्ति की भी संप्रभुता होती है।
उसने मन ही मन गांधी जी की प्रणाम किया फिर वहां से चला आया। अंग्रेज हाकिम लम्बे समय तक गांधी जी की आभा में डूबा रहा। आभा और प्रतिभा का अद्भुत सम्मिलन। एक बैरिस्टर और अद्वितीय सादगी न सिर्फ रहन-सहन में विचारों में भी। वैचारिक सादगी तो ऐसी, पश्चिमी संस्कृति को ठेंगा दिखाती और सभ्य लोगों का कार्य-भार जैसे मुहावरे को किसी बड़े झूठ में तब्दील करती।
लिली के रूस चले जाने के बाद अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा को सूना-सूना सा लगने लगा था। वैसे रणविजय अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा का आवश्यकता से अधिक ध्यान रखते तथा किसी बात की कमी न रह जाय, लिली का पास में न होना प्रभावकारी न हो जाय, रणविजय काफी सर्तकता बरतते।
रणविजय अब अपना समय कहीं बाहर न बिताते। कालेज की जिम्मेवारियों से खाली होकर सीधे हवली चले आते और घरेलू कामों की देख-रेख करते फिर किताबों की दुनिया में खो जाते। साहित्य और इतिहास की किताबें उन्हें अक्सर डुबों देतीं फिर वे सोचने लगते कि इन किताबों में लेखक का कोना किधर है और पाठक का किधर। साथ ही साथ उन्हें कभी-कभी किताबों के पाठ भी हैरान करते दरअसल किताबों ने सामाजिक बदलाव के बाबत किया क्या है? खासतौर से रणविजय तब अधिक परेशान हो जाते और अपना माथा पीटने लगते जब वे भारतीय पुरखों की कहानियां इतिहास में पढने लगते जो सीधे तौर पर राजा, महाराजा, नवाबों और सम्राटों के अय्याशगाहों से निकली होतीं।
लम्बे समय की भारतीय गुलामी के पीछे के कारणों की खोज करते समय रणविजय को जान पड़ता कि इतिहास की अंग्रेजी किताबों में ही नहीं देशी किताबों में भी पक्षपात पूर्ण झूठों का सहारा लिया गया है और भारतीय जनता को इतिहास के हासिए पर भी जगह नहीं दी गई है। कालेज में पढ़ाई जाने वाली किताबों की सूची देख कर रणविजय को लगा कि इतिहास के विद्वानों को नये तरह से शोध करने की आवश्यकता है और उस जांच-पड़ताल को जनता और सरकार के अन्तर्संबंधो पर आधारित होना चाहिए। इसके बावजूद उन्हें अपनी असमर्थता की भी समझ थी कि कालेजों में पढ़ाई जाने वाली किताबों की चयन प्रक्रिया की अंग्रेजी परंपरा को वे तोड़ नहीं सकते। उन्हें वैसा ही करना है जैसी पढ़ाई-लिखाई की परंपरा है, इससे अधिक कुछ नहीं। वैसे कालेज की प्राध्यापकीय ने रणविजय को तनहा सोचों से अलग कर दिया था और वे भी उसी में अपनी इच्छाओं की पूर्ति का समायोजन भी करने लगे थे फिर भी जब कालेज से बाहर होते तो तन्हाई में घिर जाते और काल्पनिक रूप से लिली के अगल-बगल मंडराने लगते पर लिली तो उनसे काफी दूर थी अपनी कल्पित दुनिया में, अपनी आकांक्षाओं को सहलाती दुलारती तथा महात्वाकांक्षाओं का पदयात्राी बनती। रणविजय के लिए महात्वाकांक्षाओं की पदयात्रा का कोई मतलब न था वे सामान्य थे तथा अपनी प्रतिभा को सामाजिक बदलाव की दिशा में खपाना चाहते थे।
पांच छह महीने गुजर गये, लिली ने एक चिठ्ठी भी नहीं भेजा, किसी भी उपलब्ध तरीके से संपर्क भी नहीं साधा। इसी दौरान रणविजय को सूचना मिली कि रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड भारत आया है वह एक दिन रूसी दूतावास में भी देखा गया था। कालेज के कार्यावधि के बाद रणविजय ने सोचा कि रूसी दूतावास जाकर रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड के बारे में मालूम किया जाय कि वह कहां है? गांव की तरफ गया है या पश्चिम बंगाल की तरफ जहां तेजी से वामपंथी किसान आन्दोलन फैल रहा है। लोग चारू मजूमदार के नेतृत्व में सक्रिय होने लगे हैं संभव यह भी है कि वह दिल्ली में ही हो।
रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड कुछ मायनों में तानाशाह जैसा था, वह अपने ऊपर दूसरों के कार्यक्रमों विचारों, वसूलों और सिद्धान्तों को लादता नहीं था फिर भी संभावना थी कि वह पश्चिम बंगाल की तरफ निकल गया हो। संभावना इसलिए कि वह परिस्थितियों से लाभ लेने के किसी भी अवसर को छोड़ता नहीं था। उसके लिए पश्चिम बंगाल की क्रान्तिकारी बदलाव की सारी कोशिशें अनुकूल थीं। वहां जाकर कामरेडों के साथ होकर वह अपने व्यक्तित्व को निखार सकता था तथा उनको किसी नयी सोच की ताजी हवा में नहलवा सकता था। दिल्ली में रहते हुए अक्सर उसने ऐसा ही किया था। मंच दूसरे का, कार्यक्रम दूसरे का, समर्थक दूसरे के फिर भी उसने अपनी ही बौद्धिकता का लोहा मनवाया सभी जगह एकबारगी अधिकांश श्रोताओं, वक्ताओं के बयान होते... ‘कुछ विशेष तो है रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड में’ फिर तो रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड सभा का नायक बन जाता।
रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड से मिलने की इच्छा रणविजय के लिए लिली के कारण थी, नहीं तो उससे मिलने के बारे में सोचते तक नहीं। लिली क्या कर रही? कब तक भारत वापस आ रही। पांच-छह महीने के अन्तराल ने उसे परिवर्तित किया कि नहीं या पूरी तरह से भूल गई और सारे रिश्ते नातों को तोड़ लिया? कुछ न कुछ रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड से अवश्य मालूम हो जाएगा।
रूसी दूतावास पर रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड रूस से लौटने के बाद गया था। वहां से रणविजय को सूचना मिली की कामरेड को इलाहाबाद जाना था। जहां उसके ऊपर आश्रित दो साहित्यिक आयोजन थे, पहला था एक सेमिनार, जो नई कहानियों के बाबत था कि नई कहानियां अपना जो रूप गढ़ रही है और उर्जायुक्त दैहिक कलाओं की मुक्तता के लिए कथानक रच रही हैं, क्या उनसे समाज की हसियां बचाई जा सकती हैं? तथा दूसरा था एक किताब का विमोचन जो आधुनिक आलोचना और कविता के सौन्दर्य शास्त्र की विवेचना पर केन्द्रित थी। रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड इलाहाबाद से फिर कहां जाएगा, रूसी दूतावास के अहलकारानों को मालूम न था। रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड के बाबत यह खबर रणविजय के लिए ठीक थी क्योंकि उसका आमंत्राण उन्हें भी मिला था। रणविजय तो पहले से ही कार्यक्रम बनाये हुए थे कि इलाहाबाद जाना है, वैसे भी वे अपने मित्रों के आग्रहों को ठुकराना व्यावहारिकता का अपराध मानने वालों में से थे।
रणविजय का एक कथाकार मित्रा था जो इलाहाबाद रहता था। वह पढ़ाकू और रटन्तू भी खूब था। हाईस्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक की परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी हासिल किया, फिर उसने पीएच.डी. भी किया था। पढ़ाई के बाद उसे जाने क्या सूझा कि बिना भविष्य की हलचलों और हरकतों को समझे वह डा. राममनोहर लोहिया का अनुयायी हो गया। कहीं अंग्रेजों की प्रतिमायें तोडने लगा तो कहीं दाम बांधो, जाति तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ जैसे आन्दोलनों का नेतृत्व करने लगा। कई बार उसे इस बाबत जेल भी जाना पड़ा। जेल की कालकोठरी और खेल के मैदान में वह कभी फर्क नहीं करता था और हमेशा किसी सुभाषित की तरह बोलता था। नई दुनिया संभव है यदि लोग ‘जेल, फावड़ा और वोट’ की संयुक्तता तथा व्यक्ति होने के नाते अपनी संप्रभुता को समझ लें फिर तो कुछ हजार लोग जो भारत के भूगोल, संस्कृति, साहित्य और राजनीति का व्याकरण लिख रहे हैं किसी खाई में गिरकर अपना चेहरा छिपाने की कोशिश के अलावा किसी दूसरे विकल्प की तरफ जा ही नहीं सकते।
रणविजय का कथाकार मित्रा थोड़ा प्रयास करता और कुछ चुनिन्दा लोगों से संपर्क साधता जो कालेजों व विश्वविद्यालयों में न केवल नियुक्तियों के बाबत वरन् पाठ्यक्रमों के बारे में भी प्रभावकारी दखल रखा करते थे तथा मठ बना लिए थे, तो उसे भी किसी कालेज या विश्वविद्यालय में काम करने का अवसर मिल ही जाता। पर उसने वैसा कुछ नहीं किया जो किया वह उसके लिए आत्महन्ता प्रयास ही साबित हुए और आज किसी तरह अपने परिवार का बोझ उठा रहा है। किसी तरह उपलब्धियों के नाम पर उसकी एक दो किताबें कथा साहित्य की प्रकाशित हो चुकी हैं इससे अधिक कुछ भी नहीं। रणविजय अपने वैभव के दिनों में कथाकार मित्रा की आर्थिक सहायता भी किया करते थे तथा प्रोत्साहित भी, साहित्य से बाहर नहीं निकलना, तुम्हारे लेखनी की आज के समय में बहुत आवश्यकता है।
रणविजय को तो इलाहाबाद जाना ही था। संयोग अच्छा था। रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड लिली के बारे में कुछ न कुछ सूचना अवश्य देगा। संभव है वह सूचना का चरित्रा भी बदल दे और उसमें कुछ जोड़ घटा दे फिर भी कुछ न कुछ आशय तो स्पष्ट हो ही जाएगा। रणविजय इलाहाबाद ठीक उसी दिन आये जिस दिन सेमिनार था। रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड इलाहाबाद एक दिन पहले ही आ गया था। सेमिनार के बाद रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड से रणविजय मिले हालांकि वह उन लोगों से घिरा था जो साहित्यिक कर्म के आधार पर चांद, सूरज बनने की आकांक्षा रखते थे और मनोहारी ढंग से प्रकाशित होना चाहते थे।
रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड रणविजय को देखते ही उछल पड़ा... ष्
अरे! तुम भी आये हो, कब आये? तुमने कालेज ज्वाइन किया कि नहीं, मुझसे पूछा गया था, मैंने तुम्हारा नाम प्रस्तावित किया था और कहा था यदि वह नौकरी करना चाहता है तो ठीक है। रणविजय एक समझदार और जिम्मेवार आदमी है।’
थोड़ा रुक कर रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड ने बताया...वहां लिली ठीक है, अच्छा काम कर रही है। रूसियों से घुलमिल गई है, कह रही थी रणविजय भी रूस आता तब ठीक था।
बात में हस्तक्षेप करते हुए रणविजय ने पूछा...
‘कोई संदेश वगैरह भेजा है कि नहीं, डैड और ममा दोनों पूछ रहे थे।’
नहीं सन्देश तो नहीं भेजा, यहां सब ठीक है नऽ, पूछा रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड ने।
‘हां ठीक तो है, जितना ठीक हो सकता है। डैड पूछ रहे थे लिली पत्रों का जबाब क्यों नहीं दे रही, रणविजय ने दुबारा सवाल किया
‘कोई बात होती तब तो पत्रा लिखती फिर उसके पास खाली समय कहां इस तरह की भावुकताओं में डूबने उतराने का आदी रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड कहते हुए थोड़ा मुस्कुराया और रणविजय की पीठ थप-थपा कर पूछा....
‘तुम ठीक हो नऽ’
पंचाइत
रामदयाल की जमीनदारी में एक गांव था सोनताली। सोनताली में बसने वाले अनुसूचित आदिवासी थे। एक दिन पूरा गांव महुआ के पेड़ के नीचे इकठ्ठा होकर अजीब तरह का तमाशा देख रहा था। तमाशा देखने वालों में केवल वे लोग ही नहीं थे, जिन्हें रामदयाल ने अपनी जमीनदारी की जमीन बांट दिया था और उस पर लोग अपनी खेती भी कर चुके थे, वे लोग भी थे जो पहले से ही जमीन के जोतक थे। पूरा गांव उन बातों को सुन रहा था, जिन्हें इससे पहले कभी नहीं सुना गया था।
गांव का आदिवासी मुखिया पेड़ के नीचे बैठा हुआ था और उसके पास ही रामदयाल भी बैठे थे, रामदयाल के अगल-बगल नौजवान लडके खड़े थे। देखने में जान पड़ता था कि मामला काफी गंभीर है पर मालूम न हो पा रहा था कि मामला क्या है? दरअसल वहां केवल कानाफूसियां थीं और कानाफूसियां से कोई बात भला कैसे स्पष्ट होती।
रामप्यारे वहां कुछ देर में आया। पहले वह रामदयाल को तलाश रहा था क्योंकि भइयाराजा ने जमीनदारी विनाश की कार्यवाही से स्थगन मिल जाने के बाद जमीनदारी वाले गॉवों के जोतदारों को बेदखल करना शुरू कर दिया था। रामप्यारे इस नये संकट से घबराया हुआ था। रामदयाल से बात-चीत कर अगली रणनीति पर विचार करना था। सोनताली आने से पहले रामप्यारे, रामदयाल के गांव गया था जहां उसे मालूम हुआ कि वे सोनाताली गए हुए हैं। सोनताली आने पर उसे मालूम हुआ कि सारा गांव ‘बघउत बाबा’ के महुआ वाले चबूतरे पर इकठ्ठा है। रामप्यारे को अचरज जैसा लगा असल में हुआ क्या! सारे गांव के इकठ्ठा होने का मतलब कोई अनहोनी, पुलिस आई है क्या? फिर किसी के यहां साखू की लकड़ी पकडी गई या महुआ की दारू। छापा पड़ा होगा पुलिस का। पर छापा जैसे संकेत रामप्यारे को देखने में नहीं आए। रामप्यारे गांव के बड़का ताल से जो पहले रामदयाल का था उसके बगल से गांव में दाखिल हुआ और ‘डिहवार बाबा’ के चबूतरे के पास से गांव में घुसा। गांव में उसे सन्नाटा जान पड़ा ऐसा सन्नाटा जिसकी उसे कल्पना तक न थी। दो-चार बच्चे गुल्ली-डंडा खेलते भी दिखे पर वे क्या बताते सो उनसे पूछना बेकार था। गांव की परिक्रमा करते हुए रामप्यारे बघउत बाबा के चबूतरे के पास पहुंचा।
वहां पंचाइत शुरू हो गई थी। गांव के नौजवान लडके चिल्ला रहे थे और एक तीस-बत्तीस साल की विवाहित महिला खड़ी होकर सुबकते हुए बता रही थी कि कैसे रामदयाल ने उसके साथ बलात्कार किया।कृनौजवान लड़के उस महिला का समर्थन करते हुए गवाही दे रहे थे कि ऐन वक्त पर उन्होंने रामदयाल को पकड़ा।
रामदयाल तो सकपकाये हुए थे दरअसल उन्हें अन्दाजा न था कि ऐसा भी हो सकता है। उन्होंने अपनी गर्दन झुका लिया था और नाखून से धरती खुरच रहे थे। वे धरती का मंत्रा पढ़ रहे थे और इस अद्भुत और फर्जी आरोप से बचने का उपाय सोच रहे थे। जवानी से लेकर अब तक उन्होंने जिस जीवन की यात्रा की थी, उसे सहनशीलता और संवेदनाओं से सहलाया था और मुठ्ठियों को कभी भी हवा में न लहराया था। आखिर हो क्या रहा है? कोई है जो उन्हें बदनाम करना चाहता है, कौन हो सकता है वह? उनके पास तीसरी आंख नहीं, सिर्फ दो ही थीं, तीसरी होती तो शायद वे देख लेते कि कौन षडयंत्रा कर रहा?
रामप्यारे भी हतप्रभ था, वह अनहोनी देख रहा था। रामदयाल जी ऐसा नहीं कर सकते। वह सीधे चबूतरे पर चढ़ा और नौजवान लडकों में से एक को पकड़ लिया और पूछा...
‘बोलो सच क्या है?’
‘लड़के ने दुहरा दिया कि रामदयाल ने बलात्कार किया है।’
रामप्यारे ने फिर महिला से पूछा उसने भी वही बताया।कृ
रामप्यारे फिर अवश था। आदिवासियों की पंचाइत में अब आगे वह कुछ नहीं कर सकता था सिवाय इसके कि रामदयाल को मारा-पीटा न जाये। वास्तव में उसने रामदयाल को मार-पीट से बचा लिया पर महिला का जूठन खाने से रामदयाल को न बचा सका। ‘बघउत बाबा’ के चबूतरे पर ही थाली में भात लाया गया और उसे महिला ने खाया फिर उस जूठन को रामदयाल को खिलाया गया।
नौजवान लडकों ने तो सोचा था कि रामदयाल जूठन खाने से इनकार करेंगे फिर उन्हें मार-पीट कर खिलाया जाएगा पर वहां तो दृश्य ही बदल गया।कृ
हुआ यह कि महिला ने थाली में से दो तीन कौर भात खाया और एक कौर का भात थोड़ा सा गिरा भी दिया। महिला ने यह काम कुछ ऐसे किया जैसे वह अभिनय को यथार्थ में बदलने की कलाकार हो। वह थाली रामदयाल की तरफ बढ़ा दी गई जिसे रामदयाल ने बिना ना-नूकुर के खाया।
रामप्यारे सारे दृश्य का अवाक दर्शक था पर उसका दिमाग अवाक नहीं था। महिला के घर के अगल-बगल वालों में एक आदमी था जो काफी गंभीर था, उसके चेहरे पर उदासी पसरी थी, लगता था ऐसा क्रूर दृश्य देख कर रो देगा। उसी की तरह और लोग थे जिनके चेहरे उतरे हुए थे और वे रामदयाल को जवानी से लेकर अब तक देख रहे थे कि रामदयाल लंगोट के कच्चे नहीं और न ही वादाखिलाफ। यदि रामदयाल लंगोट के कच्चे होते तो यह सारा कुछ उनका सीरवाह ही कर देता जो उनकी जमीन की निगरानी करता है और सीर वाली बखरी पर रहता है। उसके लिए औरतों को बिस्तरों पर भेजना मुश्किल नहीं।
गांव की औरतें भी रामदयाल को साफ-पाक समझ रही थीं। वे मन ही मन उस महिला पर ही आरोप लगा रही थीं कि वह रामदयाल के सीरवाह से फंसी है। पंचाइत में से एक बुजुर्ग किस्म की महिला बाहर निकली और उसने रामप्यारे को बताया कि यह सब रामदयाल के सीरवाह के कारण हो रहा है। रामदयाल ने सोनताली की सारी जमीन आवंटित कर दिया फिर यहां सीरवाह क्या करेगा? उन औरतों ने रामप्यारे से कहा...
‘रामप्यारे बेटा! सीरवाह को पकड़ो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। यह कलमुंही तो बेहया है उसके कहने पर कुछो कह सकती है और कुछो कर सकती है।’
बुजुर्ग महिला के बाद दो तीन मर्दों ने भी रामप्यारे को बताया कि यह अनरथ हो रहा है रामप्यारे भाई! एक देवता जैसे आदमी के साथ ऐसा व्यवहार जिसने आज तक किसी को लहजबान तक नहीं कहा, मार-पीट और घर-घुसनी वह क्या करेगा?
रामदयाल को बलात्कार का दंड दिया जा चुका था। रामप्यारे को गांव के दूसरों ने भी बताया कि यह गलत हो रहा। रामप्यारे, रामदयाल को देखने में लगातार था कि रामदयाल जो एक जमीनदार ही नहीं बहादुर आदमी हैं तथा दो तीन से ताकतवर भी फिर वे इस घृणित पंचाइत के आदेश का अनुपालन क्यों कर रहे?
रामदयाल थे कि वे अपना चेहरा समय की अथाह गहराई में डुबो चुके थे। उनकी देह केवल वहां पड़ी थी और आत्मा कहीं उलझी परिस्थितियों में हुई, कराहती हांफती। वे कभी समय को तौलते तो कभी अपने लगाव को कि वे गरीबों से कितने वजन का जुड़ाव रखते हैं। इसी तरह वे अपना पूरा जीवन भी तौल रहे थे। इस तौल के लिए उनके पास सिर्फ दो हांथ थे जिसे उन्होंने सामाजिक बदलाव की हथकडियों से बांध लिया था, उसे खोलना नहीं था। उनके पास जीवन तौलने के औजारों में केवल गांधी थे जो उनकी आंखों में बराबर घूमते रहते थे। वहां अहिंसा थी तथा जनता के प्रति समर्पण के सुभाषित, ये मूर्ख है नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं?
रामदयाल के सामने पंचाइत का पूरा घटनाक्रम किसी अनहोनी की तरह था जो अनायास घटित हो रहा था, इसके विपरीत उन्हें अपना हाथ नहीं उठाना। पर रामदयाल इससे अलग भी थे।
क्या सोनताली के लोग ऐसा कर सकते हैं? बिटिया सरीखी यह औरत ऐसा क्यों कर रही? कहीं भइयाराजा, उनका साला, कुछ षडयंत्रा तो नहीं रच रहे। रामदयाल की चरित्रा हत्या फिर वह खुद ही आत्महत्या कर लें।
ऐसा संभव है। भइयाराजा और मेरा साला दोनों षडयंत्रा की किसी सीमा तक जा सकते हैं। ऐसा सोचते ही रामदयाल स्थिति-प्रज्ञ हो गये फिर तो उन्होंने बिना आपत्ति जूठन भी खा लिया हालांकि जूठन खाने में उन्हें आपत्ति न होती पर परिस्थितियां सामान्य न थीं। वह तो उनके अपमान का आयोजन था।
रामप्यारे भी अपने ढंग से परिस्थिति का मूल्यांकन कर रहा था तथा वह आश्वस्त था कि रामदयाल जी इस तरह का घृणित कार्य नहीं कर सकते सो वह सचाई तक पहुंचना चाहता था। उसे गांव की बुजुर्ग महिला ने बताया भी कि यह काम सीरवाह का हो सकता है तथा आरोप लगाने वाली महिला का आचरण संदिग्ध भी है।
रामप्यारे अचानक महुआ के पेड़ वाले चबूतरे पर चढ़ गया और वहां खड़े होकर गांव वालों को संबोधित किया... मैं भी आपकी ही जाति बिरादरी का हूं। मुझे आप लोगों से कुछ कहना है। मैं समझता हूं कि पंचाइत हो चुकी है और रामदयाल जी को दंड भी दिया जा चुका है, लेकिन बलात्कार की यह सजा काफी कम है। होना यह चाहिए कि रामदयाल को ऐसी सजा दी जाये कि वे अपना घर-बार छोड़ कर इसी बस्ती में इस महिला के साथ बतौर पति रहने लगें और इसे अपनी पत्नी समझें।
रामप्यारे तो सुविचारित ढंग से बोल रहा था, उसे आभास हो गया था कि कहीं न कहीं रामदयाल के चरित्रा की हत्या करने का षडयंत्रा हो रहा है।
गांव की पंचाइत रामप्यारे की बातें सुन कर अवाक! क्या ऐसा भी हो सकता है अभी तक तो ऐसा हुआ नहीं। जाति बिरादरी वालों में से कभी किसी ने किसी महिला को बलात्कार किया तो उसे जूते मारने तथा भात-मांड़ देने से ही दंडित किया गया फिर उसे जाति में मिला लिया गया यदि गर्भ ठहर गया और बच्चा हुआ तो उसके खान-पान और परवरिश का खर्चा लिया गया। इससे अधिक कुछ नहीं।
वैसे भी गांवों में न्याय-शास्त्रा की परिभषाएं कहीं भी पसरी या डूबी हुई तो होती नहीं वहां तो सिर्फ परंपरायें और रीति-रिवाज ही होते हैं। सो गांव के लोग पीड़ित महिला और उसके साथ के युवकों की बातों को सच मान कर विचारण कर चुके थे और गांव का मुखिया भी सहमत था पर रामप्यारे की बातें सुनकर सभी सोचने लगे।
जाति-बिरादरी का मुखिया एक अधेड़ आदमी था। शक्ल सूरत से भला जान पड़ता था तथा गंभीर भी उसने पंचाइत में कहा...
रामप्यारे कह तो ठीक रहा है पर रामदयाल जी क्या कहना चाहते हैं, इन्हें भी तो अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए।
पहले तो मौका आपने दिया नहीं सीधे जूठन खिला दिया रामप्यारे ने टोका,
‘तब की बात और थी हमें छूत-अछूत का भेद भी तो मिटाना था अब तो पूरी जिनगी का सवाल है मुखिया ने सफाई दी।’
चबूतरे पर बात-चीत चल ही रही थी कि आरोप लगाने वाली महिला का पति चला आया और महिला का बाल पकड़ कर मारने लगा।
ष्बोल सच सच बोल, सबके सामने बोल, मैंने सारा कुछ सुन लिया है, मुझे छोटकू चाचा ने बताया फिर मैं भागा-भागा आ रहा हूं। बोल, बोल तूं किसके कहने पर मालिक पर इल्जाम लगा रही है, एक देवता पर, सिरवहवा पर क्यों नहीं लगाती, मैंने तो तुम्हें उसके संग पकड़ा था नऽ। उसी ने भेजा है तुम्हें नऽ। कल ही तो मालिक ने उसे काम पर से हटा दिया है। जब सीर नहीं, सारी जमीन बांट दी गई फिर सिरवाह काहे के लिए!
मुश्किल से दस पांच मिनट गुजरा होगा कि पंचाइत का सारा परि दृश्य ही बदल गया। पंचाइत में जो हो चुका था उसके बाबत दूसरी पंचाइत वहां बैठ गई। गांव के कुछ सक्रिय लोग कहीं से सीरवाह को पकड़ कर चबूतरे पर ले आए। सीरवाह रामदयाल के किसी रिश्तेदार का लड़का था। रिश्तेदार गरीब था, किसी तरह से उसकी गृहस्थी चलती थी। रामदयाल ने उसे सीरवाह रख लिया। सीरवाही करते-करते वह काफी सम्पन्न हो गया। कच्चे घर को पक्का में बदल दिया। सरिया में चार जोड़ी स्वस्थ और देखनहार बैल बंध गए। दरवाजे पर तीन मुर्रा भैंस पगुराने लगीं। कुछ जमीन भी खरीद लिया और किसी जमीनदार की तरह रंगरेलियां मनाने का शौकीन भी हो गया। सीरवाह, पैंतीस-चालीस साल का हट्टा-कट्टा आदमी था। वह नुकीली मूंछ और सुर्ख आंखों वाला था। उसे पकड़ कर लाने वाले सोनाताली के नौजवान कम न थे, ये भी रोब-दाब वाले थे व सिर उठा कर चलने वाले तथा अपमानजनक स्थितियों में न केवल गर्जने वाले वरन् मुठ्ठियॉ ं तानने वाले भी थे। सबसे बड़ी बात इनमें थी कि वे रामदयाल की नस-नस जानते पहचानते थे और आबंटन अभियान में उनके साथ जुड़े हुए थे। कभी कभार धरना प्रदर्शन, सत्याग्रह के सिलसिले में जिला मुख्यालय तक वे रामदयाल के साथ आया-जाया करते थे। उनमें एक तो रामदयाल के साथ एक बार जेल भी गया था तथा दूसरा रामदयाल की खटारा जीप का ड्राइवर भी था।
सीरवाह चबूतरे पर खड़ा कर दिया गया। खड़ा करते ही वह कंपकपी में चला गया। नौजवानों ने उससे पूछा...बताओ क्या बात है? तुमने इस औरत को क्या-क्या समझा रखा है, आज का नाटक तुमने रचा है कि नहीं’
सीरवाह चुप था और कांप रहा था।
रामदयाल वहीं बैठे-बैठे सारा तमाशा देखते हुए तमाशा बने हुए थे। सोनताली का जमीनदार जमीन की सचाई सूंघ-सूंघ खुद दुर्गन्ध बनता जा रहा था। काली मिट्टी की सोंधी गन्ध वहां से गायब थी। सचाई की परतें पीली पड़ती जा रही थीं। ऐसा भी हो सकता है। भाई-चारा, सहानुभूति और जनहित विखंडित हो रहा था। क्या ऐसा विद्रूप होता है शान्ति सहयोग तथा उदारता का रास्ता?
सीरवाह चुप था सो चुप था तभी अचानक उसके जबड़े पर दो चार घूंसे पड़े और उसके मुंह से खून निकल गया।
रामदयाल ने देखा, वे सिहर गये, नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए, इसे अपनी गलती सुधारने का मौका मिलना चाहिए।
रामदयाल ने तत्काल मारने वाले अपने ड्राइवर का हाथ पकड़ लिया, इसे न मारो, मेरा ही कोई न कोई दोष रहा होगा।
तभी दूसरे नौजवानों ने उसे मारना शुरू कर दिया। रामदयाल सभी को रोकते रह गये। पास ही में रामप्यारे भी था उसने भी सीरवाह को मारा-पीटा। बेदम होकर सीरवाह जमीन पर गिर पड़ा जब उठा तब रामदयाल के पैरों पर था...कृ
‘हां मैंने ही बहकाया था दुलरी को।’कृकृ
सीरवाह के स्वीकारोक्ति के बाद दुलरी चबूतरे से नीचे उतर आई और भागी। उसका पति उसे ही देख रहा था कि वह कहां भाग रही?
दुलरी के पति ने उसे दौड़ा कर पकड़ लिया।
‘चल वहीं चल और अपना पाप कबूल कर।’
दुलरी चबूतरे पर चढ़ी और रामदयाल के पैरों पर गिर पड़ी।
ष्बाबा! मुझसे गलती हो गई मैं बहक गई थी, फिर सीरवाह की तरफ इशारा करते हुए उसने बताया कि इसने कहा था कि वह मेरे नैहर वालों को भइयाराजा से कह कर पांच बीघा जमीन, दो बैल तथा खेती के लिए गल्ला दिलवा देगा। सो मैं लालच में पड़ गई। इसने यह भी कहा था कि वह अब भइयाराजा के यहां सीरवाही करेगा यहां का काम छोड़ देगा।
गांव वालों के सामने षडयंत्रा की अजीब कहानी थी जो सीरवाह से प्रारंभ होकर भइयाराजा तक समाप्त होती थी।
सोनाताली के लोग सीरवाह के मुंह से षडयंत्रा की कहानी सुने, आखिर उसने ऐसा क्यों किया? सीरवाह ने कहानी बताया।
भइयाराजा ने सीरवाह को एक दिन बुलवाया। अब तो तुम सीरवाह नहीं रहोगे। सोनताली की सारी जमीन रमदयलवा ने आवंटित कर दिया है। अब क्या करोगे?
‘घर जाऊंगा सरकार!’ सीरवाह ने बताया
‘घर जाकर क्या करोगे?’
‘घर का काम करूंगा।’
‘घर पर क्या इतना कमा लोगेे जितना सोनताली से कमाते रहे हो?’
‘नहीं सरकार!’
एक काम करो। भइयाराजा ने सीरवाह को समझाया और सीरवाह ने भइयाराजा का बताया हुआ नाटकीय काम कर दिया। काम उसके लिए आसान था। काम करने के लिए उसके पास कलाकारों की कमी न थी। पहली कलाकार तो दुलरी ही थी जिसे अपना जूठन रामदयाल को खिलवाना था, अभिनय प्रतिभा सम्पन्न सफल नायिका। दूसरे वे युवक थे जो रामदयाल को पकड़ सकते थे और उनके साहस और धीरज को नंगा कर सकते थे। तीसरे में सोनताली गांव था, वहां की हवा थी, पेड़-पौधे थे तथा धरती थी, साथ ही साथ वह मारक गन्ध भी थी, जो मान-अपमान के मानकों की जानकार थी।
हवा तो हवा थी वह सोनताली से उठी और रामदयाल की बखरी तक जा पहुंची फिर उनकी बिरादरी में पांव पसार कर फैल गई।
ष्रमदयलवा गिर गया, रमदयलवा पतित हो गया बिरादरी के लोग नांक-मुंह सिकोड़ते और रामदयाल पर फुसफुसाते। इनमें कुछ ऐसे थे जिन्हें दुख था लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो दलित बस्तियों की किसी मड़हा को ऐय्याशगाह बनाये हुए थे। कुछ बांये-दाये हो जाने पर अपना मुंह छिपाते फिरते ऐसे ज्यादा मुखर होते और इनकी जीभ पर दैहिक शुचिता का श्लोक चिप-चिपाता होता। गोया रामदयाल के लिए अपमान की काली बदरियां हर तरफ पसर गईं।
सोनताली में तो यह बात साफ हो चुकी थी कि रामदयाल ने बलात्कार नहीं किया था, वह महज षडयंत्रा था फिर भी पूरा जनपद रंगीन सूचनाओं में सरोबार हो गया।कृहो भी सकता है और नहीं भी हो सकता, दोनों की धारायें तीव्र थीं। रामदयाल की कांग्रेस पारटी के कुछ पदाधिकारी जो रामदयाल को अपना प्रतिद्वन्दी समझते तथा इनके द्वारा किये जा रहे स्वैच्छिक भू-आवंटन को अपराध समझते थे वे खुश-खुश थे।
वे खुश होते ही, क्योंकि रामदयाल अपमानित हो रहे थे और अपमान के दल दल में फंस चुके थे। दलित का जूठन खा चुके थे, बिरादरी द्वारा भी उन्हें अछूत बनाये जाने के आधार बन चुके थे।
सोनताली से रामदयाल सीधे अपनी कोठी पर आये। रास्ते भर वे मान-अपमान के द्वन्द में डूबते उतराते रहे उन्हें लगा कि जीवन का कुछ मतलब नहीं क्या करने चले थे और क्या हो रहा है?
सोनताली की पंचाइत खत्म हो गई थी। सिरवाह को षडयंत्रा रचने के बाबत दण्ड दिया गया। उसके सिर का बाल मुंड़वाया गया फिर गदहे पर बिठाकर गांव तथा टोलों में घुमाया गया। आरोप लगाने वाली महिला को बिरादरी से अलग कर दिया गया, इस दंड का समर्थन उसके पति ने भी किया, फिर पंचाइत खत्म। पंचाइत में यह बात नहीं मानी गई कि सिरवाह आरोप लगाने वाली महिला को अपने साथ रखे इस बाबत लिखा-पढ़ी की जाये।
रामदयाल जब सोनताली से निकलने लगे रामप्यारे उनसे मिला और पूरी घटना के लिए खेद प्रकट किया।
‘भइयाराजा ऐसे मानने वाले नहीं, कुछ सोचिए रामदयाल जी वे ही सारा षडयंत्रा रच रहे हैं।’
रामदयाल आत्मघाती चुप्पी में थे और इस चुप्पी ने उनके चेहरे को भी जकड़ लिया था। उन्होंने रामप्यारे से एक शब्द भी नहीं कहा। रामप्यारे ही लगातार उनसे बतियाता रहा...
‘भूल जाइए रामदयाल जी!’
रामदयाल चुप थे सो चुप थे, जैसे चुप्पी ही जो कुछ हो चुका था उसका पर्याप्त समाधान हो।
लाल लाल डोरे
सोनताली से वापस आने के बाद रामदयाल सबसे पहले उस मन्दिर पर पहुंचे जिसे पत्नी के कहन ेपर उन्होंने नया-नया बनवाया था। मन्दिर में स्थापित मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा हो चुकी थी। हालांकि उस अनुष्ठान में रामदयाल शामिल न हो सके थे। उन्हें शामिल भी नहीं होना था। वे कुछ हिन्दू अनुष्ठानों को कमाने खाने का माध्यम मानते उन्हीं अनुष्ठानों में मूर्तियों आदि की प्राण-प्रतिष्ठा को भी रखते। पर वे नास्तिक भी नहीं थे, जो ऐसे अनुष्ठानों से घिनाते।
सामान्य स्थिति होती तो शायद रामदयाल मन्दिर पर न जाते सीधे कोठी चले आते पर स्थिति तो विडम्बना पूर्ण थी। सोनताली में जिस तरह से उन्हें आरोपी बनाया गया और पंचाइत बुला ली गई, उनके साथ तो क्या किसी के साथ भी जो उनकी तरह का होता, संभव नहीं था। रामदयाल सीधे मन्दिर पर पहुंचे। मन्दिर की देख-रेख करने वाला पुजारी अपने आवास पर था और मन्दिर का भीतरी दरवाजा बन्द था।
मन्दिर एक भव्य परिसर में खड़ा था परिसर में स्थित पुजारी के आवास तक रामदयाल पहुंचे। पुजारी रात का भोजन बना रहा था, वह एक साधारण वेश-भूषा वाला पुजारी था तथा स्वयं-पाकी था। वह दूसरों के हाथ से बनाये खाने में पवित्राता का अभाव मानता था।
पुजारी रामदयाल के पुकारने पर बाहर निकला, उसने रामदयाल का स्वागत किया और अचरज में डूब गया...रामदयाल जी यहां!
यह अचरज ही था क्योंकि शिलान्यास के समय पुजारी ने चाहा था कि रामदयाल और उनकी पत्नी प्रभा देवी खूंट-बन्धन के बाद शिलान्यास के अनुष्ठान में हिस्सा लें पर रामदयाल इनकार कर दिये थे फिर प्रभा देवी ने ही अनुष्ठान पूरा किया था।
पुजारी ने सीधे पूछा...महाराज आप यहां, रात में, कोई आज्ञा!कृकृ
‘नहीं बस यूं ही, मन्दिर का पट खोलने की कृपा करें।’ रामदयाल ने कहा।
पुजारी ने खाना पकाना छोड़ मन्दिर का पट खोला। मन्दिर के खूबसूरत ब रामदे में रामदयाल बैठ गये फिर बोले...‘पुजारी जी! आप जायें, मैं कुछ देर यहां बैठूंगा।’
पुजारी चला गया। रामदयाल मन्दिर में स्थापित भव्य शिवलिंग की तरफ एकटक हो गये। किसी तरह से उन्हें एक मंत्रा याद आया ओम शिवाय। वे गायत्राी मंत्रा याद करने लगे। उस मंत्रा का कुछ याद आता तो बहुत कुछ भूल जाता। मां का सिखाया उन्हें याद आया कि मंत्रों का पाठ सही उच्चारण के साथ करना चाहिए। पूरा मंत्रा याद हो तभी पाठ करना चाहिए नहीं तो नहीं।
रामदयाल कई बार असफल प्रयास किये कि वे गायत्राी मंत्रा का पाठ कर लें पर मंत्रा उन्हें याद ही नहीं आया फिर विवश होकर सिर्फ ओम शिवाय का ही पाठ करते रहे। एक घंटे के भीतर जाने कितनी बार उन्होंने मंत्रा का पाठ किया लेकिन उन्हें क्षण भर के लिए भी आभास नहीं हुआ कि वे औघड़दानी शिव से संवाद कर रहे हैं या वहां से कोई रहस्यमय आश्वस्ति दायक सूचना ही मिल रही! शिवलिंग की स्थिरता और मूक आश्वस्ति, रात के अंधेरे में एक बात स्पष्ट कर रही थी कि सारा कुछ स्थिर है और शान्त भी। तुम अपनी अस्थिरतायें और चित्त की चंचलताओं को यहीं छोड़ जाओ। आरोप, प्रत्यारोप सारा कुछ क्षणिक और अस्थिर है। आरोप ही किसी को संवारते और गढ़ते हैं।
अचानक रामदयाल को महसूस हुआ कि शिवलिंग भी तो काले संगमरमर के अनगढ़ चट्टान का हिस्सा है जिसे छेनी और हथौड़ी के अनगिनत वारों से गढ़ा गया है फिर वे फटाका खड़े हुए और पुजारी को बुलाया। पुजारी ने मन्दिर का पट बन्द किया, उसके पहले रामदयाल को प्रसाद दिया और बताया कि मालिकिन सुबह आई थीं।
रामदयाल देर रात तक कोठी पर आये। कोठी की सारी व्यवस्था पहले की तरह ही थी। प्रभा देवी ने खुद को रामदयाल के प्रति समर्पित कर दिया था और भूल गई थीं कि उन्होंने रामदयाल को जमीनदारी आवंटन के लिए रोकना चाहा था। अपने भाई को भी मना कर दिया था कि तुम अपना देखो, यहां का छोड़ो।
प्रभा देवी को सोनताली की घटी घटना की सूचना मिल गई थी और यह भी कि रामदयाल अपनी कोठी के लिए सोनताली से निकल चुके हैं, पर कोठी पर आए नहीं सो प्रभा देवी सोच में थी और आंगन में बैठी प्रतीक्षा कर रही थीं। कोठी की दाई अपने घर जा चुकी थी। रामदयाल के जीप की घुरघुराहट आंगन में पहुंची, प्रभा देवी को आहट मिली कि रामदयाल आ गये। प्रभा देवी सीधे बाहरी बरामदे की तरफ आई, सामने रामदयाल थे।
रामदयाल को समझते देर न लगी कि सोनताली की खबर कोठी तक पहुंच चुकी है। सोनताली के बाबत रामदयाल ने अपने से प्रभा देवी को कुछ नहीं बताया, बताना भी क्या था? रात का खाना लेकर प्रभा देवी जब रामदयाल के पास आईं तब रामदयाल ने खाने से मना कर दिया...
‘भूख नहीं है।’कृधीरे से बताया
‘फिर भी थोड़ा सा खा लीजिए, खीर बनी है, जिसके लिए आप झगड़ते रहते हैं।’
‘नहीं प्रभा! जिद न करो, नहीं खाना, रामदयाल ने अन्तिम रूप से इनकार कर दिया।
प्रभा देवी कहां मानने वाली थीं, रामदयाल की बात।
‘आपको खाना पड़ेगा ही, नहीं तो मुझे भी नहीं खाना, प्रभा देवी ने स्पष्ट किया।’
‘मैं जानती हूं आप दुखी हैं। आप पर फर्जी आरोप लगाया गया है, लेकिन ऐसा तो होना ही था। भइयाराजा कब चाहेंगे कि आपका नाम हो, कद बढ़े, गरीब जनता आपको अपना आदमी समझने लगे। षडयंत्रा तो वे करेंगे ही यही तो तंत्रा है जिससे वे राजा बने रहेंगे। आपने जो रास्ता चुना है, उससे आपको हटाना उनके लिए जरूरी है, जिससे कि उनकी जमीनदारी और रियासत बची रहे।’
‘फिर क्या हुआ? मान है तो अपमान भी होगा। कहीं यह अपमान भी किसी खास तरह का मान तो नहीं, सिर्फ मानने और न मानने का फर्क है। थोड़ा सा खा लीजिए?’
फिर प्रभा देवी ने रामदयाल के मुंह में रोटी का एक टुकड़ा खीर के साथ डाल दिया। अब तो रामदयाल को खाना ही था लेकिन अनमने भाव से। खाना खा चुकने के बाद रामदयाल संबंधों की अन्तरंगता में डूब गये, प्रभा देवी ने भी उन्हें खूब-खूब सहलाया और दुलारा। कुछ समय के लिए रामदयाल को जान पड़ा कि कहीं कुछ है ही नहीं, कुछ हुआ ही नहीं। जो है वह सिर्फ जीने के लिए है और यह आदमी पर निर्भर है कि वह जीवन को किस तरह की खुशियों में डुबोना चाहता है?
हालांकि रामदयाल का अन्तर्मन चोटिल और दुखी था फिर भी वे सतर्क थे कि परिस्थितियां किसी को भी टुकड़ा-टुकड़ा कर सकती हैं? लेकिन न तो टूटना है और न ही अपने लक्ष्यों को खंडित करना है। पलंग पर प्रभा देवी साथ थीं और वो भी रामदयाल के साथ मादक बदरियों की तरह झिम झिम कर रही थीं और रामदयाल थे कि किसी ऊर्जा श्रोत की तरह दमक रहे थे। अचानक रामदयाल मादकता और दैहिक उन्माद से बाहर निकले...कृकृ
‘क्यों प्रभा! तुम्हें कैसा लगता है? भूमिहीनों भूमि आवंटन का अभियान मैं जो चला रहा हूं क्या वह गलत है? मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए?’
नहीं तो! हालांकि पहले मुझे काफी बुरा लगा था और मैंने आपके काम में पूरी तरह से बाधा पहुंचाने की कोशिश भी की थी पर अब समझने लगी हूं कि जमीनदारी के बचाव में आत्मिक ईमानदारी का अभाव है और कहीं न कहीं गरीबों के प्रति बहुत बड़ा छल है।
प्रभा देवी ने रामदयाल को आश्वस्त किया कि आप जो कर रहे हैं ठीक कर रहे हैं और मैं आपके साथ हूं।
रामदयाल धीरे-धीरे सोनताली में हुए अपमान से बाहर निकले। इसी दौरान एक दिन रामप्यारे भी कुछ साथियों के साथ रामदयाल की कोठी पर आया। रामप्यारे ने बारहा आग्रह किया कि रामदयाल उन गांवों की तरफ अपना कार्यक्रम बनायें जहां भइयाराजा पारंपरिक जोतदारों को जबरिया बेदखल कर रहे हैं। पर रामदयाल ने इनकार कर दिया।
इसी दौरान एक दिन एक दैनिक अखबार में खबर प्रकाशित हुई कि राज्य कांग्रेस पारटी की पहल पर जिले की कांग्रेस पारटी में फेरबदल किया गया है और रामदयाल को पारटी से निश्काषित भी कर दिया गया है।
रामदयाल ने अखबार देखा, खबर पढ़ कर चकरा गये। उनसे पूछा भी नहीं गया न ही सफाई देने का मौका दिया गया फिर कैसे निकाल दिया गया पारटी से? रामदयाल वैसे यह जानते थे कि भइयाराजा के इशारे पर जिले की कांग्रेस पारटी चल रही है। पारटी के अध्यक्ष का जोर नहीं चल रहा। सोनताली की घटना को उनके विरोधियों ने राजनीतिक रंग दे दिया था। तभी तो उनकी कोठी पर पारटी के लोग नहीं आये सिर्फ पारटी का मुखिया आया जिसे रामदयाल ने कभी राजनीतिक सहायता दिया था, तभी वह पारटी का अध्यक्ष बना रह पाया था।
कांग्रेस पारटी से रामदयाल को निकाले जाने पर पारटी के जिला अध्यक्ष ने पारटी की बहस में तीखा प्रतिरोध किया था। उसके प्रतिरोध पर कांग्रेस जनों ने ध्यान नहीं दिया और सीधे कहा कि कांग्रेस पारटी नैतिकता और शुचिता की बाहक है जिसके लिए आचरण की पवित्राता पहली शर्त है। पारटी अध्यक्ष ने इसका प्रतिरोध किया।
ष्आचरण की पवित्राता का मूल्यांकन आरोपों की पवित्राता से ही लगाया जाना चाहिए और यह साबित हो चुका है कि रामदयाल जी पर गलत आरोप लगाये गये थे। ऐसे आरोपों से कोई नहीं बच सकता, मैं जानता हूं कि उन लोगों को जो उज्ज्वल खादी वस्त्रा-धारी हैं वे केवल भूषा से ही पवित्रता फैलाते हैं और मन से घृणित अपवित्राताओं के कारक हैं। ऐसी स्थिति में रामदयाल को पारटी से निश्काषित नहीं किया जाना चाहिए।
कांग्रेस पारटी ने अध्यक्ष की एक बात नहीं सुनी और रामदयाल को पारटी से निकाल दिया गया। पूरे घटनाक्रम में भइयाराजा लगातार विशाक्त हसी हंसते रहे। पारटी अध्यक्ष जानता था कि भइयाराजा विधायक हैं और कांग्रेस पारटी ही नहीं सरकार में भी इनका दखल है, सो इनके सामने कोई भी रामदयाल के पक्ष में न होगा सो पारटी अध्यक्ष ने भइयाराजा को राजी करना चाहा पर वे क्यों राजी होते वे तो पहले से ही तैयार बैठे थे कि रामदयाल को पारटी से निकाल दिया जाये वह क्षेत्रा की जनता को भड़का रहा है। और अभिनव किस्म के जन-प्रतिरोध को पैदा कर रहा है।
भइयाराजा के विचार के ही कांग्रेस पारटी में ढेर सारे लोग थे जिनका चरित्रा सामन्ती था, जेल जाने और सत्याग्रह करने से उनके चरित्रा में रंचमात्रा भी बदलाव नहीं आया था। अधिकांया लोग उनमें से ऊंची जाति के थे, अंग्रेजी शिक्षा वाले थे तथा संपत्ति के रूप में या तो जागीरदार थे, सामंत थे या अंग्रेजी सरकार के बड़े सुपुर्दगार थे। इनमें कुछ लोग भले ही अंग्रेजी शिक्षा वाले न थे पर वे धन दौलत के मामलों में कमजोर न थे। ऐसे सभी लोग अपनी संपत्ति खास तौर से जमीन की संपत्ति बचाना चाहते थे तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम की उन धाराओं की जांच पड़ताल कर रहे थे जिससे जमीन का मालिकाना बचाया जा सकता था। उन लोगों के लिए जमीन बचा लेने या उसे बेनामी कर लेने में कानूनी रूप से प्रशासनिक सहयोग भी मिल रहा था। ऐसे लोगों को लगता कि रामदयाल जैसा आदमी उनके हितों का सत्यानाश करा देगा। सो वे खुश खुश थे और भइयाराजा के साथ गोलबन्द भी। इन लोगों ने पारटी अध्यक्ष का तीखा विरोध किया, सो वह अकेला पड़ गया विवश होकर उसने भी कांग्रेस पारटी से इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस पारटी का अध्यक्ष इस्तीफा देने के तीसरे दिन रामदयाल की कोठी पर आया और पारटी की बैठक का सारा हाल-अहवाल रामदयाल को बताया। रामदयाल ने अध्यक्ष को रोका भी और सुझायाकृकि आपको पारटी से इस्तीफा नहीं देना चाहिए था अब तो वहां हम लोगों का कोई नहीं, ऐसी स्थिति में भइयाराजा जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा।
अध्यक्ष ने प्रतिवाद किया रामदयाल का...
‘वैसा नहीं होगा, जैसा हम लोग चाहेंगे वैसा होगा। कानून उस तरफ चलेगा जिधर जनता उसे ले जाना चाहेगी। मैं जानता हूं कि जनता जानती है कौन उनके साथ है और कौन नहीं? हाईकोर्ट का स्टे आर्डर हटने के बाद सारा परिदृश्य साफ हो जाएगा।’
थोड़ा रूक कर अध्यक्ष ने रामदयाल से पूछा...
रणविजय कहां हैं? रियासत में अपना हिस्सा क्यों नहीं ले रहे, वे आ जाते तो भइयाराजा का सारा उन्माद ठंडा पड़ जाता।
रामदयाल खामोश थे और खामोश रह कर अपने को संभालने की कोशिश कर रहे थे तथा सोच रहे थे कि पूरे जिले में पार्टी अध्यक्ष के अलावा एक भी सत्याग्रही उनके साथ नहीं। आज़ादीके बाद जो कांग्रेसी बने हैं और खादी के कुर्ता में अपने को ढंकने लगे हैं उनकी बात नहीं, वे साथ दें न दें, इसकी भी तकलीफ नहीं पर क्या वे लोग भी तो साथ में नहीं जिन्होंने कांग्रेस सेवा-दल में रहकर अपने व्यक्तित्व को निखारा और संवारा था? उनके साथ तो लगातार वे कंधे से कंधा मिला कर चलते रहे हैं। रामदयाल ने अपना माथा पीट लिया और खुद को विश्लेषित करते हुए पारटी अध्यक्ष से पूछा...कृकृ
‘अध्यक्ष जी! एक बात ईमानदारी से बतायें क्या आप मुझे बलात्कार का आरोपी नहीं मानते?’
अध्यक्ष तो अध्यक्ष, वह वैचारिक पृष्ठभूमि में पका आदमी था उसने रामदयाल का प्रतिवाद किया...कृ
‘रामदयाल जी! यदि आपने बलात्कार किया भी होता तब भी मैं आपके साथ होता लेकिन मुझे मालूम है कि आप जैसा आदमी बलात्कार कर ही नहीं सकता। ऐसा मैं सपने में भी नहीं सोच सकता। सोनताली की घटना तो खुद ब खुद साफ हो गई थी, खैर छोडिए इन बातों को। जहां तक मैं समझता हूं एक कांग्रेसी बालू की दीवार जैसे मान-अपमान, दुत्कार और सत्कार से काफी ऊपर होता है और आप! दृढ़ता के साथ कांग्रेसी वसूलों पर चलें, उसे छोड़े नहीं भले ही पारटी से निकाल दिया गया है तो क्या हुआ? वैसे भी आज़ादीके पहले वाली पारटी अब है ही कहां? पारटी का चरित्रा बदल कर सत्ता-प्रबन्धन का हो गया है। सारी पारटी मुख्यमंत्रियों व प्रधानमंत्राी में सिमट गई है।
कांग्रेस पारटी का अध्यक्ष रामदयाल जी के यहां से दूसरे दिन लौटा। अध्यक्ष रामदयाल से यह आश्वासन लेने में सफल हो गया कि उन्हें जन-हस्तक्षेप के अलावा किसी आत्मघाती विकल्प के बारे में नहीं सोचना तथा आत्महीनता से बाहर निकालना है। अगले आम चुनाव तक जिले के भूमि-संबंधों के सारे सवालों पर जनतांत्रिक हस्तक्षेपों के आयोजनों को करना और करवाना है। इसी अभियान के दौरान यदि कोई समानधर्मा पारटी समझ में आती है तो उसकी सदस्यता व उसके जुड़ाव के बारे में सोचना है।
रामदयाल अध्यक्ष के वापस लौट जाने के बाद मानसिक तनावों से मुक्त हो चुके थे फिर भी उन्हें यह देखना आवश्यक लगा कि उनकी बिरादरी क्या फैसला लेती है। उनका साला तो एक दिन पहले ही आ चुका था और बोला था...
‘उसकी हिम्मत कैसे पड़ी आप पर इल्जाम लगाने की फिर अपनी बहन प्रभा देवी से...कृकृ
‘जीजा जी ने राड़ों-रहकारों का मन बढ़ा दिया है फिर तो वे बोलेंगे ही। ये उनके बारे में नहीं बोलते जो दिन रात किसी न किसी मड़हा मंे पड़े रहते हैं।’
गोया रामदयाल का साला तो पूरी प्रतिक्रिया में आ गया था। उसका वश चलता तो वह सोनताली जाता और पगलाई आक्रामकता का प्रदर्शन कर बहादुर होने के अभिमान को पीता। रामदयाल का साला अपनी पीठ खुद ठोंकने वाला था और उत्पीडन तथा दमन को अपना अधिकार समझता था। रामदयाल के नजदीकी रिश्तों के लोगों ने सोनताली की घटना को विचारणीय ही नहीं माना, पर क्षेत्रा के बिरादरी वालों ने इसे गंभीर माना।
रामदयाल को बिरादरी से बाहर निकालने की कोशिशें कैसे आरंभ हुईं और कैसे उन्हें बिरादरी से निकाल कर समाप्त हो गईं कुछ खास मालूम न हो सका। मालूम सिर्फ इतना हुआ कि उन्हें बिरादरी से निकाल दिया गया और पहले घटी उस घटना को ऐसा करने का मुख्य आधार बनाया गया कि रामदयाल ने कभी गांव के दलितों को घर की थाली में खाना खिलवाया था और थालियां भी फेंकी नहीं गई थीं।
बिरादरी से जुड़ा रहना और निकाल दिया जाना दोनों से रामदयाल विचलित नहीं हुए। वे तटस्थ बने रहे तथा महसूसते रहे कि बिरादरी उनका क्या अहित कर लेगी या कौन सा हित कर देगी। वस्तुतः बिरादरी उनका क्या नुकसान कर लेती सिवाय हुक्का पानी बन्द करने के, वैसे भी रामदयाल किसी के यहां आते-जाते भी नहीं थे। जमीनदारी आवंटित कर देने के बाद भी रामदयाल के पास जीविकोपार्जन के लिए बहुत संपत्ति थी। बहुत इसलिए कि रामदयाल अपनी दैहिक या मानसिक प्रफुल्लताओं के लिए एक धेला खर्च करना भी बुरा मानते थे। जमीनदारों वाली ऐय्याशियों से काफी दूर रहते थे तथा मदिरा और मैथुन दोनों पर उनका आत्मिक नियंत्राण था।
रामदयाल को अपनी विषम, मनः स्थितियों से बाहर निकलने में कुछ समय लगा। बाहर निकलने के बाद भी वे कोठी से बाहर कहीं नहीं निकले। उन्होंने निश्चित कर लिया था कि जमीनदारी व्यवस्था के खिलाफ जनता जब तक उन्हें अपने साथ लेने के लिए पहल नहीं करती वह उसमें श्शामिल नहीं होंगे। उन्होंने खुद को आध्यात्मिक क्रियाओं में डुबो लिया था। मन की शान्ति प्रार्थनाओं से ही हासिल हो सकती है। प्रभा देवी के साथ वे प्रतिदिन मन्दिर जाने लगे थे। शिवलिंग के सामने बैठकर वे शिव से संवाद करने का प्रयास करते पर पत्थर का शिवलिंग क्या बोलता, संगमरमर काट कर तराशा गढ़ा हुआ निर्जीव महज एक पत्थर।
रामदयाल शिवलिंग को एकटक देखते फिर कहीं खो जाते उन्हें लगता कि शिवलिंग की निर्जीवता सजीव हो उठी है और उसके आस-पास से तेज प्रकाश निकल रहा है। काला शिवलिंग, काली मिट्टी कितना सम्मिलन है अद्भुत, रहस्यमय। वे आंखें खोलते फिर वही स्थिति, शान्त, स्थिर, आग्रहहीन। शिवलिंग में किसी तरह की हरकत नहीं। वे शिवलिंग देखते रह जाते उन्हें लगता कि उनकी आंखों ने बंद होना छोड़ दिया है। पलकें ऊपर उठी हुई हैं कुछ अस्वाभाविक ढंग से। पलकों का नीचे गिरना बन्द हो चुका है।
रामदयाल ने थोड़ी कोशिश के बाद पलकें बन्द किया कि उसके भीतर प्रकाश न प्रवेश कर सके पर कुछ अचरज जैसा हुआ। बन्द पलकों के भीतर भी तीखा प्रकाश। नाभि से लेकर मस्तिष्क तक जाने वाली प्रकाश तरंग काफी गतिशील उससे मिलने वाला आन्तरिक सुख भी अद्भुत।
इसीलिए मन्दिर जाना रामदयाल ने अपना क्रम बना लिया था। एक दिन रामप्यारे मन्दिर पर ही रामदयाल से मिला। उसने रामदयाल को दो सूचनाएं दीं जो काफी महत्वपूर्ण थीं। पहली सूचना थी कि जिला कलक्टर जनपद की राजस्व भूमि-वन विभाग को हस्तांतरित कर रहा है तथा राजस्व भूमि और वनभूमि के सीमांकन का काम भी वन विभाग को सौंप रहा है। दूसरी सूचना हालांकि पहली सूचना की तरह महत्वपूर्ण न थी फिर भी उसका महत्व था जो भइयाराजा से जुड़ी थी। भइयाराजाने भाभी रानी को महल से बाहर निकाल दिया है। भाभी रानी अपने मायके चली गईं हैं। उन पर भइयाराजाने आरोप लगाया है कि उनका आचरण ठीक नहीं उनका जुड़ाव उस तहसीलदार से है जो कभी भइयाराजा की पूर्व रियासत का तहसीलदार हुआ करता था। तहसीलदार भाभी रानी का दूर के रिष्श्ते से बहनोई लगता है। महल में भइयाराजा किसी मेम को ले आये हैं जो राज्य के किसी बड़े अधिकारी की लड़की है तथा इंग्लैण्ड से पढ़ कर वापस लौटी है। महल में उस मेम के दाखिल हो जाने के बाद से ही भइयाराजा ने भाभी रानी को प्रताडित करना शुरूकर दिया था।
‘भाभी रानी की खबर सुनकर रामदयाल विचलित हो उठे और रामप्यारे से पूछे’
‘क्या यह सच है? तुम्हें यह खबर कैसे मिली?’
पूरी रियासत में हल्ला है। भइयाराजा के सीरवाह वगैरह भी बता रहे थे रामप्यारे ने खबर पुष्ट किया। भाभी रानी का रामदयाल बहुत सम्मान करते थे उन्हें भइयाराजा पर गुस्सा आया, लगता है मुझे इतिहास में लौटना होगा, हथियारों की मदद से दुश्मन सफाया अभियान चलाना होगा। रामप्यारे ने रामदयाल से राजस्व भूमि को वन विभाग में अन्तरित करने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया। रामदयाल सहमत थे कि गांव-गांव अभियान चला कर जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन आयोजित करना होगा।
रामदयाल से विचार विमर्श करके रामप्यारे लौट गया और रामदयाल अगली रणनीति पर विचार करने लगे। पहले वे निश्चिन्त थे कि भइयाराजा के सामने नहीं जाना, उनकी रियासत का नमक उनके परिवार ने खाया है। पर भाभी रानी का समाचार सुन कर रामदयाल आक्रोशित हो उठे। उन्हें लगा कि उनकी मुठ्ठियां हवा में तैरने लगी हैं और आंखों को लाल लाल डोरों ने जकड़ लिया है। रामदयाल ने अपनी उंगलियां देखाकृमजबूत कसी हुई-फिर मुठ्ठटी से फर्श पर धम्म से मारा।
‘अच्छा भइयाराजा इतने असम्मानित हो चुके हैं जो किसी का सम्मान नहीं करते क्या गुजर रही होगी भाभी रानी पर?’
दूसरी आजादी
हालांकि समय के साथ रामदयाल ने अपनी आन्तरिक मनःस्थिति को बहाल कर लिया था जिसमें प्रभा देवी ने किसी अच्छे सहयात्राी की भूमिका का निर्वाह भी किया था पर कहीं न कहीं रामदयाल को लगता कि मन की गुफा में डूब जाना और उसमें पसरी शान्ति को चूमना चाटना ही ठीक होगा। सत्याग्रह, धरना प्रदर्शन, सविनय अवज्ञा, जनता की अगुआई फिर जन-संगठन, सारा के सारा बेकार है। वे गांधी को याद करते। आखिर हत्या ही तो की गई उनकी, आरोप लगाया गया कि वे हिन्दूवादी हैं। देश और समाज ने क्या दिया उन्हें। वे भारत को बंटता नहीं देखना चाहते थे पर भारत बंटा। हत्या कर दी उन लोगों ने जो सर्वधर्म भारत नहीं हिन्दू भारत देखना चाहते थे। भइयाराजा भी तो वही कर रहे। रियासत से जुड़ाव रखने वालों में से एक-एक को तोड़ रहे, पहले तोड़ा रणविजय को फिर भाभी रानी को और मुझे भी।
रामप्यारे के बार-बार आने और कांग्रेस पारटी के अध्यक्ष का साथ होने से रामदयाल को ताकत मिली और उन्होंने खुद को तैयार किया कि अपने भीतर किसी आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह डूब जाना ठीक नहीं। मनुष्य होने के कारण समय के साथ टकराना ही एक सक्रिय व्यक्तिका काम हो सकता है। रामदयाल ने प्रभा देवी को महल का हाल बताया। प्रभा देवी हसने लगीं फिर पूछा...
‘कैसे मालूम हुआ आपको?’
‘रामप्यारे ने बताया...’
यह तो पुरानी खबर है। नई खबर यह है कि जिस मेम को भइयाराजा ने महल में रखा हुआ है। वह मां बनने वाली है और भइयाराजा चाहते हैं कि वह मां न बने, बच्चा गिरवा दे। भइयाराजा उसे अस्पताल भी ले गये थे। अस्पताल में उसने झगड़ा किया भइयाराजा से और साफ कहा कि वह बच्चा नहीं गिरवाएगी तथा महल से बाहर कहीं रहेंगी भी नहीं। भइयाराजा उसे महल से हटाकर लखनऊ या दिल्ली रखना चाहते हैं। वह महल छोड़ना नहीं चाहती। महल में रोज झगड़ा चल रहा है। वह सीधे कह रही, मैं तुम्हारी पत्नी हूं कोई रखैल नहीं हमारा भी हक है इस रियासत पर और महल पर।
‘वह पत्नी कब हो गई?’ पूछा रामदयाल ने प्रभा जी से
‘कहती तो है कि शादी का कागज उसके पास है।’ बताया प्रभा देवी ने
‘गोया तुम्हें मालूम था, फिर यह सब मुझे क्यों नहीं बताया...’ पूछा रामदयाल ने प्रभा देवी से।
‘का बताती कौन शुभ समाचार था? आप घबरा जाते भाभी रानी का हाल सुनकर। वैसे भी आप खुद काफी परेशान हैं। मैंने उसे बताना जरूरी नहीं समझा।’कृप्रभा देवी ने रामदयाल को बताया। रामदयाल कुछ समय के लिए सोच में पड़ गये।
जीवन जितना सार्वजनिक है उससे कम असार्वजनिक भी नहीं। भाभी रानी के साथ किया जाने वाले भइयाराजा के दुर्व्यवहार पर सार्वजनिक रूप से कुछ किया जा सकता है क्या?
रामदयाल इस बाबत सिर्फ इतना सोच पाये कि भाभी रानी से मुलाकात करना चाहिए और रणविजय को भी मेम वाले प्रकरण की खबर दे देनी चाहिए। रामदयाल ने प्रभा देवी से सलाह किया फिर भाभी रानी के मायके की तरफ निकल गये।
रामदयाल ने प्रभा देवी से भी साथ चलने के लिए कहा पर वे इनकार कर दीं, मुझे क्या जाना और क्या न जाना आप अकेलें जाएं।
भाभी रानी का मायका दूसरे प्रदेश में पड़ता था। उनका मायका पहले रियासत की शक्ल सूरत वाला था शक्तिषाली और प्रभुता संपन्न। पर बाद में उसमें विभाजन हो गया। उसकी एक शाख वालों ने इस्लाम कबूल लिया और तत्कालीन नबाब ने फिर उन्हें राजा बनवा दिया था। राजा बनने के लिए परिवार की एक लड़की की शादी भी नबाब से करनी पड़ी थी। बाद में दोनों शाख के लोग अपने अपने को ‘राजा’ कहने लगे थे। उनमें जघन्य प्रतिद्वन्दिता भी आ गई थी। भाभी रानी दूसरी शाख की थीं जिन्हें प्रारंभ से ही राजगद्दी हासिल थी। जमीनदारी टूटने के पहले तथा आज़ादीमिलने के आस-पास ही भाभी रानी के वंशवालों ने व्यापार करना शुरूकर दिया, सो वे शहर में रहते थे तथा व्यापार का प्रबंधन देखते थे। आर्थिक हालत भी जमीनदारी से काफी ठीक-ठाक हो गई थी।
रामदयाल दूसरे दिन भाभी रानी के पास पहुंचे। उनके पास कोठी में सन्देशा भिजवाया। भाभी रानी निवास के भीतर थीं। उनके बड़े भाई किसी काम से दिल्ली गये हुए थे। आवास पर सिर्फ औरतें थीं। भाभी रानी की भाभी तथा उनकी अम्मा रानी। भाभी रानी रामदयाल का सन्देश सुनते ही बैठका तक आईं और रामदयाल का स्वागत किया।
रामदयाल ने देखा कि वे भाभी रानी से नहीं किसी ऐसी महिला से मिल रहे हैं जिसे क्रूरता की हद तक सताया और प्रताड़ित किया गया है। रामदयाल बहुत कुछ सोचकर भाभी रानी से मिलने गये थे पर उन्हें लगा कि सारा कुछ भूल गये हैं। बात भी वे न कर पाते यदि भाभी रानी ने उनसे कुशल-क्षेम न पूछा होता।
कुशल क्षेम पूछने से रामदयाल को आधार मिल गया फिर उन्होंने महल की घटना के बारे में साफ-साफ पूछा...कृ
‘भाभी रानी! महल के बारे में मैं क्या सुन रहा हूॅ, कहीं यह अफवाह तो नहीं’
‘अफवाह नहीं है रामदयाल जी सारा कुछ सच है। आपके भइयाराजा अब वे नहीं रह गये हैं जो पहले थे।’
‘ऐसे में किया क्या जा सकता है?’ भाभी रानी से पूछा रामदयाल ने,
‘कुछ भी नहीं, सिवाय खामोशी के तथा उनसे दूरी बनाये रखने के। वह जो मेम आई है न वह भइयाराजा को कहीं का न छोड़ेगी।’
रणविजय को कुछ मालूम है कि नहीं...’कृ पूछा रामदयाल ने
रणविजय को सारा किस्सा मालूम है वे आज शाम तक आ रहे हैं। वे खुद बहुत परेशान हैं। लिली ने उनका साथ छोड़ दिया है और रूस चली गई है।’ भाभी रानी ने रामदयाल को बताया और चुप हो गईं।
रामदयाल को आगे क्या पूछना था सो वे भी खामोश हो गये। सामने पड़ा जल-पान करने लगे जिसके लिए भाभी रानी कई बार आग्रह कर चुकी थीं।
रामदयाल ने शीघ्रता से जलपान किया और भाभी रानी को तजबीजने लगे शायद वे कुछ बोलें और बतायें कि आगे क्या करना है? ऐसे तो ठीक नहीं।
वही हुआ दुबारा भाभी रानी ने बात प्रारंभ किया...
‘क्यों रामदयाल जी! खबर है कि आपने अपनी जमीनदारी गरीब किसानों आवंटित कर दी है।’
‘हां भाभी रानी। सभी काश्तकारों ने आवंटित जमीन पर अपनी खेती-बारी भी कर लिया है।’
‘क्या उनके नाम राजस्व के कागजातों पर दर्ज हो गये हैं?’ पूछा भाभी रानी ने
‘नहीं जमीनदारी जब टूटेगी तब नाम चढ़ेगा अभी कागजात बनाये जा रहे हैं’ रामदयाल ने बताया।
रामदयाल को एक दिन के लिए भाभी रानी ने रोक लिया कि रणविजय के आने के बाद जायें। देर रात तक रणविजय आये। भाभी रानी के बड़े भाई साहब भी देर रात तक आये। दूसरे दिन भइयाराजा की खुद की गढ़ी पटकथा पर विचार हुआ। इसके पहले रामदयाल और रणविजय दोनों मित्रा अपनी अपनी कहानियों में एक दूसरे को डुबोने का प्रयास किये। दोनों ने स्वीकारा कि वे परिस्थितियों के शिकार हैं, कहीं न कहीं विसंगतियां उनका पीछा कर रहीं हैं।
रणविजय को तो अचरज लगा कि सोनताली की आदिवासी महिला ने रामदयाल पर फर्जी आरोप लगाया वह भी चरित्रा की पवित्रता के बाबत। इसी तरह रामदयाल भी दुखी थे कि लिली ने रणविजय का साथ छोड़ दिया और रूस चली गई।
‘क्या लिली ने आपसे पूछा भी नहीं...?’ रामदयाल ने रणविजय से जाना।
‘काहे पूछती? उसे तो समय की अतिरिक्त ऊर्जा युक्त खुशियां चाहिए थीं मेरे पास क्या था सिर्फ मुर्दा वर्तमान और आत्महन्ता सहनशीलता तथा उसी से जुड़ी निःस्वाद सादगी।’ रणविजय रामदयाल को बताकर कहीं खो गये जिसमें वे लगातार खोते रहे हैं और खुद के संभलने का रास्ता तलाषते रहे हैं।
रामदयाल ने फिर अपने क्षेत्रा में चलाये जा रहे भूमि आवंटन का हाल अहवाल रणविजय को विस्तार से बताया। भाभी रानी के साथ जिस बर्बर व्यवहार का प्रदर्शन भइयाराजा ने किया था उससे रणविजय काफी आहत थे। ऐसा नहीं होने दिया जाएगा और भइयाराजा को कहीं न कहीं रोकना ही होगा।
रामदयाल अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा को भूल नहीं पाये थे। उन्होंने रणविजय से उनका हाल-अहवाल लिया। फिर मालूम हुआ कि लिली के रूस चले जाने के बाद अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा के साथ दिल्ली छोड़ दिया और भारतीय शिल्प और पुरातत्व का अध्ययन करने के लिए दौरे पर निकल गया। सबसे पहले वह कोणार्क गया फिर खजुराहो, इसी तरह भारत के अन्य महत्वपूर्ण स्थानों का भी दौरा किया। आज कल हरिद्वार के आश्रम में है जो वैदिक ग्रन्थों व उपनिषदों वाली दुनिया को अब नये सिरे से फिर गढना चाहता है। आश्रम आर्थिक रूप से बहुत शक्तिषाली है तथा प्रवासी भारतीयों के उदार सहयोग से चल रहा है।
अंग्रेज हाकिम को आश्रम से जोड़ने के लिए आश्रम के संचालक ने खुद पहल किया था। पहले तो अंग्रेज हाकिम ने साफ-साफ इनकार कर दिया था कि उसे नहीं जाना कहीं भी पर लिली की ममा का जोर था कि हरिद्वार में ही आखिरी सांस ली जाये। ऐसी सूरत में अंग्रेज हाकिम लिली की ममा के साथ हरिद्वार चला गया।
अंग्रेज हाकिम के हरिद्वार चले जाने के बाद रणविजय ने भी मुजफ्फर की कोठी छोड़ दिया हालांकि अंग्रेज हाकिम मुजफ्फर की कोठी रणविजय को सौंप कर ही पहले यात्रा पर फिर हरिद्वार गया था। मुजफ्फर की कोठी पर अकेले रणविजय के लिए एक रात भी गुजारना काफी असमंजस जैसा जान पड़ा था। वे रात भर सो नहीं पाते थे और बीते दिनों में डूबते उतराते रहते थे। कभी लिली सामने हो जाती हंसती खिलखिलाती तो कभी रूस जाने के लिए अपना पक्ष प्रमाणित करती। कभी भइयाराजा चले आते, महल चला आता और महल की अमानवीय प्रवृत्तियां भी। रणविजय किसी डरावने सपने में उतर जाते और खुद को प्रताड़ित करना शुरू कर देते।
तुम समय के साथ नहीं, समय सार्थक हस्तक्षेप की मांग करता है। तुम भगोड़े हो और भाग्य के सहारे जीने की कलाओं को चूमना चाहते हो। तुम्हें भइयाराजा ने दुत्कारा और लिली ने भी। रिश्तों के बीच कहां हो तुम। तुम नींद में चलने वाले हो, भागना जानते हो जागना नहीं। जागा हुआ समय से दो-दो हाथ करता है बिना परवाह किए कि समय असमय में बदल जाएगा या समय ही बना रहेगा।
रणविजय की कोठी में बिताई जाने वाली रातें यातनादाई होने लगीं, उन्हें रात भर नींद न आती। वे अतीत भूलना चाहते पर अतीत उन्हें कुरेदता रहता फलस्वरूप उन्होंने एक दिन कोठी छोड़ दिया और छोड़ने की सूचना भी अंग्रेज हाकिम को दे दिया। लिली को सूचित करने का सवाल ही न था। लिली तो रूस में अपनी अभिलाषाओं और महत्वाकांक्षाओं की खोज में थी फिर उसे दूसरी खोज की काहे चिन्ता होती? डैड और ममी या रणविजय कैसे हैं? लिली संबंधों की अन्तरंग भावुकताओं से काफी दूर हो चुकी थी और अपने में डूब चुकी थी।
रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड से इलाहाबाद में हुई मुलाकात रणविजय भूल नहीं पाये थे। उसने पूछा था ‘तुम ठीक हो नऽ’। रणविजय क्रोध पीकर रह गये थे और उसकी इस व्यंग्योक्ति को काफी गहरे से महसूसा था। मन के भीतर गाली निकली थी...
‘साला नाटक करता है, प्रतिभा की पूंजी पर अभिनव किस्म का संसार गढ़ता है, लिली मूर्ख है और उसके माया जाल में फंस गई अब उसके पास पश्चाताप करने के लिए भी कुछ न बचेगा।
रणविजय और रामदयाल अपने दुख दर्द बांटने में इतने तल्लीन हो गये कि कब सुबह हुई उन्हें पता ही नहीं चला। भाभी रानी के साथ भइयाराजा ने जिस क्रूरता का व्यवहार किया था उस पर दोनों मित्रों की राय थी कि चुप रहने से काम चलने वाला नहीं। भइयाराजा को अदालत के चौखट पर खड़ा करना होगा।
भाभी रानी के बड़े भैया भी कानूनी रास्ते पर चलने के पक्षधर थे, पर भाभी रानी नहीं चाहती थीं कि भइयाराजा को कानून के कटघरों में खड़ा किया जाय और उन पर किसी तरह का कलंक लगे। उनके भैया ने भाभी रानी को समझाया भी’
‘तुम्हारे सोचने से कुछ नहीं होने वाला, वे तो कानून के कटघरे में हैं ही। तू कुछ करो न करो वह जो मेम आई है उनकी पीठ पर कानून का पूरा व्याकरण लिख ही देगी। फिर जनता भी तो बागी हो चुकी है। जनता को कैसे रोक पाएगा कोई भी।’
भाभी रानी का नकारात्मक रूख रामदयाल, रणविजय ही नहीं उनकी भाभी और भैया को भी अच्छा नहीं लगा पर उनसे कोई बोल नहीं पाया। भाभी रानी पढ़ी-लिखी होते हुए भी अपने अधिकारों और व्यक्तित्व निर्माण से कोसों दूर थीं तथा पति के सुख-दुख से ही खुद को संस्कारित करना कर्तव्य समझती थीं, इससे अलग कुछ भी नहीं।
भाभी रानी पूरी तरह तटस्थ थीं लगता था उन्होंने अपनी निर्जीव तटस्थता को सजीव बना लिया है। किसी के समझाने व बुझाने पर उन्होंने गौर नहीं किया, साफ मना कर दिया कि उन्हें भइयाराजा के खिलाफ कुछ नहीं करना। उन्हें अपने तरह से जीवन जीने के लिए अकेली छोड़ देना ही उनके साथ सहयोग करना होगा।
रामदयाल और रणविजय भाभी रानी की अपाहिज सोच से विचलित हुए लेकिन वे उन पर अतिरिक्त दबाब भी नहीं डाल सकते थे सो सिवाय निराश होने के इनके पास दूसरे विकल्प न थे। रामदयाल और रणविजय ने फिर रियासत में चल रहे जन-आन्दोलन पर विचार किया। साथ ही साथ निश्चित किया कि भइयाराजा से किसी प्रकार का समझौता नहीं करना।
रामदयाल भाभी रानी से मिल कर अपनी कोठी पर चले आए और रणविजय दिल्ली चले गये। उन्होंने कालेज से अवकाश नहीं लिया था। रामदयाल के जिम्मे ढेर सारे काम थे, पहला तो यही था उस आदेश का विरोध करना जिसे कलक्टर ने जारी किया था और वन भूमि एवं राजस्व भूमि का सीमांकन का कार्य वन विभाग के जिम्मे लगाया था।
रामदयाल ने इस बाबत भूमिहीनों की एक जनसभा का आयोजन सुनिश्चित किया। जनसभा को सोनताली में ही आयोजित किया जाएगा। रामदयाल ने जनसभा के पहले प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों के अध्यक्षों को सूचित कर दिया तथा आग्रह किया कि वे जनसभा में आयें तथा उनके आन्दोलन का समर्थन करें। रामदयाल ने जिले की कांग्रेस पारटी तथा प्रदेश की कांग्रेस पारटी को भी जनसभा की सूचना दिया। जनसभा कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार में किसी प्रकार की कमी न रह जाये, रामदयाल ने हर संभव प्रयास किया।
जनसभा के लिए सबसे पहले रामदयाल ने एक तैयारी समिति का गठन किया जिसका मुखिया रामप्यारे को बनवाया। रामदयाल प्रारंभ से ही सचेत था कि राजस्व-भूमि को बचाने की लड़ाई जिस भूमिहीन समाज की है उसी समाज की अगुआई भी हो। फलस्वरूप रामदयाल ने तैयारी समिति में शामिल किये जाने वाले लोगों में प्राथमिकता उन लोगों को दिलवाया जो भूमिहीन थे या थोड़ी-बहुत खेती बारी वाले थे। इस समिति में अधिकांश लोग अनुसूचित जाति व जन-जाति के थे तथा कुछ पिछड़ी जातियों के भी थे। सवर्णों में से किसी भी व्यक्ति को समिति में नहीं लिया गया जबकि कई लोग ऐसे थे जो स्वेच्छया समिति में शामिल होना चाहते थे। ऐसे लोगों में कुछ बड़े काश्तकार भी थे पर अधिकतर औसत दर्जे के काश्तकार थे।
रामदयाल समिति निर्माण के बाबत पूरी सावधानी बरत रहे थे कि कहीं से भी यह संदेश नहीं जाये कि जमीन की यह राजनीति कुछ खाते-पीते लोगों के लिए मनोरंजक खेल है।
रणविजय को रामदयाल ने पहले ही दिल्ली से बुलवा लिया, रणविजय को हालांकि कालेज से छुट्टी नहीं मिल पा रही थी, क्योंकि कालेज की परीक्षाएं होने वाली थीं, किसी तरह से रणविजय ने अवकाश हासिल किया और रामदयाल के पास आ गये।
रामप्यारे तो पहले से ही रामदयाल के साथ जुड़ा हुआ था तथा गांव-गांव तैयारी समिति का गठन कर रहा था। रामदयाल ने रामप्यारे को सख्त निर्देश दिया हुआ था कि जनसभा के लिए किसी से भी चन्दा न लिया जाय और न ही रसीद वगैरह छपवाये जायें।
रामदयाल भले ही कांग्रेस पारटी से निकाले जा चुके थे पर जिले की कांग्रेस पारटी में उनका दखल कम न था। व्यवहारिक स्तर पर वे कांग्रेस के नेता थे और दूसरे कांग्रेसी उनका खूब खूब सम्मान किया करते थे। ऐसे कांग्रेसियों में गुप्त रूप से कुछ ऐसे लोग थे जो रामदयाल द्वारा आयोजित जन सभा में भागीदारी करना चाहते थे। कांग्रेस का पूर्व अध्यक्ष त्याग पत्रा दे देने के बाद भी लगातार कोशिश में था कि काग्रेस में विभाजन हो और भइयाराजा की ताकत कमजोर हो सो वह तो पहले से ही रामदयाल के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहा था।
जनसभा की तारीख जैसे जैसे नजदीक आने लगी रामदयाल घबड़ाने लगे, जाने क्या हो, कहीं जनसभा कमजोर न साबित हो जाये। कांग्रेस पारटी के प्रभाव का जब रामदयाल मूल्यांकन करते तो निराश हो जाते। कांग्रेस पारटी का राजनीतिक रंग आज़ादीमिलने के बाद से ही सत्ता-सुखों से इतना गाढ़ा हो गया था कि उस पर दूसरा रंग चढ़ ही नहीं सकता था। सो रामदयाल पसीना पसीना हो जाते। लेकिन जनता जनसभा के लिए तैयार दिखती, सो वे उत्साह में थे।
रामदयाल को थोड़ी राहत दिखती वह भी भइयाराजा के कारण। जनता उन्हें किसी खलनायक की तरह महसूसने लगी थी कि वे किसी के काम के नहीं। रणविजय को महल से निकाला, भाभी रानी जो एक देवी थीं उन्हें निकाला और आरोप भी लगाया, एक मेम को लाया, जाने कितनी तरह की बातें। निश्चित रूप से रियासत की जनता भइयाराजा पर नाराज थी। उनके मुकदमे के कारण ही अभी तक जमीनदारी नहीं टूटी, नहीं तो टूट गई होती। बहुत कुछ ऐसा।
रामदयाल के लिए एक मुश्किल यह भी थी कि वे लोगों को कैसे समझायें कि वन-भूमि तथा राजस्व-भूमि दोनों कानून से अलग-अलग हैं। दोनों की कानूनी रूप से दो स्थितियां होनी चाहिए। जनता थी कि वन-भूमि और राजस्व-भूमि दोनों को महज सरकारी भूमि ही मानती थी। कुछ लोग थे जो समझते थे कि वन-भूमि राजस्व-भूमि से पूरी तरह अलग होती है। उसका अलग कानून है तथा वन भूमि पर सरकार चाहे तो भी पट्टा नहीं कर सकती। जबकि राजस्व भूमि का पट्टा किया सरकार द्वारा जा सकता है।
रामदयाल रणविजय और पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष ने तैयारी समिति की तैयारी का अनुमान लगाने के लिए गांवों का दौरा किया। गांवों में जनसभा के बाबत तैयारी अच्छी थी। सबसे खुशी की बात यह थी गांव के लोग समझ चुके थे कि राजस्व भूमि और वन-भूमि में क्या अन्तर है? जंगल के किनारे के अधिकांश गांवों के लोग जिन जमीनों पर बिना कानूनी अधिकार के काबिज थे और खेती बारी कर रहे थे, उन जमीनों को बंजर मानकर सरकार उसका हस्तांतरण वन-विभाग को कर रही थी।
रामदयाल को ही नहीं रणविजय और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष को भी तैयारी देख कर प्रसन्नता हुई। रामदयाल को लगा उनका यह संघर्ष दूसरी आज़ादीका प्रारम्भ है। आज़ादीके भीतर आजादी। उस आज़ादीकी लड़ाई में तो खाते कमाते लोग थे इसमें वे लोग हैं जिनके मुंहसिले हैं, हाथों में हथकडियां हैं, अनपढ़ और गंवार तथा हद दर्जे तक लाचार और वेवश। रामप्यारे ने सोनताली में एक छोटी सी गोष्ठी कार्यकर्ताओं की आयोजित किया था जो तैयारी समिति का काम देख रहे थे। गोष्ठी को रणविजय और कांग्रेस अध्यक्ष ने संबोधित किया। रामदयाल ने इस गोष्ठी का समापन करते हुए दो नारे लगायेकृ‘जिसकी लड़ाई, उसकी अगुआई, दूसरा नारा था जो जमीन को जोते कोड़े, वह जमीन का मालिक होवे’ सोनताली नारों से गूंज गया। नारा लगाने वालों में वह महिला भी शामिल थी, जिसने रामदयाल पर आरोप लगाया था। सोनताली से वापस आते समय वह महिला रामदयाल से मिली, उसकी आंखें भींगी थीं, जुबान लडखड़ा रही थी, कहना चाहती थी कि माफ कर दीजिए पर कुछ कह नहीं पा रही थी। अचानक रामदयाल के पांवों पर गिर पड़ी रामदयाल ने उसे उठाया और कहा...
‘बिटिया जो हुआ उसे भूल जाओ। वह तो समय का निन्दनीय एक खेल था। एक ऐसा खेल जिसका कोई भी भुक्त भागी बन सकता है। तुमने जो किया वह किसी के कहने पर किया ऐसा नहीं करना चाहिए था तुम्हें।’
रोटी का इतिहास
भइयाराजा लगातार असमय में घिरते जा रहे थे। वही समय जिस पर वे काफी इतराया करते थे। रणविजय को महल से निर्वासित कर दिये। कांग्रेस पारटी से उनका दूर-दूर तक नाता नहीं था, उससे चुनाव का टिकट हासिल कर लिये और चुनाव जीत कर विधायक बन गये। फिर भाभी रानी को महल से निकाला और उनके स्थान पर महल में एक मेम डाल लिया, क्या हो गया? समय जो उनकी मुठ्ठी में था और आगे भी रहेगा वही समय उनके लिए असमय होता जा रहा था और मेम थी कि उनकी पीठ पर लद कर मुस्कुरा रही थी। मेम ने तो हद कर दी, भइयाराजा की एक बात नहीं माना।
भइयाराजा चिल्लाते रहे कि गर्भपात करा लो, उसने कहा नहीं कराना। भइयाराजा ने प्रस्तावित किया कि लखनऊ या दिल्ली में रहो, उसने कहा नहीं मुझे रियासत की गन्ध प्यारी है। भइयाराजा के पास जो थोड़ी बहुत नैसर्गिक शर्म थी उससे प्रभावित होकर सोच रहे थे कि यदि वह महल में रहेगी तो उनकी बदनामी होगी ऐसी स्थिति में वह लखनऊ या दिल्ली रहे तो ठीक होगा, सम्मान बचा रहेगा। लेकिन वह तो पढ़ी-लिखी थी, मेम थी, अपने अधिकारों के प्रति सतर्क थी, उसे मालूम था कि औरतों के साथ बिस्तरे का खेल खेलना, फिर विजेता होने की बंशी बजाना, मादक राग छेडना, रात को भोर में तब्दील कर देना या दिन के उजाले पर उन्माद की बदरियां चिपका देना राजाओं और जमीनदारों के ऐतिहासिक शौक हैं और यह राजा भी कम नहीं। देह तब तक जोंक की तरह चूसता रहेगा जब तक सारा खून न चूस ले। सो मेम सावधान थी उसे वही अधिकार हासिल करना है जो रानी का होता है तथा बच्चे को भी वही अधिकार दिलाना है,जो किसी भी वैध बच्चे का होता है। उसके पेट में पल रहा बच्चा किसी गैर का नहीं, फिर राजा क्यों भाग रहा, उसे अपनी संतान नहीं मान रहा?
‘एक दिन मेम ने भइयाराजा से साफ-साफ पूछा...’कृकृ
‘क्या यह बच्चा आपका नहीं, मैंने अपनी कोख किसी दूसरे के हवाले कर दिया था क्या?’
‘नहीं तो, काहे ऐसा पूछ रही हो?’ भइयाराजा ने मेम से जाना
‘क्योंकि आप लगातार गर्भपात के लिए दबाब बना रहे हैं, इसीलिए आप तनाव में भी हैं,’ मेम ने अपना पक्ष रखा।
‘ऐसा कुछ भी नहीं, मैं चाहता हूं कि हम दोनों के बीच कोई तीसरा न आये। अभी तीसरे की आवश्यकताभी नहीं। हमारी नजदीकियां लगातार मुस्कुराती रहें इसलिये आवश्यक है कि हम सावधानी बरतें और तीसरे को अपने बीच न आने दंे।’ भइयाराजा ने मेम को समझाया।
‘ठीक कहा आपने, आने वाला बच्चा तीसरा है। वह हमारी नजदीकियां लील लेगा, उसका प्रतिफल न होगा, सुकुमार, निर्विकार, मुस्कुराता, किलकारियां भरता। जाने आप क्या और कैसा सोच रहे हैं। मेरे लिए तो सारा कुछ अबूझ है वैसे भी मेरे पास वह सूझ कहां जो आपके पास है।’ मेम ने भइयाराजा का अतिरेक पूर्ण प्रतिवाद किया।
भइयाराजा भी मेम से कम न थे। वे अन्तरंगताओं के सुलझावों व उलझावों से परिचित थे। अन्तरंगता से उपजी इस उलझन से खुद को बाहर निकालने के लिए वे छट-पटा रहे थे। हालांकि उनकी सोच में इसके लिए कई तरह के सहज-असहज समाधान थे फिर भी वे प्रयास कर रहे थे कि ऐसी स्थिति का समाधान सहज ही रहे और अन्तरंग भी। भइयाराजा ने मेम को समझाया...कृकृ
‘देखो! मैं ऐसा कुछ भी नहीं सोच रहा। मैं मानता हूं कि तुम मेरे ही बच्चे की मां बनने वाली हो लेकिन अभी बच्चे को गोद में खिलाने की क्या आवश्यकता है? तुम्हें तो मालूम है कि हम दोनों के पास-पोर्ट बन गए हैं। कुछ दिनों में बीजा भी मिल जाएगा फिर हमें यूरोप की यात्रा पर निकलना है। कैसे होगा यह सब।’
‘गोया आप पहले से ही सावधान थे कि क्या-क्या करना है और कैसे-कैसे करना है? आपको तो अफसोस होगा कि मैं कैसे मां बनने की स्थिति में पहुंच गई। दवाई तो रोज आप खिलवाते रहे हैं, दाई ने सारा कुछ नहीं बताया क्या आपको।’ मेम ने भइयाराजा की करनी का स्पष्ट खुलासा कियाकृ
भइयाराजा तो जैसे कठ्ठ, सांप ने काट लिया हो। दाई को गर्भनिरोध की दवाइयां उन्होंने ही दी थीं कि रोज रात में दूध के साथ पिला दिया करना। वह तो मेम की किस्मत काम कर गई, वह एक दिन किचन में चली गई। मेम ने देखा कि दाई दूध में कुछ मिला रही, उसे शक हुआ, उसने दवाई का पत्ता देखा, वह दवाई गर्भनिरोध की थी वह भी देसी नहीं विदेशी। भइयाराजा ने उसे खास तौर से मंगवाया था।
मेम ने दाई को मना कर दिया ऐसा कभी न करना, और कुछ रूपया भी दे दिया फिर दवाई का पत्ता दाई से लेकर नष्ट कर दिया।
मेम तो पहले से ही सावधान थी कि महल में आकर वह कैद हो गई है। घबराहट भरा अनुशासन, दयाहीन संबंध और शर्मनाक औपचारिकता ही तो उसे महल के एक कोने से दूसरे कोने तक फैली पसरी दीखती है। उसे क्या पता था कि खूबसूरत चेहरे और मीठी भाषा-बोली वाला यह कथित राजा, जनता का विधायक कितना विषधर है? मेम ने महसूसा कि वह छली जा चुकी है उससे बचने का एक ही रास्ता है विवाह को वैध प्रमाणित करवाना तथा राजा का प्रतिरूप उत्पादित करना। प्रतिरूप तो मेम के पेट में पल ही रहा था।
मेम का सोचना था कि भइयाराजा से खुली बातें होनी चाहिए, जो होना होगा वह होगा ही सो मेम ने भइयाराजा से साफ-साफ कहा...कृ
‘लगता है आप किसी बलात्कारी की तरह अपना मुंह छिपाना चाह रहे हैं और होने वाले बच्चे को अपना नाम व पद देना नहीं चाह रहे। इस बाबत आपका उत्तर चाहे जो भी हो पर यह बच्चा आपका उत्तराधिकारी है और रहेगा। लेकिन मैं कभी नहीं चाहूंगी कि वह आपकी बलात्कारी प्रवृत्तियों का भी आपकी तरह से ही उत्तराधिकारी हो।
भइयाराजा की सारी कोशिश कि वे अपने चेहरे के रंगों को छिपा सकते हैं और किसी पेशेवर कलाकार की तरह उसे किसी विशेष कला का नमूना बना सकते हैं, बेकार हो गई और वे चुपचाप अपनी खोल में सिमट गये जहां से उन्हें आगे का सुगम रास्ता निकालना था। उनका रास्ता क्या था किसे मालूम?
मालूम तो तब चला जब ‘मेम’ एक दिन महल का सुरक्षा घेरा तोड़ कर रात के अन्धेरे में महल से भाग निकली और सोनताली पहुंच गई। सोनताली में रामदयाल, पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष और रणविजय का पड़ाव पड़ा हुआ था। सोनताली से ही सरकार के खिलाफ बड़े जन-प्रतिरोध का संयोजन किया जा रहा था। जनसभा का कार्यक्रम, कुछ दिन बाद में किया जाना था। सोनताली बंजर भूमि से आच्छादित अधिकांश गांवों के बीच में पड़ता था तथा वहां से जिला मुख्यालय का रास्ता पक्का था। सोनताली के पड़ाव पर प्रदेश के विभिन्न दलों के लोगों में समाजवादी लोग पहले ही पहुंच गये थे जब कि दूसरे दलों के लोंगों ने आश्वासन दिया था कि वे लोग मुख्यालय पर ही प्रदर्शन में भाग लेंगे।
रामदयाल को पूरा विश्वास था कि भले ही वे कांग्रेस पारटी में नहीं हैं फिर भी कांग्रेस के अधिकांश लोग सोनताली के पड़ाव पर आयेंगे और भूमि हकदारी यात्रा में हिस्सा लेंगे। रामदयाल को प्रदेश स्तर के कुछ कांग्रेसियों का चेहरा याद है जिन लोगों ने जमीनदारी तोड़वाने के लिए अथक प्रयास किया था। रामदयाल का विश्वास टूटने लगा था, कांग्रेस के कुछ गिने-चुने लोग ही सोनताली के भूमि हकदारी पड़ाव पर उपस्थित हुए जिनसे रामदयाल का व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ाव व लगाव था। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने रामदयाल से इस बाबत साफ-साफ बताया था.कृ. ‘सपनों में उडना बन्द कीजिए रामदयाल जी! आप गांधी क्या उनके पांव तक नहीं हो सकते फिर गांधी के ही साथ कौन और कैसे लोग थे क्या आपको पता नहीं। फिर यह भी तो है कि पहले का संघर्ष अंग्रेजों के खिलाफ था, वे विदेशी थे। आज तो सभी अपने हैं, फिर आन्दोलन की क्या आवश्यकता। आज का समय तो सुविधाओं की पलंग पर बैठने-पसरने का है, खुशियां पीने का है, आन्दोलन, धरना, प्रदर्शन सविनय अवज्ञा का नहीं। कोई नहीं आएगा रामदयाल जी, खांटी गांधीवादी भी नहीं।’
‘निराश होने की आवश्यकता नहीं, हमारे साथ जनता है फिर हमें नेता की जरूरत भी नहीं।’
सोनताली के भूमि हकदारी पड़ाव पर ‘मेम’ के पहुंचते ही अचरज फैल गया। अचरज फैलता ही, वह अस्त व्यस्त थी, भागते-भागते लस्त-पस्त भी। उसके साथ आगे-आगे भइयाराजा का मुगलकालीन जैसा आदमी भी था। उस मुगलकालीन जैसे आदमी को पूरा सोनताली जानता था। रणविजय और रामदयाल भी जानते थे। मुगलकालीन जैसा आदमी रामदयाल के पांव पर गिर गया और रो रो कर भइयाराजा और महल का हाल बताने लगा। थोड़ा शान्त होकर उसने मेम के बारे में बताया कि भइयाराजा इनके साथ क्या करने वाले हैं?
‘मेम’ को महल के बारे में कुछ भी मालूम न था कि वह महल से बाहर कैसे निकल सकती है? उसे भइयाराजा ने महल में कहीं कैद कर रखा था। सारा किस्सा दाई ने मुझे बताया फिर मैंने इन्हें महल से बाहर निकाला और भागा-भागा यहां आ रहा हूं। ये बेचारी औरत अकेली कहां जाती? मुझे तो पता था कि सोनताली में भूमि हकदारी कार्यक्रम का पड़ाव है जिसे आप लोग देख रहे हैं। आप लोग ही मेरी तथा मेम साहिबा की सुरक्षा कर सकते हैं। मुगलकालीन जैसा आदमी महल का हाल बता कर चुप हो गया।’
‘मेम वहीं पर अस्त-व्यस्त पड़ी थी। रणविजय ने मेम से बैठने के लिए कहा। वहां पंचाइत जैसा स्थान था। पूरे चबूतरे पर दरी बिछी थी, उसी पर पचासों लोग बैठे हुए थे। मेम की वेश-भूषा अंग्रेजी थी, उसके बाल भी कटे हुए थे। उम्र के हिसाब से वह तीस साल के भीतर वाली खूबसूरत युवती थी जो किसी आतंककारी खामोशी में डूबी हुई थी।
रामदयाल ने सीधे मेम से पूछा कि महल में क्या परेशानी है? फिर आश्वस्त किया कि अब वह यहां पूरी तरह सुरक्षित है। इसी तरह से वहां उपस्थित सभी लोगों ने मेम को आश्वस्त किया कि घबराने की आवश्यकता नहीं।
कुछ देर के लिए तो मेम गूंगी बनी हुई थी पर जब उसे यकीन हो गया कि वह भइयाराजा की अराजकता से बाहर है फिर वाचाल हो गई। मेम ने उपस्थित लोगों से पूछा...
‘आप लोगों में से रामदयाल जी कौन है? फिर उसने दूसरा सवाल पूछा जो रणविजय के बाबत था क्या वे भी यहां हैं?’
मुगलकालीन जैसे आदमी ने रामदयाल और रणविजय का परिचय मेम से कराया। यह जान कर कि वह अब रामदयाल जी के साथ है, उसके चेहरे का रंग बदल गया फिर उसने कहा...
‘अब मुझे कोई चिन्ता नहीं, किसी तरह से लखनऊ मेरे डेड के पास खबर भिजवा दें कि मैं महल से बाहर निकल गई हूं। एक महीने से उन लोगों की कोई खबर नहीं।’
मेम! पूरी तरह से खुल गई थी। सभी के सामने उसने बताया कि उसके डैड पहले ही मना कर रहे थे कि तुम किसी राजा-वाजा के साथ रिश्ता न बनाओ पर मैं निजी संबंधों में इतना आगे निकल चुकी थी कि पीछे लौटना मुश्किल था। महल में आने पर मालूम हुआ कि एक रानी यहां पहले से ही पड़ी हुई है। मुझे यह भी मालूम नहीं कि उन्हें महल से क्यों निर्वासित कर दिया गया।’
मेम का सारा हाल जान लेने के बाद रामदयाल और रणविजय ने उसे आश्वस्त किया कि यदि वह अपने डैड के पास लखनऊ जाना चाहती है तो कल उसे सुरक्षित भेजने का प्रबन्ध कर दिया जाएगा। भइयाराजा किसी भी तरह से इस कार्यक्रम में बाधा नहीं पहुंचा सकते। हम लोगों के आदमी उनकी ताकत से निपट लेंगे।
मेम के महल से बाहर निकल जाने के बाद भइयाराजा सक्रिय हो उठे। फिर उन्हें मालूम हुआ कि मेम को महल से निकालने वाला मुगल कालीन जैसा आदमी है और वह सोनताली गया हुआ है। जहां पर रामदयाल ने भूमि हकदारी मोर्चे का अस्थाई कार्यालय बनाया हुआ है। खबर पक्की थी सो भइयाराजा ने तत्काल सोनताली के थानाध्यक्ष से संपर्क साधा।
थानाध्यक्ष एक अधेड़ आदमी था और बात बात में अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी की तरह चबा चबा कर बोलता था। भइयाराजा ने उससे बात की कि उनकी दूसरी पत्नी का रामदयाल ने अपहरण कर लिया है। रामदयाल पर अपहरण का मुकदमा दर्ज कर तत्काल कार्यवाही की जाये। रामदयाल ने सोनताली में उनकी पत्नी को कैद कर रखा है। थानाध्यक्ष पर भइयाराजा ने एस. पी. से भी दबाब डलवाया पर थानाध्यक्ष ने रपट लिखने से इनकार कर दिया। उसने साफ बताया कि वह रामदयाल को जानता है, वे ऐसा नहीं कर सकते। भइयाराजा अपनी पूरी ताकत इस्तेमाल करके परेशान परेशान हो गये। उनकी विधायकी बेकार गई, राजा होना बेकार गया। थानेदार ने उनके आरोप पर ध्यान नहीं दिया। इसी दौरान मेम रामदयाल द्वारा लखनऊ भेज दी गई। लखनऊ पहुंच कर उसके डैड ने भइयाराजा पर रपट लिखवा दिया तथा प्रषासन पर दवाब भी डलवाया कि भइयाराजा के खिलाफ आवश्यक कार्यवाही की जाये।
मेम का डैड एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी था। भला प्रशासन का कौन ऐसा अधिकारी होगा जो उसकी बात पर गंभीरता से विचारण नहीं करेगा? भइयाराजा के कुछ लोग लखनऊ में थे जो उक्त प्रशासनिक अधिकारी के संपर्क में भी थे। उन लोगों में से किसी ने भइयाराजा को खबर भिजवाया कि वे सावधान रहें, उनकी गिरफ्तारी किसी भी समय हो सकती है।
भइयाराजा अपने जीवन में पहली बार प्रशासनिक उलझनों में फंसे थे। ऐसी उलझन जिसे उन्होंने खुद रचा था। वे सोचते थे कि एक से एक संगीन मामलों का निपटारा उन्होंने महल से ही करवा दिया था लेकिन यह छोटा सा मामला वे निपटा नहीं पा रहे। जिले का पुलिस प्रशासन उनकी बात नहीं मान रहा।
वैसे रामदयाल के अलावा कोई दूसरा होता तो भइयाराजा प्रषासन की पूरी सोच ही अपने माफिक बनवा लेते और जैसा चाहते वैसा करवा लेते। पर प्रशासन था कि उसने अपने कान और आंख दोनों को खुला रखा था। प्रशासन जानता था कि रामदयाल जनता के आदमी हैं, उनके इशारेपर जनता बारूद का ढेर बन सकती है। स्थानीय थानाध्यक्ष को यह मालूम था कि भइयाराजा ने अपनी पहली रानी को महल से निर्वासित कर दिया है तथा अपने छोटे भाई रणविजय का सारा हिस्सा भी हड़प लिया है। सो वह भइयाराजा की बात पर कान में तेल डाल कर बैठा हुआ था। उसी की तरह जिले का एस. पी. भी भइयाराजा के सामने तो उनका अनुयायी बना रहता पर पीछे काफी भला-बुरा उन्हें कहता तथा मानता कि भइयाराजा आदमियत खो चुके हैं। किसी के भले की सोच नहीं सकते। सो एस. पी. भी था कि जो न्यायिक हो वही किया जाय। थानाध्यक्ष ने भइयाराजा के आरोप की जांच कर एस. पी. को साफ-साफ बता दिया था कि मेम यदि महल से न भागती तो भइयाराजा उसकी हत्या करवा देता। भइयाराजा ने इस बाबत तैयारी कर लिया था।
तैयारी में यह था कि भइयाराजा को दूसरे दिन शिकार पर निकलना था। उनके साथ मेम भी जाती और शिकार के बहाने भइयाराजा उसका भी वहीं जंगल में शिकार कर देते फिर किसी तरह का बहाना बना लेते। जब मेम ही नहीं होती फिर भइयाराजा के खिलाफ कौन बोलता?
एस. पी. ने मुस्कराते हुए थानाध्यक्ष से पूछा था...कृ
‘क्या मतलब! इस कहानी का, क्या भइयाराजा कोई फिल्म बना रहा? रानी को महल से निकाला, मेम को ले आया, आखिर कहानी का अन्त कहां और कैसे करवाता यह सारा कुछ नाटकीय लगता है किसी घटिया कहानी की तरह।’
भइयाराजा का सारा खेल रामदयाल और मुगलकालीन जैसे आदमी के कारण बिगड़ चुका था। मुगलकालीन आदमी तो भइयाराजा से उसी समय से बदला लेना चाहता था, जब उसने भइयाराजा को अपनी पत्नी के साथ देखा था। पत्नी थी कि वह अपने को किसी रानी से कम नहीं समझती थी उसे कत्तई समझ नहीं था कि राजा किसी का नहीं होता। वह सभी में राजा होने का हिस्सा देखता है और उसी तरह का व्यवहार भी करता है। भइयाराजा तो भौंरा है कभी इस फूल पर तो कभी उस फूल पर। उसे गन्ध और रस ही तो चूसना है।
मुगलकालीन जैसे आदमी ने तत्काल अपनी पत्नी को गांव भेज दिया था। वह भी भइयाराजा का काम छोडना चाहता था लेकिन काम जब कहीं मिलता तभी संभव था। सो वह भइयाराजा के पास मुंह सिल कर पड़ा था।
मेम को सकुशल लखनऊ भेज देने के बाद रामदयाल जनसभा की तैयारी में लग गये। रणविजय भी पहले की तरह तटस्थ नहीं थे। भाभी रानी के निर्वासन ने उन्हें बौखलवा दिया था और वे निश्चित कर लिए थे कि जनसभा हो जाने के बाद वे न्यायालय में अपने हक-हकूक के लिए भइयाराजा के खिलाफ मुकदमा कर देंगे। महल का इससे अच्छा दूसरा हल नहीं। हर हाल में महल की दीवारों को धाराशायी करवाना होगा। महल जब तक धाराशायी नहीं होगा तब तक पूरी रियासत तथा उसमें बसने व रहने वाले लोग उलझनों में घिरे रहेंगे।
रणविजय तो मेम को देख लेने के बाद ही गंभीर हो गये थे। भाभी रानी से मिल कर ही हालांकि वे बदल गये थे और अपनी तटस्थता तोड़ने का फैसला ले लिए थे पर इतना जल्दी नहीं। मेम से मिल कर वे गुस्से में आ गये थे।
क्षेत्राीय समस्याओं का हल करने का केन्द्र जब महल रहा होगा तब रहा होगा। जनता ने अपनी समस्याओं का समाधान तब महल में देखा होगा तथा उसकी चमक से अपने चेहरों को चमकाया होगा। लेकिन अब महल किसी बात का हल नहीं। उसकी दीवारों पर जनता की चमक व दमक नहीं तथा वहां न्याय और सम्मान की धमक भी नहीं। वहां कुछ भी नहीं, सिवाय बर्बरता, शोषण और दमन के।
रणविजय ने, क्या करना है सारा प्रोग्राम बना लिया था कि जनसभा के बाद ही वे उस पर चलेंगे। रामदयाल रणविजय और कांग्रेस का अध्यक्ष एक साथ बैठे हुए थे। रामप्यारे ने भूमि-हकदारी कार्यक्रम के सक्रिय कार्यकर्ताओं को बुला लिया था। कार्यकर्ता सभा-स्थल पर बैठ चुके थे तथा आपसी सहमति से जनसभा की रणनीति पर बात-चीत होनी थी। मेम के आ जाने से थोड़ा व्यवधान हुआ था कार्यक्रम निश्चित समय पर प्रारंभ नहीं हो पाया।
रामप्यारे ने रामदयाल और रणविजय से कार्यक्रम प्रारंभ कराने के लिए निवेदन किया। निवेदन आवश्यक भी था कार्यकर्ता दूरदराज से आये हुए थे उन्हें अपने गांवों में लौटना भी था, सो रामप्यारे चाहता था कि कार्यक्रम जल्दी निपट जाये।
कार्यकर्ता सम्मेलन का प्रारंभ शीघ्रही रामदयाल ने कर दिया। कार्यकर्ता क्या चाहते हैं, कार्यक्रम कैसे हो पहले इस विषय पर कार्यकर्ताओं ने विचार-विमर्श किया। इसके लिए रामदयाल ने प्रत्येक कार्यकर्ता को मौका दिया कि वह अपना पक्ष रखे और बताये कि करना क्या है? कार्यकर्ताओं के लिए किसी सभा में अपना पक्ष रखना मुश्किल काम था। वे पहली बार किसी ऐसे कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे, जिसमें उन्हें अपनी बात रखने के लिए मौका दिया गया था। कार्यकर्ताओं में से एक दो लोगों ने अपनी बात रखा और बताया कि वे जनसभा का आयोजन क्यों करने जा रहे हैं। बकिया लोगों ने तो सिर्फ हां में हां मिलाया। रामदयाल जनता की इस प्रवृत्ति पर सचेत थे वे जानते थे कि हजारों साल से प्रताड़ित जनता के मुंह सिले हुए हैं वे नहीं जानते कि वे क्या हैं? अधिकार की बात तो उनकी समझ से कोसों दूर थी। उनकी सारी जिन्दगी थाना और राजा के कोड़ों के बीच फंसी हुई है।
कार्यकर्ताओं के इस सम्मेलन को रामदयाल, रणविजय, कांग्रेसी अध्यक्ष और रामप्यारे ने संबोधित किया। रामप्यारे ने जनसभा कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताया कि बंजर-भूमि को वन-भूमि हम नहीं बनने देंगे। अब हम आज़ाद हैं गुलाम नहीं।
अन्धेरा होने तक कार्यकर्ता सम्मेलन समाप्त हो गया फिर सभी लोग अस्थाई पड़ाव पर चले गये। रणविजय विश्राम करते समय देख रहे थे कि भइयाराजा का आक्रामक चेहरा उनकी आंखों में घुसा जा रहा है जबकि रामदयाल सोच रहे थे, उनके चेहरे का गब-गब रंग फीका पड़ चुका है। ष्भइयाराजा को क्या हो गया है? फिर खुद को आश्वस्त किया कि इतिहास भी तो ऐसे ही राजाओं की गाथाओं का संकलन है हमल और हमलों के वृत्त पर घूमता-थिरकता। लेकिन वे दिन लद गये जब इतिहास को पीठ पर जनता लाद लिया करती थी, अब वैसा नहीं करने वाली। अब जनता खुद अपना इतिहास लिखेगी कोई दूसरा न लिखेगा उसे ही रोटी का इतिहास कहा जाएगा।
दूसरा संस्करण
केन्द्र और प्रदेश में कांग्रेसी सरकार थी। इतना ही नहीं एक दो प्रदेशों को छोडकर सभी जगहों पर कांग्रेसियों का राजनीतिक प्रभुत्व गर्म-गर्म था। आज़ादीपाने की हवा हर तरफ बह रही थी। प्रदेश की सरकार ने कांग्रेस के पुराने संकल्प के आधार पर जमीनदारी विनाश को अधिनियम में बदल दिया था और उस पर अमल भी प्रारंभ हो गया था। पूरे प्रदेश में दो तीन ऐसी रियासतें थीं जिन्होंने जमीनदारी विनाश अधिनियम की कुछ धाराओं को अदालत में चैलेंज किया था। भइयाराजा ने भी अपनी रियासत को ‘खोइंछा’ यानि दान में मिली संपत्ति बताया था तथा तर्क दिया था कि अंग्रेजी सरकार ने अपनी सेवा के बदले उन्हें रियासत का एक हिस्सा बतौर ‘ग्रान्ट’ दिया था फलस्वरूप उनकी जमीनदारी वाले क्षेत्रा पर जमीनदारी विनाश अधिनियम लागू नहीं किया जा सकता। माननीय उच्च न्यायालय ने भइयाराजा के मुकदमे के आधार पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाहियों को स्थगित कर दिया था। रामदयाल और रणविजय ही नहीं रामप्यारे भी इस कानूनी सच्चाई को जानता था। फलस्वरूप वे लोग जमीनदारी विनाश अधिनियम की गतिविधियों से अलग केवल बंजर भूमि को आधार बना कर सत्याग्रह और आन्दोलन चला रहे थे।
भूमि हकदारी मोर्चा का मानना था कि भूमिहीन चाहे वह किसी भी जाति का हो, चाहे जिस भूमि पर काबिज हो, खासतौर से अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन-जाति तथा पिछड़ी जाति के लोग, उन्हें उनके पारंपरिक कब्जा दखल से बेदखल न किया जाये। इसके विपरीत जिला प्रशासन का मुखिया हजारों हेक्टेयर भूमि जो बंजर के रूप में कागजात माल में दर्ज थी, जिसमें खेती की जमीन के साथ चारागाह, खलिहान, कब्रिस्तान, भीटा आदि शामिल था, ऐसी जमीनों को वन-विभाग को हस्तांतरित कर रहा था और कुछ तो कर भी चुका था। खबर थी कि भइयाराजा इस काम में प्रशासन का सहयोग कर रहे तथा कुछ प्रभावशाली कांग्रेसी नेता भी। वे चाहते थे कि वन-विभाग को बंजर-भूमि भले मिल जाये, पर गरीबों को आवंटित नहीं किया जाना चाहिए।
जनसभा का दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहा था प्रशासन बहुत ही सतर्कता से परिस्थितियों का विश्लेषण कर रहा था। जिले में आज़ादीके बाद जनता द्वारा आयोजित यह पहली जनसभा होनी थी। इस जनसभा की तैयारी भी अद्भुत थी। गांव-गांव कार्यकर्ता घूम रहे थे तथा जागरूकता फैला रहे थे कि वन-विभाग भले ही सरकारी है पर वह किसी न किसी दिन लकड़ी का एक टुकड़ा लेना भी जनता के लिए बन्द करवा देगा तथा पहले के राजा और जमीनदारों से काफी क्रूर तथा आक्रामक होगा। पशाुओं को चरने के लिए जंगल में जाना रोक देगा। महुआ जैसे फल-फूल पर भी नियंत्राण लगा देगा, ऐसी सूरत में राजस्व की भूमि और वन की भूमि दोनों का अलग अस्तित्व होना आवश्यक है।
भूमि हकदारी के कार्यकर्ताओं के संगठन और उसकी ताकत देख कर प्रशासन ही नहीं वन-विभाग के आला अधिकारी भी परेशान परेशान थे। जिला कलक्टर ने प्रशासन को चौकन्ना रहने का आदेश पारित कर दिया था। प्रशासन और वन विभाग के अधिकारियों की सोच से अलग जिले की कांग्रेस पारटी और प्रदेश कांग्रेस के लोग थे। उनका सोचना था कि कांग्रेसी सरकार में हो क्या रहा? रामदयाल पक्के गांधीवादी हैं कुछ समाजवादियों के कारण गलत रास्ते पर निकल पड़े हैं। समाजवादियों का क्या है उनके पास कोई कार्यक्रम तो है नहीं सो बेमतलब का ‘दाम बांधो, खरीददारी बांधो, भूमि बांटो, लगान माफ करो’ जैसे वाहियात कार्यक्रम चलाया करते हैं। कम से कम रामदयाल को तो इस बाबत सोचना चाहिए।
रामदयाल जो सोच रहे थे वह तो कभी भी कांग्रेसियों के दिमाग में घुसने वाली ही नहीं और वह कांग्रेस अब रही भी नहीं। जिन कांग्रेसियों ने कांग्रेस के लिए पसीना ही नहीं खून बहाया था, उनमें अधिकांश अब नहीं हैं। मौजूदा कांग्रेस पारटी आधुनिक कांग्रेसियों की है जो लाल-बत्ती की लालच में पारटी में पड़े हुए हैं। उनसे कांग्रेस के वसूलों से क्या लेना देना। रामदयाल का सोचना था कि यदि जनता अपने अधिकारों के प्रति सचेत न होगी फिर तो वह किसी भी तरह का अधिकार हासिल न कर पाएगी चाहे वह अधिकार जमीनदारी-विनाश अधिनियम द्वारा ही क्यों न दिया जाने वाला हो।
प्रदेश से अलग हट कर केन्द्र की कांग्रेस पारटी की राय थी। वहां कुछ प्रमुख लोग थे जिन लोगों ने प्रदेश की कांग्रेस पारटी और सरकार को भी सहेजा था कि रामदयाल द्वारा चलाये जा रहे भूमि हकदारी कार्यक्रम को वैधानिक स्थिति प्रदान करने के लिए गंभीरता से जांचा परखा जाये तथा किसी भी हाल में अंग्रेजी सरकार की तरह उनके आन्दोलन का दमन न किया जाये। अब अंग्रेजी सरकार का राज नहीं, जनता का राज है। जनता के राज में किसी भी जनतांत्रिक संघर्ष का दमन बलपूर्वक नहीं किया जाना चाहिए। जनता को अधिकार है कि वह अपने विरोध का प्रदर्शन करे।
खबर तो यह भी पसरी थी कि माननीय प्रधानमंत्राी जी ने प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी को विशेष रूप से निर्देशित किया है कि रामदयाल जी का योगदान स्वतंत्राता संघर्ष के दौरान उल्लेखनीय रहा है और वे प्रारंभ से ही कांग्रेस के प्रमुख सहयोगी रहे हैं, किन्ही कारणों से अब वे कांग्रेस में नहीं हैं फिर भी प्रदेश की सरकार को चाहिए कि वह उनका सम्मान करे। उनके साथ निर्दय तथा हास्यास्पद व्यवहार न करे।
केन्द्र की कांग्रेस पारटी और सरकार के दिशा निर्देशों के विपरीत प्रदेश की पारटी और सरकार दोनों थी। प्रदेश सरकार के मुखिया का मानना था कि रामदयाल के जनान्दोलन का समर्थन करना कांग्रेस पारटी के लिए काफी महंगा साबित होगा। माना जाएगा कि कांग्रेस पारटी समाजवादियों के साथ मिल गई है और संयुक्त कार्यक्रम संचालित कर रही है। आजकल रामदयाल जी कांग्रेस के साथ नहीं वरन् समाजवादियों के साथ हैं। इसके अलावा प्रदेश सरकार के मुखिया ने केन्द्र को बताया कि निश्चित रूप से आगामी चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ेगा, यदि इस आन्दोलन का दमन न किया गया फिर तो समाजवादियों को कई चुनाव क्षेत्रों से जीतने से नहीं रोका जा सकता।
प्रदेश सरकार के मुखिया की छल-पूर्ण प्रतिक्रिया से केन्द्र की कांग्रेस पारटी और सरकार दोनों ने खामोशी साध लिया। फलस्वरूप प्रदेश की सरकार ने निरंकुश ढंग से जनसभा के कार्यक्रम को रोकने व बाधित करने का प्रयास तेज कर दिया। गनीमत थी कि जिले का कलक्टर एक भला आदमी था वह व्यक्तिगत रूप से चाहता था कि राजस्व-भूमि और वन-भूमि का अलग अलग सीमांकन हो तथा राजस्व भूमि किसी भी हाल में वन विभाग को हस्तांतरित न किया जाये। पर वह मजबूर था। उसका कार्यकाल भी तीन चार महीने में समाप्त होने वाला था। उसने पहले ही सरकार को सूचित कर दिया था कि राजस्व-भूमि का वन-विभाग को हस्तांतरण न केवल कानूनी रूप से वरन सामाजिक व राजनैतिक रूप से भी गलत होगा। पर सरकार तो सरकार ऐसे कलक्टरों की बात सरकार कहां सुनने वाली। कलक्टर को आदेश मिला... ‘तुमसे जो कहा जा रहा है करो।’ शासनादेषों का अनुपालन सुनिश्चित कराना ही तुम्हारा काम है, इसके आगे तुम्हारा काम नहीं।
कलक्टर सरकारी सेवा में रहते हुए समझ चुका था कि शासनादेषों का अनुपालन कराना ही उसका काम है और शासनादेशों की वैधता अवैधता पर सोचना, उस पर दिमाग लगाना सिवाय बेवकूफी के कुछ नहीं। कलक्टर ने शासनादेष की एक कापी फाइल में लगवाया और बंजर-भूमि का हस्तातंरण वन विभाग के पक्ष में कर दिया। उधर वन विभाग को निर्देशित कर दिया कि शीघ्राति शीघ्र वन अधिनियम के तहत बंजर-भूमि का अधिग्रहण कर लिया जाये।
कलक्टर शासनादेषों के क्रियान्वयन की सरकारी परंपरा का जानकार था सो उसने उन सभी औपचारिकताओं का निर्वाह किया जिसे न करने से वह कानूनी जाल में फंस सकता था। ऐसा करने के क्रम में ही उसने राजस्व-विभाग की बंजर भूमि का हस्तांतरण वन विभाग को कर दिया तथा वन-विभाग को निर्देशित भी किया कि वह बंजर-भूमि का अधिग्रहण वन-अधिनियम के तहत कर ले। अब कलक्टर निश्चिन्त था, लेकिन रामदयाल द्वारा आयोजित जनसभा को लेकर तनावग्रस्त भी था।
जनसभा और प्रदर्शन को जिला मुख्यालय पर भी आयोजित किया जाना था सो कलक्टर के लिए न केवल प्रशासनिक रूप से वरन् नैतिक रूप से भी दबाव था कि वह क्या करे और क्या न करे। इन्टिलिजेन्स के लोगों ने कलक्टर को सूचित किया था कि जनसभा और प्रदर्शन दोनों गांधीवादी तरीके से किये जाएंगे पर प्रदर्शन का क्या ठिकाना कब वह हिंसक हो जाये।
जिले का एस. पी. एक सख्त मिजाज आदमी था तथा दमन की अंग्रेजी पद्धतियों का प्रशंसक भी सो वह पूरी तैयारी में था, पहले आंसू गैस के गोले, फिर लाठियां और अन्त में फायरिंग। एस. पी. ने कलक्टर को बताया भी था कि जनसभा के प्रमुख आयोजकों की प्रदर्शन और जन सभा से पहले गिरफ्तारी करना ठीक होगा फिर प्रदर्शन स्वतः ही स्थगित हो जाएगा।
कलक्टर ने एस. पी. को इस बाबत मना कर दिया था कि किसी की गिरफ्तारी नहीं करना है क्योंकि गिरफ्तारी करने से सरकारी विरोध की आग तेज होगी फिर यहां की बंजर-भूमि का मामला देश स्तर का बन जाएगा जो शासन व प्रशासन दोनों स्तर पर ठीक नहीं होगा।
दूसरी ओर प्रदर्शन कारी भी सावधान थे तथा वे पूरी तैयारी कर चुके थे कि कब क्या करना है। प्रशासन प्रदर्शन को कमजोर करने का कोई भी दमनकारी प्रयास कर सकता है। प्रदर्शन के दो-तीन दिन पहले से ही प्रदर्शन के प्रमुख आयोजक भूमिगत हो गये थे तथा प्रदर्शन कारियों को निर्देशित कर दिया गया था कि वे भीड़ की शक्ल में मुख्यालय तक न जायें। समाजवादियों का न केवल प्रदेश का नेतृत्व वरन् केन्द्र का नेतृत्व समूह भी पहले से आ चुका था तथा मुख्यालय पर जगह-जगह ठिकाना बना लिया था।
प्रदर्शन के दिन जो हुआ वह अचरज जैसा हुआ। प्रदर्शन हुआ सभा हुई, कहीं न हल्ला न कहीं चिल्ल पों। प्रशासन को शान्ति स्थापित करने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा और सिखाई गई जोश का इस्तेमाल नहीं करना पड़ा। दिक्कत तब हुई जब प्रदर्शन कारी बिना पूर्व योजना के मुख्यालय स्थित कोतवाली पहुंच गये और नारा लगाने लगे...कृ
‘हमारी मांगें पूरी करो या गिरफ्तार करो।’
जिला मुख्यालय आज़ादीके बाद पहली बार एक ऐसा प्रदर्शन और जनसभा देख रहा था जो पहले कभी नहीं देखा गया। प्रदर्शन में शामिल लोग मैले-कुचैले, अशिक्षित तथा प्रताड़ित थे। उनके मुंह से अधिकारों के नारों का सुनना अद्भुत था। वे मुठ्ठियां हवा में लहराते हुए मार्च में शामिल थे। तब यह जनपद औद्योगिक कारखानों का केन्द्र नहीं बना था। यहां नोटों की गड्डियां हवा में लहराया नहीं करती थीं। किसी पहाड़ी या नदी पर पहले ऐसा नहीं था कि तिजोरियां रखी जायें और पत्थर तथा बालू को रुपयों में तब्दील कर दिया जाये। केवल इतना था कि जंगली इमारती पेड़ों का मोल था और उन्हें कटवा-कटवा कर ठेकेदार बेचा करते थे।
रामदयाल, रणविजय, पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष तथा प्रमुख समाजवादी प्रदर्शन के जुलूस में आगे-आगे चल रहे थे। कोतवाली पहुंच कर प्रदर्शन जनसभा में बदल गया। कोतवाली के प्रागंण में इतनी जगह नहीं थी कि दस हजार लोग खड़े भी हो सकें। किसी तरह प्रदर्शन कारियों ने अपने को व्यवस्थित किया। प्रदर्शन और जनसभा शान्तिपूर्ण ढंग से ही हो रही थी पर पुलिस वालों को महसूस हुआ कि प्रदर्शनकारी पुलिस विभाग को अपमानित करना चाह रहे हैं। कोतवाल से लेकर एस. पी. तक को कोतवाली पर प्रदर्शन और जनसभा करना ठीक नहीं लगा।
कोतवाल ने अचानक फैसला लिया कि प्रदर्शन व जनसभा दोनों रोक देना चाहिए। कलक्टर को ज्ञापन दे देने के बाद यहां प्रदर्शन करने की क्या आवष्यकता? यह क्या है किकृ‘मांगें पूरी करो या गिरफ्तारी करो, क्यों गिरफ्तारी करें क्या जेल में हराम का खाना मिलता है?’
