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विकिपुस्तक:चौपाल
4
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2026-05-01T18:22:05Z
अनिरुद्ध कुमार
5967
/* हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 */
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wikitext
text/x-wiki
{{Discussion Rooms}}{{/स्वागत}}__NEWSECTIONLINK__
== [Small wiki toolkits] Workshop on "Designing responsive main pages" - 30 April (Friday) ==
As part of the Small wiki toolkits (South Asia) initiative, we would like to announce the third workshop of this year on “Designing responsive main pages”. The workshop will take place on 30 April (Friday). During this workshop, we will learn to design main pages of a wiki to be responsive. This will allow the pages to be mobile-friendly, by adjusting the width and the height according to various screen sizes. Participants are expected to have a good understanding of Wikitext/markup and optionally basic CSS.
Details of the workshop are as follows:
*Date: 30 April (Friday)
*Timings: [https://zonestamp.toolforge.org/1619785853 18:00 to 19:30 (India / Sri Lanka), 18:15 to 19:45 (Nepal), 18:30 to 20:00 (Bangladesh)]
*Meeting link: https://meet.google.com/zfs-qfvj-hts | to add this to your Google Calendar, please use [https://calendar.google.com/event?action=TEMPLATE&tmeid=NmR2ZHE1bWF1cWQyam4yN2YwZGJzYWNzbjMgY29udGFjdEBpbmRpY21lZGlhd2lraWRldi5vcmc&tmsrc=contact%40indicmediawikidev.org click here].
If you are interested, please sign-up on the registration page at https://w.wiki/3CGv.
Note: We are providing modest internet stipends to attend the workshops, for those who need and wouldn't otherwise be able to attend. More information on this can be found on the registration page.
Regards,
[[:m:Small wiki toolkits/South Asia/Organization|Small wiki toolkits - South Asia organizers]], १५:५१, १९ अप्रैल २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=20999902 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== Call for Election Volunteers: 2021 WMF Board elections ==
Hello all,
Based on an [[:m:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Community Board seats/Main report|extensive call for feedback]] earlier this year, the Board of Trustees of the Wikimedia Foundation Board of Trustees [[:m:Wikimedia_Foundation_Board_noticeboard/2021-04-15_Resolution_about_the_upcoming_Board_elections|announced the plan for the 2021 Board elections]]. Apart from improving the technicalities of the process, the Board is also keen on improving active participation from communities in the election process. During the last elections, Voter turnout in prior elections was about 10% globally. It was better in communities with volunteer election support. Some of those communities reached over 20% voter turnout. We know we can get more voters to help assess and promote the best candidates, but to do that, we need your help.
We are looking for volunteers to serve as Election Volunteers. Election Volunteers should have a good understanding of their communities. The facilitation team sees Election Volunteers as doing the following:
*Promote the election and related calls to action in community channels.
*With the support from facilitators, organize discussions about the election in their communities.
*Translate “a few” messages for their communities
[[:m:Wikimedia Foundation elections/2021/Election Volunteers|Check out more details about Election Volunteers]] and add your name next to the community you will support [[:m:Wikimedia_Foundation_elections/2021/Election_Volunteers|'''in this table''']]. We aim to have at least one Election Volunteer, even better if there are two or more sharing the work. If you have any queries, please ping me under this message or [[Special:EmailUser/KCVelaga (WMF)|email me]]. Regards, [[:m:User:KCVelaga (WMF)|KCVelaga (WMF)]] ०५:२१, १२ मई २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=20999902 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== [[वि:चौपाल/सूचना पटल|चौपाल का सूचना पटल]] उपपृष्ठ ==
नमस्ते मित्रों, यह आवश्यक सूचना चौपाल के प्रदर्शन और इसके एक कार्य को अलग करके दूसरी जगह ले जाने के संबंध में है। इस चौपाल पृष्ठ का एक नया उपपृष्ठ परीक्षण के तौर पर शुरू किया गया है। यह नया पृष्ठ इसलिए बनाया गया ही कि सदस्य कोई भी नई घोषणा अथवा सूचना, जो विकिपुस्तक के विकास से संबंधित हो, कोई नई पुस्तक बनाने, परियोजना आरंभ करने की सूचना इत्यादि यहाँ लिख सकें। यह पृष्ठ चौपाल पर विषय सूची में एक नई पहली हेडिंग जोड़ेगा और विषयसूची के ठीक नीचे यहाँ प्रेषित घोषणाएँ और सूचनाएँ दिखाई देंगी।
;अलग बनाने के लिए कारण: इसे अलग से निर्मित करने के लिए निम्निलिखित वज़हें हैं:
# बहुत सी सूचनाएँ ऐसी होती हैं जो सूचना मात्र के लिए ही होती हैं। अर्थात ये एक तरह से घोषणा (announcement) होती हैं जिनपर कोई चर्चा की आवश्यकता नहीं होती। बस सभी सदस्य इसे देख लें और जानकारी उनतक पहुँच जाए, इतना काफ़ी होता। अतः इन्हें चौपाल से अलग करना उचित लगा क्योंकि मूलतः चौपाल की प्रकृति चर्चा करने की है (और कई बार सूचना मात्र देने पर भी लोग समर्थन और धन्यवाद या बधाई ज्ञापित करने लगते)।
# मुख्य चौपाल पृष्ठ पर ऐसी घोषणाएँ और सूचनाएँ अन्य चर्चाओं के बीच में (जिस क्रम में उन्हें यहाँ पोस्ट किया जाय) प्रदर्शित होती हैं। इस पृष्ठ को अलग करके और उसके बाद यहाँ शामिल करने पर सभी ऐसी घोषणाएँ एक साथ सबसे ऊपर इस पन्ने की पहली हेडिंग में ही दिख जायेंगी।
इस सुविधा द्वारा प्रथम सूचना इसी के आरंभ की दी गयी है जो वर्तमान में सबसे ऊपर कि हेडिंग के रूप में प्रदर्शित हो रही। इस नई सुविधा के बारे में किसी भी राय का स्वागत है (इसीलिए यहाँ अलग से भी लिखा जा रहा)।
मेरे विचार में, नई घोषणाओं के प्रदर्शन की संख्या 5 घोषणाएँ रख सकते हैं और समय की अधिकतम सीमा एक महीना तथा न्यूनतम एक सप्ताह। इस पर भी यदि कोई राय हो तो स्वागत है।
:::--[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--talk--</small>]]</sup> ०६:१०, १ जून २०२१ (UTC)
== Candidates from South Asia for 2021 Wikimedia Foundation Board Elections ==
Dear Wikimedians,
As you may be aware, the Wikimedia Foundation has started [[:m:Wikimedia_Foundation_elections/2021|elections for community seats]] on the Board of Trustees. While previously there were three community seats on the Board, with the expansion of the Board to sixteen seats last year, community seats have been increased to eight, four of which are up for election this year.
In the last fifteen years of the Board's history, there were only a few candidates from the South Asian region who participated in the elections, and hardly anyone from the community had a chance to serve on the Board. While there are several reasons for this, this time, the Board and WMF are very keen on encouraging and providing support to potential candidates from historically underrepresented regions. This is a good chance to change the historical problem of representation from the South Asian region in high-level governance structures.
Ten days after the call for candidates began, there aren't any [[:m:Wikimedia_Foundation_elections/2021/Candidates#Candidate_Table|candidates from South Asia]] yet, there are still 10 days left! I would like to ask community members to encourage other community members, whom you think would be potential candidates for the Board. While the final decision is completely up to the person, it can be helpful to make sure that they are aware of the election and the call for candidates.
Let me know if you need any information or support.
Thank you, [[:m:User:KCVelaga (WMF)|KCVelaga (WMF)]] १०:०३, १९ जून २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=20999902 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== स्वयंसेवक प्रस्तुति के लिए अपना नाम दें ==
प्रवीण दास, Senior Partnerships Manager - South Asia, Wikimedia Foundation:
द्वारा २८ जून को ई-मेल से हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप को दी गई एक सूचना साझा कर रहा हूँ-
“आज केंद्रीय हिंदी संसथान के मेंबर ने कॉल पे अगले रविवार ४ जुलाई को टॉक और वर्कशॉप के लिए विकिपीडिया के १-२ स्पीकर का परिचय और फोटो माँगा है और हमें आमंत्रण किया है | ये कार्यक्रम शाम ६ बजे के आस पास होगा जिसमे कुछ उनके मेंबर्स दूसरे देशो से जुड़ेंगे | क्या आप इस विषय मैं मेरी कोई सहायता कर सकते है? मेरे ख्याल से अगर १-२ हिंदी विकिपीडिया के एक्सपेरिएंस्ड एडिटर्स जो वर्कशॉप लेने मैं इच्छुक हो, हम उनकी सहायता ले सकते हैं
इस वर्कशॉप का उद्देश्य हिंदी विकिपीडिया की जागरूकता फैलाना है और हमारे यूजर ग्रुप और एडिटर्स द्वारा किये गए प्रयासों को साँझा करना है | इस वर्कशॉप के द्वारा हम हिंदी अध्ययन एवं अध्यापन और अनुसन्धान के क्षेत्र से जुड़े हुए लोगो को हिंदी विकिपीडिया से जुड़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं”
१ जुलाई तक गूगल मीट पर विकिपीडिया के बारे में बताने या प्रस्तुति देने को इच्छुक सदस्य अपना नाम नीचे लिख सकते हैं या हमें ई-मेल कर सकते हैं। मुझे ऐसे प्रयासों से संपादक बढ़ने के आसार नहीं लगते हैं किंतु फिर भी ऐसे प्रयासों से मुझे कोई आपत्ति नहीं है। कम-से-कम ऐसे प्रयास विकिपीडिया के बारे में थोड़ी जागरूकता और बढ़ाते हैं। हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के ऐसे प्रयासों में अपना नाम शामिल करने की अनुमति देने के संबंध में भी सदस्यों की राय का स्वागत है।
विकिमीडिया फाउंडेशन के दक्षिण एसिया सहकारी प्रबंधक के पद पर कार्य करने वाले प्रवीण जी के साथ यूजर ग्रूप का एक इतिहास भी है। पिछले वर्ष २० जुलाई को ये अमेजन के सहयोग से हिंदी विकिपीडिया पर एक लेख बनवाने के संपादनोत्सव का प्रस्ताव लेकर आए थे। हमने प्रस्ताव को समर्थन दिया तथा अमेजन के लिए प्रतियोगिता का प्रारूप तैयार कर भेजा। इसके बाद अमेजन इंडिया के कुछ कर्मचारियों के साथ यूजर ग्रूप की फोन मीटिंग होने की योजना थी जिसमें कुछ ठोस निकलकर आने पर हमने चौपाल पर सूचना देने का निश्चय किया था। किंतु प्रवीण जी उस फोन बैठक का ही आयोजन नहीं कर सके प्रतियोगिता प्रस्ताव स्वीकृत कराना तो दूर की बात थी। मैने इस प्रस्ताव के लाने पर पुरानी याद ताजा करायी तो प्रवीण जी ने उस प्रस्ताव पर पुनः अमेजन वालों से बात करने की बात कही है। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:००, ३० जून २०२१ (UTC)
:इस प्रस्तुति के लिए विकिपीडिया चौपाल पर सुरेश खोले जी ने अपना नाम सुझाया था। यह प्रस्तुति ४ जुलाई को संपन्न हो चुकी है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४६, ६ जुलाई २०२१ (UTC)
== प्रबंधक के लिए मतदान करें ==
[[विकिपुस्तक:प्रबंधक/निर्वाचन#SM7]] पर [[सदस्य:SM7]] जी को प्रबंधक बनाए जाने के लिए मतदान चल रहा है। आपकी राय का स्वागत है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:४८, ६ जुलाई २०२१ (UTC)
== [Wikimedia Foundation elections 2021] Candidates meet with South Asia + ESEAP communities ==
Dear Wikimedians,
As you may already know, the 2021 Board of Trustees elections are from 4 August 2021 to 17 August 2021. Members of the Wikimedia community have the opportunity to elect four candidates to a three-year term.
After a three-week-long Call for Candidates, there are [[:m:Template:WMF_elections_candidate/2021/candidates_gallery|20 candidates for the 2021 election]]. This event is for community members of South Asian and ESEAP communities to know the candidates and interact with them.
* The '''event will be on 31 July 2021 (Saturday)''', and the timings are:
:* India & Sri Lanka: 6:00 pm to 8:30 pm
:* Bangladesh: 6:30 pm to 9:00 pm
:* Nepal: 6:15 pm to 8:45 pm
:* Afghanistan: 5:00 pm to 7:30 pm
:* Pakistan & Maldives: 5:30 pm to 8:00 pm
* '''For registration and other details, please visit the event page at [[:m: Wikimedia Foundation elections/2021/Meetings/South Asia + ESEAP]]'''
[[User:KCVelaga (WMF)|KCVelaga (WMF)]], १०:००, १९ जुलाई २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=20999902 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== 2021 WMF Board election postponed until August 18th ==
Hello all,
We are reaching out to you today regarding the [[:m:Wikimedia Foundation elections/2021|2021 Wikimedia Foundation Board of Trustees election]]. This election was due to open on August 4th. Due to some technical issues with SecurePoll, the election must be delayed by two weeks. This means we plan to launch the election on August 18th, which is the day after Wikimania concludes. For information on the technical issues, you can see the [https://phabricator.wikimedia.org/T287859 Phabricator ticket].
We are truly sorry for this delay and hope that we will get back on schedule on August 18th. We are in touch with the Elections Committee and the candidates to coordinate the next steps. We will update the [[:m:https://meta.wikimedia.org/wiki/Talk:Wikimedia_Foundation_elections/2021|Board election Talk page]] and [https://t.me/wmboardgovernancechat Telegram channel] as we know more.
Thanks for your patience, [[:m:User:KCVelaga (WMF)|KCVelaga (WMF)]], ०३:४९, ३ अगस्त २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=20999902 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== The Wikimedia Foundation Board of Trustees Election is open: 18 - 31 August 2021 ==
Voting for the [[:m:Wikimedia Foundation elections/2021/Voting|2021 Board of Trustees election]] is now open. Candidates from the community were asked to submit their candidacy. After a three-week-long Call for Candidates, there are [[:m:Wikimedia_Foundation_elections/2021/Candidates#Candidate_Table|19 candidates for the 2021 election]].
The Wikimedia movement has the opportunity to vote for the selection of community and affiliate trustees. By voting, you will help to identify those people who have the qualities to best serve the needs of the movement for the next several years. The Board is expected to select the four most voted candidates to serve as trustees. Voting closes 31 August 2021.
*[[:m:Wikimedia_Foundation_elections/2021/Candidates#Candidate_Table|Learn more about candidates]].
*[[:c:File:Wikimedia Foundation Board of Trustees.webm|Learn about the Board of Trustees]].
*[[:m:Wikimedia Foundation elections/2021/Voting|'''Vote''']]
Read the [[:m:Wikimedia Foundation elections/2021/2021-08-18/2021 Voting Opens|full announcement and see translations on Meta-Wiki]].
Please let me know if you have any questions regarding voting. [[:m:User:KCVelaga (WMF)|KCVelaga (WMF)]], ०६:११, १८ अगस्त २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=21829177 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== Universal Code of Conduct - Enforcement draft guidelines review ==
The [[:m:Universal_Code_of_Conduct/Drafting_committee#Phase_2|Universal Code of Conduct Phase 2 drafting committee]] would like comments about the enforcement draft guidelines for the [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct|Universal Code of Conduct]] (UCoC). This review period is planned for 17 August 2021 through 17 October 2021.
These guidelines are not final but you can help move the progress forward. The committee will revise the guidelines based upon community input.
Comments can be shared in any language on the [[m:Talk:Universal Code of Conduct/Enforcement draft guidelines review|draft review talk page]] and [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Discussions|multiple other venues]]. Community members are encouraged to organize conversations in their communities.
There are planned live discussions about the UCoC enforcement draft guidelines:
*[[wmania:2021:Submissions/Universal_Code_of_Conduct_Roundtable|Wikimania 2021 session]] (recorded 16 August)
*[[m:Special:MyLanguage/Universal_Code_of_Conduct/2021_consultations/Roundtable_discussions#Conversation hours|Conversation hours]] - 24 August, 31 August, 7 September @ 03:00 UTC & 14:00 UTC
*[[m:Special:MyLanguage/Universal_Code_of_Conduct/2021_consultations/Roundtable_discussions|Roundtable calls]] - 18 September @ 03:00 UTC & 15:00 UTC
Summaries of discussions will be posted every two weeks [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Drafting committee/Digest|here]].
Please let me know if you have any questions. [[User:KCVelaga (WMF)|KCVelaga (WMF)]], ०६:२४, १८ अगस्त २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=21829177 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== [Reminder] Wikimedia Foundation elections 2021: 3 days left to vote ==
Dear Wikimedians,
As you may already know, Wikimedia Foundation elections started on 18 August and will continue until 31 August, 23:59 UTC i.e. ~ 3 days left.
Members of the Wikimedia community have the opportunity to elect four candidates to a three-year term.
Here are the links that might be useful for voting.
*[[:m:Wikimedia Foundation elections/2021|Elections main page]]
*[[:m:Wikimedia Foundation elections/2021/Candidates|Candidates for the election]]
*[[:m:Wikimedia Foundation elections/2021/Candidates/CandidateQ&A|Q&A from candidates]]
*👉 [[:m:Wikimedia Foundation elections/2021/Voting|'''Voting''']] 👈
We have also published stats regarding voter turnout so far, you can check how many eligible voters from your wiki has voted on [[:m:Wikimedia Foundation elections/2021/Stats|this page]].
Please let me know if you have any questions. [[:m:User:KCVelaga (WMF)|KCVelaga (WMF)]], ०५:४०, २९ अगस्त २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=21829177 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== Results of 2021 Wikimedia Foundation elections ==
Thank you to everyone who participated in the 2021 Board election. The Elections Committee has reviewed the votes of the 2021 Wikimedia Foundation Board of Trustees election, organized to select four new trustees. A record 6,873 people from across 214 projects cast their valid votes. The following four candidates received the most support:
*Rosie Stephenson-Goodknight
*Victoria Doronina
*Dariusz Jemielniak
*Lorenzo Losa
While these candidates have been ranked through the community vote, they are not yet appointed to the Board of Trustees. They still need to pass a successful background check and meet the qualifications outlined in the Bylaws. The Board has set a tentative date to appoint new trustees at the end of this month.
Read the [[:m:Wikimedia Foundation elections/2021/2021-09-07/2021 Election Results|full announcement here]]. [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ०२:५६, ८ सितम्बर २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=21829177 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== Universal Code of Conduct EDGR conversation hour for South Asia ==
Dear Wikimedians,
As you may already know, the [[:m:Universal Code of Conduct|Universal Code of Conduct]] (UCoC) provides a baseline of behaviour for collaboration on Wikimedia projects worldwide. Communities may add to this to develop policies that take account of local and cultural context while maintaining the criteria listed here as a minimum standard. The Wikimedia Foundation Board has ratified the policy in December 2020.
The [[:m:Universal Code of Conduct/Enforcement draft guidelines review|current round of conversations]] is around how the Universal Code of Conduct should be enforced across different Wikimedia platforms and spaces. This will include training of community members to address harassment, development of technical tools to report harassment, and different levels of handling UCoC violations, among other key areas.
The conversation hour is an opportunity for community members from South Asia to discuss and provide their feedback, which will be passed on to the drafting committee. The details of the conversation hour are as follows:
*Date: 16 September
*Time: Bangladesh: 5:30 pm to 7 pm, India & Sri Lanka: 5 pm to 6:30 pm, Nepal: 5:15 pm to 5:45 pm
*Meeting link: https://meet.google.com/dnd-qyuq-vnd | [https://calendar.google.com/event?action=TEMPLATE&tmeid=NmVzbnVzbDA2Y3BwbHU4bG8xbnVybDFpOGgga2N2ZWxhZ2EtY3RyQHdpa2ltZWRpYS5vcmc&tmsrc=kcvelaga-ctr%40wikimedia.org add to your calendar]
You can also attend the global round table sessions hosted on 18 September - more details can be found on [[:m:Universal Code of Conduct/2021 consultations/Roundtable discussions/Sep18Announcement|this page]]. [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १०:४७, १० सितम्बर २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=21829177 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== Movement Charter Drafting Committee - Community Elections to take place October 11 - 24 ==
This is a short message with an update from the Movement Charter process. The call for candidates for the Drafting Committee closed September 14, and we got a diverse range of candidates. The committee will consist of 15 members, and those will be (s)elected via three different ways.
The 15 member committee will be selected with a [[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Set Up Process|3-step process]]:
* Election process for project communities to elect 7 members of the committee.
* Selection process for affiliates to select 6 members of the committee.
* Wikimedia Foundation process to appoint 2 members of the committee.
The community elections will take place between October 11 and October 24. The other process will take place in parallel, so that all processes will be concluded by November 1.
For the full context of the Movement Charter, its role, as well the process for its creation, please [[:m:Special:MyLanguage/Movement Charter|have a look at Meta]]. You can also contact us at any time on Telegram or via email (wikimedia2030@wikimedia.org).
Best, [[User:RamzyM (WMF)|RamzyM (WMF)]] ०२:४६, २२ सितम्बर २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=21829177 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:RamzyM (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== Voting period to elect members of the Movement Charter Drafting Committee is now open ==
<div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
<section begin="announcement-content"/>Voting for the election for the members for the Movement Charter drafting committee is now open. In total, 70 Wikimedians from around the world are running for 7 seats in these elections.
'''Voting is open from October 12 to October 24, 2021.'''
The committee will consist of 15 members in total: The online communities vote for 7 members, 6 members will be selected by the Wikimedia affiliates through a parallel process, and 2 members will be appointed by the Wikimedia Foundation. The plan is to assemble the committee by November 1, 2021.
Learn about each candidate to inform your vote in the language that you prefer: <https://meta.wikimedia.org/wiki/Special:MyLanguage/Movement_Charter/Drafting_Committee/Candidates>
Learn about the Drafting Committee: <https://meta.wikimedia.org/wiki/Special:MyLanguage/Movement_Charter/Drafting_Committee>
We are piloting a voting advice application for this election. Click yourself through the tool and you will see which candidate is closest to you! Check at <https://mcdc-election-compass.toolforge.org/>
Read the full announcement: <https://meta.wikimedia.org/wiki/Special:MyLanguage/Movement_Charter/Drafting_Committee/Elections>
'''Go vote at SecurePoll on:''' <https://meta.wikimedia.org/wiki/Special:MyLanguage/Movement_Charter/Drafting_Committee/Elections>
Best,
Movement Strategy & Governance Team, Wikimedia Foundation
<section end="announcement-content"/>
</div>
०५:५०, १३ अक्टूबर २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=22177090 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:RamzyM (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== Meet the new Movement Charter Drafting Committee members ==
:''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Elections/Results/Announcement|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Movement Charter/Drafting Committee/Elections/Results/Announcement}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]''
The Movement Charter Drafting Committee election and selection processes are complete.
* The [[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Elections/Results|election results have been published]]. 1018 participants voted to elect seven members to the committee: '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Richard_Knipel_(Pharos)|Richard Knipel (Pharos)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Anne_Clin_(Risker)|Anne Clin (Risker)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Alice_Wiegand_(lyzzy)|Alice Wiegand (Lyzzy)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Micha%C5%82_Buczy%C5%84ski_(Aegis_Maelstrom)|Michał Buczyński (Aegis Maelstrom)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Richard_(Nosebagbear)|Richard (Nosebagbear)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Ravan_J_Al-Taie_(Ravan)|Ravan J Al-Taie (Ravan)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Ciell_(Ciell)|Ciell (Ciell)]]'''.
* The [[m:Special:MyLanguage/Movement_Charter/Drafting_Committee/Candidates#Affiliate-chosen_members|affiliate process]] has selected six members: '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Anass_Sedrati_(Anass_Sedrati)|Anass Sedrati (Anass Sedrati)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#%C3%89rica_Azzellini_(EricaAzzellini)|Érica Azzellini (EricaAzzellini)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Jamie_Li-Yun_Lin_(Li-Yun_Lin)|Jamie Li-Yun Lin (Li-Yun Lin)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Georges_Fodouop_(Geugeor)|Georges Fodouop (Geugeor)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Manavpreet_Kaur_(Manavpreet_Kaur)|Manavpreet Kaur (Manavpreet Kaur)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee/Candidates#Pepe_Flores_(Padaguan)|Pepe Flores (Padaguan)]]'''.
* The Wikimedia Foundation has [[m:Special:MyLanguage/Movement_Charter/Drafting_Committee/Candidates#Wikimedia_Foundation-chosen_members|appointed]] two members: '''[[m:Special:MyLanguage/Movement_Charter/Drafting_Committee/Candidates#Runa_Bhattacharjee_(Runab_WMF)|Runa Bhattacharjee (Runab WMF)]]''', '''[[m:Special:MyLanguage/Movement_Charter/Drafting_Committee/Candidates#Jorge_Vargas_(JVargas_(WMF))|Jorge Vargas (JVargas (WMF))]]'''.
The committee will convene soon to start its work. The committee can appoint up to three more members to bridge diversity and expertise gaps.
If you are interested in engaging with [[m:Special:MyLanguage/Movement Charter|Movement Charter]] drafting process, follow the updates [[m:Special:MyLanguage/Movement Charter/Drafting Committee|on Meta]] and join the [https://t.me/joinchat/U-4hhWtndBjhzmSf Telegram group].
With thanks from the Movement Strategy and Governance team,<br>
[[User:RamzyM (WMF)|RamzyM (WMF)]] ०२:२७, २ नवम्बर २०२१ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=22177090 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:RamzyM (WMF)@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== आगामी न्यासी मंडल चुनाव के लिए कॉल फॉर फीडबैक ==
:''संदेश को मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित किया गया है।''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback:2022 Board of Trustees election/Upcoming Call for Feedback about the Board of Trustees elections|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback:2022 Board of Trustees election/Upcoming Call for Feedback about the Board of Trustees elections}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
न्यासी मंडल आगामी बोर्ड चुनावों के बारे में कॉल फॉर फीडबैक तैयार कर रहा है। यह ७ जनवरी - १० फरवरी २०२२ के बीच होगा।
भले ही कॉल फॉर फीडबैक का विवरण एक सप्ताह पहले दिया जाएगा, हमने दो प्रश्नों की पुष्टि की है जो कॉल फॉर फीडबैक के दौरान प्रतिक्रिया के लिए पूछे जाएंगे:
* न्यासी मंडल के बीच उभरते समुदायों का निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
* चुनाव के दौरान उम्मीदवारों की भागीदारी कैसी होनी चाहिए?
भले ही अतिरिक्त प्रश्न जोड़े जा सकते हैं, लेकिन आंदोलन रणनीति और शासन टीम समुदाय के सदस्यों और सहयोगियों को विचार - विमर्श के लिए समय प्रदान करना चाहती हैं। प्रश्नों की पूरी सूची नहीं होने के लिए हम माफी माँगते हैं। प्रश्नों की सूची केवल एक या दो प्रश्नों से बढ़नी चाहिए। हमारा इरादा अनुरोधों के साथ समुदाय को अभिभूत करना नहीं है।
'''क्या आप स्थानीय बातचीत को व्यवस्थित करने में मदद करना चाहते हैं?'''
मेटा पर, [https://t.me/wmboardgovernancechat टेलीग्राम] पर, या msg[[File:At sign.svg|16x16px|link=|(_AT_)]]wikimedia.org पर ईमेल के माध्यम से [[m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance|आंदोलन रणनीति और शासन टीम]] से संपर्क करें।
यदि आपके कोई प्रश्न हैं तो हमसे संपर्क करें। आंदोलन रणनीति और शासन टीम में ३ जनवरी तक कर्मचारियों की कमी होगी। कृपया विलंबित प्रतिक्रिया को क्षमा करें; यदि हमारा संदेश आपकी छुट्टियों के दौरान आपके पास पहुँचा है तो हम क्षमा चाहते हैं।
धन्यवाद, [[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) १०:१३, २८ दिसम्बर २०२१ (UTC)
== Wiki Loves Folklore is back! ==
<div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
{{int:please-translate}}
[[File:Wiki Loves Folklore Logo.svg|right|150px|frameless]]
You are humbly invited to participate in the '''[[:c:Commons:Wiki Loves Folklore 2022|Wiki Loves Folklore 2022]]''' an international photography contest organized on Wikimedia Commons to document folklore and intangible cultural heritage from different regions, including, folk creative activities and many more. It is held every year from the '''1st till the 28th''' of February.
You can help in enriching the folklore documentation on Commons from your region by taking photos, audios, videos, and [https://commons.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:UploadWizard&campaign=wlf_2022 submitting] them in this commons contest.
You can also [[:c:Commons:Wiki Loves Folklore 2022/Organize|organize a local contest]] in your country and support us in translating the [[:c:Commons:Wiki Loves Folklore 2022/Translations|project pages]] to help us spread the word in your native language.
Feel free to contact us on our [[:c:Commons talk:Wiki Loves Folklore 2022|project Talk page]] if you need any assistance.
'''Kind regards,'''
'''Wiki loves Folklore International Team'''
--[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १३:१५, ९ जनवरी २०२२ (UTC)
</div>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Tiven2240/wlf&oldid=22560402 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Tiven2240@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== न्यासी बोर्ड चुनाव के लिए प्रतिक्रिया आह्वान शूरु हो गए है ==
<section begin="announcement-content" />:''[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections/Call for Feedback about the Board of Trustees elections is now open|संदेश को मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित किया गया है।]]''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections/Call for Feedback about the Board of Trustees elections is now open|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections/Call for Feedback about the Board of Trustees elections is now open}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
प्रतिक्रिया आह्वान:न्यासी मंडल चुनाव शूरु हो गए है और ७ फरवरी २०२२ को बंद हो जाएंगे।
इस प्रतिक्रिया आह्वान पहल में, हमारा दृष्टिकोण २०२१ की प्रक्रिया से सामुदायिक प्रतिक्रिया को शामिल करना होगा। चर्चा प्रमुख प्रश्नों पर केंद्रित होगी। इरादा सामूहिक बातचीत और सहयोगी प्रस्ताव विकास को प्रेरित करना है।
प्रतिक्रिया आह्वान के दौरान दो पुष्ट प्रश्न पूछे जाएंगे:
# निर्वाचित उम्मीदवारों के बीच उभरते समुदायों का निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? ''न्यासी मंडल समझता है कि उम्मीदवारों का चयन विकिमीडिया आंदोलन की पूर्ण विविधता का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। वर्तमान प्रक्रियाओं ने उत्तरी अमेरिका और यूरोप के स्वयंसेवकों का पक्ष लिया है।''
# चुनाव के दौरान उम्मीदवारों की भागीदारी कैसी होनी चाहिए? ''परंपरागत रूप से, न्यासी मंडल के उम्मीदवारों ने आवेदन पूरे किए और सामुदायिक सवालों के जवाब दिए। एक चुनाव स्वयंसेवकों के रूप में उम्मीदवारों की स्थिति की सराहना करते हुए उम्मीदवारों में उचित अंतर्दृष्टि कैसे प्रदान कर सकता है?''
प्रतिक्रिया आह्वान के दौरान एक अतिरिक्त प्रश्न पूछा जा सकता है।
[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections|बातचीत में भाग लें]]
धन्यवाद,
आंदोलन रणनीति और शासन<section end="announcement-content"/>
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ११:२९, १२ जनवरी २०२२ (UTC)
== Subscribe to the This Month in Education newsletter - learn from others and share your stories ==
<div lang="en" dir="ltr" class="mw-content-ltr">
Dear community members,
Greetings from the EWOC Newsletter team and the education team at Wikimedia Foundation. We are very excited to share that we on tenth years of Education Newsletter ([[m:Education/News|This Month in Education]]) invite you to join us by [[m:Global message delivery/Targets/This Month in Education|subscribing to the newsletter on your talk page]] or by [[m:Education/News/Newsroom|sharing your activities in the upcoming newsletters]]. The Wikimedia Education newsletter is a monthly newsletter that collects articles written by community members using Wikimedia projects in education around the world, and it is published by the EWOC Newsletter team in collaboration with the Education team. These stories can bring you new ideas to try, valuable insights about the success and challenges of our community members in running education programs in their context.
If your affiliate/language project is developing its own education initiatives, please remember to take advantage of this newsletter to publish your stories with the wider movement that shares your passion for education. You can submit newsletter articles in your own language or submit bilingual articles for the education newsletter. For the month of January the deadline to submit articles is on the 20th January. We look forward to reading your stories.
Older versions of this newsletter can be found in the [[outreach:Education/Newsletter/Archives|complete archive]].
More information about the newsletter can be found at [[m:Education/News/Publication Guidelines|Education/Newsletter/About]].
For more information, please contact spatnaik{{@}}wikimedia.org.
------
<div style="text-align: center;"><div style="margin-top:10px; font-size:90%; padding-left:5px; font-family:Georgia, Palatino, Palatino Linotype, Times, Times New Roman, serif;">[[m:Education/Newsletter/About|About ''This Month in Education'']] · [[m:Global message delivery/Targets/This Month in Education|Subscribe/Unsubscribe]] · [[m:MassMessage|Global message delivery]] · For the team: [[User:ZI Jony|<span style="color:#8B0000">'''ZI Jony'''</span>]] [[User talk:ZI Jony|<sup><span style="color:Green"><i>(Talk)</i></span></sup>]], {{<includeonly>subst:</includeonly>#time:l G:i, d F Y|}} (UTC)</div></div>
</div>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:ZI_Jony/MassMessage/Awareness_of_Education_Newsletter/List_of_Village_Pumps&oldid=21244129 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:ZI Jony@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== आंदोलन रणनीति और शासन समाचार - प्रकाशन ५ ==
<section begin="ucoc-newsletter"/>
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Newsletter/5/Global message|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Movement Strategy and Governance/Newsletter/5/Global message}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
<span style="font-size:200%;">'''आंदोलन रणनीति और शासन समाचार'''</span><br>
<span style="font-size:120%; color:#404040;">'''प्रकाशन ५, जनुअरी २०२२'''</span><span style="font-size:120%; float:right;">[[m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Newsletter/5|'''पूरा संवादपत्र पढ़ें''']]</span>
----
आंदोलन रणनीति और शासन समाचार के पांचवें प्रकाशन में आपका स्वागत है (जिसे पहले सार्वभौमिक आचार संहित समाचार के रूप में जाना जाता था)! संशोधित संवादपत्र आंदोलन घोषणापत्र, सार्वभौमिक आचार संहिता, आंदोलन रणनीति कार्यान्वयन अनुदान, न्यासी मंडल चुनाव और आंदोलन रणनीति और शासन से संबंधित अन्य प्रासंगिक विषयों के बारे में समाचार को वितरित करता है।
संवादपत्र को त्रैमासिक रूप से वितरित किया जाएगा, जब की लगातार अद्यतन सब्सक्राइबर्स को साप्ताहिक या द्वि-साप्ताहिक वितरित किए जाएंगे। यदि आप इन अद्यतनों को प्राप्त करना चाहते हैं तो कृपया यहाँ '''[[:m:Special:MyLanguage/Global message delivery/Targets/MSG Newsletter Subscription|सदस्यता]]''' प्राप्त करे।
<div style="margin-top:3px; padding:10px 10px 10px 20px; background:#fffff; border:2px solid #808080; border-radius:4px; font-size:100%;">
*'''न्यासी मंडल चुनावों के लिए प्रतिक्रिया आह्वान''' - हम आपको आगामी विकिमीडिया फाउंडेशन न्यासी मंडल चुनाव पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए आमंत्रित करते हैं। प्रतिक्रिया आह्वान १० जनवरी २०२२ को शुरू हुआ और १६ फरवरी २०२२ को समाप्त होगा। ([[:m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Newsletter/5#Call for Feedback about the Board elections|अधिक पढ़ें]])
*'''सार्वभौमिक आचार संहिता अनुसमर्थन''' - २०२१ में, विकिमीडिया फाउंडेशन ने समुदायों से सार्वभौमिक आचार संहिता नीति को लागू करने के बारे में पूछा था। प्रवर्तन दिशानिर्देशों का संशोधित मसौदा मार्च तक सामुदायिक वोट के लिए तैयार होना चाहिए। ([[:m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Newsletter/5#Universal Code of Conduct Ratification|अधिक पढ़ें]])
*'''आंदोलन रणनीति कार्यान्वयन अनुदान''' - जैसा कि हम कई प्रस्तावों की समीक्षा जारी रखते हैं, हम आपको और अधिक प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जो आंदोलन रणनीति सिफारिशों से एक विशिष्ट पहल को लक्षित करते हैं। ([[:m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Newsletter/5#Movement Strategy Implementation Grants|अधिक पढ़ें]])
*'''संवादपत्र की नई दिशा''' - UCoC संवादपत्र को MSG संवादपत्र बनाने की परिवर्तन प्रक्रिया में आप फैसिलिटेटर दल के साथ उसके नई दिशाओं की कल्पना और निर्णय लेने में भाग ले सकते हैं। ([[:m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Newsletter/5#The New Direction for the Newsletter|अधिक पढ़ें]])
*'''डिफ ब्लॉग्स''' - विकिमीडिया डिफ पर MSG के बारे में पढ़ें। ([[:m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Newsletter/5#Diff Blogs|अधिक पढ़ें]])</div><section end="ucoc-newsletter"/>
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ०७:२६, १९ जनवरी २०२२ (UTC)
== [घोषणा] नेतृत्व विकास टास्क फोर्स ==
नमस्कार,
[[:m:Strategy/Wikimedia movement/2018-20/Recommendations/Invest in Skills and Leadership Development|कौशल और नेतृत्व विकास]] आंदोलन रणनीति सिफारिश यह इंगित करता है कि हमारे आंदोलन को नेतृत्व विकास में सफल होने के लिए विश्व स्तर पर समन्वित प्रयास की आवश्यकता है।
[[:m:Community Development|सामुदायिक विकास टीम]] एक वैश्विक और समुदाय-संचालित [[:m:Leadership Development Task Force|नेतृत्व विकास टास्क फोर्स]] ([[:m:Leadership Development Task Force/Purpose and Structure|उद्देश्य और संरचना]]) के निर्माण का समर्थन कर रही है। टास्क फोर्स का उद्देश्य नेतृत्व विकास कार्य को सलाह देना है।
टीम टास्क फोर्स की जिम्मेदारियां क्या हो सकती है, इस पर सामुदायिक प्रतिक्रिया चाहती है। इसके अलावा, यदि कोई भी समुदाय सदस्य इस १२-सदस्यीय टास्क फोर्स का हिस्सा बनना चाहता है, तो कृपया तो कृपया हमसे संपर्क करें। प्रतिक्रिया अवधि २५ फरवरी २०२२ तक है।
'''प्रतिक्रिया कहां साझा करें?'''
<nowiki>#</nowiki>१ इच्छुक समुदाय के सदस्य [[:m:Talk:Leadership Development Task Force|चर्चा पृष्ठ]] पर अपने विचार जोड़ सकते हैं।
<nowiki>#</nowiki>२ इच्छुक समुदाय के सदस्य Google Meet के माध्यम से 18 फरवरी, शुक्रवार को एक क्षेत्रीय चर्चा में शामिल हो सकते हैं।
'''दिनांक और समय'''
* Friday, 18 February · 7:00 – 8:00 PM IST ([https://zonestamp.toolforge.org/1645191032 Your Timezone]) ([https://calendar.google.com/event?action=TEMPLATE&tmeid=NHVqMjgxNGNnOG9rYTFtMW8zYzFiODlvNGMgY19vbWxxdXBsMTRqbnNhaHQ2N2Y5M2RoNDJnMEBn&tmsrc=c_omlqupl14jnsaht67f93dh42g0%40group.calendar.google.com Add to Calendar])
* Google Meet link: https://meet.google.com/nae-rgsd-vif
धन्यवाद। [[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ११:५१, ९ फ़रवरी २०२२ (UTC)
== सार्वभौमिक आचार संहिता (UCoC) प्रवर्तन दिशानिर्देश और अनुसमर्थन वोट ==
'''संक्षेप:''' [[:m:Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines|संशोधित प्रवर्तन दिशानिर्देश]] प्रकाशित किए गए हैं। दिशानिर्देशों की पुष्टि करने के लिए मतदान [[:m:Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Voting|७ मार्च से २१ मार्च २०२२]] तक होगा। २५ फरवरी (१२:०० UTC) और ४ मार्च (१५:०० UTC) को समुदाय के सदस्य परियोजना टीम और मसौदा समिति के सदस्यों के साथ चर्चा में भाग ले सकते हैं। कृपया [[:m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Conversations|साइन-अप]] करें।
'''विवरण:'''
[[:m:Universal Code of Conduct|सार्वभौमिक आचार संहिता]] (UCoC) पूरे विकिमीडिया आंदोलन के लिए स्वीकार्य व्यवहार का आधार रेखा प्रदान करता है। UCoC और प्रवर्तन दिशानिर्देश [[:m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Drafting committee|स्वयंसेवक-कर्मचारी मसौदा समितियों]] द्वारा सामुदायिक परामर्श के बाद लिखे गए हैं। संशोधित दिशानिर्देश २४ जनवरी २०२२ को प्रकाशित किए गए थे।
'''आगे क्या होगा?'''
'''#१ सामुदायिक वार्तालाप'''
दिशानिर्देशों को समझने में मदद करने के लिए, [[:m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance|आंदोलन रणनीति और अनुशासन]] (MSG) टीम, UCoC परियोजना टीम और मसौदा समिति के सदस्यों के साथ, २५ फरवरी (१२:०० UTC) और ४ मार्च (१५:०० UTC) को होने वाले बातचीत की मेजबानी करेगी। कृपया [[:m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Conversations|साइन-अप]] करें।
दिशानिर्देशों के बारे में टिप्पणियाँ [[:m:Talk:Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines|प्रवर्तन दिशानिर्देश वार्ता पृष्ठ पर]] साझा की जा सकती हैं। आप किसी भी भाषा में टिप्पणी कर सकते हैं।
'''#2 अनुसमर्थन वोट'''
विकिमीडिया फाउंडेशन ट्रस्टी बोर्ड ने [[:m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Board noticeboard/January 2022 - Board of Trustees on Community ratification of enforcement guidelines of UCoC|अनुसमर्थन प्रक्रिया पर एक बयान जारी किया]], जहां मतदाता वोट के माध्यम से प्रवर्तन दिशानिर्देशों को अपनाने का समर्थन या विरोध कर सकते हैं। विकिमीडिएंस को [[:m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Voter information/Volunteer|महत्वपूर्ण जानकारी का अनुवाद करने और साझा करने के लिए]] आमंत्रित किया जाता है।
[[:m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Voting|SecurePoll]] के माध्यम से वोटिंग प्रक्रिया निर्धारित की गयी है। वोटिंग ७ मार्च से २१ मार्च २०२२ तक चलेगी।
[[:m:Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Voter information#Voting%20eligibility|योग्य मतदाताओं]] को एक सर्वेक्षण प्रश्न का उत्तर देने और टिप्पणियों को साझा करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। मतदाताओं से पूछा जाएगा कि क्या वे प्रस्तावित दिशानिर्देशों के आधार पर UCoC के प्रवर्तन का समर्थन करते हैं।
धन्यवाद। [[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) १७:३९, २२ फ़रवरी २०२२ (UTC)
== <section begin="announcement-header" />न्यासी बोर्ड चुनाव के लिए प्रतिक्रिया आह्वान समाप्त हो गए हैं <section end="announcement-header" /> ==
<section begin="announcement-content" />:''[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections/Call for Feedback is now closed|संदेश को मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित किया गया है।]]''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections/Call for Feedback is now closed|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections/Call for Feedback is now closed}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
[[m:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections|न्यासी बोर्ड चुनाव के लिए प्रतिक्रिया आह्वान]] समाप्त हो गए हैं। प्रतिक्रिया आह्वान १० जनवरी से १६ फरवरी २०२२ 2 के बीच आयोजित किया गया था। प्रतिक्रिया आह्वान ने [[m:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections/Discuss Key Questions#Questions|तीन प्रमुख सवालों]] पर ध्यान केंद्रित किया और [[m:Talk:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections/Discuss Key Questions|मेटा-विकी]] पर, सहयोगियों के साथ बैठकों के दौरान, और विभिन्न सामुदायिक वार्तालापों से प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुए। समुदाय और सहयोगियों ने कई प्रस्ताव और चर्चा बिंदु प्रदान किए। [[m:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Call for feedback: Board of Trustees elections/Reports|रिपोर्ट]] मेटा-विकी पर प्रकाशित किये गए हैं।
यह जानकारी न्यासी बोर्ड और चुनाव समिति के साथ साझा की जाएगी ताकि वे आगामी न्यासी बोर्ड के चुनाव के बारे में सूचित निर्णय ले सकें। न्यासी बोर्ड आंतरिक चर्चा के बाद एक घोषणा करेगा।
चुनाव प्रक्रियाओं में सुधार के लिए भाग लेने और मदद करने के लिए धन्यवाद।
धन्यवाद,
आंदोलन रणनीति और शासन<br /><section end="announcement-content" />
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ०८:३८, ५ मार्च २०२२ (UTC)
== UCoC प्रवर्तन दिशानिर्देशों के लिए अनुसमर्थन मतदान शुरू हो गए है (७ - २१ मार्च २०२२) ==
[[metawiki:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct|सार्वभौमिक आचार संहिता]] (UCoC) [[metawiki:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines|प्रवर्तन दिशानिर्देशों]] का अनुसमर्थन शुरू हो गया है। प्रत्येक योग्य समुदाय सदस्य मतदान कर सकता है।
SecurePoll और वोटिंग पात्रता के बारे में जानने के लिए, [[metawiki:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Voter_information|कृपया इस पृष्ठ को पढ़ें]]। मतदान करने की अंतिम तिथि २१ मार्च २०२२ है।
'''यहां वोट करें''' - https://meta.wikimedia.org/wiki/Special:SecurePoll/vote/391
धन्यवाद। [[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) १७:०२, ७ मार्च २०२२ (UTC)
== <section begin="announcement-header" />सार्वभौमिक आचार संहिता प्रवर्तन दिशानिर्देश अनुसमर्थन मतदान समाप्त हो गए है<section end="announcement-header" /> ==
<section begin="announcement-content" />
:''[[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Vote/Closing message|संदेश को मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित किया गया है।]]''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Vote/Closing message|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Vote/Closing message}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
नमस्कार,
[[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct|सार्वभौमिक आचार संहिता]] (UCoC) के [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines|संशोधित प्रवर्तन दिशानिर्देशों]] के लिए अनुसमर्थन मतदान प्रक्रिया २१ मार्च २०२२ को समाप्त हुए। '''{{#expr:2300}} से अधिक''' विकिमेडियन ने मतदान किया। इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले सभी लोगों को धन्यवाद! जांच समूह अब सटीकता के लिए वोट की समीक्षा करेगा; कृपया उन्हें अपना काम पूरा करने के लिए दो सप्ताह तक का समय दें।
मतदान प्रक्रिया से अंतिम परिणाम [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Voting/Results|यहां]] घोषित किए जाएंगे, साथ ही प्रासंगिक आंकड़ों और टिप्पणियों का सारांश भी। अगले चरणों के बारे में जानने के लिए कृपया [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Voter information|मतदाता सूचना पृष्ठ]] देखें। आप किसी भी भाषा में [[m:Talk:Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines|मेटा-विकी टॉक पेजों पर]] टिप्पणी कर सकते हैं। आप ईमेल द्वारा भी टीम से संपर्क कर सकते हैं: ucocproject[[File:At sign.svg|16x16px|link=|(_AT_)]]wikimedia.org
धन्यवाद,
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ०९:३४, २३ मार्च २०२२ (UTC)
== Announcing Indic Hackathon 2022 and Scholarship Applications ==
Dear Wikimedians, we are happy to announce that the Indic MediaWiki Developers User Group will be organizing [[m:Indic Hackathon 2022|Indic Hackathon 2022]], a regional event as part of the main [[mw:Wikimedia Hackathon 2022|Wikimedia Hackathon 2022]] taking place in a hybrid mode during 20-22 May 2022. The event will take place in Hyderabad. The regional event will be in-person with support for virtual participation. As it is with any hackathon, the event’s program will be semi-structured i.e. while we will have some sessions in sync with the main hackathon event, the rest of the time will be upto participants’ interest on what issues they are interested to work on. The event page can be seen on [[m:Indic Hackathon 2022|this page]].
In this regard, we would like to invite community members who would like to attend in-person to fill out a [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSc1lhp8IdXNxL55sgPmgOKzfWxknWzN870MvliqJZHhIijY5A/viewform?usp=sf_link form for scholarship application] by 17 April, which is available on the event page. Please note that the hackathon won’t be focusing on training of new skills, and it is expected that applications have some experience/knowledge contributing to technical areas of the Wikimedia movement. Please post on the event talk page if you have any queries. [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १८:३१, ७ अप्रैल २०२२ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=23115331 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== मरियाना इस्कंदर के साथ दक्षिण एशिया / ESEAP सम्बंधित वार्षिक योजना की बैठक ==
प्रिय समुदाय सदस्य,
[[m:User:MIskander-WMF|मरियाना इस्कंदर]] के [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Chief Executive Officer/Maryana’s Listening Tour| लिसनिंग टूर]] की निरंतरता में, [[m:Special:MyLanguage/Movement Communications|आंदोलन संचार]] और [[m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance|आंदोलन रणनीति और शासन]] दल '''[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Annual Plan/2022-2023/draft|२०२२-२३ विकिमीडिया फाउंडेशन वार्षिक योजना]]''' पर चर्चा करने के लिए आपको आमंत्रित कर रहा हैं।
बातचीत इन सवालों के बारे में है:
* [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia 2030|२०३० विकिमीडिया आंदोलन रणनीति]] "knowledge as a service" और "knowledge equity" की तरफ दिशा निर्धारित करता है। विकिमीडिया फाउंडेशन इन दो लक्ष्यों के अनुसार योजना बनाना चाहता है। इस सन्दर्भ में, विकिमीडिया फाउंडेशन के लिए आपके क्या सुझाव हैं?
* विकिमीडिया फाउंडेशन क्षेत्रीय स्तर पर काम करने के बेहतर तरीके तलाश रहा है। हमने अनुदान, नई सुविधाओं और सामुदायिक बातचीत में अपना ध्यान बढ़ाया है। हम और कैसे सुधार कर सकते हैं?
* कोई भी आंदोलन रणनीति प्रक्रिया में योगदान कर सकता है। हम आपकी गतिविधियों, विचारों और अनुरोधों के बारे में अधिक जानना चाहते हैं। विकिमीडिया फाउंडेशन आंदोलन रणनीति गतिविधियों में काम कर रहे स्वयंसेवकों और एफिलिएटस के लिए अपने समर्थन में सुधार कैसे कर सकता है?
<b>दिनांक और समय</b>
बैठक [https://wikimedia.zoom.us/j/84673607574?pwd=dXo0Ykpxa0xkdWVZaUZPNnZta0k1UT09 Zoom] के माध्यम से होगी। दिनांक और समय हैं २४ अप्रैल (रविवार) ०७:०० UTC ([https://zonestamp.toolforge.org/1650783659 स्थानीय समय])। कृपया बैठक को [https://calendar.google.com/event?action=TEMPLATE&tmeid=MmtjZnJibXVjYXYyZzVwcGtiZHVjNW1lY3YgY19vbWxxdXBsMTRqbnNhaHQ2N2Y5M2RoNDJnMEBn&tmsrc=c_omlqupl14jnsaht67f93dh42g0%40group.calendar.google.com अपने कैलेंडर में जोड़ें]। कुछ भाषाओं के लिए लाइव व्याख्या उपलब्ध होगी।
धन्यवाद,
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) १०:४२, १७ अप्रैल २०२२ (UTC)
==उम्मीदवारों के लिए आह्वान: २०२२ ट्रस्टी बोर्ड चुनाव==
प्रिय समुदाय सदस्य,
[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022|२०२२ ट्रस्टी बोर्ड चुनाव]] प्रक्रिया शुरू हो गई है। [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_elections/2022/Announcement/Call_for_Candidates|उम्मीदवारों के लिए आह्वान]] की घोषणा की गई है।
ट्रस्टी बोर्ड विकिमीडिया फाउंडेशन के संचालन की देखरेख करता है। समुदाय और एफिलिएट चयनित ट्रस्टी और बोर्ड द्वारा नियुक्त ट्रस्टी, ट्रस्टी बोर्ड बनाते हैं। प्रत्येक ट्रस्टी तीन साल का कार्यकाल पूरा करता है। विकिमीडिया समुदाय के पास समुदाय और एफिलिएट चयनित न्यासियों के लिए मतदान करने का अवसर है।
विकिमीडिया समुदाय २०२२ में ट्रस्टी बोर्ड में दो सीटों का चुनाव करने के लिए मतदान करेगा। यह ट्रस्टी बोर्ड के प्रतिनिधित्व, विविधता और विशेषज्ञता में सुधार करने का एक अवसर है।
ट्रस्टी बोर्ड में शामिल होने के लिए कृपया [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Apply to be a Candidate|अपनी उम्मीदवारी जमा करें]]।
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ०९:१२, २९ अप्रैल २०२२ (UTC)
== <section begin="announcement-header" />विकिमीडिया फाउंडेशन २०२२ न्यासी बोर्ड चुनाव - चुनाव स्वयंसेवकों के लिए आह्वान<section end="announcement-header" /> ==
<section begin="announcement-content" />
:''[[m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Election Volunteers/2022/Call for Election Volunteers|संदेश को मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित किया गया है।]]''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Election Volunteers/2022/Call for Election Volunteers|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Movement Strategy and Governance/Election Volunteers/2022/Call for Election Volunteers}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
आंदोलन रणनीति और शासन टीम आगामी न्यासी बोर्ड के चुनाव में चुनाव स्वयंसेवकों के रूप में सहयोग करने के लिए समुदाय सदस्यों की तलाश कर रहा है।
चुनाव स्वयंसेवी कार्यक्रम का विचार २०२१ के विकिमीडिया न्यासी बोर्ड चुनाव के दौरान आया था। यह कार्यक्रम सफल साबित हुआ। चुनाव स्वयंसेवकों की मदद से हम १७५३ मतदाताओं तक पहुंच और चुनाव में भागीदारी बढ़ाने में सक्षम थे। चुनाव में कुल मतदान १०.१३% था, पहले से १.१% अधिक, और २१४ विकियों का प्रतिनिधित्व किया गया था।
२०१७ में भाग नहीं लेने वाले कुल ७४ विकियों ने २०२१ के चुनाव में मतदान किया। क्या आप भागीदारी को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं?
चुनाव स्वयंसेवक निम्नलिखित क्षेत्रों में मदद करेंगे:
* छोटे संदेशों का अनुवाद करना, और सामुदायिक स्थानों में चल रही चुनाव प्रक्रिया की घोषणा करना।
* '''वैकल्पिक''': टिप्पणियों और प्रश्नों के लिए सामुदायिक स्थानों की निगरानी करना।
स्वयंसेवकों को चाहिए की वह:
* बातचीत और कार्यक्रमों के दौरान फ्रेंडली स्पेस नीति बनाए रखें।
* निष्पक्ष तरीके से समुदाय के लिए चुनाव दिशानिर्देश और मतदान की जानकारी प्रस्तुत करें।
क्या आप एक चुनावी स्वयंसेवक बनना चाहते हैं और यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आपके समुदाय का वोट में प्रतिनिधित्व हो? अद्यतन प्राप्त करने के लिए [[m:Special:MyLanguage/Movement Strategy and Governance/Election Volunteers/About|यहां साइन अप करें]]। अनुवाद के बारे में प्रश्नों के लिए आप [[m:Special:MyLanguage/Talk:Movement Strategy and Governance/Election Volunteers/About|वार्ता पृष्ठ]] का उपयोग कर सकते हैं।<br /><section end="announcement-content" />
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ०९:४१, १२ मई २०२२ (UTC)
== २०२२ चुनाव कम्पास के लिए प्रस्तावित वक्तव्य ==
:''[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Announcement/Propose statements for the 2022 Election Compass| संदेश को मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित किया गया है।]]''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Announcement/Propose statements for the 2022 Election Compass|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Wikimedia Foundation elections/2022/Announcement/Propose statements for the 2022 Election Compass}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
नमस्कार,
स्वयंसेवकों को [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022|२०२२ न्यासी बोर्ड]] '''[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_elections/2022/Community_Voting/Election_Compass|चुनाव कंपास मैं अपना वक्तव्य प्रस्तावित करने के लिए]]''' आमंत्रित किया जा रहा हैं।
चुनाव कम्पास एक ऐसा उपकरण है जो मतदाताओं को उन उम्मीदवारों का चयन करने में मदद करता है जो उनके विश्वासों और विचारों के साथ सर्वोत्तम रूप से संरेखित होते हैं। समुदाय के सदस्य वक्तव्यों का प्रस्ताव रखेंगे और उम्मीदवार लिकर्ट स्केल (सहमत/निष्पक्ष/असहमत) का उपयोग करके जवाब देंगे। वक्तव्यों के जवाब चुनाव कंपास उपकरण पर अपलोड किए जाएंगे। मतदाता इस टूल का उपयोग वक्तव्यों पर उत्तर (सहमत/निष्पक्ष/असहमत) साझा करके करेंगे। परिणाम उन उम्मीदवारों की पहचान करेंगे जो मतदाता के विश्वासों और विचारों के साथ सबसे अच्छी तरह मेल खाते हैं।
ये है चुनाव कंपास की समयरेखा:
* ८ - २० जुलाई: चुनाव कंपास के लिए स्वयंसेवक अपने वक्तव्यों को प्रस्तावित करते हैं।
* २१ - २२ जुलाई: चुनाव समिति स्पष्टता के लिए वक्तव्यों की समीक्षा करती है और विषय से परे वक्तव्यों को हटा देती है।
* २३ जुलाई - १ अगस्त: स्वयंसेवक वक्तव्यों पर मतदान करते हैं।
* २ - ४ अगस्त: चुनाव समिति शीर्ष १५ वक्तव्यों का चयन करती है।
* ५ - १२ अगस्त: उम्मीदवार खुद को वक्तव्यों के साथ संरेखित करते हैं।
* १५ अगस्त: मतदान के लिए चुनाव कम्पास खुलता हैं।
चुनाव समिति अगस्त की शुरुआत में शीर्ष १५ वक्तव्यों का चयन करेगी। चुनाव समिति, आंदोलन रणनीति और अनुशासन टीम के समर्थन के साथ, प्रक्रिया की देखरेख करेगी। आंदोलन रणनीति और अनुशासन टीम प्रश्नों की स्पष्टता, दोहराव, गलतियों आदि की जांच करेगी।
धन्यवाद,
आंदोलन रणनीति और अनुशासन
''यह संदेश बोर्ड चयन कार्य बल और चुनाव समिति की ओर से भेजा गया है।''
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ०८:५२, १२ जुलाई २०२२ (UTC)
== WikiConference India 2023: Initial conversations ==
Dear Wikimedians,
Hope all of you are doing well. We are glad to inform you to restart the conversation to host the next WikiConference India 2023 after WCI 2020 which was not conducted due to the unexpected COVID-19 pandemic, it couldn't take place. However, we are hoping to reinitiate this discussion and for that we need your involvement, suggestions and support to help organize a much needed conference in February-March of 2023.
The proposed 2023 conference will bring our energies, ideas, learnings, and hopes together. This conference will provide a national-level platform for Indian Wikimedians to connect, re-connect, and establish their collaboration itself can be a very important purpose on its own- in the end it will empower us all to strategize, plan ahead and collaborate- as a movement.
We hope we, the Indian Wikimedia Community members, come together in various capacities and make this a reality. We believe we will take learnings from earlier attempts, improve processes & use best practices in conducting this conference purposefully and fruitfully.
Here is a survey [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfof80NVrf3b9x3AotDBkICe-RfL3O3EyTM_L5JaYM-0GkG1A/viewform form] to get your responses on the same notion. Unfortunately we are working with short timelines since the final date of proposal submission is 5 September. We request you please fill out the form by 28th August. After your responses, we can decide if we have the community need and support for the conference. You are also encouraged to add your support on [[:m:WikiConference_India_2023:_Initial_conversations|'''this page''']], if you support the idea.
Regards, [[User:Nitesh Gill|Nitesh Gill]], [[User:Nivas10798|Nivas10798]], [[User:Neechalkaran|Neechalkaran]], ०६:३९, २४ अगस्त २०२२ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=23115331 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== २०२२ न्यासी बोर्ड चुनाव के लिए सामुदायिक मतदान शुरू हो गया है ==
<section begin="announcement-content" />
:''[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Announcement/The 2022 Board of Trustees election Community Voting period is now open| संदेश को मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित किया गया है।]]''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Announcement/The 2022 Board of Trustees election Community Voting period is now open|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Wikimedia Foundation elections/2022/Announcement/The 2022 Board of Trustees election Community Voting period is now open}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
आप सभी को नमस्कार,
[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022|२०२२ न्यासी बोर्ड चुनाव]] के लिए सामुदायिक मतदान शुरू हो गया है। आपके वोट सूचित करने के लिए कुछ जानकारी नीचे साझा की गई है:
* [https://board-elections-compass-2022.toolforge.org/ चुनाव कम्पास] देखें जो १५ विभिन्न विषयों पर उम्मीदवारों के दृष्टिकोण को दर्शाता है।
* [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Candidates|उम्मीदवारों के वक्तव्य]] [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_elections/2022/Affiliate_Organization_Participation/Candidate_Questions|और एफिलिएट प्रश्नों के उत्तर पढ़ें।]]
* [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Apply to be a Candidate|न्यासी बोर्ड द्वारा अपेक्षित कौशलों के बारे में अधिक जानें]], और कैसे [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Candidates|विश्लेषण समिति ने उन उम्मीदवारों की पहचान की जिनके पास अपेक्षित कौशल है]]।
* [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_elections/2022/Campaign_Videos|समुदाय द्वारा प्रस्तावित प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए उम्मीदवारों के वीडियो देखें।]]
अभी वोट करने के लिए [[Special:SecurePoll/vote/Wikimedia_Foundation_Board_Elections_2022|सिक्योरपोल]] पर जाएं। '''मतदान की अवधि २३ अगस्त ००:०० यूटीसी से ६ सितम्बर २०२२ २३:५९ यूटीसी है।''' अपनी पात्रता जानने के लिए कृपया [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_elections/2022/Voter_eligibility_guidelines|मतदाता पात्रता पृष्ठ]] पर जाएं।
धन्यवाद,
आंदोलन रणनीति और अनुशासन
''यह संदेश बोर्ड चयन कार्य बल और चुनाव समिति की ओर से भेजा गया है।''<br /><section end="announcement-content" />
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ११:५४, २६ अगस्त २०२२ (UTC)
== २०२२ न्यासी बोर्ड चुनाव के लिए सामुदायिक मतदान ख़त्म होने वाली है ==
:''[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Announcement/The 2022 Board of Trustees election Community Voting is about to Close| संदेश को मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित किया गया है।]]''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Announcement/The 2022 Board of Trustees election Community Voting about to Close|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Wikimedia Foundation elections/2022/Announcement/The 2022 Board of Trustees election Community Voting is about to Close}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
नमस्ते,
२०२२ न्यासी बोर्ड चुनाव की सामुदायिक मतदान अवधि २३ अगस्त २०२२ को शुरू हुई, और ६ सितंबर २०२२, २३:५९ यूटीसी पर खत्म होगी। आप अभी भी इस चुनाव में भाग ले सकते है। अभी वोट करने के लिए [[Special:SecurePoll/vote/Wikimedia_Foundation_Board_Elections_2022|सिक्योरपोल]] पर जाएं। अपनी पात्रता जानने के लिए कृपया [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_elections/2022/Voter_eligibility_guidelines|मतदाता पात्रता पृष्ठ]] पर जाएं।
आपको निर्णय लेने में सहायता स्वरुप कुछ संसाधन दिए गए हैं:
* [https://board-elections-compass-2022.toolforge.org/ चुनाव कम्पास] देखें जो १५ विभिन्न विषयों पर उम्मीदवारों के दृष्टिकोण को दर्शाता है।
* उम्मीदवारों के [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Candidates|वक्तव्य]] और [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Affiliate_Organization_Participation/Candidate_Questions|एफिलिएट प्रश्नों के उत्तर]] पढ़ें।
* न्यासी बोर्ड द्वारा [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Apply to be a Candidate|अपेक्षित कौशलों]] के बारे में अधिक जानें, और [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation elections/2022/Candidates|कैसे विश्लेषण समिति ने उन उम्मीदवारों की पहचान की जिनके पास अपेक्षित कौशल है]]।
* [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_elections/2022/Campaign_Videos|समुदाय द्वारा प्रस्तावित प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए उम्मीदवारों के वीडियो देखें।]]
धन्यवाद,
आंदोलन रणनीति और अनुशासन<section end="announcement-content" />
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ११:२२, १ सितम्बर २०२२ (UTC)
== WikiConference India 2023: Proposal to WMF ==
Hello everyone,
We are happy to inform you that we have submitted the [[:m:Grants:Conference/WikiConference_India_2023|Conference & Event Grant proposal for WikiConference India 2023]] to the Wikimedia Foundation. We kindly request all the community members to go through the proposal -- including the community engagement survey report, program plan, venue and logistics, participation and scholarships, and the budget, and provide us with your suggestions/comments on the [[:m:Grants_talk:Conference/WikiConference_India_2023|talk page]]. You can endorse the proposal in the [[:m:Grants:Conference/WikiConference_India_2023#Endorsements|endorsements section]], please do add a rationale for supporting this project.
According to the timeline of the Conference and Event Grants program, the community can review till 23 September 2022, post that we will start integrating all the received feedback to make modifications to the proposal. Depending on the response of community members, an IRC may be hosted next week, especially if there are any questions/concerns that need to be addressed.
We reopened the survey form and if you are still interested in taking part in the survey and you have something in mind to share or want to become a part of the organizing team, please <span class="plainlinks">[https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfof80NVrf3b9x3AotDBkICe-RfL3O3EyTM_L5JaYM-0GkG1A/viewform fill out the form]</span> so we all can work together.
Let us know if you have any questions.
Regards,
[[:m:User:Nitesh Gill|Nitesh Gill]], [[:m:User:Nivas10798|Nivas10798]], [[:m:User:Neechalkaran|Neechalkaran]], ०७:३५, १९ सितम्बर २०२२ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=23719531 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== सार्वभौमिक आचार संहिता के लिए संशोधित प्रवर्तन दिशानिर्देशों पर आगामी मतदान ==
<section begin="announcement-content" />
:''[[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Revised enforcement guidelines/Announcement/Voting 1|आप इस संदेश को मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित पा सकते हैं।]]''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Revised enforcement guidelines/Announcement/Voting 1|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Universal Code of Conduct/Revised enforcement guidelines/Announcement/Voting 1}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
सभी को नमस्कार,
जनवरी २०२३ के मध्य में [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct|सार्वभौमिक आचार संहिता]] के [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Revised enforcement guidelines|प्रवर्तन दिशानिर्देश]] द्वितीय समुदाय-व्यापी अनुसमर्थन हेतु मतदान से गुजरेगा। यह [[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Enforcement guidelines/Voting/Results|मार्च २०२२ के मतदान]] के बाद तय हुआ, जिसमें परिणामस्वरूप अधिकांश मतदाताओं ने प्रवर्तन दिशानिर्देशों का समर्थन किया। मतदान के दौरान, प्रतिभागियों ने महत्वपूर्ण सामुदायिक चिंताओं को उजागर करने में सहायता की। बोर्ड की [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Community Affairs Committee|सामुदायिक मामलों की समिति]] ने अनुरोध किया कि चिंताओं के इन क्षेत्रों की समीक्षा की जाए।
स्वयंसेवक के नेतृत्व वाली [[m:Special:MyLanguage/Universal_Code_of_Conduct/Drafting_committee#Revisions_Committee_members|संशोधन समिति]] ने सामुदायिक विचारों की समीक्षा करने और परिवर्तन करने के लिए कड़ी मेहनत की। उन्होंने चिंता के क्षेत्रों को अद्यतन किया, जैसे प्रशिक्षण और प्रतिज्ञान आवश्यकताओं, प्रक्रिया में गोपनीयता और पारदर्शिता, और स्वयं दस्तावेज़ की पठनीयता और इनके अनुवाद होने की क्षमता।
संशोधित प्रवर्तन दिशानिर्देश '''[[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Revised enforcement guidelines|यहाँ]]''' देखे जा सकते हैं, और परिवर्तनों की तुलना '''[[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Revised enforcement guidelines/Comparison|यहाँ]]''' पर देखी जा सकती है।
'''मतदान कैसे करें?'''
'''१७ जनवरी, २०२३''' से मतदान प्रारम्भ होगा। '''[[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Revised enforcement guidelines/Voter information|मेटा-विकी पर यह पृष्ठ]]''' सिक्योरपोल का उपयोग करके मतदान करने के तरीके के बारे में जानकारी प्रदान करता है।
'''कौन मतदान कर सकता है?'''
इस मत के लिए '''[[m:Special:MyLanguage/Universal_Code_of_Conduct/Revised enforcement_guidelines/Voter_information#Voting_eligibility|पात्रता आवश्यकताएँ]]''' वही हैं जो विकिमीडिया न्यासी बोर्ड के चुनाव के लिए होती हैं। मतदाता योग्यता के बारे में अधिक जानकारी के लिए मतदाता जानकारी पृष्ठ को देखें। यदि आप एक योग्य मतदाता हैं, तो आप मतदान सर्वर तक पहुँचने के लिए अपने विकिमीडिया खाते का उपयोग कर सकते हैं।
'''मतदान पश्चात क्या होगा?'''
स्वयंसेवकों के एक स्वतंत्र समूह द्वारा मतों की जाँच की जाएगी, और इनके परिणाम विकिमीडिया-I, आंदोलन रणनीति फोरम, डिफ और मेटा-विकी पर प्रकाशित किए जाएँगे। मतदाता पुनः मतदान करने और दिशानिर्देशों के बारे में अपनी चिंताओं को साझा करने में सक्षम होंगे। न्यासी बोर्ड समर्थन के स्तर और उठाई गई चिंताओं को देखेगा क्योंकि वे यह देखते हैं कि प्रवर्तन दिशानिर्देशों को किस प्रकार अनुसमर्थित किया जाना चाहिए या आगे विकसित किया जाना चाहिए।
यूसीओसी (UCoC) प्रोजेक्ट टीम की ओर से<section end="announcement-content" />
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ०९:३८, ८ जनवरी २०२३ (UTC)
== सार्वभौमिक आचार संहिता के लिए संशोधित प्रवर्तन दिशानिर्देशों हेतु मतदान प्रारम्भ हो गया है ==
<section begin="announcement-content" />
:''[[m:Special:MyLanguage/Universal Code of Conduct/Revised enforcement guidelines/Announcement/Voting 2|आप इस संदेश का मेटा-विकी पर अतिरिक्त भाषाओं में अनुवादित पा सकते हैं।]]''
:''{{subst:more languages}}''
सभी को नमस्कार,
[[m:Special:MyLanguage/Universal_Code_of_Conduct/Revised_enforcement_guidelines|संशोधित सार्वभौमिक आचार संहिता प्रवर्तन दिशानिर्देश]] [[m:Special:MyLanguage/Universal_Code_of_Conduct/Revised_enforcement_guidelines/Voting|इस मतदान की अवधि]] के लिए अब खुला है! मतदान दो सप्ताह तक चलेंगे और '''३१ जनवरी, २०२३''' को '''२३.५९ यूटीसी''' पर बंद होगा। मतदाता के पात्रता की जानकारी और मतदान कैसे करें, इस बारे में विवरण के लिए कृपया [[m:Special:MyLanguage/Universal_Code_of_Conduct/Revised_enforcement_guidelines/Voter_information|मेटा-विकी के मतदाता सूचना पृष्ठ]] पर जाएँ।
प्रवर्तन दिशानिर्देशों और मतदान प्रक्रिया पर अधिक विवरण के लिए, हमारे [[m:Special:MyLanguage/Universal_Code_of_Conduct/Revised_enforcement_guidelines/Announcement/Voting_1|पिछला संदेश]] देखें।
यूसीओसी (UCoC) प्रोजेक्ट टीम की ओर से
<section end="announcement-content" />
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) ११:१६, १७ जनवरी २०२३ (UTC)
== Global ban for PlanespotterA320/RespectCE ==
Per the [[m:Global bans|Global bans]] policy, I'm informing the project of this request for comment: [[m:Requests for comment/Global ban for PlanespotterA320 (2) ]] about banning a member from your community. Thank you.--[[User:Lemonaka|Lemonaka]] ([[User talk:Lemonaka|talk]]) 21:40, 6 February 2023 (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=User:Lemonaka/Massmessagelist&oldid=24501599 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Zabe@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== सामुदायिक बैठक निमंत्रण सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा विकिमीडिया फाउंडेशन तथा गूगल के सहयोग से आयोजित '''[[w:विकिपीडिया:सामुदायिक बैठक/13 मार्च 2023]]''' में शामिल होने को इच्छुक सदस्य 1 मार्च तक यह
[https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdW_RUwsIma6wMR0GJk1UFJ0cKPJIniRtWZMN45fzQJHG0Aug/viewform गूगल फॉर्म] जरूर भरें।
# अंतिम तिथि १ मार्च 2023।
# हिंदी विकिपीडिया पर सदस्य ने कम-से-कम १०० संपादन किया हो।
# सदस्यों को यात्रा व्यय सहयोग दिल्ली के 250 किलोमीटर के दायरे के भीतर के लिए ही प्रदान किया जाएगा।
# भारत के किसी भी क्षेत्र के दो हिंदी विकिमीडियन्स प्रबंधकों को यात्रा व्यय प्रदान किया जाएगा।
:आयोजन का विस्तृत व्यौरा '''[[w:विकिपीडिया:सामुदायिक बैठक/13 मार्च 2023|आयोजन पृष्ठ]]''' पर देख सकते हैं। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०९:०५, २६ फ़रवरी २०२३ (UTC)
== विकिमीडिया उपयोग की शर्तों को अद्यतन करने के लिए सामुदायिक प्रतिक्रिया सत्र शुरू होता है ==
<section begin="announcement-content" />
:''[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Legal department/2023 ToU updates/Office hours/Announcement|You can find this message translated into additional languages on Meta-wiki.]]''
:''<div class="plainlinks">[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Legal department/2023 ToU updates/Office hours/Announcement|{{int:interlanguage-link-mul}}]] • [https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Special:Translate&group=page-{{urlencode:Wikimedia Foundation Legal department/2023 ToU updates/Office hours/Announcement|}}&language=&action=page&filter= {{int:please-translate}}]</div>''
सभी को नमस्कार,
[[m:Special:MyLanguage/Wikimedia_Foundation_Legal_department|विकिमीडिया फाउंडेशन कानूनी विभाग]] विकिमीडिया उपयोग की शर्तों का अद्यतन करने के लिए समुदाय के सदस्यों के साथ प्रतिक्रिया सत्र की मेजबानी कर रहा है।
[[:foundation:Special:MyLanguage/Terms of Use|उपयोग की शर्तें (टीओयू)]] विकिमीडिया फाउंडेशन द्वारा होस्ट की गई वेबसाइटों के उपयोग को नियंत्रित करने वाली कानूनी शर्तें हैं। कानूनी विभाग फरवरी से अप्रैल तक एक मसौदा प्रस्ताव पर सामुदायिक प्रतिक्रिया एकत्र करेगा। मसौदे का कई भाषाओं में अनुवाद किया जाएगा, और प्रतिक्रिया किसी भी भाषा में स्वीकार की जाएगी।
यह अद्यतन कुछ चीजों के बारे में है:
* सार्वभौमिक आचार संहिता को लागू करना;
* Creative Commons BY-SA 4.0 लाइसेंस में परियोजना टेक्स्ट का अद्यतन करना;
* अघोषित भुगतान संपादन को बेहतर ढंग से संबोधित करने का प्रस्ताव;
* यूरोपीय डिजिटल सेवा अधिनियम सहित विकिमीडिया फाउंडेशन को प्रभावित करने वाले वर्तमान और हाल ही में पारित कानूनों के अनुरूप हमारी उपयोग की शर्तों को अद्यतन करना|
प्रतिक्रिया प्रक्रिया के हिस्से के रूप में, दो कार्यालयीन समय आयोजित किए जाएंगे-पहला २ मार्च को और दूसरा ४ अप्रैल को।
अधिक जानकारी के लिए, कृपया देखें:
* [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Legal department/2023 ToU updates/Proposed update|उपयोग की शर्तों का प्रस्तावित अद्यतन]]
* आपकी [[m:Talk:Terms of use|प्रतिक्रिया]] के लिए पृष्ठ
* [[m:Special:MyLanguage/Wikimedia Foundation Legal department/2023 ToU updates/Office hours|कार्यालयीन समय]] के बारे में जानकारी
विकीमीडिया फाउंडेशन कानूनी विभाग की ओर से,
[[सदस्य:CSinha (WMF)|CSinha (WMF)]] ([[सदस्य वार्ता:CSinha (WMF)|वार्ता]]) १५:४०, २१ फ़रवरी २०२३ (UTC)
== शिक्षक संगोष्ठी के दौरान औढां, सिरसा में विकीबुक्स आऊटरीच ==
मैं विकीबुक्स समुदाय के ध्यान में लाना चाहता हूं कि मेरे द्वारा कल 6 जून 2023 को ग्राम ओढां, जिला सिरसा, हरियाणा में एक आऊटरीच आयोजित की गई जिसमें विकिबुक्स पर बुनियादी जानकारी और कुछ प्रशिक्षण दिया गया। यह स्थानीय राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, औढां में शिक्षकों के लिए एक सप्ताह के सेवाकालीन प्रशिक्षण संगोष्ठी के दौरान किया गया था, जिसमें 40 शिक्षकों ने भाग लिया, जो मुख्य रूप से हिंदी विकिबुक्स पर काम कर सकते हैं या उनका उपयोग कर सकते हैं। वर्कशॉप मेटा पेज का लिंक [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikibooks_Outreach_at_Odhan,_Sirsa#Discussion_On_VP| यहां] दिया गया है। यह आउटरीच इसलिए संभव हो सका क्योंकि मैं स्वयं इस संगोष्ठी का हिस्सा था। आगे के काम के लिए आपके सहयोग और सलाह का बेसब्री से इंतजार रहेगा। धन्यवाद। [[सदस्य:Mulkh Singh|Mulkh Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Mulkh Singh|वार्ता]]) ०१:२८, ७ जून २०२३ (UTC)
== शिक्षक संगोष्ठी के दौरान औढां, सिरसा में विकीबुक्स आऊटरीच (दूसरी बार) ==
मैं विकीबुक्स समुदाय के ध्यान में लाना चाहता हूं कि मेरे द्वारा आज 14 जून 2023 को ग्राम औढां, जिला सिरसा, हरियाणा में दो अलग-अलग ग्रुपों में आऊटरीच आयोजित की गई जिसमें विकिबुक्स पर बुनियादी जानकारी और कुछ प्रशिक्षण दिया गया। यह स्थानीय राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, औढां में शिक्षकों के लिए एक सप्ताह के सेवाकालीन प्रशिक्षण संगोष्ठी के दौरान किया गया था, जिसमें 40+ 40 शिक्षकों ने भाग लिया, जो मुख्य रूप से हिंदी विकिबुक्स पर काम कर सकते हैं या उनका उपयोग कर सकते हैं। वर्कशॉप मेटा पेज का लिंक [https://meta.wikimedia.org/wiki/Wikibooks_Outreach_in_Teacher_Training_Seminar_at_Odhan,_Sirsa#Gallery| यहां] दिया गया है। इस बार मैं स्वयं इस संगोष्ठी का हिस्सा नहीँ था पर पिछले हफ्ते के अनुभव ने और संपर्क ने काम आसान कर दिया। आगे के काम के लिए आपके सहयोग और सलाह का बेसब्री से इंतजार रहेगा। धन्यवाद। [[सदस्य:Mulkh Singh|Mulkh Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Mulkh Singh|वार्ता]]) ०९:४७, १४ जून २०२३ (UTC)
== गतिविधि योजना - हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप ==
हाल में हिंदी विकिपीडिया तथा विकिस्रोत पर आयोजित संपादनोत्सव के अच्छे नतीजों से उत्साहित होकर हम गूगल तथा फाउंडेशन के साथ साझेदारी की योजना को आगे बढ़ा रहे हैं।। इसके अंतर्गत हम अगले एक वर्ष तक हर तिमाही में निम्नलिखित गतिविधियां करने का प्रयास करेंगें-
# ऑनलाइन संपादनोत्सव (विकिपीडिया तथा भगिनी प्रकल्पों पर)
# स्थानीय सामुदायिक बैठक एवं एकदिवसीय ऑफलाइन सामूहिक संपादनोत्सव (दिल्ली, बनारस, कोलकाता आदि में संभावित)
# संस्थागत भागिदारी एवं कौशल विकास कार्यशाला (दिल्ली, उत्तर-प्रदेश, बंगाल, मिजोरम के विश्वविद्यालयों में संभावित)
:ये कार्यक्रम हर तीन माह पर होंगे। इनके जरिए हम जून 2023 से मई 2024 तक निम्नलिखित लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास करेंगे:
# विकिपीडिया पर २०० से अधिक शब्दों वाले 5,000 नए लेख।
# विकिपीडिया के 500 लेखों का विस्तार 1500 से अधिक शब्दों तक।
# विकिस्रोत पर 5,000 से अधिक पृष्ठों का शोधन।
# 100 से अधिक नए सक्रिय सदस्यों को जोड़ना।
इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए 16 से 30 अक्तूबर तक विकिपीडिया पर तथा 1 से 15 नवंबर तक विकिस्रोत पर गुणवत्ता संवर्धन संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
:स्थानीय सामुदायिक बैठक के लिए सदस्य किसी नए शहर का नाम सुझा सकते हैं जहाँ वे स्वयं आयोजक का दायित्व निभा सकें तथा जहाँ कम-से-कम 10 से अधिक विकिपीडियन सक्रीय सदस्य हों।
:सांस्थानिक कार्यशाला के लिए किसी संस्थान का नाम भी सुझा सकते हैं जहाँ कोई एक अच्छा विकिपीडियन मौजूद हो ताकी कार्यशाला के बाद के प्रगति की देख-रेख की जा सके।
:किसी सुझाव या प्रस्ताव के लिए आप मेरे वार्ता पृष्ठ पर या विकिपीडिया मेल की सुविधा का प्रयोग कर लिख सकते हैं।
- संपर्क सूत्र, हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:०८, २८ सितम्बर २०२३ (UTC)
== Announcing Indic Wikimedia Hackathon 2023 and Invitation to Participate ==
Dear Wikimedians,
The [[:m:Indic_MediaWiki_Developers_User_Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is happy to announce '''Indic Wikimedia Hackathon 2023 on 16-17 December 2023 in Pondicherry, India'''.
The event is for everyone who contributes to Wikimedia’s technical spaces code developers, maintainers, translators, designers, technical writers and other related technical aspects. Along with that, contributors who don't necessarily contribute to technical spaces but have good understanding of issues on wikis and can work with developers in addressing them can join too. You can come with a project in mind, join an existing project, or create something new with others. The goal of this event is to bring together technical contributors from India to resolve pending technical issues, bugs, brainstorm on tooling ideas, and foster connections between contributors.
We have scholarships to support participation of contributors residing in India. The '''scholarship form can be filled at https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSd_Qqctj7I87QfYt5imc6iPcGPWuPfncCOyAd_OMbGiqxzxhQ/viewform?usp=sf_link and will close at 23:59 hrs on 15 October 2023 (Sunday) [IST].'''
Please reach out to contact{{@}}indicmediawikidev.org if you have any questions or need support.
Best, Indic MediaWiki Developers UG, ०४:४०, ४ अक्टूबर २०२३ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=25696853 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
‘’‘हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप’’’, विकिमीडिया फाउंडेसन तथा गूगल की साझेदारी को आगे बढ़ाते हुए इस तिमाही में ऑनलाइन तथा ऑफलाइन कार्यक्रम करने की योजना है-
# [[w:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2024|सामग्री संवर्धन संपादनोत्सव फरवरी २०२४]] – गूगल पर सर्वाधिक खोजे जा रहे विषयों पर नए विकिपीडिया लेख निर्माण के लिए
# [[s:विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2024|सामग्री संवर्धन संपादनोत्सव फरवरी २०२४]] – विकिस्रोत पर नई सामग्री के निर्माण के लिए
# राज्यस्तरीय समुदाय बैठक – संपादक सदस्यों के बीच पारस्परिक सहयोग एवं परिचय के लिए
# स्थानीय प्रशिक्षण कार्यक्रम –छोटे समूह में नए संपादकों को प्रशिक्षित कर विकिपीडिया से जोड़ने के लिए
# सांस्थानिक भागिदारी कार्यशाला – महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, संग्रहालियों एवं अन्य संस्थाओं के सदस्यों को प्रशिक्षित कर विकिपीडिया से जोड़ने के लिए।
:ऑपलाइन कार्यक्रमों का आयोजन करने या उसमें शामिल होने को उत्सुक विकिमीडियन्स [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdIGJpfgIPuoLRMpb-LaRgLdQxeRD7iMTCQ3U7YmswOTvg0vw/viewform विकिमीडियन्स सदस्य सूचना गूगल फॉर्म] 15 फरवरी 2024 तक अवश्य भर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०१:५८, २८ जनवरी २०२४ (UTC)
== सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव ==
‘’‘हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप’’’ द्वारा विकिमीडिया फाउंडेसन तथा गूगल के सहयोग से जून से अगस्त 2024 तक दो ऑनलाइन संपादनोत्सव किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जून 2024|विकिपीडिया सामग्री संवर्धन संपादनोत्सव जून २०२४]] – 21 जून से 20 जुलाई तक विकिपीडिया पर गूगल पर सर्वाधिक खोजे जा रहे विषयों पर नए लेख निर्माण के लिए।
# [[s:hi:विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2024|विकिस्रोत सामग्री संवर्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२४]] – 21 जुलाई से 4 अगस्त तक विकिस्रोत पर नई पुस्तक के निर्माण के लिए।
इन संपादनोत्सवों में शामिल होकर अंतर्जाल पर हिंदी सामग्री का विकास करने तथा पुरस्कार जीतने के लिए सभी सदस्यों का स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०१:१९, १५ जून २०२४ (UTC)
== Module नामस्थान का अनुवाद ==
विकिपुस्तक के सभी सदस्यों को नमस्कार,
हमारे हिंदी विकि प्रकल्पों पर '''Module''' नामस्थान का अनुवाद '''अनुखंड''' लागू किया गया है (13 जून 2024 से)। इस अनुवाद के औचित्य और वैधता पर हिंदी विकि-परियोजनाओं के सदस्यों की राय जानने के लिये एक चर्चा '''[[w:विकिपीडिया:चौपाल|हिंदी विकिपीडिया के चौपाल]]''' पर आहूत की गयी है, क्योंकि यह अनुवाद उचित नहीं प्रतीत हो रहा और न ही इसे लागू करने से पूर्व किसी हिंदी प्रकल्प पर कोई चर्चा या सहमति आहूत की गयी थी। अतः आप सभी विकिपुस्तक सदस्यों से इस चर्चा में भाग लेने हेतु आग्रह किया जाता है।
सधन्यवाद। --[[User:SM7|<span style="color:#00A300">SM7</span>]]<sup>[[User talk:SM7|<small style="color:#6F00FF">--talk--</small>]]</sup> ०२:१४, १५ जून २०२४ (UTC)
== विकिमीडिया मूवमेंट चार्टर को अनुमोदित करने के लिए समुदाय मतदान सुझाव दें ==
9 जुलाई 2024 तक विकिमीडिया मूवमेंट चार्टर को तीन पक्षों फाउंडेशन, संपादक सदस्य तथा समुदाय द्वारा मतदान कर अनुमोदित करने के पक्ष या विपक्ष में अपनी राय देनी है। कोई संपादक खाता मतदान के लिए योग्य है या नहीं इसकी जाँच आप अपना सदस्य नाम लिखकर [https://meta.toolforge.org/accounteligibility/75 खाता अर्हता उपकरण] के सहारे कर सकते हैं। कोई सदस्य निजी स्तर पर क्या मत देंगें इसका निर्णय उन्हें स्वयं करना है और यह गोपनीय रहेगा। कॉमन्स पर [https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Wikimedia_Movement_Charter_(June_2024).pdf घोषणापत्र पीडीएफ प्रारूप में ] उपलब्ध है।
मैं हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप की ओर से भी मतदान करूँगा जिसके लिए सदस्यों की राय की अपेक्षा है। राय बनाने में सुविधा के लिए मैं इस घोषणापत्र की तीन सकारात्मक तथा तीन नकारात्मक बातों का उल्लेख कर रहा हूँ:
• सकारात्मक बातें-
# ग्लोबल काउंसिल के रूप में फाउंडेशन पहली बार संपादक सदस्यों के सामूहिक विवेक को विकिपीडिया आंदोलन के भीतर औपचारिक रूप में मान्यता दे रहा है। इसके 25 सदस्यों में से 12 संपादक सदस्यों तथा 8 समुदायों द्वारा चुने जाने हैं। इनमें एक भाषा, समुदाय या वर्ग का बर्चस्व नहीं हो सकता है।
# ग्लोबल काउंसिल अपने चारों कार्यक्षेत्रों में सर्वोच्च होगी जिसमें विकि फाउंडेशन से प्राप्त अनुदान के विभिन्न परियोजनाओं के वितरण का अधिकार भी शामिल है। चूंकि काउंसिल विकिपीडिया के संपादक सदस्य चुनेंगें इसलिए धन के आवंटन में अधिक जिम्मेदारी की संभावना है।
# इस घोषणापत्र के जरिए पहली बार विकिपीडिया आंदोलन में शामिल विभिन्न तत्वों जैसे संपादक सदस्य, संगठन, फाउंडेशन, ग्लोबल काउंसिल आदि को परिभाषित कर उनके कार्यों को स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट किया गया है। ग्लोबल काउंसिल के जरिए संपादक सदस्यों एवं समुदायों को विकिपीडिया आंदोलन पर स्वामित्व भी दिया गया है।
• नकारात्मक बातें:
# ग्लोबल काउंसिल की शक्तियाँ बहुत सीमित है। मसलन वह फाउंडेशन द्वारा दिए धन का आवंटन मात्र कर सकता है। फाउंडेशन उसे कितना धन देगा यह पूरी तरह फाउंडेशन की मर्जी पर निर्भर है क्योंकि चार्टर में इसके संबंध में कोई निर्देश नहीं है। इसलिए यह एक कमजोर संगठन बनने वाला है। अनुमान है कि फाउंडेशन उसे अपने धन का लगभग 10 से अधिकतम 20 प्रतिशत हिस्सा ही आवंटन के लिए देने वाला है।
# ग्लोबल काउंसिल के कार्यक्षेत्र में फाउंडेशन को निर्देशित करने वाली कोई शक्तियाँ नहीं है। उसे विकिपीडिया के लिए धन जुटाने संबंधी निर्णय लेने का भी अधिकार नहीं है। वह अपनी गतिविधियाँ चलाने तथा उसके लिए कर्मचारियों का प्रबंध करने के लिए भी फाउंडेशन पर ही निर्भर रहेगा। तकनीकि विकास भी ग्लोबल काउंसिल के कार्यक्षेत्र से बाहर रखा गया है तथा इसके लिए अलग से तकनीकी काउंसिल बनाया गया है।
# अंततः ग्लोबल काउंसिल 100 सदस्यों की संस्था बनेगी ताकी सभी समुदायों परियोजनाओं तथा भौगोलिक क्षेत्रों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले किंतु ऐसा समय कब आयेगा यह निश्चित नहीं है। चार्टर आरंभिक तौर पर 25 सदस्यों वाली काउंसिल के गठन की व्यवस्था कर रहा है। सदस्यों की संख्या हर डेढ़ साल के बाद 25 बढ़ाई जा सकती है। यानी सबकुछ ठीक रहा तो भी पहली बार गठन के पाँच वर्ष के बाद ही काउंसिल सौ सदस्यों वाली हो सकती है वह भी तब जब काउंसिल और फाउंडेशन के सदस्य आकार बढ़ाने पर सहमत हों।
:ये सकारात्मक और नकारात्मक बिंदु घोषणापत्र को समझने में सुविधा के लिए दिए गए हैं। आप घोषणापत्र पढ़कर हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप की राय बनाने में मदद कर सकते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 21:22, 2 जुलाई 2024 (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप रपट 2023-24 ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप रपट 2023-24 विकिमीडिया फाउंडेशन में जमा करा दी गई है। आप इसे [[m:Hindi Wikimedians User Group/Activities Report/23-24|Hindi Wikimedians User Group/Activities Report/23-24]] पृष्ठ पर देख सकते हैं। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०३:४३, २८ जुलाई २०२४ (UTC)
== Announcing Indic Wikimedia Hackathon Bhubaneswar 2024 & scholarship applications ==
Dear Wikimedians,
We hope you are well.
We are thrilled to announce the upcoming [[:metawiki:Indic Wikimedia Hackathon Bhubaneswar 2024|Indic Wikimedia Hackathon Bhubaneswar 2024]], hosted by the [[:metawiki:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers UG]] (aka Indic-TechCom) in collaboration with the [[:metawiki:Odia Wikimedians User Group|Odia Wikimedians UG]]. The event will take place in Bhubaneswar during 20-22 December 2024.
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve the experience of contributors and consumers of Wikimedia projects. The event is intended for:
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, which includes developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers etc.
* Content contributors having in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors to any other FOSS community or have participated in Wikimedia events in the past, and would like to get started with contributing to Wikimedia technical spaces.
We encourage you to follow the essential details & updates on Meta-Wiki regarding this event.
Event Meta-Wiki page: https://meta.wikimedia.org/wiki/Indic_Wikimedia_Hackathon_Bhubaneswar_2024
Scholarship application form: [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSf07lWyPJc6bxOCKl_i2vuMBdWa9EAzMRUej4x1ii3jFjTIaQ/viewform Click here to apply ]
''(Scholarships are available to assist with your attendance, covering travel, accommodation, food, and related expenses.)''
Please read the application guidance on the Meta-Wiki page before applying.
The scholarship application is open until the end of the day 2 November 2024 (Saturday).
If you have any questions, concerns or need any support with the application, please start a discussion on the event talk page or reach out to us contact@indicmediawikidev.org via email.
Best,
[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ०९:३५, १९ अक्टूबर २०२४ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=25720607 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:KCVelaga@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
‘’‘हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप’’’, विकिमीडिया फाउंडेसन तथा गूगल की साझेदारी को 2025 ई. में आगे बढ़ाने की योजना है। जनवरी – फरवरी में दो ऑन लाइन संपादनोत्सव आयोजित किए जाने का प्रस्ताव है-
# [[w:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जनवरी 2025|सामग्री संवर्धन संपादनोत्सव जनवरी २०२5]] – विकिपीडिया पर वांछित लेखों के निर्माण के लिए।
# [[s:विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी 2025|सामग्री संवर्धन संपादनोत्सव फरवरी २०२5]] – विकिस्रोत पर नई सामग्री के निर्माण के लिए
:नववर्ष की शुभकामनाओं सहित – संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:२२, १ जनवरी २०२५ (UTC)
== संपादनोत्सव जनवरी 2025 में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रुप द्वारा विकिपीडिया के 25 वर्ष पूरा होने के अवसर पर 15 जनवरी से 31 जनवरी तक नए लेखों के निर्माण के लिए आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जनवरी 2025|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव जनवरी 2025]] में भाग लेकर हिंदी में ज्ञान के प्रसार में सहायक हों। [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जनवरी 2025/प्रतिभागी|प्रतिभागिता]] पृष्ठ पर हस्ताक्षर कर [[w:hi:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जनवरी 2025/लेख सूची|लेख सूची]] के लेखों का निर्माण आरंभ करें। शुभकामनाओं सहित --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०२:३६, १५ जनवरी २०२५ (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप फरवरी आयोजन सूचना ==
2025 की जनवरी में विकिपीडिया तथा फरवरी में विकिस्रोत पर आयोजित ऑनलाइन संपादनोत्सव के बाद उच्च शैक्षिक संस्थानों के साथ भागीदारी के अगले प्रयास के रूप में पश्चिम बंगाल के कल्याणी शहर में हम तीन कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं। कल्याणी एवं कोलकाता तथा उसके सौ किलोमीटर के दायरे के विकि सदस्य पहले दो कार्यक्रमों में जुड़ने के लिए आयोजन पृष्ठ पर प्रतिभागियों के लिए बनाए प्रपत्र में पंजियन करा सकते हैं। तीनों कार्यक्रमों के नाम तथा विकिपृष्ठ की कड़ियाँ निम्नलिखित हैं।
# [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया कौशल विकास कार्यशाला/फ़रवरी 2025|विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया कौशल विकास कार्यशाला/फ़रवरी 2025]] - 21 फरवरी 2025 को कल्याणी विश्वविद्यालय, कल्याणी, पश्चिम बंगाल, भारत में आयोजित एक दिवसीय उच्च शैक्षिक संस्थान प्रशिक्षण कार्यशाला।
# [[s:hi:विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/फरवरी २०२५|विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/फरवरी २०२५]] - 23 फरवरी 202५ को कल्याणी, पश्चिम बंगाल, भारत में आयोजित एक दिवसीय सामुदायिक बैठक।
# [[b:hi:विकिपुस्तक:प्रबंधक बैठक/फरवरी 2025|विकिपुस्तक:प्रबंधक बैठक/फरवरी 2025]] - 22 फरवरी 2025 को कल्याणी, पश्चिम बंगाल, भारत में आयोजित एक दिवसीय उच्च शैक्षिक संस्थान प्रशिक्षण कार्यशाला।
:ऑनलाइन संपादनोत्सव के परिणाम इस माह के अंत तक आने की उम्मीद है। धन्यवाद सहित --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १९:०४, १७ फ़रवरी २०२५ (UTC)
== 📣 Announcing the South Asia Newsletter – Get Involved! 🌏 ==
<div lang="en" dir="ltr">
''{{int:please-translate}}''
Hello Wikimedians of South Asia! 👋
We’re excited to launch the planning phase for the '''South Asia Newsletter''' – a bi-monthly, community-driven publication that brings news, updates, and original stories from across our vibrant region, to one page!
We’re looking for passionate contributors to join us in shaping this initiative:
* Editors/Reviewers – Craft and curate impactful content
* Technical Contributors – Build and maintain templates, modules, and other magic on meta.
* Community Representatives – Represent your Wikimedia Affiliate or community
If you're excited to contribute and help build a strong regional voice, we’d love to have you on board!
👉 Express your interest though [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfhk4NIe3YwbX88SG5hJzcF3GjEeh5B1dMgKE3JGSFZ1vtrZw/viewform this link].
Please share this with your community members.. Let’s build this together! 💬
This message was sent with [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) by [[m:User:Gnoeee|Gnoeee]] ([[m:User_talk:Gnoeee|talk]]) at १५:४२, ६ जून २०२५ (UTC)
</div>
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Global_message_delivery/Targets/South_Asia_Village_Pumps&oldid=25720607 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Gnoeee@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप सूचना ==
* हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप तथा गूगल के बीच साझेदारी का दूसरा वर्ष शुरु हो चुका है।
* पहले कार्यक्रम के रूप में जनवरी तथा फरवरी में आयोजित संपादनोत्सवों की पुरस्कार राशी सभी विजेता प्रतिभागियों को भेजी जा चुकी है।
* हिंदी विकिपीडिया पर अगला संपादनोत्सव अक्टूबर 2025 में तथा विकिस्रोत पर नवंबर 2025 में आयोजित होगा।
* हिंदीविकिमीडियन्स ग्रूप ने हिंदी विकि सम्मेलन 2026 आयोजित करने का निस्चय किया है।
* 1 अक्टूबर से 23 अक्टूबर 2025 के बीच तीन नए संपर्क सूत्रों के निर्वाचन की प्रक्रिया सुरु की जा रही है।
* यदि हिंदी विकि के संपादक कोई प्रशिक्षण, कार्यशाला, या बैठक करना चाहते हैं तथा इसके लिए आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है तो इसके लिए संपर्क सूत्रों से संपर्क कर सकते हैं। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) 16:43, 18 सितंबर 2025 (UTC)
== हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप संपर्क सूत्र निर्वाचन ==
[[w:विकिपीडिया:संपर्क सूत्र]] पृष्ठ पर हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के तीन संपर्क सूत्रों के निर्वाचन की प्रक्रिया 1 अक्तूबर 2025 से शुरु की जा रही है। सभी सदस्यों का इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए स्वागत है। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १६:२२, ३० सितम्बर २०२५ (UTC)
:सभी सौ से अधिक संपादन कर चुके सदस्यों (नियम 2.1) से अनुरोध है कि [[w:विकिपीडिया:संपर्क सूत्र#संपर्क सूत्र चुनाव 2025 अक्टूबर|संपर्क सूत्र चुनाव 2025 अक्टूबर]] पृष्ठ पर 9 से 22 अक्तूबर तक संपर्क सूत्र उम्मीदवार के प्रस्ताव पर मतदान करें। 7 अक्तूबर को नामांकन होने के कारण 8 अक्तूबर को भी संपर्क सूत्र उम्मीदवार अपना नामांकन कर सकते हैं। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०८:२८, ८ अक्टूबर २०२५ (UTC)
== विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025 ==
[[w:विकिपीडिया:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/अक्तूबर 2025]] में 1 अक्तूबर से 18 अक्तूबर तक शामिल होकर गूगल खोज में नहीं पाए गए विषयों पर विकिपीडिया पर नए लेख बनाने तथा पुरस्कार जीतने के लिए सभी विकि सदस्यों का स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १६:२३, ३० सितम्बर २०२५ (UTC)
== मातृभाषा संपादनोत्सव में भाग लें ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा [[अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस]] के अवसर पर दो संपादनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
# [[w:hi:विकिपीडिया:मातृभाषा संवर्धन संपादनोत्सव/2026|विकिपीडिया:मातृभाषा संवर्धन संपादनोत्सव/2026]]- 15 फरवरी 2026 से 21 फरवरी 2026 तक हिंदी विकिपीडिया पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव।
# [[S:hi:विकिस्रोत:मातृभाषा संवर्धन संपादनोत्सव/2026|विकिस्रोत:मातृभाषा संवर्धन संपादनोत्सव/2026]]- 21 फरवरी 2026 से 28फरवरी 2026 तक हिंदी विकिस्रोत पर आयोजित ऑन लाइन संपादनोत्सव।
:इनमें भाग लेकर मुक्त हिंदी ई-सामग्री के विकास के अभियान में सहायक होने के लिए आपका स्वागत है। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०४:३७, १४ फ़रवरी २०२६ (UTC)
== Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026 - Call for Applications ==
The [[m:Indic MediaWiki Developers User Group|Indic MediaWiki Developers User Group]] is pleased to announce the upcoming [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]], scheduled to take place in Hyderabad from 26 - 28 June 2026 (with 25 June as Day 0), in collaboration with the [[m:IIITH-OKI|IIITH-OKI]] and [https://www.osdg.in/ OSDG] club at [[w: International Institute of Information Technology, Hyderabad|International Institute of Information Technology, Hyderabad]].
Wikimedia hackathons are spaces for developers, designers, content editors, and other community stakeholders to collaborate on building technical solutions that help improve tools, workflows, and overall user experience across Wikimedia projects.
'''The hackathon is intended for:'''
* Technical contributors active in the Wikimedia technical ecosystem, including developers, maintainers (admins/interface admins), translators, designers, researchers, documentation writers, etc.
* Content contributors having an in-depth understanding of technical issues in their home Wikimedia projects like Wikipedia, Wikisource, Wiktionary, etc.
* Contributors from other FOSS communities or those who have participated in Wikimedia events in the past and would like to begin contributing to Wikimedia technical spaces.
Participants may work on curated hackathon tasks and are also encouraged to propose their own ideas, supported by a clear problem statement and a proposed approach.
To encourage participation and support promising contributions, scholarships will be provided to support participants’ related expenses.
'''Apply here:'''
* Scholarship application form (Deadline: 2 May 2026): [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSej8JvGsvQ7mYmkXdUDriMrKNPajCqH4e3clEct_GnmA1HZ3g/viewform Google form]
'''More information:'''
We encourage interested contributors to apply and participate. Further updates, including program details and venue, will be shared on the Meta page.
* Meta page: [[m:Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026|Indic Wikimedia Hackathon Hyderabad 2026]]
If you have any questions, concerns, or need support with the application, please reach out via the Meta-Wiki talk page or email at {{nospam|contact|indicmediawikidev.org}}.
Best Regards,
On behalf of Indic Mediawiki Developers User Group
== आगामी कार्यक्रम ==
:हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की सूची:
# जून- विकिपीडिया सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ जून से 30 जून)
# जुलाई- विकिस्रोत सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव (१ से 15 जुलाई)
# अगस्त- हिंदी विकि सम्मेलन (7-9 अगस्त)
-संपर्क सूत्र--[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:५०, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 ==
:मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप के द्वारा प्रस्तावित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] को विकिमीडिया के कॉन्फ्रेंस ग्रांट कमिटी द्वारा मंजूरी मिल गई है। 7-9 अगस्त 2026 को होने वाली हिंदी विकि समुदाय की यह बैठक 2020 के बाद पहली बार हो रही है। नई दिल्ली में आयोजित इस
बैठक में शामिल होने के लिए सहायता वृत्ति (स्कॉलरशिप) का आवेदन पत्र 1 मई से 20 मई 2026 तक उपलब्ध रहेगा। आयोजन संबंधी सूचनाएं सम्मेलन के लिए निर्मित विकिपीडिया पृष्ठ पर उपलब्ध होगी तथा संक्षिप्त सूचना चौपाल पर भी उपलब्ध होगी। 6 वर्ष बाद हो रहे सामुदायिक मिलन के इस प्रयास में सभी हिंदी विकि संपादकों के सहयोग की अपेक्षा है।- संपर्क सूत्र --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:५२, २४ अप्रैल २०२६ (UTC)
== हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६ छात्रवृत्ति सूचना ==
हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा 8-9 अगस्त 2026 को आयोजित [[w:hi:विकिपीडिया:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026]] में शामिल होने के लिए 10 राष्टरीय तथा 10 स्थानीय स्तर की छात्रवृत्ती प्रदान की जाएगी। इसे प्राप्त करने के लिए हिंदी विकि संपादक सदस्य [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfLBdfmW4zvXCRbz-qjzQrxT2cX2pCilcnOvK73Dhu0wc7gow/viewform?usp=header हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026 प्रतिभागिता वृत्ति प्रपत्र] 20 मई तक जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:२२, १ मई २०२६ (UTC)
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सोनभद्र के पवित्र धार्मिक स्थल
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'''सोनभद्र के पवित्र धार्मिक स्थल'''
सोनभद्र में उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों की अधिकतम उपलब्धताओं ने मतभेद मूलक विचारों व संज्ञानों के कारण सोनभद्र की ऐतिहासिकता को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। गजेटियर 1974,1978 व आजादी पूर्व का गजेटियर 1911 स्पष्ट रूप से जानकारी देता है कि वनजीवी द्रविण व आर्य प्रजातियों का राजनैतिक सामाजिक व आर्थिक हस्तक्षेप सोनभद्र में रहा है जो अविवादित है किन्तु ‘‘आइए सोनभद्र चलंे’’ पुस्तिका 1992 सोनभद्र में आर्यों की उपस्थिति को साबित नहीं करता है व इसे सामान्य रूप से लेता है। इस प्रकार सोनभद्र का ऐतिहासिक सत्य विवादास्पद हो जाता है। कुछ लोग अपने फुटकर लेखों व आलेखों में सोनभद्र की प्राचीनता का सन्दर्भ नागवंशीय राजाओं व शैव मतावलम्बियों से जोड़कर सोनभद्र को परीक्षित करने का प्रयास कर चुके हैं। इसी प्रकार लोरिक की कथा को राजा मोलागत से जोड़ दिया गया है जो कि अगोरी का राजा था इतना ही नहीं मंजरी का कोहबर व डोला भी ढूंढ निकाला गया है। इतिहास की किताबंे मोलागत नामक राजा का सन्दर्भ नहीं लेतीं। दरअसल मोलागत राजा का नाम असली राज के स्थान पर छद्म जान पड़ता हैै, इसलिए कि लोरिकी की कथा अगोरी के वास्तविक क्रूर राजा के काल में ही जनप्रिय होकर गायकों के कंठ से प्रस्फुटित होने लगी रही होगी। अंग्रेजी काल में भारतेन्दु जी भी अंग्रेजों को गोरी गिट्टयों की उपमा देते हैं सीधे तौर पर अंग्रेज नहीं लिखते। लोरिकी के स्वस्फुर्त गायकों ने अगोरी के राजा का वास्तविक नाम न लेकर एक काल्पनिक नाम मोलागत चुन लिया होगा। वैसे भी असली राजा से क्या मतलब? लोरिकी का लक्ष्य तो लोरिक के संघर्षों को स्पष्ट करना था तथा वास्तविक रियासती व्यवस्था व दमनकारी सत्ता केन्द्र का विरोध करना था।
सिल्थम पटना जो रावटर््सगंज से पूरब व दक्षिण में स्थित है तथा नल राजा नामक स्थान जो पूरब व उत्तर में स्थित है, सोन नदी की उत्तरी किनारे की पहाड़ियों से गुजरते हुए रावटर््सगंज के पश्चिम तक जाने पर शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां मूर्ति की शिल्प-कला अतीत की क्रूर त्राशदियों को न झेल रही हो। मूर्ति-कला के दमन व उत्पीड़न का क्षेत्रा जैसा सोनभद्र है वैसा शायद कहीं और नहीं। किसी भी शिल्प व संस्कृति के दमन, विलोपीकरण, समाप्तीकरण की दृष्टि से सोनभद्र की ऐतिहासिकता को जानने-बूझने का सचेत आग्रह भी बुद्धि के खिलाड़ियों में निश्चित रूप से विकसित होना चाहिए। सोनभद्र खण्डित व अखण्डित दोनों प्रकार की मूर्तियों के शिल्प का क्षेत्रा है। गोठानी जैसे स्थान पर जो अगोरी किले के समीप है वहां मूर्ति-शिल्प-कला के केन्द्र होने का प्रमाण दिखता है। नल राजा नामक स्थान किसी राज-व्यवस्था के नगर की तरफ संकेत देता है तो शिवद्वार का क्षेत्रा किसी आध्यात्मिक केन्द्र होने की गाथा कहता है। सिल्थम व पटना में खण्डित मूर्तियां हर तरफ बिखरी हुई मिलती हैं तो मऊ में सहस्त्रामुखी शिव की प्रतिमा साबूत बची हुई है। इस प्रतिमा को स्थानीय लोगों ने अपने प्रयासों से एक मन्दिर मंे स्थापित भी कर दिया है। यही स्थिति नल राजा के शिवलिंग की है जिसे स्थानीय लोगों ने मन्दिर में स्थापित कर दिया है। रामगढ़ के ठीक उत्तर शिवाला गांव में एक पुराना शिवालय एक बड़े तालाब के किनारे स्थापित है जिसमें शिव-लिंग स्थापित है। शिवालय के निर्माण की कला वास्तु की दृष्टि से अद्भुत है जो बनारस में स्थापित प्राचीन शिवालयों से किसी मायने में कमतर नहीं है। कम से कम विजयगढ़ राज के क्षेत्रा में इस शिवालय की तुलना में पुरानी कला के रूप का कहीं भी शिवालय नहीं है, वैसे तो आधुनिक काल में तमाम ऐसे शिवालय बनाये जा चुके हैं जो गॉव गॉव है। इससे यह प्रमाणित होता है कि यह पूरा परिक्षेत्रा आध्यात्मिक रूप से ‘शैव परंपरा’ का सशक्त अनुयायी है। वैसे यहां वैश्णव परंपरा के भी संकेत मिलते हैं पर शैव परंपरा की तुलना में बहुत ही कम। एक बात और सोनभद्र में उल्लेखनीय है वह यह कि अंग्रेज सोनभद्र के जिस हिस्से को सोनभद्र का दक्षिणी हिस्सा मानते हैं, जो अंग्रेजों के जमाने में आदिवासी बहुल क्षेत्रा रहा है, उन स्थानों पर हिन्दू मतावलम्बियों के आघ्यात्मिक प्रतीक नहीं के बराबर मिलते हैं केवल अगोरी व गोठानी का ही एसा परिक्षेत्रा है जहां आध्यात्मिक प्रतीक पाये जाते हैं। बहर हाल इस विषय पर एक अलग तरह का शोधात्मक अध्ययन करके पता लगाया जा सकता है कि आदिवासी परिक्षेत्रों तक आजादी के पहले हिन्दू मतावलम्बियों के धार्मिक प्रतीक क्यों नहीं पाये जाते जब कि इतिहास साफ बताता है कि आदवासी जनजातियों का आर्यीकरण अंग्रेजों के भारत आने के पहले ही प्रारंभ हो चुका था। सो वहां भी धार्मिक प्रतीक तो होने ही चाहिए थे।
'''शिवद्वार- शिव पार्वती की आलिंगन बद्ध प्रतिमा
'''
[[File:Shivdwar--.jpg|thumb|काले पत्थर पर उकेरित आलिंगन बद्ध शिव प्रतिमा]]
शिवद्वार में स्थापित शिव पार्वती की आलिंगन-बद्ध प्रतिमा काले पत्थर पर उकेरित है। दस प्रतिमा की चिकनाई तथा उसका खरादिया काम आकर्षक है। पूरे सोनभद्र में कोई भी देव-प्रतिमा आलिंगन-बद्ध नहीं है। आलिंगन-बद्ध प्रतिमाओं का भारत में प्रारंभ यदि खुजराहों से मान लिया जाय तो यह प्रतिमा भी खुजराहों कला का प्रतिरूप जान पड़ती है। खुजराहो के मूर्ति-शिल्प को चन्देल राजाओं ने प्रश्रय दिया था, ज्ञातव्य है कि चन्देल राजाओं की ही शासन व्यवस्था सोनभद्र में भी रही है, इस प्रकार शिवद्वार की शिव-प्रतिमा का निर्माण उनसे कहीं न कहीं अवश्य ही जुड़ा जान पड़ता है। काले पत्थर पर उकेरित शिव-प्रतिमा की अद्वितीयता इस अर्थ में भी है कि कैमूर घाटी की आदिम व मध्य कालीन संस्कृति में जीवन जीने की जो कलायें थीं उनमें समता व भाई-चारे का पक्ष प्रबल था। स्त्राी-पुरुष के बीच अलगाव जैसा रिश्ता न था। मध्यकाल के अन्त से आधुनिक काल के पूर्व तक, स्त्राी-पुरुष के बीच सांस्कृतिक रूप से वैराग्य की आध्यात्मिक भावनाओं के कारण जो बिलगाव पैदा होने लगा था वैसी ही भावना जब भी सोनभद्र में विकसित हुई होगी संभव है उसी काल में इस आलिंगन-बद्ध शिव-पार्वती की प्रतिमा का निर्माण कराया गया होगा। पूरे सोनभद्र में कहीं भी कोई प्रतिमा स्त्राी-पुरुष की संयुक्तता बोधी नहीं हैं और न ही वैराग्य की अवधारणा का पोषक हैं। विष्णु हैं तो अकेले हैं उनके साथ धन की देवी लक्ष्मी नहीं हैं, कोई दूसरी प्रतिमा है तो वह भी अकेली है। केवल शिव ही हैं जो पार्वती के साथ हैं वह भी आलिंगनबद्ध। गांव-गांव में शिव मन्दिर का पाया जाना प्रमाणित करता है कि सोनभद्र शैव परंपरा का अनुयायी है। तप व तकलीफ, ध्यान व साधना, विचार व आत्मा, प्रकृति व पुरुष का द्वन्द सोनभद्र की कैमूर घाटी मंें हर तरफ दिखेगा। मूर्तियाँ एक तरफ आध्यात्मिक साधना के तकलीफों की तरफ संकेत करती हैं तो दूसरी ओर जीवन जीने की बहु-आयामी कलाओं की तरफ भी। जीवन जीने की कलाओं के बीच जो भी आर्थिक व सामाजिक रूप से पूरे सोनभद्र में तकलीफ व यातना व्याप्त है, उसकी सूचना इन मूर्तियों की कलाओं व स्थापनाओं से सहज ही प्राप्त हो जाती हैं पर इन तकलीफों से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष व सार्थक प्रतिरोध के जिस तप व ताप की आवश्यकता सोनभद्र के लिए है वह कहीं भी नहीं दिखती।
'''मऊ- शिव की सहस्त्रमुखी प्रतिमा'''
[[File:Mau-- ki hiv pratima.jpg|thumb|मऊ की शिव प्रतिमा नंदी के साथ]]
मऊ गांव में स्थापित सहस्त्रा मुखी शिव प्रतिमा की पुरातात्विकता तथा उसका सांस्कतिक अर्थ-बोध बहुत ही जन-कल्याणकारी है। सहस्त्रामुखी का अर्थ सहस्त्राबाहु से है जिसका अर्थ होता है केवल मुंह ही नहीं जिसे रोटी चाहिए सहस्त्राभुजाएं भी हैं, यदि हाथ कुछ करेंगे तो रोटी मिलेगी ही। दूसरा अर्थ यह लगाया जाना चाहिए कि जितने मंुह उतनी बातें फिर जीवन का सत्य दो आंखें हैं इन्हीं दोनों आंखों से साक्षात्कार करने के लिए एक मुंह के साथ दो आंखे हैं, इन्हीं दोनांे आंखों से सत्य देखोे फिर मुंह से बोलो। इस सहस्त्रा-मुखी शिव प्रतिमा को निर्मित करने वाला कलाकार एक सोद्देश्य सांस्कृतिक कार्य भारों के तहत इसका निर्माण करता है पर सांस्कृतिक प्रदूषण होने के कारण कलाकार की भावुकता व दार्शनिकता धूमिल व प्रदूषित होने लगती है। प्रकृत व पुरुष के द्वन्द को प्रदर्शित करने वाली इन मूर्तियों का रूप कुछ इतना आध्यात्मिक हो गया है कि उसमें से सिर्फ आस्था ही शेष बचती है तर्कणा व विचारणा गायब हो जाती है। जीवन जीने के आवश्यक कार्य भारों को निपटाने के लिए जिस तप, साधना, ध्यान व आस्था की आवश्यकता होती है वह सब निरीह आस्था व विश्वास की अकर्मण्यता में विलुप्त हो जाता है तथा व्यक्ति देव-वाद का मनोवैज्ञानिक मरीज होकर पूजा पद्धतियों के तर्क-हीन कर्म-काडों में उज्जवल भविष्य का सपना देखने लगता है। व्यक्ति के जीवन में हानिकर कर्म-कांडी आचरण का प्रवेश इसी बिन्दु से प्रारंभ हो जाता है जबकि मूर्तियाँ इसके विपरीत आचरण व आस्था की संस्तुतियाँ व जागरण करती हैं कि जीवन में जीवन जीने की कलाओं का जो संषर्ष व द्वन्द है उससे विरत या मुह मोड़ कर सत्य को नहीं जाना जा सकता। वैसे तो पूरा मऊ गॉव कहीं साबूत तो कहीं टूटी हुई मूर्तियों का केन्द्र है, हर सौ डेढ़ सौ फीट की दूरी पर कोई न कोई मूर्ति अवश्य दीख जायेगी। इसी मऊ गॉव में एक पुरातात्विक संग्रहालय भी है जो आज-कल सरकारी देख-रेख की उपेक्षा का शिकार है।
'''बरकन्हरा- में स्थापित विष्णु प्रतिमा'''
[[File:God vishnu -.jpg|thumb|विष्णु प्रतिमा]]
बरकन्हरा में प्राप्त विष्णु की प्रतिमा जो सफेद पत्थर पर उकेरित है तथा जिसकी ऊँचाई डेढ़ फीट होगी यह प्रतिभा भी स्थानीय लोगों द्वारा निर्मित मन्दिर में स्थापित है। मूर्ति का सफेद रंग आचरण की शुचिता तथा कर्म करने के कठोर संकल्पों की व्याख्या करता है। प्रतिमाएं चाहे जिस रूप में हों जिस कला-कौशल से निर्मित की गई हों उनका रूप उनकी संरचना अभिव्यक्ति के सार्थक संवेगों व ऊर्जाओं को प्रस्फुटित करती हैं। बरकन्हरा घोरावल से तेरह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। घोरावल का पूरा भू-भाग बेलन व सोन जैसी नदियों के क्षेत्रों के भीतर है। ये दोनों नदियां इस क्षेत्रा की निरपेक्ष संस्कृति का निर्माण करती हैं तथा मानव जीवन जीने लायक एक ऐसा भू-भाग निर्मित करती हैं जहां आदमी अपना रहवास स्थापित करने के लिए विवश हो जाता है। इन मैदानों पर रहने वाले रहवासियों के बीच निर्पेक्ष रिश्ता देखने लायक है तथा वे प्रकृति से सीखते हुए प्रकृति के उत्पादों का उपयोग करने की योग्यता व दक्षता संपन्न हैं। यह सब मानव विकास की निर्पेक्ष गति-शीलता के प्रति स्पष्ट संकेत हैै। विष्णु की सफेद प्रतिमा कैमूर घाटी की निर्पेक्ष संस्कृति का स्पष्ट रूप से व्याख्या करती है। कहा जा सकता है कि शिवद्वार के शिव तथा बरकन्हरा के विष्णु दोनों अलग-अलग तौर तरीकों से शैव व वैष्णव धर्म संस्कृति का अनुष्ठान रचते हैं पर ऐसा कहना सोनभद्र व कैमूर घाटी संस्कृति की निरपेक्षता पर कलंक लगाना होगा। यहां तो दोनों संस्कृतियां एक में गुत्थम गुत्था हैं समझना मुश्किल कि कौन शैव मतावलम्बी है और कौन वैष्णव मतावलम्बी। मूर्तियांे की निरपेक्षता कालान्तर में अनुकरणीय नहीं रह सकी। इनके भाव संवेगों व संचारांे में विविधता व भिन्नताएं आईं फलस्वरूप मूर्ति-कला की समभावी व समायोजन-वादी शिक्षा मिटने लगी तथा मूर्तियों में पक्षपात पूर्ण धार्मिक आस्थाओं व विश्वासों को प्रस्थापित किया जाने लगा। जीवन जीने के तौर तरीकों की निरपेक्षता समाप्त होने लगी तथा मतावलम्बियों के हठ प्रभावी होने लगे। यहीं से मूर्तिरूपी पाषाण लिपि की जन समझदारी मतभेदों का शिकार होने लगी।
'''नलराजा- विशाल एवं अद्भुत शिवलिंग'''
[[File:Nal raja.jpg|thumb|विशाल शिव लिंग]]
नल राजा नामक स्थान पर स्थापित शिवलिंग सोनभद्र के ज्ञात शिव-लिंगों में अदभुत एवं आश्चर्यजनक है। लगभग चार फीट ऊँचा तथा लगभग इसी गोलाई का यह शिवलिंग अद्भुत है? संभवतः इस शिवलिंग पर कर्म-कांडियों की निगाह नहीं पड़ी, नहीं तो वे इसकी रचना-प्रक्रिया की शास्त्राीयता पर अवश्य प्रकाश डाले होते। बहरहाल मूर्ति कला की संप्रेषणीयता के विज्ञान के आधार पर नलराजा के शिवलिंग रचना पर विचार किया जाय तो यह स्पष्ट है कि सभी शिव-लिंग सृजन प्रक्रिया की तरफ संकेत देते हैं। हानि, लाभ, यश,अपयश, अच्छा,बुरा, शुभ,अशुभ, हार,जीत, देवता, राक्षस सभी प्रकृतिक संरचनाएं जब बची रहंेगी तथा प्रकृति की मानव रूपी संरचना जब सुरक्षित रहेगी तभी धर्म व राजनीति समाज व अर्थनीति न्याय व अपराध पर आधारित व्यवस्था व शास्त्रा बचे रह सकेंगे। शिव-लिंगों का यह सन्देश कि सृष्टि बचाओ, समाज बचाओ, आदमी बचाओ तभी भूगोल बचेगा, दुनिया बचेगी, नहीं तो जब सृजन ही समाप्त हो जाएगा फिर क्या बचेगा? शिवलिंगों की स्थापनाएं सृजन की स्थापनाओं के लिए किए जाने वाले पवित्रा प्रयास जैसा जान पड़ती हैं। लिंग-पूजा व समाज में प्रचलित लिंग-भेद दोनों एक दूसरे के विरोधी तत्व के रूप में विकसित हुए हैं जबकि जहां-जहां भी शिवलिंग पूज्यनीय व आराध्य हैं, कम से कम वहां तो लिंग-भेद नहीं होना चाहिए था। कदाचित स्त्राी-पुरुष का भेद मिट जाता तो यह दुनिया इतनी बद्रूप नहीं होती जितनी है। आमतौर पर देखा जा रहा है कि पुरुष उत्पीड़न व यातना झेलती औरतें जितना आस्थावादी व कर्म-कांडी होती हैं उतना पुरुष नहीं। वे काफी डरी हुई व भयभीत हैं, इसलिए डरों व भयों से मुक्त होने के लिए ईश्वरीय आस्थाओं में वे समाधान ढॅूढ़ती हैं और पूजा-पाठ जैसे कर्म विधानों में खुद को व्यस्त रखना धर्म का काम मानती हैं। पुरुष, पदार्थ के रिश्तों की अद्वितीयता मूर्तियों की आस्था में स्पष्ट रूप से दिखती है। मूर्तियाँ स्पष्ट रूप से पत्थर-रूपी पदार्थ होती हैं उनमें न तो जीवन होता है न ही जीवन जैसी उनमें हलचल होती है फिर भी मूर्तियाँ आस्था व विश्वास की भाषा में संवाद करती हैं तथा जन-मानस को प्रभावित करती हैं। पदार्थ व पुरुष के शाश्वत रिश्ते ने ही समाज को गतिशीलता प्रदान की है। मूर्तियाँ पदार्थ के सत्य का साक्षात्कार कराती हैं एक ऐसा साक्षात्कार जो प्रकृति से रिश्ता बनाने की कला सिखाता है, जिससे जीवन जीने के क्रम में निरन्तरता व समरूपता बनी रह सके। आज की वैज्ञानिक दुनिया में पर्यावरणवादी, जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों से मुहब्बत करने की कला सिखा रहे हैं तथा चेता रहे हैं कि यदि प्रकृति का विनाश रोका न गया तो निश्चित रूप से यह हसीन दुनिया नष्ट हो जाएगी। मूर्तियों के सत्य का साक्षात्कार इसलिए आवश्यक है कि पदार्थो का सत्य, पुरुष और प्रकृति का सत्य व अस्तित्व बचा रहे लेकिन व्यवहारतः विपरीतगामी कार्यवाहियों का संपादन किया जा रहा है तथा प्रकृति के प्रति आस्था व विश्वास को तोड़ दिया जा रहा है। राबर्ट्सगंज से कुछ दूर चुर्क के रास्ते पर अवस्थित पंचमुखी के शिवलिंग को मूर्तियों के सत्य के ज्ञान के लिए देखा जाना चाहिए। पंचमुखी पर स्थापित शिवलिंग सृजन के प्राकृतिक प्रक्रिया का बोध कराता है कि सृजन आवश्यक है। राबर्ट्सगंज से करीब आठ किलोमीटर दूर पश्चिम स्थित गौरीशंकर ग्राम में भी शिवलिंग स्थापित है तथा वहाँ मेला भी लगता है कुड़ारी देवी की मान्यता भी उल्लेखनीय है जो सोन नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित हैं। गोठानी व मऊ दो ऐसे स्थान है जहां पर पुरात्व विभाग की तरफ से मूर्तियों की ऐतिहासिकता सम्बन्धी कार्य किया जाना चाहिए जिससे सोनभद्र का ऐतिहासिकता का सच प्रकाश में आए तथा मतभेद के आधार समाप्त हों। क्योंकि जितने लोग उतनी बातें हैं। शिव के सहस्त्रा-मुखी प्रतिमा की तरह यहाँ का इतिहास भी सहस्त्रामुखी हो चुका है। सोनभद्र में मूर्तियों के बिखराव व पुरातात्विक साक्ष्यों की उपलब्धता के आधार पर जो निश्कर्ष निकलते हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण है, श्रम-सम्बन्धों वाले समाज के कर्म का दर्शन तथा पुरुष का पदार्थ, व प्रकृति के प्रति प्रेम व समर्पण। निश्चित रूप से सोनभद्र का प्रारम्भिक समाज कर्म से संबंधित धर्म की व्याख्या का रहा होगा जबकि आज धर्म से संबंधित कर्म की व्याख्या वाला हो गया है जो व्यक्ति को अन्ध-भक्त व आस्थावादी बना रहा है। पहले ऐसा नहीं था। पहले के समाजों में कर्म की प्रधानता थी तथा कर्म करने की छूट भी थी। भूमि की हकदारी का सवाल नहीं था, सम्पत्ति का मायाजाल व्यक्तिगत उपक्रमों में फंसा नहीं था, सम्पत्ति सार्वजनिक थी तथा एकाधिकारी प्रवृत्तियाँ प्रभावी नहीं हुई थीं। व्यक्ति को समाज के लिए कर्म करना था। इस कर्म के लिए जो आचरण व कार्मिक व्यवहार विकसित हुए वही धर्म के रूप में मान्य होते चले गए। कालान्तर में भाषा व लिपि का विकास हुआ जिससे शास्त्रा व शस्त्रा निर्मित हुए। शास्त्रों के पास धर्म की हिफाजत का जिम्मा था तो शस्त्रों के पास समाज व व्यक्ति को बचाने का। कृषि अर्थव्यवस्था पर आधारित समाजों में कर्म की प्रधानता के कारण शाश्वत श्रम सम्बन्धों का विकास हुआ जिससे पक्षपात रहित तथा सम-भाव समाज का आविर्भाव हुआ। कर्म का यह दर्शन मानव सभ्यता के विकास के क्रम मंे मिटने लगा, कहा जा सकता है कि धार्मिक जकड़नों ने कर्म के प्राचीन दर्शन को धर्म के कर्महीन सूत्रा ‘आस्था’ से जोड़ दिया। देव-आस्था के इस स्वरूप ने समाज में कर्म-हीनता तो उत्पादित किया ही साथ ही साथ हानि,लाभ, यश,अपयश, जीत-हार, जैसे जीवन के सारे क्रिया-भारों को ईश्वर के हवाले कर दिया...जैसा ईश्वर चाहेगा वही होगा। फलस्वरूप हमारेे समाज में खतरनाक जड़ता आई जो आज भी स्पष्ट रूप से दिखती है। मूर्तियों की निर्पेक्ष अभिव्यक्ति सांस्कृतिक रूप से प्रभावित हुई। पुरुष व पदार्थ का रिश्ता स्वार्थ पूर्ण एवं व्यक्ति केन्द्रित होकर एकाधिकार की तरफ बढ़ने लगा। सामाजिक रूप से सोनभद्र के भाई-चारे की स्थिति प्रायोजित प्रतियोगिता का रूप धारण करने लगी है। आज सोनभद्र के प्रतियोगी समाज की आर्थिक व सामाजिक स्थिति गरीबी व बेरोजगारी के कारण आक्रामक है, असमानता की खतरनाक वृद्धि है तथा मानवाधिकार पूरी तरह असुरक्षित। वैसे तो सोनभद्र में तमाम दर्शनीय स्थल हैं जिस पर अलग से लेखन किया जाना चाहिए जो यहां संभव नहीं है फिर भी हम उनका उल्लेख कर रहे हैं.
अन्य पुरातात्विक स्थल
[[File:सम्मिलित देव प्रतिमाएं.jpg|thumb|सम्मिलित देव प्रतिमाएं]]
[[File:All images.jpg|thumb|अन्य प्रतिमा एक साथ]]
1- ओम पर्वत- जिलामुख्यालय से दक्षिण तरफ 40 कि.मी.दूर,
2- गोमुख- जिलामुख्यालय से दक्षिण तरफ 30 कि.मी.दूर मच्छरमारा गॉव में
3- त्रिवेणी संगम-जिलामुख्यालय से दक्षिण तरफ 27 कि.मी.दूर सोन, बिजुल, रेड़ के संगम पर
4- कण्डाकोट-जिलामुख्यालय से पश्चिम तरफ 10 कि.मी.दूर
5- छिपाताली- जिलामुख्यालय से पू. उ. की तरफ 40 कि.मी.दूर
6- दिवानी चुंआं- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 35 कि.मी.दूर
7- बाघेश्वर महादेव- जिलामुख्यालय से उ.पू. की तरफ तरफ 28 कि.मी.दूर
8- बरैला महादेव- जिलामुख्यालय से पश्चिम की तरफ 3 कि.मी.दूर
9- ऋणमुक्तेश्वर नाथ- जिलामुख्यालय से पू.दक्षिण की तरफ 40 कि.मी.दूर घाघर नदी के तट पर
10- सोमा की धरती माता- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 40 कि.मी.दूर घाघर नदी के तट पर
11- बाबा सोमनाथ एवं वंसरा माता मन्दिर- जिलामुख्यालय से पू.दक्षिण की तरफ 40 कि.मी.दूर,
सोन व रेणु के संगम पर
12- अमर गुफा- जिलामुख्यालय से दक्षिण 35 कि.मी.दूर सलई बनवा में स्थित
13- भूतेश्वर दरबार की गुफा- जिलामुख्यालय से दक्षिण की तरफ 33 कि.मी.दूर
13- पिंडारी की गुफा- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 50 कि.मी.दूर
14- सोनेश्वर महादेव- जिलामुख्यालय से दक्षिण की तरफ 21 कि.मी.दूर
15- कुण्डवासिनी देवी- जिलामुख्यालय से दक्षिण-पश्चिम की तरफ 40 कि.मी.दूर
16- दुर्गावती कुण्ड- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 85 कि.मी.दूर
17- मॉ मुण्डेश्वरी देवी- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 85 कि.मी.दूर
18- ज्वालामुखी देवी- जिलामुख्यालय से दक्षिण की तरफ 120 कि.मी.दूर
19- अमिलाधाम- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 45 कि.मी.दूर
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{{delete|पाठ्य पुस्तक नहीं; किसी का मूल शोध। संभवतः प्रचार हेतु प्रकाशित। }}'''सोनभद्र के पवित्र धार्मिक स्थल'''
सोनभद्र में उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों की अधिकतम उपलब्धताओं ने मतभेद मूलक विचारों व संज्ञानों के कारण सोनभद्र की ऐतिहासिकता को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। गजेटियर 1974,1978 व आजादी पूर्व का गजेटियर 1911 स्पष्ट रूप से जानकारी देता है कि वनजीवी द्रविण व आर्य प्रजातियों का राजनैतिक सामाजिक व आर्थिक हस्तक्षेप सोनभद्र में रहा है जो अविवादित है किन्तु ‘‘आइए सोनभद्र चलंे’’ पुस्तिका 1992 सोनभद्र में आर्यों की उपस्थिति को साबित नहीं करता है व इसे सामान्य रूप से लेता है। इस प्रकार सोनभद्र का ऐतिहासिक सत्य विवादास्पद हो जाता है। कुछ लोग अपने फुटकर लेखों व आलेखों में सोनभद्र की प्राचीनता का सन्दर्भ नागवंशीय राजाओं व शैव मतावलम्बियों से जोड़कर सोनभद्र को परीक्षित करने का प्रयास कर चुके हैं। इसी प्रकार लोरिक की कथा को राजा मोलागत से जोड़ दिया गया है जो कि अगोरी का राजा था इतना ही नहीं मंजरी का कोहबर व डोला भी ढूंढ निकाला गया है। इतिहास की किताबंे मोलागत नामक राजा का सन्दर्भ नहीं लेतीं। दरअसल मोलागत राजा का नाम असली राज के स्थान पर छद्म जान पड़ता हैै, इसलिए कि लोरिकी की कथा अगोरी के वास्तविक क्रूर राजा के काल में ही जनप्रिय होकर गायकों के कंठ से प्रस्फुटित होने लगी रही होगी। अंग्रेजी काल में भारतेन्दु जी भी अंग्रेजों को गोरी गिट्टयों की उपमा देते हैं सीधे तौर पर अंग्रेज नहीं लिखते। लोरिकी के स्वस्फुर्त गायकों ने अगोरी के राजा का वास्तविक नाम न लेकर एक काल्पनिक नाम मोलागत चुन लिया होगा। वैसे भी असली राजा से क्या मतलब? लोरिकी का लक्ष्य तो लोरिक के संघर्षों को स्पष्ट करना था तथा वास्तविक रियासती व्यवस्था व दमनकारी सत्ता केन्द्र का विरोध करना था।
सिल्थम पटना जो रावटर््सगंज से पूरब व दक्षिण में स्थित है तथा नल राजा नामक स्थान जो पूरब व उत्तर में स्थित है, सोन नदी की उत्तरी किनारे की पहाड़ियों से गुजरते हुए रावटर््सगंज के पश्चिम तक जाने पर शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां मूर्ति की शिल्प-कला अतीत की क्रूर त्राशदियों को न झेल रही हो। मूर्ति-कला के दमन व उत्पीड़न का क्षेत्रा जैसा सोनभद्र है वैसा शायद कहीं और नहीं। किसी भी शिल्प व संस्कृति के दमन, विलोपीकरण, समाप्तीकरण की दृष्टि से सोनभद्र की ऐतिहासिकता को जानने-बूझने का सचेत आग्रह भी बुद्धि के खिलाड़ियों में निश्चित रूप से विकसित होना चाहिए। सोनभद्र खण्डित व अखण्डित दोनों प्रकार की मूर्तियों के शिल्प का क्षेत्रा है। गोठानी जैसे स्थान पर जो अगोरी किले के समीप है वहां मूर्ति-शिल्प-कला के केन्द्र होने का प्रमाण दिखता है। नल राजा नामक स्थान किसी राज-व्यवस्था के नगर की तरफ संकेत देता है तो शिवद्वार का क्षेत्रा किसी आध्यात्मिक केन्द्र होने की गाथा कहता है। सिल्थम व पटना में खण्डित मूर्तियां हर तरफ बिखरी हुई मिलती हैं तो मऊ में सहस्त्रामुखी शिव की प्रतिमा साबूत बची हुई है। इस प्रतिमा को स्थानीय लोगों ने अपने प्रयासों से एक मन्दिर मंे स्थापित भी कर दिया है। यही स्थिति नल राजा के शिवलिंग की है जिसे स्थानीय लोगों ने मन्दिर में स्थापित कर दिया है। रामगढ़ के ठीक उत्तर शिवाला गांव में एक पुराना शिवालय एक बड़े तालाब के किनारे स्थापित है जिसमें शिव-लिंग स्थापित है। शिवालय के निर्माण की कला वास्तु की दृष्टि से अद्भुत है जो बनारस में स्थापित प्राचीन शिवालयों से किसी मायने में कमतर नहीं है। कम से कम विजयगढ़ राज के क्षेत्रा में इस शिवालय की तुलना में पुरानी कला के रूप का कहीं भी शिवालय नहीं है, वैसे तो आधुनिक काल में तमाम ऐसे शिवालय बनाये जा चुके हैं जो गॉव गॉव है। इससे यह प्रमाणित होता है कि यह पूरा परिक्षेत्रा आध्यात्मिक रूप से ‘शैव परंपरा’ का सशक्त अनुयायी है। वैसे यहां वैश्णव परंपरा के भी संकेत मिलते हैं पर शैव परंपरा की तुलना में बहुत ही कम। एक बात और सोनभद्र में उल्लेखनीय है वह यह कि अंग्रेज सोनभद्र के जिस हिस्से को सोनभद्र का दक्षिणी हिस्सा मानते हैं, जो अंग्रेजों के जमाने में आदिवासी बहुल क्षेत्रा रहा है, उन स्थानों पर हिन्दू मतावलम्बियों के आघ्यात्मिक प्रतीक नहीं के बराबर मिलते हैं केवल अगोरी व गोठानी का ही एसा परिक्षेत्रा है जहां आध्यात्मिक प्रतीक पाये जाते हैं। बहर हाल इस विषय पर एक अलग तरह का शोधात्मक अध्ययन करके पता लगाया जा सकता है कि आदिवासी परिक्षेत्रों तक आजादी के पहले हिन्दू मतावलम्बियों के धार्मिक प्रतीक क्यों नहीं पाये जाते जब कि इतिहास साफ बताता है कि आदवासी जनजातियों का आर्यीकरण अंग्रेजों के भारत आने के पहले ही प्रारंभ हो चुका था। सो वहां भी धार्मिक प्रतीक तो होने ही चाहिए थे।
'''शिवद्वार- शिव पार्वती की आलिंगन बद्ध प्रतिमा
'''
[[File:Shivdwar--.jpg|thumb|काले पत्थर पर उकेरित आलिंगन बद्ध शिव प्रतिमा]]
शिवद्वार में स्थापित शिव पार्वती की आलिंगन-बद्ध प्रतिमा काले पत्थर पर उकेरित है। दस प्रतिमा की चिकनाई तथा उसका खरादिया काम आकर्षक है। पूरे सोनभद्र में कोई भी देव-प्रतिमा आलिंगन-बद्ध नहीं है। आलिंगन-बद्ध प्रतिमाओं का भारत में प्रारंभ यदि खुजराहों से मान लिया जाय तो यह प्रतिमा भी खुजराहों कला का प्रतिरूप जान पड़ती है। खुजराहो के मूर्ति-शिल्प को चन्देल राजाओं ने प्रश्रय दिया था, ज्ञातव्य है कि चन्देल राजाओं की ही शासन व्यवस्था सोनभद्र में भी रही है, इस प्रकार शिवद्वार की शिव-प्रतिमा का निर्माण उनसे कहीं न कहीं अवश्य ही जुड़ा जान पड़ता है। काले पत्थर पर उकेरित शिव-प्रतिमा की अद्वितीयता इस अर्थ में भी है कि कैमूर घाटी की आदिम व मध्य कालीन संस्कृति में जीवन जीने की जो कलायें थीं उनमें समता व भाई-चारे का पक्ष प्रबल था। स्त्राी-पुरुष के बीच अलगाव जैसा रिश्ता न था। मध्यकाल के अन्त से आधुनिक काल के पूर्व तक, स्त्राी-पुरुष के बीच सांस्कृतिक रूप से वैराग्य की आध्यात्मिक भावनाओं के कारण जो बिलगाव पैदा होने लगा था वैसी ही भावना जब भी सोनभद्र में विकसित हुई होगी संभव है उसी काल में इस आलिंगन-बद्ध शिव-पार्वती की प्रतिमा का निर्माण कराया गया होगा। पूरे सोनभद्र में कहीं भी कोई प्रतिमा स्त्राी-पुरुष की संयुक्तता बोधी नहीं हैं और न ही वैराग्य की अवधारणा का पोषक हैं। विष्णु हैं तो अकेले हैं उनके साथ धन की देवी लक्ष्मी नहीं हैं, कोई दूसरी प्रतिमा है तो वह भी अकेली है। केवल शिव ही हैं जो पार्वती के साथ हैं वह भी आलिंगनबद्ध। गांव-गांव में शिव मन्दिर का पाया जाना प्रमाणित करता है कि सोनभद्र शैव परंपरा का अनुयायी है। तप व तकलीफ, ध्यान व साधना, विचार व आत्मा, प्रकृति व पुरुष का द्वन्द सोनभद्र की कैमूर घाटी मंें हर तरफ दिखेगा। मूर्तियाँ एक तरफ आध्यात्मिक साधना के तकलीफों की तरफ संकेत करती हैं तो दूसरी ओर जीवन जीने की बहु-आयामी कलाओं की तरफ भी। जीवन जीने की कलाओं के बीच जो भी आर्थिक व सामाजिक रूप से पूरे सोनभद्र में तकलीफ व यातना व्याप्त है, उसकी सूचना इन मूर्तियों की कलाओं व स्थापनाओं से सहज ही प्राप्त हो जाती हैं पर इन तकलीफों से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष व सार्थक प्रतिरोध के जिस तप व ताप की आवश्यकता सोनभद्र के लिए है वह कहीं भी नहीं दिखती।
'''मऊ- शिव की सहस्त्रमुखी प्रतिमा'''
[[File:Mau-- ki hiv pratima.jpg|thumb|मऊ की शिव प्रतिमा नंदी के साथ]]
मऊ गांव में स्थापित सहस्त्रा मुखी शिव प्रतिमा की पुरातात्विकता तथा उसका सांस्कतिक अर्थ-बोध बहुत ही जन-कल्याणकारी है। सहस्त्रामुखी का अर्थ सहस्त्राबाहु से है जिसका अर्थ होता है केवल मुंह ही नहीं जिसे रोटी चाहिए सहस्त्राभुजाएं भी हैं, यदि हाथ कुछ करेंगे तो रोटी मिलेगी ही। दूसरा अर्थ यह लगाया जाना चाहिए कि जितने मंुह उतनी बातें फिर जीवन का सत्य दो आंखें हैं इन्हीं दोनों आंखों से साक्षात्कार करने के लिए एक मुंह के साथ दो आंखे हैं, इन्हीं दोनांे आंखों से सत्य देखोे फिर मुंह से बोलो। इस सहस्त्रा-मुखी शिव प्रतिमा को निर्मित करने वाला कलाकार एक सोद्देश्य सांस्कृतिक कार्य भारों के तहत इसका निर्माण करता है पर सांस्कृतिक प्रदूषण होने के कारण कलाकार की भावुकता व दार्शनिकता धूमिल व प्रदूषित होने लगती है। प्रकृत व पुरुष के द्वन्द को प्रदर्शित करने वाली इन मूर्तियों का रूप कुछ इतना आध्यात्मिक हो गया है कि उसमें से सिर्फ आस्था ही शेष बचती है तर्कणा व विचारणा गायब हो जाती है। जीवन जीने के आवश्यक कार्य भारों को निपटाने के लिए जिस तप, साधना, ध्यान व आस्था की आवश्यकता होती है वह सब निरीह आस्था व विश्वास की अकर्मण्यता में विलुप्त हो जाता है तथा व्यक्ति देव-वाद का मनोवैज्ञानिक मरीज होकर पूजा पद्धतियों के तर्क-हीन कर्म-काडों में उज्जवल भविष्य का सपना देखने लगता है। व्यक्ति के जीवन में हानिकर कर्म-कांडी आचरण का प्रवेश इसी बिन्दु से प्रारंभ हो जाता है जबकि मूर्तियाँ इसके विपरीत आचरण व आस्था की संस्तुतियाँ व जागरण करती हैं कि जीवन में जीवन जीने की कलाओं का जो संषर्ष व द्वन्द है उससे विरत या मुह मोड़ कर सत्य को नहीं जाना जा सकता। वैसे तो पूरा मऊ गॉव कहीं साबूत तो कहीं टूटी हुई मूर्तियों का केन्द्र है, हर सौ डेढ़ सौ फीट की दूरी पर कोई न कोई मूर्ति अवश्य दीख जायेगी। इसी मऊ गॉव में एक पुरातात्विक संग्रहालय भी है जो आज-कल सरकारी देख-रेख की उपेक्षा का शिकार है।
'''बरकन्हरा- में स्थापित विष्णु प्रतिमा'''
[[File:God vishnu -.jpg|thumb|विष्णु प्रतिमा]]
बरकन्हरा में प्राप्त विष्णु की प्रतिमा जो सफेद पत्थर पर उकेरित है तथा जिसकी ऊँचाई डेढ़ फीट होगी यह प्रतिभा भी स्थानीय लोगों द्वारा निर्मित मन्दिर में स्थापित है। मूर्ति का सफेद रंग आचरण की शुचिता तथा कर्म करने के कठोर संकल्पों की व्याख्या करता है। प्रतिमाएं चाहे जिस रूप में हों जिस कला-कौशल से निर्मित की गई हों उनका रूप उनकी संरचना अभिव्यक्ति के सार्थक संवेगों व ऊर्जाओं को प्रस्फुटित करती हैं। बरकन्हरा घोरावल से तेरह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। घोरावल का पूरा भू-भाग बेलन व सोन जैसी नदियों के क्षेत्रों के भीतर है। ये दोनों नदियां इस क्षेत्रा की निरपेक्ष संस्कृति का निर्माण करती हैं तथा मानव जीवन जीने लायक एक ऐसा भू-भाग निर्मित करती हैं जहां आदमी अपना रहवास स्थापित करने के लिए विवश हो जाता है। इन मैदानों पर रहने वाले रहवासियों के बीच निर्पेक्ष रिश्ता देखने लायक है तथा वे प्रकृति से सीखते हुए प्रकृति के उत्पादों का उपयोग करने की योग्यता व दक्षता संपन्न हैं। यह सब मानव विकास की निर्पेक्ष गति-शीलता के प्रति स्पष्ट संकेत हैै। विष्णु की सफेद प्रतिमा कैमूर घाटी की निर्पेक्ष संस्कृति का स्पष्ट रूप से व्याख्या करती है। कहा जा सकता है कि शिवद्वार के शिव तथा बरकन्हरा के विष्णु दोनों अलग-अलग तौर तरीकों से शैव व वैष्णव धर्म संस्कृति का अनुष्ठान रचते हैं पर ऐसा कहना सोनभद्र व कैमूर घाटी संस्कृति की निरपेक्षता पर कलंक लगाना होगा। यहां तो दोनों संस्कृतियां एक में गुत्थम गुत्था हैं समझना मुश्किल कि कौन शैव मतावलम्बी है और कौन वैष्णव मतावलम्बी। मूर्तियांे की निरपेक्षता कालान्तर में अनुकरणीय नहीं रह सकी। इनके भाव संवेगों व संचारांे में विविधता व भिन्नताएं आईं फलस्वरूप मूर्ति-कला की समभावी व समायोजन-वादी शिक्षा मिटने लगी तथा मूर्तियों में पक्षपात पूर्ण धार्मिक आस्थाओं व विश्वासों को प्रस्थापित किया जाने लगा। जीवन जीने के तौर तरीकों की निरपेक्षता समाप्त होने लगी तथा मतावलम्बियों के हठ प्रभावी होने लगे। यहीं से मूर्तिरूपी पाषाण लिपि की जन समझदारी मतभेदों का शिकार होने लगी।
'''नलराजा- विशाल एवं अद्भुत शिवलिंग'''
[[File:Nal raja.jpg|thumb|विशाल शिव लिंग]]
नल राजा नामक स्थान पर स्थापित शिवलिंग सोनभद्र के ज्ञात शिव-लिंगों में अदभुत एवं आश्चर्यजनक है। लगभग चार फीट ऊँचा तथा लगभग इसी गोलाई का यह शिवलिंग अद्भुत है? संभवतः इस शिवलिंग पर कर्म-कांडियों की निगाह नहीं पड़ी, नहीं तो वे इसकी रचना-प्रक्रिया की शास्त्राीयता पर अवश्य प्रकाश डाले होते। बहरहाल मूर्ति कला की संप्रेषणीयता के विज्ञान के आधार पर नलराजा के शिवलिंग रचना पर विचार किया जाय तो यह स्पष्ट है कि सभी शिव-लिंग सृजन प्रक्रिया की तरफ संकेत देते हैं। हानि, लाभ, यश,अपयश, अच्छा,बुरा, शुभ,अशुभ, हार,जीत, देवता, राक्षस सभी प्रकृतिक संरचनाएं जब बची रहंेगी तथा प्रकृति की मानव रूपी संरचना जब सुरक्षित रहेगी तभी धर्म व राजनीति समाज व अर्थनीति न्याय व अपराध पर आधारित व्यवस्था व शास्त्रा बचे रह सकेंगे। शिव-लिंगों का यह सन्देश कि सृष्टि बचाओ, समाज बचाओ, आदमी बचाओ तभी भूगोल बचेगा, दुनिया बचेगी, नहीं तो जब सृजन ही समाप्त हो जाएगा फिर क्या बचेगा? शिवलिंगों की स्थापनाएं सृजन की स्थापनाओं के लिए किए जाने वाले पवित्रा प्रयास जैसा जान पड़ती हैं। लिंग-पूजा व समाज में प्रचलित लिंग-भेद दोनों एक दूसरे के विरोधी तत्व के रूप में विकसित हुए हैं जबकि जहां-जहां भी शिवलिंग पूज्यनीय व आराध्य हैं, कम से कम वहां तो लिंग-भेद नहीं होना चाहिए था। कदाचित स्त्राी-पुरुष का भेद मिट जाता तो यह दुनिया इतनी बद्रूप नहीं होती जितनी है। आमतौर पर देखा जा रहा है कि पुरुष उत्पीड़न व यातना झेलती औरतें जितना आस्थावादी व कर्म-कांडी होती हैं उतना पुरुष नहीं। वे काफी डरी हुई व भयभीत हैं, इसलिए डरों व भयों से मुक्त होने के लिए ईश्वरीय आस्थाओं में वे समाधान ढॅूढ़ती हैं और पूजा-पाठ जैसे कर्म विधानों में खुद को व्यस्त रखना धर्म का काम मानती हैं। पुरुष, पदार्थ के रिश्तों की अद्वितीयता मूर्तियों की आस्था में स्पष्ट रूप से दिखती है। मूर्तियाँ स्पष्ट रूप से पत्थर-रूपी पदार्थ होती हैं उनमें न तो जीवन होता है न ही जीवन जैसी उनमें हलचल होती है फिर भी मूर्तियाँ आस्था व विश्वास की भाषा में संवाद करती हैं तथा जन-मानस को प्रभावित करती हैं। पदार्थ व पुरुष के शाश्वत रिश्ते ने ही समाज को गतिशीलता प्रदान की है। मूर्तियाँ पदार्थ के सत्य का साक्षात्कार कराती हैं एक ऐसा साक्षात्कार जो प्रकृति से रिश्ता बनाने की कला सिखाता है, जिससे जीवन जीने के क्रम में निरन्तरता व समरूपता बनी रह सके। आज की वैज्ञानिक दुनिया में पर्यावरणवादी, जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों से मुहब्बत करने की कला सिखा रहे हैं तथा चेता रहे हैं कि यदि प्रकृति का विनाश रोका न गया तो निश्चित रूप से यह हसीन दुनिया नष्ट हो जाएगी। मूर्तियों के सत्य का साक्षात्कार इसलिए आवश्यक है कि पदार्थो का सत्य, पुरुष और प्रकृति का सत्य व अस्तित्व बचा रहे लेकिन व्यवहारतः विपरीतगामी कार्यवाहियों का संपादन किया जा रहा है तथा प्रकृति के प्रति आस्था व विश्वास को तोड़ दिया जा रहा है। राबर्ट्सगंज से कुछ दूर चुर्क के रास्ते पर अवस्थित पंचमुखी के शिवलिंग को मूर्तियों के सत्य के ज्ञान के लिए देखा जाना चाहिए। पंचमुखी पर स्थापित शिवलिंग सृजन के प्राकृतिक प्रक्रिया का बोध कराता है कि सृजन आवश्यक है। राबर्ट्सगंज से करीब आठ किलोमीटर दूर पश्चिम स्थित गौरीशंकर ग्राम में भी शिवलिंग स्थापित है तथा वहाँ मेला भी लगता है कुड़ारी देवी की मान्यता भी उल्लेखनीय है जो सोन नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित हैं। गोठानी व मऊ दो ऐसे स्थान है जहां पर पुरात्व विभाग की तरफ से मूर्तियों की ऐतिहासिकता सम्बन्धी कार्य किया जाना चाहिए जिससे सोनभद्र का ऐतिहासिकता का सच प्रकाश में आए तथा मतभेद के आधार समाप्त हों। क्योंकि जितने लोग उतनी बातें हैं। शिव के सहस्त्रा-मुखी प्रतिमा की तरह यहाँ का इतिहास भी सहस्त्रामुखी हो चुका है। सोनभद्र में मूर्तियों के बिखराव व पुरातात्विक साक्ष्यों की उपलब्धता के आधार पर जो निश्कर्ष निकलते हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण है, श्रम-सम्बन्धों वाले समाज के कर्म का दर्शन तथा पुरुष का पदार्थ, व प्रकृति के प्रति प्रेम व समर्पण। निश्चित रूप से सोनभद्र का प्रारम्भिक समाज कर्म से संबंधित धर्म की व्याख्या का रहा होगा जबकि आज धर्म से संबंधित कर्म की व्याख्या वाला हो गया है जो व्यक्ति को अन्ध-भक्त व आस्थावादी बना रहा है। पहले ऐसा नहीं था। पहले के समाजों में कर्म की प्रधानता थी तथा कर्म करने की छूट भी थी। भूमि की हकदारी का सवाल नहीं था, सम्पत्ति का मायाजाल व्यक्तिगत उपक्रमों में फंसा नहीं था, सम्पत्ति सार्वजनिक थी तथा एकाधिकारी प्रवृत्तियाँ प्रभावी नहीं हुई थीं। व्यक्ति को समाज के लिए कर्म करना था। इस कर्म के लिए जो आचरण व कार्मिक व्यवहार विकसित हुए वही धर्म के रूप में मान्य होते चले गए। कालान्तर में भाषा व लिपि का विकास हुआ जिससे शास्त्रा व शस्त्रा निर्मित हुए। शास्त्रों के पास धर्म की हिफाजत का जिम्मा था तो शस्त्रों के पास समाज व व्यक्ति को बचाने का। कृषि अर्थव्यवस्था पर आधारित समाजों में कर्म की प्रधानता के कारण शाश्वत श्रम सम्बन्धों का विकास हुआ जिससे पक्षपात रहित तथा सम-भाव समाज का आविर्भाव हुआ। कर्म का यह दर्शन मानव सभ्यता के विकास के क्रम मंे मिटने लगा, कहा जा सकता है कि धार्मिक जकड़नों ने कर्म के प्राचीन दर्शन को धर्म के कर्महीन सूत्रा ‘आस्था’ से जोड़ दिया। देव-आस्था के इस स्वरूप ने समाज में कर्म-हीनता तो उत्पादित किया ही साथ ही साथ हानि,लाभ, यश,अपयश, जीत-हार, जैसे जीवन के सारे क्रिया-भारों को ईश्वर के हवाले कर दिया...जैसा ईश्वर चाहेगा वही होगा। फलस्वरूप हमारेे समाज में खतरनाक जड़ता आई जो आज भी स्पष्ट रूप से दिखती है। मूर्तियों की निर्पेक्ष अभिव्यक्ति सांस्कृतिक रूप से प्रभावित हुई। पुरुष व पदार्थ का रिश्ता स्वार्थ पूर्ण एवं व्यक्ति केन्द्रित होकर एकाधिकार की तरफ बढ़ने लगा। सामाजिक रूप से सोनभद्र के भाई-चारे की स्थिति प्रायोजित प्रतियोगिता का रूप धारण करने लगी है। आज सोनभद्र के प्रतियोगी समाज की आर्थिक व सामाजिक स्थिति गरीबी व बेरोजगारी के कारण आक्रामक है, असमानता की खतरनाक वृद्धि है तथा मानवाधिकार पूरी तरह असुरक्षित। वैसे तो सोनभद्र में तमाम दर्शनीय स्थल हैं जिस पर अलग से लेखन किया जाना चाहिए जो यहां संभव नहीं है फिर भी हम उनका उल्लेख कर रहे हैं.
अन्य पुरातात्विक स्थल
[[File:सम्मिलित देव प्रतिमाएं.jpg|thumb|सम्मिलित देव प्रतिमाएं]]
[[File:All images.jpg|thumb|अन्य प्रतिमा एक साथ]]
1- ओम पर्वत- जिलामुख्यालय से दक्षिण तरफ 40 कि.मी.दूर,
2- गोमुख- जिलामुख्यालय से दक्षिण तरफ 30 कि.मी.दूर मच्छरमारा गॉव में
3- त्रिवेणी संगम-जिलामुख्यालय से दक्षिण तरफ 27 कि.मी.दूर सोन, बिजुल, रेड़ के संगम पर
4- कण्डाकोट-जिलामुख्यालय से पश्चिम तरफ 10 कि.मी.दूर
5- छिपाताली- जिलामुख्यालय से पू. उ. की तरफ 40 कि.मी.दूर
6- दिवानी चुंआं- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 35 कि.मी.दूर
7- बाघेश्वर महादेव- जिलामुख्यालय से उ.पू. की तरफ तरफ 28 कि.मी.दूर
8- बरैला महादेव- जिलामुख्यालय से पश्चिम की तरफ 3 कि.मी.दूर
9- ऋणमुक्तेश्वर नाथ- जिलामुख्यालय से पू.दक्षिण की तरफ 40 कि.मी.दूर घाघर नदी के तट पर
10- सोमा की धरती माता- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 40 कि.मी.दूर घाघर नदी के तट पर
11- बाबा सोमनाथ एवं वंसरा माता मन्दिर- जिलामुख्यालय से पू.दक्षिण की तरफ 40 कि.मी.दूर,
सोन व रेणु के संगम पर
12- अमर गुफा- जिलामुख्यालय से दक्षिण 35 कि.मी.दूर सलई बनवा में स्थित
13- भूतेश्वर दरबार की गुफा- जिलामुख्यालय से दक्षिण की तरफ 33 कि.मी.दूर
13- पिंडारी की गुफा- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 50 कि.मी.दूर
14- सोनेश्वर महादेव- जिलामुख्यालय से दक्षिण की तरफ 21 कि.मी.दूर
15- कुण्डवासिनी देवी- जिलामुख्यालय से दक्षिण-पश्चिम की तरफ 40 कि.मी.दूर
16- दुर्गावती कुण्ड- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 85 कि.मी.दूर
17- मॉ मुण्डेश्वरी देवी- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 85 कि.मी.दूर
18- ज्वालामुखी देवी- जिलामुख्यालय से दक्षिण की तरफ 120 कि.मी.दूर
19- अमिलाधाम- जिलामुख्यालय से पूरब की तरफ 45 कि.मी.दूर
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हिंदी कथा साहित्य/रामनाथ शिवेंद्र की कहानी "चित्र कथा और वह "
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'''आदिवासी एवं दलित जीवन पर केंद्रित कहानी संग्रह''''''
'''चित्र कथा और वह'''
रामनाथ शिवेंद्र
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[[File:Chitra katha aur vah jpg चित्र कथा और वह.jpg|thumb|आदिवासी एवं दलित जीवन पर केंद्रित कहानी संग्रह]]
बांस भर धूप चढ़ जाने के बाद वह जागा। रात में देर से सोया था। खेती किसानी में वैसे भी कई काम ऐसे होते हैं जो रात में ही निपटाये जा सकते हैं, उन्हीं कामों को निपटाने में उसे पता ही नहीं चला कि रात कितनी गुजर चुकी है। उसे पता था कि उसकी पत्नी घर पर अकेली घबरा रही होगी। पत्नी घबरा तो रही थी पर उसके घर आने पर वह प्रेम से मिली, कोई उलाहना नहीं, उलाहना देना उसकी पत्नी जानती ही नहीं थी।
जल्दी जल्दी दैनिक क्रिया निपटाकर दिन में किए जा सकने वाले कामों को वह याद करने लगा। वह जब से बालिग हुआ है यानि कि वोट देने लायक तब से ही वह सारे कामों पर विचार करता है, कामों को कब और कैसे करना है उसके बारे में गुनता है। दिन में निपटाये जाने वाले कामों के बारे में वह गुन ही रहा था कि उसे ख्याल आया, उसे तो परधान जी से मिलना है। पुल बनाने के अलावा भी दूसरे काम हैं जिनमें पहला काम है गॉव की पोखर और नाले की सफाई करवाना जिसे करवाने के लिए चुनाव के दौरान परधान जी ने वादा किया था। उनके द्वारा चुनाव में किए गये वादों को उन्हें याद दिलाना है, और शिलान्यास के कार्यक्रम में भी उनके साथ जाना है।
परधान जी का घर उसके टोले से करीब दो किलोमीटर दूर था, बीच में एक नाला पड़ता था। वह उस नाले को करीब बीस सालों से उसी तरह से लगातार देखता आ रहा है, बीस साल के पहले का उसे पता नहीं। वह जानता है कि गॉव में बहुत कुछ बदल चुका है, कुछ लोगों के कच्चे मकान पक्के हो चुके हैं। पर वह नाला तथा गॉव के बीच में स्थित पोखर तथा गॉव के दक्षिण वाली दलित बस्ती आज भी जस के तस हैं। नाले तथा पोखर में पक्के मकानों की नालियां जाने कब से गन्दा पानी उगल रही हैं। ये वही नाला और पोखर हैं जिसमें गॉव के बहुलांश नहाते हैं, कपड़ा धोते हैं, गोया पोखर और नाला गॉव के लिए सुलभ जलश्रोत हैं, जिनकी सफाई कराना गाॉव से संक्रमक रोगों को भगाने के लिए सबसे जरूरी है।
गॉव परधानी के चुनाव के दौरान गॉव के लोगों से विजेता परधान ने वादा किया था कि वह नाले तथा गॉव की अकेली पोखर की सफाई करायेगा, मनरेगा के बन्द पड़े कामों को शुरू करायेगा, लगता है वह अपने वादे को भूल गया है। उसने कहीं पढ़ा था कि जागरूक नागरिकों के लिए जरूरी है कि वे जन प्रतिनिधियों को उनके वादों को लगातार याद दिलाते रहें सो परधान से जनहित का काम करवाने के लिए
उसे तो पहल करना ही होगा।
पहली बार उसे वोट देना था। वह काफी उत्साहित था। उसके बपई ने उसे समझाया था कि देखो ‘कलम दावात’ वाले निशान पर ही मोहर मारना, कलम दावात वाला ही गॉव को साफ सुथरा बना सकता है तथा गरीबों के लिए तमाम तरह की कमाऊ योजनांयें भी ला सकता है, वह दलितों का हितुआ है। उसकी अइया ने भी बपई की तरह ही उसे समझाया था और उसने वैसा किया भी था।
कलम दावात निशान वाला दलितों के समर्थन से चुनाव जीत भी गया था। कलम दावात निशान वाला गरीबों, प्रताड़ितों का आदमी था, वह उनके लिए थाना और ब्लाक घेर लिया करता था। परधान की जीत से वह खुश था, उसके मन में था कि परधान मेरे गॉव का बड़ा और प्रभावशाली आदमी है। परधान की प्रतिभा ने उसे इतना प्रभावित किया कि उसके भीतर कुलबुलाता चित्राकार जागृत हो गया। बचपन में वह पटरी पर किसिम किसिम के चित्रा बनाया करता था पशु पक्षी से लेकर आदमी तक के। चित्रा बनाने में उसकी रूचि थी। उसे याद है बचपन की बातें, साथ में जब पटरी नहीं होती थी तो वह जमीन पर ही चित्रा बना लिया करता था। अब भी वह किसी का भी चित्रा बना सकता है, कागज, कपड़े या जमीन पर ही, उसकी कला की सीख खतम नहीं हुई है।
उसके मन में आया कि गॉव के जमे जमाये और तपे तपाये लोगों को हरा कर जीते हुए जनप्रिय परधान का चित्रा बनाये। गॉव में चित्रा बनाने वाले सामान तो थे नहीं, सो वह बाजार गया और ब्रश, पेपर, रंग आदि खरीद लाया। उसने परधान का चित्रा बनाया, उसके लिए सुविधा थी। परधान के चित्रा का उसके पास एक पोस्टर था उसने पोस्टर वाले चित्रा की नकल किया। चित्रा तो एकदम परधान की तरह ही बन गया पर उसकी समझ में आया कि इस चित्रा से बहादुरी नहीं छलक रही, परधान का रूआब नहीं दिख रहा क्योंकि चित्रा में घोड़ा नहीं है, नही परधान की मूंछ है। प्राइमरी की पढ़ाई के दौरान उसने कक्षा पांच की किताब में राणा प्रताप का चित्रा देखा था, वे घोड़े पर सवार थे, उनके माथे पर एक विशेष किसिम का टोप था, उनकी नुकीली मूंछ थीं, उसने सोचा ‘बहादुर को तो राणाप्रताप की तरह दिखना चाहिए या
फिर भगत सिंह की तरह, अगर परधान का चेहरा चन्द्रष्शेखर आज़ाद की माफिक
बन जाये तब भी ठीक पर परधान का चेहरा तो वैसा नहीं बन रहा फिर तो उसने
पहले के बनाये परधान के चित्रा को मिटा दिया।
वह परधान का चित्रा किस तरह का बनाये सोचने लगा। उसके जेहन में बहादुरों के कई तरह के चित्रा उभरे, जिन्हें वह केवल किताबों के सहारे जानता था कि वे
इतिहास के बहादुर लोग थे, वे ऐसे लोग थे जो अपने समय की बद्जात हुकूमत
से टकराने का साहस रखने वाले थे। इस तरह से वह इतिहास में उतर गया मानो उसके सामने इतिहास के बहादुर जस के तस उपस्थित हो गये हों फिर तो उसने तय किया कि परधान का चित्रा तो ओज और साहस से चमकता हुआ बनाना चाहिए, आखिर परधान हमारे गॉव का मुखिया है, वह भी गॉव के जमे जमाये लोगों को पटक कर परधान बना है, क्या हुआ दंगल में नहीं, वोट में उसने पटका है। वह उन्हें पटका है जो हमेशा बाहें फुलाते रहते हैं। एक तरह से परधान ने गॉव के जमे जमाये लोगों को पटक कर हजारों साल के बद्जात इतिहास को पटका है पर वह परधान के चित्रा को किस तरह का बनाये निश्चित नहीं कर पा रहा था।
किसी चीज को गंभीरता से सोचो तो कोई न कोई रास्ता निकल ही आता है। कुछ दिनों बाद रास्ता निकल आया, उसे समझ आ गया कि परधान का चित्रा किस तरह का बनाना है।
फिर तो उसने वैसा ही किया, कुछ अतिरिक्त श्रम और कल्पना से उसने परधान का चित्रा बनाया। पर चित्रा तो जैसा वह चाहता था वैसा नहीं बन पाया हालांकि उसने परधान को घोड़े पर सवार करा दिया था, मूंछ भी लगा दी थी फिर भी परधान का चित्रा राणाप्रताप वाले चित्रा की तरह प्रभाव वाला नहीं बना पाया। उसे अपनी कला पर संदेह हुआ, शायद वह अनुभूति और अभिव्यक्ति में एकरसता नहीं सृजित कर पा रहा है। चित्रा को तो संवाद करना चाहिए पर परधान का चित्रा तो गूंगा बन गया है। उसे अपनी गलती समझ नहीं आ रही थी उसे लगा...‘कहीं न कहीं उसकी कला में कमी है।’
उसे समझ आया कि स्मृति के सहारे काम नहीं चलने वाला स्मृति से चित्रा बनाने में गलती हो सकती है। सो वह राणा प्रताप का चित्रा कहीं से ले आया। परधान के चित्रा से राणा प्रताप के चित्रा का उसने मिलान किया, बहुत फर्क था दोनों चित्रों में। फिर तो उसने पहले के बनाये परधान के चित्रा को फिर मिटा दिया। चित्र मिटाते समय उसे जान पड़ा था कि वह पूरा मुगलकालीन इतिहास ही मिटा रहा है पर ऐसा नहीं था। इतिहास तो जहां था, पड़ा था, भला इतिहास मिटाने वाली चीज है?
अब क्या करे? वह सोच में पड़ गया। उसे समझ आया कि आज के जमाने में राणा प्रताप की तरह किसी को बनाया नहीं जा सकता, राणा प्रताप तो तभी बनाये
जा सकते हैं जब अकबर हो, सच है कि अब अकबर नहीं है।
परधान का बहादुराना चित्रा बनाने में असफल होने के बाद वह जिद्द पर आ गया, परधान का बहादुराना चित्रा वह बनायेगा ही बनायेगा, बनेगा क्यों नहीं। कला निरंतर अभ्यास मांगती है, उसका अभ्यास छूट गया है, शायद इसी लिए परधान का
बहादुराना चित्रा नहीं बन पा रहा।
अपनी कला के बारे में बहुत विचार और चिंतन करने के बाद उसने दुबारा परधान का चित्रा बनाना शुरू किया। ज्योंही उसने परधान का चित्रा बनाना शुरू किया अचानक उसे लगा कि वह गलत कर रहा है, वैश्वीकरण और औद्योगीकरण के बदलते जमाने के आदमी को राणा प्रताप की तरह भला कैसे बनाया जा सकता है। वह चिन्तित हो गया। परधान तो परधान था, उसका अपना चेहरा था जो किसी से मेल नहीं खा रहा था। परधान इक्कीसवीं शताब्दी का आदमी है, वह देश के तमाम लोगों की तरह केवल एक उपभोक्ता है भले ही गॉव का परधान बन गया है तो इससे क्या हुआ? उसे भी तो थाने के दारोगा, तहसील के लेखपाल, ब्लाक के बी.डी.ओ. स्कूल के मास्टर आदि माफिक सरकारी कर्मचारियों की निगरानी में ही रहना है। सो परधान बहादुर कैसे बन सकता है?
वैसे वह जानता था कि समाज बदल के लिए आत्मोसर्ग करने वाली प्रतिभाओं को गढ़ा नहीं जा सकता, वे तो खुद पैदा होती हैं, पर उसने तो निश्चित कर लिया था कि परधान उसके गॉव का है, सरकारी कर्मचारियों से भी वह लड़ने का काम किया करता है। एक तरह से वह हुकूमत से ही तो लड़ रहा है। परधान को वह हर हाल में इतिहास के बहादुर लोगों से जोड़ेगा, उन लोगों से जिन लोगों ने आतताई हकूमत से मोर्चा लिया था, उनकी तरह, ऐसा सोचते ही वह इतिहास में उतर गया। इतिहास में उसने देखा कि एक चेहरा तो भगत सिंह का भी है, उनकी तरह से परधान का चित्रा उसे बनाना चाहिए। पर भगत सिंह तो अंग्रेजों के जमाने के थे, अब अंग्रेज तो हैं नहीं सो भगत सिंह की तरह वह परधान का चित्रा कैसे बना सकता है? उसका माथा अंग्रेजों में उलझ गया पर तत्काल ही उसके माथा ने काम किया...विदेशी अंग्रेज नहीं हैं तो का हुआ देशी अंग्रेज तो हैं ही, अब तो बहादुर उन्हें ही कहना होगा जो देशी अंग्रेजों से टकराने का साहस रखते हों।
परधान का उसने एक रफ स्केच बनाया जो वास्तविक था। उसने भगत सिंह का भी स्केच बनाया। भगत सिंह वाले स्केच को उसने परधान के स्केच पर चिपका दिया। यह क्या है, चित्रा देखते ही वह चकरा गया। परधान के स्केच को भगत सिंह के स्केच ने पूरी तरह से ढक लिया फिर तो परधान कहीं गायब हो गया। कुछ सेाचने के बाद उसने परधान के स्केच पर से भगत सिंह के स्केच के कुछ हिस्से को मिटाया, उनकी हैट और मूंछ को परधान के स्केच पर जस के तस रहने दिया फिर भी परधान का चेहरे पर वह चमक नहीं उभर पायी जैसी कि बहादुरों व वलिदानियों के चहरों पर होती है। हालांकि वह प्रशिक्षित चित्राकार नहीं था पर उसकी ललक ने उसे चित्राकार बना दिया था। वह कल्पनाओं में डूब सकता था और प्रकृति के रहस्यों को चित्रामय बना सकता था। उसने गंभीरता से परधान के चित्रा को देखा और कुछ जरूरी बदलाव किया इस बार तो परधान का चित्रा पूरी तरह से बदल गया उसके चेहरे पर
हिंसक जानवरों जैसी लकीरें जम गईं, देखते देखते ही परधान का चित्रा दुबारा बदल गया हिंसक जानवरों से अलग। परधान के हाथ में त्रिश्षूल और शंख आ गया, माथे पर लाल बिन्दी भी उभर आयी, उसे समझ नहीं आया कि आखिर परधान का चेहरा अपने आप क्यों बदल रहा है? क्या परधान के चित्रा की तरह इतिहास भी स्वतः बदल जाया करता है? नहीं नहीं ऐसा तो नहीं होना चाहिए। वह परधान का चित्रा जैसा बनाना चाहता है वैसा बनाने के लिए उसका चित्त स्थिर क्यों नहीं हो रहा है? पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया।
वह निराश हो गया उसे लगा कि परधान का चित्रा वह नहीं बना सकता फिर उसे क्या मिलेगा परधान का चित्रा बना कर। चूंकि वह मन से चित्राकार था सो हार मानना उसके लिए संभव नहीं था। यह बात अलग थी कि उसने अपनी चित्राकारिता को व्यवसाय नहीं बनाया था पर था तो चित्राकार ही। वह अपनी रोजी रोटी खेती किसानी से ही चलाता था। अपनी चित्राकारिता के लिए वह धनिया, लहसुन, गोभी आदि की कियारियों को किसी सालअष्टकोणीय बनाता था तो किसी साल किसी गुंबद या मीनार का आकार दे दिया करता था। उसने घर के सामने सेहन में उगे फूलों के पौधों की कियारियां भी कलात्मक ढंग से रचा हुआ था, जिसे देख कर वह मन ही मन खुश हुआ करता है। वह कपड़े भी गॉव वालों से अलग ढंग का पहनता है, चेहरे पर हल्की सी दाढ़ी भी रखता है। वह अपने कपड़े खुद सिल लिया करता है और दाढ़ी भी छांट लिया करता है। उसका मानना है कि कला तो हर जगह होती है बस चीजों व समय को कला की तरह देखने की ऑखें होनी चाहिए।
एक बार तो उसे जाने क्या हुआ कि करीब एक महीना लगा दिया जहां देखो उसके हाथ में चित्राकला की कापी ही होती थी उस पर वह कुछ न कुछ बनाता रहता था, उसकी पत्नी भी कई बार पूछ चुकी थी पर उसने सच नहीं बताया था। करीब एक माह बाद उसने पत्नी को अपनी कला दिखाया था...
उसकी पत्नी तो उस चित्रा को देखते ही उछल पड़ी थी...कृकृ
‘तो क्या हम ऐसे हैं’ पत्नी ने उससे पूछा था।
‘और नहीं तो का’ वह मुस्करा दिया था
वह एक खूबसूरत चित्रा बन गया था, भावुकता पूर्ण, गरिमा युक्त। वह चित्रा खाना
खिलाते समय का था। वह जमीन पर पलथी मार कर खाना खा रहा है और उसकी पत्नी पंखा झल रही है, सामने ढिबरी टिमटिमा रही है। मद्धिम रोशनी में पत्नी के चेहरे से मुलायम किरणें निकल रही हैं। पत्नी ने अपने पति के बनाये चित्रा की फ्रेमिंग करवा कर दीवार पर टांग दिया था। वह उस चित्रा को अक्सर देखती और
पति पर मोहित हो जाती। कभी कभी उलाहना भी दिया करती थी...
‘तुम चित्रा बनाने या कपड़े सिलने का ही काम क्यों नहीं करते, चार पैसे तो घर में आते, धान चावल से का होने वाला है? पेट भी तो नहीं भरता। कपड़े भी सिलते
तो ठीक रहता, तुमने मेरा ब्लाउज बिना नाप लिए ही पिछले साल सिला था वह अभी तक जस के तस है और जो दर्जी से सिलवाया था उसकी सिलाई उभर रही हैं, और
ढीली भी है, देह से बाहर।’
वह पत्नी की बातें मुस्करा कर टाल देता था...
‘कला का रोजगार नहीं होता मुनिया। कला केवल मन के लिए होती है, धन के लिए नही, तुम्हारा चित्रा मैंने मन से बनाया था बिना देखे, बिना नकल किये और ब्लाउज भी मैंने जो सिला था उसके लिए तुम्हारा नाप नहीं लिया था, बिना नाप के ब्लाउज सिला था, अनुमान से, और वह तुम पर फिट हो गया, जानती हो मुनिया कला मन की उपज होती है मन के लिए और मन के भीतर।’
करीब चार पांच दिन तक उसने सोचने में लगा दिया कि क्या उसे परधान का चित्रा बनाना चाहिए या नहीं। छठवें दिन उसने तय किया कि उसे परधान का चित्रा बनाना चाहिए, ऐसा करने के लिए उसे इतिहास में जाने की जरूरत नहीं है, इतिहास तो गॉवों के निवासियों व गावों का होता ही नहीं, इतिहास तो केवल शासकों का ही होता है, शोषित तो हर हाल में शोषित होता है गॉव का परधान भी शोषित है सो उसके चेहरे पर इतिहास कैसे चिपक सकता है?
उसने इतिहास में उतर कर खुद से सवाल किया। सवाल टेढ़ा था पर था सटीक। वह इतिहास में दर्ज वैसे लोगों के बारे में सोचने लगा जो शासक नहीं रहे थे। उसे पता था विरसा मुंडा तथा सोनभद्र के जूरा और बुद्धू भगत के बारे में, वे तो सामान्य जन थे पर दिक्कत थी उसके पास न तो विरसा मुंडा का चित्रा था और न ही जूरा और बुद्धू भगत का।
उसने काफी सोच विचार के बाद तय किया कि विरसा मुंडा, जूरा या बुद्धू भगत में से किसी एक की तरह ही वह परधान का चित्रा बनाएगा। इन तीनों चित्रों में से किसी न किसी की तरह का चित्रा तो परधान का बन ही जाएगा। उनके चित्रों को वह कहीं से खोज कर ले आयेगा।
ऐसा तो हो नहीं सकता कि सोनभद्र के नामी विद्वानों व लेखकों के पास यहां के बहादुर पुरखों के चित्रा न हों, ऐसे बहादुरांे व स्वतंत्राता प्रेमियों के जिन्होंने जनहित में अपनी जान की बाजी लगा दिया हो। वह आश्वस्त था कि किसी का चित्रा विद्वानों के पास हो न हो पर लक्ष्मण सिंह का तो होगा ही। वे तो 1857 के क्रान्तिकारी थे। विजयगढ़ राज से पूरे दो साल तक अंग्रेजी हुकूमत को बेदखल कर दिया था और खुद को स्वतंत्रा घोषित कर लिया था। बाद में क्रूर अंग्रेजो ने उनकी तथा उनके दो सौ क्रान्तिकारी साथियों की निर्मम हत्या माची के जंगल में करवा दिया था। मॉची का जंगल खून से लाल हो गया था।
फिर क्या था वह सोनभद्र के सभी नामधारी लेखकों से मिला जो इतिहास के जानकार के रूप में जाने जाते थे, पर किसी के पास जूरा और बुद्धू भगत के चित्रा
नहीं थे, न ही लक्ष्मण सिंह के। उन्हें तो यह भी पता नहीं था कि जूरा और बुद्धू भगत ने अंग्रेजी सेना को विजयगढ़ किले वाले युद्ध में तीर धनुष से ही पस्त कर दिया था। वह काफी निराश हुआ। उसने मान लिया कि इतिहास तो सिर्फ शासकों का ही होता है, परजा का इतिहास तो होता नहीं।
किसी तरह से उसे एक ऐसे आदमी से विरसा मुण्डा का चित्रा मिला जो किताबों का केवल पाठक था। वह आदिवासी तथा विरसा की जाति का था, विरसा को भगवान की तरह पूजता था। उसके पूजा वाले स्थान पर कुछ दूसरे देवताओं की तरह विरसा का भी फ्रेम किया हुआ चित्रा रखा हुआ था। विरसा मुण्डा का चित्रा पाते ही वह बासों उछल पड़ा अनमोल रतन धन पायो जैसे।
वह परधान का चित्रा विरसा की तरह बनाने में जुट गया। परधान का चित्रा बनाने के पहले उसने विरसा का चित्रा बनाया उसके बाद उसने परधान का चित्रा बनाया। परधान के चित्रा को विरसा की तरह बनाना बहुत टेढ़ा काम था पर उसे तो बनाना ही था।
वह लगातार परधान का चित्रा बनाता रहा, बनाता फिर बिगाड़ता ऐसा करते हुए एक महीना गुजर गया पर परधान का चित्रा विरसा की तरह नहीं बन पाया। वह ज्योंही परधान के कंधे पर विरसा वाला तीर धनुष चढ़ाता परधान का चेहरा बिगड़ जाता वह अधिकारियों व मंत्रियों की दलाली करने वालों की तरह दिखने लगता। एक बार तो उसने परधान के चित्रा से उसकी सर्ट ही मिटा दिया। परधान के चित्रा से सर्ट मिटा देने के बाद उसे लगा कि यह जो परधान है वह तो बौद्ध भिक्षु की तरह संसद का प्रत्याशी दिखने लगा है। उसे लगा कि परधान के चित्रा से साधारण वाला पैंट मिटा कर जिन्स की पैंट पहना देना चाहिए, फिर परधान बौद्ध भिक्षु की तरह नहीं दिखेगा, केवल प्रत्याशी दिखेगा। पर उसका सोचना गलत निकला। परधान का चित्र तो फिल्मों में दिखाये जाने वाले एलियंस की तरह दिखने लगा।
परधान का चित्रा बनाते बनाते वह थक गया, कुछ कुछ निराश भी हुआ, उसे लगा कि वह परधान का चित्रा बना ही नहीं सकता, वह महज कलाकार है, वह कोई देवता नहीं जो किसी को सिरज दे, रचना तो देवता करते हैं। पर अचानक उसे लगा कि भले ही वह देवता नहीं है तो क्या हुआ? कलाकार तो है, कलाकार भी कल्पित देवताओं से कम नहीं होता। परधान का चित्रा वह बनाएगा ही बनाएगा।
कुछ महीने के लिए उसने परधान का चित्रा बनाना छोड़ दिया और घर के बकाया कामों को निपटाने में जुट गया। वैसे भी उसे पता था कि कोई कला मन माफिक न बन पाये तो कुछ समय के लिए उसे बनाना छोड़ देना चाहिए। कुछ समय बाद मन में नये नये भाव स्वतः जागृत हो जाते हैं। फिर अनुभूति और अभिव्यक्ति में संतुलन आ जाता है। नहीं तो अनुभूति कहीं होती है और अभिव्यक्ति कहीं और।
वैसे कोई काम छूट जाता है तो छूट जाता है, रोजी रोटी के जुगाड़ में पहले चूल्हा ही दिखता है फिर कला, या कोई दूसरी चीजें। शिलान्यास वाले दिन उसने परधान को देखा। परधान स्कार्पियो पर सवार था, सफेद कपड़ों में लकदक, जिन्स की पैन्ट में खुंसा हुआ रिवाल्वर, चाल में ऐंठन, उसके साथ तीन असलहाधारी थे, जिनके हाथों में रायफलें थीं। परधान एक पुलिया का शिलान्यास करने आया था। परधान के उस रूप को वह देखता रह गया, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह किसे देख रहा है परधान को या किसी बाहुबली को। उसे समझ आया कि आज के समय के यही बहादुर हैं, वह अपने क्षेत्रा के एक बाहुबली विधायक को कई बार देख चुका है, उसे पता है कि उसकी अपनी सेना भी है तथा सुरक्षा कमाण्डो भी। अचानक उसके दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया।
परधान तो गॉव का प्यारा आदमी है फिर उसे किस बात का डर, काहे की सुरक्षा, उसे जान पड़ा कि अब बहादुरों की नश्ल बदल रही है। अब बहादुर ऐसे ही होते हैं, खुद को बदलने वाले, वे गॉव व समाज के लिए लड़ाकू नहीं, लड़ाकू हैं अपनी तरक्की के लिए। वह तत्काल शिलान्यास स्थल से अपने घर लौट आया। उसने तय किया कि ऐसे परधान से गॉव के विकास के बारे में वह कभी बातें नहीं करेगा।
‘काहे लौट आये, ‘शिलानास’ में नाहीं गये थे का?’ पूछा था उसकी पत्नी मुनिया ने....
‘का तो बोल रहे थे कि परधान जी ‘शिलानास’ करेंगे, शिलानास नाहीं हुआ का’ उसने दुबारा पूछा...’
‘नाही रे! शिलान्यास काहे रूकेगा, वह शिलानास नाहीं था गॉव का नाश था, हमारा मन उहां नाही लगा।’
मुनिया उसे ताकती रह गयी थी जैसे उसे उसके सवाल का उत्तर न मिला हो फिर वह रसोईं में चली गयी। वह परेशान था, परेशान था परधान के बदले रूप को देख कर। उसे अनुमान तक नहीं था कि साधारण रंग रूप का दिखने वाला परधान, परधान बनते ही अपना चोला बदल लेगा, बगल में रिवाल्वर खोंस लेगा, असलहाधारियों के साथ चलेगा। उसके हाथ में माला होती, जेब में शंख और माथे पर चंदन की बिन्दी होती तब भी ठीक था पर नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं, उसकी तरह तो वे लोग भी नहीं दिखते थे जो खानदानी लुटेरे हैं, जिनकी गॉव में हकूमत चला करती है? वे भी ऐसे अवसरों पर समान्य जन बन जाया करते हैं।
वह सीधे उस कमरे में गया जिसमें परधान का उसके द्वारा बनाया हुआ चित्रा रखा हुआ था। उसने परधान का चित्रा उठाया और फाड़ दिया। चित्रा फाड़ते समय उसे समझ में आया कि परधान कभी भी विरसा, जूरा या बुद्धू भगत नहीं हो सकता, इसी लिए परधान का चित्रा विरसा की तरह नहीं बन पा रहा था, बनता भी कैसे। परधान जैसे आदमी की चित्राकथा तो बन ही नहीं सकती।
वह परधान की चित्राकथा न बना पाने के कारण परेष्शान हो गया था, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि का करे और का न करे। जाड़े के दिन थे, उसने धूप में खटिया निकाला और उस पर लेवा बिछा कर लेट गया और खुद में खो गया। कब नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला। वह तब जागा जब उसके बपई ने उसे झकझोरा...
‘गॉव के सारे जवान उहां है शिलानास वाली जगह पर, अउर तूं खर्राटे मार रहा है, ऊहां रहना चाहिए था’
‘का करेंगे ऊहां रह कर’उसने बपई को जबाब दिया
‘का करेंगे ऊहां रह कर पूछ रहा है, तोहैं का पता, आजु तऽ परधन ने कमाल कर दिया। ‘परधान ने एक घंटा भाषण दिया अउर साफ कहा कि जो भी गरीबों के साथ ‘अनिआव’ करेगा वह उनकी ऑखें फोड़ देगा, गॉव की जगह जमीन पर सभी का बराबर हक है, अनियाव के खिलाफ गॉव के हर आदमी को बाबा विरसा बनना होगा, अब वह वंशवाद नहीं चलने देगा, जल्दी ही वह गॉव में विरसा भगवान की बहुत बड़ी मूरत लगवायेगा। विरसा बाबा की मूरत बनवाने के लिए आप सभी लोगों को दान में कुछ न कुछ देना होगा फिर क्या था...गॉव ने नारा लगाया...कृ
‘विरसा बाबा जिन्दाबाद।’ अइसहीं बहुत कुछ नारा लगा, हमैं खियाल नाहीं पड़ रहा’
वह बपई की बातें सुन रहा था और ऑखें मलते हुए ही बपई से पूछा...
‘किस जमीन पर गरीबों का हक मिलेगा बाबू! कोई ऐसी जमीन है का गॉव में, जिस पर किसी का नाम न चढ़ा हो, विरसा बाबा की मूरत लगाने से का होगा? जिनके पास घर नाही है औन्है घर मिल जाएगा का?’
बपई को भी पता है कि गॉव की एक ईच जमीन भी ऐसी नाहीं है जिस पर किसी का नाम न चढ़ा हुआ हो फिर कैसे देगा परधान गॉव के गरीबों को जमीन। बपई का बोलता, उसे छोड़ कर चला गया।
उसकी नींद खुल चुकी थी। आंखें मलते हुए उसने तय किया कि अब वह परधान का चित्रा नहीं बनाएगा, जमाना बदल चुका है अब कोई ऐसा बन ही नहीं सकता जिसे इतिहास के फटे पन्ने पर भी रचा जा सके।
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'''कन्फेशन''''''उपन्यास'''
'''रामनाथ शिवेन्द्र'''
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अपनी बात
मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इस उपन्यास के बारे में क्या लिखूं, बात कहां से शुरू करूं। यह सच है कि इस उपन्यास को मैं उस तरफ ले जाना चाहता था जहां थाने वाली महिला दारोगा से थाने पर झगड़ रही थी तथा उस तरफ भी ले जाना चाहता था जहां लौंगी थाने पर जाकर रपट लिखवाना चाहती थी पर थाने ने उसे खुद रपट बना दिया ऐसी रपट जिस पर वह सब कुछ लिख दिया गया जिसे मानव सभ्यता कभी भला नहीं मानती, पर वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। थाने वाली महिला जाने किस छिपी हुई ऊर्जा से दारोगा से झगड़ रही थी इसे समझना मेरे लिए मुश्किल था। मुश्किल इस लिए कि हमारा जनपद आज भी अठारहवीं सदी के अभिशापित गीतों को गा बजा रहा है। इस बाबत अनेक उदाहरण हैं, यहां आदिवासियों को विस्थापित कर कराकर ऊंची ऊंची चिमनियां खड़ी कर दी गईं पर कहीं किसी भी तरह से चूं चा नहीं किया, उनके कब्जों में हजारों एकड़ जमीन दे दी गई यह भी यहां के लिए सवाल नहीं बना बावजूद इन सबके एक आदिवासी महिला अपनी पूरी अस्मिता के साथ थाने पर ही दारोगा को नंगा कर रही है ऐसा तो अचरज भरा है।
शशि जो उपन्यास का एक पात्र भर है पर उसके सारे अन्तर्विरोध जाने कैसे मेरे बन जाते हैं? मुझे पता नहीं चलता कि मैं शशि में क्या तलाश रहा था, क्या बतौर उपन्यासकार उसके अन्तर्विरोधों के बारे में मुझे पता था? ऐसा तो नहीं था। जैसे जैसे शशि की कथा आगे बढ़ती गई वैसे वैसे उसके अन्तर्विरोध भी सामने आते गये फिर तो मुझे उसके अन्तर्विरोधों से दो चार होना ही था। किसी सामाजिक कार्यकार्ता को पुलिस परेशान करे अचरज भरा लग सकता है, मेरे और शशि के संबधों को ले कर भी सवाल दागे जा सकते हैं कि क्या ऐसा संभव है? क्या शशि केवल देखने की वस्तु भर है या इससे भी कुछ अलग है, यही तो उपन्यास में सवाल है कि शशि केवल शशि नहीं है। वह अपना पक्ष है तो अपना प्रतिपक्ष भी।
इस उपन्यास की रूपरेखा मेरे दिल, दिमाग में पहले से नहीं थी। ऐसा अक्सर होता है मेरे साथ कि मैं किसी भी उपन्यास के बारे में पहले से नहीं सोचता। मेरे सारे उपन्यास बिना किसी पूर्वयोजना के ही लिखे गये हैं, हां कुछ सवाल ऐसे हैं जो मुझे पहले से ही मथते रहे हैं, मेरा सारा लेखन, चाहे वह उपन्यास हो, कहानी हो, आलेख हो, उन्हीं सवालों के अगल बगल घूमते रहे हैं और ये सवाल आज के ही नहीं हैं। मानव सभ्यता के विकासक्रम से ही है। खासतौर से तीन ही सवाल हैं, पहला है नारी का सवाल, दूसरा है संपत्ति का सवाल तथा तीसरा है भूमि का सवाल। तीनों सवाल कुदरती हैं और जिन्हें बहुत ही बुरी तरह पूंजीमूल्य बोध वाली परंपरा
ने उन सवालों का समाधान निकाले बिना उसे विकृत कर दिया है तथा उसे ऐसा पारंपरिक बना दिया है जैसे वे कुदरती हों। लोग महसूसते है कि संपत्ति के सवाल हों या भूमि के सवाल हों उनसे उनका क्या लेना देना? ये सवाल तो जाने कब से हैं असल सवाल है कुदरती संसधनों पर स्वामित्व देने का, सवामित्व परिभाषित करने का नहीं। स्वामित्व तो पूंजीमूल्यवोध के विद्वानों तथा न्यायशास्त्रियों ने पहले से ही परिभाषित कर दिया है वह भी देश में लोकतंत्र के स्थापित होने के बहुत पहले, मानवसभ्यता को इधर उधर टहला सकने वाली ताकतों ने पहले तो इसी स्वामित्व को परिभाषित ही नहीं आरोपित भी किया फिर राजप्रबंधन को। जाहिर है ऐसी स्थिति में हमारे समाज में स्वामित्व स्थापना का मामला धीरे धीरे कुदरती मामला बनता चला गया जो आज तक चला आ रहा है।
दरअसल ऐसा ही होता है पूजीमूल्यवोधों की ताकतें अपने निर्णयों को किसी मिथक की तरह ही स्थापित कराने की तकतों से लैश होती हैं. भूमि के स्वामित्व का मामला भी पूंजी मूल्यवाधों के द्वारा रचित एक मिथक बन चुका है। नारी भी किसी मिथक से कम नहीं जब उसे योनि के कटघरे में जकड़ दिया जाता है यह योनि का कटघरा भी उन्हीं ताकतों के दिमागों का खेल है जो नारी का किसी संपत्ति की तरह परिभाषित करते हुए उनके होने तथा न होने को नकारते रहते हैं। फलस्वरूप मनुष्य तथा मनुष्य के बीच त्रासद दूरियां बतौर घृणा व नफरत बढ़ी हैं। नारी के साथ योनिशुचिता के सवाल को विमर्श की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया है, लोग नारी की योनिशुचिता के सवालों को लेकर तरह, तरह के आख्यान रच रहे हैं, कभी श्लीलता की परिभाषा गढ़ी जाती है तो कभी अश्लीलता को कसौटी पर कसा जाने लगता है, केन्द्र में वही नारी होती है जिसे पूंजीमूल्यवोध के साधकों ने जाने कबसे पूंजी बना दिया है, सपत्ति बना दिया है, जिसे पूंजीवादी परंपरा के अनुसार बाजार में बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है यानि कि नारी का एक बहुत बड़ा बाजार। पर आज की नारी पूंजीमूल्यवोधों के कटघरों से बाहर निकल कर अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रही है। कुछ ऐसा ही थाने वाली महिला करती है, शशि करती है तथा लौंगी भी करती है। लौंगी एड्स की मरीज है, यह रोग उसे कैसे मिला इसे वह नहीं जानती, जान भी नहीं सकती, उसे उसके अपने घर वालों ने ही देह के बाजार का नागरिक बना दिया है, यह लौंगी के जीवन की विडंबना है कि वह बाजार का कार्टून बन जाने के लिए विवश कर दी जाती है फिर भी वह टकराती है समय से। टकराने को तो शाशि भी टकराती है समय से, उसके समय का मुखिया उसका पति होता है, वह उससे टकराती है और अपनी एक अलग कथा का रचाव करती है।
संपत्ति व भूमि के सवालों के साथ ही साथ जाति और धर्म के सवाल भी पूरी मानव सभ्यता को कई कई नाजायज खानों में विभाजित किये हुए हैं।
ये ऐसे सवाल हैं जो दुनिया को बारूद की ढेर पर बैठने के लिए विवश किये हुए हैं और आज पूरी दुनिया वास्तव में बारूद की ढेर पर ही बैठी हुई है, भले ही बारूद पर बैठ कर लोकतंत्र के गीत गाये जा रहे हों, जनगण के लिए किसिम किसिम के महोत्सव कानूनों आदि के जरिए आयोजित किये जा रहे हों तथा घोषणायें की जा रही हों कि लोकतंत्र तो लोक का होता है, जनता का होता है, जनता के लिए होता है। योनि और जाति के दोनों कटघरों ने मानवीय सभ्यता के खास गुण मानवीय समीपता का जितना क्षरण किया है उतना किसी और कारकों ने नहीं।
दरअसल जाति तथा योनि के दोनों कटघरे पूंजीमूल्यवोध के प्रचार प्रसार का ही काम करते हैं। डाक्टर लोहिया ने कहा था कि ‘जाति बीमा कंपनी होती है, मरना है जाति में, जीना है जाति में, बिना जाति के कुछ भी संभव नहीं, मरने के बाद कांधा देने वाले जाति के ही होते हैं, वे ही मरनी का संस्कार कराते हैं। तो इस तरह जाति के कटघरों से बाहर पूंजीमूल्यवोध किसी को भी नहीं निकलने देगा, पड़े रहो इसी में। आज तो जाति का कटघरा इतना मजबूत है कि राजनीति भी उसकी चंगुल में है। तो यह जो पूंजीमूल्यवोध वाला मामला है हमारे चित्त तथा चेतन दोनों का भी मामला है. इस मूल्यवोध ने हमारी चेतना की सारी ऊर्जा को लील लिया है। जब मानवीय चेतना में जाति तथा योनि की शुचिताएं दखल देने लगती हैं फिर तो पूरी दुनिया अपने आप कई कई खानों में विभक्त हो जाती है, फिर कुछ बांटना शेष नहीं रह जाता।
यह सच है कि इस उपन्यास के सारे पात्र काल्पनिक हैं, पर इन पात्रों के चरित्र चित्रण में मेरे सामने न्यायशास़्त्र की व्यवस्था का दबाव था तो विधिव्यवस्था की जिम्मेवारी संभलने वाले वास्तविक चरित्रों का भी दबाव था। इन सभी के साथ मेरा घर परिवार भी तो था उसका भी दबाव कम नहीं था। सोनभद्र की प्रशासनिक व्यवस्था से में लगातार परिचित होता रहा हूं, यहां चाहे थाने के प्रबंधन की बात हो या दूसरे प्रशासनिक प्रबंधनों की बात हो सारा कुछ अद्भुत जैसा है। यहां अधिकारियों की उदार विनम्रता हासिल कर पाना कत्तई संभव नहीं और न ही यहां पहले के स्थापित किसी राजव्यवस्था में ऐसा रहा है। यहां जो मानसिक गुलामी पहले थी वह आज भी है। मुझे नहीं लगता कि यहां कोई भी व्यक्ति ऐसा हो सकता है जो अपनी कुदरती आजादी का इस्तेमाल कम से कम अपने लिए भी कर पाता हो। यहां सत्तावन प्रतिशत से अधिक जंगल का भू भाग है जो कुदरती है, हजारों साल से है पर यहां के लोगों में मानवीय समीपता की कुदरती शिक्षा नहीं है, सहभागिता की नहीं है। पूरे क्षेत्र को बाजार ने ऐसा डस लिया है कि हर आदमी बाजार के कार्टून का सामान बन गया है. यहां जीने की पहली शर्त है बाजारू बनना तथा दूसरी शर्त है उपभोक्ता बनना। इन्हीं दोनों शर्तों के बीच जिहें जीवित रहना है रहे नहीं तो मरे. यहां की परिस्थितियां एक नये तरह का आख्यान जनमाती है, यहां चिमनियां तो हैं पर चिमनियों के सरोकार यहां के लोगों से नहीं है, वे लगातार यहां के लोगों को बीमार बना रही हैं। जलवायु प्रदूषण के सवाल से बड़ा सवाल आर्थिक प्रदूषण है, आर्थिक कदाचार का मामला है, गोया क्या नहीं है हमारे सोनभद्र में?
इस उपन्यास में मेरा प्रयास रहा है कि किसी भी बहाने सोनभद्र आये, यहां के लोग आयें तथा यहां की परिस्थितियां आयें। यह सच है कि एक संस्था ने यहां चार पांच साल पहले एड़स के प्रति जागरूकता का अभियान चलाया था पर वह अभियान तभी तक चल सका जब तक संस्था को दानदाता संस्था से फंड मिलता रहा बाद में तो वह स्वतः समाप्त हो गया। ऐसा ही होता है सोनभद्र में ‘जब तक फंड तब तक एन.जी.ओ. वाले मुस्टंड’ बाद में तो किसी का पता तक नहीं चलता। एड़स के प्रति जागरूकता वाले अभियान ने मुझे प्रभावित किया था यह सच है पर उस अभियान से एकदम अलग है शशि का कथाचरित्र। प्राथमिक शिक्षा को केन्द्र में रखकर चलाया जाने वाला एक और अभियान जिसका नाम था फंड छात्रों को, न कि स्कूलों को, उसने भी मुझे अपनी ओर खींचा था उसका लक्ष्य था प्राथमिक या माध्यमिक स्तर पर दी जाने वाली शिक्षा के लिए सरकार जितना भी धन स्कूलों को आवंटित करती है उसे छात्रों में बांट दिया जाना चाहिए तथा छात्रों को यह कुदरती अधिकार दिया जाना चाहिए कि वे खुद स्कूल का चुनाव करें जहां उन्हें बेहतर तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके, पर यह अभियान भी कुछ महीने में ही फुर्र हो गया।
मुझे विश्वास है कि मेरे पहले के उपन्यासों की तरह इस उपन्यास को भी मुहब्बत मिलेगी।
चलिए लौट चलें
तो क्या जंगल ने शशि को खुद में आत्मसात कर लिया फिर वह जंगल की मादकता से अलग वामउग्रवाद की अगुआ बन गई? मुझे नहीं लगता कि शशि वामअतिवादी हो सकती है, पर पुलिस का मानना है कि शशि वामउग्रवादी है, इसी लिए रापटगंज से भाग गई। फिर भी मुझे यकीन नहीं आ रहा कि वामउग्रवाद से शशि का दूर दूर तक का भी नाता रहा होगा। शशि से जुड़ाव के कारण पुलिस ने मुझे पकड़ा तथा छोड़ भी दिया पर कभी भी दुबारा पकड़ सकती है। पुलिस की पकड़ से बाहर आने के बाद मुझे बीते समय का सारा कुछ साफ,साफ दीखने लगा था। उन दिनों शशि के साथ मेरे संबध मधुर रहे हैं जो मेरे दिल दिमाग से बाहर नहीं निकल सकते। हालांकि वह बीत चुका है पर उसकी महक आज भी बासी नहीं हुई है। मुझे सारा कुछ ख्याल आ रहा है कि क्या हुआ था तब, जब शशि मेरे कस्बे में आयी थी मेहमान की तरह और मेरी स्मृति में किसी कहानी की तरह छा गई थी। मुझे शशि के साथ बिताए दिन सोने नहीं दे रहे हैं, समय के एक, एक पल ताजे दिख रहे हैं.. स्मृतियों में डूबने और तैरने लायक। मेरी आंखों में आज भी शशि किसी मछली की तरह तैर रही है और मैं समझ नहीं पा रहा हूॅं कि पानी में मछली की तरह तैरने वाली महिला वामअतिवादी हो सकती है। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। अब तो शशि यहां है भी नहीं, जाने कहां, तथा किस हाल में हो, फिर भी उसकी स्मृतियां मेरे लिए अद्भुत कथानक हैं, उसकेे एक, एक हिस्से मेरी ऑखों में तैर रहे हैं, भला मैं कैसे भूल सकता हूॅ उसके सखी, सखा वाले भाव को। शशि तथा मेरी उम्र में काफी अंतर था फिर भी शशि मेरे लिए सखी तथा सखा दोनों थी। संभव है वह फिर रापटगंज आ जाये पर नहीं, यह महज कल्पना है, वह यहां नहीं आने वाली, फिर भी मैं सोच रहा हूॅ कि वह आयेगी किसी न किसी दिन... संभव है ऐसा भी हो जब सोचा हुआ परिवेश मिल जाये और कहीं गुलाब तो कहीं चांद दिखने लगे, फिर तो उस परिवेश को किसी उत्सव में तब्दील करने की कोशिश करना बेवकूफी नहीं..
जिन्दगी में ऐसा होता कहां है यदि हो जाये तो वाह, वाह, तब तो बहादुरी, कुशलता, प्रतिभा जैसी तमाम चीजें पीठ पर चस्पा की जा सकती हैं और अपने चेहरे पर दूसरों के चेहरों की चमक खींचने वाली चमक का होना भी महसूस किया जा सकता है।
परिवेश और समय की बात करें तो वह वही समय और परिवेश था और मैं उस समय अपनी आंखों में चांद डुबोने तथा बहादुरी की गाथायें लिखने की कोशिश कर रहा था, बिना परवाह किए कि मेरी उम्र गुदगुदियों वाला रिश्ता मुझसे नहीं रखती। ऑखों में गहरी झील उगाये एक दिन मैं शशि के साथ था। यह सोचते हुए कि उसकी ऑखों में भी वही झील होगी, उनमें मछलियों का तैरना, गोते लगाना व किनारों से टकराना आदि देख सकूंगा और किनारे पर बैठ कर लहरों से मीठी छेड़ छाड़ भी। पास में बैठी शशि तो मेरा साथ देगी ही, तथा मेरी ऑखों में अपना खोया हुआ चेहरा भी तलाशेगी पर..
वह तो कहीं और थी। नदी, नाले, आकाश, चॉद, तारे सभी से बाहर, किसी अनजानी सी दुनिया में, अनजानी सी धरती पर, अनजाने रास्ते पर। सुबह का वक्त था, नरम धूप हमें सहला रही थी। ऑखों के सामने बड़े बड़े दरख्त थे, उनकी प्रजाति पहचानना मुश्किल सा काम था। जरूरत भी नहीं थी कि जाना जाये पेड़ों के बारे में, तथा हिसाब लगाया जाये कि उन पेड़ों में से कितनी कुर्सियां, पलगें या इन्टीरियर डेकोरेशन के सामान बनाये जा सकते हैं?
जंगल की हरियाली, पेड़ों का झूमना, पŸिायों का सरसराना, जंगल के एकान्त की गुदगुदाहटों में मैं था और सोच रहा था कि गुदगुदाहट शशि को भी हो रही होगी पर उससे पूछना कि कैसा लग रहा यहां? अभद्रता होती, वैसे भी जंगल किसे नहीं गुदगुदाता?
वह तटस्थ थी, प्रतिक्रयाहीन मैंने उसे गौर से देखा ताकि जान सकूं कि वह प्रकृति के मनोरमों व उसकी धड़कनों से किस सीमा तक अविचलित रह सकती है? भीतरी तलों की अकुलाहटों को रोकने में किसी अभिनेत्री की तरह वह माहिर तो नहीं, स्वीकार को अस्वीकार में तब्दील कर देने की कलाकार।
किस दिल में अदृश्य झील नहीं होती? कौन नहीं उतरना चाहता उसमें? उतर जाने के बाद लहरें खुद, बखुद हिलोरने लगती हैं, निकलने लगती हैं अतृप्त संासें। लेकिन वह चंचल हिलोरों से बाहर थी। ‘करमनासा’ नदी की तरह, पूरब से पश्चिम की तरफ हरहराती हुई बहने वाली, लेकिन बरसात के बाद पूरे छह सात महीने तक शान्त, स्थिर, कितना पाट है, कितनी रेत है, नदी में, पानी है या पानी में ही नदी है, मालूम करना मुश्किल। उसमें उतर कर ही नहीं, समा जाने के बाद भी। इससे भी मुश्किल यह हिसाब लगाना कि नदी ने कितनी बरसात पिया या धूप सोखा?
वह मेरे साथ भलुआ पहाड़ी की अधिकतम ऊंचाई पर थी और वहां हिम नहीं थी फिर भी हम ठंडे थे, पहाड़ी का शिखर ऊंचा था और जिस चट्टान पर हम बैठे थे, वह उŸाुंग नहीं आयताकार था तथा चिकना भी। वहां से जंगल का झूमना व धरती की हरियाली साफ,साफ दिख रही थी फिर भी ऐसा जान पड़ रहा था कि जंगल कुछ,कुछ हमसे छिपा रहा है जिसे देखना और महसूसना अद्भुत होगा, मिलान करने में सुविधा होगी कि हमारे भीतर का जंगल अपने रहवास के लिए कितना मचल रहा है?
वैसे मेरे भीतर किसी जंगल का दखल नहीं, न ही कहीं घाट, पहाड़, न ही नदी,नाले। हां हसते, खिलते फूलों का दबदबा सदैव रहा है शायद इसीलिए मैं जीवन जीते रहने के प्रति हमेशा सकारात्मक रहते हुए उसकी भीनी भीनी गंध महसूसता रहा हूॅ.. उस समय भी मैं भीनी भीनी गंध में था पर उसमें निश्क्रिय मादकता थी, सिकुड़ी, सिमटी जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए था, चाहिए तो यह था कि जंगल के एकान्त में मुझे उस नौजवान और आकर्षक लड़की के साथ तूफानी बाढ़ बन जाना चाहिए था तथा तमाम तटबन्धों को तोड़कर धरती की गंध और जंगल के एकान्त में डूब जाना चाहिए था।
लेकिन जो होता है या जो हो रहा था वैसा सोचे हुए के भीतर ही नहीं होता, उससे अलग भी होता है बहुत कुछ। मैं काल्पनिक संभावनाओं की मौज, मस्ती में था और संभावनायें थीं कि उसकी ज्योति का एक टुकड़ा भी कहीं नहीं दिख रहा था। हम विचारों से विकलांग भी न थे, न ही हमारी मुक्ततायें अपहृत हुई थीं, हम सचेतन थे, एक दूसरे को आकर्षित करने की कलायें भी हमारे पास थीं, फिर भी हम तटस्थ थे और अपनी अपनी दृढ़ताओं में जकड़े हुए थे।
हमने गूंगापन तोड़ा। दुनिया के साहित्य को कभी बांए से तो कभी दांए से हिलाया, डुलाया तथा झकझोरा भी। हमें ऐसा करने में जो दिक्कतें आयीं वे हिन्दी साहित्य के बाबत थीं कि इसमें जो जम गया या जमा दिया गया उसे सदियां हिला नहीं सकतीं, कविता का क्षेत्र हो या कहानी का पुरखों का जमा होना पारंपरिक परिघटना है। कविता की बातें करते, करते हम आज की कहानियों में फस गये। अन्त में कहानियों ने हमारी सारी तार्किक ऊर्जा ही छीन ली, हम थके, हारे से बैठे रह गये कहानी के उन पात्रों की तरह जो दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते। आत्महत्या करने के लिए विवश किसानों या विस्थापितों से आंखें मिला पाना अपशकुन होता। हमारी भद्रताएं प्रभावित होतीं वैसे भी जंगल में होने के हमारे सरोकार स्पष्ट थे जिस पर हमें कदम दर कदम बढ़ना था। तय भी सिर्फ यह था कि ‘जंगल की तरफ चला जाये एक दिन’।
‘जंगल में होना हम दोनों का साझा लक्ष्य था कि विज्ञान का रंगीन पोस्टर बने रापटगंज से एक दिन बाहर निकला जाये, जहां एकान्त की गुदगुदियां हों और आलोचनाविहीन वातावरण।’
इसी साझे लक्ष्य के तहत जंगल का चुनाव किया गया था कि वहां प्रकृति से सीखने का अवसर मिलेगा। प्रकृति से बहुत कुछ सीखा जा सकता है, मसलन शान्ति की अतल गहराई में उतरना, उसके भीतरी तलों को खंगालना, इस मुद्दे पर वैचारिक योद्धाओं में भी मतभेद नहीं.. हममें भी मतभेद नहीं थे पर हम मौन थे तथा कहीं गहरे में उद्वेलित भी। हमने साहित्य पर की गईं बातों को अपने से जोड़ा और आगे.. अचानक शशि ने मुझे याद दिलाया..
‘आपने कभी कहा था कि इस जंगल के आसपास कहीं एक नदी है जो समतल मैदान को चीरकर निकली है, कितनी दूर होगी, वैसे भी जंगल है तो नदी भी होनी चाहिए, जो जंगल को आड़े तिरछे किसी भी तरह चीरती होगी, भले ही समतल से न निकली हो, चलिए उस तरफ चला जायेे पर समतल पर नदी की अंगड़ाई, ऐसा तो अचरज जैसा होगा।’
‘बहुत दूर तो नहीं जाना होगा’ पूछते हुए शशि खड़ी हो गई।
इधर तो समतल चीरने वाली कोई नदी नहीं, एक बेलन है जो काफी दूर है, पास में ‘करमनासा’ नाम की एक नदी है, यही कोई तीन चार किलामीटर दूर, उसे वैदिक नदी के रूप में भी जाना व माना जाता है पर वह समतल से नहीं निकली है। मैने शशि को बताया..
‘कहीं त्रिशंकु वाली तो नहीं’ कहते हुए वह चौंकी फिर गंभीर हो कर बोली..
‘वही त्रिशंकु तो नहीं स्वर्ग और नर्क के बीच लटका हुआ एक सŸााप्रभु, विश्वमित्र के याज्ञिक प्रयोगों का एक उपकरण, अपने ढंग का स्वर्ग बनाने वाला महत्वाकांक्षी।’
‘हां वही त्रिशंकु जिसे स्वर्ग के रक्षाकर्मियों ने स्वर्ग में घुसने से रोक दिया किसी तरह वह नर्क से बाहर निकला, फिर लटक गया स्वर्ग और नर्क के बीच। उसके ऑसुओं, खखारों एवं लारों से धरती पर कर्मनाशा बह निकली किसी शोक कविता की तरह’
हम भी तो त्रिशंकु की तरह ही तो लटके हुए लोग हैं, चलिए उस तरफ चलते हैं’ शशि ने स्पष्ट किया..
पहाड़ी तथा कच्चा रास्ता पार करके करमनासा के तट पर हम शीघ्र ही पहुंच गये। कटीली झाड़ियों के बीच से गुजरना भला था जो देखने में अद्भुत था, झाड़ियों की सघनताओं के बीच होठों के खिलखिलाने व मुस्कराने माफिक।
नदी काफी गहरी थी, कोई पचास साठ फीट से अधिक, नदी की तलहटी में विभिन्न आकारों प्रकारों के पत्थरों का प्रायोजित जैसा जमघट था, गोल, गोल चिकने चिकने। इन्हीं पत्थरों को चूमता, चाटता नदी का पानी बह रहा था, पानी और नदी की तलहटी की एकात्मकता देखने लायक थी, तभी तो छोटे, छोटे पत्थर भी उसके बहाव को ठहराव में बदले हुए थे।
नदी के किनारे से नदी में उतरने का रास्ता नहीं था जिससे साबित था कि पास में कहीं बस्ती नहीं.. हम किसी तरह नदी में उतरे, नदी के सपाट किनारों ने हमें सामान्य नहीं रहने दिया, किनारों के सीधे करारों पर पैर टिकाने की भी जगह नहीं थी। गनीमत थी कि बिना चोटिल हुए हम नदी की गहराई में उतरे।
पत्थरों के बीच फसे हुए पानी को पैरों से हिलाते हुए शशि बोली...
‘कितना साफ पानी है, पारदर्शी भी, इसमें मछलियां भी तो होंगी, भले ही बड़ी न हों छोटी ही सही। मछलियों का तैरना जब भी मैं देखती हूॅं लगता है अपनी सांसों में तैर रही हूॅं, जीवित उम्मीदों एवं संभावनाओं को सहला रही हूॅ.. बहुत अच्छा लगता है, क्षण भर के लिए ही सही, जड़तायें टूटती हैं और खुद को विश्लेषित करने का आनन्ददायक अवसर भी मिलता है पर कभी कभी तो... बुरा तथा भयानक, चीख निकल जाती है’
शशि किसी कविता सरीखा संवाद बोलकर चुप हो गई। कुछ देर बाद बोली... बोली क्या मुझसे पूछा उसने..
‘आप भी तो सांसों में तैरते होंगे, किसी मछली की तरह, भीतरी तलों को छू, छू कर लौटने के लिए फिर आगे तैर कर छूए हुए को दुबारा, तिबारा छूने के लिए, छुअन तो कला का ही रूप है, ऐसा करने में आप अपनी प्रतिभा का अधिकतम उपयोग करते ही होंगे...’
‘कैसा सांसों में तैरना तथा कैसी छुअन?’ क्या पूछ रही यह लड़की किसी दार्शनिक की तरह। मैं उसका उŸार दे पाता कि अचानक बिना कुछ सोचे हुए ही मैंने उससे कहा, कुछ,कुछ स्वस्फूर्त ढंग से...
‘शशि मैं भावुक नहीं, वर्तमान ने मुझे खुरदुरा बना दिया है, मैं आगे या पीछे की सोच ही नहीं सकता तथा भूत भी मेरा सहयात्री नहीं रहा है। मैं वर्तमान में ही जीता रहा हूॅ.. कुशलतापूर्वक जीने के लिए पूर्वाग्रहहीन संबध ही तो चाहिए, इससे अधिक कुछ भी नहीं। हम मनुष्य हैं, हमारे भीतर वारिश रोकने की जगह नहीं, हमारी चमड़ियां धूप सोखने की आदी हैं पर लहरें नहीं झेल सकतीं, वैसे भी मछलियों को तैरने के लिए पानी की जरूरत होती है, पानी सब जगह तो होता नहीं.. मुझे नहीं मालूम प्रतिभा किसे कहते हैं फिर उसके अधिकतम उपयोग का सवाल ही नहीं..’
मेरा प्रतिउŸार सुनकर शशि हसने लगी जैसे उसने नदी का हसना भी छीन लिया हो, थोड़ा रूक कर बोली....पूरी तरह उपेक्षात्मक...
‘पूर्वाग्रहहीन संबन्धों का निर्वाह कैसा ? किस बात का निर्वाह, निर्वाह एक आयामी तो नहीं.. मैं निर्वाह ही तो कर रही हूॅं, पहले अकेली थी, फिर साथ मिला, मॉ बाप ने मुझे ससुराल विदा किया। पांच साल गुजर गये, तीन साल तक ससुराल में ससुराल वालों के साथ रही, दो साल से अकेली हूॅं बिना तलाक के यह मान कर कि तलाक का कोई अर्थ नहीं, समझ बढ़ सकती है स्थितियों के समझने के बाबत, फिर टूटे हुए दिल मिल सकते हैं, प्रतीक्षा करना आवश्यक है। संबन्ध बहाल होने की संभावनायें तो रहती ही हैं पर क्या मैं अकेली संभावनाओं को सफल बना सकती हूॅं?’
अपना बीता बताकर शशि मौन हो गई, आगे बताना भी क्या था। कोई कहानी कितना दूर जा सकती है आखिर? लड़की से पत्नी बनने और तलाक होने तक खत्म। कहानी की आगे की यात्रा तो कई अन्तों वाली हो जायेगी, पति, पत्नी जैसे संबन्धों के बहुविकल्पों व बहुलक्ष्यों वाली।
शशि पति, पत्नी के रिश्तों के अलावा प्रचलित दूसरे विकल्पों से घिन करने वाली एक पारंपरिक लड़की मुझे जान पड़ी, देहदाह को शुचिता के आग्रहों से संवारने सजाने वाली। बहुत गहरे से शशि को मैंने देखा और सहम गया मुझे जान पड़ा कि वह देह से पार है, देह में होते हुए भी देह को तपाकर रखने वाली।
मैं शशि को साल भर से जानता हूॅ.. पहली बार उसे एक एन.जी.ओ. के लीगल एवेयरनेस प्रोग्राम में देखा था। प्रशिक्षुओं को लीगल जानकारी देने के लिए उस प्रोग्राम में मुझे भी आमंत्रित किया गया था। तब मैंने देखा था कि उसकी ऑखों में देह के बाबत तनाव पूर्ण संतुलन है ही नहीं.. आस है तो प्यास रहेगी ही, पर भूखी नहीं, भात, भात चिल्लाने वाली। उस प्रोग्राम के बाद तो हम अक्सर मिलने लगे थे।
उस एन.जी.ओ. की तरफ से भी उसे निर्देश था कि वह मुझे हर उस कार्यक्रम में आमंत्रित करे जो जन समस्याओं से जुड़े हुए हों। वह उस एन.जी.ओ. के लिए जनपद प्रभारी का काम करती थी। निश्चितरूप से शशि मेरा सहयोग लेना कभी नहीं भूलती थी। वह साल के भीतर ही मुझसे ऐसा घुलमिल गई जैसे हम वर्षों से घुले, मिले हुए हांे..
नदी की तलहटी में इधर उधर घूम लेने के बाद हम एक समतल और चौकोर पत्थर पर बैठ गये। वहां कहू के पेड़ की सघन छाया थी जो किसी अशक्त जैसा हिलता डुलता नदी के किनारे खड़ा था। अब गिरा तब गिरा पर ऐसा नहीं था, कहू की जड़ें काफी गहरे तक जाती हैं और काफी मजबूत भी होती हैं.. जानने वाले जानते हैं कि कहू के पेड़ों तथा नदियों की अन्तरंगता अटूट होती है, नदी है तो कहू के पेड़ हैं, कहू के पेड़ नहीं तो नदी नहीं.. वहां बैठे बैठे मैं नर, नारी के रिश्तों को विश्लेषित कर रहा था।
काश! नर, नारी के रिश्ते भी नदी और कहू के पेड़ की तरह होते एक दूसरे के पूरक। उस समय हम जंगल में थे, जंगल का मनोरम भी हमारे साथ था
पर जाने क्या हुआ शशि की कहानी सुनते ही जंगल के मनोरम मुझे चिढ़ाते से जान पड़ने लगे। कहीं कुछ है ही नहीं, सारा कुछ जलते हुए शून्य में घिरा हुआ है। शशि मुझे किसी परछाईं सी दिखी, दृश्य भी अदृश्य भी, हवा में लटकी हुई त्रिशंकु की तरह मैंने सोचा...
जाने किस स्वर्ग की वह प्रतीक्षा कर रही? उसे पाने के लिए अपना अमूल्य वर्तमान क्यों अपाहिज बना रही? मैंने एक बार फिर शशि को गौर से देखा कि उसके चेहरे पर क्या है? उसके मन के भीतर भी उतरना चाहा, वहां कुछ भी नहीं था या कुछ रहा भी हो तो मेरी समझ में नहीं आया कि वहां कुछ है भी, क्योंकि किसी के मन के भीतर उतरने की कला मुझे नहीं आती। वैसे भी एक छोटी सी और अस्पष्ट तथा अंखुआती कहानी के सहारे किसी के मन में उतरा भी तो नहीं जा सकता।
फिर भी मैं शशि की कहानी में सवाल था कि काहे के लिए हरामजादों ने इसे परित्यक्ता बना दिया? आखिर क्या दोष हैं इसमंे?
शशि तब तक खामोश थी, उसने मौन तोड़ा...‘पानी पी लिया जाय बिस्कुट है मेरे पास, प्यास लगी है, प्यास तो आपको भी लगी होगी, प्यास बुझाने के लिए नदी से अच्छी कोई जगह नहीं, साफ और बहता पानी, कहीं ठहराव नहीं’
मुझे भी प्यास लगी थी, मैने हां कहा और उससे पूछा...
‘बिस्कुट लेकर चली थी क्या? आने की जल्दी में मुझे तो ख्याल ही नहीं रहा कि क्या क्या लेकर चलना हैै?’ हम दोनांे बिस्कुट खाये और बहता पानी पिये, पानी मीठा था, पहाड़ी जैसा नहीं, वैसे भी वारिश का मौसम पार हो चुका था।
पानी पी चुकने के बाद शशि से मैंने पूछा..
‘कुछ और देखना है यहां वीराने में, जंगल के एकान्त में, जंगल में होना तो बहुत अच्छी बात है पर बाहर निकलो तो निकलना मुश्किल, पीछे, पीछे जंगल पीछा करता दीखता है, किसी प्रायाजित साक्षी की तरह।’
शशि ने बिना देर किए स्वस्फूर्त उŸार दिया...
‘लौटना चाहिए अब, दिन ढलान पर है, कई मील जंगल पार करना है, अब कुछ भी नहीं देखना, इससे अधिक कुछ देखा भी तो नहीं जा सकता, अधिक देखने की लालच से बचना ही सर्वोŸाम बचाव है क्योंकि फिर जंगल हमें देखने लगेगा। आप तो जानते ही हैं जब प्रकृति दिल के गहरे में उतर कर किसी को देखने, परखने लगती है फिर तो दृढ़ताएं टूट जाती हैं.. दृढ़ताएं टूट जाने पर जंगल हम पर हसने लगेगा तथा उपहास उड़ाएगा, वैसे हसियां मुझे उŸोजित नहीं कर पातीं, न ही डरा पाती हैं, फिर भी..जंगल से बाहर हमें निकलना ही है, सो जंगल का अवांक्षित उपहास लेकर निकलना ठीक नहीं, चलिए लौट चलें’
अन्धेरा गाढ़ा होते होते तक आधुनिकता में तब्दील होते रापटगंज कस्बे में हम लौट आये किसी विज्ञापन में तब्दील होने के लिए। हम भी तो विज्ञापन की तरह ही शाश्वत एकान्त पीने के लिए जंगल में पहुंचे थे पर वहां तो कोलाहल था। हमें क्या पता कि जंगल तभी कुछ देता है जब उसका मान किया जाये, नहीं तो सारा कुछ लील लेता है। तो क्या शशि जंगल की मर्यादा बचाने के लिए खुद को जंगल के हवाले कर वामउग्रवादी बन गई, घर,बार छोड़ कर, मुझे नहीं मालूम।
दूसरी बात
कस्बे में किसी तरह की हलचल नहीं थी, हलचल होती भी कैसे प्रदेश की सरकार किसी शान्ति दूत की तरह मुस्करा रही थी। अगर उसकी छवि चूमने लायक नहीं होती तो उसे आतंककारी बहुमत कैसे मिलता? हर छोटी बड़ी, जात पांत वालों ने उसे अपना माना, वोट का खजाना उस पर निछावर कर दिया। सरकार तो सरकार होती है, विज्ञापनों से अपना हाजमा दुरुस्त रखने वाली, सो कस्बे में सरकार द्वारा कराए गये एवं कराए जाने वाले विकास कार्यों के बाबत तमाम विज्ञापनी पोस्टर चिपके हुए थे जिसमें साफ,साफ लिखा था कि हर हाथ को काम तथा हर खेत को पानी मिलेगा। विज्ञापन की कुछ नस्लें दूसरे किस्म की थीं जो जनसंख्या नियंत्रण एवं एड्स के बाबत थीं.. उक्त विज्ञापन काफी डरावने थे, संदेश था कि देह को देह से दूर रखने में ही एड्स से बचाव है। पर कैसे? यह नहीं था। देह ताप का क्या होगा यदि यह भी उसमें बताया गया होता तो विज्ञापन काफी हसीन और चूमने लायक होते? एक दिन शशि का फोन आया..
‘उसकी संस्था को एड्स नियंत्रण के प्रति जागरूकता फैलाने का काम मिला है जिसके लिए एक वर्कशाप आयोजित करना है, अगर आप समय देते तो वर्कशाप की रूपरेखा बना ली जाती’
मैं जानता था कि सोनभद्र प्रदूषण जोन की तरह एड्स जोन के रूप में भी चिन्हित किया गया है तथा शशि की संस्था एड्स के बाबत जागरूकता का कार्यक्रम संचालित करना चाहती है। जिसके लिए धनदाता संस्थाओं के पास उसकी संस्था की ओर से आवेदन भी किया गया है, हो सकता है कुछ सकारात्मक उŸार आया हो और शशि वर्कशाप कराने की योजना बना रही हो। पूछने पर स्पष्ट हुआ कि जैसा मैं सोच रहा था वैसा ही था। शशि ने साफ,साफ बताया। उसके प्रस्ताव को मुझे नकारना तो था नहीं, मैंने फटाका हां कह दिया। आऊंगा, अवश्य आऊंगा।
दूसरे दिन शशि संस्था के मंत्री के साथ मुझसे मिली। मंत्री एक चालाक आदमी जान पड़ा और बातूनी भी, हालांकि वह बातें चबा चबाकर बोलने वाला आदमी नहीं था, शक्ल सूरत आधुनिक थी पर शरीफ जैसी, ऐसी भी नहीं जिससे संस्था का लक्ष्य परिभाषित होता हो, वहां लक्ष्य नाम की कोई चीज नहीं थी।
वर्कशाप के बारे में ढेर सारी बातें हुईं, वर्कशाप क्यों तथा किसके लिए यह सुनिश्चित किया गया कि वर्कशाप तो कराया जाये पर किसके लिए यह मामला हल होने से ऊपर था, हल होता भी कैसे? देहव्यापार से जुड़े लोगों के बारे में किसे जानकारी थी? उनके नाम, पता तो मालूम हांे.. कम से कम मुझे तो जानकारी नहीं थी सो मैंने उसे साफ,साफ बता दिया कि मैं इसमें आप लोगों की सहायता नहीं कर सकता। संस्था का मंत्री मेरी ओर एकटक था मानो वह मानकर चल रहा हो कि मैं भला यह सब क्यों नहीं जानूंगा, गोया उसके दिमाग में संभावना और अपेक्षा दोनों थी कि मुझे यह सब जानना ही चाहिए। अगर मैं इतना भी नहीं जानता फिर मैं सोनभद्र के बारे में क्या जानता हूॅं?
मैं था कि देह व्यवसाय से जुड़े लोगों के बारे में कुछ जानता नहीं था। अखबारों की खबरें पढ़कर ही मुझे मालूम था कि सोनभद्र एड्स जोन की संभावना वाले परिक्षेत्र के रूप में जाना जाता है। ऐसे परिक्षे़त्र जो आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों की मादकता में मुस्किया रहे हों और किसिम किसिम के कारखाने कथित विकास के उत्सव मना रहे हों, वहां एड्स नहीं पसरेगा तो क्या पसरेगा? सिद्धान्ततः मुझे इतना ही मालूम था। इसके आगे मुझे कुछ भी मालूम नहीं था। संस्था का मंत्री एड्स से प्रभावित लोगों के बारे में जानकारी जुटाने की जिम्मेवारी शशि पर थोप कर दूसरे दिन वापस लौट गया, यह निर्देश जारी करते हुए कि जानकारी जुटाने के काम को सात दिन के भीतर कर लिया जाना चाहिए। संस्था का मंत्री वापस तो लौट गया पर उसका भूत रापटगंज से वापस नहीं लौटा, वह शशि के अगल बगल मंडरा रहा था। तीन दिन गुजर गये, शशि ने हर संभव कोशिश की कि उसे देहव्यापार से जुड़े लोगों के बारे में आंशिक ही सही, जानकारी हो जाये पर एड्स प्रभावित किसी का भी नाम उसे सप्रमाण नहीं मिल सका। चार दिन और शेष हैं, रिपोर्ट क्या देगी मंत्री जी को?
शशि के लिए परेशानी थी कि वह किससे पूछे एड्स से प्रभावित लोगों के बारे में, एक मात्र सरल उपाय था सरकारी जिला अस्पताल के एड्स विभाग के डाक्टरों या कर्मचारियों से मिलना और जानकारी जुटाना।
दूसरे दिन शशि जिला सरकारी अस्पताल में थी, अस्पताल तक पहुंचना दिक्कत भरा था। पहले ठीक था, अस्पताल कस्बे के बीच में था, वहां तक पहुंचने के लिए रिक्शे की जरूरत नहीं थी, सरकार को जाने क्या सूझा कि अस्पताल को कस्बे से तीन चार किलोमीटर दूर एक वीरान पहड़ी लोढ़ी पर स्थापित करा दिया। रापटगंज से दूर अस्पताल स्थापित न किया जाये इसके लिए तमाम विरोध प्रदर्शन और घेराव आयोजित किए गये पर सरकार तो सरकार होती है। वह जनविरोध को नाजुक गंभीरता से भी लेने लगे तो तो सरकार का मतलब ही खत्म हो जाये। फिर लोकतंत्र में तो जनता विरोध प्रदर्शन, घेराव वगैरह किया ही करती है, गांधी जी के जमाने से ऐसा ही चल रहा है, उसकी चिन्ता करो तो चल चुकी सरकार। अस्पताल में शशि को मालूम हुआ कि एड्स के लिए कोई अलग से डाक्टर नहीं है.. जो डाक्टर एड्स के मरीजों की चिकित्सा कर रहा है वह चर्म रोग का डाक्टर है। दो सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उनमें से एक अस्पताल में हाजिर है। इतना मालूम करते करते तक शशि काफी आशंकित हो चुकी थी। ‘जिससे पूछो एड्स के डाक्टर के बारे में वही उसे घूरने लगता... मानो उसे ही एड्स हो गया हो’ तथा वह हर किसी के लिए सुलभ है, पर करे क्या जानकारी तो जुटाना ही था।
अस्पताल नया, नया बना था इसी लिए वहां सफाई भी थी। अन्य सरकारी अस्पतालों की तरह वहां गन्दगी नहीं थी। गन्दा होने में कुछ समय तो लगता ही है। शशि अस्पताल के मुख्य हाल में थी। हाल के अगल बगल आमने सामने डाक्टरों के कक्ष थे। ठीक पूरब की ओर एक कक्ष था। कक्ष के दरवाजे के ठीक ऊपर चर्मरोग विभाग लिखा था। उसके नीचे डाक्टर का नाम। उसके पास ही में ही जन सहायता कक्ष था जिससे साबित नहीं होता था कि किस काम के लिए सहायता? शशि उस कक्ष में दाखिल हुई, वहां एक अधेड़ किस्म का कर्मचारी बैठा था जो हसमुख स्वभाव का विनम्र आदमी था, उससे शशि ने पूछा...
‘क्या यहां एड्स के मरीजों की देख, रेख और दवा दारू होती है?’
उस विनम्र कर्मचारी ने शालीनता से शशि को बताया
‘हां होती है, कहिए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूॅं?’
शशि ने महसूस किया कि यह आदमी उन लोगों से अलग है जो एड्स के डाक्टर के बारे में पूछते ही उसे घूरने लगे थे। उसे शालीन समझ कर शशि ने उससे अपना काम बताया कि उसे एड्स से प्रभावित रोगियों एवं सेक्स का व्यवसाय करने वालों के बारे में जानकारी चाहिए’
कर्मचारी तो कर्मचारी कितनाहूॅ विनम्र हो वह ताड़ गया कि मामला कुछ गंभीर है, शशि का सवाल सुनते ही उसने दफ्तरी गंभीरता ओढ़ ली।
‘क्या पूछा आपने? एड्स के रोगियों तथा सेक्स वर्करों के बारे में जानकारी, तो यह जान लीजिए कि ऐसी जानकारी किसी को नहीं दी जा सकती, आर.टी.आई. के तहत पूछने पर भी। क्या मैं जान सकता हूॅं कि आप कौन हैं तथा इस तरह की जानकारी किस लिए जुटा रही है?ं’
‘हां यह तो मैंने आपको बताया ही नहीं कि मैं कौन हूॅ, आपकी विनम्रता ने मुझे इस औपचारिकता से वंचित कर दिया, नहीं तो मैं ऐसी गलती नहीं करती। हां तो मैं एक मामूली सामाजिक कार्यकर्ता हूॅ और एक गैरसरकारी संगठन से जुड़ी हुई हूॅ. हमारी संस्था एड्स जागरूकता का कार्यक्रम कई जनपदों में क्रियान्वित कर रही है, इस वर्ष से यहां भी संचालित करने की योजना है, इसी आशय से उक्त जानकारियां चाहिए थी..’
अचानक कर्मचारी भावुक हो उठा..
‘अरे अभी तक आप खड़ी हैं, बैठिए तो’
‘जी धन्यवाद’ फिर शशि एक कुर्सी पर बैठ गई। दूसरी ओर कर्मचारी कुछ फाइलांे को देखने लगा, कुछ देर बाद बोला ‘देखिए मैं आपकी इस काम में कुछ भी सहायता नहीं कर सकता, यह मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर है, हां डाक्टर साहब आ रहे हैं उनसे बात कर लीजिए फिर मैं एड्स रोगियों की फाइलें आपको दिखा दूंगा पर बिना डाक्टर के आदेश के नहीं’ तब तक आप यहां बैठ सकती है..’
ऐसे मामलों में शशि अनुभवी थी। बिना कुछ लेन देन के काम नहीं होता कानून टपक पड़ता है बीच में, लेनदेन कर लो तो सारा कानून खत्म। शशि ने उक्त कर्मचारी को सौ का एक पŸाा थमाया और धीरे से कहा... ‘कुछ और भी मिलेगा आपको, काम हो जाने के बाद।’
‘अरे यह सब क्या है, मैं लेन, देन नहीं करता, मैं भी तो एक सामाजिक जन संगठन का सदस्य हूॅं, यहां दो साल के लिए हूॅ. पर आपने तो ऐसा कर दिया कि अब मैं आपके आग्रह को कैसे ठुकरा सकता हूॅं, समझ में नहीं आ रहा, चलिए आपका काम निपटा देता हूॅ. पर सेक्स वर्करों के बारे में मेरे पास कोई रिकार्ड नहीं है, इसकी जरूरत भी सरकार को नहीं पड़ती, मेरी जानकारी में ऐसा कोई सर्वे भी नहीं हुआ है, फिर आंकड़े कैसे मिलेंगे?
शशि ने कर्मचारी को रोका....‘पर असल काम तो मेरा वही है सेक्स वर्करों का पता लगाना आखिर यह कैसे होगा?’
कर्मचारी गंभीर हो गया। कुछ सोचकर बोला.. ‘आपका काम हो सकता है, एड्स का एक मरीज जांच पड़ताल कराने के लिए अगले सप्ताह मेरे पास आयेगा, वह आपकी मदत कर सकता है, मुझे वह सेक्स व्यवसाय का दलाल लगता है।’
‘अगले सप्ताह तक तो काफी देर हो जायेगी, उसका नाम पता तो होगा आपके पास। अस्पताल बन्द होने के बाद आप उससे मिलवा देते तो उपकार करते, वह कहीं दूर का रहने वाला तो नहीं..’
‘नहीं वह यहां के सबसे पास वाले गांव का ही है, चलिए चलते हैं, आपके पास कोई बाहन तो होगा ही?’
‘नहीं बाहन तो नहीं है, कोई टेम्पो ले लेंगे’। शशि ने उसे बताया
कर्मचारी अस्पताल बन्द होने के बाद शशि को साथ लेकर उस मरीज के गांव के लिए निकला। मरीज का गांव रापटगंज से बहुत दूर नहीं था, आसानी से एक टेम्पो मिल गया, ढाई सौ रुपया किराया आने, जाने का तय हुआ, शशि को जानकारी जुटाने के लिए इतना तो करना ही था।
शशि कर्मचारी के साथ थी। अब उसे क्या पता था कि कर्मचारी उसके होने की गन्ध में डूब जायेगा। कर्मचारी था कि शशि से सवाल दर सवाल किए जा रहा था। सवाल भी अगर एड्स के बाबत होते तो शशि को सन्देह न होता कि वह कर्मचारी के लिए देह में तब्दील होती जा रही है। पर सवाल तो रंगीन बदरियों वाले थे जिनसे शशि का दूर दूर तक नाता नहीं था। मतलब कहां की रहने वाली हैं? का पढ़ी हैं? कबसे एन.जी.ओ. में काम कर रही हैं? कितना वेतन मिलता है? रापटगंज में अकेली रहती हैं, या किसी के साथ।’
शशि ने कर्मचारी को बताया कि वह अकेली रहती है। अकेली रहती भी है जो पूरी तरह सच था। कर्मचारी उछल पड़ा जैसे किसी लड़की का अकेली रहना उसे कुछ दूसरा बनाता हो, चौंकते हुए उसने शशि से पूछा...
‘अकेली रहती हैं आप!’ उसकी आंखें अचरजांे से भर गईं
‘हां मैं अकेली रहती हूॅ’’, शशि को मजाक सूझा
‘अकेली नहीं रहना चाहिए नऽ’
‘नहीं मेरा कहना यह नहीं है। मैं तो कह रहा था दिक्कतें होती हैं, जमाना बहुत खराब है, लोगों की आंखें अच्छा नहीं देखतीं, जाने कब लोग किस रूप में बदल जायें और..’
और क्या बलात्कार ही होगा नऽ या इससे भी कुछ अधिक, इससे भी अधिक कुछ होता है क्या? फिर पुरुष और कर ही क्या सकता है औरत के साथ? कोई कल्पना है क्या आपके दिमाग में, बता देते तो ठीक रहता’
कर्मचारी अस्पताल का था, जहां बातों में शाखायें निकालने के तमाम अवसर होते हैं। डाक्टरों के रसिया होने के बाबत किसे नहीं मालूम, देखने में सीधा सादा पर औरतों के मामलों में काफी मुखर। औरतें भी डाक्टरों की ओढ़ी सादगी पर झूमने वाली। यह बात अलग है कि सभी औरतें या डाक्टर तितलियों वाले मिजाज के नहीं होते। उन्हें अपनी मर्यादा की चिन्ता रहती है। कर्मचारी का काम भी उन्हीं मरीजों की देख, रेख करना था जो देहव्यापार से जुड़े होते थे और एड्स के शिकार थे। पर उनसे वह देह संबध तक नहीं जा सकता था, खतरा होता सावधानी बरतने के बाद भी, शक तो बना ही रहेगा फिर एड्स का मरीज सामान्य बीमारियों वाले मरीजों की तरह का तो होता नहीं, बिगड़ी हुई देह में कौतुक कहां? लहराती, इठलाती देह की बात ही दूसरी।
कर्मचारी सामान्य सोच का जीव था। खुली औरतें अपनी देह की उपयोगिता में सामाजिक या कानूनी वर्जनाओं की चिन्ता नहीं करतीं.. वे देह की कथित वर्जनाओं से मुक्त अपनी इच्छाओं की मालिकिन होती हैं.. उनमें स्त्रैणता से अलग पुरुषों वाले मनोभाव होते हैं..
‘का हो गया देह तो घिसती नहीं’ वैसे भी आज का समय देह और आत्मा के दर्शन का नहीं, का होगा तन को तपा कर?’
कर्मचारी को क्या पता था कि शशि उसे विचारों के झोंकों में बहा ले जायेगी, वह चकरा गया, लगा गिड़गिड़ाने..
कर्मचारी बलात्कार और सत्कार जानता था। औरतों के खाते में महज यही दोनों बातें होती हैं.. देवी हुई तो सत्कार, नहीं तो बलात्कार। वैसे सत्कार हमारे समाज में काफी प्रशंसित हैं और दिखावे के रूप में व्यवहृत भी। सत्कार के बाद भले ही बलात्कार हो, यह अलग बात है। जैसा कि सुना जाता है, पहले सत्कार फिर बलात्कार। बलात्कार के बाद क्या हो सकता है? उसे मालूम नहीं था। हजारों साल की हमारी सभ्यता ने बलात्कार के अपराध को अलग अलग ढंग से लिया है, औरतों के बाबत कुछ दूसरे मनोभाव और पुरुषों के बाबत कुछ दूसरे, अभी तक यह संभव नहीं हो सका है कि पुरुष मानसिक रूप से खुद को अपराधी स्वीकारे। दण्ड झेलना पड़ता है औरत को ही, बदनामी उसी के खाते मंे दर्ज होती है।
कर्मचारी को अपने खोखले विचारों में डूबना था सो वह डूब गया बताता भी क्या? बलात्कार के आगे क्या हो सकता है, इस मामले में क्रूर वैचारिकों के पास भी विचार नहीं कि बलात्कार के आगे क्या? होता भी कुछ नहीं, बलात्कार घृणित मानसिक स्थिति है इससे अधिक कुछ भी नहीं.. इससे औरत की पवित्रता भला कैसे प्रभावित हो सकती है? कर्मचारी को क्या पता था कि सोच की बहुत बड़ी दुनिया होती है। उसने तो शशि को पारंपरिक ढंग से डरवाना चाहा था। जैसा कि सामान्यतया किया जाता है, डरवाने के बहाने घ्यान आकर्षित कराने की पुरानी परंपरा। कर्मचारी ने उक्त प्रंसंग को बदल दिया वैसे मरीज का गांव भी आ गया था।
कुछ ही देर में शशि कर्मचारी के साथ मरीज के घर पर थी। गनीमत थी कि मरीज घर से कहीं बाहर नहीं गया था और देखने में मरीज जैसा भी नहीं दिख रहा था। कर्मचारी ने बताया कि इसका रोग अभी पहले चरण में है, उचित चिकित्सा से इसे बहुत लाभ मिलेगा, दस बीस साल तक जीवित रह सकता है।
मरीज के व्यवहार की गंवई आत्मीयता देखने लायक थी। शशि तो देखती रह गई। मरीज के चेहरे पर एड्स जैसे भयानक रोग का आतंक नहीं था। वहां जीवन जीने की स्वाभाविक चपलता थी तथा आन्तरिक उत्साह भी। शशि मरीज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी।
मरीज ने शशि और कर्मचारी का भरपूर स्वागत सत्कार कर लेने के बाद पूछा..
‘कैसे आना हुआ? कल तो मुझे अस्पताल आना ही था’ कर्मचारी ने आने का कारण संक्षिप्त में मरीज को बताया’
मरीज हसने लगा, हसते हुए ही बोला..‘क्या करिएगा यह सब जानकर, कुछ भी फर्क पड़ने वाला नहीं.. यह एक ऐसा कारोबार हो गया है, जिसे करने के लिए विशेष संसाधन की आवश्यकता नहीं होती। देह ही संसाधन और उसकी चपलता धन का निर्माण। कितना सरल है देह से रुपया बनाना। सभी जानते हैं इस रोग के बाबत फिर भी फैलता जा रहा है। अब मुझे ही क्या पता था कि मुझे क्या हुआ है? वह तो अगर बपई को खून न देना होता तो पता ही नहीं चलता। उसी दिन मालूम हुआ कि मैं एड्स में फस गया हूॅं, फिर दवाई शुरू हुई। जब से मुझे एड्स हुआ है, याद करने की कोशिश कर रहा हूॅ कि मुझे किस देह ने एड्स से जकड़ा। फिर भी याद नहीं आ रहा याद भी कैसे आयेगा? एक दो के साथ शारीरिक संबध होता तो याद आ जाता। रोग की जानकारी होते ही मैंने ढाबा का काम धाम बन्द कर उसे बेच दिया है। ढाबे का काम करते रहना अब मेरे लिए संभव नहीं, मैं ऐसा कर भी नहीं सकता, मैं सपने में भी नहीं सोच सकता कि मेरे
कारण यह रोग किसी दूसरे को जकड़े। ढाबे को चलाना है तो थाली में केवल खाना ही नहीं, देह भी परोसनी होगी। डाक्टर साहब ने मुझसे ढेरों सवाल किया था इस रोग के बाबत। यह जानने के लिए कि मुझे यह रोग कहां से मिला, मैं क्या बताता कि सारी सावधानियां जो बताई जाती हैं उनका प्रयोग तो मैं करता ही रहा, फिर भी। एक दो बार ही ऐसा हुआ होगा कि निरोध फट गया होगा, लेकिन वह कहां और कब फटा याद आना संभव नहीं..।’
‘ढाबे पर तो अक्सर ही ऐसा हो जाया करता था। लड़कियां या महिलायें आ जाया करती थीं ढाबे पर कमाई करने के लिए। उन्हें तीन चार सौ रुपये मिल जाया करते थे। इतना रुपया कमाने के लिए वे कौन काम करतीं, खंचिया ढोतीं या फावड़ा चलाती तो का मिलता? दो जून का खाना भी तो नहीं। कम नहीं होते तीन चार सौ रुपये, घंटे आधे घंटे में इतना रुपया कमा लेना, वह भी देह की अंतरंग गुदगुदियों के द्वारा, यह उनके लिए फायदे की बात थी। कभी कभी तो कोई लड़की अजीब कहानी बयान करती, सुन कर मुझे हसी आती। दुबारा जब मैं उस आदमी को ढाबे पर देखता तब उसे देखता ही रह जाता और सोचता काहे के लिए इतना रुपया लड़कियों पर फूंकता है। लकड़ी भी तो बिना जलाए नहीं जला करती, केवल सुंसुआती हैं, फूंकना पड़ता है। हवा तेज हुई तो वाह वाह, नहीं तो धुआं ही धुआ..। धुआयीं लड़की मशीन की तरह निर्जीव हो जाती है। उतनी बचत ढाबे से मुझे नहीं होती थी, जितनी की लड़कियों वाले रोजगार से। कभी कभी तो मुझे लगता था कि लड़की को मिले रुपयों में से कुछ काट लूं, कमीशन के रूप में पर मेरी आत्मा कांप कांप जाती थी। यह क्या कम है कि लड़िकयां मेरे साथ सोने और होने में खुशी महसूसती थीं..।’
शशि को समझने में देर नहीं लगी कि मरीज अपनी कहानी में उतर गया है, कहानी में आगे जाने पर बहुत देर हो जायेगी, मरीज को रोकना चाहिए। शशि ने मरीज को रोका...
‘भाई साहब! मुझे इस तरह के काम करने व कराने वालियों के नाम पते चाहिए ताकि मैं उनसे मिल सकूं और उनके बारे में जानकारी जुटा सकू.. आप मेरा विश्वाश कीजिए, उनके नाम पता का गलत प्रयोग नहीं होगा। कृपया मुझे उसकी जानकारी दीजिए। इसी काम के लिए हमलोग आपके पास आये हुए हैं’
‘वह जानकारी तो आप को मिल जायेगी पर क्या आप वहां तक पहुंच पायेंगी?’ मरीज ने उपेक्षात्मक सवाल किया
हां हां उसमें क्या परेशानी है, मैं तो कहीं भी आ जा सकती हूॅं’ शशि ने बेबाक बताया। मरीज कम नहीं था.... उसने जोड़ा...
‘आने जाने की बात नहीं है मैडम! बात दूसरी है, और यही दूसरी बात इस रोग का कारण बनती है।’ मरीज ने शशि को बताया।’ ‘दूसरी बात क्या हो सकती है, यह मुझे पता है और मैं उसके लिए तैयार हूॅं, वह तो कहीं भी संभव है, नर, नारी के रिश्तों में यह दूसरी बात तो हर जगह और हर समय मुंह बाये खड़ी है। उसके बारे में काहे की चिन्ता? मुझे सेक्सवर्करों के बारे में जानकारी जुटाना है, वह भी एड्स होने वाले कारणों के अध्ययन के लिए, उनके साथ रहवास नहीं,’ शशि ने दूसरी बात का स्पष्टीकरण दिया।
‘कोई बात नहीं आप बतायें तो, आगे जो होगा देखा जायेगा’
मरीज किसी सधे खिलाड़ी की तरह दूसरी बात की ओर मुड़ा..
‘तो आप जानना ही चाहती हैं, फिर मुझे बताने में क्या परेशानी। उसने जो बताया शशि के लिए असुना था हालांकि कुछ पत्रिकाओं में उसने पढ़ा था कि देह बेचने का धंधा सभ्य कहे जाने वाले बड़े घरों की लड़कियां व महिलायें भी करती हैं पर केवल उसने पढ़ा ही था, किसी से मिली नहीं थी, अब मिलने का मौका भी मिल सकता है।
‘आप उन लड़कियों से तो मिल सकती हैं जो गरीबी के कारण इस तरह का काम करती हैं पर उनसे नहीं मिल सकतीं जो ऐय्याशी के कारण ऐसा करती हैं, और काफी संपन्न हैं.. उनमें से एक दो को जानता हूॅं पर वहां तक मेरी पहुंच नहीं.. कहां कहां देखेंगी आप, जिले का कोई कोना इस काम से अलग नहीं.. शक्तिनगर से लेकर बनारस तक, ढाबों के आसपास के गावों में इस तरह का काम करने वाली लड़कियां या औरतें हर ओर बिखरी हुई हैं..एक जगह नहीं, अलग अलग ठिकानों पर। उनकी जानकारी जुटाने के लिए कम से कम दो चार दिन का समय देना ही होगा आपको।’
‘एक दो लड़कियों के गांवों के नाम तो बतायें, पूरा सोनभद्र मेरा देखा हुआ है, मेरे पास कई कार्यकर्ता हैं जो गांवों के नाम मालूम होने पर सारा कुछ पता कर लेंगे। जानकारी जुटाने की चिन्ता मेरी है, इसे अपने ऊपर न लीजिए, यह आपकी चिन्ता नहीं’ शशि ने मरीज को अपने लक्ष्य की ओर मोड़ा फिर मरीज ने शशि को लड़कियों एवं उनके गांवों के नाम नोट करा दिए।
लड़कियों एवं गांवों के नाम ही तो चाहिए थे शशि को, शशि गांवों का नाम नोट करने के बाद मरीज के गांव से लौट आयी। लौटने के बाद वह आराम महसूस रही थी, अब तो मंत्री जी को बहुत कुछ बताया जा सकता है। रापटगंज आने के बाद यदि वह कर्मचारी को उसके घर पर टेम्पो से नहीं उतारती तो वह उसके कमरे पर आता। वह रास्ते में उतरना नहीं चाहता था, चाहता था कि शशि का कमरा देखे। शशि को तो काम से काम था उसे कर्मचारी से क्या लेना देना था। वह ऐसे दिलफेंकुओं को जाने कब से देख और परख रही है, बात हुई नहीं कि लट्टू हो गये। शशि जानती है कि औरत की देह, अचरज भरी देहलीला का चालू प्रस्ताव होती है। पागल घोडों के दौड़ने के लिए किसी मैदान जैसी। चाहे जहां से दौड़ शुरू कर दो कोई रोकने टोकने वाला नहीं.. बचपन से ही वह ऐसा देख रही है, हर जगह ऐसा ही है, कहीं भी औरत के लिए मर्यादा की जगह नहीं.। वह घिन करती है मर्दों की इस प्रवृŸिा से, पर करे क्या? काम के दौरान उसे मर्दों के साथ होना ही पड़ता है। औरतें सभी जगह पर तो होती नहीं, अधिकांश जगहों पर तो मर्द ही होते हैं.. अब तो वह उन तरीकों को भी जान गई है जिससे मर्दों का कान पकड़ कर सालों घुमाया जा सकता है, रेस के घोड़ों की तरह। पहले रेस तो जीतो फिर इनाम, रेस जीतना आसान तो नहीं..
मन मारकर कर्मचारी अपने आवास पर टेम्पों से उतर गया पर वह उतरना नहीं चाहता था। उतरना भी क्यों चाहता? वह तो शशि में वह सब देख रहा था जो किसी को आकर्षित करने के लिए जरूरी होता है। एक नौजवान और खुली खुली सी लड़की, दिलफेंक और आकर्षक, कर्मचारी को यही सब तो चाहिए था, अनायास ही पास में आया हुआ। उसे अफसोस हुआ कि उसने जल्दीबाजी में मरीज से लड़की को मिलवाने का निर्णय लेकर अच्छा नहीं किया। उसे लड़की से चार छह चक्कर लगवाना चाहिए था, पर वह गलती कर चुका था, उसे अपने घर पर टेम्पो से उतरते समय दुख हुआ, उसने लड़की को अपशब्द कहा...
‘साली छिनार है, केवल मुस्कियाने वाली, मुस्कराकर सारा कुछ छीन लेने वाली, खैर कोई बात नहीं, जब एड्स पर काम कर रही है फिर बच कर कहां जायेगी? किसी न किसी दिन तो उसे मेरी चंगुल में आना ही होगा।’
गद्य कविता
दूसरे दिन मैं शशि के आवास पर था, उसे फोन से पहले ही बता दिया था कि मैं आ रहा हूॅ.. शशि को कहीं काम से निकलना भी नहीं था। सर्वेयरों की रिपोर्ट आ जाने के बाद ही उसका काम शुरू होता, कार्यकर्ताओं की मीटिंग होती, सेमिनार होता, फिर अगली रणनीति बनाई जाती कि क्या, क्या कदम उठाने होंगे जिससे एड्स जैसी समस्या को किसी स्तर तक रोका जा सके और इस भयानक बीमारी के रोकथाम के लिए जागरूकता लाई जा सके। ये सब संस्था की अपनी प्रायोजित गतिविधियां हैं जो लगातार चलती रहती हैं। शशि संस्था की प्रशासनिक और वौद्धिक गतिविधियों के बारे में जरूरत से अधिक नहीं सोचती। सोचने, गुनने से लाभ भी कुछ नहीं, होगा वही जिसे संस्था का मुखिया निश्चित करेगा। वह संस्था में कुछ कमाई और अपने जीवन निर्वाह के लिए ही काम करती है तथा जानती है कि बात को बतंगड़ बना कर संस्था के मुखिया, कार्यकताओं को निकाल दिया करते हैं। जाने कितने बेचारे निकाले भी चुके हैं। पर उसका संस्था प्रमुख इस स्वभाव का नहीं जान पड़ता। अपने में गोता लगाने व मुस्कराने वाला आदमी भी नहीं जान पड़ता है। उसके भीतर छिपा आदमी काफी सक्रिय है और सचेत भी।
मेरे आवाज देने पर शशि ने दरवाजा खोला। मुझे जान पड़ा कि उसके चेहरे पर उसकी स्वाभाविक चमक नहीं है, लगता था कि वह नींद में ही थी संभव है रात में नींद ही नहीं आयी हो, नींद भी तो सहज नहीं होती, जब चाहो उतार लो आंखों में और डूब जाओ या बेसुध होकर दिन में ही सो गई हो। आखिर कितना जागती? कुछ भी संभव था। ‘कल बनारस गये थे का’ उसने अतिरिक्त कोमलता से मुझसे पूछा...
‘हां बनारस गया था किताब का काम था’ मैंने भी उसकी कोमलता की नकल की। ‘काम हो गया’ उसने जानना चाहा
‘नहीं आसान नहीं होता किताब का काम, कई कई चक्कर लगाने पड़ते हैं, कभी प्रूफ देखना होता है, कभी कवर फिर कागज, छपाई और अंत में बाइन्डिंग भी। किताबंे छप जाने के बाद उन्हें नामधारियों को भेजो, समीक्षा वगैरह के लिए प्रार्थनायें करो, किताब का काम अनवरत चलने वाला काम होता है। किसी अ्रप्रत्याशित आशावाद के कारण लेखक अपनी रचनाओं में आजीवन डूबा रहता है। इस कामना के साथ कि शायद उसका कुछ लिखा हुआ जनता की खामोश जुबान पर चढ़ जाये। किसी किसी को सफलता भी मिल जाती है। लेखक के लिए पाने लायक सिर्फ एक ही चीज होती है कि उसका लिखा हुआ जनता की जुबान पर थिरकने लगे। इसे हासिल कर पाना उतना ही असंभव है जितना कि ईश्वर को पाना, उसे देखना। मैंने शशि को बहुत ही भोलेपन से बताया। यह मानते हुए कि उसके दिमाग में
चर्चित या प्रचार प्रसार पाये लेखकों की तस्वीर होगी, हमारे मुल्क में नामधारियों की कमी नहीं पर उसे लेखकों के बारे में कुछ भी पता नहीं था। वह तो कुछ उन लेखकों के बारे में ही जानती थी, जो कोर्स की किताबों में थे। उनके अलावा वह आज के एक भी ऐसे लेखक के बारे में नहीं जानती थी जिनके नाम से हिन्दी साहित्य कांपा करता है। जान पड़ता है कि ये लेखक नहीं रहेंगे तो निश्चित ही हिन्दी साहित्य को डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी भी नहीं मिलेगा, माचिस की तीलियां तो दूर की बात है।
शशि ने मेरी बातें सुन कर अचरज ओढ़ लिया..
‘तो इतनी परेशानी होती है, बहुत ही झंझट का काम है किताब लिखना व छपवाना, फिर इस काम से लाभ क्या है, कुछ फायदा तो होगा नऽ’ उसने पूछा...
यह सवाल मेरे लिए काफी दिक्कत वाला था, इसका उचित उŸार मुझे आज तक नहीं सूझा। उŸार क्या हो सकता है, इस सवाल का? क्या है लाभ, क्या है हानि? यह जो अर्थशास्त्र का कीड़ा है लाभ, हानि, और अतिरिक्त लाभ वाला, सभी के जेहन में क्यों कुलबुलाता रहता है?
मैंने बहुत ही सहजता से शशि का चेहरा देखा, शायद उसके चेहरे पर अर्थशास्त्र की कोई परिभाषा चिपकी हुई हो या आज की आर्थिक मन्दी ही उस पर काबिज हो। अगर ये दोनों बातें वहां नहीं हैं फिर तो वहां बाजार का कोई स्टाल अवश्य ही होगा। मुझे अचरज हुआ शशि के चेहरे से सरकारी अर्थशास्त्र ही नहीं, मन्दी और बाजार भी गायब थे। हो सकता है विलुप्त रहे हों और मुझे दीख न रहे हों.. सच कुछ भी हो सकता है। सच का क्या है, एक तरफ से देखो तो झूठ जैसा, दूसरी तरफ से देखो तो सच जैसा। इस बहुरुपिए को जान लेना आसान नहीं.. इसे तो कोई सŸााप्रमुख ही जान सकता है तथा अपने जाने हुए को प्रमाणित भी कर सकता है।
मैंने शशि को बताया क्योंकि बताना आवश्यक था, हालांकि मेरे बताने में मेरा अदृश्य अहम था, जो सच भी था।
‘देखो शशि! क्या होता है लाभ, और क्या होती है हानि, मुझे नहीं मालूम, मैं सिर्फ इतना जानता हूॅं कि जो मेरे लिए रुचिकर और आनन्द दायक है केवल वही करना है, इसके साथ यह भी चुन व गुन लेता हूॅं कि ऐसा काम नहीं करना जिससे मेरी आजादी का कोई भी कोना किसी बाड़े में कैद हो जाये। मेरे लिए आदमी होना तथा आदमियत सुरक्षित बचाए रखने का काम सबसे अनिवार्य काम रहा है। अगर लाभ, हानि के प्रचलित अर्थों को जानना चाहती हो तो उसका एक ही उŸार है कि एक भी छदाम का लाभ नहीं होता। खेती किसानी की कमाई भी इसमें स्वाहा हो जाती है।’
शशि मेरा उŸार सुन कर कहीं खो गई, वह अचरज पीने लगी कि क्या कोई ऐसा भी हो सकता है, जो लाभ हानि को ठेंगा दिखा दे, या यह बकवास है,
सन्यासी बनने का सरल उपाय, वह कुछ भी सोच सकती है। वह क्या सोच
रही थी, इसे वही बता सकती है पर मेरे देखने में था कि वह अचरज में थी।
मेरा उŸार सुन कर उसने कहा..।
‘फिर इस काम से क्या लाभ जो खानखर्च भी न जुटा सके, ऊपर से दिन रात की मेहनत। मैं समझती हूॅं यह काम खुद को कूंए में डुबोने वाला है, इससे तो अच्छा होता कहीं पढ़ाने, लिखाने का ही काम कर लेते, कम से कम खानखर्च तो चल जाता। लगता है लिखना आपका शौक है। वैसे भी आपको कोई आर्थिक परेशानी नहीं, घर से आप ठीक हैं पर यह सब हमलोग कहां लेकर बैठ गये?’
किसी के घर जाओ तो वहां औपचारिकताएं पहले ही पहुंच जाती हैं, यह करना है, वह करना है, चाय पिलानी है, मिठाई खिलानी है। तमाम तरह की बातें, ऐसा करने में काफी समय खिंच गया फिर हमलोग विषय पर आये जिसके लिए शशि मेरे घर आयी थी।
मुझसे बात करने का विषय केवल शशि के लिए ही नहीं किसी के लिए भी आवश्यक होता, चाहे जिसके साथ इस तरह के विषय चिपक जायें या चिपका दिए जायें।
मुझे शशि के आवास पर काफी समय तक रुकना पड़ गया, रुकना तो था ही इस लिए नहीं कि मैं शशि में छिपी हुई कहानी तलाश रहा था। कहानी तो हर किसी में होती है, कहानी ही नहीं कविता भी। कभी कभी तो किसी को गीत की तरह गाया बजाया जा सकता हैं कुछ ऐसी प्रतिभा के भी होते हैं.. बहरहाल मैं ऐसे किसी को नहीं जानता जिसे गीत की मधुरता और लय की मादकता के साथ गाया जा सके, हां ऐसे ढेर सारे लोग मेरी जानकारी में हैं जिन्हें मैं धूमिल की गद्य कविता की तरह पढ़ सकता हूॅं, गुन सकता हूॅं और जादुई तरीके से उनके कथाचरित्र को बुन सकता हूॅ। शशि ठीक ठाक दिख रही थी पर उसके चेहरे से जंगल की यात्रा वाली चमक गायब थी। कहां उस दिन की शशि और कहां आज की शशि। मुझे जान पड़ा कि वह परेशान है। फिर मैंने उससे पूछा..
‘कुछ परेशान सी दिख रही हो, क्या बात है, कोई दिक्क्त है क्या?’
मेरा मानना है कि परेशान आदमी के लिए प्यार भरे दो आखर दवाई का काम करते हैं, पर मैं तभी कुछ बोल पाता जब वह कुछ बताती। वह तो खामोश थी, हालांकि शशि एक सुलझी हुई महिला है वह अपनी उलझनों को स्वतः हल कर सकती है। उलझनों में तो वे ही उलझते हैं जिन्हें जीवन जीने की कला ही नहीं आती। वे जो दूसरों की संवेदनाओं, धारणाओं, अनुभूतियों का सम्मान करना जानते हैं, अगर वे उलझें तो यह अचरज है।
शशि खामोश थी, फिर घीरे से बोली... कोई बात नहीं है
बात तो थी ही, वह शायद बताना न चाह रही हो.. यही हो सकता है।
मैंने दुबारा शशि से साफ,साफ पूछा.. ‘बताओ नऽ क्या बात है? तुम अपनी
बातें मुझसे साझा कर सकती हो, संभव है मैं कुछ कर सकूं तुम्हारे लिए। फिर शशि ने मुझसे कुछ छिपाया नहीं, हालांकि वह छिपा सकती थी तथा दूसरे किस्म के कारणों को गिना सकती थी। औरतों के साथ वैसे भी तमाम कारण आगे पीछे दौड़ते रहते हैं, मारपीट, यातना, उत्पीड़न ये सब तो चर्चित कारण हैं ही पर इससे भी अलग कारण हो सकते हैं, मुझे नहीं मालूम था। शशि का बताया हुआ मुझे उद्वेलित कर गया। क्या पढ़ा लिखा संभ्रान्त पति, इतना गिर सकता है? अपनी पत्नी को ही दूसरे के सामने परोस सकता है। कथित स्वर्ग बनाने की लालसा में देह को खिलौना बना सकता है, पत्नी की देह पर पति का कैसा हक?
देह को मशीन में., बदल देना, यह वृŸिा है या प्रवृŸिा है? इतना घिनौना काम। कोई भले अपने तन के ताप को प्रतापी बनाये चाहे जो करे पर पत्नी के तन को.. यह क्या है? मेरी समझ से बाहर था। शशि की बातें सुन कर मैं खुद बौना हो गया। तो यह है पुरुष का पति वाला रूप, जाने शशि मेरे बारे में क्या सोच रही हो, मैं भी तो पुरुष ही हूॅ। वह कुछ भी सोच सकती है, वैसे भी पुरुषों ने औरतों को दिया ही क्या है और वे दे भी क्या सकते हैं.. क्या होता ही है पुरुषों के पास देने लायक, सिवाय लेने के। हमारी सभ्यता के पास इस तरह के सवालों के उŸार नहीं, वर्ण, जाति, गोत्र जैसे दूसरे सवालों की तरह, औरत भी अनुŸारित सवाल ही तो है।
विवाह की कथित पवित्रता के बारे में मैं शशि को क्या समझाता? कैसे समझाता कि परिवार, परिवार होता है, और पति तो पति होता ही है, पति से अलग औरत अधूरी होती है तथा कई तरह के जायज नाजायज सवालों के घेरे में भी। उसके सामने हर तरफ विषैले सवाल फन फैलाए रहते हैं.. तुम्हें शान्त मन से मनन करना चाहिए, और चिŸा को व्यवहारिक चिन्तन के द्वारा चेतन बनाना चाहिए। एक मात्र तुम ही वह माध्यम हो जो अपने पति को पतित होने से बचा सकती हो, पति को बचा लेना, उसे तन के विपथगामी तनावों से बाहर निकाल लेना, खुद को भी बचाना है। फिर यह जो बेचैन मन है उसे चमन बनने में तनिक भी देर नहीं लगेगी? मन में तो प्राकृतिक रूप से मनचाहा चमन उगा ही रहता है, खिला हुआ।
यह सब सुभाषित शशि को मैं कैसे समझाता, मेरी तो बोल ही छिन गई थी, मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि शशि से क्या बोलूं, उसे कैसे समझाऊं। उस समय शशि कहीं खोई हुई थी, उसे खोना ही था। वह जो हो चुका है, और जो होना है, उसे खंगालने में थी। मेरी खामोशी पढ़ कर वह खुद बोलने लगी..
‘अब आपसे क्या छिपाना, मैंने पति को समझाने का प्रयास किया पर वह तो देह की मादकता का कीड़ा निकला, वह देह की मादकता से बाहर नहीं निकल सकता। यह सच है किसी को भी पतित होने से नहीं बचाया जा सकता अगर वह खुद न बचना चाहे। बचाया उसे जाता है, जो बचा हुआ
हो, खत्म न हुआ हो या कम से कम बच जाने का आकांक्षी हो। उसमें ऐसी इच्छाशक्ति ही नहीं, वह जो कुछ भी कर रहा है, चिŸा को चेतन और जागृत करके ही, वह मन की उच्छश्रृंखलताओं को मन की प्रफुल्लतांए समझता है। और उसी में गोता लगाता रहता है। उसके लिए तो केवल तन है और तन की उन्मुक्त तान है। सभी जानते हैं कि निरंकुश मन, मन नहीं होता। ऐसे आदमी को क्या बचाना, उससे खुद को बचा लेना ही बड़ी बात होगी। मैं यही चाहती हूॅं कि खुद को बचा लंू। मैं जानती हूॅं, मन को मना लेना ठीक, पर तन को मनाना बहुत ही कठिन, मेरे पास भी तन है, इसे तनेन होने में आखिर कितनी देर लगेगी? वह भी आज के माहौल में, जहां हर ओर मन से अलग तन की तिजारत हो रही हो। मैं तन को जतन से सहेज कर और मन को मना कर जीवन जीने में विश्वास करती हूॅ.’
शशि की तर्क पूर्ण बातें किसी गंभीर गद्य कविता की तरह मुझसे सवाल पूछने लगीं क्या शशि को पुनसर््थापित कराया जा सकता है? फिलहाल तो एक ही उŸार था कि नहीं, शशि अपने फैसले से डिगने वाली नहीं। पति के बारे में जान जाने के बाद शशि ने ससुराल छोड़ दिया, मायके चली आयी। पति के बारे में मायके वालों को बताया...
मायके वाले तो चेतनाशून्य हो गये.. हो क्या रहा है आज के समय में, क्या आदमी इतना गिर सकता है...
शशि की मॉ ने उसे समझाया कि तलाक ले लो और दूसरी शादी... शशि जानती है कि उसकी मॉ पूजा,पाठ वाली हैं, उन्हें पता है कि एक लड़की अपना जीवन अकेली नहीं गुजार सकती। मॉ के लिए शादी का मतलब जनम, जनम का बंधन है, मॉ ही नहीं उसके पिता भी यही मानते हैं पर बंधन दोनों तरफ से है केवल पत्नी की तरफ से ही नहीं. सो मॉ ने साफ साफ बोल दिया कि तलाक ले लो, यही अच्छा होगा..
जाने क्या है कि तलाक का नाम सुनते ही शशि कांप, कांप गयी. मॉ के कहने पर भी उसने न तो हॉ कहा और न ही ना. शशि के मन में कहीं न कहीं विवाह वाला बंधन नैतिकरूप से असरदार बना हुआ था, हालांकि शशि पढ़ी लिखी थी फिर भी...
शशि मॉ को कैसे बताती कि वह दूसरी शादी नहीं कर सकती, फिर शादी की जरूरत भी क्या है? वह देह को तपा लेगी, मन को मना लेगी पर खुद को मिटा नहीं सकती। एक शादी में तो ऐसा हुआ, दूसरी में जाने क्या हो, कहीं दूसरा इससे भी आगे निकल गया तो... वह भी तो उसे कामाध्यात्म के प्रयागों का उपकरण बना सकता है. वह भी अंधकार तथा प्रकाश के खेल का खिलाड़ी नहीं होगा कौन बता सकता है?...
अगर ऐसा हुआ फिर वह क्या करेगी, कैसे छोड़ेगी उसे, लोग क्या कहेंगे?पहले वाला तो गन्दा था तो क्या दूसरा भी गन्दा था। नहीं शाशि ही ऐसी, तो वैसी। शशि सोच नहीं सकती कि ऐसी, वैसी बन कर उसे समाज
में रहना है, वह जैसी है वैसी ही बन कर रहना चाहती है। अपनी अस्मिता बचाने के लिए उसे चाहे जितना संघर्ष करना पड़े, वह करेगी। वह जानती है अपने बारे में कि वह उत्पादन वस्तु तथा उपभोक्ता वस्तु नहीं है, उसे कोई भी वस्तु की तरह कहीं परोस नहीं सकता। जीवन भर उसे मर्दों के कमीनेपन से लड़ते रहना होगा, नहीं लड़ना होता तो वह पतिव्रता का पोस्टर अपनी देह पर चिपका कर पति के पैरों पर गिर जाती पर नहीं उसने तो पति को ललकार दिया था।
‘समझ लो कि मैं खिलौना नहीं हूॅू। चाहे जब और जैसे खेलो और दूसरे को खेलने दो। उसने पति को जोरदार ढंग से बेड के किनारे धकेल दिया और चीखते हुए दुबारा कहा...
‘अच्छा होगा कि रुक जाओ और खुद को नियंत्रित कर लो, तुम सिर्फ और सिर्फ एक यंत्रमानव हो और तुम्हें उसी तरह रहना भी चाहिए। तुम्हें आज से यह बात गांठ बांध लेनी होगी कि शशि यंत्रमानव नहीं है, वह सोचती है और सोच सकती है कि उसे क्या करना चाहिए।’
‘मैं अच्छी तरह से समझती हूॅं कि तुम्हारे लिए रिश्ते की पवित्रता का कोई अर्थ नहीं..यदि तुम सोचो कि मैं तुम्हारे घर में हूॅं, मजबूर हूॅू इसलिए तुम मेरे मन एवं तन के साथ मनमानी कर सकते हो तथा किसी से करवा सकते हो, तो ऐसा कभी नहीं सोचना। मैं अपनी सुरक्षा करना जानती हूॅ. आखिरी बार मैं तुमसे कह रही हूॅं कि मेरे कमरे से अभी और इसी समय निकल जाओ बिना देर किए, मैं तुम्हें अपने कमरे से बाहर देखना चाहती हूॅं..
पति तो पति होता है स्वअर्जित अधिकारों का अधिकारी, वह कहां मानने वाला था? ताकत के आदिम फैसले वाली क्षमता के साथ वह उठा और शशि को जकड़ लिया पर शशि सावधान थी। उसने अपना बचाव करते हुए उसे दो तीन स्थानों पर काट लिया। काटते ही वह उसकी जकड़ से बाहर निकल गई। वह चीखने लगा। घर में हड़कंप मच गया, ऐसा हड़कंप जो मुहल्ले वालों की नींद उखाड़ दे। उसी रात शशि ने ससुराल छोड़ दिया, मायके आ गयी।
मुखिया
तर्क के खेल से बाहर निकल कर हमें वास्तविक जीवन के खेल में शामिल होना था और हमारा जीवन कहां से शुरू हुआ है, कहां तक जाकर समाप्त होगा, न शशि को कुछ मालूम, न ही मुझे, हां आभासों के सहारे जैसे सभी वैसे हम भी, समय के अनुमानों एवं संभावनाओं के साथ चल रहे हैं। शशि मेरे घर काम से आयी थी। वह रापटगंज मुख्यालय पर एक सेमिनार कराना चाह रही थी, उसकी अध्यक्षता के लिए उसने जिलाधिकारी जी का नाम चुना था। यह पूरा काम जोगाड़ का था, शशि रापटगंज के लिए नई थी। हालांकि उसके पास कार्यकर्ता थे, जो मीटिंग करा सकते थे। पर डी.एम. साहब को अध्यक्षता के लिए बुला पाना उनके वश का नहीं था। डी.एम. केवल और केवल डी.एम. होता है इसके अलावा जो होता है, वह तो उसे भी नहीं पता। डी.एम. को किसी एन.जी.ओ के सेमिनार में बुलाना आसान नहीं.. कुछ अधिकारी एन.जी.ओ को सरकार विरोधी तो कुछ कमाने खाने वाली संस्था के रूप में समझते हैं सो उसके किसी कार्यक्रम में जाना नहीं चाहते। शशि भी जानती थी कि डी.एम. से व्यक्तिगत जान पहचान के द्वारा ही मीटिंग की अध्यक्षता के लिए उनकी सहमति ली जा सकती है सो वह मेरे पास आयी थी, शायद मैं डी.एम. की सहमति हासिल कर लंू।
उसने बताया भी कि एड्स जागरूकता के लिए जो मीटिंग प्रस्तावित है जिसे डी.एम. साहब के अनुसार आगे, पीछे भी किया जा सकता है, इसी बीच उनसे बात चीत कर लेना चाहिए।
मेरी व्यक्तिगत जान पहचान डी.एम. से नहीं थी, केवल एक दो बार सामान्य प्रार्थी की तरह मुलाकात है। एक दो बार की मुलाकात, वह भी जिले के आला अधिकारी से बतौर प्रार्थी, जिस मुलाकात का कोई अर्थ नहीं हुआ करता। मेरे जैसे सैकड़ों लोग हैं, जो ऐसे अधिकारियों से अपनी अपनी फरियाद लेकर मिलते रहते हैं.. लोगों को पहचानना और पहचान को याद रखना अधिकारियों के लिए कŸाई संभव नहीं.. मैं इतना जानता था कि हमारे डी.एम. साहब बहुत सरल हैं, मिलनसार हैं.. सोनभद्र में आते ही उन्होंने मिलने वाली पर्ची गायब कर दिया। कोई भी उनसे बिना पर्ची के मिल सकता है नहीं तो पहले पता लिखा पर्ची देना पड़ता था। डी.एम. के दफ्तर का कर्मचारी सारी पर्चियां उनके मेज पर रख दिया करता था फिर वे बारी बारी से लोगों से मिला करते थे। मौजूदा डी.एम. साहब द्वारा पर्ची की अंग्रेजी परंपरा को समाप्त करवाने की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। मैं भी उनके प्रशंसकों में हूॅ। पर एक बात मैं नहीं समझ पाता कि क्या डी.एम., अधिकारी वाले मनोरोग से परिवर्तित होकर जनता का आदमी बन सकता है? जनता का आदमी बनाने के लिए हमारी सरकारें इच्छाशक्ति रखती हैं क्या? मुझे तो जान पड़ता है कि अगर डी.एम. जनता का आदमी बनना
चाहे और बन जाये तो उसे सरकारें, पद पर बने रहने नहीं देंगी। इसी लिए इस तरह के अधिकारी जनता से मधुर रिश्ता नहीं बनाना चाहते। दूरी बना कर चलते हैं.. कुछ बड़े अधिकारियों ने तो सरकार की इस यांत्रिकता से खिन्न और परेशान हो कर पद से त्याग पत्र भी दे दिया है और आज वे जनता के बीच में जनता की तरह रहते हुए काम कर रहे हैं.. उनके दुखों, सुखों एवं उनकी जनतांत्रिक लड़ाई के साथ।
‘डी.एम. साहब को बुलाया जा सकता है, वे आ भी सकते हैं, नहीं भी आ सकते, फिर बात कर लेने में का हर्ज है? उ.प्र. की नई सरकार के आदेश के मुताबिक जिले के आला अधिकारी अब दिन में बारह बजे तक अपने अपने कार्यालयों में नियमित रूप से बैठने लगे हैं.. डी.एम. साहब से आज ही मिल लेना ठीक होगा। अगर वे मीटिंग में आना स्वीकार कर लेते हैं तब किसी दूसरे से काहे के लिए बात करना नहीं तो किसी दूसरे अधिकारी को राजी करना होगा।
करीब बारह बजे तक मैं शशि के साथ डी.एम. कार्यालय पर था। संयोग ठीक था कि डी.एम. साहब कार्यालय में थे और मनरेगा के कार्यों की समीक्षा कर रहे थे। मनरेगा के कार्यों के बारे में हाल के दिनों में अखबारों में तमाम शिकायतें प्रकाशित हुईं थीं.. शिकायतों की चर्चा जनता में भी थी, केवल आन्दोलन और धरना प्रदर्शन उस बाबत नहीं हो रहे थे। यह प्रशासन के लिए अच्छी बात थी। जिले में एक खबर यह भी थी कि कोई जांच टीम दिल्ली से भी आयी थी और उसने कई अनियमितताओं को पकड़ा है। जांच टीम ने करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपयों के घोटाले को उजागर किया है तथा बताया है कि पचासों चेक डेम कागज पर बनाए गये हैं, तत्संबधी भुगतान भी असंवैधानिक तरीके से कर दिये गये हैं।
मैं शशि के साथ डी.एम. साहब के स्टेनो के कक्ष में बैठा हुआ था, कलक्टरी में वह एक ऐसा स्थान है जहां बैठने से महसूस होता है कि देह में रूतबे का खून दौड़ रहा है। डी.एम. साहब के स्टेनो एक खुशमिजाज आदमी हैं.. हालांकि गंभीर भी बहुत हैं, खुशमिजाजी और गंभीरता दोनांे का संयोजन एक ही आदमी में कम देखने को मिलता है। फिर भी वे हैं.. यह प्रकृतिक उपहार मिला हुआ है, स्टेनो साहब को। स्टेनो साहब ने हमें आश्वस्त किया कि मनरेगा की मीटिंग के बाद वे हम दोनों को डी.एम. साहब से मिलवा देंगे। सो हम प्रतीक्षा कर रहे थे कि जल्दी से मीटिंग समाप्त हो और हम डी.एम. साहब से मिल लें..
करीब एक बजे के आस पास खबर मिली कि मीटिंग समाप्त हो गई है फिर स्टेनो साहब ने हम लोगों को डी.एम. साहब से मिलने के लिए कहा..
थोड़ी ही देर में हम लोग डी.एम. साहब के भव्य कार्यालय में थे, जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ था। जनपद बन जाने के बाद सोनभद्र की कलक्टरी नई बनी है, जो देखने में अद्भुत है, महसूस होता है कि रुपयों
की चमक अगर दिवारों पर चिपक जाये तो दिवारें भी बोलने लगती हैं.. वहां का माहौल गुदगुदाने लगता है। कुछ देर के लिए ही सही, भूख का पता नहीं चलता। कितनाहूॅ भूख हो, वह गुदगुदी और हसी के बीच झूल जाती है। फिर तो वहां पहुंचने वाला होते हुए भी नहीं होता है। मानव सभ्यता को नियंत्रित करने वाले जालों में उलझा हुआ पाता है किसी मछली माफिक छटपटाता हुआ, कर भी क्या सकता है?
नये डी.एम. साहब के बारे में जोरदार चर्चा हैं कि वे लोकप्रियता के हर रेशे को गूंथ कर रखना चाहते हैं.. फिलहाल कहीं से पता नहीं चल रहा है कि डी.एम. साहब जनहित में जो कर सकते हैं, नहीं कर रहे हैं.. यह तो उन्हें ही पता होगा कि सरकारें उनसे क्या क्या करवा सकती हैं तथा उनकी प्राकृतिक प्रतिभा को कितना जनहितकारी बना रही हैं.. बहरहाल मैं शशि के साथ डी.एम. साहब के विशाल कक्ष में था। वहां दस से ऊपर लोग बैठे हुए थे। साफ दिख रहा था कि प्रार्थनाओं के कोमल व बारीक अक्षर किसी पवित्र नदी में से नहा कर निकले हुए उनके चेहरों पर चिपके हुए हैं.. वही अक्षर हम दोनों के चेहरों पर भी थे। डी.एम. साहब बारी बारी से मिल रहे थे। एक आदमी उनके सामने जाता और अपनी गरज कहता। वे उसके प्रार्थना पत्र पर कुछ लिखते फिर वह उन्हें सलाम बजाते हुए कक्ष से बाहर निकल जाता।
डी.एम. साहब को उस समय देखना किसी कविता के जन्मोत्सव का आनन्द लेने जैसा था। एक ऐसी कविता जो अचानक दिमाग में लिख जाये धूमिल की कविताओं की तरह नहीं, जटिल और खाल उधेड़ने वाली, न ही मुक्तिबोध की तरह बिम्बों में नहाई हुई। डी.एम.साहब के चेहरे पर उस समय न तो समय की जटिलतायें नाच रही थीं, न ही राजनीति का वहां कोई व्याकरण था। कक्ष पूरी तरह खामोश था, वहां बैठे हुए लोग अपने अपने कामों के होने न होने में डूबे हुए थे, जाने क्या हो। काम हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता। किसी भी काम पर कानून सदैव चढ़ा रहता है और कानून अपने आप में जितना स्पष्ट होता है, उससे अधिक अस्पष्ट भी।
हमलोगों का डी.एम. साहब से मिलने का नंबर आधे घंटे बाद आया फिर हम डी.एम. साहब से मिल पाये। बहुत ही गंभीरता से उन्होंने हमारी बातें सुनीं..
‘तो आप लोग एड्स के रोक थाम के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाते हैं, आप लोगों की संस्था इसके अलावा क्या क्या काम करती है? सोनभद्र में आपलोगों का काम कब से चल रहा है? आपलोगों की संस्था का सेमिनार है उसमें मेरी आवश्यकता क्या है? वैसे भी किसी संस्था के सेमिनार में मेरा जाना ठीक नहीं, आज कल की संस्थाएं सामाजिक कम, राजनीतिक भूमिकाओं पर अधिक जोर देने लगी हैं.. जहां देखो प्रदर्शन, घेराव कभी किसी सवाल पर तो कभी किसी सवाल पर। आप जानते हैं कि राजनीतिक समाज हो या धार्मिक, सवाल कभी नहीं मरते। ये सवाल ही हैं जो मानव सभ्यता को गतिशील बनाए रखते हैं.. मैं समझता हूॅं कि जिलाधिकारी को स्वयंसेवी संस्थाओं के आयोजनों से बारीक दूरी बना कर चलना चाहिए।’
बहुत ही मिठास के साथ डी.एम. साहब ने हमें नकार दिया और समझा दिया कि डी.एम. डी.एम. होता है, उसे क्या करना है, क्या नहीं करना है सबके बाबत उसके पास सधे हुए तर्क होते हैं.. वही तर्क जो संवाद को असरदार बनाते हैं, जिससे भाषा की असीमता का आभास होता है। वैसे डी.एम. भी तो असीम और अथाह होता है। पता नहीं क्या है कि जब भी मैं प्रतिभा परीक्षा के महानायकांे से मिलता हूॅं, मुझे लगता है कि मैं दफनाई जा चुकी कोई चीज हूॅ, एक ऐसी चीज जो बेवजह अपने समय में मौजूद है, किसी अवरोध की तरह जो न समय के लिए उपयोगी है और न ही अपने लिए। आखिर हर उस आदमी को जीने का क्या हक है जो अपनी उपयोगिता प्रमाणित नहीं कर सकता। वह यह भी साबित नहीं कर सकता कि वह पशुओं से कैसे अलग है? अगर पशु नहीं है फिर वह क्या है? मुझे अच्छा नहीं लगा मैंने कहा..
‘हां सर! यह सच है कि आप की अनुपस्थिति में भी सेमिनार हो सकता है तथा वह होगा भी। पर वह सेमिनार बिना मुखिया के कैसा होगा, आप हमारे मुखिया हैं, इस लिए हम आपको आमंत्रित कर रहे हैं न कि जिलाधिकारी के नाते, हमारा सुख व दुख दोनों आप का है, भला बतायें आप सेमिनार में नहीं होंगे फिर वह सेमिनार कैसा होगा? एड्स की समस्या तो समाज के साथ साथ सरकार की भी है।
डी.एम. साहब मेरी बात सुनकर अचानक गंभीर हो गये, थोड़ा ठमक कर उन्हांेने मेरा परिचय पूछा..
‘कहां के रहने वाले हैं आप! आपकी संस्था कितनी पुरानी है?’
‘जी मैं एक लेखक हूॅं और सोनभद्र का ही रहने वाला हूॅ। मैं इस संस्था से नहीं हूॅ। संस्था के सचिव मेरे मित्र हैं, मेरे लेखन से वे प्रभावित हैं.. उन्होंने शशि जी को निर्देशित किया हुआ है कि वे मुझे भी संस्था द्वारा चलाए जा रहे जनकार्यों से जोडं़े.. शशि जी दूसरे जनपद की निवासी हैं और इस संस्था में काम करती हैं.. यहां जब कार्य आरंभ हुआ तो शशि जी ने मुझे भी संस्था के कार्यों से जोड़ लिया, बस इतना ही।’
किसी डी.एम. से इससे अधिक अपने बारे में क्या बताया जा सकता है। इतना बता कर मैं डी.एम. साहब का चेहरा देखने लगा, उनके चेहरे पर मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया। यह मेरी कमजोरी भी हो सकती है कि जो मुझे देख लेना चाहिए उसे नहीं देख पाता या यह भी संभव है कि डी.एम. साहब ने किसी वौद्धिक कला से उस देखने को रोक लिया हो जिससे देखना अदेखा रह जाये। बहरहाल मुझे डी.एम. साहब के चेहरे पर शून्य का फैला हुआ संसार ही दिखा, अचानक डी.एम. साहब ने मुझसे जानना चाहा..
‘आप क्या लिखते हैं? कविता, कहानी, उपन्यास, आलेख? यहां के दो तीन लोगों को मैं जानता हूॅं जो कविता से जुड़े हुए हैं, उनमें से एक जन से मैंने जानना चाहा था मुक्तिबोध जी के बारे में.’ इतना बोल कर वे रूक गये। आगे कुछ कहना चाहते थे जिसे उन्होंने सायास रोक लिया। सारा कुछ वे बोल तो नहीं देंगे, सामान्य लोगों की तरह, पर मैं तो सामान्य ही था। सामान्यों को क्या पड़ी कि वे बात बात में आचार संहिता पलटें फिर बोलेें, वे जो बोलना होगा बोल देंगे पर डी.एम. साहब तो नहीं बोलेंगे। वे प्रतिभा परीक्षा उŸाीर्ण कर के असामान्य हो चुके हैं, आखिर भेद होना चाहिए कि नहीं सामान्य और असामान्य में, मैंने तुरंत उनसे पूछा..
‘हां सर उस कवि महाशय ने क्या बताया था मुक्तिबोध जी के बारे में या कविता के बारे में, सवाल कई हो सकते थे, कविता की समकालीनता पर या कुछ भी’
‘उसे क्या बताना लेकिन एक बात बता दूं कि वे केवल इतना जानते थे कि तुकबन्दियां कवितायें होती हैं.. कुछ कवितायें भी उन्हांेने सुनाया था जिनके आधार पर यही कहा जा सकता है। आगे उनसे क्या पूछना था। वे तो नागार्जुन, शमशेर, आदि तक का नाम भी नहीं जानते थे। वैसे मुझे इसका अनुमान था कि कविता के लोग पढ़ते नहीं, केवल अपना लिखा ही पढ़ते और सुनाते हैं.. एक बार मैं यहां की एक कविगोष्ठी में जा चुका हूॅं, वहां कई लोगों की कवितायें सुनने का अवसर मिला। मन ही मन मुझे हसी आ रही थी, जो मैं सुन रहा हूॅं अगर यही कवितायें हैं तो लतीफा किस चीज का नाम है? फिर तो हिन्दी का भला हो चुका, ऐसे ही हिन्दी विकसित होगी’
डी.एम. साहब की बातें मुझे झकझोर रही थीं, झकझोरने वाली थीं भी। एक आदमी के आधार पर सोनभद्र का साहित्यिक मूल्यांकन कर रहे हैं.. यह तो हड़िया का चावल देखने का आदिम तरीका हुआ। पका कि नहीं, पर वे मूल्यांकन करते भी तो कैसे, यहां कोई ऐसा नाम नहीं जो हिन्दी का पोस्टर हो, हर दिवार पर चिपका हुआ। ऐसा भी नहीं कि यहां का अज्ञात हिन्दी सेवी उनके दरबार में हाजिरी लगाता हो। उनके दरबार में तो वही जाते हांेगे जो प्रचार की उफनती नदी में गोता लगाने वाले होंगे या राजनीति तथा प्रशासनिक हस्तक्षेपों का भजन गाने वाले होंगे।
‘हां सर आप ठीक बोल रहे हैं पर बुरा न माने तो एक बात बोलूं, प्रशासन से जुड़े लोगों के लिए जो प्रिय हैं वैसी कविताओं का मेरे सोनभद्र में अकाल नहीं, हर ओर बिखरी पड़ी हैं.. कहीं भी देख व पढ़ लीजिए पर मुक्तिबोध और नागार्जुन यहां नहीं मिलेंगे? आप भी महसूस कर सकते हैं कि मुक्तिबोध जैसी कविताएं तो वही व्यक्ति रच सकता है जो मुक्त हो पर उन्मुक्त नहीं.. सोनभद्र आज भी गुलामी वाले सांस्कृतिक मौसम में सांसें ले रहा है। यह सच है कि अब यहां राजे, महराजे और जमीनदार नहीं हैं, पर कलक्टर और आला अफसर तो हैं ही। यहां का मौसम पहले वाला ही है, और आप जानते ही हैं कि जैसा मौसम होगा, वैसी ही कवितायें भी तो उगेंगी’। यह कृपा ही कही जायेगी कि डी.एम. साहब ने मेरी बातें सुन लीं, टोका टोकी नहीं की, नहीं तो वे रोक सकते थे, न बात करते न करने देते। उन्होने बहुत ही शालीनता से फिर कहा...
‘मिलवाइए ऐसे लोगों से जो मुक्तिबोध की परंपरा के हों, आप भी अपनी रचनायें दीजिए’
मेरे पास उस समय हाल का प्रकाशित एक कहानी संग्रह था, उसे मैंने उन्हें दिया इस निवेदन के साथ कि मैं इसे लेखकीय प्रतियों में से दे रहा हूॅं, इस लिए चाहूॅंगा कि इस पर आप की प्रतिक्रिया भी मुझे हासिल हो। आप जानते ही हैं कि प्रकाशक बतौर एहसान लेखकों को सिर्फ छह प्रतियां ही देता है।
डी.एम.साहब ने संग्रह को उलटना शुरू किया, प्रारंभ से अन्त तक उन्होंने उसे पलटा फिर हमारे काम पर चले आये। कब है मीटिंग? सारा कुछ जान कर उन्हांेने स्वीकृति दे दी कि वे समय पर आ जायेंगें साथ ही साथ स्टेनो को निर्देशित किया कि वह उस दिन उन्हें मीटिंग के बारे में याद दिलायें।
शशि और मेरे लिए डी.एम. साहब की स्वीकृति किसी उपलब्धि से कम नहीं थी, कलक्टरी से हम दोनों खुशियां पीते हुए लौटे।
रपट
डी.एम. साहब सेमिनार में अपनी भागीदारी के लिए स्वीकृति दे देंगे इसका अनुमान हम दोनों को नहीं था। किसी संस्था के कार्यकर्ता ने बताया था कि डी.एम.साहब संस्थाओं के कार्यक्रमों में भागीदारी नहीं करते। उसने एक बार प्रयास किया था पर उन्होंने इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि संस्थाएं समाज के विकास के लिए नारे तभी लगाती हैं जब तक फन्ड का जोर रहता है, फन्ड खत्म, नारे भी खत्म। समाज के सर्वंगीण विकास के लिए संस्थाएं उगती हैं, विकास का वही पवित्र लक्ष्य आगे चलकर धन कमाने का उपलक्ष्य बन जाता है। आज कल संस्थाएं अपने लक्ष्यित रास्तों से भटक गई हैं.. शशि खुश,खुश थी कि वह मंत्री जी को अच्छी खबर सुना सकेगी, मंत्री जी ने डी.एम. साहब की भागीदारी के लिए खासतौर से उसे निर्देशित किया था। कहने लगी..
‘मेरे लिए बहुत ही अच्छा हुआ कि डी.एम.साहब की स्वीकृति मिल गई। आप नहीं होते तो असंभव ही था। अधिकारी जिस आत्मीयता से बातें सुनते हैं उतनी ही कठोरता से बातों को अनसुना भी कर दिया करते हैं। उनके लिए बात जेठ की रात होती है, आयी और गुजर गई, बस इतना ही। अब सोचिए अगर आप नहीं होते तब क्या उनका कार्यक्रम मिलता? कŸाई नहीं.. इसी लिए मैं बार बार आपसे अनुरोध कर रही थी। मुझे पता है कि मैं क्या हूॅॅ और किस पर तथा किस तरह का प्रभाव छोड़ सकती हूॅ। यही तो फर्क है भाव और प्रभाव का। आप तो साफ,साफ इनकार कर दिए थे कि डी.एम. साहब के पास क्या जाना, मेरी जान पहचान नहीं.. आजकल अधिकारी किसी को घास नहीं डालते। वे पहचानते ही नहीं, सारा कुछ दबाव से चल रहा है। देखा आपने डी.एम. साहब ने कितनी आत्मीयता से आप से बातें की, बहुत ही अच्छे हैं, लगता ही नहीं कि वे जिले के आला अधिकारी हैं..’
‘हां तुम ठीक बोल रही हो पर वे इतने सरल और तरल नहीं हैं जितना तुम सोच रही हो। उनकी सरलता में विरलता का घोल है, सामान्य भी और असामान्य भी। अच्छा हुआ तुम्हारे लिए कि उन्होंने कार्यक्रम में भागीदारी के लिए स्वीकृति दे दिया।’
कलक्टरी से हम दोनों तकरीबन तीन घंटे बाद वापस लौटे। शशि की जिद पर मुझे उसके आवास तक जाना पड़ा। उसके आवास पर उसकी संस्था के सर्वेयर आये हुए थे। शशि ने उन्हें विशेष रूप से बुलाया हुआ था। सेमिनार की तैयारी के बारे में बातें करनी थी.. सर्वेयर बाहर वाले बरामदे में बैठे हुए थे। वह कामन जगह थी, उसका उपयोग उस मकान में रहने वाले सभी लोग करते थे। मुझे भीतर वाले कमरे में बिठा कर शशि चाय बनाने चली गई। मना करने के बाद भी नहीं मानी कहने लगी...‘आज के समय में दो ही चीजें जरूरी हैं, चाय और राय, अभी दोनों को बाजार ने डंसा नहीं है। डंसा भी है तो उनमें विष का असर नहीं दिखता। राय चल रही है तो चाय भी चल रही है। कभी चाय के समय राय तो कभी राय के दौरान चाय, पर चलेंगी दोनों.. फिर एक बात और है कि मैं आपको चाय के अलावा कुछ और तो पिला नहीं सकती।’
फिर शशि चाय बनाने के लिए किचन में चली गई और मैं बाहर बैठा हुआ एक पत्रिका पढ़ने लगा’
पत्रिका खबरों वाली थी। उसमें किसिम किसिम के फोटो प्रकाशित थे, फोटो देखने से यही लग रहा था कि अब खबरों का अकाल पड़ गया है। इतिहास मरे न मरे पर खबरें अवश्य मर रही हैं.. पता नहीं पश्चिमी चिन्तकों को क्या सूझता है? उन्हें कुछ सूझ रहा होता तो वे खबरों के सिकुड़ने, मैला होने, टूटने और बिखरने पर चिन्तन करते। अपने यहां तो इन चीजों पर सोचना ही पुरातनगामी होना है। हमारे यहां सारा कुछ अतीत से जनमता है, तथा अतीत बन जाने के लिए अभिशप्त होता है। ऐसा नहीं था कि उस पत्रिका में खबरें नहीं थीं, कुछ तो थीं ही जो देश चलाने वालों की नीली पीली पगड़ियों के बाबत थीं.. उनमें कहीं कोई युवराज होता तो कहीं दूसरा युवराज होता, खबरें पूरी तरह से वंशबादी व परंपराबादी थीं.. एक में मिली हुई किसी जहरीले रसायन की तरह केवल आश्वासन था कि देश चल रहा, लोग चल रहे और इसी तरह दुनिया चलती है।
थोड़ी ही देर में शशि चाय ले कर आयी। साथ बैठ कर वह भी चाय पीने लगी। चाय पीते हुए मैंने उसे देखा पर देख नहीं पाया। देख भी नहीं सकता था। जंगल वाली उमंग और रोचकता उसके चेहरे से गायब थी। जंगल में वह चमक रही थी। प्रकृति की अद्भुत लीला उसके चेहरे पर थिरक रही थी। ऐसा ही लगा था मुझे। जब हम दोनों जंगल में घूम रहे थे, मैं भला कैसे भूल सकता हूॅ उसने कहा था..
‘चलिए लौट चलें’ जंगल का अवांक्षित उपहास ले कर यहां से निकलना ठीक नहीं’ फिर हम दोनांे लौट आये थे। रास्ते भर शशि खामोश थी। चाहती तो मदहोश हो सकती थी। उस मदहोशी को मेरे खाते में भी उलीच सकती थी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम दोनों किसी निर्जीव की तरह वापस लौटे। रास्ते भर मेरे जोश और होश दोनों आपस में टकराते रहे। गुनते हुए कि विकल्प मुझे प्रस्तावित करना चाहिए था। पहल करने पर ही तो हल निकलेगा, पर मैंने पहल नहीं किया, न ही उसने। वैसे ऐसा भी हल क्या जो दिल को दहला दे। हल का मिजाज कुछ भी हो सकता है। उसके मिजाज के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। संभव है जंगल में होने पर ही जंगल हमारे चेहरों पर प्रकृति का नृत्य करता, बिना मिलावट और बनावट वाला, बाद में अपना दिया सारा कुछ हमसे छीन व बीन लेता। इसी कारण शशि वैसा न दिख रही हो जैसा जंगल में दिख रही थी।
मैं शशि में खोया हुआ था और खामोश था जबकि मुझे विचारना चाहिए था कि मैं शशि के साथ बैठा हुआ हूॅॅ बिल्कुल आस पास। बातें जारी रखनी चाहिए। अच्छा नहीं होता गुप चुप रहना और अपने में डूबा हुआ भी। बहरहाल शशि ने इस बाबत मुझे नहीं टोका, उसने ही बातें शुरू की..
‘जानते हैं औरत होना अद्भुत और रोमांचकारी है। किताबें न भी पढ़ो तो कोई बात नहीं, बहुत कुछ पढ़ने के लिए मिल जाता है किताबों से बाहर। घर में, समाज में दफ्तरों में, आज मैं आपके साथ डी.एम. आफिस से एक नये किस्म की किताब पढ़ कर लौटी हूॅ.. वहां तो पढ़ने लायक बहुत कुछ बिखरा हुआ था, आपने पढ़ा कि नहीं.. आपने नहीं पढ़ा होगा, दो समान चीजें आपस में प्रतिक्रियाहीन होती हैं.. उनमें तटस्थता होती है, अपनी अधिकतम सीमा तक’
‘वहां पढ़ने के लिए क्या था?’ मैंने उससे सवाल किया
शशि हसने लगी, हसते हुए ही उसने बताया..
‘यही तो बात है, आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि वहां तो बहुत कुछ था पढ़ने के लिए। वह डी.एम. आफिस है, वहां तरह तरह की किताबंे होती हैं, वह भी बन्द नहीं खुली हुई। जिसे पढ़ना आये वह अपनी पसंद की किताब पढ़े और डी.एम. की गरिमा में डूब जाये, और जिसे पढ़ना नहीं आये वह किस्मत पर रोये। मैं तो डूब ही गई थी, इतना डूब गई थी कि निकलना मुश्किल था, किसी तरह निकली। निकल जाने पर जान पड़ा कि डी.एम. केवल डी.एम. नहीं होता, वह जीता जागता आदमी भी होता है। जिसकी पुतलियां वही नाच नाचती हैं, जैसा किसी दूसरे की। उसकी पुतलियों का नाच देखना मेरे लिए मुश्किल था। मुश्किल इसलिए कि मुझे उनमें तैरना पड़ता और आपको क्या बताऊं मुझे किसी की पुतलियों में क्या, तालाब में भी तैरना नहीं आता। भला बताइए जो तैरे ही नहीं, वह क्या डूबेगा? चाहे किसी की पुतलियों में या तालाब में ही। सच बताऊं उसकी पुतलियों के जादू से बच पाना सभी के लिए संभव नहीं.. इसी लिए मैं वहां खामोश थी, और लगातार अपने पैरों के नाखून देख रही थी। ऑखें झुकाये रखने का मेरे लिए यही सबसे बेहतर तरीका है। ऑखों के झुकाव, ऊपर के उठाव से मन को सुरक्षित रखते हैं.. नहीं तो मन का क्या कभी भी बेमन हो सकता है।’
‘कैसी बातें कर रही, क्या तूं कमजोर तथा मूढ़ है? अपनी दृढ़ता नहीं बचा सकती। तुझे तो हर जगह और हर समय टकराना होगा, कभी खुद से तो कभी दूसरों से। और यही टकराहट तुम्हारे लिए आहट होगी फिर तूं समझ पायेगी कि तुझे क्या करना है और क्या नहीं करना है। फिर इस तरह की टकराहटों से किस लिए बचाव कर रही तूं? मैंने शशि को समझाया..
शशि भी पूरी तरह तैयार थी, उसे प्रतिउŸार देना ही था और उसने दिया..
‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं, मुझे समय की टकराहटें भयभीत नहीं कर सकतीं
मैं उनसे कुशलता पूर्वक लड़ सकती हूॅ पर यह जो समय की लय है नऽ,
कभी कभी प्रलय मचा देती है और मुझे प्रलय को लय में तब्दील करना आज तक नहीं आया। मैं उनमें से भी नहीं जिन्हें पता ही नहीं होता.... लय क्या है और प्रलय क्या है? वैसे भी लय तथा प्रलय का विलयन करने वालों से मैं काफी दूरी बना कर चलती हूॅ. अगर ऐसा न करूं फिर तो मेरे मन की लय, प्रलय में निश्चितरूप से बदल जायेगी। मन की लय ंजितना विनम्र होती है, उससे अधिक निष्ठुर भी।’
हम दोनों को बातें बीच में ही रोकनी पड़ी। शशि के कार्यकर्ता काफी देर से उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि कार्यशाला आरंभ हो। शशि के आग्रह पर मैं भी कार्यशाला का प्रतिभागी बन गया। नया अनुभव मिलेगा, कार्यकर्ता अपनी रिपोर्टे.. पढ़ेंगे तथा बताएंगे कि सोनभद्र में एड्स काहे बढ़ रहा है, और कहां कहां है, किस वर्ग समूह में है, कारण क्या क्या हैं..?
मीटिंग प्रारंभ होने में देर नहीं लगी। कार्यकर्ता भी कुल जमा पांच ही थे। मैंने अनुमान किया कि अधिक से अधिक दो घंटे में कार्यशाला समाप्त हो जायेगी।
शशि ने कुशल संयोजक की तरह करीब पांच मिनट का प्रारंभिक वक्तब्य दिया और बताया कि आज के समय में एड्स एक भयंकर बीमारी के रूप में हमारे समाज को डस रहा है। अगर इस रोग के प्रति जागरूकता नहीं पैदा की गई तो मानव सभ्यता नष्ट हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि हम पूरी ताकत के साथ इस रोग के रोकथाम के लिए सजगता व जागरूकता कार्यक्रम चलायंे.. इस कार्यशाला के माध्यम से सीमित साधनों के अन्तर्गत कार्य करने की प्राथमिकताओं का हमें आज ही निर्धारण करना है। कार्य क्षेत्रों का चयन करना है। इसी कार्यशाला में हम अपने अध्ययन रिपोर्टों का इसीकरण करेंगे, फिर कार्य करने की रणनीति पर विचारण भी, जिससे आगे की रणनीति बनायी जा सके।
शशि के प्र्रारंभिक वक्तब्य के बाद सर्वेयरों ने अपनी रिपोर्ट इस करना आरंभ किया। सर्वेयरों की रिपोर्टंें विस्मयकारी थीं कम से कम मेरे लिए, मुझे नहीं पता था कि हमारा सोनभद्र देहलीला में इतना संलिप्त है। मुझे देहलीला के बारे में महज दैनिक समाचार पत्रों के माध्यम से ही जानकारी थी। जानकारी भी हवा में उड़ती हुई, जिस पर विश्वास करना कठिन था। एक सर्वेयर की रिपोर्ट ने मुझे हतप्रभ कर दिया। उसने बताया कि बनारस से लेकर शक्तिनगर तक हाई वे के किनारे देहलीला के कौतुक चल रहे हैं। शायद ही ऐसे ढाबे हांे, जहां इस तरह का कार्य न हो रहे हों। उसने एक ढाबे का मौजूदा हाल बताया जिसके पास में एक आदिवासी गांव था। वहां रिहन्द बांध से विस्थापित लोग बसे हुए थे। उसने उस गांव का मुकम्मल सर्वे किया हुआ था। उसके बताने के अनुसार मुझे मालूम हुआ कि उस गांव के कुछ लोग देह को बाजार की सामग्री मानते हैं, सो वे देह बेचना अनैतिक नहीं मानते। वे लोग देह को रुपया कमाने की एक वस्तु मानकर देह का सौदा करते है और बेचते हैं.. फलस्वरूप सामाजिक या पारिवारिक रोक नहीं.. उस गांव में देह का रोजगार करने वालियां काफी सम्मानित होती हैं तथा उन्हीं के हाथों में घर चलाने का मालिकाना होता है।
सर्वेयर ने देहलीला में संलग्न तीन औरतों का संदर्भ भी बताया उनमें से दो औरतें एड्स से प्रभावित हैं, दोनों का सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा है। वे दोनों औरतें इस रोजगार में क्यों आयीं उसके कारण लगभग लगभग समान थे, अलग अलग नहीं.. उन्हें न तो किसी बाहरी व्यक्ति ने कभी भगाया था, न ही किसी गैर ने उन्हें इस घृणित रोजगार में धकेला था। उन्हें उनके संबधियों ने ही देह के रोजगार में धकेला था। उन औरतों के पास जीवन जीने की इच्छा भी नहीं है। वे जल्दी से जल्दी मर जाना चाहती हैं.. शशि उनमें एक से भी मिल चुकी थी, जिस दिन वह इलाज के लिए जिला अस्पताल आयी थी।
उस औरत की कहानी किसी अश्लील उपन्यास की तरह थी जिसे कम से कम प्रकाशित तो नहीं किया जा सकता। बता भले ही दिया जाये, केवल इसलिए नहीं कि उसके रचनाकार की नैतकिता क्षीण होगी और उसे नैतिकतावादी लेखक बिरादरी से बाहर कर दिया जायेगा। माना जायेगा कि ऐसे उपन्यास का लेखक एक गिरा हुआ व्यक्ति है.. उसे सभ्यता के मानकों की जानकारी नहीं और है भी तो वह समाज को पथभ्रष्ट करने का औपन्यासिक प्रयास कर रहा है। कम से कम लेखन के क्षेत्र में तो नैतिक मूल्यों के कसाव व बचाव का काम किसी भी लेखक को करना ही चाहिए।
उक्त औरत साफ बोलने वाली महिला थी। उसे इस बात की चिन्ता नहीं थी कि वह एड्स से प्रभावित है, और इलाज न होने पर मर जायेगी। इलाज भी ठीक से होता रहे फिर भी उसकी मृत्यु बहुत दूर नहीं.. शशि ने देखा कि उस औरत की ऑखों में मृत्यु के लाल लाल डरावने डोरे नहीं जो बरबस ही डराते रहते हैं.. वह निर्भीक ही नहीं आश्वस्त भी थी कि जो होगा, होगा फिर काहे के लिए डरना।
उस औरत से उसकी आन्तरिक कहानी जानना शशि के लिए भी कठिन था। शशि ने मनोविज्ञान की पूरी क्षमता का प्रयोग किया किसी सधे वकील की तरह। उससे जिरह भी की, जिससे वह जान सके आखिर किन कारणों से वह इस रोजगार में आयी, पर शशि के लिए मुश्किल था, हर सवाल का नकारात्मक जबाब देकर वह बहकाने की कोशिश करती। लम्बी कोशिश के बाद शशि को सफलता मिली। शशि ने उसे आश्वस्त करके सघन विश्वास दिया कि वह किसी को उसकी कहानी नहीं बताएगी। सारी बात गुप्त रखेगी। फिर उस औरत ने वह किस्सा बताया था जिसने उसकी जिन्दगी बदल दी थी और वह सेक्स बाजार की वस्तु बन गई थी। यह सच था कि पहली बार उसकी अइया ने ही दो सौ रुपयों के लिए उसे परधान के यहां भेजा था। उसे क्या पता था कि उसकी अइया उसे परधान के पास काहे के लिए भेज रही? वह तो बाद में मालूम हुआ जब परधान ने उसे किसी जवान और गदराई औरत में तब्दील कर दिया। हालांकि वह जानती थी कि किसी न किसी दिन उसे देहलीला से गुजरना होगा। पर इस तरह से जिस तरह से परधान ने उसे अचानक और जबरी खटिया पर पटक दिया और वह सब निपटा लिया जिसे निपटाने में मर्द अपनी बहादुरी समझता है। वह चीखती चिल्लाती रही, कोई सुनने वाला नहीं.. वह देहलीला के इस घिनघिन करतब से डर कर कांपने लगी। कांपते व थरथराते हुए रोती रही। परधान उसे मनाता रहा। किसी बच्ची को फुसलाने जैसा फुसलाया। यह दूंगा वह दूंगा जाने कितनी बार गिड़गिड़ाया। वह चिल्लाती और बोलती, घर पहुंचा दो, वह और कर भी क्या सकती थी? परधान ने ही मोटर साइकिल से उसे अइया के घर पहुंचाया। रास्ते भर वह खामोश थी पर अन्दर से रोती और कराहती रही। वह परधान का विरोध करती भी तो कितना करती, कितना लड़ती उससे, पूरा छह फिटा जवान, खून से सने पंजे, ऑखों में छलकता गरम खून, वह पहले से ही काफी डरी हुई थी। उसे पता था कि वह परधान से लड़ नहीं सकती फिर भी उसने कोशिश की थी और कई जगह उसे दांतों से काटा भी था पर सारा कुछ उसका किया बेकार था। परधान ने उसे तभी छोड़ा था जब उसका पौरूष शिथिल व शून्य हो चुका था तथा वह बेहोश।
कुछ समय बाद वह अइया के घर पर थी, उसे उसके वहां छोड़ कर परधान वापस लौट गया। लौटते समय परधान ने उसकी अइया को दो सौ रुपया दिया तथा और देने का आश्वाशन भी, जब भी जरूरत पड़े। वह घर में जाकर रोने लगी, रोते हुए ही उसने अइया से झगड़ा भी किया, तूंने परधान के पास काहे भेजा था? वह बहुत हरामी है, उसने मेरी इज्जत लूट ली, चल थाने पर रपट लिखा।
उसकी अइया पहले तो खामोश थी पर बाद में आग उगलने लगी..
‘यह सब तेरी करनी से हुआ तूं हल्ला करती, चिल्लाती चीखती फिर वह का कर लेता, तूं खुद पसर गई होगी। परधान तो गऊ है, उस पर काहे इल्जाम लगा रही। अब हल्ला न कर तेरी ही बदनामी होगी। जो हो गया, हो गया उसे भूल जा’
वह परेशान परेशान थी उसे अइया पर काफी गुस्सा आया, जाने का सोच कर उसने अइया को मारा नहीं, उसके मन में आया था कि पास में रखी टंगारी से अइया का माथा फाड़ दे पर उसने वैसा कुछ नहीं किया। वह खामोश हो गई कुछ देर बाद घर से बाहर निकली और सीधे थाने पर जा पहुंची। उसे पता था कि उसके साथ जो हुआ है उसका पूरा इलाज थाने पर है। वैसे भी थाना चाहे तो ऐसे मर्जों का इलाज कर सकता है पर जब इलाज करना चाहे। थाना इलाज क्यों करे, यह उसे मालूम नहीं था, मालूम होता तो थाने पर नहीं जाती। उसी की तरह बहुतों को नहीं मालूम कि थाने उसी की सुनते हैं जिसके आवाज में बारूद की आग होती है।
थाने पर वह गांव से बच बचा कर पहुंची। अन्धेरा होने तक पहुंच गई थी रपट लिखाने के लिए और उसे ही रपट का लाल पन्ना बना दिया गया। बारी बारी से सिपाहियों ने उसकी देह पर रपट का मजमून बनाया। उसके एक एक हरफ को चुन व गुन कर लिखा। लिखे हुए को कई बार काटा, उसके हसीन हरफों को दुबारा तिबारा लिखा। सिपाही मजमून लिख ही रहे थे कि वह बेहोश हो गई। उदास धरती की तरह, धरती पर पसर गई। उसे धरती पर धरती की तरह पसरा हुआ देख कर दारोगा को अचरज हुआ...अरे! साली पसर गई। आदिवासी लड़कियां तो पसरती नहीं! साली काहे पसर गई? लगता है सारे सिपाहियों ने मिल कर इसे पगडंडी बना दिया है। खड़ंजा होती तो चल जाता, उसने सिपाहियों को गाली दी...
‘अरे! हरामजादों! कुछ तो विचारा होता, दो चार पार हो लिए होते, सभी के सभी पार उतर गये। यह लड़की है, कोई बेलन या कनहर नदी नहीं, कि बूंदा बादी पर भी उफना गई, तोड़ दिया किनारों को। अब तो इसे होश में लाओ नहीं तो...
वह कब अइया के घर कब पहुंची, उसे पता नहीं चला, होश आने पर उसने समझा कि वह अपने अइया के घर में है।
अब देर न कीजिए
सर्वेयरों की रिपोर्टें सुन कर मैं हतप्रभ था। क्या हमारा सोनभद्र देहलीला के करतबों का बाजार है? यहां के कथित औद्योगिक विकास का ऐसा चौंकाऊं प्रतिफल। नारे लगाए जा रहे हैं कि औद्योगिक विकास से साहित्य संस्कृति, कला शिक्षा एवं आर्थिक जैसे क्षेत्रों में स्वतः विकास हो जायेगा पर हो क्या रहा है? किसका विकास हुआ? जब तक सर्वेयर रिपोर्टें पढ़ रहे थे तब तक मैं सामाजिक बदलाव के दर्शनों में डूबा हुआ था। कभी उन दर्शनों के बांए जाता तो कभी दाहिने, जितना दर्शनों के चिन्तनों में डूबता उतनी ही निराशा होती। माथे में मुझे दर्द महसूस हुआ, दर्द भी सहन करने लायक नहीं असहनीय। फिर तो शशि के आवास पर ठहरना मेरे लिए असंभव हो गया। शशि से मैंने छुट्टी मांगी..
‘मुझे छोड़ो, सर दर्द से मैं बहुत परेशान हूॅं, कार्यशाला समाप्त होने के बाद मिलना, अगर समय रहा तो..’
‘नहीं आपको अभी नहीं जाना है, कार्यकर्ताओं के लिए लंच पैकेट आ रहा है लंच लेकर ही जाना है। कुछ देर के लिए और रुक जाइए, कार्यक्रम समाप्त ही है, सुन तो लीजिए का हो रहा है सोनभद्र में? आप भी तो आज की व्यवस्था पर कई तरह के सवाल खड़े करते हैं अपनी किताबों में.. भूमि के असमान आवंटन, बेरोजगारी, विस्थापन और यातनापूर्ण गरीबी के बाबत लेकिन इस तरह की बदलती विसंगतियों के बारे में आप क्या कहेंगे? क्या और कैसा लिखेंगे, भूख मिटाने के लिए देह के सौदों के बारे में, आज की मानव सभ्यता के पास क्या जबाब है? इस पर तो आपको विचारना ही होगा।’
शशि बातों का एक छोर मेरे हवाले कर के भीतर वाले कमरे में चली गई, कमरे से बाहर जब निकली तब उसके एक हाथ में दवाई की टिकिया थी और दूसरे हाथ में एक गिलास पानी..
‘लीजिए दवा खा लीजिए, पांच मिनट में दर्द फुर्र’ किसी विज्ञापनी नायिका की तरह असरदार संवाद बोल कर वह कार्यकर्ताओं के पास चली गई फिर मैं उस संवाद का जीवित प्रयोग बन गया।
दवा की टिकिया ने काम किया फिर मैं सामान्य हो गया केवल ऊपरी तौर पर भीतर से आन्दोलित था। आज की मानव सभ्यता और ज्ञान विज्ञान के फैलावों पर हो क्या रहा है, हमें पहुचना कहां था और हम कहां पहुंचते जा रहे हैं? वस्तुएं तो बिकती ही हैं, बदलवन वाले समाज से हम काफी आगे निकल चुके हैं।.. वह समय काफी पीछे छूट चुका है। रुपये ने अतीत की जिन अच्छाइयों को अनुकरण किया जाना चाहिए था, उसे लील लिया है, पहले व्यक्ति का चरित्र आपसी सहयोग सद्भावना, सहानुभूति, प्रेम आदि से बना करता था और आज के चरित्र पर रुपयों के क्रयशक्ति का चरित्र हाबी हो गया है, आदमी मशीन में जिस तरह से रूपान्तरित हुआ, हुआ वह रुपयों जैसा भी होता जा रहा है। रुपयों का काम है, सारी दुनिया को वस्तु में तब्दील करना, मूल्य निर्धारित करना फिर लाभ हानि के अनुसार उपयोग एवं उपभोग के लिए उसे खरीदना।
मैं विचारों की यात्रा पर था, तभी शशि ने मुझे पुकारा। शशि चाहती थी कि मैं उसके कार्यकर्ताओं को संबोधित करूं, उसने ऐसा मुझसे कहा भी। मैने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया और उनकी पीठें थपथपाईं, कि आप जितना बेहतर कर सकते हैं उतना बेहतर कर रहे हैं और आगे भी करेंगे ऐसा मुझे विश्वास है। फिर मैंने कार्यशाला के मुख्य विषय को उठाया और कहा...
‘एड्स देहलीला का दुखद परिणाम है और देहलीला कथित परमआनन्द की प्राप्ति का सुगम माध्यम, जबकि ऐसा है नहीं, परम आनन्द का केन्द्र तन नहीं, मन है। यह अलग बात है कि मन, तनधारी होता है, आनन्द, मन और तन की स्वच्छन्दता या स्वेच्छाचारिता में नहीं, तन और मन के पवित्र अनुशासन तथा उनके संतुलित विलयन में है।’
मेरे संबोधन के बाद कार्यशाला की कार्यवाही समाप्त हो गई फिर सभी ने लंच लिया। मुझे घर लौटने में काफी देर हो गई पर यह देर मेरे लिए ठीक थी, वहां अगर नहीं रुकता तो कैसे पता चलता कि हमारे जनपद में हो क्या रहा है विकास के नाम पर, चारित्रिक एवं सांस्कृतिक पतन और हम आश लगाए बैठे हैं कि जो भी होगा ठीक होगा, ठीक के अलावा कुछ नहीं होगा। वैसे मुझे पता था कि पेट की आग बुझाने के लिए तन तथा कथित शान के लिए मन बेचना दोनों विधियों में कहीं न कहीं अन्तरंगता है। दोनों के लिए खुले बाजार हैं, जो आकर्षक ही नहीं आह्लादकारी भी हैं.. गरीबी देह बेचवाती है, और अमीरी दिमाग, बिकते दोनों हैं और यह दुनिया इन्हीं दोनों के खेलों में अपने मनोरम तलाश रही है।
कार्यकर्ताओं के चले जाने के बाद शशि ने मुझे रोक लिया।
‘चाय पीकर जाइएगा’
मेरे लाख मना करने पर भी वह नहीं मानी। वह मानती भी नहीं क्योंकि लंच पैकेट मैंने लिया नहीं था। बाजार की चीजें खाने का मन नहीं करता। मुझे चाय पीने तक उसके आवास पर रुकना पड़ गया। गैस चूल्हे पर चाय बनने में कितनी देर लगती है, वह भी आधुनिक किस्म के किचन में जहां सारी चीजें बहुत ही करीने से सजा कर रखी हुई हों, वैसे भी शशि खाना बनाने पकाने और खिलाने में आज के समय के लोगों से कुछ अधिक ही उत्सुक रहती है। चाय जल्दी आ गई और हम दोनों पीने भी लगे। कुछ ही देर में चाय समाप्त हो गई फिर भी मैं शशि के आवास पर बैठा ही रह गया और समझ भी नहीं पाया कि वहां मैं क्यों बैठा हुआ हूॅ। दूसरी जगहों पर कार्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद एक मिनट के लिए भी वहां रुकना मेरे लिए कठिन हो जाता है पर शशि के आवास पर और शशि के साथ.. दो तीन महीने से ही शशि का साथ है इसके पहले तो मैं जानता ही नहीं था कि शशि कौन है, क्या करती है, कहां की रहने वाली है। शशि से हुई पहली मुलाकात और आखिरी मुलाकात के बीच के अन्तरों को अगर मुझे रेखांकित करना हो तो यह मेरे लिए बहुत ही कठिन होगा। क्योंकि मैं मनोवैज्ञानिक नहीं.. मनोवैज्ञानिक होता तो मुझे सहायता मिलती और मैं मन की गतिविधियों को विश्लेषित कर लेता। उसके एक एक रेशे को अलग करता फिर व्याख्या करके उसमें से वांक्षित हासिल कर लेता पर ऐसा कुछ मेरे लिए संभव नहीं.. मैं तो किसी सरल रेखा की तरह ही जीवन के हर मोड़ पर खिंचता और सिकुड़ता रहा हूॅं, मुझे यह भी कभी हासिल नहीं हुआ कि मैं समानांतर रेखाओं के द्वन्दों के बीच का जो रहस्य है उसे जान सकू.. शाशि से मैं क्यों प्रभावित रहता हूॅं, उसके एक एक संदेश पर दौड़ता रहता हूॅं, कोई दूसरा कार्यक्रम लगा भी रहता है फिर भी शशि के बुलावे को ही प्राथमिकता देता हूॅं, आखिर ऐसा क्यों है मेरे साथ?
मै केवल अनुमान ही कर सकता हूॅं, उसे भी नहीं कर पा रहा हूॅं कि शशि मेरे लिए क्यों अनिवार्य बनती जा रही है किसी निहित कमजोरी की तरह। एक ऐसी कमजोरी जो गुप्त ही नहीं सुप्त भी हो, हो सकता है निष्ठुर तथा आक्रामक भी। क्या भावुकता का वेग इतना शक्तिशाली होता है? क्या मैं भावुकता का शिकार होता जा रहा हूॅं, उसी की धारा में बहने लगा हूॅ.. उसमें भंवरें भी तो होंगी फिर मेरी बुद्धि क्या कर रही, क्या उसकी कोई भूमिका नहीं, भावुकता इतनी शक्तिशाली है, जो मेरी बुद्धि को भी अपने साथ बहाए ले जा रही है। क्या मेरी बुद्धि कमजोर हो गई है कि वह इस तरह की अर्थहीन भावुकता को नियंत्रित नहीं कर पा रही।
चाय समाप्त हो जाने के बाद ही मुझे शशि के आवास से लौट आना चाहिए था फिर भी आधे घंटे तक शशि के आवास पर रुक गया। वहां रूक कर विश्लेषित करता रहा कि मैं यहां पर किस लिए रुका हुआ हूॅ.. संभव कारण क्या हो सकते हैं, जो मुझे शशि के आवास पर रोके हुए हैं.. शशि का व्यवहार, उसकी विनम्रता, बातचीत करने की अद्भुत शैली, कहीं उसके सौन्दर्य की प्रकृति तो नहीं या आत्मिक साम्य का कोई अज्ञात प्रयोजन, जिसे जाना ही नहीं जा सकता। संभव तो यह भी है कि मैं एकपक्षीय तरीके से शशि में कुछ तलाश रहा होऊं जो अवचेतन स्तर पर दबा हुआ हो, चेतन में उसकी महज प्रतिक्रिया हो और मैं उलझा हुआ होऊं सिर्फ आभास हो रहा हो कि मैं व्यर्थ ही शशि के आवास पर हूॅं, यहां रुकने का कोई प्रयोजन नहीं..
शशि के आवास से वापस लौटते समय शशि मेरे साथ हो ली। यह कहते हुए कि ‘आपको घर छोड़ कर लौट आऊंगी’ मैं उसके लौटने के साथ था, सामान्य औपचारिकता निभाते हुए। कम से कम मुझे उससे कहना चाहिए था कि घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं, तूं न चलो मेरे साथ। अपना काम
करो, तेरे कार्यकर्ता आये हुए हैं, मैं चला जाऊंगा, घर का रास्ता भला कोई भूलता है, फिर मैं कैसे भूल जाऊंगा। कौन अजाने शहर में जाना है, एक बार तूं मुझे छोड़ो फिर मैं तुझे छोड़ने वापस लौटूं, यह चक्र कभी समाप्त नहीं होगा फिर ऐसी निरीह औपचारिकता किस लिए?
‘तूं रहने दो मैं चला जाऊंगा’
ऐसा भी मैं शशि से नहीं कह पाया बल्कि मुझे अच्छा लगा कि शशि कुछ समय के लिए और मेरे साथ रहेगी। वस्तुतः मुझे उसका साथ आना काफी अच्छा लगा। रास्ते में हम दोनों रापटगंज के बारे में बातें करते रहे। शशि ने जानना चाहा...
सोनभद्र तो पहले जिला नहीं था। यह सोनभद्र कहां है? कोई न कोई जगह तो होगी ही इस नाम से। अच्छा चन्द्रकांता कौन थी? बिजयगढ़ किला कहां है? जहां की राजकुमारी चन्द्रकांता थी। इसी तरह के कई सवाल। मैने उसे संक्षेप में बताया कि रापटगंज पहले जिला नहीं था, कुछ साल पहले का नवसृजित जिला है। सोनभद्र एक कल्पित नाम है जो सोन नदी के नाम पर है। इस नाम का कोई स्थान नहीं, यह कल्पनाविदों का दिया हुआ नाम है, जिसे शासन ने स्वीकार करने की कृपा की है। राजकुमारी चन्द्रकांता तथा उसका बिजयगढ़ किले व रियासत से जुड़ाव, यह तो बहुत ही हसीन परिकल्पना है, चूमने व दुलारने लायक, इस संबध में कुछ बताना खुद को झूठा प्रमाणित करना होगा।
शशि तो शशि थी, सवालों के उŸारों का निर्पेक्ष विश्लेषक, भला वह कैसे खामोश रहती तत्काल उसने पूछा..
‘तो क्या चन्द्रकांता बिजयगढ़ की नहीं थी? यानि वह किसी कल्पना की उत्पाद थी। अच्छा यह बतायें कि बिजयगढ़ किला है कि नहीं, क्या वह भी कल्पना प्रसूत है?’
‘शशि रहने भी दो, क्या करोगी यहां के अतीत में उतर कर। जिन सहारों के द्वारा अतीत में उतरना चाहोगी कैसे कहा जा सकता है कि वे सहारे तुम्हें अतीत की गहरी झील में उतार कर सुरक्षित वापस लौटा ले आयेंगे। वे सहारे तुम्हें छोड़ कर वापस भी तो आ सकते हैं और तुम उस झील में बिना प्रयोजन छटपटाती रह जाओ, फिर कैसे लौटोगी जीवित वर्तमान में.. जहां तुम्हारी आवश्यकता है। मुझे पता है कि हम सभी वर्तमान के लिए जरूरी हैं, अतीत के लिए नहीं.. इस बिन्दु पर खूबसूरत से खूबसूरत तथा अनिवार्य अतीत भी गैर जरूरी हो जाता है।’
अरे बताइए तो.. हमें किसी अतीत से क्या लेना देना। अतीत के बारे में जानना हमारी उत्सुकताओं का एक रूप भर है। ये उत्सुकतायें ही हैं जो हमें जानकारी के लिए प्रेरित करती हैं.. यह सच है कि सभी उत्सुकताओं में आन्दोलित करने की शक्ति नहीं होती, अगर कुछ में हुईं भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला है? तो क्या चन्द्रकान्ता किसी रचनाकार द्वारा कल्पना के सहारे गढ़ी हुई हृदयग्राही रोमेन्टिक रचना भर है?’
हां कुछ ऐसा ही मान व जान लो। बिजयगढ़ रियासत और किले से इस चन्द्रकांता का दूर दूर तक नाता नहीं.. यहां का इतिहास तो कुछ दूसरा ही है जो यहीं से प्रारंभ होता है और यहीं पर समाप्त भी। यह पूरा परिक्षेत्र बारहवीं शताब्दी से ले कर अंग्रेजों के आने तक मुक्त परिक्षेत्र के रूप में वर्णित है। बतौर साक्ष्य कुछ किताबें उपलब्ध है, खासतौर से अंग्रजी गजेटियर वगैरह। यहां कभी भी मुगल नहीं आ पाये, आये तो केवल अंग्रेज ही, बहरहाल ऐसे सवालों को छोड़ो, मेरे पास कुछ गजेटियर्स हैं, उन्हें पढ़ लेना सारा कुछ साफ हो जायेगा, रजवाड़ांे से संबधित किताबें भी हैं..’
मेरा उŸार सुनते ही शशि चकरा गई..
टी.बी. सीरियल का ऐसा जादुई असर, मैं तो सोच भी नहीं सकती कि कोई कल्पना किसी ऐतिहासिक यथार्थ पर भी इस तरह हाबी हो सकती है। इस तरह तो कहीं का भी इतिहास कल्पना की वस्तु बना दिया जायेगा। फिर उस सच का क्या होगा जो कभी समय का वर्तमान था। यानि कि इतिहास बेचने का यह वौद्धिक धंधा है।’
घर लौटते समय मैं एड्स के रोगियों की वास्तविक कहानियों में था। उस समय शशि के सवाल मेरे लिए उबाने वाले जान पड़ रहे थे और मैं ऊब भी रहा था। हालांकि इतिहास मेरे लिए सदैव से ही काफी रूचिकर रहा है लेकिन अच्छा कभी भी नहीं.. हमारी सभ्यता भी अजीब रही है जो महलों में कैद थी। महलों से बाहर निकल कर खेतों खलिहानों तक पहुंची ही नहीं, सदैव डूबी रही हमलों और हमल की कहानियों मे.. उससे अच्छा तो आज का समय है जो कम से कम हर ओर टहल तो रहा है तथा उसका टहलना हम चाहें तो देख भी सकते हैं.. मेरा घर शशि के आवास से कुछ मिनटों की ही दूरी पर था और हम दोनों वहां पहुंचने वाले ही थे कि शशि ने मेरे मन की बातें छीन ली, जिसके बारे में मैं सोच रहा था।
शशि ने मुझसे जानना चाहा..
‘एड्स के रोगियों की कहानियां कैसी लगीं आपको?
‘कैसी मतलब? मैने उससे पूछा
‘कैसी यानि जैसी लगीं आपको, कुछ तो महसूस हुआ होगा आपको, हो क्या रहा है अच्छा या बुरा, उन जीवित कहानियों से आपका साहित्यिक मन प्रभावित न हुआ हो यह संभव नहीं’ क्या उन कहानियों को साहित्य के किसी रूप में ज्यों का त्यों लाया जा सकता है? आपको उस बाबत कुछ करना चाहिए’
शशि! वही तो गुन रहा हूॅं कि मैं क्या कर सकता हूॅ.. अगर उन्हें साहित्य की सामग्री बनाना हो तो मुझे क्या करना चाहिए, मुझे उन कहानियों में क्या क्या जोड़ना पड़ सकता है? क्या क्या घटाना पड़ सकता है? कल्पना और भावुकता के प्रभावों से उन्हें बचाया जा सकता है कि नहीं, सबसे बड़ी बात
जीवित कहानियों में साहित्यिक हस्तक्षेप करना ठीक नहीं.. उन्हें ज्यों का त्यों ही लिखना उचित होगा। शशि को घर पर रोकना महज औपचारिकता होती सो मैंने उसे नहीं रोका। घर पर सारा कुछ यथावत था। यह मेरे लिए खुशी की बात थी। कभी कभी घर, घर की तरह नहीं होता वह बदल जाता है, और इतना बदल जाता है कि लगता ही नहीं कि घर था। पत्नी पत्नी नहीं रह जाती, बेटा बेटा नहीं रह जाता, बहू, बहू नहीं रह जाती, सारे रिश्ते एक दूसरे में उलझ जाते हैं फिर तो घर के भीतर घर देखकर लगता है कि यह जो घर है अगर नहीं होता तो ठीक होता। ऐसे घर में क्या रहना, क्या नहीं रहना और रहना भी तो किसके लिए रहना तथा क्यों रहना?
घर आते ही देखा कि पत्नी प्रतीक्षा में बैठी हुई हैं, मुझे पता था कि भोजन का समय गुजर रहा है और वे तभी भोजन करेंगी जब मैं भोजन कर लूंगा। वस्तुतः वे बैठी हुईं थीं बाहर वाले लान के एक किनारे जहां धूप का असर नहीं था। उस समय उन्हंे उस रूप में देखना किसी ऐसे साहित्यिक सामग्री को देखना था, जिसकी लिपि प्रचलन से विलुप्त हो गई हो, उसे पढ़ने व समझने वाला कोई नहीं हो पर मैं उस लिपि को पढ़ सकता हूॅं तथा अर्थ भी निकाल सकता हूॅ। लगातार ऐसी ही लिपियों को पढ़ता रहा हूॅॅ, घर को पढ़ पाना कभी कभी जटिल हो जाता है। मुझे पत्नी का आहाते में बैठा देख कर खुशी हुई क्योंकि वे पठनीय थीं सहज और सरल भी।
‘बहुत देर कर दी आपने, बिना नाश्ते के ही चले गये थे, इसी लिए कहती हूॅं कि कहीं निकलते समय दो रोटी खा लिया कीजिए। शशि जी ठीक ठाक हैं नऽ’ पत्नी ने पूछा
‘हां जैसा होना चहिए वैसा तो नहीं फिर भी ठीक हैं’ मैंने पत्नी को बताया
‘का मतलब इसका? उन्हें कैसा होना चाहिए और कैसी हैं, एक औरत आखिर कैसी हो सकती है? पत्नी ने प्रतिवाद किया
‘अरे भाई! आप समझी नहीं, वह बहुत परेशान है और मानसिक रूप से टूट चुकी है, किसी तरह समय के साथ है और प्रयास में है कि समय से अपना नाता संतुलित कऱ ले और कोई दूसरा मतलब नहीं.. समय का क्या ठिकाना कब असमय में बदल जाये’ मैने स्पष्टीकरण दिया
‘बात तो ठीक कह रहे हैं आप, जहां तक हमैं मालूम है, समय समय होता है, सामानों की तरह, अच्छा बुरा नहीं, समय को आदमी और आदमी के रिश्ते नाते ही बनाते, बिगाड़ते हैं.. तोड़, फोड़ डालते हैं फिर क्या करे कोई, टूटता आदमी है, और लगता है कि समय टूट रहा है किसी कांच की तरह। खुद को रोकते हुए उन्होने कहा...‘अरे! छोडिए, बातें बहुत हैं, वैसे ही काफी देर हो चुकी है, अभी आपको नहाना और खाना भी है, अब देर न कीजिए।
घर के भीतर घर
घर आ कर घर की तरह हो जाना, मैंने अच्छी तरह सीख लिया है। उम्र के साथ मेरी समझ भी बढती गई कि घर, घर होता है, उसका अनुशासन होता हैै। बाहर वाले सेहन में मेरे लिए धूप में एक बाल्टी पानी रखा हुआ था ताकि गरम हो जाये। डाक्टरों ने मुझे ठंडे पानी से नहाने के लिए रोका हुआ है। उनका कहना है कि ठंडे पानी से नहाने पर मुझे शारीरीक परेशानी हो सकती है। अक्सर मैं सर्दी जुकाम की जकड़ में पड़ जाता हूॅ.. बाहर धूप अच्छी थी। धूप में नहाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। पानी गरम हो चुका था, उसी से नहाया फिर खाने के लिए बैठा। अक्सर मैं बाहर पड़ी खटिया पर ही बैठ कर खाता हूॅ। कुर्सी वगैरह पर बैठ कर खाना खाना अच्छा नहीं लगता। जान पड़ता है कि मैं आसमान से टपका हुआ आदमी हूॅ। यहां की काली मिट्टी से मेरा रिश्ता नहीं, फिर मुझे असहज लगता है। वैसे मैं कोशिश करता हूॅॅ कि जमीन पर ही बैठ कर खाना खाऊं.. खटिया पर बैठ कर खाना, खाना तो विपरीत परिस्थितियों में ही होता है, जब घर में खाली जगह नहीं होती। घर में खाली जगह हो भी तो कैसे! दो कमरे के छोटे से मकान में आखिर कितनी जगह होगी? जब साथ में बहू तथा उसके बच्चे भी हों.. खाना खाने की मेरी इच्छा नहीं थी, पर मैं पत्नी को यह बताना नहीं चाहता था कि मैंने खाना खा लिया है और पेट भरा हुआ है। अगर यह बता देता तो पत्नी का खाना, खाना असंभव हो जाता। इस मामले में मेरी पत्नी निरर्थक भावुकता की शिकार हैं.. वे कई बातों में आज की महिला नहीं जान पड़ती.. उनका मानना है कि पत्नी को खाना तभी खाना चाहिए जब पति खाना खा ले और अगर पति न खाये तो उसे नहीं खाना चाहिए। शादी के लम्बे अन्तराल के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाया कि वे ऐसा किन मनोवैज्ञानिक दबावों से करती हैं.. मैंने कई बार उनसे कहा भी है कि आप ऐसा न किया करें, पर वे साफ कहती हैं..
‘आपको यह विसवास होना चाहिए कि हमैं अपनी जिम्मेवारियॉ मालूम हैं.. तथा हम जानती हूॅं कि हमैं का करना चाहिए और का नाही.. आप बूझ रहे होंगे कि हम पूजा, पाठ वाली मेहरारू हूॅॅ और आपको परमेश्वर समझती हूॅ पर ऐसा नाही है, मैं जानती हूॅॅ कि आप परमेश्वर नाहीं हो सकते। आप केवल आदमी हैं, जैसा कि होना चाहिए। आप मेरे लिए पूजनीय हैं, काहे से कि आपके साथ मेरी सांसे गुथी हुई हैं.. मेरी धड़कनों में आप हैं, हमैं लगता ही नाहीं कि आप हमरे से अलग हैं.. शीसे में हम आपन चेहरा देखना चाहती हूॅॅ पर हमार चेहरा तो तब देखाय जब आप न देखांय। आप ही देखाने लगते हैं, हमैं हसी आती है, यह का हो रहा है, हम खुद को काहे नाहीं देख पा रही, कहीं हम सपना तो नाहीं देख रही? अब आपै बतायें आपके बिना, का खाना, का सोना, का रहना।’
पत्नी की अनावश्यक भावुकताओं के बारे में मुझे टिप्पणी करनी चाहिए कि नहीं यह विमर्श का विषय हो सकता है पर मेरे लिए टिप्पणी करना सरल नहीं.. मैं तो बातचीत के समय उन्हें एकटक देखता रह जाता हूॅॅ और समझने की कोशिश करता हूॅॅ कि कहीं मैं आधुनिक तो नहीं हो रहा या पत्नी ही अतीत की दासी तो नहीं हो गई हैं? बहरहाल मैं इस रहस्य को अब तक नहीं जान पाया। अब तो जानने की इच्छा भी नहीं.. मैंने खुद को उनके अनुसार ढाल लिया है और समय के अनुसार सरक रहा हूॅ..
खाना खाते समय पत्नी मेरे सामने ही बैठी होती हैं.. उनका सामने बैठना मेरे लिए आनन्दायक होता है। जब वे सामने बैठी होती हैं, निश्चितरूप से एक दो रोटी अधिक खा जाता हूॅ। खाने का स्वाद बढ़ जाता है। उस समय वे उन सवालों को भी नहीं छिपा पातीं जिन्हें छिपाना चाहिए, जितना उनके मन में होता है, उसके एक एक रेशे को उघार देती हैं.. मसलन मैं कहां गया था, क्यों गया था और जहां गया था, वहां हुआ क्या, मीटिंग थी तो कैसी हुई? कौन, कौन बोला, किसका भाषण कैसा था? आप कैसा बोले, खुल कर बोले कि नाहीं, फिर खुल कर क्यों नहीं बोलते, आप खुल कर नहीं बोलंेगे फिर कौन बोलेगा? सारी जिनगी लिखने और बोलने में ही तो लगा दी आपने।’
उनके सवाल और सुझाव तथा प्यार भरी निगरानी पर मेरा दार्शनिक बन जाना असंगत नहीं होता पर मैं सामान्य ही बना रहता हूॅ। मैं नहीं कह पाता कि अरे भाई! ऐसी क्या बात है, मैं तो जब भी बोलता हूॅं, खुल कर ही बोलता हूॅं, मेरे पास बन्द, बन्द जैसा कुछ है ही नहीं, सारा कुछ खुला खुला है।
पत्नी मेरे सामने बैठी हुईं थीं और मैं खाना खाने का नाटक कर रहा था जिससे उन्हें मालूम न हो कि मैंने खाना खा लिया है। खाने के लिए सिर्फ दो रोटी मांगा..
‘काहे, केवल दो रोटी, गैस बन गई है का, इसी लिए बार बार कहती हूॅं कि समय पर खा लिया कीजिए। अच्छा! रसियाव तो खाइएगा नऽ, गंाव से नया चावल आया है, साल का पहिला अनाज, रसियाव बनाना जरूरी था, आप चले गये थे, दूध कौन लाये, बल्टा वाले ने दो किलो से अधिक दिया नाहीं, एक किलो और चाहिए था, किसी तरह मंगवाया’ हां यह तो आपने बताया ही नहीं कि शशि के यहां काहे के लिए मीटिंग थी, किसी परदर्शन वगैरह की तैयारी चल रही का?’
‘नहीं ऐसा कुछ नहीं, वहां दूसरे किस्म की मीटिंग थी, एक रोग होता है ‘एड्स’ उसी के बाबत’
‘हां हां जानती हूॅं एडस, वही देह वाला रोग नऽ, एडस रोक लेंगे का आप लोग, कैसे रोका जाये इसी के लिए मीटिंग हुई होगी नऽ, एडस रोकने के उपायों के बारे में आप लोगों ने का का विचारा। कोई उपाय है भी का? हम जानती हैं कि एडस देह का रोग है। एक देह से दूसरी देह में फैलता है। देह है कि ओके गुत्थम, गुत्था होना ही है, फिर किसे पता कि किस देह में यह रोग है और उस देह से गुत्थम, गुत्था नहीं होना। वैसे भी गुत्थम, गुत्था होना भी तो रोग है, फिर कैसे रुकेगा यह सब, एड्स तो तब रुकेगा जब गुत्थम, गुत्था होना बन्द हो जाये।’ पत्नी ने मुझसे पूछा..
मैं उन्हें एड्स के बारे में क्या बताता। वे सारा कुछ जानती हैं.. उनसे इस बारे में बातें करना बेकार था। उनके एक नातेदार इस रोग से कुछ साल पहले मर चुके थे। अब तो वे कहानी बन चुके हैं.. बंबई वाले हीरो के नाम से। बंबई गये थे हीरो बनने लौटे तो एड्स ले कर, पांच छह महीने बाद मर गये। गनीमत थी कि बिना बिआह शादी वाले थे नहीं तो जाने का होता। बेकार इस लिए कि वे बात को आगे तक खींच ले जातीं, अक्सर ऐसा ही होता है। मुझे अचरज होता है, एक औरत जो पढ़ाई के नाम पर जैसे तैसे प्राइमरी है, बहस को तार्किक कैसे बना देती है? मानना होगा कि अनुभव भी कोई चीज होती है। फिर मैं उन्हें क्या बताता कि ऐसे कामों में मैं क्यों रुचि लेता हूॅं जिनसे एक पैसा मिलना, जुलना नहीं, समय नष्ट करना ही तो होता है। घर पर पड़े रहो तो आराम मिलेगा, ऐसी जांगर खटाई से क्या लाभ, कभी मीटिंग तो कभी कार्यशाला, कभी ट्रेनिंग, दो दो दिन घर से दूर रहो। कभी आधी रात आओ तो कभी आने का कोई समय ही नहीं, अब घर भी पहले वाला नहीं, घर में बहू है, उसके बच्चे हैं जाने क्या सोचें गुने, वैसे ही वह अपने में खोयी रहती है, हमलोग नहीं चाहते कि उसे दुख हो.. एक बार पत्नी ने संकेत किया था शशि के बारे में..
‘वह जो शशि आती है उसके साथ आपको देख कर मुहल्ले वाले भीतर ही भीतर कुछ बोलते हों तो किसे मालूम, हालांकि शशि वैसी नहीं जान पड़ती पर मर्द और औरत का एक साथ होना, एक विचार का होना, एक को दूसरे में देखना फिर खो जाना एक दूसरे मंे.. एक दूसरे में खोये नहीं कि मन उछाल देगा देह को? यही सब तो देह को नचाने, गवाने लगता है, एक ही बार की तो बात होती है, झिझक खतम, बहक शुरू।’
मेरे लिए पत्नी के सामने चुप बैठना बहुत ही हितकर होता है ऐसे समय में मैं गंभीर किस्म की हसियों का प्रयोग करता हूॅं जिसमें कोई नदी बहने लगती है फिर तो उन्हें तैरना पड़ जाता है। फिर घातक उलाहना...
‘आपन उमर नाहीं देखते, इस उमर में भी जवान बने हुए हैं, अरे! ऐसा भी मजाक का जो उमर से मेल न खाता हो, देह झूल गई फिर भी मन नाहीं झूला, फुदुक रहा है डार डार। देह झूल गई समझ लो मनउ झूल गया, अब तो पटेंग न मारो, मेढक की तरह टें, टें, पानी बरसे, नाहीं बरसे।’
‘पानी तो बरसेगा ही, कहीं दूर से लाना तो नहीं, सोचो तो अगर मेढक टेंटें न करे फिर करे का?, रही बात देह की, देह कभी नहीं झूलती, झूलती नेह है, नेह झूल गई समझ लो देह झूल गई। जैसे, जैसे नेह झूलती और टूटती जाती है वैसे,वैसे देह भी अपने आप झूलती और टूटती जाती है। सारा खेल तो नेह का है। नेह है कि वह कभी झूलती नहीं, उमर बढ़ने के साथ जवान होती जाती है। तोहैं का मालूम कि तोहैं देख कर हमें कैसा जान पड़ता है?’
‘अरे! एक रोटी और ले लीजिए, अब ई का है कि आप चार रोटी भी नहीं खा सकते। जवान बनते हैं, जवान का दो ही रोटी खाते हैं? आपको मोटापा वाला रोग भी तो नाहीं है कि खुराक कम करना जरूरी है। नाहीं, नाहीं हम समझ सकती हूॅॅ कि आप मोटे नाही हैं, आपका मन ही मोटा गया है और जब मन मोटा जाता है नऽ, सारी चीजें पातर हो जाती हैं..’ कहते हुए पत्नी ने थाली में एक रोटी और डाल दिया। उनका मानना है कि बुढौती की धमक उस पर नहीं होती जिसके पेट में अन्न की गमक होती है।’
थाली में रोटी पड़ जाने के बाद तो मुझे उसे खाना ही था। ज्योंही मैंने रोटी का टुकड़ा किया, पत्नी दही की कटोरी ले आयीं..
‘का लीजिएगा दही में, काला नमक, जीरा या चीनी’
चीनी ही ठीक रहेगी, खाना मीठा तो बातें मीठी, बातें भी तो बहुत करनी है। फिर पत्नी कुछ नहीं बोलीं, सीधे चली गईं किचन में, वहां गांव से आये हुए आम पानी में भिगोए हुए थे, उसे काटना था फिर अचार बनाना था। किचन से बाल्टी लेकर आते हुए मैंने उन्हें देखा, बाल्टी में आम थे, आम देखते ही मुझे लगा कि गांव से कोई आया होगा, ये आम तो हमारे अपने बगीचे के दीख रहे है.. ‘गांव से कोई आया था का?’ मैंने पूछा..
‘नाहीं तो, का मतलब? सपना देख रहे हैं का, गांव से कोई काहे आयेगा आप तो हालै में गांव से आये हैं नऽ’
‘कहां का आम है यह?’ मैंने पूछा
बजार का, काल्हु खरीदे हैं, अगल बगल वाले खरीद रहे थे, हमहूॅं खरीद लिए। एक दो दिन में गांव चले जाइए, सारा आम तोड़वा कर ले आइए नाहीं तऽ एकउ नाहीं बचेगा, सब तोड़ा जायेगा, लड़कियों के यहां भी तो भेजना होगा नऽ’, पुरबहवा अमवा तऽ खूब बउराया था, फरा है कि नाही..’
‘ओहर हम कहां गये थे, बाबा के दुआरे से ही लौट आये’ किसी अपराधी सा मैंने जबाब दिया
‘हां हां आप ओहर काहे जायेंगे, खेत कियारी, बाग, बगइचा से आपका का मतलब? ओहर जाने से तो घिनाते हैं, खेतवा काट लेगा नऽ आपको, वइसे भी पंचाइत से फुर्सत मिले तब नऽ’। पत्नी फुसफुसाईं और ठमक कर बड़े वाले चाकू से आम काटने लगीं जैसे आम के साथ वे मेरी आदतों को भी काट रही हों। नमक, मसाला मिला कर अचार बनाने के लिए। मुझे मालूम था कि चाकू से आम काटना आसान नहीं होता, उसकी गुठली मजबूत होती है। खेत वाला अप्रत्याशित प्रसंग न उभरा होता तो मुझसे कहतीं..
‘अमवा काट दीजिए नऽ, हमसे नाहीं कटाता है’ पर काहे कहतीं.. मेरी कुछ
आदतें उन्हें काफी बुरी लगती हैं कि गांव जाने पर भी मैं खेत की ओर नहीं जाता। दिन भर दरवाजे पर ही बैठा रह जाता हूॅ। कोई न कोई आता ही रहता है। कभी किसी काम के लिए तो कभी केवल हाल अहवाल के लिए। खेत पर जाना तो मैं चाहता हूॅॅ पर वहां जाने पर भारत सरकार की तमाम योजनाएं मन में कुलबुलाने लग जाती हैं..। यह प्लाट इतना खूबसूरत, लगभग लगभग वर्गाकार है, अगर इसमें एक बड़ा कूंआ खुद जाता, एक जेनरेटर होता उसके साथ मोनोब्लाक भी तो यह प्लाट उत्पादन का भंडार हो जाता। धान वाली कुछ कियारियां समतल नहीं है, उनका समतलीकरण हो जाता, जिससे कियारियों में बराबर पानी रुकने लगता फिर तो धान की पैदावार कम से कम दस फीसदी बढ़ जाती।
ऐसा नहीं है कि मैं खेत पर जाता ही नहीं, दोे महीने पहले ही तो गया था। वहां पहुंचते ही कुछ लोग अपने घरों से बाहर निकल आये, उनसे हाल अहवाल हुआ। उनमें से एक ने बताया कि मेरे खेत से कुछ लोग मिट्टी निकाल कर ले गये हैं, एक आदमी एक बांस काटकर ले गया है, कोई सूखी डार ही उठा ले गया जो दस फीट लम्बा रहा होगा।
सभी की बातें सुन कर मैं खामोश रहना ही उचित समझता हूॅ। शिकायतें हैं, तो हैं, वे रहेंगी भी। बिना नाम जाने किसी को आखिर कैसे रोका जा सकता है, या किसी से पूछा जा सकता है। एक बार मैंने एक शिकायत करने वाले एक जन से पूछा था..
आपने देखा था क्या?
‘हां हां देखा था’
फिर रोकना चाहिए था, आपने उसे रोका होगा
‘नाहीं,रोका’
रोकना चाहिए था नऽ, अगर रोक देते तब मेरी लकड़ी बच जाती, मेरा नुकसान नहीं होता।
‘मैं कैसे रोकता, मालिक नहीं हूॅं, वह हमारे ऊपर टूट जाता, साफ बोलता तूं कौन है रे! फिर हम का बताते ओसे?’
‘बोल देते मालिक ने कहा है..’
‘हम कैसे बोलते ऐसा? आपका आदमी जो आपका खेत कियारी देख रहा है वह बोलता ही नाहीं, वह कभी बांस तो कभी लकड़ी बांटता रहता है। आपके गांव वाले डीह से भर भर झोला तरकारी लाता है, अपनी पट्टीदारी में बांटता है, हम लोगन को मांगने पर भी नहीं देता। उस आदमी से बात हो ही रही थी कि किसुन भी वहीं चला आया जो मेरे खेत की रखवाली करता है। मैंने उससे पूछा..
कौन लकड़ी उठा ले गया किसुन! और कौन मिट्टी? तोहें कुछ मालूम है का?
‘एक बांस तो इहय काटे हैं, दूसरे पर टंगारी मार दिए थे, कइसहूॅं हमने देख लिया फिर रोका। बंसवा ले जाने के लिए, हमरे से खूब झगड़ा किये, हम नाहीं जाने दिए, तब से नाराज रहते हैं हमरे पर, टोला में घूम घूम कहते हैं कि ओकरे बाप कऽ बांस तो था नाहीं, फेर काहे रोका, हम देख लेंगे ओके, मालिक को आवै तऽ दो।’
जाने कितनी बार किसुन इस तरह की शिकायतें मुझसे कर चुका है। ऐसी शिकायतों के समाधान भी तो नहीं हैं.. किसुन के ही नहीं मेरे वश का भी नहीं है कि इस तरह का काम करने वालों को तक्षशिला का विद्यार्थी बना सकंू.. वे जो कर रहे हैं, वही करेंगे पर जो विचारवान हैं वे ऐसा कभी नहीं करेंगे। किसुन से मैं साफ कह चुका हूॅॅ कि इस तरह के मामलों में कभी झगड़ा, रगड़ा नहीं करना, अगर ऐसी बातें हुआ करें तो सीधे परधान के पास चले जाया करो या जोखन दाऊ के यहां, फोन पर मुझसे बात करा दिया करो। वैसे भी किसुन काफी संतुलित और गंभीर लड़का है, किसुन की बातें सुन कर शिकायत करने वाले को तो सांप सूंघ गया।
उसका चेहरा बदल गया, पहले दमक रहा था जैसा कि फर्जी वालों का होता है। किसुन के बताने के बाद मुझे शिकायत करने वाले से पूछना ही था..
‘का हो तूं बांस काटे थे काऽ’
शिकायत कर्ता चुप तो चुप, वह का बोले, कैसे बोले कि बांस नहीं काटा था। इस बात को किसुन मुझसे पहले ही बता चुका था फिर भी मैंने शिकायतकर्ता से पूछना उचित नहीं समझा था। रही होगी कोई जरूरत, काट लिया होगा, अगर वह बांस मांगता तो मुझे देना ही था, मैं इनकार तो करता नहीं.। यह सब तो मालिकाने का रगड़ा झग़ड़ा है, और मालिकाना कभी खतम होने वाला नहीं, वह वहुरुपिए की तरह किसिम किसिम का रूप धर कर धरती पर प्रकट होता रहेगा, मेरी तरह, दाऊ की तरह। धरती रहेगी उस पर उगी या उगाई हुई चीजें भी रहेंगी पर उन चीजों का अपना कोई वजूद नहीं होगा। वे किसी न किसी मालिक के अधीन ही होंगी। जाहिर है इस धरती का कोई भी आदमी इस वहियात अधीनता से बाहर हो ही नहीं सकता। मालिकाने में स्वाधीनता की खुशबू का भ्रम है तो उसकी हिफाजत में सŸाा की संप्रभुता की अकड़। फिर भी जाने क्या है कि हमें मालिकाना चाहिए ही चाहिए। मैंने उसे सहेजा..
अगर ऐसा आप लोग ही करेंगे तो मेरा खेत खलिहान बचाएगा कौन? मैंने देखा कि शिकायत कर्ता के चेहरे पर कुछ धुआं धुआं सा है।
मुहब्बत का हार
यह सच है कि गांव जाने पर अगर कोई विशेष काम नहीं हुआ तो मैं खेत की तरफ नहीं जाना चाहता। अगर खेत फसल से नहीं लह लहा रहा हो तो उस तरफ का जाना, केवल मेड़ें ही तो दिखेंगी तनतनाई और खेतों को जकड़ी हुई। फिर तो लगता है मन की हरियाली छटपटा रही है। मुझे खेतों की परवशता देख कर तकलीफ होती है। फसलें लगी होती हैं तब मन भी फसलों की तरह हिलोराता रहता है। फसलों का लहराना, भीतर तक किसी दैवीय संगीत का गुंजायित होना सारा कुछ मुझे ताजा बना देता है फिर तो कुछ समय के लिए फसलों की पैदावार का हिसाब किताब भूल जाता हूॅ। इस साल कितना लाभ हुआ खेती में, कुल कितना खर्च हुआ दोनों का हिसाब किताब अगर मन में चलता रहेगा फिर तो फसलों की सारी मादकता उड़नछू हो जायेगी। पेट और मन का झगड़ा कभी समाप्त होने वाला नहीं है। पेट को जो और जितना चाहिए उससे अलग और कुछ अधिक ही मन को चाहिए। उन दोनों को एक साथ जोड़े रखने का काम फसलें अगर न करें तब तो किसान खेती करना ही छोड़ दे, कोई दूसरा विकल्प चुन ले। कुछ हो सकते हैं जो खेती में लाभ का प्रतिशत देखें, सभी नहीं..
अगर कभी मैं फसलों से खाली खेत की ओर चला गया तो लौटते समय मैं या तो किसी गूढ़ कविता की तरह बेजान हो जाता हूॅॅ या ओबरा की उन पहाड़ियों की तरह जिन्हें बहुत ही निर्ममता से गिट्टियों में तब्दील किया जा चुका है, तथा आज तक किया जा रहा है। घर लौटते समय पत्नी को कोसना, मैं चाहूॅं भी तो नहीं भूल सकता, हर कदम पर उन्हें कोसता रहता हूॅ.. यह क्या है कि..
‘खेत की ओर चले जाइए, धमक बनी रहती है, लोग समझते हैं कि मालिक निगरानी करते रहते हैं, कभी भी आ सकते हैं, खेत अनाथ नहीं हैं, कोई है जो इन्हें दुलारने वाला है’
मेरी समझ में नहीं आता कि यह जो मालिकों वाली धमक है, वह है का चीज? जिसे मालिक या मालिकिन धमक समझते हैं, वह महक तो नहीं जिन्हें सूंघते ही मजूर घिना जाता है। फिर भी मालिक समझता है कि उसकी धमक के कारण मजूर सहम गया है। वह सहमता नहीं, वह घिनाता है बुरी तरह। यह उसकी घिन ही है जो कहीं कहीं हादसे का रूप धर लेती है। मैं अप्रत्याशित हादसों को निमंत्रित करना बेवकूफी मानता हूॅं तद्नुसार खुद को एक ऐसे सांचे में ढालने का काम करता हूॅं जिससे किसी से दुआ सलाम न बन्द हो..। चाहे स्थिति अनुकूल हो या विपरीत। अब तक तो बिना किसी तनाव के समय पार कर चुका हूॅॅ, आगे क्या होगा सारा कुछ भविष्य के हाथ में है। मुझे यकीन है कि जीवन जीने के तरीकों में अगर विनम्रता की भूमिका हो तो विपरीतताओं को अनुकूलताओं में ढालना कुछ आसान हो जाता है। यह अलग बात है कि खेत की ओर जाने से लगता है कि मेरे पास भी है कुछ, एकदम से गया गुजरा नहीं हूॅ। खेत के स्वामित्व की गांठ इस मामले मे भली जान पड़ती है। कि मालिक हूॅं, लेकिन बुरी भी कम नहीं लगती अगर मालिक नहीं होता तो गोमटी लगाता तथा पान बेच कर भी काम भर का कमा लेता। पर मालिक हूॅं, लोग मालिक समझते भी हैं, वह तो मुझे पता है कि मैं किस तरह तथा किस बात का मालिक हूॅॅ, खानदानी जमीन का, और क्या है? मालिक साबित करने के लिए मेरे पास। खेती से साल भर का घर खर्च भी तो नहीं चलता। अगर मित्रों ने मेरी अकिंचनता पर दया नहीं की होती तो क्या मैं खेती की ताकत पर बैंक का कर्जा चुका पाता?
हिसाब है उसका, पत्नी को सारा कुछ मालूम है। पांच साल में ही दस हजार का कर्ज तीस हजार हो गया। आर.सी. कट गई। आर.सी. वारंट से कम नहीं होती। तहसील का अमीन पकड़ कर तहसील के हवालात में डाल सकता है, चौदह दिन के लिए जिसकी जमानत भी नहीं होती। यह अंग्रेजों का बनाया कानून है, कोई अपराधी हो न हो, लगान का बकायेदार तो होगा ही, पकड़ कर डाल दो हवालात मंे.. जमीनदारों या अपने विरोधियों को इसी कानून के द्वारा अंग्रेज हवालात में ठूंसा करते थे।
मुझे मालूम है कि किसुन की सहभागिता; खेती तथा अन्य कामों में अगर मुझे न मिल रही होती तो मेरा गांव जाकर दस पन्द्रह दिन टिकना तथा खेती के तामझाम को संभालना मुश्किल होता। गांव पहुंच जाने पर मुझे इस बात की चिन्ता नहीं रहती कि दूध कौन लाएगा, कहां से लाएगा, रामगढ़ बाजार कौन जायेगा, रसोईं का सामान खरीदने या किसी को बुलवाने के लिए। धान की फसल में यूरिया का छिड़काव कौन करेगा, मेड़ें जो वारिश के कारण टूट गईं हैं, उन्हें कौन बांधेगा? घर तथा घर के बाहर वाले मन्दिर के आस पास की सफाई कौन करेगा। किसुन के ऊपर मेरी पराश्रयिता ने एक तरह से मुझे इतना कोढ़ी बना दिया है कि मैं सोच भी नहीं सकता कि सारा काम मुझे कर लेना चाहिए। किसुन जैसे सहायकों पर आश्रित रहना खुद को मुर्दा बनाना है। कभी कभी मैं इस सवाल से परेशान हो जाता हूॅं कि किसुन की आर्थिक विवशताओं का यह जो अवांक्षित लाभ मुझे हासिल हो रहा है क्या यह मानव सभ्यता के लिए कलंक जैसा नहीं है? इतना कुछ सोचते गुनते हुए भी किसुन को मैं इन दायित्वों से अलग नहीं कर पाया। यह किसुन की आन्तरिक महानता ही है कि वह मेरे लिए मेरे जिस्म का एक हिस्सा बन चुका है, और मेरे लिए विध्वंशक आत्महीनता कि मैं उसे अपने लड़के के बराबर का दर्जा नहीं दे पाता हूॅॅ। मैं भी वैचारिकता की तमाम सीमाओं से पार जा कर केवल यह प्रमाणित कर रहा हूॅॅ कि पुत्र पुत्र होता है तथा पुत्र मोह जैसा रोग भी मालिकाने वाले रोग की कमजोर डाल ही है, वृक्ष तो मालिकाना है ही। सारी दुनिया इसी वृक्ष के नीचे बैठ कर सुस्ता कर, लेट कर अपने जीवन के उत्सवों को मना रही है।
पिछली बार जब मैं गांव गया हुआ था तब मुझे किसुन का साथ कुछ दिनों के लिए नहीं मिल पाया था। किसुन अपनी ससुराल गया हुआ था। नवरात्रि का महीना चल रहा था। देहाती क्षेत्रों में यह महीना दैव आह्वान ले कर आता है, किसिम किसिम के पूजा पाठ आरंभ हो जाते हैं, कहीं किसी देवता की तो कहीं काली, भगवती की तो कहीं भूत, प्रेत, डाइन, डीहवार वगैरह की। गांवों में हर गली में तथा हर दीवार पर देवताओं के प्रति आस्थाओं के पोस्टर टंग जाते हैं.. एक तरह से वहां आस्थाओं के कौतुकों को देखा व महसूसा जा सकता है। किसुन भी उसी आस्था के कारण अपनी ससुराल गया हुआ था जिससे कि वह अपनी पत्नी की ओझइती करा सके।
उसने मुझे एक बार बताया भी था..
‘ओझा ने उसकी पत्नी की जान बचा दी, वह तो रात में पगला जाया करती थी।’
मैं केवल इतना ही जानता था कि उसकी पत्नी बीमार रहा करती है। बाद में मेरी पत्नी ने असल बात बताया। मुझे बहुत ही अचरज हुआ, क्या ऐसा भी रोग होता है जो किसी को इतना बेवश कर दे कि वह सारा कुछ भूल जाये और किसी ब्लूफिल्म का पात्र बन जाये। किसुन की पत्नी रात होते ही ब्लू फिल्म का पात्र बन जाया करती थी और किसुन था कि परेशान परेशान हो जाया करता था। वह घंटे दो घंटे भी चैन से नींद में नहीं उतर पाता था, वह ज्यों ही नींद में उतरता या उतर रहा होता उसकी पत्नी दैहिक उŸोजना की क्रीड़ा आरंभ कर देती। थका, मादा दिन भर काम पर जांगर खटा चुका किसुन उस समय बेवश होता। एक दो बार की बात कुछ और होती है, उसके लिए वह भी उत्साहित रहता ही, उमर थी, अभी अभी तो उसने जवानी की नदी में तैरना शुरू किया है, नदी है कि उफनिया गई है। उफनियायई नदी में कितना तैरे वह? देह टूटने और खंड, खंड होने तक तैरना उसके लिए मुश्किल होता। उसकी पत्नी थी कि नदी में तैरने वाली न हो कर नदी बन जाती, किसुन को लहरों में तो कभी भंवर में ही डुबोने लगती आखिर किसुन बढ़ियाई नदी में कितना तैरता? वह पगला जाता समझ न पाता कि उसकी पत्नी को का हो गया है? कुछ न कुछ तो पर्दा खुले लोगों में भी होता है, फिर वर्जनाओं की धूप तो हर जगह पसरी होती है, बदरियां भी होती हैं.. इन दोनों के भीतर जीवन के उत्सवों को आयोजित किये जाने की संभावनाएं भी रहती हैं, पर किसुन की पत्नी के लिए वर्जनाओं का कोई मतलब न था। वह तो किसुन को देखते ही बाढ़ में बदल जाती थी, और बाढ़ भी ऐसी जो बहा ले जाये या डुबो दे गहरे में.. किसुन अक्सर उस बाढ़ में डूब जाया करता था पर ओझा ने उसे बाढ़ में डूबने से बचा लिया। कथित ओझा ने किसुन को बाढ़ में डूबने से कैसे बचा लिया? मैंने पूछा था पत्नी से। उन्होंने बताया था..
मुर्गा, बकरा, तपावन तथा पूजा के लिए तीन हजार रुपया लिया, तमाम तरह की पूजा किया, ओझइती की, फिर उसका भूत भाग गया। उसे किसी पापी भूत ने पकड़ लिया था। पत्नी यह नहीं बता सकीं कि वह पापी भूत कहां का था और किसुन की पत्नी को कैसे जकड़ लिया था? क्या उसके लिए दूसरी औरतें नहीं थीं, उनमें से किसी को छांट लेता। वह बेचारी तो केवल एक औरत है, औरत की चमक तथा दमक से दूर, उसके पास मर्दाें को खींच लाने वाली चमक भी तो नहीं, देह तो उसकी हिलती डुलती तथा किकुड़ियाई रहती है, लगता ही नहीं कि वह औरत है तथा उसकी देह पर औरतों के आकर्षण थिरक रहे हैं, फिर उस हरामी भूत ने किसुन की पत्नी को ही क्यों पकड़ा?
उसी समय मुझे मजाक सूझा था..
‘मुझे मिलना है उस ओझा से, किसुन के साथ जाऊंगा उस ओझा के पास’
‘आप काहे जायेंगे उसके यहां?’
’उससे काम है, मुझे मिलना है भूत से। वह बहुत ही प्रतापी भूत है, इतिहास के राजाओं महाराजाओं या सम्राटों की तरह, मुझे उससे मिल कर मालूम करना है कि क्या उसकी दुनिया में कोई ऐसा भूत भी है जिसकी जाति न हो तथा मजहब न हो, अगर ऐसा हो तो बताओ, मुझे उसकी सेवायें लेनी हैं।’
‘कैसी सेवा?’
‘सेवा तो सेवा, सेवा की किस्में तो होती नहीं’
‘फिर भी बताइए नऽ’
बहुत ही गंभीर हो कर भूत की सेवा शर्तों को मैंने बताया। पत्नी हसी में डूब गईं इतना डूबीं कि उनकी आंखों में लोर आ गये। साथ ही साथ मैं भी हसने लगा, हसना था ही, लोग देखते तो चकरा जाते, काहे हस रहे दोनों, वह भी ऐसी हसी।
हसी खतम होने के बाद पत्नी ने सहज भाव से स्वीकारा कि आप ठीक बोल रहे हैं, उसे रोग ही था कोई, एक बार आपने कोई रोग बताया था, का नाम था ओकर?
‘हां खियाल आया हीस्टीरिया नऽ, आपके एक दोस्त की मेहरारू को हुआ था कभी, एकर मतलब हुआ कि लड़िका, बच्चा हो जायेगा रोग खतम।’
‘तो आप उस भूत की सेवा मेरे लिए लेना चाहते हैं ताकि मैं वह हो जाऊं जो आप मुझे बनाना चाहते हैं, आप डूबना चाहते हैं नदी में, एक बुन्नी पानी तो सह नहीं सकते, नहाना भी है तो गरम पानी से, चले हैं नदी में पउड़ने, कलम ले लीजिए अउर कागज पर पउड़िए, नदी में पउड़ेंगे तो डूब जायेंगे।
ये उमर में हमैं काहे नदी बना रहे हैं ? अगर बाढ़ आ गई तब का होगा मालूम है कुछो आपको..’
अरे बाढ़, बाढ़ होती है, सारा कुछ डूब जाता है ओमें, कुछ पता नहीं चलता, कि का डूब रहा है, कैसे डूब रहा है, अच्छा है किनारे पर खड़े रहिए, किनारे पर खड़े हो कर नदी देखिए, अउर आंख में देखने की जोति लेकर लौट आइए। मने में गुनिए कि पउड़ रहे हैं नदी में, इसे ही मनजाउर कहा जाता है’
अरे नहीं भाई! मैं तो मजाक कर रहा था, आपकी कूबत को भला मैं कैसे ललकार सकता हूॅं, मुझे मालूम है कि आप चाहें तो मुझे एक झोंके में ही उड़ा ले जायें, इसी लिए मन होने पर भी मैं कभी भी उड़ना नहीं चाहता। जमीन पर तथा जमीन थाम कर रहना वैसे भी मुझे काफी अच्छा लगता है। गिरने का डर नहीं रहता। मुझे नहीं उड़ना और न ही छटपटा कर गिरना।
अपनी ससुराल से पांच दिन बाद किसुन वापस लौटा। लौटने के दूसरे दिन सुबह ही मेरे घर आया। किसी ने उसे बता दिया था कि मैं गांव पर हूॅ.. यह पक्की बात है कि जब मैं गांव पर होता हूॅं फिर तो वह सुबह मेरे घर आना नहीं भूलता। वह जानता है कि उसे कहीं से दूध का प्रबंध करना होगा। दूध का प्रबंध करना मेरे वश का नहीं.. दूध का ही क्यों कोई सर सामान भी चाहिए तो मेरे लिए बहुत मुश्किल। पता नहीं क्यों गांव जाने पर अपने भीतर समा जाना मुझे बहुत अच्छा लगता है, का जाना कहीं, जहां जाओ हर जगह राजनीति की काली चादर बिछी मिलती है। यह भी चल जायेगा कि चलो चादर पर नहीं बैठेंगे, बच बचा कर निकल जायेंगे पर यही तो मुश्किल है कि कहीं जाओ और चादर पर नहीं बैठो, ताने और ओरहन मिलने लगते हैं..
‘बड़का काबिल बनता है, हम लोग घास फूस हैं का? अबही ऐंठन नाहीं गई, एकर का औकात है, जो है वह सारा कुछ जोखन सिंह का है, उनके बले फउकता है, फउक लो बेटा केतना फउकोगे?’
ऐसे तानों को कई बार मैं सुन चुका हूॅं, आज भी लगातार सुन रहा हूॅं, गांव के लोग अभी बदले नहीं हैं, अब भी उनके जेहन में जमीनदारी वाली बातें कुललबुला रही हैं, जबकि मुझे खुद नहीं मालूम कि जमीनदारी वाली बातें क्या थीं.. मैं कभी भी उन बातों तथा घटनाओं का गवाह नहीं रहा हूॅं, भला हों फिल्मों का जिनसे मुझे मालूम हुआ कि जमीनदार काफी क्रूर हुआ करते थे तथा जमीनदारी किसी अभिशाप से कम नहीं थी। जोखन दाऊ को आज भी जमीनदार माना जाता है पर दाऊ के आचरण में मैंने कभी भी फिल्मों वाले जमीनदार का रूप नहीं देखा। वे साधारण रहन सहन वाले आदमी हैं और काफी व्यवहार कुशल भी। गरीब गुरबों से भी भइया, भइया कह कर बातें करते हैं.. गांव की कथित राजनीति में उनका पहले भी दखल था और आज भी है। दिल्ली या लखनऊ की सरकारें हमेशा टूटती और बिखरती रही हैं पर गांव वाली दाऊ की सरकार जैसे पहले थी वैसे ही आज भी है और जब तक जीवित रहेंगे तब तक भी रहे शायद। या हो सकता है कि दाऊ के लिए यह आखिरी चुनाव हो, इस बार उनका प्रत्याशी चुनाव हार जाये। पर दाऊ आश्वस्त हैं..
‘ऐसा नाहीं होगा, हमार गांव दिल्ली अउर लखनऊ नाहीं है नऽ कि जो अब तक हुआ है वह टूट जाये अउर नये नये लोग नेता बनि जांये। हम का बतायें अगर हम दिल्ली में होते नऽ तऽ देखा देते कि कैसे सरकार चलती है, तूंहय नेता हो अउर तूंहय सबको लूट रहे हो। इहो नाहीं खियाल कर रहे हो कि पहिले तोहरे पास का था। मुखमंतरी चाहे मंतरी बनते ही का का नाहीं हो गया तोहरे पास। अरे भाई! एतना तऽ सोचो कि आजु कोई मूरख नाहीं है, खाली मजबूर है, मूरख होना अलग है, अउर मजबूर होना अलग। गांन्हीं बाबा का मूरख थे जो कउनो पद नाहीं लिए, देखि लो बिना पद वाले आदमी का कद, केतना बड़हर था? अउर तूं आपन देखो.. पद तऽ बड़हर होय गया पर कद माटी में सना गया’ हम गांव मे एही से कउनो पद नाहीं लिए हमरे लिए एतनै काफी है कि हमार आदमी पद पर रहे अउर हमसे सलाह मशविरा लेता रहे। भगवान का दिया हमरे पास बहुत है, हमैं पद लेकर दौलत नाहीं कमाना है। हमैं कउनो लालच नाहीं है फिर हमार का बिगड़ेगा? हमरे गले में जब तक आदमिन के मुहब्बत का हार है, हम कउनो चुनाव नाहीं हार सकते’
दाऊ आश्वस्त हैं कि जैसा वे चाहते हैं गांव में वैसा ही होगा, मुझे भी लगता है कि सुमन्त का प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पायेगा, जीतेगा दाऊ का ही प्रत्याशी।
उपन्यास वाली महिला
‘माई! माई! पापा कहां हैं रे!’
कांपती हुई आवाज मेरी नींद उड़ा देती है और मैं जग जाता हूॅं, यह तो बेबी की आवाज है। कमरे में मैं अकेले हूॅं, जगरन हो गई है। सुबह जगना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल हो गया था। रात भर अपने उपन्यास में फंसा हुआ था, दो बजे रात के बाद ही नींद आयी। समझ में नहीं आ रहा था कि उपन्यास में मैं उस आदिवासी महिला का क्या करूं जो जहां भी जाती है, नये किस्म का झगड़ा खड़ा कर देती है। उसका स्वभाव बन गया है, लड़ जाना। थाने पर वह दारोगा से लड़ जाती है। उसे जाने क्या हो गया है कि वह वर्तमान को मुठ्ठी में बांध कर रखना चाहती है। थाने के बाहर भीड़ खड़ी हो गई है और वह चिल्ला, चिल्ला कर कह रही है कि दारोगा ने उसके साथ रात भर बलात्कार किया है, लोगों को संबोधित करते हुए कह रही है कि आप भी आइए उसके साथ वही कीजिए जैसा दारोगा ने किया है, नहीं तो दारोगा से कहिए कि वह अपना जुरुम कबूले। अगर वह अपना जुरुम नहीं कबूलता है तो हम कप्तान के पास जायेंगी।
‘अब यह क्या है कि जो चाहे, जब चाहे मुझे बिछौना बना दे। दारोगा ने मेरे मरद को पकड़ कर जाने कहां गायब कर दिया है, बोलता है कि वह नक्सलाइट है। रात में ऊ हमरे साथै था। तबै दारोगा ने उसे पकड़वा लिया अउर हमैं लाकर यहां बन्द कर दिया अपनी कोठरी में..। हमारा मरद दारू चुआ रहा था और हम गाहकों को दारू पिला रही थी। किसे नाहीं मालूम कि पियक्कड़ गाहकों को संभालना आसान नाहीं होता। पता नाहीं कौन का कर बैठे, अच्छे हुए तो सब चल जाता है, नाहीं तो.... उनमें कोई कोई तो ऐसे होते हैं, जो दारू पीते, पीते देह तक नोच लेते हैं फिर हमैं उन्हें रस्ते पर लाना होता है। अरे! हम दारू चुआते हैं, पर देह थोड़ै चुआते हैं लार की तरह, अउर देह लार तो होती नाहीं कि टप टप टपकने लगे। कोई उसे चूसे। चूसना हो तो अपने घर जाओ, जेतना मन हो, ताकत हो चूसो, मेहरारू के पास तो जाते ही बरफ बन जाते होगे, उहां जोर नाहीं चलता होगा। का हमार बिआह नाहीं हुआ है? हमरो बिआह हुआ है, हम देह का सारा तमाशा जानते हैं.. हमरो मरद कभी कभी तो सांड़ बन जाता है पर अक्सर लुजुर, पुजुर ही रहता है। भहरा जाता है खटिया पर, लाश माफिक। लाश का करेगी, लाश तो फुंकाएगी ही नऽ, अउर का होगा ओकर?अरे साहब! हम दारू बेचते हैं, देह नाहीं बेचते, जो देह बेचती होंगी ओकरे इहां जाओ। हमरे इहां काहे चले आये? फिर हमरे मरद को काहे पकड़ लिए, थाने का खर्चा बर्चा तो हम कइसहूॅं देते ही थे, पूछ लो साहब हमरे गांयें के गोड़इत से, ऊ सब बतायेगा सही, सही। फिर हमार देह रात भर काहे नोचे, हम तो चिल्ला रहे थे, दरोगवा को नोच, चोथ रहे थे, दो तीन जगह हमने दरोगवा को दांत से काट भी दिया है, परपरा रहा होगा, जो चाहे देख ले दरोगवा का हांथ, मन तऽ हुआ कि उहय काट लें पर मेहरारू जाति, हम का करैं, का नाहीं करैं, कुछ बुझा नाहीं रहा था।
थाने के सामने कांपती हुई भीड़ थी। भीड़ सारा कुछ सुन रही थी, देख रही थी एक महिला द्वारा किए जा रहे अभिनव किस्म का विरोध पर उसमें कोई ऐसा समर्थ नहीं था जो किसी फिल्मी हीरो की तरह आगे आता और करिश्मा करता, दारोगा को पकड़ लाता, उसे घसीटते हुए माफी मांगने के लिए विवश करता या कोई दूसरे समाधान के बारे में गुनता। वहां तो सिर्फ भीड़ थी, बेवश तथा लाचार, थाने के अत्याचारों को सुन सुन कर डरी हुई फिर भी भीड़ बुदबुदाई..। ‘बेचारी के साथ बहुत बुरा हुआ’
वैसे भी भीड़ केवल बुदबुदा ही सकती थी। भीड़ का काम ही है बुदबुदाना, इसी लिए हर जगह इस तरह की भीड़ को देखा जा सकता है। थाना, कचहरी ही नहीं, विधान सभा तथा संसद की तरफ भी भीड़ होती है जो बात बात पर बुदबुदाती रहती है। लेकिन बुदबुदाने से अलग कुछ भी नहीं..
यहां तक तो मेरा उपन्यास बढ़ चुका था, कहीं रुकावट नहीं आयी पर इसके आगे का लिखना रुक गया था। अब इसके आगे उपन्यास में मैं क्या करूं? समझ में नहीं आ रहा था कि इस तरह की परिस्थिति में मैं समाधान के किन विकल्पों को चुनू.. उस महिला को छोड़ कर दारोगा का साथ पकड़ लूं और उसे इतना प्रभावशाली गढ़ दूं कि उसका सरकार भी बाल बांका न कर सके या नारीवादियों की वाहवाही लेने के लिए महिला को ही ताकतवर बनाकर दारोगा की हत्या करा दूं और वह अपने मरद को उसके चंगुल से छुड़ा ले पर यह हिंसात्मक तथा विभत्स होता। तथा भारतीय संस्कृति के विपरीत तो होता ही। क्या करूं? कैसे उपन्यास को आगे ले चलूं? मेरा उपन्यास महिला, दारोगा, तथा महिला के मरद की त्रयी में फंस गया था। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि मैं उन तीनों की भूमिका को किस तरह से रचूं? वैसे भी मै बुकर पाने के स्तर वाला उपन्यासकार भी नहीं.. रात गहरा रही थी पर मेरा लेखक मन पतला हो रहा था। मुझे कोई समाधान नहीं सूझ रहा था जो पूरी तरह से आधुनिक होता तथा मर्खेज के जादुई यथार्थ की तुलना में अनोखा तथा सर्वप्रिय भी।
उपन्यास के इस प्रकरण को महत्व पूर्ण बनाने की मेरी चिन्ता ने मुझसे मेरी नींद छीन लिया था। मुझे लगा कि विशेष तथा अद्भुत किस्म के लेखन वाला चक्कर मेरे वश का नहीं। उसी कारण समाधान नहीं निकल पा रहा था। बहरहाल कुछ भी हो मैंने उपन्यास के कथानक को उसी स्थल पर सलाम किया और निश्चित किया कि अब नींद की गोद में चले जाना है, कथानक भाड़ में जाये तो जाये, मैं का कर लूंगा। मुझे नहीं बनना प्रेमचंद या मर्खेज। आज भी प्रेमचन्द का होरी का कर रहा है, उस जमाने में वह गाय के लिए परेशान था आज के समय में टी.वी., कार, मोटर साइकिल के लिए। नींद में चले जाने के बाद मुझे पता ही नहीं चलता कि यह दुनिया सिर्फ और सिर्फ कुछ लोगों की है, जो दुनिया पर राज करते हैं। कानून बनाते हैं, तोड़ते हैं, हमला करते हैं। वे ही जज हैं तो वे ही फौज हैं। वे हाकिम भी हैं और हुकूमत भी। ऐसे माहौल में मेरे लिए मुश्किल होता कानूनों वाली इस दुनिया में लोकतंत्र की मुस्कराहटों और अंगड़ाइयों को देख पाना। नींद में जाने के बाद मुझे कैसे मालूम होता कि बेबी मुझे पुकार रही है, बहरहाल मेरी नींद खुल गई फिर मैंने पूछा..।
‘का है बेबी! काहे पुकार रही?’
बेबी घबराई हुई थी। मेरे पड़ोसी के दरवाजे पर तहसीलदार सिपाहियों के साथ आया हुआ था, सरकारी जीप बाहर खड़ी थी। बेबी जानती थी कि मेरे ऊपर बैंक का कर्जा बकाया है जिसकी वसूली तहसील चली गई है। तहसीलदार पकड़ कर चौदह दिन के लिए तहसील के हवालात में बन्द करवा देगा। सो वह मुझे यह सूचना बताने के लिए परेशान परेशान थी।
बेबी का घबराना जायज था। गांव के कई लोगों को तहसीलदार ने हवालात में बन्द कर दिया था, उसने सुना था। वे चौदह दिन बाद हवालात से निकले थे। घबराने को तो मैं भी सुनते ही घबरा गया पर मुझे पता था कि जो होना होगा, वह होगा ही। फिर जोखन दाऊ के चलते ऐसा हो ही नहीं सकता। वही हुआ भी, तहसीलदार आया और वापस चला गया। मेरे दरवाजे पर नहीं आया और न ही मुझे वहां बुलवाया।
यह वही समय था जब मैं लगातार महसूसता था कि सरकार, सरकार होती है, वह जब चाहे जिसकी चाहे चमड़ी उतार ले। मेरी भी चमड़ी इमरजेंसी में उतर गई होती अगर दारोगा सिर्फ दारोगा होता पर वह केवल दारोगा ही नहीं था, दारोगा के अलावा भी सोचने, विचारने व गुनने वाला था। पहली बार मुझे जान पड़ा था कि कविता, कहानी लिखना पढ़ना भी आदर व सम्मान वाला काम है। दारोगा ने उस समय लोगों से मेरे बारे में पता लगाते हुए बोला था..।
‘वही नऽ लिखने पढ़ने वाला, हल्की दाढ़ी वाला, जिसकी देह हवा में लहराती रहती है, अरे! ऊ का करेगा बगावत? हम ओके नाहीं पकड़ेंगे, का होगा ओके पकड़ कर, कविता कहानी वाला आदमी जब अपने लिए ही बेकार होता है फिर ऊ जेल में जा कर का करेगा, सरकार का ओकरे ऊपर फालतू में सौ दो सौ रुपया रोज खरच ही होगा।’
दारोगा ने बहुत नाटकीय ढंग से मुझे जेल जाने से उस समय बचा लिया था और पत्नी ने महसूसा था कि बरम बाबा की मनौती ने मुझे जेल जाने से बचा लिया। हुआ यह था कि मेरी गिरफ्तारी के बारे में दारोगा ने पहले ही मुझे सूचित करवा दिया था कि सी.ओ. के साथ आकर वह मुझे गिरफ्तार
करेगा सो में तत्काल ही घर छोड़ दूं। मरता का न करता। मैं भी गिरफ्तार नहीं होना चाहता था। मेरे पास उस समय साहस की बहुत बड़ी कमी थी। हालांकि मैं अब तक इस स्थिति में नहीं हो पाया हूॅं कि बता सकूं कि मैं जेल जाने से तब क्यों डर गया था? स्मृति को दुबारा रच पाना वैसे भी आसान नहीं.. ऐसा भी नहीं था कि मैंने जेल की घुटन को नहीं झेला है। अगर उस समय मैं समझ गया होता कि जेल को खेल की तरह लेना चाहिए तथा सरकार के पास दम नहीं कि वह सारे लोगों को जेल में रख कर साल दो साल तक खाना खिला सके फिर तो आज मैं साफ,साफ कहता कि मैं कायर नहीं हूॅं। मैं अपनी कायरता को अब चाहे जितना धिक्कारूं उससे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। हालांकि उस समय मेरी कायरता अपने घर तथा रिश्तेदारों में उतनी ही महिमामंडित हुई थी जितना मेरा लेखकीय व्यक्तित्व निन्दित हुआ था। यह क्या है कविता, कहानी में गोते लगाते रहना, जिससे एक कौर भी खाने के लिए हासिल नहीं हो सकता। एक तरह से मेरी कायरता का प्रतिफल दिखावे के तौर पर मेरे लिए सकारात्मक था पर मेरे दिल तथा दिमाग के लिए उथल, पुथल वाला। मेरा लेखक मुझे बार बार धिक्कारता, फटकारता.... ‘एक अवसर मिला था तुमको, जिसे तूंने गंवा दिया, ऐसे अवसर मिलते नहीं हैं..’
पर जो होना था हो चुका था, बीते दिन लौटते नहीं.. समय के साथ मैं अपनी रची हुई परिस्थितियों में उलझता चला गया। उलझनों ने मुझे इस कदर घेर लिया कि मैं उन्हें जितना सुलझाता उतना ही उनमें उलझता जाता। पर न तो थका न ही हारा, हाथ पैर लगातार मारता रहा। समय बढ़ता रहा और मुझे अपने साथ घसीटता रहा। कभी ऑखों में ऑसू भरकर तो कभी प्यार। प्यार उधार का नहीं बच्चों के लगाव का, पत्नी के छोह का। बच्चों को देखते ही मुझे सारे दुख दर्द भूल जाते। मैं खुद परिवर्तित हो जाता फिर मुझ पता ही नहीं चलता कि यह जो मैं उलझा हुआ हूॅं, इन उलझनों को मैंने ही रचा, गढ़ा है। समय, समय पर उन्हें दुलारा, सहलाया है, बिना जाने कि यह जो हसीन माफिक दिखने वाली दुनिया है, वह हसीन नहीं है। खुरदुरी और कटीली है। हो तो यह भी हो सकता है कि मेरी अतिरिक्त चहनाओं ने ही मुझे उलझन में डाल दिया हो और जैसे तैसे सुविधाओं व सुखों के बिस्तरों पर नाच रहे लोगों को देख देखकर मैं अन्धा हो गया होऊं.. कुछ न कुछ तो यह सच था ही। सुविधाओं की ललक मुझे लगातार कमजोर बनाती रही है और मैं किसी बेचारे की तरह अपने आत्म विश्वास की परमशक्ति को क्षीण करता रहा हूॅं..
लम्बे अन्तराल तक मेरा उपन्यास अधूरा ही रहा। थाने पर अपने स्वत्व व स्वाभिमान के लिए झगड़ रही महिला के लिए औपन्यासिक स्तर पर भी मैं कुछ नहीं कर सका। वह बेचारी मेरे उपन्यास में अधूरे जीवन वाली कथा नायिका की तरह छटपटाती रही पर मैं उसके लिए संवेदना के दो चार आखर भी नहीं ढूंढ सका। जब भी कलम उठाता, कई तरह के सवाल खड़े हो जाते। महिला का कथाचित्र बनाते ही आलोचकों की कड़ुवी और भद्दी आलोचना दिखने लगती। लगता आलोचक मेरी खाल उधेड़ देंगे और प्रकाशक तो पाण्डुलिपि देखते ही लौटा देतेे। वैसे भी मैं आलोचकों तथा प्रकाशकों का दुलरुवा नहीं हूॅं, अगर होता तब बात दूसरी थी फिर तो मैं चढ़ बैठता और उस महिला को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संघर्षशील कथानायिका बना देता।
लम्बे समय के बाद अचानक एक दिन थाने वाली महिला ने मुझे घेर लिया, रास्ता रोक कर खड़ी हो गई। मैं न बांए जा सकता था न दांए, वह ठीक सामने थी तनेन और आत्मबल से भरी हुई। एक दम वैसी ही शक्ल सूरत वाली उसके चेहरे पर किसी बदलाव के लक्षण नहीं थे, जबकि होने चाहिए थे। कोई लड़की चार पांच साल बाद वैसे भी काफी बदल जाती है, शादी वगैरह हो जाये फिर क्या कहने, बदलना ही है। उसने मुझे रोका....
‘कहिए आप ही हैं नऽ उपन्यासकार, लेखक, का फर्क है आप में दारोगा में? दारोगा ने मुझे थाने पर रोका और जो चाहा कर लिया, एही खातिर ऊ थाने की नौकरियय किया है, अउर आपने का किया मेरे साथ? मुझे उपन्यास में गढ़ कर ऐसी जगह पटक दिया जहां पानी भी न मिले। आपने हमैं काहे पकड़ा? हमैं जस के तस रहने देते तो का फरक पड़ जाता, हमने आपका का बिगाड़ा था, अरे बोलिए नऽ काहे गुंग हो गये? हम महिलाओं पर दिखावे का दया करने वाले आप जैसों को हमने देखा है। जिसको मौका मिला उसने हमैं बिस्तरा बना दिया। आप काहे परेशान हैं हमरे खातिर? आप भी बिस्तरा बना दीजिए, कउन मना करता है आप को। हां अब समझी कि आप की उमर नाहीं है बिस्तरा बनाने वाली, आप तो खुदै कांप रहे हैं, आप न खुद खेल सकते हैं, अउर नहीं दूसरे को खेलने देंगे। अगर आप को मेरी हालत पर थोेड़ी भी हया है तो आप हमैं छोड़ दीजिए। हमैं दारोगा से ही, नहीं आप से भी नफरत है। आखिर आपउ भी तो मरद हैं, अउर हमैं मालूम है कि मरद, अउर बरद में कउनो फरक नाहीं होता। हमैं तऽ दोनों से लड़ना है, आप से भी अउर दारोगा से भी। दारोगा थाने में जबरी पटक देता है, अउर आप दुलार, दुलार किताब में उलटते, पलटते हुए पटकते हैं’
थाने वाली महिला उस समय कड़क थी और तनेन। मुझे लगा कि उससे बातें करना झगड़ा करना होगा सो मैं खामोश था। खामोश तो मैं ऐसे मौकों पर रहता ही हूॅं, और शायद इसी खामोशी के कारण हर तरफ बवाल है बावजूद इसके मैं अपनी खामोशी तोड़ नहीं पाया अगर तोड़ा होता तो मन को शान्ति मिली होती। अब मैं परेशान रहता हूॅं और सोचता रहता हूॅं अपने समाज के बारे में कि नहीं बदल रहा, जबकि बदलना चाहिए। लोग अपने अधिकारों के लिए भी संघर्ष नहीं कर रहे, लोग यथास्थितवादी होते जा रहे हैं, आत्मकेन्द्रित और अपने स्व में गोता लगाने वाले। मैं अब लेखन की दुनिया का मुल्जिम हूॅं तथा मैंने अपने लिए अभिनव किस्म का कटघरा बना लिया है, उसी रहने, बसने की सीमा रच लिया है। ऐसा करने के मेरे पास तर्क भी हैं हालांकि ऐसे तर्कों पर मुझे अब गुस्सा आता है, यह क्या बदमाशी है कि जो देखो, झेलो, भोगो, रचो, उसे अक्षरों के रंगमहल में सजा दो किसी हसीन परी की तरह और खुद बतौर लेखक रंगमहल की रखवाली करो। यही तो किया है मैंने अब तक, इस धारणा के साथ कि लेखक, लेखक होता है। अब यह क्या है कि जनता के सवाल पर लेखक थानेदार से भिड़ जाये, कलक्टर से मुंहाठूंठी कर ले, विधानसभा का घेराव करे, धरना, प्रदर्शन करे और चिल्ला कर नारे लगाये, जनता को जागरूक बनाये। यह सब काम लेखक के नहीं.. लेखक का काम है लिखना वह भी हजारों साल की सम्मानित कलम से। कलम के सहारे बीते कल तथा आने वाले कल, दोनों को चीर फाड़ कर रख देना है तथा वर्तमान के सामने, किसी गीदड़ की तरह उपस्थित रहना है, जिस्म के हर हिस्से को वर्तमान भले ही चीरता, फाड़ता और घायल करता रहे।
शायद यह मेरी भावुकता ही हो कि मैं पीछे देखू बना रहा हूॅं, आगे देखू नहीं बन पाया या यह भी हो सकता है कि कथित सम्मान का कोई जहरीला कीड़ा मुझे काट रहा हो कि चलो कनफेश कर लो, स्वीकार कर लो कि तुम निहायत बौनी सोच के आदमी रहे हो तथा वर्तमान के संघर्षों के प्रति किसी गीदड़ की तरह केवल हुंआ हुंआ भूकते रहे हो या गली के उस कुŸो की तरह भू, भू करते रहो जो अपनी गली का शेर समझता है।
मैं जानता हूॅं कि यह सब अचानक या अनायास नहीं हुआ था मेरी गीदड़ी वृŸिा ने मुझे ऐसा बना दिया था और आज भी कहीं न कहीं वही वृŸिा मुझे घेरे हुए है। मैं यह नहीं कहता कि बहादुरी का प्रदर्शन आग में कूदने से होगा। आग में कूदो, न कूदो पर आत्मवलिदान का साहस तो हो। अगर मेरे पास आत्मवलिदान का सहस होता तब शायद मैं कुछ और होता। थाने वाली महिला लगातार मुझे सचेत कर रही है, जागो और वलिदान के लिए तैयार रहो, समय से संघर्ष करो, केवल लिखने से कुछ नाहीं होगा। थाने पर उस महिला ने किसे गाली नहीं दी, दारोगा तो भाग गया, कहीं थाना छोड़ कर।
उपचार
थाने वाली महिला की कथा मेरे ताजे उपन्यास में फस गई थी। उसकी कथा को आगे बढ़ा नहीं पा रहा था। समझ नहीं आ रहा था क्या करूं? मुझे महसूस हो रहा था कि इस तरह के चरित्र को उपन्यास का विषय नहीं बनाना चाहिए था। सोनभद्र में तो एक से एक चरित्र हैं, अतीत से लेकर आज तक जिनके बारे में लिखा जा सकता है। यहां लोरिक की कहानी है तो आदिवासी राजाओं के करतब भी हैं। जिन्हें हूबहू उतार लेना चाहिए या थोड़े बहुत फेर बदल के साथ गढ़ लेना चाहिए। कभी गुनता, थाने वाली महिला को स्कैन्डल वाली महिलाओं के रूप में रच लेना चाहिए, जिन पर ब्लूफिल्में बन जाया करती हैं। किताबें लिख जाती हैं जो रातो रात बिक जाती हैं.. भला ऐसी महिलाओं को कौन भूल सकता है जिनके रिश्ते अपने समय के राजनीतिक महानायकों से रहे हैं, बाद में किसी त्रासद स्क्ैन्डल कहानी की तरह पूरी दुनिया में लोट, लोट कर पढ़े गये हैं।
थाने वाली महिला के साथ तो बहुत कुछ हुआ था, दुनिया के तमाम प्रताड़ितों से भी अधिक। थाने वाली महिला के साथ तो दारोगा ने देह को ही अपनी देह में घोल लिया था जैसे दोनों की देह अलग हो ही नहीं। एक तरह से अद्भुत दैहिक करतब। देह हो भी तो उस पर केवल थाने की बन्दूकें नाचें तथा बारूदी राग अलापंे, पर थाने वाली महिला किसी विश्वविद्यालय की उत्पाद नहीं थी और नहीं वह आधुनिक थी, हलो हाय का हाईब्रीड। अगर वह हलो हाय की हाईब्रीड होती तो काम चल जाता, वह उपन्यास का एक ब्रान्ड चरित्र बन जाती। उस महिला को तन्दूर वाली भी बनाया जा सकता था पर तन्दूर वाली भी हाईब्रीड थी अत्यंत आधुनिक। खुले आकाश में चहचहाने वाली, रंगीन पत्रिका की फोटो या विज्ञापन की नायिका की तरह, पर थाने वाली महिला..। वह तो गंवार थी, घुर देहाती, गोबर, माटी से सनी और पुती, उसे तो नागार्जन या निराला ही देख सकते थे या उनके जैसे समान सोच वाले, इस तरह की महिलाएं आधुनिकता के समुन्द्र में गोता लगाने लगें फिर आधुनिकता को कौन चूमेगा?
थाने वाली महिला को उपन्यास का पात्र बनाना ही मेरा गलत फैसला था पर अपने ही फैसले को कैसे बदलूं?उसमें सुधार करना भी मेरे लिए संभव नहीं था। इतना ही संभव था कि मैं उस महिला के चरित्र पर उस आदिवासी लड़की की तस्बीर चिपका देता जिसे उसके अइया, बपई ने देहलीला की वस्तु बना दिया था। वह भी तो थाने पर जा कर फस गई थी। पर मामला इतना ही नहीं था, थाने वाली महिला उस आदिवासी लड़की से आगे थी। वह कप्तान के पास जाकर सारा हाल बताया था। इतना ही नहीं उसने कचहरी जाकर हड़कंप मचा दिया था कि उसके साथ थानेदार ने जितना बुरा तथा घृणित हो सकता है, उस तरह का सलूक किया।
कचहरी तो कचहरी, वहां किसिम किसिम के वकील होते हैं, कुछ अच्छे तो कुछ बुरे, पर होते सभी वकील ही हैं। उनमें कुछ राजनीतिक वायरस के शिकार भी होते हैं, उन्हें थाने वाली महिला के चेहरे पर अदालत को हिलाने डुलाने वाला मुद्दा दिखा। वकीलों ने थाने वाली महिला के प्रकरण को समय को बेहोश करने वाला राजनीतिक मुद्दा बना दिया। इस क्रम में पहला काम वकीलों ने यह किया कि थाने वाली महिला को प्रेस के सामने एक प्रेस कांफ्रेस के जरिए उपस्थित किया और थाने पर किये गये कुकर्म के बाबत उससे बयान दिलवाया। प्रेस के बाद वकीलों ने थाने वाली महिला को अदालत के सामने भी जोगाड़ लगा कर उपस्थित कराया। सारा प्रकरण लिखा पढ़ी और कानून की धाराओं का सहारा लेते हुए उठाया गया।
जनपद की एक छोटी अदालत का एक अधिकारी, न्यायायिक परंपराओं से अलग, थोड़ा बहुत बांए, दांए चलने वाला आदमी था। वह उन कामों में भी रुचि लिया करता था जो जनहित के हुआ करते थे। अक्सर वह लोक अदालत के कार्यों को देखा करता था। न्यायायिक प्रशासन भी उसे जनहित के कार्यों में वहुधा लगाया करता था। उसे आनन्द आता था, वह कहता भी था ‘कि आदमी होने के नाते हमें हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि हम अपनी करनी से ही अपनी मनुष्यता लील न लें, हमें मनुष्यता की सुरक्षा के लिए सदैव समर्पित रहना चाहिए।’ वह खुद भी जनता के प्रति समर्पित रहा करता था।
राजनीतिक वायरस वाले वकील उस अधिकारी के मनोजगत से परिचित थे। आपसी सलाह मसविरे के बाद वकीलों ने एक प्रार्थना पत्र के जरिए उस न्यायायिक अधिकारी के सामने थाने वाली महिला को इस करने का अवसर हासिल कर लिया। न्यायायिक अधिकारी ने बहुत ही गंभीरता से महिला के मामले को सुना तथा वकीलों के तर्कों को भी। वकीलों ने तर्क पर तर्क दिया कि वह इस प्रकरण पर विचार कर सकता है, इस प्रकरण उसके क्षेत्राधिकार में है और उसे विचारण करना चाहिए। उक्त न्यायायिक अधिकारी जितना सरल और तरल था उतना ही जटिल भी। वह कानून की उलझी हुई गांठों को खोलने में माहिर था। उसने कानून की फसी हुई गांठों को खोल दिया फिर तो महिला का भला होना ही था।
वकीलों के तर्क कानूनी रूप से वजनदार कम थे पर थे जनहित तथा किसी पीड़ित की सहायता के लिए। उक्त न्यायायिक अधिकारी वकीलों के तर्क सुनकर मन ही मन हसा फिर भी मन बनाया कि वह पीड़ित महिला के लिए अपने अधिकार की सीमा के अन्तर्गत जो कर सकता है करेगा, चाहे इस कार्य के लिए उसे न्यायायिक परंपराओं से इतर भी क्यों न जाना पड़े। उसे वकीलों के प्रति सहानुभूति भी हुई कि सोनभद्र के वकीलों ने कम से कम इस पीड़ित आदिवासी महिला के प्रकरण को उठाया तो....। दूसरी जगहों
पर तो लोग ऐसे मामलों पर ध्यान ही नहीं देते। ऐसे प्रकरणों पर किसे फुर्सत कि ध्यान दे..। लोग तो अपने में ही डूबे हुए हैं, अपने में ही डूब कर स्वर्ग या नर्क तलाश रहे हैं..।
उक्त न्यायायिक अधिकारी की संवेदनशीलता व प्रेस की जागरूकता के कारण उक्त पीड़ित आदिवासी महिला दूसरे दिन ही पूरे जिले की प्रमुख खबर बन गई। थानेदार को निलंबित कर उसके ऊपर अपराध कायम कर दिया गया। महिला का साथ देने वाले वकीलों के चहरों पर जीत की चमक उभर आयी।
इतना सारा कुछ मैं अपने उपन्यास में चिपका सकता था पर नहीं चिपका सका। मैं महिला को कप्तान तक भी नहीं पहुंचा सका, किसी तरह थाने पर चिल्लाने तथा चीखने के बाद उसे रापटगंज तक ले आया कप्तान के पास चुर्क तक जाने के लिए पर उसके घर वालों ने रोक दिया यह कहते हुए कि आगे नहीं जाना। आगे जा कर का होगा?
‘हमरे घरे की इज्जत काहे बाहर लिवा जा रहे हो? वहां भी तो किसिम किसिम के लोग मिलेंगे थानेदार की तरह। देह से खलने वाले, देह महकती नहीं, देह छुआती नहीं, देह की जाति नहीं होती, मजहब नहीं होता, देह तो केवल देह होती है, बलखाती, अंगड़ाती, इठलाती।’
उसके घर वालों ने मुझे भी धूमिल वाले कटघरे में खड़ा कर दिया। जिसका सीधा अर्थ था..।
‘लेखक भी कम हरामी होते हैं का? जो तूं इसके साथ कप्तान तक जा रही, यह तुझे दारोगा की तरह भले न लीले पर चूसेगा जरूर, चूस, चूस कर आम की गुठली बना देगा’
मैं महिला के घरवालों की बातें सुन कर सुन्न हो गया, अपनी निरीहता तो जानता ही हॅू....
अरे मैं क्या हूॅं भाई? एक लेखक ही तो हूॅं, कागज कलम के साथ ही तो इसके साथ चल रहा हूॅं फिर भी आप लोग मुझे फटकार रहे हैं.. मेरा व्यक्तिगत तौर पर इस महिला से कुछ लेना देना नहीं.. आप लोगों को जानना चाहिए कि एक लेखक बहुत ही निरीह होता है वह अपने पात्रों के साथ इधर उधर कुछ भी नहीं कर सकता। मैं इसे कप्तान के पास ले जा रहा था इसे न्याय दिलाने के लिए और इसे न्याय मिलना चाहिए। दारोगा ने गलत किया है, दारोगा को दण्ड मिलना चाहिए। उसे दण्ड दिलाना मेरा ही नहीं सभी का काम है। आप लोगों को इस काम में आगे आना चाहिए, दुनिया बदल चुकी है, पहले वाला जमाना नहीं है आज। आज तो किसी को भी उत्पीड़ित नहीं किया जा सकता, सभी के समान अधिकार हैं, सभी बराबर हैं, न कोई कम न कोई अधिक।
पर मेरी सुनता कौन? महिला के घर वालों ने मेरा मुह चोथ लिया....
‘रहने दीजिए अपनी अकिल, हम आपकी अकिल लेकर का करेंगे, कर्जा की
अकिल हमैं पहाड़ थोड़ै चढ़ा देगी, आप एतनै किरपा कीजिए कि इस महिला को इसके हाल पर छोड़ दीजिए। यह खुदै इस हाल से बहाल हो जायेगी, आगे जाने पर इसका जाने का हाल हो?। हमलोग नहीं चाहते कि हमलोगन की जिनगी में थाना कचहरी आये या आप नीयर लोग आयें। हमलोगन को दोनांे से डर लगता है। कुछ लोग हमैं डंडा के जोर से चूसते है तो आप जैसे लोग पीठ सहलाकर, पुचकारकर, दुलार कर, खिला पिला कर, पर चूसते सभी हैं.. हमैं छोड़ दीजिए साहब! हम लोग आपके गोड़ पड़ रहे हैं’
महिला के घर वालों की ऐसी सोच ले कर थाने वाली महिला के साथ बतौर उपन्यासकार एक कदम भी चल पाना मेरे लिए मुश्किल था। उचित यही था कि वह खुद आगे चले, अगर वह एक कदम आगे चलती तो बतौर लेखक मैं भी उसके साथ दो कदम आगे चलता पर वह भी तो आगे चले। उपन्यास में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था। महिला की स्वस्फूर्तता भाग्य भरोसे थी। जो होना था, हो चुका था, होता वही है जो होना होता है। उसके घर वाले तो जड़ थे ही, जो होगा अच्छा होगा के दर्शन वाले, करम बाबा हमारी रक्षा करेंगे। इस संकट पूर्ण स्थिति में उपन्यास कैसे आगे बढ़ता?
आलोचकों का भय मुझे अलग से सता रहा था। थाने वाली महिला को मैं जैसे,जैसे चलना, दौड़ना सिखाता, आलोचक उसके पीछे पीछे दौड़ने कूदने लगते, थक जाने पर मुझे गरियाते....
‘साला उपन्यासकार बनता है। एक दारू चुआने वाली आदिवासी महिला को पकड़ लिया उपन्यास में और उसे कप्तान तक पहुंचा दिया। अक्षरों की गाड़ी पर बिठा कर, दौड़ाने लगा किसी रेसर की तरह। इतना तेज किस्मत के भरोसे वाले किसी पात्र को दौड़ाया जा सकता है भला! वह भी उपन्यास में, फिल्म की बात दूसरी है, पात्रों को चाहे जितना दौड़ा दो, एक अदना सा हीरो आठ दस आदमियों को मार गिराता है। ऐसा तो केवल फिल्म में ही चलता है पर उपन्यास में... फिल्म की रील की तरह पन्नों को फड़फड़ना ठीक नहीं, संभल कर चलना होता है। उपन्यास में तो एक कदम भी गलत उठा तो शीलभंग होना निश्चित है। किसी लड़की का शीलभंग होने तथा उपन्यास के शीलभंग होने में धागे भर का भी अंतर नहीं.. लेखन की शुचिता भी तो कोई चीज होती है नऽ।’
थाने वाली महिला को कप्तान तथा कचहरी तक पहुंचाना आलोचकों के लिए गंभीर किस्म का मुद्दा बन जाता। सो मैं डर गया था कि आलोचक मेरी खाल उधेड़ देंगे। यह क्या है कि एक अदना लेखक वैसा लिखे जो परंपरा में ही न हो। किसे नहीं मालूम कि हमारे गंवई समाज में विरोध या प्रतिरोध की परंपरा ही नहीं है।..
आलोचक भी बेचारे क्या करें, वे मजबूर है अपनी जनता से। किसे नहीं
मालूम कि लोकतंत्र में हर किसी की अपनी जनता होती है। वकील हों, आलोचक हों, सŸाा दल के हों, विरोधी दल के हों, लेखक, उपन्यासकार हों, चित्रकार, विमर्शकार, कलाकार चाहे जो भी हों, सभी की अपनी जनता होती है, उसी जनता में रहना, खेलना, खाना, हसना, रोना, विचारों, चिंतनों के विवाह आदि करना, कराना, सारे संस्कारों को अपनी जनता में ही तो करना होता है। वे अपनी जनता की खुशी के लिए इतना तो करेंगे ही। उक्त आदिवासी महिला को मुद्दा बना कर यह साबित कर देंगे कि भारतीय समाज घायल तथा चोटिल समाज है। इस समाज में सभ्य समाज द्वारा बनाये गये प्रचलनों के अनुसार, अपनी चोट का इलाज करने की आकांक्षा नहीं है। कम से कम भारत में तो ऐसा नहीं है कि एक बलात्कृत लड़की या महिला खुले आम बोल सके कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। यानि कि उसकी इच्छा का अनादर हुआ है। अगर वह आदिवासी है, फिर का बोलेगी? उसे क्या पता है, आदर क्या है? अनादर क्या है? बलात्कार क्या है? या क्या है सत्कार?
आज के आलोचक पहले वाले आलोचकांे की तरह राष्ट्रवाद में सिमटे, सिकुड़े तो हैं नहीं, वे वैश्विक हैं, विश्व के चिंतन मनन में रमे और जमे हुए हैं। उनके सामने विदेशी जनता होती है फिर वह मेरे इस औपन्यासिक चरित्र के पक्ष में कैसे कुछ लिखते, बोलते कि उपन्यासकार ने कुछ अनूठा किया है?
उस समय मेरे पास एक ही रास्ता शेष था, उस पर कुछ दूर तक मैं चल सकता था, शायद आलोचक भी उसे आलोच्य नहीं मानते। पर मैं जोर दे कर ऐसा कह नहीं सकता क्योंकि आलोचकों की क्षणभंगुरता के बारे में किसे नहीं मालूम। फिर ऐसे आलोचकों के बारे में क्या कहना जिन्होंने परिवर्तनीयता को विचारों का औजार मान लिया हो, और साबित किया हो कि जो जड़ होते हैं, वे बदलना ही नहीं जानते, न चाहते हैं। इसे सच बना दिया गया है कि जड़ता, सभ्यता के लिए कलंक होती है, पर मुझे बचे हुए रास्ते पर चलना ठीक जान पड़ रहा था जो मेरे उपन्यास के मूल्यों से मिलता जुलता भी था। मैंने तत्काल फैसला लिया कि मुझे महिला से कप्तान तक चलने के बारे में पूछना चाहिए, उसके घर के लोग कैसे उसके जीवन के बारे में फैसला ले सकते हैं? अगर महिला कप्तान तक जाने के लिए राजी हो जाती है फिर तो काजी बने उसके घर वालों से मैं निपट लूंगा।
मैने महिला से सीधे पूछा....।
‘तूं का चाहती है? कप्तान के पास चला जाये, दारोगा की शिकायत ले कर और उसे सारा हाल बताया जाये?’
महिला खामोश थी, जैसे उसने मेरा सवाल सुना ही न हो। बार बार पूछने पर भी उसने मुंह नहीं खोला, वह लगातार मुझे ही निहारती रही, जाने वह क्या देख रही थी, मेरे चेहरे पर किसी मस्तक रेखा के जानकार की तरह। जैसे वे घूर घूर कर मस्तक की आड़ी तिरक्षी रेखाओं को देखा करते हैं फिर बताने लगते हैं, भूत, वर्तमान तथा भविष्य। मेरे माथे को देख कर जाने क्या बताने वाली है यह महिला? कुछ बोल क्यों नहीं रही?
मैंने उससे दुबारा पूछा..
‘अरे तूं बोलती क्यों नहीं?’ फिर भी वह खामोश थी जैसे कुछ सुन ही न रही हो फिर जाने क्या सोच कर होठ चबाते हुए बोली..।
‘हमैं अब घर जाना है और कहीं नाहीं, अब आपन देह हमैं दुबारा से नाहीं चोथवाना, जहां भी जाऊंगी सभै पहिले देह चबाएंगे फिर बतियाएगें’।
उस समय मैं उसके घर वालों के लिए हसी का पात्र बन गया था, हालांकि उस समय वे हस नहीं रहे थे, जाने किस संकोच के कारण, मैं समझ नहीं सका, वे चाहते तो हस भी सकते थे, इस तरह के मौकों पर हसने वालों की तरह।
‘का तुम्हारा यह आखिरी फैसला है..।’ आखिरी बार मैंने उससे पूछा
वह खामोश थी, उसके साथ उसके घर वाले भी खामोश थे। मेरे आखिरी बार पूछने पर वे फुसफुसाये थे फिर अचानक बिना कुछ बताये कि वे कहां जा रहे मुझे अकेला छोड़ रापटगंज से निकल लिए। कहां गये नहीं मालूम हो सका, न ही मालूम करने की कोई आवश्यकता थी।
दो चार दिन बाद थाने वाली महिला के गांव का एक आदमी मुझसे मिला था, उस दिन वह भी उस महिला के साथ रापटगंज था। उससे मैने थाने वाली महिला तथा उसके पति के बारे में पूछा..
‘का हुआ उसके पति का? थाने से छूटा कि नहीं’ उसने बताया
‘अरे साहब छूटना का था, दारोगा ने उसे उसी दिन छोड़ दिया। येही बात का समझौता हुआ था दारोगा अउर उसके मरद के साथ। समझौता होने के बाद उसके मरद ने गांव के एक आदमी को हम लोगन के पीछे ओही दिन लगा दिया था। वह हमलोगन के पीछे पीछे रापटगंज तक आया अउर उसकी मेहरारू को कप्तान के पास जाने से रोक दिया। सो वह काहे के लिए कप्तान के पास जाती? उसका मरद तो थाने से ही छूट गया। येही कारण ऊ गुंग बन गई थी साहब! कहां कुछौ बोली, एक बार जो सन्नाई तो सन्ना ही गई। उसका मरद ओही दिन थाने से घर चला गया अउर दरोगा ने यह भी कहा है कि उससे दारू चुआयी, अउर बेचाई का रूपया नहीं लिया जायेगा, किसी सिपाही को एक छदाम भी न देना।’
पीड़ित महिला का थाने ने ऐसा उपचार कर दिया कि वह मेरे उपन्यास के लिए किसी ऐसे कार्टून की तरह हो गई जिसके भीतर का रखा सामान निकाल लिया गया हो और कार्टून को सड़क पर फेंक दिया गया हो।
अक्षरजीवी
बहरहाल मेरे लिए गांव तथा वहां की जगह जमीन का आकर्षण अब सिर्फ भावनात्मक है, कि हमारे पास भी है थोड़ा बहुत। इसके होने का कितना प्रतिशत योगदान मेरे सुखों में है या इससे मेरे दुखों का कितना निपटारा संभव है, इसका मूल्यांकन मेरे पास नहीं.. इस बाबत मैं केवल अनुमान कर सकता हूॅं, अपने कुछ मित्रों की बातों से जो मुझे सवर्ण होने के नाते अपने से काफी दूर रखते हैं। वे समझते हैं कि मैं उनका आदमी नहीं हूॅं, मेरे भीतर भी शोषण, दमन, अलगाव और न जाने कितने किटाणु हैं जो सवर्णोें के भीतर जन्मना पाये जाते हैं।
कभी कभी मैं परेशान हो जाता हूॅं कि मैं ऐसा क्या कर दूं जिससे मेरी जाति मुझसे काफी दूर हो जाये। जाति अगर दूर भी हो गई फिर मैं क्या करूंगा अपने धर्म का, उसे कैसे बदल सकता हूॅं? मुझे फिलहाल कोई उपाय समझ में नहीं आता, उपाय है भी नहीं शायद। जाति और योनि के दोनों कटघरे इतने खतरनाक हैं कि इनसे पार पाना असंभव है। पत्नी भी कभी कभी मुझे योनि के कटघरे में खड़ा करके मेरा मजाक उड़ाती हैं...
‘मरद हैं नऽ, चाहे जउन कह बोल लीजिए, मेहरारू होते, तब थाह लग जाता कि का होती है जिनगी? फुनगी पर टिकी होती है जान। दुई आखर पति के परेम का अगर पत्नी सुन ले नऽ, तो मन कड़क हो जाता है, खाना, पानी मिले नाहीं मिले, परेम का दुई आखर ढेर है, पर मरद उहौ नाहीं बोलता, जब देखो तनेन रहता है।’
यह दुई आखर भी अजीब है, रहता तो मन ही में है, पर जाने कहां गायब हो जाता है और इसके गायब होते ही सारा खेल बिगड़ जाता है फिर इसका पता ही नहीं चलता, जब पता चलता है तब तक देर हो चुकी होती है। मैं समझता हूॅं कि पत्नी गलत नहीं बोलतीं, वह जो उनके भीतर मरद और मेहरारू वाला भेद है, वही सारा कुछ उनसे बोलवाता है। मैं अपने अनुभवों से कह सकता हूॅं कि यह भेद है, मैं जब मरद बन जाता हूॅं तब वे खामोश हो जाती हैं, शायद समझती हैं कि ऐसे में का बोलना बतियाना। मरद और बरद में फर्क तो होता नहीं.. इसका मुझे कई बार प्रमाण भी मिला है। उपन्यास को ले कर ही एक दिन मैंने पत्नी को उपन्यास के फसे हुए स्थल का हाल अहवाल सुनाया और अपनी विवशता भी कि मैं फस गया हूॅं, कुछ सूझ नहीं रहा कि आगे क्या करूं? थाने पर फसी महिला और उसके पति के लिए क्या करूं? उपन्यास में उनकी पात्रता को किस तरह से गढ़ूं? समझ में नहीं आ रहा।
‘तो आप फस गये है उपन्यास में, अरे ई का कम है कि आप जेहल में नाहीं फसे, अगर ओमे फसे होते तऽ बूझते, जर जमानत करानी पड़ती। पर आप फसे काहे, मरद हैं कउनो जोगाड़ लगाइए, अउर निकल भागिये। आपकी बतकही सुन कर हमार तऽ पेट फूल गया। अरे! ओइसन वाला पेट नाहीं फूला, अब ए उमर में ऊ का फूलेगा? हं एक बात है, थाने वाली मेहररुआ भी तऽ गलत नांही बोल रही थी, कप्तान का करेगा, उहो तऽ ओकर भरता ही बनाएगा नऽ। एक काम आप कर सकते हैं अपने उपन्यास में, अगर नीक लगे तब ऊ ई कि ओही मेहररुआ से दरोगवा को लतियवाय दीजिए थनवै पर, चप्पल, खरपा कुछो तऽ पहिने होगी ही। नाही तऽ एक काम अउर कर सकते हैं आप..। पर थोड़ा मुश्किल वाला काम है, अब आप के जइसन लगै।’
मैं आश्वस्त था कि पत्नी मेरे उपन्यास के बहाने दिल की भड़ास अवश्य निकालेंगी, वे भी तो मरद और मेहरारू के भेद से बाहर नहीं हैं। उनकी भड़ासों से मेेरे उपन्यास के लिए भले ही प्रत्यक्ष लाभ मिले न मिले पर उनके सुझावों से उपन्यास को आगे बढ़ानेे में मदत तो मिलेगी ही। मैने पूछा..
‘काम तो बताइए कि मुझे का करना होगा उपन्यास में, चाहे मुश्किल हो या आसान।’
‘हमार बात आप मानेंगे का? सोचेंगे कि चूल्हा चौका वाली मेहरारू है, ऊ का जानेगी उपन्यास अउर कहानी की बात। जौन हम बता रहे हैं ऊ कउनो मुश्किल भी नाहीं है, कउनो मेहरारू चाहे तऽ आसानी से कर भी सकती है। अरे का है ओमे? ई तऽ तय है कि मेहरारून के संगे अइसन अक्सर घरय मकान में ही होता है, खेते खरिहाने भरसक नाहीं होता है, फिर ऊ तऽ दरोगा है, ओके केकर डर? ऊहां सुनसान होगा ही, मेहररुआ के पकड कर कउनो कमरै में ले गया होगा नऽ। बस बात बन गई। मेहररुआ अइसन करै कि दरोगवा के फांस ले, अउर जब ऊ गरमा जाय तब ओकर उहै काट ले जउने से ऊ मरद बनता है। हमार तऽ कहना है कि इहै सभै मेहरारुअन के करै के चाही, पता नाहीं काहे मेहररुआ ई नाहीं करतीं हैं, अउर कचहरी पहुंच जाती है। अब आप के ई जइसन लगै, हम तऽ इहै सोचत हई’
‘तो जैसा आप बता रही हैं वैसा ही करू..’ मैंने दुबारा पूछा
‘हं हं इहै ठीक रहेगा’ पत्नी का उŸार था। उŸार दे कर मेरे लिए चाय बनानेे के लिए वे किचन में चली गईं। मैं पत्नी का सुझाव सुन कर विचारों में उलझ गया। क्या यह एकमात्र समाधान है पीड़ित महिलाओं के लिए? और कोई विकल्प नहीं। पत्नी ने तो कभी वह समाचार भी नहीं सुना होगा कि कुछ महिलाओं ने ऐसा बदला लिया है। यह जो कानून के सुभाषित का मामला है, कि कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए, इसे कौन सुनिश्चित करेगा? अदालत, सरकार, जनता या उत्पीड़ित। उत्पीड़ितों के भी तो आत्मरक्षार्थ हक हकूक होने चाहिए कि नहीं?
मेरी विवशता थी कि मैं प्रतिक्रयात्मक समाधानों को बदला लेने के लिए अपने उपन्यास में स्थान नहीं दे सकता था। जो काम कानून का है उसे हाथ में ले लिया जाये, मुझे उचित नहीं जान पड़ता। सदैव इस बात का मैं पक्षधर रहा हूॅं कि किसी भी समस्या का समाधान न्यायायिक प्रक्रियाओं के द्वारा ही निकला जाये। पर आज का लेखन इन सब बातों को थोथा मानता है। अक्षरों को रच, रच कर क्रांतिकारी बनाया जा रहा है। आज के लेखन में भावनाओं के लिए रंचमात्र भी स्थान नहीं, पहले की तरह। पहले पात्रों की भावनाएं उनके नियंत्रण में हुआ करती थीं, उन्हें लेखक सहारा दिया करता था, उसकी पीड़ा को अक्षरों से सहलाया करता था। आखिर पीड़ित कहां कहां दौड़ेगा, वह न तो थाने जा सकता है,और नहीं अदालत। उसकी ऐसी सामाजिक स्थिति भी नहीं..। आज ऐसा नहीं है, अपनी पीड़ा के प्रतिकार के लिए पीड़ित को खुद आगे आना होगा तथा संभव समाधानों के बारे में निर्णय लेना होगा। माना जा रहा कि पीड़ित अपने लिए कुछ नहीं करेगा तो कोई भी उसके लिए कुछ नहीं करेगा।
आज के समय के अनुसार पत्नी तो ठीक बोल रहीं, मुझे उनके द्वारा बताये गये समाधान को वैसे ही उपन्यास में चिपका देना चाहिए।
लगभग दो तीन महीने तक मैं उपन्यास को ले कर अनिर्णय की स्थिति में था, कुछ रास्ता निकल नहीं रहा था। एक बार मन में आया कि उपन्यास से थाना, अदालत के झमेले को निकाल दूं और मुझे ऐसा करना भी चाहिए। बच कर रहना चाहिए इन उपक्रमों से। उपन्यास में ऐसा बदलाव करने के लिए उसे दो बार पढ़ा भी, वह भी सामान्य तरह से नहीं, किसी क्रूर संपादक की तरह से। चलो यह ठीक है कि उपन्यास से थाना और अदालत निकाल ही देना है। यह सच भी है कि लोग हर जगह जाना चाहते हैं पर थाना तथा अदालत नहीं.. भगवान से विनती करते हैं कि उन्हें थाना अदालत का चक्कर न लगाना पड़े। मैं भी थाना या अदालत क्यों जाऊं? भले ही एक कमजोर व अज्ञात लेखक हूॅं, हूॅं तो मैं भी एक आदमी ही नऽ।
इसी उठा पटक के दौरान मैं एक दिन उपन्यास पढ़ रहा था कि उसे काट छांट कर आगे बढ़ाऊं पर अचानक मुझे बिजली के करंट जैसा झटका लगा। जैसे किसी ने मुझे घायल करने के लिए करेन्ट छुआ दिया हो तथा डांट रहा हो....
‘अरे तूं यह का करने जा रहा? उपन्यास से थाना और अदालत निकाल देगा तो उसमें बचेगा क्या? यह भी सोचा है? कहीं भी देख लो थाना अदालत कहां नहीं है? तूं तो गांव का रहने वाला है, वहां की परती की तरह तुम्हारी सोच भी परती हो गई है का? वहां के बंजर की तरह तुम्हारा दिमाग बंजर हो गया है। ठीक है कि मन तुम्हारा गंवई है पर अदालत और थाना तो गंवई नहीं है, वहां आधुनिकता है, वैसे भी कानून गंवई या देहाती
तो होते नहीं। गंवई होने चाहिए कि नहीं, इस पर बहस हो सकती है। अपना गांव काहे नाही देख लेते अगर तोहरे गांव में जोखन दाऊ नहीं होते तो का होता? थाना और अदालत तोहरे गांव में गली, गली घुस कर नाच नाचते कि नाहीं, फिर पिछले चुनाव में जो हुआ था तोहैं नाहीं मालूम का? मारपीट भई थी कि नाही.. कितने दिन बीत गये, जब तूं तहसील दार की पकड़ से बचा था, नहीं ंतो चौदह दिन तहसील की हवालात में सड़ना पड़ता। आखिर तूं कैसे समझ रहा है कि कोई सभ्यता ऐसी भी हो सकती है जो जेल, पुलिस तथा फौज से अलग हो, पंचाइत वाली। थाना तथा अदालत तो हर जगह रहेंगे। मान लो तूं अपने उपन्यास से थाना तथा अदालत निकाल देगा, लाभ क्या होगा? तेरे उपन्यास पर भी तो मुकदमा हो सकता है, तुझे ही जेल भेजा जा सकता है, फिर का होगा? कुल मिला कर उपन्यास से थाना तथा अदालत को नहीं निकालो, उसी को आगे बढ़ाओ।
मेरे लिए मेरा उपन्यास, उस ऊसर भूमि की तरह होता जा रहा था जिसमें अनाज का एक दाना भी नहीं उग सकता। अगर सामान्य भूमि होती तब भी ठीक था भले ही सिंचाई की सुविधा होती न होतीं दैव सहारे खेती करता, उसे जोतता कोड़ता, बीज बोता, फसल तो कुछ न कुछ होती ही पर ऊसर भूमि में का उगेगा? उक्त उपन्यास अगर ओबरा की पहाड़ियों की तरह होता फिर तो मेरी किस्मत ही चमक जाती। मैं क्रशर वाला बन जाता, पहाड़ को गिट्टियों में तब्दील करता और गिट्टियों को नोटों मंे। मैं उपन्यास के साथ कल्पनाओं में उड़ने लगा था कि कल्पनाएं बहुत ताकतवर होती हैं, उनके द्वारा हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। लोग कहते हैं कि कल्पनांए नहीं होतीं तो विज्ञान की चमक ऐसी नहीं होती जैसी दिख रही है। आज तो विज्ञान ही असल ज्ञान है, इसके अलावा कोई दूसरा ज्ञान ही नहीं..
मुझे लगता है कि ये जो कल्पना नाम की चीज है, वह भी सभी का साथ नहीं देती। इसके अन्दर भी वर्ग भेद वाले किटाणु होते हैं। वर्ग भेद वाले किटाणु नहीं होते तो इस कथित कल्पना ने मेरी मदत की होती, मेेरे साथ होती। मेरा उपन्यास फसा पडा नहीं होता। पर क्या कहूॅं दुर्दिन में सभी साथ छोड़ देते हैं, वह चाहे कल्पना हो या परिकल्पना। कहते हैं कल्पना सरल एवं सहज तथा सभी के लिए उपलब्ध होने वाली चीज है पर मेरे लिए तो वह हमेशा ही अप्राप्य ही रही है। थाने वाली महिला कोई यथार्थ महिला नहीं है, वह भी एक कल्पना ही है, फिर भी वह लजालु बन गई, इस बारे में मैं कुछ कह नहीं सकता। अगर दरोगा को लतिया देती तो का फर्क पड़ जाता कम से कम उपन्यास पूरा तो हो गया होता। फर्क भी पड़ता तो इतना ही कि पीड़ित महिला के पति को दारोगा नक्सली वाली कोई दफा लगा कर जेल भिजवा देता या एनकाउन्टर करवा देता। इस सभ्य एवं प्रगतिशील कल्पना ने भी मेरा साथ नहीं दिया, नहीं ंतो उपन्यास में फसने जैसी कोई बात ही नहीं थी। भला अक्षरों की दुनिया में भी कोई फस सकता है? अक्षर तो सभी की सहायता करते हैं, चाहे कोई छोटा हो या बड़ा, सभी के साथ कदम मिलाकर चलते हैं पर मैं था कि अक्षर भी मेरा साथ नहीं दे रहे थे। मेरे लिए वह सिद्धांत पूरी तरह निरर्थक होता जा रहा था कि लिखो तथा लिखते जाओ, किसी भी तरह से लिखना स्थगित नहीं होना चाहिए, जब लिखा रहेगा तभी प्रकाशक मिलेगा और जब प्रकाशित होगा तब आलोचक या समीक्षक, फिर चाहे प्रशंसा करें या निन्दा, कुछ न कुछ तो होगा ही।
एक बात यह भी संभव है कि मेरी ऑखों ने ही मुझे धोखा दिया हो। जिसके कारण थाने वाली महिला के प्रशंसित तथा चर्चित रूप को मैं नहीं देख पा रहा होऊं, जिसे नामधारी उपन्यासकार वगैरह देख लिया करते हैं। यह तो निश्चित है कि सारी बातें और चीजें इसी समाज में होती हैं, पर उन्हें देखने तथा परखने में फर्क होता है, देखने का कोण होता है कि आप चीजों को किस कोण से देख रहे हैं?
यह जो चीजों को देखने तथा परखने का फर्क है, उसने मुझे अन्धा बना दिया हो और मैंने मान लिया हो कि ऐसा तो होता रहता है। कोई यही महिला थोड़े ही है जो थाने पर अपना सारा कुछ खो दे रही है, उसे लूट लिया जा रहा है। ऐसा तो सदियों से होता चला आ रहा है, कब खतम होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। अगर मैं अन्धा नहीं होता तो मुझे देख लेना चाहिए था कि उक्त महिला पहले वाली महिला नहीं है। वह आज के समय की महिला है, अपना हक हकूक छीन और बीन लेने वाली। यह उपन्यास में संभव था पर मैं था कि उपन्यास के फस जाने का बहाना बना कर रो रहा था। कम से कम मुझे तो सोचना गुनना चाहिए था कि अक्षरों से सजे धजे, उस पर थिरकने वाले कथानक आखिर कैसे फस सकते हैं जब कि किसी भाषा में अक्षरों का अकाल नहीं.. अक्षर तो गली गली भटक रहे हैं, भिखारी बने हुए हैं अपने बचाव के लिए ईश्वर से प्रार्थनाएं कर रहे हैं..
इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अक्षरों के गुण धर्म को हर जगह हर समय उचित ढंग से मर्यादित नहीं किया जा रहा, वे अब तो अपमानित भी होने लगे हैं.. ऐसा शायद तभी से होने लगा था जब से अक्षरों को किसिम किसिम की साड़ियां पहनाई जाने लगीं, उनकी लिपियां रची जाने लगीं, लिपियों ने अक्षरों की आजादी छीन ली, नहीं ंतो पहले जब अक्षर बिना परदे के थे सिर्फ और सिर्फ लिपियों में सने पुते थे तब इनके गुण धर्म शास्वत तथा बिना मिलावट वाले थे। आज तो किसी भी भाषा में एक भी ऐसा शब्द नहीं जिसमें मिलावट तथा बनावट न हो, वैसे मैं पवित्रता के आधार पर मिलावट का विरोधी नहीं, बहरहाल मुझे इन पचड़ों में पड़ने से नुकसान ही था। पचड़े भी विविध प्रकार तथा आकार वाले होते हैं, सो
मैंने निश्चित किया कि थाने वाली महिला को इन पचड़ों से बाहर निकाल कर देखूं कि क्या होता है और हकीकत में मैंने ऐसा किया भी। किया क्या करने की कोशिश की, पर कोशिश तो केवल कोशिश ही होती है, वह सफल हो जाये, संभव नहीं। थाने वाली महिला को उपन्यासों के शास्त्रीय पचड़ों से बाहर निकालने के लिए मुझे उसकी पात्रता को गंभीरता से देखना था तथा गुनना था कि उक्त महिला को उपन्यास से खदेड़ देने पर उपन्यास का विषय वस्तु कहीं किसी चालू उपन्यास का विषय तो नहीं बन रहा। जिसमें विविध किस्म के पात्र होते हैं तथा एक दूसरे को गुदगुदाते रहते हैं। जिन उपन्यासों को बड़ा से बड़ा लेखक भी अपने मुड़तारी रखता है तथा समय बिताने तथा मन को हरियाने के लिए पढ़ा करता है। यह अलग बात है कि वह इस तथ्य को छिपाता भी है कि लोग न जानें कि वह वैसी किताबें भी पढ़ता है जिससे साबित हो सके कि मन को गुदगुदाने वाली किताबें नहीं पढ़ना चाहिए, इससे ब्यंिक्तत्व में गिरावट आती है।
अन्ततः मैने बहुत कुछ सोचने गुनने के बाद निश्चित किया कि मुझे जितनी समझ है उसी के अनुरूप उपन्यास को आगे बढ़ाऊं, बाद में जो होगा उसे भुगत लूंगा। आलोचक चाहें तो मेरी खाल उधेड़ें और मेरे उपन्यास को सदी का सबसे फालतू तथा खराब उपन्यास घोषित करें पर मैं किसी भी दशा में थाने वाली पीड़ित महिला को चालू उपन्यासों के गुदगुदाने वाले पात्रों की तरह नहीं गढ़ंूगा। वह गुदगुदाने वाली कथा पात्र है भी नहीं, वह तो आज के समय की प्रतिनिधि चरित्र है, जिसका कोई साथ दे न दे, पर मैं तो अक्षरजीवी हूॅं, भला मैं उसे कैसे छोड़ सकता हूॅं?
मरदों को काहे छोड़ैं बहिन जी!
उपन्यास को अन्तिम रूप देने के लिए मुझे निश्चित करना पड़ा कि उसके ऊपर आक्रामक वौद्धिकता का विज्ञापनी लेप नहीं लगाऊंगा। उसे सहज ही बढ़ने दूंगा, सहज ही बढ़ने वाली चीजों की तरह जिसके लिए विशेष वुद्विबल और तकनीक की आवश्यकता नहीं पड़ती। मैंने यह भी निश्चित किया कि थाने वाली पीड़ित महिला की सरल एवं सहज संवेदनाओं को किसी तटस्थ दर्शक की तरह ही देखूंगा। थाने पर दारोगा के सामने इस होने पर उसे कैसा महसूस हुआ होगा, उसने अपराध शास्त्र के विधानों को किस तरह से अपने निश्छल मन में महसूसा होगा तथा सोचा होगा कि अदालत क्या होती है? कुछ न कुछ तो अवश्य ही सोचा होगा। थाने वाली महिला कोई नाबालिग महिला तो है नहीं, बालिग है, शादी सुदा है, किसी हद तक आत्मनिर्भर भी है। उसने भी अपने सुनहरे भविष्य के लिए सोचा, गुना होगा, पति, सास, ससुर तथा बच्चों के बारे में सपने देखे होंगे। थाना, अदालत, तथा प्रशासन के बारे में भी उसे कुछ न कुछ तो मालूम होगा। कुल मिला कर जीवन जीने की कलाओं के बारे में भले ही वौद्धिकों की तरह उसकी सोच न हो पर कुछ न कुछ तो सोच होगी ही। मुझे बतौर उपन्यासकार उस महिला की उन धारणाओं, संवेदनाओं को पकड़ना चाहिए जिसमें मिलावट न हो, एक तरह से मुझे उस महिला को उसकी मौलिकताओं के साथ रचना व गढ़ना चाहिए जिससे कि वह महिला मेरे द्वारा गढ़े हुए अपने प्रतिरूप को देख कर चकरा जाये। सोचने लगे कि वह किसे देख रही, हूबहू उसी के जैसा, तन की तरह मन, तथा मन की तरह तन को देखने, परखने का जादू मुझे अपने लेखन में लाना होगा।
इस प्रकार यथार्थ लेखन की जादुई चमक ने अपनी ओर मुझे खींचा, मजा यह कि मैं भी उस ओर खिंचता चला गया। यह तो बहुत बाद में मालूम हुआ कि जिसे मैं यथार्थ का जादू समझ रहा था, जिसके अनुसार लिख रहा था, वह यथार्थ का प्रतियथार्थ था, यथार्थ था ही नहीं, यथार्थ का असल जैसा दिखने वाला प्रतिरूप था। चूंकि यथार्थ तथा उसके प्रतिरूप में समरूपताओं का रसायन होता है, इसलिए मिलावट नहीं दिख रही थी। सामान्यतया मिलावट दिखा भी नहीं करती। जीवन जीने की कलाओं में शायद ही कोई समर्थ हो जो मिलावटों को देख सके या उन आहटों को पहचान सके जिससे किसी यथार्थ का विलीनीकरण एक दूसरे यथार्थ को गढ़ने के प्रयोजन से सामान्यतया हो जाया करता है। मेरे सामने एक प्रकार से नये किस्म का दुविधा पूर्ण संकट उपस्थित हो गया था, अब क्या करूं? किस ओर भागंू.. थाने वाली महिला को पूर्णरूप से देखने व जानने के लिए मैं क्या करूं? जिससे वह जैसी महिला है, जिस हाल में है, वैसी ही दिखे, उससे इतर नहीं..पर ऐसा करने में मैं समर्थ नहीं था, समर्थ होता भी कैसे उस महिला की संवेदनाएं मेरी पीठ पर लगातार मुक्के मारने लगती थीं, ताने देती थीं....
‘तूं का लिखेगा मेरे बारे में? तूं भी तो मरद जाति का है, थूथुन वाला, कहते हैं, नाक न हो तो मैला खाने वाला, तूं का जानेगा मेहरारू के बारे में कि मेहरारू का होती है। मेहरारू को तूं जब जैसा चाहता है वैसा गढ़ देता है कभी देवी बनाता है तो जरूरत के हिसाब से रण्डी। देवी बना कर माला फूल चढ़ता है, तो रण्डी बना कर जोक की तरह चूसता है, देह को बिछौना बना देता है, खुश, हुआ तो खेत बना कर जोतने कोड़ने लगता है, बेंगा डाल देता है, खेत में जब बेंगा पड़ जाता है तो कुछ न कुछ जामेगा ही। जाम जाने के बाद दूसरा बेंगा डालने के लिए उसे फिर जोत भी देता है। देखना है तो दारोगा को देख कि वह का कर रहा? फिर दारोगा को भी तूं काहे देखेगा, खुद अपने को देख ले, तोहरे मुहें में मेहरारून के बारे में विषैला लार है कि जलता हुआ लोर है। पर तोहरे पास लोर कहां से होगा? लोर तो मेहरारून के पास होता है, जो उनके दिलों को लगातार हिलोरता रहता है।’
चाहे जो हो मैंने भी निश्चित कर लिया था कि उपन्यास को किसी तरह से पूरा करूंगा भले ही आलोचक गरियायें। थाने वाली लड़ाकू महिला को वैसे ही इस करूंगा जैसी वह है। उसे उपन्यास से नहीं निकालूंगा? मैं उस आदिवासी महिला से परिचित हूॅं जो एड्स का मरीज है, शशि ने जिस दिन कार्यशाला का आयोजन किया था उसके बारे में बातें हुईं थीं.. शशि ने बताया था कि वह अपने बारे में कुछ भी बताना नहीं चाह रही थी। शशि की कोशिश पर उसने अपने बारे में बताया था फिर मालूम हुआ था कि वह एड्स की मरीज है और निरंतर दवाइयों के सेवन से ठीक ठाक भी है। उसे देख कर कोई नहीं कह सकता कि वह एक ऐसे भयानक रोग का शिकार है जो देह क्रीड़ा का प्रतिफलन होता है।
एड्स वाली महिला से मिलना सहज था क्योंकि शशि जब चाहती उससे मिलवा देती पर मैं उससे मिलना नहीं चाह रहा था। किसी और कारण से नहीं सिर्फ इसलिए कि उससे मिल लेने के बाद तो कोई भी उसे अक्षरों से नहलवा लेगा, अक्षरों की पवित्रता के लेप से उसे सजा संवार देगा या विलोमी शब्दों के मायाजाल में फसा कर घिनौना बना देगा, मैं ऐसा करना नहीं चाहता था। मुझे पता था कि उससे मिल लेने के बाद मैं बहुत ही सहजता से उसे वाक्यों में रच व गढ़ लूंगा पर उसमें मजा नहीं था। वह एक कोशिश तो होती पर बेकार और बेकार कोशिश का कोई प्रयोजन नहीं। मजा तो तब था जब उससे बिना मिले ही उसे कागज पर उतार कर अक्षरों से रचता व गढ़ता। एक कलमकार के नाते मैं द्वन्द में था, द्वन्द यह कि उससे मिल कर उसे गढ़ंू या बिना मिले ही। मिल कर उसे रचूंगा तो मेरी कल्पना आहत होगी और कल्पना को आहत करना, उसे जख्मी बनाना खुद को जख्मी बनाने जैसा होगा। आत्मवेदना का एक कठिन रूप। वेदना तो वेदना होती है, उसमें अगर मगर का दखल नहीं होता। वह तर्क के सारे क्षेत्राधिकारों से बाहर की चीज है, एकदम निर्पेक्ष।
मुझे कल्पना के सहारे उड़ने का अवसर मिला था, जिसे खोना जीवन जीने ही नहीं लिखने की कलाओं को भी खोना था। सो ऐसे अवसर को मैं खोना नहीं चाहता था जो भले ही मुझे उपन्यास के बहाने मिला था। जाहिर है ऐसे अवसर मिलते ही कहां हैं? किसी पात्र को रचने, गढ़ने तथा उससे संवाद स्थापित करने का या उसके साथ हसने मुस्कराने या रोने का ही। मेरे लिए कल्पना की उड़ान भरना काफी मनोरम और चिŸााकर्षक था। मैं कल्पना की ताकत से देह के कृत्रिम या प्राकृतिक कौतुकों से खेल सकता था। देह के उŸोजक कोतुकों के स्वावलंबन तथा सक्रियता को समीप से निहार कर तन को ही नहीं मन को भी हिलते डुलते देख सकता था, चोरी से उसे निहार सकता था। यह तो तय है कि मन हिल गया तो तन अपने आप ही हिलने लगेगा।
यौवन की जैविक कल्पनाओं ने मुझे जाने कितनी बार हिलाया डुलाया है। कभी कभी तो उसके भूकंप ने मुझे उखाड़ भी दिया है। यह अलग बात है कि प्रयास करके मैंने अपनी यथस्थिति बचा ली है पर उखड़ तो गया ही था। लोग जानें न जानें मेरे यथार्थ को कि कैसे उखड़ा, उखड़ा तो कहां गिरा? क्या हुआ मेरा? फिर कैसे खड़ा हुआ या जहां जमा था वहीं फिर कैसे जम गया? लोगों के लिए भले ही मैं अचरज बन गया होऊं पर मेरे लिए कुछ भी अचरज जैसा नहीं था। मैं तो सारा कुछ जानता हूॅं अपने आप के बारे में, मैं क्या हूॅं, यह जानना केवल दर्शन का विषय नहीं है बल्कि दर्शन तथा प्रदर्शन दोनों को एक दूसरे से अलग रखना भी है, तभी तो अपने बारे में जाना जा सकता है।
अपने बारे में जानना अचरज नहीं? यौवन, यौवन होता है, किसे नहीं मालूम कि परिपक्व व क्रूर वर्जनाएं यौवन के छन्दों व रागों को गाने, बजाने से नहीं रोक सकतीं, यौवन तो गायेगा ही, नाचेगा थिरकेगा, झूमेगा, मुस्कराएगा, कभी खुद पर तो कभी प्रकृति पर। खुद से चिढ़ हुई तो प्रकृति की गोंद में चला जायेगा, प्रकृति का उपहार अगर उसे नहीं मिला तो खुद को उपहार बना कर यौवनोत्सव के हसीन करतबों में डूब जायेगा, खुद को प्रकृति के हवाले सौंप देगा, प्रकृति तो प्रकृति होती है, वहां नाते रिश्ते नहीं चलते, वहां वर्जनाए नहीं चलतीं, वहां न जय है न पराजय, न ही वहां वर्जनाओं की हिंसक तानाशाही ही है।
लगा कि मुझे ऐसे अवसर को कस कर पकड़ लेना चाहिए तथा इसके एक एक रेशे को अलग अलग करने की कोशिश करनी चाहिए जिससे कि मानव सभ्यता की आंखों से देह के दाह और उसकी लीला के असली रूपों
को देख व महसूस सकूं। ऐसा करना तन तथा मन के रसायनों का पान करना होता, पान करने से ही मालूम होता कि तन में मन के लिए कितना भूगोल सुरक्षित है तथा मन के लिए तन में कितना?
मन को जांचो तो तन में ज्वाला, तन को छुओ तो मन बेमन, एक अचरज भरी स्थिति, मुस्कराती हुई सभ्यतांए भी रोने लगें, तन तथा मन दोनों सभ्यता की जकड़न से बाहर फलांगते, डांकते, कूदते। तन का मन पर नियंत्रण नहीं, मन का तन पर नहीं, दोनों अपनी अपनी स्वायतता की जंग लड़ने के लिए तैयार, दोनों एक दूसरे के आमने सामने, मरने मारने पर आमादा। इस जंग में कौन विजेता होगा, कौन पराजित कहना मुश्किल। जंग तो जय, पराजय पर ही टिकी होती है, तन तथा मन की इस जंग ने एक बार फिर मेरे लेखक मन को फसा दिया।
थाने वाली महिला के पास तन था, उसी तन पर दारोगा उछल रहा था, महिला का मन उसके तन से अलग हो गया था वैसे तन भी तो एक तरह से उसका नहीं रह गया था, दारोगा ने उसे बन्दी बना लिया था, बन्दी तन तथा विस्थापित मन का खेल ही तो वहां चल रहा था। दोनों को पराजित करने का काम दारोगा कर रहा था किसी दूसरी सभ्यता को जन्माने के लिए। वैसे भी दारोगा महिला के मन पर कब्जा काहे जमाता, उसे तो अपने पुरुषार्थ का आदिम व्याकरण लिखने के लिए महिला का कामोŸोजक तन चाहिए था, वह भी कुछ समय के लिए। देहयज्ञ के बाद तो दारोगा महिला को खुद उठा कर कहीं फेंक देता। घर में सजा कर रखने के लिए उसे एन्टिक थोड़ै बनाता।
इससे अलग थी एड्स वाली महिला। वह देह तथा दिमाग दोनों के बाजार में खड़ी थी। पहले उसके साथ जो हुआ था, हुआ था, सारा कुछ जबरिया था, बाद में उसने स्वतः देह से दिमाग को निकाल दिया और नंगी तथा खुली देह को बाजार के हवाले सौंप दिया। देह को बाजार के हवाले सौंपने के बाद वह हसती पर उसकी हसी दिमाग तक न जा पाती, दिमाग तक उसकी हसी जाती भी कैसे? दिमाग उसकी हसी को किसी खाली कार्टून के डिब्बे की तरह बाहर फेंक देता और चिल्लाता....
‘अरी देह! देख तूं अपनी औकात, तूं ही तो दिखती है सभी को, गदराई, मांसल तथा यौवन की कांति से सजी संवरी, कामाध्यात्म के किरणों को बिखेरती, बाजार में नाचती थिरकती।’
अपनी देह पर वह हसती तथा उसकी सीमा समझती, आखिर, कितने समय तक बाजार में रहेगी? यौवन का बाजार तो पल, पल में अपना रूप बदलता रहता है, इसे बासी होने में देर नहीं लगती। उन्माद की मांद में कब तक यौवन के कौतुकों को सुरक्षित रखेगी? देह क्रीड़ा लायक देह नहीं, पीड़ा लायक मन नहीं, कहां जाओगी आखिर? इस रोजगार ने उसे कभी हसाया नहीं, वह हसती भी थी तो रोजगार की सुरक्षा के लिए तथा अपनी घृणा को
प्रमाणित करने के लिए। अब तो वह बदले की आग में किसी के भी सामने अपनी देह परोस देती है। शशि ने उसे समझाया था..।
‘देख लौंगी, तूं जो कर रही है, वह अब न कर, तूं लोगों को अपनी तरह का रोगी बना रही है, उन्हें मौत के मुंह में धकेल रही है, जाने कितने परिवार बर्बाद हो जायेंगे, बच्चे औरतें तक मरीज हो जायेंगे, इस रोग से जकड़ा आदमी जीवित नहीं रह सकता उसे अपनी उम्र से पहले मरना होता है, भले ही दवाइयों के जोर से वह सबेरा देखता रहे, बस इतना ही’
शशि की सलाह सुन कर लौंगी खूब हसी, हसती रही काफी देर तक, शशि समझ नहीं पा रही थी कि लौंगी काहे हस रही? इसमें हसने वाली बात तो नहीं, यह तो मनन करने की बात है, फिर भी लौंगी हस रही आखिर काहे हस रही? पूछा शशि ने
‘काहे हस रही रे! इतना, इसमें हसने की का बात है?’
‘हसने की बात ही तो है बहिन जी! इस सलाह पर हसी नहीं छूटेगी फिर किस बात पर हसी छूटेगी, लड़की हसी, बूझो फसी। हम हस रहे हैं समझ लीजिए कि आप की बात में फस गये। अरे बहिन जी! अब हमैं दुनिया जहान की का फिकिर, दुनिया रहे चाहे जाये। हमैं जब मालूम हुआ कि हमैं एहि तरह का रोग लग गया है, अब हमरे देह पर जो भी नाचेगा, कूदेगा, चोथेगा वह मरेगा। हमार मन करम बाबा पर झूम गया। वाह रे बाबा! तूंने हमार सुन लिया, एक कमजोर मेहरारू की गरज, तोहरे दरबार में सुन ली गई, अब थाना कलक्टरी हमार गरज सुनै, नाहीं सुनै, हमैं तनिको चिन्ता नाही..’
‘मरज का नाम अउर काम सुनते ही हम अस्पताल से घर भागे, सीधे करम बाबा को माथा नवाने, घरे पहुंच कर हमने करम बाबा के नाम पर सिरनी चढ़ाया। डीहवार बाबा के चौरा पर गुड़ का परसाद चढ़ाया। मरज का नाम सुनकर हमैं तनिको डर नाहीं लगा था कि हमार जिनगी दो चार साल की है, मर जाना है, का है हमरे पास डरने के लिए, बाल, बुतरू भी नाहीं हैं, हमने जान बूझ कर बिआह नाहीं किया। बिआह करेंगे बाल, बुतरू पैदा होंगे, उहौ तऽ हमरे नीयर देहियंय बेचेंगे या जांगर खटायेंगे। हमैं शुरुवै से मरदों से घिन थी, हमने एही से जोड़ा नाहीं लगाया, अइया बपई के साथै रह गई। सारी कमाई अइया बपई के दवा दारू में खरच हो जाती है। ‘आप तऽ जनबै करती हैं बहिन जी! एहू काम में रोज गहकी तो मिलते नाहीं, गहकी पहिले देह देखते हैं फिर लार टपकाते हैं.. लार टपक गया समझ लो बहिन जी काम हो गया। अब आपसे का छिपाना बहिन जी! हमैं गहकी मिल जाते थे। कुछ तो रोजै लार टपकाते रहते थे, आगे पीछे लगे रहते थे। पर हम ओही के संगे जाते थे जेकरे संगे जाने का हमार मन करता था। सबके साथ नाही.. सबके साथ एसे नाहीं जाते थे कि रुपया देने में किच, किच करते थे, बूझते थे कि हराम का माल है, सोन का पानी है, मार डुबकी अउर फूट। हम जो कमाते हैं, वोही से पेट परदा चलता है, हं एक बात है बहिन जी! अइया भूलती नाही है पूछना कि कारे आजु कमाने नाहीं गई, घरे बैठी रहेगी तऽ खाना कैसे बनेगा, जा जा एक दो तऽ अब्बौ मिल जायेंगे।’
‘बहिन जी ऐसा है नऽ, बुरा नाहीं मानिए तऽ एक बात कहूॅं, हमैं हर मरद ने बाघ माफिक काटा है, खाया है, पंजे से मार, मार देह फाड़ा है, चीथा है फाड,़ फाड़ कर देह की बोटी बनाया है फिर हम मरदों को काहे छोड़ें बहिन जी! अब तऽ हमैं मालूम हो गया है बहिन जी कि हमहूॅं मरदों को शमशान तक पहुंचा सकते हैं। हमरे सामने जे भी आयेगा ओकेे काट खायेंगे हम, हम ई काम काहे छोड़ें बहिन जी। हमैं तऽ करम बाबा ने वरदान दिया है कि जा अब तोहार कउनो मरद कुछ नाहीं बिगाड़ सकता जो तोहसे टकराएगा भसम हो जायेगा। परधनवा तऽ पहिलहीं भसम हो गया बहिन जी। दू, तीन साल हुआ ओके भसम हुए, हमैं नाहीं मालूम था कि ऊ काहे भसम हुआ पर अब हम बूझ रहे हैं कि ओके हमरै रोग हुआ होगा। जब चाहता था हमरे पर लोट जाता था, चाहे ओजरार हो या अन्हार।’
‘ओकर लड़िकवन भी भसम होंगे बहिन जी, देख लेना। ओकर खानदान हमैं भसम करना है। हमैं जउने दिन मरज के बारे मे मालूम हुआ ओही दिन किरिया खाये कि परधनवा के लड़िकवन को फासना है, अब तऽ ऊ दुन्नौ फस गये हैं हमरे जाल में, हमार किरिया करम बाबा फलित कर रहे हैं, बारी बारी से। दुई ठो तऽ लड़िकवै हैं परधनवा के, दुन्नौ को देही की माया में फसाना है, ओन्हैं भी एही रोग से मारना है बहिन जी! हम खुदै ओन्हन से आंख नाही मिलाते थे, पर अब तो मिलाना ही है।’
‘अब आप को का बतायें बहिन जी आप खुदै जान लो, मेहरारू जेके चाहय फसाय ले, मरद अउर बरद दुन्नौ पर जवानी का जूआ रखो, अउर जेहर चाहो ओहर घुमाय लो। एक दिन परधनवा के दुन्नौ लडिकवे अब उहै देखेंगे जउन हम ओन्हय देखायेंगे, उहै बोलेंगे जउन हम बोलवाएंगे। अब हमय एकय बात कऽ कसक है बहिन जी, ऊ दरोगवा मिलि जाता तऽ हम ओहू के लपेट लेते, पर जाने कहां ओकर बदली हो गई है पर ओके हम खोज रहे हैं।’
देह-दाह
लौंगी को समझाते बुझाते शशि परेशान हो गई पर लौंगी थी कि रŸाी भर भी बांए दांए नहीं हो रही थी, वह बदले की आग में थी, हर हाल में बदला लेना है, वह काहे बदला नाहीं ले? यही उसकी समझ में नहीं आ रहा था।
लौंगी का मानना था कि उसके बारे में तो किसी ने नहीं सोचा। लेखपाल, अमीन, सेकरेेटरी ही नहीं स्कूल के महटरवा ने भी नहीं सोचा कि लाैंगी खिलौना नाहीं है, जब चाहा खेला और फेंक दिया। उसके साथ सभी खेलते रहे, उसकी गदराई देह पर गदर करते रहे, देह की बेमिसाल कदर। परधान तो परधान था, उसने लाैंगी की जवानी और कसी हुई देह को जैविक उर्जा का कारखाना बना दिया। कामोद्दीपन के संसाधन की तरह लौंगी परधान के इशारे पर नाचती रही। वह विरोध भी तो नहीं कर सकती थी परधान का, उसकी बपई, अइया भी चाहते थे कि लौंगी रुपयों की तरह भंजती रहे। भंजती थी लौंगी, भंज, भंज कर नोट बनती थी, उसकी अइया कहती थी..।
‘करम बाबा सबको लौंगी की तरह बिटिया दें, उसके एक, एक रोंया का मोल है, रांेया, रोंया पर उसके नोट है, लोग भौंरा बने अगल बगल घूमते रहते हैं.. सब परधान की किरपा है, नाहीं तऽ हम खाये बिन मर जाते।’
गांव में सरकारी कर्मचारियों का सरकारी काम काज के सिलसिले में आना जाना लगा रहता था। उनमें जो रसिया होता था उसके लिए परधान लौंगी को बिछावन बनवा देता था। एक बार तो लौंगी बी.डी.ओ. की गोद में थी। परधान ने उसके सामने उसे परोसा था। वह अधेड़ था, उसकी सूरत आदिवासियों की तरह थी, कोहड़ौरी की तरह उसकी नाक चेहरे पर चिपकी हुई लगती थी जैसे बेल्डिंग की गई हो। वह बी.डी.ओ. था, परधान के लिए बड़ा अधिकारी, एक तरह से पूरा देश और उसका सŸााधीश। बी.डी.ओ. के सरकारी आवास पर जाते समय पहली बार लौंगी कार पर बैठी थी, उसके पहले वह कार पर नहीं बैठी थी। कार पर बैठना उसे अच्छा लगा था। बी.डी.ओ. के अवास पर लौंगी कुछ देर में ही पहुंच गई थी।
बी.डी.ओ. अकेले रहता था जबकि उसका आवास काफी बड़ा था। उसमें आठ दस लोग आराम से बस सकते थे। लाैंगी ने बी.डी.ओ. को देखा वह कुछ गुम सुम जैसा दिखा, खुद में खोया हुआ। लौंगी को बी.डी.ओ. की गुमसुमी से मतलब नहीं था, वह तो वहां देह फैलाने के लिए गई थी, बी.डी.ओ. के चेहरे को पढ़ने नहीं। वह उछलता रहे तो ठीक, भीतर भीतर रोता रहे तो ठीक। उसे याद है कि पहली बार उसकी देह परधान ने जबरन नोचा, चोथा था, उसकी अइया ने ही उसे परधान के हवाले किया था। देह फैलाने तथा बिछाने के लिए उसे कभी तीन सौ तो कभी चार सौ रुपये मिल जाते हैं, इतना कमाने के लिए उसे दो, तीन मरदों को अपनी देह पर लोटवाना तथा कुदवाना पड़ता है। पहले तो देहलीला के बाद देह ही नहीं रह पाती थी जिधर छूओ, सुन्न और सन्न, मरी हुई मछली माफिक। अब ऐसा नहीं है उसने देह साध लिया है, सामने वाला चाहे जितना छटपटाये, उछले कूदे, जो चाहे नोचे, दबाए, चूमे चाटे, लौंगी पर असर नहीं पड़ता। वह पत्थर की मूरत की तरह अबोल तथा अडोल रहती है बिना किसी संवेदना तथा उत्साह के।
इस काम के लिए लौंगी खरा सौदा करती है, एक रुपया न कम न अधिक, पर अपने किसी ग्राहक को उदास या निराश नहीं करती, सोचती है कि ग्राहक खुश और मस्त रहंे। कामोŸोजक क्रियाओं के सहारे वह ग्राहक को इतना उŸोजित तथा आवेशित कर देती है कि ग्राहक अपना पुरुषार्थ पल भर में ही गवां बैठता है। बी.डी.ओ. अच्छा आदमी निकला। एक रात का पांच सौ रुपया देगा। उसने दरवाजा बन्द किया और बिस्तरे पर जा पहुंचा, लजाते हुए उसने किसी गैर पेशेवर की तरह लौंगी को अपने पास बुलाया। आओ इधर..।
‘तुम्हारा आवास बन गया है?’..। उसने पूछा। प्रशासन का कुछ तो अतिरिक्त प्रभाव पड़ेगा।
‘नाहीं’,
यह लौंगी थी, अपनी शर्मीली उर्जा तथा सिकुड़ी गरीबी के साथ।
‘काहे?’ फिर सŸाा का रोब उछला
बी.डी.ओ. ने लौंगी को गोद में सिकोड़ते हुए प्रेम से पूछा.. कामोत्सव के क्षण में भिन्नता कहां?
लौंगी बी.डी.ओ.की बाहों में सिकुड़ी हुई थी, फिर भी उसकी देह के उŸोजक प्रदेश जस के तस़ थे तथा बी.डी.़ओ. उन पर काबिज होने की उत्सुकता में था। बी.डी.ओ. पहले जैसा नहीं दिख रहा था। कामोŸोजना की कांति से वह चमकने लगा था, पर वह चमक विनम्र नहीं थी। बी.डी.ओ. मादकता की अतिरिक्त गर्मी से मर्द बन जाने के बाद भी भद्दा दिख रहा था। लौंगी देह के रहस्यों को जानती थी कि मेहरारू देखते ही मरद का लार बहने लगता है और इतना बह जाता है कि बकाया काम के लिए लार रहता ही नहीं। जबकि काम बहुत रहते हैं..। कामोŸोजना की प्रकृतिक कांति को बचा कर खेलने की कला सभी मर्दों को नहीं आती। मरद को अहसास भी नहीं होता कि मेहरारू का लार बहेगा तब का होगा, वह बेचारी कहां जायेगी। उस समय किससे भीख मांगेगी कि हमें लार दे दो, हमें भी टपकना है ओस की बूंदों की तरह टप, टप। लोर की बात अलग है, हर मेहरारू लोर वाली होती है। कामोŸोजना की कांति को सुरक्षित रख पाने के हिसाब से उसने जाने कितने मरदों को देखा है, सभी लुज, लुज, क्षण भर की जोश और होश तो जैसे पहले से ही गायब रही हो।
लौंगी को देह के कामजनित रहस्यों का ज्ञान समय की क्रूरता से हासिल हुआ था। वह इस ज्ञान का प्रयोग बहुत ही संयम से करती, तथा खुद को कामोŸोजना के ज्वार से बचाए रखती है। उसे मजा आता है सामने वाले को हांफता देख कर। कामोŸोजना के ताव के साथ दृढ़ता का बर्ताव करने में हालांकि उसे थोड़ी परेशानी होती है पर अब तो उसकी आदत बन गई है कि मरद उसकी देह से चाहे जितना खेले उसकी दृढ़ता नहीं टूटती। जब वह चाहेगी तभी उसकी दृढ़ता टूटेगी। वह अपनी इस आदत पर खुश होती है तथा उन मरदों पर हसती है जो उसकी देह पर लोट, पोट कर रहे होते हैं..
‘का मिल रहा इन्हें? चाम से खेल व चूस कर गर्मी उतारते हैं, शायद देह की गर्मी को रोक पाना सबके वश का भी तो नहीं’
लौंगी बी.डी.ओ. की बाहों में किसी छुई मुई की तरह सिकुड़ गई, एक दम ढीली ढाली, बी.डी.ओ. जिधर चाहे उधर उसे हिलाए डुलाए, चूमे चाटे, बी.डी.ओ. ने पूरी ताकत से उसकी देह के एक एक हिस्से को अपनी देह से जोड़ा, आवश्यकतानुसार उसे तोड़ा मरोड़ा, चारो दिशाओं में उसने कामोŸोजना की लेजर किरणों को फैलाया, लौंगी थी कि दृढ़ थी हालाकि वह बी.डी.ओ. की कामक्रीड़ा में किसी बफादार सहयोगी की भूमिका निभा रही थी जिससे बी.डी.ओ. को आभास न हो कि वह किसी मुर्दे से खेल रहा है पर भीतर ही भीतर गुन भी रही थी कि उसे अपने देह ताप को भाप में उड़ाना नहीं है। काम तो करना ही है फिर तो ताप को तोप कर रखना ही होगा।
एक बार उसे महसूस हुआ था कि बी.डी.ओ. की देह से उसे खेलना चाहिए, ऐसी चिकनी और सजी हुई देह गांव में मिलती नहीं.. बी.डी.ओ. के होठों को चूमना ही नहीं काट लेना चाहिए, उसके गालों पर ऐसा निशान छोड़ देना चाहिए कि वह हमेशा याद करे कि एक थी लौंगी....
उसे बी.डी.ओ. के साथ किस तरह का बर्ताव करना चाहिए, एक रखैल, पत्नी, या वह जो है, वैसा। लौंगी विचारों में थी तभी उसने महसूसा कि बी.डी.ओ. शिथिल हुआ चला जा रहा है, उसकी बाहों की जकड़ ढीली पड़ चुकी है और उसकी देह आज़ाद हो गई है।
अरे यह का हुआ? का खेल खतम, नाहीं नाहीं ऐसा नहीं होना चाहिए, खेल तो अब शुरू होना है....
अरे साहब! का हुआ? का काम खतम? काहे ऐसा हो गये हैं, अपना पांच सौ रुपयवा तो वसूलिए, ऐसा कैसे चलेगा?
लौंगी ने बी.डी.ओ. को कस कर जकड़ा..
अरे साहब! काम खतम करिए, काहे छोड़ रहे हैं, हमैं कउनो जल्दी नाहीं है, हम सबेरहूॅं जा सकते हैं, इहां से’
बी.डी.ओ. को पता था कि ऐसे समय में वह अशक्त हो जाता है, उसकी दैहिक अशक्तता उसे नर ही नहीं रहने देती। दैहिक संबध तो उसके लिए महज उŸोजक भावना है, तमाम दूसरी भावनाओं की तरह। औरतें उसे प्रभावित करती हैं पर उसके पास औरतों को प्रभावित कर लेने जैसे गुण नहीं.. वह देह से शिथिल नहीं है पर मन से काफी शिथिल है। मन की शिथिलता तन को भी शिथिल बना देती है। पत्नी के निधन के बाद उसके मन का भी निधन हो चुका है, खासकर इन मामलों में.. तन भूखा है तो रहा करे, उसकी भूख, मन ही तो मिटायेगा। मन का क्या है, वह तो उछलता रहता है खासतौर से कमजोर मन, उछलना उसका गुण धर्म है। उसी उछाल के कारण उसने लौंगी को बुलवाया था। लौंगी को, बुलवाना बेकार हुआ, मन और तन दोनों ने साथ नहीं दिया। दोनों ने उसकी देह छोड़ दिया, एक बांए जाता तो दूसरा दांए, एक नैतिकता का मंत्र पढ़ने लगता तो दूसरा दैहिक वर्जनाओं के सहारे मोक्ष जाने के बारे मे गुनने लगता, कम से कम अगला जनम तो ठीक ठाक हो। इस देहलीला को उसकी मृतक पत्नी देख रही होगी..।
बी.डी.ओ. ने लौंगी को मुक्त कर दिया..।
लौंगी तूं जा सकती है अब, इस साल तेरा आवास अवश्य बन जायेगा। ले ये पांच सौ रुपये हैं....
अरे साहब! हमैं रुपया नाहीं चाहिए, आपने काम किया ही नाहीं, फेर काहे के लिए रुपया दे रहे हैं, फोकट का रुपया हमैं नाहीं चाहिए साहब’
‘नहीं, नहीं रख इसे, तोसे का मतलब काम हुआ कि नाहीं, तूं तो मेरे पास आयी ही, तुझे जो करना था तूंने किया, यह तो मेरा मामला है कि का हुआ, का नहीं हुआ।’
‘नाहीं साहब! अइसन हमसे नाहीं होगा, अब हम ईहां से बिना काम के जायेंगे भी नाहीं, हम जायेंगें तभी जब काम होगा’
लौंगी अड़ गई। जाने वह कौन सी प्रेरणा थी कि लौंगी को विवश हो जाना पड़ा, लौंगी उसे कभी नहीं समझ पाई। वह सिर्फ इतना समझ पाई कि बी.डी.ओ. ऊपर से जैसा दिखता है एकदम चक चक, ताजा तथा उŸोजक भी पर भीतर से वैसा नहीं है। वह टूटा तथा बिखरा हुआ है। लौंगी को बी.डी.ओ. में पहली बार अपनापन दिखा था, उसे लगा था कि इस आदमी के साथ वह अपने को बांट सकती है तथा बंटने पर हस भी सकती है। अचानक लौंगी बदल गई, काम देवता वाले कथानक की तरह। फिर तो बी.डी.ओ. का आवास अचानक देहोत्सव का मंडप बन गया और बी.डी.ओ. तथा लौंगी दोनों एक दूसरे का रसायन।
पर ऐसा यूं ही नहीं हो गया, लौंगी ने बी.डी.ओ. को काम क्रीड़ा की मौलिक क्रियाओं में काफी गहरे तक डुबो दिया, देह को ऊपर, ऊपर ही मत देखो, ऊपर क्या है, कुछ नहीं केवल मांस तथा उसके मांसल उतार चढ़ाव, झील तो नीचे है, गहरी और गहरी, देह के सारे रहस्य वहीं हैं, वहां उŸोजना के
कौतुक नहीं हैं, वहां चिर शांन्ति की मादक लहरे हैं, एक को छुओ तो सारी लहरें मन को गुद गुदाने लगती हैं..
बी.डी.ओ. समझ ही नहीं पाया कि हो क्या रहा है और वह किस दुनिया का नागरिक बनता जा रहा है? जो किसी रहस्य की तरह ही नहीं, अद्भुत तथा मनोरम भी है। इस तरह की नागरिकता तो उसे कभी नसीब ही नहीं हुई। पत्नी के जमाने में भी उसे ऐसे अवसर कभी नहीं मिले। उस समय उसे आनन्द तो मिलता था पर इस तरह का आनन्द जो आनन्द के भी ऊपर हो, यह क्या है? उसे नहीं मालूम। बी.डी.ओ. डूब गया। उसने देह की ऐसी सक्रियताओं.. को कभी नहीं देखा था। विवाहित होने के बाद भी उसे देह के भूगोल में पाये जाने वाले अनमोल तथा रहस्यमय मानसिक खनिजों के बारे में पता नहीं था। देह के अंतरंग तथा बाह्य अपनत्व भरे साक्षात्कार का सामना, उसने कभी नहीं किया था।
लौंगी को भी अच्छा लगा जितना किसी वैद्य को लग सकता है, जब वैद्य मरने वाले आदमी को दवाओं के द्वारा भला चंगा कर देता है। उसने बी.डी.ओ. को गंभीरता से देखा। बी.डी.ओ. के चेहरे पर पुरुष होने की कांति देख कर वह झूम उठी हालांकि उसका झूमना देह यज्ञ के दुबारा आयोजन के निमिŸा नहीं था उसका प्रयोजन सिर्फ यह था कि वह चाहे तो पुरुष को पुरुष बना सकती है जैसे कि उसने बी.डी.ओ. को बना दिया। वह मन ही मन हसी भी कि उसने आज जाना है कि स्त्रियों के लिए मर्द क्यों आवश्यक होता है? अभी तक तो वह आधी अधूरी औरत ही थी। आज उसे संपूर्ण औरत बनने का परम सुख मिला। वह भी देह यज्ञ की सामग्री बन कर खुश, खुश थी अभी तक तो केवल खिलौना थी, खिलौने की तरह बजती थी, थिरकती तथा नाचती थी।
बी.डी.ओ. खुश, खुश था, उसे जान पड़ा कि वह जीवित तथा सचेत है तथा उसकी दैहिक कुशलताओं का सर्वनाश नहीं हुआ है जो उसे पुरुष बनाती हैं.. वह प्रयास करे तो वह भी दैहिक कलाओं के सुखों व अनुभूतियों में गोते लगा सकता है तथा मन की झील में उतर कर निर्वाध तैर सकता है। उसने पहले की तरह नहीं, देह यज्ञ के योगी की तरह लौंगी को गंभीरता से देखा। लौंगी, लौंगी नहीं थी, वह बदली हुई थी किसी ज्योति की तरह आमंत्रण देती तथा पास बुलाती, खींचती। उसके अगल बगल नरम धूप थी तथा मन की शीतल हवाएं.. उसने सरसराहट महसूसा यह हो क्या रहा है, वह भीतर भीतर क्यों स्पंदित हो रहा है? यह स्पंदन किस लिए? क्या वह तटस्थ नहीं रह सकता? लाैंगी तो पहले भी लौंगी ही थी जब यहां आयी थी तब तो किसी हलचल ने उसे हिलाया नहीं अब यह हलचल किस लिए?
लोंगी को अपने पास तथा नजदीक पाकर उसने सोचा था कि भूख मिटा लेगा, उसने कोशिश भी किया पर भूख ही गायब हो गई थी जैसे मर गई हो। मरी हुई भूख का कोई अर्थ नहीं.. लौगी परोसी हुई थाली थी, वह देख रहा था कि थाली में उन्माद के धरोहर हैं, जो मनोहर हैं, उसे इस तरह के मनोहरों का रसपान करना चाहिए, पर मंुह खुले तब नऽ। मुंह तो सिल गये थे। पहली बार वह देह की असमर्थता तथा इनकार का सामना कर रहा था, जबकि उसकी देह न तो शिथिल थी, न ही कमजोर। शायद मन की कमजोरी उसे कमजोर तथा असमर्थ बना रही थी। भोग व संभोग के बीच आपसी सहभागिता का अभाव उसके लिए अखरने वाला था। वह देख रहा था अपनी इच्छाओं की दुखद मृत्यु तथा हताश करने वाला प्रतिफल। वैसे भी देह खुद बहुत सी बातों को स्वीकारती नहीं, वह उतना ही स्वीकार करती है जितना उसे ग्राह्य होता है। देह उल्टी करना नहीं जानती, खाया और थूक दिया, वहां यह नहीं चलता। स्वीकार तो स्वीकार, नहीं तो इनकार तथा धिक्कार भी। अब वह धिक्कार चाहे किसी को कितनाहूॅ दुख दे उससे देह पर कोई फर्क नहीं.. यही मन और तन का पवित्र द्वन्द भी है तथा उसका हासिल भी। इस लीला में द्वैत नहीं चलता मन कहीं, तन कहीं यह सिर्फ कहने की बातें हैं।
लौंगी बी.डी.ओ. के लिए काम की देवी बन चुकी थी आराध्य तथा पूज्यनीय। उसने लौंगी को धन्यवाद दिया तथा उसकी प्रशंसा किया....
‘अब मैं महसूस रहा हूॅं कि मुझे जीना चाहिए। मैं तो पत्नी कि निधन के बाद टूट गया था, मेरा मन खंड, खंड बंट गया था, होते हुए भी मैं नहीं था, मैं जो था वह दूसरा मैं था थका, हारा, टूटा तथा खंडित। मेरे लिए रंगीन मौसम या इठलाती, गुनगुनाती बदरियों का कोई अर्थ नहीं था। अर्थ तथा व्यर्थ के बीच झूले हुए आदमी की तरह मैं कभी अर्थ की तलाश करता तो कभी व्यर्थ को ही अर्थ मान लेता। मैं समय को निर्णित करने की स्थिति में नहीं था। तेरे इस क्षणिक साथ ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया कि जीवन जिया जा सकता है, हसते तथा खिलखिलाते हुए’ एक बात पूछंू लौंगी... ‘क्या तुम मेरा साथ दे सकती हो? मुझे तेरी सहानुभूति और दया चाहिए’
‘का कह रहे हैं साहब? का करेंगे एक बदनाम का साथ ले कर, आपको तो जाने कितनी लौंगी मिल जायेंगी’ लौंगी ने साफ बताया
‘नहीं नहीं तूं अपनी बता, मुझे तेरा साथ चाहिए, मैं निवेदन कर रहा हूॅं, हाथ जोड़ रहा हूॅं कि तूं मेरा साथ दे, अगर तूं चाहे तो मैं तेरे साथ घर भी बसा सकता हूॅं’, बी.डी.ओ. रिरियाया
‘नाही नाही साहब! हमैं अब घर नाहीं बसाना, अब हमार देह बसाने लगी है ऐसे में घर का बसाना। घर तो साहब तबय बसता है जब देह सुवास छोड़य, दिल अउर दिमाग में फरक नाहीं रहय। ईहां तो न दिल का पता है न दिमाग का, अउर देह तो दह बन गई है। एम्में जेहर देखो ओहर दह ही दह है.. आप तऽ जनबै करते हैं साहब! दह में दाह ही दाह होते हैं, अब ऐसे में हम का करेंगे घर बसा कर।’ लौंगी ने बी.डी.ओ. के प्रस्ताव को नकार दिया, उसे नकारना ही था।
बदला
कुछ लोग लौंगी को प्यार व आदर देते थे। हालांकि वे लोग भी लौंगी की देह खरीदते थे। उसे रोग हो गया है जानने के बाद लाैंगी उन लोगों के पास नहीं जाती। बी.डी.ओ. के पास तो कŸाई नहीं जाती। उसे खुशी हुई थी कि बी.डी.ओ. की बदली हो गई है और वह किसी दूसरे जिले में चला गया है।
कहते हैं होनी को कौन टाल सकता है? एक दिन बी.डी.ओ. खुद उसके गांव चला आया और उसे कार में बिठा कर शक्तिनगर ले गया। पहले तो लौंगी ने इनकार किया... ‘नहीं जाना है’, बी.डी.ओ. लौंगी को अपने साथ ले जाने के लिए ही जौनपुर से सोनभद्र उसके पास आया था फिर वह काहे नहीं ले जाता उसे? लौंगी की अइया सुन रही थी कि लौंगी बी.डी.ओ. के साथ नहीं जाना चाहती थी, उसकी अइया ने उसे टोका..
‘काहे रे! साहब के साथ काहे नाहीं जा रही? ओतना दूर से आये हैं साहब! जा चली जा, एक दू दिन की ही तो बात है, साहब तोहके घरे छोड़ ही देंगे, कमाई भी हो जायेगी। इहां आखिर छुछुआती ही रहेगी नऽ, एकरे संगे तऽ ओकरे संगे’
विवश हो कर लौंगी को बी.डी.ओ. के साथ जाना पड़ा। लौंगी नहीं चाहती थी कि बी.डी.ओ. को उसका रोग पकड़ ले। बी.डी.ओ. उसे केवल घुमाने के लिए तो नहीं ले जा रहा, वह देह का खेल खेलेगा जरूर सो वह उसके साथ नहीं जाना चाहती थी। बी.डी.ओ. को उसके बारे में कुछ नहीं मालूम कि उसे का हुआ है, नहीं तो वह खुद ही उसे साथ नहीं ले जाता। वैसे उसके रोग के बारे में किसी को कुछ भी नहीं मालूम, सो उसका कारोबार भी चल रहा है, मालूम हो जाने के बाद तो वह खेत का ढेला बन जाती एकदम बेकार।
लोंगी ने अपने बैग में कुछ जरूरी सामानों के साथ कंडोम भी सहेज कर रख लिया और बी.डी.ओ. की कार पर सवार हो गई किसी अफसराइन की तरह। शक्तिनगर तक पहुंचने तथा वहां होटल में डेरा जमाने तक सिर्फ तीन घंटे लगे। वहां पहुंचते पहुंचते शाम गदराने लगी थी और सूरज भी नरम होने लगा था। उधर बी.डी.ओ. था कि ऊर्जस्वित होता जा रहा था। उसके लिए पल दर पल भारी तथा बोझिल पड़ रहे थे, उबाऊ और थकाऊ। वह देहलीला की उत्सुकता में धीरज खोता जा रहा था पर आश्वस्त था कि यह जो रौशनी का खेल है शीघ्र ही अन्धेरे में बदल जायेगा फिर तो रात आयेगी ही और राते वाले खेल जो सामान्यतया देहलीला के प्रयोजनों वाले होते हैं, आरंभ होंगे ही। देह की व्यग्र उत्सुकताओं को समय के साथ रोक लेना, उसमें ठहराव लाना, हर हाल में भला तथा सुखकर होता है। बहरहाल रात आयी, उसे आना ही था, कैसे आयी? मन की चुलबुलाहटों को बी.डी.ओ. ने कैसे संयमित किया, जिससे उसके पद तथा कद की गरिमा बची रहे इससे रात के आने तथा गुजर जाने से कोई मतलब नहीं था। मतलब था तो केवल रात के आने से कि वह मुस्कराती तथा थिरकती आये और देह को गुदगुदाए।
खाना, पीना खतम हो जाने के बाद वह समय भी आ गया जिसकी बी.डी.ओ. प्रतीक्षा कर रहा था। पर लौंगी थी कि दूर हट गई। उसने समय के साथ चलने से साफ मना कर दिया। वह इस लायक नहीं कि समय को गोदी में रख कर दुलार सके।
बी.डी.ओ. को अचरज लगा..क्या बोल रही लौंगी? काहे इनकार कर रही? ‘कोई बात है का?’
बात कुछ भी नहीं थी, जो थी उसे लौंगी ही जानती थी। लौंगी ने बैग खोल कर उसमें से कंडोम निकाला और बी.डी.ओ. को थमा दिया..।
‘साहब इसे चढ़ा लीजिए’
‘यह क्या है?’
‘इसे नहीं जानते, कैसे मरद हैं? कंडोम है, बिना इसके नाहीं’
‘काहे?’
‘बस ऐसे ही’
‘ऐसे क्यों? इसकी कोई जरूरत नहीं’
‘जरूरत है साहब! तभी तो बोल रही हूॅं, पहले ऐसा बोली थी का?’
‘तो अब काहे ऐसा बोल रही हो?’
‘अब आप को का बतायें साहब? का, का बतायें? बस बूझ लीजिए कि बिना कंडोम के काम नहीं होगा।’
‘तूं बाल बुतरू से डर रही है नऽ, तो उसमें डरने की का बात है? मुझे तुमसे एक बच्चा चाहिए लौंगी, अब तूं इस काम को भी छोड़ दे और मेरे साथ रह। यहां से जाने के बाद से ही मैं इस बारे में गुन रहा हूॅं कि हमें लुका छिपी का खेल बन्द कर देना चाहिए और जो सच है उसे स्वीकार कर साथ रहना चाहिए। साथ रहने के लिए हमें शादी कर लेनी चाहिए पर जाने काहे के लिए तूं राजी ही नहीं हो रही।’
‘अरे! का बोल रहे है साहब। हम अब बिआह करेंगे, काहे के लिए? हम आपको पहिलहीं बोल चुके हैं कि हमैं अब इस झंझट में नाही पड़ना है, अच्छा ई बोलिए कि काम करना है कि नाहीं, अइसहीं रात बितानी है का? ई लगा लीजिए नऽ, का बिगड़ जायेगा, कउनो फरक नाहीं पड़ेगा।’
पहले बता कि काहे लगा लें इसे? फिर लगा लेंगे.... बी.डी.ओ. ने उसे सुझाया।
अन्ततः बी.डी.ओ. को लौंगी की बात माननी पड़ी, उसने कंडोम लगा लिया फिर रात का खेल शुरू हुआ जो काफी देर तक खेल की तरह दोनों को गुदगुदाता रहा। बाद में लौगी ने बताया कि वह कंडोम लगाने के लिए काहे बोल रही थी। बी.डी.ओ. उस समय लौंगी को देखता रह गया था किसी अचरज की तरह फिर उदास हो गया। उसके मुंह से बोल गायब हो गये थे कि का बोले? का पूछे। वह जानता था कि देहलीला में एड्स का होना अचरज नहीं..
‘यह का हो गया रे तुझे? तूं ही मेरा सहारा थी, तूं भी साथ छोडे़गी का? ऐस मत करना लौंगी। कहने को यह दुनिया बहुत बड़ी तथा हसीन भी है पर मेरे लिए नहीं, मेरा इस दुनिया में कोई नहीं, एकदम अकेला हूॅं, अनाथ तथा हताश। तुझे पाकर मैं सपने दखने लगा था, उसी में डूबा रहता था, अब तूं है कि साथ छोड़ने की सूचना दे रही।’
‘कैसे मालूम हुआ यह सब?’ पूछा बी.डी.ओ. ने
‘मालूम तो होता भी नाहीं, हमैं बर, बोखार भी तो नाहीं आया था, आजउ हमैं ई थोड़ै लगता है कि हमैं देह वाला रोग हो गया है, जो देह के साथ ही जायेगा। हर काम हमार ओइसहीं हो रहा है, जइसे पहिले होता था। आपउ तऽ देख लिए का फरक है हमरे में? कुछौ नाहीं नऽ’
‘ऊ त एक दिन हम सरकारी अस्पताल में अइया की दवाई कराने के लिए रापटगंज गये थे। अइया बोखार में थी, उसकी देह तप रही थी। बोखार तऽ ओके था ही खून की कमी भी हो गई थी, डक्टरवा बोला कि खून चढ़ाना होगा कम से कम एक बोतल। अइया को खून चढ़ाने के लिए हमैं खून देना था, हमार खून की जांच हुई फिर डक्टरवा बोला कि तोहार खून नाहीं चढे़गा, तोहैं एडस हो गया है। हमहूॅं थौड़ै जानते थे कि का होता है एडस। अइया के संगे डक्टरवा ने हमार भी दर दवाई किया अउर बोला कि हमेशा जांच करवाती रहना, दर दवाई खाती रहना। तब से दर दवाई चल रही है। अउर केहू की हमैं फिकिर नाहीं है साहब! पर आपकी है, आपके संगे हमरौ मन लग गया है, लगता है कि आपसे चिपकी रहूॅं जोंक की तरह। अइसने में बोलिए हम आपके लिए किस काम के हैं? अब हमैं भूल जाइए साहब! हमार आप से हजोरी बिनती है।’
लौंगी बात करते करते रो पड़ी, इतना रोई कि बी.डी.ओ. घबरा गया। किसी तरह उसने रोना बन्द किया।
शशि के लिए लौंगी की कहानी काफी दर्द भरी थी। लौंगी ने साफ,साफ बताया शशि को कि वह उन लोगों से निश्चित रूप से बदला लेगी जिन लोगों ने उसे इस हालत तक पहुंचाया है। अब तक उसने कई लोगों को अपना शिकार बना भी लिया है। परधनवा के छोटका बेटवा को शिकार बनाने के बाद वह किसी से बदला नहीं लेगी सावधानी बरतेगी, लौंगी ने शशि को बताया...
अरे! ऐसा न करो लौंगी, काहे उसे मौत के मुंह में धकेलोगी, तुझे का मिलेगा?’ शशि ने उसे समझाया..
‘मिलेगा बहिन जी, बहुत कुछ मिलेगा पर परधनवा कऽ छोटका लइकवा ऑख मिचौली वाला है ही नाहीं, एही से समय बीत रहा है। ऊ बनारस पढ़ता है अउर काम से काम रखता है। कई बार फेरा डालने के बाद तऽ ओसे बतकही हुई, पहिले तऽ बोलता, बतियाता भी नाहीं था। एक दिन हम ओके छेक लिए लाज शरम छोड़ कर, अपने खरिहाने से घर लौट रहा था, कुछ अन्हार भी था..’।
अरे का बबुआ! एहर, ओहर नाहीं देखते हो का?
‘का देखना है, देख तो रहे हैं..’
‘नाहीं बबुआ, तूं कुछौ नाहीं देखते हो, देखते तऽ कुछ बोलते बतियाते’
‘का बतियाना है?’ उसने पूछा
‘अरे बतियाने के लिए का नाहीं है ईहां.. चलो घरे चलि कर बतियायेंगे,’
एहि उमर में ही तो बतकही होती है, बुढ़ाने पर बतकही थोड़ै होती है, जउन चाहो बतिया लो, कुछु मन की, कुछु तन की, फिर दोनों की। तन, मन दोनों जब लड़ते हैं नऽ बबुआ फिर तो पूछो नाहीं, का होता है, मन कुलबुलाता है कि नाहीं?’ पूछा लौंगी ने
परधान का लड़का धीर, गंभीर बना हुआ था, वह था भी धीर, गंभीर, बीस साल का गबरू जवान, चमकता, दमकता सांवला चेहरा, चेहरे पर कौमार्य का अद्भुत खिंचाव। लौंगी उसके चेहरे के खिंचाव के कारण उससे बतिया नहीं रही थी, उसके मन में बदले की भावना थी, इसी लिए वह अपने आकर्षण में उसे फसाना चाह रही थी, चाहे जैसे फसे, उसे फसाना है।
आखिर कितने समय तक परधान का लड़का औरत की जादुई ताकत से खुद को बचा पाता, देहभोग की मांग देह से जुड़ी वर्जनाओं को फलांग जाती है। परधान के लड़के का मन वर्जनाओं को फलांग गया और वह लौंगी की जाल में फंस गया।
लौंगी परधान के लड़के के साथ अपने घर में थी। वहां किसी बात का डर नहीं था, सुरक्षित तथा आरक्षित स्थान था लौंगी का घर। परधान का लड़का लौंगी की देह के लिए लालायित हो उठा और लौंगी के साथ कामोŸोजना के व्याकरण को आजमाने में जुट गया। लौंगी को भी अच्छा लग रहा था, ताजी देह और उसकी ज्योति से लौंगी अविभूत थी, अब तक तो उसे बासी से ही काम चलाना पड़ता था।
अचानक लाैंगी चिहुंक उठी, देह की परमावस्था तक पहुंचते पहुंचते लौंगी के मन में पाप का बोध हुआ कि वह पाप करने जा रही, अपनी तरह किसी का जीवन छीन रही है, जैसे उससे उसका जीवन छीन लिया गया ठीक उसी तरह। पहले कभी उसने इस तरह का पाप बोध नहीं महसूसा था। वह मानती थी कि पाप पुण्य जैसा कुछ होता ही नहीं, जो होता है, जितना तथा जैसा होता है, बस उतना ही होता है, उस होने के आगे, पीछे कुछ भी नहीं
होता, फिर कैसा पाप? कैसा पुण्य?
पर उसने महसूसा की वह पाप कर रही है, करम बाबा पूछेंगे ही वे जबाब मांगेगे कि तूंने अबोध लड़के को काहे फसाया? फिर वह का बताएगी उन्हें, बदला लेना ठीक नाही.. वह भी बाप का बदला बेटे से लेना यह तो एकदम गलत है। लौंगी ने ताकत लगा कर परधान के लड़के से अपनी देह के दबाव को छुड़ाया....
‘नाहीं, नाहीं ई सब नाहीं होगा, बस ओतनै जेतना हो चुका है, अब आगे नाहीं, आगे न जाओ बबुआ, आगे जाओगे तो फस जाओगे’ कहते हुए लौंगी परधान के लड़के से दूर खड़ी हो गई।
परधान का लड़का पाप, पुण्य के द्वन्द में नहीं था। वह उस समय आवेशित था, कामाध्यात्म के आखिरी पडाव पर पहुंचने में इतनी बेहूदी दूरी। क्या कर रही लौंगी? उसने खुद ही उसे आमंत्रण दिया और अब नफरत भरा इनकार, क्या है यह? नर, नारी के दैहिक द्वन्द का रसायन पीने से रोकना, अजीब है लौंगी। लौंगी परधान के लड़के के कसाव से छिटक चुकी थी, वह मुक्त थी।
उसे लौंगी पर गुस्सा आया जो प्राकृतिक था, गुस्सा आता ही। उसने लौंगी को अपनी ओर खींचा पर नहीं खींच पाया, न ख्ंिाचने के लिए लौंगी ने जोर लगाया, वही हुआ जैसा लौंगी चाहती थी। उसे परधान के लड़के के साथ वह सब नहीं करना जिसके लिए वह छटपटा रहा है।
‘नाहीं बबुआ नाहीं, ऐसा न करो, अबहीं तोहर उमर पढ़ने लिखने की है, यह देह है बबुआ, एम्मे जे डूब गया फिर नाहीं निकल पाया, हमार बात बूझो गुनो, नाहीं तऽ एम्मे का है, हम तोहके भी सउंप देते, चाहे जउन करो, देह खियाती थोड़ै।’
परधान का लड़का सफाई चाहता था कि लौंगी अचानक ऐसा काहे कर रही? उसने लौंगी से पूछा..
‘बता तो सही तूं अब इनकार काहे कर रही? तूंने ही तो मुझे इस जाल में फसाया नहीं तो मुझसे का मतलब था, ऐसा नहीं है कि मैं तोहरे बारे में जानता नहीं था, सारा कुछ जानता था। वैसे भी मैं इन कामों के चक्कर में नहीं रहता पर अब जब बात आगे बढ़ गई है तूं रोक रही है, मत रोक लौंगी, मत रोक।’
पर लौंगी तो अलग दुनिया में थी, पाप, पुण्य की दुनिया में.. वहां सारा कुछ सरल रेखा की तरह होता है। एक में जुड़ी रेखाकृतियों की तरह नहीं.. वर्जनाओं का एक अलग संसार, पवित्रता, अपवित्रता की कष्टकर रेखाओं से विभाजित। शुचिता मन की ही नहीं तन की भी, मन को बेमन नहीं होने देना ऐसा नियंत्रण, तन को तनेन होने से रोक लेना ऐसी दृढ़ता, हर सोच को सच के सांचे में लगातार ढालते रहना। लौगी अचानक बदल गई थी। उसे करम बाबा के श्राप का ख्याल आया। अब तक तो उसने कुछ ऐसा नहीं किया जो बाबा के परसाद लायक हो कम से कम आगे तो ऐसा वैसा न करे जिससे बाबा श्राप दे दंे..
परधान का लड़का अबोध है, उसने उसके साथ कुछ किया भी नहीं है, न हसी न ठिठोली, बगल से गुजर जाता है पर कुछ बोलता नहीं, उससे बदला लेना, जैसा कि उसने परधान से लिया। परधान ने उसे छोड़ दिया था। चार पांच साल से वह उसे नहीं बुलाता था। लौगी भी परधान के पास नहीं जाती थी पर जाने लगी जब उसे मालूम हुआ कि वह रोगी हो गई है, अब बदला ले सकती है। वही हुआ लौंगी ने बदला ले लिया और एक दिन एड्स से परधान मर गया। लौंगी जानती थी कि परधान को मरना है किसी न किसी दिन। गांव में कोई नहीं जानता कि परधान किस बेमारी से मरा, पर लौंगी जानती है कि परधान एडस की बेमारी से मरा। उसे भी वही रोग लग गया था जो लौंगी को है।
परधान को तड़पता, कराहता देख कर लौंगी सिहर गई थी उसे भी इसी तरह तड़पना तथा कराहना होगा। उसका बड़का लड़का भी कराहेगा, उसे शर्म तथा हया तक नहीं कि बाप ने जिसे हवश का शिकार बनाया है उससे वह भी अपनी हवश मिटा रहा है। जानते हुए भी। जाने कितनी बार उसने देखा है बाप के साथ, तब दूध पीता थोडै था, रेखें करिया रही थीं.. वहां तक तो ठीक था पर इस लड़के के साथ..।
कभी नहीं, उसने करम बाबा का ध्यान किया..। बाबा ने उसे इस पाप से बचा लिया नहीं तो वह खुद से भी मुंह दिखाने लायक नाहीं रहती, दूसरों से तो बच जाती पर अपने आप से नहीं बच पाती।
परधान का लड़का भी विचार वाला था नहीं तो वह ताकत पर उतर आता और लौंगी को बेवश करने की कोशिश करता पर उसने वैसा कुछ नहीं किया। सिर झुका कर लौंगी के घर से निकला और अपने घर की तरफ चला गया।
लौंगी उसका जाना देखती रही और गुनती रही कि वह उसके पीछे पीछे जा रही है। वह खुश, खुश थी कि आज जो उसे हासिल हुआ है वह कभी हासिल नहीं हो सकता। एक अबोध लड़के का अबोधपन उसने नहीं छीना, नहीं तो बदले की आग उसे भी लपेट लेती। चाहती तो उसे भी कंडोम पहिनवा देती और काम निपटा लेती पर लड़के का चिŸा देह के ताप से तपने लगता फिर वह सोने की तरह खरा नहीं होता लकड़ी की तरह जल जाता। चिŸा, चेत में रहे तो ठीक, अचेत होते ही गड़बड़..
सोनभद्र की फुकूयामा
‘हां लौंगी! तूंने उस लड़के को तन के ताप में नहीं फसाया यह बहुत अच्छा किया, अब तोहरे लिए वह लटुआता है कि नाहीं’.... लौंगी से पूछा शशि ने
‘लटुआता नाहीं बहिन जी, वह हमैं देखते ही खुनसा जाता है, वह घिन करता है हमसे, हमैं भला लगता है, चलो उसे घिन तो हुई। लेकिन एक बात है बहिन जी, हम केहू के अब फसा नाहीं रहे हैं, हमैं केहू को फसाना भी नाही है, पर इहो है बहिन जी हम केहू से नाहीं बताते हैं कि हमैं देह वाला रोग हो गया है। कैसे बतंाए बहिन जी? बता देंगे तऽ हमार खाना, पीना बन्द हो जायेगा। अइया बपई को भी तो संभालना है। अइया बुढ़ा गई हैं, कहीं काम धाम करने लायक ही नाहीं हैं, अउर बपई..। वह पहले भी कुछु नाहीं करता था अब का करेगा? करने लायक ही नाही है, झूल गया है, चाम अलग, अउर हाड़ अलग’
लौंगी शशि से बात करते हुए आश्वस्त थी कि कोई है जो उसका हाल चाल ले रहा है। लौंगी शशि को अपना समझने, बूझने लगी थी, अगर ऐसा नहीं समझती तो कम से कम बी.डी.ओ. वाली बात तो नहीं बताती। उधर शशि भी लौंगी को अद्भुत नायिका की तरह देख रही थी। इस तरह की नायिका तो उसने हिन्दी साहित्य की कहानियों में भी नहीं देखा, जाने उनमें का का भरा रहता है।
नायिका तो लौंगी है, जीवट वाली, प्यार की वास्तविक रचना की तरह। चाहती तो बी.डी.ओ. के साथ घर बसा सकती थी पर उसने वैसा नहीं किया, आखिर प्यार, प्यार होता है, प्यार में तन का खेल नहीं, मन का खेल चलता है, लौंगी की तरह। वह बी.डी.ओ. के साथ तन का खेल खेल रही थी तो मन का भी। उसने कभी भी तन तथा मन को स्वायत नहीं बनने दिया, कि दोनों अलग खेलें तथा झूमें, दोनों स्वायत होते तो बी.डी.ओ. फस जाता, वह मन को तन से तथा तन को मन से अलग अलग तरीके से संतुष्ट करती रहती पर उसका चिŸा, मन की आध्यात्मिकता तथा तन की भौतिकता से संयुक्त था, उसके चिŸा तथा चेतना में दोनों के रसायन थे, एकाकार, एक में घुले मिले, किसी भी तरह से अलग होने वाले नहीं.. शशि के मुंह से स्वस्फूर्त आह निकली..।
‘धन्य हो लौंगी!’
अचानक शशि खामोशी में चली गई, लौंगी की धन्यता उसे बहुत देर तक आश्वस्त नहीं कर पाई। आश्वस्त करती भी कैसे? लौंगी अपना जीवन कभी भी खो सकती है, वह एड्स का शिकार है, गनीमत केवल इतनी है कि उसका रोग प्रथम चरण में है तथा नियमित दवाइयां ले रही है। अभी उसके लिए विशेष खतरा नहीं है पर खतरा तो उसे जकड़े हुए ही है, कभी भी बुरी खबर बन सकती है लौंगी। तब क्या होगा आगे पीछे कोई नहीं.. उसके अइया बपई का का भरोसा, कब साथ छोड़ दें, साथ है भी नहीं, दोनों लौंगी के लिए कुछ कर भी नहीं सकते। दोनों पहले से ही उस पर आश्रित हैं।
शशि एड्स की कई रोगियों से अब तक मिल चुकी है पर जो बात लौंगी में है वह बात किसी में नहीं.. लौंगी उनमें से एकदम अलग तथा अद्भुत है। उसे मृत्यु का डर नहीं पर खुद अपनी देह नहीं छोड़ने वाली। शशि ने लौंगी को कई बार गंभीरता से देखा है कि लौंगी के चेहरे पर मृत्यु के डर की छाया है कि नहीं, उसे कुछ भी नहीं दीख पड़ा, जो दिखा वह तो केवल किसी साहसी महिला के चेहरे पर ही दिख सकता है, जो मुत्यु के बिछौने पर झूमती हैं, जो अपने तथा अपने काम के प्रति आश्वस्त होती हैं, जीवन के विभिन्न किस्म के सुखों दुखों से लड़ना जानती हैं तथा अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करना भी। वे आशान्वित होती हैं, निराश नहीं।..
लौंगी शशि के लिए वर्तमान से सीधा हस्तक्षेप करने वाली महिला जान पड़ी, वह बीते दिनों में गोता लगाने वाली नहीं थी। हमेशा आने वाले कल के बारे में सोचती, गुनती। उसी कल के प्रतीक के तौर पर उसे बी.डी.ओ. मिला, उसकी देह का ग्राहक पर वह ग्राहक नहीं रह पाया उसका अपना बन गया। यह केवल संयोग नहीं हो सकता। शशि एकांत में होने पर बी.डी.ओ. के बारे में विचारती है, कैसा होगा वह आदमी?
भला आदमी होगा.. नहीं, नहीं, लौंगी ने उसे भला आदमी बना दिया, नहीं तो वह मात्र ग्राहक ही रहता, नर तथा वानर के बीच की कोई चीज, रुपयों के बल पर देह तथा दिमाग दोनों खरीदने वाला। वह सही अर्थों में जिन्दा नर था आज के नरों की तरह नहीं जो वानर बन जाते हैं.. बी.डी.ओ. शशि के लिए कल्पना की वस्तु बन गया। अगर वह कभी मिला तो उससे मिल कर शशि खुश, खुश होगी, हो सकता है कभी मिलना संभव हो जाये, असंभव तो कुछ भी नहीं..
बी.डी.ओ. के बारे में लौंगी से सुन कर शाशि अपने कोलाहलों में समा गई जहां से बाहर निकलना संभव नहीं। आज भी शशि बाहर कहां निकल पाई? पहले की तरह अब तो नहीं फिर भी वह डूब जाती है बीते दिनों में, किसी से कैसे बोले कि वह विवाहित है, जनम जनम का साथ उसे मिला हुआ है। उसका पति भी नर है तथा वह उसकी नारी। वह नर, नारी के मिलन को जानती है। कुछ भी शशि नहीं बोल सकती, इस बाबत उसके पास बोल ही नहीं, वहां सारा कुछ अबोल है। बोले भी तो का बोले कि उसका पति क्या है? दैहिक उन्माद का एक विषालु कीड़ा।
शशि लौंगी के गांव भी जा चुकी है उसने देखा है लौंगी के अइया बपई को। उसके गांव के बहुतों से शशि ने बातें की है पर उसे नहीं लगा कि वहां देहव्यापार बुरा माना जाता है। खास तौर से दक्षिणांचल के कुछ गरीब आदिवासियों की सोच में देह की शुचिता या वर्जना का कोई अर्थ नहीं, खाते, पीते मध्य वर्ग के लोगों की नैतिकता वाली सोच उस इलाके में पहुंच कर भोथरी हो जाती है, उसका कष्टकर तीखापन गायब हो जाता है। उस इलाके के लिए देहव्यापार एकदम खुला खुला है, उतना ही खुला हुआ है जितना कि दिमाग का व्यापार खुला हुआ है, तथा लोकप्रिय भी।
‘का फरक है दिमाग अउर देह में, दिमाग बेचकर नौकरी करो फिर काहे नाहीं देह बेचो, बिकते तो दोनों ही हैं’’
आज तो उस इलाके के लोग साफ बोल रहे हैं..।
‘जांगर बेचो, मनरेगा में काम करके पसीना बहाओ, गालियां सुनो, उससे तो बहुत अच्छा है गालियां देने वालों की देह पर लोटो, उनसे तलवे चटवाओ तथा वह सब करवाओ जिसे एक नौकर भी नहीं करेगा।’
शशि सोचती है कि देहव्यापार की बढती आदतों के बारे में सोन के कुछ आदिवासी समाज का वैज्ञानिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक शोध कराया जाना चाहिए, पर कराएगा कौन, वहां के कारखाने वाले तो नहीं कराएंगे और नहीं सरकार कराएगी, कोई विश्वविद्यालय करा सकता है पर जाने कब होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे उस इलाके में एक बहुत अच्छी बात हो रही है जो दूसरे इलाकों से उसे विशेष बनाती है, वह है लड़कियों के सम्मान का मामला। लड़कियां वहां सम्मानित हैं तथा घर की मुखिया भी।
शशि ने उस इलाके के बारे में विशेष अध्ययन कराए जाने का एक प्रस्ताव अपनी संस्था के मुखिया को भेजा है। क्या इस क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना तथा उससे होने वाले विस्थापन के पहले भी आज की तरह ही या थोड़ा बहुत कम बेशी, देहव्यापार था। यहां का इतिहास बताता है कि पहले यहां आदिवासी ही राजा हुआ करते थे तथा उन्हीं का राज था। वैसे शशि इस क्षेत्र को विशेष रूप से देख रही है, तथा खुद को भी विश्लेषित कर रही है, न केवल नर, नारी के संबधों के बदलावों के बारे में बल्कि यहां के आर्थिक, भौमिक संबधों के बारे में भी वह जानना चाह रही है।
एड्स का सर्वे चल रहा था। अस्पताल वाले कर्मचारी ने एक दिन शशि को एक नौजवान लड़की से मिलवाया था हालांकि वह एड्स की रोगी नहीं है केवल धन्धा करती है, वह भी किसी की जबरदस्ती नहीं, खुद की इच्छा से, धन्धा करने के लिए वह नेताओं या अधिकारियों को तलाशती है। वह अक्सर अस्पताल जाती है और खून की जांच कराती रहती है, उसे एड्स का डर बना रहता है। कर्मचारी ने शशि को बताया था कि वह लड़की कई ऐसी लड़कियों से मिलवा सकती है जो धन्धा करती हैं, बहुत व्यवहार कुशल लड़की है, जोगाड़ बना कर उसने सरकारी काम भी हासिल कर लिया है, अब वह सरकारी चपरासी है।
शशि उस लड़की से मिलने के बाद भी अस्पताल वाले कर्मचारी की बात से आश्वस्त नहीं थी कि ऐसी लड़की देह का धन्धा करती होगी। उसके रोम, रोम से पवित्रता छलक रही थी तथा उसके चेहरे की चमक चिल्ला रही थी कि लड़की संस्कारों की प्रतिमूर्ति होगी। विनम्रता से बोलना, करीने का पहनावा, केवल अनिवार्य सिंगार, बनावट नहीं, यह लड़की देहव्यापार वाली नहीं हो सकती। अस्पताल का कर्मचारी उसे उल्लू तो नहीं बना रहा? उस कर्मचारी ने शशि का परिचय उस लड़की से कराया। शशि उससे एड्स के रोगियों के बारे में बात नहीं कर सकी, किसी से देहव्यापार के बारे में सीधे पूछा भी तो नहीं जा सकता। देहव्यापार की जानकारी में अक्सर अफवाह का हिस्सा अधिक होता है, सचाई का कम। सोनभद्र में भी अफवाहों का दौर चल रहा है। बताया जा रहा है कि सोनभद्र देह ब्यापर के मामले में किसी भी बड़े शहर से आगे निकल चुका है।
यहां यह हो गया तो वहां वह हो गया, इस व्यापार के मामले में आधुनिक टेक्नोलाजी ने भी चार चॉद लगा दिया है। फलां लड़की की ब्लू फिल्म बन गई है, कुछ लड़के फलां लड़की का फोटो एम.एम.एस. कर दिए हैं, थाने सक्रिय हो गये है.ं. यानि जितने लोग उतनी बातें.. यहां बातों की वैसे भी कमी नहीं..
सरकारी काम वाली लड़की भली निकली उसने ही शशि से बातें की..।
‘तो आप एड्स के रोगियों से मिलना चाहती है पर क्यों?’ उसने पूछा
इस लिए कि लोगों को जागृत किया जा सके कि एड्स से बचाव एवं लड़ाई दोनों की जा सकती है। नियमित दवाइयां लेने से होने वाली मृत्यु को टाला जा सकता है किसी दूसरे रोगों की तरह।
शशि ने कर्मचारी लड़की को बताया पर वह लड़की शशि से सहमत नहीं थी..।
‘मैडम आप ठीक बोल रही हैं पर एड्स तथा गर्भ के मामलों में लड़कियां खुद गुनहगार हैं.. भला आज के जमाने में एड्स कैसे होगा तथा कैसे गर्भ रहेगा? पहले वाला जमाना तो है नहीं, गली गली दवाइयां बिक रही हैं, टी.बी. तथा रेडियो पर लगातार प्रचार आ रहे हैं.. हमैं तो लड़कियों पर गुस्सा भी आता है..। वह धारावाहिक बोलने लगी....
‘अरे भाई परमात्मा ने तोहैं खाली देह ही नाहीं दिया है, उसने दिमाग भी दिया है। देह तबै हिलाओ, डोलाओ जब दिमाग हिला डुला लो, यह का है कि देह को बिस्तरे पर बिछाय दो अउर दिमाग पर पर्दा चढ़ाय लो, पहिले दिमाग पर से पर्दा हटाय लो फेर देह पर से परदा हटाओ। दिमाग पर का काला पर्दा हटाया नाहीं अउर देह पर लाल पीला पर्दा डाल लिया। घर दुआर वाला, का बोलते हैं मान मर्याद वाला।
‘हमैं तऽ लडकियन पर मैडम बहुत गुस्सा आता है, हमार वश चलै तऽ हम अइसन लड़कियन के गोली मरवाय दें....’
‘अगर पेट फूल गया तऽ लड़िका को नाली में काहे फेंक रही हो, खुद जाके डूब मरो कहीं, आ ओके जनमाओ, पालो पोसो, बड़ा करो, ओही लड़िकवाा आ लड़किया से ओकरे हरामजादा बाप को मरवाओ, तूं तऽ ओकरे बाप को जानती ही हो, भले ही दूसर कोई जाने नाहीं जाने।’
हम एक बात बताएं मैडम! एड्स की जागरिति से का होगा? के के नाहीं मालूम कि दवाइयां गली, गली बिक रही हैं, जब चाहो लड़िका जनमाओ न जनमाओ, तउने पर जो हो रहा है, आप जनबै करती हैं’
वह लड़की शशि से बात कर ही रही थी कि अस्पताल वाला कर्मचारी चला गया। वह तो केवल शशि को उससे मिलवाने तथा परिचय कराने आया था। शशि उसकी बातें ध्यान से सुन रही थी तथा उसके मन का रेखाचित्र भी बना रही थी।
लड़की खुली, खुली थी पर परेशान भी कम नहीं। उसकी बातों से जान पड़ा है कि समाज ने उसे दिया कुछ नहीं होगा, लील लिया होगा बहुत कुछ। लड़की गुस्से में थी तथा गुस्से के कारण ही वह लड़कियों को दोषी बता रही थी। शशि ने बहुत ही विनम्रता से उससे कहा..।
‘पर कुछ तो करना ही होगा उनके लिए, जितना आप साफ समझ वाली हैं, उतना तो उन्हंे भी होना चाहिए। आप सोचिए तो.. कहीं वे लाज शरम के मारेे अपने बचाव के बारे में जानते हुए भी बचाव नहीं कर रहीं और फस जा रही हैं..’
लड़की खिल खिलाई..।
‘ठीक बोल रहीं आप, पर खाली शरम के कारण नाहीं, डर भी बहुत बड़ा कारण है। लडकियां डरती हैं समाज से। घर परिवार की मर्यादा का डर उन्हें हरदम बना रहता है। हम तो कहते हैं काहे का डर? काहे डर रही हो भाई, डरो तो तब जब राम या सत्यवान तोहैं मिल गया हो।’
लड़की ने शशि को देखा कि वह क्या सोच रही, कहीं बोर तो नहीं हो रही? शशि बोर नहीं हो रही थी, वह नारी मुक्ति आन्दोलनों की भूमिका में उलझी हुई थी, सोनभद्र में यह फुकूयामा कैसे पैदा हो गई? सेकेन्ड सेक्स वाली। यह लड़की तो उनसे भी आगे है, कई कदम। जो करना है खुला खुला करो, काहे का डर?
लड़की ने अपनी बात रोक कर शशि से पूछा ..।
मैडम आप कहीं बोर तो नहीं हो रहीं? हम जाने कौन सा रामायण आपको सुनाने लगे, रामायण नाहीं मैडम, देहायण, का करेंगी रामायण सुन कर?
हम जो कहना चाह रहे हैं, उसे बूझ रही है नऽ आप, आप नाहीं बूझेंगी फिर के बूझेगा? सुनिए मैडम....
‘पेट तऽ तोहार फूला है, मां बनने का मौका परमात्मा ने तोहैं दिया है, यह उनकी किरपा है तोहरे पर, फिर काहे पेट साफ करा रही हो? लड़के को तालाब में फेंक रही हो। पुरुष मिलन के लिए जवान देह अंकड़ाने लगी पर दिमाग जहां था वहीं है मर्दों वाला, धोखे बाज अउर वादा खिलाफ। के के नाहीं मालूम कि मरद धोखेबाज होते हैं, अपने खेलते खाते हैं तनिकौ लजाते भी नाहीं, अउर चाहते हैं कि मेहरारू खंूटे से बंधी रहे गाय की तरह,दूध देती रहे, अउर लात भी न मारे। हम तो कहते हैं मैडम लड़कियों को खुला और खिला होना चाहिए, अउर मर्दों के बारे में समझना चाहिए कि वे गाड़ी मोटर, रिक्सा हैं, उन पर चढ़ो, बैठो अउर जहां मन चाहे चले जाओ, उन्हंे पीठ पर लादने की का जरूरत है?’
शशि इस तरह की लड़की से कभी नहीं मिली थी न ही उसे पता था कि ऐसी लड़की भी हो सकती है फिल्मों वाली। उससे बातें करते हुए उसे महसूस हुआ कि वह फिल्म देख रही है। वस्तुतः लड़की अपने आप में आज की फिल्म ही थी। उसने विनम्रता से उसका नाम पूछा..।
‘अपना नाम तो बताइए बहिन जी’
‘हां हम तो भूलिए गये थे कि हमैं आपसे जान पहचान कर लेना चाहिए, हम आपन कउन नाम बताएं मैडम जी! हम समझ नाहीं पा रहे हैं, चलिए दोनों बताय दे रहे है..। हमार मतदाता पहचान वाला नाम है लाजवन्ती, अउर धन्धा वाला नाम था सन्नो। अब हम धन्धा भी नाहीं करते खाली नौकरी करते हैं.. आपका का नाम है मैडम जी?’ लाजवन्ती ने शशि से पूछा
शशि ने उसे अपना नाम बताया। लाजवन्ती शशि का नाम सुन कर चहक उठी, यही नाम हमरे बड़की बहिन का भी है, आप भी तब हमारी बहिन ही हुई.. हंऽ आप तो बताईं ही नाहीं कि हमसे काहे बदे मिलीं आप? का कउनो काम है?
‘हां हां काम तो है ही’
शशि सोनभद्र की फुकूयामा से मिल कर खुश, खुश थी।
लार, दुलार और धन्धा
पहली मुलाकात के दिन ही शशि ने लाजवंती से आग्रह किया था कि वह किसी दिन फुर्सत से मिले। लाजवंती ने अपनी वाचालता दिखाई..
‘अपने इहां तो फुर्सत ही फुर्सत रहती है, तहसील से निकलने के बाद खाली ही खाली, जउने दिन आप बोलें, आ जायें आपके इहां’
रविवार को आ जाइए कहते हुए शशि ने लाजवंती को अपने आवास का पता बताया। रविवार के दिन लाजवंती शशि के आवास पर थी। लाजवंती और शशि ने खुल कर बातें की पर शशि बन्द बन्द सी थी, वह नहीं खुली, खुलती भी नहीं? लाजवंती ने उसे मौका ही नहीं दिया, वह तो अपना ही बताने में थी। वैसे भी वह लाजवंती की तरह खुल भी नहीं सकती थी, ऐसा साहस उसके पास नहीं था, केवल घुंट रही थी कि उसे भी लाजवंती के रूप में ढल कर अपने ऊपर से लोकलाज का पर्दा हटाना चाहिए, पर वह सोचती ही रह गई और लाजवंती उसकी लाज लेकर चली भी गई। लाज के अलावा लाजवंती शशि के लिए सोच का विषय भी छोड़ गई। शशि लाजवंती द्वारा छोड़े गये विषय तथा उसकी प्रवृŸिा के बारे में सोचने के लिए विवश हो गई।
तो लाजवंती ऐसी है। वह धन्धा करने वालियों को प्रशिक्षित कर रही है वह भी बिना किसी लालच के जबकि वह वेतन भोगी है, तब जागरूकता का काम कर रही है। वेतन नहीं मिलता तो काहे करती ? शशि को अपना कद लाजवंती से छोटा जान पड़ा, लाजवंती तो बहुत बड़ी है।
लाजवंती धन्धा करने वालियों को साफ समझाती है ‘आज का ही न देखो कल का देखो, कल जब तूं देखने लायक ही नहीं रहोगी तब का करोगी? तूं भले ही सभी को देखो पर तोहैं कोई नाहीं देखेगा।’ लाजवंती ने धन्धा करने वाली कुछ लड़कियों के नाम भी बताया शशि को जो अब धन्धा नहीं करतीं, अपनी घर, गृहस्थी संभाल रहीं हैं, कभी धन्धा करती थीं.. तीन चार लड़कियों को लाजवंती ने घर गृहस्थी से जुड़वा दिया है। दो चार को वह और जानती है तथा उनके साथ भी प्रयास कर रही है, अगर कहीं काम निकल आया तो उन्हें भी जोड़वा देगी।
शशि लाजवंती से पहली मुलाकात के दिन ही जान लेना चाहती थी कि वह इस धन्धे में क्यों आयी पर पहली मुलाकात के दिन पूछना उसे अच्छा नहीं लगा, अच्छा था भी नहीं.. आवास पर आने के बाद उसने पूछ ही लिया..
लाजवंती तो जैसे तैयार हो शशि को बताने के लिए पूछो तो.. ‘का पूछना चाह रही हो? यही नऽ कि हम इस धन्धा में काहे आ गये?’
‘अरे बहिन जी आना ही था हमें धन्धा में, धन्धा में नहीं आती तो यह सरकारी काम मिलता, धन्धा ने ही मुझे यह काम दिलाया। वैसे मैं मजबूर
कन्फेशन // 96 //
थी, मेरे बाप पर सरकारी कर्जा बकाया था, वसूली की डर से मेरा बाप मारा मारा फिरता था। बैंक ने वसूली का कागज तहसील भेज दिया था। तहसील की वसूली कैसे होती है, आप जनबै करती हैं..। गुंडा होता है अमीन, वह तीसरे दिन हमरे घरे आता। बाप को गाली देता, हवालात में ठंूसने की धमकी देता। एक दिन उसने हमैं देख लिया फिर का था उसका दिमाग बदल गया। अब आपको का बताना कि मरद का दिमाग जब बदलता है तब का करता है। उसने एक दिन हमैं जबरी पकड़ कर अपनी गोदी में बिठाना चाहा, हम जान बचा कर भागे, भागने में सफल भी हो गये, नाहीं त ऊ जाने का करता।’
‘हमरे गांव का एक आदमी तहसील का चपरासी था। हमने सोचा कि तहसीलदार से मिल कर अपनी गरज कहना चाहिए, हो सकता है काम हो जाये। हम जानते थे कि तहसीलदार अमीनों का साहब होता है। गांव के चपरासी ने हमारा साथ दिया। उसने तहसीलदार से हमैं मिलवा दिया। हमार अम्मा भी हमरे साथय थी। हम दोनों साथय तहसीलदार से मिले।
‘तहसीलदार हमैं देखता ही रह गया। हम तब्बै छनके थे कि तहसीलदार हमरे चेहरा पर से आंख काहे नाहीं हटा रहा? हम ऐतना समझने लगे थे कि मरद मेहरारुन में का खोजता है। हमरे दिमाग में यह बात थी ही कि अमीन किसी न किसी दिन हमैं नंगा करेगा ही, नाहीं तऽ हमरे बाप को हवालात में ठूंसेगा। एसे अच्छा है कि तहसीलदार के यहां ही नंगा हो जाओ अउर बाप को बचा लो। वही हुआ बहिन जी। तहसीलदार भला आदमी निकला, भले ही वह हमरे देह पर लोटा, पोटा पर हमरे मन को दुखाया नाही। उसने वादा किया था कि यहां से जाते जाते हमैं काम पर लगा देगा, अउर लगा भी दिया। बस इहै हमार कहनी है बहिन जी। चाहे एके धन्धा कहो या कुछु अउर, पर इहै है एकरे से तनिकौ एहर ओहर नाही। अब ई न पूछो कि तहसीलदार ने हमैं बिस्तरा कैसे बनाय दिया? ओके आप बूझ सकती हैं.. जवान लड़की अगर चाह ले अउर अपने पर उतर आये फिर तो कउनो अइसन मरद नाहीं जो लार न टपकाने लगै। तहसीलदार भी तो मरदै था, लार टपकाने वाला, पर ओइसन मरद नाहीं था, जौने के पास खाली लार होता है, दुलार नाहीं, तहसील दार के पास दुलार भी खूब, खूब था।
लाजवंती लोकलाज से बाहर थी, वह मस्त, मस्त थी और खुश कि उसने बाप के माथे पर से कर्जा उतार दिया। जब से सरकारी काम मिला है तब से धन्धा नहीं करती पर धन्धा करने वालियों में गिनी जाती है। उसे इसका अफसोस नहीं कि उसके बारे में लोग क्या सोचते हैं? लोग चाहे जो सोचें वह अपने मां बाप के साथ रहते हुए खुश है। उसे इस बात का अफसोस नहीं कि उसकी देह को किसी मरद ने छू लिया है, उसे चूमा है चाटा है। वह तो आज भी पहले की तरह ही है, उसकी देह पर तहसीलदार का पाप कहां दिख रहा है? पाप तब दिखता बहिन जी जब हम उपाय नाहीं करते, हम जानते थे बहिन जी, देह का खेल, मन से हो चाहे बेमन से, पेट उसे हजम नहीं करता। मन कोई कैसे देख पायेगा पर पेट तो सभी देखते हैं। सो पेट बचा लेना चाहिए। अउर पेट हमने बचा लिया। पढ़ाई लिखाई हुई ही नाहीं फिर लड़की के लिए का बचता है बहिन जी आप ही बोलो। एक तरफ दिमाग है, दूसरी तरफ देह, न सब दिमाग बेचाता है न सब देह बेचाती है, खरीदने वाला दोनों को छांट छांट कर खरीदता है, चाहे दिमाग हो या देह। हमरे पास देह ही तो है, वही न बेचाएगी बहिन जी! पर एक बात अउर जान लो बहिन जी..।’
‘हमैं अब देह भी नाहीं बेचना, खरीदने वाला चाहे जउन करै।, आज कल जउन तहसीलदार है हमरे तहसील में वह हमैं बिस्तरा बनाना चाहता है। हमने साफ मना कर दिया। उसने हमारी देह सूंघ लिया था, ये मामले में मरदों की ऑखें गजब होती हैं, जाने कैसे वे कपड़े के भीतर भी ताक, झांक कर लेते हैं, ओन्है सब लउकता रहता है कि देह सोहर गा रही है कि लचारी।
शशि को लाजवंती की बातें गहरे तक प्रभावित कर रही थीं.. औरतों के बारे में उसके जो पहले से बने बनाए विचार थे सबके सब टूट रहे थे। लाजवंती हो या लौंगी दोनों औरतें हैं और दोनों परिस्थितियों के कारण औरतों के सांस्कृतिक रूप से अलग हैं, वे सोच सकती हैं तथा अपने सोचे हुए पर दो कदम चल भी सकती हैं....
एक वह खुद है जो अब तक अपने समय को नहीं पहचान पा रही है, उसे पता ही नहीं कि उसका भी समय है, वह अपने समय को दुलार सकती है तथा उसकी प्रफुल्लताओं को अपने पक्ष में कर सकती है पर उसका पक्ष क्या है? पक्ष है ही नहीं शायद, वह खुद अपना प्रतिपक्ष है तथा अपने प्रतिपक्ष के साथ चल भी रही है। प्रतिपक्ष के साथ नहीं चल रही होती तो मन में कोलाहल नहीं होता, आश्वस्ति होती तथा आगे जो करना है उसे निश्चित कर चुकी होती। आज भी उसे उसका पति गुद, गुदा रहा है, उसे जान पड़ता है कि वह आज भी अपने पति के साथ है उसके घर में.. उसके माथे का सिन्दूर, बिन्दिया सभी बोल रहे हैं? शीसे के सामने होते ही उसे लगता है कि उसके देह को विवाह के सारे प्रतीक जकड़े हुए हैं, उससे उलाहना दे रहे हैं आखिर वह शादी होने के प्रतीकों को अब तक काहे ढो रही है? उन प्रतीकों का अब तो कोई प्रयोजन नहीं, उसे उन सबसे अब तो मुक्त हो जाना चाहिए।
लाजवंती शशि की तरह दुविधा में नहीं है, वह अपनी तरह की सोच वाले मरद की तलाश में है, जिस दिन मिल जायेगा विवाह कर लेगी। अभी कोई नहीं मिल रहा, जो मिल रहे हैं वे उसकी देह पर उछलने वाले हैं। उछल लिए काम खतम। उन्हें सती सावित्री चाहिए वह भी तन वाली, मन चाहे जैसा हो, सौ तरह का पाप करे, उसका तन पवित्र होना चाहिए। तन को किसी ने छू दिया, बूझो अपवित्र हो गया, चाहे मन घिन घिन ही क्यों न हो। पापी हो या परतापी उससे उनका मतलब नाहीं..
अच्छा बताइए बहिन जी, आप तो पढ़ी लिखी हैं....लाजवंती ने शशि से पूछा.
‘देह पापी होती है का? ई मरद का होता है बहिन जी? जिसके छूते ही देह में पाप लग जाता है। औरत तो खेत की तरह होती है नऽ बहिन जी, खेत में का नहीं उगता, खेत तो खेत ही रहता है, वह किसी को मना थोड़ै करता है कि धान लगाओ या गेंहूॅं बोओ। खेत से का मतलब कि उसका मालिक कौन है?’
शशि हसने लगी, उसने लाजवंती को गंभीरता से देखा....
शशि उसकी ओर मुड़ी। देखने में तो देहाती लगती है, पर दिमाग देहाती नहीं है। साफ और खुला हुआ है, कहीं कोई मैल नहीं। जीवन जीने के तरीकों पर भी दुविधा नहीं। जो करना है करना है, उसमें क्या इधर उधर। लाजवंती शशि को किसी बहती नदी की तरह जान पड़ी, उसे लगा कि सोन उसके बगल से ही गुजर रही है तमाम पर्वतों, घाटियों को चीरते हुए, उसके बहाव को कोई नहीं रोक पा रहा है। वह अनवरत बिना थके अपनी गति से प्रवाहित हो रही है। लाजवंती भी वैसा ही दिख रही है, अपनी गति से प्रवाहित और चालित होने वाली। आखिर नारी इससे अधिक और कितना मुक्त हो सकती है। मर्दों द्वारा रचित वर्जनाओं को तोड़ देना तथा तन तथा मन की चपलताओं एवं दृढ़ताओं को एक सूत्र में बांध लेना ही तो मुक्तता है। कुल मिला कर अपने स्व को बचा लेना, स्व कोई राजस्व नहीं है, यह तो अपना है, किसी राज या समाज का नहीं। स्व को राजस्व बनने से रोक लेना ही तो वह काम है जो तन ही को नहीं मन को भी निर्मल बनाता है। लाजवंती किसी समाज का नहीं स्व का निर्मल उत्पाद है, एकदम प्रकृति की तरह एक जीवित तथा सजग कृति।
शशि ने महसूसा कि उसे लाजवंती को चूम लेना चाहिए और उसने उसे चूम भी लिया। उसे अनुभव हुआ कि वह प्रकृति की निर्मल कृति को चूम रही है, अनुकृति को नहीं..।
लाजवंती भी शशि से मिलकर गद, गद थी, पहली बार वह किसी ऐसी नारी से मिल रही थी जिसमें मिलावट नहीं, न ही खोखले आदर्शों की सजावट। उसे हर वह नारी अपनी जान पड़ती है, जो केवल नारी होती है समाज का नारा नहीं.. लाजवंती कभी भी अपनी राम कहानी शशि को नहीं बताती अगर उसे जान पड़ा होता कि शशि की ऑखों में भी वही खारा पानी है जो किसी को भी जला कर राख कर सकता है। पर शशि की ऑखों में उसे दूसरी जोति दिखाई पड़ी जो संवेदनाओं से प्रस्फुटित होती है। आहों तथा कराहों से बनी हुई, लोर की तरह ऑखों को हिलोरती हुई। लाजवंती ने देखा कि शशि की ऑखों में मन और तन दोनों की समझदार लहरें तैर रही हैं, जो खुद को बचा लेने के लिए संघर्षरत हैं। उसने बात, चीत के दौरान शशि से कहा भी था..।
‘बहिन जी! जिनकी ऑखों में लोर नाहीं, लोर हैं भी तो हिलोर नाहीं, उन्हें आप का बोलेंगी?’
लाजवंती के सवाल ने दोनों को हसा दिया था..।
तंूने अच्छा जोड़ा रे लाजवंती! लोर और हिलोर, लोर केवल लोर ही नाहीं है वह हिलोर भी है। वैसे तो हिलोरें उठती नहीं और जब उठ जाती हैं नऽ फिर तो वही नारी जिसे छुई मुई समझा जाता है, वह जो कर सकती है इसका अनुमान तक नहीं लगाया जा सकता।
लाजवंती ने शशि के काम में जरूरत से अधिक मदत की थी। उसने कई लड़कियों से मिलवाया था जो उसकी जान पहचान की थीं। उनमें कोई भी एड्स की मरीज नहीं थी, सभी सावधानी बरत रही थीं तथा सचेत थीं कि इसमें लापरवाही नहीं चलेगी। शशि खुश, खुश थी कि सोनभद्र में एड्स के बाबत जागरूकता है, कम से कम शहरी परिक्षेत्रों में तो ऐसा दीख ही रहा है। शशि के लिए यह एक आवश्यक खबर थी जिसके लिए उसे काम करना था। वह लाजवंती तथा दूसरी लड़कियों के बयानों को रिपोर्ट में शमिल करेगी फिर उसके अनुसार सोनभद्र के शहरी क्षेत्रों का अध्ययन करेगी। आखिर ऐसा सोनभद्र के शहरी परिक्षेत्रों तक ही सीमित क्यों है? अध्ययन से ही इसका निष्कर्ष निकलेगा।
शशि के अघ्ययन के लिए नारी की पवित्रता तथा शुचिता दोनों विषय किसी प्रयोजन के नहीं थे, उसे अध्ययन का जो विषय मिला था वह जैविक आवश्यकताओं तथा भूख व गरीबी के कारण होने वाले नर, नारी के दैहिक मिलन पर केन्द्रित था जिसके फलस्वरूप एड्स जैसे भयानक रोग का जन्म होता है। यह प्रमाणित हो चुका है कि सामाजिक वर्जनांए भले ही नर, नारी के मिलन पर अंकुश लगाती हों पर उसे रोक पायें ऐसा संभव नहीं। यह मिलन जितना जैविक है उससे कम परिस्थितिक नहीं। नर, नारी दोनों अपने शरीर के अदृश्य रासायनिेक क्रियाओं की सक्रियताओं के अनुरूप एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं और यही आकर्षण उन्हें दैहिक मिलन तक पहुंचाता है। गरीबी दैहिक संबधों को बाजार की वस्तु बनाती है। यही तो सोनभद्र में देखा जा रहा है। उसके अध्ययन के प्रमुख बिन्दु स्पष्ट थे..।
सोनभद्र में देहव्यापार के फलाव को शशि दो तरह से देख रही थी एक सोनभद्र वह है जो जंगलों में तथा कारखानों के आस पास है तथा दूसरा वह है जो मैदानी इलाकों के कस्बों से जुड़ा हुआ है। दोनों जगहों की सामाजिक तथा आर्थिक स्थितियां एक दूसरे से भिन्न ही नहीं विरोधी भी हैं.. मैदानी इलाकों में देहव्यापार का रूप मेट्रोपोलेटिन शहरों की तरह सिनेमाई है तो जंगली क्षेत्रों में उसका रूप आदिम है, वहां देहव्यापार भूख, बीमारी, गरीबी एवं कमाई के साधनों के अभाव के कारण है। मैदानी इलाकों की तरफ स्वेच्छया है। उच्च जीवन जीने के साधनों एवं संसाधनों के उपयोग तथा उपभोग की चाहना के कारण भी देहव्यापार प्रसार पा रहा है। शहरी क्षेत्रों में देह का खेल अधिकतम कमाई का विकल्प बना लिया जा रहा है। जंगल की तरफ ऐसा नहीं है, वहां जीवन जीने के सारे साधन औद्यौगिक इकाइयों एवं वन विभाग द्वारा छीन लिए गये हैं, वहां खेती के लिए न तो जमीन है और नहीं कारखानों में रोजगार के अवसर। वहां की जनता विस्थापन का दंश झेल रही है उन रिफ्यूजियों की तरह जिनका कोई क्षेत्र ही नहीं होता। ऐसी स्थिति में वहां का देहव्यापार भूख मिटाने का सुगम तरीका बनता जा रहा है।
शशि के सामने सोनभद्र की तस्वीर स्पष्ट थी तथा वह इसके आधार पर ही अध्ययन कर भी रही थी। ऐसी तस्वीर उसके दिमाग में पहले नहीं थी। पहले तो वह यही समझती थी कि सोनभद्र भारत का स्वीटजर लैन्ड है, पूरी तरह से विकसित तथा आधुनिक। अब वह सोनभद्र को महिमामंडित करने वालों की तरह की आत्ममुग्धता से बाहर थी। अब उसके सामने सोनभद्र की असल तस्वीर थी आंसुओं से नहाई तथा खून से सनी हुई। धीरे धीरे उसकी समझ में आने लगा है कि सोनभद्र में वामउग्रवाद के फैलाव का कारण भी यही है। एक ओर भूख से बिलबिलाते, चीखते, कराहते मुर्झाए लोग हैं, तो दूसरी ओर तिजोरियों से खेलते लोग, नोटों के बिस्तरों पर धनी होने के धार्मिक अनुष्ठान करते लोग।
अध्ययन के दौरान वह सोनभद्र के तमाम लोगों से बात, चीत कर चुकी थी। कुछ लोगों को छोड़कर उसे ऐसे लोग नहीं.. मिले जो यहां फैल रहे मारक एड्स के प्रति चिन्तित हों। उनकी चिन्ताओं में यह नहीं था। कुछ थोड़े से लोग मिले जो चिन्तित तो थे पर उनमें जनहस्तक्षेप की ताकत नहीं थी। उनमें केवल लोक ही लोक था और लोक के लोग थे कि वे अपने में ही मस्त, मस्त थे। तथा मानते हैं कि औरत जब नंगी होगी तब का होगा एड्स ही तो होगा।
लाजवंती उनमें नहीं थी, वह शशि के साथ छुट्टी के दिनों में अध्ययन का कार्य करने के लिए राजी थी। शशि भी उसे उन्हीं दिनों में अपने साथ रखना चाह रही थी जब वह अवकाश पर हो। शशि के आवास पर लाजवंती काफी देर तक रूक गई थी, खाना खाने के बाद ही वापस लौटी थी।
तटस्थता का अपराध
शशि मेरे साथ टीवी देख रही थी। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी आतंकी कैंपों पर सर्जिकल आपरेशन किया था, उसका वीडीओ टीवी पर दिखाया जा रहा था। बीसों पाकिस्तानी आतंकवादी मारे जा चुके थे। सेना को बड़ी सफलता मिली थी। कुछ दिन पहले पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा उरी के भारतीय सैनिक छावनी पर किये गये जघन्य हमले को भी दिखाया जा रहा था। पूरा दृश्य कंपाने वाला था और हम कांपने लगे थे। जबकि हमें पता था कि बन्दूकें सिर्फ मौत ही देती हैं, जीवन नहीं। टीवी का दृश्य अचानक बदल गया.. दृश्य में कुछ विपक्षी नेता आरोप लगाते दिखे जो सर्जिकल आपरेशन का राजनीतिक लाभ लेने के सरकारी प्रयास की निन्दा कर रहे थे। इसी तरह बहुत कुछ टीविहा किचकिच हो रहा था जो हमलोंगों की समझ से बाहर था। तभी शशि ने मुझसे पूछा.. ‘सैनिकों को वेतन कितना मिलता है?’ मैंने टीवी बन्द कर दिया। सैनिकों का वेतन.. वह तो मुझे नहीं पता, तुम सैनिकों के वेतन के बारे में काहे पूछ रही। कहीं काम के अनुसार दाम वाले सिद्धान्त के आधार पर तो नहीं..
हां, हां, उसी आधार पर...सैनिकों का वेतन कम से कम पचास हजार तो होना ही वाहिए। सैनिकों के खून का मूल्य भला सरकार काहे समझे,, देती होगी यही कोई बीस, पच्चीस हजार, सरकारी चपरासियों से भी कम।
शशि ने माथा पकड़ लिया.. हम अजीब से लोकतंत्र में हैं..
शशि गोष्ठी का कार्यक्रम नियत समय पर निपटा लेने के लिए आतुर थी। गोष्ठी के बाबत निमंत्रण पत्र छप चुके थे। शशि चाहती थी कि डी.एम. साहब को निमंत्रण पत्र देने के लिए मैं भी उसके साथ चलूं, इसी लिए वह मेरे पास आयी थी। डी.एम. साहब के बारे में मुझे पता था कि वे मनरेगा की जांच में व्यस्त हैं, उनसे तीन दिन बाद ही मुलाकात संभव है।
एक दिन पहले ही एक प्रमुख दैनिक का ब्यूरोचीफ मेरे पास आया और सूचना दी कि डी.एम. साहब तीन, चार दिन मुख्यालय पर नहीं रहेंगे। पत्रकार का चेहरा खिला हुआ था लगता था कि वह प्रतिभा की नदी में से स्नान करके निकला हो तथा उसके चेहरे को नरम धूप आहिस्ता आहिस्ता सेंक रही हो। उक्त पत्रकार को अपने घर पर देख कर मैं अचंभित था आखिर यह आदमी कैसे आ गया सुबह सुबह? जब से एक प्रमुख अखबार का ब्यूरो चीफ बना है दस मिनट के लिए भी इसके पास समय नहीं कि मेरे पास आये और दुख सुख करे, पुरानी बातों को याद करे। वह सारा कुछ भूल चुका था। बीते समय में उतरने की उसे आवश्यकता ही नहीं थी। वह जान चुका था कि उसका अतीत उसका था ही नहीं, जब वह पढ़ाई, लिखाई के बाद रापटगंज में आ कर ट्यूशन किया करता था और चाहता था कि वह किसी दैनिक से जुड़ जाये। वह जुड़ गया दैनिक से और मुझ जैसों को भूल भी गया, याद रखने की जरूरत भी क्या थी?
पर मुझे तो मालूम था कि उसे उक्त दैनिक का ब्यूरो चीफ बनवाने के लिए मुझे क्या क्या करना पड़ा था।
चाय के बाद वह पत्रकार खुला, पहले काफी गंभीर था, शायद गुन रहा हो कि मैं उसके बारे में कुछ जानना चाहूं क्योंकि अब वह पहले की स्थिति में नहीं था, उसकी देह पर प्रशासन की चादर लिपटी हुई थी। आला अधिकारी उसे खुश रखने में कोई कसर बाकी नहीं रखते थे। पत्रकारिता के कारण वह प्रशासन का दुलरुवा था, उसकी कमाई बढ़ गई थी। वह जिस ओर अपने दैनिक के सोनभद्र कर पन्ना घुमाता उस ओर से रुपया बरसने लगता। उसे केवल गिनना होता, वेतन तो था ही। चूंकि दैनिक का नाम बड़ा था, इस लिए विज्ञापन के मामले में भी वह बड़ा था। गोया उसे चहुंओर से कमाई थी, अब वह रुपयों वालों की कतार में शामिल था।
मैं तो उसे देखते ही चुप हो गया था और अर्थ निकालने लगा था कि आया क्यों है? कोई न कोई बात तो है जो सुबह सुबह ही आ धमका। बात तो थी ही। बात भी साफ,साफ थी जो उसके व्यक्तित्व को उसके अनुसार शिखर पर रखती थी कि उससे बड़ा पत्रकार सोनभद्र में कोई नहीं..। किसी पत्रकार में साहस नहीं कि वह मनरेगा में हुई धांधली के बारे में अपने अखबार में छाप सके, उसने छापा और फटाका कार्यवाही भी हो गई। जांच चल रही है। पत्रकार ने एक फाइल निकाला जिसमें उसके अखबार की कई कतरनें थीं। उसने उन कतरनों को एक, एक करके दिखाना शुरू किया, जैसे,जैसे वह कतरनें दिखाता उसके चेहरे पर मार्क्सवादियों की क्रांतिकारी चेतना वाली अतिरिक्त चमक पसर जाती, उसे लगता कि वह आज के समय में भी साहसी है, जो प्रशासन से टकराने की हिम्मत रखता है। मुझे उसके बारे में अच्छी तरह से मालूम था कि विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान वह मार्क्सवादियों की जमात में रहा करता था तथा गोरख पाण्डेय को अगुआ मानता था। पत्रकार के पास दर्जनों कतरने थीं जिसे उसने बहुत ही व्यवस्थित ढंग से रखा हुआ था। उसने सारी कतरनों को दिखाया। कतरनों में दम था, उन कतरनों की तरह कुछ छपना या छापना सोनभद्र की परंपरा नहीं। यहां तो वही छपता है जिसे अधिकारी छपवाना चाहता है या विज्ञप्ति में जो लिखा होता है।
मुझे क्या किसी को भी उक्त कतरनें प्रभवित करतीं जो उन्हें देख लेता पर मै उनसे अप्रभावित था क्योंकि मुझे पता था कि पत्रकार ने स्थानीय प्रशासन को अपने अखबार का निशाना क्यों बनाया है? पहली बात तो यही थी कि कलक्टर अखबार के हर ब्यूरोचीफों से उतना ही रिश्ता रखता था जितना रखना चाहिए। वह पत्रकारों को अतिरिक्त खुशियों तथा उत्सुकताओं से लबालब करने वाला नहीं था। उसे अंग्रेजों का वह सूत्र याद था कि प्रशासनिक अधिकारी को जनता तथा जनता से जुड़े लोगों से दूरी बना कर चलना चाहिए। कुछ इतनी दूरी जिससे प्रशासन का ताप व प्रताप दोनों सुरक्षित रह सके। कलक्टर ने सोनभद्र की भाषा में पत्रकार को घांस नहीं डाला अगर वह चारा फेंकता होता तो पत्रकार उसकी भी वाहवाही करता तथा उसे जनता का हीरो बना देता पर उसने वैसा नहीं किया। दूसरे कारण आर्थिक थे। एक तरह से कलक्टर ने पत्रकारों की अतिरिक्त कमाई पर रोक लगा दिया था, वह कहता था....
‘अखबारों में छपा पढ़ता ही कौन है? अखबार में अगर किसी प्रशासनिक अधिकारी की आलोचना प्रकाशित नहीं हुई तो जान लो वह अधिकारी ही नहीं, अधिकारी तो वह होता है जो अखबार की सुर्खियों में होता है’
पत्रकार खुश, खुश था कि सोनभद्र में मनरेगा के कार्यों की उच्चस्तरीय जांच चल रही है, ऐसा उसके कारण हुआ। उसी ने मनरेगा के कार्यों में हुए भ्रष्टाचार के तथ्य पूर्ण विवरणों को अपने अखबार के माध्यम से उठाया। दूसरी तरफ कलक्टर था कि वह मनरेगा में हुई धांधली को किसी साधारण मामले की तरह देख रहा था।
‘ऐसा तो होता रहता है, इसमें विचारणीय क्या है? काम होंगे तो धांधली भी होगी, उसकी जांच होगी, जो दोषी होगा उसे दण्डित किया जायेगा’
पत्रकार की खुशियों में मैं इसलिए शामिल हो गया क्योंकि वह मेरे घर पर था। पत्रकार की खुशियों की चादर में फैल कर मैने उसे धन्यवाद दिया और अपनी राय जाहिर की जो उसके व्यक्तित्व को काफी गरिमा प्रदान करती थी....।
‘यार तूं ही तो यहां पत्रकार हो, औरों को तो पत्रकारिता का कखग भी नहीं मालूम पर ऐसा तूंने पहले नहीं किया जबकि सोनभद्र में पहले भी कई ऐसे मामले हो चुके हैं जिनमें करोड़ों का घपले हो चुके हैं, चेक डैमों के निर्माण के मामले हों या स्वजल धारा वाली योजना हो, सभी तो कागज पर ही किए कराए गये पर तेरे अखबार में उसके बारे में कभी कुछ नहीं प्रकाशित हुआ पर अब क्या हो गया कि तूं एकदम से क्रान्तिकारी बन गया है। हां कभी तूंने एक प्रकरण प्रकाशित किया था जो फर्जी मुठभेड़ के बाबत था पर उसके बाद तो कुछ भी नहीं.. उस फर्जी मुठभेड़ वाले प्रकरण को पहली बार छाप कर तूं भी तो ठंडा ही हो गया था। उसमें आगे क्या हुआ उसके बारे में फिर कुछ नहीं प्रकाशित हुआ, आखिर ऐसा क्यों किया था तूंने?
पत्रकार ने मुझे गुस्से से देखा और आग उगलने लगा..।
‘भाई साहब! आप किसी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकते। सोनभद्र में दूसरे भी हैं जो आम जन के प्रति समर्पित हैं, केवल आप ही नहीं हैं। और आप भी तो समझौतांे में जीने वाले आदमी हैं। मुझे नहीं मालूम है क्या कि आपने कई समझौते प्रशासन से किए हैं, पर मैं आपका सम्मान करता हूॅं इसी लिए कुछ नहीं बोलता। मैं जानता व मानता हूॅं कि सोनभद्र में रहने की शर्त ही है प्रशासन से समझौते करना।’
‘भाई साहब। मै साफ,साफ कह रहा हूॅं कि आपकी यही आदत आपको बौना बनाती है कि आप दूसरों को उसके काम के अनुसार मान, सम्मान नहीं देते। पीछे क्या हुआ था भूल जाइए, आप इस प्रकरण को अखबार में उठाने से खुश हैं कि नहीं? सवाल यही है, इस पर आप नहीं बोल रहे हैं।’
मैं पत्रकार को सुनने व गुनने में था और उसे मौका भी दे रहा था कि उसके भीतर का कालापन बाहर निकले ताकि मैं समझ सकूं कि मुझे यहां के लोगों के द्वारा मिलने वाले मान, सम्मान में कितना वजन है? इस पत्रकार की तरह सोनभद्र में तमाम वुद्धिजीवी हैं जो मुझे मौखिक रूप से मर्यादा के शिखर पर बैठाए हुए हैं, गोष्ठियों आदि में तरीफ करते थकते नहीं पर भीतर से उनके दिलों में मेरे लिए केवल गालियां ही गालियां हैं। ऐसा नहीं है कि मैं इस सच को जानता नहीं, जानता हूॅं, इसी लिए यहां के लोगों से वाजिब दूरी बना कर चलता हूॅं, मैं जानता हूॅं कि यहां सच बोलना अपराध है।
बाहरी मित्रों का आग्रह होता है स्थानीय लोगों को मैं अपनी पत्रिका के माध्यम से प्रकाश में लाऊं पर किसे लाऊं? यहां तो लोग अपने द्वारा निर्मित उजाले में फुदक रहे हैं। उनके आस, पास अन्धेरा फटक ही नहीं सकता। अन्धरे में तो केवल मैं ही हूॅं और मैं मानता हूॅं कि मुझे अन्धेरों के खेलों से ही दो चार होना है। पत्रकार के गुस्से ने मुझे कŸाई विचलित नहीं किया क्योंकि मैं जानता हूॅं कि यहां के लोगों की अधिकतम सीमा है गुसिया जाना और गुस्से में कुछ भी बोल देना। मैंने पत्रकार को फिर भड़काया..।
‘अजीब आदमी हो, तूंने मुझे निशाना बना लिया। बिना सोचे समझे बोले जा रहा है, मैंने क्या किया, कब तथा किस बात पर प्रशासन से समझौता किया? प्रशासन से मेरा क्या लेना, देना और फिर मैं पत्रकार तो हूॅं नहीं। मैं ठहरा कविता, कहानी लिखने वाला, कविता कहानी वाले का प्रशासन से क्या लेना देना। बेमतलब तूं मुझे घसीट रहा। तुझे अपने बारे में तो कुछ पता नहीं कि तूं है क्या? अरे यार! तूं एक प्रमुख दैनिक का ब्यूरोचीफ है। तुझे नहीं मालूम कि ब्यूरोचीफ होना कितना कठिन है, कठिन है कि नहीं। तेरी गरिमा है, रोब है, प्रशासन के लोग तेरे सामने अदब से खड़े रहते हैं। और तूं है कि मेरे जैसे निर्जीव से अपनी तुलना कर रहा। अगर मैं ही तेरा आदर्श हूॅं फिर तो तूं छोड़ दे पत्रकारिता और कविता कहानी लिखना शुरू कर दे’
पत्रकार मेरी बातें सुन कर चकरा गया, शायद उसे मालूम नहीं था कि बात, चीत में भाषा के चमत्कार अपना प्रभाव रखते हैं.. पत्रकार अचानक पलट गया और फिर उसी फर्जी मर्यादा की खोल में दुबक लिया..।
‘भाई साहब मैं आपको कुछ नहीं कह रहा हूॅं, आपका तो मैं बहुत ही सम्मान
करता हूॅं. मै यहां के पत्रकारों की बात कर रहा हूॅं और वही आपको बताने के लिए आया भी हूॅं कि यहां के अधिकांश पत्रकार मनरेगा में हुए भ्रष्टाचार के मामले में प्रशासन के साथ हो गये हैं। कुछ ही दिन में केन्द्र सरकार की एक जांच समिति यहां जांच के लिए आने वाली है और मैं चाहता हूॅं कि यहां के पत्रकार उस समिति के सामने उपस्थित होकर मनरेगा में हुए भ्रष्टाचार के बारे में एक स्वर से बतायें। मैंने इसके लिए प्रयास भी बहुत किया। सभी ने कहा कि जांच समिति के सामने उपस्थित होना चाहिए पर अब वे बदल गये हैं। केवल मैं ही अकेला रह गया हूॅं। पत्रकारों में से कोई भी प्रशासनिक अधिकारियों के सामने नहीं आना चाहता। मैं चाहता हूॅं कि आप इस कार्य में पहल करें, आपकी तरह के दूसरे वौद्धिक भी। पत्रकारों की एक बैठक बुला ली जाये, और क्या करना है इस पर बात चीत हो। अगर पत्रकार नहीं राजी हो रहे तो जांच समिति के सामने यहां के वौद्धिक ही जनता का पक्ष रखें.. जांच समिति का क्या बताना है इस बाबत सारे प्रमाणित दस्तावेज मैं अपने साथ ले आया हूॅं, आप उन्हें देख लें’
पत्रकार अपनी बातें इस करने में अपने समाचारों की तरह कुशल था। मैंने देखा कि उसका वाकचातुर्य काफी सीमा तक बढ़ चुका है तथा वह अपनी बातचीत से दूसरे को प्रभावित भी कर सकता है। पर मुझे तो उसके ऊपर पहले से ही सन्देह था। मेरा सन्देह अनावश्यक नहीं था, उसने कभी भी मेरे विश्वास को जीवित रखने का काम ही नहीं किया था। जाने कितनी बार मैंने देखा है कि वह जो कहता है, उसे करता नहीं, और जो करता है उसे कहता नहीं, उसकी कथनी और करनी में कभी भी एकरूपता नहीं रही है, वह हमेशा विश्वास के विचलनों का यात्री रहा है।
पत्रकार की बातों का दूसरा पक्ष जो मनरेगा के भ्रष्टाचार के बाबत था उसने मुझे प्रभावित किया और मैंने निश्चित किया कि पत्रकार के साथ दो कदम चलना चाहिए तथा जांच समिति के सामने उपस्थित होना चाहिए। पत्रकार की बातों के प्रमाण मेरे पास नहीं थे पर जनश्रुति थी कि सोनभद्र में मनरेगा के कार्यों में बहुत बड़े घपले हुए हैं। पत्रकार ने घपलों से संबधित सारे कागजातों को मुझे दिखाया। उनमें कुछ सूचना के अधिकार के तहत हासिल किए गये थे जो पक्के प्रमाण थे तथा कुछ कागजातों की फोटो कापियां थीं जिन्हें देख कर प्रथम द्रष्टया गलत या अपुष्ट नहीं कहा जा सकता था। सो उन कागजातों ने मुझे प्रभावित किया और मैंने पत्रकार से सीधे बोल दिया कि मैं तुम्हारे साथ हूॅं। तुम यहां के वौद्धिकों की एक मीटिंग बुला लो, मीटिंग मेरे आवास पर ही बुला लो मैं सभी से बातें कर लेता हूॅं कुछ पत्रकारों को फोन से बोल दूंगा, पत्रकार जांच समिति के सामने जायेंगे ऐसा विश्वास तुम्हें रखना चाहिए।
मेरी स्वीकृति के बाद पत्रकार आत्मविश्वास से भर उठा, कहने लगा...‘मैं जानता था कि आपके यहां से मुझे निराश हो कर नहीं लौटना होगा, आप कुछ न कुछ अवश्य करेंगे। आपके पहले मैं एक बड़े साहित्यकार के पास गया था सोचा था कि उनसे काम चल जायेगा। आपके यहां आने पर जाने क्या, क्या सुनना पड़े, आप तो मानने वाले हैं नहीं, जो भी मन में होगा बोल देंगे। मैं इससे बचना चाहता था पर आना ही पड़ा आपके पास। उस बड़े साहित्यकार ने मुझे साहित्य की परिभाषा में ऐसा फंसा दिया कि मैं उससे बाहर निकल ही नहीं सकता था। साहित्यकार के पास गरिमा की मजबूत तथा आधुनिक जाल थीं, उसी जाल में वह अधिकारियों तक को फसाया करता था, जाने कितने अधिकारी उसमें फस भी चुके थे। सामान्य लेखकों, पत्रकारों आदि को फसाना उसके लिए सामान्य सी बात थी। साहित्यकार कहने लगा..।
‘जांच समितियों के सामने इस होना, घपलों के बारे में शिकायतें करना, प्रशासन की निन्दा करना या आलोचना करना यह सब साहित्यकार के काम नहीं.. यह सब तो राजनीति करने वालों के काम हैं। साहित्यकार तो केवल साहित्य का आदमी होता है। वह साहित्य में ही पैदा होता है, उसी में जीता तथा मरता है। साहित्य के इतर उसकी कोई दूसरी दुनिया नहीं। आप लोग पत्रकार हैं, आपका काम है अखबार में छाप देना उसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर लड़ना नहीं.. जिनको लड़ना हो लड़ें, झगड़े.ं.’