कोतवाल एस. पी. से पूछ कर लाठियां भजवाने लगा। तीन चार फायर भी किये गये। सीधी-सादी जनता कोतवाली प्रागंण में लेट गई जैसा कि उन्हें पहले ही निर्देशित किया गया था। रामदयाल रणविजय पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष, रामप्यारे व कई समाजवादियों को पुलिस कहीं उठा ली गई। लेटी हुई जनता का पुलिस क्या करे, उनका क्या करे जिन्हें लाठियों की चोटें लगी थीं। दर्जनों आदमियों के ष्शिर फूट गये थे और वे खून से लथ-पथ थे।
कोतवाली का सारा समाचार सुनकर कलक्टर हलकान हो गया उसे पुलिस की इस कार्य संस्कृति पर गुस्सा आया। देश आजाद हो गया पर पुलिस का अंग्रेजी मन नहीं बदला, वहीं अंग्रेजों वाली मार-पीट, हत्या गिरफ्तारी और दमन। कलक्टर फौरन कोतवाली आया। प्रदर्शनकारियों को पुलिस वालों ने कलक्टर के आने पहले ही एक स्कूल में कैद करवा लिया था और चोट खाये लोगों को अस्पतालों में भरती करा दिया था। प्रमुख नेताओं को कहीं अज्ञात स्थान पर पहुंचाया जा चुका था।
सारा कुछ जो भी कोतवाली पर हुआ वह पुलिसिया खेल माफिक था। कलक्टर कुछ भी न देख पाया और न ही उसे संज्ञान में लिया गया, कोतवाली पर बैठे एस. पी. ने साफ कहा...कृकृ
‘लात के आदमी बात से नहीं मानते। कलक्टर को ज्ञापन दे देने के बाद कोतवाली पर आने का क्या मतलब?’
कलक्टर एस. पी. की राजनीति समझता था। वह जानता था कि प्रदेश का मुख्यमंत्राी उसकी जाति का है वह नहीं चाहता कि एक दूसरी जाति का रामदयाल जैसा नेता राजनीति में आगे बढ़े और इस स्तर का प्रदर्शन या जनसभा करे। वैसे भी एस. पी. अपने को मुख्यमंत्राी से कम नहीं समझता था। उसे तो मेरे खिलाफ भी राजनीति करनी है। वह प्रतिक्रिया में भी हो सकता है कि कलक्टर जो दलित है वह अपने समुदाय का हित देख रहा है तथा प्रदर्शन को बढ़ावा दे रहा है।
एस. पी. एक तीर से दो निशाने मार कर मस्त था। उसे तनिक भी चिन्ता न थी कि उसने लाठियां भजवा कर तथा फायरिंग करवा कर गलत किया तथा निरीह व निरपराध जनता का अपमान किया है। एस. पी. तो मान कर चलता था कि कलक्टर दब्बू है उसे क्या मालूम कानून व्यवस्था का मतलब? पर कलक्टर तो कलक्टर था। वह स्कूल जाकर प्रदर्शनकारियों से मिला तथा सुबह होते ही आकस्मिक गिरफ्तारी से मुक्त करवा दिया पर कलक्टर चाह कर भी रामदयाल, रणविजय, राम प्यारे, पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष तथा अन्य तीन समाजवादियों को रिहा न करवा पाया, जिनके ऊपर एस. पी. ने शान्ति भंग जैसे कई अपराधों की एफ. आई. आर. करवा दिया था।
कलक्टर एस. पी. द्वारा कराये गये एफ.आई. आर. पर कुछ विचार करता कि दूसरे दिन उसे राजधानी बुला लिया गया और किसी दूसरे कलक्टर को उसके स्थान पर भेज दिया गया। जिस दिन नया कलक्टर मुख्यालय पर आया उसी दिन गिरफ्तार किये गये लोगों को रिमान्ड पर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
रामदयाल ने अपने मित्रा वकीलों को मना कर दिया था कि उन्हें जमानत पर रिहा नहीं होना। जब अपराध नहीं फिर काहे की जमानत। रामदयाल, रणविजय और पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष को गिरफ्तारी हालत में देखकर कचहरी के लोग आश्चर्य चकित थे। सरकार का क्या वह किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। आज यदि गांधी होते तो वे भी गिरफ्तार होते। रामदयाल को जनपद स्तर पर गांधी ही माना व समझा जाता।
कचहरी का दृय घृणास्पद था। सीनियर वकीलों ने अपने स्तर से पहला काम किया कि गिरफ्तार लोगों के हाथों से हथकडियां खुलवा दीं और पुलिस के रिमान्ड का कड़ा प्रतिवाद किया।
प्रतिवाद का परिणाम अच्छा निकला, न्यायालय ने गिरफ्तार लोगों को रिहा कर दिया तथा पुलिस से जबाब तलब किया कि उसने फर्जी आरोपों पर गिरफ्तारी क्यों किया। गिरफ्तार लोग जब रिहा हो गये फिर उन्हें कचहरी की भीड़ ने घेर लिया। उसी समय रामदयाल और रणविजय ने देखा कि वह मेम भी न्यायालय परिसर में दर्शकों के साथ खड़ी थी। भीड़ के कारण वह लैम्प पोस्ट बनी हुई थी। किसी तरह वह गिरफ्तार लोगों के पास आई और आने का कारण बताया कि वह प्रदर्शन में भाग लेने के लिए आई थी पर ट्रेन स्थगित होने के कारण सही समय पर उपस्थित न हो सकी।
कचहरी की भीड़ ने रामदयाल को विवशकर दिया कि वे क्लाइन्ट शेड में प्रदर्शन और जनसभा के मुद्दों का खुलासा करें। रामदयाल ने बंजर-भूमि को वन-भूमि में हस्तांतरण का मुद्दा स्पष्ट रूप से बताया फिर तो पूरी कचहरी अवाक रह गई।
जहां कानून का खलिहान है, जहां कानून जीवन हासिल करता है वहां इस तरह के अवैध हस्तांतरण की कोई सूचना नहीं यह मामला तो दूसरी आज़ादीका है। कचहरी के लोगों ने गगनभेदी नारा लगाया...कृकृ
‘जो जमीन को जोते बोवे वह जमीन का मालिक होवै, वन विभाग मुर्दाबाद, जिला प्रशासन मुर्दाबाद।’ रामदयाल संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं।
रामदयाल कचहरी परिसर में अभूतपूर्व दृश्य देख रहे थे। यदि जनता से जुड़े सवालों पर जनतांत्रिक हस्तक्षेप किये जायें तो उसे हर वर्ग, हर समुदाय से जोरदार समर्थन मिलेगा। कचहरी के वकीलों का समर्थन वस्तुतः अभूतपूर्व था। बंजर-भूमि का वन-विभाग को हस्तांतरण जनता का सवाल बन चुका था। रामदयाल कचहरी का दृश्य देखकर आह्लादित थे किकृ‘चलो उन्होंने जनता का काम तो चुना, आजाद देश में जनता की दूसरी आज़ादीका।’
मेम सारा दृश्य देख कर प्रसन्न थी, उसने महसूसा कि रामदयाल का कद बहुत बड़ा है पर वह जल्दी में थी कि रामदयाल से मुलाकात हो। मेम की मुलाकात रामदयाल से तब हुई जब वे कचहरी से बाहर निकले। रामदयाल के साथ सभी गिरफ्तार लोग थे जिनमें रामप्यारे और रणविजय भी थे। मेम ने रामदयाल से कहा कि वह भी भूमि-हकदारी के लिए काम करना चाहती है। साथ ही साथ उसने सूचना दिया कि राजधानी की पुलिस ने भइयाराजा को गिरफ्तार कर लिया है।
रामदयाल और रणविजय स्थितिप्रज्ञ की तरह चुप थे तथा समय की विविध चालों में उलझे हुए थे वे जानते थे कि भइयाराजा का साम्राज्य शीघ्र से शीघ्र टूटने वाला है फिर वे महसूस करेंगे कि आसमान में उड़ना ठीक नहीं हुआ करता। लखनऊ के समाजवादियों ने रामदयाल को पहले ही सूचित कर दिया था कि जमीनदारी विनाश का स्थगन भी दस पन्द्रह दिन में समाप्त हो जाएगा फिर सरकार तीव्र गति से जमीनदारी विनाश का कार्य प्रारंभ करा देगी।
रामदयाल ने मेम से सीधे पूछा...
‘तुम क्यों जुडना चाहती हो भूमि हकदारी से? भइयाराजा से बदला लेना चाहती हो क्या?’
मेम थोड़ा झेप गई। सम्हल कर बोली...कृ
‘ऐसा नहीं है, मेरी रूचि है जनता से जुडना, उनके हितों के लिए संघर्ष करना। ऐसा मैं पहले से ही करती रही हूं।’
रामदयाल ने तुरन्त कहा...‘बहुत कठिन है जनता से जुडना और जनता का काम करना। यह तुम्हारे वश का नहीं सीधे लखनऊ लौट जा। वहीं कुछ कर।’
मेम प्रतिक्रियाहीन। वह तो सोच-समझ कर चली थी कि रियासत नहीं छोडना, जनता के बीच रहना, पर रामदयाल को विश्वास ही नहीं हो रहा।
मुख्यालय से ही पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और समाजवादी नेता लौट गये जब कि रामदयाल, रणविजय, रामप्यारे साथ साथ रामदयाल की कोठी पर आये। साथ में मेम भी थी। भइयाराजा की गिरफ्तारी के बाद वह भयमुक्त हो चुकी थी। रामदयाल के यहां आकर आश्वस्त थी कि उसे सहयोग ही नहीं संरक्षण भी मिलेगा।
अंग्रेज हाकिम लिली की ममा के साथ रामदयाल की कोठी पर देर रात तक आया। वह विन्ध्य क्षेत्रा की सांस्तिक धरोहरों के अध्ययन पर निकला था तथा सोन नदी के तटवर्ती क्षेत्रों का भ्रमण कर रहा था। मुख्यालय आने पर उसे मालूम हुआ कि रामदयाल और रणविजय को गिरफ्तार किया गया था तथा उन्हें रिहा भी किया जा चुका है सो वह रामदयाल की कोठी की ओर मुड़ गया।
बंजर-भूमि और वन-विभाग के मुद्दे को समझ कर अंग्रेज हाकिम की सीधी प्रतिक्रिया थी...कृ
‘अभी दूसरी आज़ादीकी जंग लड़ना बाकी है रामदयाल जी! जमीन प्रबंधन व उसके समान वितरण का सवाल इस देश के लिए बहुत बड़ा सवाल है और इस सवाल को शोषित व दमित जनता ही हल करेगी कोई दूसरा नहीं। उन्हीं में से नेतृत्व वर्ग पैदा होगा।’
‘हां डैड आप सही समझ रहे हैं रामदयाल ने रामप्यारे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि दूसरी आज़ादीसंभव है, रामप्यारे जैसे जुझारूओं को आगे लाने की आवश्यकता है।
रामदयाल के बाद अंग्रेज हाकिम ने रणविजय से पूछा...कृकृ
‘कब आये दिल्ली से रणविजय? मुझे मालूम हुआ कि मुजफ्फर की हवेली तुमने छोड़ दिया है।’
‘हां वहां अकेले रहना कठिन था।’ रणविजय ने संक्षिप्त उत्तर दिया।
‘लिली का कोई समाचार।’
‘कुछ नहीं, कोई समाचार नहीं मिला।’
‘समाचार तो मुझे भी नहीं मिला, लगता है उसके पांव जमीन पर नहीं हैं।’
दूसरे दिन वापस लौटते समय अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल और रणविजय को सुझाया...
‘चाहे कितनी ही विपरीत स्थितियां हों दूसरी आज़ादीकी लड़ाई स्थगित न कीजिएगा।’
अंग्रेज हाकिम को आज़ादीके पहले वाला समय का ख्याल आया। हर तरफ इन्कलाब जिन्दाबाद, धरना, प्रदर्शन, सत्याग्रह पहले अंग्रेजों के खिलाफ अब अपनों के खिलाफ समय की आवश्यकता है। अचानक उसके मुंह से निकला
‘इन्कलाब जिन्दाबाद’
लिली की ममा ने चकराकर पूछा...
‘कुछ कहा आपने!’
‘हां इन्कलाब जिन्दाबाद’
इसका क्या मतलब? पूछा लिली की ममा ने
‘मतलब आजादी, आज़ादीकी लड़ाई, जो रामदयाल, रणविजय, रामप्यारे लड़ रहे हैं। तभी भइयाराजा जैसे लोग मिटेंगे। अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा को बताया, फिर सोच में पड़ गया। सोच में रामदयाल भी थे, उसने महसूसा...
‘रामदयाल जी गांधी के दूसरे संस्करण हैं। शाान्त, स्थिर, दृढ़ प्रतिज्ञ।’
अंग्रेज हाकिम को विदा करने के बाद रामदयाल दूसरी आज़ादीके बारे में सोचने लगे कौन लड़ेगा यह लड़ाई? सोच स्पष्ट थी...
‘रामप्यारे और रामप्यारे जैसे लोग।’
tufcn6ogy9mdw15hzu1i412lgymeo6k
हिंदी कथा साहित्य/रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "धरती कथा"
0
11513
83054
2026-04-27T04:12:55Z
Ramnathshivendra
15902
" रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "धरती कथा" [[File:Dharti katha jpg.jpg|thumb|यह कॉपीराइट मुक्त इमेज है मेरे द्वारा रचित]] [[File:Ramnathshivedra2025Rnat1946.pdf|thumb|created by me in a seminar]] ं धरत..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
83054
wikitext
text/x-wiki
रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "धरती कथा"
[[File:Dharti katha jpg.jpg|thumb|यह कॉपीराइट मुक्त इमेज है मेरे द्वारा रचित]]
[[File:Ramnathshivedra2025Rnat1946.pdf|thumb|created by me in a seminar]]
ं
धरती-कथा
उपन्यास
मनीष पब्लिकेशनन्स
दिल्ली-11009
धरती-कथा
उपन्यास
रामनाथ शिवेन्द्र
मनीष पब्लिकेशनन्स
दिल्ली-11009
ISBN 978.81.953548.2.copy right रामनाथ शिवेन्द्र
प्रकाशक : मनीष पब्लिकेशन्स
471/10, ए ब्लाक पार्ट-2
सोनिया बिहार, दिल्ली- 110090
म्उंपस रूउंदपेीचनइसपबंजपवदे/हउंपसण्बवउ
मो0 नं0- 9968762953, 8447908066
मूल्य :कृ800/-
संस्करण : प्रथम 2021
आवरण : अमित भारद्वाज
शब्द संयोजन: असुविधा, अक्षर घर, हर्ष नगर, राबर्ट्सगंज, सोनभद्र
231216
मुद्रकःपूजा आफसेट, जगतपुरी, दिल्ली- 110093
उनको......
‘जिन्होंने झाड़ियॉ काटीं
बड़े बड़े माटी के ढूह काटे
समतल बनाया खेत को
कियारियॉ गढ़ीं
फिर बीज डाला, फसलें उगीं
जब खेत बन गया,जमीन समतल हो गई
फिर पता चला कि
सरकारी कागज में उनके नाम नहीं हैं
और फिर
अहिंसक गॉव हल्दीघाटी बन गया’
आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम
आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के
बाजार के कार्टूनों में?
किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने और न बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिन्दिगियों का नियामक भी है। लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है, उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता! उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है। इस खुली छूट के बाद भी उपन्यास अगर कुछ कर सकते तो प्रेमचन्द जी के उपन्यासों के सारे पात्रा आज गली गली, गॉव गॉव रोते चिचियाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ इसी लिए आधुनिक तथा उत्तर-आधुनिक उपन्यासों के केन्द्र में वे अब नहीं हैं। प्रेमचन्द कालीन उपन्यासों के नायक तो तब के हैं जब हम गुलाम थे, आज हम गुलाम नहीं हैं सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गये हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं, किसी भी गली में, किसी भी चौराहे पर, ललकारते हुए कि ‘अरे! भाई ‘हमसे का मतलब’। यह ‘हमसे का मतलब’ कोई निरर्थक एक वाक्य/मुहाविरा ही नहीं है, यह तो बहुत ही गहरे अर्थ-बोध वाला है, इसे खोलेंगे चाहें या इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जायेगा। तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे जो नायक हैं वे उपन्यासों से, कविताओं से बाहर निकल कर सड़क पर खड़े हैं, रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं, चुनाव लड़ने के लिए पर्चे खरीद रहे हैं, ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा न होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उसके सामने, ठीक उसके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है, वह जो आदमी बिला कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है ‘हमसे का मतलब’, वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा और न प्रतिरोध में कुछ कर रहा। वह ‘हमसे का मतलब’ का मंत्रा अपने मन में बिठाये तुलसीदास की चौपाई ‘कोउ होय नृप हमैं का हानि’ का पाठ कर रहा है।
तो कहा जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं और ‘हमसे का मतलब’ का पाठ कर रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘धरती कथा’ के सारे के सारे पात्रा किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं, केवल पात्रा ही नहीं इसकी घटनायें भी ‘पाठ’ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित हैं। पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए और फटकार भी रहा है अगर तुम घटना के साक्षी हो तो...देखो और समझने की कोशिश करो के घटनायें कैसे घटा करती हैं,’ कैसे अपना नायकत्व सिरज लिया करती हैं और घटना के पात्रा, घटना का मुख्य किरादार होते हुए भी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर, बहुत दूर कूड़े की तरह फेंकाये हुए हैं, उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन और उसका घटना के घटितों द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो ‘घटित’ है वह घटना तो है ही उस घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत? जरा गुनिए जरूरत है क्या?
जरूरत तो नहीं है, मैंने पूरा प्रयास किया कि इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक रचूॅ पर ऐसा में न कर पाया, घटनायें जो खून आलूदा थीं वे लगातार मुझे घसीटती रहीं कभी मुझे बांयें की तरफ ले जातीं तो कभी दांये तरफ तो कभी आज के सत्ता-बाजार और उसके कौतुक की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्ता कौतुक में जो फस गया वह भी और जो रम गया वह भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धरती कथा का एक पात्रा सरवन ‘नायक’ की तमीज वाला था, वह करिश्मा जरूर करता पर उसकी हत्या कर दी गई। उसकी तथा उसके साथ नौ दूसरे नौजवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था। सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आश जगी थी कि ‘बबुआ’ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नये किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जॉच-पड़ताल की माया-जाल में उलझ कर रह गया। वह साहस करके पुलिसिया कार्यवाहियों के जाले को फलांगने तथा अदालती अदब के संस्कारों से निजात पाने की कोशिशें करता, पर एक कदम भी आगे बढ़ कर कथानक को कुलीन न बना पाया। सो कथानक कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि कथानक का अद्भुत होना उपन्यास के लिए अनिवार्य हुआ करता है।
तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथ ही अपनी संपूर्ण बौधिकता के साथ अलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गॉव भी आपको मिलेगा जो उपन्यास का केवल कथानक ही नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंच कर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गॉव आपको कैसा लगा, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में।
जून 2021
begining
‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे!
चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’
‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’
इस धरती कथा के दो पुराने पात्रा हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू..
‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’
बुझावन भी गुस्से में हैं...
‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’
‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’
पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास
हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे।
खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं...
‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन?
सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है।
सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे..
‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’
बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’
कई बार बुझावन ने उसे रोका था ....
‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’
अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’
गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई...
‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’
तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर।
बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’
‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’
‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’
‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा।
एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा।
‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने
‘नाहीं जानते का...?’
‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’
‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से
‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’
‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’
‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’
करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था।
‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’
‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा..
‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’
कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’
‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’
पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया...
‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’
‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’
‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’
महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’
महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था।
महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे।
नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे।
नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो...
पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था।
पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था।
गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे।
घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे।
नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये।
वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था।
नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी।
नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था...
‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था
कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे।
नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास...
वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया...
‘अरे! नन्हकू तूॅ...’
‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’
‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया
‘का काम है हो, बताओ तो..’
नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई!
‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’
‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’
हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है।
‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’
‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’
वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये...
‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’
‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’
नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में।
मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया...
‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये।
गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से...
‘अब का होगा काका?’
‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’
यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे।
धरती-माई देख रही हैं मानव सभ्यता का कानूनी खेल, किस तरह की व्यवहार-संस्कृति उग रही है धरती पर झाड़-झंखाड़ की तरह। व्यवहार-संस्कृति के कागजी झाड़-झंखाड़ को कौन साफ करेगा? नन्हकू काका जैसे पसीना बहाने वाले तमाम लोग कागजों के राजनीतिक व कानूनी खेल में फंस गये हैं धरती में, धरती ने उन्हें लील लिया है। ऐसे लोग जो धरती पर अपनी जिन्दगी लिखते हैं, धरती को जो चूमते हैं। धरती की दरारों में पैर फंस जाने के बाद भी जो धरती को प्रणाम करते हैं, गरियाते नहीं हैं, इनका क्या होने वाला है? कौन बता सकता है? क्या धरती माई बोलेंगी कुछ इस बारे में?
क्रियाशीलता की उर्वर जमीन
और कथा का विस्तार...
‘धरती-माई नहीं बोल रही कुछ, वे भी उलझ गई हैं कागजों व कानूनों की जाल में, जाल भी ऐसी कि कोरोना जैसा विष-अणु भी फस कर मर जाये उसमें। पर धरती-माई तो देवी हैं, दृश्य भी, अदृश्य भी वे निकल ही जायेंगी उसमें से बाहर। वे कहीं भी रहें का फर्क पड़ता है उनकी कथा, रियासत व कानून के जालों से निकल कर जा रही है खेतों-खलिहानों की तरफ, रियासत के लंहगे में नहीं, माथे पर हुकूमत का ताज नहीं, पॉवों में आजादी की पायल, कानों में कानून का कनफुल पहन कर, देखना है रियासत के पिजड़े से निकली धरती-कथा के पॉवों में छाले पड़ते हैं कि नहीं! अपनी ही निर्मित खुरदुरी धरती पर चलते हुए। अरे! यह क्या है भला किसी कथा के पॉवों में छाले पड़ सकते हैं, कथा तो देह-धारी होती नहीं, देह-धारी तो धरती-माई भी नहीं हैं, इससे का हुआ? वे जब धरती पर मानव-रूप में उतर ही आई हैं फिर तो उनके साथ भी धरती की व्यवहार-संस्कृति ही काम करेगी. उनकी धरती-कथा भी चोटिल व घायल होगी...’
नन्हकू काका नहीं जा पाये थे दुबारा मीरजापुर। मीरजापुर से लौट कर आये, और खेती के काम में जुट गये। रोपनी चल रही थी काका खेत जोत रहे थे, खेत तैयार करना था। रोपनी लायक खेत कम से कम तीन बाह(जोत) में तैयार होता है एक दम गिलावे की तरह खेत की माटी बनानी पड़ती है तब जाके रोपाई होती है ओमे धान का बान आराम से घंसता है बिना जोर लगाये, नाहीं तऽ पनियय पर पउंड़ता रहता है। काका को मना किया बुधनी काकी ने.. खेत मत जोतो, पानी बरस रहा है, तोहैं पहिलहीं से जोकाम है, खांस रहे हो, निमोनिया होय जायेगा पर काका काहे मानैं, लगे रहे खेत जोतने में और काफी भीग गये फेर क्या था दूसरे दिन बुखार चढ़ गया, दर-दवाई हुई पर काका नाहीं संभले।
गुजर गये कई साल, समय बीतते देर नहीं लगती, मीरजापुर जिला भी बट गया, एक नया जिला सोनभद्र बन गया। सारा मुकदमा सोनभद्र की अदालतों में चलने लगा। पूरे गॉयें का मुकदमा था, सबकी रोजी-रोटी जमीन से जुड़ी थी, कैसे छूट जाती मुकदमे की पैरवी? नन्हकू काका की जगह पर गॉव के नौजवान लड़के मुकदमे की पैरवी करने लगे।
सरवन, बबुआ, रजुआ और सुमेरना मुकदमे की पैरवीकारों में थे जिसे मौका मिलता वही कचहरी जा पहुचता। नन्हकू काका के बाद बहुत मुश्किल हो गया था कि मुकदमे की पैरवी कौन करेगा, सोमारू और बुझावन काका दोनों ने नकार दिया
था कि उनसेे मर-मुकदमे का काम नाहीं बनेगा। सोमारू ने कहा था...
‘देखो भइया अगर बोंग(लाठी) से कुछौ लिखना होय तऽ हमसे बोलो, जौन कहोगे हम लिख देंगे चाहे पीठी पर चाहे जहां, पर कागज के झमेले में हमैं जीन डालो, कायदे से तऽ हम नोटौ नाहीं गिन पाते हैं, हम का करेंगे मुकदमे की पैरवी।’
बुझावन मुकदमे की पैरवी के नाम पर हाथ जोड़ लिये थे, गॉव में कोई तैयार नहीं था उस समय। सरवन मुकदमे के बारे में जानता था, हाई स्कूल तक पढ़ा था वह भी असली वाली पढ़ाई, नन्हकू काका के पास बैठा भी करता था, मुकदमे का कागज पत्तर संभालता था तथा जान गया था, खसरा तथा खतौनी के बारे में।
सरवन उत्साही भी खूब खूब था उसने संभाल लिया मुकदमे का काम। नन्हकू काका के जमाने में गॉव भर से मुकदमा लड़ने के लिए चन्दा लिया जाता था जो बिगहे के अनुसार होता था, गॉव के लोग उत्साह से चन्दा दते भी थे। उनके लिए था कि उनकी धरती-माई को उनसे कौन छीन सकता है? हम लोग धरती-माई की पुजहाई करते हैं, तपावन देते हैं, माई को परसाद चढ़ाते हैं। कौन माई का लाल है जो हमसे हमारी धरती-माई छीन लेगा? सरवन अक्सर बबुआ के साथ कचहरी जाता पर कभी रजुआ तो कभी सुमेरन के साथ भी चला जाता। सरवन नियमित रूप से मुकदमे की पैरवी करने लगा। मुकदमे की पैरवी के दौरान उसके दो दिन बीत जाते सुमेरन नहीं चाहते थे कि सरवन मुकदमे के बवाल में फसे और पैरवी करे पर सरवन किसी की नहीं सुनता था, अपनी अइया बुधनी की भी नहीं...
‘आखिर के करेगा मुकदमे की पैरवी? मुकदमा कउनो मार-कतल है, ई जमाना राजन वाला नाहीं है के जेके चाहा आलू नीयर काट दिया, बोटियाय दिया। थाना-पुलिस है, कचहरी है, अब नियाव से काम होता है अउर सबकी सुनी जाती है फरियाद।’
घर का काम-काज उसकी अइया संभल लेती और बपई भी। इसी दौरान सरवन का बिआह भी होय गया। बिआह होने के बाद तो सुगनी ने सरवन को एकदम से अकेलुआ बनाय दिया। सरवन को कोई फिकिर ही नाहीं घर का, सारा काम संभल लेती थी सुगनी।
गॉव में खेती-बारी तो होती थी पर खेती-बारी की हालत नाजुक थी किसी तरह खान-खर्चा चल जाया करता था। एक दिन अचानक जन-कल्याण समिति का एक आदमी गॉव में आया। उसने गॉव देखा, गॉव में उसे गरीबी दिखी तथा मुकदमे का बवाल भी। यह समिति उस संस्था से अलग थी जो मालिक बन बैठी थी पूरे गॉव के जमीन की। साल भर पहले ही समिति वालों का काम शुरू हुआ था घोरावल क्षेत्रा में। समिति बाल-शिक्षा, जीवन-निर्वाह, महिला-जागृति एवं भूमि-अधिकार का काम करती थी। इसका कार्यालय भी हल्दीघाटी वाले गॉव से दो कोस की दूरी पर था। समिति ने हल्दीघाटी वाले गॉव का चयन अपने कार्य-क्षेत्रा के लिए कर लिया और सरवन को गॉव की समिति का मुखिया भी बना दिया। समिति का काम सरवन देखने लगा। उसके जिम्मे पहला काम लगाया गया गॉव का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण करने का। समिति का काम बढ़ता गया और कई कई घरना प्रदर्शन भी समिति ने आयोजित करवा लिए। धरना कभी ब्लाक पर होता तो कभी मुख्यालय पर, धरने का मुख्य विषय होता भू-धारिता, जमीन उसकी जो जमीन का जोत-कोड़ कर रहा है। पूरे सोनभद्र में समिति का यह प्रयास अद्भुत था वैसे सोनभद्र में एक संस्था दूसरी भी थी जो आदिवासियों के आर्थिक विकास के लिए काम कर रही थी पर वह सोनभद्र के दक्खिनी छोर पर थी, दुद्धी के आस-पास, घोरावल की तरफ उसके कार्य का विस्तार नहीं था।
समिति का मंत्राी कुछ सचेत किस्म का लोकतांत्रिक व्याक्ति था। उसने भी हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा किया, गॉव के एक एक आदमी से मिला, गॉव में चल रहे मुकदमे के बारे में जानकारी हासिल किया उसे महसूस हुआ कि पूरे देश में हल्दीघाटी वाले गॉव को भू-धारिता के अधिकार के संघर्ष के माडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। दिक्कत थी कि माडल के रूप में विकसित करने के लिए अधिक फन्ड की आवश्यकता होगी, फन्ड कहां से आयेगा? मंत्राी ने अपने फन्डर से बात किया और आग्रह भी कि आप एक दौरा कर लें हल्दीघाटी वाले गॉव का, यह जो हमलोग भूमि-अधिकार का अभियान चला रहे हैं उस अभियान के लिए हल्दीघाटी गॉव सबसे उपयुक्त गॉव होगा।
मंत्राी का प्रस्ताव फन्डर को विचारण्ीय लगा और फन्डर ने गॉव के दौरे का कार्यक्रम बना लिया... फन्डर का दौरा सफल रहा और उसने समिति का फन्ड भू-अधिकारों की सुरक्षा जैसे विशेष कार्य के लिए बढ़ा दिया।
समिति से जुड़ जाने के कारण सरवन के जिम्मे काम का बहुत अधिक बोझ आ गया। अब वह काफी व्यस्त रहने लगा। गॉव का एक बार सर्वे हो चुका था, उस सर्वे का फिर से अध्ययन शुरू हो गया इसी बीच भूमि अधिकार के काम को आगे बढ़ाने के लिए फन्ड-दाता संस्था ने लखनऊ में भ-ूधारिता के सवाल पर एक बैठक आयोजित किया, बैठक क्या वह एक तरह से सेमिनार ही था जिसमें देश के नामी-गिरामी विद्वान तथा वकील भाग ले रहे थे।
फन्ड-प्रदाता संस्था का सोचना था कि भमि-अधिकारिता तथा भू-धारिता दोनों अलग अलग शब्द हैं और दोनों के अर्थ भी अलग अलग हैं सो भू-धारिता के क्षेत्रा में किये जाने वाले प्रयासों को विधि-सम्मत होना चाहिए सो फन्ड-प्रदाता ने भूमि-अधिकारिता के क्षेत्रा में विशेष योग्यता रखने वालों को आमंत्रित किया हुआ था एक सेमिनार के लिए जिससे कि काम करने की साफ साफ रूप-रेखा तथा कार्य-नीति बनाई जा सके।
सरवन को विशेष रूप से लखनऊ बुलाया गया था। सरवन की लखनऊ की यह पहली यात्रा थी। लखनऊ का ताम-झाम देख कर सरवन चकरा गया, वह तो रापटगंज से बाहर कभी निकला ही नहीं था। लखनऊ उसके लिए किसी नई दुनिया की तरह था और वह होटल जहां भूमि-अधिकारिता वाला सेमिनार हो रहा था वह तो खूब खूब था, अद्भुत, क्या दीवारें, क्या कमरे, क्या लान क्या फर्श सारा कुछ किसी परीलोक जैसा उसने ऐसा मकान तो कभी सपने तक में नही देखा था फिल्मों में देखा था उसने। उसे लगा कि सारा कुछ कल्पना की बात है पर वह तो उसी परीलोक वाले होटल में है। यानि सच में होते हैं ऐसे मकान यानि महल। अगोरी किला उसने देखा था गोठानी मेले में जाते हुए, वह तो खंडहरा गया है पर जब नया रहा होगा तब भी इस होटल की तरह तो नहीं रहा होगा...
सरवन को का पता, कि अब किलों वाला जमाना धरती से गायब हो चुका है, किले दिखेंगे भी तो खंडहराते हुए, लाल किले की बात दूसरी है, विजयगढ़ किले को देख लो खंडहरा रहा है। किलों की जगह पर होटलों तथा महलों का जमाना आ गया है। पहले किले तो दो-चार ही हुआ करते थे अब ये जो महल हैं गिनने से भी नहीं गिनायंेगे। हर तरफ फैले हुए हैं चाहे जहां देख लो।
सेमिनार की कुछ ही बातेें उसकी समझ में आईं। ज्यादातर बातें तो हवा में उड़ गईं, हवा में उड़ने वाली चीजों की तरह। सरवन घुर देहात का रहने वाला उसे क्या पता कि दुनिया में यह जो समझ का मामला है आकाश में टंगी हुई किसी चीज की तरह है पर उसके बाद जो कार्यशाला हुई उससे सरवन का दिमाग खुल गया जो बन्द बन्द था। भूमि-अधिकार तथा लोकराज के बारे में काफी कुछ जान गया सरवन। उसे समझ आ गया कि यह जो जनता का राज है इसमें सभी के कल्याण के लिए काम होने चाहिए। उसे लगा कि अगर उसे इस तरह के सेमिनारों में भाग लेने का मौका मिलता रहा तो वह भी एक जागरूक आदमी बन सकता है।
सरवन लखनऊ से लौट आया और गॉव का संगठन बनाने में जुट गया। कोई भी ठोस काम करने के लिए संगठन होना चाहिए फिर उसकी समिति भी संगठन बनाने पर जोर दे रही थी। लखनऊ के सेमिनार से सरवन ने सीखा कि किसी काम को अकेले करने से कई गुना अच्छा होता है उस काम को समूह के द्वारा करना। सो वह गॉव की खेती-बारी को भी सामूहिक खेती बनाने के प्रयासों में जुट गया। फन्डर तथा समिति भी ऐसा ही चाहती थी।
करीब पन्द्रह दिन बाद समिति के मंत्राी ने सरवन को बताया कि उसे एक हजार रुपया महीना भी दिया जायेगा यह सरवन के लिए खुशी की बात थी। सरवन जी जान से जुट गया गॉव की खेती को समूह की खेती बनाने के प्रयासों में।
सबसे पहले उसने अपने बपई से सलाह किया...
बपई तो जानते ही नहीं थे कि समूह में भी खेती हो सकती है, वे तो अकेले के प्राणी थे, अकेला पैदा होना और मरना भी अकेला, उन्होंने अपनी जिन्दगी में कहीं समूह की खेती देखा भी नही था सो चुप थे... फिर कुछ सोच कर बोले...
‘का बोल रहा है तूं, कैसी समूह की खेती, का खेती-बारी भी समूह में होती है ऊ तऽ अकेले अकेले ही होती है, समूह में कैसे होगी खेती-बारी, चार दिन से मुकदमा
की पैरवी का करने लगा के काबिल बनि गया, अकेलुआ खेती-बारी सपर जाय इहै बहुत है, भाई भाई से तो पट ही नाहीं रही है चला है समूह में खेती करने, इहय कुल सीख के आया है का रे लखनऊ से।’
सरवन जानता था कि समूह की खेती के लिए कोई राजी नहीं होगा, लोग जानते ही नहीं एक साथ मिल कर काम करना। सभी के दिमाग में अलग अलग रहने तथा काम करने का कीड़ा घुसा हुआ है। एक साथ रहना और एक साथ मिल कर काम करना, रोजी-रोटी चलाना यह तो बड़ी बात है, इसे वह करके रहेगा चाहे जैसे। हॉ अगर बुझावन काका राजी हो गये तो बपई राजी हो जायेंगे ओनकर बात ऊ मानते हैं। गॉव के लड़के तो तैयार ही हैं..उन्हें मनाना नहीं था।
बपई को दुबारा समझाने का प्रयास किया सरवन ने....
‘देखो बपई, बूझो हमरी बात, हम ई कह रहे हैं कि समूह की खेती का मतलब है एक साथ मिल कर खेती करना फिर हिस्सा के हिसाब से पैदावार बाट लेना। हम जौने समिति में काम कर रहे हैं न ऊ समिति हमरे गांयंे की खेती के लिए खाद-पानी अउर बेंगा भी देगी। हम ई थोड़ै कह रहे हैं के एक साथ रहना अउर खाना भी है वह तो बाद में हो सकता है पर पहले खेती का काम तो हो एकै साथ।’
‘तूं चाहे जौन बोल हमरे समझ में कुछ नाहीं आय रहा, हम तऽ खटिया पर पड़े हैं, तोहके जौन बुझाय उहै कर, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, हम का जानैं समूह की खेती बारी के का होती है पर बहुत ही मुश्किल है बेटा! आपन दिमाग तूं बेमतलब खपाय रहे हो ये कामे में?
दूसरे दिन सरवन बुझावन काका के यहां गया उनसे भी समूह की खेती के बारे में बताया... काका हम अपने गॉये में मिल-जुल कर खेती करना चाहते हैं, हमरे गॉये में कुल बारह ‘हल’ चलते हैं, सभी के पास एक एक हल हैं, जब ई बारहो ‘हल’ एकै साथ चलेंगे खेते में काका तब बहुत मजा आयेगा। सामने गॉये के बाऊ साहब अउर दक्खिन के पंडित जी के पास ही तो हैं इतने ‘हल’, सारा काम जल्दी जल्दी निपटा लेते हैं ऊ लोग, रोपनी जोतनी सब कुछ।’
बुझावन काका चकरा गये...
‘का बोल रहा है तूं? सब ‘हल’ एकै साथ कैसे चलेंगे, एकै साथ खेती कैसे होगी, कोई मानेगा का तोहार बात, हम त बूझ रहे हैं के बहुत मुश्किल है वैसे सबसे बतियाय लो, बबुआ से पूछि लो, अब आगे का तऽ तोहीं लोगन के करना है हम बीचे में काहे टांग अड़ायें, हमैं जौने कहोगे हम तैयार हो जायेंगे, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, फेर हमसे बताना का हुआ समूह वाली खेती के बारे में?
तीन-चार दिन सरवन सामूहिक खेती के लिए सभी को राजी करने में ही जुटा रहा। बबुआ, खेलावन रज्जू गॉव के दूसरे लड़के भी उसके साथ थे...सोमारू काका के यहां से सरवन लौटने ही वाला था कि बुधनी काकी ने उसे घेर लिया..
कारे सरवन! तूं पगला गया है का? तोहार बपई बोल रहे थे के तूं सामूहिक
खेती-बारी करने के लिए गॉये के लोगन के गोलिया रहा है, अरे हमसे तो बताओ, हमहूं तऽ जाने के का होती है सामूहिक खेती-बारी, भाई भाई में, बाप-बेटवा में मरद-मेहरारू में पटियय नाहीं रहा है, मरद पूरबारे जाय रहा है तऽ मेहरारू पछिमारे जाय रही है, बाप कुछ बता रहा है तऽ बेटवा कुछ बताय रहा है। गॉये में तीन जने का घर बाप-बेटवा में ही बट गया है, अउर तूं कह रहा है कि सामूहिक खेती-बारी करना है। काहे पगला गया हे रे! आपन कमा अउर खा, अउर ई पंचायत में जीन पड़, देख हम तोके बोल दे रहे हैं।’
सरवन सोच में पड़ गया अइया की बात कभी टालता नहीं था। का करे का न करे, अइया बोल तो सही रही हैं पर हार मानने से भी काम नहीं चलता प्रयास तो करना ही चाहिए। प्रयास करने में का जाता है? सामूहिक खेती के बारे में बबुआ, खेलावन रजुआ, सुमेरन,बंधू और पुनवासी से पहले ही सरवन बतिया चुका था। अगर गॉव के लोग नहीं तैयार होते हैं तऽ का हुआ? मेरे दोस्त तो तैयार हैं ही, हमी लोग मिल कर कोशिश करते हैं, फायदा नाहीं होगा तऽ छोड़ने में केतना देरी लगती है?
सरवन मन ही मन बहुत खुश हुआ, सामूहिक खेती का काम शुरू हो सकता है उसकी इज्जत बच गई.. उसने समिति के मंत्राी जी से गरज कर कहा था...
‘साहब अगर आप खाद-पानी बंेगा देने के लिए राजी हैं तऽ हम अपने गॉयें में सामूहिक खेती कराय सकते हैं, गॉयें वालों को हम राजी कर लेंगे साहब! बस आप मदत करते रहिएगा।’
सरवन के पैर जमीन पर नहीं थे, खुश होकर उसने बबुआ से पूछा...
‘अरे बबुआ! हम तऽ सोच में पड़ गये थे के सामूहिक खेती वाला काम हमरे गॉयें में शुरू नाहीं हो सकता तब हम का बोलेंगे समिति के मंत्राी जी से। अब ओनके सामने तनेन हो कर खड़े हो सकते हैं, अउर हमार भाव भी बढ़ गया आनेकरे दिमाग में।’
‘हॉ सरवन तूूं सही बोल रहा है, अउर एक बात है के तोहार बात के नाहीं मानेगा गॉयें में, देख हम तऽ पहिलहीं बोल दिये थे अउर खेलावन ने भी बोल दिया था ओइसहीं रजुआ अउर सुमेरन ने भी कहा ही था। पहिले का बोलते हैं सामूहिक खेती का काम तो शुरू करो फेर देखो जो आजु तैयार नाहीं है नऽ उहो तैयार हो जायेगा।’
बबुआ की बातों से सरवन का कलेजा फूल गया ‘दोस्त हो तो बबुआ सरीखा, चाहे जो कह दो मान जाता है कुछौ बांया-दायां नाहीं करता है, जैसे ही सामूहिक खेती का काम शुरू होगा नऽ बपई भी मान जायेंगे एकरे पहिले हम अइया को मना लेंगे।
‘बबुआ तूहों कउनो बात खियाल नाहीं रखते हो, मुकदमवा की तारीख भुला गये का? वकील साहब का बोले थे, बोले थे नऽ के लेखपाल से मिल कर जमीन का कगज निकाल लेना, कागज निकला का?’
‘नाहीं रे सरवन कागज कहां निकला।’ बबुआ झेंप गया सही में उसे कुछ खियाल
नाहीं रहा कुछ भी, घर आया और भूल गया। एक महीने बाद बिफनी घर आई थी
मायके से उसे भुला गया कि कुछ दूसरा काम भी है, बपई की सेवा-टहलऔर बिफनी से चुहल। दिन तो बस ऐसे ही गुजर जाता था उसका रात के बारे में सोचते हुए और रात गुजर जाती थी दिन के बारे में सोचते हुए। रात आती थी फिर वह रात की तरह एकदम सन्नाटे में चला जाता था जहां वे ही दोनों होते थे और उन दोनों के बीच चुलबुली शरारतें हुआ करती थीं।
शरारतों से परेशान हो जाती बिफनी...
‘ई का है के तोहें खाली एकै काम सूझता है, कुछ दूसरौ कामे के बारे तऽ गुना करो, बड़ बुजरुग सोये हुए हैं बहरे ओसारे में, वे खांस रहे हैं अउर तोहैं चनरमा देखा रहा है, कभी तारे देखा रहे हैं तो कभी कुछ, मन नाहीं भरता का हो!’
‘काहे मन भरेगा रे पगली, ई जौन तन है नऽ एम्में मनै का तऽ खेल है चाहे जेहर से खेलो.. बस खेलो, हांथे कऽ अंगुरी पकड़ि के खेलो चाहे होठ अउर गाल, अंग अंग से खेल शुरू, अगले जनम में का होगा के जानता है? मनई का जनम मिला है तऽ एकर सुख लेने दो, एकर सुख लेने से जे बच गया समुझि लो जियतै मर गया, ओकरे मनई होने का मतलब भी मर गया। बबुआ तो घर में बैठी चनरमा में उलझा हुआ था सो उसे कैसे खियाल रहता कि लेखपाल के यहां से कागज भी लेना हे जमीन का, सरवन ने कहा था...
बबुआ अचानक लौटा घर की यादों से और सरवन के घर जाकर उससे बोला.
‘सरवन ऐसा कर तूं अपनी समिति से काल्हु मोटर साइकिल लेले अउर ओही से सबेरहींे चला जाये लेखपाल के इहां रापटगंज अउर कागज लेके वकील साहब को दे दिया जाये, चाहे ओनकरे घरे या कचहरी में, हम बूझ रहे हैं ई ठीक रहेगा काल्हु तोहके कउनो काम तऽ नाहीं है नऽ।’
सरवन कुछ सोचने लगा...
हां समिति का काम है मंत्राी जी ने का तो कहा था काल्हु के लिए के रापटगंज जाना होगा एक कागज देने, हां खियाल आया रे, रापटगंज जाने के लिए, चलो आजै चलते हैं मंत्राी जी के इहां अउर अजुयै मोटरसाइकिल मांग लेते हैं अउर काम के बारे में भी पूछ लेते हैं। फिर दोनों मंत्राी जी के यहां यानि जन कल्याण समिति के कार्यालय पर पहुंच गये। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे लेकिन व्यस्त थे। फील्ड-वर्करों से बात-चीत कर रहे थे तथा मंसौदा बना रहे थे कि ग्रामीणों के आर्थिक विकास के लिए समिति द्वारा क्या क्या किया जा सकता है और समिति की सीमा क्या है। भूमि अधिकार वाले सवाल पर धन खर्च करने के लिए फन्ड देने वाली संस्था तैयार थी पर सभी गॉवों के लिए खाद, बंेगा आदि देने के लिए उसके पास प्रस्ताव नहीं था। छोटे-छोटे बच्चों की पढ़ाई के लिए भी समिति को अनुमति मिल गई थी फन्ड देने वाली संस्था से। खाद, बेंगा देने का प्रस्ताव उन्हीं गॉवों के लिए था जहां सामूहिक खेती हो रही थी और भूमि-अधिकार का झगड़ा था।
करीब एक घंटे बाद मंत्राी जी खाली हुए फिर उन्होंने सरवन से बात किया और
मोटर साइकिल देने के लिए राजी हो गये। संमिति का एक काम भी सरवन के जिम्मे लगा दिये...
‘इस लिफाफे को डी.एम. साहब के कार्यालय जा कर प्रकाश बाबू को दे देना। कार्यालय में एकदम किनारे के तरफ बैठते हैं प्रकाश बाबू, छोटे कद के सांवले से हैं, वहां किसी चपरासी से पूछ लेना वह बताय देगा प्रकाश बाबू को, हां उनसे इस कागज पर पावती जरूर ले लेना, वे खुदै दे देंगे तोहके कुछ करना नाहीं पड़ेगा खाली बोल देना पावती के लिए।’
सरवन ने लिफाफा ले लिया और मोटर साइकिल भी। दोनों मोटर साइकिल पर बैठे और गॉव चले आये। गॉव में उन दोनों को देखने लगे लोग..
सुगनी भी चकरा गई... कहां से मोटर साइकिल पाय गये, समिति की होगी, एक दो बार पहले भी सरवन गॉव में आया था मोटर साइकिल से। पर-पानी करके बबुआ अपने घर चला आया.. उसके माथे पर रात नाच रही थी, रात सरवन के माथे पर भी नाच रही थी पर वह थोड़ा गुम-सुम था, खुद में खोया हुआ।
सरवन और बबुआ दोनों अपने अपने घरों में थे, दोनों जवान थे तथा समय को नाप-तौल की चलने वाले भी फिर भी दोनों के लिए समय का खेल एक हो जरूरी नहीं..दोनों समय के साथ खेल-कूद करने वाले थे पर कैसे? बबुआ तो जब से बिफनी लौटी है नैहर से तब से खेल रहा है समय का खेल, देखिए का करता है सरवन, वह भी खेलेगा खेल, नया न सही पुराना ही, वैसे भी मन और तन का खेल कब्बौं बुढ़ाता थोड़ै है, वही तो एक ऐसा खेल है जो हरदम जवान बना रहता है।
सरवन भी रात का पूरा समय सुगनी के नाम कर चुका है, अब सुगनी के मन पर है के वह का करती है?
सुगनी उसे कहां मना करने वाली।
सुगनी के लिए तो ‘पायो जी अनमोल रतन धन पायो’ की हालत थी। अगर तुझे खेलना है तऽ खेलो हम भी देखें कि तोहैं कउन कउन खेल आता है। फिर अचानक सुगनी लजा गई...‘वह भी का सोचती रहती है बेमतलब....’
धरती-माई का बोलेंगी मुकदमे के बारे में, वे तो स्वर्ग से उतरी हैं धरती पर, स्वर्ग में तो मर-मुकदमा होता नहीं। मुकदमा तो वहां होता है जहां अदालतें होती हैं, जहां कागज पर लिखे कानून होते हैं। स्वर्ग में तो जर-जमीन, घन-दौलत, से जुड़े झगड़े होते नहीं हैं वहां आपसी मन-मुटाव होते हैं वे भी पूरी सृष्टि के संदर्भ में। व्यक्तिगत हित के जो मामले होते भी हैं उनमें व्यापकता होती है जान पड़ता है के वे मामले सर्व-जनीन हैं वैसे भी स्वर्ग में आपसी विवाद होने की स्थिति में श्राप देने का चलन है। स्वर्ग के कुछ ही रहवासी ऐसे होंगे जो श्राप देने की कला के जानकार नहीं होंगे। लगभग सभी किसी न किसी तरह श्राप देने की कला सीख ही लेते हैं पर अफसोस हैे कि धरती-माई श्राप देना ही नहीं जानतीं नहीं तो श्राप दे देतीं...।
द
‘स्वार्थ की कथा उतर रही है धरती पर
‘अचौर्य’ गया धूल फांकने’
‘गॉव की ऊबड़-खाबड़ धरती पर नंगे पॉव चल रही धरती माई को क्या पता कि उनकी कथा कौन लिख रहा है आज के आधुनिक लोकतांत्रिक समय में। रजवाड़ों के समय में तो तय था कि धरती की कथा तलवारें लिखा करती थीं, युद्ध लिखा करते थे, महाभारत की कथा की तरह। पर आज...! आज शायद थाने लिखें, अदालतंे लिखें पर कथा तो लिखी ही जायेगी आइए देखें कौन लिख रहा है धरती-कथा..? वैसे भी धरती-माई अपनी कथा कहां पढ़ने वाली, उनके जो गॉव-देहात वाले हल-जोतक पुत्रा हैं वे भी कहां पढ़ते हैं कुछ, उनसे कविता कहानी से का लेना देना भले ही कविता कहानी उन्हीं के बाबत हांे फिर भी। कहानी कोई पढ़े न पढ़े हर काल में लिखी जाती रही हैं जिन्हें पढ़ना होता है वे पढ़ते ही हैं संभव है धरती-माई पढ़ें अपनी कहानी किसी दिन...’
सरवन और बबुआ सबेरे ही चल दिए रापटगंज के लिए। सुगनी ने भोरहरी में ही परौठा सेंक दिया था, ‘कुछ खाना खाकर जायंेगे तो ठीक रहेगा’। बिना कुछ खाये रापटगंज जाना ठीक नाहीं है, दिन भर खाना मिले न मिले फिर रुपिया भी तो चाहिए होटल में खाना खाने के लिए, कहां से आयेगा रुपिया?
बबुआ समय से आ गया था सरवन के घर पर फिर सुगनी ने दोनों को परौठे का नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद दोनों चल दिए रापटगंज के लिए। बबुआ ने बिफनी से पचास रुपिया मांग लिया था। तेल भरवाना होगा मोटर साइकिल में, हमेशा सरवन ही भरवाता है तेल, इस बार वह देगा तेल का रुपिया, सरवन को तेल भरवाने नाहीं देगा।
सरवन ने मोटर साइकिल की टंकी देखा, तेल था ओमे काम भर का। मंत्राी जी मोटर साइकिल में तेल भरा हुआ रखवाते हैं। तेल न होने पर बोतल या गैलन लेकर जाना पड़ता है घोरावल तब तेल मिलता है सो मोटरसाइकिल में कम से कम उतना तेल तो होना ही चाहिए जिससे मोटरसाइकिल घोरावल पेट्रोल टंकी तक पहुंच जाये। रास्ते मेे कही तेल डलवा लेंगे मोटरसाइकिल में, समिति का तेल खरचना बेइमानी होगी, काम तो हमलोंगों का है समिति का नहीं है काम।
लेखपाल रापटगंज में पूरब मोहाल में रहते हैं नगरपालिका के कार्यालय के आस-पास, एक बार गया था सरवन उनके पास, नई उमर के हैं, बड़की जात वाले नाहीं लगते हैं, लगता है पिछड़ी जाति के होंगे, नाम के आगे सिंह लगा हुआ है, उससे का हुआ अब तो सिंह सभै लगाने लगे हैैं। का हुआ लेखपाल की जाति से जाति चाहे कउनो हो का फरक पड़ता है, हमलोगों को तो खाली जमीन का कागज लेना
है ओनसे, रुपिया देंगे अउर ले लेंगे कागज।
लेखपाल घर पर ही थे पर उनके घर का दरवाजा बन्द था। शायद कमरे के अन्दर हों। लेखपाल सही में कमरे के अन्दर ही थे, अकेले रहते थे, उनका परिवार गॉव पर रहता था, गॉव पर सुविधा थी, घर का दूध था, अपने खेत की तरकारी थी यहां तो सारा कुछ खरीदना पड़ता वैसे भी उनके बच्चे छोटे हैं, उनकी मॉ हैं बच्चों की देख-रेख कर लिया करती हैं, जब बच्चे पढ़ने लायक होंगे तब तो उन्हें यहां लाना ही पड़ेगा।
सरवन ने कमरे का दरवाजा खट-खटाया...
एक मुलायम सी आवाज...‘कौन है?’ लेखपाल ने पूछा
‘साहब मैं हूॅ सरवन हल्दीघाटी गॉव का’ सरवन ने बताया उन्हें..
कमरे का दरवाजा खुल गया... ‘काहो सरवन काहे के लिए आये हो एतना सबेरे, का कउनो काम है?’ लेखपाल ने सरवन सेे पूछा
‘हॉ साहेब तब्बै तो आया हूॅ एकदम सबेरे कहीं आप निकल न जायें क्षेत्रा में।’
‘नाहीं हो आजु कल तहसीले में काम रहता है सब गॉयेंन कऽ खतौनी कंप्यूटर में फीड कराना है, साल भर के भीतरै पूरा कर लेना है खतौनी कऽ कुल काम, हं इ बताओ तोहार का काम है?’ सरवन से पूछा लेखपाल ने
‘साहब हमैं खतौनी चाहिए जौन जमीन हमलोग जोत रहे हैं, ओकर हम लोग मुकदमा दाखिल किये हैं नऽ।’
‘हमैं पता है हो, ऊ जमीनिया तऽ कउनो संस्था के नाम से है, ओही कऽ खतौनी।’
‘हं साहेब ओही कऽ खतौनी।’
‘हम अब्बै बनाय देते हैं।’
लेखपाल ने जल्दी ही खतौनी का फारम भर दिया और अपनी दस्तखत करके खतौनी सरवन को दे दिया। सरवन ने बीस रुपिया की नोट लेखपाल को थमाया
‘साहब इसे ले लीजिए हम लोग गरीब आदमी हैं एसे अधिक नाहीं दे पायेंगे’
‘नाहीं हो सरवन हमैं तोहसे रुपिया नाहीं लेना है, जब हम क्षेत्रा में जाते है तब तूं लोग देवता की तरह हमार सेवा-सत्कार करते हो, हमरे मने का खाना खिलाते हो, मुर्गा काट देते हो, घरे की बनी असली वाली दारू पिलाते हो, हम तोहसे भला रुपिया लेंगे! हं एक बात अउर तूं लोग जानते हो के नाहीं तोहन लोगन के जोत वाली जमीनिया बेचाय गई है, बसौना वाले रामलाल खरीद लिए हैं,ओकरे खारिज दाखिल के लिए हमरे कीहें कागज आया है, बताओ ओमे हम का करैं।’
‘साहब हम लोगों को पता है के जमीनिया बेचाय गई है अबहीं खारिज-दाखिल मत होने दीजिएगा, हम लोग ओ मुकदमा में हाजिर हो गये हैं, हमरे वकील साहब बहस भी कर दिए हैं आप ओमे कुछ न कीजिएगा। गॉये की तरफ कब आयेंगे साहेब?’‘
‘जल्दियय आयेंगे हो सरवन, एक आदमी के जमीन की नापी करनी है, ओही
समय हम तोहरे गॉयें भी आयेंगे, तूं निश्चिन्त रहो खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हम कुछ नाहीं करेंगे, ऊ पारटी हमरे इहां आई थी मुहमांगा रुपिया दे रही थी हम नाहीं लिए एक छदाम भी।’
‘ठीक है साहब! तब हम लोग चलते हैं अबहीं वकील साहेब से भी मिलना होगा।’ वकील साहब नगर पालिका कार्यालय से काफी दूर रहते हैं। ओरमौरा के आस-पास। सरवन ने मोटर साइकिल स्टार्ट किया और वकील साहब के मकान पर पहुंच गया। वकील साहब का अपना मकान था देखने से भी लगता था कि किसी चलता वकील का मकान है।
वकील साहब अपने चेम्बर में थे और मुवक्किलांे से बतिया रहे थे। वकील साहब के चेम्बर में एक से एक मुवक्किल थे, उनमें कोई मार और चोट खाये हुए था तो कोई किसी को मार कर आया था। किसी ने किसी दूसरे की जमीन कब्जा कर लिया था और जोत-कोड़ कर रहा था तो किसी की जमीन का बैनामा किसी ने करा लिया था गोया वहां कानून की कई नश्लें मुवक्किल के रूप में हाजिर थीं, वकील साहब हर मुवक्किल को अलग अलग ढंग से समझा रहे थे..।
‘तो तोहरे जमीन पर कब्जा हो गया तो का हो गया, का ऊ जमीन ओनकर हो गई! हम ओनकर कब्जा हटवाकर छोड़ेंगे बस तूं जिन भागना मुकदमा छोड़ कर।’
‘बैनामा हो गया तो का हो गया तूं जमीन पर से आपन जोत-कोड़ और कब्जा-दखल मत छोड़ना फिर हम देख लेंगे ओ लोगन के हाईकोर्ट तक।’
सरवन और बबुआ गंभीरता से वकील साहब की बातें सुन रहे थे पर वे समझ नहीं पा रहे थे कि वकील साहब मुहदेखी काहे बोल रहे हैं। बोल रहे हैं कि कब्जा जीन छोड़ना और दूसरे मुवक्किल से बोल रहे हैं तूं बैनामा ले लिए हो नऽ हम तोहके कब्जा दिलवा कर छोड़ेंगे। एक से कब्जा न छोड़ने की बात अउर दूसरे से कब्जा दिलाने की बात, का मतलब है यार बबुआ! तूं कुछ समझे के नाहीं।’
‘नाहीं सरवन! हमैं कुछ नाहीं बुझाया के वकील साहब का बोल रहे हैं अउर का होगा मुकदमा में। ई जो नियाव है नऽ राम जाने केहर जायेगा बांये के दांये...हमैं तो जान पड़ता है के ई जो नियाव है नऽ वह घुमक्कड़ किसिम का है, घूमता रहता है एहर ओहर कब्बउं बायें तऽ कब्बउं दांयें।’
‘हं यार तूं सही बोल रहा है, नियाव एक जगह लंगड़-लूज होके बइठ गया तऽ कइसे काम चलेगा दुनिया का? सरवन को भी कुछ समझ में नहीं आया। वह नहीं समझ पाया कि जमीन पर कब्जा जरूरी है कि बैनामा, का जरूरी है दोनों में से, कभी वकील साहब कब्जे की बात कर रहे हैं तो कभी बैनामे की इन दोनों में कौन कानूनी है अउर कौन गैरकानूनी हमैं तऽ कुछ नाहीं बुझाय रहा है।’
वकील साहब पहले से आये मुवक्किलों से जब खाली हो कर सरवन से बतियाने लगे...
‘का हो सरवन, खतौनिया लाये हो का?’ हां साहेब आजुयय लिये हैं लेखपाल
से अउर लेकर आये हैं, ई है खतौनी साहेब। सरवन ने खतौनी दे दिया वकील साहब को।
खतौनी देख कर वकील साहब बोले...
‘अबहीं तऽ एपर किसी का नाम नाहीं चढ़ा है, हमैं डर था के कहीं चोरी चोरी ऊ पारटी ने आपन नाम तऽ नाहीं चढ़वाय लिया है। चलो अब देखते हैं आगे का होता है? हं यार सरवन! कुछ खर्चा-पानी लाये हो का? आजकल बड़ा ठाला चल रहा है, कउनो कामै नाहीं होय रहा है कचहरी में, रोज रोज हड़ताल हो रही है हमलोग तऽ परेशान हैं हड़ताल से।’
सरवन दो सौ रुपया लाया था वकील को देने के लिए, दो तारीख पर कुछ नहीं दे पाया था उन्हें, वही रुपया सरवन ने वकील साहब को दे दिया...
‘एतनै जुटा पाये हैं साहेब कोई नाहीं दे रहा है ए समय, कुल बाकी जोड़ कर हम दे देंगे आप को फसल होने दीजिए।’
सरवन ने अपनी सुना दिया वकील साहब को जो एकदम सही था। गॉव भर घूम कर उसने रुपया मांगा था पर एक दो लोग ही दिए रुपया बाकी लोग बाद में देने के लिए बोले... किसी तरह से सरवन ने दो सौ रुपये का इन्तजाम किया।
‘चलो कोई बात नाहीं है, बाद में दे देना, ई कम थोड़ै है के तूं लोग मुकदमा लड़ि रहे हो अउर हर तारीख पर आ जाते हो, हमैं तूं लोगन का काम कइसहूं करना है अउर तूं लोगन कऽ नाम जमीन पर कराना है, हम सब कागज पत्तर निकाल लिए हैं। जवन पहिले वाली संस्थवा है नऽ उहय फर्जी है, ओकर नाम तूं लोगन के गायें के जमीनी पर दर्ज होना ही नहीं चाहिए था, ओ समय के तहसीलदार को पावर ही नहीं था किसी का नाम काट कर किसी का नाम चढ़ा देना। जब संस्था का नाम ही गलत तरीके से दर्ज किया गया है तूं लोगन के जमीन पर फेर ऊ संस्था जमीन कैसे बेच सकती है? एही बाती पर हम ओ पारटी के मुकदमा को खतम कराय देंगें।’
सरवन का मन लह लहा गया वकील साहब की बातों से, बबुआ भी खुश खुश हो गया, अबही आस मरी नाहीं है, आस बाकी है नाहीं तऽ जाने का होता जमीन का, ऊ पारटी काफी सरहंग है, पैसे वाली है, रुपिया-पैसा दे कर कचहरी को घुमा सकती है एहर ओहर...
सरवन खुशी के मारे बोल उठा...
वकील साहब आपै पर हमलोग भरोसा किए हुए हैं, जौन करेंगे आपै करेंगे, हमलोग गरीब गुरबा का जानैं कायदा-कानून। अच्छा तऽ हमलोग चलते हैं। मोटर साइकिल भी देना है मंत्राी जी को।’
अच्छा जाओ अगली तारीख पर जरूर आना, ओ दिना हमैं लिखित बहस देनी है कचहरी में। साहेब ने दोनों पारटी को मुकदमे में लिखित बहस दाखिल करने के लिए आदेश दिया हुआ है, हमीं ने साहब से कहा था कि मुकदमा में लिखित बहस लीजिए साहब फिर फैसला कीजिए जिससे काई गड़बड़ न होने पाये।’
‘ठीक है साहब हमलोग जाय रहे हैं अउर तारीख के दिन आयेंगे हमलोग साहब।’
वकील साहब के यहां से खाली होकर सरवन गॉव जाने के लिए चल दिया। रास्ते में मोटरसाइकिल में तेल भी डलवा लिया कहीं कम न हो जाये तेल।
का रे! बबुआ हमलोगों के वकील साहब तो बढ़िया आदमी हैं, रुपये के लिए कुछ नाहीं बोलते हैं जो हमलोग ओन्है दे देते हैं मान जाते हैं। वकील साहब बोल तो रहे हैं के जमीन हमलोगों की बची रह जायेगी, हमलोगों के नामे से होय जायेगी देखो का होता है...?
‘तूं निराश काहे हो जाता है सरवन! ई जमीनिया पहिले भी हमलोगों की थी अउर बादौ में रहेगी। ऊ पारटी के बैनामा करा लेने से का हो जायेगा। संस्था वाले भी कहां काबिज हो पाये थे जमीनी पर, कब्जा तो हमीलोगों का ही है।’
सरवन शाहगंज से आगे कुछ दूर निकला ही होगा कि दो मोटर साइकिल वालों ने अपनी मोटर साइकिल उसकी मोटर साइकिल के सामने लगा दिया... सरवन आगे मोटर साइकिल देख कर चकरा गया का हो रहा है? काहे छेंक लिए हमार रास्ता? सरवन ने अपनी मोटर साइकिल रोक दिया...
‘का बात है भइया! आपलोग मोटर साइकिल हमरे सामने काहे लगाय दिये?’
तभी उधर से चारो लड़के अपनी अपनी मोटर साइकिल से उतरे और उनमें से एक ने सरवन का गला पकड़ लिया...
‘उतर साले मोटर साइकिल से फेर बताते हैं...’
बबुआ नाहीं समझ पाया कि हो का रहा है, कौन हैं ये लड़के, काहे हमलोगों की मोटर साइकिल के सामने अपनी मोटर साइकिल लगा दिय,े का बात है? बबुआ आव न देखा ताव, सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के का गला पकड़ लिया...
‘बोल बे का बात है बबुआ ने सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के से पूछा.. तब तक सरवन मोटर साइकिल से उतर चुका था, वह भी नहीं समझ पाया कि हो क्या रहा है। उधर से बकिया तीनो लड़के चले आये और मार-पीट करने लगे।
सरवन और बबुआ भी कम न थे, ये दोनों भी मार का जबाब मार से देने लगे। कुछ देर तक दोनों ओर से घूंसे चले, दोनो तरफ चोटें लगीं, इसी दौरान बबुआ ने उस तरफ के एक लड़के के मुह पर ऐसा घूंसा मारा कि वह जमीन पर भहरा गया फिर क्या था...
वे लड़के मोटर साइकिल स्टार्ट किये और भाग खड़े हुए। पर वह लड़का जिसे बबुआ ने घूंसा मारा था जो जमीन पर गिर गया था वह कैसे भागता...
बबुआ ने उसे उठाया, वह होश में था, चोट के कारण गिर गया था जमीन पर, बता क्या बात है?
शाहगंज से घोरावल तक जाने वाली सड़क वैसे भी व्यस्त रहती है, तमाम गाड़ियां चलती रहती हैं उस पर, वहां भीड़ हो गई, कुछ भले मानुष मार-पीट देख कर रूक गये थे... उनमें से एक जन ने पूछा बबुआ से...
‘का बात है हो काहे मार-पीट हो रही है और कौन है ये जिसे पकड़े हुए हो?
‘हमैं नाहीं मालूम साहेब, हम लोग तऽ रापटगंज से आय रहे हैं, अउर एहीं पर ई सब हमलोगों को अपनी मोटर साइकिल तिरिछिया कर रोक लिए अउर लगे मारने, ई सब चार ठो थे, दो मोटर साइकिल थी, एके हम पकड़ि लिये हैं, एकरे अलावा बकिया तीनों भाग गये..’
वहां पर रूका हुआ यात्राी कुछ तेज किसिम का था...
‘बोल बे! काहे मार-पीट करने लगे वह भी ऐसी चालू जगह पर का बात है बताओे। वह तो... वह गुंग बना हुआ था...
यात्राी ने उसे धमकियाया...
भइया आप लोग ऐसा करो के एके थाने लेके चलो, शाहगंज थाना दो किलोमीटर ही पीछे है, चलो हम एके बैठाय लेते हैं अपनी मोटर साइकिल पर...मार करने वाला लड़का थाने का नाम सुनते ही सकपका गया..फिर बोलने लगा...
‘नाहीं भाई साहब! हमैं थाने मत ले चलिए, हमार कउनो गल्ती नाहीं है।’ लड़का रिरियाने लगा। पूछने पर उसने बता दिया कि मार करने वाले लड़कों का किसने भेजा था। उनमें से दो लोगों को बसौना के रामलाल ने भेजा था। उन लोगों का नाम क्या है उसे नहीं पता, केवल एक लड़के का नाम उसे मालूम है जो उसके साथ काम करता है गुजरात में। रामलाल ने ही आपलोगों की मोटर सयाइकिल पहिचनवाया था। जब आपलोग लेखपाल के यहां गये हुए थे तब्बै से हमलोग आपका पीछा कर रहे थे, इहां सुनसान देख कर हमलोगों ने आपकी माटर साइकिल छेंक लिया बाद में जो हुआ आप जानते ही हैं।
यात्राी लड़के को किसी भी हाल में थाने ले चलना चाहता है पर सरवन का मिजाज बदल गया है, भाई साहब! जाने दीजिए का होगा इसे थाने ले जा कर, छोड़ देते हैं इसे। बबुआ भी चाहता था कि लड़के को थाने ले चलना चाहिए.. पर सरवन नहीं चाहता था सो लड़के को वहीं छोड़ दिया सरवन ने।
‘अच्छा भइया जाओ, अब कभी किसी से मार-पीट न करना वह भी किसी के कहने पर, हमलोग तोहैं छोड़ दिये नाहीं तऽ जेल चले जाते, तोहार अइया-बपई परेशान होते, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’
लड़का हॉ में हॉ मिलाता रहा।
जब सरवन मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगा तब लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया...और हाथ जोड़ कर बोला...
‘एक बात तऽ भइया हम तोहें बताये नाहीं...
ऊ ई है कि का कउनो तोहार मुकदमा चलि रहा है का बसौना के रामलाल से?
‘हॉ चल तो रहा है।’
ओही खातिर रामलाल तोहैं जान से मरवाना चाहता है, ओसे संभल कर रहना भइया! तूं हमैं दयालु जान पड़ रहे हो, एही से हम गुने के तोहैं ई बात बताय देना चाहिए। रामलाल हमलोगों से जान मारने के लिए ही बोल रहा था पर हमलोग नकार गये। जौन लडिकवा हमरे संघे गुजरात में काम करता है ओसे जान-पहचान है रामलाल की। ओही लड़िकवा से बोले थे रामलाल कि मरवा दो उसे जान से पर लड़िकवा मुकर गया...
‘अरे बाप रे बाप! हम केहू के जान से नाहीं मार सकते, थोड़ा-बहुत मार-पीट कर लेते हैं बस एतनै पर कतल नाहीं कर सकते। रामलाल काका अइसन है कतल केहू दूसरे से करवाय लो, हम ओके छेक के धमकियाय देंगे बस एतनै कर सकते हैं हमलोग। उहै करने के लिए हमलोग छेंके आपलोगों को पर आपने हमैं पकड़ि लिया ऊ सब भाग गये। हम पकड़ा गये, हम बताय रहे हैं भइया आपको अब आप सावधान होके चला करिए।’
बबुआ और सरवन दोनों परेशान यह रामलाल वही है जिसने संस्था वाली जमीन का बैनामा कराया है।
सरवन देख! ‘हमलोगों को सावधान रहना चाहिए अउर साथ में लेकर कुछ चलना चाहिए ऊ पारटी तऽ खूनी कतली है ही।’
‘हॉ बबुआ! आगे से हम लोग सावधान रहेंगे।’
मुकदमे की अगली तारीख पर आयेंगे सरवन और बबुआ कचहरी, तारीख अभी बहुत दूर है, तब तक खेती-बारी का काम और रात के खेलों में डूब जाने का एक अलग और मजेदार काम। एक ऐसा काम जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता। उसे पूरा करने की जितनी कोशिश करो उसका काम आगे बढ़ता ही जाता है। सुगनी एक तरफ तो दूसरी तरफ बिफनी, दोनों के मन की धुनंेे एक जैसी, एक ही तरह की अलाप वाली, बिफनी न सुगनी से कम और न सुगनी बिफनी से कम, इसी लिए दोनों के बीच खाली देह का फासला है, मन तो एक्कै है गलबहियां करता हुआ, सरवन और बबुबा की तरह।
सरवन की मोटर साइकिल जब उसके घर पर पहुंची तब सुगनी गाय को चारा लगा रही थी और उसके बपई खाट पर पड़े हुए थे।
‘का हो होय गया काम रापटगंज का?’
पूछा सुगनी ने सरवन से...
‘हां होय गया, लेखपाल से मिले अउर वकीलौ से मिल लिए। चलो बइठो अंगना में हम हाथ धोय के आ रहे हैं अरे बबुआ! आपौ बइठो, चाह-पानी करके तब जाना।’
‘नाहीं हो भउजी! चाह-पानी में देरी होगी, हम जाय रहे हैं, सबेरहीं एक बोझ बरसीम काटि के ले आये थे, ओके चारा मशीन से कटवाना होगा, अकेलै बिफनी नाहीं काट पायेगी हमैं जोह रही होगी।’
‘ऊ तऽ जोहबै करेगी देवर जी! नाहीं जोहेगी तऽ कइसे चलेगा, हमहूं तऽ जोही रहे हैं, पहिले एहर कऽ जोहार पूरा करिलो फेर ओहर जाना, का बेजांय बोल रही हूॅ देवर जी! आप काहे गंुग बने हुए हैं काहे नाहीं समझाते बबुआ को।’
सुगनी ने टोका सरवन को...
बबुआ रूक गया और चाह पानी करके तब सरवन के घर से निकला...
‘अब काल्हु भेट होगी सरवन, खेत पर जाने के पहिले हम तोहसे मिल लेंगे, काल्हु तऽ तूं समिति के कार्यालय पर भी जाओगे नऽ।’
‘हॉ मोटरसइकिलियो तऽ पहुंचाना होगा।’
‘हॉ सही बोल रहे हो...’
धरती-माई को का पता कि उनकी कथा लिखी जा रही है और उसे ऐसे लोग लिख रहे हैं जिनसे इतिहास, संस्कृति और सभ्यता लगातार घृणा करती रही है फिर भी वे समाज के सक्रिय हिस्सा हैं। उनके पसीने से ही समाज में अभिजात्यता की हसीन चादरंे तना करती हैं, हवेलियां बना करती हैं, कल्याणकारी बदरियां नाचती हैं, फिर जो वैभव की रिम-झिम बरसात होती है, उससे गौरव-गाथायें खुद को अभिसिंचित कर मुदित होती हैं...
‘जीना है एक साथ, मरना है एक साथ,
फिर खेती काहे अलग अलग?’
‘धरती-कथा चल रही हैं गॉव की खुरदुरी पगडंडियों पर, पार करना पड़ रहा है उसे कई कई ढूह, पॉवों में छाले उभर आये हैं, कैसे चले आगे..अहा ग्राम्य जीवन वाला गॉव तो उसे कहीं दीख नहीं रहा, यहां की हवायें भी गुस्सैल जान पड़ती हैं, जला रही हैं देह, देह जल जायेगी तो बचेगा क्या? पॉव तो जल ही चुके हैं....पर चलना तो है ही इन्हीं पगडंडियों पर...संभव है आगे चल कर धरती-कथा विद्रोह कर दे धरती-माई से, नहीं चलना तुम्हारे साथ, तूॅ तो देवी है, माला-फूल और सुगंध पीने वाली, हवन-पूजन पर थिरकने वाली पर हम तो कथा हैं, हमारा पेट है, हमारा जनम भूख से हुआ है, यातना, दमन, शोषण से हुआ है, हमारे पास केवल हाथ-पैर ही हमारे हथियार हैं, ये चोटिल और घायल हो जायेंगे फिर हम कैसे बचा पायेंगे अपनी जान, जरा सोचो तो धरती-माई...’
बबुआ अपने घर लौट आया सरवन के घर से। थोड़ी ही दूरी पर घर था बबुआ का। बरामदे में पड़े हुए थे उसके बपई बुझावन। वे बबुआ की राह देख रहे थे।
‘का हो बबुआ! वकील से भेट हुई के नाहीं, कचहरी का काम होय गया?’
‘हॉ बपई काम होय गया कचहरी का। अब अगली तारीख पर जाना होगा कचहरी।’
‘अच्छा जाओ कुछ दाना-पानी करि लो, बिफनी तो अब्बै गई है घरे में गाय-गोरू को दाना-पानी दे कर।’
बबुआ घरे में चला गया, बिफनी चने का दाना भूज रही थी, बपई ने मांगा था
उससे ‘एकदम दाल बना कर देना बिफनी।’ का हो मिल गये लेखपाल साहब?’ बबुआ से पूछा बिफनी ने।
‘हॉ मिल गये कचहरी का कुल काम होय गया’, बबुआ ने बिफनी को बताया
‘‘चाह’ बनायें का हो! आजु सबेरे गइया ने टांग उठा दिया, दूहने ही नाहीं दिया लगा कि मार देगी टांग से, हम ओके नोये भी नाहीं थे, नोय कर बांध देते नऽ दुन्नौ टंगिया तऽ दूह लेते, बछरुआ बांध दिये हैं अलगे। दूध नाहीं है घरे में, करिययी ‘चाह’ बनाय दें का?
‘नाहीं हो! एक काम करो कि गइया को लगाय के देखो तो, बछरुआ बांधे हैं अलग, जरा देखि लो का करती है, लगती है कि नाहीं।’
‘रहने दो, ‘चाह’ जीन बनाओ, हम सरवन कीहें पी के आय रहे है चाह। हॅऽ गइया लगाय के देखते हैं, दूध नाहीं होगा तऽ बपई को का दिया जायेगा?’
गाय लग गई और बबुआ ने दूह लिया दूध।
बबुआ को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है जबसे घर आया है तब से सोच रहा है सरवन के बारे में तथा रास्ते में हुई मार-पीट के बारे में ही। सरवन ने उसे लौटते समय रास्ते में ही सहेजा था कि गॉयें में केहू के नाहीं बताना है, रस्ते में हुई मार-पीट के बारे में, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, सब डेराय जायेंगे कउनो मुकदमा लड़ने का फेर नाम न लेंगे। का करे बबुआ! बिफनी को बताये के नाहीं, वह नाहीं बतायेगा बिफनी से भी सरवन ने मना भी किया हुआ है।
चाह पी कर वह घर से निकल गया खेत की तरफ, खेत पर कुछ काम था खेती-बारी का, एक बोझ घांस भी लेता आयेगा। एह साल मौसम का रुख सही नाहीं है, खेती-किसानी तऽ ‘दउए’ के सहारे पर होती है।
सरवन से काल्हु बोलेगा बबुआ मार-पीट के बारे में, ए बाती के छिपाना ठीक नाहीं है। सरवन सबको अपने माफिक बूझता है जो गलत हैै। ई दुनिया नीक नाहीं है, अपने मतलब में सब आन्हर होय गये हैं। बहुत गलती होय गई, रामलाल के खिलाफ हमलोगों को रपट लिखवा देना चाहिए था। सरवन ने गलती किया हमैं रोक कर, चलो काल्हु बात होगी सरवन से रपट लिखवाने के बारे में। रामलाल को के नाहीं जानता है, अपने गायें में कई लोगों से मार-पीट कर चुका है।
बबुआ अन्दर अन्दर ही घबराया हुआ है, बिफनी से बता देता मार-पीट के बारे में तऽ घबराहट कुछ कम हो जाती पर सरवन ने मना किया हुआ है कैसे बताये बिफनी को। कसमसा कर रह जाता है बबुआ और खुद को रोकता है। कइसहूं रात बीत जाती फिर वह सरवन के पास जाता और उसे रपट लिखवाने के बारे में समझाता। काहे नाहीं मानेगा सरवन बात, जरूर मानेगा।
रात होने में देर नहीं थी, होने वाली ही थी। बिफनी खाना बना रही थी, रोटी और भंटा की तरकारी। भंटा की तरकारी उसे ठीक लगती है।
‘घर में दारू है कि नाहीं! अगर होती तऽ रात बीत जाती, मन बहुत परेशान है।’
बपई के यहां से उठ कर वह आंगन में जाता है, आंगन क्या पीछे के हाते में, पीछे कमरे तो हैं नहीं केवल दो ही तरफ तो बने हुए हैं घर, बकिया हाता है, बांस की टाटी से घेरा हुआ। टाटी पर जाड़े में सेम अउर नेनुआ खूब फरता है, टाटी दोनों काम करती है घोरान अउर तरकारी का। बबुआ सीधे अपने कमरे में जाता है और खोजने लगता है दारू, उसे पता है कि कहां छिपा कर रख सकती है, बिफनी जानती है कि छिपा कर न रखो तो कभी भी ढकेलने लगंेगे मुहे में।
बबुआ घर के कोनों को देख रहा है, कोनों में कई किसिम के झोले टंगे हुए हैं झोलों में कई चीजंे हैं अलग-अलग कहीं धनिया है तो कहीं मर्चा है, कहीं किसी चीज का बंेगा है तो कहीं गुड़ कहीं चीनी पर किसी में दारू नहीं है। दारू कहीं दूसरी जगह पर रखी होगी पर घर में दूसरी जगह है कौन? बबुआ को कहीं भी दारू नहीं मिलती वह परेशान हो जाता है फिर आंगन में आता है बिफनी की सिफारिश करने...
‘कारे बिफनी कुछ रखी हो का?’
‘का रखी हो’...पूछा बिफनी ने
‘उहय समझ लो,’ बबुबा ने इशारा किया
‘का उहय?’ बुझौवल न बुझाओ बोलो साफ साफ
‘अरे अब का बतावैं, बूझि लो कुछ चाही मन हरियाने के लिए, आजु दिमाग
बहुत खराब है।’
‘हम नाहीं बूझ पा रहे हैं तूं साफ साफ बताओ तो हम बतायें के रखे हैं के नाहीं’ं
‘हम का बतावैं तोहसे, उहय समझ लो जउने से चनरमा दिखाने लगता है अउर.... इसके आगे नहीं बोलता बबुआ, सीधे जकड़ लेता है बिफनी को गोदी में...
‘ई का करि रहे हो हम हल्ला कर देंगे बपई अबहीं सोये नाहीं हैं फेर तूं समझना, का है, का है चिल्लाने लगेंगे, का बताओगे ओन्है तब तऽ मुह चोराय के भाग जाओगे, न दिन देखते हो नऽ रात।’
बिफनी जोर लगा कर निकल आती है बबुआ के अॅकवार से बाहर और भाग जाती है गोइठउर की तरफ, जहां भूसा रखा हुआ है और खरी-दाना। वहां से निकाल ले आती है एक बोतल दारू जिसे छिपा कर रखा हुआ था बिफनी ने। दारू वह तब निकालती जब उसका भाई आता, भाई के लिए छिपा कर रखे हुई थी।
बबुआ के हाथ में दारू की बोतल थमाते हुए बिफनी ने मजाक किया...
‘लो इहै चाहिए नऽ’
नाहीं रे इहय नाहीं, चाही तऽ अउर कुछ, चल ऊ बाद में बतियायेंगे। चनवा भुजाय गया नऽ ओमे नून, तेल पियाज मिलाय के दो तब न खोलैं बोतल। हं एक बात अउर अकेलै नाहीं पियंेगे बूझ रही हो नऽ’
‘केके बोलाओगे राती में का सरवन भइया के आ खेलावन भइया के,’
अरे पगली केहूे के नाहीं आजु ताहरे संगे पियय के मन है, ढेरै दिन होय गया जल्दी से खाना-पीना का काम निपटाय लो, बपई के खाना खिलाय के आजाओ, खाना
खाने के पहिले पीना है, बूझ रही नऽ हमार बात।’
बबुआ की रात जिसे गजरना था गुजर गई, रात के साथ बबुआ भी गुजरता रहा एक फायदा हुआ दारू पीने से कि रामलाल का खियाल उसे नहीं आया। रामलाल का खियाल न आये इसी लिए उसने दारू पिया भी था। रात में जब तक जाग थी तब तक बिफनी परास के लाल लाल फूलों की तरह उसे दिख रही थी मुलायम और कोमल। बबुआ की यह दुनिया किराये वाली नहीं थी, अपनी थी, एकदम कुदरती, कुदरती भाव-बोधों वाली, सरस और मधुर। समय भी दोनों के साथ साथ था, प्यार से सना एक कदम आगे वे चलते तो समय दो कदम आगे चल देता फिर तो देह वाली दुनिया तन से होते हुए मन को समाधिस्त कर देती।
रात का गुजरना दोनों के लिए काफी संगीतमय था जंगल के रात वाले संगीत की धुनों की तरह, हल्की सी हवा चली नहीं कि पेड़ झूमने लगते हैं और पत्ते आपस में संगीत की धुनंे छेड़ देते हैं सर सर वाली। उसी सर-सराहट में दोनों की रात गुजर गई। दोनों रात भर झूमते रहे, सर-सराते रहे।
सबेरे जब बबुबा जागा तब उसे देह में मन्द मन्द दर्द महसूस हुआ..
लगता है रात की खुमारी वाला दरद है, ज्यादा दारू हो गई थी का? या दरद कुछ और का है? उसी का हो सकता है दरद, नर-नाश्ता करने के बाद बबुबा सरवन के घर गया, सरवन घर पर नहीं था। सरवन बगल के गॉव में गया हुआ था, समिति के मंत्राी जी ने सबेरे ही सरवन के पास समिति का एक कार्यकर्ता भेजा था। समिति के काम से वह बगल के गॉव में गया हुआ था, लौट ही रहा होगा, दुइ घंटा हो गया होगा, बुधनी काकी ने बबुआ को बताया। सुगनी घर के भीतर गई थी खरी लाने के लिए गोय-गोरू को सानी लगाना था, सबेरहीं सानी भूसा लगाय दो तो दिन भर की छुट्टी होय जाती है, गाय दुहा ही गई है, दुई ठो बैल हैं ओनकर सेवा-टहल भी तो करनी पड़ती है।
‘अरे! देवर जी बइठिये ओसारे में, इहां काहे खड़े हैं, ऊ आय रहे होंगे,बोल के गये हैं कि एक घंटे में आ जायेंगे। कउनो काम तऽ नाहीं है न घरे, जब काम नाहीं है घरे तब का, बइठिये ऊ अइयय जायेंगे।’
बबुआ सोमारू काका के पास बैठ गया। सोमारू काका आराम से थे, दर्द वगैरह नहीं था, कायदे से बोल-बतिया रहे थे, काका ने बबुआ से पूछा...
‘का हो बबुआ! का होय रहा है मुकदमा में, काल्हु तूं लोग गये थे कचहरी नऽ?
‘हां काका हमलोग गये थे काल्हु कचहरी, वकील साहब को खतौनी देना था। वकील साहब बोल रहे थे कि मुकदमा हमलोगों को ही जीतना है, ओन्है कउनो जोर-दार पाइन्ट मिल गया है।’
‘चलो ठीक है, हं एक बात अउर बताओ, का हुआ सामूहिक खेती वाले काम का, का गॉयें कऽ सब लोग तैयार हो गये हैं?’ पूछा सोमारू काका ने बबुआ से
‘हं काका सब लोग तैयार ही हैं पर काका तूं का तो बोल रहे थे, तूं तैयार हो
कि नाहीं काका?’सोमारू से पूछा बबुआ ने
हस पड़े सोमारू काका..
‘का बोलते हो बबुआ! हम काहे नाहीं तैयार होंगे, ऊ तऽ अइसही बोल दिये थे सरवन से देखने के लिए कि वह का बोलता है?
कुछ ही देर में सरवन चला आया...
‘का हो बबुआ! कब आये हो?’ पूछा सरवन ने बबुआ से
होय गया एक-डेढ़ घंटा, कहां गये थेे हो, का काम था.. पूछा बबुआ ने
अरे यार! समिति का काम था
हमरे गॉये के जोड़ लिए हैं मंत्राी जी समिति के कार्य-क्षेत्रा में, घरे घरे का सर्वे करना है, सर्वे वाला फरमवा तऽ हम तोहैं देखाये हैं नऽ’
‘सरवन! ऐसा है चलो खेत की तरफ चलते हैं। कई दिन होय गया ओहर हमलोग नाहीं गये।’
‘हां यार! ठीक बोलते हो चलो चलते हैं...’
फिर दोनों खेत की तरफ चल दिये, खेत बहुत दूर नहीं था। खेत के बीच में नीम का एक झखनार पेड़ था, उसके नीचे एक चबूतरा था, दोनों चबूतरे पर बैठ गये और बतियाने लगे...बबुआ जोर देने लगा कि रामलाल पर रपट लिखवाना है, सरवन नकारने लगा। दोनों एक दूसरे की राय से अलग थे...
‘काहे नाहीं रपट लिखवाना है?’
का होगा रपट लिखवा कर, थाना का कर लेगा, रामलाल थाने पर रुपया उझील देगा फिर ठांय ठांय फिस्स। अउर दुश्मनी अलग से बढ़ जायेगी। मार के दिन जो लड़का पकड़ाया था पता नहीं वह झूठ बोल रहा था कि सही, का पता....
सो हम तऽ गुन रहे हैं कि रपट लिखवाना ठीक नाहीं होगा अउर तूहों भुला जाओ ओके, के का हुआ था ओ दिन।
बबुआ कैसे समझाये सरवन को उसे कुछ समझ नाहीं आय रहा। सरवन तो समझना ही नहीं चाह रहा।
‘देख सरवन, तूं हमार बात नाहीं समझ रहा है, समझना चाह भी नाहीं रहा है, ई ठीक नाहीं हैै, रामलाल सरहंग है कुछ भी कर सकता है फेर का होगा? तब का करोगे, एसे हम बोल रहे हैं कि अजुए चलो थाने अउर रपट लिखवा दिया जाये।’
सरवन तो तय किए हुए था कि जो होना होगा होय जायेगा, ओके केहू नाहीं रोक सकता सो काहे परेशान होना, वे लोग चाहे जौन करें, हमें शान्ति से काम करना है अउर मार-पीट नाहीं करना है तऽ नाहीं करना है।
‘जौन किस्मत में लिखा होगा ऊ तऽ होइबै करेगा, बूझ रहे हो नऽ बबुआ!’
‘हं अब काम के बारे में सोचो, समिति के मंत्राी जी बोले हैं कि गॉयें की सूची बनाय लो, केकर केकर केतना खेत है ओकर रकबा लिख लो, कुल केतना खेती समूह में होगी ओकर पूरा कागज बनाय लो, दो ठो रजिस्टर भी दिए हैं मंत्राी जीं तूं तऽ खाली
हो गये किसानी से काल्हु से इहय काम करना है।
‘हं यार! ई बताओ के बिफनी केतना पढ़ी है?’
‘आठ पास है’
‘आठ पास है, स्कूल पढ़ कर के घरहीं से बिना पढ़े’
‘नाहीं हो स्कूल जा कर, ओकरे बुद्धि से नाहीं अन्दाजा लगता का तोहैं...’
‘कायदे से लिख पढ़ि लेती है नऽ।’
‘अउर नाहीं तऽ का?’
‘तब तऽ ठीक रहेगा सुगनी अउर बिफनी दोनों मिल कर समूह के हिसाब-किताब के लिखा-पढ़ी का काम कर लेंगी, ई ठीक रहेगा।’
सरवन किसी भी तरह से रपट लिखवाने के लिए तैयार नहीं हुआ फिर बबुबा ने उस पर जोर नहीं दिया...
‘ठीकै बोल रहा है सरवन का होगा रपट लिखवा कर थाना-थूनी का कर लेगा, रामलाल का रुपिया खा कर बइठ जायेगा।’
कुछ देर के बाद दोनों लौट आये अपने अपने घर। अगले दिन से ही सरवन ने सामूहिक खेती करने के लिए समूह के गठन का काम शुरू कर दिया। इस साल धान की खेती समूह में ही होगी अलग अलग नाहीं। समूह तो गॉव में पहले से ही बना हुआ था केवल दो-तीन लोग ऐसे थे जो समूह से अलग थे। एक दिन गॉव में समिति के मंत्राी जी आये मीटिंग होनी थी। गॉव का आर्थिक सर्वेक्षण पहले ही सरवन कर चुका था तथा समिति के पास गॉव के जोत-दारों के नाम भी दर्ज हो चुके थे। उसी के आधार पर ही समिति को फन्ड मिलना था जो एक महीने पहले ही समिति के खाते में आ गया था।
समिति को सामूहिक खेती कैसे होगी, कौन कौन से संसाधन चाहिए खेती के लिए, कितना बीज लगेगा तथा अगली खेती के लिए धन की कितनी आवश्यकता होगी? सारा विवरण मंत्राी जी को तैयार करना था तथा उस विवरण को फन्डर के पास एक सप्ताह के भीतर ही भेजना था सो मंत्राी जी गॉव में थे और समूह के सभी सदस्यों के साथ बैठक कर रहे थे।
सारा विवरण तैयार करने में करीब तीन घंटे लग गये फिर मीटिंग समाप्त हो पाई। मीटिंग समाप्त होते ही गॉव के वे कुछ लोग भी वहीं आ गये जो समूह की खेती में भाग नहीं लेना चाहते थे, वे सीधे मंत्राी जी से मिले...बकिया जो अलग थे वे तो अलग थे ही।
‘साहब हमलोग भी समूह की खेती में रहना चाहते हैं, जब आपकी तरफ से खाद और बीज मिल रहा है तब हम अपनी खाद क्यों लगायें, क्यों लगायें अपना बीज। हमलोगन के भी समूह में शामिल कर लीजिए।’
मंत्राी जी ने तो खेती में लगने वाले अनुमानित खार्चो का विवरण तैयार कर लिया
था। अब क्या करें... कुछ सोच कर उन्होंने उन लोगों का नाम भी रजिस्टर पर
चढ़ा लिया। चलो काई बात नहीं फिर से पूरा विवरण बनाना होगा। आपलोग भी इस फारम पर दस्तखत बनाय दीजिए, यह फारम हिस्से वाला है ताकि बाद में झगड़ा झंझट न हो, सबका हिस्सा बिगहे पर तय है जिसका जितना खेत होगा उसे उसके अनुसार ही लाभ मिलेगा। मजदूरी सभी को बराबर मिलेगी केवल लाभ में अन्तर होगा और लाभ निकलेगा खेती का पूरा खर्चा काट कर।
‘हमलोग सब जान गये हैं मंत्राी जी, सरवन ने बताया था हम लोगों को समूह की खेती के बारे में, आप हमलोगों को समूह में किसी तरह शामिल कर लीजिए बस एतनै कीजिए।’
मंत्राी जी ने उन लोगों का नाम रजिस्टर पर लिख लिया। उन लोगों ने संस्था का फारम भी भर दिया।
मंत्राी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि हम आपलोगों का फारम भेज देंगे अगर मंजूर हो गया तो ठीक है, इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जायंेगे नहीं तो अगले साल तो हम आपलोगों का नाम प्रयास करके समूह में जोड़वा ही देंगे। बढ़िया मौका था इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जाते पर आप लोग इनकार कर दिये...
सरवन ने तो बहुत प्रयास किया कि दोनों टोले एक हो जांयें। पर सोचने से का होता है?
सोचना, गुनना तो धरती-माई को है, धरती-कथा को का पड़ी कि वह गुने धरती-माई के बारे में, उसका तो काम है जैसा दीख रहा है वैसा ही लिख देना कथा की तरह, जगह जगह उसमें मनोरंजकता का जादुई छौंक लगा दे, कहीं कहीं कथा को रहस्य की तरफ भी मोड़ दे, कुछ कुछ बन्द बन्द जैसा खुले भी तो दिमाग लगाने के बाद। आखिर हर खुली चीज अच्छी भी तो नहीं होती आकाश की तरह, धरती की तरह पर धरती भी कहां खुली खुली है वह भी तो बन्द बन्द है संप्रभुताओं में, भूगोलों में। कथा को भी तो बन्द होना ही पड़ता है किसी न किसी दिन पर वह दिन अभी बहुत दूर है...कोई ऐसी कथा नहीं जो बन्द न होती हो चाहे कोई कथा देख लो, राम की कथा बन्द हो जाती है रावण के वध के साथ तो कृष्ण की कथा भी बन्द हो जाती है कंस वध के साथ।
‘एक नई सोच, नई अवधारणा
और समूह की खेती यानि कंधे से कंधा मिला कर चलो’
बिना राजसी सिंगार के धरती कथा गॉव में घुस रही है, माथे का मुकुट तथा गले का हार भी उसने उतार दिया है, उसके पॉवों में पैजनी भी नहीं है, राजसी वस्त्रा भी उतार दिया है देह से। देह से महलों वाली गंध भी नहीं फूट रही...चली जा रही है पगडंडियों पर उसका लक्ष्य क्या है, क्यों जा रही है गॉवों की तरफ, महलों में तो वह राज-रानी थी, स्वर्ग में भी पूज्य और आराध्य थी, आखिर ‘धरती माई’ का बनने जा रही है का गॉवों की तरफ.. का बन जायेगी धरती-माई?
समय बीतते देर नहीं लगती, जेठ खतम होय गया, अषाढ़ माथे पर खड़ा है फिर भी मौसम में आग है, कहीं नरमी का नाम नहीं, बादल जाने कहॉ छिपे हुए हैं, कुछ तो रिम-झिम शुरू होना चाहिए।
कुछ रिमझिम होगा तभी तो करइल माटी ठंडायेगी, गरम होते ही फट जाती है, दर्रे फट जाते हैं हर तरफ, गाय-गोरू घुस जांये ओमे। आदमी न देखे तो वह भी घुस जाय दर्रे में। ‘इन्नर’ भगवान का खेल के जानता है? उहय पानी के देवता हैं। एक बात एह साल ठीक हुई है चॉपा-कल का पानी नीचे नाहीं उतरा है अउर पोखरवौ में निपटान के बाद चुत्तर धोने लायक पानी बचा हुआ है। ये महीने में एतना पानी भी कहां बचा रहता है पोखरा में। वैसे अन्दाजा तो है कि मौसम ठीक रहेगा पर भगवान की गति के बारे में के जानै। समूह की खेती का काम शुरू हो चुका है।
सभी लोग मिल कर गोबर-राख के ढेरों को खेतों में डालने लगे हैं, गोबर और राख का घूर रख कर का होगा घर पर? बिअड़ा में चला जायेगा तो बंेगा अच्छा जामेगा, बेंगा अच्छा अउर पोढ़ होगा तो धान की पैदावार भी अच्छी होगी।
‘एक नामी ‘पतिवाह’ अहिरान टोले में आये थे, गाय-गोरू का जमावड़ा हो गया था पर ओतना नाहीं जेतना पहिले हुआ करता था। अब गाय-गोरू कौन रख रहा है किसानी वाला सारा काम टेक्टर से होय रहा है। पतिवाह बाबा बोले हैं कि यह साल बरसात का अच्छा जोग है, फसल भी अच्छी होगी। अन्न-धन भरा रहेगा हर घर में।
बरसात तो होनी ही थी कुछ ही दिनों के बाद बरसात होने लगी। खेतों ने जोत लायक पानी पी लिया फिर क्या था समूह के लोग अपने अपने हल चलाने लगे खेतों में। खेत भी समूह के लोगों का करीब करीब एक साथ ही मिला हुआ था इस लिए खेती करने में आसानी थी। केवल उतराहाटोले वालों के खेत अलग थे एक सिवान के बाद। बेंगा डाला जा चुका था जो काफी पोढ़ हुआ था केवल रोपाई बाकी थी। जब रोपाई शुरू हुई तो वह भी पन्द्रह-बीस दिन के अन्दर ही खतम हो गई।
अचरज हो गया पूरे समूह में, पहिले तो एक महीना नाहीं तऽ बीस दिन लग ही जाता था, एह साल जल्दी हो गई रोपाई। जल्दी काहे नाहीं होगी पन्द्रह हल जोत रहे थे खेत। रोपाई तो जल्दी खतम होनी ही थी। समूह की ताकत का असर था, नई जोश थी, किसी भी तरह से उतराहाटोले से पहले रोपाई खतम करनी ही होगी ऐसा भाव था।
रोपाई के समय ही समिति का फन्डर भी आया था और उसने खेत की सामूहिक जोताई तथा रोपाई का बी.डी.ओ. बनाया था कुछ फोटो मोबाइल से तो कुछ साधारण कैमरे से खींचा था। फन्डर काफी खुश खुश हुआ था। उसे लगा था कि समूह की खेती करवा कर वह किसी दिन सामूहिक खेती केअभियान को पूरे देश में चलवा सकेगा, उसके इस अभियान के प्रति तमाम दूसरे फन्डर भी आकर्षित होंगे और अपने अपने कार्य-क्षेत्रा में सामहिक खेती को बढ़ावा देंगे। सामूहिक खेती वाले अभियान को फन्डर ने देश के बड़े पत्राकारों से भी दिल्ली जा कर साझा कर लिया। बड़े बड़े पत्राकारों के लिए सामूहिक खेती का अभियान अचरज भरा था.. वे मान कर चल रहे थे कि भारतीय समाज आज के समय में एकल परिवार की अवधारणा पर चल रहा है ऐसी स्थिति में सामूहिक खेती का का मतलब? जरूर कोई बात होगी। पत्राकार तो पत्राकार, नई बातों को समाज के सामने लाने वाले तभी तो उनकी पत्राकारिता का मकसद सफल होगा... सामूहिक खेती का वी.डी.ओ. देख कर वे ललच उठे...
सोनभद्र चर्चित हो गया पूरे देश में। पत्राकार जो चाहें चर्चित करा दें ‘समूह की खेती देखने चलना है सोनभद्र, वह भी जनता की स्वस्फूर्तता से, उनकी अपनी चेतना और इच्छा से...पत्राकारों ने मन बना लिया। और एक दिन फन्डर के साथ वे गॉव चले आये। रोपाई खतम हो चुकी थी और सोहनी हो रही थी, खड़-पतवार निकाले जा रहे थे रोपे हुए खेतों से, करीब पचासों लोग खेतों में थे, कुछ जवान कुछ वृद्ध तो कुछ अधेड़, औरत मर्द दोनों, उनके काम को देखने वाला वहां कोई नहीं। वहां कोई देखने वाला होता भी कैसे, वे तो सबके सब मालिक थे और मजूर भी। पत्राकारों के लिए वहां का दृश्य अद्भुत था, सामूहिक खेती की बातंे उन लोगों ने किताबों में पढ़ा था पर व्यावहारिक रूप उसका वे यहीं देख रहे थे। दिल्ली लौटने पर पत्राकारों ने सामूहिक खेती के अभियान को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित करने का काम किया। उससे फन्डर को बहुत लाभ मिला कुछ दूसरे उदार घन-दाताओं ने फन्डर को धन भी दिया और बोला भी कि उ.प्र. के पिछड़े जिले सोनभद्र में सामूहिक खेती के काम को दूसरे गॉवों में भी बढ़ाओ, कोशिश करो कि वहां गॉवों में सामूहिक खेती होने लगे, जितना संभव हो सके गरीबों को सामूहिक खेती के अभियान से जोड़ो। बाहर ही नहीं अगल-बगल गॉव वालों के लिए भी हल्दीघाटी गॉव में हो रही सामूहिक खेती का काम अचरज भरा था। का हो गया गॉव में, कैसे बन गई ऐसी एकता, कहते हैं गरीबों में एकता बन ही नहीं सकती।
वैसे एकता तो हल्दीघाटी वाले गॉव में भी नहीं थी, वहां जो समूह की खेती वाली एकता बनी है वह महज तीस-पैंतीस लोगांे की ही है बकिया उतराहाटोले के करीब बीसों लोग समूह की खेती में शामिल नहीं हुए थे। वे एकता में यकीन करने वालों में नहीं थे, वे, अलग अलग तरीके से चलने की चाह और अभिलाषा वाले थे सो पहिले की तरह अलग अलग अपनी खेती कर रहे थे। पर सरवन के समूह की खेती देख कर वे लोग परेशान हो गये। उन्हें पता चल गया था कि समूह की खेती के लिए जो जन कल्याण समिति है वह खाद और बीज दे रही है। कम नहीं है खाद और बीज की मदत, इस मदत के कारण खेती अच्छी होगी और खेती का खर्चा भी कम आयेगा। जो लोग समूह से अलग थे उन्हें खाद तथा बीज दोनों का इन्तजाम अपने स्तर से करना पड़ रहा था। वैसे भी खाद खरीदना आसान नहीं था, यूरिया और डाई दोनों के दाम बढ़े हुए थे, खाद उसी को मिलती जो रुपया खरचता, और रुपया तो
एक ऐसी चीज है जो गॉवों से एकदम अलग रहने वाली चीज है। रुपया कहॉ होता है गरीब खेतिहर किसानों के पास। सो उतराहाटोले के लोग परेशान थे।
नन्हकू काका के जमाने में भी उतराहाटोले वाले अलग थे खान-पान, शादी, बिआह सभी कामों में अलग। अलगाव उन लोगों में इतना था कि किसी भी प्रयोजन में वे एक साथ नहीं जुटते थे। नन्हकू काका ने उतराहाटोले के लोगों को एक साथ जोड़ने का बहुत प्रयास किया था पर सब बेकार था। कई बार तो नन्हकू काका उतराहाटोले में शादी आदि के मौके पर बिना बुलाये भी चले जाया करते थे पर वे लोग थे कि बुलाने पर भी दखिनाहा टोले केआयोजनों में शमिल नहीं हुआ करते थे। नन्हकू काका चाहते थे कि पूरा गॉव एक हो कर मुकदमा लड़े जमीन का, आयोजनों में एक साथ रहे, पहले का हुआ था भूल जायंे पर नहीं वे लोग तो भूलना जानते ही नहीं थे वे पुरानी बातों को याद रखने में यकीन करते थे...भला वे कैसे भूल जाते कि उनके परिवार के कुछ लोगों को बिरादरी से निकाल दिया गया था, उन्हें अछूत बना दिया गया था, उनसे माड़-भात लिया गया उनके मान-सम्मान को पूरी बिरादरी में गिराया गया, कई कई लड़के जो अब बुढ़ाय गये हैं वे बिना शादी के रह गये, कौन शादी करता उनसे, बिरादरी से गिरे आदमी को कौन पूछता है, कई तरह की यादों को पकड़े हुए उतराहाटोले के लोग न तो कभी एक साथ नन्हकू काका के साथ चले और न ही अब सरवन के साथ चल रहे हैं, कभी एक साथ आयोजनों में शामिल भी नहीं हुए और न ही मुकदमा लड़ने के लिए राजी हुए। नन्हकू काका का दखिनाहा टोला था वह एक साथ उनके जमाने में भी था और सरवन के जमाने में भी एक साथ है। यही टोला जमीन का मुकदमा भी लड़ रहा है। सरवन ने भी उतराहाटोले के कई लोगों से समूह की खेती के बारे में बातें किया था पर किसी ने नहीं सुनी उसकी बातें.सुनता भी कौन? उन लोगों के मन में तो बहुत पहले से ही नन्हकू काका के दखिनाहा टोले वालों से जलन थी, जलन काहे नाहीं होती, नन्हकू काका के टोले वालों का रियासत में मान था, इसी टोले का आदमी बिरादरी का चौधरी हुआ करता था हर बार। बुझावन काका के बपई चौधरी थे उनके देहान्त के बाद बुझावन काका ने इनकार कर दिया चौधराहट करने से तब नन्हकू काका चौधराहट करने लगे। जाति बिरादरी में भी नन्हकू काका के टोले वाले ऊॅची कूरी के माने जाते थे और वैसे ही उन्हें सम्मान भी मिलता था। वैसे अब तो चौधरी वाली कोई बात बिरादरी में है नहीं, नहीं तो सरवन ही बिरादरी का चौधरी होता, वही गॉव की पंचायत निपटाता।
उतराहाटोले वालों को जाति बिरादरी में उतना मान नहीं था चाहे मामला बिआह का हो या और किसी चीज का पहले नन्हकू काका के टोले वालों की पूछ होती थी बाद में उतराहाटोले वालों की।
उतराहाटोले वालों में कुछ ऐसे लोग थे जिसके कारण उनका मान-सम्मान बिरादरी में गिर गया था। कुछ लोगों ने बिआह ऐसा कर लिया था जो बिरादरी के लिए मान्य नहीं था। किसी ने अपनी जाति से अलग चेरो बिरादरी की लड़की रख
लिया तो कोई कहीं से धांगर बिरादरी की लड़की उठा लाया। ऐसा करना पहले के दौर में बहुत भयानक सामाजिक अपराध था भले ही कानूनी नहीं था तो क्या हुआ? पहले के जमाने में जाति के नियमों का अनुपालन सामूहिक रूप से गॉव के लोग ही करवाया करते थे। भला किसी की मजाल जो बिरादरी के सामाजिक नियमों को तोड़ दे! आज के कानून का प्रभाव तथा परिणाम दोनों पहले के सामाजिक नियमों के मुकाबिले में कुछ नहीं दिख रहा। कानून तोड़ने वाले अपराधी गॉव में खुले-आम घूम रहे हैं इतना ही नहीं गॉव में हीरो बने हुए हैं, वे ग्रामनायक की तरह गॉव की राजनीति का संचालन कर रहे हैं, मस्त मस्त हैं, कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा पर सामाजिक नियम तोड़ने वालों के लिए मुश्किल था उस जमाने में ग्राम-नायक बन कर गॉव में जमे रहना। उन्हें दण्ड भोगना पड़ता था, दण्ड भी गॉव ही उन्हें दिया करता था। जाति से बाहर शादी हो गई तो बाल-बुतरू भी होंगे। ऐसे बाल-बुतरूओं को बिरादरी मान्यता नहीं देती थी, उन्हें नाजायज मानती है। बिरादरी का हजारों साल वाला रीति-रिवाज कानूनी ढंग से भले हीे गलत हो पर बिरादरी के लिए गलत नहीं होता है। वह सामाजिक न्याय आज भी पहले की तरह से कम अधिक चल रहा है हमारे समाज में।
बिरादरी काहे स्वीकारे एसेे बाल-बुतरूओं का जिससे जाति का खून गन्दा हो गया हो या मिश्रित हो गया हो। बिरादरी तो बिरादरी उसे क्या पता कि मानव समाज में शुद्ध खून वाला मामला अब कहीं नहीं है, हमारा पूरा समाज खून की पवित्राता का आज के समय में दावा नहीं कर सकता। नन्हकू काका समाज की इस सचाई को जानते थे सो वे दखिनाहा टोले के लोगों को उतराहा टोले के लोगों के साथ जोेेड़ने का लगातार प्रयास करते रहे थे, चाहते थे कि सबमें खान-पान का नाता बन जाये पर नहीं बन सका उनके जमाने तक। सरवन भी थक कर बैठ गया।
उतराहाटोला अतीत के साथ चल रहा था, और अतीत था कि उनके लिए अपमान-जनक था जिसे गढ़ा था दखिनाहा टोले वालों ने, कई बार उन दोनों टोलों में खेत के बटवारे को लेकर मार-पीट भी हो चुकी थी, यह मार-पीट आग में घी डालने जैसा था सो वे दखिनाहा टोले से काफी दूरी बना कर चला करते थे और मानते थे कि दुश्मन हमेशा दुश्मन ही रहता है, मौका मिलने पर वह कभी नहीं छोड़ेगा।
तो हल्दी घाटी वाले गॉव में भी अतीत किसी खतरनाक इतिहास की तरह सक्रिय था हालांकि उस इतिहास का भूगोल बहुत ही सीमित था कुछ ही एकड़ तक के विस्तारित क्षेत्रा वाला पर अतीत तो था ही। इतिहास चाहे कितनाहू बड़े भू-भाग का हो या कितनाहू बड़े मानव समूह का हो या कि छोटे मानव समूह का हो उसका काम हर जगह बराबरी का होता है, मन में जलन, डाह, ईर्ष्या पैदा करना और बदला लेना। इतिहास के इस खतरनाक पक्ष के साथ ही हल्दीघाटी वाले गॉव का उतराहाटोला था पर मानव सभ्यता के इतिहास का वह पक्ष जो सहयोग, सहभागिता तथा प्रेम पर टिका होता है वह उस टोले में नहीं था। इतिहास का यह दूसरा पक्ष केवल हल्दीघाटी गॉव में ही नहीं पूरे सोनभद्र में नहीं था हर जगह पहला पक्ष ही था कि उनके साथ अन्याय किया गया है, उन्हें अछूत बना दिया गया है। खरवार बिरादरी में तो यह है कि उन्हें अगोरी व बिजयगढ़ राज से बेदखल किया गया है नहीं तो किसी जमाने में ये दोनों रियासतें उनकी हुआ करती थीं। तो मानव समूहों को आपस में अलग बनाये रखने वाला इतिहास का पुराना खतरनाक खेल हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था।
सरवन समझता है इस बात को और मानता भी है कि उसके पुरखों ने अपने ही लोगों को अछूत बना कर गलत किया था पर वह अतीत तो बदल नहीं सकता। समूह की खेती के लिए उसकी जितनी अक्ल थी सब लगा दिया... सबसे माफी मांगा, उतराहाटोले वालों के पैरों पर गिरा पर वे राजी नहीं हुए।
उतराहाटोले के लोग दखिनाहा टोले वालों के साथ नहीं जुड़ पाये। सरवन के टोले वालों ने ही समूह में खेती किया और काफी फायदा भी हुआ। समिति के मंत्राी ने एक काम बहुत अच्छा किया था कि वे लगातार समूह की खेती की निगरानी कर रहे थे। दूसरी समितियों के मंत्रियों की तरह समूह वालांे को घन की सहायता करके खुद अलग नहीं हो गये थे। वे लगातार खेती के खर्चों का हिसाब किताब देख रहे थे इतना ही नहीं, पैदावार का बटवारा भी अपनी देख-रेख में ही उन्होंने करवाया। पहले खेती का खर्च निकाला गया, मजूरी निकाली गई शेष बची पैदावार को लाभ में माना गया। दखिनाहा टोले के समूह वाले गद गद थे...
बुधनी काकी तो सरवन का पीठ ठोंकने लगीं...
‘वाह बेटा! बड़ा नीक काम किये समूह बना कर, पहिले हमलोग खेती करते थे तो केवल खाने भर का ही अनाज मिल पाता था इस बार तो बेचने के लिए भी मिल गया है।’
सोमारू काका और बुझावन काका भी खुश खुश थे। सोमारू काका ने तो एक दिन सरवन से कहा भी...‘हम तो बुझ रहे थे कि तूं समूह बना कर घरवौं की खेतिया चौपट कर दोगे, एही कारण हम मना किए थे कि समूह के चक्कर में न पड़ो पर अब समझ में आय गया कि कउनो काम जवन दस लोगों के द्वारा हो जायेगा एक आदमी उसे नहीं कर पायेगा सो यह ठीक हुआ सरवन।’
उतराहाटोले वाले समूह की खेती में हुए लाभ को सुनकर परेशान थे, वे अफसोस कर रहे थे कि वे भी अगर समूह की खेती में शामिल हुए होते तो उन्हें भी लाभ मिलता। उनमें से एक दो लोग जो समूह की खेती में शामिल होना चाहते थे वे अपने टोले के लोगों को कोस रहे थे...जिन्होंने समूह की खेती में शामिल होने का विरोध किया था...
‘सरवन तो हमरे टोले में आया था सबको एक साथ जोड़ने के लिए, सबके गोड़े पर गिरा था पर नाहीं, वो तो दुश्मन है, अरे जब दुश्मनी थी तो थी अब तो नाहीं है फेर का परेशानी थी समूह में शामिल होने में। दखिनाहा टोले वालों को खाद-बीज मुफत में मिल गया, फसल काहे नाहीं अच्छी होती, फसल तो खाद से अच्छी होती
है, हम लोग खरीद कर कितना डालते खाद इसलिए फसल अच्छी नाहीं हुई।’
उतराहाटोले के लोग एक दिन समिति के मंत्राी जी के यहां गये थे और दूसरा समूह बनाने के लिए रिरिया रहे थे। मंत्राी जी ने अपनी मजबूरी उन्हें बता दिया कि वे एक गॉव में दूसरा समूह नहीं बनवा सकते, एक गॉव में एक ही समूह काम करेगा। ई तो हम पहले ही बता चुके हैं आपलोगों को, हॉ अगली फसल के लिए हम आप लोगों का नाम सरवन के समूह के साथ जोड़ सकते हैं, अगर आप लोग राजी हैं तो अगली फसल के समय आइए और एक फार्म है उसे भर दीजिए फिर समूह से जुड़ जायेंगे आप लोग।
उतराहाटोले के लोग लौट आये मंत्राी जी से बतिया कर... अगली फसल तक हमलोगों को भी समूह से जुड़ जाना चाहिए, समूह की खेती से बहुत लाभ है, मजूरी भी दाम के दाम मिल जाती है और फायदा भी होता है, खाद-बीज का दाम नहीं देना पड़ता। सरवन अच्छा लड़का है वह भी कोशिश करेगा हमलोगों को समूह के साथ जोड़ने के लिए।
जोड़ना-घटाना तो कथा में भी पड़ता है, बिना जोड़े-घटाये कथा बन ही नहीं सकती, धरती-कथा में वैसे ही अनेक पात्रा हैं? अलग अलग चित्त और चेतना वाले, अलग विचार और धारणा वाले उन्हें एक साथ जोड़ना तथा कुछ को उनमें से घटाना, करिश्मा माफिक? धरती-माई मगन हैं धरती-पुत्रों को कथा में एक साथ देख कर, उनके द्वारा समूह की खेती देख कर, समूह की खेती के लिए सहायता करने वाला फन्डर धरती-माई का कहीं भक्त तो नहीं...!
‘हिंसा के पंख लग गयेे,
उड़ने लगे आदमी?’
‘धरती-कथा गॉव पहुंच कर मंत्रा पढ़ रही है, नभ, जल, क्षितिज, वायु, अग्नि तथा खुद धरती का भी..सब कुशल-मंगल रहे, ओम शान्तिः, ओम शान्तिः। धरती-कथा को धरती पर देखते ही धरती-पुत्रा धन्य हो गये हैं, वे पूजा कर रहे हैं अपनी धरती माई की, आरती उतार रहे हैं, अक्षत-पुष्प चढ़ा रहे हैं, धन्य हो ‘धरती माई’ आपने दर्शन तो दिया धरती पर...पर क्या सचमुच....’
सरवन खेती का काम निपटा कर मस्त मस्त था। वह मस्त काहे नाहीं रहता खेती में फायदा हुआ था, समूह के लोग मस्त मस्त थे तो वह भी मस्त मस्त था। पर पहले वह डर रहा था अगर समूह की खेती से लाभ न मिला तो वह अपने टोले में मुह दिखाने लायक नहीं रहेगा, लोग थूकेंगे उस पर, पर नहीं समूह को लाभ मिला। सरवन एक दिन खेती में लगी खाद और बीज का हिसाब कर रहा था... अगर उसका कुल दाम निकाल दिया जाये तो लाभ हुआ कि नाहीं, मंत्राी जी भी इस हिसाब को जानना चाह रहे थे... हिसाब निकाला गया, फिर भी खेती में लाभ था...
खेलावन सरवन के साथ था हिसाब के समय बोल पड़ा..
‘हम बोल रहे थे के, कान एहर से पकड़ो चाहे ओहर से लाभ ही लाभ मिलेगा।’
सरवन और उसके मित्रा खेती हो जाने के बाद घर के कामों में जुट गये, कोई दीवारों का लेवरन करने लगा तो कोई नया घर बनाने लगा, कोई छाजन ठीक करने लगा। सरवन भी अपने काम में लग गया था तथा कुछ दिनों के लिए रिश्तेदारी में भी चला गया था। वह भूल चुका था मुकदमे की तारीख के बारे में सो सरवन अगली तारीख पर नहीं जा पाया रापटगंज और एक दिन अचानक...
खेत पर जमीन कब्जा करने वालों का जमावड़ा हो गया। सरवन एक दिन पहले ही रिश्तेदारी से गॉव पर आया था। गॉव में खेत पर लोगों के जमावड़े की खबर आग की तरह फैल गई फिर क्या था सरवन तथा उसके मित्रा बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवान खेत पर हाजिर हो गये, लड़कों के साथ सुगनी, बिफनी, तेतरी, बैसाखी, बुधनी काकी तथा अन्य औरतें भी खेत पर हाजिर।
‘का होय रहा है, आपलोग हमलोगों का खेत काहे जोत रहे हैं, एक साथ औरतों और मर्दों के मिश्रित सवाल...’
‘हमारा खेत है, खेत पर हमारा नाम चढ़ गया है, हमने बैनामा कराया है इस जमीन का अब हम ही इस खेत को जातेंगे’ आरोपियों ने कड़ियल जबाब दिया..
‘कैसे जोतेंगे आप लोग हमारा खेत, हमलोगों ने अपील किया हुआ है, मुकदमा चल रहा है, मुकदमे में फैसला हो जाये तब जोतिएगा खेत अबहीं नाहीं।’
सरवन, बबुआ, बुद्धन ने एक साथ प्रतिवाद किया....
ट्रेक्टर चल रहा था उसके सामने ओरतें खड़ी हो गई, ड्राइबर ने ट्रेक्टर चलाना बन्द कर दिया तब तक दूसरा ट्रेक्टर गरजने लगा उसके सामने भी कुछ लोग खड़े हो गये...फिर तीसरा ट्रेक्टर... उसके सामने भी गॉव के लड़के तनेन हो गयेे।
हमारे ऊपर चलाओ टेक्टर... एक सम्मिलित आवाज...
‘हमलोग खेत कइसहूं नाहीं जोतने देंगे, चाहे जो करोे, सैकड़ों साल से हमलोग इसी खेत पर खेती कर रहे हैं, बाप-दादे के जमाने से, कउने कानून से खेत आपका होय गया.. जे जोतै कोड़ै खेत ओकर, फेर तूं लोग कैसे आ गये खेत पर। सरवन अकड़ गया, बुद्धन तनेन हो गया...डट गये सारे लड़के..
‘निकालो अपना टेक्टर हमलोगों के खेत से, हमलोगों का खेत काहे जोतोगे, भागो इहां से हमलोग डरने वाले नाहीं हैं।’
हल्दीघाटी गॉव के लोग अपना खेत बचाने के लिए प्रतिवाद कर रहे थे, उन्हें पता था कि बात-चीत से समस्याओं के हल निकल आते हैं पर वहां तो संवाद था ही नहीं वहां केवल ताकत थी, कानून का खेल था, सैकड़ों साल के लगातार कब्जे और जोत-कोड़ का कोई मतलब नहीं था।
मतलब होता भी क्यों? आरोपी ताकतवर थे, उनके पास ताकत के सारे सामान
थे, बन्दकें थीं, शासन-प्रशासन पर प्रभाव था, रुपया था दूसरी तरफ सरवन, बुद्धन, खेलावन, रजुआ कलुआ जैसे गॉव के दूसरे लोगों के पास क्या था, कुछ नहीं, वे खाली हाथ थे, खाली पेट थे, शासन-प्रशासन से उनके रिश्ते नहीं थे। वे ट्रेक्टर के सामने लोट सकते थे तो लोट रहे थे, वे रिरिया सकते थे तो रिरिया रहे थे पर उनकी सुनता कौन?