‘मैं तो आपको सुझाव दूंगा कि आप भी प्रशासन के विरोध में कुछ न करें। कोई आपका साथ नहीं देगा। आगे आप जानें। मैं इस काम में आपकी सहायता नहीं कर सकता।’
उस प्रतापी साहित्यकार ने साफ मना कर दिया कि वह कुछ नहीं कर सकता। पत्रकार को हताश हो कर मेरे पास आना पड़ा था। वैसे मैंने भी उसे मना कर दिया था, पर मुझे पता है कि तटस्थता अपराध है सो मैंने तय किया कि पत्रकार का साथ देना चाहिए और मैंने हां कह दिया था। मैं भीतर भीतर बहुत खुश था कि तटस्थता का अपराधी बनने से बच गया।
शशि को पहले ही बता दिया था कि डी.एम. साहब के आने की सूचना पक्की कर लेने के बाद ही उनके पास निमंत्रण देने के लिए चलना उचित होगा। शाम तक खबर मिल सकती है कि डी.एम. साहब किस दिन मुख्यालय पर रहेंगे। मैंने पत्रकार से हुई बात, चीत का संदर्भ भी शशि को बताया था कि सोनभद्र में बहुत ठीक ठाक नहीं चल रहा, इस जनपद का नाम मनरेगा के भ्रष्टाचार के मामले में अब शीर्ष पर है।
‘तो आप पता करके डी.एम. साहब के मुख्यालय पर होने की सूचना मुझे दीजिएगा, उसी के अनुसार प्रोग्राम बनेगा’ मुझसे बोल कर शशि मेरे घर से चली गई थी।
परछांई
दो दिन गुजर गये फिर भी गोष्ठी के लिए निमंत्रण पत्र डी.एम. साहब को नहीं दिया जा सका। डी.एम. साहब मनरेगा की जांच में व्यस्त थे, जांच के बाद सीधे लखनऊ चले गये। उनके दफ्तर के लोगों ने बताया कि साहब दो दिन बाद ही मुख्यालय पर आयेंगे ।
मैंने फोन से शशि को बता दिया कि दो दिन बाद ही डी.एम. साहब से मुलाकात हो सकती है। सरकारी अधिकारियों वह भी डी.एम. जैसे अधिकारियों को कार्यक्रमों में बुलाना भले ही सहज और सरल हो पर वे कार्यक्रम में शामिल हो जायें यह सरल नहीं, जाने कब और कहां उनके जरूरी प्रशासनिक कार्यक्रम लग जायें और फोन से खबर आ जाये कि वे कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकेंगे। अगर भलमानुष हुए तो किसी अन्य अधिकारी को अपने स्थान पर भेज देंगे। नहीं तो नहीं..। अक्सर मैंने देखा है कि बड़े अधिकारियों के साथ ऐसा ही हुआ करता है। जबकि आयोजक आयोजन का सारा तामझाम जितना बेहतर बनाना संभव होता है उनके नाम पर बनाता है कि डी.एम. साहब आ रहे हैं। कार्यक्रम की चमक बाहर तक जानी चाहिए, नाश्ते वगैरह से महिमा फूटनी चाहिए। और अगर ऐसे में डी.एम. नहीं आये तो निराशा फैल जाती है, लगता है कि कार्यक्रम हो ही नहीं रहा, जबकि हो रहा होता है, जिसे होना ही होता है।
गोष्ठी की तारीख जैसे,जैसे नजदीक आ रही थी, वैसे,वैसे खबर फैल रही थी कि डी.एम. साहब के मुख्य आतिथ्य में एड्स की गोष्ठी होगी। गोष्ठी होने की खबर अखबारों में भी प्रकाशित हुई थीं। मनरेगा का विरोध करने वाले पत्रकार ने भी खबर सूंघ लिया और दूसरे दिन ही मेरे पास आ धमका।
‘भाई साहब! आप डी.एम. साहब को अपने कार्यक्रम में बुला रहे हैं?’
‘हां तो..। पर वह कार्यक्रम मेरा नहीं है, शशि का है, शशि बुला रही है, मैं उन्हें काहे के लिए बुलाऊंगा, मेरा कोई कार्यक्रम नहीं..’
‘शशि और आप में फर्क क्या है? शशि तो आपकी ही साथिन है या कहिए शिष्या है। सोनभद्र में किसे नहीं पता कि आप हैं तो शशि है, शशि है तो आप हैं, फिर तो वह कायर्यक्रम भी आपका ही हुआ नऽ।’
‘हां हुआ तो..। पर फर्क भी बहुत है जैसे तुम्हारा कार्यक्रम जो मनरेगा के विरोध वाला है, क्या वह मेरा है? मैं उसमें भी तो तेरे साथ हूॅं, साथ होने से का होता है? पर तूं कहना क्या चाहता है? यह तो बताओ, घुमा कर कान काहे पकड़ रह होे, सीधे पकड़ो।’
पत्रकार मेरे कहने के बाद अपने असली तेवर में आ गया..। जो उसका अपना था, गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला। बोला...
‘आपको ऐसे भ्रष्ट डी.एम. को कार्यक्रम में नहीं बुलाना चाहिए।’
उसकी राय से मैं चौंक गया.. ‘इसे भी भ्रष्ट की पहचान हो गई है।’
‘यानि कि भ्रष्ट लोगों के साथ पत्रकारों तथा साहित्यकारों को नहीं होना चाहिए, एक तरह से उनका बहिष्कार करना चाहिए। कुछ ऐसा ही कहना चाह रहे हो नऽ।’ मैने पत्रकार से पूछा..।
‘हां हां ऐसा ही।’
पत्रकार ने खुशियां ओढ़़ ली, जैसे उसने किसी बड़े रहस्य को खोलने में सफलता हासिल कर लिया हो। मुझे तो पहले का एक कार्यक्रम याद था जिसे पत्रकार ने अपने घर का कार्यक्रम बना लिया था। अपने मन और चाह से जो कर सकता था उसने वही किया किसी को घास तक नहीं डाला। पहला वांक्षित काम तो उसने यह किया कि उसने उन सारे लोगों को कार्यक्रम की समितियों से निकलवा दिया जिन्हें वह पसंद नहीं करता था। तब वह डी.एम. का दुलरुवा था। डी.एम. की सह पर स्थानीय प्रशासन ने उसे सोनभद्र का बड़ा ही नहीं अनिवार्य पत्रकार बनाया हुआ था जैसे उसके बिना सोनभद्र चल ही नहीं सकता। बाद में जाने क्या हुआ कि प्रशासन के लोगों की आंखें पत्रकार को देखते ही परपराने लगीं। डी.एम. साहब की आंखें तो उसे देख कर सूज ही गईं थीं.. कई दिन तक खुल ही नहीं रही थीं। जाने किस तरह से उन्होंने आंखों का इलाज किया। लोगों का कहना है कि योगाभ्यास से उन्हें लाभ मिला। किसी योगगुरू ने उन्हें योगाभ्यास की ट्रेनिंग दी। यौगिक क्रियाओं के अभ्यास से उन्हें कुछ ही दिन में परिवर्तन दिखा, सारा कुछ अप्रत्याशित जैसा था। उनकी आंखें पूरी तरह से खुलने लगीं तो उन्होंने सोनभद्र को देखा कि यहां क्या है? यहां के लोग कैसे हैं? और वे क्या चाहते हैं? उस योगाभ्यास ने उन्हें अर्न्तज्ञान उपलब्ध करा दिया था कि प्रशासनिक अधिकारी को धृतराष्ट्र की तरह संजय जैसों पर आश्रित नहीं होना चाहिए। वैसे भी आज के जमाने में कोई संजय हो ही नहीं सकता पर संभावना है कि लोग धृतराष्ट्र बन जायें। अधिकारी अगर धृतराष्ट्र बन गया, वह भी जिले स्तर का, फिर तो जिले को खतम होने से कोई नहीं बचा सकता।
विचारों की भैंस लड़ाई नहीं थी, अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी था। डी.एम. के लिए तमाम ऐसे कार्य थे जिसे निपटा कर वे साबित कर सकते थे कि उनका पक्ष सोनभद्र की जनता है न कि कोई खास आदमी। ऐसी समझ बन जाने के बाद डी.एम. साहब ने पत्रकार को ठेंगा दिखा दिया और साफ कह दिया कि तुम किसी के नहीं हो सकते और तुम्हारी भलाई इस बात में है कि सिर्फ पत्रकारिता करो तथा अपने काम से काम रखो।
पत्रकार को डी.एम. के दरबार से खारिज किया जाना सोनभद्र के लिए बड़ी खबर थी। यहां के लिए यह खबर दिल्ली की खबरों से कम नहीं थी। दिल्ली में भी तो ऐसा ही होता है, पर वहां पत्रकारों का स्वर्ग डी.एम. का कार्यालय नहीं, प्रधान मंत्री का कार्यालय होता है। उसकी गंध में डूबने के लिए अधिकांश पत्रकार आतुर रहते हैं। गंध भी अचरज भरी होती है, उस गंध में गरिमा, व महिमा की मादकता होती है। उसमें डूबते ही विदेश दिखने लगता है, पत्रकारों को पंख लग जाते हैं, वे हवा में प्रधानमंत्री के साथ उड़ने लगते हैं फिर तो जहां, जहां प्रधानमंत्री वहां वहां पत्रकार।
वैसे भी हवा में उड़ना, तैरना, गरिमा की मादकता में लहराना किसे अच्छा नहीं लगता। एक बार जो इस मादकता में डूब गया फिर तो उसका नशा पत्रकार से उसे साहित्यकार बना देता है। चाहे उसका रिश्ता साहित्य से कभी रहा हो न रहा हो। प्रधानमंत्री के साथ एक दो बार की विदेश यात्रा सर्वगुण संपन्नता का लोकतांत्रिक प्रमाण है फिर विपन्नता उनके पास फटकती तक नहीं। वैसे भी विपन्नता क्षीण करने के तमाम साधन आज कल हर ओर फैले हुए हैं। विपन्नता दूर करने के साधन और तंत्र धीरे धीरे पत्रकार के करीब पहुंच जाते हैं फिर पता चलता है कि पत्रकार की एक किताब जो यात्रा संस्मरण के रूप में है, छप जाती है तथा पूरी दुनिया में तहलका मचा देती है। दिल्ली में निवास करने वाले प्रकाशकों की जमात एकाएक उस पत्रकार को पत्रकार से लेखक बना देती है। यह माना हुआ सच है कि प्रकाशक जिसे चाहें उसे रातों रात बड़ा ही नहीं अनिवार्य लेखक बना सकते हैं, उनके पास क्या नहीं है, प्रेस हैं, अखबार हैं, पत्र पत्रिकाएं हैं, अब क्या चाहिए किसी को बड़ा तथा अनिवार्य बनाने के लिए?
साहित्य तथा लेखन से जुड़ी जनता तो वही पढ़ेगी तथा उसी के सहारे बढ़ेगी जो उसे पढ़ने के लिए मिलेगा, अलग से कुछ तो गढ़ेगी नहीं। उसे लगातार जो सामग्री मिलेगी उसे पढ़ कर अपना मन बना लेगी कि फलां पत्रकार जो केवल पत्रकार ही था बड़ा लेखक भी है। बेचारे आलोचक भी ऐसे आदमी के पीछे चलने के लिए विवश हैं, विवश क्यों नहीं हों वे आलोचना के लिए किसका चुनाव करें? वे भी तो चुनाव उसी का करेंगे नऽ जिसका कुछ प्रकाशित हो। प्रकाशित तो ऐसे लोगों के ही होते हैं जो राजधानियों के दुलरुवा होते हैं।
किताब प्रकाशित हो जाने के बाद गरिमा का एक ही खेल बाकी रह जाता है और वह खेल सबसे भारी होता है किसी भी सभ्यता में। वह सभ्यता चाहे पूर्बी हो, पश्चिमी हो फर्क नहीं पड़ता। इस खेल में पदक मिल जाने के बाद सारे विश्वविद्यालय भी अपने बन्द मुहों को खोल देते हैं..
साहित्य की गरिमा के इस खेल ने सारी दुनिया को आत्मिक मनोरंजनों से ओतप्रोत कर दिया है। जिससे प्रभावित हो कर साहित्य की जनता ने भी अपने अपने सुखों को सुरक्षित रखना शुरू कर दिया है। साहित्य की गरिमा का आखिरी और अन्तिम खेल पूरी तरह लोकतांत्रिक होता है, जिसे दुनिया प्यार से सम्मान के नाम से जानती है या पुरस्कार के नाम से। दोनों का एक ही वजन होता है, समय और परिस्थिति के अनुसार इनका प्रयोग थोड़ा
इन्हें अलग, अलग कर देता है। बहुत ही बारीक फर्क होता है, उतना ही जितना अश्लीलता तथा शीलता में होता है। मानों तो शील नहीं तो अश्लील। ऐसा फर्क नहीं, जो किसी दरार माफिक हो जिसमें कोई सभ्यता घुस जाये। ऐसे दरारों में सभ्यताएं घुसती भी नहीं, सभ्यतायें तो खुद अपनी दरारों में घुसा करती हैं।
अचानक एक दिन ऐसे पत्रकार को सम्मान या पुरस्कार मिलने की घोषणा हो जाती है, सारे अखबारों में पत्रकार की फोटो चमक जाती है। फिर तो साहित्य की जनता एक नये साहित्य दूत का अभिनन्दन करने के लिए मुग्धता की गुफा से बाहर निकल पड़ती है।
गरिमा हासिल करने वाली दिल्ली की साहित्यक सभ्यता सोनभद्र में भी जस के तस है। उसे यहां जस के तस अपना लिया गया है, अब माना जा रहा है कि इसमें स्थानीयता का पुट दे कर थोड़ा हेर, फेर किया जाना चाहिए। हेर, फेर किया भी जाता है। कुछ हेर, फेर के साथ सोनभद्र के साहित्य को बचाने व सम्मानित करने के योग व संयोग का बाकायदा अभियान चलाया गया जिसका नेतृत्व मनरेगा वाले पत्रकार ने किया। उस अभियान को यहां की साहित्यिक जनता ने अच्छा माना या बुरा इसका कुछ पता नहीं चला, सरकार के अन्य कामों की तरह जिसका पता नहीं चला करता।
सोनभद्र के मनरेगा वाले पत्रकार के लिए डी.एम. साहब के आफिस का दरवाजा बन्द हो जाना कोई साधारण खबर नहीं थी, बहुत बड़ी खबर थी। सोनभद्र की शाकाहारी साहित्यिक जनता अचरज में पड़ गई..।
हर ओर सवाल ही सवाल..। अरे यह क्या सुनने में आ रहा है, कल तक जो प्रशासन के लिए चमकता, दमकता सितारा था उसे यहां के आदिवासियों की तरह बहुत ही बेरहमी से विस्थापित कर दिया गया, आखिर क्यों?
‘इस क्यों’ का जबाब किसी के पास नहीं था। जबाब किसी के पास अपने आप तो चला नहीं आता फिर किसी का लेना, देना भी तो कुछ नहीं था जो पता लगाता और अपना समय पता लगाने में खर्च करता। सो जो हुआ, हुआ, माना गया ऐसा तो होता रहता है। पर जब मनरेगा वाले पत्रकार के बारे में खबर फैली कि पत्रकार के लिए प्रशासन के दरवाजे ही नहीं सारी खिड़कियां तक बन्द कर दी गई हैं तथा ऐलान कर दिया गया है कि कोई भी अधिकारी पत्रकार से रिश्ता नहीं रखे तब साहित्यिक जनता सुगबुगाते हुए कनफुसवा करने लगी। लिखने, पढ़ने वालों की ही नहीं दूसरे पत्रकारों के कान आपस में गुंथने लगे फिर भी कोई खबर के बारे में चर्चा नहीं करता था जाने क्या सच हो, सभी के मुंह तब भी सिले हुए थे।
प्रशासन का मामला है, कभी भी प्रशासन अपनी दिव्यदृष्टि से जान सकता है कि उसका मजाक उड़ाया जा रहा है। मनरेगा वाला पत्रकार तो बहाना होगा, असल बात होगी प्रशासन का मजाक उड़ाना। सोनभद्र जैसे ठंडे दिल
वाले जनपद में प्रशासन का मजाक उड़ाना यह प्रशासन की गरिमा के खिलाफ तथा विनम्रता भंजक होता। आज कल वैसे भी प्रशासन की विनम्रता तोड़ना अपराध है। सो किसी ने पत्रकार को प्रशासन के दरवाजों से खदेड़े जाने की ऐतिहासिक घटना को अपने सिर माथे पर नहीं उठाया।
कोई सिर माथे पर उठाता भी नहीं, किसे पड़ी थी कि वह जान बूझ कर जेल जाये, सभी को पता था कि एक दूसरे पत्रकार पर भी प्रशासन की आंखे लाल हैं, उसे दो तीन दिन के भीतर ही जेल भेज कर उसकी मुहफट्टई बन्द की जा सकती है। प्रशासन ने कानूनी ही नहीं कागजी तैयारी भी कर लिया है, उसे केवल क्रियान्वित करना बाकी है। दो तीन दिन तो दूर की बात थी, उसे दूसरे दिन ही फौजदारी की कई दफाएं लगा कर जेल भेज दिया गया। प्रशासन ने बहुत ही कुटिलता से अपनी हनक दिखा दिया जो दूसरे लोगों को भयभीत करने के लिए पर्याप्त थी।
तीसरे दिन प्रशासन ने एक और कानूनी खेल खेला, वह खेल गलत था या सही था यह कौन मालूम करे। लोग तो केवल खेल ही देख सकते हैं और लोगों ने देखा भी कि एक जमे जमाए पत्रकार की मान्यता रद्द करा दी गई है जो बीसों साल से पत्रकार होने की दबदबों का बेताज बादशाह था।
वह जब अपनी कार पर बैठता था तथा कटी हुई मूंछो के भीतर मुस्कियाता था तब जान पड़ता था कि पत्रकारिता रूपी चौथे खंभे की धमक से सोनभद्र का प्रशासन ही नहीं यहां की पहाड़ियां भी हिल रही हैं। जंगल अपने बचे रहने की भीख मांग रहा है। रिहंद बांध का क्षेत्रफल सिकुड़ चुका है तथा सोन की चमक फीकी पड़ गई है। लगातार बीसों साल से जो पत्रकारिता की बादशाहत कर रहा था उसकी अपनी सधी तथा साधी हुई जनता थी। उसे प्रशासन का यह काम काफी बुरा तथा क्रोध भड़काने वाला लगा। जनता आगे आयी, उसने खुद शान्ति से अशान्ति की ओर चलने का फैसला लिया, जिसका अर्थ था प्रशासन का विरोध। पर पत्रकारिता के बादशाह को यह भला व समयानुकूल नहीं जान पड़ा। उसने अपनी जनता को विनम्रता से समझाया..।
‘सभी का तथा सभी काम का विरोध नहीं किया जाता। इतना मैं जानता हूॅं कि मैं पत्रकार हूॅं और मरते दम तक पत्रकार ही रहूॅंगा। प्रशासन मुझे पत्रकार माने या नहीं माने, कुछ फर्क नहीं पड़ता। विरोध तो वे करें जो बिना मान्यता पाये पत्रकार हो ही नहीं सकते, मुझे तो पूरा जनपद जानता है कि मैं क्या हूॅं, पत्रकार की मान्यता मेरे लिए बहुत छोटी तथा घिनघिन चीज है, सो आप लोग विरोध न करें, विरोध करना भी नहीं चाहिए।’
मेरी मजबूरी थी कि मैं मनरेगा वाले पत्रकार की सलाह को न मानूं, उसे मानने का कुछ औचित्य भी नहीं था, मैं जानता था कि किसी दिन भी यह खबर मिल सकती है कि मनरेगा वाले पत्रकार ने दुबारा से डी.एम. कार्यालय में अपनी जगह बना ली है, सो मैंने उससे साफ,साफ कह दिया...
‘देखो भाई यह कार्यक्रम मेरा नहीं है शशि का है, शशि का भी नहीं उसकी संस्था का है, और संस्था के लिए डी.एम. को बुलाना अनिवार्य है क्योंकि एड्स जागरूकता वाला कार्यक्रम सरकारी है। सरकार ही इस पर फन्ड दे रही है तथा डी.एम. को ही कार्यक्रम की सफलता तथा असफलता के बाबत रिपोर्ट देना है। ऐसी परिस्थिति में संभव नहीं है कि डी.एम. की उपेक्षा कर दी जाये, सो डी.एम. को तो निमंत्रण दिया ही जायेगा, यह अलग बात है कि वे आयें या न आयें। इस मामले में मैं कुछ नहीं कर सकता।’
मनरेगा वाला पत्रकार मेरे घर से उदास ही नहीं मुझ पर नाराज हो कर लौटा। बाद में मालूम हुआ कि वह मेरे बारे में गालियों जैसी समानधर्मी बातें करने लगा है..जिसका आशय मुझे बदनाम करने का था कि मैं एक पतित आदमी हूॅं और खुद को बेचकर अपना अस्तित्व बचाने का आदी भी। मैं प्रशासन को सलाम करने तथा अपने फायदों के लिए किसी के पैर पर गिरने में तनिक भी शर्म नहीं महसूसता, गोया मैं एक घिनघिन आदमी हूॅं जिसे आदमी कहा ही नहीं जाना चाहिए।’
गोष्ठी होने की तारीख के दो दिन पहले एक दूसरे पत्रकार ने जो मेरी किताबों का अच्छा पाठक था उसने खबर दी कि मनरेगा वाले पत्रकार को दुबारा से डी.एम. कार्यालय में जगह मिल गई है तथा उसने प्रशासन की सफाई वाला समाचार भी अपने अखबार में प्रकाशित कर दिया है। मनरेगा में किसी प्रकार की यहां धांधली की ही नहीं गई। इस बाबत उसने जांच समितियों के प्रमुखों के नामों का संदर्भ भी दिया है।
खबर पक्की थी सो मैंने तय किया कि मनरेगा वाले पत्रकार को गोष्ठी में अवश्य बुलाना चाहिए। मैंने तत्काल उसका नंबर मिलाया....
उसका नंबर मिल गया, मैंने कहा....
तुम्हें गोष्ठी में आना है, तुम्हारा निमंत्रण पत्र मेरे पास पड़ा हुआ है, उसे भिजवा रहा हूॅं, साफ बताना कि तूं आ रहा है कि नहीं....
उसने कहा.... ‘आपके कार्यक्रम में मैं न आऊं यह कैसे संभव है, निश्चित रूप से आऊंगा।’ उसने जोड़ा
मैं मनरेगा वाले पत्रकार से बात कर ही रहा था कि मेरी किताबों का पाठक पत्रकार जो मेरे साथ बैठा हुआ था, उसने टोका..।
किससे बात कर रहे हैं? मनरेगा वाले पत्रकार से, उसे क्या निमंत्रण देना वह तो डी.एम. साहब के साथ आयेगा ही। जहां डी.एम. वहां मनरेगा वाला पत्रकार। वह पत्रकार ही नहीं प्रशासन की परछांई भी है और परछांई को क्या बुलाना, क्या नहीं बुलाना?
एक थी लौंगी
वही हुआ जिसका संदेह था, डी.एम. साहब गोष्ठी में नहीं आ सके, मालूम हुआ कि सरकार ने प्रदेश के सारे जिलाधिकारियों को लखनऊ तलब कर लिया है। सरकार ने अधिकारियों को क्यों तलब कर लिया है यह तो नहीं पता चल पाया, पर लगता है कि प्रदेश का नया चुनाव कुछ महीनों में ही होने वाला है। प्रदेश की सरकार नहीं चाहती कि नये चुनाव में उसका प्रदर्शन किसी भी तरह से खराब हो। सरकार चाहती है कि उसके लोकप्रिय कार्यक्रमों की जानकारी हर हाल में अधिकारी जनता तक पहुचायें तथा कार्यक्रमों का अनुपालन भी सुनिश्चित करायें।
गोष्ठी की सफलता पर शशि ही नहीं उसकी संस्था का मंत्री भी मगन था पर मैं थोड़ा दुखी था हालांकि मेरे हिस्से में प्रसन्नता कम नहीं थी फिर भी..मेरा दुख लौंगी को ले कर था, लौंगी नहीं आयी थी। वह बीमार थी तथा बनारस अस्पताल में पड़ी थी, दुखी शशि भी कम नहीं थी पर वह कार्यक्रम क्रियान्वयन के दबावों में उलझी हुई थी, लौंगी के नहीं आने के कारण कार्यक्रम रोका नहीं जा सकता था।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद शशि का चेहरा बदल गया। वह लौंगी से मिलने तथा उसे देखने के लिए तुरंत बनारस जाना चाहती थी जो संभव नहीं था। बनारस चली जाती तो गोष्ठी के लिए मंगवाए गये सामानों को कौन भिजवाता, बकाया लेन, देन कौन करता फिर संस्था का मंत्री भी तो रापटगंज में ही जमा हुआ था उसे कार्यकर्ताओं की दूसरे दिन ही मीटिंग लेनी थी।
शशि के लिए बनारस जा पाना दूसरे दिन ही संभव हो पाया। संस्था के मंत्री को दूसरे दिन दोपहर तक लखनऊ के लिए निकलना था। वह गोष्ठी की भव्यता तथा रम्यता से गदगद था। उसने अपने भाषण में ऐसा बोला भी था कि इस तरह के कार्यक्रम में उसे अब तक भाग लेने का अवसर नहीं मिला है। सोनभद्र के लोगों की सहभागिता देख कर वह अचंभित था। वैसे भी कार्यक्रम बहुत ही अच्छे से निपट गया पर मुझे कार्यक्रम में लौंगी का उपस्थित नहीं होना अखर रहा था। मैं बार बार शशि से जानना चाह रहा था.. ‘आखिर लौंगी क्यों नहीं आयी?’ वह तो बिना किसी गंभीर कारण के रुकती नहीं’
शशि को भी लौंगी के बारे में कुछ नहीं पता था। लौंगी के क्षेत्र की तरफ से जो कार्यकर्ता गोष्ठी में भाग लेने आये थे उन्हें भी लौंगी के बारे में कुछ नहीं मालूम था। उन्हें केवल इतना ही पता था कि लौंगी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अवश्य आयेगी इससे अधिक कुछ भी नहीं.. कार्यक्रम प्रारंभ होने के कुछ पहले लौगी के गांव के एक आदमी ने बताया कि लौगी बीमार
है और बनारस अस्पताल में भर्ती है, तब मालूम हुआ कि लौगी कार्यक्रम में भाग लेने क्यों नहीं आयी?
लौगी की बीमारी अप्रत्याशित नहीं थी। उसे तो बीमार होना ही था। समय जितना आगे सरक रहा था, सरक रहा था। उसे एक दिन रुक जाना था। शशि तथा मुझे भी मालूम था कि लौंगी का समय उससे दूर बहुत दूर खड़ा है। कुछ ही समय बाद जो दिन में भी कैद हो सकता है महीने तथा वर्ष में भी, वह समय से बहुत दूर हो जायेगी किसी कल्पना की तरह। कल्पना में लौंगी का समय लाैंगी के लिए नहीं होगा और न ही लौंगी समय के लिए होगी। वहां केवल हताश करने वाली कहानी होगी जिसकी शुरुवात होगी....
‘एक थी लौगी’
पर लौंगी कम से कम मेरे लिए तो ‘एक थी लौंगी’ नहीं थी, वह इससे अधिक थी, वह होने नहीं होने की व्याख्या थी तथा वह सुकुमार अभिव्यक्ति भी जो शब्दों को मरने नहीं देते। संभव है उसकी बीमारी उसे छीन ले और वह हमलोगों की स्मृतियों में शामिल हो जाये। संभव है ऐसा ही हो, पर हमारी कल्पनाओं में वह जीवित रहेगी, मरेगी नहीं। उन शब्दों की तरह जिनसे हम जीने की ऊर्जा हासिल करते हैं।
मैं कल ही शशि के साथ लौंगी के पास जा पाऊंगा, ऐसा ही होने वाला है अगर मैं तुरंत जाना चाहूॅं तो शशि रोक देगी ‘का फर्क पड़ता है आज और कल में’ ऐसा ही बोलेगी। उसे ऐसा बोलना भी चाहिए पर मैं कसमसा रहा था कि सभी के लिए तथा सभी समय में कल नहीं होता वहां केवल आज होता है, आज ही नहीं केवल अब होता है, लौंगी कल नहीं है, वह आज और अब है। कल तक जाने का हो? उसका कल उससे छिन चुका है, वह वर्तमान की धरोहर है, उसका कल स्मृति बनने वाला है, याद करने लायक चीजों की तरह। पर मैं शशि से का बोलंू....?
कैसे बोलूं कि मुझे आज ही जाने दो, तूं कल आ जाना। नहीं बोल पाऊंगा। मैं जानता हूॅं कि लौंगी, शशि की भावुकता की उत्पाद है पर अब यथार्थ बन चुकी है। वह जब उसकी भावुकता थी तब थी, आज नहीं है।
बहरहाल मुझे कल तक के लिए रुकना ही था। कल आने में देरी भी कितनी थी? कुछ घंटों की उससे अधिक नहीं.. शशि ने गोष्ठी से जुड़ी हुई जिम्मेवारियों को जैसे तैसे निपटाया और सात, आठ बजे रात तक खाली हो गई। सारे सामान भेजे जा चुके थे, लोगों के लेन देन निपट गये थे। देर रात तक शशि मेरे पास आयी, उसे मैंने पहले ही बोल दिया था कि रात का खाना तुझे मेरे साथ खाना है, आवास पर जा कर खाना पकाना नहीं..
शशि मेरे आवास पर गोष्ठी में बची हुई मिठाइयों के साथ आयी, उसे याद था कि बाबू उसे छेड़ेगा। बाबू यानि मेरे लड़के का लड़का। वह कुछ मामलों में बहुत ही शरारती है, खास तौर से खाने पीने की चीजों के मामलों में, लेकिन सभी के साथ उसका समान व्यवहार नहीं है, सभी को नहीं छेड़ता, वह समतावादी नहीं है, वह अपने चुनाव को प्राथमिकता देता है तथा उन्हीं लोगों से शरारत करता है, जिन्हें वह जानता ,पहचानता है, उसकी शरारतें जिन्हें प्यारी लगती हैं, शशि उन्हीं लोगों में से है।
कुछ देर बीत जाने के बाद शशि ने बाबू के बारे में पूछा..।
‘बाबू नहीं दिख रहा?’
‘वह सो गया है’
‘फिर मिठाइयां किसे दूं?’
‘मुझे दे दो’
बुढ्ढे तथा बच्चे में फर्क नहीं होता, मुझे चाहो तो बाबू मान सकती हो।
‘बाबू आप नहीं हो सकते। बाबू, बाबू है, वह जीवित वर्तमान का सफल उपयोगकर्ता है, और आप! खैर जाने दीजिए’
‘आखिर क्यों? क्या मैं वर्तमान का उपयोग करना नहीं जानता?’ मैंने पूछा
‘हां, हां आप जानते हैं, पर भूत की पूंछ पकड़े रहते हैं जिससे कि भविष्य के महासागर में डूब न जायें। और श्रीमान! आपका वर्तमान तो वहीं पड़ा मुस्कराता रहता है, वह भी दूसरे पर नहीं, आप पर ही। आप हैं कि वर्तमान का मुस्कराना भी नहीं महसूस कर पाते। अगर आप वर्तमान का मुस्कराना पकड़ लेते नऽ, तो बात दूसरी होती, फिर तो मुझे कुछ कहना ही नहीं पड़ता।’
मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया कि शशि का बोल रही? वह किस वर्तमान के मुस्कराने के बारे में बोल रही? मैं नहीं जानता कि वर्तमान मुस्कराता भी है, मुझे तो हर ओर रोता तथा सिसकता हुआ ही दिख रहा है। किसी दूसरे का क्यों? शशि का वर्तमान का कर रहा है? अकेले वर्तमान कर भी क्या सकता है? वर्तमान जैसी विकलांगता तो कुछ हो ही नहीं सकती। शशि अपने वर्तमान की विकलांगता आखिर क्यों नहीं देख रही? या देख रही हो तो उसे छिपा रही कि दूसरे न देख लंे.. इच्छा हुई कि शशि से पूंछू....
‘तूं सामान्य नहीं रह सकती क्या? यह क्या है कि बात बात में दर्शन की बातें, इन बातों से तूं क्या प्रदर्शित करना चाह रही? यह जो व्यतीत तथा प्रतीत का चक्कर है नऽ, यह तेरे मन को न तो शीतल कर सकता है और न ही ऊर्जस्वित, क्योंकि भावुकता में अगर, मगर होता ही नहीं.. व्यतीत तथा प्रतीत दोनों सहारा के रेगिस्तान की तरह होते हैं, जहां अनाज का एक दाना भी नहीं उग सकता। इन सब को छोड़ो, आगे बढ़ो, इसी बढ़ाव से खुद को गढ़ो, जितना गढ़ सको, हो सके तो गढ़े हुए को भी दुबारा तिबारा गढ़ो। यह जो समय है नऽ, इसे खाली तथा उन्मुक्त कभी न छोड़ो, इसे आवारा नहीं बनने दो, इससे लड़ो, लड़, लड़ कर इसे कमजोर बनाने की कोशिश करो ताकि तुझे देखते ही तेरा समय तुझे सलाम करे तथा अदब से तेरे सामने नतमस्तक रह,े फिर देखो..। आगे क्या होता है?’
‘आगे न तो व्यतीत दिखेगा नहीं प्रतीत, कुछ दिखेगा ही नहीं, दिखेगी केवल कोशिश, जिस पर चाहो तो मुस्कराओ या रोओ, समय को कमजोर बनाने की तुम्हारी कोशिश ही तुम्हें साहसी बनाएगी, और यही साहस तेरी दौलत है। तो क्या मैं बाबू से कम हूॅं जो तूं मेरी उपेक्षा कर रही?’
शशि कुछ नहीं बोली। उसे बोलना भी नहीं था, वह चिन्तित थी। लौगी को ले कर परेशान थी। खाना खाने के बाद शशि अपने आवास पर चली गई। यह निश्चित हो गया था कि सुबह सात बजे वाली बस से हम दोनों बनारस जा रहे हैं।
बनारस के लिए हम दोनों सुबह सात बजे निकल लिए। सरकारी बस में भीड़ भाड़ नहीं थी, सीट मिल गई। प्राइवेट बस से जाना खुद को बोरे की तरह बना कर एक दूसरे के नीचे दब जाना होता है। भीड़ पर भीड चंपी होती है जो एक दूसरे को दबाती रहती है, जबकि आराम किसी को नहीं मिलता। सभी कसमसाते रहते हैं..। आवागमन के हृदय बिदारक दृश्यों की खोज के लिए प्राइवेट बसों से यात्रा करने का सुझाव खोजी व्यक्ति को दिया जाना गलत नहीं होगा फिर वह साफ अन्तर निकाल सकेगा कि पदयात्राओं तथा आधुनिक यात्राओं में कितना फर्क है?
करीब दस बजे तक हमलोग बनारस पहुंच गये। लौंगी बी.एच.यू. अस्पताल में भर्ती थी। वहां तक पहुंचना आसान था और हमलोग पैदल ही चल दिए वैसे भी रिक्से की जरूरत नहीं थी। लौंगी वार्ड के कोने में थी। वार्ड की नर्स ने लौंगी कहां है? इसके बारे में हमें सही सही बताया था। लौंगी बिस्तरे पर दुबकी पड़ी थी, उसके पास एक पुरुष भी था जो देखने में पढ़ा लिखा जान पड़ता था। वह लौंगी के लिए बाहर से चाय ले कर आया था और उसे पिलाने के लिए प्रबंध में जुटा था। लौंगी थी कि चाय पीना नहीं चाह रही थी। बोल रही थी कि उसे चाय नहीं पीना।
लौंगी के पास जो पुरुष था, वह कौन था? हम दोनों को नहीं मालूम। लेकिन देखने में लगता था कि लौंगी का कोई आत्मीय ही होगा, जो कहीं गहरे तक लौंगी से जुड़ा होगा। वह जुड़ाव कैसा था, कितना था, यह तो बाद में पता चलता फिलहाल वहां केवल अनुमान था। हमलोगों के अनुमान से वह पुरुष एक भला और नेक आदमी लग रहा था।
लौंगी के साथ वाले पुरुष का नाम हमें नहीं मालूम था। वह भी हम दोनों को नहीं पहचानता था। लौंगी ने हम दोनों को देखा और खुद को संभालने लगी, दर असल वह अस्तव्यस्त थी। उसकी साड़ी भी इधर उधर सरक गई थी, अपनी जगह पर नहीं थी। उसने उसे ठीक किया और बैठ गई....
‘अरे लेटी रहो, बैठने में तकलीफ होगी’ मैंने लौंगी से कहा
‘नहीं, नहीं, ठीक है, कल रात से ही मुझे बहुत आराम है।’
लौंगी देखने में भी ठीक ही लग रही थी पर लग रहा था कि वह बीमार है, उसकी आंखों की चमक तथा चेहरे की दमक छिन चुकी थी। वह काफी ढीली हो चुकी थी जैसे कई दिनों से बीमार हो तथा अपने शरीर से लड़
रही हो। वस्तुतः वह लड़ भी रही थी, उसे पता था कि वह एक ऐसे रोग की जकड़ में है जो उसे उसके अवसान तक ले जायेगा। ऐसा तो हमें भी पता था। लौगी की बीमारी की खबर सुन कर हम निराश हो चुके थे कि शायद अब हम लौंगी का खिलखिलाना न सुन सकें।.. अमूमन लोग एड्स के रोग से नहीं बच पाते, पर इतना जल्दी भी नहीं।
लौंगी के साथ वाला पुरुष हम दोनों को लौंगी के पास छोड़ कर कहीं निकल गया। हम लोग लौंगी से बातें करते रहे। लौंगी अच्छी तरह से बोल रही थी हालांकि उसके बोलने में बीमारी का भारीपन था, उसकी बोल कांप कांप, जाती थी। शशि ने कुछ देर बाद लौंगी से पूछा....
‘ऐसा कब हो गया, कोई खबर तक नहीं दिया तंूने’
‘खबर कैसे देती बहन जी! खबर देने का टाइम ही कहां था हमरे पास, हम तो साहब के साथै थे, साहब भी अचानक आ गये थे हमरे से मिलने। आ ही जाते हैं, जाने का है कि साहब हमैं छोड़ ही नाहीं रहे हैं। अब आप से का बतायें हम लोग साथै सोए थे अउर....। अचानक हमारी होश ही खतम हो गई फिर हमैं का मालूम कि का हुआ? का नहीं हुआ, जब मालूम हुआ तब हम अस्पताल में थे। दो दिन बाद हमैं जान पड़ा कि हम अस्पताल में हैं, अउर साहब हमरे साथे हैं.. ई सब साहब ने ही बाद में हमैं बताया।’
‘साहब की कार साथ में थी, साहब ने फटाका हमैं कार में लादा अउर बनारस ले आये। यहां आने पर साहब ने अपनी छुट्टी बढ़ाई। अइया बपई भी साथ आ रहे थे, पर साहब ने उन्हें रोक दिया का होगा, वहां जा कर। साहब को हमरे रोग के बारे में मालूम है। बार बार हम ओन्हैं समझाते भी हैं कि साहब हमैं छोड़ो, रोगिहा मेहरारू के साथ आपका रहना, सोना ठीक नाहीं है, आपउ को रोगवा हो जायेगा। आप कउनो अउर रहता खोज लो, पर साहब हैं कि मानते ही नाहीं, हमैं लगता है बहिन जी नऽ कि साहब पगला गये हैं या कउनो पुरुब जनम का खेल हो, हमैं का मालूम।’
लौगी बातें कर ही रही थी कि उसका साहब आ गया, उसके हाथ में केटली थी तथा एक पैकेट भी। उसने प्लास्टिक की गिलासें हमें थमाया और उसमें चाय दिया तथा समोसे भी।
‘इसकी जरूरत नहीं थी हम लोगों ने नाश्ता कर लिया है’ शशि ने कहा
‘फिर भी इतना चल जायेगा, यही सब तो बचा रहेगा हम लोगों के बीच, नहीं तो क्या बचेगा।’ लौंगी ने नाश्ता करने के दौरान ही अपने साहब का परिचय कराया हम दोनों से।
लौंगी का साहब खिलखिलाया.... ‘मुझे मालूम है। आप लोग जब लौंगी के पास यहां आये तभी मैं समझ गया था कि आप लोग कौन हैं.. लौंगी बात बात में आपका तथा शशि जी का नाम लेती रहती है। हम लोग जब मिलते है तब बातेें ही बातें होती हैं, उन्हीं बातों के सहारे खाना, पीना तथा सोना होता है। बातें नहीं हों तो भूख, प्यास सारा कुछ गायब समझिए। जाने क्या है कि मैं लौंगी की बातों में मैं खोकर खुद को भूल जाता हूॅं कि मैं भी हूॅं, खैर छोड़िए आप लोग कब चले रापटगंज से?’
‘हां लौंगी बार बार बोल रही थी कि कल आप लोगों की कोई मीटिंग होने वाली थी, का हुआ? कैसी हुई मीटिंग?’
लौंगी ने मीटिंग का प्रसंग आते ही, अपने साहब के सवाल को छीन लिया....
‘हां बहिन जी, बताइए नऽ कैसी हुई मीटिंग? आप बोल रही थीं कि कलक्टर साहब को भी मीटिंग में आना था। मेरी तरफ इशारा करते हुए लौंगी ने मुझे टोका..।
‘आप तो कुछ बोल ही नहीं रहे हैं, बताइए नऽ मीटिंग के बारे में’
शशि ने मीटिंग के बारे में बताया कि सारा कुछ बहुत ही बढ़िया से निकल गया, तेरी कमी खल रही थी, तूं होती तो एड्स के फैलाव के बारे में बताती, वहां इस रोग के बारे में बताने वाला कोई भुक्तभोगी नहीं था। हां कलक्टर साहब नहीं आये, उन्हांेने दुद्धी के एस.डी.एम. को भेजा था। तेरा मीटिंग में न होना अखर गया, तूं होती तो बहुत अच्छा होता।
‘हम तो यहां बेड पर पड़े पड़े घबरा रही थी कि बहिन जी हमरे बारे में जाने का गुन रही हों, गुन रही होंगी कि बोल कर भी नहीं आयी’
वार्ड से खबर आयी कि सभी मुलाकाती वार्ड से बाहर निकल जांयें, डाक्टर आ रहे हैं।
हम सभी लौंगी वाले साहब के साथ वार्ड से बाहर निकल आये। बाहर एक चौड़ा गलियारा था, जिसपर मरीजों के मुलाकातियों ने कब्जा जमा लिया था। वह एक सुरक्षित जगह थी, वहां रोग तथा रोगी के बारे में ढेर सारी बातें की जा सकती थीं, एड्स के बारे में गलियारे में भी बातें जारी थीं....
‘एक पल का दैहिक सुख कितने बड़े दुख में बदल जाता है, जो बूझ ले उसे यहां न आना पड़े।’
गलियारे में जमे लोग इसी मुद्दे पर बतिया रहे थे। सभी के चेहरे पर एड्स की भयावहता नाच रही थी। लौंगी का साहब गभीर आदमी था, उसने हमें बताया..
‘फिलहाल तो लौंगी खतरे से बाहर है पर आगे कुछ नहीं कहा जा सकता। वैसे डाक्टर बोल रहा है कि जिस तरह से लौंगी दवाइयों का सेवन करते हुए सावधानियां बरत रही है अगर आगे भी बरतती रही तो खतरे की बात नहीं है। यह लगातार ध्यान रखना है कि लौंगी की दवाइयां बन्द नहीं हों, खून की बराबर जांच होती रहे, अस्पताल ही अब इसके लिए मन्दिर है।
लौगी के साहब की बातें सुन कर मुझे खुशी हुई और उस दर्द से मुक्ति भी। ‘एक थी लौंगी’ की भयावहता से मुझे गुजरना नहीं होगा। लौंगी मरेगी नहीं, जिन्दा रहेगी उसे बी.डी.ओ. का सहारा मिल गया है।
क्यों बे लेखक!
मेरे लिए ‘एक थी लौंगी’ की अनुभूति कंपा, कंपा देने वाली थी। मैंने महसूस किया है कि किसी को खो देना तथा खोए हुए को भुला देना मेरे वश का नहीं, वह भी लौंगी जैसी अक्खड़ लड़की को।
अस्पताल में लौंगी की हालत अच्छी देख कर मुझे खुशी हुई कि चलो बेचारी बच गई। उसके साथ बी.डी.ओ. को देखना मेरे लिए थोड़ी हैरानी की बात थी। यह साहबनुमा आदमी लौंगी के प्रति समर्पित क्यों है? क्या है इन दोनों में?
डाक्टर की विजिट कुछ मिनटों के लिए थी। वह वार्ड में घुसा और सभी मरीजों से मिल कर निकल गया। जब वह वार्ड से बाहर निकलने वाला था तभी मैंने उसे रोका, रोका क्या उसके आगे खड़ा हो गया। डाक्टर को शायद उसके सामने मेरा खड़ा होना अच्छा नहीं लगा, जाने कौन है कि रास्ता रोक लिया? बहरहाल उसने मुझसे कुछ कहा नहीं, सिवाय गुर्राहट के....
‘क्या है?’
‘जी मैं लौंगी के बारे में जानना चाह रहा हूॅं’ मैंने अति विनम्रता से पूछा, इससे अधिक विनम्र मैं हो भी नहीं सकता था, वह विनम्रता की अधिकतम सीमा थी।
‘कौन लौंगी?’ डाक्टर ने पूछा
बेड नंबर तेरह वाली’ मैंने उसे बताया
वही जो चार दिन पहले भर्ती हुई थी, बेहोशी की हालत में’ डाक्टर बोला
‘हां, हां सर वही’
‘वह तो अब ठीक है, दो तीन दिन में उसे डिस्चार्ज कर देंगे’ डाक्टर ने बताया साथ ही साथ एक अजीब सा सवाल भी पूछा.... सवाल उसका अजीब भले ही न रहा हो पर मुझे अजीब जान पड़ा।
‘आप कौन हैं उसके? एक आदमी तो और हैं उसके साथ।
हां सर, बी.डी.ओ. साहब हैं, उसके साथ, वही उसे भर्ती कराने लाए थे। मैं तो आज ही आया हूॅं सिर्फ उसे देखने तथा हाल अहवाल लेने।
‘अच्छा तो हाल अहवाल लेने आये हैं आप! अच्छी बात है, पर आप हैं कौन उसके? कोई रिश्तेदार वगैरह....।’ डाक्टर ने पूछा
पता नहीं क्यों डाक्टर यह सब पूछ रहा था, उसे यह सब पूछने की जरूरत क्या थी, वह मरीज देखे और निकल ले, अब यह क्या है कि पूछता फिरे, कौन आया, कौन नहीं आया? यह डाक्टर का काम नहीं.. मुझे डाक्टर का रोगियों का हाल अहवाल लेने आने वालों के बारे में पूछना उचित नहीं जान
पड़ा, मैंने भी उसे वैसा ही जबाब दिया..। ‘जी मैं उसका बाप हूॅं’......मैंने डाक्टर को बताया फिर डाक्टर मुझे घूरने लगा। उसकी आंखें मुझे देख कर सहम गई.. यह कैसे संभव है? लौंगी तो अदिवासी है, मोटे होंठ तथा गोल व चपटी नाक वाली, मेरी शक्ल, सूरत उससे भिन्न, प्रजातियों का विलीनीकरण डाक्टर को क्या पता? ‘नहीं, नहीं, आप उसके बाप नहीं हो सकते।’ पर डाक्टर ने दुबारा कुछ नहीं पूछा। पूछने के बजाय उसने कुछ अतिरिक्त संवेदना से समझाया..
‘लौंगी का ध्यान रखिएगा, इस समय उसे अतिरिक्त प्यार व मुहब्बत की जरूरत है। ऐसे रोगियों के साथ अलगाव ठीक नहीं। लोग छुआछूत का रोग समझ कर रोगी को अलग कर देते हैं। दवाइयां तो चलेंगी ही। मैंने आपसे इसी लिए पूछा था कि आप लौंगी के कौन हैं? मुझे तो इसकी जरूरत नहीं.. पर ऐसे मरीजों के लाभ के लिए जरूरत होती है। फिर मुझे शक भी था....’
‘शक यह कि ऐसे मरीजों का कोई अपना नहीं होता। जो अपना होता भी है नऽ, वह भी नहीं बताता कि वह अपना है। लोग बोल देते हैं कि मैं नहीं जानता। आप तो जानते हैं, लौंगी के रोग के बारे में कि वह देह धरे का अभिशाप झेल रही है। इस तरह के अभिशाप समाज में जन्मते हैं पर समाज उसे नहीं मानता कि उसने जन्माया है। बहरहाल लौंगी अब ठीक है, परमात्मा चाहेगा तो उसे कुछ नहीं होगा। आप लोगों को उसके साथ देख कर मेरा भरोसा बढ़ा है।’
डाक्टर की बातें अनायास नहीं थीं। मैं वार्ड में था और एड्स के मरीजों को छटपटाता हुआ देख रहा था। वहां उनकी देख, भाल के लिए नर्सों.. के अलावा उनके अपने नहीं थे। केवल दो तीन मरीज ही ऐसे थे जिनके पास अपने लोग थे जिनके चेहरों पर एड्स की भयावहता नाच रही थी। बाकी तो बेचारे भाग्य भरोसे थे। उन्हें कोई पूछने वाला तक नहीं था।
डाक्टर मुझसे बतिया कर चला गया। मेरे साथ बी.डी.ओ. और शशि थे। बी.डी.ओ. मेरी ओर था, वह जानता था कि मैं लौंगी का बाप नहीं हूॅं, वह लौंगी की अइया बपई से मिल चुका है फिर मैंने क्यों कहा कि मैं लौंगी का बाप हूॅं, वह इसमें उलझा हुआ था।
‘आपने तो गजब बताया डाक्टर को’..। बी.डी.ओ. ने सीधा सवाल किया
और क्या बताता यार? उसके बाप की उमर का नहीं हूॅं क्या? मेरी बड़ी बेटी लौंगी की उमर की होगी। बाप बताने से सारे शक सुबहे खतम हो जाते हैं फिर कोई शक नहीं करता, इसी लिए। यह एड्स के रोगियों का वार्ड है, यहां रोगी ही नहीं आते, उनकी दैहिक विडंबनाओं की कहानियां भी आती हैं.. कहानियां भी किसिम किसिम की, जो रोगियों की देह पर उछलती, कूदती रहती हैं, लड़कियों के मामलों में तो खास तौर से कहानियों को उछलना पड़ता है। इस वार्ड में रोग नहीं, रोगी की देह ज्यादा देखी जाती है, वह भी अनुमानों के सहारे कि ऐसे हुआ होगा एड्स। रोगी ने देह को बाजार में फेंक दिया होगा, सर सामान खरीदने के लिए और देह के दूकानदारों ने एड्स को खूबसूरत पैकैट में बन्द कर रोगी को थमा दिया होगा। उछलती, मटकती, कूदती, फलांगती देह को क्या पता कि उसे क्या मिल रहा है? जब पता चलता है तब देह, देह ही नहीं होती, वह महज रोग से जकड़ी लाश होती है और लाश होने का मतलब किसे नहीं मालूम?
डाक्टर के जाने के बाद हम लोग लौंगी के पास पहुंच गये। लौंगी लेटी हुई थी, उसकी आंखें खुली थीं.. डाक्टर ने दवाइयां नहीं बदली थीं, नर्स से बोला था कि पिछली दवाइयां ही चलेंगी। लौंगी ने देखा था कि हम लोग डाक्टर से बतिया रहे थे, सो उसने पूछा..।
‘डाक्टर साहब का बोल रहे थे, कुछ कह रहे थे का?’ लौंगी ने संशयात्मक सवाल पूछा..
‘हां डाक्टर बोल रहे थे कि दो तीन दिन में तुम्हें छोड़ देंगे’
‘यानि मैं ठीक हो जाऊंगी!’
हां और नहीं तो क्या? शशि ने बात आगे बढ़ाई
‘तुम ठीक ही नहीं, पूरी तरह ठीक हो जाओगी और पहले की तरह ही चहकोगी, जैसे चहका करती थी।’
‘हम कहां कभी चहक आ महक पाये बहिन जी! आप का बोल रही हैं.. लोगों को लगता है कि लौंगी चहकती है पर लौंगी हमेशा दरकती रही है। जैसे मकान दरकता है बहिन जी, बरसात का पानी पड़ते ही भहरा जाता है। देखिए हम भी तो भहरा गये, अगर साहब नहीं होते तब जाने का होता.. साहब को जाने का देखाता है खंडहर में, हमार देह तो खंडहरै हो गई है नऽ, एम्मे तो खाली सांप बिच्छी ही रह सकते हैं, बाकी साहब को का कहैं...आप लोग इन्हें समझाइये, बुझाइये नऽ, मै तो साहब से बार बार बोलती हूॅं, पर साहब हैं कि ओनके हमरे में सरग देखाता है, एकौ महीना नाहीं होता कि धमक पड़ते हैं’
लौंगी बोल, बोल कर हवा में लहरा गई, जैसे वह पहले लहराया करती थी, लहर तो उसके भीतर आज भी है पर गहरी निराशाओं के साथ। उसे मौका ही कहां था कि वह प्रकृति के नियमों के तहत चल पाती, उसे तो ठेला गया था, उसे जवान बनाया गया था, वह मन से जवान कहां थी? जब उसने महसूसा कि वह जवान है तथा जवानी उसे चूम रही है तब वह देह का खिलौना बन चुकी थी, जो बिकता है बाजार में, लोग उसे खिलौना समझ कर खरीदने भी लगे थे।
साहब से मिलने के बाद वह महसूसने लगी है कि वह खिलौना नहीं, उसमें भी जीता और हसता हुआ जीवन है, जो फुदक सकता है, लहरा सकता है, उड़ सकता है तथा मन हरियाने पर नाच, गा सकता है। लौगी लोगों के
साथ होती थी, लोग भी उसके साथ होते थे, वह उनके साथ सोती थी, उसकी देह पर किसिम किसिम के दैहिक उत्सव आयोजित होते थे पर उसे कुछ भी पता नहीं होता था कि हो क्या रहा है? लोगों के साथ होते ही वह सौ, पचास की नोट बन जाती थी। उसे जान पड़ता कि वह सिर्फ नोट है, जो बाजार में भंजता है, वह भी तो भंज ही रही है। पर भंज कहां रही है, नोट के बदले तो कुछ मिलता है, कुछ खरीदा जाता है, पर वह किसे खरीद सकती है, देह के बदले कुछ नहीं मिलता। छिः इतनी चोट बदले में सिर्फ सिर्फ नोट। वह सिसक जाती है, कांपने लगती है। उसे समझ में नहीं आता कि वह इस सोच से बाहर कैसे निकले?
उसे जहां जहां जाना पड़ता है, जाती है, लौटते समय रोती हुई घर आती है और अइया को नोट थमा देती है, जो उसे मिला होता है देह बेचने पर।
अइया तो अइया, चीख पड़ती है....
‘आजु का ऐतनै, खाली सौ ठे रुपल्ली, तूं एहर ओहर खरचती है का रे! तूं संझै से गई है काम पर, रात अउर सांझ भर का ऐतनै मिला’
लौंगी सहम जाती है, वह गंहकी कहां से पकड़े, निकल भी गये तो केतने के साथ सूतेगी? खाली सूतना ही नाहीं है नऽ, सूतने के लिए वहां मौका ही कहां है, लोग तनतनाए होते हैं, टूट पड़ते हैं देह पर, देह का एक एक हिस्सा निपोर देते हैं, रुपया खरचने का हिसाब वसूलना होता है फिर वे का बूझेंगे कि देह, देह होती है, कोई परती खेत नाहीं कि गहरे से जोत लिया, झर, झंखाड़ उखाड़ दिया। अब अइया को कउन बताए कि अइया ई सब अब हमरे से नाहीं होगा।
कई बार उसने अइया से कहा भी कि वह मजूरी कर लेगी पर देह नाहीं बेचेगी, पर अइया कहां मानने वाली थी? मारने पीटने लगती है, खुद मनचलों को बुलाती है, उनके सामने परोस देती है। वह असहाय की तरह छटपटाती रह जाती है। अगर उसे मन का सुख मिलता तो तन को खुला छोड़ देती, पर उसके मन की बात कौन जाने? सभी तन देखते हैं, मन तो किसी को देखाता ही नाहीं, देखायेगा भी नाहीं, मन का आकार, परकार ही नहीं होता। जिस तन का वह जतन करती रही है, वह ओकर नाहीं है। जिस किसी ने उसके तन पर नोट चिपका दिया उसने तन को उसके हवाले कर दिया, वह जो चाहे, जैसा चाहे करे, सजाये संवारे, बनाये या अपनी तरह से गढ़े।
लौंगी को तो पता भी नहीं चलता कि यह जो मन है, है क्या चीज? साहब से अगर नहीं मिली होती तो उसे कुछ पता ही नहीं चलता। मन के बारे में कि मन का गढ़न तो तन से खूबसूरत है। वो तो साहब हैं कि बात बात पर गुदगुदाते रहते हैं, वह किसी लतर की तरह साहब को कस लेती है और....फिर तो उसे एक अलग तरह की दुनिया देखाने लगती है, चांद तारों वाली, जहां पता ही नहीं होता कि तन और मन दोनों अलग अलग हैं.. मन के
उछलने के साथ वह उछलने लगती है।
लौंगी शशि से बतिया रही थी और मैं लौंगी को देख रहा था। लौंगी वही लौंगी है, जिससे मैं मिल चुका हूॅं और इस समय भी मैं उसके साथ हूॅ.. नारी मुक्ति का मामला सिर्फ पढ़ी, बढ़ी और खुद को गढ़ लेने वाली नारियों के साथ ही नहीं है, लौंगी के साथ भी है। लौंगी तन की आजादी को अगर आजादी मानती होती तो ऐसा काहे बोलती, काहे कुढ़ती, वह तो खुशियां पीती कि उसने जैसे चाहा वैसे अपनी देह को नचाया, गवाया, देह पर देहोत्सव की किसिम किसिम की कहानियां लिखीं, वैज्ञानिकों की तरह तन के एक एक हिस्से को परीक्षित किया। तन मुक्ति को अस्मिता का सवाल बनाने वाली नारियों की तरह वह भी खुश खुश होती तथा अपनी पीठ पर दैहिक क्रान्ति के नारों के गोदने गोदवाती।
मैंने लौंगी को समझाने की कोशिश की....
‘लौगी! तूं तो बहादुर लड़की है, फिर काहे निराश व हताश हो रही है। जो होना होता है वह होता ही है। उसे होने से रोका भी नहीं जा सकता। तूं जानती थी क्या? कि तेरे साथ तेरे साहब जैसा भी कोई होगा।’
बी.डी.ओ. की तरफ इशारा करते हुए मैने लौंगी से कहा....
‘बी.डी.ओ. साहब जब तेरे साथ हैं फिर काहे की चिन्ता कर रही है, डाक्टर भी बोल रहा है कि तुम्हें कुछ नहीं होगा, तुम स्वस्थ हो, पहले की तरह, लगातार दवाइयां खाते रहना है। दवाइयां नहीं छोड़नी है..’
बी.डी.ओ. बीच में बोल पड़ा..
‘यही तो मैं भी इससे कहता हूॅं साहब! पर मानती नहीं.. हमेशा कुढ़ती रहती है। कुढ़ने से क्या मिलने वाला है, आराम से रहो और हसते हुए समय से लड़ो। मैं जानता हूॅं जब आदमी अपने भीतर उतर कर भला बुरा तलाशने लगता है फिर बाहर कुछ भी नहीं दिखता, वैसे भी बाहर अन्धेरा ही अन्धेरा है, उजाला तो उसे ही दिखेगा जो खुली ऑखों से खुद को देखना चाहेगा। यही जीवन है और जीवन का आधार भी कि ऑखें खुली रखो। आदमी की ऑखें जिस दिन खुल जायें, समझ लो सूरज का जन्म उसी दिन हुआ है। खुली ऑखों से सूरज को देखो, उसके उजाले को चूमो, चूसो.. अंधेरों की ओर क्या भागना, क्या दौड़ना साहब!’ बी.डी.ओ. ने मुझे संबोधित किया।’
बी.डी.ओ. भावुक हो चुका था, उसकी भावुकता गहरे से लौंगी से जुड़ी थी। वह नहीं बोल रहा था उसके भीतर जो लौंगी बसी हुई थी वह बोल रही थी। बी.डी.ओ. की भावुकता मुझे प्रभावित कर रही थी कि कविता मरी नहीं है, एक आदमी जिसे कविता का क ख ग नहीं पता वह भी कविता की भाषा को मातृभाषा की तरह बिना मिलावट बोल सकता है। बी.डी.ओ. की भावुकता अचानक नहीं थी, मैं अनुमान कर सकता था कि बी.डी.ओ. कहीं गहरे में संवेदनाओं को जीने वाला आदमी है तभी तो वह उगते सूरज को देख रहा है, और विगत को लतिया रहा है, नहीं तो कुछ लोग होते हैं जो विगत में गोते लगा लगा कर खुद को डुबो लेते हैं फिर पता ही नहीं चलता कि उनके लिए क्या विगत है, क्या आगत है। बी.डी.ओ. मुझे जीवित आदमी जान पड़ा, वह जीवित आदमी था भी। नहीं तो लौंगी को छोड़ चुका होता। कुछ समय बाद तो लौंगी के पास वह देह भी नहीं रहेगी, जो मनचलों को चाहिए होती है, फिर आज भी लौंगी उनकेे लिए क्या है? पर बी.डी.ओ. मनचलों में नहीं। उसका रिश्ता केवल देह से होता तो उसे उसने कभी का हासिल कर लिया था। खरीदे हुए रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं, इस तरह के रिश्तों में स्थायित्व तो होता नहीं फिर भी बी.डी.ओ. लौंगी के साथ था, खरीदे हुए रिश्ते को वह स्थाई बना चुका था, यह आज के समय के लिए किसी अचरज से कम नहीं था।
बी.डी.ओ. एक अधिकारी था, अधिकारी सŸाा की अतिरिक्त मादकता में गहरे तक डूबे होने के कारण संवेदनाओं का मूल्य जानते हुए भी नहीं जानते हैं.. सŸाा की क्रूर मादकता के कारण वे सŸााविहीनों को अछूत समझते हैं तथा उन्हें वे मनुष्य ही नहीं समझते। लौंगी तो वैसे भी अछूत थी तथा सŸााविहीन तो थी ही। मैं बी.डी.ओ. से मिलकर अपनी ही धारणाओं को तोड़ मरोड़ रहा था, ‘सभी वैसे नहीं होते’ जैसा उनके बारे में गुना जाता है।
अस्पताल में हम लोग करीब चार बजे शाम तक रुके रह गये, बनारस में कहीं जाना नहीं था केवल लौंगी को देखने तथा उससे मिलने का ही कार्यक्रम था। बी.डी.ओ. को लौंगी के साथ रुकना था, उसके डिस्चार्ज होने के बाद ही वह लौटता।
बी.डी.ओ. मुझमें कम शाशि में अधिक रुचि ले रहा था, वह मर्दाना मिजाज में जकड़ा हुआ था, वही मिजाज जो सामान्यतया मर्दों में पाया जाता है कि शशि महिला है और पुरुष के साथ। नर, मादा के व्याकरण में उसे उलझा देख कर मुझे हसी आयी। चलो ठीक है कुछ तो हो रहा है।
शशि ने लौटते समय लौंगी को दो हजार रुपये दिए यह कहते हुए कि रख लो काम देंगे। लौंगी ने इनकार कर दिया..।
‘का होगा रुपया बहिन जी, कउनो काम नाहीं है।’
बी.डी.ओ. पास में ही था उसने देख लिया कि शशि लौंगी को रुपया दे रही है, उसने मना किया..।‘बहिन जी रुपया हैं मेरे पास, कल ही ए.टी.एम.से दस हजार रुपया निकाला है, का होगा रुपया? लौंगी है तो बहुत रुपये आयेंगे, रहने दीजिए, दुआ कीजिए कि लौंगी जल्दी अच्छी हो जाये।’
अस्पताल से लौटते समय हम लौंगी की कहानी के साथ थे, हम पीछे, पीछे थे, उसकी कहानी हमारे आगे, आगे। उजालों के तिराहे पर कहानी ने हमें रोक कर पूछा..।
क्यों बे लेखक अब आगे क्या लिखना है लौंगी के बारे में? बी.डी.ओ. है उसके साथ।
अनाम रिश्ते
बी.एच.यू. अस्पताल से हम लोग रापटगंज लौट आये, अस्पताल में रुकने की कोई जरूरत नहीं थी। लौंगी ने कहा भी था..
‘यहां साहब हैं ही फिर आप लोग काहे के लिए रुकेंगे, कोई काम भी नाही है, अस्पताल में रुपइया हो तो किसी की जरूरत नाही..’
वापस आने में काफी देर हो गई। रोडवेज की बस रास्ते में खराब हो गई जब दूसरी बस आयी तब हम लोग आ पाये। रास्ते भर लौंगी की कहानी में हमलोग उलझे हुए थे।
शशि लौंगी के साथ बी.डी.ओ. को देख कर भावुक हो चुकी थी, बी.डी.ओ. तथा लौंगी की अंतरंगता उसे जकड़े हुए थी। उसने मुझसे कहा..।
‘देखा आपने, यह होता है रिश्ता। बी.डी.ओ. तथा लौंगी के रिश्ते को आप क्या नाम देंगे? कोई नाम भी नहीं है शायद। इस तरह के रिश्ते अनाम होते हैं जो संवेदना तथा आत्मिक भावुकता से उपजते हैं, जो समाज द्वारा गढ़े तथा रचे हुए रिश्तों से प्रवृŸिा तथा विषय दोनों में अलग होते हैं.. इसी रिश्ते में वह मनुष्य भी दीखता है जो केवल मनुष्य होता है, प्रकृति का बेहतर उत्पाद, परिस्थितियों का गढ़ा तथा रचा नहीं..’
लौंगी तथा बी.डी.ओ. को साथ देख कर शशि खुद को विश्लेषित करने लगी थी कि उसके साथ ऐसा नहीं है। समाज द्वारा रचा हुआ रिश्ता भी टूट गया और वह पूरी तरह से अकेली हो गई, उसका हाल अहवाल लेने वाला कोई नहीं.. मैंने अनुमान लगाया कि लौंगी के बहाने शशि खुद को विश्लेषित कर रही है ।
मैंने शशि से कहा जो उसे समझाने जैसा था....
‘संयोग भी होता है शशि, समाज द्वारा रचे व गढ़े हर रिश्ते को हम एक ही कोटि में नहीं रख सकते, यह सच है कि विद्रूपताएं उनमें हैं पर यह भी सच है कि तमाम कोलाहलों से दूर वहां आत्मिक शांति है, एक दूसरे पर विश्वास के मजबूत आधार भी होते हैं। बी.डी.ओ. तथा लौंगी का मामला संयोग का खेल भी हो सकता है जिसे हम देख रहे हैं.. संयोग की विशेषता होती है कि वह योग को मनोनुकूल या विपरीत बना देता है, इसमें भी तो योग ही होता है, बिना योग के कुछ नहीं होता। संयोग का योग अचानक होता है जिसे कोई प्रायोजित नहीं करता। कुछ फर्क नहीं होता समाज द्वारा प्रायाजित रिश्ते तथा खुद से बने रिश्ते में।
दोनों में योग ही होता है और दोनों ही अचानक होते हैं.. इसलिए हमें लोंगी तथा बी.डी.ओ. के रिश्ते को एक प्यारा संयोग ही कहना चाहिए।
‘हां ठीक बोल रहे हैं आप, सारा खेल संयोग का ही है पर चर्चा तो उसी की होती है जिसमें विद्रूपताएं न हों या हों भी तो नगण्य हों, जिन्हें आपसी सहमति से दूर किया जा सके, शायद उसी को शुभ, शुभ कहते हैं..’
शशि ने स्पष्ट किया और खामोश हो गई।
शशि मेरे पास वाली सीट पर बैठी थी, वह जुड़वा सीट थी। बस पर बैठते समय ही हम लोगों ने जुड़वा सीट तलाशा था। अलग अलग बैठने का कोई अर्थ नहीं। यह संयोग ही था कि एक जुड़वा सीट खाली थी। हम दोनों पास, पास थे पर पास होने के अहसास से कोसों दूर थे। वह अहसास भी नहीं था जो हमें कभी जंगल की यात्रा के दौरान हासिल हुआ था। जाने कैसे सारा कुछ फुर्र हो गया था और हम किसी शून्य में भटक रहे थे, जहां कुछ होता नहीं।
लम्बे समय के बाद मैं अब महसूस करता हूॅं कि शशि वह नहीं है जो पहले थी या मैं ही बदल गया हूॅं और पहले की तरह नहीं हूॅ, शशि में वह सब नहीं देख पा रहा जो पहले देख रहा था। पहले तो शशि चहकती, दमकती, महकती जान पड़ती थी। पहले लगता था कि हवा भी हमें सहला रही है तथा जीवन की गुदगुदियां बिना हमारे जीवित नहीं रह सकतीं पर अब ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि शशि की आत्मिक शुचिता ने मुझे परिवर्तित कर दिया है। जैसे,जैसे मैं शशि के करीब होता गया वैसे,वैसे शशि मुझे किसी सरंक्षक की तरह गढ़ती गई और मैं महसूस करने लगा कि शशि वह नहीं जो मैं समझ रहा था या जो मैं उसके होने में तलाश रहा था।
‘वैसे शशि अब भी महकती है, दमकती है, चहचहाती है। वह वही है जो पहले थी पर इसकी गंध दूसरी है। इस गंध में मादकता नहीं, उन्माद नहीं इसमें स्नेह है, आदर है, तथा रिश्तों की पवित्र कोमलता है। मैं लगातार ऐसा ही महसूस कर रहा हूॅं और देख रहा हूॅं कि मैं परिवर्तित हो गया हूॅं। मेरे भीतर का वह आदमी जो मुझे दैहिक गुदगुदियों की ओर ले जा रहा था, वह मर चुका है, वह है ही नहीं या वह कभी था ही नहीं। वह केवल कल्पना की बात थी। पहले मेरी सहजता मुझसे छिन गई थी और मैं शशि की देह के आस, पास मडराने लगा था। अब मैं उसके मन के आस, पास हूॅं। शशि के मन के आस, पास मैं किस तरह पहुंचा, इसे मैं अब तक नहीं जान पाया और नहीं जानना चाहता हूॅं। मेरे लिए वैसे भी शशि के मन के आस, पास ही जगह होनी चाहिए, उसकी देह के पास नहीं।
संभव है ऐसा परिवर्तन इस लिए हुआ हो कि मैं अब खुद देह से बाहर होता जा रहा हूॅं, लगता ही नहीं कि देह भी है मेरे पास। हालांकि मैं विदेह नहीं हो सकता फिर भी विदेह होने की पवित्र अनुभूतियों का मालिक तो हो ही सकता हूॅं।
लौंगी के बारे में बातें करके शशि कुछ देर के लिए खामोश हो गई थी। मैं तो खामोश था ही। हम दोनों उस समय शून्य में थे। हम दोनों के शून्य शायद एक ही थे, जैसे हमारे पास बोलने,बतियाने के लिए विषय ही नहीं हों और अगर हों भी तो हम बतियाना ही नहीं चाह रहे हों.. उस समय की
संवाद हीनता कुछ ऐसी जान पड़ रही थी जैसे हम दोनों अपने भीतर कहीं गहरे में गोता लगाने लगे हों.. शशि के बारे में मैं ऐसा नहीं कह सकता पर मैं तो अपने भीतर काफी गहरे में उतर गया था। कभी वहां जोखन दाऊ फुफकार रहे होते तो कभी सुमन्त जोखन दाऊ से लड़ रहा होता, चिल्ला कर बोल रहा होता कि....।
‘देख लूंगा आपको, अब हम पहले वाले नहीं हैं, जमाना बदल गया है’
सुमन्त की चीखें मुझे झकझोर देतीं, चरण राम की विनम्रता मुझे प्रभावित करती। बेचारे परधानी का चुनाव हार गये, वे हमारे क्षेत्र के दलितों में काफी पढ़े लिखे तथा अनुभवी हैं, वे मुझे संबोधित करते....
‘भाई साहब आप मेरे ऊपर कोई कहानी लिखिए कि मैं, मैं, मैं नहीं हूॅं मैं तो सुमन्त या जोखन दाऊ सरकार का आदमी हूॅं, मेरा कोई व्यक्तित्व नहीं’
भीतर की झील गहरी होती है उसमें जाने कौन कौन उतर जायें कोई लेखा नहीं होता, किसुन भी उतर जाता तथा उसकी पत्नी भी जो ओझा के जाल में फसी पड़ी है। पहले के साथियों की बात ही अलग है, वे भी कभी कभी गुदगुदाते रहते हैं, चिढ़ाते रहते हैं..
बस में मेरा विगत मेरे सामने होता जा रहा था और मैं उसमें डूबता जा रहा था हालांकि उसका कोई प्रयोजन नहीं था। दूसरी ओर शशि भी खामोश थी शायद नींद में जाना चाह रही हो पर ऐसा नहीं था। नींद में जाना चाहती तो चली जाती, हवा नरम थी, बस के बाहर फुहारें थीं, कभी कभी फुहारे बस की खिड़कियों से अन्दर आकर हमें भी फुहारा बनातीं, अच्छा लगता, ऐसे में शशि सोना चाहती तो सो लेती पर वह सो नहीं रही थी, वह कहीं और थी, कहां थी नहीं मालूम।
अहरौरा आने के पहले वह पहाड़ी मुझे दिखी जहां कभी बौद्ध बिहार हुआ करता था। तत्काल मैंने शशि को सचेत किया....
‘नींद में चली गई क्या?’
‘नहीं तो’
‘वह पहाड़ी देखो, सामने वाली, दिख रही है नऽ’
‘हां दिख रही है’
‘वह सिर्फ पहाड़ी नहीं है, वहां कुछ नव निर्माण जैसा दिख रहा होगा’
‘हां हां दिख रहा है’
वह छोटा सा संग्रहालय है, इस पहाड़ी पर पाई गई पुरातात्विक धरोहरों को उसमें संरक्षित किया गया है। उसके पास ही में वह बौद्ध बिहार भी है। उसके निर्माण के बारे में अनुमान लगाया गया है कि वह बौद्ध धर्म के उत्थान काल का होगा। माना जाता है कि इस दक्षिणांचल में भी बौद्ध धर्म का जोर था। इसी तरह रापटगंज से पन्द्रह बीस किलामीटर पूरब, धंधरौल बांध के आस पास पांचवी, छठवीं शताब्दी का निर्मित विजयगढ़ किला है जिसके बारे में मैंने तुम्हें पहले कभी बताया था, उसके पहले एक गांव है,जिसका नाम मऊ है वहां बहुत अधिक पुरातात्विक धरोहर हैं जिन्हें उसी गांव में एक संग्रहालय बना कर सरंक्षित किया गया है। वहां भी बौद्ध कालीन धरोहर है..’
‘एक बात बहुत खास है, जो मुझे हसाती है तो रुलाती भी है। खैर छोड़ो उसे, वह बताना कोई आवश्यक नहीं, उस बात का आज के वर्तमान से कुछ भी लेना देना नहीं, वे पुरानी बातें हैं जो खतम हो चुकी हैं।.’
सायास मैंने खुद को रोका पर शशि उत्सुक हो चुकी थी.. उसने कहा..।
‘क्या आपके पास ऐसी भी बातें है जो इतिहास से जुड़ी हुई हों जिन्हंे आप नहीं बता सकते, कहीं यह मन का आपातकाल तो नहीं कि अभिव्यक्ति ही प्रतिबंधित हो गई, भय के मारे कुछ नहीं बोलना, बोलना भी तो संभल कर’
‘नहीं नहीं ऐसा नहीं है, बात बहुत गंभीर नहीं, ऐसी भी नहीं जिसे बताया न जा सके पर आज के समय के लिए हास्यास्पद अवश्य है।’
‘फिर बताइए नऽ क्या कहना चाहते थे जिसे कहने से जबरन आपने रोक लिया, आपको मालूम है नऽ कि बातों की स्वस्फूर्तता नहीं रोकनी चाहिए।’
‘सो तो है..। दर असल यह है कि एक समय था जब बुद्धिस्टों ने मठों के दरवाजे नर तथा नारी दोनों के लिए खोल दिए थे, पहले प्रतिबंधित था, केवल नर ही मठों में प्रवेश पाया करते थे। नर, नारी यानि भिक्षु व भिक्षुणी जब दोनों साथ, साथ मठों में रहवास करने लगे फिर उनकी अंतरंगता भी बढ़ी और उस अंतरंगता ने दैहिक वर्जनाओं को तोड़ दिया। जिसे मठों की गरिमा को निन्दित करने वाला कार्य माना गया।
शशि तो सचेत थी, उसने तुरंत टोका..।
‘कैसी गरिमा, कैसी निन्दा? मैं समझी नहीं’
‘यही तो विकट है, गरिमा मतलब उनमें दैहिक वर्जनांए समाप्त हो गईं और वे एक दूसरे में दैहिक कौतुक तलाशने लगे जो उन्हें प्राकृतिक रूप से उपलब्ध थे फिर तो मठों के सारे नियम ही घ्वस्त हो गये। उनका भिक्षु होना, भिक्षुणी होना, उनसे छिन गया। जबकि माना जाता था कि वे लोग दैहिक शुचिता के लोग हैं, दैहिक दाह जिनमें होता ही नहीं’
‘तो यही बताना चाहते थे आप! यह कौन सी बात है जिसे नहीं बताया जा सकता, यह तो मालूम ही है कि पहले दैहिक वर्जनाओं पर काफी जोर दिया जाता था, जबकि यह भी सच है कि वर्जनांए निर्मूल हुआ करती थीं। सच कहिए तो नर, नारी के अंतरंग संबधों को दैहिक वर्जनांए कभी भी किसी काल में नहीं रोक पाईं.. दिखती थीं रोकी हुई पर खुली, खुली थीं, चोरी चोरी सारा कुछ होता रहा है जो आज भी हो रहा है। पहले घुटन तथा निराशा में हुआ करता था और आज खुले में साफ,साफ हो रहा है। आज भी ऐसा नहीं है कि देह हर किसी के सामने पसरी हुई है, जो जब चाहे उस पर कहानी लिखे या कविता। ऐसा नहीं है, आज भी चॉद वरीयता का प्रथम विकल्प नहीं है, भले ही खूबसूरत तथा आकर्षक दिखे। विचारों की दृढ़ताएं आज भी जस की तस हैं, उससे उपजी वर्जनांए भी वैसी ही हैं, भले ही आज का माहौल पहले जैसा नहीं है।’
शशि अधिकतर मामलों में साफ,साफ बोलती है। उसकी इसी साफगोई ने मुझे उसके प्रति आकर्षित किया था। मैने उसकी बात का समर्थन किया..।
‘तूं ठीक बोल रही’ अचानक मुझे याद आया उसके तलाक वाले मुकदमे का फिर मैंने उससे पूछा..।
‘हां शशि देखो व्यस्तताएं भी अजीब होती हैं, लम्बा समय खिंच गया और मैं पूछ भी नहीं पाया कि तलाक वाले मामले में क्या हुआ?
‘उतने पर ही सारा कुछ रुका हुआ है जितना आप जानते हैं.. हमारी ओर से आपने प्रतिवाद दाखिल करवा दिया था, उसका जबाब मेरे वकील को अब तक नहीं मिला। तारीख पर तारीख पड़ती जा रही है, कल ही तो वकील से बात हुई थी, उसने बताया कि चिन्ता की कोई बात नहीं, उन्हें साबित करना है कि तलाक क्यों मंजूर किया जाये? रही बात तलाक स्वीकार करने के कारणों की तो वकील बता रहा था कि उधर से दावे में जो निन्दात्मक आरोप लगाए गये हैं उनके संबध में प्रमाण नहीं इस किया गया है, जिसके बिना दावे को दाखिल ही नहीं किया जा सकता, पर क्या कहा जा सकता है अदालती प्रक्रियाओं के बारे में, अदालतें भी तो आजकल अपनी मर्यादाओं का ध्यान नहीं रख पा रही.ं.’
‘तो मामला वहीं रुका हुआ है जहां तक मुझे पता था। लगता है कि आगे कुछ होगा भी नहीं.. आरोप लगाना अलग बात है तथा आरोप को साबित करना अलग। वे कभी अपने आरोपों को साबित भी नहीं कर सकते, ऐसे आरोप साबित भी नहीं होते जो दैहिक शुचिता से जुड़े होते हैं.. तमाम तरह की जिरह होती हैं तथा गवाह टूट जाते हैं, किसी टूटने वाली चीज की तरह। पर तूं क्या चाहती है उस बाबत? अभी भी पहले वाली धारणा पर द्ढ़ है क्या या कुछ बदलाव आया?’ मैंने बहुत ही सहजता से पूछा
‘मुझे क्या चाहना, क्या नहीं चाहना, क्या बदलना क्या नहीं बदलना, मेरे पास चाहने तथा बदलने के विकल्प हैं ही नहीं, उन लोगों के दिमाग में मैं कोई पक्ष ही नहीं, वे लोग तो अपने पक्ष भी हैं तथा मेरे भी। फिर ऐसे में कोई दूसरा रास्ता कहां है.. सो मैं इस मामले में स्थिर तथा जड़ बन गई हूॅं। मुझे कुछ भी नहीं सोचना, सोचें गुनें वे लोग। मैं केवल इतना कह सकती हूॅं कि जो होना हो जल्दी हो जाये, मुकदमे का चक्कर बेकार है।’
देखो शशि दुनिया बहुत बड़ी है और समय भी काफी जटिल है। पहले भी मैं चाहता था कि तुमसे अपने मन की बातें साफ,साफ बता दूं पर तेरे गुस्से ने मेरी बातों को लील लिया फिर मैं तेरे से कुछ नहीं बोल पाया। अगर तूं बुरा न मान तो मैं एक बात बोलूं हो सकता है कि तूं इसे उचित न मानो पर समय की भाषा में मेरी बात के लिए स्थान है, वह भी हासिए पर नहीं, अच्छी जगह पर।’
शशि ने मुझे बीच ही में रोक दिया..।
‘जाने क्या है कि आप सीधी बात नहीं करते, उसे घुमा कर बोलते हैं, मुझसे तो साफ,साफ बोल दिया कीजिए या किसी से भी, सामने वाला माने तो ठीक न माने तो ठीक, आपका जो काम है उसे कीजिए, सामने वाले के मानने या नहीं मानने से क्या फर्क पड़ने वाला?’
प्रतिरोधों का आदमी लेनिन ने कभी कहा था कि खराब सुलह भी झगड़े से बेहतर होती है, हो सके तो तूं भी सुलह के मुद्दांे पर विचार कर, सुलह की संभावनाओं पर सोच, यही तेरे लिए उचित होगा, अगर तूं अपनी अस्मिता के प्रति रंच मात्र भी व्याकुल है तो तेरी अस्मिता तभी सुरक्षित रह सकती है जब तूं अपने घर की परिस्थितियों को सुधार ले।’
शशि मेरी बात पर आक्रामक हो उठी....
‘यह क्या बोल रहे हैं आप? कैसी सुलह? सुलह तो पक्षों में होती है, आपको नहीं लगता कि मैं अपनी ससुराल वालों के लिए कोई पक्ष ही नहीं हूॅ फिर किनके बीच होगी सुलह? सुलह कोई हवा में लहराने या एकांत में गाने वाली चीज नहीं’
शशि से उस समय तलाक के बारे में बातें करना मुझे समयोचित नहीं जान पड़ा, मैंने खुद को रोक लिया..।
शशि उचित बोल रही, वह तो अब कोई पक्ष ही नहीं..
प्यार की उमर
बी.एच.यू. अस्पताल से लौगी अपने गांव नहीं लौटी, उसे बी.डी.ओ. अपने साथ लिवा ले गया। लौंगी स्वस्थ हो चुकी थी। डाक्टर ने उसे आराम करने के लिए कहा था। कम से कम एक महीने तक कोई काम नहीं करना है। लौंगी बी.डी.ओ. के साथ जाने तथा नहीं जाने के बाबत तटस्थ थी, उसने बी.डी.ओ. को रोका भी....
‘आप नाहीं बूझ रहे हैं कि आपकी कितनी बदनामी होगी, लोग का कहेंगे? हमैं एक दूसरे के साथ देख कर, जाने कहां से उढ़ार लाया किसी उड़िहारिन को, मैं आपके साथ नहीं जाऊंगी, हमैं हमरे घरे छोड़ दीजिए, एतना किरिपा कीजिए..। आप जेतना हमरे संघे कर रहे हैं एतना तो बिहउता भी नाहीं करता, आपने हमैं मान दिया, इहय हमरै बदे काफी है’
बी.डी.ओ. भी लौंगी से कम नहीं था..।
‘का बोल रही लौंगी तूं, अरे ओतनै बोल जेतना बोलना चाहिए, अब ई सब का है, आपने मान दिया, एतना तऽ कोई बिहउती के संघे भी नाहीं करता, तूं नाहीं जानेगी हमरे मने की बात कि हमरे मने में तूं का है, मने में हमरे तूं कैसे रहती है? हम मन उघार के तोहैं दिखा नाहीं सकते’
बी.डी.ओ. लौंगी की बात नहीं माना और उसे अपने साथ लिवा ले गया, उसे पता था कि लौंगी भले ही बीमार है पर उसका दिल बीमार नहीं है। बीमारी चाहे जैसी हो उसका इलाज हो सकता है पर दिल की बीमारी का इलाज नहीं हो सकता, उसके लिए कोई दवाई नहीं है।’
मुझे अच्छा लगा कि कोई न कोई तो लौंगी का सहारा है, वह अब अकेली नहीं.. प्यार के लिए कोई उमर नहीं होती, किसी भी उमर में किसी का किसी के साथ प्यार हो सकता है जो प्यार की मर्यादा निभाने वाला हो।
रापटगंज में सब ठीक ठाक चल रहा था। किसी काम और बात की हल- चल नहीं थी। साहित्य के क्षेत्र में नरम गर्मी थी जिसमें हम सभी डूबे हुए थे। एक रचनाकार के गीतों के संकलन का विमोचन होना था जिसकी तिथि निश्चित थी। रचनाकार के गीतों को अधिकांश स्थानों पर श्रोता मिल जाया करते थे जिससे रचनाकार में आत्मिक बदलाव के लक्षण उभरने शुरू हो गये थे जो उसे प्रभावकारी बनाते थे वैसे भी रचनाकार कम प्रभावकारी नहीं था। विमोचन के बारे में जगह जगह पर किसिम किसिम की चर्चा थी, पहली यही कि उसके कुछ गीतों को फिल्म में लिया जा रहा है। यह खबर रापटगंज के लिए बहुत बड़ी थी और खबर को बड़ी बनाने के लिए रचनाकार के हितैषी प्रयासरत भी थे। हितैषियों के प्रयासों ने खबर पर इतना रंग चढ़ाया कि रचनाकार का कद खबर से छोटा हो गया। जिस दिन विमोचन हुआ था उस दिन रचनाकार छोटा दिखने लगा था। उसे छोटा दिखना ही था क्योंकि फिल्म का नाम उससे काफी बड़ा था और विमोचन का विशिष्ट अतिथि तो सब पर भारी था। विमोचन बहुत ही अच्छे ढंग से निपट गया यह रापटगंज के लिए खुशखबरी की बात थी। मुझे विमोचन के दिन अनुमान था कि शशि अवश्य मिलेगी, कहीं भी होगी। विमोचन के कार्यक्रम में अवश्य आयेगी पर शशि उस दिन नहीं आयी। हां वह अक्खड लड़की लाजवन्ती, उस दिन मिली थी जो राजस्व विभाग में काम करती थी।
विमोचन कार्यक्रम में स्थानीय साहित्यकारों की उपस्थिति देखने लायक थी जबकि ऐसा होता नहीं है। इसका कारण शायद वह फिल्मी महापुरुष था जो कार्यक्रम का मुख्य अतिथि था। फिल्मों की जनप्रियता का दबदबा साहित्यक कार्यक्रम में मुझे पहली बार देखने को मिला। रापटगंज में अधिकारियों का दबदबा तो देखता रहा हूॅं, पहली बार फिल्मी पुरुष का दबदबा देख रहा था। वैसे फिल्मी महापुरुष एक साधारण किस्म का आदमी था, उसकी यही साधारणता उसे असाधारण बना रही थी। उसने अपने संबोधन में पहले खुद की गांठों को खोला, उसके एक एक रेशे को अलंकारिक ढंग से अलग किया जिससे उसके बीते दिनों का गहन सामाजीकरण हो जाये और ऐसा हुआ भी। उसके जीवन के सारे रेशे जिन्हें उस मुख्य अतिथि ने खोला था विमोचन की गरिमा से चिपक गये जो मन को छूने वाले थे कि कभी भी परिस्थितियां किसी को भी शिखर पर बैठा सकती हैं..
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जैसे ही वहां से मैं निकलने वाला था जाने कैसे लाजवन्ती ने मुझे देख लिया और सीधे सामने आ कर खड़ी हो गई..
‘सर! प्रणाम।’
मैंने लड़की को देखा, जानी पहचानी जान पड़ रही थी पर उसे ठीक से नहीं पहचान पाया सो उसके प्रणाम का जबाब दे कर आगे बढ़ गया पर लड़की ने रोक लिया..।
‘लगता है आप पहचान नहीं रहे हैं सर..। अरे! मैं लाजवन्ती हूॅं, शशि जी के साथ आपसे मिल चुकी हूॅं, राजस्व विभाग में काम करती हूॅ.. अब पहचाने सर!’ उसने दुबारा पूछा
हां, हां, अरे लाजवन्ती, तूं तो काफी बदल गई है रे! मुझे थोड़ा भ्रम हो गया था, अब पहचान गया....
वस्तुतः वह बदल भी गई थी। उसके रंगरूप में आकर्षक निखार आ गया था पहले से बहुत अधिक। वह खिली, खिली दिख रही थी, उसका खिलना उसे आकर्षक बना रहा था।
नहीं सर! लाजवन्ती तो पहले वाली ही है सर! एकदम वैसहीं ठस्स अउर ठोस, लाजवन्ती को का बदलना सर!‘ लाजवन्ती ने अपनी चपलता दिखाया। लाजवंती के साथ एक नौजवान लड़का भी था, उससे लाजवंती ने परिचय कराया. ‘सर! इन्हें आशीर्वाद दीजिए! अब इन्हीं के साथ रह रही हूॅं सर! ये न होते तो मैं संभल न पाती।’
लाजवन्ती का पति मेरे पांवों की तरफ झुका, मैंने तत्काल उसे उठा लिया..।
‘अरे! नहीं नहीं, ऐसा न करो, दुआ सलाम ही काफी है, यही बहुत है। लाजवन्ती के पति को मैंने अपना पैर छूने नहीं दिया जबकि उसने पूरी कोशिश की कि वह मेरे पैरों का स्पर्श कर ले और विलुप्त होती पुरातन परंपरा को दुहरा ले।’
लाजवन्ती का पति आधुनिक लिवाश में था पर आधनिक नहीं दिख रहा था। ऐसा दिख रहा था जैसे वह काफी अनुभवी हो और समय ने उसे बहुत कुछ सिखा पढ़ा दिया हो। कुल मिला कर वह सुशील जान पड़ रहा था जो कि आधुनिक होने का प्रतिपक्ष है। लाजवंती उसके साथ रह रही है, इसका मतलब उसने विवाह कर लिया...
‘लाजवंती, तूंने शादी कब किया, हाल ही में क्या?’
‘अरे नहीं सर, शादी, फादी का करना, अइसहीं एकै साथ रह रहे हैं, का होगा शादी करके, हमैं बाल, बुतरू जनमाना नाहीं है, फेर हमार एनसे शादी होती भी नाहीं, ई दूसर बिरादरी से हैं, एनकर जाति हमसे छोटी है, अब जाति न पूछिएगा सर!’
फिर मैंने उस लड़के से पूछा..।‘का करते हो भाई?
‘जी मैं संगीतकार हूॅं, गीत लिखता हूॅं, उसे गाता हूॅं और उसकी प्रस्तुति लोगों को सुनाता हूॅं’ उसने संक्षिप्त उŸार दिया पर उसके उŸार की संक्षिप्तता प्रभावकारी थी। मैंने तत्काल सवाल किया..।
‘संगीत से खर्च चल जाता है क्या?’
‘हां अब चल जाता है, पहले नहीं चल पाता था। अब काफी कार्यक्रम मिलने लगे हैं। समझ लीजिए महीने में कम से कम तीन चार कार्यक्रम मिल ही जाते हैं। तीन चार हजार भी एक एक कार्यक्रम के मिल गये तो समझ लीजिए बीस हजार हो गये।’
‘तब तो बहुत अच्छा है, नहीं तो संगीत को कौन पूछता है, वैसे भी यह कोई रोजगार तो है नहीं, यह तो केवल मन का शौक है।’
भाई मुझे भी अपने दो चार गीत सुनाना जिसे तुमने कंपोज किया हो, जो देशी हों, स्वर, लय और धुन के हिसाब से। मैंने उससे आग्रह किया..।
‘हां हां सर, क्यों नहीं, भला आपको क्यों नहीं सुनाऊंगा, जरूर सुनाऊंगा सर! लाजवन्ती तो आपके बारे में अक्सर बातें करती रहती है और शशि जी के बारे में भी, किसी दिन एक कार्यक्रम रख देते हैं सर!’
‘हां तूं जिस समय खाली रहो मेरे यहां ही कार्यक्रम रख दो पर सप्ताह भर पहले बता देना कि कब कार्यक्रम रखना है?’
‘हां सर यही करूंगा।’लाजवन्ती का पति अपने बारे में बता कर खामोश हो गया, पहली मुलाकात में इससे अधिक बोलता भी क्या? लाजवन्ती उसके पास ही में खड़ी थी। उसने मुझसे शशि के बारे में पूछा जबकि शशि के बारे में मैं ही उससे पूछने वाला था। मुझे शशि के बारे नहीं मालूम था वह बनारस से लौटने के बाद से ही नहीं मिली वैसे भी मैं रापटगंज में था भी नहीं। मैं अपने ताजे उपन्यास के प्रकाशन को ले कर प्रकाशकों के चक्कर में था। पहले वाला प्रकाशक जिसने मेरे कई उपन्यास प्रकाशित किए थे, उसका व्यवहार लेखकों के प्रति असंतोष जनक था। वह लेखकों को सरकार की तरह कूड़ा समझता था तथा मानता था कि लेखक जायेगा कहां? घूम फिर कर उसे प्रकाशक के तलवे चाटना है। वह कहता भी था..।
‘कौन ऐसा लेखक है जो प्रकाशक के पास खुद को नहीं बेच देता, प्रकाशक के सहयोग के बिना कोई चाहे कितनाहू प्रतिभाशाली हो, लेखक बन ही नहीं सकता’ रौ में आकर वह इस तरह का सूत्र बोलता..।
‘लेखक को प्रकाशक गढ़ता है, जैसे नेताओं को बनिया गढ़ता है, दोनों को गढ़ने की प्रविधियां समान हैं..’
एक दिन उसने मुझे भी अपने ज्ञान से संस्कारित करना चाहा पर मैंने उसे उसके अन्दाज में ही बहस से बाहर कर दिया और साफ,साफ बोल दिया..।
‘आप प्रकाशक हो और प्रकाशक की तरह रहो। प्रकाशक की चमक आपके चेहरे से जैसे फूटती रहती है उसी तरह से फूटे तो आपके लिए अधिक अच्छा होगा, दूसरी चमकों के चक्कर में पड़ेंगे तो आपके लिए अनुकूल नहीं होगा।’
साल भर भी नहीं बीते होंगे कि एक दिन प्रकाशक का फोन आया..।
‘आप इधर कोई किताब नहीं दे रहे प्रकाशित करने के लिए, आपसे तो मैं प्रकाशन खर्च भी नहीं लेता, बल्कि रायल्टी भी देता हूॅं, कुछ नाराजगी है क्या? अगले सप्ताह आप मिलने का कार्यक्रम बना लेते तो ठीक होता, मैं मिलना चाहता हूॅं आपसे। वामउग्रवादियों पर जो उपन्यास लिख रहे थे उसे भेज दीजिए या आते समय लेते आइएगा।’
फोन पर वह बहुत ही शालीन था, मेरी समझ में नहीं आया कि वह इतना शालीन कैसे हो गया। बहरहाल मैंने प्रकाशक की बातों पर घ्यान नहीं दिया। घ्यान देना भी नहीं था। मन में ठान लिया था कि उपन्यास प्रकाशित हो या नहीं हो ऐसे प्रकाशक के यहां प्रकाशित होना ठीक नहीं..
मुझे दिल्ली वाला प्रकाशक भला जान पड़ता है जिसके पास मेरा एक उपन्यास प्रकाशित होने के लिए दो साल से पड़ा है। कुछ दिन पहले मैंने दिल्ली वाले प्रकाशक से पूछा था उपन्यास के प्रकाशन के बारे में....
‘क्या हुआ इतना समय गुजर गया, प्रकाशन में अभी कितना समय और लग सकता है?’
‘इस माह में उपन्यास प्रकाशित हो जायेगा सर! चिंता न करें..’ जाने क्या हो? हो सकता है वह किताब प्रकाशित कर दे या नहीं भी करे पर बोलता है बहुत ही मीठा, मन को छूने वाला।
मैंने लाजवन्ती से पूछा..।
‘क्या तुमसे भी शशि नहीं मिली इधर?
‘हां सर! शशि दीदी के आवास पर मैं गई थी, लौंगी दीदी का हाल, चाल लेने, मकान मालिक ने बताया कि शशि जी बीसों दिन से यहां नहीं हैं, कुछ बता कर भी नहीं गईं हैं कि कब तक आयेंगी।
तूने फोन तो किया होगा शशि को..।
‘हां सर किया था पर उनका फोन स्वीच आफ चल रहा है, फोन तो आज भी किया था, यहां आने से पहले, पर उनके माबाइल का स्वीच आफ है, जाने काहे लोग फोन का स्वीच आफ रखा करते हैं।.’
मैंने वहीं खड़े, खड़े शशि का फोन मिलाया....। फोन का स्वीच आफ था। शशि के बारे में मुझ वैसे भी कुछ नहीं मालूम था। मैंने अनुमान किया...... हो सकता है उसके मोबाइल में ही कुछ गड़बड़ी हो, या मोबाइल ही कहीं खो गया हो, कुछ भी संभव है।
विमोचन का कार्यक्रम समाप्त हो चुका था सो वहां रुकना ठीक नहीं था, लाजवन्ती नहीं मिली होती तो मैं सीधे अपने घर चला आता। शशि के बारे में पूछ लेने के बाद लाजवन्ती ने लौंगी के बारे में पूछा....
‘अब लौंगी कैसी है सर!’
ठीक है, उसे काफी आराम हो गया है और अब वह बी.डी.ओ. के साथ है। बहुत पहले ही उसे अस्पताल से छोड़ दिया गया है।
लाजवन्ती बी.डी.ओ. के बारे में नहीं जानती थी सो उसने तत्काल जानना चाहा..। मुझसे पूछा..।
‘कौन बी.डी.ओ. सर!’
एक हैं जो पहले सोनभद्र में ही पोस्ट थे, अब यहां नहीं हैं। मैंने संक्षिप्त उŸार दिया जिससे लाजवन्ती संतुष्ट नहीं हुई। मैं समझ सकता था कि वह चकराई हुई थी। उसे चकराना ही था।
‘भला लौंगी और बी.डी.ओ. के बीच आपस में कैसे रिश्ता हो सकता है? दोनों दो किनारे हैं, कहां बी.डी.ओ. कहां लौंगी, एक आदिवासी, वह भी गली गली बिछी हुई, जो चाहे उसे ओढ़े बिछाए। बी.डी.ओ. उसे अपने साथ काहे रखेगा?’
लाजवन्ती आपनी चकराहट नहीं रोक पाई, वह नहीं समझ पाई कि जीवन संयोगों का खेल होता है, जिसमें गहन अंधेरा होता है तो मुलायम उजाला भी, जो कभी मन गुदगुदाता है तो कभी तन। इस तरह की गुदगुदाहटें किसी के जीवन में आ सकती हैं.. लौंगी के जीवन में भी ऐसा ही हुआ होगा, उसके बारे में अधिक क्या जानना, सुनना।
लाजवन्ती ने अपनी चकराहट मेरे सामने परोसा....
‘मैं नहीं समझ पा रही सर! आप जो कह रहे हैं वह कैसे संभव हो सका,
ऐसा कब हुआ? कुछ बतायें सर!’
मुझे भी बी.डी.ओ. तथा लौंगी के रिश्ते के बारे में थोड़ा बहुत ही मालूम है, कोई विशेष नहीं। बहुत पहले शशि ने ही मुझे उस बी.डी.ओ. के बारे में बताया था कि वह भावुक आदमी है, लौंगी को बहुत मानता है। दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करते हैं।
शशि भी उन दोनों के रिश्तों को लेकर चकराहटें पी रही थी तथा नहीं समझ पा रही थी कि उन दोनों में प्यार कब और कैसे हुआ। लौंगी कोई साधारण महिला भी नहीं, उसे एड्स हुआ है, हालांकि एड्स का रोग संक्रामक नहीं है फिर भी बी.डी.ओ. लौंगी में अपने जीवन के उत्सवों तथा मनोरमों को देख रहा है। बी.डी.ओ. के लिए लौंगी हासिल करने वाली जैसी नहीं, उसके लिए तो हर ओर दरवाजे ही दरवाजे हैं, कहीं से भी वह रास्ता बना लेता। कुछ न कुछ बात तो है उन दोनों के रिश्तों में जो सार्वजनिक नहीं है।
मुझे भी लौंगी के बारे में कुछ विशेष नहीं मालूम था। केवल इतना जानता था कि बी.डी.ओ. लौंगी के काफी करीब है जितना कि एक पुरुष को किसी नारी के साथ होना चाहिए। वह इस मामले में उन पुरुषों की तरह नहीं जान पड़ता जो रिश्तों को छिपाते हैं फिर भी रिश्ता बनाना चाहते हैं और बना भी लेते हैं..
मैंने लाजवन्ती को साफ,साफ बताया....
‘मैं नहीं जानता लाजवन्ती कि वे दोनों आपस में कैसे अन्तर्लयित गये? मैं तो उन दोनों के प्यार की सघनता, अस्पताल में देख कर चकित था। लगता ही नहीं था कि वे दोनों एक दूसरे से अलग हैं। उनकेे बीच विवाह जैसे रिश्ते नहीं हैं, फिर भी एक दूसरे में विलीन हैं, पहचाना मुश्किल, कौन लौंगी है, कौन बी.डी.ओ.’
घर लौटते समय मैं शशि के बारे में सोच रहा था..। आखिर कहां चली गई, महीने भर से वह यहां नहीं है, इतने दिनों तक वह बाहर तो कभी रहती नहीं थी। शशि को लेकर मैं आश्ंाकाओं में घिरता जा रहा था, सोचता शायद ननिहाल गई हो या ससुराल..। पर ससुराल तो वह जायेगी नहीं, और ननिहाल.. चाहे जहां भी गई हो, कम से कम उसे फोन तो करना चाहिए था। पागल है पागल..। वैसे जहां भी होगी कुशल से होगी, वह खुद को संभालना जानती है, कोई बात होगी जिससे फोन नहीं कर रही होगी, कहीं उसका मोबाइल ही तो नहीं खो गया? अगर मोबाइल खो गया होगा और उसके पास अलग से लिखे नंबर नहीं होंगे फिर कैसे करेगी
संयोग का खेल
घर पहुंव कर शशि की संस्था के मंत्री को मैंने फोन मिलाया, निश्चितरूप से शशि के बारे में उसे मालूम होगा। कुछ पल बाद मोबाइल ने खबर दी कि ‘डायल किया गया नंबर अब सेवा में नहीं है’। शशि से जुड़ाव रखने वाले दूसरे लोगों के नंबर मेरे पास नहीं थे, सो शशि का हाल अहवाल जानने के लिए मैं किसे फोन मिलाता।
मैंने शशि के बारे में पत्नी को बताया कि उसका फोन नहीं मिल रहा, जाने कहां चली गई है, मैं समझता था कि रापटगंज में ही है, आज मालूम हुआ कि वह यहां महीने भर से नहीं है।
पत्नी को आश्चर्य हुआ कि कहां चली गई शशि ? बोलीं....।
‘मैं तो आपसे पूछने वाली थी कि शशि नहीं दिख रही। पांच, छह दिन बीतते बीतते आ जाया करती थी। फिर मैंने सोचा कि हो सकता है उल्टा सीधा बोल कर आप उसे गुसिया दिए हों। आपका का ठिकाना, कब किसे का बोल दें, आखिर कहां गई होगी? का संस्था वाला काम छोड़ दिया है।’
‘मुझे नहीं मालूम, संस्था के मंत्री का भी फोन नहीं मिल रहा..’ मैं शशि को ले कर काफी चिन्तित था, कहां होगी, सुरक्षित तो होगी नऽ। तरह तरह के विकल्प उभरते, यहां होगी, वहां होगी, पर हर विकल्प खुद मिट जाते और मैं आश्ंाकाओं में घिर जाता। समय पर विश्वास करना मुझे नहीं आता, मैं निराश रहता हूॅं समय से। समय कब असमय में बदल जाये उसका क्या ठिकाना।
कई दिनों तक शशि के साथ बिताए दिनों में मैं डूबा रहा। शशि से जुड़े प्रसंग आंखों में तैरने लगते, कभी कोई, तो कभी कोई। करमनासा की यात्रा वाला प्रसंग तो आंखों से ओझल ही नहीं हो रहा था..।
कितने भोलेपन से शशि ने कहा था....
‘चलिए लौट चलें, जंगल का अवांक्षित उपहास ले कर लौटना ठीक नहीं’
उस दिन मैंने महसूसा था कि शशि भावुकताओं को अनियंत्रित नहीं होने देना चाहती। यह तो ठीक है पर अवांक्षित उपहासों को वह कैसे नियंत्रित कर सकेगी जो कदम, कदम पर व्यक्तित्व को खरोंचा व चोथा करते हैं। उस दिन मैं शशि को देखता ही रह गया था फिर भी नहीं समझ पाया था कि शशि अपनी भावनाओं कैसे नियंत्रित कर सकेगी। अगर ऐसा कर भी लेती है तो काहे के लिए? भावनाओं को नियंत्रित करने का प्रयोजन मेरी समझ से बाहर था, कहीं इसका कारण शुचिता की दृढ़ता तो नहीं....।’
करमनासा वाले प्रसंग के बाद एक दिन शशि ने दुबारा मेरे पूरे व्यक्तित्व को हिला दिया था फिर तो मैं उससे जब भी मिलता अतिरिक्त सावधानी बरतता, कहीं कोई गड़बड़ न हो जाये, शशि ने मुझे तोलते हुए कहा था....
‘ऑखों का देखा ही तो सच होता है, और आप मुझे देख रहे हैं। अब यह अलग बात है कि आप मुझे कितना और कैसे देख रहे हैं। देखने को परिणामकारी बना पा रहे हैं कि नहीं, मैं तो ठीक, ठाक हूॅं और वैसी ही हूॅं जैसी पहले थी, प्रकृति की एक संरचना।’
मेरी और शशि की उम्र में समानुपातिक अंतर का नैतिक दबाव नहीं होता तो मैं उससे कहता, अरे भाई! मैं भी प्रकृति की ही एक संरचना हूॅं, इसी लिए तुझे देख रहा हूॅं कि पूरा देख लूं जो भावुक तो हो ही, यथार्थ भी हो।’ इधर कुछ दिनों से शशि को फोन मिलाने की मेरी आदत पड़ गई है, जिस दिन नहीं मिलाता हूॅं, लगता है कुछ भूल सा गया है। फोन लगाते ही वही पुराना उŸार आ धमकता है कि ‘यह नंबर सेवा में नहीं है,’ कभी कभी नहीं भी आता, फोन गूंगा बना रहता है।
करीब एक सप्ताह गुजरे होंगे कि कोतवाली का एक सिपाही मेरे घर आ धमका, उसकी धमक ने मेरे घर वालों को चौंका दिया खासतौर से पत्नी को। पत्नी एकाएक छŸाीस साल पीछे आपात काल वाले दौर में चली गईं तब मैं गांव पर रहा करता था। गांव पर भी उस समय आज वाली ही पुलिस आयी थी, पुलिस ने मेरा घर ही नहीं पूरा गांव घेर लिया था। पुलिस हर ओर मुझे तलाश रही थी और मैं था कि पुलिस की पकड़ में नहीं आ रहा था। परेशान हो कर पुलिस ने मेरे घर की कुर्की कर लिया और जब्त सुदा सारे सामानों को गांव के एक आदमी की सुपुर्दगी में दे दिया।
घर की तलाशी लेते समय अपने आचरण के अनुरूप पुलिस के जवान मेरे घर के अन्दर घुसना चाह रहे थे पर दारोगा की मनुष्यता ने जवानों को घर में घुसने नहीं दिया। उसने सिपाहियों को आदेशित किया..
‘तुम सभी लोग बाहर ठहरो, मैं घर के अन्दर जा कर देख आता हंू..’
एक सिपाही ने अतिरिक्त उत्साह दिखाया..।
‘साहब आपका अकेले घर के अन्दर जाना ठीक नहीं’
‘काहे? का हो जायेगा? घर में अकेले जाने से। किसी अपराधी के घर में जाना है क्या?। अगर सी.ओ. नहीं आया होता तो मैं इस गांव में कभी आता ही नहीं, पता नहीं क्या कर रही है सरकार,? देश के विपक्षी नेताओं को बन्द करा दिया है, यह भी कोई राजनीति है, अरे कुछ तो कानून होना चाहिए, यह क्या है कि जिसे जब चाहो अन्दर कर दो।‘
दारोगा जिस समय मेरे घर में घुसा था, पत्नी घर में ही थीं। मॉ तथा भाभी तो पुलिस का नाम सुनते ही होश खो बैठी थीं। पत्नी सचेत थीं, उन्हें पता था कि मुझे किसी भी समय गिरफ्तार किया जा सकता है। उन्होंने ही दारोगा को घर के कुल कमरों को दिखाया, उनमें मैं कहीं नहीं था।
पत्नी शीघ्र ही सचेत हो गईं और विचारा कि हो सकता है कुछ काम हो, जिसके लिए आज सिपाही आया हो, वैसे भी पुलिस त्योहारों आदि के मौकों
पर मुझे भी बुला लिया करती है, खासतौर से त्योहारों के मौकों पर विचार जानने के लिए कि सांप्रदायिक सौहार्द कैसे कायम रखा जा सकता है? शायद उसी लिए बुलाया हो। उन्होंने सोचा और मुझे सूचना दी कि बाहर बरामदे में एक सिपाही जी बैठे हैं, वे आपसे मिलना चाहते हैं..
मुझे अचरज हुआ सिपाही और मुझसे मिलने..‘कोई त्योहार आ गया क्या?’
क्या बोल रही हो भाई! मैं कुछ समझा नहीं..।
‘हां, हां सिपाही ही आया है, बाहर बैठा हुआ है..।’पत्नी ने बताया
फिर मैं बरामदे में आया। दुआ, सलाम के बाद मैंने सिपाही जी से पूछा....
‘मेरे लायक कोई सेवा।’
‘जी सेवा नहीं, कोतवाल साहब ने आपको याद किया है, वे आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं..’ सिपाही जी ने बताया
‘यह तो अचरज जैसा है, कोतवाल साहब ने काहे याद किया भाई? कुछ तो बताएं.. कोई मीटिंग है क्या?’ मैंने अचरजा कर सिपाही जी से पूछा..
‘जी मैं कुछ नहीं जानता, कोई काम हो शायद’
श्रीमती जी सवाल जबाब के दौरान चाय ले आयीं, साथ में एक गिलास पानी भी। हम दोनों चाय पीने के बाद कोतवाली के लिए निकले। सिपाही जी मोटर साइकिल से थे। उन्हीं के साथ मैं भी कोतवाली पहुंच गया।
कोतवाली पर कोतवाल साहब वस्तुतः मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। वहां मुझे मीटिंग जैसा नहीं लगा। फिर मुझे डर लगा जाने कौन काम हो, पुलिस किसी को बिना काम के तो बुलाती नहीं। उनके काम भी अपराध से जुड़े होते हैं। किसी अपराधी को पकड़वाने के अलावा किसी से उनके क्या काम हो सकते हैं या तो वे मुझे ही अपराधी समझ रहे हों। किसी ने किसी अपराध के सिलसिले में मेरा नाम बता दिया हो, कुछ भी संभव था। मैंने खुद को आश्वस्त किया कि जो होना होगा वह होगा ही, फिर काहे के लिए सोचना, अब कोतवाली आ ही गया हूॅं..
सिपाही मुझे कोतवाल साहब के कक्ष तक ले गया। कोतवाल साहब एक आरामदेह कुर्सी पर बैठे हुए थे। उनका वह कक्ष पुलिसिया आफिस के बजाय किसी बैठका जैसा था। मुझे अपने सामने खड़ा देख कर कोतवाल साहब ने बैठने के लिए कहा..
‘अरे आप खड़े क्यों हैं, बैठिए नऽ’
कोतवाल से ऐसी विनम्रता का मुझे अनुमान नहीं था कि कोतवाल मुझे बैठने के लिए बोलेगा, पर उसने बोला, मुझे अच्छा लगा। मेरा डर भी थोड़ा कम हुआ। लगता है यहां सब कुछ ठीक ही होगा। कुछ अशुभ नहीं..
मेरे बैठ जाने के बाद कोतवाल साहब ने दुबारा मेरे पूर्वाग्रह को तोड़ा, उन्होंने किसी से चाय लाने के लिए बोला फिर मुझसे सवाल पूछा..।
‘शशि को आप जानते हैं नऽ’
‘कौन शशि? क्या संस्था वाली..?’ मैंने पूछा
‘हां, हां वही संस्था वाली..’ कोतवाल साहब ने पुष्ट किया
‘हां जानता हूॅं, पूरब मोहाल में रहती भी हैं पर आज कल यहां नहीं हैं। उसका मोबाइल स्वीच आफ चल रहा है, कहां गई हैं मुझे नहीं मालूम।’
‘कहां की रहने वाली हैं, आप जानते होंगे..।’ कोतवाल ने पूछा
जी नहीं, यह मैं नहीं जानता, न ही मुझे जानने की जरूरत पड़ी। वे यहां पर एक संस्था का काम करती हैं, एड्स जागरूकता का, उसी सिल सिले में मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। हम लोग एक साथ डी.एम. साहब से भी मिले थे, उन्हें एक गोष्ठी की अध्यक्षत करने के लिए निमंत्रण भी दिया था हालांकि उस गोष्ठी में डी.एम. साहब नहीं आ पाये थे।
शशि के बारे में जितना जानता था मैंने कोतवाल साहब को बता दिया, इसके आगे मुझे कुछ पता नहीं था। कोतवाल साहब खामोश थे शायद कुछ विचार रहे थे। मैं भीतर ही भीतर खलबला रहा था, आखिर कोतवाल शशि के बारे में क्यों जानना चाह रहा है, कुछ हुआ है क्या? मैं अनुमान करने में असमर्थ था। तलाक वाले मामले में पुलिस का कोई काम नहीं फिर पुलिस शशि के बारे में काहे जानना चाह रही? कोई न कोई बात है। मैंने साहस करके कोतवाल से पूछा.. ‘कोई बात है क्या सर?’
‘हां बात है तभी तो..।’
‘क्या बात है सर?’ मैंने पूछा
मेरे पूछने पर कोतवाल मुस्कराया और बोला..।
‘वह तो मैं नहीं बता सकता आपको। केवल इतना बता सकता हूॅं कि एस.पी.साहब आपसे मिलना चाहते हैं, वही बताएंगे कि शशि के बारे में पुलिस क्यों पूछ,गछ कर रही है। आइए एस.पी. साहब के यहां चलते हैं, वे कार्यालय में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं..।’
कुछ ही देर में हम लोग एस.पी. कार्यालय में थे। एस.पी. आकर्षक व्यक्तित्व वाला कम उमर का नौजवान था। उससे मेरी पहली मुलाकात हो रही थी। एस.पी. पुलिस के मिजाज से अलग किसी नेता की तरह दिख रहा था। औपचारिकताओं के बाद उसने मुझे मेरे नाम से ही संबोधित किया। उसे मेरा नाम मालूम था....।
‘तो आप उपन्यासकार हैं, कहानियां लिखते हैं, जाहिर है आर्टिकल्स भी लिखते होंगे, क्या आपने अपने बारे में कोई कहानी या उपन्यास लिखा है? लिखे हों तो बतायें, नहीं तो लिखना शुरू कर दें, क्योंकि आप खुद एक उपन्यास बन गये हैं..’
मैं तो घबरा गया, क्या बोल रहा है एस.पी. कोई न कोई गंभीर बात है जो शशि से जुड़ी हुई है। मैंने कातर भाव से पूछा..।
‘सर! मैं समझ नहीं पा रहा कि आप का बोल रहे है, मैं बहुत घबरा रहा हूॅं, रहस्यों को ओढ़ना, बिछाना मेरे वश का नहीं, कृपया साफ,साफ बतायें’
एस.पी. मुस्करा दिया संभवतः उसने मेरा घबराना पढ़ लिया था या चेहरे पर छलछलाये पसीने को देख लिया था, हालांकि मैंने बहुत ही सतर्कता से पसीना पोछ लिया था।
‘हां साफ,साफ बताने के लिए ही तो आपको तकलीफ दिया है। आप कहानियां गढ़ते हैं, पर लोग किस तरह आपको गढ़ते हैं शायद यह आपको नहीं मालूम। आपको जानना चाहिए कि लोगों के पास भी कहानियां गढ़ने की कला होती है, कहानीकार की तरह, और आपको गढ़ा जा चुका है, फिर भी नहीं जानते कि शशि कौन थी? कहां की रहने वाली थी? सोनभद्र में क्यों आयी थी? यह भी कि उसने आपकी मूरत किस तरह से गढ़ा?’
‘शशि के बारे में जो कुछ आपको मालूम हो बतायें?’ एस.पी. ने मेरी तरफ इशारा किया। मैं खमोश था। उसने फिर बातें करना शुरू किया..।
‘मैं जानता हूॅं कि आपको कुछ भी शशि के बारे में नहीं पता, सिवाय इसके वह रापटगंज में एक संस्था के जरिए एड्स जागरूकता का काम करती थी। अच्छा हुआ कि वह पकड़ ली गई नहीं तो सोनभद्र में जाने क्या करती और हम सभी उसमें फसते और आप तो फसते ही क्योंकि आप ही यहां उसके गाडफादर हैं..’ थोड़ा रूक कर उसने बातें शुरू की....
‘आप यह नहीं जानते होंगे कि मैं आपको जानता हूॅं.. जब से आपका नाम शशि प्रकरण में आया है, आपका नाम सुनते ही चौकन्ना हो गया। कहीं वही उपन्यासकार तो नहीं जिनके एक उपन्यास की समीक्षा मैंने किया था। उस समय मैं जे.एन.यू. में पढ़ रहा था। वहां आपके एक मित्र हिन्दी विभाग में थे, उनसे मेरी घनिष्ठता थी, उन्होंने ही मुझे सुझाया था कि मैं आपके ताजे उपन्यास को पढ़ंू जो भूमि बन्दोबस्ती के सवालों पर है और उसकी समीक्षा करूं। वह समीक्षा दिल्ली की एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित भी हुई थी। शशि का प्रकरण उभरने के बाद आपका नाम आया तब से मैं पता लगा रहा था कि कहीं आप वही तो नहीं जिन्हें मैं जानता हंॅू। यहां के एक दो साहित्यकारों से आपके बारे में पूछा भी, जो मेरे यहां अक्सर आया करते हैं, फिर मालूम हुआ कि मेरी सोच सही थी, आप वहीं हैं जिनके बारे में मैं सोच रहा था।’
एस.पी. बतिया रहे थे और मैं घबरा रहा था आखिर मामला क्या है? शशि ने ऐसा क्या कर दिया जो पुलिस द्वारा पकड़ ली गई, मेरी समझ में नहीं आ रहा था। अवश्य ही कोई बड़ा अपराध होगा जिसके बारे में मैं सोच नहीं सकता पर क्या शशि अपराधी हो सकती है? एक मासूम सी महिला, नहीं कुछ थोपा और गढ़ा हुआ जान पड़ता है। हो सकता है उसकी ससुराल वालों ने उसे फसा दिया हो और कोई फर्जी मुकदमा कर दिया हो। मुकदमे का क्या है, रोज ही तो फर्जी ढंग से रचे व गढ़े जा रहे हैं, अब यह किसे नहीं मालूम कि एक फर्जी मुकदमा कायम कराने के लिए सिर्फ दो गवाह ही तो चाहिए होते हैं जो आसानी से मिल जाया करते हैं, मेडिकल वगैरह भी हो जाता है।
एस.पी. करना क्या चाहता है? मुझे किस लिए बुलाया है मैं समझ नहीं पा रहा था। अगर वह मेरे उपन्यास से प्रभावित है फिर तो उसे मेरे घर आना चाहिए था। यह कैसा प्रभाव है कि मुझे कोतवाल के द्वारा अपने पास बुला लिया, प्रभाव वगैरह कुछ भी नहीं है, बात कोई गंभीर है। मैने साहस बटोर कर उससे पूछा....
‘आखिर आपने मुझे यहां क्यों बुलवाया है? उपन्यास की बात तो सामान्य तरीके से भी हो सकती थी, आप मुझे जानते हैं, मेरे उपन्यास के अच्छे पाठक हैं, घर पर ही चले आते। पुलिसिया तरीके से बुलाने का क्या मतलब? घर पर सभी घबरा रहे होंगे। मेरे घर में कोई ऐसा नहीं जो पुलिस की धमक को मीठी महक में बदल कर उसकी मादकता में डूब जाये। पुलिस के नाम से सभी बेहोश होने वाले हैं..’
एस.पी. अपने तरीके से मुस्कराया....
‘यही मैं देखना चाहता था कि एक उपन्यासकार जो पात्रों को रचता है, गढ़ता है, पात्रों की सुरक्षा के लिए घटनाओं का सहारा लेता है, वह अपनी पात्रता बचाने के लिए क्या कर सकता है? वह भी तो एक पात्र ही होता है बिल्कुल यथार्थ वाला, खुद की गढ़न व कहन वाला?’
‘तो देख लिया आपने..। दर असल अन्य उपन्यासकार अपनी पात्रता सुरक्षित रखने की कला जानते हैं कि नहीं, मैं नहीं जानता पर मैं अपने बारे में जानता हूॅं कि मुझे इस तरह की कला का ज्ञान नहीं। मैं मानता हूॅं कि पुलिस, पुलिस होती है जिसके तन, बल के सामने किसी की पात्रता पल भर भी नहीं ठहर सकती। जहां तक मेरी बात है, मैं तो लिखा पढ़ी वाले शाकाहारी अक्षरों से भी डरने वाला आदमी हूॅं। इस लिए पुलिस से ही नहीं, सभी से डरता हूॅं। अब पुलिस के सामने कैसी पात्रता, कैसी कुपात्रता, उसे क्या बचाना? क्या खोना?’
एस.पी.कार्यालय से मैं काफी समय बाद घर लौटा, कोतवाल ही मुझे घर छोड़ गया। घर पर सभी के चेहरों पर पुलिस नाच रही थी, जेल, थाना, कचहरी, मार, पीट जाने क्या हो? मैं खुश था कि पुलिस के झमेले से बच गया, अचानक मुझे यह सब दैवी कृपा जैसा जान पड़ा जिस पर मैं यकीन नहीं करता फिर तो यह संयोग का खेल होगा।
चुनौती
वस्तुतः शशि के साथ जुड़ना मेरे लिए संयोग का खेल था। बीते सारे प्रसंग अब याद आ रहे हैं। जिस संस्था में शशि काम कर रही थी अगर उसके मंत्री से मेरी मुलाकात नहीं हुई होती तो मैं शशि को जानता तक नहीं। उसी मुलाकात ने शशि को मुझसे जोड़ा जो एक संयोग था। फिर तो शशि मुझे संस्था द्वारा कराए जाने वाले कार्यक्रमों में अवश्य आमंत्रित किया करती और मैं उसमें सहर्ष भाग लिया करता था। धीरे धीरे हम दोनों अपनी अपनी सीमाओं में रहते हुए काफी करीब होेते चले गये। शशि भी सीमाओं को फलांगने से परहेज करती थी और मैं भी। हम दोनों की दृढ़ताएं एक ही क्षेत्रफल, नापतौल तथा वजन वाली थीं जो हमारे लिए किसी चुनौती की तरह मनोरम थीं पर मुझे क्या पता था कि शशि के साथ होने का अर्थ है तमाम तरह की खुरदुरी चुनौतियों को आमंत्रित करना तथा पुलिस के डंडों से अपनी पीठ अभिमंत्रित करवाना।
वैसे पुलिस ने मुझे छोड़ दिया था पर आशंका थी कि कभी भी पकड़ सकती है और अपराधशास्त्र की यातनापूर्ण धाराएं मुझ पर लाद सकती है। जैसा कि एस.पी. ने बताया था कि शशि का जुड़ाव एक वामपंथी अतिवादी संगठन से है जिसके लिए वह परोक्ष रूप से काम करती है। शशि यहां एड्स जागरूकता कार्यक्रम के बहाने वामअतिवादी संगठन के फैलाव के लिए आयी थी। एड्स जागरूकता का कार्यक्रम तो महज एक बहाना था। उसका असल काम था अतिवादी संगठन को बढ़ाना, उसके लिए जमीन तलाशना, यहां वामअतिवाद के लिए जनजागरूकता बढ़ाना फिर संगठन की बुनियाद रखना।
एस.पी. ने मुझे पूरे यकीन से बताया था कि वह विवाहित नहीं है, उसका कोई घर, बार भी नहीं, जो घर था भी, उससे उसका कोई रिश्ता नहीं.. उसके मॉ बाप ने उसका साथ छोड़ दिया है। मैं तो एकदम घबरा गया, का बोल रहा एस.पी.?
एस.पी. ने मजाकिया लहजे में मुझसे पूछा था..।
‘क्या शशि से मिलना चाहेंगे आप?’
एस.पी. का पूछना था कि मेरी बोल ही मुझसे छिन गई, हां या ना कुछ भी बोल पाना मेरे लिए संभव नहीं था। ‘हां’ बोलता तो एस.पी. जाने क्या करता? गंुजाइश थी केवल ‘ना’ बोलने की और मैंने साफ बोल दिया....
‘जी नहीं, अगर आप शशि के बारे में सच बोल रहे हैं तो मैं उससे नहीं मिलना चाहूॅंगा, अगर झूठ बोल रहे हैं तो मिलना चाहूॅंगा, अब आप बताएं कि आप क्या बोल रहे हैं सच या झूठ’।
‘नहीं मैं सच बोल रहा हूॅं शशि बिहार में अपने एक कामरेड मित्र के साथ पकड़ी जा चुकी है। उसकी जांच चल रही है पुलिस पता लगा रही है कि क्या उसका जुड़ाव अतिवादी संगठनों से है? और उसने अपाराधिक गतिविधियों में हिस्सा लेती रही है या केवल जुड़ाव ही है। अभी जांच पूरी नहीं हो पाई है। शशि ने अपनी सफाई में बताया था कि वह आपको जानती है और वह अतिवादी नहीं है फिर मुझे आदेशित किया गया है कि मैं आपके बारे में जांच करूं, कहीं आप भी अतिवादी संगठन से जुड़े तो नहीं, इसी लिए आपको तकलीफ दी पर आप तो कुछ और निकले। इसलिए लगता है कि शशि भी निर्दोष हो।’ एस.पी. ने बताया
शशि कहां है, जेल में या जेल से बाहर, यह मालूम करना मेरे लिए मुश्किल था। केवल एक ही रास्ता था जो एस.पी. से हो कर शशि तक जाता था। मुझे उस रास्ते पर चलना चाहिए फिर तो मैंने एस.पी. से निवेदन किया....।
‘सर! मेरी सहायता कीजिए और शशि के बारे में बताइए कि वह कहां है? क्या उसके जुड़ाव वामअतिवादियों से हैं?’
एस.पी. गंभीर था, हो सकता है पुलिस प्रशासन के काम में मेरे सवाल से दखल हुआ हो, पुलिस किसी वांक्षित के बारे में तो बताती नहीं और मैं वही पूछ रहा था। वह मुस्कराया.... मेरी समझ में आया कि वह मेरी मूर्खता का मूल्यांकन कर रहा..। कुछ देर में बोला..।
‘मैं जानता था कि शशि को ले कर आप परेशान होंगे। मैं अनुमान कर सकता हूॅं कि आप शशि को वामअतिवादी धारा की राजनीति से अलग मान रहे हैं, क्यों ऐसा ही है नऽ।’ उसने मुझसे पूछा..।
‘हां सर! ऐसा ही है, मैं सोच भी नहीं सकता कि शशि का जुड़ाव वामअतिवादियों से होगा।’
एस.पी. मुस्कराया.... ‘नहीं ऐसा नहीं है, उसका जुड़ाव ही नहीं वह खुद भी सक्रिय अतिवादी है और इस समय जेल में है। बिहार तथा झारखंड की वह प्रभारी है। लोग बताते हैं कि उसने ही वहां अतिवादी संगठन को स्थापित कराया है। शायद यह भी आपको नहीं मालूम उसके बारे में कि वह उच्च शिक्षा प्राप्त महिला है और सरकारी नौकरी में भी थी।’
बहरहाल शशि के बारे में मुझे इससे अधिक कुछ जानना नहीं था। उससे जेल में मिलना भी मेरे लिए संभव नहीं था। इस भावुकता को रोकना ही मेरे लिए हितकर था। एस.पी. ने मुझे अपराधियों के घेरे में नहीं लिया यह बहुत बड़ी बात थी वर्ना कुछ भी संभव था। वह मुझे जेल में भी डलवा सकता था। मैं प्रशासन का क्या बिगाड़ लेता? यह उसकी वौद्धिक उदारता थी।
मैं एकदम डरा हुआ था, किसे नहीं पता कि अक्षरों को चूमने चाटने वाला हथियारों के प्रयोगों से बचता है। पवित्रता में नहाये अक्षर उसे कंपाते रहते हैं और कांपता हुआ आदमी सिर्फ कांपने का ही काम कर सकता है, भला हथियार कैसे चला सकता है?
दर असल मैं कांप रहा था, कांपना ही था, कभी भी मैं सोच नहीं सकता कि मेरी स्वतंत्रताएं मुझसे छीन ली जायेंगी और मुझे बन्दी बना लिया जायेगा।
एस.पी. सामान्य नहीं था। मेरा मजाक उड़ाते हुए एस.पी. अपने दफ्तर में ही कलात्मकता के साथ मेरे ही तर्कों से मुझे घायल कर रहा था....जिससे कि मुझे बन्दी बना कर मेरी स्वतंत्रताएं छीन ले।
‘क्षमा करें, तो एक बात बोलूं’.... मैंने आतर भाव से पूछा
‘भला मैं क्या कर सकता हूॅं आपका? क्षमा तो वह करेगा जो आपको दण्डित कर सके।’
‘कैसी बातें कर रहे हैं आप? ऐसा नहीं है, हर एस.पी. वैसा नहीं होता जैसा आप सोच रहे हैं.. आप भी तो अपनी कहानियों की तरह नहीं हैं, कहां आपकी कहानियां और कहां आप? आपकी कहानियां स्वतंत्रता तथा वैयक्तिक संप्रभुता की सीख देती हैं.. उस सीख का असर रंच मात्र भी आप पर नहीं दिख रहा। लगता है आप जीवन जीने के लिए संतुलनवादी की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं जबकि आपकी कहानियों में खुला प्रतिरोध है। संतुलन है ही नहीं, इस पार या उस पार की बात है। आपके द्वारा लिखी कहानियों के विषय तथा वस्तु में तथा आप में इस जो खुली भिन्नताएं हैं, यह तो शोध का विषय हो सकता है। रचनाकार को तो साहसी होना चाहिए अगर वह कांपता रहेगा फिर तो रचनाकार होने के सरोकार ही खतम हो जायेंगे।’
वैसे यह सच है कि शशि ने मुझे प्रभावित किया था और मैं उसके करीब होता चला गया था पर यह नहीं जान पाया था कि शशि जो समझ में आ रही है, वह नहीं है। कुछ और है। किसी को जाना भी नहीं जा सकता अगर ऐसा होता तो मैं भी शशि को जान गया होता। पर जाने क्या है कि मुझे लगता है कि शशि वामअतिवाद का पक्षधर तो हो सकती है पर वामअतिवादियों का सहयोगी या साथी नहीं हो सकती। बन्दूक उठाने वालों के साथ वह एक कदम भी नहीं चल सकती।
लौंगी तथा दूसरे लोगों के प्रति उसकी चिन्ताओं का सारा दृश्य मेरी ऑखों में तैरने लगा। लौंगी के प्रति वह काफी संवेदनशील थी और उसकी हर तरह से सहायता करती थी। कोई नहीं समझ सकता था कि वह लौंगी के साथ अपनेपन का दिखावा कर रही है जैसा कि एन.जी.ओ वाले किया करते हैं।.. एन.जी.ओ वालों का अपनापा महज धोखा होता है। जब तक प्रोजक्ट चल रहा होता है तब तक ही वे अपनापा दिखाते हैं, लगता है उनसे बड़ा कोई शुभचिन्तक हो ही नहीं सकता, बाद में वे किसी को पूछते तक नहीं, अपनापा निभाने की बात तो दूर की कौड़ी है।
लाजवन्ती से भी शशि गहरे संवेदन के साथ जुड़ी थी, कामचलाऊ रिश्ते के लिए नहीं, तभी तो लाजवन्ती परेशान है कि दीदी नहीं दीख रहीं। उनका फोन भी नहीं मिल रहा। संस्था के सर्वेयर भी शशि के लिए परेशान हैं, वे शशि के बारे में पूछ रहे हैं कि दीदी कहां हैं? संस्था का काम आगे चलेगा कि नहीं? वैसे मैं भी शशि के लिए काफी चिन्तित था, तथा अपने अनुभवों को गरिया रहा था। मुझे अपने अनुभव पर घमंड हुआ करता था कि मैं होने और न होने के बीच के फासले को समझ सकता हूॅं और मैंने शशि को समझ लिया है। अगर एस.पी. सच बोल रहा, कोई धोखा नहीं कर रहा फिर तो मैं शशि को नहीं समझ पाया। लगभग साल भर गुजर गये उसके साथ, हसियां, गुदगुदियां पीते, एक दूसरे को बूझते, उनसे उपजी संवेदनाओं से जूझते।
भला मैं कैसे भूल सकता हूॅं तलाक की नोटिस वाले उस एक पृष्ठ के कागज को जो अदालत से आया हुआ था। तो क्या वह नोटिस भी गलत थी जिसे शशि ने मुझे दिखाया था जिसका जबाब दिया जाना था। जब वह विवाहित ही नहीं, फिर तलाक की नोटिस किस लिए? क्या इतनी धोखेपूर्ण तैयारी.... नहीं, नहीं ऐसा नहीं हो सकता। एस.पी. झूठ बोल रहा। हो सकता है एस.पी. सच बोल रहा हो और तलाक वाली वह नोटिस सच हो और शशि का नाम भी कुछ दूसरा हो। यानि शशि वह नहीं है जिस नाम से मैं उसे जानता हूॅं फिर क्या नाम है शशि का? पुलिस ने पता लगा लिया होगा! ऐसा होता तो एस.पी. बताता पर उसने इस बारे में कुछ बताया नहीं.. छिपा लिया होगा, मुझे किस लिए बताता?
बहरहाल रापटगंज की पुलिस ने मुझ पर उदारता दिखाते हुए पुलिस उत्पीड़न के योग्य नहीं समझा यानि कि मैं आजाद था तथा अपनी स्वतंत्रताओं की पवित्र नदी में अपने ढंग से गोते लगा सकता था। दो दिन भी नहीं गुजरे होंगे कि यहां बाहर से आने वाले दैनिकों ने पुलिस पर सवाल खड़ा कर दिये कि पुलिस नक्सलवाद के उन्मूलन के नाम पर साहित्यकारों तक को अपमानित कर रही है।
मैंने भी अखबारों को देखा, अखबारों में पुलिस के खिलाफ प्रकाशित था, इस संदर्भ में मेरा बयान भी प्रकाशित किया गया था, गनीमत थी कि अखबार वालों ने मेरे बयान में फेर बदल नहीं किया था।
करीब दस बजे के आस पास एस.पी. का फोन आया..। यह सब क्या हो रहा है? अखबार में ऐसा कैसे प्रकाशित हो गया कि पुलिस आपको अपमानित कर रही?
‘मुझे उसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। अखबार वालों से मैंने केवल पूछ,गछ के बारे में बताया था कि कोतवाल ने मेरी पेशी एस.पी. के सामने कराया और एस.पी. ने सम्मानजनक ढंग से शशि के बारे में पूछ,गछ की। केवल इतना ही अखबार वालों से मैंने कहा है साथ ही साथ यह भी कि कोतवाल ने मुझे मेरे घर पर छोड़ दिया, बस इतना ही।
मैंने एस.पी. को बताया....
‘मैं नहीं जानता जो कुछ अखबारों में प्रकाशित है, वह कैसे प्रकाशित हो गया पर इतना जानता हूॅं कि वह सब मेरा बताया हुआ नहीं है, आप इसकी जांच करा लें’। एस.पी. चालाक निकला उसने उसी दिन कोतवाली पर प्रेस कांफ्रेस बुला लिया, प्रेस कांफ्रेस में मैंने वही कहा जो अखबार वालों से कहा था फिर एस.पी. ने अपने तरीके से अखबार वालों को नसीहत दी....
‘आपलोगों को बहुत अधिक नहीं तो कम से कम कुछ तो सच के आस पास होना चाहिए। पुलिस ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो अपमान की श्रेणी का हो, हां पूछ, गछ की गई है और उसे करना भी चाहिए। क्या सच तक पहुंचने के लिए पूछ, गछ भी नहीं की जानी चाहिए?’ एस.पी. ने पत्रकारों से पूछा....
पत्रकार क्या बताते सिवाय इसके कि पूछ, गछ तो करनी ही चाहिए। समय के साथ शशि के प्रकरण का जो बवंडर उठा था वह कुछ दिनों तक ही बवंडर बना रह सका बाद में स्वतः ही समाप्त हो गया पर मेरे लिए समाप्त नहीं हुआ था। मैं आज भी उसी बवंडर में फसा हुआ हूॅं, और शशि का कहीं अता पता नहीं है। शशि वामअतिवादी रूझान वाली थी, नहीं थी, यह मेरे लिए चिन्ता की बात तो थी पर उससे अधिक चिंता की बात थी उसने मुझसे इस तथ्य को छिपाया।
मुझे पता था कि शशि का प्रकरण पत्नी को बताना मेरे लिए घातक होगा सो मैने उन्हें शशि के बारे में कुछ नहीं बताया कि वह कहां है, रापटगंज में क्यों नहीं है। अगर बता देता तो मेरी रचनाकारिता की चमड़ी उघड़ जाती..
‘हां हां और कुछ तो कर नहीं पाये, अब जाइए जेहल और खेलिए वहीं अक्षरों का खेल।’
उम्र के ढलान पर मैं एक बार फिर असहाय तथा असमर्थ दुनिया का आदमी बन चुका था। जिसके सामने तो होती है पूरी दुनिया पर अपने में डूबने और उतराने के सिवाय करने तथा सोचने के लिए कुछ नहीं होता। मैं वस्तुतः अपने में डूब गया था फिर तो....
शशि के अलावा मेरे गांव के लोगों के साथ, लौंगी, बी.डी.ओ. लाजवंती ही नहीं वह महिला भी मुझे नोचने, चोथने लगी जो मेरे उपन्यास में फसी पड़ी थी। इन सभी की अलग, अलग दुनिया थी। अपने पुरखों की दुनिया मुझे कभी रास नहीं आयी पर मैं उससे अलग नहीं हो सका किसी न किसी तरह उससे जुड़ा ही रहा। जिन लोगों में मैंने समाज बदल की उमंग देखी थी पर वहां भी केवल छलावा ही था और वह खुद को बदल लेने को ही समाज बदल साबित करना चाहता थे। मेरे गांव की खेती किसानी देखने वाला किसुन था जो मुझसे घर बनाने के लिए एक बिस्वा जमीन मांग रहा था। उसके लिए ‘इन्दिरा आवास’ मैंने ही मंजूर करवाया था जिसे बनवाने के लिए उसके पास जमीन नहीं थी। उसे जमीन देना जरूरी था और मैंने उसे दिया भी पर वह देना, न देना था क्योंकि एक बिस्वा जमीन देने की क्षमता भी अब मेरे पास नहीं थी। जिसे सहज रूप से मैं किसुन को दे देता, जमीन तो उसे दे दिया पर बहुत माथा पच्ची के बाद यह जानते हुए कि जमीन किसी के बाप नहीं होती फिर भी मैं डूबा हुआ था वसीयत और मालिकाने की गणित में। प्राकृतिक संसाधनों में सभी की हिस्सेदारी होनी चाहिए, इस बाबत मेरे विचार मुझे छल रहे थे फिर भी हसीन लग रहे थे। हालांकि मैं जानता था कि जो जगह, जमीन मेरे पास विरासत के जरिए आयी है, जिसका मैं मालिक बना बैठा हूॅं वह मेरी नहीं, प्रकृति की है। उस पर सारी दुनिया का प्राकृतिक हक है फिर भी उसे मैं किसुन को बहुत ही सहजता से नहीं दे पाया। जबकि दे देना चाहिए था, उसमें सोचने गुनने जैसी कोई बात ही नहीं थी।
समय का हेर फेर कहा जाये या और कुछ, अपने में गोता लगाना भी सहज नहीं होता, अगर सहज होता तो मैं भी मुस्करा रहा होता। वैसे मेरे पास मुस्कराहटों में डूबने के लिए मौके थे और मैं उनमें डूब भी सकता था पर मुस्कराहटें मुझसे काफी दूर चली जाती थीं.. लगता था कि छिन गई हैं.. मुझे क्या पता था कि उम्र के उतराव पर मेरे लिए हर ओर बिडंबनाएं बिछ जायेंगी। मैं ही नहीं लौंगी तथा लाजवंती भी शशि के लिए परेशान थीं, शशि से लगाव रखने वालों के फोन आते और मैं हर बार उन्हें एक ही जबाब देता, मुझे नहीं मालूम कि शशि कहां है और कब तक आयेगी, आयेगी भी या नहीं आयेगी।
पुलिस चाहे जो कहे मुझे यकीन नहीं हो रहा कि शशि वामउग्रवादी थी तथा सोनभद्र में वामउग्रवाद के फैलाव के लिए आयी थी। वह जंगल को जंग का मैदान नहीं बना सकती, वह तो जंगल का हरापन देख कर हरा हो जाती थी, ओबरा की टूटती पहाड़ियां देखकर सिसक पड़ती थीं, पेड़ों का खुत्थ देखते ही रोने लगती थी मानों उसे ही दो हिस्सों में काट दिया गया हो। वह तो खुद एक कविता थी, भला कविता उग्रवादी कैसे हो सकती है? वह दिन भला मैं कैसे भूल सकता हूॅ, शशि मेरे साथ जंगल घूमने गई थी, अंधेरा होते ही उसने मुझसे कहा था...
‘लौटना चाहिए अब, दिन ढलान पर है, कई मील जंगल पार करना है, अब कुछ भी नहीं देखना, इससे अधिक कुछ देखा भी तो नहीं जा सकता, अधिक देखने की लालच से बचना ही सर्वोŸाम बचाव है क्योंकि फिर जंगल हमें देखने लगेगा। आप तो जानते ही हैं जब प्रकृति दिल के गहरे में उतर कर किसी को देखने, परखने लगती है फिर तो दृढ़ताएं टूट जाती हैं.. दृढ़ताएं टूट जाने पर जंगल हम पर हसने लगेगा तथा उपहास उड़ाएगा। वैसे हसियां मुझे उŸोजित नहीं कर पातीं, न ही डरा पाती हैं, फिर भी..जंगल से बाहर हमें निकलना ही है, सो जंगल का अवांक्षित उपहास लेकर निकलना ठीक नहीं, ‘चलिए लौट चलें’
फिर हम जंगल से लौट आये थे।
कन्फेसन
शशि के बारे में कोई खबर नहीं थी। एक महीना बीत गया फिर भी शशि के साथ बिताए दिन मुझे सोने नहीं दे रहे थे। ऐसा भला कैसे हो सकता है मेरे साथ, शशि तो मेरे लिए केवल एक खूबसूरत दृश्य भर थी। दृश्य का स्मृति बन जाना मेरे लिए अचरज भरा है। मेरे लिए इस अचरज को समझ पाना मुश्किल है। शशि की स्मृतियों के एक, एक पल ताजे दिख रहे हैं मानों उनमें मैं डूब ही नहीं, तैर भी रहा हूॅ। मेरी आंखों में आज भी शशि किसी मछली की तरह तैर रही है और मैं समझ नहीं पा रहा हूॅं कि पानी में मछली की तरह तैरने वाली सुकुमार व सुघड़ महिला वामअतिवादी हो सकती है। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। अब तो शशि यहां है भी नहीं, जाने कहां, तथा किस हाल में हो, फिर भी उसकी स्मृतियां मेरे लिए अद्भुत कथानक जैसी लग रही हैं, उसकेे एक, एक हिस्से मेरी ऑखों में तैर रहे हैं. उसके सखी, सखा वाले भाव को मैं भूल नहीं पा रहा हूॅ, पता नहीं क्या हो गया है मुझे। संभव है वह फिर रापटगंज आ जाये पर नहीं, यह महज कल्पना है, वह यहां नहीं आने वाली, पर मैं सोच रहा हूॅ...
क्या शशि वस्तुतः वामउग्रवादी थी? यह सवाल मुझे लगातार परेशान करता रहा है। भले ही वह वामउग्रवादी रही हो पर मेरा मन नहीं मानता। वह कहां है? क्या कर रही है? कोई सूचना भी तो नहीं मिल रही। उसके मूल निवास का पता होता तो वहां जाकर उसकी खोज खबर लेता पर वह भी नहीं पता। विवश होकर मैं खुद में गोते लगाने लगा था। सोच रहा था इस साल गॉव की खेती कराने के बारे में, पत्नी भी तैयार थीं कि अपनी खेती कराना हर हाल में ठीक रहेेगा। खेती कराने न कराने के बाबत हमलोग आपस में बातें कर ही रहे थे कि शशि के संस्था के मंत्री का फोन आया..
संस्था के मंत्री का फोन...निश्चित ही कुछ विशेष होगा, मैने फोन उठाया...
दुआ सलाम के बाद मंत्री जी नेे मुझे बताया कि ‘शशि जी के पति का निधन हो गया है। इस समय वह अपनी ससुराल में हैं, कर्मकांड बीत जाने के बाद रापटगंज जायंेगी, शशि के मकान का किराया संभव हो तो आप चुकता कर दीजिएगा।’
मैं तो सूचना सुनते ही सहम गया, यह क्या हुआ? सहमकर मैंने उनसे पूछा.
‘जी, क्या बोल रहे हैं? कैसे निधन हुआ शशि के पति का? का हुआ था उन्हें, क्या शशि ससुराल में है?’
एक ही सांस में कई सवाल मैंने उनसे पूछा..
‘जी उन्होंने आत्महत्या कर लिया था, इस समय शशि जी ससुराल में हैं’
मैं चौंक उठा... ‘आत्महत्या, काहे, का बात थी, वे तो अलमस्त मिजाज के थे। उधर से जबाब आया...
‘जी थे तो अलमस्त, पर...’ संस्था के मंत्री चुप हो गया
‘पर क्या? ..ऐसी कौन सी बात थी, साफ, साफ बतायें’ मैंने पूछा
‘उन्हें एड्स हो गया था, इसकी जानकारी होते ही उन्होंने आत्महत्या कर लिया।’
‘क्या एड्स! कैसे जानकारी हुई कि उन्हें एड्स हो गया है?’ मैंने पूछा
संस्था के मंत्री ने जो बताया वह मुझे अचरज में डालने वाला था।
‘जानकारी काहे नाहीं होती, वे देह के करतबों का एक क्लब चलाते थे, जिसमें उनके कुछ मित्र तथा उनकी पत्नियां मेम्बर थीं। उनके मित्र तथा उसकी पत्नी को एड्स हो गया है तथा दोनों एड्स का इलाज करा रहे हैं। अस्पताल में भर्ती़ हैं। उनके मित्र को दो बोतल खून चढ़ाया जाना था। वे खून देना चाहते थे। उनके खून की जांच हुई तब पता चला कि वे भी एड्स की जकड़ में हैं तथा एड्स आखिरी चरण में है। उनके रोग के बारे में उनके तथा मित्र के घर वालों को भी जानकारी मिल गई, वे अस्पताल में ही थे। किसे नहीं पता कि एड्स काहे होता है? शर्म के मारे उसी दिन वे सदमें में चले गये। किसी तरह उन्होंने दिन बिताया और रात में जहर खा लिया। घर के लोग उन्हें अस्पताल ले गये पर वे तो रास्ते में ही मर चुके थे।
‘शशि का फोन नहीं मिल रहा...’ मैंने फिर पूछा
‘नहीं मिलेगा फोन, शशि ने अपना मोबाइल तोड़ दिया है, इस समय उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं है। मुझे भी कुछ न मालूम होता। मुझे तो शशि के बारे में मेरे एक मित्र ने बताया, जिन्होंने शशि को मेरी संस्था से जुड़वाया था। खबर सुनते ही मैं शशि के घर गया, उसे समझाया बुझाया, आज आपको फोन कर रहा हूॅ, संभव हो तो आप भी उससे मिल लें’
मैं तो खबर सुनते ही चेतनाशून्य हो गया, यह का हुआ शशि के साथ, पति से अनबन थी तो का हुआ, किसी न किसी दिन बात बन जाती पर पति का निधन, कैसे सहन करेगी शशि? कहीं उसे भी एड्स न हो गया हो। बहरहाल उसके घर चलना चाहिए। पत्नी भी अवाक... उन्होंने पूछा...
‘का शशि के पति ने आत्महत्या कर लिया? काहे, का बात थी?
‘उन्हें एड्स हो गया था’
एड्स हो गया था, तो का हो गया, यह तो पहले गुनना चाहिए था, फेर आत्महत्या से रोग खतम होगा का। लौंगी को भी तो एडस हुआ है, वह तो आत्महत्या नहीं कर रही, लड़ रही है समय से...उन्हें लड़ना चाहिए था रोग से।’
मैंने तत्काल लौंगी तथा लाजवंती को सूचित किया। लाजवंती रापटगंज में ही थी, लौंगी भी देर रात तक रापटगंज आ गयी उसके साथ बी.डी.ओ. भी था। लौंगी तो शशि के पति की मृत्यु के बारे में सुनते ही बेहोश जैसी हो गयी.. उसने माथा पकड़ लिया.. ‘का हो गया बहिन जी के साथ, ठीक है पति से शशि बहन जी नाराज थीं, पर किसी न किसी दिन तो सब ठीक हो ही जाता।’
‘का उनके पति को एडस हो गया था?’
लौंगी व लाजवंती दोनों ने चकराकर पूछा..
‘हां शशि की संस्था का मंत्री तो यही बता रहा था, अब तो वहां चलने पर ही पता चलेगा।’
लाजवंती मुखर थी..
‘पता नाहीं कइसे लोगन को एडस हो जाता है, वह भी आज के जमाने में, देहीं पर लोटना है तो लोटो पर कुछ जोगाड़ तो कर लो, एक से एक जोगाड़ हैं। पढ़े लिखे तो हम अनपढ़ों से भी गंवार हैं। बाऊजी चलिए हमलोग शशि बहिन जी के इहां चलेंगे..’
लौंगी भी..बोल उठी..
हां, हां बाऊजी, चलिए हम भी चलेंगें। लौंगी ने तत्काल अपने साहब से पूछा.....
‘का साहब! आपउ चलेंगे शशि बहिन जी के इहां? देखिए एही से हम आपउ को रोकते हैं कि हमय साहब छोड़ो, कहीं कुछौ आपउ को हो गया तो...’
बी.डी.ओ. लौंगी की बात पर मुस्करा दिया,
‘जो होना होगा, हो जायेगा, ओसे काहे डरना?’
लौंगी तथा लाजवंती नहीं जानती थीं कि शशि के पति ने देह का कल्पित स्वर्ग बना लिया था। उस स्वर्ग में उसके कुछ मित्र तथा मित्राणियां किसी पर्व की तरह देहोत्सव मनाया करते थे। उस उत्सव में पूरे उन्माद के साथ देह बोलती थी, गुर्राती थी। शशि ने पति के कथित स्वर्ग का पूरी क्षमता के साथ विरोध किया था, पर उसका पति तो स्वर्ग का आकांक्षी था। उसी ने उस स्वर्ग को बनाया था, सो काहे मानता? उसने शशि के विरोध को नपंुसक नैतिक काम मान कर कुचल दिया। अन्ततः शशि ने उसे तथा उसके घर को छोड़ दिया और रापटगंज चली आयी।
लौंगी तथा लाजवंती दोनों औरतें थीं, दोनों सदमें में थीं। लौंगी तथा लाजवंती दोनों ने विवाह नहीं किया था पर दोनों शशि के विधवा होने से दुखी थीं उन्हें लग रहा था कि एक रिश्ते की मृत्यु हो गयी है। रिश्ता जब टूटता है तो बहुत कुछ टूट जाता है।
बी.डी.ओ. की कार से हमलोग सुबह ही शशि से मिलने के लिए निकल पड़े थे। पांच घंटे की यात्रा के बाद हमलोग शशि के आवास पर थे।
तेरही दो दिन दिन बाद होनी थी। घाट वाला कार्यक्रम निपट गया था। छुरी लोटा शशि के ससुर ने लिया था। उन्हें ही मृत्यु संस्कार कराना था। शशि का परिवार खुला, खुला था। सभी मिलनसार थे। हमलोगों के पहुचने की खबर शशि को मिल चुकी थी। कुछ देर बाद शशि घर में से बाहर निकली। ऐसे समय में घर से बाहर निकलना सहज भी तो नही होता वह भी घर की बहू के लिए। वह मुर्झा चुकी थी, वैधव्य ने उसे जकड़ लिया था। मैं तो उसे देखते ही सुन्न...
शशि हमलोगों को देखते ही रोने लगी...वह मेरे पांवों पर गिर पड़ी...
‘बाऊजी! यह सब का हो गया, चले गये हमैं छोड़कर, थे तो भरोसा था कि मिलेंगे एक न एक दिन, अब का करें हम। हम आपको भी कुछ नाहीं बता सके इसके बारे में, ससुर जी का फोन मिला भागे चले आये इहां। मुझे बताया भी नहीं गया कि वे अस्पताल में हैं। वे दस दिन तक अस्पताल में पड़े थे। ऐसा नहीं था कि मैं उनकी सेवा नहीं करती, पति के नाते कुछ करती न करती मित्र के नाते तो करती ही, उनके लिए कुछ भी बाकी न उठा रखती। एक चिठ्ठी छोड़ गये हैं मेरे नाम, चिठ्ठी क्या है, मृत्युशय्या पर पड़े आदमी का कनफेसन है, एक तरह से वह चिठ्ठी मृत्यु का दस्तावेज है...उसके एक, एक शब्द रो रहे हैं। उसे पढ़ पाना मेरे वश का नहीं....’
लौंगी तथा लाजवन्ती भी शशि के साथ रोने लगीं, रोने को तो मैं भी रो रहा था पर बाहर से नहीं, अन्तर्मन से।
मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि शशि से का बोलें, मैं खुद भी सुन्न था, मुझे यकीन था कि किसी न किसी दिन शशि अपने पति से जुड़ेगी जरूर, दोनों के बीच की दूरियां खत्म हो जायेंगी पर सब गड़बड़ हो गया, अनहोनी के खेल ने सब कुछ बिगाड़ दिया। किसी तरह मैंने शशि को समझाया...
‘धीरज से काम लो शशि, होनी को भला कौन टाल सकता है? तूं तो साहसी है, साहस न तोड़ो, फिर हम लोग तेरे साथ हैं ’
लौंगी तथा लाजवंती ने भी शशि को समझाया बुझाया..
‘हमैं देखो बहिन जी, का है हमरे पास, रोग लेके घूम रहे हैं, अब मरे तब मरे की हालत है बहिन जी! पर लड़ रहे हैं जिनगी से, अउर अन्त तक लड़ेंगे बहिन जी।’
लाजवंती ने भी शशि को समझाया.. ‘अब न रोइए बहिन जी आगे देखिए, अबही बहुत काम करना है आपको’
कुछ देर बाद हमलोग वहां से रापटगंज के लिए निकल लिए। रास्ते भर मैं शशि की बातों में था...मुझे याद है कि शशि ने अपने पति को चेताया था...
‘समझ लो कि मैं खिलौना नहीं हूॅू। चाहे जब और जैसे खेलो और दूसरे को खेलने दो। उसने पति को जोरदार ढंग से बेड के किनारे धकेल दिया और चीखते हुए दुबारा कहा...
‘अच्छा होगा कि रुक जाओ और खुद को नियंत्रित कर लो, तुम सिर्फ और सिर्फ एक यंत्रमानव हो और तुम्हें उसी तरह रहना भी चाहिए। तुम्हें आज से यह बात गांठ बांध लेनी होगी कि शशि यंत्रमानव नहीं है, वह सोचती है और सोच सकती है कि उसे क्या करना चाहिए।’
‘मैं अच्छी तरह से समझती हूॅं कि तुम्हारे लिए रिश्ते की पवित्रता का कोई अर्थ नहीं..यदि तुम सोचो कि मैं तुम्हारे घर में हूॅं, मजबूर हूॅू इसलिए तुम मेरे मन एवं तन के साथ मनमानी कर सकते हो तथा किसी से करवा सकते हो, तो ऐसा कभी नहीं सोचना। मैं अपनी सुरक्षा करना जानती हूॅ. आखिरी बार मैं तुमसे कह रही हूॅं कि मेरे कमरे से अभी और इसी समय निकल जाओ बिना देर किए, मैं तुम्हें अपने कमरे से बाहर देखना चाहती हूॅं..’
अगर शशि के पति ने उसकी चेतावनियों से सबक लिया होता तो शायद संभल जाता पर नहीं, वह तो अपने मन का मालिक था।
शशि दस दिन बाद रापटगंज आयी। एड्स जागरूकता के कार्यक्रम को छोड़ना उसने उचित नहीं समझा। उसके ससुर ने भी संस्था का काम करते रहने के लिए अनुमति दे दिया था, फिर बिना कुछ कमाई के बेरोजगार रहना भी तो ठीक नहीं।
एक दिन हमलोग एस.पी. के कार्यालय पर थे। एस.पी. को मेरा नाम याद था, बिना देर किये उसने मुझे बुला लिया।
‘कहिए कैसे आना हुआ?’ एस.पी. ने विनम्रता से पूछा
‘बस आपसे मिलने।’
‘नहीं, ऐसा तो नहीं, बिना किसी प्रयोजन के तो आप नहीं आने वाले, वह भी रापटगंज से सात किलोमीटर दूर। बताइए मेरे लायक कोई काम..’
‘जी काम कुछ भी नहीं है। ये शशि जी हैं, जिनके बारे में जांच पड़ताल के लिए आपने मुझे तलब किया था।’
‘तो उस प्रकरण को आप अभी भूले नहीं हैं, भूल जाइए उसे।’
‘जी उस प्रकरण को भला कैसे भूला जा सकता है, उसे तो मैं कभी नहीं भूल सकता।’
‘अरे, उसमें क्या है, बात आई, गई खतम हो गई, विभाग को भी मालूम हो गया है कि शशि नाम की वह दूसरी महिला थी जो दिल्ली की रहने वाली थी। वह वामउग्रवादी थी, उसे पुलिस ने पकड़ लिया है। जांच हो चुकी है।’
‘इतनी बड़ी बात को भी आपने मुझे बताना जरूरी नहीं समझा?’ मैंने एस.पी. से कहा
‘जरूरी तो समझा था, पर बता नहीं पाया, क्षमा करें, मुझे ध्यान ही नहीं पड़ा।’
महोदय! आपसे एक निवेदन है, अगर बुरा न मानें तो कहें...’
‘बोलिए निवेदन नहीं, आदेश कीजिए’
‘नहीं महोदय! आदेश नहीं निवेदन। निवेदन है कि जिस तरह आपने मुझे कोतवाल के द्वारा पकड़वा लिया एक ऐसी सूचना पर जिससे मेरा कोई जुड़ाव नहीं था, कृपया कभी भी मेरे जैसे अक्षबटोर को ऐसी सूचनाओं पर न पकड़वाइएगा। आप तो जहां रहेंगे आला अधिकारी ही रहेंगे। पुलिस की धमक से मेरे घर की दीवारंे आज भी कांप रही हैं, आंगन, बारामदा तथा सेहन हिल रहे हैं, मेरे पोता, पोती का बचपन खंडित हो चुका है और पत्नी तथा बहू तो जैसे संज्ञाशून्य हो गये हैं। शशि जी भी आहत हैं, इनके पति का स्वर्गवास हो गया है। दो दिन पहले ही ये अपने घर से वापस आई हैं और आपके सामने हैं... इन्हें देख व परख लीजिए...’
‘जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोगों की विवशता है कि हम सूचनाओं पर चलें, उसकी जांच पड़ताल करें। यह जो सूचनाओं का जाल है नऽ, वह हमें मनुष्य ही नहीं रहने देता। एक अधिकारी सूचनाओं का गोदाम होता है और गोदाम में तो चूहे भी लगते हैं, बस यही समझ लीजिए चूहे लग गये थे इसीलिए मुझसे गलती हो गयी।
शशि ने उसी समय मुझसे धीरे से कहा...
‘चलिए लौट चलें,’ बात हो गई नऽ’
फिर हम पोस्टर बनते अपने कस्बे रापटगंज में लौट आये। लौंगी तथा लाजवंती दोनों शशि के कार्यालय पर हमलोगों की प्रतीक्षा कर रही थीं.। हम लोग जब कार्यालय पर पहंुचे तब वहां शशि के कुछ कार्यकर्ता भी आ चुके थे, बात पूरे रापटगंज में पसर गई थी कि शशि के पति का देहावसान हो गया है। सभी अपने अपने तरीके से दुख व्यक्त कर रहे थे शशि थी कि गुमसुम थी, खुद में डूबी। सभी लोगों के जाने के बाद लौंगी ने शशि को पकड़ लिया और..
‘बहिन जी एक बात बोलें बुरा नहीं मानिएगा, चलिए अजुअय खूने कऽ जांच करा लीजिए।’
शशि को भी लौंगी का सुझाव अच्छा लगा। लौंगी व लाजवंती के साथ शशि खून जांच कराने के लिए अस्पताल चली गई। जॉच से पता चला कि शशि एड्स से मुक्त है। काश! शशि के पति ने पहले ही कन्फेश कर लिया होता कि वह जो वांक्षित स्वर्ग बना रहा है, वह स्वर्ग नहीं यमराज का घर है तो वह जीवित रहता, पर देह के मनोरमों ने उसे पागल बना दिया था।...फिर तो वही होना था जो उसके साथ हुआ।
शशि एड्स से तो मुक्त है फिर भी संबधों की यातनाओं से मुक्त नहीं हो पायी है। मुक्त होती तो चेहरे की चमक गायब न होती, अब उसके चेहरे पर वह चमक नहीं जिसे मैंने कभी देखा था। उसके चेहरे पर देहात की अनगढ़ पगडंडियों का कब्जा हो चुका है, और उसकी चहचहाहटों को समय न निगल लिया है। एक दिन मैंने शशि से कहा था...
‘देखो शशि जितना जरूरी होता है समय से टकराना, उससे कम जरूरी नहीं होता समय को दुलारना, संभव हो तो बीच का रास्ता निकाल लो, वह तुम्हारे लिए उचित होगा? बीती घटनाओं को पीठ पर लाद कर चलना ठीक नहीं’शशि रोने लगी थी।
‘कैसे भूल जाऊं, भूलना आसान भी तो नहीं’
कहते हुए शशि और रोने थी, और मैं अवाक...
किसी तरह मैंने उसे समझाया था...
‘देखो शशि मुझे अपना ही समझो, मेरा घर तुम्हारे लिए सदैव खुला रहेगा, जो तुमसे छिन चुका है उसका कोई विकल्प नहीं पर उस छिने हुए को सहेजते हुए तुम बहुत आगे बढ़ सकती हो और तुम्हें बढ़ना भी चाहिए, मैं तुम्हारे साथ हूं’
अब तो शशि को देखते ही मैं संज्ञाशून्य हो जाता हूं, एक शशि वह थी जिसके साथ मैं जंगल की तरफ गया था और एक शशि यह है जिसे में रोज ही देख रहा हूं...एक ही देह और एक ही मन फिर भी बदल गया सारा कुछ, एक ही कविता, एक ही पाठ फिर भी अर्थ अलग, अलग, अचानक मेरे मन में अचरज उछल पड़ा...
शशि तुम तो देहधारी कविता हो,
कविता हो शशि, खुद में खुद को तलाशती, गाती, गुनगुनाती अब बिलापती।
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हिंदी कथा साहित्य/रामनाथ शिवेंद्र के उपन्यास
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रामनाथ शिवेंद्र के उपन्यास
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'''सीमांत की संघर्ष गाथा ‘हरियल की लकड़ी’'''
[[File:Hariyal ki lakadi jpg.jpg|thumb|आदिवासी महिला बसमतिया की संघर्ष गाथा पर केंद्रित उपन्यास]]
अरविन्द चतुर्वेद
दुनिया के जिस ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ में हम रहते हैं, आज़ादी के अठ्ठावन साल बाद आज भी सीमांत पर कई ऐसी जिन्दगियां हैं जिन्हें आज़ादी की रोशनी मयस्सर नहीं, उलटे तंत्र के शिकंजे में वे छटपटा रही हैं। विकास की संजीवनी तो खैर उन्हें क्या मिले, विडंबना ही है कि विकास की मार ने उनका जीना दूभर कर रखा है। ये सीमांत के दूर-दराज के जंगली गॉव भी हो सकते हैं और शहरों की झुग्गी-झोपड़ियां या फुटपाथी जिन्दगी भी।
कथाकार रामनाथ शिवेन्द्र के हाल ही में आये उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ में जिस तरह से सीमांत की जीवन गाथा उपस्थित हुई है वह भौगोलिक रूप से भी उŸारप्रदेश का दक्षिणी-पूर्वी सीमांत है। सोनभद्र जनपद के रूप में वही सीमांत है जो कोयला, सीमेन्ट, अल्युमिनियम की बदौलत औद्योगिक अंचल और बिजली कारखानों के चलते ऊर्जा राजधानी जैसे चमकदार जुमले से संबोधित किया जाता है तो दूसरी ओर इसी सीमांत पर विकास की मारी, विस्थापन से धकियाई हुई वह ग्रामीण जंगली बस्तियां हैं जो अपने अ-विकास में अचल हैं और प्रशासनिक अंधेरगर्दी, लूट,खसोट तथा बहुस्तरीय दैहिक-मानसिक शोषण की स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं। छब्बीस उपशीर्षकों में विन्यस्त उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ में इसी ग्रामीण आदिवासी ज़िन्दगी की संषर्ष गाथा को उसकी अनेक गूंज अनुगूंज के साथ प्रस्तुत किया गया है। कहना न होगा कि बहुत हद तक इसमें उपन्यासकार को सफलता मिली है।
वैश्वीकरण के जिस अभियान में विकास की दुदुभी बजाई जा रही है उसकी असलियत जाननी हो तो सीमांत के परिवेश का जायजा लेने से खोखलापन अपने आप उजागर हो जाता है। इस उपन्यास में आये गॉव का जीवन परिवेश देखिए...
‘सदी का गुज़रना इस गॉव से गायब था। यहां परंपरायें थीं, उनका दबाव था। दूसरी कोई चीज थी तो वह था जंगल, नदी नाले पहाड़। जंगल में महुआ, करवन, बेर, हर्रा, बहेरा जैसे कुछ जंगली फल-फूल थे। जिन्हें अपने उपयोग के लिए प्रयोग में लाना कानून प्रतिबंधित और दण्डित करता था। गॉव हजारों साल की परंपराओं में कुछ इस तरह ढंका था कि नई सदी का कहीं अता-पता न चलता था। एक तरफ धॉगरी बोलते हुए करम देवता खड़े थे तो दूसरी ओर मैदानी इलाके में राम, कृष्ण, शंकर जैसे देवता भी पुजहाई करवाने में कम न थे। हाल के सालों में कुछ नेताओं, परेताओं के नाम भी गॉव में घुस चुके हैं। (पृ.68)
उपन्यास की मुख्य कथा तो बस इतनी ही है कि चेरो जाति की आदिवासी युवती बसमतिया का पति जगदा पॉच साल पहले गॉव छोड़कर कहीं चला गया है। न वह लौटा, न उसने इस बीच अपनी कोई खबर दी। लेकिन बसमतिया है कि अपनी बूढ़ी विधवा सास के साथ रह कर मेहनत मजूरी करते हुए ज़िन्दगी बसर किये जा रही है। वह जवान है, आकर्षक है, मेहनती है, और चाहे तो अपने जाति समाज के मुताबिक किसी दूसरे युवक के साथ ‘सलट’ कर ज़िन्दगी की नई पारी भी शुरू कर सकती है। लंकिन वह जगदा के लौटने का इन्तजार करती है। जगदा वापस आ जाये इसके लिए ‘छठ’ का ब्रत रखती है, ‘करम’ देवता से मनौती करती है। वह जगदा और उसकी स्मृतियों को हारिल की लकड़ी की तरह थामेे हुई है, जकड़े हुई है।
सीमांत की ज़िन्दगी का अर्थिक संघर्ष कितना गहरा है उपन्यास में आया विवरण द्रष्टव्य है...
‘चेरवान के परिवारों की संख्या चालीस थी तथा धॉगर कुल पैंतालिस परिवार थे, अहीर जो लगभग भूमिहीन थे उनकी संख्या चार परिवार की थी। भूमिहीन व गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले इन परिवारों के बच्चे स्कूल न जाते थे।.... बहुतायत लोगों के पास बंधी में ली गई जमीनों के एवज में चौदह-चौदह बिस्वों के दिए गये छोटे-छोटे जमीन के टुकड़े थे। गॉव के भूमिहीन जंगल विभाग के कामों पर सब्बल, गैंता, फावड़ा चलाते और औरतें टाकरियॉ ढोतीं। कभी जंगल में वृक्षारोपण का काम भी मिल जाता।’लेकिन जिस बसमतिया की जिन्दगी दागों वाली दुनिया की न थी, वह जल की तरह चमकदार थी और पारदर्शी भी। पृ..54
उसकी स्थिति दूसरों से इस मायने में भिन्न है कि आर्थिक अभाव के साथ ही उसका जीवन भवनात्मक अभाव से भी ग्रसित है। इसलिए यह बहुत ही स्वाभाविक है कि
‘बसमतिया वर्तमान में जीने वाली औरत थी। उसके पास न तो अतीत की आनददायक स्मृतियॉ थीं और न ही भविष्य का मनोरम सपना था’ पृ..127
तो क्या बसमतिया के अन्दर इच्छा-आकांक्षा न थी, राग-अनुराग न था, या वह हाड़-मांस की नहीं बनी थी? रात के एकांत में अपनी मायके में भउजाई के साथ सोई बसमतिया कहती है...
‘भउजी जबसे तुम्हारा ननदोई भागा है तबसे जाने क्या हुआ कि मेरी देह भी उसके साथ चली गई है। समझ में नहीं आता कि देह कैसे चली गई, मेरी खुशियां लेकर.... मुई देह भी गुसिया गई है मुझ पर... पृ..52
यानि एक तरह से पति-परित्यक्ता, युवा बसमतिया जिस तरह की परिस्थितियों का शिकार है, उसमें किसी भी तरह उसकी ज़िन्दगी निरापद नहीं है। वह जिस मालिक के काम पर जाती है, एक मौका पाकर वह उसे दबोच लेता है। संघर्ष करके बसमतिया उसके चंगुल से निकल भागती है, और दुबारा फिर उसके काम पर नहीं जाती। बसमतिया के जेठ की भी उस पर बुरी निगाह है। अव्वल तो वह चाहता है कि बसमतिया किसी के साथ ‘सलट’ कर दफा हो जाये तो जगदा के हिस्से की जरा सी जमीन उसे मिल जाये या फिर बसमतिया उसके अवैध संरक्षण में रहने लगे। लेकिन बसमतिया कठिन जिन्दगी जीते हुए भी टूटती नहीं। यथासंभव न्यूनतम जरूरतों और शर्तों पर जिन्दगी जीती है, लेकिन जेठ तथा मालिक जैसे बदनीयत लोगों के लिए वह सर्वथा अलभ्य बनी रहती है।
बसमतिया का पति भगोड़ा निकला जरूर लकिन बसमतिया परिस्थितियों के अंधड़ में सूखे पŸाों की तरह उड़ जाने वाली स्त्री नहीं है। उसका जीवन रिक्त है और उसकी मन‘स्थिति को बड़ी बारीकी से उकेरने में लेखक ने पर्याप्त दक्षता का परिचय दिया है पर असल चीज है बसमतिया का जीवट, वह चट्टानी दृढ़ता, जो हर तरह के आर्थिक, मानसिक हरहराते अभावों के आगे पराभूत होना नहीं जानती। इसी ने बसमतिया के व्यक्तित्व को चमकदार बनाया है। लेकिन यहां यह कहना भी जरूरी है कि ‘हरियल की लकड़ी’ उपन्यास को स्त्री विमर्श के खाते में डालकर ‘रिड्यूस’ नहीं किया जा सकता। दरअसल यह उपन्यास सीमांत की जिन्दगी जी रहे लोगों के संघर्ष और जिजीविषा की बिडंबनापूर्ण दास्तान तो है ही, साथ ही बचे-खुचे सामंती अवशेष, पूंजीवाद के हमलावर चरित्र और जनतंत्र को अप्रासंगिक बनाने पर आमादा भ्रष्ट,क्रूर प्रशासनिक व्यवस्था तथा विकास की इकहरी प्रक्रिया के दुःपरिणामों को उजागर करता एक खौलता कथा-दस्तावेज भी है।
बसमतिया उपन्यास का केन्द्रीय पात्र तो है लेकिन एक ऐसा पुल भी है जिस पर से होकर उसके मायके और ससुराल की ग्रामीण जिन्दगी की सीमांत चुनौतियां और संघर्ष अनेक रूपों में आवाजाही करते हैं। उसके बाप ने कभी सरकारी सहायता के तहत भैंस ली थी जिसके एवज में देय बैंक का कर्ज दो हजार से बढ़कर आठ हजार रुपये हो जाता है। यह कर्ज भी एक नेता की कागजी धोखा-धड़ी की देन है जिसका शिकार उसका अनपढ़ बाप बनता है। बाप को जेल न जाना पड़े और किसी तरह कर्ज से छुटकारा मिले इसके लिए गॉव के सीधे सादे दूसरे कर्जदारों के साथ बसमतिया को बैंक और कचहरी का चक्कर लगाना पड़ता है। बसमतिया की गॉव की सहेली ननकी का दूर का एक रिश्तेदार देवनाथ डूबते को तिनके का सहारा जैसा वकील मिल जाता है और हालांकि बसमतिया का बाप जेल जाने से बच जाता है, उपभोक्ता फोरम के माध्यम से मुकदमा जीतने के कारण उसे कर्ज से मुक्ति भी मिल जाती है। फिर भी रोज कमाने खाने वालों के लिए बैंक-कचहरी का चक्कर अपने आप में कितना बड़ा संघर्ष है, यह वकील देवनाथ से बसमतिया की इस जिज्ञासा व चिन्ता से समझा जा सकता है....
‘फैसला कब तक हो जाएगा वकील साहब! यहां आओ तो सŸार अस्सी रुपया खरच हो जाता है, दो दिन का नुकसान अलग से। रोज कमाओ खाओ नहीं तो फांका...पृ..159।
प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लूटतंत्र का शिकार होकर सरकारी अनुदान, सहायता और बैंक कर्ज आदि के जरिए सीमांत की जिन्दगियां जहां जाल में फंसकर छटपटाती हैं, वहीं औद्योगिकरण और इकहरे विकास की प्रवंचना भी उन्हीं के हिस्से आती है।...
‘गॉव के आकाश का सूरज, गॉव के हिस्से की जमीन, धूप हवा, जंगल, पहाड़ सभी कुछ गॉव में होते हुए भी गॉव से बाहर थे उन पर दूसरों का कब्जा था। नदी का पानी दूर जाकर नहर में गिरता था जिससे गॉव का रिश्ता नहीं। गॉव का पहाड़ टूट-टूट कर ढोंका, पटिया, चूना, सीमेन्ट, अल्युमिनियम बनता था, जंगल कटकर पलंग, कुर्सी,मेज, किवाड़ वगैरह में ढलता था पर बसमतिया का मायका.... बिना नहर वाला, बिना कुर्सी वाला, बिना सीमेन्ट वाला था जो आज भी है। इतिहास की बनती बिगड़ती स्थितियों ने कभी भी इस गॉव का भला नहीं किया’ पृ...73-74।
उपन्यास का अंत सचमुच विचलित कर देने वाला है। गॉव के पंडितों के मन मुताबिक ग्रामसभा का काम न होने के कारण वे भूमिहीनों और मजदूर तबके के लोगों का साथ देने वाले ग्रामप्रधान के खिलाफ हैं। अंततः गॉव के भूमिपति यानि पंडित वन विभाग के रंेजर के साथ मिलकर प्रधान व भूमिहीन ग्रामीणों के खिलाफ साजिश रचते हैं। रेजर की अगुवाई में वन विभाग वाले जंगल की जमीन पर कब्जा का बहाना बना कर उनकी झोपड़ियां उजाड़ते हैं, आग लगा देते हैं, विरोध करने वालों को खदेड़कर पकड़ ले जाते हैं। रेंजर आफिस पर खुद लकड़ी के गोदाम में आग लगवाकर रेजर, गॉव वालों को आरोपी बनाता है। यह सारी र्काावाई रात में होती है। बसमतिया और रज्जो के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। इस बर्बर दमनात्मक कार्रवाई के बाद प्रधान समेत पकड़े गये ग्रामीणों को गिरफ्तार कराके जेल भेज दिया जाता है। पक्ष विपक्ष में खबरे छपती हैंे, चूंकि वकील देवनाथ भी ग्रामीणों को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार होता है इसलिए वकीलों की हड़ताल और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के धरना प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता है। एक बार फिर मामला जॉच और कचहरी की पेचीदा गलियों में चला जाता है। विचलित कर देने वाले दमन और षडयंत्र के गर्भ में जिस तरह के विस्फोट के मुहाने पर जाकर उपन्यास खत्म होता है, वहां हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और इसकी उपलब्धियों के सामने एक बड़ा प्रश्नचिन्ह स्वयमेव खड़ा हो जाता है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि वैश्वीकरण के गाए जा रहे भारतीय सोहर के सामने यह उपन्यास एक ऐसा शोकगीत है जिसे अनसुना नहीं किया जा सकता।
परिचय... अंक 06 पृ...107-110
हंस...
समीक्ष्य कृति... हरियल की लकड़ी’ (उपन्यास)
प्रकाशक.. राजकमल,
नेता जी सुभाष मार्ग
नई दिल्ली,110002
मूल्य..195..00
सन्... 2006
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'''मौलिक अधिकारों के संषर्ष की तैयारी ‘तीसरा रास्ता’'''
[[File:Teesara Rasta.jpg|thumb|NGO संस्कृति परकेंद्रित उपन्यास भूमिअधिकार के सन्दर्भ में]]
नन्द किशोर नीलम
एन.जी.ओ. की भूमिका पर अनगिनत सवाल उठते रहे हैं। एन.जी.ओ. ने अपनी कार्यप्रणाली और समग्र व्यवहार से बराबर ऐसे हालात पैदा किए हैं जिससे तमाम धारणायें पुष्ट और प्रमाणित हुई हैं कि इनकी भूमिका विकास विरोधी दलालों की तरह है। निरीह जनता के हिस्से की कल्याणकारी योजनाओं की अकूत राशि इनके पंचतारा ऐशो-आराम पर खर्च कर दी जाती है। बाड़ (बाउन्ड्री) का काम खेत की रखवाली करना होता है, पर यदि बाड़ ही खेत खाने लगे तो! संभवतः एन.जी.ओज की भूमिका पर अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले रामनाथ शिवेन्द्र के महत्वपूर्ण उपन्यास ‘तीसरा रास्ता’ में यही संशय उमड़ता-घूमता रहता है। मानवाधिकार जन समिति की एन.जी.ओ. का कर्ताधर्ता डी.बी़ जैसा शातिर व्यक्ति, जिसके हाथ में समाज को बदलने की ताकत और साधन दोनों हैं, शोषक व भक्षक की भूमिका में है। समाज की बेहतरी के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले साधनों को वह समाज के विनाश के, समाज की चेतना को कुंद करने के हथियारों के रूप में तब्दील करने में माहिर है...वह कहता है...
‘क्रान्ति एक छलावा है, तथा विकास यथार्थ’ वह आगे कहता है...
‘बुद्धि के व्यापार के लिए किसी एन.जी.ओ. का होना आवश्यक था सो उसने अमेरिकी फन्डर की बात जस के तस मान कर अपनी संस्था बना ली’ पृ..21
इसलिए क्रान्ति को अवरूद्ध करने के तमाम उपाय करता हैै। डी.बी. राजनीतिक समीकरण बिठाने में माहिर है। उसके मंसूबों को साकार करने और उसके अटके कामों को करवाने के लिए कोई न कोई स्त्री हमेशा देह में परिवर्तित हो जाने को तत्पर रहती है, जो उसका विरोध करती है उसे वह बर्बाद कर देता है। जटिल जीवन पद्धति, बाजारीकरण और घिचपिच सौन्दर्यबोध से स्त्री का संपूर्ण व्यक्तित्व किस तरह संचालित होता है इसका ज्वलंत उदाहरण है डी.बी. की सहायक मधुनिहलानी और शालिनी। वस्तुतः यह उपन्यास समाज परिवर्तन की दिशा में स्त्री की भूमिका के परस्पर विरोधी आयामों की गहरी पड़ताल करके उसके सही और सकारात्मक भूमिका और हस्तक्षेप को सुधा, अस्मिता, नन्दिता तथा प्रमिला जैसी स्त्री पात्रों के द्वारा रचता है जो हर स्तर पर समाज बदल के लिए प्रतिरोधी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। स्त्री जीवन के दो घनघोर विरोधी स्वरूपों (देह में तब्दील हो जाना एक स्वरूप तथा विरोधी स्वरूप अपनी अस्मिता के बचाव में प्रतिरोध करना) पर रामनाथ शिवेन्द्र ने स्त्री पात्रों के माध्यम से गंभीर विचारण किया है।
यह उपन्यास सोनपुर जनपद की आम जनता के माध्यम से आज के असंख्यशोषितों, पीड़ितों, दलितों, दमितों और वंचितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किए जा रहे संघर्ष की कथा कहता है। सोनपुर के ये लोग अपने जल,जंगल और जमीन के हक़ के लिए लगातार ठगे जा रहे हैं। शासन इनके प्रति निष्क्रिय और उदासीन है, लगभग जनविरोधी और विकास विरोधी भूमिका में। वन विभाग इन पर झुठे मुकदमे दायर करवाकर क्रूर हत्यारे की तरह व्यवहार करता है और उनके मौलिक अधिकारों की हिफाज़त की लड़ाई के लिए देशी-विदेशी फंडरों से करोड़ों रुपये डकारने वाले एन.जी.ओ. इनके सामाजिक तथा मौलिक अधिकारों का सबसे बड़े अपहर्ता हैं। देखें...
‘आर्थिक उदारवाद तथा एन.जी.ओ. संस्कृति ने आन्दोलनों के चरित्र की हत्या कर दी है’ पृ..224
‘एन.जी.ओ.वाले.बेकारी तथा बेरोजगारी का लाभ उठाते हैं तथा रुपया कमाने का व्यापार करते हैं....आधे से भी कम मजूरी पर कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं पृ..198
समाज बदलने के व्यापक उद्दश्यों को छोड़कर...
‘ये एन.जी.ओ. वाले गरीबी, भुखमरी,बीमारी का सौदा करते हैं तथा अमेरिका व इंग्लैंड को बेचते हैं। पृ..198
इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण घटना है सुधा के नेत्त्व में सोनपुर में बंधी का निर्माण जो वास्तव में आज के समय में जनभागीदारी के द्वारा जल संरक्षण के श्रोतों को सिरजने के पहल के लिए प्रेरित करता है, दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार द्वारा बड़े बांध बनाने के लिए अपनी जमीन से उजाड़ दिए जाने वाले निरीह आदिवासियों के विस्थापन को रोकने तथा बड़े बांध के विकल्प में छोटी-छोटी बंधियां बनाकर प्राकृतिक रूप से जल संरक्षण करने से जल, जंगल और जमीन रूपी आम जनता के मौलिक अधिकारों का हनन भी नहीं होगा और उन्हें बार बार उजड़ने से निजात भी मिलेगी पर वन विभाग सुधा द्वारा जनसहभागिता से बनवाये जा रहे बंधी निर्माण से खुश नहीं है, उसके धन व वर्चस्व का सारा खेल बड़े बांध खड़े होने में है।
वन विभाग के पैमाइशी फीते का जाल इतना गहरा और बड़ा होता है कि आम आदमी और उसके जीवन जीने के संसाधन भी इसी जाल में उलझकर रह जाते हैं। प्रतिरोध करने पर वन विभाग का दमन चक्र क्रूरता में बदल जाता है फिर पुलिस? नेता, और स्वयं सेवी संगठनों के भ्रष्ट आका आपसी साठगांठ से जनप्रतिरोध की धार को कुन्द कर देते हैं। उपन्यास में सोनपुर के निरीह लोगों को रेंजर की हत्या के आरोप में फसाना ऐसी ही सांठगांठ का परिणाम है। सुधा, विजयकीर्ति भाई, निखिल दा और विनय जैसे लोगों की बड़ी चिंता यह है कि इन्हें किसी भी तरह से उजड़ने से बचाया जाए और विस्थापित किए जाने वाले लोगों के बीच जाकर उन्हें आदिवासियों के मौलिक स्वत्व के संघर्ष के लिए कैसे तैयार किया जाए? लेकिन अनेक बार उजड़ चुके और शासन और पुलिस की पाश्विकता को भोग चुके लोग डरे हुए हैं। गॉव का एक सŸारवर्षीय वृद्ध सुधा और विनय को इस बर्बरता के बारे में बताते हुए लगभग पागलपन की हद तक पहुंच चुकी निराशा में ‘करमा’ गा गा कर नाचने लगता है। पृ..222। यह बुजुर्ग आदिवासी बार बार के विस्थापन को अपनी नियति मान चुका है। जिस डर, हताशा और निराशा का वह शिकार है वह आज पूरे भारतीय समाज पर हावी है। पर इसी गॉव के कुछ युवा लोग इस नियति को बदलकर आपने जीने के अधिकार को पाना चाहते हैं। इनमें अथाह जोश है और प्रतिरोध की आवश्यक क्षमता भी। ये अब मरने-मारने पर उतारू हैं।
इस उपन्यास का शीर्षक ‘तीसरा रास्ता’ देख कर ऐसा लगता है कि राजनीति में तीसरे विकल्प की तरह उपन्यासकार भी एक ‘तीसरा रास्ता’ बनाने या सुझाने की पहल करेगा जो कायम सŸाा और विकास विरोधी स्वयं संगठनों की लूट से परे होगा। जिस तीसरे रास्ते का खुलासा रामनाथ शिवेन्द्र उपन्यास के अंतिम ख्ंाड तीसरा रास्ता में करते हैं वह चौंकाता है। प्रारंभ में एक क्रान्तिकारी कामरेड रहे दीपेश भट्टाचार्य (डी.बी.) का रमेशरा बनकर नन्दिनी के जमीनदार पिता की हत्या करवाना, हत्या की राजनीति का पैरोकार होना, बाद में एन.जी.ओ. चलाना और अपने भ्रष्ट व्यभिचारी चरित्र को छिपाने के लिए अंततः आध्यात्मिक गुरु बन जाना ही क्या अब ‘तीसरा विकल्प’ या ‘तीसरा रास्ता’ बचा है? क्या वास्तव में आज के इस विकट दौर में जनपक्षधर मूल्यों के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है? क्या सघंर्ष और प्रतिरोधी चेतना पर ‘धन’ और ‘आध्यात्म’ ने आधिपत्य कायम कर लिया है? क्या अमेरिकी धनकुबेरों का प्रतिरोधी ताकतों को मनोवैज्ञानिक रूप से अपहृत करने का षडयंत्र फलीभूत हो चुका है? ऐसे कई प्रश्नों से यह उपन्यास विचलित करता है। आध्यात्म वास्तव में इस उपन्यास की ‘जय’ है या ‘पराजय’ तनिक गंभीरता से विचार करना पड़ेगा।
डी.बी. का सब तरफ से हार कर अपने पुराने आध्यात्मिक गुरु की शरण में चले जाना और अंत में अपने गुरु की जगह लेकर भगवा धारण कर लेना आज के समय की बड़ी सच्चाई है। आध्यात्मिक गुरुओं का प्रभामंडल लगातार फैल रहा है। कई गुरुओं और बापुओं के यौन-दुराचारों का पर्दाफास होने के बाद भी ये अपना प्रभामंडल विस्तृत करने मे कामयाब हो रहे हैं। आज जिस तरह की घटनांए हमारे वैचारिक समाज में घट रही हैं उन्हें देखते हुए यही कहा जा सकता है कि रामनाथ शिवेन्द्र आगत के भयावह हालात की पूर्व सूचना दे रहे हैं। प्रगतिशील और जनपक्षधरता के अगुआओं का इन दिनों जातियों, संघियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के चंगुल में फसना या स्वेच्छा से उनके आतिथ्य और धन को स्वीकार करना कहीं वही ‘तीसरा रास्ता’ तो नहीं जिसकी ओर रामनाथ शिवेन्द्र ने संकेत किया है? बहरहाल आज के वैज्ञानिक युग में आध्यात्म की दुन्दुभी जिस ऊंचे सवर में कान फोड़ रही है उसे देखते हुए ‘तीसरे रास्ते’ का घातक संकेत हमें सावधान करता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अतिवाद के इस कठिन समय में बड़े बड़े अपराधियों का अंतिम ठौर आध्यात्म (?)ही हो सकता है, जहां न तर्क चलता है न कानून। यहां तमाम धार्मिक व कठमुल्ला ताकतें उनके जयकारे और संरक्षण के लिए तत्पर हैं। इस तथ्य की सच्चाई को हम पिछले सालों देख चुके हैं।
इस उपन्यास के माध्यम से रामनाथ शिवेन्द्र ने घटित हो रही सच्चाइयों पर और बढ़ती संवेदनशीलता पर बहुत कुछ कहने की कोशिश की है। विचारों का भारी दबाव व ऊभ-चूभ तथा अधिक कथा विस्तार शिथिलता लाता है ऐसी तमाम सीमाओं के बावजूद यह कहने में संकोच नहीं है कि यह उपन्यास व्यापक सामाजिक सरोकारों को बड़े पैमाने पर बहस के बीच लाता है, यही इस उपन्यास की सफलता है।
उपन्यास के कुछ अंश जो विचारण के लिए अनिवार्य जैसे हैं उन्हें यहां प्रस्तुत करना गलत न होगा।...
‘हम साकारी विधानों, कानूनों, परंपराओं के तार्किक व प्रतिबद्ध अहिंसक अवज्ञाकारी हैं, इस अवज्ञा के दौरान हमें हक़ है कि हम अपनी हिफाजत करें तथा जनता की भी जिसे जागरूक बनाने के लिए हम संकल्पित और लक्ष्यित हैं’ पृ..33
‘अमेरिकियों का नारा था जिसका पेट भरेगा वह खूनी क्रान्ति नहीं करेगा सो रुपया बांटो, खाना दो, पढ़़ाओ, दवाई दो यानि उन्हें बचाओ जो खुद मर रहे हैं या प्रायोजित मृत्यु के लिए क्रान्तिकारी बन रहे हैं’ पृ..35
‘डी.बी. को स्वयंसेवी संस्थावाद की इस परिभाषा से पहले कुछ दिक्कत हुई, क्यांकि तब तक वह मानसिक रूप से दिवालिया नहीं हुआ था, उसे कदम कदम पर मार्क्स याद आते जैसे रति प्रसंग के दौरान फ्रायड’ पृ..39
‘तुम्हारा नाम प्रवीण है, तूं एन.जी.ओ. चलाता है, तूं गॉव का विकास करेगा खैरात बांट कर। तूं जमीन क्यों नहीं बटवाता? ’पृ..64
‘वैसे भी वे इतिहास की अश्लील आदतों से परिचित न थे कि वह परिवर्तित होने वाली परिघटना है तथा समय समय पर कई तरह का रंग रूप धारण करना उसका स्वभाव है। पृृ..106
‘सरकार के पास इतनी बड़ी जेल नही जो सभी को जेल में रख सके’ पृ..116
‘बड़े उद्योगों का विशाल सांचा नहीं बचेगा... यदि लाभ, अतिरिक्त लाभ वाली व्यवस्था को सहभागितापूर्ण अर्थतंत्र व प्रबंधन से तोड़ दिया जाए, इससे नौकरशाही का सांचा भी तोड़ा जाना संभव हो सकता है।’
‘प्रतिरोध कार्यक्रम खुला-खुला था यानि कि नई दुनिया संभव है पर दान, प्रतिदान, बैंक कर्जों के आवंटन, दया व कृत्रिम आर्थिक सहयोग के द्वारा नहीं...। संभव बनाया जा सकता है बराबरी का दर्जा देकर, क्रय शक्ति बढ़ा कर, अवसरों में समानता का वातावरण बना कर, सामाजिक मर्यादा बहाल कर? उत्पादनों को जनोन्मुखी बना कर’ पृ...193
‘आखिर हम आदिवासी ही क्यों उजाड़े जाते हैं, जमीन में कोयला, हीरा, सोना, चॉदी चाहे जो मिल जाये उजड़ो, हमेशा उजड़ते रहो, हमारा कुछ भी नहीं, ऐसा नहीं चलेगा। हम कोई लाश नहीं, हमारा भी हक़ है इस माटी पर, इस जंगल पर, अब हम इसे कटने नहीं देंगे, जंगल का फल-फूल, बालू, मिट्टी सारा हमारा, हमें नहीं चाहिए दिल्ली’ पृ.....224
‘यहां आकर इतिहास मरे न मरे पर विज्ञान, राजनीति, दर्शन और धर्म सारे के सारे यहां आकर मर चुके हैं इसलिए इस परिक्षेत्र में बारहवीं शताब्दी आज भी जीवित है। इनके चेहरे आज पूंजीवादी बर्बरता के परिणाम हैं’ पृ...227
हंस कथा मासिक...फरवरी..2010 पृ....84-85
समीक्ष्य कृति... तीसरा रास्ता
पिलग्रिम्स प्रकाशन
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्ड
वाराणसी, 221010
मूल्य...225.00 फोन...(91-542)2314060
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कितनी लड़ाई ,कितनी बार "दूसरी आजादी"''''
सुरेश पंडित
‘इतिहास तो हर पीढ़ी लिखेगी/बार बार पेश होंगे/मर चुके/जीवितों की अदालत में/बार बार उठाए जायेंगे/कब्रों में कंकाल/हार पहनाने के लिए/ कभी फूलों के/कभी कांटों के/समय की कोई अंतिम अदालत नहीं/और इतिहास आखिरी बार नहीं लिखा जाता।’ पंजाबी कवि सुरजीत पातर की कविता का यह हिन्दी अनुवाद इतिहास के बारे में फैलाए गये बहुत से मिथकों का खंडन करता है। कोई भी इतिहास समग्रतः सच्चा नहीं होता। इसलिए वह बार बार लिखा जाता है। बार बार गड़े मुर्दे उखाड़ जाते हैं और उनकी कारनामों पर समय की अदालत में फैसले लिए जाते हैं। रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘दूसरी आज़ादी’ भी इस सच को पकड़ने की एक बेचैन कोशिश है। शीर्षक से जाहिर होता है कि इसमें उस पहली आज़ादी के बाद का इतिहास है, जिसे पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में काफी संघर्षो और कुर्बानियों के बाद हासिल किया गया था। उसके बाद आज तक सŸाा के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ी गई हैं और आगे भी लड़ी जाती रहेंगीं क्योंकि सŸाा चाहे सामंतशाही की हो या लोकतांत्रिक उसका चरित्र प्रायः एक सा होता है। इसलिए इस तरह की लड़ाइयों के क्रम का कभी अंत नहीं होता। उपन्यास में आज़ादी से पहले इसे पाने के लिए लोगों को जिस तरह के आकर्षक सपने दिखा कर संघर्ष हेतु तैयार किया गया था उसका और बाद में उन सपनों को किस तरह तोड़ा गया इसका वर्णन बड़ी संवेदनात्मक भाषा में किया गया है। साथ ही खोई आज़ादी को पुनः पाने के लिए किए गये प्रयासों को भी दर्शाया गया है। लगता है हमारे देश के सारे इतिहास आम लोगों को सपने दिखाने और उन्हें तोड़ने के प्रयासों को ही लेकर लिखे गये हैं। उपन्यास के सभी पात्र चाहे वे नायक हों या खलनायक, पहली आज़ादी के संघर्षों की उपज हैं फिर चाहे उन्होंने एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उसमें भाग लिया हो या उसके विरोध में अथवा एक तटस्थ दर्शक के रूप में। नायक इस उपन्यास का रणविजय भी हो सकता है, रामदयाल भी और रामप्यारे भी। क्योंकि तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। ये सब मिलकर एक चरित्र बनते हैं। आज़ादी के बाद इस लड़ाई में शरीक होने वाले लोग दो वर्गों में बट जाते हैं। एक में वे लोग होते हैं जो किसी न किसी रूप में सŸाा से जुड़ जाते हैं। एक में वे लोग होते है जो इससे अलग तो रहते हैं लेकिन आगे क्या करें की दिशाहीनता में गोते लगाते नज़र आते हैं। पहली तरह के लोग गॉधी का मुखौटा लगाकर सŸाा सुख भोगने में लग जाते हैं और दूसरे, गॉधी की राह पर चलकर आगे क्या किया जा सकता है की सोच में उलझ जाते हैं। रणविजय एक शाही परिवार के सदस्य हैं लेकिन इसलिए महल से निकाल दिए जाते हैं क्योंकि वे एक ऐसी लड़की से प्यार कर शादी कर लेते हैं जो एक अंग्रेज पिता और भारतीय मॉ की संतान है। इसी तरह उनके भाई भैया राजा रियासत में रणविजय को हिस्सेदारी से इस आधार पर वंचित कर देते हैं क्योंकि वे भूतपूर्व राजा की दूसरी पत्नी की संतान हैं अर्थात भाई होकर भी सगे भाई नहीं हैं। यद्यपि दोनों ही आरोप सही हैं फिर भी उन्हें कानूनन उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन रणविजय अपने हक़ के लिए स्वयं लड़ने को तैयार नहीं होते। यह शायद उन पर चले आ रहे गॉधी के चिंतन के प्रभावों का परिणाम है या वह भावुकता है जो गॉधी को लेकर बाद तक बनी रही थी।
रामदयाल जी दोनों भाइयों के मित्र हैं वे इस तरह के अन्याय को सहन नहीं कर पाते फिर भी वे न तो भैया राजा का विरोध करते हैं और न ही रणविजय को भैया राजा का विरोध करने के लिए तैयार ही कर पाते हैं। नतीजा यह कि पहली आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने के कारण दोनों ही गॉधी के हैंगओवर से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते। वैसे भी यह ऐसे लोगों का स्वभाव है कि वे तब तक कोई निर्णय नहीं लेते जब तक किसी आन्दोलन के लिए पुख्ता ज़मीन तैयार नहीं हो जाती। पहली आज़ादी की लड़ाई में भी शुरू में किसान, मजदूर और वंचित वर्ग के लोग ही शामिल हुए थे, मध्यम वर्ग तो तब आया था जब वह लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच गई थी।
राजमहल से निष्कासित और पैतृक संपŸिा से वंचित हो जाने के बाद रणविजय और लिली दोनों लिली के घर आकर रहने लगते हैं। रणविजय एक गंभीर विचारक से दिखाई देते हैं जबकि लिली अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है। शायद यही वह कारण है जिससे वह रणविजय से शादी करती है और जब यह महसूस करती है कि रणविजय उसकी महत्वाकांक्षी प्रकृति को संतुष्ट करने में सहयोगी नहीं बन सकता तो वह नामदेव की ओर झुकती है। रणविजय और लिली के माता-पिता उसके इस झुकाव को पसंद नहीं करते। लेकिन उनकी अनिच्छा के बावजूद लिली अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए नामदेव के साथ रूस चली जाती है। समझ में नहीं आता कि इतनी चंचल चिŸा और महलों में रहने की इच्छा पालने वाली युवती के साथ रणविजय विवाह क्यों कर लेता है। वैसे लिली बौद्धिक रूप से काफी जागरूक है, गंभीर विषयों पर होने वाली चर्चाओं में वह भाग ले सकती है और रूसी साहित्य का अनुवाद तो वह करती ही है। फिर भी वह अथाह प्रेम करने वाले रणविजय और अपने माता-पिता को छोड़कर क्यों चली जाती है? यह समझना कोई मुश्किल नहीं है। दरअसल उसे लगता है कि नामदेव के साथ रहने पर उसके सपने पूरे हो सकते हैं उसकी प्रकृति और प्रवृŸिा दोनों परस्पर विरोधी भावों से बनी है। अन्त में उसका क्या होता है पता नहीं लगता। हो सकता है कि उपन्यासकार ने उसे इसलिए रचा हो कि वह पाठकों के लिए पहेली बनी रहे या फिर आगे वही हुआ जो प्रायः जो इस प्रकार के मामलों में हुआ करता है।
रणविजय के बजाय रामदयाल का चरित्र अधिक परिपक्व व डायनामिक है। यद्यपि एक रात को लिली के साथ घटी धटना का विश्लेषण कर पाना काफी कठिन है। कहीं नहीं लगता कि दोनों का इस तरह का पारस्परिक कभी रहा हो, हो सकता है यह आकस्मिक भावावेग मात्र रहा हो। चरित्र का यह आकस्मिक विचलन इस बात को लेकर भी हो सकता है कि हम एक दूसरे के साथ रहकर और घनिष्ठ संबध बनाकर भी आपस में सारी जानकारी नहीं रख पाते। मानव मन के बारे में किसी भी प्रकार की भविष्यवाणी प्रायः अनुमाननीय होती है। प्रसिद्व अंग्रजी उपन्यासकार ‘सौमट सेर माम’एक जगह लिखते हैं... ‘मैं किसी पात्र को जैसा सोचकर रचता हूं केई बार उसका आचरण मेरी कल्पना के अनुरूप नहीं होता’। फिर इस घटना पर किसी और से कोई प्रतिक्रिया का न होना भी हैरानी पैदा करता है। क्या यह कोई ऐसी घटना थी जिसे सामान्य मानकर भुला दिया जा सकता था। दोनों में से कोई भी न इसके बारे में आत्मग्लानि महसूस करता है न आत्मिक संतृप्ति ही प्रकट करता है।
सरकारी जमीनदारी उन्मूलन कार्यक्रम को विभिन्न हथकंड़ों से क्रियान्वित न होने देने के प्रयासों का रामदयाल, रणविजय और रामप्यारे के साथ मिलकर विरोध करता है। वह स्वयं भी एक छोटा-मोटा जमीनदार हैं अपने आन्दोलन को प्रामाणिक बनाने के लिए पहले वह अपनी जमीन को अपने अधिकार क्षेत्र के किसानों में बांट देता है। यद्यपि इसके लिए उसे अपनी पत्नी और अन्य संबधियों का भारी विरोध सहन करना पड़ता है। जब भैया राजा सहित सारे जमीनदार एकजुट हो जमीनदारी उन्मूलन कार्यक्रम के राह में रोड़े अटका राहे होते हैं तब रामदयाल का यह कदम लोगों का मन जीतने वाला साबित होता है।
गॉधी जी किसी भी काम की शुरूआत अपने से करते थे इसी लिए जनता उनका साथ देती थी। यहां भी लोग रामदयाल का साथ इसी लिए देते हैं। रणविजय और रामप्यारे तो पहले ही सर्वहारा थे। उनके पास अपना कुछ भी नहीं था। इसलिए तीनों का नेतृत्व आमजन को बदलाव की राह दिखाने में उत्साहजनक साबित होता है।
भैया राजा का चरित्र शुरू में जैसा दिखाया जाता है अंत तक वैसा ही बना रहता है। वह पहले सारी रियासत पर अपना एकक्षत्र प्रभुत्व स्थापित करने की राह में कांटा बन सकने वाले अपने ही भाई रणविजय को दरकिनार करता है। फिर कांग्रेस में शामिल होकर रामदयाल और कांग्रेस के जिलाध्यक्ष को एक तरफ खड़ा कर देता और स्वयं विधानसभा का टिकट प्राप्त कर लेता है। तरह तरह की तिकड़मों से वह चुनाव जीत भी लेता है। अपनी ऐययाशी के लिए देवी स्वरूपा अपनी पत्नी के चरित्र पर आरोप लगाकर वह उसे महल से निकाल देता है और एक मेम को ले आता है। मेम के गर्भिणी हो जाने पर वह बच्चे को गिरवाना चाहता है जब मेम इसके लिए तैयार नहीं होती तो उसे राह से हटाने का षडयंत्र रचता है। पर मेम उसकी चंगुल से निकल कर रामदयाल के जमीनदारी विरोधी आन्दोलन में शरीक हो जाती है। आखिर भैया राजा की जमीनदारी के विरूद्ध संघर्ष इतना तेज हो जाता है कि उसे रोकने की सारी चालें असफल हो जाती हैं।
आश्चर्य है लिली का चरित्र जिस तरह उपन्यास में दिखाया गया है उसके माता-पिता से किसी भी रूप में नहीं मिलता। उसकी मॉ जो एक भारतीय माता-पिता की संतान है एक अंग्रेज से शादी करने के बावजूद अंत तक एक पतिपरायण आदर्श भारतीय नारी बनी रहती है। अंग्रेज पति उसके समर्पण और त्याग से अभिभूत दिखाई देता है। वह मन ही मन अंग्रेज औरतों से उसकी तुलना करता है और पाता है कि दोनों में कोई मुकाबिला नहीं किया जा सकता। ब्रिटिश राज के जमाने में वह प्रशासनिक अधिकारी रहा था। गॉधी और उनके अनुयायियों से यहां की संस्कृति से, यहां के लोगों के छल-कपट विहीन स्वभव से वह इतना प्रभावित हो जाता है कि इन्गलैन्ड जाने के बजाय वह यहीं रह जाने का फैसला कर लेता है। यहां के पुरातन साहित्य का अध्ययन करने और उसका अंग्रेजी में अनुवाद करने में वह स्वयं को झोंक देता है। दोनों रूस जाने के लिली के फैसले से आहत तो होते ही हैं लेकिन वह भी जानते हैं कि उनके किए कुछ होने जाने वाला नहीं है। परिणामस्वरूप वे लिली के इस कार्य को धीरे धीरे भुला देते हैं। और अपने अपने कामों में लग जाते हैं। रणविजय के प्रति उनका व्यवहार अत्यंत स्नेहपूर्ण बना रहता है।
पहली आज़ादी का आम लोगांे पर जादू एक डेढ़ दशाक तक चलता रहता है इसकी एक वजह तो यह है कि उनमें यह उम्म्ीद बनी रहती है कि उनके दिन बदलेंगे और वे सपने जो पहले दिखलाए गये थे पूरे होंगे। दूसरा कारण यह भी था कि उस समय में सरकार की बागडोर उन लोगों के हाथ में रही जो स्वतंत्रता सेनानी रहे थे और आम लोगों के हालात सुधारने की कम से कम आशायें बनाये रखने वाले थे। फिर उनके चरित्र भी बेदाग थे। वे अपने त्याग और देशभक्ति के कारण जनता के हृदय में इतना मोहक स्थान बनाये हुए थे कि चुनावों में बिना धन-बल और बाहु-बल का प्रयोग किए जीत जाते थे या उनके विरूद्ध खड़ा होने की कोई हिम्मत ही नहीं दिखा पाता था। जो कुछ गड़बड़ियां या स्वार्थसिद्धियां हो रही थीं उन लोगों की ओर से हो रही थीं जो आज़ादी के पहले तक तो अंग्रेज सरकार के कृपापात्र थे लेकिन जैसे ही हवा पलटी कांग्रेस में आ गये और जोड़-तोड़ कर सŸाा के गलियारे में भी पहुंच गये। वे अन्याय, भ्रष्टाचार और दमन पहले भी करते थे और बाद में भी जारी रखे रहे थे। इन परिस्थितयों ने लोगों का स्वप्न भंग किया। उन्हें लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। सŸाा हमेशा भ्रष्ट, अन्यायी व दमनकारी होती है। उस पर विश्वास करना मूर्खता है। इस लिए इसके विरूद्ध निरंतर आन्दोलन करते रहने की जरूरत है। सरकारें जनदबाव के सामने ही झुकती हैं। जरा सी भी ढील देना उन्हें निरंकुश बनने का अवसर देना है। लेकिन सवाल यह है कि आन्दोलन की निरंतरता कैसे बनी रहे? देश के कुछ लोग तो इतने संतोषी हैं कि उन्हें दिन में एक बार भी रोटी मिलती रहे तो उन्हें और कुछ नहीं चाहिए। कुछ लोग सक्रिय हो सकते हैं लेकिन उन्हें जीविकोपार्जन से ही फुर्सत नहीं मिलती। बाकी वे लोग हैं जिन्हें हर तरह की सुविधायें मिली हुई हैं। उन्हें किसी तरह के बदलाव की जरूरत नहीं है। बल्कि उनकी तो हर मुमकिन कोशिश यही रहती है कि इसी तरह की यथास्थिति बनी रहे ताकि वे सुख भोगते रहें।
पहली और दूसरी आज़ादी की लड़ाइयों के बावजूद देश की स्थितियों में वह परिवर्तन नहीं आया जिसके लिए वे लड़ी गईं थीं इन दोनों के बाद राममनोहर लोहिया व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई जिन्दगी भर लड़ते रहे पर व्व्यवस्था पहले जैसी ही बनी रही। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भी एक लड़ाई लड़ी गईं उसमें जीत हासिल कर लेने के बाद भी हालात वही बनी रही। अन्ना हजारे इसी तरह की एक लड़ाई छेड़े हुए हैं (वह भी सŸाा की माया में दब गया) देखना है कि उसका अंजाम क्या होता है? इमरजेन्सी के बाद से देश में जहां तहां अनेक छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहे हैं और अब भी हो रहे हैं, ये जनता को प्रभावित करने वचाले मुद्दों को लेकर हो रहे हैं। इनमें व्यवस्था परिवर्तन की जगह व्यवस्था में रहते हुए ही कुछ बदलाव लाने की कोशिशें हो रही हैं। भूमण्डलीकरण ने इस तरह पूंजीवाद के विरूद्ध पनपने वाले जनाक्रोश को टुकड़ों में बाट कर मुख्य लड़ाई का रूख बदल दिया है।
रामनाथ शिवेन्द्र एक जमीनी स्तर के सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने विभिन्न आन्दोलनों में भाग लिया है और अब भी संघर्ष-रत हैं। तीन उपन्यासों के बाद उनका यह चौथा उपन्यास है। कुछ कल्पना, कुछ यथार्थ और कुछ जमीनी अनुभवों का उपयोग करते हुए इसका कथानक बुना गया है। यह चाहे पूरी तरह इतिहास सम्मत न हो पर उस समय के लोगों की मनःस्थिति को, और अन्यायी व्यवस्था को बदलने की तड़प को वाणी देने की कोशिश जरूर करता है।
प्रकाशित- नया सबेरा.... 2010
समीक्ष्य कृति- दूसरी आज़ादी
पिलग्रिम्स प्रकाशन
बी.27/98-ए-8, दुर्गाकुण्ड
वाराणसी, 221010
मूल्य..250.00
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'''विस्थापित होते समय का दस्तावेज ‘ढूह वाली लछमिनिया’'''
[[File:Dohawali Laxmaniya Final jpg.jpg|thumb|विस्थापन के सवाल पर केंद्रित उपन्यास आदिवासी महिला लक्ष्मीनिया की गाथा]]
अमरनाथ अजेय
यह दौर कठिन समय का है। इस समय में चुनौतियां चारो तरफ से हैं, कुछ खतरे बाहर से हैं तो कुछ भीतर से। जहां तक खतरों की बात है खासतौर से ये सोनभद्र जैसे आदिवासी बहुल जनपद में अन्य जनपदों की तुलना में कुछ ज्यादा ही हैं। लेकिन जो खतरे अपने लोगों से हैं वे कहीं अधिक त्रासद हैं, चिंतनीय है। आज के बाज़ारवादी समय का दबाव जंगल व जंगल भूमि पर ज्यादा है, और ये दबाव बनाने वाले कोई और लोग नहीं हैं, बल्कि अपने हुक्मरान हैं, अपने अफसर हैं, अपने कानून हैं। जो जंगली मानुष अपनी जमीन और जंगल से विस्थापित हो रहा है उसके लिए खतरा केवल जमीन का ही नहीं है बल्कि संस्कृति और सम्मान का भी है, अस्तित्व बचाने का भी है। ऐसे दुरूह समय का दस्तावेज है रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘ढूह वाली लछमिनिया’। लछमिनिया समामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक खतरों से घिरे हुए एक आदिवासी परिवार की युवा लड़की है। लछमिनिया की चिंता में केवल अपनी देह ही नहीं है उसकी चिंताओं में भीखू काका की जमीन है, तो वह पीड़ित लडकी भी है जो जिला स्तर के एक अफसर द्वारा यौनशोषण की शिकार हुई है, तथा उसका गॉव भी है जिसे किसी न किसी दिन विस्थापित किया जाना है। गॉव को विस्थापित किए जाने की नोटिस सरकार ने कथितरूप से तामिल करा दिया है। इन चिंताओं व चुनौतियों के अलावा उसकी चिंताओं में गॉव की फसल है, गीत, संगीत तथा परंपराएं है ‘करमा’ नृत्य, संगीत मण्डली की सहभागिता को टूटने से बचाना भी है। इन चिंताओं की खातिर वह माथा पीट कर टूट जाने वाली किसी लड़की की तरह नहीं है बल्कि किसी बहादुर की तरह वह हर स्तर पर चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार भी है। चुनातियों से टकराने की उसकी मानसिक तैयारी कुदरती है, इस तैयारी के लिए उसने कहीं से शिक्षण प्रशिक्षण नहीं लिया है। वह अब तक तमाम चरित्रों से अलग है जो स्वस्फूर्त चेतना का उत्पाद है। उसे पता है कि चुनौतियों से टकराने के लिए उसे क्या करना चाहिए। बाहर तथा भीतर से आए संक्रमणों से जिस तरह वह लड़ती है वह स्वतः उल्लेखनीय बन जाता है। संक्रमण की स्थितियां, परिस्थितियां कुदरती नहीं, बदलते समय के जड़ लोगों की कुटिल चालों, विभेदी कानूनी फन्दों, लुभावने वादों के जरिए आती हैं। समय तो बदला है लेकिन उसके साथ खतरे भी बदल गये हैं। खतरों नेे अपना रूप जिले के पीड़ित लड़की का यौन शोषण करने वाले अधिकारी (उपन्यास का एक पात्र) की तरह बदल लिया है। यह वही अधिकारी है जो एक दिन लछमिनिया को दबोच लेता है, उसे क्या पता कि लछमिनिया जो एक आदिवासी युवती है वह समय से टकराने के कौशल में माहिर है, वह अपना बचाव विषम स्थितियों में भी कर सकती है। ऐसा ही हुआ..अपने बचाव में लछमिनिया हसुआ वाली लड़की बन जाती है। खतरों के बारे में किसे पता कि वे अफसर की कुटिल चालों के रूप में आयेंगे, या किस प्रकार आयेंगे? खतरा आ गया अफसर के रूप में...अफसर को तो करमा मंडली का चुनाव करना था। सो उक्त अधिकारी लछमिनिया के गॉव गया हुआ था, करमा नाचने व गानेवाले तो आदिवासियों के गॉव में ही मिलते। गॉव में करमा नृत्य का प्रदर्शन हुआ, नृत्य के प्रदर्शन ने अफसर की निगाह में लछमिनिया के रूप को कामुक बना दिया फिर क्या था, अफसर तो अफसर कृत्रिम बहानों के जरिए वह टूट पड़ा लछमिनिया पर और लछमिनिया ने बचाव में हसुआ उठा लिया। इसके पहले कि लछमिनिया अफसर पर हसुआ चला देती, अफसर अपने वर्गीय चरित्र के अनुरूप गिड़गिड़ाने लगा। लछमिनिया ने कुदरती उदारता के कारण अफसर को जीवित छोड़ दिया, उस पर हसुआ नहीं चलाया। अफसर के गिड़गिड़ाने व माफी मांगने को उसने कुदरती समझा, ‘गलतियां हो जाती हैं किसी की जान लेना ठीक नहीं।’
खतरों का क्या, दिन हो रात हो, जगह कोई हो, दहाड़ते हुए आ जाते हैं। वह भी ऐसे समय मंे जब दुनिया पूंजी के नाच में मगन हो, जहां कदम कदम पर आशंकायें व खतरे ही हों। खतरे तो ऐसे हैं जो गॉव के बड़े जोतदार तथा थाने के दुलरुआ शंकर गवहां की तरफ से भी लछमिनिया के सामने आये। वह उन खतरों से तो लड़ ही रही थी कि एक दिन पूंजीवादी चरित्र का एक और खतरा उसके बपई की तरफ से आ गया जिसमें वह बुरी तरह से उलझ गई...
अब क्या होगा? कैसे लड़ेगी वह बपई से? बपई ने तो एक ठीकेदार से उसे बेचने का राजीनामा कर लिया है। जैसे वह कोई सामान हो, धान, चावल, गेहूं, गाय गोरू की तरह। वह बिक जायेगी पर उसके बपई को नहीं मालूम कि लछमिनिया बिकने वाली सामान नहीं, वह कोई कमोडिटी नहीं है, जिसे बेच दिया जाये। वह उस खतरे से भी लड़ती है और सफल होती है। ठीकेदार की कार दिन दहाड़े जला दी जाती है, लछमिनिया का बपई भी उस दिन गॉव में होता तो मारा जाता, गॉव की स्वस्फूर्त उŸोजना में उसकी जान चली जाती, ठीकेदार जान बचाकर भागा नहीं तो जाने क्या होता, ठीकेदार की अकूत संपदा उसे जीवन दान तो नहीं दे सकती थी। सो अगर वह गॉव से भागा न होता तो मारा जाता। लछमिनिया को क्या पता कि उसका बपई भी उसके लिए खतरा बन जायेगा और उसका सौदा ठीकेदार से कर लेगा। लछमिनिया का बपई हालांकि था तो आदिवासी ही जो सामान्यतया बाजारू नहीं हुआ करते वह ठीकेदार के प्रलोभन में बाजारू बन गया और अपनी बिटिया का ही बेचने के लिए राजीनामा कर लिया। उसे ठीकेदार ने सपना दिखाया था कि उसे वह अपने क्रशर का पार्टनर बना देगा जहां वह मजूरी करता था। पार्टनर बन जाने की लालच ने लछमिनिया के बपई को बाजरू बना दिया और उसने अपनी बिटिया को बेच देने का राजीनामा ठेकेदार से कर लिया। तो खतरे ऐसे होते हैं, खतरे मॉ, बाप, भाई, बहन, बहनोई, मामा किसी के भी जरिए आ सकते हैं। बपई की तरफ का खतरा लछमिनिया के लिए पूंजी के खेल वाला था, कौन है जो धन दौलत वाला नहीं बनना चाहता। पर लछमिनिया तो स्थितिप्रज्ञ होकर बपई की कुटिल योजना से टकरा जाती है। ठीकेदार भाग जाता है, उसकी कार जला दी जाती है। लछमिनिया के गॉव के लिए ही नहीं थाने के लिए भी यह घटना करवट बदल लेती है। थानेदार व ठीकेदार आदि तो वैसे भी पूंजीतंत्र के रिश्तों में बंधे होते हैं। स्थानीय थाने का दारोगा जो पदेन अर्थपिपाशु था उसे ठीकेदार की पूंजी ने मोह लिया फिर तो दारोगा ने ठीकेदार की कार जलाने और गॉव में झगड़ा फसाद करने के जुर्म में गॉव के कुछ अन्य युवाओं के साथ लछमिमिया के पति को गिरफ्तार कर लिया। लछमिनिया जानती थी कि दारोगा कि यही सीमा है, उसके पति को गिरफ्तर करने के अलावा वह कर भी क्या सकता है पर दारोगा को नहीं पता कि लछमिनिया का गॉव का जन मन क्या कर सकता है?
लछमिनिया व उसके पति को को पूरा गॉव भली भांति जानता है। गॉव के लड़के उन दोनों के लिए मरमिटने के लिए तैयार रहते हैं। लड़कों को बुरा लगा कि लछमिनिया के बपई ने लछमिनिया को बेचने का ठीकेदार से राजीनामा कर लिया है सो गॉव के नौजवान लड़कों ने गुस्से में आकर स्वस्फूर्त ढंग से ठीकेदार की कार जला दिया और उसी दिन थाना भी घेर लिया। उन्हें नहीं पता था कि थाना घेरना अन्याय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन है या और कुछ। दारोगा थाना घिरा देख कर सहम गया उसके पास घेराव का दमन करने के तरीके नहीं थे, वह मजबूर था, अदालत ने लछमिनिया के पति की गिरफ्तारी के बारे में थाने से रिपोर्ट भी मॉग लिया था। लक्षमिनिया के पति की मॉ से जंगल विभाग के रेंजर की करीबी पहचान थी। रेंजर कानूनी दॉव पेंचों के अनुसार लछमिनिया के पति को गिरफ्तार होते ही अदालत चला गया था। अदालत ने थाने से रिपोर्ट मॉग लिया था। गॉव से गवाह भी नहीं मिलते। सो थानेदार ने लछमिनिया के पति को थाने से ही छोड़ दिया, कौन बवाल में पड़े, अदालत किसी को नहीं छोड़ती। तो यही कहानी है ‘ढूह वाली लछमिनिया’ उपन्यास की। इस कहानी में लछमिनियिा की जिन्दगी से जुड़ी चुनौतियां है तो गॉव जवार से जुड़ी चुनौतियां भी हैं। लछमिनिया जंगली गॉव की रहने वाली है जंगल के गॉव यानि कई बार के विस्थापन के शिकार गॉव। लछमिनिया का गॉव भी कई बार के विस्थापन के बाद बसा है पर उसे हाल ही में उजाड़ा जाना है, नोटिसें दी जा चुकी हैं। उपन्यास इसी आखिरी बार के विस्थापन के लिए दी जा चुकी नोटिस एवं विस्थापन कार्यवाहियों के विरोध के स्तर पर समाप्त हो जाता है।
होता यह है कि जिस कंपनी को लछमिनिया के गॉव की जमीन सरकार द्वारा आवंटित किया गया है उक्त कंपनी आवंटित जमीन पर कब्जा लेना चाहती है दूसरी तरफ गॉव वाले हैं कि वे किसी भी हाल में उजड़ना नहीं चाहते सो वे प्रतिकार में उठ खड़े होते हैं। जैसा कि मालूम है कि सरकार और प्रशासन तो एक रेखीय दमनात्मक सŸाा प्रबंधन पर पुलिस बल के सहयोग से चलने का अभ्यासी हुआ करती है सो वहां पुलिस बल दमन पर उतर जाता है... फिर वही हजारों साल की पुलिस परंपरा, मारपीट, यातना, दमन और गिरफ्तारियां.... गॉव के नौजवानों के साथ गॉव की कुदरती नेत्री लक्षमिनिया को गिरफ्तार कर लिया जाता है, वह पाथरटोला वालों के साथ जेल चली जाती है.... वह निश्चिंत है.
‘का फरक है जेहल अउर ईहां में? ईहां से तो जेलवय ठीक है, न मार का डर, न चोरी चमारी का डर, खाओ अउर सूतो’
लछमिनिया पाथर टोला गॉव के सर्वतोमुखी विकास के लिए एक नायिका की भूमिका निभाती है जो भीखू काका की जमीन में बोई धान की फसल को दबंग शंकर गवहां व उनके पुत्रों को ले जाने से रोकवा देती है। गॉव में होने वाली अर्थहीन रैलियों का प्रतिरोध करती है और प्रतिशोध में फसाये गये अपने प्रेमी/पति को थाने का घेराव करके छुड़वा लेती है। इतना ही नहीं वह खुद को भी अपने बाप के साजिशों से बचा ले जाती है। इतना ही नहीं वह अपने गॉव के विस्थापन के प्रतिरोध में गॉव वालों के साथ जेल जाती है।
उपन्यास में आये शब्द चित्रों को देखें...
‘चरिŸार लड़कियों को जानता है, यदि मजबूरी न हो तो वे किसी को भी सभ्य बनाकर ऐसा संस्कारित कर दें कि वे जीवन भर नाम न लें कि लड़कियां ऐसी होती हैं जिनकी देह पर बाजार का अर्थ लिखा जा सकता है’
आखिर बाजार ने किसे नहीं छला है? अपसंस्कृति भी तो बाजार का ही एक खेल है। आज के जटिल समय में जंगल का आदिवासी विकास की धारा से कोसों दूर है। उनमें जनतांत्रिक प्रतिरोध की क्षमता का भी विकास नहीं हो पाया है। सोनभद्र जिले के आदिवासियों के विस्थापन पर केन्द्रित प्रस्तुत उपन्यास ‘ढूहवाली लछमिनिया’ गिरिवासियों के दुख दर्द का कालजयी दस्तावेज हैै। अपनी भाषा में उपन्यास के पात्र अपनी स्थितियों, परिस्थितियों का एहसास कराते हैं जिससे संवाद जीवंत हो जाता है। उपन्यास की भाषिक जीवंतता उल्लेखनीय है। अपेक्षा है कि प्रस्तुत उपन्यास पाठकांे का घ्यान आकर्षित करने में सफल होगा।
अन्त में उपन्यास में आये कुछ संवादों, प्रतिसंवादों का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा।
‘पर शंकर यादव अपने घर लौटने के बाद अपने में डूब गया.. ज़माना बदल गया है, जंगल जाग रहा है पहले वाला नहीं कि सोया हुआ था। सरकारें भी अब पहले वाली नहीं हैं, गरीब गुरबों की सरकार प्रदेश में काबिज है, गरीबों की सुरक्षा के बाबत कानून बन गये हैं। थाना हो या कचहरी अब कहीं भी गॉधी टोपी वाले नहीं दिखते, ठाकुर, बाभन जैसे ज़मीनदार अपनी गुफाओं में बैठे हैं, करंे भी तो क्या?’ पृ...20
‘चुप रह छोटकू, तूं बड़बड़ करता रहता है, तूं का जानेगा कायदा, कानून, अब तो पुलिस पेड़ों अउर झाड़ियों पर भी मुकदमा कर देती है’ पृ..21
‘समझेगा का? यही कि चिड़िया जाल में, जाल खींचो अउर पकड़ लो’ पृ..38
‘का खाली, का भरा, खाली ही ठीक है, पहिले मॉग भरो फिर पेट, आया था एक लंगूर’ पृ...47
‘देख महटर, हम तोहरे पर इलजाम नाहीं लगा रहे, खाली हम अपने को बचाय रहे हैं,नाहीं बचायेंगे तो...मन तो भर जायेगा जो खाली खाली है, पर मनवै तो नाहीं भरेगा नऽ, पेटवो तऽ भर जायेगा’ पृ...51
‘लछमिनिया ऐसी नदी नहीं जिसे बांधा जा सके या पुल ही बनाया जा सके’ पृ...57
‘गॉव में जबसे चिमनियां घुसी हैं, न जाने कितने किसिम के धुंआ भी घुसे हैं’ पृ..61
‘नींद में केवल नींद ही नहीं थी, उसमें पीड़ित लड़की थी, उसकी बेबस छटपटाहट थी,खूनी पंजे थे। लड़की छटपटा तथा चीख रही थी, चीखें निकलतीं जो कमरे की दीवारों, छाजन से टकराकर बिस्तरे पर भहरा जातीं, फिर पसीना पसीना हो जातीं। खूनी पंजे किसी उत्सव में डूबे हुए देह का मनोरम चूमते चाटते। पृ...76
‘संघरस तो मरदों का काम है, एमें जनाना का करेंगी? पृ...81
‘वैसे गॉवों में कागजों की पहुंच बहुत कम होती है, और कानून तो कागजों पर ही उछलता कूदता है।’ पृ...87
‘टोले मं जनतंत्र की आग धधक रही थी’ पृ..90
‘उस दौर के अधिकारी भी खूब थे, कानून की सजी संवरी जीभ वाले, पुलिस के पास तो बारूदी जुबान थी ही।’ पृ..92
‘बाल, बुतरू भी नौकरों से जनमवाते हैं का अइया?’ पृ..93
‘इस सभ्यता ने तो यही सिखाया है कि हर चीज बेचे जाने योग्य है।’ पृ..101
‘अरे! मरदवा तऽ सभै हरामी होते हैं।’ पृ...127
‘लछमिनिया तूं घूंघट काढ़कर घर में बैठी है, निकल बाहर, हल्ला कर, चिल्ला जोर जोर से, कोई तो सुनेगा, कोई तो चलेगा तेरे साथ’ पृ...136
‘भगाई को राजीनामा बोलता है, एके कानून बचायेगा, जा कानून के संगे खा, पी, अउर हग, मूत। रहेगा कहां रे! पृ...139
समीक्ष्य कृति... ढूह वाली लछमिनिया
रचनाकार.. रामनाथ शिवेन्द्र
पाठ...जुलाई...2017
ज्योतिपर्व मीडिया एण्ड पब्लिकेशन
99,ज्ञानखण्ड-3, इन्दिरा पुरम्
गजियाबाद-201012 मूल्य..299.00
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'''बदलते मानकों का आइना ‘अन्तर्गाथा’'''
[[File:Antargatha jpg.jpg|thumb|बदलते मानकों का आइना ‘अन्तर्गाथा’]]
अमरनाथ अजेय
सृष्टि में जैसे जैसे बदलाव हो रहे हैं वैसे ही मानव सभ्यता, संस्कृति व सामाजिक संरचना में भी दिनों दिन बदलाव होते दिख रहे हैं। मानव मूल्य व मान्यताएं तथा सिद्धान्त जो मानव निर्मित क्रियाकलाप हैं, वे भी सुविधाओं की परिधि में अपनी जमीन छोड़ कर भिन्न भिन्न आडबरों में रूपान्ताित होते जा रहे हैं।
श्री रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘अन्तर्गाथा’ कुछ इन्हीं विसंगतियों पर प्रहार करता हुआ कथा का आकार लेता है। आदमी, आदमी न होकर मात्र अपनी परर्छाइं हो गया है। प्रस्तुत उपन्यास में कथाकार, कवि, ठेकेदार, नेता जैसे कई चरित्रों का पोस्टमार्टम किया गया है। विमर्श की दृष्टि से स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, और बहुत से अन्य सभ्यतागत विमर्शों के साथ साथ मानव जीवन में घटित होने वाले बिडम्बनाओं का विश्लेषण किया गया है, जो कथित सभ्य समाज से अन्तर्गुम्भित हैं।
कथा प्रारंभ होती है प्रवासीनाथ जी से जो एक चर्चित उपन्यासकार एवं विश्वविद्यालय के प्रवक्ता है ंतथा सुशीला और अमरेन्दर से, जो उनके निर्देशन में शोध कार्य कर रहे हैं। प्रवासीनाथ सुशीला से नाटकीय ढंग से शारीरिक संबध बना लेते हैं, यही नहीं शारीरिक संबध बन जाने के बाद उन्हें लगता है कि सुशीला उनके प्रस्तावित उपन्यास की पाण्डुलिपि है। प्रवासीनाथ, सुशीला तथा अमरेन्दर के अलावा जो दूसरे चरित्र हैं उनमें एल.आर., कवि विलोचन, जगेशर, प्रधानाचार्या, बंगाली बाबू की बिटिया, जद्दो भाई, बाहुबली विधायक, सुशाीला के चाचा, सांसद तथा सुदर्शन जी आदि। इन्हीं चरित्रों के क्रियाकलापों के विवरणों व विश्लेषणों के द्वारा अन्तर्गाथा की औपन्यासिक जमीन तैयार की गई है। आई.ए.एस. के समकक्ष अधिकारी की बिटिया सुशीला इन्हीं चरित्रों के विभिन्न प्रसंगों पर केन्दित एक फिल्म भी बनाती है।
वैसे प्रवासीनाथ के लिए पप्पू चाय के बैठकबाज चरित्रों का कोई मतलब नहीं होता पर सुशीला उहीं चरित्रों का मूल्य स्थापित करने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर देती है जो उपन्यास के केन्द्रीय विषय बन जाते हैं। प्रवासीनाथ के लिए वामपंथ या उसकी अवधारणाएं उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना कि एल.आर. तथा जगेशर के लिए हैं। जबकि जगेशर तो प्रवासीनाथ की वामधारा की चेतना से ही प्रभावित होकर चारू मजूमदार के संगठन के साथ जुड़ा था पर उस रास्ते के अन्तर्विरोधों से दुखी होकर बनारस लौट आया था। यही हाल एल.आर. का भी था। वामउग्रवाद के अन्तर्विरोधों का शिकार होने के बाद उसने भी संगठन छोड़ दिया था। जगेशर ने बनारस में दूध बेचने का रोजगार डाल लेने के बाद खुद पान की गोमटी खोल लिया था पर एल.आर. बिना काम के था, खालीपन मिटाने के लिए वामपंथी धारा की एक पत्रिका निकालता था। वह कामरेडों को दो खानों में बांटता था, चुनाव लड़ने वालों को मठी कामरेड मानता तथा चुनाव का विरोध करने वालों को हठी कामरेड। चरित्रों की विभिन्नताओं के कारण पप्पू चाय की दुकान के बैठकबाजों का जुड़ाव बना रहता है।
प्रवासीनाथ की लेखकीय काम के बाबत अपनी प्रस्थापनायें हैं,..तरीके हैं ...
‘‘प्रवासीनाथ थे कि बिना सुरा सुन्दरी के न कुछ लिख पाते थे न किसी का कोई काम करा पाते थे। वे इसे लिखने का रोग मानते थे। सुरा, सुन्दरी से बचने के लिए जिन लोगों ने कुछ न लिखने की कसम खा रखी है, उन्हें वे बहुत अच्छा मानते तथा खुद को बुरा।’’ अपने खास मित्रों से वे सगर्व कहते भी..
‘‘कल्पनाओं के सहारे शब्दों एवं संवेदनाओं से निरंतर सहवास करते रहने से लेखक का मनोरोगी हो जाना स्वाभाविक है’’
साहित्य जगत में प्रवासीनाथ का आतंक अमेरिकी तर्ज पर है, अपनी अपेक्षाओं की चीजों को हासिल कर लेना और दूसरों को देने के नाम पर ऑखें घुरेरना। उपन्यास में विभिन्न कथापात्रों के माध्यम से लेखकीय समाज की पड़ताल करते हुए राजनीतिक विचारधाराओं में व्याप्त विद्रूपताओं व बिडंबनाओं की समीक्षा अद्भुत हैं। अधिकांश पात्र एकल नहीं हैं, उनके साथ कोई न कोई महिला है..एल.आर. के साथ उसकी नर्स मित्र व बंगाली बाबू की बिटिया, कवि विलोचन के साथ एक कवियत्री, जद्दोभाई के साथ उनकी पत्नी हैं तो हनुमान भक्त पाण्डेय के साथ विदेशी लड़की, प्रवासीनाथ के साथ उनकी पत्नी पूसी हैं। प्रवासीनाथ तो प्रवासीनाथ हैं उनके साथ सुशीला भी जुड़ी हुई है। लहा, पटा कर किसी कवियत्री के कारण कवि विलोचन को कविसम्मेलनों में जहां केवल पांच सौ रुपये मिला करते थे तो महिला कवियत्री के साथ होने पर उन्हें पांच हजार मिलने लगे थे। प्रस्तुत उपन्यास वामपंथ में व्याप्त हताशा, निराशा और उसके कारण संगठन में उपजे भेदों, उपभेदों तथा विचारों में बदलते प्रतिमानों का आइना है। उपन्यास में एल.आर. एक ऐसा पात्र है जो वामपंथ त्याग कर समाजवादी हो जाता है, कारण होता है विश्वविद्यालय में होने वाले चुनाव के दौरान एक भाषण, उसे एक समाजवादी नेता संबोधित कर रहा था, एल.आर. कामरेडों के साथ उस नेता के लिए मंच के पास ही ‘गो बैक’, ‘गो बैक’ का नारा लगा रहा था..समाजवादी नेता ने सुन लिया कि कुछ कामरेड लड़के उसका विरोध कर रहे हैं, फिर तो उसने मंच से ललकारा...
‘‘कहां जाऊं गुरू? यहीं पैदा हुआ, यही पला, बढ़ा और पढ़ा लिखा। मेरी सभा का विरोध न करो, सभी को सुनना सीखो, रही लड़ने की बात तो एक एक करके आओ, फरिया लो।’’ फिर तो समाजवादी नेता मंच से डांक कर जमीन पर आ गया और एल.आर. को पकड़ लिया। समाजवादी नेता ने जांघिया छोड़ कर सारे कपड़े उतार दिये, एल.आर. सन्न और सुन्न.. समाजवादी नेता ने एल.आर. को जबरन मंच पर बिठा लिया और उसे आमंत्रित किया कि वह बोले.. विरोध बोल कर सामने करो, आड़े नहीं। इस घटना ने एल.आर. को बदल दिया और उसने सयुस की सदस्यता ले ली। उपन्यास की भाषा की बात करें तो पूरा उपन्यास काव्यमय है। एक तरफ प्रवासीनाथ हैं तो दूसरी तरफ उनका भाई ब्लाकप्रमुख है जो तीन दलितों को गोली मार देता है और बाद में तीन तिकड़म करके उसी पारटी के टिकट पर चुनाव लड़ कर विधायक बन जाता है। मुकदमे से प्रवासीनाथ प्रधानाचार्या से जुगाड़ लगा कर बरी हो जाते हैं. कथा कहन में बनारसी बोली का ठाठ अद्भुत है..
‘‘थाने गये थे का गुरू? का हुआ?/ होगा क्या, सौ रुपये में सौदा पटा/महिनवारी/ हॉ/बंबई जा रहे हो न?/नहीं, जाने का मन था पर अब नहीं जाऊंगा/ काहे?’’ कुछ वाक्य तो बहुत ही अर्थपूर्ण हैं..‘‘यार! यह धन पशु जद्दो भाई तो अन्तःमन से कामरेड है’/ ‘का गुरू कब से जेबा में गुड़ लेके चलय लगला?’ जेल और कचहरी तो मर्दों के लिए ही होती है’/‘हड़ताल, घेराव, प्रदर्शन तो पूंजीवाद के गुप्तांग हैं’’
बनारस में स्थित पप्पू चाय की दुकान की उपन्यास में केन्द्रीय भूमिका है। उपन्यास के सारे पात्र उस दुकान से गुंथे हुए हैं। वहां पर देश की संपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों का पोस्टमार्टम होता रहता है, एक अजब तरह की अन्त हीन बहस, पर निर्णायक कभी नहीं। कभी तो देश में राजनीतिक रूप से वैसा ही होता जो पप्पू की दुकान में तय होता। दुकान में अमरेन्दर और सुशीला का प्रवासीनाथ द्वारा अपना उल्लू सीधा करने की बातें हों या बंगाली बाबू की बिटिया को लेकर बंबई भाग जाने की झूठी घटना हो जिस पर प्रवासीनाथ का संस्मरण छपा हो, सभी बातों को लेकर मुहल्ला गर्म हो जाता...उपन्यास में एक कथा चित्र है...
‘एक आदमी रिक्से पर कहीं जा रहा था, गंतव्य पर पहुचकर रिक्से से उतर गया, उसने रिक्से का किराया चुकता किया, रिक्से वाले को किराया कम लगा, उसने एतराज किया, बाकी किराया उसने मांगा। गोया झंझट बढ़ गई, रिक्से वाले ने सांस्कृतिक बयान दिया..
‘गरीब हंू, मार लीजिए, कोई दूसरा होता तो मारते क्या? यात्री ने उसे दुबारा झापड़ मारा, उसने भी सांस्कृतिक बयान दिया...साले! पन्द्रह साल से कुबेर (धन के देवता) को खोज रहा हूं, मिल जाता नऽ , रामकसम पटक पटक कर उसे मारता.. पर मिलता ही नहीं, मिलते तो गरीब हैं फिर किसे मारूं? इसी आशय की कविता थी कवि विलोचन की, गरीब, दलित नहीं मारा जायेगा फिर कौन मारा जायेगा? इसका समाधान न तो जनतंत्र में है और न तो तानाशाही में...क्या ऐसी कोई हुकूमत नहीं जिसमें उसका समाधान हो? एक सवाल...
जद्दो भाई व उनकी ठकुराइन की बातें देखें...
‘रहस्यमय ढंग से ठकुराइन टोंकती...अपने हिस्से का...
ठकुराइन व्यंग्य रूपक गढ़तीं.. कहां से कैसे आपका हिस्सा? आप कहते हैं हमारे देश में गरीबी है... लोग खाये बिना मर रहे हैं... उस पर आप का हिस्सा, यह हिस्सा क्या है?
जद्दो भाई बोलते... ‘‘यार ठकुराइन! तुम तो मार्क्स की बिटिया जैसी जान पड़ती हो, देखो, इस रूप को बनाये रखो, कहीं लेनिन या माओ का बेटा बन गई तो...यह तुम्हारा जद्दो आग में जल जायेगा।’’
नुक्कड़ नाटक के द्वारा हिन्दू मुस्लिम दंगा फैलाकर उसका चुनाव में चाहे राजनीतिक लाभ लेने की बात हो या इच्छाधारी प्रेत की बात हो जो सात समुन्दर पार एक सफेद महल में बसता हो इन कथाक्रमों को रूपकों के द्वारा समय की विसंगतियों पर प्रहार करने का तरीका रामनाथ शिवेन्द्र को एक अलग पहिचान देता है। दलित बस्ती जलाये जाने के विरोध में जद्दो भाई द्वारा किया जाने वाला प्रयास फिर उनकी गिरफ्तारी तथा उस विरोध के द्वारा पप्पू चाय की दुकान के बैठक बाजों को एक साथ जोड़ लेने का प्रसंग भी उपन्यास की गरिमा बढ़ाने वाला है। एल.आर.,जद्दो भाई तथा जगेशर के अनगढ़ चरित्रों का उपन्यास में बहुत ही आकर्षक संयोजन है, सुशीला की तरह। सुशीला है कि वह अपने लिए नहीं जीती, ऐसे चरित्रों को गढ़ने में उपन्यासकार की महारथ दिखती है।
सुशीला अपने गुरुभाई अमरेन्दर के साथ बंबई चली जाती है, उसका मधुर जुड़ाव एक नामी फिल्मी गीतकार से है। वहां वह एक फिल्म बनाती है जिसकी चर्चा जोरों पर है खासकर बनारस में कि वह फिल्म बनारस के अस्सी पर स्थित पप्पू चाय की दुकान के बैठकबाजों पर केन्द्रित है। अचानक एक दिन गीतकार को सुशीला पर सन्देह हो जाता है कि उसका संबध फिल्म के नौजवान प्रोड्यूसर से है, वह उसके कमरे में एक दिन देख भी लेता है। गीतकार तो गीतकार उसने आत्महत्या कर लिया। इसके बाद सुशीला के जीवन में आश्चर्यजनक बदलाव आ जाता है। वह बंबई की सारी संपŸिा अमरेन्दर के नाम से स्थानांतरित करके बनारस चली आती है। बनारस यानि उसके गांव का पड़ोसी शहर। वह उसी गांव में बसने और सामाजिक काम करने का संकल्प ले लेती है जिस गांव का नाम तक उसके पिता के.नाथ कभी किसी को नहीं बताया करते थे। यहां तक कि वे अपने बड़े भाई का नाम भी किसी का नहीं बताते थे। उन्हें दलित कहलाये जाने का डर बना रहता था जबकि सुशीला दलित होने के हीनताबोध के डर से बाहर है। सुशीला अपने पिता का विलोम थी, संभव है बढ़ती दलित चेतना के कारण ऐसा हुआ हो। उपन्यास में दलित चेतना के उत्कर्ष के प्रभावकारी विवरण हैं तो जन संघर्ष के भी हैं। कुल मिला कर उपन्यास में अमरेन्दर तथा सुशीला के प्रेम की शुचितापूर्ण गाथा है तो प्रवासीनाथ के वैयक्तिक प्रतिभा के छद्म के उत्कर्ष का भी। सुशीला द्वारा अपना जीवन गांव के विकास के लिए समर्पित कर देना तथा अपनी जड़ों की तरफ लौटना किसी चुनौती की तरह है जैसा कि अमूमन नहीं हुआ करता। गांव में उसे दलित जन ही नहीं सवर्ण भी प्यार करने लगते हैं वह अपने गांव में स्कूल तथा अस्पताल खुलवाती है तथा गांव से बाहर पढ़ने वाले छात्रों को स्कालरशिप भी देती है। अपनी कार्ययोजना को सुचारु रूप से चलाने के लिए वह जद्दो भाई, एल.आर. तथा बंगाली बाबू की बिटिया को भी जोड़ लेती है। उसके स्कूल के प्रबंधन को लेकर क्षेत्र के बाहुबली विधायक से भी उसे पंगा लेना पड़ता है। दरअसल बाहुबली नहीं चाहता कि सुशीला दलितों व सवर्णों को एक साथ जोड़ कर चले तथा विद्यालय चलाये। पर सुशीला तो सुशीला वह बाहुबली से पंगा ले ले लेती है। एक घटना के दौरान सुशीला के स्कूल के छात्र बाहुबली का विद्यालय परिसर में ही कुटम्मस कर देते हैं फिर तो पुलिस, सरकारी दमन। विधायक सŸाापक्ष का होता है पर सुशीला उससे नहीं डरती, वह तनेन खड़ी है। प्रशासन विद्यालय बन्द करा देता है, परिसर में पुलिस का पहरा लग जाता है सुशीला इस दौरान एस.पी. से भी भिड़ जाती है। मुकदमे का अन्तहीन सिलसिला पर हाई कोर्ट का आदेश सुशीला के पक्ष में आ जाता है, विद्यालय फिर से शुरू हो जाता है। मरने जीने की परवाह किये बगैर सुशीला ने बाहुबली के खिलाफ चुनाव लड़ने का निश्चय किया। सुशीला द्वारा बाहुबली के खिलाफ चुनाव लड़ने का निर्णय लेने के बाद उपन्यास समाप्त हो जाता है। आगे क्या हो सकता है? इसका निर्णय पाठकों पर शिवेन्द्र जी छोड़ देते हैं। ऐसा करना उपन्यासकार की लेखकीय कुशलता है। पाठक भी तो सोचें... आशा है शिवेन्द्र जी का प्रस्तुत उपन्यास भाषा, शैली तथा कथा के प्रस्तुतीकरण की काव्यात्मकता प्रभावित करेगी उनके अन्य उपन्यासों की तरह।
उपन्यास- अन्तर्गाथा
रचनाकार- रामनाथ शिवेन्द्र
प्रकाशक- नेहा प्रकाशन, (शिल्पायन)
उलधनपुर, नवीन शाहदरा दिल्ली, 110032
दूरभाष-9899486788
मूल्य..450.00
प्रकाशित......कथाक्रम जनवरी-मार्च 2017 पृ...99-101
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'''अनसुलझे सवालों की पड़ताल करता
उपन्यास ‘कनफेशन’'''
अमरनाथ ‘अजेय’
संबंधों के बीच न जाने कितने सवाल हैं, जो अब तक सुलझाए नहीं जा सके हैं, जिनसे टकराते हुए व्यक्ति की आत्मा चटक-चटक कर विदीर्ण हो रही है जिसके लिए कोई मरहम कारगर नहीं दीखता। संबंध चटकने की टकराहटें इतनी तेज होती हैं कि उसकी आवाजें संवेदनशील साहित्यकार के लिए सर्जना का विषय-वस्तु बन जाती हैं। कविता, कहानी, लेख, संस्मरण और उपन्यास की शक्ल मंे ढलकर देश, काल व समाज के लिए अमूल्य कृति बन जाती हैं। सामाजिक संरचना में भूमि, संपŸिा तथा नारी अस्मिता के सवाल प्रमुख रूप से मानवीय संबधों को चालित करतेे हैं। यह सच है कि नर, नारी के संबंधों की सुकुमार प्रवृŸिायॉ ही मानव सभ्यता को गतिशील करते हुए ऊॅचाई तक ले जाती हैं।
चर्चित लेखक रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘‘कनफेशन’’ नर, नारी के मानवीय संबंधों की विसंगतियों के धरातल पर बुना गया उनका नया उपन्यास है। नारी को उपभोग की वस्तु मान कर उसके साथ बनाए जाने वाले संबंधों की परिणति ‘एड्स’ जैसे रोग तक जा पहुॅचती है। यह कितना भयानक होता है इसका अनुमान किसे नहीं। आखिर देह व्यापार का मामला आज केी विकसित दुनिया क्यों नहीं खतम कर पा रही है अचरज होता है। देह को भी व्यापार की वस्तु बना दिया गया है। मन, तथा वुद्धि के बेचे जाने का तो बाजार ह हीै, दोनों बेचे जा रहे है बाजार में, दोनों के कानूनी तथा गैर कानूनी बाजार हैं। बिक दोनों रहे है तन भी मन भी।
देश के पूर्वोŸार मंे स्थित उ0प्र0 का सोनभद्र जिला पहाड़ी और आदिवासी बाहुल्य है। इन आदिवासियों के सुख-चैन मे सेंध लगाते हुए कल-कारखानंे इन्हें किसी लायक नहीं छोड़ रहे हैं। इनकी पुस्तैनी जल, जंगल और जमीन पर से इनके विस्थापन का दंश इनके अस्तित्व को समाप्त करता जा रहा है क्योंकि, इन्हें इनसे मिलता है, चिमनियों का काला धुआं, कारखानों से निकलता विषाक्त जल जिससे वे असमय ही मृत्यु के मुह मंे समा जा रहे हैं। प्रदूषण की मार सहते हुए ये आदिवासी आर्थिक तंगी का भी सामना कर रहे हैं। भुखमरी की समस्या के समाधान के लिए परदे के अन्दर-अन्दर इनकी बहन-बेटियां देह बेचकर अपने परिवार की भुखमरी की समस्या का समाधान कर रही हैं, जिसकी जानकारी प्रकाश मे आ रही है। शिवेन्द्र का उपन्यास ‘‘कनफेशन’’ देह-व्यापार और उससे उपजी विसंगतियों का विस्तृत पड़ताल करता हैं, जो कथानक व शिल्प के स्तर पर अपनी तरह का नया है। देह-व्यापार के दलदल में फंसे एड्स रोगियों की समस्या व उसके समाधान के लिए एक संस्था के माध्यम से एक युवती के सर्वेक्षण की रिपोर्ट अत्यंत रोचक व चौकाने वाली है।
एक एन.ज.ी.ओ. से जुड़ी शशि जिसकी उपन्यास में प्रमुख भूमिका है उसका पति खुद भी देह-कौतुक में फंसकर एड्स का मरीज हो गया है। वह अपनी पत्नी पर देह के विविध खेलों का प्रतिभागी होने के लिए घृणित दबाब डालता है जिसे वह निर्ममतापूर्वक ठुकरा देती है। और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए एक संस्था में कार्य करने लगती है। शशि के अलावा उपन्यास में कई महिला पात्र हैं, जो अपने अस्तित्व के लिए जद्दोजहद करती हुई औपन्यासिक कृति ‘कन्फेशन’ की औपन्यासिक कथा की ताकत बनती हैं। आज जहां, सामाजिक समानता के लिए राजनीतिक क्षेत्र मंे स्त्री सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया जा रहा है, वहीं साहित्य के क्षेत्र मंे भी स्त्री-विमर्श के नाम पर स्त्री पात्रों को कहानियों व उपन्यासों में भी इन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए दिखाया जा रहा है। समीक्ष्य उपन्यास में पुरूष पात्रों की संख्या नगण्य है पहला पुरुष पात्र तो उपन्यासकार खुद है और दूसरा एक वी.डी.ओ. है कुछ जो दूसरे पुरुष पात्र हैं वे तो केवल पूरक हैं फिर भी उपन्यास नारी विषयक उपन्यासों से अलग है कथ्य, तथ्य तथा भाषा के स्तर पर।
रामनाथ ‘शिवेन्द’्र के उपन्यास ‘कनफेशन’ की स्त्री पात्र घर से बाहर निकलकर विभिन्न स्तर पर संघर्ष कर रहीं हैं। शशि के अतिरिक्त एक और पात्र है लाैंगी, जो घर के खाना- खर्चे का भार स्वयं अपने सिर पर उठाती है। उसका पिता बीमार हैं घर में कमाने वाला कोई नहीं है। पेट खर्ची के लिए उसकी अइया (मॉ) उसे देह व्यापार में झोंक देती हैं। एक दिन वह प्रधान से पैसे लेकर उसे उसके यहां भेजती हैं, जहां प्रधान उसकी देह नोचता खसोटता है। वह अपनी अइया से इसकी शिकायत करती है परन्तु अइया नहीं सुनती, उसे ही
भला बुरा कहती है। वह थाने भी जाती है पर थाना उसे ही रपट बना देता है। लौंगी प्रधान से प्रतिशोध लेने के लिए उसे, और फिर उसके बेटे को अपना एड्स रोग बांटने की कोशिश करती है। क्योंकि उसे एड्स है वह जानती है कि एड्स देह धरे का रोग है, देह संबंध से ही फैलता है। वह परधान को एड्स में फसा देती है। एक दिन परधान मर जाता है। ऐसा भी नहीं कि वह यह धंधा करते हुए विल्कुल ही संवेदनशून्य हो गई हो। स्त्री की स्वाभाविक संवेदना उसके भी अन्दर है। साथ ही शारीरिक करतब भी। तभीं तो बी. डी. ओ. जिसकी पत्नी मर चुकी है, उसके शारीरिक व संवेदनात्मक कौतुक पर वह आकर्षित है। यहां तक कि उसे एड्स है, यह जानकर भी। इसीलिए लाैंगी भी बी.डी.ओ. से सहवास के वक्त कंडोम लगवाना नहीं भूलती। वह तो कभी की उससे शादी कर चुकी होती, परन्तु लौंगी को अपनी जिम्मेवारियां अच्छी तरह याद हैं। घर की परवरिश उसे ही करनी है! साथ ही बी. डी. ओ. का भी ख्याल रखना है कि उसे एड्स न हो जाय। उस आदिवासी बाला से बी.डी.ओ. का भी प्रेम खूब कुलांचे भर रहा है। यहां तक कि लौंगी के बीमार हो जाने पर उसे अस्पताल मे भरती करवाना व उसकी रात-दिन तिमारदारी करना साथ ही दवा-दारू में पैसे की कमी न होने देने तक बी. डी.ओ. उसका ख्याल रखाता है। उपन्यास में एक और औरत है, थाने वाली महिला के नाम से, वह थाने पर अपने पति को छुड़वाने के लिए जाती है तो, थानेदार उसे ही अपने हबस का शिकार बना लेता है फिर तो थाने वाली महिला आग बन जाती है मानो जला देगी थाना। वह थाने पर ही हंगामा कर बैठती है। वह थानेदार के निलंबन तक संघर्ष करती है। थाने वाली महिला तो उपन्यासकार को भी नहीं छोड़ती फटकारती है, अपनी मौलिक शैली में....
‘‘तूं का लिखेगा मेरे बारे में? तूं भी तो मरद जाति का है, थूथुन वाला, कहते हैं, नाक न हो तो मैला खाने वाला, तूं का जानेगा मेहरारू के बारे में कि मेहरारू का होती हैं। मेहरारू को तूं जब जैसा चाहता है वैसा गढ़ देता है कभी देवी बनाता है तो जरूरत के हिसाब से रण्डी बना देता है। देवी बना कर माला फूल चढ़ता है, तो रण्डी बना कर जोंक की तरह चूसता है, देह को बिछौना बना देता है, खुश, हुआ तो खेत बना कर जोतने कोड़ने लगता है, बेंगा डाल देता है, खेत में जब बेंगा पड़ जाता है तो कुछ न कुछ जामेगा ही। जाम जाने के बाद दूसरा बेंगा डालने के लिए उसे फिर जोत भी देता है। देखना है तो दारोगा को देख कि वह का कर रहा? फिर दारोगा को भी तूं काहे देखेगा, खुद अपने को देख ले, तोहरे मुहें में मेहरारून के बारे में विषैला लार है कि जलता हुआ लोर है। पर तोहरे पास लोर कहां से होगा? लोर तो मेहरारून के पास होता है, जो उनके दिलों को लगातार हिलोरता रहता है।’ पृ..73
इन महिलाओं के अतिरिक्त एक अन्य महिला पात्र लाजवंती भी है, जो देह की सीढी से चढकर नौकरी तक की उंचाई प्राप्त कर लेती है और अपने पिता पर चढे कर्ज को उतार देती है। देह के धंधे सड़क के किनारे होटलों व ढाबों में निरन्तर हो रहे हैं, जिसकी जानकारी एक सामाजिक कार्यकर्ता शशि को एड्स के रोगियों से मिलने के दौरान होती है। इस उपन्यास के माध्यम से उपन्यासकार ने कुछ अपनी धारणाओं व प्रस्थापनाओं को भी उकेरा हैे।
क्या पत्नी का अधिकार अपने शरीर पर भी नहीं है? वर्ण, जाति व गोत्र की तरह स्त्री स्वातंत्र्य का भी सवाल अनुत्तरित है। उच्च पदाधिकारी जनता का व्यक्ति नहीं होता, वह जनता से एक निश्चित दूरी बना कर रहता है।’
सोनभद्र में पचासों चेकडैमों के नाम पर करोड़ों रुपयों का गमन किया गया, जो जांच के दौरान उजागर हुआ था, उपन्यासकार ने इसे उपन्यास में वर्णित कर उपन्यास का वजन बढाया है। उपन्यासकार ने एक उपन्यासकार के अस्तित्व-बोध पर भी सवाल खड़ा किया है कि वह अनुत्पादक कार्यों मे अपना जीवन खपा देता है। उसे हासिल कुछ भी नहीं होता। प्रकाशक तक उसकी उपेक्षा करते हैं पाठकों की तो बात ही अलग है। सेक्स जोन के गांवों मंे जिस परिवार में देह व्यापार से जितना अधिक धन-संग्रह होता है, उस परिवार की इज्जत गांव मंे उतनी ही बढ जाती है। देहव्यापार को मर्यादा से जोड़ना आखिर कैसा सन्देश देता है? सवाल है? प्राकृतिक आपदा के चलते जब कोई किसान खेत का मालगुजारी या पनिकर नहीं दे पाता, तो उस किसान को चौदह दिनों तक तहसील की हवालात मंे किस बात की सजा काटनी होती हैं? यह सवाल उभरा है लाजवंती के बहाने। लाजवंती अमीन की डर से तहसीलदार के पास जाती है फरियाद करने के लिए कि उसके बाप को गिरफ्तार न किया जाये। उसकी फरियाद सुन व गुन लेता है तहसीलदार। उसके बाप को तहसील की हवालात में नहीं जाना पड़ता। फरियाद सुनने के एवज में तहसीलदार लाजवंती की देह से खेलता है, यह बात और है कि उसे तहसील में नौकरी भी दिलवा देता है। पर ऐसा सभी के साथ तो होता नहीं वह
तो महज संयोग का खेल था कि लाजवंती को नौकरी मिल गई नही ंतो कुछ नहीं मिलता सिवाय अपमान के। ज्ञातव्य है कि सोनभद्र के गरीब, किसान कर्ज वसूली के संकट से लगातार गुजरते रहे हैं।
उपन्यास की भाषा भी खूब खूब है... देखें....
‘नेह अगर है तो, देह नहीं झूलती। मर्द के पास लार व स्त्री के पास लोर ही तो होता है। मर्द जब चाहे तब जिस पर चाहे लार टपका दे, और औरत दुखों मे सिर्फ आंसू ही बहाती रहे।’
‘मर्द और बर्द पर जवानी का जुआ रख दीजिए और जहां चाहे तहां ले चलिये।’ ‘अनब्याही बाला को यदि बच्चा पैदा हो जाता है, और जिसकी करनी से बच्चा पैदा हुआ हो, वह व्यक्ति बच्चा लेने से या उस औरत से शादी करने से इंकार करता हो तो मां को चाहिये कि,उस बच्चे को निःसंकोच पाल-पोष कर बड़ा करे और बाप से बदला लेने के लिए उसे तैयार करे। गर्भ में या पैदा होने पर बच्चे की हत्या न करे।’
उपन्यास में एक नारी पात्र है लौंगी जो सेकेन्ड सेक्स की ‘फुकुयामा’ की अवधारणा से अधिक स्वतंत्र व संघर्षशील है। पीत पत्रकारिता को भी लेखक ने एक पात्र के माध्यम से आड़े हाथों लिया है, जो पठनीय बन पड़ा है। प्रकाशकों द्वारा लेखकों को प्रताड़ित करने की बातें भी उपन्यास के माध्यम से कही गई है। लेखक स्वयं को भी नही छोड़ता है। वह कहता है कि,
‘जैसे थानेदार महिला से बलात्कार करता है ठीक उसी तरह से एक लेखक भी महिला को जहां चाहे तहां पटक देता है उपन्यास में। लेखक भी महिला को लेकर कम दोशी नहीं।’
उपन्यासकार का मानना है कि, जाति व योनि के दोनों कटघरे पूंजीमूल्यबोध का ही प्रचार करते हैं। स्त्री-स्वातंत्र्य के प्रसंग में लेखक ने स्वीकार किया है कि, काश! स्त्री और पुरुष के रिश्ते नदी और कहू (अर्जुन का पेड़) की तरह होते। नदी न तो पेड़ का गिराती है और न ही पेड़ नदी को क्षतिग्रस्त करता है, दोनों अर्न्तलयित होते हैं एक दूसरे में ।
एक मिथक का भी प्रयोग उपन्यासकार ने बखूबी से किया है। ‘‘हां, वहीं त्रिशंकु जिसे स्वर्ग के रक्षा-कर्मियों ने स्वर्ग में घुसने नही दिया। किसी तरह वह नर्क से बाहर निकला, फिर लटक गया, स्वर्ग ओर नर्क के बीच जिसके आंसुओं, खखारों और लारों से धरती पर कर्मनाशा नदी बह निकली, किसी शोक कविता की तरह।’’
प्रभावकारी भाषा, तथा कलात्मक शिल्प के द्वारा उपन्यासकार ज्वलंत सवालों पर अपनी राय देने में पीछे मुड़कर नहीं देखता। सोनभद्र में एक ओर भूख से कराहते व बिलबिलाते लोग हैं तो दूसरी ओर तिजोरियों से खेलते लोग। नोटों के बिस्तरेां पर धनी होने के धार्मिक अनुष्ठान करते हुए।’’ घृणित दर्जे की यह आर्थिक असमानता सोनभद्र में वाम उग्रवाद के फैलाव के कारणों में से है। शशि के पति की आत्महत्या वाली घटना पर एक आदिवासी बाला की स्वाभाविक साफ बयानी यहां देखने योग्य है.....
‘‘एड्स हो गया था तो क्या हो गया। यह तो पहले गुनना चाहिये था न ! फेर आत्महत्या से रोग खतम होगा का ?लौंगी को भी तो एड्स हुआ हैे। वह तो आत्महत्या नहीं कर रही। लड़ रही है समय से....शशि के पति को भी लड़ना चाहिये था रोग से...।’’
आदिवासियों की जमीनें जहां से वे विस्थापित कर दिये गये, वहां बड़े-बड़े कल-कारखानें बना दिये गये हैं। उन कल-कारखानों में भी इन आदिवासियों को रोजगार नहीं मुहैया कराया गया, जो बड़ी त्रासदी है। लेखक ने कारखानों की चमक -दमक की दुनियां की आड़ मंे फैल रहे देह-व्यापार के इस विष-बेल को, जो बड़े फलक वर व्याप्त है, को एक छोटे से उपन्यास में करीने से कहने का करिश्माई कार्य किया है। उपन्यास के सभी चरित्र जीवन के खुरदरे रपटों को सही- सही कनफेश करने मे कहीं से कोताही नहीं करते। किसी न किसी बहाने सभी पात्र कन्फेश करते हैं चाहे लौंगी हो, लाजवंती हो, या शशि का पति हो। उपन्यासकार भी कन्फेश करता है वह अंश यहां प्रस्तुत करना आवश्यक जान पड़ता है.... देखें उक्त अंश...
‘साला उपन्यासकार बनता है। एक दारू चुआने वाली आदिवासी महिला को पकड़ लिया उपन्यास में और उसे कप्तान तक पहुंचा दिया। अक्षरों की गाड़ी पर बिठा कर, दौड़ाने लगा किसी रेसर की तरह। इतना तेज किस्मत के भरोसे वाले किसी पात्र को दौड़ाया जा सकता है भला! वह भी उपन्यास में, फिल्म की बात दूसरी है, पात्रों को चाहे जितना दौड़ा दो, एक अदना सा हीरो आठ दस आदमियों को मार गिराता है। ऐसा तो केवल फिल्म में ही चलता है पर उपन्यास में... फिल्म की रील की तरह पन्नों को फड़फड़ना ठीक नहीं, संभल कर चलना होता है। उपन्यास में तो एक कदम भी गलत उठा तो शीलभंग होना निश्चित है। किसी लड़की का शीलभंग होने तथा उपन्यास के शीलभंग होने में धागे भर का भी अंतर नहीं.. लेखन की शुचिता भी तो कोई चीज होती है नऽ।’ पृ...63
शशि का पति जो, देह के कौतुकों में फंसकर अपना जीवन वरबाद कर चुका था, और जिसे वह त्याग ही चुकी थी, वह भी अन्त में मरने से पहले एक चिट्ठी छोड़ जाता है, जिसपर शशि कहती है कि....
‘‘वे दस दिन अस्पताल में पड़े रहे, ऐसा नहीं था कि, मैं उनकी सेवा न करती,... एक चिट्ठी छोड़ गये हैं हमारे नाम, चिट्ठी क्या है, मृत्यु-शैय्या पर पड़े आदमी का कनफेशन है। एक तरह से वह चिट्ठी मृत्यु का दस्तावेज है।’’ उपन्यास में पाठकीय आकर्षण है। अस्तु यह ‘कनफेशन’ उपन्यास अत्यंत पठनीय है।
समीक्ष्य उपन्यास
उपन्यास- ‘कनफेशन’ लेखक-रामनाथ ‘शिवेन्द्र
प्रकाशक----
मनीष पब्लिकेशन
471/10, ए ब्लाक, पार्ट-प्प्
सेनिया विहार, दिल्ली
मूूल्य- रु 650
-7-
‘भूमि प्रबंधन पर जायज सवाल उठाता ‘पट्टा चरित’
पट्टा चरित
पट्टा चरित उपन्यास के बारे में कुछ कहना, न कहना दोनों बराबर है। उपन्यास खुद आपसे संवाद करेगा, संवाद ही नहीं प्रतिवाद भी करेगा तथा अपने सृजन के बारे में बाजिब बयान भी देगा तथा बताएगा कि मौजूदा शदी में भी इस उपन्यास की जरूरत क्या है? वैसे यह बता देना लेखकीय औचित्य है कि इसकी कथा आठवें दशक में ही उपन्यास का रूप धर कर ‘सहपुरवा’ उपन्यास के नाम से मेरे मित्रों के सहयोग से प्रकाशित हो चुकी थी। वह मेरा पहला औपन्यासिक प्रयास था। इसमें पात्रों के संवाद की भाषा हिन्दी तथा भोजपुरी बलिया, गोरखपुर, आजमगढ़, जौनपुर वाली नहीं थी बल्कि ठेठ बनारसी या बिजयगढ़िया थी। संवाद के अलावा सारा कुछ खड़ी बोली में था।
तो कथा पुरानी है आपात काल के आस पास की। सवाल है कि पुरानी कथा को फिर से क्यों? आठवें दशक से लेकर अब तक के गॉवों की जॉच पड़ताल कर लीजिए और एक झटके से आपात काल को फलांग कर इक्कीसवीं शताब्दी में घुस आइए फिर देखिए कि क्या गॉव बदल गये? गॉवों की संस्कृति बदल गई? और गॉव ऐसे हो गये कि बिना संकोच ‘अहा ग्राम्य’ कहा जा सके, हॉ गॉवों से पोखर गायब हो गये, पनघट गायब हो गये, आजादी मिलते ही किसिम किसिम के विस्थापित पैदा हो गये, कुछ कारखानों के निर्माण के कारण, कुछ सड़कांे, नहरों के निर्माण के कारण तो अधिकांश वन प्रबंधन की दादागिरी और वनअधिनियम की धारा 4 तथा 20 के कारण। तो गॉवों में अब जो निवसित हैं वे या तो विस्थापित हैं या ऐसे है जो शहर में कहीं खप नहीं सकते।
होमगार्ड से लेकर स्कूल के मास्टर तक, चपरासी से लेकर बड़े ओहदे तक का पदाधिकारी बना कर तन बल तथा वुष्द्वि बल वाले व्यक्ति को गॉवों से छीन लिया गया है, कोशिश की गई है और की जा रही है कि वे गॉव में रहने न पाये, उन्हें किसी भी तरह से सत्ता प्रबंधन से जोड़ लिया जाये। वही हुआ। आज के समय में गॉव में वही बचे हुए है जिनके पास जीवन जीने के लिए कहीं कोई ठौर नहीं तथा वे चौदह दिन की हवालात की योग्यता वाले हैं। इनसे गॉव तो नहीं बचेगा।
इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय है भूमिहीन गरीबों को भूमि आवंटन। आपात काल
के दौरान कांग्रेस का यह प्रशंसनीय अभियान था जिसे बाद में किसी ने लागू
नहीं करवाया।अभियान तो ठीक था पर जो तत्कालीन सामंत थे उनके लिए यह अभियान महज राजनीतिक खेल था। प्रस्तुत उपन्यास में सवालों दर सवालों से गुंथी वही कहानी दुहराइ गई है कि आजादी के बाद कितनी आजादी मिली लोगों को, सन्दर्भ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक किसी भी तरह का हो। एक भूमिहीन व्यक्ति गॉव में कैसे निवसे, किस तरह से रहे? रहे तो किस किस को सलाम करे यह सवाल जैसे पहले था वैसे आज भी है।
यह तो नहीं कहा जा सकता कि गॉव नहीं बदले, गॉव बदले हैं पर गरीबी का प्रतिशत जिन जिन क्षेत्रों में जैसे पहले था वैसे ही आज भी है। इसी लिए कहा जाना चाहिए कि गरीबी पूॅजीवादी सत्ता प्रबंधन का आर्थिक उत्पादन है और आज तो गरीबीे उत्पादन में वृद्धि हो चुकी है। आखिर किसे पड़ी जो जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी इस पर गुने जाहिर है कि गरीबी पूॅजीवादी सत्ता प्रबंधन की रहस्यमय आर्थिक प्रक्रिया है गरीबी रहेगी तभी तो अमीरी रहेगी। हॉ गरीबी की उग्र भूख गरीबों में पैदा न होने पाये इसके समाधान के लिए पूॅजीवादी सत्ता प्रबंधन सभी को भोजन का अधिकार, सभी को शिक्षा का अधिकार, सभी को बुनियादी आय तथा कुछ मामलों में सब्सिडी जैसी रियायतें प्रदान किया करती है जिससे सरकार की छवि लोकतांत्रिक बनी रह सके। पर इससे क्या होगा?
होगा तो तब जब यह पता लगाया जाये कि महज दस फीसदी लोग देश की समस्त कुदरती संपदा पर काबिज कैसे हैं, कौन कौन से कानून है जो उन्हें अमीर बनाते हैं। हमारे कानूनों में कहॉ कहॉ दरारे है जिनमें से इस कथा के रामभरोस जैसे लोग सभी की छाती पर कोदो दरकर उग जाया करते हैं जिनके दमन से फेकुआ, सुमिरनी, औतार, जोखू तथा बिफना को गॉव से भागने के लिए विवश होना पड़ता है। प्रस्तुत उपन्यास का यही आशय है कि हम पता लगा सकें कानूनी दरारों को जिनसे होेते हुए दमन हमारे ग्राम्य संस्कृति तथा जीवन को लील रहा है। चिमनियॉ चाहे जितनी उग जॉये पर गॉव की हरियाली तथा पनघट की मोहकता नहीं पैदा कर सकतीं। जीवन तो गॉवों में है क्योंकि वहॉ अनाज के दाने हैं, दानों पर मन के संगीत लिपे पुते हैं, उसे मन के राग संवारते हैं पोंछते है, बीनते हैं। आइए गॉव बचायें गॉव के लिए कुछ करें। आशा है प्रस्तुत उपन्यास पाठकों की कुदरती प्रतिक्रियाओं को हकदार बनेगा। इसी आशा में....
रावर्ट्सगंज,सोनभद्र 2019
रामनाथ शिवेंद्र के उपन्यास ‘‘पट्टा चरित‘‘ की समीक्षा
‘भूमि प्रबंधन पर जायज सवाल उठाता ‘पट्टा चरित’
अमरनाथ अजेय
भगत सिंह ने अपनी जेल डायरी में लिखा था कि, गोरे अंग्रेजों से भारत को आजादी तो मिल जाएगी परंतु अपने देश के काले अंग्रेजों से दलितों व शोषितो को आजादी कैसे मिलेगी, यह एक बड़ा प्रश्न है!
क्या आजादी मिलने के बाद मेहनतकश मजदूर अपनी आर्थिक हालत सुधार पाए ? क्या मजदूरों व दलितों पर एलीट वर्ग द्वारा हो रहे अत्याचार मे कोई कमी आई ? क्या सत्ता- प्रबंधन के थाने व उनकी पुलिस दलितों के पक्ष में कभी खड़ा होने की हिम्मत जुटा पाई ? क्या मजदूरों को उन्हे आवंटित पट्टो पर पुलिस उनका कब्जा दिला पाई ? ये तमाम ऐसे सवाल हैं जिनका लेखक रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास ‘‘पट्टा चरित ‘‘ पड़ताल करने का प्रयत्न करता है स यही नहीं इन तमाम विद्रूपताओं के समाधान के लिए भी रास्ता तैयार करता है स यह उपन्यास उनके शहपुरवा उपन्यास का संशोधित दूसरा संस्करण है जो देश में आपातकाल के दौरान ग्रामीण जीवन में घटी घटनाओं पर आधारित है स लेखक का मानना है कि आपातकाल ही नहीं उसके बाद 21 वीं शताब्दी तक में क्या गांव की संस्कृति में कोई बदलाव आया, गांव के पोखर गायब हो गए बगीचे नहीं रहे यहां तक की वही गांव में बचे हैं जो 14 दिन की हवालात की योग्यता वाले लोग हैं स इसीलिए कहा जाना चाहिए कि गरीबी पूंजीवादी सत्ता प्रबंधन का आर्थिक उत्पाद है स पूंजीवाद के लिए गरीबों का होना और गरीबों में गरीबी होना अत्यंत आवश्यक है स गांव की इस अपसंस्कृति के संरक्षण के लिए जितना कुछ अंग्रेजों ने किया आजादी के बाद भी वही कुछ हो रहा है।
ग्रामीण जीवन में अन्त्यजो पर सामंतों के अत्याचारके के विविध रूप देखे जाते हैं स खासतौर से इमरजेंसी कॉल में सरकारी महकमे और पुलिस गांव के प्रभावशाली और चालू जमींदारों के पक्ष में आकर गरीब कामगारों को अपनी आवाज उठाने पर उन्हें बिना वजह प्रताड़ित करने लगी स सहपुरवा के सामंत रामभरोस की निगाह जहां एक ओर गांव में आई नई दुल्हनों पर होती तो दूसरी ओर अपने आतंक से मजदूरों पर शासन करने की भी होती , जिसके चलते वे अपने लठैतो के बल पर घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं स इन्हीं कारणों से गांव के चमारों को गांव से विस्थापित होना पड़ा स रामभरोस जिस मजदूर युवती को चाहते उसे अपने लठैतो के बल पर उठा ले जाते और अपने हवस का शिकार बना लेतेस जो कोई उनकी जी हजूरी नहीं करता उसके पट्टे वगैरह रद्द करवाने के लिए अपने प्रभाव का प्रयोग करते, जिससे मजदूरों में असंतोष भड़कता स सुमिरनी जैसी नवोढा को जब उसने दबोच लिया तो एक मजदूर ने इसका प्रतिरोध किया और उसके सतीत्व की रक्षा कीस इसी तरह फेकुआ के पट्टे की जमीन पर पंचायत भवन बनवाने के लिए मंत्री जी से उद्घाटन करवा कर रामभरोस ने कार्य शुरू करा दी स मजदूरों ने संगठित होकर पंचायत भवन के काम पर न जाने, एवं जोड़े गए कुछ ऊंचाई तक के दीवारों को ढहाने के लिए तैयारी कर ली,जो प्रसन्न कुमार जैसे गांव-गांव के एक युवक की प्रेरणा से हो सका।
प्रसन्न कुमार बाम उग्रवाद के प्रभाव में आकर एक अभियान के अंतर्गत मजदूरों को संगठित करता है स सन 67 के नक्सलबाड़ी आंदोलन का असर पश्चिम बंगाल से असम बिहार एवं उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेशों में फैल गया था जिससे गांव गांव प्रसन्न कुमार जैसे युवक मजदूरों को उनके पट्टा की जमीनों पर कब्जा दिलाने का कार्य करने लगे थे स इस उपन्यास पट्टा चरित में ग्रामीण जीवन में सिसक रहे मानव मूल्यों के लिए व उसके प्रतिस्थापन के निमित्त एकता का महत्वपूर्ण सूत्र अपनाया गया है जिसे पकड़ कर विभिन्न देशों में त्वरित परिवर्तन की क्रांतियां हुई । कहा भी गया है कि भूख जब पेट से चढ़कर सिर पर सवार हो जाती है तब ऐसी क्रांतियां होती हैं । उपन्यास का केंद्रीय चरित्र प्रसन्न कुमार है जिस की चिंता खुद लेखक की चिंता है । उपन्यास में प्रसन्न कुमार कहता है- लोग देश बेचने के साथ-साथ दिमाग बेचने का काम आखिर क्यों कर रहे हैं , जबकि किसान अपना धान और गेहूं भी नहीं भेज पा रहा है । इसमें कोई न कोई तिलिस्म है जरूर !
फेकुआ के आवंटित पट्टे की जमीन में बोई गई फसल नाजायज ढंग से लावा ले जाने के बाद जब उस जमीन पर जबरन पंचायत भवन का निर्माण रामभरोस ने करवाना शुरू किया तो फेकुआ के उसे रोकने से संबंधित दरख्वास्त पर जिले के आला अफसरों ने चुप्पी साधे रखी तो गरीब ग्रामीणों को संगठित होकर उसके विरुद्ध कार्यवाही करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचता। आखिरकार ग्रामीणों ने पंचायत भवन ढहाकर मलबा नदी में फेंक दिया और जमीन पहले जैसी बना दिए । इस कार्रवाई के बाद पुलिस का जो तांडव गांव में हुआ उसका वर्णन लेखक ने इस प्रकार किया हैस
एक सिपाही घर में जाता दूसरा लाइन में खड़ा रहता उसके बाद फिर तीसरा जाता स सहपुरवा सिपाहियों के घर के अंदर जाने और बाहर निकलने का खेल बन गया था। उन्हें घर में जाने से कौन रोकता ऊपर का आदेश था, कितने ऊपर का था गांव के लोग क्या जाने!
उपन्यास की भाषा काव्यात्मक है । लालित्य गुणों से भरपूर प्रसाद गुण संपन्न है । काव्य में कहानी और कहानी में काव्य का समावेश लेखक की भाषा को प्रभावोत्पादक बनाती है । ‘‘बैलों को पगुरी करता देखकर फेकुआं का मन हरा हो गया । जैसे प्रकृति के हरेपन में उसका मन कै द हो गया हो । उसे तो समझ आ गया कि अबोलता बैलों को नहीं मारना - पीटना चाहिए ।क्या ऐसी समझ रामभरोस को भी आएगी? उनके सामने तो पूरा शहपुरवा अबोलता है फिर भी वे अबोलतो को सदा मारते पीटते रहते हैं। पर उन्हें कभी भी समझ नहीं आएगी कि अबोलो को नहीं मारना पीटना चाहिए।
‘‘ शोभनाथ पंडित को फेकुआ चमार सुरती बना कर देता है तो सोमनाथ फेकुआ की हथेली से सुरती उठा जीभ के नीचे दबा लिया जैसे वे छूत-अछूत की बदजात संस्कृति दबा रहे हैं चूस कर उसे फेंकने के लिए, पर यह तो छूत- अछूत की संस्कृति है स वह सुरती माफिक नहीं है कि वह जीभ के नीचे डाल दिया और चूस कर थूक दिया।
इस संदर्भ में निम्न वाक्य अत्यंत मौजू हैं - ‘‘कहीं थाना भी मेरी पीठ पर कुछ लिखने ना लगे , पता नहीं हम लोगों की का किस्मत है कि लोग हम लोगों की पीठ पर अपना गुस्सा लिखने लगते हैं ।अरे गुस्सा है तो पहाड़ों पर लिखो बादलों पर लिखो नदियों पर लिखो ,बादल पानी क्यों नहीं बरसा रहे, नदियां क्यों सूख जाया करती हैं यपर नहीं।
इसके अतिरिक्त कवि सम्मेलनों का प्रभाव मजदूरों के ऊपर क्या असर छोड़ता है ,की व्याख्या लेखक ने इस उपन्यास में किया है ।रामनाथ शिवेंद्र के इस उपन्यास में कहानी में उपन्यास और उपन्यास में कहानी पिरोने की कला है ,तो पाठ के शुरुआत में उसका शीर्षक भी काव्यात्मक पंक्तियों में आवद्ध करने का हुनर है। यानी यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह ‘‘पट्टा चरित ‘‘उपन्यास पढ़ते हुए पाठक को कहानी उपन्यास एवं काव्य यानी तीनों का रसास्वादन एवं पुण्य प्राप्त होता है। एक पाठ का शीर्षक देखिए- ‘‘जुबान काट दी जाए संप्रभुता छीन ली जाएं , फिर भी कथाएं नहीं मरती। आइए कथा के साथ चलें कुछ दूर ही सही पर चलें। परहित का पुण्य अर्जित करें ,पर पीड़ा में भागीदार बने । लेखक की ‘‘अपनी बात ‘‘ में उपन्यास का मंतव्य खुद उसकी बातों में देखें-
‘‘ प्रस्तुत उपन्यास का यही आशय है कि हम पता लगा सकें कानूनी दरारों को , जिन से होते हुए दमन हमारे ग्राम - संस्कृति तथा जीवन को लील रहा है । चिमनियां चाहे जितनी उग जाएं पर गांव की हरियाली तथा पनघट की महत्ता नहीं पैदा कर सकतीं।जीवन तो गांव में है क्योंकि वहां अनाज के दाने हैं दानों पर मन के संगीत लिखे हैं उसे मन के राग सवारते हैं। मारते हैं पोछते हैं ,बीनते हैं। आओ गांव बचावें, गांव के लिए कुछ करें । ‘‘ निश्चित ही पूरी मानव सभ्यता उत्पीड़नो की गाथाओं पर ही निर्मित की गई है । मालिकों के रूप में उत्पीड़ितों का संगठित गिरोह पूरी धरती पर है। धरती माता कांपती है उनसे।
शहपुरवा का संशोधित संस्करण इस ‘‘पट्टा चरित‘‘ के साथ लगभग 6 उपन्यास एवं कई कहानी संग्रह ,इतिहास, आलोचना एवं कविताओं की पुस्तकें लेखक की प्रकाशित हैं और चर्चित हैं । असुविधा पत्रिका का भी प्रकाशन अनवरत लेखक की जीवटता को प्रमाणित करता है। हमारे समझ से लेखक ने एक आंदोलन के तौर पर अपनी रचना धर्मिता में पीड़ित, शोषित, विस्थापित एवं असहायओं की आवाज पाठकों तक पहुंचने का कार्य किया है और आज भी निरंतर कठिन दिनों में भी लेखन से अपना गहरा संबंध बनाए रखा है।
मुझे पूरा विश्वास है कि उपन्यास ‘‘पट्टा चरित ‘‘ पाठकों पर अपना प्रभाव अवश्य छोड़ेगा ।
उपन्यास- पट्टा चरित
रामनाथ शिवेन्द्र
प्रकाशक-मनीष पब्लिकेशन,
441/10,ए ब्लाक, पार्ट-2
सोनिया बिहार, दिल्ली-110090
मोबाइल-9968762953 मूूल्य- रु 650.00
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धरती कथा उपन्यास
जरूरी सवाल तो पूछे ही जाएंगे
वीरेन्द्र सारंग
वरिष्ठ कथाकार रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास धरती कथा काल्पनिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। शिवेंद्र सोनभद्र के हैं और भी वहां के समाज साहित्य से पूरी तरह परिचित है। वे राजनीति में दखल नहीं रखते लेकिन उसमें भी उनकी समझ सार्थक रूप से देखने को मिलती है। धरती कथा उपन्यास की कथा जिस घटना पर आधारित है वह दिल दहलाने वाली है। आज के लोकतंत्र में ऐसा नरसंहार जो जमीन से बेदखल करने के लिए किया जाए कई सवाल खड़ा करता है। इतना ही नहीं नरसहार बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से किया गया है। 10 लोगों की हत्या कोई मामूली घटना नहीं है। वे 10 लोग कौन हैं? हां वे वही लोग हैं जो अपने उर्वर भूमि पर खेती करते हैं आज से नहीं बाप दादा के समय से। उन्हें पता ही नहीं कि वह जमीन तो किसी और की है। ऐसी स्थिति में विवाद होना तो तय है। उस नरसंहार की चर्चा पूरे भारत में विस्तारित हुई। घटना कहीं और की नहीं सोनभद्र जिले के किसी गांव की है। या वही जिला है जहां आदिवासी और छोटे किसान रहते हैं।
उपन्यास में जिस गांव की घटना है वह गांव काल्पनिक है बल्कि 100 फीसदी सही है। हल्दीघाटी गांव जंगल के बिल्कुल पास है और जिस भूमि पर विवाद है उस पर मुकदमा भी चल रहा है लेकिन कोई समाधान नहीं। आखिर हमारे किसान कब तक अदालत के चक्कर में अपना पेट काटते रहेंगे जमीन से बेदखल होने के डर से मानसिक पीड़ा झेलते रहेंगे । सोनभद्र जनपद को बतोर लेखक पड़ताल करें तो पता चलेगा की पूरे जनपद में विस्थापन का दर्द पसरा हुआ है वह भी एक कारण है उत्पीड़न और यातना का। चारों ओर गरीबी पसरी हुई है धरती कथा की कथा जमीन के अधिकार से शुरू होती है और वहीं पर खत्म भी हो जाती है आखिरकार जमीन का मालिक कौन है? और उस पर अधिकार किसका है? सवाल तो वैसे का वैसे ही और फिर नरसंहार उनका जो भोले-भाले किसान हैं जो खेत को उर्वर बनाते हैं अनाज उत्पादित करते हैं। लगता ही नहीं कि हम लोकतंत्र में जी रहे हैं ऐसा जान पड़ता है यह किसी राजतंत्र द्वारा हम किसान लोग कुचले गए हैं तभी तो खेतों में निर्दोष लोगों की इतनी लाशें अपने सवालों के साथ पसरी पड़ी है जो आज की सत्ता व्यवस्था पर हमें मुंह चिढाती हैं और कहती हैं कि लोकतंत्र में क्या किसान सिर्फ मरने के लिए बैठा होता है?
रामनाथ शिवेंद्र का या उपन्यास घटना को बखूबी समझता है और पूरी पड़ताल भी करता है। किसानों की भूमि किससे और कैसे कई हाथों में बिकते बिकते ऐसी जगह पहुंच जाती है जो दबंग है और जो छोटे किसानों को बेदखल करने के लिए बंदूके चलाता है मानो कोई किला फतह करने की योजना बनाई गई हो। ऐसा भी नहीं की आदिवासी किसान प्रतिरोध नहीं करते गोली के आगे हाथ का क्या विरोध? चीखना चिल्लाना क्या गोली से लड़ पाएगा ? अब जो मारे गए हैं उस पर राजनीति भी होगी। क्या यही लोकतंत्र है?
विपक्ष की एक नेत्री आती है संवेदना व्यक्त करते हुए सवाल खड़े करती है लेकिन सत्ता में बैठे लोग क्या कर रहे हैं? सवाल यह भी है कि कोई घटना बिना वजह क्यों घट जाती है? और जब घटना घट जाती है तब सरकार को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लग जाता है उसके पहले तमाम ऐसे मुकदमे जो वर्षों से तारीखें झेल रहे हैं लेकिन उधर किसी का ध्यान नहीं है। हर घटना के बाद योजनाएं बनेंगी, खडन्जे बिछे्गे मकान पक्का हो जाएगा और धीरे-धीरे सब ठीक-ठाक। फिर तब जमीन को नए ढंग से बंदोबस्ती का आदेश भी दिया जाएगा लेकिन कौन जानता है की यहां भी खेल होता है जो आदिवासी मारे गए जिन्होंने उस जमीन को उर्वर बनाया वह जमीन उन्हें नहीं मिलती उर्वर भूमि को उसे दे दी जाती है जो अधिकारियों को संतुष्ट करता है आदिवासी चुप नहीं बैठते वे उसके लिए भी आंदोलन करते हैं और पुलिस प्रशासन द्वारा मारे पीटे जाते हैं। किसान सवालों के ढेर पर खड़ा होकर सवाल करता है की लो काट लो मेरा पेट जितना भी चाहो, वह मुंह चिढ़ाता है सत्ता में बैठे लोगों या बड़े अधिकारियों को। आज भी किसान अपने अधिकार की लड़ाई पीढ़ी दर पीढ़ी लड़ रहा है आखिर कब तक?
उपन्यास इस सवाल पर भी रोशनी डालता है कि समस्याएं कब हल होंगी? किसान केवल सोनभद्र का ही नहीं पूरे देश का है वैसे सोनभद्र में लगभग 70 फीसदी मुकदमें भूमि विवाद के ही हैं। क्या जमीन सिर्फ तारीखे देखने के लिए उर्वर बनी है? यह कोई छोटी बात नहीं है। मुकदमे की तारीखें पूरे देश की समस्या है। आखिर हमें लोकतंत्र में समानता क्यों नहीं मिलती सवाल तो पूछे ही जाएंगे जो जरूरी होंगे। उपन्यास के पात्र सोनभद्र के धरती से जुड़े हुए लगते हैं और भाषा भी सोनभद्र की कुल मिलाकर धरती कथा की कथा जरूरी लगती है। यह उपन्यास बाकायदा पढ़ा जाना चाहिए इसलिए भी अति पिछड़े आदिवासी क्षेत्र सोनभद्र के कथाकार रामनाथ शिवेंद्र की दृष्टि व्यापक है।
मनीष पब्लिकेशन
प्रकाशक-मनीश पब्लिकेशन,
441/10,ए ब्लाक, पार्ट-2
सोनिया बिहार, दिल्ली-110090
मोबाइल-9968762953 मूूल्य- रु 650
प्रथम संस्करण...2021
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धरती कथा
प्रस्तावना----
‘आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम
आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के
बाजार के कार्टूनों में?’
किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने और न बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिन्दिगियों का नियामक भी है। लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है, उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता! उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है। इस खुली छूट के बाद भी उपन्यास अगर कुछ कर सकते तो प्रेमचन्द जी के उपन्यासों के सारे पात्रा आज गली गली, गॉव गॉव रोते चिचियाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ इसी लिए आधुनिक तथा उत्तर-आधुनिक उपन्यासों के केन्द्र में वे अब नहीं हैं। प्रेमचन्द कालीन उपन्यासों के नायक तो तब के हैं जब हम गुलाम थे, आज हम गुलाम नहीं हैं सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गये हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं, किसी भी गली में, किसी भी चौराहे पर, ललकारते हुए कि ‘अरे! भाई ‘हमसे का मतलब’। यह ‘हमसे का मतलब’ कोई निरर्थक एक वाक्य/मुहाविरा ही नहीं है, यह तो बहुत ही गहरे अर्थ-बोध वाला है, इसे खोलेंगे चाहें या इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जायेगा। तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे जो नायक हैं वे उपन्यासों से, कविताओं से बाहर निकल कर सड़क पर खड़े हैं, रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं, चुनाव लड़ने के लिए पर्चे खरीद रहे हैं, ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा न होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उसके सामने, ठीक उसके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है, वह जो आदमी बिला कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है ‘हमसे का मतलब’, वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा और न प्रतिरोध में कुछ कर रहा। वह ‘हमसे का मतलब’ का मंत्रा अपने मन में बिठाये तुलसीदास की चौपाई ‘कोउ होय नृप हमैं का हानि’ का पाठ कर रहा है।
तो कहा जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं और ‘हमसे का मतलब’ का पाठ कर रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘धरती कथा’ के सारे के सारे पात्रा किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं, केवल पात्रा ही नहीं इसकी घटनायें भी ‘पाठ’ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित हैं। पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए और फटकार भी रहा है अगर तुम घटना के साक्षी हो तो...देखो और समझने की कोशिश करो के घटनायें कैसे घटा करती हैं,’ कैसे अपना नायकत्व सिरज लिया करती हैं और घटना के पात्रा, घटना का मुख्य किरादार होते हुए भी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर, बहुत दूर कूड़े की तरह फेंकाये हुए हैं, उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन और उसका घटना के घटितों द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो ‘घटित’ है वह घटना तो है ही उस घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत? जरा गुनिए जरूरत है क्या?
जरूरत तो नहीं है, मैंने पूरा प्रयास किया कि इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक रचूॅ पर ऐसा में न कर पाया, घटनायें जो खून आलूदा थीं वे लगातार मुझे घसीटती रहीं कभी मुझे बांयें की तरफ ले जातीं तो कभी दांये तरफ तो कभी आज के सत्ता-बाजार और उसके कौतुक की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्ता कौतुक में जो फस गया वह भी और जो रम गया वह भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धरती कथा का एक पात्रा सरवन ‘नायक’ की तमीज वाला था, वह करिश्मा जरूर करता पर उसकी हत्या कर दी गई। उसकी तथा उसके साथ नौ दूसरे नौजवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था। सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आश जगी थी कि ‘बबुआ’ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नये किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जॉच-पड़ताल की माया-जाल में उलझ कर रह गया। वह साहस करके पुलिसिया कार्यवाहियों के जाले को फलांगने तथा अदालती अदब के संस्कारों से निजात पाने की कोशिशें करता, पर एक कदम भी आगे बढ़ कर कथानक को कुलीन न बना पाया। सो कथानक कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि कथानक का अद्भुत होना उपन्यास के लिए अनिवार्य हुआ करता है।
तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथ ही अपनी संपूर्ण बौधिकता के साथ अलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गॉव भी आपको मिलेगा जो उपन्यास का कवल कथानक ही नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंच कर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गॉव आपको कैसा लगा, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में।
धरती कथा- कुछ नोट
2021 प्रउत्तर प्रदेश का सबसे पिछड़ा जनपद सोनभद्र कई मायनो में कुछ विशेष किस्म के लोगों को बहुत ही विकसित दिख सकता है और यहां की विशाल काय चिमनियां उनके दिल दिमाग को बसंती बना सकती हैं, वे पूंजी की मादकता में गोते लगा सकते हैं पर सभी के लिए ऐसा नहीं है खासतौर से उन लोगों के लिए जो सोनभद्र के रहने वाले हैं। पूरे जनपद में विस्थापन का दर्द पसरा हुआ है तो उत्पीड़न और यातना के घृणित परिणाम भी हर हर तरफ गरीबी के रूप में पसरे हुए हैं। प्रस्तुत उपन्यास धरती कथा धरती से जुड़े हुए कानूनों एवं उसके पक्षपाती प्रबंधन पर जलते हुए सवालो के परिप्रेक्ष्य मे एक औपन्यासिक रचाव है। जाहिर है कथा में यथार्थ के साथ कल्पना का विस्तार भी कथा की मांग के अनुरूप है। कथा जमीन से जुड़े मालिकाना अधिकार से शुरू होती है और और उसी पर जाकर खत्म हो जाती है। जमीन पर मालिकाना का अधिकार किसका? किस सीमा तक यह एक ऐसा सवाल बन जाता है जो खून खराबा कत्ल और बलबा तक जा पहुंचता हैं । जमीन कब्जा करने के लिए गांव में योजनाबद्ध तरीके से कुछ लोग आते हैं और 10 निरीह आदिवासियों की हत्या कर देते हैं। हल्दीघाटी नाम का एक गांव (बदला हुआ नाम) है जो जंगल का समीपवर्ती है और यहां पर दलित आदिवासी सैकड़ों साल से खेती किसानी करते हुए आबाद है। इसी गांव की जमीन का विवाद है कि यह जमीन किसकी? राजस्व अदालत में मुकदमा भी चल रहा है पर मुकदमे का कोई विधिक समाधान नहीं निकलता फलस्वरूप विवाद बना रह जाता है और यह विवाद कत्ल तक जा पहुंचता है। कथा यहां से प्रारंभ लेती है आजादी के 70,72 साल बाद गांव में एक एनजीओ वाला आता है और कहता है की यह जमीन उसकी है उसने इसका रजिस्टर्ड बैनामा करा लिया है। गांव वाले आदिवासी हैं प्रताड़ित है दमित है तथा विस्थापित है। वे कहते हैं की यह जमीन उनकी है। राजा बड़हर ने उन्हें दान में दिया है तब वे यहां के राजा थे अब नहीं है। उक्त एनजीओ वाला उस जमीन को एक ऐसे आदमी को बेच देता है जो स्थानीय है तथा शासन प्रशासन में पर्याप्त दखल रखता है। वही आदमी अपने सैकडो सहयोगियों के साथ मौके पर जमीन कब्जाने के लिए बंदूके चलाता है मारपीट करता है आदिवासी भी प्रतिरोध करते हैं और वे मारे जाते हैं फिर शुरू होता है शासन-प्रशासन का खेल जो मुआवजा तक पहुंचता है। पोस्टमार्टम से लेकर मुआवजा देने तक सारा प्रकरण किसी खेल की तरह दिखता है । विपक्ष की एक बडी नेत्री का भी उस गांव में आगमन होता है उसके तरफ से भी आदिवासियों को मुआवजा दिया जाता है। गांव के विकास के लिए कई तरह की योजनाएं लागू कर दी जाती है सब देखते देखते होने लगता है एक तरह से गांव में 10 आदिवासियों की हत्या कर दिए जाने के बाद प्रशासन की मदद से स्वर्ग उतर आता है गलियां खड़ंजा मय हो जाती है, दमितों के कच्चे मकान पक्के बन जाते हैं, गली गली खाद्यान्न बटता हुआ दिखाई देने लगता है गोया सब कुछ ठीक-ठाक होने लगता है असंभव संभव बन जाता है पर यह सब होता है 10 आदिवासियों की हत्या के बाद । विडंबना यही यही कथा का मुख्य विषय भी है। सबसे महत्वपूर्ण अंश कथा का यह है कि पूरे गांव की जमीन को नए ढंग से बंदोबस्ती के लिए आदेश दे दिया जाता है और पुरानी बंदोबस्ती को निरस्त कर दिया जाता है नए तरह से बंदोबस्ती शुरू हो जाती है।
बहुत कम समय में जमीन की बंदोबस्ती कर भी दी जाती है। कथा का असली मकसद यहां से शुरू होता है इस बंदोबस्ती मे मारे गए आदिवासियों को वह जमीन नहीं मिलती जिसके लिए बलवा हुआ था बल्कि वह जमीन दे दी जाती है जिस जमीन से उनका कभी भी कोई नाता नहीं था जो अच्छी जमीन थी जोत कोड वाली थी जिस पर वे खेती करते थे। जाहिर है प्रताड़ित इस नई बंदोबस्ती को क्यों मानते वे आंदोलन रत हो जाते हैं और कचहरी पर धरना प्रदर्शन करते और उन्हें वही मारा पीटा जाता है तथा गिरफ्तार कर लिया जाता है। इसी दौरान कोरोना की घोषणा ह़ो जाती है और लॉकडाउन हो जाता है आंदोलन करने वाले आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिए जाने के तत्काल बाघ कुछ ही घंटे बाद ही शासन के आदेश पर उन्हें मुक्त भी कर दिया जाता है। खेल यहां से शुरू होता है और कोरोना के बहाने पूरे गांव को सील कर दिया जाता है आदिवासियों की मांग थी कि हमें वही जमीन बंदोबस्त की जाए जिस जमीन पर हमारा पुश्तैनी कब्जा दखल चलता आ रहा है। किसे नहीं मालूम कि प्रशासन प्रशासन होता है किसी ने किसी बहाने शासन को भी ठेंगा दिखा देता है। वही हुआ हल्दीघाटी गांव में भी, बंदोबस्ती में लेन देन का खेल चला और उर्वरक जमीन उन्हें दे दी गई जिन्होंने प्रशासन की सेवा की। धरती कथा उपन्यास की कथा ही कथा का नायक है और घटना भी। औपन्यासिक रचाव के लिए कुछ पात्रों का होना जरूरी है वे पात्र भी सरवन बबुआ खेलावन सुमेरन के नाम से है तथा सुगनी बिफनी जैसी नारी पात्र भी है। वेअनुरोध करती हैं तो प्रतिरोध भी। उपन्यास खत्म हो जाता है उस बिंदु पर जब आदिवासी नई बंदोबस्ती का विरोध करते हैं और प्रतिरोध में खड़े हो जाते हैं उपन्यास में हल नहीं निकलता की आदिवासियों को अपने प्रतिरोध में क्या मिला इसे पाठकों के हवाले छोड़ दिया गया है तथा बताने का प्रयास किया गया है यह जो भूमि प्रबंधन है कितना प्रपंच भरा है। धरती प्रबंधन का जो खेल है वह पूरे सोनभद्र को परेशान किए हुए आज कचहरी में लगभग 70 प्रतिशत मुकदमे भूमि विवाद के हैं इनका त्वरित ढंग से निस्तारण नहीं हो पा रहा है केवल तारीखें पडती रहती है मुकदमे में। जमीन का मामला भी मुकदमे में जाकर अटका हुआ है भले ही नई बंदोबस्ती कर दी गई है फिर भी कथा का दर्द यही है इसीलिए यह कथा भी । सबसे मजेदार बात यह है कि यह सब तमाशा धरती भाई देख रही है और सुन रही है और पृथ्वी से स्वर्ग लोक जाने की तैयारी में है। अब नहीं रहना पृथ्वी पर पृथ्वी पुत्रों के साथ।
पहला अंश----
‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे!
चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’
‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’
इस धरती कथा के दो पुराने पात्र हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू..
‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’
बुझावन भी गुस्से में हैं...
‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’
‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’
पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास
हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे।
खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं...
‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन?
सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है।
सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे..
‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’
बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’
कई बार बुझावन ने उसे रोका था ....
‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’
अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’
गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई...
‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’
तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर।
बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’
‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’
‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’
‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा।
एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा।
‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने
‘नाहीं जानते का...?’
‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’
‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से
‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’
‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’
‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’
करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था।
‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’
‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा..
‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’
कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’
‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’
पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया...
‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’
‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’
‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’
महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’
महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था।
महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे।
नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे।
नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो...
पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था।
पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था।
गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे।
घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे।
नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये।
वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था।
नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी।
नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था...
‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था
कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे।
नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास...
वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया...
‘अरे! नन्हकू तूॅ...’
‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’
‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया
‘का काम है हो, बताओ तो..’
नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई!
‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’
‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’
हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है।
‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’
‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’
वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये...
‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’
‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’
नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में।
मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया...
‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये।
गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से...
‘अब का होगा काका?’
‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’
यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे।
धरती-माई देख रही हैं मानव सभ्यता का कानूनी खेल, किस तरह की व्यवहार-संस्कृति उग रही है धरती पर झाड़-झंखाड़ की तरह। व्यवहार-संस्कृति के कागजी झाड़-झंखाड़ को कौन साफ करेगा? नन्हकू काका जैसे पसीना बहाने वाले तमाम लोग कागजों के राजनीतिक व कानूनी खेल में फंस गये हैं धरती में, धरती ने उन्हें लील लिया है। ऐसे लोग जो धरती पर अपनी जिन्दगी लिखते हैं, धरती को जो चूमते हैं। धरती की दरारों में पैर फंस जाने के बाद भी जो धरती को प्रणाम करते हैं, गरियाते नहीं हैं, इनका क्या होने वाला है? कौन बता सकता है? क्या धरती माई बोलेंगी कुछ इस बारे मे
'''वाम उग्रवाद पर केंद्रित रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास जंगल दंश'''
अपनी बात----
‘जंगलदंश’ उपन्यास के बारे में कुछ कहने से अच्छा है, कुछ न कहा जाये तथा यह भी न बताया जाये कि जंगलदंश उपन्यास है या लम्बी कहानी है। पर इतना कहना जरूरी है कि आज के आलोचनात्मक व विखंडनवादी समय में, जहां कदम कदम पर कुदरती चिंतन तथ व्यवहार को ठेंगा दिखाया जा रहा हो, मानवीय समीपताओं को किसी भी तरह से नष्ट करने व मिटा देने के कूट प्रयास किये जा रहे हों, कृत्रिम संप्रभुताओं के द्वारा व्यक्ति की नैसर्गिक संप्रभुता को दमित व उत्पीड़ित किया जा रहा हो, जहां आदमी को आदमी की तरह जीने, मरने की कुदरती परिस्थितियां न उपलब्ध कराकर उसे उपभोक्ता वस्तु में तब्दील किया जा रहा हो, जहां चित्त, चेतना तथा चिंतन के हसीन बाजार हों और उस बाजार में विचार व दृष्टि को ( प्कमं ंदक अपेपवद ) बेचे तथा खरीदे जाने के कौशल दिखाये जारहे हों, ऐसे में ‘जंगलदंश’ की कुदरती कथा लिखना जरूरी था। ऐसे खतरनाक समय में कथा के माध्यम से यह देखना भी जरूरी था कि यह जो ‘जंगल में मंगल’ या‘अहा ग्राम्य जीवन’ की राग अलापने, किसानों को फसल की दुगनी आय दिला कर उनकी आत्महत्या रोकने वाली साहित्यिक व खासतौर से राजनीतिक व्यवहारलिपि है, उसमें इन दोनों ‘पदों’ का कितना मान, सम्मान व आदर है?
किसे नहीं पता कि जंगल में जंग है तो गॉव में जाति है, गोत्रा है, अगड़ा है, पिछड़ा है, मंडल है कमंडल है, इनके अपने अपने दांव हैं पर ‘अहा ग्राम्य जीवन’ तथा ‘मंगल’ कहीं नहीं है। हर तरफ जंग ही जंग हैं, दांव ही दांव हैं। जंगल में जंग हैं तो गॉव में दांव हैं। जंगल हैं, तो कारखानों के द्वारा उपजाये गये विस्थापन के दंश हैं, गॉव हैं तो जमीन है, जमीन है तो उसके होने न होने के कारण हैं, मालिकाना है, विरासत है, वसीयत है और कब्जे हैं तथा जब ये सब हैं तो थाना है, कचहरी है यानि बहुत कुछ है। जमीन, जोरू और जर(संपत्ति) का सीधा मतलब है झगड़ा, झगड़ा है तो थाना है कवहरी है, मुकदमा है। बाहरी दुनिया यानि प्रशासकों की दुनिया में विवेकाधिकार तथा विशेषधिकार हैं। गोया हर समाज बटा हुआ है चाहे नागर हो या ग्रामीण उसी के अनुसार मानवनिर्मित अधिकार भी विभाजित हैं समझना यही है कि ये विभाजन समतावादी समाज के अनुकूल हैं या समाज को पन्द्रहवी शताब्दी में ले जाने वाले हैं। अगर ऐसा ही है फिर हमारी सभ्यता किन अर्थों में आधुनिक है?
जमीन किसी ने जनमाया नहीं, उगाया नहीं, पहाड़ किसी ने रचा नहीं, नदियों को किसी ने बहाया नहीं। अब तो ये कुदरती सच सत्ताप्रबंधनके लिए जटिल सवाल बन कर किसिम किसिम की संस्कारलिपि भी रचने लगे हैं, खतरा इसी नये किस्म की संस्कारलिपि से है। दुखद है कि इस संस्कारलिपि से मानव समीपतायें कांप रही हैं, कांप तो जंगलदंश की कथा भी रही है, आइए देखते हैं, आगे क्या होाता है?
वैसे कथाओं का क्या है, चाहे जितनी कही जायें या सुनी जांये उनका सामाजिक बदलावों के सन्दर्भों में कुछ विशेष असर पड़ा हो ऐसा नहीं जान पड़ता। गोदान का होरी जीवित समाज का प्रतिनिधि बन गया हो नहीं देखा गया। अगर उस तरह के चरित्रा देखे भी गये तो उन्हें बाजार ने डस लिया, फिर वे होरी से बदल कर कुछ और हो गये। गायब हो गया होरी और बाजार की चमक में कहीं खो गया, अब उसे कौन गढ़े या रचे? पूंजीवादी सत्ता प्रबंधन ने उन्हें भलमानुष नहीं रहने दिया, उपभोक्ता संस्कृति ने उन्हें किसी कमोडिटी में बदल दिया। बाजार की कमोडिटी बने लोगों के बीच मानुष रहना आसान भी तो नहीं। आसान होगा भी कैसे, बाजार में तो किसी कार्टून की तरह इधर से उधर उड़ते रहना मजबूरी है।
जंगल दंश की कथा आपके सामने है, देखिए यह कथा आपको प्रभावित कर पाती है या नहीं। अगर इस कथा के माध्यम सेआप वामउग्रवाद के क,ख,ग, से वकिफ हो जाते हैं फिर तो यह सार्थक कथा होगी।
हिन्सा तथा अहिन्सा दो छोर हैं वामउग्रवाद को समझने के लिए। कम से कम
भारतीय संस्कृति किसी भी हाल में हिन्सा की वकालत नहीं करती। वामउग्रवादी
चिन्तन भारतीय व्यवहार संस्कृति की भाषा नहीं है। समाज बदल के लिए हिन्सा का सहारा लेना यह पद्धति भारत में मनोवैज्ञानिक व सामाजिक रूप से त्याज्य है, इस पद्धति में सामाजिकता तो हो ही नहीं सकती। आज के समय को सोलहवीं शदी में बदल देना या बदलने का प्रयास करना सिवाय बेवकूफी के और कुछ नहीं।
आशा है मेरे पिछले उपन्यासों की तरह प्रस्तुत उपन्यास को भी आपकी मुहब्बत मिलेगी। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा में...
जून- 2019
राबर्ट्सगंज,सोनभद्र,उ.प्र.
भावना प्रकाशन
109-पटपड़गंज गॉव, दिल्ली-110091
मो...8800139684, 9312869947
प्रथम संस्करण 2022
मूल्य..400.00
जंगल दंश का पहला अश----
‘लाईन में लगना और लाइन बन जाना,
अलग अलग बातें हैं, यानि कथा आगे है’
मनीष देर रात तक घर लौटा। वह बाहर दोस्तों से घिर गया था। दोस्त उसे समझा रहे थे कि चुनाव में हार, जीत तो होती रहती है, उससे घबराना नहीं चाहिए, पर उसके घबराने का कारण दूसरा था, जिसे वह दोस्तों को बताना नहीं चाहता था।
मनीष घर में घुसते ही अवाक रह गया, उसे लगा जैसे वह अपने घर में न हो कर किसी दूसरे के घर में घुस गया हो, जहां होने का कोई मतलब नहीं... इस घर में तो वह कभी आया ही नहीं था। पता नहीं कैसे आ गया है। उसे विगत का सारा कुछ ख्याल आता जा रहा है, उसे भूलना चाहे तो भी नहीं भूल सकता, कुछ दूसरी भूल जाने लायक बातों की तरह, जिन्हें वह कबका भूल चुका है। उसकी यादें उसे नोचने चोथने लगी हैं, जबाब मांगने लगी हैं... यह पहला अवसर है जब वह अपनी यादों से मुठभेड़ करने की स्थिति में नहीं है। चार साल पहले ही उसने अपना घर बनवाया था, यह मानकर कि शहर में रहना हर हाल में ठीक होता है। किसे नहीं पता कि घर बनवाना आसान नहीं होता, वह भी शहर में, फिर भी मनीष ने शहर में घर बनवाया। कुमुद भी तो घर बनवाने के लिए जिद्द कर रही थी।
उसे पता था कि कुमुद गॉव मंें नहीं रह सकती, उसने गॉव देखा नहीं है। जब से उसने खुद को जानना और समझना शुरू किया है, तब से शहर में ही रह रही है। पढ़ाई लिखाई सारा कुछ, उसने शहर में ही किया है।
एक बार कुमुद किसी गॉव में गई थी, अपने पापा के साथ। गॉव में कोई मीटिंग होनी थी, विस्थापन का मामला था, एक प्राइवेट कारखाना बनवाने के लिए गॉव वालों को उजाड़ा जाना था। कारखाने को तीन सौ एकड़ जमीन चाहिए थी और सरकार ने उसे देने के लिए जो भी कानूनी प्रस्ताव वगैरह होते हैं, पास कर लिया था। सारा कार्यक्रम सरकार ने आनन फानन में तय कर लिया था और किसी को कानो कान खबर तक नहीं लगी थी। कुछ महीनों में ही गॉव वालों को उनकी जन्मभूमि तथा कर्मभूमि से उजाड़ दिया जाना था। यह सब करने में कमजोर से कमजोर सरकार भी बहुत मजबूत व ताकतवर हुआ करती है। चाहे वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के मामलों में विश्वबैंक तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ के सामने, किसी अनाथ की तरह हाथ जोड़े खड़ी रहती हो, इतना ही नहीं, सारी दुनिया में घूम घूम कर देश की सुरक्षा के नाम पर घातक हथियारों, मिजाइलों वगैरह की भीख मांगा करती हो फिर भी देश के आंतरिक मामलों जैसे गॉव के गरीब किसानों के विस्थापन संदर्भाें में या दूसरे तरह के शोषणों के मामलों में, भीख मांगने वाली सरकारें भी अपनी जनता के साथ जघन्य से जघन्य क्रूरताएं बरतती रहती हैं।
तकरीबन दस गॉवों को उजाड़ा जाना था, गॉवों के लोगों को विस्थापित किये जाने के औचित्य को साबित करने के लिए सरकार के पास ढेरों कानून थे। उन कानूनों में जो भी दरारें थीं उन्हें सरकार ने संसदीय सहमतियों, एवं विधिक संस्तुतियों से पाट लिया था। प्रशासन ने गॉवों को उजाड़े जाने की नोटिस भी तामिल करवा लिया था। नोटिस में साफ लिखा था कि जिन्हें आपŸिायां करनी हों, वे एक माह के भीतर करें नहीं तो माना लिया जायेगा कि किसी को कोई एतराज नहीं है, फिर सारे प्रकरण को एकतरफा ढंग से निपटा लिया जायेगा।
गॉव वालों को नोटिस वगैरह के बारे में कुछ पता नहीं था... नोटिस कब आई, किसने भेजा, सारा कुछ रहस्य था। अचानक एक दिन गॉव की नापी होने लगी, तब गॉव वालों को पता चला कि वे उजाड़े जांएगे।
विस्थापन वाले कामों को किये जाने की ऐसी ही परंपरा है। पहले नोटिस भेज दी जाती है। नोटिस के जबाब आते हैं। जिन्हें पता होता है कि जबाब दिया जाना है, वे जबाब दे देते हैं। जिन्हें नहीं पता होता वे जबाब नहीं दे पाते। जो जबाब आए होते हैं, कहा जाता है कि जबाबों के परिप्रेक्ष्य में नोटिस का निस्तारण होता है। जबकि जबाबों के निस्तारण की परंपरा ने कभी समाज को उल्लेखनीय लाभ नहीं पहुंचाया है। मान लिया जाता है कि सरकारें जो कुछ भी करती, कराती हैं वह सब राष्ट्र हित में समाज और अपनी जनता के लिए ही, फिर सरकारी काम से किसी को कैसे नुकसान हो सकता है?
कुमुद को जाने कैसे उस दिन गॉव अच्छा लगा था। वहां के लोग उसे सरल और सीधे लगे थे, पर उसे वहां गुस्सा भी खूब खूब आया था। ऐसे सरल और सहज लोगों को जाने कैसे उजाड़ने के बारे में सरकार निर्णय ले रही है? क्या तमाशा है, जो कई कई शहरों में काबिज हैं, कई कई धन्धों को हथियाए बैठे हैं, उन्हें नहीं उजाड़ रही? उजाड़ रही ऐसे लोगों को जिनके पास इस गॉव के अलावा कहीं शरण नहीं...
वह तो अपने पापा पर ही गुस्सा हो गई थी.....
‘पापा यह क्या है? आप मीटिंग करके यहां से लौटने के लिए सोच रहे हो। आपके मित्र कामरेड भी चले गये, उनमें से एक कामरेड तो कार्यक्रम के संयोजक से कार का किराया भी मांग रहे थे, बोल रहे थे, कार का किराया दे दो, दसके अलावा हमलोगों को कुछ नहीं चाहिए।’
‘अरे वही, जो लखनऊ विश्वविद्यालय वाले हैं, जिनका बहुत बड़ा नाम है, उनके साथ जो लेखक किस्म के एक आदमी थे, अभी उनकी एक किताब ‘खामोशी का वैश्वीकरण’ प्रकाशित हुई है, जिसकी समीक्षा मैंने साहित्य की चर्चित पक्षीनामधारी पत्रिका में पढ़ी है। वे मना कर रहे थे...
‘जाने दो भाई, गॉव वाले रूपया कहां से देंगे। हमलोग आपस में खर्चा बांट लेंगे। तीन तीन सौ या चार चार सौ एक एक आदमी पर पड़ेगा और क्या। साथ ही साथ वे सभी लोगों को रोक भी रहे थे, काम तो यहां हैं, जनता के
बीच में, इनकी लड़ाई को आगे बढ़ाना है, फिर यहां से लौटने का क्या मतलब। बेचारे गॉव वाले क्या करेंगे, सरकार का विरोध करना आसान नहीं होता। सरकार के पास तमाम तरह की ताकतें होती हैं, जो जनता के मन को कमजोर तथा लचीला बना दिया करती हैं। फिर जनता किसी छुई मुई माफिक अपनी ही छुअन से डर कर, खुद को अपने अपने भाग्य के रहस्यों में डुबो लिया करती है।
मीटिंग में जो बाहरी लोग आए हुए थे वे गॉव में रुकने वाले नहीं थे। वे भाषणों को बेचने वाले सौदागर थे। ऐसे तिजारती लोग भला उस गॉव में रुक कर गॉव वालों के साथ लाठी डंडंे क्यों खाते। मीटिंग खत्म हुई और वे चले गये। कुमुद ने अपने पापा पर व्यंग्य किया....
‘पापा आपको जाना हो तो जाइए, मुझे इन गॉव वालों को इस हालत में छोड़ कर नहीं जाना’ कुमुद लड़ गई अपने पापा से..
पापा तो पापा, उन्हें अपने अनुभवों से हासिल ज्ञान पर गर्व था..
‘क्या बोल रही तूं, का करेगी इस गॉव में रुक कर, जानती है इस इलाके के बारे में, यह क्षेत्र नक्सलाइटों का है, यहां आदमी नहीं, बन्दूकें बोलती हैं, यहां बन्दूकें कहानियां और कवितायें लिखती हैं। यहां रुकना ठीक नहीं होगा और गॉव वालों को भी कुछ लाभ नहीं मिलेगा।’
‘पापा आप चाहे जो सोंचें, गुनें, पर मुझे इस गॉव से बाहर नहीं जाना। मैं जानती हूॅं कि गॉव वालों को इस समय मेरी आवश्यकता है, और अगर नहीं भी है तो मुझे मालूम है कि गॉव वालों के साथ रहने की आवश्यकताओं को मैं कैसे रच व गढ़ सकती हूॅं। इस परेशान गॉव में मैं अपनी उपयोगिता सिरज लूंगी’
‘तो तुम्हें वापस नहीं लौटना, तूं यहां रुक कर करेगी क्या? कोई प्लान है क्या तेरे पास?’
‘फिलहाल तो नहीं, प्लान पहले से बना कर क्या होगा? प्लान तो परिस्थितियों के आधार पर बनाना अच्छा होता है।’
‘पापा शहर लौटने के लिए आप कैसे बोल रहे हैं? आपने ही तो मुझे सिखाया है कि अत्याचारों से लड़ना हर समझदार के लिए आवश्यक है, चाहे अत्याचार खुद के या किसी गैर के ऊपर हो। अत्याचार तो सिर्फ अत्याचार होता है, अत्याचार का प्रतिकार न करना, खामोश रहना, यह अत्याचार करने से भी भयानक है। आपकी उस सीख का क्या हुआ पापा?
‘आप कहा करते थे, जनता की लड़ाई जनता के द्वारा, उसकी अगुआई भी जनता के द्वारा। प्रताड़ित किये जाने वाले लोगों को वुद्धिजीवियों द्वारा वैचारिक सहायता देनी चाहिए, जिससे लड़ाई की धारा अराजक न होने पाये। मैं तो आपके साथ नहीं लौटने वाली। गॉव वालों को असहाय छोड़ कर मैं नहीं जा सकती पापा।’
कुमुद की बातें प्रोफेसर आलोकनाथ को बहुत बुरी लगी थीं...
‘लगता है, कुमुद मनबढ़ होती जा रही है और अपने लिए हुए फैसलों के प्रति कट्टर भी।’
बहुत कुछ कुमुद के बारे में सोचने लगे थे आलोकनाथ। जैसे यही कि कुमुद को खुली सोचों का नागरिक नहीं बनने देना चाहिए था। यह तो अतुकांत कविता की तरह मर्यादा के नियंत्रणों को तोड़ रही है। इसे पता ही नहीं कि जीवन जीने के तरीकों में आत्मनियंत्रण की भूमिका होती है। अभी से ही मनमानी पर उतर आई है, बोल रही है, वापस नहीं लौटना। मेरी समझ में नहीं आ रहा यहां रुक कर करेगी क्या? क्या आन्दोलन चलाएगी? क्या करेगी आखिर यहां रुक कर?
‘नहीं तुझे मेरे साथ चलना ही होगा, मेरे बारे में सोचो न सोचो, कम से कम मनीष के बारे में तो सोचो, उसे बुरा लगेगा।’
सख्त हो गये थे आलोकनाथ, उनकी ऑखें लाल होने लगीं थीं और चेहरे पर लोहे सी गर्मी पसर आई थी। एक दम से लाल लाल, तपते तवा माफिक। होठ सूखने लगे थे, उंगलियां हरकत में आ गई थीं जैसे कुमुद को मार ही देंगे पर उन्हांेने कुमुद को कभी मारा नहीं था, मारना तो दूर गुस्सा कर डांटा भी नहीं था। जब कभी कुमुद की मॉ कुमुद की युवा शरारतों पर डांट दिया करती थीं, तब वे पत्नी पर बरस पड़ते थे। आलोकनाथ ने कुमुद की तेज तर्रार छाया में छरहरा जवान लड़का देखा था, समय से मुठभेड़ करने वाला तथा अपने पैरों पर खड़ा होकर आसमान में छेद करने वाला, साथ ही साथ अपने हित अहित के द्वन्दों को अनुकूलित करने वाला, पर यह कुमुद तो जाने क्या सोच व गुन रही है।
‘आन्दोलन करेगी, गिरफ्तारी देगी, नारे लगायेगी, इन गॉव वालों के साथ। इसने मुझसे कुछ नहीं सीखा। इसे तो यह भी नहीं मालूम कि लड़ाइयां विचारों के औजारों से लड़ी जाती हैं... लड़ाई लड़ने के लिए विचारों को जांचा परखा जाता है, फिर युद्ध की चुनौती स्वीकार की जाती है, तूं तो पहले ही चुनौती देने लग गई हो।’
आलोकनाथ छटपटाती सोचों में थे, कुमुद को दुबारा आदेशित किये...।
‘चल मेरे साथ, यहां नहीं रुकना है’
पर कुमुद को तो खुद को प्रमाणित करने वाली दुनिया दीख रही थी, शहादत वाली, वलिदान वाली, सिर्फ अपने लिए क्या जीना, जिया तो दूसरों के लिए जाता है। उसने आलोकनाथ से साफ बोल दिया कि उसे नहीं लौटना तो नहीं लौटना।
कुमुद तो अपने पापा के प्रति पहले से ही सचेत थी और उसने तय कर लिया था कि उसे क्या करना है तथा कैसे करना है? वह अपने पापा को लगातार समझने की कोशिश कर रही थी, पर समझा नहीं पा रही थी। कुछ समय बाद तो वह उनके बारे में बहुत कुछ जान गई थी।
वह उन कामरेडों को भी संदेह से देखने लगी थी, जो वैचारिक ज्ञान अर्जन के लिए उसके पापा के पास आया करते थे। क्या उन्हें नहीं पता है कि ये जो कामरेड आलोकनाथ हैं, वे अक्षरों के युद्धभमि के योद्धा हैं...। इनके तमाम भाषण कामरेडों के द्वारा संसदीय प्रणाली स्वीकार करने के बाबत थे। जो काफी महत्वपूर्ण तथा गंभीर थे। वे एक ऐसे कामरेड हैं जिनसे कोई माई का लाल तर्कों में जीत नहीं सकता। इनके पास बने बनाए तर्कों व मन्सौदों का खजाना है। संसदीय लाईन पर चलने के औचित्य को कामरेड आलोकनाथ ने तत्कालीन परिस्थितियों में अनिवार्य बताया था तथा उसे समाज बदल का कारगर औजार भी प्रमाणित किया था। देश भर में बिखरे कामरेडों को जान पड़ा था कि उनके बीच आलोकनाथ के रूप में कोई देवदूत है, फिर तो वे संसदीय लाईन को समाज बदल का कारगर तरीका मान लिये थे।
पढ़ाई के अन्तिम वर्ष में एक दिन कुमुद ने अपने पापा को छेड़ा था.....
‘पापा हरावल दस्ता क्या होता है? क्या आप कभी इस दस्ते में रहे हैं?’
आलोकनाथ पसीने से सरोबार हो गये थे, तत्काल उनका ज्ञान बौना पड़ गया था तथा उŸार देने में असमर्थ हो गये थे.
कुमुद ने दुबारा पूछा था...
‘पापा क्या होता है, हरावल दस्ता?’
‘इसे लड़कू दस्ता बोलते हैं बेटा’
‘कैसा लड़ाकू दस्ता?’
‘अरे उनका दस्ता जो क्रूर हुकूमत बदलने के लिए हिंसा का सहारा लेते है.. सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ने वाले लड़ाकू दस्ते को, हरावल दस्ता बोलते हैं, पर यह सब तूं काहे पूछ रही है?’
‘बस ऐसे ही पापा, कोई खास बात नहीं, मैं जानना चाह रही थी कि आपकी लाईन क्या है? सुना है आप भी कभी भूमिगत थे और जनचेतना के हरावल दस्ते में रहे थे। अब आप संसदीय लाईन पर हैं, वैसा कुछ नहीं कर रहे हैं जिससे भूमिगत रहना पड़े, इसीलिए पूछ रही हूॅं पापा।’
आलोकनाथ कुमुद का चेहरा देखने लग गये थे। उन्हें समझ आ रहा था कि कुमुद कोई चुनमुन चिरैया नहीं है, इसकी ऑखों में तरतीब से जलने वाली आग है, ऐसी आग जो बनावटी तथा सजावटी चेहरों को भस्म कर दिया करती है। आलोकनाथ कुमुद के चेहरे पर अपनी ऑखें नहीं टिका पाये थेे। उन्हांेने अपना मुंह आलमारी में सजा कर रखी किताबों की तरफ घुमा लिया था।
आलमारी में ढेर सारी किताबें रखी हुई थीं। वहां ऐसी भी किताबें थीं जिसमें दुनिया में हो चुके सभ्यतागत बदलावों को विश्लेषित करने वाले खोजपूर्ण आलेख प्रकाशित थे। उनमें खास बात यह भी थी कि उन बदलावों के तरीकों के विशद वर्णन थे। आलोकनाथ उन वर्णनों को जब तब पढ़ा करते थे और अपनी मानसिक ऊर्जा बढ़ाया करते थे। उनमें कुछ आलेख ऐसे भी थे जिनमें उनके करतबों का प्रतिबिम्ब दिखता था। जिन्हें पढ़ कर वे घबरा जाया करते थे और आत्मपरीक्षण करने लगते थे।
‘नहीं,ं नहीं, वे संशोधनवादी नहीं हैं, संशोधनवादी तो उन्हें कहा जाना चाहिए जो सŸााप्रबंधन के समर्थक हों। ठीक है, वे हरावल दस्ते में नहीं हैं, समाज बदलने के लिए हिन्सा का समर्थन नहीं करते पर वैचारिक लड़ाई में तो वे किसी योद्धा से कम नहीं हैं। उन्हांेने सŸाा का कभी समर्थन नहीं किया।’
आलोकनाथ अकेले शहर लौटे, कुमुद आलोकनाथ के साथ नहीं लौटी, वह गॉव में ही रह गई। गॉव में गई तो गॉव वालों का बन कर रह गई। उनके आन्दोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन कर। वह मनीष के बारे में आश्वस्त थी कि उसे समझा लेगी, सो उसे मनीष की चिन्ता नहीं थी।
मनीष परेशान, परेशान था, आखिर कुमुद कहां चली गई? वह कभी इस तरह से बाहर कहीं नहीं रुका करती थी, चाहे जितनी रात हो जाये, घर अवश्य ही लौट आती थी। उसने आलोकनाथ को फोन मिलाया...
‘सर! कुमुद नहीं आई क्या अभी तक।’
‘हां वह वहीं गॉव में रुक गई है, उसे लगता है उसकी जरूरत गॉव में है।’
‘कब तक वापस लौटेगी? कुछ बताया है क्या?’
‘नहीं, इस बारे में उससे कोई बात नहीं हुई’
मनीष लगातार कुमुद को फोन मिला रहा था पर उसके मोबाइल का स्वीच आफ चल रहा था, परेशान हो कर उसने आलोकनाथ से पूछा था।
मनीष को अपने घर में भला नहीं लग रहा था। वह तो पहले से ही चुनाव की हार के गम में डूबा हुआ था। सारी जमा पूॅजी उसने चुनाव में फूंक दिया था, इतना ही नहीं गॉव की कुछ जमीन भी बिक गई थी। ऐसे तनाव भरे समय में उसके लिए कुमुद ही सहारा थी। वह मान कर चल रहा था कि वह जिन्दगी की सारी उलझनों को कुमुद के साथ रहते हुए सुलझा लेगा। देर रात तक वह कुमुद की प्रतिक्षा करता रहा था। नींद ने उसे कब जकड़ लिया, उसे पता ही नहीं चला। नींद खुलने पर उसने देखा कि घर के सारे दरवाजे खुले हुए हैं...
‘कोई अनहोनी नहीं हुई?’ मनीष दरवाजे बन्द करना भूल गया था।
कुमुद की प्रतिक्षा करते करते सात दिन गुजर गये। कुमुद का फोन नहीं आया और न ही उसका फोन मिल रहा था। मनीष घबड़ा गया, हुआ क्या आखिर? ऐसा तो कुमुद कभी नहीं करती थी, कहीं बीमार तो नहीं हो गई, गॉव का पानी लग गया होगा या मच्छरों ने काट लिया होगा।
मनीष अखबारों में लगातार पढ़ा करता था कि गॉव वालों के सक्रिय विरोध के कारण पहड़िया टोला में कारखाना बनना मुश्किल हो गया है। कई बार ग्रामीणों तथा पुलिस के बीच हिन्सात्मक झड़पें हो चुकी हैं। कई ग्रामीणों की गिरफ्तारियां भी की गई हैं। कहीं कुमुद भी गिरफ्तार तो नहीं हो गई?
मनीष ने एक दिन आलोकनाथ से कुमुद के बारे में दुबारा पूछा था पर उन्हें भी कुमुद के बारे में कुछ नहीं पता था। वे कुमुद से नाराज थे, सो उसका हाल अहवाल नहीं ले रहे थे। आलोकनाथ ने तो कुमुद को फटकार ही दिया था।
‘जा जो करना हो कर, तुझे मरना है तो मर। मैंने तो सोचा था कि किसी कालेज में लगवा दूंगा। कालेज के लिए लेक्चररों की नियुक्तियों वाले चयन समितियों में बहुत सारे लोग मेरे हैं। किसी को बोल दूंगा, पर नहीं, तुझे तो क्रान्तिकारी बनना है तो बन। तुझे कौन समझाए कि हमारे देश की समाजार्थिक परिस्थितियां क्रान्ति के अनुकूल नहीं हैं। सामाजिक क्रान्ति का अभियान चलाने के लिए यहां के लोगों में वह गुस्सा नहीं है जो होना चाहिए। किसी खास मुद्दे पर आकस्मिक ढंग से गुस्सा हो जाना तथा सामाजिक बदलाव के लिए सŸाा के प्रबंधकीय तकनीकों पर गुस्सा हो जाना, दोनों बातें अलग अलग होती हैं।... क्रान्ति के लिए सŸााप्रबंधन के तकनीकों पर गुस्सा आवश्यक है जो दूर दूर तक भारतीय समाज में नहीं दीख रहा। हम भारतीय लोग तटस्थता और मौन के सनातनी पूजक हैं, हम सारी चीजों को दैवीय मानते हैं।’
आलोकनाथ कुमुद के कारण तनाव में थे, तनाव में क्यों नहीं रहते, वही उनका सहारा थी। पर करते क्या कुमुद तो जुनूनी हो गई थी, जिसे आलोकनाथ एक गलत कार्यवाही मानते थे। कहते थे......
‘उŸोजना शुचितापूर्ण चेतना को लील कर व्यक्ति को अराजक बना देती है, जाहिर है, अराजकता से समाज बदल नहीं हुआ करता’
मनीष को कुमुद के बारे में आलोकनाथ से कोई जानकारी नहीं मिली। परेशान हो कर वह अपने गॉव चला गया, जहां आन्दोलन चल रहा था। वहां कुमुद नहीं थी। वह संतोष के साथ भूमिगत हो चुकी थी।
’यह संतोष कौन है?’
मनीष के लिए बहुत बड़ा सवाल था। संतोष के बारे में उसे जो जानकारी मिली वह चौंकाने वाली थी। मालूम हुआ कि संतोष बिहार का रहने वाला है और किसी भूमिगत संगठन का अगुआ है। संतोष के सक्रिय सहयोग व समर्थन के कारण गॉव वालों को अब तक नहीं उजाड़ा जा सका है। गॉव वालों की प्रशासन से कई बार आमने सामने की लड़ाइयां हो चुकी हैं और प्रशासन के लोग भाग खड़े हुए हैं...। लड़ाइयों के कारण प्रशासन ने फिलवक्त विस्थापन के काम को रोक दिया है।
संतोष के बारे में जानकारी जुटाना मनीष के लिए खतरनाक भी हो सकता था, क्योंकि गॉव के लोग गरम थे, एक महीने पहले ही तो गॉव वालों की वन प्रशासन से आमने सामने की झड़प हुई थी। गॉव वाले आग में जलने के लिए तैयार थे, लगता था कि वे आग में से तप कर निकले भी हैं। लगता उनके लिए सामाजिक व्यवस्था, कायदा, कानून तथा समरसता का मामला, महज कुछ शब्द भर हैं जो समय के साथ भोथरे तथा निष्प्रयोज्य हो चुके हैं...।
मनीष गॉव में जिस आदमी के घर पर था, वह भी खूब खूब डरा हुआ था। डरते हुए बताने लगा...
‘बबुआ जाने का हो इस गॉव का, सिपाहियों को मारना ऐसा तो हमने नाहीं सुना था न देखा था बबुआ! पर उहो देखना पड़ा हमैं... संतोष गुरुजी ने ललकार दिया फिर क्या था गॉव के लड़के सिपाहियों पर टूट पड़े। लात जूते बरसने लगे, सिपाहियों पर। दो बार तो पहले भी ऐसा हो चुका था बबुआ। बीसों लोग गॉव के गिरफ्तार हो चुके हैं। संतोष गुरुजी और उनके साथ रहने वाली मेम साहब जाने का लगती हैं, गुरु जी की? हमैं तो जान पड़ता है कि मेहरारू ही हांेगी। गॉव में मारपीट के बाद दोनों लोग जाने कहां भाग गये। उन दोनों लोगों का कहीं अता पता नाहीं है। हमरे गॉव के लड़कवे हैं न बाबूजी! संतोष गुरुजी को कउनो देवता बूझते हैं, ओन्हई के आगे पीछे लगे रहते हैं, लड़िकवन के कुछू बोलो तो गरम हो जाते हैं.....।
‘बोलते हैं कि ई सब हम लोगन कऽ राज है, वन हमार, पहाड़ हमार, नदी नाला, ईहां जौन कुछ है, सब हमार है। बाहरी लोगन के हम लोग ईहां नाहीं आने देंगे।’
‘जाने दो बबुआ का करोगे सब जानकर। हमार बात केहूॅ से जीन बताना, तोहैं भलमानुष बूझ कर हमने बताय दिए, नाहीं तो हम लोगन कऽ मॅुह सिलाय गया है। एक बात अउर है बबुआ! तूंहो ए गॉव से जल्दी भाग निकलो। पुलिस के लोग अगलै बगल होंगे। देख लेंगे तो तोहैं भी संतोष गुरुजी का साथी बूझ कर जेहल में डाल देंगे। भागो भागो बबुआ!’
मनीष उस गॉव वाले की बातें सुन कर अनिर्णय की स्थिति में था, आखिर यह संतोष कौन है और कुमुद का उससे क्या लेना देना है? उसे विगत ख्याल आने लगा...
वह भी तो पहले कुमुद को नहीं जानता था। हालांकि दोनों एक ही विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे। पर थे अलग अलग कालेजों में, अलग अलग विषयों में पोस्ट ग्रेजुएसन कर रहे थे। छात्र संघ के चुनाव के दौरान कुमुद उससे मिली थी, वह भी छात्र संघ की अध्यक्षी की प्रत्याशी थी। मनीष तो था ही। मनीष चुनाव जीत गया, उसे भारी समर्थन हासिल हुआ था। दूसरे नम्बर पर कुमुद थी। कुमुद ने मनीष को जीत की बधाई दी थी। फिर मिलने का सिलसिला जो चला तो चलता ही गया। दोनों साथ रहने लगे। साथ रहने में दोनों के सामने कोई दिक्कत नहीं थी, दोनों खुले दिमाग के थे और मानते थे कि नर और नारी के रिश्तों में सखी-सखा वाला मन ही आवश्यक होता है। दोनों वादाखिलाफी को बुरा मानते थे फिर तो उनके लिए विवाह का नाटक आवश्यक नहीं था। इसी सोच के कारण दोनों ने वस्तुतः विवाह भी नहीं किया। हां दोनों ने आलोकनाथ के चरण छू कर आशीर्वाद जरूर लिए थे और साथ साथ रहने लगे थे। कुछ दिनों में ही दोनों की सांसें व घड़कने एक दूसरे को सहलाने, चूमने लगीं थीं..।. जैसे उन्हें अलग होना ही नहीं है हालांकि वे अर्धनारीश्वर नहीं थे, पर थे, उसी के समरूप, एक दूसरे में विलयित।
मनीष का सोचना था कि जिस तरह उसने छात्रसंघ का चुनाव जीत लिया था अपने व्यवहार और विचार के आधार पर, उसी तरह विधायकी भी जीत लेगा, पर नहीं जीत सका और हार गया। हार भी पांचवें नम्बर की। कुमुद ने चुनाव में मनीष के लिए जी जान लगा दिया था। जितना वह कर सकती थी।
कुमुद के बारे में जानकारी लेकर मनीष शहर लौट आया, उसे लौटना ही था, का करता गॉव में... चार दिन बाद उसे एक चिठ्ठी मिली। वह चिठ्ठी पढ़ने लगा...
‘प्रिय मनीष!
मैंने तुझे गॉव में देखा, मुझे मालूम था कि तुम मुझे ढूढने जरूर आओगे, मैंने संतोष को तुम्हारे बारे में बता दिया था। संतोष तुझसे मिलना भी चाहता था पर सुरक्षा कारणों से हमलोग तुझसे नहीं मिल पाये। हम दोनों तुझे देख रहे थे तथा उस आदमी को भी, जो तुझसे बतिया रहा था।
तुम एक अच्छे आदमी हो मनीष! ऐसा मैं कई बार संतोष को बोल चुकी हूॅं, तुझसे बहुत कुछ सीखने और जानने का लाभ मुझे मिला है, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती। अब संतोष के साथ रहते हुए मुझे रोमांचक अनुभव मिल रहे हैं...
जंगल, नदी, नाले, पहाड़, पेड़, झाड़ियंा और चौड़े चौड़े हरियाई धरती के विशाल भूखण्ड, पŸाों का हरापन, उनका सरसराना, मादकता में डूब कर झूमना सारा कुछ देखो तो देखते रह जाओ। शायद तुमने पŸिायों से लदी टहनियों को, झूम झूम कर आपस में बोलते बतियाते देखा और महसूसा होगा। जंगल की मादकता में डूबना मुझे तो बहुत ही अच्छा लगता है।
जानते हो मनीष! यह पत्र लिखते समय मैं पहाड़ की एक चोटी पर बैठी हुई हूॅं, इसे हिमगिरि का उŸाुंग शिखर समझ सकते हो, संतोष मुझे भीगे नयनों से देख रहा है, मैं शीतल प्रवाह की तरह संतोष को खुद में बहाए जा रही हूॅं, मजा यह कि वह भी मेरे प्रवाह के साथ बह रहा है।
मनीष याद करो वे दिन, जब मैं तुम्हारे साथ तुम बन गई थी और तुम मैं बन कर मुझे दिल की अतल गहराई में डुबोए जा रहे थे फिर उस गहराई में अचानक हमदोनों तैरने लगे थे। याद हैं न वे दिन। क्षमा करना मनीष! मैं तुमसे बिना कुछ बताए ही यहां आ गई, मैं जानती हूॅं कि मुझे तुमको बता देना चाहिए था। यहां आने पर संतोष मिला तथा गॉव के लोग, जो परेशान हैं जिन्हें विस्थापित किया जाना है। मुझे लगता है कि गॉव वालों के लिए मैं कुछ कर सकती हूॅं। विस्थापन के खिलाफ एक सक्रिय मोर्चा बना सकती हूॅं, यानि कि एक लड़ाई लड़ी जा सकती है, सरकार की जनविरोधी नीतियों एवं कार्यक्रमों के खिलाफ। कुछ ऐसी ही ऊर्जां संतोष में भी मैं देख रही हूॅ... यही ऊर्जा हासिल करने के लिए जाने कब से परेशान परेशान थी मैं...।
‘बुरा मत मानना मनीष! समाजबदल की ऊर्जा से तो तुम भी लबालब हो पर तुम्हारी ऊर्जा में संभ्रांतता का घोल है। जिसमें दिमाग और कंठ का मिश्रण है, जबकि संतोष की ऊर्जा में पेट ही पेट है। पेट की धधकती आग है, वही आग जो मुझे चिनगारी बनने के लिए प्रेरित करती है, वही मैं संतोष की चेतना में देख रही हूॅं, पर एक बात साफ है कि आजादी पूर्वक जीवन जीने का रास्ता तुमने ही मुझे सिखाया है। जिसका परिणाम है कि मैं इस पत्र में वह सब लिख पा रही हूॅं जो मुझे नहीं लिखना चाहिए था, पर मुझे यकीन है कि तुम एक सचेतन आदमी हो, दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना जानते हो, यही तुम्हारी आदत तुम्हें मुझ पर नाराज होने से रोकेगी। तुम खुद को नियंत्रित कर यह प्रमाणित भी कर सकोगे कि तुम आजादी का सम्मान करना जानते हो, तथा समानधर्मा रिश्तों का निर्वहन भी।
‘सच बताऊं मनीष! आज जिस लाईन का चुनाव मैं कर सकी हूॅं, वह तुम्हारी ही सीख है। तूंने ही सिखाया है कि मित्रता में झूठ बोलना अपराध होता है, सो सच सच बोल रही हूॅ...
हम इस समय ऐसे मोड़ पर हैं, जहां तमाम तरह के आकस्मिक निर्णयों के लिए सलाह मशविरे की जरूरत पड़ती है। मेरे साथ तुम्हारा न होना काफी अखर रहा है, पर मैं तुम्हारी प्राथमिकताओं को जानती हूॅ...। सो तुमसे यह नहीं बोलूंगी कि तुम भी हमारे साथ जुड़ जाओ, फिर हम एक साथ मिल कर नया सबेरा देखने की कोशिश करंे...।
खैर क्षमा करना साथी! और उस समय को भूलने की कोशिश भी, जिसे हम दोनों ने एक दूसरे में विलयित हो कर जिया था। संभव है कि अब तुमसे मुलाकात न हो, मैं जिस रास्ते पर चल पड़ी हूॅं उसके हर कदम पर मृत्यु थिरकती रहती है।
एक निवेदन यह भी है कि हमारे बीच संबधों का जो अन्तर्लयन था, उसे प्रलय न समझना तथा प्रकृतिस्थ होने के संभव उपायों को आजमाते रहना। यहां मैं तुम्हारी स्मृतियों के मनोरम कौतुकों में गोते लगाती रहूॅंगी। हो सके तो पापा का भी ध्यान रखना।’
पत्र लम्बा था, पत्र के एक एक शब्द मनीष को टुकड़ों में बांट रहे थे। मनीष विखंडित हो कर किसी कठिन कविता का हिस्सा बनता जा रहा था। उसे आने वाले समय के साथ कुमुद से जुड़ी यादों की संगति बिठाने का काम करना था तथा मान कर चलना था कि समय उससे आगे निकल चुका है। वह बीते समय में अब नहीं लौट सकता, उसके सारे दरवाजे बन्द हो चुके हैं...।
पत्र पढ़ लेने के बाद मनीष चौंक गया...
‘तो क्या कुमुद जिस ‘लाईन’ की बातें, बात बात में किया करती थी, वह ‘लाईन’ यही है। इसी लाईन पर वह चलना चाहती थी, यानि कि संतोष की लाईन। संतोष की लाईन ही अगर कुमुद को पसंद थी तो मुझसे जुड़ने का मतलब?’ क्या उसे नहीं पता कि ‘लाइन’ में लगना और ‘लाइन’ बन जाना अलग अलग बातें होती हैं’
‘मुझसे वह जुड़ी तो उसे पता था कि मेरी लाईन का बाजार है और मैं छात्रसंघ का चुनाव जीत चुका हूॅ, वह विजेता के साथ थी, पराजित के साथ नहीं। अब तो मैं हारा हुआ, औसत दर्जे का आदमी भर ही हूॅ। भला मेरे साथ कुमुद कैसे रह सकती है? अगर उसे कहीं जाना था, तो चली जाती, यह क्या है कि बिना बताये ही चली गई। कुमुद को समझना चाहिए था कि ’आज का राजनीतिक समय पहले वाला नहीं है, आज तो केन्द्र की सरकार ही नहीं प्रदेशों की सरकारें भी वामपंथियों तथा जनवादियों के विचारों के खिलाफ हैं। वामपंथी व जनवादी शाक्तियों को जनता ने मौजूदा चुनावों में नकार दिया है।
मनीष परेशान था। वह दोस्तों से कुमुद के बारे में क्या बताता, कि वह उसे छोड़कर चली गई है अपनी ‘लाइन’ बनाने के लिए।
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हिंदी उपन्यास/रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास पट्टा चरित
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रामनाथ शिवेन्द्र
'''रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास पट्टा चरित'''
मनीष पब्लिकेशन्स
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Sonia bihar, Delhi
दिल्ली-110090
ISBN : 978-93-81435-06-9
© ramnath shivendra
Mobile.7376900866
Pattacharit ...Novel
By. RAM NATH SHIVENDRA
'''अपनी बात'''
पट्टा चरित उपन्यास के बारे में कुछ कहना, न कहना दोनों बराबर है। उपन्यास खुद आपसे संवाद करेगा, संवाद ही नहीं प्रतिवाद भी करेगा तथा अपने सृजन के बारे में बाजिब बयान भी देगा तथा बताएगा कि मौजूदा शदी में भी इस उपन्यास की जरूरत क्या है? वैसे यह बता देना लेखकीय औचित्य है कि इसकी कथा आठवें दशक में ही उपन्यास का रूप धर कर ‘सहपुरवा’ उपन्यास के नाम से मेरे मित्रों के सहयोग से प्रकाशित हो चुकी थी। वह मेरा पहला औपन्यासिक प्रयास था। इसमें पात्रों के संवाद की भाषा हिन्दी तथा भोजपुरी बलिया, गोरखपुर, आजमगढ़, जौनपुर वाली नहीं थी बल्कि ठेठ बनारसी या बिजयगढ़िया थी। संवाद के अलावा सारा कुछ खड़ी बोली में था।
तो कथा पुरानी है आपात काल के आस पास की। सवाल है कि पुरानी कथा को फिर से क्यों? आठवें दशक से लेकर अब तक के गॉवों की जॉच पड़ताल कर लीजिए और एक झटके से आपात काल को फलांग कर इक्कीसवीं शताब्दी में घुस आइए फिर देखिए कि क्या गॉव बदल गये? गॉवों की संस्कृति बदल गई? और गॉव ऐसे हो गये कि बिना संकोच ‘अहा ग्राम्य’ कहा जा सके, हॉ गॉवों से पोखर गायब हो गये, पनघट गायब हो गये, आजादी मिलते ही किसिम किसिम के विस्थापित पैदा हो गये, कुछ कारखानों के निर्माण के कारण, कुछ सड़कांे, नहरों के निर्माण के कारण तो अधिकांश वन प्रबंधन की दादागिरी और वनअधिनियम की धारा 4 तथा 20 के कारण। तो गॉवों में अब जो निवसित हैं वे या तो विस्थापित हैं या ऐसे है जो शहर में कहीं खप नहीं सकते।
होमगार्ड से लेकर स्कूल के मास्टर तक, चपरासी से लेकर बड़े ओहदे तक का पदाधिकारी बना कर तन बल तथा वुष्द्वि बल वाले व्यक्ति को गॉवों से छीन लिया गया है, कोशिश की गई है और की जा रही है कि वे गॉव में रहने न पाये, उन्हें किसी भी तरह से सत्ता प्रबंधन से जोड़ लिया जाये। वही हुआ। आज के समय में गॉव में वही बचे हुए है जिनके पास जीवन जीने के लिए कहीं कोई ठौर नहीं तथा वे चौदह दिन की हवालात की योग्यता वाले हैं। इनसे गॉव तो नहीं बचेगा।
इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय है भूमिहीन गरीबों को भूमि आवंटन। आपात काल
के दौरान कांग्रेस का यह प्रशंसनीय अभियान था जिसे बाद में किसी ने लागू
नहीं करवाया।अभियान तो ठीक था पर जो तत्कालीन सामंत थे उनके लिए यह अभियान महज राजनीतिक खेल था। प्रस्तुत उपन्यास में सवालों दर सवालों से गुंथी वही कहानी दुहराइ गई है कि आजादी के बाद कितनी आजादी मिली लोगों को, सन्दर्भ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक किसी भी तरह का हो। एक भूमिहीन व्यक्ति गॉव में कैसे निवसे, किस तरह से रहे? रहे तो किस किस को सलाम करे यह सवाल जैसे पहले था वैसे आज भी है।
यह तो नहीं कहा जा सकता कि गॉव नहीं बदले, गॉव बदले हैं पर गरीबी का प्रतिशत जिन जिन क्षेत्रों में जैसे पहले था वैसे ही आज भी है। इसी लिए कहा जाना चाहिए कि गरीबी पूॅजीवादी सत्ता प्रबंधन का आर्थिक उत्पादन है और आज तो गरीबीे उत्पादन में वृद्धि हो चुकी है। आखिर किसे पड़ी जो जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी इस पर गुने जाहिर है कि गरीबी पूॅजीवादी सत्ता प्रबंधन की रहस्यमय आर्थिक प्रक्रिया है गरीबी रहेगी तभी तो अमीरी रहेगी। हॉ गरीबी की उग्र भूख गरीबों में पैदा न होने पाये इसके समाधान के लिए पूॅजीवादी सत्ता प्रबंधन सभी को भोजन का अधिकार, सभी को शिक्षा का अधिकार, सभी को बुनियादी आय तथा कुछ मामलों में सब्सिडी जैसी रियायतें प्रदान किया करती है जिससे सरकार की छवि लोकतांत्रिक बनी रह सके। पर इससे क्या होगा?
होगा तो तब जब यह पता लगाया जाये कि महज दस फीसदी लोग देश की समस्त कुदरती संपदा पर काबिज कैसे हैं, कौन कौन से कानून है जो उन्हें अमीर बनाते हैं। हमारे कानूनों में कहॉ कहॉ दरारे है जिनमें से इस कथा के रामभरोस जैसे लोग सभी की छाती पर कोदो दरकर उग जाया करते हैं जिनके दमन से फेकुआ, सुमिरनी, औतार, जोखू तथा बिफना को गॉव से भागने के लिए विवश होना पड़ता है। प्रस्तुत उपन्यास का यही आशय है कि हम पता लगा सकें कानूनी दरारों को जिनसे होेते हुए दमन हमारे ग्राम्य संस्कृति तथा जीवन को लील रहा है। चिमनियॉ चाहे जितनी उग जॉये पर गॉव की हरियाली तथा पनघट की मोहकता नहीं पैदा कर सकतीं। जीवन तो गॉवों में है क्योंकि वहॉ अनाज के दाने हैं, दानों पर मन के संगीत लिपे पुते हैं, उसे मन के राग संवारते हैं पोंछते है, बीनते हैं। आइए गॉव बचायें गॉव के लिए कुछ करें। आशा है प्रस्तुत उपन्यास पाठकों की कुदरती प्रतिक्रियाओं को हकदार बनेगा। इसी आशा में....
रावर्ट्सगंज,सोनभद्र 2019
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'''‘जुबान काट दी जांए, संप्रभुतांए
छीन ली जांए फिर भी कथाएं नहीं मरतीं
आइए कथा के साथ चलें कुछ दूर ही सही, पर चलें’'''
‘का रे! बिफना रापटगंज में कवि सम्मेलन है, चलना है कि नाहीं, चलो बुड़बक! हमहूं चलेंगे। बुल्लू के बिरहवा में परसाल बहुत मजा आया था। कवि सम्मेलन में तो और भी मजा आएगा।’
‘का सोच रहे हो यार! बोलते काहे नाहीं, कुछ तो बोलो’
हल जोतते हुए फेकुआ ने बिफना से पूछा। उसके साथ बिफना भी हल जोत रहा था। हल जोतते हुए बिफना कैसे बोले। हल जोतना और बतियाना दोनों संभव नहीं। उसने हल हांकना बन्द कर दिया और मेड़ की तरफ बैलों की जोड़ी खड़ा कर बैलों को सहेजा..
‘होर्र होर्र... यानि रुक जाओ, यहीं खड़े रहो। बैल भी किसी आज्ञाकारी की तरह खेत के एक किनारे खड़े हो गये जहां फेकुआ ने हल चलाना बन्द कर दिया था।
‘संघी लोग अइसहीं खड़ा रहो, कहीं भागना नहीं’
हल में नधे बैलों को उसने दुबारा सहेजा और जेब से सुर्ती, चूना निकाल उसे मलने लगा। सुर्ती मलते हुए उसने बिफना से पूछा....
‘हां रे बिफना! परउ साल तऽ कवि सम्मेलन भया था रापटगंज में। जोखुआ बता रहा था कि बहुत मजा आया था। चलो ए साल हमहूं चलेंगे, तूं भी चलेगा नऽ।’
तीन चार बार सुर्ती ठोंक ठाक कर बिफना ने सुर्ती वाली हाथ की गदोरी फेकुआ की तरफ बढ़ा दिया। बिफना की गदोरी में से फेकुआ सुर्ती निकाल ही रहा था कि गॉव के जाने माने मुखिया रामभरोस वहीं आ गये। रामभरोस खेतों की निगरानी के लिए निकले थे। काम की निगरानी करने के लिए वे अक्सर शाम को खेत की तरफ निकल जाते हैं।
सुर्ती मुंह में डाल कर फेकुआ ने रामभरोस से पूछा, वह उन्हें चिढ़ाना चाहता था। अब पहिले वाला जमाना नाहीं है कि मजूरों को हंका दिया और काम शुरू, चाहे जोतनी हो, लवनी या कुछ भी।
‘सरकार! आप की जोतनी नाहीं हो रही है का?’
‘नाहीं रे! आज काम बन्द है, साले एक भी काम पर नहीं आए, सब बउराय गये हैं। गांड़ मोटा गई है सालों की। सालों को इनिरा ने पट्टा का दिला दिया कि सभी का दिमाग सिकहरे चढ़ि गया है। जब देखो साले काम बन्द कर देते हैं। कातिक का महीना है और हमारी जोतनी बन्द है। खेतवा उखड़ जाएगा तब का होगा? राड़ कूटने तथा चाम पीटने पर ही ठीक रहते हैं। ठीक रखने के लिए पीटना दोनों को पड़ता है। राड़ को भी तथा चाम को भी।’
रामभरोस ने बिफना व फेकुआ को ही नहीं पूरी हरिजन बिरादरी को उलाहा। जैसे पूरी बिरादरी ही हरामी हो। रामभरोस जैसे सामंत हरिजनों को हरामी मानते भी हैं, उनकी सभ्यता ने उन्हें इसी निरर्थक सोच से गढ़ा हुआ है।
सोनभद्र में बहुत पहले से ही हल जोतने का काम हरिजन किया करते हैं। उनकी आबादी भी सोनभद्र में उल्ल्ेखनीय है। वैसे दलितों में कोल, धांगर चेरो आदि जैसी अन्य दलित जातियां भी सोनभद्र में बसती हैं जो हल जोतने का काम पारंपरिक रूप से करती चली आ रही हैं। पर हल जोतने वालों में हरिजन ही प्रमुख हैं। एक तरह से हल जोतने के काम में वंशवाद, पहले बाप हल जोतता था, फिर बेटा और बेटे के बाद बेटा। सवर्ण लोग हल जोतने के काम को वंश्षवादी रोग नहीं मानते हैं। राजाओं के वंश्षवाद को लोकतांत्रिक सभ्यता ने प्रमाणित कर उसे खतम भी कर दिया है। अब कोई राजा का बेटा राजा नहीं रह गया है पर मजूरों में चल रहे वंश्षवाद को सायास बचाए रखा गया है।
मजूर का बेटा मजूरी नहीं करेगा तो क्या कलक्टर बनेगा? आज के समय का मजूर एक जाति में बदल चुका है, जैसे बाभन का बेटा बाभन, बनिया का बेटा बनिया, ठाकुर का बेटा ठाकुर, वैसे ही मजूर का बेटा मजूर। मजूर बनने तथा बनते जाने की विवशता पर कोई नहीं सोच रहा बल्कि लोग तो मजूरी की परंपरांए बचाए रखने के बारे में ही किसिम किसिम के नारे लगा रहे हैं।
यह जो हल जोतने की वंश परंपरा है राजाओं व जमीनदारों की वंश परंपरा से मिलती जुलती है। राजपरंपरा को तोड़ दिया गया ताकि जो खानदानी राजा नहीं हैं वे लोकतंत्रा के राजा बन सकें। पर हलवाही की वंशपरंपरा को कौन तोड़ेगा, शायद कभी टूटेगा भी नहीं अगर इस परंपरा को तोड़ दिया गया फिर मजूरी कौन करेगा? संसद में बैठने वाले हों या कारखाने चलाने वाले हों सभी को खाना बनाने वाला रसोइयां, कार चलाने वाला ड्राइबर, महलों में टहल करने वाला मजूर तो चाहिए ही चाहिए। मालिकों का हर हाल में मजूरों के मजबूत हाथ चाहिए और उनकी देह भी।
फेकुआ की अपनी बिरादरी हल जोतने वालों की थी। उसके बपई हल जोतते थे तो उसके दादा भी हल जोतते थे। लोग बताते हैं कि उसके दादा हल जोतने में माहिर थे। एक से एक नखनहा बैलों को जूए में वे नाध लिया करते थे। उनके पास नखनहा बैलों को ठीक कराने के लिए लोग आया करते थे। दो चार दिन वे नखनहा बैलों को हल में नाध कर जोतते थे फिर बैल अपने आप ठीक हो जाया करते थे और आज्ञाकारी की तरह हल में चलने लगते थे। पता नहीं कैसा जादू था उनके पैने में और डांट में। जहां तक उसे मालूम है हल जोतने का काम उसके घर में ही नहीं नाते-रिश्ष्तों में भी चलता रहा है। और आज भी चल रहा है।
अपनी बिरादरी के बारे में रामभरोस की अपमानजनक बातें सुन कर फेकुआ को बुरा लगा। पर वह कर ही क्या सकता था रामभरोस का। हालांकि उसे पता था कि मजूर जनम से मजूर नहीं होते। मजूरों के पास खेती के लिए खेत नहीं है, कोई दूसरा काम उन्हें आता नहीं है, फिर वे का करेंगे हल जोतने के अलावा। भूख की आग बुझाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा। फैकुआ समझने लगा है कि मजूर जनम से मजूर नहीं होते। उन्हें मजूर बनाया जाता है। उसने रामभरोस की बात में बात जोड़ा...कृकृ
‘हां सरकार! आप सही बोल रहे हैं। ई हरिजन, हरिजनै रहि जांएगे, ई बिरादरियय अइसन है, अपनै हथवैं हरवा काहे नाही जोत लेते सरकार! फिर लतियाइए हरिजनों को। बनी मजूरी भी बच जाएगी। एक बात बोलैं सरकार! आपन काम अपने हाथय करना भी चाहिए, गलत तो नाहीं बोल रहे सरकार।’
‘यह साला मजूर हमें समझाय रहा है’ रामभरोस सोच में पड़ गये
रामभरोस को फेंकुआ की बातें बुरी लगीं। लगतीं भी क्यों नहीं, मजूर होते काहे के लिए हैं? मजूरी करने के लिए ही तो होते हैं।’
फेकुआ की बातें रामभरोस काहे सह पाते? हालांकि फेकुआ ने कुछ गलत नहीं कहा था। तमाम सुभाषितों की बातें भी तो यही हैं कि आदमी को अपना काम खुद करना चाहिए पर रामभरोस तो रामभरोस थे अपना काम भी करने की संस्कृति से अलग। अपना काम भी करना उनके लिए शर्मनाक बीमारी की तरह लगता है। अपना काम करेंगे तो उनकी इज्जत भहरा जाएगी। उनकी बखरी पर हर काम के लिए अलग अलग नौकर हैं। कोई पानी पिलाने वाला है तो, कोई गाय, भैंस चराने वाला है तो कोई ट्रेक्टर चलाने वाला है। बखरी के भीतर भी किसिम किसिम की नोकरानियां हैं। बर्तन साफ करने वाली अलग, तेल मालिश करने वाली अलग, मलिकिनों की टहल करने वाली अलग। रामभरोस की बखरी नौकरों के पसीने से न नहाए तो उसकी चमक फीकी पड़ जाए। बखरियॉ तो तब चमकती हैं जब उनके भीतर मजूरों के पसीने नाचते रहते हैं बिना खाए पिए।
‘साले का मन बढ़ गया है, हमरे मुह लग रहा है’
मन में गरियाया रामभरोस ने फकुआ को। कोई दूसरी जगह होती तो रामभरोस फेकुआ को लतियाना शुरू कर देते। मजूरों को लतियाना तथा लतियाते रहना वे अपना पारंपरिक अधिकार मानते हैं पर जगह सिवान की थी। वहां रामभरोस अकेले थे, सिवान में फेकुआ को मारते तो जाने का होता। फेकुआ भी उनसे गुत्थम गुत्था हो सकता था। समय भी तो बदल रहा था। मजूरों को तमाम कानूनी अधिकार दिए जा रहे थे। रामभरोस जानते थे कि अब उनके करतब थाने की निगरानी में हैं, प्रष्शासन की ऑखें जमीनदारों पर अब तनेन भी रहने लगी हैं।
वे प्रत्यशिात डर के कारण चुप हो गए थे।
रामभरोस को पहले से ही पता था कि फेकुआ रियाज मारता है। कुश्ती लड़ता है, शरीर से गठा हुआ है। एक दो आदमी को निपटा सकता है फेकुआ। रामभरोस ने थोड़ा मुड़ कर उसका गठा हुआ शरीर देखा और सहम गये। उन्हें निराशा हुई, फेकुआ की तरह गठे हुए शरीर का एक भी लड़का उन्हें अपनी बिरादरी में नहीं दिखा। परमात्मा भी जाने का करते हैं।
‘साला जाने का खाता है? अरे! का खाता होगा, भात और ‘सिलहट’ (नमक व मिर्चा एक में बारीकी से पिसा हुआ) की तरकारी, बहुत हुआ तो नून रोटी, या नून भात, और का मिलेगा सालों को खाने के लिए फिर भी सालों की ऐसी देह।’
‘जाने का बोल गया साला! अब यही रह गया कि रामभरोस हल जोतें। उनके लड़के हल जोतें। साले ये राड़, रहकार फिर का करेंगे, गद्दी पर बैठेंगे। ठीक है, जमाना बदल रहा है पर इसका का मतलब? कउआ हंस हो जाएगा, बाघ घांस खाएगा।’
उनके मुह से वंशपरंपरा की पगलाई आवाज मन के गहरे में गूंज गई।
रामभरोस काहे हल जोतेंगे? उनके घर में काहे की कमी है। पूरा गॉव उनका है, ठीक है जमीनदारी टूट गई है पर उन्होंने आज भी तीन चार सौ बीघे जमीन कुत्तों, बिल्लियों के नाम से करवाके बचा लिया है। आलीशान बखरी है, जवान बेटा है जो बाहर के अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है। गॉव के वे परधान हैं, कांग्रेसी हैं। बी.डी.ओ. से लेकर दारोगा तक जान पहचान है। जिले का कोई भी आला हाकिम जब भी उनके गॉव की तरफ आता है, उनकी बखरी पर नाश्ता लिए बिना मुख्यालय वापस नहीं लौटता। कौन नहीं जानता कि कलक्टर साहब भूमि आवंटन के सिलसिले में पिछले साल पूरे लहसन के साथ रामभरोस की बखरी पर पधारेे थे। उनकी जोरदार दावत हुई थी। अधिकारी भी दावत का इन्तजाम देख कर अविभूत हो गये थे।
‘और यह फेकुआ!’
रामभरोस से हल जोतने के लिए बोल रहा है। उसे नहीं पता कि रामभरोस ही ऐसे किसान हैं जिन पर सीलिंग का मुकदमा चला था। उन्हीं की पुश्तैनी जमीन पर सहपुरवा ही नहीं कई गॉव आबाद हैं। जमीनदारी न टूटी होती तो किसी गरीब को एक धूर भी जमीन नहीं मिली होती। वैसे भी कई तरह की बातें हैं जो रामभरोस को ‘सरकार’ कहलवाती हैं। ऐसा केवल परंपराओं के कारण ही नहीं तमाम अन्य कारणों से भी हैं। जैसे इलाके में सबसे अधिक धनी-मानी होना, सबसे अधिक जमीन और जोत वाला होना, अधिकारियों का उनकी बखरी पर रोज रोज की दावतें लेना, दबंग होना और हमेशा लठैतों से घिरे रहना। बात बात पर किसी को भी लतिया देना आदि आदि। यही सारी बातें रामभरोस को लोगों से ‘सरकार’ कहलवाती हैं। रामभरोस उस समय फेकुआ से कुछ बोल नहीं पाये पर उनकी भीतरी ऐंठन भी न खुले ऐसा संभव नहीं। उनकी ऐंठन खुली.... जिसेे खुलना ही था, सामंती संस्कृति को भला रामभरोस खण्ड खण्ड टूटने व विखरने कैसे देते।
‘का रे फेकुआ! आज कल ज्यादा रियाज मार रहे हो का? देख रहा हूं कि तोरे देंही पर काफी मांस चढ़ गया है चलो यह ठीक है पर, दिमाग तो नहीं खराब हुआ है नऽ, अगर दिमाग भी खराब हो चुका हो तो बताओकृ.’
अधपकी मूंछें और सुर्ख ऑखों से मिलीजुली रामभरोस की आकृति भयानक हो गईं। उनके चेहरे को सैकड़ों साल के रोब-दाब ने जकड़ लिया। फिर तो उनका चेहरा जो गब गब गोरा था लाल हो गया। एकदम से डरावना। उनका चेहरा देख कर फेकुआ फक्क रह गया। उसके देह की ऐंठन रामभरोस की एक ही घुड़की में खतम हो गई। फेकुआ को अपने कहे पर अफसोस होने लगा। फिर तो कई डरावने देखे दृश्य उसकी ऑखों में तैरने लगे।कृ
फेकुआ की ऑखें उन दृश्यों से भर गईं जब रामभरोस ने रामगढ़ अस्पताल के सामने रमदिनवा हरिजन को बुरी तरह पीटा था। वह गरीब दवा दारू भी नहीं करा पाया। घर में कुछ था ही नहीं, तीन चार दिन बाद मर गया था। दवाई कराता भी कौन, गॉव में किसी की हैसियत ही नही थी जो रामभरोस द्वारा पिटवाए गये आदमी की दवाई करवाये। रामभरोस की बखरी से भी रमदिनवा को कुछ मिलना जुलना नहीं था, बखरी नाराज तो नाराज फिर किसकी हिम्मत जो एक कदम भी आगे बढ़ कर उस बेचारे की मदत करता। बेचारा रमदिनवा तड़प तड़प कर मर गया।
रमदिनवा ही क्यों बहुत सारे लोगों को रामभरोस ने खुद मारा पीटा है, या तो अपने लठैतों से मरवाया पिटवाया है। किसी को भी मरवाने पिटवाने के लिए रामभरोस का इशारा ही काफी है।
कुछ दिन पहले की ही तो बात है। रमचेलवा के खेत का धान जबरी लवा ले गये, अपने खलिहान में दवां भी लिए। वह बेचारा हिम्मत जुटा कर थाने पर गया, उसे लगा कि थाना उसके साथ हुए अन्याय का इलाज करेगा पर थाना तो अपनी गंध पीने में मस्त था। थाने को क्या पड़ी कि वह गॉव में होने वाले कुकृत्यों का इलाज करे। ऐसा तो होता रहता है।
रमदिनवा गॉव गॉव घूमकर चिल्लाता रहा, चीखता रहा, कोई तो बचाए पर वहां बचाने वाला कौन था। सभी के माथे पर रामभरोस की लाठियॉ चिपकी हुई थीं। रामभरोस जस के तस, उनका रोआं तक टेढ़ा नहीं हुआ। किसे नहीं मालूम कि रामभरोस जब जैसा चाहते हैं कर गुजरते हैं। परधान के चुनाव में शोभनाथ पंडित उनके खिलाफ खड़े क्या हो गये कि आफत आ गई। बेचारे का घर-बार ही उजड़वा दिया रामभरोस ने। उनके भाइयों में बटवारा करा दिया। इतने से रामभरोस का जब मन नहीं ठंडा हुआ तो उन्होंने एक दिन शोभनाथ का खलिहान आग के हवाले करवा दिया। सारा अनाज जल कर भसम हो गया। पूरा गॉव तमाशा देख रहा था और शोभनाथ पडित का खलिहान जल रहा था। शायद गॉव वालों को पता नहीं था कि वे जिस तमाशे को देख रहे हैं वह तमाशा उनकी खामोशी का है। उनकी तटस्थता का है। यह तमाशा केवल शोभनाथ पंडित के घर का ही नहीं सभी के घरों का है, आज शोभनाथ का खलिहान जलवाया है तो कल किसी दूसरे का।
गॉव में कोई माई का लाल नहीं जो रामभरोस की मर्जी के खिलाफ उनके सामने ही नहीं पीठ पीछे भी बोल दे। सभी उनकी ‘जय’ ‘जय’ बोलते हैं।
रामभरोस के आतंक के दृश्ष्यों ने फेकुआ को पसीना पसीना कर दिया, वह कॉपने लगा। उसे पसीना पसीना होना ही था। वह बीसवीं शदी का आदमी था फिर भी उसे अपना मूलाधिकार हासिल करने की कला नहीं आती थी। उसे केवल इतना पता था कि राजाओं का राज खतम हो चुका है, जनता का राज आ गया है, जनता के राज में न कोई बड़ा होता है न छोटा होता है। उसे क्या पता कि यह सब अभी केवल कागज पर ही है। कागज ही उड़ रहे हैं देश में, कागज उड़ रहे हैं थाने पर, कागज उड़ रहे हैं गॉव की पंचायत में, सभी जगहों पर कागज ही तो उड़ रहे हैं। उसे कागज पढ़ना नहीं आता। कागजों पर वह अॅगूठा लगाता है। वह अॅगूठा लगाता है साहूकार के कागज पर, मालिकों के कागज पर। अॅगूठा लगाना ही वह जानता है, उसे पढ़ना नही आता कि कागज पर का लिखा है। कागज पढ़ना उसे आता तो बात दूसरी थीकृ उसे अपनी गलती का आभास हुआ फिर वह सोलहवीं शताब्दी में चला गया।
‘सरकार हमसे गलती हो गई, आप बड़हर अदमी, भला आप काहे हल जोतेंगे, हमरे गलती पर धियान जीन देंगे सरकार! आप तो कागज जोतकर ही काफी कमा लेते हैं। कागज जोतने से ही आपको फुर्सत नहीं फिर कैसे जातेंगे हल सरकार।’
बिफना पास ही में था। वह भी रामभरोस से माफी मांगने लगा पर रामभरोस का माथा काहे ठंडा होता। वे गरम हो गये और भावी दुर्घटनाओं की तरफ इशारा करने लगे। समूचा लील जाने के तर्ज पर उन्होंने फेकुआ को देखा जबकि फेकुआ और बिफना दोनों सम्मिलित रूप से माफी मांग रहे थे।
रामभरोस तो रामभरोस थे, समय को मुठ्ठी में बांध कर रखने वाले। उस समय कुछ नहीं बोले, रास्ता पकड़े और सीधे बखरी की ओर वापस हो लिए तमाम तरह के गुस्सों को पीते और समय को गरियाते हुए।
‘यह जो समय है नऽ जाने किस तरफ मुह घुमा रहा है? जिनके मुह में जीभ नहीं थी, वे कम्युनिस्टों की जीभ मुह में डाल कर बोलने लगे हैं।’
रामभरोस के लौट जाने के बाद फेकुआ को बिफना सीख देने लगा, वही सीख जिसे उसने बाप दादों से सीखा था। उसने सीखा था कि बड़ों से ऐंठ कर नहीं बोलना, बतियाना चाहिए। बिफना ने फेकुआ को डांटा....कृ
‘कुछ बूझता क्यों नहीं है बे! भला ‘सरकार’ से अइसे बात की जाती है, तोसे का मतलब बे!, ऊ हल जोतंय चाहे न जोतंय, ओन्हय तूं पढ़ाएगा? तोके अपनी पीठ नहीं दिखती है का रे! उस पर कोड़े बरसने लगेंगे तब सब कुछ भूल जाएगा। वे मालिक हैं, ‘सरकार’ हैं। मालिक लोग हम मजूरों के पीठ पर हल जोतते हैं, पेट पर हल जोतते हैं, जमीन पर वे लोग हल नहीं जोतते बे! एतना भी तूं नहीं जानता।’
फेकुआ का करता, उसे जो बोलना था बोल चुका था। बोली और गोली वापस तो होती नहीं। अपराधी की तरह बिफना की खरी खोटी सुनता रहा बाद में उसने अपना गुस्सा बैलों पर उतारा। पैना दर पैना पीटने लगा बैलों को। उसे सुख मिला कि वह हल में जुते बैलों को नहीं रामभरोस को पीट रहा है। सुरूज देवता के ढलान पर होते ही दोनों ने हल जोतना बन्द कर दिया तथा घर की ओर वापस हो लिए। फेकुआ को लगा कि घर का आसमान लाल नहीं होगा, वहां हसियां होगीं और अइया बपई का दुलार होगा।
घर बहुत दूर नहीं था, दोनों कुछ ही देर में घर पहुंच गये। अभी सूरज डूबा नहीं था सो थोड़ा उजाला था। पर फेकुआ के विचारों का सूरज तो डूब रहा था, उसके मन में अन्धेरा गाढ़ा होने लगा थाकृबपई और अइया दोनों बहुत भला-बुरा कहेंगे। उन्हें भला बुरा कहना ही था। वे भला बुरा कहना ही जानते थे।
देश में होने वाले बदलावों की बातें उनकी सोच में नहीं थीं। उनकी सोच तो आजादी के पहले वाली ही थी, गुलामी वाली। वे इतना ही जानते थे कि धरती पर दो तरह की दुनिया होती है, एक दुनिया है मालिकों व शासकों वाली दूसरी दुनिया है उनकी सेवा व मजूरी करने वालों तथा पीठ पर कोड़े खाने वालों की। आजादी के पहले तथा आजादी के बाद के उछलकूद करने वाले नारों के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी। जबकि देश के हर हिस्से में मजूरों, किसानों के विकास से जुड़े किसिम किसिम के नारे उछल रहे थे कि देश के आजाद होते ही मजूरों व किसानों को पूरा अधिकार मिल जाएगा। हर हाथ को काम मिलेगा तथा हर खेत को पानी मिलेगा। सभी को जमीन में हिस्सेदारी मिलेगी, निःश्षुल्क शिक्षा होगी, निःश्षुल्क चिकित्सा होगी। औतार नारों के बीच कभी नहीं थे उन्हें इस तरह के नारे कभी सहला नहीं पाए थे सो वे तत्कालीन सभ्यता के हल जोतने वाले श्रमिक की तरह का महज एक उत्पाद भर थे। सो उन पर दमन की यातनादायी संस्कृति सदैव नाचती रहती थी। उन्हें क्या पता था कि फेकुआ रामभरोस सरकार से उलझ गया था।
बिफना फेकुआ का दोस्त था वह सोच नहीं सकता था कि फेकुआ का अहित हो सो उसने पूरी घटना को फेकुआ के बपई औतार से बता दिया। रामभरोस का क्या कब गरम हो जांए, कब लाठियॉ उठालें, कब फेकुआ को पिटवा दें फिर का होगा? औतार कक्का फेकुआ को डांट देंगे तो ठीक रहेगा आइन्दा वह कभी गलती नहीं करेगा।
औतार भी तो पुराने जमाने के थे, अपने मुह पर ताला लगाकर चलने वाले। उन्हें जिन्दगी ने सिखाया था कि मालिकों से डर कर रहना चाहिए। अदब से रहने पर खतरे कम होते हैं या नहीं के बराबर होते हैं पर मालिकों की हुकूम उदूली तो विपत्तियां ही लाती हैं। वैसे भी विपत्तियां नेवता देकर तो आती नहीं, चली आती हैं दौड़ती उछलती। फिर तो औतार फेकुआ पर लाल लाल हो गये। उन्हें लाल लाल होना ही था।
‘तुमने रामभरोस ‘सरकार’ से अपना काम खुद करने के लिए बोला, इसका मतलब क्या कि वह हल जोतें, बैल चरांए, यही नऽ। तोहार मजाल है उनसे ऐसी बात करने की। तूं ससुर इहय करोगे। घर भर को मरवाओगे। नहीं जानते का कि ‘सरकार’ केतना प्रतापी हैं? तनिक रियाज का मारि लिए कि पगलाय गये। ई ससुरा का मजाल देखोकृकहता है कि हमार माई अब नार नाहीं काटेगी। तब का करेगी तोहार माई। एकरे बारे में सोचा है, गॉव में वह रह पाएगी का बिना नार काटे, मालिकों की गुलामी किए बिना।’
‘अरे! ससुर तोहके का मालूम, कमर झुका कर पालागी बोलने पर पर तो ‘सरकार’ रिसिआये रहते हैं। अउर उनका हुकूम न मानने पर जाने का करेंगे। कब घर फुंकवा देंगे, कब पीठ पर डन्डा बरसवा देंगे का मालूम।’
औतार एक आम आदमी, गालियों की दुनिया में ही पैदा हुए, बात बात पर गाली, एक तरह से संबोधन ही गालियों का किसिम किसिम की गालियां, गालियों के लिए हर वह पात्रा है जो रामभरोस के अनुसार टेढ़ा चलता है। रामभरोस को तो कोई कहीं छिप कर भी गाली नहीं दे सकता। रामभरोस को मालूम हो जाता है। गालियां कहीं भी दी जांए उनके कान तक पहुंच जाती हैं। उनके कान और मुह हमलोगों माफिक नहीं हैं। उनके कान में अदब की सुरंग है और मुह में आग।
सुबह का समय था और औतार थे कि सुबह की नरम धूप से बाहर थे। उन्हें सूरज का उजाला नहीं दिख रहा था। उनके सामने तो रामभरोस की बखरी हुंकार भरती हुई खड़ी थी, गालियां देती हुई, वही दिख रही थी। सूरज के सारे उजाले को वह लील जाती थी बखरी के लीलने से उजाला बचे तब तो औतार के पास आए फिर वे उसे देखें या महसूसें।
रामभरोस की बखरी की तरह तमाम बखरियां हैं जो फैली हुई हैं पूरे जिले में। कोई चार कोस दूर हैं तो कोई दस कोस दूर। बखरी तो राजा साहब वाली भी है पर वे बेचारे बनारस में रहते हैं। रियासत क्या टूटी कि वे बखरी ही छोड़ दिए। राजा साहब बखरी काहे छोड़ दिए औतार नहीं जानते थे। रामभरोस की तरह यहां रह कर वे भी हुकूम चला सकते थे।
इस तरह की सोचों से अलग औतार अपनी यादों में थे। उन्हें भूला नहीं है अब तक.... जवानी में रामभरोस ने उन्हें खंभे से बांध कर खूब मारा-पीटा था वह भी बिना किसी गलती के। एक महीने तक दवा दारू करना पड़ा था। और सुगिया की बात उसे कैसे भूल सकते हैं औतार कि रामभरोस नेअपने लठैतों द्वारा घर में से ही उसे उठवा लिया था। नुची, चुथी, लुटी, सुगिया तीन दिन बाद घर वापसआई थी। सुगिया को घर से उठाए जाने की खबर सहपुरवा के सारे लोगों को थी। सभी कान में तेल डाल कर अपनी ऑखें ढाप लिए थे। जैसे कान सुनने के लिए नहीं होते और ऑखें देखने के लिए नहीं होतीं मुह तो बोलने के लिए होते ही नहीं।
‘गूंगा तथा अन्धा रहने में ही भलाई है’, कौन रामभरोस से झगड़ा मोल ले। औतार ने खुद को गूंगा बना लिया था। वे दिन का उजाला देखते हुए भी उसे न देख पाते थे। वे उजाला देखने की कोशिश करते तब उन्हें लगता कि वे भयानक किस्म के अन्धेरों में डूब गए हैं जिससे बाहर निकलना संभव नहीं। दरअसल अन्धेरा तो था ही उसी अन्धरों ने उनके घर को जकड़ लिया था। घर की माटी की दीवारें, फूस के छाजन सबके सब अन्धेरे में डूब गए थे। वैसे भी सुगिया को घर से उठवा लेना किसी अन्धेरे से कम कैसे था?
रामभरोस के लठैतों द्वारा सुगिया को उठा ले जाने की घटना को सहपुरवा के लोगों ने किसी दुर्घटना की तरह माना। दुर्घटना का क्या है वह तो संयोग का खेल है, घटती रहती है। जो किस्मत में लिखा होता है वह तो होता ही है। सुगिया के साथ भी हो गया और क्या? वे खामोश थे, वे खामोशी से बाहर निकलना नहीं जानते थे। दिक्कत यह नहीं थी कि वे खामोश थे दिक्कत यह थी कि वे नहीं जानते थे कि उनकी खामोशी उनकी मनुश्यता छीन कर उन्हें जानवर बना देगी।
वैसे भी इस तरह की घटनाएं केवल सहपुरवा की ही नहीं थी बल्कि पूरे विजयगढ़ और जसौली की थीं। पूरी मानव सभ्यता उत्पीड़नों के गाथाओं पर ही निर्मित की गई है। मालिकों के रूप में उत्पीड़ितों का संगठित गिरोह पूरी धरती पर है, धरती माता भी कॉपती हैं उनसे। मालिकों की सूरतें समय समय पर अपना रूप, रंग बदलती रहती हैं। इच्छाधारी होती हैं मालिकों की सूरतें, जरूरत पड़ने पर अपनी सूरतें बदल लेने मंे माहिर होती हैं। उत्पीड़ितों के बीच सहज स्वीकृति होती है कि ऐसा तो होता रहता है। वे मालिक हैं जब चाहें अपना रूप रंग बदल सकते हैं। भला उन्हें कौन रोक सकता है रूप, रंग बदलने से।
गॉव भर देख रहा था कि सुगिया जवान हो रही है। उसके देह के उतार चढ़ाव मनोरम लगने लगे हैं। सुगिया बोले बतियाए भले नहीं पर उसकी देह हमेशा बोलती और गुदगुदाती रहती है। जवान लड़के तो उसे देखकर अपनी दृढ़तायें नहीं रोक पाते थे। खासतौर से सवर्ण जवान लड़के। वे समझते थे कि सुगिया गॉव की सार्वजनिक संपत्ति है जो उनके लिए भोग की वस्तु है उस पर उनका कुदरती हक है। सो वे पारंपरिकरूप से इन मामलों में नैतिक दृढ़ताओं को पाले रखने के विरोधी थे।
सुगिया केवल सवर्ण जवान लड़कों के लिए ही नहीं उन लोगों के लिए भी मनोरम दीखती थी जिनकी बेटियां सुगिया की हमउम्र थीं। गोया सबकी नजर सांवली, पतली, इकहरी बदन वाली सुगिया पर थी और सुगिया थी कि अपनी देह के करतबों से अजान थी। उसे पता ही नहीं था कि वह किसी कुसंयोग का बेहूदा प्रस्ताव है। सुगिया अपने में डूबी हुई, दिन रात के करतबों में गोता लगाती हुई, छोटी छोटी बातों में भी खुष्शियां तलाश लेने वाली। सुगिया नहीं देख पाती थी उन नजरों को जो उसे बेध रही होती थीं। देख भी लेती थी तो समझ-बूझ नहीं पाती थी कि लोगों की बेधक नजरें उसे चीर रही हैं। पोर पोर काट रही हैं। वैसे भी उसका साबिका देह को दाह बना देने वाली नजरों से कभी नहीं पड़ा था। वह तो अपनी देह के बदलावों व कुदरती गठन को कुदरत की लीला मानती थी। उसे क्या पता था कि उसकी देह में कोई जादुई ताकत है जो लोगों को पागल बना रही है।
रामभरोस भी सहपुरवा के थे। वे सामंत थे, उनकी ऑखें सामन्त थीं, उनका दिल-दिमाग भी सामंत था। वे सामंती परंपरा की निकृष्ट चेतना के अनुसार सुगिया को अपने बिस्तरे पर देखना चाहते थे। दया, प्रेम, आदर जैसी दूसरी सामंती पंरंपराओं से उनका कुछ लेना देना नहीं था।
गॉव के दूसरे तो सुगिया को देख कर ही मनोरम पीते थे और खुश रहते थे। पर रामभरोस ने तो योजना ही बना लिया था कि किसी भी तरह से सुगिया को हासिल करना है। इस हासिल को वे प्यार मानते थेे। प्यार की उनकी यह अपनी परिभाषा थी। वे प्यार करते थे, बिस्तरा बना कर, संपत्ति बना कर, कब्जा जमा कर। रामभरोस औरतों को संपत्ति समझते थे। आखिर उनकी संपत्ति कौन कब्जिया सकता है, वे कमजोर तो थे नहीं। रामभरोस का मनमिजाज ताकत के प्रदर्शनों से बना हुआ था। तमाम तरह की निन्दनीय वीरगाथांए उनके चिंतन का हिस्सा थीं। वे मानते थे ‘वीर भोग्या वसुन्धरा’ वसुन्धरा को भोगने का अधिकार केवल वीरों को है और वे ही बीसवीं शदी के वीर है। किसे पड़ी कि रामभरोस को समझाए, वीर वह नहीं होता जो दूसरों को सताता है, वीर तो वह होता है जो दूसरों की हर तरह से रक्षा करता है। रामभरोस तो रामभरोस थे शास्त्रों के तमाम कथनों को अपने तरीके से व्याख्यायित व परिभाश्षित करने वाले फिर वह किसी की काहे सुनते।
रामभरोस के प्यार करने का तरीका भी अपना था। वे इस मामले में तमाम लोगों से अलग हैं, वे प्यार करने के लिए पनघट पर नहीं जाते थेे, पनघट को ही घर पर उठा लाते थे। वे रीति और रति दोनों को अपने अनुसार रचते थे। सुगिया उन्हें जंच गई तो जंच गई, अब यह क्या है कि वे सुगिया के पास प्रणय निवेदन भेजें, नहीं, नहीं ऐसा वे नहीं करेंगे।
औतार को रामभरोस ने अपना असामी बना लेना उनके प्यार करने की योजना में था। असामी बन जाने के बाद तो औतार वही करेगा जो वे चाहते हैं। इसी सूत्रा के आधार पर रामभरोस के प्यार को हरियाना तथा लहराना था। सूत्रा था असामी वाला, औतार असामी तो सुगिया भी उनकी असामी फिर तो सुगिया की देह भी असामी। औतार पहले शोभनाथ के असामी थे। औतार को असामी बना लेने के बाद कई तरह की अतिरिक्त सुविधांयें भी रामभरोस ने औतार को दे दिया जिससे सुगिया से उनका कथित प्यार हवा में लहरा सके। दो बीधा खेत उन्होंने माफी में औतार को दे दिया, उसका लगान भी माफ कर दिया। बीज बंेगा वे बखरी से दिला देंगे इस प्रकार कई तरह के प्रलोभन।
रामभरोस जानते थे कि असामी होने के नाते औतार का आना जाना बखरी पर रहेगा ही, उसके साथ सुगिया भी आती जाती रहेगी। ऐसा करने से ही सुगिया के करीब पहुंचा जा सकता है। रामभरोस का मानना था कि सुगिया उनकी देह से क्यों घिनाएगी?
औतार को असामी बना कर वे सपने में डूब गए। रंगीन बदरियों वाले सपने, देह को फरफरा देने वाले सपने। सुगिया से एक बार मेल मिलाप का सिलसिला शुरू हो गया फिर काहे खतम होगा। तो ऐसा था रामभरोस के प्यार करने का सामंती तरीका। इसी लिए वे जमीन व बंेगा रूपी प्यार की वारिश औतार पर करा रहे थे जिससे औतार भींग जाए फिर तो सुगिया भींग ही जाएगी।
सामंती प्यार भी खूब नखड़े बाज होता है, नखड़े भी किसिम किसिम के बाजार की तरह, खुद अपना विज्ञापन भी करता है, करवाता है। बस पास आ जाओ, सारा कुछ मिलेगा। तुझे इतना मिलेगा जिसकी तूं कल्पना नहीं कर सकती। सामंती प्यार की सीफत होती है उदारता खरीदना, उस खरीद को प्यार में बदलना, रामभरोस इसी रास्ते पर चल रहे थे। वे सुगिया को ही नहीं उसके तन, मन दोनों को खरीद लेना चाहते थे चाहे दाम जो लगे। दाम की कमी तो थी नहीं उनके पास। इस तरह की खरीद बिक्री का मामला बाजार के विकास का प्राथमिक चरण वाला था। उस दौर में आदमी की खरीद बिक्री वस्तु के रूप में शुरू हो चुकी थी।
हुआ भी यही, सुगिया अक्सर औतार के साथ बखरी में आने जाने लगी पर रामभरोस सुगिया के आस पास तक नहीं पहुंच पाये। बखरी किसी आकर्षक बाजार की तरह खड़ी थी पर बखरी का बाजार सुगिया को आकर्षित नहीं कर पा रहा था। सो वह बाजार में काहे खड़ी होती। हालांकि रामभरोस सुगिया के पास जाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे पर सुगिया रामभरोस से भी चालाक निकली, वह खुद को बचा कर उनसे दूर चली जाती थी। वह जानती थी कि रामभरोस आग हैं, वे तन ही नहीं मन भी जला डालेंगे, भसम कर देंगे पूरी देह। वह खुद को भसम करना नहीं चाहती थी। सुगिया आगे आगे जाती और रामभरोस का सामंती प्यार उसके पीछे पीछे जाता। प्यार में न चौरोहा होता है न ही तिराहा, जहां रामभरोस का प्यार गलबहिंया करता। रामभरोस का प्यार पहले भी तनहा था और औतार के असामी बन जाने के बाद भी तनहा रह गया था। वे ताकतवर थे और ताकत के बल पर अपने प्यार की तनहाई दूर करने की कोशिश में थे जिससे वे सुगिया के सौन्दर्य का अपने तरीके से लाभ उठा सकें जबकि जवानी की समझ होने के पहले से ही सुगिया रामभरोस जैसे मालिकों से सावधान रहा करती थी। मालिकों के प्यार का मतलब आग की भठ्ठी, गिरो तो भसम हो जाओ। उसे रामभरोस के प्यार की भठ्ठी में गिरना नहीं था, गिरना तो दूर उसके पास तक भी नहीं जाना था। सुगिया गॉव की थी उसे क्या पता कि रामभरोस की बखरी एक रंगीन बाजार भी है। बाजार में मेले ठेले लगते हैं, दूकानें सजती हैं, औरतों, लड़कियों को खरीदा बेचा जाता हैै। उसे पता भी होता तो क्या हो जाता, वह खुद को बिकने से कैसे रोक लेती। उसके बाप को असामी बना कर रामभरोस ने उसे भी बाजार में खड़ा कर दिया है। उसकी बिक्री चाहे जब हो यह समय की बात है।
उस समय रामभरोस बाप नहीं बने थे। बखरी में केवल उनकी जवान औरत ही रहती थी। रामभरोस के मां बाप कुछ साल पहले मर चुके थे। कोई भाई, वाई नहीं था। रामभरोस बाप के अकेले वारिस थे। बखरी बहुत बड़ी थी सो उसमें एकांत की कमी नहीं थी। उसी एकांत का लाभ लेने के लिए रामभरोस ने एक बार सुगिया से छेड़ छाड़ की थी पर सब बेकार चला गया। रामभरोस की पत्नी तथा सुगिया के सबल प्रतिरोध के कारण। रामभरोस मन मसोस कर रह गये थे। करते भी क्या? सुगिया के बचाव में उनकी पत्नी रणचण्डी की तरह खड़ी हो गईं रामभरोस के सामने। उसके बाद से तो उनकी पत्नी सुगिया के बचाव में सचेत रहने लगीं थीं। कभी भी गोशालेे या भुसउल की तरफ सुगिया को अकेली न जाने देतीं, उसके साथ खुद जातीं। उन्हें पता था कि यह जो बखरियों का एकांत होता है लड़कियों के मामले में एकांत नहीं होता बल्कि उनकी शुचिता का अंत होता है। सुगिया को भी बखरी में अकेली छोड़ना ठीक नहीं होगा। रामभरोस किसी भी तरह से उसके एकांत को कोई तुकांत कविता बना सकते हैं जो न तो सुगिया के लिए ठीक होगा न ही उनके लिए।
रामभरोस की बखरी में सुगिया के बहाने गुस्सैल तनाव पसर चुका था। रामभरोस अपनी पत्नी पर अपना आपा खो बैठते, उन्हें भला बुरा कहते। यह क्रम रुकने का नाम नहीं ले रहा था। पत्नी पर रामभरोस का गुस्सा दिनों दिन बढ़ता चला गया, रोज रोज बेवजह बेचारी पिटने लगी। उसके बाद तो रामभरोस अपने असफल प्रयत्न की प्रतिक्रिया में जीने लगे।
रामभरोस तो मानकर चल रहे थे कि सुगिया काम करने के लिए जैसे बखरी में आएगी वे उसे अपने माया जाल में फसा लेंगे पर ऐसा संभव नहीं हो पाया। रामभरोस के मन में सुगिया को हासिल करने के दूसरे तरीके भी थे जिन्हें वे आजमाना नहीं चाहते थे पर करते क्या, उन्हें तो हर हाल में अपने वांक्षित लक्ष्य तक पहंुचना ही था। हार मान कर रामभरोस दूसरे रास्ते पर चल पड़े।
रामभरोस के लिए दूसरा रास्ता आसान और आजमाया हुआ था। वह रास्ता खानदानी था। प्रलोभन देकर, औतार को असामी बना कर। उन्होंने औतार को असामी बना लिया, औतार को अतिरिक्त मजदूरी भी देने लगे, फिर भी वे सुगिया तक नहीं पहुंच पाए। अपनी गोदी में सुगिया को देखना उनके लिए जैसे पहले सपना था, वह सपना जस के तस बना रह गया था। आजमाए हुए खानदानी रास्ते पर चलते हुए रामभरोस ने एक दिन अपने दरबार के डण्डपेलुओं और लठैतों द्वारा सुगिया को उसके घर से ही उठवा लिया यह उनके लिए दूसरा तरीका था। ऐसा करना उनके लिए काफी लाभप्रद साबित हुआ। दूसरे रास्ते के प्रयोग में कहीं कोई बाधा न आने पाए सो उन्होंने अपनी पत्नी को मॉ विन्ध्यवासिनी के पूजन के लिए विन्ध्याचल भेज दिया था, साथ में साले को भी लगा दिया था। इस तरह की कला में रामभरोस को महारथ हासिल थी।
वह अवसर रामभरोस के लिए आश्वस्ति दायक और मनोरम बन गया। सुगिया उनके घर में थी, जहां ढेर सारा एकांत था और सुरक्षा भी खूब खूब थी। घर में एकांत ऐसा था कि कैसे सुगिया ने रामभरोस का माथा फोड़ दिया यह रामभरोस को पता ही नहीं चला। उनका माथा फूट गया, वे चीखने लगे। बखरी की मजबूत दीवारों ने भी उनकी चीखें नहीं सुना और न ही दीवारों से बाहर उनकी चींखें निकल पाईं। उनकी बखरी किसी बंकर माफिक हो गई थी। जहां सारी चीजें बन्द बन्द सी रहती हैं। उनके हाथ और देह को कई जगहों पर काट लिया सुगिया ने फिर भी रामभरोस अपने लक्ष्य से एक रत्ती भी बांए दांए नहीं हुए, उन्हें तो लक्ष्य हासिल करना था। सुगिया का करती, कैसे करती, कितना काटती रामभरोस को पर उसने रामभरोस को कई जगहों पर बुरी तरह से काटा। उसे क्या पता था कि यह जो उसकी बन्दी है कुछ घंटों के लिए नहीं दो तीन दिन के लिए है। कुछ निशान तो आज भी रामभरोस के चेहरे पर उनके करतबों की कहानी के रूप में दिखते हैं।
दो दिन बाद सुगिया को रामभरोस ने उसके घर भिजवा दिया क्योंकि उसी दिन उनकी पत्नी विन्ध्याचल से लौटने वाली थीं। औतार और फेकुआ की अइया को अचरज नहीं हुआ। अचरज था भी नहीं उन्हें गुस्सा आया पर वे रामभरोस का का कर लेते। इस तरह की घटनांए हरिजन बस्ती के लिए आम थीं। वह भी उस घर के लिए जिनमें जवान बेटियां पलती हों, गदराई और मांसल। भला हो रामभरोस का कि वे घर पर नहीं चढ़ आये, चढ़ भी आते और सुगिया के साथ अपना मुह काला करते तो उन्हें कौन रोक पाता,उनका कोई क्या बिगाड़ लेता, कौन उनका प्रतिरोध करता। मान लिया जाता कि ऐसा होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। थाने पर रपट लिखाना भी तो आसान नहीं होता। रपट लिखा भी जाती तो दारोगा गवाही मांगता, गवाही कौन देता? कौन बोलता कि यह सब हमने देखा है फिर इतना ही थाने पर थोड़य होता, थाने पर तो रामभरोस से अधिक होता। थाना भी तो नामी और प्रतापी जगह है किसे नहीं मालूम कि प्रतापियों के ताप में बहुत आग होती है। थाना भी तो सुगिया की देह में अपना अधिकार देखने लगता, बेचारी को प्रशासनिक ताप में तपा देता। सुगिया बेचारी सोना तो थी नहीं जो प्रशासनिक ताप में तप कर खरा हो जाती, वह गल गल जाती, पिघल पिघल जाती।
दो दिन बाद सुगिया अपने घर वापस आ गई या भेज दी गई यह रहस्य माफिक था। औतार तथा फेकुआ की अइया को आश्ष्चर्य नहीं हुआ। वे पहले से ही जानते थे कि सुगिया कहां होगी। वे डर रहे थे कहीं सुगिया की हत्या न कर दी गई हो पर ऐसा नहीं हुआ था। सुगिया साबूत थी। हरिजन बस्ती के लिए यह आम बात थी। वे जानते थे कि मालिक लोगों के लिए औरतों की देह अछूत नहीं होती, अछूत तो केवल मरद होते हैं। औरतों की देह मालिकों को नहीं घिनाती, उन्हें गरीबों की औरतों में नए तरह का स्वर्ग दिखता है, खुद का बनाया हुआ स्वर्ग, ताकत के बल पर रचा गया स्वर्ग। अपने रचे हुए स्वर्ग कोे बनाने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं।
सुगिया टूट चुकी थी, उसकी सारी चंचलता व अल्हड़ता समाप्त हो चुकी थी। वह केवल एक देह भर रह गई थी जिसमें जीवन नाम की कोई चीज नहीं थी। वह केवल संासें ले सकती थी, कराह सकती थी तथा किस्मत पर रो सकती थी। सुगिया का घर बड़ा नहीं था। घर की दीवारें माटी की थीं तथा उस पर छान्हें टिकी हुई थीं। एक में औतार तथा उनकी पत्नी बैठी थीं जिसमें वे अक्सर बैठा करते थे। दूसरे में सुगिया जा कर बैठ गयी। दिन बीतते गये, बीतते गये, सुगिया तोड़ दी गयी, औतार तोड़ दिए गये, पर बिरादरी नहीं टूटी। बिरादरी टूटती भी नहीं।
सुगिया के घर वापस आते ही बिरादरी का कानून औतार के माथे पर चढ़ बैठा। थाने पर गवाही देने के नाम पर बिरादरी का कोई भी आदमी तैयार नहीं हुआ। औतार ने अपने लोगों को टटोला और मालूम किया तो मालूम हुआ जो पहले से ही मालूम था कि उनकी बिरादरी के लोग थाने पर गवाही नहीं देंगे कि रामभरोस ने सुगिया को उठवा लिया था और दो दिनों तक अपने घर में जबरन कैद कर रखा था। आखिर कौन बोलता, रामभरोस के आतंक के कारण सभी के मुह सिले हुए थे। औतार की बिरादरी वालों के पास केवल देह थी, उस देह में मुह न था, था भी तो गूंगा था, न ही ऑखें थीं, थीं भी तो अन्धी उनमें कुछ दिखता न था कान तो जैसे बहरे थे। वे सहपुरवा में रहते हुए गूंगे थे, बहरे थे, अन्धे थे। वे एक आक्रामक संस्कृति के मुर्दा प्रतीक भर थे।
बिरादरी के किसी आदमी ने गूं गा नहीं किया, किसी ने नहीं गुना कि सुगिया के साथ रामभरोस ने जो किया गलत किया। आखिर किस अधिकार से रामभरोस ने सुगिया को उसके घर के भीतर से उठवा लिया। पर बिरादरी की पंचायत कराने के लिए सभी उतावले हो चुके थे। पंचायत कराओ नहीं तो हुक्का पानी बन्द कर देने की धमकी देने लगे थे। औतार को भात, माड़ की सजा दिया जाना चाहिए। औतार थे कि बिरादरी से जानना चाह रहे थे कि किस बात के लिए वे पंचायत बुलवाएंगे। सुगिया को रामभरोस ने बेइज्जत किया है, यही थाने पर चल कर बोल दो। सुगिया के साथ जो हुआ वही थाने पर चल कर बता दो कि क्या और कैसे हुआ, किसने किया। उसी बात की तो भात माड़ ले रहे हो फिर थाने पर चल कर काहे नाही बोल रहे हो। नाहीं बोल सकते थाने पर फिर काहे के लिए भात माड़ ले रहे हो? काहे की सजा दे रहे हो? काहे की पंचायत करा रहे हो।
बिरादरी के एक एक जन से पूछा औतार ने पर सभी ने नकार दिया था। सभी की गर्दनें जमीन ताकनें लगीं थीं। कोई आगे नहीं आया, कई कदम नहीं एक कदम भी। सभी खामोशी ओढ़ लिए थे जैसे उन्हें पता ही न हो कि कि गलत क्या है और सही क्या है।
औतार जानते थे कि भात, माड़ नहीं देने पर बिरादरी से उन्हें निकाल दिया जाएगा। निकालना है तो निकाल दो बिरादरी से काहे धमकी दे रहे हो? रहेंगे तो हरिजनै ही, हरिजन से भी कोई छोटी बिरादरी होती है का? धमकी दे रहे हैं कि निकाल देंगे बिरादरी से, धमकियाओ मत निकाल दो बिरादरी से, अब क्या बचा है उनके पास इज्जत के नाम पर, इज्जत तो रामभरोस की बखरी में कराह रही है। लोगों की इज्जत उतारने के लिए ही तो बखरियॉ होती हैं। कहते कहते औतार आह भरने लगे थे।
''''''‘गॉव का बूढ़ा पीपल क्या बोलता चरित्रा तथा
दुश्चरित्रा के बारे में और पंचायत! सुगिया राम आसरे
थी लड़की होने का अभिशाप झेलती और कराहती’'''
'''
सुगिया दो दिनों तक रामभरोस की बखरी में थी। कहां थी गॉव वालों को मालूम था पर रामभरोस से कोई कहने बोलने वाला नहीं था। रामभरोस बखरी वाले थे, बखरी के आतंक में सहपुरवा डूबा हुआ था। रामभरोस से भला गॉव का कौन वासिन्दा पूछता? बखरी गरजने लगती, सहपुरवा का पूरा आकषश लाल हो जाता, खून माफिक। कितनों के हाथ तोड़ दिए जाते, कितनों के पॉव। बिरादरी के कुछ बोलक्कड़ों ने आसान रास्ता पकड़ा और सुगिया को दुश्चरित्रा घोश्षित कर दिया। बोलक्कड़ों के लिए सुगिया का घर से बाहर होना उसे दुश्चरित्रा साबित करने के लिए काफी था। दूसरे सबूतों की जरूरत ही नहीं थी। सुगिया चिल्ला चिल्ला कर बोल रही थी गॉव में कि उसके साथ रामभरोस ने बलात्कार किया। बोलक्कड़ों को मसाला मिल गया बात को बात से जोड़ने वाला। बोलक्कडों के लिए सही क्या है गलत क्या है इससे मतलब नहीं था। उनका मतलब था कि रामभरोस पर ऑच न आए और औतार परेष्शान हो जांए। औतार की तरक्की बोलक्कड़ों को अखर रही थी जबकि उनकी तरक्की सिर्फ इतनी थी कि वे बाढ़ी (कर्ज) लेकर नहीं खाते थे, जितना कमाते थे उसी से सारा खर्चा चलाते थे। एक दिन भी काम पर नागा नहीं होने देते थे। जब तक कोई बर-बीमारी न हो।
रामभरोस ने गॉव की बिटिया के साथ बलात्कार किया बोलक्कड़ों के लिए चिन्ता की बात न थी। रामभरोस जमीनदार हैं तो क्या किसी के साथ बलात्कार करेंगे? बिरादरी के लोगों के लिए यह फालतू सवाल था। बिरादरी के सामने केवल सुगिया थी और औतार थे, जिन्हें दण्डित किया जा सकता था। औतार को दण्डित करवाने की ताकत बोलक्कड़ों के पास थी पर रामभरोस को दण्डित करवाने की ताकत उनमें नहीं थी। दण्डसंहिता भी तो ताकत का ही पोषण करती है, सजा भी तो कमजोर को ही मिलती है ताकतवर को नहीं। ताकतवर को भला कौन दण्डित कर सकता है?
औतार को सारा कुछ मालूम था कि बिरादरी के बोलक्कड़ कितना पउंड़ सकते हैं? गॉव के पंचायती बोलक्कड़ बिरादरी की पंचायत न बुलायें संभव नहीं था। आनन फानन में पंचायत के सभी चौधरियों को सूचनांए भेज दी गईं। बिरादरी का सिपाही पंचायत की तैयारी में जुट गया। पंच तो जैसे तैयार बैठे थे कि पंचायत हो और हम सभी एक साथ जुट कर नियाव करें।
पंचायत के लोग निश्चित दिन पर जुट गये। पंचायत का जुटाव एक ऐसा अवसर होता है जब हरिजनों में एकता ही नहीं अनुशासन भी दिखाई पड़ता है। नहीं तो काहे का अनुशासन, काहे की एकता, काहे का संगठन। पंचायत तो इस आश में जुट जाती है कि किसी दिन भात माड़ कायदे से मिलेगा नहीं तो कौन किसे खिलाता है, घर में तो नून रोटी से ही काम चलाना होता है। माड़-भात की सजा में तो तरकारी, बरी, चटनी अंचार और भात मिलता है वह भी जितना खा सको।
गॉव में पीपर का एक पेड़ था, बहुत पुराना तथा काफी झकनार था। वह पंचायती पेड़ था। उसकी एक एक शाखा पर पंचायती फैसले लिखे हुए थे। उस पेड़ की गॉव वाले पूजा भी किया करते थे और उसी की छाया में पंचायत भी हुआ करती थी। पेड़ के नीचे पंचायत बैठ गई। यह पेड़ रामभरोस की शौर्यगाथा व दमन का गवाह भी था। आजादी के पहले विजयगढ़ राजा के सजावल भी इसी पेड़ के नीचे हुंकार भरा करते थे, गरीबों, बकाएदारों आदि को दण्डित किया करते थे। तमाम तरह के गॉव के झगड़ों-रगड़ों को निपटवाया करते थे। रियासतें खतम होने के बाद सजावल तो खतम हो गए पर रामभरोस जैसे स्वघोषित कई सजावल औतार ले लिए हैं और वे सजावल का काम करने लगे हैं। सजावल की तरह ही रामभरोस की हुकूमत पूरे गॉव में हुंकार भरने लगी है। यह वही पेड़ है जो अंग्रेजी व्यवस्था का गवाह है तो देशी व्यवस्था का भी गवाह है। रामभरोस के एक एक करनामें उस पेड़ की हरी हरी पत्तियों ने जाने कितनी बार सोखा है जिससे पत्तियों का हरापन गायब हुआ है। पर रामभरोस लगातार हरियाते रहे हैं।
इसी पेड़ के नीचे सुगिया की करुण वेदनाओं तथा क्रूर यातनाओं की पंचायत होनी थी। पेड़ के नीचे तीन चार टाट बिछाए गए थे। ये टाट दो तीन गॉवों की हरिजन बस्ती से मॉग कर लाए गए थे। इनका उपयोग व्याह के अवसरों पर तो होता ही था खासतौर से पंचायत के लिए भी होता था।
सुर्ती, तमाखू आदि लेकर पंचायत के चौधरीगण टाट पर आसीन हो गये। हरिजनों के बड़े चौधरी को विशेष तौर पर चौधरियों के बीच में बिठाया गया। अपने स्थान पर बैठते ही बड़े चौधरी पुनवासी ने बिरादरी के सिपाहियों (हर गॉव से चुने गए सुरक्षाकर्मी जिनका काम होता है बिरादरी के नियमों के विरूद्व चलने वालों की निगरानी करना तथा उनके बारे में पंचायत के चौधरी को बताना) को आदेशित किया....कृकृ
‘पंचायत के सामने सुगिया को हाजिर कराया जाए’
पुनवासी चौधरी का यह आदेश जमीनदारों के आदेशों की नकल की तरह था, हूबहू वैसा ही, बेचारे हरिजन क्या जानते कि यह जो न्यायशास्त्रा है वह है क्या चीज? क्या होता है न्याय और क्या होता है अन्याय, उन्हें क्या पता! वे तो पारंपरिक व कुदरती न्याय के प्रतीक थे सिर्फ इतना जानते थे कि जमीनदार गलत नहीं कर सकते।
पंचायत में सुगिया हाजिर नहीं थी। सुगिया घर पर थी। उसने तय कर लिया था कि उसे पंचायत में नहीं जाना है। उसके मन में आया था कि घर छोड़ कर कहीं भाग जाए पर उसे घर से भागना अच्छा नहीं लगा। पंचायत की डर से काहे भागना? वह जहां भी जाएगी पंचायत का कानून उसके पीछे पीछे लगा रहेगा। सो वह घर पर ही रहेगी। बिरादरी के सिपाही कुछ ही देर में सुगिया को उसके घर से पकड़ ले आए और सुगिया को पंचायत के सामने हाजिर करा दिए।
पुनवासी चौधरी ने सुगिया से साफ साफ पूछा, बिना लाग लपेट केकृकृ
‘तोहरे साथे का किए हैं रामरोस सरकार! साफ साफ बताओ’
यह अदालतों में होने वाली जिरह की तरह का सवाल था जिसका जबाब सुगिया को देना था जबकि इस सवाल का जबाब चौधरी जानता था फिर भी उसने पूछाकृ
‘उसके साथ जो हुआ था रामभरोस की बखरी में सुगिया ने साफ साफ बता दिया। साफ साफ में साफ था कि रामभरोस अपराधी हैं, और उन्हें गॉव से बाहर निकाल देना चाहिए।’
यह सुगिया और औतार का लक्ष्य था पर पंचायत का नहीं था। पंचायत का लक्ष्य था औतार को दण्डित करने का। रामभरोस को गॉव से बाहर निकालने का फैसला देने के लिए पंचायत नहीं हो रही थी। पंचायत का लक्ष्य तो औतार से भात, माड़ लेना था न कि क्या हुआ था सुगिया के साथ यह जानना और रामभरोस के विरूद्ध उचित कार्यवाही करना। औतार भरी पंचायत में रो रो कर रामभरोस की काली करतूत बताते रह गए थे पर किसी ने उनकी नहीं सुना। दोषी उन्हें ही माना गया। पीपर के पेड़ के नीचे एक अलग किस्म का न्यायशास्त्रा उसकी जड़ से लेकर शाखाओं तक पसरा हुआ था। उस न्यायशास्त्रा में पीड़ित को ही दोषी मानने का चलन सामंती रूप से था। पंचायत के चौधरी को अपने ही लोगों को दण्डित करने का अभ्यास था ताकतवरों को नहीं। यह मनुष्श्यों की अलग दुनिया का मामला था। पीपर का पेड़ जानता है कि सुहपुरवा गॉव के लोग किसी दूसरे समाज के लोग हैं जिस समाज में पीड़ितों को ही दण्ड का भागी माना जाता है। चौधरियों ने साफ कहा....कृ
‘देखो औतार तोहार बिटिया ही सरकार के यहां भाग कर गई होगी मुलायम बिस्तरा पर पसरने के लिए। जवानी में मर्दानी गंध सूंघने के लिए। वह खुद ही चली गई होगी सरकार की बखरी में, तूं गलत इलजाम लगाय रहे हो सरकार पर कि सरकार ने उसे घर से उठवा लिया था।’
का करते बेचारे औतार, वे तो विरोध करना जानते ही नहीं थे। उन्होंने अपने बपई को देखा था कि वे भी मालिकों का एक भी जूता पीठ पर से नीचे गिरने नहीं दिया करते थे। रोप लेते थे जूतों को अपनी पीठ पर यही हाल था उनके बपई का भी। वे तो बपई से भी आगे थे।
औतार को एक दरी तथा भात माड़ की सजा कबूल करनी पड़ी। पीड़ित समाज में भी कुछ अक्खड़ किस्म के लोग हुआ करते हैं, बिफना के बपई सुक्खू ने चौधरियों के इस अन्यायी फैसले की कड़ी आलोचना की....
‘अरे! चौधरी साहब! एमें सुगिया का का दोष है? ऊ कवन जुलूम किया है जुलूम तऽ रामभरोस किए हैं, ओनके सजा दीजिए, सुगिया को काहे सजाय दे रहे हैं? ऊ बेचारी तऽ घरे में सोई हुई थी। रामभरोस के लठैत ओके घरवै में से उठाय ले गए बखरी में। तीन दिना तक अपने बखरी में रखे रह गए थे। गांयें में कौन ऐसा है जो इस बात को नाहीं जानता है? आज जो पंच बने बैठे हैं उस दिन तमाशा देख रहे थे, अउर आज पंचायत कर रहे हैं। ई नियाव नाही है चौधरी साहब। अब ऐसा नाहीं चलेगा। हमलोग इस फैसले को नाहीं मानेंगे।’
पंचायत के वरिष्ठ चौधरी पुनवासी को सुक्खू पर गुस्सा आ गया। उन्हें पंचायत के मामलों में अक्सर गुस्सा आ ही जाया करता है। पुनवासी चौधरी भी जाति से हरिजन हैं पर बिरादरी का चौधरी बनते ही उन्हें लगने लगा है कि वे मालिकों की जमात में शामिल हो गए हैं। मालिकों की तरह ही वे बोलने बतियाने लगे हैं। लोग जानते हैं कि पुनवासी चौधरी के लिए गुस्सा एक ऐसी चीज है जिसे वे मालिकों की तरह हमेशा नाक पर धरे रहते हैं और जुबान पर मालिकों वाली सनातनी गालियां.मॉ, बहन वाली, वे भभक उठे....कृकृ
‘का बकते है रे सुखुआ हरामी की औलाद! तुम नाहीं जानते है हमार बिरादरी को कानून, हमारे अनियाव को बड़का, बुड़का सभै मानते हैं कि हमार पंचायत साफ साफ अनियाव करती है। तुम्हारी यह मजाल कि तुम बिरादरी के कानून को नाहीं मानो, हम जो चाहेंगे वोही करेंगे। गॉव में तो और भी लड़की लोग होते हैं उनको तो सरकार नाहीं उठवाय ले गए बखरी में। तुम का जानेगा सुक्खुआ, औतरवा साला ओनकर असामी है, सिरवही करता है। सरकार की बखरी में सुगिया का आना जाना था, ओकर सरकार से लस-पुस हो गया होगा। सरकार के बिस्तरा पर पसरने का ओकर मन हो गया होगा। येही कारण सरकार ओके उठवा ले गये। एम्मे औतरवा की चाल है, जौन हम बूझ रहे हैं, बिटिअयवय की कमाई औतरवा खाय रहा है, जब कमाई खाएगा सरकार की तब तो सरकार उठवा ही ले जांएगे ही, बोलो पंचों गलत तो नाही बोल रहा हूं नऽ....’
पंचायत के दूसरे चौधरियों कोे पुनवासी चौधरी के हॉ में हॉ मिलाना ही था और उनलोगों ने तत्काल हॉ में हॉ मिलाया भी।
‘नाहीं साहेब आप गलत नाही बोल रहे हो, औतरवा बिटियवय की कमाई खाता है।’
सुक्खू थोड़ा तनेन मिजाज वाले थे उन्हें पुनवासी की बात पर गुस्सा आ गयाकृ
‘तऽ का चौधरी असामी का काम करना, हलवाही करना अपनी बहिन बेटी बेच देना है। ई का बक बक कर रहे हैं चौधरी। कहीं रामभरोस ने आपको गठरी तो नाही थमाय दिया नऽ।’
सुक्खू औतार को जानते थे, सुगिया को जानते थे, सचाई जानते थे कि रामभरोस कुछ भी कर सकते हैं। सुघ्घर लड़की देख कर उसे हासिल करने के लिए अच्छा बुरा किसी भी तरह का करम कर सकते हैं। सुक्खू ने एकबार अपनी ऑखों से देखा था। सुगिया जंगल से लकड़ी का बोझ लिए घर वापस आ रही थी। रामभरोस ने उसे वहीं कहीं देख लिया था फिर क्या था। रामभरोस का स्त्राीयार्थ जाग उठा और उन्होंने सुगिया को पकड़ लिया। पकड़ छुड़ाकर किसी तरह से सुगिया भागी, पर कितना भागती, कहां जाती, सुनसान सिवान, एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक, हर तरफ सन्नाटा और मरघटी खामोशी। सुगिया रामभरोस की पकड़ छुड़ा कर भागी पर रामभरोस ने सुगिया को दुबारा पकड़ लिया फिर तो वह उनकी पकड़ में थी, कसमसाती, छटपटाती। सुगिया रामभरोस को जानती थी, कि वह फस गई है, रामभरोस उसे नहीं छोड़ेगा। सुरक्षा मिल जाए कहीं से वह चिल्लाने लगी। संयोग था कि सुक्खू भी जंगल से लकड़ी का बोझ लिए वापस आ रहे थे। सुक्खू को सुगिया की चीख साफ सुनाई पड़ी, वे चीख की ओर दौड़े, कौन हो सकता है जो इस समय चीख रहा है? चीख रहर के खेत में से आ रही थी पर वहां कोई दीख नहीं रहा था, वहां केवल आर्तनाक चीखें थीं जो साफ साफ किसी औरत की जान पड़ रही थीं। रामभरोस सुगिया को रहर के खेत के अन्तःपुर की ओर घसीटे जा रहे थे। नजदीक जाने पर सुक्खू ने देखा कि यह तो सुगिया है, औतार की बिटियवा, सुगिया हांफ रही थी हकर हकर। उसकी सांसें जहां थीं, वहीं टंगी हुई थीं, टंगी हुई दूसरी चीजों की तरह। सुगिया रामभरोस की पकड़ में मछली की तरह छटपटा रही थी। सुक्खू ने लकड़ी का गट्ठर पहले ही उतार दिया था तथा उसी गट्ठर में से एक सीधी लकड़ी डंडा माफिक हाथ में ले लिया था। यह मानकर कि इसकी जरूरत पड़ सकती है। उसकी जरूरत पड़ भी गई सुक्खू ने बिना आगा पीछे देखे, सोचे उसी लकड़ी से रामभरोस को पीटना शुरू कर दिया। इतना मारा कि उनका पलीदा निकल गया। तब जा कर सुगिया का कुंवारापन सुरक्षित रह सका था।
सुक्खू रामभरोस की असलियत जानते थे फिर काहे खामोश रहते...कृ
‘चौधरी साहब थोड़ा कम मुह निपोरिए। कुछ जानते भी हैं कि अइसहीं हवा में झार रहे हैं। हम आपसे जानना चाह रहे हैं कि सुगिया अगर आपकी बिटिया होती तब आप का इहै नियाव करते? औतरवा तऽ रामभरोस के ईहां मेहनत, मजूरी करता है तब जाके रामभरोस ओके बनी मजूरी देते हैं, फोकट में कुछ नाहीं देते हैं मुह देख कर। आप रामभरोस को जानो चाहे जीन जानो हम ओनके जानते हैं, आजु औतरवा के बिटिया संगे तऽ काल्हु तोहरे बिटिया संगे, तब जीन नरिआइएगा।’
पुनवासी चौधरी को बहुत ही खरी-खोटी सुक्खू ने सुनाया। सुक्खू की बातें पुनवासी चौधरी को पंचायत के अनुशाशन के प्रतिकूल जान पड़ीं।
‘सुक्खुआ साले की इतना मजाल’
पुनवासी चौधरी ने सिपाहियों को तुरन्त आदेश दियाकृ
‘बांध दो सुक्खुआ साले को पेड़ से और पचास जूते तथा पचास कोड़े मारो’
पुनवासी चौधरी के आदेश का अनुपालन बिरादरी के सिपाही काहे नाहीं करते, वे तत्काल उठे और सुक्खू को पकड़ने लगे।
उसी समय पंचायत में जोरदार हल्ला किसी बवन्डर की तरह उठा, वह भी अप्रायोजित, स्वस्फूर्त।
‘हमलोग भी देखते हैं कौन साला सुक्खू कक्का को पकड़ कर मारता है। जो भी सुक्खू कक्का को पकड़ेगा वह हमारे गॉव से साबिक नाहीं लौटेगा। उसे मार मार कर भर्ता बना देंगे हमलोग।’
यह गॉव के जागरूक युवकों की क्रोधभरी आवाज थी जो पहली बार सहपुरवा में किसी चौधरी के आदेश के खिलाफ उठी थी। युवकों की आवाज में चौधरी का आदेश कही बिला गया था।
पुनवासी चौधरी पंचायत वाले आदमी थे। वे छोटे बड़े सभी के यहां बैठकी किया करते थे वे समझते थे कि पंचायत में आग लग गई तो नहीं बुझाई जा सकती। इसे रोकना चाहिए। पुनवासी चौधरी अपने आसन से उठे और नेताओं की तरह हाथ जोड़ कर खड़े हो गए... लगे समझाने....कृ
‘भाइयों, आप हमारी बात धियान से सुनिएगा। यहां पंचायत सुगिया की हो रही है न कि सुक्खू की। सुक्खू को जो भला लगा बोल दिए ओसे पंचायत से का मतलब। आपलोग बूझ रहे हैं न हमारी बात...’
फिर तो पंचायत सुगिया के अपराध पर केंद्रित हो गई। पुनवासी चौधरी को भी यही ठीक जान पड़ा उनसे सुक्खू से क्या लेना देना। मामला तो सुगिया का है जो पंचायत के सामने है। सुक्खू को पंचायत में घसीटने से सुगिया का मामला भी हल नहीं होगा जबकि औतार कोे हर हाल में सजा देना है और उनसे भात, मांड़ और एक दरी लेना है। सुगिया के मामले की पंचायत शान्तिपूर्ण ढंग से निपट गई, उसमें हो हल्ला नहीं मचा। मचता भी नहीं, औतार ने बिरादरी को भात माड़ देना स्वीकार कर लिया, वे इसको प्रतिरोध कर भी नहीं सकते थे। झगड़ा करने से अच्छा है भात, मांड़ दे देना, सो उन्होंने भात, माड़ की सजा स्वीकार कर लिया।
सुक्खू को पंचायत का फैसला बेइमानी वाला लगा। उन्हें बुरा लगा कि गॉव के लड़के काहे चुप रह गए पंचायत में, उनके नाम पर तो बोलनेे लगे थे। तो क्या गॉव के लड़के चाहते हैं कि औतार को दण्ड दिया जाए। उन्होंने बस्ती में आकर गॉव के नौजवान लड़कों को खूब खूब फटकारा भी। गॉव के लड़के सुक्खू की फटकार सुनते ही चुप हो गए थे। उन्हें महसूस हुआ कि पंचायत में पुनवासी चौधरी के फैसले का विरोध करना चाहिए था। पंचायत ने गलत फैसला किया है, भला सुगिया की का गलती है इसमें? गलती तो रामभरोस की है। फिर औतार काहे भात-माड़ और दरी की सजा भुगतें। पर पंचायत तो हो चुकी थी और औतार सजा कुबूल कर चुके थे।
औतार जानते थे कि वे बिरादरी के विरोध में नहीं जा सकते थे, जाते भी नहीं, विकल्प ही नहीं था सुगिया का बियाह भी तो बिरादरी में ही करना था, उसका बियाह भी होगा बिरादरी में ही। बिरादरी के अलावा दूसरी जाति के लोग सुगिया से थौडै बियाह करेंगे। ऊंची जाति के लोग देहीं पर चाहे जेतना नाच कूद लें पर बियाह नाहीं करेंगे। औतार केवल एक ही काम कर सकते थे, रामभरोस का काम छोड़ सकते थे और उन्होंने वैसा किया भी। उन्होंने रामभरोस का काम छोड़ दिया। औतार अपने तरीके से सुगिया के बचाव में खड़े थे और उसके बियाह के बारे में गुनने लगे थे।
सहपुरवा कई महीने तक पुनवासी चौधरी की पंचायत वाली गंध पीता रहा। वैसे भी पंचायत की गंध पूरे जवार में फैल चुकी थी। गंध भी किसिम किसिम की, कुछ तो मादक तथा बेधक थी तो कुछ नाक-मुह सिकोड़ने वाली भी। नाक-मुह सिकोड़ने वाली गंध कुछ गिने चुने लोगों को परेशान किए हुए थी। वे समझ नहीं पा रहे थे कि यह जो आजादी मिली है वह किससे मिली है, किस बात और काम की आजादी मिली है। रामभरोस जैसे बाज तो आज भी आसमान में बिना अवरोध उड़ रहे हैं और जहां होता है वहीं झपट्टा मार दे रहे हैं। झपट्टा मार ही दिया रामभरोस ने औतार के घर पर और अपने पंजों में जकड़कर उठा ले गए सुगिया को अपनी बखरी में। बखरी में जिस तरह से उन्होंने लोकतंत्रा तथा आजादी की गांठें खोला उसे देखने परखने वाला कोई नहीं। आखिर जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिए वाली सरकार में रामभरोस ऐसा कैसे कर पा रहे हैं?
और पंचायत!
उसका क्या कहना, हो गई पंचायत। सुगिया के बाप औतार को दण्डित कर दिया गया। न्यायशास्त्रा की किताब में सहपुरवा के न्याय का एक पन्ना और जुड़ गया। यही बीसवीं शताब्दी है, यही बदला हुआ देश्ष है, यही अंग्रेजमुक्त भारत है।देश अंग्रेजों से तो आजाद हो गया पर रामभरोस जैसे देशी अंग्रेजों से...! आजाद हुआ कि नहीं कौन बताएगा? क्या वह पीपर का बूढ़ा पेड़ या सहपुरवा के बरम बाबा बतांएगे? कोई नहीं बताएगा।
औतार पंचायत की गंध से कब तक बाहर निकल पाएंेगे उन्हें नहीं पता। शायद भात-माड़ और दरी देने के बाद। पर क्या वे सुगिया के साथ हुए बर्बर अत्याचार की कष्टप्रद पीड़ा से भी बाहर निकल पाएंगे? औतार के बाल पक चुके हैं, उन्होंने जिन्दगी को हसते देखा है तो रोते बिलखते भी देखा है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि हर रोज होने वाली सुबह को किस तरह नमन करें और शाम को किस तरह से विदा करें। औतार क्रान्तिकारी चेतना से लैश होते तो शायद पंचायत के फैसले के खिलाफ लड जाते पर वे तो आदिम युग के आदमी थे अपने भीतर ही अपनी गलती निकालने वाले, हर घटित को भाग्य का फल मानने वाले। उनके लिए यही कम नहीं था कि वे अपना पक्ष किसी प्रकार से पंचायत में रख पाए थे। वे जानते थे कि तमाम सुखों में चुप रहना और खामोशी से उगते सूरज को निहारना बहुत बड़ा सुख होता है। वे बाल-बच्चे वाले हैं सो उन्होने खुद को समय के हवाले कर दिया है, जो करेगा समय ही करेगा। उनकी मुठ्ठी तो खाली खाली है।
पंचायत का दिन जो औतार के लिए भात-माड़ तथा दरी की सजा लेकर आया था, गुजर गया, उसे गुजरना ही था। भले ही कसमसाते और चीखते हुए ही गुजरा पर गुजर गया। औतार के जीवन का वह दिन अतीत बन चुका था पर औतार अतीत नहीं थे। वे कथित सभ्यता के प्रतीक व प्रतीत थे। अन्धेरा होते ही औतार उसमें डूबने लगे। अन्धेरे मंे भी राहत जैसी कोई बात औतार के लिए न थी। जब दिन ही लतियाते हुए आता है तब रात का क्या, जो आने ही वाली होती है वह तो किसिम किसिम का यातनादाई खेल लेकर ही आएगी। कैसे निपट पांऐगे औतार उससे। संभव है वह भी दिन की तरह ही आये और औतार को दण्डित करे। औतार रात के तमाम खतरों के डरों से कॉपने लगे, जैसे मलेरिया ने उन्हें जकड़ लिया हो।
औतार कर भी क्या सकते थे वे आगत के डरों से खुद को कैसे मुक्त कर सकते थे। वे पसीना पसीना हो गए। तभी फेकुआ की अइया उनके पास आ गईकृ
‘यह का हो रहा है आपको! आप तो पसीने से तरबतर हैं काहे पसीना हो रहा है आपको, गर्मी का महीना भी तो नाहीं है। लगता है बोखार है, चलिए घर में काहे ओसारे पर बैठे हुए हैं? दवाई की एक टिकिया घर में पड़ी है बोखार वाली, खा लीजिए उसे।’
फेकुआ की अइया औतार को ओसारे से घर के भीतर ले गई। घर के भीतर क्या था, वही माटी वाले फूस के छाजन वाले छोटे छोटे दो कमरे। उन कमरों में सहपुरवा के पाचास साल की उमर बराबर इधर उधर नाचा करती थी पर उस समय कमरे में उमर का नाचना छिन गया था। नाच की जगह पर सन्नाटा नाच रहा था। सन्नाटों ने कमरों की खुशियॉ लील लिया था। सन्नाटे भी सहज, सरल और तरल नहीं थे पूरी तरह डरावने थे। भीतर वाले कमरे में जाते ही औतार और कॉपने लगे, एक बार फिर उन्हें आतताई डरों ने जकड़ लिया।
‘भात-माड़ और दरी की सजा भुगत लेने के बाद भी उन्हें चैन से रहने दें रामभरोस तब नऽ, रामभरोस चुप बैठे रहने वालों में नहीं हैं।’
किसी तरह नमक मिला गीला भात कंठ से नीचे औतार ने पेट में उतारा। कंठ सिकुड़ चुका था, कंठ ने भात निगलना बन्द कर दिया था। एक एक कौर औतार के लिए कठिन हो गया था निगल पाना। फिर दवाई की टिकिया खाया और पसर गए लेवा पर, ऊपर से एक कथरी ओढ़ा दिया फेकुआ की मतारी ने। औतार नींद में जाने की कोशिश करने लगे पर नींद थी कि उनसे कोसों दूर थी। नींद को तो रामभरोस के आतंक ने उड़ा दिया था।
'''‘सुभाश्षितों के बीच कॉपता, हिलता कथा नायक
प्रतिनायक बन गया यानि कथा आगे बढ़ रही है, पढ़िए कैसे?’
'''
वैसे भी लोकतांत्रिक देशों में रंगीन किस्म की पंचायतें पाई जाती हैं। ऐसी रंगीन पंचायतें सहपुरवा में ही नहीं सभी जगहों पर हुआ करती हैं भले किसी का साबिका उनसे पड़े न पड़े। देश की जो सबसे बड़ी पंचायत है उसमें भी तमाम लोगों के मुह सिले होते हैं रंगीन पंचायत वाले लोगों की तरह। व्यवस्था में अव्यवस्था नहीं होने पाए इस बाबत सुक्खू जैसे कुछ थोड़े से लोग ही तो बोल पाते हैं पंचायत में पर उनकी सुनता कौन है, वे वहां बोलें चाहे चिल्लाएं...
इस समय तो पूरे देश में आपात काल लगा हुआ है। आपातकाल लगाए जाने का निर्णय देश की बड़ी पंचायत ने ही किया है। उस पंचायत में भी कुछ लोग ऐसे होंगे ही जिनकी शक्लसूरत तथा विचार पुनवासी चौधरी से मिलते जुलते होंगे तथा वहां सुक्खू जैसे लोग भी होंगे। कुछ लोग देश की बड़ी पंचायत की कमान संभाले हुए हैं तो पुनवासी चौधरी सहपुरवा की पंचायत का। इसी तरह हर तरफ पंचायतें हो रही हैं, एक से बढ़ कर एक फैसले सुनाए जा रहे हैं, फैसलों को लागू करवाया जा रहा है। पंचायत का काम है नियमों की व्याख्या करना तथा व्याख्यायित नियमों को जनता के हितों के लिए जनता का नियम बनाना। और नियम लगातार बन रहे हैं। किसे पड़ी कि वह नियमों के बारे में गुने। कोई नहीं गुन रहा पंचायत के बनाए हुए नियमों तथा व्याख्याओं के बारे में....कृकृ
सहपुरवा के लोगों ने भी नहीं गुना पुनवासी चौधरी के फैसले के बारे में जो नियम की तरह लागू किया गया था। पुनवासी चौधरी का फैसला तो इतना बड़ा था कि उसकी अपील भी नहीं हो सकती थी। वैसे भी पुनवासी चौधरी फैसला करने वाले थे तो उसे लागू कराने वाले भी थे। फैसला और उसका क्रियान्वयन दोनों उनकी शक्ति में केन्द्रित था। ऐसे शक्तिवान हमारे देश में सर्वत्रा फैसला करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
रामभरोस ने सुगिया के साथ जो कुकृत्य किया था इसकी जानकारी फेकुआ को सुन सुनाकर ही हुई थी। उस समय फेकुआ की उमर सात-आठ साल की थी। उस घटना को तो केवल औतार ही जानते थे, उन्होंने उस संत्रास को भोगा था, झेला था। गॉव भर की उलाहनाएं सुना था तथा रामभरोस के प्रकोपों को भी झेला था। पर रामभरोस के बारे में कोई कहने बोलने वाला नहीं था। गॉव का सारा आकाश खामोश हो गया था, गलियॉ सिकुड़ गई थीं। सिकुड़ने को तो वह पनघट भी सिकुड़ गया था जहां औतार जा कर नहाया करते थे।
सुक्खू और औतार दोनों हरिजन हैं पर उनमें बिरादरी का बारीक फर्क भी है, सुक्खू उतरहा हरिजन हैं तो औतार बड़हरिया। माना जाता है कि उतरहा हरिजनों का रियासत से सरोकार कभी नहीं रहा है और बड़हरियों का सरोकार सदैव से चन्देल राजाओं के साथ रहा है, चन्देल राजाओं के आने के साथ ही वे भी विजयगढ़ में आये थे।
सुक्खू और औतार की दोस्ती बचपन से ही है। हरिजन बस्ती में यही दोनों खानदान ऐसे हैं जो सहपुरवा में कई पीढ़ियों से आबाद हैं। दूसरे हरिजन जो सहपुरवा में रह रहे हैं वे सालाना इस गॉव से उस गॉव अपने डेरा तम्बू लगाते रहते हैं। उन्हें लगता है कि इस गॉव में गड़बड़ है, मालिक का अत्याचार है तो दूसरे गॉव में अच्छा रहेगा पर गॉव तो गॉव, मालिकों के जूते के नोकों पर खड़े और पड़े।
बिरादरी के सभी बड़े-बूढ़ों ने फेकुआ को भला बुरा कहा कि वह काहे के लिए रामभरोस से उलझ गया। उसे मालूम होना चाहिए कि रामभरोस सरकार हैं और उनके सामने सिर झुका कर रहना चाहिए। वे जो बोलंे, कहें उसे सुनो पर उस सुने को अनसुना कर दो, बोलना चाहो तो मुह सिल लो, इस तरह की सााधना जिसके पास नहीं वह सहपुरवा में रहने लायक नहीं।
फेकुआ हताश और निराश। फेकुआ थोपी हुई मर्यादाओं का आदमी नहीं था। सो उसे नहीं पता था कि मर्यादांए होती क्या हैं? कैसे बनती बिगड़ती हैं। वह सभी की बातें सुनता फिर भी नहीं समझ पाता कि उसने रामभरोस के साथ ऐसा क्या बोल दिया जिससे उनकी मर्यादा चोटिल हो गई। मर्यादा चोटिल करने वाली बात उसे नहीं बोलना चाहिए था। क्या वह नहीं बोल सकता कि ‘मालिक आपन हरवा खुदै जोत लिया करैं? अपना काम करना क्या बुरा होता है जो सभी उसे दोष दे रहे हैं।’ फेकुआ करता भी क्या, जो उसके मन में आया तत्काल बोल गया? बोला हुआ वापस भी तो नहीं हो सकता था।
औतार भी फेकुआ से कब तक गुस्साए रहते। आखिर कब तक एक बाप नाराज रह सकता है अपने बेटे से। किसी तरह औतार का गुस्सा ठंडा हुआ या उन्होंने खुद गुस्से को ठंडा किया पर उनका गुस्सा ठंडा हो गया। फेकुआ के माथे पर अपने मां बाप तथा दूसरे बड़े-बूढों की चेतावनियों का बोझ लद गया जबकि अपने माथे पर किसी प्रकार को बोझ लाद कर वह नहीं रहा करता था। बोझ के कारण वह रात भर नहीं सो पाया, करवटें बदलता रहा। वह जैसे जैसे करवटें बदलता उसकी नींद भी करवटें बदलने लगती। नींद कभी बांए तरफ जाती तो कभी दांए तरफ, नीद को बांए दांए के बीच में जाकर पसरना अच्छा नहीं लगता। नींद तो सदैव किनारों की तलाश में रहती है, किनारा हो सुख का, चैन का, आराम का, खुली और खिली सांसे लेने का। पर वहां किनारे कहां थे, वहां तो केवल सैलाब था, चेतावनियों का, आने वाले संभावित खतरों का।
फेकुआ को अपनी गलती समझ में नहीं आ रही थी आखिकार उसने किया क्या? ऐसा क्या बोल दिया रामभरोस से कि उनकी मर्यादा भरभरा कर गिर गई। क्या उनकी इज्जत इतनी कमजोर तथा भुरभुर है कि उसके कहने से भरभरा गई? उसे रह रह कर बिफना पर गुस्सा आता। उसने रामभरोस से हुई बात-चीत का हवाला उसके बपई से क्यों बता दिया? अगर नहीं बताया होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती फिर काहे के लिए उसका बपई नाराज होता उससे।
फेकुआ की दुनिया बहुत छोटी थी, वह मजूर था और बचपन से ही मजूरी के काम में लगा हुआ था। जब वह पॉच छह साल का था तब से पसीना बहा रहा है। चरवाही करते समय उसने कितना पसीना बहाया होगा उसका हिसाब उसके पास नहीं। चौदह पन्द्रह साल तक का होते होते तो उसने हल चलाना सीख लिया था फिर लगा था हलवाही करने। वह हलवाह है तो क्या हुआ उसके चित्त से उसका होना मरा नहीं था, उसके पास सपनों की पूंजी थी। उसका सपना था कि वह हलवाही करते करते असामी बनेगा। खूब कमाएगा अपना बैल खरीदेगा। असामी से कमाई कर लेने के बाद वह जमीन खरीदेगा, अपनी जमीन में मकान बनाएगा और अपने खेत में खेती करेगा। बेकार है हलवाही करना यानि मालिकों का हुकूम अपनी पीठ पर लाद कर चलना, उसके लिए मुश्ष्किल हो रहा है। जवान होते ही वह जान गया था कि जो बात उसे बुरी लगती है वह बात दूसरे को भी बुरी लगेगी। इस हिसाब से तो उसने रामभरोस से कुछ बुरा नहीं कहा, अपना काम खुद करने के लिए ही तो बोला था रामभरोस से फिर लोग उसे काहे दोष दे रहे हैं।
समय सुबह का था, फेकुआ निपटान के लिए गॉव से बाहर गया हुआ था। गॉव के बाहर ढूह वाला एक क्षेत्रा पड़ता था। वहां कई ढूहे थे, कुछ बहुत बड़े तो कुछ औसत आकार वाले। जिधर देखो उधर ही ढूहे। ढूहे बहुत बड़े व ऊॅचे नहीं थे फिर भी इतने बड़े थे कि उसके नीचे बैठे हुए आदमी का दिखना बन्द हो जाता था। यही ढूह वाला क्षेत्रा सहपुरवा के लोगों के लिए सार्वजनिक शौचालय था। औरतों के लिए गॉव के पूरब वाले ताल का भीठा था। बिफना भी ढूहे की तरफ गया हुआ था। बिफना को लौटता देख कर बीच रास्ते में ही उसका इन्तजार फेकुआ करने लगा। इन्तजार का गहन रिष्श्ता सुर्ती से होता है सो वह सुर्ती मलने लगा इसीर बीचबिफना भी वहीं आ गया।
‘का रे बिफना! ससुर तूं बड़ा काबिल बनते हो, रामभरोस वाली बात बपई से काहे बताय दिए रे! वैसे भी बोलो हम रामभरोस को का कह दिए थे जौने से ओनकर इज्जत गिर गई। फेर तोके का मिला बपई से वह सब बता कर?’ बिफना कुछ देर तक फेकुआ का चेहरा देखता रह गया, उसे लगा कि उसके कारण फेकुआ नाराज हो गया है और उस पर शक कर रहा है। उसने बहुत ही मुलायमियत से फेकुआ को समझाया....
‘देख फेकुआ ई सब तोके नाहीं पता, केकरे से कइसे बोलना, बतियाना चाहिए। रामभरोस के बारे में तोके पता होता तो तूं खुदै उनसे वैसा न बोलते वे राक्षस हैं राक्षस, मारने पीटने लगते हैं। हम तो वोही दिन डेरा गए थे कहीं रामभरोस तोके मारने न लगें।’
फेकुआ निर्बुद्धि नहीं था, वह भी रामभरोस के बारे में बहुत कुछ जानता था। कई काण्ड रामभरोस ने उसके सामने किया कराया था। जिन्हें उसने बहुत पास से घटते हुए देखा था। हालात समझते हुए उसने बिफना से प्रतिवाद नहीं किया बल्कि आगे क्या करना चाहिए उसके बारे में जानना चाहा। जो बीत चुका था, बीत चुका था, उसे तो लौटना नहीं था। बिफना ने आष्श्वासनों के सहारे उसे समझाया बुझाया कि रामभरोस सहुरवा में सबसे नीच और खराब आदमी हैं, या यह कहो कि वे आदमी ही नहीं हैं। उनसे बेमतलब रार नहीं लेना चाहिए।
फेकुआ आशंकाओं में घिर गया जाने का करें रामभरोस। दैनिक क्रिया से निवृत्त हो कर दोनों अपने अपने घर लौट आये। रात में जो भोजन बना था उसे फेकुआ की अइया ने उसके सामने परोस दिया। फेकुआ सहजता से खाने लगा नहीं तो वह ताजा भात ही खाना चाहता है नून और मर्चा की चटनी के साथ। यह मौका फेकुआ की अइया के लिए अच्छा था, उन्हांेने उसे समझाना शुरू किया....कृकृ
‘बड़का अदमिन से तनिक नरम हो के बोला बतियाया जाता है रे। तूं नाहीं जानते, बड़का अदमिन का मन अउर दिमाग, दुन्नो जनमै से गरम होता है। उन लोगों के माथे से भाप निकलती है। ऐसे में नरमी से काम लेना चाहिए। बड़का लोगन का दिमाग गरम रहता ही है और तूॅ भी गरम हो गए तो मारै-पीट होगी नऽ।’
फेकुआ की अइया इतना ही बोल पाई थीं कि उन्हें सुगिया की याद आ गई, सुगिया की ही नहीं उसके साथ घटी घटना की भी। रोना रोकना चाहा पर नहीं रोक पाईं, मड़हा के अन्दर भाग कर चली गईं। अइया का बोलते बोलते रोना, बपई का डांटना सारा दृश्य फेकुआ को उलट पुलट गया, उसे लगा कि वह सिर के बल खड़ा है और धरती कांप रही है।
किसी भी आगत भय से फेकुआ कभी आतंकित नहीं हुआ था। यह पहली बार था कि अपनी पीठ पर डन्डे बरसता हुआ वह महसूस कर रहा था। हालांकि डरों में उसने कभी जीना नहीं सीखा था पर उसे लगा कि उसे डर कर रहना चाहिए पर कब तक! वह उथल-पुथल में था। कब तक का जबाब उसके पास नहीं था।
जोतनी पर उसे जाना था देर हो रही थी। जल्दी से वह घर से पैना लेकर बाहर निकला। उसे सन्देह था कि आज जरूर कुछ न कुछ होगा खेत पर, सभी लोग बेकार नहीं बोल रहे। रामभरोस करेंगे कुछ न कुछ। सामने से उसके मालिक चौथी गंवहा आ रहे थे जिनके यहां वह हलवाही करता था, फेकुआ को देखते ही गुसिया गए.
‘अबहीं तोहार बेला भयी है ससुर, बिफना कब्बइ काम पर निकल गया अउर तूं अबहीं हर जोतने जाय रहे हो। न काम का पता’ न बाप का पता, इहै हाल है ससुर तोहार।’
रामभरोस ने तो फेकुआ को उतना बुरा नहीं कहा था जितना चौथी गवहां सरपट बोल गए एक ही सांस में बाप तक चले गए। कुछ भी नहीं छोड़ेे। उसे लगा कि चौथी गवहां तो रामभरोस से भी आगे हैं। फेकुआ इन सभी बातों को आज से ही नहीं सुन रहा है, खेलने कूदने से लेकर गाय गोरू की चरवही करने तक, वह यही सब तो सुन रहा है। अभी दो ही साल तो हुए होंगे जब चौथी गंवहां ने उसे हलवाही पर लगाया था। उसके बाप औतार ने कोले के रूप में दो बिगहे खेत की मांग किया था चौथी गवहां से, पर चौथी गवहां ने औतार की बात पर विचार नहीं किया, एक तरह से नहीं माना।
चौथी गवहां ऐसे वैसे आदमी तो हैं नहीं, हिसाबी आदमी हैं, बातों का वजन तौल कर चलने वाले, उन्हें सौदा महंगा जान पड़ा। वे पहले बड़े जोतदारों की जमीन बटाई पर ले कर खेती किया करते थे, छोटी आमदनी थी, उसी में से बचाकर बाढ़ी-डेढ़ा का कारोबार करने लगे। कारोबार चल निकला। उन्नीस सौ छाछठ का अकाल आते ही उनकी किस्मत चमक गई। बाढ़ी डेढ़ा के उनके कारोबार ने उन्हें फटाफट धनी बना दिया। अकाल के समय हर कोई उनके पास चावल, गेहूॅ, दाल के लिए जाता और बाढ़ी डेढ़ा पर खाद्यान्न लेता, मान कर चलता कि दुगना ही तो देना पड़ेगा नऽ, बालबुतरू कम से कम भूखे तो नहीं मरेंगे।
गॉव में चौथी नाम से जाने जाने वाले चौथी, चौथी गवहां हो गये। हजारों रुपया बैंक में जमा हो गया, जमीन खरीद ली, पक्का मकान बनवा लिया। उनके घर में कितना गल्ला है किसी के लिए थाह लगाना मुष्किल। चौथी गवहां ने हिसाब लगा कर फेकुआ को अधारा पर रख लिया क्योंकि वह अकेला था, मेहरारू होती तो पूरे पर रखते, अधारा पर नहीं, फिर पूरा कोला भी देना पड़ता।
फेकुआ काम पर देर से आने का कारण चौथी गवहां को जरूर बताता पर कहीं शिष्टाचार में कोई कमी न रह जाए इसलिए महटिया गया। रामभरोस के नाराज होने का मतलब गाली गलौज, मारपीट आदि आदि और चौथी गवहां के नाराज होने का मतलब भूख, प्यास। चूल्हा ही नहीं जल सकता, पेट में जाने का का दोड़ने कूदने लगंे। रामभरोस से दूसरे किस्म का डर था और चौथी से दूसरे किस्म का पर दोनों डरों का रिश्ता केवल और केवल भूख वाली गरीबी से ही जुड़ता था। गरीबी से जुड़ने वाली और भी तमाम बातें सहपुरवा में थीं। जिन्हें धीरे धीरे फेकुआ बूझने लगा था। वह यह भी बूझने लगा था कि उसके अइया बपई मुह सिल लेने तथा कान बन्द रखने की नसीहतें उसे क्यों दिया करते हैं।
फेकुआ सीधे बैलों की तरफ गया जिन्हें चौथी गवहां का लड़का चरा रहा था। उसने बैलों को हल में नाधा यह सोचते हुए कि क्या कभी वह रामभरोस और चौथी गवहां को भी बराबरी के जूए में नाध सकता है इन बैलों की तरह। उसे खुद पर गुस्सा आया...एक गरीब हरिजन भला ऐसा कैसे सोच सकता है? उसके नसीब में तो बराबर गालियॉ ही लिखी होती हैं।
बिफना हल जोत रहा था, फेकुआ की इन्तजारी में कि फेकुआ आये और बैलों को नाधे। फेकुआ ने नधे बैलों को बिफना के पीछे लगा दिया। हल जोतते हुए ही बिफना ने भी फेकुआ को भला बुरा कहा। उसने पहले जो कुछ भी फेकुआ से कहा था उससे उसका पेट नहीं भरा था। रामभरोस के पुराने करतबों ने उसके मन को भयातुर बना दिया था। वह बराबर डर पीने लगा था। फेकुआ के साथ कुछ भी कर सकते हैं रामभरोस फिर तो पूरी गृहस्थी ही औतार कक्का की बैठ जाएगी और फेकुआ का हाथ पैर टूटेगा अलग से। बिफना अपने दोस्त को हर हाल में बचाना चाहता था सो वह उसे डांट रहा था। फेकुआ खामोश था तथा हल में नधे बैलों के थूथुन पर सारा गुस्सा उतारने लगा था। हालांकि फेकुआ डरा हुआ था पर डर कर घुटने वाला नहीं था सो रामभरोस व चौथी के लिए मन के भीतर जमी हजारों किस्म की गालियांे को वह अबोल बैलों पर उतार रहा था। जबकि उसे पता था कि इन अबोलता बैलों का दोष नहीं है? इन्हें नहीं मारना चाहिए। फिर भी फेकुआ उन्हें मारे जा रहा था। बहुत मुष्किल होता है गुस्से को रोक पाना, जिसने गुस्सा रोक लिया, खुद को संतुलित कर लिया उसने जीवन साध लिया। अभी फेकुआ की उमर ही क्या थी जो वह खुद को साध लेता। उसे गुस्सा अपने लोगों पर आ रहा था, जो उसे दोष दे रहे थे। अचानक उसकी समझ में आया कि लोग तो उसे ही दोष देंगे रामभरोस को कौन दोष दे सकता है भला। यह दुनिया ही ऐसी है हर हाल में मारा जाता है कमजोर आदमी ही, गरीब आदमी ही। ताकतवरों को मारने पीटने की किसी में औकात नहीं होती। रामभरोस ताकतवर हैं उनसे निपटने की ताकत किसी में नहीं।
फेकुआ अपनी सोच से बाहर निकला उसे समझ में आया कि अबोलता बैलों को मार कर उसने गलती किया है। बैलों को नहीं मारना चाहिए था। फिर वह बैलों को सहलाने लगा, पुचकारने लगा जो बैलों से माफी मॉगने माफिक था। बैल भी गर्दन हिलाने लगे और मस्त हो कर पगुरी करने लगे। बैलों को पगुरी करता देख फेकुआ का मन हरा हो गया जैसे प्रकृति के हरे पन में उसका मन कैद हो गया हो। पर उसके मन में उसी समय एक सवाल ने भी जनम ले लिया...कृ
उसे तो समझ आ गई कि अबोलता बैलों को नहीं मारना-पीटना चाहिए, क्या ऐसी समझ रामभरोस को भी आएगी? उनके सामने तो पूरा सहपुरवा ही अबोलता है फिर भी वे अबोलतों को सदैव मारते-पीटते रहते हैं। पर उन्हें कभी भी समझ नहीं आएगी कि अबोलतों को नहीं मारना-पीटना चाहिए।
'''‘विवेकहीन कथाचरित्र भले ही उल्लेखनीय न हो
पर कथा विषय की प्रभावोन्वति को कुदरती ताकत तो देते ही हैं’'''
कुर्सी पर बैठे हुए रामभरोस चाय की चुस्की ले रहे थे। चाय की चुस्की में गॉव था, गॉव के होने का मूल्यांकन भी चाय की प्याली में तैर रहा था। उनका दबदबा चाय की भाप के साथ उड़ रहा था पर भाप थी कि उनके मुह पर पसर पसर जाया करती थी। भाप का वे क्या बिगाड़ लेते? भाप तो किसी से नहीं डरती और न ही उसे अदब में रहना आता है। सो उनके चेहरे को ढक लिया करती थी इसीलिए फूॅंक फूॅक कर वे चाय पी रहे थे जिससे उनके चेहरे को भाप ढकना बन्द कर दे। पर नहीं भाप थी कि मानने वाली नहीं थी और उनके चेहरे पर मडरा रही थी।
चौथी गवहां हरिजन बस्ती से लौट कर अपने घर न जाकर रामभरोस की बखरी पर जा पहुंचेे। उन्होंने देखा कि चाय की भाप में रामभरोस जी घिरे हुए हैं. यानि उनका मूड ठीक है तभी तो चाय की भाप से प्यार कर रहे हैं।
‘पा लागी सरकार!’ चौथी गवहां ने हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया जो किसी प्रार्थना माफिक था।
‘खुष्श रहो, केहर से आ रहे हो चौथी? बदलुआ तोहरे कीहें नाहीं गया था का?’ रामभरोस ने चौथी गवहां से पूछा
‘गया था सरकार!’ चौथी गवहां ने जबाब दिया
‘अच्छा, अच्छा बइठो’
रामभरोस ने चौथी गवहां को बैठने के लिए संकेत किया। चौथी गवहां रामभरोस की कुर्सी से दो हाथ की दूरी पर रखे गये मोढ़े पर बैठ गये। रामभरोस के पास रखी कुर्सी पर बैठने की योग्यता चौथी गवहां में न थी। अगर बैठ जाते तो रामभरोस का माथा ठनक जाता। चौथी जैसे तमाम लोगों का रिष्ता केवल मोढ़े से ही हो सकता था और वह बराबर बना हुआ था। जो रामभरोस की कुर्सी से दूर कहीं रखा होता था। कुर्सी और मोढ़े के द्वन्द ने कभी भी चौथी को विचलित नहीं किया था। वे विचलित होते भी क्यों? बैठना तो मोढ़े या कुर्सी दोनों पर ही होता है, बैठा तो जमीन पर भी जा सकता है, उकड़ू पल्थी मारकर पद्मासन की मुद्रा में भी। यह कम नहीं कि वे रामभरोस के सामने मोढ़े पर बैठते हैं, उनसे हस हस कर बतियाते हैं। चौथी को क्या पड़ी कि वे मोढ़े, कुर्सी या जमीन पर बैठने की सांस्कृतिक परंपरा का पता लगाएं कि ऐसी परंपरा कब से है? किसने चालू करवाया है इस परंपरा को। इस परंपरा के अतीत के बारे में तो उन्हें नहीं पता पर इतना पता है कि बराबरी दर्जे काआदमी ही कुर्सी पर बैठता है। उससे कम दर्जे का आदमी मोढ़े पर बैठता है और जो दर्जाविहीन होता है वह जमीन पर बैठता है या खड़ा रहता है। बाप दादों के जमाने से ही वे जैसा देखते आ रहे हैं वैसा ही कर रहे हैं। मोढ़े पर बैठते ही उन्होंने विनम्रता पूर्वक रामभरोस से पूछा....कृ
‘का हुकुम है सरकार! काहे बलाव भेजे थे?
चाय की प्याली कुछ इस तरह से रामभरोस ने मेज पर रखा जैसे वे अपना पूरा दबदबा मेज पर रख रहे हों जिसे चौथी देख लें। चौथी ने उसे देखा भी। उसे न भी देख पाते चौथी तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ता। चौथी हरिजन बस्ती से जब वापस आ रहे थे रामभरोस की बखरी की तरफ, तभी से बखरी का दबदबा उनके पीछे पीछेे आने लगा था। चौथी एक कदम आगे चलते तो ठीक उनके पीछे बखरी का दबदबा होता। दोनों की संयुक्त चाल पगडन्डी की धूल उड़ा देती। चाय खतम होने के बाद रामभरोस ने चौथी से जानना चाहा..कृ
कोई बात है का कि सुबह के समय ही चौथी चला आया बखरी पर, बाद में आराम से आता, क्या किसी खबर की गंध फैलने वाली है सहपुरवा में या ऐसे ही चला आया। रामभरोस तमाम बड़े लोगों की तरह भूल चुके थे कि उन्होंने चौथी को बुलवाया था अचानक उन्होंने खुद को संयत कर लिया फिर वे चौथी से हाल-चाल पूछने लगे....कृ
‘अइसहीं तोहके बुलाए थे हो! कोई खास बात नाही है, थोड़ी सुर्ती गाठों चौथी। जोतनी का का हाल-चाल है?’ रामभरोस ने पूछा चौथी से
‘अबहीं पछड़ी है सरकार!, पांच छह दिन तो चलबै करेगी, आपके सीलिंग वाले मुकदमवा में का हुआ सरकार?’
अभिमान जताते हुए रामभरोस जबबिआए....कृ
‘अरे! चौथी तूं का बूझता है रे बुड़बक, हमारी जमीन सरकार निकाल पाएगी, मजाक है का? जब तक हम रहेंगे, जमीन नाहीं निकलने देंगे। ओके तो हमैं ही जोतना है। तोहार छोटका सरकार हमरे बाद चाहे जौन करैं।’
कुछ ख्याल करके रामभरोस फिर बोले जैसे कुछ भूल गए हों..कृ
‘अरे हां चौथी! तनिक ई बताओ कि आज कल किसका काम-काज कर रहा है फेकुआ?
चौथी गवहां को अचरज हुआ, रामभरोस एक असाधारण आदमी हैं, घर घर की खबर रखते हैं। पूरे क्षेत्रा की खबरें इनके यहां सुबह शाम सलाम बजाया करती हैं और इन्हें फेकुआ के बारे में जानकारी नहीं कि वह किसका काम कर रहा है? निश्ष्चित ही कोई गंभीर बात है या होने वाली है वर्ना फेकुआ के बारे में रामभरोस हमसे नाहीं पूछते। कुछ न कुछ तो विशेष चल रहा है रामभरोस के दिमाग में। बहरहाल चौथी गवहां ने उत्तर दिया। उन्हें उत्तर देना ही था, बिना उत्तर दिये रामभरोस के प्रकोप से वे बच नहीं सकते थे।
‘सरकार! ऊ तऽ असउं हमरय काम कर रहा है। मेहर लइका नाहीं हैं, अधारा पर है।‘
‘अधारै पर हो’
आश्चर्य चकित होने की नौटंकी रामभरोस ने की जैसे उन्हें कुछ पता ही न हो पर ऐसा नहीं था उन्हें तो फेकुआ के बारे में सारा कुछ पहले से ही मालूम था।
‘हं सरकार!’ चौथी गवहां ने रामभरोस की हां में हां मिलाया। रामभरोस ने एक खखार लिया और मुंह में दबी सुर्ती वहीं कुर्सी के बगल में अखच दिया जिसे देख कर किसी को भी उल्टी हो जाती पर चौथी गवहां रामभरोस के दरवाजे पर कैसे घिनाते, उल्टी करने का तो सवाल ही नहीं था। रामभरोस उल्टी करें, पर-पाखाना करें किस बात की घिन। रामभरोस सरकार जैसे लोग तो कहने के लिए देहधारी होते है पर असल में विदेह होते हैं, न तो उनकी उल्टी में बदबू होती है न ही उनके पाखाने में, उनकी गालियों में सभ्यता के सुभाशितों वाले तत्व होते हैं सो उनकी गालियां भी प्राचीन सभ्यता के प्रसाद माफिक होती हैं। चौथी गवहां ने खुद को संयमित किया और मन में उपजी घिन को दबा लिया। वैसे भी बड़े लोगों के व्यवहारों में घिन तो होती नहीं, होगी भी अगर तो उससे क्या घिनाना। रामभरोस अपने दरवाजे पर या गॉव में कहीं भी, कुछ भी करें, उन्हें कोई रोकने टोकने वाला तो था नहीं।
मुंह में दबी सुर्ती खखार कर रामभरोस ने चौथी गवहां से पूछा....
‘का हो चौथी! फेकुआ कऽ कोला (हलवाहों को हलवाही के एवज में दिया जाने वाला खेत का छोटा टुकड़ा) अबहीं लवाया (कटाया) के नाहीं?’
चौथी गवहां ने सिर हिला कर नकारा और बताया...
‘नाहीं सरकार अबहीं नाहीं लवाया है!’
रामभरोस की हर बात मतलब वाली होती है, उसका प्रयोजन होता है, एक ऐसा प्रयोजन जो भले ही देर में पूरा किया जाए पर उसे निष्चित ही पूरा किया जाना है। उन्होंने साफ साफ निर्देश दिया....
‘देखो चौथी! ओकर कोला तूं लवाय लो, ओके जीन लवने दो। ओकरे कोला का सारा डांठ अपने खरिहाने रखवाओ, बूझ गए के नाहीं फिर दवांय भी लो। इसमें देरी नहीं होनी चाहिए।’
‘अरे सरकार! आप ई का बोल रहे हैं, आज कल हरिजनों का कोला कौन लवाएगा, हरिजनों के लिए सारा कुछ कर रही है सरकार। पूरा थाना आ जाएगा, हम गरीब आदमी पिसाय जाएंगे, जेहल होय जाएगी, हमार बाल बुतरू अनाथ जांएगे सरकार! ई कैसा हुकूम दे रहे हैं आप!’
पूरी बात भी चौथी नहीं कह पाए थे कि रामभरोस की पुतलियां नाचने लगीं। दो तीन बार कुर्सी से उठे और बैठे। यह रामभरोस के गुस्से की जानी पहचानी पहचान थी। वे जब दो तीन बार कुर्सी से उठते बैठते थे तब उनके सामने बैठने वालों को पता चल जाता था कि रामभरोस गुसिया गए हैं। गुस्से की स्थिति में वे क्या कर जाएंगे यह समय को भी भी नहीं पता होता। चौथी का माथा ठनका....
‘जाने का होने वाला है, लगता है सरकार गुसियाय गए हैं?’
रामभरोस के सामने चौथी गवहां का मान-सम्मान अर्थहीन था। उन्हें लगा कि उनकी धन-पूंजी बेकार है और वे एक ऐसे आदमी हैं जो केवल रामभरोस की ‘हां’ में ‘हां’ ही मिला सकते हैं यानि हुकूम के गुलाम। वही हुआ चौथी गवहां खुद ही रामभरोस की जुबान में बोलने लगे जैसे रामभरोस की जीभ उनके मुंह में घुस गई हो।
‘नाहीं नाहीं सरकार! आप जौन कहेंगे उहय होगा, फेकुआ का कोला हम लवाय लेंगे अउर दवांय भी लेंगे।’
इसके अलावा चौथी गवहां क्या बोल पाते। उनके मन की सारी बातें मन ही में दबी रह गईं। कभी कभी उन्हें लगता है कि वे रामभरोस के गुलाम नहीं हैं कि जैसा वे कहें वैसा ही करें, पर करते क्या? रामभरोस के होने का जो प्रचलित अर्थ था वह यह कि उनके सामने जवार का कोई आदमी सिर्फ गूंगे की तरह ही रह सकता है। ऐसे संवेदनशील अवसर पर रामभरोस की मुखाकृति अजीब किस्म की हो जाती है, उनके थुथने फूल जाते हैं, ऑखें चढ़ जातीं हैं, वे हद से ज्यादा सीरियस हो जाते हैं। अपनी नाटकीय अभिव्यक्ति दिखाने में विशेषकर क्रोध की भूमिका में रामभरोस विशेष किस्म की खड़ी बोली बोलने लगते हैं, कभी कभार अंग्रेजी शब्दों को भी अपनी बोली में घोल लेते हैं। उन्होंने वैसा ही किया क्योंकि वे गुस्से में थे कि चौथी उन्हें सलहइया रहा है।
‘देखो जी चौथी! हमने जो कह दिया, कह दिया, फेकुआ साले को कोला मत लवने (काटने) दो, थाना पुलिस से काहे डरते हो जी! हम काहे के लिए ईहां बैठे हैं, ईहां हमहीं सरकार हैं, हम गॉव के परधान होते हैं, हमरे मर्जी बिना ईहां एक पत्ता भी नाहीं हिल सकता। बूझे कि नाहीं, कलिहै ओ सारे का कोला लवाय लो और संगे संगे दवांय भी लो।’
रामभरोस की बात केवल बात ही नहीं होती, वह सहपुरवा के लिए हुकुम होती है। थाना, कचहरी से ऊपर। चौथी गवहां हालांकि बी.डी.सी हैं फिर भी रामभरोस के लिए किसी आज्ञाकारी की तरह ही हैं। हुकुम तो हुकुम, हुकुम उदूली हुई कि नहीं किसिम किसिम के खतरे, जिसमें मार, पीट, घर का जलना, खलिहान आदि का जल जाना सारा कुछ शामिल। चौथी की इलाके के बड़े लोगों तथा सरकारी अहलकारानों से जान पहचान भी है पर रामभरोस के आगे उस जान पहचान का कोई प्रयोजन नहीं। रामभरोस खुद थाना हैं तो तहसील और कलक्टरी भी। यह जो सहपुरवा के लोगों की स्वतंत्राता है उनके यहां प्यास लगने पर पानी पीने के लिए आया जाया करती है और भूख लगने पर खाना भी खा लिया करती है। बराबर खड़ी रहती है दरवाजे पर दरवान की तरह। मुस्कराती है तो रामभरोस के कहने पर, सोती है तो रामभरोस के कहने पर। चौथी जानते थे कि उनकी आजादी भी रामभरोस के कृपा पर ही टिकी है।
फेकुआ का कोला यदि नहीं लवाया गया तो रामभरोस कुपित हो जांयेगे, मार-पीट करेंगे, घर फुंकवा देंगे, बलात्कार आदि भी करवा देंगे सो फेकुआ का कोला लवाय लेना ही ठीक होगा। अगर सहपुरवा में साबूत रहना है तो...। यही समयानुकूल होगा। रामभरोस की अवज्ञा करना तो मार-पीट को दावत देना होगा, अपने दरवाजे पर भी मारने लगेंगे रामभरोस। फेकुआ का कोला लवाय लेने पर तो रामभरोस थाना थूनी से उन्हें बचा ही लेंगे सो फेकुआ का कोला लवाय लेना चौथी ने उचित समझा।
‘अच्छा सरकार! आप जौन कहेंगे उहय होगा। अब हम घरे जांए सरकार! कोलवा लवाने का जोगाड़ भी तो बनाना होगा। हलवहिनों को धान कुटवाने के लिए रामगढ़ भेजना है, उन्हें सहेजना होगा फेकुआ का कोला लवने के लिए। आप तो जनबै करते हैं कि ओन्हने छिनार जाने का करैं।’
रामभरोस का आदेष्श अपनी पीठ पर चिपका कर रामभरोस के दरवाजे से अपने घर की तरफ चौथी निकल गए। बखरी से वे कुछ दूर चले गए पर उन्हें लगता कि अभी वे बखरी के आसपास ही हैं। बखरी से दूर नहीं जा पा रहे हैं। वे पैदल चल रहे थे, एक कदम आगे बढ़ाते फिर दूसरा कदम उसके आगे। कितना तेजी से चलते। उन्होंने कुदरती चाल थोड़ा तेज किया, वे तेजी से चल कर अपने घर पहुंच जाना चाहते थे। उनकी ऑखों के सामने उनका घर था, घर थोड़ी ही दूरी पर था। घर तक पहुंचने का जो समय था वह चौथी के लिए सोच गुन का समय था।कृ
फेकुआ को कोला वे लवा तो लेंगे, कोला लवाते समय ही मारपीट हो गई तो.वे का करेंगे, फेकुआ थाने चला गया तो वे का करेंगे? कई तरह के सवाल अचानक उनके रास्ते पर बिछे जा रहे थे। एक सवाल के बारे में गुन रहे होते कि दूसरा सवाल आगे आकर बिछ जाता, उन्हें लगता के ये सारे सवाल उनका चलना बन्द कर देंगे, दरअसल ऐसा था भी।
चौथी को आदेश देकर बखरी के अन्तःपुर में रामभरोस समा गए थे। चौथी थे कि उन्हें ही फेकुआ का कोला लवाना था, उसे दंवाना था। सारा कुछ चौथी को ही करना था, कानून व परंपरा दोनों उन्हें हाथ में लेना था। रामभरोस तो अन्तःपुर से बाहर निकलते नहीं। वे बखरी में से ही खबरों को सूंघते कि खबर सूंघने लायक है या नहीं। खबर का क्या वह हमेशा बाहर रहती है। फेकुआ के कोला लवा लेने की घटना बखरी से बाहर निकल कर खबर बनती कि फेकुआ के कोले का क्या हुआ? खबर बनती कि चौथी का क्या हुआ? बनती हुई खबरों को रामभरोस अन्तःपुर से विश्लेषित करते। अगर खबर चूमने चाटने लायक होती तो बाहर निकलते नहीं तो अन्तःपुर में आराम कर रहे होते। यह तो समय व चौथी के किस्मत का खेल है कि वह खबरों को किस तरह से गढ़ता है? समय कहीं बुरा न गढ़ देे खबर को और उन्हें जेल जाना पड़ जाए।
चौथी असमंजस में थे, उन्हें खबर बनना बुरा लग रहा था, क्या करंे, क्या न करें। कुछ ही देर में वे घर आ गए।
'''‘गढ़ी हुई ताकत वालों की ताकत अधिक ताकतवरों
के सामने बौनी हो जाती है पर कमजोरों के सामने क्या कहने’'''
रामभरोस का सन्देशा पाकर हल्के का लेखपाल रामबली तड़के ही उनकी बखरी पर आ गया था। आजकल गरीबों के लिए भूमि आवंटन का कार्यक्रम चल रहा है सो वह परेष्शान है। कागज तैयार करते करते वह थक जाता है। ग्रामसभा की जमीन का आवंटन करने के लिए वह गरीबों की चौथी सूची बना रहा है। तीन बार उस सूची को बना चुका है। हर बार सूची में उसे बदलाव करना पड़ रहा है कभी अधिकारियों के आदेशों पर तो कभी क्षेत्रा के प्रभावषाली नेताओं के दबावों पर। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह कैसी सूची बनाए जिससे अधिकारी तथा नेता दोनों खुश रहें। वह गॉवों में एक बार नहीं जाने कितनी बार घर घर जा चुका है, अब तो उसे गरीबों के नाम तक याद हो चुके हैं। एक घर में वह जाता है तो वहां उसकी ऑखों पर पहले का देखा हुआ घर तैरने लगता है। घरों की हालत देख कर वह समझ नहीं पाता कि किस घर में अधिक गरीबी है? जिस घर को वह देख रहा है यहां अधिक गरीबी है कि उस घर में जिसे वह पहले ही देख चुका है। वह एक महीने से गरीबों के घरों के चित्रा मन में बना रहा है। उसे लगता है कि जमीन का आवंटन तो सभी गरीबों को किया जाना चाहिए पर ऐसा आदेश नहीं है। आदेश है कि अत्यधिक गरीब को ही जमीन आवंटित किया जाना चाहिए। चौथी सूची में वह ऐसा नहीं करेगा। उसमें सभी भूमिहीन गरीबों का नाम लिखेगा और सारी भूमि को उनमें बराबर बराबर आवंटित करेगा। उसने वैसा ही किया भी। आवंटन के सिलसिले में उसे अपने हल्के में प्रतिदिन हाजिर रहना पड़ता है। कल वह सहपुरवा के पड़ोसी गॉव नुनुआ में था वहीं रामभरोस का करिन्दा रामदयाल उससे मिला।
रामदयाल कई कई विशेषताओं वाला आदमी है। पहली विशेषता उसकी है कि वह पहलवान है। दो चार को अकेले ही मार सकता है। लाठी-डंडा चलाने में उसका जोड़ नहीं। मार-पीट की उसकी कई कहानियां चर्चित हैं। उसी ने रामभरोस का सन्देशा उसे दिया कि वह शीघ्र ही रामभरोस सरकार से मिले जितना जल्दी हो सके। ‘सरकार! बुलाए हैं।’
लेखपाल रामबली का काम तहसील में सराहनीय माना जाता है तथा क्षेत्रा में भी। यह अच्छाई उसे कैसे हासिल हुई उसे नहीं पता, न ही उसे इसका घमंड है कि वह अच्छा आदमी ही नहीं अच्छा लेखपाल भी है। वह स्वभाव से मृदुभाषी सरल और सामान्य आदमी है। लेखपालियत पीठ पर लाद कर चलने वाला वह नहीं है दूसरे कमाऊ लेखपालों की तरह। लेखपाल की आर्थिक स्थिति भी किसी से कम नहीं है हालांकि पहले के रईसों में उसके बाप-दादों के नाम नहीं थे। लेखपाली के द्वारा रामबली ने अपनी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत कर लिया है। लेखपाल रामबली को अचरज लगा....कृ
‘कल ही तो मिले थे रामभरोस सरकार तहसील में, कुछ बोले नहीं, फिर आज काहे के लिए बुलावा भेज दिए’ हो सकता है कोई काम आन पड़ा हो’
रामभरोस के दरवाजे पर उस समय कोई नहीं था। रामबली आए और एक किनारे रखी मचिया पर मर्यादा की पर्याप्त दूरी बना कर बैठ गये। थोड़ा समय गुजरा होगा कि रामभरोस का कारिंन्दा रामदयाल आ गया। वह कंधे पर करियहवा बोंग धरे हुए था। लेखपाल को देखते ही मुस्कराया और मूंछे नुकीली करने लगा। लेखपाल रामबली ने मचिया से उठ कर रामदयाल को सलाम बजाया....कृकृ
‘सलाम बाबू साहब! सरकार से भेंट कराइए, थोड़ी जल्दी है’
रामदयाल ने मूंछ नुकीली करना बन्द किया और लेखपाल से कहा....कृकृ
‘अरे! लेखपाल बइठो तो... अबहीं सरकार गुसलखाने में होंगे, ओनकर इहै टेम है। काहे की जल्दी है? दर-दतुइन करो फिर पर-पानी करो, सरकार बुलवाये हैं तो मिलबै करेंगे।’
रामदयाल की बातों में रामभरोस के रूतबे की गंध मिली हुई थी, नहीं तो हल्के के दूसरे लोग इस तरह की बात लेखपाल से नहीं कर पाते। लेखपाल से बातें करके रामदयाल कारिंदा ने बखरी के कहांर डंगरा को गरियाया, वह वहीं खड़ा था।
’कारे डंगरा! तोके ससुर नाहीं लउक रहा है? लेखपाल आए हैं, एनकर सेवा-सत्कार कौन करेगा ससुर, जाओ नर-नाश्ता ले आओ।’
डंगरा रामभरोस का कहांर था, उसका काम था दरवाजे पर आए मेहमानों का स्वागत-सत्कार करना, बोला...कृ
‘हं सरकार! का हुकुम बा?’
रामभरोस के नौकर रामदयाल को भी सरकार ही बोलते थे। वे रामदयाल से डरते थे। रामभरोस तो बाद में मारेंगे पीटेंगे पर रामदयाल तो तुरंत पीठ पूजने लगेंगे।
डंगरा रामदयाल के पास आ गया, वह हाथ में लेजुर और बाल्टी लिए हुए था, उसने लेखपाल को सलाम बजाया और उन्हें दातुन दिया।
‘सरकार मुंह हाथ धोय लीजिए, नाश्ता लाय रहा हूं। सरकार के आने में अबहीं देरी है।’
रामभरोस के दरवाजे पर लेखपाल धुक-धुकी में था, सोच नहीं पा रहा था कि रामभरोस ने उसे किस काम के लिए बुलवाया है। लेखपाल के मन में आया कि उसे रामदयाल कारिन्दा से पूछना चाहिए पर नहीं पूछ पाया जाने का गुनें रामदयाल।
रामदयाल भी कम हरामी नहीं है। मन में रामदयाल से पूछने वाले उठते भावों को लेखपाल दबा गया। होगा कुछ काम, सरकार कुछ कराना चाहते होंगे, काम के लिए ही बुलवाया होगा। उसने खुद को सहलाया..। उसने रामभरोस का कुछ नहीं बिगाड़ा है फिर काहे के लिए डरना। गरीबों के लिए चलाए जा रहे भूमि-आवंटन का काम भी तो सहपुरवा में नहीं चल रहा। यहां तो प्रथम चक्र में ही निपट गया था आवंटन का सारा काम। उसे मालूम है कि कलक्टर साहब जब सहपुरवा आए थे तब रामभरोस के कार्यों की भूरि भूरि प्रशंसा किए थे। उस समय रामभरोस ने भूमि आवंटन के लिए जितने सुझाव दिए थे लेखपाल ने सारा काम उनके सुझावों के आधार पर कर दिया था। उसे पता था कि रामभरोस से विरोध करके वह लेखपाल नहीं बना रह सकता है। रामभरोस के मन मुताबिक ही प्रष्शासन चलता है।
अचानक लेखपाल को अपने मित्रा रामकिशुन का ख्याल आ गया। वह भी इसी क्षेत्रा का लेखपाल था। उसने किसी मामले में रामभरोस का कहा हुआ नहीं माना था। रामभरोस कुछ उल्टा सीधा करवाना चाहते थे किसुन से और किसुन ने वही किया जो कानूनी रूप से उचित था। दो चार दिन के अन्दर ही उसे सस्पेन्ड कर दिया गया था और एस.डी.एम. साहब ने गालियां भी उसे दीं थीं।
लेखपाल के मन में रामभरोस को लेकर भय बना हुआ था, सरकार हैं जाने का करें। असली सरकार से तो लड़ा भी जा सकता है जिसने उसे नौकरी दिया है पर रामभरोस जैसे सरकार से नहीं लड़ा जा सकता। वैसे भी ऐसे सरकारों से कभी नहीं लड़ा जा सकता। ये ऐसी सरकारें होती है जो दिखती नहीं हैं, जो जनता द्वारा चुनी नहीं जाती हैं, जिनके कानूनों के बारे में किसी को जानकारी नहीं होती, ऐसी सरकारें खुद कानून बनाती हैं और उसे खुद लागू भी कराती हैं।
लेखपाल एकबारगी कांप गया। वह जानता था कि असली सरकार तो रामभरोस ही हैं। सरकार वाले अधिकारी तो दिखावा होते हैं। वे रामभरोस जैसे ‘सरकारों’ के मुताबिक चलते हैं। कौन ऐसा आला अधिकारी होगा जो रामभरोस के यहां आ कर मेहमानी न करता हो और शिकार करने के लिए जंगल न जाता हो। उसे एक कहानी आज भी याद है कि कुछ साल पहले यहां के जो कलक्टर साहेब थे उन्होंने अडगुड़ के जंगल में एक बाघ मारा था। उस शिकार वाले कार्यक्रम को रामभरोस ने ही आयोजित करवाया था। खुश होकर कलक्टर साहेब ने रामभरोस को एक रायफल तत्काल दिलवा दिया था।
करीब एक घंटे बाद लेखपाल ने खड़ाऊं की कट कट सुना...कृ
‘लगता है सरकार आ रहे हैं!’
सरकार के आने की आहट सेे गूॅज गया बखरी का आहाता। आने की आहट पीने लगा लेखपाल।
आहट सही थी। वे रामभरोस ही थे। शरीर का भारी भरकम बोझ लिए रामभरोस खड़ाऊं की कड़प कड़प के साथ बखरी से बाहर निकल रहे थे। खड़ाऊं की कड़प कड़प में सामन्ती धुन थी जो सामन्ती तरीके से फैल रही थी। सामन्ती धुन में पहले कड़प फिर झड़प, ऐसी ही होती है सामन्ती धुन। वे लकदक सफेद खादी के आवरण में थे। सफेद खादी का उनका अवरण भी खूब खूब था जैसे उसी आवरण से स्वतंत्राता संग्राम का इतिहास ने खुराक हासिल किया हो। पर वहां भगत सिंह और चन्द्रष्शेखर आजाद की वास्तविक कहानियॉ किसी चकत्ते की तरह भी नहीं दीख रही थीं। सो खादी का उनका आवरण लेखपाल को डराने लगा। उसकी डरावनी आभा लेखपाल की ऑखों में थिरकने लगी। लेखपाल रामबली ने हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया....
‘पा लागी सरकार!’
‘खुश रहो, बइठो’
रामभरोस ने लेखपाल को आशीषा फिर जनेऊ निकाल कर कान पर चढ़ाया और पेशाब करने के लिए किनारे की तरफ चले गये।
लेखपाल रामबली ने रामभरोस के आने के बाद मचिया छोड़ दिया और रामभरोस की कुर्सी के सामने बिछी दरी पर बैठ गया। लेखपाल जानता था कि रामभरोस के सामने कुर्सी कौन कहे मचिया या खटिया पर बैठ जाना पीठ पर खुद कोड़े मरवाने वाला अपराध हो जाएगा। अगर कोई अनजाने बैठा रह गया फिर तो रामभरोस उसकी ऐसी तैसी कर दिया करते थे। लेखपाल जानता था कि रामभरोस काम करने की छूट भी दिया करते थे और कहते भी थे कि...कृ
‘जहां तक होय सकै वही काम करना चाहिए, जिससे कि नौकरी न जाने पाए।’
पर काम नहीं होने पर वही रामभरोस कर्मचारी को सस्पेंड भी करवा दिया करतेे थे। उस क्षेत्रा का हर कर्मचारी जानता है कि रामभरोस का काम न करने पर नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है, मरवाएंगे पिटवाएंगे ऊपर से। पेशाब कर चुकने के बाद रामभरोस सीधे अपनी कुर्सी पर आ कर धम्म से बैठ गए।कृ
‘का हाल-चाल है हो रामबली?’ रामभरोस ने पूछा
‘सब ठीक है सरकार!’ रामबली ने विनम्रता से बताया
‘देखो कल तूं तहसीलदार साहब के ईहां मिले थे पर हमार खियालय भूल गया कि तोसे बात करनी है। तहसील से जब घर आए तब खियाल आया कि तोहके तो एक जरूरी काम बताए ही नाहीं’ कृ
रामभरोस चुप हो गए लगे काम के बारे में सोचने....
‘का बात करनी थी सरकार’ लेखपाल ने पूछा
‘अरे कुछ नाहीं हो’
रामभरोस ने लेखपाल को आश्वास्त किया जैसे कोई बात ही न हो पर बिना बात के रामभरोस उसे क्यों बुलवाते?
लेखपाल के आने के पहले रामभरोस ने गॉव पंचायत की बैठक बुलाया था। बैठक में चौथी गवहां ने प्रस्ताव दिया था कि सार्वजनिक उपयोगों वाली कुछ भूमियों का आवंटन हो गया है, जिसे गॉवसभा के हित में खारिज कराना बहुत जरूरी है। इस प्रस्ताव का समथर्न गॉवसभा के सदस्य रामदयाल कारिन्दा ने किया था पर एक सदस्य शोभनाथ पंडित ने इस प्रस्ताव का पंचायत में ही विरोध करते हुए कहा था कि किसी भी आवंटन को खारिज कराना गलत होगा। कोई भी आवंटित भूमि ऐसी नहीं है जिससे गॉवसभा या गॉव के किसी आदमी का नुकसान होता हो फिर काहे के लिए आवंटन खारिज कराना। पर शोभनाथ का प्रस्ताव नहीं स्वीकारा गया। उनका प्रस्ताव एक के खिलाफ छह मतों से गिर गया और भूमि प्रबंधक समिति की कार्यवाही पूरी कर ली गई। रामभरोस ने ताजे प्रस्ताव का विवरण लेखपाल को दिया और प्रस्ताव की नकल भी।
‘देखो रामबली हमरे ग्रामसभा ने एक प्रस्ताव पास किया है, ए प्रस्ताव में है कि आराजी नंबर 47 अउर 54 का पट्टा खारिज कराना है, समझे कि नाहीं’
‘समझ गए सरकार, पर ई काम हम कइसे कर पांएगे, इस काम को डिप्टी साहब करेंगे। ओनसे बतियालें सरकार! ओ जमीनी में घर दुआर बना है कि नाहीं, अगर घर बना होगा तो दीवानी का मामला हो जाएगा। हमारा विभाग उसे कैसे निपटा सकता है?
‘हं हं हम सब जानते हैं हमरे सामने कानून जीन निपोरो, तूं एतनै करो कि प्रस्ताव पर अपनी और कानून गो की रिपोरट लगवाय के डिप्टी साहब के इहां दाखिल कराय दो। आगे हम देख लेंगे, समझे के नाहीं। एकरे आगे जीन सोचो तोहार काम सोचबे का नाहीं है। तोहके हम जौन बोल रहे हैं वोही करना है।’
सहपुरवा ऐसा वैसा गॉव तो है नहीं, यहां के लोग भी साधारण नहीं हैं। रामभरोस के पास बिना कागजात के लेखपाल हाजिर हो ऐसा संभव नहीं था। रामभरोस के सामने ही लेखपाल रामबली ने आवंटन पत्रावली निकाला। उस पत्रावली में देखा तो मालूम हुआ कि प्रस्तावित दोनों आराजी का आवंटन औतार के नाम से हुआ है। लेखपाल ने खसरा देखा खसरे में वह जमीन कृषि भूमि के रूप में दर्ज थी, उस पर खेती हो सकती है। उस जमीन से गॉव व गॉव वालों को कोई नुकसान नहीं था। अगर वह जमीन बॉध या भीटा के रूप में होती तो पट्टा खारिज करना आसान होता। आखिर कैसे खारिज होगा यह आवंटन? लेखपाल सोच में पड़ गया।
रामभरोस तो रामभरोस थे अपने पर भरोसा रखने वाले, रामभरोस ने रामबली को गंभीर देख कर तत्काल रामदयाल कारिन्दा से पूछा....कृ
‘का हो रामदयाल, लेखपाल का खरवनवा (सरकारी कर्मचारियों को जमीनदारों व बड़े किसानों द्वारा दिया जाना वाला खाद्यान्न) गया के नाहीं’
‘अबहीं तऽ नाहीं गया है सरकार, काल्हु चला जाएगा! महीनका चउरे का बोरा बांध के रखा हुआ है’ रामदयाल कारिन्दा ने रामभरोस को बताया।
लेखपाल कायदा कानून जानता था कि आवंटन खारिज कराना आसान नहीं होता पर वह रामभरोस से इनकार नहीं कर सकता था। आखिर कैसे बोले कि पट्टा खारिज नहीं कराया जा सकता। लेखपाल भी कम नहीं होते बात चीत करने और गढ़ने में, उत्तर देने तथा बहाना बनाने में कलाकार होते है। तत्काल लेखपाल ने अपना बवाल कानून गो पर थोप दिया।
‘अरे सरकार एम्मे हम का करेंगे, एके तो कानून गो साहब करेंगे। हम आपन रिपोरट लगाय दे रहे हैं।’
रामभरोस के सामने ही गॉवसभा के प्रस्ताव पर तत्काल उसने रिपोर्ट लगा भी दिया।
‘एके सरकार आप कानून गो साहब से कराय लीजिएगा। आप के लिए ई कौन काम है सरकार। हमसे कानून गो नाहीं नुकूर करने लगेंगे, बूझेंगे कि सरकार से अपने तो गठरी ले लिया और हमसे फोकट में कराय रहा है।’
रामभरोस सब कुछ सुन सकते थे पर अपने को कमजोर नहीं। यह उनकी कमजोरी थी जिसे लेखपाल जानता था। लेखपाल की बात सुनते ही रामभरोस गरम हो गये।
‘क्या बकते है रे रामबली! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, कानून गो का होता है रे! जिला में कउनो अफसर ऐसा नाहीं है जो हमार बात रिजेक्ट कर दे। साम, दाम, दण्ड, भेद हम सारा कुछ जानते हैं। बूझते हो कि नाहीं, हम महाभारत पढ़ते हैं, कब का करना चाहिए, हमैं नालेज है’
अपने बारे में बता कर रामभरोस ने रामदयाल कारिन्दा को ललकारा।
‘अरे रामदयलवा का कर रहा है रे! लेखपाल को नर नाश्ता कराएगा के नाहीं। हमैं अब्बै रापटगंज जाना है तनिक टेक्टरवा निकालि देते, संझा तक लौटेंगे।’ (उस समय रामभरोस जैसे लोगों के लिए ट्रेक्टर ही कहीं आने जाने का सहारा था)
रामदयाल कारिन्दा के हाथ में दूध का गिलास था। उसने रामभरोस को गिलास थमाया, रामभरोस ने गट्ट से दूध सुड़ुक लिया और तश्तरी में से दो बीड़ा पान ले कर मुह में दाब लिया। पान के हिसाब से सुर्ती और सोपारी भी। कारिंदा तब तक टेªक्टर निकाल कर स्टार्ट भी कर चुका था। ड्राइविंग सीट पर बैठ कर रामभरोस ने लेखपाल को बुलाया फिर उसके कान में कुछ कहा जो आवंटन खारिजा के बाबत था कि रुपया चाहे जेतना लगि जाये पर आवंटन खारिज होना चाहिए।
रामभरोस के जाने के बाद लेखपाल दूसरे गंाव नुनुआ चला गया जहां आवंटन की कार्यवाही चल रही थी।
'''‘करने या न करने के बीच रिश्ता नहीं होता,
अगर इनमें रिश्ता ही हो तो द्वन्द किस बात का?
किस लिए कथा आगे बढ़े पर कथा तो बढ़ने के लिए होती है’
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फेकुआ और बिफना दोनों चौथी गवहां के यहां हलवाही करते थे। चौथी गवहां के यहां लवनी का काम खतम हो चुका था। एक दिन बिफना और फेकुआ दोनों ने अपने अपने कोले के धान की लवनी करने के बारे में चौथी से पूछा। जोतनी के बाद धान की फसल खड़ी रहना ठीक नहीं है, धान खरा जाएगा फिर उसे दरवाने पर चावल टूटने लगेगा। उसकी लवनी कर लेना चाहिए। चौथी गवहां लवनी का काम टालना चाहते थे जैसा कि रामभरोस ने कहा था कि तूं फेकुआ के कोले के धान की लवनी करा कर दवांई भी करा लो। चौथी ने धान की लवनी रोकने का बहाना खोजा। कल सभी लोग मिल कर खलिहान तैयार कर उसकी पोताई कर लो बाद में अपने धान की लवाई कर लेना। इसी तरह का फरमान चौथी गवहां ने जारी कर दिया, अभी बंधे के पार वाले खेत की जोतनी भी तो बाकी है।
‘बंधे के पार वाला कौन खेत मालिक!’ पूछा फेकुआ ने
‘अरे उहै रामभरोस सरकार वाला, ये साल ऊ हमरे जिम्मे है’ चौथी ने बताया
फेकुआ और बिफना दोनों को आभास हो चुका था कि चौथी कोला का धान खुद लवाना चाहते हैं सो बहाना बना रहे हैं। गॉव में वैसे भी कोई खबर चाहे सत्कार की हो या बलात्कार की, प्यार की हो या मारपीट की, उपकार की हो या षडयंत्रा की, पर्दे में नहीं रह सकती, नाचने लगती है पूरे गॉव में। चौथी फेकुआ का कोला लवा लेंगे यह खबर पूरे गॉव में नाचने लगी थी। फिर भी वे क्या करते? उन्हें चौथी गवहां की बात माननी ही थी। चौथी गवहां बहाना बना रहे थे, वह खेत रामभरोस का था, चौथी गवहां का नहीं। रामभरोस के दरवाजे से सीधे चौथी गवहां अपने खेत पर चले गये थे। वहां आने वाले कल का पूरा प्रोग्राम मजूरों को समझा कर चौथी गवहां अपने घर चले आये। गिद्ध की तरह चौथी खेत पर डटे हुए थे सो बिफना और फेकुआ अपनी बातें नहीं कर पा रहे थे जबकि कई बातें उनके मन में उमड़ घुमड़ रही थीं।
‘ये मालिक भी गजब होते हैं कउआ की तरह ऑखें लगाये रहते हैं काम पर।’
खेत पर से चौथी के जाने के बाद दोनों अपनी बातों में डूब गए। बिफना जानता था कि इस साल फेकुआ का बियाह होगा। उसे यह भी मालूम था कि फेकुआ की औरत काफी खूबसूरत है, लोग देखते ही रह जाते हैं, उसका रंग रूप ठकुराइन, पंडिताइन माफिक है। उसने फेकुआ को टोका....कृ
‘का रे फेकुआ ए साल तोहार बियाह होगा, अब तऽ तोहार चानी है राजा, अबहीं साइत धराया के नाहीं रे!’
फेकुआ उस समय गॉव के मालिकों के बारे में सोच रहा था। यहां तो जांगर खटाने के लिए भी कायदा कानून है। हम किसी को गाली तो देते नाहीं फिर भी एक भी मालिक ऐसा नाहीं है जो हमैं गरियाता न हो। बात बात पर गारी, हगनी मुतनी से ले कर जाने का का। गारी सुनो और सुनते रहो, बोलो कुछ नहीं फिर भी हमारे बिरादरी के बड़का बुड़का हमैं ही दोषी बोलते हैं। हमने रामभरोस से हल जोतने के लिए का कह दिया कि बुरा हो गया, बपई डाटने, दबेरने लगे, अइया भी रिसिया र्गइं। अरे हमने ओन्है गरियाया तो नहीं था। बिफना के पूछने पर अचानक फेकुआ का ध्यान टूटा....कृ
‘हमैं कुछ मालूम नाहीं है यार! बपई से चाहे अइया से पूछो नऽ बियाहे के बारे में’
बियाह के बारे में वस्तुतः फेकुआ को कुछ भी मालूम नहीं था सो वह बिफना को का बताता। वह आगे सोचने लगा....
‘हमार बुढ़वा सब के सब पगला गये हैं, हमार वश्ष चलता तो हम देखा देते कि हम हलवाह हैं तो का हुआ? केहू के गुलाम नाहीं हैं, अब हम आजाद हो गए हैं, मन होगा जेकर काम करेंगे नाही मन होगा ओकर काम नाहीं करेंगे।’
बिफना काहे मानता, वह जानता था कि फेकुआ परेष्शान है, रामभरोस के बारे में सोच गुन रहा है। रामभरोस इतना कमीना है कि साधारण सी बात को भी तिल का ताड़ बना कर औतार कक्का को परेष्शान करेगा। बिफना को ख्याल आया...कृ एक बार बुद्वू मौसा रामभरोस के दरवाजे पर छाता लगा कर चले गये थे फिर क्या था, रामभरोस ने रामदयाल कारिन्दा को सहेज दिया और उस हरामजादे ने बुद्वू मौसा को इतना मारा कि दवाई करानी पड़ी। पन्द्रह बीस दिन तक वे खटिया थामे रह गये थे। दो तीन महीने जिन्दा रहे बस। सोच से बाहर निकल कर बिफना ने दुबारा फेकुआ को झकझोरा...कृ
‘आज कल जाड़ा खूब पड़ रहा है यार! मेहरारू के बिना ओंघाई नाहीं लगती। तोर भउजी जब से नइहरे गई हैं, तब से ई जो रात है नऽ बिताना पहाड़ हो गया है। आज रात में तऽ पाला पड़ा था। अकेले सूतो तो लगता है कि रतिया पूरी देह कंप कंपा रही है साथ सोने पर तो पता नाहीं चलता कि रात है कि दिन है।’
फेकुआ का बोलता, उसके बियाह को लेकर बिफना उसे अक्सर तंग करता रहता है। ऐसी बतकही करता कि फेकुआ आवेषित हो जाए और मन तथा तन के बारे में बड़ बड़ाने लगे। अनमने भाव से फेकुआ बोला...कृ
‘हमैं तो जाड़ा लगबै नाही करता है फिर हम का बतांए जाड़ा के बारे में? किसी दिन भउजी के संघे सूतने का मौका मिलता तो बताते कि मेहरारू जाड़ा सोख लेती हैं कि नाहीं। अरे यार बिफना! एकाध दिन भउजी को भेजो हमरे ईहां फिर हम बतांए कि का होता है संगे सूतने पर। हम किरिया खाय रहे हैं कि ये बात का ढोल नाहीं पीटेंगे।
फेंकुआ के मुखर होते ही बिफना को लगा कि उसका काम हो गया उसने फेकुआ को सोचने से रोक लिया अब वह अपनी उदासी से बाहर निकल जाएगा फिर उसने दुबारा मजाक किया....कृ
‘इसमें का है यार! काल्हु तोहार भउजी आएगी, परसों भेज देंगे ओनके ताहरे पास। फेकुआ लजा गया, का बोल रहा बिफना। फेकुआ ने कभी भउजाई से मजाक तक नहीं किया था और उसके साथ सोने की बात। तत्काल बात का प्रसंग फेकुआ ने बदला....कृकृ
रापटगंज में होने वाले कवि सम्मेलन के बारे में पूछने लगा। चलना है कि नहीं चलना है। दोनों ने पहले ही निश्चित किया हुआ था कि इस बार कविसम्मेलन सुनने चलना ही है। मालिक लोग चाहे डांटें या दबेरें का फर्क पड़ता है। डांट तो पीठ पर अपना घर बनाएगी नहीं फिर डांट से काहे डरना, वह तो हवा में उड़ जाएगी हवा की तरह। बिफना ने फेकुआ को बताया कि परसों ही कविसम्मेलन है।
अचानक बिफना को ख्याल आया कि शंकर झांकी के अवसर पर रापटगंज में बिरहा का दंगल था, बहुत भीड़ थी। घोरावल के इलाके के किसी गॉव की एक लड़की बिरहा का दंगल सुनने आई थी। उसके साथ उसकी छोटी बहिन भी थी। वह गॉव के कुछ लोगों के साथ थी। सभी लोग बिरहा सुन रहे थे तथा उसी में खोये हुए थे तभी अचानक लड़की गायब हो गयी। लड़की कैसे गायब हो गई? किसी को नहीं पता चला। साथ के लोग लड़की को ढूढने लगे तब मालूम हुआ कि लड़की वहां है ही नहीं। गॉव के परधान जी भी साथ में ही थे सभी घबरा कर लड़की को खोजने लगे पर लड़की वहां होती तब तो मिलती। लड़की के न मिलने पर परधान ने सुरक्षा व्यवस्था में लगे सिपाहियों को बताया। सुरक्षा व्यवस्था के सिपाहियों ने अक्ल से काम लिया और थाने पर खबर कर दी। थाने के सिपाही लड़की को हर संभावित स्थान पर खोजने लगे संयोग ठीक था कि लड़की अकड़हवा पोखरा पर मिली। वह कुछ लड़कों से घिरी थी। एक लड़का घटना स्थल पर ही दबोच लिए गया, दूसरा भाग गया। दारोगा जी ने कानूनी कार्यवाही किया। लड़की का बयान लिया गया और रात भर उसे थाने पर ही रोक लिया गया। परधान से कहा गया कि बिरहा का दंगल चल रहा है ऐसे में लड़की को छोड़ना बवाल करना होगा। गुस्से में भीड़ कुछ भी कर सकती है, लड़कों का चालान कल सुबह होगा। दूसरे दिन मालूम हुआ कि लड़की के साथ बलात्कार किया गया था। लोगों का शक सही निकला, लड़की छटपटा रही थी। यह नहीं मालूम हो सका कि लड़की खुद अपनी मर्जी से लड़कों के साथ चली गई थी या लड़कों ने उसे उठा लिया था। इस सचाई को बताता भी कौन? वैसे लड़की चिल्ला चिल्ला कर बोल रही थी कि कुछ लड़कों ने उसको जबरी उठा लिया था और थाने पर....
उस घटना की याद बिफना ने फेकुआ को दिलाया जिसे फेकुआ जानता था। ‘मेला-ठेला में तो यह सब होता ही रहता है।’ यह जो देह की बात है जितना देह के भीतर है उतना ही देह के बाहर भी है। मेला-ठेला में लड़कों और लड़कियों को मौका मिल जाता है, भाग जाते हैं सब, जब पकड़ जाते है तब मामला दूसरा बन जाता है। देह के करतबों को रोकना असान नहीं होता, देह कब किस तरह का करतब दिखाने लगे कोई नहीं जानता। कोई जान भी नहीं सकता देह के करतबों के बारे में। फेकुआ अपनी देह इसी लिए बांध कर रखता है, कहीं भाग न जाए किसिम किसिम के करतबों में गोते लगाने के लिए।
फेकुआ ने बिफना को चिढ़ाने की नियति से सुकुली की चर्चा की। सुकुली नुनुआ की रहने वाली थी। रामगढ़ में जब बिरहा का दंगल था तब वह भी सुकुली को भगा ले गया था। धर-पकड़ हुई थी पर बिफना नहीं पकड़ाया, संयोग ठीक था। कई बार दोनों ने इस बाबत योजनाएं भी बनाई थीं, फेकुआ की बात से बिफना झेप गया...कृ
‘अरे यार! ई सब बिआहे के पहिले की बात है, अब ऐसा कौन करेगा। उस समय तो कुछ बुझाता ही नहीं था कि आग में गोता लगाना है कि पानी में। अब वह बात नाही है।’
वे दिन भर हल जोतते रहे। बेर ढल रही थी, अब तो काम बन्द कर देना चाहिए, पर मालिक कुछ नहीं बोल रहे हैं। इस मामले में मालिक कुछ नहीं बोलते कि बोल दें अब हल छटका दो, बेर ढलने वाली है या ढल चुकी है। बिफना ने मालिक से पूछ कर हल छटका दिया फिर अपने अपने घर की तरफ दोनों चल दिए। चौथी का लड़का मुन्नू भी खेत पर ही था, उसने बैलों को चराने के लिए बिफना और फेकुआ को रोक लिया। कुछ दूरी पर शोभनाथ पंडित का खलिहान था। खलिहान में कउड़ा जल रहा था। कउड़ा पर वे दोनों भी बैठ गये। जाडे की ठंड तेजी पर थी चैत वाली। शोभनाथ पंडित ने जेब से सुर्ती निकाला और फेकुआ को दिया...कृ
‘सुर्ती बनाओ बेटा, का हाल है जोतनी की?’
ष्शोभनाथ पंडित ने बिफना से पूछा..कृकृ
‘खतमै है सरकार, दू तीन दिन अउर चलेगी’ बिफना ने बताया।
फेकुआ अचरज पीने लगा था, यह क्या है कि शोभनाथ पंडित सुर्ती बनाने के लिए उससे बोल रहे हैं, बाभन हैं, बाभन तो हरिजन के हाथ का पानी भी नाही पीते फिर ये उसकी बनाई सुर्ती कैसे मुह में डालेंगे, उनका धरम बिला जाएगा। गॉव के दूसरे बाभन तो हरिजनों के अगल बगल बैठने पर घिनाते हैं। फेकुआ कुछ सोच नहीं पा रहा था, बिफना से पूछेगा...
फेकुआ सुर्ती मलने लगा। सुर्ती मलने में फेकुआ का जोड़ नहीं। गजब की सुर्ती मलता है, खाते ही नशा चढ़ जाता है। सुर्ती मल जाने पर उसने अपनी हथोली शोभनाथ पंडित की तरफ बढ़ाया...कृ
‘लीजिए सरकार।’
ष्शोभनाथ पंडित ने चुटकी से फेकुआ की हथोली पर से सुर्ती उठाया और जीभ के नीचे दबा लिया। जैसे वे छूत अछूत की बद्जात संस्कृति दबा रहे हों चूस कर उसे फेकने के लिए। पर यह जो छूत अछूत की संस्कृति है वह सुर्ती माफिक नहीं है कि जीभ के नीचे दाब लिया और चूस कर थूक दिया। वह तो सालों साल से चली आ रही है आदमी को आदमी से अलगियाने के लिए।
ष्शोभनाथ की खेती की तुलना रामभरोस से नहीं की जा सकती थी। शोभनाथ की खेती कम थी पर पैदावार अधिक थी। शोभनाथ खेती अच्छे ढंग से करते थे, खूब खाद पानी देते थे तथा खुद निगरानी करते थे। यह सब रामभरोस के यहां नहीं होता था। हो भी नहीं सकता था, वे मजूरों पर आश्रित थे। मजूरों के बिना उनका कोई काम हो ही नहीं सकता था। अन्हार होते होते तक दोनों अपने अपने घर चले गये और बैलों को मुन्नू चराने लगे थे। रास्ते में फेकुआ ने पूछा था बिफना से...कृकृ
कारे! शोभनाथ पंडित मेरे द्वारा बनाई सुर्ती सीधे मुह में दाब लिए, घिनाए नाहीं।’
‘वे घिनाते तो तोहसे काहे बनवाते’
‘तो का पंडित जी की जाति बिगड़ नाहीं गई ?’
‘नाहीं रे सुर्ती खाने से जाति बिगड़ती है भला। यह सब तो पंडितों का नाटक है, लेकिन शोभनाथ पंडित नहीं मानते यह सब।’ दूसरे दिन ही चौथी गवहां ने फेकुआ का कोला लवाने का कार्यक्रम बना लिया था। उस दिन सरकारी छुट्टी थी। छुट्टी के दिन फेकुआ कहां जाता, का कर लेता, बहुत होता तो थाने जाता पर थाने जा कर का करता। खेत का रकबा कम था मुश्ष्किल से आधे से कम घंटे में लवा गया फिर काम खतम। वही हुआ धान लवा कर चौथी गवहां अपने खलिहान उठवा ले आये। गॉव का एक भी मजूर फेकुआ का धान काटने नहीं गया। मजूर जानते थे कि फेकुआ के कोला का धान दूनी मजूरी पर चौथी जबरी लवा रहे हैं। मजूर बाहर से बुलवाए गये थे। गॉव के मजूरों से बोला भी नहीं गया था, बोला भी जाता तो गॉव के मजूरे फेकुआ का कोला नहीं काटते। इतनी एकता थी मजूरों में भले वे मालिकों के गलत कामों का विरोध नहीं कर पाते थे। गॉव भर को मालूम हो जाता तो फेकुआ और औतार सावधान भी हो जाते फिर तो फेकुआ के कोला का धान नहीं कटा पाता, मारपीट भी हो सकती थी। उस दिन सावधानी बरतते हुए फेकुआ और बिफना को धान कुटाने के लिए चौथी गवहां ने रामगढ़ भेज दिया था। यह विचारते हुए कि रिष्श्क लेना ठीक नहीं होगा। रामगढ़ से जब तक बिफना व फेकुआ लौटेंगे तब तक धान की लवनी हो चुकी रहेगी, वही हुआ।
रामगढ़ से फेकुआ और बिफना देर रात तक लौटे। गॉव आने पर मालूम हुआ कि उसका कोला लवा लिया गया है। औतार ने फेकुआ को समझा बुझा कर शान्त किया कि झगड़ा नहीं करना है। पहले मालूम करना है कि यह सब किसके उकसावे पर चौथी गवहां ने किया। चौथी गवहां ने अपने मन से तो किया नहीं होगा, बात भी सच थी। चौथी ने तो रामभरोस के इशारे पर फेकुआ का कोला लवाया था। गॉव में कोई भी बात होती तो पैदल है पर उड़ती है हवाई जहाज की तरह। बात फैल गई कि यह जो कुछ हुआ है सब रामभरोस के कारण हुआ है। रामभरोस के कारण ही चौथी गवहां ने औतार और सुक्खू का पट्टा खारिज कराने के लिए प्रस्ताव दिया है। जिसे गॉवसभा ने पास भी कर दिया है। गॉव के बड़े लोग समझते हैं कि राजनीति वे ही जानते हैं, मजूर का जानेंगे राजनीति? पर ऐसा नहीं है अब मजूर भी कान और ऑखें खोल कर रखते हैं और बात बात में राजनीति की परख करने लगे हैं।
लोग कहते हैं कि जमाना बदल रहा है। आजादी के बाद नया जमाना आ गया है, गरीबों का राज हो गया है पर सहपुरवा में तो अब भी पहले वाला राज ही है। रामभरोस कहां बदले, वे आजादी के पहले जिस तरह से मजूरों, गरीबों का दमन किया करते थे उसी तरह से आज भी कर रहे हैं। औतार ने सुक्खू को समझाया...कृ
‘देखो सुक्खू भाई! कुछ नाहीं बदलेगा, सहपुरवा जैसा था वैसा ही रहेगा। यहां हर जगह रामभरोस की ऑखें ही तमाशा करेंगी। वही हम लोगों की पीठ पर कोड़े बरसाएंगी। अरे का बोलते हो सुक्खू भाई गरीबन का राज आ गया है। गरीबन का राज आ जाएगा तब जो बड़का बुड़का हैं उनकी सेवा टहल कौन करेगा, उनका हल कौन जोतेगा। का बूझते हो कि गरीबन का राज ऐसा ही होता है कि जेकर चाहो कोला लवाय लो, मजूरी दो चाहे न दो। पीठ पर कोड़े बरसाओ।’
औतार हालांकि सुक्खू को समझा रहे थे पर भीतर भीतर आक्रांत थे। वे सुगिया वाली घटना भूले नहीं थे। किसी तरह औतार ने सुगिया का विवाह किया था। उसी समय से रामभरोस औतार से नाराज ही नहीं बहुत नाराज थे। वे नाराज होते भी क्यों नहीं। औतार ने सुगिया के पति को रामभरोस की हलवाही से हटवा कर शोभनाथ पंडित की हलवाही पर लगवा दिया था और बाद में उसे गॉव से बाहर भेज दिया था। रामभरोस चाहते थे कि किसी भी हाल में सुगिया न उनका काम छोडे़ और न ही गॉव छोड़े। रामभरोस के लिए सुगिया जैविक संपदा थी जिस पर उनका स्वघोषित अधिकार था। सुगिया का ससुर पहले रामभरोस की ही हलवाही करता था। रामभरोस सुगिया के बिआह के बारे में जानते थे कि उसका पति निकम्मा है, गांजे और दारू के बदले वह अपनी बीबी रामभरोस को सौंप देगा। इन सब कामों को सरल व सुलभ बनाने के लिए रामदयाल कारिन्दा था ही। बिआह के बाद रामभरोस ने सुगिया के पति को अपने गॉव बुलवा लिया और वह आ भी गया। सुगिया अपने पति के साथ सहपुरवा लौटना नहीं चाहती थी पर उसे लौटना ही पड़ा। का करती, कितना मार खाती। वह अपने पति से बता भी नही सकती थी कि रखैल बनाने के लिए उसे रामभरोस बुलवा रहे हैं। फिर भी उसने मना किया....
‘हम नहिययरे नहीं जांएगे। बिआहे के बाद नहिययरे थोड़य रहा जाता है’
फिर तो उसके पति ने उसे मार कर अधमरा कर दिया, हाथ पीठ सूज गया उसका। डर के मारे पति के साथ वह सहपुरवा आ गई। सुगिया का सहपुरवा आना फेकुआ, औतार और सुक्खू को बहुत बुरा लगा।
सो औतार ने सुगिया को गॉव से भगाना जरूरी समझ कर उसे सहपुरवा से भगा भी दिया पर सुगिया के पति को पहले का सारा किस्सा बताना पड़ा। सुगिया का पति मर्द निकला वह वैसा नहीं था जैसा कि उसके बारे में बताया जाता था। सुगिया को सहपुरवा से भगा देना यह बात भी रामभरोस को चुभ रही थी पर वे उसे जाहिर नहीं होने देते थे। सुगिया के मामले में रामभरोस की बहुत बेइज्जती भी हुई थी। औतार के कारण गॉव भर सुगिया की बात जान गया था। रामभरोस ने रामदयाल कारिन्दा को लगा दिया था कि वह औतार को प्रताड़ित तथा अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़े जबकि खुद को संभाले रखते और खुद औतार के सामने नहीं आते थे।
जले पर नमक छिड़कना रामभरोस नहीं छोड़ते थे। इसी लिए औतार रामभरोस के बारे में फेकुआ को कुछ भी नहीं बताते थे फिर भी फेकुआ जानता था। उनके लड़के फेकुआ पर किसी भी तरह का बवाल न आए सो औतार खामोश रहा करते थे कि वह जवान है, गुस्से में मालिकों से झगड़ सकता है। औतार हरदम यही सोचा करते थे। एक ही बार की तो बात होती है संकोच खतम हुआ नहीं कि रामभरोस के सिर पर सैकड़ों लाठियां, माथे का कचूमर निकल जाये।
वे जानते थे कि चौथी गवहां भी रामभरोस के डर के कारण से ही फेकुआ का कोला लवा लिया होगा नहीं तो वे खुद ऐसी हिम्मत नहीं करते।
फेकुआ का कोला लवा लेने के बाद चौथी गवहां खुश खुश हो गए थे क्योंकि बिना अवरोध के फेकुआ का कोला लवा लिया गया था। संभव है रामभरोस उन्हें इनाम ओकराम भी दें। इसकी खुशी में रामभरोस के बैठका पर आ गये। बैठका पर रामभरोस नहीं थे। बैठका पर केवल रामदयाल कारिन्दा था जो चिलम रियाज कर रहा था, चिलम में गांजा भरा हुआ था और हर फूंक से वह आग निकाल रहा था। रामदयाल ने चौथी गवहां से पूछा....कृ
‘बैठिए हो चौथी भाई, गांजा पीजिए, का हुआ फेकुआ का कोला लवाया कि नाहीं’
चौथी गवहां अपने अनुसार युद्व फतह करके आये थे। किसी मजूर का कोला लवा लेना उनके लिए आसान काम न था। सो प्रसन्नता के मूड में थे पर अपराध बोध में भी थे। उन्हें लग रहा था कि फेकुआ का कोला नहीं लवाना चाहिए था। गरीब आदमी है, बेचारा का खाएगा, साल भर की उम्मीद जुड़ी होती है गरीबों की कोले की पैदावार से। कोले का धान घर पर आने के बाद वे तय करते हैं कि यह करना है वह करना है। बेचारों का सपना टूट जाएगा। सपने तो रामभरोस की तरफ भी थे, उनका सपना था कि फेकुआ बर्बाद हो जाए, भीख मांगे। फेकुआ के सपनों का क्या उसे तो रामभरोस जैसे तोड़ते व लूटते ही रहते हैं।
‘कोला लवाय गया रामदयाल!’
सहमे हुए से चौथी ने रामदयाल को बताया....
‘बहुत सहम के बोल रहे हो चौथी, राड़ रहकारों से डेरा रहे हो का, वे हरामी की औलाद का कर लेंगे यार! रामभरोस सरकार के रहते।’
गॉजे की चिलम तैयार थी। केवल फूॅक लगाना बाकी था। चौथी गवहां ने गॉजे की चिलम तत्काल मुंह से लगा लिया उसमें से धुआं खींचा और बम बम, हर हर महादेव, औघड़ दानी बोलने लगे। गॉजे का धुआं पेट के अन्दर गया, फिर थोड़ा सा बाहर आया, फिर दुबारा गया और बाहर आया। गॉजे के प्रभाव में चौथी झूमने लगे, उनका मन नाचने लगा। कुछ देर बाद मन अचानक स्थिर हो गया। मन ने नाचना बन्द कर दिया, अब क्या नाचना, नाच तो तब होती जब कुछ अच्छा काम किया होता, किसी गरीब को कोला लवा लेना यह तो सरासर पाप है। वे पापबोध में अचानक डूबने उतराने लगे थे।अपराधी से अपराधी व्यक्ति भी कभी कभी पापबोध में चला जाया करता है पर होता है वह अपराधी ही।
गॉजे का नशा चौथी को पटकने लगा था, वे कभी ऊपर उड़ जाते मानो उड़ रहे हों कभी नीचे गिर जाते जैसे उन्हें किसी ने पटक दिया हो जमीन पर। पर जो होना था वह हो चुका था। जो हो चुका था उसके होने की अनहोनियॉ चौथी के माथे पर उछलने लगी थीं। अनहोनियों की संभावनांए तो केवल डर ही पैदा करती हैं, डर भी किसिम किसिम के अगर रामभरोस थाने को मनमुताबिक नहीं चला पाए और उनके पास थाना आ गया तो....कृकृ
औतार ने उन पर मर-मुकदमा कर दिया तो....कृ
यह ‘तो’ चौथी के लिए मन ही मन डर पैदा करने लगा। जाने का हो? थाने के झमेले में पड़ गये तो सारी कमाई बर्बाद हो जाएगी।
'''‘बखरियांे की चमकों में खून के
लाल लाल चकत्तों के साथ कोड़ों व डंडों के चित्रा दिखते हैं, ऐसे
चित्रा तो आपको इस कथा में भी दिखेंगेकृमजबूरी है उनका दिखना’'''
फेकुआ का कोला लवाने की खबर गॉव भर में बहुत तेजी से फैल गई थी। खबर तो होती ही है फैलने के लिए। खबर में खास किस्म का सन्देश था कि जो भी रामभरोस की ऑख पर चढ़ जाएगा उसकी हालत औतार जैसी सिरज दी जाएगी। रामभरोस के आतंक के तमाम नमूनों में औतार जैसा एक और नमूना सहपुरवा के आकाश में मडराने लगा। सहपुरवा का आकाश था भी कितना? केवल रामभरोस की मर्जी तक पसरा सिमटा, कराहता। किसी ने आश्चर्य व्यक्त किया ‘ईमरजेन्सी’ में ऐसा कर रहे हैं रामभरोस औतार और फेकुआ के साथ?’
‘क्या करेगी ईमरजेन्सी? ईमरजेन्सी भी तो एक कानून ही है। कानून गढ़ने वाले हैं तो उसे तोड़ने वाले भी हैं तथा कुछ अपने मनमाफिक कानून को नचाने व घुमाने वाले भी हैं। कानून की किस्म जैसी भी हो रामभरोस जैसे कुछ लोग उसे अलग किस्म का बना दे देते हैं। रामभरोस जैसों के यहां तात्कालिक समय का कानून बराबर गुलामी करता रहता है। कानून नाचता है उनकी बखरी में, कभी नग्न हो कर तो कभी ताप ताप कर। रामभरोस के लिए ‘ईमरजेन्सी’ का कोई मतलब नहीं।’
समय बीतने लगा। फेकुआ का कोला लवाने के मामले में चौथी गवहां को लोग निर्दोष समझने लगे। गॉव में इस तरह का खेल हमेशा रामभरोस करवाते रहे हैं। चौथी बेचारे तो रामभरोस की जाल में फस गए थे। फेकुआ ने जाने अनजाने जो कुछ रामभरोस से कहा था उसका कोई मतलब नहीं था, असल बात थी औतार से नाराजगी वह भी सुगिया वाले मामले को लेकर। औतार वैसे भी अपने दिल और दिमाग को अपने अनुसार चलाते थे और रामभरोस की बखरी पर जा कर सलाम नही बजाया करते थे। उन्हें किसी को सलाम बजाना अच्छा नहीं लगता था। यही सब बातें थीं जो रामभरोस को अखरती थीं। सहपुरवा में रहना है तो उनकी बखरी पर जा कर उन्हें सलाम बजाना है।
बखरियां होती भी तो इसी लिए हैं। लोकतंत्रा में ऐसी बखरियों की कमी नहीं, थोड़ी शक्ल बदल बदल कर हर तरफ बखरियॉ अपना रुतबा बनाए हुई हैं। रामभरोस की बखरी तो सांस्कृतिक है, तहसील, थाना, कलक्टरी आदि की बखरियां कानूनी हैं। पंचायतें सभी बखरियों पर हुआ करती हैं चाहे वह बखरी सांस्कृतिक हो या कानूनी।
औतार आशंकाओं में घिरे हुए थे। रामभरोस खामोश रहने वालों में नहीं हैं। औतार की आशंकाएं कई तरह की थीं। रामभरोस उन्हें किसी कानूनी झमेले भी फसा सकते हैं या खुद ही मार-पीट कर सकते हैं। कुछ भी कर सकते हैं रामभरोस। सो वह रामभरोस के खिलाफ कुछ करने के बजाय फेकुआ को समझाया बुझाया करते थे। वैसे भी राभरोस के खिलाफ कुछ करना उनके ही क्या किसी के वश का नहीं था। औतार कर भी क्या लेते, थाने ही जाते, थाना रामभरोस की जेब में था।
फेकुआ भी क्या करता। वह खामोश था, जो होना था हो चुका था जो होगा बाद में देखा जाएगा। भोर में ही फेकुआ का कोला लवा लिया गया था। गॉव भर घूमे थे औतार, एक एक आदमी को बताए थे कि उनके बेटे का कोला रामभरोस लवा रहे हैं। पर उनकी दुहाई गॉव में सुनने वाला कोई नहीं था। गॉव में तो रामभरोस का आतंक हर तरफ पसरा हुआ था। गॉव की सारी गलियां कांप रही थीं और सिवान थे कि वहां लोकराज का कोई शिनाख्त न बचा था। चारो तरफ रामभरोस, रामभरोस ही थे, उनकी लाठियॉ थीं, गालियॉ थीं और जुल्म की तमाम किस्में थीं। जुल्म भी ऐसी नश्ष्लों वाले थे जिन्हें अपराधशास़्त्रा की किसी किताब में नहीं पढ़ा जा सकता था। रामभरोस सदैव अलग अलग तरीके से जुल्मों की शक्ल गढ़ा करते थे जिससे गॉव डर पीने लगता था। रामभरोस के जुल्मों में ही सहपुरवा का जीवन था।
चौथी गवहां ने फेकुआ के कोला का धान लवा लिया है यह बात गॉव वालों को भी मालूम थी। औतार की दुहाई तो दुहाई भर थी इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। गॉव का एक आदमी भी उनकी दुहाई पर नहीं पसीजा। पसीजते भी काहे। उन्हें पता था कि रामभरोस से पंगा लेना खुद को मिटाना है, आखिर कौन खुद को मिटाने के लिए तैयार होता। रामभरोस की बखरी पर जा कर कोई क्यों पूछता कि आपने ऐसा काहे किया? थाने पर जाने की बात तो दूर की कौड़ी थी। गॉव ने मान लिया कि यह औतार का व्यक्तिगत मामला है इससे किसी दूसरे से क्या लेना देना। औतार गॉव का होते हुए भी ‘व्यक्तिगत’ हो चुके थे, उनकी समस्या उनकी है गॉव की नहीं, लोगों की नहीं, समाज की नहीं। समाज ने औतार से नाता तोड़ लिया था। पूरे जिले में नई तरह की ‘व्यक्तिगत’ वाली संस्कृति अवतार ले चुकी थी जिसका नाता सहभागिता व सहयोग वाली पुरानी संस्कृति से अंशमात्रा भी नहीं था।
औतार गॉव के लोगों से निराश हो कर चौथी गवहां के पास भी गये थे पर चौथी गवहां ने बहाना बना दिया और कहा कि उन्होंने फेकुआ को कोला दिया ही नहीं था और फेकुआ उनके यहां काम भी नहीं करता है, सो कोला लवाने की बात कहां से आ गई?
पहले उन्होंने कहा था..
‘कोला न लवांए तो का करें? कोला दिए थे काम करने के लिए कि घरे बइठने के लिए, जब फेकुआ ने हमारा काम ही नाहीं किया फिर काहे का कोला। ऊ खेत ओकरे बाप का तो था नाहीं’ हमारा खेत था हमने लवाय लिया।
‘का जमीन किसी के बाप की होती है’ औतार सोचने लगे।
जमीन किसी के बाप की तो होती नहीं, पर जो ताकतवर हैं वे जमीन के बाप बने हुए हैं। सहपुरवा में रामभरोस, चौथी जैसे कई हैं जो यहां के पेड़, पौधे, नाले, भीटा, बांध आदि के स्वयंभू बाप हैं। ऐसे बापों की कई किस्में हैं, कोई जमीन का बाप है तो कोई कायदा कानून का। कोई सरकार का तो कोई गॉव की पंचायत का। इन बापों से काहे के लिए रार लेना? ऐसे बापों से का बतियाना, बात करने के लिए जगह ही कहां बची हुई है?
रामभरोस की बखरी रास्ते में पड़ती थी, वे रामभरोस की बखरी पर भी गये। सुबह की धूप बखरी को सजाए हुए थी। बखरी चमकों वाली थी। उन चमकों में औतार को खून के लाल लाल चकत्ते चमकतेे दिखे। कहीं कहीं तो कोड़ों व डंडों के चित्र भी दिखते जो बखरी की चमकती दिवारों पर उभरते और खुद ही मिट जाते। औतार बखरी की चमक में जकड़ गए।
सरकार से औतार को कहना क्या है उन्हें भूल जाता। कहना तो है फेकुआ का कोला लवाने के बारे में है पर कैसे कहें, कहीं उनके कहने से बखरी की चमक छिन गई तो...। औतार बखरी पर पहुंचते ही डर की अलग दुनिया में पहुंच गए एक ऐसी दुनिया जिसमें केवल डर ही डर होता है। पीठ होती है तो कोड़े खाने के लिए। हाथ होते हैं काट दिए जाने के लिए, देह होती है परंपरा और कानून के जुल्मों को लिखने के लिए।
औतार का दिमाग कुछ काम कर रहा था और कुछ नहीं, करें क्या? क्या फेकुआ का कोला लवाने के बारे में रामभरोस सरकार को बतांए या लौट चलें बखरी से। बखरी के आहाते में रामभरोस बैठे हुए थे। उनके सामने दरी पर चार जन और बैठे हुए थे। रामभरोस चमक रहे थे। उनकी चमक सामने बैठे हुए लोगों को भी चमका रही थी। रामभरोस के चेहरे से फूटने वाली चमकीली किरणें अजीब ढंग से औतार को डराने लगीं फिर भी औतार ने तय किया कि रामभरोस से उन्हें कहना ही है। कहने से का होगा बहुत होगा तो पीठ लाल हो जाएगी, हाथ पैर की एकाध हड्डी टूट जाएगी और का होगा?
साहस जुटा कर औतार ने कोला लवाने वाला सारा मामला रामभरोस को बताया। रामभरोस ने अपने चेहरे पर बनावटी दुख चढ़ा लिया जिसमें वे कलाकार थे। गुस्से ने अपनेे चेहरे को गब गब लाल बना लेते है, रंग जाते हैं गुस्से की लाली में। जरूरत पड़ने पर वे दुख को भी चढ़ा लिया करते हैं चेहरे पर और भिगो लिया करते हैं पूरा चेहरा मानो उनसे दुखियारा धरती पर कोई दूसरा नहीं है। उनकी ऐसी अभिव्यक्ति कुदरती थी या केवल अभिनय होता था, औतार का जानें।
‘चौथी को यह सब नहीं करना चाहिए था, गरीब आदमी को तो कोले के धान का ही आसरा है, दो चार मन अनाज मिल जाता, इतने अनाज से का होगा चौथी का?’
औतार रामभरोस की फर्जी संवेदना में डूबने उतराने लगे। रामभरोस तो गिरगिट की तरह रंग बदल लिए। अब किसके पास चला जाये, कौन नियाव करेगा। चौथी गवहां ने तो अपने मन से कुछ नहीं किया होगा, सारा खेल रामभरोस का है और ये ऐसा बोल रहे हैं। औतार पहले से ही जानते थे कि रामभरोस नाटक करेंगे जैसे उन्हें पता ही न हो कि फेकुआ का कोला कैसे लवा लिया गया। औतार निराश हो कर रामभरोस की बखरी से अपने घर चले आये। घर लौटना ही था, जाते कहां, थाने पर जाने के लिए गवाह चाहिए, गवाह थे नहीं, गॉव के लोगों के मुंह सिले हुए थे, जैसे गॉव में कुछ हुआ ही न हो।
बिरादरी में केवल सुक्खू ही था जो औतार के साथ कुछ भी करने के लिए तैयार था पर अकेले सुक्खू से क्या होगा? सुक्खू ने औतार को सुझाया कि परगनाधिकारी के यहां दरखास दिया जाये पर औतार के पास से हिम्मत नाम की चीज ही गायब थी। रामभरोस के काले कारनामे उन्हें किसी भूत की तरह डरा रहे थे और कंप कंपा रहे थे, इतना ही नहीं धमकिया भी रहे थे.
‘जहां भी जाना हो जाओ, जाकर देख लो, इस जमाने में तो कुछ नहीं होने वाला, बाद में चाहे जो हो जाये।’
वैसे भी अकेले सुक्खू के बोलने कहने से का होगा, कम से कम दो चार लोग दूसरे भी बोलें तो शायद कहीं सुनवाई हो, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। दरखास देने के लिए भी रुपया चाहिए कम से कम बीस पचीस रुपये तो लग ही जाएंगे, बस का किराया-भाड़ा अलग से।
औतार मन बना चुके थे कि जो हो गया हो गया अब दरखास काहे के लिए देना, ताकतवरों से लड़ पाना आसान नहीं होता। पर सुक्खू तो सुक्खू, वह डट गया कि परगनाधिकारी के यहां दरखास हर हाल में देना है। चुप रहना ठीक नाहीं है, चुप रहने से भी का हो जाएगा, कुछ नहीं होगा सो दरखास देना चाहिए। दरखास देने से कुछ हो भी सकता है पर नहीं देने से तो तय है कि कुछ नहीं होगा। औतार विवश्ष हो गये और उन्हें कचहरी जाना पड़ गया।
कचहरी तो कचहरी, झुलसे चेहरे वालों का हुजूम, काली कोट वाले वकील, नियाव का अखाड़ा। औतार और सुक्खू अदालत में जिस तरफ जाते उन्हें हर तरफ मुर्झाए व किकुड़ियाए लोग दीखते, किसी की ऑखें धसी होतीं तो किसी के गाल सिकुड़े होते। सबके चेहरे पर मातमी उदासी पसरी हुई। औतार भीतर से पसीजे हुए। उन्हें अदालत अस्पताल जैसा दिखने लगी, यहां भी किकुडियाए तथा सिकुड़े हुए लोग दिख रहे हैं हर तरफ और अस्पताल में भी ऐसे ही लोग दिखते हैं। अस्पताल तथा अदालत में कुछ तो फर्क होना चाहिए पर नहीं दोनों एक ही जैसे जान पड़ते हैं। अस्पताल में देह की बीमारी से परेष्शान तथा हताश लोग दिखते हैं तो यहां जमीन की मालिकाना वाली बीमारी से परेशान व हताश लोग दिख रहे हैं।
औतार और सुक्खू दोनों कचहरी में थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि किस काली कोट वाले की शरण में जांए। उन्हें किसी ऐसे वकील के बारे में मालूम नहीं था जो गरीबों की लड़ाई लड़ता हो। उन्हें एक दो ऐसे नेताओं का नाम मालूम था जो जनता के अधिकारों की सुरक्षा के लिए संघर्ष किया करते थे पर वे अदालत में नहीं थे। सो वे दोनों अदालत परिसर में वकील की तलाश करने लगे।
अदालत में वकीलों की भिन्न भिन्न किस्में हुआ करती हैं। उनमें कुछ ऐसे होते हैं जो मुवक्किलों की तलाश करते रहते हैं। इसी खोजा खोजी में एक वकील उन्हें मिल गया....
वकील ने औतार से पूछा...
‘का बात है दादा, कुछ काम है का कचहरी में, बहुत परेशान दिख रहे हो?’
औतार को लगा कि का पूछ रहा है वकील? ‘का लोग यहां बिना परेष्शानी के भी आते हैं‘?
फिर उन्होंने वकील को सारी घटना बताया कि उनके साथ क्या हुआ है। कचहरी भरी थी, हर ओर वकील छितराए हुए दीख रहे थे, और भीड़ भी छितराई हुई थी। कहीं दो चार लोग इकठ्ा दिख जाते थे, सभी के चेहरों पर परेशानियां ही परेशानियां दिख रही थीं, औतार को उससे संतोष हुआ, अकेले वही परेशान नहीं है, दूसरे भी हैं।
वकील ने सारा प्रकरण सुनकर औतार से वाटर मार्क कागज और टिकट खरीदने के लिए बोला कि सामने से खरीद कर ले आओ। औतार को सहेज कर वकील अपनी कुर्सी की तरफ चला गया।
वकील पीपल के पेड़ के नीचे बैठा करता था। पीपल के जड़ की गोलाई में गोलाकार चबूतरा था। मुवक्किल उसी चबूतरे पर बैठा करते थे। औतार कुछ देर में कागज और टिकट खरीद ले आए। वकील साहब दरखास लिखने लगे... पीपल के पेड़ पर औतार ने अपनी ऑखें गड़ा दिया।कृयह पेड़ यहां भी है और सहपुरवा में भीकृवहां का नियाव तो वे देख चुके हैं देखो इस पेड़ के नीचे किस तरह का नियाव होता है?
दरखास लिखना बीच ही में छोड़ कर वकील ने औतार से पूछा..
‘देखो भाई औतार! एक बात समझ लो दरखास अंग्रेजी में लिखवाओगे कि हिन्दी में। हिन्दी में लिखूंगा तो दस रुपये लूंगा और अंग्रेजी में लिखूंगा तब बीस रुपये लूंगा, पेशकार को अलग से चार रुपया देना होगा, इसे समझ लो भाई बाद में गड़बड़ न करना।’
औतार हलकान हो गए, का बोलें, पहली बार तो कचहरी आए हैं। उन्हें का मालूम कि दरखास कउने भाखा में लिखी जाती है, जउने का असर होता हो। भाखा तो एक ही होती है जिसे बोलो तो दूसरा समझ ले। यह वकील का पूछ रहा उनसे? हो सकता है यह जो कचहरी है, वह कोई दूसरी भाखा समझती हो, ऐसी भाखा जो गरीब-गुरबों की न हो। हां हां यही होगा तभी वकील पूछ रहा है। वैसे भी अमीरों का खाना, पहनना, घर मकान जैसे अलग तरह का होता है गरीबों से वैसे ही भाखा भी अलग होती होगी उनकी। कचहरी की भाखा भी तो अमीरों वाली ही होगी। कुछ सोचने के बाद औतार ने वकील से कहा...
‘अरे वकील साहब हमार दरखास ओही भाखा में लिखो जौने भाखा को अदालत जानती हो, समझती हो। अब हमैं का पता कि अदालत कौन भाखा जानती व समझती है? हम ठहरे गवांर आदमी, हम तो एतनै जानते हैं कि हमारा काम होना चाहिए, आप जौन ठीक बूझैं उहै करैं, आप को रुपिया चाही, ओके दिए बिना हम इहां से न डोलेंगे।’
दरखास लिखने की बात पक्की होने के बाद वकील ने औतार को समझाया.
‘देखो भाई औतार! अंग्रेजी का काम अंग्रेजों की तरह होता है तेजी से और हिन्दी का काम तो तूं जानते ही हो वही लकड़ घिसघिस, कितनी लकड़ी घिसेगी, कोई गारंटी नहीं काम होने की। हो गया तो ठीक नहीं तो नहीं?’
’अरे साहब हमै ई सब का पता एतनै पता होता तो कचहरी आते’
वकील साहब ने दरखास लिख लिया और औतार के साथ परगनाधिकारी के आफिस गये पर परगनाधिकारी नहीं थे। वे राजस्व मंत्राी के कार्यक्रम में गये हुए थे। आफिस से मालूम हुआ कि शाम तक वापस आ जाएंगे। एस.डी.एम. के आने तक औतार को कचहरी में ही रूकना पड़ गया। करीब चार बजे तक दरखास पर आदेश हो पाया फिर औतार को वह दरखास मिली जिस पर परगनाधिकारी का आदेश था।
वकील साहब ने औतार को दरखास देते हुए सहेजा...
‘इसे आज ही थाने पर दे देना, तुम्हारा काम हो जाएगा’
औतार थाने का नाम सुनते ही डर गये, वे वकील से बोले...कृकृ
‘का सरकार दरखास को थाने पर देना होगा, दरोगा मरखहा है, मारने लगेगा तो...कृमारेगा जरूर। ऊ रामभरोस का आदमी है। रामभरोस के यहां से उसका खाना-खुराक जाता है, थाने पर उनकी एक भैस बंधी हुई है।
वकील गरज उठा...
‘का बोलते हो जी, दारोगा के गांड़ में दम है जो हमरे मुवक्किल को मारे। हम का ईहां घास छीलने के लिए बैठे हुए हैं।’
‘तूं बेडर थाने पर जाओ अउर दरखास दे दो, तोहार काम हो जाएगा’
औतार ने वकील को कुल साठ रुपया दिया इतना ही वकील ने मांगा भी था। औतार के लाख कहने पर वकील ने एक धेला भी कम नहीं किया। औतार देर रात तक घर आये, रात में थाने जाना उन्हें अच्छा नहीं लगा, अब रात में का जाना। घर आने पर देखा कि फेकुआ घर पर नही ंथा। फेकुआ बिफना के साथ था, मालूम हुआ कि दोनों कविसम्मेलन सुनने रापटगंज गये हुए हैं।
सुबह होते ही औतार थाने पर थे। थाने पर शासन की गर्मी हर ओर पसरी हुई थी। लगता कि अब अपराधियों की खैर नहीं, जो अपराध करेगा पकड़ लिया जाएगा। थाने पर औतार की तरह दो तीन लोग और थे जो दारोगा का इंतजार कर रहे थे। दारोगा थाने पर नहीं था। मुंशी ने औतार की दरखास ले लिया और बोला कि दारोगा जी के आने पर वह उन्हें दरखास दे देगा। औतार को थाने का नियम नहीं मालूम था सो मुशी जी को दरखास देकर आफिस से निकल लिए। मुंशी तो मंुशी था उसने ऑख पर का चश्ष्मा उतारा और औतार को रोका...कृकृ
‘अरे कहां चल दिए भाई। वाह वाह खूब रही दरखास थमाये अउर चल दिए। थाना का तोहरे बाप का है? इहां दरखास लिखाने अउर देने, दोनों का नेम है, हमलोग ईहां हरिकीर्तन करने नाहीं बैठे हैं, एहर आओ’
ओतार मुंशी की फटकार सुनते ही मुड़ गये और मुंशी जी से पूछा...
‘का नेम हऽ सरकार! आप कुछ नाहीं बोले तो हम लौट लिए।
‘निकाल पचास रुपया’ मुंशी ने बेबाकी से मांगा
‘एतना तऽ नाहीं है सरकार कुछ कम है’ औतार ने जेब की हालत बताया
‘केतना है?’ पूछा मुंशी ने
‘तीस रुपया है सरकार।’
‘चलो उहै दे, और बाकी बीस रुपया कल पहुंचा देना तभी जांच होगी। बूझे के नाहीं’
‘अच्छा सरकार बाकी रुपिया हम कल पहुंचाय देंगे। पर हमार काम हो जाना चाहिए सरकार। हमरे संघे रामभरोस बहुतै जुरूम कर रहे हैं’
मुंशी को तीस रुपया दे कर औतार थाने से घर लौट आये। पहले तो मुंशी की कड़क आवाज सुन कर डर गए थे, जाने काहे के लिए बुला रहा है, कुछ गलत हो गया का। यह तो थाना है, थाने पर तो बड़े बड़े लोग भी कांपते रहते हैं, हमारी का औकात एक असामी की। कहीं थाना भी मेरी पीठ पर कुछ लिखने न लगे। पता नहीं हम लोगों की का किस्मत है कि लोग हमलोगों की पीठ पर अपना गुस्सा लिखने लगते हैं। अरे गुस्सा है तो पहाड़ों पर लिखो, बादलों पर लिखो, नदियों पर लिखो। बादल पानी क्यों नहीं बरसा रहे, नदियॉ क्यों सूख जाया करती हैं पर नाही हमलोगों की पेट और पीठ पर ही लिखेंगे अपना गुस्सा। औतार ने मुह में आए खखार को वहीं थूका और घर का रास्ता पकड़ लिया।
'''‘कारे बिफना गाना, गाना भी कतल या डकैती
माफिक जुरूम होता है का फिर काहे की गिरफ्तारी?
गिरफ्तारी की कथा हमरे समझ में नाहीं आय रही है’'''
बिफना और फेकुआ दोनों कवि सम्मेलन सुनने के लिए रापटगंज चल दिए यह मान कर कि उन्हें अपने बापों के सामने कुछ भी नहीं बोलना, का होगा बोल कर उनसे। उन लोगों के सामने बोलना पहाड़ तोड़ने माफिक होगा फिर भी न टूटे, भला पहाड़ टूटता है? उनसे बोलो तो नसीहतें दर नसीहतें, यह करो वह न करो, चुप हो कर अपना सिर हिलाते रहो, केवल इतना ही। हर रास्ते पर कांटे बिछे हैं। घर में भी माहौल ठीक नहीं था, पूरे घर को रामभरोस का आतंक लीले हुए था जिससे हर तरफ मारपीट का भय पसर गया था। फेकुआ घर के दमघोंटू माहोल से निकलना चाहता था, चाहता था कि कहीं ऐसी जगह जाए जहां खुल कर बोल बतिया सके, हस सके। कविसम्मेलन के बहाने घर से निकलने का मौका अच्छा था सो दोनों घर में बिना कुछ बताए ही रापटगंज चल दिए। बाद में जो होगा देखा जाएगा, बहुत होगा तो डाट पड़ेगी और का होगा। डाट की उमर ही कितनी होती है? कुछ सेकेण्डों व मिनटों वाली, हवा की तरह बही और चली गई।
रापटगंज में जहां कवि सम्मेलन हो रहा था उस स्थान का आसानी से पता चल गया। स्थान जाना पहचाना था। तहसील के सामने वाला क्लब का मैदान। वैसे भी वह मैदान काफी सजा-धजा हुआ था। पूरा मैदान खूबसूरत पांडाल के घेरे में था तथा माइक लगातार चिल्ला रहे थे। बिजली की सजावट भी देखने लायक थी। एक बार तो उन दोनों को भ्रम हो गया कहीं यहां बियाह न हो रहा हो पर वहां विआह का कर्यक्रम नहीं था। पांडाल के मुख्य द्वार पर बहुत भीड़ थी, स्वयंसेवकों की भरमार थी। वे दोनों भी उसी भीड़ का हिस्सा बन गये। कुछ खास किस्म के लोगों को पांडाल के भीतर जाने की विशेष व्यवस्था थी। ऐसा जान पड़ रहा था कि पांडाल के अन्दर जाने वाले उन विशेष लोगों ने भरपूर चन्दा दिया होगा और चन्दा नहीं देने वाले सामान्यों के लिए दूसरी व्यवस्था थी।
बिफना और फेकुआ दोनों पैदल चल कर पन्द्रह किलोमीटर दूर रापटगंज आये थे, उन्हें विशेष सुविधा दिया जाना चाहिए था क्योंकि वे मजूर कविसम्मेलनी श्रद्धालु थे, पर कौन पूछता है परिश्रमी लोगों को। वहां भी उन्हीं की पूछ थी जो रुपये व गरम तोंद वाले तथा अपना काम करने से भी लजाने वाले थे। भीड़, भीड़ होती है, भीड़ इतनी बढ़ गई कि लोग बोझ बने जा रहे थे। एकदम ठसाठस, कहीं बैठने की जगह नहीं। पांडाल के अन्दर घुस पाना तो वैसे भी असंभव था। दोनोें को लगा कि वे पांडाल के भीतर नहीं जा पांएगे। वे सोचने लगे कि यहां आना बेकार हुआ। कोई ऐसा दीख भी नहीं रहा था जो आसानी से पांडाल के भीतर उन्हें घुसवा देता। यह असंभव काम था। फेकुआ को लगा कि बाहर खड़े स्वयंसेवको को झपड़ियाये और सीधे भीतर घुस जाये पर यह रापटगंज है, रामगढ़ होता तो वह शायद ऐसा कर भी जाता। कुछ देर बाद गॉव का विभूति दिखाई पड़ा। विभूति रामभरोस का लड़का है, बिफना विभूति को पुकारने लगा पर भीड़ में कौन किसकी बात सुनता है? बिना देर किए बिफना विभूति की ओर दौड़ा....कृ
संयोग से विभूति मिल गया और उसने बिफना की आवाज सुन भी लिया थाकृबिफना तो उसे पुकार ही रहा था।
‘छोटका सरकार! छोटका सरकार!’
छोटका सरकार को हालांकि बिफना की पुकार सुनाई पड़ रही थी पर वहां विभूति अकेले छोटे सरकार तो था नहीं, वहां तो उसके जैसे जाने कितने सरकार थे, एक से बढ़ कर एक थे, विभूति रुक गया और बिफना की ओर मुड़ा..कृ
‘अरे! बिफना तूं, यहां का कर रहे हो!’ विभूति ने पूछा
‘हम लोग भी कविसम्मेलन सुनने आए हैं छोटका सरकार!’
एक ही सांस में बता गया बिफना।
‘तूं कब आए यहां, फेकुआ भी दीख रहा है। बुड़बक ईहां बिरहा नाहीं हो रहा है, कवि सम्मेलन होगा, तूं लोग कविता नाहीं समझ पाओगे, चलो कोई बात नाही है। आ गए हो तो हम बैठवा दे रहे हैं तूं लोगों को।’
फिर विभूति ने किसी परिचित स्वयंसेवक को तलाश कर उसे सहेजा कि इन दोनों को भी पांडाल में बिठवा देना और खुद उस तरफ चला गया जिधर से असामान्य लोगों को पांड़ल के भीतर जाना था जिनके लिए विशेष गद्दों का इन्तजाम मंच के ठीक सामने किया गया था।
सामान्य लोगों को पांडाल में बैठने की व्यवस्था पीछे की तरफ थी जो देखने से साफ साफ समझ में आ रही थी। वहां फर्श पर गद्दे नहीं बिछे थे और आगे की तरफ गद्दे बिछे हुए थे। पांडाल में आने वालों का क्रम करीब नौ बजे रात तक चलता रहा, मंच से लोगों को पांडाल के भीतर बैठने और शान्त रहने का निर्देष्श भी दिया जा रहा था। कवियों के आने की भी सूचना मंच से प्रचारित की जा रही थी और बताया जा रहा था कि फलां फलां कवि पधार चुके हैं और शीघ्र ही कविसम्मेलन प्रारंभ होने वाला है।
भीड़ शान्त हुई, श्रोता समूह ने कविसम्मेलन की आश में अपना मुंह बन्द कर लिया जो एक अच्छी बात थी। कुछ ही देर में कविसम्मेलन के संयोजक महोदय माइक पर आये और कविसम्मेलन की उपयागिता पर बोलने लगे कि कविसम्मेलन आज के समय में क्यों जरूरी है। फेकुआ और बिफना दोनों की समझ में नहीं आया कि संयोजक का बोल रहा, वे फुसफुसाये...
‘शुरू करो भाई, का बक बका रहे हो, कविसम्मेलन जरूरी नहीं होता तो हमलोग यहां काहे आते’
संयोजक के बोल चुकने के बाद विधिवत कविसम्मेलन का उद्घाटन हुआ। दीप प्रज्वलित कर सरस्वती वन्दना की गई फिर कहीं दस बजे तक कवि सम्मेलन प्रारंभ हो पाया। एक आदमी जो कविसम्मेलन का संचालन कर रहा था, वह भारीभरकम देह वाला था, उसकी बोली भी भारीभरकम थी। वह मंच पर खड़ा होता और दहाड़ते हुए कुछ गिटपिट बोलकर कवि को बुलाता फिर बुलाए हुए कवि मंच पर आते और अपनी कविता का पाठ करते। संचालक की दहाड़ फिल्म के किसी खलनायक जैसी लगती। कवि जो माइक पर आते उनमें कोई भाषण सरीखा कविता पढ़ता तो कोई उसे गाने लगता। गाना सुनकर दोनों को मजा आता, दोनों उसकी धुन पकड़ते और अपने में खो जाते। लगते विचारने कि कौन सी कजरी या बिरहा की धुन पर यह गाना है और किसने कब कहां इसे गाया था। एकाध घंटे के बाद दोनों ऊबने लगे अचानक किसी कविता की धुन ने दोनों को प्रभावित किया...कृकृ
‘बहुत बढ़िया धुन है रे बिफना,’ बिफना ने फेकुआ को खोदा
‘हां यार! देखो तो कितना बढ़िया गाय रहा है,’
‘इसका का नाम है? यार हम नाम नाही सुने, का तो बोला गया था। रापटैगंज के हैं, कउनो ‘पंथी जी’ हैं। गीत की धुन लोकधुनों के रसायन वाली थी, कान को प्रभावित और गदगद करने वाली, फेकुआ वाह वाह कर उठा...
‘हां यार ई तो याद करने लायक है।’
पर गीत में क्या था या उससे क्या संदेश दिया जा रहा था? वे नहीं समझ पा रहे थे। बस गीत था, उसकी लय थी, राग था, उसमें कंठ का उतार चढ़ाव था जो उन्हें कर्णप्रिय लग रहा था।
कर्णप्रिय गीत ने फेंकुआ को नींद में धकेल दिया, वह जम्हाने लगा। कभी सचेत भी हो जाता कभी नींद में चला जाता। वह यह भी संकोच कर रहा था कि उसी ने कवि सम्मेलन सुनने का प्रोग्राम बनाया था सो उसे नींद में नहीं जाना चाहिए। कोशिश्ष करने के बाद भी वह नींद में जाने से खुद को न रोक पाया। अचानक वह पूरी नींद में चला गया। बिफना ने उसे झकझोर कर जगाया।
‘जागो यार फेकआ! काहे सूत रहे हो। सुनो तो मेहरारू गाय रही है, बहुत बढ़िया धुन व राग है रे!’
नींद मीठी थी, उसे टूटते ही फेकुआ गुसिया गया बिफना पर...
‘का बक बका रहे हो, का बुल्लू के बिरहवा से बढ़िया गाय रही है। पता नाहीं सारे का का गा रहे हैं, कुछ भी नाहीं बुझा रहा है। लेकिन ई मेहररुआ तऽ बढ़िया अलाप रही है यार!
इसी तरह कविसम्मेलन चलता रहा, लोग सोते रहे, जागते रहे, वाह वाही करते रहे और श्रोतागण कविताओं में डुबकी लगाते हुए खुद को तलाषते रहे। मैं कहां हूं? खास कर प्रेम-गीतों वाली कविताओं में। मंच पर आसीन कविगण भी मगन थे, इतने बढ़िया श्रोता उन्हें अन्यत्रा नहीं मिल पाते थेे। श्रोता शान्त और मगन थे, कहीं चिल्ल पों नहीं, किसी को बोर करना नहीं, सारा कुछ अद्भुत। पर बिफना और फेकुआ को कविसम्मेलन उदास कर रहा था सो दोनों इस बात की चिन्ता में थे कि यहां से बाहर कैसे निकला जाये? उस भीड़ में से आसानी निकलना कठिन था फिर भी निकलने के लिए वे जैसे ही खड़े हुए तभी अचानक वहां हंगामा खड़ा हो गया...
फिर क्या था हर ओर भागा भागी, हर ओर शोर ही शोर...
भीड़ को भगदड़ बनने में देर नहीं लगी। उसी भीड़ में फंसे थे फेकुआ और बिफना, कैसे निकलें भीड़ से बाहर? वहां कुछ सोचने गुनने को मौका भी नहीं था। पुलिस ने पूरा पांडाल घेर लिया, हर ओर बन्दूकंे चमकने लगीं। पुलिस का कोई अधिकारी मंच पर आ कर सभी को शान्त रहने का निवेदन करने लगा, वह बार बार एक ही बात कहता....
‘यहां कुछ नहीं हुआ है, जो हुआ था वह हो चुका है, अब आगे कुछ भी नहीं होगा पुलिस ने सारा मामला संभाल लिया है, दरअसल मामला संभल भी गया था। बाद में मालूम हुआ कि गोपाल चुनाहे नाम के कवि की किसी कविता पर बवाल खड़ा हो गया है। आपातकाल में सरकार विरोधी कविता नहीं पढ़नी चाहिए थी।’
गोपाल चुनाहे ने शासन प्रष्शासन को ललकार दिया था। आपातकाल में सरकार को ललकारना भला पुलिस कैसे सह पाती!
‘प्रश्ष्न खड़ा है लोक तंत्रा में कौन बड़ा है, तंत्रा बड़ा है, लोक बड़ा है’
यह सवाल सरकार से भला कौन पूछ सकता है? किसकी मजाल है? गोपाल चुनाहे ने यही सवाल पूछ लिया था सरकार से। असल सरकार तो लखनऊ, दिल्ली में थी पर खुद को सरकार समझने वाले सरकारी अधिकारी तो वहीं थे। उन्हें सरकार से वफादारी का अच्छा मौका मिला सो वे गोपाल चुनाहे को गिरफ्तार करने के लिए दौड़ पड़े। वैसे गोपाल चुनाहे पर पहले से ही वारंट था जैसे देश के तमाम लोगों पर था। वे भी डी.आई.आर. में वान्टेड थे सो पुलिस ने तत्काल उन्हें गिरफ्तार करना चाहा पर वे मंच से कैसे गायब हो गये किसी को नहीं पता चला। पुलिस ने उनका पीछा किया। पुलिस की भागा भागी और पीछा करने से पांडाल में हड़कंप मच गया।
कुछ समय के लिए कविसम्मेलन बन्द करवाकर पुलिस गोपाल चुनाहे को तलाशने लगी, उनका कहीं अता पता नहीं चला। गोपाल चुनाहे कविसम्मेलन स्थल पर काहे के लिए होते, इसलिए होते कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर ले। नहीं ऐसा नहीं होता सो वे फरार हो गए पुलिस उन्हें नहीं पकड़ पाई। कुछ घंटे बाद पुनः कविसम्मेलन शुरू कराने की अनुमति पुलिस ने दे दी, तब जाकर कविसम्मेलन दुबारा शुरू हो सका। कविसम्मेलन शुरू होते ही संचालक ने कवि गोपाल चुनाहे की खूब खूब आलोचना की जिससे मंच पर आसीन दूसरे कवि काफी नाराज हो गये और प्रतिक्रिया में आपातकाल विरोधी रचनांए सुनाने लगे, भीड़ तो आपातकाल का विरोध सुनने के लिए जैसे तैयार ही बैठी थी।
वाह! वाह! वाह! वाह! क्या बात है, भीड़ की तरफ से मंच की ओर जाता हुआ प्राकृतिक शोर कि आदमी को गुलाम भले बना दिया जाए, पर पैदा गुलाम नहीं होता। भीड़ का मिजाज देख कर पुलिस ने दुबारा हस्तक्षेप नहीं किया। कविसम्मेलन चलने ही नहीं दौड़ने लगा पर फेकुआ और बिफना दोनों को ऊब हो रही थी तथा उन्हें यह भी ताज्जुब हो रहा था कि गाना गाने पर भी पुलिस किसी की गिरफ्तारी कर सकती है।
फेकुआ ने बिफना से पूछा...
‘कारे बिफना गाना गाना भी कतल या डकैती माफिक जुरूम होता है का फिर काहे की गिरफ्तारी? गिरफ्तारी की कथा हमरे समझ में नाहीं आय रही हैं।’
’‘तोहके हम का समझाएं, तूं नाही जानते का कि पुलिस जो चाहती है कर लेती है, ओके रोकने वाला कौन है। तोहके नाही बुझाता है का कि ये समय ईमरजेन्सी लगी है, सरकार के खिलाफ बोलोगे तो पुलिस गिरफ्तार करेगी ही।’
‘अब हमहूं बूझ गए, चलो वापस चला जाए, अब हमार मन नाही लग रहा है। भला बताओ मन काहे लगेगा? कवियो तो पता नाहीं का का बकबका रहे हैं, दिमाग में कुछो नाहीं घुस रहा है।‘
फेकुआ कविसममेलन में आ तो गया था पर उसके दिमाग पर कोले का लवाना नाच रहा था। केवल मन बदलने के लिए कविसम्मेलन सुनने आया था कि उसका मन बदल जाएगा। कविसम्मेलन में आ कर तो और बोर हो गया। बिरहा की एकाध लाइन दोनों याद कर लिया करते थे पर यहां तो कुछ भी याद करने लायक था ही नहीं। उन्हें जान पड़ा था कि वे एक अलग किस्म की दुनिया में आ गए हैं, जिस दुनिया से उनका कुछ भी लेना-देना नहीं है। उनकी दुनिया तो गोबर माटी वाली है, बिरहा, कजरी वाली है। ये बड़े लोग हैं, उनकी बातें बड़ी होती हैं, इनकी कविताएं भी बड़ी होती हैं, इनकी बातों व कविताओं में गरीबों के समझने, बूझने लायक कुछ भी नहीं होता।
फेकुआ कविसम्मेलन में उबिया गया था उसने तुरंत बिफना से कहा...
‘भोरहरी हो गई है बिफना। आसमान से तारे नीचे उतर रहे हैं, आसमान भी खाली हो रहा है तारों से। चलो हमलोग भी चलें, ओजरार होने तक गॉए पहुंच जाएंगे।’
बिफना भी उबिया गया था। वह भी जल्दी से कविसम्मेलन से निकलना चाहता था। फिर तो दोनों कविसम्मेलन की निराशा पीते हुए घर की तरफ लौट लिए।
‘अब कभी नाहीं आना है ऐसेे परोगाम में।’
'''भूख और पेट की दूरी नाप कर लिखी जाने
वाली कथांए खुद ब खुद उत्पीड़न गाथा बन जाया
करती हैं,क्या ऐसी गाथांए उत्पीड़न की किताब मानी जा सकती है?'''