सुनने के बजाय घॉय, घॉय, शुरू हो गया, गरज उठीं बन्दूकें, चल पड़ीं लाठियां और गड़ासे, दमन-संस्कृति की मध्यकालीन भाषा, लोकतंत्रा में स्व ‘तंत्रा’ का अद्भुत आख्यान उतर आया धरती पर और दस आदमी कतल कर दिए गये, आदमी और भी मारे जाते पर फरियादियों की भीड़ अपनी जान गॅवाना नहीं चाहती थी, वे जीना चाहते थे सो गोली की डर से भागने लगे थे। ललकार भगाने की थी भी...कृ
‘भागो जितना भाग सकते हो’ यह ललकार की मध्यकालीन क्रूर धारा थी। पर आदिवासी भाग भी नहीं पाये, आखिर कितना भागते.. गोलियों ने उनके जिस्मों को छलनी कर दिया...फिर भी आदिवासी भागे, भागने में कोई कहीं गिरा कोई कहीं गिरा, किसी का माथा फूटा तो किसी का ठेहुना, चोटिल सभी हुए। औरतें उस समय भूल र्गइं अपना ऑचल संभालना, बच्चों को सहेजना, बच्चे भी भागे जो भाग सकते थे।
मारे गये आदिवासी अपने अधिकारों की फरियादी भीड़ का हिस्सा थे। वे अपना खेत बचाना चाह रहे थे, हमारा खेत है इसे मत जोतो, हमारा कब्जा रहनेे दो, बस इतना ही...उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिन्दगी गोलियों का निशाना बन जायेगी। आदिवासी इक्कीसवी शदी के लोग थे, एक देश एक कानून वाले, समता और बन्धुत्व के समाज वाले। ‘मानेंगे नहीं मारेंगे भी नहीं’ के वसूल वाले।
उनकी भीड़ पर निशाना साध कर बन्दूकंे चली थीं, भीड़ कभी नहीं मरती, मरते हैं भीड़ के कुछ लोग। और वे मरे थे। कुछ घायल हुए थे। उन्हें मारने के लिए ही बन्दूकें चलाई गई थीं। बन्दूकंे खुद नहीं चलतीं उसे चलाता है आदमी। बन्दूकें अपने लिए शिकार का चुनाव नहीं करतीं, शिकार का चुनाव करता है आदमी। ���
आदमी बन्दूकों का भी चुनाव करता है तथा समय और स्थान का भी। बन्दूकें चलाने वाला आदमी सुनिश्चित करके चलाता है बन्दूकें कि वह बचा रहे साबूत, मर मुकदमे से भी बच जाये। बन्दूकें चलाने का मामला चुनाव का है, चुनाव समय का, स्थान का, प्रयोजन का तथा उससे हासिल हो सकने वाले लाभ का।
आदमी बहुत सारी चीजों का चुनाव करता है। चुनाव करना एक खास मनोवैज्ञानिक उद्यम है जिसे बाजार ने काफी विस्तारित कर दिया है। वह चुनाव करता है नौकरी का, व्यवसाय का, खेती-बारी का, कुर्सी पर बैठाने वाली राजनीति का, इहलोक का परलोक का, मार-पीट तथा कतल का भी।
तो बन्दूकधारियों ने चुनाव कर लिया था कि बन्दूकंे चलानी हैं, गोलियों से सीना छलनी कर देना है दुश्मनों का। अब यह अलग बात है कि कौन सी बन्दूक? बन्दूकंे भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं देशी भी विदेशी भी। गोलियॉ भी कई जात-पात वाली हुआ करती हैं रायफल की अलग, बारह बोर की अलग। बन्दूकों में गोलियॉ होती हैं, वही गोलियॉ जब तोपों में होती हैं तो गोलों में बदल जाती हैं आदमी की तरह। आदमी भी भेष-भूसा और परिवेश से जैसे बदल जाता है वैसे ही गोलियॉ भी बदल जाया करती हैं। खलिहान का आदमी अलग होता है, संसद में बैठा आदमी अलग होता है, आफिस में बैठा आदमी साहब होता हैऔर उसके सामने खड़ा आदमी फरियादी होता है। तो आदमी भी अलग-अलग होते हैं, अलग-अलग अधिकार व कर्तव्य वाले, वैसे अधिकार वाले आदमी हर तरफ मिल जांयेंगे पर कर्तव्य वाले आदमी तो खोज के विषय हैं, ये खोज करने पर भी शायद ही मिल पायें।
बन्दूकधारी संपदा वाले थे, शासन, प्रशासन पर उनका असर था, हत्या करना उनका लक्ष्य था, कोई का बिगाड़ लेगा उनका। उन्होंने आदिवासियों की जमीन खरीद लिया था जिस पर आदिवासी पुश्त दर पुश्त से काबिज थे, वे उस जमीन पर खेती करते थे, उसे हरा-भरा बनाये रखते थे। विवादित जमीन बहुत पहले नहीं जमीनदारी टूटने के समय तक ढूहों वाली थी, जगह जगह पलाश के पेड़ उगे हुए थे, कही पांच फीट ऊपर थी तो कहीं दस फीट गहरी थी जमीन। आदिवासियों ने उसे समतल किया था, कियारियॉ गढ़ा था पसीना बहा कर। तब मशीनों का जमाना नहीं था।
तो हत्या का चुनाव करने के बाद ही बन्दूकें चलाई गईं थीं फिर दस आदमी मारे गये बहुत से घायल हुए, इक्कीसवीं शदी में मध्यकाल का आदिम प्रयोग सफल हुआ। दस आदमियों का मारा जाना चूंकि मध्यकाल की परिघटना माफिक है इस लिए आधुनिक समय के लिए बड़ी खबर है, परिपूर्ण खबर है। खबर के सारे तत्व जैसे घटना, अचरज, अचानक, उन्माद, भयानक, मानवताविरोधी, कानून विरोधी, कानून अपने हाथ में लेना आदि आदि इसमें हैं। खबर में किसी अच्छी कहानी तथा कविता का भी स्वाद होना चाहिए सो इस खबर में भला कैसे नहीं होती!
एक चौंकाने वाली खबर,कृखबर का काम है फैलना, चौंकाना, पसर जाना दिल दिमाग पर। खबरनवीशों ने पूरी ताकत के साथ खबर को फैलाया भी।
खबर ने अचानक जकड़ लिया प्रशासन को, खबर का चरित्रा भी जकड़ने वाला था। और प्रशासन जकड़ गया इस खबर से।कृचूॅकि यह खबर है इस लिए इसमें खबर का कारण है जमीन कब्जा करना। फिर भी जॉच होगी। जॉच पड़ताल का क्या... यह तो सत्ता का कौतुक भरा उद्यम है। कुछ न कुछ तो पता चल ही जायेगा। दस आदमी मारे गये यही सच है, इस सच के अगल बगल ही जॉच, मुकदमे, उचित, अनुचित, न्यायायिक, अन्यायायिक आदि मुद्दे स्वतः खड़े हो जायेंगे। आदमियों का मारा जाना मानव सभ्यता के लिए कोई नई बात नहीं है। आदमी तो हर काल में मारे जाते रहे हैं चाहे सत्ता किसी भी मिजाज की रही हो, मुगलों की या अंग्रेजों की किसी की भी। वही दस आदमी अगर आतंकवादी होते तो बात दूसरी हो जाती। झूम उठता पूरा देश, नाचने लगती शहरों की गलियॉ, ढोल-नगाड़े बजने लगते, कवितायें सड़कों पर टहलने लगतीं किताबों से बाहर निकल कर। पर वे आतंकवादी नहीं थे,
वे आदमी थे, गरीब थे, किसान थे, आदिवासी थे, उनके चेहरों पर गरीबी की झुर्रियॉ थीं, ऑखों में विकसित होने की काली बदरियॉ थीं, वे भगवान भरोसे रहने वाले लोग थे। जीवन जीने के मनोरमों व उत्सवों को वे प्रार्थना-गीतों के जरिए मनाने वाले थे सो मारे गये। कॉप गया पूरा जनपद। हल्दीघाटी गॉव भी कॉप गया। कवितायें वहीं कहीं कोने में दुबकी पड़ी रह गईं लाशों के अगल-बगल। कई सवाल आसमान में परिन्दों की तरह उड़ने लगे। परिन्दे भी कॉप गये होंगे जब आवाज सुने होंगे बन्दूकों की, बन्दूकों की आवाज होती भी है कॅप-कॅपाने वाली, डराने वाली। आसमान में उड़ते सवालों ने जनपद के परिक्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया। एक चेहरे से दूसरे चेहरे तक सवाल कूदने-डाकने लगे, लगे डराने लोगों को। बन्दूकों की आवाजें अचानक भयानक सवालों में बदल गईं सवाल भी यक्ष-प्रश्न की तरह जिसका उत्तर देना करीब करीब मुश्किल।कृ
क्यों गरज गईं बन्दूकें? एक ही जबाब था....जमीन कब्जियाने के लिए... जमीन कब्जियाने के लिए या देश कब्जियाने के लिए ही बन्दूकंे चलती हैं, यही तो खेल है धरती का और उसकी कथा का।
‘बन्दूकें क्यांे चलाई जाती हैं? कौन चला सकता है बन्दूकें, बन्दूकें लोंगों को आखिर क्यों दी जाती हैं, क्या बन्दूकों ने मानव सभ्यता का कभी भला किया है? आखिर वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने बन्दूकें बनाईं होगी, क्या वह सुन रहा होगा बन्दूकों की धॉय धॉय, कहीं बहरा तो नहीं हो गया होगा, पता नहीं, वह बन्दूक का निर्माण कर विलीन हो गया प्रकृति में। उसे क्या पड़ी कि आये मानवों की धरती पर और अपने उत्पाद का बाजार बनाये, उसकी समीक्षा करेकृबम, बन्दूक, बारूद बनाने की कला का खोज करने वाले आखिर क्यों आयें धरती पर, अपनी लिखी धरती-कथा पढ़ने के लिए। उनकी बनाई बन्दूकें उन पर भी चल सकती हैं किसी दिन।आखिर क्या करती हैं बन्दूकें? कैसी होती हैं बन्दूकें? सवाल भी किसिम किसिम के, लोग भी किसिम किसिम के, बन्दूकें भी किसिम की। बन्दूकों से पैदा किया गया एक सवाल तथा सबसे जरूरी सवाल कि बन्दूकें क्यों चलाई गईं? क्या जरूरत थी बन्दूकों को चलाने की यह कैसे पता चलेगा कि बन्दूकें क्यों गरजीं, उनमें से गोलियॉ क्यों निकली, किसने चलाया बन्दूकें, क्यों चलाया बन्दूकें क्या बात-चीत के द्वारा बन्दूकों को चलाया जाना रोका नहीं जा सकता था। कहते हैं संवाद के जरिए हर किसिम के प्रतिवाद को रोका जा सकता है, संवाद ही तो कर रहे थे हल्दीघाटी के सरवन, बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू,बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवानभी पर क्या हुआ? संवाद गायब हो गये, मर-बिला गये कहीं, वहां बन्दूकी संवाद आ गया, धॉय धॉय वाला।
आदमी और आदमी के बीच संवाद गायब हो चुके हैं। आज का आदमी संवाद नहीं करता, वह बन्दूकों से संवाद करता है तथा बन्दूकी समाधान का विकल्प चुनता है। आखिर ऐसा क्यों करता है आदमी?
क्या आप यह नहीं जानना चाहेंगे कि बन्दूकें कहां चलीं? क्या किसी पानीपत के मैदान में या हल्दीघाटी के मैदान में। इसकी जरूरत क्या है? बन्दूकें कहीं भी चल सकती हैं, किसी गॉव में, किसी शहर में, किसी मुहल्ले में। हल्दीघाटी जैसा मैदान कहीं भी बनाया जा सकता है और एक शान्तिप्रिय आदिवासी गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया तभी तो बन्दूकें चलीं।
आप अहिंसक हैं तो भी कल्पना कर सकते हैं कि बन्दूकें अधिकांश मामलों में सत्ता हासिल करने के लिए ही चलाई जाती हैं आत्मरक्षा के लिए नहीं के बराबर। मान लेते हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव में बन्दूकें चलीं। एक ऐसे गॉव में जिसका भूगोल हजारों एकड़ के रकबे वाला है। फिर आप जानना चाहेंगे कि वह गॉव क्या है? राजस्व गॉव या वन ग्राम। गॉव भी बटे हुए हैं किस्मों में। फिलहाल हल्दीघाटी का मैदान बना वह गॉव राजस्व ग्राम है।
खैर छोड़िए कानूनी लफड़ों को आइए चलते हैं उसी गॉव में। उस गॉव का नाम अपनी समझ के लिए कुछ भी रख सकते हैं आप। यहां गॉव का नाम बताना जरूरी इसलिए नहीं है कि वहां सरकारी जॉच चल रही है, सरकार पता लगा रही है कि उस गॉव में जमीन का जो झगड़ा है वह किस लिए है? कब से है क्या जमीनदारी विनाश अधिनियम के लागू होने के पहले से है या उसके बाद से है? कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, मुकदमे कायम हो चुके हैं। गॉव के भूगोल को कानूनी बनाये जाने का प्रस्ताव है सरकार के पास। गॉव के इतिहास के बारे में सरकार चिन्तित नहीं है, इतिहास तो बनता बिगड़ता रहता है पर भूगोल नहीं बिगड़ना चाहिए।
मान कर चलिए कि वह गॉव भी ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला गॉव है, जंगल से घिरा, चारो तरफ खेत ही खेत, हर तरफ फसलें हसी ठिठोली करती मुस्कराती, अपने उन्माद में कजरी, करमा गाती, खुद को दुलारती सहलाती, गॉव वाले भी मगन, अमन चैन से निवसते, खेती-बाड़ी करते।कृ
किसी जमाने में राजा की दान की हुई जमीन,बाप-दादों से आबाद अपने फुसहा मकानों के साथ। एक घर दूसरे घर की निगरानी करता, गलियॉ घरों के मोड़ों को बाटती, अलगियाती। गॉव केवल गॉव था, गॉव खुले आसमान के नीचे था पास ही में जंगल हर-हराता, जंगल में आने वालों को गुदगुदाता। गॉव कागज पर था कि नहीं किसे पता, अगर गॉव है तो उसे कागज पर होना चाहिए। हम सभ्य हैं हमारे यहॉ कागज बोलते हैं, वे अधिकार हक-हकूक बाटते हैं, गॉव को नहीं पता और गॉव वालों को भी नहीं पता।कृ
एस.डी.एम. तथा डी.एम. परेश्शान परेशान, परेश्शान तो एस.पी. भी हैं।कृबातें हो रही हैं, बातें ओर-छोर वाली हैं जो केवल क्यों पर टिकी हुई हैं।कृएक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी का मैदान क्यों बना दिया गया? कैसे उतरा गया उस गॉव में मघ्यकाल? आज के लोक-तांत्रिक समय में।कृकृ
यह क्या हो गया? दस लोग मारे गये, आखिर क्यों?कृ
यह ‘क्यों’ चाहे किसी को मालूम हो न हो पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को तो मालूम ही था, मालूम था कि गॉव में जमीन के बाबत विवाद है, मुकदमा चल रहा है। जमीन का कब्जा करने के लिए बन्दूकधारी आये और लोगों को गोलियों से भून कर चले गये।
एस.डी.एम. ज्यादा परेशान हैं, वह गॉव उनके क्षेत्राधिकार में पड़ता है। खबर सुनते ही बेहोश हो गये....कृ
‘अब तो नौकरी गई’ नौकरी टूट जाने की कराह निकली’कृबेमतलब मास्टरी छोड़कर राजस्व विभाग में चले आये। इस तरह के बवाल मास्टरी में तो नहीं थे। वहां केवल छात्रों को पढ़ाना था और यहां तो किसिम किसिम के बवाल।’कृ
बिना देर किए जिले के आला अधिकारी गॉव के पीड़ित भूगोल पर हाजिर हो गये। फिर तो गॉव का भूगोल घिर गया बूटों से, सत्ता के ओहदेदारों से, कानून के रखवालों से, प्रतिभा-परीक्षा पास कर चुके अधिकारियों से। गॉव के आकाश में कानूनी राज के अभिलेख खुद बखुद फड़फड़ाने लगे परिन्दों की मानिन्द। कदम कदम पर भीख मॉगती कानून की धारायें, गिड़गिड़ाती कानून व्यवस्थाओं की मान्यतायें तथा अदालती फैसले, वहीं कहीं कोने में दुबके बैठे खुद पर तरस खाते और आसमान सभी को निहारता उन आदमियों को ताकता जो कुछ देर पहले सॉसें ले रहे थे, हस बोल रहे थे, प्रार्थनायें कर रहे थे...कृ
‘हमें मत मारो,कृहमें मत मारो’ रिरिया रहे थे’कृकृ
‘यह जमीन न तुम ले कर जाओगे और न ही हम ले कर जायेंगे, हमारे बाल-बच्चे अनाथ हो जायेंगे। हम आपस में लड़ कर मर जायेंगे पर जमीन नहीं मरेगी। मुगल चले गये, अंग्रेज चले गये पर यह मुई जमीन आज भी है जस के तस है। सो भइया मत मारो, मत मारो किसी को। मुकदमा चल रहा है चलने दो उसका फैसला तुम भी मानो हम भी मानें।’
पर कौन सुनता है रिरियाते चिचियाते आदमी की फरियाद।
बन्दूकें कहां सुनती हैं किसी की चीखें, गोलियॉ कहां सहलाती हैं किसी का शरीर, वे तो छेदती हैं और छेदती हैं सिर्फ छेदती हैं। महज तीन घंटे के भीतर गॉव का भूगोल हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हो गया। वहां की घरती पर उतर आया मध्यकाल, हमलों व हमल वाला, सिर्फ मारो-काटो, जीतो और जीतो। बहुत मुश्श्किल से हमल तथा हमले के खिलाफ मानव सभ्यता ने भाई-चारा विकसित किया था, लोकतंत्रा आया था। खतम हो गया लोकतंत्रा, खतम हो गया भाई-चारा। रोने लगा पूरा गॉव। मारने वाले भाग गये, उन्हें भागना ही था। वे जानते थे कि वे अपराधी हैं, वे किसी को गोलियों से भून नहीं सकते, अपने हाथ में कानून नहीं ले सकते। वे आश्रयदाताओं की तलाश करेंगे। वे उन पनाहगाहों में शरण लेंगेे जहॉ वे हर तरह से सुरक्षित रह सकें, उनका बाल-बॉका न हो सके।
वैसे ऐसे पनाहगाहों की कमी नहीं, हर तरफ बिखरे पड़े हैं। ये पनाहगाह आज
के नहीं हैं आदिम जमाने से हैं। अब तो इनकी शक्लें बदल गई हैं, नये रंग रूप के हो गये हैं इनके मालिक। लगभग सभी जगह हैं, छोटे से कस्बे से लेकर राजधानी तक हैं। पनाहगाहों के मालिकों में अधिकारी हैं तो कुछ लोकप्रतिनिधि तथा कुछ धन्ना सेठ वगैरह भी हैं। पनाहगाहों की पहचान करना भी एक विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव करता है ये चूॅकि रंग रूप, चाल चलन आदि बदलने में माहिर हुआ करते हैं इसलिए इन्हें सरलता से नहीं पहचाना जा सकता। ये तो इक्कीसवीं शदी है इस शदी में तो कुछ देश भी अच्छे पनाहगाह की योग्यता वाले हैं। देखते ही देखते उस जंगली गॉव के भूगोल पर शोकगीतों वाली, ऑसुओं वाली, यातना के जख्मों वाली एक नई दुनिया उतर आई। पूरा परिदृश्य ही बदल गया गॉव का। जगह जगह बिखरी पड़ी लाशों के रूप में मानव देह, देह पर चीखते वंशज, भाई, पत्नी, बच्चे, गोतिया, पड़ोसी..।कृ
देह संवेदनहीन, वह नहीं बोलेगी, वह नहीं बतायेगी अपने बारे में, देह का काम खतम, देह का बस यही काम है एक दिन बोलना बन्द कर दो विलीन हो जाओ अनन्त में। दमन का पुराना इतिहास आधुनिक ढंग से उतर आया था उस गॉव के भूगोल पर। मानो वहां आदमी और आदमी का युद्ध नहीं इतिहास और भूगोल का युद्ध हुआ हो, सहनशीलता बनाम दुःसाहस का युद्ध हुआ हो।
भूगोल परवाह नहीं करता इतिहास का, वह तो चौहद्दी से बंधा होता है, भूगोल निर्मित करने की संस्कृति युद्ध कराती है और इतिहास निर्मिति की संस्कृति युद्धों को टालती है। यह अलग बात है कि भूगोल गढ़ने के लिए इतिहास में मनमुताबिक दरारंे पैदा कर दी जाती हैं।
इतिहास की दरारों में फसा भाई क्या करे, मॉ क्या करे, पत्नी क्या करे, बच्चे क्या करें? समय की बात है, समय गोलियों के साथ आया और निरीह तथा निहत्थे लोगों को भून कर चला गया। दमन की आधुनिक दुनिया की तस्वीर व पोस्टर फैल गये धरती पर। गॉव का एक एक कोना दमन के पोस्टर में तब्दील हो गया। ये पोस्टर फड़फड़ायेंगे, नाचेंगे, कूदेंगे। धरती पर मध्यकाल की हमले की लिखी कहानियॉ लिखी हुई हैं पोस्टरों पर, उसे कोई पढ़ेगा, कोई उसे कुचलते हुए निकल जायेगा। इतिहास बन चुकी धरती-कथा कोई पढ़े चाहे न पढ़़े का फरक पड़ता है भूगोल पर, भूगोल तो खुद इतिहास बनाता रहता है, कभी मुगलों का, कभी अंग्रेजों का, कभी किसी का। पर नहीं धरती पर लिखी धरती-कथा को पढ़ने अहिंसक व उदार लोग हैं जो पढ़ेंगे धरती-कथा को या कि पत्थरों पर लिखे पत्थर-कथा को। यही कथायें तो इतिहास बनाती हैं और भूगोलों के पार चली जाती हैं। जिसे सब पढ़ते हैं पर आदमी सारे अधिकारी परेश्शान हैं, उन्हें नहीं सूझ रहा कि क्या करें? अपराधी भाग चुके हैं वहां केवल पीड़ित लोग हैं बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू हैं, सारेे परिजन हैं। अधिकारियों की समझ में आ चुका है कि वे उलझन में फस गये हैं, इस उलझन को सुलझाना आसान नहीं होगा। उन्हें पता है कि वे किसी समय यहां से हटाये जा सकते हैं, ट्रान्सफर हो सकते हैंे, कहीं दूसरी जगह पोस्टिंग हो सकती है। फिर नये अधिकारी आयेंगे उनके सामने यह घटना नहीं होगी, जाने वे किस तरह से इस घटना को विश्लेषित करें, यह सब उनके विवेक पर निर्भर करेगा। अरे! ट्रान्सफर ही क्यों सस्पेन्ड भी किया जा सकता है उन्हें, पता नहीं किस तरह की जॉच हो, जॉच भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं। अधिकारी मन ही मन थर-थरा रहे हैं पर थर-थराना रोके हुए हैं कहीं गॉव वाले देख न लंे फिर क्या होगा उनके रोब-दाब का?कृरोब-दाब ही तो प्रशासन चलाता है, जिले की चौदह पन्द्रह लाख की आबादी को महज सौ, दौ सौ अधिकारी कैसे संभल सकते हैं?
लाशें जगह जगह पड़ी हुई हैं, कहीं सरवन की लाश है तो कहीं रजुआ की, तो कहीं सुमेरना की, कहीं लखना की, कहीं कलुआ की तो कहीं नन्दू की, कहीं बुद्धन की तो कहीं बलेशर और सन्तू की।
पुलिस एक एक लाश का मुआयना कर रही है, देख रही है गोलियों के घाव। लाशें नहीं बोलतीं पर पुलिस वालों के लिए बोल रही हैं, वे लाशों की बोली समझने में माहिर होते हैं। समझ रहे हैं कि इन निहत्थों की हत्या करके अपराधियों ने जघन्य काम किया है, वे मन ही मन तय कर रहे हैं कि अपराधियों को किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। वे जुट गये हैं सबूत इकठ्ठा करने में पोस्टमार्टम भी कराना होगा, इसके पहले सबूतों को सहेज लेना ठीक होगा। अधिकारी संकेतों में बोल-बतिया रहे हैं, ये करो वो करो आदि, आदि। कोई खुल नहीं रहा है। वे जानते हैं आज के हल्दीघाटी के मैदान का मामला राणाप्रताप वाले हल्दीघाटी जैसा नहीं है, उस मामले में तो पुलिस की कोई भूमिका थी ही नहीं। वह तो वीर-गाथा काल की घटना थी। उसमें सभी वीर थे जो मारे गये वे भी जो बचे रह गये थे वे भी। युद्धों की जॉच-पड़ताल का चलन पहले तो था ही नहीं, उस समय की सभ्यता को जॉच पड़ताल स्वीकार्य नहीं था। जॉच-पड़ताल तो लोकतंत्रा का एक विशेष उपक्रम है। अब लोकतंत्रा है, ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस को ही जिम्मेवार ठहराये जाने का चलन है। सो पुलिस वाले कॉप रहे हैं पर मजा यह कि उनकी कॅप-कॅपी दिख नहीं रही है। कॅप-कॅपी विलुप्त है वर्दी में। वे बहादुरों की तरह लाशों का मुआइना कर रहे हैैं, तलाश रहे हैं सबूत, बन्दूकें तलाश रहे हैं, गोलियों के निशान तलाश रहे हैं।
अब क्या तलाश रहे हो भाई! कतल के बाद मुआइना कर रहे हो अगर पहले ही चेहरे पर की झुर्रियों का इतिहास पढ़ना तुम्हें आता तो सारा कुछ बूझ जाते पर करोगे क्या... चेहरे की झुर्रियों का इतिहास पढ़ते हैं कवि, लेखक जिनके पढ़ने न पढ़ने का कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक अर्थ नहीं। धरती पर लिखे हमले के आख्यानों को तो केवल भूगोल ही पढ़ सकता है, वही कर सकता है इन्द्राज के रूप में उसका लिप्यातंरण। पर सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू तो कुछ भी नहीं पढ़ पायेंगे, उनका नाम धरती-कथा में दर्ज होगा कि नहीं क्या पता...वे तो शहीद हो चुके हैं अपनी ‘धरती मॉ’ को बचाते हुए, मिल
चुके हैं माटी में, माटी बन चुके हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता...
आइए देखते हैं क्या होता है आगे?
‘नाचने लगीं वर्दियॉ ‘करमा नाच’ का कहीं
अता-पता नहीं आइए देखते हैं किधर हैं करम बाबा?’
‘धरती माई’ रो रही हैं अपनी कथा के पात्रों को लाशों में तब्दील हुआ देख कर, उन्हें अपने होने पर दुख हो रहा है, उन्हांेने तो अपना रूप उर्वर इसलिए सृजित किया है कि लोग खेती कर सकें, अन्न पैदा कर सकें, भूख मिटा सकें पर नहीं...लोग तो खुद धरती पैदा करने वाले बन गये हैं, कागज पर मालिकाना चढ़वा ले रहे हैं, धरती माई कराह उठीं.. इस दुनिया ने मुझे धरती के बजाय कागज बना दिया है। धरती से तो स्वर्ग ही अच्छा था भले ही कुछ लोग वहां उन पर ताने मारा करते थे तो क्या हुआ यहां जैसा खून-खराबा तो वहां नहीं था।’
गॉव के सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू गोली के शिकार हो चुके हैं वे बेचारे अपनी जान बचाने के लिए भाग भी नहीं सके थे। प्रशासन सक्रिय हो गया है। बूटों व बन्दूकांे की गंध पूरे गॉव में पसर चुकी है। वर्दियॉ इधर उधर नाच-कूद रही हैं वे कभी लाशों की तरफ जा रही हैं तो कभी किसी तरफ। शासन के रंग से रंगी वर्दियों की धमक सूरज की किरणों की तरह फैल चुकी है धरती पर। मृतकों के आश्रित शोक-गीत में तब्दील हो चुके हैं। आसमान में चीखें तडपड़ा रही हैं उन्हें भविष्य दीख रहा है क्या होगा अब आगे?
आगे जॉच है, मुकदमा है, मुकदमे के अगल-बगल गुगली करती कहानियॉ हैं, गवाही है, बहस है फिर फैसला है। कब तक चलेगा मुकदमा? मुकदमे में क्या होगा अदालत को भी नहीं पता...पता होगा भी कैसे सारा कुछ निर्भर है गवाहों पर, गवाहों का क्या? वे न भी बदलना चाहें तो भी समय के खेल का शिकार तो हो ही सकते हैं, समय किसे नहीं बदल सकता, समय बदल देता है सारा कुछ, यह समय ही है जिसने एक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना दिया।
कुछ पुलिस वाले लाशों की पहचान में जुटे हुए हैं। परिजन एक एक लाश की पहचान करा रहे हैं पुलिस को। सभी के नाम मय वल्दियत दर्ज किया जा रहा है कागज पर साथ ही साथ उमर, रंग-रूप, कद आदि भी लिखा जा रहा है। गनीमत है कि लाशें छत-विछत नहीं हुई हैं, वे साबूत हैं, देखने पर लग रहा है कि बोल देंगी घटना के बारे में बता देंगी कि कैसे उन्हें भूना गया गोलियों से। अगर वे जिन्दा हो जायें तो बता देंगी हत्यारों के बारे में, लाशों को पता है कि हत्यारे कहीं और जगह के नहीं गॉव के ही हैं। पर लाशें तो लाशें हैं, वे नहीं बोल सकतीं कुछ भी, वे इहलोक से बाहर निकल चुकी हैं। इहलोक तो जिनका है वे जानें, समझें।
जॉच-पड़ताल से जुडे़ सारे काम सिपाही कर रहे हैं। सिपाही भी किसी न किसी गॉव के लोग ही हैं गोबर-माटी से सने, लिपे-पुते, सरकारी काम करते हुए गरिया भी
रहे हैं, उन्हें बाप-दादों की कथनी याद आ रही है...‘झगड़ा लगावैं तीन, जर, जोरू औ’ जमीन’ साले मार-कतल करेंगे और परेश्शान हम लोग होंगे फिर उन्हें ख्याल आता है कि वे इसी काम के लिए ही तो नियुक्त किये गये हैं, यही सब करना है उन्हें। सिपाही तो सिपाही, कम पढ़े-लिखे, बाप-दादों की कथनी को दार्शनिकता से जोड़ सकते तो वे आगे की गुनते फिर बोलते...जर, जोरू, जमीन ही नहीं, विवेकाधिकार, विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार भी लोकतंत्रा के लिए नहीं किसी भी मानव-सभ्यता के लिए बहुत ही घातक हैं, इन्हें खतम होना चाहिए। उनमें एक सिपाही तो माथा पकड़ कर बैठा हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे। साल भर पहले ही वह सिपाही के पद पर भर्ती हुआ है। उसे नहीं पता कि सबूत क्या क्या होते हैं, सबूतों की शक्लें क्या होती हैं? उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा। अपने से सीनियरों के साथ वह लगा हुआ है, सीनियर जैसा उसे सहेज रहे हैं वैसा ही वह कर रहा है।
लाशों को कपड़े में बॉधा जाना है, कैसे बंधायेगा कपड़ा जो खुल न पाये और उस पर पुलिस की सील भी लग जाये, वह सोच कर कॉप रहा है तथा छिपाने की कोशिश भी कर रहा है कि उसकी कमजोरी उसके सीनियर ताड़ न जायें सो वह चालाकी से इधर-उधर सरक जाया करता है। लाशें महकनी शुरू हो चुकी हैं, मक्खियॉ मडरा ही रही हैं अगल-बगल। बड़े अधिकारी मौंके पर हैं पर इधर-उधर वे लाशों से दूर हैं उनके पास तक महक जा रही है कि नहीं सिपाही अनुमान लगा रहे हैं। महक तो उनके पास भी जा रही होगी। नया सिपाही कुछ काल्पनिक किस्म का है, परमात्मा के करतबों पर यकीन करने वाला वह समझना चाह रहा है आखिर मार-पीट और कतल काहे हुआ कोई न कोई कारण तो रहा होगा ही पर पूछे किससे, यह भी भला पूछने की बात है।
वैसे पुलिस विभाग में हर तरह के काम के लिए कुछ विशेषज्ञ तो होते ही हैं। दो तीन सिपाही विशेषज्ञ हैं भी जो सभी लाशों की निगरानी कर रहे हैं। उन्हें कपड़ों से बंधवा रहे हैं उन पर सील-मुहर लगवा रहे हैं। और जो दूसरे किस्म के विशेषज्ञ सिपाही हैं वे सबूत, बयान आदि इकठ्ठा करने में जुटे हुए हैं। पुलिस की सक्रियता तथा तत्परता अपने आप उद्धरणीय बनती जा रही है। एस.पी. तथा डी.एम. पीड़ितों के परिजनों को दुलारने, सहलाने में लगे हुए हैं तथा समझा रहे हैं कि किसी भी हाल में अपराधियों को छोड़ा नहीं जायेगा। अपने पद की कथित गरिमाओं से अलग वे धर्म-गुरुओं की तरह बन चुके हैं, उनके मीठे बोल मनोचिकित्सकों को भी धत्ता पढ़ा सकने की क्षमता वाले हैं। डी.एम. साहब तो एस.पी. साहब से दो बॉस आगे निकलते जा रहे हैं।कृवे मृतकों के छोटे-छोटे बच्चों के साथ हैं, मृतकांें की पत्नियॉ भी उनके पास ही हैं, मॉ की गोदी में बच्चा रो रहे हैं, उन्हें दुलार रहे हैं डी.एम. साहब।
सारी लाशों को कपड़े से ढका जा चुका है। कपड़े खुले न रहें इस लिए उसे बॉध भी दिया गया है शवदाह के लिए ले जाने वाली अर्थियों की तरह। कपड़े गब गब सफेद हैं उन पर खून के धब्बे लगते जा रहे हैं चूूॅकि लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाया जाना है इसलिए काफी सतर्कता बरती जा रही है जिससे कि लाशेें सुरक्षित ढंग से पोस्टमार्टम घर तक ले जाई जा सकें।
डी.एम. व एस.पी. दोनों वर्तमान में नहीं हैं। उनसे उनका वर्तमान इस भयानक तथा आतंककारी घटना ने छीन लिया है। वे कल देख रहे हैं उसी के बारे में सोच रहे हैं। कल क्या होगा इसके बारे में वे लोग अनुमान लगा रहे हैं। अनुमान बहुत ही खतरनाक रास्ते पर दौड़ रहा है बिना विराम। वे कॉप रहे हैं आने वाले कल के अनुमानों को विखंडित करते हुए चूॅकि वे जिले के आला अधिकारी हैं इसलिए अपने कॉपने को प्रदर्शित नहीं होने दे सकने के वे बड़े कलाकार भी हैं सो उनकी कॅप-कपियॉ उनके चेहरे पर दबी कुचली पड़ी हुई हैं। परिजन दुखों में हैं, मरद तो कुछ ठीक भी हैं पर ओरतें...औरतें तो लगातार विलपने व कलपने में हैं। एक वरिष्ठ महिला बुधनी अपने बेटे सरवन की लाश के पास में है, स्वस्थ है, वह पूछती है एस.पी.साहब से...कृ
‘अब का होगा साहेब! लोग बोल रहे हैं कि लाशों का पोसटमारटम होगा। काहे करायेंगे साहेब पोसटमारटम? पोसटमारटम माने चीर फाड़ नऽ। अब लशिया काहे चीरेंगे-फाड़ेंगे साहेब! उसे तऽ साबूत रहने दीजिए। लाश चीरने-फाड़ने से का फरक पड़ि जायेगा साहेब! हम लोग बोल रहे हैं नऽ गोली चलाने व झगड़ा लगाने वालों के नाम। किसने गॉव में बवाल करवाया सभै कुछ तऽ हम लोग बताय रहे हैं साहेब! फेर काहे होगा चीर-फाड़, चाहे पोसटमारटम।’
सरवन की मतारी एस.पी. साहब से बतिया ही रही थी कि एक दूसरी महिला तनबुड़ुक की भउजाई चीखने लगी.....
‘आप लोग चले जाइए साहेब! अब आगे कुछ नाहीं होगा हमलोग लाश नहीं ले जाने देंगे, लाश हमारी है, आपकी नाहीं है। आजु आपलोग आये हैं गॉयें में जब हम लोग चिल्लाय चिल्लाय के गोहार लगा रहे थेे कचहरी में के साहब नियाव करो, कुछ लोग हमार गॉव उजाड़ना चाह रहे हैं, जमीन कब्जियाने की धमकी दे रहे हैं, तब कउनो साहेब धियान नाहीं दिये। आपलोग पहिलहीं आय गये होते तो झगड़ा फरियाय गया होता। अब तो दस ठे लाल मरि गये तब आये हैं फूॅकने-तापने।’
रजुआ की मतारी रो रही है रजुआ की लाश के पास। एस.पी.साहब उस दूसरी महिला को समझाने में जुट गये..
‘माता जी! आप लोगों के साथ अन्याय नहीं होगा धीरज रखिए।’
रजुआ की मतारी समझदार है, है तो भुच्च देहाती फिर भी...कृ
‘का धीरज रखें साहेब! धीरज ही तो धरे हुए हैं अब तक। जब बारह साल की थी तबै बिआह कर आई थी गॉव में। हम जवन खेत आजु जोत रहे हैं उहै हमरे ससुरो भी जोत रहे थे आजु ऊ नाहीं हैं, चार साल हुआ ऊ बेमारी में मरि गये। आजु हमार उमर सत्तर के पार है साहेब! हमार सासू भी इहै बताईं थीं हमको के हमारे पास दस बिगहा जमीन थी। हमरे ससुर दो भाई थे दोनों लोगों में पॉच पॉच बिगहा बट गई। उहै पॉच बिगहा हमरे पास है साहेब जउने के हम लोग जोत रहे हैं ओहू पर झगड़ा लग गया है। लेखपालउ बोल रहा है कि ऊ जमीन पर तूॅ लोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। नामय चढ़वाने के लिए हमलोग कचहरी दौड़ रहे थे, नाम चढ़ि गया होता तऽ हमार बचवन मारे न जाते साहेब!’ फिर आगे नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, फफक फफक कर लगी रोने।कृ
रोने को तो वहां उपस्थित सारी औरतें रो रही थीं। उनके रिश्ते सिर्फ अलग थे, कोई मॉ थी तो कोई पत्नी, कोई बिटिया कोई बहन करीब करीब सभी रिश्तों में थीं। रिश्तों में काहे नाहीं होतीं। एक ही गॉव था, एक ही बिरादरी थी, रियासत के जमाने से ही पूरा गॉव रियासत के बफादारों में था। रियासत ने ही उस गॉव को बसाया था, खेती-बारी करने के लिए, सभी को जमीन दिया था। रियासत की परंपरा भी थी कि रियासत में बसने वाले सभी बालिगों को एक‘हल’ की जोत तक की जमीन खेती-बारी करने के लिए दी जाती थीे। रियासत का यह नियम जमीनदारी टूटने तक चलता रहा था। लेकिन विवादित गॉव का मामला अलग था। इस गॉव को रियासत के राजा ने बसाया था। दरअसल गॉव बसाने की एक कहानी है। राजा खुश तो खुश, नाराज तो नाराज। नाराज हुए तो गॉव के गॉव आग के हवाले करवा दिया खुश हुए तो गॉव को आबाद करा दिया, धन-दौलत दे दिया, जगह-जमीन दे दिया वही हुआ। राजा साहब खुश हो गये, खुश इस लिए हो गये क्योंकि उन्होंने शेर का शिकार कर लिया था और यह सब हुआ था विवादित गॉव के आदिवासियों के अथक प्रयास से। यह अलग बात है कि एक आदिवासी को जान गंवानी पड़ी थी। हॉका करना आसान होता नहीं। उस जमाने में गॉव के गॉव निकल पड़ता था रियासत के आदेश पर, गॉव वाले तैयार बैठे रहते थे हॉका करने के लिए। जब तक हॉका चलता है तब तक रियासत की तरफ से गॉव वालों को भोजन-पानी दिया जाता है।
राजा साहब निकल पड़े हैं शिकार की यात्रा पर। गॉव वालों को पता होता है कि शेर किधर से निकलते हैं, कहॉ पानी पीते हैं, कहॉ रहते हैं, कहॉ शिकार करते हैं। शेर होने के संभावित स्थान के आस-पास मचान बनाया जा चुका है। चार-पॉच दिन से वहां मचान बनाया जा रहा था। मचान काफी ऊॅचे बनाया गया है, राजा साहब और उनके कुछ खास उस पर बिराजेंगे।
हॉका शुरू हो गया है। ढोल-नगाड़े बजने लगे हैं, अलग किस्म का हल्ला भी किया जाने लगा है। करीब पचासों आदिवासी एक टोली में तो दूसरी टोली में भी करीब करीब उतने ही आदमी। जंगल दहल रहा है, पेड़ों की पत्तियॉ कॉपने लगी हैं, उनकी श्शाखायें हिल रही हैं, रियासत की धमक जंगल को अपनी जकड़ में ले चुकी है। राजा हैं तो सभी के राजा हैं पेड़, पौधे, नदी, नाले, पहाड़. सभी के, उनके सम्मान में जंगल की हरियाली नतमस्तक हो चुकी है, हवा मन्द-मन्द बहने लगी है पत्तियों की आपसी टकराहटें मादक धुनंे प्रवाहित कर रही हैं। यह हॉका जंगली शेर बनाम राजा रूपी मैदानी शेर के बीच का है। मैदानी शेर निकल चुका है जंगली शेर की तलाश में। जंगली शेर के राज में वीरता की कहानियों के अलग किस्से हैं तो मैदानी क्षेत्रा के शेर के राजा की भी वीरता की कहानियॉ अलग किस्मों की हैं। देखना बाकी है कि जंगली शेर अपनी माद से बाहर निकलता है कि नहीं..अनुमान तो है कि जंगली शेर अपनी मॉद से बाहर निकलेगा । हॉका हो रहा है, नगाड़े बज रहे हैं, जंगली शेर बेचैन हो जाएगा, उसकी बेचैनी उसे भागने के लिए विवश कर देगी फिर वह मॉद से बाहर निकलेगा और मारा जाएगा। वही हुआ, जंगली शेर अॅधेरा होते होते तक मॉद से बाहर निकला और सीधे मैदानी क्षेत्रा के राजा के मचान पर धावा बोल दिया फिर क्या था..राजा तो तैयार बैठे थे...धॉय, धॉय, धॉय और जंगली शेर ढेर। उस पर बरस गईं कई गोलियॉ वह भी एक साथ। हॉके के पांचवंे दिन राजा को शिकार मिला, राजा खुश खुश्श। गॉव वालों को राजा ने अपने महल पर दावत दे दी। दिन भी तय हो गया।
महल पर गॉव वाले बन-ठन कर पहुंचे। उन्हें महल के आहाते में बिठाया गया। दावत यानि खान-पान रात में था इसके पहले नाच-गाना वह भी मैदानी इलाके वाला नहीं आदिवासी इलाके वाला। ढोल-नगाड़े बज उठे, मानर भी बजने लगा। गैसें जल गईं। आदिवासी नाच करमा शुुरू हो गया। एक से एक गाने, एक से एक ताल, धुन बाहर निकल रही है, पूरा महल मादकता में डूबा जा रहा है। पैर के घुंघरू अलग तरह से मन मोह रहे हैं, आदिवासी महुआ के मादकता से सरोबार हैं उधर महल कीे रानियॉ खिड़कियों के सहारे हैं, वे भी झूमने लगी हैं पर अपना झूमना बचा बचा कर वे इधर उधर हो रही हैं कहीं कोई देख न ले। महल के आहाते में रीतिकाल उतर आया है, अजीब तरह का प्रेम-रस बरसने लगा है। अभी राजा बाहर नहीं निकले हैं ज्योही वे बाहर निकलेंगे दरवान महराज के आने की खबर देगा, दरबार में महाराज पधार रहे हैं की तर्ज से अलग हुजूर पधार रहे हैं।
महाराज महल से बाहर निकल आये हैं। आहाते में उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध किया गया है, वे उस पर बिराज गये हैं। उनके अगल बगल वाले भी महाराज के साथ बिराज चुके हैं।कृ
नृत्य-संगीत शुरू हो चुका है।
महाराज भी मगन हुए जा रहे हैं। संगीत की मादक घुनें उनके चेहरे को बदलने लगी हैं। नृत्य की मादकता उन्हें महल के अन्तःकक्ष में धकेले जा रही है पर करें क्या? कैसे जायें महल के अन्तःकक्ष की तरफ। उनकी परजा उनके लिए आई है, उनके लिए नाच रही है, राज-सम्मान भी तो काई चीज होती है, सो वे मन मसोस कर बैठे हुए हैं, अन्तःकक्ष के मनोरमों को नाच के मादक दृश्यों से मेल बिठा रहे हैं। मन बोल उठता है....
‘रानियॉ इस तरह का नृत्य नहीं कर सकतीं, वे सीखना भी चाहें तो भी नहीं सीख सकतीं। जो प्रकृति के साथ हैं वही पृकृति का नृत्य कर सकते हैं एकदम से कुदरती, बिना घालमेल वाला। ’
आदिवासियों के नृत्य में तो पता ही नहीं चल रहा कि नर और नारी दोनों अलग अलग हैं, इनका विलयन तो देखते ही बन रहा है। कितना कुदरती है इनका नृत्य! काश! वे कवि होते तो कविता फूट पड़ती पर वे कवि नहीं हैं फिर भी अन्तःमन से कविता का प्रस्फुटित होना वे महसूस रहे हैं।
नृत्य का कार्यक्रम देर रात तक चला फिर खाना-पीना हुआ। रियासत की कचहरी के सामने वाले हाल में आदिवासियों के सोने का प्रबंध किया गया था। रियासत के कारकून आदिवासियों की सेवा में लगे हुए थे। कुछ कारकून तो उनमें ऐसे भी थे जो आदिवासियों से भर मुह बात भी नहीं किया करते थे, हमेशा गालियों से बातें करते थे, वे भी शालीन और संस्कारी बने हुए थे। महाराज जाने क्या सोचें अगर शिकायत हो गई तो...
महाराज दूसरे दिन देर से जगे फिर महल से बाहर निकले, दरबार में आये जहॉ आदिवासी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। महाराज को सलाम करके ही निकलना है पहले कैसे वापस लौटा जा सकता है। आदिवासी महाराज को सलाम किए बिना महल से कैसे लौट सकते थे.. बाप-दादों की परंपरा भला वे कैसे भूलते, यही सब तो है सामंती अनुशासन।
बहुत ही उल्लास से महाराज आदिवासियों से मिले और उनसे खान-पान के बारे में तथा रात में सोने के बारे में पूछा....
आदिवासी गदगद हैं, भर पेट मास, मछली खाये थे, भर पेट दारू पिये थे, इससे अधिक चाहिए भी क्या एक स्वर से बोल उठे...कृ
‘भल खइलौं मालिक! भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’
महाराज ने उसी दिन सभी आदिवासियों को अंग-वस्त्रा तथा कुछ नगदी उपहार स्वरूप दिलवाया फिर आदिवासी चले गये। महाराज आदिवासियों की बात नहीं समझ पाये थे कि आदिवासी का बता गये उनको।कृका मतलब है भल खइलौं भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ उन्हांेने रियासत के मंत्राी से पूछा...कृ
मंत्राी कांपने लगा, राजा जाने का विचारें, सभी आदिवासी खटिया पर तो सोये नहीं थे जबकि राजा ने आदेश दिया था कि आदिवासियों के रहने खाने का प्रबंध मेहमान की तरह से किया जाये। डरते-डरते मंत्राी ने राजा को बताया...कृ
‘हजूर! भल खइलौं का मतलब... छक कर खाना, भल सुतलौं का मतलब अच्छी तरह से सोना, भर भुइयॉ भर खटिया का मतलब, खटिया पर भी सोये और जमीन पर भी।’‘हजूर! ऐसा था कि हाल में एक ही खटिया थी जिसे एक कोने में बिछा दिया गया था बकिया हाल में दरी बिछाई गई थी, आदिवासियों ने सोचा कि महाराज ने खटिया भी उनके सोने के लिए प्रबंध कराया हुआ है सो आदिवासी खटिया को हाल के बीच में बिछा दिये और खटिया के अगल बगल सो गये। पैरों को खटिया पर रख दिये। यही है हुजूर भर भुइयॉ और भर खटिया। मंत्राी का जबाब सुनते ही राजा आदिवासियों की स्वामिभक्ति के बारे में गुनने लगे...कृ
धन्य है मेरी परजा, फिर क्या था महाराज ने एक दिन आदिवासियों के गॉव जाने का कार्यक्रम बना लिया। कार्यक्रम बन गया और फिर राजा आदिवासियों के गॉव में। राजा ने आदिवासियों के लिए एक गॉव जो राजा के सीर का गॉव था जिस पर राजा की खेती-बारी हुआ करती थी, जो आदिवासियों के गॉव से करीब चार कोस की दूरी पर था, उसे आदिवासियों को माफी में देने की घोषणा कर दिया और आगे की कागजी कार्यवाही के लिए मंत्राी को आदेशित भी कर दिया।
आदिवासी तो आदिवासी कुदरती चेतना वाले, राजा को भगवान का अवतार मानने वाले, आदिवासी झूम उठे, ढोल नगाड़े बज उठे, राजा के जयकारे के साथ करम बाबा के गीत चल पड़े। एक महीने के भीतर ही राजा के आदेश का क्रियान्यन भी हो गया। तभी से आदिवासी विवादित गॉव की जमीन पर खेती-बारी करते चले आ रहे हैं। राजा की दी हुई जमीन पर बसा हुआ है आदिवासियों का हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हुआ यह गॉव। तब राजा ही जगह-जमीन के आला मालिक हुआ करते थे। वे ही अपनी परजा को जमीन बन्दोबस्त किया करते थे।
आजादी मिलने के बाद कई किसिम के मालिक पैदा हो गये हैं। कुछ लोगों का तो जमीन पर नाम भी चढ़ गया है। आदिवासी नहीं जानते जमीन के कागज के बारे में वे सिर्फ इतना जानते हैं कि महाराज ने इस गॉव की पूरी जमीन उनके पुरखों को माफी में दे दिया था इससे अधिक कुछ नहीं वे जानते। जाने कैसे किसिम किसिम की खतौनियॉ बनी हुई हैं। कागज लेकर कभी कोई चला आता है तो कभी कोई। आदिवासी उलझ चुके हैं कागज के खेल में। आदिवासियों ने भी मुकदमा दाखिल करा दिया है, अदालत में मुकदमा चल रहा है जाने कब फैसला हो। इस बीच दूसरे लोग भी आ गये जमीन पर कब्जा करने के लिए आदिवासी भिड़ गये उनसे...कृ
‘कागज आपका है तो लिए रहो आप! कागज ही जोतो, उसी पर खेती-बारी करो पर हमलोग जमीन पर से अपना कब्जा नाहीं छोड़ने वाले, हम मूरख गॅवार, हम का जानते हैं कि जोत-कोड़ करना मालिकना नाहीं है, मालिकाना है कागज, तो कागज जोतो, ईहां काहे आये हो भइया।’
‘साहब! आप लोग फूटो ईहां से, बेफजूल ईहां आये हो कब्जा करने, ई जमीन हमलोगों की है, पुरखों के जमाने से हमलोग जोत-कोड़ कर रहे हैं, बूझि गये के नाहीं।’ इतना ही तो बोल पाये थे सरवन, बुद्धन, रजुआ, कलुआ और उसके साथी।
कतल वाले दिन ऐसे लोग आये कब्जा करने के लिए जो खून-कतल पर आमादा थे। अपनी सेना लेकर आये थे। उनलोगों ने कागज बनवा लिया था अपने नामों से, वे कागज के सहारे ही गॉव में घुसे थे। कागजों के खेल में क्या क्या होता है उसका नमूना बन गया वह गॉव। लाशें बिछ गईं जमीन पर अब क्या होगा लाशों का? पोस्टमार्टम, चीर -फाड, फिर दाह-संस्कार, कर्म-काण्ड, यही सब तो होता है। यह कागजों की दुनिया है सारा कुछ कागज पर होता है। भूगोल, इतिहास जैसे सारा कुछ कागजों के खेल से बना हुआ है वैसे ही हल्दीघाटी की धरती की कथा भी टिकी हुई है कागजों के खेल पर, कतल का मुकदमा भी टिक जायेगा कागजों के खेल पर। चलिए, गॉव देख लिया जाये वहां का हो रहा है? फिर पोस्टमार्टम के जादू की तरफ चला जाये देखा जाये कि वहॉ कागज क्या बोलते हैं?’
‘यह दुनिया आधुनिक है, इस दुनिया में आदमी के बोलने का कुछ मतलब नहीं, कागजों के बोलने का मतलब होता है। कागज पर कानून होता है, कागज पर मकान होता है, कागज पर जमीन होती है और यह धरती-कथा भी कागज पर ही है उपन्यास के रूप में।’
‘हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं
कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है,
इस पर का लिखा पढ़ि लो...’
‘कागज पर लिखी अपनी कथा पढ़ते हुए उदास होती जा रही हैं धरती माई, वे आरोपियों को श्राप भी नहीं दे पा रही हैं, कैसे दें श्राप..! धरती से प्यार करने वाली पवित्रा आत्माओं ने रोका हुआ है उन्हें कि किसी को श्राप न देना पर उन्हें लग रहा है कि धरती पर निवसने वाले दुष्ट-जनों को श्राप देना ही होगा... यह जो श्राप है नऽ स्वर्ग में खूब प्रचलित था फिर भी उन्होंने किसी को श्राप नहीं दिया है, पता नहीं क्यों उन्हें दया आ जाती है ‘का श्राप देना’। किसी का जीवन बेकार बनाना, किसी को दण्डित करना, सभ्यता में किसी न किसी खोट के कारण ही तो कोई गलती कर देता है, अपराध कर देता है। उसे सुधारने के बजाय श्रापित करना यह तो अहं जैसा है, अहंकार ही किसी को दण्ड तथा अपराध की तरफ ले जाता है। वे अहंकारी नहीं बनेंगी फिर भी पूछ लेना चाहिए गॉव के बुजुर्गों से... ’
सोमारू व बुझावन दो ही तो बुजुर्ग हैं गॉव में पड़े हुए हैं खटिया पर जितना रो सकते थे रो रहे हैं। जो भी हाथ पॉव से ठीक थे, जवान थे, मन में कुछ कर गुजरने की सोच वाले थे, वे लाशों के पास थे।
गॉव में मवेशियां थीं अपनी जगह पर पड़ी हुई थीं, उन्हें कौन चारा-भूसा दे? फुसहा मकान थे वे देश की कानूनी बदरियों में विलाप कर रहे थे और आधुनिक सभ्यता की आधुनिकता में कराह रहे थे। एक तरह से पूरा गॉव दमन के किसी नमूने की तरह हो गया था एकदम सुन्न और सन्न जैसे वहां पहले कुछ न रहा हो और अब भी नहीं हो।
उसी गॉव में खटिया पर पड़े पड़े बुझावन व सोमारू दोनों अपने बाल-बुतरूओं को गरिया रहे हैं... वे कर भी क्या सकते हैं, एक सोच ही तो थी जो उनके पास कर्म और धर्म की तरह थी वह भी मुर्दा माफिक, फिर भी वे सोच रहे हैं....
‘दो तीन घंटे तो गुजर ही गये होंगे, कोई नहीं लौटा खेत से, खेत पर जाने का कर रहे हैं सारे लौंडे, कोई नाहीं बूझ रहा कि हमलोग केतना परेशान हैं, अरे कोई तो लौट आता और बता देता कि खेत पर का हुआ, काहे भगदड़ मची हुई है?’ मेहररुआ भी नाहीं आय रही हैं, वे भी वहीं पड़ी हुई हैं वहीं, जाने का हो रहा है वहां. सामने वाले घर के ओसारे में हैं सोमारू पूछ रहे हैं बुझावन से...
‘अरे बुझावन! कुछ तो बताओ का हुआ होगा खेत पर?’
‘का बतावैं भइया कुछ समझ में नाहीं आय रहा है...मार-पीट तो जरूर हुई होगी, कहीं गोली न चली हो, जो लोग संसथा वाली जमीनिया खरीदे हैं नऽ वे बहुत हरामी हैं। तोहैं तो खियाल होगा उन लोगों का एक आदमी गॉव आया था अउर बोल रहा था कि मुकदमा जीन लड़ो, खेत छोड़ दो, जमीन जोतना नहीं छोड़ोगे तो फिर समझ लेना, बहुत बुरा होगा। ओकर धमकी सुनते ही गॉव कऽ लड़कवे ओके दौड़ाय लिए थे, कइसहूं ऊ भागा था गॉयें से।’
‘हॉ तूं सही बोल रहे हो बुझावन! गोली ही चली होगी, वे सब तो पहिले से ही धमकियाय रहे थे, गोली-बारूद की कमी नाहीं है ओन्हने कीहें, कहकर सोमारू खामोश हो गये।’
दोनों वृद्ध सिकुड़े हुए हैं अपनी विवशताओं की खोल में, अगर ठीक होते, चलने फिरने लायक होते तो वे भी खेत पर होते...पर करें का...देह ने साथ छोड़ दिया है, खाली मन से का होता है, मन का करेगा सोचने के अलावा। बुझावन खुद को भगवान के सहारे छोड़ कर लगे सोचने... कि एक जमाना था..जमाने में किसिम किसिम की बातें होती हैं, बुझावन का जमाना राजा बड़हर से शुरू होकर हल्दीघाटी गॉव में आ कर खतम हो जाता था। इसी बीच गॉव की धरती-कथा भी खतम हो जाती थी पर धरती-कथा तो द्रोपदी की चीर की तरह बढ़ती जा रही है, बुझावन खटिया पर पड़े पड़े इस कथा में कौन सी भूमिका निभा पाते... केवल सोच सकते हैं गॉव के बारे में, गॉव की जमीन के बारे में...वे ननकू काका के बारे में सोच रहे हैं जो धरती-कथा के पुराने पात्रा हैं, उन्हीं के साथ अपने बारे में भी। वे हमेशा नन्हकू काका के साथ रहा करते थे। उन्हें पता है कि सोनभद्र जिला बन जाने के बाद ननकू काका ने ही जमीन का मुकदमा रापटगंज में दाखिल किया था और वे ही पैरवी करने के लिए रापटगंज जाया करते थे। कभी कभी वे भी चले जाया करते थे रापटगंज, वकील से मिल आया करते थे और वहां की खबर नन्हकू काका को बताया करते थे।
उनके जमाने में बहुत ही सपाट हुआ करती थी धरती-कथा, उस कथा से परेशान होने की बात न थी। जमीन के बारे में किसी तरह का हल्ला गुल्ला भी नहीं था जमीन किसकी है किसकी नहीं है। हमलोग बूझते थे कि राजा साहब की जमीन है, बस एतनै था। राजा साहेब ही धरती-कथा लिखते हैं।
पर हाल में ही जब संसथा वाले गॉव में आये तब पता चला के राजा साहब हमरे गॉव कऽ मालिक नाहीं हैं फेर घबरा गये हमलोग। संसथा वालों में एक आदमी था जो बार बार गॉव में आया करता था और गॉव वालों को बुलाकर समझाया करता था...आपलोग काहे मुकदमा लड़ रहे हो...छोड़ दो मुकदमा। संसथा का कागज पक्का बन गया है ओमे कोई शक नहीं है। हमलोग आपलोगों से जमीन थोड़ै छीन रहे हैं, जमीन पर आप लोगों का जोत-कोड़ है, आपलोग ही इसे जोतिए कोड़िए, हॉ उसके एवज में जो खरवन राजा साहब को आपलोग देते हैं वह हमारी संस्था को दिया करिए बात खतम, बूझ रहे हैं आपलोग नऽ हमारी बात।’ तब ननकू काका जिन्दा थे। नन्हकू काका ओ समय कुछु नाहीं बोले चुप लगा गये। उनकी समझ में नहीं आया कि संसथा वाला आदमी का बोल रहा है, अगर इसका कागज पहिलहीं बनि गया था तो अब तक का करि रहा था, पहिले तऽ कब्बौ नाहीं आया। जाने केतना साल बीत गया हमलोग लगातार राजा साहब को खरवन दे रहे हैं। जाने का बोल रहा है संसथा वाला...
संसथा वाले की बात से नन्हकू काका परेशान, ननकू काका को रात में नीन काहे आती बिना महाराज से पूछे कैसे वे बोलते संसथा वालों से.. का कहते ओनसे...किसी तरह से करवट बदल बदल कर रात बिताये और दूसरे दिन बड़हर महाराज के इहां भोरहरी में ही पहुंच गये नन्हकू काका। कहीं महाराज बाहर न निकल जायें, राजाओं का का, वे तो चिरई माफिक उड़ते रहते हैं।
महाराज महल पर ही थे। दस बजे दिन के बाद ननकू काका को दर्शन दिए महाराज.फिर काका ने संसथा वालों की बात महाराज को बताया... और पूछा...
‘हमलोग का करें महाराज...संसथा वाला बोल रहा था कि कागज उसका बनि गया है।’
महाराज तो महाराज...घीरज के देवता, एकदम शान्त और स्थिर..
‘जौन आपलोग सोचो गुनो, हम तऽ चाहते हैं कि ऊ जमीन आपलोग जोतते-कोड़ते रहो बस एतनै। वैसे जउन नीक लागै उहै करो। अगर संस्था वालों का कागज बनि गया है तो ओके देख लो तहसील जाय के...’
नन्हकू काका परेशान अब का करें। मीरजापुर के वकील को बोल ही आये थे कि कागज देख लो भइया। वकील दो चार दिन बाद ही बतायेगा। नन्हकू काका राजा साहब के महल से गॉव लौट आये।
गॉव वाले रियासत से नन्हकू का काका के लौटने की राह देख रहे थे। तीन चार घंटे का रास्ता है, पैदल ही आना है। महाराज से जाने मुलाकात हुई कि नाहीं। कई तरह के सवाल गॉव वालों के दिमाग में पउड़ रहे थे... एक विश्वास भी था कि नन्हकू काका होशियार आदमी हैं, महाराज को मना ही लेंगे, कउनो काम वे खराब नाहीं करते। संसथा वालों का कागज बनि गया होगा तब का होगा? पूरा गॉव डूबा हुआ था इसी चिन्ता में। यह कैसी धरती-कथा है जिसे कभी राजा साहब लिखे थे तो अब संसथा वाला लिख रहा है। राम जाने कल का होगा कोन लिखेगा धरती-कथा?
गॉव की औरतें थोड़ी मुखर थीं...
‘होगा का? कउनो हाल में हमलोग गॉव नाहीं छोड़ेंगे, अब ई का है के इहां बसो तो उहां बसो, बार बार उजड़ते रहो। ई जमीनिया का कोई के बाप की है, किसी ने जमीन बनाया है कि पेड़ पौधा बनाया है, का किया है किसी ने, हमलोग जमीन नाहीं छोड़ेंगे तो नाहीं छोड़ेंगे। हम लोगों ने कियारियॉ गढ़ी, ढूह काटे, खेत समतल किया अउर छोड़ दो खेत बोलते हैं, कागज बनि गया है, का होता है कागज, बताते काहे नाहीं? हम किसी का कहा नाहीं मानेंगे हम अपनी धरती-कथा खुद लिखेंगे वह भी कागज पर नाहीं धरती पर।’
एक दूसरी औरत जो पहली औरत के साथ थी वह थी तो संकोची पर बोलनेेे में तनेन थी, बोल पड़ी...’
‘सही बोल रही हो बहिन, कउनो तरह से हमलोग आपन खेत-कियारी नाहीं छोडं़ेगे। हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, एही पर हमलोग आपन जिनगी लिखते हैं अउर उहै लिखा पढ़ते हैं सहूर होय तऽ जमीनिया पर का लिखा-पढ़ा पढ़िलो, पर तब तो नानी मरि जायेगी। कलम से लिखो तो वह कानून अउर जो कुदारी, फरसा से लिखो वह कानून नाहीं ई कइसन नियाव है, हमैं तो कुछौ नाहीं बुझाय रहा है।’
नन्हकू काका समझाय रहे हैं...बुधिया काकी को..
‘का बक बक करती रहती रे! तोहसे कोई कुछ पूछ रहा है का? जमीन सब राजा की होती है, जउने राज में हमलोग रहते हैं ओ राजा की, हम सब उनकी ही परजा हैं। राजा ही धरती-कथा लिखते हैं। राज-काज नाहीं बूझती है तऽ न बोला कर। चली आई मुह निपोरने...।’
बुधिया काकी कम न थीं, हाड़ काठ से मजबूत और बात-विचार से भी मजबूत,काहे मानतीं और रुकतीं, टोक बैठीं...
‘हमैं जीन समझाओ राज-काज, राजा होंगे तो अपने महल के, कउनो देवता नाहीं हैं के सबकी देख-रेख कर रहे हैं... देवता ही सबको संभालता है, देख-रेख करता है। हमैं पता है के डंडा के जोर से राजा बने हैं। हमरे बपई कहते थे कि ई जो राज है नऽ खरवारन कऽ है। आजुकल के जो राजा हैं उनके बाप दादों ने खरवारों से राज छीन कर खुदै राजा बनि गये हैं।’ नन्हकू काका सुनते तो सबकी थे पर जब कभी गुसिया जाते थे तो किसी की नही ंसुनते थे...गुसिया गये काकी पर...
‘का बकबका रही है रे! तोहार बपई ने जो बताय दिया का ऊ पथरा की लकीर बन गया के नाहीं मेटा सकता...’
‘हमहूं एतना जानते हैं कि राजा हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं रियासत की खातिर। इहौ जो राजा हैं नऽ इनके बाबा को महाराज बनारस बलवन्त सिंह ने भगाय दिया था अउर बिजयगढ़ किला पर कब्जा कर लिया था...फेर जब अंग्रेज आये तब ई राजा बहाल हुए। का होगा एके जानकर। हमार राजा बड़हर हैं तो हैं अब तऽ सारे राजा खतम होय गये हैं अब कोई राजा नाहीं रहि गया है।’
अब नन्हकू काका या बुधिया काकी को का पता कि राजा कभी नहीं मरते, वे हमेशा खुखड़ी की तरह पैदा हो जाया करते हैं। एक राजा मरेगा तो दूसरा पैदा हो जायेगा। और आजकल किसिम किसिम के राजा पैदा भी हो गये हैं। एम.एल.ए.
एम.पी., मंत्राी आ जेतने नेतवा हैं नऽ सभै तऽ राजा हैं, ई जो कलक्टर होता है नऽ जिले का मालिक, का ऊ कउनो राजा से कम होता है? अब तो कलक्टर ही हवा, पानी, पहाड़, नदी, नाला सबकर मालिक है, ऊ जो लिख-पढ़ देता है जमीन के बारे में उहय धरती-कथा बन जाती है।
किसी तरह से नन्हकू काका ने बुधिया काकी को शान्त किया....चलो थोड़ी सी आश बची है कि जमीन छीनने की बात नाहीं कर रहे हैं संसथा वाले, ओन्हई लोगन के खरवन दिया जायेगा अउर का...?
‘हे डीह बाबा कउनो रहता निकालिए, आप तऽ सब बूझते अउर समझते हैं। गॉव वाले डूबे हुए हैं पुराने समय में वे जब इस गॉव में बसे थे। वे लगे सोचने जिन्दगी के बारे में....’
‘का था ईहां पर? हर तरफ बबूर का पेड थे़, झाड़ थे, झंखाड़ थे, माटी के बड़े बड़े ढूहे थे। पूरा गॉव मिलकर पेड़ों को काटता था, झाड़ों को साफ करता था। खेत साफ करनेे के बाद तब कियारियॉ गढ़ता था। कई साल पसीना बहाना पड़ा था फिर जाकर खेत बना था फसल बोने लायक।’
नन्हकू काका जब भी खेत की तरफ जाते हैं तब उन्हें बहते हुए पसीने की गमक एक अलग की तरह दुनिया में ले जाती है.. कोई हिसाब नहीं है उनके पास कि कितना पसीना बहा होगा कियारियॉ गढ़ने में। एक ही पल में पसीने का सारा मूल्य खतम हो गया कागजों के खेल में, कानूनी कागज सोख गये सारा पसीना। भीग भीग जाती थीं कुर्तियॉ, सूज जाते थे हाथ, छाले पड़ जाते थे हाथों में...अब कागजों की दुनिया को का पता कि वे सूजे हुए हाथ, सूजे हुए पंजे कहॉ हैं, का मिला उन्हें आखिर?
कागज तो सूजते नहीं, कागज तो रोते नहीं, उन्हें पसीना नहीं आता, उनकी ऑखों में लोर नहीं होता, कागज पर तो हुकूमत का नशा होता है मादक, उत्तेजक, आक्रामक। हुकूमत का नशा कागज पर उतराया रहता है, वही धरती पर उतरता है कानून की शक्ल में, लाठियॉ भॉजते हुए आता है, गॉव गॉव घूमने लगता है और कदम कदम पर कानून चिपकाये चलता है।
बुझावन कागज की सोच से निकल रहे हैं बाहर...जो होगा देखा जायेगा। उन्हें ‘खराई’ मारने की तास लगी है, कोई ‘खराई’ तो मरवा देता, चार दाना दे देता तो वे ‘खराई’ मार लेते। अबेर होने पर उन्हें खर-सेवर हो जाता है। बुझावन अपनी पतोहिया के बारे में गुन रहे हैं...वह भी नाहीं आई, आ जाती तो ‘खराई’ करा देती...पर कैसे डलाएगा दाना मुहे में। नहीं कर पायेंगे ‘खराई’ पर एक दो दाना डालना होगा ही मुह में। वह आती ही होगी भुलक्कड़ तो है नाहीं के भूल जायेगी।
कुछ ही देर में बुझावन की पतोह भागती भागती घर चली आई। दस दस लाशों को देखकर वह पगला गई थी, उसे नाहीं बुझा रहा था कि का करे का न करे...बहुत देर बाद उसे खियाल आया बुझावन का...बपई तो खटिया पर पड़े होंगे, ‘खराई’ का
टेम होय गया है, खूब खांस रहे होंगे, मन ही मन गरिया भी रहे होंगेे।
‘बड़ी गलती हो गई बपई, हम तऽ उहां से पहिलहीं चले आते पर का बतावैं पुलिस वाले एक एक आदमी से पूछ रहे थे, लाशों को किनारे रख रहे थे, कपड़े से ढक रहे थे, उहय सब देखने में भुला गये कि बपई तो घरे हैं, ओन्है दाना-पानी देना होगा। अबै ला रहे हैं कुछ बना कर।’
बुझावन की पतोह खेत से लौट कर ही बुझावन को बता चुकी थी कि किसको किसको गोली लगी है। सोमारू काका के लड़के को भी गोली लगी है। वही तो गॉव का अगुआ था।
बुझावन ने सहेजा पतोह को...
‘चली जाओ सोमारू के इहां, ओनसे बताय दो सरवन के बारे में अउर दाना पानी भी कराय दो ओन्है....बूझ रही हो हम दाना-पानी नाहीं करेंगे हमार मनै उचट गया सब सुन कर, एको कवर नाहीं जायेगा पेट में, ई जमीन ससुरी होती ही ऐसी हैै, हमेशा खून मांगती है, पता नहीं केतना खून पीएगी ई मुई जमीन! हमरे बाप-दादा जब इहां बसे थे तब भी इस जमीन ने खून पिया था, दो तीन खरवार मारे गये थे तब जाकर हमलोगों का कब्जा हुआ था ये गॉयें पर। अब देखो फेर उहय होय गया जउने का डर था, सोख गई दस लालों का खून... चली जाओ सोमारू के इहां ओन्हय दाना-पानी कराय दो, हम नाहीं खायेंगे कुछ भी।’
बुझावन की पतोह कसमसा गई... ‘काहे नाहीं खायेंगे बपई, एक तऽ बुढ़ाई की उमर, पेट में कुछ नाहीं जायेगा तऽ कइसे रहेंगे, बीमार हैं देह को ताकत चाहिए.’
आखिर सोमारू काका के इहां जा कर वह कैसे बोलेगी सरवन के बारे में का बताएगी ओन्है, हॅ दाना-पानी जरूर करा देगी, उ कुछ नाहीं बोल पाएगी सरवन के बारे में। सरवन की लाश देखते ही वह मुर्झा गई थी, गोली लगी थी उसकी छाती पर, छाती के आर-पार हो गई थी गोली। खूब खून बहा था, जमीनिया भीग गई थी। सरवन के मेहरिया सुगनी का तो न पूछो...
‘वह माथा पीटे जा रही थी मेड़ पर, फोड़ दिया सारी चूड़ी, निकाल दिया गले में का मंगल-सूत्रा, पथरा भी धस गया ओकरे माथे में, खूब खून बहा। किसी तरह से उसे उठाया गया, पानी का छींटा मराया उसके मुह पर। कुछ देर बाद वह होश में आयी। वह जायेगी सोमारू काका के ईहां पर बतायेगी कुछ नाहीं। ओन्है दाना-पानी कराय दंेगी, दतुइन कराय दंेगी, बिस्तरा झार-बिछाय दंेगी, बस एतन करंेगी पर कतल के बारे में कुछ नाहीं बोलंेगी। उसे तऽ जाना होगा खेत पर भी उसका मरद बबुआ उहंय है, ओन्है समझाना होगा पर सोमारू काका के घर से लौटने के बाद। बुझावन की पतोह अचानक सकपका जाती है...’
सोमारू काका से का बोलेगी, कैसे बोलेगी...
वह कुछ समझ नहीं पाती फिर भी जाना तो है ही, बपई को पहले दाना-पानी करा तो लें...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ फिर पिर्थबी के लिए
काहे मार-पीट कतल, बदल रहा देश, बदल रहा समाज’
‘तो मध्यकाल की धरती-कथा बीसवीं शदी के लोकतंत्रा की धरती पर मंचित हो रही है जैसे उसका सीधा प्रसारण किया जा रहा हो। लोकतंत्रा के आला-अधिकारी कुदरती भूमिका में हैं, उनकी भूमिका से पता ही नहीं चल रहा है कि वे विशेष योग्यता व प्रतिभा वाले हैं। वे दिखावे के लिए नहीं मन से सरल व तरल हो चुके हैं, उनकी सरलता देखने लायक है। मृतकों के परिजनों की ऑखें सूज गयी हैं, सूजी हुई उनकी ऑखों में लोर नहीं है हिलोर है और वहीं कोने में पड़ा हुआ एक सवाल है आखिर यह पिर्थवी कैसे किसी की हो जायेगी? पिर्थवी तो किसी ने नहीं पैदा किया...पिर्थबी तो उसकी जिसने इसे खेती करने लायक बनाया, कियारियॉ गढ़ी, जो इसे हरा-भरा बनाये रख सके...’
पिर्थबी को हरा-भरा बनाये रखने वालों का गॉव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है, हर तरफ पुलिस ही पुलिस दीख रही है, पुलिस के कई कैंप लगाये जा चुके हैं। पुलिस की भीड़ में मृतकों के परिजनों का कहीं अता-पता नहीं चल रहा, बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी सबके सब खोे गये हैं पुलिस की वर्दी में, उनके बोल भी विलीन हो चुके हैं पुलिस की धमक में। गॉव के एक मात्रा प्राथमिक स्कूल को पुलिस के आवास में तब्दील कर दिया गया है। पुलिस वाले उसमें अपना डेरा जमा चुके हैं, बड़े साहेब लोग मुख्यालय से आना-जाना कर लेंगे, बेचारे सिपाही तो रात भर की सेवा वाले हैं, फिर वे कैसे जा सकते हैं अपने अपने डेरे पर। सो वे स्कूल पर ही अपना डेरा जमा रहे हैं। साहबांे ने आदेश दिया हुआ है...
‘लाशों के पोस्टमार्टम आज ही हो जाने चाहिए’
जिले के बड़े हाकिमों ने फरमान पर पुलिस के मझोले व छोटे कर्मचारी हाउर हाउर कर रहे हैं। लाशों को सफेद कपड़ों में लपेटा जा चुका है, गाड़ियॉ भी आ चुकी हैं। जिले का अस्पताल तैयार बैठा हुआ है। वहां घायलों को ले जाया जा चुका है। जिला अस्पताल में घायलों केे लिए एक अलग वार्ड बना दिया गया है। सीरियस किस्म के घायलों को बनारस रेफर कर दिया गया है। अस्पताल के डाक्टर मुस्तैद हो चुके हैं। इस अवसर पर सारी दवाइयॉ जाने कहां से अस्पताल में लाई जा चुकी हैं वैसे तो वहां के डाक्टर अक्सर दवाइयॉ बाहर से खरीदने के लिए ही अस्पताल की पर्ची पर लिख दिया करते हैं। मरीज भी समझते हैं कि अस्पताल की दवाइयॉ घटिया किसिम की होती हैं। सो मरीज बाहर से दवाइयॉ खरीद लिया करते हैं। घायलों की दर-दवाई अस्पताल की तरफ से हो रही है। अस्पताल का सजग होना, सभी घायलों का मुस्तैदी से इलाज करना उल्लेखनीय है। अस्पताल तथा पुलिस दोनों की सक्रियतायें उदाहरण बन रही हैं। उदाहरण इस लिए क्योंकि आमतौर पर ऐसा देखा नहीं जाता। कामना की जा सकती है कि डाक्टरों तथा अस्पताल की सक्रियता हमेशा बनी रहे और लोकतांत्रिक जनता उनका गुण-गान गाती रहे। दवाइयां मुफ्त मिलती रहें केवल संकट की घड़ी में ही नहीं हमेशा।
नया सिपाही परेश्शान परेशान है। उसे कुछ पता नहीं है कि पोस्टमार्टम में होता क्या है, क्या पेट में से गोलियॉ निकाली जायेंगी पर पूछे किससे? वह खामोशी से लाशों को ट्रक में लदवाने के लिए तैयार है, उसके साथ चार पांच दूसरे सिपाही भी हैं जो अनुभवी हैं, वे जानते हैं कानूनी खेलों के बारे में सो वे तटस्थता के साथ अपना काम कर रहे हैं पर नया सिपाही तो घबराया हुआ है...कृ
‘बेकार है पुलिस की नौकरी अब चलो लाशें उठाओ और जाने का का करो...गॉव में तो मुर्दा छूने पर नहाना पड़ता था यहां जाने का करना पड़े, जैसा दूसरे सिपाही करेंगे वैसा ही वह भी करेगा, पर पहले यहां से तो खाली हो।’
औरतें लाशों को घेरी हुई हैं, सभी एक साथ बोल रही हैं...
‘साहेब लाशें ईहां से नाहीं जायेंगी, हमलोग एही जमीन पर लाशों को फूॅकंेगे, इहैं करम करेंगे। नाहीं होगा पोसटमारटम। केतना पोसटमारटम होगा साहेब। दो चार महीना बाद ऊ लोग फेर गोली चलायेंगे, जब हमलोग उनका विरोध करेंगे डंडा फरसा लेकर, जमीन पर कब्जा नाहीं होने देंगे। वे लोग फेर गोली चलायेंगे हम लोग फेर मारे जायेंगे। ओ लोगन के पास बारूद है, गोला है, हथियार है, कागज है, टेक्टर है, रुपया है, सोर्स है, फोर्स है, हमलोगन के पास का है साहेब? खाली माटी है, भुखायल पेट है, अउर का है साहेब? कउनो हाल में लाश नाहीं ले जाने देंगे साहेब! हमलोगों को मुकदमा नाहीं लड़ना है। जमीन वाला मुकदमा चल रहा है नऽ साहेब अगर ओमे फैसला हो गया होता फेर ई सब काहे होता साहेब।’
औरतें लेट गई हैं लाशों के अगल -बगल। वहां औरतों की कमी नही हैं, ढेर सारी औरतें वहां हैं, विलपती, रोती। महिला जागृति देखने लायक है वहॉ, आदवासी पुरुष तो अपनी बातें बोल भी नहीं पा रहे हैं, कुछ ही हैं जो बता रहे हैं घटना के बारे में। महिलायें बहुत आगे हैं, घटना का एक एक ब्योरा साफ-साफ बता रही हैं। डी.एम. एस.पी. महिलाओं की चेतना परख रहे हैं...उन्हें अचरज माफिक जान पड़ रहा है, सोनभद्र तो पिछड़ा हुआ जाना व माना जाता है पर यहां की आदिवासी महिलायें! ये तो काफी तेज हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी। दोनों अधिकारी खुश हैं महिलाओं पर।
महिला पुलिस सक्रिय हो गई है, बहुत ही मीठे बोल बोल रही है महिला पुलिस जैसे उन्हें यही सिखाया गया हो कि प्रताड़ितों से मीठे बोल बोलना चाहिए। एक महिला पुलिस समझाय रही है बुधनी काकी को....कृकृ
‘बहिन जी! लाशें जाने दीजिए, लाशों के पोस्टमार्टम होने के आधार पर मुकदमा होगा तभी तो अपराधियों को सजा मिल पायेगी, नहीं तो कैसे मिलेगी अपराधियों को सजा।’‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है। तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल देखाता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हमलोग लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव, नियाव मॉग रहा था।’
महिला सिपाही अनुभवी है, अधेड़ है, वह जानती है कि पुलिस का काम कैसे करना चाहिए और पीड़ितों को कैसे समझाया जाना चाहिए। इस बाबत उसे इनाम-उनाम मिला है कि नाहीं किसे पता पर इनाम लायक काम है उसका। नया सिपाही उसके काम को देख रहा है और मन ही मन महिला सिपाही के समझाने की कला पर मुग्ध भी हो रहा है। वह देख लेना चाहता है कि महिला सिपाही आगे क्या करती है? महिला सिपाही बहिन जी बहिन जी कहते कहते थक भी नहीं रही है वह लगातार है समझाने में तब तक उसकी बड़ी अधिकारी कोतवाल भी वहीं आ गईं हैं। कोतवाल दिखने में तो महिला की तरह ही दिख रही हैं पर हैं मरदों से भी कड़क, कट कट उनके बूटों की आवाज सभी का घ्यान खींच रही है।कृबोल भी टन-टन है एकदम कड़क... महिला सिपाही कोतवाल साहिबा को सैल्यूट बजाती है, कोतवाल साहिबा महिला सिपाही की तरफ हैं...कृ
‘का हुआ लाशों को लदवाओ ट्रक पर, अस्पताल वाले तैयार बैठे हैं, घायलों की चिकित्सा शुरू हो गई है, मरहम पट्टी हो रही है उनकी। दस लाशें हैं, चार-पांच डाक्टर लगेंगे तब जाकर पोस्टमार्टम हो पायेगा, हो सकता है दो दिन लग जायंे पोस्टमार्टम करने में, डाक्टर मशीन थोड़ै हैं, वे भी बेचारे घिनाते हैं पोस्टमार्टम करने में। अगर अस्पताल का सफाई-कर्मी न हो तो हो चुका पोस्टमार्टम, वही तो करता है सारा कुछ। सी.ओ. साहब ने लगा दिया है सदर के एक दारोगा को कि वह उस सफाई-कर्मी को अस्पताल से बाहर न जाने दे। महिला कोतवाल कड़क हैं.. वे जोर से बोल रही है, बोल क्या हुकूम दे रही हैं.‘का हुआ आप लोग काहे घेरी हुई है लाशों को, लाशों से दूर हटिए, लाशों को ले जाना है पोस्टमार्टम के लिए। चलिए हटिए, हटिए यहां से।’
महिला कोतवाल सख्ती के साथ महिला सिपाही को सहेज रही हैं...कृ
‘हटाओ जी इन लोगों को, काहे के लिए भीड़ जुटा रखा है? लाशों को घेर कर बैठी औरतें अनसुनी बनी हुई हैं, वे नहीं सुन रही है महिला कोतवाल का आदेश, वे जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही बैठी हुई हैं गोलबन्द। थाना, कोतवाली, प्रशासन को रोब-दाब वहॉ से फुर्र हो चुका है, समा गया है किसी गुफा में या जंगल के किसी कोने में। महिला सिपाही औरतों से आग्रह कर रही है...हटिए बहिन जी! हटिए बहिन जी! जाने कितनी बार वे बोल चुकी हैं पर दुखियारी महिलायें वहां से हटे तब नऽ। अब का कुछ ही देर का तो साथ है, जल जायेंगी सारी लाशें, मिट जायेगा मृतकों के होने का प्रमाण, मर जाने के बाद कुछ भी नहीं बचता, बचती हैं सिर्फ यादें। फिर अचानक जाने क्या समझ में आ जाता है महिला कोतवाल को कि वे एक महिला को लाशों के पास से अलग हटाकर ले जाती हैं। तभी डी.एम.और एस.पी भी वहीं चले आते हैं और वे समझाते हैं कि लाशों का पोस्टमार्टम कराना काहे जरूरी है? मुआवजा मिलेगा, सरकार घायलों की दवाइयॉ करायेगी बिना पोस्टमार्टम के कुछ नहीं मिलेगा। अब तो जो होना था हो चुका है। आपलोग धीरज से काम लीजिए, सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी आपलोगों के साथ न्याय होगा।
एस.पी. और डी.एम. नई उमर के हैं, पढ़ने-लिखने वाली प्रतिभा उनके चेहरों पर नाच-कूद रही है। आदिवासियों के समझ में है कि ये बड़े साहेब लोग हैं, राजाओं के बाद इन्हीं साहबों का जिले पर राज चलता है, ये चाह लें तो का नहीं हो सकता! ये आग को पानी बोलें तो पूरा जिला पानी बोले और जो पानी को आग बोलें तो पूरा जिला आग बोले। सो इनकी बात में दम है, आदिवासी मरद औरतों को समझाय रहे हैं...कृ
‘अरे जो सरकार लोग(डी.एम. व एस.पी.) कर रहे हैं करने दो, रापटगंज भी तो चलना है, जो घायल हुए हैं उनकी देख-भाल करनी है। दूसरा आदिवासी मरद भी समझाय रहा है महिला आदिवासियों को। महिलाओं की ऑखों सेऑसू अब सूखने भी लगे हैं आखिर कब तक रोयेंगी, रोने की भी तो सीमा है, एक सीमा के बाद थक जाना है और खुद को करम बाबा के हवाले कर देना है। सभी की ऑखें नम हैं, चेहरे मुर्झाये हुए हैं, करइल माटी जेैसे सख्त हो चुके हैं उनके चेहरे। आदिवासी महिलाओं में बुधनी थी जो पहले से ही बोल रही थी बकिया तो चुप्प थीं केवल रोने में थीं सीधे डी.एम. साहब के पास जा पहुंची....कृ
‘का बचवा! आप का बूझ रहे हैं के हम लोग गलत हैं? हमार बेटउना जो मारा गया साहेब नऽ उहौ आपय की उमर का था, आपय नीयर ओकर कद काठी थी, अपने काम से काम रखता था, केहू से झगड़ा झंझट नाहीं करता था, ओहू के मारि दिये हत्यरवा, ऊ तऽ सबके समझाया रहा था, झगड़ा बरकाय रहा था फेर भी मारा गया। ई कैसा नियाव है बचवा!’
डी.एम. साहब अवाक, का बोलें बुधनी से। वे जानते हैं कि जमीन का विवाद राजस्व के मुकदमे से शुरू तो होता है पर अन्त होता है फौजदारी के मुकदमे से। वही हुआ होगा इस मामले में फिर भी वे पता लगायेंगे कि असल झगड़ा काहे का है। काहे कतल हुआ? वे गंभीरता से पढ़ेंगे धरती-कथा, कहां से गलती हुई? डी.एम. साहेब ऊॅची प्रतिभा वाले हैं, वे समझाते हैं आदिवासी बोलाक महिला को.....
‘माता जी आप चिन्ता न कीजिए प्रशासन अपराधियों को नहीं छोड़ेगा एक दो दिन में सारे अपराधी जेल में होंगे, आप यकीन रखिए माता जी।’
वहां गॉव के ही क्या पास-पड़ोस के बहुत सारे लेाग थे, इस हत्याकाण्ड ने सभी के मन में विविध किस्मों वाली धरती-कथा अपने आप उपजा दिया था। दरअसल
कथा का मिजाज भी तो ऑसुओं वाला होता है, दमन के प्रतिरोध वाला होता है। दिल दिमाग से एक था राजा तथा एक थी रानी वाली कथायें कहीं दूर फेंका गई हैं। ऐसी कथायेंॅ उस समय वहां का करतीं का रंगमहल सजातीं अपना सिंगार पटार करतीं। उनमें बहुत सारे लोग ऐसे थे जो मौके पर बतौर प्रतिभागी खड़े थे, वे विवादित जमीन के पुराने जोतदार थे, वे भला कैसे चाहते कि उनकी जोत वाली जमीन उनसे छिन जाये सो वे भी वहां मुस्तैद थे। उन्हें क्या पता था कि जिस जमीन की वे जोत-कोड़ कर रहे हैं वही जमीन उन्हें मुर्दा बना देगी, बदल देगी लाश में, उनका खून चूसेगी। जिस धरती माई की वे पूजा करते हैं क्या वह उनका खून चूसेगी? मामला जोत का था, जमीन पर कब्जा करने का था। कहा जाता है जमीन हो या कोई भी चीज हो जो ताकतवर होता है वही उसका मालिक होता हैै। किसे नहीं पता कि ‘वीर भोग्या वसुन्धरा।’ डी.एम. और एस.पी.दोनों आला-अधिकारीधरती-कथा की कहानी जान कर खुद में खोये हुए हैं फिर भी धरती-कथा खुल रही है उनके मन में....
तो वहां मध्यकाल वाले वीर आ गये थे सैकड़ों की संख्या में, उनके साथ कई ट्रेक्टर थे। पूरा सिवान खाली था, सिवान के बाहर गॉव आबाद था। टेªेक्टर गरजने लगे एक दो नहीं करीब दस की संख्या में, टेªक्टरों का गरजना आदिवासियो के गॉव में घुसा, पहले तो उसका गरजना मधुर था पर बाद में आक्रामक हो गया। गॉव के लोगों ने ऑखें गड़ा दीं अपनी जमीनों पर...कृ
ट्रेक्टर उनकी जमीन पर चल रहे हैं... कब्जेदार जोत रहे हैं जमीन...कृ
लम्बे समय से चल रहे मुकदमे ने आदिवासियों को प्रशिक्षित कर दिया था कि राजस्व तथा दीवानी के मुकदमों में यह जो जमीन पर कब्जे का मामला है बहुत ही महत्वपूर्ण होता है सो वे सचेत थे किसी भी हाल में जमीन पर से जोत-कोड़, कब्जा-दखल नहीं छोड़ना है। पर उन्हें नहीं पता था कि कब्जा लेने के लिए प्रतिवादी अचानक एक दिन चले आयेंगे, घुस आयेंगे गॉव में। पर वे आ गये थे और ट्रेक्टर से खेत जोतने लगे थे। आदिवाससियों का मानना था कि मुकदमे के फैसले के बाद ही जो कुछ होगा होगा, उनके वकील ने भी यही समझाया था उन्हें।
कब्जाकर्ताओं को तो जल्दी थी, वे आनन-फानन में थे। आदिवासियों के वकील ने सर्वे अधिकारी के पास एक दरख्वास्त दिया था कि गॉव का मौके पर सर्वे किया जाये तथा कब्जों का इन्द्राज किया जाये। सर्वे अधिकारी ने आदिवासियों के दरख्वास्त को खारिज कर दिया था इसके बाद आदिवासियों के वकीलअपील अधिकारी कलक्टर की अदालत में अपील दाखिल कर दिया था यह दावा करते हुए कि बिना कब्जों के इन्द्राज के मुकदमे में अग्रिम कार्यवाही नहीं की जा सकती। तीन-चार महीने तक कलक्टर की अपीलीय अदालत में आदिवासियों का मुकदमा झूला झूलता रहा और एक दिन अचानक अपीलीय अधिकारी कलक्टर ने आदिवासियों की दरख्वास्त खारिज कर दिया। अपील का खारिज हो जाना कब्जाकर्ताओं के लिए वरदान माफिक हो गया जबकि अपील खारिज करना वह भी पक्ष-कारों की बिना सुनवाई के गलत था। आदिवासियों के दरख्वास्त का खारिज होना कब्जाकर्ताओं के अधिकारों की स्थापना कत्तई नहीं है। लेकिन कब्जाकर्ताओं ने अपील के खारिजा को अपने हित में माना और विवादित जमीन पर पूरी तैयारी के साथ कब्जा लेने पहुंच गये। फिर क्या था देखते देखते पूरा गॉव विवादित जमीन पर पर जमा हो गया, क्या बच्चे क्या औरतंे, क्या जवान, क्या बूढ़े सभी वहां हाजिर हो गये और उनमें से कुछ तो खेत पर लोट गये ठीक ट्रेक्टर के सामने। आदिवासियों के खेत पर लोट जाना अलग किस्म का सत्याग्रह था जिसे आदिवासियों ने किसी स्वयंसेवी संस्था की कार्यशाला से सीखा था। सत्याग्रह से कुछ नहीं हुआ, कुछ मिनटों में ही दस सत्याग्रही आदिवासियों को गालियों से भून दिया गया, ऐसा कभी सोनभद्र में नहीं हुआ था और न ही ऐसा कभी सुना गया था। इससे बड़ी दर्दनाक घटना केवल एक बार हुई थी वह भी अॅग्रेजों के जमाने में जब अॅग्रेजों ने विजयगढ़ किला पर कब्जा किया था। उस समय किले की सुरक्षा में जुटे दो सौ आदिवासियों को अॅग्रेजी सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। आदिवासी अपने तीर-धनुष के साथ भिड़ गये थे अंग्रेजी सेना से कि हम किला पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ेंगे।
एस.पी. तथा डी.एम. मौके पर आकर धरती कब्जा करने की धरती-कथा पढ़ चुके हैं धरती-कथा को, कथा के कथा बनने के कारणों को भी वे जान चुके हैं। वे जानते हैं कि यही दुखान्त कथा उन्हें बार बार सुनने के लिए मिलेगी सो दोनों मनोवैज्ञानिकों की तरह लाशों को ले जाने के बारे में सोच रहे हैं, मिला-जुला कर ही लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा सकता हैै। उसी के अनुसार वे बातें भी कर रहे हैं, एकदम से सन्तुलित किसी संरक्षक माफिक। देखने सेे लग ही नहीं रहा है कि वे दोनों जिले को हिला-डुला देने की क्षमता वाले अधिकारी हैं। बिना इनकी राय के एक पत्ता भी जिले में कहीं नहीं हिलता।
डी.एम. साहब तो पलथिया कर बैठ गये हैं कड़क आवाज वाली बोलाक़ महिला बुधनी के पास...
‘माता जी! लाशों को ले जाने दीजिए पोस्टमार्टम के लिए। अब तो जो होना था वह हो चुका है फिर आप जानती हैं कि होनी पर किसी का वश नहीं होता।’बुधनी के सामने डी.एम. ने डाटा था महिला कोतवाल को...
‘काहे हल्ला कर रही हो जी! यहां की महिलायें लाशों के पास नहीं बैठ्रेंगी तो का महिलायें किराये पर लाई जायेंगी यहां बैठने के लिए, इन्हीं महिलाओं के तो बाल-बच्चे मारे गये हैं गोलीकाण्ड में...।’
डी.एम.तो डी.एम. उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह जो बोलाक आदिवासी महिला है इसमें नेतृत्व का कुदरती गुण है सो इससे संभल कर बोलना होगा। वैसे भी नेताओं कोे समझा लेना देहातियों को समझाने से सरल होता है। डी.एम. ने वही किया...बोलाक आदिवासी महिला को माता जी माता जी बोलकर आधा कर दिया। उसने कभी प्यार भरा बोल नहीं सुना था जो कोई उसेे पुकारता है रेरी मारकर ही,
साहब तो माता जी माता जी बोल रहे हैं। लड़कवे भी उसे पागल समझते हैं, नहीं सुनते उसकी बात। साहब धियान से सुन रहे हैं उसकी बात।
बोलाक आदिवासी महिला नरम हो गई है और डी.एम. से वादा ले रही है...साहेब आप जो बोल रहे हो ऊ करोगे नऽ, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए साहेब! आप काहे नाहीं बोल रहे हो साहेब! कुछ तो बालिए..... डी.एम. तो जैसे तैयार बैठे थे बोलने के लिए।...
‘हॉ माता जी, हॉ माता जी, सोलहो आने सजा होगी अपराधियों की देख लेना।’ फिर डी.एम. ने हाथ पकड़ कर उठा दिया बोलाक महिला को। तभी जाने का हुआ कि वहीं एक लड़का हल्ला करता हुआ आन खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा...
आओ आओ गिनो लाशों को,
आओ आओ गिनो विधवाओं को,
आओ आओ गिनो अनाथ बच्चों को,
आओ आओ गिनो बूढ़े अइया-बपई को,
आओ आओ नापो जमीन को,
आओ आओ देखो बड़े बड़े हाकिमों को,
आओ आओ देखो अपने भाग को....,
होर्र, होर्र होर्र, कोन पकड़ कर चलो, हराई छूटने न पाये... होर्र होर्र हा हा हा जोत लिए खेत जोत लिए खेत, काट लिए धान, काट लिए धान, कोई भागने न पाये, मारो सालों को मारो सालों को, ठांय ठांय ठांय....
‘अरे इहां का करि रहे हो आपलोग... जाओ आफिस में बैठो’
‘मोटी तनखाह लो, मउज करो.. ईहां का करि रहे हो....साहब आपलोग?’
फिर वह लड़का हसने लगता है... हसते हुए ही अचानक एक आदिवासी गीत शुरू कर देता है...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी केहू कऽ न भई
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी
जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई
सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी,
दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी,
भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही
त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी,
ओहू के संग धरती हाथ भर न गई,
पिर्थबी केहू कऽ न भई.....’
सुरक्षा कर्मी गाना गाने वाले लड़के को घेर लेते हैं बहुत ही फुर्ती के साथ जैसा उन्हें सिखाया गया है वे वैसा ही करते हैं। मजाक है जो कोई आदमी डी.एम. के
सामने तनेन हो कर खड़ा हो जाये ही नहीं गाना-फाना भी गाने लगे और सुरक्षाकर्मी देखते रहें वह भी बक-बक करता हुआ, अनाप-सनाप गाता हुआ।
गाना गोते हुए ही अचानक वह लड़का गिर जाता है डी.एम. के सामने जमीन पर और बेहोश हो जाता है... सुरक्षाकर्मी जकड़ लिए हैं उस लड़के को...यही कोई अठारह बीस साल का लड़का, नाजुक, जवान होता हुआ..उसे उठा रहे हैं, सिपाही, वह खड़ा नहीं हो पा रहा है, एक सुरक्षाकर्मी उसका मुह सूंघ रहा है, संभव है दारू पिये हो। दारू की महक नहीं आ रही। गॉजा या हिरोइन पिये होगा.. सुरक्षाकर्मी उसे उठाकर कहीं दूर ले जाना चाह रहे हैं...
डी.एम. रोक रहे हैं सुरक्षाकर्मियों को..
‘कहीं न ले जाओ, पानी के छीटंे मारो, डाक्टर को बुलाओ...
डाक्टरों की टीम आई हुई है, घायलों की मरहम पट्टी कर रही है। उनमें से एक डाक्टर आता है, लड़के को देखता है, आला लगाता है, सीना ठोंकता है, नाड़ी देखता है, पेट देखता है, कुछ नहीं हुआ है इसे.. लगता है शाक लगा है साहेब! डाक्टर के साथ उसका सहायक भी है...
सहायक लड़के को इन्जेक्सन लगाता है...
डी.एम. जानना चाह रहे हैं, पूछते हैं...लड़के के बारे में, कौन है यह लड़का, स्कूल ड्रेस पहने हुए है, कहां पढ़ता है। क्या इसका दिमाग ठीक नहीं है? क्या हुआ है इसे?
बुधनी वहीं पर है लाश के साथ... अधिकांश लोग आ जाते हैं लड़के के पास, एक महिला लड़के का माथा सहलाने लगती है सभी लोग दूर खड़े हैं वही डी.एम. भी खड़े हैं...
बुधनी बताय रही है डी.एम. साहेब को।
‘अरे साहेब! ई हमरे गॉयें का तनबुड़ुक है। इसका भाई मारा गया है साहेब! गोली से बेधाया भाई का सीना देखते ही पगला गया। पगलाय तो हमलोग भी गये हैं साहेब पर का करें, कलेजा थाम कर खड़े हैं आपके सामने। इसका बाप तो बहुत पहले ही मर गया था। केवल इसकी अइया है घर में अउर भउजाई है। उहै भउजइया है साहेब जो उसका माथा सहलाय रही है। लड़िकवा कक्षा दस पास है साहेब! गियारह में पढ़ रहा है घोरावल कालेज में। इसका भाई इसको आगे पढ़ाना चाहता था। वह कहा करता था....
‘देख लेना तनबुड़ुका को सिपाही बनाके रहूंगा। इसका बड़ा भाई दो बिगहे खेत का जोतदार था, खेती के समय में खेती करता था बकिया टाइम में राजगिरी का काम करता था। बहुत ही भला लड़का था साहेब!’
‘अरे ऊ देखिए साहेब। तनबुड़ुका की अइया दौड़ती हुई आय रही हैं एहरै।’
डी.एम तनबुडु़क के गाने में घुस चुके हैं, लड़का होश में होने लगा है.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई....फिर काहे के लिए खून-कतल, मार-पीट बलबा। क्या यह हिन्दू
दर्शन आदिवासियों तक पहुंच चुका है।
डी.एम. साहब कहीं खो खो जाते हैं....
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ यह तो दर्शन है और दर्शन का क्या, वह तो कहीं भी पहुंच जाता है पर मानव व्यवहार-संस्कृति पर असर नहीं डाल पाता...असर होता तो पिर्थबी के लिए काहे कतल होती, मार-पीट होते? कुछ नहीं होता यही तो फर्क है दर्शन और प्रदर्शन का। हर तरफ कब्जा ही कब्जा, गॉव पर कब्जा, फिर देश पर कब्जा उसके बाद दुनिया पर कब्जा...एटम बम, हइड्रोजन बम, न्यूकिलियर बम, जाने कितने तरह के बम, सारे के सारे कब्जे के लिए ही तो...
‘लगता है धरती कथा ऐसे ही बढ़ती रहेगी’ अचानक एक आह निकलती है डी.एम. साहब के दिल से....
मुल्जिमान नामजद हैं,
गोलियॉ चली हैं फिर...
‘आह’ तो धरती-माई के दिल से भी निकल रही है इसी ‘आह’ के कारण ही तो धरती-कथा भी बढ़ रही है आगे और उसके साथ कदम मिला कर चले रहे हैं जिले के आला-अधिकारी‘आह’ छोड़ते हुए। आलाअधिकारियों के चलने से हिलने लगी है धरती। जहां जहां पॉव पड़ रहे हैं अधिकारियों के वहां वहां कानूनी धारायें उग जा रही हैं धरती पर। कानून की हर धारायें आपस में अपने होने को प्रमाणित भी कर रही हैं धरती की कुदरती कानूनों से अलग। जैसे जैसे कथा आगे बढ़ रही है वैसे वैसे ही कानूनी धाराओं का रंग, रूप भी बदलता जा रहा है...। धरती-माई पढ़ना चाह रही हैं कानूनी धाराओं को पर कानून की भाषा की वे जानकार नहीं हैं, कानून की लिपि भी उनके लिए अज्ञात है जाने किस लिपि में लिखा हुआ है सारा कुछ। धरती-माई माथा पकड़ का ‘आह’ भर रही हैं...‘उनके वश का कुछ भी नहीं’
वश में तो एस.पी. साहेब के भी कुछ नहीं वैसे कुछ महत्वपूर्ण प्रमाण मिल चुके हैं पुलिस को। एक दारोगा ने सहेज लिया है बारह बोर के कारतूस के खोखों को। रायफल वाले भी खोखे मिल जाते तो ठीक होता, पर रायफल वाले खोखे नहीं मिल रहे। मौके पर तीन कल्टीवेटर भी सबूत के तौर पर सहेज लिया है पुलिस ने जिससे अपराधी जमीन जोत रहे थे। ट्रेक्टर नहीं मिले उन्हें घर से उठाना पड़ेगा।
मौका मुआयना कर एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब की तरफ आ रहे हैं, उनसे कहना चाह रहे हैं कि चला जाये मुख्यालय, पोस्टमार्टम भी तो कराना है, उसमें काफी समय लगेगा सो जल्दी पहुंच लिया जाये। लखनऊ से लगातार निर्देश आ रहे हैं। एस.पी. व कलक्टर दोनों जिले के आला-अधिकारी हैं। उनका आला होना इस समय छिना गया है उनसे, इस दर्दनाक घटना ने साहबों से उनके रोब-दाब, अफसरई की ऐंठन सारा कुछ छीन लिया है। उन्हें महसूस ही नहीं हो रहा है कि वे जिले के आलाधिकारी हैं जिनके इशारों पर वसंत की मादक बदरियॉ हों या सावन की रिमझिम फुहारें हों उमड़-धुमड़ कर उतर जाया करती हैं धरती पर। वे परेशान परेशान हैं चाह रहे हैं बातें करना कि आगे क्या होगा...? सरकार जाने का करे...बहुत बड़ा मामला बन गया है। मुख्यमंत्राी जी सख्त हैं कुछ भी कर सकते हैं... घटना की सारी गाज उनलोगों पर गिर सकती है। वे दोनों अशुभ की संभावनाओं के ओर-छोर को पकड़ना चाह रहे हैं पर कुछ भी उन्हें आभास नहीं हो रहा। सारा कुछ आने वाले दिनों के गर्भ में है। संभव है कल का सूरज हसता, विहसता आये, संभव है दहाड़ता तथा गरियाता आये। सूरज का क्या है वह संप्रभु है किसी भी तरह से उतर सकता है धरती पर। पर दोनों अधिकारी मन में चल रहे हलचलों को रोके हुए हैं, मन की हलचलों को रोकने के वे कलाकार भी हैं, इसी कला की गुणवत्ता ने उन्हें जिले का ेेेेेेआला-अधिकारी बनाया हुआ है। वे मन के संवेगों को दबाये हुए हैं कहीं निकल न जायें बाहर... दोनों आला-अधिकारीएक दूसरे के सामने खुलना नहीं चाह रहे हैं, एस.पी. के सामने डी.एम. खुद खुलने से बचाये हुए हैं तो, एस.पी. भी डी.एम. से कम नहीं, वे भी खुद को खुलने से बचाये हुए हैं डी.एम. के सामने। वे नौकरी में आते ही सीख गये हैं गोपनीयता के मंत्रा को। यह गोपनीयता ही है जो सरकार दर सरकार एक ही नाप-तौल पर चला करती है, यही गोपनीयता ब्यूरोक्रेसी के प्रपंचों को भी खुलने से मौके गर मौके बचाया करती है। सो दोनों अधिकारी मन ही मन सोच रहे हैं इस धरती-कथा के बाबत सरकार जाने का करती है..? सरकारों के करनी के कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण उनकी ऑखों में उतराये जा रहे हैं। उनकी सोच अपने बाबत है, क्या उनकी नौकरी इस बर्बर घटना के बाद सुरक्षित है?
उन्हें कभी कंुभ मेले का ख्याल आता है तो कभी किसी दूसरे मेले का, भगदड़ में ढेर सारे लोग मारे गये थे.. वे बनारस के संकटमोचन मन्दिर के सामने हुए बम धमाके के बारे में भी गुन रहे हैं और खुद ही काट दे रहे हैं बीते उद्धरणों को। वे मामले ऐसे न थेे। आतंकवादी हमलों का चरित्रा दूसरा होता है और उसके लिए दायित्वों का चरित्रा भी दूसरे किस्म का हो जाता है। आतंकवादी हमलों का दायित्व हालांकि होता है जिले के आलाअधिकारियों पर फिर भी उन हमलों के कारण आलाअधिकारियों की लापरवाही नहीं मानी जाती। उन घटनाओं को दैवीय मान लिया जाता है करीब करीब ‘एक्ट आफ गाड’ की तरह। उसके लिए पूरे सुरक्षातंत्रा की जिम्मेवारी मान ली जाती है फिर उसी दृष्टि से मंथन होता है घटना के घटित के बारे में कि कहॉ चूक हो गई, इन्टेलिजेन्स से, कहॉ लापरवाही हो गई, आतंकवादी घटना के कई कोण बन जाते हैं सो जिले के आलाधिकारी जिम्मेवारी से करीब करीब बच जाते हैं।
एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब के पास आ चुके हैं... दोनों जन एक दूसरे को देख रहे हैं.. वहां तो भीड़ है, एक लड़के को घेरे हुए हैं सभी लोग। डी.एम. साहेब भी घिरे हुए हैं लोगों से। एस.पी. साहेब नहीं समझ पा रहे हैं कि लड़के को क्या हुआ? संभव है यह लड़का भी घायल हुआ हो पर नहीं... कलक्टर साहेब बताते हैं
लड़के के बारे में एस.पी. साहेब को।
एस.पी. साहेब चकरा रहे हैं...
‘तो लड़का पागल हो गया है, इसे भी ले चलना चाहिए मुख्यालय पर, दर-दवाई हो जायेगी अभी इसकी उमर ही क्या है?’ वे खुद को समझाते हैं...‘इस गॉव का यह हमला तो पूरी तरह से स्थानीय है, नागरिकों के बीच का है, भारत माता की जय बोलने वालों के बीच का है, जमीन के जोतदारों के बीच का है, अज्ञाकारी तथा अनुशासित जनता के बीच का है, यहां के हमले को आतंकवादी हमलों की तरह नहीं लिया जा सकता। सो उन्हें काहे के लिए चिन्ता करना। पर उन्हें सन्देह भी है क्योंकि घटना उनके क्षेत्राधिकार की है, उन्हें भी फसाया जा सकता है इस काण्ड को नियंत्रित न कर पाने के कारण। इस जघन्य हत्याकाण्ड के लिए उन्हें जिम्मेवार माना जा सकता है। अगर राजस्व के मुकदमे का निपटारा सही समय पर हो गया होता तो हमला शायद नहीं होता। यहां के काण्ड में मुकदमे वाला पेंच फसा हुआ है। सो दोनों आलाधिकारी परेशान हैं। भीतर भीतर डरे हुए हैं, सरकारें कभी भी खुद को दोषी नहीं मानतीं, दोषी मानती हैं अधिकारियों व कर्मचारियों को। अधिकारियों व कर्मचारियों को दण्डित भी करती हैं सरकारें, किसी को ससपेन्ड कर देती हैं तो किसी को बर्खास्त, कुछ न कुछ तो प्रदेश की सरकार करेगी ही.. वैसे भी सरकारों की यही कार्य-संस्कृति भी रही है। अपने अपने डरों के साथ दोनों आलाधिकारी एक दूसरे के साथ कदम मिलाते हुए चल रहे हैं।
डी.एम., एस.पी. के साथ जुटे हुए हैं तो एस.डी.एम., तहसीलदार भी वहीं आगे-पीछे कर रहे हैं। वे भी धुधकियॉ पी रहे हैं, आग बरसा सकती है सरकार उनकी नौकरियों पर, और जब आग की वारिश होगी फिर तो जलना ही होगा सभी को। आग तो चेहरा पहचान कर नहीं जलाती, जलाती है सभी को।
अधिकारियों के दिल दिमाग ही नहीं राजस्व विभाग के सारे अहलाकारानों के दिमाग उड़े हुए हैं, वे जहां हैं जिस हाल में हैं, कंपकंपियॉ पी रहे हैं। हल्के का लेखपाल तो सुबह से ही अपना कागज-पत्तर सहेज रहा है, खतौनी के तमाम इन्द्राजों की जॉच पड़ताल कर रहा है। शंकर भोले दानी के मन्दिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ा आया है भगवान भला करना...’वह हिसाब किताब कर रहा है अपने काम का...
‘लेखपाल आत्म-संवाद में है...मैंने कुछ गलत नहीं किया है, खतौनी में वही इन्द्राज किया है जिस पर तहसीलदार साहब या डिप्टी साहब के आदेश रहे हैं। मनमानी कुछ भी नहीं किया है। लेखपाल आने वाले कल के बारे में गुन ही रहा है कि एक मुलायम सी भरोसे वाली हवा उसे सहला जाती है...
‘तेरा कुछ नहीं होगा रे! जब तूने कुछ किया ही नहीं है, तूंने तो हाल में ही यहां का चारज लिया है, तब भी साल भर तो हो ही गया होगा। यहां का मामला तो बहुत पुराना है जमीनदारी विनाश के समय का है। सारी गड़बड़ी उसी समय की है। वैसे भी मुकदमा चल रहा था, उसमें तूं का कर लेगा। ऐसा तो है नहीं कि तूंने जमीन की नापी नहीं किया, तूं तो केवल नापी ही कर सकता है वह भी तब जब साहबों के आदेश हों। वैसे गॉव की नापी का आदेश ही नहीं हुआ था फिर काहे की नापी होती। ऐसा आदेश तो उसे कभी मिला ही नहीं, न ही उसे कचहरी में जाकर कब्जा के बाबत कभी बयान ही देना पड़ा फिर का होगा उसका... कुछ नाहीं होगा, बेमतलब वह डर रहा है।’
खुद को संभाल रहा है लेखपाल, पर उसे अपनी औकात पता है। पन्द्रह साल से लेखपाली कर रहा है, ऐसे मामलों में कभी तहसीलदारांे या डिप्टी साहेबों को कानून के घेरों में नहीं लिया जाता, कानून के घेरे में लिया जाता है लेखपालों को, कानूनगोओं को, जॉच-पड़ताल का बहाना बना कर उन्हें घर बिठा दिया जाता है। तो ऐसे ही होता है सरकारी काम। बड़े साहेब लोग थोड़ै नपेंगे, उनका कुछ नहीं होगा, वैसे भी बड़ों का कुछ नहीं होता। बड़े तो पहाड़ की नाईं होते हैं सरकार का हथौड़ा उनका भला का बिगाड़ पायेगा। अदालत की तराजू में भी बड़ों के मामलों में पासंग हो जाता है।
लेखपाल मौके पर जाने के पहले अपने आराध्यों की पूजा कर लेना चाहता है। तहसीलदार ने उसे सुबह ही फोन से निर्देश दे दिया था कि तुम कागज-पत्तर के साथ मौका-ए-वारदात पर उपस्थित रहना। सो वह मौके-ए-वारदात पर जाने की तैयारी कर रहा है। आराघ्यों की पूजा-पाठ से वह खाली हो चुका है। पत्नी ने नाश्ता की जगह पर खाना ही बना दिया है जाने कब तक लौटना हो। सरकारी काम का क्या, वही कभी भी शुरू हो सकता है और कभी खतम हो सकता है। लेखपाल भी खाना खा लेना चाहता है और वह खाने के लिए जमीन पर पल्थी मार कर बैठ चुका है। वह जमीन पर बैठ कर ही खाना खाता है, जमीन पर बैठ कर खाना खाते समय सुविधा रहती है। परोसे हुए भोजन की पूजा करना और देवताओं के लिए खाना निकालना, फिर जल से थाली को शुद्ध करना,आग पर खाना-रूपी प्रसाद को चढ़ाना। लगभग दो मिनट का यह अनुष्ठान देखने लायक होता है। लेखपाल इस अनुष्ठान का कलाकार है, शादी होने के बाद से ही कर रहा है इसे, भोजन की पूजा करने के अनुष्ठान को उसने बाप से सीखा है।
लेखपाल पूजा का कार्य निपटा चुका है, अब वह खाना खाने लगा है। खाना खा लेने के बाद ही वह मौका-ए-वारदात पर हाजिर हो जायेगा।
लेखपाल मौका-ए-वारदात पर आला अधिकारियों के पहुंचनेे के पहले ही हाजिर हो चुका है। वह भी प्रताड़ितों की भीड़ में शामिल हो गया है। सिपाही दारोगा आ चुके हैं वे अपना काम कर रहे हैं, दिख रहा है कि कई थाने उजड़ कर आ गये हैं मौके पर। प्रशासनिक अमला भी काम करने में जुटा हुआ है। हर विभाग के किसिम किसिम के काम हैं, लेखपाल गॉव के कागज-पत्तर को मोटरसाइकिल की डिग्गी में संभाल कर धरे हुए है। पता नही कब किस रिकार्ड की जरूरत पड़ जाये।
लेखपाल मौके पर इधर-उधर घूम रहा है, वह कभी लाशों की तरफ जा रहा है
तो कभी किसी तरफ यह सोचते हुए कि तहसीलदार साहेब उसे देख लेते तो ठीक होता। उसकी हाजिरी पक्की हो जाती। उसकी ऑखें नवछेड़ुआ तहसीलदार को तलाश
रही हैं, यहां पहली पोस्टिंग है तहसीलदार की। तहसीलदार हैं वहीं पर, पर वे खो गये हैं प्रशासनिक अमले में, नहीं दिख रहे कहीं, सामने कानूनगो दिख रहे हैं, पहले वे भी खोये हुए थे जनता की भीड़ में अब दीख रहे हैं सामने। लेखपाल कानूनगो की तरफ जा रहा है वह कुछ दूर पहुंच ही चुका था कि एस.पी. साहेब आ गये, जनता की भीड़ उनके साथ थी, फिर लेखपाल खो गया भीड़ में, कैसे देखे कानूनगो साहब को...वह आगे की तरफ बढ़ना चाह ही रहा था कि डी.एम. साहेब आ गये, रेंगने लगे खेतों में, उनके साथ दोनों किस्म की भीड़ थी, पीड़ितों की भी तथा दर्शकों की भी। लेखपाल की ऑखें तलाश रही हैं भीड़ में से तहसीलदार साहेब को, कोई बात नहीं अगर वे नहीं दिखें तो कम से कम डिप्टी साहब तो दिख जायें, पर वे भी नहीं दिख रहे। लेखपाल की ऑखें तनी हुई हैं जैसे वे किसी खोई हुई चीज की तलाश कर रही हों। आखिर कहां विलुप्त हो जायेंगे तहसीलदार साहेब तथा डिप्टी साहेब, होंगे कहीं आस-पास ही पर वे दिखने में नहीं आ रहे। लेखपाल परेशान है कि साहब लोग उसे देख लें...मालूम हो जाये उन्हें कि वह अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद है।
सामने से एस.पी.साहेब खेतों को राैंदते हुए आते दीख रहे हैं, उनकी चाल बता रही है कि वे डी.एम. साहेब से मिलने के लिए आ रहे हैं। वही हुआ फिर तो लेखपाल कहीं खो गया भीड़ में उसकी बद्किस्मती थी कि वह अपना चेहरा तहसीलदार साहेब को नहीं दिखा पाया। भीड़ में खोने का एक फायदा लेखपाल को मिल गया.. लगता है उसके आराध्य उस पर प्रसन्न हैं भीड़ में ही खोये हुए थे कानूनगो साहेब, उनके उदास चेहरे को लेखपाल की ऑखों ने पकड़ लिया।
‘अरे साहेब! बहुत देर से अपको तलाश रहा हूॅ और आप हैं कि मेरी तलाश से बाहर हुए जा रहे हैं, कहॉ थे साहेब...?’
‘कहॉ क्या, यहीं तो था, का करता इधर-उधर नाच रहा था। यहां हमलोगों का क्या काम है, सारा काम तो पुलिस विभाग का है। कोई जमीन की पैमाइश तो करनी है नहीं फिर भी तहसीलदार साहेब ने बुला लिया। मुझे लगा था कि साहब-सूबों के लिए इन्तजाम करना होगा चाय-नाश्ता आदि का पर नहीं आज किसी को चाय-नाश्ते की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमलोग तो राजस्व विभाग से हैं पर जानते हो यहॉ जो स्कूल का मास्टर है नऽ वह तो घटना के समय से ही पड़ा हुआ है बिना खाये-पिये नहीं तो जानते हो मास्टरों को वे कहीं रुकते हैं भला। स्कूल का टाइम खतम वे छोड़ देते हैं स्कूल।’
कानूनगो अधेड़ किस्म का आदमी है। वह जानता है मार-पीट-कतल आदि के मामले में राजस्व विभाग के कर्मचारियों का कोई काम नहीं होता। ऐसे मामलों में पुलिस का ही काम होता है, छान-बीन करना, लाशों का पोस्टमार्टम कराना, मुकदमा लिखना, अपराधियों की गिरफ्तारी करना आदि आदि पर कानूनगो तथा लेखपाल को तो कोई काम होता ही नहीं फिर भी साहेब लोग बुला लिया करते हैं, और हम लोगों को मजबूरन आना ही पड़ता है। साहबों का तो काम होता है ऐसे मामलों में, कानून व्यवस्था का मामला खड़ा हो जाता है, खासतौर से डी.एम. साहेब के जिम्मे सारा काम आ जाता है डी.एम. साहब के काम का मतलब... एस.डी.एम., तहसीलदार, कानून गो तथा लेखपाल का काम। पूरा प्रशासन एक जाल है, इसी जाल में से समस्यायें निकलती है तो समाधान भी निकलते हैं। हम सभी एक जाल में है और जाल की अलग अलग छोटी छोटी जालियॉ हैं।
‘संयोग ठीक था कि कानूनगो साहेब को तहसीलदार साहेब की ऑखों ने देख लिया है। उन्होंने कानूनगो को सहेजा है कि वहीं स्कूल के आस-पास ही रहना, लेखपाल भी आ गया होगा, मिले तो उसे भी अपने साथ रोक लेना, जाने कब कौन सा काम आ जाये, बूझ रहे हो नऽ।’
‘हॉ हॉ साहेब मैं वही रहूंगा स्कूल के आस-पास ही फिर फोन नंबर तो है ही बुला लीजिएगा साहेब।’
कानूनगो साहब फिर उस तरफ चले गये जिधर बड़े अधिकारी गण विचार-विमर्श कर रहे थे कि गॉव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए क्या क्या उपाय किये जा सकते हैं? दरअसल मामला था भी बहुत ही गंभीर। दस आदमी की हत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो थी नहीं, बड़ी घटना थी। गॉव में आगे जाने क्या हो सो शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए ठोस प्रबंध किए जाने के बारे में निर्णय तो लेना ही होगा। इसी लिए सारे आलाधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे। वे कभी एक रास्ते की तरफ सोचते फिर कभी दूसरे रास्ते के बारे में सोचने लगते। एक बात जो आम राय बन कर निकली वह थी कि गॉव में सक्षम पुलिस बल की स्थापना अनिवार्य है। जिसके लिए एस.पी. साहब ने आदेश जारी कर दिया था और तमाम थानों से पुलिस बल एवं पी.ए.सी. के गार्डों को भी बुलवा लिया गया था। यानि शान्ति-व्वस्था की स्थापना के लिए पर्याप्त पुलिस बल वहां हाजिर आ गये थे।
शान्ति स्थापना के साथ साथ जो दूसरी राय बनी थी वह यह कि गॉव में पीड़ितों की सुरक्षा तथा उनके लिए खाने-पीने के सामानों का भी प्रबंध किया जाना चाहिए। शवदाह तथा कर्मकाण्ड के लिए भी विशेष सहायता दी जानी चाहिए। कई स्तर पर प्रशासन की तैयारी चल रही थी। गोया वहां एक तरह से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूरे गॉव में टहलने लगी थी। पुलिस भाई-चारे के स्वभाव वाली हो चुकी थी। राजस्व विभाग के आलाधिकरियों का स्वभाव व भाव दोनों कुदरती हो गया था, सहभागिता वाला। सहभागिता का भाव तो तभी आता है अधिकारियों में जब साहेबपना उनसे छिन जाता है। उनकी बात-चीत से उनका साहब होना छिन गया था, उस समय तो काम से भी छिना हुआ ही दीख रहा था। घटना-स्थल पर न कोई साहब रह गया था न कोई प्रजा, सारे लोग प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद ‘आदमी’ बन चुके थे। इस जघन्य हत्याकाण्ड ने अधिकारियों की नश्ल बदल कर उन्हें आदमी
बना दिया था।
प्रशासन के लोगों में यह भाव तो है ही कि घटनास्थल पर उपस्थित रहना है।
पर उनमें जो कुछ नये हैं वे परेशान हैं आखिर उनका काम क्या है यहॉ पर। यहॉ तो केवल पुलिस का काम है जिसे पुलिस कर रही है। पूरे गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया हैै, हर तरफ बूटों की आवाजें धमक पैदा कर रही हैं, सिपाहियों के कैम्प भी लग चुके हैं। फिर उनकी यहां काहे की जरूरत वे समझ नहीं पा रहे हैं।
अचानक सारी चीजंे नये कर्मचारियों की समझ में आने लगीं जब वहां सप्लाई विभाग के लोगों को देखा गया, कहीं से वे सुन भी लिए कि गॉव को राशन भी दिया जाना है, गॉव वालों में पूड़ियॉ भी बाटी जानी है तथा शवदाह के लिए आर्थिक सहायता भी दिया जाना है। गोया प्रशासन हर तरह से वहां कल्याणकारी राज्य की मजबूत बुनियाद की अवधारणाओं को फलित कर देना चाहता है।
जब सारे मुल्जिमान नामजद हैं, किसी का नाम तो पता लगाना है नहीं, जाहिर है गोलियॉ चली हैं फिर काहे पोस्टमार्टम कराना? नया सिपाही इतना जानता है कि कतल आदि के मामले में मृतक का पोस्टमार्टम किया जाता है पर काहे किया जाता है नहीं जानता। का यह नियम कुदरती है, मार के बदले मार वाले मध्यकालीन नियम से अलग। उस दौर में तो पोस्टमार्टम होता ही नहीं था। घटना तो मध्यकालीन जैसी ही है फिर काहे होगा पोस्टमार्टम?
पर नहीं पोस्टमार्टम तो होगा ही, मध्यकालीन जैसी घटना घटी है वह भी बीसवीं शदी के लोकतांत्रिक समय में? धरती-माई यही गुन रही हैं कि यह जो मार-पीट कतल का मामला है आखिर है क्या? सभ्यता को संचालित करने वाले सारे सुभाषित और उपदेश कहां बिला गये, वेदों, उपनिषदों के मंत्रा कहां चले गये? क्या उनकी धार कमजोर हो गई है? धरती-माई सोच में पड़ गई हैं...
‘वंशवाद की जड़ें हाय!
कितनी गहरी हैं!’
‘सोच में तो धरती-कथा के पात्रा भी हैं कि आरोप लग सकता है उन पर कि किसिम किसिम के पात्रों के कारण कथा का कहन गड़बड़ा गया है, एकरूपता खतम हो गई है कथा की। पर विवशता है कि धरती-कथा लोकतांत्रिक समय की है सो कथा में सत्ता प्रबंधन से जुड़े लोग समय समय पर आवा-जाही करते ही रहेंगे...जाहिर है सत्ता-प्रबंधन से जुड़े लोगों की कथा में हिस्सेदारी से कथा का मूल-रूप तो कुछ बदलेगा ही फिर भी धरती-माई उनमें संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं पर...’