कवि सम्मेलन में जाने के बारे में फेकुआ और बिफना दोनों ने अपने अपने घर वालों को नहीं बताया था पर सुक्खू और ओतार को मालूम हो गया था कि दोनों कवि सम्मेलन सुनने के लिए रापटगंज गये हैं। वे दोनों घर पर सुबह तक नहीं आ पाए थे। सुक्खू और औतार ने मान लिया था कि दोनों बिगड़ते जा रहे हैं तथा आवारागर्दी पर उतर आए हैं। दोनों लड़के हाथ से निकले जा रहे हैं। दोनों को घर परिवार की रंच मात्रा भी चिन्ता नहीं।
हमलोगों के जमाने में ऐसा नहीं होता था कि बपई को कुछ बताए बिना घर से बाहर निकल जांए। आज तो लड़के मनमानी कर रहे हैं। उन्हें घर की परंपरा की तनिक भी चिन्ता नहीं।
‘औतार भाई! जमाना बदल रहा है, घर परिवार ही हम गरीबन की पूॅजी है और का है हमलोगों के पास पूॅजी के नाम पर। लड़के भी जब कहे में न रहे तो का कहा जाए।’
‘सही बोल रहे हैं सुक्खू भाई, लड़के हैं, उनकी मनमानी भी सबर तो हम ही करेंगे।’ कोला लवाने के बारे में डिप्टी साहब वाली दरखास औतार थाने पर दे आये थे साथ ही साथ थाने के मंुशी को अपने दुख दर्द की कहानी भी सुना आये थे। मुंशी ने थानेदार के निर्णय लेने के बाद ही कुछ बताने के लिए बोला था।
औतार को भरोसा नहीं था थाने पर। थाना जाने का करे, अरे थाना का करेगा। थाना रामभरोस के झांसे में आ जाएगा और जैसा वे कहेंगे वैसा ही थाना करेगा। थाने की इस सांस्कृतिक परंपरा को औतार जानते थे। दारोगा और मुंशी सभी मिले रहते हैं जमीनदारों तथा बड़ी जोत वालों से। औतार थाने पर चले तो गए थे पर चिंताओं में भी घिर गए थे। चिंताओं में तो वे वैसे भी थेे। थाने पर जाते तो भी, नहीं जाते तो भी। उनके लिए अपने जानने वालों में कोई ऐसा नहीं दीख रहा था जो उनकी मदत कर सके। उन्हें केवल भगवान का सहारा था, वही शायद कुछ करें। पर भगवान को भी तो ढेर सारी पूजा चाहिए होती है, चढ़ावन व तपावन के साथ साथ मिठाइयॉ आदि के साथ बकरे या मुर्गे की बलि भी। कहां से जुटाएंगे इतना सामान, घर में अनाज का एक दाना भी नहीं और इतना सामान। उनकी इतनी भी क्षमता नहीं कि पूजा का सामान भी जुटा सकें भगवान को अर्पित करने के लिए। पूजा भी बड़े लोगों की चीज होती है गरीबों की नहीं। औतार ने सोच कर माथा पकड़ लिया। बिपत्ति आती है तो हर तरफ से आती है। भगवान की शरण में जाओ तो रुपया, थाने पर जाओ तो रुपया। यह जो रुपया है, वह आए कहां से? केवल बनी-मजूरी का सहारा है उससे तो पेट भी नहीं भर पाता है फिर कैसे पैदा होगा रूपिया भगवान की पूजा करने के लिए? औतार ने माथा पकड़ लिया जैसे माथा पकड़ लेने से सारा दुख दर्द फुर्र हो जाएगा और हाथ में रुपया आ जाएगा।
फेकुआ और बिफना दोनों बिरहा गाते हुए घर वापस आये। चौथी गवहां की जोतनी पिछड़ रही थी। फेकुआ और बिफना को जोतनी पर नहीं देख कर चौथी गवहां हरिजन बस्ती चले गये और सुबह होते ही उनके घरों के सामने ले-दे करने लगे। लगे ओरहन देने....कृकृ
‘ऐसे ही हलवाही होती है, जब चाहो काम करो और जब न चाहो न करो। सारा कुछ मनमानी हो गया है। कोला और हलवाही का हक (दोनों फसलों में उपहार के तौर पर हलवाहों को खलिहान से दिया जाने वाला कुछ मन (तौल का नाम) अनाज) तो चाहिए ही चाहिए उसमें से कुछ काट लो तो किच किच। हलवाही में जो पॉच मन अनाज दिया जाता है, का ऊ हरामी का है। काम नाही करना है फिर काहे का हक, पद, कोला, बिगहा।’
इसके साथ बहुत भला-बुरा औतार व सुक्खू को चौथी ने सुनाया। औतार और सुक्खू दोनों खामोश थे। ओरहन के साथ शामिल चौथी गवहां की गालियॉ वे सुनते रहे थे, और वे कर भी क्या सकते थे, जमाना भी तो वही था मालिकों वाला। किसी मजूर की इतनी मजाल जो मालिक से कुछ बोल सके सिवाय सलाम वा पलग्गी करने के, दूसरी बातें थी ही नहीं। औतार और सुक्खू दोनों चौथी गवहां के सामने तो कुछ नहीं बोल पाए पर भीतर भीतर बोल रहे थे, ऐसी बोली जो मालिकों के सामने नहीं बोली जा सकतीं। अपने उत्पीड़न का प्रतिकार भला वे आमने-सामने कैसे कर सकते थे। उन्हें इतिहास व परंपरा ने यही सिखाया था कि चुप रहो, गालियॉ सुनते रहो। जो गालियॉ देगा, गालियॉ उसी को पड़ेंगी, सुनने वाले को नहीं। इस तरह के तमाम सुभाषित उनके दिल दिमाग में भरे पड़े थे जो उन्हें खामोश किए हुए थे।
चौथी गवहां कम नहीं थे। उन्हांेने औतार को लपेट लियाकृ
‘का हो औतार! तूं तो बड़े-बूढ़े हो, का हलवही ऐसे ही होती है, जब मन हुआ काम पर चले आए, मन नहीं हुआ तो नहीं आए। मनमानी चल रही है। मालूम हुआ है कि दोनों कविसम्मेलन सुनने गए हैं रापटगंज। लिखि लोढ़ा पढ़ि पत्थर, ऊ ससुरा का गए हैं कवि सम्मेलन सुनने। नाच तो है नाही कि कमर हिलाना देखना है।’
सूर्योदय नहीं हुआ था। सूर्योदय होने में कम से कम एकाध घंटे की देरी थी औतार लेवा में दबे पड़े थे, लेवा लपेटे ही घर से बाहर निकलेे। आखिर कितना सहते, सहनशीलता की भी तो कोई सीमा होती है, सीमा टूट चुकी थी और औतार अपने पर आ गए थे ‘जो होगा देखा जाएगा’....कृ
‘गवहां काहे हल्ला कर रहे हैं। कोला दिए थे अउर ओके लवाय भी लिए। अब फेकुआ से आपका काहे का नाता। एक नाता बना था मालिक और हलवाह वाला, उसे भी आपने तोड़ दिया। अब आप काहे बकबका रहे हैं। एक बात और जान लें गवहॉ कि फेकुआ अब आपकी हलवाही नाहीं करेगा। हम आपके बंधुआ नाहीं हैं, हमार जो मन करेगा हम वही करेंगे, डंडे के जोर से आप हमलोगों से हलवाही नहीं करा सकते।’
आजादी के बाद भी हलवाहों को बंधुआ बना कर उनसे जबरन काम कराने की परंपरा रही है हर तरफ। उसी का विरोध कर रहे थे औतार। औतार अपने पर आ गए थे, वे तैयार हो चुके थे कि जो होगा उससे निपट लेंगे। सामंती डर से बाहर कैसे निकलते जा रहे थे औतार यह उन्हें खुद नहीं पता था। पर इतना पता था उन्हें कि जिन्दा रहना है तो डरों से बाहर निकलना ही होगा।
चौथी गवहां थे कि कोला लवा कर भारी पड़ गये थे। हालांकि ईमरजेन्सी में किसी हरिजन का कोला लवा लेना आसान नहीं था पर सहपुरवा के लिए आसान था। ताकतवरों के लिए आसान था। वहां कुछ भी हो सकता था वहां रामभरोस की सरकार चलती थी। बावजूद इसके अगल बगल के गॉवों के लोग महसूसते थे कि चौथी गवहां को किसी न किसी दिन जेल जाना ही पड़ेगा। भले ही थाने को कुछ दे दिलवाकर जेल जाने से अब तक बचे हुए हैं। उनके ऊपर भी डी.आई.आर. लग सकता है जिसकी जमानत तक नहीं होती। किसी हरिजन का कोला लवाना अपराध है। पर हुआ कुछ भी नहीं। चौथी गवहां आज भी पुराने मिजाज से हैं मस्त मस्त। फेकुआ उनके काम पर नहीं गया सो पूछने चले आए थे नहीं तो हरिजन बस्ती में काहे आते। फेकुआ का कोला लवा लेने के बाद भी उस पर वे अपना हक समझ रहे थे।
‘फेकुआ काहे काम नाहीं करेगा हो औतार? हलवाही किया है, साल भर तो काम ओके करना ही पड़ेगा। ई बात कान खोलकर सुन लो औतार ओके हमारा काम करना ही पड़ेगा, ऊ चाहे जैसे करे, हम ओके छोड़ नाहीं सकते।’
वैसे चौथी गवहां शान्तिप्रिय आदमी थे फिर भी उनसे उनका मध्यमवर्गीय चरित्रा छिनाया हुआ नहीं था। झूठे शान व अभिमान की उन्हें भी सामंती बीमारी थी सो वे औतार को भला बुरा सुनाने लगे थे। औतार नहीं चाहते थे कि फेकुआ चौथी गवहां का काम करे और चौथी गवहां हैं कि अड़े हुए हैं, काम करवाना ही है। पर औतार कहां मानने वाले थे, वे थाने पर चौथी गवहां के खिलाफ दरखास दे ही आये थे। प्रशासन पर से उनका विश्वास मिटा नहीं था।
फिर तो औतार भी साफ साफ बोल गये जिसमें उनके गुस्से की धुन थी...कृकृ
‘हे गवहॉ! जो करना हो कर लीजिएगा, कोला तो लवा ही लिए हैं अब का करेंगें, का जान मारेंगे, उहो मारकेे देख लीजिए। हमारा माथा खराब न करिए फूटिए ईहां से, हमैं अपनी तरह से बोलने के लिए मजबूर न करिए गवहां! हम आपकी तरह से गिरे नाहीं हैं कि मुंह में गालियॉ ठूंस लें और आपको लहजबान बोलें या आप पर डन्डा चला दें, हम अपना धरम नाहीं बिगाड़ने वाले।’
औतार चौथी से भला बुरा बोल ही रहे थे कि वहीं बिफना और फेकुआ दोनों आ गये। फेकुआ को देखते ही चौथी गवहां का ताव उफन पड़ा....कृ
‘फेकुआ काम पर चलो और तुरंत हल नाधो।’
चौथी गवहां ने फेकुआ को सहेजा...
‘चल रहे हैं मालिक’ सधा सधाया जबाब दे कर फेकुआ अपने मड़हा में घुस गया। औतार मड़हा के सामने ही थे, बोल पड़े....कृ
‘गवहां फूटिए ईहां से फेकुआ अब आपका काम नाहीं करेगा तो नाहीं करेगा।’
चौथी गवहां तो मानो आग में जल रहे थे। उन्हें हरिजनों के मुंह लगना बुरा लग रहा था। साला यह मजूरा मेरे जैसे मालिक से बहस कर रहा है, इतनी हिम्मत बढ़ गई है साले की, समाज बिगड़ता जा रहा है।
औतार भला बुरा बोलने में कहीं से भी चौथी गवहां से कम नहीं थे, जैसे चौथी बोल रहे थे वैसे ही औतार भी बोल रहे थे। ईंट का जबाब पत्थर से दे रहे थे पर उसमें गाली नहीं थी। वे केवल अपना पक्ष रख रहे थे वह भी शालीनता के साथ, मर्यादित ढंग से।
चौथी को जान पड़ रहा था कि अब पहले वाला शील-संकोच पूरी तरह से खतम हो गया है। औतार ने काम बन्द करने का ऐलान कर दिया। चौथी गवहां हालांकि अपना काम खुद करने में यकीन करते हैं और मानते हैं कि सभी को ऐसा ही करना चाहिए पर काम ही इतना होता है कि बिना मजूरों की सहायता के काम निपटा पाना संभव नहीं होता, हर हाल में मजूर लगाना ही होता है।
चौथी गवहां आखिर भीतर भीतर कब तक गरम होते उसे बाहर निकलना ही थाकृ
‘ठीक है हमारा काम वह नाहीं करेगा तो न करे पर हमारा कर्जा तो वापस कर दे। चलो आज ही हिसाब कर लो, हमारा जो निकले दे दो और तोहर जो निकले ले लो।’
चौथी गवहां ने यह आखिरी सामंती दॉव खेला। यही दॉव जानते थे चौथी, इसका अभ्यास था उन्हें। मजूरों को परेशान करना हो तो दिए हुए कर्जे के वापसी की े मॉग उनसे सख्ती से करो। उनके पास रुपया तथा गल्ला है नहीं फिर कैसे चुकता करेंगे कर्जा? मजबूर होकर काम पर लौट आएंगे। जाएंगे कहां?
औतार भी चाहते थे कि चौथी गवहां असल बात पर आ जांये और हिसाब किताब करने की बात करें। इससे अधिक वे कर भी का सकते हैं। उन्हें तो मालूम ही था कि मजूरों के सारे कर्जों को सरकार ने माफ कर दिया है, चाहे वह कर्ज किसी भी तरह का और किसी का भी हो। कर्जा के बकाए का एक धेला भी किसी को नहीं देना है। सारे कर्ज माफ। नये कानून की जानकारी औतार को पहले से ही थी। कचहरी में भी उस दिन इसी कानून के बारे में बातें हो रही थीं जिस दिन एस.डी.एम. साहब के यहां दरखास देने के लिए वे कचहरी गये हुए थे।
औतार मुखर हो गये....कृ
‘कर्जा, फर्जा हमसे का मांग रहे हैं गवहां! जाइए सरकार से मांगिए। सरकार ने गरीबों का कर्जा माफ कर दिया है। आप लोग तो सारा कायदा कानून जानते हैं पर इतना सरल कानून नहीं जानते का? तो जान लीजिए सरकार ने गरीबों का सारा कर्जा माफ कर दिया है। हम एक धेला भी नाहीं देने वाले, बूझ रहे हैं कि नाहीं।’
औतार को चौथी गवहां पर हास्यास्पद हसी आ गई, वे हंसे भी। जानबूझ कर हंसने लगे जिससे चौथी गवहां को गुस्सा आए और वे कुछ उटपटांग बोलें पर ऐसा हुआ नहीं। चौथी गवहां को ऐसी आशा नहीं थी कि औतार ऐसा उत्तर देगा, अभी जमाना इतना भी नहीं बदला है कि औतार जैसा दरिद्र हरिजन उनके जैसों के सामने तनेन हो जाये। वे तो जानते थे कि औतार पंचायत कराएगा, रुक्का पुर्जा देखेगा, हर-हिसाब कराएगा फिर लेनी-देनी करेगा। पंचायत जब होगी तो कोई पंच आसमान का तो होगा नहीं, पंच जो बन सकते हैं वे भी तो लेन-देन करने वाले हैं सो फैसला तो जैसा वे चाहेंगे वैसा ही होगा पर औतार तो अंग्रेजी बोल रहा है। अच्छा होगा कि हरिजन बस्ती से खिसक लिया जाए नहीं तो बात बढ़ने पर जाने का हो। हो सकता है कि मजूरे मारपीट करने लगें। बस्ती उनकी है, उनके लोग हैं, अकेले वे क्या कर सकते हैं उनकी बस्ती में, अच्छा होगा कि फूटो यहां से।
फिर भी चौथी गवहां हरिजन बस्ती से बाहर नहीं निकले, निकलते भी कैसे, उन्हें तो मध्यमवर्गीय मानसिकता के जहरीले कीटाणु डसने लगे थे। आखिर अपना कर्ज हम काहे छोड़ दें। नगद रुपया दिया है हमने, और गल्ला भी, हम दानी तो हैं नहींकृकृ फिर तो...चौथी पूछने लगे... कृ
‘औतार ई बताओ चार लोगों के सामने जो रूक्क्वा लिखे हो ओकर का होगा? ऊ रुपिया तो तूं फेकुआ के बियाहे के पहले लिए थे। उसका पूरा हिसाब लिखा हुआ है रुक्के म,ेंकृचार मन धान, दू सौ रुपया नगद था। ऊ सब का तोरे बाप का था जो नाहीं दोगे।’
इसी बीच जाने का गुन कर चौथी गवहां ने बात रोक दी। वे गुनते भी तो क्या गुनते यही कि जबरी करने से कुछ हासिल नहीं होगा सो बड़बड़ाते हुए वहां से विदा हो लिए।कृ
‘हम तुम लोगों को देख लेंगे।’ धमकी भरा आखिरी वाक्य वे बोले
इतना बोलना चौथी गवहां की आखिरी सीमा थी। इस सीमा के पार जाने के दुःसाहस को वे खुद ही धमकी की सीमा में समेट लिए।
औतार चौथी की धमकी से डरने वाले नहीं थे। उन्होंने तो पहले से ही निश्चित कर लिया था कि जब चौथी गवहां ने कोला लवा लिया फिर काहे का कर्जा फर्जा वापस करना। कोला नहीं लवाए होते तो उनका कर्जा वे हर हाल में लौटा देते पर अब उनको कुछ नाहीं देना है। औतार को जाने कहां से ताकत मिल गई थी कि वे ललकारने लगे थे....कृ
‘जाइए जाइए जो करना हो कर लीजिएगा’ वे तो कहना चाहते थे कि ‘जो उखाड़ना हो उखाड़ लीजिएगा।’ पर नहीं कह पाये, शायद भद्दा हो जाता और उनके हिसाब से गलत भी।
यह औतार के उत्पीड़ित मन का आर्तनाद था जो समय के अनुसार नए किस्म का कथानक बन रहा था। इस कथानक में औतार थे, उनका घर परिवार था तथा उनके जीवन का एक एक रेशा भी था जो उत्पीड़न की किताब की तरह था जिसे भूख तथा पेट की दूरी नाप कर लिखा गया था।
चौथी गवहां क्या कर सकते थे। कोई रास्ता उनकी समझ में नहीं आ रहा था। रास्ता था भी नहीं। जमीनदरी वाले आतंकी रास्ते पर चला नहीं जा सकता था और गुंडई वाले रास्ते पर चल कर चौथी खुद ही फस जाते। वे तो खुद काफी डरे हुए थे फेकुआ का कोला लवा कर। उनका वश चलता तो वे रामभरोस की बात टाल देते पर नहीं टाल पाये। उन्हें लगा कि ओतार को तो वे झेल लेंगे पर रामभरोस को नहीं झेल पायेंगे। फेकुआ का कोला लवाना था तो रामभरोस खुद लवा लेते, बवाल उनपर काहे टाल दिए। उन्हें लगा था कि रामभरोस उन्हें कहीं का न रहने देंगे, बरबाद करके छोड़ेंगे। चौथी को अपनी गलती का एहसास होने लगा था पर वे क्या करते, फेकुआ को कोला तो लवाया जा चुका था। फेकुआ का कोला लवा कर ऐसी गलती वे कर चुके थे जिसके लिए किसी भी प्रकार की माफी नहीं थी।
औतार ने चौथी गवहां के काम पर जाने से फेकुआ को रोक दिया। चौथी गवहां जान चुके थे कि उनका सारा कर्जा अब डूब जाएगा। रामभरोस भी फेकुआ का कर्ज नहीं लौटाएंगे। डूब गया सारा कर्जा। चौथी गवहां हिसाब लगाने लगे।
चार मन धान यानि बाढ़ी लेकर कुल छह मन हुआ और दो सौ रुपया नगद, सूद ले कर साढ़े तीन सौ रुपया उसका भी हुआ। अब यह सारा कुछ नाले में चला गया केवल रामभरोस के कारण। कोला का धान कितना होगा कुल मिलाकर पांच मन से अधिक नहीं होगा, उससे कर्जा कैसे पटेगा?
चौथी गवहां दुविधा में थे और सोच रहे थे कि अच्छा नहीं हुआ। इलाके में बदनामी हुई सो ऊपर से कि गरीब आदमी का कोला लवा लिया। अगर मुकदमा चल गया तो मुंह दिखाना मुष्श्किल हो जाएगा। कहीं न कहीं वे फस गये हैं रामभरोस की जाल में। रामभरोस को छोड़ना भी ठीक नहीं होगा ऐसे समय में। कानूनी बवाल अगर बढ़ा तो रामभरोस ही बवाल से बाहर निकाल सकते हैं। वही तारनहार हैं ऐसे बवालों के।
काम-काज बन्द, अभी जोतनी भी बाकी है, कर्जा का लेन-देन भी खतम हो गया, हर तरफ से नुकसान ही नुकसान दिखाई पड़ रहा है। बिपत्ति में कोई साथ नहीं देता। चौथी गवहां का करते, हरिजन बस्ती से अनमने भाव से निकले अफसोस करते हुए कि वे बेमतलब रामभरोस के चक्कर में पड़ गये।
चौथी गवहां की हालत सांप छुछून्दर वाली हो चुकी थी। एक ही आस थी रामभरोस की। सो आस लेकर रामभरोस की बखरी पर वे पहुंच गये। रास्ते में रामदयाल कारिन्दा मिला। उससे चौथी गवहां हरिजन बस्ती का सारा किस्सा बयान किए कि औतार ने का, का कहा। किस्सा सुनते ही रामदयाल भड़क उठा....
गालियों पर गालियां देने लगा औतार को, औरतों के सारे अवयवों को गालियों में शामिल करते हुए। इसके अलावा गालियों में होता भी क्या है? हमारी सभ्यता में अधिकांश गालियॉ औरतों की देह से ही तो जुड़ी हुई होती हैं। सामंती मिजाज वालों को लगता है कि गलियॉ दे लो तो राहत मिल जाती है, कथित पुरुषार्थ शिथिल नहीं होता। चौथी गवहां को भी यह पता था कि अपने घर पर औतार भी रामदयाल से अधिक भद्दी भद्दी गालियां उन्हें दे रहा होगा। बहरहाल गॉवों में गालियों को ऐसे अवसरों पर किसी उपकरण माफिक प्रयोग किया जाता रहा है, जाने वह समय कब आएगा कि गालियां खतम हों जांएगी मानव सभ्यता से।
चौथी गवहां की सोच में रामदयाल की हैसियत सिर्फ बैठकबाज और डंड पेलू की थी। रामभरोस के अलावा किसी दूसरे के लिए वे किसी काम के नहीं थे। चौथी गवहां को लगा कि रामदयाल से बतियाना अपना समय नष्ट करना होगा। उन्हें रामभरोस की बखरी की ओर जाना था सो वे रामदयाल से बतियाना छोड़ सीधे रामभरोस की बखरी की ओर चल दिए। बखरी से ही उन्हें राहत मिल सकती है, बखरी चाह लेगी तो औतार क्या उसका मरा भूत भी कर्जा लोटा देगा।
रामदयाल की बखरी पर बहुत सारे लोगों का जमावड़ा था। अधिकारीनुमा लोगों के बखरी पर जमावड़े से बखरी चमक उठी थी। ब्लाक से कई अधिकारी आए हुए थे, वे बेंत वाली मंहगी कुर्सियों पर बिराजे हुए थे। चाय पानी का दौर चल रहा था। दरवाजे के खिदमतगार खूबसूरत ट्रे में नाश्ते का सर सामान ले कर इधर उधर घूम रहे थे। चौथी गवहां को दरवाजे पर एक भी मचिया खाली नहीं दीख रही थी। अधिकारियों की चमक से चौथी की ऑखें चुधिया गई थीं। रामगढ़ के सरकारी अस्पताल के डाक्टर भी आये हुए थे, सभी लोग बातचीत में मशगूल थे। बखरी पर जिले का प्रष्शासन नाचने लगा था और उस नाच में डूबे हुए थे रामभरोस। उस नाच को देखने के लिए लिए चौथी कहां जगह तलाशें बखरी पर जा कर वे खडे हो गये, बैठते भी कहां ? बैठने वाली हर जगहों पर प्रशासन के लोग अपने सरकारी अधिकारों के साथ काबिज थे। चौथी के पास क्या था, वे तो केवल एक मतदाता थे तथा रामभरोस के एक दरबारी बस इतना ही। सो वे बेचारे एक कोने में खड़े हो गए, बखरी पर खड़ा होना भी उनके लिए कम न था। कम से कम अधिकारियों की ऑखों से निकलने वाली ज्योति तो उन पर भी पड़ेगी। वे लोगों की बातें सुनने लगे। अधिकारियों की उपस्थिति के कारण बखरी की चमक मनोरम हो गई थी और सहपुरवा की गलियॉ भी चमकने लगीं थीं।
अस्पताल वाले डाक्टर रामभरोस को सलाहित कर रहे थे कि सहपुरवा में नसबन्दी का एक कैंप अवश्ष्य लगना चाहिए। इस बार अगर आप चाहें तो स्वास्थ्य मंत्राी जी को भी बुलाया जा सकता है। भूमि आवंटन वाले कार्यक्रम में तो कलक्टर साहब आये ही थे। वैसे आपका नाम जिले में कौन नहीं जानता फिर नसबन्दी कैंप लग जाने से आपका नाम हर तरफ आग की तरह फैल जाएगा।
चौथी गवहां तो औतार की शिकायत रामभरोस से करने आये थे पर वहां का माहौल दूसरे ढंग का था, शिकायत करने से कहीं बखरी की चमक खराब न हो जाए। चमक तो वैसे भी नाजुक होती है, दाग पड़ जाएंगेे, अधिकारियों के अधिकार गन्धाने लगेंगे। चौथी का करते बिना बातचीत किए ही घर वापस हो लिए। वे बखरी से लौटने के अलावा कर भी क्या सकते थे। वे रामभरोस से सीधे बतियाने की भी हिम्मत नहीं रखते थे। ऐसे लोगों की हिम्मत पर रामभरोस का स्थाई कब्जा है जो देखने में नहीं आता था, पर कब्जा स्थाई होता है। चौथी भी जानते हैं कि उनकी हिम्मत पर ही नहीं उनके दिल दिमाग पर भी रामभरोस का कब्जा है। रामभरोस की बोली, उनकेे इशारे व उनके फैसले उनके लिए किसी ताकतवर देवता की बोली, इशारे, व फैसले होते हैं। जिसमें किसी भी तरह के बदलाव की संभावना नहीं होती।
रामभरोस की ही नहीं उनकी बखरी की भी चमक पीते हुए चौथी घर वापस आ गए। घर आते ही उनके घर ने उन्हें दौड़ा लिया हालांकि वे अपने घर में घुसे नहीं थे। वे अपने घर में घुसते भी तो कैसे उनका घर तो रामभरोस की कृपा पर जीवित बचा हुआ था। रामभरोस की एक भी हुकूमउदूली हुई नहीं कि घर आग पीने लगेगा, जल उठेगा धू धू करके। सहपुरवा धूएंे में घिर जाएगा, आग की लपटों में उनका परिवार जलने लगेगा। आग की लपटें तो पानी की बौछारें होती नहीं कि कोई सह लेगा। वे जला डालती हैं सारा कुछ, सब कुछ बदल देती हैं राख में। वैसे भी जो घर आग की लपट तथा थाने की रपट से बच गया मान लो कि जीवन बच गया। मरना और जलना दोनों से पड़ता है। आग सीधे जला देती है पूरी देह और रपट धीरे धीरे जलाती है एक एक अंग। पर जलाते हैं दोनों ही।
चौथी खुद को किसी तरह संभाल पाए पर पत्नी के सामने नहीं जा पाए। पत्नी पूछती औतार के कर्जा के बारे में कि वह कब लौटा रहा कर्जा? तो वे क्या बताते उनसे। बताते कि औतार ने उन्हें फटकार दिया कि कर्जा नहीं लौटाएगा। उसका कहना है कि सरकार ने कर्जा माफ कर दिया है। वह तो भरमुह बोल भी नहीं रहा था, गरज रहा था। यही बताते पत्नी को तो उनकी कथित मर्दानगी बौना न हो जाती। पत्नी के सामने तो बहादुर बने फिरते थे, उनकी सारी बहादुरी खतम हो चुकी थी। सो वे खुद में खोए हुए थे, खुद को तलाषते हुए।
'''‘जो समय के साथ है वह अपने साथ है
जो समय के साथ नहीं है वह अपने साथ भी नहीं है।
समय कभी भी ज्ञात तथा अज्ञात का खेल बन सकता है’'''
चौथी गवहां असमंजस में थे। रामभरोस से बातचीत किए बिना औतार से कर्जा कैसे वसूल करना है इस पर निर्णय लेने में वे समर्थ नहीं थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि औतार से कर्ज वसूली के बारे में उन्हें करना क्या है? औतार ने तो साफ इनकार कर दिया कि वे कर्ज चुकता नहीं करेंगे।
करीब दो घंटे बाद जीपों के स्टार्ट होने की आवाज सुनाई पड़ी तब उन्हें लगा कि रामभरोस की बखरी पर आये सारे लोग लौटने लगे हैं फिर तो रामभरोस से बातचीत की जा सकती है। फिर क्या था लाई, चना झोरिया कर रामभरोस की बखरी की तरफ चौथी चल दिए। रामभरोस की बखरी मुश्ष्किल से सौ कदम की दूरी पर थी, एकदम किनारे, गॉव के पूरब की तरफ। जैसे ही चौथी रामभरोस की बखरी की तरफ कदम बढ़ाए वैसे ही बखरी की परछांई ने उन्हें घेर लिया। रामभरोस की बखरी परछांई वाली थी जितने बड़े रामभरोस थे उतनी बड़ी उनकी बखरी की परछांई भी थी। बखरी पर पहंुंचने के लिए कुछ दूर तक बखरी की परछांई में भी रेंगना पड़ता था। जैसे जैसे वे बखरी के पास पहुंचते बखरी की परछाईं उन्हें घेर लेती। परछाईं उनसे पूछने लगती।
‘काहे जा रहे हो सरकार के पास, फेकुआ का कोला लवाना था तो अपने बल पर लवाते, रामभरोस के कहने पर काहे लवा लिए। जब फेकुआ का कोला लवा ही लिए फिर उसका परिणाम भी भुगतो, अब रामभरोस के आगे-पीछे क्या कर रहे हो। एकदम से चूतिया ही हो का?’
परछांईं के टोंकनेे पर वे काहे रुकते, बखरी की तरफ बढ़ते रहे। बखरी की दूरी कदम दर कदम घटने लगी। चौथी जानते थे कि केवल रामभरोस की ही नहीं बखरी की परछाईं में भी लोग गोते लगाने लगते हैं सो उन्हें भी गोते लगाना ही होगा। अब रामभरोस जैसा कहेंगे वैसा ही करना है उन्हें।
रामभरोस आरामदेह कुर्सी में धंसे हुए थे। सामने वाले चबूतरे पर रामदयाल कारिन्दा बैठा हुआ था तो एक तरफ दरी पर कुछ फुटकर लोग भी बैठे हुए थे। रामभररोस ने चौथी गवहां को देखते ही बैठने का हुकुम दिया...कृ
‘बइठो चौथी! केहर से आय रहे हो?’
चौथी किनारे पड़ी मचिया पर बैठ गये और बैठते ही उन्होंने रामभरोस से जानना चाहा....कृ
‘के के आया था सरकार! आज तो दरबार में काफी भीड़ जुटी थी।’
‘अरे यार! कोई बाहर का नाहीं था, सरकारी डाक्टर और बी.डी.ओ. साहब आए थे। सारे अधिकारी नसबन्दी कैंप कराने के लिए दौड़ रहे हैं। अब तूं बताओ हमलोग जबरी नसबन्दी किसकी करा सकते हैं। खैर छोड़ो, ई बताओ खेती बारी का का हाल है?’
‘अबहीं तो जोतनी चल रही है सरकार! फेकुआ और बिफना ने काम ही छोड़ दिया है, कह रहे हैं सब कि हम काम नाहीं करेंगे। औतरवा आज बहुत खरी खोटी सुना रहा था, कउनो अदब नाहीं रह गया साले में। जब हम कर्जा लोटाने के लिए उससे बोले तो वह हमसे अकड़ गया....कृ
‘कहने लगा एक छदाम नाहीं देंगे जो करना हो कर लीजिएगा।’
चौथी गवहां ने औतार से हुई बातचीत व खरी खोटी का पूरा विवरण रामभरोस को सुनाया। विवरण बताते बताते चौथी गवहां सीरियस हो गए। अपनी आदत के अनुसार हाथ से मुंह फेरने लगे। रामभरोस गंभीर बने हुए थे। ऐसे अवसरों पर वे स्वभावतन गंभीर हो भी जाया करते हैं क्योंकि कोला लवाने का मामला उन्हीं के कहने पर घटा था जो तूल पकड़ता जा रहा था। उन्होंने चौथी गवहां को आश्वस्त किया.जैसे चौथी की पीठ सहला रहे हों....कृ
‘काहे घबरा रहे हो चौथी! ऊ सब जोतनी नाहीं कर रहे हैं तो का हुआ? हमारा ट्रेक्टर ले जाकर जोतनी करवा लो। हम आपन हलवाह भेज कर तोहार खेत बोआ देंगे।’
रामभरोस के जोरदार आश्वासन ने चौथी गवहां की पीठ सहलाया, पीठ सहलाते सहलाते उनके माथे तक पहुंच गया फिर उनका तनाव कुछ कम हुआ, पर पूरी तरह से कम नहीं हुआ, माथे का दर्द बना रह गया। पर उन्हें यकीन हो गया कि उनका खेत जोता और बोआ जाएगा। खेती बिगड़ने नहीं पाएगी, नहीं तो साल भर का फांका हो जाता। रामभरोस ने जब टेªक्टर भेजने के लिए बोल दिया है तब ट्रेक्टर जाएगा ही फिर तो खेत बोआ जाएगा, इस मामले में रामभरोस बात के पक्के हैं।
चौथी गवहां गॉव की राजनीति के जानकार थे। उन्होंने महसूसा कि रामभरोस का मिजाज ठीक है, ऐसे समय में औतरवा की बदमाशी के बारे में साफ साफ बात कर लेनी चाहिए रामभरोस से। उन्होंने अपनी बात जोड़ा...कृ
‘सरकार एक बात बोलें, औतरवा का मन बहुत बढ़ गया है, र त्ती भर भी संकोच नाहीं रह गया है ओकरे में। ऊ तो आज लड़ने पर आमादा हो गया था हमसे। ऊ तो हम भाग आए वहां से नाहीं तो जाने वह का करता। ओकरे संगे का करना है कुछ सोचिए सरकार! ओकी मनबढ़ई रोकना है।
रामभरोस तो रामभरोस, गंभीरता की प्रतिमूर्ति, गंभीरता के साथ उन्होंने चौथी को समझाया...कृ
‘हम कह रहे है नऽ जब तक औतरवा का पट्टा खारिज नाहीं हो जाता तब तक मुह सिला रखना है, आगे हम देख लेंगे। ओकरे गाड़ीं में दम है जो हम लोगों का कुछ बिगाड़ सके।
बात भी समयानुकूल थी। रामभरोस समय की राजनीति के साथ थे। वे नहीं चाहते थे कि समय उनकी हसी उड़ाने लगे और वे भहराकर जमीन पर गिर जांए। पट्टा खारिज कराने के बारे में वे प्रयासरत थे और रामबली लेखपाल को उन्होंने सहेज भी दिया था। गॉवसभा का प्रस्ताव पास हो ही गया था। रिपोर्ट लग जाने के बाद एस.डी.एम. साहब से उसे स्वीकृत वे करा ही लेंगे। रामबली ने पट्टा खारिजा के काम को कानूनगो के ऊपर उछाल दिया था और रामभरोस कानूनगो को भी राजी कर रहे थे। हालांकि वह बोल रहा था कि ईमरजेन्सी में वह वही करेगा जो सही होगा गलत कुछ भी नहीं करेगा। रामभरोस ने भी उससे बोल दिया था कि गलत न करो, सही ही करो। अब इससे अधिक सही क्या होगा कि औतार का पट्टा खारिज करने का प्रस्ताव गॉवसभा ने पास कर दिया है। इसमें का गलती है, ग्रामसभा ही तो मालिक है गॉव की जमीन की। रामभरोस अपनी बात पर डटे हुए थे।
‘एम्मे का है, गॉवसभा की जमीन है, जो गलत तरीके से पट्टा हो गई है, वह सार्वजनिक उपयोग की भूमि है, आप जानते ही हो कि सार्वजनिक उपयोग की भूमि का पट्टा नहीं किया जाना चाहिए, कानूनन गलत है, अगर हम चाहें तो तोहके भी एम्मे फसा सकते हैं कि तोहंई ले दे के पट्टा किए हो।’
कानूनगो असमंजस में था, एक ओर उसकी नौकरी थी तो दूसरी ओर रामभरोस थे। रामभरोस का डर उसे इसलिए था कि वे उसे किसी भी फर्जी मामले में भी फसा सकते हैं। रामभरोस जैसों के कई कई हाथ पैर होते हैं। कानूनगो जानता था कि जब सहपुरवा में चकबन्दी हो रही थी तब चकबन्दी अधिकारी उनकी राय में नहीं था। मौजा नुनुआ में चकबन्दी का दफ्तर था। वहीं पर सबके सामने ही रामभरोस की किचकिच चकबन्दी अधिकारी से हुई थी। रामभरोस अपनी जमीन की मालियत बढ़वाना चाहते थे। चकबन्दी अधिकारी गलत तरीके से मालियत बढ़ाना नहीं चाहता था। बात बढ़ गई गाली गलौज तक, रामदयाल कारिन्दा ने लात घंूसों से अधिकारी की पिटाई कर दी। कहानी खतम नहीं हुई, कहानी आगे बढ़ गई। दो तीन दिन बाद रामभरोस ने रापटगंज चौमुहानी पर उस अधिकारी को किसी सफाईकर्मी से पिटवा दिया किसी नाटक की तरह। जाने कहां से वह सफाईकर्मी आया और चकबन्दी अधिकारी को जूतों से पीट दिया। नुनुआ गॉव में चकबन्दी अधिकारी का परिवार भी रहता था। उनके बाल बच्चों का डर के मारे घर से बाहर निकलना बन्द हो गया जाने कब क्या हो जाए। अधिकारी शीघ्र ही अपना तबादला करा कर कहीं दूसरी जगह चला गया। कानूनगो यह सारा किस्सा जानता था, कुछ सोच कर बोला..कृ
‘आप ठीक बोल रहे हैं, गॉवसभा का प्रस्ताव पास हो गया है। अब आप तहसीलदार साहब से बात कर लें, क्योंकि हमारी रिपोर्ट को तहसीलदार साहब ही अपनी संस्तुति देकर एस.डी.एम. के पास भेजेंगे। आप तो सारी प्रक्रिया जानते ही हैं। मैं आज ही अपनी तथा लेखपाल की रिपोर्ट लगवा देता हूं’।
रामभरोस हालांकि पढ़े लिखे कम थे पर उन्हें कोई चूतिया बना दे ऐसा भी नहीं था। वे समझ रहे थे कि ये सारे के सारे कर्मचारी हमैं चूतिया बना रहे हैं। लेखपाल टाल रहा है कानूनगो पर, कानूनगो टाल रहा है तहसीलदार पर, तहसीलदार टाल देगा एस.डी.एम. पर। ऐसा सोच कर रामभरोस अपने ताव में आ गये....कृ
‘कानूनगो साहब ऐसा है हमके चूतिया जीन बनाओ, हम तोहन लोगन का सारा खेल जानते हैं। जिस काम में कुछ दक्षिणा मिल जाती है उसे तूं लोग फटाफट कर देते हो और दूसरे जरूरी कामों को लटका देते हो। हम बताय दे रहे है ऐसे बहाना बनाने से काम नाहीं चलेगा। पर हमार काम तो तोहके कइसहूं कराना है, हम नाहीं जानते के तूं इसे कैसे कराओगे। जो लेना देना हो साफ साफ बोलो, लजाओ जीन।’
कानूनगो पूरी तरह से सहम गया वह जानता था कि रामभरोस से घूस लेने पर गड़बड़ी हो जाएगी, पूरी तहसील इनके इशारे पर नाचती है। तहसील के ये अप्रत्यक्ष तहसीलदार हैं तो एस.डी.एम. भी हैं। सो इनसे बच कर रहना चाहिए नहीं तो पीठ पर कानून की दण्डात्मक धारांए ये चिपकवा देंगे। सावधान होकर उसने अपनी विवशता बताया....कृ
‘सरकार! ई का बोल रहे हैं आप! आप से लेन-देन का करना है। हम तो जानते हैं कि आपका काम करना है बस। लेकिन डिप्टीसाहब की मर्जी के बिना पट्टा खारिजा का काम नाहीं हो सकता, हमलोग रिपोर्ट लगाय दे रहे हैं, आप डिप्टी साहब से औतार का पट्टा खारिज कराय लीजिए।’
कानूनगो की यह बात रामभरोस को अच्छी लगी, कौन तीन तेरह करे, सीधे डिप्टी साहब से ही बात कर लेनी चाहिए। यही अच्छा और सरल होगा क्योंकि पट्टा तो एस.डी.एम. साहब को ही खारिज करना है, कानूनगो ठीक बोल रहा है। फिर तो रामभरोस वहां से चल दिए।
कानूनगो के यहां से रामभरोस निकल तो लिए पर कानूनगो उनके दिमाग पर भूत की तरह चढ़ा हुआ था। कानूनगो कहीं उन्हें बेवकूफ तो नहीं बना रहा...कृ
नहीं, नहीं वह बेवकूफ नहीं बना रहा, उसे तो केवल रिपोर्ट ही लगाना है, वह रिपोर्ट लगाने के लिए बोल ही रहा है। इससे अधिक वह कर भी क्या सकता है। रामभरोस ने तय किया कि अब वे डिप्टी साहब से मिलेंगे, अगर संभव हो सकेगा तो कृपालु जी के साथ मिलेंगे। कृपालु जी की बात टालना डिप्टी साहब के लिए आसान नहीं होगा। जब कृपालु जी तैयार हो जाएंगे फिर तो फेकुआ का पट्टा खारिज हो ही जाएगा। प्रशासन से कत्थक नचवाना कृपालु जी जानते हैं। कत्थक जैसा कठिन नाच भी करमा की नाच की तरह हो जाता है।
‘मजूरों का दिन या रात वाला समय, मजूरी करता
हुआ ही धरती पर उतरता है उसी तरह कथा समय भी तड़पता, छटपटाता, खुद को खोलता, तोड़ता उतर रहा है कथा धरती पर’
फेकुआ के बियाह की साइत पक्की हो चुकी थी। मामा, फूफा, मौसा आदि नातेदारों व रिष्श्तेदारों को बुलाया जा चुका था। गोतिहउजी के लोग तो गॉव में थे ही। कुछ जो दूसरे गॉवों के थे उन्हें भी बुलाया गया था पर वे बियाह के दिन ही आते।
फेंकुआ के मालिक चौथी गवहां चूंकि औतार से नाराज थे सो वे औतार की कुछ भी मदत नहीं किए। औतार की मदत करने के बजाय वे मजाक उड़ा रहे थे कि देखो फेकुआ का बियाह औतरवा कैसे करता है?’ औतार ने बियाह का खर्च-वर्च जो कुछ भी उधार में लेना था उसका जोगाड़ पंडित शाोभनाथ के यहां से किया था। औतार ने बनी मजूरी वाला धान जो बचाया हुआ था उसे बेच कर उन्होंने सर सामान खरीद लिया। उन्हें यकीन था कि चढ़ने वाले कर्जे को मजूरी करके चुका देंगे। मजूरी तो करना ही है। फेकुआ के कोला का धान भी मिल जाता तो वे अपने सहारे ही बियाह का खर्चा निपटा लेते, थोड़ा बहुत ही किसी से उधार लेना पड़ता। कपड़े की दुकान वाले को शोभनाथ ने सहेज दिया था कि जितना भी कपड़ा औतार को चाहिए होगा, दे देना और उसने दिया भी। दुकानदार से औतार ने चार जनानी धोती और एक मर्दानी धोती तथा परचून का सारा सामान खरीदा था। मिट्टी का तेल सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान पर नहीं था उसका जोगाड़ शोभनाथ पंडित ने किसी दूसरे दुकानदार के यहां से करवा दिया था। गहना के लिए फेकुआ की अइया ने चानी वाला अपना कनफुल और पायल पहले ही दे दिया था जिसे औतार ने सोनार के यहां से साफ करा लिया था, और वह चमकने लगा था। नाक के लिए एक नथिया औतार ने पहले ही खरीद लिया था जिसे फेकुआ की अइया को ही पता था फेकुआ को नहीं। नाक का लवंग नैहर से मिलेगा ही। बियाह के सारे जरूरी सामानों को खरीद लेनेे के बाद औतार ने राहत की सांस लिया था और अपने देवता को याद किया था। उनकी कृपा के बिना बियाह का सारा सामान खरीदा जाना संभव नहीं था।
औतार बहुत ठाठ बाट से फेकुआ का बियाह करना चाहते थे। फेकुआ उनका एकमात्रा लड़का था सो काफी उत्साहित थे। कर्जा फर्जा जो भी होगा दोनों कमा कर वापस कर देंगे। फेकुआ भी तो कमाएगा। गॉव में जो देखा देखी वाला पूर्वाग्रह होता है वह औतार के पास भी था किसी भी हालत में फेकुआ की बारात किसी से कम नहीं होनी चाहिए। औतार गॉव के मालिकों को परख लेना चाहते थे तथा अपनी बिरादरी वालों को भी कि वे उनके लिए क्या करते हैं? खेलावन चौधरी की बारात उन्हें नही भूलती। का था उनके पास, वे भी तो गरीब थे, उनके पास तो पट्टे वाली जमीन भी नहीं थी। रामभरोस की हलवाही करते थे, बस यह था कि उनकी मेहरारू का टांका रामभरोस से था एकरे अलावा का था उनके पास?’
औतार चौंक गए खुद पर, का सोच रहे हैं वे, खेलावन चौधरी की मेहरारू का टॉका रामभरोस से था तो क्या यह कम था, यह तो बहुत बड़ी ताकत थी खेलावन चौधरी के पास। उस टॉके के कारण क्या नहीं कर सकते थे खेलावन चौधरी। इसका मतलब खेलावन चौधरी के पास बहुत कुछ था। औतार जानते थे कि यह जो टॉका होता है, वह बहुत बड़ी बात होती है। वे खेलावन चौधरी के जोड़ में खड़े नहीं हो सकते।
औतार ने लवण्डा नाच का इन्तजाम भी किया था बिना लवण्डा नाच चाहे नेटुबा नाच के के कैसी बारात? बिफना उसी नाच मंडली में काम भी करता था। बिफना नाच में जोकरई का काम करता था। उसने भी जोर दिया था कि लवण्डा नाच मंण्डली को ले कर ही वह चलेगा। आखिर क्यों नहीं ले चलेगा नाचमण्डली फेकुआ की बारात में? उसका एक ही तो दोस्त है फेकुआ, उसका बियाह होगा, वह भी बिना नाच बाजा के, कैसी लगेगी बारात, उदास और फूहर। सो उसने अपने स्तर से नाच वालों को बुला लिया था। नाच वालों के लिए गैस और दरी का इन्तजाम नहीं करना था, उनके पास था और बाकी चौकी आदि चीजें तो घरात वाले दे ही देंगे।
आज शाम को ही बारात जानी थी। सभी लोग बारात जाने की तैयारी में जुटे थे। सुक्खू समधियाना ठाट में बीड़ी पर बीड़ी दाग रहे थे। घर में इकठ्ठी औरतों पर अपने रुतबे का असर भी छोड़ना नहीं भूले थे। किसी को इधर उधर देखा कि डांटना दबेरना शुरू कर देते थे।
दूसरी तरफ चौथी गवहां आस लगाए बैठे थे कि कर्जा लेने के लिए उनके पास औतार जरूर आएगा। गॉव में ऐसा कौन है जो औतार को कर्जा दे सके सिवाय मेरे और रामभरोस के। बात सही भी थी पर शोभनाथ पंडित गॉव में एक ऐसे आदमी थे जो किसी की मदत के लिए अपना खाना भी छोड़ सकते थे। औतार ने सारा किस्सा जब उन्हें बताया कि उसके साथ क्या हुआ और अब इतने कम समय में किसके पास जांए सो उनके यहां आए हैं फिर तो शोभनाथ से रहा नहीं गया। उन्होंने केवल आश्वासन ही नहीं हर तरह से औतार की मदत की। वैसे शोभनाथ पंडित की स्थिति बहुत कमजोर नहीं थी पर ऐसी भी नहीं थी कि वे किसी भी समय किसी की आर्थिक मदत कर सकें। उनके ऊपर लड़का पढ़ाने का बहुत बड़ा बोझ था सो वे संभल संभल कर चलते थे। उनकी पत्नी को गॉव में पुजारिन काकी, आजी, भउजाई आदि के नाम से जाना जाता है, हैं भी पुजारिन ही। हमेशा भजन कीर्तन में मगन रहने वाली। शोभनाथ दो बच्चियों के पिता थे और एक लड़का था। बच्चियों की बियाह उन्होंने पहले ही कर दिया था। लड़का इण्टर में रापटगंज पढ़ रहा था बाद में बनारस चला गया क्योंकि आगे की पढ़ाई रापटगंज में नहीं होती थी।
बाजे गाजे के साथ फेकुआ की बारात सोहदवल गॉव की ओर चल पड़ी। बारात जाने के पहले गॉव में स्थित सभी देवस्थानों पर पुजहाई की गई, बरम बाबा से लेकर डीहवार तक। सबसे पहले सती माई के यहां पुजहाई की गई बाद में डीह बाबा, बरम बाबा दूसरे स्थानों पर पुजहाई की गई। पुजहाई में ओतार की मेहरारू के साथ गॉव की गोतिहारिनें तथा नातेदारिनें भी चल रही थीं। देखने लायक दृश्ष्य था, अंग्रेजी बाजा बज रहा था और औरतें पूरी साज, सिंगार के साथ अंग्रेजी बजा के पीछे पीछे थीं। गॉव में ढोल नगाड़े के बजाय अंग्रेजी बाजा का बजना वह भी लोगों को चकरियाये हुए था पर बाजा था कि बज रहा था उसके बजने से दूसरों का बाजा बजे तो उससे औतार को क्या?
ढोलक वालों का साज अलग था। उनके साथ गिटार किस्म का एक वाद्य था जो बैटरी से चलता था जिसे एक आदमी बहुत अच्छे ढंग से बजा रहा था। जब बारातियों का मन गाना गाने का हो जाता तो वे बाजा रोक देते और गाना शुरू कर देते खासतौर से जहां किसी का दरवाजा होता। ‘बगिया फुलै बसंत रे, बउराइल मोरा जियरवा’ की धुन, नगाड़ा पर उफन पड़ती और ढोलक पर ताल देने वाला नाचने लगता। गॉव के छोटे बड़े सभी इस दृश्य को अपनी ऑखों में कैद करते और औतार की तारीफ करते पर चौथी गवहां और रामभरोस कोे इससे खुशी नहीं थी। वे लोग कर ही क्या सकते थे, बारात जानी थी सो गई। अब इससे उनका बाजा बज रहा था तो बजा करे। औतार से का मतलब।
दूल्हे के लिए रिक्सा मंगा लिया गया था जो नुनुआ गॉव से आया था। बारातियों को पैदल ही जाना था सो उनके लिए कुछ विशेष नहीं करना था। दिन के साढ़े चार बजे के आस पास बारात जानी थी इसके पहले भत्तवान का कार्यक्रम निपटा लेना था। बारात जाने में थोड़ी देर हो गई क्योंकि भत्तवान भी उसी दिन था। भत्तवान के दिन अगर खाली पूड़ी खिलानी होती तो देर नहीं होती पर कच्चा खाना दल, भात, तरकारी, बरी, फुलौरी कतरा आदि खिलाना था। औतार ने चौथी गवहां को दिखाने के लिए बरी, बारा, फुलौरी तथा दो किसिम की तरकारी का इन्तजाम किया था। भात, दाल तो था ही। यह सारा इन्तजाम औतार की औकात से अधिक था, पर जिद तो जिद। जिद ही औतार से सारा कुछ करा रही थी उनकी औकात से बहुत अधिक।
करीब पांच बजे दिन के आसपास बारात चल पड़ी बहुत देरी भी नहीं हुई थी। भत्तवान जल्दी निपटा लिया गया। वैसे भी बारात को सहपुरवा से दो कोस की दूरी पर ही तो जाना था।
औतार के लिए एक खुशी की बात थी कि होने वाला उनका समधी किसी की हलवाही नहीं करता था। वह असामी था तथा वह पांच बिगहा उपजाऊ जमीन का मालिक भी था। जिसमें दोनों फसलें होती थीं। उसके पास दस गायें तथा तीन जोड़ हल बैल भी थे। साइत तय करते समय उनका समधी बोल रहा था कि वह जल्दी ही एक भैंस भी खरीदेगा। रिक्सा औतार के मड़हा के सामने खड़ा था तीन चार औरतों ने फेकुआ को ओंइछा फिर बाद में रिक्सा पर बैठाया। उसके माथे पर चावल और दही का टीका लगाया, टीका लगाते समय औरतें कुछ भुनभना रही थीं जो समझ से बाहर था बाकी औरतें वही गीत गा रही थीं जो राम के विवाह का गीत माना जाता है पर उसके बोल साफ नहीं थे।
बारात चल पड़ी, औरतें बारात का जाना तब तक देखती रहीं जब तक बारात का दिखना ओझल नहीं हो गया। औतार के मड़हा के सामने बारात की गंध हर ओर पसरी हुई थी जबकि चौथी गवहां के यहां निराशा और गुस्सा वाली दूसरी गंध थी।
‘बारात का इतना इंतजाम कैसे कर लिया औतरवा ने?
‘इतना इन्तजाम, औतरवा साले ने किसके जोर से किया?’
चौथी गवहां बारात का तामझाम देख कर परेशान थे, परेशान तो वे भी थे जो औतार से जला करते थे।
बारात रास्ते भर गाती बजाती तथा नाचती चल रही थी। करमनाशा नदी पर पहुंच कर बारात रुक गई। वही जगह सुस्ताने लायक थी भी। नदी के भीतर छितराए चौड़े चौड़े पत्थर। पत्थरों के बीच से बहता नदी का पानी, सफेद और साफ, कल कल की मधुर धुन बारातियों का दिल और दिमाग दोनों को खींच रही थी। यह वही करमनाशा नदी है त्रिशंकु वाली, उनके लोर और ऑसंुओं के बहने के कारण नदी बह निकली। त्रिशंकु मतलब एक अभागा राजा जो विश्ष्वमित्रा की यौगिक साधनाओं का प्रायोगिक नमूना बन गया था। उसे वे अपने बनाए स्वर्ग का नागरिक बना रहे थे पर हुआ कुछ नहीं और त्रिशंकु स्वर्ग और नर्क के बीच में जा कर कहीं अटक गया। स्वर्ग वाले तथा नर्क वाले दोनों अपने अपने हितों को देखते हुए उन्हें अपने यहां आने नहीं दिए।
सूर्यास्त हो चुका था। निपटान के लिए नदी से अच्छी जगह और दूसरी कहां हो सकती है। चिलमें दग गईं, बीड़ियां जलने लगीं, सुर्ती ठोंकी जाने लगी। पनपियाव के लिए गुड़ निकाला गया, दाना निकाला गया, फेकुआ की मतारी ने दाना भूज कर बारात के साथ भिजवा दिया था। सारा सामान था नाश्ते का भी और दम लगाने का भी। सभी अपनी अपनी पसंद पर टूट पड़े। गांजा और बीड़ियां तो जलीं पर दाना किसी ने नहीं चबाया। कुछ देर पहले ही तो सब खा पी कर चले थे। यह भी था कि यहीं पेट भर जाएगा फिर वहां घरात में कैसे खाया जाएगा? दैनिक क्रिया से निपट कर बारात सोहदवल के लिए चल पड़ी, वहां जल्दी पहुंचना भी तो था। बारात को लेट करना ठीक नहीं चाहे बारात बियाह की हो या गवन की।
अन्धेरा गाढ़ा होने लगा था, पगडंडी पर रास्ता देखना मश्ष्किल था इसी लिए औतार ने पहले ही गैस जलवा दिया था। एक गैस आगे थी तथा दूसरी पीछे। रास्ता आसानी से दिखने लगा था और बारात कुछ देर में ही सोहदवल के सिवान तक पहुच गई। गॉव के आस पास पहुंचते ही बाजे बज उठे उधर घरात की तरफ से भी बाजे गरजने लगे। बारात को घरातियों ने गॉव के एक बगीचे में ठहरवाया था। वहीं पर नाश्ता करने के बाद बारात दुआर लगाने के लिए घरात के दरवाजे की ओर चल पड़ी। आगे आगे गैस और उसके पीछे लवण्डा का नाच, पीछे पीछे बाराती नाचते गाते। बाराती लड़के अपनी धुन में थे, माइक से गाना बज रहा था और लड़के उस धुन पर नाच रहे थे लगता था कि कोई फिल्म चल रही हो सारा दृश्य अपने आप फिल्मी हुआ जा रहा था। औतार मगन थे, अतिरिक्त आनंद और उत्साह में डूबे हुए थे। उन्हें लगा कि उन्होंने जैसा सोचा था वैसा ही हो रहा है। इस समय औतार भूल चुके थे कि चौथी गवहां ने उनके साथ क्या किया था। उन्हें याद थे तो केवल शोभनाथ पंडित जिनके सहयोग के बिना बारात की इतनी बढ़िया तैयारी नहीं हो पाती। बाराती तो अपने उमंग और रंग में थे ही।
करीब एक घंटे बाद बारात घरातियों के दरवाजे पर पहुंची। दरवाजे पर पहुंचते ही वहां एक औरत ने कलशा दिखाया। कलशा उसके सिर पर रखा हुआ था। औतार ने कलशा उतार कर द्वार पूजा वाले स्थान पर रखा। द्वार-पूजा का स्थान दो चौकियों को जोड़ कर बनाया गया था। चौकी पर ऑटे का चौकोर घेरा बनाया गया था उसी के बीच में कलशे को रखा जाना था। वह पूजा स्थान काफी आकर्षक दिख रहा था। कलशा के ऊपर आम की पत्तियां यानि टेरियां रखी हुईं थीं, भीतर पानी भरा हुआ था। कलशा रखे जाने के बाद द्वार-पूजा शुरू हुई। मंत्रोच्चार होने लगे जो वहां उपस्थित किसी के भी समझ में आने वाला नहीं था। सारे मंत्रा संस्कृत भाषा के थे भला वह किसे समझ में आती? सारा संस्कार बाभनों ठाकुरों जैसा किया जा रहा था पर नकल जैसा नहीं जान पड़ रहा था। ऐसा प्रबंध घरातियों द्वारा करवाया हुआ था। इस तरह से द्वार-पूजा का संस्कार औतार ने अपनी बिरादरी में कभी पहले नहीं देखा था। हालांकि उन्होंने मालिकों के यहां देखा था बाद में उन्हें मालूम हुआ कि उनके होने वाले समधी का मन था कि उनकी लड़की का बियाह वैसे ही होगा जैसे बाभनों या ठाकुरों की लड़कियों का होता है, पर कैसे होता उस तरह से बिआह? सो औतार के समधी ने एक योग्य पुरोहित की तलाश किया था।
औतार के समधी ने अपनी बिरादरी के कई पुरोहितों से बातें की पर उनमें एक भी ऐसा नहीं था जो सवर्णो के विवाह वाले तरीकों को जानता हो। सो वे बिहार से पुरोहित बुलावाए थे। वह पुरोहित ब्राह्मणी विवाह संस्कार का जानकार था। वह आधा हरिजन था तो आधा पंडित था। आधा हरिजन तथा आधा पंडित इसलिए कि उसका बाप पंडित था पर मतारी हरिजन महिला थी। उसके बाप को पंडितों ने अपनी बिरादरी से निकाल दिया था फिर भी वह उनसे नहीं डरा और गॉव में ही डटा रहा। उसने पंडितों के डर के कारण गॉव नहीं छोड़ा। साफ कहता था जो करना हो कर लो, बिरादरी से निकालने के अलावा और तुम कर ही क्या सकते हो। पंडिताई का काम तो उसे चाहिए ही था उसने पंडिताई वाला काम पकड़ लिया जिसे उसने अपने बाप से सीखा था।
हरिजनों में नई लहर आ रही थी, वे दलित होने के आग्रहों से निकलना चाहते थे, वे चाहते थे कि वे सवर्णों की तरह दिखें और उनके जैसा ही आचरण अपनांए। बिना ब्राह्मणी संस्कार अपनाए वे अपना अस्तित्व नहीं बचा पाएंगे सो वे ब्राह्मणी संस्कारों को अपनाने लगे थे। इसी लिए उसे हरिजनों की तरफ से हर ओर पंडिताई का काम मिलने लगा था। हरिजन जो ब्राह्मणी कर्मकाण्ड से दूर रहने वाले थे वे ब्राह्मणी कर्मकाण्ड की तरफ बढ़ने लगे थे। जिसका उसे लाभ मिला।
द्वार पूजा के बाद बारातियों को नाश्ता कराया गया। नाश्ते में घरात वालों ने लड्डू और गुड़हइया जलेबी का प्रबंध किया था जो अद्भुत था, बाराती खुश खुश थे और वाह वाही कर रहे थे।
‘वाह रे औतार! समधी तो बड़हर आदमी पा गया’
नाश्ता खतम और लवण्डे का नाच शुरू। बाराती नाच का आनन्द लेने लगे और बूढे़ किस्म के लोग बतकहियों में डूब गये।
‘सरकार ने हमारा कर्जा माफ कर दिया है, पट्टे की जमीन भी दे रही है, मजूरी बढ़ाने के लिए कह रही है’
औतार पास ही में थे सारा कुछ सुन रहे थे, उन्होंने टोका....
‘अरे समधी साहेब! का बोल रहे हैं? हमरे विजयगढ़ अउर जसौली में अबहीं भी चरसेरवै मजूरी है, चार सेर से आगे बढ़े तो बोलैं। किसका कर्जा माफ हुआ हो समधी साहेब, खाली सरकारी कर्जा माफ हुआ है। हम लोगों के पास सरकारी कर्जा था ही कहां, हमलोगों पर तो मालिकों का कर्जा है, वह माफ हुआ तो कुछ लोगों कां माफ हुआ? हां एक बात हुई है कि पट्टे में जमीन मिली है पर ओकरे संगे झगड़ा भी तो मिला है।’
औतार का कहना था कि सभी ने ‘हां’ में ‘हां’ मिलाना शुरू कर दिया।
‘हां भइया औतार ठीक बोल रहे हैं’
ओतार की बात से सभी सहमत तो होते ही क्योंकि कहीं भी मजूरी नहीं बढ़ी थी। प्रतिदन कच्चा चार सेर वाला पुराना रेट ही चल रहा था, दिन भर की खटनी के बाद। सूर्योदय के पहले से सुरूज देवता के अस्त होने तक काम ही काम, महीने में एक दिन की भी छुट्टी नहीं, रोज रोज काम, अगर बर बेमारी का बहाना नहीं बनाओ तो काम से कहां फुर्सत। बेमतलब का झूठ बोलो, अगर जीना है तो। किसी का कर्जा माफ नहीं हुआ था। बाढ़ी डेढ़ा वाला रोजगार मालिकों का चल ही रहा था। गॉव गॉव साहूकारों जैसे लोग हो गए थे जो सूद और बाढ़ी पर कर्ज दिया करते थे। मजूरों के सामने आर्थिक जरूरतें किसी मुसीबत की तरह खड़ी हो जाती है कि मालिकों, साहूकारों से कर्जा और बाढ़ी लेना ही पड़ता है। आवंटन में जितनी जमीन नहीं मिली उससे अधिक झगड़ा मिला। कहीं रास्ते का झगड़ा तो कहीं चकरोड का झगड़ा। मालिकों से मार-फौजदारी करो तो जमीन जोतो, फिर दारोगा की मार सहो, मुकदमा लड़ो, चक्कर लगाओ कचहरी की। किसे नहीं पता कि विजयगढ़ में एक भी ऐसा गॉव नहीं जहां गॉवसभा की जमीन पर किसी न किसी दबंग का कब्जा न हो। अगर उस जमीन को कब्जेदारों से छीन लिया जाए और भूमिहीनों में बांट दिया जाए तो तमाम भूमिहीनों के पास अपना मकान और अपनी जमीन हो जाए पर ऐसा करेगा कौन? सरकारें तो केवल नारे लगाती हैं और उसी के सहारे सरकार भी चलाती हैं।
सुक्खू पास ही में खड़े थे उन्होंने अपनी बात जोड़ा....
‘तोहें भूल गया का औतार! हमरे समधी साहब को वनविभाग ने परसाल उजाड़ नाहीं दिया का? उनका घर दुआर ढहा दिया। भगा दिया गॉव से। उसके पहले उनका ठाठ था, चार बिगहे की खेती करते थे। क्या नहीं था उनके पास, दो जोड़ी देखनहरू बैल थे, तीन गॉयें थीं और एक मुर्रा भैंस भी थी। दूध पूत दोनों से भरे हुए थे। उनका ठाट-बाट बड़का लोगन माफिक था। सात बिगहा जमीन के जोतदार बन गए थे। पर किस्मत भी तो कोई चीज होती है वनविभाग ने एक ही झटके में उजाड़ कर जंगल से बाहर कहीं फेंक दिया। उनका दुख दर्द कोई सुनने, गुनने वाला नहीं। कुछ ही दिन में बेचारे पगला गए और रेणूकूट में क्वार्टर क्वार्टर घूम कर भीख मॉगने लगे।’
‘हंऽ हो सुक्खू! सही बोल रहे हो, हमरे मउसा को भी वनविभाग ने जंगल से बहियाय दिया आज बेचारे हलवाही कर रहे हैं।’
सुक्खू और औतार की बातें जैसे ही खतम हुईं कि किसी ने सीलिंग वाली जमीन के बारे में बोलना शुरू किया....कृ
‘हल्ला था कि सीलिंग से जो जमीन निकलेगी उसे गरीबों में बांटा जाएगा पर का हुआ? का पट्टा हुआ भूमिहीनों को सीलिंग वाली जमीन का?’
‘नाहीं हो, कहां हुआ सीलिंग की जमीन का पट्टा। रामभरोस की जमीन तो निकली थी सीलिंग में पर ओके रामभरोसै जोत रहे हैं।’
बारात नाश्ते के बाद आराम कर रही थी। उसके बाद वियाह का कार्यक्रम था। आराम करते हुए बारात समय और समाज के रिष्श्तों के बारे में अपने अपने ढंग से बतिया रही थी। ‘गरीबों का राज आ गया है या आएगा’ उसे विखंडित कर रही थी। माना जाता है कि गरीब सोचता और गुनता ही नहीं पर औतार की बारात में तो यह साफ दिख रहा था कि गरीब भी सोचता और गुनता है। हां उसके गुनने में कोई प्र्रतिरोध नहीं होता। वे नहीं समझ पाये हैं कि वे कभी सरकार पलट कर अपनी सरकार भी बना सकते हैं, खांटी गरीबों वाली, मजूरों वाली, मजूरों के लिए काम करने वाली सरकार। औतार अपने समय के हिसाब से आगे थे, समय उनके पीछे चल रहा था। औतार जमीनदारी की याद दिला रहे थे। जमीनदार जब श्षिकार पर निकलता था तब क्या क्या करता था, कहां सोता था, किसे मारता पीटता था, जंगल को कैसे रनिवास बना देता था, सारा कुछ। ओतार जानते हैं कि वे पहले भी मजूर थे और आज भी मजूर ही हैं। उनकी पहले वाली पीढ़ी भी मजूर थी और आने वाली पीढ़ी भी मजूर ही होगी।
औतार और सुक्खू को तो यह भी पता नहीं कि सरकार जो होती है वह जनता द्वारा, जनता की, जनता के लिए होती है और मजूर तो केवल मजूर होता है, उसे सरकार ‘जनता’ नहीं मानती।
औतार की आदत पड़ गई है मजूरी के काम में खुद को डुबोए रखने की। उनका जो समय है, चाहे दिन वाला हो या रात वाला वह भी मजूरी करता हुआ ही धरती पर उतरता है। उन्हें लगता है कि आसमान में छितराए हुए जो तारे हैं उनमें भी कई पसीना बहाने वाले होंगे। उनके पसीनों से तर यह जो आकाश है वह भी तो कॉप रहा होगा जैसे कि वे कॉप रहे हैं।
औतार के लड़के की बारात है उनका दिल दिमाग खुशियों से भरा हुआ है। वे मगन हैं बारातियों के साथ। प्रकृति ने उन्हंे मजबूरियों में भी हसना सिखा दिया है।
बारात की मौजमस्ती केवल रात भर की है दूसरे दिन खान-पान के बाद बारात बिदा हो जाएगी। घर में गीत-गारी चल रही है साथ ही साथ भोजन की तैयारी भी। घर में तरह तरह की गारियों वाले गीत गाये जा रहे हैं, समधी साहब नेग पाने की गरज से खाना नहीं खा रहे हैं, दूल्हा भी उदास बैठा हुआ है, नेग पाने की लालच म भीें। समधी और दूल्हे की मनउव्वल हो रही है, साथ ही साथ गीतमय गारियॉ भी चल रही हैं।
‘भागो भागो भड़ुआ भागो’ जैसी किसिम किसिम की गारियां।’
बारातियों को गारियॉ कर्णप्रिय लग रही हैं। समधी ही नहीं सभी मजाकिया रिश्ते के लोगों के नाम ले लेकर किसिम किसिम की गारियॉ गाई जा रही हैं, औरतें अपनी धुन में हैं, बहुत अच्छा लग रहा है उन्हें गारियॉ गाने में। बियाह के समय ही तो मौका मिलता है औरतों को मन की भड़ास निकालने का। गारियों के द्वारा, आंगन में नये किस्म का रीतिकाल उतर आया है नख से लेकर शिख तक। उसमें निर्गुण है तो सगुण भी, दोनों के रसायन में डूब चुके हैं बाराती, वे चाहते हैं कुछ और देर तक आंगन में बैठे रहना और धरती पर उतरे रीतिकाल में गोते लगाते रहना, पर ऐसा संभव नहीं था। शायद ये गारियां उन किलकारियों की आहट थीं जिसे औतार के घर में बियाह के बाद सुना जाना है। रिश्ते की इस पराकाष्ठा पर शायद किसी और पवित्राता की आवश्यकता नहीं।
लगभग दो बजे दिन तक लड़की विदा हो गई, लड़की के साथ बारात भी। फेकुआ के साथ लड़की को रिक्से पर बिठाया गया। बिफना तथा फेंकुआ के कुछ दोस्त जो साइकिल से थे वे रिक्सा के साथ हो लिए। बारात चल पड़ी औतार के घर की तरफ।
घर पर दूसरी तरह की खुशियां बारातियों के आने की प्रतिक्षा में परेशान थीं कि बारात आए फिर वे खुशियों का रसपान करें। बारात भी जल्दी जल्दी में थी कि बेर ढलने के पहने तक घर पहुंच जाया जाये। बारात के घर पहुंचने के बाद कई तरह के तामझाम करने पड़ते है औरतों को। नई बहुरिया के परछन से लेकर घर में प्रवेश तक के अलग अलग कार्यक्रम होते हैं।
‘कथांए भी लाज वाली होती हैं वह लाज न जनानी
होती है न मर्दानी इसी लिए कथांए केवल कथांए होती हैं ’
बारात वापस लौट आई। औतार के घर पर बारात के स्वागत के लिए विशेष तैयारी थी। फेकुआ की अइया तो सुबह से ही परेषान थीं यह करना है, वह करना है, उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे उन्हें लग रहा था कि दुनिया की सारी खश्षियां उनके घर में आ कर हसी-ठिठोली कर रही हैं। फेकुआ की फूआ तथा दूसरी नातेदारिनंे बारातियों के खाने-पीने के लिए भोजन बनाने और बनवाने में जुटी हुई थीं। जवान औरतें और लड़कियां तो दूसरे सपनों में थीं।
‘दुलहिन कैसी होगी, करिया होगी कि गोर, लमछर होगी कि बौनी।’
चाहे जैसी होगी अब तो आ ही रही है घर में। बारात आने में कोई देरी तो है नहीं, करमनासा पार कर चुकी होगी, दुलहिन वाला रिक्सा बारात के आने के पहले ही आ जाएगा।
औतार की हरिजन बस्ती सड़क किनारे थी। सड़क पर से जो भी पर्दे वाला रिक्सा गुजरता बच्चे और लड़कियां उसकी ओर दौड़ पड़ते। वे समझते कि उनके घर का ही दूल्हा आ रहा है पर वह कहीं दूसरी जगह का होता। वे निराश हो जाते। निराशा भी कितने समय तक रहती?
अन्त में फेकुआ वाला रिक्सा आ गया जिसे आना ही था। रिक्सा घर पर पहुंचते ही गीत शुरू, गीत के साथ परिछनहारिनें भी दरवाजे पर। रिक्सा रुकते ही औरतों ने दुलहा और दुलहिन को ओइंछना शुरू कर दिया। अद्भुत दृश्य है..दुलहा दुलहिन पर हल्दी में रंगा चावल छिड़का जा रहा है, साथ ही साथ विवाह गीत भी चल रहा है। दृश्य आकर्षक और मनुहारी है। दुलहा और दुलहिन दोनों सपनों में हैं। नर और नारी के मिलन का इतना चित्ताकर्षक दृश्य। फेकुआ गदगद है। ओइंछने का काम कुछ मिनटों में समाप्त हो गया। दुलहा इस रीति से अब बाहर हो चुका था। ओइछन के बाद दुलहिन को फेकुआ के कमरे में ले जाया गया जिसे लीप पोत कर दो दिन पहले ही फेकुआ की अइया ने तैयार कर दिया था। उन्हें तो अपना ख्याल था कि जब वे दुलहिन बन कर इस घर में आईं थीं तब घर की लिपाई पोताई भी नहीं हुई थी। घर में खटिया भी नहीं थी। उन्हें भूला नहीं है पहली रात, उस रात का ही क्या? जानेे कितनी रातें उन्होंने जमीन पर सो कर बिताई हैं फिर बाद में फेकुआ के बपई ने जोगाड़ करके एक खटिया का इन्तजाम किया था। खटिया पर सोना और एक दूसरे में विलीन हो जाना फेकुआ की अइया को आज भी रह रह कर ख्यालआता है।
दुलहिन को उसके होने वाले घर में बिठा दिया गया। उधर फेकुआ का दिल धड़ धड़ कर रहा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्यों घबड़ा रहा है? घबड़ाने की बात तो थी नहीं, उसे एक गाना याद आ रहा था ‘आजु सइयां से होइहंय मिलनवा’ पर यह मिलन उसे आसान नहीं लग रहा था। वह कल्पनाओं में डूब गया और.कृअपरिचित सी चाह उभरी उसके मन में, जल्दी से रात आए और वह अपनी मेहरारू देखे पर ऐसा संभव नहीं था। मेहरारू तो वह तब देख पाएगा जब उसे घर के रिवाज देखने देंगे। रिवाज खतम होने में रात हो जाएगी। रात तो अपने समय पर ही आती है। आती भी है तोकृयह करो वह करो वाले रीति रिवाजों कोे साथ लेकर आती है।
दुलहिन आने के बाद चौथी का रसम फिर गृह प्रवेश। गृह प्रवेश तो होना ही था चाहे गृह जैसा हो, फूस के छाजन वाला हो, खपरैल के छाजन वाला हो या कंक्रीट वाला ही क्यों न हो। घर से क्या मतलब कि उसमें प्रवेश के लिए कितने दरवाजे हैं। प्रवेश तो एक ही दरवाजे से होगा। गृह प्रवेश तो होगा ही और हुआ भी। पर बहुत बाद में। उसके पहले ‘चौथी’ छुड़ाने जैसे तमाम रिवाज निपटाए गये।
दुलहिन के घर में आने के बाद मुंह दिखाई शुरू हो गई। औरतें एक एक कर दुलहिन का मुंह देखने लगीं, कोई अठन्नी तो कोई चवन्नी दुलहिन को देतीं। दुलहिन आंचल थोड़ा उठाती तो गॉव की ननदें उसे पूरा उठा देतीं। दुलहिन लजा जाती पर उसे भी आनंद मिलता। वह जानती थी कि यही तरीका है। वह डूबी हुई थी संइया से मिलने की कुंआरी कल्पनाओं में जिसे उसने सहेजकर रखा हुआ है अब तक। ऑखों में जोति है, किरणें फूट रही हैं, किरणों में सपनों का राजकुमार बसा हुआ है। फेकुआ का कान घर में से निकलने वाली औरतों की बातों पर टिका हुआ है कि वे दुलहिन के बारे में का बोल रही हैं? एक दो का बोला हुआ उसने सुना भी कि ‘दुलहिन ठीक है’, ‘देखनहरू’ है। फेंकुआ गदगद हो गया है, उसने भी तो सपना देखा है कि दुलहिन देखनहरू होनी चाहिए, अच्छी कद-काठी वाली, अच्छी नाक-नक्स वाली, गोर-गार, सुघ्घर।
रात हुई। फेकुआ खाना खा पीकर बाहर कहीं ढरक गया। भला उसे नींद कैसे आती? वह दुलहिन के बारे में ही सोच रहा था जाने कैसी हो, बिफना भइया की दुलहिन की तरह है कि नाहीं, होगी ही, हाथ तो साफ दीख रहे थे और पैर भी, गोर तो होगी ही, चलो जो होगा ठीक होगा, अब का हो सकता है बियाह के बाद अब तो हमेशा हमेशा के लिए साथ निभाना है। फेकुआ के पास नींद वाले गोते नहीं थे पर वह काफी थका हुआ था। दिन भर की थकान ने उसे नींद में धकेल दिया। तभी किसी औरत ने उसे जगाया....
‘का हो फेकुआ! सूति गए का? कैसे नीन आय गई तोहके, चलो उधरकृ’
औरत ने इशारा किया उस कमरे की तरफ, जिसे उसके लिए खासतौर से तैयार किया गया था। वह बिफना की औरत थी। चघड़ और मस्त, उसने फेकुआ का हाथ पकड़ा और उसके कमरे की तरफ ले गई फिर अचानक ऐसा धक्का दिया कि फेकुआ अपने आप कमरे में समा गया। किसी तरह गिरने से बचा नहीं तो मजाकिया रिष्तांे वाली रिष्तेदारिनंे हसने लगतीं। बिफना की औरत ने फटा फट दरवाजे का टटरा लगा दिया, जाते जाते मजाक भी करती गई...
‘सम्हारि के हो फेकुआ, नई नई है बेचारी, खेलल खायल नाहीं लाग रही’
फेकुआ भीतर भीतर रोमांचित था। उसे भउजी के मजाक पर हसी आ गई हालांकि उसने हसी रोक लिया। भउजी का मजाक भी तो समयानुकूल था। पर था शुचिता के बाबत। शुचिता हर हाल में औरतों से ही जुड़ी होती है पुरुषों से नहीं।
कमरे की सजावट देखने लायक थी। खटिया पर लेवा बिछाया हुआ था और उस पर एक पलंगपोस भी बिछाया गया था। पीछे की तरफ भेड़िहवा कंबल रखा गया था। फेकुआ के लिए यह इन्तजाम अद्भुत था। जनम से ही वह जमीन पर सो रहा है। लेवा-कथरी तो मेहमानों के लिए रखी रहती है घर में। बहुत हुआ तो कमरे में पुअरा बिछा दिया गया उसी पर लंुगी फैलाकर सो लिया। इतना इन्तजाम उसने अपनी बिरादरी में किसी के घर नहीं देखा था। यहां तो खटिया है, कंबल है और साफ-सुथरा लेवा भी। फेकुआ धधा गया। उसकी मतारी ने इंतजाम में कोर कसर नहीं छोड़ा है। सारा इन्तजाम खुशियों से भरा हुआ था। खुशियांे की सजावट कमरे में थी जो उल्ल्ेखनीय नहीं थीं पर थीं खुशियों से भरी हुई। फेकुआ के लिए रात भी खुशियों वाली होने वाली थी। वह खुशियों को रात भर चूम-चाट सकता है।
फेकुआ जानता था कि उसकी औरत का नाम सुमिरिनी है। वह आज उसे नाम से बुलाए या कैसे बुलाये समझ नहीं पा रहा था। का बोलेगा उससे कैसे बोलेगा, कहेगा ‘का हो सुमिरिनी’ भोजपुरी में। नहीं खड़ी बोली में ही बोलेगा, वह बोल लेता है खड़ी बोली। सुमिरिनी कौन पढ़ी लिखी है कि उसकी गलती निकाल पाएगी खड़ी बोली में, अपनी बोली में नहीं बोलेगा। फिलिम में तो ‘डार्लिंग’ और जाने का का जाने का बोला जाता है मेहरारू को। फेकुआ सकपकाया हुआ है। पर वह उसे डार्लिंग नहीं बोलेगा उसका नाम लेकर ही उससे बतियाएगा।
फेकुआ के घर में घुसते ही खटिया से उठ कर जमीन पर एक किनारे सुमिरिनी बैठ गई। खटिया से उतर कर जमीन पर बैठ जाना चाहिए सुमिरिनी केवल इतना ही जानती थी। उसने सुना था कि पति के सामने खटिया पर बैठे नहीं रहना चाहिए। जमीन पर क्यों बैठ जाना चाहिए उसे पता नहीं था। वह साधारण सी लड़की थी कोई परंपराओं की शोधार्थी नहीं थी। वह काफी सकपकाई हुई थी। नर-नारी के रिश्तों के बारे में कुछ सुनी सुनाई बातें ही उसे मालूम थीं, जैसे यही कि पति देवता होता है आदि आदि। जबकि किसी देवता के बारे में उसे कुछ भी पता नहीं था कि देवता होते हैं या नहीं होते हैं। होते है तो उनके रंग रूप कैसे होते हैं?
सकपकाई हुई सुमिरिनी अपने ढंग से लजा रही थी, उसे लजाना ही था। और फेकुआ था कि वह भी अलग ढंग से लजा रहा था, दोनों लजा रहे थे, एक की लाज मर्दानी थी तो दूसरे की जनानी पर रात नहीं लजा रही थी, रात की लाज मर्दानी तथा जनानी में नहीं बटी होती। रात की लाज खुली खुली थी और मस्त मस्त भी। रात के लिए वहां औपचारिकता की जगह नहीं थी कि रात बोलती और फेकुआ या सुमिरिनी से कहती बैठो और रात के रहस्य को समझने की कोशिश करो। रात जो चुप थी तो चुप थी, उसे कुछ नहीं बोलना था। बोलना बतियाना तो उन दोनों को था, कुछ मन की तो कुछ बेमन की। कुछ दिल की तो कुछ दिमाग की। रात का उपयोग उन्हें अपने मन और तन की जरूरत के हिसाब से करना था जिससे रात नाराज न हो जाए। रात का नाराज होना शुभ संकेत नहीं होता।
फेकुआ ने जेब से सुर्ती निकाला, उसे हथेली पर रख कर बनाना चाहा तभी अचानक रुक गया।
‘आज नाहीं बनाएगा सुर्ती। आज सुर्ती खाना ठीक नाहीं है।’
सुमिरिनी जाने क्या सोचे, गुने उसे अच्छा नहीं लगेगा। सुमिरिनी का मन-मिजाज जानकर ही वह सुर्ती खाएगा। अगर खाना हुआ तो चुपके से खा लेगा कहीं छिप कर। पर उसके सामने नहीं।
उसने सुर्ती तत्काल जेब में डाल लिया। उसने देखा कि सुमिरिनी जमीन पर गुड़़ुर-मुड़ुर हो कर बैठी हुई है। उसके दिमाग ने काम किया फिर तो उसने सुमिरिनी का एक हाथ थाम लिया...
‘ईहां काहे बइठी हैं हो! खटियवा पर बैठिए’
फेकुआ ने कहा ही नहीं बल्कि सुमिरिनी को हाथ पकड़ कर खटिया पर बैठा भी दिया। खटिया पर बैठ जाने के बाद भी सुमिरिनी किकुड़ियाई हुई थी किसी गठरी माफिक। फेकुआ का हाथ छुआते ही सुमिरिनी सिहर गई थी। अजीब तरह की गुदगुदाहट, देह न हिल रही थी न कांप रही थी पर मन कांप रहा था। पुरुष संपर्क का पहला अवसर। सुमिरिनी का अंचरा नीचे सरक गया था उसने उसे तत्काल ठीक किया फिर सामान्य हो गई पर सामान्य होना आसान नहीं था। गुदगुदियां उसे सामान्य नहीं होने दे रहीं थीं। उन दोनों में सामान्य औपचारिकता कुछ देर में ही समाप्त हो गई फिर वे दोनों नर और मादा में तब्दील हो गये। नर मादा के कौशलों में उनका डूबना था कि रात भी मुस्कराने लगी। रात के मुस्कराने में नर-नारी के दैहिक करतबों की कुदरती कलायें थीं जिसे सीखने व जानने के लिए कथित गुरू की जरूरत नहीं होती। बातें शुरू हुईं...रात उनकी बातें सुनने लगीं...
‘तोहके हम बिअहवै में देखि लिए थे, अउर मन किया कि....’
फेकआ आगे नहीं बोल पाया।
सुमिरिनी का बोलती फिर भी उसे बोलना था...
‘झूठ’
‘झूठ बोल रहे हैं, बिआहे में कैसे देख लिएआप?
बातचीत के सहारे दोनों एक दूसरे में खोने लगे, वे काफी देर तक एक दूसरे में विलीन होते रहे, विलीनता में एक दूसरे को खोजते रहे, वह खोज न तो मर्दानी थी न जनानी, केवल खोज भर थी। रात चढ़ती और गदराती गई, दोनों के तन ही नहीं सांसें भी एक दूसरे को तलाशने लगीं। पता ही नहीं चला कि रात भी होती है और उसके अनमोल करतब भी। रात को ढलना था, ढल गई। दिन के चिढ़ाते उजाले की डर से सुरुज देवता के उगने के पहले ही दोनों कमरे से बाहर निकल आये, दुनिया देख लेगी तो संकोच के दबावों को संभाले हुए।
फेकुआ दिन भर सुमिरिनी में डूबा हुआ था। रात में उसने क्या किया क्या नहीं इसी का हिसाब लगाता रहा। कभी सूरज की तरफ देखता तो कभी उसकी रौशनी की तरफ।
अजीब होता है यह दिन भी, लील जाता है रात की गुदगुदियों को, उसके एकांत को, उसकी सारी बतकहियों को अनसुना कर देता है। दिन को जानना चाहिए कि गरीबों के पास केवल रातें होती हैं, उसका एकांत होता है। फिर उसे क्यों लील जाते हो भाई! दिन में तो काम ही काम, हर काम में पसीना बहाना, जॉगर कूटना, गालियॉ सुनना और का होता है दिन में। दिन तो धरती पर उतरता ही है गालियॉ देने, मारने, पीटने के लिए इसके अलावा और क्या कर सकता है दिन। जब तक सुरुज बाबा अस्त नहीं हो जाते तब तक काम ही काम, काम है तो गालियॉ ही गालियॉ हैं। ये जो सुरुज बाबा हैं न अजीब तरह की हरकतें करते रहते हैं, कभी बदरियों में से झॉकने ताकने लगते है तो कभी माथे पर आकर खड़े हो जाते हैं तनेन। काम करो तो निगरानी, काम छोड़कर पर पेशाब करो तो निगरानी। मालिक गरियाने लगते हैं......‘साला जाने कितनी बार पेशाब करता है, जाने कितनी बार सुर्ती ठोंकता है’
आज भी जाने क्या हुआ सुरुज बाबा को कि जल्दी ही उतर आए धरती पर। एक दो घंटे और अपनी ऑखें बन्द रखते तो उनका क्या बिगड़ जाता। आप तो देवता हैं, देवता का कोई का बिगाड़ लेगा? आपको किससे डर है। पर नहीं आप भी मालिकों की तरह ही हम गरीबों के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं, भोरहरी हुई नहीं कि ऑखें खोल देते हैं। आप भी चाहते हैं कि गरीब आराम न कर पांए और लगातार पसीना बहाते रहंे।
अरे सुरुज बाबा! रातें गरीबों के जीवन में मुष्किल सेआती हैं, हसते गाते और गुदगुदाते हुए, उसे काहे छीन लेते हैं आप बाबा! कुछ तो रहम करिए आप मालिक न बनिए, छीनने का काम मालिकों को करने दीजिए, वे हम लोगों का सुख चैन छीनें या मारे पीटें, वे करें। आप तो देवता हैं सभी का भला चाहने और करने वाले, समावेशी मिजाज वाले।
फेकुआ कुछ भी सोचे रात की गुदगुदियों के बारे में, रात थी कि दिन के उजाले में विलीन हो चुकी थी। फेकुआ ने खुद को संभाला....कृ
चलो कुछ समय की ही तो बात है। रात आने वाली ही है, रात आएगी ही, फिर दिन के बारे में क्या सोचना। आज वह हलवाही करने नहीं जाएगा, दिन भर आराम करेगा। दिन है तो क्या केवल काम करने के लिए है, दिन चाहे जिस काम के लिए हो वह आराम करेगा तो आराम करेगा, पक्का है। काम पर नहीं जाएगा तो नहीं जाएगा।
'''‘वैसे कथांए गुलाम नहीं होतीं पर उसके पात्रा गुलाम हो
सकते हैं, आजादी की लड़ाई लड़ती कथाओं में भी अगर मगर हो तो’'''कृ
फेकुआ के बियाह की चर्चा सहपुरवा में ही नहीं पूरे पठ्ठ भर में थी। चर्चा इसलिए नहीं कि बियाह में कोई खास बात थी। चर्चा इस लिए हो रही थी कि फेकुआ के बियाह में औकात से बढ़ कर औतार ने खर्च किया था। किसी हरिजन के लड़के का बियाह बाभनों, ठाकुरों की तरह हो, उनके तरह का इन्तजाम हो विवाह में संस्कृत के श्लोक पढ़े जांएअचरज था, सो चर्चा थी।
चर्चा का कारण घरात वाला किया गया स्वागत सत्कार तथा औतार की तैयारी भी थी। घरात तथा बारात दोनोेें का इन्तजाम लगता ही नहीं था कि किसी हरिजन का है। सवर्णों की तरह का ही ताम झाम, नाच बाजा, धूम-धाम व फिजूलखर्ची। घरात वालों द्वारा लड़की की बिदाई में एक गाय, जो हाल की ब्याई हुई थी, सुतरी की बिनी हुई चारपाई, चार मन के आसपास चावल तथा कपड़ा लत्ता आदि दिया जाना उल्लेखनीय बन गया। गवन में साइकिल देने के लिए भी घरात वाले बोले हैं, वे गवन में देंगे भी, ऐसा नहीं है कि खाली बोल दिए हैं। खान-पान भी एक नम्बर का था। पान तो इतना चला कि बारातियों ने घरात का आंगन ही पान की पीच से रंग दिया। दसियों भर तो गांजा दिया होगा घरातियों ने और शराब की तो छूट ही थी चाहे जितना पियो। शुद्व महुआ वाली, घर की बनाई एकदम ऑख चढ़ाने वाली। औतार के समधी ने जी भर कर खर्च-वर्च किया था। उसका जोगाड़ भी ठीक क्या बहुत ठीक था। वह खेतिहर है अपने पैर पर खड़ा, खुद अपने बारे में फैसला लेने वाला, अपना काम करने वाला किसी दूसरे की मजूरी नहीं करता। एक हरिजन किसी की हलवाही न करे यह बड़ी बात थी।
अपने अपने ढंग से फेकुआ के बियाह की लोग व्याख्या कर रहे थे। रामभरोस की चौकड़ी भी अचरज में डूबी हुई थी।
‘का हो चौथी फेकुआ के बियाहे में केतना सामान दिया है हो घरात वाला? लगता है कि हरिजनों का राज आ गया है’ रामभरोस अचरजाए।
चौथी गवहां काहे चुप रहते।
‘हां सरकार! सही बोल रहे हैं, औतरवा का समघी धनी-मानी है सरकार। दूइ ठो हल चलता है उसका, ओकर आपन जमीन है, और पट्टे में भी जमीन मिल गई है उसे। गाय गोरू भी एक लेहड़ा (कम से कम 20 पशु) रखे हुए है। कोई बता रहा था कि बन्दूक के लाइसेन्स की दरखास भी दिया है।’
रामभरोस को कुछ भी अचरज नहीं हुआ वे मानते थे कि जमाना बदल रहा है और बदलेगा भी उन्होंने जोड़ा।कृउन्हें अचरज था औतार पर, उसने इतना इन्तजाम कैसे कर लिया, कहां से कर्जा फर्जा लिया हो?
अब तो हरिजनों का ही राज है। आगे का समय बहुत ही खतरनाक होने वाला है। जितने दिन चल रहा है, चल रहा है, अब हलवाह भी नाहीं मिलेंगे, सारा काम खुद करना होगा। आखिर हरिजन चाहे गरीब लोग अब हलवाही काहे करेंगे? ओनकर कर्जा माफ, बाल-बच्चों की फीस माफ, फोकट में राशन, रोज मजूरी बढ़ रही है, नौकरी में आरक्षण, नेतागीरी में सीट आरक्षित।
चुरुक फैक्टरी का खुली कि उनकी आंखें खुुलि गई हैं। अब तो जेहर देखो वोहर कारखाना ही कारखाना। डाला ओबरा, रेणकूट, शक्तिनगर सभी जगहों पर कारखाने ही कारखाने। मजूरे कारखानों की तरफ भागने लगे हैं। गॉव में मजूरी करने पर अब तो उन्हें लाज लगती है। कारखानों में मजूरी करना उन्हें अच्छा लगता है, वहां जांगर खटाने में उन्हें लाज नहीं लगती। वहां उन्हें कोई नहीं पहचानता, उनकी कोई जाति नहीं पूछता। वहां वे अपने काम से जाने जाते हैं जाति से नहीं। काम अच्छा होने पर तरक्की भी मिल जाती है। उन्हें अच्छा लगने लगा है प्लास्टिक के एक छोटे से तम्बू में रहना, किसी नाले से ला कर पानी पीना, दिन भर धूल धुंआं पीते रहना। उन्हें लगता है कि गॉव में उनकी अस्मिता छिन जाती है, इज्जत नहीं मिलती। कारखानों के काम पर उन्हें कोई अछूत नहीं मानता, गॉव में रहो तो यह छुआ गया वह छुआ गया यही होता रहता है दिन भर।
रामभरोस आगे क्या होने वाला था जानते थे या कहिए आने वाले समय का अनुमान उन्हें था। जानने को तो चौथी गवहां भी जानते हैं कि आज के जमाने में कोई अपना काम भी नहीं करना चाहता है, चाहता है कि हर काम के लिए मजूर हों और मजूर हैं कि वे भी जांगर खटाना नहीं चाहते। इस तरह आज के जमाने की लड़ाई यह नहीं है कि काम करने वाले नहीं हैं यह है कि कोई जांगर खटाना नहीं चाहता। सभी अपना काम जिसे उन्हें खुद करना चाहिए उसे भी मजूरों से करवाना चाहते हैं। अपना काम खुद करने से लजाने वाली संस्कृति आज भी जीवित है जो प्रस्तावित करती है कि अपना काम खुद करना शर्मनाक बीमारी है। इस शर्मनाक बीमारी से सहपुरवा के ही नहीं सभी क्षेत्रों के लोग जकड़े हुए थे।
चौथी गवहां तो जेठ दशहरा के बाद परेशान परेशान हो जाते हैं। किसको हलवाही पर रखना है, कौन हलवाही पर रहेगा इसका संकट खड़ा हो जाता है जेठ आते ही। जेठ दशहरा आते ही हलवाह काम करने से जबाब दे देते हैं और किसी दूसरे की हलवाही करने का सौदा कर लेते हैं। हालांकि यह सौदा अलिखित होता है पर होता है सौदा ही। उनका मन हुआ पुराने मालिक के यहां काम करने का तो उनके यहां करेंगे नहीं तो उनका काम छोड़ कर किसी दूसरे का काम थाम लेंगे। जेठ दशहरा हलवाहों के लिए पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी से बड़ा दिन होता है। उस दिन वे आजाद हो जाते हैं, हलवाही छोड़ने और पकड़ने के लिए। वह दिन उनके लिए बंधुआ श्रम से आजादी वाला होता है। बंधुआ श्रम से आजादी वाला यह रिवाज जाने कब से चल रहा है, चौथी गवहां नहीं जानते। शायद अंग्रेजों के जमाने से ही चल रहा हो।
जेठ दशहरा आते ही अपना काम करना जिन मालिकों के लिए शर्मनाक बीमारी की तरह होता है उनके माथे पर बल आ जाते हैं। उनकेे चेहरे मुर्झा जाते हैं, आग में झुलसने माफिक। अब का होगा, कैसे काम होगा?
जेठ दशहरा के बाद हलवाहों को बहकाने व तोड़ने वाली कूटनीति मालिकों में शुरू हो जाती है। कोई साड़ी ब्लाउज तथा कुछ नगद देने की बात हलवाहों व हलवाहिनों से करने लगता है तो कोई कोला बढ़ाने की बात करने लगता है। गॉव में जेठ दशहरा के समय एक अलग किस्म का बाजार खड़ा हो जाता है जिसमें वस्तुएं नहीं बिकतीं आदमी की स्वतंत्रताओं की बोली लगने लगती है। इस बाजार में हलवाह के रूप में आदमी की खरीद-बिक्री होने लगती है। मजूर कहीं न कहीं हलवाही करने के लिए विवश होता है, हलवाही नहीं करेगा तो खाएगा का? मजूर बेवश होता है जांगर खटाने के अलावा वह का करे। उसकी जरूरतें उसे इतना कमजोर बना चुकी होती हैं कि वह खुद बाजार में आ कर खड़ा हो जाता है और अपनी आजादी बेचने की बोली लगवाने लगता है। विकल्प भी तो नहीं हैं पेट की आग बुझाने के लिए। बिकने और खरीदने वाले तरीकों को ही तो हमारी सभ्यता ने खोजा है अब तक। दिमाग बेचो या जॉगर बेचो, दोनों के बाजार हैं। जेठ दशहरा के अवसर पर बाजार गॉवों में आकर खड़ा हो जाता है, यह एक ऐसा बाजार होता है जहां बिके आदमी जैसे माल पर सरकार का टैक्स भी नहीं लगता।
जेठ दशहरा के अवसर पर मालिकों की रातंे मजूरों की बस्ती में बीतने लगती हैं। उस दिन उन्हें बस्ती नहीं गंधाती, न ही मजूर गंधाते हैं लगता है मजूर देवता हैं (जो होते ही हैं)। सबसे अधिक बातचीत उस दिन हरिजनों की औरतों से ही होती है क्योंकि वे मुखर होती हैं, साफ साफ बोलती हैं। मर्द तो संकोच करते हैं, वे लजाते हैं, कुछ अपमान भी महसूसते हैं, अपना दाम क्या लगाना?कृजो मिल जाए वही ठीक। औरतों का खुलापन देखना हो तो जेठ दशहरा के अवसर पर किसी मजूर की बस्ती में चले जाइए फिर देखिए कि औरतें क्या होती हैं? नारी वादिनी भी माथा थाम लेंगी। गूंगी या वाचाल, अपना ख्याल खुद रखने वाली या दूसरों के सहारे पर अमरबेल की तरह टंगी हुई। यह अलग बात है कि कुछ औरतों को थोडे से सामान जैसे साड़ी, ब्लाउज, टिकुली, सेन्हुर आदि पर रिझाया जा सकता है पर वे जानती हैं कि उन्हें किस लिए रिझाया जा रहा है। सो वे जानकर रीझ भी जाती हैं पर मालिकों की तिकड़मों समझते हुए।
चौथी गवहां रामभरोस के दरवाजे पर मजूर पुराण वाचने नहीं गये थे वे तो औतार के पट्टा खारिजा के बारे में उनसे जानने गये थे पर करें क्या। कैसे पूछंे रामभरोस से....उनकी बखरी पर तो वैसे भी किसिम किसिम की बातें थीं जब वे खतम हों तब तो वे असल बात पर आंए... थोड़ा मौका मिला...रामभरोस का मन बदलने के लिए चौथी ने फकुआ की मेहरारू का प्रसंग उठा दिया।कृ‘मेहरारू का प्रसंग आते ही रामभरोस खिल उठेंगे।’ इसी बहाने औतार के बारे में भी बात हो जाएगी।
‘सरकार आप नाहीं जानते नऽ फेकुआ की मेहरारू गजब की सुघ्घर है। ओइसन मेहरारू बड़का लोगन के घरे में नाही हैं। हम आजै देखे हैं ओके। पंडित शोभनाथ का ओसारा लेवार रही थी।’
‘सरकार औतरवा के पट्टवा का का हुआ, खारिज हुआ कि नाहीं?’
चौथी गवहां ने रामभरोस से पूछा...कृ
रामभरोस ने स्वभावतन गंभीरता ओढ़ लिया और बढ़ चढ़ कर जबबियाए...कृ
‘हां चौथी! कल एस.डी.एम. साहब से बात हुई थी। उन्होंने बताया कि का बात कर रहे हैं रामभरोस जी! आपका काम है वह नहीं होगा, उसे तो करना ही है। हॉ लेखपाल व कानूनगो की रिपोर्ट सही लगवा दीजिएगा, ग्रामसभा का प्रस्ताव है ही। डिप्टी साहब के यहां दरखास भी पहुंच चुकी है। हां यार चौथी एक बात और कि हमारे गॉव में नसबन्दी का कैप लगना तय हो चुका है, तहसीलदार साहब बोल रहे थे ओ कैंप में कलक्टर साहब भी रहेंगे और का तो बोल रहे थे कि यहीं नाइटफालउ करेंगे।’
रामभरोस को का पता कि ‘नाइटफाल’ के क्या मायने होते हैं उनकी समझ में जैसा आया वैसा बोल रहे थे। ‘नाइटहाल्ट’ की जगह ‘नाइटफाल’ बोल गए। उन्हें बताया गया था कि रात में कलक्टर साहब सहपुरवा में ही नाइटहाल्ट करेंगे। चौथी ने भी ध्यान नहीं दिया कि रामभरोस का बोल रहे हैं, ध्यान देते भी तो वे नाइटहाल्ट तथा नाइटफाल के अन्तर को तो न समझ पाते।
‘किसी भी तरीके से औतरवा का पट्टा खारिज कराइए सरकार, ई काम सबसे जरूरी है।’
रामभरोस से बतियाकर उनकी बखरी से चौथी निकल लिए। रामभरोस ने स्वीकार में अपना सिर हिला दिया।
‘चलिए जरा उन ऑखों को देखा जाये
जिनमे स्वयंभू मुंसिफों के फैसले तैर रहे होते हैं’
पता नहीं का हुआ कि फेकुआ की बियाह के चार पांच दिन बाद ही सहपुरवा में पुलिस की गंध फैल गई। नाक भिनाने वाली। दारोगा जी की मोटर साइकिल सहपुरवा में गरज उठी। गरजते हुए सीधे हरिजन बस्ती में घुस गई। दारोगा ने औतार के घर का पता मालूम किया फिर वह वहां पहुंच गया। मोटर साइकिल की आवाज तो आवाज, उस समय वह हुकूमत की आवाज थी, आज्ञा एवं अनुशासन की आवाज थी, दमन व प्रताड़ना की आवाज थी। वह आवाज हरिजन बस्ती के लिए जानी पहचानी नहीं थी, जान पहचान तब हुई जब दारोगा औतार से मिला। औतार के दरवाजे पर हरिजन बस्ती उतरा गई। सब अवाक और अचरज में। हुआ क्या? दारोगा कोई ऐसा देहधारी नहीं जो प्यार मुहब्बत के लिए सहपुरवा की हरिजन बस्ती में आया था, प्यार मुहब्बत के लिए आना होता तो रामभरोस के दरवाजे पर जाता। हरिजन बस्ती में क्या है, सूखी हुई अतड़ियां और गुलाम दिमाग, वह भी बिका हुआ।
औतार घर पर ही थे, दारोगा की धमक के सामने थे, दारोगा के सामने गॉव की भीड़ खड़ा होकर अनहोनी पी रही थी, जाने का हो। तभी दारोगा ने भीड़ से पूछा..कृ ‘तुमलोगों में से औतार कौन है?’
‘हम हैं सरकार!’ औतार ने डरते हुए अपना नाम बताया
‘तूंने डिप्टी साहब के यहां दरखास दिया था का?’ दारोगा ने औतार से पूछाकृ
‘हं सरकार!’
‘तेरे लड़के फेकुआ के कोला का धान किसने लवाय लिया, साफ साफ बताओ’ दारोगा ने औतार को घुड़कते हुए पूछा....कृ
‘चौथी गवहां ने सरकार!’
’अपने लड़के फेकुआ और सुक्खूआ को बुलाओ, वे कहां है?
दारोगा ने आदेश दिया..
और फिर सुक्खू को बुलवाया गया क्योंकि सुक्खू का नाम भी दरखास पर था। सभी के आ जाने के बाद दारोगा ने एक एक आदमी का बयान लेना शुरू किया। औतार और फेकुआ को तो वही बोलना था जो हुआ था पर सुक्खू ने भी सच बोला और साफ साफ दारोगा को बताया कि चौथी गवहां ने फेकुआ के कोला का धान लवा लिया है। बयान नोट करने के दौरान ही दारोगा ने पूछा था वह खेत किसका था, किसने कोला दिया था? जिसका धान चौथी गवहां ने लवाय लिया। सभी ने बताया कि वह खेत चौथी गवहां का था जिसे चौथी गवहां ने काम करने के बदले कोला के रूप में फेकुआ को दिया था और फेकुआ ने ही उसे जोता और रोपा भी था।
चौथी गवहां का बयान लेने के लिए, दारोगा रामभरोस के घर की ओर मोटर साइकिल से रवाना हुआ। मोटर साइकिल की धक धक सहपुरवा में गूंज रही थी, उस धक धक में हरिजनों की कंपकपी घुलने लगी, उनके दिल धड़कने लगे। थोड़ी दूर चलने के बाद ही रामभरोस का खलिहान आ गया। रामभरोस के खलिहान पर दारोगा रुक गया। दारोगा जी भरे-पुरे थे, रामभरोस का खलिहान भी भरा-पुरा था। रुकते ही चौकीदार को आदेश दिया....
‘दौड़ कर जाओ! चौथी को यहीं पर बुला लाओ।’
अच्छा सरकार!’ चौकीदार ने कहा और दौड़ गया चौथी गवहां के घर की तरफ। आखिर हुकुम हुकुम होती है। चौकीदार जितनी तेजी से दौड़ रहा था उतनी ही तेजी से दारोगा का हुकुम भी उसके साथ दौड़ रहा था। वह दौड़ देखने लायक थी जिसमें आज्ञाकारिता और आज्ञा का रसायन मिला हुआ था।
थोड़ी देर में चौथी गवहां हाजिर हो गये। उन्होंने दारोगा को सलाम बजाया।
‘सरकार सलाम’
‘तेरा नाम चौथी है?’ दारोगा ने चौथी से पूछा
‘हं सरकार!’ चौथी ने स्वीकारा
चौथी गवहां जैसे ही दारोगा के पास आये वैसे ही रामभरोस भी वहीं चले आये। दारोगा ने शिष्टता दिखाया, उन्हें प्रणाम किया।
रामभरोस को देखते ही दारोगा के चेहरे से हरिजन बस्ती वाली दारोगाई गायब हो गई फिर वह एक सामान्य आदमी की तरह दिखने लगा जैसे उसके चेहरे पर प्रशासन की चमक ही न हो। वहां रामभरोस के रोब-दाब की चमक चिपक गई हो जैसे।
‘अरे नेता जी! आपने क्यों कष्ट किया? हम तो आपके यहां ही आ रहे थे। आपका कारिन्दा रामदयाल मिला था, शायद खेत में पानी चढ़ाने के लिए जा रहा था नहर की तरफ।’
रामभरोस ने दारोगा की हां में हां मिलाया....
बात को आगे बढ़ाते हुए दारोगा ने खुशामती अन्दाज में रामभरोस से पूछा...कृ
‘नेता जी! बी.डी.ओ. साहब बोल रहे थे कि नसबन्दी कैम्प के दिन माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी सहपुरवा आ रहे है, आपके ही गॉव मेें, का यह सच है नेता जी’
‘मैं तो नहीं जानता दारोगा जी, लखनऊ जाना है, वहीं से मालूम होगा। वैसे एक बार मंत्राी जी हमारे यहां आना चाहते हैं।
अरे आप इतनी सुबह हमारे गॉव में किस लिए आये हैं, खलिहान मेें काहे बैठे हैं, चलिए बखरी पर चला जाये।’
दारोगा जी के साथ वहां उपस्थित सभी लोग रामभरोस की बखरी पर आ गये। रामभरोस की बखरी पर सजाई हुई लकड़़ी की कुर्सी पर दारोगा बैठ गया। अन्य लोगों को बैठने के लिए दरी बिछा दी गई। यह पहला अवसर था जब बखरी पर हरिजनों को दरी पर बैठेने का मौका मिला था। जनता से मुहब्बताना संबध दिखाने में दारोगा जी के सामने रामभरोस भला कैसे चूकते।
‘का बात है हो दारोगा जी’
‘कुछ भी नहीं नेता जी, आपके गॉव के चौथी पर औतारवा ने दरखास दिया है, शायद उसका कोला चौथिया ने जबरदस्ती कटवा लिया है।’
‘आप तो जानते ही हैं कि ‘सेड्यूल कास्ट्स यार आन फर्स्ट प्रायरिटी’ इसी लिए आना पड़ा। अंग्रेजी न समझते हुए भी रामभरोस ने उसे समझने का अभिनय किया जैसे समझ गए हों कि अनुसूचित जाति प्राथमिकताओं में हैं।
‘कैसी दरखास? जरा हमहूं देखें’
रामभरोस गंभीर हो गये। दारोगा ने रामभरोस को दरखास दे दिया। हालांकि रामभरोस को सारी जानकारी थी और उन्हीं के कहने पर चौथी गवहां ने फेकुआ का कोला भी लवाया था। रामभरोस फिर भी अनजान बने हुए थे। रामभरोस ने बहुत ही नाटकीय ढंग से औतार से पूछा....कृ
‘का हो औतार! फेकुआ का कोला कब लवा लिया चौथी ने? इतनी बड़ी बात हो गई और तूं हमें बताए भी नाहीं, बताए होते तो उसे हम यही हल करा देते सब कुछ। राम, राम दारोगा जी को काहे तकलीफ दिए, गॉव की बात गॉव में हल होनी चाहिए, क्यों दारोगा जी?
रामभरोस की बखरी पर गॉव के कई अन्य हरिजन भी हाजिर थे, उनमें एक रामचेल भी था जो हरिजनों का नेता था बोलने बतियाने में माहिर था। रामभरोस ने उससे पूछा....कृ
‘का हो रामचेल! का गुन रहे हो, फेकुआ का कोला चौथिया लवाय लिया है तो उसका धान वापस करे, कितना हुआ होगा फेकुआ के कोला में धान, कुछ अन्दाज लगाओ रामचेल?
‘कितना हुआ होगा धान सरकार! करीब पॉच मन (कच्चा मन) हुआ होगा सरकार’
‘ठीक है हो, ओतना धान हम दिलाय दे रहे हैं औतार को ’
रामभरोस ने तुरंत अपने कारिन्दा रामदयाल को बुलाया और आदेश दियाकृ. ’औतार के घरे पॉच मन धान पहंुचवाय दो’,
दारोगा ने टोका....कृ
‘नेता जी आप धान काहे दे रहे हैं, धान तो लवाया है चउथिया ने, ऊ साला देगा, नाहीं तऽ हम ओकरे गांड़ी में से उतना धान निकाल लेंगे।’ रामभरोस तो रामभरोस थे, वे दारोगा के पहले ही चौथी पर गरम हो गये। वे सामंती नाटक के जानकार थे, उसी के अनुसार अभिनय भी कर लिया करते थे।कृकृ
‘ऐसा काहे किए चौथी? फेकुआ का कोला काहे लवाय लिए? हमसे भी नाहीं बताए, भला ईमरजेन्सी के समय में ऐसा किया जाता है, जानते नाहीं प्रशासन ऐसे मामलों में बहुत सख्त होता है। चलो कोई बात नाहीं है, दारेागा जी हमारे बहुत खास हैं। पर अब ऐसा कभी मत करना, बूझे कि नाहीं।’
रामभरोस ने किसी कलाकार की तरह उस घटना को अपनी ओर मोड़ लिया। खुद मुंसिफ बन गए और मुल्जिम भी। मुल्जिम इसलिए कि चौथी ने फेकुआ का कोला उनके कहने पर ही लवाया था और मुंसिफ इस लिए कि फैसला सुनाकर उसका क्रियान्वयन भी करा दिए। रामभरोस का यह फैसला दुधारी तलवार की तरह था। औतार को अपनी औकात का पता चल गया कि दरखास देने से कुछ नहीं होने वाला और चौथी को भी मालूम हो गया कि रामभरोस हैं क्या चीज? खुद झगड़ा कराते हैं और मुंसिफ बन कर फैसला भी करते हैं। किसे पड़ी है कि देखे औतार की ऑखों को जिनमे स्वयंभू मुंसिफों के फैसले तैर रहे होते हैं’।
रुपया पैसा तो चौथी के पास भी है पर उससे का होता है, रुपया होने से ही कोई बड़ा नहीं हो जाता, बड़े हैं रामभरोस। जमीनदारी वाले सामंत हैं वे खुद झगड़ा लगवाते हैं और खुद ही उसका फैसला भी करते हैं। दारोगा सहपुरवा में अपना रूआब दिखाने आया था। उसे पता था कि अब पुराने जमाने वाले सामंत खतम हो चुके हैं। आज के समय का वही सरकारी सामंत है पर उसकी सामंती रामभरोस के रहते भला कैसे चलती? फेकुआ का कोला तो चौथी ने रामभरोस के कहने पर ही कटवाया था। दारोगा इस सच को जान पाता कि उसके पहले ही रामभरोस ने पंचायत कर दिया। तो ऐसे की जाती है सामंती जिसे रामभरोस ने किया था। सहपुरवा से जब दारोगा लौटा तब उसके हाथ में रामभरोस की जनप्रियता और रोब-दाब था। उसे ही नोट मानना था दारोगा को।
‘आज का दिन बेकार गया साला कुछ मिला नहीं, रामभरोसवा ने खुद पंचायत कर दिया’। रामभरोस को गरियाते हुए दारोगा सहपुरवा से थाने लौट गया। सहपुरवा से लौटते समय उसका हाथ खाली था और दिमाग भी।
'''‘जनता तो वाह वाह करना ही जानती है उससे
क्या मतलब कि कार्ययोजानांए क्या हैं और नारे क्या गढ़े गए थे?'''
फेकुआ का कोला लवा लेना अपराधिक मामला था। ऐसे अपराधिक मामले को भी जिस नाटकीयता से रामभरोस ने गॉव की आपसी पंचायत बना दिया, अद्भुत था, जैसे कुछ हुआ ही न हो। ऐसा तो गॉवों में होता रहता है, ऐसे मामलों में थाने की क्या भूमिका? किसी भी संगीन घटना को सामान्य घटना बना देने में रामभरोस को महारथ हासिल थी। समय को अपने अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है कोई रामभरोस से सीखे। उन्होंने फेकुआ के कोला का धान औतार को लौटा कर चौथी गवहां को मुकदमे के लफड़े से बचा लिया। ऐसा करके रामभरोस ने चौथी गवहां का दिल भी जीत लिया। चौथी गवहां मानसिक रूप से रामभरोस के मानसिक गुलाम बन गए। उन्हें उनका गुलाम बनना ही था, उनकी हैसियत ही क्या थी। उन्हें पता है कि रुपया पैसा हो जाने से ही थाना थूनी से नहीं पार पाया जा सकता, उससे पार पाने केे लिए राजनीतिक ताकत भी चाहिए होती है जो उनके पास कभी थी ही नहीं और न है। वैसी ताकत के मालिक तो रामभरोस ही हैं सहपुरवा में।
पूरा विजयगढ़ जानता है कि गोटी बिछाने में रामभरोस का मुकाबिला नहीं है। इस मामले में वे आज भी बेजोड़ हैं, भले ही अंग्रेजों वाला जमाना नहीं है पर कानूनी व राजनतिक परंपरांए वही चल रही हैं एक तीर से दो निशाने वाली, कानून में भी तथा राजनीति में भी हर जगह एक तीर से दो निशाने लगाये जा रहे हैं। हुआ वही। चौथी गवहां को झटका मिलना चाहिए था कि रामभरोस बनना आसान नहीं है। रामभरोस ने तो पहले ही ताड़ लिया था कि चौथी गवहां, फेकुआ और औतार दोनों से नाराज हैं सो उन्होंने चौथी गवहां की समझ का लोहा गरम कर दिया था कि फेकुआ को कोला लवाय लो, सालों को तंग करो। रामभरोस का सुझाव चौथी को अच्छा लगा, गुस्सा उतारने के लिए फेकुआ का कोला लवाना ही ठीक होगा। फिर क्या था चौथी ने कोला लवाय लिया। रामभरोस के लिए यह था कि चौथी धीरे धीरे संपन्न होता जा रहा है उसे थोड़ा ही सही झटका मिलना चाहिए। झटका तभी मिलेगा जब किसी मुकदमें में फसेगा। फेकुआ के मामले में फसकर चौथी को झटका मिला भी। दारोगा को देखते ही चौथी पसीना पसीना हो गये थे, सुलह हो जाने के बाद ही वे सामान्य हो पाये थे।
औतार की पट्टे वाली जमीन का पट्टा खारिज कराने के लिए रामभरोस प्रयासरत थे। परगनाधिकारी के पास दरखास पड़ चुकी थी। उस पर रामबली लेखपाल की रिपोर्ट नहीं लग पाई थी, वह छुट्टी पर था। उसने छुट्टी बढ़ा ली थी और अपना ट्रांसफर भी करवा लिया था। नए लेखपाल ने चार्ज ले लिया था, दरखास पर उसे ही रिपोर्ट लगानी थी। उससे रामभरोस ने बात कर लिया था तथा वह राजी भी था। नया लेखपाल कुछ दबंग किस्म का आदमी था तथा कायदे कानून को अपनी जेब में रख कर चला करता था। ऐसे लोग रामभरोस के लिए अति प्रिय हुआ करते थे सो वह चारज लेते ही रामभरोस का प्रिय बन गया। उसने फटाका रिपोर्ट लगा दिया कि औतार के पट्टे वाली जमीन सार्वजनिक उपयोग की भूमि है तथा उक्त पट्टा सार्वजनिक हित में खारिज किया जाना आवश्यक है, जिससे गॉवसभा की अपूर्णनीय क्षति न हो। उसने रिपोर्ट लगाने में अपने दिमाग का कत्तई प्रयोग नहीं किया। गॉवसभा के प्रस्ताव में जो तथा जैसा लिखा था वैसी ही रिपोर्ट भी लगा दिया। लेखपाल की रिपोर्ट कम से कम गॉवों के मामलों में किसी माननीय राज्यपाल की रिपोर्ट से कम अहमियत नहीं रखती। गॉवों में कहा भी जाता है कि दो ही लोग तो होते हैं दुनिया में जिनके कलम में ताकत होती है, राजधानी में राज्यपाल और हल्के में लेखपाल। बीच की दुनिया तो ढोर डांगरों की होती है।
लेखपाल की रिपोर्ट लग जाने के बाद कानूनगो तथा तहसीलदार ने भी रिपोर्ट लगा दिया हालांकि तहसीलदार से रिपोर्ट लगवाने में रामभरोस को पसीना पसीना होना पड़ा। दरअसल वह कायदा कानून वाला आदमी था और जिधर से चलता था उधर की जमीन पर फूंक फूंक कर पैर रखता था पर उसके सामने दिक्कत थी कि उसका पाला रामभरोस जैसे घाघ से पड़ा था। रामभरोस ने भी उसे समझा दिया था कि कायदा कानून से मतलब तब होगा जब तुम जिले में रहोगे, तुम ऐसी जगह फेंक दिए जाओगे जहां कायदा कानून चलाने के लिए मौके ही नहीं मिलेंगे, बेकार में हाथ मलते रह जाओगे।
पट्टा खारिज कराने के बाबत रामभरोस की योजना पक्की थी। वे आश्वस्त थे कि उसे तो खारिज करा ही लेना है पर वे समय की प्रतिक्षा में थे। समय भी उनके आस पास ही किसी दोस्त की तरह खड़ा था। वह आ चुका था उनकी सहायता करने के लिए और वह समय था स्वास्थ्य मंत्राी जी के सहपुरवा में आने वाले दिन का। उस दिन ही पट्टा खारिजा वाले काम के बारे में परगनाधिकारी से कहना ठीक होगा। उस दिन तो जिले के आला अधिकारी उनके गॉव में उपस्थित रहेंगे ही।
रामभरोस जानते थे कि उनके सहयोग के बिना सौ आदमियों की नसबन्दी कराई ही नहीं जा सकती सो हर हालत में अधिकारी उनके दबाव में रहेंगे। नसबन्दी कैंप से रामभरोस को तो फायदा ही फायदा था। खर्चा सरकार का और नाम उनका। सो नसबन्दी कैंप की सफलता के लिए वे जी जान से सक्रिय हो गये थे।
वह दिन भी दूर नहीं रह गया जब सहपुरवा में नसबन्दी कैंप की तैयारी शुरू हो गयी। रोगियों के आपरेशन के लिए पांडाल की व्यवस्था होने लगी। काम चलाऊ अस्पताल के लिए पांडाल के घेरे वाला ही एक अलग कक्ष बनाया जाने लगा। युवक मंगल दल के कार्यकर्ताओं को भी इस काम में लगा दिया गया। अस्पताल के अलावा राजस्व कर्मचारियों में लेखपाल एवं नायब तहसीलदार को तो स्थाई रूप से व्यवस्था देखने व करने के लिए सहपुरवा में बिठा दिया गया। परगनाधिकारी की जीप अल्लसुबह ही सहपुरवा चली आती जो देर रात तक वापस होती। एक दिन तो उसका प्रबंध देखने के लिए माननीय जिलाधिकारी भी सहपुरवा में आ धमके। उन्हें पता था कि सहपुरवा में आने वाला मंत्राी केवल मंत्राी ही नहीं है, वह मुख्यमंत्राी का खासम खास भी है। वही दाहिना हाथ है मुख्य मंत्राी जी का। लखनऊ में उसकी बहुत ताकत है। वह अकेले नहीं चलता, पूरी सरकार अपनी जेब में रख कर चलता है। वह प्रधानमंत्राी जी का भी खासमखास है, दोनों जगहों पर कांग्रेस की ही सरकार है।
सभी जानते है ंकि दूसरे कार्यकर्ताओं का इस आयोजन से भले ही लाभ न हो पर रामभरोस का लाभ नहीं होगा ऐसा हो ही नहीं सकता। रामभरोस किसी न किसी तरह से इस कार्यक्रम के द्वारा भी अपना लाभ हासिल कर ही लेंगे। एक लाभ तो यही दिख रहा था कि औतार का पट्टा खरिज हो जाएगा अन्य लाभों के बारे में कुछ विशेष अनुमान नहीं था। रामभरोस को वैसे नसबन्दी वाले कार्यक्रम से नाम तथा यश सारा कुछ तो मिलने वाला ही था।
स्वतंत्राता संग्राम के दौरान भी रामभरोस अधिकारियों की ऑखों की पुतली बने हुए थे। अधिकारियों के जायज नाजायज हर काम में बढ़ चढ़ कर सहयोग दिया करते थे काम चाहे जैसा भी हो। जाने कितने सत्याग्रहियों व स्वतंत्राता संग्राम आन्दोलनकारी नेताओं को उस जमाने में रामभरोस ने पुलिस द्वारा पकड़वाया था जिसके लिए उन्हें इनाम भी मिला था। एक तरह से रामभरोस और अधिकारी दोनोें एक ही नस्ल का नाम है। अन्तर केवल इतना ही है कि अधिकारी वेतनभोगी होता है, प्रतियोगी परीक्षा पास किया होता है और रामभरोस जैसे लोग वेतनभोगी नहीं होते, सुविधाभोगी होते हैं, परीक्षा वाली प्रतियोगिता नहीं पास करते, जनलोकप्रियता की परीक्षा पास करते हैं। इसीलिए ऐसे लोग सरकार की हर योजना का लाभ लेने में माहिर होते हैं। सरकार तथा उससे जुड़े अधिकारियों से मधुर रिश्ता बनाने में रामभरोस कभी भी कमजोर नहीं थे। अंग्रेजों के जमाने में भी सरकार और अधिकारियों में उनका दखल था और आज भी है। रामभरोस का एक रूप दूसरा भी है जो जनता तथा क्षेत्रा के विकास के बाबत है। पहले भी रामभरोस ने तमाम ऐसे काम क्षेत्रा में करवाए हैं जिससे क्षेत्रा का लाभ हुआ है और आजादी के बाद भी उनके द्वारा करवाए गये तमाम काम बतौर उदाहरण हैं। यह सच है कि क्षेत्रा के विकास के लिए रामभरोस ने बहुत कुछ किया है और अपने हित के लिए भी, उससे कम नहीं किया है यानि दोनों हित एक दूसरे से गुंथे हुए हैं। यह मंत्रा उन्हें पता था कि क्षेत्रा का हित होगा तो उनका भी हित होगा। सो वे क्षेत्रा के हित के बहाने अपना भी हित साध लिया करते थे।
नसबन्दी कैंप की व्यवस्था हो रही थी। प्रचार भी किया गया था कि नसबंदी कराने वालों को जमीन आवंटित की जाएगी तथा प्रचार यह भी था कि जिन लोगों को पहले जमीन आवंटित की जा चुकी है अगर उन लोगों ने नसबन्दी का आपरेशन नहीं कराया तो उनके भूमि के आवंटन खारिज कर दिए जांएगे।
जिले में कोई ऐसा विभाग नहीं था जिनके लिए प्रशासन की ओर से निर्देश न जारी किए गये हों। लेखपाल, प्राइमरी स्कूलों के अध्यापक, अमीन, पंचायत सेवक, ग्राम सेवक जैसे तमाम ग्राम स्तर के कर्मचारियों को साफ निर्देश जारी किए गए थे कि वे अपने अपने कोटे की नसबन्दी कराएं अन्यथा उन्हें सस्पेन्ड कर दिया जाएगा। सिर्फ यही बात गोपनीय थी जिसे सारे कर्मचारी बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि यह जो आदेश के पीछे छिपा हुआ तथ्य है उसका मतलब है सस्पेन्डगी? सो सभी कर्मचारी सतर्क और सावधान थे कि उन्हें किसी प्रकार की कोताही नहीं बरतनी है, नहीं तो उन्हें सस्पेन्ड कर दिया जाएगा। नौकरी चली जाएगी। फिर क्या खांएगे?
सारे कर्मचारी नसबन्दी कराने के निहित लक्ष्यों के प्रति सतर्क थे पर लक्ष्य बड़ा था जिसे पूरा कराना आसान नहीं था। दस दस आदमियों या औरतों की नसबन्दी कराना यह आसान काम न था। वे जानते थे कि रापटगंज के देहाती समाज में बच्चों के जन्म के प्रति दैवीय अवधाराणाओं की भूमिका बहुत अधिक है। लोग बच्चों के जन्म को भगवान का दिया हुआ उपहार मानते हैं, सो नसबन्दी कराना उनके लिए भगवान को नकारने जैसा होगा, भगवान का अपमान करना होगा फलस्वरूप देहात के रहने वाले लोगों में नसबन्दी के प्रति आकर्षण नहीं था। नसबन्दी कराना वे पाप समझते थे। आकर्षण तभी हो सकता था जब उन्हें विशेष प्रलोभन दिया जाता, वैसा किया भी गया। जमीन देने की बात एक तरह से प्रलोभन ही थी और जमीन छीनने की बात भी प्रलोभन से ही जुड़ी हुई थी। कर्मचारी जानते थे कि नसबन्दी का केस न देने पर उनका स्थानांतरण ही नहीं उन्हें सस्पेन्ड भी किया जा सकता है। सरकारी स्तर से किए जाने वाले प्रयास हर तरीके से किये जा रहे थे। उस प्रयास में उचित अनुचित का भेद नहीं रह गया था। केवल यह था कि निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप नसबन्दी कराना है, फलस्वरूप गॉवों में आतंक जैसा माहौल उपस्थित हो गया था, सभी आतंकित थे। वे भी जिन्हें जमीन मिलनी थी तथा वे भी जिन्हें जमीन मिल चुकी थी। इतना ही नहीं आतंकित तो वे लोग भी थे जिनके अपने लोग सरकारी नौकरी में थे तथा छोटे छोटे पदों पर थे।
नसबन्दी के तारगेट ने एक और काम किया कि उसमें से उम्र का मानक अपने आप समाप्त जैसा मान लिया गया और ऐसे लोगों की नसबन्दी को भी शामिल कर लिया गया जिनसे बच्चे जनमने की दूर दूर तक की भी संभावना नहीं थी। आखिर कर्मचारी करते क्या, उन्हें तो लक्ष्य का कागजी कोटा पूरा करना ही था। नसबन्दी करने वाले डाक्टर भी जानते थे कि बूढ़ों की नसबन्दियां गलत कराई जा रही हैं पर वे क्या करते, उन्हें भी तो अपना कोटा पूरा करना था।
‘बखरियों के अन्तःपुरों की लीलाओं को
हूबहू कथाओं में उकेरना...अरे ना भाई ना संभव नहीं’
विद्यालय बन्द हो जाने पर विभूति बनारस से घर आ चुका था। वह भी हमउम्र लड़कों के साथ युवक मंगल दल के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगा था। गॉव के सभी लड़के जिनकी उम्र पन्द्रह साल से ऊपर तथा पचीस साल से कम थी सभी युवक मंगल दल के सदस्य बन चुके थे। प्रसन्नकुमार ने ही गॉव में युवक मंगल दल का गठन किया था। वह शोभनाथ पंडित का लड़का था। सहपुरवा गॉव का युवक मंगल दल अन्य गॉवों के युवक मंगल दलों से कई मामलों में भिन्न था। प्रसन्नकुमार हालांकि पढ़ने लिखने में तेज नहीं था पर खेल कूद, बातचीत और अन्य व्यवहारों में काफी निपुण था। अन्तर्विद्यालयी खेल-कूद प्रतियागिताओं में उसे कई बार पुरस्कृत भी किया जा चुका था। एक बार तो जनपद मीरजापुर के सर्वोत्तम खिलाड़ी का पुरस्कार भी उसे मिल चुका था। प्रसन्नकुमार और विभूति में दोस्ती थी जबकि उनके पिताओं में किसी भी तरह का व्यावहारिक रिश्ता नहीं था। वे एक दूसरे के घोर विरोधी थे, एक दूसरे को देखना तक उन्हें पसंद नहीं था। गॉव आने पर विभूति का अधिकांश समय प्रसन्नकुमार के साथ ही बीतता था। दोनों साथ साथ रहते थे तथा युवक मंगल दल के कार्यक्रमों में भाग लेते रहते थेे, कार्यक्रमों का संचालित करवाया करते थे।
जब से युवक मंगल दल से प्रसन्नकुमार जुड़ा है तब से लेकर अब तक एक भी कार्यक्रम में रामभरोस शामिल नहीं हुए नहीं तो पहले वे ही खेल कूद का समापन तथा मिष्ठान्न वितरण आदि किया करते थे। प्रसन्न्कुमार की मंगल दल में सक्रियता रामभरोस को फूटी ऑख से भी न सुहाती थी।
प्रसन्नकुमार भी थोड़ा ऐंठ कर चलने वाला था। पिछले साल के पन्द्रह अगस्त के कार्यक्रम में भी इसीलिए रामभरोस को नहीं बुलाया गया था वैसे भी प्रसन्नकुमार उन्हंे नहीं बुलवाता। प्रसन्नकुमार को लगता कि रामभरोस गॉव के हित में कार्य नहीं कर रहेे हैं। उसी साल प्रसन्नकुमार रामभरोस से लड़ गया था और जिद्द पर अड़ गया था कि गॉव के पोखरे से वे अपना पंपिग सेट हटालें तथा पोखरे से पानी निकालना बन्द कर दें। उसका कहना था कि आज तो हर कूंए में पानी है पर गर्मी आते ही सारे कूंए सूख जांएगे। पोखरे में पानी रहेगा तभी कूंआ नहीं सूखेंगे। वैसा ही हुआ जैसा प्रसन्नकुमार चाहता था। रामभरोस को पोखरे के भीटे से पम्पिंग सेट हटवाना पड़ा। राभरोस की कुछ आदतें प्रसन्नकुमार को अच्छी नहीं लगतीं थीं जैसे उनकी बखरी पर जाओ तो दरी या टाट पर बैठो, यह करो वह न करो। उनके बारे में वह अपनी मां से बहुत कुछ सुन चुका है सो वह उनसे दूरी बना कर चलना ठीक समझता है और चलता भी है।
रामभरोस ने विभूति को कई बार रोका था और सहेजा था कि वह प्रसन्नकुमार के साथ न रहा करे पर विभूति मानने वाला नहीं था। वह जब भी गॉव पर होता प्रसन्नकुमार के साथ ही रहता। विभूति को एक बार रामभरोस ने समझाया भी था.कृकृ’विभूति सोच समझकर काम किया करो, अब तूं दुधमुहें नहीं हो, गॉव में किसके यहां जाना है, किसके यहां उठना बैठना है, इसे समझा करो। तुमको पता होना चाहिए कि हमरे बखरी से गॉव में किसी के यहां कोई नहीं आता जाता। जिसको मिलना होता है वह हमरे पास आता है बखरी पर।’
रामभरोस विभूति को समझा रहे थे और वह गूंगा तथा बहरा बना हुआ था। वह जान बूझ कर रामभरोस की बातें नहीं सुनना चाह रहा था। रामभरोस ने ताड़ लिया फिर तो डाटने लगे विभूति को....कृ
‘हम तोके बताय दे रहे है गॉव में कहीं गए तो ठीक नाहीं होगा। गॉव के लफंगों के साथ रहने में तुझे का मिलता है? घूमने का मन हो तो रापटगंज चले जाओ, वहां जाकर साहब, सूबों से मिला करो। कभी कभी शिकार खेलने के लिए निकल जाया करो। यह जो युवकमंगल दल है, ई कौन दल है यार? बड़े आदमियों के साथ संपर्क जोड़ो, चुनाव लड़कर एम.एल.ए., एम.पी. बनो ई सब का कर रहे हो।’
न चाहते हुए भी रामभरोस की सारी बातें विभूति को सुननी पड़तीं यद्यपि उन बातों का असर विभूति पर कुछ भी नहीं पड़ता। विभूति वैसे भी फक्कड़ और मस्त मौला था पता नहीं कैसे सभी लोगों में वह अपने काम लायक चीजें खोज लिया करता था। उसने प्रसन्नकुमार में अपना मित्रा ढूॅढ लिया था। प्रसन्नकुमार और विभूति दोनों बचपन के दोस्त हैं तथा दोनों बाल सुलभ कामों के एक दूसरे के साक्षी और भोक्ता भी हैं। सो दोनों एक दूसरे से कैसे अलग हो जाते? रामभरोस माथा पीटें या और कुछ करें। दोनों को अच्छे बुरे की पहचान थी तथा दोनों उन साजिशों से अलग थे जो आदमी और आदमी के बीच दूरियॉ पैदा करती हैं।
विभूति का मन तो पढ़ाई में भी नहीं था पर रामभरोस की डर से वह बनारस पढ़ रहा था। वह जानता था अपनी प्रतिभा के बारे में। उसे सरकारी नौकरी मिलेगी नहीं और मिल भी जाए तो उसे करना ही नहीं है। वह यह भी जानता था कि अगर पढ़ाई नहीं करेगा तो उसके लिए संकट हो जाएगा कायदे की जगह पर उसका बियाह नहीं हो सकेगा। उसे मालूम था कि अच्छे घर में उसका बियाह हो जाए इसीलिए उसके पिता उसे पढ़ा रहे हैं। शहर में रौशनी थी, खूबसूरती थी, चमक थी तथा खुली दुनिया थी उसे वह दुनिया पसंद थी पर उसे पढ़ाई कत्तई पसंद नहीं थी।
विभूति के लिए प्रसन्नकुमार अपने सगे भाई से बढ़कर था। वह उसमें अपना दोस्त ही नहीं अपना भाई भी देखता था। वह जानता था कि प्रसन्नकुमार अपने लिए कुछ नहीं करता, वह पहले गॉव देखता है और गॉव का काम देखता है इसी लिए वह प्रसन्न कुमार के साथ रहता भी है। उसने देखा है कि प्रसन्नकुमार की ऑखों में सहपुरवा तैरता रहता है, कोई चाहे तो देख ले उसकी ऑखों में सहपुरवा को तैरते हुए। हालत यह है कि गॉव में रहते हुए दोनों एक दूसरे को न देखें या न मिलें तो उनका खाना नहीं पचता है। रामभरोस के समझाने बुझाने का असर विभूति पर नहीं पड़ा। पड़ता भी काहे, प्रसन्नकुमार तो रामभरोस की सोच का प्रतिलोम था, एकदम विरोधी। विभूति की चाहना थी कि गॉव के सभी लोग एक दूसरे को प्यार करें, सभी एक दूसरे की भलाई करें पर रामभरोस तो गॉव के लोगों को आपस में हरदम लड़ाया करते थे, वे गॉव के आपसी भाई-चारे को भी नष्ट करते रहते हैं। वे स्वभावतन विभूति की सोच के विरोधी थे। सो विभूति उनसे दूरी बना कर चलता था।
सहपुरवा में ऐसे लोग कम नहीं थे जो रात को दिन की तरह बनाना चाहते थे। उन लोगों की नजर फेकुआ की मेहरारू पर थी तथा उनकी भी जिनकी आंखों में रंगीन बदरियां नाचा करती थीं। गॉव के ऐसे लोग अपनी अपनी नजर से फेकुआ की मेहरारू को देख रहे थे। कुछ ही समझदार लोग थे जिनके लिए वह बहू, बिटिया या पतोहू थी। गॉव में जिन्हें मनचला होने का गौरव था वे तो फेकुआ की मेहरारू को खड़े खड़ लील जाना चाहते थे। उन मनचलों में रामदयाल भी थे जो रामभरोस के कारिंदा थे। वे रामभरोस के लिए गॉव में या गॉव के बाहर तितलियों को फसाया करते थे। एक दिन रामदयाल ने सुमिरिनी के बारे में रामभरोस को बताया था..कृ
‘सरकार फेकुआ के मेहरारू को आपने देखा है कि नाहीं, बहुत जानमारू है सरकार!’
उखड़ गए रामभरोस रामदयाल पर....कृ
‘हमसे ई का बता रहे हो, का हम गॉव में जा कर फेकुआ की मेहरारू देखें, इहै काम रह गया है हमारा गॉव की गली गली घूमना। लाज शर्म धोकर पी गए हो का? तूं काहे के लिए है हरामजादा, हरामी का माल खाने के लिए ही का?’
रामभरोस ने रामदयाल को फटकारा। रामदयाल को रामभरोस की फटकार मिलती ही क्योेंकि रामदयाल ही तो तितलियों को फसाने का विशेषज्ञ था। वह जरूरत पड़ने पर राभरोस के लिए औरतों का इन्तजाम किया करता था। रामभरोस थे तो बहुत कुछ, बहुत कुछ अमानवीय जैसा करने में माहिर भी थे पर मजनू नहीं थे जो सुमिरिनी के ेइश्क में फस जाते। वे गली गली घूमने व पनघट पर बैठ कर मुहब्ब्त का गाना गाने वालों में भी नहीं थे। वे माशूका को निहारने के लिए खिड़कियॉ खोलकर रखने वालों में भी नहीं थे। वे रामभरोस थे, उनका औरतों से नाता-रिश्ता भी रामभरोनुमा था। रामभरोस औरतों का उपयोग करते, उनका उपयोग केवल बिस्तरे पर पसर पाता उससे बाहर निकलने पर हथकड़ी लग जाती। रामभरोस जब ऊब जाते तब औरत या लड़की उनको कूड़ा की तरह दिखने लगती फिर वे उसे कहीं फेंकवा देते। वे अपनी पीठ पर रीतिकाल की कविता लाद कर चलने वालों में नहीं थे। वे आधुनिक थे यूज एण्ड थ्रो वाले। वे अपने इस आचरण का साबित भी करते कि
‘औरतें तो होती ही हैं बिस्तरों पर लेटाने, सहलाने, गुदगुदाने के लिए’ भले ही उनके विमर्श पर लोग थूंके पर रामभरोस तो चूमते थे अपने विमर्श को।
रामभरोस ने वैसे कभी भी सुमिरिनी को देखा नहीं था फिर भी मान कर चल रहे थे कि लोग झूठ नहीं बता रहे सुमिरिनी के बारे में। उनकी भोगलिप्सा सुमिरिनी के प्रति बढ़ती जा रही थी। उन्हें लगने लगा था कि बासी होने के पहले ही उन्हें सुमिरिनी हासिल हो जानी चाहिए। बियाह के बाद कुछ दिनों तक सुमिरिनी फेकुआ के घर में ही परदे में बनी हुई थी पर एक मजूरिन कितने दिनों तक परदे में रह सकती थी। घर से बाहर निकल कर मजूरी के लिए उसे तो जाना ही था। वह घर में रह रही थी ऐसा रिवाज के कारण था। औतार चाहते थे कि सुमिरिनी कुछ दिनों तक घर में ही बैठी रहे, अभी नई नवेली है, कहां जाएगी जॉगर खटाने। पर दिक्कत थी कि बिना बनी मजूरी के घर-खर्च कैसे चलता, चूल्हा कैसे जलता, थालियों में कैसे रोटियॉ पड़तीं? मजबूरन सुमिरिनी को घर से बाहर काम पर निकलना पड़ा।
वह काम पर गई। सबसे पहिले वह शोभनाथ पंडित के काम पर गई। उसे घर-गृहस्थी, गोबर, गोइठा, लेवरन आदि का काम तो आता ही था स्वाभाविक ढंग से वह काम करने लगी। प्रसन्नकुमार की मां से वह खूब बतियाती तथा सुमिरिनी में वे रूचि भी लेतीं। वह काम पर जाने लगी है और उसका ही नहीं, उसके घर का गुजारा भी चलने लगा है। फेकुआ तथा औतार तो काम कर ही रहे थे। घर में जब चार चार कमाने वाले हों फिर खाने की क्या दिक्कत? वैसे भी एक मुह के साथ दो हाथ होते हैं, एक मुह का खाना दो हाथ भला कैसे नहीं जुटा पाएंगे? आखिर कितना खाएगा आदमी? बस काम मिलना चाहिए साथ ही साथ मजूरी भी।
अपनी ससुराल के बारे में सुमिरिनी को जानकारी नहीं थी। भला वह कैसे जानती सहपुरवा के बारे में वह नई नवेली थी। कुछ दिनों बाद उसे सुगिया के बारे में मालूम हुआ कि सुगिया के साथ रामभरोस ने कुकर्म किया था। बिफना की औरत से उसकी पटरी हो चुकी थी। दोनों हम उमर थीं तथा दूसरी बातों में भी उनमें तमाम समानताएं थीं। बिफना की औरत ने उसे गॉव के लोगों के बारे में बताया था कि यहां रहने वाले लोगों की आंखें नाचा करती हैं, वे गदराई देह पर ही जाकर जमती हैं। सुमिरिनी को जान पड़ा कि उसकी ससुराल और नैहर में कुछ भी फर्क नाहीं है। दोनों जगहों पर ऑखें नचाने वाले ऑखें नचा रहे हैं, हर जगह एक ही जैसे लोग हैं, देह से खेलने तथा देह पर कूदने वाले। सुमिरिनी और फेकुआ की मेहरारू का सहेलियाना व्यवहार उन दोनों के लिए तो ठीक था ही, उधर फेकुआ और बिफना के लिए भी ठीक था। वे दोनों भी तो दोस्त ही थे, एक दूसरे की सांसें पीने वाले।
औतार व सुक्खू दोनों परिवारों के लोगों ने चौथी एवं रामभरोस के काम पर न जाने की कसमें खा रखी थीं कि उनके काम पर किसी हालत में नहीं जाना है। भले ही भूखे मर जाना पड़े पर रामभरोस के काम पर नहीं जाना है तो नहीं जाना है। चौथी गवहां को जेठ दशहरा के पहिले ही औतार ने जबाब दे दिया था। लेन-देन और कर्जे के बारे में औतार ने साफ साफ इनकार कर दिया था कि वे किसी भी हाल में नहीं लौटाने वाले। गॉव में चौथी और रामभरोस के अलावा जिस किसी के यहां काम मिलता वहां फेकुआ और बिफना दोनों डट जाते और मन लगा कर काम करते। उन दोनों को मउज भी आता तथा उन्हें बनिहारी में अधिक मजूरी भी मिलती। हलवाही में तो केवल चार सेर ही मिलता है जबकि बनिहारी में पांच सेर मिलता है। सेर भर धान का फायदा होता है। बनिहारी करने में एक फायदा और था, वह था मान-सम्मान का। नया मालिक प्यार से बतियाता और हर तरह की मदत भी करता। वैसे यह भी था कि जब शोभनाथ के पास काम नहीं होता था तभी वे किसी दूसरे के पास काम करने के लिए जाते थे नहीं तो शोभनाथ के यहां ही काम करते थे।
औतार चौथी का कर्जा चुकता करने में बेइमानी नहीं करना चाहते थे। पर चौथी से नाराज थे औतार। चौथी ने रामभरोस की साजिश से फेकुआ का कोला लवा लिया था। साजिश नहीं होती तो फेकुआ का कोला चौथी कैसे लवा लेते? इतना ही नहीं औतार जब से कुछ समझने के काबिल हुए हैं तब से देख रहे हैं कि रामभरोस उनके साथ कुछ न कुछ षडयंत्रा करते रहे हैं। औतार कभी किसी का कर्जा चुकाना नहीं भूलते, पाई पाई जोड़ कर कर्जा सूद समेत चुकाते रहे हैं।
एक दिन रामदयाल कारिन्दा ने फेकुआ से काम करने के लिए कहा था कि दंवरी पर आ जाना। अखइन चलाना है पर फेकुआ ने इनकार कर दिया था कि वह उनका काम नहीं करेगा। वह किसी भी हाल में रामभरोस के काम पर नहीं जाएगा चाहे जो हो जाए।
रामदयाल के बैठका का काम चल रहा था हरिजन बस्ती के ढेर सारे मजूर उनके काम पर लगे हुए थे। रामदयाल चाहता था कि फेकुआ और बिफना भी काम पर आयें पर किसिम किसिम की लालच देने के बाद भी दोनों उनके काम पर नहीं गए। वैसे ऐसा नहीं है कि गॉव के सभी मजूरे रामभरोस के काम पर नहीं जाना चाहते थेे, कुछ तो खासतौर से जाना चाहते थे और वे रामभरोस का काम छोड़ते ही नहीं थे। जिन लोगों ने रामभरोस के भीतर के बैठके का बैठका देख लिया है वे कभी उनका काम छोड़ ही नहीं सकते थे। उस बैठका के भीतर क्या नहीं है, दारू है, शिाकार है, रुपया है, अच्छे तरह का खाना पीना है, साड़ी ब्लाउज, कपड़ा लत्ता सारा कुछ तो है बैठका के अन्दर वाले कमरे में। रामभरोस के बैठका में एक बार जो बैठ गया बैठ गया, लद गया उसके दिल और दिमाग पर रामभरोस का दिया हुआ सामान, फिर तो वे वैसा ही करते थे जैसा रामभरोस उनसे करवाना चाहते थे।
रामभरोस मजूरों सेे क्या करवाना चाहते यह उन्हें भी पता होता। वे जानते हुए भी वही करते जो रामभरोस उनसे करवाना चाहते। वे भूल जाते कि उनसे बहुत बड़ी कीमत वसूली जानी है। लड़की, पतोहू चाहे जो भी हो उन्हें रामभरोस के हवाले सौंपना होगा। यह सच जानते हुए भी वे अनजान बने रहते और अन्दर वाले बैठका में आनन्दित हो रहे होते। उधर दूसरी ओर रामभरोस अपना नया स्वर्ग बना रहे होते हैं। बैठका के भीतर वाले बैठका में।
रामभरोस के काम पर हर तरह की सहूलियतें हुआ करतीं थीं पर ये सहूलियतें कुछ खास लोगों के लिए ही होती थीं। काम करने वालों का अच्छा खासा जमघट भी लगा रहता था उनके यहां। वहां किसिम किसिम के लोग होते थे। कुछ पटे पटाए होते थे तो कुछ पटाये जाने के लायक होते थे। पर वही होते थे जिनके घर में जवानी होती थी, जवानी किसी की भी, बहिन की, बहू की, बिटिया की पर जवानी हो, खिली खिली, गुद गुदी उगाने वाली। रामभरोस देह के मामले में समाजवादी किस्म के थे। देह के मामले में वे छूत अछूत का भेद भी न करते थे न ही रिश्ता देखा करते थे कि गॉव के नाते वह का लगती है उनकी? वे केवल देह का उतार चढ़ाव और उसका गढ़न ही देखा करते थे चाहे रिश्ते में कुछ भी लगती हो किसी भी जाति बिरादरी की हो।
रामभरोस रिश्तों से बाहर के आदमी हैं। वे नहीं जानते कि रिश्तों के आधार पर लोग एक दूसरे को जानते पहचानते हैं। रिश्तों के मामले में जाति-धर्म नहीं चलता। जुम्मन को गॉव के बाभनों, ठाकुरों, अहीरों आदि जाति के लड़के चाचा बोलते हैं तो मुसलमान लड़के औतार को दाऊ बोलते हैं। मदारन चुड़िहारिन गाव भर के लड़कों की चाची लगती हैं। पर रामभरोस के लिए औरतों व लड़कियों के मामले में कोई नाता रिश्ता नहीं था। वे रिश्तों से बाहर की कोई चीज हैं हवा में लहराने वाली चीजों की तरह।
'''‘मुक्त समय की मुक्त कथा का न कोई नायक
होता है न कोई नायिका। वहां तो समय ही नायक
और नायिका की भूमिका में होता हैकृकैसे? आइए देखते हैं’
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सुमिरिनी शोभनाथ पंडित के काम पर गई थी। एक दिन अकेली ही सुमिरिनी काम पर से अपने घर लौट रही थी। शोभनाथ पंडित के ओसार का लेवरन करते करते वह थक चुकी थी। उसे तुरंत आराम करना था वैसे भी वह महीने से थी। वह रास्ता चलने में थी कि रामदयाल कारिन्दा मिल गया।
‘कौन जा रही है रे! अरे, सुमिरिनी तूं है का रे! कहां काम कर रही है रे! आज कल’
बहुत ही आशिकाना ढंग से रामदयाल ने सुमिरिनी से पूछा। सुमिरिनी थी कि बिना किसी प्रतिक्रिया के चुपचाप रास्ता चलने में थी उसके पीछे पीछे रामदयाल कारिन्दा बोंग लिए हुए चल रहे थे। सुमिरिनी के चुप रहने पर रामदयाल ने उसे दुबारा छेड़ा....कृ
‘नाहीं सुन रही का रे! हम भी आदमी ही हैं कोई जिनावर नाहीं हैं कि तूं हमसे लजा रही है। काहे लजा रही है रे, एक दो दिन लजाया जाता है कि हमेशा, रहना तो गॉवै में है।’
इस बार भी सुमिरिनी चुप थी तो चुप थी। वह समझ रही थी कि रामदयाल काहे उससे बतियाना चाह रहा है? वह आगे बढ़ती चली जा रही थी, उसने अपना एक कदम भी नहीं रोका। वह लगातार चलती रही अपने घर की तरफ बस रास्ता ही उसका चलना न बन्द कर दे।
रामदयाल को नहीं पता था कि फेकुआ भी सुमिरिनी के पीछे पीछे आ रहा है। फेकुआ कहीं दीख भी नहीं रहा था। सुमिरिनी तो जानती थी कि फेकुआ उसके पीछे पीछे आ रहा है। भले अन्धेरा हो रहा है तो का हुआ? का बिगाड़ लेगा रामदयाल। अंधेरा घिरता जा रहा था। रामदयाल तो निश्चिंत थे कि उनकी बातें कोई नहीं सुन रहा, न ही उन्हें कोई देख रहा जबकि फेकुआ ने रामदयाल की बातें सुन लिया था और वह रामदयाल के करीब भी आ चुका था।
सुमिरिनी को तो कुछ बोलना ही नहीं था। उसे रास्ता चलना था तो चलना था। वैसे भी चुप रहने की आदत उसने नैहर से ही डाल ली थी। वह जानती थी कि बोलने का मतलब खुद को खोलना भी लोग लगा लेते हैं। सो न बोलो, चुप्प रहो और चुप्पी में डूब जाओ जैसे कुछ सुनाई ही न दे रहा हो। चुप्पी ने कई बार उसकी मदत भी किया है। फेकुआ बीच में ही बोल पड़ा....कृ
‘का हो कारिन्दा साहेब, तोहसेे ई काहे लजाएगी हो। तोहसे मेहरारू लजाएंगी तो काम कैसे होगा? मेहरारून के सेन्हुर, टिकुली, साड़ी, बिलाउज सब चाहिए ही चाहिए। वे लजाएंगी तो उन्हें उनकी जरूरत का सामान कौन देगा, उन्हें बिलाउज कैसे मिलेगा, टिकुली कैसे मिलेगी। हम तोहके बता रहे हैं कि एकरे संगे सूतना हो तो हमरे घरे चलिए और सूत लीजिएगा रात भर।’
रामदयाल को नहीं मालूम था कि फेकुआ भी पीछे पीछे आ रहा है। वह तो अंधेरा देख कर सुमिरिनी से बोलना चाहता था, वैसे भी उसने अगल बगल देख भी लिया था पर उसे उस समय उधर कोई नहीं दिखा था। रामदयाल चकरा गया उसने सफाई दिया....जो माफी जैसा था।
‘नाहीं यार फेकुआ! अइसन कउनो बात नाहीं है, तूं उलटा काहे बूझ रहे हो। गांये घरे के बिटया बहिन संगे भला हम बुरा सोचेंगे। हम तो एके समझाय रहे थे कि जमाना बहुत खराब है रात में अकेली निकलना ठीक नाहीं होता है।’
रामदयाल की बनावटी बातें सुन कर फेकुआ को गुस्सा आ गया। उसकी समझ में आया कि वह रामदयाल को वहीं गिरा कर खूब मारे-पीटे और छाती पर चढ़ बैठे। हड्डी पसली तोड़ कर बराबर कर दे पर वह विवश था वैसा नहीं कर सकता था। उसे मालूम था कि अगर उसने वैसा कर दिया तो उसका बपई उसे इस बार तो घर से ही निकाल देगा। बपई के जीते जी रामदयाल से मारपीट कौन कहे वह तूं, तूं, मैं, मैं भी नहीं कर सकता। उतना ही कर सकता है जितना उसके बपई चाहें। फिर भी वह अपने आप को कितना रोकता....
‘देखिए कारिन्दा साहब! आपन आदत सुधार लीजिए। जान लीजिए कि सुमिरिनी हमार मेहरारू है। ओकरे संघे अगर कुछ एहर ओहर करेंगे नऽ तो हमसे बुरा कोई नाहीं होगा।’
मुसुक ऐंठते हुए फेकुआ एक ही सांस में अपना गुस्सा उगल गया। हालांकि रामदयाल को बहुत बुरा लगा कि हरिजन का लड़का ऐसा बोल रहा है। धमकिया रहा है, इस साले की इतनी हिम्मत पर करते क्या? उनके कंधे पर टंगा बोंग इस समय किसी काम का नहीं था। अगर थोड़ा बहुत भी वे अनाप सनाप करते तो फेकुआ उन्हें पटक कर लतिया देता। और गोड़ हाथ तोड़ देता अलग से। सो वे चुप रहना और समय को टालना ही ठीक समझ कर खिसक लिए, फेकुआ से कुछ नहीं बोले।
रामदयाल जानता था कि सुमिरिनी को नजदीक लाने का तरीका दूसरा है। जाने कब से उस तरीके को वह सहपुरवा में आजमाता रहा है और उस तरीके में कहीं से भी उसे खोट भी नहीं दिखता। लड़ाई झगड़े से कुछ भी हासिल नहीं होता इससे अच्छा तो वही तरीका है। साड़ी, रुपया पैसा तथा दूसरे तरह के सामानों को देने वाला। आखिर कितनी बार सुमिरिनी इनकार करेगी, किसी न किसी दिन तो रुपये पैसे के जाल में फसेगी ही। औरतें भी जोर जबरदस्ती पसंद नहीं करतीं। वे चाहती हैं कि उन्हें कोई प्यार से सहलाए दुलारे और रुपया उनकी देह पर बिछाए। देह पर थिरकते रुपयों की माया से अलग हो जाना कुछ ही औरतों के वश का होता है। देह का क्या है उस पर रुपया नचाओ देह नाचने लगेगी। बस रुपया नचाने की कला आनी चाहिए। जितने कलात्मक ढंग से रुपया नाचेगा औरत भी उतने ही कलात्मक ढंग से नाचेगी। औरत नाच गई तो समझ लो उसका मन नाच गया फिर तो वह खुद को खुला छोड़ देगी। जैसे चाहो उसे वॉचो, उसके मन के किसिम किसिम रागों को अलापो या उसमें गोते लगाओ।
कुछ देर में रामदयाल बखरी पर आ गया। बखरी पर रामभरोस अपने मूड में थे वैसे भी वे मूड में तब हुआ करते थे जब दारू पी लिया करते थे। उस समय उनकी गंभीरता टूट जाती थी फिर तो वे किसी ब्लू फिल्म का पात्रा बन जाते थे। रामदयाल ने रामभरोस का मूड ठीक देख कर सारा किस्सा बता दिया कि कि आज उनसे फेकुआ अकड़ गया। रामदयाल की बातें सुन कर रामभरोस गरज उठे....कृ
‘ठीक बोल रहे हो रामदयाल! फेकुआ साले का दिमाग खराब हो गया है। मुसुक ऐंठकर बतियाता है। हमरे बैठका पर काम कर रहा है कि नाहीं।’
‘नाहीं सरकार! ऊ ससुरा काम पर नाहीं आ रहा है, तीन चार बार तो हमने ओसे कहा भी था।’ रामदयाल ने बताया रामभरोस को।
रामभरोस गंभीर हो गए, लगा दारू का नशा उतर रहा है।
‘ई सब तोहसे नहीं बनेगा, हमही को कुछ करना होगा। जोतिया के माई को आज बुलाओ, हम ओसे बात करना चाहते हैं। सुमिरिनी को वह किसी भी तरह से पटा लेगी। हां तुम एक काम और करना औतरवा से बोल देना कि सरकार बइठका पर काम करने के लिए बुलाए हैं।’
रामदयाल को सहेज कर रामभरोस बखरी के अन्तःपुर की तरफ चले गये। ष्शायद फिर से दारू की घंूट पीनेे के लिए।
रामदयाल का प्रसंग रास्ते पर उठा था वहीं दफन हो गया। फेकुआ और सुमिरिनी दोनों रास्ता चलने में थे। वे दोनों रास्ता देखते हुए चल रहे थे तो रास्ता भी उन दोनों को देख रहा था। फेकुआ के लिए वह रास्ता अजाना नहीं था पर सुमिरिनी के लिए तो अजाना ही था, एकदम नया। अजाने रास्ते पर चलते हुए भी सुमिरिनी के पैर संयत थे, डगमगा नहीं रहे थे। वैसे रास्ते तो होते ही हैं देखने और चलने के लिए। वे दोनों रास्ते पर चल भी रहे थे पर फेकुआ तो वह रास्ता देखना चाहता था जो सुमिरिनी के दिल तक जाता था। पता नहीं सुमिरिनी उस समय दिल तक जाने वाले रास्ते के बारे में गुन रही थी कि नहीं जिसके बारे में फेकुआ गुन रहा था। फेकुआ ने सुमिरिनी को देखा। सुमिरिनी का चेहरा आकर्षक व लुभावन चमकों से घिरा हुआ था। फेकुआ चकरा गया, ऐसी चमक तो उसने सुमिरिनी के चेहरे पर कभी देखा ही नहीं था। सुहागरात वाली चमक तो इन्द्रधनुषी रंगों वाली थी, यह तो दूसरे ढंग की चमक है। वह चकरा गया क्या औरतें रोज नए चमकों को सिरजती रहती हैं?आकर्षक और मन को खींचने वाली। उसे इन्हीं चमकों के सहारे सुमिरिनी के दिल तक पहंुचना चाहिए। उसका दिल भी तो चेहरे वाली चमकों की तरह चमक छोड़ता होगा। फिर उसकी ऑखों की किरणें स्वतः रंगीन हो गईं जिनमें सुमिरिनी तैरने लगी। फेकुआ ने सुमिरिनी को छेड़ा...
‘रामदयाल तोहें काहे छेड़ रहा था मालूम है, तूं देखनहरू है ही जो तोहें देख लेगा उसका मन बहक जाएगा। रामदयाल बहक गया होगा।’
सुमिरिनी को देख कर रामदयाल बहका था कि नहीं पर फेकुआ तो बहक ही गया था। पर वह जानता था कि उसका बहकना केवल कमरे के भीतर तक ही उचित है, बाहर नहीं। सुमिरिनी को वह बाहर देख कर नहीं बहक सकता जिस तरह कमरे के भीतर बहक सकता है। कमरे के भीतर वाली बहक को दुनिया ठीक मानती है बाहर की बहक को नहीं। पर फेकुआ बहक चुका था पर उसे पता था कि हक और बहक के बीच फासला होना चाहिए। उस फसले को मिटा देना गलती होगी। वैसे फासला भी कितना था, कुछ ही समय का, उतनी ही देर का फासला था जितनी देर में दोनों घर पहुंच जाते। फेकुआ सुमिरिनी से कुछ नहीं बोला, जो बोलना था, रास्ता चलते समय उचित नहीं था सो वह जल्दी जल्दी घर की तरफ बढ़ने लगा। सुमिरिनी भी पीछे पीछे थी। दोनों रास्ता तय करने में थे। यह रास्ता तो कुछ देर का ही था, तय हो जाएगा पर दिल तक पहुंचने वाला रास्ता उनसे दूर था। उसी रास्ते पर उन्हें बहुत दूर तक जाना था जहां दोनों एक में विलीन हो जाते। विलीनीकरण के बाद फेकुआ न फेकुआ रह जाता और सुमिरिनी न सुमिरिनी रह जाती, वहां तो केवल प्यार की गीतमय युगलबन्दी होती, तन और मन की लयवद्ध रागों वाली।
रात आई, तमाम तरह की प्यास ले कर, आजादी ले कर। फेकुआ अपने कमरे में था, बाहरी फुसफुसाहटें कमरे की दीवारोेें को पार नहीं कर सकती थीं। वहां फेकुआ था और सुमिरिनी थी, उनकी कल्पनांए थीं, उससे जुड़ी उम्मीदें थीं और ढेर सारा एकांत था जो सतर्क निगरानी कर रहे थे दोनों की ताकि दोनों प्रकृति की कृति बने रह सकें, उनमें किसी भी तरह से भिन्नतांए न आने पाएं। अपने कमरे में फेकुआ सुमिरिनी से बोल बतिया सकता था। पर ऐसा नहीं था कि कमरे में अनुशासन नहीं था, एकांत का कानून नहीं था, परंपरा की ऑखें नहीं थीं। वहां एकांत था जो केवल इतनी ही छूट देता था कि वे एक दूसरे के दिल और दिमाग तक, तन से होते हुए मन तक और मन से होते हुए तन तक, एक दूसरे को दुलारते, संवारते हुए पहुंच सकें। फेकुआ को ऐसे मुक्त समय की ही तो प्रतिक्षा थी।
प्रतिक्षा का समय खतम हो गया, समय उतर आया कमरे में। रात का अंधेरा घर के भीतर अंधेरा ले कर उतरा था पर उस अन्धेरे में भी देखी जा सकने वाली सारी चीजें फेकुआ को साफ साफ दीख रहीं थीं। उसके मन और तन पर अंधेरे का असर नहीं था पर वह सुमिरिनी के बारे में आश्वस्त नहीं था, जाने का सोच व गुन रही हो सुमिरिनी। वह अन्धेरों में डूबना चाह रही है या नहीं। पता नहीं।
सुमिरिनी दिन भर के काम से थक गई थी। घर के लेवरन का काम बहुत ही थकाऊ होता है। क्षण भर का भी समय नहीं मिलता, नाक खुजलाना हो तो मुश्किल हो जाए, हाथों में सनी हुई माटी लगी रहती है। किस हाथ से नाक खुजलाई जाए। पहले माटी तैयार करो, उसे आलन (भूसा, पुरेसा) मिलाकर सानो, धान की भूसी मिलाओ, आंकड़ बीन बीन कर निकालो, आंटे की तरह माटी सानो, तब जा कर माटी तैयार होती है फिर लेवरन करो चाहे दीवार की या जमीन की।
सुमिरिनी की थकान ने उसकी आंखों को ऐसा जकड़ा कि वह नींद में चली गई। फेकुआ ने उसे दो तीन बार इशारा किया कि वह जागे पर वह ‘हूं,’ ‘हूं’ बोल कर वह नींद पीने लगती। फेकुआ उसे दुबारा जगाता पर वह काहे बोलती वह तो नींद में थी। नींद ने उसका बोलना, बतियाना छीन लिया था।
फेकुआ तो मान कर चल रहा था कि सुमिरिनी को हर हाल में जगाना है और रात के खेलों को खेलना है। फेकुआ ने उसे झकझोरा...कृइस बार सुमिरिनी का करती, जम्हाते हुए उसने कहा....कृ
‘का है हो! काहे परेशान कर रहे हैं, हमैं सूतने दीजिए, बहुत नीन लग रही है।’
‘भोर हो गई है हो! कब तक सोना है, काम पर नहीं जाना है का? पूछा फेकुआ ने
‘भोर हो गई और हमारी नीन भी पूरी नाहीं हुई, मुई नीन भी हरामी होती है, बिना कुछ बोले बतियाएऑखों को जकड़ लेती है अपनी गोदी में।’
‘और नाहीं तऽ का, भोर हो गई है अब तो जागो।‘ फेकुआ ने उसे बताया
सुमिरिनी नेअपनी ऑखों पर जोर दिया, उसने देखा कि उसे कस कर फेकुआ बांधे हुए है और घूर रहा है। उसे जान पड़ा कि अभी तो रात बाकी है, रात अगर बाकी नहीं होती तो बाहर साफ दिखता। पर बाहर नहीं दिख रहा था कुछ। फूस के छाजन के भीतर रात का गाढ़ापन उतर चुका था। सो बाहर कैसे दिखता।
सुमिरिनी ने फेकुआ की बाहों के कसाव से खुद को छुड़ाना चाहा पर कसाव कैसे छूटता, फेकुआ ने उसे और जकड़ लिया।
‘तोहार मन खराब हो गया है का?’ सुमिरिनी ने फेकुआ से पूछा
‘हमसे काहे पूछ रही हो अपने मने से पूछो कि मन खराब है या बढ़िया। तोहार मनवा भी तो लहरिया रहा होगा, डोल रहा होगा। अच्छा सही बताओ कि फुदक रहा है कि नाहीं।’ फेकुआ ने पूछा सुमिरिनी से।
वह बेचारी का बोलती, वह जानती है मरद अउर बरद दुन्नौ एकय होते हैं? जब मन करता है तबय....समय नाहीं देखते। सुमिरिनी ने नकली बहाना बनाया।कृ
‘हमार मन हर समय फरकता रहता तो जाने का होता...।’
इसके आगे नाहीं बोल पाई सुमिरिनी, उसे बोलना भी नहीं था, उसका भी मन फरक चुका था।
फेकुआ तो रंगीन बदरियों वाली दुनिया में था। एक ऐसी दुनिया जहां सारा कुछ एक में एक मिला होता है, यौगिक की तरह, कुछ भी अलग नहीं। उस दुनिया से अलग होने का मतलब खुद को समाप्त करना होता है। फेकुआ समाप्त नहीं होना चाहता था, वह चाहता था कि वह भी सुमिरिनी में विलीन हो कर सारा कुछ भूल जाये, वह भूल जाये कि उसके साथ तथा उसके बाप के साथ क्या हुआ था सहपुरवा में, यह भी कि रामदयाल कारिन्दा आज सुमिरिनी के आगे पीछे क्यों चल रहा था?
फेकुआ जानता है कि सुमिरिनी पर डोरा डालने वालों की सहपुरवा में कमी नहीं है। लोगों के पास एक से एक डोरे होते हैं, लाल,पीले,नीले,हरे, किसिम किसिम के रंग वाले। इसी डोरे से बॉध देते हैं लोग औरतों को पतंग की तरह उड़ाने के लिए। पर वह सुमिरिनी को पतंग नहीं बनने देगा चाहे जो भी करना पड़े। वह सावधान है, एक एक को देख लेगा।
कुछ ही देर में सुमिरिनी नींद से बाहर निकल गई। वह समझ सकती थी कि फेकुआ ने उसे क्यों जगाया? तथा आगे क्या करने वाला है। चाहती तो वह भी थी पर नींद का का करे, फेकुआ जैसे मरद के साथ रह कर वह भी मरद बन गई है और बूझने लगी है रात के खेलों को। खेल तो खेल उसमें काहे पीछे रहना और खुद को दबा कर रखना, पर डरती है कि फेकुआ मरद है जाने का बूझे, बूझ सकता है कि सुमिरिनी भुक्खड़ है, इसका पेट ही नहीं भरता फिर तो वह लजा गई और नींद में जाने का बहाना उसने बना लिया।
फेकुआ के लिए तो यह था कि उसे रात को चूमना चाटना है, बिजली कड़के तो ठीक, नहीं कड़के तो ठीक। मन के ताप का खेल शुरू होते ही फेकुआ को जान पड़ा कि केवल वही प्रतापी नहीं है, सुमिरिनी भी प्रतापी है, उसका ताप केवल देखाता नाहीं है पर है प्रतापी।
रात को बीतना था सो बीत गई।
‘कथांए भी किसी दरखास की तरह होती हैं
गोबर, माटी, कीचड़ में सनी पाठकों से ‘नियाव’ मांगती’
खड़ी रहती हैं कि मुझे पढ़ो, कुछ जो उदार होते हैं पढ़ भी लेते हैं’कृ
सहपुरवा में नसबन्दी का कैंप लगा हुआ था। कई टेन्टों को जोड़कर एक बड़ा सा हालनुमा घेरा बनाया गया था। उसी हालनुमा घेरे के भीतर छोटा सा चिकित्सा कक्ष भी बनाया गया था। मंत्राी जी के लिए स्वागत कक्ष का निर्माण अलग से कराया गया था जो बड़े वाले हालनुमा घेरे से थोड़ा दूर था। टेन्ट का सारा सामान कुछ रापटगंज से तो कुछ बनारस से मंगवाया गया था। पूरा पांडाल ऐसा सजा हुआ था कि देखते बन रहा था कुछ लोग तो वहां पांडाल को सजते हुए बैठ कर देखा करते थे, घंटों बीत जाता था पर उन्हें अखरता नहीं था।
सरकारी लोग ही नहीं क्षेत्रा की जनता भी वहां उमड़ पड़ी थी। हर ओर भीड़ ही भीड़ सिर्फ आदमियों की खोपड़ियां दिखतीं कहीं भी जमीन नहीं दिख रही थी। वैसे भी टेन्ट की नीचे की जमीन दरी बिछावन से तोप दी गई थी। सरकारी काम है जमीन नहीं दिखनी चाहिए, जमीन पर सरकार का ताप हर ओर आसानी से नहीं पसर सकता। धूल व ढेले वाली जमीन पर सरकार के ताप को ठोकर लग सकती है। भहरा सकता है सरकार का ताप।
नसबन्दी के लिए लक्ष्य दंपतियों की सूची बना ली गई थी। जिसे एक महीने पहले से ही बनाया जा रहा था। सूची में कर्मचारियों व आम नागरिकों दोनों को शामिल किया गया था। उस दिन सहपुरवा में उन लोगों को नसबन्दी कराना था जो दो पुत्रोंा या पुत्रियों के पिता या माता थे। सरकारी फरमान था कि जो नसबन्दी नहीं कराएंगे उन्हें सस्पेन्ड भी किया जा सकता है। सो कर्मचारी डरे हुए थे और सस्पेंशन वाले सरकारी तानाशाही आदेश की निन्दा भी कर रहे थे।
‘यह भी कोई कार्यक्रम है, नसबन्दी कराओ तभी नौकरी करो नहीं तो निकाल देंगे नौकरी से, निकाल दें साले पर हम तो नहीं कराएंगे’
यह एक डरे हुए सरकारी कर्मचारी की विवषताभरी बोल थी।कृ
दूसरा बोल रहा था....वह भी डरा हुआ था पर आदेश का विकल्प उसने तलाश लिया था।
‘यार! तूं तो चूतिया हो हम नसबन्दी काहे कराएंगे हमारे नाम पर हरिजन कराएंगे। लिस्ट बनाने तथा रिपोर्ट वगैरह देने का काम तो हमी लोगों को करना है। सरकार भी कोई काम करती है क्या? तूंने देखा है किसी सरकार को काम करते हुए, सरकार तो भगवान की तरह अदृश्य होती है निराकार। असली सरकार तो कर्मचारी ही होते हैं पर क्या बतांए ये साले सरकारी कर्मचारी किसी भी मुद्दे पर एक नहीं होते, इनमें संगठन नहीं है, संगठन होता तो ये अनपढ़ मंत्राी हम पर रोब डाटतें।’
‘अरे यार! यह भी नहीं करना होगा, डक्टरवा को सौ पचास दे कर लिखवा लिया जाएगा, यह तरीका सबसे आसान और सरल है।’
चौथा जो मजबूर किसिम का था वह अपना दुख बता रहा था।
‘यार! मैं तो नसबन्दी करांउगा ही, बिना तनखाह के मेरा काम नहीं चल सकता, मैं बाल-बच्चों को भूखा नहीं रख सकता, हमैं तो नौकरियय का सहारा है।’
समझाने वाले ने उसे समझाया....कृ
‘यार! तूं कैसे करा सकता है नसबन्दी, तेरी तो सिर्फ तीन लड़कियां ही हैं।’
‘उससे का होता है पेट कैसे भरेेगा, मैं तो कराऊंगा नसबन्दी, मान लूंगा कि किस्मत में लड़कियां ही बदा हैं। यार! सेवा करना होगा तो लड़कियां भी किसी लड़के से कम नहीं करेंगी। इन्दिरा गांधी भी तो लड़की ही हैं आज देश चला रही हैं। मेरी लड़कियॉ भी बुढ़ौती में मेरा सहारा बनेंगी।’
सहपुरवा नसबन्दी कैंप में हर तरह के लोग आये हुए थे, कोई मजबूर था तो कोई मजबूर बना दिया गया था। जमीन का पट्टा रद्द कर देने का भय दिखा कर लेखपालों ने तमाम मजबूरों और यातनाग्रस्त लोगों को बुला लिया था। वे लोग बारी बारी से आपरेशन करा रहे थे कोई नायब तहसीलदार के नाम पर आपरेशन करवा रहा था तो कोई परगनाधिकारी के नाम पर। ऐसा ही ब्लाक के कर्मचारी भी कर रहे थे जिससे सभी को कोटा पूरा हो सके। परमिट कराने, राशन की दूकान देने, बन्दूक का लाइसेन्स देने, बैंक से कर्जा दिलाने आदि के नाम पर भी दना दन नसबन्दी हो रही थी। एक तरह से सहपुरवा नौकरी बचाने का स्वर्ग बन गया था और कर्मचारियों को अभयदान दे रहा था। नसबन्दी कराने के एवज में मिलने वाला रुपया प्रेरकों की जेब में तथा डाक्टरों की जेब में जा रहा था। नसबन्दी करा लेने में कर्मचरी जितने मस्त थे उतने दवा दारू कराने में नहीं, नसबन्दी हो जाने के बाद मरीजों से यह भी नहीं पूछा जा रहा था कि उनकी हालत कैसी है, उन्हें रामभरोसे छोड़ दिया जा रहा था। सहपुरवा में जब तक मंत्राी जी नहीं आ पाए थे तब तक सारा प्रबंध ठीक ठाक था जैसे ही वे आये और चले गए मरीजों की सुरक्षा भी उनके साथ चली गई। मरीजों के प्रति लापरवाही एक बड़ी खबर थी पर उन दिनों अधिकारियों कर्मचारियों के खिलाफ समाचार पत्रों में खबरें नहीं छपा करती थीं। सो मरीजों के प्रति लापरवाही खबर न बन सकी। अखबार वाले दूसरे काम निपटाने में मस्त थे जिनसे उन्हें फायदा मिला करता था यही तो ईमरजेन्सी का फायदा था।
लम्बी प्रतिक्षा के बाद मंत्राी जी का आगमन हुआ, सरकारी पारटी के बड़े स्थानीय नेता कृपालु जी मंत्राी जी के साथ थे। सबसे पहले मंत्राी जी रामभरोस के दरवाजे पर गये। रामभरोस के यहां जाना उनका व्यक्तिगत कार्यक्रम था। इसे सरकारी कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया था। रामभरोस के यहां ही मंत्राी जी ने नाश्ता किया और विभिन्न मुद्दों पर बातें भी की। उन्होंने क्षेत्रा का हाल अहवाल लिया तथा रामभरोस का भी।
रामभरोस के दरवाजे से मंत्राी जी सीधे सभास्थल पर पहुंचे, वहां मंत्राी जी की सैकड़ों लोग प्रतिक्षा कर रहे थे। मंत्राी जी को तत्काल मालाओं व फूलों से लाद दिया गया, अन्त में मंत्राी जी ने अपना भाषण दिया।कृ
‘कि वे पैदा ही हुए हैं जनता की सेवा करने के लिए, जनता के साथ मरने और जीने के लिए। वे तब तक जनता की सेवा करते रहेंगे जब तक हर हाथ को काम, हर खेत को पानी तथा हर घर में चूल्हा नहीं जल जाता, तब तक उनकी लड़ाई चलती रहेगी। वे भूख और भोजन के बीच की दूरी पाट कर ही रहेंगे।’
अपने भाषण के अंत में मंत्राी जी ने रामभरोस की भी खूब प्रशंसा किया और उनके बारे में बोलते हुए कहा....
‘रामभरोस जैसा आदमी आपके साथ है यह इस क्षेत्रा के लिए गौरव की बात है’
इसी बात पर सभा स्थल पर हल्ला भी मचा था जिसे पुलिस वालों ने ताकत के बल पर तत्काल रोक दिया था।
भाषण के बाद मंत्राी जी कार में बैठे और फुर्र....कृ
जिले के आलाधिकारियों के चेहरों पर नसबन्दी कार्यक्रम की सफलता थिरकने लगी, वे मस्त मस्त थे। मंत्राी जी के वापस होते ही अधिकारी भी सहपुरवा से वापस हो लिए वहां रूकने का क्या मतलब था, मतलब तो नसबन्दी कराना था जो संपन्न हो चुका था।
कुल पैंसठ लोगों की नसबन्दी हुई थी। उन्हें अस्पतालनुमा टेन्ट में लिटा दिया गया था। उनके लेटने के लिए चौकियों का प्रबंध कई गॉवों से लाकर पहले से ही कर लिया गया था। चौकियों के प्रबंध का काम प्रधानों के जिम्मे स्थानीय प्रशासन ने लगाया हुआ था। मरीजों की देख रेख के लिए दो डाक्टरों तथा चार नर्सों को भी तैनात किया गया था।
देखने में सारा प्रबंध ठीक ठाक दिख रहा था पर ठीक नहीं था। ठीक इस लिए नहीं था कि सहपुरवा के नसबन्दी कैप के लिए जिन दो डाक्टरों को तैनात किया गया था उनमें से एक तो उसी दिन सहपुरवा से निकल गया और नर्सों में से दो वापस हो गईं। दोनों ने बच्चों का बहाना बना लिया कि उनके दूध पीते बच्चे हैं उन्हें दूध कौन पिलाएगा?
बहरहाल नसबन्दी हो चुकी थी। परमात्मा की कृपा से सारे के सारे मरीज ठीक ठाक थे, कोई अनहोनी नहीं हुई। मरीजों के खाने का प्रबंध रामभरोस के जिम्मे था जिसका प्रबंध रामभरोस ने अच्छी तरह से किया था।
औतार का पट्टा खारिज करने के प्रस्ताव को गॉव सभा ने बहुमत से पहले ही पारित कर दिया था अब उस पर केवल ऊपर के अधिकारियों को ही विचार करना था। विचार हो गया और औतार का पट्टा खारिज कर दिया गया इस तरह का प्रचार रामभरोस ने पूरे सहपुरवा में करा दिया था। गॉव सभा के प्रस्ताव पर पंडित शोभनाथ ने हालांकि बहुत विरोध किया था पर उनके अकेले विरोध का कुछ मतलब नहीं था, बहुमत तो पट्टा खारिज कराने के पक्ष में था, सो प्रस्ताव पास हो गया।
प्रस्ताव के समय ही शोभनाथ ने चेताया था....कृ
‘सभापति जी! औतार का पट्टा खारिज कराना गलत है। अभी भी गॉव में बहुत सी जमीनें उपलब्ध हैं जिन पर पंचायत भवन बनवाया जा सकता है। पंचायत भवन तो कहीं भी बन सकता है क्या केवल औतार के पट्टे वाली जमीन पर ही बनेगा तभी ठीक होगा। बहुत गलत हो रहा हे सभापति जी।’
रामभरोस को तो जो करना था उसके प्रति वे सावधान थे, उन्होंने साफ कहा थाकृ
‘आप लोग तो जानते ही है कि गॉव में स्कूल जब बन रहा था तब भी शोभनाथ ने उसका विरोध किया था और आज जब पंचायत भवन बनने के लिए प्रस्ताव हो रहा है तब भी विरोध कर रहे हैं। पता नाहीं शोभनाथ का सोच रहे हैं। हम चाहते है कि पंचायत भवन गॉव के आस-पास ही बने। गॉव के आस-पास कोई जमीन है नहीं, केवल औतार के पट्टे वाली जमीन ही है। उस पर पंचायत भवन बन जाएगा तो बियाह आदि में गॉव के लोगों के काम आएगा, उसमें बाराती ठहरेंगे और भी तमाम काम होंगे। औतार से हमारी कोई दुश्मनी तो है नाहीं, हम उनका पट्टा काहे खरिज कराएंगे? हम तो गॉव के हित के लिए औतार का पट्टा खारिज करा रहे हैं।
ष्शोभनाथ पंडित भी बोलक्कड़ थे....कृ
‘अरे रामभरोस जी अपनी बात कीजिए, भाषण मत झारिए। पंचायत भवन बन जाएगा तो सभी को बियाह आदि में काम देगा, पहले कैसे होता था बियाह? बकवास मत करिए। हम तो परेशान हैं अपने परिवार से। हमारा परिवार बंट गया नहीं तो आप को बताते कि का होती है राजनीति और कैसे होती है गॉव की भलाई। गॉव का भला करना है तो अपनी सीलिंग वाली जमीनिया काहे नाहीं बॉट देते गरीबों में, उसे तो कब्जियाए हुए हैं। उसको गरीबों में बॉट दीजिए फिर हम पंचायत भवन का विरोध नहीं करेंगे। चले हैं गॉव की भलाई देखने....
रामभरोस से इससे मतलब नहीं था कि शोभनाथ पंडित का बोलते हैं और का सोचते हैं, उनसे तो सिर्फ प्रस्ताव पास कराने से मतलब था जो पास हो चुका था। रामभरोस ने उस समय बहुत गुस्से से शोभनाथ को देखा था कि यह साला किसी न किसी दिन सीलिंग वाली जमीन मेरे कब्जे से निकलवा कर ही रहेगा पर बोले कुछ नहीं। यह सोच कर कि इस समय बोलना उचित नहीं होगा। उन्होंने तय कर लिया था कि इसका जबाब शोभनाथ को उचित समय पर जरूर देंगे।
रामभरोस जो सोचतेे हैं कर डालते हैं। उन्हांेने सोच लिया था कि पंचायत भवन बनना है तो बनना है। रामभरोस ने पंचायत भवन के निर्माण के लिए जिला पंचायत अधिकारी द्वारा रुपया भी हासिल कर लिया था जो गॉवसभा के नाम से खाते में जमा हो गया था। केवल उसे बैंक से निकालना ही था। रामभरोस ने पंचायत भवन के उद्घाटन तक की योजना बना लिया था। उन्होंने कृपालु जी से उद्घाटन के बारे में बातें कर ली थीं। यह सुनिश्चित हो गया था कि उद्घाटन डी.एम. साहब करेंगे। रामभरोस जानते हैं कि डी.एम. से उद्घाटन कराने से कई लाभ होते हैं और मंत्राी वगैरह से कराने पर कोई खास लाभ नहीं होता।
रामभरोस के लिए पंचायत भवन का उद्घाटन शीघ्र से शीघ्र करा लेना बहुत आवष्यक था। इस काम में वे देरी करना नहीं चाहते थे। उनका वश चलता तो आनन फानन में उद्घाटन करा लेते पर ऐसा नहीं करना था, जल्दी का काम कभी कभी नुकसान दायक साबित होता है।
पंचायत भवन का उद्घाटन कराने में अधिक दिन नहीं लगा। कृपालु जी ने सारा इन्तजाम कर दिया था तथा वे खुद भी समय से सहपुरवा आ गये थे। डी.एम. साहब कार्यक्रम शुरू हो जाने के बाद आये फिर भी बहुत देर नहीं हुई थी। डी.एम. साहब के आने के कारण भीड़ भी एकत्रा हो गयी थी। क्षेत्रा के सारे परधान और परमुख भी आये हुए थे। रामभरोस ने स्वागत, सत्कार का बहुत ही अच्छा प्रबंध किया हुआ था। कार्यक्रम में पहले डी.एम. साहब का स्वागत किया गया फिर उद्घाटन हुआ। अपने भाषण में डी.एम. साहब ने पंचायत व्यवस्था के तमाम फायदों का गुणगान किया। वहां उपस्थित जनता के खाते में धन्यवाद आया और रामभरोस के खाते में प्रतिष्श्ठा। वहां उपस्थित जनता धन्यवाद का पुरस्कार लेकर फूट गयी।
औतार को ही नहीं पूरे क्षेत्रा को मालूम था कि डी.एम. साहब सहपुरवा आ रहे हैं सो औतार भी डी.एम. साहब से मिलने के लिए आतुर थे। वे एक प्रार्थना पत्रा लिखवा कर सभास्थल पर उपस्थित थे। वहां के स्वयंसेवक जो रामभरोस के अपने लोग थे, वे जानते थे कि औतार काहे के लिए आया है और काहे डी.एम. साहब से मिलना चाहता है सो वे औतार को मंच तक जाने नहीं दे रहे थे। किसी तरह औतार को मौका मिला फिर वे मंच तक पहुंच पाये और फटाफट डी.एम. साहब के पैर पर गिर गये ‘सरकार’ ‘सरकार’ कहते हुए....कृकृ
औतार किसी की नहीं सुन रहे थे। वे अपनी फरियाद रिरियाते हुए कहने लगेकृ
‘सरकार! हमैं सहपुरवा से मत उजरवाइए, हमारे पास खाली पट्टा वाली जमीन ही है और दूसर जमीन नाही है। सरकार हमरे पट्टा वाली जमीन पर पंचायत भवन बनने जा रहा है, गॉए में बहत जमीन है सरकार उस पर पंचायत भवन बनवाइए। रामभरोस की जो जमीन सीलिंग से निकली है वह भी गॉव के नजदीक ही है, उस पर बनवाएं पंचायत भवन सरकार, हमरे पट्टा वाली जमीन पर नाहीं।’
डी.एम. साहब घबरा गये, हो क्या रहा है, पट्टे की जमीन पर पंचायत भवन कैसे बन रहा है? जानने के बाद चुप्पी लगा गये। डी.एम. जैसे अधिकारियों की चुप्पी अपने आप में रहस्य होती है। वे अपनी चुप्पी के द्वारा ढेर सारा प्रशासनिक कार्य निपटा लिया करते हैं सो वे जनता के बीच जनता के कार्य के लिए अपनी चुप्पी का प्रयोग लोकतांत्रिक औजार की तरह किया करते हैं। औतार ने पहले से लिखा प्रार्थनापत्रा उन्हें दे दिया। औतार को मालूम था कि डी.एम. साहब भी हरिजन हैं सो वे हमारा काम कर देंगे। निश्चित ही उनका काम हो जाएगा और पंचायत भवन का बनना रूक जाएगा। पर ऐसा होता कहां हैं? डी.एम. अपनी जाति नहीं देखा करते। कोई भी हो जब वह अधिकारी बन जाता है फिर वह बहुत कुछ भूल जाता है। भूलना बहुत ही सरल होता है। नौकरी पाने के लिए उसे स्मृतियों के कठिन दौर से गुजरना होता है, उसे सारा कुछ याद रखना पड़ता है। जितना याद रहेगा उतना ही परीक्षा की कापी पर वह लिख सकेगा। लिखे के अनुसार ही उसे नंबर मिलेगा। याद रखने की जरूरत नौकरी पाने के बाद खतम हो जाती है। नौकरी करना है तो बहुत कुछ भूल जाना है। भूल जाना ही उसे अच्छा अधिकारी प्रमाणित करेगा। धीरे धीरे वह वह सारा कुछ भूल जाता है, सबसे पहले वह जाति भूलता है फिर वर्ग। उसे यह भी याद नहीं रहता कि वह गोबर माटी और कीचड़ में पैदा हुआ है, गोबर, माटी, कीचड़ से सने, पुते चेहरे ही उसके अपने हो सकते हैं, उनके लिए कुछ करना उसका दायित्व है। पर नहीं वह अपना अतीत भूल कर चमकदार चेहरों में शामिल हो जाता है।
डी.एम. साहब ने प्रार्थना पत्रा पढना शुरू किया और पढ़ कर ओतार से प्रार्थनापत्रा के बारे में पूछा भी... औतार ने उन्हें पंचायत भवन निर्माण काण्ड का किस्सा बताया कि उनके साथ हो क्या रहा है।
डी.एम. साहब ने पास खड़े परगनाधिकारी को वह प्रार्थना पत्रा दे दिया और निर्देश दिया कि इस पर संभव कार्यवाही करें तथा कृत कार्यवाही से मुझे अवगत भी करांए।
‘हॉ सर’!’ कहते हुए परगनाधिकारी ने प्रार्थना पत्रा ले लिया। औतार भी परगनाधिकारी के पास ही खड़े थे, वे दुबारा गिड़गिड़ाने लगे...
‘सरकार हमैं बताइए कि हम का करें, कहां रहें, कैसे खेती-बारी करें। पंचायत भवन बन जाएगा तब हम कहॉ खेती करेंगे सरकार! पंचायत भवन को रोकवा कर हमैं उबारैं सरकार।’
औतार के साथ साथ शोभनाथ पंडित ने भी निवेदन किया....
‘सरकार! केवल दुश्मनी के कारण औतार के पट्टे वाली जमीन पर रामभरोस जबरिया पंचायत भवन बनवा रहे हैं, गॉव में दूसरी जमीन पर भी पंचायत भवन बनवाया जा सकता है।’
अधिकारी तो अधिकारी होता है, पद और अधिकार की गरिमा में गोते लगाने वाला। औतार के साथ शोभनाथ पंडित भी गिड़गिड़ते रहे पर अधिकारी पर कुछ भी असर नहीं पड़ा। डी.एम. साहब सीधे कार की ओर बढ़े, उसमें बैठे और फुर्र, किसी चिड़ि़या माफिक।
डी.एम. साहब के जाने के बाद औतार को परगनाधिकारी की फटकार भी सुननी पड़ी....
‘आप लोग काहे बक बक कर रहे हैं, मालूम है कि नहीं कुछ, औतार का पट्टा खारिज हो चुका है। अब का होगा? उस समय कहां थे आप लोग? अब चले हैं दरखास ले कर। जाइए अपना काम करिए हमारा समय बेकार मत करिए। जब गॉवसभा ने मुकदमा किया था तब दरखास दिए होते तो हम विचार करते अब कुछ नहीं हो सकता।’
पर औतार का पट्टा खारिज नहीं हुआ था। परगनाधिकारी रामभरोस के मुह की बात कर रहा था, उसके मुह में रामभरोस की जीभ तालू तक पहुंच चुकी थी।
परगनाधिकारी भी सामने खड़ी जीप पर बैठा और चला गया। वहीं औतार और शोभनाथ पंडित खड़े खड़े एक दूसरे का मुंह देखने लगे। औतार शोभनाथ का मुह देखते तो औतार का शोभनाथ, दोनों के चेहरों पर प्रशासन ने अपनी मुहर लगा दी थी, काली स्याही वाली। सरकारी मुहर पर लिखा था...
‘कुछ जाना करो, कुछ समझा करो, सरकार सरकार होती है, सरकार अपने ढंग से चलती है, अपने ढंग से सोचती है और सरकार को जो करना था कर दिया है उससे तुम्हारा फायदा हो तो ठीक न हो फायदा तो भी ठीक।’
शोभनाथ पंडित और औतार दोनों समय की चाल के बारे में गुनने लगे। लोकतंत्रा का समय लोक के लिए ही होता है पर यह जो समय है वह खुद लोकतात्रिक नहीं होता इसे सत्ता चलाने वाले लोकतांत्रिक बने रहने नहीं देना चाहते। वे लोकतंत्रा को अपने मन को खेल बना देते हैं और उसे अपने हिसाब से खेलते हैं..आज फिर एक खेल हो गया...
'''‘कुछ लोग होते ही हैं जो अपनी पीठ ठोंकने में
माहिर हुआ करते हैं और जब ऐसे लोग कथाओं में
होते हैं फिर क्या कहनेकृकहने के लिए शेष ही क्या बचता है?’'''
पंचायत भवन के शिलान्यास के बारे में केवल रामभरोस को ही जानकारी थी। अपने हमराहियों को भी उन्होंने नहीं बताया था। शाोभनाथ पंडित को भी पता नहीं चल पाया था पंचायत भवन के शिलान्यास के बारे में? सारा कुछ गुप्त था। एक दिन पंचायत भवन का शिलान्यास हुआ और तीन दिन के भीतर ही पंचायत भवन की बुनियाद जमीन से ऊपर उठ गई। पंचायत भवन के उसी निर्माण को गिराए जाने के दिन संयोग ही था कि शोभनाथ पंडित भी गॉव पर आ गये थे नहीं तो सहपुरवा से वे कहीं बाहर गये हुए थे किसी काम से।
रामभरोस को यह बात तब मालूम हुई जब औतार ने पट्टा खारिज किए जाने के खिलाफ दरखास दिया कि उस दरखास को उनके लड़के विभूति ने लिखा था फिर तो वे विभूति पर गरम हो गये। औतार तो इस बात के लिए भी तैयार नहीं थे कि दरखास दिया जाए किसी तरह उन्हांेने हिम्मत जुटाई थी दरखास देने के लिए। इसलिए नहीं कि वे निर्बल तथा कमजोर थे इसलिए कि रामभरोस का प्रशासन कुछ नहीं कर सकता, होगा वही जो रामभरोस चाहेंगे। सो दरखास देने से का फायदा?
औतार को जब मालूम हुआ कि डी.एम. साहब भी हरिजन हैं तो उनका विष्वास बढ़ गया कि उनकी जमीन का पट्टा खारिज होने से बच सकता है। डी.एम. साहब उनकी बातें सुन कर पट्टा खारिजा रोक सकते हैं। फिर उन्होंने दरखास दिया था। जिस दिन औतार ने दरखास दिया उसी दिन उन्हें आभास हो गया था कि अधिकारी, अधिकारी होता है वह न हरिजन होता है और न कुछ दूसरा होता है सिर्फ अधिकारी होता है। वे मान कर चल रहे थे कि दरखास देने से कुछ नहीं होने वाला।
रामभरोस मगन थे तथा अपना सीना फुलाए बैठे हुए थे। उन्हें बहुत अच्छा लगा था कि एस.डी.एम. साहब ने शोभनाथ को डांटा और झिड़क दिया। वे मान कर चल रहे थे भले ही डी.एम. साहब हरिजन हैं तो का हुआ पर हरिजनों वाला काम तो नहीं कर रहे। उन्हें डी.एम. साहब का व्यवहार देख कर यकीन था कि औतार के दरखास पर डी.एम. साहब कुछ भी नहीं करने वाले। और एस.डी.एम. तो जैसा वे चाहेंगे वैसा ही करेगा और उसने किया भी औतार को झिड़क दिया। रामभरोस ने प्रसन्नता जाहिर करते हुए चौथी से कहा....
‘का हो चौथी आज तो गड़बड़ हो जाता, औतरवा साले ने तो सारा खेल बिगाड़ दिया था। उसके समझ में आया होगा कि डी.एम. साहब हरिजन हैं और उसका पट्टा बहाल करने के लिए बोल देंगे। देखे नाहीं कैसा हरिजन हरिजन चिल्ला रहा था एक सुर से। औतरवा साले को छोड़ो शोभनथवा को नाहीं देखे...कृउहौ साला औतरवा के साथ बकबका रहा था। उसके अन्दर तनिक भी बड़प्पन नाही है, पता नाहीं कैसे बाभन के घरे में जनमा है, एकदम हरिजनै है का? सुने कि नाहीं एस.डी.एम. ने तो औतरवा को डांट दिया....
‘का बक बक कर रहे हो, पहले कहां थे, अब आए हो दरखास देने’
उस समय शोभनाथ का मुंह झुराय गया था, नेता बनता है साला, सुकुर सुकुर करता रहता है और मारने चला है सरकारी कुकुर। साले को यह पता नहीं कि रामभरोस से मोर्चा लेना पहाड़ से टकरा कर माथा फोड़ना है। देखना चौथी! शोभनथवा किधरौ का नाहीं होगा, न बाभनों का न हरिजनों का।
रामभरोस गद गद थे। उन्होंने अपने अस्तित्व की इस जंग को भी जीत लिया था। सो बोलने के मूड में थे जैसे भाषण दे रहे हों।
‘हमैं तो जानते ही हो चौथी! रियासत और अंग्रेजन के राज में भी हम केहू को कुछ नाहीं समझते थेे, राजा या जमीनदार, चाहे बड़का अफसर कोई भी हो। शोभनथवा को का समझना है यार! उसके जैसे कितने फेंकू पवारू पड़े हुए हैं विजयगढ़ में।’
उस समय चौथी गवहां रामभरोस की हां में हां बोल रहे थे। उन्हें केवल ‘हां में हां’ ही बोलना था रामभरोस की हर बात में और कर भी का सकते थे। रामभरोस को भी चौथी गवहां जैसा हां में हां बोलने वाला कोई चाहिए था। आखिर वे अपने बारे में खुद के गढ़े आख्यान किसे सुनाते? अपना गढ़ा आख्यान सुनाना हर हाल में जरूरी होता है रामभरोस जैसे सामन्ती मिजाज वालों के लिए। अपनी पीठ ठोंकना भी सामन्ती कला का ही रूप होता है, जिसमें रामभरोस माहिर हैं। इसमें का जाता है कोई दूसरा पीठ नहीं ठोक रहा तो का वे खुद भी न ठोंके, खुद ही ठोक लो। पीठ ठोंकने की यह कला भारतीय संस्कृति में काफी लोकप्रिय है और सफल भी।
बातें करते हुए ही जैसे उन्हें कुछ ख्याल आ गया फिर तो बातें बन्द करके उन्होंने रामदयाल को पुकारा... एक कर्कश आवाज मालिकों वाली, अतिरिक्त गुर्राहटों माफिक।
रामदयाल कहीं पास में था, हाजिर हो गया।
‘का सरकार! का हकुम है?’
रामदयाल ने अदब से कहा जो देखने व सुनने लायक था कि अदब अदब होती है चाहे वह जैसे आये, नमक खाने से या किसी और चीज से आये पर आये। दरबारों में अदब ही तो मातहतों का आभूषण होता है।
‘जोतिया की माई मिली कि नाहीं ? उसको आज ही हाजिर कराओ हमारे सामने।’
रामभरोस ने रामदयाल को सहेजा जो आदेष्श की तरह था।
रामदयाल कारिन्दा तत्काल वहां से चला गया जोतिया की माई को बुलाने के लिए, जोतिया की माई हरिजन बस्ती में रहती थी।
‘जोतिया की माई को अभी बुला लाना ठीक होगा। पता नहीं बाद में धियान उतर गया और उसे नहीं बुला पाए तोकृरामभरोस सरकार माथा फोड़ देंगे।’ रामदयाल बखरी से सीधे चले गए जोतिया के माई को बुलाने के लिए।
चौथी गवहां रामभरोस के पास ही में बैठे हुए थे। रामभरोस के आदेश के बिना वे बखरी से उठ कर जा भी नहीं सकते थे। रामभरोस के हुकूम की उदूली करने पर का हो सकता है चौथी जानते थे। सो वे वहीं बैठे हुए थे।
‘चौथी तनिक सुर्ती बनाओ यार! थोड़ा ठीक से गांठना, पान खाते खाते मुंह में छाला पड़ गया है, एक बात और बताओ कि पंचायत भवन के शिलान्यास वाला कार्यक्रम कैसा था?’
चौथी फूल गये गंुबारा की तरह, सरकार ने कुछ पूछा तो...कृ
‘अरे का बताना सरकार, सभै लोग बढ़िया बढ़िया चिल्ला रहे थे। आपका जैसा नाम वैसा ही काम। डी.एम. साहब भी तो आपके बारे में खूब तारीफ किए थे।’
चौथी तो रामभरोस की बातें चूसने के लिए ही वहां बैठे हुए थे और रामभरोस के लिए था कि अपना बखान जितना सुना सको सब सुना दो चौथी को। सो वे दुबारा अपने बारे में बखानने लगे....कृ
‘यार! चौथी, जानते हो आज का जमाना परचार वाला है, परचार करने कराने में कोई कसर नाहीं छोड़नी चाहिए। परचार करने में चाहे जितना खर्च लगे हम सारा खर्च करते हैं, भागते नाहीं हैं। उतना खर्चा तो हम सीलिंग वाली जमीन से ही जुटा लेते हैं। एक बात और बताएं चौथी!कृचाहे जो भी हो जाए सीलिंग वाली जमीन पर हम कभी भी कब्जा नाहीं छोड़ेंगेे। तूं देख लेना।’
बात तो बात; जब बढ़ गई तब बढ़ गई रामभरोस रौ में थे फिर उन्हें वहां कौन रोकता, समझाता कि अपने बारे में सिर्फ मूर्ख ही वाह वाह किया करते हैं। वहां केवल चौथी थे, उनसे का मतलब था कि वे रामभरोस को रोकते या सलाहते कि सरकार अपनी तारीफ खुद नहीं करनी चाहिए।
‘तूं तो जानते ही हो चौथी कि राजा के अलावा यहां की जनता केवल मेरा नाम जानती है। विजयगढ़ में मुझसे बड़ा जोतदार और धनी मानी कौन है? जितना कमाना था उतना कमा लिया है। चौथी! अब तो मुझे केवल विभूति की चिन्ता है। वे अगर सारा काम-धाम सम्हाल लेते तो मैं आराम से बैठ जाता, सारा ताम-झाम उनके ऊपर छोड़ देता। पर का बतांए विभूति ने प्रसन्नवा का गड़बड़ संग साथ पकड़ लिया है। प्रसन्नवा को तो तूं जानते ही हो लोफर है साला, लोफर। सुन रहा हूं कि वह कम्युनिस्ट पार्टी का नेता बन गया है।
चौथी को रामभरोस का दरबारी माना जाता है पर चौथी जानते हैं कि वे रामभरोस के का हैं, दरबारी हैं कि समय के साथ चलने के लिए मजबूर हैं। उन्हें पता है कि रामभरोस की जी हुजूरी नहीं करना घर में डकैती डलवाना है। रामभरोस को रोज सलाम नहीं करना खुद को किसी झमेले में फसाना है। खुद को रामदयाल जैसों के बोंग से पिटवाना है। गॉव में केवल शोभनाथ पंडित ही ऐसे आदमी हैं जो रामभरोस की जी हुजूरी नहीं करते। जो बोलना या करना होता है उनके सामने कर या बोल जाते हैं। चौथी गवहां भी शोभनाथ को अच्छा आदमी मानते हैं और जानते हैं कि शोभनाथ ही गॉव में ऐसे आदमी हैं जो किसी का नुकसान नहीं कर सकते। चौथी गवहां अब किससे कहें कि रामभरोस के आतंक के कारण ही उन्होने फेकुआ का कोला लवाय लिया था। नहीं तो वे फेकुआ का कोला कभी नहीं लवाते पर फेकुआ का कोला लवा लेने के बाद अब किस मॅुह से बोलें अपनी करनी के बारे में। कौन मानेगा उनकी बात। फेकुआ का कोला लवा लेने के बाद अब ऐसी स्थिति आ गई है कि रामभरोस को वे नहीं छोड़ सकते। थाना थूनी हो जाएगा, जेल भी जाना पड़ सकता है फिर कौन बचाएगा उन्हें? रामभरोस ही बचा सकते हैं। दारोगा आया ही था एक दिन। दारोगा के सामने होते ही वे कॉपने लगे थे। लगा था उन्हें जेल दिखाई देने। मार-पीट अलग से, पता नहीं दारोगा उन्हें कैसे मारता, डंडे से मारता या हाथ से। वे जानते हैं कि दारोगा जब मारने लगते हैं तब ऑखें मूॅद कर मारते हैं और डंडा भी नहीं गिनते। अब तो ऐसे ऐसे दारोगा होने लगे हैं जो मार-पीट न करने का रुपया लेते हैं और जेल भिजवा देते हैं। सड़ो जेल में जा कर, जर, जमानत कराओ, वह भी जमानत हो न हो। वकील मनमाना रुपया लेते हैं, मुकदमे की तारीखें पड़ती हैं। उस दिन भीतर भीतर रोने लगे थे चौथी।कृ
बहुत ही गड़बड़ हो गया है उनसे पर रामभरोस की बात टाल देते तो और गड़बड़ हो सकता था। अचानक चौथी भावविभोर हो गए।कृ
‘भला हो रामभरोस का कि उन्होंने दारोगा को संभाल लिया। दारोगा जैसे आया था वैसे ही वापस थाने लौट गया। कुछ नहीं कर पाया सहपुरवा में आ कर। संभव है रामभरोस ने दारोगा की सेवा किया हो, कुछ माल-पानी दिया हो पर पता नहीं चला। अनुमान है कि रामभरोस ने दारोगा को माल-पानी जरूर दिया होगा। बिना माल-पानी लिए सहपुरवा से खाली हाथ दारोगा काहे लौटता?
'''‘गुरू भी किसिम किसिम के होते हैं,
गुरू मानने के लिए पूरी स्वतंत्राता होती है चाहे
जिसे मान लो गुरू, हर काम के लिए गुरू चाहे काम जैसा भी हो’'''
रामभरोस का सन्देश पाते ही जोतिया की माई बखरी पर हाजिर हो गई। एक दिन पहले ही जोतिया के माई को बखरी पर बुला लाने के लिए रामभरोस ने सहेजा था रामदयाल को। बखरी पर उस दिन वह नहीं आ पाई थी। वह अपने घर का काम निपटा रही थी।
सूरुज देवता ढलान पर थे। सो उनकी चमक थोड़ी कमजोर हो चुकी थी। उस कमजोर चमक में भी जोतिया की माई चमक रही थी। संभव है वह रामभरोस की बखरी की चमक के कारण चमक रही हो या रामभरोस की चमक के कारण पर वह चमक रही थी। संभव है सुरुज देवता ही उसे चमका रहे हों। रामभरोस की बखरी तो चमकों वाली थी ही। उनकी बखरी पर उतरते ही सुबह भी बखरी की चमक पीने लगती और रात चमकती तो नहीं थी पर गुदगुदी जगा देती थी। वैसे भी वहां जो लोग होते थे वे भी चमकने लगते थे। इसी तरह बखरी पर चमकों का खेल चलता रहता था।
रामभरोस अपनी आरामदेह कुर्सी पर पसर कर हुए बैठे हुए अलग किस्म की चमक छोड़ रहे थे। जोतिया की माई को रामभरोस ने देखा फिर तो उनके चेहरे की चमक ने जोतिया के माई के चेहरे को ढंक लिया। वह भी उनकी तरह चमकने लगी। रामभरोस के चेहरे की चमक पीते हुए जोतिया की माई ने भी रामभरोस कोे देखा। फिर तो वहां चार ऑखें मिल कर एक दूसरे की चमकों को देखने लगीं। चारो ऑखों के रंजक खेल में कहना मुश्ष्किल कि जोतिया की माई रामदयाल के चमक में थी या रामदयाल जोतिया के माई की चमक में थे। कौन किसकी चमक चूस रहा था? शायद दोनों एक दूसरे की चमक चूसने लगे थे।
जोतिया की माई को लगा कि ये वही रामभरोस हैं जिन्होंने उसे कभी अपने बगीचे में पटक दिया था। रामभरोस को महसूस हुआ कि यह वही जोतिया की माई है जिसने बतौर गुरू पहली बार उन्हें महसूस कराया था कि देह अद्भुत चीज होती है फिर तो वे उसी में गोता लगाने लगे थे। जोतिया की माई को देखते ही रामभरोस समाधिस्थ हो गए।
रामभरोस की बखरी पर पहले से ही चौथी बैठे हुए थे। रामभरोस सतर्क हो गए.कृ ‘चौथी के सामने समाधिस्त होना ठीक नहीं.’कृ क्या कर रहे हैं वे?कृ
तत्काल रामभरोस ने चौथी को सहेजा...बखरी से हटाने के लिएकृ
‘कोई काम हो तो बताओ चौथी! नहीं तो कल आना फिर बातें करेगे।’
जोतिया की माई को देखते ही चौथी समझ गये थे कि अब रामभरोस दूसरी दुनिया के सैर पर निकल कर देहाघ्यात्म में चले जाएंगे सो यहां बैठे रहना ठीक नहीं, वे फौरन वहां से चल दिए। रामभरोस यही चाहते भी थे कि चौथी चले जांये फिर जोतिया के माई से अन्तरंग बातें हों देह की समाधि और साधना वाली।
रामभरोस ने जोतिया के माई से पूछा....कृकृ
‘का रे जोतिया की माई! आज कल का हो रहा है? तूं कभी बखरी पर देखाती नाहीं हो, का बात है, नाराज हो का?
‘हम तो घरै पर हैं सरकार! टैम नाही मिलता है कि एहर आंए। आप भी तो खोज खबर नाहीं लेते हैं। आज सनेश मिला और हम चले आए। अब तो हमारी तबियत भी खराबै रहती है, कब्बौं कुछ तो कब्बौं कुछ लगा रहता है।’ं
‘का हुआ रे! तेरी तबियत को?’
रामभरोस ने पूछा जोतिया की माई से...कृ
‘तबियत को का होना है सरकार! वैसा तो हरदम होता रहता है हर महीनवै में अउर का?’
जोतिया की माई ने गंभीर हो कर रामभरोस को बताया....कृ
रामभरोस उसके मजाक को नहीं समझ पाये कि वह का बोल रही है उन्होंने हमदर्दी दिखाते हुए पूछा।
‘का होता रहता है हरदम रे! हरदम बिमारय रहती हो का?’
जानने के लिए जोतिया के माई से रामभरोस दुबारा पूछे...कृकृ
‘का होता रहता है हरदम रे? हम कुछ समझे नाहीं....
जोतिया की माई ने बिना संकोच रामभरोस को बताया। वैसे भी उसे संकोच तो करना नहीं था, बस वह लजाने का अभिनय कर रही थी। उसे तो रामभरोस को एहसास कराना था कि जोतिया की माई अब भी देह वाली है तथा उसकी देह में मन को गहरे तक धकेलने वाली वाली ऊर्जा है। इस उमर में भी वह समाधिस्त हो सकती है। रामभरोस तो उसे विशेष काम से बुलाए थे, काम आसान नहीं था जिसे वे आसानी से जोतिया की माई को बता देते। उसके लिए जोतिया की माई को उन्हें मोहना था फिर तो वे उसे मोहने वाले लक्ष्य पर आ गये।
‘का रे! जोतिया की माई तूं अपना नेग वगैरह ले गई कि नाहीं, तोहार साड़ी और बिलाउज आ गया है, उसे आजै ले जाओ।’ हां रे तोहसे हमारा एक काम है, तोहें ओके कराना है हर हाल में। ओकरे लिए चाहे जितना खर्चा पानी लगे, बूझ गई न।’
‘काम का है सरकार! आप हुकुम तो कीजिए....’
काम काज का मतलब जोतिया की माई अच्छी तरह से जानती थी। उसका मतलब होता था कि वह किसी तरह से रामभरोस के लिए एक स्वस्थ, सुन्दर, देखनहरू मेहरारू का इन्तजाम करे, दू चार रात के लिए, चाहे एकै रात के लिए ही, पर करे जरूर।
जोतिया की माई जब से सहपुरवा में आयी है, तब से यही ध्ंाधा कर रही है। पहली बार ही उसे रामभरोस मिल गये थे। वह रामभरोस के बगीचे में काम कर रही थी फिर क्या था रामभरोस ने अपना पौरुष दिखाना शुरू कर दिया। वह कितना भागती, भाग कर कहां जाती, घना बगीचा सूर्यास्त के बाद वाला ताजा अन्धेरा, वह भागते भागते भहरा गई तब से लेकर आज तक भहरा ही रही है। कभी किसी के बिस्तरे पर तो कभी किसी के। रामभरोस उसे पहले बुलवा लिया करते थे तब उसकी देह अपने तन तथा मन के रयासन वाली थी। वह नहीं भूलती कि भहराने के बाद रामभरोस ने एक बार उससे कहा था....
‘जोतिया की माई तूं हमार गुरू है रे!’
गुरू तो जोतिया के माई को रामभरोस मानते ही थे। जोतिया के माई को खुद नहीं पता कि वह कितनों की गुरू है। आखिर किस किस से पूछे, एक दो होते तो पूछ भी लेती। जोतिया की माई जानती है कि रामभरोस का विरोध करने से कोई फायदा नहीं। उसका पति उसकी सुरक्षा नही कर सकता। उसका पति सीधा है, सरल है, जिसने जैसा समझा दिया उसे देववाणी मानने वाला। वह रामभरोस से नहीं लड़ सकता। अपने पति की भी सुरक्षा उसे ही करनी है साथ ही साथ अपनी भी। गॉव में केवल रामभरोस ही तो नहीं हैं, कई लोग हैं जो इठलाती देह को खिलौना बनाने के लिए तीनतिकड़म किया करते हैं। रामभरोस की गोद में जाने का मतलब फिर कोई उसे गुड़िया नहीं बना सकता। बेचारी का करती थक-हार कर रामभरोस के अन्तःपुर वाले दरबार की परजा बन गई।
जोतिया की माई अपनी बिटिया जोतिया की देह देख कर परेशान परेष्शान है। वह सयानी हो रही है। उसकी देह रोज ही कसावों की तरफ बढ़ रही है, देह के सुगठित उभारों से वह खूबसूरत दिखने लगी है। उसकी देह पर फुदकने की कोशिश में मनचले जुट गए होंगे। जोतिया को मनचलों तथा मनबढ़ो से सुरक्षित बचाने की चिन्ता उसे परेशान करती रहती है। गॉव में सबसे बड़े मनचले तो रामभरोस ही हैं।
वह जानती है कि जोतिया को भी कागज वाली ही नहीं बलखाती देह वाली गुड़िया रामभरोस बना देंगे उसके माफिक। फिर वह किसी की नहीं रह पाएगी। एक बार की ही तो बात होती है। रामभरोस के सामने वह भहरा गई तो भहरा गई, पर वह जोतिया को नहीं भहराने देगी इसके लिए उसे चाहे जो करना पड़े। वह सहपुरवा छोड़ कर भाग जाना चाहती है, पर भाग कर कहां जाए? सभी जगह तो रामभरोस और रामदयाल हैं। जोतिया को देख कर कहने वाले कहते हैं कि वह रामभरोस पर पड़ी है। उसेे भी लगता है कि वह रामभरोस से ही जनमी है। उस समय उसका संबध भी पति के अलावा केवल रामभरोस से ही था। वह रामभरोस के साथ रह कर उनका हर काम करते हुए आज तक कर्जा पटा रही है। कर्जा पटाते पटाते खुद भी पट गई पर कर्जा नहीं पटा। वह रामभरोस को जब भी देखती है ऊपर से मोहने का काम करती है पर मन के भीतर गरियाती है। उसका मन करता है कि उनके मुंह पर पिच्च से थूक दे। वह अब ऊब चुकी है, कोई नहीं जानता उसका दरद, उसके होने का अन्तर्द्वन्द। इस बार रामभरोस के पूछने पर उसे लगा कि रामभरोस जोतिया के बारे में कह रहे हैं। जोतिया के बारे में नहीं कह रहे हैं तो का हुआ आज नहीं तो कल जोतिया के बारे में जरूर कहेंगे। ओन्है लाज शरम तो है नाहीं। पर भगवान की कृपा थी कि रामभरोस ने फेकुआ की मेहरारू के बारे में उससे कहा कि उसे पटाना है चाहे जैसे। राजी हो गई तो ठीक नहीं तो किसी न किसी दिन उसे उठवाना पड़ेगा। जोतिया की माई रामभरोस से इनकार नहीं कर सकती थी। रामभरोस से इनकार का मतलब कई तरह की बर्बादी, गॉव से खदेड़ा जाना, टोनही का ठप्पा लगवाना। गॉव की एक दो औरतों ने रामभरोस की बात नहीं माना था, उनकी गोदी में भहराने से इनकार कर दिया था। रामभरोस ने गॉव में डंका पिटवा दिया कि वे टोनहीं हैं फिर गॉव वालों ने ही उन औरतों को मार-पीट कर गॉव से खदेड़ दिया। अब तक पता नहीं चला कि वे कहॉ हैं, नदी, नाले में डूब कर मर-बिला गई होंगी!
जोतिया की माई डर गई रामभरोस से, ये जो कहें वैसा ही करो नहीं तो रात ही में वे जोतिया को उठवा लेंगे फिर वह का करेगी? ऐसा तो संभव नहीं कि रामभरोस को जोतिया के बारे में नहीं पता होगा, जरूर पता होगा। वे सहपुरवा की माटी तक सूंघते रहते हैं फिर कैसे संभव है कि उनके तक जोतिया की गंध न पहुंची हो।
जोतिया की माई सवधान रहा करती थी रामभरोस से, अगर रामभरोस की ऑखें जोतिया पर टिक जांएगी फिर तो वह उनसे साफ साफ बोल देगी। का करने जा रहे हैं सरकार! जोतिया तो आपकी ही बिटिया है, का आप अपनी बिटिया को ही गोदी में झुलांएगे? उसी की देह पर साधना करेंगे? पर ऐसा समय जब आएगा तब आएगा, अभी तो फेकुआ की मेहरारू के बारे में रामभरोस बतिया रहे हैं। उसे बहुत सावधानी से रहना होगा सो जैसा रामभरोस कह रहे हैं वैसा ही करना चाहिए। बहुत कुछ सोच समझकर जोतिया की माई ने रामभरोस से ‘हां’ कह दिया था कि फेकुआ की मेहरारू को बखरी में लाने के लिए वह पूरी कोष्शिश करेगी।
'''‘पता नहीं क्या है कि जनप्रतिरोध
खुदबखुद तनेन हो जाते हैं किसी को पता
नहीं चला कि कैसे जनम गया सहपुरवा में जनप्रतिरोध?’'''
पंचायत भवन का शिलान्यास होते ही हरिजन बस्ती में कोकहाड़ मच गया। गॉव वालों से औतार को जो कहना था वे कह ही चुके थे। सुक्खू ने भी हरिजनों के चौधरी को बुलवा कर सारा वृतांत बता दिया था कि चौथी गवहां ने फेकुआ का कोला लवा लिया और औतार का पट्टा खारिज करा कर उस पर पंचायत भवन रामभरोस बनवा रहे हैं। हरिजनोें के चौधरी रामभरोस को जानते थे। उनके आतंक और स्वभाव के बारे में उन्हें सारा कुछ पता था। पुनवासी ने ही सुगिया के मामले में पंचायत किया था। उन्हें पता था कि सुगिया को उसके घर में से रामभरोस उठवा ले गये थे। उस पंचायत में औतार को दरी और भात माड़ की सजा मिली थी। औतार ने जैसे तैसे भात माड़ और दरी पंचायत को दे कर सजा भुगता था।
जमीनदारों के राज में हरिजनों की कौन सुनता था पर अब ऐसा नहीं है। पुनवासी चौधरी जानते हैं, उन्होंने निश्चित कर लिया है कि इस बार पहले की तरह नहीं होगा कुछ न कुछ करना होगा रामभरोस के खिलाफ। उनकी मनमानी नहीं चलने दी जाएगी। देश की आजादी की गंध पीकर पुनवासी बदल गये थे उन्हें लगने लगा था कि अब डर कर नहीं रहना चाहिए हालांकि उन्होंने स्वतंत्राता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया था। पर उस संग्राम को देखा जरूर था। उनके सामने ही विजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह को गिरफ्तार किया गया था और वे इन्कलाब जिन्दाबाद बोलते हुए गिरफ्तार हुए थे। गिरफ्तार होते समय उनके चेहरे पर तनिक भी शिकन नहीं थी, उनसे भाग चुका था डर, वे निर्भीक हो चुके थे। उनका चेहरा आजादी की चमक से अचानक चमक उठा था। बाद में पता चला कि अंग्रेजों ने लक्ष्मण सिंह को सुअरसोत के जंगल में गोली मार दिया था। लक्ष्मण सिंह का चेहरा आज भी याद करते हैं पुनवासी चौधरी, बात बात में कहा करते हैं....कृ
‘हमरे विजयगढ़ में तो एकै मरद थे, बाबू लक्ष्मण सिंह, लड़ गए थे अंग्रेजों से। पूरे छह महीने तक रामगढ़ रियासत में अंग्रेजों की एक भी न चली। कलक्टर को तो ऐसा झापड़ मारे थे कि वह भहरा गया था वहीं जमीन पर। उनके बाद तो विजयगढ़ में कोई मरद हुआ ही नाहीं।’
पुनवासी को अचानक लक्ष्मण सिंह ने जकड़ लिया। वे लक्ष्मण सिंह की तरह बोलने लगे, कड़क और ओजपूर्ण....
‘भाईयों जान लो जमीन किसी के बाप की नाहीं होती है। सब कुछ आदमी बना सकता है पर जमीन नाहीं बनाय सकता, नदी, पहाड़ कुछ भी नाहीं बनाय सकता। यह सब तो भगवान ने बनाया है, सभी के लिए कुछ लोगों के लिए नाहीं। सारी जमीन सरकार की है। सरकार ने ही औतार को जमीन का पट्टा दिया था। उसे रामभरोस कैसे खारिज करा सकते हैं। यह सब जो सहपुरवा में हो रहा है हमलोगों की कायरता और कमजोरी के कारण हो रहा है। एक बात और सोचिए आप लोग! अपने जॉगर से रामभरोस पंचायत भवन तो बनाएंगे नाहीं। उसे तो हमारे जैसे मजूरा ही बनांएंगे फिर काहे के लिए परेष्शानी है। एक काम करना है हमलोगों को, पंचायत भवन पर काम करने ही नाही जाना है फिर कैसे बनेगा पंचायत भवन। सभी मजूरों को पंचायत भवन के काम पर जाने से रोकना होगा, मजूरे मान भी जाएंगे। कोई नाहीं जाएगा पंचायत भवन के काम पर।’
बैठक में ढेर सारी बाते हुईं, बातंे सभी की वाजिब थीं। पंचायत भवन के निर्माण का काम रोकने के मुद्दे पर लोगों की आशंका थी कि मारपीट हो सकती है उसमें से उपस्थित लोगों ने कहा कि हम भी मार करेंगे अगर वे हमैं मारेंगे तो हम ओन्है नाहीं छोडेगे, हम लोग भी उन्हें मारेंगे जो हमैं मारने आएगा। बातें बहुत हुईं पर सभी बातांे से पुनवासी को क्या लेना देना था। सभी के द्वारा मान्य बात पर आखिरी फैसला हुआ कि पंचायत भवन किसी भी हाल में नहीं बनने देना है। इसके लिए चाहे जो करना पड़े। पंचायत में यह भी तय किया गया कि पहले हमलोग शान्ति से काम लेंगे अगर झगड़ा झंझट हुआ तो थाने पर रपट करेंगे। थाने पर गवाही देंगे, चन्दा इकठ्ठा करके मुकदमा लड़ेंगे, वे डंडा चलांएगे तो हम भी चलाएंगे जैसे हल चलाते हैं, उन्हें जोत कर पाटा दे देंगे। रामभरोस जैसे आदमी के कंट्रोल में रहने से अच्छा है कि जेल के कंट्रोल में रहा जाए वहां तो खाना भी मिलता है, जान की सुरक्षा भी रहती है। गॉव में रहो तो सरकार ख्याल नहीं करती जेल में रहने पर तो ख्याल करेगी ही। और इस गॉव में का है? बिना खाए मरो। पर अब नाहीं बहुत हो चुका, सहपुरवा में रहना है तो शान से रहना है।
हरिजनों की बैठक के बारे में शोभनाथ पंडित को कुछ भी पता नहीं था। कुछ आवश्यक समझ कर औतार को बुलाने के लिए शोभनाथ ने प्रसन्नकुमार को हरिजन बस्ती की तरफ भेजा था। प्रसन्नकुमार औतार को खोजते हुए हरिजन बस्ती में पहुंचा तब उसे मालूम हुआ कि पंचायत भवन के बाबत हरिजनों की बैठक हो रही है। औतार बिरादरी की बैठक में थे। बैठक गॉव के पोखरे पर हो रही थी। जहां बैठक हो रही थी प्रसन्नकुमार वहां जा पहुंचा। औतार को देखा कि वे बैठक में व्यस्त हैं। औतार ने इशारा भी किया जिसे प्रसन्नकुमार समझ गया कि सभी लोग उसे बैठक में बैठने के लिए बोल रहे हैं। प्रसन्नकुमार बैठक में शामिल हो गया। हरिजन सोच नहीं सकते थे कि उनकी बैठक में प्रसन्नकुमार बैठेगा उन्हीं लोगों के अगल बगल सट कर। वे तो यही जानते थे कि उनकी देह मालिकों को घिनाती है पर प्रसन्नकुमार बहुत सहजता सेऔतार के बगल में बैठ गया। पुनवासी चौधरी प्रसन्नकुमार को अपनी बिरादरी की बैठक में बैठा देख हुमक पड़े....कृ
‘भइया जी आप बताएं हमलोग का करें, औतार की जमीन पर रामभरोस पंचायत भवन बनवा रहे हैं।’
‘देखिए चौधरी साहेब, बैठक वगैरह करने से कुछ नहीं होने वाला। बैठकें तो होती रहती हैं। पर होता कुछ नाहीं है। हम तो सोच रहे हैं कि पंचायत भवन पर आप लोग काम करने ही न जांए और न किसी मजूर का जाने दें। समझ लीजिए काम हो गया। रामभरोस अपने जांगर से पंचायत भवन तो बना नहीं पाएंगे। पंचायत भवन का काम एक दिन का है भी नहीं, बुनियाद पड़ेगी, फिर दीवार उठेगी। कम से कम महीने भर का समय लगेगा। अगर आप लोगों ने वहां काम करना बन्द कर दिया फिर समझ लीजिए काम हो गया। इस बैठक में काम बन्द करने का प्रस्ताव पास कराइए चौधरी साहेब कि पंचायत भवन पर काम करने कोई मजूर नहीं जाएगा।’
प्रसन्नकुमार का इस तरह बोलना आग में घी डालना था किसी ने वहां कहा भी कि ‘बांस के जरी बांसय जामता है’ यानि जैसे शोभनाथ पंडित वैसे ही उनका लड़का भी।
किसी दूसरे ने प्रसन्नकुमार की नियति पर सवाल उठा दिया....कृ
‘प्रसन्नकुमार ईहां ऐसा बोल रहे हैं पर रामभरोस के सामने होने पर घिघियाने लगेंगे, मुकर जांएगे, फिर कुछ नहीं करेंगे।’
प्रसन्नकुमार अपनी आलोचना सुन रहा था और महसूस कर रहा था कि हजारों साल की यातनाओं ने इन्हें अविश्वासी बना दिया है। हजारों साल की प्रताड़ित लोग भला कैसे विष्वास कर सकते हैं प्रताड़कों पर? सभी ने इन्हें ठगा है, इनकी उदारता का बेजा लाभ उठाया है, मारा-पीटा है, गालियॉ दी हैं। इनके दिल दिमाग से विश्वास का गायब होना कोई अचरज नहीं।
पर किसी को नहीं पता कि प्रसन्नकुमार चाहता क्या है? प्रसन्नकुमार चिन्तित हो गया। उसे कोई न कोई प्रमाण देना पड़ेगा तभी लोग मानेंगे। पर वह जानता है कि उसमें गरीबों के साथ चलने की ऊर्जा है। अभी उसने कोई ऐसा उदाहरण भी तो प्रस्तुत नहीं किया है जो साबित करता हो कि उसका पक्ष गरीबों का है। वह वहां मीटिंग में का बोलता इस बाबत, फिर भी बोला....कृ
‘आप लोग मेरे ऊपर सन्देह कर रहे हैं यह सही है। आपलोगों को मेरे जैसांे पर सन्देह करना भी चाहिए। पर सभी एक तरह नहीं होते, अब तो समय आ गया है, आपलोग देख लेंगे कि आपलोगों के साथ मैं हूं या नहीं हूं।’
प्रसन्नकुमार खुद को नहीं रोक सका वह आवेश में आ गया, उसका चेहरा लाल हो गया। वह हरिजनों के आतंकित मन का विश्लेषण करते हुए घर वापस लौटा। आज के समय में हरिजन किसी पर विश्वास नहीं कर सकते कितना खतरनाक समय आ गया है कि उन्हें किसी पर विश्वास भी करने नहीं दे रहा। हरिजनों का समाज पर अविश्वास शोषण और अत्याचार का ही सबूत है। वे शंकालु हो गये हैं जिसके कारण उनके पहचानने की शक्ति कमजोर हो गई है। वे उसे भी नहीं पहचान पा रहे हैं जो उनकी भलाई करना चाहता है जो दुश्मन हैं उन्हें क्या पहचानना? वे समाज को शक़ की निगाह से देखते हैं, सचाई भी तो यही है उन्हें हर मोड़ पा छला गया हैं। उनके साथ जीवन जीने के तमाम रास्तों पर किसिम किसिम की चालें चली गई हैं। उनकी तरक्की रोकने के लिए बन्द कमरों में छलावा पूर्ण योजनांए बनाई जाती हैं? अखबारों में उन पर होने वाले अत्याचारों को प्रकाशित करने में भी राजनीति की जाती है। किसिम किसिम की फर्जी जांच कमेटियां नियुक्त की जाती हैं। अंग्रेजी जमाने से यही क्रम आज तक चला आ रहा है। कहने को तो कहा जाता है कि सरकार सभी की है पर काम केवल अमीरों एवं लुटेरों का ही करती है। विश्वास और अविश्वास की लड़ाई में हरिजनों के विश्वास को छीन लिया गया है, केवल सांसे लेते हुए अब वे भगवान की प्रार्थनांए कर रहे हैं। उनके पास एक ही रास्ता बचा हुआ है भगवान की प्रार्थनाओं से खुद को सजाने, संवारने का। वे वैसा कर भी रहे हैं।
इधर उधर कर करा कर कुछ दिनों बाद पंचायत भवन का निर्माण रामभरोस ने प्रारंभ करा दिया। प्रसन्नकुमार और शोभनाथ पंडित पंचायत भवन का बनना सरकारी स्तर पर नहीं रोकवा सके हालांकि उन लोगों ने अपने स्तर से खूब पैरवी किया था फिर भी। प्रशासन भी खूब खूब होता है जो कुछ खास लोगों की ही सुनता है और उनकी बातों को गुनता है।
प्रसन्नकुमार ही नहीं रामभरोस के लड़के विभूति के मन मे भी काफी दुख था कि वे पंचायत भवन का निर्माण नहीं रोकवा सके। विभूति भी नहीं चाहता था कि औतार के पट्टे वाली जमीन पर पंचायत भवन बने पर वह अपने पिता का प्रत्यक्ष विरोध नहीं कर सकता था। पंचायत भवन निर्माण रोकवा सकने की ताकत उसके पास थी भी नहीं। विभूति और प्रसन्नकुमार को दुख इस बात का था कि उन दोनों पर हरिजन विश्वास नहीं कर रहे थे। हरिजन विश्वास करते भी तो क्यों? विभूति और प्रसन्नकुमार दोनों सवर्णों के लड़कों लफाड़ियों में शुमार थे। और विभूति तो रामभरोस का ही लड़का था सो हरिजन उस पर काहे विश्वास करते। बात साफ थी। रही बात प्रसन्नकुमार की तो वह भी नेता परेता तो था नहीं, एक सामान्य सा लड़का था। उसके पास लोगों का प्रभावित कर सकने की नेताओं वाली कला न थी।
प्रसन्नकुमार को नेता कहा भी जाता तो क्यों? वह नेता था भी नहीं और न ही नेताओं वाली उसके पास कला थी। वह रापटगंज में रह कर पढ़ता था। छन्नू या बेचन की चाय, पान की दूकानों पर भी वह नहीं जाता था जहां नेताओं का जमघट लगा करता था। खादी आवरणधारी भी नहीं था। उसकी फोटो भी अखबारों में नहीं छपती थी। उसका बयान कभी भी इस बाबत अखबारों में प्रकाशित नहीं हुआ था कि रापटगंज क्षेत्रा में और क्षेत्रों के मुकाबिले गरीबी अधिक है। सूखा पड़ने पर भी यहां सहायता कार्य नहीं चलाए जाते हैं। वह किसी दल विशेष का सदस्य भी नहीं था। भंाग खा कर रात भर बाजार में घूमता नहीं था। उसके पास यह भी कला नहीं थी कि देश की राजनीति को भंाग की गोली में भर ले और राजनीति, राजनीति चिल्लाता रहे। यहां तक कि उसे जार्ज फर्नाडिंस या अटल जी के जुकाम होने पर जुकाम भी नहीं होता था। वह ऊंच-नीच का भेद तो कत्तई नहीं जानता था। वह तो एक ऐसा आदमी था जो अपने समय में रहते हुए भी आदमी और आदमी में भेद नहीं कर पाता था। जाने कैसे किन सैद्वान्तिक आधारों के कारण वह सिर्फ यह जानता था कि सभी के खून का रंग एक ही तरह का लाल लाल होता है। चाहे वह किसी का हो, अमीर का हो, गरीब का हो। उसे इतना ही मालूम था कि आदमी को रोटी चाहिए। एक आदमी दूसरे आदमी का शोषण न करे और हर हाल में आदमी बना रहे। वह तो बस इतना ही जानता था। प्रसन्नकुमार ने तय कर लिया था कि औतार के पट्टे वाली जमीन की घटना को राजनीतिक रंग देना है इस काम के लिए जितना वह कर सकता है औतार के लिए करेगा और पट्टा को किसी भी तरह बहाल कराएगा। उसे पता था कि इस तरह की घटना केवल उसी के गॉव की ही नहीं है पूरे क्षेत्रा की है। प्रसन्नकुमार कोई विचारक नहीं था पर उसे पता है कि हरिजन और छोटे किसान हर जगह प्रताड़ित हैं। उन्हें किसी भी हाल में राजनीति की उदारता या अनुकंपा नहीं मिल रही। हरिजनों के बारे में कोई नहीं सोच रहा, कम्युनिस्ट भी जाने किस प्रकार की राजनीति कर रहे हैं, न उनके पास सरकार का विरोध करने की ताकत है और न ही प्रार्थनाआंे वाली विनम्रता है।
प्रसन्नकुमार देख चुका था कि ईमरजेन्सी लगने के कारण देश के विरोधी नेताओं को अचानक एक झटके में जेल में डाल दिया गया। बिना वारंट के विरोधी नेताओं की गिरफ्तारियां की र्गइं जो अब भी जारी हैं। पुलिस जब चाहती है जिसे चाहती है उठा लेती है। सड़कें पुलिस की हो गईं हैं। उन पर उनके बूट दौड़ रहे हैं। प्रसन्नकुमार देख रहा था कि सरकारी घोषणांए यूं ही हवा में उछलने वाली चीजों की तरह उड़ रही हैं। भूमि आवंटन तथा नसबंदी में होने वाले अत्याचारों को वह जानता था।
प्रसन्नकुमार ने एक पर्चा छपवाया जिसमें हरिजनों व दलितों पर होने वाले अत्याचारों के विवरण थे। पर्चे में सारा कुछ साफ साफ लिखा था, पर्चा पढ़ने से ऐसा लग रहा था कि उसे किसी प्रताड़ित आदमी ने ही छपवाया होगा।
‘आज हम छोटी बिरादरी के लोग, छोटी जोत के लोग एक दूसरे से अलग थलग होते जा रहे हैं। हममें मतभेद भी बढ़ते जा रहे हैं। कुछ थोड़े से लोग जो शक्तिमान हैं, वे बड़ी जोत व जाति वाले हैं। वे हमारी फूट का नाजायज फायदा उठा रहे हैं। लगता है ‘जोत’ और ‘जाति’ का पुराना रिश्ता है। जिसकी जोत बड़ी, उसकी जात भी बड़ी। हमारी स्वतंत्राताएं छीनी जा रही हैं। भूमि आवंटन में धांधलियां की जा रही हैं। जोर जबरदस्ती नसबन्दियां करवाई जा रही हैं। हमारे सम्मानित नेताओं को जेलों में बन्द कर दिया गया है और किया जा रहा है। ऐसे में हम क्या करें? रास्ता क्या है? चुनाव, संघर्ष, क्रांति, प्रतिक्रांति, संपूर्ण क्रांति या 47 के पहले वाली बात, फिर वही सवाल, शासन कौन करेगा? जनता या कुछ लोग। कमजोर या ताकतवर? कौन करेगा शासन? भूख और भोजन के बीच की दूरी नापने में परेष्शान जनता या खाए, अघाए, महलों में अय्याशी करने वाले लोग। अंग्रेजी मिजाज के देशी लोग या भारतीय मिजाज के गरीब लोग। आखिर शासन कौन करेगा हम पर? हम अपनी पीठ तथा पेट किसके सामने दिखायंे, उस पर किस हुकूमत का नाम लिखंे, सियाही से लिखें या खून से?’
पर्चा नकली नाम से छपा था आपात काल में उसे असली नाम से छपवाने का साहस प्रसन्नकुमार के पास नहीं था।
पर्चा बंटने लगा, प्रसन्नकुमार गॉव गॉव घूम कर सरकारी नीतियों की आलोचना करने लगा। वह लोगों तक पहुंचने लगा, लोग उसके पास आने लगे, जनता से जुड़ाव वाला एक नये किसिम का राजनीतिक सिलसिला शुरू हुआ। वह लोगांे की बातें सुनता, लोग उसकी बातें सुनते। लोगों का विश्वास उस पर बढ़ने लगा, लोग उसके साथ होने लगे। कहीं उसे नफरत और आलोचना भी मिलती पर वह निराश नहीं होता। उसे जनता का प्यार मिलता और दुलार भी जो उसे ताकत देती। प्रसन्नकुमार महसूस कर रहा था कि लोग उसके सामने उसकी हां में हां तो मिला देते थे पर कुछ लोग ही उसके साथ चल पाते थे। अपने गॉव से निकल कर दूसरे गॉव में जाने के लिए अक्सर नौजवान लड़के ही तैयार होते थे और उसके साथ चल भी पड़ते थे। प्रसन्नकुमार हार मानने वालों में से नहीं था। वह अपने अभियान को हर हाल में जनता का अभियान बनाना चाहता था।
किसी और को भले ही न मालूम हुआ हो कि पर्चा किसने छपवाया था पर रामभरोस को मालूम हो गया था। रामभरोस को अच्छा मौका मिला शोभनाथ पंडित से निपटने का। पर्चा के बहाने शोभनाथ ही नहीं प्रसन्नकुमार को भी वे जेल भिजवा सकते हैं। फिर तो रामभरोस कृपालु जी से मिलने रापटगंज चले गये।कृ
कृपालु जी अपने घर पर ही थे, मिल गये। रामभरोस को देखते ही उन्होंने प्रसन्नता ओढ़ लिया....कृ
‘आइए, आइए रामभरोस जी, आपका ही इन्तजार कर रहा था। यहां तो आनंद ही आनंद है विरोधी दलों के कुछ लोग जो नेता बना करते थे, साले बाहें फुलाते थे उन सालों को जेल भिजवा दिया है। उनमें जो साले चतुर तथा नमक हराम थे वे फरार हो गये हैं। पर जांएगे कहां? एक न एक दिन तो पकड़ाएंगे ही।
‘वाह वाह ’ रामभरोस ठठाए
कुछ देर बाद रामभरोस ने मुह खोला....
‘पर कुछ लोग अभी भी बाकी रह गए हैं पंडित जी, उनकी गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। जबकि वे कमीनई कर रहे हैं।’
कुर्ते की बांह चढ़ा कर कृपालु जी ने रामभरोस से पूछा...
‘कौन बाकी रह गया है हो?’
‘अरे पंडित जी! वही शोभनथवा का लड़कवा, का तो नाम है उसका, अरे प्रसन्नकुमरवा।’’ रामभरोस ने कृपालु जी को बताया...
‘का बात कर रहे हैं रामभरोस जी, वह तो पढ़ने लिखने वाला लड़का है, रापटैगंज में रहता है, उसको का फसाना ईमरजेन्सी में’
वैसे भी प्रसन्नकुमार कृपालु जी के दूर के रिश्ते में आता था। वह कृपालु जी की फूआ का लड़का था। रामभरोस तो गॉव से सोच कर चले थे कि वे कृपालु जी को राजी कर लेंगे और वे प्रसन्नकुमार को गिरफ्तार करवा देंगे पर कृपालु जी तो प्रसन्नकुमार के मामले में लोच खा रहे थे। वे नहीं चहते थे कि प्रसन्नकुमार गिरफ्तार किया जाए। रामभरोस ने चालाकी दिखाया और अपनी जेब से प्रसन्नकुमार वाला पर्चा निकाला।
‘पंडित जी यह पर्चा पढ़िए, इसमें सरकार की तेरही कर दी गई है। जरा पढ़िए इसे, वह पूरे क्षेत्रा में इहै पर्चवा बांट रहा है, जनता पर इसका बहुत ही बुरा असर पड़ रहा है। लोग कह रहे हैं कि कृपालु जी का नातेदार है का होगा इसका’आपकी बदनामी हो रही है पंडित जी....’
कृपालु जी ने तो उस पर्चे को पहले ही देख लिया था उनके लिए वह नई बात नहीं थी। नई बात सिर्फ यह थी कि उसे प्रसन्नकुमार ने छपवाया था। कृपालु जी खुद पता लगा रहे थे कि इस तरह का पर्चा किसने छपवाया और कौन बटवा रहा है। रामभरोस के बताने पर वे खामोश हो गये। वे सोच भी नहीं सकते थे कि उनकी रिश्तेदारी का कोई लड़का गिरफ्तार होकर जेल जाये। पर रामभरोस कम गोटीबाज नहीं थे उन्होंने ऐसा पैतरा बदला कि कृपालु जी को रामभरोस की बात माननी पड़ी। प्रसन्नकुमार को डी.आई.आर. का मुल्जिम बनवाने के साथ साथ उसे गिरफ्तार करवाने की पैरवी भी, कृपालु जी को करनी पड़ गई।
पर्चा बटवाने के पहले ही प्रसन्नकुमार अपना घर छोड़ चुका था। उसे पता था कि रामभरोस उसे गिरफ्तार करवाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे। एक दिन वह विभूति के साथ रापटगंज गया था फिर दोनों वहां से कहां गायब हो गये सारा कुछ अज्ञात था। रामभरोस को पता नहीं था कि वे दोनों कहां हैं और क्या कर रहे हैं।
पर शोभनाथ पंडित को पता रहता था कि प्रसन्नकुमार कहां है और क्या कर रहा है। हालांकि पंडिताइन को पता नहीं था। प्रसन्नकुमार अपने पिताजी से बराबर संपर्क बनाए रखता था उन्होंने उससे कहा भी था कि अपने बारे में बराबर बताते रहना।
'''‘यह जो प्रषासनिक स्तर पर लूट और
आतंक का मामला है अपनों की ही लूट और आतंक
का मामला है किसी गैर के नहीं, पर इस सचाई को कौन समझे?’
'''
कृपालु जी की सक्रिय पैरवी के कारण प्रसन्नकुमार को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस सक्रिय हो गई और प्रसन्नकुमार को जगह जगह खोजने लगी। फिर भी प्रसन्नकुमार पुलिस को नहीं मिला। पुलिस पर कृपालु जी का दबाव था ही सो पुलिस ने फटाफट शोभनाथ पंडित के घर की कुर्की करना अपना लक्ष्य बना लिया। पुलिस के लिए कुर्की करना बहुत आसान होता है। पुलिस कुर्की करके खुद को सुरक्षित बचा लेती है फिर पुलिस पर सवाल नहीं उठ पाते।
दो चार दिन बाद, सात आठ सिपाहियों के साथ दारोगा जी सहपुरवा आ धमके। दारोगा का कहना था कि शोभनाथ पंडित के घर की कुर्की का उन्हें आदेष्श मिला है और वे उनकी कुर्की करने के लिए आये हैं। गॉव में इधर उधर पैतरा मारने के बाद दारोगा जी सीधे शोभनाथ के घर पर टपक पड़े। शोभनाथ पंडित घर पर ही थे। उन्होंने दारोगा जी को नमस्कार किया फिर जलपान के लिए निवेदन किया पर दारेगा जी ने नकार दिया।
‘मुल्जिम के घर का जलपान उन्हें नहीं करना है, वे सरकारी काम करने आए हैं जलपान करने नहीं।’
‘प्रसन्नकुमार आपका लड़का है नऽ उसके खिलाफ वारंट है आपने उसे कहां छिपाया हुआ है। सच सच बता दीजिए नहीं तो हम आपके घर की कुर्की करेंगे, यह देखिए कुर्की का आदेश।’
ष्शोभनाथ पंडित चौंक गये का बोल रहा है दारोगा? मेरे लड़के को काहे गिरफ्तर करेगा? का किया है उसने?’ शोभनाथ पंडित ने दारोगा से पूछाकृ
‘का किया है मेरे लड़के ने? काहे के लिए कुर्की का आदेश है, अगर मेरे लड़के ने अपराध किया है तो उसे गिरफ्तार कीजिए। मेरे घर की कुर्की काहे करेंगे?’
दारोगा हसने लगा, हसते हुए ही बोला....कृकृ
‘अरे पंडित जी वह डी.आई.आर. का मुल्जिम है, सरकार विरोधी पर्चा बंटवा रहा है, इसे देखिए, यह वही पर्चा है। सरकार विरोधी पर्चा बंटवाना अपराध है? पता नहीं कहां वह भाग गया है, खोजने पर नहीं मिल रह है और न ही उसने अब तक सरेन्डर किया फिर तो कुर्की ही न होगी वह भी आपके घर की ही, उसका कहॉ घर है?’
‘हां आप ठीक बोल रहे हैं। आपका कहना है कि प्रसन्नकुमार ने अपराध किया है तो उसके घर की कुर्की कीजिए, मेरे घर की कुर्की काहे करेंगे आप? यह कौन सा कानून हुआ? अपराध करे कोई और कुर्की हो किसी दूसरे घर की।’
ष्शोभनाथ पंडित जी तो पंडित जी थे उन्होने दारोगा को उलाहा....कृ
सहपुरवा के लोगों ने डी.आई.आर. का नाम कभी नहीं सुना था। यह का हो सकता है, कौन सा अपराध है यह? कतल, डकैती, फौजदारी, बलवा, बलात्कार, राहजनी आदि का नाम तो गॉव वालों ने सुना था पर डी.आई.आर. का नाम कभी नहीं। दारोगा जी के साथ रामभरोस भी थे। शोभनाथ पंडित रामभरोस का मुंह ताकने लगे। रामभरोस का ही खेल होगा प्रसन्नकुमार को डी.आई.आर. में फसवाने वाला। ष् शोभनाथ पंडित से नहीं रहा गया तो उन्होंने दुबारा दारोगा से पूछा....कृ
‘मेरे घर की कुर्की काहे करेंगे आप, अपराध प्रसन्नकुमार ने किया है मैंने तो नही किया हैं। बेटे के अपराध की सजा बाप को यह कैसा न्याय है दारोगा जी।‘
दारोगा तो दारोगा वह अपनी रौ में आ गयाकृउसके साथ कानून था, वह रौ में काहे नाहीं आता? रौ में आने की ही तो उसे ट्रेनिंग दी गई है। गुस्सा करना, मारना, पीटना इसी काम की तो उसने ट्रेनिंग लिया है। दारोगा तो केवल इतना ही जानता है कि अपराधी न मिले तो उसके मॉ बाप को थाने पर बिठा लो, उसके घर की कुर्की कर लो, उसका अपना घर न हो तो उसके बाप के घर की कुर्की कर लो।
‘बक बक जीन करो, प्रसन्नकुमरवा को हमारे हवाले कर दो नहीं तो गांड़ में डंडा कर देंगे, अभी हम शराफत से बतिया रहे हैं।’
पुलिस के अपने नियम और कानून होते हैं। वे नियम कुछ ज्ञात होते हैं तो बहुत कुछ अज्ञात होते हैं। अज्ञात कानून के अनुसार कुछ सिपाही शोभनाथ के घर में घुस कर घर की तलाशी लेने लगे। घर में प्रसन्नकुमार नहीं मिला, मिलता भी कैसे घर में वह था ही नहीं। फिर सिपाही घर का सामान बाहर फेंकने लगे। शोभनाथ पंडित के घर का सामान देखते देखते ही बाहर फेंक दिया सिपाहियों ने। वहां गॉव के लोग थे, शोभनाथ के हितुआ, मितुआ थे, गॉव की सभ्यता थी, आदर्श थे, सिपाही कुल आठ थे। आठ ही काफी थे। कानूनी सरकस करने में पुलिस को भला कितनी देर लगती?
ष्शोभनाथ पंडित के घर का सामान बाहर फेंक देने के बाद शोभनाथ के बैल, गाय, भैंस सब थाने की ओर ले जाए जाने लगे।
ष्शोभनाथ पंडित अवाक थे, सारा गॉव अवाक था, वे कुर्की देख रहे थे, ऐसी ही होती है कुर्की। घर का सारा सामान निकालो और उसे फेंक दो तथा थाने ले जाओ। प्रसन्नकुमार की मां और बहनें घर में रो रही थीं और पंडित शोभनाथ अपनी बर्बादी का कुर्कीनुमा दृश्य देख रहे थे। युग बदल रहा था और स्थितियां बदल रहीं थीं, नागरिक आजादी को ठेंगा दिखाया जा रहा था पर रामभरोस के लिए यह सब मनोरंजन था। उनके लिए वही पुराना वाला समय था। सामंती मिजाज वाला, चाहे जिसे मारो पीटो, प्रताड़ित करो। शोभनाथ की बर्बादी से भीतर भीतर वे हसियां बटोर रहे थे। शोभनाथ का बर्बाद हो जाना उनके लिए महज एक खेल था ‘जो उनसे टकराएगा चूर चूर हो जाएगा’ जैसा। शोभनाथ के घर का सारा सामान उनके घर के सामने कुछ ही देर में कूड़े करकट की तरह फेंक दिया गया। ऐसे ही तो होती है कुर्की। पुलिस की कुर्की का काम खतम हो गया। पुलिस ने आनन फानन में कुर्की का काम निपटा लिया। उस समय का दृश्य ही ऐसा था कि शोभनाथ पंडित का दिल दिमाग भी कुर्क हो चुका था।
‘कहां जाएगा साला प्रसन्नवा, भाग कर आएगा ही थाने पर, थाने पर जब वह हाजिर होगा वह दृश्य देखने लायक होगा।’
ष्शोभनाथ पंडित ने प्रसन्नकुमार की मां को रोता हुआ देख कर बहुत तेज डांटा था....कृ
‘काहे रो रही हैं पंडिताइन, प्रसन्नवा चोरी, डकैती नाहीं किया है। आपको नहीं पता कि इस समय देश के सारे विरोधी नेता जेल में बन्द कर दिए गए हैं। आपातकाल का जो सच है उहै सब तो भइया ने छपवाया है पर्चा में। भइया गिरफ्तार हो जाएगा तो का बिगड़ जाएगा, वह देश के लिए लड़ रहा है, अन्याय के खिलाफ लड़ रहा है। यह तो गर्व की बात है। समझ रही हैं नऽ। आपको तो भइया के काम पर खुष्श होना चाहिए और आप रो रही हैं। वह तो वही काम कर रहा है जो सरकार को करना चाहिए था। सरकार इसीलिए उससे नाराज है कि वह सरकार का काम क्यों कर रहा? जनता के लिए किया जाने वाला उसका काम सरकार को बुरा लग रहा है, इसी लिए पुलिस उसे खोज रही है। आखिर वह कौन होता है जनता का काम करने वाला, जनता का काम करने के लिए तो सरकार होती है, जनप्रतिनिधि होते हैं, वह तो केवल एक नागरिक है। एक नागरिक की इतनी हिम्मत कि वह जनता का काम करे।’
ष्शोभनाथ की बातें सुन कर दारोगा ने मुंह फेर लिया। शोभनाथ पंडित चुप थे जरूर पर उनके माथे पर चिन्ता की लकीरें नहीं थी। दमक रहा था उनका चेहरा जैसे उनके चेहरे परआजादी वाले संघर्ष के वास्तविक संकल्प नाच रहे हों।
ष्शोभनाथ पंडित के घर का सामान कुर्क कर लेने के बाद शोभनाथ पंडित को दारोगा बताता गया कि अगर प्रसन्नकुमार, दो, तीन दिन के भीतर थाने पर या अदालत में हाजिर नहीं हुआ तो कुर्क किया गया सारा सामान नीलाम करा दिया जाएगा।
आपसी तनातनी चाहे जैसे और जिससे हो पर गॉव का कोई लूट लिया जाए, वह भी थाने के द्वारा, उसे अपमानित किया जाए, गॉवों में ऐसे कामों को सहन नहीं किया जाता पर यही सहपुरवा में हो रहा था। गॉव में कुछ लोग थे जो इसे अच्छा नहीं मान रहे थे पर उनके हाथ बंधे हुए थे। मुंह सिले हुए थे। उनके हाथों में प्रशासन की हथकड़ियॉ थीं। चौथी गवहां हालांकि रामभरोस के आदमी थे पर उन्हें भी पुलिस द्वारा शोभनाथ का उत्पीड़न बुरा लग रहा था और वे दुखी थे। वे शोभनाथ पंडित से मिलना चाहते थे पर किस मुंह से मिलें। गॉव के अधिकांश लोग शोभनाथ के दरवाजे पर ही थे, उनके सामने ही कानून का तमाशा हो रहा था। उन्हें लग रहा था कि कानून बड़ा नहीं होता बड़े होते हैं रामभरोस जैसे लोग जो कानून को अपनी मुठ्ठी में बॉधे रहते हैं। कानून तो बहुत ही छोटा होता है, इतना छोटा कि रामभरोस जैसों की मुठ्ठी में बॅध जाता है। अगर अपराध किया है तो प्रसन्नकुमार ने किया है, उसे दण्ड दो। शोभनाथ के पसीने की कमाई को कूड़े की तरह उनके घर के बाहर क्यों फेंक दिए? सारे अनाज को एक में मिला दिया, दरवाजे, खिड़कियॉ तोड़ दीं, गालियॉ दी गईं शोभनाथ को। क्या यही सब करने के आदेश देता है कानून, कि घर दुआर गिरा दो, गल्ले को कूड़ा की तरह माटी में मिला दो, मारो पीटो, गालियॉ दो। क्या यही कानून होता है जनता के लिए और जनता वाला तथा जनता के द्वारा।
दारोगा के जाने के बाद जो सामान व्यवस्थित किया जा सकता था उसे गॉव वालों ने व्यवस्थित कर दिया। जो सामान कुर्क नहीं हुआ था उसे घर में रख दिया गया। गनीमत थी कि चारपाई और बिस्तरों को दारोगा ने कुर्क नहीं किया था। कुछ खाद्यान्न भी दारोगा के आतंक से बच गया था, उसे एक में मिलाया नहीं गया था। दारोगा ने घर में तोड़-फोड़ भी नहीं करवाया था कुछ दरवाजे तथा खिड़कियों को ही उखाड़ा था। दारोगा गाय, बैल और भैंसों को हंकवा कर थाने ले गया था। नुकसान में यह था कि सिपाहियों ने सारे अनाज को एक में मिला कर माटी में फेंक दिया था। चावल, गेहूं और धान को माटी में से अलग अलग निकालना कठिन काम था करीब करीब मुश्ष्कल था।
ष्शोभनाथ का सारा कुछ बर्बाद कर दिया गया था फिर भी हताश और निराश नहीं थे शोभनाथ पंडित।
कुर्की की घटना हरिजन बस्ती में अलग रूप धर लेगी किसी को अनुमान नहीं था। हरिजनों ने मान लिया था कि पंचायत भवन के निर्माण का विरोध करने के कारण ही प्रसन्नकुमार पर डी.आई.आर. लगाया गया है। यह सारा खेल रामभरोस ने खेला है। उन्हीं के कारण शोभनाथ के घर की कुर्की भी की गई है।
रामभरोस एक तीर से दो निशाना लगा रहे हैं, औतार और शोभनाथ दोनों पर। हरिजनों का साथ देना प्रसन्नकुमार के सामने कई तरह का बवाल लेकर आया। रामभरोस शोभनाथ पंडित को परेष्शान करना चाहते हैं, प्रसन्नकुमार को झूठे मुकदमे में फसा कर रामभरोस अपनी ताकत दिखा रहे हैं, और कुछ नहीं। हरिजन बस्ती में कुछ गिने चुने लोग ऐसे भी थे जिनकी आवाज दूसरी थी। उन्हें सहपुरवा के पूरे घटनाक्रम में प्रसन्नकुमार का षडयंत्रा दिख रहा था। आखिर वह हरिजनों के लिए ऐसा काहे कर रहा? उन्हें प्रसन्नकुमार पर सन्देह था। इसका जबाब हरिजन नहीं खोज पा रहे थे। ऐसा तो होता नहीं कि हरिजनों के लिए कोई सवर्ण खुद तवाह हो जाए। फिर भी बहुमत रामभरोस की निन्दा कर रहा था और प्रसन्नकुमार के साथ था।
ष्शोभनाथ के घर की कुर्की हो गई जिसे होना ही था। शोभनाथ का सारा सामान कुर्क कर लेने के बाद पुलिस सहपुरवा से चली गई थी। सहपुरवा बचा रह गया था, रामभरोस बचे रह गये थे, उनका आतंक बचा रह गया था। पर गॉव की संस्कृतिकृ उसका क्या? वह तो बनती बिगड़ती रहती है। वैसे भी संस्कृति की तो कुर्की होती नहीं। कुर्की खुद में संस्कृति होती है दमन वाली। किसी ने पुलिस का प्रतिरोध नहीं किया तो क्या हुआ, प्रतिरोध करने की संस्कृति गॉवों में होती भी तो नहीं, फिर कौन करता प्रतिरोध? ऐसा तो गॉवों में होता रहता है। शोभनाथ पंडित अपनी बर्बादी देखते रहे, उनके चेहरे पर पुलिस का आतंक और डर कत्तई नहीं था। गॉव भर परेशान और स्तब्ध, पर रामभरोस नहीं, वे मस्त मस्त थे कि उन्हें अपना रोब दिखाने का एक अच्छा मौका मिला।
ष्शोभनाथ गॉव के अपने हितैशियों को समझा रहे थे....कृकृ
‘का हो गया हो औतार! मेरा बेटा जेल चला गया तो... जेल में तो रोटी खाना सब सरकारी है,अब इससे अधिक क्या चाहिए किसी को। जेल में जिन्दगी भी तो सुरक्षित रहती है। वहां मारपीट का कोई डर नहीं होता। मन तो मेरा भी कर रहा है। एक बार जेल हो आते, मौका भी मिला था आजादी वाली लड़ाई में पर का बतांए, बाबू जी नहीं जाने दिए, मुझे भुसौल में छिपवा दिए।’
ष्शोभनाथ की बात सुन कर औतार चकराए हुए थे।
आपातकाल की घोषणा पहले ही हो चुकी थी। पूरे देश में कांग्रेस विरोधी नेताओं की गिरफ्तारियां हो चुकी थीं तथा उन लोगों की भी जो कांग्रेस विरोधी रहे हों न रहे हों पर कांग्रेसियों के विरोधी थे। बिना किसी डर भय के गॉव का हाल-चाल लेने के लिए विभूति और प्रसन्नकुमार एक दिन सहपुरवा आये हुए थे। उस दिन विभूति अपने घर नहीं गया वह प्रसन्नकुमार के ही घर पर रुक गया था। उन दोनों ने सरकार की जनविरोधी नीतियों एवं कार्यक्रमों के बारे में गॉव के साथियों को आगाह कर दिया था। रामभरोस की योजना के बारे में भी दोनों ने शोभनाथ पंडित को बताया था कि वे क्या कर सकते हैं। पूरी कोशिश करेंगे कि गिरफ्तारियां हों और चुन चुन कर हमारे अपने लोगों को गिरफ्तार करवाएंगे। सबको आगाह करने के बाद ही दोनों गॉव से रात ही में भाग गए थे।
ष्शोभनाथ पंडित प्रसन्नकुमार को मना करना चाहते थे और समझाना चाहते थे कि आग में न कूदो पर वे क्या समझाते वह तो उनके समझाने से बहुत आगे जा चुका था। जहां किसी भी तरह का समझाइस काम नहीं करती, वहां से उसका लौटना मुश्किल था। मजबूर हो कर उन्होंने अपनी सहमति दे दी थी। वे समझ चुके थे कि प्रसन्नकुमार को अब नहीं रोका जा सकता है। इतना निर्देश अवश्य दिये थे कि जहां कहीं भी रहना संवाद बनाए रखना।
प्रसन्नकुमार भूमिगत रहते हुए भूमिगत नेताओं के बाहरी आदेशों की प्रतिक्षा में था क्योंकि उसके लोग बाहर थे जो प्रदेश स्तर के थे तथा आपातकाल का सक्रिय विरोध कर रहे थे। प्रसन्नकुमार दौड़-धूप कर अपने बिखरे साथियों से संपर्क साध रहा था तथा उन्हंे सचेत भी कर रहा था कि सरकार के आगे किसी भी हाल में नहीं झुकना है, भले ही हम लोग टूट जांएगे पर झुकेंगे नहीं। बाहर से कोई कार्यक्रम भी नहीं आ रहा था कि आगे क्या करना चाहिए, निराशा तथा हताशा की स्थिति थी।
आपातकाल में वे लोग जो आपातकाल के पहले कागजी रूप से सरकार के मुखर विरोधी थे और अखबारों के जरिए बयानबाजियां किया करते थे सबके सब आपातकाल का समर्थक होते जा रहे थे। प्रसन्नकुमार को ऐसे लोगों से घिन होने लगी थी। कुछ ही लोग बचे हुए थे जो सरकार का विरोध कर रहे थे तथा सक्रिय थे। आपातकाल के दसवें पन्द्रहवें दिन के भीतर ही बहुत से लोग सरकारी बन चुके थे और घूम घूम कर सरकार की जय जय भी करने लगे थे। लगता था कि सारे समाजवादी संकल्प भहरा चुके हैं और मार्क्स मर गया है उसके साथ साथ लोहिया और गांधी का सत्याग्रह भी दफन हो चुका है। लोग गुंबारे की तरह हवा में उड़ने लगे हैं जिसमें भय की हवा भरी हुई है।
आपातकाल के काले समय में पता नहीं चल रहा था कि लोहिया वाली ‘जिन्दा कौमें’ इस देश में हैं भी कि नहीं हैं। पता नहीं वे कौमें कहां बिला गई हैं। उनमें से अधिकांश लोग तो जेलों में बन्द किए जा चुके थे। वे जेल से बाहर होते तब तो सरकारी अत्याचार के खिलाफ खड़े होते! एक ओर सरकारी अत्याचार शोषण और दमन, दूसरी ओर वुद्धिजीवियों में मरघटी सन्नाटा, प्रसन्नकुमार राजनीतिक परिदृष्य को देख कर परेष्शान परेशान था पर वह कर क्या सकता था? जो कर सकता था कर ही रहा था अपनी सीमा के भीतर।
विजयगढ़, जसौली ही क्या पूरा देश भीतर से कुछ और बाहर से कुछ दीख रहा था। पूरे क्षेत्रा में केवल सरकारी लोग ही दीख रहे थे तथा दूसरी दिखने वाली चीज थी सरकारी लोगों का आतंक। सरकारी लोगों का उस समय एक ही काम था चाहे जैसे भी सरकार विरोधी लोगों या अपने विरोधियों को डी.आई.आर. में फसवना। वे इसमें सफल थे इस काम में पुलिस उनके आगे पीछे डोल रही थी। वह एक ऐसा समय था जो पुलिस ही नहीं अन्य अधिकारियों के विवेक और प्रतिभा को छीन चुका था। वे कठपुतली माफिक सरकारी नाच नाच रहे थे। ‘जेकर राज ओकर दोहाई’ वाले वसूलों पर अधिकारी चल रहे थे। वैसे भी अधिकांश अधिकारी जय बोलने में माहिर होते ही हैं पर कुछ ऐसे भी कर्मचारी और अधिकारी थे जो दुखी थे तथा जय बोलने वाली परंपरा से अलग थे। ऐसे लोग हालांकि बहुत कम थे, पर थे। वे संवेदित थे तथा समझ रहे थे के गलत हो रहा है। आखिर कोई लोकतांत्रिक सत्ता निरंकुश कैसे हो सकती है? कैसे थोप सकती हैआपातकाल जनता पर?
थानेदारों की तो बन आई थी। वे भूल चुके थे कि जिन्हें झूठे मुकदमे में वे फसा रहे हैं वे भी उन्हीं के परिवार के सदस्य हैं। समान आर्थिक और सामाजिक स्थिति के लोग हैं फिर उन्हें वे क्यों गिरफ्तार कर रहे हैं? वे अपनी वर्गीय चेतना भूल चुके थे और अपना ही माथा फोड़ने में जुटे थे। दारोगाओं को अगर यह पता होता कि वह अपने हल्के में जो कर रहा है वैसा ही उसके मूल निवास वाले हल्के में भी उन्हीं की तरह का कोई दूसरा दारोगा कर रहा होगा। वहां भी उसके जैसा ही कोई दारोगा होगा वह भी वही कर रहा होगा जो वे यहां कर रहे हैं। फिर क्या हो रहा है यह सब? पर दारोगाओं के पास इतनी दूर की समझ कहां से होती, वे तो अपने में डूबे हुए लोग होते हैं। उन्हें अपने अलावा कोई और नहीं दिखता। यह जो प्रशासनिक स्तर पर लूट और आतंक का मामला है अगर ठीक से समझा जाए तो अपनों की ही लूट और आतंक का मामला है किसी गैर का नहीं पर इस सचाई को कोई समझ नहीं रहा।
प्रसन्नकुमार वैतनिक कर्मचारियों पर आंसू बहाता है, आन्तरिक विलाप करता है, क्या अपने आत्म की हत्या करके ही सरकारी बना जा सकता है या दूसरे विकल्प भी हैं। प्रसन्नकुमार कई तरह की सोचों में डूबा हुआ है वह उस अन्तर्विरोध को नहीं समझ पा रहा है कि लोग देह बेचने के साथ साथ दिमाग बेचने का भी काम आखिर क्यों कर रहे हैं? वह बिके हुए दिमागों में फस गया है जबकि किसान अपना धान और गेहूं भी नहीं बेच पा रहा है, कोई न कोई तिलिस्म है जरूर। प्रसन्नकुमार माथा पकड़ लेता है और खुद को तमाम तरह की सोचों से बाहर निकालने की कोशिश करता है।
अचानक उसकी आंखों के सामने प्रशासनिक क्षमताओं की बौद्विक ताकतों का विवरण किसी फिल्म जैसा घूमने लगता है....कृकृ
आई.ए.एस.,पी.सी.एस., कमिश्नर, कप्तान, तहसीलदार, दारोगा, अध्यापक, प्रधानाचार्य, संचालक, जवान, व्यवस्थापक, संस्तुति, प्रार्थना पत्रा, मुकदमा, अदालत, सोर्स, नौकरी, कंपटीशन, बड़ा मकान, छोटा मकान, फैक्टरी दर फैक्टरी, मकान दर मकान, उ.प्र., बिहार, राजस्थान, बुद्विजीवी, गरीब, शोषित, प्रताड़ित, विस्थापित, बाजार, सारा कुछ बेचो, दिल, देह और दिमाग कुछ भी, कुछ खरीद कर बेचो, कुछ बेच कर खरीदो, खरीदो और बेचो, अधिकार मांगो, स्वतंत्राता मांगो, रोटी मांगो और एक दिन अपना होना मांगो कि तूं हो कि नहीं, प्रसन्नकुमार उलझ जाता है और अपना माथा पीटने लगता है। वह करे तो क्या करे? हर ओर आग ही आग है, कुछ भी साफ और चिकना नहीं दिख रहा, चाहे जिधर जाओ जलना ही पड़ेगा।
प्रसन्नकुमार अपनी सोचों के अन्तर्द्वन्दों में फस जाता है वह नहीं समझ पाता है कि जीवन का मतलब क्या होता है? अचानक उसके मन में कविता सरीखी बात गूंजने लगती है।कृ
‘कुछ लोग, बहुत सारे लोग, उनमें आदमी कुछ ही लोग। उनकी आदतें भी खरीदी जा रही हैं, हम बिकाऊ हैं, हम बाजार में हैं और बाजार में मेरे साथ साथ मेरा चित्त और चेतना सभी बिकने के लिए खड़े हैं। हम बिके हुए हैं, हमारी सोच व चिन्तांए भी बिकी हुई हैं। हम उतना ही सोच व गुन पा रहे हैं जितना हमें सोचवाया जा रहा है, हमारी अपनी कोई सोच नहीं, हम बिके हुए सोच के लोग हैं।’
प्रसन्नकुमार की आंखें बन्द नहीं हैं खुली खुली हैं और उनमें कई तरह के फिल्म सरीखे चित्रा अपने आप तैरने लगे हैं, कहीं किसी कोने से भगत सिंह आ रहे हैं तो कहीं से सुभाष चले आ रहे हैं। फिर अचानक दृश्य बदल जाता है उन लोगों की चेहरों से कुछ चीजें गायब हो जाती है फिर वहां चन्द्रष्शेखर की मूंछ, भगत सिंह का हैट और सुभाष की टोपी ही बची रहती है। गांधी जी भी कहीं से टपक आते है फिर कहीं खो जाते हैं अपना चश्मा छोड़ कर। प्रसन्नकुमार गांधी का चश्मा अपने आंख पर चढ़ा लेता है। वह समय को गांधी की ऑख से देखना चाहता है पर उसे हर ओर अन्धेरा ही अन्धेरा दिख रहा है। गॉधी जी के चश्मे का लेन्स खराब हो चुका है। वह गांधी का चश्मा उतार फेंकता है। इसमें कुछ नहीं दिख रहा। उसका सपना तथा अनामंत्रित दृश्य अचानक सब खतम हो जाता है और वह फिर प्रसन्नकुमार में तब्दील हो जाता है। उसके पास अब न तो भगत सिंह वाला हैट है, न चन्द्रषेखर वाली मूंछें हैं, न गांधी वाला चश्मा है, फिर भी कुछ न कुछ करना है। क्या करना है पता नहीं, केवल करना है बस इतना ही।
'''‘भूख और भोजन की दूरी पाटी जा सकती है
सहभागी प्रबंधन से तथा असहयोग आन्दोलन भी चलाए जा सकते हैं'''
पुलिस प्रसन्नकुमार को तलाश रही थी। वह अपने कार्य क्षेत्रा में ही कहीं छिपा हुआ था। प्रसन्नकुमार किस क्षेत्रा में सक्रिय है इस बारे में कुछ लोगों को ही जानकारी थी जो उसके अभियान से जुड़े हुए थे या कुछ ऐसे लोगों को जो अभियान के लिए आर्थिक सहायता दिया करते थे। प्रसन्नकुमार देखने मेंअदृश्ष्य था पर सहपुरवा के अदृश्ष्य नहीं था। उसने सहपुरवा के मजूरों व कमकर जनता को समझा दिया था कि पंचायत भवन पर मजूरी नहीं करना है, जिसे मजूर समझ चुके थे। पंचायत भवन के काम पर मजूरी न करके ही पंचायत भवन के निर्माण को रोका जा सकता है। हरिजन बस्ती के लोग भी अपने स्तर से कोष्शिश करने लगे थे कि पंचायत भवन पर कोई मजूर काम करने न जा पाए। जब से पंचायत भवन को बनने से रोकने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, तब से लेकर अब तक उस पर एक भी ईंट की चुनाई नहीं हो सकी है। मजूरों ने पंचायत भवन के निर्माण से खुद को अलगिया लिया है। पंचायत भवन के निर्माण कार्य से मजूरों का विरत रहना यह अलग तरह का असहयोग आन्दोलन था जिसे सहपुरवा ही नहीं पूरा बिजयगढ़ पहली बार देख रहा था। पठ्ठ जवार के लोग भी देख रहे थे। चतुर किस्म के कुछ लोग मजूरों के असहयोग को दूरगामी प्रभाव वाला मान रहे थे। वे भविष्य के प्रति आशंकित थे। तब क्या होगा जब मजूरे हल जोतने से इनकार कर देंगे। आने वाले दिनों में ऐसा ही होगा हल जोतने वाला कोई नहीं रहेगा।
प्रसन्नकुमार ने एक और काम किया था। उसने सभी मजूरों को जो रामभरोस के थे उन्हें भी राजी कर लिया था कि वे रामभरोस के काम से जबाब दे दें। वही हुआ, रामभरोस के मजूरों ने रामभरोस को काम से जेठ दशाहरा के दिन जबाब दे दिया था कि उन्हें उनका काम नहीं करना है। मजूरों के जबाब देने से रामभरोस परेष्शान थे कि ऐसा कैसे हो गया? सारे मजूरों ने एक ही दिन कैसे काम करने से इनकार कर दिया? रामभरोस के समझाने तथा मनौव्वल करने, रामदयाल के डंडा भाजने के बाद भी रामभरोस के मजूरे उनका काम करने के लिए राजी नहीं हुए। रामभरोस के पास मजूरों को दुबारा से काम पर लगवाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था सो उन्होंने मजूरों पर बकाए का हिसाब करने की धमकी दिया। रामभरोस जानते थे कि उनका मजूरों पर काफी रुपया बकाया है जिसे वे नहीं चुका सकते। पर यह धमकी भी बेकार गई, धमकी से उनके मजूरे नहीं डरे। कोई मजूर टस्स से मस्स नहीं हुआ। यह रामभरोस की सहपुरवा में सबसे बड़ी और पहली हार थी। मजूरों के पास उनका काफी रुपया बाकी था। क्षेत्रा के अलिखित नियमों के अनुसार यह था कि मजूरों को जो भी अपने काम पर लगाएगा वह पहले के मालिक के बकाये का भुगतान करेगा तभी उन्हें काम पर रख पाएगा। ऐसा अलिखित व स्वीकार्य नियम सामंतो में बहुत पहले से प्रचलित था। सालों से निर्वाध चली आ रही इस परंपरा के मजूर भी आदी थे। अपने पुराने मालिक के कर्जे के बकाए के रुपए को नए मालिक से वे चुकता करवाते थे, फिर नए मालिक का काम पकड़ते थे। कोई न कोई मालिक मिल जाता था जो पहले मालिक का बकाया चुकता कर देता था। क्योंकि सभी को मजूर चाहिए होता था। वह जमाना मशीनों वाला था भी नहीं, मशीन के नाम पर कहीं कहीं केवल ट्रेक्टर हुआ करता था और पंपिंग सेट। खेत की जोताई के अलावा भी बहुत सारे काम ऐसे हुआ करते थे जिसे बिना मानव श्रम के नहीं निपटाया जा सकता था। सो मजूरी करने वाले श्रमिकों की जरूरत सभी को पड़ा करती थी।
रामभरोस का मजूरांे पर काफी बकाया था। किसी के पास हजार रुपया और गल्ला बकाया था तो किसी के पास पांच सौ रुपया था तथा गल्ला बकाया था। रामदयाल का लोहबन्दा हरिजन बस्ती में चमकने लगा। बहुत अर्से के बाद रामदयाल ने लोहबन्दा उठाया था। रामभरोस को भरोसा था कि कोई भी क्षेत्रा में ऐसा नहीं है जो उनके चौदहो मजूरों को काम पर लगा लेगा। मजूरों पर बकाया रुपया लौटा पाना तो किसी के वश का नहीं? किसी के पास इतना न तो रुपया है और न गल्ला ही। ये मजूरे जाएंगे कहां? लौट कर उन्हीं के काम पर आएंगे आज नहीं तो कल।
रामभरोस का आतंक मजूरों के रखने के बाबत भी कम नहीं था। रामभरोस के डर के कारण उनके मजूरों को लोग काम पर नहीं लगाते थे। कुछ लोग हिम्मत करके रामभरोस के मजूरों को हलवाही पर रखना चाहते पर उन पर कर्जे का बकाया इतना होता था कि लोग चुकता नहीं कर सकते थे, कर्जा चुकता करना उनकी क्षमता से बाहर होता था। प्रसन्नकुमार को जान पड़ा कि रामभरोस के मजूरों के काम का जोगाड़ नहीं हुआ तो यह जो मजूरों की हड़ताल है सब फुस्स हो जाएगी। मजूरों की रोजी-रोटी के सवाल को ले कर रामभरोस से लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। उनके मजूरों के काम दिलवाने के लिए विकल्प तलाशना जरूरी है जिससे प्रतिदिन उनके पास मजूरी आती रहे।
औतार, फेकुआ, बिफना, सुक्खू तथा कुछ खास लोगों को प्रसन्नकुमार ने गॉव के बाहर वाले अपने मकान पर बुलवा लिया था। उसने अपने पिता जी को भी बता दिया था कि रामभरोस के मजूरों को कहां काम दिलवाया जाए इस पर बातें होनी है, वे भी वहीं आ गये थे। प्रसन्नकुमार ने अपने पिता जी से विभूति के बारे में पूछाकृ
‘विभूति गॉव में नहीं आया था का ?’
‘का वह भी गॉव में आया था?’ प्रसन्नकुमार के पिता ने आश्चर्य से पूछा....
‘उसको अब तक यहां आ जाना चाहिए था, कुछ पर्चा भी बांटना है, पर्चा लाने के लिए रापटगंज मैंने ही उसे भेजा था। कहीं फस गया होगा, वह आ जाएगाकृ
जी! घबराइए नहीं।’
प्रसन्नकुमार ने अपने पिता शोभनाथ जी से बात कर लेने के बाद सीधे औतार से पूछा....कृ
‘अब क्या होगा औतार जी, रामभरोस के हलवाहों के लिए का इन्तजाम किया जाये, वे बेचारे मजूरी के बिना कैसे जिन्दा रह सकते हैं? हमलोगों के समझाने बुझाने पर रामभरोस का काम उन लोगों ने छोड़ दिया है। अब उनके लिए क्या करना चाहिए, क्या खाएंगे बेचारे, कुछ सोचिए, गुनिए आपलोग।
औतार काफी गंभीर हो गए। बात तो सही है, बिना मजूरी किए गुजर-बसर करना मुष्किल होगा। मजूरी जो मिलती है उससे भी जब पेट नहीं भर पाता है फिर बना मजूरी पाये कैसे भरेगा पेट? कैसे चलेगा घर? उनका दिमाग काम नहीं कर रहा था। औतार जानते थे कि क्षेत्रा का कोई आदमी रामभरोस की डर से उनके मजूरों को अपने काम पर नहीं रखेगा, फिर दूसरा रास्ता का है? बाहर के लोग शायद काम पर रख लें पर कौन घर घर जा कर पूछेगा कि आपको मजूरों की जरूरत है का? आप काम पर रखेंगे आदमी को, कौन पूछेगा गॉव गॉव जा कर। मजूर तो बेचारे खाए बगैर मर जाएंगे।
चिन्तित तो प्रसन्नकुमार भी कम नहीं था पर वह सोच नहीं पा रहा था कि इस संकट का हल कैसे निकाला जाए, सभी के सभी वहां मौन बैठे हुए थे। सबका मौन तोड़ा प्रसन्नकुमार के पिता जी ने। उन्होंने आश्वस्त किया...कृ
‘चार पांच आदमी का जोगाड़ हो जाएगा, पर सभी का नहीं’
प्रसन्नकुमार ने दूसरा रास्ते का प्रस्ताव दिया...