सोनभद्र का प्रशासन तो कंपकंपियों में है ही राज्य सरकार भी लखनऊ में जमी हुई माथे का पसीना पोछ रही है। कभी हिल रही है तो कभी कांप रही है आखिर मध्य-काल कैसे उतर गया सोनभद्र में? एक ही दिन मार दिये गये दस आदमी, सैकड़ों की निहत्थे सत्याग्रहियों पर चला दी गईं गोलियॉ वह भी जमीन के कब्जे के सवाल को लेकर। जमीन के सवाल पर तो सोनभद्र में पहले भी माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश पर सर्वे किया जा चुका है। वन-भूमि तथा काश्तकारी के भूमि के बाबत किसिम किसिम केे बवालों को हल करने के लिए ही सर्वे किया गया था। इस तरह केे हत्याकाण्ड के बारे में सोनभद्र में कभी नहीं सुना गया था। वह तो आदिवासियों का परिक्षेत्रा है, आदिवासी कभी मनुष्यता-विरोधी काम नहीं करते फिर भी ऐसा हुआ। आदिवासियों का समाज सदैव से सहभागितापूर्ण संबन्धों का अनुगामी रहा है। सरल तथा सहज किस्म के सत्याग्रही आदिवासियों पर इतना बड़ा अत्याचार...! यह तो शासन व प्रशासन दोनों के लिए शर्मनाक है। मुख्यमंत्राी जी विचारों से सख्त होते जा रहे हैं, वे सख्ती को प्रशासन का गुणधर्म भी मानते हैं आखिर सरकार का रोब-दाब ही खतम फिर काहे की सरकार। वे आला-अधिकारियों को चैन से बैठने नहीें देंगे।
प्रदेश की राजधानी भी परेशान थी पर अखबारों तथा टी.वी. से शासन के लोकतांत्रिक ऑसुओं की धारा फूटती हुई नहीं दिख रही थी। अखबार तथा टी.वी. वाले पूरे प्रकरण को अपने तरीके से दिखा रहे थे तथा प्रमाणित कराना चाह रहे थे कि सोनभद्र के भूमि-प्रबंधन का मामला जनहित में नहीं है जिसे लोकतांत्रिक ढंग से विधि-पूर्वक हल किया जाना चाहिए।
दिल्ली की नई नई नई सरकार बनी है, दिल्ली की पुरानी सरकार ही दुबारा पूरे बहुमत के साथ चुन कर सत्ता में आई है। उसका दुबारा सत्ता में आना और सत्ता पर जम जाना लोकतंत्रा के लिए इतिहास बन चुका है सो सरकार मस्त मस्त है। जश्न में डूबी हुई है। जीत की खुशी में बजाये जाने वाले ढोल नगाड़ों की आवाजें अभी भी सरकार के कानों में जमी हुई हैं। प्रधानमंत्राी जी विदेशी सत्ता केन्द्रों पर अपने व्यक्तित्व का सिक्का जमाने की योजनाओं को गति प्रदान कर रहे हैं। गति है तो प्रगति है। विदेशी सत्ता प्रमुखों को समझ लेना चाहिए कि नया भारत उग आया है धरती पर, अब भारत में सत्ता के पुराने केन्द्र पूरी तरह से शाकाहारी तर्कों व कार्यक्रमों के कारण जमीनदोज हो चुके हैं। वे अब जमीन से बाहर कभी नहींे निकल पायेंगे। जो गया वो चला गया सदा सदा के लिए ऐसा ही कुछ। दिल्ली पर काबिज सरकार सत्ता में वंशवाद की पक्षधारता के समापन के लिए पूरा जोर लगाती हुई दीख रही है पर दिक्कत है कि वंशवाद को समाप्त कर देने के बाद समाज के उन हिस्सों का क्या होगा जो वंशवाद की जमीन पर ही खड़े हैं, बढ़े हैं, पले हैं और तने हुए हैं, तनेन हैं जो वंशवाद को भाग्य-फल मानते हैं तथा उत्तराधिकार को गठरी की तरह पीठ पर बांधे चल रहे हैं। वंशवाद तो अपने समाज की माटी में धसा हुआ है, इसकी जड़ें काफी गहरे तक हैं उद्योगपतियों से लेकर सामान्य खेतिहर किसानों तक, नाम से लेकर जाति तक, धर्म से लेकर कर्म तक, मजदूरों से लेकर मालिकों तक। वंशवाद कहां नहीं है खोज का विषय है। कैसे खतम करेंगे वंशवाद को आखिर...मारे गये दस सत्याग्रही आदिवासियों के साथ यहां आखिर है कौन, सब तो वंशवादी ही हैं नऽ, वंश के लोग ही मृतकों को कॉधा दंेगे, करमकाण्ड करेंगे, गवाही देंगे, मुकदमा लड़ेंगेे अगर मुकदमरा चला तो....!
केन्द्र और प्रदेश में एक ही पारटी की सरकार है जो वर्षों की आराधाना व पूजा-पाठ के फलस्वरूप स्थापित हुई है, एक तरह से भग्वत-कृपा से हासिल हुई है सत्ता। सत्ताधारी पारटी वाले प्रदेश की सरकार को भी भग्वत प्रसाद ही मानते हैं तथा जोर जोर से नारा उछालते हैं ‘जहॉ सत्य है वहां विजय है’, सत्य कभी नहीं हारता, विजय किसी न किसी दिन सत्य की ही होती है। इस पारटी में भी बहुत सारे लोग वंशवादी प्रक्रिया तथा सुविधाओं से अलग नहीं हैं। इनके बारे में पारटी का करने वाली है किसी को नहीं पता। गनीमत है कि भग्वत-कृपा वाली सरकार ने सोनभद्र की हत्याकाण्ड वाली घटना को दैवीय नहीं माना। माना कि ऐसे कुकृत्य इहलौकिक हैं। सरकार ने यह भी मान लिया कि ऐसा काम भूमाफियाओं ने ही किया है किसी दूसरे ने नहीं। साथ ही साथ इस कुकृत्य की पूरी जिम्मेवारी पुरानी सरकार पर आरोपित कर दिया। पुरानी सरकारों ने ही सोनभद्र के जमीन के सवालों को जनमाया है जाहिर है पहले की सरकारें अपनी पीठ पर सेकुलर विचारधारा लाद कर चला करतीं थीं पर सेकुलर नहीं थीं, सेकुलर दिखने का नाटक किया करती थीं। भूमाफियाओं तथा बड़े जोतकांे की पक्षधरता ही पुरानी सरकार का लक्ष्य था। पूरे देश में भूमाफियाओं को पुरानी सरकारों ने ही हर जगह जनमाया है। उनका लक्ष्य अपना विकास था सबका विकास नहीं पर प्रदेश की नई सरकार किसी भी भूमाफिया को नहींे छोड़ेगी। नई सरकार सबके विकास के लिए काम करती है।
मौजूदा सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा लगाती है। उसे सेकुलर शब्द से ही घिन है मानो यह शब्द अनायास ही धरती पर उतर आया हो, अनायास ही धरती पर उतरने वाली अन्य चीजों की तरह। प्रदेश की सरकार परेशान परेशान हो गई है आखिर मामला क्या है...सरकार सतर्क है, किसी भी हाल में लापरवाही नहीं बरतना चाहती। स्थानीय प्रशासन की नकेल कस दी गई है सो स्थानीय प्रशासन के आलाधिकारी कॉपते हुए सक्रिय हो उठे हैं। नागरिकों की सुरक्षा को लेकर वे मन ही मन प्रार्थनायें कर रहे हैं। हत्याकाण्ड की जॉच-पड़ताल के लिए राज्य-स्तर की कई कमेटियॉ सक्षम अधिकारियों के नेतृत्व में गठित कर दी गई हैं। राज्य स्तर पर गठित कमेटियों के बारे में जिले के आला-अधिकारियों को पता है सो वे जहां है वहीं से सतर्क हो गये हैं और भविष्य के कर्म-फल के बारे में गुनने लगे हैं। कर्म-फल के बारे में क्या गुनेंगे अधिकारी, अभी तो वे हत्याकाण्ड वाले गॉव पर ही हैं, उसी के सीमित भूगोल की जॉच-पड़ताल कर रहे हैं, खाता राज, खाता व्यक्तिगत, खाता सहकारी, खाता वन जिरायत की जॉच-पड़ताल तो बाद में की जायेगी पोस्टमार्टम के बाद। अधिकारी मन बना चुके हैं पहले पोस्टमार्टम, एफ.आइ.आर.,आरोपियों की गिरफ्तारी फिर जमीन के कागजों की जॉच-पड़ताल। सरकार को रिपोर्ट भी भेजना है सरकार को, पहला काम है शान्ति-व्यवस्था का जिसे वे करीने से प्रबंधित कर रहे हैं। लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाना है, रपटें लिखनी हैं। प्रशासन को कई टुकड़ों में बाटा जा चुका है जिससे काम के अलग अलग खण्डों को विधिवत किया जा सके। एस.डी.एम. घोरावल रपट लिखवाने के काम की निगरानी कर रहे हैं, तहसीलदार घोरावल उनके साथ हैं, दारोगा घोरावल आरोपियों की सूची बनाने में लगे हुए हैं। गॉव वाले नाम याद करके सूची बनवा रहे हैं कुछ के नाम तो उन्हें याद हैं पर बहुत आरोपी ऐसे है जिनके नाम गॉव वालों का नहीं मालूम सो गॉव वाले तथा मृतकों के परिजन मिल कर आरोपियों के नाम याद कर रहे हैं जैसे जैसे उन्हें नाम याद आ रहे हैं वे दारोगा को बता रहे हैं।
पुलिस का एक निपुण दस्ता आरोपियों को पकड़ने में लग चुका है। आरोपियों के गॉव में पुलिस इधर-उधर घूम रही है। आरोपियों का गॉव सन्नाटा पी रहा है। वहां चहल-पहल नहीं है, न ही ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला वसंत है। इसी सन्नाटे के बीच से पुलिस वालों को आरोपियों को खोज निकालना है। वे जायेंगे कहां भाग कर इस तरह की उम्मीद है पुलिस वालों को। वे भगवान की प्रार्थनाओं में हैं, एक भी आरोपी मिल जाता तो सारे आरोपियों को पकड़ लिया जाता...पर एक भी आरोपी मिले कैसे इसका संकेत प्रार्थनाओं में नहीं है केवल कामना है। आरोपी का मिलना भगवान के ऊपर है वे चाह लेंगे तो सारे आरोपी धर लिए जायेंगे। पुलिस टीम में एक अनुभवी है उसने कई बार जमीन में गड़े आरोपियों को खोज निकाला है, जो नहीं मिल पा रहे थे उन्हें भी, उसके लिए उन पनाहगाहों तक पहुंचना आसान हो जाता है जहां माना जाता है कि पुलिस पहुंच ही नहीं सकती।
उसके कारनामों को पुलिस बल का मुखिया जानता है। मुखिया उसे सहेज रहा है.‘यार! कुछ तो उपाय बताओ..कैसे तलाशा जाये आरोपियों को कम से कम एक तो मिल जाता...तुम तो जानते ही हो कि नामजद आरोपियों को न तलाश पाना पुलिस महकमे के लिए बहुत बड़ी बदनामी है। कोई अज्ञात कतल वाला यह मामला नहीं है, दसियों नामजद हैं, और भी नामजद किए जा सकते हैं अज्ञात आरोपियों को छोड़ो उन्हें बाद में तलाशा जायेगा। दारोगा गंभीर है और दिल से चाहता है कि आरोपी पकड़ लिए जायें, उसका कद व पद दोनों बढ़ जायेगा, एस.पी. साहेब इनाम देंगे अलग से।
अनुभवी सिपाही आगे बढ़ आया है..वह आरोपियों को पकड़ने के बारे में गुन रहा है तथा उन सूत्रों पर विचार कर रहा है जिसके लिए पुलिस के मुखवीर जाने जाते हैं। वह सोच रहा है कि पुलिस के मुखवीर तो होंगे ही, घोरावल थाने को वह नहीं जानता तो क्या हुआ वहां के लोग तो जानते ही होंगे मुखवीरों के बारे में वैसे भी बना मुखवीरों के कोई थाना कैसे चल सकता है? मुखवीर जासूसी करने के मामलों में किसी व्यावसायिक जासूस से कम नहीं होते, वे बांए चलने वालों के बारे में जितना जानते हैं दाहिने चलने वालों के बारे में उससे कम नहीं जानते। वे तो उन तटस्थों के बारे में भी जानकारियां जुटाये रखते हैं जो समाज में साधुता की गठरी
पीठ पर लादे हुए चला करते हैं।
मुखवीरों की जासूसी कला का नमूना आपातकाल के दौर में देखने को मिला था जब महज दो दिन के भीतर ही तत्कालीन सरकार विरोधी दलों के तमाम नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसने का रिकार्ड बना दिया था। उस दौर में मुखवीरों की चॉदी थी, लोग-बाग उन्हें देखते ही डर पीने लगते थे। पुलिस के ये मुखवीर पनाहगाहों से उपजते हैं। पनाहगाहों के लिए मुखवीर मेहमान की तरह होते हैं, कहा जाता है कि मुखवीर न हों तो पनाहगाह न हों। पनाहगाह मुखवीरों की सुरक्षा करते हैं तो मुखवीर पनाहगाहों को पुलिसिया सूचनाओं से मालामाल किए रहते हैं सो दोनों के रिश्ते अन्योन्याश्रित होते हैं एक दूसरे के पूरक।
अनुभवी सिपाही आरोपियों को पकड़ने के दायित्व को पा कर मस्त मस्त है..आरोपी जायेंगे कहां रहेंगे तो इसी धरती पर। कुर्की होने के पहले आरोपियों को गिरफ्तार कर लेना है। कुर्की की कार्यवाही के बाद तो आरोपी खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया करते हैं जिससे पुलिस की बदनामी होती है। सो आरोपियों को कुर्की की कार्यवाही होने के पहले ही पकड़ना आवश्यक है।
अनुभवी सिपाही गॉव में भी इधर उधर घूम रहा है, गॉव के लोगों से पूछ-गछ कर रहा है। गॉव वालों को तो पता है ही कि आरोपी कौन हैं और कहां के रहने वाले हैं। वह हत्याकाण्ड कोई अज्ञात मामला नहीं है, दिन के उजाले में सूरज देवता को प्रणाम करते हुए गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया था एक तरह से समय को मध्यकाल का समय बना दिया गया था। मजाक नहीं है गॉव में दो तीन सौ आदमियों का गोलबन्द होकर आ जाना, कई ट्रेक्टरों से खेत जोतना, फिर गॉव वालों का वहां हाजिर हो जाना, बहस मुबाहिसा होना, तूॅ तूॅ मैं मैं होना और फिर बन्दूकों का निकल जाना और लगारतार धॉय धॉय धॉय, जाहिर है धॉय धॉय होने के बाद लाशें गिरने लगीं, एक लाश गिरी फिर दूसरी गिरी इसी तरह दस लाशें जमीन पर गिरा दी गईं।
अनुभवी सिपाही कुछ कुछ मनोवैज्ञानिक किस्म का है, वह जानता है कि इस तरह किसी गॉव पर हमला करना वह भी दिन के उजाले मे आसान नहीं है, आरोपियों के कुछ लोग इस गॉव में होगे जरूर, बिना गॉव के निवासियों के संपर्क के इतनी बड़ी घटना की कोई तैयारी नहीं कर सकता। आरोपियों के गहरे जुड़ाव गॉव के कुछ लोगों से होंगे जरूर। उन जुड़ावों को पता करना पहला काम है। जुड़ाव का पता चल गया समझ लो आरोपियों का पता चल गया।
अनुभवी सिपाही भीड़ से बाहर निकल जाता है, आरोपियों के जुड़ावों की गन्ध सूंघने। उसके जिम्मे आरोपियों को गिरफ्तार करने का दायित्व दिया गया है सो वह वहां क्यों रहे? लाशों को उठाने का काम दूसरे सिपाही कर ही रहे हैं। कुछ ही देर में लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए चली जायेंगी रापटगंज। दारोगा चोपन ने
आरोपियों की सूची बना लिया है केवल रपट लिखाना ही बाकी है। वह भी लिख
जायेगी कुछ घंटों में। अनुभवी सिपाही भीड़ से कुछ दूर आगे निकला ही था कि सी.ओ. रापटगंज ने उसे बुला लिया।
‘कहां जा रहे हो, लाशों को ले चलना है रापटगंज और तुम चले जा रहे हो’ पूछा सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही से...
‘नाहीं साहेब हम कहां जायेंगे, हम तो पुलिस का ही काम करने जा रहे हैं’ अनुभवी सिपाही ने सी.ओ. रापटगंज को बताया
‘उधर का काम है पुलिस का भीड़ से अलग, काम तो यहां है, लाशों को उठाना है, रापटगंज ले चलना है, रपट लिखवाना है।’
सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही को उसका काम बताया, सीओ. को का पता कि अनुभवी सिपाही को आरोपियों के बारे में सूचना इकठ्ठा करने के काम पर लगाया गया है। अनुभवी सिपाही ने विनम्रता से सी.ओ. को बताया....
‘साहेब!आरोपियों को पकड़ना भी तो पुलिस का काम है, मुझे इसी काम पर लगाया गया है। सो मैं गॉव में जाकर पता करूंगा कि आरोपी कहां है, कहां तक भाग सकते हैं, कैसे पकड़ा जा सकता है उनको आदि आदि।’
सी.ओ. रापटगज एकदम नया है रंगरूट महज चार पांच साल पुराना, एस.डी.एम. घोरावल की तरह। दोनों पहली या दूसरी परीक्षा में ही क्वालीफाई कर गये हैं। सी.ओ. रापटगंज अनुभवी सिपाही की बातें सुनकर गंभीर हो जाता है वह चाहता है सिपाही से पूछना कि वह कैसे पता कर पायेगा अन्डरग्राउन्ड हो चुके आरोपियों के बारे में, उनका पता-ठिकाना कैसे मालूम करेगा...पर उसे अपने पद का ख्याल आ जाता है। एक अदना से सिपाही से पूछना यह उचित नहीं होगा सो सी.ओ. चुप लगा जाता है पर मन में उसके हलचल है.. पूछ लेना ही ठीक होगा संभव है उसे भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम पर लगा दिया जाये हालांकि यह मामला उसके क्षेत्राधिकार के भीतर का नहीं है फिर भी, एस.पी के विवेक पर है वह जैसा उचित समझेगा निर्णय ले सकता है और जब एस.पी. का आदेश हो जायेगा फिर तो उसे भी आरोपियों के पकड़ का काम करना ही होगा।
सी.ओ. का मन सिकुड़ गया है अफसरी फैलावों से, वह कुदरती आदमी बनने लगा है, बिना अधिकार-फधिकार वाला। बिना अधिकार-फधिकार वाले आदमी की तरह वह तमाम तरह के डरों से घिरने लगा है, कुछ भी हो सकता है अगर वह अपराधियों की पकड़ नहीं कर पाया। वह अपने आरध्य को याद करता है, वही बचायेंगे जो होना होगा वह होगा ही फिर काहे डरना। उसने खुद को संभाला और सिपाही से विनम्रता से पूछा..
‘का हो कैसे पता लगाओगे यार! आरोपियों का’
अनुभवी सिपाही तो जानता है कि ये साहेब लोग हाथी दांत की तरह होते हैं इन्हें का पता कि आदमी कई कई परतों वाला होता है, एक परत होती है मनुष्यता वाली, उसी परत के सहारे हम आरोपियों तक पहुंच पाते हैं। कभी कभी लालच देनी पड़ती है मुखवीरों को और कभी दूसरे किस्म की सहायता, जिले पर उसका कोई काम है तो उसे करवा दिया। मनुष्यता वाली परत छू लीजिए बस काम हो गया।
सिपाही ने अपने अनुभव को सी.ओ. साहेब के सामने उड़ेल दिया...
सी.ओ. अनुभवी सिपाही का मुह देखता रह गया...
‘पढ़ाई की गरिमा से कम नही होती अनुभव की गरिमा’। सिपाही भले सिपाही है पर जानकार है.. सी.ओ के मन में सिपाही के बाबत जबाब उछला।
साहब से बोल-बतिया कर सिपाही चला गया। वह अब उन पनाहगाहों तक जाना चाहेगा जहां आरोपियों के होने की सभावनायें होंगी। आरोपी आखिर कहां तक जा सकते हैं उसे इसका अनुमान है। वह उन्हीं अनुमानों के साथ आरोपियों को पकड़ने का प्रयास करेगा...
‘देखिए क्या होता है क्या आरोपी पकड़ में आ पायेंगे उसके? वह सिपाही भी धरती-माई का भक्त है, चारपाई छोड़ते ही हर सुबह वह धरती को स्पर्श कर प्रणाम करता है फिर जमीन पर पॉव रखता है, प्रार्थना करता है कि दिन अच्छा बीते। धरती-माई भी ऐसे भक्तों का बहुत ध्यान रखती हैं पर इस समय संकट में हैं धरती-माई, उन्हें समझ नहीं आ रहा किस भक्त की प्रार्थना सुनें किसकी नहीं। प्रार्थना तो सभी कर रहे हैं..धरती-माई व्यथित होकर प्रार्थनाओं से बाहर निकल कर प्रकृति का एक उत्पाद बनना चाह रही हैं...’
‘लाशें बोलने लगीं...
हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया!’
‘पर लाशों की सुनेगा कौन? धरती-कथा के पात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है, कुछ की भूमिका तो लाश बन कर खतम हो चुकी है। लाशों की भूमिका प्रशासन के आलाअधिकारियों की भूमिका के साथ जुड़ चुकी है एकमएक हो गई है। वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं, अपने संवाद रट रहे हैं, अधिकारियत के अभिनय को संवार रहे हैं, जिससे किसी भी सार्वजनिक दृश्य में कमजोर न दिखें। धरती-कथा अभी तो शुरू हुई है तरह तरह के दृश्य आयेंगे इस कथा में। विरोधी-दलों के नेताओं के विरोध वाले दृश्य, सरकार के बड़े अफसरों, मंत्रियों कीे डाट-फटकार वाले दृश्य, जॉच के दृश्य, कई तरह के दृश्यों से टकराना होगा उन्हें। अगर अफसरियत का अभिनय कमजोर हुआ तो वे पिट जायेंगे फिर उनकी भूमिका ही छीन ली जायेगी। आला-अधिकारियों से जुड़े छोटे कर्मचारी भी कथा में कहीं कहीं किसी दृश्य की तरह दीख रहे हैं बिना किसी भूमिका के....धरती-कथा में अभिनय करने वालों को नहीं पता कि कथा का अंत कैसे होगा। भला ऐसी कथाओं के अंत के बारे में किसे पता चलेगा वह चाहे कोई हो।’ नया सिपाही लाशों का मुआयना कर रहा है और लाशें हैं कि उससे बतियाने के लिए बांया-दांया कर रही हैं। सिपाही अचरजों में है, हो क्या रहा है उसके साथ, भला लाशें कभी बोलती-बतियाती हैं? वह तो केवल इतना देखना चाहता है कि लाशें ठीक से बंधी हैं कि नहीं, ठीक से नहीं बंधीं तो पोस्टमार्टम घर तक ले जाना मुश्किल होगा। नये सिपाही को खुद पर गुस्सा आया.‘जो मर गया, मर गया वह बोलने-बतियाने के लिए काहे आयेगा धरती पर, बोलने-बतियाने वालों की धरती पर कमी तो है नहीं, भरे पड़े है हर तरफ।’
नया सिपाही समझ चुका है कि लाशों के पोस्टमार्टम के बाद ही वह पुलिसिया जिम्मेवारी से मुक्त हो सकेगा। ड्यूटी से मुक्त होने के बाद अपने आवास पर जायेगा, अपने घर वालों से बातें करेगा। नया सिपाही अचानक मुड़ गया उसे लगा कि उत्तर तरफ वाली लाश के कपड़े ठीक से बॉधे नहीं गये हैं। वह उस लाश की तरफ जाता है और देखता है..कपड़े तो बंधे हुए है ठीक से ही’ वह आश्वस्त हो गया। लाश का कपड़ा ठीक से बंधा देखकर वह लौट ही रहा था कि उसे लगा लाश उसे बुला रही है... वह चिढ़ जाता है.. अधिकारी तो उसे बुलाते ही हैं अब यह लाश भी उसे बुला रही है।
‘का है भाई! कुछ तो बोलो काहे बुला रहे हो’...उसने सामने बंधी लाश से पूछा’भला लाश बोलती है! पर उसे लगा कि लाश बोल रही है और साफ साफ बोल रही है....‘हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया! हम तो झगड़ा बरकाय रहे थे तब्बै बन्दूक चला दिया हत्यारों ने, अब आपसे का बतावैं भइया! हम भागौ नाहीं पाये अउर लाश बन गये, हमरी लाश जीन काटना-पीटना सिपाही बाबू!’
नया सिपाही वहीं ठमक गया, उसने दिमाग पर जोर दिया, लाश नहीं बोल रही, बोल तो उसका मन रहा है। वह कल्पना चित्रा बनाने लगा है हालांकि वह चित्राकार नहीं है। उसने कपड़ा बांधते समय लाश को देखा था, गठीला बदन, मोटी नाक, फैला माथा, गंदुम सांवला रंग, करीब पौने छह फीट की ऊॅचाई यही कोई तीस-पैंतीस की उमर। एक बार तो सिपाही को लगा कि लाश कुछ बताना चाहती है, शायद बयान देना चाहती हो पर बयान देकर का मिलेगा उसे, वह साहेब तो है नहीं, मरते आदमी का बयान केवल मजिस्ट्रेट ही लेता है मजिस्ट्रेट को बुलाना होगा क्या?
‘पागल हो क्या जी! वह खुद को फटकारता है, मजिस्ट्रेट तेरे बुलाने से आयेगा क्या? वह हाकिम होता है और हाकिमों के अपने तौर-तरीके होते हैं, वे उन्हीं तौर-तरीकों से चला करते हैं, तुझे जो काम मिला है उसे कर। तूॅ मृतक के आखिरी बयान के चक्कर में मत पड़। वह मर गया वही उसका आखिरी बयान है इस बयान को कानून, अदालत, सरकार समझे न समझे तूॅ का कर लेगा समझ कर। नये सिपाही ने अपने विचारों के खोल में दुबक जाना उचित समझ कर खुद को विषयान्तरित किया...
‘ये सब काम सिपाही के थोड़ै हैं, ये सब तो साहबों के काम हैं, मृतक का बयान लेना, जॉच करना तथा अपराधिक कृत्यों की समीक्षा आदि करना। उसका तो काम है साहबों के आदेशों का पालन करना, उनके कहे के अनुसार धूप हो गर्मी कहीं भी
खड़े रहना, जब तक ड्यूटी है तब तक उसे लगातार देखते रहना है साहब की ऑखों को, समझते रहना है उनके इशारों को, उनके हिलते हुए होठों की चालों को समझ सकने की योग्यता हासिल करना है उसे।
अचानक वह हिल गया... अरे! उसे नौकरी भी तो संभालनी है, बहुत मुश्किल से मिली है। जब वह पढ़ रहा था काशी हिन्द विश्वविद्यालय में तब उसे यह पता नहीं था कि यह जो नौकरी वाली दुनिया है कितनी कठिन है...वह चाहता था कहीं अध्यापकी करना पर पूरी ताकत लगा देने के बाद भी उसे अध्यापकी हासिल नहीं हो सकी। कई तरह की प्रतिययोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया पर हाय री किस्मत! लगातार उससे कोसों दूर भागती रही थी। एक दिन अचानक उसने निर्णय लिया कि सिपाही वाली भर्ती को आजमाया जाये और संयोग देखिए कि वह चुन लिया गया उसमें। तमाम कठिनाइयों से मिली इस नौकरी को वह नहीं गवां सकता अगर नौकरी गंवा दिया फिर तो सारा कुछ चला जायेगा, नौकरी है तो जीने का आसरा है। केसे संभालेगा अपना घर वह बिना नौकरी के।
लोग दुनिया को जाने कैसे खूबसूरत और हसीन मानते हैं, कैसे है यह दुनिया हसीन, इसकी हसीनी तो कहीं नहीं दिख रही, हर तरफ खुरदुरी ही दिख रही है। वह सोचते सोचते विश्वविद्यालय की यात्रा पर निकल गया पढ़ाई के दिनों में। एक कवि-गोष्ठी में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह की सुनी एक कविता की मार्मिक पंक्तियों ने उसे पकड़ लिया.. कवि भी दुनिया को सुन्दर और गर्म देखना चाहते हैं उस हाथ की तरह जिसे उन्होंने हाथ में लिया हुआ है।
‘उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह सुन्दर और गर्म होना चाहिए’
विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान तमाम विद्वानों के लिखे को पढ़ते हुए उसे भी लगा था कि दुनिया को सुन्दर और गर्म होना चाहिए पर कैसे? उसे समझ नहीं आया। उसका अनुभव केदार जी से कुछ भिन्न है। मॉ का चरण स्पर्श करते हुए उसे लगातार महसूस होता रहा है कि दुनिया को मॉ की चरणों की तरह ममत्व से पूर्ण होना चाहिए भले ही गर्म हो न हो पर ममत्व-पूर्ण दुनिया को तो होना ही चाहिए। वह लगातार अपने चित्त को ममता से ओत-प्रोत बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसा करने के कारण उसे सभी का प्यार व दुलार भी मिलता रहा है पर अब वह सोचता है कि कवि केदारनाथ जी सही कहते हैं कि दुनिया को सुन्दर ही नहीं गर्म भी होना चाहिए जिससे अवश्यक होने पर आकाश की तरफ मुठ्ठियॉ लहराई जा सकें।
विश्वविद्यालय की सोच से बाहर निकल कर एक बार फिर वह लाशों की तरफ मुड़ता है और पूरी तरह से सहेज लेना चाहता है कि सारी लाशें ठीक से बंधी हुई हैं कि नहीं..
लाशें ठीक से बंधी हुई देख कर वह खुश होता है, भले ही वह नया सिपाही है तो का हुआ काम करने के मामले में नया नहीं है। धीरे-धीरे वह सीख लेगा सिपाही-गिरी।
घटना-स्थल पर जितने लोग थे सभी के दिल-दमाग पर घटना का आतंक पसरा हुआ था सो वे जल्दी जल्दी सारी कार्यवाही निपटा लेना चाहते थे, सभी जल्दी में थे। नया सिपाही पान मसाला वगैरह नहीं खाता था पर सुुर्ती खाता था इसके लिए वह सुर्ती पहले से ही बना कर एक डिब्बी में रखे हुए था। उसने डिब्बी खोला, उसमें से सुर्ती निकाला फिर मला और मुह में डाल लिया। उसके पास ही में राजस्व विभाग के एक जन और भी खड़े थे उनसे नहीं रहा गया...
‘भाई साहब! और है क्या...?’
‘हॉ और है’
‘थोड़ा दीजिए’
‘थोड़ा नहीं पूरी डिब्बी लीजिए मन भर खा लीजिए’
राजस्व विभाग का कर्मचारी खुश हो गया। उसके पहले उसने गॉव के एक आदमी को सुर्ती मलते हुए देखा था उसके मन में आया था कि उससे सुर्ती मॉगे पर उसने खुद को रोका...पता नहीं इसका हाथ साफ है कि नहीं सो उसने नहीं मॉगा उस गवईं आदमी से। इस बार वह खुद को नहीं रोक सका और मॉग लिया। यह मानकर कि सिपाही है इसका हाथ तो साफ होगा ही पर उसको क्या पता कि जिनके हाथ साफ दीखते हैं उनके दिल दिमाग बहुत गन्दे होते हैं। सुर्ती का खेल हाथ का है दिमाग का नहीं। केवल हाथ साफ रहना चाहिए दिमाग का क्या.. उसकी जरूरत सुर्ती बनाने में थोड़ै पड़ती है।
राजस्व विभाग के आदमी ने नये सिपाही से सुर्ती मांगा और खाया फिर सुर्ती की डिब्बी उसे लौटा दिया। राजस्व विभाग का आदमी भी वहां ड्यूटी बजा रहा था। उसके साहब ने कहा था कि जब तक लाशें पोस्टमार्टम के लिए रवाना न हो जायें तब तक तुझे वहीं घटना स्थल पर डटे रहना है। सो वह ड्यूटी स्थल पर डटा हुआ था। करीब दो घंटे से वह वहीं हैं तथा नहीं समझ पा रहा है कि वह वहां क्यों है? सिवाय इसके कि उसे ड्यूटी करनी है तो करनी है नहीं तो साहेब लोग उसके खिलाफ कार्यवाही कर सकते हैं, उसका हल्का बदल सकते हैं, तनख्वाह काट सकते हैं, भला-बुरा बोल सकते हैं। वह घटना-स्थल के अगल बगल मडरा रहा है। घटना स्थल पर हाजिर होने के लिए जब उसे आदेश दिया गया था तभी बोल दिया गया था कि वह सफेद रंग का साठ मीटर कपड़ा तथा कुछ रस्सी खरीद लेगा जिसे लाशों बाधा जा सके। घर से निकलते ही उसने वही काम किया खरीददारी वाला। सुबह के समय दुकानंे तो खुली नहीं थी। घोरावल आकर उसने एक परिचित की दुकान खुलवाया और कपड़ा तथा रस्सी खरीद लिया। रुपये की उसे चिन्ता नहीं थी विभाग से उसे नगद कभी भी मिल जायेगा। खंजाची बाबू बहुत ही अच्छे आदमी हैं। कई
बार उसने अपनी टेट से रुपया खर्चा है। पी.डब्लू.डी. के बंगले पर जब मंत्राी वगैरह आते हैं तब उसे ही वहां ड्यूटी पर लगाया जाता है, वह उनके खान-पान का इन्तजाम करता है। साहब लोग तो केवल इन्तजाम देखने आते हैं। मंत्राी वगैरह भी उसे कुछ न कुछ दे ही जाते हैं पर सब नहीं देते कुछ तो एकदम चिरकुट होते हैं मक्खी-चूस। वे कायदे से सलाम भी नहीं कबूलते ऐंठे रहते हैं।
राजस्व विभाग के कर्मचारी को अचानक हसी आ गई... वह यहां आकर काहे परेशान हुआ जा रहा है, यहां भी तो इन्तजार करना है, वहां भी इन्तजार ही तो करते हो आखिर का फर्क है यहां के इन्तजार में और डाकबंगले के इन्तजार में, इन्तजार करो, जब साहब लोग बोलेंगे तब निकल लेना यहां से और क्या.. वह फिर हस रहा है अपने पर आखिर तुम्हारा काम क्या है?
‘खड़े रहना और खड़े रहना...’
‘इन्तजार करना और इन्तजार करना...’
फिर तुझे यह जो इन्तजार है काहे बुरा लग रहा? इन्ताजर तो अच्छी बात है लेकिन हॉ ड्यूटी वाला इन्तजार अच्छा नहीं होता, अच्छा होता है प्रेमिका का इन्तजार करना या बुरी हालत में पत्नी का वह फिर हसने लगता है अपने आप पर...
‘बेटा! जब नौकरी किए हो तो यह सब करना ही पड़ेगा।’
हस लेने के बाद वह खुद से संवाद करने लगता है...
‘अरे! डाकबंगले वाले इन्तजार और यहां के इन्तजार में जमीन आसमान का फर्क है वहां का इन्तजार तो इतना मनोरम और हसीन होता है कि क्या कहने... एकदम स्वर्ग माफिक, सिर्फ मेहमानों का दिल-दिमाग रंगीन हो बस। मेहमानों के साथ यह जो रात है नऽ अपने आप रंगीन हो जाती है, मुझे ही देखना होता है कि मेहमान को कोई छेड़ने न आ जाये, रात का मनोरम कहीं से घायल न होने पाये। साहब सो रहे हैं, इतना ही बोलना पड़ता है। आहाते के गेट पर ताला चढ़ा कर मैं भी आराम से सो जाता हूॅ, खाने-पीने का सारा सामान होता ही है, मंहगी दारू होती है, चिकन होता है, पोलाव होता है, अरे क्या नहीं होता उस समय किचन में, चाहे जो खाओ, जितना खाओ, खाने से कुछ कम नहीं होता, यह मुझे डाक बंगले की मेहमाननवाजी से ही समझ आया।’
राजस्व विभाग का कर्मचारी एकदम खाली खाली है तथा उसे समझ आया कि यह जो नया सिपाही है वह भी खाली खाली ही होगा। उसके जिम्मे भी कोई काम नहीं दिख रहा केवल लाशों की निगरानी कर रहा है..यही ड्यूटी है शायद उसकी।
राजस्वविभाग के कर्मचारी ने नये सिपाही को टोका...
‘सिपाही जी आप किस थाने से हैं?’
‘मैं रापटगज कोतवाली पर तैनात हूॅ’
‘वहां कब से हैं?’
‘अभी पहली पोस्टिंग है साल भर से हूॅ’
‘कहां के रहने वाले हैं?’
‘जौनपुर के’
इसके आगे जाति आदि पूछना ठीक नहीं है सो राजस्व विभाग का आदमी खुद को रोक लेता है...जाति पूछना ठीक नहीं। जाति पूछना उसने जान-बूझ कर रोका मन में तो था ही कि जाति पूछ ले, पर असभ्यता हो जाती। वह राजस्व विभाग का छोटा कर्मचारी है तो का हुआ असभ्य थोड़ै है। वह जब रुक जाता है फिर नया सिपाही उससे पूछता है कि चलो जान-पहचान हो जायेगी। विभाग पूछ लेना चाहिए।
‘और भाई साहेब! आप किस विभाग से हैं...?
नये सिपाही ने राजस्व विभाग के कर्मचारी से पूछा...
उधर से उत्तर आया....
‘भइया मैं राजस्व विभाग से हूॅ जो सभी विभागों का मालिक होता है। हमारा ही अधिकारी जिले का मुखिया होता है, जो सभी विभागों पर हुकूमत करता है। उसी विभाग का हूॅ भाई साहेब! पर का करें ड्यूटी ऐसी है कि खड़े रहना है दिन भर, बिना खाये, बिना पिये। भोर में ही निकला हूॅ घर से। वो तो मेरी पत्नी घुर देहाती है, मुझे परमेश्वर मानने वाली। उसने भोर में ही नाश्ता क्या खाना बना दिया उसे खाकर घर से निकला नहीं तो यहॉ मर ही जाता। घोरावल में कर-कपड़ा खरीदा लाशों को तोपने तापने के लिए फिर यहॉ आया। लाशें चली जायें फिर थोड़ा आराम मिले।’
‘यही हाल मेरा भी है, कोतवाल साहेब यहीं ड्यूटी लगा गये हैं। वैसे लाशें बंध गई हैं, कुछ ही समय में यहां से चली जायेंगी भी, दिवान जी बोल कर गये हैं।’
नया सिपाही राजस्व विभाग के कर्मचारी से कुछ विशेष बतियाना नहीं चाहता। का होगा बतियाकर, राजस्व विभाग का है बहुत होगा तो लेखपाल होगा और का होगा। कानूनगो भी होता तो साहबों के साथ रहता, यहां थोड़ै रहता। वह भी साहबों की जाति का होता है। मेरे दिवान जी भी साहबों की जाति वाले हो गये हैं। कक्षा दस पास हैं, बोली सुनो तो जान पड़ता है कि आदिशंकराचार्य बोल रहे हैं पर काम देखो तो घिन आती है। रात में अगर कंजड़ टोले वाली छमिया नहीं आती तो परेशान हो जाते हैं। उन्हें नींद ही नहीं आती। छमिया है भी तो गजब की, कौन नहीं लुभा जायेगा उस पर। दिवान जी के लिए छमिया पाकेट खर्च है तो प्रमोशन का कागज भी। थाने के दारोगा लोग दिवान जी पर फिदा रहते हैं। दारोगा भी का करंे, घर से दूर, मार-पीट वाले कामों की रोक-थाम, रपट, मुकदमा, गिरफ्तारी, दिन भर की ड्यूटी, अक्सर साहबों के यहां सलामी करना तो कभी अदालत में गवाही साक्षी के लिए हाजिर रहना, पूरी तरह से नीरस और उबाऊ जिन्दगी। सूरज कैसे उगता है कैसे अस्त होता है दारोगा नहीं जानते, कौन सा महीना वसंत का है, कौन सा महीना सावन का है, कैसे होते हैं सावन के गीत बेचारे दारोगाओं को क्या पता, वे तो रोबोट की तरह वर्दी पहने रिवाल्वर खोंसे और चल दिये ड्यूटी पर।
अरे वो तो दिवान जी हैं कि दारोगाओं को सावन के गीतों से दो-चार करवा देते हैं, फगुनहटी गुलाल लगवा देते हैं उनके गालों पर, नहीं तो बेचारे दारोगा किसी शोक-कविता की तरह केवल रोजनामचा ही लिखते रह जाते हैं।
तो मेरे दिवान जी थाने की रौशनी हैं, वे नहीं हैं थाने पर तो बूझो कि थाना अन्धेरे में घिर गया है। थाने पर चाहे कोई हो दिवान जी ही सबकी जेबों को बाजार में खरीद की योगयता वाला बनाते हैं, रोज का खर्चा किसी न किसी बहाने डाल दिया करते हैं जेबों में। मैं भी उन्हीं के आगे-पीछे परछाईं की तरह डोलता रहता हूॅ। मेरा भी काम चल जाया करता है।
नया सिपाही अब परेशान हुआ जा रहा है, काफी देर हो गई अभी दिवान जी नहीं आये। बड़े साहब लोग जाने का कर रहे हैं। अरे अब काहे के लिए देरी हो रही है नया सिपाही देर होने के कारण को जानना चाह रहा है पर उसे बताये कौन? तभी एक सिपाही उसकी तरफ जोर जोर से रेंगता आता दिखा... जरूर कोई सन्देश ला रहा होगा लाशों को ले जाये जाने के बारे में...
बात सही थी वह सूचित करने ही आया था उसे कि अब लाशें ले जाई जायेंगी, बड़े साहेब लोग भी इधर ही आ रहे हैं।
‘देखो कहीं हिलना नहीं, बड़े साहब लोग अब खाली हो गये हैं इधर ही आ रहे हैं। सिपाही माथा ठोंकते हुए जैसे काफी दुखी हो बताने लगा...
‘अरे! का करें साहेब लोग, एक से एक नेता-परेता आ गये हैं। साबित कर रहे हैं कि वे आदिवासियों के हितुआ हैं। इसके पहले जाने कहॉ थे? अब जब दस सत्याग्रही आदिवासी मार दिए गये फिर चले आये प्रशासन को हड़काने। अब का करोगे हड़काकर जो होना था वह तो हो चुका।
‘एक दूसरा नेता था विरोधी पारटी का शायद आदिवासी नेता था बक बक कर रहा था। बोल रहा था कि प्रशासन की लापरवाही से ऐसा हुआ। हमार मन तो किया कि साहेब से बोल दूॅ इसका नाम भी लिखवा दो साहेब एफ.आई.आर. में पर हम का बोलते सो चुप रहे। का बतावैं यार! जमीन का मामला पुलिस का थोड़ै है यह मामला तो राजस्व विभाग का है। जमीन का इन्तजाम कायदे कानून से करोगे नहीं और पुलिस को दोष दोगे, पुलिस का कर लेगी जमीन के झगड़े में।’
‘एक बात बतायें, हमारे साहेब लोग जो इस समय जिले पर तैनात हैं बहुत ही होशियार हैं। यार! मेरे तो समझ में नहीं आया कि उनमें से कौन अधिक बुद्धिमान हैं, एस.पी. के डी.एम., दोनों लोग एक से बढ़ कर एक हैं। लगता है डी.एम. साहेब एस.पी. साहेब से ज्यादा काबिल हैं फिर लगता है कि एस.पी. साहेब डी.एम. साहेब से ज्यादा काबिल हैं। खूब खूब समझाये नेताओं को, समझाये का यार! उल्लू बनाये और बेचारे नेता अपना मुह लिए बोलना बन्द कर दिये। यार! साहेब साहेब होते हैं। नेताओं की पंचाइत में काफी देर हो गई।
‘मुझे तो लगा था कि नेतवा मिल कर हल्ला बोल देंगेे, नहीं ले जाने देगे लाशों को गॉव की भीड़ नेताओं के साथ हो ही जाती पर वाह रे हमारे साहेब लोग! तब्बै सरकार ओनपर पैसा खरचती है और राजसी सुविधायें देती है नाहीं तऽ सरकार पूछती है भला किसी को। साहब लोग भी बेचारे का करते, वे मजबूर थे, समझा-बुझा कर ही उन्हें काम निकालना था।’
‘पर एक नेतवा बेचारा ठीक बोल रहा था। वह शुरू से बोल रहा था कि साहेब जमीन का सर्वे फिर से करवाओ। नया सर्वे हो जायेगा सारा कुछ ठीक हो जायेगा। येही बीच एक बात और हो गई थी किसी तरह से डी.एम. साहेब को मालूम हो गया था कि कोई मंत्राी भी घटनास्थल पर आने वाला है सो साहेब जल्दी करना चाहते थे। सी.एम.ओ. साहेब का फोन भी आ गया कि वे तैयार हैं, पोस्टमार्टम करने की सभी व्यवस्था हो चुकी है। पूरा अस्पताल परेशान था घायलों का इलाज करने में, अस्पताल के एक एक कर्मचारी जुटे हुए थे वे अपने स्तर से प्रयास कर रहे थे घायलों का इलाज करने में। गंभीर रूप से कुछ घायलों को बी.एच.यू. भिजवा दिया गया सभी के लिए एम्बुलेस का प्रबंध किया गया था।
दौड़ कर आते हुए सिपाही के बातें सुनकर नया सिपाही आश्वस्त हुआ, नहीं तो वह घबड़ाया हुआ था। घटनास्थल पर लाशें पड़ी रहने का अब कोई मतलब नहीं, पोस्टमार्टम जितना जल्दी संभव हो सके करा लेना चाहिए। घर के लोग लाश को अधिक देर तक जैसे घर में नहीं रखना चाहते वैसे ही पुलिस भी नहीं चाहती लाशों को अपने कब्जे में रखना, निपटा देती है दाह या दफन करके। चट-पट पंचनामा फिर मृतक-संस्कार। कुछ न कुछ उपाय करती ही है पुलिस।
नया सिपाही खुश खुश है कि लाशों की निगरानी तथा उसे बांधने का उसका काम खतम होने वाला है...
यानि कि लाशों की जॉच और मुआयना की कथा का अन्त होने वाला है पर क्या होगा असल कथा का जिसके लिए ऐसा जघन्य काण्ड हुआ? राम जानें, वह कुछ नहीं बता सकता...
‘बताने को तो धरती-माई भी नहीं बता सकती अगर वे देवी रूप में होतीं, स्वर्ग वाली तो पराशक्ति से बता देतीं शायद पर नहीं वे तो मानव रूप में हैं भले ही अदृश्य हैं, उन्हें कोई देख नहीं सकता, सो कैसे परगट हो सकती हैं? वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं अब उनका स्वर्ग से कोई नाता भी नहीं, हॉ एक काम कर सकती हैं संकट निवारण की क्षमता संपन्न किसी देवता को याद कर सकती हैं। आह्वान के मंत्रों के द्वारा विघ्न-बाधा निवारण देव को आमंत्रित कर सकती हैं पृथ्वी पर। पर सन्देह है यह शदी आधुनिकता-बोध वाली है। इस शदी में देवताओं केआह्वान के जो पुराने मंत्रा हैं उनकी क्षमता पहले वाली है कि नहीं, संभव है वे शक्ति-हीन हो चुके हों। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता...
ऐसे में धरती-माई अपनी कथा के विस्तार के लिए कैसी कार्य-योजना बनाती हैं यह देखना काफी कौतुक भारा होगा...
वे कोई न कोई योजना तो बनायेंगी ही.....
‘हमलोग काहे डरैं,
डरै ऊ जे मजूरों के सहारे है’
‘कौतुक भरा तो धरती-कथा का आगे बढ़ना भी है फिर भी कथा बढ़ रही है असली कथा-पात्रों के सहारे। वैसे भी दुखान्त वाली कथाओं के कुछ चालू किसिम के पात्रा ऐसे होते भी हैं जो कथा को दुखात्मक होते ही भाग खड़े होते हैं, छोड़ देते हैं कथा की अपनी निर्धारित भूमिका। वे तो कथा में तभी तक रहते हैं जब तक उसमें मनारमों, व आनन्द दायक उत्सवों की बदरियां हर दृश्य को घेरे रहती हैं, मनोरमों की बदरियां हटीं के वे भागे कथा छोड़ कर पर कथा के असली पात्रा कहां जायें, उन्हें तो कथा के साथ ही चलना है वे चल भी रहें हैं कथा के साथ। धरती से जुड़े, धरती को धरती-माई मानने व पूजने वाले, धरती पर कभी वसंत तो कभी फागुन उगाने वाले, धरती से अनाज के दाने उगाने वाले, भूख और भोजन की दूरी पाटने वाले, वे कहां जायेंगे, ये चिल्ला रहे हैं, ललकार रहे हैं, पूरी मानव सभ्यता को, उसके कानून को...का यही लोकतंतर का कानून है?’
बुझावन काका की पतोह अपने ससुर की सेवा करने में देर नहीं की। घर आते ही उनकी सेवा-टहल में जुट गई। खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख फेंका और उसमें साफ राख डाल कर ससुर की खटिया के नीचे रख दिया। उनका बिछावन बदल दिया। उसे ख्याल है अस्पताल की बातें....
उसकी अइया एक बार जब रापटगंज सरकारी अस्पताल में भर्ती थीं उस समय नर्स उनके बेड का कपड़ा रोज बदल दिया करती थी। सो बपई जो लगातार खटिया पर पड़े हुए हैं उनका बिस्तरा बदल देना चाहिए। बिस्तरा बदल देने के बाद उसने रोटी बनाया। रोटी बनाने में थोड़ी दिक्कत हुई, आग जलाना था, घर में लकड़ी थी नहीं, केवल ‘गोइठा’ था जो बिना लकड़ी के जलता नहीं, वह का करे? वह घर से बाहर निकली, बाहर युकिलिपटस का पेड़ था, उसके पत्ते जमीन पर गिरे थे, एक भउकी में उसने उसे बटोरा और चूल्हे में डालना शुरू किया। युकिलिप्टस का पत्ता बारूद की तरह जलता है। मिट्टी के चूल्हे के पास ही सरकार की तरफ से दिया गया गैस का सिलेन्डर भी था, उसे देखते ही गुसिया गई वह..
‘ई मुआ इहां का कर रहा है, जगह घेरे हुए है। आज निकाल देती हूं इसे, एतना महंगी गैस कौन खरीदेगा साढ़े नौ सौ रुपये का, बीस रुपया उपरौढ़ा भी देना पड़ता है गैस लाने वाले को, कुल एक हजार पड़ ही जाता है। उतने में तो महीने भर का खर्चा निकस जायेगा। बने जा कर जलावन नाहीं बीन लूंगी! हमैं नाहीं जलाना गैस। बुझावन की पतोह ने सिलिन्डर उठाया और उसे बरामदे में फेंक दिया। फिर रोटी सेकने लगी। रोटी और ‘सिलहट’ की तरकारी बनाकर वह बुझावन के पास ले आई।
बुझावन से कई बार उसने कहा... कि दो रोटी खा लीजिए पर बुझावन काहे सुनते उसकी बात.. वे तो दुखी थे, गॉव के दस लड़के बिना कारण मार दिये गये थे, ऐसे में का खाना, का पीना...किस मुह से खवाएगा आखिर...
बुझावन की पतोह बिना बुझावन से पूछे काली चाय बना कर ससुर के सामने ले आई...रोटी नाहीं खाये तो कम से कम चाह तो पी लीजिए, कुछ तो कंठ में जायेगा। दिन भर का टेम है खाली पेट कैसे रहेंगे?
‘लो चाह तो पी लो बपई! वह ससुर को बपई ही बोलती है। आखिर ससुर बापै नऽ होता है।’
‘तूॅ नाहीं मानेगी, अरे काहे बनाई चाह, हमार सही में कुछ मन नाहीं है खाने-पीने का, हम सोच रहे है ई सब देखै-सुनै के पहिले हम मरि काहे नाहीं गये, काहे बदे हम जिन्दा हैं, हे करम बाबा! अइसन दिन केहू के न देखना पड़े... कराह उठे बुझावन।’
बपई की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सोमारू के यहां जा पहुंची... उनकी भी तो देख-रेख करनी होगी आखिर ये समय के है ओनकरे घरे, सरवन था जिसे हत्यारों ने गोली मार दिया, ओकर मेहरारू सुगनी है जो वहीं पड़ी हुई है सरवन की लाश के पास। अउर घरे में कौन है सरवन की मतारी बुधनी काकी हैं भला वह लाश छोड़ कर घर कैसे आतीं!
‘काका हम रोटी अउर सिलहट की तरकारी लाये हैं, पहिले मुह हाथ धो लो फेर रोटी खाय लो...ई दतुइन लो मुह धोय लो...’
बुझावन की पतोह ने सोमारू के हाथ में सिल पर कूंची हुई दतुइन थमा दिया.
‘काका मुह नाहीं धोय रहे हो, धोओ मुह, हम चापा कल से पानी लाय देते हैं।’
दोड़ कर वह गई और एक बाल्टी पानी चापा कल से ले आई। सोमारू के घर के सामने ही था चापा कल।
सोमारू कभी गबरू जवान थे... खूब खूब रियाज मारा करते थे, एक सास में सौ-दो सौ डंड और पॉच सौ बैठक किया करते थे। रियासत को जब कभी राज-काज की सुरक्षा के लिए गबरू जवानों की जरूरत पड़ा करती थी तब राजा साहेब सोमारू को जरूर याद किया करते थे। जाने कितने लोगों को सोमारू ने राजा साहब के कहने पर अपने लोहबन्दा से पीटा होगा पर कभी किसी का कतल नाहीं किया है। एक बार एक मामला फस गया था, नौबत कतल की आय गई थी, रियासत का मंत्राी अपने किसी दुश्मन का कतल कराना चाहता था। ओ जमाने में दो सौ रुपया दे रहा था पर सोमारू टस्स से मस्स नहीं हुए। दस पॉच रुपये के लिए लोग तब जाने का कर दिया करते थे।
‘हम केहू कऽ जिनगी नाहीं ले सकते। हमैं नाहीं चाही रुपिया...’
रियासत का मंत्राी नाराज होय गया था और उनकी जोत की जमीन छिनवाय लिया था। राजा साहब के कहने पर दुबारा जमीन मिली थी और छोटके राजा ने जमीन दिलवाया था उन्हें।
सोमारू खटिया पर पड़े पड़े बीते दिनों की करनी को कोस रहे हैं...
‘ओही करनी कऽ पाप लगा है, बिना गुनाहे हमने जाने कितनों को मारा-पीटा हैै रियासत के कहने पर, ओही कारण आज हम खटिया पर पड़े हुए हैं, एकलंगिया लकवा मारि गया है, एको कदम रेंग नाहीं सकते, कइसहूं करवट बदल लेते हैं, पड़े हुए हैं खटिया पर, अब देखो आगे का होता है...’
रोटी खाते हुए बुझावन की पतोह से पूछा सोमारू ने...
‘का बिटिया! सरवन की मेहर काहे नाहीं आई, सरवन की मतारी भी नाहीं आई, का करि रही हैं ऊ सब उहां... हमैं सरवन के बारे में डर लगा रहता है, वही मर-मुकदमा लड़ि रहा है जमीन का, वह दुश्मनों के निशाने पर है, ओके कुछ नाहीं हुआ नऽ, हमैं साफ साफ बताना, उहां सब ठीक है नऽ ’
‘हॉ काका सब ठीक है उहां, सुगनी भी वहीं है, सरवन भी वहीं हैं, काकी भी वहीं हैं...सबलोग ठीक हैं काका, घबराने की कोई बात नाहीं है।’
बुझावन की पतोह कैसे बताती सोमारू को सरवन के बारे में, छिपाना जरूरी था, बताने पर जाने कैसी हालत होती काका की। वह छिपा गई सारा कुछ।
‘तब ई बताओ.. के के, के के गोली लगी है....’
‘का बतावैं काका उहां लाशंे पड़ी हैं, हम सबके नाहीं देख पाये, बहुत भीड़ है पुलिस ने घेर लिया है सारी लाशों को, केहू को नाहीं जाने दे रहे हैं पुलिस वाले देखने भी नाहीं दे रहे हैं किसी को।’
‘जरूर कउनो बात है, नाहीं तऽ सरवन की मेहरारू सुगनी अब तक घरे आय गई होती, ऊ नाहीं मानने वाली... सरवन की मतारी का करि रही है उहां, कुछ तो बताओ....’
बुझावन की पतोह चुप थी तो चुप थी, वह कुछ भी नहीं बताती बुझावन काका को, का होगा बता कर, ख्टिया पर पड़े पड़े कहीं जिनगी न छोड़ दें, कउन ठेकाना है जिनगी का...?
चार महीना पहले की ही तो बात है, का हुआ था काका को, वे तो हल जोत रहे थे, एक बैल जुआठ से बाहर निकल गया, लगा भागने, काका ओके पछियाय लिए, कुछ दूर गये होंगे कि भहरा गये जमीन पर... लगे चिल्लाने...
‘बचाओ बचाओ..’
आगे वाले खेत में हमरे ससुर हल जोत रहे थे, चिल्लाहट सुन कर दौड़े चले आये सोमारू काका के पास.. उन्हें लगे उठाने..
पर काहे के लिए उठें सोमारू काका, उन्हें तो लकवा मार गया था एकलंगिया। जबरी खड़ा किए अउर बुलवाये सरवन को... गॉव के कई लड़के तब तक पहुंच गये खेत पर, मिलकर सब काका को उठा कर घर ले आये। ऐसे में सरवन के बारे में बता दे तो जाने का हो जाये... नाहीं नाहीं वह नाहीं बतायेगी काका को।
पूरा गॉव कई टोलों में बटा हुआ है, कहीं दो घर हैं तो कई तीन, टोलों की दूरी आधे किलोमीटर से कम नहीं। सोमारू का घर बुझावन के टोले में ही है, एक तरफ
बुझावन का घर है तो सामने सोमारू का घर।
बुझावन की पतोह का मन हुआ कि वह दूसरे टोले में भी जाये और वहां का हाल-अहवाल ले, पर नाहीं देर हो जायेगी, सुगनी उहां परेशान होगी, उसे तुरन्त लौट जाना चाहिए खेत की तरफ और सुगनी को संभालना चाहिए।
सोमारू काका की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सीधे घर आ गई। घर पर आते ही बुझावन ने उसे रोक लिया...
‘अरे बता तो गोलीकाण्ड में के के, के के गोली लगी है...’
हम नाहीं जानते पुलिस वाले लाशों के पास नहीं जाने दे रहे हैं। अब हम जाय रहे है उहां बपई, मालूम करके आयेंगे तब बतायेंगे।
‘बबुआ कहां है रे! ऊ नाहीं आया, का करि रहा है उहां, बुझावन ने अपने बेटे के बारे में पूछा पतोहू से...’
‘ऊ ओहीं ठे हैं बपई, सबको शान्त करा रहे हैं, समझाय रहे हैं सबको, वहां बहुत किच किच हो रही है, पुलिस अलग तरह तरह से कन्ट्रोल कर रही है तो दूसरे भी अलग तरह से किच किच कर रहे हैं। सबको समझाना-बुझाना पड़ि रहा है, एही लिए ऊ वहीं रूक गये हैं...’
खेत से घर आते समय बुझावन की पतोह ने अपने पति को समझाया था...
‘देखो पुलिस वालों से रार जीन लेना, वे केहू कऽ नाहीं होते, तूॅ गोली चालाने वालो में से केहू कऽ नाम जीन बताना, चिल्ला रहे थे कि गोली चलाने वाले फला फला थे... तूं काहे चिल्लाय रहे थे, मुंहें पर ताला लगाय लो, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’
‘अरे तोहसे का मतलब, तूं काहे के लिए नांउ बताय रहे हो, पुलिस पता लगाये अउर नाम निकासे। तूं एकदम चुप्प रहना जैसे तूने कुछ देखा ही नाहीं, गोली से बचि गये, करम बाबा की किरपा है, तूंहांे तो डाक रहे थे, घर से भागे भागे निकसे थे सरवन भइया के साथ....’
‘अरे गोली के आगे तू लोग का करि लेते, भाग जाना चाहिए था बन्दूक देखते ही, बहुत होता तो हमलावर जमीन जोत लेते, अउर का करते। ओनके लौट जाने के बाद हमलोग जमीन में बंेगा डाल देते, पर अकल तो है नाहीं... फसल हो जाती तऽ हम लोग ओके काट लेते, ऊ लोग जब तक फसल काटने आते खेत पर तब तक फसल कट चुकी होती। हमलोगों को कउनो मजूरों के सहारे फसल थोड़ै कटवाना है जो हमलोग डरैं’, डरैं ऊ जे मजूरों के सहारे है, जेकरे इहां किसिम किसिम के मजूरे हैं, खेत जोतने के लिए कोई, तो सेवा-टहल के लिए कोई।’
बुझावन की पतोह बहुत कुछ बोलती अपने पति से पर उसे बुझावन का खियाल था, ओन्है खराई कराना होगा, सो लौट आई घर पर।
बुझावन को खराई करा लेने के बाद बुझावन की पतोह सीधे भागी खेत की तरफ। वहां सुगनी अब भी बेसुध पड़ी हुई है। नन्हकी की तरह नौ और औरतें हैं
जो अपना सुध बुध खो चुकी हैं, सब विलाप कर रही हैं। तीन ठो तो दुइ-तीन साल की बिआही हैं, तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी पूरी जिनगी ओनकर पड़ी है। गॉव की दूसरी औरतंे उन्हें समझाय रही हैं...
पर समझाने से का होता है, इसे जानते सभी हैं फिर भी समझाना बन्द नहीं होता। सरवन की मतारी बुधनी बेटे की लाश से अलग होकर पुलिस वालों को फटकार रही हैैंं.‘आपलोग पहिलहीं धियान दिये होते तो कतल नाहीं होता, अब चले हैं लाश उठाने पोसटमार्टम कराने, पहिले मरि गये थे का, अब का करोगे, भागो इहां से हमलोग जनमाये हैं तां लाश भी फूंक लेंगे।’
बुझावन की पतोह सीधे सुगनी के पास जाती है और उसे गोदी में ले लेती है.
‘मत रोओ सुगानी, अब सोच के आगे का करना है... जो होना था वह हो चुका है, हमलोगों को अब आगे के काम के बारे में सोचना है...सरवन भइया तो नाहीं रहे पर ओनकर काम तऽ हमैं ही करना है, हमरे मरद को तो तूॅ जानती ही है, खाली लठ्ठ चलाना जानते हैं, लठ्ठ के अलाव कुछ जानते ही नाहीं, एक ठो बुधनी काकी हैं अउर परमू हैं, खेलावन, बंधू अउर पुनवासी बच हुऐ हैं ओनके अलावा गॉये में है ही कौन जेकरे भरोसे मर-मुकदमा का काम होगा। तनबुड़ुक तो पगला ही गया है, ओकर भाई बुद्धन भी मरि गये हैं गोली से। उहो बेचारा ईमानदार थे, उनके बारे में कब्बउ एहर-ओहर नाहीं सुना गया...’
सुगनी चुप्प थी तो चुप्प थी। उसने भी कई बार अपने पति को रोका था अउर समझाया था...
‘देखो ऊ लोग बहुत ही खतरनाक हैं, संसथा वालों की तरह नाहीं हैं। ओन्है झगड़ा झंझट का डर होता तो संस्था वालों की जमीन काहे खरीदते? ऊ जमीन नाहीं झगड़ा खरीदे हैं, अउर जमीन पर कब्जा करने के लिए मार-पीट कतल कुछ भी कर सकते हैं, पर ओन्हय तऽ बुझाता था कि जमीन खरीदने वाले साधू हैं..’
तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी वहीं कोने में कराह रही हैं, गॉव की कुछ सयानी लड़कियॉ उन्हें संभाल रही हैं।
बुझावन का लड़का बबुआ सरवन की लाश के पास है, वह रो रहा है और अपना माथा पीट रहा है। पुलिस वाले उसे वहां से हटा रहे हैं। बबुआ की औरत बिफनी बबुआ को पकड़े हुए है...
‘पुलिस को अपना काम करने दो, अपना मुंह सिल लो..’पर बबुआ अपना मुह कैसे सिल लेता... ‘उसे पता है कि गॉव के लिए सरवन का था? गॉव के लिए सरवन लेखपाल था, तो तहसीलदार भी था, वह विधवा पेंशन था तो बृद्धा पेंशन भी था, कभी कभी तो वह थाना भी बन जाता था...मजाल है कोई सिपाही गॉव में घुस जाये अउर किसी की बहिन बेटी पकड़ि ले। सरवन के कारण पुलिस का सारा अत्याचार रुक गया था गॉव में। नाहीं तो पहिले का नाहीं होता था गॉये में बात बात पर सिपाही घुस आते थे गॉयें में....’
फोकेट की दारू लेते थे...अनाज पानी वसूलते थेे, दारू का रेट बंधा होता था उनका पर सरवन ने सब रोकवा दिया, भले ही उसे मुकदमा लड़ना पड़ा। गॉव की जमीन का मुकदमा भी वही लड़ रहा है, पहिले नन्हकू काका मुकदमे का काम देखते थे उनके साथ बुधिया काकी थीं। अब कौन देखेगा मुकदमा, सरवन तो चला गया पूरा गॉव अनाथ छोड़ कर।
बबुआ परेशान है पर करे का.. पुलिस वाले अलग से दबाव बना रहे हैं। वे लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहते हैं रापटगंज...।
बिफनी प्यार से समझाती है बबुआ को... बबुआ अब शान्त है खुद में खोया हुआ, आकाश ताकता.. आकाश में तो कुछ होगा ही जमीन के बारे में, शायद हो वहां कुछ, पर नहीं बबुआ तो खोया हुआ है सरवन की याद में...
अब वह अकेला हो गया है, खेलावन, बंधू और पुनवासी हैं पर वे तो पीछे चलने वाले हैं, आगे चलने वाला तो खाली सरवन था चला गया। मुसीबत की घड़ी में पता चलता था कि सरवन है तो का करेगी मुसीबत। वह चढ़ जाता था थाने पर, तहसील पर। हमलोगों के जमीन का मुकदमा जिस दिन खारिज हुआ था वह तनेन हो गया था डिप्टी साहेब के सामने, किसी तरह से उसे समझाया गया था तब शान्त हुआ था।
बिफनी फिर समझाती है उसे...आगे की सोचोे....
बबुआ आगे की का सोचे उसे समझ नहीं आ रहा। वह घटनास्थल पर पड़े पड़े खुद में डूबा हुआ है। उसके साथी खेलावन, बंधू, पुनवासी हैं उसके साथ वे उसे समझाय रहे हैं...
‘आगे का करना है बबुआ! एकरे बारे में गुनो, बुधनी काकी तो लड़ रही हैं अधिकारियों से के लाश नाहीं ले जाने देंगे, का होगा? लाशें जायेंगी के नाहीं बताओ तो... बबुआ खामोश तो खामोश, वह भी लाश बन चुका है, वह कुछ नहीं बोल पा रहा है, सरवन ही तो था उसके लिए सबकुछ.... वह तो केवल उसके साथ लगा रहता था।
गोली से मारे गये और घायल हुए सभी धरती-पुत्रा हैं और धरती-कथा के प्रमुख पात्रा भी पर वे लाश बन चुके हैं तथा जो घायल हैं वे अस्पताल की प्रयोगशाला में जीनेउऔर मरने के बीच अस्पताल की दवाइयॉ खा रहे हैं। धरती-कथा के पात्रा तो और भी लोग हैं जो गॉव में हैं, रो रहे हैं कराह रहे हैं। उनकी कराहों से किसिम किसिम की कहानियॉ निकल रही हैं पर उन कहानियों को कौन सुनेगा..?
शासन, प्रशासन या गोली चलाने वाले आरोपी!
वह धरती जिसे जोतने कोड़ने वाले लाश बन गये!
या वे जो बन्दूकंे चला रहे थे!
कौन सुनेगा चीखों, कराहों तथा ऑसुओं सेे लिखी धरती-कथा।कौन सुनेगा धरती कथा की चीखें? कोई नहीं...शायद समय सुने उनकी चीखें!
‘यह जो संपत्ति का मामला है
हल होगा का?’
‘कोई नहीं सुनता चीखें जबकि कभी न कभी चीखते सभी हैं। इसी चीख की सिसिकती परतों पर गोल गोल घूम रही है धरती, कराह रही है धरती-कथा भी। इसके सारे पात्रों को पता है कि धरती और प्रकृति से प्यार करना चाहिए, यही कुदरत का सच है पर पता नहीं कहां गायब हो चुका है वह सच। अब जो प्यार है धरती से धरती का संपत्ति/ पूंजी में रूपान्तरण के कारण, जिसे बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है, इससे लाभ कमाया जा सकता है। किसे नहीं पता कि पूंजी हमेशा किसिम किसिम के खेल खेला करती है। पूंजी धरती की चीखों व कराहों को भी खेल बना सकती है, इससे लाभ कमा सकती है। फिर तो जहां लाभ आ गया, वहां लाभ हासिल करने के लिए क्या नहीं हो सकता? खून-कतल, मार-पीट, बेइमानी ये सब भी तो पूंजी के ही उत्पाद हैं, सत्ता के खेल हैं। हल्दीघाटी गॉव भी पूंजी केे लाभ-हानि का खेल बन चुका है, क्रय-विक्रय की युद्व-भूमि हो गया है। संपत्ति है कि उसके खेल खेले जातेे हैं अदालतों में, थानों पर, न्याय अन्याय की जमीन पर, कानून के रंगीन कागजों पर वैसे इस कथा में कहीं रंग महल का आतंक तो नहीं पर अदालत, थाना, कानून का आतंक है, जो किसी रंग-महल से कम नहीं..’
ऐसे मंे बबुआ का करे, अपनेे मित्रों के साथ लाश की तरह घटना-स्थल पर खड़ा है, उन्हें नहीं बुझा रहा है कि आगे का करना होगा। वे अधिकारियों को देख रहे हैं और मन ही मन गुन रहे हैं कि ये अधिकारी पहले ही गॉव में आ गये होते तो दस लड़के न मारे जाते। यह धरती माई भी केतना खेल खेलती हैं तब्बै नऽ तनबुड़का गाय रहा था....
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’
धरती माई ने बलि ले ही लिया है, अब तो मन भर गया होगा धरती माई का। बबुआ आपने साथियों के साथ जा रहा है अधिकारियों की भीड़ की तरफ वह देख रहा है उसकी छल-छलाई ऑखों में वहां का पूरा दृश्य भर गया है, ऑखों के कोनों से लोर भी निकल रहा है पर करे का, देखना तो है ही, वह देख भी रहा है, ऑखें इनकार कर रही हैं कि न देखो कुछ फिर भी वह देख रहा है...
नया सिपाही लाशों को उठवा रहा है, उसके साथ चार-पांच सिपाही और भी हैं, सामने एम्बुलेन्स खड़ी है। ढेर सारे सिपाही वहां और भी हैं जो सुरक्षा के प्रतीक जैसे बने खड़े हैं। हर सिपाही जरूरत के अनुसार पुलिसिया ड्यूटी पर लगा हुआ है, कोई लाश उठवा रहा है तो कोई एम्बुलेन्स में लाशों को रखने की व्यवस्था कर रहा है, कोई आला-अधिकारियों के अगल-बगल सुरक्षा घेरे में शामिल है। नया सिपाही पहले गुन रहा था कि कोई ट्रक आयेगी और सभी लाशों को एक साथ उठवाया जायेगा, लाशों को ट्रक से ही रापटगज ले जाया जायेगा पर नहीं साहबों के कहने पर एम्बुलेन्संे आई हैं। एम्बुलेन्स से ही पोस्टमार्टम के लिए लाशें जायेंगी। लाशें एम्बुलेन्सों पर बहुत ही सावधानी तथा मर्यादापूर्ण तरीके से रखी जा रही हैं ऐसा नहीं कि उठाया और झोंक दिया एम्बुलेन्स में। वहां भीड़ इकठ्ठा है और अलग-अलग तरीके से घटना के बारे में बोल-बतिया रही है। सारे आला-अधिकारी भी मौके पर आ चुके हैं उनके चेहरांे पर उदासियॉ नाच रही हैं। वे परेशान हैं कि जाने क्या हो उनका? प्रदेश की सरकार का रूख अभी साफ नहीं दीख रहा है पर लगता है कि प्रदेश की सरकार इस मामले में कड़ा रूख ही अख्तिायार करेगी।
डी.एम. साहेब, एस.पी साहेब के साथ भीड़ में अधिकारियत से अलग हटकर भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। एस.पी. साहेब तो वर्दी में हैं सो उनका रोब-दाब, प्रशासनिक क्षमता सारा कुछ जोति की तरह भीड़ में भी फूट रहा है पर डी.एम. साहब तो सामान्यों की तरह प्राकृतिक बने हुए हैं एकदम कुदरती मनुष्य की तरह। पर भीड़ है कि जानती है कि वे आला-अधिकारी हैं। इशारों से पूरे जिले को हिलाने-डुलाने व चलाने वाले सो भीड़ उनसे दूर किसी आभामंडल के घेरे की तरह अगल-बगल खड़ी है। भीड़ में बबुआ और उसके साथी हैं तो मृतकों के परिजन भी हैं। बाहरी दर्शकों की भीड़ भी है वहां। उनमें से एक-दो जन हैं जो आला-अधिकारियों की हॉ में हॉ तथा ना में ना मिला रहे हैं सामान्य प्रवृत्ति की तरह। किसी भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं वे आला-अधिकारियों के अगल-बगल खड़े हो कर उनकी प्रशासनिक गंध सूंघने के मौके नहीं छोड़ते सो वे मस्त मस्त हैं अगल-बगल मडराते हुए। आलाधिकारी भी जल्दी में हैं वे झट-पट पोस्टमार्टम करवा लेना चाहते हैं, जिले से कई बार सी.एम.ओ. का फोन भी आ चुका है।
लाशें आ रही है अस्पताल पर सो अस्पताल पर भी मरीजों के अलावा बहुत सारे लोग हाजिर हो चुके हैं जो देखना चाहते हैं मृतकों को, सो वे इन्तजार में हैं। उनके लिए भी यह घटना हृदय-विदारक है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे शासन की किस दुनिया के वे नागरिक हैं। कहा जाता है कानूनी-राज का जमाना है, यहां सारा कुछ कानून के मुताबिक चलता हैै पर कहां दिख रहा कानून! वे व्यथित और चिन्तित हैं। वैसे उन्हें पता है कि सोनभद्र में जमीन के गैर-कानूनी आवंटन का सवाल बहुत बड़ा सवाल है। भीड़ में से जो जंगलों के निवासी हैं वे भोग चुके हैं वन-बन्दोबस्त वाले कानून को। उनके पास जितनी पुश्तैनी जमीनें थीं वे भी छीन ली गईं मिला केवल पन्द्रह पन्द्रह बिस्वा जमीन का छोटा सा टुकड़ा। जितना कब्जा था उतनी भी जमीन उन्हें बन्दोबस्त नहीं की गई। हल्ला मचा था कि नये वन-बन्दोबस्त कानून 2005 के जरिए आदिवासियों का बहुत भला होगा पर भला होना तो दूर नुकसान कर दिया गया। जिस जमीन को वे पुरखों के जमाने से जोतते-कोड़ते चले आ रहे थे उसे भी छीन लिया गया। जहां जहां जंगल के रिश्ते गॉवों से जुड़े हुए हैं हर जगह मार-पीट है, जंगल हर जगह अपना कब्जा जमाये हुए है। वन-विभाग के खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं है। जंगल-विभाग के लोग मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यहां के जो आदिवासी हैं पुराने जमाने से अपनी अपनी जमीनों पर खेती-बारी कर रहे हैं अंग्रेजों के पहलेे से। उस जमाने से जब सोनभद्र में ‘डहिया’ खेती का प्रचलन था। आदिवासी समूह के लोग जमीनों को खेती करने लायक बनाते थे, जमीन पर के झाड़-झंखाड़ पर ‘डहिया’ लगा कर साफ करते थे, कियारियां गढ़ते थे फिर उस पर खेती किया करते थे। पुरखे बताया करते थे कि सोनभद्र में पहले था ही क्या.. चारो तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे, नाले थे, नदियॉ थीं, झाड़-झंखाड़ थे। जोत लायक जमीन बनाने के लिए वे जंगली पेड़ों को नहीं काटते थे केवल समतलीकरण करते थे तथा झाड़-झंखाड़ ही आग लगा कर साफ किया करते थे। अब जब आदिवासी समूह के मिहनती लोगों ने जमीनों को खेती लायक बना दिया फिर जंगल विभाग ने उस पर अपना कब्जा जमा लिया।
‘यह जमीन हमारी है,’ जंगल विभाग लगा पैमाइश करने।
वन-अधिनियम की धारा चार और बीस लगा दिया। मार-पीट कर आदिवासियों को जमीनों से बेदखल कर दिया। जंगल के निवासी अपने विस्थापन की गाथाओं में हैं उन्हीं गाथाओं के साथ वे लाशों को देख लेना चाहते हैं, अस्पताल में दाखिल घायलों से मिल चुके हैं, कोई कराह रहा है तो कोई बता रहा है कि बहुत ही बेरहमी से हत्यारों ने उन्हें मारा-पीटा। बताने वाला बता रहा है कि वह तो बच गया करम बाबा की कृपा से, बन्दूक चलाने वाला हमलावर तो उसके सामने ही था। हमलावरों में से किसी ने रोका था बन्दूक चलाने वाले को, गोली न चलाओ यार! पर उसके ऊपर तो खून सवार था काहे रुकता...बताने वाला हालांकि वह जमीन पर गिर गया था फिर भी सुन सकता था हमलावरों में शामिल हमलावर की बातें...
हमलावरों की गोल में शामिल आदमी चीख रहा है ..‘भागो, भागो यहॉ से, अब कितनों को मारोगे? बीसों गिर चुके हैं जमीन पर, बहुत सारे घायल हो चुके हैं सभी छितराये हुए दिख रहे हैं।’
‘देखो तो गॉव वालों की भीड़ भाग रही है, भागती भीड़ पर हमला नहीं करना चाहिए।’
हमलावरों के साथियों में कुछ संवेदित है, उनमें से एक जो अज्ञात था, वह गाली दे रहा है, कब्जा करने वाले आयोजकांे को....‘सालों ने कहा था कि कब्जा कराने के लिए पुलिस आयेगी, मुकदमे में जीत हो चुकी है। कहीं पुलिस नहीं दिख रही! पुलिस काहे दिखेगी? कोर्ट का आदेश हुआ होता तो पुलिस आती। कौन जानता है कि मुकदमे में जीत हुई है कि नहीं, झूठ भी तो बोल सकता है कब्जा करने का आयोजक। बोला था कि सारा मामला हल हो गया है।’
‘अरेे! मेरी तो बुद्धि मारी जा चुकी थी। मुझे तो तभी समझ जाना चाहिए था जब ढेर सारे आदमी गोलबन्द होने लगे थे, दसियों ट्रेक्टर आ चुके थे। जब सारा कुछ हल हो ही गया था फिर सौ-डेढ़ सौ आदमियों की जरूरत क्या थी यहां लाने की। पूरी फौज ले आया है कब्जा करने वाला आयोजक। दस ट्रेक्टर आये हैं कितना खेत जोतना है केवल सौ डेढ़ सौ बिगहा ही नऽ फिर दस ट्रेक्टर की जरूरत क्या थी लाने की।’
घायल आदमी को होश आ चुकी है, उसकी ऑखों में घटनास्थल का सजीव दृश्य घूमने लगा है। वह पूरी तरह से बोलने-बतियाने की स्थिति में आ चुका है। कहीं हमलावर यहां भी न आ जायें, वे समर्थ हैं, शासन, प्रशासन उनके हाथ में है वह शंकित है पर नहीं समझ रहा है कि वह अस्पताल में है, यहां हमलावर नहीं आ सकते। वह बोल बतिया रहा है उसे देखने वालों से। हालांकि वह महाभारत वाले संजय की वुद्धि का नहीं है फिर भी बता रहा हैं कि मौके पर क्या हुआ और कैसे हुआ? घायलों में से दो तीन और भी बोलने की स्थिति में आ चुके हैं पुलिस उनका बयान ले चुकी है। बबुआ, खेलावन, पुनवासी का बयान भी पुलिस ले चुकी हैं, ये बेचारे थोड़ा दूर थे गोली चालाने वालों से, ये टेªेक्टर के पास थे, खेत जोतने से मना कर रहे थे तभी गोलियॉ चलाई र्गइं और घटना घटी। लाशें जमीन पर गिर जाने के बाद फटा फट आरोपी भाग निकलेे। यही बात वे अस्पताल में आने वालों को भी बता रहे हैं घटना के बारे में जो पुलिस को बता चुके हैं। जमीन के मुकदमे की सामान्य घटना देखते देखते जघन्य घटना में तब्दील हो गई। अदालत का आदेश अगर हमलावर दिखा देते तो ऐसी घटना ही न घटती पर अदालत का आदेश उनके पास तो था नहीं सो वे का दिखाते? जमीन पर बलपूर्वक कब्जा करने का आदेश अदालत किसी भी हाल में न देती।
एक घायल जो कुछ मुखर किस्म का था.. वह कुछ चलाक जान पड़ता है और अपना पक्ष रखने में समर्थ भी.. उसका बताया सारा कुछ किसी खोजी कहानी की तरह है। जादुई याथार्थ से काफी ऊपर...देखे गये सच का यथार्थ यानि कोरा यथार्थ कोई मिलावट नहीं। सुबह सुबह ही गॉव में हल्ला मचा कि हम लोगों की जमीन जोती जा रही है, हल्ला सही था। फिर क्या था पूरा गॉव मौके पर आन डटा, थोड़ी बात-चीत हुई...‘काहे जोत रहे हैं आपलोग हमलोगों की पुश्तैनी जमीन, राजा साहब ने यह जमीन हमलोगों को दिया है।’
गॉव वालों ने ट्रेक्टर चलाने वालों से पूछा...
‘हमलोगों ने इस जमीन का बैनामा करा लिया है सो जोत रहे हैं जमीन।’
‘आपलोगों का बैनामा फर्जी है हम लोग उस बैनामे को सही नहीं मानते, अदालत में मुकदमा चल रहा है, जमीन पर कब्जा करने का आदेश अदालत ने तो दिया ही होगा। अदालत का आदेश देखाइए।’
‘तूॅ लोग कौन होते हो आदेश देखने वाले, हमलोग जमीन जोत रहे हैं अगर यह ‘जमीन तुम लोगों की है तो अदालत से ले आओ सटे(स्थगन) फिर हम लोग नहीं जोतेंगे जमीन।’
‘हम लोग काहे जायें अदालत आप लोग जाओ और जमीन कब्जा करने का आदेश ले आओ। हम लोग तो इस जमीन को बाप-दादे के जमाने से जोत-कोड़ कर रहे हैं। आप नये नये जमीनदार बने हो तो आप जाओ कब्जा करने का आदेश ले आओ।’
सरवन इतना ही बोल पाया था कि हमलावरों ने उसे गोली मार दिया और वह गिर पड़ा जमीन पर... एक ही गोली से ढेर हो गया, उसकी सांसें हवा में टंग गईं।
जमीन कब्जा करने वाले तो अपनी तैयारी में थे, पूरी ताकत इकठ्ठा करके आये थे, वे भला काहे मानते गरीब सत्याग्रहियों की बातें। वे जोर-जबर के सहारे जमीन कब्जियाना चाहते थे। ट्रेक्टर जमीन जोत रहे थे, बातें दूसरे लोग कर रहे थे जिनके हाथ में बैनामा था। बन्दूक चलाने वाले बन्दूक चला रहे थे...
तेतरी, फगुनी, और बैसाखी के पति को भी गोली लगी, वे सरवन के साथ ही थे मौके पर ही मर गये। रजुआ, सुमेरना और लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी गोली से मारे गये, का कउनो देरी लगी। वे सब सामने थे हमलावरों के पास... गोली चली और सब जमीन पर गिर कर चल बसे। गायें कऽ सब लड़िकवे भिड़ गये थे हमलावरों से।
जमीन का जोता जाना जब बन्द नहीं हुआ फिर तो आदिवासी ट्रेक्टरों के आगे सत्याग्रहियों की तरह लेट गये, वे जानते थे ट्रेक्टर के आगे लेट जाने से से जमीन का जोता जाना रुक जायेगा पर नहीं, एक दो आदमी ट्रेक्टर के पहियों के नीचे आ भी गये फिर भी टेªक्टर का चलना बन्द नहीं हुआ कुछ लोग दब भी गये।
शुरुआत हुई थी बात-चीत से बात-चीत जा पहुंची धॉय धॉय तक। बन्दूकंे गरज उठीं और दस सत्याग्रही ढेर हो गये। कुछ लोग गोली से तो कुछ लोग ट्रेक्टर से दब कर मर गये...।
घायल आदमी अपनी बात को कहानी का रूप नहीं दे पा रहा था फिर भी उसकी बातों तथा बताने की शैली में कहानी की ही गंध थी, मन को कंपा कंपा देने वाली। पूरी घटना घटने में मुश्किल से पन्द्रह बीस मिनट लगे होंगे और क्या! इतनी ही देर में कई आदमी गोली लगने से मर गये कई घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े, हर तरफ चीखें उठ गईं, कोई कहीं चीख रहा है तो कोई कराह रहा है, किसी के समझ में ही नहीं आ रहा है कि किस तरफ भागें, कोई कोना सुरक्षित नहीं, खतरा हर तरफ से मुहबाये खड़ा। पर भागना तो था ही। कब्जाधारकों में भी कुछ थे जो मार-पीट रोकना चाह रहे थे वे कोशिश भी कर रहे थे पर उनकी कौन सुनता है खासतौर से वे जिन पर खून के भूत सवार हो गये हों।
घायल आदमी ने बताना रोक दिया है, उसके दवाई खाने का समय हो गया है वैसे भी अस्पताल पर लाशें आ चुकी हैं, अगर वह दो-चार कदम भी चल पाया तो लाशें देखने जायेगा हालांकि उसके घर वालों ने उसे बता दिया है कि गॉव का कौन कौन मरा है।
सभी घायलों का एक ही बयान है बिना मिलावट वाला, बिना वकील की सलाह वाला, अनगिनत बार दुहराये जाने वाला बयान, घायलों के बयान आदलती बयानों
से एकदम अलग हैं, पवित्रा, पूरी तरह से एक, किसी रटे हुए पाठ की तरह, जैसा देखा वैसा बताया, सभी एक ही तरह का बयान दे रहे हैं। आदलतों में तो बयानों के चरित्रा ही पलट जाते हैं, वकीलों की जिरहें तोड़ देती है बयानों को खण्ड खण्ड।
अस्पताल में एम्बुलेन्स की गाड़ियॉ दाखिल होते ही अस्पताल की मरीजिहा भीड़ ने एम्बुलेन्स को घेर लिया है, होड़ लग गई है उनमें कि कौन पहले देख ले मृतकों को। अधिकारी-गण पहले ही अस्पताल आ चुके थे। अस्पताल की व्यवस्था ठीक थी। नहीं ठीक होती तो उसे ठीक रखना सी.एम.एस. की जिम्मेवारी थी। सो वे बेचारे सूचना मिलते ही अस्पताल को व्यवस्थित रखने में जुटे गये थे। वे जानते हैं कि इस समय की लापरवाही की सजा उन्हें मिल सकती है। कुछ डाक्टर जो छुट्टियों पर थे उन्हें भी सी.एम.एस. ने बुलवा लिया है। दस लाशों का पोस्टमार्टम करना कोई सरल काम नहीं है। सी.एम.एस. सचेत हैं वे मन ही मन डाक्टरों की टीम के बारे में विचार चुके थे। पहली टीम में फला फला तो दूसरी टीम में तीसरी टीम में फला फला इसी तरह हर टीम में फला फला। अपने आफिस में बैठे-बैठे वे टीम बनाने के विचार कर लेने के बाद सोच रहे हैं कि और बेहतर क्या किया जा सकता है? कुछ सलाह भी दे रहे हैं उनके साथ बैठे दूसरे डाक्टर। सूची करीब करीब बना ली गई है और तत्संबधी डाक्टरों को बता भी दिया गया है, डाक्टर भी तैयार हैं।
अस्पताल की तैयारी तो है पर तैयारी में निराशा तथा हताशा भी है। ऐसा कभी तथा कहीं भी नहीं सुना गया था एक अचरजनुमा वाक्य डाक्टरों के दिमाग में उधम मचाये हुए है आखिर काहे ऐसा हुआ..? वही जमीन का मामला। एक पुरानी कहावत उनके दिमाग को जकड़ रही है ‘झगड़ा लगावैं तीन, जर जोरू औ जमीन’ तो जमीन का मामला बहुत ही टेढ़ा है। आधा वैज्ञानिक हो चुका डाक्टरों का दिमाग काम नहीं कर रहा है। ऐसे हमलों के बारे में वह भी लोकतांत्रिक समाज में समाजशास्त्राीय ढंग से वे नहीं सोच पा रहे हैं, राजनीतिक ढंग से सोचना तो उनके अध्ययनों से काफी दूर का मामला है। वे कभी भी समाज के सामाजिक अध्ययनों को अपनी चेतना का हिस्सा नहीं बना पाते जबकि वे डाक्टर हैं, मानव शरीर के एक एक हिस्से को जानते हैं, वैज्ञाानिक ढंग से वे बता सकते हैं कि यह जो मानव शरीर के भीतर दिल है किस तरह से क्रिया करता है, आमाशय भोजन को कैसे पचाता है, किडनी गन्दे खून को कैसे साफ करती है। वैसे ही दिमाग क्यों हिंसक हो जाता है? मानव शरीर के एक एक अंग की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के बारे में गुणवत्तापूर्ण जानकारियां रखने के बाद भी वे वे मानव-समाज के भीतर होने वाली मानसिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं, घातों-प्रतिघातों को नहीं जानते। शायद इस बात को मनोचिकित्सक समझते हों।
वे डाक्टर हैं शरीर विज्ञानी, अर्थविज्ञानी वे नहीं हैं, न ही वे दर्शनशास्त्राी हैं सो वे एक साधरण मनुष्य की तरह गुन रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जाहिर है कि मनुष्य की तरह सोचना एक अलग बात है और मनुष्य बन कर सोचना अलग बात है। डाक्टर मनुष्य भी हैं और डाक्टर भी हैं सो संवदनाओं की उनके पास कमी नहीं, वे चाहते हैं कि जिस मरीज का वे इलाज कर रहे हैं वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाय। घायलों की देख-रेख वे कर चुके हैं अब वे तैयार हैं मृतकों के पोस्टमार्टम के लिए। डाक्टर हल नहीं निकाल पा रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जिसकेे लिए हर तरफ मार-काट मची हुई हैं। डाक्टर थक जाते हैं और मान लेते हैं कि संपत्ति की लालच वाले रोग को समझना उनके वश का नहीं, वे देह का रोग ठीक कर लें यही बहुत है लालच का रोग ठीक करना उनके कूवत में नहीं।
लाशें आ चुकी हैं अस्पताल में। उन्हंे रखने के लिए एक हाल जैसे कमरे को खाली करा लिया गया है, बारी बारी से ही तो पोस्टमार्टम होगा। लाशें रखी जा रही हैं कमरे में। अस्पताल में शोक वाला सन्नटा पसर हुआ है सभी लोग अपनी अपनी खोलों में दुबके हुए हैं। वहां हर कोई गुन रहा है अपने बारे में कि वह मध्यकाल का नागरिक नहीं है पर क्या सच में? लोगों के दिलोदिमाग से मध्यकाल मिट चुका है, लोकतंत्रा की सहभागिता, सहयोग की कुदरती भावना ने लोगों के दिल दिमाग को हरा भरा बना दिया है, लोग एक व्यक्ति से समष्टि वाली चेतना में खुद को स्थापित या नियोजित कर पाये हैं अगर ऐसा हैे फिर तो वाह वाह क्या कहने? कोई हर्ज नहीं बोलने में कि हमारा लोकतंत्रा अमर रहे, अमर रहे और अमर रहेे।
पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टरों की टीम अपने अपने काम में लग चुकी है। डी.एम.व एस.पी. साहेब भी पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहे हैं। वे नहीं चाहते कि किसी भी तरह का बवाल हो। बवाल का क्या वह कहीं भी हो सकता है।
हल्दीघाटी वाले गॉव से लाशें चली आईं कोई बवाल नहीं मचा यह बड़ी बात है, कुछ नेता तो वहां पहुंच ही गये थे बवाल करने के लिए। दोनों अधिकारी अपनी कार्यकुशलता से खुश खुश हैं। अब पोस्टमार्टम हो जाये फिर देखा जायेगा। इसके पहले दोनों आलाअधिकरी घायलों से मिल कर उनका हाल-अहवाल ले चुके हैं तथा जिन जिन घायलों को बनारस भेजा गया है उनके बारे में भी जानकारी भी ले चुके हैं।
अस्पताल से जुड़ा हुआ एक कर्मचारी है जिसे जमादार बोला जाता है जिसकी सहायता के बिना डाक्टर पोस्टमार्टम कर ही नहीं सकते उसे भी सी.एम.एस. साहेब ने पहले से ही अस्पताल पर बुलवा लिया है। वह तैयार बैठा हुआ है। उसकी तैयारी कुछ कुछ अलग किस्म की है वह पोस्टमार्टम के पहले खुद को साधता है, मन को चीर-फाड़ के लिए तैयार करता है। तैयारी के लिए उसे दारू का सहारा लेना पड़ता है। जब वह दारू पी लेता है फिर किसी की नहीं सुनता अपनी धुन में रहता है। इस काम को करते हुए उसे पचीस साल हो चुके हैं अभी तक सोनभद्र के अस्पताल में उसके जैसी योग्यता कोई हासिल नहीं कर सका है, वह अकेलुआ है अपने काम में सो एंेठता भी खूब है। उसकी ऐंठ के आगे डाक्टर भी झुके रहते हैं।
‘हमसे नहीं बनेगा साहेब! गले से लेकर पेट तक शरीर को दो हिस्सों में बाटना, शरीर के चीर-फाड़ वाले हिस्सों की गठरी बनाना फिर लाश को कपड़े में बाधना। मन कांप जाता है साहेब! चीड़-फाड़ वाली लाश देख कर। चेहरा तो साफ देखाता है पर शरीर कटा हुआ थुथुराया हुआ, भर्ता माफिक। डाक्टर भी नाक-मुह सिकोड़ कर चीरते फाड़ते हैं लाशों को। मुझे डर लगता है कि लाश कहीं जिन्दा न हो जाये। रात में सपने आते हैं, सपने में लाशें मुझे ताने मारती हैं..
‘अरे कोई दूसरा काम नाहीं है का जो पोस्टमार्टम करवाते हो, कभी कभी तो डरवाती भी हैं लाशें। अभी एक महीना भी नाहीं बीता होगा... एक लाश के पोस्टमार्टम के काम में मैं था अरे का तो नाम है डाक्टर साहेब का याद आया पाड़े डाक्टर साहेब के साथ। एक जवान लड़की का मामला था। उसने आत्महत्या कर लिया था। डाक्टर साहेब उस लाश का पोस्टमार्टम कर रहे थे। लड़की के पेट में से एक साबूत बच्चा निकला देखने में जिन्दा लग रहा था पर था मरा हुआ। डाक्टर साहेब कांपने लगे, पसीना पसीना हो गये, लगे माथा पोछने, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे को पेट में से कैसे निकालें। बच्चा देखते ही भक्क हो गये। मेरी तरफ देखने लगे। अब इतनी समझ मुझे आ ही गई है कि पोस्टमार्टम में का करना होता है और कैसे करना होता है। डाक्टर साहेब पसीना पसीना थे... बच्चे को पेट में एकदम साबूत देख कर, ‘देख यार! का करूं इसका?’ डाक्टर साहेब ने मुझसे पूछा...
फिर मैंने बच्चे को पेट में से बाहर निकाला हालांकि वह मरा हुआ था, कहीं चीरा नहीं लगा उसकी देह पर।’। पोस्टमार्टम हो जाने के बाद डाक्टर साहेब ने पोस्टमार्टम का कागज-पत्तर बनाया फिर जब खाली हुए तब मुझे पकड़ लिए... अभी जाना नहीं, चलो मेरे साथ मेरे क्वार्टर पर। क्वार्टर पर जाने के बाद पूछने लगे.
‘तुम खुद को कैसे कन्ट्रोल किए रहतेे हो भाई! पोस्टमार्टम के समय, घबड़ाते नहीं हो का?’ पूछा डाक्टर साहेब ने
‘मैं उन्हें का बताता कि साधू हूॅ जो मन को साध लेता हूॅ या तांत्रिक हूॅ। मैं कुछ नाहीं हूॅ साहेब! साधारण आदमी हूॅ। उपाय क्या है मेरे पास और का उपाय करूंगा एक ही काम करता हूॅ। छक कर दारू पीता हूॅ। सी.एम.एस. साहेब से दो बोतल का दाम ले लिया था और दारू खरीद कर रख दिया हूॅ कमरे पर। चिखना भी लाकर रख दिया हूॅ, अब कुछ नाहीं करना है। दारू की बोतल खोलना है और चिखना के साथ बुत भर पीना है। बड़ा आनन्द आता है साहेब पहले चिखना फिर घीरे धीरे दारू, दोनों का मेल गजब का होता है साहेब!
‘दारू तब तक पीते रहना है साहेब! जब तक दारू न बोलने लगे। और जब दारू बोलने लगती है नऽ फिर तो यह जो दुनिया है बहुत ही छोटी हो जाती है। वो समय कोई आ जाये वह बौना ही देखाता है मुझे साहेब! खाली डर लगता है सिपाहियों से वे दारू पीने के बाद भी राक्षसै देखाते हैं मरखनहा की तरह। एक ही उपाय है साहेब! मन को कन्ट्रोल करने का वह है छक कर दारू पीना और दारू में डूब जाना। फिर तो आपको कुछ नाहीं करना है, दारू ही सारा काम करने लगती है और सब कुछ आगे या पीछे का भुला जाता है।’
‘मैं तो कहता हूॅ साहेब कि अगर खुद को भूल जाना है तो दारू पियो और उसी में गोते लगाते रहोे।’
डाक्टर पाण्डेय जमादार का मुह देखते रह गये थे। फिर उन्हांेने ने भी वही किया था जैसा पोस्टमार्टम कराने वाला जमादार किया करता था।
पोस्टमार्टम घर के सामने हैं गॉव वाले, पुलिस उन्हें थोड़ा दूर हटने का आदेश दे रही है उतना ही दूर जितना दूर उनसे कानून है, कानून की प्रक्रियायें हैं, अब मृतक कानूनी प्रक्रियाओं के हिस्से हैं कानून उन्हें देखेगा...
घटना की जॉच करेगा,
कारणों की जॉच करेगा,
कानूनों के उलंघन की जॉच करेगा,
क्या सचमुच?
‘निपटने की भी तमीज नहीं
बनते हैं बड़का आदमी’
‘जॉच में उलझ गई हैं धरती-कथा, उसके पॉव भी रूक गये हैं, छाले पड़ गये हैं पॉवों में, एक कदम भी आगे नहीं चल पायेगी जबकि जाना है उसे बहुत दूर तक, मानव सभ्यता के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बीच में पड़ने वाली तमाम सभ्यताओं से दो-चार होते हुए। सभ्यता का दूसरा किनारा कहां है धरती-कथा को नहीं पता, ‘चरैवेति चरैवेति’ ही उसे याद है सो कथा चल रही है गॉव की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर। पर उसका चलना गणेश-परिक्रमा की तरह जान पड़ रहा है हल्दीघाटी वाले गॉव से निकल जाये फिर पता चले कि वह सभ्यता के दूसरे छोर की तरफ जा रही है। धरती-कथा शंकित भी कम नहीं है क्या सभ्यता के भी ओर-छोर होते हैं, ओर-छोर तो विभाजन जैसा होगा जबकि सभ्यता में तो विभाजन होता ही नहीं। आदमी का अहंकार ही सभ्यता को अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े, गरीब-अमीर में बाटता है। धरती-माई जानती हैं कि आदमी का अहंकार ही भेद-उपभेद पैदा करता है सो अहंकार से बचना चाहिए, हल्दीघाटी गॉव में तो सब तरफ अहंकार ही पसरा हुआ है एसी स्थित में वे क्या करें....कुछ समझ नहीं आ रहा।
समझ में तो पोटमार्टम घर पर मृतकों के जो परिजन है उन्हें भी कुछ नहीं आ रहा है पर वे वहां हैं दर्शक की तरह, देखो जितना देख सकते हो, वहां प्रशासन का काम है, पुलिस का काम है, उसके बाद अदालत का काम शुरू होगा, लोकतंत्रा की
यही मान्य प्रक्रिया है। फिर भी गॉव के लोग तथा मृतकों व घायलों के परिजन वहां हाजिर हैं, वे देख रहे है पूरा दृश्य,उनका वहां देखना भी दृश्य ही है गोलीकाण्ड की घटना तो वेसे भी किसी भयानक दृश्य में बदल चुकी है। दृश्य है कि वह घूम रहा है...दृश्य का काम है घूमते रहना, दृश्य के साथ गॉव के लोग तथा परिजन भी घूम रहे हैं...उनकी ऑखों में दृश्य उतरा चुका है पूरी तरह, वे देख रहे हैं कि...
जमादार पहंुच गया है पोस्टमार्टम घर। जमादार देखने में सामान्य लग रहा है अगर कोई पहचानना चाहे उसे कि वह नशे में है कि नहीं तो नहीं पहचान सकता। वह आधा बोतल से ऊपर की देशी दारू पी लेने के बाद भी सामान्य बना रहने का कलाकार है। उसके जैसे दूसरे भी हो सकते हैं कलाकार पर अस्पताल में उसके जैसा कोई नहीं है। उसके माफिक तो कुछ नेता ही हो सकते हैं जो जनता का सारा कुछ छीन लेते हैं पर सामान्य बने रहते हैं। परमात्मा ने उसकी शक्ल भी कुछ ऐसी बनाई है कि सोख ले मन की सारी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को, कुछ न उभरने दे चेहरे पर। चेहरे पर के उभारों को वह सोख लिया करता है।
डाक्टर भी पहुंच चुके हैं। पोस्टमार्टम घर खुली जगह पर है मुख्य अस्पताल से करीब पचास मीटर दूर एकदम किनारे। डाक्टरों के रहायशी क्वार्टर भी उससे काफी दूर हैं। सामान्य रूप से माना जाता है कि पोस्टमार्टम घर से रात में आवाजें निकलती हैं सो उसके आस-पास रहायशी क्वार्टर नहीं होने चाहिए। अस्पताल की तरफ से दसियों कुर्सियॉ बाहर रखवा दी गई हैं वहीं बाहर एस.पी.साहेब और डी.एम. साहेब बैठे हुए हैं। उनके साथ नगर के सक्रिय लोगों की जमात भी है कई तो उनमें जन-प्रतिनिधि भी हैं। कुछ जन-प्रतिनिधि जो हल्दीघाटी वाले गॉव से लौट चुके हैं वे कहीं क्षेत्रा-भ्रमण पर जा चुके हैं वे यहां नहीं हैं। नगरपालिका के चेयरमैन बैठे हुए हैं आला-अधिकारियों के साथ।
वैसे भी जहॉ आला-अधिकारी विराजमान होते हैं वहां लोग अपने आप जुट जाया करते हैं और आला-अधिकारियों की बातों से खुद को संतुष्ट किया करते हैं। अधिकारियों की हसी में हसी मिलाना यह लोगों की सामान्य क्रिया है, गोया वे आलाअधिकारियों के रूपक बने होते हैं। आला-अधिकारी हसे तो वे हसे नहीं तो हॉ में हॉ में बोलते रहना है। आला-अधिकारी हैं कि खामोशी ओढ़े हुए हैं, वे कुछ नहीं बोल रहे हैं। वैसे भी आला-अधिकारी बातों को कंजूसी से बोलते हैं, वे जानते हैं अपनी बोली का मूल्य, जब तक बोली का पूरा दाम न मिले न बोलो। जितना संभव हो कम बोलो, लोगों को बोलने दो, जब लोग बोलेंगे तभी तो उन्हें तोला जा सकता है। लोगों को तोल कर बोलो तो लोग समझते हैं कि साहेब बहुत ही प्रतिभाशाली हैं।
जमादार चकराया हुआ है आलाअधिकारियों को पोस्टमार्टम घर पर देख कर। ‘इनकी का जरूरत है इहॉ पर पोस्टमार्टम के समय? बहुत हुआ तो दारोगा आ गया नहीं तो सिपाही आते हैं और पोस्टमार्टम करा कर चले जाते हैं।’
जमादार अपना दिमाग ठीक कर रहा है, होगा कोई मतलब, एक गॉव के दस आदमी मारे गये हैं, यह बड़ा मामला है, शायद इसीलिए आला-अधिकारी भी हाजिर हैं नाहीं तो काहे आते यहां, आफिस में बैठ कर फोन घरघरा रहे होते।’
पोस्टमार्टम घर के बाहर हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना छितराई हुई है। सभी एक ही तरह का कारण बता रहे हैं हत्याकाण्ड का जैसे रटे हुए हों। जमीन के कब्जे को लेकर घटना घटी। कोई सलाह दे रहा है कि हमलावरों को झगड़े वाली जमीन खरीदनी ही नहीं चाहिए थी। हमलावरों ने जमीन नहीं वहां झगड़ा खरीदा है। सोनभद्र में तो झगड़े वाली जमीन खरीदना आसान सा काम है। जिस किसी का शासन-प्रशासन तक जोगाड़ है, शरीर की ताकत है, वह औने-पौने दाम में झगड़े वाली जमीन खरीद लिया करता है, भले ही उस जमीन का मामला अदालत में लम्बित हो। सोनभद्र के दक्षिण में ऐसे हजारों मामले होंगे जो बीसियों साल से चल रहे होंगे। जमीनदारी टूटने के बाद से ऐसे मामले बढ़े ही हैं, घटे कत्तई नहीं हैं। हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीन भी इसी लिए हमलावरों ने खरीद लिया और फस गये बवाल में सोचा होगा कि आदिवासी हैं का कर लेंगे? कोई बस्तर या झारखण्ड तो है नहीं? वैसे भी उनके नाम से कागज-पत्तर है ही नहीं, पर नहीं, आदिवासी डट गये और मामला कतल तक जा पहुंचा। कई लोग मार दिये गये। आतंक फैल गया चारो तरफ। पूरा क्षेत्रा कंपकपियों में चला गया जैसे सुन्न हो गया हो सारा कुछ। सुन्न हो भी गया था पूरा क्षेत्रा। हमले को कभी भी किसी भी तरह की जनता उचित नहीं मानती।
जमादार पोस्टमार्टम घर में घुस चुका है, मेज वगैरह ठीक कर रहा है, छूरा, चाकू आदि एक ट्रे में रख रहा है, उसे मालूम है कितने औजारों की जरूरत पड़ेगी। सारे औजार हैंे वहां बस उन्हें सहेजना है, साफ करके रख देना है। वह एक एक औजार साफ कर रख रहा है ट्रे में। पोस्मार्टम के बाद फर्श साफ करने के लिए पानी चाहिए, जमादार नल की टोटी खोल रहा है, उसमें से पानी आ रहा है गनीमत है कि टंकी में पानी है, नहीं तो पानी भी खतम हो जाता है फिर उसे कहीं बाहर से लाना पड़ता है।
पोस्टमार्टम के लिए सारे जरूरी औजारों को सहेज कर जमादार वहां से बाहर निकल रहा है, वह अगल-बगल देख रहा है, कहीं कोई आड़ वाला कोना मिल जाता तो.. पर वहां कोई आड़ वाली जगह नहीं दिख रही जमादार को। फिर वह अस्पताल के बाहर वाले यार्ड की तरफ जाता है, उसे मालूम है कि वहां कोई नहीं होगा। वह एक गन्दी जगह है सो वहां सुनसान भी है, जहां अस्पताल के इलाज वाले कचरे सूइयां, बोतलंे वगैरह फेके जाते हैं। जमानदार उसी जगह पर पहुंच चुका है कुछ ही देर में वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहता है। ऐसा नहीं कि वह खुद को विलीन कर देगा मन के करतबों में, संभाले रहेगा खुद को। होश नहीं खोयेगा सिर्फ डूबेगा मन की मौजों में।
हालांकि अपने कमरे से निकलने के पहले ही वह आध्यात्मिकता में डूब चुका था। काम भर की दारू की खुराक लेकर कमरे से निकला था। फिर भी लाल परी की उसे तलब लग गई है कि थोड़ा और ढरका लेते हैं पेट के भीतर। का हो जायेगा पेट में तो जाने कितनी चीजें जाते ही हजम हो जाती हैं फिर भी भूखा रहता है पेट। यह ससुरा कभी भरता ही नहीं।
जमादार पेट को गरियाता है...
‘साला यह पेट नहीं होता तो ऐसा घिनौना काम जिस्म के चीर-फाड़ वाला हम थोड़ै करते। हमरे बाप भी यही करते थे साल भर का खाना नहीं जुटा पाते थे। जाने कितनी बार अइया ने रोका था बपई को कि ऐसा काम न करो, हमरे घरे की बढ़न्तरी रूक गई है। झाड़ू-बहारू वाला काम ही हमलोगों के लिए ठीक है। झाड़ू-बहारू के काम में बहुत आराम है, सड़कै तो साफ करनी होती है, झाड़ू उठाये और साफ कर दिए गली, सड़क। सड़क का कूड़ा-कचरा झाड़ू से ही घसीटते हुए सड़क के एक किनारे लगा दिए। कूड़ा उठाने वाला आयेगा और कूड़ा उठा ले जायेगा। सबरे सबेरे का काम है, काम पूरा करके दस बजे तक खाली हो गये फिर नहा लिए, भगवान का ध्यान लगा लिए, मनौती भी कर लिए भगवान की कि अगले जनम में हमैं ‘मेहतर’ न बनाना, झर-झाड़ू न करना पड़े।’
पर अइया की बातें बपई मानते कहां थे?
जमादार निराश नहीं है..भगवान सुनते कहॉ हैं सबकी, पर नाहीं भगवान ने सुना है हमारी फरियाद। भगवान ने नाहीं सुना होता तो हमलोग आज भी उठउआ पाखाना साफ कर रहे होते। अब तो उठउआ पाखाना के बारे में सोचते ही घिन आती है। हमरे अइया-बपई तथा सास-ससुर उठउआ पाखाना साफ किया करते थे। अइया ने बताया था कभी कि जब वह बिआह कर आई थी तब की बात...बताती थी अइया कि रापटगंज में जहॉ देखो वहां उठउआ पाखाने ही थे। घर के पिछवाड़े मालिक लोग पाखाने को बनवाया करते थे। एक बार हमारी सासू बिमार हो गईं अउर ससुर कही नातेदारी में गये हुए थे। ओ समय दस घरे का काम हमरे ससुर के इहां था। अब हम का करें थोड़ी देर हो गई तब तक एक मालिक हमरे घरे आ गये...
ससुर का नाम लेकर हल्ला करने लगे... हम मड़हा से बाहर निकले
‘का है साहेब!’ हमने पूछा मालिक से
‘अरे! आजु पाखाना साफ नाहीं होगा का? ’...मालिक ने पूछा
‘ काहे नाहीं साफ होगा साहेब। आप चलिए हम आय रहे हैं साफ कर देते हैं।’
का बतावैं उहां का हुआ था, सारा पाखाना महक रहा था, हर तरफ छितराया हुआ था पाखाना, जाने कैसा आदमी गया था निपटने, देखने में लगता था कि उसने हर तरफ पाखाना कर दिया है, जेहर देखो ओहर मैला। लोगों को निपटने की भी तमीज नहीं फिर का करेंगे ऊ। बनते हैं बड़का आदमी अउर सहूर नर-निपटान करने का भी नाहीं, बड़का बनते हैं। बहुत ही घिन आ रही थी पर करते का.. पाखाना साफ तो करना ही था। घिनाते घिनाते साफ किए पाखाना अउर घर आते ही उल्टी करने लगे। खूब उल्टी हुई फिर गिर गये बिस्तरा पर अकल आ गई थी कि नहा लिए थे नहीं तो पूरा घरा बसा जाता।’
अइया तो बपई को रोज ही फटकारती थीं कि पोसटमार्टम वाला काम न करो
ओसे अच्छा है झाड़ू-बहारू वाला काम, पर बपई अइया की बातें सुनते कहां थे उन्होंने ही मुझे भी फसा दिया इस काम में वैसे भी हम दूसर काम करते भी का? सो हमैं तो करना ही था पोसटमार्टम वाला काम।
‘हमार लड़कवे भी मना करते हैं, न करो इस काम को, घर बैठो अउर दो रोटी खाओ। दोनों मजूरी करते हैं। बड़का मोटरसाइकिल का मिस्त्राी हो गया है अउर दुसरका बिजली का काम करता है। दोनों अपने काम में बहुत आगे हैं। बिजली वाला मिस्त्राी तो मकान के बिजली के काम का ठीका लिया करता है, बढ़िया पैसा कमा रहा है। दोनों ठीक-ठाक हैं। हम बूझते हैं कि दोनों मुझे अपना बाप बताने में भी लजाते होंगे पर सही सही नाहीं पता। हमरे बिरादरी का एक लड़का जो मास्टर हो गया है वह कभी आपन जाति नाहीं बताता। वह बताता है कि वह रावत है। अरे जाति का नाम न बताने से का हो जायेगा कउन नाहीं जानता कि राउत का होते हैं। सभै जानते हैं राउत के बारे में। जाति बदल तो लोगे पर बिआह शादी कहां करोगे, मरनी करनी में कौन आयेगा तोहरे इहां लाश उठाने यह सब तो बिरादरियय में करना होगा फेर बिरादरी का नाम बदलने से का फायदा?’
‘हमने समझाय दिया है अपने लड़कों को कि कभी बिरादरी का नाम न छुपाना, काहे छिपाओगे बिरादरी का नाम, कउनो तूने गढ़ा है बिरादरी का नाम, जिसने गढ़ा है ऊ जाने। हम तो साफ साफ बताते हैं अपनी बिरादरी। हमरे बपई भी बिरादरी का नाम नाहीं छिपाते थे पूरा रापटगंज ओन्हैं जानता था। हमरे बाप की बिरादरी में सबसे ऊॅची कूरी थी सो हमरे बाप के पास मुहल्ला भी अधिक थे, अधिक गहकी भी थे। पहले रापटगंज आज की तरह से बड़ा तो था नहीं, छोटा था चौराहे के आस-पास ही बस्ती थी। बिरादरी की पंचाइत वही किया करते थे।
रापटगंज में जबसे पोस्टमार्टम का काम होने लगा तब से बपई पोस्टमार्टम का काम करने लगे डाक्टरों के साथ। पोस्टमार्टम का काम जब आ जाता था तब हमैं भी साथै रख लिया करते थे, अपने दारू पीते थे तो हमैं भी जबरिया पिला दिया करते थे। तबै से लत पड़ गई है अब छोड़ने से थोड़ै छुटने वाली है। जमादार मन के मौजों में डूब चुका है तथा पूरी तरह से होश में भी है, यही तो उसे विशेष बनाती है तथा औरों से अलग भी करती हैै।
जमादार झूमता हुआ पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहा है। अस्पताल के सी.एम.एस. भी उसके सामने से आ रहे हैं। सी.एम.एस. ने जमादार को देखा..
‘ज्यादा पी लिया है का?’ उन्हें जमादार पर शक होता है। उन्हें शक तो पहले से ही था इसी लिए उन्होंने कम्पउन्डर पाडे़ को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि जमादार का ध्यान रखिएगा मौका मिलते ही वह दारू छान लेगा फिर किसी के वश का नहीं कि पोस्टमार्टम हो जाये बिना उसकी मदत के। पोस्टमार्टम हो ही नही सकता। सी.एम.एस. की ऑखों में कम्पाउन्डर पाड़े तैरने लगे, कहॉ हैं पाड़े कितना समझाया था उनको कि जमादार का ध्यान रखिएगा पर नहीं.. छोड़ दिए उसके
अकेला...सी.एम.एस. मन में बुदबुदा रहे हैं....
इधर उधर ही होंगे पाड़े जायेंगे कहां? सामने से आता अस्पताल का एक कर्मचारी दिखता है उन्हें.. वे उसे बुलाकर सहेजते हैं पाड़े को मिलवाइए मुझसे..
पाड़े लाश घर में थे लाशों के साथ, वहां भी तो होना चाहिए किसी को, वहां हाजिर भीड़ को दूर भगाये रखने का बड़ा काम था सो पाड़े लाशों की निगरानी पर थे।
कर्मचारी ने बता दिया है पाड़े को कि सी.एम.एस. साहब ने बुलाया है सो पाड़े भागे भागे आय रहे हैं सोच भी रहे हैं...
‘काहे बुलवा लिया साहेब ने’ कोई काम आ गया होगा तभी तो बुलवाया है। अब पाड़े को का पता कि काम क्या है? जमादार ने अधिक दारू पी लिया है, उसे संभालना है, वह होश में रहेगा तभी तो पोस्टमार्टम हो पायेगा।
सी.एम.एस. ठहरे हुए हैं अस्पताल और पोस्टमार्टम घर के बीचो बीच, पाड़े से बातें हो जायें फिर वे आगे बढ़ें और लाशों को पोस्टमार्टम घर में भेजना शुरू हो।
पाड़े आ गये हैं और सी.एम.एस. साहेब के सामने खड़े हैं फिर सी.एम.एस. साहेब पाड़े से पूछ रहे हैं...
‘कैसे होगा पोस्टमार्टम जमादार तो नशे में धुत्त दीख रहा है, अभी अभी गया है पोस्टमार्टम घर की तरफ।’
‘नाहीं साहब ओके हम समझाय दिये हैं। मोटरसाइकिल पर बैठा कर ओके हम घरे से लाये हैं। हमारी बात वह नाहीं टालेगा साहेब। एक बात अउर है ओकर शकलियो तो नशे में धुत्त माफिक देखाती है। आप चिन्ता न करें साहेब ऊ ठीक ठाक होगा, एकाध बोतल दारू पी लेने से वह बहक थोड़ै जायेगा। हम जायके ओके देखते हैं।’
सी.एम.एस. साहब गंभीर बने हुए हैं जैसे कुछ सोच रहे हों फिर उन्होंने पाड़े को सहेेजा....
‘जाइए आप पोस्टमार्टम घर की तरफ, इधर-उधर न घूमिए, वहीं पर रहना आपके लिए जरूरी है, आपही संभाल सकते हैं जमादार को कोई दूसरा नहीं, उससे बोल दीजिएगा कि उसके लिए बढ़िया इन्तजाम हो जायेगा पोस्टमार्टम हो जाने के बाद, जो मांगेगा मिलेगा भी।’
हाउर हाउर जा रहे हैं पाड़े पोस्टमार्टम घर की तरफ। पोस्टमार्टम घर कितना दूर ही है मुश्किल से पचास कदम पर।
सी.एम.एस. भी वहां से चले गये अस्पताल की तरफ। सी.एम.एस. के जाने के बाद पाड़े को ख्याल आया कि उन्होंने गुटखा तो लिया नहीं, जमादार मांगेगा गुटखा, का देंगे उसे? बच-बचाकर खुद भी खाना है। पाड़े जा तो रहे हैं पोस्टमार्टम घर की तरफ पर किसी को देख भी रहे हैं पर कोई नहीं दिख रहा, लगता है खुद ही जाना पड़ेगा अस्पताल के बाहर, बाहर कई दुकानें हैं पान-गुटखा वाली। पाड़े पहुंच चुके हैं पोस्टमार्टम घर, बस दस कदम और चलना है। तभी वहां उन्हें एक मुहलगा मरीज दिख जाता है..
वह दो महीने से अपना इलाज करा रहा है, पता नहीं क्या है कि उसे बार बार मलेरिया और टाइफाइड हो जाया करता है, अभी नई उमर है। पाड़े ने ही उसे एक डाक्टर को दिखवाया है। इलाज से उसे फायदा है। पाड़े उसे बुलाते हैं और रुपया देते हैं गुटखा लाने के लिए जाओ गुटखा ले आओ...
मरीज रुपया नहीं लेता है, रुपया है साहब हम ले आते हैं आप रहने दीजिए, कुछ तो मौका दीजिए सेवा करने का। मरीज भावुकता में है...
‘अगर पाड़े जी न होते तो उसकी दर-दवाई न हो पाती। पाड़े जी ने ही उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, दवाई करवाया तब जाकर वह ठीक हुआ। कई दवाइयां अस्पताल में नहीं होती थीं उसे बाहर से खरीदना होता था। पाड़े जी उसे बाहर से खरीदवा दिया करते थे पाड़े जी के कारण पन्द्रह परसेन्ट की दाम में छूट मिल जाती है बच जाता है दो-तीन सौ रुपया। सो वह भला कैसे ले सकता है पाड़े जी से रुपया वह भी गुटखा के लिए।’
मरीज ने पाड़े जी से रुपया नहीं लिया और चला गया गुटखा खरीदने अस्पताल के बाहर। मरीज के जाने के बाद पाड़े जी पोस्टमार्टम घर.. वहां जमादार था और सचेत था...वह भी लाश आने की प्रतीक्षा में था।
पाड़े जी ने जमादार के चेहरे का सरसरी मुआयना किया...
चेहरा तो ठीक ठाक दिख रहा है, कहीं नशे की खुमारी नहीं छलक रही, फिर साहेब का बोल रहे थे...
साहब तो बोलेंगे ही, दस लाश का पोस्टमार्टम कराना साधारण बात है। पूरे कार्यकाल में अपने इस तरह से तो कभी न फसे होंगे, बहुत हुआ होगा तो एक दो पोस्टमार्टम किए करवाये होंगे इससे अधिक नहीं। घबरा गये हैं साहेब। कोई भी घबरा जायेगा। सारी लाशें यहीं ला दी गईं। अस्पताल तो घोरावल भी है वहां से लाशों को रेफर किया जाना चाहिए था, वहीं पर कागज-पत्तर बन गया होता पर नहीं ले चलो रापटगंज और ले आये सभी लाशों को। प्रशासन को काहे की चन्ता, मरें अस्पताल के लोग उनका काम खत्म। सोचना चाहिए था कि खाली पोस्टमार्टम ही तो नहीं करना है नऽ, परेशानी तो उसके बाद है, रिपोर्ट बनाओ, मुकदमे के दौरान अदालत में हाजिरी दो, वकीलों के बेतुके जिरहों को झेलो, अदालत न जाओ तो वारंट झेलो गोया हर तरफ से बवाल...मरीज गुटखा लेकर आ गया है और पाड़े को दे रहा है। वह भी पोस्टमार्टम घर पर रुक गया है वैसे भी वहां काफी भीड़ है, न अधिकारी वहां से हट रहे हैं और न ही भीड़ हट रही है। कुछ ही देर में पोस्टमार्टम होना शुरू हो जायेगा। जमादार खुद को तैयार किये हुए है उसके साथ पाड़े जमे हुए हैं... उसे छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे। पाड़े को भी डर है, जाने जमादार का करे?
कहीं भाग गया तो...कैसे हो पायेगा पोस्टमार्टम?
‘हम सभी लाश ही तो
हैं एकदम खामोश, चुप, खुद में डूबे’
‘पोस्टमार्टम तो होगा ही, कहीं न कहीं से बुला लिया जायेगा कोई दूसरा जमादार पर धरती और उसकी कथा का क्या होगा? हमारी सभ्यता में धरती खुद एक पात्रा है, इसकी खूबसूरती, इसकी उर्वरा सभी को आकर्षित कर लेती है और लोग हैं कि इसे हासिल करने के लिए, कुछ भी करने की सीमा तक चले जाते हैं और धरती को ही नहीं इसके असल कथा-पात्रों को भी पहुंचा देते हैं पोस्टमार्टम घर तक...वैसे पोस्टमार्टम किस चीज का नहीं होता, यह पोस्टमार्टम ही तो है हमारे कथित सभ्य समाज का जो जाने कितने खानों और परतों में बटा हुआ है। कहते हैं हमारे यहां विभिन्नता में एकता है जो हमारी विशेषता है पर कोई नहीं बताता कि यह जो हमारे समाज में विभिन्नता है उसकी सामाजिक जरूरत क्या है? धरती-माई धरती का समाज देख व समझ कर दुखी हैं, वे चाहती है कि यह जो आदमी ने अपने अहंकारों के संरक्षण के लिए मानव समाज को खानों में बाटा हुआ है गलत है, मानव समाज का हर आदमी बराबर है सभी मायनों में। इस मानव-कृत विभिन्नता के खिलाफ धरती-माई लोक-कल्याण के देवता शिव से शिकायत भी कर चुकी हैं, उनके पास सामाजिक भिन्नता के बाबत ढेर सारी शिकायतें पहुंची हैं पर अभी तक शिव जी ने उन शिकायतों का निस्तारण नहीं किया है... देखिए क्या होता हे आगे...
आगे यही है कि आला-अधिकारी डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर के सामने उनके साथ शोकातुर लोगों की भीड़ भी डटी हुई है साथ ही साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं भीड़ में जो सिर्फ देखने के लिए आये हुए हैं कि हो क्या रहा है वहॉ। वैसे वे लोग तमाम तमाशबीनों से अलग मिजाज वाले हैं जो कहीं भी भीड़ का हिस्सा बन जाया करते हैं। वे दुखी हैं और जानना चाह रहे हैं आखिर ऐसा क्या हो गया कि दस लोग भून दिये गये गोलियों से। पर पोस्टमार्टम घर के सामने जबाब तो था नहीं उनके सवालों का, कि वे जान जाते और पोस्टमार्टम घर सवालों के जबाब दे देता लोगों को।
असल बात तो यह भी है कि जबाब किसी के पास नहीं है, थाना भी चुप है और उससे जुड़ा प्रशासन भी चुप है। सरकार के सभी विभाग खामोशी में डूबे हुए हैं। सरकारी ओहदेदारों में किसी को कुछ भी नहीं पता कि हल्दीघाटी वाले मैदान में क्यों खेली गई खून की होली केवल इतना ही पता है कि कैसे खेली गई खून की होली इससे अधिक कुछ भी नहीं। हर तरफ से एक ही बात छन कर आ रही है कि जमीन के कब्जे को लेकर गोलियॉ चलीं, गोली खाने वालों ने कब्जेदारों को रोका, कब्जा नहीं करने दिया जमीन पर, कब्जे का प्रतिरोध किया और चल पड़ी गोलियॉ। जमीन के कब्जे के सवालों को लेकर गोलियॉ चला ही करती हैं, पूरे देश में जमीन के कब्जे को लेकर चलने वाली गोलियों का इतिहास पुराना है। यह जो कब्जे की गोली वाली संस्कृति है आदिम है इसे न तो मुगल रोक पाये, न अंग्रेज रोक पाये और न ही इसे मौजूदा हुकूमत ही रोक पा रही है। गोलियॉ लगातार चल रही हैं कभी कहीं तो कभी कहीं, सोनभद्र में पहली बार चली हैं गोलियॉ। एक बार और गोलियॉ चली थीं सोनभद्र में जब अंग्रेज कलक्टर टक्कर ने चलवाया था माची और सुअरसोत वाले जंगल में। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी राजा लक्ष्मण सिंह मारे गये थे उनके साथ दो सौ स्वतंत्राता-संग्राम सेनानी भी मारे गये थे। बहरहाल वह मामला अंग्रेजी हुकूमत से बगावत वाला था पर यह मामला तो सीधे सीधे जमीन के कब्जे को लेकर था बगावत या आतंक का नहीं था।
सी.एम.एस. साहब लाशों को भिजवा रहे हैं पोस्टमार्टम घर, पाड़े तैयार हैं वहां दो डाक्टर भी हाजिर हैं। लाश नं.1 जा रही है पोस्टमार्टम घर में। लाश पोस्टमार्टम घर के भीतर जाने के बाद दरवाजा बन्द हो चुका है। जमादार लाश पर ढके कपड़े को हटा चुका है, डाक्टर लाश का मुआयना कर रहे हैं, जख्मों की नापी कर रहे हैं। साबूत लाश पड़ी हुई है आपरेशन टेबुल पर। जैसे बोल ही देगी कि का हुआ था उसके साथ पर लाश नहीं बोलने वाली। गनीमत है कि लाश गन्धा नहीं रही है और न ही उसमें सड़न आई है। कभी कभी तो एकदम सड़ी हुई लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए आ जाया करती हैं। हाथ अलग तो पैर अलग पूरी देह बजबजाती गंधाती, कही सबूत नहीं देह का।
डाक्टर जखमांे का नाप ले रहे हैं सामने पड़े कागज पर नाप चढ़ा रहे हैं, चेहरे तथा शरीर के तमाम कुदरती चिन्हों को चढ़ा चुके हैं कागज पर, इन नापों की जरूरत पड़ती है अदालत में। डाक्टर के लिखने की लिपि अंग्रेजी है पर शिनाख्त वाली लिपि उर्दू है। मृतक की पूरी शिनाख्त लिख रहे हैं कागज पर, सावधानी बरत रहे हैं कि एक भी चिन्ह छूटने न पाये हल्के से हल्के तिलों या काले चकत्तों कटे-फटे-टूटे को जोड़ कर लिख रहे हैं। दागों-तिलों को चढ़ा लेने के बाद मृतक की कद-काठी का हिसाब उतार रहे हैं कागज पर। सांवला रंग, भरा भरा सा चेहरा, हटटा-कठठा शरीर, उमर पचीस साल, जवान, इकहरा बदन बस इतना ही कोई बड़ा निशान कटे-फटे का नहीं दिख रहा शरीर पर। इतना तो काफी है और क्या लिखा जायेगा। फारम पूरी तरह से भर चुका है कोई कालम छूटा नहीं है डाक्टर खुद को आश्वस्त कर रहे हैं। क्लीनिकल परीक्षण तो हो ही रहा है यहां पर। फोरंन्सिक परीक्षण के लिए बिसरा वगैरह फोरेन्सिक लैब में भेजना होगा। वे बिसरा को जमा कर चुके हैं अस्पताल का काम है बिसरे को फोरेन्सिक लैब भेजना।
जमादार लाश को गले से लेकर पेट तक जरूरत के हिसाब से चीरा लगा रहा है उसके बाद डाक्टर गोलियॉ तलाशेंगे पेट के भीतर या ऑत वगैरह में। डाक्टर के माथे पर लकीरे उभर गई हैं, वे गोलियॉ तलाश रहे हैं पर वहां गोलियॉ नहीं मिल रही हैं...शरीर को आर-पार छेद कर निकल गई होंगी शरीर से बाहर। गोली के निशान वाली जगह पाइपनुमा बन चुकी हैं उसी जगह के भीतर डाक्टर तलाश रहे हैं गोलियॉ। डाक्टर बुदबुदा रहे हैं कि रायफल की गोली होगी, वह घूमते हुए निकल
जाती है शरीर से बाहर। अगल बगल का सारा मास छील देती है, तभी तो इतना बड़ा खोखला हो गया है। किडनी, लीवर तथा फेफड़ा भी आ गया है गोली के चपेट में। यह आदमी तो तुरंत मर गया होगा मौके पर एक दो मिनट भी जिन्दा नहीं रहा होगा। डाक्टर डाक्टरी का काम करते हुए भावुक हुआ जा रहा है वह अपनी भावुकता जबरिया रोकता है उससे का लेना-देना यह सब तो होता रहता है। वैसे भावुकता रोकना सरल नहीं होता फिर भी डाक्टर रोक रहा है खुद को...
‘तुझसे क्या मतलब तूॅ अपना काम कर, तेरा काम है पोस्टमार्टम करना, रिपोर्ट बनाना इससे अधिक नहीं करना है तुझे कुछ। लाश की उमर क्या है, किस जाति का है, इसके बाल बच्चे हैं कि नहीं, इसके घर में कौन कौन हैं, क्या करेगा यह सब जानकर तूॅ, चल आगे बढ़ और आपना काम कर। पता लगा कि गोली कैसे लगी, किस तरफ से लगी, कितनी गोलियॉ लगीं, गोली लगने के बाद कितनी देर में मरा होगा आदमी यह सब पता कर अगर कर सकता है तो, नहीं तो छोड़ केवल बिसरा इकठ्ठा कर ले और भिजवा दे फोरेन्सिक लैब। कोई अज्ञात मर्डर का मामला नहीं है कि कानूनी झंझट खड़े होंगे मामला बहुत ही क्लीयर है। मारने वाले ज्ञात हैं तो मरने वाले भी ज्ञात हैैं, हत्या के कारण का भी पता है अब इससे अधिक कानून को चाहिए क्या, कानून इतने से अपना काम निपटा लेगा?’
डाक्टर पेशेवर बन चुका है, अनुमान लगा रहा है, लगता है कि एकदम पास में ही रहा होगा मृतक और हमलावर ने पास से ही गोली मारा होगा इसे। दूर रहा होता तो इतना बड़ा जखम नहीं होता। लगता नहीं कि दो गोलियॉ लगी हैं इसे, एक ही गोली में मर गया होगा। माथे वाली चोट तो जमीन पर गिरने के कारण लगी होगी क्योंकि थुथुरा गई है चोट, कुछ खरोंच भी है शरीर पर ये सब भी जमीन पर गिरने के कारण आई होंगी। गोली लगने के बाद दो मिनट भी जीवित नहीं बचा रहा होगा मृतक, कराह कर गिर गया होगा जमीन पर। एक दो हिचकियॉ आई होंगी, संभव है करवट भी बदला हो, संभव यह भी कि है कुछ न हुआ हो, न हिचकियां आई हों और न ही करवट बदला हो, जैसे गिरा होगा जमीन पर उसी तरह मर गया होगा। गोली लगते ही मृतक के प्राण-पखेरू उड़ गये होंगे।
डाक्टर महसूस कर रहा है कि वह अपने पेशे के नियत कामों से अलग जा रहा है, वह किसी वकील या किसी सोसल-वर्कर की तरह सोच रहा है। उससे इस तरह की सोचों से का लेना-देना, उसके सामने एक लाश पड़ी हुई है, उसे इसी लाश का पोस्टमार्टम करना है केवल। कुछ दूसरा नहीं करना है और न ही सोचना है। पर नहीं डाक्टर फिर बहका जा रहा है उसके अन्तःमन में कुछ चित्रा उभर रहे हैं, सारी दुनिया उसे लाश की तरह दीख रही है, वह भीतर संवाद करता है हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश। हम कहां जानते हैं अपना पक्ष रखना, अपने पक्ष के लिए संवाद करना। कुछ लाशें बोलती-बतियाती हुई जान पड़ती हैं तो कुछ खोमाशी ओढ़े हुए रहती हैं, हम सभी खोमोशी ओढ़े हुए लाश की मानिन्द ही तो हैं।’
डाक्टर हालांकि वैज्ञानिक हैं, विज्ञान ने ही उसे गढ़ा हुआ है, विज्ञान की पढ़ाई किया है उसने फिर भी दार्शनिक हुआ जा रहा है, उसका दार्शनिक होना अस्वाभाविक नहीं जान पड़ रहा, कोई भी लाश देख कर खुद के जीवन के बारे में सोचने लगेगा, जीवन का मतलब निकालने लगेगा। जीवन तो यही है कि उसे लाश बनना है किसी न किसी दिन।
डाक्टर खुद को जबरिया संभालता है और अपने पेशे की मनःस्थिति की तरफ लौटता है...ऐसा करने के लिए डाक्टर को खुद से संवाद करना पड़ता है...
‘यह तो दुनिया है, दुनिया में लोग मरते-जीते रहते हैं, यह जो मरना-जीना है शारीरिक क्रिया है। बहुत सारे तत्व आपस में मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं तो वही तत्व क्षीण होने पर शरीर को समाप्त भी कर देते हैं, मरना-जीना एक प्रक्रिया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।’
डाक्टर तमाम अस्पतलिहा कामों को निपटा रहे है जो कि एकदम अलग तरह का होता है। डाक्टर को चिन्ता है अदालत की, अदालत में भी तो जाना होगा सो सारा काम वह विधिपूर्वक करना चाह रहा है। विधिपूर्वक काम हुआ रहेगा तो परेशानी नहीं होगी। कुछ दिन बाद ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मांग शुरू हो जायेगी। डाक्टर जल्दी में है उसे पता है कि नौ और लाशों का पोस्टमार्टम करना होगा। सी.एम.एस. साहब ने कहा भी है कि पोस्टमार्टम जल्दी करना है जितना संभव हो सके। इसका मतलब यह नहीं कि जरूरी जॉचों को छोड़ देना है।
पोस्टमार्टम घर के सामने की भीड़ जमी हुई थी अधिकारी भी जमे हुए थे। कोई हिलने का नाम नहीं ले रहा था। अधिकारियों को कहीं से सूचना मिली थी कि कुछ आदिवासी संगठन हत्या का विरोध करने के लिए अस्पताल की तरफ आने वाले हैं, अस्पताल के बाद वे मुख्यालय पर जायेंगे वहां कोई ज्ञापन देंगे। सो अधिकारी भी वहीं जमे हुए थे। अधिकारियों का मानना था कि जो घट चुका है वह तो घट ही चुका है पर उसके बाद कोई अप्रिय घटना न घटने पाये। वे सतर्कता बरतने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे। सो वे ऑखें खोले हुए थे तथा कानों को सतर्क किए हुए थे।
करीब दो घंटे गुजरे होंगे कि हल्दीघाटी वाले गॉव में ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ गाने वाला वह लड़का तनबुड़ुक भी पोस्टमार्टम घर आ धमका। वहां उपस्थित लोगों में से किसी ने उसे पहचाना नहीं पर जो हल्दीघाटी वाले गॉव के थे वे पहचान रहे थे। वह लाशें जहां रखी हुई थीं वहां से लौटा था अपने भाई को ढूढ रहा था पर वह अपने भाई को कैसे पहचानता सारी लाशें तो कपड़े से ढंकी हुई थीं।
अस्पताल आने के बाद वह वहां सभी से पूछता...गॉव वालों से भी पूछता...
‘मेरा भाई कहां है?’
जहां लाशें रखी हुई थीं वहां किसी को नही पता कि उसका भाई कौन है। लाशों पर नंबर लगाने वाले को ही पता था कि कौन लाश किसकी है जिसे रजिस्टर पर चढ़ा लिया गया था। अब वहां कौन खाली है जो बताता कि उसका भाई कौन है। वह अस्पताल में चिल्ला रहा है ...
कैसा अस्पताल है यह? मेरा भाई भर्ती है यहां और कोई नहीं बता रहा कि मेरा भाई कहां है। कहीं छिपा दिया है अस्पताल वालों ने। गॉव पर तो उसे बताया गया था कि उसके भाई को अस्पताल वाले ले गये हैं।
‘अस्पताल वाले चोर हैं, ये मरीजों की किडनी निकाल लेते है, ऑखें निकाल लेते हैं और बेच देते हैैंं, इसी लिए मेरे भाई के बारे में नहीं बता रहे हैं लगता है कहीं छिपा दिये हैं पर मैं अपने भाई को तलाश कर रहूंगा। अस्पताल के बड़े साहब से मिलूंगा, कलक्टर साहब से मिलूंगा, कैसे छिपाओगे मेरे भाई को।’
उस लड़के को लाश घर के सामने से दूर हटाया जा रहा है वह विरोध नहीं करता, निकल रहा है वहां से।
वहां से निकलने के बाद वह सीधे भीड़ की तरफ जा रहा है यानि पोस्टमार्टम घर की तरफ। तब तक जाने क्या हुआ कि वह पीछे लौट आया...
पीछे आने पर उसे एक आदमी मिला जिसके कंधे पर एक बैग लटक रहा था। लड़के ने अनुमान लगाया कि इस आदमी के पास सादा कागज होगा और कलम भी। अस्पताल के काम से आता तो बैग लेकर नहीं आता। लड़के का अनुमान सही निकला। लड़के ने उस आदमी से एक दरखास लिखने के लिए निवेदन किया...
‘भाई साहब एक दरखास लिख दीजिए।’
कैसी दरखास पूछा अनजान आदमी ने..
‘मेरे भाई को अस्पताल वाले जाने कहां छिपा दिए हैं, गॉव पर लोगों ने बताया कि उन्हें अस्पताल वाले ले गये हैं रापटगंज। गॉव से भागा भागा में यहां आया हूॅ अस्पताल। अस्पताल में सभी से पूछ चुका हूं कोई नहीं बता रहा मेरे भाई के बारे में, आप जानते हैं ये अस्पताल वाले बहुत बड़े चोर होते हैं, ये किडनी निकाल कर बेच देते हैं इसी लिए मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हैं।’
लड़के की बातें सुनकर अनजान आदमी चकरा गया। का बोल रहा है यह लड़का, लगता है कि इसका दिमाग ठीक नहीं है..
उसने लड़के को समझाया...
‘ऐसा नही होता भाई! का बोल रहे हो, जाओ अपना काम करो, घर चले जाओ और आराम करो। किसी डाक्टर को दिखा कर दर-दवाई ले लो।’
अनजान आदमी लड़के को समझाकर आगे बढ़ना चाहा तभी लड़के ने उसे रोक लिया और बोला..
‘अरे भाई साहब! मेरी कोई नहीं सुन रहा आप तो सुनिए मेरी बात। भाई साहब!
आप मेरी चिन्ता न करें, मैं पूरी तरह से ठीक हूॅ, मैं जानता हूूॅ कि अस्पताल वालों ने मेरे भाई को कहीं छिपा दिया है। आप दरखास तो लिखिए फिर देखिए तमाशा। जब कलक्टर साहब आयेंगे नऽ तब पता चलेगा इन लोगों को। आप नहीं जानते कि इस समय जो कलक्टर साहब हैं नऽ बहुत ही ईमानदार हैं, वे अस्पताल वालों की खटिया खड़ी कर देंगे। आप दरखास लिखिए आगे मेरे ऊपर छोड़ दीजिए।’
‘लड़का रिरियाने लगा।’
अनजान आदमी कुछ ठीक ठाक था नहीं तो दूसरा होता तो सरक लेता दूसरे का बवाल अपने सिर काहे लेता।
‘अच्छा बताओ का बात है तेरे भाई को असपताल वाले कब यहां ले आये?’ अनजान ने सवाल पूछा...
लड़का संयत था...
‘आज ही ले आये हैं सरकारी गाड़ी से भाई साहब! मैं भी उसके पीछे पीछे आ रहा हूॅ बस पकड़ कर।’
‘तेरा भाई बिमार था क्या...?’
‘नाहीं भाई साहेब वह बिमार नहीं था वह बेसुध पड़ा हुआ था। मैंने उसे गॉव पर देखा था फिर जाने का हुआ कि गॉव वालों ने मुझे वहां से भगा दिया। लोग बता रहे थे कि वह गोली लगने से मर चुका है पर वे झूठ बोल रहे थे। मेरा भाई कभी नहीं मर सकता, गोली भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वह मुझे देखते ही जिन्दा हो जायेगा पर साले मुझे नहीं देखने दे रहे है मेरे भाई को। इसी लिए तो बोल रहा हूॅ कि आप दरखास लिख दीजिए मुझे दरखास देना है कलक्टर साहब को। मैं अपने भाई को यहां से लौटाकर ले जाने के लिए आया हूॅ।’
अनजान आदमी समझ नहीं पा रहा है कि वह का करे। लड़का पागल भी नहीं समझ में आ रहा है लगता है, भाई को मरा देख कर घबरा गया है सो बक बक कर रहा है। अनजान आदमी ने लड़के का गॉव पूछा...क्योंकि उसे पता था कि एक गॉव में गालियॉ चली हैं जिसमें कई आदमी मारे गये हैं..संभव है लड़का उसी गॉव का हो।
लड़के ने गॉव का नाम बताया फिर अनजान आदमी समझ गया कि लड़का सुध-बुध खो चुका है, इसे ढंग से समझाना होगा। पर ढंग से अनजान आदमी लड़के को का समझाता। उसे तो अन्दाजा हो गया था कि लड़के केे भाई की लाश पोस्टमार्टम के लिए लाई गई होगी और लड़का समझ रहा है कि दर-दवाई के लिए लाया गया है उसका भाई। पोस्टमार्टम के बारे में लड़के को बताना ठीक नहीं होगा। फिर दरखास ही लिख देते हैं यही ठीक होगा। बिना दरखास लिखवाये लड़का उसे छोड़ने वाला नहीं है।
अनजान आदमी ने अपने बैग से एक पेज कागज निकाला, कलम जेब से निकाल लिया फिर दरखास लिखना शुरू कर दिया...
बोलो का लिखें दरखास में... लड़का भी तो बताये कुछ।
लड़का बताने लगा...लड़के के बताने के अनुसार अनजान ने दरखास लिख दिया और दरखास लड़के को थमा दिया। लड़का वहीं खड़ा खड़ा इधर उधर देख रहा था कि उसे गॉव के दो चार लोग दिखे...
लड़का उस तरफ दौड़ पड़ा...
लड़के ने गॉव वालों से पूछा अपने भाई के बारे में.....
‘कहां है मेरा भाई, ले चलो मुझे मेरे भाई के पास’
गॉव वाले तो जानते ही थे कि भाई की लाश देख कर ही लड़का सुध-बुध खो चुका है....वे भी भला लड़के को का बताते... लड़का गॉव वालों से नाराज हो जाता है, लगता है गॉव वालों को गरियाने...
‘साले! तुम लोग मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हो और बोल रहे हो कि मर गया मेरा भाई। मेरा भाई मर गया है तो उसकी लाश तो दिखाओ। मेरा भाई तो देवता था देवता, देवता भला कभी मरते हैं। अस्पताल वालों ने उसे छिपा दिया है कहीं, तुमलोग भी अस्पताल वालों से मिले हुए हो।’
लड़का गॉव वालों से नाराज हो कर चल देता है पोस्टमार्टम घर की तरफ मन में बुदबुदाते हुए... ‘कोई किसी का नहीं होता सब अपने में आन्हर हैं।’
‘दृश्य पलट रहा है..
सरकार और प्रशासन के काम की तरफ’
‘आन्हर तो हैं ही सभी, कुछ जान-बूझ कर आन्हर हैं तो कुछ कुदरती आन्हर हैंं। परेशानी जान-बूझ कर बने आन्हरों से है, वे देखते हुए भी नहीं देखते, वे वही देखते है जो उन्हें देखना होता है या जो उनके अगुआ उन्हें दिखाते हैं। उनके पास ऑखें होते हुए भी ऑखें नहीं होतीं और यह जो देखना है... देखते वे ही हैं जिनके पास ऑखें होती है। लोग देखते हैं क्योंकि उसके पास ऑखें हैं, गलत है। यह धरती-कथा भी नहीं दिखेगी ऐसे लोगों को जो देखना ही नहीं चाहते, वे सक्रिय ऑखों वाले अन्धे हैं। पर धरती-माई की ऑखें खुली हुई हैं वे सारा कुछ देख व समझ रही हैं, वे उस गीत को भी सुन रही हैं जिसे कथा में एक लड़का बराबर गाता हुआ चल रहा है। धरती-माई उस लड़के के गीत से प्रसन्न हैं, मन ही मन उसे आशीर्वाद दे रही हैं, इतनी कम उमर और इस तरह का गीत, उनकी अस्मिता का वर्णन करता ‘कैसे किसी की हो सकती है धरती भला...’
नहीं यह तो गलत है कैसे बाट लोगे धरती को, आकाश नहीं बट सकता फिर धरती कैसे बट जायेगी?
पोस्टमार्टम घर के सामने पहले की तरह ही भीड़ जमी हुई है। सात लाशों का पोस्टमार्टम हो चुका है। आला-अधिकारी भी डटी हुई भीड़ में खोये हुए हैं, वे डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर। लग नहीं रहा है कि वहां आला-अधिकारी भी हैं। आला अधिकारियों के चेहरे छिप से गये हैं भीड़ में, नहीं दिख रही उनकी गरिमा। वही अधिकारी जब अपने दफ्तरों में होते हैं तब उनके चेहरों से जोति निकलती रहती है गरिमा की। पर पोस्टमार्टम घर पर तो उनकी जोति कहीं बिला सी गई है।
सी.एम.एस. साहब भी खोए हुए हैं भीड़ में, वे समझ नहीं पा रहे हैं कि ये आला-अधिकारी यहां का कर रहे हैं? अधिकारियों की जोति में वे इधर उधर उछल रहे हैं पता नहीं कब और क्या आदेश जारी कर दें। वे मन ही मन सोच रहे हैं कि आला-अधिकारी चले जाते तो ठीक होता।
पोस्टमार्टम का क्या है वह तो हो ही जायेगा। यह सब तो पहले से ही सोचना चाहिए था कि मुख्यालय पर भीड़ जुटाना ठीक नहीं होगा। मर्डर का मामला है सारी लाशों को मुख्यालय के अस्पताल पर भिजवा दिया यह भी कोई तरीका है? वहीं पास ही में घोरावल की पी.एच.सी. थी वहीं रोक लेते, घायलों का इलाज वहीं हो जाता बकिया को रेफर कर देते पर नहीं घायलों को भी यहीं संभालो और लाशों का पोस्टमार्टम भी यहीं करो। सी.एम.ओ. साहब हैं कि उन्हें तनिक भी चिन्ता नहीं कहीं छिप कर सिगरेट फूंक रहे होंगे। वे तो चिकित्सा विभाग के आला-अधिकारी हैं उनका काम है यहां का सारा इन्तजाम करना, पर नहीं सारा कुछ थोप दिया सी.एम.एस. पर? अब भुगतो सारा बवाल। वो तो अच्छा हुआ कि सभी डाक्टरों को बुलवा लिया अस्पताल नहीं तो का होता! कोई बता रहा था कि लखनऊ से कोई मंत्राी जी आ रहे हैं, वे हल्दीघाटी वाले गॉव जायेंगे खैर उससे मेरा क्या लेना-देना, उसे डी.एम. साहब जानें। सी.एम.एस. झुंझलाये हुए हैं, उन्हें अच्छा नहीं लग रहा सी.एम.एस. होना यह भी क्या तरक्की है केवल मेडिकल आफिसर ही रहते तो ठीक था। ड्यूटी करते और घर निकल जाते।
बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी गॉव के लोगों के साथ डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर, उन्हें चीर-फाड़ के बाद लाशें ले जाना है गॉव पर, भला वे लाशें छोड़कर कैसे वापस लौटते। डी.एम और एस.पी. दोनों फुसफुसाकर राय बना चुके हैं कि पोस्टमार्टम के बाद लाशों को गॉव तक भिजवाना है और कुछ आर्थिक सहायता भी उनलोगों की करना है जिससे गॉव में तनाव न बढ़ने पाये। दोनों आला-अधिकारी हैं उन्हें इसी बात की शिक्षा भी दी गई है कि विपरीत परिस्थितियों का जन-भावना के अनुसार कैसे अनुकूलन किया जाये। विपरीत परिस्थितियों के अनुकूलन में उन्हें महारथ हासिल है। मातहत अधिकारियों से विमर्श करके आला-अधिकारियों ने अगले कार्यक्रम की रूप-रेखा बना लिया है।
अगले कार्यक्रम में तय था कि लाशों के कफन-दफन के लिए मृतकों के परिजनों की आर्थिक सहायता करना है जिससे उन्हें तकलीफ न हो। खर्च-वर्च की व्यवस्था सदर तहसीलदार के जिम्मे लगा दिया गया है वे अपने काम में लग चुके हैं।
एस.पी. साहब पोस्टमार्टम घर से थोड़ा आगे निकल चुके हैं शायद वहां से मोबाइल का टावर काम नहीं कर रहा था। वे कोई नम्बर मिला रहे हैं तथा जानना चाह रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव की क्या स्थिति है? हालांकि वहां पर सुरक्षा का
पोख्ता इन्तजाम कर दिया गया है एक तरह से गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया है। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस का यह आजमाया हुआ तरीका होता है कि पूरे गॉव को घेर लो, गॉव में बाहरियों को घुसने ही न दो। गॉव में आने वाले एक एक आदमी की चेकिंग करो। यहां तक कि मृतकों के रिश्तेदारों को भी गॉव में बिना चेकिंग के न घुसने दो। पुलिस ऐसे मामलों में कत्तई कोताही नहीं बरतती, पुलिस की चेकिंग पुलिस सक्रियता के उदाहरण माफिक होता है। एकदम चुश्त तथा दुरूश्त पशु-पक्षी भी उनकी सतर्कता देख कर कॉपने लगें।
पुलिस का सक्रिय दस्ता आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए निकल चुका है, किसी भगोड़े आरोपी को ढूढ निकालना उन्हें आता है, इस कला में वे माहिर होते हैं। दिक्कत तब होती है जब वे खुद आरोपी को नहीं पकड़ना चाहते, चाहे कारण जायज हो या नाजायज नहीं तो पुलिस की पकड़ से आरोपियों का बचना मुश्किल होता है। वे एक दो दिन में पकड़ ही लिए जायेंगे पर आरोपियों की संख्या पचास के पार है यही एक दिक्कत-तलब बात है नहीं तो कोई दूसरी बात नहीं। एस.पी.साहब इसी लिए परेशान हैं तथा लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देर रात तक किसी भी हाल में मुख्य आरोपी की पकड़ हो जानी चाहिए। वे बार बार सक्षम अधिकारियों तथा दारोगाओं से बतिया रहे हैं, कलक्टर साहब कई बार मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारियों के बारे में एस.पी से बातें कर चुके हैं।
पोस्टमार्टम घर के सामने से एस.पी. तथा डी.एम. दोनों निकल रहे हैं। वे पैदल चलते हुए मुख्य अस्पताल के बगल वाले जन-औषधालय केन्द्र के आस-पास आ चुके हैं, दोनों लोग देखने में गंभीर दीख रहे हैं वैसे अधिकारी गंभीर दिखते भी हैं। उनके पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी लेफ्ट-राइट कर रहे हैं। सुरक्षाकर्मी सावधान हैं पर उनकी सावधानी का कोई काम अस्पताल परिसर में नहीं दिख रहा पर वे करें क्या सावधान दिखने तथा दिखते रहने का ही तो उन्हें वेतन मिलता है सो वे अपना काम कर रहे हैं।
डी.एम. साहब अचानक एक जगह पर खड़े हो जाते हैं और अपना मोबाइल एस.पी. साहब को दे देते हैं, इसे पढ़ लें मैसेज आया है...
एस.पी. साहब मोबाइल का मैसेज पढ़ रहे हैं। मैसेज पढ़ लेने के बाद मोबाइल लौटा देते हैं डी.एम. साहब को...
‘चलिए अच्छा हुआ आज मंत्राी जी नहीं आ रहे हैं’ एस.पी.साहब प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं, डी.एम. साहब से तभी डी.एम. साहब का मोबाइल घनघना उठा...
फिर तो डी.एम. साहब... लगे जबाब देने...
‘हॉ सर! सर, सर, सर, हॉ सर,! सारा इन्तजाम हो चुका है सर! लाशों की वापसी के बाद मुझे भी हल्दीघाटी वाले गॉव जाना है सर! हॉ सर, एस.पी. साहब भी जायेंगे सर, मेरे साथ ही हैं। कफन-दफन के बाद ही लौटंेगे हम लोग। हॉ सर, वहां शान्ति है सर! वहां धारा 144 लगा दिया गया है सर! विरोधी पारटी के तमाम नेता परेता
वहां जाने का प्रोग्राम बना चुके थे सर! इन्टेलिजेन्स से मुझे जैसे ही खबर मिली तुरन्त मैंने धारा 144 लगवा दिया। पुलिस और प्रशासन दोनों एकमत हैं 144 लगाने के बाबत, 144 लगाने में देर नहीं की गई। घटना की खबर लगते ही 144 लगवा दिया गया। ए.डी.एम. साहब तो सुबह से ही लगे हुए हैं शान्ति-व्यवस्था के काम में। सारे अधिकारी तथा फोर्स के लोग सुबह से ही बिना खाये-पिये जुटे हुए हैं सुरक्षा के काम में। लाशों का शव-दाह हो जाने के बाद ही सभी के खाने के लिए इन्तजाम किया जायेगा।’
‘हॉ हॉ सर! शव-दाह के लिए आर्थिक सहायता सभी को दी जायेगी सर! सरकारी बजट तो बहुत ही कम है सर! दूसरे तरीके से इन्तजाम करके सभी को पॉच पॉच हजार दिया जा रहा है। एस.डी.एम. व तहसीलदार घोरावल के जिम्मे लगा दिया गया है शव-दाह का काम। तहसीलदार घोरावल ने तीन चार ट्राली सूखी लकड़ी जंगल विभाग की चौकी से मंगवा लिया है जिससे लाशों के शव-दाह में दिक्कत न हो सभी लाशों का शव-दाह ही होना है सर! कोई मुसलमान नहीं है उनमें सर! आदिवासी हैं सभी सर! हॉ हॉ सर! वे भी शव-दाह ही करते हैं लाशों का। वहां सारी तैयारी हो चुकी है सर! अभी तीन मृतकों का पोस्टमार्टम किया जाना है जो रात ढलने तक हो जायेगा सर!’
‘आप निश्चिंत रहंे सर! अगर मंत्राी जी आ रहे हैं तो आयें उन्हें कोई शिकायत नहींे मिलेगी... हॉ हॉ सर! हमलोग किसी भी तरह से विरोधी दल के नेताओं को वहां जाने नहीं देंगे। हॉ हॉ सर! घायलों की देख रेख हो रही है उनमें जो ज्यादा सीरियस थे उन्हें बी.एच.यू. रेफर कर दिया गया है।’
‘अरे नहीं सर! क्या मुख्यमंत्राी जी!’
‘तो ठीक है सर! वे दो तीन दिन बाद आ रहे हैं, कोई बात नहीं सर! आयें यहां सारा इन्तजाम उन्हें ठीक मिलेगा। कुछ बड़े पत्राकारों तथा विरोधी दलों के नेताओं से मेरी और एस.पी.साहब की बातें हो चुकी हैं वे लोग भी इस घटना को एक संयोग ही मान रहे हैं सो उनकी तरफ से कोई परेशानी नहीं आने वाली। पत्राकार तो गये थे मौके पर गॉव वालों ने झगड़े का कारण जमीन पर कब्जे को बताया जो सच है सर! सारा झगड़ा जमीन कब्जाने को लेकर हुआ।’
‘हॉ हां सर! रात में ही मुख्य आरोपी पकड़ लिया जायेगा उसकी पकड़ के बाद सारे आरोपी पकड़ लिए जायेंगे। आरोपियों के बारे में जानकारी रखने वाला एक चालाक मुखवीर पुलिस के संपर्क में है सर!’
‘क्या सर! झगड़ा कैसे हुआ, मार-पीट क्यों हो गई? इसकी जॉच हमलोग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के वकीलों को भी हम लोग जॉच के दायरे में रखे हुए हैं।
‘क्या सर! वकीलों ने...’
‘नहीं नहीं सर! ऐसा नही जान पड़ता, आरोपी कोई मूर्ख नहीं जो वकीलों के कहने पर इतना गंभीर काण्ड कर देंगे। आरोपी काफी धनी-मानी और सरहंग किस्म के हैं
ये अपने मन से बवाल किए हैं। वकीलों के फोन को सर्विलान्स पर लगा दिया गया है। सर! सारी काल डिटेल निकल जायेगी। हमलोग इस मामले का हर ऐन्गिल से देख रहे हैं सर!’ कुछ पत्राकार जो प्रशासन के काफी करीब हैं वे भी प्रशासन की मदत कर रहे हैं सर!’
मोबाइल पर हुई सारी बातों का हवाला डी.एम. साहब ने संक्षेप में एस.पी. साहब को बताया। एस.पी.साहब हॉ में हॉ कर रहे थे। उनके अपने लोग बार बार उन्हें बता रहे थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला टी.वी. तथा अखबारों के लिए बहुत बड़ा बन चुका है। तमाम चैनलों से खबरें दिखाई जा रही हैं। गनीमत है कि खबरंे सारी की सारी शाकाहारी हैं उनमें घटना के लिए किसी अधिकारी को जिम्मेवार नहीं बताया जा रहा। अभी तो केवल खबरंे ही दिखाई जा रही हैं। संभव है टी.वी. के पत्राकार घटना-स्थल के दौरे के बाद अधिकारियों से तथा पक्ष-विपक्ष के वकीलों से भी मिलें और घटना के बारे में जानकारी जुटा कर फिर कुछ दूसरा प्रसारित करें।
वैसे भी पुलिस के लिए यह मामला रहस्यमय तो था नहीं आतंकवादी हमलों की तरह जो पुलिस के लिए दिक्कत होती पूरा मामला खुला खुला था। जमीन का मामला था और गोली चलाने वाला पक्ष सभी के सामने था। कुछ अज्ञात थे उनका पता चल ही जायेगा।
फिर भी डी.एम. साहब को अनुमान लग चुका है कि अब उन्हें इस जिले में नहीं रहने दिया जायेगा चाहे जिस दिन उनका ट्रान्सफर हो जाये, एस.पी. भी नहीं रहने वाले, वे भी जायेंगे। यह सरकारों का पुराना तरीका होता है बड़ी घटना घट जाने के बाद कि कम से कम आला-अधिकारियों को जनपद से रवाना कर दो। बाद में आगे की कार्यवाही करते रहो।
डी.एम.साहब तथा एस.पी.साहब दोनों लोग पोस्टमार्टम घर की तरफ लौट रहे हैं वे सोच रहे हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम का काम खतम हो जाये। हालांकि वहां दूसरे अधिकारी लगे हुए हैं, सी.एम.एस. साहब भी वहीं हैं वे भी प्रयासरत हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम खतम हो फिर वे चैन की सांस लें। सुबह से लेकर अभी तक एक प्याली चाय भी नहीं पी पाये हैं, कैसे पियें चाय? पाड़े कम्पाउन्डर ने दो तीन बार पूछा है चाय के लिए कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब के लिए चाय मंगवा देते हैं या तो आफिस में ही बनवाय देते हैं। सी.एम.एस. आफिस में पूरी व्यवस्था है चाय बनाने की। सी.एम.एस. ने ही मना कर दिया...
‘नहीं रहने दो इस भीड़ में चाय क्या पीना, लोेग अच्छा नहीं मानेंगे।’
वैसे सी.एम.एस. के मन में दो-तीन बार आया कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब को दफ्तर में ले जा कर ही चाय पिला दी जाये पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। वे नहीं बोल पाये आला-अधिकारियों से। यही तो रूआब होता है अधिकारियों का जो मातहतों को अदब में रखे रहता है और वे बेचारे चाय वगैरह के लिए भी नहीं पूछ पाते अधिकारियों से, कहीं नाराज न हो जायें साहब!
डी.एम. साहब पूछ रहे हैं सी.एम.एस. साहब से...
‘कितनी देर लगेगी पोस्टमार्टम में अभी, जल्दी निपटवाइए यहां का काम। उनके साथ एस.पी.साहब भी...हॉ भाई जल्दी निपटाओ अभी बहुत काम है.. अब यहां तो कोई बवाल नहीं होने वाला... आदिवासी हैं बेचारों के साथ चलेगा भी कौन, कोई नहीं दिख रहा उनके साथ वैसे भी गरीबों के साथ चलता ही कौन है?..
‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. डी.एम. साहब बोल पड़े...’
दो-तीन दलित व आदिवासी नेता मेरे पास आये थे, वे बहुत बक-बक कर रहे थे। बोल रहे थे कि प्रशासन की गलती के कारण इतना बड़ा काण्ड हो गया सोनभद्र में...
‘इसमें प्रशासन की का गलती है?’ थोड़ा ऐंठ कर मैंने पूछा था उनसे
‘जमीन के विवाद के मुकदमे का निपटारा हो गया होता तो ऐसा नहीं होता. नेता बोल रहे थे...
‘मुकदमे का निपटारा प्रशासन करेगा क्या? वह भी दीवानी के मुकदमे का..’
‘राजस्व का मुकदमा भी तो चल रहा है...’ नेताओं ने प्रतिवाद किया
‘उससे क्या हुआ, मुकदमे नियम कायदे से निस्तारित होते हैं उसमें प्रशासन क्या कर लेगा? फिर अब तक आप लोग कहॉ थे, जब दस आदिवासी सत्याग्रही मौत के घाट उतार दिये गये फिर आये है लाशों पर राजनीति करने। पहले काहे नहीं आवाज उठाये जो अब बोल रहे हैं। मैं तो कहूंगा आप नेताओं की खामोशी के कारण इतना जघन्य काण्ड हुआ नहीं तो आप लोग अगर सतर्क होते तो यह घटना न घटती। बहरहाल आप अपना काम करें और प्रशासन को अपना काम करने दें यही उचित होगा।’ तब जाकर दलित नेता खामोश हुए थे।
एस.पी. और डी.एम. बतिया ही रहे थे कि तनबुड़ुक थाली बजाते हुए वहां हाजिर हो गया... यह वही लड़का था गॉव वाला।
यह वही लड़का था जो एक अनजान से दरखास लिखवा रहा था..
दरख्वास्त उसकी जेब में थी और थाली की आवाज के साथ गाना गाने लगा, गाने के बोल को थाली के बोल के साथ मिलाते हुए... अद्भुत संयोजन था गीत और थाली के वाद्य धुन का...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी केहू कऽ न भई’
अधिकारी उसके गीत को एक बार हल्दीघाटी वाले गॉव में सुन चुके थे, रोमांचित करने वाला गीत था। डी.एम. और एस.पी दोनों डूबे जा रहे थे गीत के धुनों में। उन्हें पता था कि लड़के का भाई गोलीकाण्ड में मारा गया है सो उनकी मानवीय संवेदना लड़के के साथ जुड़ गई थी तथा गीत का दर्शन भी उनके साथ जुड़ गया। जो उन्हें ‘सब धन धूरि समान’ की तरफ ले जा रहा था। ‘रुपया हाथ का मैल’ होता है, ‘माया महा ठगिन हम जानी’ के दर्शन में दोनों आलाधिकारी उतर चुके थे। तभी .....
सुरक्षाकर्मियों ने लड़के को पकड़ लिया.. उसके मुह पर हाथ लगा दिया...
‘चुप कर यह क्या कर रहे हो, यहां गाना गा रहे हो...’
सुरक्षकर्मियों से लड़का खुद को छुड़ाने लगता है, पर वह खुद को नहीं छुड़ा पाता. तभी डी.एम. साहब ने सुरक्षाकर्मियों को रोक दिया...
‘उसे गाने दो...’
लड़का गाना फिर से शुरू करता है बीच में सुरक्षाकर्मियों ने उसे रोक दिया था। इस बार वह कुदरती चेतना में है तथा कुदरती धुन के साथ। लड़का जैसे अधिकारियों से संवाद कर रहा हो...कि इस दुनिया में क्या है सभी को मर जाना है, गॉव के दस सत्याग्रही मर गये, मेरे भइया का पता नहीं का हुआ उनका? धन-दौलत के पहाड़ का का मतलब, पिर्थबी का का मतलब, काहे लोगों की जान ले रहे हो जमीन की खातिर.
पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी केहू कऽ न भई
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई,
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी,
जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई,
सत!जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी,
दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी,
भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही
त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी,
ओहू के संग धरती हाथ भर न गई,
पिर्थबी केहू कऽ न भई।’
आदिवासी गीत का गीतमय संदेश निराला था जो अधिकारियों तथा वहां उपस्थित लोगों को मजबूर कर रहा था कि वे सोचें गीत के द्वारा भी जीवन दर्शन की बातें की जा सकती हैं जिसे किसी दूसरे माध्यम से नहीं कहा जा सकता। गोली के दमनकारी संवाद के प्रतिरोध में कुदरती गीत का संवाद काफी अर्थयुक्त था जो समझना चाहे समझे जो न समझना चाहे उसे मजाक बना दे।
धरती-माई भी सुन रही हैं तनबुड़ुक का गीत, यही तो सच है उनका, धरती तो सभी की है, सभी के लिए है। धरती का मालिक बन जाना यह गलत है, पूरी मनुष्यता के खिलाफ है पर...
मनुष्य तो लालची हो गया है और लालच क्या नहीं करा सकती। मानव-सभ्यता में यह जो लालच है कैसे घुस गई आखिर? लालच ही तो पसरी हुई हर तरफ, हुकूमत करने वाले हों या नियाव करने वाले सभी ने ओढ़ा हुआ है लालच की मुलायम चादर, उस मुलायम चादर से बाहर कोई नहीं निकलना चाहता, दिक्कत यही है जो कभी खतम नहीं होने वाली।
‘नियाव देखिए, नाचेगा अब
कानून की चुनरी ओढ़ कर’
‘मानव-सभ्यता में लालच, भोग, विलास अहंकार, भेद-उपभेद, अपना-पराया जैसे दुर्गुण प्रभावकारी स्थान बना कर समाज का संचालन करने लगेंगे, नेतृत्व करने लगेंगे और सभ्यता की परिभाषा गढ़ने लगेंगे। बताने लगेंगे कि सत्य तथा असत्य, न्याय तथा अन्याय क्या है फिर तो हो चुका मानव सभ्यता का भला। धरती-माई सोच सोच कर कॉप रही हैं तथा रास्ता तलाश रही हैं कि धरती को दुर्गुणों से कैसे मुक्त करें पर क्या वे धरती को दुर्गुणों से मुक्त कर पायेंगी!
अभी तो वे उलझी हुई हैं धरती-कथा में। कथा के प्रमुख पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, जो धरती पर अधिकार जमाने वाले लोभियों की क्रूरता के कारण लाशों में तब्दील हो चुके हैं, उनके खून से धरती का कर्ज चुकता हो पाया कि नहीं, पता नहीं, शायद कहानी कुछ बोले इस बाबत...’
कहानी कुछ नहीं बोलती बोलते हैं उसके पात्रा, और पात्रा हैं कि लाश बन चुके हैं जो जीवित हैं वेपोस्टमार्टम घर के सामने खड़े हैं, बैठे हैं, वे भीड़ बन चुके है। पुलिस के लोग उन्हें व्यवस्थित किए हुए हैं, दो सिपाही लगे हुए हैं इस काम में। कोई किसी को समझा रहा है तो कोई डाट रहा है...हल्ला न करो, चुप रहो, पोस्टमार्टम के बाद लाशें मिल जायेंगी। बबुआ अपने साथियों के साथ लोगों की भीड़ में दुबका पड़ा है...वह मनुष्य न हो कर दृश्य बन चुका है एक ऐसा दृश्य जिसे देखते ही ऑखें भर जायें, चेहरा उतर जाये पर करे क्या, उसे तो दृश्य बनाना ही था..दृश्य में सरवन है पर वह तो चला गया कई सत्याग्रहियों के साथ। वह अब नहीं लौटेगा धरती पर। अब उसे ही मुकदमा देखना होगा, इस कतल का भी। समूह की खेती देखनी होगी पर जब जमीन बची रहेगी तब न समूह की खेती होगी, पता नाहीं का करने वाली है धरती-माई। धरती माई की कहनी भी गजब है, खून से रंगी हुई। गॉव को संभालना होगा। वह खुद को मन ही मन तैयार कर रहा है। गुटखा पर गुटखा खाये जा रहा है। उसकी मेहरारू भी साथै है उसके साथ सुगनी भी है। बबुआ नाराज हो रहा है अपनी बीबी पर...
‘का रे! बिफनी!’
‘गुटखा खाने से भी रोक रही है तूं, का कउनो दारू पी रहे हैं, अब का दारू पियेंगे हम, अब कबउ दारू नाहीं पियेंगे’
बिफनी बोल पड़ी...
‘हम गुटका खाने से थोड़ै रोक रहे हैं, ये ही बोल रहे हैं कि कम खाओ’
सुगनी, बिफनी, तेतरी,फगुनी और बैसाखी सभी साथ बैठी हुई हैं पोस्टमार्टम घर से थोड़ी दूर पर। बुधनी काकी और परमू दोनों घायलों को देखने गये हैं अस्पताल के वार्ड में। घायल ठीक-ठाक हैं उनका इलाज चल रहा है। दो चार दिन में सब ठीक
होकर घर चले जायेंगे। दो लोग जो बनारस भेजे गये हैं दवाई के लिए उनकी खबर है कि वे ठीक हैं, उनके घर वाले गये हैं उनके साथ...
तेतरी तो साल भर पहले ही बिआही थी अउर फगुनी तथा बैसाखी का बिआह दो साल पहले हुआ था। तेतरी का पति होमगार्ड की नौकरी पा गया था और फगुनी का पति एक स्कूल में चपरासी पर लग गया था, बैसाखी का पति टेम्पो चलाता था। तीनों अच्छी कमाई कर रहे थे पर किस्मत भी तो होती है कुछ।
सरवन के साथ ये तीनों लड़के पूरी जोश के साथ भिड़ गये थे हमलावरों से..भिड़ने को तो रजुआ, सुमेरना, लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी भिड़ गये थे। सरवन ही सबका नेता था, नेता आगे आगे और दूसरे जवान उसके पीछे पीछे। उन्हें भी पता नहीं था कि आरोपी बन्दूकंे चला देगे, मार देंगे गोली पर नहीं, गोली चली और वे मारे गयेे। मौके पर बुद्धन ने समझाया था सरवन को..
‘देखो हमैं मार-पीट नाहीं करनी है तो नाहीं करनी है, मुकदमा चल रहा है तो हम काहे फिकिर करें...हमें डंडा नाहीं चलाना है चाहे जो भी हो।’
‘हॉ यार! बुद्धन, हम मार-पीट नहींे करेंगे पर खेत पर भी न जायें ई कइसे होगा चलो खेत पर चलते हैं...हम केहू पर हमला नाहीं करेंगे पर आपन बात तो कहेंगे नऽ ओ लोगन से..’
बात ही बोल रहे थे बुद्धन और सरवन, इहय बोल रहे थे के गलत होय रहा है, आपलोग हम लोगों की जमीन जीन जोतो, मुकदमा चल रहा है ओकर फैसला होय जाने दो...’
पर बात केवल बात तो होती नहीं, जहां स्वार्थ होता है, वहां बात ताकत तक जा पहुंचती है, आरोपी तो तैयार बैठे थे सो वे बात काहे सुनते... उन्हें ताकत के परदर्शन का मौका चाहिए था, मौका मिल गया और धॉय धॉय। कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन सभी मारे गये, सभी सामने थे हमलावरों के, तनेन थे मानो उन्हें डर ही न हो... का होगा मरि जायेंगे अउर का? गोलियां चल र्गइं... सबसे पहले गोली सरवन को लगी और वह जमीन पर भहरा गया फिर एक गोली और लगी, उसके साथ तेतरी का पति रजुआ जो होमगार्ड था वह सरवन की लाश पर लोट गया और फगुनी का पति सुमेरना तथा बैसाखी का पति लखना दोनों हमलावरों से बन्दूक छीनने लगे गॉव के दूसरे लड़के भी हमलावरों से बचाव में भिड़ गये थे, लखना तथा सुमेरना बन्दूक छीन ही रहे थे कि हमलावरों की तरफ से धुआधार गोलियॉ चलने लगीं। सरवन की लाश के एक तरफ लखना और दूसरी तरफ सुमेरना दोनों गिर पड़े जमीन पर और सांसंे छोड़ बैठे। बुद्धन तो पहले ही सरवन की लाश के पास गिर कर सांसें छोड़ चुका था...
गॉव की भीड़... का करती उहां, भागी गॉव की तरफ, हमलावरों ने उनका पीछा कर उन्हें लाठी डंडांे से पीटा वे जितना पीट सकते थे...
सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी और बैसाखी के साथ बैठी हुई हैं। उनमें केवल
बिफनी ही बची हुई है उसका पति बबुआ किसी तरह से बच गया है जबकि वह सरवन के साथ ही था उस समय। वह पेशाब करने चला गया था और सरवन लखना, नन्दू और सुमेरन एक साथ हमलावरों से बतिया रहे थे उन्हें का पता था कि गोलियॉ चल जायेंगी।
मृतकों व घायलों के परिजनों की ऑखों तथा मन में घटनास्थल का दृश्य स्थायी तौर पर अंकित हो गया है, बात बात पर उभर आता है और निहत्थे मृतक तो बात कर रहे थे अपनी बोली में, और हमलावर गोली से बतिया रहे थे।
बिफनी परेशान है आखिर कब तक होगा पोस्टमार्टम? वह बबुआ को देख रही है वह आ जाता तो कुछ पता चलता पोस्टमार्टम के बारे में। सामने से आता दिख रहा है बबुआ.. उसके साथ गॉव के दो लड़के और हैं।
‘का हो केतना देरी है पोसटमार्टम में अपने पति से पूछा बिफनी ने। सात लाशों का पोसटमार्टम होय चुका है तीन अउर बाकी हैं। डाक्टर बताय रहे हैं के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका की लाशें अब जायेंगी पोसटमार्टम के लिए। ये बेचारे तो वहां झगड़ा छोड़ाय रहे थे ओही में एहूलोगन के गोली लग गई। इनकी मेहरारू अउर लड़कवे भी अस्पताल पर डटे हुए हैं।
सुगनी अपने पति का चेहरा देखना चाहती है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी वे तीनों बिफनी से बोल रही हैं... तीनों मौके पर लाशों पर लेट गई थीं। सुगनी कुछ पढ़ी लिखी है, घोरावल बाजार की है, बोलना-बतियाना जानती है, वह भिड़ गई थी महिला दारोगा से मौके पर...
‘काहे लाश ले जायेंगी मैडम! अब जब गोली चल गई तब आई हैं देखाने के हमरे राज में पुलिस है, पुलिस नियाव करती है, कमजोरों की मदत करती है, हमरे अजिया ससुर के जमाने से मुकदमा चल रहा है तब कउनो अधिकारी के नाहीं बुझाया के मामला ठंडा करो, गॉव में चलि के पंचाइत करो अउर मामला के निपटाय दो पर नाहीं... अब आई हैं लाश लेजाने के लिए जमराज की तरह। सब देखा भी रहे हैं जमराज की तरह, ऊ तो एस.पी. साहब ने अकिल से काम लिया..’
‘अरे तूं हमार बिटिया की तरह है, लाश ले जाने दो बिटिया! तूं लोगन के संघे नियाव होगा, हमसे जवन चाहे किरिया खवाय लो’
एस.पी. साहब की बोल में जैसे जादू था सुगनी सरवन की लाश से अलग होय गई, मेहरारू दरोगवा तो कुरूछ थी, बेरुखी थी, अउर कड़क बोलती थी गरियाने लायक।
‘सुगनी भी रिरिया रही है अपने पति का मुह देखने के लिए कि एक बार मुहवां देखवाय देती बहिन...’
मुह देखाने की बात सुनते ही लगा बिफनी रो पड़ेगी, उसकी ऑखें डब डबा गईं, वह दौड़ी बबुआ की तरफ, बबुआ वहीं पोस्टमार्टम घर के सामने था..
‘का हो तनिक सुनो तो’ बिफनी ने पति से कहा
‘का है, का बात है...पूछा बबुआ ने बिफनी से..
सुगनी, तेतरी, बैसाखी अपने मरदों का मुह देखना चाहती हैं एक बार कइसहूं मुंह देखवाय देते...
‘कइसे होगा इहां, इहां कइसे मुह देखाई होगी.. पुलिस वाले देखने नाहीं देंगे, कपडा से बंधी हैं लाशें, सील, मोहर लगी है ओन पर, अच्छा देखते हैं के का होता है?’
बबुआ पोसटमार्टम घर की तरफ गया और वहां ड्यूटी दे रहे एक सिपाही से निवेदन किया...
‘साहब एक मेहरारू है ओकर पति कऽ लाश है ईहां, ऊ अपने पति का मुह देखना चाह रही है, एक बार देखवाय दो साहेब।’ सिपाही थोड़ा नरम मिजाज का था उसने बबुआ को समझाया..
‘काहे घबराय रहे हो, कुछ देर की ही तो बात है, पोस्टमार्टम होय चुका है फिर सारी लाशें पंचनामे के बाद तूं लोगों को मिल जायेंगी। गॉव ले जा कर शवदाह के पहले औरतों को मुह देखवा देना। यहां कौन खोलेगा कपड़ा, यहां संभव नहीं है।’
बबुआ लौट आया पोस्टमार्टम घर से...उसे देखते ही बिफनी पूछ बैठी उससे. ‘का हुआ मुह देखने देंगे नऽ साहब लोग’
नाहीं हो ईहो नाहीं देखने देंगे, बोल रहे हैं गॉव ले जा कर मुह देखवा देना, हमहूं देखना चाहते थे सरवन का मुह, जब से इहां आये हैं तब से फेरा में पड़े हैं के कइसहूं देख लें पर कउनो नाहीं देखने दिए, जाने दो चलो घरे देख लेंगे हम लोग। लशिया नहलवाना होगा नऽ ओही समय सबके देखवाय देंगे, इहय ठीक रहेगा। जायके ओन्हने के समझाय दो के जवन हौवे के होता है होय जाता है, ओमें केहू का जोर नाहीं है। कुछ देर की अउर बात है सभै के गांयें ही चलना है।’
‘अरे बिफनी एक काम करती तऽ जायके देख लेती के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका के परिवार वाले कहां हैं, एक घंटा पहले तो मिले थे सबको गोलियाय लो, सब एक साथ रहें, देख रही हो अस्पताल में बहुत भीड़ है पूरा अस्पताल भरा है खचाखच, जाओ देख कर आओ, सबके एही बोलवाय लो, एहरै एम्बुलेन्स भी आयेगी।’
‘हां हां अब्बै जाय के ओ लोगन केे देख रही हूं, चल सुगनी तूंहो चल इहां बइठ कर का करेगी? नाहीं दीदी तूं जाओ हमार मन नाहीं कर रहा है कहीं आने-जाने का, हम नाहीं जायेंगे। बिफनी अकेली जा रही है नगेशर, बलेशर अउर सन्तू के परिवार वालों को देखने के लिए, कहां होंगे ऊ लोग... फटकवा के तरफ होंगे ओहरै पान-गुटखा अउर चाह-पानी की दुकान है। एहर तो नाहीं देखा रहे कहां चले गये? सामने से आती एक औरत दिखी जो नगेशर की मेहरारू की तरह दिख रही थी, वहीं होगी नगेशर बो काकी...।
वह औरत नगेशर बो काकी ही थीं, हाउर हाउर बिफनी पहुंची आने वाली औरत
के पास... ‘का हो काकी चलो पोसटमार्टम घरे की तरफ, ओहरै रहना है, हं इ बताओ बलेशर अउर सन्तू बो काकी कहां हैं?’
‘का बतावैं बिफनी! दोनों बेसुध पड़ी हैं अउर जहां जच्चा-बच्चा वाला बरामदा है नऽ ओही लेटी हुई हैं, ओही जगह खाली है, नाहीं तऽ सब जगह भीड़ ही भीड़ है। दोनों का रोते रोते बुरा हाल है, कइसहूं हम अपने को संभाले हैं, का करें बाल-बुतरू हैं ओन्हय तऽ संभालना होगा ही नऽ’
बिफनी गॉव के लोगों को गोलिया कर ले आई है पोस्टमार्टम घर के सामने, वहीं सब बैठे हुए हैं, एम्बुलेन्संे आने लगी हैं, तीन एम्बुलेन्स का इन्तजाम प्रशासन ने किया हुआ है। यह एम्बुलेन्स कुछ दूसरे तरह की है लगता है लाशें ढोने वाली है। कुछ ही देर में लाशों को गॉव भेजा जायेगा, अभी अभी बबुआ बता कर गया है गॉव वालों को...
धरती माई को कितना खून चाहिए पीने के लिए बबुआ! खेलावन, बंधू, पुनवासी को नहीं पता, क्या ये जीवित लोग भी बलि चढ़ जायेंगे धरती-माई के नाम पर?
‘सरहंग लील चुके हैं उजाले को
गॉव है तो रहे अन्धेरे में’
‘धरती-माई किसी का बलि नहीं स्वीकारतीं, बलि क्या होती है वे जानती तक नहीं। बलि की परंपरा को तो धरती के लोभियों ने सृजित किया है, शास्त्रों तक में लिख दिया है। धरती-माई नाराज हैं इस परंपरा से, उनका वश चलता तो वे मिटा देतीं इस परंपरा को तथा इसके अनुयायियों को कठोर से कठोर दण्ड भी देतीं पर किसी परंपरा को मिटाना तथा किसी को दण्ड देना उनके अधिकार में नहीं है। वे तो धरती का केवल हरा-भरा रखने की देवी हैं, न्याय की देवी नहीं हैं वे। फिर भी धरती पर चालित बलि जैसी कुप्रथा के बारे में न्याय की देवी से वे बातें करेंगी। फिलहाल वे खामोश हैं तथा मंथन कर रही हैं। वे देख रही हैं कि धरती-कथा के अधिकारीनुमा पात्रा प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का देहान्तरण आश्चर्य-जनक लग रहा है उन्हें, नाटकीय तो है ही। भला अधिकारी यानि उनके योग्य पुत्रा प्रताड़ितों की काया में कैसे रूपान्तरित हो सकते हैं..उनकी देह, उनके दिमाग, उनके चिन्तन तो सब के सब सुविधाओं के गुलाम हैं, भला ये कैसे लौट सकते हैं अपने कुदरती स्वरूप में..!’
कोई नहीं लौटना चाहता कुदरती स्वरूप में, कुदरती स्वरूप में लौट कर का होगा? धरती कथा के पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, लाशों को हल्दीघाटी वाले गॉव भेजा जा रहा है। गॉव से आये परिजनों को भी गॉव भेजने का प्रबंध प्रशासन ने किया हुआ था। लाशों के साथ सुरक्षा का तगड़ा प्रबंध था, कई गाड़ियां प्रशासन की आगे पीछे थीं, कहीं कोई अवरोध न आने पाये। पूरा रास्ता विलापों तथा चीखों से सना हुआ था कहीं ऐसा नहीं था कि मृतकों के परिजनों की ऑखें बरस न रही हों। पूरी वारिश हो रही थी ऑखों से। गाड़ियों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी भी खुद को संयत नहीं रख पा रहे थे, वे भी ऑसुओं में थे, केवल रो नहीं रहे थे। वे वर्दीधारी थे, वे खुद को भावुकताओं में डूबने से बचाए हुए थे। उनमें जो मुखर थे वे आरोपियों को गालियॉ दे रहे थे...
‘बहादुरी का इतना ही जुनून था तो फौज में चले जाते, निहत्थों पर गोली चलाने से राणाप्रताप बन जाओगे का..? पुलिस को चाहिए पहले आरोपियों को पकड़े तथा यातना-गृह में डाल कर अधिकतम यातना दे, फिर अदालत में हाजिर कराये.. कठोर से कठोर सजा देने का काम पुलिस ही कर सकती है। अदालत का क्या है... जाने का करें, वहां तो गवाही-साखी होगी, बहसें होंगी, किताबें पलटी जायेंगी, जाने कितने साल लगे फैसला आने में, वैसे कोई आरोपी बचेगा नहीं, एक उम्मीद है।’
मृतकांे के परिजनों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी अश्रुपूरित हो चुके हैं। परिजनों को रोता देख कर वे सुरक्षाकर्मी के कर्तव्यों से अलग होकर एक मनुष्य बन चुके हैं, वे समझा रहे हैं परिजनों को...
किसी को काका जी तो किसी को बहिन जी तो किसी को माता जी यही संबोधन है उनका, पूरी तरह से कुदरती, वहां प्रशासन की शासकीय भाषा तथा बोली का कहीं अता-पता नहीं...
‘मत रोइए माता जी! आपकी तबियत खराब हो जायेगी।’
‘मत रोइए काका जी! आप वैसे ही बीमार दिख रहे हैं।’
‘बहिन जी! आपके छोटे छोटे बच्चे हैं, इन्हें संभालिए, इन्हें देखिए, देखिए यह बच्चा कितना रो रहा है... इसे संभालिए।’
सुरक्षाकर्मी खुद से बोल रहा है...
‘कुछ खाना-पीना तो बच्चों को मिला नहीं होगा, कौन देगा खाना पीना इन्हें। सभी बेचारे हत्याकाण्ड के बाद से ही लाशों के साथ लाश बने हुए हैं। कौन है इन्हें संभालने वाला। रिश्तेदार भी सारे के सारे रो रहे हैं। ऐसे में खाने-पीने का ख्याल कहां...
सुरक्षाकर्मी स्वविवेक से एक जगह पुलिस वैन रोकवा देता है और गाड़ी से उतर कर एक दुकान में जाता है, कई पैकेट बिस्कुट खरीदता है फिर गाड़ी पर सवार होता है। वह बिस्कुट बच्चों में बाटता है... उसे पता था कि बीच रास्ते में पुलिस वैन रोकवाना गलत है फिर भी उसने रोकवा दिया पुलिस वैन... का हो जायेगा वैन रोकवाने से...
‘बहिन जी बिस्कुट खिला दीजिए बच्चों को।’
बिस्कुट देखते ही बच्चे खिल जाते हैं, कुछ तो खाने के लिए मिलेगा, लालच में उनकी जीभें हिलने लगती हैं।..
सुरक्षाकर्मी बच्चों का खिलना देख कर अपने खुद के जीवन में दाखिल हो जाता
है। वह भी दलित परिवार का हैै, नया नया भर्ती हुआ है पुलिस में। उसने देखा है अपने गॉव में सरहंगों के कारनामों को। वह जानता है कि सरहंगों का वश चले तो सूरज का उजाला लील जायें कहीं रौशनी ही न होने दें। जगह-जमीन पर जो काबिज हैैंं ही, वश चले तो चॉद-तारों को भी कब्जिाया लें, पूरी दुनिया पर कब्जा कर लें। वे नहीं चाहते कि उनके सामने कोई दलित दो जून की रोटी भी खाये और अपने पैर पर खड़ा हो जाये। वैसे अब काफी गनीमत है कहीं मार-काट नहीं हो रही है, दलित अपने पट्टे वाली जमीनों पर काबिज हो कर खेती कर रहे हैं लेकिन सब जगह ऐसा नहीं है।
नया सिपाही हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था, गया था लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लाने के लिए, पूरा गॉव चीख रहा था, रो रहा था। हालांकि गॉव के आकाश में बादल नहीं थे, आसमान साफ था पर उसे लगता था कि आसमान पर खून के लाल लाल चकत्ते उभर आये हैं, उन चकत्तों में से मानव सभ्यता की क्रूरता की दर्दनाक कहानियॉ झॉक रही हैं।
वैसे नया सिपाही कर भी क्या सकता था वह केवल भावुकता में डूब सकता था सो डूब गया था। वह कोई कवि तो था नहीं कि इस जघन्य हत्याकाण्ड पर कवितायें लिखता। उसे जो काम मिला था कर रहा था।
आला-अधिकारी भी पोस्टमार्टम हो जाने के बाद जा चुके थे अपने अपने बंगलों पर। पर वे पहले की तरह खिले हुए नहीं थे, उनके चेहरे मुर्झाये हुए थे। उनके चेहरों को तमाम तरह के प्रशासनिक तनावों ने जकड़ लिया था। प्रशासनिक तनावों के अलावा भी मनुष्य होने के जो तनाव थे वे भी चेहरों पर चस्पा हो चुके थे। वे पहले मनुष्य थे बाद में अधिकारी थे, मनुष्यता-बोध में उनका डूबना उन्हें तनावग्रस्त किए हुए था फिर आदिवासी लड़के तनबुड़ुक का गाया गीत ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ भी उन्हें परेशान किए हुए था।
घर पर थोड़ा रिलैक्स होने पर अधिकारी जीवन-दर्शन की तमाम धारणाओं में गोते लगाने लगे...जिसमें निर्गुण अधिक था सगुण था ही नहीं। यह धन-दौलत का मामला समझ से बाहर है, थोडी सी जमीन के लिए भी चल जाया करती है गोलियॉ, किसी भी क्षेत्रा को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया जाता है। कहा जाता है कि सोनभद्र ठण्डा परिक्षेत्रा है, यहां खून के चकत्तांे वाली बदरियॉ नही दिखतीं, यहॉ तो हर तरफ वसंत नाचता-कूदता रहता है गॉव-गॉव गली-गली, यहां की हवायें भी बेधक और मादक हुआ करती हैं सो यहां के लागों का चित्त शान्त तथा संगीत-मय होता है मादर की धुन की तरह, पर नहीं झूठ बोलते हैं लोग।
जीवन का मतलब क्या है...? जनमना और मर जाना फिर संपत्ति का का मतलब, काहे के लिए संपत्ति। देह और दिमाग के द्वन्द में अधिकारी ऐसा उलझ चुके थे कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे मन को कैसे हसायें? प्रशासनिक दायित्वों का तनाव अलग से था। सुबह ही रिपोर्ट भेजना है सरकार को, सरकार सख्त है, मुख्यमंत्राी जी खुद काफी सख्त हैं, वे किसी की नहीं सुनते, सामान्य सी गलती
पर भी कठोर दण्ड देतेे हैं। किसी की भी सफाई उनके यहां पहुंच कर बौनी हो जाती है, सफाई से बचाव होने के बजाय दण्ड की ही अधिक संभवना रहती है। सो कोई भी अधिकारी सफाई देने से बचता है।
डी.एम. साहब के यहां देर रात तक फोन आते रहे कभी मुख्य सचिव का तो कभी किसी का। इन्टिेलिजेन्स वाले भी उन्हें लगातार फोन करते रहे। वे किसी से कुछ तो किसी से कुछ बतियाते रहे। देर रात हो जाने के कारण उनसे नींद भी दूर छिटक गई थी। नींद में डूबने के लिए उनके पास साधन भी नहीं थे।
साधन होता भी कैसे? बेचारे अकेले रहते थे। पत्नी बच्चों को बढ़िया शिक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ में जमी हुई थीं। डी.एम. साहब साहित्यकार भी नहीं थे अगर होते तो कवितायें लिख कर खुद को बहला लेते या कोई कहानी ही लिखते पर ऐसा नहीं था। वे पढा़कू थे तथा पढाई के दौरान उन्हीं किताबों को पढ़ा करते थे जिससे परीक्षा में अधिक नंबर आये। उन्हें नंबर मिला भी करते थेे। कभी नंबर की कमी ने उन्हें परेशान नहींे किया बल्कि उससे उन्हें और पढ़ने की प्रेरणा ही मिली। अक्सर वे नंबर वाले विषयों को रट लिया करते थे उसे बार बार दुहराया करते थे। हालांकि उन रटे हुए विषयों की उन्हें अब कभी आवश्यकता नहीं पड़ती वे सब के सब बिला गये हैं नौकरी की माया में। केवल एक विषय ही काम में आता है वह है प्रबंध-शास्त्रा वाला, उसका अक्सर काम पड़ जाया करता है। मनःस्थिति समझनी पड़ती है सभी की, चाहे कोई नेता हो, आन्दोलनकारी हो, फरियादी हो कोई भी हो सभी के दिमागों की संभावित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को तौल कर उन्हें समझाना पड़ता है किसी शिक्षक की तरह, किसी मुखिया की तरह। इसी तरह पूरा जिला संभालना होता है, नेताओं-परेताओं को समझाना होता है, गरीबों बेरोजगारों को सहलाना होता है ऐसे समय में मैनेजमेन्ट की पढ़ाई काम आ जाया करती है पर नंबर दिलाने वाले विषयों का तो कोई काम ही नहीं आता।
डी.एम. साहब खुद को खुद को तलाशते हुए अपने मन में गोते लगा रहे थे फिर उन्हांेने टी.वी. आन कर दिया पर अचानक उन्हें झटका लगा। टी.वी. पर तो केवल हल्दीघाटी वाला मैदान ही आ रहा था। लगातार लाशें दिखाई जा रही थीं। टी.वी. के पत्राकार सजग थे। वे हल्दीघाटी वाले गॉव की एक एक बातें सचित्रा दिखा रहे थे। मृतकों की कतार में रखी लाशें देख कर द्रवित हो गये डी.एम. साहेब।
डी.एम. साहब का माथा ठनका ‘यहां भी वही हाल है... कहीं चैन नहीं’ चैनल बदलनेे का भी उन्हें ध्यान आया, बदल देना चाहिए चैनेल। कोई फिल्म लगा देना चाहिए पर फिल्में तो उलझा दिया करती हैं मार-काट में वहां भी कोई राहत नहीं।
डी.एम. साहब की ऑखों में हल्दीघाटी वाले गॉव का पूरा दृश्य उभर जाता है, दर्दनाक, भयानक, मानवता विरोधी... हर तरफ उन्हें चीखें ही सुनाई दे रही हैं, उनके मुह से एक आह निकलती है...
किसी तरह से तो गॉव वालों को संभाल पाये थे। गॉव में आक्रामक तनाव था।
लगता था कि मारने-पीटने पर उतर जायेंगे आदिवासी। वैसे भी वह नक्सली क्षेत्रा है, आदिवासी अपने हक के लिए लड़ना सीख चुके हैं। आदिवासी डट गये थे कि लाशें नहीं ले जाने देंगे। वे लाशों पर लोट जा रहे थे। उनके भीतर कुदरती प्रतिरोध जनम चुका था ऐसी स्थिति में उन्हें मनाना आसान नहीं था। किसी तरह एस.पी.साहब तथा मेरे समझाने-बुझाने से मामला शान्त हुआ।
डी.एम. साहब खुद को संतुलित करते हैं। खुद को सन्तुलित कर लेने के बाद अन्तर भी महसूस करते हैं कि लोगों को संतुलित करना आसान है पर खुद को संतुलित करना कठिन है।
करें तो करंे क्या..? नींद आ नहीं रही अचानक उन्हें एक किताब का ख्याल आता है उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्रा का। पाउल फ्रेरे की किताब थी जो एक विदेशी किताब थी पर उसे डी.एम. साहब काफी गंभीरता से पढ़ा करते थे तथा समझना चाहते थे कि समाज में जो उत्पीड़ित हैं वे अपने उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध करना क्यों नहीं चाहते? अगर वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर प्रतिरोध करने लगंे तो शायद सामंती ताकतें उनके खिलाफ दमनात्मक गतिविधियॉ न कर पायें। पर दमन का प्रतिरोध करना क्या सरल है?
प्रतिरोध तो तभी संभव है जब मानवीय सभ्यता ने प्रतिरोध करने की शिक्षा दी हो। ऐसी शिक्षा दी ही नहीं जाती। शिक्षा तो दी जाती है कि कान है तो वही सुनो, जो दमनकारी सुनाना चाहते हैं, ऑखें हैं तो वही देखो जिसे दमनकारी दिखाना चाहते हैं, मुह है तो वही बोलो जो वे बोलवाना चाहते हैं, अपने मन से न कुछ देखो, न बोलो न सुनो। ऐसे सुभाषितों की शिक्षा से भला उत्पीड़ित अपने अधिकारों के लिए कैसे प्रतिरोध कर पायेंगे। सो वे दमन की असहनीय पीड़ा भले ही बर्दास्त कर लें पर प्रतिरोध तो कत्तई नहीं कर सकते।
डी.एम. साहब उठे और किताबों की आलमारी से उत्पीड़ितों का शिक्षा-शास्त्रा किताब निकाल ले आये। हालांकि उस किताब को उन्होंने कई बार पढ़ा था पर इस बार पढ़ने का अर्थ था हल्दीघाटी वाले गॉव के दमन के बारे में वैचारिक स्तर से खुद को मजबूत बनाना। वे जाने अनजाने पीड़ितों की संवेदनाओं, प्रताड़नाओं के साथ होते चले जा रहे थे हालांकि उन्हें पता था कि प्रशासनिक स्तर पर संवेदन-शील हो जाने से वे पीड़ितों का कुछ भी भला नहीं कर सकते, वे कानूनी विधानों के बांए-दांए किसी भी हाल में नहीं जा सकते उन्हें वही सब करना होगा जिसे हुकूमत उनसे करवाना चाहेगी। हुकूमत तो वही चाहेगी जिससे जनमत उनके साथ लगातार बना रहे भले ही ऊपरी तौर पर हमदर्दी का लेप लगाये, सहलाये पीड़ितों की पीठें, उनकी ऑखें पांेछे। डी.एम. साहब किताब हाथ में ले लिए, एकदम पहले की तरह ही है किताब कई बार के ट्रान्सफर होते रहने के कारण सबसे ज्यादा असर पड़ता है किताबों पर, दूसरे सामान तो ठीक ठाक रह जाते हैं पर किताबें ठीक से नहीं रह पातीं, वे खराब हो जाया करती हैं। वे किताब का एक पन्ना भी नहीं खोल पाये थे कि सोचों में डूब गये...सोचों का क्या किसी भी हाल में रहो चढ़ बैठती हैं माथे पर।
‘का होगा किताब पढ़ कर, इसके अनुसार तो वे एक कदम भी नहीं चल पायेंगे, किसी भी तरह की सहायता वे नहीं कर पायेंगे पीड़ितों की। कानूनी परंपरायें उनके सामने आ कर तनेन हो जायेंगी खुद सवाल पूछने लगंेगी....’
‘क्या तूॅ पीड़ितों के पक्ष में है? पीड़ितों के पक्ष में तूॅ कैसे हो सकता है? तेरा पक्ष तो तुझे नियुक्त करने वाली सरकार है। तूॅ जिले के इतने बड़े ओहदे पर है, इस ओहदे पर रहते हुए भला तूॅ कैसे सोहदा बन सकता है, तुझे पता है कि नहीं तूॅ आला-अधिकारी है, तेरी सोच भी सरकारी होनी चाहिए, सरकारी होने के कारण ही तेरी गरिमा है। का तूॅ उस गरिमा को तोड़ना चाहता है?’
डी.एम. साहब अचानक सरकारी ओहदे की खोल में दुबक जाते हैं फिर जाने क्या होता है कि उनके भीतर का आदमी तनेन हो जाता है...वह उन्हें फटेकारने लगता है... उनके हाथ में पड़ी किताब कांपने लगती है...
‘तूॅ कैसा आदमी है रे! खुद को नहीं जान सकता, तेरी अस्मिता केवल तेरा ओहदा नहीं है, तॅू इस ओहदे से अलग एक आदमी भी है जिसके पास कुदरती अस्मिता होती है। कुदरत की तरह, पेड़ों की हरियाई हुई पत्तियों की तरह, उनकी शाखाओं की तरह, बिना भेद-भाव किए सभी को छांह देने वाली, सभी को फल देने वाली। तूॅ तो एक आदमी है जो सोच सकता है तथा अपने सोचे हुए के अनुसार दो-चार कदम चल भी सकता है। निकल अपने सरकारी ओहदे की खोल से और अपनी अस्मिता बचा।’
डी.एम. साहब अपना माथा पकड़ लेते हैं... यह क्या हो रहा उनके साथ। जब आई.एस. में चुने गये थे तब कितना आनन्द मिला था उन्हें, जैसे सारी दुनिया फतह करके आये हों, ऐसा था भी सभी जगहों पर उनकी पीठ थपथपाई गईं, बहुत शाबासियां मिलीं पर आज क्या हुआ जा रहा है उनके साथ...
आखिर ऐसा क्या घटित हो गया हल्दीघाटी वाले गॉव में जिससे वे आहत हुए जा रहे हैं, यह सब तो होता रहता है कौन सी नई बात है इसमें। वे हाकिम हैं उन्हें हाकिमों की तरह ही सोचना चाहिए। पर वे तो प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का व्यक्तित्वांतरण उचित नहीं। वे भला कैसे सोच सकते हैं एक प्रताड़ित की तरह... यह कोरी भावुकता है और अगर आलाधिकारी भावुकता में आ गया फिर तो हो चुका प्रशासन का काम।
डी.एम. साहब खुद को संयत करने लगे, उन्हीें यह सब नहीं सोचना, गुनना। पर वे खुद को संयत नही कर पा रहे हैं। संयत करने की जगह पर कई तरह के सवाल उभरते जा रहे हैं, ऐसे सवाल जिसे प्रशासन कभी सुनना ही नहीं चाहता। प्रशासन में बने रहना है तो मानवीय संवेदनाओं से खुद को अलगियाना होगा और
एक कमोडिटी की तरह प्रशासन की एक इकाई बन कर रहना होगा, आज्ञाकारी और बफादार, जो सरकार बोले, सोचे वही सच, उसके अलाव कोई दूसरा सच नहीं। वे
एक भावुक आदमी की तरह क्यों सोच रहे हैं, भावुकता तो साहित्यकारों के पास होती है, साहित्यकार सोचें, कहानियॉ लिखें, वे साहित्यकार नहीं ऐसा काहे सोच रहे हैं।
डी.एम.साहब को कई तरह के मानवीय संवेदनाओं के सवालों ने जकड़ लिया। अरे वे तो भावुकता में यहां तक पहुंच गये और खुद से पूछने लगे कि अगर उनका भाई इस गोलाकाण्ड में मारा गया होता तो वे का करते?
डी.एम. साहब अपनी अन्तरात्मा खंगालने लगे। शायद वहां कुछ मिले, आत्मा तो झूठ नहीं बोलती पर वहां कुछ भी नहीं था। वहां तो खाली खाली था कुछ भी पहले से लिखा हुआ था ही नहीें। उन्हें लगा था कि उनकी अन्तरात्मा में आह्लाद भरे होगे, प्रतिभा की चमचमाती चमकें होंगी, उनके पद की गरिमा होगी, प्रफुल्ल्तायें पूरी जोश में उछल-कूद रही होंगी पर वहां कुछ भी नहीं था, खाली खाली था खेतों की तरह, जैसे खेत खाली खाली हुआ करते हैं, खेत लहलहाते तब हैं जब उसे किसान जोतता कोड़ता है फिर बीज डालता है, खेतों में, बालियॉ निकलती हैं पौधों में...।
अन्तरात्मा तो खाली खाली है... डी.एम. साहब को अपनी अन्तरात्मा में कुछ नहीं दिखा। वे खुद से पूछते हैं...‘अन्तरात्मा खाली कैसे हो गई, वहां तो जीवन का पूरा पूरा सच होता है, उसे तो भरा होना चाहिए, तमाम भरी हुई चीजों की तरह। उन्होंने जो चाहा, जब चाहा उसे हासिल कर लिया, आज के समय की हर खुशियॉ तथा सहूलियतें उनके पास हैं, सारी सुख-सुविधायें हैं उनके पास किसी चीज की कमी नहीं, मान-सम्मान भी कम नहीं फिर भी अन्तरात्मा खाली खाली है, उनकी कमाई हुुई चीजें कहां चली गईं, वे किताबंे भी वहां नहीं हैं जिन्हें पवित्रा-पोथी के रूप में उन्होंने पढ़ा था आखिर ऐसा कैसे हो गया...? उन्हें यकीन नहीं आ रहा, उनसे देखने में गलती हो गई होगी। कुछ चीजें ऐसी होती है जो देखने में नहीं आतीं कहीं ऐसा तो नहीं! ’
वे अपनी अन्तरात्मा की जॉच-पड़ताल में दुबारा निकल पड़ते हैं एक अधिकारी की तरह। वे सतर्क निगाहों से अन्तरात्मा का मुआयना कर रहे हैं...अन्तरआत्मा का एक एक कोना गंभीरता से देख रहे हैं, उनकी कमाई हुई कोई चीज वहां उन्हें नहीे दिख रही। उनका वह आलीशान मकान जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ है लखनऊ वाला, वह भी नहीं दिख रहा, उनके पासबुक वाले खाते भी नहीं दिख रहे, कंपनियों के वे तमाम शेयर भी नहीं दिख रहे। वह आलमारी भी नहीं दिख रही जिसमें अनमोल गहने रखे हुए थे, तमाम रत्न रखे हुए थे, किसिम किसिम की उपाधियॉ रखी हुई थीं। कहां चली गईं सब। उनकी दुबारा कोशिश भी बेकार गई, उन्हें आभास हुआ कि सारी चीजें यहां से हटा दी गई हैं। उन्हें चीजों के होने का तो आभास होता है पर दिखता कुछ भी नहीं। कौन हटा सकता है यहां से सारी चीजों को, अन्तरात्मा में चोर दरवाजे तो होते नहीं जिससे कोई गैर यहां आकर दाखिल हो जाये और यहां की चीजें हटा दे...चीजंे खुद से तो अदृश्य हो नहीं सकतीं, चीजों में अदृश्य होने की क्षमता तो होती नहीं।
वे अपनी अन्तरात्मा को स्वविवेक से परिभाषित करते हैं...अन्तरात्मा तो उनकी अपनी एकाधिकार वाली पूॅजी है भला इसे कौन हाथ लगा सकता है? कोई नहीं हटा सकता उनकी चीजों को, कुछ न कुछ उनके साथ गड़बड़ हो रहा है...।
डी.एम.साहब चौंक जाते हैं अपनी अन्तरात्मा का वैचारिक भूगोल देख कर। वे पुनः मौजूदा भौतिक दुनिया में लौट आते हैं अन्तरात्मा से बाहर निकल कर। अब वे किताब पढ़ना चाहते हैं... किताब के कुछ पन्ने पढ़ते हैं तथा उत्पीड़िन की परिभाषा में डूब जाते हैं। लगते हैं सोचने कि यह जो हमारा समाज है वही उत्पीड़ित तथा उत्पीड़क दोनों को निर्मित करता है। दोनों की निर्मिति के अवसर हमारे समाज के पास ही होते हैं, समाज ही उन्हें रचता तथा गढ़ता हैै। समाज जिस तरह का समाज बनाना चाहता है बना लेता है। यानि जैसा समाज वैसा व्यक्ति। व्यक्ति अकेले अपना निर्माण नहीं कर सकता व्यक्ति को बनाता समाज ही है।
डी.एम. साहब सोचों में हैं तथा अपने होने के कारणों के बारे में गुन रहे हैं फिर उन्हें किसने रचा, गढ़ा?
इसका उत्तर उनके पास पहले से ही था। वे जानते हैं कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलगियाया गया है, उन्हें गरिमा के एक कटघरे का नागरिक बना दिया गया है आम नागरिकता से पूरी तरह अलग। जिस कटघरे में उन्हें स्थापित किया गया है उसी तरह के तमाम कटघरे हैं, जो भिन्न भिन्न रंग-रूप आकार-प्रकार वाले हैं। उनके जैसे लोग जिन कटघरों में रखे गये हैं उनमें वे मस्त मस्त हैं पर ऐसा है नहीं वे तो उनकी तरह से परेशान भी होंगे बहुत पर उन्हें अपनी परेशानी का आभास नहीं है सिर्फ इतना ही है।
डी.एम साहब की ऑखें भर्राने लगी हैं आखिर कब तक नींद उनसे दूर रहती। उतर रही है नींद उनकी ऑखों में वैसे भी एक सचेतन आदमी खुद को बहुत समय तक भुलावे में नहीं रख सकता, उसे अपनी स्थिति में लौटना ही होता है।
डी.एम. साहब लौट आये हैं अपने स्वरूप में, ओढ़ी गई भावुकता उनसे कहीं दूर फेंका गई है। नींद तो उतर रही है उनकी ऑखों में, पर यह क्या वह लड़का भी नींद के साथ उतर रहा है अपने गाने के साथ...गाना गाता हुआ ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ शायद नहीं, वे फिर शासकीय कटघरे का नागरिक बन जायेंगे और फुफकारने लगेंगे शासन की नीतियां। शासन की नतियों के बारे में डी.एम. साहब को क्या बताना, उनकी प्रतिभा का कठिन इम्तहान लिया जा चुका है, अब आज्ञाकारिता वाली यांत्रिकता का इम्तहान लिया जाना है, इसमें भी वे सफल ही होंगे।
वे खुश हैं कि शान्तिपूर्ण ढंग से पोस्टमार्टम का काम निपट गया और पंचनामे के बाद लाशें हल्दीघाटी गॉव भेज दी गईं। पर उनकी खुशी अभी तो जॉच में फसेगी, जॉच के समय रोने लगेगी मृतकों के परिजनों की तरह। कई कई जॉच टीमें आयंेगी उन्हीं की तरह की प्रतिभा वाले होंगे उन टीमों में, टीमें किस तरह से उनके कामों का पोस्टमार्टम करेंगी..अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।
ऊॅची ऊॅची प्रतिभा वाले अधिकारी अवतार ले चुके हैं धरती-कथा में, कुछ तो काम शुरू भी कर चुके हैं अधिकारियत वाला, इनमें भी पदेन व्यवस्था है वंश-परंपरा की रियासत वाली, वही परंपरा जॉच के बहाने उतरने वाली है सोनभद्र की धरती पर। धरती-माई सारा कुछ देख रही हैं तथा धरती पर अपने अवतार के बारे में गुन भी रही हैं आखिर वे किस लिए अवतरित हुई धरती पर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा।
‘संस्कृति, सभ्यता और अपराध
जोड़ कर देखिए...’
‘धरती-माई को कैसे समझ आता, भले ही वे धरती-माई हैं, धरती की देवी हैं इससे क्या हुआ धरती तो उसकी होती है जो ताकतवर होता है यही तो मानव सभ्यता है। धरती-पुत्रों को धरती सौंप देने के बाद वे कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि धरती-पुत्रा उनके मन-मिजाज से चलें, आपस में बन्धुत्वपूर्ण रिश्ता बनायें, सहभागी एवं सहयोगी व्यवहार संस्कृति बनायें पर नहीं वे तो आधुनिक हैं, अपने अनुसार चलेंगे। वे चल भी रहे हैं, अपनी नई यांत्रिक आधुनिकता रच रहे हैं। आधुनिक समय में इसीलिए कथा कोई भी हो उसमें थाना, कचहरी, नेता, वकील, पत्राकार, अधिकारी, भूमि, संपत्ति और नारी का प्रसंग न आये ऐसा नहीं होता। ये सारे कुदरती कथा पात्रा अपनी जरूरी भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए ही तो बढ़ा रहे हैं धरती-कथा को....
वैसे एस.पी. साहब धरती-कथा को बढ़ाना नहीं चाह रहे पर करें क्या? धरती की कथा ही ऐसी है जो खुद बढ़ती जा रही है पर वे खुश हैं कि पोस्टमार्टम का काम निपट गया मन ही मन वे तारीफ कर रहे हैं मेडिकल स्टाफ की तथा खासतौर से सी.एम.एस. साहब की। अस्पताल वालों ने बहुत परीश्रम किया और काम करने में शीघ्रता भी पर वे अपने ढंग से परेशान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कौन सी रणनीति उन्हें अख्तियार करनी चाहिए? जिस किसी रणनीति के बारे में वे गुनते हैं उसके नकारात्मक पक्ष सामने आकर तनेन हो जाते हैं। उन्हें यकीन है कि आरोपी किसी न किसी पनाहगाह के संरक्षण में होंगे। पर उन्हें किस पनाहगाह से संरक्षण मिल रहा है इसे वे सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं इसे सुनिश्चित करने के लिए ही कल सभी दारोगाओं की मीटिंग भी उन्हांेने बुलवाया है। सभी दारोगाओं को सचेत करना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए वे हर संभव प्रयास करें तथा उन सूत्रों के बारे में जानकारी जुटायें जो आरोपियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इस काम को बहुत ही तत्परता से करना होगा।
इस तरह का बर्बर काण्ड उनके पूर कार्य-काल में कहीं नहीं घटित हुआ। सोनभद्र आकर वे निश्चिन्त जैसे हो गये थे...एक महीने बाद ही उन्हें महसूस होने लगा था कि इस जनपद में अपराध तो कहीं है ही नहीं। छोटे-मोटे अपराध तो मानव सभ्यता के उत्पादन हैं वे तो होते रहते हैं। बहुत ही आसानी से उनका खुलासा भी हो जाया करता है। पता नहीं कैसे सोनभद्र में ऐसा बर्बर गोलीकाण्ड, वे माथा पकड़ लेते हैं। प्रदेश के कुछ जिलों का अनुभव उन्हें डरा डरा देता है, कदम कदम पर माफियाओं का डर। वे पुलिस को घास-फूस की तरह एक ही फूॅक में उड़ा दिया करते हैं। माफियाओं के गैंग खुले-आम अपराध किया करते हैं और पुलिस असहाय की तरह अपनी खोल में दुबकी रहती है। उन्हें अपने एक मित्रा एस.पी. का किस्सा आज भी याद है। वे गरम मिजाज के तनेन आदमी थे, अपराधी है तो है उसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उसे जेल में होना चाहिए। यह क्या है कि वह खुले में घूमता फिरता रहे और पुलिस उसका मुह ताकती रहे। एक माफिया किस्म का अपराधी था, उसके ऊपर जनता के दबाव से बलात्कार का एफ.आई आर.एक थाने में दर्ज हुआ था। एफ.आई.आर. ने माफिया को उत्तेजित कर दिया और वह पूरे दल-बल के साथ एस.पी. साहब के कार्यालय पर आ धमका...
‘वह वहीं नारा लगाने लगा कि दम हो तो गिरफ्तार करो....’
उसके समर्थक भी चिल्लाने लगे... इस दृश्य को बाकायदा टी.वी. वाले भी कवर कर रहे थे, वह सभी से अपने निर्दोष होने के बारे में बताता...
पुलिस ने जान-बूझ कर उस पर एफ.आई.आर. किया है... उसका कहना था कि बलात्कार तो दूर वह लड़की को तो जानता तक नहीं। पुलिस ने उसे जान-बूझ कर बद्नियती से फसाया है।
खूब खूब नारे लगे थे। एस.पी. कार्यालय से बाहर निकल आये थे फिर वे मिले थे माफिया से। एस.पी. तथा माफिया का मिलन और उस समय हुई बात-चीत केवल टी.वी. चैनल पर ही नहीं वरन् सोशल मीडिया पर भी खूब खूब उछाल पाया था। तकरीबन दिन भर उस बाबत किसिम किसिम की टिप्पड़ियां टी.वी. पर आती रहीं थीं। कुछ पक्ष में तो बहुत कुछ विपक्ष में पर दोनों पक्षों की चर्चाओं में सरकार कटघरे में असहाय सी खड़ी दिखती थी, और एस.पी. गूंगे बहरे की तरह कोने में खड़ा दिखता था।
वह उस समय गूंगा क्यों बना हुआ था आज भी रहस्य ही बना हुआ है। उसने किसी को नहीं बताया उसके बारे में पर एक अनुमान प्रदेश स्तर पर फैल चुका था कि सरकार का पूरा पूरा दबाव था एस.पी पर नहीं तो वह चुप नहीं रहता वैसे भी अगर एस.पी. वैधानिक विवशताओं से खुद को मुक्त कर लेता तो बात ही दूसरी हो जाती और माफिया उसके दफ्तर के सामने सड़क पर गिर कर कराह रहा होता या नजदीकी थाने में बन्द सिसक रहा होता। एस.पी. का करता वह तो केवल पद का एस.पी. है। असल काम तो प्रदेश सरकार का गृह-मंत्रालय ही करता है।
तो एस.पी. साहब के सामने अपने समकक्षों की पिछली कहानियॉ भी जस के
तस खड़ी हैं वे जान चुके हैं कि अपराध की दुनिया में आरोपियों की पकड़ का मामला सरकार की नियति पर निर्भर करता है। सरकार जिसे बचाना चाहती है उसे बचा
ही लेती है अधिकारियों पर नाजायज दबाव बना कर। लेकिन हल्दीघाटी वाले गावॅ का मामला ऐसा नहीं जान पड़ता है। नहीं जान पड़ता कि इस मामले में सरकार दखल देने वाली है क्योंकि यह मामला माफियाओं से जुड़ा हुआ नहीं है न ही यह मामला राजनीतिक रंजिश का लगता है सो इस मामले को सरकार दबाने वाली नहीं। यह अलग बात है कि कुछ आरोपियों को बचाव वाले आधार भले ही खड़े हो जायें जिसके बारे में फिलहाल नहीं कहा जा सकता यह तो जॉच के बाद ही पता चलेगा।
एस.पी. साहब पिछली कहानियों से बाहर सप्रयास निकलते हैं और मौजूदा बर्बर हत्याकाण्ड के बारे में गुनने लगते हैं।
वे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जिले के जाबांज अधिकारियों को लगा चुके हैं तथा उन खास मुखबीरों को भी सहेज चुके हैं कि जैसे भी हो आरोपियों की पकड़ करो।
पोस्टमार्टम घर से वे डी.एम. साहब के साथ निकले थे। आवास पर आते ही धम्म से पसर गये थे बिस्तरे पर। आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे से लम्बे दौरे पर जाया करते थे पर आवास पर आते ही दिन भर के काम-काज का ब्योरा लेकर ही बेड-रूम की तरफ जाते थे पर आज तो कोई हाल-चाल नहीं लिए सीधे बेड-रूम में घुस गये। वे भी डी.एम. साहब की तरह अकेले रहते हैं उनका परिवार दिल्ली में रहता है, उनका घर भी दल्ली के आस-पास ही पड़ता है। पता नहीं क्या है कि सोनभद्र को कमाई का बेहतर ठिकाना मानने वाले बड़े अधिकारी अपनी पत्नियों को यहां नहीं रखते, उनकी पत्नियां कहीं दूर रहती हैं भले ही कुछ अधिकारी अपवाद रहे हों वह भी कार्यकाल के आखिरी पड़ाव वाले उनको छोड़ कर बकिया जो जवान होते हैं जिनकी पत्नियां जवान होती हैं किसी के बारे में ऐसा नहीं देखा गया कि वे सोनभद्र में सपरिवार रहते हों। कुछ न कुछ कारण तो होगा ही, संभव है उनकी पत्नियों को सोनभद्र का रापटगंज बाजार रूचता न हो, मौके गर मौके आती हों और कुछ दिनों बाद निकल जाया करती हों। रापटगंज बाजार वैसे भी काफी सिकुड़ा सिकुड़ा सा है, यहां न तो फाइव स्टार होटल हैं और न ही मन-भावन क्लब वगैरह हैं, पार्क वगैरह तो हैं ही नहीं। यहां की सड़कंे भी वीरान दिखती हैं, सड़कांे पर टहलने वालों में आधुनिकता नहीं दिखती, वे गंवार जान पड़ते हैं। बड़े शहरों में तो सड़कें भी आधुनिकता में डूबी कैबरे नाचती हुई दिखती हैं एक में एक गुत्थम-गुत्था।
सुरक्षाकर्मी मन ही मन सोच रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव ने एस.पी. साहब को तनावग्रस्त कर दिया है।
रात गुजर जाती है। एस.पी. साहब सुबह जग जाते हैं और सीधे पुलिसिया काम पर लग जाते हैं। घटना घटने के कारणों का पता शायद पक्ष-विपक्ष के वकीलों से
चल जाये। मुकदमा तो चल ही रहा था। उन्हांेने पहले दिन ही दोनों वकीलों के फोन नंबरों का पता लगाने के लिए मातहतों को निर्देशित कर दिया था। मातहतों ने
वकीलों का फोन नंबर मालूम कर लिया था। जब साहब दफ्तर में आयेंगे उन्हें बता दिया जायेगा।
सुबह सुबह ही साहब अपने कैम्प कार्यालय में हाजिर हो गये। दूसरे दिन सुबह मिलने के लिए उन्होंने अपने खास पत्राकारों से भी बोला था। उन्हें अनुमान था कि पत्राकार उनके काम को आसान बना सकते हैं। कुछ ही देर में वे पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय पर हाजिर हो गये जिसकी सूचना सुरक्षाकर्मी ने एस.पी. साहब को तत्काल दे दिया। पर एस.पी साहब ने पत्राकारों को करीब आधे घंटे बाद बुलवाया। अधिकारियों का किसी से मिलने-मिलाने का यह पुराना तरीका होता है वे तत्काल किसी से नहीं मिलते, मिलने के लिए भले ही उन्होंने ही किसी को बुलवाया हुआ हो। कुछ देर आगन्तुकों को बैठाए रखना उनकी कार्य-संस्कृति का हिस्सा होता है, अदब का कुछ पाठ मातहतों को भी तो पढ़ाना होता है, वे क्या साचेंगे कि साहब ने आगंतुक को तुरंत बुलवा लिया, कोई दमदार आदमी जान पड़ता है।
पत्राकार पूरी जानकारी के साथ थे।
कुछ पता चला क्या कि एक शान्तिप्रिय गॉव हल्दीघाटी में कैसे बदल गया? ‘केवल जमीन के कब्जाने का मामला था सर! आरोपियों ने उस जमीन का बैनामा करा लिया है और उस पर कब्जा करना चाहते थे। बैनामा भी कानूनी ढंग से आरोपियों ने कराया है। सुनने में आया है सर! कि आरोपियों ने कब्जा करने के लिए पुलिस बल की मॉग किया था जिसके लिए जो कानूनी खर्च होता है उसे भी आरोपियों ने जमा करवा दिया है, घटना के एक सप्ताह पहले ही।’
‘इसके अलावा कोई खास बात... आप लोग तो उनके वकीलों से भी मिले होंगे।’ वकीलों का का कहना है इस बारे में?
‘हॉ सर! कल ही हमलोग वकीलों से मिले थे वकील भी इस घटना को अप्रत्याशित ही मान रहे हैं सर! घट गई अचानक। घटना के पूर्वनियोजित होने के बारे में वकीलों ने भी कुछ नहीं बताया। हमलोगों को जान पड़ा कि उनके वकीलों को भी घटना के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। हमलोग हर तरह से पूछ चुके हैं उनसे। वैसे भी सर! दोनों पक्षों के वकील केवल वकालत से ही मतलब रखा करते हैं उनसे दूसरी बातों से कोई मतलब नहीं। वे लोग सरल मिजाज के भी हैं केवल वकालत से मतलब रखने वाले।’
एस.पी. अचरज में पड़ गये...
उन्हें पता था कि जमीन के मामलांे में कुछ वकील विधि-व्यवस्था से अलग हटकर काम किया करते हैं तथा अपने मुवक्किलों को अक्सर जमीन पर से कब्जा न छोड़ने की हिदायतें दे दिया करते हैं। क्योंकि जमीन पर काबिज होना कानून के अनुसार एक नये तरह का अधिकार साबित करता है और काबिज न होना मुकदमे को कहीं न कहीं कमजोर बना दिया करता है। वैसे राजस्व या दीवानी का मुकदमा लड़ने वाला हर आदमी इस सचाई को जानता है कि जमीन खरीद लेना कोई खास
बात नहीं है, खास बात है जमीन पर कब्जा हासिल कर लेना। सो हर आदमी जमीन पर कब्जे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। कब्जा करना है चाहे जैसे। ऐसी हालतों में मार-पीट हो जाया करती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि वकीलों ने आरोपियों को सहेजा नहीं होगा.. अपने मुवक्किलों को, इतनी बड़ी घटना, दस दस टेªक्टर और दो तीन सौ आदमी अचानक कैसे पहुंच जायेंगे जमीन कब्जा करने के लिए? वकीलों ने आरोपियों को तथा मृतकों को कब्जा छोड़ने न छोड़ने के लिए अवश्य ही कुछ न कुछ सहेजा होगा।
‘आप लोग गंभीरता से पता लगायें। समझ रहे हैं नऽ मेरी बात। कोई न कोई सूत्रा तो होगा ही घटना घटने का, देखना यह होगा कि वह सूत्रा क्या है?’
एस.पी. एक ही सांस में सारा कुछ बोल गये...
पत्राकार तो जैसे तैयार बैठे थे... बोल उठे...अपनी सफाई में
‘हमलोगों को तो काई विशेष जानकारी नहीं मिल सकी सर। वैसे भी प्रताड़ितों का वकील टी.वी. चैनल के पत्राकारों से घिरा हुआ था। वे कई तरह के सवाल पूछ रहे थे प्रताड़ितों के वकील से। सभी से वकील एक ही तरह की बात बता रहा था कि प्रताड़ितों ने आरोपियों को कब्जा नहीं करने दिया। चलते ट्रेक्टर के सामनेे पूरे खेत पर प्रताड़ित लेटे हुए। अजीब तरह का सत्याग्रह जिधर देखो उधर प्रताड़ित खेत पर लेटे हुए एक ईंच भी जमीन खाली नहीं, आरोपी प्रताड़ितों को खेत पर से उठाते पर वे दुबारा लेट जाते जमीन पर। प्रताड़ितों का पूरा गॉव प्रतिरोध में खड़ा हो गया फिर आरोपियों ने फायर छोड़ दिया और आगे का तो आप जानते ही है सर! आज भी वकील की बाइट चल रही है टी.वी. पर। किसी तरह से मौका निकाल कर प्रताड़ितों के वकील ने हमलोगों से बातें किया।’
दूसरी तरफ आरोपियों का वकील फुर्सत में था। पत्राकारों की भीड़ उसके पास नहीं थी। वैसे भी वह साफ साफ बोल के पिण्ड छुड़ा लेता था कि वह आरोपियों का वकील अदालती कामों के लिए है, आरोपी बाहर का करते हैं इससे उसका कोई मतलब नहीं। वह आरोपियों के बाहरी कृत्यों का वकील नहीं है सो आप लोग आरोपियों से ही पूछें घटना के बारे में। मैं उसके बारे में कुछ भी जानकारी आप लोगों को नहीं दे सकता। यही बातंे उसने हमलोगों से भी बताया कि वह कुछ भी नहीं जानता घटना के बारे में।
एस.पी. से बातें हो जाने के बाद पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय से वापस लौट आये और एस.पी. साहब पुलिस अधिकारियों की बैठक में जाने के लिए तैयार होने लगे। उनके पास समय भी कम था, मीटिंग लेनी थी अधिकारियों की। मीटिंग का एजेण्डा एक मातहत को लिखवाकर वे कार्यालय से उठ गये। तभी एक फोन आ गया उनका मोबाइल घनघना गया...
फोन डी.एम.साहब का था...
डी.एम. साहब जानना चाह रहे थे आरोपियों के पकड़ के बारे में।
‘अभी किसी की पकड़ नहीं हो पाई सर! आज किसी न किसी की पकड़ अवश्य ही हो जायेगी, सूत्रा पक्के हैं सर! बहुत ही जाबांज दारोगा लगाये गये हैं आरोपियों की पकड़ के काम पर।’
‘हॉ सर! किसी भी विरोधी दल के नेता को हल्दीघाटीवाले गॉव की यात्रा नहीं करने दी जायेगी, अधिकारी मुस्तैद हैं।’
खबर मिली है सर! कि समाजबादी पारटी के जिले स्तर के कुछ नेता हल्दीघाटी वाले गॉव जाना चाहते हैं पर उन्हें घोरावल में ही रोक लिया जायेगा, मैंने निर्देशित कर दिया है सर! अधिकारियों को।’
फिर एस.पी. साहब अपने आवास पर चले गये, नाश्ता वगैरह करने के बाद अधिकारियों की मीटिंग में भाग लेने के लिए निकलेंगे। कैम्प कार्यालय से ही जुडा हुआ था एस.पी. का आवास।
एस.पी. मीटिंग में भाग लेने के लिए निकल ही रहे थे कि कैम्प कार्यालय के सामने भीड़ इकठ्ठा हो गई...
भीड़ एक लड़के के गाने में डूबी हुई थी। इस बार लड़के ने थाली बदल कर ढपली ले लिया था और झूम झूम कर नृत्य के साथ गा भी रहा था। एस.पी को देखते ही वह ठनक गया... ‘साहब आ गये...’
उसने गाना रोक दिया और झोले में से कुछ निकालने लगा। झोले में एक कागज था, वह वही कागज था जिसे पहले दिन ही लड़के ने एक अनजान आदमी से अस्पताल में लिखवाया था।
उसने कागज निकाल कर हाथ में लिया और एस.पी. साहब के सामने जा खड़ा हुआ...एस.पी. साहब ने उसे पोस्टमार्टम घर के सामने देखा था गाना गाते हुए, उन्होंने लड़के को पहचान लिया और सुरक्षाकर्मियों को रोक कर आदेश दिया उसे आने दो...
‘क्या बात है?’ लड़के से एस.पी.साहब ने बहुत ही दुलार से पूछा
‘सर! दरखास देनी है,’ लड़के ने बताया
लड़के ने एस.पी.साहब को दरख्वास्त दे दिया
एस.पी.साहब दरख्वास्त पढ़ने लगे...
दरख्वास्त में वही सारी बातें लिखी थीं जिसे एस.पी.साहब जानते थे...
‘हॉ तुम्हारा भाई कुछ दिन बाद तुम्हारे गॉव चला जायेगा, तुम चिन्ता न करो, हम लोग उसे खोज निकालेंगे। हमने तुम्हारी दरख्वास्त रख लिया है अब तूं अपने गॉव चले जाओ...’
एस.पी. ने झूठा बहाना बनाया लड़के की विक्षिप्तता के कारण जबकि उन्हें पता था कि लड़के का भाई बुद्धन गोली काण्ड में मारा जा चुका है।
‘नाहीं साहेब अब हम गॉव नाहीं जायेंगे, वे लोग हमैं जान से मार डालेंगे।’
एस.पी. साहब उसे देखने में थे। उस दिन तो उसके हाथ में थाली थी और आज
डफली है। इसने अपना रूप बदल लिया है, गा, गा कर खुद को बहला रहा है। लगता है इसे पता चल गया है अपने भाई के बारे में, नहीं पता चला होता तो दरख्वास्त काहे देता...नहीं पता चला होगा तभी तो परेशान है।
‘अभी तुम गॉव नहीं गये का?’ लड़के से पूछा एस.पी.साहब ने
‘गॉव का जाना साहेब!’
एस.पी.साहब से बता कर लड़का रोने लगा...
एस.पी.साहब लड़के के रोने में चले गये, वे किसी शोक-कविता की तरह पुलिस की वर्दी में ही विलापने लगे... ‘कितना असहज हो जाता है किसी का जाना, और जाने हुए का जाना वह तो बहुत ही असहज होता है।’
एस.पी.साहब किसी अधिकारी को बुलाते हैं... उसे निर्देशित करते हैं... ‘इस लड़के को इसके गॉव पहुंचवा दो तुरंत। गॉव वाले तो लाश के साथ चले गये होंगे गॉव।’
‘हॉ साहेब’
एस.पी. साहब तनबुड़ुक के गाने में खो गये अचानक...
‘धरती केहू कऽ न भई’
‘एस.पी. साहब की अनिवार्य भूमिका है धरती-कथा में, वे जानते हैं कि मानवीय रिश्ते पूॅजी-संबंधों से ही बनते बिगड़ते हैं और यही व्यवहार-संस्कृति का निर्माण भी करते हैं कुदरती व्यवहार-संस्कृति से एकदम अलग। यह संस्कृति मनुष्यता की सारी हदें छलांग कर पूंजी-संचयन, पूंजी-निर्माण के लिए कुछ भी करना गलत नहीं मानती फिर तो पूॅजी कहीं न कहीं हल्दीघाटी उगायेगी ही... पर क्या धरती-माई स्व-रचित धरती की व्यवहार-संस्कृति को जानती हैं?’
‘कथा का शोक-पक्ष विधवायें हैं यानि
सुगनी तेतरी, फगुनी और बैसाखी!’
‘धरती माई का जानंेगी धरती की व्यवहार-संस्कृति के बारे में, वे तो देवी हैं स्वर्ग वाली वैसे भी धरती-कथा पारंपरिक मृतक-अनुष्ठान में अभी उलझी हुई है। धरती-माई सतर्क हैैं और मृतक-अनुष्ठान देख रही हैं। उन्हें प्रभावकारी लग रहा है मृतक-अनुष्ठान। मृतक-अनुष्ठान के बहाने कम से कम मृतक को सम्मान तो दिया जा रहा है धरती पर। इस अनुष्ठान से पारलौकिक लाभ मृतक को मिलेगा कि नहीं यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। अनुष्ठान के बाद कथा आगे बढ़ेगी, कथा किस तरफ बढ़ती है देखना जरूरी होगा...’
गॉव में सारी लाशें पहुंच चुकी हैं। गॉव के जो लोग अस्पताल गये हुए थे उन्हें भी प्रशासन ने एक बस से गॉव पहुंचवा दिया है। सुगनी, तेतरी, बिफनी,फगुनी सब साथ हैं। बबुआ लाशों के साथ ही गॉव आया हुआ है गॉव के वे सभी परिजन लाशों के साथ हैं जो जघन्य गोलीकाण्ड से हताहत हुए थे। पुनवासी, खेलावन और
बन्धू भी साथ में हैं वे एक मिनट के लिए भी लोगों से अलग नहीं हुए घटना के दिन से लगातार साथ में हैं। ऐसे समय में का खेती-बारी देखना, क्या गाय-गोरू का इन्तजाम देखना, गॉव पर जो लोग हैं वे संभाल रहे होंगे सारा कुछ।
गॉव एकदम सुनसान हो गया है। थोड़े बहुत वही लोग बचे रह गये हैं गॉव में जो गाय-गोरू का इन्तजाम संभाल सकें आखिर मवेशियों को तो बिना निगरानी के नहीं छोड़ा जा सकता, वे अबोला जीव हैं, बोलेंगे कुछ थोड़ै, न शिकायत करंेगे। बिफनी और सुगनी दोनों एम्बुलेल्स से उतर कर सीधे भाग रही हैं अपने अपने घरों की तरफ। सुगनी को चिन्ता है सुमेरन की और बिफनी को चिन्ता है बुझावन की। रापटगंज जाते समय दोनों अपने अपने पड़ोसी को सहेज कर गई थीं उन लोगों की देख-रेख करते रहने की। यहां औरतों का कोई काम नहीं सारा काम मर्दों का है।
पुलिस की गाड़ी रुक गई है गॉव की तिमुहानी पर उससे आगे जाने का रास्ता नहीं है, आगे खडंजा बिछा है जो गाड़ी जाने लायक नहीं है संकरा है। पुलिस की गाड़ी रुकने में भले ही कुछ देर हुई हो पर गॉव वालों को वहां जुटने में तनिक भी देर नहीं हुई... सारा गॉव तिमुहानी पर जुट गया, गॉव ही नहीं पास-पड़ोस के टोले भी। देखते ही देखते भीड़ सैकड़ा पार कर गई, क्या मरद, क्या औरतें, क्या बच्चे.अधिकांश रोते बिलखते, कराहते, सभी की ऑखें डबडबाई जैसे अब रो देंगी तब रो देंगी। औरतों का बिलाप गूंज रहा है हवा में, आकाश भी मानो नीचे उतर कर विलाप सुनने के लिए बेताब हो, खडंजे सिसक रहे हैं, गॉव के सिवान तो रोते-रोते इतने आक्रामक हो चुके हैं कि वे मानो गरिया रहे हों इक्कीसवीं शदी को...
‘यही है तेरी इक्कीसवीं शदी, यही है तेरा लोकतंत्रा, यही है तेरी मानव सभ्यता! सिवानों के जलते सवालों के साथ सुगनी का विलाप है तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी का विलाप भी है, तीनों विधवा हो चुकी हैं। रापटगंज से लौटते ही तीनों ने चूड़ियॉ फोड़ दी हैं और माथे का सेन्हुर भी पोछ दिया है। विधवायें तो कई हो चुकी है गॉव में पर ये तीनों तो ऐसी विधवायें हैं जिनका सधवा जीवन महज दो तीन साल का रहा है, ये खिलती कली की तरह हैं फूल बन कर खिलने के समय ही गोलीकाण्ड ने लील लिया, इनके माथे का सेन्हुर मिटाय दिया, चूड़ियां फोड़ दिया...
‘हाय री किस्मत...!’
किस्मत भी जाने कैसा कैसा खेल खेलती है।
सामाजिक परंपराओं के रूपों का यह नामकरण सधवा और विधवा, औरत तो हमेशा औरत रहती है पर नहीं सुगनी, फगुनी और तेतरी अब विधवा हो चुकी हैं। उनका सधवा होना गोलीकाण्ड ने ही नहीं परंपरा ने भी छीन लिया है उनसे। वे आदिवासी हैं जो अभी भी लोक-संस्कृति और लोक-व्यवहार के काफी करीब हैं उनके
यहां विधवाओं को सवर्ण-संस्कृति की तरह परित्यक्त नहीं किया जाता, उन्हें हक मिला हुआ है कि वे चाहें तो किसी से सलट सकती हैं यह सलटना विवाह का ही
एक रूप है पर क्या वे सलटेंगी किसी से....पता नहीं। वे तीनों भी लाशों के पास ही हैं, रो रही हैं सिसक रही हैं... बिफनी और सुगनी दोनों गई हैं अपने अपने ससुरों का हाल-अहवाल लेने लौट कर आयेंगी कुछ देर में, बोल कर गई हैं तेतरी, फगुनी और बैसाखी से।
रोते सिसकते गॉव में अब कर्म-क्रिया किया जाना है इस पारंपरिक क्रिया को नहीं रोका जा सकता। गॉव के समझदार लगे हुए हैं इस काम में। प्रशासन भी सक्रिय है, गॉव का लेखपाल लकड़ी मगवा चुका है। एक ही साथ जलाना है लाशों को यह तय हो चुका है। लाशों को पहले की तरह बगइचा में नहीं जहां कतल हुआ है वहीं जलाना है।
लाशें उतारी जा चुकी हैं पुलिस की गाड़ी से... रख दी गई हैं तिमुहानी पर एक कतार में। लाशों को उनके घरों तक ले जाने का कोई मतलब नहीं...
बबुआ यही समझा रहा है पुनवासी, खेलावन और बंधू को। घरे, घरे लाशें ले जाने का का मतलब है? मान गये है गॉव के लोग भी, चलो यहीं सब क्रिया-करम कर लेते हैं लाशों के जलाने के पहले वाले। पंडित किस्म का एक आदमी भी बुलाया जा चुका है, वह अपने काम में लग गया है, दूब घांस वगैरह उसके हाथ में है और कुछ फूल भी।
कुछ दूसरे लोग है जो हरे बांस की तिख्ती बना रहे हैं, दस तिख्तियां चाहिए, बांस काटती टंगारी की आवाज भयानक हुई जा रही है, टंगारी के कट और खट की आवाज दहला दे रही है, एक आर्तनाक सुर... फिर भी बांस काटना है और तिख्ती बनानी ही है, उसी पर लाशें रखी जायेंगी, लोग इसी तिख्ती के सहारे कॉधा दंेगे, दो लोग आगे दो लोग पीछे तिख्ती कॉधे पर ले कर चलेंगे।
लाशों के पास खड़ी हैं औरतें उनमें से कुछ हैं जो कुछ ही देर में विधवा बन जाने वाली हैंें, उन्हें वहां से हटाया जा रहा है, वे हटें तब लाशों को नहलवाया जाये.औरतें नहीं हट रही हैं..
‘हम नाहीं हटेंगे, हमैं मुह देखाओ, हमैं मुह देखाओ एक बार तो देख लें फेर कैसे देखेंगे, चले गये हमैं अनाथ छोड़ कर हमरे नाथ। जिनगी सपना बन गई हाय री किस्मत! ऐसे ही बहुत कुछ...’ यह परंपरा का विरोध है।
औरतें अपने वश में नहीं हैं, समय के यथार्थ ने उनसे उनका सोचना और समझना दोनों हड़प लिया है, केवल शरीर बचा हुआ है उनके पास, उनसे छिन गई हैं जीवन जीते रहने की अभिालाषा, आकांक्षा। देह है वह बेचारी का करेगी अकेली...वे समझ रही हैं कि उनकी आकाक्षायें कुछ ही देर में चढ़ा दी जायेंगी चिता पर, देखते देखते ही सारा कुछ आग की लपटों में जल जायेगा।
बबुआ लाशों पर से बंधा सरकारी कपड़ा हटाय रहा है उसके साथ पुनवासी, खेलावन और बंधू भी हैं चारों एक एक लाश पर से कपड़ा हटाय रहे हैं। सभी चेहरे गॉव के हैं, उनमें कोई अजाना नहीं है परिजन देख रहे हैं लाशों को, बबुआ भी देख रहा है सरवन को, सुगनी भी वहीं है वह भी सरवन को देख रही है, तेतरी, फगुनी
और बैसाखी सभी अपने पतियों के सामने हैं, वे देख रही हैं....
वे देख रही है कि उनका वर्तमान भविष्य बन गया है, हसती खिलखिलाती देह मुर्दा बन चुकी है, ये न नाराज होगी न खुश, गालियां भी नहीं दे सकती न गुदगुदा सकती है, बात बात में गुदगुदाने वाले जाने कहां चले गये छोड़ कर। यह धरती तो यहीं है, इसका कुछ नहीं बिगड़ा, इसी धरती के लिए परेशान थे लोग....
औरतें लाशों का मुह देख ही रही थीं कि तनबुड़ुक जाने किधर से चला आया,
‘का हो रहा इहां....’
वह सभी से पूछ रहा है मेरे भइया कहां हैं, नाहीं दिख रहे हैं?
उसे कोई नहीं बता रहा, सभी जानते हैं कि उसका भाई बुद्धन गोली का शिकार हो चुका है, उसकी लाश आई है, कोई नहीं बता रहा उसे। बता देने पर जाने कैसा उसका मन हो जाये।
तनबुड़ुक बढ़ रहा है लाशों की तरफ, वह वहीं देखता है बबुआ को...
‘का भइया! हमार भइया नाहीं आये का’
वह बबुआ से पूछता है। तनबुड़ुक की भउजाई रमेशरी वहीं है वह बेसुध है वैसे भी वह दो दिन से बिना खाये-पिये है, घटना के पहले से ही बीमार चल रही है, उसे मियादी बुखार हो गया है, एक कदम भी चलना उसके लिए मुश्किल है।
तनबुड़क अपनी भउजाई रमेशरी को देखता है और...
‘अरे! भउजी...तूं यहीं हो का, तूं तो बीमार है इहां काहे के लिए आई हो...
उसकी भउजाई रमेशरी तनबुड़ुक को देख कर रोने लगती है, उसकी ऑखें वैसे ही पहले से ही डबडबाई हुई हैं...
‘का हो तूं कहां चले गये थे, इहां का से का हो गया अउर तोहार कुछ पता नाहीं, इहौ नाहीं बूझे के तोहार भउजाई अकेली का करेगी।’
तनबुड़ुक भउजाई को देख कर खुद को संभाल रहा है।
‘नाहीं भउजी! हम कहीं नाहीं गये थे, रापटगंज गये थे भइया को खोजने, वहां भी भइया नाहीं मिले तऽ हम चले गये कप्तान साहब के इहां दरखास देने उहै हमके इहां भेजे हैं, एक सिपाही आया था वही पहुंचा गया है हमैं। मोटरसाइकिल से था पहुंचा कर वह लौट गया। ई देखो हम तोहरे सामने खड़े हैं एकदम साबूत।’
‘तूं इहां का देख रही हो भउजी! भइया घरे आ गये हैं का बताओ तो हम भइया से मिले बिना परेशान हैं जाने कहां चले गये हैं भइया, कुछ तो बताओ भउजी भइया के बारे में, काहे नाहीं बोल रही कुछ।’
तनबुड़ुक ने अपनी भउजी को उलाहा...
भउजी सोच में पड़ गई, का करे, तनबुड़ुक को बताये कि नाहीं उसके भइया के बारे में... कौनो न कौनो दिन तो बताना ही पड़ेगा। रमेशरी जानती है कि भइया को गोली लगी है सुनते ही तनबुड़ुक का दिमाग खराब हो गया है पहले ऐसा नहीं था। वह पढ़ता था, पढ़ने में भी ठीक था। इहां तो साबूत लाश पड़ी हुई उसके भइया
की..
रमेशरी असमंजस में पड़ गई तभी बबुआ वहां आ जाता है और तनबुड़ुक को वहां से हटा कर कुछ दूर ले जाता है उसे समझाता है कि उसका भाई बुद्धन बनारस गया हुआ है। ई तो जानते ही हो कि हमरे गांये में गोली चली है कुछ लोग मारे गये हैं, गोली से कुछ घायल हो गये हैं ओन्हय देखने के लिए बुद्धन बनारस गया हुआ है, घायल लोग वहीं अस्पताल में हैं।’
तनबुड़ुक स्थिर हो रहा है, जैसे कुछ सोच रहा हो... उस दिन किसी ने कहा था कि तोहार भइया बुद्धन गोली लगने से मर गये... यानि वे लोग गलत बोल रहे थे, बबुआ भइया तऽ हमरे भइया के दोस्त हैं, ई गलत नाहीं बोलेंगे’
‘सही सही बोल रहे हो नऽ बबुआ भइया! तोहैं हमार किरिया, सही सही बोलो हमसे जीन छिपाओ कुछ भी’
‘नाहीं रे तनबुड़ुक तोहसे हम झूठ थोड़ै बोलेंगे, अब तूं इहां से खेते चले जाओ ओहीं ठे हम लोग भी आय रहे है। शवदाह वहीं होगा नऽ’ खेतवै। पर।
अच्छा बबुआ भइया हम ओहरै जाय रहे हैं। तनबुड़ुक का मिजाज स्थिर हो गया है, उसे महसूस हो रहा है कि उसका भाई गोलीकाण्ड में नाहीं मरा है। वह जा रहा कतल वाली जगह की तरफ गुनगुनाते हुए...‘धरती केहू कऽ नाहीं भई’ पर बबुआ परेशान हो रहा है उसने तनबुड़ुक से झूठ बोल कर अच्छा नहीं किया किसी न किसी दिन उसको पता चल ही जायेगा बुद्धन के बारे में तब का होगा?
का हो बबुआ, तनबुड़ुक केहर गया हो?’ पूछा रमेशरी ने बबुआ से
‘ओके हम खेत की तरफ भेज दिये हैं अउर समझाय दिये हैं कि कुछ नाहीं हुआ है तोहार भइया के संघे, ऊ बनारस गये हुए हैं घायलों को देखने के लिए, दो तीन दिन में लौट आयेंगे। हम कुछ गलत किये का भउजी?’
‘नाहीं हो बबुआ तूं सही समझाये ओके, तोहरे जगह पर केहू होता तऽ ऊ इहय समझाता जौन तूं समझाये, ओकर खियाल करना बबुआ, ओकरे अलावा अउर के है हमरे घरे में।’
बबुआ रमेशरी से बतिया ही रहा था कि पुनवासी, खेलावन और बंधू उसे भीड़ में खोजते हुए आ गये...
‘का हो बबुआ भइया! अब का देरी है इहां, चलो खेत की तरफ, वहां चितायें तैयार हो गई हैं। खेत पर चितायें देख कर हैरान हो गये हैं अधिकारी, यहां तो शव-दाह नहीं होता फिर...फिर क्या? कतल ईहां हुआ है तो लाशें भी यहीं जलंेगी, अउर का। बबुआ ने तो पहले से ही साथियों से सलाह कर लिया था कि लाशें कतल वाली जगह पर ही जलेंगी अउर उहां समाधि भी बनेगी सबकी। कानूनगो साहब चिताओं के पास ही डटे हुए हैं वे का बोलें चिताओं के बारे में चाहे जहां जलें।
काननूगो साहब के पास फोन आ गया है की राशन वाली टरक आय रही है, ओमे अनाज पानी है, सब घरे में बटवाना है, स्कूल के मास्टर को फोन किए हैं कानूनगो साहब, कि सरा अनाज कमरों में रखवा दें कल सुबह बटेगा।
‘उहां चिता बन गई है दसो’, पूछा बबुआ ने पुनवासी से
हॉ अउर का, गॉव भर के लड़के चिउंटा माफिक लग गये काम में, लकड़ी बने से तहसीलदार साहब भेजवाय ही दिये थे, का करना था, खाली बोटियाना था अउर सजा देना था, बस एतनै। सब होय गया है। इहां नहलवाकर सबको ले चलो बुद्धू भइया। दुई रात अउर दुई दिन होय गया है माथा फटा जाय रहा है।
‘माथा तऽ हमरौ फटि रहा है पर करें का हमहूं तऽ परेशानै हैं चलो नहलवाते हैं सबको..।’
एक तरफ लाशों को नहलवाया जा रहा है तो दूसरी तरफ मृतकों के परिजनों में से दस लोग एक कतार में बैठे हुए हैं। नाऊ उनके माथे का बाल उतार रहा है उनके पहनने के लिए मारकीन का कपड़ा आया हुआ है वहीं पहनना तथा ओढ़ना है। एक एक गंजी आई है पहनने के लिए। लेखपाल मगवा लिए हैं सारा सामान घोरावल से बंधू भी लेखपाल के साथ गया था बाजार। जिनके सर के बाल मूड़े जा चुके हैं ये लोग ही अगदेउआ(चिता में आग देने वाले) हैं। ये दस दिन तक अलग तरह की जिन्दगी जियेंगे, अलग खाना-पीना सारा कुछ।
बबुआ, खेलावन, बंधू तथा कुछ दूसरे लोग भी लाशों को नहलवाने में जुट गये हैं, सामने एक ड्राम रख हुआ है उसमें लड़के पानी भर रहे हैं, पानी सामने वाले चॉपा कल से लाया जा रहा है, जवान होते लड़के पानी निकाल रहे हैं चॉपा कल से। उसी समय बिफनी और सुगनी भी गॉव में से लौट आती हैं।
ठीक हैं बुझावन और सोमारू। सोमारू को अभी नहीं बताया गया है सरवन के बारे में। कुछ समय बीत जाने के बाद बताया जायेगा। सुगनी समझती है कि बपई को सरवन के बारे में अगर बता दिया गया तो शायद ही बच पायें बपई सो नाहीं बताना है। समय किसी न किसी दिन उन्हें बता ही देगा।
समय सारा कुछ बता देगा सोमारू को तो जो होगा, होगा।
‘होगा क्या?’