‘बाबू जी इससे काम नहीं चलेगा, दो चार मजूरों को काम पर लगा देने से। बात तो तब बनेगी पिताजी! जब रामभरोस के सभी मजूर किसी का काम न करें, हमलोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लडते रहें और घर में बैठ कर आराम से खाते रहें।’
‘ऐसा कैसे होगा, काम भी न करो और घर बैठकर खाते रहो, ऐसा नहीं हो सकता, ऐसा सोचना बेकार है।‘
जो भी स्कीम बनाना हो जल्दी बना लेना चाहिए। रामभरोस चुप लगाकर बैठने वालों में नहीं है। वह कोई जोगाड़ कर रहा होगा कि गॉव में पुलिस आ जाए और सभी को गिरफ्तर कर ले। तुम जल्दी से यहां का काम निपटा कर भागो, ऐसा करने में ही खैर है। यह समय आराम से पंचायत करने का नहीं है।
जल्दी जल्दी बैठक का काम निपटा लिया गया। प्रसन्नकुमार भी जानता था कि रामभरोस उसे गिरफ्तार करवा सकते हैं। बैठक में तय किया गया कि आन्दोलन से जुड़े सभी मजूरों व जोतदारों पर सहयोग राशि लगा दी जाए। मजूरों के लिए उनकी मजूरी में से आधे सेर अनाज की राशि तथा जोतदारों के लिए एक एक सेर की राशि ली जाए। सारी राशि इकठ्ठा हो जाने पर रामभरोस के मजूरों में बराबर बराबर बॉट दिया जाए। मजूरों की मजूरी के लगभग लगभग राशि इकठ्ठा तो हो ही जाएगी। थोड़ा बहुत जो कम होगा उसे पिता जी पूरा कर देंगे। ऐसा करने से गॉव के मजूरों में विश्वास बढे़गा कि वे अकेले ही रामभरोस से नहीं टकरा रहे हैं बल्कि उनके साथ और भी लोग हैं जो रामभरोस से टकरा रहे हैं। यह संकल्प लेना ही होगा कि रामभरोस के पास काम करने के लिए किसी भी कीमत पर उन मजूरों को नहीं भेजना है।
वहां बैठे सभी लोगों को प्रसन्नकुमार का प्रस्ताव उचित लगा और वे अपनी सहमति दे दिए। शोभनाथ पंडित ने अपने स्तर से क्षमतानुसार सहयोग करने का वादा किया।
बातचीत समाप्त हो जाने के बाद प्रसन्नकुमार भागने की तैयारी में था कि विभूति आ गया। उसे भी पूरी योजना की जानकारी दी गई। शोभनाथ को यह खटक रहा था आखिर विभूति पर प्रसन्नकुमार इतना विश्वास क्यों कर रहा है। यही बात औतार को भी खटक रही थी पर प्रसन्नकुमार को कौन रोके, वही सारी योजना का क्रियान्वयन कर रहा था, निश्चित ही उसने कुछ विचार कर ही विभूति को अपने साथ जोड़े हुआ है। शोभनाथ और औतार इसी लिए प्रसन्नकुमार से कुछ नहीं बोले।
विभूति को कत्तई घबराहट नहीं हुई और न ही अकुलाहट। वह योजना सुन कर सहमत था जबकि वह जानता था कि सारी योजना उसके पिता के खिलाफ ही बनाई जा रही है। विभूति सोच नहीं सकता था कि प्रसन्नकुमार कभी भी अपने पिता के खिलाफ इस तरह की योजना बनाएगा फिर भी वह योजना से सहमत था और उसके प्रति सक्रिय भी। कोई भी सुनता तो चौंक जाता, ऐसी भी बात नहीं थी कि विभूति नालायक और विवेकहीन था। उसे अपने पिता का उत्तराधिकारी बनने की भी लालच नहीं थी। विभूति की समझदारी दूसरे ढंग की थी जो अपने पिता के अन्यायों के प्रति थी। पिता का वह सीधे विरोध कर नहीं सकता था पर जानता था कि उसके पिता सहपुरवा में गलत कर रहे हैं, सो वह प्रसन्नकुमार के साथ था। उसका मानना था कि अन्याय का विरोध हर हाल में किया जाना चाहिए और उसके पिता गॉव में सभी को एक दूसरे से लड़वाकर अन्याय कर रहे हैं। किसी को चैन से रहने नहीं दे रहे हैं।
विभूति अपने बाप की प्रतिलिपि नहीं बनना चाहता था। बाप का समर्थन करना और प्रसन्नकुमार का साथ न देना अपने बाप की प्रतिलिपि ही बनना होता।
विभूति जानता था कि सभी के लिए सामान्य साधनों एवं सुविधाओं की पहुंच आवष्यक है जो सहपुरवा में रामभरोस के आतंक के कारण वाधित थी। नमक, रोटी, चावल, दाल, ऑटा, कपड़ा, लत्ता,सीमेन्ट, ईंट, नौकरी, हर व्याक्ति के लिए जरूरी हैं पर पहले नमक, रोटी ही आवश्यक है, भूख और भोजन के बीच की दूरी पाटना जरूरी है। वह भी सभी के लिए। वह व्यक्तिगत रूप से आर्थिक प्रतियोगिता का विरोधी है और मानता है कि आर्थिक असमानता वाले समाज में कभी भी समानता जैसी चीज नहीं हो सकती। समानता तो तब आएगी जब लोगों का आर्थिक स्तर उठे और जिनका उठा हुआ है वह थोड़ा संकुचित हो। सरकारों को चाहिए कि गरीबों के आर्थिक स्तर को उठाए तथा अमीरों के आर्थिक स्तर को थोड़ा नीचे लाए।
बैठक समाप्त हो जाने के बाद दोनों किसी अज्ञात जगह पर चले गये। कहां चले गये, कब तक वापस लौटेंगे किसी को नहीं पता। न तो उन दोनों ने किसी को बताया ही कि वे कहां जा रहे हैं?। वे दोनों कहां हैं इसकी खबरें कुछ लोगों को ही मालूम होती थीं, वे ही कार्यक्रम बनाते फिर दोनों निष्चित स्थान पर हाजिर हो जाते।
बैठक समाप्त हो जाने के बाद औतार शोभनाथ आदि अपने अपने घर लौट आये। और प्रसन्नकुमार क्षेत्रा में कहीं चला गया। उसे पर्चों को बटवाना था जिसे विभूति रापटगंज से लेकर आया था।
'''‘यह अकेला पन जटिल और क्रूर इतिहास ने
उन्हें दिया है। वे पहले भी अकेले थे और आज भी हैं।
वे अपना अधिकार जानते ही नहीं थे सो जहां थे वहीं पड़े थे’'''
पंचायत भवन का निर्माण रूक गया था तो रूक गया था। हालांकि अपने स्तर से रामभरोस ने बहुत कोशिश की थी कि पंचायत भवन का निर्माण शुरू हो जाए पर ऐसा संभव नहीं हो पाया। क्षेत्रा के मजदूरों की तलाश की गई पर क्षेत्रा के मजूरों में यह बात फैली चुकी थी कि रामभरोस ने एक गरीब हरिजन औतार का पट्टा खारिज करा दिया है तथा उनके बेटे फेकुआ के कोले का धान लवा लिया है। जिसके कारण सहपुरवा के मजूर हड़ताल पर चले गए हैं और वे पंचायत भवन के निर्माण कार्य पर नहीं जा रहे है। उनका कहना है कि औतार की जमीन पर पंचायत भवन नहीं बनना चाहिए अगर उस पर बनेगा तो वे पंचायत भवन के निर्माण के काम पर नहीं जाएंगे। सहपुरवा के मजूरों की देखा देखी क्षेत्रा के दूसरे मजूरों ने भी पंचायत भवन पर काम करने से मना कर दिया था। रामदयाल कारिन्दा ने मजूरों को तमाम तरह का प्रलोभन दिया फिर भी मजूर काम पर नहीं लगे तो नहीं लगे। रामदयाल को रामभरोस ने झारखण्ड भी भेजा था कि वहां से मजूरों को वह ले आये और काम शुरू हो पर वहां के मजूर भी पंचायत भवन के काम पर नहीं आये। सहपुरवा के मजूरों की हड़ताल तमाम लोगों के लिए विचारणीय थी। खेती-किसानी वाले असंगठित क्षेत्रा के मजूरों की हड़ताल संभव नहीं है, ऐसा नहीं हुआ करता। हड़तालें तो कारखाना वाले संगठित क्षेत्रों के मजूर किया करते हैं पर खेती-किसानी वाले क्षेत्रा के असंगठित मजूर नहीं। असंगठित क्षेत्रा के मजूरों में हड़ताल की चेतना मालिकों को चौंकाने वाली थी और सहपुरवा के असंगठित कृश्षि मजूरों की हड़ताल सफल थी तो थी।
मजूरों के अभाव में पंचायत भवन के निर्माण के सारे रास्ते बन्द थे। परेष्शान हो कर रामभरोस ने कृपालु जी से बातें की। कृपालु जी रामभरोस की क्या मदत करते उनका भी काम-काज बन्द था। उनके मजूरों ने भी हड़ताल कर दिया था तथा जेठ दशहरा के दिन ही काम से जबाब दे दिया था। रामभरोस ने मजूरों की मजूरी बढ़ाने का वादा किया, टेस्ट वर्क के कामों पर लगे मजूरों से बातें की, पर सब बेकार। बढ़ी मजूरी के लालच ने भी पंचायत भवन पर काम करने के लिए मजूरों को आकर्षित नहीं किया।
सहपुरवा की बात हर तरफ फैल चुकी थी और बिना किसी प्रचार, प्रसार व शिक्षण के मजूरों ने स्वस्फूर्त तरीके से तय कर लिया था कि सहपुरवा के पंचायत भवन के निर्माण का काम उन्हें नहीं करना है। पंचायत भवन के काम पर मजूरों को लगाने का प्रयास रामभरोस का सफल नहीं हुआ। मजूरे गुन रहे थे कि पंचायत भवन पर काम करना औतार के साथ अन्याय करना होगा। वह अन्याय हम लोगों जैसे गरीबों के साथ ही होगा। फिर क्या था संक्रामक रोग की तरह हड़ताल बढ़ गई और मजूरों में चेतना प्रबल हो गई कि पंचायत भवन पर काम नही करना तो नहीं करना है। यानि एक तरह से गांधी जी का असहयोग आन्दोलन कि किसी भी हाल में जनविरोधी कामों में भागीदारी नहीं करना है बल्कि जनविरोधी कार्यों का प्रतिरोध करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। आजाद भारत में मजूरों का असहयोग विचारणीय था जो सहपुरवा जैसे छोटे गॉव में प्रायोगिक रूप ले चुका था।
सरकारी काम पर लगे हुए मजूरों से रामभरोस के लोगों ने बातें की, उन्हें अधिक मजूरी देने का प्रस्ताव दिया फिर भी वे टस्स मस्स नहीं हुए। दूसरे स्थानों के मजूर भी काम पर नहीं आएंगे ऐसा आभास किसी को नहीं था। किन्तु सही जानकारी और समझाने के सही तरीके के कारण मजूरों में असहयोग की भावना उत्पन्न हो चुकी थी। इसी के लिए प्रसन्नकुमार निरंतर प्रयास कर रहा था। उसके कुशल नेतृत्व के कारण मजूरों के दिल दिमाग में अन्याय का प्रतिरोध करने की कुदरती ताकत आ गई थी। जो असंभव जैसा था। मेल मिलाप कुछ ऐसे कारण होते हैं जो लोगों का दिमाग बदल सकते हैं, दुश्मनी दोस्ती में, असहमति सहमति में, कभी भी ऐसा संभव हो सकता है। खेतिहर गरीब मजूरे एक नहीं हो सकते, वे एक दूसरे का साथ देना नहीं चाहते, सारे मिथक सहपुरवा में टूट कर खंड खंड हो चुके थे। मजूरों के पास रामभरोस तथा रामदयाल के पहुंचने के पहले ही विभूति और प्रसन्नकुमार पहुंच जाया करते थे। वे मजूरों को जागरूक करते थे कि सहपुरवा में ही नहीं हर जगह रामभरोस हैं और हर जगह औतार हैं, सभी जगहों की समस्याएं भी एक ही तरह की हैं, लड़ाई भी एक तरह से ही लड़नी होगी। मजूर जनता प्रसन्नकुमार की बातों से प्रभावित होती और उसका साथ देने का वादा करती। इतना प्रसन्नकुमार के लिए काफी था।
रामभरोस की खेती-बारी का काम रुक गया था। मजूरों की हड़ताल का दायरा सिर्फ पंचायत भवन तक ही नहीं था बल्कि वह रामभरोस के खेती-किसानी वाले काम को भी रोकने तक फैल चुका था। हड़तालियों के हड़ताल के दायरे में दूसरे जोतदार नहीं थे। उनका काम पहले की तरह से चल रहा था।
रामभरोस की ऑखों में प्रसन्नकुमार का चेहरा तैरने लगा था। वे गरियाते थे कि प्रसन्नकुमरवा ने सिर्फ उनका काम ही नहीं बन्द करवाया बल्कि उनके बेटे विभूति को भी उनसे छीन लिया। रामभरोस के सामने अपनी खेती की भी समस्या आ गई थी कि उसे कैसे सपराया जाएगा। पंचायत भवन जो नहीं बन पा रहा वह तो अलग समस्या है उससे उनकी प्रतिष्ठा तो गिरी ही पर खेती का काम भी नहीं हो पा रहा, यह काफी दुखद था उनके लिए।
रामभरोस कल्पनाओं में जीने लगे थे। प्रसन्नकुमार को वे किसी झूठे मुकदमे में फसाने की बात सोचते तो कभी कुछ तो कभी कुछ। डी.आई.आर. वाला मुकदमा भी तो प्रसन्नकुमार के ऊपर उन्होंने झूठा ही तो करवाया था दारोगा को मिला कर। रामभरोस असमंजस में थे तथा उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था सो परेशान परेष्शान थे। वे इस बाबत किसी अन्य से बातें भी नहीं कर सकते थे। बहुत सोच विचार के बाद उन्हें एक रास्ता सूझा जो उनके व्यक्तित्व के अनुरूप था। फिर तो उन्होंने रामदयाल कारिन्दा को सहेज दिया कि हरिजनों को उनके खेतों में से न चलने दिया जाए। उनके खेतों से कोई घास भी न काटे, न कोई गोइठा बीने, गाय-गोरू उनके खेत में चरने भी न दिए जांए। अगर कोई उनके आदेश की अवज्ञा करता है तो उसे तत्काल उनके सामने हाजिर कराया जाए।
रामभरोस चाहते थे कि किसी तरह गॉव में झगड़ा हो जाए फिर तो वे उस झगड़े को बलबा में बदलवा कर हरिजनों का फंसवा देंगे उनके साथ प्रसन्नकुमार को भी। पर सहपुरवा में ऐसा कुछ नहीं हो पाया। किसी हरिजन ने रास्ता रोकने, रामभरोस के खेत में से घांस न काटने देने जैसे कामों का विरोध नहीं किया। रामभरोस की इस रणनीति को प्रसन्नकुमार जानता था सो उसने गॉव के लोगों को समझा दिया था कि उन्हें किसी भी हाल में रामभरोस के लागों से झगड़ा नहीं करना है। सो किसी ने झगड़ा नहीं किया।
रामदयाल रामभरोस के खेत से ले कर हरिजन बस्ती तकअपना लोहबन्दा चमकाता रह गया पर कहीं भी किसी ने कुछ प्रतिरोध नहीं किया। मजूरों ने प्रसन्नकुमार के समझाने के कारण अपना मुंह सिल लिया था।
गॉव में झगड़ा लगाने के लिए एक दिन तो फेकुआ की औरत से भी रामदयाल ने छेड़ छाड़ किया फिर भी औतार तथा दूसरे हरिजन प्रतिक्रिया हीन बने रह गये थे। केवल एक सूत्रा कि चाहे जो भी करें रामभरोस ही करें, उनका विरोध नहीं करना है। पंचायत भवन नहीं बनने देना है, न उनकी खेती बारी होने देना है, यही विरोध हमलोगों का लक्ष्य होना चाहिए दूसरे तरह के विरोध हमलोगों के लक्ष्य में नहीं होने चाहिए। मजूरे अपने लक्ष्य के प्रति सावधान थे सो रामदयाल के भटकाने पर भी वे अपने लक्ष्य से नहीं भटक रहे थे। रामदयाल ने तो बहुत कोष्शिश किया कि मजूरे झगड़ा झंझट करें पर मजूर तटस्थ थे, तो थे।
रामभरोस के सभी हलवाहे अपने घर बैठे हुए थे। घर बैठ कर खाना खा रहे थे तथा उन पर किसी का काम न करने तथा मजूरी न मिलने का असर नहीं था। घर में बैठे रहने के बदले उन्हें प्रतिदिन मजूरी मिल जाया करती थी। औतार मजूरी देने का इन्तजाम कर दिया करते थे वैसे भी काम पर जाने वाले दूसरे मजूर एक एक सेर अनाज प्रतिदिन के हिसाब से औतार के पास पहुंचा दिया करते थे और औतार उसअनाज को रामभरोस के मजूरों में बांट दिया करते थे।
रामभरोस के मजूर गॉव में घूम घूम कर बिरहा गाते और रामदयाल के सामने ऐंठते हुए चलते। रामदयाल सारा कुछ रामभरोस को बताता पर रामभरोस क्या कर लेते मजूरों का? रोपनी के समय तक रामभरोस के मजूरों ने किसी का काम नहीं थामा। सहपुरवा के मजूरों का ऐसा संगठन देख कर रामभरोस परेष्शान थे उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनके सारे मजूरे उनका काम बन्द कर देंगे। रामभरोस को जान पड़ रहा था कि सब कुछ उनके विपरीत हो रहा है, जो पहले कभी नहीं हुआ था।
रामभरोस को बाद में मालूम हुआ कि उनके मजूरों को चन्दा इकठ्ठा करके मजूरी दी जा रही है। गॉव के मजूर भी चन्दा दे रहे हैं। मजूरों केे अलावा शोभनाथ तथा कुछ दूसरे किसान भी चंदा दे रहे हैं। रामभरोस ने पता लगाना शुरू किया कि वे दूसरे जोतदार कौन हैं शोभनाथ केअलावा जो चंदा दे रहे हैं पर उन्हें कैसे पता चलता? यह बात तो केवल शोभनाथ जानते थे या चंदा देने वाला ही जानता था। रामभरोस को यह भी मालूम हो गया था कि दूसरे गॉवों के लोग भी उनके मजूरों की बनी (मजूरी) के लिए चंदा दे रहे हैं। प्रयास करने के बाद भी रामभरोस चंदा देने वालों के नाम नहीं जान पाए।
सुक्खू और औतार के जिम्मे बहुत बड़ा काम था। वे हमेशा सतर्क रहा करते थे कि कोई मजूर रामभरोस की चाल में न फस जाए क्योंकि मजूर निश्छल होते हैं, वे मालिकों की चाल नहीं समझ पाते हैं और फस जाते हैं उनकी जाल में। रामभरोस इस समय परेशान हैं, अपना काम निकालने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं, धन दौलत उनके पास है ही। रूपयों की लालच किसे नहीं होती, रूपया मजूरों को तोड़ सकता है, भटका सकता है वसूलों से।
प्रसन्नकुमार के लिए आगे का समय काफी जटिल होता जा रहा था। एक तो पुलिस से बच कर रहना दूसरे गॉव में जागरूकता का कार्य करना दोनों कठिन हुआ जा रहा था पर वह हिम्मत नहीं छोड़ रहा था। प्रसन्नकुमार को सबसे अधिक खतरा रामभरोस से ही था उनके अलावा क्षेत्रा में कोई भी उसके विरोध में नहीं था। रामभरोस की टोह लेने के लिए प्रसन्नकुमार ने विभूति को उसके घर भेज दिया था कि वह अपने घर पर ही रहे अपने पिता के साथ। तथा उनके कररतूतों एवं रणनीति के बारे में लगातार उसे बताता रहे। विभूति कहीं भी आ जा सकता था, उसे कोई खतरा नहीं था। कम से कम उसके लिए रामभरोस कुछ गलत नहीं करेंगे यह तय था पर विभूति था कि वह प्रसन्नकुमार को अकेला छोड़ना नहीं चाहता था। उसने प्रसन्नकुमार को रोका भी और स्पष्ट रूप से कहा....कृ
’कहीं तुम मुझ पर सन्देह तो नहीं कर रहे हो कि मैं अपने बाप का साथ दूंगा, इसी लिए मुझे घर तो नहीं भेज रहे’
प्रसन्नकुमार अवाक, क्या बताए विभूति को। प्रसन्नकुमार ने तुरंत विभूति को गले लगा लिया और रूआंसा हो गया, लगा रो देगा...कृ
‘नहीं यार! ऐसा नहीं है, तुम्हारे पिता जी क्या कर रहे हैं उनकी क्या योजना है इसके बारे में कौन जानकारी जुटा सकता है तेरे अलावा, अगर कोई हो तो बताओ’
प्रसन्न कुमार की सलाह विभूति को ठीक लगी। रामभरोस की योजना के बारे में कोई दूसरा नहीं बता सकता था। अपने घर में वह जब रहेगा तभी तो उसे मालूम होता रहेगा पिता जी की रणनीति के बारे में।
वैसे भी प्रसन्नकुमार की बात विभूति टाल नहीं सकता था।
पूरे विजयगढ़ परिक्षेत्रा में भूमि आवंटन में धांधलियां हुई थीं इतना ही नहीं कुछ तपे हुए लोग आवंटित जमीनों पर कब्जा नहीं छोड़ रहे थे। प्रसन्नकुमार भूमिगत था फिर भी वह इस तरह की शिकायतों को प्रार्थना पत्रा के माध्यम से उच्चाधिकारियों के पास भिजवाया करता था। वह किसी सुरक्षित स्थान पर बैठ कर शिकायतें लिखता और अपने मित्रा वकील के जरिए उसकी पैरवी करवाता। शिकायतों पर होता जाता कुछ भी नही था पर वह शिकायतें जरूर भिजवाता। अधिकांश लोग जो बंजर जमीनों पर अनधिकृत रूप से काबिज थे वे अधिकारियों के करीब होते, नहीं भी होते, तो कुछ ले देकर करीबी बन जाते। ऐसे शिकायती कामों की जॉच में घूस आम बात हो गयी थी। जोरदार शिकायतें होने पर भी ताकतवर लोग उसे घूस दे कर दबवा दिया करते थे परिणाम शून्य निकलता फिर भी हार मान कर प्रसन्नकुमार बैठने वालों में नहीं था। उसका मानना था कि उसे जो करना है वह कर रहा है। उसकी आंखों के सामने शिकायती प्रार्थना पत्रा भिजवाने का सारा दृश्य तैरने लगता।
शिकायती प्रार्थना पत्रा, पेशकार की मेज, दो रुपये की पेशी, कानून की किताबें, रूलिंग, अदालत में गिडगिड़ाता फरियादी, पोलिंग बूथ पर ऊॅघता वोटर, कर्जे से बंधा नागरिक, कर्जदार, कर्णधार, सिपाही, कब्जा नहीं मिलता, सारा कुछ देख कर शिकायत करने वाला घर लौट जाता। अदालत बन्द नहीं होती, न्याय, घूस, फैसला सब चलता रहता, हाकिम चौबीसों घंटे जीवित रहते उनका काम बन्द नहीं होता, केवल दफ्तर बन्द होते हैं। आज से ही नहीं बहुत पहले से ही ऐसा हो रहा है और होता भी रहेगा शायद....
प्रसन्नकुमार को सामने कई दृश्य दीखने लगते हैं....कृ
ष्शहर, छोटे शहर, बंगले, सरकारी अफसर, सरकारी लोग, कुछ समझ में नहीं आता। लोकतंत्रा का जाल कितना बड़ा है? समझने वाली बात,बोतल, महुआ या रम, ठर्रा भी, जवानी गॉव की मुहल्ले की, स्कूल की, सड़क की, बाभन, ठाकुर, बनिया, कुनबी, अहीर, हरिजन या अछूत कुछ भी बोलो, कुछ भी समझो। सब बोतल, सब जवान, देश महान, अधिकारी महान, सरकारी लोग महान और जनता! राम जाने का है?
शिकाती प्रार्थना पत्रों पर सुनवाई नहीं की जाती उन्हें खामोशी बस्ते में डाल दिया जाता है।
प्रसन्नकुमार जानता था कि शिकायती प्रार्थना पत्रों से कुछ होने जाने वाला नहीं है। इसलिए वह दुखी रहा करता था पर दुख करने से काम चलने वाला तो था नहीं। आवंटित जमीनों पर कब्जा दिलवाने का प्रयास तो उसे करना ही है। पहले तो उसके सामने आवंटित जमीन पर केवल औतार को कब्जा दिलवाने की समस्या थी पर अब तो बहुत सारे लोग उसकी जानकारी में हैं जिन्हंे उनकी आवंटित जमीनों पर कब्जा दिलवाना है। प्रसन्नकुमार मार-पीट फौजदारी करना नहीं चाहता था। वह शाान्तिपूर्ण ढंग से कब्जा दिलवाना चाहता था भूमि आवंटियों को। कहीं कहीं तो उसे लोगों को समझाने बुझाने से सफलता भी मिल जाती थी सो वह क्षेत्रा में लोगों को समझा बुझा कर अवैध कब्जा छोड़ने के उन्हें लिए राजी भी कर लेता था। जहां लड़ाई, झगड़े की आशंका होती वहां वह नहीं जाता था। वह जानता था कि बड़े काम के लिए उसे जनसमर्थन चाहिए ही चाहिए। ‘अपना काम अपनी लड़ाई’ जैसी जागरूकता जब जनता में आ जाएगी तब सारे मसले अपने आप हल होने लगेंगे।
दर असल आवंटित जमीन पर कब्जे का खेल आपातकाल में प्रचलित हो चुका था। सरकार द्वारा जैसे ही आवटित जमीनों पर गरीबों को कब्जा दिलवाया जाता वैसे ही दबंगों द्वारा कब्जे से उन्हें बेदखल भी कर दिया जाता। कभी नांव इस तरफ होती तो कभी उस तरफ। पर सारे लोग ऐसे नहीं थे जो एक बार कब्जा छोड़ कर दुबारा कब्जा कर लेते हों। ऐसे लोग थे पर गिने चुने थे। ज्यादातर लोग तो आवंटित भूमि पर कब्जा जमा लेने वाले ही थे। आवंटित भूमि पर कब्जा न करने वाले लोग तो कई कई विशेषताओं वाले थे।वे केवल खेती करना जानते हैं, परिवार चलाना जानते हैं, झूठ नहीं बोलते हैं,आतिथ्य जानते हैं, सहनशील हैं, छल, कपट, बेइमानी, नाइन्साफी नहीं जानते तथा जोर-जबरी करना नहीं जानते। ऐसे लोग तो आवंटित जमीनों पर से अपना कब्जा समझाने बुझाने पर छोड़ते जा रहे थे। पर जो दबंग थे, जिनका विश्वास लूट व प्रशासन पर था, वे झगड़ा पर उतारू हो जाते थे। उनसे प्रसन्नकुमार टकराना नहीं चाहता था। हरिजनों के समझ में यह बात आगई थी कि जमीन किसी के बाप की नहीं होती, उसे जबरिया ही कब्जियाया गया होता है। पहले जमीन पर कब्जा करना फिर अपना नाम चढ़वा लेना। बेचारे मजूर का कर लेते भले ही प्रकृति का नियम उनके साथ था, पर प्रकृति पर कब्जा तो ताकतवरों का होता है। वे तो शिकायती प्रार्थनापत्रा देने सेें भी डरते थे, वे भगवान के सहारे थे, उन्होंने ही जीवन दिया है, वे ही बचाएंगे।
कोई आगे बढ़ कर उनका साथ देना भी चाहता था और कहता था कि ‘तुम्हारी आवंटित जमीन है कब्जा कर लो’ तो वे एक ही बात बोलते थे....कृकृ
‘कब्जा तो हम कर लेंगे भइया पर जब आप साथ रहेंगे, अकेले नाहीं।’
यह अकेला पन जटिल और क्रूर इतिहास ने उन्हें दिया है। वे पहले भी अकेले थे और आज भी हैं। वे अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए भी आगे नहीं बढ़ सकते थे। आवंटित भूमि पर कब्जा लेने के लिए सभी भूमिहीन चाहते थे कि प्रसन्नकुमार उनके साथ रहे। प्रसन्नकुमार अकेला था वह आखिर किस किस के साथ रहता। यह विशेष किस्म की विवशता थी। सभी डरे हुए हैं, वे जेल जाने से डरते हैं, आन्दोलन करने से डरते हैं। वे जेल जाने के बजाय घूस देना अच्छा समझते हैं, बहुतों ने घूस फूस दे कर अपना कब्जा भी पा लिया है। प्रसन्नकुमार जानता है कि हजारों साल के यातनादायी इतिहास ने उन्हें कमजोर और असमर्थ बना दिया है। वे प्रतिरोध और खामोशी के बीच के फासले को नहीं जानते। वे चुप हैं पर उनका मन! मन चुप नहीं है, समय और उचित अवसर उन्हें कभी इतना प्रशिक्षित कर देगा कि वे अपना हक ले कर रहेंगे। प्रसन्नकुमार आशावादी है, उसका आशावाद ही उसे इस रास्ते पर ले आया है।
सहपुरवा का पंचायत भवन और औतार की आवंटित जमीन का मामला प्रसन्नकुमार के लिए जनप्रतिरोध का नमूना था। जनप्रतिरोध की सफलता देख कर ही वह आगे की योजना बनाना चाहता था। उसे देखना था कि औतार को उनकी जमीन पर कब्जा दिलवाने के लिए पंचायत भवन के निर्माण को वह रोकवा सकता है कि नहीं।
कब्जा दिलवाने की योजना बन चुकी थी। योजना के मुताबिक साथी मजूर विवादास्पद जमीन पर एकत्रा होने लगे थे, सूर्योदय होते होते तक अधिकांश साथी विवादास्पद जमीन पर एकत्रा हो गये। उनके साथ जमीन जोतने के लिए हल और बैल भी लाए जा चुके थे तथा साथ ही साथ फावड़ा और कुदाल भी वे लिए हुए थे। सभी कानाफूसी भी कर रहे थे, पुलिस की मार, रामभरोस की गाली, रामदयाल का लोहबन्दा, जेल, मार, पीट, कुछ भी संभव है फिर भी काहे के लिए डरना? जो होगा उसे साथ साथ झेलेंगे, साथ साथ मार खाएंगे और जेल भी जाएंगे। सभी साथी आपस में किसिम किसिम की बतकही कर रहे थे और प्रसन्नकुमार के वहां न होने पर चिन्तित भी थे।
‘प्रसन्नकुमार भइया अभी तक नाहीं आए, उनको तो अब तक आ जाना चाहिए था। काफी देर हो रही है। नहीं आऐंगे तो का होगा?’
पंचायत भवन निर्माण स्थल पर उपस्थित सारे मजूर घबराये हुए थे। वे प्रसन्नकुमार के आने का रास्ता देख रहे थे। उनमें प्रसन्नकुमार को वहां होने की चर्चा हो रही थी। उनमें कुछ लोग आशंकित भी थे। बड़े आदमी और बड़ी जात का लड़का है। मीठी बातें करना, हमदर्दी दिखाना जितना आसान और सहज है मोर्चे पर डटे रहना और संघर्ष को संभालना उतना ही कठिन है।
बात बात होती है, बात पर चले नहीं चले, बड़े आदमियों के स्वभाव में है। बड़े आदमियों का कहना और करना तथा दोनों के अर्थ अलग अलग होते हैं। कहना केवल कहने के लिए होता है।
लोग सोच ही रहे थे कि प्रसन्नकुमार वहां आ गया। सबकी बातें मुंह में पड़ी रह गयीं। पंचायत भवन जमीन से ऊपर करीब चार फीट बन चुका था देखते ही देखते उसे मजूरों ने गिरा दिया और उसके कचरा पास वाले नाले में फेंक दिया। औतार की जमीन ही कितनी थी केवल पन्द्रह बिस्वा, उसे भी तीन चास जोत कर उसमें गेंहूं बो दिया गया। वहां देखने पर एक भी ऐसा निशान नहीं बचा रह गया था जिससे साबित होता हो कि वहां कभी पंचायत भवन भी बन रहा था। सारा काम आसानी तथा जल्दी से निपटा लिया गया जिसकी कल्पना तक प्रसन्नकुमार या किसी ने नहीं किया था। हड़ताली डर रहे थे कि रामभरोस के पालतू गुंडे आ सकते हैं फिर झागड़ा मार-पीट या गोली चल सकती है पर ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे सारे मजूर प्रसन्न थे। रामभरोस और उनके सारे गुंडे, बोंग वाला रामदयाल कारिन्दा सारे के सारे जाने कहां चले गए थे उस समय। वहां उनमें से कोई नहीं दिखा। रामभरोस की दुनाली भी नहीं दिखी वहां? क्या और कैसा होता है आतंक इसकी परिभाषा गायब हो चुकी थी। आखिर कौन लिखता आतंक की परिभाषा? संगठित प्रतिरोध आतंक की परिभाषा लिखने ही नहीं देता।
वहां उपस्थित सारे हरिजन अचरज में थे औतार भी अचरजाए हुए थे। वे मजूर जो रामभरोस के डर के कारण पंचायत भवन का निर्माण गिराना नहीं चाहते थे वे भी सीना फुलाए हुए थे और अपनी पीठ ठोंक रहे थे। शोभनाथ को भी करिश्मा लग रहा था। प्रसन्नकुमार को प्रसन्नता थी कि बिना बवाल के सारा काम निपट गया, जनप्रतिरोध का पहला प्रयास सफल तो हुआ।
वहां मार पीट होना निष्चित था पर कुछ नहीं हुआ पहले जो होता था और जो सुना जाता था रामभरोस के बारे में, वह वहां नहीं दिखा। उनकी ताकत, मारपीट कुछ भी तो नहीं दिखी वहां। प्रसन्नकुमार रामभरोस के आतंक का आकलन कर रहा था। पहले रामभरोस का प्रतिरोध करने वाले गॉव में नहीं हुआ करते थे, अप्रत्याशित भय के कारण लोग रामभरोस का प्रतिरोध ही नहीं करते थे, हस्तक्षेप की सोच ही उनके दिल दिमाग से गायब थी। वैसे भी पहले कभी भी संगठित प्रतिरोध भी रामभरोस का नहीं किया गया था। संगठित प्रतिरोध के आगे रामभरोस कैसे टिकते? कोई नहीं टिक पाता संगठित प्रतिरोध के सामने। एक दो आदमियों का मार देना, मरवा देना अलग बात है पर संगठित समूह के प्रतिरोध को कुचल देना अलग बात है। इस बार सहपुरवा की गरीब जनता का एक भी सदस्य रामभरोस के साथ नहीं था, सबका एक ही लक्ष्य था पंचायत भवन के निर्माण को गिराना, औतार की जमीन जोत कर उसकी बोआई करना। एक आदमी का लक्ष्य सारे गॉव का लक्ष्य बन कर जनप्रतिरोध की शक्ल में ढल गया, तभी उनका लक्ष्य भी पूरा भी हो पाया। न गोलियां चलीं, न मारपीट हुई, न बलबा हुआ। पूरी तरह शान्तिपूर्ण प्रतिरोध जो अद्भुत था।
औतार अपनी जमीन पर कब्जा पा गये पर कब तक? यह सवाल कब्जा करते समय भी था और कब्जा पाने के बाद भी जिन्दा था। मरा नहीं था पर आशा है जब तक सहपुरवा के मजूर संगठित रहेंगे, उनमें आंतक के प्रतिरोध की चेतना रहेगी तब तक रामभरोस उनका कुदरती अधिकार नहीं छीऩ सकते। जनता का दमन करने की बात तो दूर, उनके खिलाफ कुछ अहितकर करने के लिए सोच भी नहीं सकते।
पंचायत भवन गिरवाने की योजना प्रसन्नकुमार ने बहुत पहले ही बना लिया था जिसे विभूति नहीं जानता था उसे प्रसन्नकुमार ने बताया भी नहीं था। जबकि वह पंचायत भवन ढहाने की योजना को अपने पिता से कभी भी नहीं बताता। वह प्रसन्नकुमार का साथ नहीं छोड़ सकता था। पंचायत भवन गिराए जाने के दिन विभूति प्रसन्नकुमार के ही साथ था और प्रतिरोध की कार्यवाही में सहभागी भी था। वह सोच रहा था कि इतनी बड़ी योजना के बारे में प्रसन्नकुमार ने उसे बताया क्यों नहीं? कहीं वह उस पर सन्देह तो नहीं कर रहा? उसने खुद को आश्वस्त भी कियाकृ
‘नहीं, प्रसन्नकुमार उस पर संदेह नहीं कर सकता।’
विभूति प्रसन्नकुमार से बहुत प्रसन्न था उसे लगा कि कभी कभी आकस्मिक ढंग से किया जाने वाला काम भी परिणामकारी हो जाता है। यह मजेदार बात थी कि पंचायत भवन का निर्माण गिराए जाने तथा औतार की आवंटित जमीन जोत कर गेहूं बोने की जानकारी रामभरोस को नहीं हो पाई थी। रामभरोस ने रामदयाल को इस बाबत डांटा भी था....कृ
‘साला बांेग ले कर गॉव में घूमता रहता है फिर भी यह भी न जान सका कि पंचायत भवन का निर्माण गिराए जाने के लिए हरिजन कमर कस चुके हैं। इतना ही नहीं औतार की आवंटित जमीन वे जोतने व बोने वाले हैं। गॉजे का दम लगा कर सोया रहता है।’
पर जो होना था वह हो चुका था रामभरोस चाहे जिसे डांटे या मारें, कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला था। विभूति प्रसन्नकुमार की सलाह का निर्वहन कर चुका था और अपने पिता को भ्रम में डाल चुका था कि प्रसन्नकुमार आज कल कहीं बाहर गया हुआ है। रामभरोस को भ्रम में डालकर ही पंचायत भवन गिराने का काम किया जा सकता था। रामभरोस को भ्रम में रखना जरूरी है उन्हें पता नहीं चलना चाहिए कि सहपुरवा बदल चुका है, मजूर उनके खिलाफ संगठित हो चुके हैं। मजूरों के संगठित होने तथा पंचायत भवन गिराए जाने की भनक तक उन्हें नहीं लगनी चाहिए। ऐसा हुआ भी, रामभरोस को भनक नहीं लगी कि सहपुरवा में पंचायत भवन गिराया जाने वाला है? अगर उन्हें भनक लग गई होती कि प्रसन्नकुमार सहपुरवा में ही है फिर तो वे कान खड़े और आंखें खोले रखते तथा नाक से सूंघते रहते कि सहपुरवा में का होने वाला है? और उन्हें पता चल ही जाता पंचायत भवन गिराए जाने के बाबत।
अच्छा हुआ कि रामभरोस अपने में ही डूबे रह गये थे, वे अपनी तीसरी आंख नहीं खोल पाए। रामभरोस तीसरी ऑख खोल भी देते तो क्या फर्क पड़ जाता। पंचायत भवन तो हर हाल में गिराया जाता भले मारपीट होती बलबा होता, आखिर भीड़ भीड़ होती है, भीड़ का अपना मिजाज तथा कानून होता है, भीड़ का संगठित मन किसी भी तानाशाही प्रवृत्ति वाले आदमी को मसल कर रख देता है। वैसे पंचायत भवन गिराने तथा औतार के खेत की बोआई करने का काम आसानी से निपट गया। कुछ अहितकर नहीं हुआ।
'''‘दंगे अपने आप नहीं होते। बलबे अपने
आप नहीं होते, घर नहीं बंटते, देश नहीं बंटते। बलबा, दंगा,
बटवारा सब करवाए जाते हैं’ पर करवाता कौन है? कथा के साथ चलें’'''
सहपुरवा से थाना काफी दूर पड़ता था। जिस दिन औतार के आवंटन वाली भूमि की जोताई कर आन्दोलनकारी हरिजनों ने कब्जा बहाल कर लिया था तथा पंचायत भवन के अवैध निर्माण को गिरा दिया था उस दिन थाने पर जाने कितनी रपटें लिखाई जा चुकी थीं। थाने पर रपट लिखने लिखाने का ही काम होता है पर सहपुरवा की रपट वहां नहीं लिखी जा सकी थी। जाने क्या हो गया था उस दिन कि हर तरफ से आवंटित जमीनों के झगड़ों के बारे में शिकायतें आने लग गई थीं थाने पर और थाना परेष्शान था कैसे करे इन्तजाम, सिपाहियों को कहां भेजे, कहां न भेजे। काम की प्रथमिकता चुनना थाने के लिए मुश्किल हो गया था। दारोगा ने एक दो सपाहियों को थाने पर छोड़ कर, सारे सिपाहियों को क्षेत्रा में भेज दिया था तथा खुद भी आवंटित भूमि पर कब्जे की दरखास की जांच के लिए थाने से निकल गया था किसी गॉव में।
पंचायत भवन गिराए जाने की खबर में रामभरोस के लिए आग छिपी हुई थी। खबर की आग ने उन्हें झुलसा दिया और वे मदत के लिए सीधे थाने की ओर भागे थे। हरिजनों के संगठित प्रतिरोध से वे टकरा नहीं सकते थे। हरिजनों के जन प्रतिरोध को दबाने के लिए थाने की भूमिका के बारे में रामभरोस को पता था सो थाने पर जा कर उन्होंने सूचना दी थी कि सहपुरवा के पंचायत भवन का ताजा निर्माण गिरवा दिया गया, जिसकी अगुआई प्रसन्नकुमार ने किया था पर थाने पर था कौन? थाने पर तो सिर्फ दो ही सिपाही थे जिनका थाने पर रहना आवष्यक था। थाने की भी सुरक्षा का सवाल था। सहपुरवा कोई भी सिपाही थाने से नहीं भेजा जा सका। रामभरोस का विश्वास थाने पर था पर थाना उन्हें धोखा दे देगा, इसका अनुमान उन्हें नहीं था।
प्रसन्नकुमार की योजना सफल हो चुकी थी और आने वाले परिणाम के लिए वह तैयार था। रामभरोस क्या करते? वे थाने ही जाते पर दारोगा नहीं था थाने पर, वे दारोगा का वहीं इन्तजार करने लगे। सहपुरवा में रहने पर उन्हें डर था अगर मजूर उनकी बखरी की ओर चल पड़े तो.... मजूर हैं, गुस्से में हैं कहीं भी आ जा सकते हैं, गुस्साए मजूरों को आने जाने से कौन रोक सकता है? अन्धेरा होते होते तक सिपाही थाने पर आने लगे, बाद में दारोगा जी आये। उन्होंने थाने पर रामभरोस को देखा, वे मुर्झाए हुए थे।
‘का हुआ पंडित जी! बहुत परेशान दिख रहे हैं, कोई बात हो गई है का?’ दारोगा ने रामभरोस से पूछा....
दारोगा जी को सहपुरवा का सारा हाल रामभरोस बता गये। दारोगा जी असमंजस में पड़ गए क्या बता रहे हैं रामभरोस जी। हरिजनों की इतनी हिम्मत कि वे पंचायत भवन गिरा दें जिसका शिलान्यास जिलाधिकारी जी ने किया था। मन बढ़ गया है सालों का।
दारोगा रामभरोस के दबाव में था फिर भी उसे नहीं सूझ रहा था कि ऐसे संकट में वह रामभरोस की सहायता कैसे करे? रपट लिख कर मौके पर जाए या बिना लिखे ही चले मौके पर। रपट भी सोच समझ कर लिखना होगा जिसे अदालत भी मान ले। दारोगा जानता था कि केवल रपट से कुछ नहीं होता। होता तब है जब अदालत में रपट प्रमाणित हो जाए सो बहुत सोच समझ कर रपट लिखना होगा। रामभरोस के कहने पर वह शोभनाथ पंडित को मुल्जिम नहीं बना सकता था और प्रसन्नकुमार को भी मुल्जिम बनाना उसके लिए आसान नहीं था। मामला हरिजनों का था, वे भूमिहीन थे, जिस खेत को हरिजनों ने जोत तथा बो लिया था वह खेत औतार के पट्टे का था। पट्टे वाली जमीन का मामला खतरनाक होता है। रामभरोस भले ही पट्टे की जमीन पर अपनी ताकत दिखांए पर अपने स्तर से वह किसी भी तरह का पठनीय या अपठनीय पट्टाचरित नहीं लिखेगा।
दारोगा परेष्शान परेष्शान था। दारोगा के लिए सहपुरवा का मामला आसान और सरल किस्म का नहीं था। वह जानता था कि पट्टे की जमीन का मामला राजनीतिक रंग भी पकड़ सकता है तथा बहुत बड़ा पट्टा चरित भी बन सकता है। वैसे भी आपातकाल खतम होने वाला है। नये चुनाव भी होने वाले हैं। सरकार बदलने पर नई सरकार का मिजाज जाने कैसा हो। सरकार बनते ही उसका ट्रान्सफर भी हो सकता है सो संभल कर काम करना होगा।
देर रात तक दारोगा जी सहपुरवा की घटना के बाबत कोई समाधान नहीं निकाल पाये। रामभरोस के साथ उसकी दोस्ती का भी भविष्य बिगड़ रहा था। रामभरोस का काम नहीं हुआ तो उन पर कई तरह का आरोप लगवाकर रामभरोस उनका ट्रान्सफर भी करवा देंगे ऐसा करना उनके बांए हाथ का खेल है और अगर उसने रामभरोस के कहने पर कुछ किया तो आपातकाल हटते ही उसके ऊपर बवाल आ जाएगा। सारे विरोधी पारटी के लोग उस पर चढ़ बैठेंगे क्योंकि अगली सरकार तो उनकी ही बननी है। पूरे कार्यकाल में इस तरह की उलझन का सामना दारोगा को कभी नहीं करना पड़ा था।
दारोगा पंचायत भवन गिराए जाने के मामले में संतोष जनक निर्णय नहीं ले पा रहा था। निर्णय ने ले पाने का एक कारण प्रसन्नकुमार भी था। प्रसन्नकुमार की कार्ययोजना के बारे में गुप्त सूत्रों द्वारा दारोगा को जानकारी थी कि प्रसन्नकुमार सहपुरवा का एक लड़का भर नहीं है, जिसके बाप का नाम शोभनाथ है, वह जनता का आदमी है और जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। प्रसन्नकुमार को छूने का मतलब आग में तेल डालना होगा और हरिजनों के बहुत बड़े आन्दोलन का सामना करना होगा। उसे पता था कि सहपुरवा का एक भी आदमी रामभरोस के पक्ष में नहीं है और न ही क्षेत्रा का कोई आदमी रामभरोस का साथ देगा। ऐसी स्थिति में दारोगा सोच विचार कर ही निर्णय लेना चहता था।
दारोगा ने रामभरोस को सुझाया था कि विभूति को प्रसन्नकुमार के साथ लगा दीजिए जिससे मालूम हो सके कि उसकी योजना क्या है? विभूति हस कर दारोगा की बात टाल गया। प्रसन्नकुमार की अगली योजना की जानकारी वह नहीं जुटा सकता।
‘वह कैसे मालूम कर सकता है प्रसन्न कुमार की योजना के बारे में? प्रसन्नकुमार मुझ पर विष्वास ही नहीं करता वह जानता है कि मैं अपने पिता के विरोध में नहीं जा सकता। फिर वह मुझे अपने साथ क्यों रखेगा?’
विभूति को लग रहा था कि दारोगा उसे फिल्मी जासूस बनाना चाहता है जो वह कभी नहीं बनेगा। रामभरोस भी विभूति को प्रसन्नकुमार के साथ जुड़वाना नहीं चाहते थे जबकि प्रसन्नकुमार से वह जुड़ा हुआ था। रामभरोस को डर था कि प्रसन्नकुमार की तरह विभूति भी डी.आई.आर. का मुल्जिम हो जाएगा। इस मामले को वे चाहे जैसे हल करेंगे पर विभूति को इस काम से नहीं जोडं़ेगे। यह विभूति की लिए अच्छी बात थी।
थाने पर से रामभरोस अपने घर नहीं लौटे सीधे रापटगंज चले गये। वे उलझन में थे, उन्हें चैन नहीं पड़ रहा था। उन्हें कृपालु जी से मिलना चाहिए, वे ही पंचायत भवन गिराए जाने के मामले में कुछ कर सकते हैं। और वे उनसे मिले भी। उन्होंने कृपालु जी को सहपुरवा का सारा किस्सा बताया कि किस तरह से औतार की जमीन जोत ली गई और पंचायत भवन का निर्माण गिरा दिया गया। कृपालु जी चकरा गयेकृ
‘का बोल रहे हैं रामभरोस जी, मुझे तो यकीन ही नहीं आ रहा कि हमारे क्षेत्रा के हरिजन कानून अपने हाथ में ले सकते हैं, का वे सरहंग हो गये हैं?’
रामभरोस ने अपनी बात को सच बताया और यह भी कि आगे क्या करना चाहिए, इस पर सलाह लेने के लिए वे उनके पास आये हुए हैं।
कृपालु जी ने सीधे पूछा....
‘थाने पर गये थे का?’
‘हां थाने पर गया था पंचायत भवन गिरा दिए जाने के बाद। उस समय थाने पर केवल दो ही सिपाही थे। वे थाना छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। दारोगा भी थाने पर नहीं थे वे अन्धेरा होने पर आये। तब तक तो औतार की जमीन जोती व बोई जा चुकी थी तथा पंचायत भवन का निर्माण गिराया जा चुका था। अब आगे क्या करना है इसी लिए आपके पास आया हूं। इस काण्ड का कर्ता-धर्ता कोई और नहीं शोभनाथ का लड़कवा प्रसन्नकुमरवा है। अगर पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती फिर तो सब ठीक हो जाता। दारोगा रपट भी तो नहीं लिख रहा है वह विचार कर रहा है कि उसे क्या करना चाहिए। वह सीधे प्रसन्नकुमार को मुकदमे में नहीं रखना चाहता। वह प्रसन्नकुमार से डर रहा है, बोल रहा है कि उसके साथ क्षेत्रा भर के हरिजन हैं, मुकदमे में उसे फसाते ही बवाल हो जाएगा। रामभरोस ने कृपालु जी से प्रार्थना किया....कृ
‘पंडित जी आप चाहेंगे तभी रपट लिखा पाएगी नहीं तो नहीं।आप थाने पर चलिए और रपट लिखवाइए। दारोगा पर दबाव डालिए कि वह प्रसन्नकुमार को पकड़ ले। प्रसन्नाकुमरवा पकड़ा जाएगा फिर सहपुरवा का सारा झमेला खतम हो जाएगा।’
‘पंडित जी आप तो जानते ही हैं कि औतरवा का पट्टा भी अभी तक खारिज नहीं हुआ है, डिप्टी साहब के यहां लटका हुआ है। औतार का पटटा खारिज होने का झूठा प्रचार मैंने ही करवा दिया था। औतार के पट्टे को भी आपको ही खारिज करवाना है। आप की बात डिप्टी साहब नहीं टालेंगे।’
औतार का पट्टा खरिज होने के पहले ही रामभरोस ने पंचायत भवन का निर्माण शुरू करा दिया था जो कानूनन गलत था। उस जमीन पर औतार का ही नाम चल रहा था जिस पर औतार अपनी खेती कर सकते थे। कृपालु ने रामभरोस को डांटा कि ऐसा काम जो कानूनन गलत हों आप काहे करते हो। पट्टा खारिज करा लेते फिर पंचायत भवन बनवाते पर आपका हर काम जल्दीबाजी का होता है खैर चलिए, दारोगा के पास चलते हैं।’
कृपालु जी दारोगा के पास आये या लाए गये, यह सहपुरवा के लिए आवश्यक नहीं। आगे क्या होता है यह आवश्यक है। कृपालु जी का थाने पर आना दारोगा के लिए भी ठीक था। उसने रपट लिख ली कुछ अपने मन से तथा कुछ कृपालु जी के दबाव से।
रपट लिख जाने के बाद दारोगा सहपुरवा जाने की तैयारी करने लगा। दारोगा का डर टूट चुका था वह समझ चुका था कि कृपालु जी के कारण उसकी नौकरी पर असर नहीं पड़ेगा। कृपालु जी का राजधानी तक सोर्स है। पुलिस के सारे बडे़ अधिकारी कृपालु जी को जानते व मानते हैं। दारोगा मन ही मन अपनी कार्य योजना बनाने लगा था कि उसे सहपुरवा जा कर क्या क्या करना है। हरिजनों को तो छूना तक नहीं है, सिर्फ सभी को डरवा देना है।
कृपालु जी के सक्रिय हो जाने से रामभरोस का संकट दूर हो चुका था। रामभरोस जानते थे कि कहीं कुछ नहीं होता। कोई कुछ नहीं करता। सब कुछ करवाया जाता है। दंगे अपने आप नहीं होते। बलबे अपने आप नहीं होते, घर नहीं बंटते, देश नहीं बंटते, बलबे, दंगे, बटवारे सब करवाए जाते हैं। किसी भी तरह से उन्हें तो अपना काम कराना है और शोभनाथ को दिखा देना है कि रामभरोस अकेला रामभरोस है फिर भी उसके काम को कोई नहीं रोकवा सकता। सहपुरवा में वही होगा जो रामभरोस चाहेगा।
थाने पर से ही कृपालु जी घोरावल लौट गये। वहां भी सहपुरवा की तरह का एक मामला फसा हुआ था। हरिजन और सवर्ण वाला? वहां तो हरिजन मार-पीट पर आमादा हैं, थोड़ा भी मौका मिला तो वे जाने क्या कर दें। हालांकि वहां सिपाहियों की ड्यूटी लगा दी गई है फिर भी डर बना हुआ है। रामभरोस थाने से देर रात तक अपने घर आये और सो गये। रामभरोस के आने की रामदयाल प्रतिक्षा कर रहा था। थाने पर मिली दारोगा की सहमति से रामभरोस मगन थे। रामदयाल से वे सगर्व बोले....कृ
‘कल तक सब हल हो जाएगा हो रामदयाल’
‘अच्छा सरकार!’
कृपालु जी थाने से ही घोरावल चले गये। घोरावल जाना उनके लिए जरूरी था। वहां के एक गॉव में सहपुरवा की तरह ही संकटपूर्ण स्थिति थी। कृपालु जी का जो शक था वह सही निकला। कुछ न कुछ अशुभ ही होगा। वही हुआ। गरीब जनता जब प्रतिरोध पर उतर जाती है तब उस प्रतिरोध को रोक पाना आसान नहीं होता। प्रतिरोध इतना उग्र हो गया कि एक बाऊसाहब का घर तक हरिजनों ने घेर लिया था। वहां सीलिंग से निकली जमीन का विवाद था। सीलिंग से निकली जमीन को हरिजन जोत रहे थे। बाऊसाहब ने मना किया। ताकत की जोर से हरिजनों को उन्होंने रोकने का प्रयास भी किया, वे रोकने के अलावा और क्या कर सकते थे। वे अपने पक्ष में अकेले थे उनके विपक्ष में गॉव के पूरे हरिजन थे। वहां मामला शारीरिक ताकत का आन खड़ा था। कोई कायदा कानून नहीं रह गया था वहां। शासन प्रशासन जहां था वहां था पर वहां नहीं था जहां होना चाहिए था। वहां कानून भी गॉव की जमीन पर पसर कर सो रहा था, उसे जगाए भी तो कौन? कानून को जगाना था बाऊसाहब को, बाऊसाहब कानून के दरवाजों पर दौड़ लगा रहे थे। वे कानून को जगाना चाहते थे, लगातार कानून के दरवाजे पीट रहे थे पर कानून सो गया तो सो गया, उसे जगाना आसान और सरल नहीं। बाऊसाहब ने पूरी कोशिश की पर सब बेकार, कानून सोया ही रह गया, उसे वे नहीं जगा सके। हरिजन संगठित थे, मरने मारने पर तुले हुए थे। वे मानने वाले नहीं थे। हरिजनोें की समझ थी कि सीलिंग से निकाली गई जमीन पर उनका अधिकार होना चाहिए और किसी का नहीं, उस जमीन को आवंटित किया जाना चाहिए। वे इसी राजनीतिक समझ पर आगे बढ़ रहे थे। वे बाऊसाहब से लड़ गये और फिर बात बढ़ गई। कृपालु जी चिन्तित थे कि रापटगंज परिक्षेत्रा में हो क्या रहा है, हर जगह झगड़ा।
वस्तुतः हरिजनों में चेतना आ गई थी। वे समझने लगे थे कि ‘जो जमीन सरकारी है वह हमारी है’। ऐसी चेतना उनमें कैसे आई कृपालु जी के लिए सोचने व गुनने वाली बात थी फिर भी वे जानते थे कि हरिजनों की यह समझ राजनीतिक आकांक्षाओं के कारण है। अब उनकी आकांक्षाओं को किसी भी तरह से नहीं रोका जा सकता।
‘आदमी की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म
नहीं होता उसका तो केवल एक ही धर्म होता है मनुश्ष्यता
वाला, मानवीय समीपता वाला। काश! हम ऐसा ही सोच पाते’
कृपालु जी की पैरवी काम कर गई। आखिर दारोगा कृपालु जी की बात काहे नहीं मानता। कृपालु जी जिले के बड़े नेता हैं, वे कुछ भी कर सकते हैं विरोध में। उनकी बात मान लेनी चाहिए। दारोगा दूसरे दिन सहपुरवा आया। उनके साथ आठ सिपाही थे। रामभरोस के बताने के अनुसार दारोगा सावधानी बरत रहा था। रामभरोस ने उसे थाने पर ही बता दिया था कि सहपुरवा में मार-पीट भी हो सकती है। सो दारोगा सावधान था।
दारोगा गॉव में नहीं घुसा, सीधे मौके पर गया। हरिजन बस्ती से दक्षिण की तरफ जहां पंचायत भवन का निर्माण हो रहा था। उसने देखा कि वहां निर्माण के शिनाख्त भी नही बचे हुए हैं, ईंटों और ढोकों के गिट्टी जैसे टुकड़े पास वाले नाले में फेंके हुए दिख रहे थेे जो घटनास्थल से करीब तीन सौ मीटर से अधिक दूरी पर था। उसके अगल बगल का खेत जोता हुआ था तथा उसमें गेहूॅ बो दिया गया था। वहां कभी पंचायत भवन बन रहा था या निर्माण हुआ था ऐसे चिन्ह वहां पर नहीं थे।
सिपाही दारोगा के निर्देश के मुताबिक शोभनाथ, औतार, और सुक्खू को खोजने तथा पकड़ने के लिए गॉव में गये हुए थेे। दारोगा भी उनके साथ गॉव में घुसा। जाहिर है जब किसी की पकड़ करनी होती है तब पुलिस पकड़ किए जाने वाले व्यक्ति के घर में सीधे घुस जाया करती है, यही है पुलिस का आदिम तरीका। सिपाही जागरूक थे सो सिपाहियों ने लक्ष्य बना लिया था कि गॉव से वांक्षितों को भागने नहीं देना है। दूसरी ओर गॉव के हरिजन थे कि वे असावधान थे। उनका मानना था कि पुलिस को जांच या पकड़ के लिए गॉव में आना होता तो घटना के दिन ही आ जाती। पर वे गलत थे, उनका सोचना गलत था। रामभरोस की रपट पर पुलिस की इतनी मजाल कि वह गॉव में नहीं आये, जॉच पड़ताल न करे ऐसा संभव नहीं था। पर घटना के दिन पुलिस नहीं आई थी सो हरिजन मान कर चल रहे थे कि पुलिस अब सहपुरवा में नहीं आने वाली। जो होना था हो चुका।
पुलिस गॉव में दूसरे दिन आई। वैसे औतार व शोभनाथ को यकीन था कि पुलिस कभी भी आ सकती है गॉव में। और पुलिस आ भी गई। पुलिस के गॉव में आने का यकीन औतार को इसलिए था कि रामभरोस कानून को जब चाहें अपने हिसाब से नचा सकते हैं, नहीं तो कोई दूसरा कानूनी कारण नहीं था, वह जमीन तो औतार की ही थी।
पुलिस को सहपुरवा में आना था, नहीं आना था, सारा शाक खतम हो गया था और पुलिस का दल आठ सिपाहियों के साथ गॉव में आ धमका।
पुलिस या रामभरोस जिन्हें मुल्जिम मान रहे थे वे सभी लोग अपने घरों पर ही थे। शोभनाथ औतार व सुक्खू इनमें से कोई कहीं भागा नहीं था। उन्हें भागना भी नहीं था। वे जानते थे कि वे गलत नहीं हैं गलत हैं रामभरोस, अभी औतार का पट्टा भी खारिज नहीं हुआ है फिर भी रामभरोस औतार की जमीन पर पंचायत भवन बनवा रहे हैं। यह गलत है। पुलिस ने वांक्षितों को पकड़ लिया, वे सभी अपने अपने घर पर ही पुलिस को मिल गए, वे घर से भागे नहीं थे। पुलिस गॉव में किसी को पकड़ ले और वहां भीड़ न इकठ्ठा हो जाए ऐसा नहीं होता। वहां भीड़ इकठ्ठा हो गई। भीड़ अपने स्वभाव के मुताबिक एक दूसरे का चेहरा देखने और पढ़ने लगी। लोगों के चेहरों पर एक ही इबारत लिखी थी कि पुलिस किसी को भी पकड़ सकती है वह भी जब चाहे, वक्त कैसा भी हो। भीड़ के दिमाग में दूसरा सवाल था जो भविष्य का था कि आगे क्या होगा? लोग आशांकित थे कि आगे ठीक और भला नहीं होने वाला।
दारोगा के लिए कुर्सी मंगा ली गई थी। वहां कुछ चारपाइयां थीं जिन पर अन्य लोग बैठे हुए थे तथा हरिजन उनके सामने जमीन पर बैठे हुए थे। दारोगा के आदेश की प्रतिक्षा में सिपाही बीड़ी पर बीड़ी दागे जा रहे थे वहां एकत्रा लोग क्या होने वाला है? की प्रतिक्षा में थे। दारोगा सीरियस था और जाने क्या इधर उधर देख रहा था। वह वहां बैठे हुए लोगों में से केवल प्रसन्नकुमार के पिता शोभनाथ और रामभरोस को ही जानता था। दारोगा ने अचानक मुंह खोला....कृ
‘औतरवा कौन है रे! यहां हाजिर है कि नहीं, हाजिर है तो सामने आओ, कहां बैठे हो? पंचायत भवन जो बन रहा था उसे किन किन लोगों ने गिराया, सभी का नाम लिखवाओ। तुम कमीनों का इतना मन बढ़ गया है कि कायदा कानून खाए जा रहे हो।
सकपकाए हुए औतार भीड़ में से बाहर निकले। उनके चेहरे को अप्रत्याशित डर ने जकड़ लिया था फिर भी वे खुद को संभाले हुए थे? जो होना होगा, होगा ही उसे नहीं रोका जा सकता।
‘हम हैं औतार सरकार!’
‘तूं हो औतार, देखने में तो सीधे सादे दीख रहे हो पर काम तो तूंने हरामियों वाला किया है। इतनी हिम्मत कहां से आ गई रे तेरे पास। तोहके कौन साला बहकाया है रे! बताओ पंचायत भवन किन किन लोगों ने गिराया?’
‘हम नहीं जानते सरकार! कौन पंचायत भवन?
औतार ने दारोगा से पंचायत भवन के बारे में पूछा..कृ
इतना काफी था। दारोगा गाली पर गाली चढ़ाने लगा, किसिम किसिम की गालियां जिसे सहपुरवा ने कभी नहीं सुना था, मालिक लोग भी ऐसी कमीनी गालियां नहीं देते।
‘साले तूं नहीं जानता कि पंचायत भवन किसने गिराया? और पूछ रहा है कौन पंचायत भवन? क्या बाहरी लोग आए थे, गांड़ में डंडा पड़ेगा तब बकोगे साले!’
फेकुआ दारोगा के पास ही में था, वह गाली पर गाली सुन रहा था। फेकुआ मन ही मन बुदबुदा रहा था। गाली गलौज सहन करना उसके लिए संभव नहीं था। आखिर का हो जाएगा, जेल ही जाना पड़ेगा नऽ अउर का होगा। बाप दादों की सीख उसे अब नहीं मानना। जेल तो जाना ही होगा रामभरोस नहीं मानने वाले, चाहे मार करो, तो भी, न करो तो भी। अचानक दारोगा ने फेकुआ को पुकारा....कृ
‘ई साला फेकुआ कौन है रे?’
फेकुआ सामने आ गया वह मन से तनेन था।
‘हम हैं सरकार फेकुआ!’ फेकुआ ने बताया
‘क्यों बे! तुम्हारे बाप के पट्टे वाले खेत पर कल कौन कौन लोग गये थे? किसने जोता वह खेत? तथा पंचायत भवन किन किन लोगों ने गिराया? वह तो चार फीट ऊपर तक बन चुका था।’
फेकुआ चुप था, सो चुप था, वह का बोलता उससे तो सिखाया जा चुका था कि दारोगा के सामने कुछ नहीं बोलना, सो वह चुप था। बड़ों की सीख वह कैसे तोड़ता?
दारोगा गरजा....कृ
‘बोलते क्यों नहीं साले! तुम्हारी चमरई तुम्हारी गांड़ में घुसेड़ दूंगा, साले कुत्ते की औलाद।’
इस बार भी फेकुआ कुछ नहीं बोला। उसके बोलने के पहले रामदयाल कारिन्दा बोल पड़ा....कृ
‘सरकार! ई साला का बोलेगा, इन लागों ने अपने मन से कुछ नहीं किया है सरकार! सारा खेल तो प्रसन्नकुमरवा का है। वही मेरे गॉव में बवाल करवा रहा है। का हो शोभनाथ पंडित हम गलत बता रहे हों तो बोलिए का सही है? गांड़ीं में दम हो तो बोलिए सबके सामने, आड़े आड़े भुचकी का मारते हैं?’
ष्शोभनाथ पंडित को तो पहले से ही वहां का नाटक अखर रहा था। वे काफी गुस्से मेें थे....कृ
‘काहे चिल्ला रहे हो रामदयाल! का उखाड़ लोगे मेरा, तुम्हारे जैसे पालतू नहीं हैं हम। बहादुर थे तो कल ही आ गए होते मौके पर, फरिया गया होता सारा कुछ। दरोगा जी के सामने बमक रहे हो। जिसके तुम पालतू हो उसको तो हम कुछ समझते ही नहीं हैं, तूं किस खेत का ढेला है रे!’
ष्शोभनाथ पंडित भी अपने आचरण के विपरीत बोल उठे हालांकि किसी के साथ अपमानजनक बातें करना उनका स्वभाव नहीं था। वे एक ठंडे दिल दिमाग के आदमी हैं और हर बात संभाल कर बोलते हैं। पर करें क्या जैसे को तैसे वाली बात, उन्हें बोलना ही पड़ा।
दारोगा के सामने ही सहपुरवा का मामला उलझ कर रामभरोस, शोभनाथ पंडित और औतार के बीच फसता जा रहा था। दारोगा खामोश, वर्दीधारी सिपाही खामोश, वहां इकठ्ठे लोग खामोश, हरिजन खामोश, औतार खामोश, गोया सभी खामोश थे। हवा और मौसम के बारे में क्या बताना? मामला तूल पकड़ रहा था।
सहपुरवा खामोशी का उदाहरण बनने वाला था सो सभी खामोश थे। पर खामोशी के भीतर गुस्सा था गुस्से में साधारण सी बात भी बढ़ने लगती है तो बढ़ती ही जाती है, कितना बढ़ जाएगी अनुमान लगाना कठिन। बात बढ़ गयी। मौका अच्छा था, बवाल करने का, रामभरोस तो चाहते ही थे कि बवाल हो जाए। मौके का लाभ लेने के लिए रामभरोस ने रामदयाल कारिन्दा को संकेत कर दिया फिर क्या था....कृकृ रामदयाल कारिन्दा ने शोभनाथ पंडित पर लोहबन्दा चला दिया, एक ही लोहबन्दा में शोभनाथ पंडित जमीन पकड़ लिए। शोभनाथ पंडित का जमीन पकड़ लेना ही सहपुरवा का आग में तब्दील हो जाने का कारण बन गया। रामभरोस चाहते भी यही थे कि सहपुरवा आग का खेल बन जाए। जल जाये हहाकर।
ष्शोभनाथ पंडित पर हुए हमले को फेकुआ बर्दास्त नहीं कर पाया। वह तत्काल भूल गया बाप दादों की सीख। जहां वह खड़ा था वहीं से रामदयाल कारिन्दा की पीठ पर एक बोंग मारा और रामदयाल भहरा गया जमीन पर। फिर तो रामदयाल को फेकुआ तब तक मारता रहा जब तक रामदयाल अधमुआ नहीं हो गया। बलवा होने की आशंका तो तभी बढ़ गई थी जब रामदयाल ने शोभनाथ पंडित पर लोहबन्दा चला दिया था पर तब सारे हरिजन औतार का इशारा देख रहे थे....
औतार भी क्या करते हालांकि वे नरम दिमाग वाले थे फिर भी शोभनाथ पंडित पर हुए हमले को वे नहीं बर्दाश्त कर पाए। शोभनाथ पंडित तथा उनका लड़का प्रसन्नकुमार दोनों रामभरोस जैसे कमीने आदमी से हरिजनों के लिए ही तो टकरा रहे थे। औतार को भी गुस्सा आ गया फिर तो उन्होंने भीड़ की तरफ इशारा कर दियाकृऔतार का इशारा मिलते ही....कृ
लाठी पर लाठी, लोहबन्दा पर लोहबन्दा, झापड़ पर झापड़, लात पर लात, ऐसे दृश्य को ही कानून बलबा कहता है। कितने आदमी, जाने कितने? कौन मार रहा था, कौन मार खा रहा था,कृसारा कुछ अज्ञात, ज्ञात केवल इतना ही कि सहपुरवा में बलबा हो गया। जैसे कोई फिल्म चल रही हो जिसका कोई निर्देशक न हो, सभी निर्देशक हों तथा सभी पात्रा हों।
तो बलबा शुरू....कृ
औतार, बिफना, सुक्खू तथा दूसरे हरिजन भी लाठी लेकर कूद पड़े, मार होने लगी, मार तो मार होती है। कहीं भी मार होने पर पता नहीं कैसे बचाने वाले भी निकल आते हैं, कुछ बचाने लगे पर मार जिसे होना था वह रुकने वाली नहीं थी। मार तो होती रही, बचाने वाले बचाते रहे, एक आदिम दृश्य मार-काट वाली, खून बहाने वाला। सहपुरवा की हजारों साल की शुप्त धरती पर मार का बदला मार वाला आदिम मिजाज का संगीत गाता बजाता उतर चुका था सहपुरवा में।
हरिजनों का उत्पीड़ित मन लहरा उठा था। वे एक एक लाठी में अपना उत्पीड़न देख रहे थे, एक साल दो साल का नहीं हजारों साल का। क्रोध में तो कुछ दिखता भी नहीं, सिपाही भी मार खाने लगे, थे ही कितने केवल आठ और हरिजन कौन गिने? लगभग सभी थे सहपुरवा के जिनके हाथ पैर मजबूत थे और अक्ल वाले थे, जो भविष्य की यातनाओं से डरने वाले नहीं थे।
हरिजनों को तो मालूम ही था कि सिपाही रामभरोस के बुलाने पर सहपुरवा में आये हुए हैं। वे न्याय करने नहीं आये हैं। वे रामभरोस के माथे पर जीत लिखने के लिए आए हुए हैं। हरिजनों को उत्पीड़ित करने के लिएआए हुए हैं। किसी सिपाही का हाथ टूटा तो किसी का माथा फूटा पर फूटा और टूटा सभी का। हरिजनों को भी गंभीर चोटें आई, चोटें दोनों तरफ बराबर थीं। यही तो होता है बलबा में। रामदयाल कारिन्दा जमीन पर गिर कर कराह रहा था। पहली बार ऐसा हुआ था कि रामदयाल बुरी तरह से सहपुरवा में मारा गया था नहीं तो सांड़ बना वह गॉव में घूमा करता था। सारा द्श्य देखते ही रामभरोस और दारोगा जी भाग खड़े हुए हालांकि फेकुआ और बिफना ने उन्हें पछियाया था पर वे लोग पकड़ में नहीं आये फिर वे दोनों वापस आ गये और मार के बदले मार में शामिल हो गये।
ष्शोभनाथ पंडित चोट के कारण कराह रहे थे। विभूति सिपाहियों को मार रहा था और गालियां दिए जा रहा था। मार के दौरान बिफना ने सावधानी नहीं बरता होता तो रामदयाल कारिन्दा शोभनाथ पंडित की जान ले लेता। शोभनाथ के माथे पर लोहबन्दा पड़ते ही बिफना ने देख लिया फिर क्या था शोभनाथ की देह पर वह तुरंत लेट गया, पसर कर उनकी देह जकड़ लिया। लोहबन्दा पड़े तो उसकी पीठ पर, शोभनाथ पंडित पर एक भी लोहबन्दा नहीं पड़ना चाहिए। फिर तो कई लोहबंदे बिफना की पीठ पर ही पड़े, उसे काफी चोट लग गई फिर भी बिफना ने बचा लिया शोभनाथ पंडित को। जवान था पर चोट बर्दाश्त करने से बाहर की थी। वह कराहने लगा था। रामदयाल कारिन्दा तो पहले ही भाग जाता पर सबसे पहले हरिजनों ने उसको ही मारना शुरू किया और वह वहीं भहरा गया। सो वह न भाग सका।
ष्शोभनाथ पंडित को गोदी में उठा कर दो तीन लोग उनके घर लाए, घर पर उनका घरेलू उपचार किया गया। चोट बिभूति को भी लगी थी पर वह चोट के कारण असमर्थ नहीं हुआ था। वह सीधे घर की तरफ भागा और अपना ट्रेक्टर निकाल लाया। शोभनाथ पंडित और बिफना को काफी चोटे लगी थीं, वे कराह रहे थे, उन्हें अस्पताल पहुंचाना जरूरी था। किसी तरह ट्रेक्टर पर लाद कर उन्हें बिभूति अस्पताल ले गया।
गॉव में झगड़ा या बलवा होते ही रामभरोस अपने घर चले गये फिर घर से कहां लापता हो गये किसी को नहीं मालूम, अनुमान था कि बखरी छोड़ कर भाग गये होंगे। कृपालु जी का भी सहपुरवा में कहीं अता पता नहीं था।
प्रसन्नकुमार सहपुरवा में नहीं था। शोभनाथ पंडित और बिफना को अस्पताल ले जाते समय ही विभूति ने साथियों से गॉव छोड़ कर भाग जाने के लिए बोल दिया था। उसके कहे के अनुसार सभी हरिजनों ने गॉव छोड़ दिया था गोया पक्ष विपक्ष दोनों गॉव छोड़ चुके थे।
सहपुरवा में किसी भी तरह से रामभरोस को बलबा कराना था, वह हो चुका था। मारपीट, पुलिस मुजाहिमत, शोभनाथ पंडित मरें या जियें यह उनकी निजी बात थी। आगे का परिदृश्य साफ था, रामदयाल जिन्दा है, वह पुलिस का गवाह बनेगा अगर मर जाता तो रामभरोस दूसरा कारिन्दा रख लेते। रामभरोस के लिए सहपुरवा का वातावरण काफी अनुकूल था। उन्हें अफसोस इस बात का था कि कानून का यह खेल पंचायत भवन का निर्माण गिराए जाने के दिन ही हो जाता तो अच्छा होता पर एक दिन बाद हुआ। दारोगा के आने के पहले ही सहपुरवा में बलवा हो जाना चाहिए था पर यह भी अच्छा हुआ कि सारा मामला पुलिस और हरिजनों के बीच में हो गया। अब उनसे इस बलबे से कुछ लेना देना नहीं।
रामभरोस जानते हैं कि घरों में विभूति जैसे नालायक भी हुआ करते हैं जो अपनों के खिलाफ ही लड़ते रहते हैं। प्रसन्नकुमार भी नालायक ही है। वह यह नहीं जानता कि हरिजनों का मन बढ़ा कर उसे क्या मिलने वाला है? विभूति पकड़ जाये चाहे प्रसन्नकुमार, हम मार खांयें या शोभनाथ दोनों एक हैं, कोई फरक नहीं है दोनों में। विभूति और प्रसन्नकुमार पता नहीं क्या पढ़ रहे हैं, उन्हें अपनी जाति तथा अपने लोगों के बारे में कुछ भी पता नहीं। भला हरिजन कभी पंडितों का साथ देंगे? पर कौन समझाए उन दोनों को। कउआ कभी बगुला हो सकता है भला!
बलवा हो जाने के बाद रामभरोस चिंतक बने जा रहे थे। अपनी जाति और वर्ण के बारे में सोचने लगे थे, वे भला कैसे सोच पाते कि आदमी तो केवल आदमी होता है, आदमी की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता उसका तो केवल एक ही धर्म होता है मनुश्यता वाला, मानवीय समीपता वाला। उन्हें का पता कि पुलिस में भी तो अपने ही लोग होते हैं गॉव के लोग, गॉव की माटी में जन्मे, गोबर, माटी से सने। फिर किस बात का झगड़ा। पर झगड़ा तो वे लगा चुके थे उसी का परिणाम था बलबा। रामभरोस गॉव में अगर राजनीति न करते तो शायद बलबा न होता, आखिर का जरूरत थी औतार का पट्टा खारिज कराने की उन्हें, किसी दूसरी जमीन पर पंचायत भवन बनवा देते।
प्रसन्नकुमार का रामभरोस से झगड़ा केवल उनके आंतंक को समाप्त करने के लिए था। रामभरोस को जानना चहिए कि जमाना बदल चुका है सो उन्हें भी बदल जाना चाहिए जमाने के साथ। रामभरोस का प्रसन्नकुमार और शोभनाथ से झगड़ा इस लिए था कि वे रामभरोस के आतंक को रोक रहे थे उनके फर्जी सम्मान पर चोट कर रहे थे सो रामभरोस झगड़ रहे थे और प्रसन्नकुमार को जेल भिजवाना चाहते थे।
रामभरोस को बार बार रामदयाल कारिन्दा पर भी गुस्सा आ रहा था....
‘साले ने शोभनाथ पंडित को मार कर बेमतलब सारा खेल बिगाड़ दिया और गॉव में बवाल बढ़ गया। रमदयलवा को शोभनाथ पर बोंग चलाना ही नहीं चाहिए था। उसे तनिक भी समझ नहीं कि पुलिस बोंग चलाने के लिए ही तो आई थी। जो काम उसने किया उसे पुलिस करती, पुलिस ही फेकुआ, औतार, सुक्खू, शोभनाथ को मारती पीटती, गिरफ्तार करती। हम लोगों को तो केवल खामोश रहना था और पुलिस के कानूनी खेल को देखना था। दारोगा सहपुरवा में भंाग पीने या सोहर गाने थोड़य आया था।’
रामभरोस सारा खेल सामंती चाल के तहत कर रहे थे। सामंती चालें हालांकि पहले नहीं खुलतीं पर बाद में खुल जाया करती हैं। सामंती चाल की ऐतिहासिकता बताती है कि कमजोरों को आपस में सदैव लड़ाते रहो, उनमें फूट पैदा किए रहो। सामंती चाल अंग्रेजों वाले फूट डालो और राज करो से मिलती जुलती ही होती है। जो हमारे समाज में बहुत पहले से चल रही है। रामभरोस की चाल थी कि पंडित शोभनाथ के प्रति हरिजनों में अविश्वास पैदा करना और हरिजनों से ही शोभनाथ पडित पर मुकदमा करवाना पर सब बेकार हो गया। रामभरोस के लिए चिन्ता की बात यह भी थी कि उनका लड़का विभूति भी उनके विरोधियों की गोल में शामिल हो कर उनके खिलाफ हो गया है। वह भी बांेग चला रहा था हरिजनों के साथ। ट्रेक्टर पर लाद कर शोभनाथ पंडित को वही अस्पताल भी ले गया था। उनकी सामंती चाल सहपुरवा में फेल कर चुकी है।
चोट खाये सिपाहियों को थाने पर पहुंचा दिया गया।
भीड़, दारोगा और सिपाही, मार पीट और सहपुरवा, सहपुरवा के रामभरोस, रामदयाल, शोभनाथ पंडित, प्रसन्नकुमार, औतार ओर विभूति, सिपाही घायल। सहपुरवा घायल। एक गॉव का घायल और चोटिल होना अशुभ नहीं तो और क्या है और सिपाहियों का घायल होना... वह तो सत्ता प्रबंधन का अपमान है।
क्षेत्रा में ही नहीं पूरे जिले में जोरदार चर्चा थी जिन्हें सहपुरवा का नाम तक मालूम नहीं था वे भी जान गये थे सहपुरवा का नाम। हरिजनों के लिए शोभनाथ पंडित का संघर्ष प्रशंसनीय था पर उनकी बिरादरी में निन्दनीय, उन्हें उनकी जाति वाले गरिया रहे थे। हर ओर हल्ला था....कृ
‘ये हरिजन किसी के नहीं होते’
प्रसन्नकुमार को बाद में मालूम हुआ कि उसके पिता को चोटें आईं हैं और सहपुरवा में बलबा हो गया है। सिपाही भी मार खाये हैं। प्रसन्नकुमार अपने पिता जी से मिलने के लिए व्याकुल हो उठा। वह अपने पिता से अस्पताल में मिला, उन्हें ज्यादा चोेटें नहीं आई थीं। दूसरे दिन ही शोभनाथ पंडित और बिफना को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। गनीमत थी कि औतार सुक्खू और फेकुआ को अधिक चोटें नहीं आयी थीं, केवल बिफना को अधिक चोट लगी थीं वह भी शोभनाथ पंडित की देंह पर लोट जाने के कारण। प्रसन्नकुमार का मानना था कि जो लोग फरार हैं उन्हें फरार ही रहना चाहिए। गिरफ्तारी देना उचित नहीं होगा आखिर गिरफ्तारी भी किस सरकार के आगे? ऐसी सरकार के आगे जो विनम्र नहीं है। ऐसी सरकार के आगे जो कुछ खास लोगों का पक्ष लेती है, ऐसी सरकार के आगे जो समाज में आर्थिक रूप से भेद-भाव करती है, जो गरीबों को, प्रताड़ितों को जनता ही नहीं मानती।
सरकारी व्यवस्था का पूरा चित्रा उसकी ऑखों के सामने था जयप्रकाश अटल, लालकृष्ण आडवानी, राजनारायण जेलों में बन्द हो कर न्याय की भीख ही तो मांग रहे हैं। न्याय नहीं मिलता, न्याय मिलने वाली चीज भी नहीं, मिलता है प्रशासन का दमन,, मिलता है डंडा और मिलती है जेल, बन्दूक की गोलियां मिलती हैं।
सहपुरवा के हरिजन फरार थे। वे गॉव में तब तक नहीं आते जब तक प्रसन्नकुमार उन्हें गॉव आने के लिए नहीं बोलता।
'''‘घटना, मुजाहिमत, विश्लेषण, कानून
व न्याय, औतार, रामभरोस, प्रसन्नकुमार सभी
वहीं फिर भी गॉव की संस्कृति अपराध की कृति बन गई!’'''
पंचायत भवन का निर्माण गिराए जाने के दूसरे दिन सहपुरवा की हरिजन बस्ती पुलिस द्वारा घेर ली गई। समाज में शाान्ति बनाए रखने के लिए वेतन पाने वाले सिपाही कोई करतब नहीं कर पाए। मार-पीट के सहारे विवाद सुलझाने की उनकी कोशिश बेकार चली गई। गॉव में मार शुरू हो गई, सिपाही तथा गॉव के दोनों पक्ष चोटिल हो गए। मार शुरू किया रामदयाल ने शोभनाथ पंडित पर बोंग चला कर, उनका साथ दिया सिपाहियों ने। सिपाहियों ने जैसे ही लाठी भॉजने का पारंपरिक कौशल दिखाना शुरू किया वैसे ही सहपुरवा के हरिजनों ने अपने बचाव में लाठियां भॉजना शुरू कर दिया। मार तो एक रेखीय होती है, मार, मार, मार केवल मार। सिपाही थे ही कितने जो गॉव वालों के सामने टिक पाते। सिपाही टिक भी नहीं पाते। सिपाही तभी टिक पाते हैं जब तक उनका अदब लोगों को डराए रहता है। यह दुनिया अदब का खेल है, इसी अदब के कारण सारा कुछ चलता हुआ दीखता है। सहपुरवा से अदब खतम हो चुका था। वैसे भी गरीबी और यातना की जंग में अदब की ही हार होती है। गॉव वाले आत्मरक्षा पर उतर आये थे, उनकी आत्मा ने मान लिया था कि मार का प्रतिकार केवल मार ही होता है। वे मान जाने की स्थिति में नहीं थे, रामनोहर लोहिया का सिद्धान्त ‘मानेंगे नहीं पर मारेंगे भी नहीं’ सहपुरवा की गलियों में भहरा कर चोटिल हो चुका था सो मार तो होनी ही थी। गॉव वाले भी चोटिल हो गए थे, वे भी मार खाए थे पर उनका मार खाना व्यवस्था के लिए चुनौती नहीं थी। चुनौती थी सिपाहियों के मार खाने की, सो सारा प्रशासन आग में जलने लगा था।
जिलाधिकारी और कप्तान के आदेश आ चुके थे। सिपाहियों का दस्ता बुला लिया गया था। गरीब व यातनाग्रस्त जनता सिपाहियों से मार-पीट कर ले यह साधारण बात नहीं थी जितनी मनोवैज्ञानिक है उससे अधिक सामाजिक है। सहपुरवा से जान बचाकर दारोगा को भागना पड़ा था। सहपुरवा की मानसिक शान्ति खत्म हो चुकी थी। अनहोनी किस्म का डर पूरे गॉव में पसर चुका था। पुलिस से मार-पीट करना पूरी व्यवस्था को चुनौती देना था। सहपुरवा में शान्ति स्थापित करवाना और दोषियों को दण्डित करवाना पुलिस के लिए सबसे जरूरी काम बन चुका था। पर दोषी कौन था, किसने पहले मार करना शुरू किया था उसे पता लगा पाना अज्ञात का खेल बना दिया गया पर पुलिस जानती थी कि सहपुरवा में बलबा रामभरोस के कारण हुआ। उन्हीं के इशारे पर रामदयाल ने शोभनाथ पंडित पर लोहबन्दा चलाया था। अगर शोभनाथ पंडित को रामदयाल ने लोहबन्दा से न मारा होता तो शायद सहपुरवा में बलबा नहीं होता।
मानव सभ्यता की बुनियाद तो शान्ति व्यवस्था पर टिकी होती है पर कैसे स्थापित रह सकती है शान्तिव्यवस्था। इस बाबत इतिहास से शायद कुछ सीख मिल सके पर सहपुरवा में तो कहीं इतिहास था ही नहीं। सहपुरवा की हर गली, हर सिवान इतिहास विहीन थे, इतिहास तो केवल रामभरोस का था। गॉवों में मारपीट और बलबा कराने का, उस इतिहास से सहपुरवा का कैसे भला होता? उनका इतिहास तो मार-पीट, दमन से शुरू ही होता था।
सहपुरवा की घटना का विश्लेषण पुलिस कर रही थी कि शान्तिप्रिय हरिजनों ने अपने हाथ में कानून क्यों ले लिया? कुछ ही लोग पुलिस के ऐसे थे जो मान कर चल रहे थे कि हरिजनों ने आत्मरक्षा में लाठियॉ चलाईं थीं पर जो रामभरोस के समर्थक थे वे हरिजनों का दोष गिना रहे थे। सहपुरवा की घटना का कौन दोषी है जिसके कारण सुलह सफाई वाली एक घटना बलवा में तब्दील हो गई, इसका निर्णय तो पुलिस को ही करना था सहपुरवा के हरिजन इसका निर्णय कैसे कर सकते थे?
क्षेत्रा के लोगों को पता था पुलिस की ताकत के बारे में, केवल पुलिस की प्रतिक्षा थी कि पुलिस क्या करने वाली है?
पुलिस मानने वाली नहीं थी उसे तो अपनी ताकत दिखानी ही थी। पुलिस के लोगों ने जब सिपाहियों की हालत गंभीर देखा फिर तो उनके गुस्से का पारा चढ़ गया। सिपाही बहुत अधिक चोटिल हुए थे एक सिपाही की हालत तो इतनी गंभीर थी कि उसे बनारस भेजना पड़ गया था।
हरिजनों की हिम्मत टूट चुकी थी। वे कोई पेशेवर अपराधी नहीं थे जो हिम्मत रखते। स्वस्फूर्तता के कारण मार-पीट हो गई थी, वह भी खुद को बचाने के लिए। वैसे भी हरिजनों की पूर्व योजना नही थी मार-पीट की। वे तो खुद को बचाना चाहते थे कि पुलिस के डन्डे उन पर न पड़ें। हरिजन डर के मारे परेशान थे, जाने पुलिस क्या करे। किसे गिरफ्तार करे, किसे मारे पीटे। इसी डर के कारण वे गॉव छोड़ चुके थे, भाग गए थे कहीं।
घटना के दूसरे दिन ही गॉव में पुलिस आ गई एक दो सिपाही नहीं, कई कई सिपाही, कई दारोगा तथा पुलिस के अधिकारी भी। शोभनाथ पंडित, औतार और सुक्खू अपने घरों पर नहीं मिले। उनके न मिलने के कारण उनके घरों की तलाशी ली जाने लगी। उनके घरों के सामानों को कूड़े की तरह घर से बाहर गली में फेका जाने लगा। घर में भी जो घर होता है उसमें उपद्रव शुरू हो गया। बच्चे जो घर में थे डर कर भागने लगे, रोने लगे। हर तरफ चिल्ल पों शुरू हो गया, औरतें भागने लगीं। पुरुष डंडे और बन्दूकोें के कुन्दों की मार से बेहोश होने लगे। पूरी हरिजन बस्ती से व्यवस्था के आंसू बह निकले, खपरैल और मड़हा कराहने लगे। दीवारें रोने लगीं। कॉपते हुए सहपुरवा का दृश्य ‘अहा ग्राय जीवन’ से एकदम अलग वाला उभर चुका था।
कोई सुराग नहीं मिला। औतार, सुक्खू, शोभनाथ, प्रसन्नकुमार तथा बिफना कहां हैं? कहां छिप गये हैं, गॉव में काई बताने वाला नहीं था या किसी को मालूम ही नहीं था। फिर कौन बताता उनके बारे में। गॉव में जो उनके बारे में जानने वाले थे वे मार खा रहे थे फिर भी फरार लोगों के बारे में कोई बता नहीं रहा था। वे मार खा रहे थे पर बोल नहीं रहे थे। पूरे सहपुरवा को नियंत्रित कर सकने तक की संख्या में सिपाही थे। पहली बार की तरह नहीं कि उस बार कम थे सो मार खा गये इस बार मारने के लिए आये थे और मार रहे थे। मारने के लिए दिशा निर्देश तो होते नहीं, मारने का तरीका तो आदिम ही है। मार-पीट के मामले में सरकार भी क्या कर सकती है? सरकार को तो जनता में शान्ति चाहिए वह चाहे जैसे स्थापित हो जनता में। सिपाही सरकारी काम निपटा रहे थे। सहपुरवा में कोई पूछने वाला भी तो नहीं था कि सिपाहियों से पूछता....कृ
‘का कर रहे हो भाई?’
सहपुरवा पुलिस बल प्रदर्शन का नमूना बन गया था, कैसा होता है पुलिस बल? बल के द्वारा मनुष्यों को नियंत्रित व अनुशासित रखने वाला पुलिस का अभिनव तरीका सहपुरवा देख रहा था।
‘भाई ऐसा काहे कर रहे हो’ सिपाहियों से कौन पूछता?
सहपुरवा ही नहीं कहीं भी कोई नहीं पूछता, पुलिस से ही नहीं दंगाइयों, उग्रवादियों व आतंकियों से भी नही पूछता। जनता बुरी तरह से डरती है बन्दूक चलाने वालों से। पुलिस तो पुलिस होती है कानून व्यवस्था को स्थापित करने वाली, उससे भला कौन पूछ सकता है। हमारी सभ्यता से पूछने का सिलसिला ही गायब है, कोई किसी से नहीं पूछता, किसी बात पर नहीं पूछता पर गॉव की गलियॉ पूछती हैं, सिवान पूछते हैं, खून भी तो उन्हें ही सोखना पड़ता है।
घरों में औरतें चीख रही थीं, बच्चे चीख रहे थे। माई, माई चिल्ला रहे थे, पुरुष कराह रहे थे। पुलिस बारी बारी से सबकी पिटाई कर रही थी। पकड़ कर खदेड़ कर जैसे भी पर मार रही थी। मार-पीट से कोई हल नहीं निकल रहा था। फरार लोगों के बारे में पुलिस को कहीं से सूचना हासिल नहीं हो पा रही थी। एक घर के बाद दूसरे घर की तलाशी होती। विशेष देर उन घरों में लगती जहां खूबसूरती होती थी, जवानी होती थी। उन घरों में सिपाही अधिक देर तक रुकते और अपनी पीठ ठोंकते हुए बाहर निकलते।
एक सिपाही घर में से बाहर निकलता, दूसरा घर के अन्दर जाता फिर बहुत जाते। सहपुरवा सिपाहियों के घर के अन्दर जाने और बाहर निकलने का खेल बन गया था। उन्हें घर में जाने से कौन रोकता? ऊपर का आदेश था, कितने ऊपर का था इसे सहपुरवा का जाने, पर आदेश था, तो था।
पुलिस वालों में आक्रोश था, सिपाही मारे गये थे, कोई छोटी बात नहीं थी। पुलिस मुजाहिमत हुई थी। पुलिस कुछ भी कर सकती है, जो वह कर भी रही थी। उनके पास मारपीट का शास्त्रा था, शस्त्रा था, और क्या चाहिए उन्हें? घर में मुल्जिम न मिलने पर वे अपनी समझदारी से घरों में घुसते फिर तो देह ढीला छोड़ देते, मन में बसंत उतार लेते, वे इस काम में अनुशासित रहते। वे ऐसा करतब करते कि हरिजन महिला भी अनुशासित रहती। लोगों को अनुशासित रखने की कलायें पुलिस के पास होती ही हैं। हरिजन महिलायें बेचारी करती भी क्या, कितना करती, कितना लड़ती। इनकार करने पर एक पर दो हो जाते। वह चीखने लगती। एक खड़ा रहता, दूसरा बाहर इन्तजार करता। बाहर इन्तजारी में वह ढीला पड़ने लगता।
‘अबे साले बाहर निकलो, दूसरा बोलता’
बाहर वाला आखिर कब तक अन्दर, बाहर के खेल की प्रतिक्षा करता?
पहला भीतर असफल प्रयास करता या प्रयास कर ही नहीं पाता। अब बाहर वाले को का पता कि अन्दर का हो रहा है? सिपाहियों का घरों में घुसना भले ही जनहित के खिलाफ हो, पर उनके हित में तो था ही। वे उस समय अपना हित देख रहे थे जिसमें वे सफल थे। मुल्जिम नहीं मिले तो नहीं मिले, उन्होंने पूरी कोष्शिश की। रामभरोस को जो करना था वह पुलिस कर रही थी। रामभरोस तो चाहते ही थे कि हरिजन परेशान हों, वे मारे-पीटे जांए सो रामभरोस भी सिपाहियों केे साथ साथ थे तथा उनके बांए दांए चल रहे थे।
औतार के घर की भी तलाशी ली गई। औतार और फेकुआ को पुलिस गिरफ्तार करना चाहती थी। वे घर में नहीं थे। औतार और फेकुआ के बारे मेें पुलिस ने सुमिरिनी से पूछा, सुमिरिनी का जबाब पुलिस के लिए अपमान जनक था। एक चमाइन (हरिजनों की औरतों को हरिजनाइन न बोल कर चमाइन बोला जाता था, ठाकुर की औरत ठकुराइन की तर्ज पर) अकड़ कर उनसे बतियाए....कृ
‘ईहां ऊ लोगन नाहीं हैं, वे इहां रहते तो अकेली अकेला फरिया लेते आप लोग फिर पता चल जाता कि किसके मुसुक में केतना जोर है? आपलोगों के घर बहिन बिटिया नाहीं हैं का कि हर घरे में घुसुर जा रहे हैं। सहपुरवा का झगड़ा निपटाने के लिए आप लोग नाहीं आये हैं। आप लोग तो देह जुड़वाने आए हैं तो जुड़वा लीजिए अपनी अपनी देह, पटा लीजिए देह की गर्मी। फिर हमसे काहे पूछ रहे हैं कि वे लोग कहां गए हैं। जो करने आए हैं वही कीजिए। मेहरारू देखते ही उस पर टूट पड़ रहे हैं आप लोग। इहां का सारा झगड़ा रामभरोस लगवाए हैं उनसे काहे नाही पूछ रहे हैं आप लोग, उनसे पूछिए कि वे काहे झगड़ा लगा रहे हैं गॉव में’
कौन सहता कौन बर्दास्त करता वह भी एक चमाइन की बात। वह भी तब जब सुन्दर तथा जवान चमाइन बोल रही हो, पुलिस वैसे भी किसी की नहीं सुनती न सहती है।
‘का बक रही है रे! इसका मुंह तो बहुत तेज है, इसकी इतनी मजाल कि हमलोगों से कड़क बोले।’
सहपुरवा आतंकित था। दमन का खेल पुलिस वहां खेल रही थी तथा नये नये खेलों को आजमा भी रही थी। वहां न कोई छिप सकता था न भाग सकता था। जिन घरों के दरवाजे नहीं खुले उनमें आग लगा दी गई फिर तो दरवाजे अपने आप खुलने लगे, खुले दरवाजे से पुलिस अन्दर जाती और अपना करतब दिखाती, सहपुरवा करतब देखता। सन्न और सुन्न।
रामभरोस सिपाहियों के साथ थे। उन्होंने सिपाहियों को बताया...कृ
‘यही फेकुआ की मेहरारू है, देखिए केतना कड़क बोल रही है। भला बताइए नऽ इसको कौन चमाइन बोलेगा।’
सिपाही कुछ भी कर सकते थे। इसी समर्थता के तहत वे कर भी रहे थे। उनसे जाति बिरादरी से का मतलब, देह वाले कामों के लिए सभी बराबर होते हैं, ऐसे कामों में देह नहीं छुआती, मन नहीं घिनाता। वे सुमिरिनी की ओर बढ़ गये।
सुमिरिनी सिपाहियों को सुन्दर लग रही थी, न भी सुन्दर होती तो भी क्या था, जवान तो थी ही। वैसे वह सुगठित देह वाली युवा थी चित्ताकर्षक, मन मोहने वाली थी। रामभरोस के सामने ही एक सिपाही सुमिरिनी की तरफ बढ़ा, वह बढ़ता ही जा रहा था और रामभरोस देख रहे थे कि वह बढ़ रहा है सुमिरिनी की तरफ। कभी कभार जब रामदयाल कारिन्दा रामभरोस के पहले कुछ कर जाता था, तब वह रामभरोस से मार खाता था। वे सिपाहियों का का कर लेते....वे सिपाहियों को सुमिरिनी की तरफ बढ़ने से रोक नहीं सकते थे। वे सिपाही थे रामदयाल कारिन्दा नहीं जो उसे मारते। सिपाहियों को भला वे कैसे रोक पाते, सिपाही तो सिपाही होते हैं, दमन की कारीगिरी में सने-पुते।
सहपुरवा जल रहा हो, कोई रोकने वाला न हो, सामने औरत हो। आग में तपता तवा। पानी छन्न, सिपाही छन्न हो चुके थे, मामला छनक गया था।
एक सिपाही ने सुमिरिनी को छेड़ा...कृ
‘का राजा, तेरी जुबान तो बहुत कड़क है’
सुमिरिनी का गाल पकड़ कर दूसरे सिपाही ने हिलाया।
बचना कठिन है, मुश्किल है। सुमिरिनी को दूसरा सिपाही घूर रहा था। सामने रामभरोस खड़े थे। उस समय वह भाग भी नही सकती थी, भागती भी तो किधर जाती, हर तरफ सिपाही ही सिपाही थे। गली में, नोक्कड़ों पर, बरम बाबा की चौरी की तरफ भी, वहां भी जहां गॉव के डीहवार थे। सहपुरवा के सिवान तथा गलियां को ही नहीं, देवताओं के निवासों को भी सिपाहयों ने घेर लिया था। एक बार तो वह भाग गई थी उस समय पुलिस नहीं रामभरोस उसे छेड़ रहे थे। इस बार तो पुलिस है, भागती भी तो कितना भागती कहां जाती? पूरा गॉव घिरा हुआ है, सब घिरे हैं, पूरा देश घिरा है, समय की बात है, कोई पहले कोई बाद में।कृसुमिरिनी ने साहस बटोरा और..कृ
‘का हो सिपाही बाबू! सब कुछ तो लूट लिए आप लोग, बस्ती में आग भी लगा दिए। मार-पीट भी कर रहे हैं। इतने से पेट नहीं भरा तो हगनी मुतनी पर उतर आए हैं। जो करना चाह रहे हैं वह सब कर ही रहे हैं फिर हमसे का पूछ रहे हैं कि औतार कहां हैं और फेकुआ कहां है। हमैं का पता कि ऊ लोग कहां हैं। आपलोग पापी हैं, पापी, जो बहिन बिटिया भी नाहीं छोड़ रहे हैं, का इहै सब करने के लिए आपलोगों को सिखाया जाता है।’
अचानक सुमिरिनी रामभरोस की ओर मुड़ जाती है और....कृ
रामभरोस सुमिरिनी को देख कर जैसे अवाककृजाने क्या करने के लिए उनकी तरफ बढ़ रही हैकृसंभव है गरियाए या और कुछ... पर गरियाने के लिए रामभरोस की तरफ सुमिरिनी नहीं बढ़ रही थी....कृ
‘का हो रामभरोस पंडित! तोहके भी तो हगनी मुतनियय चूमना चाटना था, अउर लोटना था देहीं पर। जेके जेके देहीं पर लोटना अउर हाड़मास चूसना होय सभै को बुलवाय लीजिए, कोई बाकी न रहि जाए। नाहीं तो पता नहीं कै बार सहपुरवा में पुलिस आएगी और सहपुरवा जलता रहेगा।’
‘पंडित जी एक बात बताइए हमरे देहीं पर पहिले के लोटेगा सिपाही बाबू के आप? मौका अच्छा है आप भी लोट लीजिए हमरे देहीं पर, चूस लीजिए हगनी मुतनी, काहे गुमसुम हैं, कुछ करिए न पंडित जी! हमरे देहीं पर जितना लोटना हो लोट लीजिए पर फिर कभी सहपुरवा न जलाइएगा। सहपुरवा जलाने से आपको का मिलेगा। आपको भी तो हाड़ैमास ही चूसना था, हम राजी हैं जितना चूसना हो चूस लीजिए। दिन में चूसिए चाहे रात में चूसिए, हम मना नाहीं करेगे। गुसियाके हम नाहीं बोल रहे हैं, साची बोल रहे हैं पंडित जी!’
सुमिरिनी की ऑखें लोर टपका रहीं थीं फिर भी वह बोल रही थी, उसे बोलना ही था। उसने ऑखें पोंछी और अचानक रामभरोस की गोदी में भहरा गई।
रामभरोस तो जैसे सुन्न और सन्न। हो क्या रहा है, क्या करना चाह रही सुमिरिनी। उन्हें बिजली के करेन्ट जैसा झटका लगा जान पड़ा कि उनकी देह हरिजन बस्ती की तरह जल उठेगी फिर तो वे कॉपने लगे हालांकि वे कॉपने वाले आदमी नहीं थे। अचानक उनकी ऑखें नीचे झुक गईं। उन्हें कुछ नहीं सूझा कि सुमिरिनी से का बोलें? सुमिरिनी को गोदी से हटा देने के बाद वे बखरी की तरफ चल दिए। बखरी की तरफ जाते समय उनके पैर कांपने लगे थे और कलेजा धड़कने लगा था। तब तक सहपुरवा पूरा जल चुका था, पूरे गॉव के हरिजनों पर मुकदमा लाद दिया गया....
गॉव के हरिजनों पर चल रहे मुकदमे का हुआ सारा कुछ समय की चालों में समा गया। रामभरोस मुक्त हो चुका है सहपुरवा, धीरे धीरे बीत गये तिरालीस साल। सहपुरवा छोड़ चुके हैं औतार, फेकुआ तथा मुकदमे के अन्य आरोपी भी, रामभरोस की बखरी बहरा गई है पर सहपुरवा आज भी है आइए चलते हैं सहपुरवा में.....कृकृ
‘रामभरोस से मुक्त सहपुरवा के बीत गए
तिरालीस साल। बीसवीं शदी ने छलांग लगा लिया इक्कीसवीं
शदी में। पर क्या सहपुरवा मुक्त हो पाया गरीबी और यातना से?
रामभरोस मुक्त तो हो गया सहपुरवा पर गरीबी और यातना से मुक्त नहीं हो पाया। प्रसन्नकुमार ने आपातकाल वाला सहपुरवा भी देखा था और आज का सहपुरवा भी देख रहा है। सहपुरवा आपातकाल में रामभरोस का आतंक झेल रहा था तो आज सहपुरवा बाजार, बैंक, कर्ज तथा अधिकारियों की उपेक्षाओं का दंश झेल रहा है। पहले रामभरोस की बखरी ही थी सहपुरवा में जिसके इशारे पर सहपुरवा नाचा करता था औरआज तो वहां कई किस्म की नोटों वाली बखरियॉ उसे नचा रही हैं।
रामभरोस से ही नहीं उन लोगों से भी मुक्त हो चुका है सहपुरवा जो रामभरोस के आतंक से परेशान थे। वे सभी सहपुरवा छोड़ कर भाग चुके हैं अब वे गॉव में नहीं हैं।
वैसे भी आपातकाल की कहानी में प्रसन्नकुमार कभी नहीं जाना चाहता। उस कहानी के बारे में सोचते ही वह सिहर उठता है। आग में जलता हुआ सहपुरवा दिखने लगता है उसे।
उसके घर की मरम्मत का काम चल रहा था। टूट फूट हो गई थी घर में। बाप दादों के घर को तो वह गिरने नहीं दे सकता। परिवार की स्मृतियों को सहेज कर रखना है। वैसे वह गॉव में नहीं रहता। वह रापटगंज में रहता है वहीं उसने अपना निवास बना लिया है।
घर जाते समय उसे रामभरोस की खंडहराती बखरी दिखी। वही बखरी जिसकी चमक से कभी ऑखें चुधिया जाया करती थीं। बखरी शान्त खड़ी थी विजयगढ़ किला की तरह। किले के बाबत किसिम किसिम की कहानियॉ अब अर्थहीन हो चुकी हैं केवल यही शेष है कि बनारस के राजा चेत सिंह इसी किले से भागे थे जब अंग्रेजी सेना ने उनका पीछा किया था। चर्चा में यह भी है कि अंग्रेजी सेना का मुकाबिला करते हुए दो आदिवासी जूरा महतो और बुद्वू भगत वहीं शहीद हो गए थे। बिजयगढ़ किले की तो किसी न किसी रूप में आज भी चर्चा है पर रामभरोस की बखरी तो चर्चाओं से बाहर हो चुकी है। समय की प्रखरताओं ने बखरी के अस्त्तिव को मिटा दिया है, केवल बखरी बची हुई है खण्डहर बनने के लिए, जो बन भी रही है।
रामभरोस की बखरी के उतरे हुए ताप ने प्रसन्नकुमार को विचलित कर दिया अब तो यहां कुछ भी नहीं, बखरी ही नहीं उसकी दिवारें भी रो रही हैं, रामभरोस नाम का कोई आदमी यहां कभी रहा करता था, पता नहीं चल रहा। रामभरोस मुक्त हो चुका है सहपुरवा अंग्रेज मुक्त भारत की तरह।
जनप्रतिरोध ने पंचायत भवन के अस्तित्व को ही नहीं रामभरोस की बखरी के अस्तित्व को भी मिटा दिया। बखरी की मिट चुकी कहानी ने प्रसन्नकुमार को भावुक बना दिया। उसे लगा कि बखरी रो रही है। ऐसा ही हुआ करता है, बखरियॉ को तो खुद ही अपने अतर्विरोधों से किसी न किसी दिन रोना ही पड़ता है।
आपातकाल के ठीक बाद कांग्रेसी सरकार का पतन हो गया। कई दलों के गठबंधन वाली जनता पार्टी की सरकार बनी जो अपने दलगत अन्तर्विरोधों से अल्पकाल में ही भहरा गई। सरकारें तो बनती बिगड़ती रहती हैं उससे जुड़े जनता के सपने भी लगातार बनते बिगड़ते रहे हैं। जनता के सपनों को खंडित होता महसूस कर प्रसन्नकुमार काफी दुखी रहा करता था। जनता के सपने भी किसिम किसिम के थे, उनमें गरीबी हटाओ वाला जो रंगीन सपना था वह लगातार नारे की शक्ल में बदलता जा रहा था और जनता थी कि वहीं खड़ी थी 1947 के समय में। यानि आजादी वाले समय में। जनता नहीं जान सकी थी कि नया सबेरा क्या होता है क्या होता है नया युग, कैसे आते हैं अच्छे दिन, कैसी होती है अपने लोगों की सरकार, कैसा होता है लोकतंत्रा? वर्तमान लगातार अतीत बनता जा रहा था और सरकारें थीं कि वे हुकूमती रंग में रंग कर लगातार भूलती जा रही थीं अपने नारों को, वे जनता के प्रति विनम्रता भी भूल चुकी थीं। सहपुरवा में गरीबी जैसे पहले थी वैसे ही आज भी है।
देश का राजनीतिक रंग अचानक 2014 में बदल गया और केन्द्र में भाजपा की सरकार बन गई। भा.ज.पा. के पास तो पहले की सरकारों से भी अधिक प्रभावशाली नारे थे। नारों ने जनता को जागरूक कर दिया था कि देश जनता के प्रति तभी जिम्मेवार बन सकता है जब भारत ‘कांग्रेस मुक्त’ हो रामभरोस मुक्त सहपुरवा की तरह। अंग्रेज मुक्त भारत वाले नारे की तरह ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत का नारा भी चल निकला। जनता ने मान लिया कि कांग्रेस को सरकार से बेदखल कर देना चाहिए और कांग्रेस बेदखल हो भी गई। भर भरा कर ढह गया कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग।
किसी समय सहपुरवा को रामभरोस मुक्त बनाने के लिए प्रसन्नकुमार ने भी प्रयास किया था। पर वह सफल नहीं हो पाया था। उसे अपने प्रयासों से निराशा मिली थी। आपातकाल में ही सहपुरवा में बलबा व पुलिस मुजाहिमत का मुकदमा कायम हो गया था। वहां के सभी हरिजनों को उस मुकदमे में आरोपी बना दिया गया था। प्रसन्नकुमार ने राममभरोस के आतंक से सहपुरवा को मुक्त कराने का जो असहयोग आन्दोलन चलाया था वही हरिजनों के लिए विस्थापन का कारण बन गया। औतार, फेकुआ, बिफना, सुक्खू जैसे आन्दोलन वाले उसके सहयोगी गॉव छोड़ कर नहीं भागते पर वे गॉव में रहने, बसने की ताकत कहां से पाते? वे कमजोर तथा आतंकित थे सो सहपुरवा छोड़कर भाग जाना ही उन्हें समयानुकूल व उचित जान पड़ा और वे भाग गए।
हालांकि जनता दल वाली नई सरकार ने हरिजनों पर बलबा को जो मुकदमा चल रहा था उसे वापस ले लिया था फिर भी वे गॉव में रुकना उन्हें भला नहीं जान पड़ा। प्रसन्नकुमार अपने सहयोंगियों को बराबर आश्वस्त करता रहता था कि किसी न किसी दिन रामभरोस मुक्त हो जाएगा सहपुरवा फिर भी उसके सहयोगी उसकी बातें नहीं माने और गॉव से उजड़ गए।
रामभरोस जैसे सामंत किसी न किसी दिन मिट जाएंगे प्रसन्नकुमार जानता था पर वह यह नहीं जानता था कि दिन दहाड़े ही वामउग्रवादी उनकी हत्या कर देंगे वह भी उन्हीं की बखरी में घुस कर। वही बखरी जिसका अदब पूरे क्षेत्रा में पसरा रहता था दिन रात। हत्या के दिन ही विभूति से प्रसन्नकुमार मिला था तथा विभूति के साथ उनके मृत्यु संस्कार में भी वह शामिल हुआ था। उसने विभूति को समझाया भी था कि गॉव मत छोड़ो। आपातकाल के दौरान एक साथ मिलकर हम लोग जैसे काम किया करते थे वैसे ही मिलकर वामउग्रवादियों से भी मोर्चा लेंगे पर विभूति कहां मानने वाला था उसकी बातें। वामउग्रवादियों की डर से विभूति बनारस भाग गया और वहीं अपना घर मकान बना लिया। गॉव की सारी जमीन भी बेच दिया। विभूति की जमीन कौन खरीद पाता गॉव में, केवल एक ही आदमी थे चौथी गवहां। चौथी गवहां तो रामभरोस की हत्या के बाद से ही रामभरोस की जमीन की तरफ ऑखें लगाए हुए थे। उन्हांेने ही विभूति के दिल दिमाग को बदल दिया थाकृ ‘गॉव में रहोगे तो तुम्हे भी वामउग्रवादी नहीं छोड़ेंगे।’ डर तो डर, अगर डर ने दिल में घर बना लिया फिर तो सारे निर्णय डर के अगल बगल ही होंगे। रामभरोस की हत्या के बाद बिभूति दिमागी सन्तुलन खो चुका था इसीलिए उसने प्रसन्नकुमार के सुझावों पर ध्यान नहीं दिया और गॉव छोड़ दिया।
प्रसन्नकुमार नहीं चाहता था कि वह गॉव में अकेला हो जाए। वह चाहता था कि सहपुरवा में सभी रहें, रामभरोस रहें गॉव के हरिजन रहें, केवल रामभरोस का आतंक मिट जाए। वह रामभरोस का आतंक मिटाना चाहता था सहपुरवा से पर वह यह नहीं चाहता था कि रामभरोस मुक्त हो जाए सहपुरवा। समय को क्या कहा जाए सहपुरवा रामभरोस से ही नहीं औतार, फेकुआ, सुक्खू, बिफना, सुमिरिनी आदि से भी मुक्त हो गया एक दिन।
प्रसन्नकुमार अकेला हो गया गॉव में। तीन साल के भीतर ही उसके मॉ, बाप भी स्वर्गवासी हो गए। पूरे क्षेत्रा में वामउग्रवादियों का बोल-बाला हो गया। प्रसन्नकुमार की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, गॉव में रहे या विभूति की तरह जगह-जमीन बेच कर वह भी कहीं दूर चला जाए। उसे पहले से ही विभूति अपने पास बुला रहा था पर प्रसन्नकुमार तो दूसरे दिल दिमाग वाला था। गॉव से पलायन करना यानि वामउग्रवादियों से डर कर भाग जाना उसे कायरता जान पड़ी। वह गॉव में ही रहेगा और गॉव के लिए कुछ न कुछ करेगा।
रामभरोस मुक्त सहपुरवा में बाजार आ चुका था। तमाम बाहरी लोग बस चुके थे गॉव में पुराने मिटने लगे थे और नये नये उभरने लगे थे। बाजार की गंध में सनी पगी दूसरी बखरियां गॉव में जनम ले चुकी थीं। उनमें सबसे बड़ी और प्रतापी बखरी बन चुकी थी चौथी गवहां की। रामभरोस की सारी जमीन चौथी ने पहले ही खरीद लिया था पर बखरी नहीं खरीदा था, उसे वे असगुनहा मानते थे। रामभरोस की बखरी की तरह ही चौथी गवहां की बखरी की हुकूमत गॉव में चलने लगी थी। चौथी गवहां का क्या कहने, वे देखते देखते रुपये के बल पर ब्लाक प्रमुख बन गए थे। गॉव की राजनीति बाजारू बनने लगी थी। जाति, धर्म वाली राजनीति भी घुस चुकी थी सहपुरवा में।
प्रसन्नकुमार बाजारू राजनीति नहीं कर सकता था सो उसने खुद को मौजूदा राजनीति के लिए अयोग्य मान लिया और राजनीति छोड़ दिया। पर करता क्या? कुछ न कुछ तो उसे समाज के लिए करना ही था। भला वह कैसे भूल सकता था सामाजिक दायित्व को भले ही उसने राजनीति छोड़ दिया था। बहुत सोच विचार कर अपने पिता जी के नाम पर शोभनाथ विद्या निकेतन नाम का एक विद्यालय गॉव में ही उसने स्थापित किया और उसके प्रचार प्रसार में लग गया। विद्यालय निःषुल्क था और खासतौर से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए था। निःषुल्क विद्यालय चलाना आसान काम नहीं होता पर उसे जन सहयोग मिलने लगा था।
विद्यालय चल निकला और आज वह विद्यालय महाविद्यालय बन चुका है। पूरे जिले में शोभनाथ महाविद्यालय का बड़ा तथा चर्चित नाम है। उसमें पोस्ट ग्रेडुएसन की कक्षाएं भी चलने लगी हैं। प्रसन्नकुमार विद्यालय में कानून की पढ़ाई कराने के लिए भी अनुमति लेने का प्रयास कर रहा है। उसे उम्मीद है कि अनुमति मिल जाएगी पर अभी एक जॉच और की जानी है जिसके लिए जॉच पैनल शीघ्र ही विद्यालय पर आने वाला है।
उस पैनल में प्रसन्न नाम का शिक्षा विभाग में एक प्रमुख अधिकारी है जो जे.डी. के पद पर है। उसके जिम्मे ही जॉच का मुख्य कार्य है। प्रसन्न तो सहपुरवा का नाम सुनते ही गुनने लगा था कि कहीं यह सहपुरवा उसकी अइया वाला गॉव तो नहीं है? पर खुद को भरोसा नहीं दिला पा रहा था। संभव है कि अइया वाला सहपुरवा कोई दूसरा गॉव हो। जब उसे प्रसन्नकुमार के द्वारा सहपुरवा के बारे में विस्तृत रूप से मालूम हुआ तो वह खुष्श खुश हो गयाकृचलो जॉच के दौरान वह अइया का गॉव भी देख लेगा जहां कभी उसके पुरखे रहा करते थे। उसके मन में सहपुरवा के बाबत कौतूहल था, उसने अपनी अइया सुमिरिनी से पूछा....कृकृ.
‘अइया! एक जॉच के सिलसिले में ‘सहपुरवा’ गॉव मुझे जाना है, वहां से हम दो दिन बाद ही वापस आ सकेंगे।’
‘सहपुरवा जाना है, कौन सहपुरवा? उसने पूछा प्रसन्न से
सहपुरवा का नाम सुनते ही चकरा गई सुमिरिनी।
‘अरे अइया वही सहपुरवा जो कभी हमलोगों का गॉव था।’
‘काहे जाएगा तूं? वहां नहीं जाना है तुझे। तूं अपनी जगह पर किसी और को भिजवा दे वहां।’
‘नहीं अइया ऐसा नहीं हो सकेगा, मुझे ही वहां जाना पड़ेगा। सहपुरवा में शोभनाथ विद्यानिकेतन नाम का एक शैक्षणिक संस्थान है। कानून की पढ़ाई के लिए उस विद्यानिकेतन के पास क्या क्या साधन, संसाधन हैं इसी की जॉच पड़ताल करनी है। हमने उस संस्थान के प्रबंधक प्रसन्नकुमार जी से बोल दिया है कि अगले सप्ताह हमारी टीम आपके संस्थान पर जाएगी। हमने उनसे वादा भी कर दिया है अइया! हम वहां नहीं जाएंगे तो उनकी समझ में आएगा कि लेन-देन के चक्कर में जे.डी. नहीं आ रहे हैं।’
सहपुरवा का नाम सुनते ही सुमिरिनी अतीत में उतर गई। लगा कि उसकी ऑखें जल उठेंगी, जलती हुई हरिजन बस्ती उसकी ऑखों में तैरने लगी, बच्चों की चीखें, मार-पीट, एक एक घर का आग में धधकना, पुलिस के बूटों से रौदाता गॉव। हर तरफ आग ही आग, चीखती चिल्लाती औरतें, किसी की साड़ी फाड़ी जाती तो किसी का ब्लाउज, कोई नंगी तो कोई अधनंगी और सिपाही हसते मुस्करातेकृ’पास में खड़े रामभरोस भी’कृ
अचानक सुमिरनी को लगा कि उसकी देह नंगी हो चुकी है और वह सिपाहियों के सामने बेवश है, सामने हैं रामभरोस...कृ
‘का हो पंडित जी, के पहले तूं कि ई’
उसने पूछा था रामभरोस से। वह चीख पड़ी थीकृ
‘सहपुरवा नहीं जाना है तो नहीं जाना है, तूं कसम खा कि तुझे वहां कभी नहीं जाना है।’
प्रसन्न तो जैसे डर गया, हो क्या हो गया अइया को। प्रसन्न किचन में से एक गिलास पानी ले आया...कृ
‘अइया पानी पी ले, लगता है ब्लड प्रेशर बढ़ गया है तेरा।’
प्रसन्न ब्लडप्रेशर वाली मशीन ले आया और सुमिरिनी का ब्लडप्रेशर नापा जो थोड़ा बढ़ गया था। उसने उसे ब्लडप्रेशर की दवाई खिलाया। और मन ही मन सहपुरवा जाने का प्रोग्राम उसने कैन्सिल कर दिया अगले महीने तक के लिए। अइया के ठीक होने के बाद ही वह सहपुरवा जाएगा।
प्रसन्न ने फोन से प्रसन्नकुमार को बता भी दिया कि वह दूसरे महीने के पहले सप्ताह तक ही उनके विद्यानिकेतन पर आ सकेगा।
प्रसन्नकुमार तो पूरी तैयारी कर चुका था जॉच समिति के आव-भगत की। उसे चिन्ता हुई ऐसा क्या हो गया कि जे.डी. साहब ने आने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। वह दूसरे दिन ही मुख्यालय जा पहुंचा और फिर प्रसन्न के आवास पर। साथ में फल फूल भी लेता गया।कृ
अधिकारी के आवास पर खाली हाथ जाना ठीक नहीं होता पर डर भी रहा था कि प्रसन्न जी ईमानदार अधिकारी हैं कहीं बुरा तो नहीं मान जाएंगे, फल फूल में क्या रखा है, यह तो शिष्टाचार का हिस्सा है।
प्रसन्नकुमार सुबह आठ बजे ही अधिकारी के आवास पर पहुंच गया। आवास के बाहर लगी थी, काल बेल उसने दबाया। घंटी गुनगुनाने लगी। तभी आवास से बाहर सुमिरिनी निकली....
क्या है? सुमिरिनी ने प्रसन्नकुमार से पूछा....
‘क्या है?’ घंटी बजाने वाले से पूछ तो लिया सुमिरिनी ने पर जब घंटी बजाने वाले का उसने चेहरा देखा, तो देखती ही रह गई प्रसन्नकुमार को....कृकृ
‘अरे ये तो बबुआ जी हैं’
उसे प्रसन्नकुमार का चेहरा भूला नहीं था। भला कैसे भूल जाती वह प्रसन्नकुमार का चेहरा जबकि प्रसन्नकुमार के चेहरे को बुढ़ौती ने कसना शुरू कर दिया था फिर भी उसके चेहरे पर वही शान्ति, लोगों की भलाई करने की वही आतुरता, ये सब बातें उसके चेहरे सेअलग नहीं हुई थी। वे जस के तस उसके चेहरे पर चमक रही थीं।
‘अरे बबुआ जी आप और यहां’
‘अरे सुमिरिनी तुम! तुम तो बुढ़ा गई होकृपर बानी वही पुरानी वाली, एकदम से कड़क, यहां रहती हो तुम, साहब के यहां काम करती हो का?’
सुमिरिनी को देखते ही प्रसन्नकुमार को जान पड़ा कि प्रसन्न जी के यहां घरेलू काम-धाम करती होगी।
‘आइए बबुआ अन्दर आइए फेर हम बताते हैं।’
प्रसन्नकुमार सुमिरिनी के साथ आवास के भीतर आ गया। आवास का बैठका साहबों के बैठकों जैसा सजा हुआ था।
‘बैठिए बबुआ जी’
सोफे के एक किनारे पर बैठ गया प्रसन्नकुमार। सोफे पर बैठते ही प्रसन्नकुमार ने दुबारा पूछा सुमिरिनी से...कृ
‘तुम यहां कैसे सुमिरिनी?’
सुमिरिनी समझदार थी। समझ गई कि बबुआ को अचरज हो रहा है उसे इस बंगले में देख कर। सुमिरिनी मुस्कियायी...कृ
अरे बबुबा! ई बंगला हमरे लड़िकवा का है, प्रसन्न की हम अइया हैं।’ सुमिरिनी ने बताया प्रसन्नकुमार को। फिर तो अचरजा जाने की बारी थी प्रसन्नकुमार की और वह अचरजा भी गया...कृ
‘का प्रसन्न जी तोहार लड़के हैं?’
‘हॉ बबुआ हॉ, गौर से देखिए नऽ उसका चेहरवो तऽ औन्हई माफिक है’
वस्तुतः प्रसन्न का चेहरा भी फेकुआ की तरह ही था एकदम से खिला हुआ।
प्रसन्नकुमार तो सोफे पर बैठ चुका था पर सुमिरिनी असमंजस में थी कि बबुआ के सामने बैठे या न बैठे। एक बार तो उसके मन में आया कि बबुआ के सामने न बैठे। वह प्रसन्नकुमार के सामने खड़ी रह गई। वह गॉव में कभी बैठी नहीं थी बबुआ के सामने। प्रसन्नकुमार ने ही उससे बैठने के लिए कहा...कृ
‘अरे भाभी जी बैठिए तो काहे खड़ी हैं आप! ’
‘नाहीं बबुआ हम ऐसे ही ठीक हैं’ सुमिरिनी ने कहा
फिर तो प्रसन्न खड़ा हो गया और सुमिरिनी की बांह पकड़ कर उसे सोफे पर बिठा दिया।
‘मुझे मालूम है कि प्रसन्न को आपके विद्यानिकेतन पर किसी जॉच के सिलसिले में जाना था। मैंने ही उसे रोक दिया था नहीं तो वह आपके यहां चला गया होता। मैं डर रही थी उसे सहपुरवा जाने देने से। सहपुरवा तो वही होगा रामभरोस वाला, वही मार काट, बात बात पर गला कटाई।
‘नहीं, नहीं रामभरोस मुक्त हो चुका है सहपुरवा। पर एक बात का दुख है कि पुराने सहयोगी गॉव से पलायन कर चुके हैं, कोई नहीं है गॉव में अब। बिफना और सुक्खू काका भी जाने कहां चले गए, कोई खोज खबर नहीं है उनकी।’
सहपुरवा की पूरी कहानी प्रसन्नकुमार ने सुमिरिनी को संक्षेप में बताया।
सुमिरिनी का समय भी तो जादुई कहानी बन चुका था। सहपुरवा से पलायन के दूसरे साल ही साधारण सी बीमारी ने उसके ससुर औतार के जीवन का अन्त कर दिया। उसका पति फेकुआ भी दिल के दौरे से चल बसा। पति की यादें सुमिरिनी के मन में आज भी बसी हुई हैं।
‘अरे भाभी आप तो जानती थीं कि मैं सहपुरवा में ही हूं, आप लोग तो मुझे अकेला छोड़ कर सहपुरवा से निकल गईं पर मैं सहपुरवा छोड़ कर कहां जाता? फिर भी आपने खोज-खबर नहीं लिया। मुझे तो पता ही नहीं था कि गॉव छोड़कर आप लोग कहां चले गए? पता होता तो निष्चित ही हाल अहवाल लेता रहता’ प्रसन्नकुमार ने सुमिरिनी को उलाहा।
‘ऐसी बात नहीं है बबुआ। मेरे पूरे परिवार का मन आपलोगों में हमेशा लगा रहता था। घर में रोज ही आपके और बाबूजी के बारे में बातें हुआ करती थीं पर जानते हैं बबुआ हमलोगों का मन टूट चुका था वहां से। मन टूटने का कारण हमलोगों की गरीबी थी, कमाई का कोई साधन नहीं था उस पर रामभरोस का अत्याचार। रोज कमाओ खाओ इसी में दिन गुजर जाता था। अगर आपसे लगाव न होता बबुआ तो हमलोग अपने बेटे का नाम आपके नाम पर ‘प्रसन्न’ काहे रखते, खाली कुमार नाहीं जोड़े हैं उसके नाम के साथ। कुमार हम जोड़ते भी नाहीं हरिजनों के नाम के साथ कुमार ठीक नाहीं लगता। कुमार तो बड़का लोगन के लिए है। प्रसन्न के बपई चाहते थे कि हमारे घर में भी बबुआ जी जैसा ही एक लड़का पैदा हो जो किसी के बारे में बुरा न सोचे। सभी के भले के लिए तन तन से तैयार रहे।आपसे का बतांए बबुआ उस समय हमलोग केवल एक जुआर खाकर दिन बिता दिया करते थे। कुछ राहत तब मिली जब प्रसन्न के बपई को कारखाने में काम मिल गया बाद में तो वे डम्फर आपरेटर बन गए थे। अच्छा वेतन मिलने लगा था। उस समय प्रसन्न सातवीं में पढ़ रहा था।
वे दोनों बातें कर ही रहे थे कि प्रसन्न चला आया। तभी एक दाई घर में से नाश्ता ले कर आ गई...प्रसन्नकुमार को देखते ही उसने पूछाकृ
‘आप कब आए प्रसन्नकुमार जी, फोन भी नहीं किया आपने आने का’
‘कार्यक्रम जब आपने कैन्सिल कर दिया फिर तो मुझे आपसे मिलना ही था आपसे मिले बिना पता कैसे चलता कि प्रोग्राम काहे कैन्सिल हुआ।’
दाई के हाथ से नाश्ते का प्लेट सुमिरिनी ने अपने हाथ में ले लिया और प्रसन्नकुमार से पूछा....कृ
‘का बबुआ हमारे घरे का नाश्ता करेंगे नऽ आप, वैसे हमारी दाई हरिजन नाहीं है पिछड़ी जाति से है’
प्रसन्नकुमार तो चकरा गया। का पूछ रही हैं भाभी जी। अभी भी इनके मन में है कि मैं पंडित हूं और मुझे हरिजनों के यहां का पानी भी नहीं पीना चाहिए। प्रसन्नकुमार तो जाति बिरादरी धर्म आदि से बाहर निकल कर केवल एक आदमी बन चुका था पर सुमिरिनी को क्या पता कि वह क्या है आदमी या पंडित। प्रसन्नकुमार खड़ा हो गया और सुमिरिनी के हाथ से नाश्ते का प्लेट छीन लियाकृनाश्ता करते हुए ही उसने सुमिरिनी को उलाहा....कृ
‘अरे भाभी आप क्या पूछ रही हैं यह भी पूछने की बात है कि मैं आपके घर का नाश्ता करूंगा या नहीं।’
दूसरे सप्ताह ही प्रसन्न ने सहपुरवा जाने का कार्यक्रम बना लिया। प्रसन्नकुमार के आग्रह पर सुमिरिनी को भी सहपुरवा जाना पड़ा। सुमिरिनी सहपुरवा भले ही चली गई पर गॉव देखने का साहस नहीं जुटा पाई।
‘नाहीं बबुबा! हमैं गॉव में न ले जाइए, हम गॉव में नहीं जा पाएंगे, किसी तरह हम भुला पाए हैं पहले की कहानी। उस कहानी के बारे में गुनते ही रामभरोस दिखने लगते हैं, जलता हुआ सहपुरवा दिखने लगता है और चीखें व कराहें भी सुनाई पड़ने लगती हैं। हम गॉव में नाहीं जा पाएंगे बबुआ! हमैं माफ कीजिएगा। हॉ आपके घर जरूर चलना चाहते हैं अपने भतीजों तथा देवरानी से मिलने के लिए।’
रामभरोस मुक्त हो गया था सहपुरवा फिर भी सुमिरिनी नहीं गई गॉव में। सुमिरिनी काहे नहीं गई गॉव में प्रसन्नकुमार समझ सकता था।
सहपुरवा से लौटते समय सुमिरिनी प्रसन्नकुमार के घर पर गई। प्रसन्नकुमार का घर सादगी वाला था हालांकि पक्का था पर स्नातकोत्तर महाविद्यालय चलाने वाले प्रबंधकों के बंगलों जैसा ताम झाम वहां नहीं था। प्रसन्नकुमार की पत्नी भी साधारण घरेलू महिला थी सादगी से पूर्ण पर उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की असाधारण चमक थी। वह भी विद्यानिकेतन में प्रसन्नकुमार के साथ पढ़ाया करती थी। उसने सुमिरिनी और प्रसन्न की खुले दिल से आवभगत किया। प्रसन्नकुमार के घर में बच्चों को न देख कर सुमिरिनी ने पूछा....कृ
‘बच्चे नहीं दिख रहे, कहीं नौकरी कर रहे हैं का?’
नहीं, बच्चे ही नहीं हैं’ प्रसन्नकुमार की पत्नी ने बताया सुमिरिनी को
सुमिरिनी तो चकरा गई, ‘का बोल रही हैं बहिन जी, बच्चे काहे नाहीं हैं, का पैदा ही नहीं हुए?’
‘नाहीं बहिन जी ऐसा नाहीं है, हमलोग बच्चे जनमाए ही नाहीं। ई तो बियाह ही नाहीं कर रहे थे, बच्चा न जनमाने की शर्त पर तो बियाह किए हैं। हम भी बात मान गए इनकी। वैसे भी विद्यानिकेतन के बच्चे तो हमलोगों के ही बच्चे हैं। का होगा बच्चा जनमा कर।’
सुमिरिनी उस समय प्रसन्नकुमार की पत्नी का चेहरा देखने में थी और प्रसन्न था कि अपने बारे में गुन रहा था.... श्षादी का मतलब बच्चा पैदा करना तो नहीं!’
प्रसन्न एक झटके में इक्कीसवीं शताब्दी के पार चला गया बाइसवीं शदी में।
भले प्रसन्न बाइसवीं शदी में चला गया था पर सुमिरिनी प्रसन्नकुमार की पत्नी की ऑखों में शिशुओं की तैरती हुई तस्वीरें देख रही थी। प्रसन्न ने भी सुमिरिनी से कहा था...कृ
‘अइया का होगा शादी करके?’
सुमिरिनी प्र्रसन्नकुमार की तरफ मुड़ कर कहने लगी...कृ
अरे बबुआ! ई का किए आप, कम से कम एक बच्चा तो पैदा होने देते’
‘नाहीं भाभी ऐसे ही ठीक है, मुझे अपनी शक्ल नहीं गढ़नी है’
सुमिरिनी को उस दिन प्रसन्नकुमार ने वापस नहीं लौटने दिया। सुमिरिनी को क्या पता था कि प्रसन्नकुमार उसे क्यों रोक रहा है, पता तो उसे तब चला जब उसका अभिनन्दन विद्यानिकेतन पर किया गया।
अभिनन्दन के बाद सुमिरिनी भावविभोर हो गई।
‘जमाना बदल गया पर प्रसन्नकुमार बबुआ नाहीं बदले। पहले भी आदमी थे और आज भी आदमी ही हैं जिसकी पूॅजी होती है मनुष्यता’
‘अच्छा बबुआ चलते है हमलोग, आते रहिएगा घर पर और एक विनती है प्रसन्न का धियान रखिएगा।’
ठीक है भाभी जी भला हम कैसे भूल सकते है अपने भतीजे को उन्हीं के कारण मेरे विद्यानिकेतन को कानून की पढ़ाई की मान्यता मिलने वाली है। हॉ एक निवेदन है आप लोगों से....कृ
हम चाहते हैं कि औतार काका के नाम से विद्यानिकेतन में एक हाल का निर्माण हो जाए पर हमारे पास संसाधन नहीं हैं। अगर प्रसन्न जी थोड़ी मदत करें तों हम औतार काका के नाम से उक्त हाल का निर्माण कराना शुरू कर दें।
सुमिरिनी कुछ बोलने वाली ही थी कि प्रसन्न बोल उठा....
‘अरे! काका यह तो मैं खुद आपसे प्रस्तावित करने वाला था पर संकोच कर रहा था कि जाने कैसा लगे आपको। मैं तैयार हूॅ। कल से ही बनवाना शुरू कर दीजिए। अब तो यह विद्यानिकेतन आपका ही नहीं मेरा भी है। हम दोनों मिल कर इसे विश्वविद्यालय तक ले जायेंगे।’
प्रसन्नकुमार तो गदगद हो गया, उसने प्रसन्न को गोदी में उठा लिया। उसे जान पड़ा कि प्रसन्न के रूप में मिल गया है उसे उत्तराधिकारी।
फिर प्रसन्न और सुमिरिनी उसी दिन लौट गए सहपुरवा से। और प्रसन्नकुमार विद्यानिकेतन के काम में लग गया। गेट के पास ही में औतार काका के नाम से वह हाल बनवाना ठीक होगा।
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हिंदी कथा साहित्य- रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "दूसरी आज़ादी"
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रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "दूसरी आज़ादी"
रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "दूसरी आज़ादी "
[[File:Dusary azadi jpg.jpg|thumb|यह कवर चित्र मेरे उपन्यास का चित्र है]]
[[File:Ramnathshivedra2025Rnat1946.pdf|thumb|created by me in a seminar]]
दूसरी आज़ादी
उपन्यास
रामनाथ शिवेन्द्र
प्रथम संस्करण
रामनाथ शिवेन्द्र
मूल्य :
संस्करण: प्रथम 2025
आवरण :
शब्द संयोजन-असुविधा
अक्षर घर, हर्ष नगर,
राबर्ट्सगंज, सोनभद्र..231216
मोबाइल..7376900866
मुद्रक :
Pilgrims publishing, b.27/98 A-8, Durgakund, varanasi, 221010
अपनी बात
दूसरी आज़ादीका कथानक उन हसीन सपनों से उपजा है, जो सन् 1857 से लेकर 1947 से होते हुए आज़ादी मिलने के बाद तक मेरे मन में लगातार अंखुआते रहे हैं। आज़ादीमिलते ही हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, सभी को रोटी और मकान मिल जाएगा, पर सपना तो सपना वह भला कैसे जमीन पर उतरे?
आज़ादी के समय और काफी बाद तक सोनभद्र मीरजापुर जनपद का एक भूभाग रहा है, जिसे कैमूर का दक्षिणांचल कहा जाता रहा है। अंग्रेजों के समय यह हिस्सा अनुसूचित हिस्सा था, जहां केवल फौजदारी के कानून लागू थे तथा राजस्व और दीवानी के कानून यहां की परम्पराओं पर आधारित थे। आज़ादी मिलते ही यहां के पारम्परिक कानूनों को समाप्त कर दिया गया। अब तो सोनभद्र एक अलग जनपद है, जहां देश-प्रदेश के सारे कायदे कानून लागू हैं। तमाम औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, ऊंची-ऊंची चिमनियां हैं तो लाखों की संख्या में विस्थापित भी हैं। इनके अलावा कुछ स्वतंत्राता संग्राम सेनानी भी हैं तथा बाकियों के परिजन भी हैं। उनसे मिल कर आज़ादी की जो तस्वीर उभरती है तथा दूसरी आज़ादी तक का चित्रा प्रस्तुत करती है वही दूसरी आज़ादी उपन्यास का कथानक है। वैसे यह अचरज नहीं है कि सोनभद्र के 57 प्रतिशत भू-भाग पर वन विभाग काबिज है और भूमिधारिता का औसत प्रति व्यक्ति एक बीघे से भी कम है। खाद्यान्न की कुल उपलब्धता पांच सौ ग्राम तक भी नहीं है। वन विभाग की क्रूर जमीन्दाराना गतिविधियों के दंश और प्रताड़ना को देख कर कोई भी शब्द-योगी सभ्य समाज की आरोपित मर्यादाओं के प्रति निष्ठुर हो जायेे तो अचरज की बात नहीं।
सोनभद्र में आपात-काल के काले कारनामों का तांडव, जिसका मैं गवाह और भुक्तभोगी भी था, उसे जस का तस सहपुरवा उपन्यास में मैंने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भूमि-वितरण के सवाल पर उपन्यास की दलित नायिका सुमिरिनी जिस तरह से राज-व्यवस्था व सवर्ण समाज से मुठभेड़ करती है और वह भी आपात-काल के दौर में जब दलित साहित्य का कहीं अता पता तक नहीं था, एक विचारणीय मामला है। वन-प्रबन्धन के खिलाफ संघर्ष करती बसमतिया जो आदिवासी महिला है तथा मेरे उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ की नायिका है उसके संघर्षों को उल्लिखित करना गलत न होगा। वह वन-प्रबन्धन से टकराती है फलस्वरूप उसे जेल भिजवा दिया जाता है।
मैं आभारी हूं मनीष प्रकाशन का जो इस उपन्यास को दुबारा प्रकाशित कर रहे हैं जिसके लिए पहले प्रकाशक आ.रामानन्द तिवारी जी ने सहर्ष अनुमति प्रदान कर दिया है।
दुनिया का सन्दर्भ छोड़ भी दें तो कम से कम आज़ाद और जनतांत्रिक भारत में वर्ण, स्त्राी और सम्पत्ति के सवाल सबसे बड़े सवाल हैं, जिनसे साहित्यकर्मी लगातार टकराते रहे हैं। हालांकि यह सच है कि इन सवालों से टकरा रहे कुछ नामवर और विशिष्ट (जो खुद को साबित कर सकें) लोगों के अगल-बगल ही साहित्य का भूगोल घूम रहा है, वही आलोच्य विषय हैं तो आलोचना भी, वही कथाकार हैं तो कथानक भी, वही पाठ हैं तो पाठ्य विषय भी। वे ही अखंडित हैं और विखंडित भी, वे ही पाठ को विखंडित कर दूसरा पाठ रचते हैं तो दूसरे पाठ को पहले पाठ पर चिपकाते भी हैं। कहा जाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य के कुछ लोग ही नियामक हैं, ब्रह्म हैं तथा साहित्य के प्रजनन-श्रोत व माध्यम भी। बताइये ऐसे कठिन समय में साहित्य के रंग महल में जिसका रूप संसद की तरह है, उसमें हासिए पर पड़ा कोई अदना कैसे दाखिल हो सकता है? फिर कठिन परिवेश में जी रहे शोषित, यातनाग्रस्त, प्रताडित वर्ग-समाज के द्वन्द, अन्तर्द्वन्द, उनका जीवन किस तरह अभिव्यक्ति हासिल कर सकता है वह भी यथार्थ ढंग से। जाहिर है यथार्थ का यथार्थ महज कल्पना है।
वैसे आज के समय का बाजारवाद, उपभोक्ता संस्कृति, वैश्वीकरण, अणुबम संस्कृति सामाजिक वानिकी को चाहे जिस भांति क्षतिग्रस्त करे, पर एक बात खुले रूप से प्रकट हुई है वह है अपनी पीठ ठोंकने की कला। हम सभी आत्म-मुग्ध हैं तथा अपने अपने वांक्षित शिखरों की तलाश में हैं। आज भी हम सम्पत्ति व स्त्राी के सवाल पर किसी प्राच्यवादी की तरह ही सोच रहे हैं और खुद को परिवर्तित होने से बचा रहे हैं। आज़ादी के बाद भी मैं भूमि-प्रबन्धन को बड़ा मुद्दा मानता हूं। आप भले हवाई हों, आकाशचारी हों, पर पैर तो जमीन पर उतारेंगे ही। मैं समझता हूं कि न्याय, किसके लिए न्याय? किसके लिए कानून? किसके लिए किताबें, किसकी आज़ादी इस पर बहस होनी चाहिए। दूसरी आज़ादी में कुछ इसी तरह की बहस से आप रूबरू होंगे। आशा है उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा, यदि आप निराश होते हैं तो मुझे क्षमा करें। छोटन के अपराध को गंभीरता से नहीं लिया जाता। दूसरी आज़ादी उपन्यास की सगुण या निर्गुण आलोचना के लिए आपकी प्रतीक्षा में।
रामनाथ शिवेन्द्र
अक्षर घर, हर्ष नगर, पूरब मोहाल,
रार्बट्सगंज (सोनभद्र) 231216
मो..7376900866
टूटता इतिहास
जो होना था, हो चुका था, इस होने और हो चुकने के बीच रणविजय, उलझे हुए थे। वे समझ पाने में असमर्थ थे कि उन्हें अपनों से अपेक्षा रखनी चाहिए कि नहीं, फिर उनका गुनाह क्या था, ऐसी विषम स्थिति की तो उन्होंने कल्पना तक नहीं किया था कि ऐसा भी हो सकता है!
एक दिन वे अकेले हो जायेंगे, अपने में डूबा हुआ, बाहर निकलने के लिए किसी गलियारे की तलाश करता, लेकिन बाहर निकल कर जाना कहां? हर ओर धुआं ही धुआं, आग ही आग, मार-काट, खून-खराबा। वे लान में बैठे हुए थे सुबह की नरम धूप भी उन्हें जला रही थी, जैसे आग में से तप कर आ रही हो। सामने दीख रहे फूलों की सुगन्ध का कहीं पता नहीं था, वहां धमाके थे, बमों की गर्जनायें थीं। नारियलों के पौधे हिलते तो वे सिहर उठते, भीतर से सवाल उठता...कृकृ
‘क्यों रणविजय अब क्या करोगे?’
उन्हें अपने मनुष्य होने तथा मनुष्य बने रह सकने पर सन्देह हुआ। उन्होंने अपने हाथों को देखा, उसे इधर-उधर झटका दिया, उनमें पहले वाली ही ऊर्जा थी, वे फावड़ा, कुल्हाड़ी कुछ भी चला सकते थे, सामने से आ रहे बाघों को मार सकते थे तथा एक ही हाथ से रायफल दाग सकते थे। हाथ तो ठीक ठाक है, पूरी तरह दुरुस्त और स्वस्थ।
वे फौरन कुर्सी से उठ खड़े हुए, लान में टहलने लगे, एक तरफ से दूसरी तरफ तक, अगल-बगल देख कर उन्होंने दौड़ना शुरू किया, गोया वे टहल सकते हैं, दौड़ सकते हैं, विपरीत परिस्थितियों में आगे या पीछे भाग कर खुद को बचा सकते हैं। दौड़ते हुए ही उन्होंने महल देखा, महल सामने पूरी लम्बाई-चौड़ाई में खड़ा था, उन्हें घूरता हुआ। उसके बुर्ज, उसकी छतें, सारी चीजें उन्हें घूरती हुई दिख रही थीं, जैसे वे भी पूछ रही हों, क्यों रणविजय अब क्या करोगे?
रणविजय उत्तरहीन थे। वही रणविजयकृजो स्वतंत्राता संग्राम के बारे में सोचा करते थे। राजनीति के आचरण के बारे में तर्क किया करते थे। राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय विषयों के बारे में मित्रों से बहसें किया करते थे। गान्धी के अहिंसा के पक्ष में किसिम-किसिम के भारतीय मानस की चर्चा किया करते थे तथा उन रास्तों का विरोध किया करते थे, जो स्वतंत्राता हासिल करने के लिये युद्ध व हिंसा की पैरवी करते थे। हजारों साल की भारतीय गुलामी पर उनके तर्क विस्मयकारी थे, मानते थे कि भारतीय मन पूरी तरह मोह और माया से मुक्त आध्यात्मिक रहा है, वहां भौतिकता व इहलौकिता का रंच मात्रा प्रभाव नहीं, जैसा कि अरबियों व ब्रिटिशियर्सों का हुआ करता है। मोह ग्रस्तता, कुंठित स्वार्थ तथा घृणित इहलौकिकता से पूर्ण। सारा कुछ अपने लिए तथा अपने को समाज पर आरोपित करता हुआ, सामाजिक होने तथा सामाजिकता का विभत्स प्रदर्शन। वही रणविजय निरुत्तर थे, वे महल की तरफ न देख सके, उन्होंने आंखें फेर लीं तथा लान के फूलों पर केन्द्रित कर लिया।
उनकी आंखें फूलों की तरफ केन्द्रित न रह सकीं, उन्हें फिर महल की दीवारों की तरफ लौटना पड़ा, उन्हें जान पड़ा कि महल कोई साधारण पनाहगाह नहीं, यहां विशेष किस्म के इतिहास का निर्माण होता है। यह किसी उत्पादन इकाई की तरह है, यहां सत्ता की नस्लें पैदा होती हैं, नस्लों की पहले कल्पना की जाती है, फिर उसे गढने व रचने का काम शुरू होता है। यहां युद्ध की भूमिका ही नहीं, उसके एकतरफा लाभकारी गुणों को रेखांकित किया जाता है। सेनायें इन्हीं महलों के इरादों पर अपना नाच नाचती हैं, उनका नृत्य खून से सने जमीन पर होता है, जहां सिर अलग ढंग से तथा धड़ अलग ढंग से अपनी युद्धगत भागीदारी की पहचान कराते हैं। एक बारगी उन्हें झटका लगा, वे आहत हुए फिर उन्हें लगा कि कोई अदृश्य ताकत है, जो उनका जीवन की खुशियों को बहुत ही निर्ममता से छीन रही है पर वहां कोई ऐसी ताकत नहीं थी, जो उन्हें लान के फूलों, पौधों या पीछे मुस्करा रहे महल की तरह दीखती। पर वे तो वर्तमान जो भविष्य बना हुआ था, उसकी निर्मम कल्पना में फंसे हुए थे। उनके सामने कल जो बीत चुका था, एक पुरानी कल्पना जिस पर कालिख पोती जा चुकी थी, और कल जो आने वाला था, वह उन्हें आतंकित कर रहा था कि तुम्हारा भविष्य गहरे कुंए में जा गिरा है और तुम एक अंधे भविष्य के आदमी हो। जहां सूरज उगता है, चांद खिलता है, मौसम हंसता-गुनगुनाता है, रिमझिम बदरियां दिल-दिमाग को बसन्ती बनाती है, फिर भी उन्हें तुम न देख सकते हो, न महसूस कर सकते हो। फिर तो उन्हें लगा कि वे अपनी आंखें खो चुके हैं, उन्हें कुछ नहीं दिख रहा, तभी किसी मुलायम सी हवा ने उन्हें सहलाया...कृ
वे ठीक-ठाक ही नहीं, इतना ठीक-ठाक थे कि अपना होना बचा सकते थे तथा वह सब तौर-तरीका आजमा सकते थे, जो ठीक-ठाक होने के लिए समय और समाज द्वारा प्रस्तावित थे। तरीके दो थे या तो भागो या तो परिस्थिति का मुकाबिला करो। दोनों तरीके युद्धकालीन थे। भागने वाले तरीके में जमीन पर लेट जाना भी था। वे क्या करें, भागें और जमीन पर लेट कर इच्छा मृत्यु का प्रयास करें या आगे बढ़ें और हत्या, प्रति हत्या करें, विजेता के गौरव से आत्ममुग्ध हों। वे आत्म-लीन हो उठे, आाखिर क्या करें? वे गुनने लगे जैसे उनके मन के गहरे में विषम स्थितियों के सापेक्ष समाधान हों। पर वहां भी तूफान थे। तूफानों में तर्क थे, एक दूसरे की विपरीतता को प्रभावित करते।
अचानक उन्हें लगा कि वे विजेता नहीं बनना चाहते, वे हिंसा, प्रतिहिंसा से अपना भविष्य संवारना नहीं चाहते। किसी सन्त की तरह उन्होंने विचारा..
‘उन्हें किसी का जीवन छीनने का क्या अधिकार?’लेकिन यदि उनका अधिकार छीना गया हो फिर!
फिर तोकृवे उलझ गये, अधिकार का मामला जटिल था। इतना जटिल, उन्होंने उसे ज्यों का त्यों छोड़ दिया इस मुद्दे पर उनके ज्ञात दार्शनिकों ने भी उनकी मदद नहीं की। भारतीय दार्शनिक तो किसी अधिकार की कल्पना तक नहीं करते। ले देकर उनके सामने महाभारत का उदाहरण था...सूई की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा, दुर्योधन का यह दुराग्रही फैसला महाविनाशकारी युद्ध को आमंत्रित करता है, वे कांप उठे, उनके साथ कोई नहीं, यदि साथ में कृष्ण होते, फिर वे सोचते। नहीं! महाभारत महज एक कल्पना है, संपत्ति के अधिकार के लिए युद्ध की अनिवार्यता को प्रमाणित करता, पर मन के गहरे में घुस चुके प्रबोधन आसानी से पिन्ड नहीं छोड़ते, वे धुआं-धुआं हो उठे।
‘सूई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा’ दुर्योधन का कल्पित चेहरा उनके सामने जीवन्त हो उठा और वह चेहरा भी जब वह सारा कुछ हार चुका होता है, अपने सभी भाईयों को घृणित अभिमान के युद्ध में गवां चुका होता है। उन्हें लगा कि वह युद्ध एक ऐसा विवादास्पद युद्ध था, जिसमें सभी पराजित होते हैं, कृष्ण अपनी कूटनीति में हारते हैं और दुर्योधन को ऐतिहासिक सन्तुलन के लिए राजी नहीं करा पाते। युधिष्ठिर अपने सच से पराजित होते हैं, अर्जुन, कर्ण से हारते हैं तथा कृष्ण जैसे देव रूप से अपना रथ हंकवाते हैं। कुन्ती अपनी गोपनीय सच को छिपाने में इतनी कमजोर हो जाती है कि उसे कर्ण को पांडवों के पक्ष में युद्ध करने के लिए सहमत करने का प्रयास करना पड़ता है, तो उस युद्ध का कोई विजेता नहीं, सभी पराजित होते हैं।
नहीं! नहीं, उन्हें किसी भी युद्ध को आमंत्रित नहीं करना, उन्हें जय-पराजय दोनों में से कोई भी स्वीकार्य नहीं, फिर क्या होगा, भइयाराजाने तो उन्हें महल से निर्वासित होने का आदेश दे दिया है। भइयाराजाके आदेश का अनुपालन या सबल प्रतिरोध, आखिर क्या करना है उन्हें!
‘आदेश का अनुपालन ही ठीक होगा’ यह उनके मन की गुफा में छलछलायाकृकृअचानक रणविजय ने समय के साथ हस्तक्षेप किये जा सकने वाले विचारों में से एक का चुनाव किया, यह उनके लिए खुशी प्रदान करने वाला क्षण था। ऐसा इसलिए कि उन्होंने आदेशों का अनुपालन ही अब तक सीखा था, बड़ी अम्मा रानी यही सिखाया करती थीं उन्हें। लेकिन उन्हें आदेश के अनुपालन के बाबत उचित अनुचित का ख्याल नहीं रखना चाहिये क्या! विवेक भी तो कुछ होता है इसके आगे रणविजय विचारों के अंधेरे में कहीं खो गयेकृ
एक उलझन भरी मनःस्थिति, ऐसी स्थिति जो दीखती स्पष्ट, पर वह दीखने का आभास ही होती।
उनकी खुशी क्षण-भंगुर थी, जैसे आई वैसे लौट गई।
रणविजय को अपना जीवन खुरचने लगा, जिसे उन्होंने गांधी के चरणों पर चढ़ा दिया था। गांधी के दिशा निर्देशों से कौन सी शिक्षा उन्होंने हसिल किया है..कृ सविनय अवज्ञा यह है कि नहीं, वे धरना और सत्याग्रह करते रहे कि नहीं, ब्रिटिश कानूनों की अवज्ञा करते रहे हैं कि नहीं!
हां ऐसा तो है फिर तो भइयाराजाके सामने उन्हें हाजिर होना होगा आखिर उनका अपराध क्या है? यह तो बतायें भइया राजा।
रणविजय ने पारिवारिक संस्कारों से बाहर निकल कर समय की आवश्यकतानुसार कुछ करने के लिए सोचा कि चुपचाप होकर निर्वासित हो जाना, अपना अधिकार छोड़ देना, कायरता होगी। इस महल, महल के इर्द-गिर्द वाली सारी संपदा पर उनका भी अधिकार है, केवल भइयाराजाका ही नहीं। फिर तो बंटवारा कराना होगा!
बंटवारा के बारे में सोचते गुनते ही रणविजय का मस्तिष्क तनाव से भर गया। एक बंटवारा तो उन्होंने देखा है, खून के सैलाबों और लाशों से पटी धरती का, भारत और पाकिस्तान का। एक देश को दो हिस्सों में बंटता हुआ। बंटा भी क्या, केवल धड़, सिर तो अपने-अपने स्थान पर बने रह गये, सिरों ने ही अपने अपने हिस्से की धरती का चुनाव किया था। पहली बार उन्हें लगा कि बंटवारे के लिए धर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। समाज का अपना कोई सिर नहीं होता..समाज तो एक अद्भुत गठबन्धन होता है, जो गिने-चुने सिरों के नेतृत्व में चला करता है। शायद भारत न बंटा होता, यदि वह कुछ चुनिन्दा सिरों का नेतृत्व न स्वीकारता। बंटवारे से हुआ क्या? क्या संस्कृति और सभ्यता की प्राचीन समरसता खंडित नहीं हुई! तो महल का बंटवारा क्या सभ्यता और संस्कृति का बंटवारा नहीं होगा? उस खून का बंटवारा नहीं होगा, जो उनके और भइयाराजाकी नसों में धारा-प्रवाह दौड़ रहा है। वही होगा...कृ
रणविजय अपनी सोच कुछ आगे बढ़ा पाते कि एक छोटी सी चिडिया उड़ती हुई उनके सामने से निकली, जो उनकी आंखों के इतना करीब से गुजरी कि उन्हें सिर को झटका देना पड़ा। चिड़िया उनका ध्यान तोड़ कर गुलाब के पौधे पर जा बैठी। वह वहां आश्वस्त थी और चीं चीं कर रही थी। यह उसकी अपनी भाषा थी, जिसमें उसका सुख-दुख था या गुलाब के खूबसूरत फूलों की प्रशंसा, रणविजय चिड़िया के अस्तित्व के बारे में सोचते हुए भावुक हो उठे। तथा चिड़िया का चहचहाना सुनते रहे तथा यह भी निश्चित करते रहे कि वे चिड़िया नहीं हो सकते, उसकी तरह चहचहा नहीं सकते।
सुबह होते ही वे लान की तरफ निकल आये थे, फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रह गया था कि उनके साथ कोई दूसरा भी है। उनके साथ पढने वाली लड़की ने जिद्द किया था कि वह गांव देखना चाहती है। भारत तो गांवों का देश है, गांव देखना भारत को देखना होगा। उसने मजबूत तर्क दिया था। रणविजय जानते थे कि भारत के गांव दीखते सरल व सीधे हैं, पर होते काफी जटिल हैं। हालांकि लडकी भारत की ही थी। एक दो बार ही अपने डैड के साथ इंग्लैंड जा पाई थी तथा दो भिन्न-भिन्न तहजीबों में पल-बढ़ रही थी, ऐसी सूरत में वह मानसिक रूप से काफी परिपक्व भी होने लगी थी। कभी-कभी वह उन उत्तरों की चाहना करने लगती, जो उसके डैड या मम्मी ही दे पाते। पर वह पूछती नहीं, उसे उत्तरों को सवाल में बदलना बेतुका और अनावश्यक जान पड़ता। इसीलिये वह डैड और मम्मी के रिष्श्तों को स्वीकार कर चलती। मम्मी के साथ मम्मी की तरह, डैड के साथ डैड की तरह रहना उसकी आदत बन गई थी।
रणविजय का महल गांव में था, पर गांव महल में नहीं था। वहां दिल्ली जैसे शहरों की आधुनिकता थी। गांव महल की संस्कृति ही नहीं हवा से भी काफी दूर था। महल की शान्ति, महल का सुख, उसका वैभव, हालांकि गांवों की सांसों पर ही टिका था। फिर भी ऐसा नहीं था कि महल की दीवारों पर गांवों की गरीबी और यातना के चकत्ते उभरते। गांवों की भूख महल में दाखिल हो कर रोटी का टुकड़ा पा जाती या कोई बीमारी अपना दवा इलाज करा पाती, ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता। रणविजय की मित्रा लडकी महल में आकर अचरज पीने लगी थी क्या ऐसा भी संभव है? लेकिन उसे मालूम था कि महल राजाओं के होते हैं, गरीबों के नहीं। गरीबों के बारे में उसे सुनी-सुनाई बातें मालूम थीं, महल में आकर वह कहीं खो गई थी।
रणविजय की मित्रा लडकी सुबह देर से उठती, दैनिक क्रियायें निपटाती, फिर अखबार पढ़ती। उसने देखा कि रणविजय महल में नहीं हैं। किसी नौकर ने बताया कि छोटे भइया लान में बैठे हुए हैं, फिर लडकी लान की तरफ निकल आई। लान की तरफ आते समय भाभी रानी मिली थीं, जो एक आधुनिक महिला थीं, गहनों से लदी, वे चलती तो छन-छन की आवाज होती। लडकी को अच्छा लगता। चेहरे पर कुटिलता नहीं थी, होंठ हमेशा मुस्कराहट पीते रहते, कुल मिलाकर लडकी भाभी रानी से प्रभावित थी, हालांकि उसकी मम्मी भी एक प्रभावशाली महिला थीं पर उनके चेहरे से सादगी फूटती और भाभी रानी के चेहरे पर हुकूमत नाचती रहती, वैभव थिरकता रहता। उसे भी भाभी रानी की तरह ही महल में रहना होगा, सोचते- सोचते वह लान तक चली आई।
यहां क्या हो रहा है भाई! किसी कविता की रचना तो नहीं की जा रही? उसने पूछा और रणविजय के पास बैठ गई।
कुछ नहीं, सोच रहा था कि दिल्ली निकल लिया जाय, छोटा सा उत्तर दिया रणविजय ने।
क्यों शिकार पर नहीं चलना क्या? पूछा लडकी ने।
नहीं, सरकार ने पाबन्दी लगा दिया है, रणविजय ने उससे कहा।
कैसी बातें करते हो, डैड ने बताया था कि राजाओं की रियासतों वाली सारी सुविधायें बहाल कर दी गई हैं, उनकी जमीनों एवं अन्य संपदाओं का बाजार दर के अनुसार मुआवजा मिलेगा। डैड तो बोल रहे थे कि जमीनदारियां व रियासतें छीनी नहीं गई हैं, बल्कि सुविधाजनक समझौते किये गये हैं ताकि अमन-चौन बना रहे, चलो आज शिकार पर चलते हैं।कृ
‘नहीं, लिली नहीं, बच्चों की तरह जिद नहीं करते, भइयाराजाने भी शिकार पर जाने के लिए मना किया हुआ है। रणविजय ने उदास होकर कहा।’
पर लिली तो जिद पर अड़ी थी, उसे शिकार पर निकलना ही था, उसके डैड अब शिकार पर नहीं जाते, उनके पास हथियार भी नहीं। दिल्ली से वह शिकार करने का रोमांच देखने के लिए ही आई थी। लिली रणविजय के पास से फुदकी और सीधे जा पहुंची भाभी के पास।
‘भाभी रानी, आपसे कुछ कहना है,’ कहते हुए लिली उनसे चिपक गई।
‘बोलो क्या है? दुलार भर कर पूछा भाभी ने।
उसने ठुनक कर कहाकृ‘हम शिकार पर निकलना चाहते हैं, पर रणविजय नहीं जा रहे।’
‘तुम दोनों आपस में बातें कर लो, मैं बोलती हूं छोटे भइया को।’
यह कहते हुए भाभी रानी लान तक आईं, उन्होंने रणविजय से बातें की, पर रणविजय तो खामोश बैठे रहे, जैसे उन्हें कुछ सुनाई ही न पड़ रहा हो या जानबूझ कर सुनना ही न चाह रहे हों, परकृभाभी रानी तो उन्हें सुनाने के लिए ही आई थीं कि वे सुनें और लिली के साथ शिकार पर निकलें।
‘नहीं भाभी रानी! मुझे दिल्ली निकलना है और फिर शिकार का मूड भी नहीं, वैसे भी नई सरकार ने शिकार करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, अब जंगल भी अपना नहीं है।’
‘तो क्या हुआ! हमारे पास तो सरकारी पास है, पिछले हफ्ते ही भइयाराजाशिकार पर निकले थे। भाभी रानी ने समझाने और राजी करने की हद तक रणविजय को समझाया, पर रणविजय कहां समझने वाले थे, फिर भाभी रानी ने लिली को ही आश्वस्त कियाकृ
‘जाने दो लिली, दुबारा आना, फिर हम भी निकलेंगे शिकार पर, लम्बा समय गुजर गया है शिकार पर गये हुए।’ भाभी रानी ने लिली को किसी बच्चे की तरह विषयान्तरित किया।
रणविजय का शिकार पर न निकलना, भाभी रानी के सन्देह को पक्का कर गया। भाभी रानी देख रही थीं कि जबसे महाराज ने रणविजय को भला बुरा कहा है, तब से उनका चहकना बन्द है। उन्होंने खुद को अपने में समेट लिया है। लेकिन भाभी रानी यह नहीं जानती थीं कि भइयाराजावास्तव में उन्हें महल से निर्वासित ही करना चाहते हैं, वे तो उसे सामान्य सी परिघटना ही मान रही थीं कि भाइयों में ऐसा होता रहता है, सामान्य अनुशासन के तहत। पर मामला इतना ही नहीं था, भले ही भाभी रानी को आगे क्या होगा? नहीं मालूम था। लेकिन उन्हें यह तो मालूम ही था कि भइयाराजाने लिली के बारे में ही रणविजय से कहा-सुना था।
लिली यानि उस अंग्रेज की लडकी, उसी दासी की पुत्राी जिससे उस अंग्रेज ने भारतीय रीति-रिवाज के अनुसार विवाह रचाया था। भाभी रानी उस अंग्रेज के बारे में पहले से ही जानती थीं, उन्हें बड़ी अम्मा रानी ने बताया था कि वह अंग्रेज, तब एक बहुत बड़ा हाकिम था। उस समय हर ओर अंग्रेजों की हुकूमत थी। अंग्रेज हाकिम से महाराज की काफी पटरी थी, वह जब भी शिकार पर जाता, महाराज को साथ लिये रहता। वह महाराज को उनकी शक्ल सूरत देख कर राजा ही समझता, पर वे राजा नहीं थे।
अंग्रेज हाकिम इतना ताकतवर तथा प्रभावशाली था कि वह जिसे चाहता राजा बनवा देता, खास तौर से ऐसे लोगों का जो मुगलों के विरोध में थे। उसी अंग्रेज हाकिम ने भइया को भी राजा बनवा दिया। राजा बनवाने के पहले वह यहां आया था, उसे आमंत्रित किया गया था। बड़ी अम्मा रानी उस किस्सा को काफी हास्यास्पद अंदाज में बतातीं।
रामदयाल के पिता एक प्रभावशाली आदमी थे तथा मुगलों के यहां वजारत का काम किया करते थे, यह सारा कुछ उन्हीं का किया कराया था। जब अंग्रेज हाकिम के यहां आया तथा उसका स्वागत सत्कार किया जा रहा था उस समय रामदयाल के पिता, हाकिम के साथ-साथ थे तथा यह सुनिश्चित कर रहे थे कि कहीं से कुछ गड़बड़ न हो जाय।
गड़बड़ तो कुछ होना ही नहीं था, अंग्रेज हाकिम का जोरदार स्वागत सत्कार किया गया। रात में आदिवासी नृत्य आयोजित किया गया। दासी, जो तब दासी थी, बहुत बढिया नष्त्य भी करती थी। वह आदिवासी गांवों की रहने वाली थी, मूल रूप से वह आदिवासी नहीं थी, पर आदिवासियों के साथ रहते रहते उन्हीं के संस्कारों में ढली हुई थी। आदिवासी औरतों ने उसे पकड़ लिया तथा इतना मजबूर किया कि उसे नाचना पड़ा। फिर तो उसने खूब खुल कर नृत्य भी कियाकृयह भूल कर कि वह नृत्य कर रही है। दरअसल उसका नृत्य काफी प्रभावशाली था, हालांकि आदिवासी नृत्य ‘करमा’ एक समूह नृत्य होता है, जिसमें स्त्राी-पुरुष दोनों पंक्तिबद्ध होकर एक दूसरे का हाथ पकड़, थोड़ी सी गर्दन झुका कर मानो वे जमीन देख रहे हों, एक निश्चित गोलाई में ही थिरकते हैं। उनके थिरकने से पैरों की घुंघरु, हाथों के कंगन बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मधुर स्वरों में बजने लगते हैं। घुंघरुओं का छन-छना छन-छन इतना प्रभावकारी होता है कि किसी को भी प्रभावित कर सकता है। लिली की मां थी कि वह नृत्य में मगन थी थोड़ा सा नशे के सुरूर में थीं, हालांकि दारू तो सभी नाचने वालियों ने भी पिया था। बिना दारू पिये, करमा नाचना मुश्किल है।
नृत्य देखने वाले भी दारू के नशे में डूबे थे, उन्हें हर तरफ चांद तारे दिख रहे थे, उनके दिल बरसात के रिम-झिम से भरे हुए थे। अंग्रेज हाकिम दारू पीने के बाद भी काफी संयत था तथा उसे मालूम था कि वह मेहमान ही नहीं, एक ऐसा हाकिम है, जिसकी कलम ‘राजा और प्रजा’ बनाया करती है। वैसे भी उसे संयत तो रहना ही था क्योंकि उसी को वहां सारे लोग देख रहे थे। उसे अपनी मर्यादा का पूरा ख्याल था, जिसे वह पूरी तरह बचाये हुए था।
अंग्रेज हाकिम नृत्य देखने में इतना मगन था कि उसके सामने की रखी दारू की गिलास भी खाली नहीं हुई। सामने जो खास तौर से फ्राई की गई मछली रखी गई थी जिसे बंगाल से मंगवाया गया था, वह प्लेट भी आसमान ही ताकती रही। रामदयाल के पिता ने एक दो बार अंग्रेज हाकिम से आग्रह भी किया जिसे वह विनम्रता से टाल गया। वह तो नृत्य की तरफ था, खास तौर से लिली की मां की तरफ। जो समूह में थी, उसके साथ दस और लड़कियां थीं, नौजवान आकर्षक देह वाली वैसे उनके चेहेरे के रंगों में फूलोंवाला आकर्षण नहीं था। फिर भी ऐसा नहीं था कि उनमें पुरुष मन उद्वेलित करने का चुम्बकत्व नहीं था। लोग बाग नृत्य की तरफ खिंचे हुए थे, अंग्रेज हाकिम था कि वह लिली की मां की तरफ एकटक था। उसे लगता कि वह अकेली नृत्य कर रही है और समूह है कि उसमें महज सहभागिता कर रहा है। उसके भारतीय ज्ञान ने उससे कहलवाया कि वह नृत्य की देवी है।
करमा के गायन और नृत्य की संयुक्तता से अंग्रेज हाकिम काफी प्रभावित था। कुछ देर के लिए तो वह भावुक हो उठा, फिर तो उसे लगा कि वह कुर्सी छोड़ चुका है और लिली की मां का हाथ पकड़ कर उसी की तरह थिरकने लगा है। पर उसने खुद को दृढ़ किया कि उसे आम लोगों के बीच अपनी निश्छल भावुकता को रोकनी चाहिए, वह अधिकारी है उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। वस्तुतः उसने खुद को रोक लिया और भूनी मछली के साथ एक घूंट दारू भी पिया। अब वह ठीक था तथा हाकिम होने के प्रभाव को बचाये हुए था। फिर भी उसके मन के गहरे में लिली की मां तैरने लगी थी, खजुराहों की नग्न मूर्तियों की तरह। अंग्रेज हाकिम ने खजुराहों की मूर्तियां देखा था, जो किसी भी कोमल मन की उदात्तता बहुत ही मीठे ढंग से खींच लिया करती हैं। आदिवासी नृत्य करने वाली लड़कियां धीरे-धीरे खजुराहों की मूर्तियों में परिवर्तित होने लगीं, फिर तो अंग्रेज हाकिम के लिए वहां रुकना कठिन हो गया। वह सीधे विश्राम कक्ष में जा पहुंचा।
पीछे-पीछे रामदयाल के पिताजी थे, फिर जाने क्या हुआ कि अंग्रेज हाकिम उसी रात वहां से वापस हो लिया, इसे अपशगुन माना गया कि कहीं हाकिम नाराज तो नहीं हो गया? पर वह नाराज नहीं था। यह बात दूसरे दिन मालूम हुई, जब रामदयाल के पिता उससे मिले। फिर तो लिली की मां व उसके माता-पिता से उन्होंने बातें की कि अंग्रेज हाकिम उनकी लड़की से शादी करना चाहता है और यह भी कि अब वह इंग्लैण्ड वापस नहीं लौटेगा।
वहां तो सभी अचरज में थे कि इतना बड़ा हाकिम करने क्या जा रहा है? एक आदिवासी लड़की से शादी! भइयाराजाभी अचरज में थे, पर जो होना था वह होने के लिए समय का अनुकूलन कर रहा था। लडकी के मां बाप तो बहुत खुश थे, उन्हें केवल चिन्ता इस बात की थी कि वे दुबारा अपनी लडकी से न मिल सकंेंगे, पर उन्हें आश्वस्त किया गया कि ऐसा नहीं होगा तथा उनकी यह बात भी मान ली गई कि शादी आदिवासी परंपरा के अनुसार ही होगी।
अंग्रेज हाकिम ने वैसा ही किया भी तथा लडकी के मां बाप के लिए एक गांव भी खरीद दिया, जो पड़ोसी रियासत में पड़ता था। अंग्रेज हाकिम आदिवासियों की परंपरा से मनोवैज्ञानिक रूप से खुद को जोड़ नहीं पा रहा था कि जब तक लिली की मां गर्भवती नहीं होगी, शादी नहीं हो सकती। वस्तुतः वैसा ही हुआ, लिली की मां अंग्रेज हाकिम के साथ रहने लगीं, जब गर्भवती हुईं तभी उसकीष्शादी का आयोजन किया गया। पड़ोस की दोनों रियासतों ने मिल कर जंगल में ही जहां उसके मां बाप के लिए गांव खरीदा गया था,वहीं शादी का प्रबन्ध किया। अद्भुत आयोजन था। मयूर के पंखों और जंगली फूलों से सजा हुआ, आदिवासी लिबास में अंग्रेज हाकिम अद्भुत एवं आकर्षक लग रहा था, बड़ी अम्मा रानी भी शादी में श्शामिलथीं।
भाभी रानी ने लिली को आश्वस्त ही नहीं किया, वरन उसे अपने साथ लान से वापस महल में लौटा ले आईं। रणविजय भी भाभी रानी के साथ ही वापस हुए, पर उनका महल में दाखिल होना महल से निर्वासित भी होना था। महल का बंटवारा सामान्य न होगा! ऐसा सोच कर वे कांप उठे तथा सोचने लगे कि कल ही दिल्ली निकल चलना होगा। भाभी रानी लिली के साथ थीं तथा कोशिश कर रही थीं कि दासियों वाली गंध जो लिली में चिपकी होगी, उसे वे पकड़ें। पर वहां तो दूसरी गन्ध थी ऐसी गंध जो भाभी रानी के पास तक न थी, अंग्रेजी मेमों के साथ होकर वे देसी हो जाती थीं किसी बंसवारी से निकलती हुई, लिली थी कि उससे बंसवारियां तथा जंगल की सरसराहटें गायब थीं। भाभी रानी को हालांकि लिली ने गहरे तक प्रभावित किया, फिर भी वे मान कर चल रही थीं कि भइयाराजाइसे उनकी देवरानी तो नहीं बनाएंगे, फिर क्या होगा, इसका? ये दोनों तो स्त्राी-पुरुष की सारी वर्जनायें तोड़ एक दूसरे में अर्न्तलयित हो चुके हैं।
भाभी रानी, भइया राजा, रणविजय अंग्रेज हाकिम, दासी और लिली इन सबके अलावा पूरी खामोशी के साथ अपनी भव्यता व विलक्षणता बचाये हुए महल खड़ा था वही महल, जहां इतिहास जन्मता है। रणविजय महल में किसी अजनबी की तरह रात भर गुजार सके, रात भर उन्हें दीखता रहा कि इतिहास टूट रहा है, खंड-खंड होकर बिखर रहा है। पास में सोई लिली ऐसी सोई हुई थी, जैसे उसके सपने भी नींद में चले गये हों।
सत्ता का खेल
रणविजय लडकी के साथ दिल्ली लौट आये। लडकी के पिता ने रणविजय से उनके भइया के बारे में पूछा। लडकी का पिता, जो उस समय अंग्रेजों का प्रशासनिक अधिकारी था, उसी ने रणविजय के भाई को राजा बनवाया था तथा राजा बनवाये जाने वाले अंग्रेजी कानूनों की उन धाराओं का प्रयोग किया, जो प्राधिकृत अधिकारी को अधिकृत करता था कि वह जैसा उचित समझे, विवादास्पद स्थितियों में फैसला ले। हालांकि उस समय ऐसा नहीं था कि रेजीडेन्ट मनमानी कर सकता था। फिर वारेन हेस्टिंग्स पर चलाया गया महाभियोग का मामला सभी सक्षम अधिकारियों के लिए केवल पाठ ही नहीं, दिशा निर्देश भी था कि रेजीडेन्ट भी मुकदमे में फंस सकता है।
रणविजय के भइयाराजाके क्षत्रा चंवरधारी हो जाने के बाद मृतक राजा की विधवायें चुप तो नहीं बैठतीं, वे वायसराय के यहां फरियाद लेकर हाजिर होतीं, फिर वायसराय जाने क्या करता! वह किन कानूनी सूत्रों का प्रयोग करता तथा अंग्रेजी कानूनों को रानियों की गोदी में किस तरह बिठाता सारा कुछ होने और न होने की संभावनाओं का आधार होता। वैसे कुछ हुआ नहीं, क्योंकि मृतक राजा की रानियां भी अपनी-अपनी स्थितियों के कारण मतभिन्नताओं की शिकार थीं। विवाहित रानी पुत्राविहीन थी तथा दूसरी रानी जातिगत शुचिता के सवाल पर विवाहित रानी का दर्जा हासिल कर पाने में असफल रही थीं, मृतक राजा भी दूसरी रानी की तरफ ही अपना सिर झुकाये हुए वह सब हासिल करने के लिए लालायित रहा करता था, जो उसकी सुप्त दैहिक ऊर्जा को काल्पनिक ढंग से उर्जस्वित कर सकें।
अंग्रेज हाकिम ने बहुत ही सहजता से पूछा..कृकृ
‘क्यों रणविजय! तुम्हें भइयाराजाने महल से निकाल दिया, आखिर क्यों?’
‘मुझे नहीं मालूम कोई ऐसा कारण भी नहीं था जिसके कारण मुझे महल से निकाला जाता। मैंने भइयाराजाकी कभी अवज्ञा भी नहीं किया, मैं तो उन्हें पिता तुल्य समझता हूं।’
‘यही होता है रणविजय, समय बदल चुका है, नहीं तो वह तुम्हारी हत्या भी करवा सकता था। संभवतः उसने तुम्हारा भविष्य पढ़ लिया है, और तुममंे राजा जैसा बन जाने के गुणों का आकलन कर लिया है। लेकिन यह तुम्हारे लिए अच्छा हुआ, अब तुम खुली हवा में अपनी सांसें ले सकते हो, सूरज की नर्म किरणों से बतिया सकते हो तथा अपनी मनुष्यता बचाने के लिए खुद से संघर्ष कर सकते हो।’
अंग्रेज हाकिम ने रणविजय को समझाया जैसे कोई दार्शनिक हो या कोई सन्त। लेकिन वह जानता था कि भाइयों में बंटवारा न हो, यह कुछ कुछ आरोपित जैसा होता है वैसे भारतीय समाज में बंटवारे को घृणित माना जाता है, जिसका रूप आन्तरिक कम दिखावटी अधिक होता है। किसे सत्ता प्रमुख बनना रुचिकर न लगेगा? सो अंग्रेज हाकिम ने रणविजय को महल से निकाले जाने को महज एक साधारण सी स्वाभाविक घटना माना जिसका घटना संभाव्य था। बावजूद इसके अंग्रेज हाकिम उलझन में था क्योंकि रणविजय के भइयाराजाकी ‘इस्टेट’ बहुत छोटी न थी। गुलामी के दौर में उस इस्टेट की अधिरचना औसत से बड़ी थी, तो क्या रणविजय को कुछ भी हासिल न होगा?
‘निश्चित रूप से रणविजय को ‘इस्टेट’ संपदा का आधा भाग मिलेगा निश्चित मानकर अंग्रेज हाकिम अपने दूसरे काम में लग गया।’
रामदयाल जब महल पहुंचे तब उन्हें वहां बताया गया कि रणविजय दिल्ली जा चुके हैं तथा भइयाराजाने उन्हें महल से निर्वासित कर दिया है।
‘आखिर क्यों? जानना चाहा था रामदयाल ने, पर महल से उन्हें कौन उत्तर देता। भइयाराजाप्रदेश की राजधानी जा चुके थे, वहां उन्हें जमीनदारी बांड के बाबत कई काम निपटाना था। महल की देख-रेख, सुरक्षा व प्रबन्ध करने वाला एक अधिकारी था, जो शक्ल सूरत व आज्ञाकारिता के हिसाब से मुगलिया काल का जान पड़ता था। हालांकि उसका पहनावा आधुनिक था, उसकी देह एक पैन्ट और झूलने वाली शर्ट से ढंकी हुई थी तथा वह पैर दबा कर चलने वाला आदमी था, जिसके जूते की टप-टप गायब थी। मुगलिया काल जैसा यह आदमी दौड़ा-दौड़ा हांफता हुआ महल के संवाद कक्ष तक आया कि रामदयाल जी आये हुए हैं और बैठे हैं। वैसे रामदयाल के जीप की गर्जना चारो ओर पहले ही पसर चुकी थी, पर मुगलिया काल जैसे उस आदमी को जीप की गर्जना न सुनाई पड़ी थी, वह उस समय किसी काम में काफी व्यस्त था। सो, उसके कान इस लायक न थे कि किसी आवाज की पहचान बना सकें।
रामदयाल की जीप आज के हिसाब से खटारा थी, जो पेट्रोल से चला करती थी तथा कभी कभी उसे स्टार्ट करने के लिए धक्का भी देना पड़ता था, फिर भी यह था कि उस समय जीप से चलना महत्वपूर्ण बात थी, घोड़ों व रथों वाला जमाना पीछे की तरफ लौट रहा था। रामदयाल की खास विशेषता थी कि उन्हें देख कर या बातचीत कर अनुमान करना मुश्किल था कि वे ब्राह्मण हैं तथा ब्राह्मण होने को बचाना चाहते हैं। वे साफ-साफ तो नहीं पर बगल से देखने पर राणा प्रताप के वंशज दीखते थे। गोरे चिट्टे, लम्बी मूंछों वाले, किसी अतिरिक्त रोब-दाब वाले आदमी की तरह। उनके पिता भी प्रभावकारी शक्लसूरत वाले जिन्दा आदमी थे, अंग्रेज हाकिम उनसे मिल कर महसूसते कि वे किसी राजा की चमक से चमक रहे हैं तथा इतिहास की हुकूमती मादकता व उन्माद में सराबोर हैं।
रामदयाल की प्रारंभिक पढ़ाई लिखाई रणविजय के साथ ही अंग्रेजी स्कूल में हुई थी, सो वे अच्छी अंग्रेजी बोलते तथा अंग्रेजी रहन-सहन में रहते। घर जाने पर उनकी मां जबरदस्ती उन्हें संस्कृत के श्लोक रटवातीं तथा समझातीं कि संस्कृत देवभाषा है। देवताओं की सारी प्रार्थनायें संस्कृत में है जिन्हें याद रखना बहुत आवश्यक है। मां की बातें रामदयाल के लिए प्रभावकारी होतीं तथा वे पूजा अर्चना वाले श्लोकों को रटने की कोशिश भी करते। यह तो बाद में हुआ कि उन्हें श्लोकों के प्रभाव पर सन्देह होने लगा तथा वे देवताओं के होने और न होने पर विचार करने लगे, खास तौर से तब जब वे भारत के इतिहास में घुसना चाहे, एक ऐसा इतिहास जिसे वे कालेज में पढ़ा करते थे, फिर तो उनके सामने इतिहास की दो तस्वीरें थीं, एक थी जिस पर अंग्रेज रंगा पुता था। दूसरी थी-मुगलों के चेहरों वाली। राज्यों की सुरक्षा तथा संप्रभुता के सवालों पर, रामदयाल इतिहास में से सुरक्षा प्रबन्धन के बारे में कुछ खोजना चाहते तथा खुद को आश्वस्त करना चाहते कि युद्धकालीन भारत में राजपुरोहितों या ज्योतिषियों की भूमिकायें कैसी थीं? वे निराश हो जाते, उन्हें वहां कुछ भी ऐसा न मिलता, जो याद करने लायक होता। उन्हें मां द्वारा याद कराये गये श्लोक भी अप्रभावित छोड़ते तथा किसी देवता की प्रतिमा के सामने श्लोकों का सस्वर पाठ करना, उन्हें निराशा की या असहायता की आत्म-स्वीकृति जैसा जान पड़ता, नीरस व उबाऊ।
रणविजय रामदयाल को राज-परिवार का एक ऐसा सदस्य जान पड़ते थे एकदम सहज व सरल जो साधारण लोगों में भी समाज के लिए भला करने की योग्यताओं व क्षमताओं को देखता है तथा अपने हितैषियों के हितों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाता है। बचपन से ही रामदयाल रणविजय से प्रभावित थे। जब रणविजय को महल से बेदखल करने की खबर उन तक पहुंची, वे महल आ धमके, गनीमत थी कि भइयाराजामहल में नहीं थे, यदि वे होते तो शायद रामदयाल अपना संतुलन गवां बैठते और वह सब कर जाते जो राज-परंपरा के विपरीत होता तथा राज-मंत्राी के परिवार की मर्यादाओं का भी उलंघन करने वाला होता। रामदयाल तो कभी भी ‘इस्टेट’ से बतौर अधिकारी नहीं जुड़े थे पर उनके पिता की इस्टेट के लिए की जाने वाली सेवायें कभी काफी महत्वपूर्ण हुआ करती थीं। हालांकि भइयाराजाउन्हें इस्टेट के साथ जोडना चाहते थे, पर रामदयाल दूरदर्शी थे, उन्हें भारतीय राजनीति के उथल-पुथल का आभास था, वैसे उनकी उस समय वह उम्र नहीं थी जो भविष्य का अनुमान करने में सहायक होती है। वे गांधी जी के सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा में भाग लेते, गिरफ्तार होते तथा विशेष किस्म की राजनीतिक सक्रियताओं के चलते रामदयाल का विश्वास काफी मजबूत हुआ था कि भारत से अंग्रेजी सरकार की विदाई सुनिश्चित है, सिर्फ तारीख नहीं मालूम कि वह कौन सा दिन होगा, उस दिन पछुआ हवा होगी या पूर्वा। चांद अपने असली रूप में होगा या बदरियों में छिपा हुआ होगा पर एक दिन सारा आकाशा हमारा होगा, हम अपने आकश के भीतर होंगे।
संवाद कक्ष में बैठे-बैठे रामदयाल बीते समय में उतर चुके थे, उन्हें रणविजय के मासूम चेहरे ने अस्त-व्यस्त कर दिया था। उन्हें मुगलिया काल जैसे महल के व्यवस्थापक ने अपनी ओर खींचा। उसने रामदयाल के चरणों पर अपना माथा रखा जो एक सामान्य व्यवहार था लेकिन रामदयाल मुगलिया काल जैसे आदमी के इस व्यवहार से अप्रभावित थे। उन्होंने सीधे पूछा- क्यों क्या हुआ? भइयाराजाने रणविजय को महल से क्यों निर्वासित कर दिया?
‘मुझे नहीं मालूम सरकार! हां रानी मां सुबह कह रही थीं कि छोटे भइया जिस लडकी को अपने साथ यहां लाये थे, वह ‘दोगली’ थी। किसी दासी की जाया, वह भी अंग्रेज द्वारा, शायद उन्होंने उससे शादी भी कर लिया है, रियासत का मान-सम्मान गिरा दिया है। छोटे भइया ने, मुगलकालीन जैसे आदमी ने रामदयाल को वह सब बताया जितना वह जानता था। उसके आगे क्या था, उसे न तो मालूम हो सकता था और न ही मालूम था।
रामदयाल संवाद कक्ष में बैठे थे, एकदम खामोश, जैसे कुछ गंभीर विचार कर रहे हों। मुगलकालीन जैसा आदमी उनके सामने ऐसे खड़ा था, जैसे उसका खड़ा होना उससे छीना जा चुका हो। रामदयाल महल के लिए खास रिष्श्तों वाले प्रभावकारी आदमी थे। बिना असलियत जाने महल से लौटना उन्हें पिन्ड छुड़ाने जैसा जान पड़ा, उन्होंने मुगलकालीन जैसे आदमी को आदेशित कियाकृ
‘जाओ! भाभी रानी से बोलो कि रामदयाल भेंट करना चाहते हैं।’
मुगलकालीन जैसा आदमी रामदयाल के आदेश पर जितना तेजी से महल में जा सकता था, चला गया।
थोड़ी देर में भाभी रानी संवाद कक्ष में थीं अपने उसी स्थान पर बैठी हुई जो भइयाराजाके साथ बैठने पर उनके लिए हुआ करती थी। मेहमानों के स्थान पर रामदयाल पहले से बैठे हुए थे।
रामदयाल ने भाभी रानी को अपनी तरफ से आशीर्वाद दिया फिर भाभी रानी ने उनका रियासती अभिवादन किया, जो सामान्य दुआ-सलाम या हलो-हाय से काफी भिन्न था तथा साबित करता था कि दुआ-सलाम जैसी क्रियाओं में भी काफी असमानतायें होती हैं। वहां समानताओं के तत्व ढूंढना काफी बेवकूफी होगी। ण्क आम आदमी का दुआ-सलाम और एक राजा का एकदम अलग अलग।कृ
भाभी रानी संवाद कक्ष में ज्यों ही हाजिर हुईं, उनके साथ ही साथ रामदयाल के लिए नाश्ते का थाल लिए दासी भी उपस्थित हुई। रामदयाल के लिए शाही नाश्ते का कोई खास मतलब न था, क्योंकि वे उन्हीं नाश्तों के सहारे अपनी उम्र बढ़ा रहे थे। पर यह था कि जब वे अपने घर में होते, तब इस तरह का अदब न देखते, जबकि उनके यहां भी दासियां थी, नौकर चाकर थे पर यह अदब कहां? वे तरस तरस जाते फिर भी महसूसते कि यह सारा कुछ दिखावटी है जिसका कोई मतलब नहीं।
‘राजा भइया कहीं गये हैं क्या’ पूछा रामदयाल ने।
‘हां पहले लखनऊ फिर दिल्ली जायेंगे,’ भाभी रानी ने छोटा सा उत्तर दिया।
‘किसलिये, कुछ बताया नहीं?’
‘कब तक आयेंगे?’
‘बोले थे आठ-दस दिन लग जायेंगे।’
असल सवाल जो रामदयाल पूछना चाहते थे उनके मन में कस-मसा रहा था। आखिर कैसे पूछें, कहीं भाभी रानी उन्हें रणविजय का मददगार न समझ लें। समझ लेंगी तो समझ लें, वे रणविजय की मदद निश्चित रूप से करेंगे, फिर रणविजय के लिये किसी न किसी दिन आमने सामने तो होना ही होगा। रामदयाल ने अतिरिक्त पारंपरिकता से भाभी रानी से पूछा।
‘भाभी रानी एक बात पूछूं, चारों ओर चर्चा है कि छोटे भइया को महल सेकृ जाने क्या गुन कर रामदयाल ने खुद को रोक लिया, फिर बाद में सवाल पूरा किया कि उन्हें निर्वासित कर दिया गया है।
‘ऐसा कुछ तो नहीं। सिर्फ महाराज ने उन्हें डांटा फटकारा था, गुस्से में कहा था निकल जाओ महल सेे।’
हुजूर को गुस्सा आ गया था उस लडकी को देख कर, आपको तो मालूम है न उस अंग्रेज के बारे में, जिसने रियासत की एक दासी से विवाह रचाया था, जाने उस अंग्रेज को क्या दिखा था उस दासी में, चाहता तो उसे राजकुमारियां मिल जातीं, भाभी रानी ने कुछ ऐसे बताया जैसे बताना भी घृणा की बात हो।
रामदयाल के दुबारा पूछने पर जोड़ाकृ‘वह लडकी उसी दासी की थी देखो तो जैसे कोई मेम हो उसके परिवार के लोग पड़ोसी रियासत में रहते हैं, दासी के भाई वगैरह तो हैं ही।’
भाभी रानी ने आह भर कर जोड़ा ‘भला बताइए दासी की लडकी से शादी! महाराज, हुजूर कैसे सहन करते, आखिर परिवार भी तो कुछ होता है कि नहीं? आप ही बतायें पंडित जी!’
‘तो क्या मतलब उसकी सजा निर्वासन है? रामदयाल ने प्रतिसवाल किया फिर अपने स्थान से उठ खड़े हो गये, जैसे उन्हें कुछ याद आ गया हो, संवाद कक्ष के चारों ओर घूमने लगे। संवाद कक्ष एक बहुत बड़ा हाल था जिसकी फर्श संगमरमर की थीं, दीवारें शीशम की लकड़ी के नक्काशीदार पटरों से ढंकी थी, कहीं भी चेहरा देख लो, हूबहू दिखता, पटरों के जोड़ कहीं नहीं मालूम होते। फर्श पर जगह जगह भूसा भरे शेर और चीते थे, हिरन के खाल हर तरफ कलात्मक ढंग से बिछी थी। भूसा भरे शेरों और चीतों के पाससे गुजरना विस्मयकारी होता पर डरावना कत्तई नहीं अलबत्ता वैभव की गुदगुदियां भीतर कहीं उठतीं तथा खुद बखुद समाप्त हो जातीं, वैभव को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर देतीं जैसे कभी भी उसे क्षत-विक्षत या लूटा जा सकता है, सार्वजनिकता में परिवर्तित करने के लिये।
रामदयाल संवाद कक्ष के पूर्वी हिस्से से होते हुए सीधे दक्षिणी हिस्से के पास पहुंच कर रुक गये, वह एक चमचमाती सपाट दीवार थी, उस दीवार पर रामदयाल चमकने लगे, उनकी पैंट और शर्ट ने दीवार पर अपना रंग चढ़ाया, जिसे रामदयाल ने नहीं देखा, वे तो कुछ दूसरा ही देख रहे थे। दीवार के ऊपरी हिस्से पर उनकी आंखें जमीं थी। वहां जहां इस्टेट के भूतपूर्व महाराजाओं, महारानियों के तैलचित्रा बहुत ही कलात्मकता से व्यवस्थित किये गये थे। चारो ओर चित्रों की पूरी श्रृंखला ही फैली हुई थी। दीवार पर लगभग पांच छह सौ साल का इतिहास महाराजाओं के चित्रों के साथ चिपका हुआ था। पांच छह सौ साल कम नहीं होते, एक ही कुल एक ही गोत्रा, सिर्फ चित्रा बदलते गये, इस्टेट जो पहले थी वही लगातार सन् ४७ तक। चित्रों का बदलना ही तब का इतिहास था। पिता के स्थान पर चाचा या चाचा के स्थान पर भतीजा इससे राज-परंपरा नहीं बदलती। रामदयाल को इस्टेट के बारे में क्या नहीं मालूम सो वे दीवार पर टंगे सारे चित्रों को लापरवाही से देखते हुए आगे निकल संवाद कक्ष के दाहिनी दीवार के पास रुके हुए थे। दीवार पर किसी महारानी का चित्रा टंगा हुआ था। चित्रा के नीचे महारानी का नाम लिखा था साथ ही साथ उनका जन्म और बलिदान भी उल्लिखित था।
भाभी रानी, रामदयाल को लगातार देख रही थीं तथा कोशिश कर रही थीं कि वे समझ सकें आखिर वे रानियों एवं महाराजाओं के चित्रों को क्यों देख रहे हैं? लेकिन उनके लिए समझना आसान न था, क्योंकि उनका काम किसी रहस्य जैसा था। बात छोटे भइया की और महाराजाओं के चित्रा दोनों में रिष्श्ता न बन पा रहा था।
रामदयाल महारानी के चित्रा के नीचे महज कुछ देर के लिए ठहरे, फिर उन्होंने भाभी रानी को बुलाया, भाभी रानी भी चित्रों के नीचे थीं।
‘इन्हें देखिए भाभी रानी! ये मुगलों से लड़ते हुए बलिदान हुई थीं। तब इनका किला यहां नहीं था, यहां से ठीक दक्षिण की तरफ जो पहाड़ों की श्रृंखला दिखाई देती है उन्हीं पहाड़ों के बीच कई मील लंबा चौड़ा क्षेत्रा है, जहां आज भी खंडहर दिखते हैं, जगह जगह मूर्तियां मिलती हैं। वह एक खूबसूरत क्षेत्रा है। पर उसे यहां के लोग मनहूस इलाका मानते हैं। बाद में इस इस्टेट के अधिपतियों ने उस स्थान को छोड़ दिया तथा यहां महल बनवा लिया।’
महारानी विधवा हो गई थीं, महाराज एक दिन के लिए बीमार हुए और स्वर्गवासी हो गये। मुगलों ने आज के उत्तर प्रदेश की रियासतों को कई तरफ से घेर रक्खा था। राजपूत रियासतें एक पर एक मुगलों की अधीनता में चली जा रही थीं, कुछ राणाप्रताप जैसे गिने चुने लोग मुगलों से टकरा रहे थे। महाराज हुजूर ने भी फैसला किया हुआ था कि वे मुगलों की अधीनता में राजसी वैभव का लाभ न उठायेंगे। महाराज के स्वर्गवास के तत्काल बाद मुगलों ने इस्टेट पर हमला बोल दिया, रानी ने उनका मुकाबला किया तथा मुगलिया सेना को पहाड़ी के दक्षिणी हिस्से की तरफ पन्द्रह दिनों तक हिलने न दियाकृलेकिन मुगलिया सेना तो युद्ध को जीत में बदलने के लिए हर तरह के षडयंत्रों के लिए तत्पर थी। मुगल सेनापति ने रानी के भाई को मिला लिया, जो कबीले का सरदार था तथा स्वर्गीय महाराज से हर हाल में बदला लेना चाहता था, पर महाराज तो थे नहींकृसो उसने मुगलों से समझौता किया कि रानी जो उसकी बहन थी, उसकी हत्या नहीं होनी चाहिए तथा उसे राजा बनाया जाएगा।
कबीले का सरदार रानी को समझाने बुझाने के लिए अपनी बहन से मिला, बहन रानी ने साफ साफ इनकार कर दिया कि ऐसा संभव नहीं। भाई नाराज होकर वापस चला गया। उसी की योजनानुसार रानी पर हमला किया गया और रानी का बलिदान हुआ, उसके बाद महारानी का भाई जो कबीले का सरदार था, उसे मुगलों ने इस्टेट का राजा बना दिया।
भाभी रानी देखिए! उसका चित्रा वह है, महारानी के बगल वाला, उसने तीस साल तक इस इस्टेट पर हुकूमत किया, अब आप ही सोचें, इस इस्टेट के पांच छह सौ साल के इतिहास में कौन दासी का पुत्रा है, कौन किस कबीले का, कौन रानी राजपूत वंश की है और कौन दूसरे वंश की? कैसे निश्चित किया जा सकता है।
भाभी हुजूर चित्रा देखतीं रह गईं। वे जब से महल की महारानी बनी हैं तब से उन्होंने कभी दीवार पर टंगे चित्रों की श्रृंखलाओं को ध्यान से नहीं देखा था। वे तो इस्टेट के वैभव से अभिभूत थीं, उन्हें क्या पड़ी जो दीवार पर टंगों चित्रों की छान-बीन करतीं। रामदयाल द्वारा दी गई जानकारी ने उन्हें चोटिल किया तथा वे खुद से पूछ बैंठीकृ‘तो क्या महाराज आदिवासी कबीला के वंशज हैं? इतना ही नहीं वे थोड़ा आगे बढ़ कर खुद पर भी सन्देह करने लगीं।
‘वे ही राजपुतानी हैंें कैसे प्रमाणित किया जा सकता है?’
भाभी रानी जाति गोत्रा के ऐतिहासिक मिश्रण से उलझ गईं। राजकुमारी से लेकर महारानी बनने तक वे कोख की शुचिता को वंश का आधार मान रही थीं सारा कुछ भहरा चुका था, एकदम से खंड-खंड टूटा हुआ, उन्हें तो बचपन से ही सिखाया गया था कि सती होना पवित्रा कार्य है तथा मृतक की आत्मा की शान्ति का सर्वोत्तम उपाय पर अब वह टूट चुका था। वे तमाम रानियों को जानती हैं, जिन्होंने वैधव्य स्वीकारा है, अपना जीवन जी रही हैं, वैसे अब जमाना युद्धों वाला भी नहीं है।
भाभी रानी ने महसूसा कि छोटे भइया ने कोई गलत काम नहीं किया है, दासी की पुत्राी है तो क्या पढ़ी-लिखी, सुघड़ कन्या है, फिर लडकी में क्या दोष पर महाराज को समझाना उनके वश का नहीं, उन्होंने रामदयाल से अपनी स्थिति के बारे में स्पष्ट बताया कि वे छोटे भइया और महाराज के मामले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, आप महाराज से ही बातें करें।
रामदयाल जानते थे कि इस्टेट की महारानियों की सीमायें महज श्रृंगार पटार तक ही हैं तथा एक अच्छा उत्तराधिकारी को पैदा करना, उसे गढना तथा रचना, इससे अधिक नहीं, फिर ये भाभी रानी तो वैसे भी काफी अन्तर्मुखी हैं, अपने में खोयी, समाई तथा अपना अस्तित्व तलाशती-गढ़ती।
रामदयाल भाभी रानी से आदेश लेकर महल से निकले। बाहर उनकी जीप खड़ी थी तथा ड्राइवर जीप पर तैनात था। ड्राइवर ने जीप स्टार्ट किया, रामदयाल उस पर सवार हुए, फिर जीप दौडने लगी। जीप महल की घेरेबन्दी से बाहर होती जा रही थी पर, रामदयाल महल में चलने वाले षडयंत्रों, दांव-पेंचों में उलझते जा रहे थे।कृ
‘कहीं भइयाराजाकी यह कोई चाल तो नहीं, वैसे रियासतें तो अब भारतीय गणतंत्रा में विलीन हो चुकी हैं, फिर भी अभी बहुत कुछ बाकी रह गया है जो राजाओं के अधीन है। उन्हें मालूम भी नहीं कि रणविजय की अब कानूनी स्थिति क्या है? लगता है कानूनी कार्यवाईयों को देखना होगा, पर इसके पहले रणविजय से मिलना आवश्यक है।
रामदयाल महल से निकल चुके थे, फिर भी रणविजय के महल से निर्वासन किए जाने के बारे में काफी चिंतित थे। अब उनके सामने अतीत वाली चिन्तायें न थीं, जो खास तौर तरीके से चला करती थीं, राजाओं और राजाओं के बीच, एक दूसरे को बरबस पराजित व अपमानित करने का षडयंत्रा, पूर्ण युद्ध कभी कोई मुद्दा, तो कभी कोई मुद्दा। युद्ध को व्यापार की तरह संचालित करना अब रामदयाल को सिर्फ मूर्खता लगती, वैसे भी रामदयाल राजमहलों और राजाओं के आस-पास भौरों की तरह मंडराते रहने के बाद भी खुद को पुनर्निर्मित कर रहे थे। कांग्रेस पारटी के सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा जैसे कार्यक्रम उन्हें मानसिक रूप से परिपक्व बना रहे थे।
‘अंग्रेजों वापस जाओ पहले तो उन्हें समझ में ही नहीं आया आखिर क्यों? क्योंकि अंग्रेज भारत में तब बतौर राजा उन्हें कहीं नहीं दीखते थे। भारत के सभी इस्टेटों पर भारतीय लोग ही राजा बने हुए थे, वह तो बाद में उन्हें समझ में आया कि यह जो राजाओं की प्रजाति है, इसकी आवश्यकता किसी भी रूप में नहीं, न ही प्रातिक रूप से और नहीं ऐतिहासिक रूप से।’
रामदयाल खुद से पूछते फिर... किसे जाना है? अंग्रेजों को या राजाओं को, दोनों को, बाद में हंसने लगते और गांधी के रंग-रूप में उतर जाते, मोटा सा चश्मा, एक छड़ी, आधी अधूरी धोती, एक सामान्य देहयष्टि वाला आदमी, जो प्रथम द्रष्टया किसी का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच सकता। दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैण्ड से लौटा एक बैरिस्टर, आत्मविश्वास से भरा, जिसने पहली बार सोचा कि अंग्रेजों को वापस भेजा जा सकता है। जाने क्या मजबूरियां थीं कि पहले किसी भी ने नहीं सोचा कि वर्तमान को बदला जा सकता है और शायद अब समय आ गया है लोगों में यकीन जमा है कि अंग्रेजों को अपने देश से भगाया जा सकता है। अब तो राजा महाराजा भी गांधी का साथ देने लग हैं, यह बहुत अच्छा है कि अंग्रेजों के खिलाफ राजा महाराजा भी जनता के साथ मिल कर कार्य करेंगे। अंग्रेजों के जाने के बाद वे सामाजिक भेद-भाव ही नहीं, आर्थिक असमानता को मिटाने का भी प्रयास करेेंगे लेकिन भइया राजा!
भइयाराजातो निहायत स्वार्थी निकले, वह लडकी तो उसी अंग्रेज की थी, जिसने अंग्रेजी कानूनों को शिथिल करते हुए उन्हें राजा बनवाया था। वे विधान सभा सदस्य भी कैसे बन गये? भले ही आला कमान ने उन्हें टिकट दे दिया था फिर भी हार की संभावना तो थी ही। मैंने जो किया उनकी जीत के लिए किया ही, रणविजय तो खाना-पीना और आराम तक भूल गये थे कि किसी भी तरह भइयाराजाको चुनाव जितवाना है।
‘विधान सभा सदस्य बनते हीभइयाराजाने महल से निकाल दिया रणविजय को। रामदयाल भले ही आश्वस्त थे कि रणविजय की भागीदारी इस्टेट की सत्ता में सुनिश्चित है, फिर भी वे सत्ता के इस आधुनिक खेल से परेशान थे। सत्ता का यह आधुनिक खेल पहले के सत्ता खेलों से अच्छा है, क्योंकि उस जमाने में तो रणविजय को सत्ता के रास्ते से ही हटा दिया जाता अभी तो वे सत्ता के रास्ते पर ही हैं।’
हमारा रास्ता
रामदयाल दिल्ली न जा पाये, उन्हें रणविजय की तरफ से कोई सूचना भी न मिली। वैसे रामदयाल यकीन न कर पा रहे थे कि रणविजय ने शादी कर लिया होगा, एकदम गुप-चुप तरीके से, कम से कम उन्हें तो बुलाया ही होता, भले ही वे शादी वहीं दिल्ली से ही करते।
एक दिन महल का एक खास आदमी रामदयाल से मिला। वह आदमी भइयाराजाका काफी विश्वसनीय था, इतना श्ष्विसनीय कि भइयाराजाके दोनों चेहरों का वह गवाह था, बाहर से जितना बाहर दिखते भइयाराजाउतना ही अन्दर से अन्दर दिखते। वह आदमी भइया के बाहर और भीतर दोनों का बराबर साक्षी था, पता नहीं वह आदमी रामदयाल में क्या देखता कि वह भइयाराजाके बारे में बताता जरूर, वैसे भी एक आदमी कितना मन को दबा कर रखने की ताकत रख सकता है, जब वह केवल दर्श्षक हो तथा निर्देशित भी कि कहीं बात न खुले।
रामदयाल बातों को दबा कर रखने के मामले में उस आदमी के लिए काफी विश्वसनीय थे। उस आदमी ने महल का रहस्य खोला। लड़की को तो बहाना बनाया था महाराज ने असल बात तो भविष्य पर टिकी है। यानि कि रियासत व जमीनदारी क्या टूटी महाराज ने, कानून का खेल आरंभ कर दिया। तत्कालीन कलक्टर जो भारतीय मूल का अंग्रेज था, उसने महाराज का साथ दिया। सीर खुद के नाम व डोमेन इस्टेट की संपदाओं को महाराज ने अपने लोगों के नाम करवा लिया तथा महज दो गांवों को रणविजय के हवाले किया, महल व महल की सम्पत्ति तथा बनारस और लखनऊ वाली हवेलियां महाराजा की।
स्वतंत्राता के बाद से ही महाराज कांग्रेसियों के अगल-बगल मंडराने लगे थे। जिस दिन प्रथम स्वतंत्राता दिवस का आयोजन दिल्ली में था, पंडित जवाहर लाल नेहरु को तिरंगा फहराना था, उस दिन महाराज दिल्ली जा पहुंचे थे। दिल्ली जाने के पहले उन्होंने अपने विश्वसनीय एक दूसरे महाराजा से संपर्क साधा था। उक्त महाराजा दिमाग का भी महाराजा था तथा १९३५ से ही वह पंडित जवाहर लाल नेहरु के अगल-बगल तिजोरी लेकर खड़ा रहा करता था। उसकी तिजोरी का काम १९४२ के समय आया, अंग्रेजों भारत छोड़ो यह एक असाधारण ऊर्जा वाला आन्दोलन था। बम्बई वाले अधिवेशन की भीड़ रुपयों के कुशल प्रबंधन के कारण थी वर्ना उस समय भी स्वतंत्राता जिसे चाहिये थी वह जमात तो चुपचाप नमक-रोटी के जोगाड़ में थी। उसकी अधिकतम आकांक्षायें, अपनी पीठ बचाने की होती थी कि उस पर आंदोलन, सत्याग्रह, इंकलाब जिन्दाबाद चाहे जो लिख दिया जाय ठीक, लेकिन जूतों, डंडों, बेंतों की मार न पड़े। पीठ बची रहेगी फिर तो आतों को समझाया जा सकता है कि सुबह होगी ही फिर भूख को भूखा न रहने देंगे। स्वतंत्राता दिवस की तारीख दूर थी और महाराजा ने रामदयाल से भी कहा था दिल्ली चलना है पर रामदयाल को तो नोआखली दिख रहा था, उन्होंने रणविजय से बात कर लिया था। रणविजय भी तैयार थे। उस समय औसत बुद्धि के लोग, जो राजनीति में थे उन्हें यह बात साफ तौर पर मालूम थी कि संभव है कि प्रथम स्वतंत्राता दिवस समारोह में गांधी जी उपस्थित न रहें, नोआखली में हो रहे दंगों से गांधी जी चिन्तित थे। वैसे रामदयाल राजनीतिक चिन्तन के पुरोधा नहीं थे, पर कांग्रेस पारटी संयुक्त होते हुए भी कितने टुकड़ों में बंटी हुई थी इसे वे समझते थे। गरम दल व नरम दल के अलावा उस समय कांग्रेस पारटी में भी कुछ ऐसे आत्मजीवी लोग थे, जो कांग्रेस को अपनी जेब में रखकर चलना और चलाना चाहते थे।
कांग्रेस पारटी को लेकर गांधी जी स्पष्ट थे कि इसकी राजनीतिक जिम्मेदारी समाप्त हो चुकी है, इतना ही नहीं, कांग्रेस के लिए अपनी आवश्यकता पर भी महात्मा गांधी जी को कोई दुविधा न थी। सो, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि नोआखली जाना ही है। नोआखली के दंगे यदि नहीं रुके तो न तो देश बचेगा और न ही यह साबित हो सकेगा कि भारतीय अपना देश चला सकते हैं, फलस्वरूप एक बार फिर गुलाम होने की हमारी अनिवार्यता सिद्ध हो जाएगी। यह साबित हो जाएगा कि हम भारतीय नहीं, मुसलमान और हिन्दू हैं और हमें एक नहीं दो देश चाहिए ही वैसे गांधी जी यह अच्छी तरह से जानते व मानते थे कि भारतीय समाज पहले भी अखंड था और आज भी है, पर जो यहां का अगुआ वर्ग है, वह भले ही देश की स्वतंत्राता के सवाल पर कन्धे से कन्धा मिला कर सटा दीख रहा, पर ऐसा है नहीं, अगुआ वर्ग पूरी तरह विभक्त था, स्वतंत्राता आन्दोलन में श्शामिलहोते हुए भी वह अपने-अपने अनुरूप की स्वतंत्रातायें देख रहा था।
रामदयाल ने कांग्रेस पारटी की शीर्षस्थ गतिविधियों के निर्धारण में कभी हिस्सा नहीं लिया, न ही उन्हें ऐसा अवसर मिला क्योंकि वे ऐसे कांग्रेसी के शीर्षस्थ लोगों को अखबारों में, मीटिंगों में या मंचों पर ही देख पाते थे। एक दो बार उन्होंने कोशिश किया था कि वे नेहरु जी के आमने सामने हो जायें तथा उनका बोलना, समझाना, हंसना, यानि चेहरे की सारी क्रिया-प्रतिक्रियाओं को अपनी आंखों से देख लें फिर समझने की कोशिश करें कि उनके व्यक्तित्व में ऐसा क्या कुछ है, जो उन्हें अद्भुत तथा अनिवार्य बनाता है। जो उन्हें लाखों, करोड़ों में एक बनाता है। पर उन्हें मजबूत प्रयास के बाद भी मौका नहीं मिला।
नेहरु जी इलाहाबाद आये, आनन्द भवन में रुके और फिर दिल्ली चले गये। रामदयाल इलाहाबाद से नेहरु मिलन की आकांक्षा लिए वापस लौट आये, फिर भी वे निराश नहीं हुए। दूसरी बार अवश्य मिलूंगा। वे इलाहाबाद तो आएंगे ही। नेहरु जी दूसरी बार इलाहाबाद लगभग छह माह बाद आये। उस दिन रामदयाल की बहन की शादी थी, पिता रोकते रह गये, जो तब जर्जर हो गये थे, अब गये तब गये। पर रामदयाल कहां मानने वाले थे। वे तो नेहरु की राजनीतिक हैसियत में सराबोर थे, एक ऐसी मजबूत हैसियत जो अंग्रेजी वायसराय की जुबान छीन लेती हो, उसके दिमाग से अंग्रेजी राजनीति के घृणित षडयंत्रों को निकाल फेंकती हो। बुद्धि, विवेक, समझ और ज्ञान का सन्तुलित उपयोग करने की नेहरु की ताकत पर रामदयाल झूम-झूम जाते। उन्हें नेहरु से मिलना था तो मिलना था। वे बहन की शादी छोड़ इलाहाबाद जा पहुंचे। इस बार रामदयाल आश्वस्त थे कि वे भारत के राजनीतिक सूरज के सामने होंगे। उन्होंने कुछ अतिरिक्त प्रबन्धन भी किया था, वे विश्वविद्यालय के एक भूतपूर्व प्रोफेसर के साथ हो लिये थे जिसने उन्हें राजनीति शास्त्र पढ़ाया था तथा प्रोफेसरई छोड़ कर कांग्रेस पारटी का होल टाइमर हो गया था और नेहरु के काफी करीब माना जाता था तथा वह खुद कहता भी था कि
‘नेहरु की मिलनसारिता की नकल जिस किसी ने नहीं किया, समझ लो, उसकी आधी जिन्दगी खत्म।’
नेहरु जी इलाहाबाद आये। तकरीबन अड़तालीस घंटे उनका आनन्द भवन, उनके होने से किसी महल जैसा गन्ध छोड़ता रहा, रामदयाल, प्रोफेसर के साथ उसकी गन्ध पीते रहे, सूरज की धूप जमीन पर उतराती रही, हवा के झोकें, रामदयाल का पसीना सुखाते रहे। आनन्द भवन की प्रागंण भीड़ पर भीड़ अपने में श्शामिलकरता रहा फिर एक क्षण ऐसा आया कि तिरंगा वाली नेहरु की कार फुर्र से निकल गई। रामदयाल कार का गुरगुराना सुनते रहे, फिर भीड़ की बोली भी ‘नेहरु जी चले गये।’ रामदयाल प्रोफेसर की बताई विशेषता मिलनसारिता का अर्थ निकालते रहे। एक अर्थ तो यही था कि कोई बहुत जरुरी काम आ गया होगा, दूसरा अर्थ था, हजारों की भीड़ आखिर वे किस-किस को समय देते चौबीस घंटे में कुल चौदह सौ चालीस मिनट ही तो होते हैं। भले ही वे देश के जन प्रतिनिधि हैं, पर यह कहां संभव है कि पचास-साठ करोड़ की आबादी से मिल सकें। रामदयाल ने खुद को समझाया तथा आश्वस्त किया कि उन्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि उनके नेता की मिलनसारिता जरुरी या गैरजरुरी के चुनाव पर टिकी हुई है तथा समाज को चलाने वाले लोग किससे मिलना है, किससे नहीं मिलना है, का चुनाव करते हैं।
रामदयाल उलझ गये थे। घर जा कर क्या बतायेंगे?बहन की शादी में भी श्शामिलनहीं हुए, पिताजी क्या कहेंगे? गनीमत थी कि साथ में रणविजय नहीं थे। कांग्रेस में होना तब गौरव की बात थी और उस गौरव को रामदयाल ने खुद तोड़ा था, आखिर उन्होंने नेहरू से मिलने का प्रोग्राम ही क्यों बनाया? उनका दर्शन तो वे मीटिंगों, अखबारों में कर ही लिया करते थे। अचानक उन्होंने किसी दार्शनिक की तरह सोचा...देश के अगुआ का दर्शन ही महत्वपूर्ण है और यही व्यावहारिक भी और आमने-सामने होना तथा अपना दुख-सुख बताना, यह तो कल्पना की बातें हैं और पूरी तरह निर्मूल। फिर भी रामदयाल को कांग्रेसी होने के गौरव को तो बचाना ही था, गौरव बचाने के लिए झूठ का सहारा लिया जाना ही उचित होगा, यह एक ऐसा झूठ होगा, जिससे किसी का अहित नहीं, यदि अहित होता फिर तो झूठ झूठ ही रहेगा। यह भी था कि नेहरु का कद भी तो मिलनसारिता के गुण से बढ़ेगाकृवर्ना यह तो किसी भी काल का सच हो सकता है कि जितना असंभव है वायसराय से मिलना उससे कम असंभव नहीं नेहरु जैसे अपने नेताओं से मिलना।
रामदयाल भीतर-भीतर टूट चुके थे, उन्हें कांग्रेसी राजनीति की सहभागिता पर सन्देह होने लगा था, कहीं यह ऐसा प्रोजेक्ट तो नहीं जो सत्ता बदल के बाद दूसरा रास्ता अख्तियार कर ले और वही सब करना शुरु करे, जिसे अंग्रेज कर रहे थे। बहरहाल रामदयाल मन-मसोस कर इलाहाबाद से लौट आये। उनका घर उनकी प्रतीक्षा में था। घर जो सामान्य सी किसी हवेली का आभास देता था, उसकी दीवारों, मुंडेरों, बुर्जों, सामने के पेड़, पौधों इतना ही नहीं हवेली के गेट तक, बहन की शादी का उत्सव थोड़ा सुस्ती के साथ ही पर नाच रहा था। रामदयाल की जीप हवेली में दाखिल हुई।कृबहन की विदाई हो चुकी थी। बहन रामदयाल से उम्र में काफी छोटी थी और वे उसे बहुत प्यार करते थे, घर में बहन की अनुपस्थिति ने घातक एकान्त पैदा किया हुआ था, पिता जी बीमार थे, वैसे उम्र भी उनकी काफी थी, मां का स्वर्गवास हो चुका था, घर में रिश्तेदार औरतें तो थीं, पर उनके होने की चहक गायब थी। हो सकता है कि रामदयाल को खंडित मन की अप्रत्यक्ष अनुभूति से ऐसा महसूस हो रहा हो, ऐसा था भी, अब उस स्थिति का स्वीकार ही उनके लिये विकल्प था। उनकी पत्नी रिष्तेदार औरतों के साथ थीं। रामदयाल के लिए मुश्किल था पत्नी के सामने होना, जब कि पिता जी को वे अपनी राजनीतिक सक्रियता के लाभकारी गुणों से प्रभावित कर सकते थे। पत्नी को क्या समझाते!कृपत्नी तो वैसे भी सत्याग्रह, आन्दोलन, घेराव, फिर जेल वगैरह को घटिया काम मानती थीं।
‘ये सब काम या तो मूर्खों के हैं या उनके जिनके पास दूसरे काम नहीं। वे साफ बोलतीं... पिता जी वृद्ध हैं, आपको जमीनदारी का काम देखना चाहिए ठीक है जमीनदारी छोटी ही सही, पर है तो कुछ। टूटने के बाद भी कम से कम दो गांव तो बच ही गये हैं, जो सीर खुद काश्त हैं उन पर हमारी खेती-बारी होती है।’
रामदयाल की पत्नी उस जमाने के अनुसार काफी पर्दे वाली, सुघड़ महिला थीं, बोलचाल में अर्थों को चूस कर बोलती थीं, ताकि बोली गई बात जमीनदारी की विशेष किस्म वाली तहजीब से बाहर न हो जाय फिर भी मन के भावों को कितना दबातीं, उन्हें रामदयाल पर काफी गुस्सा आता, वे अपने भइया का हवाला देतीं..कृकृ‘भइयाराजाकी एक बीघा जमीन भी नहीं निकाल पाई सरकार, आखिर सरकार में भी तो वही लोग हैं जिन्हें अपनी जमीन हर हाल में बचाना चाहते हैं।’
रामदयाल का कांग्रेसी होना उनकी पत्नी के लिए गौरव की बात न थी, वैसे गौरव की बातें उनमें कुछ थीं, जिससे उनकी पत्नी पोर-पोर सराबोर रहा करती थीं, जैसे यही कि वे अपनी आंखों में चांद की खूबसूरती का बांया-दांया नहीं उतारते थे, भइयाराजाकी तरह। भइयाराजातो लगता ही नहीं भाभी जी को कुछ समझते हैं, जबकि इतनी खूबसूरत और नाजुक हैं कि पूछो नहीं, ताज्जुब होता है उन्हें बच्चे कैसे हो गये? भइयाराजाकी जगह कोई दूसरा होता तो जीवन भर के लिए भाभी के कमरे में खुद को कैद कर लेता, वही बसन्त, फागुन और सावन की रिम-झिम पीता, पर भइयाराजाहैं कि बंदरियों के आवारापन में डूबे रहते हैं।
रामदयाल की पत्नी खबर सुनते ही कि ‘पंडित जी आ गये हैं,’ फौरन उनके पास आ गईं। दाई ने एक बाल्टी पानी और परात पंडिताइन के सामने रख दिया। पंडिताइन ने पंडित जी का पैर धोया, धोया क्या पानी पैरों पर डाला ही था कि दासी ने पंडिताइन को वहां से अलग कर दिया, बड़े घरों के नियम इतना ही अनुमति देते हैं यानि की संस्कार बचा लो, पैर तो दाई ही धोएगी और उसे धोना ही था। पंडिताइन, रामदयाल या कि पैर धोने वाली दाई, इनमें से कोई भी नहीं जानता था कि बाहर से आने वालों के पैरों को धोने का क्या प्रयोजन है? बस पैर धोना है, वह भी साफ परात में, हैसियत के अनुसार परात चांदी या पीतल की हो सकती है, पर सोने की नहीं। सोने की परात में पैर नहीं धोया जाता।
नाश्ते के बाद पंडिताइन ने पूछा...कृकृ
‘क्यों पंडित जी मुलाकात हो गई नेहरु जी से, कैसे हैं? अंग्रेजों की तरह या गान्धी की तरह लंगोटी वाले या राजा महाराजा की तरह शेरवानी वाले।’
‘बहुत अच्छे आदमी हैं, वे पूछने लगे...स्वतंत्राता दिवस के दिन तुम दिल्ली नहीं आये? कहां चले गये थे।’
रामदयाल ने अपना कद बचाने के लिए पत्नी से पहली बार झूठ बोला, उन्हें दूसरी बार भी झूठ बोलना था। दूसरी बार का झूठ स्वतंत्राता के बाद का झूठ था, पहला झूठ तो गुलाम आदमी का था, पर दूसरा झूठ स्वतंत्रा आदमी का था। एक ऐसे आदमी का जिसकी जमीन, आकाश, हवा, पानी सारा कुछ अपना था, मजे की बात यह कि दिमाग भी अपना था, दूसरी बार का झूठ राजनीतिक रसायन में से पक कर निकला था, जिस पर उनकी पत्नी ने भी अफसोस किया था। रामदयाल ने पत्नी को बताया कि नेहरु जी ने उन्हें देखते ही गले लगा लिया।कृमुख्यमंत्राी वगैरह सभी भौचक थे, फिर पूछा...
‘मंत्रिमंडल में कौन सा विभाग मिला है तुम्हें?’
‘मैं विधायक नहीं हूं सर।’
अचरजा गये नेहरू जी... ‘क्यातुम विधायक नही हों, तुम्हें टिकट नहीं मिला?’ पूछ कर नेहरू जी मुख्यमंत्राी की तरफ देखने लगे, मानो उनकी आंखें मुख्यमंत्राी को भस्म कर देंगी, मुख्यमंत्राी तो पसीने में डूब गये।
‘मैंने ही टिकट नहीं लिया सर, मैं तो पारटी वर्कर हूं पारटी का काम देख रहा हूं, यही काफी है सर।’
मेरा उत्तर सुनकर नेहरु जी ने मुख्यमंत्राी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को निर्देशित किया कि ‘इसे किसी भी तरह विधान परिषद में ले आओ।’
इस दूसरे झूठ का जादुई प्रभाव केवल रामदयाल की पत्नी पर ही नहीं, सभी पर पड़ा। प्रभाव तो पड़ता ही, क्योंकि जिले स्तर पर रामदयाल अपने आप में, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा ही नहीं, नमक आन्दोलन भी थे। यदि वे न होते तो शायद जिला उदास खामोशी पी रहा होता और अंग्रेजों के बूट हर तरफ खट, खट कर रहे होते। उनके जीवन में एक झूठ ऐसा भी था, जो था पूरी तरह सच पर उसके बारे में उनकी पत्नी तक नहीं जानतीं, सिवाय रणविजय के, न ही उस झूठ की चर्चा उन्होंने कभी किसी से किया क्योंकि उस झूठ का जो सच था कांग्रेस पारटी के लिए कोई मतलब नहीं था। भारत में तिंरगा फहराया जाने वाला था और पाकिस्तान में चांद। उस झूठ का सच था कि रामदयाल नोआखली में गांधी जी के साथ थे, रणविजय भी उनके साथ थे। नोआखली में गांधी जी के साथ वालों में कुछ थोड़े से लोग थे, जिनके चेहरों पर कांग्रेस पारटी का लक्ष्य और स्थिति दोनों दीखती थी, सबसे मजेदार यह था कि सभी लोग राजनीतिक ताप से तपे हुए सुखों से स्वअर्जित निर्वासन में थे। सभी के दिलों में गांधी की लंगोटी और छड़ी का राज था। किसी के मन में यह सवाल नहीं था कि दिल्ली में क्या हो रहा होगा, नेहरु जी ने राष्ट्रीय ध्वज किस तरह से फहराया होगा, उन्होंने उस समय क्या पहनना था? उस कपड़े का रंग क्या था, शाही बग्गी से सभा स्थल पहुंचे या किसी विदेशी कार से।
प्रथम स्वतंत्राता दिवस का अभिनव महोत्सव नोआखली के हिंसा से काफी दूर था। गांधी जी की राजनीतिक उपलब्धि दिल्ली में रह गई थी और उनका महात्मा शरीर लाषों के बीच, नोआखली में। गांधी जी वहां अशरीरी बन गये थ यानि विदेह, किसी बात का भय नहीं, उनका ‘अभय’ रूप देखते बनता, कहीं से गोली आ सकती है, कोई खुंखरी भोंक सकता है और उन्हें को लाश में बदल सकता है।
रामदयाल का मन गांधी जी के महात्मा और दार्शनिकता में उलझा हुआ था, वे गांधी जी के साथ चलते, आगे बढ़ते पर फंसे जाते कि गांधी जी महात्मा हैं या दार्शनिक। रणविजय सीधी सोच में थे, जिसमें किसी वक्रता के लिए स्थान नहीं था। गांधी जी योद्धा हैं, भय जीतने वाले उन्होंने रामदयाल को सुझाया...
‘योद्धा न होते तो वे दिल्ली में होते, देश को स्वतंत्राता दिलाने के एवज में मालायें पहन रहे होते, हाथ उठाकर सभी का अभिवादन स्वीकार कर रहे होते। किसी कल्पित देवता की मुद्रा धारण कर सभी को आषीर्वाद दे रहे होते पर ऐसा कुछ भी नहीं, गांधी जी तो नोआखली में हैं इस जोश के साथ...
‘या तो मेरी हत्या करो या यह दंगा बन्द करो।’
गांधी जी का नोआखली में होना ही प्रमाणित करता था कि देश का बंटवारा अपरिहार्य नहीं था। देश बंट जाने के बाद यह दंगा भी कोई हल नहीं निकाल सकता और न ही यह किसी गहरे असन्तोश या दुख की अभिव्यक्ति ही हो सकता है, दंगा सिर्फ दंगा होता है जो दहशत और खूनखराबा पर टिका होता है।
रामदयाल ही नहीं रणविजय ने भी नोआखली की यात्रा को झूठ में बदल दिया था। उन लोगों ने अपने नजदीकियों तक को नहीं बताया था कि वे लोग गांधी जी के साथ थे, शायद सबसे महत्वपूर्ण मामले नोआखली के अलावा और भी थे, फिर कांग्रेस पारटी के सत्तारूढ़ हो जाने के बाद गांधी जी के सहारे किसी विशेष लक्ष्य को हासिल भी तो नहीं किया जा सकता था सो नोआखली यात्रा की चर्चा करना बुद्धिमता नहीं थी, अपने लोग दहशत में होते, खास तौर से रामदयाल की पत्नी, उधर रणविजय के भइया हुजूर। फिर यह भी था कि ये लोग बहाना बना कर घर से बाहर निकले थे कि दिल्ली जाना है।
बहरहाल समय काफी पीछे जा चुका है जिसका कोई खास मतलब नहीं, भइया तो कांग्रेसी बन कर सत्ता सुख बहाल रखना चाहते हैं और उन्होंने ऐसा कर भी लिया है जैसा कि भइया का आदमी बता ही रहा था। रणविजय का क्या होगा? श्शीघ्रही वे दिल्ली जायेंगे, लेकिन कम से कम एक सप्ताह बाद।
इस बीच वे कचहरी जाकर मालूम करेंगे कि भइयाराजाने किया क्या?
रामदयाल किसिम किसिम के मन्सौदों को बनाते बिगाड़ते इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पहले रणविजय व भइया हुजूर के हिस्सों के कानूनी स्थितियों को सही ढंग से जान तो लिया जाये...कृ
महाराजा के आदमी के वापस होने के दूसरे दिन रामदयाल जिला कचहरी में थे। ‘इस्टेट’ की संपदा का कागजी मुआयना करते, दूसरे दिन रामदयाल तहसील व कलक्टरी से इस्टेट की परिसंपत्तियों की पक्की नकलें निकलवा सकंे। इस सन्दर्भ में रामदयाल को जिला कलक्टर से भी मिलना पड़ा।
जिला कलक्टर रामदयाल के राजनीतिक आभा मंडल से परिचित था। कलक्टर अचरज में था कि रामदयाल महाराजा की संपत्तियों के बारे में जानकारी क्यों कर रहे हैं। उसे सन्देह ने जकड़ लिया जरूर कहीं गड़बड़ है? कहीं रामदयाल अपनी जांच को सरकार के पास तो न भेजेंगे?
कलक्टर ने ससन्देह रामदयाल से पूछा...कृकृ
‘इस्टेट की परिसंपत्तियों की निकलें किस लिए ले रहे हैं?’
रामदयाल ने नकल लेने का असल कारण कलक्टर को बताया फिर तो कलक्टर हंसने लगा और अपनी बात पर अड़ गया।
‘रणविजय जी तो महाराजा के सगे भाई नहीं!’
चकरा गये थे रामदयाल ‘मैं कुछ समझा नहीं, हां हां, शायद!
इतना बोल कर कलक्टर रुक गया, बड़ों की बातें थीं, उनकी बातें भी बड़ी होती हैं। पता नहीं वह जो जानता है या जिसे महाराजा ने बताया है, वह कितना प्रभाव और कैसा प्रभाव डाले, पर रामदयाल के कान और दिमाग दोनों कलक्टर की तरफ ही थे, भइयाराजाने बिना कलक्टर के संज्ञान के घपला तो न किया होगा। वह जानता ही होगा सचाई। उन्होंने कलक्टर को प्रेरित किया..कृ
अरे बोलिए तो! कैसा वे?
कलक्टर ने फिर बताया कि रणविजय तो शायद दूसरी मां के हैं, पहली के तो महाराजा ही हैं, शायद वह विवाहित भी नहीं थीं। केप्ट थीं महाराजा के पिता की।कृ
अब रामदयाल का दिमाग अपने कान के भीतर था जहां कलक्टर का कहा हुआ सारा कुछ अपने मूल रूप में था, एक दूसरे से लड़ता-झगड़ता, एक दूसरे को धकियाता गरियाता।कृ
कौन असल, कौन नकल, कौन विवाहित, कौन अविवाहित क्या कह रहा है कलक्टर?
रामदयाल तो एकदम से खामोश हो गये।कृकलक्टर का बताना उनकी जानकारी में न था। वे दोनों औरतों को अम्मा हुजूर ही संबोधित किया करते थे, वे ही नहीं भइयाराजाव रणविजय भी अम्मा रानी ही पुकारा करते थे, यह बात अलग थी कि बड़ी अम्मा रानी छोटी अम्मा रानी से उम्र में काफी बड़ी दिखती थीं, उतनी ही बड़ी जितनी कि भइया हुजूर रणविजय से जान पड़ते हैं। महल की दीवारें भी जानती हैं कि रणविजय भइयाराजाके भाई हैंकृफिर यह कलक्टर क्या कह रहा है?
रामदयाल ने खुद को कलक्टर की बात से दूसरी तरफ मोड़ा-‘मुझे नकलें कब तक मिल सकेंगी उन्होंने पूछा...कृ
‘कल शाम तक तो अवश्य मिल जाएगी, कलक्टर ने संक्षिप्त उत्तर दिया। रामदयाल के खामोश हो जाने से कलक्टर भी सन्देहों से घिर गया जाने क्या सच हो फिर उससे क्या मतलब? दोनों भाई आपस में निपटें, उसको यहां रहना तो है नहीं।
दो दिन बाद रामदयाल को सारी नकलें मिल गईं, नकलें स्पष्ट थीं जितना कि भइयाराजाका घपला स्पष्ट था। उन्हें भइयाराजाके चेहरे पर षडयंत्रा और कूट चाल की रेखायें दिखीं, फिर उन्हें ख्याल आया राजा बनाये जाने का किस्सा जिसे उनके पिताजी बताया करते थे। पिता जी ने तो यह भी बताया था कि उक्त अंग्रेज हाकिम यदि सहमत न होता तो भइयाराजाजौनपुर के शर्की वाले नबाबों के शरणागत हो जाते। भइयाराजाने निश्चित कर लिया था कि उन्हें हर हाल में राजा बनना है, चाहे अंग्रेज बनाये या मुगल, राजा बनने के लिए यदि उन्हें मुसलमान भी बनना होता तो भी वे बन जाते। क्या रखा है धर्म में? राजा तो राजा, वह न मुगल होता है और न अंग्रेज सिर्फ राजा होता है बिना जाति और धर्म वाला एक शासक।
‘धर्म का सहारा मूर्ख लिया करते हैं और उसी में जीवन की सारी क्रियाओं को व्यवस्थित करते हैं, धर्म का प्रभाव जो साफ तौर से दीखता है वह केवल शोषितों में दीखता है, वही प्रभाव राजाओं के पास फटकता तक नहीं। अकबर और राणा प्रताप में धर्म कहां है? वे राजा थे और राजा बने रह सकने के लिये युद्धरत थे।’
रामदयाल घर की तरफ वापस हो रहे थे, पर घर उनसे काफी दूर भागा जा रहा था। घर, परिवार, नाते रिष्तेदार क्या सभी अपने में डूबे हुए होते हैं, आखिर ऐसा क्यों किया भइयाराजाने? रणविजय ने तो कभी अपना हक हकूक मांगा नहीं था, न ही वे कभी मांगते, फिर ऐसी कौन सी दिक्कत थी जो उन्होंने यह सब किया। रामदयाल अपने में डूब गये, ये साली जगह-जमीन किसी को भी भ्रष्ट बना सकती है। संपत्ति का मामला व्यक्तित्व के शुचिता के सवाल को काफी उलझा हुआ और विवादास्पद ही बनाती है।
घर आने पर रामदयाल को मालूम हुआ कि भइयाराजामहल पर आ गये हैं, उनके साथ प्रदेश का एक मंत्राी भी आया हुआ है। रामदयाल ने भइयाराजासे मिलने का कार्यक्रम बाद के लिए निश्चित किया और अपने घरेलू काम में लग गये।
घरेलू कामों में संलिप्त हो जाना, रामदयाल के लिए रणविजय की समस्याओं से विस्थापन का माध्यम न बन सका। भइयाराजाका सारा कारनामा उन्होंने अपनी पत्नी से बताया ताकि उन्हें कुछ राहत मिल सके फिर भी वे परेशान परेशान थे, उनके सामने रणविजय का मासूम चेहरा आ खड़ा होता...क्या होगा बेचारे का जितना रामदयाल परेशान होते, उतना ही भावुक हो जाते, भावुक होने के बाद वे रास्ते जो रणविजय को राहत दे सकते थे बुरे लगने लगते। विवश हो कर रामदयाल को स्वीकार करना ही पड़ा कि वे किसी भी स्थिति में रणविजय के साथ अन्याय नहीं होने देंगे आखिरकार यही तो सिखाया है कांग्रेस पारटी ने कि अन्याय का विरोध करो, अन्याय करने वाले चाहे अंग्रेज हो या अपने ही लोग। एकबारगी रामदयाल के हाथों की भाषा बदल गईं, वे उठ गये, मुठ्ठियां बन्द हो गईं, फिर वे सावधान हुए...
‘नहीं, नहीं ऐसा नहीं, हमारा रास्ता खून बहाना नहीं, पर सिर झुकाना भी तो नहीं।
आधा भारतीय
रणविजय दिल्ली लौट आये थे पर अब दिल्ली उन्हें ठीक-ठाक नहीं लग रही थी। कांग्रेसी सरकार, सरकार के जाने व माने जाने के विभ्रमों से मुक्त थी। देश का पहला आम चुनाव सम्पन्न हो चुका था। कांग्रेस पारटी के प्रमुख विरोधी चुनावी युद्ध का पराजय स्वीकार कर राजनीति की खोलों में समा चुके थे। गोया राजनीति का असल काम हो चुका था। इसी दिल्ली में रणविजय थे, इसी दिल्ली में वह लोकसभा थी जहां चुने हुए सांसद बैठते थे और कानूनों के अमल आदि पर बहसें किया करते थे, पर रणविजय को इसका आभास तक न होता था। अगर वे अखबार पढने के आदी न होते तो उन्हें यह भी मालूम न होता कि कब और कैसे भारत का संविधान लिख गया।
अब वे समझने लगे थे कि राजनीति एक गंभीर कार्यवाई है, केवल हड़ताल, आन्दोलन, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा वगैरह ही नहीं। पढ़ाई के दिनों में अपने मित्रा छात्रों से वे बहस किया करते थे कि, भारत का संविधान राष्ट्रपति प्रणाली के अगल-बगल का होना चाहिए, लेकिन ऐसा न हुआ, संविधान प्रधानमंत्राी के आगे-पीछे का बना और राष्ट्रपति को प्रतीकात्मक सत्ता मिली। इतना अवश्य हुआ कि इंग्लैण्ड की तरह अब यहां कोई राजा, रानी या महाराजा, महारानी नहीं।कृ
वैसे भी रणविजय अपने आप में डूबे हुए उन विकल्पों की तलाश कर रहे थे, जो उन्हें इस लायक बनाते कि वे अपनी ज़िन्दगी गुजार लेते। यह तो उन्होंने निश्चित ही कर लिया था कि अब वे रियासत की तरफ कभी नहीं लौंटेगे। एकदम साफ-साफ तो नहीं पर कुछ-कुछ बहुत पहले से ही उन्हें आभास होने लगा था कि भइयाराजाकी नियति में अपना हित बहुत तेजी से प्रभावी होता जा रहा है।
तब बड़ी अम्मा रानी जीवित थीं। बड़ी अम्मा रानी ने ही उन्हें बताया था कि जब वे दो साल के थे तभी उनकी अम्मा रानी का स्वर्गवास हो चुका था तथा उसके साल भर बाद ही पिताजी महाराज भी जीवित नहीं रहे। उस समय भइयाराजाकी शादी नहीं हुई थी। वे बीस साल के आस-पास के थे। पिता जी महाराज के बाद बड़ी अम्मा रानी ही जागीरदारी का काम-धाम देखा करती थीं। भइयाराजाराजा बनने के पहले से ही अम्मा रानी के मन की टोह लिया करते थे, क्यों रणविजय का क्या होगा?
बड़ी अम्मा रानी उन्हें डांटा करती थी...कृकृ
‘चुप कर, कुछ तो शर्म कर, आखिर वह भी तुम्हारे पिता महाराज का ही लडका है।’
स्वतंत्राता मिलने के पहले ही बड़ी अम्मा रानी परिवार छोड़ र्गइं, इधर स्वतंत्राता मिली, उधर भइयाराजाइस्टेट की संपदा बचाने में लग गये, इस दौरान कई ऐसे मौके आये जब रणविजय ने महसूसा कि भइया एक भी समय में अपनी दोनों आंखों का इस्तेमाल अलग-अलग लक्ष्यों के लिए कर सकते हैं। एक बार ऐसा मौका आया था कि रणविजय ऊंची शिक्षा के लिए इंग्लैंड जा सकते थे। अंग्रेज हाकिम ने भी सुझाया था तथा वह भइयाराजासे विदेश जाने के बाबत सम्पर्क करना भी चाहता था पर उसे रणविजय ने रोक दिया था। फिर अंग्रेज हाकिम ने अपनी लड़की को ही अकेली भेज दिया था विदेश। भइयाराजाने रणविजय को भारत में होने की अनिवार्यता बता कर विदेश जाने से रोक दिया था ‘क्या होगा वहां जाकर कोई नौकरी तो करनी नहीं।’
उस समय रणविजय के लिए बहुत मुश्किल था भइयाराजाकी पक्षपातपूर्ण नियति को समझ पाना। वे भइयाराजाकी सलाह में अपना हित देख व मान कर चुप हो गये थे। लेकिन अब तो सारी बातें स्पष्ट होती जा रही थीं, उन्हें इस तरह का अनुमान नहीं था कि भइया उन्हें महल व इस्टेट से निर्वासित कर देंगे, महल से निर्वासित होने के बाद रणविजय बीते समय में जा चुके थे। पीछे का अच्छा-बुरा सामने था जिसे वे समीक्षित कर रहे थे। उन्हें बड़ी अम्मा रानी का ध्यान आया, वास्तव में वे एक ‘देवी’ थीं। तीन चार दिनों के बाद ही वे सामान्य हो पाये, वैसे अंग्रेज हाकिम उन्हें बार-बार समझाता रहा कि चाहो तो नौकरी कर लो अभी उसकी पकड़ प्रशासन पर कम नहीं है।
पर रणविजय को तो नौकरी करना ही नहीं था, वे चाहते तो अंग्रेज हाकिम के साथ ही काम करना शुरू कर देते। उसका काम हालांकि रुपया बनाने वाला काम नहीं था, पर था सम्मान वाला। अंग्रेज हाकिम उस समय गीता और रामचरित मानस का अंग्रेजी अनुवाद कर रहा था। उसे प्रशासनिक सेवा में होने के कारण उसे इतना पेंशन मिल जाता था कि उसका समय हंसते हुए गुजर सकता था। उसने इंग्लैण्ड की अपनी संपदा को भाइयों में आवंटित कर दिया था तथा पूरी तरह भारतीय बन जाने का संकल्प लेकर भारत में रुक गया था। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि वह साल भर के लिए काशी प्रवास करे तथा खजुराहो दुबारा जाये, फिर वहां काले पत्थरों पर उकेरी गई काली प्रतिमाओं से खुला संवाद करे। पहली बार जब वह खजुराहो गया था, तब उसे ऐसा कुछ महसूस हुआ था कि पत्थरों की मूर्तियों के मूक संवादों की मानसिक भाषा होती है, जिसकी कोई लिपि नहीं होती। वह भाषा चाक्षुस-संवेदना की अभिव्यक्ति होती है। अब उसे लगता है कि खजुराहो जाना चाहिये, खजुराहो को देखना भारतीय अतीत का खुला साक्षात्कार होगा।
अंग्रेज हाकिम ने, हालांकि प्रशासनिक सेवा और इंग्लैण्ड दोनों छोड़ दिया था, फिर भी वह आर्थिक रूप से औसत से अधिक मजबूत था। वह दुनिया के चर्चित अखबारों में आर्टिकल लिखता, आर्टिकिल्स के विषय मुख्यतया राजनीतिक होते, जिसका सन्दर्भ भारतीय होता। अखबारों में लेख लिखना उस समय भी रुपया कमाने का सन्तोषजनक आधार नहीं था फिर भी काम चलाऊ तो था ही। प्रशासनिक सेवा के दौरान ही उसने मन बनाया था कि वह अपने भारतीय अनुभवों पर कोई किताब लिखेगा, पर ऐसा नहीं कर पाया। एक बार तो उसने प्रयास भी किया था, उसने भारतीय उदारता और सहनशीलता को अपने लेखन का आधार बनाया, तभी उसे झटका लगा कि भारतीय समाज तो अपनी सारी इच्छाओं, आकांक्षाओं की पूर्ति की कामना किसी दैवीयता की जादुई ताकत से हासिल करना चाहता है, युद्ध और विवाह, जन्म और मृत्यु, हानि और लाभ सारा कुछ दैवीय। वह उलझ गया कि फिर ऐसी मनःस्थिति में मनुष्य कहां है? उसके हस्तक्षेप क्या हैं? फिर तो वह किताब प्रारंभ ही नहीं कर सका।
प्रशासनिक सेवा के दौरान डायरी लिखना अंग्रेज हाकिम ने अपनी आदत बना लिया था। वह डायरी अंग्रेजी की काव्यमय भाषा में लिखता, मानो कोई कविता लिख रहा हो। उस दौर के सत्याग्रहियों, जेल यात्रियों को वह गंभीरता से देखता फिर अर्थ निकालता कहीं ये लोग भेड़ें तो नहीं, क्योंकि गांधी, नेहरु जैसे लोग कहीं होते, आन्दोलन प्रदर्शन कहीं होता, क्या ऐसी भी शिक्षा हो सकती है, या जागरुकता कि बिना किसी नेतृत्व के भी आन्दोलन हो, ऐसी अद्भुत स्वस्फूर्तता फिर उसे लेनिन ख्याल आते कि स्वस्फूर्तता यदि नियंत्रित व निर्देशित नहीं है, फिर तो किसी भी क्षण वह अराजक हो सकती है।
फिर तो अंग्रेज हाकिम किसी चिन्तक की तरह गंभीर हो जाता तथा गांधी जी की दूरदर्शिता से प्रभावित हो जाता ‘तभी गांधी जी ने स्वतंत्राता आंदोलन पर हिंसा का प्रतिबन्ध लगाया हुआ था। अगर स्वतंत्राता आन्दोलन में हिंसा की धारा चल रही होती, फिर तो बहुभाषी, बहु सांस्कृतिक, बहु धार्मिक भारत में आंदोलन का स्वरूप बहुत ही भयानक व आक्रामक होता।’
फुर्सत के समय अंग्रेज हाकिम अपनी डायरी उलटता-पुलटता। डायरी में दर्ज उन राजनीतिक कार्यवाईयों के अपवादों को देखता, जो आम तौर से ऐसे लोगों द्वारा किये जा रहे होते जो राजनीति से कोसों दूर होते, उसने एक दो बार सत्याग्रहियों से व्यक्तिगत रूप से पूछा भी था, कुछ सवाल उसने रट लिए थे जिसे वह रुक रुक कर सत्याग्रहियों की बोली में पूछ सकता था...कृ
‘आप लोग सड़क पर काहे लेटे हो?’
‘आज़ादीलेकर ही रहेंगे, का नारा क्यों लगा रहे हो?’
‘क्या तुम्हारे पास करने के लिए दूसरे काम नहीं?’
अंग्रेज हाकिम सत्याग्रहियों के उत्तर सुन कर उनके मुंह ताकता रह जाता। सत्याग्रही जोश और उत्साह से भरे होते, उनके चेहरे से जेल जाने की यातना गायब होती। वहां देश के लिए काम करने की उमंग होती, पर वे सत्याग्रह का मतलब सिर्फ रटा-रटाया बताते कि यह सब जो वे कर रहे हैं, देश की आज़ादीके लिए कर रहे हैं।देश के बारे में उनकी जानकारी सिर्फ इतनी होती कि एक किनारे हिमालय है तो दूसरे किनारे समुद्र, इससे अधिक कुछ नहीं। फिर वे अपनी रियासत के बारे में बताने लगते। सत्याग्रहियों को भारत के तीर्थस्थानों की जानकारी अधिक होती, वे उनके बारे में खूब-खूब बताते।
‘आज़ादीका मतलब क्या होता है? पूछने पर वे बताते कि यहां से गोरी चमड़ी वाले चले जायें, वे हमारे राजा नहीं, फिर वे हमारे देश में क्यों है?’
‘गुलामी के बारे में भी वे कुछ न बताते, पर इतना बताते कि हम आजाद हो जायेंगे तो हमारी जमीन होगी, हमें लगान न देना पड़ेगा, हमारे बच्चे स्कूलों में पढ़ेगे, हमें रोजगार मिलेगा, हमारे देश का रुपया बाहर नहीं जायेगा, हमसे बिना पारिश्रमिक कोई काम न कराएगा, बेगार से हमें मुक्ति मिलेगी।’
अंग्रेज हाकिम सत्याग्रहियों के कल्पित राजनीतिक चाहनाओं के बारे में विचार करने लगता, क्या ऐसा संभव हो सकता है? ब्रिटिशियर्स तो एक न एक दिन यहां से चले ही जाएंगे, ब्रिटिष्श साम्राज्यवाद का अन्त प्रारंभ हो चुका है, पर क्या जब भारतीय सत्तारुढ़ हो जायेंगे, वे कुछ कर पायेंगे इन सत्याग्रहियों के लिए। वह कांग्रेस पारटी के उन अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों से मिलता जो अच्छे घरानों से होते फिर तो अंग्रेज हाकिम को निराश होना पड़ता क्योंकि अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग अंग्रेजियत में रंगे होते तथा मूल्यांकन कर रहे होते कि कांग्रेस पारटी का भविष्य क्या है? १९४२ के बाद तो साफ-साफ दीखने लगा कि अंग्रेजों को जाना है, ऐसी स्थिति में जो कभी अंग्रेजों के आगे-पीछे परछाई की तरह होते, वे कांग्रेस पारटी में शामिल होने लगे थे। अंग्रेज हाकिम बुद्धिजीवियों एवं संभ्रान्तों के इस तात्कालिक बदलाव को अपनी डायरी में नोट करता...कृकृ
‘सत्ता सुख से बड़ा कोई सुख नहीं सुविधा-भोगियों का सूत्रा वाक्य।’
अंग्रेज हाकिम अब बदले हुए भारत में था, एक ऐसे भारत में जो भारतीयों का था, जिनकी अपनी सरकार थी, जिनका अपना दिल-दिमाग था, हाथ पैर और मुंह भी। गुलामी के दौर में तो सारा कुछ बन्धा हुआ गिरफ्तार जैसा था। अंग्रेज हाकिम रणविजय व अपनी पुत्राी के लिए परेशान नहीं था, उसे यकीन था कि दोनों मिलकर विपरीत परिस्थितियों को संतुलित कर लेंगे। वे जीवन जीने की समझ रखते हैं तथा अपने व्यक्तित्व निर्माण के लिए पूरी क्षमता के साथ तत्पर भी हैं। बावजूद इसके अंग्रेज हाकिम परेशान था, उसकी दासी पत्नी बीमार रहने लगी थी। सो जीवन से निराश भी। उसे एक ही बात सूझती, देवी देवताओं के दर्शन, तीर्थयात्रा और गंगा स्नान। अंग्रेज हाकिम जानता था कि भले ही उसकी पत्नी उसके साथ है पर उसके संस्कार पूरी तरह हिन्दू औरतों वाले बचे हुए हैं। वैसे वह भी ऐसी इच्छा नहीं रखता कि उसकी पत्नी धर्म के पाखंडों से बाहर निकले, यदि उसे उसमें मानसिक शान्ति हासिल होती है तो वह चाहे जैसा करे। घर के एक कोने में उसकी पत्नी ने लकड़ी का छोटा सा शिवालय बनाया हुआ है, उसमें किसी देवी की प्रतिमा स्थापित थी।
लिली की मां के रूप में पत्नी को पुकारना अंग्रेज हाकिम को भला लगता था। इसमें उसे दोहरा सुख मिलता था, इसी बहाने वह लिली को भी पुकार लेता था। पत्नी सुबह उठती, स्नान करती, बाहर लान में से फूल चुनती, फिर लकड़ी के ष्शिवालय के पास जाकर जमीन पर बैठ जाती, फूल चढ़ाती और कुछ बुदबुदाती। अंग्रेज हाकिम इस दृश्य की तुलना चर्च में किये जाने वाले प्रार्थनामय दृश्यों से करता, जहां सारा कुछ बिना किसी अतिरिक्त क्रिया के संचालित किया जाता है। जब कि उसकी पत्नी कम से कम आधा घंटा तक शिवालय के पास बैठती उसकी आंखें बन्द होतीं, होठों से बुदबुदाहटें निकलतीं अन्त में वह घुटनों के बल होकर अपनी देह किसी गठरी की तरह बनाती और माथा शिवालय के चौखट पर टेक देती। ऐसा करना नमाज वाली क्रिया से थोड़ा भिन्न होता, पर होता कुछ उसी तरह ही। अंग्रेज हाकिम हिन्दू, इस्लाम और ईसाई धर्मों के धर्माचरण वाले कर्मकांडों में उलझ जाता, फिर उसे समझ में नहीं आता कि यह जो आस्था का मामला है, आखिर है क्या? उसकी मां भी तो चर्च जाया करती थी, रविवार के दिन चाहे कितने ही दूसरे जरूरी काम हो, पर उसकी ममा घर नहीं रुका करती थी, उसके संकोची डैड को फटकारा करती थी कि चर्च नहीं जा रहे?
अंग्रेज हाकिम का परिवार आस्थावादी परिवार था तथा एक ऐसे ईश्वर की कल्पना किया करता था, जो सभी के दुखों, पापों का निवारण करने में समर्थ था। मां अक्सर उसे समझाती ‘प्रभु यीशु’ ही सभी पापों के लिए क्षमा दान दे सकता है।’ बचपन में वह भी समझता था कि वह पापी है, सारी दुनिया पापी है, यह तो बाद में उसे स्पष्ट होने लगा कि कल्पित पाप का स्वीकार उसे कुंठित बना कर जीवन जीने के प्रति निराश बना देगा, लेकिन पहले तो जैसे उसकी ममा समझाया करती थी, वैसा ही वह समझा करता था। ज्यों ज्यों वह मानसिक रूप से मजबूत होता गया, त्यों त्यों वह आस्थावाद को गंभीरता से विश्लेषित करने लगा। उसके कारण भी थे। जब वह पांच साल का था तथा एक बोर्डिंग स्कूल में प्रारंभिक षिक्षा ले रहा था, ठीक उसी समय उसकी ममा ने उसके डैड के एक मित्रा के साथ अपना घर बसा लिया। डैड का मित्रा एक धनी आदमी था तथा धार्मिक अनुष्ठानों का प्रबल समर्थक था, वह भी ममा की तरह हर रविवार चर्च जाता तथा चर्च के पादरियों के साथ समय गुजार कर प्रदर्शित करता कि वह प्रभु यीशु का परम विश्वासपात्रा है। वह अक्सर उसकी ममा के साथ घर आता तथा काफी समय तक ‘न्यू टेस्टामेन्ट’ के बाबत बातें करता। उसके डैड का विश्वास ममा पर तमाम सन्देहों से मुक्त था, सो वे आश्वस्त रहते कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला जो उसकी ममा और उनको एक दूसरे से अलग कर दे फिर किसी कानूनी कार्यवाही को संपादित कर तलाक लेने की आवश्यकता पड़े। पर हुआ ऐसा ही, लेकिन इसके पहले डैड ने ममा को काफी समझाया और अंग्रेज हाकिम को आधार बनाया..कृ
‘हम अपने लड़के को एक दूसरे से अलग कर मानसिक रोगी बना देंगे’
अंग्रेज हाकिम अपने डैड से अक्सर ममा के बारे में पूछा करता, उसके डैड ममा के बारे में बहाना बनाने वाली कोई झूठी कहानी रच देते, फिर वह बचपना में खो जाता। लम्बे समय बाद उसे असलियत मालूम हुई कि उसकी ममा किसी दूसरे के साथ रहती है तथा दो बच्चों की मां है। अब उसकी ममा किसी दूसरे शहर में रहती है। बाद में अंग्रेज हाकिम विचारने लगा था कि आस्थावादी उसकी ममा आखिर किस पाप की क्षमा याचना प्रभु यीशु से कर रही थी? उस पहले पाप की, जिसे उन्होंने उसके डैड से अर्जित किया था या उस पाप की, जो वे उसके डैड के मित्रा के साथ आयोजित करने वाली थीं तथा आयोजित कर भी चुकी थीं?
ममा के आस्थावादी व्यवहार ने अंग्रेज हाकिम को खंडित कर दिया था। शायद वह खंडित नहीं भी होता यदि उसके परिवार की ऐसी परिस्थितियां होती जो तलाक के दायरों को पूरा करतीं, फिर तो उसके ममा का तलाक लेना एक आवश्यक कार्य हो जाता तथा वह डैड की कमियों के बारे में गंभीर होता पर ऐसा था नहीं। उसके डैड तो सद्भाव और प्रेम के अतिरिक्त उर्जा वाले साधारण आदमी थे। सामान्य जीवन धारा में चलना उनकी आदत थी।
भारत आने के बाद अंग्रेज हाकिम ने अपनी मानसिक गतिविधियों को काफी रूपान्तरित कर लिया था। खास तौर से पारिवारिक संबंधों के बारे में। वह जहां जाता, भारतीय औरतों के निश्छल समर्पण को देख कर अविभूत हो उठता। भारतीय अधिकारियों की पत्नियों से भी उसका मिलना-जुलना होता था, वह उनमें एक पवित्रा रिष्श्ता पाता, जो आरोपित जैसा जान न पड़ता, औरतें अपने पतियों की तरफ भावनात्मक ही नहीं, मन की सभी स्थितियों के साथ प्रभावित दीखतीं, जब कि वे किसी प्रेम के कारण विवाहित न होतीं, उनकी शादियां ऐसे पुरुषों से हुई रहतीं जो एक दूसरे को शादी के पहले जानती तक नहीं थीं।
ऐसा नहीं था कि अंग्रेज हाकिम भारतीय औरतों के काले पक्षों के बारे में विचार नहीं करता था, औरतों की पुरुष निर्भरता से उसे घिन थी, उसका मानना था कि औरतों का भी पति के अलावा सामाजिक हस्तक्षेप के मामलों में पर्याप्त दखल होना चाहिए। लेकिन वह अंग्रेजी खुलेपन को भी ठीक नहीं मानता था। जिसे उसने बालिग होने से लेकर भारत आने के पहले तक अपने देश में देखा था। उसे अपने देश का विवाहेत्तर संबंध उतना ही खटकता था जितना कि किसी भारतीय को खटकता है। इस मामले में वह भारतीय मानस का प्रतिनिधित्व करता था, यही कारण था कि उसने निश्चित कर लिया था कि वह विवाह ही नहीं करेगा या करेगा तो किसी भारतीय औरत से ही, जो आधुनिकता की हवाओं में बहने वाली न हो।
अंग्रेज हाकिम अपने विवाह के योग्य औरत के चुनाव से काफी खुश था। वह घर आता, पत्नी उसका इन्तजार करती मिलती। वह पत्नी की सतर्क निगरानी से प्रसन्न होता, क्योंकि वह उसका सोना, खाना, जागना सारा कुछ देखती रहती। क्या खाना है, कब सोना है, इसका निर्णय करना उसकी आदत थी। इसके अलावा अंग्रेज हाकिम ने महसूस किया कि उसकी पत्नी देह की थकान दूर करने की कलाकार है। वह आरामदायक मालिश करती तथा घर के सारे कामों को बहुत ही सावधानी से निपटाती। भारतीय औरतों के ऐसे व्यवहारों से अंग्रेज हाकिम पहले कत्तई वाकिफ न था, सो उसे यह सब आश्चर्य जैसा जान पड़ता। वह कभी कभी भारतीय शास्त्रों की सूक्तियों में उलझ जाता फिर सोचने लगता कि क्या ऐसी औरतों को ही ‘लक्ष्मी’ कहा गया है। ऐसी स्थितियों में उसका अंग्रेजी मन प्रभावी हो जाता, फिर वह भारतीय औरतों के प्रति संवेदित हो जाता। कुछ भी हो भारतीय औरतों का आत्म-निर्भरता के प्रति उन्मुख न होना प्रशंसनीय नहीं है। घर का सारा काम निपटाना, पति की देखभाल करना, बच्चों की परिवरिश करना, यह सारा कुछ पुरुष के पक्ष में जाता है पर ऐसा करने में भारतीय औरतों का अपना पक्ष क्या है?
अंग्रेज हाकिम अपनी पत्नी के साथ था रणविजय की प्रतीक्षा कर रहा था कि वो डाक्टर के साथ आ रहे होंगे, उनके साथ लिली भी थी। इस दौरान कई बार उसने अपने को रोका...कृ
‘नहीं रणविजय के बारे में पत्नी को कुछ नहीं बताना, जाने उसकी कैसी प्रतिक्रिया हो, हो सकता है उसकी परेशानी काफी बढ़ जाये जो ठीक न होगा।’
रणविजय कुछ देर में डाक्टर के साथ वापस लौटे। डाक्टर ने लिली की मां का परीक्षण किया। मेडिकल जांच की सारी रिपोर्टस् आ गई थीं, डाक्टर को सन्देह था कि लिली की मां को टी. वी. हो सकती है, क्योंकि वे सामान्य से अधिक खांसती तथा उन्हें सासें लेने में भी तकलीफ होती। जब खांसती तब कफ भी आता, सामान्य रूप से वे कमजोर हो गई थीं तथा कई-कई बच्चों वाली मां की तरह बुढ़ापा धारण किये हुए पर ऐसा नहीं था वे सिर्फ लिली की मां ही बन पाई थीं।
मेडिकल जांच रिपोर्ट लिली की मां के लिए ठीक थीं तथा उन्हें टी. वी. नहीं थी। मलेरिया और मियादी बुखार के बिगड़ जाने के कारण उन्हें खांसी आने लगी थी तथा सांस की तकलीफ बढ़ गई थी, वैसे इस्नोफीलिया भी कुछ बढ़ा हुआ था। रिपोर्ट देख कर डाक्टर प्रसन्न था तथा उसे अपने ऊपर विश्वास हुआ था कि वह लिली की मां को श्श्शीघ्रही स्वस्थ कर सकता है। उसके द्वारा प्रस्तावित दवाइयां काफी ताकत वाली होंगी तथा श्श्शीघ्रही उनके स्वास्थ्य को वापस लौटा लायेंगी।
डाक्टर ने कुछ अपने पास से दवाइयां दीं तथा बाकी के लिए पुर्जा लिख दिया।
डाक्टर के जाने के बाद अंग्रेज हाकिम सामान्य हो पाया, वर्ना वह तो विचार कर रहा था कि लिली की मां की हालत ठीक नहीं, वैसे भी लिली की मां के लिए अस्पताल में भर्ती होना एक घिनाने वाला काम होता। वे तो सिर्फ यही कामना करतीं कि एक बार काशी हो लें और बाबा विश्वनाथ का दर्शन तथा गंगा स्नान कर लें। इसके अलावा वे लिली और रणविजय के बारे में चितिंत रहती कि वे कुछ ऐसा काम-धाम पकड़ लेते, जिससे उनका गुजारा हो जाता, क्योंकि उन्हें इस बात का अन्दाजा था कि रणविजय लिली के साथ अपनी इस्टेट में न रह पायेेंगे। वहां उन्हें घृणा व उपेक्षा ही मिलेगी। वे भाभी रानी और महाराज के विचारों से वाकिफ थीं कि वहां केवल कुल और गोत्रा का खेल खेला जाता है, इसके अलावा जो दूसरे किस्म के खेल महल के भीतर चलते हैं, उस पर बेहया से बेहया भी शरमा कर अपनी आंखें बन्द कर ले।
मन ही मन अंग्रेज हाकिम ने पक्का कर लिया था कि वह पत्नी के साथ काशी जाएगा तथा वहीं से एक बार फिर खजुराहों के लिए निकलेगा। एक बार उसके मन में आया कि वह रणविजय के भइया, भइयाराजासे भी मिल ले तथा रणविजय के बारे में बात करे। उसके सामने फिर तो विगत ही आ खड़ा हो गया, जैसे वह अब भी अंग्रेजों का प्रशासनिक अधिकारी हो तथा राजा बनने के निरकुंश अधिकारों का उपयोग करने वाला। उसके सामने रामदयाल के पिता का चेहरा जग-मगाया, जिनकी पैरवी पर उसने रणविजय के भाई को राजा की उपाधि दिलवाया था। तो क्या उसे भूल जायेंगे रणविजय के भइया राजा? उसने तो उन्हें राजा बनवाने के उपलक्ष्य में कुछ अतिरिक्त लिया भी नहीं था जो सदैव लिया जाता रहा है।कृ
अंग्रेज हाकिम ने अपनी भावुकता को तत्काल नियंत्रित किया तथा भारतीय राजाओं के चरित्रा में वह सब तलाशने लगा जो कभी अतीत की बातें थीं, जो कह दिया, कह दिया राजाओं की बातों में निश्छलता होती थी तथा सच्चाई भी, पर अब ऐसा नहीं। अब तो राजा सिर्फ इसका ख्याल रखता है कि वह हर हाल में राजा बना रहे इसके अलावा कुछ भी नहीं, उसे सिन्ध के राजा दाहिर का ख्याल आया जब उसे अपनी इस्टेट बचाने के लिये अपनी बहन से ही शादी करना पड़ा था, कुछ इसी तरह के ऐतिहासिक अपवाद उसके सामने एक के बाद एक नाचने लगे, फिर तो वह भूल गया कि राणा प्रताप और टीपू सुल्तान भी तो राजा ही थे, उन्होंने ऐसा तो नहीं किया जो समय को कलंकित बनाता। भारतीय राजाओं के अतीत से बाहर निकल कर अंग्रेज हाकिम वर्तमान में उतर आया तथा निश्चित किया कि वह रणविजय के भइयाराजासे नहीं मिलेगा। किसी कड़वे यथार्थ का सामना भावुकता या कल्पना से नहीं किया जा सकता।
अंग्रेज हाकिम यह भी नहीं चाहता था कि रणविजय के मामले को भविष्य के हवाले कर दिया जाय सो उसने रणविजय को अकेले में बुलाया...कृ
‘साफ साफ बताना रणविजय, इस्टेट के बारे में क्या करना है, उसने पूछा।
‘कुछ नहीं डैड!’ रणविजय ने संक्षिप्त उत्तर दियाकृ
‘क्या तुम समझ रहे हो कि क्या कह रहे हो?’ उसने पूछाकृ
‘हां तभी तो!’
‘तभी तो क्या?’
‘यही कि न मुझे इस्टेट की तरफ जाना है और नहीं वहां से कुछ लेना है।’
‘तुम अपना अधिकार छोड़ कर बहुत बड़ी गलती कर रहे हो तथा एक आदमी को और अन्याय करते रहने देने के लिये मौका दे रहे हो। क्या तुमने सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा से यही सीखा है कि खुद को उचित हस्तक्षेपों से निरस्त कर दो अंग्रेज हाकिम ने व्यंग्यात्मक लहजे में रणविजय को चेताया।’
‘ऐसा नहीं है डैड! मैं न तो भगोड़ा हूं और न ही कायर तथा अपनी जिम्मेवारियों से उदासीन भी नहीं, लेकिन मैं समझता हूं कि मैं इस योग्य नहीं कि खून के चकत्तों पर पांव रख कर आगे बढ़ूं तथा जीवित आदमी को लाश में बदलूं।’ कह कर रणविजय चुप हो गये, उन्होंने अपनी आंखें जमीन पर गड़ा दीं।
‘लेकिन अब ऐसा क्या है, अब तो भारत आजाद है, यह जमाना युद्धों वाला भी नहीं। कानूनी ढंग से भी किसी संपदा का बंटवारा संभव है। चाहे इस्टेट का मामला हो या किसी दूसरे कार्य व्यवसाय का’कृ अंग्रेज हाकिम ने जोड़ा।
‘लेकिन मुझे ऐसी संपदा चाहिये ही नहीं डैड! जिसमें धोखा, कपट, छल वगैरह की गन्ध आती हो, यह सब तो आप अच्छी तरह से जानते हैं कि इस्टेट कैसे बनते बिगड़ते हैं। भइयाराजाको तो आपने ही महाराज बनवाया था। क्या उन्हें नहीं मालूम कि लिली आपकी एकमात्रा लड़की है। मुझे किसी ऐसी संपदा में हिस्सा नहीं चाहिए, जो जन्म से पहले ही खून से लथ-पथ हो।’
रणविजय की उम्र और इस तरह की बातें, अंग्रेज हाकिम हालांकि ताल-मेल न बैठा पाया फिर भी उसने गंभीरता से स्वीकारा कि रणविजय ठीक कह रहा। आखिर उसने ही क्यों शानदार नौकरी छोड़ा? चाहता तो रिटायर होने तक करता रहता, पर उसने मन को नियंत्रित करना लिली की मां से सीख लिया था। वह खुश-खुश था कि रणविजय के पास महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करने की श्शक्ति है। उसने अपनी आंखें रणविजय पर टिका दीं, लगता है रणविजय आधा भारतीय है, नहीं तो सम्पदा हासिल करने के लिए अमर्यादित व्यवहार करना, इसने भी सीख लिया होता जो यहां सामान्य सी बात है।
आत्म हन्ता
वैसे रणविजय ने इस्टेट की संपदा में हिस्सा नहीं लेने का संकल्प तो ले लिया था पर संपदा सुख की अनुभूतियों एवं अंधकार पूर्ण भविष्य के बीच चलने वाले मनोवैज्ञानिक द्वन्द्व उन्हें आश्वस्त नहीं रहने दे रहे थे। वे लिली के साथ उसके मां बाप के आवास पर ही रह रहे थे जो उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उनकी ऐसी स्थिति भी नहीं थी कि कहीं दूसरा ठिकाना बना लेते। अंग्रेज हाकिम और लिली की मां को रणविजय हर तरह से प्रसन्न रखने की इच्छा रखते। वैसे उनके यहां अभाव भी नहीं थे क्योंकि उन लोगों ने अपने जीवन स्तर को औसत भारतीय के आस पास का बना लिया था। अंग्रेज हाकिम के भारतीय प्रेम को देख कर भारत सरकार ने उसे भारतीय नागरिकता भी प्रदान कर दिया था जो था तो अस्थायी पर उसकी कानूनी प्रवृत्ति स्थायी होने की थी। अंग्रेज हाकिम रुपया बनाने या रुपयों पर बैठ कर मनोवैज्ञानिक सुखानुभूतियों में डूब कर अपनी पीठ ठोकने वाला आदमी न था, वह सामान्य रूप से अपने पेट को नाप कर तथा आंतों की गति के अनुकूल ही रुपये की जरुरत का निर्धारण करता फिर फटा-फट कई लेख वगैरह तैयार करता या अनुवाद के काम में लग जाता।
अंग्रेज हाकिम के काम में लिली और रणविजय दोनों अपनी क्षमता के साथ सहायता करते। उन दिनों भारत में रूसी राजनीतिक साहित्य की बहुत मांग थी। अंग्रेज हाकिम रुसी साहित्य का अंग्रेजी अनुवाद करता, फिर रणविजय और लिली मिलकर अंग्रेजी का हिन्दी अनुवाद कर डालते। हिन्दी अनुवाद को प्राथमिकता के आधार पर रूसी दूतावास रूस भेजवा देता था, दूसरे उपायों के जरिए प्रकाशित करवाता था। अंग्रेजी अनुवाद, यूरोप के देशों के लिए आवश्यक होते। यूरोपीयदेशों में लेनिन वगैरह की रचनाओं का पाठ अचरज भरी धारणाओं से किया जाता तथा उसका आशय प्रजातंत्रा के कल्याणकारी प्राविधानों पर चस्पा किया जाता। प्रजातंत्रा की निर्वाचित संस्थायंे उस पर विचारण करतीं, फिर उसके अनुसार नियमों में संशोधन करतीं जिससे कि जनता में यह भ्रम स्थायी तौर पर बना रहे कि सर्वहारा की तानाशाही वाली सरकार से हर हाल में जनता द्वारा चुनी गई सरकार बहुत भली होती है। अंग्रेज हाकिम जो कमाता, कमाता ही रणविजय और लिली भी कमा लेते तथा उसमें संतुष्ट रहते।
रणविजय को भी कोई खास आर्थिक दिक्कत न थी, वे उस जमाने में भी कार से चलते। तब दिल्ली भी कारों से अटी-पटी न थी, सडकों का कालापन तब चांदनी चौक, बहादुरष्शाह जफर मार्ग, दरियागंज, लाल किला के आस-पास अच्छी तरह से देखा जा सकता था, आज की तरह से नहीं कि सड़क कहीं नहीं दिखती सिर्फ कारों की छतें ही दीखती हैं। कार अंग्रेज हाकिम की थी, उसे एक मुसलमान दोस्त ने दिया था जो किसी नबाब का लडका था। उसकी पढ़ाई-लिखाई इंग्लैण्ड में हुई थी। उसने आखिरी पढ़ाई उस कालेज में किया था जिसमें अंग्रेज हाकिम भी पढ़ा था। उससे अंग्रेज हाकिम की पहली मुलाकात दिल्ली में अंग्रेजी सरकार के एक कार्यालय में हुई थी जहां वह अपने काम के सिलसिले में आया था। अंग्रेज हाकिम ने उसके काम के लिए अपने स्तर से प्रयास किया था, उसे सफलता मिली थी, फिर तो वह अंग्रेज हाकिम का दोस्त ही बन गया था।
उसका नाम था तो बहुत बड़ा, जो पुकारने में थोड़ा अट-पटा लगता था, सो अंग्रेज हाकिम उसे सिर्फ मुजफ्फर नाम से ही पुकारता था। मुजफ्फर अंग्रेजी मिजाज का नौजवान था तथा अंग्रेजी लिबास में ही रहता था, वह एक सफाई पसन्द आदमी था तथा प्रतिदिन दूसरा लिबास पहनता था, वह लम्बी टाई की जगह गले की टाई बांधता तथा किसी कम्युनिस्ट की तरह ऐसी घनी मूंछे रखता कि उसका मुंह, मूंछ के कड़े बालों से ढंका रहता, गोरा होने के कारण भद्दी सी दीखने वाली मूंछ उसके चेहरे के प्रभाव को कम नहीं कर पाती, उसका आकर्षण बना रहता। उसकी बोल-चाल से अंग्रेज हाकिम काफी प्रभावित रहता, क्योंकि उसकी अंग्रेजी में काफी भिन्नता होती, जो सामान्यतया भारतीयों में व्यवहृत नहीं थी, क्योंकि दूसरे भारतीय जिस अंग्रेजी को बोलते उसमें होता तो सारा कुछ ठीक ठाक, पर अंग्रेजी समाज के लोक-राग का अभाव होता।
मुजफ्फर जब अंग्रेज हाकिम को प्यार से डार्लिंग कहता तब अंग्रेज हाकिम झूम-झूम जाता, फिर वह उसे स्वीटी पुकार कर गले से लिपटा लेता। एक अद्भुत दृश्ष्य होता उस समय। मुजफ्फर के पिता नबाब साहब का इन्तकाल १९४२ के आस-पास इंग्लैण्ड के एक अस्पताल में हो गया था, तब से मुजफ्फर इंग्लैण्ड में ही अम्मी के साथ रहने लगा था। बीच-बीच में भारत आता था और अक्सर दिल्ली में ही रहता था। अंग्रेज हाकिम के नौकरी छोडने के बाद के दिन तो मुजफ्फर के साथ ही बीतते थे। वह भी जब दिल्ली आता तब पहला काम यही करता कि अंग्रेज हाकिम से मिलता तथा लिली की मां के साथ घुल-मिल जाता। लिली की मां उसे खूब खूब स्नेह देती तथा महसूसती कि वह किसी अपने की गंध में है जो उससे बिछुड़ गई थी, क्योंकि वह चाह कर भी अपने मां बाप, भाई के घर नहीं जा पाती थी। मां-बाप की मृत्यु के बाद तो उसके लिए अपने जन्म स्थान का कोई विशेष अर्थ ही नहीं रह गया था।
अंग्रेज हाकिम को मुजफ्फर का भारत में न होना काफी अखरता है। वह ऐसी स्थिति में भी नहीं कि मुजफ्फर से मिलने के लिए इंग्लैण्ड की यात्रा करे। भारत विभाजन के समय मुजफ्फर को अंग्रेज हाकिम ने जाने कितनी बार समझाया था कि वह भारत में ही रहे, पाकिस्तान जाने का संकल्प छोड़ दे, पर ऐसा सम्भव न हो पाया। मुजफ्फर की अम्मी और बेगम दोनों भारत में रहने के लिए सहमत नहीं थीं, संयोग से दोनों लाहौर की थीं और लाहौर को हर हाल में पाकिस्तान का हिस्सा होना था। मजबूर होकर मुजफ्फर को भी पाकिस्तान की नागरिकता स्वीकारनी पड़ी। फिर तो उसे भारत के अन्दर आने वाली तमाम संपदाओं को औने-पौने दाम में बेचना पड़ा। पाकिस्तान जाने के पहले मुजफ्फर ने दो काम अंग्रेज हाकिम के हित में किये, हालांकि अंग्रेज हाकिम चाहता था कि वह इंग्लैण्ड की अपनी संपदा मुजफ्फर के नाम से कर दे, पर वह भारतीय मिजाज का सधा आदमी था तथा उस प्रवृत्ति का था जो सामान्यतया भारतीयों में ही दिखती है कि शुभचिन्तकों को दी जाने वाली संपदाओं का मूल्य या अदला-बदली नहीं करना। भारतीय इसे अपना नैतिक दायित्व मान कर आत्ममुग्ध होते हैं। अंग्रेज हाकिम था कि वह इस प्रवृत्ति से बिल्कुल अलग था, वह दान या भीख को गलत मानता था तथा समझता था कि उपहार भी इसी कोटि के होते हैं, सो वह इंग्लैण्ड की अपनी संपदा मुजफ्फर के हवाले अदला-बदली के रूप में करने का इच्छुक था दान के रूप में नहीं।
मुजफ्फर था कि उसे हर हाल में विशेष उपहार अंग्रेज हाकिम को देना ही था। सो उसने दिल्ली में स्थित एक पुरानी हवेली जिसे मुजफ्फर ने ठीक ठाक कराया हुआ था तथा दिल्ली प्रवास में उसमें रहा करता था, उसके अगले हिस्से को लिली के नाम कर दिया तथा पिछले हिस्से को जो मुजफ्फर के कर्मचारियों के आवास थे तथा वे भारत में रहना चाहते थे, उनके नाम आवंटित कर दिया। भारत से जाते जाते मुजफ्फर ने हवेली के अगले हिस्से और पिछले हिस्से के बीच एक विभाजक दीवार भी चुनवा दिया, ताकि बाद में किसी भी तरह की उलझन न रहे।
मुजफ्फर ने भारत छोडने के पहले अंग्रेज हाकिम को इतना प्रेरित किया कि उसे मुजफ्फर की हवेली में अपना सारा सामान समेटना पड़ा। हवेली में आकर अंग्रेज हाकिम की भावुकता ने उसे परेशान कर दिया। उसे महसूस होता कि उसका समय उससे छीन लिया गया है तथा एक ऐसे इतिहास में कैद कर दिया गया है, जो अपनी सफेदी पूर्ण राजनीतिक कार्यवाहियों के लिए नहीं जाना जाता, जितना अपने कालेपन की शोक-प्रवृत्तियों व दमनकारी व्यवहारों के कारण जाना जाता है। फिर भी उसे हवेली में ही रहना था तथा अपनी आदतों को हवेली की आदतों से बचाना था।
एक दिन मुजफ्फर हवेली पर आया और बताया कि वह पहले इंग्लैण्ड, फिर वहां से पाकिस्तान जाएगा तथा प्रथम पाकिस्तानी स्वतंत्राता महोत्सव में भाग लेगा। उसे वहां से निमंत्राण भी मिल चुका है तथा पाकिस्तान में रहने व बसने का अपना लक्ष्य उसने भारतीय अधिकारियों को भी बता दिया है। उसी दिन वह इंग्लैण्ड चला भी गया तथा अपनी कार अंग्रेज हाकिम के हवाले कर गया। अब अंग्रेज हाकिम करे क्या? क्या करे कार का? मुजफ्फर ने कार का सारा कागज अंग्रेज हाकिम के नाम बनवा दिया था।
अंग्रेज हाकिम के पास एक पुरानी कार थी, जो छोटी थी तथा उसमें तेल का खर्च कम था। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार उसने खरीदा था तथा इस कार की तुलना में वह किसी ऐसी कार के बारे में सोच भी नहीं सकता था, जैसी मुजफ्फर की थी, ज्यादा तेल पीने वाली लम्बी और बड़ी। पुरानी खरीदने का एक कारण यह भी था कि अंग्रेज हाकिम कुशल मिस्त्राी भी था तथा कार बिगडने पर वह पहले खुद ठोंक-ठाक करता तथा भारतीय मिस्त्रिायों की तरह कार में नया सामान लगाने से परहेज करता।
अंग्रेज हाकिम अपनी पुरानी कार से ही कहीं आता जाता पर रणविजय मुजफ्फर की कार से ही चलना चाहते जब किसी महत्वपूर्ण के यहां जाना होता। एक तो वह नई थी तथा दिल्ली के लिए स्टेटसिम्बल थी। मुजफ्फर की कार से चलने पर रणविजय को मुलायम आयवस्ति का आभास होता कि लोग यह नहीं समझ पायेंगे कि वे राज्य के निर्वासन में हैं तथा अपने अधिकारों का समर्पण करने वाले कायर आत्म-हन्ता हैं।
एक दिन मुजफ्फर की कार से रणविजय रूसी दूतावास जा रहे थे, साथ में लिली थी। किसी रुसी किताब का हिन्दी अनुवाद दूतावास के अधिकारियों को दिखाना था। रास्ते में लिली ने रणविजय को रोका-‘चलो कहीं काफी पीते हैं।’
फिर वे किसी रेस्ट्राँ के सामने थे। रेस्ट्राँ अपने समय की आधुनिकता में था तथा उसकी पुरानी आधुनिकता की पहचान पूरी तरह गायब थी, जब कि वह रेस्ट्राँ 1875 का था। उसके मुख्य दरवाजे के ऊपर निर्माण काल सफेद संगमरमर पर अंग्रेजी में लिखा हुआ था। गोया उस काल का जब अंग्रेज भारत के लिए किसिम किसिम के कानूनों को अंग्रेजी रंग में बनाने लगे थे। वैसे रेस्ट्राँ ठीक था, उसमें बैठने के लिए पर्याप्त जगह थी, कुर्सियां मेज वगैरह सभी काले रंग के प्रभाव में थीं, जो विशेष लकड़ी का निर्मित होने का आभास दे रही थीं। रेस्ट्राँ में पच्चीस तीस के आस पास बैठे हुए लोग थे, जो भारतीय कम अंग्रेज ज्यादा लग रहे थे, क्योंकि उनमें अधिकांश अंग्रेजी लिबास में थे तथा अंग्रेजी में बतिया रहे थे। उनकी बात-चीत में राजनीति थी तथा नेहरु हर दूसरे वाक्य से जुड़े होते। उनमें गांधी को सुनना असंभव होता। वहां गॉधी कहीं थे भी नहीं।
रणविजय लिली के साथ रेस्ट्राँ में दाखिल हुए और काफी का आदेश दिया, वह भी काली। लिली रेस्ट्राँ के लिए किसी विषय में बदल गई थी, यह रणविजय या लिली दोनों को कुछ देर बाद मालूम हुआ। जब दोनों काफी पीने लगे तथा अनुवाद वाली किताब के बारे में चर्चा करने लगे। दरअसल चर्चा तुलनात्मक थी, सन्दर्भ रूस का था तथा बातचीत भारत की। लेनिन ने ‘स्वस्फूर्तता’ के बारे में जो सिद्धान्त बनाये थे या जिस सामाजिक जागरुकता को उन्होंने स्वस्फूर्तता माना था, क्या उसी की तरह ही ‘स्वस्फूर्तता’ भारतीय स्वतंत्राता-संघर्ष में भी थी?
लिली ने यही जानना चाहा था रणविजय से। रणविजय एकबारगी खामोश हो गये थे, उन्हें नहीं सूझ रहा था कि उसका उत्तर हां है या नहीं, क्योंकि लिली अपने सवाल को आगे तक ले जाती जिसमें ‘हां’ के लिए भी और ‘ना’ के लिए भी उत्तर देना होता। रणविजय ने लिली को हिंसा और अहिंसा जैसे रास्तों में ले जाकर उलझा दिया और बताया कि जो सवाल तुम पूछ रही हो, इसे दो तरीके से पूछ सकती हो...
लिली ने रणविजय को तत्काल रोका...कृ‘वह कैसे?’
रणविजय ने लिली को उत्तरित किया कि एक तो इसी तरह जैसे तुमने पूछा है, दूसरा थोड़ा क्या बहुत अधिक भिन्न है, वह यह कि मान लो, तुम्हारे हाथ में रायफल है और सवाल पूछ रही हो, अब कल्पना करो कि जब रायफल की नाल किसी की तरफ हाथ भर के फासले पर हो फिर उसका जबाब क्या होगा?