वे डूब जायेंगे अपनी गाथा में, कोसेंगे करम बाबा को, अपने जीवन को, सामंती समाज को, सरकार को, गॉव के किनारे बैठे हुए बरम बाबा को, डीह बाबा को फिर माथा पकड़ लेंगे। धरती-माई को कोसेंगे कि नहीं...!
जरूर कोसेंगे, फटकारेंगे... काहे की देवी हो?
‘काहे के लिए बनाया तूने धरती को?’
‘काहे हाथ पकड़ कर सिखाया हल जोतना, खेती करना?’
जब अपनी पूजा करने वालों को ही नहीं बचा सकती फिर काहे की माई हो, काहे धूप-दसांग की गंध पीती हो, किसिम किसिम के फल परसाद में काहे चढ़ावा लेती हो, नाराज होकर वे कहीं धरती-माई की चौरी ही न उखाड़ दें....उनका का ठिकाना कुछ भी कर सकते हैं।
‘कानून के मजूरे आ गये हैं गॉव में
देखिए क्या करते हैं’
‘धरती-कथा का पूर्वार्ध शोक-गाथा है धरती को हरा-भरा रखने वालों का। धरती को हरा-भरा रखने वालेे प्रमुख पात्रों की कथा-भूमिकायें चिताओं पर चढ़ चुकी हैं, उसी स्थान पर जहां उनकी हत्यायें की गईं। वहीं उनकी समाधियां भी बनाई जानी हैं इसके अलावा उनकी मृत-आत्मा की शान्ति के लिए अनुष्ठान किए जा रहे हैं। इहलोक तो उनके लिए ठीक-ठाक नहीं था कम से कम परलोक तो उनका ठीक हो जाये। अब इस कथा से नये पात्रा बबुआ, बंधू और पुनवासी तथा शासन के कुछ कारकून भी जुड़ चुके हैं, देखना दिलचस्प होगा कि ये कथा पात्रा धरती-कथा को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं...आगे बढ़ते हैं तो कितनी दूर तक और कब तक’
माथा पकड़ कर बैठे हुए लोग खड़े हो गये हैं ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, राम नाम सत्य है’ के बोल बोल रहे हैं। बोल हवा में तैरने लगे हैं। इस ‘राम नाम सत्य है’ के उच्चरण में कई तरह की दर्दनाक घ्वनियों का समायोजन है। कितना कष्टकर है ‘राम नाम सत्य है’ केवल एक वाक्य का लय बन जाना, गॉव के महाप्रलय के बाद। ‘राम नाम सत्य है’ धुन महाप्रलय के बाद पूरे गॉव की लय बन चुकी है जो गॉव में हुई गोलीकाण्ड के कारण पैदा हुई है। यह लय उर्फ प्रलय कब से है मानव इतिहास में पता नहीं, शायद किसी को पता हो, वे पारंपरिक रूप से इस बोल को बोलते चलते हैं शव वाली तिख्ती के साथ किसी के मर जाने के बाद। क्या यह लय मृत्यु का सत्य है? जीवन जीते रहने और न जी पाने के बीच का सत्य है? क्या है इस लय में? क्या इस लय में जीवन की सत्ता है, व्यक्ति की अस्मिता की सत्ता है, जीवन जीते रहने और उसे समाप्त हो जाने के बीच की मारक चीखें हैं, आज है, कल भी थी और परसों भी। इसी लय के साथ पूरे गॉव कीं चीखें हैं, कराहे हैं तथा ऑसू हैं जो जाने कितने समय तक गॉव वालों की ऑखों को डब-डबाये रहेंगी। क्या पता!
गोलीकाण्ड और ‘राम नाम सत्य है’ के बीच छिपी हुई बातें मानवीय सभ्यता के उन दरारों से उपजती हैं जो आदमी और आदमी में संपत्ति-मोह के कारण पैदा होती हैं, मेरा, तेरा करती हैं और ‘हम’ तथा ‘हमारे’ वाले लोकबोध को लील कर मैं में बदल जाती हैं। इसी संपत्ति-मोह तथा अधिकतम धन-अर्जन की चाहनाओं के कारण बन्दूकें चलती है, कतल होते हैं और मानव समीपता, एकता वाली सभ्यता कहीं कोने में दुबकी पड़ी कराह रही होती है।
‘राम नाम सत्य है’ बोल रहे हैं लोग, बोलने का भी एक क्रम है, तिख्ती उठाये हुए लोग पहले बोल रहे हैं फिर तिख्ती के साथ चलने वाले दूसरे लोग उसे दुहरा रहे हैं, बोल सभी रहे हैं। पूरी भीड़ ‘राम नाम सत्य’ में डूबी हुई है पर क्या है सत्य? सत्य को कैसे जाना जा सकता है? फिर यह सत्य क्या जीते जी नहीं जाना जा सकता, देह के समापन के बाद ही यह सत्य क्यों उभरता है बाहर लय बन कर?
औरतें रुक गई हैं गॉव में, वे नहीं जा सकतीं शव-दाह स्थल तक पर सुगनी अड़ गई है, उसके साथ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी...सभी अड़ी हुई हैं।
‘नाहीं हम जायेंगे, हम दाह दंेगे, हम मेहरारू हैं, अपने पति का दाह नाहीं देंगे तऽ कौन दाह देगा? नेम नाहीं है दाह का, तऽ न रहे, का होता है नेम से, हम नेम सेम नाहीं मानते, हमैं दाह देना है तो देना है, कोई दूसर काहे दाह करेगा।’
औरतें अड़ी हुई हैं अपनी बात पर, बबुआ, खेलावन और बन्धू समझा रहे हैं औरतों को पर औरतें नहीं समझ रही है उनकी बातें, वे जिद पर अड़ी हुई हैं, बिफनी भी समझा रही है सुगनी को...
‘देख सुगनी तोहके बहुत काम करना है जौने के सरवन बबुआ नाहीं कर पाये हैं ओके तऽ तूंहै पूरा करेगी नऽ, फेर काहे जिद कर रही है उहां जाने के लिए, जिद छोड़ दे, तूं जिद नाहीं करेगी तऽ तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी भी जिद नाहीं करेगी। वे अबोध हैं, अजान हैं, ओन्है तऽ जौने समझा दिया जायेगा, मान जायेंगी। हमरे समाज कऽ जौन नेम है, ओके मानना चाहिए हमैं, बूझ रही है नऽ हमार बात के हम का बोल रहे हैं।’
सुगनी गुम-सुम है खुद में खोई, सुन रही है बिफनी की कही बातें, फिर बोलने लगी-
‘यही तो समझा रहे थे बबुआ अउर पुनवासी भइया, पर हमरे समझ में नाहीं आ रहा कुछ के हम का करें, काहे न जायें अपने पति केे दाह में, एक बुन्न पानी भी नाहीं पिलाय पाये हम ओन्हैं, हमैं जीन रोक बिफनी दीदी! हम जायेंगे जरूर।’
गॉव के कई सयाने जुट गये हैं वहां, सभी समझाय रहे हैं, बिरादरी के पंडित जी भी आय गये हैं वे भी औरतों को समझाय रहे हैं, कर-किताब का हवाला बताय रहे हैं, धरम-करम की बातें बताय रहे हैं, इशारे इशारे में बताय रहे हैं के कोई अशगुन होय गया तो...
अशगुन का डर सभी को है, सुगनी, तेतरी, बिफनी, बैसाखी, फगुनी सभी डरों में हो जाती हैं, अशगुन होय सकता है, पता नाहीं कौन अशगुन था के यह सब हुआ गोली चल गई, दस दस जवान मरद मरि गये आगे जाने का हो... अशगुन तो होता ही है और वह तरह तरह का खेल भी खेलता है...
अशगुन का नाम सुनते ही सुगनी बीते समय में चली जाती है जिसे उसने देखा है। उसके नैहर में एक अशगुन होय गया था, बरम बाबा के इहां उसकी काकी ने अपने लड़के का मुंडन बरम बाबा के यहां नहीं करवाया था, घर पर ही करवा लिया था और कथा भी सुन लिया था.. लड़का तीसरे दिन ही बीमार हो गया, ऊ तऽ पुजैती हुई के बचि गया लड़का नाहीं तऽ जाने का होता, तो अशगुन बड़ा खतरनाक होता है...।
ढली उमर वाली औरतों को बुरा लग रहा है, ई सब का बोल रही हैं, मेहरारू दाह
नाहीं देतीं, वे भी समझाय रही हैं, सुगनी मान जाती है फिर तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी मान जाती हैं।
बबुआ तिख्ती उठवाने लगता है कुछ ही देर में तिख्ती चल पड़ती है तिमुहानी से कतल वाले स्थान की तरफ, ‘राम नाम सत्य है’ गूंजने लगता है हर तरफ... पॉच पड़ाव के बाद तिख्तियां पहुंच जायेंगी वहां। हर पड़ाव पर पंडित कुछ अनुष्ठान करते हैं, चावल के दाने और फूल छिड़के जाते हैं, एक मिनट का विश्राम होता है, तिख्ती पर के कांधे बदले जाते हैं, दूसरे लोग अपने कांधे पर उठा लेते हैं तिख्ती, तिख्ती चल पड़ती है कतल वाले स्थान की तरफ।
पंडित का अनुष्ठान देख रहा है बबुआ, पहले उसके समाज में ऐसा नाहीं होता था, ई तिख्ती रोक रोक कर अनुष्ठान कराना यह का है बाभनों-ठाकुरों वाला काम, औन्हई लोगन की तरह बिआह-शादी भी कराना। बबुआ घबरा रहा है बे मतलब देरी करा रहा है पंडित। बपई तो बोलते हैं के हमलोगन की बिरादरी में ई सब नाटक नाहीं होता है, दाह देने वाले का मंुडन हो गया फिर तिख्ती पर लाश ले गये अउर भगवान का नाम लेके जलाय दिये। दस दिन बरकाय के गियारहवें दिन करम-काण्ड कर दिये। ओही समय महापातर आते हैं, ओन्हय दान-दक्षिणा दे दिये होय गया काम खतम। अब तऽ सब करना पड़ता है बाभनों-ठाकुरों की तरह। बबुआ परेशान है, उसे दाह के बाद स्कूल पहुंचना है, वहां कानूनगो साहब उसकी राह देख रहे हैं, कलक्टर साहब की तरफ से गॉव में बाटने के लिए राशन आया है, उसे बटवाने के लिए कानूनगो साहब से बात करनी होगी। कैसे बटेगा राशन, का पूरे गॉव वालों को या जेकरे घरे मरे हैं लोग वोही घरे वालों को, लेखपाल तो बोल रहे थे पूरे गॉव वालों को राशन दिया जायेगा।
तिख्ती को कतल वाले स्थान तक लेकर चलने के बीच के सारे अनुष्ठान खतम हो चुके हैं, खून से सना वह स्थान भी पास आ चुका है, दूर से ही दिखाई दे रही हैं चिता के लिए सजाई गई लकड़ियां। वहां तिख्ती जमीन पर उतारी जा रही है और पंडित जी फिर कोई अनुष्ठान कर रहे हैं। पंडित जी का अनुष्ठान खतम होते ही दाह की तैयारी शुरू हो गई... दस परिजन तैयार हैं वहां मुंडन करा कर, किसी भिक्षु की तरह एक सफेद कपड़े में दीख रहे हैं वे।
दाह दिया जा रहा है, कुछ ही देर में सारी चितायें एक ही साथ जल उठेंगी और दस आदमी विलीन हो जायेंगे धरती में...
लकड़ियों ने आग पकड़ लिया है, लपटें उठ रही हैं आकाश की तरफ, वहां बैठे लोग आग की गर्मी से इधर-उधर खिसक रहे हैं, लगभग दो घंटे के बाद वहां राख बचेगी, दस लोगों का जीवन राख में विलीन हो जायेगा। कुछ समय बाद उनकी यादें भी राख में तब्दील हो जायेंगी। गोलीकाण्ड की घटना भी कुछ समय बाद चिता की राख बन जायेगी फिल-हाल तो ताजी है घटना, कुछ दिन, कुछ महीने, कुछ साल जीवित रहेगी।
तनबुड़ुक भी वहीं पहुंच गया है, ‘धरती केहू कऽ न भई वाला गीत’ उसे पगलाये हुए है, लगा कि वह गाने लगेगा, खुद को संभाल रहा है तनबुड़ुक, यहां नहीं गाना
है उस गीत को। तनबुड़ुक जाने कैसे दो दिन के लिए विक्षिप्त हो गया था... अपने भाई बुद्धन को देखते ही उसका माथा घूम गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि का हो गया उसे...
रमेशरी भउजी भी समझाय रही थीं के तूं संभल के रहोगे तभी तो आगे का काम संभाल पाओगे, अपना माथा ठीक रखो बचवा! अब तऽ ऊ नाहीं रहे।’
रमेशरी ने बुबआ से बोल दिया था कि तनबुड़ुक से दाह जीन दिलवाना उसके चचेरे भाई से दिलवा देना। वही हुआ। तनबुड़ुक का चचेरा भाई दाह दे चुका है बुद्धन का। गॉव के दूसरे लोग तनबुड़ुक को देख रहे हैं, तनबुड़ुक शान्त, स्थिर और खुद में डूबा हुआ है। शायद उसकी समझ में आ गया है कि अब उसका भाई वापस नहीं आने वाला, उसे समय से टकराने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।
रात काफी गुजर चुकी है अभी पोखरे में नहाने के लिए औरतों को आना होगा, बबुआ फिकिर में है, इहां से जल्दी लौटना चाहिए पर लाशें जल जायेंगी तभी नऽ। जितने गोतिया हैं उन सभी के घरों की औरतंे पोखरे में नहाने के लिए आयेंगी। लाशें जल जाने के बाद मरद लोग पोखरे में नहायेंगे फिर गॉव आ कर ऑगन में बैठेंगे, ऑगन में भी एक अनुष्ठान होगा, वहां टंगारी होगी, उस पर पैर रखना होगा, कूसे से रखे पात्रा में से जल लेकर पावों पर छिड़कना होगा, जब तक इस तरह की क्रिया सभी बैठने वाले कर लेंगे तभी सब उठेंगे वहां से फिर अपने अपने घरों की तरफ लौटेंगे।
ऑगन वाले अनुष्ठान के बाद सभी लोग अपने अपने घर चले गये। औरतें भी पोखरे में से नहा कर वापस लौट चुकी हैं। बबुआ खेलावन, बंधू और पुनवासी के साथ स्कूल पर आ गया है। राशन की ट्रक आई थी और राशन उतार कर चली गई है। राशन स्कूल के बाहर ही बोरों में पड़ा हुआ है। स्कूल के मास्टर के साथ कानूनगो तथा लेखपाल सोये हुए हैं एक दरी पर। दो तीन कमरों में पुलिस के लोग सोये हुए हैं दरी पर, स्कूल में खटिया तो थी नहीं।
बबुआ सोचने लगा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं, सबह ही रखा जायेगा सारा राशन कमरों में पर सुबह तो गॉव वाले राशन लेने आ जायेंगे, तहसीलदार साहब की बातें गॉव वाले पहले ही सुन चुके हैं...
बबुआ नहीं सोच पा रहा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं...
वह पूछता है खेलावन से..
का हो खेलावन! का करना है, का कानूनगो साहब को जगा दें, कल सुबह ही तो राशन बटवाना होगा, राशन बटवा कर खाली हो जाना ठीक होगा, घायल लोगों को भी तो देखने जाना है, ओनेके लिए खर्चा-पानी भेजना है, सरकार खर्चा-पानी थोड़ै देगी घायलों को खाना दे दे यही बहुत है फेर काल्हु दुधमुही भी तो है।
‘बबुआ देख, हमैं कुछ नाहीं बुझा रहा है जौन तोके नीक लगे उहै कर, जगाना हो तो जगा दे कानूनगो साहब को नाहीं तऽ चल इहां से, थोड़ा करवट बदल लें, नींद आ रही है पर लगेगी नाहीं, इहौ ससुरी एकदम नरम अउर मुलायम दिमाग चाहती है’ खेलावन ने स्पष्ट किया। साथ में ही बन्धू था वह बबुआ को समझाने लगा...
‘अरे बबुआ काहे जगायेगा कानूनगो साहब को, वे बेचारे भी तो आगे पीछे कर रहे है दो दिना से, अपना लेखपाल बेचारा तो घटना के दिन से ही धुक-धुका रहा है, ये सब ही तो डाक-कूद कर रहे हैं, साहब लोग थोड़ै कुछ करते है खाली हकूम देते हैं, फोन करते हैं। लेखपाल, कानूनगो, अमीन ये सब तो मजूरे होते हैं साहबों के हम लोगों की तरह, रहने दो जीन जगाओ कानूनगो साहब को, घरे चालो, थोड़ा करवट बदल लिया जाये’
बबुआ असमंजस में पड़ गया है, उसके साथी बोल तो सही रहे हैं, रात काफी हो गई है, बची ही कितनी है, बबुआ ने मोबाइल देखा, अरे चार बज रहा है, टैम का पता ही नहीं चलता। मोबाइल तो बन्धू के पास भी है पर उसका स्वीच आफ हो गया है, गॉव में बिजली नाहीं है।
‘चार बज गया हो, जाने दो अब नाहीं जगाना है कानूनगो साहब को चलो घर चलते हैं, बपई को भी तो संभालना होगा..’
‘अरे! बन्धू तूं चले जाना सोमारू काका के इहां ओनकर हाल-चाल ले लेना हम नाहीं जाय पा रहे हैं ओनकरे इहां, हां जाना जरूर, अरे आपन मोबाइल हमैं दे दो हम अपने इहां सौर ऊर्जा वाली बैटरी में लगाय देंगे चारज हो जायेगा।’
बन्धू अपना मोबाइल बबुआ को दे देता है और फिर तीनों अपने अपने घर की तरफ चले जाते हैं।
बुझावन काका खटिया पर पड़े हुए हैं। बिफनी ने सबेरे ही खराई कराना चाहा था ओन्है, बहुत जोर दिया था के बपई खराई मार लो पर काका कुछ खराई नाहीं मारे। बिफनी पोखरे से नहा कर जब घर लौटी तब उन्हें उनकी दवाई खिलाया था और खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख भी बदल दिया था। उसके बाद वह कुछ आराम करने के लिए अपने किनारे वाले कमरे में गयी थी, कुछ आराम कर ले... पर आराम कहां बबुआ आया नाहीं था, वह तो स्कूल पर गया हुआ था।
बबुआ काफी देर में आया तब भोरहरी होने वाली थी, तारे डूबने लगे थे चनरमा तो पहले ही डूब गया था, कुछ ही देर में मुर्गे बांग देने लगेंगे। बबुआ बपई को सोया जान कर घर के अन्दर जाना चाहा तभी पूछ बैठे बुझावन..
‘का हो बबुआ! सब काम निपट गया, खेलावन, बन्धू अउर पुनवासी कहां हैं? ये सब तोहरे साथै थे नऽ। देख! बबुआ! जौन हो गया होय गया अब आगे की देख, आगे संभल के चलना होगा। देखे नऽ सरवन का का हुआ? ऊ पारटी बहुत हरामी है बबुआ! बात-बात पर कतल-मार करने वाली, कब्बउ कुछ कर सकती है।
धन-दौलत की भी कमी नाहीं है ओ लोगन के पास, दस पॉच लाख खरच देंगे बच जायेंगे मर-मुकदमा से।’
बुझावन बैठ चुके हैं खटिया पर, सांसे फूल रही हैं उनकी, खांस भी रहे हैं, फिर भी बोलना चाह रहे हैं और बोल रहे हैं...
‘हम कब्बै से तोहार राह देख रहे हैं, तोहैं समझाने के लिए के संभल कर रहना। ऊ पारटी सरहंग है कुछौ कर सकती है, देखे नऽ कतल होय गया दस लालन कऽ। ऊ सब तऽ सरवन के पहिलहीं से निशाना बनाय लिए थे अउर...’
‘खैर छोड़ो संभल के रहना बबुआ! मर-मुकदमा सब कुछ छोड़ि दो, हम लोग ई गॉव छोड़ देंगे, बहत बडी दुनिया है कहीं भी गुजर-बसर कर लेंगे पर ईहां नाहीं रहेंगे इहय हम बिफनी को भी समझाय रहे हैं पर ऊ नाहीं मान रही है कुछ भी, बोल रही है....
‘काहे गॉव छोड़ दें बपई! हमलोग एहीं रहेंगे, अउर ओनकर मुकाबला करेंगे। देखना पुलिस ओ लोगन के कइसहूं नाहीं छोड़ेगी। बपई तूं नाहीं गये थे नऽ रापटगंज, पुलिस वाले सबै अफसर गरिया रहे थे उन बदमाशों को। एतना गुस्सा तऽ हम कब्बौ नाहीं देखे थे पुलिस कऽ बपई।’
बुझावन फिर खामोश हो गये, नया जमाना है, नई उमर है, इतना बड़ा काण्ड हुआ है आखिर कैसे चुप रह जायेंगे आज के जमाने के लड़के फिर सरवन तो बबुआ का हाथ पैर था, मुह था, जुबान था। अबहीं कुछ भी समझाना बबुआ को ठीक नाहीं होगा। बुझावन चुप लगा गये और चादर ओढ़ कर मुह तोप लिए।
बबुआ घर में दाखिल हो गया देखा कि बिफनी करवट बदल रही है, नीन उसे नहीं आई, नीन में होती तो करवट थोड़ै बदलती। वही हुआ...
‘आ गये का हो... पूछा बिफनी ने
‘हां आ तो गया, तोहैं नीन नाहीं आई का?’
नीन कैसे आती, सरवन भइया चले गये हमलोगन के छोड़ि के, तोहार जेतने संगी साथी थे सभै तो चले गये गोली सेे, दो तीन जने अउर बचे हैं, हम तऽ काफी घबराय रहे हैं, आगे का होगा, सब तोहरे कपारे पर आय गया है।
‘छोड़ एके का लेके बैठ गई?’
‘का स्कूल पर सारा सामान रखा गया’
‘हॉ रखा गया सब काल्हु सबेरही बटेगा भी’
फिर बबुआ खटिया पर पसर गया, रात बीत जाये, कल सबेरे राशन बटवाना होगा गायें में। पर रात का अंधेरा उसकी ऑखों में नींद बन कर नहीं उतर पाया, उसे दिखता कि सरवन उसके सामने खड़ा है और बुला रहा है...
धरती-माई भी नहीं जा पा रही है नींद में। जब स्वर्ग में थीं तब नींद के बारे में उन्हें सोचना नहीं पड़ता था। वहां तो जागना भी नींद माफिक होता था और सोना भी जागने जैसा होता था। मौसम का भी वहां पता नहीं होता था, जाड़ा, गर्मी, बरसात सभी मौसम आपस में घुले-मिले होते थे, ऋतुयें भी बराबर होती थीं क्या वसंत, क्या फागुन, क्या जेठ क्या अषाढ़।
‘नियाव का पोसटमार्टम
कैसे नापेगा भूख और भोजन की दूरी’
‘भूख और भोजन यानि जीवन और जीविका के लिए किए जाने वाले प्रतिरोध की तरफ बढ़ रही है धरती-कथा, धरती-माई भी कथा के साथ चल रही हैं। पर किस बात का प्रतिरोध, किसका प्रतिरोध। प्रतिरोध का मतलब क्या है कोई सत्ता भला प्रतिरोध से हिलती है? प्रतिरोध से तो वही सत्ता हिला करती हैं जो विनम्र होती हैं, जो जीवन और जीविका के उपायों को हर सामान्य के हित में उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हुआ करती है। प्रतिरोध और अनुरोध दोनों तो धरती के व्यवहार कौतुक हैं इससे धरती-माई का क्या लेना-देना। वे तो स्वर्ग की वासी हैं यहां धरती पर प्रवासी हैं। स्वर्ग में तो तप और तपस्या को चलन है, तन को तपाओ और मन को साधना में। धरती पर तो तप और तपस्या का कोई मतलब ही नहीं।’
तप और तपस्या से सरवन और बबुआ का भी कोई मतलब नहीं, वे धरती-कथा के पात्रा हैं केवल इतना ही। बेर चढ़ गई तब नींद खुली बबुआ की हालांकि वह साधना में नहीं था, बिफनी पहले ही जाग गई थी, उसका मन हुआ कि जगा दे बबुआ को पर नाहीं थके हैं काफी, थोड़ा आराम कर लेने देते हैं तब तक हम चाय बना लेते हैं। बर्तन तो पहले से ही मजाया हुआ है। रात अउर दिन का खाना तो बनना था नहीं, खाना बनता भी कैसे गमी पड़ गई है। दुधमुहीं के बाद ही खाना बनेगा। बपई के लिए अहिरान से खाना आ गया था अउर सोमारू काका को भी वे लोग ही रोटी खिला आये थे। इतना तो है ही हमरे गॉयें में...
‘कउनो दुख-सुख पड़ता है गॉयें में अहिरान अउर चेरवान सभै जुट जाते हैं। जात पात का फेर-फार ऊ लोग नाहीं मानते। आजउ कऽ रोटी ओही लोगन के घरे से आयगी बुढ़वा लोगन अउर बाल-बुतरूओं के लिए, हमहन के घरे तऽ रोटी तब बनेगी जब दुधमुहीं बीत जायेगी। एकरे पहिले चूल्हे में आगी नाहीं जलेगी। पहिला चूल्हा जलेगा ‘अगदेउआ’ का जिसने दाह दिया है फेर बाद में घर का।’
बन्धू भइया तऽ बोल रहे थे के दुधमुहिंयो एक्कय जगह पर करना चाहिए देखो का होता है। ई सब के बारे में बुधनी काकी से पूछना होगा, परमू काका भी बताय देंगे। सबेरे हम बोलेंगे बन्धू भइया से एकरे बारे में।
बिफनी सबेरे उठ कर चाय बना रही है, चाय बन जायेगी तब जगायेगी बबुआ को पहले बपई को पिलाना होगा...
बिफनी चाय बना ही रही थी कि खेलावन, बन्धू और पुनवासी उसके घर पर चले आये। नीन तो आई नाहीं फेर का सोना चलो बबुआ के ईहां चलते हैं, फेर स्कूले पर चल कर राशन बटवा देते हैं, कोटेदार आय गया होगा। बंधू ने घोराय दिया था खेलावन को, उनके पास ही घर है पुनवासी का फिर तीनों साथ चले आये बबुआ के पास। ...
उन लोगों को देखते ही बिफनी चाय बनाने के लिए पानी बढ़ा देती है, पर चीनी तो कम है का होगा, गुड़ की बनाय देते हैं वोही में मरीच डील देंगे अउर तुलसी का पत्ता.
तुलसी का पत्ता.. ‘गमी’ में कैसे तोडं़ेगे, नाहीं तोड़ना चाहिए तुलसी का पत्ता गमी में। बिना तुलसी का पत्ता के ही बनाय देते हैं चाय।’
घर में खटर-पटर सुन कर जाग जाता है बबुआ...
‘का खट-पट कर रही है, नीन उचट गई,’
कुछौ नाहीं कर रहे हैं चाय बना रहे हैं, अउर खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया आय गये हैं, का तऽ स्कूल जाना है नऽ, राशन बटवाने के लिए। थोड़य देर में बुधनी काकी अउर परमू काका भी आय जायंेगे तब बात होगी दुधमुहीं के बारे में, इहो तय करना होगा, कैसे होगी दुधमुहीं, घरे, घरे होगी के एकय जगह पर होगी।
बबुआ उठो अब चाय पी लो, बपई के पासै बैठाय दिए है खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया के।
बबुआ कसमसाकर खटिया छोड़ता है, उसे सरवन दिखता है पर वहां सरवन नहीं है। खुद को सचेत करता है..आराम करने का समय नाहीं है उसके पास पर देह का क्या, वह तो कभी भी अपनी मांग लेकर तनेन हो जाती है लगती है गर्ु्राने। बबुआ किसी तानाशाह की तरह देह की गुर्राहट का दमन कर देता है...
‘बैठी रह किनारे, चुप अउर खामोश।’
उसकी देह बबुआ की एक ही घुड़की में ठंडा गई फिर बबुआ ऑगन में आ गया और बरामदे की तरफ चल दिया।
‘का हो बबुआ! भुलाय गये थे का स्कूल पर चलना है।’
‘नाहीं हो खियाल था पर नीन का का करें उसने जकड़ लिया।’
बिफनी गिलासों में चाय ले आई। सबसे पहिले उसने बपई को गिलास थमाया फिर सभी को...
बुझावन इस बीच समझाय रहे थे खेलावन, बंधू अउर पुनवासी को। वही समझाइस जो वे रात में ही बबुआ को समझाय चुके थे। बुझावन करते भी क्या खटिया पर पड़े पड़े, वे तो केवल समझा ही सकते थे। उन्हांेने सामंती जीवन देखा था, उसकी यातना को भी भोगा था, वे जानते थे कि ये जो जगह जमीन के मालिक हुआ करते हैं उनका मन और दिमाग सामंती रंगंों से रंगा होता है, वे मार-पीट और दमन को अपने लिए किसी औजार की तरह से इस्तेमाल करते हैं फिर करें क्यों नऽ सरकार भी तो उनके जैसे लोगों की ही तो होती है।
बबुआ को आता देख एकदम से चुप हो गये बुझावन, मन में सोचने लगे...बबुआ नाहीं मानने वाला, आजु के समय का जवान है, गरम दिमाग का, गरम दिमाग वाले आर-पार की बात करते हैं, या तो एहर या तो ओहर, बीच में कुछ होता ही नाहीं एहर-ओहर के बीच में तऽ हमलोगन के समय में होता था...जाने दो का हुआ, अगर मार दिया मालिक ने तो का पीठ खिया जायेगी? भला आज के समय का लड़का एके मानेगा, वह भिड़ जायेगा, मार खायेगा तो मारेगा भी, खाली मार खाकर घरे नाहीं लौटैगा। हे भगवान! हम का करि सकते हैं, बबुआ की रक्षा करना। कहते हुए बुझावन चुप हो गये और चाय पीने लगे।
चाय पी चुकने के बाद बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी स्कूल पर पहुंचे। स्कूल पर जगरन थी। कानूनगो तथा लेखपाल सभी जागे हुए थे, पुलिस के लोग भी जाग चुके थे और दतुइन-कुल्ला कर रहे थे। स्कूल के मास्टर और राशन का कोटेदार भी आ चुका था। स्कूल के सामने भीड़ भी कम न थी। लोग थे वहां पर राशन बटना था गॉव में।
लेखपाल ने बबुआ को सहेजा कि सूची बन गई है और सूची के अनुसार एक एक लोगों को राशन लेने के लिए भेजें, कोटेदार तराजू का काटा खड़ा कर चुका था। उपभोक्ता सूची लेखपाल ने ले लिया था, काननू गो साहब भी वहीं निगरीनी में मास्टर के साथ बैठ चुके थे...
तभी अचानक वहीं बुधनी काकी और परमू काका भी आ गये...
का होय रहा है इहां, काहे आये हो तूं लोग का बात है?
‘राशन बंाटना है’
‘केकरे पेटे में आग लगी है? ऊ तऽ सामने आये, दस दस लड़िका मरि गये हमरे गॉयें कऽ अउर तूं लोगन के पेट में आग लगी है। खाली राशन से काम चलि जायेगा का? हम पूछ रहे हैं तूं लोगन से, जरा बताओ हमैं खाली राशन से पेट भरि जायेगा, के जौन लोग हमरे लालन के मारे हैं ओनकर गिरफ्तारी भी होयगी।’
स्कूल के सामने की भीड़ शान्त और स्थिर..
‘परमू काका बोल तो सही रहे हैं अपराधिन कऽ गिरफ्तारी होय के चाही, का होगा राशन लेय के...’
सामने ही बुधनी काकी भी थीं...
‘सही बोल रहे हो परमू भइया! हमैं राशन नाहीं लेना है तऽ नाहीं लेना है। दस दस लाल हमारे मरि गये, तऽ चले हैं राशन बाटने, काहे बाट रहे हो राशन भइया। हम लोग तऽ मुकदमा निपटाने के लिए बोल रहे थे, नहीं निपटाये, मुकदमवै निपटाय दिये होते तऽ कतल नाहीं होता नऽ। अब जब कतल हो गया तऽ चले हैं राशन बांटै। ई लोग रोटी खिालय के गोली मारते हैं परमू भइया। मुकदमा की गोली से मारि दिये हमरे लालन के।
भीड़ तो भीड़ होती है, उसका मिजाज बदलने के लिए भीड़ के किसी कोने से थोड़ी सी हवा चाहिए जो भीड़ के माथे को सहला सके या उसे गरम कर सके और कुछ नहीं, हवा बह गई कोने से, उठने वाली हवा गरम थी, उत्तेजक थी। सो हवा ने भीड़ को गरम कर दिया।
हालांकि गॉव में गमी थी, शोक था, साथ ही साथ भूख थी गॉव में, गरीबी थी,
बेरोजगारी थी और उन पर गमी का असर नहीं था। भूख, गरीबी और बेरोजगारी की भाषा, संस्कृति और सभ्यता नहीं पहचानती, कथित सभ्यता से इसका नाता नहीं होता, भूख की अपनी अलग भाषा होती है, अलग चीखें होती हैं, लगी चीखने गॉव की भूख, भूख की चीख भी भूखी थी सो इसका सुर थोड़ा कड़क और उत्तेजक था, इसने स्कूल पर बैठे सरकारी अहलकारों को परेशान कर दिया...
स्कूल पर जमे सिपाहियों के कान खड़े हो गये, बवाल होगा का? दारोगा जी भी नहीं हैं ईहां, रातै में चले गये सब कुछ ठंडा देख कर, का होगा आगे?
कानूनगो साहब भीड़ के सामने खड़े हो गये...
‘का बात है आप लोग नारा काहे लगा रहे हैं, का राशन नहीं लेना है आपलोगों को, सरकार ने आपलोगों के लिए ही तो राशन भेजा है... गॉव में कोई भूखा न रहे।’ बुधनी काकी पास ही में थीं..
‘हम बूझ रहे हैं साहेब के सरकार ने हमलोगों के लिए ही राशन भेजा है पर कब भेजा है? हम पूछ रहे हैं आपसे, ई भी तो बतावैं सरकार! ई नाहीं बता रहे हैं बोल रहे हैं के सरकार ने राशन भेजा है।
‘जब दस लाल मरि गये तब राशन लाये हैं। मुकदमवा नाहीं निपटाय दिये, मुकदमवा निपटाय दिये होते। हमैं राशन नाहीं चाहिए, धरती-माई हमलोगन के राशन दे देती हैं, जांगर है तऽ राशन की का कमी। हमार धरती हमैं दिलवाय दो हमैं आपन धरती माई चाहिए, हम अपने धरती-माई को बेइज्जत नाहीं होने देंगे। जेही आवै उहै लूट ले इज्जत। हमलोग धरती-माई को पूजते हैं हर साल। जाइए उन हत्यारों को दे दीजिए जिन लोगों ने हम लोगांे के लालों को मार दिया है, हमलोग नाहीं लेंगे राशन, हम लोग करम कराने वाले महापातर नाहीं है कि करम करवाने का दान लें।’
बुधनी काकी जोर जोर से चिल्ला ही रहीं थीं कि गॉव के दूसरे लोग भी चिल्लाने लगे, हम पिण्ड दान लेने वाले महापातर नहीं हैं, आपन राशन ले जाओ, हम लोग राशन नाहीं लेंगे हमैं आपन धरती-माई चाहिए।
बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान परेशान, हो का रहा है गॉव में हालांकि बबुआ जानता था कि गॉव जितना ठंडा दिखता है उतना है नहीं, गरम होना भी जानता है गॉव। उसने तो यह सोच कर सरकारी राशन उतरवा दिया था गॉव में कि हो सकता है गॉव वाले ले लें, गॉव वालों को राशन लेने के लिए मना करना ठीक नहीं होगा वैसे उसका मन नहीं था। पर संकोच भी तो होता है कुछ। बबुआ का संकोच टूट गया किसी भी हाल में सरकार का खैरात नहीं लेना तो नहीं लेना। वैसे भी गॉव में राशन की कोई कमी नाहीं खाने भर का अनाज सभी को दे देती है धरती-मइया।
कानूनगो और लेखपाल अलग से परेशान अब का करंे?
कानूनगो ने लेखपाल से पूछा...
‘का हो अब का करना है, गॉव वाले तो राशन नाहीं ले रहे हैं। कानूनगो को तो पता ही है कि यही गॉव वाले लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भी नहीं जाने दे रहे थे। एक औरत थी जो भिड़ गई थी महिला पुलिस इन्सपेक्टर से...लगता है यह वही महिला है... काननूगो साहब को पूरा ख्याल आ गया, कुछ कुछ बुधनी काकी का चेहरा भी.. चेहरा तो वैसा ही दिख रहा..वही है घटना के दिन वाली बोलाक महिला।
‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है, तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल दिखता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हम लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव नियाव मॉग रहा था।’
कानूनगो की ऑखों में घटना का दिन पूरी तरह से तैर गया। बुधनी तो उनकी ऑखों में तैरने ही लगी, एस.पी.और डी.एम.साहब भी तैरने लगे। बहुत ही चालाकी से दोनों आला-अधिकारियों ने उस महिला को समझाया था और न्याय दिलाने का वादा भी किया था। कानूनगो साहब को लगा कि उन्हें भी उसी प्रलोभनिया तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। वे आगे बढ़े और बुधनी काकी तक जा पहुंचे...
‘माता जी ऐसा है नऽ राशन ले लीजिए आप लोग और जो लड़ाई लड़नी है आप लोगों को वह बड़े साहबों से लड़िये। हम तो आपैलोगन की तरह कानून के मजूरे हैं, हम कउनो साहब थोड़ै हैं, हम कुछ नाहीं कर सकते।’
‘तो काहे के लिए इहां आय गये, जौन साहब हांेय ओन्है बुलाय लो’
बुधनी काकी गरज उठीं...
फिर भीड़ से एक ही बोल उठी... ‘साहब को बुलाय लो फेर बटवाओ राशन’
कानूनगो साहब परेशान, वे तहसील के सबसे चतुर एवं अनुभवी कानूनगोओं में हैं, उनकी बुद्धि भीड़ में राख की तरह उड़ गई अब का करें...
लेखपाल ने भी उन्हें सलाहा कि तहसीलदार साहब को फोन से बता दीजिए। काननूनगो साहब फोन जैसे ही मिला रहे थे गॉव में तैनात पुलिस वाले आय गये। पुलिस वाले चालाक थे, उन्हें ऐसी घटनाओं को निपटाने का अनुभव था..वे खामोश हो गये कुछ नहीं बोले। इस समय कुछ बोलना ठीक नहीं होगा, पूरा गॉव आग के तवे पर है समझाना-बुझाना आग ही लगाएगा।
संयोग अच्छा था तहसीलदार साहब का फोन मिल गया। कानूनगो ने गॉव के लोगों के द्वारा राशन न लेने का प्रकरण उन्हें बताया। उनके साथ एस.डी.एम. भी थे दोनों लोग मुख्यालय जा रहे थे। लखनऊ से जॉच कमेटी आई थी, उनके सामने हाजिर होना था। मुख्यालय को सूचित करके दोनों जन हल्दीघाटी वाले गॉव चले आये। हल्दीघटी वाला गॉव तनाव में था। साहबों को आता देख गॉव खामोश हो गया इतना तो होता ही है कहीं भी हो साहबियत का रूआब बोलक्कड़ों तक का मुह सिल दिया करता है, ऑखंे बन्द कर दिया करता है। गॉव एकदम खामोश...
एस.डी.एम.नई उमर के हैं। वे जब घटना स्थल पर मौका मुआइना के लिए आये थे तब उन्होने देखा था कि औरतों ने लाशों को घेर लिया था। लाशों को पोस्टमार्टम कराने के लिए औरतें नहीं ले जाने दे रही थीं, झगड़ बैठी थीं अधिकारियों से। वे भला कैसे भूल सकते हैं औरतों द्वारा किए जाने वाले प्रतिवाद को। औरतों का प्रतिवाद सुनकर उन्हें अचरज हुआ था...
यह सोनभद्र आखिर कैसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है? वे वैसे ही हिले हुए हैं, रात भर सो नहीं पाये हैं जॉच होगी पता नहीं जॉच में क्या हो... ट्रान्सफर हो जायेगा तो कोई बात नहीं कहीं सस्पेन्ड न होना पड़े, सरकार का क्या है जनमत बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है। एस.डी.एम. खुद को संभाल रहे हैं जनता के सामने मानवीय कमजोरी नहीं दिखनी चाहिए...
‘का है कानूनगो साहब! का बात है?’
‘साहब! गॉव के लोग राशन नाहीं ले रहे हैं, बोल रहे हैं कि हमैं राशन नाहीं लेना, हमै न्याय चाहिए, मुजरिमों की गिरफ्तारी चाहिए...हमैं धरती-माई चाहिए’
हॉ तो इसमें का है, इनकी मॉग तो सही है, गिरफ्तारी तो होनी ही चाहिए मुल्जिमों की। आपकी धरती-माई को कोई नाहीं छीन सकता, यकीन मानिए, ई धरती आपकी थी और आपकी ही रहेगी। एस.डी.एम. साहब ने तत्काल फोन मिलाया...
हॉ कोतवाल साहब!
अच्छा अच्छा, का हुआ मुल्जिमों की गिरफ्तारी का?
‘का एक मुल्जिम पकड़ लिया गया है, सभी मुल्जिमों का नाम उसने बताय दिया है, एक बन्दूक भी बरामद हो गई है का बोल रहे हैं कोतवाल साहब...’
‘हॉ साहेब सही बोल रहा हूॅ। बहुत पक्का मुखवीर मिल गया है।’
एस.डी.एम. साहब संयत हो चुके हैं उनका यकीन बढ़ रहा है कि वे गॉव वालों को समझा लेंगे। वे भीड़ की तरफ मुड़े, सामने ही बुधनी और परमू थे, वहीं बगल में बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी भी थे।
एस.डी.एम. साहब बुधनी के सामने हैं...
‘का हो माता जी! आपलोग राशन काहे नाहीं ले रही हो, पेट भरेगा तभी तो जान बचेगी, सरकार से लड़ने के लिए भी तो ताकत चाहिए, खाली पेट सरकार से लड़ने का का मतलब? आपलोग राशन ले लीजिए, मुल्जिमों की गिरफ्तरी एक दो दिन में हो जायेगी, एक मुल्जिम गिरफ्तर हो चुका है, आपलोग घबरायें नहीं।’ का एक मुल्जिम गिरफ्तार हो चुका है?
और नहीं तो का, कोतवाल साहब से अभी अभी बात हुई है, पूरे जिले की पुलिस
लगी हुई है इस काम में, माता जी! आप तो होशियार हैं आप समझिए मेरी बात। मैंने देखा था आपको मौके पर, आपके कहने पर ही गॉव वाले लाश ले जाने दिए थे पोस्टमार्टम के लिए। आप बोल देंगी तो गॉव वाले राशन ले लेंगे। राशन बटवा दीजिए फिर हमारे साथ चलिए घोरावल थाने पर वहां गिरफ्तार मुल्जिम को हम देखवाय देते हैं आपको।’
बुधनी काकी जितना बोलाक थीं उससे चालाक भी कम न थीं...
‘बोल पड़ीं, साहेब! हमलोगन कीहें राशन की कमी नाहीं है, धरती-माई खाने भर से जादा राशन दे देती हैं हमलोगन के, हमलोग बेचते-बिकीनते भी हैं, हमैं तऽ आपन धरती-माई चाहिए। मुकदमवा में नियाव करावैं साहेब।’
एस.डी.एम. नये थे और भूख की भाषा से परिचित थे, उनके कुदरती चरित्रा को प्रशासनिक करतबों ने बदला नहीं था सो वे गॉव वालों की भावना के अनुसार चल रहे थे पर वे कर क्या सकते थे, वे जानते थे अपनी सीमा, पर गॉव वालों को किसी तरह से समझाना है तो समझाना है।
‘हॉ हॉ माता जी! आपकी धरती-माई आपकी ही रहेंगी, हमलोग लगे हैं उस काम में बस आप लोग प्रशासन का साथ दें। डी.एम. साहब सरकार को लिख रहे हैं, सरकार ने भी आश्वासन दिया है आपलोग घबरायें नहीं’
एस.डी.एम. साहब के रिरियाने में प्रशासन था सो बुधनी को प्रभावकारी लगा बुधनी सहम गई... साहब बोल रहे हैं तो बात मान लेनी चाहिए, बात नहीं भी मानेंगे तो का कर लेंगे हमलोग प्रशासन का? बुधनी ने खुद से पूछा और राशन बटवाने के लिए राजी हो गई।
राशन बट गया तब बबुआ खाली हुआ फिर वह गॉव में लौट आया। यह बात मृतकों के परिजनों ने मान लिया था कि सुगनी के घर पर ही दुधमुही का आयोजन किया जायेगा, आयोजन में सभी ने भागीदारी दिया जो एक उदाहरण जैसा था। गॉव वालों की एकजुटता सराहनीय थी। राशन बट जाने के बाद एस.डी.एम. तथा दूसरे कर्मचारी वापस लौट गये। गॉव के प्रतिरोध के सामने प्रशासन कुछ कुछ झुकता सा दिख रहा था पर क्या आगे भी झुकेगा इस धरती-कथा में धरती का जीवित पात्रा बन कर...
‘सारा खेल धरती-माई देख रही हैं जो उनकी अपनी धरती पर हो रहा है पर उस खेल को धरती-माई न तो रोक पा रही हैं और न ही उसमें प्रतिभाग कर पा रही हैं केवल तमाशा देख रही हैं वैसे भी धरती के प्रपंचों के बारे में उन्हें क्या पता उनके लिए जो भी लोग धरती पर हैं सभी प्रिय हैं।’
दिक्कत भी यही है किसी कथा की, कथा अपने आप मुड़ जाती है भले लोगों की तरफ, उसे नायक बनाने के लिए मजबूर होती है कथा करेगी भी क्या, सरवन
तो मारा गया, बबुआ, खेलावन या उनमें से कोई नायक बन पायेगा..पता नहीं।
‘अन्धेरे में का दिखेगा...
देखते हैं क्या दिखता है?’
‘प्रिय तो धरती पर बहुत कुछ है, नदियॉ, पहाड़, जंगल, हरे-भरे मैदान, फसलों से लदी मुस्कराती धरती, पेड़ों के पत्तों से छन कर आती मन्द-मन्द हवा ऐसे ही बहुत कुछ पर गड़बड़ भी बहुत कुछ है उसी गड़बड़ी ने जनमा दिया है इस धरती-कथा को जिसका कथात्मक रूप भी बन चुका है, कथा आगे बढ़ भी रही है, कथा को बढ़ा सकने की क्षमता वाले पत्राकार रूपी धरती-पुत्रों ने संभाल लिया है अपना मोर्चा धरती-कथा को शासन प्रशासन तक पहुंचवाने का, उन्हें पढ़वाने का, कथा पर आवश्यक कार्यवाही करने का...’
धरती-माई के लिए है कि धरती के पुत्रा अपना अपना काम कर रहे हैं स्वर्ग के वासियों की तरह श्राप या आशीर्वाद तो नहीं दे रहे हैं और स्वर्ग के मनारेमों में केवल डूबे हुए तो नहीं हैं।
धरती की कथा प्रवेश कर चुकी है मीडिया में सो दर्दनाक घटना का दूसरा दिन अखबार वालों के नाम था। जनपद में आने वाले सारे अखबार घटना की चर्चाओं से भरे पड़े थे सभी पर हल्दीघाटी की घटना अपने अखबारिया कलेवर में काबिज थी। अखबारों के रंगीन व सादे पन्नों पर खबरें थीं, खबरें नाच रही थीं तो कहीं मुसिकया रही थीं जैसे खबरों का दिन उतर आया हो धरती पर। खबरों का रंग-रूप ठीक उसी तरह से था जिस तरह से काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद खबरों ने अपना रंग-रूप व साज-सज्जा धारण कर लिया था। कभी कभी ही देखने में आता है कि खबरों को भी सजाया जा सकता है, उसे नये कपड़े पहनाये जा सकते हैं, वही हुआ था। खबरें थीं कि नये परिधान में थीं और तमाम तरह की क्रियाओं-प्रतिक्रयाओं से सजी हुई थीं। खूबसूरत दिख रही थीं कि नहीं, पता नहीं....
खबरें अपनी साज-सज्जा से प्रभावित कर रही थीं पर उनका चरित्रा देख कर लगता था कि वे कुछ अनहोनी किसिम की घटनाओं के घटने के इन्तजार में रहा करती हैं। अनहोनी किसिम की घटनाओं के अलावा दसूरे तरह की घटनाओं से खबरों का पेट नहीं भरता। वे सोनभद्र के आदिवासियों की तरह भूखी रह जाया करती हैं बिना कुछ खाये पिये। उनका पेट तो तब भरता है जब कुछ अनहोनी हो जाती है, न कुछ हो तो बलात्कार ही हो। यह क्या है कि सत्कार, सत्कार चिल्लाते रहो, शुभ, शुभ बोलते रहो, उससेे खबरों का पेट भला कैसे भरेगा? कुछ लोगों ने तो काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद प्रकाशित होने वाले कई अखबारों को इकठ्ठा भी किया हुआ है, काश्मीर से 370 का हटाया जाना तो ऐतिहासिक था सो उसे संभाल कर रखना चाहिए, जाने कब काम आ जाये।
भला यह भी भूलने वाली बात है कि हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ माह पहले ही काश्मीर से 370 हटाया गया था, संभवतः स्वतंत्राता-दिवस के कुछ दिन पहले ही। बाद में स्वतंत्राता-दिवस का जश्न मनाया गया था। उस दिन के अखबार भी क्या खूब थे, माननीय गृहमंत्राी जी के चित्रों व बयानों से पूरे अखबार रंगे हुए थे। लगता था कि पन्द्रह अगस्त1947 वाला दिन भी उस दिन के मकाबिले काफी फीका रहा होगा, असली आजादी तो अब मिली है काश्मीर से 370 हटाये जाने के दिन।
अब यह किसे पता कि आजादी मिलने के बाद तबके गृहमंत्राी जी की फोटो प्रधान मंत्राी जी की तुलना में बराबरी पर अखबारों में छपी थी कि नहीं।
कानून समझने वाली तथा कानूनों से लाभ उठा सकने वाली सोनभद्र की जनता भी उस दिन गद्गद् हो उठी थी मानो वे नये स्वर्ग में दाखिल हो गये हों और पूरे देश को एक कानून, एक विधान, एक झण्डा मिल गया हो। वैसे एक कानून, एक विधान, एक झण्डा तो होना ही चाहिए पूरे देश में, अगर इसी के साथ एक पढ़ाई, एक दवाई तथा कमाई के एक दाम की भी बात हो जाती तो ठीक था। एक तरह से पूरा समाजवादी नारा ही उतर आया था 370 हटाये जाने के दिन घरती पर। कामन सिविल कोड से होते हुए कामन एजूकेशन कोड तक की यात्रा पर ही किसी जमाने में खॉटी समाजवादी चला करते थे, हर जगह इसी के नारे भी लगाया करते थे। कामन एजूकेशन कोड की तरफ हम कब बढ़ेंगे? देखना होगा कि हमारी सभ्यता ‘जैसा काम वैसा दाम’ ‘आवश्यकता के अनुसार दाम तथा योग्यता के अनुसार काम’ इसकी तरफ कब बढ़ती है? ऐसी आकांक्षाओं वाली खबरें अखबारों में नहीं थी। संपादकीय भी केवल 370 पर ही केन्द्रित थे विषय के अनुरूप।
विपक्ष के लोग बेचारे अखबार में कहीं नहीं थे। 370 पर पर विपक्ष की क्या भूमिका थी, या क्या होने वाली थी इसका कुछ पता नहीं चलता था अखबार से। संभव है विपक्ष भयभीत हो गया हो कि उसे ‘पाकिस्तानी’ बोल दिया जायेगा। बोला जायेगा कि जैसा पाकिस्तान बोल रहा है वैसा ही विपक्ष भी बोल रहा है। संभव है विपक्ष की उपेक्षा किया हो मीडिया ने और उसके बारे में खबर न दी हो। कौन अपनी पीठ पर पाकिस्तानी होने की मुहर लगवाये!
हल्दीघाटी वाले गॉव की खबर भी 370 हटाये जाने वाले दिन की तरह ही प्रकाशित हुई थी बल्कि उससे बढ़ चढ़ कर। कभी कभी प्रकाशित होने वाले अखबारों ने भी हल्दीघाटी वाले गॉवकी घटना पर केन्द्रित अंक प्रकाशित किये थे। आखिर खबरों में इससे अधिक क्या प्रकाशित किया जा सकता है? सारे मृतकों की फोटो छपी थी, घटना किस कारण से घटी वह भी प्रकाशित था। मौके पर हाजिर लोगों के बयान भी सचित्रा प्रकाशित किए गये थे गोया कुल मिलाकर अखबारों के करीब दो पन्नों पर हल्दीघाटी वाला गॉव छाया हुआ था बादलों की तरह। बकिया पन्नों पर ही देश-विदेश की खबरें जगह पा पाई थीं। उस दिन अचानक अखबार खरीदने वालों की संख्या भी काफी बढ़ गई थी सो अखबार कम पड़ गये थे। प्रशासन की सतर्कता तथा सचेतनता के बारे में भी शुभ, शुभ प्रकाशित था यानि अखबार में समय की जागरूकता मुखर थी।
घटना का दिन दमन के इतिहास का दिन बन चुका था ऐसा कभी नहीं सुना गया था सोनभद्र में। बहरहाल दिन चाहे कोई भी हो शुभ या अशुभ उसे हर हाल में गुजर जाना ही होता है और हल्दीघाटी की घटना वाला दिन भी गुजर चुका था। दिन तो होते ही हैं गुजर जाने के लिए। घटना के दिन रापटगंज के लोगों के कान खड़े हो गये थे और ऑखें सतर्क, दूसरे दिन ऐसा नहीं था, पूरा नगर पहले की तरह ही सामान्य बना हुआ था, नगर की न तो दुकानें बन्द हुईं थीं और न ही हल्दीघाटी वाले गॉव को लेकर कहीं प्रदर्शन वगैरह ही हुए थे। गोया जनपद का मुख्यालय पहले की तरह खामोश तथा अपने मुह पर पट्टी बांधे हुए था ऐसी उम्मीद पहले से ही थी। जनपद का एकमात्रा यह नगर अपनी खामोशी के लिए विशेष पहचान के रूप में जाना जाता है। वैसे भी हल्दीघाटी वाले गॉव से रापटगंज कस्बे से क्या लेना-देना था, वह मामला तो ग्रामीणों का था, आदिवासियों के दमन का था, सामान्य मार-पीट का था, ऐसे ममले तो होते रहते हैं हर जगह, पुलिस का मामला है पुलिस अपना काम करेगी।
एक उम्मीद थी कि संभव है रापटगंज काश्मीर से 370 हटाये जाने वाले दिन गरम हो जाये पर नहीं, उस दिन भी बर्फ की तरह ठंडा बना रहा, कहीं एक पत्ता तक नहीं हिला, नगर की सारी दुकानें हसती, गाती बजाती रहीं, गलियॉ आने जाने वालों को देख कर झूमती रहीं। सड़कों के बारे में तो न पूछिए वे भी मौसम के नशे से नहीं खुद की साधना में मस्त मस्त थीं। पर एक बात है जो गुनने लायक पहले भी थी और आज भी है कि जी.एस.टी. के विरोध में राबर्ट्सगंज की गलियों में आक्रोश की धमक फैल गई थी और पूरा नगर सरकार की नतियों पर थूकने लगा था हर तरफ हाय हाय होने लगी थी। गजब की गर्मी पसर गई थी नगर में, लगा कि विरोध मरता नहीं, वह लोगों के दिल-दिमाग में जिन्दा रहता है। रापटगंज भी विरोध में तनेन हो सकता है ऐसा पहली बार महसूस हुआ था।
भले ही रापटगंज शान्त दिख रहा था पर नगर के कुछ राजनीतिक लोग थे जो हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना से बेहद आक्रोशित थे तथा दुखी थे। हो क्या रहा है इस देश में पहले तीन तलाक का कानून आया, फिर अचानक 370 आ गया जाने और क्या क्या आयेगा? पर उनके भीतर जो कुछ था वह बाहर नहीं निकल रहा था सब के सब भीतर भीतर चाहे जो गुन रहे हों सरकार की नियति के बारे में पर खामोश थे तो खामोश थे। उनकी चुप्पी विशेष तरह की समझ के प्रस्ताव की तरह थी।
हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला सरकार से सीधे नहीं जुड़ा था सो जनपद के विरोधी नेताओं के लिए वहां का मामला राजनीतिक लाभ वाला जान पड़ा। इसका विरोध करने पर सरकार प्रताड़ित नहीं करेगी। इस मामले को उछालने से राजनीतिक लाभ मिल सकता है और जनता में पहचान भी बढ़ सकती है फिर क्या था... पहले दिन ही विरोधी-दलों के नेताओं ने भीतर भीतर तैयारी कर लिया कि घटनास्थल पर जाना चाहिए, प्रताड़ितों के परिजनों से मिलना चाहिए। उन विरोधी नेताओं में अधिकतर लोग खुद को गरीब जनता का हितैषी मानते थे तथा प्रताड़ितों के हितों की रक्षा के लिए किए जाने वाले राजनीतिक प्रयासों को अपना कर्म समझते थे। उनके साथ कुछ ऐसे भी लोग थे जो मध्यवर्ग यानि खेती-किसानी से जुड़े हुए लोगों के हितों के लिए कार्य किया करते थे यानि कामरेड तथा समाजबादी किस्म के लोग थे। ये लोग जाने कैसे बिना किसी पूर्व सूचना के हल्दीघाटी वाले गॉव की यात्रा बना लिए। ये लोग घोरावल तक तो पहुंच गये पर उसके आगे नहीं जा पायेे। पुलिस ने उन्हें वहीं घेर लिया और कस्टडी में ले लिया। कस्टडी में लिए जाने के बाद ये लोग सरकार विरोधी धुन वाले रटे-रटाये नारे लगाने लगे जो पचासों साल से लगातार लगाये जा रहे हैंऔर जाने कब तक सरकार के विरोध में लगाये जाते रहेंगे। हालांकि मौजूदा सरकार भी तो उन्हीं नारों के सहारे ही सरकार पर काबिज हुई है, नारों की नश्वरता के बारे में कोई सवाल नहीं। सरकार को क्या बताना उन नारों के मूल्यों के बारे में।
ये नारे भी क्या खूब हैं जब लगाये जाते हैं तब गर्मी पैदा कर देते हैं, पता नहीं किसने गढ़ा है इन नारों को। शायद ही किसी को पता हो। ये नारे उन लोक-गीतों की तरह के आस्वाद वाले होते हैं जिसके रचयिता को कोई नहीं जानता पर गीतों को याद किए रहता है। लोक-गीतों की तरह ये नारे भी अमर हैं।
कस्टडी में लिए गये लोगों में एक पूर्व विधायक जी भी थे, नौजवान, चेहरे से दुरूस्त, नई सरकार के पहले उनकी पारटी की ही सरकार थी। वे भी सरकार विरोधी नारों की धुनों में थे। लेकिन वही नारे जब उनकी सरकार में लगाये जाते थे तब विधायक जी का चेहरा बदरंग हो जाया करता था केवल इतना था कि वे गुसियाते नहीं थे अपनी शान्ति-प्रियता बचाये रखते थे। हल्दीघाटी वाले गॉव में जो कुछ थोड़े से दूसरे जाने वाले थे वे कामरेडियत से लबालब थे। उनकी तो बात ही और थी वे नारों के साथ उछल रहे थे। जितना नारे की धुनें उछलतीं उससे कई गुना ज्यादा वे उछलते। उनके नारों से लगता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव में वे क्रान्ति की फसलें उगाकर ही रहेंगे। आरोपी तो खेतों पर कब्जा नहीं कर पाये पर वे प्रताड़ितों के दिल-दमाग पर कब्जा जरूर पा जायेंगे। उनके साहस की निरीहता देखने लायक थी जिसे सरकार विरोधी नारों ने ही सजाया-दुलारा था। सो वे बेचारे काहे खामोश रहते उन्हें पुलिस भी नहीं पहचानती थी। दो तीन सुरक्षा-कर्मियों ने उन्हें पकड़ा और सीधे पुलिस की वैन में बिठा दिया...
‘यहीं नारा लगाओ चाहे जो करो, बाहर भीड़ न इकठ्ठा करो।’
पूर्व विधायक जी की बात दूसरी थी उनका राजनीतिक चेहरा चमकदार था सो उस चमक में पुलिस के लोग भी थे। पुलिस उनसे आग्रह कर रही थी कि...
‘विधायक जी! हमलोग आपको हल्दीघाटी गॉव तक तक नहीं जाने दे सकते जब तक कि वहां की स्थिति सकारात्मक नहीं हो जाती। वहां जाने पर आपको भी खतरा
है सो पुलिस किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले सकती। वैसे भी वहां धारा 144 लगी हुई है, आप तो कानून मानने वाले पूर्व विधायक हैं, आप कानून का सम्मान नहीं करेंगे फिर कौन करेगा? आप ही सोचिए...’
पुलिस की निवेदनिहा शैली से पूूर्व विधायक जी संकोच में पड़ गये। पुलिस की मुलायमियत ने उन्हें गुनने के लिए विवश कर दिया कि अभी उनके विधायकी वाला सम्मान मरा नहीं है वरना पुलिस तो भर मुह किसी से बात तक नहीं करती।
पूर्व विधायक ने सीधे एस.पी. को फोन मिलाया संयोग ठीक था फोन मिल गया। एस.पी. ने भी उनसे वही बताया जिसे पुलिस पहले ही बता चुकी थी। अब विधायक जी का करते? धारा 144 तोड़ना उनके वश का नहीं था उन्हें पता था कि अगर पुलिस अपने पर आ गई फिर तो मार-पीट, कितने डंडे पडं़ेगे गिनना मुश्किल हो जायेगा सो पूर्व विधायकी की खोल में दुबक जाना ही विधायक जी ने समयोचित समझा और चुप हो गये। आदमी ही क्या जो समय की चाल न बूझे, बे मतलब पिट-पिट करता रहे और मार खाता रहे। सम्मान अगर एक बार गिर गया फिर उसे उठाया नहीं जा सकता। बहुत ही नाजुक होता है सम्मान।
पूर्व विधायक जी एक चिन्ता से दुबले हो रहे थे कि पत्राकारों ने उनसे बातें नहीं की ऐसा गुनते ही वे नारा लगाने लगे, नारे वही पुराने थे पचासों साल पहले वाले ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे’ इसके साथ ही राममनोहर लोहिया का नारा...‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं’।
‘धन-धरती बट कर रहेगी, कमाने वाला खायेगा, लूटने वाला जायेगा’ इस तरह के नारे वहां नहीं थे। इनकी जगह पर एक ऐसा नारा था जिसे सभी लगा रहे थे कि.
‘आरोपियों को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो’
‘जो खेत को जोते कोड़ै वह जमीन का मालिक होवै’
यह नारा भी खूब खूब उछला था।
विधायक जी को तो पता था कि कोई दूसरा पत्राकार उन्हें कवर करने के लिए आये न आये उनका चहेता पत्राकार तो अवश्य ही आयेगा पर वह भी नहीं दिख रहा, प्रचार का एक सुनहरा मौका उनके हाथ से निकला जा रहा था। पत्राकार वगैरह आ जाते तो उनकी फोटो अखबार में छप जाती, किसी चैनल पर उनकी बाइट भी आ जाती पर पत्राकार नहीं थे वहां। संभव है पत्राकारों को उनकी गिरफ्तारी की खबर ही न मिली हो, ऐसा ही होगा, नहीं तो उनके चहेते पत्राकार तो आन पहुंचते वहां।
विधायक जी परेशान थे, अब क्या करें, उन्हें उस समय तात्कालिकता का एक ही कर्म समझ में आया कि नारे लगाओ? नारों की आवाज दूर तक जाती है, वह जायेगी ही। नारे लगाने के लिए अच्छा परिवेश था, भीड़ थी, उत्सुक जनता थी फिर क्या था विधायक जी जोर-जोर से नारा लगाने लगे। उनके साथ भीड़ के रूप में जो
कामरेड थे वे भी लगे नारा लगाने लगे। नारा लगाने में सभी आगे थे पर कांग्रेसी थोड़ा कमजोर थे, वे विरोधी राजनीति का क,ख,ग, सीख रहे थे पर वे बेचारे भी अपनी क्षमतानुसार नारे लगा रहे थे।
पत्राकारों का क्या वे तो खबरें सूंघते रहते हैं। विधायक जी की गिरफ्तरी की गंध पूरे घोरावल क्षेत्रा में पसर चुकी थी, उस गंध को पत्राकारों ने भी कहीं से सूंघ लिया फिर वे भागे भागे चले आये विद्यालय पर जहां विधायक जी नारे लगाने में मस्त मस्त थे। विधायक जी ने पत्राकारों को देख कर राहत की सांस ली...उधर उनके चहेते पत्राकार ने भी राहत की सांस लिया। विधायक जी का बयान घटना के बाबत बहुत ही महत्वपूर्ण होगा।
पत्राकारों ने विधायक जी का बयान लिया उनका बयान सरकारी नीतियों के खिलाफ था तथा प्रशासन के खिलाफ भी। प्रशासन ने सतर्कता बरता होता तो ‘हल्दीघाटी’ नहीं होता। राजस्व न्यायालय ने पूरी सतर्कता के साथ वहां का मामला हल नहीं किया नहीं तो संतोषजनक परिणाम निकल ही आता। इसी बयान को टी.वी. के पत्राकारों ने भी अपने कैमरे में कैद कर लिया बाद में जितना जरूरी होगा उतना प्रसारित करेंगे नहीं तो बकिया काट देंगे।
पत्राकारों के बयान लेने के बाद सरकार विरोधी दल के लोगों को घोरावल के माध्यमिक विद्यालय के भवन के एक कक्ष में ले जा कर बिठा दिया गया और पुलिस बल उनकी निगरानी में लग गया। जो भी हल्दीघाटी वाले क्षेत्रा की तरफ जाना चाहता उसे पुलिस कस्टडी में ले लेती और विद्यालय ले जाकर उन्हें बिठा देती। दिन भर यही क्रम चलता रहा। पुलिस साफ कहती कि हल्दीघाटी वाले गॉव में कफर््यू लगा हुआ है सो आप लोग वहां नहीं जा सकते।
पत्राकारों का जत्था स्वतंत्रा था वे सभी जगह पर बराबरी से बने हुए थे, उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था, वे जहां चाहते थे चले जाया करते थे। इसी बीच अंग्रेजी चैनल वालों के पत्राकार भी हल्दीघाटी वाले गॉव आ धमके। वे भेष-भूषा बोल-चाल सभी सेे अलग दिखते थे जिससे यह पता लगाना मुश्किल था कि वे चाल-चेहरे तथा चरित्रा में कैसे होंगे फिर उसकी जरूरत भी क्या थी कि पता लगाया जाये किसका चरित्रा कैसा है? वे पत्राकार थे इतना ही काफी था।
वही पत्राकार पहले दिन भी हल्दीघाटी वाले गॉव में थे। दूसरे दिन के लिए पत्राकारों ने अपना शेड्यूल अलग बना लिया था। मृतकों के परिजनों से मिलकर वे जानने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें सरकारी सुविधायें क्या क्या मिलीं। वे एक एक परिजन से उस बाबत पूछते... दाह संस्कार वगैरह के लिए प्रशासन से सहायता मिली कि नहीं, वहां सुरक्षा कैसी है, कुछ राशन वगैरह मिला कि नहीं आदि आदि। परिजनों का उत्तर सुनकर पत्राकार संतुष्ट हो गये थे। सारी सहूलियतें हल्दीघाटी वाले गॉव में पहुंचा दी गई थीं। दो नायब तहसीलदारों की ड्यूटी वहां लगा दी गई थी पुलिस के सी.ओ और दारोगा तो वहां थे ही। सरकारी सस्ते गल्ले का दुकानदार घर-
घर घूम कर खाद्यान्न बाट रहा था, मिट्टी का तेल पहुंचा रहा था। नायब तहसीलदार वगैरह परिजनों के लिए कंबल वगैरह बाट रहे थे, स्वयंसेवी संस्थाओं के कुछ लोग थे जो परिजनों के दुखों पर मरहम लगा रहे थे गोया प्रशासनिक सेवा का कुदरती भाव वहां हर कदम पर पसरा हुआ दीख रहा था। वहां की व्यवस्था देख कर लगता था कि एक नई तरह की लोक वाली दुनिया ही उतर आई है हल्दीघाटी वाले गॉव में। पर देखना यह था कि आरोपी कब पकड़े जाते हैं इस खबर को गॉव में पहुंचने में कितना समय लगेगा पता नहीं था... पत्राकार भी अनुमान लगाने में असमर्थ थे, वे अधिकारियों से सवाल दर सवाल पूछ रहे थे। अधिकारी आरोपियों के पकड़ के बारे में चुप रहते वे इतना ही बताते प्रयास हो रहा है, एक आरोपी पकड़ लिया गया है, दूसरे आरोपी शीघ्र ही पुलिस की पकड़ में हांेगे। बस इतना ही।
‘आइए अब गॉव से बाहर निकलते हैं और प्रशासन की तरफ चलते हैं। प्रशासन के हाल-अहवाल केे बाद बुझावन और सुमेर काका का भी हाल लेते हैं गॉव वालों के साथ। धरती-कथा में उनकी पात्राता ही तो वह पुल है जिस पर से होकर सभी पात्रों को अपनी अपनी भूमिका का कथा में निर्वहन करना है।’
‘समय कराह रहा है
कानून तोड़ने और लागू करवाने वालों के बीच’
‘उम्मीदों पर कभी हथौडे नहीं चलाने चाहिए, यही तो एक पूंजी है जो जीवन को बचाये रखती है, उम्मीद की भूमिका धरती-कथा में किसी विशेष प्रयोजन की तरह उपस्थित हो चुकी है, देखिए यह जो उम्मीद है का करती है कथा में...मृतकों के परिजनों की उम्म्मीदें थीं कि वे प्रशासनिक अधिकारियों की गलबहियां करने लगी थीं। अपने भक्त-पुत्रों की उम्मीदें देख कर धरती-माई मगन हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना चाहिए बल्कि उसके अनुकूलन का प्रयास करना चाहिए और उनके धरती-पुत्रा धरती पर खेले जाने वाले खेलों का मुकाबिला कर रहे हैं।’
खेल तो सरकारें खेलती हैं पर लगता है कि उ.प्र. की सरकार खेल नहीं खेलेगी, वह सतर्क है तथा मन बना लिया है कि हल्दीघाटी वाली घटना को बहुत ही गंभीरता से देखना होगा। साथ ही साथ मुख्यमंत्राी जी विशेष रूप से यह भी पता लगवाना चाहते थे कि सोनभद्र में भूमि-प्रबंधन की हालत कैसे गड़बड़ हो गई? जाने कैसे मुख्यमंत्राी जी ने महसूस कर लिया था कि भूमि-प्रबंधन के द्वारा बनने वाले मानवीय संबंध ही मानव सभ्यता का निर्माण करते हैं सो मुख्यमंत्राी जी खुद रूचि लेने लगे थे घटना के बारे में।
जनपद में एक दिन खबर फैल गई कि मुख्यमंत्राी जी एक दो दिन के अन्दर ही घटना स्थल का दौरा करने वाले हैं।
जनपद का प्रशासन तो घटना के दिन से ही कॉप रहा था जाने क्या हो, प्रशासन स्तर पर घटना की रिपोर्ट भी तैयार की जा रही थी। मुकदमे से लकर राजस्व विभाग के कागजों को देखा जाने लगा था। सभी अधिकारी हिले हुए थे, उनके ओहदे कांपने लगे थे, मुख्यमंत्राी जी का दौरा होने वाला है जाने क्या पूछ दें मुख्यमंत्राी जी।
हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना अपने कद में काफी बड़ी हो चुकी थी जबकि घटना के सजीव पात्रा उल्लेखनीय समूहों के नहीं थे फिर भी। ‘सबका बिकास, सबका साथ, सबका विश्वास’ तो हर हाल में चाहिए होता है लोकतांत्रिक सरकारों को, सरकार भी लोकमूल्यों की परिधि पर घूमने और थिरकने वाली हुआ करती हैं।
डी.एम. साहब घटना के बाद से ही सचेत हो चुके थे जो हो चुका था उसे तो अब ठीक नहीं किया जा सकता पर आगे भी कुछ गड़बड़ न हो जाये सो वे मन ही मन अपने दायित्वों को सही ढंग से निभाना चाहते थे। मुख्यमंत्राी जी के द्वारा पूछे जा सकने वाले संभावित सवालों की सूची उन्होंने बना लिया था और उसके अनुसार राजस्व के कागजों की निगरानी में जुट गये थे। वे किसी सहायक के भरोसे रहना ठीक नहीं समझ रहे थे। करीब चार-पांच घंटे डी.एम. साहब के बीत गये मुख्यालय वाले रिकार्ड रूम में उतना ही तहसील के रिकार्ड रूम में। पर कोई खास कागज उन्हें हासिल नहीं हुआ। हां एक बात उन्हें समझ आई कि रिकार्ड रूम में दस्तावेज सही ढंग से नहीं रखे गये हैं जिसके लिए उन्हांेने मातहतों को फटकारा भी। ए.डी.एम को लगाया गया था कि मुकदमे के दोनों पक्षों के वकीलों से मिलकर जघन्य हत्या काण्ड के बाबत जानकारियॉ जुटायें। इसी दौरान एस.पी.साहब वकीलों के फोन काल-डिटेल खंगाल चुके थे।
काल-डिटेलों से वकीलों पर आरोप नहीं लगाया जा सकता था कि वकीलों ने आरोपियों को या प्रताड़ितांे को भड़काया है जिसके कारण घटना घटित हुई। एस.पी. साहब ने फोन के द्वारा डी.एम. साहब को बता भी दिया था कि दोनों पक्षों के वकीलों का घटना में संलिप्त होना उनके काल डिटेलों से नहीं जान पड़ता। वैसे भी इस समय वकीलों पर सन्देह करना या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना गलत होगा सारे वकील हल्ला करते हुए घेराव कर देंगे प्रशासन का। बात सही भी थी, वकीलों को छेड़ना भौरों के खोते पर ढेला मारना होगा। सो बेचारे वादी-प्रतिवादी दोनों के वकील जॉच के दायरों सेअपने आप बाहर हो गये।
मुकदमों की जानकारी के लिए वकीलों से बात करनी चाहिए। अचानक डी.एम. साहब ने सोचा और किसी मातहत को लगा दिया कि प्रताड़ितों के वकील से मिलवाओ आज ही।
प्रताड़ितों का वकील कचहरी में था वह चैनल वालों को बाइट देने में परेशान था। वह खुद को लेकर परेशान था कि वह बहुत बड़े बवाल में फस गया है। उसके एक मित्रा पत्राकार ने उसे बताया भी था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में कैसे हो सकता है उसने किया क्या है? वकील अपना माथा ठांेक लेता है, पता नहीं समय किस किस तरह का खेल खेलता है, वह तो केवल वकील है प्रताड़ितों का, उससे हल्दीघाटी
की घटना से क्या लेना-देना। भला उसके कहने पर कोई झगड़ा-फसाद करेगा! यह जो लड़ाई-झगड़ा का मामला होता है खुद की इच्छाशाक्ति से होता है।
चैनल वालों की बाइट जैसे ही समाप्त होती है प्रताड़ितों का वकील चैन की सांस लेता है और चाय पीने के लिए कैन्टीन की तरफ चल देता है तभी उसे तहसील के एक नायब तहसीलदार ने घेर लिया... नायब तहसीलदार ने वकील से दुआ-सलाम किया फिर असल मकसद पर आ गया...
‘सर जी! आपको डी.एम.साहब ने तुरंत बुलवाया है और गाड़ी भी भेजा है।’
‘काहे के लिए बुलवाया है डी.एम. साहब ने वह भी मुझेे?
वकील ने पूछा नायब तहसीलदार से’ हालांकि वह जानता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के मुकदमे के बारे में कुछ पूछना होगा।
‘पर इस समय तो मैं नहीं जा पाऊंगा कई मुकदमे लगे हैं बिना उनको निपटाये उनके पास जाना संभव नहीं।’
प्रताड़ितों के वकील ने विनम्रता से नायब तहसीलदार को बताया...
नायब तहसीलदार अनुभवी था तथा किसी को मनमुताबिक चला सकने का कलाकार भी...
‘अरे तुरंत छोड़ देंगे हम आपको, हम भी आपके साथ चल रहे हैं, मुकदमा तो आपके जूनियर ही देख लेंगे वैसे भी आज जज साहब हैं नहीं, केवल छोटी अदालतें चालू हैं, मुकदमों में तारीखें पड़ जायंेगी फिर अदालतों में काम ही कितना होता है, चलिए लौट आया जायेगा जल्दी ही।’
प्रताड़ितों का वकील असमंजस में पड़ गया का करे का न करे, कैसे नायब तहसीलदार को मना कर दे, तहसील का पूरा काम तो नायब तहसीलदार ही करता है, प्रभावशाली अधिकारी है जो काम चाहता है उसे करा लेता है, कई काम प्रताड़ितों के वकील का भी उसने निपटवाया है।
अच्छा एक काम है उसे करके चलते हैं। फिर प्रताड़ितों का वकील एक अदालत की तरफ चला गया। कुछ ही देर में प्रताड़ितों का वकील लौट आया और नायब तहसीलदार के साथ डी.एम. साहब के यहां जाने के लिए निकल लिया।
इतना करने कराने में बारह से पार हो चुका था और डी.एम. साहब अपना कार्यालय छोड़ चुके थे। वे अपने आवास पर थे। डी.एम. के आवास पर ही प्रताड़ितों के वकील की मुलाकात डी.एम. साहब से हुई। बात-चीत से लगा कि प्रताड़ितों के वकील की वे प्रतीक्षा कर रहे थे।
डी.एम. साहब के चेहरे पर तनाव की तमाम रेखायें उछल-कूद कर रही थीं देखने से लगता था कि डी.एम. साहब हल्दीघाटी की घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी तनाव से बाहर नहीं निकल पाये हैं जबकि वहां का वातावरण करीब करीब सामान्य हो चुका है केवल जॉच-पड़ताल तथा आरोपियों को गिरफ्तर करने का काम बचा हुआ है।
डी.एम. साहब ने प्रताड़ितों के वकील से बहुत ही विनम्रता से बातें की जो मुकदमे के बाबत थीं। प्रताड़ितों के वकील ने भी डी.एम. साहब को साफ साफ बताया कि वह पहले प्रताड़ितों का वकील नहीं था इधर साल भर से वह प्रताड़ितों के मुकदमे की पैरवी कर रहा है। वह प्रताड़ितों के मुकदमे में वकील तब बना जब विवादित जमीन का बैनामा आरोपियों ने ले लिया। सबसे पहले प्रताड़ितों की तरफ से वह खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हाजिर हुआ था। खरीदी गई जमीन पर आरोपी अपना नाम पहले के दर्ज नामों को खारिज करा कर आरोपी अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। उसके बाद फिर वह परगनाअधिकारी की अदालत में हाजिर हुआ। वहां उसने एक आवेदन पत्रा के द्वारा परगना अधिकारी से निवेदन किया था कि मौके पर चल कर कब्जों की परताल कर लें, मेरे मुवक्किलों का विवादित जमीन पर पुश्तैनी कब्जा-दखल एवं जोत-कोड़ है, आजादी के पहले से चल रहे लगातार कब्जों के आधर पर खारिज-दाखिल वाले मुकदमे का निस्तारण करें। परगना अधिकारी के यहां महीनों तारीखें चली, तारीख पर तारीख दे दिया करते थे परगनाअधिकारी और एक तारीख पर उन्हांेने मेरे प्रार्थनापत्रा को मुझे बिना सुने ही खारिज कर दिया। उसके बाद मैंने आपकी अदालत में अपील दाखिल किया जिसे आपने कई तारीखों के बाद खारिज कर दिया। उसी अपील के खारिजा के बाद ही तो हल्दीघाटी वाले गॉव में बवाल हुआ। अगर दाखिल खारिज वाले मुकदमे का वैधानिक तरीके से निपटारा हो गया होता तो शायद हल्दीघाटी वाला मामला न होता।’
मुकदमे का जो सच था उसे प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को बता दिया। वैसे डी.एम. डी.एम. होता है, किसी के भी माथे की रेखाओं को पढ़ सकने की योग्यता वाला, उसने प्रताड़ितों के वकील को पढ़ लिया था फिर क्या था डी.एम. साहब अपने बारे में गुनने लगे कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हो गई! कुछ सोचने के बाद अपील वाला मुकदमा उन्हें भी ख्याल में आ गया..
‘हॉ एक अपील तो मैंने खारिज किया था... पर परगना अधिकारी का निर्णय देखने के बाद, वह मामला तो मेन्टेनेबुल ही नहीं था। कुछ कुछ ख्याल आ रहा है।’
डी.एम. साहब कुछ ही देर में अपनी पूर्व स्थिति में आगये फिर उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से पूछा...
‘वकील साहब! यह बताइए विवादित जमीन किसकी है जिसका बैनामा आरोपियों के पक्ष में किया गया है... क्या बैनामा करने वाला जमीन का असल मालिक नहीं है? क्या विवादित जमीन प्रताड़ितों की है... अगर दूसरे की है तो किसकी है?’
प्रताड़ितों का वकील राजस्व विभाग के कागजों का कीडा़ था। उसे तो पता ही था कि जमीन के घपलों के मामलों में सोनभद्र बहुत ही आगे है। सोनभद्र आगे न होता तो जमीन के सवालों को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया
होता। तथा वन-प्रबंधन को आदेश जारी किया होता कि सोनभद्र के दक्षिणी हिस्से में वन अधिनियम की धारा 20 की कार्यवाही स्थगित कर दी जाये तथा धारा 4 के निपटारे के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया जाये जिसमें हाई कोर्ट के रिटायर न्यायाधीश हों। माननीय उच्चतम न्यालय नेअपने फैसले में उसकी प्रक्रिया भी उल्लिखित कर दिया था। प्रताड़ितों का वकील राजस्व-भूमि के सरकारी घपलों के बारे में जानता था उसे यह भी पता था कि कैमूर के दक्षिणी भाग में ग्राम-सभाओं में अनिवार्य रूप से निहित होने वाली भूमिप्रबंधक समितियां भी गठित नहीं की गई हैं। आज तक ग्राम-सभाओं में भूमिप्रबंधक समितियों के गठन के बारे में निर्णय नहीं लिया जा सका है।
प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को ब्यारेवार बताना शुरू किया...
‘हॉ साहब! जिन लोगों ने जमीन का बैनामा आरोपियों को किया है वे लोग कागजात माल में दर्ज थे पर कागजात माल में उनका दर्ज होना ही गलत है साहब! और घपला भी इसी बिन्दु पर हुआ है। बैनामा करने वाले लोग आखिर किस कानून के द्वारा विवादित जमीनों पर दर्ज कागजात माल हैं? पुरानी खतौनी बताती है कि हल्दीघाटी वाले गॉव की पूरी जमीन ‘जंगल जिरायत’ के नाम से दर्ज है फिर वह जमीन किसी संस्था के नाम से कैसे दर्ज हो सकती है, क्या संस्था ने उस जमीन को खरीदा या जमीनदारी टूटते समय क्या संस्था उस जमीन पर काबिज थी? संस्था का नाम तत्कालीन तहसीलदार द्वारा जंगल जिरायत की जमीन पर नामांतरित कैसे कर दिया जाता है जब कि उस समय नामांतरण का अधिकार ही तहसीलदार को नहीं था। वहां सारी कानूनी गलतियॉ उसी एक गलत नामांतरण के कारण हुई जान पड़ती हैं, इससे अधिक मुझे कुछ भी नहीं मालूम सर!
डी.एम. साहब अपनी गंभीरता में थे तथा कुछ सोच भी रहे थे। वे सोच रहे थे कि अगला सवाल प्रताड़ितों के वकील से क्या किया जाये...
‘तो वकील साहब क्या जमीन के कागजात तथा मुकदमे की पूरी पत्रावली मुझे दिखाने की कृपा करेंगे आप!’
वकील तो तैयार बैठा था तथा चाहता था कि देर से सही डी.एम.साहब हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीनों के विवाद की सचाई जानने के लिए कम से कम राजी तो हो गये, यह बहुत ही अच्छी बात है, वहां की जमीन की सचाई ही तो वह जनाना चाह रहा था एस.डी.एम. तथा डी.एम. साहब को पर वे लोग तो तैयार ही नहीं थे कुछ सुनने तथा विचारने के लिए। बिना मेरे प्रतिवाद को सुने ही मेरे प्रार्थना-पत्रों को खारिज कर दिये। कम से कम अब तो तैयार हैं वहां की जमीनों का खाता-वृतान्त सुनने के लिए। उसका तो काम ही है मुकदमे के तथ्यों को सक्षम अधिकारियों के समक्ष विधि-पूर्वक प्रस्तुत करना। वह बतायेगा जरूर, अच्छा मौका मिला है...
उसने तत्काल डी.एम. साहब से कहा...
‘हॉ सर! पूरी पत्रावली दिखा दूंगा। अब आप जिस दिन कहें उस दिन में आ जाऊॅ आपके कार्यालय पर या आवास पर ही।’
‘आप अपना फोन नंबर दे दीजिए मुझे, मैं आपको काल कर दूंगा सारे कागजात लाइएगा, प्लीज! कुछ भूलिएगा नहीं संभव है मैं आज ही आपको शाम को बता दूॅ कि आपको कब आना है।’
यह डी.एम. साहब थे पूरी विनम्रता के साथ..
‘तो मैं जाऊॅ सर!’ प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब से पूछा
‘कैसे आये हैं गाड़ी से आये हैं या...’ डी.एम. ने जानना चाहा वकील से
‘नहीं सर! मैं नायब साहब के साथ आया हूॅ ’ वकील ने उन्हें बताया
‘कहां है वह! और तुरंत डी.एम. साहब ने कालबेल बजा दिया..
‘नायब घोरावल को भेजो!’
नायब घोरावल हाजिर, एक भारी भरकम देह काया वाले।
‘जी सर!’ नायब घोरावल डी.एम. के सामने हाजिर हो गये।
‘कल वकील साहब को दुबारा ले आना है मेरे आवासीय कार्यालय पर। कब लाना है इसकी सूचना तुम्हंे मिल जायेगी सारे कागजात भी साथ में लाना है वकील साहब को याद दिला देना कहीं वकील साहब कोई कागज भूल न जायें।’
डी.एम. साहब ने नायब तहसीलदार को निर्देशित किया।
‘जी सर! जी सर!’
प्रताड़ितों का वकील सीधे कचहरी लौट आया डी.एम. कार्यालय से...कचहरी पर पहले से ही कुछ पत्राकार जमे हुए थे वे भी जानना चाहते थे प्रताड़ितों के मुकदमे के बारे में। वहां जमीन का कैसा लफड़ा है? जमीनदारी के बाद तो जमीन के सारे लफड़े खतम हो चुके हैं, अब यह कैसा मामला है? प्रताड़ितों के वकील ने उन पत्राकारों को भी वही बताया जो पहले के पत्राकारों से बताता रहा था। प्रताड़ितों के वकील के पास तो एक ही नश्ल वाली बात थी कि उसके मुवक्किलों का विवादित जमीन पर गुलामी के पहले से ही कब्जा-दखल मय जोत-कोड़ लगातार चला आ रहा है कागजों में चाहे जिसका नाम हो। दिक्कत यही है कि जमीनदारी टूटते समय भी उनके मुवक्किलों के कब्जों का विधिक रूप से संज्ञान नहीं लिया गया अगर संज्ञान लिया गया होता तो उसके मुवक्किल विवादित जमीन के सीरदार हो चुके होते तथा मालगुजारी का दस गुना ट्रेजरी में जमा करके भूमिधर बन जाते। आदिवासियों को न तो सीरदार बनने का मौका दिया गया और न ही भूमिधर क्योंकि अशिक्षित आदिवासियों का मामला था कौन सुनता है उनकी। वे बेचारे जस के तस पड़े हुए हैं अब तो उनके दस लोग कतल भी कर दिये गये।
प्रताड़ितों के वकील से मिलने के लिए जो बाहरी पत्राकार आये हुए थे वे खबरें सूंघ कर आये थे क्योंकि खबरें दो दिन से लगातार देश के भूगोल में ही नहीं विदेश के भूगोलों में भी घूमने लगीं थींे और उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन पर सवाल उठानेे लगीं थीं। कैसा है वह परिक्षेत्रा जहां जमीन के विवाद में दस दस आदमी मार दिये जा रहे हैं। क्या कर रहा है वहां का प्रशासन। क्या वहां ‘हल्दीघाटी’ और ‘चौसा’ वाली युद्धगत स्थितियां फिर से जनम लेने लगी हैं?
प्रताड़ितों का वकील मुकदमे के फाइलों को कचहरी से खाली हो कर सहेजने में जुट गया। कल ही डी.एम. साहब के यहां ले चलना होगा सभी फाइलों को। उसकी फाइलंे दुरूस्त थीं उसमें सर्वे अधिकारी/एस.डी.एम.का खारिजा वाला आदेश तथा डी.एम. साहब का अपील खारिजा वाला आदेश भी था। उनकी पक्की नकलंे प्रताड़ितों के वकील के पास थीं तथा वह खतौनी भी थी जो विवादित जमीन को ‘जंगल जिरायत’ साबित करती थी।
तो हल्दीघाटी गॉव की खबरों ने पूरे मानव समाज को सचेत कर दिया था खासतौर से प्रशासन तथा सरकार को। इसी लिए सरकार के कान खड़े हो गये थे और मुख्यमंत्राी जी ने घटनास्थल के दौरे का कार्यक्रम बना लिया था।
दौरे के तमाम कार्यक्रम विरोधी दलों के नेताओं ने भी बना लिए थे। एक दो नेता तो आये भी थे सोनभद्र में घटना-स्थल पर जाने के लिए पर प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते से ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। विरोधी दलों के नेता थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा करने की जिदों पर अड़े हुए थे फिर पुलिस ने उन नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस जानती थी कि ये नेता हैं, ऐसे नहीं मानने वाले इन्हें गिरफ्तार करो। देर रात तक उन्हें रिहा भी कर दिया गया था। जब प्रदेश स्तर के विरोधी दलों के नेताओं को हल्दीघाटी वाले गॉव नहीं जाने दिया गया फिर बेचारे सोनभद्र के विरोधी दलों के नेता-परेता कैसे हिम्मत जुटा पातेे सो वे अपनी खोलों में दुबके पड़े हुए थे तथा समय के गति की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कभी न कभी उनके दिन भी बहुरेंगे। वे जायेंगे किसी न किसी दिन हल्दीघटी वाले गॉव, कितने दिनों तक सरकार पाबन्दी लगाये रहेगी।
‘धरती-माई जानती हैं कि समय बहुत ही चंचल होता है, कभी दुखों का पहाड़ उठाये स्वर्ग और धरती का चक्क्र काटने लगता है तो कभी सुखों की मनोरम व हसीन बदरियों के साथ सबको आनन्दित करता रहता है। हल्दीघटी वाले गॉव में भले ही दुखों को लेकर समय टहल रहा है पर किसी न किसी दिन इन दुखों को समय लील जायेगा फिर तो हर तरफ सुख ही सुख।’ गॉव में दुख पसरा हुआ है तभी तो कई तरह के राजनीतिक लोग भी गॉव में आवा-जाही करना चाहते हैं नहीं तो वे भला गॉव में आते, मुख्यमंत्राी जी आने का प्रोग्राम बनाते...
धरती-माई उत्सुक हो चुकी हैं धरती के देवता रूपी राजा मुख्यमंत्राी जी को देखने के लिए...
आखिर वे कैसे हैं?
स्वर्ग के राजा ईन्द्र की तरह ठाट-बाट वाले या
किसी और की तरह... एकदम सरल औघण-दानी शिव की तरह, जमीन से उपजे जमीन वाले’
उनको देखना अद्भुत होगा।
‘यादें मिट रही है अनुष्ठान में
और अनुष्ठान कहानी बनता जा रहा है’
‘जीवन जीने के तरीकों में ये जो अनुष्ठान होते हैं बहुत ही मनोवैज्ञानिक भूमिका का निर्वाह करते हैं, मन को शान्ति पहुंचाने वाले होते हैं पर अनुष्ठान केवल अनुष्ठान नहीं होते, ये भी रुपयों पर टिके होते हैं, उसी के द्वारा पूरे होते हैं। एक तो गॉव में शोक-गाथा फैली हुई है हर तरफ और ये अनुष्ठान! बहुत ही संकट का समय है देखिए कैसे कटता है यह समय धरती-कथा के साथ या उससे अलग। धरती-माई भी देख रही हैं सारे अनुष्ठानों को जो स्वर्ग में किए जाने वााले अनुष्ठानों से एकदम अलग हैं। उन्हें खुशी हो रही है कि धरती-पुत्रों ने भी जीवन जीते रहने के लिए अनुष्ठानों को अपने माफिक सिरज लिया है पर यह जो अनुष्ठान कराने वाला व्यक्ति है वह है कौन किसी देव-दूत की तरह बना ठना उसकी क्या जरूरत है अनुष्ठानों के लिए?’
बबुआ दुधमुही का अनुष्ठान निपटाने में है। सभी की सहमति से एक ही स्थान पर यानि सोमारू काका के घर के सामने वाले दलान में किया गया है दुधमुही का कार्यक्रम। यह भी तय हो चुका है कि मरनी का पूरा कार्यक्रम एक साथ मिल कर यहीं किया जायेगा। अलग अलग घरे नाहीं होगा मरनी का कायक्रम। वैसे भी सरवन ने पहले से ही पूरे गॉव को एक रसरी में बांधा हुआ था, वे लोग गॉव के लोगों से अलग होकर कुछ सोच भी नहीं सकते थे। विआह हो, अन्नप्रासन हो, तीज हो खिचड़ी हो सारे कार्यक्रम एक ही साथ किए जाते रहे हैं समझना मुश्किल है कि आज की बटी हुई दुनिया में जब भाई भाई अलग अलग रहो चुकेे हैं, अलग अलग खाना-पीना कर रहे हैैं फिर गॉव का मरनी वाला कार्यक्रम एक साथ कैसे हो रहा है? बुझावन काका देख रहे हैं खटिया पर पड़े पड़े सारा कार्यक्रम, देखने को तो सोमारू काका भी देख रहे हैं...उन्हें अच्छा लग रहा है गॉव की एकता खतम नाहीं हुई है, समूह की खेती ने सिखा दिया है लोगों को एक साथ मिल कर काम करने से लाभ ही लाभ है। सभी लोग एक साथ मिल कर अनुष्ठान कर रहे हैं। लगता है अब बबुआ संभल लेगा पूरे गॉव को। नाहीं तऽ जान पड़ता था के सरवन चला गया, गॉव की एकता भी चली गई उसके साथ।
‘इसी तरह की एकता गॉव में बनी रहे तब नऽ’, दोनों बुढ़वा सोच रहे हैं। सोचने को तो बबुआ, बंधू, पुनवासी और खेलावन भी सोच रहे हैं। अगर वे न सोच रहे होते तो दुधमुही का कार्यक्रम एक जगह निपटाना मुश्किल हो जाता। खाली दुधमुहियय नाहीं करना था उसमें खर्चा-बरचा भी लगना था। ऊ तो खेलावन था कि घोरावल बाजार से सारा सामान खरीद लाया। बबुआ को भी पता नहीं था कि मरनी के अनुष्ठान का सारा सामान एक साथ ही खरीदा जाता है। सोमारू काका ने सबेरे ही बता दिया था और बुझावन काका रात ही में बोल दिए थे। बुधनी काकी नेे भी सहेजा था बबुआ को...
‘मरनी का सारा सामान एक साथ खरीदाता है। ‘एकै साथ सारा सामान खरीदाता है’ सुन कर बबुआ परेशान हो गया था, का करे, उसके पास उतना रुपया नाहीं हैं, थोड़ा बहुत है तऽ ओसे का काम चलेगा। गॉव में किससे मॉगे, कौन दे सकता है, कोई नाहीं है, सारा रुपया तो खेती-बारी में लग चुका है...खेलावन, बंधू अउर पुनवासी से बतियायेंगे, कउनो रस्ता निकलबै करेगा।’
‘यह जो मरनी का अनुष्ठान है नऽ का बतावैं...गमी का दुख और ऊपर से रुपये का दुख अलग से। दूसरे कार्यक्रम होते हैं विआह, अन्नचिखउआ वाले तो पता रहता है कि कार्यक्रम करना है, सो तैयारी होती रहती है, पर मरनी वाले का क्या... इसका किसे पता चलेगा, अचानक होता है और कुल कार्यक्रम तेरह दिन में ही निपटाना होता है। पता नाहीं कैसे सरवन निपटाया करता था सारा काम। सरवन होता तो किसी को कुछ नाहीं करना पड़ता... बबुआ उदास हो चुका है।
‘सामान एकै साथ खरीदाता है,’ बिफनी भी जानती है।
कैसे खरीदायेगा कुल सामान एकै साथ, केतने का खर्चा-बर्चा आयेगा.. सरकारी रुपया तो आने वाला है, बोल रहा था लेखपाल, कल ही आ जाना चाहिए था रुपया पर नाहीं आया हो सकता है आज आ जाये। सुनने में आ रहा है कि घायलों को पचास पचास हजार और मृतकों के परिवार को एक एक लाख रुपये की सहायता दी जायेगी।
रुपया जब आयेगा तब आयेगा, काम तो तत्काल आ गया है रुपयों का, कैसे होगा, कुल सामान एकै साथ खरीदना है.. बबुआ परेशान है। वह अपने मित्रों से सलाह कर रहा है, खेलावन समझाय रहा है बबुआ को...
‘अरे एमें का है, सारा सामान उधारी ले लेंगे, फसल तैयार होजाने पर बेच कर चुका देंगे दुकानदार का। एक काम अउर हो सकता है। हमलोगों के नाम जमीन होती तो ग्रीन कार्ड बना होता उससे रुपया निकाल लेते पर जमीनी पर हमलोगों का नाम ही नाहीं है।’
‘हमरे बपई के नाम से खाते में कुछ रुपया था, खेती के समय ही निकसि गया सारा रुपया, अब एक छदाम भी नाहीं है।’
बबुआ ने अपनी मजबूरी बताया....
‘तो का करना होगा? करना का होगा हमैं तो लगता है कि बन्धू अउर पुनवासी के खाते में कुछ न कुछ रुपया तो होगा ही, बन्धू मोटर साइकिल खरीदने के लिए रुपया रखा हुआ था खाते में, ओकर बड़का लड़िकवा बताय रहा था कि जीजा को विआहे में मोटर साइकिल नाहीं दिलाया था गौना में खरीद कर देना है। ऊ रुपया होगा ओकरे पास।’
बोल पड़ा सोमारू...
‘का फुसुर-फुसुर करि रहे हो तूं लोग, हमहूं तऽ जानें। रुपिया कऽ बात है नऽ तब्बै बबुआ का मुह लटकि गया है, बबुआ केहू से रुपिया मांगेगा नाहीं अउर काम भी चल जाना चाहिए...’
बोल बोल बबुआ! केतना रुपिया चाही करम काण्ड करने में, खर्चा-बर्चा कऽ हिसाब बनाय लो अउर खरीद लो घोरावल बाजार से। हमरहूं कीहें पन्द्रह हजार रुपया है रखे थे काट-कपट कर, कुंअरकी लडिकिया के बिआहे के लिए कनफुल अउर मॉग टीका खरीद लेंगे पर जाने दो ऊ सब बाद में खरीदायेगा। ये साल हम बिआहौ नाहीं करेंगे, सब ठीक हो जायेगा तब बिआह करेंगे।’
दुधमुही का खाना-पीना बनाने में जुटी हुई है बिफनी। गॉव की कई औरतंे हैं जो काम निपटाय रही हैं। बुधनी काकी सभी नवछेड़ुआ औरतों को बताय रही है कि का का करना होता है। नवछेड़ुओं का का पता कि का होता है रीति-रिवाज। बाहर बैठे हुए है रामखेलावन, बन्धू, पुनवासी और परमू काका। परमू काका चीलम भर रहे हैं...
‘दो दिन होय गया दम लगाये, आजु लगा लेते हैं, ससुरा मनै नाहीं किया के दम लगाना है, दम लगाना भी भुलाय गया हैै।’
‘केसे पूछि रहे हो काका’ बन्धू ने छेड़ा.. काका...दम लगाना है तो लगा लो कउन रोक रहा है तोहैं।’
‘हमैं कउन रोकेगा बे! रजवाडी के जमाने में तऽ कोई नाहीं रोक पाया अब का कोई रोकेगा, हमार मनै नाहीं किया समझि लो मुर्दा बनि गये थे हम, रहि रहि के सरवन अॅखियै पर चढ़ जाता था... गजब लड़िका था। खाली सरवनै का दुख नाहीं चढ़ा था कपारे सब लड़िकवन कऽ चढ़ा था पर सरवन की बात अउर है? उहय पूरे गॉये के एक किये था, ओकरे कारण गॉये कऽ रगड़-झगड़ा भी खतम हो गया था अब आगे का होगा राम जानैं।’
परमू काका चीलम भर चुके हैं... लगा बे बन्धुआ! चीलम में फाहा, ई सलाई है अउर फाहा थामो...
बन्धू ने फाहे में आगी लगाय दिया है, फाहा भभक उठा है और परमू काका...बम बम औघड़दानी बम बम.. एक दम लगाया परमू काका ने, दम ठीक से नहीं लगा, ठीक से लगा होता तो भर मुह धुआं निकलता फिर दम खींचते हैं परमू काका. इस बार दम ठीक से लगा, भर गया पूरा मुह काका का...
परमू काका ने मुह से धुआं उगला और...
‘ले रे खेलौना! लगा ले एक दम, बन्धुआ तूं लेगा, तूंहो ले ले बेटा, औघड़ दानी बम भोले का परसाद है?’
फिर तो सभी ने एक एक दम लगा लिया लेकिन बबुआ दम लगाने से किनारे रह गया वह वहां नहीं था। बन्धू पकड़ लाया बबुआ को...
‘ले मार ले एक दम...’
‘नाहीं हमार मन नाहीं कर रहा’
‘मन कैसे करेगा, मन को मनाओगे तब नऽ मन करेगा, मन को तऽ तनेन कर दिये हो...’
‘ले मार एक फूंक’
बबुआ भी मार लेता है एक फूंक....
दुधमुही का अनुष्ठान दो बजे दिन तक निपट गया।
बबुआ सोच में है, दम का जोर भी होय गया है उसे, जो सोचना है उससे अधिक सोचेगा.....दूसरे दिन घारोवल बाजार जाना है और मरनी का सारा सामान खरीदना है। रुपये का इन्तजाम भी होय गया है, कल तक रुपया हाथ में आ जायेगा केवल सोमारू को ही बैंक से निकालना है रुपया। बन्धू का तो घर पर ही रखा हुआ है। खेलावन को बाजार जाना ही होगा सामान खरीदने वहीं रुपया भी निकाल लेगा खेलावन। महंगी का जमाना है बहुत कम खर्चा होगा तो कम से कम चालीस हजार रुपया तो लग ही जायेगा। दस लोगों का करम है इतना तो लगेगा ही, दुधमुयिय में दुइ हजार लग गया, पुरवा पर्तन दाल-साल, तेल- पानी लेकर, सिलेन्डर भराइयय लग गया एक हजार रुपया सौ रुपिया ऊपर से घूस देना पड़ा तब मिला सिलेन्डर।
बिफनी अभी खाली नहीं हुई है, दुधमुही का सारा जूठा बर्तन पड़ा हुआ है माजना है उसे। बबुआ को नाहीं देख पाई है खाना खाते समय देखा था, उसे चिन्ता लगी हुई है मरनी का सामान कैसे खरीदायेगा... बबुआ ने का किया?
बबुआ ही बता सकता है कुछ न कुछ उपाय तो किया ही होगा, चलते हैं ओसारे की तरफ, एक बार गये थे देखने तो वह बपई को खाना खिला रहा था और खेलावन गये थे सोमारू काका को खिलाने। बात नाहीं हो पाई लौट आये...
बबुआ सोमारू काका के दालान में है उसके संगी-साथी सब चले गये हैं अपने अपने घर।
‘ईहां का कर रहे हो, घरहीं चले जाते अउर करिहांय सोझ कर लेते, बपई को भी देख लेते।’
बिफनी ने टोका बबुआ को..
‘हॉ रे घरहीं जाय रहे हैं, खाना खा लेने के बाद आजु खाली सोना है अउर कुछ नाहीं करना है। अबहीं तऽ खाना खाने आना ही होगा’
‘का हुआ रुपिया का इन्तजाम होय गया, कइसे खरीदायेगा मरनी का सारा सामान?
पूछा बिफनी ने बबुआ से...
‘तूं काहे फिकिर करती है बबुआ के रहते रुपिया की कमी नाहीं पड़ेगी।’
‘उ हम जानते हैं पर रुपिया का मामला है, विपत्ति में कोई रुपिया नाहीं देता है, सब मजाक उड़ाते हैं अलग से, एही से पूछ रहे हैं अउर का...’
‘तूं जा इहां से, उहां से खाली होय के जल्दी से घरे आय जा, बर्तन-फर्तन सब मजवाय देना, कुछ जूठा न रहे बूझ रही हो नऽ हमार बात। अबहीं केतना देर लगेगी उहां? हमहूं आय रहे हैं देह सोझ कर के।’
‘एक घंटे का टाइम तो लगेगा ही’ बिफनी ने बताया बबुआ को
‘काम पूरा करके आय जाना’, कहते हुए बबुआ अपने घर चला गया। बबुआ घर पहुंचा ही था कि बुधनी काकी आ गईं...
‘का रे! बबुआ आराम करने जा रहे हो का?’
‘हॉ काकी थोड़ा करिहांय सोझ करलें, अईंठ गई है खड़े खड़े।’
‘ऊ तऽ ठीक है दुई दिन होय गया करिहांय अईठ तऽ जायेगी ही। हम ए बदे तोहरे कीहां आये हैं के कइसे होगा कुल मरनी का काम, सुने हैं के एकै संघे करना है सब कुछ, ढेरै रुपिया लगेगा ओमें कइसे करोगे सब?’
बुधनी काकी बबुआ से बतिया ही रही थीं कि परमू काका चले आये... वे भी जानने के लिए ही आये हुए हैं, कइसे करना है तेरही तक के खर्चा-बर्चा का इन्तजाम?
बबुआ ने बताय दिया...
‘देखो काकी खेलावन कीहां मोटर साइकिल का रुपिया पड़ा हुआ है अउर बन्धू कीहां भी रुपिया है, दोनों देय रहे हैं, फसल तैयार हो जायेगी तऽ लौटाय देंगे दोनों जने कऽ रुपिया।’
बात तो ठीक है पर एक काम अउर है, सभी बोल रहे थे के मरनी का काम है सब घरे से रुपिया लगना चाहिए, अउर बबुआ सब घरे से रुपिया आय गया है ओके तूं कागज पर चढ़ाय लो, जौन घटै ओही के खेलावन से चाहे बंधू से ले लो। का हम गलत बोल रहे हैं। तोहरे कीहां दुइ तीन बार ऊ लोग आये पर तोहैं काम में देखि के कुछ नाहीं बोले, हमरे इहां जायके दे दिये रुपिया अउर हम लेय लिए।’
‘नाहीं रे काकी, तोहार बात सही है पर हम ई समझे के एतना बड़ा संकट आय गया है अइसने में केहू से रुपिया का मांगे, एही खातिर हम केहू से कुछ नाहीं बोले अउर चुप लगा गये। अब तऽ सरवन है नाहीं, हमहीं के सब देखना है नऽ काकी।’
बुधनी काकी के हाथ में एक झोला था ओही में रुपिया रखा हुआ था। काकी ने झोला उझील दिया, रुपया निकलि गया बाहर...
‘रे बबुआ कुल गिन के अहतियाय ले अउर सब कर नाम भी लिख ले सबका एक कागज पर हम बताय रहे हैं के, के के दिया है गॉवै भर तऽ दिया है।
बबुआ बोल पड़ा, ‘परमू काका तूंहय गिन दो रुपिया...’
‘नाहीं रे तूं गिन कर सब सहेज ले, हम का गिनें।’
बबुआ रुपिया गिनने लगा...
कुल पन्द्रह हजार रुपिया था, काकी ने उन लोगों का नाम भी बताय दिया जिनके घरों से रुपया आया था। बुधनी काकी और परमू काका ने पांच पांच हजार रुपया दिया था, जिसके पास जितना था सभी ने जोड़ कर दे दिया था।
बिफनी भी काम निपटा कर आ गई, बबुआ को रुपया गिनता देख कर वह
अपने कमरे में गई और पांच हजार रुपया ले आई..।
ई हमरे तरफ से रख लो काकी, एतने है हमरे ईहां...
बुधनी काकी बिफनी का मुह देखने लगीं... एकरे घरे कऽ तऽ कोई नाहीं मरा है फिर भी मरनी के काम के लिए दे रही है रुपिया..
‘ओसे का हुआ गॉव तऽ एकै है तऽ मरनी का काम भी सबके मिल के ही निपटाना होगा।’
बुधनी काकी ने रुपया देने वालों का नाम लिखवा दिया, कागज पर सबका नाम लिख लिया बबुआ ने।
तऽ हम लोग जाय रहे हैं बबुआ! काल्हु सामान खरीदने के लिए के जायेगा घोरावल? सुमेरना कऽ टेम्पो खड़ा है बैसाखी के दुआरे पर, ओके ले लेना बन्धू चलाता है टेम्पो ओही से सारा सामान ढोआ जायेगा। बैसाखी कऽ ससुई बोल रही थी के बबुआ को बोल देना बहिन।
‘काकी हम तऽ सोच रहे है कि खेलावन, बंधू अउर पुनवासी के भेज देते हैं बजारे, उहां भीड़ लगाने की का जरूरत है।’
‘हां बबुआ तूं ठीकै सोच रहा है ओही लोगन के भेज देना, हम तऽ सरवन के छोटका भइयवा के भी भेज देते पर ऊ तऽ सुध-बुध खोकर पड़ा हुआ है खटिया पर कहीं ओकर हालत तनबुड़ुक वाली न हो जाय, हमैं बहुत डर लग रहा है बबुआ।’
‘नाहीं काकी नन्हका कऽ हालत तनबुड़ुक नीयर नाहीं होगी, तनबुड़ुक भी ठीक होय जायेगा गमी बीत जाने तो दो। नन्हका समझदार है, बूझता है सब कुछ। ऊ दिमाग से ठीक-ठाक रहेगा। पता नाहीं कैसे तनबुड़ुक गड़बड़ाय गया दिमाग से पहिले तऽ उहौ ठीकै था।’
‘हां बबुआ! अब तऽ सब बोझा नन्हका पर आय गया है, अकेली सुगनी का करेगी। उहो बेचारी दिन-रात रो रही है, के समझावै ओके, अउर का समझायेगा कोई, ओकर बपई आया था, ओकर अइया भी आई थी, दोनों गुंग हो गये थे, कुछ बोलते नाहीं बना दुन्नौ से। सुगनी जइसे हमरे घरे कऽ बड़की पतोह वैसहीं ओनकरे घरे कऽ बड़की बिटिया। बेचारे का बोलते। हम तऽ बबुआ ओही दिना से सुगनी के समझाय रहे हैं पर ऊ कुछ बोलबै नाहीं करती है, हम ओके समझाय रहे हैं भोले बाबा चाहेंगे तऽ ऊ समझ जायेगी हमरी बात।’
पूरा गॉव भर गया था नाते-दारों से, सब आजु लउट रहे हैं अपने अपने घरे अब आयेंगे तेरही के दिन। हं एक बात तऽ भूलियै गये हम, तेतरी के घरे ओकर भाई आया था, हमै तऽ जान पड़ा के ऊ गरम मिजाज का है, बड़ा गड़बड़ बोल रहा था के मार कऽ बदला मार। हम अपने जीजा के मारने वालों को नाहीं छोडं़ेगे, करम-काण्ड बीत जाय बस एकरे बाद हम देख लेंगे ऊ लोगन के।’
‘हम उहां नाहीं थे बबुआ नाहीं तऽ ओन्हय समझाय देते के मार कऽ बदला मार का का मतलब होता है। हमलोगन कऽ गॉव राड़-रहकारों वाला गॉव नाहीं है, हमलोग
खूनी-कतली नाहीं हैं। हम तऽ देखि चुके हैं मार-काट वाला जमाना भी...नन्हका के बपई के बारे में के नाहीं जानता, घूमि घूमि के मारै किया करते थे, रियासत के कहने पर, ऊ तऽ जब हम बिआह के आये तब ओन्है संभाले, आदत ऐसन है कि आजउ गरमाय जाते हैं। देख बबुआ! मार-काट के बारे में कब्बउ न सोचना।’
बबुआ को पता है के गॉयें के जवान लड़कवन के दिल-दमाग में गुस्सा है पर नाहीं, गुस्सा से का होगा? हमार बपई हमेशा इहय समझाते हैं कि बबुआ!
‘गुस्सा आदमी को खाय जाता है, गुस्सा कुछ देता नाहीं है अउर छीन लेता है सारा कुछ, एसे आदमी उहय है जे अपने गुस्सा पर काबू रखै। आदमी अउर जिनावर में तऽ कुछ फरक होना चाहिए।’
बबुआ ने काकी की बात में हॉ मिलाया....‘हंऽ काकी तूं सही बोल रही हो, का होगा झगड़ा करके, झगड़ा से कुछ नाहीं निकसेगा पर एक बात बताओ काकी हमरौ मन कभी कभी गड़बड़ा जाता है पर सरवन का खियाल आते ही ठीक हो जाता है। सरवन चाहा होता नऽ तऽ पहिलहीं फरियाय गया होता...पर जाने दो काकी जौन करम बाबा करेंगे, करेंगे हमैं विसवास है भगवान पर।’
दुधमुही का खाना-पीना दिन रहते ही निपट गया। औरतें देह सोझ कर रही हैं और मरद अपने अपने घर चले गये हैं।
बबुआ भीतर से परेशान है मार का बदला मार या चुप बैठना, कहने को तो वह भी कहता है कि मार का बदला मार ठीक नाहीं है पर क्या ऐसा ही है.. हॉ ऐसा ही है पर वह फसा हुआ है, उसका मन नहीं मान रहा, डोल रहा है उसका मन, खून का बदला तो लेना ही होगा, दस साथियों का खून हुआ है...।
नाहीं नाहीं खून का बदला खून से सोचना गलत है..
‘हम हथियार नाहीं उठायेंगे, हम कानून के सहारे अपनी लड़ाई लड़ेंगे और आरोपियों को सजा दिलवाकर ही रहेंगे। कानून को हमलोगों की फरियाद किसी भी हाल में सुननी ही पड़ेगी।’
‘और कानून है कि घुस चुका है, धरती-कथा में भी, किधर से घुस गया वांयें से या दांये से, पूरब से कि पश्चिम से किसी को नहीं पता। पता तो धरती-माई को भी नहीं, उन्हें तो यह भी नहीं पता कि धरती के समाज पर जब कानून उतरता है तब वह अदालत साथ लेकर लेकर आता है। अदालत ही कानून की व्याख्या करती है, अपराधियों को दण्डित करती है। स्वर्ग में तो ऐसा चलन है नहीं, वहां तो श्रापों से ही काम चल जाता है। हल्दीघाटी वाली घटना अगर स्वर्ग में घटी होती तो वहां का कोई भी देवता श्राप दे देता, स्वर्ग से निष्काशन करा देता, ढकेल देता धरती की तरफ पर वहां तो घटना हुई ही नहीं। घटना हुई है धरती पर, धरती-माई श्राप दे नहीं सकतीं उनके पास श्राप देने का अधिकार हैं ही नहीं, अगर देंगी भी तो उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ेगा। सो वे खामोश हैं...
बिना अधिकार के कुछ भी करना बेकार है।
‘सॉसें थम गई हैं
पर जीना तो है ही, पार करना है जीवन की नदी’
‘धरती-कथा अनुष्ठानों में उलझी हुई है, और उसके पात्रा हैं कि कई तरह की योजनायें बना रहे हैं। कथा में एक ही तरह की पात्राता निभाना उन्हें ठीक नहीं जान पड़ रहा, वे भूमिका बदलने के लिए परेशान हैं, वे हिंसा और अहिंसा के बीच में फस गये हैं...आखिर हम काहे बर्दास्त करें? हिंसा और अहिंसा भी क्या खूब है, जाने कितने इसके रूप हैं। हिंसा हुई है हल्दीघाटी वाले गॉव में, वहीं हिंसा गॉव के नौजवान लड़कों का सहला रही है, दुलार रही है, हमदर्दी दिखा रही है ‘मार का बदला मार’, ‘कतल का बदला कतल’ इसी वसूल से समाज बदलता है, मानव सभ्यता में बदला लेना हमेशा से बहादुरी का कार्य माना गया है, इतिहास भी इसकी पैरवी करता है.इन्हीं सोचों के बीच सिकुड़ी सी द्रोपदी माफिक अहिंसा भी अपनी साड़ी थामे विलाप कर रही है। धरती-माई तो जानती हैं कि हिंसा का क्या मतलब होता है? सुर-असुर का संग्राम उनकी ऑखों के सामने नाचने लगा... वे कराह उठीं..
किसी भी तरह से वे युद्ध नहीं होने देंगी पर राम और कृष्ण भी मानव रूप में अवतार लेकर कहां रोक पाये युद्ध? फिर वे कैसे रोक पायेंगी?
बुधनी काकी जा रही हैं अपने घर, बिफनी भी उनके साथ जा रही है गायंे में। रात का खाना बनाना नाहीं है, दुधमुही के दिन केवल एक बार ही खाना बनता है सबेरे। अब एक साथ खाना तो बरहो अउर तेरही के दिन ही बनेगा। तेरही के पहिले का खाना अलग अलग अपने अपने घरों में बनेगा।
बिफनी मिलना चाहती है तेतरी, फगुनी, बैसाखी अउर सुगनी से। बेचारी सबके सब कम उमिर की हैं अउर पहाड़ नीयर जिनगी है। बोलने-बतियाने से मन बदल जायेगा। उन सबों से बोल-बतिया कर आ जायेगी सुगनी कीहें। सुगनी से मिलना जरूरी है, ऊ जिद्दी है किसी की नाहीं सुनती, उसकी बातें मानती है, उमिर भी बराबरै होगी, समझाने-बुझाने से कुछ तो फरक पड़ेगा उसके दिमाग पर।
तेतरी का घर फगुनी अउर बैसाखी के घरे से कुछ दूरी पर है, पर है आमने सामने ही, एक दो ढूह पार करना होता है फिर पहुंच जाओ तेतरी के घर। तेतरी घर पर ही थी बुधनी काकी ने सहेजा था सभी को कि अब खेती का काम भी तूं लोग देखो। जेतना होय सके ओतना करो, खेती के काम करोगी तो मन बदलता रहेगा।
‘खेती-बारी, गाय-गोरू का काम गमी से नाहीं रूकता, ओके तऽ कइसहूं करना होता है, चाहे जउने हाल में रहो, गाय-गोरू पियासे अउर बिना खाये-पिये थोड़ै रहेंगे ओइसहीं खेती कऽ काम है, कउनो हाल में रहो ओके निपटाना ही पड़ता है। चैती की फसल की तैयारी करनी है, खेतों में डहिया लगाना है, खेतवा उखड़ जायेगा तब कैसे होगी ओमे जोतनी, मरद लोग तो तेरही के बाद ही जोतनी का काम शुरू कर सकते हैं एकरे पहिले नाहीं। तब नऽ बोआएगा गेहूं, मटर। बुधनी काकी ने गॉव वालों से यह भी कहा था कि जवन जवन पतोहिया ‘बेवा’ होय गई हैं ओन्हनन के काम पर नाहीं भेजना है कम से कम तेरह दिन तक।
आजु काम पर नाहीं जाना है। सो आज ही मिल लेना चाहिए सबसे, कल से तो डहिया का काम शुरू हो जायेगा, जाना होगा काम पर, मरद लोग चले जायेंगे तेरही का बाजार करने। बिफनी तेतरी के घर पहुंच चुकी है, तेतरी कोने में बैठी हुई है माथा थामे, उसकी सासू हाथ में हुक्का लिये हुए हैं...
‘का रे बिफनी! सब काम हो गया, मजाय गया सारा बर्तन, बड़का तसलवा अउर भगौनवा अउर एक ठे करहियवा पहुंचाना होगा रे अहिराने, अहिराने से ही बर्तन आया था, जाने दो काल्हु हम आयेंगे ओहरै, बर्तन पहुंचाय देंगे अहिराने।’
‘हॉ काकी सब काम निपट गया, सारा बर्तन सहेज कर हम चले घरे से, काल्हु मौका नाहीं मिलेगा, बुधनी काकी सहेजी हैं कि काल्हु से डहिया लगाना होगा खेते में।’
‘हां रे हमहूं चलेंगे, कुछ काम करेंगे तबै भुलाय पायेंगे रजुआ की यादें, हमेशा बोलता था रजुआ कि अइया हम तोहके चारो धाम करायेंगे। आगे कुछ नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, बोलतीं भी का? बचा ही का था?’
तेतरी की सासू से बतिया कर बिफनी तेतरी के पास जा कर बैठ गई.. वह जमीन पर बैठी हुई थी। खामोश अपने में खोई...
‘का रे तेतरी का सोच रही है?’ तेतरी से पूछा बिफनी ने
‘का सोचना है दीदी! सोचने के लिए का बचा ही है। सब कुछ तऽ करम बाबा ने छीन लिया जाने कउन अपराध हमलोग किए थे, कुछ समझ में नाहीं आय रहा है दीदी!’
तेतरी की ऑखें भर आईं, बिफनी ने उसे संभाला...
‘रोना-धोना बन्द करो तेतरी, जौन करम में लिखा होता है उहै मिलता है, अब आगे का देखो।’
आगे का देखती तेतरी उससे बोल कर गये था रजुआ कि वे ड्यूटी पर जाय रहा है पर पता नाहीं कैसे चले गये खेते पर...हम तऽ जानि रहे थे कि रजुआ ड्यूटी पर गये हुए हैं बाद में पता चला कि खेत पर गये थे अउर...
चुप हो गई तेतरी, आगे का बोलती, बोलने के लिए था ही क्या?
‘हॉ तेतरी हमरे गॉये में कोई भी मार-पीट करने वाला नाहीं है, हम तोहरे पति रजुआ को अच्छी तरह से जानते हैं, सरवन भइया को भी जानते हैं। तूं ई समझ लो कि जे जे मरे हैं नऽ ओमे से कोई मरखनहा नाहीं था पर का बतायें, मारने वाले तो मारने के लिए ही आये थे मार के चले गये। जाने दो ओ सभन कऽ कब्बउं भला नाहीं होगा, सब मरेंगे अपनी करनी से।’
‘बिफनी दीदी! देखो ऐसन है नऽ कि ऊ सब जब मरेंगे तब मरेंगे, हमार मॉग तऽ सूनी होय गई नऽ, पोछाय गया नऽ हमरे माथे का सेन्हुर, केतना मानते थे हमके,
बोलते थे कि घर में तोहरे आते ही देखो हमके होमगारड वाली नौकरी मिल गई, हमार भाग ठीक है पर अब का होगा दीदी! कइसे काटेंगे हम आपन जिनगी?’
बिफनी तेतरी की बातें सुन कर सन्न और सुन्न। उसे समझ नहीं आ रहा था कि का बतावै तेतरी को, उसकी बातों का का जबाब दे। बिफनी जबाब का देती, जबाब था ही नहीं, ऐसे सवालों के जबाब तो होते ही नहीं। पर समझाता है सब कोई ऐसा ही। बिफनी भी समझा रही थी पर वह जानती थी कि बिधवा होकर जीवन जीना फर्जी लांक्षनों, उलाहनों, तानों के साथ होता है।
बात-बात पर ताने मिलते हैं, बिआह-शादी का कोई काम विधवाओं को नहीं करने दिया जाता, आयोजनों के अवसर पर मुह देखना भी पाप माना जाता है बिधवाओं का। वह जानती है अपनी काकी के बारे में...
काकी पर का का लांक्षन नाहीं लगा, कभी किसी के साथ जोड़ दिया गया काकी को तो कभी किसी के साथ। एक बार तो काकी को उनके ममेरेे भाई के साथ ही जोड़ दिया गया, बेचारे मामा सल्फास खा कर मर गये तीसरे दिन। काकी भी मर जातीं, उन्होंने सल्फास खाया भी था पर सल्फास खाने के बाद भी नहीं मर पाईं, बचा लिया डाक्टरों ने उनको। तो बिफनी जानती है बिधवा होकर जीवन जीना बहुत ही कठिन होता है। फिर भी वह समझा रही है तेतरी को...