‘क्या जबाब देने वाला आदमी रायफलधारी आदमी की ताकत के बारे में विचार नहीं करेगा? यदि विचार करेगा फिर तो उसका जबाब रायफलधारी के इच्छानुकूल ही होगा ताकि उसका जीवन यूं ही या अचानक न समाप्त हो जाये।’
काली काफी के साथ लिली और रणविजय दोनों अपनी चर्चा में खोये हुए थे कि बगल वाले आदमी ने रणविजय को अपनी तरफ खींचा...
‘क्या आप उत्तर प्रदेश से हैं? किसी तरह उस अपरिचित आदमी ने हिन्दी के शब्दों को जोड़ कर उच्चारित किया। उसके बोलने के तौर तरीके से रणविजय और लिली दोनों को आसानी हुई, फिर वे समझ सके कि अपरिचित आदमी गैर हिन्दी भाषी किसी दक्षिणी क्षेत्रा का है। रणविजय और लिली की साफ हिन्दी से गैर भाषी भी अनुमान कर सका था कि ये दोनों उत्तर प्रदेश जैसे हिन्दी प्रदेश के ही होंगे।कृ
‘हां, हम लोग उत्तर प्रदेश से ही हैं’ रणविजय ने अपरिचित को बताया तथा पुरानी चर्चा को आगे बढ़ाया, पर दक्षिणी क्षेत्रा का आदमी तो एकटक था रणविजय की तरफ, उसे कुछ और पूछना था, उसने दुबारा रणविजय को अपनी तरफ आकर्षित किया और पूछा...कृ
‘तब तो आप करपात्राी जी महाराज को जानते होंगे, जो हाथ को ही पात्रा मानते हैं तथा उसी पर भोजन रख कर खाते हैं।’
रणविजय ने थोड़ा रुक कर मुंह से निकलने वाले उत्तर को सायास बदला और उससे पूछा...कौन करपात्राी जी महाराज?
वही जिनका बनारस में धर्मसंघ नाम का एक अच्छा आश्रम हैकृअपरिचित ने बताया।
अच्छा! वही करपात्राी जी! जो अछूतों के मन्दिर प्रवेश के खिलाफ हैं, वे भी बनारस में रहते हैं कहीं, मैं उन्हें नहीं जानता। रणविजय ने अर्थहीन उत्तर अपरिचित आदमी की तरफ उछाला और काफी का आखिरी घूंट पेट में उड़ेला, जैसे वह कसैली हो। हद हो गई ये लोग जो आश्रम की अथाह पूंजी में गोता लगा रहे हैं इन्हें सभी जानते हैं और इनके बारे में पूछते हैं, पर कोई प्रेमचन्द, प्रसाद, कबीर के बारे में नहीं पूछता,भारतेन्दु का तो यहां नाम लेवा भी नहीं। रणविजय घिना गये, जैसे सारी काफी हलक से बाहर आ जाएगी।
स्वस्फूर्तता वाली चर्चा फिर वे कार में चलते हुए पूरी कर पाये। किसी तरह लिली आश्वस्त हो पाई कि रूस की स्वस्फूर्तता और भारतीय स्वस्फूर्तता में रास्तों की शुचिता का अन्तर था। फिर भी लिली का भ्रम ताजा ही बना रह गया कि बन्दूक के सामने बलिदान का क्या मतलब? लिली बन्दूक और बलिदान में उलझ गई, उसके सामने रूस के राजनीतिक बदलाव का मुकम्मल सांचा था, खून से लथपथ बारूद में झुलसा, बन्दूकों की भाषा बोलता, समझता समाज। हालांकि उसने किताबें ही पढ़ी थी, जिनमें अपनी पूरी राजनीतिक सैद्धान्तिकी के साथ बोलशेेविक दर्ज होते थे तथा मेनशेविकों की गद्दारियां एवं पथ-भ्रश्टता भी घृणित तरीके से विश्लेषित होती थीं। उन्हीं किताबों में से एक किताब थी, जिसके हिन्दी अनुवाद की पांडुलिपि वे रूसी दूतावास ले जा रहे थे।
बन्दूक और बलिदान की चर्चा फिर कभी, पर उसे अचरज था कि रणविजय ने रेस्ट्राँ में उपस्थित अजनबी से झूठ क्यों बोला, उसकी जरूरत क्या थी? क्योंकि करपात्राी जी को तो वह जानता है, मम्मी अक्सर वहां जाने की बातें करती हैं, रणविजय से पूछा भी था एक बारकृ
लिली ने रणविजय को टोका...‘क्या तुम वास्तव में करपात्राी जी को नहीं जानते?’
‘जानता हूं फिर भी मैंने प्रति सवाल किया था, कौन करपात्राी जी?’ तुम यही जानना चाहती हो कि ऐसा मैंने क्यों किया, करपात्राी जी का जानना किस लिए छिपाया?’
इसलिए कि इन बाबा और महाराजाओं जैसे लोगों का नाम बाहर संक्रामक रोग की तरह फैल जाता है, सो यह पूछना आवश्यकथा कि कौन करपात्राी जी? यदि वह अपरिचित थोड़ा भी समझदार हुआ फिर तो उसे समझ लेना चाहिए कि जब उत्तर प्रदेश के लोग ही करपात्राी जी को नहीं जानते तो उनकी कैसी महत्ता?
लिली रणविजय का स्पष्टीकरण सुन कर हंसने लगी, ‘गोया तुम किसी का कद छिपाने की कला जानते हो।’
रणविजय भी हंसने लगे। कार चलाते हुए रणविजय ने लिली को किसी की पद प्रतिष्ठा के फैलने के उन कारणों को बताया जो पूरी तरह अवास्तविक और झूठे होते हैं। दर असल किसी बड़े या चर्चित के साथ अपने जुड़ावों की प्रामाणिकता में आदमी इतना कुछ बोल जाता है जिसका कोई मतलब नहीं होता और वह उस व्यक्ति का प्रचारक-प्रसारक बन जाता है। जैसे मैं यह कहूं कि कशी नरेश को जानता हूं, उनसे हमारे दादा के संपर्क हैं, तो मुझे यह आश्वस्ति मिलेगी कि काशी नरेष की तरह मैं भी बड़ा हो चुका हूं, तो बेहतर यही है कि कहूं जानता ही नहीं जो सचाई है, काशी नरेश या करपात्राी जी को मेरे जैसा आदमी जान भी कैसे सकता है? नाम जानना तो जानना नहीं है नऽ।कृ
एक बार फिर हंसते हुए लिली ने सुझाया ‘तुम्हें तो साइकोलाजिस्ट होना चाहिए था, मन से खेलने वाला तुम राजनीति में क्यों चले आये, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, जेल और प्रतिदिन हल्ला, अवांक्षित शोर व आन्तरिक उर्जा का दोहन, फिर अपनी पीठ पर साम्राज्यवादी दमन की कहानियां लिखवाना।’
नहीं, ऐसा नहीं है लिली! जो तुम विचारती हो उसका भी अपना कारण है क्योंकि तुम मानती हो कि दुनिया से बन्दूकंे नहीं गायब हो सकतीं, नागाशाकी और हिरोशिमा हर जगह है।
लिली अपने तर्कों पर दृढ़ थी, उसे रणविजय के तर्क सन्तुष्ट न कर पाते, चाहे वे जितना आधार प्रस्तुत करते। लिली मान कर चलती कि बारूद और एटमबम पर बैठी दुनिया, उसी से किसी दिन समाप्त हो जाएगी, वैसे वह बारूद पुलिस तथा सेना को भी एक इकाई मानती तथा स्पष्ट करती कि बारूद में जीवनहीनता होती है और सेना तथा पुलिस में जीवन होते हुए भी जीवन का इनकार होता है तथा एक ऐसी बारूदी आज्ञाकारिता होती है जिसके लिए पुलिस तथा सेना के पेट और स्वास्थ्य का ख्याल रखा जाता है। लिली स्पष्ट करती है सेना तथा पुलिस से भी बारूद जैसा काम लिये जाने की संभावना बराबर सुरक्षित रहती है। ऐसी स्थिति में बारूद का प्रतिद्वन्दी बारूद, सेना की सेना, पुलिस की पुलिस, पर रणविजय, सेना और पुलिस को बारूद जैसा न मानते तथा विश्वास करते कि सेना की प्रवृत्तियां हर हाल में यांत्रिक नहीं होतीं, उसमें भी संवेदनशीलता तथा विवेकयुक्तता का रसायन होता है।
रणविजय ने अपने समर्थन में एक लघु कहानी सुनाना चाहा लिली को कि रूसी दूतावास सामने आ गया। लिली और रणविजय दोनों दूतावास में दाखिल हुए। अनुवाद की टाइप की हुई पांडुलिपि रणविजय ने रूसी अधिकारी को सौंपा। रूसी अधिकारी ने रणविजय को अंग्रेजी अनुवाद वाली दूसरी दो किताबें भी दिया तथा आग्रह किया कि उनके अनुवाद का काम रणविजय जल्दी निपटा दें। उस विशेष रूसी अधिकारी से मिल लेने के बाद रणविजय दूतावास में ही एक ऐसे भारतीय से मिले, जो हर तरह से भारतीय था पर उसका दिमाग पूरी तरह रूसी था। उसकी आंखों में रूसी वैभव का पानी था तथा उसके हाथों की विशेषता थी कि वे पूरी तरह पराश्रयी थे। वह अपने हाथों का इस्तेमाल तभी करता था जब उसके पास खरीदे गये हाथ नहीं होते थे, वह अपने नियंत्राण में पैसे के बल पर कई जोड़ा मजबूत हाथ नौकरों के रूप में हरदम रखा करता था।
रूसी दूतावास में रणविजय से वह भारतीय बहुत ही गर्मजोशी से मिला। वैसे वह हंसमुख आदमी था। उसके हंसमुख होने में उसका चेहरा भी काफी सहयोग करता था। उसके पतले-पतले होंठ थे तथा उनसे नाक की दूरी औसत से कम थी। उसके हंसने में कौतुकपूर्ण विशेषता ये थी जैसे उनकी अलग से कोई जुबान हो या कोई संगीतमय भाषा ही हो। सब कुछ के बावजूद उसकी हंसियों में रीतिकालीन या चलताऊ हास्य वाली कविताओं का पूरी तरह अभाव था, यही कारण था कि उसके व्यक्तित्व से गंभीरता फूटती थी तथा प्रथम द्रष्टया आभास होता था कि यह आदमी संवेदनाओं और भावनाओं को जूते से दबा कर रखता है। उसकी हंसियां जो एक स्वाभाविक क्रियायें थीं, उनमें यह ताकत नहीं थीं कि वे बुद्धि के कुशलतम और व्यावहारिक उपयोग से उसे किसी भी तरह रोक पातीं। उसकी यही विशेषता रूसी विद्वानों को भाती थीं, इसीलिए उसे रूसी दूतावास में उसके द्वारा प्रस्तावित मानदेय पर ससम्मान रखा गया था। रूसी दूतावास उसके द्वारा सुझाई गई रूसी किताबों खासतौर से वाम राजनीतिक व साहित्यिक किताबों का अनुवाद करवाता, फिर उसका काम होता हिन्दी अनुवादों को जांचना। वैसे वह बारीक बुद्धि वाला आदमी था तथा अनुवाद की गई किताबों को गंभीरता से देखता।कृ
‘कब आये रणविजय? सुना अपनी ‘इस्टेट’ की तरफ गये थे?’ उस आदमी ने पूछा
‘हॉ गया था पर वहां से बहुत पहले ही लौट आया था’
‘तुम्हें तो रूसी किताबें काफी चोटिल करती होंगी!’ दुबारा उसने रणविजय को छेड़ाकृ
‘हां करती तो हैं, क्योंकि रूसी किताबों का यहां व्यावहारिक प्रयोग नहीं हो सकता जब कि भाषण वाले मार्क्स और लेनिन की यहां कमी नहीं, आप भी तो कुछ नहीं कर रहे। रणविजय ने रूसी दिमाग वाले भारतीय को थोड़ा चोटिल कियाकृफिर वह पलट गया किसी कुशल बाजीगर की तरह। उसने लिली की तरफ अपना ध्यान मोड़ा और लिली से पूछा...‘सुना तुम भी इस्टेट गई थी!’
‘हां गई तो थी’
‘कैसी लगी इस्टेट?’
‘इस्टेट कहां देख पाई, सिर्फ महल देखा जिस पर कथित पराक्रम का इतिहास लिखा हुआ था, पर महलों की भाषा से मैं परिचित नहीं, सो महल में गूंगी और बहरी बनी रह गई।’
रूसी दिमाग वाला भारतीय सकपका गया, क्या कह रही लिली? इतिहास की भाषा जो बहुरुपिया की तरह अपना रंग बदला करती है उसे समझना आसान है क्या?रूसी दिमाग वाला भारतीय फिर रणविजय की तरफ मुड़ा और प्रशासनिक भाव लिए रणविजय को बताया। उसने रणविजय और लिली द्वारा अनुवादित दोनों किताबों को प्रकाशित करने की स्वीकृति अपने स्तर से दे दिया है तथा वे साल के अन्त तक प्रकाशित भी हो जायेंगी।
रणविजय और लिली देर शाम तक अपने आवास पर पहुंचे। आवास पर रामदयाल आ चुके थे तथा लिली की ममा से उनके कमरे में बतिया रहे थे। लिली के डैड कहीं बाहर निकले हुए थे। लिली की मां पहले जैसी अस्वस्थ नहीं थीं तथा आराम से रामदयाल से हाल चाल पूछ रही थीं। रामदयाल को देखते ही रणविजय उर्जस्वित हो उठे, जैसे पूरी इस्टेट उनके भीतर हाजिर हो गई हो तथा इस्टेट होने न होने के जो अन्तर्द्वन्द्व थे वे स्वतः समाप्त हो चुके हों। फिर तो रणविजय रामदयाल से लिपट गये और लिली उन्हें दुआ सलाम कर किचन जा पहुंची।
उस समय रामदयाल और रणविजय को लिपटा हुआ देख कर कट्टर से कट्टर भारतीय भी भ्रम पीने लगता कि क्या रणविजय ‘इस्टेट’ में अपना हिस्सा न लेकर किसी आत्महन्ता की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं तथा रामदयाल जैसा मित्रा उन्हें समझा भी नहीं पा रहा है।
पर रामदयाल रणविजय को क्या समझाते, वे कोई गंवार तो थे नहीे, पढ़े-लिखे थे राजकुमार थे सो वे बहुत कुछ विचार कर चुप थे और समय की चाल तजबीज रहे थे कि जब समय बदलेगा फिर वे रणविजय के बारे में निर्णय लेंगे।
समय की अभिव्यक्ति
रामदयाल का दिल्ली आना सिर्फ रणविजय के लिए था। वे महल भी गये थे, तब तक प्रदेश का मंत्राी लखनऊ लौट चुका था। भइयाराजासे रामदयाल की हुई बातें काफी नीरस तथा क्रोधित करने वाली थीं।
भइयाराजाकिसी भी सूरत में रणविजय को अपना भाई मानने के लिए तैयार नहीं थे। कलक्टर की कही सारी बातें भइयाराजाके पेट से बाहर आने लगीं। रामदयाल को काफी बुरा लगा तथा उनके पास भइयाराजाकी बातों को उन्हीं के मुंह पर चस्पा करने के लिए मर्यादाहीन रास्ता पकडने का ही तरीका बचा हुआ था, जिसे वे पकडना नहीं चाहते थे, क्योंकि यह उनके स्वभाव के विपरीत था। सो, वे भइयाराजाकी सारी बातें सुनकर बिना किसी प्रतिक्रिया के वापस हो लिए।
रामदयाल का महल से वापस होना काफी दुखभरा था तथा उस पवित्रा विश्वास का टूटना था जिसे रामदयाल ने अपने पिता से तथा खुद के अनुभवों से हासिल किया था। लेकिन जो टूटना था, उसे तो टूटना ही था। महल किसी भी विश्वास को कपोल कल्पना में तब्दील कर सकते हैं तथा संपत्ति व सत्ता हासिल करने के लिए कोई रास्ता घृणित नहीं होता, यह सब रामदयाल जानते थे फिर भी उनका अटूट विश्वास भइयाराजापर था कि चाहे जैसी भी विपरीत स्थितियां हो भइयाराजादूसरे राजाओं की तरह स्वार्थी नहीं, वैसे भी उन्हें कभी भी ऐसा मौका नहीं मिला था कि भइयाराजाको आग में से गुजरता देखते फिर समझ बनाते कि वे जले कि नहीं।
रामदयाल को वैसे यह मालूम था कि रणविजय की मां दूसरी थीं जो भइयाराजाकी मां नहीं थीं, भले ही वे अविवाहित रही हों पर थीं तो उनके बाप के साथ ही, उसी महल में उनका निधन हुआ, राज-व्यवस्था के तहत उनका दाह संस्कार हुआ। खुद भइयाराजाके पिता ने चिता में आग लगाया और तेरह दिन तक शोक मनाया। तब भइयाराजाके पिता महज जागीरदार थे, यदि राजा होते फिर तो राज द्वारा अधिकृत व्यक्ति दाह देता तथा मृत्यु संस्कार करता क्योंकि राजा को ऐसा नहीं करना चाहिए। माना जाता है कि छत्रा-चंवरधारियों को एक सामान्य व्यक्ति की तरह न शोकातुर होना चाहिए और न ही प्रसन्न। यदि ऐसा हुआ फिर तो राजा जो देवता होता है वह पक्षपाती हो जाएगा। जबकि उसे पूरी जनता का संरक्षक होने जैसा व्यवहार करना चाहिए जिसमें पूरी तरह निर्पेक्षता हो।
अब कह रहे हैं कि रणविजय मेरा भाई ही नहीं, भइयाराजाके स्थान पर यदि कोई दूसरा होता तो शायद इस तरह की निकृष्ट बात कभी नहीं करता। वह मां के साथ साथ बाप को बाप समझता। रामदयाल को भइयाराजाके दोहरे चरित्रा पर काफी घिन हुई और वे तत्काल घिना गये जैसे भइयाराजाका चेहरा देखना भी प्रायश्चित हो। रामदयाल का भइयाराजा से जुड़ाव उनके पिता के जमाने से था, एक दूसरे से मिला-जुला, लोग सराहना करते कि संबंधों का निर्वाह करना रामदयाल के पिता ही नहीं वे भी अच्छी तरह से जानते हैं। वैसे भी रामदयाल का सामाजिक और राजनीतिक जीवन दाग वाला नहीं था, वे एक साफ आदमी थे तथा साफ काम करते थे।
समझना आसान नहीं कि भइयाराजाकैसे आदमी हैं? आदमी हैं भी या नहीं, कौन पूरे भारत की बादशाही मिल रही? जमीनदारी टूटेगी, दान और दहेज के नाम पर आखिर कितने गांव बचा पायेंगे, ठीक है हाईकोर्ट में मुकदमा दाखिल हो गया है कि कम से कम तीन सौ गांव जो जंगलों के समीपवर्ती हैं, जहां उनकी जमीनदारी नहीं थी, वे गांव उनकी अम्मा रानी को खोइछां (कन्यादान) के रूप मेें प्राप्त हुए थे, अम्मा हुजूर के पिता महाराज ने विदाई में दिया था। साथ ही साथ यह भी था कि उन गांवों की जमीनों के कागजात भी कभी तैयार नहीं किये गये थे। सो वहां की जमीनदारी नहीं टूटनी चाहिए।
रामदयाल उलझ गये थे, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि भइयाराजाऔर रणविजय के बीच उनकी भूमिका किस तरह की होगी? वे दिल्ली तो महल से वापस होने के बाद ही चले जाते पर राजनीति के स्थानीय जालों में उलझे थे। दर असल हुआ यह था कि उत्तर प्रदेश की कांग्रेसी सरकार बनते ही जिले में पारटी के विभिन्न पदों के बाबत आपसी संघर्ष काफी बढ़ चुके थे, अधिकांश चाहते कि उन्हें ही पारटी का अध्यक्ष बनाया जाय। किन्ही कारणों से निष्पक्ष चुनाव में विश्वास करने वाली पारटी दो तीन सालों से पारटी का चुनाव रोके हुई थी। जिला कांग्रेस पारटी के अध्यक्ष वगैरह को लखनऊ के कांग्रेसी दिग्गज मनोनीत कर देते, फिर मनोनीत अध्यक्ष का पूरे जिले में दब-दबा बढ़ जाता प्रशासन और नागरिक दोनों क्षेत्रों में। लोग समझते कि अध्यक्ष जी का प्रभाव यदि राजधानी में नहीं होता फिर वे कैसे अध्यक्ष बनाये जाते। वस्तुतः उन दिनों कांग्रेस पारटी का अध्यक्ष जिला स्तर पर प्रशासन का कान ऐंठने वाला हुआ करता था। वह मौके गर मौके प्रषासन का कान ऐंठता तथा जिस तरफ चाहता प्रशासन के आलाहाकिमों की गर्दनें उस तरफ घुमा देता। आलाहाकिमों को फिर जिले की समस्याएं दीखने लगतीं। इस बार जिले का अध्यक्ष एक ऐसा आदमी था जो पहले दिल-दिमाग से समाजवादी था तथा वह आज़ादीके पूर्व तक समाजवादी ही था।
आज़ादीके पहले पुरानी कांग्रेस सोशलिस्ट पारटी का सम्मेलन नासिक में हुआ था। वहां सोशलिस्टों ने निर्णय लिया था कि कांग्रेस सोशलिस्ट पारटी को कांग्रेस पारटी से अलग रखा जाय और वही हुआ लेकिन कुछ सोशलिस्ट पारटी के फैसले के विरोध में थे सो वे सीधे तौर पर कांग्रेस से जुड़ गये। पारटी के उस फैसले का विरोधी जिले का अध्यक्ष भी था क्योंकि वह अशोक मेहता के अगल-बगल, आगे-पीछे घूम कर आत्मतुष्ट हुआ करता था और अशोक जी थे कि वे कांग्रेस में बने रहना चाहते थे तथा उनका मानना था कि कांग्रेस पारटी के कार्यक्रमों को ही इतना प्रभावी और परिणामकारी बनाया जाये कि कांग्रेसी सरकारों का रूप समाजवादी हो जाये। यह बात अध्यक्ष को जंच गई थी सो वह कांग्रेस में ही बना रह गया था।
रामदयाल जब गांधी जी के साथ नोआखली में थे, तब रणविजय ही नहीं जिला कांग्रेस का अध्यक्ष भी वहां था और गांधी जी ने नोआखली में अपनी एक सहयोगिनी को वहां भेजा था। वह एक निर्भीक महिला थीं तथा व्यावहारिक इतनी कि विरोधियों तक को प्रभावित कर लिया करती थीं। उन्होंने नोआखली में आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया कि जब तक यहां खून का एक बूंद भी सड़क पर गिरेगा, वे आमरण अनशन नहीं तोड़ेंगी। जिले का कांग्रेसी अध्यक्ष रामदयाल और रणविजय तीनों जन उनके साथ थे। इतना ही नहीं ये तीनों जन गांधी जी के साथ कलकत्ता भी आये, क्योंकि वहां भी दंगे आरम्भ हो चुके थे।
कलकत्ता जो भाई-चारे और सद्भावना का शहर था, हिंसक और आक्रामक हो उठा था। वहां बदले की भावना हर तरफ आंधी की तरह फैल चुकी थी। कुछ ही सप्ताह बाकी थे कि दिल्ली में स्वतंत्राता दिवस का जश्न मनाया जाने वाला था। दिल्ली के जश्न में ष्शामिल होने वाले महत्वाकांक्षियों के लिए कलकत्ता में हो रहे खून-खराबे का कोई अर्थ नहीं था, न तो राजनीतिक स्तर पर और न ही संवेदनात्मक स्तर पर। वे दिल्ली के लाल किला व राष्ट्रपति भवन के अगल बगल मंडरा रहे थे तथा जोगाड़ में थे कि स्वतंत्राता के लड्डू उनके हाथ में भी आ जायंे, वे भी किसी सरकारी विभाग की अध्यक्षता हथिया लें। उस समय कुछ हासिल कर सकने की बदरियां तो दिल्ली में थी हीं, जिनसे अंग्रेजों ने नाता तोड़ लिया था। अब देश का सारा कायदा कानून, पद, गरिमा, वैभव, धन दौलत भारतीय पंजों में था, फिर कौन देखे कि कलकत्ता में क्या हो रहा? गांधी जी बेचैन थे, उनका सारा राजनीतिक दर्शन खंड-खंड होकर बिखर रहा था। उनकी आध्यात्मिक पवित्राता को भारत के उनके कुछ अनुयायी अपने निहित स्वार्थों से विश्लेषित कर रहे थे तथा हाथ में आई सत्ता पर काबिज होने के प्रयासों में लगे थे। गांधी जी कलकत्ता की बिगड़ती हालत जानकर सीधे कलकत्ता आ गये और ‘सोदपुर’ के आश्रम में जम गये। उनके लिए १५ अगस्त १९४७ का प्रस्तावित स्वतंत्राता दिवस उतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना कि कलकत्ता के दंगों का समापन। गांधी जी अगस्त के दूसरे सप्ताह तक सोदपुर आश्रम में, प्रार्थना सभायें करते रहे तथा लोगों को समझाते बुझाते रहे। इस दौरान रामदयाल गांधी जी के पीछे-पीछे सोदपुर आश्रम आ गए थे, जब कि कांग्रेसी अध्यक्ष और रणविजय ये दोनों लोग गांधी जी की सहयोगिनी के साथ नोआखली ही रुक गये थे। कांग्रेसी अध्यक्ष कलकत्ता रणविजय के साथ उस दिन आया, जिस दिन डा. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में एक विशाल जुलूस निकाला गया था। उस दिन गांधी जी बलिया घाट में थे तथा दंगा शान्ति के उपायों में सक्रिय थे। उनके शान्ति उपायों को शान्ति यज्ञ का नाम दिया गया था। शान्ति यज्ञ का ही प्रभाव था कि कलकत्ता मशाल जुलूस के जलते मशालों से जगमग करने लगा। क्या हिन्दू क्या मुसलमान क्या औरतें क्या पुरुष, लड़के और लड़कियां भी।
ऐसा अद्भुत जुलूस रामदयाल ने कभी नहीं देखा था, रणविजय और कांग्रेसी अध्यक्ष तो जैसे किसी कल्पनालोक में थे। मारवाड़ियों की अकूत दौलत और बंगाली भद्रजनों के शहर कलकत्ता में उस समय अंग्रेजों की पहचानों को खोजना मूर्खता होती। वहां था भी नहीं कुछ, जिस अंग्रेजी धूर्तता और धोखों से कभी यह शहर अट-पटा हुआ करता था। वहां बनारस वाली निश्चिन्तता और शान्ति की हवा बह रही थी, और मशाल जुलूस में दंगे की घृणित मनोवृत्तियां तेल के साथ जल रही थीं। शहर के मुहल्ले दर मुहल्ले आपस में जुड़ते जाते, सभी के हाथों में जलते मशाल होते, जुलूस अपने में डूबा हुआ शान्ति और सद्भावना की प्रार्थना करता और मनुष्यता का शाश्वत अर्थ महसूसता हुआ गली दर गली घूम रहा था, लोग बाग जो जुलूसों में नहीं थे, वे अपने घरों से जुलूस का सन्देश पढ़ते-गुनते कि आदमी न तो मुसलमान होता है और न ही हिन्दू, वह जन्मता तो सिर्फ आदमी ही है, कहीं न कहीं हमारी सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में खोट है जो हमें हिन्दू या मुसलमान बना देती है, फिर प्रारंभ हो जाता है हिन्दू और मुसलमान होने का खेल, कुछ अतिवादी दंगे को भी खेल जैसा खेलने लगते हैं तथा विजेता होने के विनाशकारी गौरव हासिल करने में खून बहाने लगते हैं।
रामदयाल, रणविजय और कांग्रेसी अध्यक्ष तीनों जुलूस में शामिल थे। जूलुस को हर जगह, सम्मान मिला, चाहे मुहल्ले, मुसलमानों के थे या हिन्दुओं के, राममनोहर लोहिया जैसे लोग हाथ में मशाल लिए जुलूस के आगे-आगे थे। बंगाल के मुख्यमंत्राी का समर्थन भी जुलूस के साथ चल रहा था, नहीं तो जाने क्या होता?
कहा जाना चाहिए कि समय ठीक था, कम से कम रणविजय के लिए। बलिया घाट में गांधी जी का शान्तियज्ञ चल रहा था। उनकी सुबह प्रार्थना सभा होती। उसके ठीक बाद गांधी जी प्रार्थना सभा को अश्रुपूरित भषा में संबोधित करते प्रार्थना सभा में हर तरफ गांधी की विनम्र प्रार्थना सभी को संवेदित किये रहती, सभा गांधी को देखती, गुनती तथा गांधी को राजनीतिक निरीहता को समझती फिर उनके आध्यात्मिक मन का हिस्सा बन जाती जहां राजनीति का व्याकरण पूरी तरह प्रभावहीन होता। प्रार्थना सभा के तुरन्त बाद गांधी जी सभा को संबोधित करने ही वाले थे कि...कृ
कई धमाके एक साथ हुए, कुछ नौजवान लड़के गांधी जी के विरोध में नारा लगाने लगे फिर क्या था प्रार्थना सभा बिखर गई, लोग जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे, गांधी जी को प्रार्थना सभा के लोगों ने अपने घेरे में ले लिया। धमाका करने वाले नौजवान धमाका के बाद भागने में सफल भी हो गये, सभा के बाहर रणविजय छट पटा रहे थे, वे धमाके की चपेट में आ गए थे, पूरी सभा में मौत जैसा सन्नाटा छा गया।
रणविजय का एक पैर जख्मी हो गया था फिर भी वे होश में थे, गांधी जी ने उन्हें देखा, उनकी आंखें आंसू न रोक पाईं उन्होंने रणविजय को उठा लिया तत्काल खुद को संयमित किया, किसी तरह गांधी जी उपस्थित लोगों को समझा पाये कि ‘यह सब तो होगा ही ताकि हम शान्ति स्थापित करने में असफल हो जायें।’
राममनोहर लोहिया कलकत्ता में ही थे, उन्होंने रणविजय के इलाज की व्यवस्था की तथा उन्हें अपने किसी दोस्त के यहां ठहरवा दिया। रामदयाल रणविजय के साथ हो लिए, भला वे रणविजय को कलकत्ता छोडकर वापस कहां आने वाले थे?
कांग्रेसी अध्यक्ष गांधी जी के आमरण अनशन तक कलकत्ता रहा, फिर वह पटना से होते हुए दिल्ली चला आया था, दिल्ली भी अशान्त हो गई थी। गांधी जी का आमरण अनशन जो सीधे तौर पर उपवास था, उसका अच्छा प्रभाव पड़ा, पर दिल्ली जो प्रथम स्वतंत्राता समारोह की दर्शक थी, उससे स्वतंत्राता की खुशियां छिन चुकी थीं, वहां खून बह रहा था, वही खून जिसे बचाने के लिए गांधी जी ने स्वतंत्राता संग्राम के दिनों में अहिंसा का रास्ता चुना था। दिल्ली में सहयोग सद्भाव के स्थान पर असहयोग सत्याग्रह के स्थान पर दुराग्रह वह भी धार्मिक राजनीतिक नहीं, सविनय अवज्ञा के स्थान पर रक्त रंजित अवज्ञा सारा कुछ प्रारंभ हो चुका था। कांग्रेसी अध्यक्ष गांधी जी की दुर्दान्त हत्या के एक माह पहले ही वापस लौट चुका था, उधर कलकत्ता से रामदयाल रणविजय के स्वस्थ होने के बाद लौटे। कांग्रेसी अध्यक्ष हर दूसरे, तीसरे माह दिल्ली जाया करता था। पहले तो उसने प्रयास किया था कि उसे संविधान सभा का सदस्य बना दिया जाय, बाद में उसने प्रयास करना आरंभ किया था कि उसे विधायकी का टिकट मिल जाये पर उसे मिला कुछ नहीं, किसी तरह उसे जिले की कांग्रेस पारटी की अध्यक्षी ही हासिल हो पाई। लेकिन वह चयनित अध्यक्ष नहीं था, उसे मनोनीत किया गया था। रामदयाल और रणविजय भी उसे अध्यक्ष के पद पर देखना चाहते थे यह भूल कर कि वह महत्वाकांक्षी अधिक है तथा उसके राजनीतिक सपने काफी रंगीन व मोहक हैं, जिनमें जनता के साथ जुड़ कर काम करने के लिए केवल सूनापन है।
इधर के सालों में कांग्रेसी अध्यक्ष पारटी की अन्दरूनी कलह से परेशान था। उत्तर प्रदेशके कांग्रेसी अध्यक्ष से जिले के कांग्रेसी काना-फूसी कर रहे थे किकृ‘वह सोशलिस्ट है तथा उसकी आस्था न तो कांग्रेस पारटी में है और न ही नेहरु में, आज भी वह सोशलिस्टों की जमात में सक्रिय है, उसकी डा. लोहिया से पटरी है।’
उसकी शिकायत तो पहले कानाफूसी में थी, लेकिन जब उत्तर प्रदेश की कांग्रेसी सरकार का गठन हो गया फिर तो कानाफूसी किसी आक्रामक शोर में बदल गई। वैसे भी विधायकी का टिकट हासिल करने में कांग्रेसी अध्यक्ष की ताकत का बंटाधार हो चुका था, उसके स्थान पर एक ऐसे आदमी को टिकट दे दिया गया था, जो प्रदेश के कांग्रेसी अध्यक्ष के काफी नजदीक था। कांग्रेस अध्यक्ष के पसन्द की दूसरी जगह थी ‘भइयाराजाकी कांस्टीच्युयेसी,’ जहां से भइयाराजाने टिकट हासिल कर लिया था। वैसे वह भइयाराजाके टिकट की खिलाफत भी नहीं करता, क्योंकि भइयाराजाका खजाना अंश मात्रा ही सही उसके काम आता था। जिले के कांग्रेसी राजनीतिक ताकत सूंघने में चतुर थे, उन्हें मालूम था कि उनका अध्यक्ष प्रदेश की पारटी या सरकार दोनों में उल्लेखनीय ताकत नहीं रखता तथा उसकी श्शक्ति के श्रोत सूख चुके हैं, फिर वह किस काम का?
ऐसी स्थिति में कांग्रेसी अध्यक्ष का विरोध होना बहुत ही सहज था, उसने रामदयाल को पकड़ा उस समय रणविजय दिल्ली में थे, उसने भइयाराजाका भी सहयोग चाहा, पर भइयाराजाउसका सहयोग करके खुद को फंसाना कैसे स्वीकारते? रामदयाल ने कांग्रेसी अध्यक्ष का साथ दिया तथा एक बार फिर उसे पद दान मिला। बाद में रामदयाल दिल्ली के लिए निकल पाये। क्योंकि रणविजय का मामला उनके लिए काफी महत्वपूर्ण था।
महल अपने कागजी काम निपटाने में मशगूल था, उसका मानना था कि कांग्रेसी होने के कारण उसके मुकदमे का रूख जीत के रूप में बदल सकता है। रामदयाल ने महल के सूत्रों से उन दिनों काफी संपर्क बढ़ा लिया था, ताकि वहां की खबरें उन्हें मिलती रहें। रामदयाल के लिए यह अचरज था कि भइयाराजाने उनसे कभी सम्पर्क नहीं किया, वर्ना पहले तो जुकाम होने की दवा के बारे में भी पूछा करते थे। शिकार वगैरह पर निकलते समय साथ में रामदयाल का न होना भइयाराजाको काफी अखरता था। रामदयाल भइयाराजाके मानसिक बदलाव को खूब समझने लगे थे, पर करते क्या? रणविजय तो दिल्ली में थे, दिल्ली आये तो फिर लौटे नहीं।
दिल्ली आने पर रामदयाल यह भूल गये कि वे दिल्ली में हैं। उन्हें लगा कि वे अपने घर में हैं तथा वहां रहने वाले सारे लोग उनके अपने हैं। लिली की ममा की आत्मीयता से वे काफी प्रसन्न थे, उन्हें लिली की ममा एक संस्कारित महिला जान पड़ीं, जब कि वे जानते थे कि वे आदिवासी परिवार समूह से हैं, जहां संस्कार की जड़ें कथित सभ्य समाज से अलग हैं। इसलिए उन्हें लिली की ममा की आत्मीयता देख कर काफी ताज्जुब हुआ। दूसरी तरफ लिली के डैड रामदयाल को पूरा आदमी जान पड़े, वर्ना वे तो मान कर चल रहे थे कि वे कम से कम आधा अंग्रेज तो होंगे ही, लेकिन लिली के डैड तो एक ऐसे आदमी थे, जिनके दिल-दिमाग से संस्कृतियां प्रशिक्षित होती हैं।
जिस दिन रामदयाल दिल्ली पहुंचे थे उस रात तो रामदयाल और रणविजय बातें करते ही रह गये थे, समझ में नहीं आया कि कब रात जमीन पर उतरी और फिर आसमान में टंग गई। रात को तो आसमान में टंगना ही था, नहीं तो सूरज जाने क्या करता?
रामदयाल ने महल का सारा किस्सा रणविजय को बताया, सिवाय उस बात के कि भइयाराजारणविजय को भाई ही नहीं स्वीकारते। यही बात कलक्टर ने भी उनसे बताया था। आखिर कैसे कहते इस बात को रामदयाल? चाहे बात सही रही हो या गलत, क्योंकि यह तो सच था कि दोनों भाइयों के बाप तो एक ही हैं। सो वे इस बात को दबा लिये थे।
इस्टेट के बंटवारे को लेकर रणविजय का रुख सकारात्मक नहीं था, जबकि रामदयाल का पक्ष बंटवारा था। बंटवारे के प्रति खामोशी या लापरवाही ठीक नहीं होगी भइयाराजाकी बेइमानी से पर्दा हटाना हर हाल में आवश्यक है पर रणविजय ने तो जैसे अपना मुंह सिल लिया था, आंखें फोड़ ली थीं एवं हाथों में हथकडियां पहन रखी थीं।
रामदयाल के लिए रणविजय का यह दूसरा रूप था। एक ऐसा रूप जो अवांक्षित त्याग को भी नैतिकता का मानक समझता है तथा दूसरा रूप जो था, वह तो था ही जिसे रामदयाल खूब महसूसते थे।
रामदयाल नैतिकता के पक्षधर थे, पर ऐसी नैतिकता की नहीं जो अवांछित व निहायत गैर जरूरी हो। लिली के डैड भी रामदयाल के विचारों के थे। पर लिली की ममा पूरी तरह रणविजय के फैसले के साथ थीं। उन्हें लगता कि लिली और रणविजय की इस्टेट की तरफ की वापसी कई तरह के विवादों को उपजा सकती है। वहां का सामाजिक मन जाति बिरादरी की संकीर्ण धाराओं में गुंथित है, वे हरदम सवाल दर सवाल खड़ा करेंगे कि लिली यह तो वह, लिली की ममा यह तो वह। अब उन्हें क्या मालूम कि भइयाराजापहले से ही रणविजय पर आरोप लगा रहे हैं कि वे उनके सगे भाई नहीं तथा दूसरी मां के है। इस तरह से लिली की ममा का सोचना ठीक था।
रणविजय का निर्णय किसी हठ की तरह था, जिसने रामदयाल को उद्वेलित किया था...कृवे मन के गहरे में उतरे ‘कहीं रणविजय को अपनी सच्चाई मालूम तो नहीं?’ जिसे भइयाराजारणविजय पर आरोपित कर रहे हैं। हो सकता है कि रणविजय मानसिक रूप से अपने सच के कारण अपमानित महसूस कर रहे हों कि बंटवारे की किसी कोशिश के साथ असली और नकली का तथ्य सभी के सामने आ जाएगा, फिर तो उन्हें ‘दोगला’ होने के राजवंश्ीय अपमान का शिकार होना पड़ेगा, किसिम किसिम की बातें लोगों के सामने जाएंगी निश्चित रूप से रणविजय जातिगत शुचिता जो एक आरोपित झूठ होता है, उसी में फंसे हुए है। सही अर्थों में दोगला कोई कैसे हो सकता है, दोगला का अर्थ जो समाज में प्रभावी है वही गलत है, रामदयाल सामाजिक मानस पर घिना उठे, वाह रे समाज!
‘मां तो सिर्फ मां होती है, वह न किसी जाति की होती है न धर्म की, औरत होने के कारण संतति के जन्म से अपना मानसिक पारितोषिक हासिल करने वाली चाहे वह संतति, विवाहित होकर हासिल करे या बिना विवाहित हुए ही, यह उसका अधिकार है विवाह को स्वीकारे या अस्वीकारे।’ ‘यह एक घृणित मामला है, कम से कम भइयाराजाको तो बुद्धि से काम लेना चाहिए था, उन्होंने घृणित ऐतिहासिक प्रवृत्तियों को दुहरा कर, अपना वर्तमान विवादास्पद बना दिया है।’
रामदयाल ने रणविजय को अपनी पूरी बौद्धिक क्षमता के साथ समझाने का प्रयास किया कि आज का समाज कानूनी समाज है, यहां कानून से ऊपर कोई नहीं और कानून का पक्ष उनके साथ है, उन्हें कुछ अतिरिक्त नहीं करना पड़ेगा, पर उनका रणविजय को समझाना अर्थहीन था। रणविजय थे कि खुद को या तो भाग्य के हवाले कर रहे थे या आत्महीनता के रोगी हो रहे थे। चाहे कुछ भी हो रामदयाल ने अपने को उस तरफ मोड़ा, जो सामान्यतया किसी चुप्पी की तरह सारहीन होता है। उनसे क्या मतलब? ‘रणविजय चाहे अपना पक्ष देखें न देंखे।’
लिली रणविजय की तुलना में आधुनिक थी, उससे उसकी पुरातनता गायब थी, रामदयाल ने महसूसा कि लिली रणविजय को हालांकि विवश नहीं कर रही, कि वे इस्टेट का अपना हिस्सा न छोड़ें, पर कहीं न कहीं रणविजय की अर्थहीन चुप्पी से वह परेशान थी। अपने अधिकारों को किसी नैतिकता के जाले में फंसाकर समझना कि माया-मोह से मुक्ति मिल गई और निःस्वार्थी होने का गौरव हासिल हो गया, यह एक किस्म का मनोरोग ही कहा जा सकता है। लिली का मानना था कि रणविजय का बंटवारे के यथार्थ से अस्वीकार उन्हें समय से टकराने की क्षमता का सम्यक उपयोग भी न करने देगा। वैसे बंटवारा रणविजय का व्यक्तिगत मामला है, ऐसी स्थिति में रणविजय पर दबाव बनाना मूर्खता के सिवा कुछ और नहीं।
लेकिन मैं किसी न किसी समय इस्टेट की तरफ आऊंगी जरूर, वह तो बहुत ही अच्छा हुआ कि जब महल में मैं थी मुझे कुछ न मालूम चला, रणविजय ने खामोशी साध लिया और मैं भाभी रानी के दुलार में उलझी गई थी। वैसे मुझे बार बार यह आभास हो ही जाता था कि महल की दीवारें जितनी मजबूत हैं, इसमें रहने वाले उतने ही कमजोर और लुज-लुज हैं। यहां की सारी चीजें और बातें सड़ान्ध फैलाने वाली है। सड़े हुए लोगों के बीच रहने वाला ताजा आदमी पहले बासी होगा फिर एक दिन सड़ जाएगा। मैं तो शिकार पर जाने के लिए जिद कर रही थी तथा वहां सारा कुछ किसी उत्सव की तरह महसूसना चाहती थी पर बच गई। वह जगह तो ऐसी है जहां सिर्फ और सिर्फ शोक मना कर आत्मदाह करने की कोशिश ही की जा सकती है कि सारा कुछ खत्म हो चुका है, न कुछ करने के लिए शेष है और न ही किसी अच्छी या बुरी कल्पना में ही डूबने लायक। निर्मम-मृत्यु शोक में डूबा हुआ जीवन, आक थू! यह भी कोई बात है?
रामदयाल ने लिली से खूब बातें की तथा समझने की कोशिश, कि लिली रणविजय का संपूरक है कि नहीं तथा पढ़ा- लिखा अंग्रेजी डैड और अश्क्षिित ममा के द्वन्दों का कोई रूपक तो नहीं, पर वह तो समय की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी, उत्साह और उमंग से पूर्ण, एक ताकतवर महिला। वे रणविजय में खो गये,
‘यह जितना चुप्पी पीने वाला दिखता है उससे अधिक वक्ता है, अपने अन्तर्मन से बतियाने वाला तभी तो लिली का चुनाव कर पाया।’
एक औरत दिल्ली में
रामदयाल दिल्ली जाकर महसूसने लगे कि वे आजाद दिल्ली देखें कि अब गुलामी के आतंक हैं कि नहीं, यहां की सडकों, गलियां और मकानों में से गुलामी की डायन की भयानक आवाजें अब नहीं निकलती होंगीकृअब तो हर जगह बसन्ती हवा बहती होगी, आंखों में रस-भरी बदरियां थिरकती होंगी और लोग होंगे कि अपने द्वारा प्रायोजित कर्तव्यों को पूरी स्वतंत्राता के साथ निपटा रहे होंगे।
रणविजय ने मुजफ्फर की कार निकाली, जो वास्तव में एक खूबसूरत और आकर्षक कार थी। रामदयाल की खटारा जीप अगर उसके साथ खड़ी हो जाये फिर तो कार का रंग ही फीका पड़ जाय। रामदयाल कार देखते ही रह गये, अन्ततः उन्होंने पूछ ही लिया ‘कब खरीदी?’
‘खरीदी नहीं यह कार, भारत विभाजन का पुरस्कार है और यह मकान भी जो कभी हवेली थी नवाब मुजफ्फर की बताया रणविजय ने।
‘विभाजन का पुरस्कार! समझा नहीं।’
समझने लायक इसमें है भी क्या? फिर रणविजय ने पूरा किस्सा सुनाया जो मुजफ्फर से जुड़ा हुआ था, जो भारत विभाजन की त्रासदी था, क्योंकि मुजफ्फर पाकिस्तान जाना नहीं चाहता था। यदि मां और बेगम की जिदों के प्रति वह लापरवाह हो जाता फिर तो यहीं रह जाता।
अंग्रेज हाकिम तो इस कार पर कभी बैठता ही नहीं था, कार देखते ही वह मुजफ्फर में खो जाता सोचने लगता कि मुजफ्फर ने उसे उपहार देकर तमाचा मारा है। रणविजय कार में बैठते, उसे चलाते तथा मुजफ्फर को याद करते कि निराश व हताश आदमी जो कर सकता है वही किया मुजफ्फर ने, सो निराशा के कर्तव्य का सम्मान किया जाना चाहिए जिसमें किसी प्रतिफल की चाहना ही नहीं होती।
रणविजय ने कार का फाटक खोला और रामदयाल के लिए इशारा किया कि वे चलायेंकृरामदयाल ने इनकार कर दिया ‘नहीं उनके वश का नहीं, वे कार नहीं चला सकते, यह दिल्ली है, जो सभी को अनुमति नहीं देती कि कोई ऐरा गैरा उसकी सड़कों पर कार दौड़ाये।’
विवश होकर रणविजय ड्राइविंग सीट पर बैठे और रामदयाल उनकी बगल वाली सीट पर। दिल्ली की सड़क पर मुजफ्फर की कार दौडने लगी जो सीधे संसद भवन की तरफ जा रही थी, पाकिस्तान में होती तो वहां की संसद भवन की तरफ जाती। वैसे पाकिस्तानी या भारतीय समय पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा था, केवल इतना हुआ था कि दंगे रुक गये थे, दंगों के व्यापारी अपनी-अपनी खोलों में दुबक लिये थे। आम जनता जो स्वतंत्राता के रंगीन सपनों में डूबी हुई थी वह फिर आज़ादीके बाद दूसरे सपनों में डूब गई कि अब हर तरफ प्रकाश ही प्रकाशहोगा,देश के कोने-कोने में रोटियां बिखरी हुई मिलेंगी, भूख को भी अपनी आत्महत्या की तैयारी करनी पड़ेगी। कार सीधे संसद भवन जा पहुंची, बिना किसी जाम या सडक पर होने वाली दूसरी यातनाओं के न कहीं ट्रैफिक पुलिस वालों ने कार रोका, न हीं किसी थाने के दरोगा ने। यहां तक कि कोई उचक्का भी नहीं मिला जो कार रोकता तथा कार में सवार होकर रणविजय की कनपटी पर रिवाल्वर लगा देता फिर किसी तानाशाह की तरह गुर्राता...कृ
‘घुमाओ कार, उस तरफ जहां अंधेरा हो और तुम दोनों को लूटा जा सकता हो तुम्हारे पास ऐसी हैसियत नहीं जो इस तरह की कार पर चलो।’
कुछ भी नहीं हुआ। कार संसद भवन के पास थी अपनी विशेष गरिमा के साथ जैसे किसी शौकीन मंत्राी की हो। संसद उस समय स्थगित थी, वहां भयानक किस्म का सूना-पन था। रामदयाल की चाहना थी कि वे स्वतंत्रा संसद की कार्यवाही देखें तथा समझने की कोशिश करें कि वहां कानून कैसे बनाये जाते हैं, वहां की होने वाली बहसों का रूख क्या होता है? लेकिन संसद सत्रा तो स्थगित था, ऐसी स्थिति में यही समयानुकूल था कि वे लोग अपने क्षेत्रा के सांसद से ही मिल लें। फिर वे लोग सांसदों के आवासों की तरफ थे यह पूछते हुए कि यू. पी. के सांसद किधर रहते हैं।
सांसद जी अपने आवास पर हैं कि नहीं यह दुविधा थी, यानि हो भी सकते हैं और नहीं भी, हो सकता है अपने स्थाई आवास पर हों, क्योंकि उनका जुड़ाव दिल्ली से काफी पुराना है। उनके बाप दादा दिल्ली के प्रभावशाली लोगों में थे, अंग्रेजों के जमाने में अंग्रेजी कानून पीछे चला करता था और उनके पुरखे उसके आगे-आगे। उन्हें जम्हाई आती थी तो आला हाकिम नींद में चले जाते थे। लेकिन सांसद ने 1942 में ही अपनी खानदानी परंपरा को लतिया दिया और गांधी जी की लंगोटी और छड़ी को जमाने का ब्रह्मास्त्रा मान लिया कि अंग्रेजों के पास इसका विकल्प नहीं।
सांसद जी तो चाहते थे कि उन्हें दिल्ली के पड़ोसी प्रदशों से ही टिकट मिले पर वे इस दौड़ में काफी पीछे पड़ गये, क्योंकि बहुत सारे लोग थे जो दिल्ली अपनी पीठ पर खाद की बोरी की तरह बांध कर चला करते थे, आवश्यकता पड़ने पर खाद की बोरी भी दिया करते थे, इस मामले में सांसद थोड़ा कमजोर था, वह जब समझता कि बोरी खोलनी चाहिए तभी देखता कि वहां खुली हुई तमाम बोरियां हैं। फिर वह अपने में डूब जाता कि राजनीति में अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है फिर वह राजनीति का पहाड़ा याद करने लगता।
मालूम हुआ कि सांसद जी आवास पर नहीं हैं, लेकिन बहुत ही कम समय पर वे आवास पर होंगे। आवास पर एक जरूरी बैठक है जो एक घंटे बाद प्रारंभ होगी, उनके क्षेत्रा के कलक्टर भी उसमें शामिल होंगे।
रामदयाल असमंजस में पड़ गये, क्योंकि कलक्टर का ट्रांसफर नहीं हुआ था, वही कलक्टर था जिसने भइयाराजा की बातें बताया था। क्या हुआ यदि वही है तो वह रणविजय को अच्छी तरह जानता पहचानता है। हां उसे सन्देह हो सकता है कि शायद मैंने उसकी बातें जो भइयाराजाके बाबत थीं रणविजय को बता दी हों, लेकिन रामदयाल असमंजस से श्शीघ्रबाहर निकल लिये।कृ
रणविजय की किसी से मिलने की योजना नहीं थी। वे रामदयाल के साथ थे, उनके सामने कोई दूसरा आवश्यक काम भी नहीं था, सो वे समय दे सकते थे तथा सांसद की प्रतीक्षा कर सकते थे। रामदयाल के लिए भी प्रतीक्षा करना ही उचित था। सांसद आवासों के पास में ही एक चायखाना था, जो स्वतंत्राता की लहर से प्रभावित जान पड़ता था। चायखाना बहुत हसीन नहीं था फिर भी बदसूरती से ऊपर था। वहां बैठे लोग खादी के कपड़ों में थे, कुछ के सिर नहीं दीखते थे, उनके सिरों पर आड़ी तिरछी गांधी टोपियां थीं तथा सिरों का गंजा-पन नहीं दीख रहा था। सारे लोग अपनों जैसे जान पड़ रहे थे।
चाय का दूकानदार एक वाचाल आदमी था, वह बात-बात पर बक-बक करता तथा किसी भी बात को काफी खींचता। उसके पास राजनीतिक व्यवहार की चंचल भाषा थी, उसने रामदयाल और रणविजय को देखते ही आमंत्रित किया...
‘आइए सर! आइए सर आपका स्वागत है,’ इतना वह बोल ही पाया था कि दो जन और आ गये जो खादी के कुर्ता-धोती में थे, उनके सिर खाली थे, वहां टोपियां नहीं थीं, सामान्यतया वे लोग नव गान्धीवादी दिख रहे थे जो गान्धी टोपी को किसी बोझ की तरह समझते थे।
दूकानदार ने अपनी बोली को आगन्तुकों के अनुसार बदलाकृ
‘आइए पधारिए महोदय! आपका स्वागत है।’
‘बोलिए क्या सेवा करूँ?’ इसी तरह दूकानदार सभी से पूछता था। तथा खुद सामने खड़ा हो जाता था। उसकी विशेषता थी कि वह भी खादी के कपड़े में लिपटा हुआ था, उसे कुर्ता पाजामा में देखना अच्छा अनुभव था। रामदयाल ने दिल्ली आते समय अपना पैंन्ट शर्ट उतार दिया था, अक्सर वे यही करते थे। लेकिन रणविजय पहनावे को नकल मानते थे वे नहीं समझ पाते थे कि व्यक्तित्व निर्माण में भूषा की कितनी जरूरी भूमिका है। उन्हें सहज लगता सो वे अंग्रेजों की तरह शर्ट और पैंट पहनते, वैसे भी उन्हें धोती पहनना नहीं आता था। उनका सोचना था कि धोती टांगों को नहीं ढंक पाती, सो नंगी टांगे भद्दी दीखती हैं।
विदेशी कपड़ों से रामदयाल तथा रणविजय दोनों को नफरत थी, सो वे लोग कांग्रेस में शामिल होने के बाद से ही खादी पहनने लगे थे। रणविजय भी खादी में ही थे फिर भी दूकानदार नहीं समझ पाया कि वे कांग्रेस के कार्यकर्त्ता हैं, उसने समझा कि रामदयाल जैसे नेता के साथ कोई अधिकारी है तथा वह नेता जी को चाय पिलाने के लिए यहां आया है, सो उसने सर संबोधित किया नहीं तो महोदय कहता-वैसे स्वतंत्राता के बाद दिल्ली में महोदय और मान्यवर तथा श्रीमान् जैसी हिन्दी, संसद भवन ही नहीं कार्यालयों तक में घुस चुकी थी, जो कभी सर हिज हाईनेस जैसे अंग्रेजी विशेषणों से दबे हुए थे। यह अच्छी शुरूआत थी जो स्वतंत्राता के बाद महसूस की जाने लगी थी।
चायखाने में अंग्रेजी साम्राज्यवाद की गन्ध कहीं नहीं थी, जो एक अच्छी बात थी फिर भी यह तो था ही कि वहां गांवों के कीचड़ और गोबर माटी या सावन की पहली वारिश वाली मिट्टी की सोन्धी गंध भी नहीं थी, वहां स्वतंत्राता का ताजा वर्तमान था, मुस्कुराता हुआ, जो गुलामी के लम्बे संघर्षों के बाद हासिल हुआ था।
रामदयाल ने काफी पीते हुए रणविजय को स्वतंत्राता की उपलब्धियों की तरफ खींचा...कृ ‘अब तो हम स्वतंत्रा है?’ शायद यह स्वतंत्राता हमें इस लायक बना दे कि हमें आदमी होने पर शर्म न महसूस हो’
‘संभव है,’ रणविजय ने बताया, लेकिन खतरे भी कम नहीं क्योंकि स्वतंत्रा रहना हमारी आदत नहीं, हमें हमेशा एक चतुर चरवाहे की आवश्यकता रहती है, कि हमें वह किसी मजबूत डंडे से हांकता रहे।’
‘हां ऐसा तो है आज भी हम चरवाहों की ऐसी नस्लें नेता व अधिकारी के रूप में हर जगह देख सकते हैं।’
इसी तरह की ढेर सारी बातें रणविजय और रामदयाल ने कीं, और पता ही नहीं चला कि एक घंटा गुजर गया ‘अब तो सांसद जी आ गये होंगे।’
‘हां आ तो जाना चाहिए’
चलिए चला जाय कहते हुए रामदयाल ने चाय के दूकानदार से पूछा..कृकृ ‘कहिए मान्यवर! कितना भुगतान करने के बाद हम अपने को मुक्त समझें।’
‘केवल काफी ही तो ली है आप लोगों ने, सिर्फ एक रुपया, यानि कि दो अठन्नियां मांग कर दूकानदार रामदयाल की तरफ देखने लगा, जैसे पूछना चाह रहा हो कि कहां से पधारे हैं, दिल्ली आने का उद्देश्य क्या है? लेकिन उसने कुछ पूछा नहीं।
कुछ देर बाद रामदयाल और रणविजय सांसद आवास पर थे। सांसद का आवास दूसरे तल्ले पर था, वह एक छात्रावास जैसा स्थान था। छात्रावासों वाली चहल-पहल वहां थी पर सादगी भी कम न थी यानि लम्बाई में फैला हुआ, जिसमें कमरे दर कमरे। वहां बताया गया कि सांसद जी कलक्टर के साथ मीटिंग में हैं।कृ
रामदयाल ने बताने वाले को अपना नाम बताया...कृकृ
‘जाओ बोलो, हमारे पास अधिक समय नहीं तुरन्त सांसद जी बाहर आयें, उन्होंने रामदयाल का अभिवादन किया और रणविजय का भी।
‘अरे आप लोग यहां, भीतर आ जाना चाहिए था’
‘भीतर जाना आसान बनायेंगे तब न ये सज्जन फिर पहरेदारी काहे कर रहे हैं?’
भीतर कलक्टर था कलक्टर भइयाराजा के हाई कोर्ट वाले मुकदमे के संबंध में आया था। उसे सांसद जी से जानना था कि वह सरकार को किस तरह का उत्तर दे, हाई कोर्ट ने राजस्व सेक्रेटरी और मंत्राी जी को जवाबदेही के लिए निर्देशित किया है। अभी तक उस विवादास्पद परिक्षेत्रा में जमीनदारी विनाश अधिनियम लागू नहीं किया गया है।
कलक्टर को यह अनुमान नहीं था कि वह जब सांसद जी के यहां होगा, ठीक उसी समय रामदयाल और रणविजय भी वहीं आ जायेंगे। ये दोनों जन कांग्रेस पारटी के प्रभावकारी व आक्रामक लोग थे तथा हमेशा महसूसते थे कि सरकार उनकी है तथा अधिकारी गण मात्रा कर्मचारी हैं व उन्हें आज्ञाओं के अनुपालनों की विशेषज्ञता हासिल है। रामदयाल और रणविजय को देख कर कलक्टर प्रथम द्रष्टया सकपकाया जैसे उसकी कोई चोरी पकड़ी गई हो, पर सांसद जी तो तटस्थ थे, उनके चेहरे पर पद की दृढ़ता थी। सांसद जी ने कलक्टर को उकसाया...कृ
‘आप बात जारी रखें, आखिर सरकार क्या चाहती है? भइयाराजा भी कांग्रेसी विधायक हैं फिर सरकार उनके विपरीत तो कुछ करेगी नहीं।’
‘यही तो समस्या है सांसद जी! राजस्व मंत्राी जी ने साफ-साफ कहा है कि उत्तर प्रदेश का कोई भी क्षेत्रा जमीनदारी विनाश की कार्यवाही से नहीं बचना चाहिए, चाहे वह क्षेत्रा भइयाराजा का ही क्यों न हो।’
‘आखिर कैसे करेंगे वहां जमीनदारी विनाश? जब वहां ‘रिकार्ड आफ राइट्स’ ही नहीं तैयार किये गये हैं।’
‘हां यही सबसे बड़ा इस्सू है।’
रामदयाल और रणविजय ओढ़ी हुई खामोशी में थे। उन्हें क्या पड़ी जो कुछ बोले-लेकिन सांसद जी खामोश नहीं थे उन्होंने पूछा...कृकृकृ
‘वहां फारेस्ट का क्या हुआ? एक दिन डी.एफ.ओ. आया था, बोल रहा था आपकी तरफ से कोई आदेश जारी नहीं हुआ, नहीं तो फारेस्ट का सीमांकन हो गया होता।’
‘सीमांकन तो राजस्व भूमि का भी होना है, माननीय मुख्यमंत्राी जी का मौखिक आदेश है कि सीमांकन का काम वन विभाग को ही दे दिया जाय।’
‘भाई! आप देख लीजिए, जमीन का मामला काफी पेचीदा होता है, राजस्व भूमि का सीमांकन तो राजस्व मंत्राी जी को कराना चाहिए आप करायें, आप राजस्व के सर्वेसर्वा हैं।’
‘लेकिन कैसे? मुख्यमंत्राी जी चाहें तब न। कलक्टर ने अपनी विवशता बताया’
बोलिए! आप मुझसे किस तरह की अपेक्षा करते हैं, प्रदेश सरकार के मामलों में मैं कुछ भी न कर पाऊँगा। मैं अपनी सीमायें जानता हूँ। आप वहीं किसी से संपर्क करें। नहीं तो जैसा राजस्व मंत्राी जी कह रहे हैं वहीं करें, हाई कोर्ट तो किसी को छोडने वाली नहीं।
थोड़ी देर में कलक्टर चला गया फिर सांसद जी ने रामदयाल और रणविजय को घेरा। कलक्टर ने सांसद जी को मीटिंग के पहले ही बता दिया था कि भइयाराजा रणविजय को इस्टेट में कुछ नहीं देने वाले। सांसद जी को अचरज लगा था, नहीं ऐसा नहीं होगा। कलक्टर के जाने के बाद सांसद ने सारा कुछ साफ-साफ बता दिया कि वह अब अपने स्तर से भइयाराजा का पक्ष लेने वाला नहीं।
रामदयाल और रणविजय मना करते रह गये कि वे लोग कल दुबारा आ जाएंगे पर सांसद कहां मानने वाला था फिर वे लोग सांसद के स्थायी आवास पर थे। आवास किसी भव्य ईमारत की रूप में कम से कम एक एकड़ की जमीन पर खड़ा था। भवन के आगे-पीछे अगल-बगल चारों तरफ खाली जमीन थी जो पानी और आदमियों के श्रम की बदौलत किसी पार्क का आभास देती थी। आवास के अगल-बगल फूलों की मुस्कुराहटें बिखरी हुई थीं, जो कलियां थीं, उनका कौमार्य भी देखने लायक था। उन्हें देख कर साफ लगता था कि श्रम की खरीद का उपयोग कुशलता से किया गया है। रणविजय और रामदयाल के लिए भी सांसद का आवास अद्भुत लगा किसी खूबसूरत महल को लजवाता हुआ। कोई भी सामान्य आदमी उस भवन को देख कर महल या हवेली ही कहता, पर उसका नाम हवेली नहीं था, क्योंकि उसे किसी राजा ने नहीं बनवाया था वह व्यवसायी का था।
रामदयाल और रणविजय का सांसद ने खूब स्वागत किया। खाना खिलाने के बाद ही सांसद ने उन लोगों को छोड़ा। तथा आमंत्रित किया कि जब संसद का सत्रा प्रारंभ हो वे लोग एक बार फिर आवें। रणविजय को तो उसने उलाहा भी, आप यहीं हैं और कभी भी नहीं मिले। अगला आम चुनाव भी आ गया, और आप लोगों ने यह नहीं महसूसा कि अपने सांसद से मिलना चाहिए। रामदयाल ने सांसद से साफ बताया कि कौन बिना किसी काम के दिल्ली आये। हां रणविजय को आते रहना चाहिए वे यहीं रहते हैं।
सांसद से भइयाराजा और रणविजय के बटवारे के बारे में कोई बात नहीं हुई। रणविजय को तो बात करना ही नहीं था और रामदयाल ने बंटवारे को अपने मन से बाहर निकाल दिया था कि अब उसके बारे में कुछ भी नहीं सोचना।
रामदयाल की उत्सुकता थी कि वे बनारस के बारे में सांसद से पूछें। राममनोहर लोहिया वाले समाजवादी दल के नेतृत्व में हरिजनों ने जो विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश किया था, कई समाजवादियों को लाठियां लगी थीं, बनारस के राजनारायण को काफी चोटें आई थीं, उनकी एक टांग टूट गई थी। बनारस में हिन्दू बनाम अहिन्दू का मुद्दा उठ खड़ा हुआ था। एक आश्रमी सन्त ने दूसरा विश्वनाथ मंदिर बनवाने की घोषणा की थी। क्या बनारस की वह घटना संसद में भी उठी? फिर संसद का क्या रूख है उसके बारे में? ये जो हिन्दू और अहिन्दू का मामला है आखिर कब तक चलेगा? अब गांधी जी भी तो नहीं रहे जो हरिजनोद्धार कार्यक्रम चलायेंगे। स्पृश्य और अस्पृश्य का मामला आज तो कांग्रेस पारटी की सूची से गायब है। पर जाने क्या सोच कर रामदयाल ने सांसद से बनारस की घटना के बारे में कुछ भी नहीं पूछा।
वैसे भी सांसद क्या बताता? वह एक व्यवसायी था तथा राजनीतिक पद सांसद का उपयोग अपने व्यवसाय के हित में करने के लिए पारटी में आया था। वह एक चालाक आदमी था तथा राजनीति के आधार स्तम्भों जो टिकट वगैरह या मंत्राी आदि बनाया करते हैं उनकी आंखों में धूल झोंक सकता था तथा अपने राजनीतिक समर्पण को हसीन बना सकता था कि लोग हसीनी पर झूम-झूम जाते। वही हुआ, उसे पारटी का टिकट मिला और वह अब सांसद है, यही हाल विधान सभा का भी था। रामदयाल विधान सभा के कुछ सदस्यों को देख कर महसूस करने लगे थे कि विधान सभा में दो तरह के चेहरों का जमावड़ा है, एक चेहरा तो उन लोगों का है जिसे अंग्रेजी जेलों की यातनाओं ने बनाया है दूसरा चेहरा उन लोगों का है जो अंग्रेजों के तलवे चाटा करते थे। जेल छाप कांग्रेसी आज जहां भी है, जिस हाल में है, उनकी जेब में यातनादाई कोई न कोई जेल अवश्य है, लेकिन तलवाचाट कांग्रेसियों की बात दूसरी है उनके दिल दिमाग में किसी मजबूत सत्ता प्रभु के दोनों हसीन तलवे ही हैं। वे लगातार कोशिश में रहते हैं कि उन्हेें मौका मिले फिर वे तलवा चाटना प्रारंभ करें। चिकने तलवे तो हर काल में होते ही हैं। ये तलवे मुगल काल में जितने महत्वपूर्ण और परिणामकारी थे, उतने ही अंग्रेजी काल में भी। आज़ादीके बाद भी उनकी ताकत में किसी तरह की कमी नहीं आई, बल्कि तलवा चाटना काफी सुविधाजनक भी हुआ कि हर आमोखास को आज़ादीहै कि वह तलवा चाटे और वर्तमान को अपने अनुकूल बनाये। संसद की तरफ आने और सांसद से मिलने की योजना रामदयाल ने बनारस की घटना मन्दिर में हरिजन प्रवेश के मुद्दे को विस्तार से जानने के लिए ही बनाया था पर सांसद से मिलने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि उस सांसद से क्या पूछना? जिसने जेल नहीं देखा, बर्फ की सिल्ली पर जिसे लिटाया नहीं गया, किसी अंग्रेजी सिपाही ने अपने डंडे से जिसकी पीठ और खोपड़ी का भूगोल ही नहीं नापा, वह क्या बताएगा बनारस की घटना के बारे में, एक ऐसी घटना जो कांग्रेस पारटी ही नहीं, सरकार को भी किसी राजनीतिक मजाक में तब्दील कर रही हो कि देखो! तुम्हारे गांधी कहां हैं? उनका हरिजनोद्धार कहां हैं? नागरिक समानता कहां है?
बहुत कुछ विचार कर रामदयाल ने खुद को रोक लिया था और सांसद से कुछ नहीं पूछा था। सोचा अवश्य था कि दिल्ली से लौटने के बाद वे गांधी जी की तर्ज पर सामूहिक भोज का आयोजन अवश्य करेंगे तथा गन्दी बस्तियों की सफाई का भी। उन्होंने बनारस की घटना पर रणविजय से विस्तार से बातें की, रणविजय ने आश्वासन भी दिया कि वे और लिली, दोनों उसमें शामिल होंगे।
रणविजय को सांसद का व्यवहार काफी शालीन और शिष्टता पूर्ण लगा जबकि वह धन दौलत की परतों से ढंका हुआ था वहीं रामदयाल को सांसद के व्यवहार में अंग्रेजी नाटकीयता दिखी थी जो आज्ञाकारिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धतायें प्रदर्शित कर रही हो। फिर भी सांसद एक व्यावहारिक आदमी, उन लोगों को जान पड़ा था जो व्यवहार को भी रुपयों में बदल सकने की क्षमता रखता हो।
गांधी जी के समाधि स्थल पर जाने का प्रोग्राम दूसरे दिन था, लिली और उसके डैड को भी वहां आना था, सो रणविजय सीधे घर पर आ गये। लिली और उसके डैड, किसी काम से निकले थे। लिली की ममा घर पर थीं तथा रणविजय और रामदयाल की प्रतीक्षा कर रही थीं। उनके स्वास्थ्य में सन्तोषजनक सुधार था। घर पहुंचते ही उन्होंने रामदयाल को टोका...कृ
‘पंडित जी! कहां देर कर दी आप लोगों ने?’
लिली की ममा रामदयाल को पंडित जी ही पुकारतीं। उनके पुकारने में गांव होता, पंडितों को खास तौर से दिया जाने वाला सम्मान होता। रामदयाल ने महसूसा कि लिली की ममा से गांव अलग नहीं हुआ है। उनका अतीत अपने चुनी हुई अच्छाइयों के साथ उनके पास है। रामदयाल ने लिली की ममा को रोका भी कि ‘मुझे रामदयाल ही पुकारा करें, मुझे काफी भला लगेगा, उससे आपकी निश्छल आत्मीयता मेरे साथ होगी जो लिली और रणविजय को उपलब्ध है।’
‘नहीं, आत्मीयता तो आपके साथ है ही, वह आपकी है, लेकिन पंडित जी पुकार कर मुझे लगता है कि मैं किसी अपने को संबोधित कर रही हूं जो आदमी को आदमी समझता है, जाति बिरादरी वाला नहीं।’
‘आप लोग खाना तो खा लीजिए, फिर उन्होंने रणविजय से कहा कि इन्तजाम करवा दीजिए लिली की ममा पूरी तरह स्वस्थ होतीं तो शायद खाना खुद परोसतीं, पर उन्हें मनाही है कि अभी सात-आठ दिन तक और उठना-बैठना बन्द रखें। सो उन्होंने रणविजय को सहेजा।कृ
वे लोग तो पहले से ही खाना खा कर आये थे फिर भी रणविजय ने रामदयाल को पुकारा। वे ना, नू करते रहे पर रणविजय और लिली की ममा का आग्रह ठुकरा नहीं सके।
डाइनिंग टेबुल पर देहाती थाली में खाना रखा था, खाना पूरी तरह ब्राह्मणी था, पूडियां, कचौडियां, कोहड़े की सब्जी, मिर्च और नमक, साथ में खटाई भी, खाना देख कर रामदयाल अचरज में थे, रात में भी पूडियां कचौडियां और दिन में भी, लिली की मां अभी तक भूली नहीं है कि ब्राह्मण कच्चा खाना, चावल दाल, रोटी वगैरह सभी बिरादरी वालों के यहाँ नहीं खाते।कृ
रामदयाल खाना देख कर ठिठके थे, एक तो बहुत अधिक था, तथा दूसरा उन्हें सीधे तौर पर ब्राह्मण बनाया जा रहा था जिसे वे कब का भूल चुके थे। वे अपने को ब्राह्मण मानते भी नहीं थे तथा कर्म-कांड के किसी आडम्बर का निर्वाह भी नहीं करते थे, वे खुद को कुजात मानते जिसकी कोई जाति ही न हो, वे रणविजय को देखने लगे।
रणविजय तो जानते थे कि रामदयाल ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मण नहीं हैं और उन्होंने उनके खाने के बारे में ममा से कुछ कहा भी नहीं था। ममा ने अपनी मर्जी से ही ऐसा बनवाया होगा। रणविजय ने अपनी सफाई दी तब रामदयाल ने खाना आरंभ किया कि वे ममा से बोलेंगे।
लेकिन ममा क्या बतातीं कि उन्होंने पूडियां क्यों बनवाई, उन्हें तो पूडियां ही बनवाना था, वे अपना धर्म नहीं बिगाडने वाली थीं, उन्होंने दिल्ली में रहते हुए भी खुद को परिवर्तित नहीं किया था, वे गांव की थीं, गांव उनके भीतर था, जैसे गांव कोई स्वर्ग हो, जिसे ब्राह्मणों का संरक्षण मिलता हो, जो देवताओं के प्रतिरूप होते हैं, ब्राह्मण कच्चा खाना खाएगा तो सृष्टि का नाश हो जाएगा, उन्हें अपनी नहीं सृष्टि बचाने की चिन्ता थी, वे कर्मकांडों में डूबी हुई विवेक व बुद्धि का न उपयोग करने वाली ऐसी महिला थीं जो दया की पात्रा थीं, निश्छल, विकार रहित गांवों की दूसरी औरतों की तरह।
खतरनाक आदमी
रामदयाल रोपित पंडित-पना में रात भर डूबे रह गये थे। उन्हें लिली की ममा द्वारा बनवाई गई पूड़ियों ने रात भर सोने नहीं दिया। पूड़ियां कड़ाही में छनती रहीं तथा हजारों साल का ब्राह्मणवाद उनकी आंखों में उछलता-कूदता रहा। क्या वस्तुतः ब्राह्मणवाद ही जांत-पात का विभाजन करता है? स्पृश्य अस्पृश्य बनाता है, खाना छुआता है, पानी छुआता है, मन्दिर छुआता है? रामदयाल ब्राह्मणवाद के चिन्तन में जो उलझे तो उलझे ही रह गये। मनुस्मृति उनके लिए सहज और सुलभ किताब थी उन्होंने मन बनाया कि वे उसे अवश्य पढ़ेंगे, ब्राह्मण ग्रन्थों को तो वे हासिल भी नहीं कर सकते तथा वेदों की रहस्यात्मकता व उसके रूपकों को समझना उनके वश का नहीं।
किताबों के अलावा रामदयाल के लिए सामाजिक संरचना का ताना-बाना था जिसे वे पढ़ व गुन सकते थे तथा उस ताने-बाने में से एक ऐसा आदमी निकाल सकते थे जो सिर्फ आदमी हो, न छूत न अछूत, न हिन्दू न मुसलमान। ऐसा करना रामदयाल के लिए अपनी पुनर्निमिति होती। वे ऐसा कर भी रहे थे उन्हें अपना बचपन याद आया।
मां हमेशा संस्कृत के श्लोकों को रटवाती, खास तौर से प्रार्थनाओं में काम आने वाले श्लोकों को, वे उन्हें रटना नहीं चाहते, उनके लिए किसी प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं था। मां डांटती, फटकारती, ‘तू ब्राह्मण है, तुझे श्लोक भी याद नही’ं उन्हें लगता कि मां ब्राह्मणों को परिभाषित कर रही है कि जिसे श्लोक याद होता है वही ब्राह्मण होता है।
रामदयाल श्लोकों की दुनिया से बाहर थे तथा ऐसे लोगों को देख रहे थे जो श्लोकों से बाहर रहते हुए भी सामाजिक अन्तरविरोधों से टकरा रहे थे।
‘तूं जनेऊ नहीं पहनता, तथा खान-पान में भी वही सब करता है जो ब्राह्मणों को नहीं करना चाहिए, तुम्हारे पिता कम से कम इसका तो ध्यान रखते हैं।’
रामदयाल की मां अक्सर इसी तरह के निर्देश जारी करतीं तथा एक ऐसे भगवान का डर पैदा करतीं जो अपनी उचित पूजा-अभ्यर्थना न होने के कारण कुपित हो सकता है जिसका परिणाम भयानक से भयानक हो सकता है।
रामदयाल अपनी मां को समझने की कोशिश करते। उनकी मां उदार और आश्वस्त मां थी। उनका अधिकांश समय ऐसी प्रार्थनाओं में गुजरता जो संस्कृत के शब्द समूह होते। उन्हें मां अच्छा स्वर देतीं जो कर्णप्रिय होते, कभी-कभी तो अपने अर्थ खोते हुए पर वे मां की उस आध्यात्मिक उत्साह को विश्लेषित न कर पाते कि वे ऐसा क्यों करती हैं। उनकी पत्नी भी मां से कम नहीं, वह भी मां की परंपरा की विशेष उत्पाद जैसी थीं तथा प्रार्थनाओं से अपना जीवन संवारने का सपना देखती थीं। रामदयाल ने पत्नी के उत्साह को कभी रोका नहीं यह मान कर कि इससे नुकसान भी क्या है?
लेकिन एक दिन समय पलटा, उन्होंने देखा कि कुछ थालियां रसोई से बाहर निकाली जा रही हैं तथा बाहर वहां रखी जा रही थीं, जहां पहले से ही कई थालियां थीं, बाहर रखी हुई थालियां, उनके काम आती थीं, जिनकी जातियां सामाजिक रूप से अछूतों की श्रेणी की होती थीं तथा वे उनकी खेती का काम किया करते थे। दरअसल हुआ यह था कि रामदयाल का एक मित्रा बम्बई से आया हुआ था तथा वहां वह अम्बेडकर की नीतियों के प्रचार-प्रसार का काम करता था, वह एक अच्छा विचारक था तथा आदमी के पक्ष में बोलता था। वह भी उत्तर प्रदेश का ही रहने वाला था, पेट के लिए बम्बई रहता था तथा किसी कारखाने में फोरमैन था। रामदयाल ने पत्नी को सूचित नहीं किया कि उनका मित्रा किस जाति का है, सो खाना रसोई की थाली में ही परोसा गया। दूसरे दिन वही थालियां रसोई से बाहर निकाल कर फेंक दी गईं ज्योंही उनकी पत्नी को मालूम हुआ कि उनका मित्रा अछूत बिरादरी का था।कृ
रामदयाल अपना गुस्सा न रोक सके फिर तो घर में हंगामा हो गया, एक ऐसा हंगामा जो उस समय किसी को भी हसा सकता था तथा पत्नी का पक्ष मजबूत हो सकता था।
‘आखिर क्या बुरा किया थाली बाहर निकाल कर, लेकिन रामदयाल अपने फैसले पर दृढ़ थे तथा अपने घर में ही टकरा रहे थे जो सामान्यतया मुश्किल काम होता है।’
रामदयाल ने अनशन प्रारंभ कर दिया कि वे अन्न और जल नहीं ग्रहण करेंगे।’
एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन, पांच दिन गुजर गये, उन्हें मुश्किल जान पडने लगा कि वे अनशन की दृढ़ता संभाल नहीं पायेंगे, कहीं न कहीं से वे कमजोर होने लगे, लेकिन फिर भी वे अपने फैसले को टूटने से बचाने में सफल रहे। साथ ही साथ वे अपनों की पहचान करने में भी लगे थे कि उन्हें कौन संभालने आ रहा? पत्नी थीं कि वह उनके अगल-बगल मँडराती रहतीं, वह अपनी वेदना को आंखों से स्पष्ट करतीं, भरी-भरी आंखें साफ साफ संस्कारगत विवशताओं को स्पष्ट करतीं, पर उनकी विवशताओं का वहां कोई पाठक नहीं था। वहां तो उन्हीं की तरह का थोड़े भिन्न किस्म का रचनाकार था, रामदयाल के रूप में, और वे पत्नी की संस्कारगत विवशताओं को पढ़ कर अपने फैसले को स्वतः गलत तो न साबित करते और अनशन तोड़ देते।
पांचवां दिन रामदयाल के लिए काफी हास्यास्पद था। पहले के चार दिन तो यूं ही गुजर गये, कुछ उल्लेखनीय नहीं हुआ पर पांचवा दिन!कृपांचवां दिन तो ऐसे आया जैसे वह खुद ही तर्कशास्त्राी हो, रामदयाल के संस्कार-द्रोही साबित करता। रामदयाल के ससुर ही नहीं, फूफा और बहनोई भी सभी सामने थे, सभी ब्राह्मण थे तथा ब्राह्मण होने के गौरव से पूर्ण भी। वे संस्कारी ही नहीं, संस्कारों को बचाये रखने के प्रयासों वाले लोग थे। उनके ससुर ने रामदयाल को खूब खूब लताड़ा, वे फटा फट श्लोक पढ़ते फिर अर्थात...यह तो वह, ‘गोया वे श्लोकों द्वारा पुष्ट करते कि छूआछूत का व्यवहार करना धर्म की रक्षा करना होता है।’
रामदयाल के पास अपने ससुर के श्लोकों के विपरीत अर्थों वाले श्लोकों का अभाव था। शायद हैं भी नहीं, उनके पास कबीर और रैदास के कुछ दोहे थे, जिनका वजन ससुर द्वारा उद्धृत किए गये श्लोकों से काफी भारी था, पर वे संस्कृत जैसी देव-भषा में नहीं थे। सो ससुर का पक्ष वहां उपस्थित ब्राह्मणी संस्कारों के अनुपालकों के लिए काफी महत्वपूर्ण था। पर रामदयाल तो उस समय उन पंडितों से कोई विमर्श ही नहीं करना चाहते थे। क्योंकि वे जानते थे कि पंडित रटन्तू होता है, वह मूर्ति-पूजा के साथ-साथ किताबें ही नहीं व्यक्ति को भी पूजने लगता है। वे चुप थे तथा चुप्पी को लगातार बचाये हुए थे, लेकिन कब तक चुप रहते, उन्होंने थोड़ा गुस्से में कहा...कृकृ.
‘भोजन करना न करना उनका अपना मामला है, इससे किसी से क्या मतलब? मेरा मानना है कि ब्राह्मण कभी भी कर्म-कांडी संस्कारों से खुद को नहीं बचा पाएगा, यदि उसे बचना है तो ब्रह्म-रूपी समाज से सीखना होगा जिसे कर्मकांडी ब्राह्मणों ने कई विनाशकारी खानों में बांटा हुआ है।’
‘कम से कम मेरे घर में तो ऐसा नहीं चलेगा, मेरे लिए कोई छूत या अछूत नहीं है। मेरे अनशन तोडने का एक ही आधार हो सकता है कि इसी घर में मेरे गांव के सारे अछूत, मेरे साथ भोजन करें और आप लोग भी उसमेें शामिल हों नहीं तो मुझे अपनी मौत स्वीकारने दीजिए। ब्राह्मण तो वह है जो मनुष्यता को जाने, किसी किताब को नहीं, ब्राह्मण का आचरण ही किताब है।
रामदयाल के बैठका में बैठे उनके सभी रिश्तेदार चकित थे, ‘ऐसा तो कोई पतित ही बोल सकता है।’ रिष्श्तेदार उनकी पतनशीलता को निन्दनीय ही नहीं हास्यास्पद भी समझ रहे थे पर रामदयाल अड़ गये तो अड़ गये, उनकी पत्नी को अपने पति की सारी शर्तें स्वीकार्य थीं, सो वही हुआ जैसा वे चाहते थे।
लेकिन ब्राह्मणों की जमात ने उन्हें जाति से बाहर कर दिया, वह तो बाद में कुछ ऐसा हुआ कि धीरे-धीरे एक एक ब्राह्मण उनसे जुडने लगे फिर तो अब किसी को कोई एतराज नहीं कि उन्होंने कभी क्या किया था? रणविजय रामदयाल के परिवर्तित एवं नये ढंग से निर्मित होते व्यक्तित्व से परिचित थे लेकिन लिली की मां को क्या पता कि वे सिर्फ नाम के ब्राह्मण हैं उसे ओढ़ते-बिछाते नहीं, तथा एक मनुष्य की तरह रहते हैं। अपने दिमाग को ब्राह्मणी कर्म-कांड व पाखंड की कोई किताब नहीं बनाते जो साफ तौर से भेदभाव की अप्राकृतिक वर्जनाओं के सूत्रों को अभिव्यक्त करती हों।
दूसरा दिन फुर्सत वाला था, उसमें किसी प्रस्तावित काम का तनाव न था। वह साफ-साफ था तथा उसका उपयोग बकाया कामों के लिए भी किया जा सकता था। रणविजय ने अपने मित्रा के स्वागत के लिए अपने सारे कामों को स्थगित कर दिया था। सुबह उठते ही सूरज की किरणों के साथ रणविजय लिली के मां के कमरे में घुसे, यह मानकर कि वे जग चुकी होंगी तथा लिली के डैड दिन भर के कामों का ब्योरा निश्चित कर रहे होंगे।
लिली की ममा जग चुकी थीं तथा खाना बनाने वाली को सुबह के नाश्ते का मेनू बता रही थीं, कचौडियां बनाओ, उरद की दाल का आटा है, उसे भिगो लो फिर उसमें जीरा, इलायची, नमक, मंगरइल और जवाइन, सारा कुछ मिला लो। मिलाते समय सारा समान दिखा लेना, थोड़ा भी कम अधिक हुआ तो स्वाद बिगड़ जाएगा, खीर तो जैसा बनाती हो, वैसी ही बनेगी ही। मालपूआ वाली सूजी को दूध में भिगो लेना तथा नरम आंच पर उसे छानना।
रणविजय उस समय ममा की श्रद्धात्मक तत्परता से अविभूत थे कि अभी भी अतिथि का सम्मान कायम है। सो वे ममा के निर्देशों को जो वे खाना बनाने वाली औरत को बता रहीं थी ध्यान से सुनने लगे थे।
रणविजय ने मेनू सुनकर, लिली की मां को रोका।कृ
‘नहीं! ममा, आप नहीं जानतीं कि रामदयाल जी सिर्फ ब्राह्मण ही नहीं, वे एक भले आदमी हैं तथा भेद-भाव, छुआ-छूत जैसी बिमारियां उनमें नहीं। लगातार पूडियां खाकर वे परेशान हैं, कल तो खाना ही नहीं चाहते थे, कह रहे थे कि ममा ऐसा काहे सोचती हैं। वे सादा खाना खाएंगे, रोटी, दाल, चावल, अगर सत्तू वाली बाटी नाश्ते में हो तब फिर क्या कहने?
अरे! पूडियां नहीं कचौडियां बन रही हैं, उरद की दाल वाली, मीठी-मीठी चटपटा लिए, जलेबियां बाजार से आ जाएगीं। लिली की मां ने बताया और आश्चर्य किया क्या वे जात-पांत नहीं मानते, वैसे यह बहुत अचरज वाली बात है।
लिली के डैड, उस समय योगासन कर रहे थे। वे नंगे बदन तो न थे पर देह का आधा हिस्सा आर.एस.एस. के कैडरों की तरह खुली हवा में था। सघन सफेदी वाली देह पर खाकी की हाफ पैंट अच्छी लग रही थी, ऊपर की शर्ट जो कम्युनिस्टों के सुरक्षित लाल रंग की थी, वह तो अपने अच्छा होने से अधिक अच्छा थी, देखने में था कि वहां अच्छा के सिवाय भद्दे के लिए कोई स्थान न था। साठ के आस-पास वाले लिली के डैड पचासा के भीतर जान पड़ रहे थे जैसे उनकी उम्र आगे बढने की जगह पीछे की तरफ भाग रही हो। वे योगासन का अभ्यास पूरा करके सीधे उस तरफ आये जहां लिली की ममा और रणविजय थे। उन्होंने हस्तक्षेप किया..
‘काहे का मन्सौदा बन रहा है भाई! मैं भी तो जानू! क्यों लिली की ममा! लिली कहां हैं? वह तो अभी नींद में होगी, रात में दो बजे तक पढ़ेगी और सुबह दस बजे जगेगी। उसे जगाओ रणविजय!’
अंग्रेज हाकिम ने रणविजय से फिर पूछा... रामदयाल जी को दिल्ली नहीं घुमा रहे हो क्या? बातें जारी थीं, फिर यह भी था कि रामदयाल ने ब्राह्मणी संस्कारों से खुद को मुक्त कर लिया है। अंग्रेज हाकिम जानता था कि रामदयाल के पिता भी, हालांकि वैभव पीने वाले आदमी थे पर थे काफी सरल और सहज, वे अप्राकृतिक शान,शौकत के प्रदर्शन से परहेज करते थे।
‘फिर तो वही संस्कार रामदयाल का भी होगा!’
जमीनदारी टूटने के बाद, अब उनकी क्या हालत है? राजस्व का सहारा तो छिन गया!
‘सारा राजस्व सीधे सरकारी खजाने में जमा होता होगा? क्या उन्होंने आमदनी का दूसरा क्षेत्रा पकड़ा है?
कई तरह के सवाल अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल के बारे में रणविजय से एक साथ पूछा। रणविजय ने अंग्रेज हाकिम को सारा कुछ बताया भी ‘नहीं रामदयाल का दिमाग तिजोरी संस्कति और रोब-दाब की तपन से बाहर है, वे रुपयों के बिस्तरों पर सोने वाले नही हैं, न ही डंडों व बन्दूकों की भषा में अपने व्यक्तित्व का दमनकारी प्रचार-प्रसार करते हैं, सो उन्होंने जान-बूझ कर, नोटों, चांदी व सोने के दूसरे आर्थिक परिक्षेत्रों से खुद को कभी नहीं जोड़ा। उन्होंने अपनी क्षमता का उपयोग सामाजिक कार्यों के संपादन की तरफ केन्द्रित किया हुआ है, लोगों के बीच रहना, उनके दुख दर्दों को बांटना तथा कामना करना कि सभी को दो जून का खाना तो अवश्य मिले।’
लिली की ममा ने रणविजय को फिर महल का सारा हाल सुनाया जहां उन्होंने पांच साल तक अपनी मां के साथ काम किया था। अंग्रेज हाकिम महल की बाहरी क्रिया-प्रतिक्रियाओं से तो वाकिफ था, पर महल के भीतर की दुनिया से वह परिचित नहीं था। रणविजय हालांकि महल के थे, महल में ही उनकी परिवरिश भी हुई थी फिर भी उन्हें महल की भीतरी रहस्यमय दुनिया का पता नहीं था।
महल में एक से एक रहस्य थे जो महल की दीवारों से बाहर नहीं जा पाते थे। सारे रहस्य वहीं जन्म लेते और घुट-घुट कर मर जाते। लिली की ममा ने यह भी बताया कि महल का भविष्य निश्चित रूप से किसी न किसी ब्राह्मण के दिमाग से जुड़ा होता है, वह ब्राह्मण महल के लिए देवता जैसा होता है तथा खुद को ज्योतिषी कहलवाना प्रतिष्ठा परक मानता है।
एक बार महल का ज्योतिषी आया और उसने भइयाराजा की कुंडली देखा जिसे उसने ही बनाया हुआ था और घोषित किया कि किसी न किसी दिन भइयाराजा ‘राजा’ अवश्य बनेंगे, वही हुआ भइयाराजा ‘राजा’ बन ही गये। भइयाराजा के राजा बनने के पहले उसी ज्योतिषी ने तुम लोगों के पिता को बताया था कि वे भी राजा बनेंगे, पर वे कभी राजा नहीं बन पाये। उस समय लिली की ममा काफी छोटी थीं, पर इतनी बड़ी थीं कि उन्हें सारी बातें याद थीं, तुम लोगों के पिता को राजा बनने के लिए ज्योतिषी ने कई तरह के क्रिया-कर्म को बताया था, जिसमें एक क्रिया ऐसी थी जो काफी हास्यास्पद और घृणित थी। लिली की ममा की मां तो उस क्रिया को हस-हस कर बतातीं तथा कहा करती थीं कि बड़े लोग अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग न करके बहुत ही घृणित तरीके से किसी ब्राह्मण को अपना सारा कुछ मान लेते हैं, जाने क्यों वे ज्योतिषियों पर यकीन करते हैं तथा वे जैसा जैसा कहते हैं, वही करते हैं। ज्योतिषी ने तुम लोगों के पिता को बताया था कि वे महल में किसी अनजान लडकी को ले आयें, जिसकी उम्र सोलह साल से कम हो। लेकिन दिन में नहीं रात में। रात भी पूरी काली हो, अमावस्या वाली, महीना चैत्रा का हो, महल से निकलते समय कोई उन्हें न देख पाये। जिस घोड़े से जांये वह एकदम काला हो, उस पर किसी दूसरे रंग के चकत्ते न हो। काली रात में ही उस लडकी को महल में लाना होगा, जाते समय शरीर पर कपड़े भी काले हों।
ज्योतिषी ने यह भी निर्देशित किया कि वह उस दिन महल पर ही होगा तथा कुछ दूसरे तरह का अनुष्ठान करेगा।
लिली की ममा उस रहस्यमय किस्से को तोड़-फोड़ कर बताने लगीं। किसी कुशल वाचक की तरह कि उसकी रहस्यात्मकता पूरी तरह सुरक्षित रहे। मां बताती थीं कि चैत्रा की अमावस्या के दिन ज्योतिषी महल पर आया, उसका जोरदार स्वागत किया गया। उसके द्वारा किये जाने वाले अनुष्ठान को गोपनीय रखना था, सो उनकी मां का चुनाव किया गया, लिली के ममा की मां रणविजय के पिता महाराज की खासम खास थीं, वे उन पर विश्वास करते थे।
मां ने ही ज्योतिषी के लिए अनुष्ठान में काम आने वाले सामानों को जुटाया, जैसे काली गाय का घी, दूध, उसका गोबर व मूत्रा, इसके अलावा काला तिल, कौए की पांख तथा काले घोड़े की नाल। ज्योतिषी ने रात में अनुष्ठान आरंभ किया। वह अपने साथ मानव खोपड़ी का एक कंकाल रखे हुए था। कुछ दूसरे किस्म की हड्डियां भी थीं, जिसे पहचानना मुश्किल था कि वे किसी जानवर की थीं या मनुष्य की। ज्योतिषी ने महल के बाहर वाले आँगन की जगह अनुष्ठान करने के लिए पहले ही निश्चित कर दिया था। वहां की मखमली घासों की सफाई करके दो चारपाई का स्थान बना लिया गया था। जमीन की काली गाय के गोबर से पुताई कर दी गई थी, वहीं छोटा सा हवन कुंड भी बना दिया गया था। ज्योतिषी ने जब प्रस्तावित क्रिया कर्म करना प्रारंभ किया ठीक उसी समय महाराज महल से बाहर निकले, उस समय वे काले कपड़े में किसी प्रेत जैसा दीख रहे थे। कुछ देर बाद जाने कहां से एक लडकी को घोड़े पर बिठा कर महाराज महल ले आए।
अब लडकी महल में थी। जिस समय महाराज को महल के एक गुप्त कमरे में लडकी के साथ होना और सोना था तथा ठीक तीन बजे ही हवन कुंड पर आकर ज्योतिषी के निर्देशानुसार हवन करना था। उसी समय ज्योतिषी को भी एक ऐसी लडकी के साथ होना और सोना था जो मासिक धर्म के शारीरिक व्याकरण की जानकार न रही हो। ऐसी अबोध लडकी ज्योतिषी के साथ पहले से ही थी। ज्योतिषी नाम से ज्योतिषी था तथा स्वघोषित एक ऐसा श्शक्तिषाली था जिसके द्वारा निर्देशित क्रियायें करने पर कोई अपना भविष्य अपने अनुकूल बना सकता था। गोया वह एक तांत्रिक था जो भविष्य को नियंत्रित कर सकता था। वह ज्योतिषी रूपी तांत्रिक खान-पान में विशेष ध्यान रखता था। उसका खाना धुली लकड़ी की आंच से पकता था तथा वह किसी का छुआ खाना नहीं खाता था। उसी की तरह से बहुत सारे ब्राह्मणों को लिली की मां ने महल में रहते हुए देखा था, सो वे डरा करती थीं कि भविष्य का नियंत्राक ब्राह्मण पर्याप्त सेवा न किये जाने पर श्राप दे सकता है। सो वे रामदयाल की सेवा का हर संभव ख्याल रख रही थीं।
रणविजय को महल में रहते हुए भी यह वृत्तान्त न मालूम था, महल की कहानियों का यह गोपनीय हिस्सा था। रणविजय तो यह भी नहीं जानते थे कि उनकी मां कौन थीं? लिली की ममा के बताने पर मालूम हुआ कि रणविजय की मां वही अज्ञात लडकी थी, जो उनके पिता द्वारा महल में लाई गई थीं। जिनका जीवन महल में कैद होकर रह गया था, उन्होंने महल के बाहर हवा, पानी, धूप, कुछ नहीं देखा था। वे मां भी बन गई, उनके पिता फिर भी राजा नहीं बन पाये, लिली की मां जब भी उस किस्से का ख्याल करती हैं, हंसी से लोट-पोट हो जाती हैं।
हालांकि उस समय यह अनावश्यक था बताना कि महल की रहस्यात्मकता में सारा कुछ खोया रहता है, वहां जो होता है वही और उतना ही नहीं होता, कभी-कभी तो होने के ठीक विपरीत भी होता है। ऐसा होता है जिसके गवाह महल की मजबूत दीवारें होती हैं, दीवारों में ईंट की चुनाई ही नहीं, वफादारों की आज्ञाकारिता भी चुनी होती हैं तथा उनकी विशेषता होती है महल के रहस्यों को और रहस्यमय बनाना।
महल की कुलबुलाती रहस्यमयता लिली की ममा को तभी से हिलाने व झकझोरने लगी थी जबसे उन्होंने सुना था कि रणविजय को महल से निर्वासित कर दिया गया है। वे सोचने लगीं थीं कि रणविजय को सारा कुछ बता देना चाहिए, संभव है उनको अपने बारे में तथा अपनी मां के बारे में कुछ भी मालूम न हो। भइयाराजा को तो उनकी अम्मा रानी ने सारा कुछ बता ही दिया होगा, तभी तो उन्होंने रणविजय को महल से निर्वासित करने का फैसला लिया है। लेकिन रणविजय को कौन बताता, उनकी अम्मा रानी तो बहुत पहले ही मर गई थीं जब रणविजय बहुत ही छोटे थे। यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि रणविजय के पिता महाराज उनकी मां का काफी सम्मान करते थे तथा कभी भी उन्होंने उन्हें दूसरी रानी नहीं समझा, जैसा कि आम तौर पर हुआ करता है। रणविजय की अम्मा भी गजब की महिला निकलीं, वे भइयाराजा की अम्मा रानी का काफी ख्याल रखतीं, खुद उनके सिर पर तेल मालिश करतीं तथा सारा श्रंृगार-पटार भी, उनके आदेश के अनुपालन में हर समय खड़ी रहतीं।
‘तो सत्तू की बाटी में क्या है? पक जाएगी, बाटी का सारा सामान जाकर ले आओ, पुरानी दिल्ली के पास ही कहीं मिलेगी, थोड़ी उपलियां भी ले लेना, मैं अब ठीक हो गई हूं बना दूंगी।’ अंग्रेज हाकिम बाटी का स्वाद जानता था, जिसे राजा- महाराजा भारतीय खाने के रूप में कई बार उसे खिला चुके थे, लेकिन नौकरी छोडने के बाद फिर उसे बाटी खाने का मौका नहीं मिला। उसने भी बाटी प्रस्तावित किया।
बाटी का सारा सामान आ गया फिर बाटी बनी, लिली की ममा ने अपने सामने ही बाटियां बनवाया, सभी ने खाया, बाटियां ठीक बनी थीं, पूरी की पूरी घी में डूबी हुई, साथ में आलू, टमाटर और भंटे का भरता, रामदयाल को जान पड़ा कि वे अब पीछे की तरफ लौट आये हैं तथा ब्राह्मण-पना जो उनकी देह से चिपका हुआ था, गोइठे की आंच में जल चुका है। सामने ही बैठी हुई थीं लिली की ममा, लिली भी तैयार होकर वहीं बैठ गई थी। सामने गोइठे का ‘अहरा’(भठ्ठी) जल रहा था, उसकी धुंधुआती आग अपनी रफ्तार में थी, बाद में उसमें तपिश ही बची रह गई थी, जिसे गोल-गोल बांटिया पूरी ताकत से सोख रही थीं।
रामदयाल को अपनी मां का ख्याल आया, उन्होंने पाया कि लिली की ममा और उनमें कोई उल्लेखनीय फर्क नहीं, लेकिन जो छुआछूत का फर्क था वह यहां नहीं दिख रहा, वही स्नेह, वही दुलार, खाना बनाने वाली औरत ही बांटियां पका सकती थी फिर भी लिली की ममा बाटियां पका रही थीं। लिली ने खाना परोसने का इन्तजाम किया तथा भर्ता बनाया, गोया यह केवल आधुनिक ही नहीं रामदयाल ने लिली को किसी अचरज जैसा देखा और पूछाकृ‘खाना वगैरह बना लेती हो क्या?’
‘हां और नहीं तो क्या? ममा बचपन से ही सिखाया करती थी कि आत्मनिर्भर बनो, पैरासाइट नहीं, खाना पकाना आत्म-निर्भरता के पहले पाठ की तरह मुझे जान पड़ता है। खाना तो डैड भी अच्छे से बना लेते हैं, खास तौर से अंग्रेजी खाना, लेकिन वे अब भारतीय खाना ही खाना चाहते हैं।’
महात्मा गांधी की समाधि पर रामदयाल, रणविजय, अंग्रेज हाकिम और लिली दूसरे वक्त पहुंचे। मौसम सुहाना था, बादलों के चकत्ते आसमान पर साफ-साफ चिपके हुए थे। दिल्ली की प्रभुसत्ता की संप्रभुता आसमान में कहीं नहीं दीख रही थी, वहां प्रकृति का रहस्यमय खेल चल रहा था। बादल का एक टुकड़ा तेजी से आता, सामने के कमजोर टुकड़े को निर्वासित कर खुद वहीं जम जाता, कहीं से थोड़ी जगह बचती उसमें सूरज अपनी आधी अधूरी ताकत के बल पर दाखिल हो जाता। गांधी जी की समाधि के ठीक ऊपर बादल का मटमैले रंग वाला एक चकत्ता आसमान पर था और नीचे गांधी जी की समाधि थी। समाधि के ठीक सामने किसी पर्यटक की तरह रामदयाल और रणविजय खड़े थे। अंग्रेज हाकिम लिली को गांधी जी के बारे में बता रहा था, कि उनके बारे में अंग्रेजी सरकार क्या सोचा करती थीकृ
दुनिया का सबसे ‘खतरनाक आदमी’, जो जेल और बन्दूक से नहीं डरता था, जिसके लिए धन दौलत और वैभव किसी काम का नहीं, जिसका व्यक्तित्व किसी संगठन और फौज से बड़ा था, जो खुद अपने आप में एक महादेश ही नहीं संस्कृति और सभ्यता भी था।’
रामदयाल और रणविजय तो समाधि स्थल तक पहुंच कर नोआखली की भूल रही स्मृतियों में खोये हुए थे तो क्या गांधी जी के साथ उनके विचारों की भी प्रायोजित हत्या की जा रही है?
कहीं आप कामरेड तो नहीं!
गांधी जी के समाधि स्थल पर रामदयाल के बीते दिन उन्हें चिढ़ाने लगे, जब कि रणविजय भविष्य के सपनों में थे। उधर अंग्रेज हाकिम लिली के सामने स्वतंत्राता संग्राम के उन हस्तक्षेपों को प्रस्तुत कर रहा था जो गांधी जी की उपयोगिता को ऐतिहासिक आवश्यकता बनाते थे।
रामदयाल अपने नाम के पहले पंडित शब्द का प्रयोग नहीं किया करते थे, उन्हें वह शब्द चिढ़ाता था। हाल के दो तीन सालों में इस शब्द ने उन्हें कई बार बौना बनाया था, खास तौर से जब वे जनता के बीच में हुआ करते थे। एक दो बार जब वे कुछ स्थानों पर केवल पंडित होने के कारण ही बुलाए गए थे तथा पंडित यानि कि ब्राह्मण होने के कारण उनकी विदाई किसी अनुष्ठानिक ब्राह्मण की तरह की गई थी, तब उन्हें काफी अपमान महसूस हुआ था। एक तो वे किसी अनुष्ठान की वास्तविकता पर यकीन नहीं करते थे, दूसरा था कि वे अनुष्ठान की किसी क्रिया को जानते भी न थे। उन्हें जो आमंत्राण दिया गया था, उसका कारण सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मण होना था। इस प्रकार रामदयाल के लिए पंडित शब्द केवल शब्द भर ही नहीं रह गया था वह छुत-अछूत, स्वीकार्य-अस्वीकार्य का मानक भी बन गया था। जब कि व्यावहारिक रूप से वे सिर्फ एक आदमी भर थे, प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद, जो अन्य जीवों के मुकाबिले बुद्धि व विवेक वाला होता है।
रामदयाल ने महात्मा गांधी की समाधि को साक्षी मानकर, भीतर-भीतर संकल्प लिया कि वे जाति सूचक शब्दों का प्रयोग कभी नहीं करेंगे चाहे जो भी हो। दूसरी ओर रणविजय थे कि भविष्य के लिए कुछ नया करने के लिए सोच रहे थे। किताबों के अनुवाद के अलावा वे नया क्या कर सकते थे! यह उनके लिए स्पष्ट नहीं था। महात्मा गांधी की समाधि पर फूल वगैरह चढ़ाने के बाद उन लोगों ने महात्मा गांधी की प्रार्थना दुहराया। प्रार्थना दुहराते ही मौजूदा कांग्रेस पारटी और सरकार जो कांग्रेस की ही थी दोनों बिल्कुल अलग-अलग जान पड़े। कांग्रेस पारटी की कार्य संस्कृति से जनान्दोलन जैसी बातें बाहर होने लगी थीं, उनमें सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे कार्यक्रम नहीं थे, केवल सरकार थी, सरकारी घोषणाएं थीं, सरकारी घोषणाओं में बेरोजगारी का समापन था, सबको शिक्षा का नारा था तथा समाज को समानता के दर्जे पर पहुंचाने की कर्णप्रिय बातें थीं। सरकार के मुकाबिले पारटी कहां थीं, पारटी क्या करने वाली थी, यह सारा काम धाम संसद सदस्यों या विधानसभा सदस्यों को टिकट देने तक सिकुड़ चुका था। कांग्रेस पारटी के विपक्षी थे कि वे लगातार कांग्रेस पारटी पर आरोप दर आरोप लगा रहे थे।
गांधी जी की समाधि जो कांग्रेसी संघर्ष की गाथा थी तथा अपने भीतर एक ऐसे आदमी को समेटे हुई थी जो पूरा के पूरा आंदोलन था, जो अंग्रेजी साम्राज्य के समापन का अहिंसक हथियार था। उनकी समाधि अन्य समाधियों की तरह समय की भयानक चुप्पी में थी तथा वहां वही माहौल था जो किसी पूज्य स्थान का होता है, जहां पूजा ही आवश्यक होती है, कुछ भजन हो जाये, कुछ फूल चढ़ा दिये जायें, मात्रा इतना ही।
समाधि गांधी जी की थी, जैसे उनकी यादें और उनकी शिक्षाओं को वहां किसी इतिहास में डूबे रहने के लिए दफना दिया गया हो। रामदयाल के लिए वहां की स्थिति काफी कष्टकर थी, वहां की चुप्पी निराश व हताश करने वाली थी, उन्हें लगा कि गांधी जी के क्रान्तिकारी विचारों को यहां दफना दिया गया है। वे एक छोटे आदमी हैं सो पूरे देश के बाबत क्या कर सकते हैं? उनकी कार्यक्षमता भी इतनी नहीं कि वे गांधी के विचारों को देश स्तर पर व्यवहृत करने के लिए प्रयास कर सकें। उन्हें लगा कि गांधी इस खूबसूरत समाधि स्थल तक सिमटा दिये गये हैं, एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब वे कहीं भी न रहेंगे।
रामदयाल ने मानसिक तौर पर अपना माथा पीट लिया और फैसला लिया कि वे अब खामोश नहीं रहेंगे। अपने क्षेत्रा के लिए जितना संभव हो सकता है करेंगे। जिले के कांग्रेसियों में रणविजय व रामदयाल ही ऐसे लोग थे जो स्वतंत्राता संग्राम के लिए मिलने वाली धनराशि जो पेंशन के रूप में थी, लेने से इन्कार कर दिया था। कलक्टर को लिखित रूप से दे दिया था कि उन्हें पेंशन की आवश्यकता नहीं, जब कि बहुत सारे ऐसे थे जो पेंशन लेने के लिए रात-दिन एक किए हुए थे। स्वतंत्राता संग्राम के दिनों में ऐसे लोग भी थे जो अपराधों को अपना व्यवसाय माना करते थे, उन्हें भी पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जेल भेजा था उनकी पीठ पर भी स्वतंत्राता संग्रामी होने की मुहर लगी थी। वे हर जायज नाजायज तरीका अख्तियार कर पेंशन के हकदार बन चुके थे, रामदयाल ने ऐसे गलत कामों का विरोध करना चाहा था पर न कर पाये थे, लोगों का कहना था किसी की रोजी-रोटी चल रही तो आप आड़े क्यों आ रहे, फिर तो वही हुआ जो लोग चाहते थे।
गांधी जी की समाधि से ज्योंही वे लोग लौटना चाहे, ठीक उसी समय सौ डेढ़ सौ लडकों और कुछ सयाने लोगों का एक जत्था, समाधि स्थल तक आ धमका। जत्था क्रान्तिकारी नारा लगा रहा था, ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं,’ ‘धन-धरती बंट कर रहेगी,’ इसी तरह बहुत कुछ था जत्थे के नारों में, जत्था, एक संयमित जत्था था जो कतारबद्ध था, जो पंक्तियों में बंटा हुआ। अंग्रेज हाकिम लिली, रणविजय और रामदयाल, पास वाले पार्क में एक ऐसी जगह बैठ गये, जहां से जत्थे की गतिविधियों को देखा जा सकता था।
जत्था आन्दोलन की गरिमा से भरा हुआ था। सारे लोग एक दूसरे से बढ़ कर थे। उनके कपड़े भिन्न-भिन्न थे पर अधिकांश चमकदार कुर्ता-पाजामा में थे, उनके सिरों से गांधी टोपियां गायब थीं फिर भी उन्हें देखना उस आभास को देखना था जो उन्हें नेता बनाते थे। अन्तर सिर्फ यह था कि वे नेताओं की नई नस्ल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनमें एक नौजवान लडका नारा लगाता फिर पूरा जत्था उसे उसी स्वर तान में उस नारे को दुहराता। अंग्रेज हाकिम को ही नहीं रणविजय, रामदयाल व लिली, सभी को वह प्रदर्शन ऊर्जा से भरपूर लगा, फिर भी सन्देह हुआ और सवाल भी क्या प्रदर्शन को अपना लक्ष्य हासिल हो सकेगा?
जत्था गांधी जी की समाधि तक आकर पंक्तिबद्ध होकर अगल-बगल, आगे-पीछे बैठ गया। जत्था पांच मिनट के लिए मौन में चला गया। जत्थे में से एक आदमी उठा, उसके हाथ में एक पर्चा था, उसने पर्चा पढना आरंभ किया।कृ
परचा एक शपथ पत्रा था, जिसका आशय था कि वे समाज और सरकार दोनों को बदलने का काम पूरी निष्ठा के साथ करेंगे। परचे में सरकार पर हमला था कि हमें इस सोई हुई सरकार को जगाना है, सरकार के पास कान ही नहीं, उसे नहीं मालूम कि सरकार देश के संविधान की अवज्ञा कर रही है। मूलाधिकारों को ठुकरा रही है।
परचे के अन्त में घोषणा थी...कृकृ
घोषणा में था कि पूरा जत्था गांधी जी की समाधि स्थल पर तब तक बैठा रहेगा जब तक सरकार उसे आश्वस्त नहीं करती कि पांच एकड़ की जोत का राजस्व नहीं लिया जायेगा तथा उतनी सीमा तक का राजस्व संग्रहणीय नहीं है, इसके साथ ही इस बात पर भी जोर था कि किसानों व भूमिधारियों द्वारा किये जाने वाले जन-सत्याग्रहों, जन-आन्दोलनों व जन-प्रदर्शनों को सरकार लाठी-डंडे की ताकत से नहीं रोकेगी तथा सरकार हर हाल में अपने प्रदर्शन व अपने कार्य-व्यवहार से साबित करेगी कि वाणी की स्वतंत्राता हर हाल में सुरक्षित रहेगी।’
परचा पढने वाले ने घोषणा के बाद पांच-पांच लोगों का जत्था बनाया जो समाधि स्थल पर अनशन पर बैठ गया। इस नारे के साथ कि आमरण अनशन तब तक नहीं तोड़ा जाएगा जब तक जत्थे की मांगें मान नहीं ली जातीं। बहुत लम्बे अंतराल के बाद अंग्रेज हाकिम पुराने भारतीय शासन के चरित्रा को देख रहा था, एक ऐसे भारतीय शासन का जो बदलने की इच्छाश्शक्ति ही नहीं रखता, तभी तो यह प्रदर्शन। वह अंग्रेजी साम्राज्यवाद की दमनकारी सरकारी कार्य पद्धति में कहीं खो गया। भारत ने अपने आप को फिर क्या बदला? क्या केवल सरकार ही बदली है सरकार का चरित्रा नहीं? अंग्रेज हाकिम के लिए ही नहीं, रणविजय और रामदयाल के लिए भी यह दुखद स्थिति थी।
जत्थे के लोग बिहार के थे, वहां की प्रान्तीय सरकार ने किसानों के शान्तिपूर्ण प्रदर्शन पर लाठीचार्ज करवाया, सैकड़ों को जेलों में ठूस दिया, घायलों की चिकित्सा भी नहीं करवाया, पांच दिन बाद जेल में बन्द किसानों की रिहाई की गई, लेकिन तीन किसान नेताओं को कहां बन्द रखा गया है, इसके बारे में कोई खबर नहीं।
स्वतंत्रा भारत में होने वाली इस घटना ने भारत की स्वतंत्राता को संदिग्ध बना दिया था। जत्थे के लोग जब अनशन पर बैठ रहे थे तभी रामदयाल को जान पड़ा था कि उन्हें भी जत्थे के साथ हो लेना चाहिए पर यह क्षणिक भावुकता थी सो उन्होंने खुद को उससे विस्थापित किया और सीधे रणविजय से पूछा...‘कैसा लग रहा है? अभी भी हम 1947 के पहले वाले भारत के हैं।’
‘हां, बिल्कुल वैसे ही’
अंग्रेज हाकिम ने हस्तक्षेप करते हुए जोड़ा...कृकृ
‘शायद बाद में, स्वतंत्राता के लम्बे अन्तराल के बाद महसूस होने लगे कि पुराना भारत ही ठीक था। आओ चला जाये, लिली की ममा प्रतीक्षा कर रही हांेगी, शायद डाक्टर भी आया हो।’
गांधी समाधि-स्थल के बाहर मुजप्फर की कार थी, प्रतीक्षा करती हुई, वे सभी लोग कार तक आये, उसमें सवार हुए, फिर कार चल पड़ी।
लिली की ममा प्रतीक्षा करतीं मिलीं। वे बाहर लान में बैठी हुई थीं। हवेली के पीछे के घरों की दो औरतें उनके साथ बैठी हुई थीं। वे इस्लाम मानने वाली थीं तथा बतिया रही थीं कि वे पाकिस्तान जाना चाहती हैं, जहां उनके रिष्तेदार हैं। एक का दामाद वहां रहता था, दूसरी का वहां मायका था, पर बीजा नहीं बन रहा। बनेगा भी तो काफी रुपया लगेगा जो उनके पास नहीं। नबाब साहब के जाने के बाद उनके मर्द बेकार हो गये हैं किसी तरह से सड़क के किनारे ठेला लगाते हैं, ठेले पर ही कबाब वगैरह बनाते हैं, बिक्री इतनी हो जाती है कि दो जून का खाना मिल जाये, इससे अधिक नहीं।
उन औरतों में एक मुखर थी, उसने लिली की ममा से निवेदन किया कि उसे यदि उनके यहां झाड़ू पोछा, बर्तन वगैरह मांजने का काम मिल जाता तो ठीक होता। यह मुहल्ला हिन्दुओं का है, यहां हमसे यह सब काम कोई नहीं लेगा। नवाब साहब के जमाने में तो उसका मर्द उनकी रसोई संभालता था, नवाब साहब ही नहीं छोटे नवाब साहब भी अक्सर कहतेकृ‘जुम्मन तुम्हारे हाथ में जादू है, गजब बनाते हो चिकन बिरियानी।’
उनके जमाने में हम लोगों की गृहस्थी चल जाती थी, साल में दो तीन बार कपड़ा मिला करता था। मेहमान वगैरह आते तो जाते समय बख्शीस दे जाते, अब तो सारा कुछ सपना सपना है।
दूसरी औरत थोड़ा कम बोलने वाली थी, उसका अपने मायके वालों से मिलने वाला सहयोग बन्द हो चुका था। जब पाकिस्तान नहीं बना था तब की बात दूसरी थी, अब कौन आये, कौन जाये, नहीं तो बहुत दूर नहीं था, गोरखपुर पार करो, वाघा के बगल से वहां हो लो। उसके मायके वाले हर समय सहयोग करने के लिए तैयार रहा करते थे। लिली की ममा ने उन औरतों में अपना घर देखा, वे भूली नहीं है अभी तक। सत्राह-अठारह साल उनके गांव में ही गुजरे हैं। अक्सर चूल्हा नहीं जलता था, अकाल पड़ जाने पर तो बहुत ही मुश्किल होता था। उनके पिता (बपई) एक बुद्धिमान और तेज आदमी थे। उनका घर सरकारी जंगल में पड़ता था तथा भइयाराजा की इस्टेट ठीक उसके बगल में थी, समझना मुश्किल था कौन सरकारी जंगल है, कौन भइयाराजा की इस्टेट का।
महीने-दो महीने तक का खाना-पीना महुआ से चल जाता था। तेन्दू की पत्ती का सीजन आने पर, पूरा घर पत्ती तोड़ता, सौ-सौ पत्तियों का बंडल बनाता था, फिर उसे ठीकेदार खरीद लेता था, प्रतिदिन का हिसाब बस खाने भर का होता था। रुपयों की अधिक जरूरत पडने पर, बर-बिमारी में, बपई, साखू का पेड़ काट गिराता था, उसे जंगल में ही कहीं छिपा देता था। जंगल दारोगा पेड़ की बिक्री का आधा रुपया लिया करता था। बपई ऐसा तभी करता था, जब रुपयों की जरूरत पड़ती थी।
लिली की ममा को अपना विगत साफ-साफ दिखने लगा, ऐसा विगत जहां सपने केवल चूल्हे तक सिमटे हुए थे, जिनका आकार मोटी-मोटी रोटियों की तरह होता था गन्ध सोन्धी और मुलायम जिनका रिश्ता आंत से होता था। बकाया सारे सपने जंगलों से बाहर थे, वे कभी-कभार विशेष मेहमान की तरह आया करते थे, जंगल की हवा पीते, हरियाली सोखते, फिर लौट जाया करते।
आज़ादीके बाद भी सपनों के रूप और स्वभाव में कोई फर्क नहीं आया, फर्क इतना हुआ कि राजा के अलावा दूसरे भी जंगल की हवा पीने लगे, जंगल की खूबसूरती और उसकी शान्ति पर अपने-अपने दांत और बघनखा धसाने लगे। जंगलों का कटान इतना होने लगा कि अब हर तरफ खुत्थ ही दीख पड़ते हैं। किसी तरह भइयाराजा के यहां बपई को शरण मिल गई, फिर तो पूरा परिवार भइयाराजा का होकर रह गया, ऐसा नहीं होता शायद...पर हुआ।कृ
हुआ यह कि एक दिन भइयाराजा शिकार पर निकले थे, खबर थी जंगल में सफेद बाघ आया है, वह आदमखोर हो गया है। भइयाराजा फौरन जंगल में। बहुत ऊंचाई पर एक मंच बनाया गया, उसे झाडियों और पत्तों से ढंक दिया गया, ताकि मंच पर बैठे लोग न दीख पड़े। मंच नदी के किनारे बनाया गया जहां जंगली जानवर सुबह और शाम पानी पीने के लिए आया करते थे। लिली की ममा के बपई मचान बनाने तथा हांका करने में माहिर थे। कलक्टर भी जब जंगल आता उन्हीं की खोज होती बाघ का शिकार करवाने के लिए ।
मचान बन गया, भइयाराजा रायफल के साथ मचान पर बैठ गये, उनके साथ दो तीन और लोग थे, जिनमें लिली की ममा का बपई भी था। बाघ मचान के पास से गुजरा फिर धांय धांय, लगातार तीन फायर बाघ सामने जमीन पर छटपटाया फिर मर गया, उसकी चीखें हवा में घुल गईं मचान पर बैठे लोगों के लिए यह खुशी पीने वाली बात थी तथा अभिमान में गोता लगाने वाली भी कि बाघ मारा गया। भइयाराजा के लिए तो यह था कि उन्होंने अभूतपूर्व कारनामे का गौरव हासिल कर लिया है, उनकी जानकारी में पचास बाघ मारने वाला कोई दूसरा राजा उनके क्षेत्रा में न था, वह भी एक ऐसा राजा जो पहले जागीरदार था। अब उनके महल में दाखिल होने वाला यह पचासवां बाघ होगा। किसी कलाकार से वे बाघ का चमड़ा उतरवायेंगे तथा खाल में बरीक किस्म की रूई भरवाएंगे। मचान पर वे बैठे न रह सके, खुशी का आवेग इतना बढ़ा कि वे फटाका मचान से नीचे उतर आये। लिली की ममा का बपई भी उतरा, वे सभी लोग बाघ के पास थोड़ी दूरी पर थे, यह सुनिश्चित करने के लिए कहीं बाघ जीवित तो नहीं।
बाघ जीवित नहीं था। बांस के लम्बे डंडे से बाघ को दूर से हिलाया डुलाया गया। बाघ अपना जीवन जी चुका था तथा उसकी साहस पूर्ण हिंसक क्रियाशीलता समाप्त हो चुकी थी अब वह एक लाश भर था जिसके पास कुछ नहीं होता, न अतीत, न वर्तमान, न भविष्य। भइयाराजा का वर्तमान और भविष्य दोनों कथित बहादुरी से पूर्ण होने वाला था तभी, एक भयानक दहाड़ और हमला।
लिली की ममा का बपई, खुशी पीने वाला आदमी न था। वह जंगल की पशुचर संस्कृति जानता था कि इस बाघ का जोड़ा कहीं आस-पास ही होगा, वह इस समय भी या कभी भी आ सकता है, वह अपने साथी की गन्ध अवश्य पियेगा फिर वह सब करेगा, जिसे बदला कहा जाता है। उसने अपनी बन्दूक से धांय-धांय किया, हालांकि उस समय उसकी आंखों की रोशनी में अंधेरा घुस गया था, जो बाघ के हमले के डर के कारण था। उसका निशाना ठीक था, गोली ने बाघ को जमीन पर पटक दिया, तभी भइयाराजा ने रायफल से दो फायर उस पर दाग दिया जो रायफल में बचे हुए थे।कृ हालांकि वे बाघों के जोड़े के अप्रत्याशित हमले के कारण भयभीत थे, अपने भय को उस समय दबाने में सफल हो गये थे कि राजा को डरपोक नहीं होना चाहिए, लोगों तक गलत संदेश पहुंचता है।
यह दूसरा बाघ, भइयाराजा के लिए उनके शिकार का इक्यावनवां बाघ था तथा लिली की ममा के बपई के लिए जीवन निर्वाह का सुविधाजनक साधन लेकर आया था। भइयाराजा ने लिली की ममा के बपई को गले लगा लिया और खूब तारीफ कीकृफिर तो वही हुआ, जो राजाओं के किस्सों कहानियों में हुआ करता है। लिली की ममा के बपई को महल का खास आदमी और महल के भीतर की खास औरत उनकी अइया को बना दिया गया। काम वही, आम मजूरों से थोड़ा ऊपर, थोड़ा कम पसीना पीने वाला, पांच बीघा जमीन और एक छोटा सा मकान भी दिया गया जो महल के पास पास था। महल में दाखिला मिल जाने के बाद खाने-पीने की दिक्कतें न थीं, बर-बिमारी का झमेला भी नहीं था। वहां की दिक्कतें दूसरे किस्म की थीं जो काफी आरामदायक थीं। वहां अपनी नींद तथा हसियां पराया हो गई थीं, उन्हें महल के अनुशासन(प्रोटोकाल) में शामिल रहना पड़ता था। उतना ही सोओ, जितना महल चाहता, उतना ही हसो जिससे महल की दीवारों पर हसियों के चकत्ते न उभरें यानि नींद भी महल की, हसी भी महल की तथा आराम भी महल का।
लिली की ममा को सारा कुछ याद है, जो काफी पीछे छूट चुका है। पेट के लिए क्या नहीं करना पड़ता! महल और हवेलियां किसी पनाहगाह की तरह केवल आंतों को ठीक रख सकती हैं, पर वहां नींद को नींद नहीं आती, आंसू के लिए आंखों में जगह नही होती, मन और दिल में कोई मयूर नहीं नाच सकता। सारी भावनायें महल की बन्दी हो जाती हैं। लिली की ममा ने आह भरा...फिर उन दोनों औरतों से बोली ंठीक है आप लोग मेरे यहां काम किया कीजिये मुझसे जो कहेंगी महीने का, वह हम दिया करेंगे, मर्दों को वही करने दीजिए जो कर रहे हैं।कृ क्या कोई कार चलाता है आप लोगों के यहां उन्होंने पूछा...कृ
‘हां असरफ के अब्बू चलाते हैं’ उनमें एक औरत ने बताया
‘फिर तो उन्हें भेजिए, साहब से बातें कराते हैं’
रणविजय और अंग्रेज हाकिम के आने के बाद दोनों औरतें जाने को हुईं लेकिन उन्हें लिली की ममा ने जाने नहीं दिया ‘चाय पीकर जाइए।’
रामदयाल और रणविजय लिली की ममा के साथ बाहर ही बैठ गये तथा लिली अपने कमरे की तरफ चली गई। अंग्रेज हाकिम को कहीं जाना था सो वह केवल चाय पीने तक सभी के साथ था, फिर कहीं चला गया देर रात तक आने के लिए।
दोनों औरतों के बारे में रामदयाल ने लिली की ममा से पूछा...
‘वे कौन थीं? रणविजय तो जानते ही थे कि ये लोग हवेली के पीछे रहते हैं पर पूरी तरह से नहीं, न ही उन्होंने कभी उनसे बात-चीत ही किया था।कृ
लिली की ममा ने रामदयाल को उन औरतों के बारे में बताया फिर तो रामदयाल एक बार फिर भारत-पाक बंटवारे के सन्दर्भों में उलझ गए, जैसे धूमिल होते दृश्य फिर ताजे हो रहे हों। उन्हें समझ में आया कि वे ही समाज के लिए क्या कर रहे, स्वतंत्राता मिलते ही क्या वे खुद स्वतंत्राता की वसन्ती हवाओं में नहीं खो गये? पारटी की ओर से किसी कार्यक्रम का न तो निर्देश मिलता था और न ही अपने स्तर से जिला कांग्रेस कमेटी ही कुछ किया करती थी। पारटी ने तो जमीनदारी विनाश अधिनियम को, अधिनियम की मंशा के अनुरूप भी लागू करवाने का प्रयास नहीं किया। केवल इतना ही हो सका कि भारत का हिन्दू बहुल क्षेत्रा, भारत के हिस्से में बचा रह सका, लेकिन पाकिस्तान तो एक नया राष्ट्र बन ही गया, आखिर किस लिए? क्या केवल इसलिए कि कुछ लोग प्रधानमंत्राी मुख्यमंत्राी, मंत्राी, सांसद व विधायक बन जांये। वे तो तब भी बनते, अंग्रेजी सरकार में भी बन सकते थे, हां मामला प्रधानमंत्राी बनने का था, वह कौन बनता? अब तो दो प्रधानमंत्राी हैं, दो सरकारें हैं, दो देश हैं दो संसदें हैं। लेकिन जिनका एक हाथ भारत में है तथा दूसरा पाकिस्तान में, उनको क्या मिला? वे आज भारत में रो रहे हैं, आंसू पाकिस्तान में गिर रहे हैं।कृजाने कितने बदकिस्मत इन औरतों की तरह भारत में हैं या पाकिस्तान में है, कौन बताये?
‘तो ये औरतें पाकिस्तान जाना चाह रही हैं अपने रिष्तेदारों से मिलने?’ रामदयाल ने लिली की ममा से पूछा...
‘हां लेकिन बीजा नहीं बन रहा बता रहीं थी सब।’
‘हां ऐसा ही है जबसे कष्मीर का मामला उलझा है तभी से, काफी जांच पड़ताल होती है, उस कार्यवाही को पूरा कर पाना काफी कठिन है। फिर खर्चा भी खूब लगेगा, कहां से जुटा पायेंगे ये लोग।’
रामदयाल ने लिली की मां को बताया।
लेकिन उनके लिए इतना सब बताना उन्हें भावुक बनाने वाला था कि आदमी देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर किसी बाड़े में रहने वाले पशुओं की तरह ही रह सकता है, इससे अधिक की आकांक्षा करना मूर्खता होगी।
‘यानि देशों की भौगोलिक सीमायें बाड़ों की तरह हैं?’
रामदयाल ने खुद से सवाल पूछा...कृसवाल का उत्तर उनके पास था जा ेदेश की सीमाओं के नियंत्राण को परिभाशित करता था।
‘भीतर से रणविजय और लिली दोनों साथ निकले। लिली रामदयाल के पास बैठ गई, उसने धीरे से पूछा...
‘भइया आप दिल्ली और कहां कहां देखना चाहते हैं? हम लोगों ने खुद को अपने-अपने कार्यों से मुक्त कर लिया है, अब हम अपना समय आपके हवाले करते हैं? क्या आप पुराना किला देखना चाहेंगे या और कोई दूसरा स्थान?’
लिली रामदयाल से सवाल पूछ कर उन्हें देखने लगी कि वे उत्तर दें फिर दूसरे दिन का प्रोग्राम बने। रामदयाल लिली की आत्मीयता के साथ थे, उन्होंने दिल्ली देखने के बारे में बताया जो जितना सवाल था उतना सुझाव भी।
‘तुम जहां सोचो, चलेंगे, मैं भी तो जानूं कि तुम दिल्ली को कैसे दिखाना चाहती हो, मुझे भी लौटने की जल्दी नहीं, वैसे मेरी इच्छा है कि मैं यहां वह सब देखूं जो किसी भी इतिहास के हिस्सा नहीं है।’
लिली ने रामदयाल की बात को समझने के लिए पूछा...
‘यह इतिहास का हिस्सा क्या है?’
‘तुम इतिहास नहीं जानती-समझती क्या?’
‘समझती तो हूं। समझती हूं कि यहां कभी मुगलों व अंग्रेजों का इतिहास था, उसके पहले आर्यों और बौद्धों का, सनातनियों का, पर इतिहास का हिस्सा, नहीं समझती?’
‘आर्य बौद्ध, हिन्दू, मुगल और अंग्रेज, ये सारे के सारे इतिहास के ही तो हिस्से थे लेकिन क्या ये सत्ता-समूह पूरे भारत का इतिहास थे? इनकी कहानियों में पूरा भारत था, चूल्हे चौके थे, झोपड़ी थी, खलिहान था या तुम्हारी हवेली के पीछे रहने वाले जुम्मन मियां और असरफ के अब्बा थे, तुम्हारी दाई जो तुम्हारे घर का काम संभालती है, उसके घर वाले थे? हां इतिहास मेंकृलोगों के प्रतिस्पर्धात्मक बदला पूर्ण युद्धों ने लोगों को विस्थापित व बर्बाद अवश्य किया है। किसी को दुलारा या सहलाया नहीं है।’
‘समझ गई! आप क्या देखना चाहते हैं? रूसी किताबों का अनुवाद करते-करते मैं भी कुछ-कुछ समझने लगी हूं, बुरा न मानें तो एक बात पूछूं...’कृ
‘पूछा’े
‘कहीं आप कामरेड तो नहीं!’
रामदयाल सोच में पड़ गये लिली को क्या बतायें?
और बाल-बुतरू
रामदयाल कामरेडों के बारे में वही विचार रखते थे जो सामान्यतया स्वतंत्राता संग्राम के दिनों में हर तरफ फैले हुए थे। उनमें एक तो यही था कि कामरेडों ने भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के कार्यों में सहयोग किया था, दूसरा था कि कामरेड राजनीतिक रूप से हिंसक क्रांति का समर्थन करते हैं। सो उन्हें यह स्वीकार्य नहीं था कि कोई उन्हें कामरेड कहे क्योंकि वे राजनीतिक बदलावों को शान्तिपूर्ण रास्तों से करना ठीक समझते हैं, उनके पास गांधीवाद था उसके रास्ते थे इसके किसी दर्शन की जरूरत नहीं थी उन्हें, मन में अटल विश्वास था कि मन बदलेगा, देश बदल जाएगा, देश बदल भी गया था, स्वतंत्राता हासिल हो चुकी थी, गांधी जी का जनतांत्रिक विरोध सफल हो चुका था।
रामदयाल समझ रहे थे कि लिली ने उनसे यह क्यों पूछा कि आप कामरेड तो नहीं। लिली क्या कोई भी लिली की तरह ही पूछता क्योंकि वे भी तो उसी वर्ग के विकास और इतिहास का अनिवार्य हिस्सा होने, बनने के बारे में सोचा करते हैं जिस वर्गहित के लिए कामरेड बन्दूक उठाते हैं, लेकिन वे बन्दूक की नाल से परिवर्तन का इतिहास लिखना पसन्द नहीं करते। उन्हें महसूस होता है कि उसमें आतंक और भय के छन्द होते हैं, ऐसी सूरत में कोई कामरेड अपनी मनुष्यता का ही दुश्मन हो जाता है लेकिन कभी-कभी वे काफी चिन्तित भी हो जाते हैं जब उन्हें समाज के विकसित ताकतों की निष्ठुरताओं का सामना करना होता है फिर तो उन्हें महसूस होता कि विकसित ताकतों को प्रार्थनाओं, अभ्यर्थनाओं वगैरह से निष्ठुर-हीन नहीं बनाया जा सकता।
रामदयाल ने अनमने भाव से लिली को बताया...कृ
‘हां हां, मैं कांग्रेसी कामरेड हूं मानूंगा नहीं पर मारूंगा भी नहीं’
लिली खिल-खिलाई, रामदयाल का जवाब ही खिल-खिलाने वाला था, पर था काफी रहस्यपूर्ण। ऐसा नहीं था कि लिली राजनीति की वाममार्गी धारा और दक्षिणमार्गी धारा को समझती नहीं थी। वह समझती थी कि रामदयाल क्या कह रहे हैं, ‘मानूंगा नहीं और मारूंगा भी नहीं’ एक छोटे से सूत्रा वाक्य के जरिए।कृ
उसे ख्याल आया, एक बार रणविजय भी आन्दोलन की स्वस्फूर्तता के बारे में उसे उलझा चुके थे, तब उनसे लिली ने कहा था कि, अनशन, हड़ताल, सत्याग्रह वगैरह आत्म-हन्ता प्रयास भर हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। इसीलिए गांधी जी के सारे कार्यक्रम अब सिकुड़ चुके हैं, आखिर कौन है जो अनशन करके खुद की आत्महत्या करना चाहेगा? लिली ने रणविजय से हुई बात-चीत के बारे में सोचा पर रामदयाल से उस बात को आगे नहीं बढ़ाया। उसने रामदयाल की सहमति में सिर हिलाया...कृ
‘आप ठीक कह रहे हैं क्योंकि आज का कांग्रेसी तो सनातनी होता जा रहा है।’
‘रणविजय तब तक पूरी तरह खामोश बैठे हुए थे और लिली की तार्किकता का आनन्द ले रहे थे। उन्हें अच्छा लग रहा था कि लिली ने राजनीतिक सवालों पर रामदयाल से बातें करने का तरीका सन्तुलन पूर्ण बना लिया है, जब कि वह सामान्यतया ऐसा नहीं करती, कम से कम उनके साथ और अपने डैड के साथ। वह झल्लाहट के साथ आक्रामक हो जाती है तथा साफ-साफ कहती है कि...
‘बहस करना और अपने विचारों को किसी किताब के अनुरूप बना लेना दोनों काम खाते-पीते लोगों के हैं, जो पराश्रयी होते हैं, जो अपना काम भी दूसरों से करवा कर सम्मानित महसूस करते हैं।’
रणविजय की इच्छा हुई कि वे लिली को छेड़ें और पूछें क्या होता है सनातनी कांग्रेसी लेकिन वे न पूछ सके क्योंकि बात आगे तक रबर की तरह बढ़ सकती थी, जबकि समय काफी गुजर चुका था। रामदयाल को थोड़ा आराम भी चाहिए था शाम का अन्धेरा बढने लगा था। लिली की ममा अपने कमरे में जा चुकी थीं। रणविजय ने रामदयाल के आने के बाद ही प्रोग्राम बना लिया था कि उन्हें अनुवाद का काम दिखायेंगे। सो बहस आगे बढ़ा कर पहले से विचारित काम को स्थगित करना ठीक न होगा।कृ
रणविजय ज्योहीं रामदयाल और लिली के साथ, अपने अध्ययन कक्ष की तरफ जाने के लिए सोचे तभी चाय आ गई। चाय के साथ पकौडियां थीं, गरम-गरम, देहात वाली, प्याज और पुदीने के साथ, टमाटर की चटनी, जरूरत भर की कड़वी, पकौडियां रामदयाल को भा र्गइं, थोड़ी और होतीं... वे सोच ही रहे थे कि पकौडियों की दूसरी खेप भी आ गई। रामदयाल दिल्ली में थे, पर वहां दिल्ली नहीं थी, दिल्ली होती तो पकौडियों की दूसरी खेप न आती, बड़े घरों में ऐसा नहीं होता, कम से कम बौने से शहर में भी। लिली की ममा ने अंग्रेज हाकिम के साथ रहते हुए भी गांव बचाया हुआ है। पकौडियां लाने वाली से रामदयाल ने पूछा...
‘किसने बनाया है, तूने ही नऽ’
‘नहीं, ममा ने!’ उसने बताया।
दाई एक जवान औरत थी उसके काले जिस्म से उसकी आत्मनिर्भरता की चमक फूट रही थी। वह कम बोलने वाली थी तथा जो भी, जितना भी बोलती, तौल कर बोलती। अपने काम से काम रखती।
उसने पकौडियां परोसा और सीधा भीतर चली गई। रामदयाल पकौडियां खा कर बनारसी मौज-मस्ती में डूब गये, जैसे सडक के किनारे खड़े हों और दनादन पकौडियां मुँह में डाले जा रहे हों। चाय भी ठीक बनी थी, दूध वाली जो अलग-अलग थालियों में लाई गई थी। पहले दिन तो चाय कन्टेनर में आई थी, चीनी, दूध अलग, चाय का लीकर भी अलग। लिली ने चाय परोसा था उस दिन। रामदयाल को ऐसी चाय ठीक नहीं लगती, सारा कुछ पहले मिलाओ, घोलो फिर पियो, तब तक ठंडी हो जाती है चाय।
रणविजय, लिली और रामदयाल, चाय के बाद अध्ययन कक्ष तक साथ-साथ आये। अध्ययन कक्ष, बाहरी बरामदे वाले गलियारे से जुड़ा था। अध्ययन कक्ष एक बड़ा सा कमरा था, कमरा मुगलिया भवन संस्कृति का नमूना था। छत के नीचे दीवार के ऊपर का प्लास्टर नक्कासीदार था। छत के बीचो-बीच कलात्मक नमूना था, जो ध्यान खींचता था। दीवार का रंग हल्का पीला था, जो रोशनी पडने पर चमकता था। कमरे में अलग-अलग कोने में तीन कुर्सियां और तीन मेजें थीं, जो शायद लिली, रणविजय और अंग्रेज हाकिम के लिए थीं। अंग्रेज हाकिम की मेज थोड़ी दूरी पर थी। रामचरित मानस का कुछ अंग्रेजी भषानुवाद वहीं पड़ा था। रणविजय ने उसे उठाया और रामदयाल को दिया।
रामदयाल देखने लगे। अनुवाद बालकांड का छोटा हिस्सा था। रामदयाल अंग्रेजी के भषानुवाद में डूब गये, उन्हें खूब खूब अच्छा लगा। फिर उन्होंने पूछा
‘डैड ने हिन्दी कब सीखी?’
सीखी नहीं, अब भी सीख रहे हैं, रणविजय उन्हें सिखाता है,कृलिली ने उन्हें बताया।
रणविजय! उन्हें अचरज हुआकृवैसे रणविजय की हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ठीक है, मेरी अंग्रेजी तो रामभरोसे है, हिन्दी को संस्कृत से ठीक कर लेता हूं।
‘तुम्हारी हिन्दी कैसी ही लिली?’ उन्होंने पूछा
‘रणविजय से अच्छी है भइया।’
‘अच्छा! उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया,’ तभी रणविजय बोल पड़ेकृ
‘कुछ तो शर्म करो लिली।’
‘इसमें शर्म की क्या बात है, ठीक है तुमने मेरी हिन्दी में मदद की है, लेकिन भाषा सीखने में नहीं, केवल व्रज और अवधी की कविताओं को ही मैंने तुमसे पढ़ा है। निराला, प्रसाद जी को तो मैं समझ ही लेती हूं।’
‘चलो ठीक है, मान लेता हूं, इसी साल तुम्हें पी.एच.डी. की थीसिस जमा करना है, मेरी सहायता न लेना।’ रणविजय ने लिली को धमकियाया
‘सहायता क्यों नहीं लूंगी, तुम हो काहे के लिए, तुम्हारे साथ जो करना पड़ता है, अगर वैसा ही सुपरवाइजर के साथ करूं तो क्या वह मेरी थिसीस नहीं लिख देगा?’
रामदयाल हसने लगे पर रणविजय तो जैसे मजाक के मूड में थे।कृ
‘अच्छा तो लिखवा लेना थिसिस! उसे गोली नहीं मार दूंगा, केवल महल छूटा है, उसका संस्कार नहीं।’
लिली, अपनी कुर्सी से उठी, सीधे सामने वाली आलमारी तक गई, उसने आलमारी खोला, टाइप शुदा कागज निकाला उसे रामदयाल को थमा दिया।
‘भइया देखिए...कृ‘यह हिन्दी अनुवाद मैंने किया है, अंग्रेजी से। मार्क्स की किताब से, ‘मुद्रा’ पर उनके लेख का, रामदयाल अनुवाद देखने लगे, फिर तो वे पूरा पढ़ ही गये।कृ
वह एक जटिल निबन्ध था जो सामाजिक संबंधों को मुद्रा के द्वारा नियंत्रित होने की व्याख्या करता था। सांस्कारिक, व्यावहारिक व मानवीय संबंध नहीं, सारे संबध, आदमी और आदमी के बीच मौद्रिक होंगे, आदमी मूल्य होगा और वह बिकेगा, संबंध, नैतिकता, ईमानदारी, सारा के सारा बिकेगा।’
रामदयाल अनुवाद पढ़ कर सोचने लगे, उन्होंने मार्क्स तथा लेनिन को कभी पढ़ा नहीं था। मार्क्स के बारे में फैलाई गई अफवाहों को ही वे सुने थे। ‘वर्नस्टीन’ जैसे विचारकों के सन्तुलनवादी कुछ लेखों को उन्होंने अवश्य पढ़ा था। कांट, हीगल, हाब्स, रूसो के विचारों से भी वे वाकिफ थे पर केवल कामचलाऊ स्तर पर। उन्हें किसी भी विदेशी विचारक के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी। मार्क्स तो साफ-साफ अलग था उनके पाठन से।कृ
‘मार्क्स की इस किताब को कल खरीद दो लिली, मैं अब पढ़ूंगा उसे। पहले तो मैं मार्क्स के विचारों से घृणा करता था कि वह बारूद और बन्दूक का समर्थन करता है, हर जगह आग लगाना चाहता है।’
‘कल तो हम लोग निकलेंगे ही, उस तरफ जो इतिहास के हिस्से नहीं हैं, रास्ते में किताब खरीद ली जाएगी, कनाट प्लेस पर मिल जाएगी, काफी हाउस के पास, लिली ने रामदयाल को बताया।’
अध्ययन कक्ष में वार्तालाप का ऐसा दौर चला कि रात के दस बज गये, बीच में दो बार चाय भी आई, तभी अंग्रेज हाकिम आ धमका। पूरी मंडली को अध्ययन कक्ष में देख कर उसने टोका...
‘अभी खाना-पीना नहीं हुआ क्या?’
‘अभी नहीं,’ यह लिली थीकृ
अंग्रेज हाकिम, रामदयाल को पंडित कहा करता था, उसने पंडित कह कर उन्हें संबोधित कियाकृ
‘पंडित जी! आप लिली से बहस न कीजिएगा, यह विषय को उलझाने में माहिर है।’
‘नहीं, ऐसा तो नहीं, बहुत सार्थक बहस करती है रामदयाल ने अंग्रेज हाकिम को बताया, साथ ही साथ निवेदन भी किया कि वे उन्हें पंडित जी न कहा करें, वे सिर्फ रामदयाल हैं।’
ऐसा क्यों? पूछा अंग्रेज हाकिम ने
बस यूं ही, भला नहीं लगता, रामदयाल बताकर गंभीर हो गये, जो अंग्रेज हाकिम के लिए किसी घोषणा पत्रा की तरह था।कृ
कोई भी प्रगतिशील विचार का आदमी, खुद को जातियों में नहीं बांटेगा। जातियों में बटा भारत अपना समभाव व सहकार खोता हुआ दीखता है। अंग्रेज हाकिम ने सोचा और बात का क्रम बन्द कर दिया।
अचानक जैसे उसे कुछ याद आ गया हो, फिर उसने पूछा...कृ
‘क्यों लिली! रामदयाल जी को तूने मेरा अंग्रेजी अनुवाद, रामचरित मानस वाला दिखाया कि नहीं?
‘दिखा दिया डैड, भइया ने उसे काफी सराहा भी।’
‘अच्छा! अब इस कमरे को छोड़ो, खाना-पीना खाओ, क्यों खाने के पहले कुछ.उन्होंने रामदयाल की तरफ इशारा किया।कृ
‘नहीं डैड! नहीं, रामदयाल समझ गये कि डैड, दारू के लिए पूछ रहे हैं।कृ
फिर तो रात का खाना-पीना और सोनाकृतथा दूसरे दिन के सुबह की प्रतीक्षा करना। दूसरा दिन आया, सुबह की नरम धूप के साथ, पिछले दिन के प्रस्तावित कार्यक्रम के साथ।कृजिसे रामदयाल ने सुझाया था, यानि उस तरफ की यात्रा जो हो तो दिल्ली में ही पर वह क्षेत्रा इतिहास का हिस्सा न हो।
आखिर ऐसा कहां हो सकता है? लिली समझते हुए भी उत्सुक थी कि देखिए भइया कहां चलते हैं? मुजफ्फर की कार उसकी यादों के साथ सडक पर दौडने लगी। रणविजय स्टेयरिंग पर थे और लिली रामदयाल के साथ पिछली सीट पर।
दिल्ली की सडकें कम होने का नाम ही न लें, मुहल्ले मुहल्ले दर गुजरने लगे, जामा मस्जिद, लाल किला, सभी गुजर गये, कार बढ़ती जा रही थी। दिल्ली की बड़ी-बड़ी ईमारतों की परछाइयां कार पर पड़ती, कार उन्हें रौंद कर आगे बढ़ जाती, सडकें एक दम काली, पूरी लम्बाई में फैली, अगल-बगल दूकानों की कतारें, सभी बन्द, वे दस बजे के आस-पास खुलतीं फिर किसी शहर में तब्दील होतीं, दूकानों से सामान निकलते, नोटें जो आजाद भारत की थीं, सामानों के बदले दूकानों के मनी बाक्स में समा जातीं, लेकिन रामदयाल को तो वहां जाना था, वह देखना था जो किसी इतिहास के हिस्सा न थे, यानि वहां न दूकानें होतीं, न सामान होता, न अस्पताल होता, न स्कूल होते, आदमी होते, आदमियत होती, पर उनके चेहरों पर किसी सरकार की परछाईं तक न होती।कृ
कार बढ़ती जा रही थी, दिल्ली का वह हिस्सा जो दिल्ली को दिल्ली बनाता था, वह काफी पीछे छूट चुका था, पर इतना नहीं कि वहां दिल्ली की सरकार न होती, रामदयाल ने कार रुकवाया।
रोकिए रणविजय जी!
‘यहीं’
‘हां’
कार का ब्रेक लगा, कार रूक गई, लिली ने कार के शीसे से बाहर देखा। वहां कुछ न दिखा, था भी नहीं कुछ, खेतों का समूह था, खेत थे मेड़ों से बन्धे हुए, उनकी लम्बाई-चौड़ाई मजबूत मेड़ों से बांधी गई थी। कहीं-कहीं छायादार पेड़ दीखते। कुछ मेड़ों पर बबूल के पेड़ थे, कहीं-कहीं नीम दीख रही थे, खेत समतल थे, उन पर फसलों के शिनाख्त थे, फसलें काट ली गई थीं। रामदयाल कार के दाहिनी ओर देख रहे थे जब कि लिली बायें तरफ, लिली को क्या दिखता जो दिखता वह उसका देखना होता, जबकि रामदयाल का देखना लिली के देखने से अलग था जिसे रामदयाल देख रहे थे। रामदयाल के देखने में तमाम कच्चे मकान थे, कुछ झोपड़े थे, एक छोटी सी बस्ती थी, दिल्ली से महज चालीस-पचास किलोमीटर दूर, यहां दूसरी दिल्ली थी, जो पहले भी रही होगी।कृइस दूसरी दिल्ली का अस्तित्व पृथ्वीराज चौहान के जमाने में था कि नहीं, यहां लार्ड माउन्टबेटन और उसकी बेगम के पवित्रा पांव पड़े थे कि नहीं-यही जानना और देखना था रामदयाल को।
रामदयाल ने बस्ती देखा और कार रुकवा दिया।कृ
कार से उतरने के बाद, रणविजय ने अगल-बगल देखा कार जाने लायक पतला रास्ता भी नहीं दिखा, वहां पगडंडियां थीं एक दूसरे को काटती हुई। मुख्य मार्ग पर भी कुछ मकान थे जिनकी उपस्थिति काफी विरल थी, रामदयाल ने इशारा किया कि उस बस्ती की तरफ चलना है।कृ
बस्ती मुश्किल से दो तीन सौ मीटर पर थी।कृलिली का उत्साह बढ़ता जा रहा था तथा वह गुनने लगी थी कि भइया भी अजीब इच्छाओं के मालिक हैं, रणविजय तटस्थ थे। वे रामदयाल को अच्छी तरह जानते थे कि रामदयाल अपनी भावुकता को यथार्थ में तब्दील करने की क्षमता रखते हैं। एक बार तो उन्होंने अपना खलिहान ही गरीबों में आधा-आधा बांट दिया था, तब उनके पिताजी जीवित थे, सुनते ही वे क्रोधित हो गये थे। इकलौता होने के कारण उनकी मां रामदयाल के साथ हुआ करती थीं।कृ
‘क्या हुआ? बांट दिया तो बांट दिया’
जो मजूरी होती, उससे अधिक दे देता, इकतीस बोझ गेहूं के बदले एक बोझ की मजूरी देनी थी, पच्चीस बोझ पर एक बोझ दे देता, बीस पर दे देता, यह क्या कि आधा-आधा बांट दो मजदूरी के बदले।कृरामदयाल के पिता ने उन्हें काफी भला-बुरा कहा। मजूरों ने सारा कुछ सुनाकृफिर सम्मिलित होकर उनके पिता से कहा...कृकृ.
‘सरकार! हमारा जितना हक होता है उतना ही दीजिए, सारा गेहूं खलिहान में पड़ा है, कोई भी मजूरा ले नहीं गया है।’
‘नहीं तुम लोग आधा ले जाओ, जो दे दिया, दे दिया, इन्हें हल्ला करने दो।’कृ रामदयाल ने जोर देकर तेज आवाज में कहा।कृलेकिन मजूर तो मजूर, मजूरी मिल जाय, इसी में खुशियां पीने वाले, वे नाजायज मजूरी हराम समझ कर, बांटा हुआ बोझ, उस जगह फेंकने लगे जहां रामदयाल के बोझ थे।कृ
लेकिन रामदयाल भी कम न थे, उन्होंने धमकी दी, यदि तुम लोग आधा नहीं ले गये और पिताजी का कहना मान लिए तो मैं खलिहान ही आग के हवाले कर दूंगा।
रामदयाल की धमकी काम कर गई, बोझ आधा-आधा बंट गये।
तो रामदयाल अपनी जिदों के आदमी हैं, रणविजय जानते थे, सो उनकी तरफ ही बढ़ रहे थे, वे रास्ता चलते हुए आगे-आगे थे, लिली बीच में, पीछे रणविजय। बस्ती में बरगद का एक छायादार पेड़ था, उसके नीचे मिट्टी का एक चबूतरा था, चबूतरे पर कुछ लोग बैठे हुए थे।कृ
उनमें एक अधेड़ था तथा तीन जवान थे, वे चबूतरे पर चौपड़ का खेल खेल रहे थे, गिट्टियां बिछी थीं।कृ
‘क्या हो रहा है भाई।’ पूछा रामदयाल ने
‘क्या किया जाय, चौपड़ खेल रहे हैं’
अधेड़ आदमी भारतीय आचार-विचार जानने वाला था, उसने सभी को नमस्कार किया और पूछा...
‘किससे मिलना है साहब! रघुवर तो दिल्ली गया है।’
‘हमारा काम आप सभी लोगों से है! लेकिन रघुवर दिल्ली काहे गये हैं, वहां काम करते हैं का? प्रति सवाल किया रामदयाल ने
अरे नाही सरकार! गरीबों को काम कहां मिलता है, काम तो पढ़े-लिखों को मिलता है, हम लोग निरक्षर, हमारे लिए लिखा-पढ़ा भैंस माफिक। असल में यह है कि दो तीन दिन से एक नेता जी लगातार आ रहे हैं मेरे गॉव में। कल भी आये थे। संसद भवन पर धरना प्रदर्शन करना है। किसान-आन्दोलनकारियों को कहीं मारा-पीटा गया है। उसी सिल-सिले में रघुवर वहां गया है, देखिए क्या रेट तय होता है परदर्शन में जाने का?
कैसा रेट? पूछा लिली ने
एक- दो दिन तो लगेगा न, वहां जाने वाले पेट बांध कर तो जायेंगे नहीं, मजूरी से अधिक नहीं मिला तो उसमं जाने से क्या फायदा? कौन डंडा खाये!कृफिर रघुवर तो भीड़ जुटाने का ठीका लेता है। जितना आदमी चाहिए उतने लोगों की प्रतिदिन की मजूरी दो और भोजन-पानी का खर्चा अलग से। अपने साधन से ले चलो फिर काम हो जाने पर पहुंचा दो। सारा रेट पहले से तय न करो तो बाद में नेताजी लोग झगड़ा करने लगते हैं।
लेकिन एक बात है साहब! कांग्रेसी ले जाते हैं तो अधिक रुपया देते हैं वह भी बिना मांगे। इस बार जो नेताजी आये थे, वे शायद जनसंघ के थे, बोल रहे थे कि उनकी पारटी हिन्दुओं वाली है देखो ये लोग कितना देते हैं?
अधेड़ आदमी रघुवर को दिल्ली जाने का लक्ष्य बता कर चुप हो गया, फिर पूछा...कृ
‘आप लोग किस पारटी के लिए आए हैं?’
‘हम लोगों की कोई पारटी नहीं, हम लोग आप लोगों से मिलने आये हैं।’
अरे साहब! काहे मजाक कर रहे हैं, गरीबों से कौन मिलता है? साफ साफ बताइए कहीं कोई दूसरा काम तो नहीं!कृ
तभी एक नौजवान बोला, जो अधेड़ के साथ खड़ा था...
वह बस्ती यहां से दो किलोमीटर दूर है, बगल वाली पगडंडी वहां तक पहुंचा देगी, अधेड़ ने बस्ती के बारे में बतायाकृ
कैसा दूसरा काम? रणविजय, रामदयाल और लिली तीनों नहीं समझ पाये, रणविजय ने पूछा।
अरे साहब! क्या बतायें? उस बस्ती की लड़कियां दिल्ली जाती हैं, वहीं रात, दो रात गुजारती हैं, काफी कुछ कमा कर लौट आती हैं।कृ
‘अरे नहीं भाई, ऐसा काम हम लोगों का नहीं, आइए बैठते हैंकृपानी पिलाइए।’ रामदयाल ने पानी मांगा और चबूतरे पर बैठ गये, साथ में लिली और रणविजय भी।
पानी गुड़ के साथ आया, वे लोग पानी पीये फिर बात आगे बढ़ी। आगे काफी दूर तक कि वे लोग दस पन्द्रह साल से प्रदर्शन, घेराव, सत्याग्रह जैसे काम कर रहे हैं। पहले अंग्रेजों के जमाने में, कम से कम सात आठ बार साल में उन्हें काम मिल जाता था, पर आज-कल काफी मन्दी है। अपनी सरकार बन गई है सो प्रदर्शन वगैरह नहीं होते, ऐसे में हमलोग बेकार हो गये हैं। बीच में चार-पांच साल तो एकदम बेकार हो गये थे, काम नहीं मिलता था।कृइधर दो-तीन साल से काम मिलने लगा है, अब कुछ कुछ काम चल जा रहा है।
किस-किस पारटी का काम मिल जाता है आप लोगों को? पूछा लिली ने, जो उस समय काफी गंभीर बनी हुई थी, कुछ-कुछ गहन विचारण करती...‘ऐसा भी होता है।’
‘कांग्रेस, कम्युनिस्ट और जनसंघ का, काम अक्सर मिलता रहता है। एक बार हम लोगों को अम्बेडकर की पारटी का भी काम मिला था, जो केवल खाना, नाश्ता पर था, क्योंकि वह गरीबों की पारटी थी बेचारे कहां से रुपया देते!’कृ
‘कैसे पता चला आप लोगों कि वे गरीबों की पारटी के थे?’ उस आदमी से दुबारा पूछा लिली नेकृ
‘गरीबों को गरीब नहीं पहचानेगा फिर कौन पहचानेगा साहब? उनके चेहरे खुरदुरे और झुलसे होते हैं,’ बताया अधेड़ आदमी ने।
सभी लोग चबूतरे पर बैठ गये। चबूतरा गोबर से पुता था, कुल मिलाकर वह साफ जगह थी। थोड़ी देर में बस्ती की औरतें भी आ गईं। औरतों के चेहरे, काम की थकान के कारण धुआंसे थे, उन पर वह चमक नहीं थी जिसे उम्र चमकाया करती है। चेहरे की प्राकृतिक सुन्दरता गायब थी, रामदयाल के लिए यह कोई अचरज न था पर लिली के लिए.. तो अचरज था ही
उसने कुछ औरतों की उम्र भी पूछा।कृएक का चेहरा जवान होती लडकी का था। उसकी गोदी में एक बच्चा था, लिली ने उससे जाना
‘तुम्हारी उम्र क्या है?’
‘सत्राह साल’
‘कब शादी हुई तुम्हारी?’
‘दो साल पहले’
लिली खुद तीस के आस-पास थी, दो चार साल बड़े होंगे रणविजय। तीन साल पहले उसने रणविजय से सिविल मैरेज किया था।
अभी बच्चा नहीं चाहिए ऐसा मान कर चलती है, उम्र की हिफाजत करना है उसे, बहुत सारे काम करने हैं। लिली ने एक बार फिर जवान होती लडकी को देखा, वह सहमी हुई थी, अपने में खोई, जाने क्या सोच कर उसने लिली से प्रति सवाल किया...कृ
‘आपकी उम्र क्या होगी बहन जी?’
उन्तीस साल
ष्आपकी शादी नहीं हुई का? माथे पर सिन्दूर न देख कर लडकी ने पूछा...कृ
‘हो चुकी है’
‘और बाल-बुतरू!’ अधेड़ औरत ने पूछा जो लिली के सामने खड़ी थी। रणविजय और रामदयाल किसी तरह हसना रोक सके।
‘अभी नहीं लिली ने बताया।’
‘कोई गड़बड़ी है का ‘देहियां’ में?’ जवान होती लडकी ने पूछाकृ
‘नहीं’
लिली को बाथरूम जाने की आवश्यकता महसूस हो रही थी, पर वह किधर जाये, सामने बाथरूम जैसी कोई जगह नहीं दिख रही थी। वह चबूतरे से उठी, जवान होती लडकी को इशारा किया, फिर दोनों साथ-साथ आगे बढ़ गईं। वे दोनों एक झोपड़ी के पीछे गईं, वहां निखालिस एकान्त था, वहीं लिली एक जगह बैठ गई।
जवान होती लडकी विचार कर रही थी कि वह अवश्य पूछेगी बहन जी से कि बाल-बुतरू क्यों नहीं हो रहे? लिली आई फिर भी जवान होती लड़की नहीं पूछ पाई उससे, वह शर्म में डूब गई भला यह भी पूछने की बात है!
रामदयाल और रणविजय ने चबूतरे पर बैठे लोगों से बस्ती का सारा हाल तब तक जान लिया था कि प्राइमरी स्कूल, बस्ती से दस किलोमीटर दूरी पर है, दवाई के लिए बीस किलोमीटर जाना पड़ता है, वहीं थाना भी है, बस्ती में केवल रघुवर ही कक्षा दो तीन तक पढ़ा हुआ है, बस्ती में कुल अस्सी लोग हैं। उन लोगों के पास खेत नहीं, उनके घर भी दूसरे की जमीन में हैं। जमीन, सामने वाले गांव के पंडित जी की है।
बस्ती में सूरज था, उसकी चहक थी, चांद था, उसकी नाजुक किरणें थीं, हवा का आना-जाना जारी था, बस्ती का आकाश था, उसके बादल थे, उसकी बारिश थी। पर वहां वह नहीं था जो इतिहास जैसी चीज होता है, लिली ने रामदयाल को देखा, चाहा कि वह उनकी निश्छल भावुकता पकड़े, रणविजय तो स्थित-प्रज्ञ थे, लिली ने संबोधित किया रामदयाल को...कृकृ.
‘भइया इन लोगों का वर्तमान मारा जा चुका है, भला ये इतिहास का हिस्सा कैसे बनेंगे?’
कैसा इतिहास रे!
इतिहास के हिस्सों से दूर वाली बस्ती से रामदयाल, रणविजय और लिली, दोपहर के आस-पास निकले। लौटते समय रामदयाल को मार्क्स की किताब ‘आर्थिक व दार्शनिक पांडुलिपियां’ खरीदना था। लिली को भी भूला नहीं था। मुजफ्फर की कार, सड़क के किनारे खड़ी थी। सभी लोग कार तक आये। बस्ती का वह आदमी भी साथ में कार तक आया जो अधेड़ था। सडक तक आते-आते रघुवर दीख गया वह साधारण शक्ल सूरत वाला आदमी था, उसका पहनावा बस्ती के स्तर से थोड़ा ऊंचा था। अधेड़ आदमी ने रघुवर को आवाज दिया, वह सीधे सडक पर दक्षिण की ओर जा रहा था, कार का मुंह भी दक्षिण की तरफ ही था। उसने रामदयाल की टीम की तरफ तब ध्यान दिया जब अधेड़ आदमी ने उसे जोर से आवाज दिया।
रघुवर का काम हो गया था, उसे दूसरे दिन ही प्रदर्शन के लिए भीड़ जुटाने का ठेका मिल गया था सो वह खुश था तथा खुशियों की गाढ़ी चमक उसके चेहरे पर साफ-साफ थी। उसे काम की जल्दी थी तथा दूसरी बस्तियों में भी जाना था जिससे वह अधिक से अधिक आदमियों को जुटा सके। अधेड़ आदमी ने रघुवर का परिचय, रामदयाल की टीम से कराया। पूछने पर उसने बताया कि प्रदर्शन संसद भवन पर होगा, पर जुलूस गांधी जी की समाधि से चलेगा।
‘लगता है वही लोग हैं जो गांधी जी की समाधि स्थल पर मिले थे।’
रामदयाल ने रणविजय को सुझाया...रणविजय ने भी हामी भराकृ
‘तब तो देखना चाहिए क्या होता है संसद भवन के सामने स्वतंत्राता के बाद इस तरह का सरकार विरोधी प्रदर्शन कभी देखने का मौका नहीं मिला, रणविजय ने बात जोड़ा।कृ
लिली मुंह दाबे खड़ी थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो जाएगा प्रदर्शन से? वह प्रदर्शन के बाबत कुछ जानना भी नहीं चाहती थी, फिर भी उसने सोचा कि वह भी देखेगी कि क्या होता है प्रदर्शन में? स्वतंत्राता संघर्ष वाले तरीकों से कुछ अलग या उसी तरह। पहले तो विदेशियों के खिलाफ नारा लगता था अब किसके खिलाफ लगेगा? यह देखना विस्मयकारी तो होगा ही।
कुल कितने आदमियों को जुटाने का ठेका मिला है।’ रामदयाल ने रघुवर से पूछा
‘डेढ़ हजार आदमियों का साहब!’
‘रुपया कब मिलेगा?’
‘आधा मिल गया है,’
‘आधा कब मिलेगा?’
‘प्रदर्शन के बाद’कृ
फिर रघुवर बताने लगा कि उसे पांच हजार आदमियों को जुटाने का ठेका मिलता पर एक आदमी और आ गया, वह दिल्ली शहर की झुग्गी झोपड़ी का आदमी था, उसने दिल्ली से ही आदमियों के प्रबन्ध का ठेका ले लिया। वहां के आदमी पैदल ही गांधी जी की समाधि तक पहुंच जायेंगे, मेरे यहां के लिए तो ट्रकें भेजनी पड़ेगीकृया फिर रेल से जाना होगा। रघुवर का चेहरा, बताते-बताते काफी कुछ उतर सा गया, फिर भी वह मस्त-मस्त था। कई वर्षों बाद उसे ठेका मिला था।
देश की संस्कृति किस तरफ जा रही? रामदयाल को इस तरह के सवाल अक्सर परेशान करते हैं। वे इन सवालों से खुद को जितना दूर ले जाना चाहते उन्हें लगता कि सवाल उन्हें किसी विषधर की तरह काटने लगते हैं, उन्होंने खुद को नियंत्रित किया और लिली से कहा...कृ
‘चलो लिली वापस हो लें और इतिहास की गुफा में समा जांये, उस दिल्ली में जहां इतिहास संवरता है। फिर मुजफ्फर की कार सड़क पर दौडने लगी।कृ रास्ते मेें मार्क्स की किताब खरीदी गई, एक जगह सभी लोगों ने चाय पी और फिर अंग्रेज हाकिम के आवास पर।कृ
दोपहर का खाना-पीना हुआ, खाना सामान्य था जिसमें देहाती पुट अधिक था, चावल-दाल, रोटी-सब्जी और सलाद, एक चीज विशेष थी जो रामदयाल को काफी रुचती थी, वह थी कढ़ी, दही से तैय्यार की हुई।कृरामदयाल भोजन के साथ संलग्न आत्मीयता के स्वाद में थे। लिली की ममा खाना खाते समय सामने बैठी थीं, उन्होंने कढ़ी के बारे में पूछा...कढ़ी कैसी बनी है रामदयाल जी?
‘बहुत स्वादिष्ट बनी है ममा! रामदयाल ने कढ़ी की बरी मुंह में डाल कर बताया, अभी तक गांव-गिरांव का खाना आपको भूला नहीं है! पूछा रामदयाल नेकृ
अरे! कुछ नहीं भूला है भइया! लिली अपनी जगह से चहकी, वह रणविजय के पास ही बैठी थी, अंग्रेज हाकिम रामदयाल के पास बैठा था..उसने भी...कृ
‘मुझे भारतीय खाना काफी रुचता है, खास तौर से कढ़ी, फ्राई की हुई दाल, मसालेदार सब्जी और आलू-मूली के पराठे तो जितना खाओ, कम ही लगता है, इच्छा बनी रहती है।’
आज कहां-कहां घूमना हुआ? पूछा लिली की ममा नेकृ
ममा! न पूछो...कृ ‘भइया दिल्ली के बाहर एक बस्ती में गये थे, जो गरीबों की थी, भइया का मानना है कि वहां इतिहास नहीं होता लिली ने स्पष्ट किया।कृ
कैसा इतिहास रे! कोई खतरनाक चीज है क्या? जो वहां होता तो दिक्कत होती। लिली की ममा ने बहुत ही भोलेपन से रामदयाल से पूछा।कृ
‘नहीं ममा! मुझे दिल्ली नहीं देखना था, सो गांव की तरफ चला गया। गरीबों का इतिहास नहीं होता न, वे गरीब, उनके बाप-दादे गरीब, उनकी हर पीढ़ी गरीब रामदयाल ने छोटा सा उत्तर दिया।
इतिहास क्या है रामदयाल जी? कोई खाने-पीने वाली चीज है क्या? लिली की ममा ने सहजता से पूछा, जिससे साबित होता था कि लिली की ममा बौद्धिक तात्विकता से जैसे अब भी काफी दूर हैं तथा एक ऐसी जमात का प्रतिनिधित्व कर रही हैं जिसका इतिहास से कुछ लेना-देना नहीं होता।
इतिहास मतलब कहानी, आपको करमा की कहानी याद है न ममा! पूछा रामदयाल ने, फिर थोड़ा रुक कर ममा को याद दिलाते हुए...कृ
वही करम और धरम वाली कहानी
लिली की ममा का चेहरा हसा...कृ‘हां हांकृभला वह कहानी कभी भूलेगी पूरा सात दिन का व्रत होता है, करम के पेड़ की पूजा होती है फिर नाच...कृ
नाच कहते ही लिली की ममा शरमा गईं और उन्होंने अंग्रेज हाकिम की तरफ आंखें घुमाया, जैसे मजाक करना चाहती हों...कृ
नाच अच्छी लगती है नऽ, अंग्रेज हाकिम भी कम न था...कृ
‘तुम तो आदिवासी नहीं फिर तुमने करमा नाच क्यों सीखा?’
‘आदिवासी गांव में रहती थी। वहां करमा न सीखती तो क्या भांगड़ा सीखती, तुम्हारे क्लब में जाकर किसी से कमर पकड़वाती फिर नाचती...’
‘तभी तो नहीं गई कभी! लिपटी रह गई छह मीटर की साड़ी में,’ अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा को छेड़ा।कृ
‘तुम्हें अच्छी नहीं लगती क्या, नंगी हो जाऊं,’ लिली की ममा ने हसोड़ा प्रतिवाद किया।कृ
‘अरे लिली की ममा! नहीं, नहीं ऐसा नहीं, साड़ी में तो तुम देवी लगती हो। तो इतिहास कुछ नहीं, बाप दादों की कहानी ही इतिहास होता है, वह भी सबका नहीं, राजाओं-महाराजाओं का। मेरा, तुम्हारा, रामदयाल थोड़ा आगे जाकर रणविजय का भी कोई इतिहास नहीं, कोई कहानी नहीं, भले ही रणविजय, राजा का भाई है तो क्या हुआ? इतिहास तो उनका होता है जिनकी पुतलियां दिल्ली, अवध, जयपुर, जोधपुर, हैदराबाद, बीकानेर, ग्वालियर, मैसूर आदि को नचवाया करती हैं।’
‘अब समझी...साफ बोलो न इतिहास माने राजा व रानी की कहनी। मेरी अइया अक्सर किसी राजा की कहानी सुनाती थी।कृजिसमें एक महल होता तथा उसके कुछ किस्से होते थे, चार-पांच साल महल में रही हूं, उसकी दीवारों से बोली बतियायी हूं।
तब तो मैं इतिहास जानती हूं रामदयाल जी! लिली की ममा ने सगर्व बतायाकृ
खाना खाते समय बस्ती के बारे में बातें होती रहीं तथा अंग्रेज हाकिम सारा कुछ गुनते हुए सुनता रहा। उसे कुछ आश्चर्य भी हुआ कि प्रदर्शन के लिए किराये के आदमियों का इन्तजाम स्वतंत्राता संग्राम के समय में भी किया जाता था और आज कल भी किया जा रहा है। प्रदर्शन में भाग लेने वाले आदमियों के आने-जाने की सुविधायें पहले भी दी जाती थीं, पूरी की पूरी ट्रेन भरी होती थी उनसे, टिकट के स्थान पर सभी के हाथ में पंपलेट होता, मुंह में नारे होते, एक उत्साही भीड़ होती, भीड़ के सामने टी. सी. बौका बना खड़ा रहता, उसे अपनी कानूनी श्शक्तिहीनता महसूस होती तथा फालतू कमाई का अभाव भी।
‘मार खाना ही होगा?’ ऐसी स्थिति में सरकार सुरक्षा नहीं दे सकती टी. सी. अन्तःमन के समयानुकूल फैसले को सुनता तथा निर्जीव माफिक प्रदर्शनकारियों की उर्जायुक्त भीड़ का अवलोकन करता रहता। अपने देवता की मनौती करता कि वह सकुशल बचा रहे, भीड़ टिकट ले तो ठीक न ले तो ठीक।कृ
अंग्रेज हाकिम के पास प्रशासनिक कार्य संस्कृति का सारा लेखा-जोखा था। उसके जमाने में जो धरना-प्रदर्शन वगैरह हुआ करते थे, उनमें स्व-स्फूर्तता हुआ करती थी और ऐसा नहीं था कि किराये के आदमियों का इन्तजाम किया जाता था अपने आप जनता प्रदर्शन में भाग लिया करती थी।
‘तो क्या ऐसा है?’ अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल से पूछा।कृ
‘हां डैड ऐसा ही’ मुझे भी पहले न मालूम था।कृ
यही तो यहां की त्रासदी है, कभी-कभी तो मुझे लगता है कि यहां कभी भी विरोध का इतिहास ही नहीं था, जो था सारा कुछ युद्धों का विवरण भर था, छोटे-छोटे किस्सों में विभक्त, एक राजा दूसरे राजा को मारता काटता, जनता त्रास्त और खामोश, दमन के लिए मजबूर।
खाना खत्म हो चुका था, लिली की ममा अपने कमरे में चली गईं। दूसरे दिन का प्रोग्राम था प्रदर्शन देखना, जो संसद भवन के सामने होना था। लिली की ममा के साथ अंग्रेज हाकिम भी उसी तरफ गया। अध्ययन कक्ष की तरफ लिली रणविजय और रामदयाल आये और बैठ गये।
ये सभी लोग अध्ययन कक्ष में बैठे ही थे कि अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल को पुकारा...कृ
फिर रामदयाल उनके कमरे में थे। अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल को वह शिवालय दिखाया जिसे अंग्रेज हाकिम ने खुद बनाया था। शिवालय लकड़ी का बना था जो तीन फीट ऊँचा तथा चार फीट के घेरे में था। शिवालय एक चौकोर लकड़ी पर अवस्थित था। शिवालय के चारों ओर दो ईंच का घेरा था, जो बाउन्ड्री जैसा दिखता था। दो इंच की ऊँची दीवार भी बनाई गई थी, जो लकड़ी की चिकनी पट्टी थी। पूरा शिवालय गहरे चमकदार काले रंग का था जो शीशम की लकड़ी से बनाया गया था। शिवालय के भीतर शिवलिंग स्थापित किया गया था। शिवालय के बाहर चारो ओर एक-एक मूर्तियां चिपकाई गई थीं, मूर्तियां भी लकड़ी की ही निर्मित थीं।
शिवालय को देखना अद्भुत था। शिवालय में कुछ फूल पड़े थे जो मुरझा गये थे। कमरे के एक खास कोने में व्यवस्थित ढंग से, एक ऊँची चौकी पर शिवालय रखा हुआ था जिससे कमरे की खूबसूरती तथा सुविधा दोनों अप्रभावित थीं। शिवालय के बाहर परदे लगे थे, परदे चारो तरफ से थे, सो प्रथम द्रष्टया शिवालय दीखता नहीं था परदा हटाने पर ही शिवालय देखा जा सकता था।
लिली की ममा ने रामदयाल को शिवालय निर्माण की पूरी कथा बताया।पहले तो नहीं, बाद में जब यह निश्चित हो गया कि यहीं रहना है फिर शिवालय बना। पूरे दस दिन लगे थे। शिवालय बनाने के लिए आरी, रुखानी, बसुला सभी सामान खरीदा गया, खजुराहो की तरह ये बाहरी मूर्तियों को बनाना चाहते थे जो एक मुश्किल काम था। फिर भी इन्होंने बिना थकान के पूरा किया, मैंने इनसे कहा था
‘कहीं से खरीद लीजिए या किसी मिस्त्राी से बनवा लीजिए’
‘नहीं माने...मैं ही बनाऊँगा।’कृ
शिवालय बन जाने के बाद पूजा-पाठ हुआ, शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की गई बाद में मैंने कहा था कि ‘अकेले शिवालय ठीक नहीं, आप अपने धरम का भी कुछ बनवा लीजिए मैं तब ईसा मसीह के बारे में नहीं जानती थी। लेकिन ये तो धरम करम मानते नहीं।’कृ
‘तुम्हारे देवता ही हम दोनों की रक्षा करेंगे।’कृ
मुझे हसी आ गई थी, ‘अब समझने लगी हूं कि इनका मन धरम से काहे उठ गया?’
‘एक बात पूछूं ममा, डैड भी यहीं हैं’कृ रामदयाल ने पूछा
‘ये आपकी बोली समझ लेते थे, और आप भी इनकी बोली’कृ
‘दोनों जन हसने लगेकृफिर अंग्रेज हाकिम बोला...कृ
‘कुछ महीने तक हम दोनों देह भर थे, देह की भाषा ही हम दोनों समझते थे। शायद हमारी स्थिति वही थी जब आदमी के पास भाषा नहीं थी, सिर्फ ध्वनियां थीं, तरंगे थीं, इशारे थे...अद्भुत था वह समय।’कृ
हमारी भाषाहीनता ने कमाल का काम किया.. हम दोनों को अच्छी तरह से समझने का मौका दिया, पिछला समय याद कर मैं रोमांचित हो जाता हूं।कृ
मुझे थोड़ी-थोड़ी हिन्दी आती थी। प्रशासनिक सेवा की ट्रेनिंग में जो सिखाई गई थी, पर वह काफी अपर्याप्त थी।कृहम खुद को अभिव्यक्त नहीं कर पाते थे लेकिन देह सारा कुछ स्पष्ट कर देती थीकृफिर आंखें बकिया सारा कुछ बता दिया करती थीं।आंखें तो अनुवादक का काम करतीं थीं, मैं तो अक्सर इनकी आंखें देखता..उनमें कभी चिठ्ठियां तैरती थीं तो कभी-कभी अभिज्ञान शाकुन्तलम के मर्मस्पर्शी संवाद...’कृ
‘अरे! अब तो चुप रहिए,कृबच्चों के सामने ऐसी बातें, लिली की ममा ने अंग्रेज हाकिम को झिडका।कृ
‘बच्चों से क्या छिपाना? यह सब तो किताब में छपेगा, बच्चे क्या उसे न पढ़ेंगे?’ अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा को रोकाकृ
‘किताब पूरी हुई कि नहीं डैड?’ रामदयाल ने जानना चाहाकृ
पूरी हो गई है प्रकाशक के पास पड़ी हुई है।
रामदयाल अंग्रेज हाकिम को देखने व महसूसने में लगातार थे। अद्भुत आदमी है, चीजों को उसकी गहनतम बारीकी से मूल्यांकित करता है। लिली की ममा की दूसरी बोली, हाकिम की दूसरी...ऐसा संपर्क, जहां बोली का कोई मतलब न होकृ गजब गुजरा होगा वह समय अविस्मर्णीय, किताब भी ठीक ही कंपोज हो गई होगी।
रामदयाल ने पूछा...‘कब तक प्रकाशित हो जाएगी?’
एग्रीमेन्ट वगैरह हो गया है, अग्रिम रायल्टी भी मिली है कुछ, छपेगी ही अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल को बताया।
फिर रामदयाल अपने कमरे में चले आये, जहां लिली और रणविजय किसी विशेष विषय के तर्क में उलझे हुए थे। लिली मानने के लिए तैयार नहीं थी कि भारतीय लोकतंत्रा में सभी को समानता हासिल हो जाएगी। कानूनी समानता के बावजूद आर्थिक असमानता में कभी भी संकुचन नहीं होगा, आर्थिक निष्ठुरतायें और बढ़ेंगी।
रणविजय लिली की बातें स्वीकारते हुए, उसे उलझाते कि फिर क्या होगा, लोकतंत्रा नहीं तो फिर क्या? क्या सर्वहारा की तानाशाही, फौजी या सम्राटों वाली?
रणविजय बौद्धिक विमर्शों के योद्धा थे, वे विमर्श को गति देने के जरूरी तर्क तलाश लेते, उन्होंने, लिली को लोकतंत्रा और तानाशाही को परोस दिया। दोनों में ही तो जनता की भागीदारी होती है।
रामदयाल के कमरे में दाखिल होते ही लिली ने जान बूझ कर खुद को रोक लियाकृलेकिन रामदयाल ने सुन लिया था कि बहस लोकतंत्रा और सर्वहारा की तानाशाही में फंसी पड़ी है, उन्होंने तत्काल लिली को टोका...कृ
‘कैसी तानाशाही, कैसा लोकतंत्रा?’
‘जहां तक मैं समझता हूं कि वही बात सही है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे, बुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा।’
लिली चहक उठीकृ‘ठीक कह रहे हैं भइया आप।’
क्या ठीक कह रहे हैं? मूर्खों के पास भले ही ज्ञान न हो पर ताकत तो होती है नऽ, और ताकतवर ही सरकार चलाता है। रणविजय ने प्रतिवाद किया फिर ज्ञान का क्या मतलब?
कैसी ताकत? देह की,कृवह क्या करेगी एटम बमों के आगे एटम बम भी तो बौद्धिक उत्पाद ही हैं... रामदयाल ने प्रति तर्क दियाकृ
क्या करेगा एटम बम? एटम बम बनाने व विस्फोट करने वाले फिर कहां रहेंगे, उनके ऐश्वर्य, वैभव, ज्ञान, शान व अभिमान वगैरह आखिर किसके ऊपर रहेंगे, उन्हें भी मूक-बधिर और अन्धी जनता चाहिए ही चाहिए, यह उनकी स्वार्थपूर्ण जिम्मेवारी है कि बहुसंख्यक गरीबों को किसी भी तरह जीवित रखें। रणविजय ने अपना पक्ष रखा।कृ
लिली चुपचाप सारा सुन रही थी तथा दोनों मित्रों की बौद्धिक प्रतिभा का मूल्यांकन भी कर रही थी। उसे आशंका भी थी कि बहस का रुख तिक्त और कड़ुआ न हो जाये, क्योंकि बौद्धिक एक दूसरे के स्वीकार से अलग होते हैं।
उसने रणविजय को रोकाकृ
‘आप लोग क्या प्रोग्राम बना रहे हैं? कल संसद भवन तक चलना है कि नहीं, प्रदर्शन देखना है नऽ।’
‘हां भाई! वहां तो चलना ही है, स्वतंत्राता के बाद का प्रदर्शन है, देखना है नेता जी लोग क्या-क्या तर्क गढ़ते हैं, मजबूत और समर्थ तर्क तो सरकार के पास हैं ही, उनके खंडन कैसे हो रहे हैं, देखना और सुनना है, क्यों रामदयाल जी! पूछा रणविजय ने।
सोच रहा हूं कल निकल चलूं, तीन दिन हो गये रामदयाल ने घर वापस लौटने के लिए कहाकृ
भइया! यह क्या कह रहे हैं आप, अभी नहीं। मुजफ्फर अंकल इसी सप्ताह आने वाले हैं, उनसे मिल कर आपको खुशी होगी तथा उनका भारतीयपना देख कर दुख भी कि क्या वे पाकिस्तान में रह सकते हैं, जहां सैनिक तानाशाही है,जहां लोकतंत्रा खत्म हो चुका है।’ लिली ने रामदयाल से दिल्ली में रूकने के लिए आग्रह कियाकृ
रणविजय ने भी लिली का समर्थन किया... ‘अभी नहीं जाना आपको, इस समय खेती-किसानी का काम भी नहीं।’कृ
‘अभी तो भइयाराजा के बारे में पूरी बातें भी नहीं र्हुइं, क्या हो रहा है जमीनदारी वाले मुकदमे में?’
‘जमीनदारी नहीं टूटी नऽ’ पूछा रणविजय नेकृ
‘हाई कोर्ट में अटका पड़ा है, नम्बर आने पर मुकदमा खुलेगा फिलहाल जमीनदारी तोडने का काम रुका हुआ है। रामदयाल ने बताया और लिली को संबोधित किया...’कृ
‘चलो कल प्रदर्शन देख आते हैं, किराये के आदमी वहां क्या करते हैं?’
‘हां अब यह ठीक होगा’कृलिली ने जोड़ाकृ
लिली पहले कभी रामदयाल से नहीं मिली थी। कभी-कभी रणविजय रामदयाल की चर्चा किया करते थे। लिली समझती कि रणविजय तो हर किसी की तारीफ करते हैंकृउनकी आदत किसी में खोट देखने की है ही नहीं।
‘भइयाराजा को तो देवता मानते थे, उनका देवता होना स्पष्ट था। पूंजी का स्वार्थपूर्ण आग्रह किसी की भी आदमियत छीन लिया करता है।’
रामदयाल में लिली किसी पूर्ण आदमी को देख रही थी, जो खुद को सामाजिक आवश्यकता के अनुरूप निर्मित करने का प्रयास कर रहा हो। वे संबंधों की गंभीरता को समझने वाले आदमी हैं, इसीलिए उनका व्यवहार अतिरिक्त आकर्षण युक्त है।कृलिली चाहती थी कि रामदयाल जी कुछ अधिक दिन तक दिल्ली प्रवास करें, अभी तो उसने कांग्रेसी राजनीति की आधुनिक गतिविधि पर बातें ही नहीं की।
रामदयाल से मिलकर लिली रणविजय की बातों को ठीक मानने लगी थी, जो उन्होंने रामदयाल के बारे में बताया था। रणविजय भी लिली की सोच वाले थे, किसी भी तरह रामदयाल को रोके रखना है कम से कम एक सप्ताह तक। मुजफ्फर के भारत आने का प्रोग्राम पक्का था। मुजफ्फर ने जिन्ना साहब की मृत्यु के बाद ही पाकिस्तान छोड़ दिया था। वैसे भी मुजफ्फर का कारोबार इंग्लैण्ड में फल-फूल ही रहा था। कारोबार का मामला जो था, वह था ही मुजफ्फर के लिए। पाकिस्तान बन जाने के बाद मुजफ्फर महसूस करने लगा था कि वहां की हवा में जनता की सांसें नहीं, वहां का मौसम, महलों और हवेलियों में बन्द हो चुका है। सडकें जो गांवों को जोड़ती हैं, उस पर सभी नहीं चल सकते, जो चलना चाहते हैं, उनके पास दूसरे का सीना छलनी करने की ताकत भी होनी चाहिए। अगर ताकत नहीं तो जहां है वहीं बन्द रहें और ताकतवरों की प्रार्थनाएं करते रहें।
लिली चाहती थी कि मुजफ्फर अंकल से रामदयाल की भेंट अवश्य हो सो वह आरूढ़ थी कि उन्हें दिल्ली से तब तक वापस न होने देगी जब तक मुजफ्फर अंकल भारत आ नहीं जाते। रामदयाल के लिए कठिन था लिली के आग्रह को ठुकराना। मुजफ्फर का लिली, लिली की ममा और लिली के डैड की जुबान पर थिरकना इसने अतिरिक्त चाहना पैदा कर दी थी रामदयाल के मन में। सो वे लिली का आग्रह स्वीकार कर लिए। अगले दिन संसद भवन तो जाना ही था प्रदर्शन देखने के लिए।कृरणविजय भी खुश-खुश थे कि लिली रामदयाल में काफी रुचि दिखा रही है। यह अच्छी बात है, अब रामदयाल के दिल्ली प्रवास का बोझ उनके सिर पर नहीं होगाकृपहले तो रणविजय असमंजस में थे, जाने क्या सोचे लिली के डैड और उसकी ममा क्योंकि रणविजय ससुराल को ससुराल ही समझते थे जहां रुकने, ठहरने की बंधी बंधाई सीमा है, उससे थोड़ा बहुत भी अधिक नहीं, सो वे हर कदम संभाल कर उठाते, और संभाल कर ही नीचे जमीन पर रखते।
रणविजय ने अपने रहने का प्रबंध कहीं दूसरी जगह कर लिया होता पर लिली के डैड और ममा दोनों ने रोक दिया।कृ
‘क्या यहां तकलीफ है? लिली की ममा ने पूछा था रणविजय सेकृ
अंग्रेज हाकिम ने तो आरोप ही लगा दिया था उन पर...कृ
‘बाप होने का मेरा हक क्यों छीनना चाहते हो रणविजय?’
रणविजय उत्तरहीन थे, तत्काल उन्हें कोई उत्तर न सूझा, उत्तर था भी नहीं, संवेदनाओं से सने सवालों के उत्तर कठोर से कठोर आदमी के पास भी नहीं होते रणविजय तो वैसे भी भावुक आदमी थे। उनकी भावुकता ही उनसे ससुराल और घर का फर्क करा रही थी, जिसे उन्होंने अपनी उम्र में जिया था। दोस्त, दुश्मन, हित-अहित, अपना-पराया सारा कुछ उन्होंने समाज से ही जाना था, अब अपने स्तर से भी कुछ समझने लगे हैं कि ये सारे संबंध वैसे नहीं जैसे दीखते हैं। भइयाराजा एक मजबूत उदाहरण हैं, और संबंधों की व्याख्या भी। वे ताकतवर हैं और साबित कर सकते हैं कि कौन असली है कौन नकली? पर मुझे तो पिता महाराज को देखना है जिन्होंने मेरी मां को असली रानी से कम नहीं समझा व माना।कृ
रणविजय को ऐसी स्थिति में लिली का घर कहां छोडना था, दो साल से इसी हवेली में रह रहे हैं, उन्हें आभास तक नहीं हुआ कि हवेली उनकी नहीं, लिली की ममा की आंखों में अलग-अलग मानकों वाली पुतलियां हैं, लिली के डैड भीतर से कुछ बाहर से कुछ हैं। जैसा अपने लोग हैं।
‘कहीं रामदयाल तो नहीं सोच रहे कि यह रणविजय का घर नहीं? रणविजय ने यह जैसे ही विचारा वैसे ही पूछ लिया रामदयाल से। सीधे तो पूछ नहीं सकते थे उनसे,कृथोड़ा घुमावदार सवाल कियाकृ
यहां भला नहीं लग रहा क्या आपको?
भला! कैसा भला? घर में भला के अलावा भी कुछ होता है क्या? रामदयाल ने बताया रणविजय को
साथियों
रणविजय और रामदयाल के लिए रात का कोई विशेष अर्थ नहीं था, कब रात ने जमीन पर अपने नाजुक पैर उतारे और उन्हें कैसे समेट लिया, सूरज की किरणों ने उसको लील लिया, उन्हें कुछ भी पता नहीं, लिली रात में एक दो बार रणविजय को अपने शयन कक्ष से निकल कर देख लेती कि वहां क्या चल रहा? दो मित्रा अपनी मित्राता के किन टापुओं पर उतर रहे, कैसे-कैसे मनोरमों, आकर्षणों को अपनी चर्चा का विषय बना रहे, कमरे के बाहर तक लिली आती, कुछ सुनती, कुछ अनुमान करती फिर अपने कमरे की तरफ वापस हो लेती और निर्णय लेती कि रणविजय को इस समय छेडना ठीक नहीं, यदि वह उन्हें बुलाती है तो यह व्यावहारिक न होगा।कृवैसे भी रणविजय आज-कल खुद को समय के साथ संतुलित नहीं कर पा रहे।कृ
लिली ने देखा कि दोनों मित्रा गुजरे दिनों, सालों के पन्ने खोले बैठे हैं, कुछ भीगे हुए, कुछ फटे हुए, और कुछ ऐसे जैसे ताजे हों, एक-दो दिन के लिखे हुए। बीते समय के लिखे पन्ने दोनों मित्रों के साथ थे, रामदयाल के यहां वैसे कुछ खास नहीं था, जो था वह पूरी तरह राजनीतिक दशा और दिशा का था कि उन्हें अगला चुनाव किसी भी स्थिति-परिस्थिति में लड़ना है, चाहे पारटी टिकट दे या न दे, इस बार तो वे मान गये, उनका जायज हक उनसे छीन लिया गया। पर रणविजय की स्थिति रामदयाल से कई मायनों में काफी भिन्न थी। उनका हक-हकूक छीनकर उन्हें सर्वहारा बनने के लिए विवश कर दिया गया था।कृ
अगर उन्हें लिली न मिली होती तो...पता नहीं कैसे लिली जैसी जागरूक महिला ने उन्हें अपना प्यार दिया।
इतना सुनते ही लिली वहीं ठहर गई...देखो आगे क्या बातें होती है? लिली ने समय देखा, दो पार हो रहा था।कृ
‘अब तक मैं सड़क पर होता रामदयाल जी, फटाफट नौकरी कहां मिल जाती?’ सर्वहाराओं के बारे में सोचना-विचारना अलग बात है, सर्वहाराओं की तरह बन जाना, रहना, अलग। बहुत मुश्किल है धन व वैभव के सुखों से अलग होना या उसे स्वेच्छया छोड़ देना मजबूरी चाहे जैसा कराये।
लिली कमरे के बाहर से सारा कुछ ऐसे सुन रही थी जैसे वह रामदयाल और रणविजय के आमने-सामने हो, उसे साफ-साफ रणविजय का आंसुओं से भीगा चेहरा दीख रहा था, उसने सोचा भी, क्या रणविजय अपनी भावुकता रोक पाने में कमजोर हैं? उन्हें समय के साथ टकराने का साहस रखना चाहिए शायद ऐसा इस लिए नहीं कि उनसे सारा कुछ छीन लिया गया है। उन्हें क्रूर धोखा दिया गया है।
लिली की ममा और डैड दोनों जन उन्हें लड़के जैसा मानते हैं, बहुत ही अच्छे लोग हैं। वे तो बाहर रहने का प्रबन्ध करना चाहते थे, उन्होंने कहा भी था, पर लिली के डैड और ममा ने उन्हें रोक दिया। उसे कोई अतिरिक्त उदारता और स्नेह वाला आदमी ही रोक सकता है।
उन्हें यहां सारी सुविधायें हैं, वे कार से चलते हैं, घर का सारा खर्च लिली के डैड चलाते हैं, वे अपना खर्च अनुबाद के काम से निकाल लेते हैं, पहली बार तो गजब हो गया, उन्हें अनुबाद का थोड़ा सा नकद भुगतान मिल गया था, साथ में लिली भी थी, डैड घर पर थे उन्होंने कार खड़ी की, सीधे डैड के कमरे में...कृ
‘पारिश्रमिक मिला है आज,’ कहते हुए उन्होंने भुगतान डैड को थमा दियाकृ
डैड तो रुपया देखकर कहीं खो गये,
‘नहीं-नहीं लो इसे रखो! पहले पारिश्रमिक का उत्सव मनाओ, पाओगे कि उत्सव के एक-एक क्षण परिश्रम की गन्ध में सने हैं और उसके सुवास से तुम्हें दुगुनी-तिगुनी ताकत हासिल हो रही है।’
लिली सारा कुछ सुनकर दृढ़ न रह सकी, पहली बार वह सुन रही थी किसी निर्वासित का बयान।कृएक ऐसे आदमी का बयान जो पांच साल पहले हर तरह से एक मजबूत आदमी था और दिल्ली में सिर्फ इसलिए निवास कर रहा था कि वह अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर ले। राजनीति के खिलाडियों से उसके संपर्क काफी घने थे। चाहता तो वांक्षित हासिल उसके साथ होता लेकिन राजनीति में भी वह सूफी ही बना रहा। लिली सीधे अपने कमरे में चली आई और बेड पर निर्जीव सा पसर गई।
रणविजय पर अतिरिक्त ध्यान देना होगा तथा उसे उत्साहित करना होगा कि जीवन तब जीवन होता है जब उसे उचित हस्तक्षेपों के साथ जिया जाये, लिली ऐसा सोच ही रही थी कि रणविजय चले आये। उसने जागते हुए सोना ओढ़ लिया। रणविजय ने लिली को सोया हुआ जान कर, उसे जगाना उचित न समझा। हालांकि उस समय लिली का जागा हुआ होना उनकी आवश्यकता थी फिर भीकृ
लिली तो जागी हुई थी, वह समझ सकती थी कि समय का संकेत किस दिशा में है? रणविजय उसे जगायें या न जगायें। ऐसी मनःस्थिति में वे खुद अभिव्यक्त न होना चाहेंगे और न ही मानसिक तरंगों को दूसरी तरफ मोड़ने का जबरिया प्रयास भी करेंगे। लिली ने महसूसा कि उसे दमित इच्छाओं का खेल खेलना चाहिएकृफिर तो उसने उत्तेजक करवट लिया और अपने हाथों को सीधे रण्विजय के ऊपर फेंका। रण्विजय उस समय छत की तरफ एकटक थे। लिली के हाथों में तेज झटकन थी। रणविजय सो जाने की कोशिश में थे फिर भी उनकी आंखों को जो देखना चाहिए या नाइट बल्ब की हल्की रोशनी में जो दिख सकता था, देख रही थीं। उन्होंने लिली के मुलायम हाथों का मुलायम झटका महसूसा, जो उत्तेजक किस्म का था। इसके बाद तो लिली रणविजय की देह के संग ऐसा संयुक्त हो गई कि वहां दो देहों, दो तरह की सांसों वगैरह का कोई प्रयोजन नहीं था।
दमित इच्छाओं को आमंत्रित कर लेने के बाद खेल के प्रारम्भ होने और न होने के बीच जो फासला था, थोड़ी ही देर में वह फासला फासला न रह गया फिर तो वहां एक रूप, एक चरित्रा और एक गुण का ही समय बच रहा था, और वह समय, उस समय का एक-एक कतरा, रणविजय के लिए आश्वस्ति दायक था कि जीवन में सिर्फ हताशायें ही नहीं होतीं, वैसे रणविजय के लिए अपनी हताशाओं की अभिव्यक्ति आवश्यक थी। रामदयाल से कोई दूसरा उनका खास था भी तो नहीं, केवल लिली थी। उसके सामने वे खुल सकते थे पर लिली उनके लिए एक कमजोर महिला थी जाने उस पर कैसा प्रभाव पड़े, समान्यतया औरतें कमजोर आदमी में रुचि नहीं लेतीं। पर लिली ऐसी न थी, वह भी अनायास मिले उत्तराधिकार को अपना अधिकार मान कर मूर्खता ओढने-बिछाने का सपना नहीं देखती थी।
रात बची हुई थी, लेकिन उसका बचना काफी कमजोर था, और नींद थी कि रणविजय की आंखों से लजा रही थी जो लिली के यहां से भाग ही चुकी थी। सो बातों ने अपनी धारा पकड़ ली, लिली ने प्रारंभ किया...कृ
‘रात गुजार दी आप लोगों ने बातें करते हुए’
‘हां गुजर तो गई’ बताया रणविजय ने।
‘कैसी बातें थीं जिसे रात ने बन्दी नहीं बनाया, निश्चित ही बातें ताकतवर रही होंगी’ पूछा लिली नेकृ
नहीं ऐसा कुछ नहीं, बातें काफी कमजोर थीं, क्योंकि कमजोर आदमी की थीं, मैं ही बतियाता रहा रात भर, तारीफ करनी चाहिए रामदयाल की, उन्होंने उकताहट नहीं दिखाया, गंभीरता से सुनते रहे मेरा अनाप-सनाप।
रणविजय ने लिली को बातों की प्रकृति के बारे में बताया।कृ
‘हूं, ऐसा, मैं भी तो जानूं कुछ। आप दोनों के बीच कमजोर आदमी कहां से चला आया? अगर आपको महसूस हो कि मैं आपके लिए गंभीर हूं तो आपको मुझसे कुछ छिपाना नहीं चाहिए यह लिली थी अपनी गंभीर आद्रता के साथ।कृ
ऐसा कुछ भी नहीं लिली! तूं सारा कुछ जानती है कि मुझे या साफ कहो तो हमें किसी पनाहगाह की तलाश करना ही चाहिए, डैड या ममा से अलगकृ रणविजय ने बात का खुलासा किया।
बस इतनी सी बात,कृफिर तो मैं समझती हूं कि इस कार्य में हताषा के लिए कोई स्थान नहीं। क्यों मैं गलत तो नहीं कह रही? पूछा लिली नेकृ
नहीं मैं हताश नहीं हंू, डैड से पूछ लूं फिर कोई अखबार ही पकड़ लूं व्यवसाय के लिए तो पूंजी चाहिए सो उसे नहीं कर पाउंगा।कृ
अखबार क्या बुरा है? पी.एच.डी. के बाद मुझे कोई कालेज तो मिल ही जाएगा।कृएक दिन रूसी दूतावास में रूसी दिमाग वाला आपका कामरेड दोस्त बोल रहा था जो कुर्ता धोतीवाला है। हम दोनों के खर्च ही कितने पड़ेंगे, अभी क्या दिक्कत है, डैड तो हैं ही, उन्हें किसी दूसरे को कुछ देना तो है नहीं, लिली ने रणविजय को आश्वस्त कियाकृ
रोशनदान पर सुबह की धमक पड़ चुकी थी, बाहर अंधेरे का हल्का कतरा भी नहीं, लिली ने रोशनदान देखा...कृ
‘अब कमरे से बाहर निकलना चाहिए दाई आ चुकी होगी, चाय लाने वाली होगी।’कृ
सुबह होने का अनुशासन लिली के दिमाग पर चढ़ गया। रणविजय ही नहीं लिली और उसके डैड भी सुबह के अनुशासन के प्रति सतर्क रहा करते थे। रामदयाल तो वैसे ही अनुशासन प्रिय आदमी थे, वे सुबह ही नहीं, रात के अंधेरे में भी अनुशासित रहते तथा मन के अन्तःपुर में जरूरी अंधेरा या उजाला ही घुसने देते।कृ
वस्तुतः दाई आ चुकी थी, उसने विस्तर वाली चाय बना लिया था, सिर्फ कमरे दर कमरे पहुंचाना बाकी था।
सुबह का प्रोग्राम पहले से ही निश्चित था कि प्रदर्शन देखने जाना होगा सो जल्दी तैयार होकर निकलना था।
जबसे रामदयाल आये हैं, रणविजय उन्हीं के साथ चाय पीते हैं, वे सीधे उनके कमरे की तरफ चले गये।
लिली ने अपने शयनकक्ष में चाय पिया, दाई ने डैड और ममा को चाय पहुंचा दिया था तथा रणविजय और रामदयाल को भी।कृ
चाय पीते समय ही हाकर ने अंग्रेजी का एक अखबार अतिथि कक्ष की खिडकी से भीतर फेंका, उसके साथ पत्रिका जैसी एक चीज थी...कृ
रणविजय ने अखबार का बंडल उठाया, साथ-साथ पत्रिका भी। पत्रिका नई थी, पहले उन्हांेने उसे कभी नहीं देखा था। पत्रिका ठीक-ठाक थी, नाम भी ठीक था ‘मैनकाइन्ड’ हैदराबाद से प्रकाशित। संपादक राममनोहर लोहिया थे। लोहिया का नाम तब रणविजय और रामदयाल दोनों के लिए अज्ञात नहीं था। रणविजय भी लोहिया की राजनीतिक समझ से प्रभावित होने लगे थे। रामदयाल तो बनारस वाले हरिजनों के मन्दिर प्रवेश की लोहिया की आन्दोलनात्मक घटना से ही प्रभावित थे, क्योंकि वह कार्यक्रम राजनीतिक कम मानसिक ज्यादा था। छूत-अछूत को परिभाषित करने वाला तथा कांग्रेसी सरकार की गान्धीवादी प्रतिबद्धताओं को साफ-साफ स्पष्ट करने वाला। जानने को तो उस घटना के बारे में रणविजय भी जानते थे पर उन्होंने उसे गंभीर राजनीतिक कार्यवाही नहीं माना था। रणविजय खास तौर से लोहिया से तब प्रभावित हुए थे जब लोहिया को गिरफ्तार किया गया था नहर वाले आन्दोलन में। तत्कालीन उत्तर प्रदेश की सरकार ने नहर का रेट (पनिकढ़) बढ़ा दिया था और लोहिया ने उस मुद्दे को आन्दोलन के जरिए उभार दिया था। स्वतंत्रा भारत में किसानों का वह पहला आन्दोलन राजनीतिक दृष्टिसे काफी महत्वपूर्ण था जिसमें हजारों किसानों की गिरफ्तारी हुई थी।
पहले तो रणविजय को महसूस होता था कि लोहिया आसमान में कुछ ठोस शब्दों के सहारे छेद करना चाहते हैं, उनका नारा ‘जेल, फावड़ा, वोट’कृबाहरी और भीतरी जनतंत्रा या वाणी की स्वतंत्राता हो, सारे के सारे दुनिया के मजूरों एक हों जैसे थोथे आह्वान भर जान पड़ते हैं।
‘कौन सी पत्रिका है?’ रणविजय से पूछा रामदयाल ने
‘मैनकाइन्ड है लोहिया की’कृ
अंग्रेजी में! हिन्दी का पक्षधर और पत्रिका अंग्रेजी में!
अंग्रेजी के पाठक ज्यादा हैं इसीलिए शायद।
हिन्दी में वे ‘जन’ नामक पत्रिका निकालते ही हैं।कृ
देखूं तो रामदयाल ने पत्रिका रणविजय से मांग लिया। रणविजय अखबार पलटने लगे। अखबार पारंपरिक मिजाज का था, जहां-जहां वायसराय और अंग्रेजी सरकार की चर्चा प्रकाशित होती थी, वहां वहां तत्कालीन प्रधानमंत्राी चस्पा हो गये थे तथा बाकी जगहों पर देश और प्रदेश की सरकारें थीं। कहीं कहीं मुख्यमंत्राी और राज्यपाल आदि भी थे। हत्याओं, बलात्कारों, लूटों, दुर्घटनाओं की खबरें भी पहले की तरह यथा-स्थान थी। अखबार में पढने लायक जो लेख था वहां पहुंच कर रणविजय ठहर गये थे। रणविजय की आंखें लेख पर थीं।
मैनकाइन्ड पत्रिका रामदयाल के हाथ में थी जो अपनी भाषा तथा स्पष्टता में काफी भिन्न थी। कांग्रेसी सरकार का राजनीतिक पक्ष साफ तौर से पत्रिका में परिभाषित था कि सरकार केवल सरकार है, यह जनता की सरकार नहीं है। पत्रिका में एक लेख ऐसा भी था जो पंचायत से लेकर विश्व सरकार और विश्व नागरिकता की संभाव्यता के तर्कपूर्ण विमर्शों से भरा था कि कैसे ग्राम पंचायतें अपने शासन को चलाते हुए, जिला शासन और फिर प्रदेश तथा देश के शासन के साथ सार्थक सहयोग व भागीदारी कर सकती हैं।
रामदयाल पत्रिका का पढना जारी न रख सके उन्हें आन्तरिक कुलबुलाहट होने लगी फिर उन्होंने रणविजय को अपनी तरफ प्रभावित किया...कृ
‘यह तो बहुत ही सार्थक राजनीतिक पत्रिका है भाई।’
‘इसके कई लेख पढने लायक हैं।’
साहसपूर्ण है, स्वतंत्रा जनतंत्रा या लोकराग को व्याख्यायित करती, इसकी एक प्रति मुझे भी चाहिए, इसकी सदस्यता का रुपया आज ही एम.ओ. कर देना है।कृ
रणविजय ने पत्रिका ले लिया, उन्होंने सरसरी तौर पर उसे देखा उन्हें महसूस हुआ कि इसे गंभीरता से पढना, गुनना होगा। अब रणविजय भी डा. लोहिया को गंभीरता से महसूसने लगे थे कभी कभी उनके बयान वगैरह अखबारों में छपा करते थे। जो बहु-अर्थी जैसे जान पड़ते थे, जैसे ‘भूमि सेना जेल, फावड़ा और वोट’ पर बाद में उन्हें जान पड़ा था कि ‘भूमि सेना’ का गठन किसी भी लोकप्रिय सरकार का लोकप्रिय कार्यक्रम हो सकता है तथा हजारों, लाख एकड़ परती, ऊसर, बंजर भूमि को कृषि योग्य भूमि में बदला जा सकता है तथा एक ऐसे वर्ग समाज को भूमिधारी बनाया जा सकता है जिनके पास अपने आवास तक के लिए जमीन नही हो, इसके बावजूद रणविजय खुद को आश्वस्त न कर पाते कि वर्ण-समाज में आखिर वर्ग-संघर्ष क्यों नहीं होगा? वर्ग-संघर्ष की अवधारणा का मुद्दा रणविजय के लिए चिन्तन के स्तर पर इतना प्रभावकारी था कि उन्हें लोहिया के राजनीतिक सुझाव विचलित न कर पाते लेकिन उनके लिए मुश्किल हो जाता कि वे किसे ठीक मानें। उन्हें वह याद क्रोधित कर देती कि कामरेडों ने स्वतंत्राता संग्राम के समय अंग्रेजों की मदद की थी। वर्ग-संघर्ष बनाम वर्ग-सन्तुलन का द्वन्द उनके भीतर चलता रहता। वे मानकर चलते कि भारतीय कामरेडों ने स्वतंत्राता संग्राम में भाग न लेकर अंग्रेजों का साथ दिया था, यह भारतीय कामरेडों की गलती थी न कि वर्ग-संघर्ष की। लेकिन यह जो वर्ग-सन्तुलन का मामला है, जिसे डा. लोहिया व्याख्यायित कर रहे हैं क्या यह इसलिए है कि रक्तपात न हो, लोगों का खून न बहे।कृ
पत्रिका का कुछ हिस्सा देख कर रणविजय ने विचार किया...कृ
‘लोहिया को पढना, संवेदना के स्तर पर खुद की कार्य क्षमता व इच्छा शक्ति को समीक्षित करना है।’
ऐसा ही जान पड़ रहा है। रामदयाल ने रणविजय को स्वीकारते हुए पूछा...कृ
अरे! भाई संसद भवन कब चलना है! लिली नहीं दिखी अभी सो रही है क्या?
तभी लिली आ धमकी, लिली यहीं है आपके पास। आप लोग चाहें तो रात की बाकी नींद पूरी कर लें, फिर चलेंगे लिली ने जोड़ा।
अरे! नहीं काफी देर हो जाएगी रामदयाल ने सुझायाकृ
आप लोग जल्दी तैयार हो लें। रोटी और लौकी की सब्जी का नाश्ता लेकर चलते हैं, डैड से भी पूछ लेती हूं वे चलेंगे क्या? लिली कहते हुए डैड और ममा के कमरे की ओर वापस हो ली।कृ
लिली के डैड को कहीं दूसरी जगह जाना था, सो वे संसद भवन तक नहीं जा सकते थे। रणविजय, रामदयाल और लिली ही संसद भवन के लिए निकले। किसानों, मजूरों का प्रदर्शन तब तक बीच रास्ते में कहीं फंसा पड़ा था। संसद भवन के सामने सन्नाटा था। रामदयाल ने कोशिश किया कि वे उस सन्नाटे में से एक ऐेसे भारत को बाहर निकालें, जो पन्द्रह अगस्त सैंतालिस के पहले का था। पर यह तो उनकी सोच का ही हिस्सा था वास्तविकता जो थी वह सामने थी कि वहां सन्नाटा था, अब सन्नाटे में से चाहे जो जैसा समझे निकाले।
संसद भवन की दाहिनी ओर कुछ लोग थे, जो मंच वगैरह बनाने की तैयारी में थे, पास में ही दरियां वगैरह रखी हुई थीं। उन लोगों ने बताया कि प्रदर्शन का मार्च प्रारंभ हो गया है जो घंटे दो घंटे में यहां आन पहुंचेगा, यहां भाषण होंगे, बताया जाएगा कि देश की तस्वीर कैसी है? और कैसी बनाने का वादा किया गया था।
रामदयाल ने घड़ी देखा..दिन के ग्यारह पार हो रहा था।कृ
रणविजय ने मंच बनाने वालों से प्रस्तावित किया...संसद का सत्रा प्रारंभ होने पर प्रदर्शन करना चाहिए था अभी तो संसद खामोशी में है।
हम लोग कुछ नहीं जानते प्रदर्शन के बारे में हमें तो मजूरी मिलेगी। हम टेन्ट ष्शामियाने वाले की तरफ से हैं।कृ
एक नेता जी हैं, वे यहां अभी आये थे, वे आ ही रहे होंगे, आप उनसे बातें करें।
लिली मौजूदा समय की राजनीतिक कार्यवाहियों के बारे में गुन रही थी, सो गंभीरता से सारा कुछ देख रही थी। उसके लिए था कि चलो कुछ तो हो रहा। सन्नाटा किसी भी लोकतंत्रा के लिए ठीक नहीं होता।
संसद भवन की भव्य अंग्रजी जमाने वाली ईमारत, उसकी महराबें, घुमावदार घेरे, एक प्रभावकारी संरचना, भवन निर्माण कला और धन का बुद्धिमत्ता पूर्ण उपयोग किसे प्रभावित नहीं करेगा? पर क्या वहां वैसे ही कानून भी गढ़े जाते हैं जो जनता के हितों की हिफाजत करते हैं, यही सोच रहे थे रामदयाल रणविजय और लिली भी, फिर वे खुद अपने आपको कोसते...कृ
‘कि उनके सोचने का तरीका ही कसैला है, हर चीज में उन्हें नकारात्मकता ही दीखती है, जो है जैसा है, उसके प्रति वे तटस्थ नहीं रह पाते।’कृ
आप संसद भवन के भीतर गये हैं कि नहीं? रामदयाल से पूछा रणविजय ने।
कहां मौका मिला? अंग्रेजों के जमाने में संसद भवन में जाना काफी मुश्किल था, बाद में कभी उस इच्छा से दिल्ली आया ही नहीं। इच्छा है कि एक बार वह स्थान देखूं, जहां से भगत सिंह ने बारूद का गोला फेंका था और कोई मरा नहीं था। रणविजय को बताया रामदयाल ने।
‘मैं भी नहीं दाखिल हो सका हूं उसके अन्दर रणविजय ने अपने बारे में बताया।’कृ
‘इसमें क्या रखा है? जब चाहें देख लिया जाएगा, इस बार सत्रा चालू होने दीजिए, भइया आप भी आइयेगा तब, साथ ही देखा जाएगा, लिली ने रामदयाल से कहा।कृ
‘हां आऊंगा जरूर, बतौर सांसद तो उसमें घुसना असंभव है, बतौर दर्शक ही देख लिया जायेकृजैसे कि हम ‘भारत’ देख रहे हैं, नक्शा फैला लिया, देख लिया सारा कुछ नदियां, पहाड़, शहर, महाशहर उस तरह भी देखना कम रोमांचक नही होगा।कृ
रामदयाल ने अपनी विवशता व्याख्यायित किया।कृ
चलिए क्या हुआ? हम गणेशिया संस्कृति के लोग हैं। गणेश देवता, देवताओं की दौड़ में थे, देवताओं के पास तेज दौडने वाली सवारियां थीं, गणेश जी के पास चूहा था, चूहा कितना दौड़ता! उन्होंने चूहे की सवारी किया और अपने पिता महाराज की ही परिक्रमा करने लगे। देवताओं को काफी अचरज हुआ, पूरे रास्ते पर चूहे के पैरों के निशान मिलते। गणेश आगे निकल गया क्या?
गणेश उस प्रतियोगी परिक्रमा में सबसे आगे निकल गये थे। हम लोगों को ऐसा ही मान लेना चाहिएकृक्योंकि हमारी सीमायें सीमित हैं, पूरी तरह मापित। रणविजय ने रामदयाल का समर्थन किया कि एक औसत भारतीय के लिए अपना भारत केवल गणेश परिक्रमा की तरह ही देख पाना संभव है? और अपनी तमाम सक्रियताओं के साथ भारतीय होने का यही स्वादिष्ट भ्रम पीते रहना होगा।
जब तक प्रदर्शनकारी अपने प्रदर्शनों के साथ संसद भवन नहीं आ जाते, तब तक का समय रामदयाल, रणविजय और लिली के लिए किसी तरह गुजार लेने जैसा था। यानि कि ऐसे कार्य-योजना हीन समय का उपयोग चाय पीने और किसी लुभावने गप-शप के लिए किया जा सकता है फिर तो लोग उस चाय वाली दूकान की तरफ बढने लगे, जो वहीं पास में थी।
संसद भवन के आस-पास का इलाका केन्द्रीय राजधानी का अधिग्रहित क्षेत्रा था, उसकी विशेषता थी कि वहां देश के पूंजीपतियों के कब्जों से वह क्षेत्रा मुक्त था, उन पूंजीपतियों से भी जिन्होंने स्वतंत्राता संग्राम में अपनी तिजोरियां खोल रखा था, ऐसा क्यों था? यह समझ पाना रामदयाल और रणविजय दोनों के लिए मुश्किल था।
मुश्किल इसलिए था कि कांग्रेसी सरकार दो नावों पर चल रही थी, उसका पहला आधा हिस्सा पूंजीवादी था, यानि गर्दन के ऊपर सरकार का रंग-रूप पूंजीवादी दिखावटी उदारता, दया, प्रेम, लाभ व क्रूर निजी सुविधा, भोग-विलास वाला था तो नीचे का दूसरा हिस्सा नंगे पांव चलने वाला भी था। गनीमत थी कि संसद भवन के प्रभावित परिक्षेत्रा पर पूंजीपतियों का कब्जा नहीं था यह अचरज की बात थी। लिली तो अपने दिमाग को थपकियां देकर सुला चुकी थी, उसने खुद को प्रदर्शन देखने तक सीमित कर लिया था, वह उसमें से आह्लादकारी प्रसन्नताओं को पकड़ने के लिए ही उत्सुक थी ‘चलो कुछ तो हो रहा खामोशी पीने से तो कुछ भी न होगा?’
बहुत दूर जाने के बाद चाय की दूकान मिली जो एक छोटे से गोमटीनुमा वाले कमरे में थी, वह कमरा सरकारी था और ठेके पर आवंटित किया गया था। दूकानदार ने उसे ठेकेदार से किराये पर लिया था। ठेकेदार दिल्ली का था जिसने नई दिल्ली क्षेत्रा के ऐसे कई सरकारी दूकानों का साझा ठेका लिया था, वह किसी नामी कांग्रेसी का पुत्रा था, जिसका दिल्ली नगर निगम और केन्द्रीय सरकार पर काम चलाऊ प्रभाव था।
दूकानदार गाढ़ी होती रेखों वाला नौजवान लडका था, जो हसियों को अपने मोटे होठों के भीतर रखता था, दूकान के भीतर और बाहर दोनों तरफ ‘सर’ ही ‘सर’ था क्या दें सर? दूकानदार ने पूछा।
रणविजय ने दूकान का सामान देख कर पूछा..‘क्या क्या है तुम्हारे पास?’
दूकानदार फर्राटा सामानों की सूची बांच गया। जिसका अर्थ था यहां भूखे नहीं आते कि पूड़िया मिलेंगी, यहां खाते-पीते लोग ही आते हैं, चाय, काफी, बिस्किट क्या नहीं है? यहां सिगरेट और पान भी है, खैनी नहीं मिलेगी।कृ
‘चाय दो और बिस्किट भी’ लिली ने मांग कियाकृ
चाय पीते समय ही दूकान में आवाज आने लगी...कृ
‘इन्कलाब जिन्दाबाद! इन्कलाब जिन्दाबाद, संघर्ष हमारा नारा है, धन-धरती बंट कर रहेगी, हमें हमारा हक दो, यह देश हमारा भी है, जैसे कानफोड़ू नारों की आवाजें साफ-साफ थीं, लिली, रामदयाल और रणविजय को सारे नारे प्रभावित करने लगे थे कि लोकतंत्रा की यही सबसे बड़ी ताकत है।
कुछ देर में प्रदर्शन और प्रदर्शन की भीड़ दिखने लगी थी, अनुमान करना आसान हो गया था कि भीड़ कितनी है? यह भी कि भीड़ में जो भीड़ है, वह भी कैसी है?
भीड़ अनुशासित थी, पर नारे अवज्ञाकारी थे, सीधे सीधे सरकार की बदनीयती को साबित करते। यही अपेक्षा भी की जा सकती थी प्रदर्शन से। प्रदर्शन के साथ ही रणविजय, रामदयाल और लिली भी चलने लगे।कृप्रदर्शन के सारे लोग सड़क पर थे, पहचानना कठिन था कि कौन नेता है कौन अनुयायी? सभी नेता और अनुयायी दोनों लग रहे थे।
संसद भवन के सामने पहुंच कर जहां मंच वगैरह बनाया गया था, भीड़ किसी बड़ी सभा में बदल गई, चार पांच हजार वाली सभा जैसी। कुछ लोग मंच पर बैठ गये, जो पहनावे से नेता दिखते थे, मंच के पास एक माइक भी खड़ा था...कृ
फिर एक नेता खड़ा हुआ उसने माइक थामा, संबोधित किया
‘साथियों’
दूसरे दिन की सुबह
प्रदर्शन की भीड़ खामोशी ओढ़ कर मंच के सामने बैठी थी। उनका बैठना व शान्त रहना और मंच से संबोधित किये जाने वाले संबोधनों को सुनना तब उनके लिए किसी जरूरी काम की तरह था भले ही भीड़ या प्रदर्शन के यायावर दर्शक रामदयाल, रणविजय और लिली जैसे लोग प्रदर्शन का अर्थ विपरीत प्रभावों वाला लगा रहे हों।
मंच पर खड़ा नेता ‘साथियों’ माफिक प्रिय संबोधन से आगे निकल कर प्रदर्शन को आश्वस्त करना चाहा कि मुख्य वक्ता किसी जरूरी काम से कहीं फंस गये हैं वे शीघ्र ही यहां आने वाले हैं, उनके यहां उपस्थित होने तक हमें कार्यक्रम प्रारंभ रखना है। फिर उसने प्रदर्शन क्यों को किसी प्राध्यापक की तरह व्याख्यायित किया जिसका अर्थ था कि बिहार की कांग्रेसी सरकार हर वह काम कर रही जो किसान व मजदूर विरोधी हैं। नेता ने कोई उदाहरण न देकर कि वस्तुतः बिहार की कांग्रेसी सरकार क्या कर रही? भीड़ पर ही यह जिम्मेवारी सौंप दी कि आप समझते हैं कि बिहार की सरकार जनता की सरकार नहीं है, यदि जनता की सरकार होती तो ‘पांच एकड़ भूमि’ तक का राजस्व माफ कर दिया गया होता। भूमि आवंटन हुआ होता, सीलिंग लगाई गई होती, बेरोजगारों को रोजगार दिया गया होता।’
रामदयाल, रणविजय और लिली रघुवर को देख रहे थे कि वह कहां है? चार-पांच हजार के सामूहिक जत्थे में रघुवर का दिखना छिप गया था, छिप तो वह अधेड़ आदमी भी गया था जो बस्ती में उन्हें मिला था।
मंच से भाषण प्रारंभ था, मंच पर अभिव्यक्ति का ताप धीरे-धीरे फैलने लगा था। एक नेता, दूसरा नेता फिर तीसरा नेता, तभी मंच से घोषणा हुई कि प्रमुख नेता जी आ गये हैं, जिनकी सद्प्रेरणा से यह प्रदर्शन आयोजित किया जाना संभव हो सका है। भीड़ ने तालियां थप-थपाया, फिर जोरदार नारा लगायाकृऐसा नारा कि यदि संसद भवन की दीवारों में मानवीय संवेदनशीलता होती तो दीवारें भी नारा लगाने लगतीं। प्रदर्शन देखने वालों ने भी नारा लगाया,भाषण चलता रहा, नेता बदलते रहे, भाषण के प्रति प्रभाव एक,सामान्य लोगों की विचारधाराओं का घोल कि सरकार द्वारा संतोषजनक जैसा कुछ भी नहीं किया जा रहा।कृ
रामदयाल और रणविजय के लिए उस प्रदर्शन का सबसे महत्वपूर्ण भाग था कि उसमें भाग लेने वाले देश स्तर के कुछ नामी-गिरामी नेता भी थे। सामान्यतया ऐसा ही हुआ करता है बिना किसी बड़े और प्रभावी नेता के ऐसे प्रदर्शन आयोजित नहीं किये जाते कम से कम दिल्ली में। यह एक महत्वपूर्ण बात थी, किराये पर जो प्रदर्शनकारी शामिल थे, उनके कारण प्रदर्शन की गुणवत्ता काफी बढ़ गई थी। वैसे भी प्रदर्शन के लिए भीड़ ही तो चाहिए होती है। रामदयाल, रणविजय और लिली ने भी देखा कि उस समय रघुवर किसी नेता की तरह दिख रहा था। सफेद, चमचम कुर्ता,पायजामा, काली जैकेट, इस्त्राी किया हुआ। वह भीड़ में से उठता, अगल- बगल, आमने-सामने देखता फिर रटा-रटाया नारा लगाता। भीड़ में पंक्ति बद्ध बैठे उसके साथी उसी नारे को दुहराते।
रघुवर ने रामदयाल को जब पहचाना तभी भीड़ में से बाहर निकल आया।कृ
रामदयाल को नमस्कार किया नमस्कार साहब! आप लोग भी आ गये हैं, उसने पूछा...कृ
‘हां, तुम्हारा प्रदर्शन देखना था।’कृरामदयाल ने उसे बताया
‘अरे! यह प्रदर्शन क्या है साहब? कम्युनिस्टों का प्रदर्शन देखते तो कहतेकृ उसमें हमलोगों को मजा आता है, बहुत जोरदार होता है।’ रघुवर ने रामदयाल को बतायाकृ
‘क्यों उसमें क्या होता है?’ पूछा रामदयाल नेकृ
‘उसके नारे गरीबों के होते हैं, नेता गरीबी, बेरोजगारी पर भाषण देते हैं तथा प्रदर्शन में शामिल लोगों को सम्मान देते हैं, एक साथ खाना खाते हैं, सोते हैं। वैसा भाई-चारा इस प्रदर्शन में कहां? अभी तक लाई-चना भी नहीं मिला, दोपहर खतम होने वाली है।’
‘कब तक चलेगा प्रदर्शन?’ उससे पूछा रामदयाल नेकृ
‘देखिए शायद तीन-चार बजे तक चले। रघुबर ने उन्हें बताया और रामदयाल से क्षमा मांग कर श्रोताओं की भीड़ का हिस्सा बनने के लिए चला गया।कृ
रामदयाल और रणविजय को मंच, प्रदर्शन, नेताओं के भाषण, मौजूदा सरकार, ताजा संविधान, बिहार के किसानों की गिरफ्तारी सारा कुछ किसी प्रायोजित नाटक की तरह जान पड़ रहा था, ऐसा ही होता आया है, और शायद ऐसा ही होता रहेगा, सत्ता का खेल किसी कौतुक से कम नहीं। पर लिली के लिए कुछ उल्टा था, उसे सारा कुछ संभावनापूर्ण दिख रहा था, उसे प्रदर्शन जैसा प्रजातांत्रिक हस्तक्षेप अच्छा लग रहा था, कल क्या होगा से उससे वह काफी पीछे थी, उसका सोचना था जो हो रहा है, वह होते रहना चाहिए।
प्रदर्शन को संसद भवन से होते हुए राष्ट्रपति भवन तक जाना था। प्रदर्शनकारियों के दिल-दिमाग में यह बात बहुत मजबूती से बैठी हुई थी कि राष्ट्रपति जी बिहार के हैं, अपने हैं, अपनों के आंसू देख उनकी आंखें भी छल-छला जाएंगी, फिर तो हुकूमत की कलम वही लिखेगी जो बिहार के लोग चाहते हैं।कृ
अब हुकूमत के खेल में राष्ट्रपति जी से बड़ा कौन है?
प्रदर्शनकारियों के पास भाषाई कला तो थी नहीं जो बड़ा को ताकतवर से जोड़ते पर मतलब वही था लेकिन प्रदर्शन में शामिल बुद्धिजीवी किस्म के लोग तो जानते ही थे कि भारत का राष्ट्रपति महज मर्यादापूर्ण सत्ता प्रमुख होता है, उसके हाथ में सत्ता के हथियार नहीं होते, सारा कुछ प्रधानमंत्राी जी की मुठ्ठी में बन्द होता है... वे चाहें तो मुठ्ठी खोलें या बन्द रखें। मंच से बार बार राष्ट्रपति जी का नाम धुंआ की तरह उठता और हवा में विलीन हो जाता, प्रदर्शनकारी प्रजातांत्रिक हस्तक्षेप का धुंआ देखते, जो उनकी तरफ भी कुछ समय के लिए आता फिर कहीं खो जाता।
रामदयाल दिल्ली में हो रहे इस प्रदर्शन को सैंतालिस के पहले वाले प्रदर्शनों से जोड़ रहे थे, आखिर कितनी समानता है इनमें?
पर समानता न थी समानता होती भी कैसे?कृतब शासक अंग्रेज थे और अब लोग अपने हैं जो शासन-प्रषासन की पलंग पर सोये, बैठे हैं।
‘सरकार में बैठों के विरोध में आखिर कोई क्या बोलेगा? उन्हें विदेशी तो न कहेगा।’
मंच से एक तेज तर्रार नौजवान नेता का भाषण चल रहा था, उसका भाषण काफी आक्रामक था तथा उसके भाषण में शास्त्राीय शिष्टता का ही नहीं व्याकरण की सांख्यिकी का भी अभाव था, वह आंकड़ा प्रस्तुत कर रहा था और उसके जरिये साबित करना चाहता था कि बिहार काफी पिछड़ा क्षेत्रा है, उसे पहले बंगाल ने लूटा और अब केन्द्र लूट रहा है।कृ
रामदयाल रणविजय और लिली तीनों को उस नेता में जनतंत्रा की आंच काफी तेज महसूस हुई... यह आगे बढ़ेगा तीनों की यह सम्मिलित सोच थी।प्रदर्शन के प्रमुख नेता मंच पर विराजमान हो चुके थे पर उनका भाषण तो अन्त में ही होना था।कृ
‘भाषण शायद लम्बा चले लिली ने आशंका जाहिर की’कृ
‘वह तो चलना ही है, बहुत सारे लोग मंच पर विराजमान हैं, कितना अच्छा लग रहा है कांग्रेसी तो अपनी पीठ ठोंक रहे हैं कि उनसे अच्छा कोई नहीं, अब वे अपना चेहरा देखें, इस विरोध प्रदर्शन के आइने में, रणविजय और रामदयाल, कहीं न कहीं कांग्रेसी हुकूमतों से असन्तुष्ट थे, क्योंकि कांग्रेसी हुकूमतें भी अपने चरित्रा और व्यवहार में अंग्रेजी हुकूमत की नकल बनती जा रही थीं। वही नौकरशाही, वही दमन, वही पुलिस अत्याचार आखिर क्या बदला? कुछ नहीं।
रामदयाल के लिए दिल्ली का कथित वैभव आसमान में टंगी हुई खुशियों की तरह था। वहां गांवों की गलियां, गोबर और कीचड़ के लिए कुछ भी न था। वहां एक अलग किस्म की दुनिया थी जिस दुनिया में पांव रखने भर की जमीन गांव वालों के लिए न थी। रामदयाल अपने जिले के बारे में सोच रहे थे तथा प्रदर्शन से प्रेरणा ले रहे थे कि जमीनदारी विनाश के कानूनों को सही तरीके से लागू करवाने के सन्दर्भ में कुछ किया जा सकता है। रणविजय के बारे में तो कुछ करना ही नहीं है, क्योंकि वे खुद कुछ करना नहीं चाहते। वैसे रणविजय अच्छा नहीं कर रहे।कृ
‘अब चला जाये’ रामदयाल ने रणविजय को सुझायाकृ
‘लिली भी वापस होना चाहती थी, हां अब यहां क्या देखना।’
फिर तो मुजफ्फर की कार सडक पर दौडने लगी। रास्ते में ही रामदयाल ने अपने घर वापस होने की बात की... यार! कई दिन हो गये।
‘अभी नहीं, कुछ दिन और रुकिए, क्या यहां ठीक नहीं लग रहा?’ कहा लिली ने।
‘ऐसा नहीं, इस समय मुझे वहां होना चाहिए, जमीनदारी टूटने के काम पर।’ वहां काश्तकारों को जमीनों पर कब्जे नहीं मिल रहे। राजा भइया का मुकदमा भी तो उच्चतम न्यायालय में अन्तिम चरण में है, कलक्टर ने रिपोर्ट लगा दिया होगा।’
रामदयाल ने वापस होने का स्पष्टीकरण दिया।कृ
‘फिर भी नहीं जाना है आपको’ रणविजय कार चला रहे थे, बोलेकृ
‘दो चार दिन और रुकिए...’ लिली ने अपनी तरफ से जोड़ाकृ
रामदयाल असमंजस में थे, क्या करें, क्या न करें, उनके लिए कठिन था आग्रह ठुकराना, आखिर किसी न किसी दिन तो जाना ही होगा, वे सोचने लगे और खामोश हो गये।
रास्ता तो लम्बा होता नहीं, कार चलने में लगातार थी, सड़क की लम्बाई कम होती चली गई और मुजफ्फर की हवेली पास आती गई।
अंग्रेज हाकिम घर पर था, बाहर लान में बैठा हुआ, उसके साथ आधुनिक लिबाश में लिपटा एक दूसरा आदमी था, जो किसी रईस जैसा दीख रहा था, वह सिगरेट फूंक रहा था, लान के फूल-पौधे उस समय पूरी तरह खामोश थे, हवा थी कि वह उस समय गुम गई थी।कृ
रणविजय ने कार रोका।कृ
रणविजय और लिली दोनों उस दूसरे आदमी की तरफ, पीछे-पीछे रामदयाल दुआ सलाम...कृ
‘कैसी हो लिली और रणविजय तुम’कृउस आदमी ने पूछाकृ
‘ये रामदयाल जी हैं, रणविजय के दोस्त! आप हैं... मुजफ्फर अंकल’ लिली ने परिचय करायाकृ
रामदयाल ने अभिवादन उनका किया।कृ
लान में कुर्सियां थीं, जिस पर सभी लोग विराज गये, उस आदमी ने सभी को बैठने के लिये कहा।
फिर रामदयाल से परिचय का सिलसिला... परिचय अंग्रेज हाकिम ने कराया कि ये रणविजय के इस्टेट के हैं।
मुजफ्फर पाकिस्तान से लौट कर आया है और इंग्लैण्ड जाने का प्रोग्राम है। उसके अम्मी का निधन हो चुका है, पाकिस्तान की राजनीति अब बन्दूकों के कर्कश धमाकों में उलझ गई है, वहां कोई उन्हें घास नहीं डालता, खासतौर से जो लोग भारत से पाकिस्तान गये हैं। उसका सारा कारोबर घाटे में जा रहा है। पाकिस्तानी सरकार समझती है कि वह हिन्दुस्तानी है।
रामदयाल के बारे में जानकर मुजफ्फर का चेहरा खिल-खिला गया पर रणविजय के बारे में सुनकर कि उसके बड़े भाई भइयाराजा रणविजय का हिस्सा हड़प रहे हैं उसे दुख हुआ। पर मुजफ्फर धीर गंभीर बना रहा तथा चेहरे पर उभरने वाले तनावों को रोकता रहा।
रामदयाल को मुजफ्फर ने काफी गहरे तक प्रभावित किया और उसने अपने बारे में सारा कुछ बताया जिसे किसी विश्वसनीय से ही बताया जा सकता है। रामदयाल को आश्चर्य हुआ, ऐसा भी हो सकता है!
आखिर मुजफ्फर अंकल पाकिस्तान में क्यों नहीं रहना चाहते और भारत आना चाहते हैं। क्या हो रहा है पाकिस्तान में? इस बाबत रामदयाल के पास विशेष जानकारी न थी। कुछ जो वे जानते थे, वे बातें हवा में घूमने-टहलने वाली थीं सो वे मुजफ्फर की बातों में रुचि लेने लगे थे। रामदयाल ने सारी बातों का अर्थ निकाला..‘हुकूमत सिर्फ हुकूमत होती है इस पर इन्द्रधनुष के रंग नहीं चढ़ा करते। हुकूमती करतबों में चांद या सूरज कुछ भी दिखे उस पर बन्दूकों से निकली बारूद व गोलियों के गाढ़े दाग चस्पा रहते हैं।’
मुजफ्फर से रामदयाल का मिलना किसी ऊबड़-खाबड़ पहाड़ की यात्रा करना था और कल्पना करना था कि पहाड़ के कठोर पत्थरों पर किस किस्म के फूल या सब्जियां उगाई जा सकती हैं। पहाड़ जैसी होतीं मुजफ्फर की अपनी कहानियां भी इतनी कठोर हो चुकी थीं कि उन्हें तराश कर काम लायक कोई चीज नहीं बनाई जा सकती थी।
मुजफ्फर और रणविजय में कई तरह की समानताएं थीं जो दोनों के व्यक्तित्व को रच रही थीं। मुजफ्फर मुल्क के बंटवारे का प्रतिफल था तो रणविजय भी बंटवारे के ही उत्पाद थे। दोनों अपनी परिस्थितियों से लड़ने के विरुद्ध थे। दोनों के अपने-अपने आदर्श थे जो समरूप थे। मुजफ्फर अपनी मां और पत्नी की आग्रही धार्मिक जिदों के कारण पाकिस्तान का नागरिक बना था तो रणविजय अपनी मां का दंश झेल रहे थे कि उनकी मां रणविजय के पिता महाराज की रानी नहीं रखैल थीं। अजीब दुनिया है, अजीब हैं लोग, स्वार्थों के गटर में स्वर्ग तलाशने वाले। रामदयाल की आंखें मुजफ्फर से मिलकर पहले तो नम हुईं, उसके कोनों में बूंदे छलछलाईं, पर तुरन्त ही उनकी आंखों का रंग बदल गया, उसे लाल-लाल डोरों ने घेर लिया, रामदयाल भीतर ही भीतर बुदबुदाये...कृ
कितना भागोगे? कहां भागोगे? हर जगह तुम्हारा यथार्थ तुम्हें चीर कर फाट-फाट करता रहेगा लेकिन वे मुजफ्फर के लिए तो कुछ कर नहीं सकते थे यहां तक कि उसके पाकिस्तानी होने के कारण न उसकी पीठ सहला सकते थे, न ही उसकी आंखों में झांक सकते थे। रही बात मुजफ्फर को वैभव का प्रसाद खिलाने का तो वह भी नहीं, रणविजय के लिए वे बहुत कुछ करने जैसा कर सकते थे तथा उनका करना करने जैसा मालूम भी होता पर रणविजय तो आत्म-विस्थापन में थे तथा अपना जीवन किसी गलियारे या गुफा से निकाल कर खुले आसमान के नीचे गुजारने के लिए प्रतिबद्धता दिखा रहे थे जो हर तरीके से पलायन था। वैसे भी कहीं खुलापन नहीं।
समय सभी को सिखाता है यही एक सरल समाधान था जिस पर रामदयाल टिके हुए थे तथा प्रतीक्षा करो की धारणा पर चल रहे थे। रणविजय किसी न किसी दिन अपने पलायन के बाबत गंभीरता से सोचेगा और अपनी इस्टेट की तरफ वापस लौटेगा।
अंग्रेज हाकिम और मुजफ्फर जब कहीं घूमने निकल गये फिर लिली की ममा ने मुजफ्फर के बारे में सारा कुछ खुल कर बताया कि वह एक भावुक आदमी है, रणविजय और लिली भी मुजफ्फर को भावुक मानते थे जो भारत-पाक विभाजन का शिकार है।
मुजफ्फर ने लिली के ममा को पहले ही बता दिया था कि वह पाकिस्तान में नहीं रहेगा, वहां की सारी सम्पदा बेच देगा और एक ऐसे देश में रहने की योजना बनाएगा जहां उसे कम से कम केवल मुसलमान तो न समझा जाएगा, आदमी समझाा जायेगा।कृ
अंग्रेज हाकिम ने मुजफ्फर को समझाया था कि इंग्लैण्ड या अमेरिका में तुम रह और बस सकते हो पर मुजफ्फर ने इनकार कर दिया था वहां नहीं रहना। भारत से चले जाने के बाद भी अंग्रेजों की आंखों में हुकूमत का खारा पानी भरा है कि वे शासक थे और भारतीय उनके गुलाम थे इसी से मिलती-जुलती बातें अमेरिकनों में भी हैं।
और मुझे अंग्रेजों या अमेरिकनों के सामने मनुष्यों की पिछड़ी प्रजाति का होना कबूल नहीं वैसे मुजफ्फर निर्णय नहीं कर पाया था कि उसे किस देश में रहना है, केवल इतना था कि पाकिस्तान में नहीं रहना।
मुजफ्फर के आने से अंग्रेज हाकिम की हवेली खुशियों से झूमने लगी थी, अंग्रेज हाकिम तो इतना प्रसन्न था जैसे उसे उसका सारा भूला हुआ वापस मिल गया हो। लिली की ममा के पांव कभी किचन की तरफ होते तो कभी बैठक की तरफ तो कभी लान की तरफ। आंखें हमेशा सतर्क व सावधान देखती, तलाशती कहीं कोई कमी न रह जाये, लान में फूलों की कतारें हों या गमले जो रखे हुए थे लिली की ममा सभी पर निगाह दौड़ाती, कमी निकल जाये तो तुरन्त ठीक करा दिया जाय।
मुजफ्फर के आने के बाद ही लिली की ममा ने हवेली के थोड़े से हिस्से में रहने वाले, उस रसोइयां को भी बुलवा लिया था जो कभी मुजफ्फर का खास हुआ करता था। वह जानता था मुजफ्फर के खाने-पीने के बाबत।कृ
अंग्रेज हाकिम तो मुजफ्फरमय हो चुका था, पहचानना मुश्किल होता कौन मुजफ्फर था कौन अंग्रेज हाकिम। रात के गदराते ही दोनों टेबुल और कुर्सियां से चिपक गए, टेबुल पर नवाबी गिलासें चमकने लगीं तथा मुगलिया सुराही भी दारू से भरी। बातें और दारू दोनों आपस में घुल गईं। लिली की ममा दोनों की निगरानी में, दोनों की सेवा में चाहिये क्या? कबाब, काजू की नमकीन, फ्राई मछलियां उबले अंडे, बकरे की भूनी कलेजी वगैरह।
दोनों दोस्त अपने को एक दूसरे में बदलते रहे, एक कोशिश करता कि दूसरा बदल जाये फिर दूसरा कोशिश करता कि पहला बदल जाये। मुजफ्फर ने अंग्रेज हाकिम से सीधे पूछा... जब कि वह नहीं पूछना चाहता थाकृ
‘आखिर तुमने जीवन गुजारने के लिए भारत को क्यों चुना?’
इसलिए कि हजारों साल की गरीबी व शोषण के बाद भी लोग एक दूसरे पर विश्वास करते हैं तथा दुखों, यातनाओं को साझा बनाते हैं, केवल कुछ अपवादों को छोड़ कर अंग्रेज हाकिम मुजप्फर को बताते बताते धुआंसा हो गया उसे अपना घर परिवार याद आया, उसने घर की कहानी मुजफ्फर को कभी नहीं बताया था न ही बताने की आवश्यकता थी।
मुजफ्फर को पहले भी अचरज लगा था कि यूरोप का कोई जागरूक आदमी भारत में बसे। भारत या एशिया के लोग तो वहां जाकर बसना स्वर्ग में बसना मानते हैं। स्वयं मुजफ्फर भी पाकिस्तान में दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर नहीं रहना चाहता।
अंग्रेज हाकिम को मालूम था कि मुजफ्फर पाकिस्तान में क्यों नहीं रहना चाहता? मुजफ्फर ने अंग्रेज हाकिम को पहले ही बता दिया था कि अम्मी नहीं चाहतीं। अम्मी का तो बहाना था दरअसल उसकी पत्नी खुद नहीं चाहती कि वह एशिया में कहीं रहे। इंग्लैण्ड में रह कर पूरी तरह अंग्रेजिन बन गई है।
उसके मुंह से अंग्रेजी संस्कृति की सांसें निकलती है, आंखों में वहां का खुलापन तैरता है। देह पर स्वतंत्रातायें ही नहीं स्वच्छन्दतायें उछला-कूदा करती हैं। उसे लगता है कि वह पूरी औरत है साबूत फिर उसे लगता है कि उसके भीतर पैठ रखने वाली औरत कहीं दूर खड़ी होकर उसे घूर रही है, जो बार-बार सुझाव दे रही है कि तुम मर्दों से ऊपर की चीज हो। मुजफ्फर ने अपनी पत्नी के बारे में अंग्रेज हाकिम को कभी बताया भी था कि उसकी बेगम ने खुद को परिवर्तित कर लिया है और औरतों की जमात में अद्भुत बनने के सारे उपायों में लग गई है। उसकी तत्परताएं किसी साधना से कम नहीं, वह खुद अपना आदर्श है और उस आदर्श का प्रयोजन भी। परंपराओं, संस्कृतियों, रीति रिवाजों को उसने अपनी चर्या में जानबूझ कर अनुपस्थित कर दिया है तथा खुद जिस तरह से उपस्थित है, वैसी परिस्थितियां पाकिस्तान ही नहीं पूरे एशिया में नहीं।
मुजफ्फर लिली की ममा को देखता तो देखता रह जाता।
ओफ इतना महान समर्पण? सारी बातों पर निगाह, खाना, पीना, सोना, पहनना, आना, जाना मुजफ्फर ने अपने नबाबी परिवार में लिली की ममा जैसा किसी को न देखा, हां केवल दादी अम्मा थीं जो छोटे-बड़े सभी की परवाह करतीं पर शान-ष्शौकत, दाई, सेवक, पान में केशर न हो तो पनडिब्बा बाहर। गहनों का रूप नहीं, वजन देखतीं तौलतीं, रत्नों में जड़ी रहतीं।
मुजफ्फर, अंग्रेज हाकिम के चेहरे पर उसके भाग्य को खिल-खिलाता पाता। अच्छा किया जो आदिवासी लड़की से शादी किया। अंग्रेजिन या राजकुमारी होती तब जाने किस तरह से दिल-दिमाग, मौसम, हवा पानी, चांद सूरज से अपना रिश्ता बनाती? कब मुठ्ठियां बांधती कब दांत किटकिटाती और कब आंखों में अंगारे भर लेतीं।
अंग्रेज हाकिम से बतियाते हुए मुजफ्फर खुद से भी बतियाता रहा। रात का समय दोनों दोस्तों की बातों में उलझ गया था। पूरी हवेली सो गई थी पर वह कमरा, उसकी छत, खिड़कियां दोस्तों की गुफ्तगू से झूम रहे थे।कृनींद ने जब दोनों को परेशान करना शुरू किया फिर वे वहीं पसर गये, उनके भविष्य उन्हें सहलाने लगे... जागो! गुजरा वापस नहीं होता। दूसरे दिन की सुबह उनकी प्रतीक्षा में थी, उसी ने उन्हें जगाया भी।
धरती का नाच
मुजफ्फर कुछ दिनों के लिए ही भारत आया था। उसे भारत और पाकिस्तान दोनों छोडना था। भारत तो पहले ही छोड़ चुका था। पाकिस्तान में उसे वह खुशबू नहीं मिली जो ताकत देती और आदमी तथा आदमी के फर्क को मिटा देती। वहां धार्मिक जड़ताओं व सत्ता की क्रूरताओं की हवा खेत-खलिहान, घर व कार्यालय, नागरिक व सेना सभी जगहों पर पसरी हुई थी। वहां की सांसों में कहीं भी जिन्ना न थे, भारत की तरह, यहां भी गांधी का सत्य, अहिंसा, सहकार, अतीत के दुखद प्रसंग बन चुके थे मात्रा यह था कि एक थे ‘गांधी’ वहां था एक थे ‘जिन्ना’ और अंग्रेजों का द्विराष्ट्रवाद दोनों जगह स्थापित व मान्यता प्राप्त कर चुका था।
मुजफ्फर के भारत छोड़ देने के बाद रामदयाल अपने गांव लौट आये। गांव पहले की तरह जस के तस न थे। पूरे इलाके में जमीनदारी के खत्म किये जाने की बयार थी। छोटे किसानों ने अपनी पीठ थप-थपाना शुरू कर दिया था कि वे अब जमीन वाले बन जायेंगे। उनका अपना मकान होगा, अपना खेत होगा, पोखरे के पानी पर उनका हक होगा। जंगल से महुआ बीन सकेेंगे तथा जलावन के लिए जंगल से सूखी लकडियां भी ला सकेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, गुलामी जैसी हालत फिर भी बनी रही, उन्हें न खेत मिले और न कोई दूसरे अधिकार जो जंगल, परती और बंजर भूमि के बाबत होते जिस पर उनका अधिकार होता।
रामदयाल को मालूम था कि केवल कागज़ी आज़ादीमिली है, अंग्रेज चले गये हैं, देसी हुकूमत बन गई है, पर लोगों का मन नहीं बदला है। मन वही पुराना है सामन्ती और शोषण वाला, गरीबों का खून चूसने वाला। देशी रियासतें, जमीन-जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर से अपना अधिकार नहीं छोड़ने वाली। रणविजय के भइया ने तो जमीनदारी तोड़ने की प्रक्रिया को ही बाधित कर दिया है। आधे से कुछ कम गांवों के बाबत उन्होंने मुकदमा दाखिल कर दिया है, वहां जमीनदारी तोड़े जाने के काम को न्यायालय ने रोक दिया है। बकिया आधे गांवों में भी पुश्तैनी जोतदारों को जमीन पर हक नहीं मिल रहे।
रामदयाल गांव पर आकर किसी लाश की तरह बनने लगे। दिमाग पर जोर देते तो वह गायब हो जाता, कुछ सोचना चाहते तो वह छिन जाता, पुराने सपनों का हिसाब किताब करते तो वे भी स्मृति में न आते। खालीपन ऐसा कि उन्हें महसूस होता कि वे होते हुए भी नहीं हैं और जो हैं, उसके होने का तो सवाल ही नहीं।
उथल-पुथल में दो दिन गुजरा, तीन दिन गुजरा, पूरा सप्ताह निकल गया। वे विचारने लगे आखिर ऐसा किस लिए हो रहा? उनकी पत्नी भी चिन्तित, एक दिन उन्होंने उनसे पूछा...
आप दिल्ली से वापस जब से आये हैं, तब से मुझे लग रहा है कि आप काफी चिन्तित और व्यथित हैं, आखिर ऐसा क्या हुआ? कुछ तो बतायें क्या वहां रणविजय और लिली से खटपट हो गई?
नहीं नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुआ वहां। वहां तो मुझे जान पड़ा कि मैं अपने घर में हूं। अपने सगों के साथ। किसी तरह का अलगाव नहीं, अपनापा ऐसा जो मन के गहरे में जगह बना ले, उसके सभी कोनों को अपने में डुबो ले रामदयाल ने पत्नी को बतायाकृ
फिर आप उदास क्यों है? क्या सोच रहे हैं? पत्नी ने पूछा।
रामदयाल पत्नी को क्या बताते? क्या समझाते? कि वे जो सोच रहे हैं, जिसके लिए चिन्तित हैं, उनका समाधान भी वे ही खुद हैं। उन्हें अगले रास्ते के बारे में निर्णय लेना है। रणविजय तो चले गये अपने भाई से कुछ मांगा नहीं, न ही अपने हक के लिए उनसे संघर्ष करने जा रहे, लेकिन यहां के किसानों, मजदूरों का क्या होगा? भइयाराजा तो उन्हें कुछ नहीं देने वाले, सारा कुछ हड़प लेना चाहते हैं। रियासत के सारे जोतदार परेशान हैं, उन्हें अभी तक उनकी जोतों पर हक नहीं मिला, जमीन के कागजात मिलने का तो सवाल ही नहीं। दिल्ली से लौटने के बाद रामदयाल लगातार गांव-गांव घूमे। गांवों में हर तरफ मुर्झाये, यातनादायी चेहरे, गहरे तक धंसी आंखें, हकलाती जुबानें, जुबानें कुछ इस तरह...कृकुछ नहीं मिला, खाने के लिए अनाज तो मिल नहीं रहा, जमीन क्या मिलेगी? लेखपाल आया था, बोल रहा था सारी जमीनें जंगल विभाग को सरकार ने दे दिया है। राजा के हाथ से जो थोड़ा बहुत निकला, वह भी।
रामदयाल गांवों में जाते, गांवों की भीड़ दो हाथों, दो पैरों वाली, एक मुंह के साथ उनके साथ बैठ जाती, उन्हें अपनी गरीबी में डुबो देती तथा जीवन जीते रहने की यातनादायी परिस्थितियों में धकेल देती। रामदयाल चिन्तित हो उठते और अपनी भूमिका को लेकर काफी परेशान भी। गांधीवादी होने के नाते, उन्हें क्या करना चाहिए, उनका जनता के लिए तात्कालिक कर्म क्या होना चाहिए उनकी समझ में न आता। स्वतंत्राता मिल जाने के बाद कांग्रेस पारटी किसी आश्वस्ति की खोल में लगातार दुबकती जा रही थी, सामाजिक व राजनीतिक हस्तक्षेपों के बारे में वहां निर्णय व कार्यक्रम नहीं थे।
भइयाराजा की रियासत में स्वतंत्राता की गन्ध न थी, न ही वहां जमीनदारी विनाश के लक्षण थे। रामदयाल ने रियासत के बारे में प्रदेश के कांग्रेसी आलाकमान को सूचित किया तथा एक प्रतिनिधि मंडल लेकर उनसे मिले भी, पर प्रदेश की कांग्रेसी राजनीति में किसी तरह का बदलाव नहीं आया। रामदयाल के सामने कुछ करने का रास्ता न था, सो वे गुप-चुप थे तथा खुद को खंगालने की कोशिश में थे कि कोई रास्ता निकले फिर उस पर आगे चला जाये।
रास्ता तो निकलना ही था, सत्याग्रह, धरना, प्रदर्शन का। फिर क्या था पूरी रियासत धरना, प्रदर्शन से गर्म हो उठी। रियासत के भूमिहीनों में एकता आने लगी भूमि हकदारी-मोर्चा का गठन हो गया और गांव-गांव मोर्चे की समितियां भी बन गईं।
रामदयाल का यह रास्ता रियासत के बड़े-छोटे, मझोले जमीनदारों को भी खटकने लगा तथा भइयाराजा तो रामदयाल से खार ही खा गये। अरे रामदयलवा की इतनी हिम्मत जो मेरी रियासत में बवाल मचाये।
भइयाराजा ने रामदयाल को एक दिन महल पर बुलवाया। सन्देह वाहक वही आदमी था जो मुगलकालीन आदमी जैसा दिखा करता था। रामदयाल अपने गांव से काफी दूर किसी आदिवासी बस्ती में थे। मुगलकालीन जैसा आदमी उस बस्ती में पहुंचा और भइयाराजा का संदेश रामदयाल को दिया कि महाराज आपसे मिलना चाहते हैं।
आखिर क्यों? मुगलकालीन आदमी से रामदयाल ने पूछाकृ
‘मुझसे मिलने की क्या जरूरत?’
मुझे नहीं मालूम मुगलकालीन जैसा आदमी संक्षिप्त सा उत्तर देकर खामोश हो गया। दरअसल उसे मालूम भी होता तो कैसे? वह लगातार रामदयाल का चेहरा देखने में था कि वहां कोई उत्तर होगा जिसे रामदयाल देंगे, भइयाराजा से मिलना है कि नहीं। पर रामदयाल के चेहरे पर मुगलकालीन आदमी द्वारा भइयाराजा के दिये गये संदेश का कुछ असर न था।
मुगलकालीन आदमी ऐसी स्थिति में रामदयाल को बस्ती वालों से घिरा देखा। महुआ के पेड़ के नीचे, यही कोई दो तीन सौ स्त्राी-पुरुषों की भीड़ जो रामदयाल को घेरे हुए बैठी थी। मुगलकालीन आदमी ऐसी स्थिति में रामदयाल को देख कर घबरा गया, ऐसा नहीं हो सकता वह कोई घृणित सपना देख रहा, ठीक है रामदयाल राजा नहीं, पर रियासत के बड़े जमीनदारों में तो हैं ही। इन जंगलियों के साथ जमीन पर बैठना, न दरी न बिछावन, न मसलन्द न गद्दा और फिर ये जंगली, बसाने व छुआने वाले, रामदयाल के साथ अगल-बगल, मानो उनकी देह पर चढ़ जायेंगे।
मुगलकालीन जैसे आदमी को सारा कुछ किसी धोखे जैसा जान पड़ा, क्या एक जमीनदार इतना बदल सकता है? कोड़े मारने वाला, घोड़े से लोगों को रौंदने वाला, बहू-बेटियों की अस्मत लेन ेवाला। एक बार फिर मुगलकालीन जैसे आदमी ने रामदयाल को देखा।
मुगलकालीन जैसे आदमी को कुछ नहीं दिखा, रामदयाल ग्रामीणों के साथ आश्वस्त बैठे थे, उसी तरह जिस तरह कोई दूसरा बैठता जो उनका भला चाहता है। मुगलकालीन आदमी चकरा गया, ऐसा तो होता नहीं लगता है यहां कोई गहरा धोखा है जिसे वह नहीं समझ पा रहा। वह समझ भी कैसे सकता है? उसके पास समझने की ताकत नहीं।कृ
मुगलकालीन आदमी ने अन्तिम रूप से जानने का प्रयास किया कि रामदयाल जी भइयाराजा से मिलने के लिए कब आ रहे हैं? लेकिन रामदयाल ने उसके सवाल को टाल दिया, फिर मुगलकालीन आदमी वापस लौट आया और भइयाराजा को बस्ती का हाल-अहवाल बता दिया।
भइयाराजा को यह बात मालूम थी कि रामदयाल जमीनदारी तोड़े जाने के प्राविधानों को ठीक से लागू करवाने के लिए जनता से संपर्क साध रहे हैं। दूसरे किस्म के थोड़े औसत दर्जे के जमीनदारों को भी रामदयाल का जन-संपर्क अभियान अखरने वाला था, सो वे भइयाराजा के निरन्तर संपर्क में रहते हुए, निगरानी कर रहे थे कि रामदयाल कर क्या रहे हैं?
रामदयाल के लिए जनसंपर्क का मुद्दा तो गौण था उसे उन्होंने बाद में प्रारंभ किया। पहले उन्होंने जो काम किया वह अद्भुत था। उनकी पत्नी और रिष्तेदार ही आमने-सामने हो गये...कृ
यह क्या कर रहे हैं आप? सारी जमीनों का पट्टा क्यों कर रहे हैं? उनके अपने लोगों ने रामदयाल के सामने सवाल रखा।कृ
रामदयाल ने अपनों के सवालों को बहुत हल्के से लिया।कृ
‘जो करना चाहिए, वही कर रहा हूं, जमीनें जिनकी हैं उनको दे रहा हूं।’
‘तो क्या ये सारी जमीनें उनकी हैं, उनके नाम से हैं, वे मालिक हैं? रामदयाल के साले ने, जो खुद जमीनदार था कड़ा प्रतिवाद किया। साले के साथ उनकी पत्नी थीं, उन्होंने भी जोड़ा...कृ
‘हरिष्चन्द्र हैं सारा खैरात बांट देंगे, कोई क्या कर लेगा इनका?’
रामदयाल अपनों के प्रतिरोधात्मक मोर्चे से सचेत थे, उन्हें मालूम था कि जब वे जमीन का आवंटन करने लगेंगे तब उनका उनके घर में ही विरोध होगा, सभी सामने आ जाएंगे वही हुआ। सभी सामने थे, एक ओर पत्नी, दूसरी ओर साला, चाचा, चचा-जात भाई और मामा वगैरह। सभी को महसूस हो रहा था कि रामदयाल पगला गये हैं, एक बार पहले भी पगला कर आमरण अनशन पर बैठे थे, गांव के सारे अछूतों को साथ में खाना खिलवाया था। छूत-अछूत का फर्क मिटा रहे थे। इस बार भी पहले की तरह ही कुछ कर रहे हैं। सरकार को जितनी जमीन निकालनी होगी, सरकार निकाल ही लेगी फिर यह सब करने की क्या आवष्यकता? रामदयाल ने अपनों को ललकारा...
‘तो क्या जमीन आपकी है? मेरी है, किसी जमीनदार की है, किसी राजा की है? जमीन आपने पैदा किया, समतल किया, खेती किसानी लायक बनाया, कुछ किया आपने जमीन के लिए? यदि नहीं फिर आप जमीन के मालिक कैसे? कुछ भी नहीं है आपका, आप लोगों से तो जीवन जीने की स्वतंत्राता भी छीन लेनी चाहिए। लेकिन उल्टा होता रहा आज तक जिसे जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए वही गुलाम है, अछूत है, शोषित और गरीब है।’
‘और आप हैं कि अय्याशी कर रहे हैं, छत्रा-चंवरधारी बने हुए हैं, महलों में रहते हैं, प्रकृति के सारे संसाधनों के मालिक हैं। एक बात सुन लीजिए और आखिरी बात कि जमीन का आवंटन हो कर रहेगा, मुझे कोई नहीं रोक सकता।’
रामदयाल का साला एक जटिल आदमी था उसने तुरन्त प्रतिवाद किया...कृ
‘ठीक है जमीन का आवंटन कीजिए पर यह तो समझायें कि आपकी जमीन और जमीनदारी कहां है? क्या यह जमीन जिसका आवंटन आप कर रहे हैं, वह आपकी है, उसे आपने बनाया, आप तो महज प्रबन्धक हैं, मालिक नहीं फिर कैसे बांटेंगे आप? और आपको जमीन बांटने भी नहीं दिया जाएगा।’
रामदयाल अपने कहे जाने वालों के चेहरों में खो गये, वहां उत्तराधिकार की मोटी पर्तें जमी थीं। उनमें कोई ऐसा नहीं था जो अपने श्रम और अक्ल का ब्योरा दे सकता था। सभी बाप-दादों के सुरक्षित अधिकारों के वारिश थे। पीढ़ी दर पीढ़ी सरकने वाली संपत्तियों के मालिक थे, उसी को कोई थोड़ा बढ़ा रहा था तो कोई घटा भी रहा था। रामदयाल का साला उनमें न था। उसने तत्कालीन गुणा-गणित से बाप की मिली जमीनदारी को थोड़ा बढ़ा भी लिया था तथा स्वतंत्राता के बाद टूटने वाली जमीनदारी का कुछ भाग बचा लेने की कोशिश में था। इसके लिए वह सरकारी अहलकारानों से संबंध भी बना रहा था।
रामदयाल ने साले का चेहरा देखा, वहां आदमी की सूरत न थी, आदमी के रूप में वहां कोई आक्रामक था जो सिर्फ अपने लिए जीता और मरता है। रामदयाल को घिन आई-आखिर इसे क्या परेशानी है? मैं जमीन अपने पास रखूं या उसका कुछ और करूं यह क्यों परेशान है? रामदयाल को साले पर गुस्सा आया, पत्नी भी साले के साथ थीं।कृ
‘तुम यहां मेहमानी करने आये हो या गुण्डागिरी, तुमसे क्या मतलब? मैं अपना लाभ-हानि समझता हूं, अब ज्यादा बकवास न करो सीधे फूट लो यहां से, नहीं तो धक्के मार कर भगा दूंगा।’
अचानक रामदयाल को आक्रामक होना पड़ा, जबकि उनका यह स्वभाव न था। फिर तो दूसरे भी सहम गये और वापस हो लिये। रामदयाल की पत्नी तो अपना मुंह लेकर वापस हो लीं। कहां तो उन्होंने मन्दिर और धर्मशाला बनवाने के लिए सोचा था, उसके बाद बहुत बड़ा यज्ञ करवाने का भी संकल्प लिया था कि दिल्ली से लौटने के बाद काम शुरू हो जाएगा कहां ऐसा हो रहा, सारी जमीनें बांटी जा रही हैं। रामदयाल ने पत्नी से कहा भी था कि दिल्ली से वापस आने के बाद मन्दिर और धर्मशाला निर्माण का काम प्रारंभ करा दूंगा।
रामदयाल दिल्ली से वापस होते ही जमीन आवंटन के काम में लग गये, कुछ दिन तो उदास-उदास से थे जब थोड़ा ठीक हुए तो गांव-गांव मीटिंग और जमीन का आवंटन।
उनसे कौन पूछे मन्दिर और धर्मशाला के निर्माण का क्या हुआ?
रामदयाल की पत्नी, पति के कामों को सीधे रूप से रोक नहीं सकती थीं। आमने-सामने की बहस और प्रतिरोध दोनों उनके वश में नहीं था और न उन्हें विरोध या समर्थन की नैतिकता का ही व्यावहारिक ज्ञान था। उन्हें सीख में मिली थी पति की आज्ञाकारिता, आंख मूंद कर उसका समर्थन और वैसा ही वे कर रही थीं। हालांकि रामदयाल जो कर रहे थे, जिस मिजाज से कर रहे थे, सारा कुछ अपवाद जैसा था, सामान्यतया अपनी कही जाने वाली संपत्ति का बंटवारा या आवंटन कोई नहीं करता।
रामदयाल की पत्नी ने अपने भाई को बुलाया था कि वह उनके पति को समझा-बुझा लेगा पर उसे तो रामदयाल ने फटकार दिया।
‘मैं समझता हूं कि मैं क्या कर रहा हूं और मैं यह भी समझता हूं कि मुझे क्या करना चाहिए, यह बात अलग है कि सभी नहीं समझ पा रहे कि मैं क्या और क्यों कर रहा हूं, जिसमें तुम भी हो, मेरा साला तथा और दूसरे रिष्तेदार भी।’
रामदयाल की पत्नी ने निर्विकार प्रतिबाद किया...कृ
‘हां हां मैं क्या समझूंगी, मेरे पास समझने के लिए है ही क्या? अब तक तो आपको ही समझने में उलझी रही और खुद को भी न समझ पाई, अब जब खुद को समझना चाह रही हूं, तो सारा कुछ अबूझ हुआ जा रहा, एक में एक उलझा हुआ। यदि कुछ कहना भी चाहूं तो बहुत कुछ अनकहा रह जाएगा। दूसरों को अपना बना लेना अच्छी बात है लेकिन अपनों को पराया बनाना इसे क्या कहेंगे अच्छा या बुरा।
रामदयाल की पत्नी ने फिर खुद को नियंत्रित कर लिया और औरतपना में कहीं खो गई कि औरतों को सलाह मशविरा से दूर रहना चाहिए तथा सिर्फ और सिर्फ पति की सेवा में पूरा जीवन खपा देना चाहिए। उन्होंने खुद को समझा-बुझा भी लिया कि आगे है ही कौन न कोई लड़का, न लड़की। सारी जायदाद किसी दूसरे के पास ही तो जाएगी,कृउन्होंने अपने देवता को कोसा...कृ
‘क्या हो जाता यदि कोई सन्तान दे देते, फिर तो ऐसे दिन न देखने पड़ते कोई सन्तान होती तब तो वे भी सोच विचार करते और खुद को रोकते, सारी पूजा बेकार गई, जाने कब से पूजा-अर्चना कर रही हूं, सुबह-शाम आरती, मंत्रों का पाठ।’
रामदयाल फिर तो एक ऐसे ताकतवर आदमी में बदल गये जिसे पारिवारिक जकडनें जकड़ नहीं पातीं और न संवेदनायें ही रगड़ पाती हैं। वे अकड़ कर अपनी जमीन के आवंटन के काम में लग गये। अपनी जमीनदारी की सारी जमीनों का आवंटन उन लोगों में कर दिया जो उस पर जोत-कोड़ पुश्त-दर पुश्त से करते चले आ रहे थे। अपने रिहायशी गांव की करीब सौ बीघा जमीन उन्होंने अपने खान-खर्च के लिए छोड़ दिया, जिस पर उनकी खेती-बारी हुआ करती थी। आम, आंवला और कटहर के बगीचों को उन्होंने आवंटन से अलग रख दिया।
इतना बहुत है एक दिन साहचर्य के मनोरम क्षणों में रामदयाल ने अपनी पत्नी को आध्यात्मिक गुद-गुदियों से गुद-गुदाया...कृ
‘देखो! कोई कुछ न लेकर आता है और न लेकर जाता है। किसी का कुछ भी नहीं होता, जिसे अपना होना समझा जाता है खासतौर से संपत्ति के बारे में वह तो अपना होता ही नहीं। सूरज, चांद, तारे, इनमें जितना डूबो, जितना चाहो डूबो, डूबते चले जाओ, फिर निकलो हाथ में कुछ नहीं होगा। धरती भी किसी की नहीं, लेकिन उनकी है जो धरती को हरा-भरा रख सकें, धरती का श्रंृगार कर सकें, किसी दुल्हन की तरह उसे सजा सकें, लाल-लाल होठों वाली, हरियाली की मादकता में डूबी हुई आंखों वाली।’
पत्नी अवाक, सारा सुनती रहीं, बिना कुछ बोले, धरती की तरह, धरती किसी से बोलती बतियाती नहीं, वे तो परती हो चुकी थीं, जिस पर कुछ उगता नहीं, एक ही काम, सूरज को ताकते रहना, बारिश में भीगते जाना। भीग भी चुकीं थीं काफी हद तक फिर भी सूखापन था। धीरे से उन्होंने जोड़ा...कृ
‘मन के सुखों के लिए सूख जाना क्या यह अच्छा होगा। लुट जाना अलग बात है लुटा देना अलग। धन दौलत जमीन लुटा सकते हैं आप! क्या तन और मन भी लुटा पायेंगे, फिर किस-किस को लुटायेंगे? मुझे तो पता ही नहीं क्या करने जा रहे हैं आप! सिर्फ इतना पता है कि मैं रुक सकती हूं आपको रोक नहीं सकती।
रामदयाल को लगा कि उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है। प्रभा को संज्ञान में लेना चाहिए था, उन्होंने पत्नी को समझाया...
‘नहीं प्रभा! ऐसी बात नहीं, तुम रोक सकती हो। मुझ पर विश्वास करके तुम्हें लज्जित नहीं होना चाहिए। जमीनदारी का आवंटन तो मुझे करना ही था। सारा कुछ लूटा हुआ था, खून से लथपथ उसे तो लुटाना ही था, सिर्फ उनको जो उसके हकदार थे। जो धरती का श्रृंगार कर सकते हैं और मन की परती को हरा-भरा रखने की कोशिश भी। इस बारिश में तुम सूखे मुर्झायें चेहरों पर धरती का नाच देख कर नवयौवना न बनी तो मेरा नाम भी रामदयाल नहीं।’कृ
फिर रामदयाल ने पत्नी को आकस्मिक ढंग से अपने में डुबो लिया। उन्हें जान पड़ा कि पत्नी के मिजाज को बदल चुके हैं
समय के पहले
रामदयाल पारिवारिक उत्तरदायित्वों के प्रति लापरवाह नहीं थे। न्यूनतम आवश्यकताओं और जरूरी आवश्यकताओं का फर्क वे दिल-दिमाग से किया करते थे और वे समझते थे कि जीवन जीने के लिए बिना आर्थिक निष्ठुरताओं के भी उनके पास बहुत कुछ है और औसत तरीके का जीवन वे जी सकते हैं, जिसके लिए अतिरिक्त हाथ पैर और दिमाग मारने की आवश्यकता नहीं। हालांकि उनकी पत्नी प्रभा देवी ऐशो-आराम की धारा में बहने वाली महिला थीं, उनका ठाट-बाट, रहन-सहन जमीनदारी वाला था। उनकी आध्यात्मिकता में यह बात अवश्य थी कि प्रत्यक्ष रूप से किसी का नुकसान नहीं करना पर यह भी था कि जगह-जमीन, संपदा का मामला सारा कुछ परमात्मा का दिया हुआ है, वही किसी को रंक और किसी को राजा बनाता है तथा उनकी जमीनदारी परमात्मा की देन है फिर इसे किसी को बांटने की क्या आवष्यकता? प्रभा देवी ने पूरी कोशिश की कि रामदयाल जमीन का आवंटन न करें, उन्होंने भइयाराजा का हवाला भी दिया...
‘रणविजय तो भइयाराजा के सगे भाई हैं, वे रियासत में हिस्सा भी रणविजय को नहीं दे रहे। पूरी रियासत अपने नाम करा लिया। जमीनदारी भी नहीं तोडने दे रहे, मुकदमा दाखिल कर दिया है और एक आप हैं कि सारा कुछ बांटे जा रहे हैं? आखिर इसका क्या मतलब?
रामदयाल भी पहले ऐसे नहीं थे। पढ़ाई-लिखाई से लेकर सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा के कार्यक्रमों के पहले तक वे भी अपने में गोता लगाने वाले तथा अपना संसार बनाने वाले उसमें से हसियां तथा मनोरमों को हासिल करने वाले मिजाज के थे पर बाद में धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगे। उन्हें गांधीजी ने काफी हद तक प्रभावित किया फिर बाद में अंग्रेज हाकिम ने। मौजूदा सामाजिक संरचना के उलझे हुए जालों पर उन्होंने गंभीरता से विचार किया फिर महसूस किया कि वे जमीनदार होते हुए भी हवा में टंगे हुए हैं, जिसका कोई अस्तित्व नहीं। उनका सोचना था कि धन, दौलत, जमीन, जायदाद की उत्फुल्लताओं ने उनकी मनुष्यता को काफी हद तक लील लिया है और वे एक निष्ठुर आदमी में बदलते जा रहे हैं।
दिल्ली प्रवास के दौरान ही उन्होंने निर्णय ले लिया था कि उन्हें गांव वालों के लिए कुछ करना है। सरकार ने भी जमीनदारी तोडने का काम प्रारंभ कर दिया था। उन्हें कांग्रेसी सरकार का यह काम जनता का काम जान पड़ा था तथा वे हर स्तर से गांव आकर इस काम से जुड़ गये थे।
रामदयाल ने पत्नी को भी खूब समझाया। वेद, पुराण, उपनिषद आदि ग्रन्थों का हवाला दिया कि ईश्वर भी मनुष्यों की बराबरी का समर्थन करता है, वह आदमी और आदमी में फर्क नहीं करता। आदमी और आदमी के बीच यह जो असमानता है, फर्क है, दूरी है वह सब मानवीय निष्ठुरताओं और क्रूरताओं के कारण है।
‘तो आप इस फर्क को मिटा देंगे, अपना लुटा कर या खुद को मिटा कर, क्या यह आत्महत्या की एक प्रवृत्ति नहीं। हां निष्ठुरतायें और क्रूरतायें तो बहशी हैं इनसे बचना अच्छी बात है लेकिन खुद को मिटा देना और मिटते हुए पर मल्हार तो आप ही गा बजा सकते हैं, दूसरा नहीं।’
रामदयाल की पत्नी ने रामदयाल का न केवल व्यावहारिक स्तर पर वरन् तार्किक स्तर पर भी खूब विरोध किया, पर उसका असर उन पर न था, रामदयाल को जो करना था वे कर रहे थे, उसी के अनुसार वे अपनी उदारताओं की जाल गांव-गांव फैला रहे थे। उनका समझना था कि वे जमीन के आवंटन के द्वारा अपने बोझ का आवंटन कर रहे हैं, न कि किसी के प्रति दया या उपकार। उन्होंने पत्नी को अपनी इस समझ से परिचित भी कराया...
‘देखो प्रभा! जमीनदारी का प्रबंधन मेरे जैसे आदमी के लिए बोझ है।वैसे भी इतनी सारी जमीनों की हरियाली जैसी उर्वरता पर सिर्फ मेरा हक व अधिकार... मुझे तो जान पड़ता है कि यह अन्याय है, उस पर की जा सकने वाली खेती-बारी के साथ।’
पर यह सब उनकी पत्नी प्रभा देवी की समझ से बाहर था। समझ से बाहर इसलिए कि उनका मालिकाना टूट रहा था। एक ऐसा मालिकाना जिसे वे जन्म से ही चूस रही थीं और जमीनदार बन कर जमीनदारी की परजा पर मालिकाना का रोब-दाब गांठा करती थीं। एक भयानक किस्म का अन्तर खड़ा था जो उन्हें मालिकिन बनाता था और परजा को एक तरह से उनका दास या गुलाम।
प्रभा देवी के लिए जमीनदारी का मामला उनके मालिकाना जैसे व्यक्तित्व का निर्माण कर्ता था, जो परजा या अन्यों से उन्हें कथित श्रेष्ठता के अलग खानों में रखता था। दूसरी तरफ रामदयाल थे कि वे उनकी कुछ सुनने वाले नहीं थे, सो वे थक-हार कर बैठ गई।
प्रभा देवी का लालन-पालन जमीनदारी परिवेश वाला था। एक ऐसा जमीनदार परिवार जो जितना गांव की जमीनदारी की अप्राकृतिक वैभवों का सुख पीता था उतना ही शहर की आधुनिकताओं में भी आकंठ डूबा रहता था। प्रभा देवी की शिक्षा-दीक्षा मिशनरी स्कूल और कालेज वाली थी तथा वेद-पुराण और तमाम संस्कृत ग्रन्थों की पढ़ाई-लिखाई घर पर हुई थी। प्रभा देवी घुड़सवारी करतीं तथा अपने पिता के साथ शिकार पर भी निकलतीं। गोया उनका व्यक्तित्व निर्माण ऐसा नहीं था जैसा कि रामदयाल के परिवार में आकर दिखा करता था। रामदयाल के यहां आकर प्रभा देवी परदे वाली बन गई थीं तथा परदे की सारी परंपराओं में सरोबार हो चुकी थीं फिर भी जमीनदारी के प्रबन्धन में पर्याप्त हस्तक्षेप रखती थीं। रामदयाल को प्रभा देवी की प्रबन्धकीय कुशलता गहरे तक प्रभावित करती थी। वे भी अन्य बातों के अलावा प्रभा देवी के साहचर्य सुखों को अभूतपूर्व मानते तथा उनके साथ चांद-तारों का खेल आन्तरिक मन-मिजाज से खेलते।
प्रभा देवी इधर रामदयाल से काफी दूरी बना कर चलने लगी थीं, उन्हें लगने लगा था कि वे अकेली हैं तथा उन्हें अकेली ही समय की लकीरों को छोटा-बड़ा करना है। प्रभा देवी कहीं न कहीं भइयाराजा की जमीनदारी वाली शैली से प्रभावित थीं, वे ठीक कर रहे हैं राड़-रहकारों को जमीन का आवंटन करके क्या मिलेगा, भइयाराजा ने जमीनदारी न तोड़े जाने का जो मुकदमा दाखिल कर दिया है, अच्छा किया है। लेकिन उन्हें इस बात की तकलीफ थी, कि भइयाराजा ने रणविजय का हिस्सा हड़प कर गलत किया है, भाई का हक उन्हें दे देना चाहिए था।
प्रभा देवी ने एक दिन हवेली का सारा कारबार ठप्प कर दिया और इस बात के लिए अड़ गईं कि मन्दिर और धर्मशाला का जब तक निर्माण नहीं होगा आगे का कुछ भी काम नहीं होगा। रामदयाल जानते थे कि प्रभा इससे आगे भीं जा सकतीं हैं। ऐसी स्थिति में रामदयाल ने भइयाराजा के खिलाफ किये जाने वाले सत्याग्रह व आन्दोलन के काम को तत्काल स्थगित करके मन्दिर तथा धर्मशाला के निर्माण के कार्य में लग गये।
उधर भइयाराजा की रियासत में अभिनव किस्म का आन्दोलन सुलगने लगा। आन्दोलन की जड़ में था रामदयाल द्वारा किया जाने वाला भूमि-आवंटन, जो एक उदाहरण बन गया था। अम्बेडकर वादी एक दलित नेता महाराष्ट्र की नौकरी छोड़ कर अपने गांव आ चुका था। पहले तो उसने सोचा था कि वह रामदयाल से मिलेगा और भइयाराजा के खिलाफ चलाये जा सकने वाले आन्दोलन की संभावना पर सलाह-मशविरा लेगा। अम्बेडकर वादी दलित नेता अपने गांव आया, क्षेत्रा में घूमा लोगों से संपर्क किया फिर उसे मालूम हुआ कि कांग्रेस पारटी का जमीनदारी विनाश कार्यक्रम क्षेत्रा के जमीनदारों तथा संभ्रान्तों के लिए निहायत कष्टकर और विनाश करने वाला है सो वे लोग जो गांधी के सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे कार्यक्रमों में हिस्सा लिये थे और जेल की यातना भी झेले थे, वे लोग धीरे-धीरे कांग्रेस पारटी से दूरी बनाने लगे थे सो जमीनदारी विनाश का सरकारी कार्यक्रम शिथिल ढंग से चल रहा था, इतना ही नहीं, उसमें भौतिक कब्जों को भी कानूनी स्थान नहीं मिल रहा था। सरकारी अहलकार जमीनदारी विनाश अधिनियम के प्राविधानों का अलग ढंग से व्याख्या कर रहे थे, उन्हें ऐसा करने के लिए पर्याप्त अवसर भी था। भइयाराजा की पूरी रियासत अनसर्वेड थी और जमीन के मालिकाना के जिनके पास कागजात थे भी उसकी प्रमाणिकता पर सन्देह भी था। अधिकारी और अहलकारान ऐसी स्थिति का लाभ धन कमाने के लिए उठा रहे थे। अम्बेडकर वादी दलित नेता ने देखा कि सामान्य प्रक्रिया की तरह चलने वाला यह जमीनदारी विनाश का कार्यक्रम यहां के गरीबों दलितों व भूमि-जोतकों को कुछ लाभ न दे सकेगा। उसे कुछ अलग ढंग से इस सवाल पर जनमत को जागृत करना होगा।
अम्बेडकर वादी दलित नेताने अपने पुराने मित्रा रामदयाल से भी मुलाकात नहीं की। उसे जो कुछ भी करना होगा अकेले करेगा, हो सकता है रामदयाल उसका साथ न दें क्योंकि वे भी जमीनदार हैं और अपनी जमीन गंवाना नहीं चाहेंगे।
अम्बेडकर वादी दलित नेता ने अपना माथा तब पीट लिया जब उसे मालूम हुआ कि रामदयाल ने अपनी जमीनदारी की जमीनों का आवंटन खुद कर दिया है। रामदयाल ने स्थानीय कलक्टर को दबाव में लिया, उसका दौरा क्षेत्रा में करवाया तथा गांव-गांव जाकर भूमि-जोतकों की सूची बनवाया। रामदयाल के पास भी एक सूची थी जिसके आधार पर वे जमीनों को बटाई पर काश्तकारों को आवंटित किया करते थे। राजस्व विभाग के अहलकारों द्वारा जब अन्तिम रूप से सूची बना ली गई फिर उसे रामदयाल ने देखा और भूमि जोतकों से ही उस सूची की तस्दीक भी कराया।
अम्बेडकर वादी दलित नेता तो चकराया हुआ था उसे अचरज जैसा लग रहा था कि क्या कोई व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है जो अपनी जमीनदारी का खुला आवंटन उसके जोतकों के हित में करे? एक बार तो उसे झटका जैसा लगा क्योंकि प्रारंभ में उसे जान पड़ा था कि उसे रामदयाल से भूमि आवंटन के सिल-सिले में नहीं मिलना चाहिए सो महाराष्ट्र से आकर वह रामदयाल से नहीं मिला और अकेले ही गांव-गांव घूमने लगा। उस समय राजस्व कर्मचारी जमीनदारी तोड़ने की कार्यवाहियों में लगे थे।
अम्बेडकर वादी दलित नेता ने भी अपने स्तर से भूमि जोतकों की सूची बना लिया था इस काम के लिए उसे अन्य सहयोगी भी मिल गये थे जो पढ़े-लिखे तो कम थे पर दिमाग से तेज थे तथा बातों को उतना समझ लेते थे जितना कि कोई पढ़ा-लिखा भी समझता।
अम्बेडकर वादी दलित नेता के सामने एक दिन अचानक कोई आफत आन खड़ी हो गई जिसकी उसे कल्पना तक नहीं थी। दरअसल हुआ यह कि अम्बेडकर वादी दलित नेता भइयाराजा की रियासत का निवासी था, वह उन्हीं की रियासत में जमीनदारी विनाश के कार्यक्रमों की निगरानी कर रहा था, इसी दौरान एक खबर हवा की तरह फैली कि भइयाराजा के दो सौ गांवों की जमीनदारी विनाश के कार्यक्रम पर उच्च न्यायालय ने रोक लगा दिया है। अदालत का जब तक अगला आदेश पारित नहीं हो जाता तब तक भइयाराजा के दो सौ गांवों में जमीनदारी विनाश की कार्यवाहियां स्थगित रहेंगी। खबर सुनकर अम्बेडकर वादी दलित नेता परेशान हो गया अब वह आगे क्या करे? महाराष्ट्र की जमी जमाई नौकरी भी उसने छोड़ दिया, यहां अदालत द्वारा जमीनदारी विनाश की कार्यवाही स्थगित किए जाने के बाद वह कहां जाये, किसी दूसरे क्षेत्रा में उसकी जान-पहचान भी नहीं। भइयाराजा की इस्टेट का तो वह मूल निवासी है, उसकी जाति की आबादी भी सत्राह अऋारह प्रतिशत से अधिक है, सभी पहचानते व जानते हैं, जो नहीं भी जानते वे पहचान जाएंगे, इस क्षेत्रा में वह जनतांत्रिक मोर्चा बना सकता है, यहां के जमीनदारों व बड़े जोतदारों से टकरा सकता है, लेकिन किसी अपरिचित अनचीन्हे क्षेत्रा में तो यह काफी मुश्किल होगा।
अम्बेडकर वादी दलित नेता जितना प्यारा आदमी था उसका नाम भी प्यारा था और यह प्यारा उसके नाम से जुड़ा था फर्क था कि वह बाद में था, पहले राम आता था, दोनों जोड़ देने पर वह रामप्यारे में बदल जाता था। तो इस प्रकार नाम से वह रामप्यारे था और काम से अम्बेडकर वादी-अम्बेडकर वादी जैसी उपाधि उसे गांधीवादी की तर्ज पर जनता द्वारा उसकी राजनीतिक सोच के आधार पर मिली थी। वैसे कुछ अन्य विचारों के लोग मजाकिया लहजे में उसे अम्बेडकर वादी की उपाधि से ही संबोधित करते जिसे वह बुरा नहीं मानता अपने लोगों से अक्सर वह कहता...