बिफनी जानती है कि ओकरे बिरादरी में सलटने का रिवाज है, जेसे जोगाड़ बनि जाये ओसे सलट लो, बाभनों ठाकुरांे वाला मामला नाहीं है देखावा वाला। बिधवा बनी रहो अउर जिनगी बिताओ सधवा की तरह। घूमि घूमि के बिस्तरा बदलती रहो, कबहूं ए खटिया पर तऽ कबहूं ओ खटिया पर, कबहूं एक मरद के संघे तऽ कबहूं दूसरे मरद के संघे। हमरे बिरादरी का मामला ठीक है। न बनै बिधवा बनि के रहना, तऽ सलट लो जेकरे संघे मन होय ओकरे संघे, का होगा? बहुत होगा तऽ भात-माड़ देना होगा अउर का? मन मसोस कर जिन्दा रहना ठीक नाहीं है।
‘ये समय तेतरी से ये बारे में कुछ बोलना ठीक नाहीं होगा, सुगनी, बेसाखी, फगुनी से भी वह कुछ नाहीं बोलेगी। बोलना होगा तऽ करम-काण्ड बीत जाने के बाद बोलेगी। अउर जो बिधवा हो गई हैं गॉयें में ओनकर चिन्ता नाहीं है, ऊ सब बाल-बच्चे वाली हैं, ऊ सब सलटने के बारे में नाहीं गुनेंगी, ओनकर उमर भी हो गई है सब अधेड़ से अधिक हैं, अब उमिर ही केतनी बची है कि सलटेंगी किसी से। बाल-बुतरू लेकर कोई के संघे सलटना ठीक भी नाहीं होता। पर तेतरी, बैसाखी, फगुनीे, सुगनी बेचारी तो बिना बाल-बुतरू वाली हैं एकदम बिटिहिन माफिक, एन्है कोई देख के नाहीं कह सकता कि ये सब बिअहुती हैं। कइसे गुजारेंगी सब जिनगी बिना मरद के सहारे। खाली जिनगियै गुजारना होता तब्बौ ठीक था पर खाली जिनगियै गुजारना नाहीं है नऽ। मन की भी तो बात होती है, मन कुछ मांगता है तो तन भी तो कुछ मांगता है, दोनों की मांग बिना मरद के कैसे पूरी हो सकती है?’
बिफनी उलझ गई है अपने समाज में, अपने समाज के चाल-चलन में। उसका
समाज भी वही है जो सभ्य लोगों का समाज है। मरद साथ में रहे तो चाहे जो करो, जेकरे संघे करो, चाहे खटिया पर टॉगे फैलाती रहो, छिप-छिपा कर चुम्मा-चाटी करती रहो। मॉग में बस सेन्हुर लगाये रहो कियारी की मेड़ की तरह गब गब लाल, दूर से ही दिखाई देता रहे। बड़की बिरादरी में भी इहय होय रहा है अउर ओकरे बिरादरी में भी। बड़की बिरादरी में तऽ हमरे बिरादरी से भी गड़बड़ है, बिधवा भउजाई के के कहै भयहु तक तार जोड़ ले रही हैं कभी देवर से तो कभी जेठ से।
बिफनी तेतरी को देख रही है, उसकी उदासी परख रही है और मन के गहरे में उठ रहे बुलबुलों के बारे में भी गुन रही है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है, पर समाज का चाल-चलन देख रही है कि औरतें किस हाल में हैं, समाज में उनका कितना मान-सम्मान है। पर बबुआ तो उसे मानता है, उसकी फिकिर करता है पर सब मरद तो बबुआ की तरह नाहीं हैं। दारू पी कर बाहर से आये अउर घरे में पसर गये खटिया पर, मेहरारू का कर रही है, ओके का चाही ऐसे मतलब नाहीं, ऐसे थोड़ै चलती है जिनगी। जिनगी तो चलती है बोल-चाल से, मन की बतियाने से, एक दूसरे को समझने से, ई सब कहां होता है हमरे समाज में?
बिफनी घिना जाती है कुछ मरदों को देख कर, वे न तो घर के लिए सही होते हैं और न अपनी घरनी के लिए, ओन्है केवल दारू चाहिए, पी लिए और लोटने लगे। जिनगी का होती है ओनसे का मतलब?
तेतरी के घर से निकलनेे के पहले वह देख लेना चाहती है कि तेतरी का मन बदला कि नाहीं..
‘कारे तेतरी! घरहीं में बैठी रहोगी के एहर-ओहर निकलोगी भी, घर में बैठे बैठे अनवा के बनवा सोचाता रहता है मन। तोहरे घरे के आगे तऽ काफी जगह है, तर-तरकारी भी लगी है, ओही कोलवा में जायके कुछ किया कर, लहसुन है, आलू है, भंटा है, ओमे कर-कोड़ा दिया कर, खाली रहा करो तो गइयय छोड़ दिया करो बहरे, कुछ घास-फूस चर लिया करेगी। बूझ रही हो नऽ के हम का बोल रहे हैं....’
‘पर दीदी अइसने में हम बहरे निकलेंगे तऽ लोग का बोलेंगे, तेरहो दिन नाहीं बीता, लगी हरिना माफिक डाकने, भइया हमार आया था बोल रहा था कि तेरही के बाद लिवा ले जायेगा हमैं गायें पर, अइया बुलाई है। हम तऽ जाने के लिए सोच रहे हैं पर अइया जाने का करें, जाने दें या न जाने दें, अब तऽ उनकी मर्जी कऽ बात है।’
‘हं तूं ठीक गुन रही है नइहरे चली जाओगी तऽ मन-फेर हो जायेगा, ई ठीक रहेगा अबहीं इहां कउनो खास कामौ नाहीं है खेती-बारी का। चैती का काम है थोड़ा बहुत तऽ ऊ सपर जायेगा। धान की खेती के पहले आ ही जाओगी, तब का हरज है।’
बिफनी तेतरी से बोल-बतिया कर अपने घर चली आई। बबुआ घर पर था और सो गया था, बपई ओसारे में बैठ कर बिफनी का इन्तजार कर रहे थे...
‘कारे बिफनी कहां गई थी रे! बबुआ का भी पता नहीं चल रहा, कहीं बाहर गया
है का...’
‘घरवा में होंगे बपई’
‘का कउनो काम है’
‘नाहीं रे, समिति का एक आदमी आया था, वह पूछ रहा था बबुआ के बारे में हमैं तऽ पता ही नाहीं था सो हम का बताते ओसे। कह कर गया है कि काल्हु समिति के मंत्राी जी बोलाये हैं समिति के कार्यालय पर।’
‘अच्छा बपई! हम बोल देंगे ओनसे, घरवा में होंगे तऽ अब्बै बोल देते हैं अउर आपको बताय देते हैं।’
बबुआ घर में नहीं था, बिफनी ने अनुमान लगाया था कि चार दिना से छट-पटा रहे हैं, कब्बंउ ई काम तऽ कब्बंउ ऊ काम, थक गये हैं काफी, हो सकता है घरे में जायके सो रहे हों पर घरे में तऽ नाहीं हैं, आखिर कहां चले गये। कहीं गये होंगे। कहां जा सकते हैं, हो सकता है कि खेलावन भइया के यहां गये हों नाहीं तऽ पुनवासी भइया के यहा गये होंगे, कहीं दूसरी जगह गॉव में तो जाते ही नाहीं। बिफनी नहीं सोच पाई कि बबुआ कहां गये होंगे, अन्हार होते होते तऽ अइये जायेंगे।
समिति का आदमी काहे के लिए खोज रहा था बबुआ को... बिफनी सोचने लगी. कउनो काम आ गया होगा। जौने दिन चितायें जल रही थीं ओहू दिन तऽ समिति के मंत्राी जी आये थे खेते पर, दाह के बाद लौटे अपने कार्यालय पर। इहौ बोल रहे थे कि श्मशान पर चितायें न जलाकर कतल वाले स्थान पर चितायें जला कर अच्छा किया आप लोगों ने। पोस्टमार्टम के दिन भी अस्पताल पर थे मंत्राी जी। बहुत बढ़िया आदमी हैं, गॉये के मेहरारून के भी अपनी समिति से जोड़ने के लिए बोले थे पर का करें, खूनै-कतल होय गया, ए समय ऊ कैसे समिति का काम करते।
बिफनी भी कई दिन से खटिया पर आराम से लेटी नहीं थी, कई तरह के काम थे, उसे ही करना था, उसका साथ देने वाली तो अपना माथा पीट रहीं थीं, ऊ कैसे काम करतीं अउर के ओनसे करवाता। बिफनी तत्काल खटिया पर पसर गई, कुछ ही देर में नींद में चली गई।
बबुआ समिति के आदमी से मिल कर अपने घर आ चुका था। उसने देखा कि बिफनी नींद की फुफकार में है...
‘का होगा उसे जगा कर, बेचारी लगातार छट-पटा ही तो रही है, थोड़ा आराम कर ले। बबुआ उसे खटिया पर सोता छोड़ कर ओसारे में चला आया...वहां बपई लेटे हुए थे खटिया पर, पर सोये हुए नहीं थे...
‘का बपई सो रहे हो का’ पूछा बबुआ ने बपई से
‘नाहीं हो बबुआ! मुई नींद कहां आती है, आती भी है तो किसिम किसिम का सपना ले कर आती है, मन घबरा जाता है। तोहार मंत्राी जी के आदमी से भेंट हुई कि नाहीं।’ पूछा बुझावन ने बबुआ से...
‘हॉ बपई भेंट हो गई है, काल्हु बोलाये हैं अपने कार्यालय पर मंत्राी जी।’
‘काहे के लिए बुलाये हैं हो?’
‘पता नाहीं बपई! होगा कउनो काम, कुछ अन्दाज नाहीं लग रहा है, अब काल्हु जायेंगे कार्यालय पर तब पता चलेगा।’
बुझावन खटिया पर बैठ गये मानो उन्हें विशेष बातें करनी हैं बबुआ से, बात तो करनी ही थी...
बुझावन बताने लगे...
‘अरे!बबुआ जौने दिन तूं लोग रापटगंज थे पोसटमार्टम कराने के लिए ओ दिना मंत्राी जी आये थे हमरे कीहें, सोमारू से भी मिले थे। लखनऊ से जब ऊ लौटे तब ओन्है खबर लगी कि गॉयें में कतल होय गया है वह भी अखबार पढ़ कर। पहिले इहां आये फिर रापटगंज गये, तूं लोगन से मिले थे के नाहीं..?’
‘मिले थे बपई! अउर हमके पॉच हजार रुपया भी दिए थेे...।’
‘बाले कि इसे रख लो बबुआ! कउनो काम आ सकता है रुपये का...’ हम नाहीं ले रहे थे पर नाहीं माने। लगे कहने कि बबुआ हम पराये नाहीं हैं, हमैं तूं लोग अपने घरे का मानो, दुख-सुख का साथी। साथी दुख में काम नाहीं देगा तब कब काम देगा हमसे जो भी बन पड़ेगा तूं लोगन के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, हमसे फोन से बातें करते रहना लगातार। यहां पर मेरा कोई काम हो तो रुक जाते हैं।’
‘नाहीं मंत्राी जी आप का कउनो काम इहां नाहीं है, आप जाइए समित पर, कउनो काम पड़ेगा तऽ फोन से बतायेंगे आपको।’
‘करीब दुई घंटा थे रापटगंज में फेर उहां से चले थे। बहत अच्छे आदमी हैं बपई! सरवन के तऽ आपन लइका जइसन मानते थे, मानने को तो हमके भी मानते हैं, ओनके संघे रहो तऽ बुझइबै नाहीं करता है के कउनो अधिकारी के संघे हैं।’
‘अरे! बबुआ का बोल रहे हो, मंत्राी जी तोहैं पॉच हजार रुवया भी दिये!’ चकरा गये बुझावन।
‘हॉ बपई रुपया भी दिये।’
‘काल्हु काहे के लिए बुलाये हैं, हमके भी अच्छा आदमी जान पड़े, बोल-चाल से ही बुझा जाता है के के कइसन है।’
कउनो काम होगा बपई! बपई से बतिया कर बबुबा अपने कमरे में चला आया। कमरे में आकर वह खटिया पर लेट गया, लगा खपरैल का छाजन देखने...
‘नाहीं नाहीं हम केहू कऽ बात नाहीं मानेंगे, हमार जौन मन करेगा उहै करेंगे। केहू के कहने पर हम रामलाल अउर ओनकरे भाई कऽ कतल नाहीं करेंगे। ई खून-कतल ठीक नाहीं है।’
खटिया पर पड़े पड़े बबुआ बड़-बड़ा रहा है... उसी समय बिफनी भी चली आई उसने बबुआ का बड़-बड़ाना सुन लिया...
‘का बड़-बड़ा रहे हैं हो, का बात है कइसन खून-कतल.. केकर कतल नाहीं
करेंगे, का बात है बताओ तो....’
बबुआ सहम गया, का पूछ रही है बिफनी, कैसे सुन लिया उसने कतल की बात। गॉव के लड़कवे तऽ मार कऽ बदला मार वाले हैं, बोल रहे थेे सब कि रामलाल का खलिहान फूंक देना चाहिए ओनकरे घरे में आ्रग लगा देनी चाहिए। ओनकर गॉव खाली है, सब भाग गये हैं गॉव छोड़ कर पुलिस के डर से।
‘कउनो बात नाहीं है हो।’ बबुआ ने कुछ नहीं बताया बिफनी को बड़बड़ाने के बारे में पर बिफनी तो बिफनी थी...
वह सीधे अपने कमरे में गई और एक बोतल दारू ले आई। दो दिन पहले ही उसने दारू मंगवा लिया था चेरवान से। जब तक करम-काण्ड का आयोजन है तब तक तो घरे में दारू चुआई नहीं जायेगी। चेरवान में तो रोजै बनती है। हमरे कीहें बनेगी तब भेजवा देंगे, लेन-देन चलता रहता है।
लगता है कि बबुआ के मने में कुछ है जौने के ऊ बताना नाहीं चाह रहे हैं, दारू पियेंगे तऽ सब बकर देंगे बिना कुछ पूछे।
दारू देखते ही उछल पड़ा बबुआ, ‘रखी थी का रे बिफनी! ओ दिना भी एक बोतल तूने दिया था अउर आजउ, कहां से जोगाड़ बनाई हो?’
‘चेरवाने से अउर कहां से’
‘रहिला भी है घरे में के नाहीं’
‘पहिलहीं का है भूजा हुआ है एहर कहां भुजा पाया...’
‘तनिक नून अउर हरियर मर्चा भी ‘बूक’ देती’
‘बूक देते हैं....’
दारू की बोतल खुल गई उसके साथ बबुआ भी खुल गया, एकदम साफ साफ आजादी के पहले वाले गंगा-जल की तरह निर्मल और पवित्रा...
‘नाहीं नाहीं रामलाल को तो मारना ही है उसने सरवन का कतल किया है, हमलोग काहे सहैं?
बिफनी ने माथा पकड़ लिया.. अब का होगा, गॉये वालों का मिजाज खराब होय गया फिर तो कतल होगा ही, लाठी-डंडा में हमार गॉव कमजोर नाहीं है, ओ लोगन से सरदारी भी हमरे गॉयें में अधिक है। गॉव के लड़कों को समझाना होगा कि कतल ठीक नाहीं है पर के समझायेगा गॉव के लड़कांे को? समिति के मंत्राी जी....वे समझा सकते हैं पर का लड़के मान जायंेगे मंत्राी जी की बातें...
‘धरती-माई गॉव के लड़कों के मिजाज के बारे में जान चुकी हैं, वे अपने आराध्य शिव जी से प्रार्थना कर रही हैं कि गॉव में शान्ति बनी रहे, दुबारा मार-काट न मचे। मार-काट से का मिलेगा?’
हे प्रभु! गॉव के लड़कों को बुद्धि दो, समझ दो, वे मार-पीट के बारे में न सोचे,
गुनें’
धरती-माई शिव जी की प्रार्थना में हैं, देखिए का होता है आगे....?
आग पर चलने वाली है धरती-कथा
पर यह आग कैसे पैदा हो गयी?
‘धरती-माई नहीं चाहतीं कि गॉव में मार-काट हो, लोग लड़ें एक दूसरे का गला काटें पर उनके चाहने से का होता है? वे कैसे नियंत्रित कर सकती हैं लोगों को, उनकी सुनेगा कौन, सभी तो स्यंभू हैं। गॉव में आग लगेगी तो धरती-कथा को भी आग में जलना होगा, किसी भी तरह से आग के खेल को रोकना होगा...धरती-माई अचानक ध्यान में चली जाती हैं। उनके घ्यान में स्वर्ग उतर आता है वहां एक से एक देवता हैं उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी वेदना किस देवता से बोलें वहां इन्द्र हैं, शिव हैं, शनिदेव हैं, ब्रह्मा जी हैं कई देवताओं से भरा हुआ है स्वर्ग, वहां पूर्ण शान्ति है जो वीरानी से अलग है, सुहाना मौसम है, मधुर मधुर सुगंध फैली हुई है हर तरफ। धरती-माई धरती पर आ कर काफी थक चुकी थीं स्वर्ग में पहुंचते ही उनकी थकान फुर्र हो गयी...
स्वर्ग में पहुच कर उनके मन ने कहा, तुम शिव से बातें करो वे लोक-कल्याण के देवता हैं धरती के प्रपंचों को हल करने का दायित्व उनका है...धरती-माई सीधे शिव जी से मिलती हैं और धरती का पूरा हाल उन्हें बताती हैैंं...शिव जी तो ठहरे औघड़दानी उन्हें किसका संकोच साफ साफ बोले...
देखो धरती! धरती पर बसने वाले सभी प्राणियों के भाग्य-फल और कर्म-फल पूर्व निर्धारित हैं उसे नहीं बदला जा सकता। वहां तो जो हो रहा है वही तो धरती को धरती बनाता है, वहां इसी लिए प्रेम है तो विरह भी है, सुख है तो दुख भी है, लाभ है तो हानि भी है, यश है तो अपयश भी है क्योंकि धरती पर मृत्य के देवता का राज है और ये सब मृत्यु के कार्य-कारण हैं। तुम तो धरती की मॉ हो वहां की रानी नहीं हो सो जो हो रहा है वहां उसे सिर्फ देखती जाओ...’
धरती-माई धरती पर होने वाले खेलों को देख रही हैं, वे देख रही हैं कि समिति के आदमी से मिल कर बबुआ गॉव में चला आया था। गॉव में हर तरफ आग ही आग थी, गॉव के लड़कों की बातें सुन कर उसे लगा कि वे आग की भठ्ठी में से तप कर निकले हुए हैं सबकी ऑखें चढ़ी हुई र्हैं, उनकी सॉसंे भी तप रही हैं, और दिमाग तो लाल लाल हैं ही आग में तपे हुए लोहे की तरह। गॉव के लड़के मार का बदला मार से लेने के लिए मन बना चुके हैं।
बबुआ सहम गया उन्हें देख कर, उसे डर लगने लगा। का होगा आगे! मार होगी तो सारे लड़के फस जायेंगे कानून के मकड़ जाल में। पुलिस मान लेगी कि बदला लिया गया है। पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं, का होगा गॉव का? समूह की खेती तब्बै हो पाई थी जब हमारे टोला के लोग एक साथ जुड़े थे...खेती से फायदा भी हुआ था। मार होते ही हमारा टोला बिखर जायेगा, मार करना तो आसान है पर मर मुकदमा, थाना-पुलिस झेलना आसान नाहीं है। वैसे भी मार का बदला मार से यह कौन सी बात है। हमारे बपई हमेशा कहते हैं कि खून-कतल से कुछ नहीं होता, बस एतनै होता है कि हमने बदला ले लिया। अरे! बदला लेने से का हो जायेगा, तूॅ मरो चाहे कोई दूसरा मरे का फरक पडेगा? कब्बौं नाहीं कभी भी मार-पीट, कतल के बारे में नाहीं सोचना चाहिए।
सरवन हमेशा सपना देखा करता था पूरा गॉव एक होने का, एक साथ चलने का, मिल कर एक साथ खेती करने का पर दखिनाहा टोले के लोग तैयार नहीं हुए नाहीं तऽ ऊ गॉयें के एक कर दिया होता। वह हमेशा कहता था जो बात मिल कर, एक साथ रह कर जीवन जीने में है वह बात अलग अलग रहने में नाहीं है।
दारू काम भर पीने के बाद भी वह नींद में नहीं जा पाया, नींद में गोते लगाने के लिए ही उसने दारू पिया था पर रह गया करवट बदलते ही, नींद उसके पास जो नहीं आई तो नहीं आई। पास ही में बिफनी भी थी वह सो गई थी उसे का पता कि बबुआ का सोच रहा है? बिफनी उसके पास ही में थी पर बिफनी का उसके पास में होना बबुआ को नहीं दिख रहा था, दिखता भी कैसे, उसकी ऑखों में तो मार-पीट चढ़ा हुआ था, सरवन, रजुआ, सुमुरना आदि का चेहरा दीख रहा था...फूटा हुआ माथा, गोली से छेदाई छातियॉ दिख रही थीं, बन्दूक और भाले दिख रहे थे, पोस्टमार्टम घर दिख रहा था। फिर खून बहवायेंगी का धरती-माई, का करने वाली हैं धरती-माई? धरती-माई भी कैसा कैसा रूप बदलती रहती हैं अपना।
‘काहे नाहीं परगट हो जातीं धरती-माई, धरती पर अउर जो बवाल हो रहा है गॉयें में काहे नाहीं रोक रही हैं? धरती तो ओनकरै है, ओन्है चाहिए कि धरती पर अवतार ले कर संभालैं इपने धरती पुतरन के। ओनकर दस पुत्तर तो मर गये गोली खा कर अब केतना पुतरन के अउर मरवाना चाहती हैं धरती-माई, केतना खून पीना चाह रही हैं, कउनो हिसाब किताब है कि नाहीं।’
बबुआ सोने की कोशिश करता, पर उसकी ऑखों में धरती-माई तैरने लगतीं, वह धरती-माई से सवाल-जबाब करने लगता। धरती-माई को फटकारता...
‘कैसी धरती-माई हैं आप! माई तो अपने पुतरन को संभालती है, दुलारती हैं, लोरी सुनाती हैं और एक आप हैं कि खून पर खून कराये जा रही हैं। लगता है कि आप किसी की माई नाहीं हैं अउर न किसी की माई हो सकती हैं। आप का हैं आप ही जानें। बेकार हो गई सारी पूजा... हमार अइया हमेशा आपको अरघ देती थी, हमार बपई जब भी खटिया छोड़ते हैं आपको गोड़े गिर कर ही अपना पैर जमीन पर रखते हैं। बपई की तरह हम भी करते हैं, कभी भूल-चूक हो जाती है तऽ माफी मॉगते हैं आप से। बिफनी आज भी आपके नाम पर दिया-बाती करती है। अइया बोलती थी कि जो सती माई हैं नऽ, नीबिया के पेड़वा के नाचे जेकर पक्का चौतरा बना है,उहै धरती-माई भी हैं, दुन्नौ जने बहिन हैं आपस में। बिफना गुसिया जाता है धरती-माई पर...
‘आप माई नाहीं हैं, आप कसाई हैं, अपने पुतरन कऽ खून पीने वाली, माई कैसे
हो सकती है? कब्बौं नाहीं हो सकतीं माई आप।’
बबुआ की ऑखों से जब धरती-माई हट जाती तब गॉव के लड़के उतरा जाते.लगते फटकारने बबुआ को, मार का बदला मार ही होता है बबुआ...
फिर बबुआ खुद को समझाता....
‘ऐसा काहे सोच रहा है तूॅ, लड़के हैं मान जायेंगे, ओन्है ठीक से समझाना होगा। सोचते सोचते तथा करवट बदलते बदलते रात बीत गई। बबुआ सुबह उठा और चाय-पानी करके सीधे मंत्राी जी के यहां साइकिल से जा पहुंचा।
मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे और कुछ कागजी काम निपटा रहे थे। उनके सामने उनका लैपटाप पड़ा हुआ था। कार्यालय भी उनका किसी आश्रम जैसा ही था, उसकी दीवारें हालांकि ईंट की थी पर उसका छाजन खपरैल का था। पतले-पतले बॉसों का छाजन था उस पर सीमेन्ट के साथ खपरैल छाया गया था जिससे छत चिकनी दिखे। छत चिकनी दिखती भी थी। मंत्राी जी का कार्यालय षटकोण के आकार का था जो बाहर से करीब करीब गोल दिखता था।
मंत्राी जी अपने कार्यालय में जमीन पर बैठे हुए थे, वे बैठते भी जमीन पर ही थे उनके सामने एक दरी बिछी हुई थी जिस पर वहां आने-जाने वाले बैठा करते थे। बिफना मंत्राी जी के सामने जा कर बैठ गया...
दुआ-सलाम के बाद मंत्राी जी ने बिफना से हाल-चाल पूछा फिर बातें शुरू हुईं।
‘का हो सब ठीक चल रहा है नऽ’ तेरही के खर्चे-बर्चे का इन्तजाम हुआ कि नाहीं।’
‘ इन्तजाम हो गया मंत्राी जी, खेलावन, बंधू, पुनवासी घोरावाल जायेंगे आज अउर सारा सामान खरीदा जायेगा।’
‘कुछ रुपया उपया चाही के नाहीं? चाहै तऽ बताओ हम प्रबंध कर देंगे, तूं रुपये के लिए परेशान न होना।’
‘नाहीं मंत्राी जी! रुपया का इन्तजाम होय गया है।’
‘चलो ठीक है, पर शरम न करना। मरनी का आयोजन अचानक होता है, पहले से तो रुपयों का कुछ प्रबंध तो रहता नहीं इसलिए दिक्कत हो जाती है।’
‘बबुआ तोहके आज हम एक जरूरी काम से बुलवाये हैं, तोहके एक खबर देनी है। हमारे पास कल रामलाल का एक आदमी आया था और धमकिया रहा था कि जो हल्दीघाटी के गॉव वालों के साथ चलेगा ओकरे संघें उहय किया जायेगा जो दस लोगों के साथ किया गया है। और एक बात बोला है हमसे, मंत्राी जी! आप बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को मना कर दें कि वे मुकदमे की पैरवी न करें, थाना-थूनी पर जा कर गवाह न बनें नाहीं तऽ गड़बड़ै होगा, हम आपको समझाय दे रहे हैं फिर जीन बोलिएगा कि तूं लोग बताये नाहीं थे। बूझ रहे हैं नऽ हमरी बात।’
मैंने डाट-डपट कर उस आदमी को अपने यहां से भगा दिया।
‘देख बबुआ! डरने की बात नहीं हैं। वे धमका रहें हैं धमकाते रहें पर तूॅ कानून
का साथ मत छोड़ना। हत्यारों ने इतना बड़ा अपराध किया है कि सरकार ही उन्हें नहीं छोड़ने वाली। हल्दीघटी गॉव का यह बर्बर हत्याकाण्ड देश-विदेश तक फैल चुका है संसद व विधान सभा में भी सवाल उठाया गया है। एक दो दिन में मुख्य मंत्राी जी भी आने वाले हैं गॉव में.... तूं देख लेना कोई नहीं बचेगा, सबकी सजा होगी वे जैसा किए हैं वैसा ही भोगेंगे भी।’
‘हॉ मंत्राी जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोग नाहीं डर रहे हैं ओ लोगन से पर एक बात अउर है मंत्राी जी, हमैं राती में नींद नाहीं आई, इहय सोचते रह गये हम रात भर...’
‘का बात है हो बबुआ बताओ तो सही..’ पूछा मंत्राी जी ने बबुआ से
बबुआ सहमा हुआ है, मंत्राी जी को बताये कि नाहीं, बतायेगा मंत्राी जी को, भला मंत्राी जी किसी से बोलेंगे...
मंत्राी जी ऐसा है नऽ गॉव के लड़कवे हैं नऽ सब बदला लेने के लिए बोल रहे हैं कउनो बोल रहा है कि...
‘कुछ नाहीं कर सकते हैं ये समय में तऽ ऊ लोगन का खलिहान फूंक तो सकते हैं नऽ’
’ऊ लोगन के लड़कों का पकड़ि के मार सकते हैं नऽ’
‘घरै में आग लगाय सकते हैं नऽ’
‘जब हम ओ लोगन से बोले कि मार-पीट ठीक नाहीं है और घर फूंकना, खलिहान में आग लगाना, उनके लड़कों को मारना ई सब गलत है, हमैं अइसन नाहीं सोचना चाहिए, तब ऊ सब हमरे पर गरमाय गये, बोलने लगे कि तूं गद्दार है। हमैं तऽ लगता है मंत्राी जी हमरे टोला के लडकों का उतराहाटोले के लोगों ने बहकाय दिया है। आप तो जानते ही हैं कि उतराहाटोले वाले न तो जमीन का मुकदमा लड़ि रहे हैं और न ही ओ दिना खेते पर थे। सब लोग हमारे टोले के मारे भी गये हैं, घायल हुए हैं। ओ टोले वाले तो मजाक उड़ाते हैं हमरे टोले वालों का। समूह की खेती का लाभ देख कर तथा कुछ पुरानी बातों के कारण उतराहाटोले वाले हमारे टोले वालों से खार खाये बैठे हैं, अइसने में हम का करंे कुछ बुझा नाहीं रहा है, आप बतावैं कुछ।’
मंत्राी जी बबुआ की बातें सुनकर गंभीर हो गये।
‘बात तो गड़बड़ है, तुम्हारे टोले के लड़कों का बदला लेने के बारे में सोचना एकदम गलत है। देखो बबुआ! बदला लेने से का हो जायेगा... का सरवन जिन्दा हो जायेगा, का बुद्धन जिन्दा हो जायेगा? रजुआ, सुमेरन,लखना, कलुआ, नन्दू,नगेशर, बलेशर और सन्तू जिन्दा हो जायेंगे फिर किस कस कतल करोगे? हत्याकाण्ड में केवल रामलाल का ही तो परिवार शामिल नहीं था, तमाम बाहरी थे फिर बदला लेना यह मनुष्यता नहीं है। कानून काहे के लिए है, अदालत काहे के लिए है, जो काम कानून का है, अदालत का है वह काम आखिर हम काहे करें। हमें सोचना चाहिए इस बारे में।’
बबुआ सुन रहा है मंत्राी जी की बातें, यही तो वह कह रहा है गॉव के लड़कों से पर लड़के हैं कि उसे ही गलत बता रहे हैं। एसी स्थिति में का करे का न करे नहीं समझ पा रहा बबुआ। मंत्राी जी अब आप ही कउनो रास्ता निकालिए हमैं तऽ कुछौ नाहीं बुझा रहा है।
मंत्राी जी जहां बैठे थे वहां से उठे और बबुआ के पास आ गये... उसकी पीठ पर हाथ रख कर उसे समझाने लगे...
‘देख! बबुआ ऐसा है जो बात अपने वश में न हो उसे समय पर टाल देना चाहिए, यह मान कर चलना चाहिए कि समय हर चीज का फैसला करता है बस तूॅ गॉव के लड़कों को समझाते-बुझाते रहो। हॉ एक बात बताओ...
बन्धू, पुनवासी और खेलावन का का हाल है, का ऊ सब भी गॉव के लड़कों के साथ हो गये हैं? ऊ सब तो तोहार दोस्त हैं।’
मंत्राी जी ने पूछा बबुआ से...
‘नाहीं मंत्राी जी ऊ सब भी हमरे संघंे बोल रहे थे, ऊ तो वहां हम थे रोक लिए बंधू को नाहीं तऽ मार-पीट भी हो जाती, खेलावन भी तनेन होय गया था।’
समिति के मंत्राी जी से बतियाकर बबुआ लौट आया अपने गॉव। गॉव तो गॉव कोई बात गॉव में छिपी नहीं रहती, एक कान से दूसरे कान तक पहुंच ही जाती है मार-पीट की बातें भी पहुंच गई गॉव के परमू काका, बुधनी काकी, सोमारू काका, और बबुआ के बपई बुझावन तक...
परमू काका और बुधनी काकी दोनों सीधी राह चलने वाले हैं दोनों बांये-दायें नहीं चला करते। दोनों ने लड़कों की बातों को आसमान में उठा लिया...
‘अबहीं तेरही नाहीं बीती अउर लगे पहाड़ा पढ़ने, ओ दिना कहां थे जब हमरे टोला के लड़कवे डट गये थे खेत पर। आज मरद बन रहे हो ओ दिना मरद नाहीं बने थे, पकड़ि लिये होते बनूकिया अउर मार दिये होते ओ सभन के। पर नाहीं ओ दिना तऽ बीली में लुकाय गये थे अब निकसे हैं बीली में से। चले हैं बदला लेने, केसे केसे बदला लोगे, तीन सौ आदमी थे, कुछ अकिल है कि नाहीं। मुकदमा लड़ने के लिए रापटगंज जाना होता है तऽ बबुआ जाता है, कबहूं खेलावन तऽ कबहूं बंधू चला जाता है, कइ ठे रुपया लगाये हो अब तक मुकदमा में, कुछ खियाल हो तो बताओ।’
‘अरे! तूं लोग का बोलोगे, तूं लोग तो मेहरारून से भी कमजोर हो ओ दिना काहे नाहीं बोले अधिकरियन से हम तऽ लाशौ ले जाने से रोक दिए थे...जब अधिकारी बोले कि अपराधियों को किसी भी हाल में नाहीं छोड़ा जायेगा, आपलोग लाशों को ले जाने दीजिए, मत रोकिए तब हम माने।’
‘का बूझते हो हमैं दरद नाहीं है हमरौ लड़िका मर गया है, ओकरे छाती में गोली लगी है, सामने से मरा है तनेन हो कर, बबुआ भी ओही दिना मर जाता पर वह
टेक्टर रोक रहा था इहां हत्यारों ने गोली चला दिया। लड़के तो दस ठे मरे हैं ओनकरे घरे लोग नाहीं हैं का बदला लेने के लिए, पर नाहीं ऊ लोग तूं लोगन नीयर नाहीं हैं के खाली हल्ला करना है...’
अरे! बुधनी काहे एतना बोल रही है, तूं चुप लगा जा, ई लोगन से पूछो कउने दिन हत्यारों का खलिहान फूंकना है...?
‘हं भइया बताओ तूं लोग के कउने दिना रामलाल का खलिहान फूंकना है..?’
‘बताओ बताओ, नाहीं बोल रहे हो कुछ, काहे चुप हो गये तूं लोग, कुछ तऽ बोलो लड़के सुन्न तो सुन्न, का पूछ रहे हैं परमू काका...
परमू काका के बारे में लड़कों को पता है कि वे जो बोलते हैं वही करते हैं फिर रूकते नाहीं हैं।
परमू काका लड़कों से पूछ रहे हैं पर लड़के चुप तो चुप, उन्हें तो सॉप सूंघ गया हो जैसे.... जबकि वे गोल-बन्द थे छह की संख्या में, उन लड़कों में उतराहाटोले के लड़के भी थे...
परमू काका चुप रहने वालों में नहीं थे...
‘काहे का हो गया, काहे नाहीं बोल रहे हो तूं लोग...?’
‘चलो अजुयै फूंक दिया जाये ओ लोगन कऽ खलिहान, ओ लोगन कऽ लड़िकवे स्कूल जाते होंगे वहीं से उठा लिया जाये या वहीं मार दिया जाय ओन्है। का बोलते हो, हम बोलाय लेते हैं बुझावन, पुनवासी, खेलावन अउर बंधू के भीे, का बोलते हो चला जाय खलिहान फूंकनेे। ओ लोगन कऽ गॉव सुन्न पड़ा है, मौका बढ़िया है गॉयें में कोई नाहीं है, सिपाहियो चले गये होंगे, एक दो दिन सिपाही गॉव अगोर दिये बहुत होय गया। हमरे गॉयें में भी अब ओतना सिपाही नाहीं हैं, सब धीरे धीरे लौट रहे हैं।’
लड़के चुप तऽ चुप। वे कुछ नहीं बोले और धीरे धीरे वहां से सरक लिए। परमू काका बुधनी के साथ बबुआ के घर पर आ गये। बबुआ से मिलकर समझाने लगे बबुआ को..
‘देख बबुआ! तूं आपन काम कर, तूं घबरा जीन, कोई कुछ करने वाला नाहीं है। हमारे टोले की जो एकता बनी है नऽ उतराहाटोले वालों को अच्छी नाहीं लग रही है, वे जल रहे हैं, खेती में फायदा सुन कर सब डाह करने लगे हैं और चाहते हैं कि मार-पीट हो जाये रामलाल के लोगों से। देख! बबुआ हमरे समझ में एक बात अउर आय रही है, हमैं तऽ लगता है कि रामलाल से उतराहाटोले वाले मिले हुए हैं। खियाल करो जौने दिना मार-पीट अउर कतल हुआ ओ दिना ऊ सब मौके पर नाहीं थे। केवल दुई आदमी थे अउर दूर से मार-पीट देख रहे थे। सबसे पहिले उहै सब भागे थे खेलावन हमसे ईहय बताय रहा था... आखिर ओ दिना उतराहाटोले के लोग कहां चले गये थेे, सोचने की बात है कि नाहीं। खैर छोड़ो ई सब बात, एके हम गॉयें में देख लेंगे, तूं आगे का काम देखो अउर ओही के बारे में सोचो...रपट वगैरह
लिखाई गया है, ओमे गवाह सब अपने दखिनाहा टोले के ही हैैं। थाना जाते जाते सोमारू भइया ने हमैं सहेजा था...।
‘देखना परमू उतराहाटोले वालों का नाम गवाही में जीन देना, ऊ सब मिल सकते हैं रामलाल से, कुछ रुपया-पानी दे देगा सब बदल जायेंगे गवाही के दिन। गवाही में अपने टोले के लोगों का ही नाम देना। ओनकरे कहने पर ही ही हम गवाही में अपने टोले के लोगों का नाम दिये हैं नाहीं तऽ गड़बड़ा जाता, भगवान ने अकिल दे दिया।’
‘हं यार एक बात बताओ, तूं मंत्राी जी के ईहां गये थे नऽ, का बोल रहे थे मंत्राी जी ओनसे कुछ बताये के नाहीं ये बारे में..’
‘ओनसे सब बता दिए काका, वे बोल रहे थे के मार का बदला मार से का होगा, कानून अउर अदालत खुदै बदला लेगी, कोई नहीं बचेगा सबकी फॉसी नाहीं तऽ उमिर भर की सजा जरूर होगी। देखे नाहीं कलक्टर अउर एस.पी. साहब का चेहरा अउर मनवै उतर गया था उनलोगों का। कउनो अखबार नाहीं है जौने में खबर न छपी हो। किसी का वश नहीं है कि ये घटना के दबा दे।’
‘ईहै तऽ हमरौ मन कह रहा है काका! कोई नाहीं बचेगा सजा से, सबकी सजा होगी जरूर, देर है पर अन्धेर नाहीं है। हमरे टोला के लड़कवे ठीक हैं ये बवाल नाहीं करेंगे ओ टोला वाले भी का कर लंेगे खाली बड़-बड़ा रहे हैं।’
घरती-माई परेशान हैं अपनी ही धरती पर अवतार लेकर, धरती को उर्वरा संपन्न बना कर, धरती पर नदियॉ और उपजाऊ जमीन बना कर, पेड़-पौधे उगा कर, जीव-जन्तु पैदा कर... वे अपने धरती-पुत्रों से निराश व हताश हैं उनके पुत्रा किसिम किसिम की भूमिका निभानेे लगे हैं, मनमाना करने लगे हैं। उन्हांेने सुन लिया है उतराहाटोले के लड़कों की बातें..‘वे मार का बदला मार से लेना चाहते हैं।’
‘धरती-माई ध्यान से बाहर आ चुकी हैं, स्वर्ग से उन्हें राहत नहीं मिली। वे जा रही हैं गॉव से बाहर नाले की तरफ, वहीं पीपर का एक पेड़ है, उसी के नीचे बैठना चाहती हैं कुछ देर। संभव है कि वहां पीपर के पेड़ के पत्तों पर निवास करने वाले देवी-देवता मिल जांये। कहते हैं पीपर के हर पत्ते पर भगवान का वास होता है, भगवान मिलेंगे जरूर। कोई न कोई देवता वहां होंगे ही, सभी एक साथ अपना पवित्रा निवास थोड़ै छोड़ देंगे, उनसे बातें करेंगी धरती-माई अपने पुत्रों के बारे में। भले ही शिव जी से बातें हो गयी है तो का हुआ? दूसरे देवता भी तो यहीं पीपर के पत्तों पर अपना डेरा जमाये हुए हैं उन्हें तो धरती पर फैल रही क्रो्रधों तथा बदलों की प्रचण्ड आग के बारे में पता होगा ही। धरती-माई कुछ ही देर में पहुंच गयीं पीपर के पेड़ के नीचे..। वहां शान्ति थी, हवा भी नहीं बह रही थी, पीपर के पेड़ के पत्ते भी स्थिर थे, वे हिल-डुल नहीं रहे थे। धरती-माई पद्मासन लगा कर पेड़ के नीचे बैठ गईं और भुन-भुनाने जैसा कुछ करने लगीं जो सामान्यों की समझ से बाहर था। उस क्रिया को तो समर्थ वैज्ञानिक भी नहीं समझ सकता...’
‘कागज उड़ रहे हैं
उड़ते कागजों ने ही सिरजा है धरती-कथा’
‘समझने को तो धरती-माई भी नहीं समझ पा रही हैं कि वे धरती पर आकर क्या कर रही हैं, बस पड़ी हुई हैं एक किनारे, कभी पीपर के पेड़ के नीचे तो कभी अपनी चौरी पर। हल्दीघाटी गॉव में जब से कतल हुआ है तबसे उनकी कोई पूजा भी नहीं कर रहा, अक्षत-पुष्प और दसांग-घी की सुगंध भी नहीं मिल रही उन्हें। बिना पूजा की सुगन्ध पिये वे कैसे जीवित रहें संकट खड़ा हो गया है उनके सामने। स्वर्ग से भी उन्हें निराश और हताश हो कर लौटना पड़ा, वहां कोई नहीं सुनने वाला उनकी। और यह जो धरती की कथा है कि उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं, धरती-कथा अपनी कथा खुद सिरज रही हैं, उसे सिरजने में मस्त मस्त है और इसके जो पात्रा हैं वे तो पहले से ही स्वतंत्रा और निरकुंश हैं वे किसी की नहीं सुनने वाले, सुने भी क्यों? वे अपनी आजादी बेचकर कथा में भूमिका थोड़ै निभायेंगे कुछ बिके हुए लोगों की तरह। वे अपनी भूमिका खुद गढ़ रहे हैं और कथा को आगे बढ़ा रहे हैं। इसीलिए तो धरती-माई परेशान हैं आखिर उनकी कोई सुन क्यों नहीं रहा?’ फिर सरकार उनकी क्या सुनेगी?
वैसे भी सरकार तो सरकार होती है। उसके कई कई हाथ होते हैं, कई कई मुह होते हैं, काम करने की शैली भी रंगबिरंगी होती है। अपनी जनता पर हुकूमत का रूआब दिखाने में माहिर भी। प्रदेश की नई सरकार तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों की गर्मी से भरी हुई थी। हल्दीघाटी वाली घटना की जॉच-पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी नई सरकार ने बिना देर किए गठित कर दिया। उस कमेटी में बिना दाग वाले कड़ियल अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया। जिससे मामले की विधिक जॉच सही सही हो पाये। जॉच में घपले न होने पायें।
कमेटी वाले ऐसे अधिकारी थे जो सीधी राह चलने वाले थे वे बाएं-दाएं नहीं देखा करते थे। वे जिधर से गुजरते थे रास्ते कांपने लगते थे, गलियां सिकुड़ जाया करती थीं तथा विकास के जो प्रोजेक्ट चल रहे होते थे वे अपना पूरा लेखा-जोखा हाथ में ले कर उनकेे सामने नतमस्तक हो जाया करते थे।
उच्चस्तरीय कमेटी की सरकारी घोषणा ने अखबारों को रंगीन बदरियों की तरह ढक लिया फिर क्या था सोनभद्र की जनता में खुशियां उछलने लगीं। चलो यह काम तो अच्छा हुआ अब कोई नहीं बचेगा, मुख्यमंत्राी जी इतने कड़ियल हैं कि वे पूरे सोनभद्र के भमि-प्रबंधन की खामियों की जॉच करा कर ही छोड़ेंगे, वे जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
सरकार की उच्चस्तरीय कमेटी एक दिन जिला मुख्यालय पर आ धमकी। कमेटी के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव की कागज पर उतरी घटना भर थी। घटना कैसे घटी क्यों घटी इसकी पूरी जॉच रिपोर्ट नहीं थी कमेटी के सामने, केवल प्राथमिक जॉच के कुछ रिपोर्टें थीं। एफ.आई.आर. थी इसके अलावा कोई दूसरे साक्ष्य न थे। केवल एफ.आई.आर. तथा कुछ प्राथमिक रिपोर्टाें से कैसे पता चलता कि जमीन के झगड़े के मुख्य कारण क्या थे? जमीन के सारे साक्ष्य तो रिकार्ड रूम में थे जिसे डी.एम. साहब देख और दिखवा चुके थे। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों को उन सभी कागजी साक्ष्यों को दिया भी। कमेटी के अधिकारी दुविधा में पड़ते जा रहे थे। बैनामा तो ठीक जान पड़ता है, बैनामा जिसने किया है जमीन उसके नाम से है वह जमीन का असल खाता घारक भी है, असल खाता घारक होने के कारण वह जमीन का बैनामा कर सकता है। जिसके नाम से हालिया जमीन का नामांतरण हुआ है वह भी दर्ज कागजात माल हो चुका है। नामंतरण होने के बाद ही वह जमीन का कब्जा लेने पहुंचा हल्दीघाटी वाले गॉव फिर हत्यायें हुई। दूसरी तरफ कब्जाधारक कब्जे के आधार पर जमीन को अपना मानते थे, आजादी के पहले से ही उनका कब्जा-दखल व जोत-कोड़ विवदित जमीन पर लगातार चलता आ रहा है। कमेटी के अधिकारी जोत-कोड़ वाले विन्दु पर उलझ गये। आदिवासियों का विवादित जमीन पर आजादी के पहले से ही लगातार कब्जा-दखल व जोत-कोड़ चला आ रहा है फिर विवादित जमीन उनके नाम से कागजात माल में जमीनदारी विनाश के तहत दर्ज क्यों नहीं हुई? आखिर कैसे की गई यहां पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाही? वे जमीन पर कब्जे व जोत-कोड़ का एक सिरा पकड़ते तो बैनामे वाला सिरा अपनेआप छूट जाता फिर वही सवाल ‘लगातार कब्जे वाला’ उनके सामने आकर तनेन हो जाता...
आखिर मार-पीट काहे हुई, कौन गलत है कोन सही है? किसके नाम वाली जमीन सही है, फिलहाल तो आरोपी तथा प्रताड़ित ही पक्ष हैं, लगता है तीसरे पक्ष के रूप में राजस्व अधिकारी भी हैं, राजस्व का मुकमा निर्णित करने में भी तो गलतियां हो सकती हैं! राजस्व के मुकदमों को देखना होगा...। जमीनदारी विनाश अधिनियम को भी यहां विधिक ढंग से लागू किया गया कि नहीं उसे भी समझना होगा।
कमेटी के विचारण के लिए तीन पक्ष हो गये, पहले तो दो ही पक्ष थे आरोपी तथा प्रताड़ित, राजस्व अधिकारी भी एक तीसरे पक्ष के रूप में सवाल जैसे दीखने लगे। कमेटी के विद्वान अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों की भूमिका तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम के क्रियान्ययन पर भी गंभीरता से विचार करने लगे।
देखना यह होगा कि विवादित जमीन आरोपी के नाम से कब और कैसे आई?
इस सवाल का उत्तर ही हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना का मुख्य कारण हो सकता है। इसका उत्तर डी.एम. साहब के पास था। वे काफी होमवर्क कर चुके थे इस मामले में। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव के सभी खातों का पूरा वृतांत जो धरती-कथा की तरह था सप्रमाण प्रस्तुत कर दिया।
अब कमेटी के अधिकारियों के पास खातों का खुला खुला वृतान्त था, यानि पूरी कथा थी पर वह कथा-वृतान्त नहीं था जिससे मालूम होता कि जिस कथित संस्था ने आरोपियों को जमीन का बैनामा किया उस संस्था का नाम विवादित जमीन पर
‘जंगल जिरायत’ काट कर कैसे और कब नामांतरित हो गया? संस्था वालों ने आरोपियों को जमीन बेचा था उसी आधार पर आरोपियों का नाम जमीन पर चढ़ गया। वैसे डी.एम. साहब की जानकारी पक्की थी कि आरोपियों के नाम से जमीन कब और कैसे नमांतरित हुई? जानकारी होते हुए भी डी.एम. साहब ने कमेटी के अधिकारियों को नहीं बताया। वे बताते भी क्यों? उसी विन्दु पर तो फसान था जिसके कारण डी.एम. साहब तथा एस.डी.एम. साहब जांच के घेरे में आ जाते। आरोपियों के नाम से जमीन का नामांतरण एस.डी.एम. ने किया था तथा उसपर हुई आपत्ति को डी.एम.साहब ने खारिज किया था। गंभीरता से जॉच करने पर मुकदमों को निर्णित करने में कुछ वैधानिक खामियॉ निकल सकती हैं। प्रताड़ितों के वकील के प्रतिवाद को आखिर क्यों ध्यान में नहीं रखा गया तथा उसे बिना सुने ही आरोपियों के नामों को पूर्व खातेदार का नाम काट कर दर्ज कागजात-माल कर दिया गया।
कमेटी वाले अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों से जिरह करके हल्दीघाटी वाले गॉव के काण्ड के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे पर असल बातें जिसे वे जानना चाहते थे पर्दे में थीं। कारणों पर ढके पर्दों को हटाने में कमेटी वाले दूसरे दिन जुट गये इस क्रम में कमेटी वालों की समझ में आया कि प्रताड़ितों के वकील से मिल कर ही विवाद के कारणों पर से पर्दा हटाया जा सकता है। स्थानीय राजस्व विभाग के अफसर तो कारण वही बतायेंगे जिससे उन पर ऑच न आने पाये। प्रताड़ितों का जो वकील है बहुत कुछ जानता होगा जमीन विवाद के बारे में उसके तर्क हांेगे तथा प्रतिवाद के आधार भी होंगे उसके पास। सो रास्ता उससे मिलकर ही निकलेगा।
दूसरे दिन ही कमेटी वालों ने प्रताड़ितों के वकील को बुलावा भेज दिया... प्रताड़ितों का वकील उस दिन नगर में नहीं था वह कहीं गया हुआ था। प्रशासन ने उसी नायब तहसीलदार को लगा दिया प्रताड़ितों के वकील को कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कराने का। नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील से रात में उसके आवास पर मिला और कमेटी के अधिकारियों से मिलने का प्रस्ताव उसे दिया।
दूसरे दिन करीब ग्यारह बजे दिन के आसपास नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील को जिला मुख्यालय ले गया फिर प्रताड़ितों का वकील कमेटी वालों के समक्ष हाजिर हुआ। उसके साथ कुछ फाइलें भी थीं, वही फाइलंे जिसे उसे डी.एम. साहब को दिखाना था। प्रताड़ितों का वकील खुद को तैयार कर चुका था कि कमेटी वालों को अपनी बातों से किस तरह प्रभावित करना है। कमेटी वाले प्रदेश के बडे़-बड़े़े अधिकारी थे, कई तरह के अनुभवों वाले, कानूनों के जानकार तथा गूॅगों से भी सच उगलवा सकने वाले सो प्रताड़ितों के वकील को भी तो हर तरह से खुद को तैयार करना था जिससे वह वहां गूॅगा न रह जाये।
कमेटी भी अधिकारियों की ही थी। मानव सभ्यता के अलग नश्ल वाली, वे किसी से तय समय पर मिल लें ऐसा अपवाद ही होता है वैसे भी कमेटी वाले पुलिस के अधिकारियों से सवाल-जबाब कर रहे थे। करीब दो घंटे बाद वे खाली हुए फिर
प्रताड़ितों के वकील की कमेटी वालों से मुलाकात हुई।
कमेटी वाले सज्जन थे उनके चेहरे पर सामान्य लोगों की तरह ही चमक थी अधिकारियों वाला रूआब कहीं गायब था। वे भाषा तथा भूसा से भी सरल जान पड़ रहे थे काई दिखावा नहीं। कोट, पैन्ट, टाई का तो दूर दूर तक पता नहीं था। वे सामान्य से लिवास में थे मानो तरकारी खरीदने जा रहे हों। उनमें एक महिला अधिकारी भी थीं वही कमेटी की मुखिया थीं। वे शालीन थीं तथा उनकी बोली बहुत ही मीठी थी।
अपनी मीठी बोली में ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से बैठने के लिए बोला.
‘अरे वकील साहब काहे खड़े हैं बैठिए’
प्रताड़ितों का वकील कहां बैठे? वहां एक ही दो सीटर सोफा था जिस पर वे बैठी हुई थीं सामने कमेटी के दूसरे लोग बैठे हुए थे...
प्रताड़ितों के वकील की समझ में नहीं आया कि वह कहां बैठे तभी महिला अधिकारी बोल उठीं तथा अपने पास ही बैठने का इशारा किया फिर प्रताड़ितों का वकील उनके पास ही बैठ गया। प्रताड़ितांे के वकील को आभास हुआ कि वह असहज हुआ जा रहा है और महिला अधिकारी की प्रतिभा में कहीं विलुप्त होता जा रहा है। ऐसा पहली बार उसके साथ हुआ था जब वह किसी आलाधिकारी के साथ ही नहीं बिल्कुल बगल में बैठा हो। प्रताड़ितों के वकील ने खुद को संयत किया।
महिला अधिकारी ने विनम्रता से कहा वकील से...
‘देखिए वकील साहब! यह कमेटी हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना की सचाई जानना व समझना चाहती है, आपसे आग्रह है कि कमेटी को वह विधिक रास्ता बतायें जिससे कमेटी सचाई तक पहुंच सके, हम लोग तो उलझ चुके हैं भूमि प्रबंधन के माया जाल वाले धरती-कथा में...। समझ में नहीं आ रहा है कि यह जो खाता-वृतांत है कब का है तथा किस बिन्दु से जॉच प्रारंभ करें। मुख्यमंत्राी जी हैं कि वे मन बना चुके हैं यहां के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने के लिए। किसी भी हाल में वे नहीं मानते कि प्रताड़ितों ने कुछ गैर कानूनी किया होगा, गैर कानूनी कार्य किया है आरोपियों ने। हमलोगों को भी यही जान पड़ रहा है।’
महिला अधिकारी से ऐसी मीठी बोली की आशा प्रताड़ितों के वकील को न थी।
उसे तो अनुमान था कि जिले के दूसरे आलाधिकरियों की तरह ही कमेटी वाले कड़क होंगे और बेधक बोली वाले होंगे, वह तो चकरा गया...
‘हॉ मैडम! जितना में जानता हूॅ उतना बता सकता हूॅ आप सवाल पूछें फिर मैं बताऊॅ, ऐसे का बताऊंगा? मुझे क्या पता कि आप क्या जानना चाह रही हैं।’
फिर महिला अधिकारी ने सवाल पूछना शुरू किया, उनके एक एक सवाल का प्रताड़ितों के वकील ने सप्रमाण उत्तर दिया। महिला अधिकारी वकील के बताये सारे उत्तरों को नोट करती जा रही थीं। एक जगह जा कर महिला अधिकारी की कलम रूक गई... कलम रूकते ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से साफ पूछा...
‘तो क्या बैनामा वाली जमीन का खारिज-दाखिल आरोपियों के नाम से हो चुका है?’
‘हॉ मैडम तभी तो आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया.. और गोलियॉ चल गईं दस लोग मारे गये।’
‘यह बताइए वकील साहब! बैनामे वाली जमीन का खारिज-दाखिल कब हुआ और उसे किसने किया?’
महिला अधिकारी ने दूसरा सवाल पूछा प्रताड़ितों के वकील से..
‘हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ दिन पहले ही आरोपियों के नाम दर्ज कागजात माल हो चुके थे, घटना उसके बाद ही घटित हुई। आरापियों का नाम दर्ज कागजात माल हो जाने के कारण उसकी खतौनी भी उन्हें मिल चुकी थी। सो वे तत्काल जमीन पर कब्जा ले लेना चाहते थे उसी के कारण घटना घटित हुई।’
प्रताड़ितों के वकील ने महिला अधिकारी को बताया तथा उसका प्रमाण भी दे दिया।
कमेटी के अधिकारियों के दिल-दिमाग में सन्देह पैदा हो चुका था वे मान चुके थे कि कुछ न कुछ प्रशासनिक स्तर पर भी गड़बड़ हुआ है। कमेटी वाले राजस्व विभाग के कागजों तथा उसमें किए गये फैसलों को मुख्य आधार बनाने के बारे में सोचने लगे। कमेटी वालों ने आपस में बातें की और प्रताड़ितों के वकील को घन्यवाद दिया तथा निवेदन भी किया कि हमलोग आपसे एक बार दुबारा मिलना चाहेंगे।
कमेटी वालों के पास कम ही समय था उन्हें सरकार को रिपोर्ट देना था सो वे जल्दी में थे और दूसरे कामों में संलग्न हो गये।
प्रताड़ितों का वकील प्रसन्न होकर वहां से लौट आया। उसे लगा कि कमेटी वाले प्रताड़ितों के पक्ष की तरफ खड़े जान पड़ रहे हैं। उन्हें आभास हो चुका है कि खारिज दाखिल वाले राजस्व के मुकदमे में वैधानिक गल्ती हुई है। फिर वह कचहरिया कामों में लग गया। कचहरी से वह अपने आवास पर लौटने वाला ही था कि पीड़ितों के परिजनों ने उसे घेर लिया...
‘का हो रहा है वकील साहेब! हमलोग तो बर्बाद हो गये।’
प्रताड़ितों के वकील को कहीं से सूचना मिली थी कि सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक सहायता मिलने वाली है और कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। सरकार पूरी तरह से आपलोगों के साथ है, मुख्यमंत्राी जी आने वाले हैं, संभव है उसी दिन कुछ आर्थिक सहायता आपलोगों को मिले। आपलोग गॉव में शान्ति बनाये रखें और सरकार पर भरोसा रखें।’
प्रताड़ितों का वकील पीड़ितों के परिजनों को समझा कर अपने आवास पर चला गया और परिजन सीधे अपने अपने घर लौट गये।
हल्दीघाटी वाली घटना का असर कचहरी पर तनिक भी न था असर होता तो कम से कम एक दिन के लिए कचहरी के कार्य का बहिष्कार वकीलों ने किया होता
और कचहरी बन्द हो जाती। पर ऐसा नहीं हुआ था। कोई दूसरा कारण होता तो वकील न चूकते वे कार्य बहिष्कार अवश्य ही करते। दर असल हल्दीघाटी वाला मामला दो पक्षों का था वह भी जमीन के मालिकाने के सवाल को ले कर सो उस मामले के आधार पर वकीलों को कचहरी के कार्य का बहिष्कार करना उचित न लगा था। ऐसे मामले तो जनपद में होते रहते हैं।
यह जमीन ही है जिसका मामला शुरू तो होता है राजस्व के मुकदमे से पर पहुंच जाता है दिवानी तथा फौजदारी के मुकदमे तक। जमीन का मामला हो या मकान का, दौरान मुकदमा इन मामलों में मार-पीट कतल हो जाना किसी हिंसक संस्कृति की तरह है जो फैली हुई है हर तरफ। लोग मुकदमा लड़ते लड़ते परेशान तथा हलकान हो जाते हैं फिर विवाद के आखिरी हिंसक समाधान मार-पीट, कतल पर उतर जाते हैं। कतल हो जाने के बाद उन्हें अगर कुछ समझ में आया भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला? तब तक तो दोनों पक्ष खुद की गृहस्थी मटियामेट कर चुके होते हैं। रोते रहने के अलावा उनके पास फिर से गृहस्थी संभालने की क्षमता नहीं बची रहती, वे सड़क पर आ चुके होते हैं।
प्रताड़ितों का वकील कमेटी के अधिकारियों से मिल कर कचहरी लौट आया था और कमेटी के सभी अधिकारी कलक्टरी पर ही थे। कलक्टरी का माहौल पहले की तरह था शान्त और स्थिर। लम्बे चोड़े घेरे वाली कलक्टरी अपने आप एक अलग शान का प्रतीक थी पुराने जमाने के किलों की तरह नई नई बनी भी थी। किलों में जैसे अदब और शान हर तरफ पसरा होता है, रियासत की गरिमा अलग तरीके से प्रभावित कर रही होती है वैसेे ही आज के समय की कलक्टरी की गरिमा भी राजशाही के अतीत में झोंकने वाली होती है। वहां पहुंचो तो भूल जाना ही होता है अपनी अस्मिता अपना सारा कुछ जो याद रहता है वहां याद नहीं रहता। कलक्टरी कुछ दे न दे अदब जरूर सिखा देती है समझ में आने लगती है बातें कि शासन यूॅ ही नहीं चला करता शासन चलता है, अदब से और अदब सिखाने वाली केवल एक संस्था है, वह है प्रशासन। लोक-समाज वाली संस्था तो जाने कब की बिला चुकी है, उसके गीत-संगीत, वार्तायें, उसकी व्यवहार-संस्कृति गायब हो चुकी हैं। अदब की उस पाठशाला में चाहे जो पहुंचे वह किसी योग्य भिक्षु की तरह हाथ जोड़े ही खड़ा मिलेगा। अधिकारियों के चपरासियों के अदबी स्वभाव वे तो हस हस कर सूचित कर रहे होते हैं कि यहां आये हो तो अदब से खड़े रहो, अदब से बोलो, अदब से सुनो और अदब से देखो...
पर जाने कैसे वहां गॉव का वह लड़का तनबुड़ुक भी पहुंच गया जबकि एस.पी. साहब ने उसे घर भिजवा दिया था एक सिपाही के साथ। क्या फिर चला आया गॉव से?
कुछ न कुछ हुआ ही होगा तभी तो कलक्टरी आ गया अपने वाद्य यंत्रा के साथ। कलक्टर साहब के कार्यालय के सामने काफी खुली जगह है। अमूमन वहां भीड़ का पता नहीं चलता, सौ-दो सौ आदमी रहें तो भी। कुछ थोड़े से लोग होते हैं जो कलक्टर आफिस के अगल-बगल मडराते रहते हैं, कुछ होते हैं जो कलक्टर साहब के आफिस के अन्दर या उनके स्टेनो के पास बैठे होते हैं कुछ कलक्टरी के दूसरे कार्यालयों की तरफ छिटक जाते हैं।
तनबुड़ुक भीड़ का मोहताज नहीं है न ही उसे अपनी कला दिखाने का कोई शौक है वह तो जाने किस ऊर्जा से जहां जाता है वहीं गाने लगता है.... वह कलक्टरी आफिस के ठीक सामने नाचने व गाने लगा इस बार उसका वाद्य-यंत्रा बदल चुका था हाथ में डफली आ गई थी। किसी ने उसके गाने से प्रभावित हो कर दे दिया हो उसे डफली शायद। गॉव का लड़का गाना शुरू कर देता है...
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी,
जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई।
सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी,
दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी,
भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही
त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी,
ओहू के संग धरती हाथ भर न गई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।’
गाने की धुन कलक्टरी के अन्तःपुर तक पहुंच रही थी शायद गाने की धुन तथा उसके राग वहीं कहीं दफन हो जाते पर डफली की थापों से प्रस्फुटित होने वाली धुन भला कैसे न जाती कलक्टरी के अन्तःपुर तक। वह सरसरा कर कलक्टरी के अन्तःपुर में अपनी सुमधुरता के साथ दाखिल हो गई। कलक्टरी के अन्तःपुर में प्रदेश के आलाधिकारी थे हालांकि वे सरकारी कार्यों की कानाफूसियों में थे फिर भी लड़के के गाने की मधुरता ने उन्हें अपनी ओर खींचा...वे खुद को न रोक पाये भूल गये कि कलक्टरी का अनुशासन क्या होता है, वे गाना सुनने के लिए बाहर आखिर कैसे निकल सकते हैं? वे तो आफिस में बैठे बैठे घंटी बजा देते चपरासी आ जाता फिर गाना गाने वाले लड़के को रोकवा देते पर वे ऐसा नही किए। वे अधिकारियत से बाहर निकल कर गाने की धुन की तरफ बढ़ जाते हैं। आफिस से बाहर निकल आते हैं आफिस के कलात्मक बारामदे में। गाने की कुदरती धुन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया था फिर वे गाना सुनने लगे। पर वहां तैनात चपरासियों तथा सुरक्षा
कर्मियों को बुरा लगा वे गॉव के लड़के को रोकने लगे एक दो बार पहले भी गॉव
के लड़के को वे रोक चुके थे...
‘गाना न गाओ, साहबों को बुरा लगेगा लखनऊ से बड़े बड़े साहब आये हुए
हैं। फूटो इहां से जाओ कहीं दूसरी जगह गाना-बजाना करो’
कलक्टरी के कर्मचारी भी कम नहीं होते उनमें अधिकारियत का रोग पूरी तरह से संक्रमित हो चुका रहता है। गॉव का लड़का तो अपनी धुन में था, कुछ धुनंे जो पेट की आग से बनी होती हैं जो आत्मा की घेरे बन्दी से निकल कर आजाद हो चुकी होती हैं, वे धुनंे किसी के रोकने से नहीं रूकतीं बिना प्रस्फुटित हुए वे कहीं नहीं ठहरतीं।
गॉव का लड़का किसी की नहीं सुनता वह अपनी धुन में गाये जा रहा है...
पिर्थबी केहू कऽ न भई....
कमेटी के अधिकारियों के लिए वह गाना तथा उसकी कुदरती धुन अद्भुत थी, पूरा गाना सुन चुकने के बाद कमेटी वालों में जो महिला अधिकारी थीं वे गाना गाने वाले लड़के से प्रभावित हो जाती हैं और लड़के को बुलवाती हैं। पढ़ाई के दिनों में महिला अधिकारी भी लोक-गीत गाया करती थीं, कालेज के कई प्रोग्राम में वह बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग किया करती थीं... पर उन्होंनेे कभी इस तरह का लोक-गीत जन-जागृति वाला नहीं सुना था...वह अचानक मन में सोचती हैं... यह गीत तो अद्भुत है...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई...’
मन ही मन महिला अधिकारी गीत को दुहराती हैं लड़के की धुन में,लोकधुन में डूब जाती हैं महिला अधिकारी, मानो गाने लगेंगी पर नहीं कैसे गायेंगी, वे तो जॉच में आई हुई हैं। पूर्रा आिर्थक-दर्शन है इस गीत में। पर आज की दुनिया तो केवल अपने स्वार्थ में है...‘उससे दर्शन से क्या लेना-देना।’
एक संतप्त ‘आह’ निकली उनके मुह से जो कुदरती थी।
भला ‘आह’ को कैसे रोक पातीं वे...‘आह रूकती भी तो नहीं’
उन्होंने खुद को संयत किया, वे कैसे गा सकती हैं कोई लोक-गीत, अधिकारियत ने उन्हें रोक दिया फिर भी मन में गुनगुनाते हुए वे दाखिल हो गईं कार्यालय में। उन्होेंने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि वह कौन लड़का था जो कलक्टरी परिसर में लोक-गीत गा रहा था।
तनबुड़ुक लोक-गीत का गायन पूरा करके वहां से लौट गया, कहां गया क्या पता?
‘तनबुड़ुक को धरती-माई देख रही हैं अपनी चौरी पर बैठे हुए कि तनबुड़ुक लोक-गीत गा रहा है वह भी उन्हीं के बारे में कि पृथ्बी किसी की नहीं होती, सच में पृथ्बी किसी की नहीं होती! धरती-माई सोच में पड़ जाती हैं। इसका मतलब जो किसी का नहीं होता वह तो अपना भी नहीं होता शायद यही कारण है कि वे खुद
धरती की भी नहीं हो पा रही हैं धरती-माई होकर भी।’
धरती-माई कितना विश्लेषित करतीं खुद को, यह जो भौतिक जगत का आर्थिक प्रपंच है उसके बारे में उन्हें क्या पता?
‘दृश्य पलट रहा है
किसी के लिए दृश्य है तो किसी के लिए अदृश्य’
‘धरती-माई रापटगंज काहे के लिए आतीं, वे गॉव पर ही हैं, गॉव में चल रहे हल-चलों को देख रही हैं। वे निराश हैं धरती-पुत्रों से सो पीपर के पेड़ के नीचे बैठ कर खुद के बारे में गुन रही हैं कि उनकी भी तो वही हालत है जो धरती पर रहने वाली दूसरी माताओं की है जो खाना-दाना के लिए भी मोहताज हैं, गालियां सुन रही हैं मार खा रही हैं। धरती-माई समझ रही हैं कि दिखावे के लिए धरती-पुत्रा उनकी पूजा करते हैं, दिया-बाती करते हैं, माला-फूल चढ़ाते हैं...धरती-माई पसीना पसीना हो चुकी हैं। ऑचल से पसीना पोंछ रही हैं पसीना है कि बहता ही जा रहा है, का करें, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा....खुद से सवाल पूछ रही हैं, का इसी लिए परगट हुई थीं धरती पर? स्वर्ग में उन्हें कोई मार तो नहीं रहा था, वहां के कुछ निर्विभागीय देवता केवल ताने ही तो मार रहे थे, कतल व खून-खराबा धरती पर जैसा तो नहीे कर रहे थे।’
वे तो परगट हुई थीं धरती पर कि अनाज पैदा करेंगी, फल-फूल पैदा करेंगी, जीव-जन्तु सभी के लिए भोजन का प्रबंध करेंगी किसी के लिए अनाज तो किसी के लिए घांस-फूस। खैर अनाज, फल-फूल, घांस-फूस तो पैदा हो ही रहा है धरती पर। पर यह मार-पीट, खून-कतल धरती पर कब्जा करना चाहे जैसे, यह क्या है? धरती जब किसी ने बनाया नहीं फिर काहे के लिए कब्जा और मार-पीट... वे किससे पूछें... विफना, खेलावन, बंधू किससे या उस रामलाल से जो आरोपी है, जिसने धरती कब्जा करने के लिए हल्दीघाटी वाले गॉव में खून-खराबा किया, आखिर किससे पूछें... अगर किसी से वे पूछें भी तो क्या कोई बतायेगा उन्हें मार-पीट की सचाई?
धरती-माई तय नहीं कर पा रही हैं। अचानक उन्हें समझ आया कि सारा खेल लालच और लोभ का है, धरती के लोग लालची हो गये हैं पर पहले ऐसा नहीं था। पहले के लोग जब गुफाओं में रहते थे, खेती करना सीख रहे थे तब अपनी सहूलियत के हिसाब से जमीनों को आवश्यकता के अनुसार मिल कर बाट लिया करते थे। हर बालिग को आवश्यकतानुसार जमीन मिलती थी। वे उतने से ही संतुष्ट रहा करते थे। वे मार-पीट नहीं करते थे, गुफाओं से बाहर निकल कर शान्तिपूर्वक खेती-बारी करने लगे थे। खैर यह जो लालच है नऽ वह तो उन्हें स्वर्ग में भी दिखा था, कुछ देवता भी अपने क्षेत्राधिकारों के विस्तार के लिए आपस में झगड़ जाया करते थे खासतौर से लोक-मंगल वाले क्षेत्राधिकार के संदर्भ में, झगड़ते थे पर मार-पीट नहीं करते थे। वे सोचते थे कि लोक-मंगल वाला कार्य बहुसंख्यक सामाजिक जुड़ाव के कारण लोक-प्रियता वाला क्षेत्रा है, इसमें काम करने की संभावना भी अधिक है सो वहां के देवता इस विभाग को अपने अधिकार में रखने के लिए लालायित रहा करते थे।
पीपर के पेड ़के नीचे बैठे बैठे धरती-माई अचानक ध्यान में चली गई फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि समाधि से बाहर निकलना है कि बीत गये तेरह दिन, चौदहवां दिन आ गया तेरही के बाद वाला दिन। धरती-माई अभी भी समाधि में हैं पीपर के पेड़ के नीचे। वे जांयें भी तो कहां जांयें सो समाधि में हैं। समाधि के लिए पीपर के पेड़ सेे अच्छी जगह दूसरी नहीं।
धरती-माई समाधि में हैं फिर भी अपने धरती-पुत्रों को देख रही हैं पर बिफना, पुनवासी, बंधू, खेलावन में से कोई भी उन्हें नहीं दिख रहा। जाने कहां चले गये हैं सब। गॉव में तो सब ठीक है नऽ! धरती-माई गुन रही हैं...उन्हें सन्देह हो रहा है समय पर। समय भी तरह तरह का खेल खेलता रहता है। यह समय का खेल ही है जो खेल कर चला गया और दस लड़के गॉव के मार दिये गये पता नहीं आगे क्या करे समय? बहुत ही खराब हालत है धरती-पुत्रों की, धरती-जोतक समाज की। धरती पर काबिज होने के लिए धरती-लोक पर हर जगह मार-काट मची हुई है कोई इसी गॉव में थोड़ै। धरती पर तो अब पॉव रखने की भी जगह नहीं जहां झगड़े न हों। वे ऐसी जगह तलाश रही हैं हल्दीघटी गॉव में जहां आराम से बैठ सकें, अपने मन को समझा सकें, कुछ राहत महसूस कर सकें पर ऐसी जगह उन्हें कहीं नहीं दिख रही धरती पर। अचानक उन्हें समझ आया कि पीपर के पेड़ क नीचे की जगह ही ठीक है तथा पवित्रा भी है, यहां शान्ति भी है।
धरती-माई जानती हैं कि पीपर पेड़ के हर पत्ते पर देवताओं का वास होता है, इसी लिए यहां शान्ति है, शान्ति थी भी। वहीं बैठे बैठे वे देख रही हैं गॉव को, वे उस दिन भी थीं गॉव में ही जब प्रशासन का पूरा अमला गॉव में कदम मार्च कर रहा था... हर तरफ पुलिस नाच-कूद रही थी।
उस दिन पोस्टमार्टम के लिए लाशें ले जाई जा रहीं थीं रापटगंज। धरती-माई उस समय पीपर के पेड़ के पास वाली अपनी चौरी पर बैठ कर रो रही थीं, विलाप कर रही थीं पर उनका विलाप कोई नहीं सुन रहा था। वे देवी हैं, सो देवी-देवता का रोना- धोना भी उनकी तरह गुप्त होता है कोई नहीं सुन सकता। वैसे भी धरती पर निवास करने वालों ने तो कभी भी किसी देवता को सांसारिक कारणों के कारण रोते-विलखते देखा नहीं है। देवता तो अधिआत्मिक होते हैं, उनसे अधिभौतिक सुखों-दुखों से क्या लेना-देना, वे पराशक्तियों के स्वामी होते हैं, सो वे काहे रोयेंगे?
बुधनी काकी अभी अभी लौटी हैं पीपर के पेड़ के पास से ‘बरम बाबा’ व धरती-माई की चौरी पर माथा नवा कर...
‘गॉव का भला करना बाबा! भला करना माई’ पर उन्हें भी नहीं दिखीं धरती-माई व बरम बाबा, दिखतीं कैसे भला देवी-देवता भी दिखते हैं! कहीं चली गई होंगी। धरती-माई की पूरी दुनिया है, भला वे एक जगह पर पल्थियाकर बैठी रहेंगी तो दुनिया का काम कैसे चलेगा? धरती-माई कभी गॉव में रह लेती हैं तो कभी दफ्तरों की तरफ भी चली जाती हैं। दफ्तरों में उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा रहते हैं, वे अधिकारी, कर्मचारी, नेता-परेता हैं, किसिम किसिम के काम हैं उनके उन पुत्रों के जिम्मेे...
धरती-माई एक दिन रापटगंज में कलक्टर दफ्तर में चली गई थीं और खुश खुश थीं कि उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा न्याय के रास्ते पर चल रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि हल्दीघाटी गॉव में अन्याय हुआ है, बर्बरता हुई है। हालांकि कलक्टर दफ्तर में उन्हें माला-फूल नहीं चढ़ाया गया और न ही उनकी पूजा-अर्चना की गई। धरती-माई को बुरा भी नहीं लगा... कोई बात नहीं पूजा-अर्चना तो घर में होती है, आफिस में उनके अधिकारी, कर्मचारी पुत्रों के घर तो हैं नहीं, वे अपने अपने घरों से ही पूजा-अर्चना करके ही दफ्तर आये होंगे सो दफ्तर में का पूजा करना सो धरती-माई ने उस तरफ घ्यान नहीं दिया।
लखनऊ से आये हुए जॉच-अधिकारी हत्याकाण्ड के बाबत सरकार को एक रिपोर्ट भी भेज चुके हैं सो धरती-माई खुश खुश हैं कि ये जो पढ़े-लिखे प्रतिभा परीक्षा पास उनके योग्य पुत्रा हैं.. ये संभाल लेंगे धरती को, धरती के प्रबंधन को कहीं से गड़बड़ न होने देंगे। धरती-माई खुद को सहला रही हैं, हल्दीघाटी वाली घटना से उन्हें विचलित नहीं होना चाहिए। दफ्तरों में कार्यरत उनके ये जो पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा हैं, कानूनों के जानकार हैं, संस्कृति और परंपरा के अनुपालक हैं, वे सामाजिक, समरस्ता तथा भाई-चारे को किसी भी हाल में खण्डित न होने देंगे। गॉव के अशिक्षित पुत्रों को भले ही ‘समत्वम् बोध’ वाली संस्कृति और परंपरा के बारे में जानकारी न हो पर ये जो उनके पढ़े-लिखे पुत्रा हैं ये तो संस्कृत व सभ्यता का सारा व्याकरण जानते हैं। इनसे संस्कृति और सभ्यता के व्याकरण को चाहे जहां से पूछ लो, कहीं इनसे गलती नहीं होगी बताने में। गॉव के पुत्रा तो केवल खेत जोतना, तथा जोते हुए खेत में बीज डालना ही जानते हैं, फसल तैयार हो जाती है तब काट लेते हैं, अनाज के दाने निकाल लेते हैं, चूल्हे पर खाना बना लेते हैं, रहने के लिए कच्चा-पक्का घर बना लेते हैं, कभी कभार पोलिंग बूथ पर जा कर किसी को भी मत-दान कर देते हैं, इससे अधिक सामाजिक ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक जानकारी उन्हें नहीं है, जानकारी हो भी नहीं सकती? वे कैसे समझ सकते हैं कि यह जो हमारा भारतीय समाज है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वाला है। हमारे समाज में कानूनी, सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से भेद-भाव न तो कभी रहा है और न ही आगे रहेगा। इस सत्य को तो केवल हमारे पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा ही भली-भांति समझते हैं और इसी के अनुसार चलते भी हैं।
धरती-माई का रोम रोम सन्तुलन से पूर्ण है, वे सबका भला तथा सबका विकास की सोच वाली हैं। एकतरफा विकास की बातें वे सोच ही नहीं सकतीं आखिर माई हैं तो सबकी माई हैं गरीब-अमीर, साक्षर-निरक्षर, बड़ा-छोटा, सबकी। सो सबके विकास के बारे में गुनेंगी, सबके विकास की मंगल-कामना करेंगी। हल्दीघाटी गॉव में जो बर्बर हत्याकाण्ड हुआ उस एक घटना के आधार पर पूरी धरती को कोसना, उसे उपेक्षित करना यह तो ठीक नहीं होगा। धरती-जोतक पुत्रा भी तो उनके ही पुत्रा
ही हैं फिर भी पढ़े-लिखे पुत्रों से उनकी तुलना करना यह तो गलत होगा। कहॉ पढ़े लिखे, योग्य, प्रतिभा परीक्षा पास, कहॉ गोबर-माटी कीचड़ से लिपे-पुते मुर्झाये चेहरे वाले, हल-जोतने वाले, फावड़ा चलाने वाले, बैंक का कर्जा न चुका पाने वाले, सरकारी राशन से पेट भरने वाले, चौदह दिन के लिए हवालात में बन्द होने की योग्यता वाले, थाने के सामने रिरियाने वाले, अफसरों के सामने गुलामों से भी बद्तर हालत में फरियाद करने वाले, ये सब का जानेंगे धरती के बारे में, धरती के प्रबंधन के बारे में। आपस में झगड़ रहे हैं, मार-काट कर रहे हैं... यह सब देखने के लिए वे थोड़ै परगट हुईं थीं धरती पर, उनकेे लिए आकाश में तैरता स्वर्ग बुरा थोड़ै था। धरती-माई धरती से जुड़े धरती-पुत्रों को कोस रही हैं पर उन्हें यह भी ध्यान है कि ये जो धरती से जुड़े उनके पुत्रा हैं भले ही अशिक्षित हैं, गोबर-माटी से सने हुए हैं ये ही तो उन्हें अक्षत-पुष्प चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं। शादी-बिआह चाहे जो भी अवसर हो ये धरती-पुत्रा उनकी पूजा करना नहीं भूलते। यही सब गुन कर ही तो वे अवतरित हुई थीं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के साथ रहने के लिए पर धरती के समाज कोे देख कर वे सोच में पडी़ जा रही हैं आखिर वे करें क्या? कहां जायें, अब तो स्वर्ग में भी वापस नहीं जा सकतीं, स्वर्ग के रहवासियों को धमकिया कर अवतरित हुई थीं धरती पर... स्वर्ग की अप्सराओं से ही नहीं, केवल देवियों से ही नहीं, बिना क्षेत्राधिकार वाले देवताओं से भी झगड़ पड़ी थीं घरती-माई।
‘मैं तत्काल ही छोड़ रही हूॅ स्वर्ग और जा रही हूॅ अपनी धरती पर।..’
स्वर्ग की देवियॉ भी कम न थीं वे तनेन हो कर धरती-माई को उलाहती रहतीं थीं, स्वर्ग ऐसा तो वैसा, यह स्वर्ग ही है जो तमाम तरह के प्रवासी देवी, देवताओं को शरण दिए हुए है, वे अपना मूल स्थान छोड़ कर स्वर्ग में अपना ठिकाना बनाये हुए हैं, उनमें से तो कुछ ऐसे हैं जो स्वर्ग की नागरिकता भी हासिल कर चुके हैं। एक बार सवाल उठा था स्वर्ग की महा-सभा में कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को स्वर्ग से भगाओ। दोहरी नागरिकता वाले देवताओं की हालत यह है कि जब उनकी जरूरत स्वर्ग के कामों के लिए स्वर्ग में होती है तब धरती पर चले जाते हैं, काम-चोरों की तरह ऐसा नहीं चलेगा, ऐसी आवा-जाही नहीं चलेगी जब चाहो धरती पर जब चाहो स्वर्ग में। यह आवाज उठाई थी स्वर्ग के मूल वासियों ने जो आज के समय में स्वर्ग में अल्पमत में हैं। स्वर्ग में अब उनकी नहीं चलती, चलती है वहां दूसरे किसिम के जमात वालों की जो आधुनिक होने का दिखावा करते हैं और बोलते हैं कि वे पद, ओहदा तथा जाति आदि के रोग से बाहर हैं पर ऐसा नहीं है। बोलते हैं कि वे ‘समत्वम् बोध’ वाले हैं, आगे देखू लोग हैं पर हैं आदिम मन, मिजाज, चेतना वाले, वे कट्टर किस्म के लोग हैैंं एक ही रेखा पर चलने, नाचने, थिरकने वाले।’
धरती-माई को जाने कितनी बार इन कट्टर किसिम के लोगों से ताने सुनने पड़े हैं स्वर्ग में, एक बार तो बिना क्षेत्राधिकार वाले एक कट्टर देवता ने साफ साफ कह दिया था धरती-माई से...
‘आपका क्या है यहां पर धरती-माई! जो पड़ी हुई हैं यहां पर, हर काम में अड़ंगा डालती रहती हैं। धरती आपका क्षेत्रा है जिसे आपने स्वेच्छा से चुना है वहां जाइए और धरती के अपने पुत्रों को संभालिए, उनके सुखों दुखों में शामिल रहिए, उनके लोकमंगल की योजनायें क्रियान्वित कराइये। यहां पर आपका क्या काम है? आप यहां प्रवास कर दोहरी नागरिकता का बेजा लाभ उठा रही हैं? स्वर्ग के एक कोने से दूसरे कोने तक बिना किसी काम के घूमती रहती हैं। आपको तो खुद सोचना चाहिए इस बारे में पर नहीं, आप काहे सोचेंगी, आपको यहां जब बिना कुछ किए ही सारी सुख-सुविधा मिल रही है फिर धरती पर काहे जायेंगी?’
धरती-माई का मन हुआ कि बिना क्षेत्राधिकार वाले देवता को फटकारें तथा उससे साफ साफ बोलें कि जिस स्वर्ग की बात तुम कर रहे हो वह केवल तुम्हारा ही नहीं है पूरी सृष्टि का है, चर-अचर सभी का है, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सभी का है, यह स्वर्ग किसी की बपौती नहीं है। पर धरती-माई अपनी मर्यादा का ख्याल रखतेे हुए उस निर्विभागीय देवता सेे उसकी भाषा-शैली में फटकार नहीं सकती थीं, उन्हें अपनी मर्यादा का ख्याल था फिर भी बोल-अबोल सारा कुछ बोल गईं थीं....
‘तेरी का औकात है रे! जो तूॅ मुझसे बातें कर रहा है। आज तक तुझे कोई विभाग भी नहीं मिला स्वर्ग में, बिना विभाग के उछल-कूद कर रहे हो। ‘देवराज इन्द्र’ की कृपा से देवता बन गये हो नहीं तो तुम देवता बनने लायक हो ही नहीं, न कोई साधना न सिद्धि। कभी किसी विभाग वाले देवता के यहां तो कभी किसी देवता के यहां शीर्षासन करते फिरते हो फिर तेरा क्या है यहां पर। तुम तो बिना विभाग वाले देवता हो। तूॅ अपनी औकात समझ कि तूॅ किससे बातें कर रहा है। जिन देवताओं के हाथों में शक्तियॉ हैं, वे तो मेरा अभिवादन करते हैं, नहीं देखा है का तूने शक्ति संपन्न देवताओं को मेरा अनिनन्दन व अभिवादन करते हुए, चिकित्सा क्षेत्रा के देवता धन्वन्तरि हों, अर्थ-प्रबंधन के देवता कुबेर हों, लोक-कल्याण, लोक-मंगल, लोक-चेतना के देवता शिव हों, मानव-सृष्टि के देवता ब्रह्मा हों, ज्ञान-विज्ञान, सूचना, प्रसारण की देवी सरस्वती हों, मौसम, पर्यावरण, शान्तिव्यवस्था, विश्व-प्रबंधन के देवता इन्द्र हों सभी तो मेरा आदर करते हैं, वे अपनी मॉ समझते हैं मुझे और एक तूॅ है कि मुझे स्वर्ग से निकल जाने के लिए बोल रहा है, मुझे प्रवासी बोल रहा है, तेरी इतनी औकात कि तूं मुझसे मर्यादाहीन बातें करे...’
हालांकि धरती-माई सहनशील हैं पर उनके स्वाभिमान पर कोई चोट करे तो वे सहन नहीं करतीं। धरती-माई को गुस्सा आ गया और उसी दिन उन्होंने स्वर्ग वाला अपना ठिकाना छोड़ दिया...स्वर्ग वालों ने पहली बार धरती-माई का गुस्सा देखा था एकदम से काली बन गईं थीं, खूनी खप्पर वाली...
‘जाओ हमें नहीं रहना स्वर्ग में, हम आज ही छोड़ देते हैं स्वर्ग, चले जाते हैं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के बीच। स्वर्ग में है ही क्या हमेशा आकाश में टंगे रहो, उड़ते रहो हवाओं के साथ, तमाम तरह के ग्रहों-उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों के बीच, किसिम
के मुकटधारियों, क्षत्रा, चॅवरधारियों, जादुई करिश्मा करने वालों के साथ इधर-उधर की बातें करते रहो, काम के नाम पर कुछ नहीं सिवाय आशीर्वाद व श्राप देने के...’
‘वत्स तुम्हारा कल्याण हो’ आशीर्वाद देने से अच्छा है धरती पर निवास करना, धरती-पुत्रों के साथ रहना।’
‘धरती-माई जानती हैं कि वे पढ़े-लिखे पुत्रों के साथ तो रह नहीं सकतीं, वेे पुत्रा तो उनके चेहरे तक को बिगाड़ देते हैं, कहीं खदान बनाने के लिए कई कई किलोमीटर तक उनका पेट खोद देते हैं, घुस जाते हैं उनकी ऑत तक, कलेजा तक निकाल लेते हैं जब उनका वश नहीं चलता तो रूक जाते हैं। उनके पेट में से कहीं कोयला, बालू, सोना, चूना ही नहीं अनेक किस्म के खनिज निकालने लगते हैं। बारूदों के धमाकों से उनके जिस्म को चलनी कर देते हैं। फट चुका है उनका पूरा सीना। ऊॅची, ऊॅची इमारतें बना कर बेमतलब का बोझ डाल देते हैं उनकी पीठ पर आखिर कितना बोझ वे उठा सकती हैं? इस बारे में उनके योग्य पुत्रा नहीं गुनते पता नहीं किस तरह का वे विकास करना चाहते हैं।’
धरती-माई कलक्टर के आफिस में बैठे बैठे थक चुकी हैं, उन्हें दया आ रही है पढ़े-लिखे अधिकारी पुत्रों पर। वे बैठे हुए हैं कुर्सी पर दिन भर से, काम भी नहीं दिख रहा कुछ, खाली एक जगह पर बैठे रहना है, यह मुश्किल काम है। सुबह से ही वे देख रही हैं कि काम के नाम पर वेे खाली गूं गा कर रहे हैं और किसीे कागज पर कुछ लिख दे रहे हैं बस इतना ही। पर बेचारे जो हल्दीघाटी की बर्बर घटना की जॉच के लिए लखनऊ से आये हुए हैं वे सुबह से ही काम कर रहे हैं, यह फाइल लाओ तो वह फाइल लाओ, वे पता कर रहे हैं आखिर हल्दीघटी गॉव में इतनी बर्बर घटना काहे घट गई? किसकी कमी के कारण, किसकी गलती के कारण। आखिर काहे ये अधिकारी नर-नाश्ते के लिए भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं जबकि किसी बढ़िया होटल से उनके लिए नाश्ता भी आ चुका है... नाश्ता परोस रहा है साफा वाला एक कर्मचारी...
धरती-माई का मातृत्व छलक उठता है..उनका मन हुआ कि वे ही जा कर अधिकारी पुत्रों को नाश्ता परोस दें पर वे कैसे अवतरित हो सकती हैं मानव देह में, नहीं नहीं वे मानवरूप में अवतरित होकर नाश्ता नहीं करा सकतीं। नाश्ता देख कर धरती-माई खुद को संयत कर रही हैं जबकि उनकी जीभ बायें-दायें करने लगी है, उन्हें भी कुछ खाने की ललक लग चुकी है पर वे कैसे खायेंगी धरती का खाना, नाश्ता... उनका तो धूप, दीप, अक्षत, फूल से ही पेट भर जाता हैै, आग पर घी, दशंाग का हवन, पूजन ही उनका भोजन है। फिर भी धरती-माई को प्लेटों में सजा कर लाया गया नाश्ता खींच रहा है अपनी ओर... वे नाश्ता करें न करें पर उनके योग्य पुत्रों को तो चाहिए कि उनसे बोलें नाश्ता करने के लिए या गोबर-माटी से सने पुत्रों की तरह कुछ पर-परसाद ही चढ़ायें या दीप-धूप करें पर नहीं... ये सब तो अपने में मगन हैं। उन्हें अपने योग्य पुत्रों पर थोड़ी घिन होती है, का मतलब है इस पढ़ाई-लिखाई का?
धरती-माई करें का? वे निराश हैं पर खुद को राजी करना ही उचित होगा...
‘का हो जायेगा अगर वे नाश्ता कर लंेगी तो, ये भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं भले ही सांस्कृतिक व सामाजिक रूप से अलग चित्त व चेतना वाले हैं तो का हुआ? इससे का होता है, हैं तो देह-धारी ही एक मुह, एक नाक, एक कान, दो हाथ, दो पैर वाले एकदम से गॉव वाले धरती-पुत्रों की तरह।’
धरती-माई खुद को समझा रही हैं कि अपने जाये बेटों में किसी भी तरह का फर्क मॉ को नहीं करना चाहिए यह मातृ-धर्म व कर्म की अवहेलना है। पर उनके योग्य पुत्रा तो उनसे नाश्ते के लिए भी नहीं पूछ रहे हैं। कुछ ही देर में खाने का भी समय हो जायेगा। धरती-माई निराश हो जाती हैं तभी कहीं से सरसराती हवा ने उनको अपनी ओर खींच लिया...
‘अरे! इस हवा में तो हवन, दीप और पूजा की सुगंध है।’
अपनी पराशक्ति से धरती-माई ने जान लिया कि गॉव वाले गोबर-माटी से सने उनके धरती-पुत्रा पूजा कर रहे हैं, पूजा-अर्चना की ही सुगंध है। कल ही तो तेरही बीती है फिर भी उनके गॉव वाले पुत्रा नहीं भूले उनकी पूजा-अर्चना करना। ये वाकई आज्ञाकारी हैं, ठीक है इनमें कुछ कमियां हैं पर इनकी कमियां योग्य-पुत्रों द्वारा पैदा की हुई जान पड़ती हैं नहीं तो ये बेचारे किसी सिद्ध कर्मयोगी या साधक ऋषि से कम नहीं हैं।
तेरही बीत जाने के बाद हल्दीघाटी के गॉव के लोग मृतक अनुष्ठान के दायित्व से बाहर आ चुके थे फिर भी उन्हें परंपरा के अनुसार तमाम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करना था। सो वे देवताओं की पूजा-आराधना में जुट गये थेे....गमी में वैसे भी देवी-देवताओं की पूजा बन्द हो जाया करती है, सामाजिक मान्यता है कि मृत्यु के अनुष्ठान तक सारे परिजन अशुद्ध रहते हैं, मृत्यु का अनुष्ठान पूरा हो जाने के बाद ही देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए पूरी तरह पवित्रा होने के बाद।
तेरही के बाद वाले पहले शुभ दिन शुक्र्रवार को देवताओं की पूजा में गॉव के आस्तिक मर्द और पुरुष जुट गये। सभी देवताओं की पूजा की गई तथा मनौती भी कि अब गॉव में अनर्थ नहीं होने देना बाबा! उस दिन धरती-माई की खासतौर से पूजा की गई और मनौती भी...
‘माई यह गॉव तेरे हवाले है, अनर्थ नहीं होने देना। तूं तो सभी की रक्षक है, सभी की मॉ है, तेरे रहते गॉव में अनिष्ट काहे हो रहा है?’
धरती-माई धूप, दीप, दसांग, फूल की सुगन्ध में डूब गयी हैं, उन्हें महसूस हो रहा है कि धरती के जोतक उनके पुत्रा उनकी पूजा कर रहे हैं और मनौती भी कर रहे हैं पर धरती-माई तो बेवश हैं, वे क्या कर सकती हैं धरती-जोतक पुत्रों के लिए उनकी समझ में नहीं आ रहा। वे धरती-माई तो जरूर हैं, उन्हें सबकी रक्षा भी करनी चाहिए पर रक्षा तथा कल्याण का काम तो उनके हाथ में है नहीं पर कैसे बतायें कि धरती पर बसने वाली दूसरी माताओं की तरह ही वे भी बेवश हैं कोई नहीं सुन रहा उनकी।
धरती-पुत्रों के कल्याण के लिए ही एक बार घ्यान लगा कर वे स्वर्ग जा पहुंची थीं, वहां के वासी सभी देवताओं के दरवाजों को उन्होंने खट-खटाया भी पर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी सभी कहने लगे...
‘तोहार धरती है धरती को स्वर्ग के देवता काहे संभालें, तोहसे संभालते बने तो संभालो नाहीं तऽ छोड़ दो, वे जैसे चाहे जैसे रहें, मार-कतल चाहे जो करें, तूं काहे परेशान हो रही हो।’
वे स्वर्ग से उपेक्षित हो कर लौट आयीं धरती पर। धरती पर भी कोई ऐसा है नहीं जिससे धरती-माई का जोगाड़ हो, उनसे धरती-जोतकों की परेशानियों के हल के लिए बतिया सकें। वे निराश हो जाती हैं विपत्ति में कोई नहीं साथ देता। अचानक उन्हें ख्याल आता है आफिसों में काम करने वाले अफसर तथा जन-प्रतिनिधियों जैसे योग्य व कमाऊ पुत्रों का। पर वे भी उन्हें एक बार पहले फटकार चुके हैं...
‘तूं अपने धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहती हो, उन्हीं के बारे में सदैव सोचती हो, हमलोगों के बारे में तुम्हें कोई चिन्ता ही नहीं है फिर हमलोग तोहार मदत काहे करें? बात भी ठीक है उनकी।’
अपने योग्य पुत्रों की दलीलंे सुन कर धरती-माई हसने लगीं, जो चोर है वही खजाने का रखवाला है, क्या मजाक है। फिर उन्हें गुस्सा आ गया..लगीं फटकारने, ‘शासन, प्रशासन तो तुम लोगों के हाथ में है, तुम लोग ही कायदे-कानून बनाते हो, विधान-संविधान बनाते हो, संसद में तुम लोग हो, अदालत में तुम लोग हो, थाने पर तुम लोग हो, जहां देखो वहां तुम लोग हो पूरी धरती पर छितराये हुए फिर भी बोल रहे हो कि जाओ धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहो। अरे सोचो तो बेचारे धरती-जोतकों के पास क्या है अधिकार तथा अस्मिता के नाम पर, वे तो पेट भर खाने के लिए भी मोहताज हैं। कुछ तो शर्म करो धरती पर का सारा नियम, कायदा, कानून संपत्ति तुम लोगों ने कब्जिया लिया है और बोल रहे हो कि धरती-जोतक पुत्रों का तुम ख्याल रखती हो, ताने मार रहे हो मुझ पर। थोड़ा पढ़-लिख लिए, कुछ किताबंे रट लिए और पूरी धरती के मालिक बन बैठे, किसी ने ठीक ही कहा है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे वुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा। मैं सारा कुछ समझती हूॅ पर चुप हूॅ, क्योंकि मैं मॉ हूॅ मैंने ही जना है तुमलोगों को भी, तुम लोगों जैसे स्वर्थियों के लिए भी कुछ बुरा नही सोच सकती पर हॉ अगर ऐसा ही चलता रहा तो किसी न किसी दिन तुमलोगों का कागजी प्रपंच, कागजी घोखा, कागजी नियम, कागजी कायदे कानून, कागजी संस्कृति अपने आप जल जायेगी किसी ज्वालामुखी की तरह फिर तुम लोग दर-बदर रोते, विलखते, कराहते घूमते रहोगे, कोई नहीं पूछेगा तुम्हें।’
धरती-माई ने योग्य-पुत्रों को फटकार तो दिया पर उन्हें अच्छा नहीं लगा, वे डर गईं कहीं ये नुकसान न कर दें धरती-जोतक पुत्रों का, इन्हीं के हाथ में सारी ताकत है। आखिर जिन्हें वे योग्य-पुत्रा समझती हैं ये ही तो कुटिल और चतुर हैं, स्वार्थी हैं, लालची हैं, ये ही धरती पर फूट, वैमनस्य और फसाद उगा रहे हैं कागज के नाम पर विधान के नाम पर। योग्य-पुत्रों की मनःस्थिति तौल कर धरती-माई विचलित हो गईं और खुद को कोसने लगीं...
‘अरे! तूं काहे की धरती-माई है रे! जब तोहार कोई नाहीं सुन रहा धरती पर भी। उन्हें खुद पर सन्देह होता है कि वे ‘देवी’ है कि नहीं हैं। उनसे तो वे जो बिना विभाग वाले स्वर्ग केे देवता हैं बहुत अच्छे हैं, उनके भी अधिकार हैं, अपमान होने पर जब गुसिया जाते हैं तो श्राप दे देते हैं, खुश होते हैं तो वरदान देते हैं और एक वे हैं कि अधिकार के नाम पर उनके हाथ में कुछ भी नहीं, कहने को तो पूरी धरती की मालिकिन हैं। धरती पर जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य है सब उनका है केवल कहने के लिए जबकि है कुछ भी नहीं, धरती की मलिकिन कौन कहे वे तो एक मजदूर से भी बद्तर हैं। केवल बैठी रहो और पूजा करवाती रहो। धूप-दीप का सुगन्ध पीती रहो। अरे! कैसी मालकिन! जिसके अधिकार में कुछ हो ही नहीं, किसी को वरदान देना तो छोड़ो वे श्राप भी नहीं दे सकतीं किसी को। धरती पर रहने लायक नहीं है, यहां वे रह नहीं सकतीं और स्वर्ग वापस लौट नहीं सकतीं... फिर का करें?
धरती-माई सोचते-गुनते थक जाती हैं और चौरी पर जाकर चौरी में विलीन हो जाती हैं। चौरी में विलीन हो जाना उनके काम का साबित होता है.. पूरी धरती दिखने लगी एक साथ। धरती पर के चर-अचर, जीव-जन्तु सभी दिखने लगे। धरती-माई की ऑखें मनुष्यों पर केन्द्रित हो गई फिर तो मनुष्यों के चित्त और चेतना, मन और मस्तिष्क, वुद्धि और विवेक, भाव और भवना, दिल और दिमाग सभी कुछ साफ साफ दिखने लगा उन्हें जैसे उनकी ऑखें ऑखें न होकर कोई नई तकनीक वाली एक्स-रे मशीन हों। धरती पर का दृश्य देख कर धरती-माई चौरी में पड़ी हुई छटपटाने लगीं.
‘धरती पर तो कुछ भी शुभ शुभ नहीं दिख रहा...’
उन्हें अचरज हो रहा है मनुष्य का स्वभाव जान कर। क्या इतना लालची हो चुका है आदमी और झूठा भी और जो उनके योग्य पुत्रा हैं वे भी तो मनुष्यता का क,ख,ग भी नहीं जानते, वे केवल विधान जानते हैं और विधानों को अपने हितों में तोड़ना जानते हैं, वे स्वार्थी हो चुके हैं, कागजों के नाम पर शासन कर रहे हैं...मूर्ख बना रहे हैं लोगों को...कैसे बचेगी धरती की सभ्यता और संस्कृति, कैसे बचेगी मनुष्यता, कैसे बचेगा लोक-व्यवहार, लोक-परंपरा कैसे बचेगी? धरती-माई व्याकुल हो जाती हैं...वे गुनती हैं, धरती-जोतक पुत्रा तो अबोध हैं, अनपढ़ हैं, गंवार हैं पर ये जो पढ़े-लिखे कागजों, शास्त्रों, किताबों, विधानों वाले पुत्रा हैं ये तो धरती-जोतक पुत्रों से भी निकृष्ट और लालची हो चुके हैं।
धरती-माई खुद को संभालती हैं, घबराने से काम नहीं होता, यह जो समय है नऽ सभी को कुछ न कुछ रास्ता दिखाता है, समय ही हल करेगा सारा कुछ। फिर भी वे अपनी चौरी से बाहर कम से कम एक दो दिन बाद ही निकलेंगी, यहां आराम से रहेंगी एकान्त में शिव जी का घ्यान करेंगी, शिव जी दयालु हैं वे कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालेंगे। उनका शिव जी पर पूरा विश्वास है। वे किसी को निराश व हताश नहीं करते। जब वे स्वर्ग गयीं थी उसी समय उन्हें शिवजी के पास जाना चाहिए था, खैर कोई बात नहीं।
धरती-माई ने शिवजी के बारे में सोचा और शिव जी के घ्यान में चली गईं। उनका घ्यान में जाना था कि शिवजी डमरू बजाते हुए परगट हो गये। वैसे भी शिवजी धरती-माई का बहुत अधिक मान करते हैं। धरती-माई का मान करने का कारण भी है। शिव जी जानते हैं कि स्वर्ग का कोई देवता मानव रूप में धरती पर अवतरित नहीं होना चाहता। स्वर्ग में कई बार धरती की देख-रेख व प्रबंधन के बाबत सवाल उठ चुका है स्वर्ग की महा-सभा में। हर बार महा-सभा में धरती के प्रबंधन के बाबत कई देवताओं के नामों को प्रस्तावित भी किया गया है, खुद देवराज ने कई देवताओं को प्रस्तावित किया था पर सभी ने इनकार कर दिया पर धरती-माई ने इनकार नहीं किया उसी दिन से शिवजी के लिए धरती-माई सबसे प्रिय देवी बन गईं हैं। धरती-माई शिवजी का ध्यान करें और वे परगट न हों यह संभव नहीं, सारा काम छोड़ कर वे परगट होंगे ही।
ध्यान में ही शिव जी ने धरती-माई को रास्ता दिखाया तथा हल्दीघाटी गॉव में आगे क्या होने वाला है वह सब भी बताया। बता क्या दिया आने वाले समय के विविध घटना-क्रमों को सचित्रा दिखा भी दिया आज-कल के टी.वी.वालों की तरह। शिव जी ने धरती-माई को सुझाया भी कि तंू न्याय के देवता शनि की आराधना करो लोक-कल्याण का कार्य तो मैं अपने स्तर से निपटा दे रहा हूॅ पर न्याय वाला कार्य मैं नहीं कर सकता। न्याय करने व अपराधियों को दण्डित करने का कार्य शनि देव का है, उनके अधिकार क्षेत्रा में मैं दखल दे नहीं सकता। तूं शनि देव की आराधना करो, वे बहुत ही उदार किस्म के देवता हैं, मात्रा आराधना से ही खुश हो जाते हैं, उनकी आराधना करोगी तो वे आरोपियों को निश्चित ही दण्डित करेंगे जो धरती पर अशान्ति फैला रहे हैं, मार-कतल कर रहे हैं उन्हें शनि देव किसी हाल में नहीं छोड़ेंगे।
शिव जी का आश्वासन व आशीर्वाद पाकर धरती-माई का मातृत्व छलक उठा.फिर उन्हें महसूस हुआ कि वे तो मॉ है धरती-पुत्रों की, मॉ कभी निराश नहीं हो सकतीं अपने पुत्रों से वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं, उन्हें रहना तो अपने पुत्रों के साथ ही है। स्वर्ग छोड़ देने के बाद भी उनकी बातें लोक-कल्याण के देवता शिव जी ने गंभीरता से सुना और रास्ता भी सुझाया यह उनके लिए बड़ी बात है। वे जानती हैं शिवजी की परा-शक्ति के बारे में, वे चाह लेंगे तो धरती पर स्वर्ग उतर आयेगा, वे लोक-कल्याण के देवता हैं और शक्तिशाली भी हैं, कोई बनावट नहीं एकदम से सादा आम-आदमी की तरह। भला वे आम-आदमी के भले के लिए कैसे खामोश रह सकते हैं। वैसे भी शिवजी के कथनी-करनी तथा चाल-चरित्रा में कोई फर्क नहीं।
शिव जी के संतोषप्रद आश्वासन के बाद धरती-माई ने निश्चित कर लिया कि समाज में न्याय और सत्य की स्थापना के लिए वे शनि देव की भी आराधना करेंगी। फिर तो धरती-माई कल्पना में डूब गईं कि बुरे दिन चले गये। धरती को स्वर्ग जैसा बन जाने की कल्पना भर से धरती-माई की हताशा, निराशा कहीं फेका गई शायद नर्क में चली गई होगी। उन्हें लगा कि अभी कुछ दिन तक उन्हें चौरी में रह कर ही विश्राम करना चाहिए और घ्यान के द्वारा धरती का हाल-चाल लेते रहना चाहिए। हालांकि उनकी चौरी काफी छोटी थी, कम गहरी थी, लम्बाई चोड़ाई भी कम थी, पॉव पसारने तक की जगह नहीं थी उसमें लेकिन उनके लिए क्या, उन्हांेने ध्यान लगाया और चौरी देखते देखते ही सभी सुविधाओं से पूर्ण आधुनिक विश्राम-कक्ष में तब्दील हो गई। अब उनके लिए वहां दिक्कत नहीं थीं चाहे जितना दिन उसमें विश्राम करें। इस विश्राम कक्ष में एक खास बात यह भी थी कि धरती का सजीव चित्रा वे सोते, जागते किसी भी हाल में वहीं से देख सकती थीं, वहीं से किसी से बतिया सकती थीं। गोया पूरी दुनिया उनके सामने थी इस पराशक्ति के चमत्कार से धरती-माई अत्यन्त प्रसन्न हो गईं।
पर समय भी तो होता है कुछ जो अपने तरह का खेल खेलता रहता है किसी के भी साथ, समय के लिए क्या देवी, क्या देवता, क्या दानव, समय खेल खेल गया और धरती-माई की खुशी चौरी के सुविधा संपन्न विश्राम-कक्ष में तब्दील हो जाने के कुछ समय ही बाद ही फुर्र हो गई, वे खुद से सवाल पूछने लगीं...
‘जब उनकी चौरी पराशक्ति के चमत्कार से सुविधा पूर्ण हो सकती है, तमाम तरह की आधुनिक सुविधायें निर्मित हो सकती हैं इस छोटी सी चौरी में फिर हल्दीघाटी गॉव के जो दस लड़के मारे गये हैं उनके लिए सुविधायें क्यों नहीं मिल सकतीं, उनकी विधवाओं के लिए कल्याणकारी कार्य क्यों नहीं किए जा सकते... कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है, गड़बड़ क्या है उन्हें देखना होगा और एक बार फिर शिवजी का घ्यान करना होगा।
धरती-माई ने निश्चित किया कि वे दुबारा शिवजी का ध्यान लगायेंगी और अपने धरती-पुत्रों के लिए हर सारी सुविधायें उपलब्ध करवायेंगी जिसके वे हकदार हैं। साथ ही साथ उनके जो योग्य-पुत्रा हैं, जो लगातार निरंकुश होते जा रहे हैं मानवीयता छोड़ते जा रहे हैं, हर तरफ कागज उड़ा रहे हैं, बेमतलब कानूनों की वारिशें करा रहे हैं, जो धरती-जोतक पुत्रों को मनुष्य ही नहीं समझते उन्हंे मनुष्य बन जाने तथा मनुष्यता के निर्वहन का पात्रा बन जाने के लिए भी शिवजी से प्रार्थना करेंगी।
धरती पर हो रहे हलचलों को देखते झेलते धरती-माई काफी परेशान हो चुकी थीं ठीक है वे देवी हैं फिर भी थकान तो होती ही है चाहे कोई हो, देवी है तो का मतलब कि उन्हें थकान नहीं होगी, यह कैसे संभव है, थकान, हरारत, नींद, भूख, प्यास ये तो कुदरती प्रक्रिया हैं ये तो होंगे ही। धरती माई दो दिन के लिए पूरी तरह से विश्राम करने का मन बना लेती हैं और विश्राम के लिए चौरी में प्रवेश कर जाती हैं...
अब उन्हें कुछ भी नहीं देखना, कुछ भी नहीं सुनना, कुछ भी नहीं बोलना। पूरी तरह से शान्त, चित्त तथा चेतना को बांध कर रखना, मन तथा मस्तिष्क की गतिविधियों को रोक देना, तन तथा मन को निष्क्रिय बना देना। कुछ न तो पहले था और न अब है, कुछ भी शेष नहीं है सृष्टि में, सारा कुछ विलीन हो चुका है परमशक्ति में, उसकी ज्योति में। पर धरती-माई मुश्किल से एक दिन ही विश्राम कर पाई होंगी पूरी तरह आत्मलीन होकर दूसरे दिन ही धरती पर होने वाली आकस्मिक हल-चलों ने उनकी ऑखें खोल दीं....
हल्दीघाटी वाले गॉव में तो हल-चल हो रही है, भला वे कैसे विश्राम कर सकती हैं अपनी चौरी में, वे सतर्क हो जाती हैं। जहां पर दसों सत्याग्रहियों की चितायें जली थीं वहां तो केवल अधिकारी ही अधिकारी दिख रहे हैं, उन्हें दिख रहा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी गॉव में आये हुए हैं, बहुत ही आकर्षक मंच बनाया गया है सत्याग्रहियों के शवदाह स्थल के पास उनके लिए। इसी मंच से वे हल्दीघाटी गॉव में हुए हत्याकाण्ड पर दुख व्यक्त करते हुए अपने ढंग से कानूनी ऑसू बहायेंगे। हल्दीघाटी गॉव के प्रताड़ितों की याचनाभरी ऑखें एकटक निहार रहीं हैं मुख्यमंत्राी जी को...
‘कुछ राहत दे दे मौला!’
‘कुछ तो दे मालिक, भगवान तेरा भला करेगा।’
धरती-माई अपनी चौरी से बाहर निकल कर मुख्यमंत्राी को निहारने का मन बनाती हैं और फिर मन को रोक देती हैं...का होगा चौरी से बाहर निकल कर, वे तो अपनी चौरी में से ही सारा कुछ देख व सुन सकती हैं, सारी सुविधायें तो हो ही गई हैं चौरी में ही। सो वे चौरी से बाहर नहीं निकलतीं और सावधान होकर मुख्यमंत्राी जी केे हितोपदेशों को सुनने लगती हैं।
धरती-माई को समझ आया कि मुख्यमंत्राी जी के वाचित सारे हितोपदेश वैदिक हितोपदेशों के नकल जैसे हैं वे उन हितोपदेशों को ऐसे बोल रहे थे जैसे रट कर आये हों। मुख्यमंत्राी जी ने अपने हितोपदेशों के माध्यम सेे नोटों की गड्डियों को कुछ जादुई ढंग से उड़ाया कि हल्दीघाटी गॉव के लोग भूल गये कि उनके दस परिजनों की नृशंस हत्यायें की गई थीं, गॉव वाले नोटों के जादू में डूब गये। हत्याकाण्ड के आरोपियों की पकड़ के बारे में तो वे अपने संबोधन के प्रारंभ में ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों को आश्वस्त कर चुके थे।
मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों को सुनते हुए धरती-माई को जान पड़ा कि मंच से मुख्यमंत्राी जी नहीं साक्षात शिव जी ही बोल रहे हैं...उन्हीं की तरह खड़े हैं मंच पर, हाव-भाव भी शिवजी वाला ही है, भाषा व बोली भी उन्हीं की तरह, ये मुख्यमंत्राी नहीं ये तो शिवजी हैं, वही बोल रहे हैं। लौकिक जगत का कोई राज-नेता रूपांतरित होकर शिव जी की तरह उदार कैसे हो सकता है भला! इन गरीब आदिवासियों को खुश रखने से लोक-नेता को कोई राज-नीतिक लाभ तो मिलेगा नहीं फिर भी अगर मुख्यमंत्राी जी मृतकों के परिजनों की सहायता करने का वादा कर रहे हैं तो निश्चित ही वे शिवजी की कृपा से ही ऐसा कर रहे हैं। मुख्यमंत्राी जी के रूप में शिवजी का रूपांतरित होना धरती-माई को अचरज जैसा लगा पर शिवजी के लिए क्या है वे कभी भी किसी का रूप धर सकते हैं उन्होंने धर लिया होगा मुख्यमंत्राी जी का रूप।
मुख्यमंत्राी जी के सुभाषित हवा में तैर ही रहे थे कि मुख्यमंत्राी जी के मंच के सामने हो-हल्ला मच गया, धरती-माई चौंक गईं..
यह का हो रहा है, पोख्ता सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी। धरती-माई ने अपना पूरा ध्यान हो-हल्ला की तरफ लगा दिया....
चकरा गई धरती-माई यह लड़का तो तनबुड़ुक है जिसका भाई गोलीकाण्ड में कतल किया गया है, यह लड़का यहां का कर रहा है?
अरे यह तो डफली बजा रहा है,
गाना गा रहा है, गाने के बोल तो एकदम कुदरती जान पड़ रहे हैं जैसे भजन हों और लोक के हितोपदेश हों। धरती-माई केन्द्रित हो जाती हैं लड़के की तरफ.
‘इसका गाना सुनना चाहिए लेकिन प्रशासन के लोग इस लड़के को गाने नहीं देंगे, वे उसे भगा देंगे यही हो रहा था, सिपाहियों ने घेर लिया लड़के को...धरती-माई भले ही खुद को बिना अधिकार वाली मानंे पर ऐसा नहीं है कि उनके पास अधिकार नहीं। मुख्यमंत्राी को ही संवेदित करना होगा... धरती-माई ने कोई मंत्रा पढ़ कर मुख्यमंत्राी जी की तरफ उछाल दिया...
फिर तो मुख्यमंत्राी जी गरज उठे, प्रशासन को फटकारने लगे...
‘लड़के को मंच की तरफ आने दो, वह गाना गा रहा है गाने दो, उसे ले आओ मेरे पास...’
तनबुड़ुक को प्रशासन के अधिकारी मुख्यमंत्राी जी के मंच के पास ले गये, वहां का माहौल भी शान्त हो गया.. का करने वाले हैं मुख्यमंत्राी जी, किसी की समझ से बाहर था। मुख्यमंत्राी जी तो लोक-मन के कलाकार थे उन्हें पता था कि जनता को जनता के तरीके से ही संवेदित करना चाहिए सो उन्होंनेे एक अधिकारी को आदेश दिया कि लड़के को मंच पर ले आओ...मुख्यमंत्राी का आदेश तो आदेश, राजा क्या नहीं कर सकता माफिक...
लड़का मंच पर... मुख्यमंत्राी का लोकव्यवहार मंच पर छल-छला उठा, लड़के का उन्हांेने नाम, पढ़ाई सारा कुछ पूछा और उसे मंच से गाने की अनुमति दे दिया। लड़का मंच से गाने लगा....
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी,
जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई।
सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी,
दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी,
भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही
त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी,
ओहू के संग धरती हाथ भर न गई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।’...
तनबुड़ुक को क्या पता था कि उसके गाने का उपयोग मुख्यमंत्राी जी अपनी छवि निखारने के लिए करेंगे वह तो जगह-जमीन लूटने वालों को सीख देने के लिए गा रहा था कि सुधर जाओ, धरती किसी की नहीं होती पर हुआ उल्टा। मुख्यमंत्राी जी ने तनबुड़ुक के गाने को अपनी छविनिर्माण का औजार बना लिया तथा साबित भी कर दिया कि ये जो किकुड़ियाये, सिकुड़े, टूटे हुए लोग हैं उनके अपने हैं, उनके दिल में हैं तथा वे उनके हित के लिए ही समर्पित हैं।
मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों से हल्दीघाटी गॉव के लोगों की ऑखों में वसंत की बदरियां नाचने लगीं, वे झूमने लगे और किसिम किसम की कल्पनायें अपने विकसित होने के बाबत करने लगे। गॉव में एक दो लोग जो भावुक किस्म के थे वे तो सोचने लगे कि गॉव में मुख्यमंत्राी जी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए बरम बाबा की चौरी के पास और उन्हीं की पूजा-अर्चना भी करनी चाहिए। गॉव में तो पहले से कई देवी-देवता स्थापित हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं हम लोग पर उन देवी-देवताओं ने तो उनके कल्याण के लिए कुछ नहीं किया, बेकार है पहले से स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करके रुपया खरचना।
धरती-माई अपनी चौरी में से ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों का मन तौल रही हैं, वे आक्रोशित हो चुके हैं, दूसरे देवी-देवताओं की कौन कहे गॉव के लोग उनकी भी पूजा करना बन्द कर सकते हैं। उनके जो अधिकारी रूपी योग्य पुत्रा हैं कागजों की दुनिया वाले वे तो पहले से ही उनकी पूजा नहीं करते और अब ये भूमि-जोतक पुत्रा भी उनकी पूजा छोड़ने वाले हैं। धरती-माई को लगा कि उनके अस्तित्व पर खतरा मडराने लगा है किसी भी तरह से धरती-जोतक पुत्रों की चेतना में आस्था तथा भक्ति वाला पुराना विश्वास जगाना होगा।
धरती के जोतक पुत्रों में विश्वास बहाल करने का एक ही रास्ता है उन्हें जादुई तरीके से भ्रमित करना होगा और वही हुआ...
दो दिन ही गुजरा होगा कि हल्दीघटी गॉव के लोग प्रतिरोधी हवा के झोंकों में बहने लगे। लोक-राज के प्रतिरोधी दल की एक नेत्राी ने पूरे गॉव का मन-मिजाज अपनी ओर खींच लिया। उक्त नेत्राी हल्दीघटी गॉव में आना चाहती थी बहरहाल उसे गॉव में नहीं आने दिया गया। उसे जिले के बाहर ही रोक दिया गया, उसके अगल-बगल पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया। उक्त नेत्राी राजनीति के सारे व्याकरण को जानती थी, सत्ता के किसिम किसिम के खेलों की जानकार थी पर उसे सत्ता के विरोध करने का जो कुदरती लडा़कू तरीका होता है उसे नहीं पता था फिर भी उसने सत्ता का प्र्रतिरोध किया और अहिंसक धरने पर बैठ गई।
सत्ता चाहे किसी भी मत-अभिमत वाली हो, बांये चलने वाली हो या दायें चलने वाली हो उसके पास एक तीसरी ऑख भी होती है। उसी तीसरी ऑख से सत्ता ने समझ लिया कि विरोधी दल की नेत्राी पर जिस भी प्रकार के शासकीय अंकुश लगाये जायेंगे उससे उक्त नेत्राी की लोक-प्रियता में गुणात्मक उछाल होगा शेयर मार्केट के उछालों से भी अधिक सो उक्त नेत्राी पर सत्ता के अंकुशों को उसी सीमा तक लगाया जाना चाहिए जिससे जनता में सकारात्मक प्रतिक्रिया हो कि विरोधी नेता तो सत्ता का प्रतिरोध किया ही करते हैं इसके अलावा उनके पास काम ही क्या है?
लेकिन उक्त नेत्राी भी कम नहीं थी। वह लोक-राजनीति का सारा व्याकरण कंठस्थ करके आई थी। सो उसने सत्ता के विरोध का कोमल व मुलायम हिस्सा ही अपने प्रतिरोध में शामिल किया जिससे प्रचार-प्रसार तो मिल जाये पर शासन की यातना न झेलनी पड़े। उक्त नेत्राी ने सत्ता द्वारा सुझाये गये सुझावों को मान लिया और उसकी जहां प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की गई थी वहीं हल्दीघाटी गॉव के ग्रामीणों को बुला दिया गया। मृतकों के परिजनों से मिलना तथा उनसे संवाद करना ही उक्त नेत्राी का लक्ष्य भी था, उक्त नेत्राी का मृतकों के परिजनों से मिलवाना तथा संवाद करनेे का लक्ष्य सरकार के लिए शाकाहारी किस्म का था सो सरकार ने फटाफट प्रबंध कर दिया। उक्त नेत्राी मृतकों के परिजनों से मिली और उनकी सहायता करने का आश्वासन देकर दिल्ली लौट गई।
उक्त नेत्राी के हल्दीघाटी वाले गॉव में दौरे के कार्यक्रम से भविष्य में राजनीतिक लाभ मिले न मिले पर आदिवासियों को लाभ तो मिला ही। आदिवासियों को मुआवजे के रूप में जो आर्थिक लाभ सरकार द्वारा मिलने वाला था उसमें गुणात्मक बदलाव आ गया, कई गुना राशि बढ़ गई। आदिवासियों को जो लाभ मिला वह मिला ही उक्त नेत्राी के राजनीतिक प्रतिरोधी तेवर का भरपूर लाभ उठाया मीडिया प्रतिष्ठानों ने। लगातार तीन दिनों तक सारे मीडिया प्रतिष्ठान उक्त नेत्राी को प्रमुखता से अपने अपने प्रतिष्ठानों के द्वारा समादरित करते रहे थे।
हल्दीघाटी गॉव की स्थिति सामान्य हो जाने के बाद दुबारा एक दिन उक्त नेत्राी हल्दीघाटी चली आई उस बार वह गॉव नहीं आ पाई थी और उसने देश की अनुकंपा की परंपराओं को धत्ता पढ़ाते हुए मृतकों के परिजनो व घायलों को अनुग्रह राशि प्रदान करने की घोषणा से मालामाल कर देने की पारटी स्तर पर घोषणा कर दिया।
उक्त नेत्राी के वापस लौटते ही उसके द्वारा घोषित की गई अनुग्रह राशि की मात्रा को संज्ञान में लेते ही प्रदेश की सरकार मूर्छा में चली गई, यह क्या कर दिया उक्त नेत्राी ने, इतनी अधिक अनुग्रह राशि! स्थानीय प्रशासन भी मूर्छित हो गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि विधिक प्राविधानों को कुचलते हुए उक्त नेत्राी द्वारा घोषित आर्थिक मुआवजे से कैसे अधिक मुआवजा दिया जाये गरीब आदिवासियों को... जिससे सरकार की छवि बची रह सके, धूमिल तथा मटियामेट न होने पाये। नहीं तो जनता का क्या है, वह तो सरकार की आलोचना करने के लिए तैयार बैठी होती ही है। ऐसी विकट स्थिति में मुआवजे की धन-राशि सरकार को उक्त विरोधी नेत्राी द्वारा घोषित घन-राशि से अधिक तो देनी ही थी साथ ही साथ भूमि-प्रबंधन के विभेदकारी प्रविधानों व प्रबंधनों को भी जनता से छिपाये रखना था कहीं जनता सरकारी धोखों को जान न जाये, जागृत हो कर आन्दोलन न कर बैठे कि भूमि- प्रबंधन के नाम पर उन्हें लूटा और ठगा गया है।
धरती-माई चौरी में विश्राम करती हुई धरती पर लोक-नायकों द्वारा सृजित राजनीतिक कौतुकों पर हस रही हैं...
‘अच्छा हुआ, गजब का खेल खेला है विपक्ष की नेत्राी ने, पहले वह सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर गई, वहां की माटी माथे पर लगाई फिर मृतक के परिजनों को आर्थिक मुआवजा देने की घोषणा किया। सरकार उक्त नेत्राी के कारण ही जाग उठी है और किसिम किसिम की घोषणायें कर रही है, सहायता करने का प्रदर्शन कर रही है, अब प्रदर्शन से काम नहीं चलने वाला सरकार उक्त नेत्राी द्वारा घोषित अनुग्रहराशि से अधिक देने के लिए विवश हो चुकी है। सरकार रोयेगी भी तो किसके सामने उक्त नेत्राी ने तो सरकार का रोना भी छीन लिया है वैसे तो सरकार रोने और सिसकने की कलाकार होती है पर इस अवसर पर उसे रोने का कोई तरीका ही नहीं सूझा। यह बात और है कि कहीं कोने में दुबक कर सिसक लिया हो। यह अनुमान तो पक्का हो ही गया कि मृतक के परिजनों को कुल जोड़ कर तीस तीस लाख रुपये तो अब मिल ही जायेंगे, दस दस लाख रुपयों के आस-पास घायलों को भी मिलंेगे। इस तरह से रुपयों की वारिश होगी उनके गॉव में हल्दीघाटी गॉव वाले कभी सोचे ही नहीं होंगे। वाह रे! शनि देव तेरे रहते किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता।
धरती-माई की हसी से उनकी चौरी भी मुसिकयाने लगी, चौरी में जिधर देखो उधर मुस्कुराहट पर धरती-माई को जाने क्या हुआ कि वे धरती-पुत्रों पर बरस रही कृपा के लिए शिवजी को धन्यवाद देने के बजाय कुंठित हो गईं...
‘तो क्या यह जो रुपयों की वारिश है उससे धरती-पुत्रों की सूजी ऑखें, किकुड़ियाये चेहरे खिल उठेंगे? वे भूल जायेंगे कि उनके दस लोग गोलियों से भून दिये गये हैं, उन्हें मारा-पीटा तथा कतल किया गया है। खैर जमीन तो उन्हें मिल जायेगी सरकार ने ऐलान कर दिया है पर का होगा उनका जिनकी जिन्दगी छीन ली गई?’
क्या यह अनुग्रह राशि जिन्दगी पर मलहम लगायेगी, जीवन लौटा देगी, नहीं नहीं धरती-लोक की यह गलत परंपरा है। धरती-माई दुखी हो जाती हैं।
उन्हें समझ आता है कि शिवजी से प्रार्थना करनी चाहिए, वे तो भोले दानी हैं पर नहीं, शिवजी मृतक धरती-जोतक पुत्रों को जीवित नहीं कर सकतेे, उनके या किसी के अधिकार में किसी मृतक को पुनः जीवित करने का अधिकार है ही नहीं, जो मर गया, मर गया। दुबारा जीवित होने की कुछ घटनायें भले ही किताबों में दर्ज हैं पर उससे क्या हुआ हल्दीघाटी गॉव के लिए ऐसा संभव नहीं। इतना जानते हुए भी धरती माई ने शिवजी से प्रार्थना किया...
‘हे लोक कल्याण के देवता शिव जी! आपने धरती-पुत्रों के लिए बहुत कुछ किया जिसकी आशा मुझे नहीं थी अब एक प्र्रार्थना और स्वीकार कर लीजिए, मेंरे मृतक धरती-जोतक पुत्रों को उनका जीवन लौटा दीजिए, उनकी सांसे मत छीनिए।’
शिवजी ने धरती-माई की प्राथना सुनते ही अपना मुह बाईं ओर घुमा लिया और ध्यानमग्न हो गये। धरती-माई को समझते देर न लगी कि शिवजी नहीं सुनने वाले। सो बेकार है इनसे रिरियाना।
गॉव के लोगों को देख कर धरती-माई मगन थीं, ये खुश तो वे भी खुश। वे शिवजी पर भी खुश थीं बहुत कुछ किया उन्होंने गॉव वालों के लिए। बहुत अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, ऐसा वाला गीतोक्त भाव महसूस कर चौरी में विश्राम करने लगीं...
वे नींद में गोते लगाना चाहती थीं, नींद आ जाती तो ठीक था पर नींद भी तो बहुत ही नाजुक चीज होती है, वह आती है तो अपने मन से मनाने पर तो तनेन हो जाती है। वही हुआ धरती-माई को नींद नहीं आई उल्टा यह हुआ कि वे हल्दी-घाटी गॉव की हवाई यात्रा पर निकल पड़ीं.. देखा जाये कि गॉव में क्या हो रहा है? रुपयों की वारिश हुई है, गॉव के लोग तो खुश हैं नऽ। वे मगन होंगे।
गॉव के लोग खुश थे, मगन थे, मृतकों के पुरुष परिजन खुश थे पर विधवायें अपने कुदरती ऑसुओं में भीगी हुई थीं, वे वैधव्य की चादर ओढ़े मन ही मन सिसक रहीं थीं, उनकी ऑखें पहले की तरह भीगी हुई थीं और ऑचल पर सामाजिक व कानूनी दागदार खूनी चकत्ते उभरे हुए थे। ऑचल ओढ़ते ही उन्हें लगता कि उनकी देह को खून से पोता जा रहा है, देह भी मरछहा गंध छोड़ रही है। वे जब नींद में चली जातीं तो नींद में ही चिल्लाने लगतीं। उनका चीखना-चिल्लाना हृदय विदारक होता।
धरती-माई गॉव में पसरा हुआ हृदय-विदारक दृश्य देख कर दुखी हो गईं और हवाई मार्ग से अपनी चौरी पर वापस चली आईं, अब फिर गॉव की तरफ नहीं जाना।
विधवाओं को रुपया प्रभावित नहीं कर पाया, कुछ लोग होते ही हैं जिनके दिल दिमाग को रुपयों का खेल अपने मुताबिक नहीं चला सकता, भीगी हुई ऑखें पोंछ नहीं सकता। वैसे यह जो रुपया है नऽ, है अजीब चीज, किसी को भी पकड़ लेता है, बांध लेता है, बांये-दांये नहीं होने देता। धन-शास्त्रा के आगे तमाम पवित्रा पोथियॉ पानी भरती जान पड़ती हैं, तमाम पवित्रा नदियॉ अपनी पवित्राता खो बैठती हैं, मान, स्वाभिमान, अस्मिता, विचार, चिन्तन, रीति-रिवाज, परंपरायें, अधिकार, कर्तव्य, यश, अपयश सारे के सारे तराजू पर एक साथ रख दिये जाने के बाद भी हवा में लटक कर ऊपर उठ जाते हैं, पलड़े पर और रुपया धरती के गुरूत्व से चिपक जाता है, इतना वजनी होता है रुपया कि सब पर भरी पड़ जाता है, रुपये की तुलना में सभी चीजें हवा में लटक जाती हैं गुरूत्वहीन हो कर। धरती-माई को अचानक महसूस हुआ कि उनकी देह पत्थर की हो रही है, चेतनाहीन, उनके सामने किसिम किसम के नोटों की गड्डियॉ हवा में उड़ रही हैं, कुछ तो उन्हें चोटिल भी कर रही हैं उनके सामने कुछ तनेन खड़ी हैं और उन्हें धमकियॉ रही हैं...
‘तो तूॅ है धरती माई! तूॅ नहीं बिकेगी तो ये बता तेरी चौरी कैसे बन गई? तुझे जो प्रसाद चढ़ता है वह कैसे आता है? तूं कैसे लेती है धूप-दीप की सुगंध और उस सुगंध में झूमती रहती हो कैसे होता है यह सब? नोटों से ही तो होता है, तेरी चौरी के भीतर जो आधुनिक सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं, ठीक है वे सब पराशक्ति के द्वारा निर्मित हुई हैं, जरा सोचो, वही काम तो नोटों की गड्डियॉ भी करती हैं तो का फर्क है नोटों की गड्डियों की ताकत और पराशक्ति में, दोनों शक्तियॉ तो एक ही काम करती हैं, सारी सुख-सुविधायें जुटाना, गॉव वाले अगर रुपयों की मादक गंध में डूब गये और भूल गये हत्याकाण्ड की घटना को तो का हुआ? कुछ बिगड़ तो नहीं गया? अरे! धरती-माई तेरा भी तो लक्ष्य है कि गॉव में मंगल रहे, वे खुश रहें, मौज से खाते-पीते रहें। देखो धरती-माई! संभल जाओ जो हो रहा है होने दो, यह धरती है यहां पर बिना नोटों के पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते, नदियों में पानी नहीं बहता, न किसी का जनम हो सकता है और न ही मरण। लेकिन तूं का जानेगी यह सब तेरी नोटों के प्रति नकारात्मक सोच के कारण ही तो तेरा आज तक कहीं मन्दिर भी नहीं बना। दूसरे देवी-देवताओं को देखो, कमजोर से कमजोर देवताओं के भी भव्य मन्दिर जगह जगह पर बने हुए हैं, आने वाले दिनों में मुख्यमंत्राी जी का भी मन्दिर बन सकता है, दूसरे लोगों के भी बन सकते हैं। उनके मन्दिरों में पूजा-आराधना हो रही है पर तुझे कोई पूछने व पूजने वाला ही नहीं है। हल्दीघाटी गॉव वाले जो तेरी पूजा कर रहे हैं वे भी छोड़ देंगे तेरी पूजा करना, देख लेना किसी न किसी दिन।’
धरती-माई को नोटों की गड्यिों ने ऐसा फटकारा कि वे पसीनी पसीना हो गईं, उनके पास तर्क तथा संवाद की जो पूंजी थी सब खतम हो गई, उन्हें कुछ नहीं सूझा जबाब देने के लिए। स्वर्ग में तो उन्हें हाजिर जबाब माना जाता था, तमाम बड़े बड़े देवता उनकी हाजिर जबाबी की तारीफ किया करते थे पर धरती पर का हुआ उन्हें कि नोटों की गड्डियों को जबाब तक नहीं दे पा रही हैं।
धरती-माई बेचैन हो जाती हैं का जबाब दंे नोटों की गड्डियों को, जबाब है भी नहीं शायद। धरती पर तो रुपयों का ही बोल-बाला है, खरीद-बिक्री की रीति है, यहॉ रुपये ही शस्त्रा हैं तो शास्त्रा भी हैं, रुपये ही कहानी, कविता हैं, रुपये ही विधि तथा विधान हैं, यहॉ सुबह भी रुपयों की मादकता में स्नान कर धरती पर उतरती है और सन्ध्या! उसका क्या कहने...वह तो झूमती-इठलाती वैभव के गीत गाती हुई अपने कोमल व हसीन पॉवों को आहिस्ते-आहिस्ते धरती पर धरती है। उसके अवतरित होते ही धरती के कण कण, जन गण उल्लिसित व हर्षित हो जाते हैं।
धरती-माई रुपयों के लोक-लुभावन कोतुकों से परिचित हैं फिर भी उनके मन में आधुनिक मानव-सभ्यता के विकास के पहले के लोक-सत्य पर आधारित एक विचार उद्वेलित कर रहा था कि रुपया सब कुछ नहीं होता और आज तक उसी वसूल पर डटी हुई हैं। पर जमाने ने करवट बदल लिया है और रुपया जीवन जीने के तरीकों का अनिवार्य औजार बन चुका है। फिर भी धरती-माई लोक-सत्य की कुदरती विचारों पर डटी हुई हैं। उनका मन्दिर बने न बने कोई बात नहीं पर वे रुपयों की नदी में नहाने नहीं जायेंगी, नहा लेंगी किसी कूंये पर, पी लेंगी किसी झरने का पानी, बिता लेंगी अपना जीवन, बन जायेंगी वनवासी, धूप-दीव की सुगंध पीने के बजाय पत्तों की हरियाली पी लेंगी पर कुदरती चेतना नहीं छोड़ेंगी।
धरती माई किसी तपस्वी की तरह ‘स्वरूप शून्य’ होना चाहती हैंं, न स्वरूप रहेगा और न ही उन्हें सांसारिक माया-जाल में फसना पड़ेगा। वे ‘शिशुबोध’ की तरफ लौटना चाह रही हैं पातंजलि के योगसूत्रा ‘प्रतिप्रसव’ की ओर। वे स्वर्ग लौट जाने का मन भी बना रही हैं...भले ही वहॉ ताने हैं, फटकारें हैं, आलोचनायें हैं फिर भी कम से कम धरती पर जैसा मार-काट व स्वार्थ तो नहीं है। वहां धरती से अधिक शान्ति है।
‘सभी नशे में हैं
कमाल की होती है रुपयों की मादकता’
बबुआ मुख्यमंत्राी जी के गॉव में आने वाले दिन गॉव में ही था और उसने देखा कि लोकतंत्रा की पूरी शक्ति उसके गॉव में उतरा गई है। उसे अच्छा लग रहा है गॉव के सिवान पर नोटों को उड़ता हुआ देख कर सो वह मगन है। उसे चिन्ता थी सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी जैसी विधवाओं की ‘उनका क्या होगा किसके सहारे वे जीवन जियेंगी?’
अब बबुआ को संतोष है मृतक और घायलों के परिजनों को काफी रुपया मिल रहा है किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। रुपया जब टेट में होता है तब किसी भी तरह की तकलीफ भी महसूस नहीं होती, दुख-दर्द भी खतम हो जाते हैं। मर-मुकदमे का झंझट भी करीब करीब खतम होय गया है। जमीन की नापी भी किसी दिन होय जायेगी कागज तो मिल ही गया है।
वह काफी खुश था और मगन भी चलो गॉव का सारा बवाल खतम होय गया। अब गरीबी नदारत हो जायेगी गॉव से, खुशी में वह इतना मगन हो गया कि सीधे सरकारी दारू की दुकान पर चला गया, वहां उसने छक कर दारू पिया और झूमते हुए घर लौटा। बुझावन ओसारे में चारपाई पर लेटे हुए थे। बुझावन ने देखा कि बबुआ के पैर डगमगा रहे हैं, स्वाभाविक ढंग से वह चल नहीं पा रहा है, उनके मन में हुआ कि बबुआ से बतियायें...
‘काहे इतनी दारू पी लिया रे!’ फिर भी कुछ नहीं पूछ पाये बबुआ से, मन मसोस कर रह गये।
बबुआ सीधे घर में चला गया और चारपाई पर जाकर धड़ाम हो गया। बिफनी गाय-गोरू के लिए सानी-भूसा कर रही थी। सानी-भूसा निपटा लेने के बाद वह सीधेे कमरे में गई उसने देखा कि चारपाई पर बबुआ उतान सोया हुआ है और उसकी सांसें चल रही हैं...
‘लगता है नींद में चले गये हैं।’ बबुआ को सोता देख कर बिफनी ने उसे नहीं जगाया सो लेने दो, तीन-चार दिन से लगातार दोड़-धूप कर रहे हैं, कभी किसी साहेब के साथ तो कभी किसी के साथ। कभी वारिशों की जॉच-पड़ताल तो कभी कुछ। रोज ही तो काई न कोई साहब गॉव चला आता था और बबुआ को ही पूछता था, उसे सहेज कर लौटता था कि बबुआ यह कर लेना तो वह कर लेना। विपक्ष की जो नेताइन आई थीं वे भी बबुआ को ही पूछ रही थीं, बबुआ से मिल लेने के बाद ही दूसरों से मिली थीं। बबुआ से उन्हांेने कहा था...
‘बबुआ हम तोहरे घरे चलेंगे’
हम तऽ ओनकर बात सुनकर कठ्ठ हो गये थे, हमरे घरे आयेंगी तऽ हम ओनके पनपियाव का करायेंगे? यह कैसे हो सकता है कि कोई बड़ बुड़का हमरे घरे आये अउर हम ओके पानी भी नाहीं पिलायें। तऽ का पियायेंगे ओन्हैं, गुड़ अउर चिरउंजी दे देंगे एक प्लेट में, दही-चीनी घोरि के सरबत पियाय देंगे, बोलेंगी तऽ चाह पियाय देंगे दूध वाली।
‘लेकिन गजब मेहरारू हैं, एकदम कड़क अउर तेज, हाउर हाउर चल रही थीं, कियारी के मेड़ पर भी ऐहर ओहर नाहीं हुईं, हमैं तऽ लगा कि भहरा जायेंगी खेते में, घाव लग जायेगा पर नाही गिरीं, कहीं भी नाहीं डगमगाईं,ं जबकि रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था पर ओन्हैं कउनो फरक नाहीं सीेधे अंगना में आईं अउर चारपाई पर पल्थियाकर बैठ गईं एकदम देहातिन माफिक तनिको नाहीं लगा कि ऊ देहातिन नाहीं हैं। गुड़ चिरउंजी तो खाई ही दही का सरबत भी पिया तनिकौ घिन नाही, एहर के बड़का लोग तऽ घिनाते हैं हमलोगों के यहां पानी पीने में भी, पानी पीते समय नाक-मुह सिकोड़ लेते हैं। अउर दारू पीने में नाहीं घिनाते। खूब छछाकर दारू पीते हैं मॉग मॉग कर।
हमार नाम पूछा था नेताइन ने हमने बताय दिया ओन्है फेर वे नाम से ही हमैं बोलाने लगीं। गुड़ चिरउंजी खा लेने के बाद उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला था-
‘का हो बिफनी! चाह नाहीं पिलाओगी का?’
‘पिलायेंगी साहेब!’ हमरे मुहें से अचानक साहबै निकल गया था फेर उन्होंने टोक दिया था...
‘हमैं बहिन जी बोलो, हम साहेब चाहे मैडम नाहीं हैं, हमहूं तोहार बहिनै हैं दूसरी बहिनों की तरह।’ बोलते हुए कलेजे से लिपटा लिया, हमैं बहुतै नीक लगा, हम तऽ घबराय रहे थे ओनसे लिपटने में, हम ठहरे मजूरिन, हमार देंिहंया गंधाती होगी पर नाहीं उन्होंने अपने अकवार में हमैं कस लिया। ओनकरे पारटी कऽ दूसर नेतवा ओनकरे सामने खड़े थे चाहते तो अंगना में बिछाई दरी चाहे खटिया पर बइठ सकते थे पर नाहीं बइठे, का बइठते बेचारे दरियो तो भींग गई थीं पानी से, ओलोगन कऽ लकदक सफेद कपड़ा खराब हो जाता, माटी लग जाती, कपड़ा सिकुड़ जाता। पर बहिन जी तो बहिन जी अपने घरे माफिक पल्थियाकर बैठ गईं खटिया पर।’
‘हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे आप लोग घबड़ाइएगा नहीं। अंगना में बैठी हुई एक एक मेहरारून से मिलीं, जो विधवा हो गई हैं ओनसे भी मिलीं पूछ कर सबसे हस हस कर बतर्याइं। सबको साहस दिलाईं कि आपन हक तबै मिलता है जब ओकरे बदे लड़ा जाये, चुप बइठने से कुछ नाहीं मिलता। बड़ा मीठ थी ओनकर बोली, बोली सुनकर मन लहक गया।’
बबुआ दूसरे दिन सुबह ही जाग गया, रात का खाना भी नहीं खाया। सुबह उसे ताजगी महसूस हुई। दैनिक क्रिया से निवृत्त हो कर वह बिफनी को उलाहने लगा।
‘रतिया में काहे नाहीं जगाई रे!’
‘रतिया में का जगाते हम तोहके, तूं होश में थे का? जाने कहां दारू पी लिए थे मरने माफिक, भला ये तरह से दारू पी जाती है, बेहोश होने लायक पर तोहैं के समझावै कउनो बहाना बनाय दोगे कि ई होय गया था तऽ ऊ होय गया था। अच्छा बताओ कहां पी लिए थे दारू, बपई तीन-चार बार पूछे होंगे तोहके।’
‘अइसही रे! कुलि संघी साथ जुट गये थेे अउर पी लिए। मनवौ तऽ गदगद था। कुल काम निपट गया। जेतना हमलोग सोचे नाहीं थे ओसे अधिक रुपिया मिला अउर खेतवा भी हमलोगों के नाम से होय गया। अब का चाही। एक बात जानि लो बिफनी अगर ऊ बहिन जी नाहीं आई होतीं हमरे गांये तऽ मनमाना रुपिया नाहीं मिलता अउर न खेतवा हमलोगों के नाम से होता।’
बिफनी अपने तथा अपने जैसे दूसरों के बारे में गुन रही थी ओन्हैं का मिला? मिला खाली ओ लोगन के जेकरे घरे के लोग मारे गये या घायल हुए बाकियों को का मिला, कुछौ नाहीं नऽ। जमीन की लड़ाई तऽ सब मिलकर लड़ रहे थे, आजउ जे जिन्दा बचा है ओकरे जान कऽ खतरा है, रामलाल केहू के छोड़ेगा थोड़ै।
सरकार तथा उक्त नेत्राी ने घायलों व मृतकों के परिजनों को चेक दे दिया था। इसी तरह से जो दूसरे सरकारी विभाग थे तथा जिन जिन विभागों से आर्थिक सहायता दी जाती है उन विभागों की तरफ से भी सारे चेक परिजनों को साैंप दिये गये थे। चेक भला कौन रोकता, कौन ना नुकूर करता जब मुख्यमंत्राी जी ही जुट गये हों कि आदिवासियों की पूरी मदत करनी चाहिए फिर क्या कहने! फटाफट सारा चेक मृतकों तथा घायलों के परिजनों को बाकायदा एक कार्यक्रम के जरिए सौप दिया गया। सुविधा के लिए एक अधिकारी ने उन सबका खाता पहले से ही बैंक में खुलवा दिया था मौके पर बैंक का एक कर्मचारी भी उपस्थित था जिससे कोई गड़गड़ी न होने पाये। परिजनों के आवास भी बनाये जाने लगे थे, गॉव की गलियां पक्की की जाने लगी थीं साथ ही साथ एक ऑगनवाड़ी केन्द्र का निर्माण भी शुरू हो गया था, गोया उद्घोषित विकास की सारी योजनायें गॉव में शुरू करा दी गई थीं। कुछ ही महीने में गॉव स्वर्ग माफिक दिखने लगेगा पर उन विधवाओं का क्या होगा जिन्हें वैधव्य झेलना पड़ेगा, उस बाबत क्या किया जा रहा था? या क्या किया जा सकता है विकासमूलक आधुनिक सभ्यता के पास इसका जबाब नहीं था। जबाब तो आधुनिक सभ्यता के पास इस बात का भी नहीं है कि यह जो जमीन का प्रबंधशास्त्रा है पूरे देश में विवादास्पद क्यों है? आखिर जमीन का यही विभेदकारी प्रबंधन ही तो किसी भी शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना देता है।
बिफनी उलझी हुई है कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू जैसों का का मिला जो लोग उस घटना में बच गये थे, मौके पर तो बहुत से लोग थे, उन्हें का मिला? कुछ तो नहीं, जो मर गया, चाहे जो घायल होय गया उसे ही तो मिला। आज पूछेगी बबुआ सेअउर खेलावन से के का मिला तूं लोगन के?
बिफनी चाय बनाय चुकी थी, एक गिलास में चाय उसने बपई को दिया अउर दूसरी गिलास में बबुआ को...
‘लो चाह पी लो, ताजगी आ जायेगी, कइसन तऽ मुहवा झुराय गया है तोहार।’
अपने चेहरे पर हाथ फिरा कर बबुबा खखाकर बोला...
‘का बोल रही है रे, मुह कहां झुराया है एकदम से लकदक तऽ है।’
बिफनी तो अकबकाई हुई थी बबुआ से पूछने के लिए वह पूछने ही वाली थी कि खेलावन आ गये, उन्होंनेे दरवाजे से हॉक लगाया...
‘का हो बबुआ कहां हो।’
‘एहरै चले आओ हम अॅगना में हैं।’
खेलावन अॅगना में आय गये, बिफनी के लिए ठीक था उनसे भी पूछ लेगी, उसने वही किया।
‘का हो खेलावन भइया! एक बात हम नाहीं समझ पाय रहे हैं कि जेकरे घरे कऽ कोई नाहीं कतल हुआ चाहे घायल नाहीं हुआ ओके का मिला? गया तो गॉव भर था मौके पर उतराहाटोला वालों को छोड़ कर। ओमे से केहू कऽ कतल होय सकता था, कोई घायल हो सकता था, हम समझ नाहीं पाय रहे हैं काहे से लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोले के लोग लड़े हैं फेर जो जो लड़ाई लड़े हैं सबके काहे नाहीं मिला कुछ। हमैं बताओ सबके सहायता मिलना चाहिए के नाहीं।’
बबुआ और खेलावन के पास बिफनी के सवाल का जबाब नहीं था, भला वे क्या जबाब देते यह सवाल तो सरकार चलाने और बनाने वालों से पूछना चाहिए। वे दोनों चुप थे तो चुप थे फिर भी बबुआ ने जबाब दिया वह भी गुसिया कर...
‘तूं का बूझेगी यह सब, ई का कम है कि जे, जे मरे हैं घटना में चाहे घायल हुए हैं ओन्है रुपया मिल गया, तोहके का पता! अगर ऊ नेताइन गॉव में नाहीं आई होती नऽ तऽ एतना थोड़ै मिलता जेतना ए समय मिला है, अधिकरिया चटनी की तरह चट कर जाते सारा रुपिया। कोई का कर लेता उनका, ओन्हई लोगन के कागज भरना, लिखना है, खुदै अपना लिखा हुआ पढ़ना भी है, लिखे-पढ़े के अनुसार रुपिया देना है, जॉच करना है। देखी नाहीं का? सब घायलों का नाम ही कहां लिख रहे थे कागज पर, हमलोग ओनसे झगड कर नाम लिखवाये सबका। हाथ पैर जिनका नाहीं टूटा था उन सबका भी। अधिकरिया तऽ बोल रहे थे कि जेकर माथा फूटा है, जेकर हाथ पैर टूटा है वोही का नाम लिखेंगे, जेकरे पीठी पर घाव लगा है, गोड़े में घाव लगा है अउर रंेगने लायक है ओकर नाम नाहीं लिखेंगे। रही बात ओ लोगन कऽ जे उहां था घटना के स्थान पर ओन्हैं काहे नाहीं रुपिया मिला? अरे! पगली एतनौ नाहीं जानती ओन्हैं कैसे रुपिया मिलेगा? वे तो जिन्दा हैं, सरकार जिन्दा आदमी का करम(मृत्यु संस्कार) नाहीं करती करम करती है मुर्दा का। सरकार खाली मुर्दे पर बिछाती है नोटों की गड्डियॉ। जा कर पूछ लो सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी से चाहे ओमें कउनो से जेकर पति कतल होय गया है का ओकर पति जिन्दा हो जायेगा नोटों से? पागल है का रे! जान बच गई, का ई कम है, जान है तो जहान है एके समझाना पड़ेगा।’
बोलते बोलते बबुआ रूक गया, उसे जान पड़ा कि वह कुछ अधिक बोल गया है। बिफनी जो पूछ रही थी उसके सवाल का यह जबाब नहीं है क्योंकि बबुआ को भी अखर रहा था कि गॉव के दूसरे लोगों को किसी भी तरह की सहायता राशि नहीं दी गई जबकि सभी को दिया जाना चाहिए था। खेलावन पास ही में थे, वे काहे चुप रहते, बोल पड़े....
‘देख बबुआ! तूं गलत समझाय रहा है बिफनी को, जमीन की लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोला लड़ा है ऐसे में पूरे दखिनाहा टोले वालों को रुपिया देना चाहिए था थोड़ा कम चाहे अधिक पर देना सबको चाहिए था। जो जिन्दा है उसी को तो सब कुछ भोगना है। जिन्दा लोगों के लिए सरकार कुछ सहायता दे देती तो का उसका मान गिर जाता हम तो कहते हैं कि सरकार का मान बढ़ जाता। अब ई का है कि जेकर जान चली गई है ओही के परिवार के रुपिया दो, खतरा में तऽ ऊ है जेकर जान बची हुई है ओके रामलाल छोड़ेगा थोडै ओकरे बदे का हुआ?’
बबुआ भी तो वही चाहता है जो खेलावन बोल रहे हैं पर करे का, किसके सामने जा कर फरियाद करे। उसने खेलावन को समझाना चाहा...
‘ऐसा है खेलावन भइया! जिन्दा आदमी वह भी गरीब-गुरबा उसे कौन पूछता है, नाहीं, देख रहे हो कि उसकी पूछ मरने के बाद होती है, एक्सीडेन्ट में मर जाये चाहे कतल से मर जाये। नाहीं देखे भइया मुख्यमंत्राी जी का कार्यक्रम भी वहीं हुआ जहां हमलोग साथियों की लाशें जलाये थे। वहां जा कर मुख्यमंत्राी जी ने माथा नवाया, और धूल उठा कर माथे पर लगाया। ऐसा दिखावा दस साथियों के मरने के बाद ही तो सब आयेे दरोगा, कलक्टर, मंत्राी-संत्राी, पत्राकार/लेखक दौड़ने सभी वह भी रुपियों की भारी-भरकम गठरी ले कर। एकरे पहिले के आया था ए गॉयें में? चलो हम लोगों को का करना है, एही पर संतोष करना है कि मरने अउर घायल होने वालों के परिजनों को तो मिला नऽ रूपिया।’
खेलावन ने बबुआ की बात का समर्थन किया...
‘सही बोल रहे हो बबुआ तुम! गरीबन कऽ मान-सम्मान मरने के बाद ही होता है वह भी बर-बेमारी से मरने पर नाहीं, कतल अउर एक्सीडेन्ट होने पर मरने से।’
खेलावन और बबुआ ऑगन में बैठ कर बतिया ही रहे थे कि बुधनी काकी चली आईं उनके साथ परमू काका भी थे। बुधनी काकी बबुआ से मिलने के लिए परेशान थीं। जब से गॉव वालों को चेक मिला है तब से वे चैन से नाहीं हैं जाने कहां गायब होय गया है बबुआ, दिखाई ही नाहीं दे रहा है, बबुआ से मिलते ही बुधनी काकी पूछ बैठीं बबुआ से...
‘का रे बबुआ कहां गायब होय गया था रे! जब तक चेक नाहीं बना था तब तक तो तूं छटपटा रहा था, एक एक आदमी का चेक बनवा रहा था, नाम पता लिखवाय रहा था, आधार कारड सही करवाय रहा था अउर जउने दिन चेक मिलना हुआ ओ दिना गायब हो गया, कहां चला गया था ओ दिना से?’
बबुआ गंभीर था, वह जान-बूझ कर मौके से हट गया था, का होगा इहां रह कर उसे तो चेक मिलना नाही है, वह जिन्दा बच गया है इस लिए अमीर है, उसे रुपियों की का जरूरत? उसने धीरे से बताया बुधनी काकी को...
‘अरे! काकी हम भला कहां जायेंगे हम घरहीं पर थे? उहां हमार का जरूरत थी?’
बुधनी काकी तो बुधनी काकी बोल पड़ीं...
‘हां हो ताहार का जरूरत थी उहां पर, तोहार तो जरूरत थी मुकदमा लड़ने की, मुआवजा का चेक बनवाने की, आधार कारड सही करवाने की, एक एक आदमी की पहचान करवाने की, पोसटमार्टम करवाने की, घायलों का इलाज करवाने की, रापटगंज से लेकर बनारस तक दौड़ने की, कभी लेखपाल कीहें तऽ कभी तहसीलदार अउर दूसरे अधिकारी के यहॉ दौड़ लगाने की, एकरे बादौ बोल रहे हो कि तोहार का जरूरत है? अब हमैं जरूरत बताओगे तबै हम समझ पायेंगे?’
बिफनी, काकी के साथ ही बैठी हुई थी... काकी को उसने समझाना चाहा...
‘अरे काकी! बोल तो सहियय रहे हैं बबुआ, चेक लेते समय इनकर का जरूरत थी उहां पर सो घरही में सन्ना कर पड़े रह गये थे नाहीं गये उहां पर अउर कुछ दूसर बात नाहीं हैं काकी।’
‘अच्छा अच्छा चुप कर मत बोल कुछ एकरे आगे, हमार अइया नहीं है तूं, हम पेटे में की बातउ सुन लेते हैं अउर अरथ निकालि लेते हैं। अच्छा ई बताओ उहां मौके पर बबुआ नहीं गया सो नाहीं गया, खेलावन, बंधू अउर सोमारू भी काहे नाहीं गये मौके पर एकरे बारे में कुछ बताय सकती हो तो बताओ... तूं बोल खेलावन, काहे नाहीं थे जब चेक बट रहा था अउर सोमारू तथा बंधू कहां थे ओ दिना? तूं लोगन में से कोई नाहीं था उहां, कउनो न कउनो बात तो है, हमैं साफ साफ बताओ, इहै जानने के लिए हम तोहरे कीहें आये हैं।’
काकी बोलने में धरावाहिक थीं बबुआ उनकी बातें खामोशी से सुन रहा था और गुनता रहा कि काकी का बोल रही हैं। उसने काकी को बताया...
‘देखो काकी कउनो बात नाहीं है, हम उहां नाहीं गये थे ई सोचकर कि हमार कउनो काम तऽ उहां है नाहीं फेर काहे जायें, कागज का सारा काम हमने करवाय दिया था, चेक की लिस्ट भी बनवाय दिया था जौने हिसाब से चेक बटना था फेर बताओ काकी! उहां हमार कौन काम था?
बुधनी काकी तो गॉव भर की काकी थीं उन्हें कौन समझा सकता था, वे ही गॉव वालों को समझाया करती थीं। जिस दिन चेक गॉव वालों को दिया गया था उसी दिन सोमारू ने पूछा था बुधनी काकी से...
‘का हो केके केके चेक मिला? काकी ने बताया था चेक पाने वालों का नाम सोमारू को। सोमारू हसने लगे थे, खूब ठठाकर हसे थे, का परभू तोहार लीला कोई नाहीं बूझ सकता, काहे मजाक कर रहे हैं हम गरीबन के संघे, हमार लड़का तऽ चला गया दुनिया जहान छोड़ कर एकै बचा है बबुआ ओहू के काहे भगाय रहे हैं गॉयें से उहौ भाग जायेगा कउनो नऽ कउनो दिना गॉव छोड़ कर?’
बुधनी काकी चकराई हुई थीं कि बुढ़ऊ एतना हस काहे रहे हैं,अइसन तऽ कब्बौ नाहीं हसते थे, काकी ने पूछा सोमारू से...
‘काहे एतना हस रहे हो, का मिल गया तोहें।’
अरे ई पूछो का नाहीं मिला, रुपिया की गठरी मिल गई, अब ओही पर सूतो अउर हगो।
‘का बोल रहे हो साफ साफ काहे नाहीं बोलते।’ काकी गुसिया गई सोमारू पर
‘अच्छा बुधनी ई बताओ, बबुआ, खेलावन, पुनवासी तथा अउर दखिनाहा टोले वालों को का मिला? का जो जो मरे हैं उहै जमीनी के लिए लड़े हैं दूसर नाहीं लड़े हैं। लड़े तो सब हैं, एक साथ मिलकर लड़े हैैंं तो सबको सहायता मिलनी चाहिए के नाहीं। सरकार के नियाव पर हमैं एही से हसी आ गई। हम ओपर हसे फिर हसे कि चलो ठीक है कुछ लोग तो रुपयों के बिस्तरे पर सोयेंगे राजाओं की तरह, एहू पर हमैं हसी आ गई। सरवन तो चला ही गया अब बबुआ भी गॉव छोड़ देगा गॉव कहीं चला जायेगा भागकर, गॉव में परजा बन कर तो वह रहेगा नाहीं। अब तऽ ऊ गॉये में परजा बन कर रहेगा, रुपिया वाले तऽ राजा बनि गये, रुपिया पर नाचेंगे, कूदेंगे, रुपिया से बोलेंगे, बतियायेंगे। सरकार का तो काम ही है किसी को राजा बना देना और बकिया को परजा बना देना। कम से कम हमार गॉव तो राजा परजा में पहिले नाहीं बंटा था अब बंट गया बुधनी। गॉव में सब बराबर थे, दुख सुख के साथी थे अब तो गॉव की खेती भी समूह में ही होने लगी है। देखो का होता है आगे समूह की खेती तो नाहीं होगी।’
सोमारू की बातें बुधनी के दिल-दिमाग में धस गईं...
‘बुढ़वा ठीक बोल रहा है, बबुआ से मिलना चाहिए।’ बुधनी काकी उसी दिन बबुआ के घर आ गईं और उससे बतियाने लगीं। बबुआ का बोलता काकी से वह तो जानता ही था कि सरकार केवल कतल तथा घायल हुए लोगों के परिजनों को ही सहायता देती है वह भी काफी जोर-आजमाइश के बाद सो उसे कैसे मिलेगी रुपयों वाली सहायता?
बबुआ के जानने न जानने से का फर्क पड़ता है, हमारी सभ्यता भले ही आधुनिकता का दम भरती रहे पर है आदिम जमाने वाली ही। सरकारें भी विनम्र तथा उदार नहीं होतीं कि पूरे गॉव के बारे में सोचें, सबकी मदत करें, सरकारों की संस्कृति ‘सबका साथ सबका विश्वास’ केवल कागजों पर है, जमीन पर नाहीं।
बबुआ ने काकी को समझाया कि काकी कउनो बात नाहीं है... सरकार की सहायता उसे काहे मिलेगी, वह भी मरा होता चाहे चोटिल होता तो मिल ही जाती जैसे सबको मिल रही है।
बबुआ से बोल-बतियाकर काकी अपने घर चली गईं। उनके घर जाने पर सुगनी ने काकी से बबुआ का हाल-चाल पूछा...
‘का अइया बबुआ ठीक हैं नऽ, ओनके घरे आने के लिए नाहीं बोली हैं का? एहर तऽ ऊ अइबै छोड़ दिये हैं, रिसियाय तऽ नाहीं गये हैं।’
नाहीं रे! काहे रिसयायेगा बबुआ! हम बोल दिये हैं काल्हु घरे आना बबुआ कुछ काम है। देखो काल्हु शायद आये।
सुगनी जानती थी कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू या गॉव के किसी को भी कउनो तरह की सहायता नाहीं मिली है, बपई बोल रहे थे कि इहै नेम है, सरकार वोही के नाम पर सहायता देती है जेकर कतल हुआ है या जे घायल हुआ है, बकिया को छदाम भी नाहीं देती। सो नाहीं मिला छदाम भी किसी को...अरे! ई का है जेके जेके सहायता मिली ऊ तऽ राजा होय गया, ओकर पैर जमीन पर नाहीं पड़ रहा है।
सुगनी एक दिन गॉये में गयी थी। जाने के पहिले उसने हल्ला सुना था कि नगेशर काका के लड़के कार खरीदे हैं। नगेशर काका के दुआरे पर गॉव की भीड़ जुटी हुई थी, सबको परसाद बाटा जा रहा था। परसाद नगेशर बो काकी ने सुगनी को भी दिया। सुगनी भीड़ से हट कर नगेशर काका के परधानमंत्राी आवास की तरफ चली गई जो उनके माटी वाले मकान के बगल में ही था। वहां उनके बड़े लड़के कार रखने के लिए एक गैरेज बनवा रहे थे। नगेशर काका के घरे पर ही उसे मालूम हुआ कि कुछ और लोग कार या मोटर साइकिल खरीदने वाले हैं। अइया ने तो पहले ही बता दिया था...
‘देखना सुगनीे! जैसे रुपियवा मिला है न ऽ वैसही फुर्र भी हो जायेगा, ई रुपिया कइ दिन रहेगा लोगन के पास, रुपिया अउर मेहरारुन की खूबसूरती दोनों को छिपा कर रखना पड़ता है, तब्बै बचता है।’
सुगनी निश्चित कर चुकी है कि वह कार नहीं खरीदवायेगी, उसमें से कुछ खर्चेगी भी नाहीं, उसका जो सूद मिलेगा उसी से काम चलायेगी पर का करेगी रुपिया बचा कर सोचते ही सुगनी रूऑसा हो जाती है, बाल-बुतरू तो हैं नाहीं किसके लिए बचा कर रखेगी रुपिया पर खरचेगी भी तो कहां किस काम से?
सुगनी ने बुधनी काकी से साफ साफ पूछा बबुआ के बारे में कि वे आयेंगे कि नाहीं। बबुआ आयेगा रे थोड़ा दुखी होय जाना पड़ा हमैं, दुखी तो खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भी हैं, केहू के छदाम भी नाहीं मिला।
सुगनी गाय के लिए सानी-भूसा कर रही थी कि बबुआ आ गया।
‘का हो भउजी काकी कहां हैं घरे पर ही के नाहीं’ सुगनी से पूछा बबुआ ने
अउर कहां जायेंगी, अॅगने में गोहूॅ किरियाय रही हैं सब मटिहन हो गया है। बबुआ जी! अगना में चलिए ओही बतियायंेगे हमहूूं सानी लगाय के आ रहे हैं।
सुगनी भी थोड़ी देर में अॅगने में आ गई, आते ही उसने बबुआ से पूछा...
‘का हो बबुआ जी! हमलोगन के तऽ भुलाय गये, जब ऊ थे तो दिनवा भर एहरै रहते थे अब का हो गया, रिसियाये हैं का?
बबुआ सुगनी या बुधनी काकी से काहे नाराज होता वह तो सामान्य था सुगनी से बोला...
का बोल रही हो भउजी! हम काहे बदे रिसियायेंगे, अइसही मौका नाहीं मिल रहा था सो नाहीं आये, भला हम तूं लोगन से कबहूं रिसियाय सकते हैं।
बुधनी काकी ने गेहूॅ किरियाना छोड़ दिया बबुआ के अॅगना में आते ही। बुधनी काकी ने सुगनी को सहेजा... ‘अरे सुगनी का करि रही है रे एतना दिना बाद हमरे घरे में हमार भतीजा आया है, चाह-पानी तो कराओ।’
‘हॉ अइया! हम चाह बनाय रहे हैं, लेकर आते हैं।’ सुगनी ने बताया बुधनी काकी को।
चाह आ गई, बबुआ चाह पीने लगा...बुधनी काकी ने मतलब से बुलाया था बबुआ को, कई दिन से सुगनी कह रही थी कि बबुआ हमेशा ओकरे पति का साथ दिए हैं, ओनके लिए मरने मिटने के लिए तैयार रहते थे, ओन्हैं कुछ नाहीं मिला हम तऽ सोच रहे हैं कि हमैं जो रुपिया मिला है ओमे से कुछ रुपया बबआ को दे देना चाहिए, हमलोगों की देख-रेख करने वाला अब है कौन, वहीं हैं नऽ।
बुधनी काकी मुस्किया गईं थीं, वे तो पहले से ही गुन रही थीं कि कोई बबुआ को दे न दे वे जरूर देंगी पर रुपिया तऽ सुगनी के नामे से है, सुगनी दे या न दे। बुधनी काकी खुश हो गई हैं लगा कि खुशी में रोने लगेेंगी... जइसन सरवन था ओइसनै सुगनी है, बूझती है नाता, उसने बूझ लिया कि सरवन होता तो वह भी बबुआ को रुपिया देता अकेलै रुपिया ले कर बैठ नहीं जाता।
बुधनी काकी ने बबुआ से सुगनी के मन की बताया...
देख बबुआ! एक बात हम बोलने जा रहे हैं ओकेे मान जाना, मना जीन करना अउर हम उहै बोल रहे हैं जौन सुगनी चाहती है..
सुगनी का चाहती है, बबुआ सोचने लगा... का सलटना चाहती है कहीं, फिर किससे, सलट सकती है, बाल-बुतरू हैं नाहींे, अबही उमिरियो का है, एकाध साल बड़ी होगी बिफनी से अउर का?
बुधनी काकी ने बबुआ को साफ साफ बताया कि सुगनी का चाहती है। बबुआ ने सुनते ही इनकार कर दिया... ‘नाहीं काकी हम सरवन भइया का रुपिया नाहीं लेंगे, ऊ ओनके जान खतम होने के बदले में मिला है।’
सुगनी ने बबुआ को बातों में घेर लिया...
‘का बोल रहे हैं, ऊ ओनके मिला है कि हमैं मिला हैै ठीक है रुपिया ओनके नाम पर हमैं मिला हैं एक बात पूछें...
‘अगर तोहार भइया जिन्दा होते अउर तोहसे रुपिया लेने के लिए बोलते तऽ का तब्बौ मना कर देते, बोलिए हमार किरिया खाकर बोलिए।’
बबुआ खामोश था, उसकी ऑखें छल-छला गईं। ऑसुआंे में सरवन का प्यारा चेहरा तैरने लगा, जाने कितनी बार सरवन न उसे संभाला था। बिफनी की बीमारी में रुपिया तो लगाया ही दस दिन तक अस्पताल भी नाहीं छोड़ा हमरे साथय पड़ा रहा अस्पताल में। अइया की दवाई कराने के लिए भी सरवन ने अपना अनाज खरिहाने से ही बेच दिया और एक बोतल खून भी दिया था अइया को। का बोले सुगनी से कि रुपिया लेगा कि नाहीं।
अन्त तक बबुआ सुगनी को नहीं बता पाया रुपया लेने के बारे में वह खामोश था तो खामोश था। सुगनी ही नहीं बुधनी काकी भी उससे बार बार पूछती रह गईं थीं। बुधनी काकी बबुआ की खामोशी से परेशान होने वाली नाहीं थीं। वे जो सोचती, गुनती थीं वैसा करती भी थीं, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि बबुआ के बैंक खाते में पॉच लाख रुपिया डालना है। बुधनी काकी ने अनुमान लगा लिया कि बबुआ कभी भी रुपिया लेने के लिए हॉ नाहीं बोलेगा, लालची होता तो बोल देता। पॉच लाख रुपिया...कम नाहीं होता!
चकरा गईं बुधनी काकी, ‘जिनगी बीत जायेगी इतना कमाने में तब्बौ नाहीं जुटेगा इतना रुपिया फिर भी नाहीं बोल रहा बबुआ कुछ भी। ओके अपने तन अउर मन पर यकीन है। मन आसमान पर न टांगो तो पेट भरने के लिए दो रोटी अउर तन ढकने के लिए गज भर कपडा़ बस एतनै तऽ चाहिए आदमी को। धरती-माई एतना जोगाड़ कर देती हैं, पेट-परदा चल जाता है।’
बबुआ उथल-पुथल में था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि सुगनी से रुपिया लेने के लिए हॉ बोले या ना बोले फिर भी उसने बुधनी काकी से कहा...
‘देखो काकी हमैं रुपिया नाहीं चाहिए, हम आपन काम जैसे पहिले चला लेते थे ओइसहीं आगे भी चला लेंगे सो रहने दो रुपिया सुगनी के खाते में पड़ा है सुगनी को काम देगा।’
सुगनी के घर कुछ देर रुकने के बाद बबुआ अपने घर चला आया, रास्ते भर सरवन का चेहरा उसकी ऑखों में तैरता रहा था...सरवन भी यही करता जो सुगनी कर रही है, सुगनी का दिल-दिमाग भी सरवन माफिक ही है पर...सोचते ही बबुआ ठमक गया...का होगा सुगनी का, बेचारी विधवा होय गई, पूरी जिनगी पड़ी है, कैसे काटेगी, कहीं सलट लेती तो ठीक था, पर सलटेगी नाहीं, किसी से सलटने वाली ऊ मेहरारू नाहीं है। बबुआ गंभीर हो गया...भगवान कम जुरूम नाहीं करते, जुरूम ओही संघे करते हैं जो सबका भला चाहने वाला होता है। केतना बढ़िया मेहरारू है सुगनी ओके देखते ही हमार अॅखिया भर जाती है लोरों से।’
बिफनी घर पर ही थी और बुझावन को सतघरिया (सुबह का नाश्ता) करा रही थी। बबुआ को देख कर बुझावन ने उससे पूछा..
‘का हो कहां चले गये थे सबेरे सबेरे, सुगनी के घरे गये थे का?’
‘हॉ बपई ओहीं गये थे बुधनी काकी ने बुलाया था।’
‘का कउनो काम था।’
‘नाहीं अइसहीं’
अइसहीं काहे, अब तऽ सब काम निपट गया है, सबके रुपिया की गठरी मिल गई है अब का काम है तोहार, सब राजा बनि गये हैं अब तूू परजा माफिक ये गॉये में रहो अउर का?’
‘का बोल रहे हो बपई! हमहूं मरि गये होते तऽ बिफनी के रुपिया नाहीं मिलता का, जिनगी से बढ़ कर रुपिया नाहीं होता बपई।’
बीच में बिफनी बोल पड़ी.. ‘का बोल रहे हैं बपई हमैं मरधन नाहीं चाहिए, बबुआ ही हमार रुपिया हैं, ई जीयत रहैं तऽ हमैं कुछ नाहीं चाही। भगवान ने बचा लिया ओ दिना। ई तो है नऽ बपई कि कइसहू हमलोगन के दुइ ठे रोटी की कमी नाहीं पड़ेगी, चूल्हा घरे में जलता रहे अउर का चाही।’
हॉ रे बिफनी तूं ठीक बोल रही... कोई जाके पूछे सुमेरन से कि सरवन के तउल के बराबर रुपिया मिल गया अब तो ठीक हो नऽ सुमेरन! कोई पूछे सुगनी से...सुगनी का बोलेगी। तूं ठीक बोल रही है जिनगी बची रहे बहुत है, रुपिया तो आता जाता रहेगा, जिनगी से बढ़ कर रुपिया थोड़ै है।
बुझावन का कलेजा फूल गया बिफनी की बातें सुनकर। वे तो तौलना चाह रह थे बिफनी और बबुआ को। कहीं इन दोनों के मन में रुपयों का मलाल तो नही, सबको मिला, और एन्है नाहीं मिला। खुश हो गये बुझावन।
रुपयों की गंध में थिरकने लगा समय
झूम रही जनता
समय शान्त था, गॉव में रुपयों की गंध घरों से लेकर गलियों व खड़न्जों तक गमक रही थी। सरकारी विकास की देवी मगन हो कर गॉव में उछल-कूद रही थी, उसने बिकास का पीला कपड़ा पहना हुआ था। वह लोकराज के मनोरम गीतों को गुनगुनाते हुए कभी उतराहा टोले की तरफ जातीं तो कभी दखिनाहा टोले की तरफ। अब वह विकास की देवी हैं तो गोबर-माटी से सनी गलियों में कैसे चलेगी, उसके कोमल पॉव मैले न हो जायेंगे! सो गॉव की सारी गलियॉ खड़न्जों में बदल दी गई थीं, गॉव को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया था, परधानमंत्राी आवास तो बन ही चुके थे। विकास की देवी तो कोई धरती-माई है नहीं जो चौरी में पड़ी पड़ी कराहती रहतीं।
उन्हें तो थिरकना था, चहकना था सो वह चहक रही थीं। बबुआ भी घरेलू काम में जुटा हुआ घर-द्वार का छर-छाजन सही करने में लगा था। अगर छाजन सही नहीं हुआ तो बरसात का एक बूंद पानी भी छाजन से बाहर नहीं निकलेगा, चूता रहेगा घर में। बिफनी हत्याकाण्ड के पहले से ही बबुआ से बोल रही थी कि एक गाय खरीद लो, पुरनकी गाय बिसुकने वाली है, बेचारी बुढ़ा भी गई है। कई लोग बोले कि बिसुकने के बाद गइया को पहाड़े भेज देना, बुढ़न्ठ गाय घरे में रख कर किस कमाई से उसे सानी-भूसा खिलायेगा? गॉये के लोगों ने बुढ़ाये पशुओं को पहाड़ पर भेज भी दिया है, पहिले तो बेचा जाते थे अब कोई नाहीं खरीदता। बुड़ांठ गाय-गोरू केवल कसाई खीरदते हैं, सरकार ने रोक लगा दिया है। चाहे कुछौ हो वह अपनी गाय पहाड़े पर तो कभी नाहीं भेजेगी मरने के लिए।
बबुआ गाय खरीदने के लिए एक गॉव में गया हुआ था। उसे सूचना मिली थी कि दूसरी बियान की एक गाय है वहां जो एक महीना पहले ही बियाई हुई है, गब गब करिया है कहीं कउनो दाग नाहीं है, धरती-माई की पूजा में करिया गाय का ही दूध चढ़ता है अइया भी करिया गाय रखती थी घरे पर। बबुआ के साथ में पुनवासी भी है, किसी बन्हुआ गाय को हॉक कर लाना आसान नहीं होता, गायें अपना ठिकाना नहीं छोड़ना चाहती हैं, वे रास्ते भर अपने ठिकाने पर लौटने के लिए पगहा तोड़ाती रहती हैं, दो आदमी रहने पर गाय को हकाने में ठीक रहता है, वे भाग नहीं पाती हैं नहीं तो उन्हें पकड़ना बहुत ही मुश्किल का काम हो जाता है।
बिफनी घर पर है, बबुआ उससे बोल कर गया हुआ है कि गाय का मोल-तोल सही हो गया तो गाय लेकर वह शाम तक वापस आ जायेगा नहीं तो वह एक दूसरे गॉव चला जायेगा जो दस किलोमीटर दूर है घोरावल से सो वह दूसरे दिन ही वापस लौटेगा गाय लेकर ही। बिफनी बपई को सतघरिया करा रही थी कि खेलावन बबुआ को खोजते हुए आ गये...
‘का रे बिफनी बबुआ कहा है? का ओन्है नाहीं मालूम था कि आजु खेते की नापी होगी अउर कब्जा मिलेगा। लेखपाल तो आये हुए हैं गॉव में वे बबुआ को खोज रहे हैं, हमके भेजे हैं बबुआ को बोलाने के लिए। तहसील के लोग स्कूल पर रुके हुए हैं, तहसीलदार अउर परगना हाकिम भी हैं वहीं पर।’
खेलावन को देखते ही बिफनी ने ऑचल माथे पर चढ़ा लिया और ऑचल के कोने से बोली...
‘नाहीं भइया जी! ऊ तऽ गये हैं गाय खरीदने के लिए ओनके संघे पुनवासी भइया भी गये हुए हैं।’
खेलावन थे तो बोलाक पर खेत कियारी के नाप-तौल का हिसाब उन्हें नहीं आता था। गॉव में पहले नापी का काम सरवन किया करता था अब बबुआ करता है, कैसे होगी नापी? खेलावन घबरा गये। जाकर लेखपाल से बोल देते हैं कि बबुआ गॉये पर नाहीं है, कहीं गया हुआ है गाय खरीदने के लिए वपिस आयगा तऽ नापी होगी।
खेलावन ने स्कूल जाकर लेखपाल को बता दिया कि बबुआ कहीं गया हुआ है गॉव पर नाहीं है। तहसील के लोग बहुत चालाक होते हैं। हर प्रशासनिक काम को वे राजनीति के हिसाब से करते हैं। एस.डी..एम. सहब ने पहले ही बोल दिया था तहसीलदार को कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति के किसी नेता को जमीन की नापी के समय जरूर बुलवा लेना। संयोग अच्छा था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति का एक आदमी जो जिलापंचायत सदस्य था और घोरावल के पास का रहने वाला था, वह पढ़ा-लिखा था साथ ही साथ वह प्रशासन के लोगों के अगल-बगल मडाराते रहने वाला भी था। तहसीलदार उसे जानते थे और बुलवा लिए थे। तहसीलदार की गाड़ी में बैठ कर उसे भी लगा था कि वह भी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है साहब की तरह साहबी में सना-पुता।
जमीन की नापी का काम लगभग दो दिन चला होगा। दूसरे दिन जमीन की नापी हो जाने के बाद बबुआ अपने घर आया उसके साथ एक गाय भी थी एकदम करिया रंग की। गॉव आने पर उसे पता चला कि जमीन की नापी हो चुकी है और अधिकारी वापस लौट चुके हैं। खेलावन और बंधू बबुआ की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह कब आता है?
जमीन नापी हो जाने के बाद उतराहा टोला मगन हो गया पर दखिनाहा टोले में तो तूफान आ गया। दखिनाहा टोले वाले बबुआ की प्रतीक्षा में थे कि वह आये तब बात हो। दखिनाहा टोले के लोग नापने वाले अधिकारियों को भला-बुरा बोल रहे थे का ऐसही नापी करना था पहले तो तय था कि जहां जिसकी जोत है वही जमीन मिलेगी पर नाहीं जोत की जमीन किसी की और मिली किसी को। बंधू और खेलावन तथा बुधनी काकी नापी के समय ही उलझ गईं अधिकारियों से...
‘ई का करि रहे हो साहेब! हमार जमीन उतराहा टोले वालों को काहे दे रहे हो, उतराहा टोले वालों की जमीन तो गॉव के उत्तर की तरफ है। हमलोगों का कब्जा-दखल मत बदलो साहेब! पसीना बहा बहा कर हमलोगों ने खेत समतल किया है खाद-पानी डालकर उपजाऊ बनाया है।’
अधिकारी तो अधिकारी भला वे किसी की सुनते हैं। वे तो किसिम किसिम का कागजी खेल खेलते हैं। दफ्तर में बैठे-बैठे ही अधिकारी कागजों का खेल खेल गये और जमीन के कब्जों को किनारे कर दिया। गॉव की उर्वर जमीनंे उतराहा टोले वालों को दे दिया तथा कम उर्वर जमीन को दखिनाहा टोले वालों को दे दिया। अधिकारियों ने सारी भूमि को एक ही नंबर में रहने दिया उसी नंबर में से सभी को जमीन देना था सो दे दिया अब कोई कर लेगा अधिकारियों का। सभी जमीनों का नंबर तो एक ही है चाहे जहां जोतो-कोड़ो। उतराहा टोले के भी कुछ लोग थे जिन्हें उनके कब्जे वाली जमीन नहीं मिली थी सो वे भी दखिनाहा टोले वालों की तरह से परेशान थे। बबुआ घर आ कर चाह पानी भी नहीं कर पाया था कि उसके घर पर भीड़ जमा हो गई..
भीड़ गुस्से में थी उनके चेहरे से चेक पाने वाली खुशियां गायब थीं, उनके चेहरांे को प्रशासन के न्याय ने जिसे आदिवासी नियाव बोलते हैं खुरच दिया था।
बात चाहे गंभीर हो या छिछली किसी न किसी दिन खुलती जरूर है। नापी के दूसरे दिन ही लेखपाल ने जमीन बन्दोबस्त में हुए खेल को बबुआ से बता दिया।
‘हमैं भी नाहीं मालूम था हो बबुआ! और न मालूम होता, ईहां के बन्दोबस्ती का काम सब चोरी चोरी किया गया है, लेनी-देनी भी खूब हुई है, एक बड़का साहेब हैं ओन्हई किए-कराये हैं सब, कलक्टरौ साहब के नाहीं पता है।’
बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान, ई तो बहुतै गड़बड़ हुआ है आखिर उतराहा टोले वालों ने जमीन के लिए किया क्या है? जॉगर को कौन कहे एक धेला भी नाहीं लगाया है मुकदमे में, कतल वाले दिन भी ऊ सब तमाशा देख रहे थे पुरबारा लाठे पर बइठ कर। पहिले तऽ बोल रहे थे कि मार कऽ बदला मार से लेंगे एकर मतलब ऊ सब खेतवै के लिए बोल रहे थे, मार का करेंगे? ए काम में रामलाल के आदमी जरूर लगे होंगे।
खेलावन बोल पड़े...
‘सही बोल रहे हो बबुआ! रामलाल जेहल में है तो का हुआ ओकर आदमी तो हैं जेहल से बाहर, उहै जोगाड़ बनाये होंगे खेत के बन्दोबस्ती का।’
पुनवासी तो पुनवासी वे काहे चुप रहते...
‘ठीक बोल रहे हो खेलावन भइया! हमलोग तऽ करम-काण्ड निपटाने में लगे थे अउर ऊ सब जमीन के बन्दोबस्ती में लगे थे। अच्छा एक बात है हमलोग आपन कब्जा छोड़ेंगे तब न ऊ सब कब्जा करेंगे, हमलोग कइसहूं आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे। एक बार अउर मार-पीट हो जाये भले।’
बबुआ जमीन की बन्दोबस्ती के बारे में सुन कर सन्न हो गया। वह उलझना नहीं चाहता था, मामला आगे तक जायेगा, चुप रहना ही उसके हित में होगा। बबुआ तो अपने मन के भीतर था पर दखिनाहा टोला मन के भीतर नहीं था। टोले में संघर्ष की बातें हर छोटे बड़े के दिल-दिमाग में घुस चुकी थीं.. ‘हम अपना कब्जा नाही’ं छोड़ेंगे पर उन्हें यह नहीं पता था कि जो नापी हुई है जमीन की उसका क्या होगा, नापी का नक्शा बन चुका है, इसमें फेर-बदल कैसे होगा? सरकार से लड़ना बहुत मुश्किल है, कौन लड़ेगा आखिर?
दखिनाहा टोले के लोग चैन से नहीं थे, बुधनी काकी कभी आगे की गुनती तो कभी सरवन की हत्या की तरफ लौट जातीं। दखिनाहा टोलेे के दस लोग मारे गये थे, भला टोले के लोग उसे कैसे भूलते?
करना क्या है? इसकी पंचायत एक दिन बबुआ के घर पर हुई। दखिनाहा टोले के सभी लोग उस पंचायत में शामिल हुए। बुझावन काका और सोमारू काका को भी टोले के लड़के उन्हें खटिया सहित पंचायत में उठा लाये। बुधनी काकी मुखर थीं...
‘उतराहा टोले वाले का बूझते हैं कि हमारे दस लड़के मर गये तऽ पूरा टोला मर गया, हमरे ईहां सरदारी नाहीं है, एक ठे हमहीं काफी है उतराहा टोले वालों के लिए, हमार सरदारी भी कम नाहीं है, हमलोग मरनी-करनी में फसे थे अउर ऊ सब चोरी चोरी हमलोगों का खेत पर अपना नाम चढ़वाने में लगे थे। सब बेइमान हैं बेइमान, तब्बै तऽ नन्हकू काका कहा करते थे... सबसे दोस्ती कर लेना पर उतराहा टोले वालों से नाहीं करना, ऊ सब पीठ में छूरा भोंकते हैं।’
सोमारू काका ने बुधनी को रोका...
‘का बक बक कर रही है रे! पूरा टोला जमा हुआ है, सबको बोलने दे। अकेली बक-बका रही है।’
बुझावन काका को बुधनी की बातें ठीक लग रही थीं, बोल तो सही रही हैं। सोमारू भइया काहे रोक रहे हैं बुधनी भउजाई को, का गलत बोल रही हैं?
‘अरे बुधनी भउजाई तूं सही बोल रही है, हमलोग आपन कब्जा छोड़ कर दूसरे जगह कब्जा काहे लेंगे, हम उत्तर तरफ जायेंगे भी नाहीं, हमार दक्खिन तरफ है अउर ओहरै रहेगा चाहे जौन कुछ करना पड़े। हं सोमारू भइया तूं ऐसे मत बोलो, नियाव की बात है कि जेकर जहॉ पहिले से कब्जा है वहीं रहे, कब्जा काहे बदलेगा?
खेलावन, बंधू, पुनवासी कूद पड़े बीच में...
‘काका तूं सही बोल रहे हो, हमलोग आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ फिर तो पूरा दखिनाहा टोला बोल पड़ा करीब करीब नारा लगाने की तरह...‘आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे तऽ नाहीं छोड़ेंगे।’
बबुआ धीर गंभीर है किसी मूर्ति माफिक, का बोले का न बोले। वह देख रहा है कि टोले वालों के साथ सुगनी, तेतरी, फगुनी भी हैं और बिफनी भी सब मिलकर बोल रही है मानो नारा लगा रही हों। एक तरफ परमू काका हैं, वे भी नारे के साथ हैं। कुछ नौजवान लड़के हैं, उनके चेहरे तमतमाये हुए हैं। अतीत का आधुनिक संस्करण लोगों के मन मिजाज में उतर चुका है। उतराहा टोला न पहले कभी साथ रहा है और न ही रहेगा, वह पहले भी धोखा देता रहा है और इस बार भी धोखा दे दिया। बबुआ को अचरज हुआ बिफनी पर वह भी लोगों के साथ हो गई है घर में तो शान्ति का जाप करती है, का शान्ति से अपनी जमीन मिलेगी? कुछ न कुछ तो करना ही होगा।
परमू काका सीधे बोल रहे हैं बबुआ से...
‘का हो बबुआ! तूं काहे खामोश है हो, कुछ काहे नाहीं बोल रहे हो, पूरा दखिनाहा टोला तोहरे दुआरे पर जुटा हुआ है अउर तूं गंभीर हो, का बात है? सरकार जैसे कब्जा दे रही है का ओही पर रहना है, तोहरौ खेतवा तऽ फेंकाय गया ताले के उत्तर एक कियारी हाथ भर ऊंच तऽ दुसरकी कियारी हांथ भर नीच, कइसे खेती करोगे। अइसहीं तऽ सबके संघे भया है।’
बुधनी काकी भी दोहराय रही हैं परमू काका की बातें, खटिया पर लेटे लेटे सोमारू काका भी बोल रहे हैं बबुआ से....
‘देख बबुआ! ई बहुत बड़ी आफत आय गई है, ये आफत के सब मिल कर ही खतम कर सकते हैं। दखिनाहा टोले में जैसे पहले एकता थी वह नहीं टूटनी चाहिए कइसहूं।’
बबुआ अचानक बोल उठा..
‘काका हमलोगन कऽ जौन जमीन कब्जे वाली है उहै रहेगी चाहे एकरे बदे जौन कुछ करना पड़े, परेशान होने की कउनो बात नाहीं है।’
बहुत देर तक गंभीर बने रहने के बाद अचानक बबुआ का माथा ठनक गया सुगनी को देखते ही.. उसे जान पड़ा कि वह सुगनी नाहीं है सरवन है, सरवन जिन्दा है और उससे पूछ रहा है जमीन बन्दोबस्ती के बारे में...
‘बोल बबुआ! का करना है उतराहा टोले वालों ने तो हमलोगों की जमीन अपने नाम से बंटवा लिया।’
बबुआ घबरा गया, यह कैसे हो सकता है कि सरवन जिन्दा हो कर मुझसे पूछे फिर भी उसे लगा कि सरवन ही उससे पूछ रहा है, उससे पूछता ही ऐसे मौके पर, बिना उससे पूछे-जाने वह कुछ नाहींे करता। पूरा दखिनाहा टोले ओकरे दुआरे पर है अउर वह खामोश है। उसे बोलना ही होगा वह बोलने वाला ही था कि जन-कल्याण समिति के मंत्राी जी बबुआ के दुआरे पर चले आये।
मंत्राी जी को पता था कि दखिनाहा टोले वालों के जोत की अधिकांश जमीनें उतराहा टोले वालों के नाम से आवंटित कर दी गई हैं। सरकारी कर्मचारियों ने जमीन की बन्दोबस्ती में लेन-देन का खेल किया है। इस खेल को खेलने में स्थानीय विधायक ने भी सक्रिय भूमिका निभाया है। मंत्राी जी को भी प्रशासन का यह कृत्य काफी बुरा लगा था। उन्होंने आदिवासियों के एक प्रमुख नेता को इस बारे में बताया भी था पर तब तक प्रशासन बन्दोबस्ती का काम निपटा चुका था।
मंत्राी जी से उस आदिवासी नेता ने हल्दीघाटी में आने के लिए बोला भी था कि वह उस गॉव में आयेगा और बन्दोबस्ती के मामले का विधिक प्रतिरोध करेगा जन आन्दोलन के माध्यम से। वह आदिवासी नेता आज ही गॉव में आने वाला है, करीब बारह बजे तक आ जायेगा। मंत्राी जी उस नेता के आने के पहले दखिनाहा टोले वालों को उस नेता के आने के बारे में बताने के लिए गॉव में आये हुए हैं।
उस आदिवासी नेता के गॉव में आने की खबर सुन कर दखिनाहा टोले वाले खुश खुश हो गये... चलो अच्छा है।
वह आदिवासी नेता दिन में करीब दो बजे तक गॉव आ गया और दखिनाहा टोले वालों के साथ एक मीटिंग किया, प्रतिरोध की रणनीति बनाया। तय किया गया कि यह जन-प्रतिरोध केवल महिलाओं का होगा, महिलायें ही जन-प्रतिरोध का नेतृत्व करेंगी। इस प्रतिरोध में खासतौर से वे महिलायें शामिल होंगी जो हत्याकाण्ड के कारण विधवा हो चुकी हैं। बबुआ, पुनवासी, बंधू और खेलावन प्रतिरोध की तैयारी मंे महिलाओं का मार्ग-दर्शन करेंगे।
मंत्राी जी तो जन-प्रतिरोध के आयोजनों व संचालनों के कलाकार थे। पूरे तीन दिन लग गये महिलाओं को प्रतिरोध करने की क्षमता से लैश करने में, बबुआ और उसके मित्रों ने रात-दिन एक कर दिया, मंत्राी जी भी समिति के कार्यालय से सुबह चले आते और देर रात तक वापस लौटते।
सुगनी, बिफनी और तेतरी ने तो दूसरे दिन ही प्रतिरोध के सारे नारों को रट लिया, इतना ही नहीं करीब दो मिनट तक खड़े होकर भीड़ के सामने बोलना भी सीख लिया। बोलने में था कि वे प्रतिरोध क्यों कर रही हैं तथा प्रशासन से क्या चाहती हैं, उनकी मॉगंे क्या हैं?
वह आदिवासी नेता तीसरे दिन भी गॉव आया और एक कार्य-शाला किया जॉचने के लिए कि महिलायें अपनी बात प्रशासन के सामने ठीक से रख पाती हैं कि नहीं। वही कार्यशाला प्रदर्शन और नारे बाजी के बाद एक सभा में बदल गई। सभा का संचालन तेतरी करने लगी.. सभा में सबसे पहले बिफनी अपनी बातें रखी, फिर सुगनी, तेतरी तथा फगुनी ने उसके बाद बुधनी काकी ने प्रतिरोध के सारे निचोड़ों का खुलासा किया।
वह आदिवासी नेता ही नहीं मंत्राी जी भी आश्चर्यचकित थे, बबुआ भी हैरान था। सोमारू काका और बुझावन काका तो एकदम चुप्पी में चले गये...
‘का हमार पतोहिया एतना तेज हैं एतना तऽ हमलोग नाहीं बोल सकते जेतना सुगनी, तेतरी, बिफनी अउर फगुनी बोल रही हैं, बुधनी तो पहिलहीं से बोलाक है ओकर कउनो बात नाहीं है।’
दोनों वृद्ध चारपाई पर पड़े पड़े खुश हैं और गर्वान्वित भी...
‘अब हमलोगों की जमीन कोई नहीं ले सकता हमैं विश्वास हो गया है।’
आदिवासी नेता ने बबुआ की पीठ ठोंकते हुए उसे शाबासी दी...
‘वाह बेटा! तूने तो कमाल कर दिया, तूने तो वह कर दिखाया जो लम्बे समय के प्रयासों के बाद भी नहीं हो पाता वह भी केवल तीन दिन में।
जन-प्रतिरोध की तारीख निश्चित कर आदिवासी नेता लौट गया। वह प्रतिरोध के दिन कलक्टरी पर रहेगा। मंत्राी जी बबुआ के घर पर खाना खाने के बाद वापस हुए। लौटते समय उन्होंने बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को सहेजा कि महिलाओं की कार्यशाला रोज करते रहना है, छोड़ना नहीं है, कार्यशाला से उनकी कुदरती प्रतिभा में निखार आ जायेगा, हमारा काम है महिलाओं की प्रतिभा निखारना तथा उन्हें जन-प्रतिरोध लायक बनाना।’
समय गुजरते देर नहीं लगती, गुजर गये प्रतीक्षा के दिन और जन-प्रतिरोध तथा आदिवासियों की सहनशीलता के परीक्षण का दिन आ गया। और कलक्टर का मुख्यालय आदिवासियों से घिर गया...जिधर देखो उधर आदिवासी ही आदिवासी, शिवजी की बारातियों की तरह, कोई केश-धारी तो कोई मुंडन वाला, किसी की दाढ़ी जटियायी हुई तो किसी की घंुघराली, स्त्रिायां भी साफ साफ अलग पहचान वाली गोया आदिवासियों की सारी नश्लें अपनी आदिवासियत के साथ आदिवासी होने को प्रमाणित करती हुई। पर वे जो नारे लगा रहे थे जमीन के बाबत वे आधुनिक थे, उनमें आदिमपना नहीं था, उन्हें पता था कि जमाना बदल गया है राजाआंे-महाराजाओं वाला नहीं है, जिसे चाहा, जब चाहा निकाल दिया अपनी रियासत से।
आदिवासी कैसे आ गये मुख्यालय पर वह भी भारी संख्या में प्रशासन के लिए सवाल बन गया। आदिवासी नारे-नूरी के बाद भाषण देने लगे, बारी बारी से औरतें भीड़ से बाहर निकलतीं और अपनी बातें टूटी-फूटी बोली में बोलतीं। आदिवासी नेता तथा जन-कल्याण समिति के मंत्राी भीड़ से दूर खड़े थे तथा महिलाओं के प्रस्तुुतीकरण पर मगन भी...
‘सटीक बातंे बोल रही हैं महिलायें बिना घबराये, इतने कम समय में महिलाओं ने बोलना कैसे सीख लिया, अचरज है। बुधनी काकी ने तो कमाल कर दिया, पोस्टमार्टम से लेकर जमीन की बन्दोबस्ती तक बोल गईं एकदम साफ साफ।
वह भाषण ही था पर था संवाद शैली में,औरतें संवाद की तरह बोल रही थीं, फिर भी उन नेताओं से काफी प्रभावकारी था जो लिखा हुआ पढ़ा करते हैं। सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी ने पहले से टाइप किया हुआ एक मॉग-पत्रा कलक्टर आफिस में पहले ही दे दिया था फिर भी प्रदर्शन स्थल पर कोई अधिकारी नहीं आया। सामान्यतया अधिकारी किसी की सुनते कहां हैं? वे भी आदिवासियों के बीच आयंे और उनकी बातें सुनें, ऐसा नहीं देखा गया है। आदिवासी कितना बोलते, कितनी फरियाद करते जब कोई सुनने वाला ही नहीं।
जन-संवाद का कार्यक्रम करीब तीन घंटे तक चला इसके बाद भीड़ जुलूस में बदल गई। जुलूस पूरे रापटगंज में घूमा और कलक्टरी पहुंच कर धरने में तब्दील हो गया। कलक्टरी कैम्पस के अन्दर आदिवासियों को धरने पर नहीं बैठने दिया गया। पोस्टमार्टम के समय जो नया सिपाही हल्दीघाटी गॉव गया हुआ था उसकी ड्यूटी लगी थी कि आदिवासियों को किसी भी हाल में कैम्पस के अन्दर न आने दिया जाये। नये सिपाही के साथ वह महिला दारोगा भी थी जो हल्दीघाटी गॉव में थी। आदिवासियों ने तो तय कर लिया था कि जब तक उनकी मॉगे नहीं मान ली जातीं तब तक वे धरने पर बैठे रहेंगे। नया सिपाही तथा महिला दारोगा आदिवासियों को कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ ले जाते और धरना देने की जगह बताते, आदिवासी डटे हुए थे कि वे कलक्टरी के मेन गेट के सामने वाली खाली जगह पर ही बैठेंगे और वे वहीं बैठे भी।
सोनभद्र में आदिवासियों का धरना देना तथा धरने पर बैठे रहना प्रशासन के लिए नई बात थी सो प्रशासन ने अपने कान खड़े कर लिए। कहीं आदिवासियों का धरना दिल्ली के शाहीनबाग की तरह न हो जाये, धरने का क्या वह लम्बा खिंच सकता है अनिश्चित काल तक। सोनभद्र में उग आये दूसरे शाहीनबाग ने क्षेत्रा की जनता को भी चौंका दिया। प्रशासन सतर्क हो गया और उसने घोरावल क्षेत्रा के उस सी.ओ. की ड्यूटी वही पर लगा दिया जो हल्दीघाटी गॉव में हुए बर्बर हत्याकाण्ड के कारण सेवा से सस्पेन्ड कर दिया गया था।
उक्त सी.ओ. सस्पेन्शन के कुछ महीने बाद ही बहाल हो गया था और सदर तहसील का सी.ओ. बन गया था। वह प्रभावशाली व्यक्ति था तथा सरकार में उसके कई आश्रयदाता थे सो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था सो जल्दी ही बहाल हो गया। मौजूदा कलक्टर राजनीति के चक्रव्यूहों को तोड़ने में माहिर था वह जानता था कि हल्दीघाटी गॉव वालों का मामला है इसे सावधानी से देखना होगा, मुख्यमंत्राी जी ही नहीं विपक्ष की बड़ी नेत्राी की ऑखें भी इस मामले की तरफ लगी हुई हैं। बहुत कुछ सोच समझ कर उसने सस्पेन्ड हुए सी.ओ. को ही वहां ड्यूटी पर लगाया, इसका कोई क्या बिगाड़ लेगा? हालांकि कलक्टर साबित करता था कि वह डरने वाला आदमी नहीं है पर हरदम डरता रहता था कि उसे भी पहले की कलक्टर की तरह सस्पेन्ड किया जा सकता है सो हमेशा सतर्क रहा करता था।
आदिवासी सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर कसम खा कर आये थे कि वे प्रशासन से डर कर घरना खत्म नहीं करेंगे सो डटे हुए थे। वे नारे-बाजी कर रहे थे, पम्फलेट बांट रहे थे, जगह जगह पोस्टर चिपका रहे थे। धरने दूसरा दिन आ गया, नगर की दिवारें भूमि-प्रबंधन में प्रशासन द्वारा की गई धॉधली के बाबत छपे पोस्टरों से रंग गई। चार पॉच रिक्सों पर प्रचार करता माइक भी नगर में घूमने लगा, कलक्टर सतर्क हो गया मामला आगे तक जा सकता है, अब आदिवासी कमजोर नहीं हैं, उनके पास रुपया है, और वे धरने के कार्यक्रम को आगे तक ले जा सकते हैं। आदिवासियों का एक प्रतिनिधि मंडल लखनऊ भी जाने वाला है मुख्यमंत्राी जी को ज्ञापन देने के लिए संभव है विपक्ष की उक्त महिला नेत्राी भी प्रतिनिधि मंडल में शामिल हो जो हल्दीघाटी गॉव गई थी फिर तो बवाल बढ़ेगा ही।
कलक्टर सावधान ही नहीं सतर्क था उसने धरना स्थल पर अपनी ऑखें टिका दिया था तथा वहां की निगरानी के लिए जिम्मेवार कर्मचारियों व अधिकारियों को तैनात करवा दिया था इतना नहीं उसने हल्दीघाटी गॉव की गतिविधियों की निगरानी के लिए हल्कापुलिस को निर्देशित भी कर दिया था।
सो धरना स्थल से लेकर गॉव तक के आदिवासी प्रशासन की निगरानी में थे जिससे प्रशासन की ऑच कहीं से कमजोर न होने पाये, आग पर चढ़ेे तवे की तरह तपता रहे प्रशासन।
धरने कर दूसरा दिन जैसे-तैसे गुजर गया पर तीसरा दिन....
तीसरा दिन तो तूफान का दिन था...
प्रशासन के करतबों का था...
सहनशीलता, विनम्रता छीनने का दिन था...
लाकडाउन लागू करने का दिन था....
काहे के लिए यहां पुलिस आ गई? हो क्या रहा है, पुलिस सक्रिय हो गई, धरने पर बैठे हुए आदिवासियों को तितर बितर करने लगी आदिवासी चकराये हुए थे, हर तरफ भागो भागो, वही आर्त-बोल जिससे हत्याकाण्ड वाले दिन हल्दीघाटी का आकाश भीग गया था, धरती पर खून बहने लगा था। रो पड़ी थीं खून देख कर धरती-माई भी।
‘भागो यहां से, हटाओ सारा सामान, धरना खतम करो, यहां धरना नहीं होगा।’ लोकतंत्रा के सत्ता प्रमुख ने पूरे देश में लाकडाउन घोषित कर दिया है, देश में कोरोना वायरस फैल रहा है, उससे बचाव का एक ही उपाय है देश को बन्द रखना, आवा-जाही को खतम कर देना, पूरे देश में धारा 144 या कफर््यू लागू करना आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को कम करना, सभी को खुद अपने घर में बन्द कर लेना है। कोरोना एक संकक्रामक रोग है यह संपर्क से फैलता है सो आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को रोकना होगा।
पहले लाकडाउन का दिन उतर चुका था धरती पर तमाम तरह के अनुशासनों व प्रतिबंधों को लेकर इसी तरह से कभी आपात-काल भी उतरा था अचानक एक दिन धरती पर...और पूरे देश के मुह पर पट्यिां बांध दी गई थीं, बहुतों को गिरफ्तार कर लिया गया था रातो रात। यह धरती भी अजीब है, इस धरती से अचानक उतरने वाली चीजों को बहुत मुहब्बत है मुहब्बत इतनी कि नोटों की गड्डियां भी फालतू के कागज की तरह उड़ने लगीं थी एक दिन धरती पर सारे नोट बेकार हो गये थे पुराने नोटों को कोई पूछने वाला नहीं रह गया था धरती पर।
तो यह जो एक दिन है कम से हमारे देश के लिए बहुत ही आक्रामक होता है क्योंकि यह रात में ही उतरता है बिना सूचना दिये, बिना जागरण किए एकदम से अचानक वाह रे! हमारा देश! इस एक दिन को अपनाने में कत्तई देर नही करता, सभी एक सुर से एक दिन के पक्ष में बोलने लगते हैं, कुछ तो वाहवाही के लिए ‘जय हो’ ‘जय हो’ भी बोलने लगते हैं।
पूरे देश में लाकडाउन लागू हो गया हो और सोनभद्र में आदिवासी धरना प्रदर्शन करें भला यह कैसे संभव है, प्रशासन मूक, बधिर और लंगड़ा तो है नहीं, उसके हाथ में शक्ति है, बुद्धि चातुर्य है, प्रतिभा है, क्षमता है, शिक्षित-प्रशिक्षित पुलिस बल है, इस तरह के धरनों-प्रदर्शनों को रोकने, खंडित करने का उसके पास व्यावहारिक कुशलता है सो आदिवासियों के धरने को क्यों चालू रहने दिया जाये?
प्रशासन के सामने धरने को लेकर सवाल खड़े थे। जमीन बन्दा्रबस्ती का मामला मुख्यमंत्राी जी तक जायेगा बहुत बुरा होगा। वैसे भी किसी भी तरह से यहां शाहीनबाग नहीं बनने देना। चलो लाक डाउन के बहाने धरना-प्रदर्शन खतम करने का मौका तो मिला।
प्रशासन ने तय किया कि पहले बात-चीत यानि संवाद के जरिए धरने को समाप्त कराया जाये। यह लोक-तंत्रा का बहुत ही दुलरुआ उपाय है।
बात-चीत होने लगी, आदिवासियों के हितैषियों को भी खोज कर प्रशासन ले आया और उन्हें बात-चीत में शामिल कर लिया। आदिवासी नेता और जन-कल्याण समिति के मंत्राी को भी बात-चीत में शामिल कर लिया गया। बात-चीत आगे बढ़ कर जमीन बन्दोबस्ती में सुधार तक जा पहुंचती कि कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये। कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये जब बात यहां तक पहंुचती प्रशासन मूक हो जाता, वह बांये-दांये देखने लगता। कलक्टर गंभीर बना रहता...आखिर गड़बड़ी हुई कैसे? पर उसके पास समय नहीं था, अब वह लाकडाउन के सफल क्रियान्वयन के बारे में कोई व्यवस्था बनाये कि चले जमीन के बन्दोबस्ती की जॉच करने आखिर का करे वह?
आदिवासियों एवं प्रशासन में धरने को समाप्त किए जाने के बाबत बात-चीत हो ही रही थी कि तनबुड़ुक वहीं चला आया...और लगा गाना गाने...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी,
तनबुड़ुक गाना गा ही रहा था कि एक सिपाही ने उसे पकड़ लिया। का कर रहे हो? उसके हाथ में जो डफली थी उसे छीन कर दूर फेंक दिया। चल इधर... उधर दूसरे सिपाही थे जो घेरा बना कर खड़े थे। तनबुड़ुक को घेरे में खड़ा कर दिया गया। एक दो सिपाही कौन कहे करीब बीसों सिपाही थे उन्हीं सिपाहियों में से पोस्टमार्टम वाले दिन का नया सिपाही भी था। वह दूसरे सिपाहियों की तरह सक्रिय नहीं दिख रहा था लगता था कि वह केवल फर्ज अदायगी कर रहा है।
तत्काल ही जाने क्या हुआ कि सिपाही लाठियॉ भाजने लगे। बबुआ, खेलावन, बंधू कुछ समझ पहीं पाये फिर देखे कि समिति के मंत्राी जी जमीन पर गिर गये हैं और आदिवासी नेता लाठियों से चोटिल हो चुका है। देखते देखते ही बबुआ, खेलावन, बंधू, पुनवासी सभी लाठियों की चपेट में आ गये। वहां भगदड़ मच गई पर तेतरी, बिफनी, फगुनी, सुगनी और बुधिया काकी वही डटी हुई थीं और नारे लगा रही थीं
‘और मारो! मारने के अलावा तुम कर क्या सकते हो, तुम्हें तो मारना ही सिखाया गया है, मारने की ही पढ़ाई किये हो, बोलते हो जनता कऽ राज है, का इहै जनता कऽ राज है?’
बुधनी काकी अपनी रौ में थीं, उनके साथ सुगनी और बिफनी भी, वे किसी की
नहीं सुन रही थीं केवल बोल रही थीं। तभी बुधनी काकी ने सी.ओ.को देख लिया वह पोस्टमार्टम वाले दिन हल्दीघाटी गॉव में भी था फिर क्या था बुधनी काकी ने उसे घेर लिया...
‘का हो इहै नियाव है, हमलोगों का कब्जा छीन कर दूसरों को दे दिये, बात तो हुई थी कि जो जमीन हमारी है वही हमारी रहेगी फिर कब्जा काहे छीन लिए?’
पर काकी या सुगनी कितना लड़तीं सिपाहियों से, पुलिस की लाठियों से..
संवाद के द्वारा कोई हल नहीं निकला, आदिवासी धरना तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए। लाठियॉ चाहे जहां चलें, गोलियां चाहे जहां चलंे, करामात करती हैं अद्भुत किस्म का। धरती ही नहीं आकाश भी कॉपने लगता है, अगल-बगल के पेड़-पौधे हिलने लगते हैं, मौसम तो बेहोश सा हो जाता है न गर्मी का पता चलता है न ही ठंड का। लाठियॉ काम कर गईं और धरना को लाठी और बन्दूकों के जोर से समाप्त कर दिया गया जैसे वहां कभी धरना हुआ ही न हो।
लाठियों, बन्दूकों के सामने धरने को तो समाप्त होना ही था। बबुआ, खेलावन, बंधू पुनवासी जैसे कुछ कर्मठ आदिवासी लड़कों को ही नहीं तेतरी, सुगनी, बिफनी, फगुनी,आदिवासी नेता और जनकल्याण समिति के मंत्राी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने धरना पर बैठे आदिवासियों को डंडे के जोर से इधर-उधर भागने पर विवश कर दिया, कितनों को चोटें लगी कौन गिने? कुछ का माथा फूटा तो कुछ की पीठंे लाल हुईं और कुछ के पैर चलने काबिल नहीं रह पाये। जब डंडे भाजे जा रहे हों, किसिम किसिम की गालियां दी जा रही हों, गोली मारने का परिवेश बनाया जा रहा हो फिर ऐसी आक्रामक परिस्थिति में भला वहां कौन टिका रहता सो देखते देखते आदिवासियों का धरना उखड़ गया, कोई कहीं भागा और कोई कहीं, धरने पर बैठे लोग तितर-बितर हो गये। आदिवासियों को तितर-बितर करना ही तो पुलिस का लक्ष्य था जो सफल हुआ और धरना-स्थल खाली हो गया।
पर आदिवासी तो आदिवासी जो ठान लेते हैं उसे कर गुजरने वाले। आदिवासी जो गिरफ्तार नहीं हुए थे वे कलक्टरी से खिसक लिए और कहीं चले गये फिर जाने क्या हुआ कि शाम पांच बजे के आस-पास गोलबन्द हो कर वे कोतवाली पर चले आये और नारे लगाने लगे...
उनका नारा प्रशासन विरोधी था, नारा लगाने वालों में महिलायें आगे थीं एक तरह
से वहां महिलायें ही थीं उनमें पुरुषों की संख्या बहुत ही कम थी। महिलाओं का नारा लगाना अद्भुत था, चकराये हुए थे कोतवाल साहब!
‘हो क्या रहा है पुरुषों को तो मार-पीट कर खदेड़ दिया गया इनका क्या किया जाये? महिलाओं को कैसे तितर-बितर किया जाये?’
वैसे सच है कि पुलिस जो तय कर लती हैे उसे कर डालती है और वही हुआ, महिलाओं के नेतृत्व वाले घेरेबन्दी को पुलिस ने तोड़ दिया। और उन्हें एक बस में लदवा कर कहीं दूर भेज दिया गया वहां से दूसरे दिन उन्हें उनके घर भेजा गया। दरअसल पुलिस उन्हें उनके घर शायद नहीं भिजवाती पर शासन की तरफ से निर्देश अचानक आ गया कि सभी आदिवासियों को बाइज्जत छोड़ो। शासन के निर्देश के पहले उक्त विरोधी नेत्राी जो हल्दीघाटी गॉव गयी थी उसका एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया... ‘आदिवासियों के साथ अत्याचार... ‘उन्हें उनकी जमीन नहीं दी जा रही, उन्हें उनके कब्जे से अलग किया जा रहा।’
किसे नहीं पता कि शासन की नाक जनप्रतिरोधी गंध सूंघने में काफी तेज हुआ करती है खासतौर से सरकार विरोधी गंध। शासन ने सूंघ लिया और आदिवासी रिहा हो गये पर प्रशासन दुबारा जॉच के घरे में आ गया। शासन ने माना कि स्थानीय प्रशासन ने गड़बड़ किया है जिसका जहां कब्जा था जमीन वहीं देनी चाहिए थी।
आदिवासी अपने अपने घर लौट गये। ‘अब जो होगा लाकडाउन समाप्त होने के बाद ही होगा। इस साल की खेती कब्जे के आधार पर ही हमलोग करेंगे। उतराहा टोले वाले विरोध करेंगे तो उन्हें देख लिया जायेगा, हमलोग कमजोर थोडै़ हैं।’
आदिवासियों के गॉव लौटने के पहले ही एक तूफानी हलचल गॉव में पसर चुकी थी, गॉव के सभी लोग ‘का हुआ’ ‘का हुआ’ की धुन में थे वे एक दूसरे से जानना चाह रहे थे गॉव में पसरी हुई हलचल के बारे में। गॉव में था ही कौन केवल सोमारू और बुझावन थे, दोनों परेशान थे जानने के लिए। ये लोग देख रहे थे कि कुछ नौजवान गॉव में आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैं, मकानों के दिवारों पर चस्पा कर रहे हैं, नारे लगा रहे हैं इन्कलाब जिन्दाबाद का। सोमारू ने उनसे पूछा था..
‘का करि रहे हो भइया! काहे के लिए नारे लगा रहे हो, लाल पर्चा भी बाट रहे हो, पर्चे में का लिखा है कुछ तो बताओ...?
‘दादा! हमलोग आपलोगों के साथ हैं और चाहते हैं कि जमीन पर कब्जा तथा जोत-कोड़ पहले जैसे था वैसे ही रहे, किसी भी हाल में कब्जा न बदले। प्रशासन से मिल कर उतरहा टोले वालों ने मनमाने ढंग से जमीन का आबंटन करवाया है, उतराहा टोले वाले मिले हुए हैं रामलाल से, हमलोग जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर चाहते हैं इसीलिए हमलोग पर्चा बाट रहे हैं।’
लाल पर्चा बाटने वाले पर्चा बाट कर चले गये। उनके जाने के बाद गॉव में गजब
की शान्ति छा गई। बबुआ, सोमारू, बंधू, खेलावन जब गॉव लौटे तो गॉव का हाल जानकर धक्क रह गये...उतराहा टोले वाले लाल पर्चा देख और पढ़ कर कॉपने लगे। यह क्या हो गया? लाल सलाम वालों से कैसे निपटा जायेगा? ये तो किसी को नहीं छोड़ते, छह ईंच छोटा कर देते हैं, का होगा अब? अधिकारियों को मिला कर उपजाऊ जमीनों का पट्टा तो करा लिया गया पर अब उस पर कब्जा कैसे होगा। अधिकारियों ने जमीन भी नाप दिया, कौन जायेगा खेती करने, हर तरफ लाल लाल झण्डियां गाड़ दिया है लाल सलाम वालों ने। उतराहा टोले वाले लाल पर्चा पढ़ कर कॉपने लगे।
बबुआ भी लाल पर्चा पढ़ कर सहम गया, जो वह नहीं चाहता था वही हो रहा
है।
खेलावन तो लाल पर्चा पढ़ते ही बोल पड़े....
‘देख बबुआ! ई लाल सलाम वाले हमरे गॉव में आ ही गये, जिसे हमलोग जाने कबसे बचाय रहे हैं, हालांकि ये लोग हमलोगों का फायदा ही करायेंगे फिर भी यह ठीक नहीं हो रहा...’
‘हॉ भइया खेलावन पर हमलोग ‘लाल सलाम’ वालों को कैसे रोक सकते हैं, सो हमलोगों को चुप ही रहना है अउर समय के चाल को देखते रहना है।’
धरती-माई ने भी देखा था कि गॉव में लाल सलाम वाले आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैैंं जमीन के कब्जा के बारे में। धरती माई नहीं समझ पा रहीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? उनके तो दो ही पुत्रा हैं धरती जोतने-कोड़ने वाले और दूसरे कायदा कानून जानने व बनाने वाले, पर ये तीसरे किसिम के पुत्रा कौन हैं?
धरती माई चकरा जाती हैं लाल सलाम वालों को देख कर...वे नहीं समझ पातीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? किसके पुत्रा हैं? जो धरती जोतक-पुत्रों के भले की बातें बोल रहे हैं, प्रशासन द्वारा किए गये गलत कामों को दुरूस्त करने के बारे में पर्चा बाट रहे हैं।
अचानक धरती-माई को लगता है कि कहीं लाल सलाम वाले उनके मानस-पुत्रा तो नहीं क्योंकि उनके मन में भी है कि धरती-जोतक पुत्रों को उनके कब्जे की जमीन ही मिले। संभव है कि लाल सलाम वाले उनके मानस पुत्रा ही हों जो स्वतः पैदा हो गये हों। प्रकृति का क्या है वह तो लीला करती रहती है समाज में सन्तुलन बनाने के लिए।
धरती-माई गंभीर होकर लाल सलाम वालों को देखने लगती हैं। लाल सलाम वाले गॉव में पर्चा बाट लेने के बाद धरती-माई की चौरी के पास आकर पीपर के पेड़ के नीचे आराम से बैठ जाते हैं और आगे क्या करना है गॉव में उसकी रण-नीति बनाने लगते हैं। अगले सप्ताह गॉव में आ कर सभी की जमीन कब्जे के आधार पर बांट देना है।
धरती-माई लाल सलाम वालों की रणनीति सुनने में गंभीर हैं, उन्हें समझ आता
हैैे कि ये जो लाल सलाम वाले हैं, ये धरती-जोतक समाज के हितों के लिए मौजूदा सरकार से टकराने के लिए तैयार हैं, ये चाहते हैं कि तमाम तरह की पर्तों में बटा
समाज हर हाल में बदलना ही चाहिए पर कैसे? इसे धरती-माई नहीं समझ पातीं, उन्हें समझ में आता भी नहीं। वैसे भी देश में चल रहे राजनीतिक प्रबंधन को भला धरती-माई कैसे समझ पातीं, यही तो आज की दुनिया का सबसे जटिल मामला है कि यह जो धरती है यह आखिर कैसे बंट गई, किन लोगों ने किस नियम से इसे बांट लिया? प्रकृति की सारी संपदा कुछ लोगों ने आपस में मिल कर बांट लिया है और बटी हुई संपत्ति की सुरक्षा के लिए कानून भी बना लिया है।
धरती-माई धरती पर प्रचलित प्रकृति की संपदा के प्रबंधन पर हसने लगती है,
उन्हें लगा कि उनकी हसी रुकने वाली नहीं है पर उन्होंने अपनी हसी रोका जिससे कि लाल सलाम वाले सुन न लें और शान्त होकर लाल सलाम वालों की बातें सुनने लगीं। गंभीरता से सुनने के बाद लाल सलाम वालों की कुछ बातें धरती-माई की समझ में आने भी लगीं जैसे यही कि प्रकृति की संपदा पर सबकी हिस्सेदारी है, सरकार में जनसंख्या के आधर पर हिस्सेदारी होनी चाहिए जिस वर्ग समूह की जितनी संख्या
है सरकार में उसी के अनुपात में हिस्सेदारी भी होनी चाहिए, विशेषाधिकार, उत्तराधिकार समाप्त होना चाहिए। इसी तरह की तमाम बातें लाल सलाम वाले कर रहे थे उनमें से कुछ बातें धरती-माई समझ रहीं थीं...
ये लाल सलाम वाले बोल तो सही रहे हैं पर करेंगे कैसे? समाज में बराबरी कैसे लायेंगे? धरती-माई गंभीर हो जाती हैं सुनने के लिए.... लाल सलाम वालों में से कोई आदमी कड़क आवाज में बोलता है...
‘कितना देर आराम करोगे भाई अभी बहुत काम है, दूसरे गॉव भी जाना है, दो दिन बाद ही इस गॉव में एक सभा करनी है, सभी को समझाना है, अब चलो बहुत हो गया आराम।’
लाल सलाम वाले जल्दी से उठ खड़े होते हैं और अपने गंतब्य की ओर चले जाते हैं, धरती माई लाल सलाम वालों की कार्य-योजना नहीं सुन पातीं। कैसे सुनतीं वे, लाल सलाम वाले अपनी कार्य-योजना के बारे में कुछ बात ही नहीं किए। धरती-माई खुद विचारने लगीं आखिर ये लाल सलाम वाले करेंगे क्या...कुछ बात भी नहीं कर रहे, इनका पीछा करना चाहिए, और वे उनके पीछे पीछे चल पड़ीं, देखो कहां जाते हैं ये लोग, और हैं कौन? इनके बारे में जानना जरूरी है...
धरती-माई के लिए उनका पीछा करना आसान था, वे तो देवी हैं, अदृश्य हैं जल, थल, नभ सभी मार्ग उनके लिए सहज है। उन्हांेने देखा कि लाल सलाम वाले एक गॉव के सामने हैं, वहां एक बोलेरो खड़ी है, वे उसी पर सवार हो रहे हैं, अरे! यह क्या ये तो फुर्र हो गये। धरती-माई भी कम न थीं, वे उनके पीछे पीछे...
चकरा गई धरती-माई, यह तो दफ्तर जैसा जान पड़ता है या कोई बंगला, बंगला ही होगा, बंगला ही था वह। घोरावल से करीब डेढ़ सौ किलामीटर दूर होगा ही, धरती-माई ने अनुमान लगाया। धरती-माई बंगले के अन्दर घुस गईं, वहां की बातें सुन कर दंग रह गईं। बंगले के अन्दर के लोग उन्हें उनके योग्य पुत्रों की तरह जान पड़े, पढ़े-लिखे, कायदे-कानून के जानकार, समाज को चलाने वाले, प्रतिभा परीक्षा पास योग्य पुत्रों की तरह।
धरती-माई चकित तो थीं ही सो यह जानने के लिए उत्सुक हो गईं कि ये हैं कौन और इनका लाल सलाम वालों संे रिश्ता क्या है?
किसी का किसी से रिश्ता जानना आसान तो नहीं पर धरती-माई के लिए क्या है, उन्होंने मन को साधा और पता कर लिया कि ये लोग काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और मौजूदा सरकार के समानान्तर सत्ता चलाने के लिए प्रयास-रत हैं। धरती-माई धरती के इस राजनीतिक सत्ताग्रही खेल से फिर चकरा गईं।अरे यह क्या? एक सत्ता तो चल ही रही है उसी में फेर-बदल करो, दूसरी सत्ता की स्थापना के लिए काहे जान दे रहे हो? सत्ता तो एक ही होनी चाहिए एक देश में, एक राष्ट्र में। एक ही राष्ट्र में दो तरह की सत्ता, यह तो राष्ट्र-द्रोह है। तो क्या ये राष्ट्र-द्रोही हैं? बंगले में बैठे लोगों की कुछ बातें धरती-माई को याद हो गई थीं जैसे यही कि सत्ता पर कमकरों, गरीबों, मजूरों का अधिकार होना चाहिए उनका नहीं जो अपने हाथ से उठा कर एक गिलास पानी भी नहीं पीते, बात बात पर नौकर चाहिए जिन्हें, खाना बनाने वाला अलग, खिलाने वाला अलग, खेत जोतने वाला अलग, कार चालाने वाला अलग गोया हर काम के लिए नौकर, जो अपना काम करने में भी शर्म महसूसते हैं यानि यह जो मालिक और नौकर वाली दुनिया है यह प्रथा मिटनी ही चाहिए हर हाल में, मौजूदा सत्ता नौकर बनाती है, गुलाम बनाती है, सो इस सरकार को उखाड़ फेंकना है।
धरती-माई बंगले में बैठे हुए लाल सलाम वालों को देखती रह गई, वही रंग-रूप, वैसे ही चेहरे, बोल-चाल भी वैसी ही, सूट-बूट भी वही, वैसे ही अदब और अनुशासन, ये लोग तो उनके योग्य पुत्रों की तरह ही जान पड़ रहे हैं, काफी पढ़े-लिखे, शासन, प्रशासन को चलाने वालों की तरह। ये अपनी सत्ता चाहते हैं सो प्रशासन का विरोध करने के लिए हल्दीघाटी गॉव तक भी जा पहुंचे, आगे जाने का करें ये लोग वहां, लगता है उनके धरती-जोतक पुत्रों को ये बहकायेंगे, सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करेंगे और का कर ही सकते हैं। धरती-माई चकरा गईं...
अरे यह धरती! बहुत अजीब है, यहां किसिम किसिम के खेल चल रहे हैैं, यहां का हर आदमी खिलाड़ी है और अपने स्वार्थ के खेल खेल रहा है, यहां कोई आरोपी रामलाल की तरह का मार-काट वाला खेल खेल रहा है तो कोई लाल सलाम वालों की तरह का सत्ता-बदल वाला खेल तो कोई सरवन जैसा है, जो अपने अधिकार की रक्षा के संघर्ष में कतल कर दिया गया। इनके अलावा वे लोग हैं जो शासन की कुर्सी पर विराजे हुए हैं, मंत्राी अधिकारी बन कर ये लोग भी कागजांे पर विधानों का खेल खेल रहे हैं, हर तरफ कागजों पर लिखे कानूनों की पतंगे हवा में उड़ा रहे हैं, धरती पर शान्ति व्यवस्था के नाम पर बन्दूकों से बारूदें उगलवा रहे हैं।
धरती-माई घिना जाती हैं धरती पर चल रही व्यवस्था से। इस धरती पर बबुआ,
खेलावन, बंधू, सोमारू और बुझावन की कोई नहीं सुनने वाला। तेतरी, फगुनी जैसी विधवाओं की भी कोई सुधि लेने वाला नहीं। वे बंगले से बाहर निकल जाती हैं, यहां रहना बेकार है, का होगा इनका प्रवचन सुन कर, ये भी अपने निहित विचारों के सुभाषित ही उचारेंगे, अपने विचारों को प्रकृति का नियम साबित करेंगे एकदम कुदरती लोकबोध की तरह। ऐसी हालत में तो अपनी चौरी में ही रहना ठीक होगा पर चौरी में क्या रहना, सीधे स्वर्ग लौट जाना ठीक होगा, वे धरती का स्वार्थ-मूलक, व्यक्ति-मूलक, निजता-मूलक छल-छद्म वाला प्रबंधन संभालने में समर्थ नहीं, फिर उनकी कोई सुनने वाला भी तो नहीं। लाल सलाम वालों के पीछे पड़ने से कोई लाभ नहीं, ये भी भाषण-वीर ही जान पड़ रहे हैं। वे समझ चुकी हैं कि धरती का प्रबंधन काफी जटिल और उलझन भरा है तभी तो ‘देवराज इन्द्र’ के कहने पर भी स्वर्ग का कोई देवता धरती के प्रबंधन के लिए तैयार नहीं हुआ, स्वर्ग के देवता जानते थे धरती के प्रबंधन के बारे में, यहां कोई किसी का नहींे, सभी अपने अपने कबूतर उड़ाने में जुटे हुए हैं। यहां कोई किसी का होना भी चाहे तो धरती की जो सत्ता है नऽ वह किसी को किसी के साथ जुड़ने ही नहीं देगी। वैसे भी संपत्ति का काम ही है पूरे समाज को खानों में बांट देना, उनमें किसिम किसिम की श्रेणियॉ बना देना खैर श्रेणियॉ तो देवताओं में भी विभाजित हैं, श्रेणीकरण के रोग से तो स्वर्ग भी नहीं बचा है। कहां देवराज इन्द्र और कहां शिव, दोनों के रहन- सहन, चाल-चलन, चरित्रा और चेहरा, एक वैभव और ऐश्वर्य का मालिक दूसरा जन सामान्य की तरह औघड़, फक्कड़, भभूत और भस्म लगाये। बहुत फर्क है दोनों देवों में। धरती पर तो स्वर्ग से कहीं अधिक विकृत रूपों में यह श्रेण्ीाकरण हर जगह पसरा हुआ है। सो धरती पर अब नहीं रहना भले ही स्वर्ग के देवताओं के ताने सुनने पड़ें फिर भी।
धरती-माई तत्काल अपनी चौरी में लौट आईं। उनकी चौरी पर भीड़ थी। हल्दीघाटी गॉव के दखिनाहा टोले वाले अपने कुशल-मंगल के लिए धरती-माई की पूजा-अर्चना कर रहे थे कि पुलिस उन्हें परेशान न करे। लाल सलाम वाले लाल पर्चा बाट कर बवाल खडा़ कर दिए पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं। हालांकि लाल पर्चे में उनके हित की ही बातें थी, कब्जों के आधार पर जमीन आवंटित करने की धमकी थी जिसके लिए दखिनाहा टोले वालों ने कलक्टरी पर परदर्शन किया था और धरना दिया था फिर भी वे अशांत थे। कई तरह के सन्देहों ने उन्हें जकड़ लिया था। पुलिस को जिस दिन मालूम होगा पुलिस उनके पीछे पड़ जायेगी, लाल सलाम वालों से उनके जुड़ावों के बारे में पूछेगी और न जाने का का करेगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी कर सकती है। दखिनाहा टोले वालों को मालूम है कि जसौली में का हुआ था? जसौली के पनबासा गॉव में ऐसे ही लाल सलाम वालों ने एक रात डेरा जमा दिया था, उसी गॉव में खाना-पीना भी किए थे और दूसरे दिन अल्ल-सुबह कहीं चले भी गये थे पर.......दूसरे दिन...
दूसरे दिन तो पुलिस वालों ने पूरे गॉव को घेर लिया और पॉच लड़कों को पकड़
लिया। गॉव से थाने लाकर हवालात में डाल दिया। एक महीने तक हो-हल्ला मचा तब जा कर पुलिस वालों ने गॉव वालों को छोड़ा। पुलिस वाले उन लड़कों को नक्सली साबित करने पर तुले हुए थे। पर उस समय की सरकार जनता के प्रति कुछ संवेदनशील व विनम्र थी सो सरकार ने पुलिस की दलील अनसुनी कर दिया और लड़कों कोे छोड़ने का आदेश दे दिया पर अब जो सरकार है वह किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाली वह विशाल बहुमत की ताकत को बारूद की तरह इस्तेमाल करती है। वैसे भी कोरोना की महामारी में अदालतें बन्द है, अस्पताल बन्द हैं, हर सरकारी काम लंगड़ा रहे हैं अपाहिज की तरह, कोई किसी की नहीं सुनने वाला। अगर गॉव में पुलिस आ गई तो का होगा कुछ लड़कों को गिरफ्तार करेगी ही, बिना गिरफ्तारी किए पुलिस कहीं से लौटती कहां है?
पूरा दखिनाहा टोला कॉप रहा है लाल सलाम वालों के गॉव में आने से। गॉव वालों का कॉपना गलत भी नहीं था। गॉव वाले तो लाल सलाम वालों से पहले से ही कॉप रहे थे कुछ भी हो जाये गॉव के जमीन के झगड़े के मामले को लाल सलाम वालों तक नहीं ले जाना है। सरवन भी हमेशा सावधान रहा करता था लाल सलाम वालों से। उसका तो एक दो बार लाल सलाम वालों से झगड़ा भी हो चुका था। आज अगर सरवन जिन्दा होता तो लाल सलाम वाले गॉव में नहीं आते। सरवन भिड़ जाता लाल सलाम वालों से। वह हमेशा उनसे बोलता देखो! हम कोई भी फैसला बन्दूक की नोक वाला नहीं चाहते, भले ही हमें नमक रोटी तक की मोहताजगी झेलनी पड़े। हमें सपना मत दिखओ, यह मत बताओ कि हमारा सोनभद्र में कभी राज था और हम राजा हुआ करते थे। लाल सलाम वाले गॉव में आये और पर्चा बाट कर चले गये जो मिला उन्हें समझाते गये कि जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर ही होगी अगर कोई कब्जे का विरोध केरेगा तो उसकी खैर नहीं। गॉव वालों के लिए लाल सलाम वालों की धमकी का मतलब था, छह ईच गरदन को कटवाना, तुरन्त फैसला और भी बहुत कुछ, उनकी अदालत फैसला लेने तथा दण्ड देने में देरी नहीं करती, चाहे कोड़े मारना हो या गरदन ही काटनी हो पूरे गॉव के सामने वह भी डुगडुगिया पिटवा कर, गॉव वालों को बुलवा कर। लाल सलाम वालों के इसी न्याय की परंपरा से सरवन चिढ़ा करता था और उसका लाल सलाम वालों से झगड़ा होता रहता था।
लाल सलाम वालों के हल्दीघटी गॉव में आने की खबर पुलिस ने सूंघ लिया और फटाफट आदिवासी नेता तथा जन कल्याण समिति के मंत्राी जी को पकड़ लिया। काहे पकड़ लिया किसी को कोई सूचना नहीं बस पकड़ लिया उसके तत्काल बाद पुलिस गॉव में चली आई और बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को पकड़ कर थाने ले गई।
थाने पर पूछ-ताछ होने लगी, वहीं पर आदिवासी नेता और जन कल्याण समिति के मंत्राी भी थे। पूरे सोनभद्र में कोरोना का लाक डाउन था, सारा जनपद डिब्बे में बन्द जैसा हो गया था, कोई कुछ बोल नहीं सकता था, न कहीं निकल सकता था। वैसे भी आदिवासियों के सवाल पर बोलने वाले न के बराबर हैं सोनभद्र में। सोनभद्र में भले ही खामोशी छाई हुई थी, चुप्पी पसरी हुई थी पर सोनभद्र के बाहर चुप्पी नहीं थी। प्रदेश और देश के विरोध पक्ष के बड़े नेता ट्वीटर युद्ध में सक्रिय हो गये थे, एक से एक ट्वीटर के बाण सत्ता पक्ष पर दागने लगे थे। प्रतिपक्ष के सक्रिय होने से हल्दीघाटी गॉव एक बार फिर देश के बड़े नेताओं के ट्वीटर युद्ध का प्रतिभागी बन गया। प्रदेश ही नहीं देश के भी प्रतिपक्ष के लोगों ने पुलिस की कार्यवाही की निन्दा करना शुरू कर दिया। शाम होते होते तक एक दो न्यूज चैनल वालों ने भी मामले की विवेचना अपनी कार्य-सूची में जोड़ लिया। चैनल पर बहस होने लगी सोनभद्र के साथ पूरे उ.प्र. के भमि-प्रबंधन पर। यह पहला अवसर था जब बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू तथा आदिवासी नेता और संस्था के मंत्राी जी को टी.वी. पर लाइव प्रस्तुत किया जा रहा था। उनके बयान सुनवाये जा रहे थे। हल्दीघाटी गॉव में जब बर्बर हत्याकाण्ड हुआ था तब भी इस तरह का प्रसारण टी.वी. पर नहीं हुआ था। उस बार तो कुछ खास लोगों तथा प्रशासनिक अधिकारियों को ही चैनल वालों ने कवर किया था पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार तो सभी के बयान लिए जा रहे थे हालांकि बुधनी काकी, बिफनी और तेतरी को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था फिर भी उनके बयानों को अक्षरशः चैनल वाले प्रसारित कर रहे थे। एक चैनल वाले ने तो उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन की बखिया उधेड़ दिया था। भूमि-प्रबंधन की बहस चैनल पर तो हुई बहुत ही जोर-शोर से पर उस बहस से यह निष्कर्ष निकालना कठिन था आखिर जब सोनभद्र जनपद आजादी के पहले आदिवासियों का परिक्षेत्रा था फिर इस जनपद को संविधान की अनुसूची पॉच को लाभ क्यों नहीं दिया गया। चैनल की पूरी बहस आजादी के बाद वाले भूमि-प्रबंधन पर टिकी रह गई। चैनल पर सोनभद्र में आजादी के पहले के भूमि-प्रबंधन के बारे में किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। फिर भी हल्दीघाटी गॉव की घटना को प्रचार तो मिल ही गया।
चैनल पर चर्चा होते ही प्रदेश की सरकार के कान खड़े हो गये, हो क्या रहा है सोनभद्र में, मुख्यमंत्राी जी ने तो हल्दीघाटी गॉव के मामले को निपटवा दिया था, मुआवजा भी नियमों के विपरीत जाकर बहुत अधिक दिलवाया था, जमीन के आवंटन को भी पूरा कर लिया गया था फिर कौन सी बाधा खड़ी हो गई? वहां के आदिवासियों को कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन काहे करना पड़ा, बात क्या है?
वाकई हल्दीघाटी गॉव में घटी मौजूदा घटना से जिले के वुद्धिजीवी ही नहीं सामान्य लोग भी चकित थे, सरकार को तो चकित होना ही था। जगह जगह लोग उस पर चर्चा कर रहे थे पर लाक डाउन होने के कारण सभी अपने भीतर खामोश थे। वैसे केवल सोनभद्र ही नहीं पूरा देश खामोश था कौन बोले कोरोना की महामारी में। अगर देखा जाये तो हमारी सभ्यता में खामोश रहना, प्रतिक्रिया-हीन रहना एक तरह से गुण है जिसे हम पैदा होते ही सीख जाते हैं कोई कसर बाकी रहती है तो हमारी परंपरायें, आज्ञाकारिता वाली शिक्षायें सिखा देती हैं। जनता तो खामोश थी पर सरकार खामोश नहीं थी, सरकार के सुजानों का मानना था कि हल्दीघाटी के लिए सरकारी स्तर पर जितना किया जा सकता था उससे अघिक ही किया गया फिर भी वहां असंतोष है आखिर आदिवासी चाहते क्या हैं? निश्चित ही स्थानीय प्रशासन ने कुछ गड़बड़ जरूर किया होगा।
प्रदेश की सरकार प्रतिपक्ष के ट्वीटर बाणों से आहत हो चुकी थी। सरकार ने फटा-फट मौजूदा कलक्टर को जिले से हटा दिया। कलक्टर को जिले से हटाना सरकार के लिए तात्कालिक समाधान जैसा था। कलक्टर को हटा देने से आदिवासी खुश खुश हो जायेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। आदिवासी तो पट्टे में वही जमीन चाहते थे जिस पर उनका आजादी के पहले से ही जोत-कोड़ था, जिस पर वे काबिज थे। स्थानीय प्रशासन ने जमीन तो आदिवासियों को दिया जरूर पर कब्जे से अलग, अब यह किसे नहीं मालूम कि जमीन का चरित्रा अलग अलग होता है सभी जमीन तो उपजाऊ होती नहीं। स्थानीय प्रशासन ने उपजाऊ तथा अनउपजाऊ के वितरण में मुहदेखी तथा लेन-देन वाला अधिकारियत का खेल किया था।
शासन के सतर्क होने के पहले ही स्थानीय प्रशासन जो प्रशासनिक कलाकारिता में आगे था उसने कमाल कर दिया। थाने पर बिठाये गये आदिवासियों तथा संस्था के मंत्राी व आदिवासी नेता पर कोई मुकदमा कायम न करके उन्हें सीधे क्वारेनटाइन कर जिले के एक क्वरेनटाइन केन्द्र में रखवा दिया। आदिवासी नेता, संस्था के मंत्राी, बबुआ, व खेलावन को कोरोना पाजिटिव घोषित कर दिया फिर क्या था उन्हें जिले के कोरोना अस्पताल में ले जाकर अस्पताल के बिस्तरों पर सुलवा दिया। अपना अधिकार मांगने वाले कोरोना मरीज बन कर बिस्तरे पर पड़े थे। प्रशासन अपने विशेष तरीके से कोरोना की महामारी के जरिए धरती-कथा लिख रहा था।
इतना ही होता तब भी ठीक था इसके आगे बढ़ कर अस्पताल के तमाम कर्मचारियों ने पुलिस के साथ हल्दीघाटी गॉव को घेर लिया। पूरे गॉव की बॉस-बल्लियों से घेरे-बन्दी कर दिया। गॉव की गलियों के हर मुहाने पर होमगार्ड तथा सिपाही को बिठा दिया। कोई भी गॉव से बाहर नहीं निकल सकता था और न ही कोई गॉव में आ सकता था। गॉव में आवाजाही पर पूरी तरह से पाबन्दी।
सोनभद्र का कलक्टर यहां से जाते जाते हल्दीघाटी गॉव की घेरे-बन्दी करवा गया था। नया कलक्टर जिले में दूसरे दिन ही आ गया। वह एक नौजवान था और औसत कद-काठी का था, शकल से तो कलक्टर नहीं जान पड़ता था पर बात-चीत से मालूम हो जाता था कि वह प्रतिभा-परीक्षा पास एक होनहार अधिकारी है, उसकी ऑखों से कुछ विशेष कर गुजरने की तड़प निकलती दीखती थी। जिले का चार्ज लेते ही उसने हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावली तलब कर लिया। कलक्टर ने अपनी प्रतिभा की दिव्य-ज्योति सारी पत्रावलियों पर फैला दिया फिर क्या था पत्रावली पर दर्ज सारी बातें कलक्टर को साफ साफ दिखने लगीं। पत्रावली की टिप्पड़ियॉ स्वतः बोल्ड हो गई... उसे कोई भी पढ़ सकता था। नया कलक्टर प्रशासन की हेरा-फरी वाली कलाओं को तो समझ गया पर उसे साबित करना रोक लिया। किसी दूसरे अधिकारी को पता नहीं चलना चाहिए कि उसे हल्दीघाटी गॉव में खेले गये प्रशासनिक हेर-फेर वाले खेल की जानकारी हो चुकी है। कलक्टर नया तो जरूर था पर नियमों, कानूनों के क्रियान्वयनों तथा उनकी व्याख्याओं में किए जा सकने वाले जन-विरोधी पालनाओं को अच्छी तरह से समझता था। हल्दीघाटी गॉव की जमीन आवंटन की पत्रावली पढ़ लेने के बाद उसे समझने में देर नहीं लगी कि आवंटन करने वाले अधिकारी ने जन-विरोधी कार्य किया है। पर वह निश्चित नहीं कर पा रहा था कि हल्दीघाटी के मामले को कैसे हल कर सकता है सो वह उलझन में था। कोरोना का समय चल रहा है, सोनभद्र जो पहले ग्रीन जोन में था धीरे धीरे रेड जोन में बदलता जा रहा है। जिले के कई कस्बे और शहर कोरोना के प्रभाव में हैं।
‘इस समय तो कुछ भी नहीं हो सकता, हल्दीघाटी गॉव भी कोराना प्रभावित हो गया है, पूरे गॉव को क्वेरेन्टाइन करके उसे बांस-बल्लियों से घेर दिया गया है ऐसी स्थिति में वह जमीन के आवंटन के बारे में कुछ भी नहीं कर सकता फिलहाल तो सोनभद्र को कोराना मुक्त कराना है। बाद में देखा जायेगा कि सोनभद्र में ये जो जमीन बन्दोबस्ती के मामले हैं उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अगर नये भूमि बन्दोबस्ती करने की आवश्यकता समझ में आयेगी तो वह सरकार को एक प्रतिवेदन भी देगा। पर नहीं वह एक कलक्टर की तरह कुछ भी नहीं कर पायेगा, ज्योंही वह सोनभद्र के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने का प्रयास करेगा उसे यहां से हटा दिया जायेगा।
नया कलक्टर कुछ ही देर में कलक्टर की पद-गर्भित भावनाओं की यात्रा से लौट आया और अपनी कुर्सी पर जम गया। उसके मुह से एक आह निकली ‘वह कुछ नहीं कर सकता, वह सरकार का महज एक पुर्जा है जिसे सरकार अपनी ऊर्जा से चलाती है।’ उसने घंटी बजाई वहां एक चपरासी हाजिर हुआ...
‘स्टेनो बाबू और पेशकार को बुलाओ’
स्टेनो बाबू और पेशकार हाजिर हो गये
‘हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावलियॉ ले जाइए और ए.डी.एम. साहब से इन पत्रावलियों पर रिपोर्ट तैयार करवाइए कि आदिवासियों में जमीन बन्दोबस्ती के कारण फैली अशान्ति को विधिक रूप से कैसे रोका जा सकता है तथा आदिवासियों के कब्जे की जमीनें उन्हें किन कारणों से आवंटित नहीं की गईं जिसके कारण आदिवासियों ने कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन किया था। इसकी भी जॉच होनी चाहिए कि पुलिस ने हल्दीघाटी गॉव के लोगों को क्यों गिरफ्तार किया?
स्टेनो बाबू और और पेशकार को आदेशित करने के बाद कलक्टर ने अचरज भरा एक आदेश खुद को दिया.. खुद के लिए...
‘हे कलक्टर! अपनी औकात में रह, वुद्धिमान न बन, हल्दीघाटी गॉव में हुई भूमि आवंटन की धांधली सुधारने के चक्क्र में तुझे ही हटा दिया जायेगा, सो ऑख मूंद ले, कान बन्द कर ले और जुबान पर चाटुकारिता की पालिस चढ़ा ले, कोरोना की महामारी को अपनी प्रगति का अवसर बना ले, मुह में अपनी जीभ डाल कर इसका लाभ उठा। कभी भी धरती-कथा लिखने ही नहीं पढ़ने की भी कोशिश न करना।’
कलक्टर अपने अवचेतन के आदेश से हिल गया... ‘बात तो ठीक ही है।’
धरती-माई लाल सलाम वालों के बारे में पता कर खामोश हो गईं थी, उसी खामोशी में उन्हें पता चला कि हल्दीघाटी के कई लोगों को कोरोना हो गया है। गॉव को हाटस्पाट घोषित करके उसे सील कर दिया गया है, उनकी चौरी भी हाटस्पाट में है। धरती-माई नहीं समझ रहीं कि कोरोना क्या है, यह कैसी महामारी है, लोग दूरी बना रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से, आवागमन बन्द है, बाजार बन्द हैं, आफिस बन्द है। उनकी चौरी पर जो लोग पूजा करने आये थे वे भी मुह बाधे हुए थे, दूर दूर बैठे हुए थे, एक दूसरे से फैलता है यह रोग।
धरती-माई अपनी चौरी से निकलीं और सीधे कलक्टर के बंगले पर पहुंच गइं, उनके पहुंचते ही कलक्टर का बंगला तेज दुधिया रौशनी से नहा उठा... कलक्टर चौंक गया.. उसने रौशनी की तरफ देखा....
एक नई आभा, सफेद साड़ी में लिपटी, छत्राधारी...साक्षात देवी की तरह आभा बिखेरती... कलक्टर उन्हें देख कर चकरा गया...
‘देवी कौन हैं आप?’
‘मैं धरती-माई हूॅ, धरती पर आई हूॅ धरती का हाल सुधारने के लिए, अनपढ़ और पढ़े लिखे लोगों, गरीबों और अमीरों की बीच की खाईं पाटने के लिए पर यहां तो गड़बड़ ही गड़बड़ है, मुझे कुछ और करना होगा। गरीबों के हितों के लिए नयेे ढंग से लड़ाई लड़नी होगी। मेरे साथ तुझे भी उस लड़ाई में शामिल होना होगा।’
कलक्टर धरती-माई की आभा में सम्मोहित हो गया। वह धरती-माई के चरणों में तत्तकाल झुका और उसने शपथ लिया...
‘मॉ चाहे जो हो जाये मैं हल्दीघाटी गॉव वालों को न्याय दिलवाकर रहूंगा। कलक्टर हैरान, धरती माई गरीबों को न्याय दिलाने के लिए जब धरती पर उतर सकती हैं फिर मैं क्यों नहीं आदिवासियों का भला कर सकता, मैं भी तो एक घरती पुत्रा ही हूॅ, धरती की गोदी में पला-बढ़ा....’
‘सरकार चाहे जो करे, चिन्ता नहीं, मुझे वही करना है जिसे मेरी आत्मा बोल रही है, नौकरी किया है, गुलामी नहीं’। उसने स्टेनो को तत्काल बुलवाकर आदेशित किया, ‘हल्दीघाटी वाले गॉव की आवंटन पत्रावली ले आओ और आदिवासियों की वह दरख्वास्त भी जो आवंटन के विरोध की है...’
पत्रावली पर उसने ए.डी.एम. को आदेशित किया..‘हल्दीघाटी गॉव की जमीन का आवंटन आवंटियों के कब्जे के आधार पर दुबारा किया जाये तथा कृत कार्यवाही से मुझे अवगत कराया जाये।’
यह आदेश उसकी पवित्रा आत्मा का था पक्षपातहीन। एक सप्ताह गुजरा होगा कि पता चला कि कलक्टर का ट्रान्सफर कर दिया गया। फिर जमीन का आवंटन खटाई में पड़ गया। देखिए नया कलक्टर कब आता है, कोराना कब खत्म होता है उसके पहले तो कुछ नहीं होगा और धरती-माई का करती हैं, धरती पर रहती हैं या स्वर्ग लौट जाती हैं।
q7cl8vqiko3eu48lgujfyvoduqt2sny