‘आज भले ही अम्बेडकर देश की मौजूदा राजनीति में हासिए पर हों पर कल उनका है, जब लोग उनके सिद्धान्तों और राजनीतिक आचरणों पर अगला कदम उठाने में उत्फुल्लित होंगे?’
रामप्यारे हालांकि उन दलित नेताओं की तरह नहीं था जो राजनीतिक सिद्धान्तों को चिन्तन की तरह दिमाग की सुरंग में दबा कर सजा कर रखा करते हैं और किसिम-किसिम के वार्तालापों, संवादों, गोष्ठियों, सेमिनारों वगैरह में सजावटी सूत्रों की तरह प्रस्तुत किया करते हैं। रामप्यारे राजनीतिक सिद्धान्तों के मामलों में सहज था तथा सिद्धान्तों की असहजता से बच कर चलता था। वह तात्कालिकता के कर्म को दूरगामी लक्ष्यों को पाने का धर्म समझता था तथा इसी मर्म पर चलते हुए वह अपने गृह जनपद में था ताकि कुछ ऐसा कर सके जिससे वंचितों उपेक्षितों व शोषितों को उनका अधिकार हासिल हो सके।
कहते हैं सोचा हुआ उसी रूप में घटित हो जाये, ऐसा संभव नहीं होता, रामप्यारे ने भी सोचा कुछ था और समय उसकी सोच पर अदालत का स्थगन लिख चुका था। सो वह कुछ समय के लिए पहाड़ जैसा जड़ बन चुका था, करने के लिए उसके पास कोई सकारात्मक कार्यक्रम न थे लेकिन समय तो नई-नई सीखें लेकर आता है। रामदयाल द्वारा किया जाने वाला भूमि-आवंटन उसके लिए सीख थी और इसी सीख से निकली हुई दूसरी सीख थी कि भूमि-जोतकों को इस काम के लिए जागरूक किया जाना चाहिए कि वे जमीन पर से अपना कब्जा दखल न छोड़े तथा सरकार व प्रशासन पर दबाब बनाये जाने की आवश्यकता है कि प्रशासन भूमि-जोतकों के कब्जा दखल को जमीन के कागजातों में दर्ज करे। रामप्यारे अपने जैसे सहधर्मा साथियों के साथ गांव-गांव जाता, भूमि-जोतकों की सूची बनाता। ऐसा करने में उसे कुछ अचरज जैसा जान पड़ा। अचरज इसलिए कि लगभग सभी गांवों में कुछ ऐसे भूमि-जोतक मिल जाते जो जाने कितने पुश्त से जमीन पर खेतीबारी करते चले आ रहे थे पर वे कानूनी रूप से सिर्फ बटाईदार की हैसियत रखा करते थे, वह भी सिर्फ स्थानीय राजा के कागजातों में। अंग्रेजी सरकार से उनका रिश्ता न था।
एक बार अंग्रेजी सरकार ने जमीन पर सुपुर्दगार बनाने की योजना चलाया था। उस योजना का लाभ भी दलितों को नहीं मिल पाया। अंग्रेजी अहलकारों तथा स्थानीय जमीनदारों ने उन्हीं लोगों को सुपुर्दगार बनवाया जिन लोगों ने सुपुर्दगार बनने के लिए काफी रुपया खर्च किया।
रामप्यारे गांव के ऐसे लोगों से मिलता तथा उन्हें आश्वस्त करता कि जमीनदारी तो किसी न किसी दिन अवश्य टूटेगी क्योंकि कांग्रेसी सरकार तथा कांग्रेस पारटी के लिए जमीनदारी तोडना प्रतिष्ठा का सवाल है। सहभागी प्रशासन तथा प्राकृतिक संसाधनों पर सभी का बराबर हक, इसी नारे के आधार पर देश की जनता गांधी और कांग्रेस के इशारे पर नाच रही थी। जगह-जगह स्वस्फूर्त धरना, सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा चल रहा था सो प्रदेश की मौजूदा कांग्रेसी सरकार भी परेशान परेशान थी। न्यायालय के स्थगन आदेश ने जमीनदारी विनाश के सारे कार्यक्रमों को बाधित कर दिया था। कांग्रेसी सरकार न्यायालय में हाजिर होकर स्थगन आदेश निरस्त किये जाने के बारे में प्रार्थनापूर्ण दलीलें दे चुकी थी पर वहां तो सन्नाटा था सारा कुछ कानून की लम्बी तथा यातनापूर्ण प्रक्रियाओं में फंसा पड़ा था। ऐसे विपरीत समय में सिर्फ जागरूकता व सावधानी के बाबत ही सार्थक प्रयास किये जा सकते थे कि भूमि-जोतकों का किसी भी तरह से अहित न हो। रामप्यारे इसी प्रयास में लगा था और इसके लिए वह एक दिन रामदयाल से भी मिला पुरानी बातों को छोड़ कर कि रामदयाल भी तो जमीनदार हैं। उसे उनके द्वारा किया जाने वाला भूमि-आवंटन का काम निष्ठुरताओं तथा क्रूरताओं से अलग होकर मनुष्य बने रहने वाला लगा।
बातचीत के दौरान रामप्यारे ने रामदयाल को अपनी वर्णगत व वर्गगत भावना के बारे में बताया भी। ‘भइया! ऐसा है कि मैं आपसे पहले ही मुलाकात करता लेकिन मेरा मानना था कि अच्छा मित्रा होना अलग बात है और मित्रा का साथ देना दूसरी बात। वह भी ऐसी स्थिति में जब मित्रा का काम वर्गीय व वर्णीय हितों के विपरीत हो। मैं जमीनदारी टूटने की उत्फुल्लता में कुछ ज्यादा ही एकतरफा हो गया था और आपको सिर्फ जमीनदार मानने लगा था, आदमी नहीं जो परिस्थितियों के मनन द्वारा मन बनाता है, समय भांप कर रास्ता नापता है।’
रामदयाल खामोशी से पूरी होश के साथ रामप्यारे को सुन रहे थे। अनुचित व उचित के बीच रामप्यारे का चित्त जिस तरह निर्मित हो रहा था और उसने नौकरी छोड़ कर जन के लिए अपना मन और तन सौंप दिया था, धन तो था ही नहीं, रामदयाल को अच्छा लगा, दिल को गुदगुदाने वाला। रामदयाल ने रामप्यारे को आश्वस्त किया।
‘ऐसा ही होता है रामप्यारे! धन व संपत्ति का मामला सिर्फ सुखों व भोगों का ही नहीं है, यह एकाधिकार व विशेषाधिकार का होता भी है जो आदमी को अहंकारी बनाता है। चलो मिल कर कार्यक्रम बनाते हैं जिससे जनता लाभान्वित हो सके।
फिर रामदयाल ने कहा...कृकृ
‘तुमने खुद को समय के पहले तैयार कर लिया, यह खुशी की बात है रामप्यारे! मैं तुम्हारे कार्यक्रम के साथ हूं पर अभी नहीं कुछ समय बाद फिलहाल तो दूसरे काम में व्यस्त हूं।’
रामप्यारे, रामदयाल से मिल कर खुश खुश लौटा, उसे लगा कि कुछ ऐसे होते हैं जो दूसरों के लिए भी सुगम रास्ता बना देते हैं।
उफनती नदी
रणविजय और लिली दोनों किसी मर्यादापूर्ण उदाहरण में लगातार तब्दील होते जा रहे थे। अंग्रेज हाकिम उनके बदलावों की रागात्मकता का गहरे से मूल्यांकन करता और झूम झूम जाता।
जीवन मन और तन के खेलों का समन्वय व सन्तुलन ही तो है अंग्रेज हाकिम लिली की ममा को देखता और भीतर से कह उठता। अंधेरे और उजाले के बनावटी पर्दे को हटाकर वह लिली की ममा को चूमने लगता जबकि लिली की ममा अंग्रेज हाकिम को रोकती और उलाहती जिसका आशय होता... ‘उम्र और उत्तेजना में कुछ फर्क तो किया करो।’ अंग्रेज हाकिम तमाम वर्जनाओं से बाहर निकल कर सिर्फ इच्छाओं की तात्कालिक क्रीड़ा का नायक बन जाता और समझता मन से पार जाने के लिए इससे सुगम रास्ता दूसरा नहीं फिर लिली की ममा को रणविजय और लिली के सुन्तलित संबंध के बारे में बताता।
लिली की ममा भी खुश खुश थीं। उन्होंने तो पहले ही ताड़ लिया था कि रणविजय और लिली दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं। दोनों में से किसी एक को अलग से देखना पहचानना मुश्किल होगा पर समय की गति का तो कोई नियंत्राक नहीं होता। समय के साथ घटनायें जुड़ी होती हैं और इनका जुड़ाव कहीं बसन्तनुमा दीखता है तो कहीं पतझड़ जैसा। ऐसा ही हुआ लिली और रणविजय की खुशनुमा जिन्दगी में ऐसा पतझड़ आया कि सारा कुछ हवा के झोंके में उधरा गया।
लिली की ममा और अंग्रेज हाकिम दोनों परेशान। अंग्रेज हाकिम ने लिली से पूछा भी...कृ
‘क्या हुआ लिली, आजकल तुम बदली-बदली सी दीख रही हो। तुम्हारे चेहरे पर रात की धुंध दीखती है सुबह की ताजगी नहीं।’
‘नहीं डैड! ऐसा कुछ भी नहीं। चेहरा तो बदलता रहता है। दिन और रात से चेहरे का कोई नाता नहीं, मैं जैसी थी, वैसी ही हूं। एकदम अपरिवर्तित किन्तु जड़ व स्थिर नहीं। मैं पहले भी अपने होने की तलाश अपने भीतर कर रही थी और आज भी कर रही हूं, चाहती हूं आजीवन मैं ऐसा ही करती रहंू। जाने कैसे आपको फर्क दीख रहा?
‘रणविजय भी तो बुझा-बुझा सा है। तुम दोनों की चहकें, चुलचुलाहटें घर के भीतर कहीं नहीं। कब तुम आती हो कब रणविजय आता है, उसकी आहट तक नहीं होती। हमारी घबराहट यही है कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम दोनों सन्तुलन को बन्धन समझ रहे। आखिर क्या बात है? कुछ तो है जो हमलोगों से छिपाया जा रहा है।
‘क्या छिपाना और क्या दिखाना है डैड? सारा कुछ खुला-खुला सा है, बोलता-बतियाता लेकिन तौलता हुआ, मैं नहीं चाहती कि रणविजय आहत हो और मेरे मातहत रहे पर मैं भी उसके मातहत नहीं रह सकती। मेरे सपने हैं जिन्हें पूरा करने की पूरी कोशिश मुझे करनी है और रणविजय के भी मेरी तरह के सपने हैं, आजाद। भला यह कैसे संभव है कि हम दोनों के एक ही सपने हों, एक ही रंग रूप और गुण वाले। मैं नहीं चाहती कि रणविजय के रंगीन सपनों से छेड़-छाड़ करूं, ऐसा उसे भी करना चाहिए पर वह तटस्थ नहीं, वह मेरे सपनों को मरोड़-मरोड़ कर तोड़ रहा है।’
कहते कहते लिली रूआंसा हो जाती है। आंखें छल-छला जाती हैं। अंग्रेज हाकिम लिली को सहारा देता है फिर समझाता है...
‘भावुकता से बाहर निकलो लिली। सपनों के चुनाव से मन को तनाव में डालना ठीक नहीं। चुनने को तो कुछ भी चुन सकती हो पर गुनना भी जरूरी है। ऐसा चुनाव भी क्या जो तनाव पैदा करे और समय को कुसमय में बदल दे।’
लिली तो जैसे सतर्क थी, उसे पता था कि डैड उसकी समझ को बदलने के लिए क्या-क्या समझा सकते हैं और ममा भी। कोई नहीं चाहेगा कि उसकी दूरी रणविजय से कुछ इस तरह बढ़ जाये कि दोनों किसी स्वतंत्रा इकाई में तब्दील हो जायें। जबकि यही क्रूर सच था। दोनों संबंधों के आर-पार थे किसी नदी के दोनों किनारों की तरह एक दूसरे से अलग बीच में बाढ़ का उफनता पानी जाने किस तट को तोड़े। लिली समझती कि वह अपनी धडकनों और सांसों का सहला और उन्हें सुरक्षित रखने की सायास कोशिश कर रही है जबकि रणविजय उनसे छेड़-छाड़ कर रहा, उन्हें तोड़ रहा और जिसे जोडना चाह रहा है वह तो पहले से ही टूटा हुआ और खंडित है। टूटे हुए को क्या जोडना और क्या तोडना? लेकिन रणविजय नहीं समझ रहा। वह समझ रहा कि दुनिया बदल डालेगा जैसा चाह रहा वैसा पर कैसा? इसकी पतली समझ भी नहीं।’
लिली रणविजय को जाने कितनी बार समझा चुकी है कि खुद को बदल डालना जब सहज और सरल नहीं फिर समाज को, दुनिया को बदल डालना यह कैसे संभव है? ये सब तो जन्म से ही मरे हुए सपने हैं। इनके साथ एक कदम भी चलना बेवकूफी है ऐसी कठिन स्थिति में तुम जीते हुए जागृत वर्तमान को पोस्टमार्टम घर में क्यों भेज रहे हो? आत्म-हन्ता बनने की तुम्हारी किसी क्रिया-प्रतिक्रिया का कम से कम मैं तो भागीदार नहीं बन सकती।’
रणविजय रहन-सहन में जितने सरल थे वैचारिक मुद्दों पर उतने तरल नहीं, वे कल को आज की संभावनाओं से काफी दूर रखा करते थे और मानते थे कि यह जो आज है कल का बिगड़ा हुआ रूप है जो आने वाले कल की भी दुर्गति ही करेगा। ऐसी सूरत में जो आज है उससे मुठभेड़ करते रहने की आवश्यकता को नकारना बेवकूफी और जिम्मेवारियों से अर्थहीन पलायन के सिवाय कुछ नहीं। रणविजय अपने तर्कों से लिली के वैचारिक झुकावों को समय की आवश्यकता से जोडना चाहते और उसे समझाते...कृकृ
‘अपने लिए जीवन की प्रसन्नताओं, आकांक्षाओं को हासिल कर लेना या उसके लिए प्रयास करना यह जीवन को एकतरफा बनाना है तथा यह आत्म विस्तार का एक रूप है जो मनुष्य की संघर्षपूर्ण सचेतनता को लील जाता है। हमारी जिम्मेवारियां जितना अपने प्रति हैं उससे कम समाज के प्रति नहीं। हम अपनी पीठ पर कथित महिमाओं, गरिमाओं की पालिश भले ही चढ़ा लें पर अपना चेहरा सर्वग्राही नहीं बना सकते जिससे दूसरे भी मुहब्बत करने लगें तथा समझें कि अपना आदमी है।’
लिली तो जैसे आश्वस्त थी कि वह जो सोच रही उससे इतर दूसरी कोई सोच नहीं हो सकती। उसे मौका मिला है रूस जाने का, वहां काम करने का, वहां के राजनीतिक साहित्य का अनुवाद करने का, अच्छे वेतन और अच्छी सुविधाओं के साथ अब इसके आगे उसे क्या पाना?
एक दिन रूसी मिजाज का जो वह भारतीय कामरेड रूसी दूतावास में उससे मिला था, उसने भी यही सुझाया था कि रूसी सरकार का यह प्रस्ताव कभी न ठुकराना। उस दिन लिली तो जैसे चकरा गई थी यह आदमी क्या कह रहा?
लिली जानती थी कि रूसी सरकार गिने-चुने लोगों को ही सरकारी प्रकाशन संस्थान से जोड़ती है। वहां काम पाना आसान नहीं। एक से एक प्रतिभाशाली, चाहे वे जिस क्षेत्रा के हों, साहित्य, विज्ञान, कला किसी के भी मुंह बाये खड़े हैं और अपने-अपने देवता की मनौती कर रहे हैं, लेकिन सभी को तो वहां काम नहीं मिल रहा।
रणविजय जाने किस मिट्टी का बना है? कहता है...कृकृ
‘लिली! मुझे तुम्हारे चुनाव पर कुछ नहीं कहना। तुम जैसा चाहो निर्णय ले सकती हो लेकिन यह तुम्हारा निर्णय एकतरफा होगा, सिर्फ अपने लिए। क्या तुम्हें नहीं सोचना चाहिए ममा और डैड के बारे में। उन्हें तुम्हारे सहारे की आवश्यकता है फिर तुम रूस कैसे जा सकती हो।’
‘आखिर मैं उनके लिए कर क्या कर सकती हूं? क्या मैं संबंधों की भावुकता में सुनहरे अवसर को छोड़ दूं और अपने भविष्य को बन्धक बना दूं।’
लिली तो फैसला ले चुकी थी कि उसे रूस जाना है तो जाना है और सुनहरे अवसर की उपलब्ध खुशियों में पोर-पोर डूब जाना है।
रूसी दिमाग के भारतीय कामरेड ने लिली के रूस जाने के फैसले को सराहा था...
‘मुझे उम्मीद थी कि तुम इस अवसर को नहीं ठुकराओगी। पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है, समय सारी बातों को याद करने के सारे निशानों को मिटा देता है। संबंधों में अवसर की सुगन्ध होनी चाहिए और जब दुर्गन्ध आने लगे तो उससे बाहर होना ही ठीक होता है।’
लिली ने रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड की बातों को किसी मंत्रा माफिक समझा था। उस समय उसके लिए यह समझना सरल न था कि उसका पक्ष क्या है और विपक्ष क्या है? वह तो मात्रा इतना समझ रही थी कि वह एक ऐसे मुल्क में जा रही जहां आदमी और आदमी के बीच की सारी दूरियां समाप्त की जा चुकी हैं और प्राकृतिक किस्म का साम्य स्थापित किया जा चुका है, साथ ही साथ ऐसी राजनीतिक परिस्थितियां निर्मित की जा चुकी हैं जहां मानव का मानव के प्रति किसी भी तरह का दुराचार अंखुआ ही नहीं सकता।
लिली अपने फैसले पर आश्वस्त थी कि वह जो करने जा रही उसे वैसा ही करना चाहिए। रणविजय ने हालांकि उसे समझाया था कि डैड और ममा की देखभाल भी तो करना आवश्यक है ऐसी सूरत में तुम्हारा रूस जाना ठीक न होगा पर लिली ने रणविजय की बात पर कत्तई ध्यान नहीं दिया और अपने फैसले पर डटी रही। रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड ने सबसे पहले लिली का पासपोर्ट बनवाया फिर रूसी बीजा। पासपोर्ट बनवाने के लिए भी लिली ने रणविजय या अंग्रेज हाकिम से कुछ नहीं कहा, सारा कुछ खुद और रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड के सहयोग से किया। लिली का पासपोर्ट बन जाने के बाद अंग्रेज हाकिम को मालूम हुआ कि लिली रूस जा रही, उसे भी लिली ने कभी नहीं बताया। जबकि पहले छोटी सी छोटी बात भी खिल खिला कर अंग्रेज हाकिम को बताया करती थी।
ष्डैड हमने यह किया, डैड हमने वह किया, कल हिन्दी कथा साहित्य वाले सेमिनार में हमने अपना पक्ष रखा जो सराहा गया। अब दिल्ली से बाहर भी मुझे सेमिनारों में आमंत्रित किया जाता है। अंग्रेज हाकिम के लिए लिली का रूस जाना एक सामान्य सी घटना थी। पढ़ी-लिखी है, समझदार है, अपने पक्ष के साथ मजबूती से खड़ी रह सकती है तथा उसे क्या करना है और क्या नहीं करना है, इस पर विवेक पूर्ण निर्णय ले सकती है। अभी रूस, कल अमेरिका फिर कहीं जा सकती है फिर भी अंग्रेज हाकिम चिन्तित और व्यग्र था... कृ
‘आखिर इसे लिली ने बताया क्यों नहीं? क्या मैं उसे रोकता, और कहता कि रूस न जाओ, यहीं इसी देश में अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करो या तो पारंपरिक रास्ते पर चलते हुए किसी एकेडेमी में स्थान बना लो या किसी नये रास्ते की यात्राी बनो।
आखिर क्यों नहीं बताया लिली ने? एक दिन अंग्रेज हाकिम ने लिली से पूछा.कृ‘क्यों लिली तूं रूस जा रही क्या?’
‘हां डैड’
‘कभी बताया नहीं?’
‘पहले कन्फर्म नहीं था’
‘कन्फर्म हो गया?’
‘हां अगले सप्ताह जा रही हूं, कागजात बन गये हैं।’
‘काम क्या है?-
‘वहां के सरकारी प्रकाशन संस्थान में मुझे हिन्दी विभाग का प्रमुख बनाया गया है।’
‘अच्छा! यह तो खुशी की बात है। तुम्हारे साथ रणविजय भी तो जा रहा होगा!
‘नहीं डैड वह नहीं जा रहा।’
‘तंू अकेली जा रही या और कोई?’कृ
‘एक आदमी और है डैड, वह हिन्दी साहित्य का बहुत बड़ा आदमी है, खांटी कामरेड।’
‘कौन है वह? कहीं नामदेव तो नहीं!’
‘हां वही डैड, उन्हीं के सहयोग से मुझे यह प्रस्ताव मिला।’
‘रणविजय ने भी कोशिश किया था क्या?’
‘नहीं डैड! वह देश नहीं छोडना चाहता, उसके लिए यहां की काली मिट्टी और नदियों का मटमैला पानी काफी प्यारा है। वह तो मुझे भी रोक रहा, और बता रहा कि दुनिया को आंखें मूंद कर देखो, खाली हाथ परचम लहराओ और भूखे पेट लाल सलाम बोलो...कृकृ
‘तो क्या वह तुम्हारे साथ जा सकता है, ऐसी सुविधा है?’
‘हां, शादीशुदा लोगों को इस तरह की सुविधा मिलती है।’
‘फिर तो उसे जाना चाहिए।’
अंग्रेज हाकिम इससे अधिक लिली से क्या पूछता? पूछना भी क्या था। रणविजय को अंग्रेज हाकिम अच्छी तरह से जानता था कि उसे देश नहीं छोडना। वह इसी देश में रह कर कुछ ऐसा करना चाहता है जिससे यहां का चेहरा बदल सके और लोग खुद को बदलना सीख सकें। अंग्रेज हाकिम ने फिर भी रणविजय से पूछा...
‘तुम लिली के साथ रूस नहीं जा रहे क्या?’
‘नहीं डैड! वहां मेरे लिए कोई आकर्शण नहीं।’
‘क्यों! वहां तो मार्क्स चप्पे-चप्पे पर दीख रहे हैं। वहां तो मार्क्स के विचारों की बदरियां हैं और बदलाव के इन्द्रधनुष हर तरफ बिखरे पड़े हैं।’
‘सब कहने की बातें हैं डैड! यदि आप व्यंग्य नहीं कर रहे तो आप भी समझते हैं कि वहां क्या हो रहा है। सरकार विरोधी एक-एक आदमी को चुन-चुन कर मारा जा रहा, यातना-शिविरों में भेजा रहा। साइबेरिया को निर्वासितों का कैम्प बना दिया गया है। मुझे नहीं जाना वहां! मेरे लिए यहीं ढेर सारे काम हैं और मैं इसी देश में खुशियों की तलाश कर सकता हूं फिर वहां किस लिए जाना? वैसे भी मार्क्स की बन्दूकें मेरे किसी काम की नहीं, मैं हिंसा में विश्वास नहीं करता। सहनशीलता और विचारों की दृढ़ता मेरे लिए किसी असलहे से कम नहीं।’
अंग्रेज हाकिम ने लिली का रूस जाना किसी विशेष संदर्भ में नहीं लिया, न ही उसने सोचा कि वह भारत में अकेला हो जाएगा, उसकी बुढ़ौती किस तरह कटेगी। किसी थके हारे भारतीय की सोच से अंग्रेज हाकिम बाहर था। वह अपने लिए लिली की मुक्तता को बाधित नहीं कर सकता था और न ही रणविजय पर दबाब बना सकता था कि वह भी लिली के साथ रूस जाये। पारिवारिक संबंधों की सोच अंग्रेज हाकिम के लिए भिन्न किस्म की थी जहां किसी भी सदस्य की मुक्तता के लिए किसी भी तरह की वर्जना न थी। अंग्रेज हाकिम मान कर चलता था कि लिली या रणविजय अपने लिए जिस रास्ते का चुनाव करेंगे नाप-तौल कर करेंगे। पर लिली की ममा की सोच अंग्रेज हाकिम से अलग थी। उन्होंने लिली को समझाया...कृकृ.
‘तूं अकेली रूस जा रही, तेरे साथ रणविजय नहीं जा रहा?’
‘हां ममा, वह नहीं जा रहा।’
‘क्यों?’
‘मुझे नहीं मालूम’ एक मायूस उत्तर लिली ने उन्हें दिया
‘तुझे नहीं मालूम! क्या कह रही तूं फिर किसे मालूम?’
‘हां ममा! मुझे नहीं मालूम।’
तो मालूम करो और वह नहीं जा रहा तो तूं वहां क्यों जा रही अकेली?’
‘मैं नहीं मालूम कर सकती, और मुझे जाना है तो जाना है।’
‘डैड से बाते कर लीं।’
‘हां’
‘उन्होंने तुम्हें रोका नहीं’
‘नहीं’
‘कुछ बोले’
‘नहीं, सिर्फ पूछा...’
लिली की ममा ने अन्त में लिली से साफ साफ कहा...
यदि तुम रूस जाना ही चाहती हो तो रणविजय को भी साथ ले लो, वहां अकेली न जाओ। ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रही कि तुम्हारे साहस और दृढ़ता पर मुझे शक है। सिर्फ इसलिए कि रणविजय यहां और तू वहां यह ठीक नहीं। मैंने पहले ही तुझे रोका था कि शादी में जल्दी न करो। कुछ बन जाने के बाद रिश्ते में बंधती तो ठीक था। अब तो बंध चुकी हो और इसी बंधाव के कसाव के सहारे ही तुम्हें आगे बढना चाहिए।
लिली को तो ममा का सारा कहा-सुना अनसुना ही करना था और वही करना था जो उसने सोचा था। लिली अपने फैसले पर दृढ़ थी। रणविजय से शादी के जुड़ाव में भी उसने विचारों के कसाव को देखा था जैसा सोचा वैसा पाया और रणविजय को अपने से जोड़ लिया। लेकिन ममा...वह तो इतना ही सोच सकती है, साधारण सी घरेलू महिला की पत्नी को पति के साथ रहना चाहिए अलग नहीं, क्या तब भी जब पति साथ न रहना चाहे और सिर्फ अपने मन की करे। जुड़ाव तो तन और मन दोनों का होना चाहिए। रणविजय मेरे बारे में कहां सोच रहा? फिर मैं उसके बारे में क्यों सोचूं, क्या वह मेरे साथ नहीं रह सकता? कहीं मेरी प्रतिभा उसके जलन का कारण तो नहीं।
लिली की ममा का उसे समझाना आसमान में तीर मारना था फिर लिली की ममा ने खुद अपना मुंह सिल लिया। जो होना होगा वह होगा ही और जो होगा, वह भी ठीक ही होगा ऐसा मानकर लिली की ममा अपने में कहीं खो गईं फिर उन्होंने रणविजय को ही समझाया और पूछा...कृकृ
‘तूं ही लिली के साथ क्यों नहीं चले जाते, तूं यहां और लिली वहां ऐसे रहना ठीक नहीं।’
‘नहीं ममा मुझे नहीं जाना। मैं लिली के लिए कोई व्यवधान नहीं बनना चाहता। उसे अकेली चलना है और आगे बढना है, मैं उसके लिए किसी काम का नहीं। काम का होता तो वह मुझे छोडकर कहीं भी नहीं जाती। उसे न तो मेरा हाथ चाहिए न ही साथ। वह इस समय ऐसी स्थिति में नहीं कि अपनी प्रसन्नताओं के लिए पीछे छूट जाने वाली अप्रसन्नताओं का लेखा-जोखा करे।’
रणविजय तो बहुत पहले ही जान चुके थे कि लिली अपने आकाश की सीमाएं बढ़ा कर असीम हो जाना चाहती है। वह अपनी मुक्तता के लिए किसी भी निर्णय तक जा सकती है उसने खुद को पुनर्विचार से अलग कर लिया है फिर भी रणविजय ने लिली को रोका था...कृकृ
‘लिली! इस समय तुम्हारी आवश्यकता इस देश को है, यहां के समाज को है, मुझे है, मेरी तरह से ढेर सारे लोगों को है। देश आजाद हुआ है लेकिन आज़ादीकी गन्ध कहीं भी नहीं। वही बसाती राजनीतिक बदबू। हमें लोगों के साथ जुड़कर उनकी आज़ादीके लिए काम करना होगा। लोकतंत्रा व लोकराज की स्थापना का काम हमें अपनी उपलब्धियों से जोडना चाहिए।’
रुक जाओ लिली, रुक जाओ। पढ़ाई के दिनों के सपनों के लिए उन संकल्पों और वादों के लिए जिसने मुझे तुमसे जोड़ा था। याद करो वह सुबह। आज़ादीमिलने के ठीक दूसरे दिन वाली। क्या हमारी आंखों ने उगते सूरज में भारत का मानचित्रा नहीं देखा था? क्या हम सूरज की मनभावन लालिमा में खो नहीं गए थे और ऐसा महसूस नहीं हुआ था कि हम कालिमा से बाहर हैं और कालिमा मुक्त समाज बनाने का संकल्प हमने नहीं लिया था।
रणविजय सारा कुछ याद कराते रह गये थे लिली को, पर लिली खामोश थी, उसे तो सारा कुछ भूल जाना था। वह याद की बुनियाद पर खड़ी नहीं होना चाहती थी। आखिरी उत्तर के लिए रणविजय ने ही लिली से पूछा...कृकृ
‘तो क्या तुम रूस जाने वाले अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं कर सकती?’
पलंग पर रणविजय के साथ लेटी हुई लिली ने पलंग का किनारा पकड़ लिया और मुलायम सा चादर मुंह पर ढांप लिया, फिर तो बीच में जो खाली जगह थी उफनती नदी की तरह हरहराने लगी। रणविजय पलंग के एक किनारे पसरे-पसरे सोचने लगे उस पार जाना जोखिम भरा भी हो सकता है। कमरे में रोशनी थी, रणविजय ने स्विच बन्द किया और नींद में जाने की कोशिश करने लगे लेकिन वहां नींद न थी, न ही वहां गुदगुदियों वाली स्मृतियां थीं, जो थीं उनका मुंह ढंपा था, तन सिकुड़ा था और दिल था कि मुर्दा बन गया था। लेकिन वहीं खुले में रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड मुस्कुरा रहा था और पूछ रहा था...कृकृ
‘क्यों ककामरेड रणविजय! क्या चुनना चाहोगे लिली या भारत। उस समय उफनती नदी के पार जाना रणविजय के लिए कठिन था।
समय के साथ
अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा लिली को जितना समझा सकते थे, समझा चुके थे कि यदि तुम्हें रूस जाना है तो रणविजय को भी साथ ले लो। लिली तो जैसे दृढ़ थी कि उसे वह सब नहीं समझना और न उनके समझााये पर एक कदम भी चलना जो उसे समझाया जा रहा है। साथ ही साथ उन लोगों ने रणविजय को भी समझाया था कि यदि लिली नहीं रुक रही और रूस जाने का कार्यक्रम नहीं स्थगित कर रही तो तुम ही उसके साथ चले जाओ, पर रणविजय भी कत्तई तैयार न थे कि उन्हें लिली के साथ रूस जाना है।
रणविजय हाल के कई महीनों से देख रहे थे कि लिली कामरेड नामदेव को अपना पूरक समझने व मानने लगी है। रणविजय ने देखा कि लिली का शोध कार्य पूरा हो चुका है। उसका शोध पूरा कराने के लिए रणविजय पहले से ही तैयार थे पर लिली ने रणविजय से किसी तरह का सहयोग लेने के बजाय, शोध संबंधित, बात भी नहीं की। सारी सामग्री का विश्लेषण व व्याख्या खुद किया और कहीं आवश्यकता पड़ी तो नामदेव का सहयोग लिया।
चार पांच महीनों में लिली ने शोध कार्य का अन्तिम लेखन पूरा कर लिया था। इस दौरान वह घर पर अक्सर देर रात तक आती और सुबह ही रूसी दूतावास निकल जाती। लेखन का सारा कार्य वह रूसी दूतावास जाकर पूरा करती। किसी दिन अति उत्साह में लिली ने रणविजय से कहा था...
उसके शोध का अनुवाद दूसरी भाषाओं के अलावा रूसी में अवश्य ही होगा। वैसे आशा है कि अंग्रेजी में भी होगा। नामदेव जी ने आश्वस्त किया है.. शोध स्वीकृत हो जाने के बाद वे हिन्दी के अच्छे प्रकाशक से छपवा देंगे। एक दिन तो उन्होंने एक नामी प्रकाशक से मिलवाया भी था। प्रकाशक एक अच्छा आदमी था, उसकी बातें सरस थीं और उसने मेरी तारीफ करते हुए कहा भी...
‘लिली जी! आप उपन्यास अच्छा लिख सकती हैं। ऐसा उपन्यास जिसमें नर-नारी के संबंधों की सरसता, भावुकता, विद्रूपता और विडम्बनाओं का यथार्थ परक लेखा जोखा हो।’कृ
‘अरे नहीं! मैं उपन्यास न लिख पाऊंगी, उपन्यास लिखने के लिए उपन्यास बनाना पड़ेगा जबकि मैं एक छोटी सी कहानी या लघुकथा भी नहीं हूं। लिली ने प्रकाशक के सामने अपना पक्ष रखा।
प्रकाशक के संस्थान पर तो लिली किसी उत्तेजना पुंज की तरह थी जिसे प्रकाशक और नामी विचारक कामरेड दोनों परख रहे थे और सोच रहे थे कि लिली की आंखों में गरिमा और महिमा की ललचाई परतें अवश्य होगी। कामरेड नामदेव ने लिली को प्रोत्साहित किया।
‘नहीं लिली जी! ऐसी कोई बात नहीं। कोशिश ही रास्ते का निर्माण करती है। वैसे भी उपन्यास या कहानी है क्या? जो मन की हलचलें हैं, कहीं गहरे में फंसी पड़ी उसे बाहर निकालना और जो बाहर है, खुशबू या दुर्गन्ध उनमें सन्तुलन स्थापित करना, दुर्गन्ध की जगह खुशबू में डूब जाना और अपने होने को उससे जोड़ लेना। बाहर और भीतर दोनों में आवाजाही को बनाये रखना ही तो लेखन है, रही कला की बात, वह तो अभ्यासों से सहज ही हासिल हो जाती है।’
‘तो ऐसा नहीं है कि आप नहीं लिख सकतीं, आप लिखना तो शुरू करें, कोई जन्म से रचनाकार नहीं होता, रणविजय लिली के उत्साही संवाद में गोता लगाना चाहते तो भी नहीं लगा सकते थे। फिर भी उस समय लिली के उत्साहों पर चांद की स्वच्छता बिठाना आवश्यकथा। फिर रणविजय ने लिली को उत्साहित किया
‘हां ठीक तो कह रहा था प्रकाशक और कामरेड नामदेव भी। निश्चित रूप से तुम्हें लेखन की ताजगी भरी दुनिया का नागरिक होना चाहिए और शब्दों के जनतंत्रा का अगुआ भी लेकिन वे दोनों जो तुममें रुचि ले रहे हैं, उसके कारणों को समझना, मैं समझता हूं आवश्यक होगा जिससे अकारण तुम किसी सुविधा के लिए दुविधा में न पड़ जाओ।’
लिली अचानक आवेश में आ गई।कृकृ
‘जानते हो क्या कह रहे हो तुम। यदि जान कर कह रहे हो तो इसका मतलब अपनी सीमा बता रहे हो कि कितने संकुचित और शक्की हो तुम।’
कैसी सुविधा और काहे की दुविधा। क्या वे मेरी प्रतिभा का मूल्यांकन नहीं कर सकते और मैं प्रतिभाशाली नहीं सिर्फ प्रतिमा हूं कोई। एक ऐसी प्रतिमा जिसका आकार तुमने गढ़ा हो और उसी आकार के भीतर मुझे अपनी आकांक्षाओं को सदैव दूध पिलाते रहना है।’
रणविजय को लिली की हमलावर प्रतिक्रिया का पक्का अनुमान था कि वह कच्चे दूध की तरह उबल जाएगी और जाने क्या क्या कहेगी जिसका असल बात से रिश्ता न होगा। रणविजय ने बहुत ही तरलता से लिली को सफाई दिया भलाई भी इसी में थी रणविजय की।
‘नहीं मैं ऐसा तो नहीं कह रहा। मैं सिर्फ और सिर्फ यह कह रहा कि कोई कारण तो होना चाहिए आखिर वे तुमसे लिखने-पढने, रचनाकार बनने का पवित्रा प्रस्ताव क्यों दे रहे जब कि जाने कितने रचनाकार जगह-जगह ठोकर खा रहे हैं, प्रकाशक उन्हें घास तक नहीं डाल रहे। रही नामदेव की बात तो कौन नहीं जानता कि वह रचना को जितनी लापरवाही से झटक देता है, उसे कभी नहीं पढ़ता न ही उस पर कुछ लिखता है, उतनी ही सावधानी से रचनाकार को पकड़ लेता है खास तौर से.... आगे नहीं बोल पाये, जो बोलना था उसे चबा गये।
‘बहरहाल तुम्हें जो भला लगे वैसा करो।’
यह रणविजय का लिली से आखिरी बार संवाद था और रणविजय ने पक्का मान लिया था कि लिली ने अपनी आन्तरिक और बाहरी आज़ादियों का मन व चित्त माफिक विस्तार कर लिया है। उस मुक्त विस्तार में रणविजय के लिए पांव रखने भर की भी खाली जगह नहीं है। स्थिति इतनी बदल गई कि एक ही पलंग एक ही कमरा, एक ही परिस्थिति फिर भी लगता की कोई निगरानी कर रहा। लिली कमरे में आती एक ओर पसर कर सांसंे छोडने लगती और रणविजय सांसों का उडना देखते। सांसे छत से टकरातीं और लौटतीं फिर रणविजय को गुद-गुदातीं और संबंधों की कसमें देतीं...
रणविजय नर-नारी के मान्य संबंधों में उतर जाते और ज्योंही किसी जागरूक और अभ्यर्थी नर में बदलते लिली को मादा से ऊपर पाते नर में तब्दील होता हुआ एक स्वयं निर्मित।
‘छोड़ो भी, बहुत थक गई हूं, प्लीज सोने दो।’
रणविजय के लिए मुश्किल हो जाता, समझना कि लिली क्या कह रही? अपने होने से इनकार या स्वीकार, अगर स्वीकार फिर इनकार किसका। उन्हें लगता कि वे ही कहीं खो गये हैं। वे यहां इस कमरे में हैं भी और नहीं भी। दिन बीतने लगा, बीत-बीत कर महीना बनने लगा और एक दिन सारा कुछ धुंआ-धुंआ बन गया। लिली के साथ बिताये गये दिनों और रातों ने अपनी आकृति बदल ली, रणविजय उनमें तलाश करने लगे कि वे वादे कहां हैं? वे आश्वासन कहां हैं, वे सहयोग और साथ चलने के इरादे कहां हैं। लिली ने रणविजय से साफ कहा...
‘रणविजय तुम्हें समझना चाहिए कि सामयिक स्थितियों का समय के साथ बदलना असंभव नहीं। बदलती हुई सोचों व बदलती हुई स्थितियों के साथ सन्तुलन बनाये रखना ही पारस्परिक संबंधों को मजबूती प्रदान कर सकता है और मुझे लगता है कि हम जुड़ाव से हटकर किसी अलगाव की तरफ बढ़ रहे हैं। तुम्हें लगने लगा है कि मैं तुमसे अलग होकर कामरेड नामदेव के साथ को सहलाने-दुलारने लगी हूं।’
‘रणविजय ने सीधा सा सवाल लिली से पूछा... ‘क्या ऐसा नहीं है? मैं स्वीकारता हूं कि मैं मूर्तिकार नहीं, किसी की मूर्ति गढ़ नहीं सकता, अपनी मूर्ति भी नहीं पर कामरेड नामदेव तो सफल और प्रसिद्ध मूर्तिकार है, वह किसी भी ऐरे-गैरे की मूर्ति गढ़ कर दुनिया के साहित्यिक भूगोल पर चिपका सकता है। इसके कई उदाहरण हैं जो दिल्ली की सड़कों पर, विश्वविद्यालयों आदि में दीख जाते हैं।’
‘क्या वह तुम्हारी मूर्ति नहीं गढ़ रहा, तुम्हारे चेतन और अवचेतन को सम्मोहित नहीं कर रहा फिर क्या है ऐसा तुम्हारे पास जिसे तुम अपना बता सको, जिसकी सुरक्षा के लिए जी जान लगा दो।’
लिली रणविजय के इस अप्रत्याषित सवाल पर सतर्क न थी। उसे आभास तक न था कि रणविजय उस पर इस तरह का आरोप लगा सकता है। उसके पास जबाब न थे आखिर इतने समय से वह रणविजय से दूरी बना कर क्यों चल रही और न ही उसके पास साहस था कि वह फटाका कह देती... ‘हां मैं कामरेड नामदेव का हिस्सा हूं, लेकिन सच यही था। वह कामरेड नामदेव का लगातार हिस्सा बनती जा रही थी पर ऐसा हिस्सा नहीं जो पति-पत्नी के अन्तरसंबंधों में बदल जाय पर लिली को महसूस होने लगा था कि कामरेड नामदेव का साथ उसके साथ बोलना, बतियाना, हसना, घूमना, टहलना अतिरिक्त ऊर्जा से भरा हुआ होता है जो देह के पार है तो देह के भीतर भी। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं जिससे दैहिक पवित्राता लांक्षित होती हो। पर रणविजय जाने कैसा महसूस रहा, कहते हैं संवादहीनता बहुत खतरनाक होती है, पर रणविजय के लिए तो संवाद हीनता ही ठीक-ठाक थी। लिली खुल चुकी थी और बता चुकी थी कि उसे करना क्या है? रणविजय सोच रहे थे बेमतलब उन्होंने लिली को छेड़ा, सारा कुछ पर्दे में रहता तो ठीक था। एक तरह से रणविजय ने अपने मन को सन्देहों से बाहर निकालने के लिए ठीक किया। उन्होंने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया और लिली से दूर रहने की कोशिश करने लगे। थोड़े लम्बे अन्तराल के बाद ही सही रणविजय ने मन को साध लिया।
मन को साध लेना और किसी निश्चय से बांध लेना ही रणविजय ने अपने अनुकूल समझा। लिली यदि अपनी कल्पित स्वतंत्राताओं को हासिल करने के लिए कोई फैसला ले रही फिर उन्हें किसलिए हस्तक्षेप करना, उस हस्तक्षेप का मतलब क्या होगा?
और एक दिन लिली कामरेड नामदेव के साथ रूस उड़ गई। अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा ने लिली को एयरपोर्ट तक छोड़ा। रणविजय भी एयरपोर्ट तक गये थे, कार वही चला रहे थे। बगल में अंग्रेज हाकिम बैठा था और पीछे लिली तथा उसकी ममा। अंग्रेज हाकिम रणविजय और लिली दोनों को तजबीज रहा था कि दोनों के अन्तर-संबंधों में कहीं अपनापा नहीं दिख रहा। दोनों जैसे दो ध्रुव हों एक दूसरे से अलग और खुद को नकारते हुए कि दोनों कभी संयुक्त आकांक्षाओं के थे।
अंग्रेज हाकिम ऐसी विषम स्थिति देखकर झुंझला गया आखिर यह क्या हो रहा? तभी एयरपोर्ट पर कामरेड नामदेव पहुंचा। वह एक खूबसूरत और लगभग नई कार से आया था। लिली कामरेड नामदेव को देखते ही उस तरफ आगे बढ़ गई, जिधर नामदेव था। दोनों ने बातें की और फिर दोनों एयरपोर्ट की कानूनी औपचारिकताओं को निपटाने लगे। इसी बीच लिली ने कामरेड नामदेव का परिचय अपने डैड और ममा से भी कराया।
कामरेड नामदेव एक हंसमुख आदमी था उसने निश्क्रिय पड़े रणविजय से बात की और सुझाया कि तुम्हें भी रूस चलना चाहिए था। लिली के साथ तुम्हें भी अनुमति मिल जाती फिर वहां काम भी ढेर सारे थे। चलते तो ठीक रहता खैर कोई बात नहीं तुम जब भी वहां आना चाहोगे आ सकते हो, कोई परेशानी न आएगी।
रणविजय भी विपरीत परिस्थितियों को अनुकूलित करने में कलाकार थे। उन्होंने कामरेड नामदेव को आश्वस्तकिया, जो व्यंग्य था तो सच भी था।
‘आप जब लिली के साथ जा ही रहे हैं फिर मेरा जाना आवश्यक नहीं, लिली दुधमुंही तो नहीं जिसे संभालना पड़ेगा।’
‘नहीं ऐसा नहीं तुम चलते तो ठीक रहता। एक नई दुनिया, नये खिलखिलाते सपने, आज़ादीमें सरोबार एक दूसरे को गुदगुदाते। रूस को देखना, मानवीय मुक्तताओं को देखना होगा। तुम्हारा साथ अच्छा लगता पर जाने क्यों तू नहीं जा रहे चिपके रहना चाहते हो भारत से। यहां क्या है, दलबन्दी जाति और धर्म की जकड़न। मानवीय रिश्तों में पवित्राता तक नहीं।’
हवाई यात्रा की कानूनी औपचारिकताओं के बाद लिली कामरेड नामदेव के साथ रूस के लिए किसी चुनमुन चिरैय्या माफिक उड़ गई और रणविजय उसका उड़ना काफी देर तक देखते रह गये फिर उन्होंने अपनी भावुकता को दबाया।
आखिर वे क्यों बिफरे लिली के इस फैसले पर, जब तक उसे भला जान पड़ा वह साथ थी ही अब दूर जा रही, कोई नया राजमार्ग बना रही तो बनाये, आखिर वह भी तो अपना भविष्य सुरक्षित करना चाह रही होगी। फिर यह कैसी भावुकता है जो एकतरफा और एकांगी है लेकिन एक बात रणविजय को परेशान कर रही थी कि लिली एक कमजोर और भयभीत महिला क्यों बनती जा रही? वह कैसे कमजोर हो गई? वह बचपन से साहसी रही है और अपने पक्ष के प्रति काफी सतर्क लेकिन लगता है कि वह डरी हुई है। काहे का डर? समाज का, संबंधों का, किसका? उसे ईमानदारी से स्वीकारना चाहिए था कि वह कामरेड नामदेव के साथ है। ऐसा न स्वीकार कर वह धोखा और वादाखिलाफी क्यों कर रही?’
नर-नारी संबंधों में रणविजय एक दूसरे की वादाखिलाफी और धोखे को काफी बुरा मानते। बकिया संबंधों पर वे कत्तई विचार न करते और मानते कि सभी को अपनी चाहनाओं के अनुसार बदलते रहने का हक है।
अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा दोनों के लिए लिली का रूस जाना महज एक सामान्य सी घटना थी लेकिन एयरपोर्ट पर जो कुछ उन्होंने देखा उनके लिए काफी चिन्ताजनक था। एयरपोर्ट से लौटकर रणविजय कहीं निकल गये थे। आवास पर केवल अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा ही थे। अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा से जानना चाहा...
‘तुम्हें कैसा लगा? रणविजय और लिली दोनों ने बातें तक नहीं की, कम से कम लिली को तो पहल करना चाहिए था। लगता है दोनों के रिश्तों में दरार आ गई है।’
‘हां मुझे भी ऐसा ही महसूस हुआ। चार पांच महीनों से दोनों खोये खोये से दीख रहे थे। दोनों की चहचहाहटें गायब थीं। दोनों घर कब आते, कब निकल जाते, मालूम न चलता। मैं तो तभी से परेशान परेशान हूं।’
‘हां मैं भी ऐसा ही महसूस रहा था पर क्या किया जाना चाहिए और क्या किया जा सकता था, मेरी समझ में न आया। मैंने तो उसे पति-पत्नी के बीच होने वाली या हो जाने वाली सामान्य सी बातें माना। समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। पर लगता है दोनों विपरीत धाराओं और दिशाओं की तरफ बढ़ चुके हैं। उन्हें पहले की स्थिति तक लौटा लाना शायद अब संभव नहीं होगा।’
‘लिली को धीरज से काम लेना चाहिए था लेकिन यह भी तो हो सकता है कि लिली अपने प्रति सतर्क हो और सिर्फ काम के लिए रूस गई हो।’
‘संभव है कामरेड नामदेव से उसकी सिर्फ मित्राता ही हो लेकिन...’कृ
अंग्रेज हाकिम रुक गया आगे नहीं कह पाया कुछ। मित्राता तो मन मिलने पर ही होती है और जब मन मिल जाता है फिर तो तन अछूत नहीं रह सकता। बहुत मुश्किल होगा मन के मिलान के बावजूद भी तन को तनेन रखना। अंग्रेज हाकिम अपने भीतर उतर गया और खुद को आश्वस्त किया आखिर वह क्या कर सकता है। लिली और रणविजय को केवल समझा ही तो सकता है, समझना और सतर्क रहना तो उन दोनों का ही काम है। उसने दोनों को समझाया भी था। पर समझे हुओं को समझाना लगभग असंभव होता है।
अंग्रेज हाकिम हालांकि पति-पत्नी के बीच होने वाले इंकार और स्वीकार को निहायत व्यक्तिगत प्रवृत्ति मानता था पर कहीं न कहीं यह भी मानता था कि हर रिश्ते की पवित्राता ही उसका गुण होती है और ईमानदारी उसे गति प्रदान करती है। अंग्रेज हाकिम ने महसूस किया कि लिली और रणविजय ने एक दूसरे को सतर्कता से नहीं समझा। यदि समझा होता तो दोनों को चिन्ता होनी चाहिए थी कि चित्त साफ रखना है और अपने पक्ष को साफ-साफ बता देना है, लेकिन ऐसा न हो पाया दोनों अपनी-अपनी गुफा से बाहर निकल कर झांक भी न सके जो बहुत बड़े फांक का कारण बन गया।
रणविजय मुजफ्फर की हवेली पर देर रात तक आये। उन्होंने देखा कि लिली के डैड और ममा दोनों उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। अंग्रेज हाकिम ने पूछा भी...
‘कहां देर कर दी?’
‘हां डैड देर हो गई, थोड़ा काम था, शहर में रुक गया था। आप लोग अभी सोये नहीं। मैं तो आ ही जाता।’
रणविजय अंग्रेज हाकिम को बताकर सीधे अपने कमरे की ओर चले गये। कमरा खामोश था उसकी खामोशी हर तरफ डराती हुई पसरी थी। कमरे में भूत था, वर्तमान का कहीं अता-पता नहीं, भविष्य तो मुर्दा पड़ा था। रणविजय के सामने महज आज का नहीं कल का सवाल खड़ा था। स्मृति के सहारे समय को गुजारना कठिन होगा। रणविजय ने किसी तरह पहना हुआ उतारा और सामान्य कपड़ों में हो गये फिर ममा और डैड की तरफ वापस आये।
लिली की ममा तब किचन में थीं और रणविजय के लिए खाना गर्म कर रही थीं। रणविजय ने ममा को रोका...
‘ममा यह क्या कर रही हैं, खाना मैं गरम कर लेता, आपको आराम करना चाहिए कहते हुए रणविजय ने ममा का हाथ पकड़ लिया।’
‘नहीं ममा नहीं, मैं खाना निकाल लेता हूं और रणविजय ने खाना निकाला। जब तक रणविजय खाना खाते रहे तब तक लिली की ममा रणविजय के साथ बनी रही।
रणविजय अपने कमरे में जा कर पसर गये। नींद में डूबना चाहे पर वहां नींद न थी। नींद तो लिली के साथ हवाई जहाज से उड़ गई थी। रणविजय को जीवन जीने की दूसरी धारा का अनुभव करना था तदनुसार खुद को ढालना था। लेकिन यह आसान न था। वे सोच भी नहीं सकते थे कि लिली किसी दिन उनके लिए अन्धकारों से भरी दुनिया छोड़ कर अपने लिए किसी सुरक्षित तथा मनमाफिक उजालों की तरफ बढ़ जाएगी। वे सोच भी नहीं सकते कि जब लिली नहीं फिर दूसरी कोई। कौन होगी वो? होगी भी तो क्या गारंटी कि लिली न बन जाएगी और कल्पित मुक्तता की यात्रा पर न चल देगी।
रात जो गुजरने के लिए आई थी गुजर गई। सुबह ने रणविजय की अधढपी आंखें खोला फिर वे डैड और ममा के कमरे की तरफ चले गये। अंग्रेज हाकिम व्यायाम से खाली हो चुका था तथा भारतीय अनुभवों पर लिखी किताब का प्रूफ देख रहा था।
‘डैड प्रूफ आ गया क्या? पूछा रणविजय ने,’
‘हां कई दिन हो गये, लिली को तो मालूम था।’
‘प्रूफ में कुछ बदला तो नहीं।’
‘नहीं, मुझे ही कुछ बदलना है अंग्रेज हाकिम ने रणविजय को बताया और सोचने लगा क्या उसे अपने पारिवारिक मुद्दों को भी किताब में उठाना चाहिए? लिली और रणविजय, मैं और लिली की ममा। अलग अलग से पसरे हुए संबंध, ठंडा और गरम, उदार व क्रूर, सहनशील और हमलावर। अंग्रेज हाकिम ने अचरज भरी दृष्टि से रणविजय को देखा और पूछा...
‘तुम ठीक हो रणविजय! मैं समझता हूं कि तुम व्यवस्थित रहने की रीति जानते हो और किसी भी कुरीति से खुद को बचा सकते हो।’
रणविजय अंग्रेज हाकिम को क्या बताते? कि वे व्यवस्थित हैं, जैसा सोचा नहीं था वैसा हुआ।
भइयाराजा की बात नहीं माना, उन्हें नाराज किया और लिली ने भी मुझे अकेला छोड़ दिया। रणविजय अन्तर्मन से निकले ....‘हां डैड, मैं ठीक हूं, व्यवस्थित ही नहीं, समय में और समय के साथ उपस्थित हूं लेकिन चिन्तित भी, कहीं लिली किसी जाल में न उलझ जाये। उसका साथ समय दे न दे और वह समय के साथ चल पाये न चल पाये, आवश्यक सतर्कता में कमी रह जाय, कुछ कहा नहीं जा सकता। नामदेव बहुरूपिया और बहेलिया भी तो है।’
तुम ठीक हो न
लिली के रूस उड़ जाने के बाद रणविजय की चर्या में काफी बदलाव आ गया था। वे देर रात तक घर आने लगे तथा महसूसते थे कि उन्हें अपने लिए कोई ठिकाना बना लेना चाहिए अब लिली भी नहीं फिर उसके घर में क्या रहना। रणविजय के लिए ये उथल-पुथल वाले दिन थे। वे चांद देखते, उन्हें लगता कि वहां दाग है और अन्धेरा उसे लील रहा है। सुबह की नरम-नरम किरणें भी उन्हें तपाने लगतीं कोई न कोई उलाहना देतीं। क्या कर रहे हो आखिर? कब तक परजीवी बने रहोगे। एक बार तो उन्हें लगा कि वे अपनी इस्टेट की तरफ लौट जायें और भइयाराजा से सारा हिसाब किताब कर लें पर उन्होंने खुद को रोका, नहीं! इस्टेट की तरफ अब नहीं लौटना।
एक दिन रणविजय रूसी दूतावास पर थे, अनुवाद किये गये कुछ कामों के पारिश्रमिक का हिसाब-किताब करना था वहीं एक दूसरा कामरेड मिला। उसने रणविजय को अपने बारे में तथा अपने द्वारा चलाये जा रहे अभियान के बारे में बताया।
जब तक ‘किसान क्रान्ति’ नहीं होगी तब तक सामाजिक व्यवस्था में बदलाव न आ पाएगा। ऐसी क्रांति का आरंभ बंगाल में किया जा चुका है। देश के नामी-गिरमी अधिकांश बुद्धिजीवी अपना व्यक्तित्वांतरण करके उस क्रान्ति में शामिल हो रहे हैं। आप भी चलिए एक नई दुनिया जो सार्थक प्रयासों तथा वैचारिक प्रतिबद्धताओं से संभव है, आपकी भागीदारी उसमें आवश्यक है।
रणविजय ने उस नये कामरेड से साफ इनकार कर दिया था...कृकृ
‘नहीं मैं ऐसी किसी कार्य-योजना का सहभागी नहीं हो सकता जिसमें बन्दूकें समाज का राजनीतिक व सामाजिक इतिहास लिखती हों और समाज के लिए बारूद की गन्ध पीना अनिवार्य कर दिया जाये।’
रणविजय आने वाले समय से सन्तुलन स्थापित करने के प्रयास में थे कि रोजी-रोटी का अपना अलग इन्तजाम होना चाहिए। अब अंग्रेज हाकिम के सहारे रहना ठीक नहीं। इस बाबत उन्हें अपने जिले के सांसद का ख्याल आया जिससे उनकी अच्छी जान पहचान थी। सांसद ने रणविजय को आश्वस्त भी किया कि वह अपने स्तर से प्रयास करेगा।
सांसद का प्रयास सार्थक हुआ और रणविजय को दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कालेज में प्रध्यापकीय मिल गई। वेतन भी ठीक ठाक था। उन्हें वहां इतिहास का प्राध्यापक बनाया गया वह भी खासतौर से आधुनिक इतिहास का। उन्हें स्नातक और परास्नातक स्तर के छात्रों को पढ़ाना था।
रणविजय के लिए नौकरी मिलना काफी सुखद था। सुखद इसलिए कि वे एकान्त से बाहर निकल गये नहीं तो खाली बैठे दिन रात सोचते रहना, क्या करना है और क्या नहीं करना है? कभी कुछ सोचते गुनते तो कभी कुछ और निश्चित न कर पाते कि करना क्या है?
अंग्रेज हाकिम को जब मालूम हुआ कि रणविजय को स्थायी जैसी नौकरी मिल गई है तो वह भी खुश हुआ। उसने बातचीत के दौरान कहा भी...कृकृ
‘रणविजय तुमने अच्छा किया जो अघ्यापन पकड़ लिया। लिली भी कहीं न कहीं यहां ही अच्छा काम पा जाती। अभी तो आज़ादी की हवा है। साहित्य, संस्कृति, कला, विज्ञान तमाम क्षेत्रों में इस देश को अपना सांचा अलग ढंग से बनाना है जिसके लिए काम के अवसरों में काफी बढ़ोत्तरी की आवश्यकता होगी। कहीं भी काम मिल सकता था।’
अंग्रेज हाकिम अनुभवों से पका हुआ आदमी था फिर उसने बहुत नजदीक से विकसित और कथित रूप से सभ्य कहे जाने वाले लोकतांत्रिक, तानाशाही या साम्यवादी परंपराओं वाले देशों के राजनीतिक प्रबंधन को देखा था। उसे पता था कि सत्ता-प्रबन्धन से जुड़े तमाम नामी-गिरामी लोग कैसे-कैसे यांत्रिक होते चले जाते हैं। उसने पाया था कि दौरान कलक्टरी वही खुद कितना बदल गया था। आज़ादीके पहले की वह घटना उसे आज भी अच्छी तरह से याद है जब वह सगुण मानवीयता छोड़ कर अंग्रेजी सरकार के आदेशों के अनुपालन में किसी मशीन माफिक बदल गया था। वह तब किसी जिले का कलक्टर था। अंग्रेजों भारत छोड़ो का दौर था। पूरे देश में कांग्रेस के सत्याग्रही धरना-प्रदर्शन और सत्याग्रह कर रहे थे। इसी दौरान खबर आई कि गान्धी जी भी धरना, प्रदर्शन में हिस्सा ले सकते हैं, किसी तरह से कांग्रेस के प्रदर्शन को रोकना है और अवरोध पैदा करना है लेकिन ऐसा भी न जान पड़े कि अंग्रेजी सरकार बाधा पहुंचा रही।
कांग्रेस के धरना-प्रदर्शन को रोकना मुश्किल काम था। जनता जो राजनीति का क ख ग भी नहीं जानती थी वह भी बिना हिसाब लगाये कि होगा क्या, स्वस्फूर्त ढंग से कांग्रेसी स्वयंसेवकों के साथ थी। अंग्रेज हाकिम संकट में था। वह ऐसा क्या करे जिससे सत्याग्रह और धरना का काम बाधित हो जाये और सरकार पर दाग भी न लगे।
बहरहाल अंग्रेज हाकिम प्रदर्शन और धरना तो न रोक पाया लेकिन वह स्थान अवश्य बदलवा दिया जहां प्रदर्शन किया जाना था। वैसे उसे सरकारी निर्देश था कि वह चाहे तो कांग्रेस के विरोधी मुस्लिम लीग के नेताओं की सेवायें हासिल कर सकता है और कहीं भी किसी तरह से दंगे के विकल्प को भी चुन सकता है। पर अंग्रेज हाकिम जानता था कि मेट्रोपोलेटिन शहरों जैसा बनते इस शहर में स्पष्ट रूप से आज़ादीके सवाल पर मुस्लिम लीग वालों और कांग्रेसियों में किसी भी तरह की व्यवहारिक भिन्नता नहीं है, भले ही राजनीतिक भिन्नतायें हैं। सो अंग्रेज हाकिम के लिए ‘अंग्रेजों द्वारा दंगा कराने जाने वाले सधे हुए फार्मूल’े को आजमाना कठिन था।
अंग्रेज हाकिम उन दिनों अंग्रेजी राज-व्यवस्था पर आंख मूंद कर चलने वाला अधिकारी था, उसके लिए यह समझना अनावश्यक था कि वह एक प्रशासनिक अधिकारी के अलावा भी कुछ ह ैजिसका अपना विवेक है, चित्त है और चिन्तन है। उसे उस समय जान पड़ता कि सरकार सरकार होती है, उसका आदेश सभी प्रशासनिक अधिकारियों कोे अनिवार्य रूप से पालन करना चाहिए।
अंग्रेज हाकिम ने इस संबंध में एक काम किया। जिस रेल से गांधी जी यात्रा कर रहे थे, उस रेल को ही कहीं दूर दराज के इलाके में रोकवा दिया और उतनी देर तक रोकवा दिया जितनी देर तक प्रदर्शन का चलते रहना असंभव हो जाये।
अंग्रेज हाकिम अब महसूसता है कि वह नौकरी के समय कितना यांत्रिक हो गया था। अपनी तरह वह सत्ता-प्रबन्धन से जुड़े हर व्यक्तियों के बारे में सोचता कि सभी को यांत्रिकता का शिकार बनना ही पड़ता है। सरकार के नेटवर्क में किसी मछली की तरह फंस कर सरकारी आदेशों का क्रियान्वयन ही उसका धर्म और कर्म हो जाता है।
अंग्रेज हाकिम ने लिली के बारे में सोचा, उसे रूस नहीं जाना चाहिए था वहां उसे क्या मिलेगा? सत्ता-प्रभुओं की यांत्रिकता, दंड- विधान की जघन्य क्रूरतायें, स्वतंत्राता, समानता और मानवाधिकार के नाम पर निष्ठुर वर्ग विभाजन और कल्पित वर्ग-समूहों का निर्माण।
अंग्रेज हाकिम को आज भी याद है वह दिन, जब उसने मन से स्वीकारा था कि भारतीयों को एक न एक दिन आज़ादीमिल कर रहेगी और अंग्रेजी शासन को यहां से उजडना ही होगा। गान्धी जी जब उसके शहर में आये तब उसे मालूम हुआ कि वे उससे मिलेंगे। अंग्रेज हाकिम अचरज में यह क्या सुन रहा? क्या गांधी जी उसके कैम्प कार्यालय पर आ रहे, सूचना देने वाले से उसने कई बार पूछा क्या तुम्हारी सूचना सच है। फिर तो अंग्रेज हाकिम कैम्प कार्यालय छोड़ कर गांधी जी के पास चला गया जहां गांधी जी रुके हुए थे।
कुछ देर में वह बापू के सामने था...
बापू ने अंग्रेज हाकिम को धन्यवाद दिया,
आपकी उदार कृपाऔर सहयोग से कल का धरना, प्रदर्शन और सत्याग्रह सफल हो सका। मुझे तो लगता है कि आप पहले नेक इन्सान हैं बाद में हाकिम। एक ऐसा हाकिम जो सरकार की संप्रभुता बचाये तो व्यक्ति की संप्रभुता भी सुरक्षित रखने का प्रयास करे।
अंग्रेज हाकिम तो कठ्ठ, बापू क्या कह रहे, उसने ऐसा कुछ नहीं किया अलबत्ता उसने रेल में ही बापू को रुकवा दिया। उन्हें यहां आने नहीं दिया। फिर भी बापू प्रतिक्रिया से बाहर।
अंग्रेज हाकिम पहली बार गांधी जी के सामने हुआ था तथा पहली बार ‘व्यक्ति की संप्रभुता’ के महत्व को सुन रहा था। उसे तो पढ़ाई-लिखाई से लेकर नौकरी मिलने तक यही सिखाया गया था कि राष्ट्र ही संप्रभुता सम्पन्न होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो गुलाम या दास होते हैं। अंग्रेज हाकिम के लिए व्यक्ति की संप्रभुता का मुद्दा सोच के स्तर पर बहुत बड़ा था आखिर उसने अब तक इस पर विचारा क्यों नहीं कि व्यक्ति की भी संप्रभुता होती है।
उसने मन ही मन गांधी जी की प्रणाम किया फिर वहां से चला आया। अंग्रेज हाकिम लम्बे समय तक गांधी जी की आभा में डूबा रहा। आभा और प्रतिभा का अद्भुत सम्मिलन। एक बैरिस्टर और अद्वितीय सादगी न सिर्फ रहन-सहन में विचारों में भी। वैचारिक सादगी तो ऐसी, पश्चिमी संस्कृति को ठेंगा दिखाती और सभ्य लोगों का कार्य-भार जैसे मुहावरे को किसी बड़े झूठ में तब्दील करती।
लिली के रूस चले जाने के बाद अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा को सूना-सूना सा लगने लगा था। वैसे रणविजय अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा का आवश्यकता से अधिक ध्यान रखते तथा किसी बात की कमी न रह जाय, लिली का पास में न होना प्रभावकारी न हो जाय, रणविजय काफी सर्तकता बरतते।
रणविजय अब अपना समय कहीं बाहर न बिताते। कालेज की जिम्मेवारियों से खाली होकर सीधे हवली चले आते और घरेलू कामों की देख-रेख करते फिर किताबों की दुनिया में खो जाते। साहित्य और इतिहास की किताबें उन्हें अक्सर डुबों देतीं फिर वे सोचने लगते कि इन किताबों में लेखक का कोना किधर है और पाठक का किधर। साथ ही साथ उन्हें कभी-कभी किताबों के पाठ भी हैरान करते दरअसल किताबों ने सामाजिक बदलाव के बाबत किया क्या है? खासतौर से रणविजय तब अधिक परेशान हो जाते और अपना माथा पीटने लगते जब वे भारतीय पुरखों की कहानियां इतिहास में पढने लगते जो सीधे तौर पर राजा, महाराजा, नवाबों और सम्राटों के अय्याशगाहों से निकली होतीं।
लम्बे समय की भारतीय गुलामी के पीछे के कारणों की खोज करते समय रणविजय को जान पड़ता कि इतिहास की अंग्रेजी किताबों में ही नहीं देशी किताबों में भी पक्षपात पूर्ण झूठों का सहारा लिया गया है और भारतीय जनता को इतिहास के हासिए पर भी जगह नहीं दी गई है। कालेज में पढ़ाई जाने वाली किताबों की सूची देख कर रणविजय को लगा कि इतिहास के विद्वानों को नये तरह से शोध करने की आवश्यकता है और उस जांच-पड़ताल को जनता और सरकार के अन्तर्संबंधो पर आधारित होना चाहिए। इसके बावजूद उन्हें अपनी असमर्थता की भी समझ थी कि कालेजों में पढ़ाई जाने वाली किताबों की चयन प्रक्रिया की अंग्रेजी परंपरा को वे तोड़ नहीं सकते। उन्हें वैसा ही करना है जैसी पढ़ाई-लिखाई की परंपरा है, इससे अधिक कुछ नहीं। वैसे कालेज की प्राध्यापकीय ने रणविजय को तनहा सोचों से अलग कर दिया था और वे भी उसी में अपनी इच्छाओं की पूर्ति का समायोजन भी करने लगे थे फिर भी जब कालेज से बाहर होते तो तन्हाई में घिर जाते और काल्पनिक रूप से लिली के अगल-बगल मंडराने लगते पर लिली तो उनसे काफी दूर थी अपनी कल्पित दुनिया में, अपनी आकांक्षाओं को सहलाती दुलारती तथा महात्वाकांक्षाओं का पदयात्राी बनती। रणविजय के लिए महात्वाकांक्षाओं की पदयात्रा का कोई मतलब न था वे सामान्य थे तथा अपनी प्रतिभा को सामाजिक बदलाव की दिशा में खपाना चाहते थे।
पांच छह महीने गुजर गये, लिली ने एक चिठ्ठी भी नहीं भेजा, किसी भी उपलब्ध तरीके से संपर्क भी नहीं साधा। इसी दौरान रणविजय को सूचना मिली कि रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड भारत आया है वह एक दिन रूसी दूतावास में भी देखा गया था। कालेज के कार्यावधि के बाद रणविजय ने सोचा कि रूसी दूतावास जाकर रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड के बारे में मालूम किया जाय कि वह कहां है? गांव की तरफ गया है या पश्चिम बंगाल की तरफ जहां तेजी से वामपंथी किसान आन्दोलन फैल रहा है। लोग चारू मजूमदार के नेतृत्व में सक्रिय होने लगे हैं संभव यह भी है कि वह दिल्ली में ही हो।
रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड कुछ मायनों में तानाशाह जैसा था, वह अपने ऊपर दूसरों के कार्यक्रमों विचारों, वसूलों और सिद्धान्तों को लादता नहीं था फिर भी संभावना थी कि वह पश्चिम बंगाल की तरफ निकल गया हो। संभावना इसलिए कि वह परिस्थितियों से लाभ लेने के किसी भी अवसर को छोड़ता नहीं था। उसके लिए पश्चिम बंगाल की क्रान्तिकारी बदलाव की सारी कोशिशें अनुकूल थीं। वहां जाकर कामरेडों के साथ होकर वह अपने व्यक्तित्व को निखार सकता था तथा उनको किसी नयी सोच की ताजी हवा में नहलवा सकता था। दिल्ली में रहते हुए अक्सर उसने ऐसा ही किया था। मंच दूसरे का, कार्यक्रम दूसरे का, समर्थक दूसरे के फिर भी उसने अपनी ही बौद्धिकता का लोहा मनवाया सभी जगह एकबारगी अधिकांश श्रोताओं, वक्ताओं के बयान होते... ‘कुछ विशेष तो है रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड में’ फिर तो रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड सभा का नायक बन जाता।
रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड से मिलने की इच्छा रणविजय के लिए लिली के कारण थी, नहीं तो उससे मिलने के बारे में सोचते तक नहीं। लिली क्या कर रही? कब तक भारत वापस आ रही। पांच-छह महीने के अन्तराल ने उसे परिवर्तित किया कि नहीं या पूरी तरह से भूल गई और सारे रिश्ते नातों को तोड़ लिया? कुछ न कुछ रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड से अवश्य मालूम हो जाएगा।
रूसी दूतावास पर रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड रूस से लौटने के बाद गया था। वहां से रणविजय को सूचना मिली की कामरेड को इलाहाबाद जाना था। जहां उसके ऊपर आश्रित दो साहित्यिक आयोजन थे, पहला था एक सेमिनार, जो नई कहानियों के बाबत था कि नई कहानियां अपना जो रूप गढ़ रही है और उर्जायुक्त दैहिक कलाओं की मुक्तता के लिए कथानक रच रही हैं, क्या उनसे समाज की हसियां बचाई जा सकती हैं? तथा दूसरा था एक किताब का विमोचन जो आधुनिक आलोचना और कविता के सौन्दर्य शास्त्र की विवेचना पर केन्द्रित थी। रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड इलाहाबाद से फिर कहां जाएगा, रूसी दूतावास के अहलकारानों को मालूम न था। रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड के बाबत यह खबर रणविजय के लिए ठीक थी क्योंकि उसका आमंत्राण उन्हें भी मिला था। रणविजय तो पहले से ही कार्यक्रम बनाये हुए थे कि इलाहाबाद जाना है, वैसे भी वे अपने मित्रों के आग्रहों को ठुकराना व्यावहारिकता का अपराध मानने वालों में से थे।
रणविजय का एक कथाकार मित्रा था जो इलाहाबाद रहता था। वह पढ़ाकू और रटन्तू भी खूब था। हाईस्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक की परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी हासिल किया, फिर उसने पीएच.डी. भी किया था। पढ़ाई के बाद उसे जाने क्या सूझा कि बिना भविष्य की हलचलों और हरकतों को समझे वह डा. राममनोहर लोहिया का अनुयायी हो गया। कहीं अंग्रेजों की प्रतिमायें तोडने लगा तो कहीं दाम बांधो, जाति तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ जैसे आन्दोलनों का नेतृत्व करने लगा। कई बार उसे इस बाबत जेल भी जाना पड़ा। जेल की कालकोठरी और खेल के मैदान में वह कभी फर्क नहीं करता था और हमेशा किसी सुभाषित की तरह बोलता था। नई दुनिया संभव है यदि लोग ‘जेल, फावड़ा और वोट’ की संयुक्तता तथा व्यक्ति होने के नाते अपनी संप्रभुता को समझ लें फिर तो कुछ हजार लोग जो भारत के भूगोल, संस्कृति, साहित्य और राजनीति का व्याकरण लिख रहे हैं किसी खाई में गिरकर अपना चेहरा छिपाने की कोशिश के अलावा किसी दूसरे विकल्प की तरफ जा ही नहीं सकते।
रणविजय का कथाकार मित्रा थोड़ा प्रयास करता और कुछ चुनिन्दा लोगों से संपर्क साधता जो कालेजों व विश्वविद्यालयों में न केवल नियुक्तियों के बाबत वरन् पाठ्यक्रमों के बारे में भी प्रभावकारी दखल रखा करते थे तथा मठ बना लिए थे, तो उसे भी किसी कालेज या विश्वविद्यालय में काम करने का अवसर मिल ही जाता। पर उसने वैसा कुछ नहीं किया जो किया वह उसके लिए आत्महन्ता प्रयास ही साबित हुए और आज किसी तरह अपने परिवार का बोझ उठा रहा है। किसी तरह उपलब्धियों के नाम पर उसकी एक दो किताबें कथा साहित्य की प्रकाशित हो चुकी हैं इससे अधिक कुछ भी नहीं। रणविजय अपने वैभव के दिनों में कथाकार मित्रा की आर्थिक सहायता भी किया करते थे तथा प्रोत्साहित भी, साहित्य से बाहर नहीं निकलना, तुम्हारे लेखनी की आज के समय में बहुत आवश्यकता है।
रणविजय को तो इलाहाबाद जाना ही था। संयोग अच्छा था। रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड लिली के बारे में कुछ न कुछ सूचना अवश्य देगा। संभव है वह सूचना का चरित्रा भी बदल दे और उसमें कुछ जोड़ घटा दे फिर भी कुछ न कुछ आशय तो स्पष्ट हो ही जाएगा। रणविजय इलाहाबाद ठीक उसी दिन आये जिस दिन सेमिनार था। रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड इलाहाबाद एक दिन पहले ही आ गया था। सेमिनार के बाद रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड से रणविजय मिले हालांकि वह उन लोगों से घिरा था जो साहित्यिक कर्म के आधार पर चांद, सूरज बनने की आकांक्षा रखते थे और मनोहारी ढंग से प्रकाशित होना चाहते थे।
रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड रणविजय को देखते ही उछल पड़ा... ष्
अरे! तुम भी आये हो, कब आये? तुमने कालेज ज्वाइन किया कि नहीं, मुझसे पूछा गया था, मैंने तुम्हारा नाम प्रस्तावित किया था और कहा था यदि वह नौकरी करना चाहता है तो ठीक है। रणविजय एक समझदार और जिम्मेवार आदमी है।’
थोड़ा रुक कर रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड ने बताया...वहां लिली ठीक है, अच्छा काम कर रही है। रूसियों से घुलमिल गई है, कह रही थी रणविजय भी रूस आता तब ठीक था।
बात में हस्तक्षेप करते हुए रणविजय ने पूछा...
‘कोई संदेश वगैरह भेजा है कि नहीं, डैड और ममा दोनों पूछ रहे थे।’
नहीं सन्देश तो नहीं भेजा, यहां सब ठीक है नऽ, पूछा रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड ने।
‘हां ठीक तो है, जितना ठीक हो सकता है। डैड पूछ रहे थे लिली पत्रों का जबाब क्यों नहीं दे रही, रणविजय ने दुबारा सवाल किया
‘कोई बात होती तब तो पत्रा लिखती फिर उसके पास खाली समय कहां इस तरह की भावुकताओं में डूबने उतराने का आदी रूसी मिजाज का भारतीय कामरेड कहते हुए थोड़ा मुस्कुराया और रणविजय की पीठ थप-थपा कर पूछा....
‘तुम ठीक हो नऽ’
पंचाइत
रामदयाल की जमीनदारी में एक गांव था सोनताली। सोनताली में बसने वाले अनुसूचित आदिवासी थे। एक दिन पूरा गांव महुआ के पेड़ के नीचे इकठ्ठा होकर अजीब तरह का तमाशा देख रहा था। तमाशा देखने वालों में केवल वे लोग ही नहीं थे, जिन्हें रामदयाल ने अपनी जमीनदारी की जमीन बांट दिया था और उस पर लोग अपनी खेती भी कर चुके थे, वे लोग भी थे जो पहले से ही जमीन के जोतक थे। पूरा गांव उन बातों को सुन रहा था, जिन्हें इससे पहले कभी नहीं सुना गया था।
गांव का आदिवासी मुखिया पेड़ के नीचे बैठा हुआ था और उसके पास ही रामदयाल भी बैठे थे, रामदयाल के अगल-बगल नौजवान लडके खड़े थे। देखने में जान पड़ता था कि मामला काफी गंभीर है पर मालूम न हो पा रहा था कि मामला क्या है? दरअसल वहां केवल कानाफूसियां थीं और कानाफूसियां से कोई बात भला कैसे स्पष्ट होती।
रामप्यारे वहां कुछ देर में आया। पहले वह रामदयाल को तलाश रहा था क्योंकि भइयाराजा ने जमीनदारी विनाश की कार्यवाही से स्थगन मिल जाने के बाद जमीनदारी वाले गॉवों के जोतदारों को बेदखल करना शुरू कर दिया था। रामप्यारे इस नये संकट से घबराया हुआ था। रामदयाल से बात-चीत कर अगली रणनीति पर विचार करना था। सोनताली आने से पहले रामप्यारे, रामदयाल के गांव गया था जहां उसे मालूम हुआ कि वे सोनाताली गए हुए हैं। सोनताली आने पर उसे मालूम हुआ कि सारा गांव ‘बघउत बाबा’ के महुआ वाले चबूतरे पर इकठ्ठा है। रामप्यारे को अचरज जैसा लगा असल में हुआ क्या! सारे गांव के इकठ्ठा होने का मतलब कोई अनहोनी, पुलिस आई है क्या? फिर किसी के यहां साखू की लकड़ी पकडी गई या महुआ की दारू। छापा पड़ा होगा पुलिस का। पर छापा जैसे संकेत रामप्यारे को देखने में नहीं आए। रामप्यारे गांव के बड़का ताल से जो पहले रामदयाल का था उसके बगल से गांव में दाखिल हुआ और ‘डिहवार बाबा’ के चबूतरे के पास से गांव में घुसा। गांव में उसे सन्नाटा जान पड़ा ऐसा सन्नाटा जिसकी उसे कल्पना तक न थी। दो-चार बच्चे गुल्ली-डंडा खेलते भी दिखे पर वे क्या बताते सो उनसे पूछना बेकार था। गांव की परिक्रमा करते हुए रामप्यारे बघउत बाबा के चबूतरे के पास पहुंचा।
वहां पंचाइत शुरू हो गई थी। गांव के नौजवान लडके चिल्ला रहे थे और एक तीस-बत्तीस साल की विवाहित महिला खड़ी होकर सुबकते हुए बता रही थी कि कैसे रामदयाल ने उसके साथ बलात्कार किया।कृनौजवान लड़के उस महिला का समर्थन करते हुए गवाही दे रहे थे कि ऐन वक्त पर उन्होंने रामदयाल को पकड़ा।
रामदयाल तो सकपकाये हुए थे दरअसल उन्हें अन्दाजा न था कि ऐसा भी हो सकता है। उन्होंने अपनी गर्दन झुका लिया था और नाखून से धरती खुरच रहे थे। वे धरती का मंत्रा पढ़ रहे थे और इस अद्भुत और फर्जी आरोप से बचने का उपाय सोच रहे थे। जवानी से लेकर अब तक उन्होंने जिस जीवन की यात्रा की थी, उसे सहनशीलता और संवेदनाओं से सहलाया था और मुठ्ठियों को कभी भी हवा में न लहराया था। आखिर हो क्या रहा है? कोई है जो उन्हें बदनाम करना चाहता है, कौन हो सकता है वह? उनके पास तीसरी आंख नहीं, सिर्फ दो ही थीं, तीसरी होती तो शायद वे देख लेते कि कौन षडयंत्रा कर रहा?
रामप्यारे भी हतप्रभ था, वह अनहोनी देख रहा था। रामदयाल जी ऐसा नहीं कर सकते। वह सीधे चबूतरे पर चढ़ा और नौजवान लडकों में से एक को पकड़ लिया और पूछा...
‘बोलो सच क्या है?’
‘लड़के ने दुहरा दिया कि रामदयाल ने बलात्कार किया है।’
रामप्यारे ने फिर महिला से पूछा उसने भी वही बताया।कृ
रामप्यारे फिर अवश था। आदिवासियों की पंचाइत में अब आगे वह कुछ नहीं कर सकता था सिवाय इसके कि रामदयाल को मारा-पीटा न जाये। वास्तव में उसने रामदयाल को मार-पीट से बचा लिया पर महिला का जूठन खाने से रामदयाल को न बचा सका। ‘बघउत बाबा’ के चबूतरे पर ही थाली में भात लाया गया और उसे महिला ने खाया फिर उस जूठन को रामदयाल को खिलाया गया।
नौजवान लडकों ने तो सोचा था कि रामदयाल जूठन खाने से इनकार करेंगे फिर उन्हें मार-पीट कर खिलाया जाएगा पर वहां तो दृश्य ही बदल गया।कृ
हुआ यह कि महिला ने थाली में से दो तीन कौर भात खाया और एक कौर का भात थोड़ा सा गिरा भी दिया। महिला ने यह काम कुछ ऐसे किया जैसे वह अभिनय को यथार्थ में बदलने की कलाकार हो। वह थाली रामदयाल की तरफ बढ़ा दी गई जिसे रामदयाल ने बिना ना-नूकुर के खाया।
रामप्यारे सारे दृश्य का अवाक दर्शक था पर उसका दिमाग अवाक नहीं था। महिला के घर के अगल-बगल वालों में एक आदमी था जो काफी गंभीर था, उसके चेहरे पर उदासी पसरी थी, लगता था ऐसा क्रूर दृश्य देख कर रो देगा। उसी की तरह और लोग थे जिनके चेहरे उतरे हुए थे और वे रामदयाल को जवानी से लेकर अब तक देख रहे थे कि रामदयाल लंगोट के कच्चे नहीं और न ही वादाखिलाफ। यदि रामदयाल लंगोट के कच्चे होते तो यह सारा कुछ उनका सीरवाह ही कर देता जो उनकी जमीन की निगरानी करता है और सीर वाली बखरी पर रहता है। उसके लिए औरतों को बिस्तरों पर भेजना मुश्किल नहीं।
गांव की औरतें भी रामदयाल को साफ-पाक समझ रही थीं। वे मन ही मन उस महिला पर ही आरोप लगा रही थीं कि वह रामदयाल के सीरवाह से फंसी है। पंचाइत में से एक बुजुर्ग किस्म की महिला बाहर निकली और उसने रामप्यारे को बताया कि यह सब रामदयाल के सीरवाह के कारण हो रहा है। रामदयाल ने सोनताली की सारी जमीन आवंटित कर दिया फिर यहां सीरवाह क्या करेगा? उन औरतों ने रामप्यारे से कहा...
‘रामप्यारे बेटा! सीरवाह को पकड़ो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। यह कलमुंही तो बेहया है उसके कहने पर कुछो कह सकती है और कुछो कर सकती है।’
बुजुर्ग महिला के बाद दो तीन मर्दों ने भी रामप्यारे को बताया कि यह अनरथ हो रहा है रामप्यारे भाई! एक देवता जैसे आदमी के साथ ऐसा व्यवहार जिसने आज तक किसी को लहजबान तक नहीं कहा, मार-पीट और घर-घुसनी वह क्या करेगा?
रामदयाल को बलात्कार का दंड दिया जा चुका था। रामप्यारे को गांव के दूसरों ने भी बताया कि यह गलत हो रहा। रामप्यारे, रामदयाल को देखने में लगातार था कि रामदयाल जो एक जमीनदार ही नहीं बहादुर आदमी हैं तथा दो तीन से ताकतवर भी फिर वे इस घृणित पंचाइत के आदेश का अनुपालन क्यों कर रहे?
रामदयाल थे कि वे अपना चेहरा समय की अथाह गहराई में डुबो चुके थे। उनकी देह केवल वहां पड़ी थी और आत्मा कहीं उलझी परिस्थितियों में हुई, कराहती हांफती। वे कभी समय को तौलते तो कभी अपने लगाव को कि वे गरीबों से कितने वजन का जुड़ाव रखते हैं। इसी तरह वे अपना पूरा जीवन भी तौल रहे थे। इस तौल के लिए उनके पास सिर्फ दो हांथ थे जिसे उन्होंने सामाजिक बदलाव की हथकडियों से बांध लिया था, उसे खोलना नहीं था। उनके पास जीवन तौलने के औजारों में केवल गांधी थे जो उनकी आंखों में बराबर घूमते रहते थे। वहां अहिंसा थी तथा जनता के प्रति समर्पण के सुभाषित, ये मूर्ख है नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं?
रामदयाल के सामने पंचाइत का पूरा घटनाक्रम किसी अनहोनी की तरह था जो अनायास घटित हो रहा था, इसके विपरीत उन्हें अपना हाथ नहीं उठाना। पर रामदयाल इससे अलग भी थे।
क्या सोनताली के लोग ऐसा कर सकते हैं? बिटिया सरीखी यह औरत ऐसा क्यों कर रही? कहीं भइयाराजा, उनका साला, कुछ षडयंत्रा तो नहीं रच रहे। रामदयाल की चरित्रा हत्या फिर वह खुद ही आत्महत्या कर लें।
ऐसा संभव है। भइयाराजा और मेरा साला दोनों षडयंत्रा की किसी सीमा तक जा सकते हैं। ऐसा सोचते ही रामदयाल स्थिति-प्रज्ञ हो गये फिर तो उन्होंने बिना आपत्ति जूठन भी खा लिया हालांकि जूठन खाने में उन्हें आपत्ति न होती पर परिस्थितियां सामान्य न थीं। वह तो उनके अपमान का आयोजन था।
रामप्यारे भी अपने ढंग से परिस्थिति का मूल्यांकन कर रहा था तथा वह आश्वस्त था कि रामदयाल जी इस तरह का घृणित कार्य नहीं कर सकते सो वह सचाई तक पहुंचना चाहता था। उसे गांव की बुजुर्ग महिला ने बताया भी कि यह काम सीरवाह का हो सकता है तथा आरोप लगाने वाली महिला का आचरण संदिग्ध भी है।
रामप्यारे अचानक महुआ के पेड़ वाले चबूतरे पर चढ़ गया और वहां खड़े होकर गांव वालों को संबोधित किया... मैं भी आपकी ही जाति बिरादरी का हूं। मुझे आप लोगों से कुछ कहना है। मैं समझता हूं कि पंचाइत हो चुकी है और रामदयाल जी को दंड भी दिया जा चुका है, लेकिन बलात्कार की यह सजा काफी कम है। होना यह चाहिए कि रामदयाल को ऐसी सजा दी जाये कि वे अपना घर-बार छोड़ कर इसी बस्ती में इस महिला के साथ बतौर पति रहने लगें और इसे अपनी पत्नी समझें।
रामप्यारे तो सुविचारित ढंग से बोल रहा था, उसे आभास हो गया था कि कहीं न कहीं रामदयाल के चरित्रा की हत्या करने का षडयंत्रा हो रहा है।
गांव की पंचाइत रामप्यारे की बातें सुन कर अवाक! क्या ऐसा भी हो सकता है अभी तक तो ऐसा हुआ नहीं। जाति बिरादरी वालों में से कभी किसी ने किसी महिला को बलात्कार किया तो उसे जूते मारने तथा भात-मांड़ देने से ही दंडित किया गया फिर उसे जाति में मिला लिया गया यदि गर्भ ठहर गया और बच्चा हुआ तो उसके खान-पान और परवरिश का खर्चा लिया गया। इससे अधिक कुछ नहीं।
वैसे भी गांवों में न्याय-शास्त्रा की परिभषाएं कहीं भी पसरी या डूबी हुई तो होती नहीं वहां तो सिर्फ परंपरायें और रीति-रिवाज ही होते हैं। सो गांव के लोग पीड़ित महिला और उसके साथ के युवकों की बातों को सच मान कर विचारण कर चुके थे और गांव का मुखिया भी सहमत था पर रामप्यारे की बातें सुनकर सभी सोचने लगे।
जाति-बिरादरी का मुखिया एक अधेड़ आदमी था। शक्ल सूरत से भला जान पड़ता था तथा गंभीर भी उसने पंचाइत में कहा...
रामप्यारे कह तो ठीक रहा है पर रामदयाल जी क्या कहना चाहते हैं, इन्हें भी तो अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए।
पहले तो मौका आपने दिया नहीं सीधे जूठन खिला दिया रामप्यारे ने टोका,
‘तब की बात और थी हमें छूत-अछूत का भेद भी तो मिटाना था अब तो पूरी जिनगी का सवाल है मुखिया ने सफाई दी।’
चबूतरे पर बात-चीत चल ही रही थी कि आरोप लगाने वाली महिला का पति चला आया और महिला का बाल पकड़ कर मारने लगा।
ष्बोल सच सच बोल, सबके सामने बोल, मैंने सारा कुछ सुन लिया है, मुझे छोटकू चाचा ने बताया फिर मैं भागा-भागा आ रहा हूं। बोल, बोल तूं किसके कहने पर मालिक पर इल्जाम लगा रही है, एक देवता पर, सिरवहवा पर क्यों नहीं लगाती, मैंने तो तुम्हें उसके संग पकड़ा था नऽ। उसी ने भेजा है तुम्हें नऽ। कल ही तो मालिक ने उसे काम पर से हटा दिया है। जब सीर नहीं, सारी जमीन बांट दी गई फिर सिरवाह काहे के लिए!
मुश्किल से दस पांच मिनट गुजरा होगा कि पंचाइत का सारा परि दृश्य ही बदल गया। पंचाइत में जो हो चुका था उसके बाबत दूसरी पंचाइत वहां बैठ गई। गांव के कुछ सक्रिय लोग कहीं से सीरवाह को पकड़ कर चबूतरे पर ले आए। सीरवाह रामदयाल के किसी रिश्तेदार का लड़का था। रिश्तेदार गरीब था, किसी तरह से उसकी गृहस्थी चलती थी। रामदयाल ने उसे सीरवाह रख लिया। सीरवाही करते-करते वह काफी सम्पन्न हो गया। कच्चे घर को पक्का में बदल दिया। सरिया में चार जोड़ी स्वस्थ और देखनहार बैल बंध गए। दरवाजे पर तीन मुर्रा भैंस पगुराने लगीं। कुछ जमीन भी खरीद लिया और किसी जमीनदार की तरह रंगरेलियां मनाने का शौकीन भी हो गया। सीरवाह, पैंतीस-चालीस साल का हट्टा-कट्टा आदमी था। वह नुकीली मूंछ और सुर्ख आंखों वाला था। उसे पकड़ कर लाने वाले सोनाताली के नौजवान कम न थे, ये भी रोब-दाब वाले थे व सिर उठा कर चलने वाले तथा अपमानजनक स्थितियों में न केवल गर्जने वाले वरन् मुठ्ठियॉ ं तानने वाले भी थे। सबसे बड़ी बात इनमें थी कि वे रामदयाल की नस-नस जानते पहचानते थे और आबंटन अभियान में उनके साथ जुड़े हुए थे। कभी कभार धरना प्रदर्शन, सत्याग्रह के सिलसिले में जिला मुख्यालय तक वे रामदयाल के साथ आया-जाया करते थे। उनमें एक तो रामदयाल के साथ एक बार जेल भी गया था तथा दूसरा रामदयाल की खटारा जीप का ड्राइवर भी था।
सीरवाह चबूतरे पर खड़ा कर दिया गया। खड़ा करते ही वह कंपकपी में चला गया। नौजवानों ने उससे पूछा...बताओ क्या बात है? तुमने इस औरत को क्या-क्या समझा रखा है, आज का नाटक तुमने रचा है कि नहीं’
सीरवाह चुप था और कांप रहा था।
रामदयाल वहीं बैठे-बैठे सारा तमाशा देखते हुए तमाशा बने हुए थे। सोनताली का जमीनदार जमीन की सचाई सूंघ-सूंघ खुद दुर्गन्ध बनता जा रहा था। काली मिट्टी की सोंधी गन्ध वहां से गायब थी। सचाई की परतें पीली पड़ती जा रही थीं। ऐसा भी हो सकता है। भाई-चारा, सहानुभूति और जनहित विखंडित हो रहा था। क्या ऐसा विद्रूप होता है शान्ति सहयोग तथा उदारता का रास्ता?
सीरवाह चुप था सो चुप था तभी अचानक उसके जबड़े पर दो चार घूंसे पड़े और उसके मुंह से खून निकल गया।
रामदयाल ने देखा, वे सिहर गये, नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए, इसे अपनी गलती सुधारने का मौका मिलना चाहिए।
रामदयाल ने तत्काल मारने वाले अपने ड्राइवर का हाथ पकड़ लिया, इसे न मारो, मेरा ही कोई न कोई दोष रहा होगा।
तभी दूसरे नौजवानों ने उसे मारना शुरू कर दिया। रामदयाल सभी को रोकते रह गये। पास ही में रामप्यारे भी था उसने भी सीरवाह को मारा-पीटा। बेदम होकर सीरवाह जमीन पर गिर पड़ा जब उठा तब रामदयाल के पैरों पर था...कृ
‘हां मैंने ही बहकाया था दुलरी को।’कृकृ
सीरवाह के स्वीकारोक्ति के बाद दुलरी चबूतरे से नीचे उतर आई और भागी। उसका पति उसे ही देख रहा था कि वह कहां भाग रही?
दुलरी के पति ने उसे दौड़ा कर पकड़ लिया।
‘चल वहीं चल और अपना पाप कबूल कर।’
दुलरी चबूतरे पर चढ़ी और रामदयाल के पैरों पर गिर पड़ी।
ष्बाबा! मुझसे गलती हो गई मैं बहक गई थी, फिर सीरवाह की तरफ इशारा करते हुए उसने बताया कि इसने कहा था कि वह मेरे नैहर वालों को भइयाराजा से कह कर पांच बीघा जमीन, दो बैल तथा खेती के लिए गल्ला दिलवा देगा। सो मैं लालच में पड़ गई। इसने यह भी कहा था कि वह अब भइयाराजा के यहां सीरवाही करेगा यहां का काम छोड़ देगा।
गांव वालों के सामने षडयंत्रा की अजीब कहानी थी जो सीरवाह से प्रारंभ होकर भइयाराजा तक समाप्त होती थी।
सोनाताली के लोग सीरवाह के मुंह से षडयंत्रा की कहानी सुने, आखिर उसने ऐसा क्यों किया? सीरवाह ने कहानी बताया।
भइयाराजा ने सीरवाह को एक दिन बुलवाया। अब तो तुम सीरवाह नहीं रहोगे। सोनताली की सारी जमीन रमदयलवा ने आवंटित कर दिया है। अब क्या करोगे?
‘घर जाऊंगा सरकार!’ सीरवाह ने बताया
‘घर जाकर क्या करोगे?’
‘घर का काम करूंगा।’
‘घर पर क्या इतना कमा लोगेे जितना सोनताली से कमाते रहे हो?’
‘नहीं सरकार!’
एक काम करो। भइयाराजा ने सीरवाह को समझाया और सीरवाह ने भइयाराजा का बताया हुआ नाटकीय काम कर दिया। काम उसके लिए आसान था। काम करने के लिए उसके पास कलाकारों की कमी न थी। पहली कलाकार तो दुलरी ही थी जिसे अपना जूठन रामदयाल को खिलवाना था, अभिनय प्रतिभा सम्पन्न सफल नायिका। दूसरे वे युवक थे जो रामदयाल को पकड़ सकते थे और उनके साहस और धीरज को नंगा कर सकते थे। तीसरे में सोनताली गांव था, वहां की हवा थी, पेड़-पौधे थे तथा धरती थी, साथ ही साथ वह मारक गन्ध भी थी, जो मान-अपमान के मानकों की जानकार थी।
हवा तो हवा थी वह सोनताली से उठी और रामदयाल की बखरी तक जा पहुंची फिर उनकी बिरादरी में पांव पसार कर फैल गई।
ष्रमदयलवा गिर गया, रमदयलवा पतित हो गया बिरादरी के लोग नांक-मुंह सिकोड़ते और रामदयाल पर फुसफुसाते। इनमें कुछ ऐसे थे जिन्हें दुख था लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो दलित बस्तियों की किसी मड़हा को ऐय्याशगाह बनाये हुए थे। कुछ बांये-दाये हो जाने पर अपना मुंह छिपाते फिरते ऐसे ज्यादा मुखर होते और इनकी जीभ पर दैहिक शुचिता का श्लोक चिप-चिपाता होता। गोया रामदयाल के लिए अपमान की काली बदरियां हर तरफ पसर गईं।
सोनताली में तो यह बात साफ हो चुकी थी कि रामदयाल ने बलात्कार नहीं किया था, वह महज षडयंत्रा था फिर भी पूरा जनपद रंगीन सूचनाओं में सरोबार हो गया।कृहो भी सकता है और नहीं भी हो सकता, दोनों की धारायें तीव्र थीं। रामदयाल की कांग्रेस पारटी के कुछ पदाधिकारी जो रामदयाल को अपना प्रतिद्वन्दी समझते तथा इनके द्वारा किये जा रहे स्वैच्छिक भू-आवंटन को अपराध समझते थे वे खुश-खुश थे।
वे खुश होते ही, क्योंकि रामदयाल अपमानित हो रहे थे और अपमान के दल दल में फंस चुके थे। दलित का जूठन खा चुके थे, बिरादरी द्वारा भी उन्हें अछूत बनाये जाने के आधार बन चुके थे।
सोनताली से रामदयाल सीधे अपनी कोठी पर आये। रास्ते भर वे मान-अपमान के द्वन्द में डूबते उतराते रहे उन्हें लगा कि जीवन का कुछ मतलब नहीं क्या करने चले थे और क्या हो रहा है?
सोनताली की पंचाइत खत्म हो गई थी। सिरवाह को षडयंत्रा रचने के बाबत दण्ड दिया गया। उसके सिर का बाल मुंड़वाया गया फिर गदहे पर बिठाकर गांव तथा टोलों में घुमाया गया। आरोप लगाने वाली महिला को बिरादरी से अलग कर दिया गया, इस दंड का समर्थन उसके पति ने भी किया, फिर पंचाइत खत्म। पंचाइत में यह बात नहीं मानी गई कि सिरवाह आरोप लगाने वाली महिला को अपने साथ रखे इस बाबत लिखा-पढ़ी की जाये।
रामदयाल जब सोनताली से निकलने लगे रामप्यारे उनसे मिला और पूरी घटना के लिए खेद प्रकट किया।
‘भइयाराजा ऐसे मानने वाले नहीं, कुछ सोचिए रामदयाल जी वे ही सारा षडयंत्रा रच रहे हैं।’
रामदयाल आत्मघाती चुप्पी में थे और इस चुप्पी ने उनके चेहरे को भी जकड़ लिया था। उन्होंने रामप्यारे से एक शब्द भी नहीं कहा। रामप्यारे ही लगातार उनसे बतियाता रहा...
‘भूल जाइए रामदयाल जी!’
रामदयाल चुप थे सो चुप थे, जैसे चुप्पी ही जो कुछ हो चुका था उसका पर्याप्त समाधान हो।
लाल लाल डोरे
सोनताली से वापस आने के बाद रामदयाल सबसे पहले उस मन्दिर पर पहुंचे जिसे पत्नी के कहन ेपर उन्होंने नया-नया बनवाया था। मन्दिर में स्थापित मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा हो चुकी थी। हालांकि उस अनुष्ठान में रामदयाल शामिल न हो सके थे। उन्हें शामिल भी नहीं होना था। वे कुछ हिन्दू अनुष्ठानों को कमाने खाने का माध्यम मानते उन्हीं अनुष्ठानों में मूर्तियों आदि की प्राण-प्रतिष्ठा को भी रखते। पर वे नास्तिक भी नहीं थे, जो ऐसे अनुष्ठानों से घिनाते।
सामान्य स्थिति होती तो शायद रामदयाल मन्दिर पर न जाते सीधे कोठी चले आते पर स्थिति तो विडम्बना पूर्ण थी। सोनताली में जिस तरह से उन्हें आरोपी बनाया गया और पंचाइत बुला ली गई, उनके साथ तो क्या किसी के साथ भी जो उनकी तरह का होता, संभव नहीं था। रामदयाल सीधे मन्दिर पर पहुंचे। मन्दिर की देख-रेख करने वाला पुजारी अपने आवास पर था और मन्दिर का भीतरी दरवाजा बन्द था।
मन्दिर एक भव्य परिसर में खड़ा था परिसर में स्थित पुजारी के आवास तक रामदयाल पहुंचे। पुजारी रात का भोजन बना रहा था, वह एक साधारण वेश-भूषा वाला पुजारी था तथा स्वयं-पाकी था। वह दूसरों के हाथ से बनाये खाने में पवित्राता का अभाव मानता था।
पुजारी रामदयाल के पुकारने पर बाहर निकला, उसने रामदयाल का स्वागत किया और अचरज में डूब गया...रामदयाल जी यहां!
यह अचरज ही था क्योंकि शिलान्यास के समय पुजारी ने चाहा था कि रामदयाल और उनकी पत्नी प्रभा देवी खूंट-बन्धन के बाद शिलान्यास के अनुष्ठान में हिस्सा लें पर रामदयाल इनकार कर दिये थे फिर प्रभा देवी ने ही अनुष्ठान पूरा किया था।
पुजारी ने सीधे पूछा...महाराज आप यहां, रात में, कोई आज्ञा!कृकृ
‘नहीं बस यूं ही, मन्दिर का पट खोलने की कृपा करें।’ रामदयाल ने कहा।
पुजारी ने खाना पकाना छोड़ मन्दिर का पट खोला। मन्दिर के खूबसूरत ब रामदे में रामदयाल बैठ गये फिर बोले...‘पुजारी जी! आप जायें, मैं कुछ देर यहां बैठूंगा।’
पुजारी चला गया। रामदयाल मन्दिर में स्थापित भव्य शिवलिंग की तरफ एकटक हो गये। किसी तरह से उन्हें एक मंत्रा याद आया ओम शिवाय। वे गायत्राी मंत्रा याद करने लगे। उस मंत्रा का कुछ याद आता तो बहुत कुछ भूल जाता। मां का सिखाया उन्हें याद आया कि मंत्रों का पाठ सही उच्चारण के साथ करना चाहिए। पूरा मंत्रा याद हो तभी पाठ करना चाहिए नहीं तो नहीं।
रामदयाल कई बार असफल प्रयास किये कि वे गायत्राी मंत्रा का पाठ कर लें पर मंत्रा उन्हें याद ही नहीं आया फिर विवश होकर सिर्फ ओम शिवाय का ही पाठ करते रहे। एक घंटे के भीतर जाने कितनी बार उन्होंने मंत्रा का पाठ किया लेकिन उन्हें क्षण भर के लिए भी आभास नहीं हुआ कि वे औघड़दानी शिव से संवाद कर रहे हैं या वहां से कोई रहस्यमय आश्वस्ति दायक सूचना ही मिल रही! शिवलिंग की स्थिरता और मूक आश्वस्ति, रात के अंधेरे में एक बात स्पष्ट कर रही थी कि सारा कुछ स्थिर है और शान्त भी। तुम अपनी अस्थिरतायें और चित्त की चंचलताओं को यहीं छोड़ जाओ। आरोप, प्रत्यारोप सारा कुछ क्षणिक और अस्थिर है। आरोप ही किसी को संवारते और गढ़ते हैं।
अचानक रामदयाल को महसूस हुआ कि शिवलिंग भी तो काले संगमरमर के अनगढ़ चट्टान का हिस्सा है जिसे छेनी और हथौड़ी के अनगिनत वारों से गढ़ा गया है फिर वे फटाका खड़े हुए और पुजारी को बुलाया। पुजारी ने मन्दिर का पट बन्द किया, उसके पहले रामदयाल को प्रसाद दिया और बताया कि मालिकिन सुबह आई थीं।
रामदयाल देर रात तक कोठी पर आये। कोठी की सारी व्यवस्था पहले की तरह ही थी। प्रभा देवी ने खुद को रामदयाल के प्रति समर्पित कर दिया था और भूल गई थीं कि उन्होंने रामदयाल को जमीनदारी आवंटन के लिए रोकना चाहा था। अपने भाई को भी मना कर दिया था कि तुम अपना देखो, यहां का छोड़ो।
प्रभा देवी को सोनताली की घटी घटना की सूचना मिल गई थी और यह भी कि रामदयाल अपनी कोठी के लिए सोनताली से निकल चुके हैं, पर कोठी पर आए नहीं सो प्रभा देवी सोच में थी और आंगन में बैठी प्रतीक्षा कर रही थीं। कोठी की दाई अपने घर जा चुकी थी। रामदयाल के जीप की घुरघुराहट आंगन में पहुंची, प्रभा देवी को आहट मिली कि रामदयाल आ गये। प्रभा देवी सीधे बाहरी बरामदे की तरफ आई, सामने रामदयाल थे।
रामदयाल को समझते देर न लगी कि सोनताली की खबर कोठी तक पहुंच चुकी है। सोनताली के बाबत रामदयाल ने अपने से प्रभा देवी को कुछ नहीं बताया, बताना भी क्या था? रात का खाना लेकर प्रभा देवी जब रामदयाल के पास आईं तब रामदयाल ने खाने से मना कर दिया...
‘भूख नहीं है।’कृधीरे से बताया
‘फिर भी थोड़ा सा खा लीजिए, खीर बनी है, जिसके लिए आप झगड़ते रहते हैं।’
‘नहीं प्रभा! जिद न करो, नहीं खाना, रामदयाल ने अन्तिम रूप से इनकार कर दिया।
प्रभा देवी कहां मानने वाली थीं, रामदयाल की बात।
‘आपको खाना पड़ेगा ही, नहीं तो मुझे भी नहीं खाना, प्रभा देवी ने स्पष्ट किया।’
‘मैं जानती हूं आप दुखी हैं। आप पर फर्जी आरोप लगाया गया है, लेकिन ऐसा तो होना ही था। भइयाराजा कब चाहेंगे कि आपका नाम हो, कद बढ़े, गरीब जनता आपको अपना आदमी समझने लगे। षडयंत्रा तो वे करेंगे ही यही तो तंत्रा है जिससे वे राजा बने रहेंगे। आपने जो रास्ता चुना है, उससे आपको हटाना उनके लिए जरूरी है, जिससे कि उनकी जमीनदारी और रियासत बची रहे।’
‘फिर क्या हुआ? मान है तो अपमान भी होगा। कहीं यह अपमान भी किसी खास तरह का मान तो नहीं, सिर्फ मानने और न मानने का फर्क है। थोड़ा सा खा लीजिए?’
फिर प्रभा देवी ने रामदयाल के मुंह में रोटी का एक टुकड़ा खीर के साथ डाल दिया। अब तो रामदयाल को खाना ही था लेकिन अनमने भाव से। खाना खा चुकने के बाद रामदयाल संबंधों की अन्तरंगता में डूब गये, प्रभा देवी ने भी उन्हें खूब-खूब सहलाया और दुलारा। कुछ समय के लिए रामदयाल को जान पड़ा कि कहीं कुछ है ही नहीं, कुछ हुआ ही नहीं। जो है वह सिर्फ जीने के लिए है और यह आदमी पर निर्भर है कि वह जीवन को किस तरह की खुशियों में डुबोना चाहता है?
हालांकि रामदयाल का अन्तर्मन चोटिल और दुखी था फिर भी वे सतर्क थे कि परिस्थितियां किसी को भी टुकड़ा-टुकड़ा कर सकती हैं? लेकिन न तो टूटना है और न ही अपने लक्ष्यों को खंडित करना है। पलंग पर प्रभा देवी साथ थीं और वो भी रामदयाल के साथ मादक बदरियों की तरह झिम झिम कर रही थीं और रामदयाल थे कि किसी ऊर्जा श्रोत की तरह दमक रहे थे। अचानक रामदयाल मादकता और दैहिक उन्माद से बाहर निकले...कृकृ
‘क्यों प्रभा! तुम्हें कैसा लगता है? भूमिहीनों भूमि आवंटन का अभियान मैं जो चला रहा हूं क्या वह गलत है? मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए?’
नहीं तो! हालांकि पहले मुझे काफी बुरा लगा था और मैंने आपके काम में पूरी तरह से बाधा पहुंचाने की कोशिश भी की थी पर अब समझने लगी हूं कि जमीनदारी के बचाव में आत्मिक ईमानदारी का अभाव है और कहीं न कहीं गरीबों के प्रति बहुत बड़ा छल है।
प्रभा देवी ने रामदयाल को आश्वस्त किया कि आप जो कर रहे हैं ठीक कर रहे हैं और मैं आपके साथ हूं।
रामदयाल धीरे-धीरे सोनताली में हुए अपमान से बाहर निकले। इसी दौरान एक दिन रामप्यारे भी कुछ साथियों के साथ रामदयाल की कोठी पर आया। रामप्यारे ने बारहा आग्रह किया कि रामदयाल उन गांवों की तरफ अपना कार्यक्रम बनायें जहां भइयाराजा पारंपरिक जोतदारों को जबरिया बेदखल कर रहे हैं। पर रामदयाल ने इनकार कर दिया।
इसी दौरान एक दिन एक दैनिक अखबार में खबर प्रकाशित हुई कि राज्य कांग्रेस पारटी की पहल पर जिले की कांग्रेस पारटी में फेरबदल किया गया है और रामदयाल को पारटी से निश्काषित भी कर दिया गया है।
रामदयाल ने अखबार देखा, खबर पढ़ कर चकरा गये। उनसे पूछा भी नहीं गया न ही सफाई देने का मौका दिया गया फिर कैसे निकाल दिया गया पारटी से? रामदयाल वैसे यह जानते थे कि भइयाराजा के इशारे पर जिले की कांग्रेस पारटी चल रही है। पारटी के अध्यक्ष का जोर नहीं चल रहा। सोनताली की घटना को उनके विरोधियों ने राजनीतिक रंग दे दिया था। तभी तो उनकी कोठी पर पारटी के लोग नहीं आये सिर्फ पारटी का मुखिया आया जिसे रामदयाल ने कभी राजनीतिक सहायता दिया था, तभी वह पारटी का अध्यक्ष बना रह पाया था।
कांग्रेस पारटी से रामदयाल को निकाले जाने पर पारटी के जिला अध्यक्ष ने पारटी की बहस में तीखा प्रतिरोध किया था। उसके प्रतिरोध पर कांग्रेस जनों ने ध्यान नहीं दिया और सीधे कहा कि कांग्रेस पारटी नैतिकता और शुचिता की बाहक है जिसके लिए आचरण की पवित्राता पहली शर्त है। पारटी अध्यक्ष ने इसका प्रतिरोध किया।
ष्आचरण की पवित्राता का मूल्यांकन आरोपों की पवित्राता से ही लगाया जाना चाहिए और यह साबित हो चुका है कि रामदयाल जी पर गलत आरोप लगाये गये थे। ऐसे आरोपों से कोई नहीं बच सकता, मैं जानता हूं कि उन लोगों को जो उज्ज्वल खादी वस्त्रा-धारी हैं वे केवल भूषा से ही पवित्रता फैलाते हैं और मन से घृणित अपवित्राताओं के कारक हैं। ऐसी स्थिति में रामदयाल को पारटी से निश्काषित नहीं किया जाना चाहिए।
कांग्रेस पारटी ने अध्यक्ष की एक बात नहीं सुनी और रामदयाल को पारटी से निकाल दिया गया। पूरे घटनाक्रम में भइयाराजा लगातार विशाक्त हसी हंसते रहे। पारटी अध्यक्ष जानता था कि भइयाराजा विधायक हैं और कांग्रेस पारटी ही नहीं सरकार में भी इनका दखल है, सो इनके सामने कोई भी रामदयाल के पक्ष में न होगा सो पारटी अध्यक्ष ने भइयाराजा को राजी करना चाहा पर वे क्यों राजी होते वे तो पहले से ही तैयार बैठे थे कि रामदयाल को पारटी से निकाल दिया जाये वह क्षेत्रा की जनता को भड़का रहा है। और अभिनव किस्म के जन-प्रतिरोध को पैदा कर रहा है।
भइयाराजा के विचार के ही कांग्रेस पारटी में ढेर सारे लोग थे जिनका चरित्रा सामन्ती था, जेल जाने और सत्याग्रह करने से उनके चरित्रा में रंचमात्रा भी बदलाव नहीं आया था। अधिकांया लोग उनमें से ऊंची जाति के थे, अंग्रेजी शिक्षा वाले थे तथा संपत्ति के रूप में या तो जागीरदार थे, सामंत थे या अंग्रेजी सरकार के बड़े सुपुर्दगार थे। इनमें कुछ लोग भले ही अंग्रेजी शिक्षा वाले न थे पर वे धन दौलत के मामलों में कमजोर न थे। ऐसे सभी लोग अपनी संपत्ति खास तौर से जमीन की संपत्ति बचाना चाहते थे तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम की उन धाराओं की जांच पड़ताल कर रहे थे जिससे जमीन का मालिकाना बचाया जा सकता था। उन लोगों के लिए जमीन बचा लेने या उसे बेनामी कर लेने में कानूनी रूप से प्रशासनिक सहयोग भी मिल रहा था। ऐसे लोगों को लगता कि रामदयाल जैसा आदमी उनके हितों का सत्यानाश करा देगा। सो वे खुश खुश थे और भइयाराजा के साथ गोलबन्द भी। इन लोगों ने पारटी अध्यक्ष का तीखा विरोध किया, सो वह अकेला पड़ गया विवश होकर उसने भी कांग्रेस पारटी से इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस पारटी का अध्यक्ष इस्तीफा देने के तीसरे दिन रामदयाल की कोठी पर आया और पारटी की बैठक का सारा हाल-अहवाल रामदयाल को बताया। रामदयाल ने अध्यक्ष को रोका भी और सुझायाकृकि आपको पारटी से इस्तीफा नहीं देना चाहिए था अब तो वहां हम लोगों का कोई नहीं, ऐसी स्थिति में भइयाराजा जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा।
अध्यक्ष ने प्रतिवाद किया रामदयाल का...
‘वैसा नहीं होगा, जैसा हम लोग चाहेंगे वैसा होगा। कानून उस तरफ चलेगा जिधर जनता उसे ले जाना चाहेगी। मैं जानता हूं कि जनता जानती है कौन उनके साथ है और कौन नहीं? हाईकोर्ट का स्टे आर्डर हटने के बाद सारा परिदृश्य साफ हो जाएगा।’
थोड़ा रूक कर अध्यक्ष ने रामदयाल से पूछा...
रणविजय कहां हैं? रियासत में अपना हिस्सा क्यों नहीं ले रहे, वे आ जाते तो भइयाराजा का सारा उन्माद ठंडा पड़ जाता।
रामदयाल खामोश थे और खामोश रह कर अपने को संभालने की कोशिश कर रहे थे तथा सोच रहे थे कि पूरे जिले में पार्टी अध्यक्ष के अलावा एक भी सत्याग्रही उनके साथ नहीं। आज़ादीके बाद जो कांग्रेसी बने हैं और खादी के कुर्ता में अपने को ढंकने लगे हैं उनकी बात नहीं, वे साथ दें न दें, इसकी भी तकलीफ नहीं पर क्या वे लोग भी तो साथ में नहीं जिन्होंने कांग्रेस सेवा-दल में रहकर अपने व्यक्तित्व को निखारा और संवारा था? उनके साथ तो लगातार वे कंधे से कंधा मिला कर चलते रहे हैं। रामदयाल ने अपना माथा पीट लिया और खुद को विश्लेषित करते हुए पारटी अध्यक्ष से पूछा...कृकृ
‘अध्यक्ष जी! एक बात ईमानदारी से बतायें क्या आप मुझे बलात्कार का आरोपी नहीं मानते?’
अध्यक्ष तो अध्यक्ष, वह वैचारिक पृष्ठभूमि में पका आदमी था उसने रामदयाल का प्रतिवाद किया...कृ
‘रामदयाल जी! यदि आपने बलात्कार किया भी होता तब भी मैं आपके साथ होता लेकिन मुझे मालूम है कि आप जैसा आदमी बलात्कार कर ही नहीं सकता। ऐसा मैं सपने में भी नहीं सोच सकता। सोनताली की घटना तो खुद ब खुद साफ हो गई थी, खैर छोडिए इन बातों को। जहां तक मैं समझता हूं एक कांग्रेसी बालू की दीवार जैसे मान-अपमान, दुत्कार और सत्कार से काफी ऊपर होता है और आप! दृढ़ता के साथ कांग्रेसी वसूलों पर चलें, उसे छोड़े नहीं भले ही पारटी से निकाल दिया गया है तो क्या हुआ? वैसे भी आज़ादीके पहले वाली पारटी अब है ही कहां? पारटी का चरित्रा बदल कर सत्ता-प्रबन्धन का हो गया है। सारी पारटी मुख्यमंत्रियों व प्रधानमंत्राी में सिमट गई है।
कांग्रेस पारटी का अध्यक्ष रामदयाल जी के यहां से दूसरे दिन लौटा। अध्यक्ष रामदयाल से यह आश्वासन लेने में सफल हो गया कि उन्हें जन-हस्तक्षेप के अलावा किसी आत्मघाती विकल्प के बारे में नहीं सोचना तथा आत्महीनता से बाहर निकालना है। अगले आम चुनाव तक जिले के भूमि-संबंधों के सारे सवालों पर जनतांत्रिक हस्तक्षेपों के आयोजनों को करना और करवाना है। इसी अभियान के दौरान यदि कोई समानधर्मा पारटी समझ में आती है तो उसकी सदस्यता व उसके जुड़ाव के बारे में सोचना है।
रामदयाल अध्यक्ष के वापस लौट जाने के बाद मानसिक तनावों से मुक्त हो चुके थे फिर भी उन्हें यह देखना आवश्यक लगा कि उनकी बिरादरी क्या फैसला लेती है। उनका साला तो एक दिन पहले ही आ चुका था और बोला था...
‘उसकी हिम्मत कैसे पड़ी आप पर इल्जाम लगाने की फिर अपनी बहन प्रभा देवी से...कृकृ
‘जीजा जी ने राड़ों-रहकारों का मन बढ़ा दिया है फिर तो वे बोलेंगे ही। ये उनके बारे में नहीं बोलते जो दिन रात किसी न किसी मड़हा मंे पड़े रहते हैं।’
गोया रामदयाल का साला तो पूरी प्रतिक्रिया में आ गया था। उसका वश चलता तो वह सोनताली जाता और पगलाई आक्रामकता का प्रदर्शन कर बहादुर होने के अभिमान को पीता। रामदयाल का साला अपनी पीठ खुद ठोंकने वाला था और उत्पीडन तथा दमन को अपना अधिकार समझता था। रामदयाल के नजदीकी रिश्तों के लोगों ने सोनताली की घटना को विचारणीय ही नहीं माना, पर क्षेत्रा के बिरादरी वालों ने इसे गंभीर माना।
रामदयाल को बिरादरी से बाहर निकालने की कोशिशें कैसे आरंभ हुईं और कैसे उन्हें बिरादरी से निकाल कर समाप्त हो गईं कुछ खास मालूम न हो सका। मालूम सिर्फ इतना हुआ कि उन्हें बिरादरी से निकाल दिया गया और पहले घटी उस घटना को ऐसा करने का मुख्य आधार बनाया गया कि रामदयाल ने कभी गांव के दलितों को घर की थाली में खाना खिलवाया था और थालियां भी फेंकी नहीं गई थीं।
बिरादरी से जुड़ा रहना और निकाल दिया जाना दोनों से रामदयाल विचलित नहीं हुए। वे तटस्थ बने रहे तथा महसूसते रहे कि बिरादरी उनका क्या अहित कर लेगी या कौन सा हित कर देगी। वस्तुतः बिरादरी उनका क्या नुकसान कर लेती सिवाय हुक्का पानी बन्द करने के, वैसे भी रामदयाल किसी के यहां आते-जाते भी नहीं थे। जमीनदारी आवंटित कर देने के बाद भी रामदयाल के पास जीविकोपार्जन के लिए बहुत संपत्ति थी। बहुत इसलिए कि रामदयाल अपनी दैहिक या मानसिक प्रफुल्लताओं के लिए एक धेला खर्च करना भी बुरा मानते थे। जमीनदारों वाली ऐय्याशियों से काफी दूर रहते थे तथा मदिरा और मैथुन दोनों पर उनका आत्मिक नियंत्राण था।
रामदयाल को अपनी विषम, मनः स्थितियों से बाहर निकलने में कुछ समय लगा। बाहर निकलने के बाद भी वे कोठी से बाहर कहीं नहीं निकले। उन्होंने निश्चित कर लिया था कि जमीनदारी व्यवस्था के खिलाफ जनता जब तक उन्हें अपने साथ लेने के लिए पहल नहीं करती वह उसमें श्शामिल नहीं होंगे। उन्होंने खुद को आध्यात्मिक क्रियाओं में डुबो लिया था। मन की शान्ति प्रार्थनाओं से ही हासिल हो सकती है। प्रभा देवी के साथ वे प्रतिदिन मन्दिर जाने लगे थे। शिवलिंग के सामने बैठकर वे शिव से संवाद करने का प्रयास करते पर पत्थर का शिवलिंग क्या बोलता, संगमरमर काट कर तराशा गढ़ा हुआ निर्जीव महज एक पत्थर।
रामदयाल शिवलिंग को एकटक देखते फिर कहीं खो जाते उन्हें लगता कि शिवलिंग की निर्जीवता सजीव हो उठी है और उसके आस-पास से तेज प्रकाश निकल रहा है। काला शिवलिंग, काली मिट्टी कितना सम्मिलन है अद्भुत, रहस्यमय। वे आंखें खोलते फिर वही स्थिति, शान्त, स्थिर, आग्रहहीन। शिवलिंग में किसी तरह की हरकत नहीं। वे शिवलिंग देखते रह जाते उन्हें लगता कि उनकी आंखों ने बंद होना छोड़ दिया है। पलकें ऊपर उठी हुई हैं कुछ अस्वाभाविक ढंग से। पलकों का नीचे गिरना बन्द हो चुका है।
रामदयाल ने थोड़ी कोशिश के बाद पलकें बन्द किया कि उसके भीतर प्रकाश न प्रवेश कर सके पर कुछ अचरज जैसा हुआ। बन्द पलकों के भीतर भी तीखा प्रकाश। नाभि से लेकर मस्तिष्क तक जाने वाली प्रकाश तरंग काफी गतिशील उससे मिलने वाला आन्तरिक सुख भी अद्भुत।
इसीलिए मन्दिर जाना रामदयाल ने अपना क्रम बना लिया था। एक दिन रामप्यारे मन्दिर पर ही रामदयाल से मिला। उसने रामदयाल को दो सूचनाएं दीं जो काफी महत्वपूर्ण थीं। पहली सूचना थी कि जिला कलक्टर जनपद की राजस्व भूमि-वन विभाग को हस्तांतरित कर रहा है तथा राजस्व भूमि और वनभूमि के सीमांकन का काम भी वन विभाग को सौंप रहा है। दूसरी सूचना हालांकि पहली सूचना की तरह महत्वपूर्ण न थी फिर भी उसका महत्व था जो भइयाराजा से जुड़ी थी। भइयाराजाने भाभी रानी को महल से बाहर निकाल दिया है। भाभी रानी अपने मायके चली गईं हैं। उन पर भइयाराजाने आरोप लगाया है कि उनका आचरण ठीक नहीं उनका जुड़ाव उस तहसीलदार से है जो कभी भइयाराजा की पूर्व रियासत का तहसीलदार हुआ करता था। तहसीलदार भाभी रानी का दूर के रिष्श्ते से बहनोई लगता है। महल में भइयाराजा किसी मेम को ले आये हैं जो राज्य के किसी बड़े अधिकारी की लड़की है तथा इंग्लैण्ड से पढ़ कर वापस लौटी है। महल में उस मेम के दाखिल हो जाने के बाद से ही भइयाराजा ने भाभी रानी को प्रताडित करना शुरूकर दिया था।
‘भाभी रानी की खबर सुनकर रामदयाल विचलित हो उठे और रामप्यारे से पूछे’
‘क्या यह सच है? तुम्हें यह खबर कैसे मिली?’
पूरी रियासत में हल्ला है। भइयाराजा के सीरवाह वगैरह भी बता रहे थे रामप्यारे ने खबर पुष्ट किया। भाभी रानी का रामदयाल बहुत सम्मान करते थे उन्हें भइयाराजा पर गुस्सा आया, लगता है मुझे इतिहास में लौटना होगा, हथियारों की मदद से दुश्मन सफाया अभियान चलाना होगा। रामप्यारे ने रामदयाल से राजस्व भूमि को वन विभाग में अन्तरित करने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया। रामदयाल सहमत थे कि गांव-गांव अभियान चला कर जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन आयोजित करना होगा।
रामदयाल से विचार विमर्श करके रामप्यारे लौट गया और रामदयाल अगली रणनीति पर विचार करने लगे। पहले वे निश्चिन्त थे कि भइयाराजा के सामने नहीं जाना, उनकी रियासत का नमक उनके परिवार ने खाया है। पर भाभी रानी का समाचार सुन कर रामदयाल आक्रोशित हो उठे। उन्हें लगा कि उनकी मुठ्ठियां हवा में तैरने लगी हैं और आंखों को लाल लाल डोरों ने जकड़ लिया है। रामदयाल ने अपनी उंगलियां देखाकृमजबूत कसी हुई-फिर मुठ्ठटी से फर्श पर धम्म से मारा।
‘अच्छा भइयाराजा इतने असम्मानित हो चुके हैं जो किसी का सम्मान नहीं करते क्या गुजर रही होगी भाभी रानी पर?’
दूसरी आजादी
हालांकि समय के साथ रामदयाल ने अपनी आन्तरिक मनःस्थिति को बहाल कर लिया था जिसमें प्रभा देवी ने किसी अच्छे सहयात्राी की भूमिका का निर्वाह भी किया था पर कहीं न कहीं रामदयाल को लगता कि मन की गुफा में डूब जाना और उसमें पसरी शान्ति को चूमना चाटना ही ठीक होगा। सत्याग्रह, धरना प्रदर्शन, सविनय अवज्ञा, जनता की अगुआई फिर जन-संगठन, सारा के सारा बेकार है। वे गांधी को याद करते। आखिर हत्या ही तो की गई उनकी, आरोप लगाया गया कि वे हिन्दूवादी हैं। देश और समाज ने क्या दिया उन्हें। वे भारत को बंटता नहीं देखना चाहते थे पर भारत बंटा। हत्या कर दी उन लोगों ने जो सर्वधर्म भारत नहीं हिन्दू भारत देखना चाहते थे। भइयाराजा भी तो वही कर रहे। रियासत से जुड़ाव रखने वालों में से एक-एक को तोड़ रहे, पहले तोड़ा रणविजय को फिर भाभी रानी को और मुझे भी।
रामप्यारे के बार-बार आने और कांग्रेस पारटी के अध्यक्ष का साथ होने से रामदयाल को ताकत मिली और उन्होंने खुद को तैयार किया कि अपने भीतर किसी आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह डूब जाना ठीक नहीं। मनुष्य होने के कारण समय के साथ टकराना ही एक सक्रिय व्यक्तिका काम हो सकता है। रामदयाल ने प्रभा देवी को महल का हाल बताया। प्रभा देवी हसने लगीं फिर पूछा...
‘कैसे मालूम हुआ आपको?’
‘रामप्यारे ने बताया...’
यह तो पुरानी खबर है। नई खबर यह है कि जिस मेम को भइयाराजा ने महल में रखा हुआ है। वह मां बनने वाली है और भइयाराजा चाहते हैं कि वह मां न बने, बच्चा गिरवा दे। भइयाराजा उसे अस्पताल भी ले गये थे। अस्पताल में उसने झगड़ा किया भइयाराजा से और साफ कहा कि वह बच्चा नहीं गिरवाएगी तथा महल से बाहर कहीं रहेंगी भी नहीं। भइयाराजा उसे महल से हटाकर लखनऊ या दिल्ली रखना चाहते हैं। वह महल छोड़ना नहीं चाहती। महल में रोज झगड़ा चल रहा है। वह सीधे कह रही, मैं तुम्हारी पत्नी हूं कोई रखैल नहीं हमारा भी हक है इस रियासत पर और महल पर।
‘वह पत्नी कब हो गई?’ पूछा रामदयाल ने प्रभा जी से
‘कहती तो है कि शादी का कागज उसके पास है।’ बताया प्रभा देवी ने
‘गोया तुम्हें मालूम था, फिर यह सब मुझे क्यों नहीं बताया...’ पूछा रामदयाल ने प्रभा देवी से।
‘का बताती कौन शुभ समाचार था? आप घबरा जाते भाभी रानी का हाल सुनकर। वैसे भी आप खुद काफी परेशान हैं। मैंने उसे बताना जरूरी नहीं समझा।’कृप्रभा देवी ने रामदयाल को बताया। रामदयाल कुछ समय के लिए सोच में पड़ गये।
जीवन जितना सार्वजनिक है उससे कम असार्वजनिक भी नहीं। भाभी रानी के साथ किया जाने वाले भइयाराजा के दुर्व्यवहार पर सार्वजनिक रूप से कुछ किया जा सकता है क्या?
रामदयाल इस बाबत सिर्फ इतना सोच पाये कि भाभी रानी से मुलाकात करना चाहिए और रणविजय को भी मेम वाले प्रकरण की खबर दे देनी चाहिए। रामदयाल ने प्रभा देवी से सलाह किया फिर भाभी रानी के मायके की तरफ निकल गये।
रामदयाल ने प्रभा देवी से भी साथ चलने के लिए कहा पर वे इनकार कर दीं, मुझे क्या जाना और क्या न जाना आप अकेलें जाएं।
भाभी रानी का मायका दूसरे प्रदेश में पड़ता था। उनका मायका पहले रियासत की शक्ल सूरत वाला था शक्तिषाली और प्रभुता संपन्न। पर बाद में उसमें विभाजन हो गया। उसकी एक शाख वालों ने इस्लाम कबूल लिया और तत्कालीन नबाब ने फिर उन्हें राजा बनवा दिया था। राजा बनने के लिए परिवार की एक लड़की की शादी भी नबाब से करनी पड़ी थी। बाद में दोनों शाख के लोग अपने अपने को ‘राजा’ कहने लगे थे। उनमें जघन्य प्रतिद्वन्दिता भी आ गई थी। भाभी रानी दूसरी शाख की थीं जिन्हें प्रारंभ से ही राजगद्दी हासिल थी। जमीनदारी टूटने के पहले तथा आज़ादीमिलने के आस-पास ही भाभी रानी के वंशवालों ने व्यापार करना शुरूकर दिया, सो वे शहर में रहते थे तथा व्यापार का प्रबंधन देखते थे। आर्थिक हालत भी जमीनदारी से काफी ठीक-ठाक हो गई थी।
रामदयाल दूसरे दिन भाभी रानी के पास पहुंचे। उनके पास कोठी में सन्देशा भिजवाया। भाभी रानी निवास के भीतर थीं। उनके बड़े भाई किसी काम से दिल्ली गये हुए थे। आवास पर सिर्फ औरतें थीं। भाभी रानी की भाभी तथा उनकी अम्मा रानी। भाभी रानी रामदयाल का सन्देश सुनते ही बैठका तक आईं और रामदयाल का स्वागत किया।
रामदयाल ने देखा कि वे भाभी रानी से नहीं किसी ऐसी महिला से मिल रहे हैं जिसे क्रूरता की हद तक सताया और प्रताड़ित किया गया है। रामदयाल बहुत कुछ सोचकर भाभी रानी से मिलने गये थे पर उन्हें लगा कि सारा कुछ भूल गये हैं। बात भी वे न कर पाते यदि भाभी रानी ने उनसे कुशल-क्षेम न पूछा होता।
कुशल क्षेम पूछने से रामदयाल को आधार मिल गया फिर उन्होंने महल की घटना के बारे में साफ-साफ पूछा...कृ
‘भाभी रानी! महल के बारे में मैं क्या सुन रहा हूॅ, कहीं यह अफवाह तो नहीं’
‘अफवाह नहीं है रामदयाल जी सारा कुछ सच है। आपके भइयाराजा अब वे नहीं रह गये हैं जो पहले थे।’
‘ऐसे में किया क्या जा सकता है?’ भाभी रानी से पूछा रामदयाल ने,
‘कुछ भी नहीं, सिवाय खामोशी के तथा उनसे दूरी बनाये रखने के। वह जो मेम आई है न वह भइयाराजा को कहीं का न छोड़ेगी।’
रणविजय को कुछ मालूम है कि नहीं...’कृ पूछा रामदयाल ने
रणविजय को सारा किस्सा मालूम है वे आज शाम तक आ रहे हैं। वे खुद बहुत परेशान हैं। लिली ने उनका साथ छोड़ दिया है और रूस चली गई है।’ भाभी रानी ने रामदयाल को बताया और चुप हो गईं।
रामदयाल को आगे क्या पूछना था सो वे भी खामोश हो गये। सामने पड़ा जल-पान करने लगे जिसके लिए भाभी रानी कई बार आग्रह कर चुकी थीं।
रामदयाल ने शीघ्रता से जलपान किया और भाभी रानी को तजबीजने लगे शायद वे कुछ बोलें और बतायें कि आगे क्या करना है? ऐसे तो ठीक नहीं।
वही हुआ दुबारा भाभी रानी ने बात प्रारंभ किया...
‘क्यों रामदयाल जी! खबर है कि आपने अपनी जमीनदारी गरीब किसानों आवंटित कर दी है।’
‘हां भाभी रानी। सभी काश्तकारों ने आवंटित जमीन पर अपनी खेती-बारी भी कर लिया है।’
‘क्या उनके नाम राजस्व के कागजातों पर दर्ज हो गये हैं?’ पूछा भाभी रानी ने
‘नहीं जमीनदारी जब टूटेगी तब नाम चढ़ेगा अभी कागजात बनाये जा रहे हैं’ रामदयाल ने बताया।
रामदयाल को एक दिन के लिए भाभी रानी ने रोक लिया कि रणविजय के आने के बाद जायें। देर रात तक रणविजय आये। भाभी रानी के बड़े भाई साहब भी देर रात तक आये। दूसरे दिन भइयाराजा की खुद की गढ़ी पटकथा पर विचार हुआ। इसके पहले रामदयाल और रणविजय दोनों मित्रा अपनी अपनी कहानियों में एक दूसरे को डुबोने का प्रयास किये। दोनों ने स्वीकारा कि वे परिस्थितियों के शिकार हैं, कहीं न कहीं विसंगतियां उनका पीछा कर रहीं हैं।
रणविजय को तो अचरज लगा कि सोनताली की आदिवासी महिला ने रामदयाल पर फर्जी आरोप लगाया वह भी चरित्रा की पवित्रता के बाबत। इसी तरह रामदयाल भी दुखी थे कि लिली ने रणविजय का साथ छोड़ दिया और रूस चली गई।
‘क्या लिली ने आपसे पूछा भी नहीं...?’ रामदयाल ने रणविजय से जाना।
‘काहे पूछती? उसे तो समय की अतिरिक्त ऊर्जा युक्त खुशियां चाहिए थीं मेरे पास क्या था सिर्फ मुर्दा वर्तमान और आत्महन्ता सहनशीलता तथा उसी से जुड़ी निःस्वाद सादगी।’ रणविजय रामदयाल को बताकर कहीं खो गये जिसमें वे लगातार खोते रहे हैं और खुद के संभलने का रास्ता तलाषते रहे हैं।
रामदयाल ने फिर अपने क्षेत्रा में चलाये जा रहे भूमि आवंटन का हाल अहवाल रणविजय को विस्तार से बताया। भाभी रानी के साथ जिस बर्बर व्यवहार का प्रदर्शन भइयाराजा ने किया था उससे रणविजय काफी आहत थे। ऐसा नहीं होने दिया जाएगा और भइयाराजा को कहीं न कहीं रोकना ही होगा।
रामदयाल अंग्रेज हाकिम और लिली की ममा को भूल नहीं पाये थे। उन्होंने रणविजय से उनका हाल-अहवाल लिया। फिर मालूम हुआ कि लिली के रूस चले जाने के बाद अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा के साथ दिल्ली छोड़ दिया और भारतीय शिल्प और पुरातत्व का अध्ययन करने के लिए दौरे पर निकल गया। सबसे पहले वह कोणार्क गया फिर खजुराहो, इसी तरह भारत के अन्य महत्वपूर्ण स्थानों का भी दौरा किया। आज कल हरिद्वार के आश्रम में है जो वैदिक ग्रन्थों व उपनिषदों वाली दुनिया को अब नये सिरे से फिर गढना चाहता है। आश्रम आर्थिक रूप से बहुत शक्तिषाली है तथा प्रवासी भारतीयों के उदार सहयोग से चल रहा है।
अंग्रेज हाकिम को आश्रम से जोड़ने के लिए आश्रम के संचालक ने खुद पहल किया था। पहले तो अंग्रेज हाकिम ने साफ-साफ इनकार कर दिया था कि उसे नहीं जाना कहीं भी पर लिली की ममा का जोर था कि हरिद्वार में ही आखिरी सांस ली जाये। ऐसी सूरत में अंग्रेज हाकिम लिली की ममा के साथ हरिद्वार चला गया।
अंग्रेज हाकिम के हरिद्वार चले जाने के बाद रणविजय ने भी मुजफ्फर की कोठी छोड़ दिया हालांकि अंग्रेज हाकिम मुजफ्फर की कोठी रणविजय को सौंप कर ही पहले यात्रा पर फिर हरिद्वार गया था। मुजफ्फर की कोठी पर अकेले रणविजय के लिए एक रात भी गुजारना काफी असमंजस जैसा जान पड़ा था। वे रात भर सो नहीं पाते थे और बीते दिनों में डूबते उतराते रहते थे। कभी लिली सामने हो जाती हंसती खिलखिलाती तो कभी रूस जाने के लिए अपना पक्ष प्रमाणित करती। कभी भइयाराजा चले आते, महल चला आता और महल की अमानवीय प्रवृत्तियां भी। रणविजय किसी डरावने सपने में उतर जाते और खुद को प्रताड़ित करना शुरू कर देते।
तुम समय के साथ नहीं, समय सार्थक हस्तक्षेप की मांग करता है। तुम भगोड़े हो और भाग्य के सहारे जीने की कलाओं को चूमना चाहते हो। तुम्हें भइयाराजा ने दुत्कारा और लिली ने भी। रिश्तों के बीच कहां हो तुम। तुम नींद में चलने वाले हो, भागना जानते हो जागना नहीं। जागा हुआ समय से दो-दो हाथ करता है बिना परवाह किए कि समय असमय में बदल जाएगा या समय ही बना रहेगा।
रणविजय की कोठी में बिताई जाने वाली रातें यातनादाई होने लगीं, उन्हें रात भर नींद न आती। वे अतीत भूलना चाहते पर अतीत उन्हें कुरेदता रहता फलस्वरूप उन्होंने एक दिन कोठी छोड़ दिया और छोड़ने की सूचना भी अंग्रेज हाकिम को दे दिया। लिली को सूचित करने का सवाल ही न था। लिली तो रूस में अपनी अभिलाषाओं और महत्वाकांक्षाओं की खोज में थी फिर उसे दूसरी खोज की काहे चिन्ता होती? डैड और ममी या रणविजय कैसे हैं? लिली संबंधों की अन्तरंग भावुकताओं से काफी दूर हो चुकी थी और अपने में डूब चुकी थी।
रूसी मिजाज के भारतीय कामरेड से इलाहाबाद में हुई मुलाकात रणविजय भूल नहीं पाये थे। उसने पूछा था ‘तुम ठीक हो नऽ’। रणविजय क्रोध पीकर रह गये थे और उसकी इस व्यंग्योक्ति को काफी गहरे से महसूसा था। मन के भीतर गाली निकली थी...
‘साला नाटक करता है, प्रतिभा की पूंजी पर अभिनव किस्म का संसार गढ़ता है, लिली मूर्ख है और उसके माया जाल में फंस गई अब उसके पास पश्चाताप करने के लिए भी कुछ न बचेगा।
रणविजय और रामदयाल अपने दुख दर्द बांटने में इतने तल्लीन हो गये कि कब सुबह हुई उन्हें पता ही नहीं चला। भाभी रानी के साथ भइयाराजा ने जिस क्रूरता का व्यवहार किया था उस पर दोनों मित्रों की राय थी कि चुप रहने से काम चलने वाला नहीं। भइयाराजा को अदालत के चौखट पर खड़ा करना होगा।
भाभी रानी के बड़े भैया भी कानूनी रास्ते पर चलने के पक्षधर थे, पर भाभी रानी नहीं चाहती थीं कि भइयाराजा को कानून के कटघरों में खड़ा किया जाय और उन पर किसी तरह का कलंक लगे। उनके भैया ने भाभी रानी को समझाया भी’
‘तुम्हारे सोचने से कुछ नहीं होने वाला, वे तो कानून के कटघरे में हैं ही। तू कुछ करो न करो वह जो मेम आई है उनकी पीठ पर कानून का पूरा व्याकरण लिख ही देगी। फिर जनता भी तो बागी हो चुकी है। जनता को कैसे रोक पाएगा कोई भी।’
भाभी रानी का नकारात्मक रूख रामदयाल, रणविजय ही नहीं उनकी भाभी और भैया को भी अच्छा नहीं लगा पर उनसे कोई बोल नहीं पाया। भाभी रानी पढ़ी-लिखी होते हुए भी अपने अधिकारों और व्यक्तित्व निर्माण से कोसों दूर थीं तथा पति के सुख-दुख से ही खुद को संस्कारित करना कर्तव्य समझती थीं, इससे अलग कुछ भी नहीं।
भाभी रानी पूरी तरह तटस्थ थीं लगता था उन्होंने अपनी निर्जीव तटस्थता को सजीव बना लिया है। किसी के समझाने व बुझाने पर उन्होंने गौर नहीं किया, साफ मना कर दिया कि उन्हें भइयाराजा के खिलाफ कुछ नहीं करना। उन्हें अपने तरह से जीवन जीने के लिए अकेली छोड़ देना ही उनके साथ सहयोग करना होगा।
रामदयाल और रणविजय भाभी रानी की अपाहिज सोच से विचलित हुए लेकिन वे उन पर अतिरिक्त दबाब भी नहीं डाल सकते थे सो सिवाय निराश होने के इनके पास दूसरे विकल्प न थे। रामदयाल और रणविजय ने फिर रियासत में चल रहे जन-आन्दोलन पर विचार किया। साथ ही साथ निश्चित किया कि भइयाराजा से किसी प्रकार का समझौता नहीं करना।
रामदयाल भाभी रानी से मिल कर अपनी कोठी पर चले आए और रणविजय दिल्ली चले गये। उन्होंने कालेज से अवकाश नहीं लिया था। रामदयाल के जिम्मे ढेर सारे काम थे, पहला तो यही था उस आदेश का विरोध करना जिसे कलक्टर ने जारी किया था और वन भूमि एवं राजस्व भूमि का सीमांकन का कार्य वन विभाग के जिम्मे लगाया था।
रामदयाल ने इस बाबत भूमिहीनों की एक जनसभा का आयोजन सुनिश्चित किया। जनसभा को सोनताली में ही आयोजित किया जाएगा। रामदयाल ने जनसभा के पहले प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों के अध्यक्षों को सूचित कर दिया तथा आग्रह किया कि वे जनसभा में आयें तथा उनके आन्दोलन का समर्थन करें। रामदयाल ने जिले की कांग्रेस पारटी तथा प्रदेश की कांग्रेस पारटी को भी जनसभा की सूचना दिया। जनसभा कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार में किसी प्रकार की कमी न रह जाये, रामदयाल ने हर संभव प्रयास किया।
जनसभा के लिए सबसे पहले रामदयाल ने एक तैयारी समिति का गठन किया जिसका मुखिया रामप्यारे को बनवाया। रामदयाल प्रारंभ से ही सचेत था कि राजस्व-भूमि को बचाने की लड़ाई जिस भूमिहीन समाज की है उसी समाज की अगुआई भी हो। फलस्वरूप रामदयाल ने तैयारी समिति में शामिल किये जाने वाले लोगों में प्राथमिकता उन लोगों को दिलवाया जो भूमिहीन थे या थोड़ी-बहुत खेती बारी वाले थे। इस समिति में अधिकांश लोग अनुसूचित जाति व जन-जाति के थे तथा कुछ पिछड़ी जातियों के भी थे। सवर्णों में से किसी भी व्यक्ति को समिति में नहीं लिया गया जबकि कई लोग ऐसे थे जो स्वेच्छया समिति में शामिल होना चाहते थे। ऐसे लोगों में कुछ बड़े काश्तकार भी थे पर अधिकतर औसत दर्जे के काश्तकार थे।
रामदयाल समिति निर्माण के बाबत पूरी सावधानी बरत रहे थे कि कहीं से भी यह संदेश नहीं जाये कि जमीन की यह राजनीति कुछ खाते-पीते लोगों के लिए मनोरंजक खेल है।
रणविजय को रामदयाल ने पहले ही दिल्ली से बुलवा लिया, रणविजय को हालांकि कालेज से छुट्टी नहीं मिल पा रही थी, क्योंकि कालेज की परीक्षाएं होने वाली थीं, किसी तरह से रणविजय ने अवकाश हासिल किया और रामदयाल के पास आ गये।
रामप्यारे तो पहले से ही रामदयाल के साथ जुड़ा हुआ था तथा गांव-गांव तैयारी समिति का गठन कर रहा था। रामदयाल ने रामप्यारे को सख्त निर्देश दिया हुआ था कि जनसभा के लिए किसी से भी चन्दा न लिया जाय और न ही रसीद वगैरह छपवाये जायें।
रामदयाल भले ही कांग्रेस पारटी से निकाले जा चुके थे पर जिले की कांग्रेस पारटी में उनका दखल कम न था। व्यवहारिक स्तर पर वे कांग्रेस के नेता थे और दूसरे कांग्रेसी उनका खूब खूब सम्मान किया करते थे। ऐसे कांग्रेसियों में गुप्त रूप से कुछ ऐसे लोग थे जो रामदयाल द्वारा आयोजित जन सभा में भागीदारी करना चाहते थे। कांग्रेस का पूर्व अध्यक्ष त्याग पत्रा दे देने के बाद भी लगातार कोशिश में था कि काग्रेस में विभाजन हो और भइयाराजा की ताकत कमजोर हो सो वह तो पहले से ही रामदयाल के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहा था।
जनसभा की तारीख जैसे जैसे नजदीक आने लगी रामदयाल घबड़ाने लगे, जाने क्या हो, कहीं जनसभा कमजोर न साबित हो जाये। कांग्रेस पारटी के प्रभाव का जब रामदयाल मूल्यांकन करते तो निराश हो जाते। कांग्रेस पारटी का राजनीतिक रंग आज़ादीमिलने के बाद से ही सत्ता-सुखों से इतना गाढ़ा हो गया था कि उस पर दूसरा रंग चढ़ ही नहीं सकता था। सो रामदयाल पसीना पसीना हो जाते। लेकिन जनता जनसभा के लिए तैयार दिखती, सो वे उत्साह में थे।
रामदयाल को थोड़ी राहत दिखती वह भी भइयाराजा के कारण। जनता उन्हें किसी खलनायक की तरह महसूसने लगी थी कि वे किसी के काम के नहीं। रणविजय को महल से निकाला, भाभी रानी जो एक देवी थीं उन्हें निकाला और आरोप भी लगाया, एक मेम को लाया, जाने कितनी तरह की बातें। निश्चित रूप से रियासत की जनता भइयाराजा पर नाराज थी। उनके मुकदमे के कारण ही अभी तक जमीनदारी नहीं टूटी, नहीं तो टूट गई होती। बहुत कुछ ऐसा।
रामदयाल के लिए एक मुश्किल यह भी थी कि वे लोगों को कैसे समझायें कि वन-भूमि तथा राजस्व-भूमि दोनों कानून से अलग-अलग हैं। दोनों की कानूनी रूप से दो स्थितियां होनी चाहिए। जनता थी कि वन-भूमि और राजस्व-भूमि दोनों को महज सरकारी भूमि ही मानती थी। कुछ लोग थे जो समझते थे कि वन-भूमि राजस्व-भूमि से पूरी तरह अलग होती है। उसका अलग कानून है तथा वन भूमि पर सरकार चाहे तो भी पट्टा नहीं कर सकती। जबकि राजस्व भूमि का पट्टा किया सरकार द्वारा जा सकता है।
रामदयाल रणविजय और पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष ने तैयारी समिति की तैयारी का अनुमान लगाने के लिए गांवों का दौरा किया। गांवों में जनसभा के बाबत तैयारी अच्छी थी। सबसे खुशी की बात यह थी गांव के लोग समझ चुके थे कि राजस्व भूमि और वन-भूमि में क्या अन्तर है? जंगल के किनारे के अधिकांश गांवों के लोग जिन जमीनों पर बिना कानूनी अधिकार के काबिज थे और खेती बारी कर रहे थे, उन जमीनों को बंजर मानकर सरकार उसका हस्तांतरण वन-विभाग को कर रही थी।
रामदयाल को ही नहीं रणविजय और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष को भी तैयारी देख कर प्रसन्नता हुई। रामदयाल को लगा उनका यह संघर्ष दूसरी आज़ादीका प्रारम्भ है। आज़ादीके भीतर आजादी। उस आज़ादीकी लड़ाई में तो खाते कमाते लोग थे इसमें वे लोग हैं जिनके मुंहसिले हैं, हाथों में हथकडियां हैं, अनपढ़ और गंवार तथा हद दर्जे तक लाचार और वेवश। रामप्यारे ने सोनताली में एक छोटी सी गोष्ठी कार्यकर्ताओं की आयोजित किया था जो तैयारी समिति का काम देख रहे थे। गोष्ठी को रणविजय और कांग्रेस अध्यक्ष ने संबोधित किया। रामदयाल ने इस गोष्ठी का समापन करते हुए दो नारे लगायेकृ‘जिसकी लड़ाई, उसकी अगुआई, दूसरा नारा था जो जमीन को जोते कोड़े, वह जमीन का मालिक होवे’ सोनताली नारों से गूंज गया। नारा लगाने वालों में वह महिला भी शामिल थी, जिसने रामदयाल पर आरोप लगाया था। सोनताली से वापस आते समय वह महिला रामदयाल से मिली, उसकी आंखें भींगी थीं, जुबान लडखड़ा रही थी, कहना चाहती थी कि माफ कर दीजिए पर कुछ कह नहीं पा रही थी। अचानक रामदयाल के पांवों पर गिर पड़ी रामदयाल ने उसे उठाया और कहा...
‘बिटिया जो हुआ उसे भूल जाओ। वह तो समय का निन्दनीय एक खेल था। एक ऐसा खेल जिसका कोई भी भुक्त भागी बन सकता है। तुमने जो किया वह किसी के कहने पर किया ऐसा नहीं करना चाहिए था तुम्हें।’
रोटी का इतिहास
भइयाराजा लगातार असमय में घिरते जा रहे थे। वही समय जिस पर वे काफी इतराया करते थे। रणविजय को महल से निर्वासित कर दिये। कांग्रेस पारटी से उनका दूर-दूर तक नाता नहीं था, उससे चुनाव का टिकट हासिल कर लिये और चुनाव जीत कर विधायक बन गये। फिर भाभी रानी को महल से निकाला और उनके स्थान पर महल में एक मेम डाल लिया, क्या हो गया? समय जो उनकी मुठ्ठी में था और आगे भी रहेगा वही समय उनके लिए असमय होता जा रहा था और मेम थी कि उनकी पीठ पर लद कर मुस्कुरा रही थी। मेम ने तो हद कर दी, भइयाराजा की एक बात नहीं माना।
भइयाराजा चिल्लाते रहे कि गर्भपात करा लो, उसने कहा नहीं कराना। भइयाराजा ने प्रस्तावित किया कि लखनऊ या दिल्ली में रहो, उसने कहा नहीं मुझे रियासत की गन्ध प्यारी है। भइयाराजा के पास जो थोड़ी बहुत नैसर्गिक शर्म थी उससे प्रभावित होकर सोच रहे थे कि यदि वह महल में रहेगी तो उनकी बदनामी होगी ऐसी स्थिति में वह लखनऊ या दिल्ली रहे तो ठीक होगा, सम्मान बचा रहेगा। लेकिन वह तो पढ़ी-लिखी थी, मेम थी, अपने अधिकारों के प्रति सतर्क थी, उसे मालूम था कि औरतों के साथ बिस्तरे का खेल खेलना, फिर विजेता होने की बंशी बजाना, मादक राग छेडना, रात को भोर में तब्दील कर देना या दिन के उजाले पर उन्माद की बदरियां चिपका देना राजाओं और जमीनदारों के ऐतिहासिक शौक हैं और यह राजा भी कम नहीं। देह तब तक जोंक की तरह चूसता रहेगा जब तक सारा खून न चूस ले। सो मेम सावधान थी उसे वही अधिकार हासिल करना है जो रानी का होता है तथा बच्चे को भी वही अधिकार दिलाना है,जो किसी भी वैध बच्चे का होता है। उसके पेट में पल रहा बच्चा किसी गैर का नहीं, फिर राजा क्यों भाग रहा, उसे अपनी संतान नहीं मान रहा?
‘एक दिन मेम ने भइयाराजा से साफ-साफ पूछा...’कृकृ
‘क्या यह बच्चा आपका नहीं, मैंने अपनी कोख किसी दूसरे के हवाले कर दिया था क्या?’
‘नहीं तो, काहे ऐसा पूछ रही हो?’ भइयाराजा ने मेम से जाना
‘क्योंकि आप लगातार गर्भपात के लिए दबाब बना रहे हैं, इसीलिए आप तनाव में भी हैं,’ मेम ने अपना पक्ष रखा।
‘ऐसा कुछ भी नहीं, मैं चाहता हूं कि हम दोनों के बीच कोई तीसरा न आये। अभी तीसरे की आवश्यकताभी नहीं। हमारी नजदीकियां लगातार मुस्कुराती रहें इसलिये आवश्यक है कि हम सावधानी बरतें और तीसरे को अपने बीच न आने दंे।’ भइयाराजा ने मेम को समझाया।
‘ठीक कहा आपने, आने वाला बच्चा तीसरा है। वह हमारी नजदीकियां लील लेगा, उसका प्रतिफल न होगा, सुकुमार, निर्विकार, मुस्कुराता, किलकारियां भरता। जाने आप क्या और कैसा सोच रहे हैं। मेरे लिए तो सारा कुछ अबूझ है वैसे भी मेरे पास वह सूझ कहां जो आपके पास है।’ मेम ने भइयाराजा का अतिरेक पूर्ण प्रतिवाद किया।
भइयाराजा भी मेम से कम न थे। वे अन्तरंगताओं के सुलझावों व उलझावों से परिचित थे। अन्तरंगता से उपजी इस उलझन से खुद को बाहर निकालने के लिए वे छट-पटा रहे थे। हालांकि उनकी सोच में इसके लिए कई तरह के सहज-असहज समाधान थे फिर भी वे प्रयास कर रहे थे कि ऐसी स्थिति का समाधान सहज ही रहे और अन्तरंग भी। भइयाराजा ने मेम को समझाया...कृकृ
‘देखो! मैं ऐसा कुछ भी नहीं सोच रहा। मैं मानता हूं कि तुम मेरे ही बच्चे की मां बनने वाली हो लेकिन अभी बच्चे को गोद में खिलाने की क्या आवश्यकता है? तुम्हें तो मालूम है कि हम दोनों के पास-पोर्ट बन गए हैं। कुछ दिनों में बीजा भी मिल जाएगा फिर हमें यूरोप की यात्रा पर निकलना है। कैसे होगा यह सब।’
‘गोया आप पहले से ही सावधान थे कि क्या-क्या करना है और कैसे-कैसे करना है? आपको तो अफसोस होगा कि मैं कैसे मां बनने की स्थिति में पहुंच गई। दवाई तो रोज आप खिलवाते रहे हैं, दाई ने सारा कुछ नहीं बताया क्या आपको।’ मेम ने भइयाराजा की करनी का स्पष्ट खुलासा कियाकृ
भइयाराजा तो जैसे कठ्ठ, सांप ने काट लिया हो। दाई को गर्भनिरोध की दवाइयां उन्होंने ही दी थीं कि रोज रात में दूध के साथ पिला दिया करना। वह तो मेम की किस्मत काम कर गई, वह एक दिन किचन में चली गई। मेम ने देखा कि दाई दूध में कुछ मिला रही, उसे शक हुआ, उसने दवाई का पत्ता देखा, वह दवाई गर्भनिरोध की थी वह भी देसी नहीं विदेशी। भइयाराजा ने उसे खास तौर से मंगवाया था।
मेम ने दाई को मना कर दिया ऐसा कभी न करना, और कुछ रूपया भी दे दिया फिर दवाई का पत्ता दाई से लेकर नष्ट कर दिया।
मेम तो पहले से ही सावधान थी कि महल में आकर वह कैद हो गई है। घबराहट भरा अनुशासन, दयाहीन संबंध और शर्मनाक औपचारिकता ही तो उसे महल के एक कोने से दूसरे कोने तक फैली पसरी दीखती है। उसे क्या पता था कि खूबसूरत चेहरे और मीठी भाषा-बोली वाला यह कथित राजा, जनता का विधायक कितना विषधर है? मेम ने महसूसा कि वह छली जा चुकी है उससे बचने का एक ही रास्ता है विवाह को वैध प्रमाणित करवाना तथा राजा का प्रतिरूप उत्पादित करना। प्रतिरूप तो मेम के पेट में पल ही रहा था।
मेम का सोचना था कि भइयाराजा से खुली बातें होनी चाहिए, जो होना होगा वह होगा ही सो मेम ने भइयाराजा से साफ-साफ कहा...कृ
‘लगता है आप किसी बलात्कारी की तरह अपना मुंह छिपाना चाह रहे हैं और होने वाले बच्चे को अपना नाम व पद देना नहीं चाह रहे। इस बाबत आपका उत्तर चाहे जो भी हो पर यह बच्चा आपका उत्तराधिकारी है और रहेगा। लेकिन मैं कभी नहीं चाहूंगी कि वह आपकी बलात्कारी प्रवृत्तियों का भी आपकी तरह से ही उत्तराधिकारी हो।
भइयाराजा की सारी कोशिश कि वे अपने चेहरे के रंगों को छिपा सकते हैं और किसी पेशेवर कलाकार की तरह उसे किसी विशेष कला का नमूना बना सकते हैं, बेकार हो गई और वे चुपचाप अपनी खोल में सिमट गये जहां से उन्हें आगे का सुगम रास्ता निकालना था। उनका रास्ता क्या था किसे मालूम?
मालूम तो तब चला जब ‘मेम’ एक दिन महल का सुरक्षा घेरा तोड़ कर रात के अन्धेरे में महल से भाग निकली और सोनताली पहुंच गई। सोनताली में रामदयाल, पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष और रणविजय का पड़ाव पड़ा हुआ था। सोनताली से ही सरकार के खिलाफ बड़े जन-प्रतिरोध का संयोजन किया जा रहा था। जनसभा का कार्यक्रम, कुछ दिन बाद में किया जाना था। सोनताली बंजर भूमि से आच्छादित अधिकांश गांवों के बीच में पड़ता था तथा वहां से जिला मुख्यालय का रास्ता पक्का था। सोनताली के पड़ाव पर प्रदेश के विभिन्न दलों के लोगों में समाजवादी लोग पहले ही पहुंच गये थे जब कि दूसरे दलों के लोंगों ने आश्वासन दिया था कि वे लोग मुख्यालय पर ही प्रदर्शन में भाग लेंगे।
रामदयाल को पूरा विश्वास था कि भले ही वे कांग्रेस पारटी में नहीं हैं फिर भी कांग्रेस के अधिकांश लोग सोनताली के पड़ाव पर आयेंगे और भूमि हकदारी यात्रा में हिस्सा लेंगे। रामदयाल को प्रदेश स्तर के कुछ कांग्रेसियों का चेहरा याद है जिन लोगों ने जमीनदारी तोड़वाने के लिए अथक प्रयास किया था। रामदयाल का विश्वास टूटने लगा था, कांग्रेस के कुछ गिने-चुने लोग ही सोनताली के भूमि हकदारी पड़ाव पर उपस्थित हुए जिनसे रामदयाल का व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ाव व लगाव था। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने रामदयाल से इस बाबत साफ-साफ बताया था.कृ. ‘सपनों में उडना बन्द कीजिए रामदयाल जी! आप गांधी क्या उनके पांव तक नहीं हो सकते फिर गांधी के ही साथ कौन और कैसे लोग थे क्या आपको पता नहीं। फिर यह भी तो है कि पहले का संघर्ष अंग्रेजों के खिलाफ था, वे विदेशी थे। आज तो सभी अपने हैं, फिर आन्दोलन की क्या आवश्यकता। आज का समय तो सुविधाओं की पलंग पर बैठने-पसरने का है, खुशियां पीने का है, आन्दोलन, धरना, प्रदर्शन सविनय अवज्ञा का नहीं। कोई नहीं आएगा रामदयाल जी, खांटी गांधीवादी भी नहीं।’
‘निराश होने की आवश्यकता नहीं, हमारे साथ जनता है फिर हमें नेता की जरूरत भी नहीं।’
सोनताली के भूमि हकदारी पड़ाव पर ‘मेम’ के पहुंचते ही अचरज फैल गया। अचरज फैलता ही, वह अस्त व्यस्त थी, भागते-भागते लस्त-पस्त भी। उसके साथ आगे-आगे भइयाराजा का मुगलकालीन जैसा आदमी भी था। उस मुगलकालीन जैसे आदमी को पूरा सोनताली जानता था। रणविजय और रामदयाल भी जानते थे। मुगलकालीन जैसा आदमी रामदयाल के पांव पर गिर गया और रो रो कर भइयाराजा और महल का हाल बताने लगा। थोड़ा शान्त होकर उसने मेम के बारे में बताया कि भइयाराजा इनके साथ क्या करने वाले हैं?
‘मेम’ को महल के बारे में कुछ भी मालूम न था कि वह महल से बाहर कैसे निकल सकती है? उसे भइयाराजा ने महल में कहीं कैद कर रखा था। सारा किस्सा दाई ने मुझे बताया फिर मैंने इन्हें महल से बाहर निकाला और भागा-भागा यहां आ रहा हूं। ये बेचारी औरत अकेली कहां जाती? मुझे तो पता था कि सोनताली में भूमि हकदारी कार्यक्रम का पड़ाव है जिसे आप लोग देख रहे हैं। आप लोग ही मेरी तथा मेम साहिबा की सुरक्षा कर सकते हैं। मुगलकालीन जैसा आदमी महल का हाल बता कर चुप हो गया।’
‘मेम वहीं पर अस्त-व्यस्त पड़ी थी। रणविजय ने मेम से बैठने के लिए कहा। वहां पंचाइत जैसा स्थान था। पूरे चबूतरे पर दरी बिछी थी, उसी पर पचासों लोग बैठे हुए थे। मेम की वेश-भूषा अंग्रेजी थी, उसके बाल भी कटे हुए थे। उम्र के हिसाब से वह तीस साल के भीतर वाली खूबसूरत युवती थी जो किसी आतंककारी खामोशी में डूबी हुई थी।
रामदयाल ने सीधे मेम से पूछा कि महल में क्या परेशानी है? फिर आश्वस्त किया कि अब वह यहां पूरी तरह सुरक्षित है। इसी तरह से वहां उपस्थित सभी लोगों ने मेम को आश्वस्त किया कि घबराने की आवश्यकता नहीं।
कुछ देर के लिए तो मेम गूंगी बनी हुई थी पर जब उसे यकीन हो गया कि वह भइयाराजा की अराजकता से बाहर है फिर वाचाल हो गई। मेम ने उपस्थित लोगों से पूछा...
‘आप लोगों में से रामदयाल जी कौन है? फिर उसने दूसरा सवाल पूछा जो रणविजय के बाबत था क्या वे भी यहां हैं?’
मुगलकालीन जैसे आदमी ने रामदयाल और रणविजय का परिचय मेम से कराया। यह जान कर कि वह अब रामदयाल जी के साथ है, उसके चेहरे का रंग बदल गया फिर उसने कहा...
‘अब मुझे कोई चिन्ता नहीं, किसी तरह से लखनऊ मेरे डेड के पास खबर भिजवा दें कि मैं महल से बाहर निकल गई हूं। एक महीने से उन लोगों की कोई खबर नहीं।’
मेम! पूरी तरह से खुल गई थी। सभी के सामने उसने बताया कि उसके डैड पहले ही मना कर रहे थे कि तुम किसी राजा-वाजा के साथ रिश्ता न बनाओ पर मैं निजी संबंधों में इतना आगे निकल चुकी थी कि पीछे लौटना मुश्किल था। महल में आने पर मालूम हुआ कि एक रानी यहां पहले से ही पड़ी हुई है। मुझे यह भी मालूम नहीं कि उन्हें महल से क्यों निर्वासित कर दिया गया।’
मेम का सारा हाल जान लेने के बाद रामदयाल और रणविजय ने उसे आश्वस्त किया कि यदि वह अपने डैड के पास लखनऊ जाना चाहती है तो कल उसे सुरक्षित भेजने का प्रबन्ध कर दिया जाएगा। भइयाराजा किसी भी तरह से इस कार्यक्रम में बाधा नहीं पहुंचा सकते। हम लोगों के आदमी उनकी ताकत से निपट लेंगे।
मेम के महल से बाहर निकल जाने के बाद भइयाराजा सक्रिय हो उठे। फिर उन्हें मालूम हुआ कि मेम को महल से निकालने वाला मुगल कालीन जैसा आदमी है और वह सोनताली गया हुआ है। जहां पर रामदयाल ने भूमि हकदारी मोर्चे का अस्थाई कार्यालय बनाया हुआ है। खबर पक्की थी सो भइयाराजा ने तत्काल सोनताली के थानाध्यक्ष से संपर्क साधा।
थानाध्यक्ष एक अधेड़ आदमी था और बात बात में अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी की तरह चबा चबा कर बोलता था। भइयाराजा ने उससे बात की कि उनकी दूसरी पत्नी का रामदयाल ने अपहरण कर लिया है। रामदयाल पर अपहरण का मुकदमा दर्ज कर तत्काल कार्यवाही की जाये। रामदयाल ने सोनताली में उनकी पत्नी को कैद कर रखा है। थानाध्यक्ष पर भइयाराजा ने एस. पी. से भी दबाब डलवाया पर थानाध्यक्ष ने रपट लिखने से इनकार कर दिया। उसने साफ बताया कि वह रामदयाल को जानता है, वे ऐसा नहीं कर सकते। भइयाराजा अपनी पूरी ताकत इस्तेमाल करके परेशान परेशान हो गये। उनकी विधायकी बेकार गई, राजा होना बेकार गया। थानेदार ने उनके आरोप पर ध्यान नहीं दिया। इसी दौरान मेम रामदयाल द्वारा लखनऊ भेज दी गई। लखनऊ पहुंच कर उसके डैड ने भइयाराजा पर रपट लिखवा दिया तथा प्रषासन पर दवाब भी डलवाया कि भइयाराजा के खिलाफ आवश्यक कार्यवाही की जाये।
मेम का डैड एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी था। भला प्रशासन का कौन ऐसा अधिकारी होगा जो उसकी बात पर गंभीरता से विचारण नहीं करेगा? भइयाराजा के कुछ लोग लखनऊ में थे जो उक्त प्रशासनिक अधिकारी के संपर्क में भी थे। उन लोगों में से किसी ने भइयाराजा को खबर भिजवाया कि वे सावधान रहें, उनकी गिरफ्तारी किसी भी समय हो सकती है।
भइयाराजा अपने जीवन में पहली बार प्रशासनिक उलझनों में फंसे थे। ऐसी उलझन जिसे उन्होंने खुद रचा था। वे सोचते थे कि एक से एक संगीन मामलों का निपटारा उन्होंने महल से ही करवा दिया था लेकिन यह छोटा सा मामला वे निपटा नहीं पा रहे। जिले का पुलिस प्रशासन उनकी बात नहीं मान रहा।
वैसे रामदयाल के अलावा कोई दूसरा होता तो भइयाराजा प्रषासन की पूरी सोच ही अपने माफिक बनवा लेते और जैसा चाहते वैसा करवा लेते। पर प्रशासन था कि उसने अपने कान और आंख दोनों को खुला रखा था। प्रशासन जानता था कि रामदयाल जनता के आदमी हैं, उनके इशारेपर जनता बारूद का ढेर बन सकती है। स्थानीय थानाध्यक्ष को यह मालूम था कि भइयाराजा ने अपनी पहली रानी को महल से निर्वासित कर दिया है तथा अपने छोटे भाई रणविजय का सारा हिस्सा भी हड़प लिया है। सो वह भइयाराजा की बात पर कान में तेल डाल कर बैठा हुआ था। उसी की तरह जिले का एस. पी. भी भइयाराजा के सामने तो उनका अनुयायी बना रहता पर पीछे काफी भला-बुरा उन्हें कहता तथा मानता कि भइयाराजा आदमियत खो चुके हैं। किसी के भले की सोच नहीं सकते। सो एस. पी. भी था कि जो न्यायिक हो वही किया जाय। थानाध्यक्ष ने भइयाराजा के आरोप की जांच कर एस. पी. को साफ-साफ बता दिया था कि मेम यदि महल से न भागती तो भइयाराजा उसकी हत्या करवा देता। भइयाराजा ने इस बाबत तैयारी कर लिया था।
तैयारी में यह था कि भइयाराजा को दूसरे दिन शिकार पर निकलना था। उनके साथ मेम भी जाती और शिकार के बहाने भइयाराजा उसका भी वहीं जंगल में शिकार कर देते फिर किसी तरह का बहाना बना लेते। जब मेम ही नहीं होती फिर भइयाराजा के खिलाफ कौन बोलता?
एस. पी. ने मुस्कराते हुए थानाध्यक्ष से पूछा था...कृ
‘क्या मतलब! इस कहानी का, क्या भइयाराजा कोई फिल्म बना रहा? रानी को महल से निकाला, मेम को ले आया, आखिर कहानी का अन्त कहां और कैसे करवाता यह सारा कुछ नाटकीय लगता है किसी घटिया कहानी की तरह।’
भइयाराजा का सारा खेल रामदयाल और मुगलकालीन जैसे आदमी के कारण बिगड़ चुका था। मुगलकालीन आदमी तो भइयाराजा से उसी समय से बदला लेना चाहता था, जब उसने भइयाराजा को अपनी पत्नी के साथ देखा था। पत्नी थी कि वह अपने को किसी रानी से कम नहीं समझती थी उसे कत्तई समझ नहीं था कि राजा किसी का नहीं होता। वह सभी में राजा होने का हिस्सा देखता है और उसी तरह का व्यवहार भी करता है। भइयाराजा तो भौंरा है कभी इस फूल पर तो कभी उस फूल पर। उसे गन्ध और रस ही तो चूसना है।
मुगलकालीन जैसे आदमी ने तत्काल अपनी पत्नी को गांव भेज दिया था। वह भी भइयाराजा का काम छोडना चाहता था लेकिन काम जब कहीं मिलता तभी संभव था। सो वह भइयाराजा के पास मुंह सिल कर पड़ा था।
मेम को सकुशल लखनऊ भेज देने के बाद रामदयाल जनसभा की तैयारी में लग गये। रणविजय भी पहले की तरह तटस्थ नहीं थे। भाभी रानी के निर्वासन ने उन्हें बौखलवा दिया था और वे निश्चित कर लिए थे कि जनसभा हो जाने के बाद वे न्यायालय में अपने हक-हकूक के लिए भइयाराजा के खिलाफ मुकदमा कर देंगे। महल का इससे अच्छा दूसरा हल नहीं। हर हाल में महल की दीवारों को धाराशायी करवाना होगा। महल जब तक धाराशायी नहीं होगा तब तक पूरी रियासत तथा उसमें बसने व रहने वाले लोग उलझनों में घिरे रहेंगे।
रणविजय तो मेम को देख लेने के बाद ही गंभीर हो गये थे। भाभी रानी से मिल कर ही हालांकि वे बदल गये थे और अपनी तटस्थता तोड़ने का फैसला ले लिए थे पर इतना जल्दी नहीं। मेम से मिल कर वे गुस्से में आ गये थे।
क्षेत्राीय समस्याओं का हल करने का केन्द्र जब महल रहा होगा तब रहा होगा। जनता ने अपनी समस्याओं का समाधान तब महल में देखा होगा तथा उसकी चमक से अपने चेहरों को चमकाया होगा। लेकिन अब महल किसी बात का हल नहीं। उसकी दीवारों पर जनता की चमक व दमक नहीं तथा वहां न्याय और सम्मान की धमक भी नहीं। वहां कुछ भी नहीं, सिवाय बर्बरता, शोषण और दमन के।
रणविजय ने, क्या करना है सारा प्रोग्राम बना लिया था कि जनसभा के बाद ही वे उस पर चलेंगे। रामदयाल रणविजय और कांग्रेस का अध्यक्ष एक साथ बैठे हुए थे। रामप्यारे ने भूमि-हकदारी कार्यक्रम के सक्रिय कार्यकर्ताओं को बुला लिया था। कार्यकर्ता सभा-स्थल पर बैठ चुके थे तथा आपसी सहमति से जनसभा की रणनीति पर बात-चीत होनी थी। मेम के आ जाने से थोड़ा व्यवधान हुआ था कार्यक्रम निश्चित समय पर प्रारंभ नहीं हो पाया।
रामप्यारे ने रामदयाल और रणविजय से कार्यक्रम प्रारंभ कराने के लिए निवेदन किया। निवेदन आवश्यक भी था कार्यकर्ता दूरदराज से आये हुए थे उन्हें अपने गांवों में लौटना भी था, सो रामप्यारे चाहता था कि कार्यक्रम जल्दी निपट जाये।
कार्यकर्ता सम्मेलन का प्रारंभ शीघ्रही रामदयाल ने कर दिया। कार्यकर्ता क्या चाहते हैं, कार्यक्रम कैसे हो पहले इस विषय पर कार्यकर्ताओं ने विचार-विमर्श किया। इसके लिए रामदयाल ने प्रत्येक कार्यकर्ता को मौका दिया कि वह अपना पक्ष रखे और बताये कि करना क्या है? कार्यकर्ताओं के लिए किसी सभा में अपना पक्ष रखना मुश्किल काम था। वे पहली बार किसी ऐसे कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे, जिसमें उन्हें अपनी बात रखने के लिए मौका दिया गया था। कार्यकर्ताओं में से एक दो लोगों ने अपनी बात रखा और बताया कि वे जनसभा का आयोजन क्यों करने जा रहे हैं। बकिया लोगों ने तो सिर्फ हां में हां मिलाया। रामदयाल जनता की इस प्रवृत्ति पर सचेत थे वे जानते थे कि हजारों साल से प्रताड़ित जनता के मुंह सिले हुए हैं वे नहीं जानते कि वे क्या हैं? अधिकार की बात तो उनकी समझ से कोसों दूर थी। उनकी सारी जिन्दगी थाना और राजा के कोड़ों के बीच फंसी हुई है।
कार्यकर्ताओं के इस सम्मेलन को रामदयाल, रणविजय, कांग्रेसी अध्यक्ष और रामप्यारे ने संबोधित किया। रामप्यारे ने जनसभा कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताया कि बंजर-भूमि को वन-भूमि हम नहीं बनने देंगे। अब हम आज़ाद हैं गुलाम नहीं।
अन्धेरा होने तक कार्यकर्ता सम्मेलन समाप्त हो गया फिर सभी लोग अस्थाई पड़ाव पर चले गये। रणविजय विश्राम करते समय देख रहे थे कि भइयाराजा का आक्रामक चेहरा उनकी आंखों में घुसा जा रहा है जबकि रामदयाल सोच रहे थे, उनके चेहरे का गब-गब रंग फीका पड़ चुका है। ष्भइयाराजा को क्या हो गया है? फिर खुद को आश्वस्त किया कि इतिहास भी तो ऐसे ही राजाओं की गाथाओं का संकलन है हमल और हमलों के वृत्त पर घूमता-थिरकता। लेकिन वे दिन लद गये जब इतिहास को पीठ पर जनता लाद लिया करती थी, अब वैसा नहीं करने वाली। अब जनता खुद अपना इतिहास लिखेगी कोई दूसरा न लिखेगा उसे ही रोटी का इतिहास कहा जाएगा।
दूसरा संस्करण
केन्द्र और प्रदेश में कांग्रेसी सरकार थी। इतना ही नहीं एक दो प्रदेशों को छोडकर सभी जगहों पर कांग्रेसियों का राजनीतिक प्रभुत्व गर्म-गर्म था। आज़ादीपाने की हवा हर तरफ बह रही थी। प्रदेश की सरकार ने कांग्रेस के पुराने संकल्प के आधार पर जमीनदारी विनाश को अधिनियम में बदल दिया था और उस पर अमल भी प्रारंभ हो गया था। पूरे प्रदेश में दो तीन ऐसी रियासतें थीं जिन्होंने जमीनदारी विनाश अधिनियम की कुछ धाराओं को अदालत में चैलेंज किया था। भइयाराजा ने भी अपनी रियासत को ‘खोइंछा’ यानि दान में मिली संपत्ति बताया था तथा तर्क दिया था कि अंग्रेजी सरकार ने अपनी सेवा के बदले उन्हें रियासत का एक हिस्सा बतौर ‘ग्रान्ट’ दिया था फलस्वरूप उनकी जमीनदारी वाले क्षेत्रा पर जमीनदारी विनाश अधिनियम लागू नहीं किया जा सकता। माननीय उच्च न्यायालय ने भइयाराजा के मुकदमे के आधार पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाहियों को स्थगित कर दिया था। रामदयाल और रणविजय ही नहीं रामप्यारे भी इस कानूनी सच्चाई को जानता था। फलस्वरूप वे लोग जमीनदारी विनाश अधिनियम की गतिविधियों से अलग केवल बंजर भूमि को आधार बना कर सत्याग्रह और आन्दोलन चला रहे थे।
भूमि हकदारी मोर्चा का मानना था कि भूमिहीन चाहे वह किसी भी जाति का हो, चाहे जिस भूमि पर काबिज हो, खासतौर से अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन-जाति तथा पिछड़ी जाति के लोग, उन्हें उनके पारंपरिक कब्जा दखल से बेदखल न किया जाये। इसके विपरीत जिला प्रशासन का मुखिया हजारों हेक्टेयर भूमि जो बंजर के रूप में कागजात माल में दर्ज थी, जिसमें खेती की जमीन के साथ चारागाह, खलिहान, कब्रिस्तान, भीटा आदि शामिल था, ऐसी जमीनों को वन-विभाग को हस्तांतरित कर रहा था और कुछ तो कर भी चुका था। खबर थी कि भइयाराजा इस काम में प्रशासन का सहयोग कर रहे तथा कुछ प्रभावशाली कांग्रेसी नेता भी। वे चाहते थे कि वन-विभाग को बंजर-भूमि भले मिल जाये, पर गरीबों को आवंटित नहीं किया जाना चाहिए।
जनसभा का दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहा था प्रशासन बहुत ही सतर्कता से परिस्थितियों का विश्लेषण कर रहा था। जिले में आज़ादीके बाद जनता द्वारा आयोजित यह पहली जनसभा होनी थी। इस जनसभा की तैयारी भी अद्भुत थी। गांव-गांव कार्यकर्ता घूम रहे थे तथा जागरूकता फैला रहे थे कि वन-विभाग भले ही सरकारी है पर वह किसी न किसी दिन लकड़ी का एक टुकड़ा लेना भी जनता के लिए बन्द करवा देगा तथा पहले के राजा और जमीनदारों से काफी क्रूर तथा आक्रामक होगा। पशाुओं को चरने के लिए जंगल में जाना रोक देगा। महुआ जैसे फल-फूल पर भी नियंत्राण लगा देगा, ऐसी सूरत में राजस्व की भूमि और वन की भूमि दोनों का अलग अस्तित्व होना आवश्यक है।
भूमि हकदारी के कार्यकर्ताओं के संगठन और उसकी ताकत देख कर प्रशासन ही नहीं वन-विभाग के आला अधिकारी भी परेशान परेशान थे। जिला कलक्टर ने प्रशासन को चौकन्ना रहने का आदेश पारित कर दिया था। प्रशासन और वन विभाग के अधिकारियों की सोच से अलग जिले की कांग्रेस पारटी और प्रदेश कांग्रेस के लोग थे। उनका सोचना था कि कांग्रेसी सरकार में हो क्या रहा? रामदयाल पक्के गांधीवादी हैं कुछ समाजवादियों के कारण गलत रास्ते पर निकल पड़े हैं। समाजवादियों का क्या है उनके पास कोई कार्यक्रम तो है नहीं सो बेमतलब का ‘दाम बांधो, खरीददारी बांधो, भूमि बांटो, लगान माफ करो’ जैसे वाहियात कार्यक्रम चलाया करते हैं। कम से कम रामदयाल को तो इस बाबत सोचना चाहिए।
रामदयाल जो सोच रहे थे वह तो कभी भी कांग्रेसियों के दिमाग में घुसने वाली ही नहीं और वह कांग्रेस अब रही भी नहीं। जिन कांग्रेसियों ने कांग्रेस के लिए पसीना ही नहीं खून बहाया था, उनमें अधिकांश अब नहीं हैं। मौजूदा कांग्रेस पारटी आधुनिक कांग्रेसियों की है जो लाल-बत्ती की लालच में पारटी में पड़े हुए हैं। उनसे कांग्रेस के वसूलों से क्या लेना देना। रामदयाल का सोचना था कि यदि जनता अपने अधिकारों के प्रति सचेत न होगी फिर तो वह किसी भी तरह का अधिकार हासिल न कर पाएगी चाहे वह अधिकार जमीनदारी-विनाश अधिनियम द्वारा ही क्यों न दिया जाने वाला हो।
प्रदेश से अलग हट कर केन्द्र की कांग्रेस पारटी की राय थी। वहां कुछ प्रमुख लोग थे जिन लोगों ने प्रदेश की कांग्रेस पारटी और सरकार को भी सहेजा था कि रामदयाल द्वारा चलाये जा रहे भूमि हकदारी कार्यक्रम को वैधानिक स्थिति प्रदान करने के लिए गंभीरता से जांचा परखा जाये तथा किसी भी हाल में अंग्रेजी सरकार की तरह उनके आन्दोलन का दमन न किया जाये। अब अंग्रेजी सरकार का राज नहीं, जनता का राज है। जनता के राज में किसी भी जनतांत्रिक संघर्ष का दमन बलपूर्वक नहीं किया जाना चाहिए। जनता को अधिकार है कि वह अपने विरोध का प्रदर्शन करे।
खबर तो यह भी पसरी थी कि माननीय प्रधानमंत्राी जी ने प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी को विशेष रूप से निर्देशित किया है कि रामदयाल जी का योगदान स्वतंत्राता संघर्ष के दौरान उल्लेखनीय रहा है और वे प्रारंभ से ही कांग्रेस के प्रमुख सहयोगी रहे हैं, किन्ही कारणों से अब वे कांग्रेस में नहीं हैं फिर भी प्रदेश की सरकार को चाहिए कि वह उनका सम्मान करे। उनके साथ निर्दय तथा हास्यास्पद व्यवहार न करे।
केन्द्र की कांग्रेस पारटी और सरकार के दिशा निर्देशों के विपरीत प्रदेश की पारटी और सरकार दोनों थी। प्रदेश सरकार के मुखिया का मानना था कि रामदयाल के जनान्दोलन का समर्थन करना कांग्रेस पारटी के लिए काफी महंगा साबित होगा। माना जाएगा कि कांग्रेस पारटी समाजवादियों के साथ मिल गई है और संयुक्त कार्यक्रम संचालित कर रही है। आजकल रामदयाल जी कांग्रेस के साथ नहीं वरन् समाजवादियों के साथ हैं। इसके अलावा प्रदेश सरकार के मुखिया ने केन्द्र को बताया कि निश्चित रूप से आगामी चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ेगा, यदि इस आन्दोलन का दमन न किया गया फिर तो समाजवादियों को कई चुनाव क्षेत्रों से जीतने से नहीं रोका जा सकता।
प्रदेश सरकार के मुखिया की छल-पूर्ण प्रतिक्रिया से केन्द्र की कांग्रेस पारटी और सरकार दोनों ने खामोशी साध लिया। फलस्वरूप प्रदेश की सरकार ने निरंकुश ढंग से जनसभा के कार्यक्रम को रोकने व बाधित करने का प्रयास तेज कर दिया। गनीमत थी कि जिले का कलक्टर एक भला आदमी था वह व्यक्तिगत रूप से चाहता था कि राजस्व-भूमि और वन-भूमि का अलग अलग सीमांकन हो तथा राजस्व भूमि किसी भी हाल में वन विभाग को हस्तांतरित न किया जाये। पर वह मजबूर था। उसका कार्यकाल भी तीन चार महीने में समाप्त होने वाला था। उसने पहले ही सरकार को सूचित कर दिया था कि राजस्व-भूमि का वन-विभाग को हस्तांतरण न केवल कानूनी रूप से वरन सामाजिक व राजनैतिक रूप से भी गलत होगा। पर सरकार तो सरकार ऐसे कलक्टरों की बात सरकार कहां सुनने वाली। कलक्टर को आदेश मिला... ‘तुमसे जो कहा जा रहा है करो।’ शासनादेषों का अनुपालन सुनिश्चित कराना ही तुम्हारा काम है, इसके आगे तुम्हारा काम नहीं।
कलक्टर सरकारी सेवा में रहते हुए समझ चुका था कि शासनादेषों का अनुपालन कराना ही उसका काम है और शासनादेशों की वैधता अवैधता पर सोचना, उस पर दिमाग लगाना सिवाय बेवकूफी के कुछ नहीं। कलक्टर ने शासनादेष की एक कापी फाइल में लगवाया और बंजर-भूमि का हस्तातंरण वन विभाग के पक्ष में कर दिया। उधर वन विभाग को निर्देशित कर दिया कि शीघ्राति शीघ्र वन अधिनियम के तहत बंजर-भूमि का अधिग्रहण कर लिया जाये।
कलक्टर शासनादेषों के क्रियान्वयन की सरकारी परंपरा का जानकार था सो उसने उन सभी औपचारिकताओं का निर्वाह किया जिसे न करने से वह कानूनी जाल में फंस सकता था। ऐसा करने के क्रम में ही उसने राजस्व-विभाग की बंजर भूमि का हस्तांतरण वन विभाग को कर दिया तथा वन-विभाग को निर्देशित भी किया कि वह बंजर-भूमि का अधिग्रहण वन-अधिनियम के तहत कर ले। अब कलक्टर निश्चिन्त था, लेकिन रामदयाल द्वारा आयोजित जनसभा को लेकर तनावग्रस्त भी था।
जनसभा और प्रदर्शन को जिला मुख्यालय पर भी आयोजित किया जाना था सो कलक्टर के लिए न केवल प्रशासनिक रूप से वरन् नैतिक रूप से भी दबाव था कि वह क्या करे और क्या न करे। इन्टिलिजेन्स के लोगों ने कलक्टर को सूचित किया था कि जनसभा और प्रदर्शन दोनों गांधीवादी तरीके से किये जाएंगे पर प्रदर्शन का क्या ठिकाना कब वह हिंसक हो जाये।
जिले का एस. पी. एक सख्त मिजाज आदमी था तथा दमन की अंग्रेजी पद्धतियों का प्रशंसक भी सो वह पूरी तैयारी में था, पहले आंसू गैस के गोले, फिर लाठियां और अन्त में फायरिंग। एस. पी. ने कलक्टर को बताया भी था कि जनसभा के प्रमुख आयोजकों की प्रदर्शन और जन सभा से पहले गिरफ्तारी करना ठीक होगा फिर प्रदर्शन स्वतः ही स्थगित हो जाएगा।
कलक्टर ने एस. पी. को इस बाबत मना कर दिया था कि किसी की गिरफ्तारी नहीं करना है क्योंकि गिरफ्तारी करने से सरकारी विरोध की आग तेज होगी फिर यहां की बंजर-भूमि का मामला देश स्तर का बन जाएगा जो शासन व प्रशासन दोनों स्तर पर ठीक नहीं होगा।
दूसरी ओर प्रदर्शन कारी भी सावधान थे तथा वे पूरी तैयारी कर चुके थे कि कब क्या करना है। प्रशासन प्रदर्शन को कमजोर करने का कोई भी दमनकारी प्रयास कर सकता है। प्रदर्शन के दो-तीन दिन पहले से ही प्रदर्शन के प्रमुख आयोजक भूमिगत हो गये थे तथा प्रदर्शन कारियों को निर्देशित कर दिया गया था कि वे भीड़ की शक्ल में मुख्यालय तक न जायें। समाजवादियों का न केवल प्रदेश का नेतृत्व वरन् केन्द्र का नेतृत्व समूह भी पहले से आ चुका था तथा मुख्यालय पर जगह-जगह ठिकाना बना लिया था।
प्रदर्शन के दिन जो हुआ वह अचरज जैसा हुआ। प्रदर्शन हुआ सभा हुई, कहीं न हल्ला न कहीं चिल्ल पों। प्रशासन को शान्ति स्थापित करने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा और सिखाई गई जोश का इस्तेमाल नहीं करना पड़ा। दिक्कत तब हुई जब प्रदर्शन कारी बिना पूर्व योजना के मुख्यालय स्थित कोतवाली पहुंच गये और नारा लगाने लगे...कृ
‘हमारी मांगें पूरी करो या गिरफ्तार करो।’
जिला मुख्यालय आज़ादीके बाद पहली बार एक ऐसा प्रदर्शन और जनसभा देख रहा था जो पहले कभी नहीं देखा गया। प्रदर्शन में शामिल लोग मैले-कुचैले, अशिक्षित तथा प्रताड़ित थे। उनके मुंह से अधिकारों के नारों का सुनना अद्भुत था। वे मुठ्ठियां हवा में लहराते हुए मार्च में शामिल थे। तब यह जनपद औद्योगिक कारखानों का केन्द्र नहीं बना था। यहां नोटों की गड्डियां हवा में लहराया नहीं करती थीं। किसी पहाड़ी या नदी पर पहले ऐसा नहीं था कि तिजोरियां रखी जायें और पत्थर तथा बालू को रुपयों में तब्दील कर दिया जाये। केवल इतना था कि जंगली इमारती पेड़ों का मोल था और उन्हें कटवा-कटवा कर ठेकेदार बेचा करते थे।
रामदयाल, रणविजय, पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष तथा प्रमुख समाजवादी प्रदर्शन के जुलूस में आगे-आगे चल रहे थे। कोतवाली पहुंच कर प्रदर्शन जनसभा में बदल गया। कोतवाली के प्रागंण में इतनी जगह नहीं थी कि दस हजार लोग खड़े भी हो सकें। किसी तरह प्रदर्शन कारियों ने अपने को व्यवस्थित किया। प्रदर्शन और जनसभा शान्तिपूर्ण ढंग से ही हो रही थी पर पुलिस वालों को महसूस हुआ कि प्रदर्शनकारी पुलिस विभाग को अपमानित करना चाह रहे हैं। कोतवाल से लेकर एस. पी. तक को कोतवाली पर प्रदर्शन और जनसभा करना ठीक नहीं लगा।
कोतवाल ने अचानक फैसला लिया कि प्रदर्शन व जनसभा दोनों रोक देना चाहिए। कलक्टर को ज्ञापन दे देने के बाद यहां प्रदर्शन करने की क्या आवष्यकता? यह क्या है किकृ‘मांगें पूरी करो या गिरफ्तारी करो, क्यों गिरफ्तारी करें क्या जेल में हराम का खाना मिलता है?’
कोतवाल एस. पी. से पूछ कर लाठियां भजवाने लगा। तीन चार फायर भी किये गये। सीधी-सादी जनता कोतवाली प्रागंण में लेट गई जैसा कि उन्हें पहले ही निर्देशित किया गया था। रामदयाल रणविजय पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष, रामप्यारे व कई समाजवादियों को पुलिस कहीं उठा ली गई। लेटी हुई जनता का पुलिस क्या करे, उनका क्या करे जिन्हें लाठियों की चोटें लगी थीं। दर्जनों आदमियों के ष्शिर फूट गये थे और वे खून से लथ-पथ थे।
कोतवाली का सारा समाचार सुनकर कलक्टर हलकान हो गया उसे पुलिस की इस कार्य संस्कृति पर गुस्सा आया। देश आजाद हो गया पर पुलिस का अंग्रेजी मन नहीं बदला, वहीं अंग्रेजों वाली मार-पीट, हत्या गिरफ्तारी और दमन। कलक्टर फौरन कोतवाली आया। प्रदर्शनकारियों को पुलिस वालों ने कलक्टर के आने पहले ही एक स्कूल में कैद करवा लिया था और चोट खाये लोगों को अस्पतालों में भरती करा दिया था। प्रमुख नेताओं को कहीं अज्ञात स्थान पर पहुंचाया जा चुका था।
सारा कुछ जो भी कोतवाली पर हुआ वह पुलिसिया खेल माफिक था। कलक्टर कुछ भी न देख पाया और न ही उसे संज्ञान में लिया गया, कोतवाली पर बैठे एस. पी. ने साफ कहा...कृकृ
‘लात के आदमी बात से नहीं मानते। कलक्टर को ज्ञापन दे देने के बाद कोतवाली पर आने का क्या मतलब?’
कलक्टर एस. पी. की राजनीति समझता था। वह जानता था कि प्रदेश का मुख्यमंत्राी उसकी जाति का है वह नहीं चाहता कि एक दूसरी जाति का रामदयाल जैसा नेता राजनीति में आगे बढ़े और इस स्तर का प्रदर्शन या जनसभा करे। वैसे भी एस. पी. अपने को मुख्यमंत्राी से कम नहीं समझता था। उसे तो मेरे खिलाफ भी राजनीति करनी है। वह प्रतिक्रिया में भी हो सकता है कि कलक्टर जो दलित है वह अपने समुदाय का हित देख रहा है तथा प्रदर्शन को बढ़ावा दे रहा है।
एस. पी. एक तीर से दो निशाने मार कर मस्त था। उसे तनिक भी चिन्ता न थी कि उसने लाठियां भजवा कर तथा फायरिंग करवा कर गलत किया तथा निरीह व निरपराध जनता का अपमान किया है। एस. पी. तो मान कर चलता था कि कलक्टर दब्बू है उसे क्या मालूम कानून व्यवस्था का मतलब? पर कलक्टर तो कलक्टर था। वह स्कूल जाकर प्रदर्शनकारियों से मिला तथा सुबह होते ही आकस्मिक गिरफ्तारी से मुक्त करवा दिया पर कलक्टर चाह कर भी रामदयाल, रणविजय, राम प्यारे, पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष तथा अन्य तीन समाजवादियों को रिहा न करवा पाया, जिनके ऊपर एस. पी. ने शान्ति भंग जैसे कई अपराधों की एफ. आई. आर. करवा दिया था।
कलक्टर एस. पी. द्वारा कराये गये एफ.आई. आर. पर कुछ विचार करता कि दूसरे दिन उसे राजधानी बुला लिया गया और किसी दूसरे कलक्टर को उसके स्थान पर भेज दिया गया। जिस दिन नया कलक्टर मुख्यालय पर आया उसी दिन गिरफ्तार किये गये लोगों को रिमान्ड पर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
रामदयाल ने अपने मित्रा वकीलों को मना कर दिया था कि उन्हें जमानत पर रिहा नहीं होना। जब अपराध नहीं फिर काहे की जमानत। रामदयाल, रणविजय और पूर्व कांग्रेसी अध्यक्ष को गिरफ्तारी हालत में देखकर कचहरी के लोग आश्चर्य चकित थे। सरकार का क्या वह किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। आज यदि गांधी होते तो वे भी गिरफ्तार होते। रामदयाल को जनपद स्तर पर गांधी ही माना व समझा जाता।
कचहरी का दृय घृणास्पद था। सीनियर वकीलों ने अपने स्तर से पहला काम किया कि गिरफ्तार लोगों के हाथों से हथकडियां खुलवा दीं और पुलिस के रिमान्ड का कड़ा प्रतिवाद किया।
प्रतिवाद का परिणाम अच्छा निकला, न्यायालय ने गिरफ्तार लोगों को रिहा कर दिया तथा पुलिस से जबाब तलब किया कि उसने फर्जी आरोपों पर गिरफ्तारी क्यों किया। गिरफ्तार लोग जब रिहा हो गये फिर उन्हें कचहरी की भीड़ ने घेर लिया। उसी समय रामदयाल और रणविजय ने देखा कि वह मेम भी न्यायालय परिसर में दर्शकों के साथ खड़ी थी। भीड़ के कारण वह लैम्प पोस्ट बनी हुई थी। किसी तरह वह गिरफ्तार लोगों के पास आई और आने का कारण बताया कि वह प्रदर्शन में भाग लेने के लिए आई थी पर ट्रेन स्थगित होने के कारण सही समय पर उपस्थित न हो सकी।
कचहरी की भीड़ ने रामदयाल को विवशकर दिया कि वे क्लाइन्ट शेड में प्रदर्शन और जनसभा के मुद्दों का खुलासा करें। रामदयाल ने बंजर-भूमि को वन-भूमि में हस्तांतरण का मुद्दा स्पष्ट रूप से बताया फिर तो पूरी कचहरी अवाक रह गई।
जहां कानून का खलिहान है, जहां कानून जीवन हासिल करता है वहां इस तरह के अवैध हस्तांतरण की कोई सूचना नहीं यह मामला तो दूसरी आज़ादीका है। कचहरी के लोगों ने गगनभेदी नारा लगाया...कृकृ
‘जो जमीन को जोते बोवे वह जमीन का मालिक होवै, वन विभाग मुर्दाबाद, जिला प्रशासन मुर्दाबाद।’ रामदयाल संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं।
रामदयाल कचहरी परिसर में अभूतपूर्व दृश्य देख रहे थे। यदि जनता से जुड़े सवालों पर जनतांत्रिक हस्तक्षेप किये जायें तो उसे हर वर्ग, हर समुदाय से जोरदार समर्थन मिलेगा। कचहरी के वकीलों का समर्थन वस्तुतः अभूतपूर्व था। बंजर-भूमि का वन-विभाग को हस्तांतरण जनता का सवाल बन चुका था। रामदयाल कचहरी का दृश्य देखकर आह्लादित थे किकृ‘चलो उन्होंने जनता का काम तो चुना, आजाद देश में जनता की दूसरी आज़ादीका।’
मेम सारा दृश्य देख कर प्रसन्न थी, उसने महसूसा कि रामदयाल का कद बहुत बड़ा है पर वह जल्दी में थी कि रामदयाल से मुलाकात हो। मेम की मुलाकात रामदयाल से तब हुई जब वे कचहरी से बाहर निकले। रामदयाल के साथ सभी गिरफ्तार लोग थे जिनमें रामप्यारे और रणविजय भी थे। मेम ने रामदयाल से कहा कि वह भी भूमि-हकदारी के लिए काम करना चाहती है। साथ ही साथ उसने सूचना दिया कि राजधानी की पुलिस ने भइयाराजा को गिरफ्तार कर लिया है।
रामदयाल और रणविजय स्थितिप्रज्ञ की तरह चुप थे तथा समय की विविध चालों में उलझे हुए थे वे जानते थे कि भइयाराजा का साम्राज्य शीघ्र से शीघ्र टूटने वाला है फिर वे महसूस करेंगे कि आसमान में उड़ना ठीक नहीं हुआ करता। लखनऊ के समाजवादियों ने रामदयाल को पहले ही सूचित कर दिया था कि जमीनदारी विनाश का स्थगन भी दस पन्द्रह दिन में समाप्त हो जाएगा फिर सरकार तीव्र गति से जमीनदारी विनाश का कार्य प्रारंभ करा देगी।
रामदयाल ने मेम से सीधे पूछा...
‘तुम क्यों जुडना चाहती हो भूमि हकदारी से? भइयाराजा से बदला लेना चाहती हो क्या?’
मेम थोड़ा झेप गई। सम्हल कर बोली...कृ
‘ऐसा नहीं है, मेरी रूचि है जनता से जुडना, उनके हितों के लिए संघर्ष करना। ऐसा मैं पहले से ही करती रही हूं।’
रामदयाल ने तुरन्त कहा...‘बहुत कठिन है जनता से जुडना और जनता का काम करना। यह तुम्हारे वश का नहीं सीधे लखनऊ लौट जा। वहीं कुछ कर।’
मेम प्रतिक्रियाहीन। वह तो सोच-समझ कर चली थी कि रियासत नहीं छोडना, जनता के बीच रहना, पर रामदयाल को विश्वास ही नहीं हो रहा।
मुख्यालय से ही पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और समाजवादी नेता लौट गये जब कि रामदयाल, रणविजय, रामप्यारे साथ साथ रामदयाल की कोठी पर आये। साथ में मेम भी थी। भइयाराजा की गिरफ्तारी के बाद वह भयमुक्त हो चुकी थी। रामदयाल के यहां आकर आश्वस्त थी कि उसे सहयोग ही नहीं संरक्षण भी मिलेगा।
अंग्रेज हाकिम लिली की ममा के साथ रामदयाल की कोठी पर देर रात तक आया। वह विन्ध्य क्षेत्रा की सांस्तिक धरोहरों के अध्ययन पर निकला था तथा सोन नदी के तटवर्ती क्षेत्रों का भ्रमण कर रहा था। मुख्यालय आने पर उसे मालूम हुआ कि रामदयाल और रणविजय को गिरफ्तार किया गया था तथा उन्हें रिहा भी किया जा चुका है सो वह रामदयाल की कोठी की ओर मुड़ गया।
बंजर-भूमि और वन-विभाग के मुद्दे को समझ कर अंग्रेज हाकिम की सीधी प्रतिक्रिया थी...कृ
‘अभी दूसरी आज़ादीकी जंग लड़ना बाकी है रामदयाल जी! जमीन प्रबंधन व उसके समान वितरण का सवाल इस देश के लिए बहुत बड़ा सवाल है और इस सवाल को शोषित व दमित जनता ही हल करेगी कोई दूसरा नहीं। उन्हीं में से नेतृत्व वर्ग पैदा होगा।’
‘हां डैड आप सही समझ रहे हैं रामदयाल ने रामप्यारे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि दूसरी आज़ादीसंभव है, रामप्यारे जैसे जुझारूओं को आगे लाने की आवश्यकता है।
रामदयाल के बाद अंग्रेज हाकिम ने रणविजय से पूछा...कृकृ
‘कब आये दिल्ली से रणविजय? मुझे मालूम हुआ कि मुजफ्फर की हवेली तुमने छोड़ दिया है।’
‘हां वहां अकेले रहना कठिन था।’ रणविजय ने संक्षिप्त उत्तर दिया।
‘लिली का कोई समाचार।’
‘कुछ नहीं, कोई समाचार नहीं मिला।’
‘समाचार तो मुझे भी नहीं मिला, लगता है उसके पांव जमीन पर नहीं हैं।’
दूसरे दिन वापस लौटते समय अंग्रेज हाकिम ने रामदयाल और रणविजय को सुझाया...
‘चाहे कितनी ही विपरीत स्थितियां हों दूसरी आज़ादीकी लड़ाई स्थगित न कीजिएगा।’
अंग्रेज हाकिम को आज़ादीके पहले वाला समय का ख्याल आया। हर तरफ इन्कलाब जिन्दाबाद, धरना, प्रदर्शन, सत्याग्रह पहले अंग्रेजों के खिलाफ अब अपनों के खिलाफ समय की आवश्यकता है। अचानक उसके मुंह से निकला
‘इन्कलाब जिन्दाबाद’
लिली की ममा ने चकराकर पूछा...
‘कुछ कहा आपने!’
‘हां इन्कलाब जिन्दाबाद’
इसका क्या मतलब? पूछा लिली की ममा ने
‘मतलब आजादी, आज़ादीकी लड़ाई, जो रामदयाल, रणविजय, रामप्यारे लड़ रहे हैं। तभी भइयाराजा जैसे लोग मिटेंगे। अंग्रेज हाकिम ने लिली की ममा को बताया, फिर सोच में पड़ गया। सोच में रामदयाल भी थे, उसने महसूसा...
‘रामदयाल जी गांधी के दूसरे संस्करण हैं। शाान्त, स्थिर, दृढ़ प्रतिज्ञ।’
अंग्रेज हाकिम को विदा करने के बाद रामदयाल दूसरी आज़ादीके बारे में सोचने लगे कौन लड़ेगा यह लड़ाई? सोच स्पष्ट थी...
‘रामप्यारे और रामप्यारे जैसे लोग।’
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हिंदी कथा साहित्य/रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "धरती कथा"
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रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास "धरती कथा"
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धरती-कथा
उपन्यास
मनीष पब्लिकेशनन्स
दिल्ली-11009
धरती-कथा
उपन्यास
रामनाथ शिवेन्द्र
मनीष पब्लिकेशनन्स
दिल्ली-11009
ISBN 978.81.953548.2.copy right रामनाथ शिवेन्द्र
प्रकाशक : मनीष पब्लिकेशन्स
471/10, ए ब्लाक पार्ट-2
सोनिया बिहार, दिल्ली- 110090
म्उंपस रूउंदपेीचनइसपबंजपवदे/हउंपसण्बवउ
मो0 नं0- 9968762953, 8447908066
मूल्य :कृ800/-
संस्करण : प्रथम 2021
आवरण : अमित भारद्वाज
शब्द संयोजन: असुविधा, अक्षर घर, हर्ष नगर, राबर्ट्सगंज, सोनभद्र
231216
मुद्रकःपूजा आफसेट, जगतपुरी, दिल्ली- 110093
उनको......
‘जिन्होंने झाड़ियॉ काटीं
बड़े बड़े माटी के ढूह काटे
समतल बनाया खेत को
कियारियॉ गढ़ीं
फिर बीज डाला, फसलें उगीं
जब खेत बन गया,जमीन समतल हो गई
फिर पता चला कि
सरकारी कागज में उनके नाम नहीं हैं
और फिर
अहिंसक गॉव हल्दीघाटी बन गया’
आखिर कब तक बन्द रहेंगे हम
आधुनिकता तथा उत्तर-आधुनिकता के
बाजार के कार्टूनों में?
किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने और न बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिन्दिगियों का नियामक भी है। लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है, उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता! उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है। इस खुली छूट के बाद भी उपन्यास अगर कुछ कर सकते तो प्रेमचन्द जी के उपन्यासों के सारे पात्रा आज गली गली, गॉव गॉव रोते चिचियाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ इसी लिए आधुनिक तथा उत्तर-आधुनिक उपन्यासों के केन्द्र में वे अब नहीं हैं। प्रेमचन्द कालीन उपन्यासों के नायक तो तब के हैं जब हम गुलाम थे, आज हम गुलाम नहीं हैं सो नायक चुनने का तरीका भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गये हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं, किसी भी गली में, किसी भी चौराहे पर, ललकारते हुए कि ‘अरे! भाई ‘हमसे का मतलब’। यह ‘हमसे का मतलब’ कोई निरर्थक एक वाक्य/मुहाविरा ही नहीं है, यह तो बहुत ही गहरे अर्थ-बोध वाला है, इसे खोलेंगे चाहें या इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जायेगा। तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे जो नायक हैं वे उपन्यासों से, कविताओं से बाहर निकल कर सड़क पर खड़े हैं, रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं, चुनाव लड़ने के लिए पर्चे खरीद रहे हैं, ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा न होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उसके सामने, ठीक उसके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है, वह जो आदमी बिला कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है ‘हमसे का मतलब’, वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा और न प्रतिरोध में कुछ कर रहा। वह ‘हमसे का मतलब’ का मंत्रा अपने मन में बिठाये तुलसीदास की चौपाई ‘कोउ होय नृप हमैं का हानि’ का पाठ कर रहा है।
तो कहा जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं और ‘हमसे का मतलब’ का पाठ कर रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘धरती कथा’ के सारे के सारे पात्रा किसी ‘पाठ’ में तब्दील हो चुके हैं, केवल पात्रा ही नहीं इसकी घटनायें भी ‘पाठ’ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित हैं। पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए और फटकार भी रहा है अगर तुम घटना के साक्षी हो तो...देखो और समझने की कोशिश करो के घटनायें कैसे घटा करती हैं,’ कैसे अपना नायकत्व सिरज लिया करती हैं और घटना के पात्रा, घटना का मुख्य किरादार होते हुए भी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर, बहुत दूर कूड़े की तरह फेंकाये हुए हैं, उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन और उसका घटना के घटितों द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो ‘घटित’ है वह घटना तो है ही उस घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत? जरा गुनिए जरूरत है क्या?
जरूरत तो नहीं है, मैंने पूरा प्रयास किया कि इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक रचूॅ पर ऐसा में न कर पाया, घटनायें जो खून आलूदा थीं वे लगातार मुझे घसीटती रहीं कभी मुझे बांयें की तरफ ले जातीं तो कभी दांये तरफ तो कभी आज के सत्ता-बाजार और उसके कौतुक की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्ता कौतुक में जो फस गया वह भी और जो रम गया वह भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धरती कथा का एक पात्रा सरवन ‘नायक’ की तमीज वाला था, वह करिश्मा जरूर करता पर उसकी हत्या कर दी गई। उसकी तथा उसके साथ नौ दूसरे नौजवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था। सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आश जगी थी कि ‘बबुआ’ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नये किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जॉच-पड़ताल की माया-जाल में उलझ कर रह गया। वह साहस करके पुलिसिया कार्यवाहियों के जाले को फलांगने तथा अदालती अदब के संस्कारों से निजात पाने की कोशिशें करता, पर एक कदम भी आगे बढ़ कर कथानक को कुलीन न बना पाया। सो कथानक कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि कथानक का अद्भुत होना उपन्यास के लिए अनिवार्य हुआ करता है।
तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथ ही अपनी संपूर्ण बौधिकता के साथ अलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गॉव भी आपको मिलेगा जो उपन्यास का केवल कथानक ही नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंच कर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गॉव आपको कैसा लगा, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में।
जून 2021
begining
‘पैर तो जमीन पर ही चलेंगे!
चलिए, चलते हैं कुछ दूर धरती कथा के साथ...’
‘गॉव के दस लोगों के मारे जाने के बाद गॉव खामोश हो गया है, कोई नहीं रह गया है गॉव में, सभी लाशों के पास मुह बाये खड़े हैं। क्या छोटे क्या बड़े क्या औरत क्या मर्द, सभी खामोश और चकित हैं। खामोश तो धरती-माई भी हैं आखिर क्या हो गया गॉव में? क्या ऐसा ही समय देखने के लिए वे उतरीं थी धरती पर, यह समय का हेर-फेर है, कोई क्रीड़ा-कौतुक है, क्या है यह आखिर? धरती-माई अपना माथा पकड़ कर चिन्तन की दुनिया में चली जाती हैं...चिन्तन की दुनिया में तो अन्धेरा है, सन्नाटा है, चित्त कहीं और धक्के खा रहा है तो चेतना किसी गटर में बज-बजा रही है। वे भावुकता के परतीय क्षेत्रा की तरफ लौटती हैं फिर तो उनकी ऑखें भर भर जाती हैं...उन्हें कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा, वे ऑचल से ऑखें पोंछती हैं फिर भी...ऑखों से लोर बह जाने के बाद अचानक उनकी ऑखों में हिलोरें उठ जाती हैं हर तरफ खून ही खून, वे कॉप जाती हैं... वे तो धरती पर अवतरित हुईं थीं धरती को हरा-भरा बनाने के लिए, पेड़-पौधे उगवाने के लिए, अन्न उपजवाने के लिए, भूख और भोजन की दूरी पाटने कि लिए पर यहां तो खून हो रहा है, कतल हो रहा है, सभ्यता का यह कैसा खेल है? धरती-माई गुम-सुम हो गयी हैं, आइए चलते हैं...धरती-कथा के साथ....’
इस धरती कथा के दो पुराने पात्रा हैं, दोनों बूढ़े हैं सोमारू व बुझावन, वे पड़े हुए हैं अपनी खटिया पर। वे कराह रहे हैं, रो रहे हैं, चाह कर भी नहीं जा सकते घटना स्थल पर सो खुद पर रोते हुए अपने बाल-बुतरूओं को कोस रहे हैं सोमारू..
‘हम तऽ पहिलहीं से बोल रहे थे, छोड़ दो गॉव चलो कहीं दूसरी जगह चलें वहीं बस जायेंगे इहां का धरा है। मर मुकदमा जीन लड़ो पर नाहीं मुकदमा लड़ेंगे...’
बुझावन भी गुस्से में हैं...
‘हम जानते थे कि कउनो दिन कतल होगा हमरे गॉयें में। जमीन ओकर होती है जेकरे हाथ में लाठी होती है, ओकर नाहीं जो खाये बिना मर रहा है, जेकरे घरे में चूल्हा जलना मुहाल है।’
‘अब भोगो, दस लाल लील गई यह धरती। अउर जोतो जमीन, खेती करो, जेकरे पास जॉगर है वोके का कमी है, जहां पसीना बहाओ वहीं कुछ न कुछ मिलेगा। जाने कहां सब मरि गये कउनो देखाई नाहीं दे रहे हैं, अरे! हमहूॅ के ले चलो लालों के पास। उहां ले चलो जहां धरती माई ने खून पिया है हमरे लालों का, केतनी पियासी है यह धरती?’
पर वहां है कौन जो उन्हें लाशों की तरफ ले जायेगा। सभी तो लाशों के पास
हैं। जहां लाशें गिरी हैं। वह खेत दो किलोमीटर दूर है गॉव से, कई ढूह पार करो, ऊबड़, खाबड़ जमीन नापो तब पहुंचो वहां। वे तो खुद वहां जाने में समर्थ हैं नहीं, सो पड़े हुए हैं खटिया पर कराहते और सिसकते हुए नाहीं तऽ ओहीं जातेे।
खटिया पर बैठे हुए वे चिल्ला रहे हैं...
‘अरे हमहूं के ले चलो लालों के पास ओनकर मुहवा तऽ देख लें’ पर कोई नहीं सुन रहा उनकी, वहां है ही कौन?
सोमारू और बुझावन दोनों अपनी उमर जी चुके हैं। पिछले साल ही सोमारू को लकवा मार गया है और बुझावन को टी.बी. ने जकड़ लिया है। खॉसते रहते हैं हरदम, खॉसते खांसते बलगम निकल जाता है, पूरी बोरसी भर जाती है दिन-रात में। ऊ तो उनकी छोटकी पतोहिया है कि रोज बोरसी साफ कर दिया करती है और गोइठे की राख भर दिया करती है उसमें। उनका छोटका बेटवा बबुआ खूब खूब है वह बुझावन को खटिया पर छोड़ कर कमाने के लिए कहीं बाहर नहीं गया न कभी जायेगा। उनके दो लड़के तो चले गये हैं गुजरात, वहीं कहीं कारखाने में काम करते हैं। बुझावन कहते भी हैं मेरे छोटका लड़िकवा को देखो वह साक्षात सरवन कुमार है।
सोमारू और बुझावन दोनों जनों को नहीं पता है कि भयानक गोलीकाण्ड में का हुआ है, कौन कौन मरे हैं। दोनों शक कर रहे हैं अपने लड़कों के बारे में। सोमारू तो मान कर चल रहे हैं कि उनका सरवन ही मारा गया होगा, बहुत बोलाक है, दतुइन-कुल्ला कर सीधे भागा था खेत की तरफ। वे पूछते रह गये थे उससे..
‘कहां जाय रहे हो सबेरे सबेरे, पर नहीं बताया था कुछ भी और दौड़ पड़ा था खेत की तरफ।’
बुझावन अपनी कहानी लेकर बैठे हुए थे। उनका छोटका लड़का ही तो मुकदमा लड़ रहा था सरवन के साथ, वही दोनों गॉव को गोलबन्द किए हुए थे। उन्हें निशाने पर लिया होगा हत्यारों ने।’
कई बार बुझावन ने उसे रोका था ....
‘देखो मर मुकदमा के चक्कर में जीन पड़ो, गरीब आदमी मुकदमा नाहीं लड़ते, ई जो नियाव है नऽ वह गरीबों के लिए नाहीं होता है। गरीब आदमी का तो एक्कै काम है बड़े लोगों को सलाम करना अउर उनकी सेवा-टहल करना। पर नाहीं माना, बोलता है कि अब कउनो राजा कऽ राज है, अब तो ‘लोकतंतर’ है। हमहू आदमी हैं सो काहे डरंे केहू से, हम मुकदमा लड़ेंगे अउर हाई कोरट तक लड़ेंगे।’
अचानक बुझावन पूरी तरह से उतर गयेे गॉव की गाथा में। उन्हें याद आने लगे हैं उनके बपई। जो गोड़ बिरादरी के चौधरी थे, बहुत ही रोब-दाब था उनका। क्या मजाल था कि उनकी बिरादरी का कोई आदमी उनका हुकुम टाल दे। गॉव-घर में गलती-सलती करने पर जाने कितनों को पेड़ से बंधवा कर मारा करतेे थे पर थे सही आदमी। नियाव के लिए कुछ भी कर जाते थे, डरते तो किसी से नहीं थे चाहे मैदान का राजा उनके सामने आ जाये या जंगल का राजा शेर, भिड़ जाते थे दोनों से।’
गॉव के खातिर वे भिड़ गये थे बड़हर महाराज से। याद आ रहा है सारा कुछ बुझावन को। बड़हर रियासत का मनीजर गॉव में आया था घोड़े पर सवार हो कर ‘खरवन’ वसूलने। उससे भिड़ गये थे बुझावन के बपई...
‘ई का हो रहा है साहेब? का वसूल रहे हैं, हम लोग एक छटांग भी नाहीं देंगे ‘खरवन’ में, ई गॉव हमलोगों को महाराज ने माफी में दिया है फेर काहे का खरवन दें हमलोग।’
तूॅ तूॅ मैं मैं होने लगी थी। बिरादरी के सभी छोटे बड़े गोलबन्द हो गये थे, का करते मनीजर भाग चले रियासत की ओर।
बुझावन को याद है कि ‘जब जब तक बड़का महाराज थे उनके बाद छोटका महाराज राजा बनेे उनके जमाने में भी गॉव से एक छदाम भी ‘खरवन’ के नाम पर नाहीं गया था रियासत में। फेर बाद में जाने का हुआ के रियासत को ‘खरवन’ दिया जाने लगा। वही नेम चलता रहा बपई के जमाने तक। जो आज तक चल रहा है।’
‘ओ समय गॉये गॉये गॉधी बाबा का जोर था। हमरहूं गॉये में कंग्रेसी नेता-परेता आया-जाया करते थे। एक बार तो हमरे बिरादरी का भी नेता आया था हमरे गॉयें में जो म.प्र. के आदिवासी सटेट का राजा था। हमरे राजा साहेबओकरे संघे थे। वे लोग नारा लगवाया करते थे। संघे संघे हमहूं लोग नारा लगाया करते थे...’
‘सुराज आयेगा सुराज आयेगा’ ‘जनता कऽ राज होगा, अब परजा ही राजा होगी, कोई रेयाया नहीं होगा।’
‘गॉधी बाबा की जय’ अउर न जाने का का नारा लगाया करते थे हमहूं लोग,लइकई कऽ बात है खियाल नाहीं पड़ि रहा कुलि नरवा।
एक दिन बड़हर राजा का करिन्दा हमरे गॉये आया उसके साथ कई आदमी थे। सारे आदमी ‘पटेवा’ लिए हुए थे। ‘पटेवा’ पर मिठाइयों की भरी ‘दौरी’ थी, करिन्दा गॉव वालों को बुला कर मिठाइयॉ बांटने लगा।
‘काहे मिठाइयॉ बाट रहे हो करिन्दा साहेब...’पूछा था बपई ने
‘नाहीं जानते का...?’
‘आजु हमार देश आजाद हो गया है, अंग्रेजवा भाग गये हैं, अब हमरे देश के लोगन की हुकूमत होयगी, आपन राज होगा, हमरे पर कोई जोर-जबर नाहीं करेगा।’
‘पहिले का था हो करिन्दा साहेब...?’ पूछा था गॉव वालों ने कारिन्दा से
‘पहिले गुलाम था नऽ हमार देश, हमलोगन पर हकूमत अंग्रेजों की थी’
‘कइसन गुलाम हो करिन्दा साहेब...?’
‘हमलोग तऽ कुछु नाहीं जानते, केके बोलते हैं गुलामी अउर के के बोलते हैं अजादी।’
करिन्दा साहब से पूछ बैठे नन्हकू काका, वे हमरे बपई के छोटका भाई थे। थे तो बहुत बातूनी अउर सवाल खूब पूछा करते थे। बाद में पता चला कि ननकू काका जानते ही नहीं थे कि गुलामी का होती है। ऊ जमनवो तऽ उहय था कोई पढ़ा लिखा था नाही गॉयें में, अब ससुर के जाने का होती है गुलामी अउर का होती है आजादी। ओ समय हम लोगन कऽ जिनगी राजा साहेब से शुरू होती थी अउर राजा साहेब पर जा कर खतम जाती थी। राजा साहब का हुकूम हमलोगन के सर-माथे पर हुआ करता था।
‘ओ दिना हमलोग जाने के हमार देश आजाद हो गया है। पहिले तऽ हमलोग जानते थे कि बड़हर राजा ही हमरे राजा हैं, हमलोगन के का मालूम के हमरे राजा भी अंग्रजों के गुलाम ही थे। अंग्रेज ही देश के राज-महाराजा थे।’
‘साल दुई साल गुजरा होगा कि गॉये गॉये हल्ला मच गया। ई जो खेत कियारी है नऽ, खेती बारी कऽ जमीन है नऽ, ऊ सब ओकर है जे एके जोतत होय... जेकर जमीन पर कब्जा होय, जोतै वाले के नामे से जमीन होय जायेगी, तब हमैं खियाल आया पहिले का एक नारा..
‘जे जमीन के जोतेय कोड़य ऊ जमीन कऽ मालिक होवै’
कंग्रेसी सरकार ने ई ऐलान कर दिया है, अब न कोई राजा रहेगा न परजा, सब बराबर होय गये हैं, सब कर जगह-जमीन पर बराबर कऽ हक है।’
‘ओ समय लोग कहते थे कि सब की रियासत टूट गई जमीनदारी टूट गई। अब जे खेत का जोतदार है उहै ओकर मालिक है, अब ‘लगान’, ‘खरवन’, ‘चौथा’ राजा को नाहींें देना पड़ेगा, कानून बनि गया है।’ हमरे बाप-दादा खबर सुन कर मस्त होय गये थे कि अब राजा के मनीजर को जो ‘खरवन’ दिया जाता है नाहीं देना पड़ेगा अउर साल में एक गाय अउर बछवा भी नाहीं देना पड़ेगा। खेती-बारी के समय माफी में दस दिन बिना मजूरी काम नाहीं करना पड़ेगा। बाद में जाने का हुआ के कागजों के हेर-फेर में एक दूसरे आदमी आ गये गॉयें में कहने लगे कि गॉव की सारी जमीन अब उनके नाम से हो गई है। कांग्रेसी सरकार ने उनकी संसथा के नाम से गॉये कऽ कुल जमीन कर दिया है, अउर संसथा को गरीबों आदिवासियों के विकास के लिए नई सरकार ने बनाया है। पूरा गॉव घबरा गया था सुन कर, आसमान से गिरे अउर खजूर पर लटकि गये। लो अब संसथा वाले आय गये! राजा साहब कउन खराब थे, ओनसे तो निभ गई थी अब एनसे कैसे निभेगी? अउर तब हम आजाद कहां हुए, हम तऽ रहि गये गुलाम के गुलाम।’
पूरा गॉव भागा भागा गया था महराज के ईहां, उहां हाजिरी लगाया...
‘ई का सुनाय रहा है महाराज! एक संसथा वाला आया था बोल रहा था कि हमहन कऽ गॉव ओकरे नामे से होय गया है अब ओके खरवन देना होगा, खेती करने के बदले। का बात है महाराज आप सही सही बतायें हुजूर।’
‘हॉ हो तूं लोग सही सुने हो, जमीनदारी टूट गई है नऽ, हमहूं अब राजा नाहीं रहि गये। हमरौ सब जमीन छिना गई है, जउने जमीनियन पर हमार जोत-कोड़ है यानि सीर है बस ओतनै हमरे नामे से रहेगी नाहीं तऽ बाकी सब सरकार ने छीन लिया है। ऊ ओकरे नामे से होय गई है जेकर जोत-कोड़ था ओ जमीनी पर।’
‘महाराज जोत-कोड़ तऽ हमलोगों का है फेर हमहन के जोत-कोड़ पर संसथा का नाम कैसे होय गया। ईहै तो समझ में नाहीं आय रहा है...’
महाराज खामोश हो गये, उनके पास कोई जबाब नहीं था। उन्हें खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जमीनदारी तोड़ने की क्या प्रक्रिया है, वे लगातार अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि जमीनदारी बचाई जा सके।’
महाराज ने अनुमान लगाया कि जमीनदारी टूटते समय ही संसथा वालों ने हेर-फेर करके संस्था का नाम चढ़वा लिया होगा। वैसे राजा ने भी संस्था वालों के नाम से कुछ बीघे जमीन का पट्टा संस्था वालों के पक्ष में पहले ही कर दिया था पर आदिवासियों की जमीनों को छोड़ दिया था।
महाराज तो खुद टूटे हुए थे। उनकी रियासत तोड़ दी गई थी, वे परजा बन चके थे। जमीनदारी तोड़े जाने के खिलाफ वे मुकदमा दाखिल करने के फिराक में थे। बडे़ बड़े वकीलांे से सलाह-मशविरा कर रहे थे।
नन्हकू काका थे तो बातूनी पर चालाक भी बहुत थे। थोड़ा बहुत कागजों के खेल के बारे में जानते थे। उन्हें पता था कि नई दुनिया कागजों वाली है। जमीन पर जिसका जोत-कोड़ होता है उसके नाम से ही कागज बनता है। अंग्रेज एक बिस्वा जमीन का भी कागज बनवाया करते थे। उनका गॉव राजा साहब की जमीनदारी का गॉव था सो उसका कागज राजा साहब के नाम था। राजा साहब ने आदिवासियों को जो जमीन दिया था उसका रियासती पट्टा कर दिया था। अंग्रेज बिना कागज के कुछ काम नहीें करते थे।
नन्हकू काका रियासत से अपने गॉव लौट आये और जमीन का कागज तलाशने लगे। पूरे गॉव में खबर फैल गई कि अब जमाना कागजों वाला है सो राजा साहब ने जो पट्टा दिया था उसका कागज खोजो...
पूरा गॉव कागज खोजने लगा... कागजों की खोज में गॉव पसीना बहा रहा है.गॉव था ही कितना बड़ा यही कोई चार पॉच घरों की बस्ती। फूस के मकान, फूस की दिवालें...और करइल माटी की जमीन। फूस के घेरों से बने घर, घर क्या किसी के पास एक कमरा तो किसी के पास दो कमरा। किसी के पास बांस की चारपाई तो किसी के पास वह भी नहीं। लेवनी, फटे कंबल, कथरा, एक दो चादर ओढ़ने व बिछाने के नाम पर बस इतना ही... और सामान रखने के लिए...टीन के छोटे बक्से किसी घर में वह भी नहीं, वैसे रखना भी क्या था, क्या था ही आदिवासियों के पास। जंगली गॉव था, लेन-देन की परंपरा थी, कोइरी अनाज ले कर तरकारी दे दिया करता था, बनिया अनाज लेकर कपड़ा और परचून का सामान दे दिया करता था। कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो रोजाना गॉव आते थे और दारू खरीदते थेे। दारू से कुछ कमाई हो जाया करती थी गॉव वालों की। इसी कमाई से आदिवासियों का गुजारा होता था।
पूरा गॉव दारू चुआने में माहिर था। हर घर में एक अड़ार था। बर्तन में महुआ सड़ रहा होता था, खमीर उठने पर दारू चुआना शुरू होता था।
गॉव की यह ब्यवस्था जो सरकारी तो नहीं थी पर समझदारी से पूर्ण थी वह थी आपसी सहयोग की। एक दिन में एक ही घर में दारू चुआई जाती थी दूसरे घर में नहीं। पूरे साल यही क्रम चलता था। बारी से बारी से दारू चुआना और उसे बेचना यह कुटीर उद्योग की तरह था। यह कब से था किसी को नहीं मालूम। वहां की दारू का गुण-गान गरीब गुरबा ही नहीं जमीनदार किसिम के रईस भी किया करते थे। लोग बताते हैं कि होली, दशहरा के पहले वहां की दारू खरीदने के लिए मारा-मारी तक हो जाया करती थी। इलाके के लोग खास त्याहारों के लिए वहीं से दारू खरीदा करते थे।
घरों के सारे बर्तन देख लिये गये, एक दो जो बक्से थे वे जाने कितनी बार देखे गये पर कहीं पट्टा वाला कागज नहीं मिला। कागज होता तो मिलता, कागज तो था ही नहीं फिर मिलता कैसे।
नन्हकू काका को सिर्फ इतना मालूम है कि राजा साहब का कारिन्दा पट्टा का कोई कागज बहुत पहले दे गया था। कागज देने के बदले में एक बकरा भी हॉक ले गया था और दो बोतल दारू उपरौढ़ा से लिया था। उस कागज को किसने रखा यह उन्हें याद नहीं। वह जमाना कागजों वाला था भी नहीं, जुबान वाला था, गर्दन कट जाये भले पर जुबान न कटने पाये। नन्हकू काका माथ पकड़ कर बैठ गये।
वैसे नन्हकू काका थक-हार कर बैठने वालों में नहीं थे। दारू बेचने का अगवढ़ ले कर वे एक दिन मीरजापुर पहुंच गये, मीरजापुर ही तब जिला था।
नन्हकू काका दूसरी बार मीरजापुर आये थे। एक बार तब आये थे जब उन्हें माई के दर्शन के लिए विन्ध्याचल धाम जाना था और फिर इस बार कागज तलाशने। मीरजापुर पहुंचने पर उन्हें ख्याल आया एक वकील का, जो कुछ महीने पहले ही उनके गॉव आया था और हिरन की खाल के लिए रिरिया रहा था। हिरन की खाल किसी ने उसे नहीं दिया सभी ने बोल दिया कि नहीं है खाल। ये नन्हकू काका ही थे जो उसकी रिरियाहट से पसीज गये थे और वकील को हिरन की एक खाल इन्तजाम करके दिया था। वकील बहुत परेशान था उसका लड़का बीमार था किसी तांत्रिक ने उसे बताया था कि हिरन की खाल पर बैठ कर ही तंत्रा-साधना करनी होगी।
नन्हकू काका वकील का नाम याद करने लगे..कौन था वह वकील, का नाम था उसका, बहुत ही चाव से उनकी बनाई दारू पिया था और अपनी जीप में एक मटकी रख भी लिया था...
‘ऐसी दारू मिलती कहां है?’ उसने कहा था
कोई बात नाहीं, नाम नाहीं याद रहा तो का हुआ कचहरी में तो पहचना जायेगा ही, यही होगा कि उसे खोजना होगा पूरी कचहरी मंे।
नन्हकू काका कचहरी करीब बारह बजे पहुंचे। पैदल ही मीरजापुर जाना था कलवारी से होते हुए लालगंज फिर मीरजापुर। तीन दिन से पैदल ही चल रहे थे, पैर सूज गया था पर हिम्मत थी, सो तनेन थे और कड़क भी...कचहरी पहुंच कर लगे खोजने वकील को। तब कचहरी नाम में तो बड़ी थी पर आकार मेंआज के मुकाबिले बहुत ही छोटी थी। खोजते, खोजते नन्हकू काका जा पहुंचे वकील के पास...
वकील काका को न पहचान पाया, तीन साल पहले की बात थी वह भूल चुका था काका को। काका ने उसे याद दिलाया फिर उसे याद आया हिरन की खाल से। वकील चौंक गया...
‘अरे! नन्हकू तूॅ...’
‘ईहां काहे आये हो, का बात है...का कउनो काम आ गया कचहरी का..?’
‘हॉ सरकार तब्बै तो ईहां आया हूॅ’ नन्हकू ने बताया
‘का काम है हो, बताओ तो..’
नन्हकू काका ने वकील को काम बताया। जमीन कऽ काम है सरकार! राजा साहब ने हमारे खानदान वालों को जमीन पट्टा में दिया था। ऊ जमीन पर हमलोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। ओ जमीनी केे हमरे बाप-दादों ने काट-पीट कर समतलियाया था, कियारियॉ गढ़ी थीं फिर खेती बारी शुरू हुई थी अउर आज भी हमलोग उसे जोत कोड़ रहे हैं। वह जमीन कउनो संस्था वाले के नाम से होय गई है। एही के पता लगाना है सरकार के हमलोगों के जोत-कोड़ वाली जमीनिया केकरे नामे होय गई!
‘ठीक है नन्हकू! हम आजै पता लगा लेते हैं पर ई बताओ एतना दिना कहां थे? जमीनदारी टूटे तो चार साल होय गया, ई सब काम तो वोही समय कर लेना चाहिए था।’
‘का बतावैं सरकार! हम लोग ठहरे जंगली, हम लोग का जानते हैं कानून-फानून के बारे में कि का होता है कानून। हम लोग का जानते साहेब ऊ तो संसथा के दो आदमी गॉव में आये थे। जमीन देखने लगे, खेती के बारे में पूछने लगे कौन कौन जोता कोड़ा है किसकी फसल है। हम लोगों ने सही सही बताय दिया और वे लोग उसे कागज पर उतार भी लिए। फिर बाद में पूछने लगे..राजा साहब को खरवन में केतना रुपिया देते हो तुम लोग?’
हमलोगों ने बता दिया कि पहिले एक पैसा बिगहा दिया जाता था अउर अब तीन आना बिगहा दिया जाता है।
‘तो अब वह खरवन तूॅ लोग हमारी संस्था को देना, इस गॉव की सारी जमीन हमलोगों की संस्था के नाम से होय गई है।’
‘ओही दिना हम लोग जाने सरकार कि जमीन का कागज बनता है। तब हम लोग पता करने लगे कि हमलोगों की जमीन का कागज बना है कि नाहीं।’
वकील चला गया कागज के बारे में पता करने किसी आफिस में, नन्हकू काका वहीं बैठे रहे। करीब एक घंटे बाद वकील वापस लौटा और नन्हकू काका को बताया। उससे काका हिल गये...
‘अब का होगा सरकार! कैसे चढ़ेगा हमलोगन कऽ नाम कागज पर। अगोरी से भाग कर तो बड़हर आये थे, राजा साहब ने बसाया था हम लोगों को, अब कहां जायेंगे इहां से उजड़ कर। पहिले तो जंगल काट कर जमीन बना लेते थे हम लोग अब तो जंगल का एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते। नन्हकू काका माथा पकड़ लिए।’
‘नन्हकू! तूॅ लोगों का नाम नाहींें लिखा है जमीन पर ओपर कउनो संस्था का नाम लिखा हुआ है, कहां की है यह संस्था, जानते हो का? एक काम करना तूॅ लोग जमीन पर से कब्जा कभी नाहीं छोड़ना, बूझ गये नऽ मेरी बात। जोत-कोड़ में संस्था वाले दखल करंेगे या मारपीट करेंगे तो तो सीधे चले आना मेरे पास। हम देख लेंगे संस्था वालों को। हम अजुएै एक दरखास लगाय देते हैं देखो का होता है ओमें...’
नन्हकू काका को को कुछ पता नहीं था कि कैसे कागज बन गया संसथा वालों का। जोत-कोड़ के हिसाब से कागज बनना था तो संसथा वालों का कैसे बन गया। वकील ने साफ बताया काका को कि घपला किया गया है कागज बनाने में।
मीरजापुर में ननकू काका ने एक मुकदमा दाखिल करा दिया...
‘साहब आप देखो हमलोगांे का मुकदमा, आपका खर्चा-पानी देने में कमी नाहीं करेंगे हमलोग।’ वकील से बोल-बतिया तथा मुकदमा दाखिल करा कर नन्हकूं काका वहां से गॉव लौटआये।
गॉव में सन्नाटा पसरा हुआ था जाने का हो मीरजापुर में। काका की बातें सुनकर गॉव सन्न हो गया...गॉव वालों ने पूछा काका से...
‘अब का होगा काका?’
‘का बतावैं हो, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, एक बात है वकील ने कहा है कि जमीन पर से कब्जा न छोड़ना, तो समुझि लो के हमलोग कउनो तरह से कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’
यह आजाद भारत का नया कानून था कागजों पर लिखा हुआ जो नन्हकू काका को कुदरती जमीन से बेदखल करने वाला था। ऐसी जमीन से जिसे किसे ने नहीं बनाया, जिसे किसी ने नहीं रचा, उसे खेती करने लायक बनाया नन्हकू काका के पसीने ने, पसीने ने ही उसे समतल किया, कियारियां गढ़ीं। देश आजाद होते ही किसिम किसिम के मालिक उग गये धरती पर, किसिम किसिम की धरती-कथा लिखने लगे। पहिले के जमाने में धरती-कथा लिखने वाले जो राजा थे, मालिक थे, वे टूट रहे थे और दूसरे किसिम के लोग धरती-कथा लिख कर राजा बन रहे थे।
धरती-माई देख रही हैं मानव सभ्यता का कानूनी खेल, किस तरह की व्यवहार-संस्कृति उग रही है धरती पर झाड़-झंखाड़ की तरह। व्यवहार-संस्कृति के कागजी झाड़-झंखाड़ को कौन साफ करेगा? नन्हकू काका जैसे पसीना बहाने वाले तमाम लोग कागजों के राजनीतिक व कानूनी खेल में फंस गये हैं धरती में, धरती ने उन्हें लील लिया है। ऐसे लोग जो धरती पर अपनी जिन्दगी लिखते हैं, धरती को जो चूमते हैं। धरती की दरारों में पैर फंस जाने के बाद भी जो धरती को प्रणाम करते हैं, गरियाते नहीं हैं, इनका क्या होने वाला है? कौन बता सकता है? क्या धरती माई बोलेंगी कुछ इस बारे में?
क्रियाशीलता की उर्वर जमीन
और कथा का विस्तार...
‘धरती-माई नहीं बोल रही कुछ, वे भी उलझ गई हैं कागजों व कानूनों की जाल में, जाल भी ऐसी कि कोरोना जैसा विष-अणु भी फस कर मर जाये उसमें। पर धरती-माई तो देवी हैं, दृश्य भी, अदृश्य भी वे निकल ही जायेंगी उसमें से बाहर। वे कहीं भी रहें का फर्क पड़ता है उनकी कथा, रियासत व कानून के जालों से निकल कर जा रही है खेतों-खलिहानों की तरफ, रियासत के लंहगे में नहीं, माथे पर हुकूमत का ताज नहीं, पॉवों में आजादी की पायल, कानों में कानून का कनफुल पहन कर, देखना है रियासत के पिजड़े से निकली धरती-कथा के पॉवों में छाले पड़ते हैं कि नहीं! अपनी ही निर्मित खुरदुरी धरती पर चलते हुए। अरे! यह क्या है भला किसी कथा के पॉवों में छाले पड़ सकते हैं, कथा तो देह-धारी होती नहीं, देह-धारी तो धरती-माई भी नहीं हैं, इससे का हुआ? वे जब धरती पर मानव-रूप में उतर ही आई हैं फिर तो उनके साथ भी धरती की व्यवहार-संस्कृति ही काम करेगी. उनकी धरती-कथा भी चोटिल व घायल होगी...’
नन्हकू काका नहीं जा पाये थे दुबारा मीरजापुर। मीरजापुर से लौट कर आये, और खेती के काम में जुट गये। रोपनी चल रही थी काका खेत जोत रहे थे, खेत तैयार करना था। रोपनी लायक खेत कम से कम तीन बाह(जोत) में तैयार होता है एक दम गिलावे की तरह खेत की माटी बनानी पड़ती है तब जाके रोपाई होती है ओमे धान का बान आराम से घंसता है बिना जोर लगाये, नाहीं तऽ पनियय पर पउंड़ता रहता है। काका को मना किया बुधनी काकी ने.. खेत मत जोतो, पानी बरस रहा है, तोहैं पहिलहीं से जोकाम है, खांस रहे हो, निमोनिया होय जायेगा पर काका काहे मानैं, लगे रहे खेत जोतने में और काफी भीग गये फेर क्या था दूसरे दिन बुखार चढ़ गया, दर-दवाई हुई पर काका नाहीं संभले।
गुजर गये कई साल, समय बीतते देर नहीं लगती, मीरजापुर जिला भी बट गया, एक नया जिला सोनभद्र बन गया। सारा मुकदमा सोनभद्र की अदालतों में चलने लगा। पूरे गॉयें का मुकदमा था, सबकी रोजी-रोटी जमीन से जुड़ी थी, कैसे छूट जाती मुकदमे की पैरवी? नन्हकू काका की जगह पर गॉव के नौजवान लड़के मुकदमे की पैरवी करने लगे।
सरवन, बबुआ, रजुआ और सुमेरना मुकदमे की पैरवीकारों में थे जिसे मौका मिलता वही कचहरी जा पहुचता। नन्हकू काका के बाद बहुत मुश्किल हो गया था कि मुकदमे की पैरवी कौन करेगा, सोमारू और बुझावन काका दोनों ने नकार दिया
था कि उनसेे मर-मुकदमे का काम नाहीं बनेगा। सोमारू ने कहा था...
‘देखो भइया अगर बोंग(लाठी) से कुछौ लिखना होय तऽ हमसे बोलो, जौन कहोगे हम लिख देंगे चाहे पीठी पर चाहे जहां, पर कागज के झमेले में हमैं जीन डालो, कायदे से तऽ हम नोटौ नाहीं गिन पाते हैं, हम का करेंगे मुकदमे की पैरवी।’
बुझावन मुकदमे की पैरवी के नाम पर हाथ जोड़ लिये थे, गॉव में कोई तैयार नहीं था उस समय। सरवन मुकदमे के बारे में जानता था, हाई स्कूल तक पढ़ा था वह भी असली वाली पढ़ाई, नन्हकू काका के पास बैठा भी करता था, मुकदमे का कागज पत्तर संभालता था तथा जान गया था, खसरा तथा खतौनी के बारे में।
सरवन उत्साही भी खूब खूब था उसने संभाल लिया मुकदमे का काम। नन्हकू काका के जमाने में गॉव भर से मुकदमा लड़ने के लिए चन्दा लिया जाता था जो बिगहे के अनुसार होता था, गॉव के लोग उत्साह से चन्दा दते भी थे। उनके लिए था कि उनकी धरती-माई को उनसे कौन छीन सकता है? हम लोग धरती-माई की पुजहाई करते हैं, तपावन देते हैं, माई को परसाद चढ़ाते हैं। कौन माई का लाल है जो हमसे हमारी धरती-माई छीन लेगा? सरवन अक्सर बबुआ के साथ कचहरी जाता पर कभी रजुआ तो कभी सुमेरन के साथ भी चला जाता। सरवन नियमित रूप से मुकदमे की पैरवी करने लगा। मुकदमे की पैरवी के दौरान उसके दो दिन बीत जाते सुमेरन नहीं चाहते थे कि सरवन मुकदमे के बवाल में फसे और पैरवी करे पर सरवन किसी की नहीं सुनता था, अपनी अइया बुधनी की भी नहीं...
‘आखिर के करेगा मुकदमे की पैरवी? मुकदमा कउनो मार-कतल है, ई जमाना राजन वाला नाहीं है के जेके चाहा आलू नीयर काट दिया, बोटियाय दिया। थाना-पुलिस है, कचहरी है, अब नियाव से काम होता है अउर सबकी सुनी जाती है फरियाद।’
घर का काम-काज उसकी अइया संभल लेती और बपई भी। इसी दौरान सरवन का बिआह भी होय गया। बिआह होने के बाद तो सुगनी ने सरवन को एकदम से अकेलुआ बनाय दिया। सरवन को कोई फिकिर ही नाहीं घर का, सारा काम संभल लेती थी सुगनी।
गॉव में खेती-बारी तो होती थी पर खेती-बारी की हालत नाजुक थी किसी तरह खान-खर्चा चल जाया करता था। एक दिन अचानक जन-कल्याण समिति का एक आदमी गॉव में आया। उसने गॉव देखा, गॉव में उसे गरीबी दिखी तथा मुकदमे का बवाल भी। यह समिति उस संस्था से अलग थी जो मालिक बन बैठी थी पूरे गॉव के जमीन की। साल भर पहले ही समिति वालों का काम शुरू हुआ था घोरावल क्षेत्रा में। समिति बाल-शिक्षा, जीवन-निर्वाह, महिला-जागृति एवं भूमि-अधिकार का काम करती थी। इसका कार्यालय भी हल्दीघाटी वाले गॉव से दो कोस की दूरी पर था। समिति ने हल्दीघाटी वाले गॉव का चयन अपने कार्य-क्षेत्रा के लिए कर लिया और सरवन को गॉव की समिति का मुखिया भी बना दिया। समिति का काम सरवन देखने लगा। उसके जिम्मे पहला काम लगाया गया गॉव का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण करने का। समिति का काम बढ़ता गया और कई कई घरना प्रदर्शन भी समिति ने आयोजित करवा लिए। धरना कभी ब्लाक पर होता तो कभी मुख्यालय पर, धरने का मुख्य विषय होता भू-धारिता, जमीन उसकी जो जमीन का जोत-कोड़ कर रहा है। पूरे सोनभद्र में समिति का यह प्रयास अद्भुत था वैसे सोनभद्र में एक संस्था दूसरी भी थी जो आदिवासियों के आर्थिक विकास के लिए काम कर रही थी पर वह सोनभद्र के दक्खिनी छोर पर थी, दुद्धी के आस-पास, घोरावल की तरफ उसके कार्य का विस्तार नहीं था।
समिति का मंत्राी कुछ सचेत किस्म का लोकतांत्रिक व्याक्ति था। उसने भी हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा किया, गॉव के एक एक आदमी से मिला, गॉव में चल रहे मुकदमे के बारे में जानकारी हासिल किया उसे महसूस हुआ कि पूरे देश में हल्दीघाटी वाले गॉव को भू-धारिता के अधिकार के संघर्ष के माडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। दिक्कत थी कि माडल के रूप में विकसित करने के लिए अधिक फन्ड की आवश्यकता होगी, फन्ड कहां से आयेगा? मंत्राी ने अपने फन्डर से बात किया और आग्रह भी कि आप एक दौरा कर लें हल्दीघाटी वाले गॉव का, यह जो हमलोग भूमि-अधिकार का अभियान चला रहे हैं उस अभियान के लिए हल्दीघाटी गॉव सबसे उपयुक्त गॉव होगा।
मंत्राी का प्रस्ताव फन्डर को विचारण्ीय लगा और फन्डर ने गॉव के दौरे का कार्यक्रम बना लिया... फन्डर का दौरा सफल रहा और उसने समिति का फन्ड भू-अधिकारों की सुरक्षा जैसे विशेष कार्य के लिए बढ़ा दिया।
समिति से जुड़ जाने के कारण सरवन के जिम्मे काम का बहुत अधिक बोझ आ गया। अब वह काफी व्यस्त रहने लगा। गॉव का एक बार सर्वे हो चुका था, उस सर्वे का फिर से अध्ययन शुरू हो गया इसी बीच भूमि अधिकार के काम को आगे बढ़ाने के लिए फन्ड-दाता संस्था ने लखनऊ में भ-ूधारिता के सवाल पर एक बैठक आयोजित किया, बैठक क्या वह एक तरह से सेमिनार ही था जिसमें देश के नामी-गिरामी विद्वान तथा वकील भाग ले रहे थे।
फन्ड-प्रदाता संस्था का सोचना था कि भमि-अधिकारिता तथा भू-धारिता दोनों अलग अलग शब्द हैं और दोनों के अर्थ भी अलग अलग हैं सो भू-धारिता के क्षेत्रा में किये जाने वाले प्रयासों को विधि-सम्मत होना चाहिए सो फन्ड-प्रदाता ने भूमि-अधिकारिता के क्षेत्रा में विशेष योग्यता रखने वालों को आमंत्रित किया हुआ था एक सेमिनार के लिए जिससे कि काम करने की साफ साफ रूप-रेखा तथा कार्य-नीति बनाई जा सके।
सरवन को विशेष रूप से लखनऊ बुलाया गया था। सरवन की लखनऊ की यह पहली यात्रा थी। लखनऊ का ताम-झाम देख कर सरवन चकरा गया, वह तो रापटगंज से बाहर कभी निकला ही नहीं था। लखनऊ उसके लिए किसी नई दुनिया की तरह था और वह होटल जहां भूमि-अधिकारिता वाला सेमिनार हो रहा था वह तो खूब खूब था, अद्भुत, क्या दीवारें, क्या कमरे, क्या लान क्या फर्श सारा कुछ किसी परीलोक जैसा उसने ऐसा मकान तो कभी सपने तक में नही देखा था फिल्मों में देखा था उसने। उसे लगा कि सारा कुछ कल्पना की बात है पर वह तो उसी परीलोक वाले होटल में है। यानि सच में होते हैं ऐसे मकान यानि महल। अगोरी किला उसने देखा था गोठानी मेले में जाते हुए, वह तो खंडहरा गया है पर जब नया रहा होगा तब भी इस होटल की तरह तो नहीं रहा होगा...
सरवन को का पता, कि अब किलों वाला जमाना धरती से गायब हो चुका है, किले दिखेंगे भी तो खंडहराते हुए, लाल किले की बात दूसरी है, विजयगढ़ किले को देख लो खंडहरा रहा है। किलों की जगह पर होटलों तथा महलों का जमाना आ गया है। पहले किले तो दो-चार ही हुआ करते थे अब ये जो महल हैं गिनने से भी नहीं गिनायंेगे। हर तरफ फैले हुए हैं चाहे जहां देख लो।
सेमिनार की कुछ ही बातेें उसकी समझ में आईं। ज्यादातर बातें तो हवा में उड़ गईं, हवा में उड़ने वाली चीजों की तरह। सरवन घुर देहात का रहने वाला उसे क्या पता कि दुनिया में यह जो समझ का मामला है आकाश में टंगी हुई किसी चीज की तरह है पर उसके बाद जो कार्यशाला हुई उससे सरवन का दिमाग खुल गया जो बन्द बन्द था। भूमि-अधिकार तथा लोकराज के बारे में काफी कुछ जान गया सरवन। उसे समझ आ गया कि यह जो जनता का राज है इसमें सभी के कल्याण के लिए काम होने चाहिए। उसे लगा कि अगर उसे इस तरह के सेमिनारों में भाग लेने का मौका मिलता रहा तो वह भी एक जागरूक आदमी बन सकता है।
सरवन लखनऊ से लौट आया और गॉव का संगठन बनाने में जुट गया। कोई भी ठोस काम करने के लिए संगठन होना चाहिए फिर उसकी समिति भी संगठन बनाने पर जोर दे रही थी। लखनऊ के सेमिनार से सरवन ने सीखा कि किसी काम को अकेले करने से कई गुना अच्छा होता है उस काम को समूह के द्वारा करना। सो वह गॉव की खेती-बारी को भी सामूहिक खेती बनाने के प्रयासों में जुट गया। फन्डर तथा समिति भी ऐसा ही चाहती थी।
करीब पन्द्रह दिन बाद समिति के मंत्राी ने सरवन को बताया कि उसे एक हजार रुपया महीना भी दिया जायेगा यह सरवन के लिए खुशी की बात थी। सरवन जी जान से जुट गया गॉव की खेती को समूह की खेती बनाने के प्रयासों में।
सबसे पहले उसने अपने बपई से सलाह किया...
बपई तो जानते ही नहीं थे कि समूह में भी खेती हो सकती है, वे तो अकेले के प्राणी थे, अकेला पैदा होना और मरना भी अकेला, उन्होंने अपनी जिन्दगी में कहीं समूह की खेती देखा भी नही था सो चुप थे... फिर कुछ सोच कर बोले...
‘का बोल रहा है तूं, कैसी समूह की खेती, का खेती-बारी भी समूह में होती है ऊ तऽ अकेले अकेले ही होती है, समूह में कैसे होगी खेती-बारी, चार दिन से मुकदमा
की पैरवी का करने लगा के काबिल बनि गया, अकेलुआ खेती-बारी सपर जाय इहै बहुत है, भाई भाई से तो पट ही नाहीं रही है चला है समूह में खेती करने, इहय कुल सीख के आया है का रे लखनऊ से।’
सरवन जानता था कि समूह की खेती के लिए कोई राजी नहीं होगा, लोग जानते ही नहीं एक साथ मिल कर काम करना। सभी के दिमाग में अलग अलग रहने तथा काम करने का कीड़ा घुसा हुआ है। एक साथ रहना और एक साथ मिल कर काम करना, रोजी-रोटी चलाना यह तो बड़ी बात है, इसे वह करके रहेगा चाहे जैसे। हॉ अगर बुझावन काका राजी हो गये तो बपई राजी हो जायेंगे ओनकर बात ऊ मानते हैं। गॉव के लड़के तो तैयार ही हैं..उन्हें मनाना नहीं था।
बपई को दुबारा समझाने का प्रयास किया सरवन ने....
‘देखो बपई, बूझो हमरी बात, हम ई कह रहे हैं कि समूह की खेती का मतलब है एक साथ मिल कर खेती करना फिर हिस्सा के हिसाब से पैदावार बाट लेना। हम जौने समिति में काम कर रहे हैं न ऊ समिति हमरे गांयंे की खेती के लिए खाद-पानी अउर बेंगा भी देगी। हम ई थोड़ै कह रहे हैं के एक साथ रहना अउर खाना भी है वह तो बाद में हो सकता है पर पहले खेती का काम तो हो एकै साथ।’
‘तूं चाहे जौन बोल हमरे समझ में कुछ नाहीं आय रहा, हम तऽ खटिया पर पड़े हैं, तोहके जौन बुझाय उहै कर, हमैं तऽ कुछ बुझाय नाहीं रहा है, हम का जानैं समूह की खेती बारी के का होती है पर बहुत ही मुश्किल है बेटा! आपन दिमाग तूं बेमतलब खपाय रहे हो ये कामे में?
दूसरे दिन सरवन बुझावन काका के यहां गया उनसे भी समूह की खेती के बारे में बताया... काका हम अपने गॉये में मिल-जुल कर खेती करना चाहते हैं, हमरे गॉये में कुल बारह ‘हल’ चलते हैं, सभी के पास एक एक हल हैं, जब ई बारहो ‘हल’ एकै साथ चलेंगे खेते में काका तब बहुत मजा आयेगा। सामने गॉये के बाऊ साहब अउर दक्खिन के पंडित जी के पास ही तो हैं इतने ‘हल’, सारा काम जल्दी जल्दी निपटा लेते हैं ऊ लोग, रोपनी जोतनी सब कुछ।’
बुझावन काका चकरा गये...
‘का बोल रहा है तूं? सब ‘हल’ एकै साथ कैसे चलेंगे, एकै साथ खेती कैसे होगी, कोई मानेगा का तोहार बात, हम त बूझ रहे हैं के बहुत मुश्किल है वैसे सबसे बतियाय लो, बबुआ से पूछि लो, अब आगे का तऽ तोहीं लोगन के करना है हम बीचे में काहे टांग अड़ायें, हमैं जौने कहोगे हम तैयार हो जायेंगे, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, फेर हमसे बताना का हुआ समूह वाली खेती के बारे में?
तीन-चार दिन सरवन सामूहिक खेती के लिए सभी को राजी करने में ही जुटा रहा। बबुआ, खेलावन रज्जू गॉव के दूसरे लड़के भी उसके साथ थे...सोमारू काका के यहां से सरवन लौटने ही वाला था कि बुधनी काकी ने उसे घेर लिया..
कारे सरवन! तूं पगला गया है का? तोहार बपई बोल रहे थे के तूं सामूहिक
खेती-बारी करने के लिए गॉये के लोगन के गोलिया रहा है, अरे हमसे तो बताओ, हमहूं तऽ जाने के का होती है सामूहिक खेती-बारी, भाई भाई में, बाप-बेटवा में मरद-मेहरारू में पटियय नाहीं रहा है, मरद पूरबारे जाय रहा है तऽ मेहरारू पछिमारे जाय रही है, बाप कुछ बता रहा है तऽ बेटवा कुछ बताय रहा है। गॉये में तीन जने का घर बाप-बेटवा में ही बट गया है, अउर तूं कह रहा है कि सामूहिक खेती-बारी करना है। काहे पगला गया हे रे! आपन कमा अउर खा, अउर ई पंचायत में जीन पड़, देख हम तोके बोल दे रहे हैं।’
सरवन सोच में पड़ गया अइया की बात कभी टालता नहीं था। का करे का न करे, अइया बोल तो सही रही हैं पर हार मानने से भी काम नहीं चलता प्रयास तो करना ही चाहिए। प्रयास करने में का जाता है? सामूहिक खेती के बारे में बबुआ, खेलावन रजुआ, सुमेरन,बंधू और पुनवासी से पहले ही सरवन बतिया चुका था। अगर गॉव के लोग नहीं तैयार होते हैं तऽ का हुआ? मेरे दोस्त तो तैयार हैं ही, हमी लोग मिल कर कोशिश करते हैं, फायदा नाहीं होगा तऽ छोड़ने में केतना देरी लगती है?
सरवन मन ही मन बहुत खुश हुआ, सामूहिक खेती का काम शुरू हो सकता है उसकी इज्जत बच गई.. उसने समिति के मंत्राी जी से गरज कर कहा था...
‘साहब अगर आप खाद-पानी बंेगा देने के लिए राजी हैं तऽ हम अपने गॉयें में सामूहिक खेती कराय सकते हैं, गॉयें वालों को हम राजी कर लेंगे साहब! बस आप मदत करते रहिएगा।’
सरवन के पैर जमीन पर नहीं थे, खुश होकर उसने बबुआ से पूछा...
‘अरे बबुआ! हम तऽ सोच में पड़ गये थे के सामूहिक खेती वाला काम हमरे गॉयें में शुरू नाहीं हो सकता तब हम का बोलेंगे समिति के मंत्राी जी से। अब ओनके सामने तनेन हो कर खड़े हो सकते हैं, अउर हमार भाव भी बढ़ गया आनेकरे दिमाग में।’
‘हॉ सरवन तूूं सही बोल रहा है, अउर एक बात है के तोहार बात के नाहीं मानेगा गॉयें में, देख हम तऽ पहिलहीं बोल दिये थे अउर खेलावन ने भी बोल दिया था ओइसहीं रजुआ अउर सुमेरन ने भी कहा ही था। पहिले का बोलते हैं सामूहिक खेती का काम तो शुरू करो फेर देखो जो आजु तैयार नाहीं है नऽ उहो तैयार हो जायेगा।’
बबुआ की बातों से सरवन का कलेजा फूल गया ‘दोस्त हो तो बबुआ सरीखा, चाहे जो कह दो मान जाता है कुछौ बांया-दायां नाहीं करता है, जैसे ही सामूहिक खेती का काम शुरू होगा नऽ बपई भी मान जायेंगे एकरे पहिले हम अइया को मना लेंगे।
‘बबुआ तूहों कउनो बात खियाल नाहीं रखते हो, मुकदमवा की तारीख भुला गये का? वकील साहब का बोले थे, बोले थे नऽ के लेखपाल से मिल कर जमीन का कगज निकाल लेना, कागज निकला का?’
‘नाहीं रे सरवन कागज कहां निकला।’ बबुआ झेंप गया सही में उसे कुछ खियाल
नाहीं रहा कुछ भी, घर आया और भूल गया। एक महीने बाद बिफनी घर आई थी
मायके से उसे भुला गया कि कुछ दूसरा काम भी है, बपई की सेवा-टहलऔर बिफनी से चुहल। दिन तो बस ऐसे ही गुजर जाता था उसका रात के बारे में सोचते हुए और रात गुजर जाती थी दिन के बारे में सोचते हुए। रात आती थी फिर वह रात की तरह एकदम सन्नाटे में चला जाता था जहां वे ही दोनों होते थे और उन दोनों के बीच चुलबुली शरारतें हुआ करती थीं।
शरारतों से परेशान हो जाती बिफनी...
‘ई का है के तोहें खाली एकै काम सूझता है, कुछ दूसरौ कामे के बारे तऽ गुना करो, बड़ बुजरुग सोये हुए हैं बहरे ओसारे में, वे खांस रहे हैं अउर तोहैं चनरमा देखा रहा है, कभी तारे देखा रहे हैं तो कभी कुछ, मन नाहीं भरता का हो!’
‘काहे मन भरेगा रे पगली, ई जौन तन है नऽ एम्में मनै का तऽ खेल है चाहे जेहर से खेलो.. बस खेलो, हांथे कऽ अंगुरी पकड़ि के खेलो चाहे होठ अउर गाल, अंग अंग से खेल शुरू, अगले जनम में का होगा के जानता है? मनई का जनम मिला है तऽ एकर सुख लेने दो, एकर सुख लेने से जे बच गया समुझि लो जियतै मर गया, ओकरे मनई होने का मतलब भी मर गया। बबुआ तो घर में बैठी चनरमा में उलझा हुआ था सो उसे कैसे खियाल रहता कि लेखपाल के यहां से कागज भी लेना हे जमीन का, सरवन ने कहा था...
बबुआ अचानक लौटा घर की यादों से और सरवन के घर जाकर उससे बोला.
‘सरवन ऐसा कर तूं अपनी समिति से काल्हु मोटर साइकिल लेले अउर ओही से सबेरहींे चला जाये लेखपाल के इहां रापटगंज अउर कागज लेके वकील साहब को दे दिया जाये, चाहे ओनकरे घरे या कचहरी में, हम बूझ रहे हैं ई ठीक रहेगा काल्हु तोहके कउनो काम तऽ नाहीं है नऽ।’
सरवन कुछ सोचने लगा...
हां समिति का काम है मंत्राी जी ने का तो कहा था काल्हु के लिए के रापटगंज जाना होगा एक कागज देने, हां खियाल आया रे, रापटगंज जाने के लिए, चलो आजै चलते हैं मंत्राी जी के इहां अउर अजुयै मोटरसाइकिल मांग लेते हैं अउर काम के बारे में भी पूछ लेते हैं। फिर दोनों मंत्राी जी के यहां यानि जन कल्याण समिति के कार्यालय पर पहुंच गये। मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे लेकिन व्यस्त थे। फील्ड-वर्करों से बात-चीत कर रहे थे तथा मंसौदा बना रहे थे कि ग्रामीणों के आर्थिक विकास के लिए समिति द्वारा क्या क्या किया जा सकता है और समिति की सीमा क्या है। भूमि अधिकार वाले सवाल पर धन खर्च करने के लिए फन्ड देने वाली संस्था तैयार थी पर सभी गॉवों के लिए खाद, बंेगा आदि देने के लिए उसके पास प्रस्ताव नहीं था। छोटे-छोटे बच्चों की पढ़ाई के लिए भी समिति को अनुमति मिल गई थी फन्ड देने वाली संस्था से। खाद, बेंगा देने का प्रस्ताव उन्हीं गॉवों के लिए था जहां सामूहिक खेती हो रही थी और भूमि-अधिकार का झगड़ा था।
करीब एक घंटे बाद मंत्राी जी खाली हुए फिर उन्होंने सरवन से बात किया और
मोटर साइकिल देने के लिए राजी हो गये। संमिति का एक काम भी सरवन के जिम्मे लगा दिये...
‘इस लिफाफे को डी.एम. साहब के कार्यालय जा कर प्रकाश बाबू को दे देना। कार्यालय में एकदम किनारे के तरफ बैठते हैं प्रकाश बाबू, छोटे कद के सांवले से हैं, वहां किसी चपरासी से पूछ लेना वह बताय देगा प्रकाश बाबू को, हां उनसे इस कागज पर पावती जरूर ले लेना, वे खुदै दे देंगे तोहके कुछ करना नाहीं पड़ेगा खाली बोल देना पावती के लिए।’
सरवन ने लिफाफा ले लिया और मोटर साइकिल भी। दोनों मोटर साइकिल पर बैठे और गॉव चले आये। गॉव में उन दोनों को देखने लगे लोग..
सुगनी भी चकरा गई... कहां से मोटर साइकिल पाय गये, समिति की होगी, एक दो बार पहले भी सरवन गॉव में आया था मोटर साइकिल से। पर-पानी करके बबुआ अपने घर चला आया.. उसके माथे पर रात नाच रही थी, रात सरवन के माथे पर भी नाच रही थी पर वह थोड़ा गुम-सुम था, खुद में खोया हुआ।
सरवन और बबुआ दोनों अपने अपने घरों में थे, दोनों जवान थे तथा समय को नाप-तौल की चलने वाले भी फिर भी दोनों के लिए समय का खेल एक हो जरूरी नहीं..दोनों समय के साथ खेल-कूद करने वाले थे पर कैसे? बबुआ तो जब से बिफनी लौटी है नैहर से तब से खेल रहा है समय का खेल, देखिए का करता है सरवन, वह भी खेलेगा खेल, नया न सही पुराना ही, वैसे भी मन और तन का खेल कब्बौं बुढ़ाता थोड़ै है, वही तो एक ऐसा खेल है जो हरदम जवान बना रहता है।
सरवन भी रात का पूरा समय सुगनी के नाम कर चुका है, अब सुगनी के मन पर है के वह का करती है?
सुगनी उसे कहां मना करने वाली।
सुगनी के लिए तो ‘पायो जी अनमोल रतन धन पायो’ की हालत थी। अगर तुझे खेलना है तऽ खेलो हम भी देखें कि तोहैं कउन कउन खेल आता है। फिर अचानक सुगनी लजा गई...‘वह भी का सोचती रहती है बेमतलब....’
धरती-माई का बोलेंगी मुकदमे के बारे में, वे तो स्वर्ग से उतरी हैं धरती पर, स्वर्ग में तो मर-मुकदमा होता नहीं। मुकदमा तो वहां होता है जहां अदालतें होती हैं, जहां कागज पर लिखे कानून होते हैं। स्वर्ग में तो जर-जमीन, घन-दौलत, से जुड़े झगड़े होते नहीं हैं वहां आपसी मन-मुटाव होते हैं वे भी पूरी सृष्टि के संदर्भ में। व्यक्तिगत हित के जो मामले होते भी हैं उनमें व्यापकता होती है जान पड़ता है के वे मामले सर्व-जनीन हैं वैसे भी स्वर्ग में आपसी विवाद होने की स्थिति में श्राप देने का चलन है। स्वर्ग के कुछ ही रहवासी ऐसे होंगे जो श्राप देने की कला के जानकार नहीं होंगे। लगभग सभी किसी न किसी तरह श्राप देने की कला सीख ही लेते हैं पर अफसोस हैे कि धरती-माई श्राप देना ही नहीं जानतीं नहीं तो श्राप दे देतीं...।
द
‘स्वार्थ की कथा उतर रही है धरती पर
‘अचौर्य’ गया धूल फांकने’
‘गॉव की ऊबड़-खाबड़ धरती पर नंगे पॉव चल रही धरती माई को क्या पता कि उनकी कथा कौन लिख रहा है आज के आधुनिक लोकतांत्रिक समय में। रजवाड़ों के समय में तो तय था कि धरती की कथा तलवारें लिखा करती थीं, युद्ध लिखा करते थे, महाभारत की कथा की तरह। पर आज...! आज शायद थाने लिखें, अदालतंे लिखें पर कथा तो लिखी ही जायेगी आइए देखें कौन लिख रहा है धरती-कथा..? वैसे भी धरती-माई अपनी कथा कहां पढ़ने वाली, उनके जो गॉव-देहात वाले हल-जोतक पुत्रा हैं वे भी कहां पढ़ते हैं कुछ, उनसे कविता कहानी से का लेना देना भले ही कविता कहानी उन्हीं के बाबत हांे फिर भी। कहानी कोई पढ़े न पढ़े हर काल में लिखी जाती रही हैं जिन्हें पढ़ना होता है वे पढ़ते ही हैं संभव है धरती-माई पढ़ें अपनी कहानी किसी दिन...’
सरवन और बबुआ सबेरे ही चल दिए रापटगंज के लिए। सुगनी ने भोरहरी में ही परौठा सेंक दिया था, ‘कुछ खाना खाकर जायंेगे तो ठीक रहेगा’। बिना कुछ खाये रापटगंज जाना ठीक नाहीं है, दिन भर खाना मिले न मिले फिर रुपिया भी तो चाहिए होटल में खाना खाने के लिए, कहां से आयेगा रुपिया?
बबुआ समय से आ गया था सरवन के घर पर फिर सुगनी ने दोनों को परौठे का नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद दोनों चल दिए रापटगंज के लिए। बबुआ ने बिफनी से पचास रुपिया मांग लिया था। तेल भरवाना होगा मोटर साइकिल में, हमेशा सरवन ही भरवाता है तेल, इस बार वह देगा तेल का रुपिया, सरवन को तेल भरवाने नाहीं देगा।
सरवन ने मोटर साइकिल की टंकी देखा, तेल था ओमे काम भर का। मंत्राी जी मोटर साइकिल में तेल भरा हुआ रखवाते हैं। तेल न होने पर बोतल या गैलन लेकर जाना पड़ता है घोरावल तब तेल मिलता है सो मोटरसाइकिल में कम से कम उतना तेल तो होना ही चाहिए जिससे मोटरसाइकिल घोरावल पेट्रोल टंकी तक पहुंच जाये। रास्ते मेे कही तेल डलवा लेंगे मोटरसाइकिल में, समिति का तेल खरचना बेइमानी होगी, काम तो हमलोंगों का है समिति का नहीं है काम।
लेखपाल रापटगंज में पूरब मोहाल में रहते हैं नगरपालिका के कार्यालय के आस-पास, एक बार गया था सरवन उनके पास, नई उमर के हैं, बड़की जात वाले नाहीं लगते हैं, लगता है पिछड़ी जाति के होंगे, नाम के आगे सिंह लगा हुआ है, उससे का हुआ अब तो सिंह सभै लगाने लगे हैैं। का हुआ लेखपाल की जाति से जाति चाहे कउनो हो का फरक पड़ता है, हमलोगों को तो खाली जमीन का कागज लेना
है ओनसे, रुपिया देंगे अउर ले लेंगे कागज।
लेखपाल घर पर ही थे पर उनके घर का दरवाजा बन्द था। शायद कमरे के अन्दर हों। लेखपाल सही में कमरे के अन्दर ही थे, अकेले रहते थे, उनका परिवार गॉव पर रहता था, गॉव पर सुविधा थी, घर का दूध था, अपने खेत की तरकारी थी यहां तो सारा कुछ खरीदना पड़ता वैसे भी उनके बच्चे छोटे हैं, उनकी मॉ हैं बच्चों की देख-रेख कर लिया करती हैं, जब बच्चे पढ़ने लायक होंगे तब तो उन्हें यहां लाना ही पड़ेगा।
सरवन ने कमरे का दरवाजा खट-खटाया...
एक मुलायम सी आवाज...‘कौन है?’ लेखपाल ने पूछा
‘साहब मैं हूॅ सरवन हल्दीघाटी गॉव का’ सरवन ने बताया उन्हें..
कमरे का दरवाजा खुल गया... ‘काहो सरवन काहे के लिए आये हो एतना सबेरे, का कउनो काम है?’ लेखपाल ने सरवन सेे पूछा
‘हॉ साहेब तब्बै तो आया हूॅ एकदम सबेरे कहीं आप निकल न जायें क्षेत्रा में।’
‘नाहीं हो आजु कल तहसीले में काम रहता है सब गॉयेंन कऽ खतौनी कंप्यूटर में फीड कराना है, साल भर के भीतरै पूरा कर लेना है खतौनी कऽ कुल काम, हं इ बताओ तोहार का काम है?’ सरवन से पूछा लेखपाल ने
‘साहब हमैं खतौनी चाहिए जौन जमीन हमलोग जोत रहे हैं, ओकर हम लोग मुकदमा दाखिल किये हैं नऽ।’
‘हमैं पता है हो, ऊ जमीनिया तऽ कउनो संस्था के नाम से है, ओही कऽ खतौनी।’
‘हं साहेब ओही कऽ खतौनी।’
‘हम अब्बै बनाय देते हैं।’
लेखपाल ने जल्दी ही खतौनी का फारम भर दिया और अपनी दस्तखत करके खतौनी सरवन को दे दिया। सरवन ने बीस रुपिया की नोट लेखपाल को थमाया
‘साहब इसे ले लीजिए हम लोग गरीब आदमी हैं एसे अधिक नाहीं दे पायेंगे’
‘नाहीं हो सरवन हमैं तोहसे रुपिया नाहीं लेना है, जब हम क्षेत्रा में जाते है तब तूं लोग देवता की तरह हमार सेवा-सत्कार करते हो, हमरे मने का खाना खिलाते हो, मुर्गा काट देते हो, घरे की बनी असली वाली दारू पिलाते हो, हम तोहसे भला रुपिया लेंगे! हं एक बात अउर तूं लोग जानते हो के नाहीं तोहन लोगन के जोत वाली जमीनिया बेचाय गई है, बसौना वाले रामलाल खरीद लिए हैं,ओकरे खारिज दाखिल के लिए हमरे कीहें कागज आया है, बताओ ओमे हम का करैं।’
‘साहब हम लोगों को पता है के जमीनिया बेचाय गई है अबहीं खारिज-दाखिल मत होने दीजिएगा, हम लोग ओ मुकदमा में हाजिर हो गये हैं, हमरे वकील साहब बहस भी कर दिए हैं आप ओमे कुछ न कीजिएगा। गॉये की तरफ कब आयेंगे साहेब?’‘
‘जल्दियय आयेंगे हो सरवन, एक आदमी के जमीन की नापी करनी है, ओही
समय हम तोहरे गॉयें भी आयेंगे, तूं निश्चिन्त रहो खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हम कुछ नाहीं करेंगे, ऊ पारटी हमरे इहां आई थी मुहमांगा रुपिया दे रही थी हम नाहीं लिए एक छदाम भी।’
‘ठीक है साहब! तब हम लोग चलते हैं अबहीं वकील साहेब से भी मिलना होगा।’ वकील साहब नगर पालिका कार्यालय से काफी दूर रहते हैं। ओरमौरा के आस-पास। सरवन ने मोटर साइकिल स्टार्ट किया और वकील साहब के मकान पर पहुंच गया। वकील साहब का अपना मकान था देखने से भी लगता था कि किसी चलता वकील का मकान है।
वकील साहब अपने चेम्बर में थे और मुवक्किलांे से बतिया रहे थे। वकील साहब के चेम्बर में एक से एक मुवक्किल थे, उनमें कोई मार और चोट खाये हुए था तो कोई किसी को मार कर आया था। किसी ने किसी दूसरे की जमीन कब्जा कर लिया था और जोत-कोड़ कर रहा था तो किसी की जमीन का बैनामा किसी ने करा लिया था गोया वहां कानून की कई नश्लें मुवक्किल के रूप में हाजिर थीं, वकील साहब हर मुवक्किल को अलग अलग ढंग से समझा रहे थे..।
‘तो तोहरे जमीन पर कब्जा हो गया तो का हो गया, का ऊ जमीन ओनकर हो गई! हम ओनकर कब्जा हटवाकर छोड़ेंगे बस तूं जिन भागना मुकदमा छोड़ कर।’
‘बैनामा हो गया तो का हो गया तूं जमीन पर से आपन जोत-कोड़ और कब्जा-दखल मत छोड़ना फिर हम देख लेंगे ओ लोगन के हाईकोर्ट तक।’
सरवन और बबुआ गंभीरता से वकील साहब की बातें सुन रहे थे पर वे समझ नहीं पा रहे थे कि वकील साहब मुहदेखी काहे बोल रहे हैं। बोल रहे हैं कि कब्जा जीन छोड़ना और दूसरे मुवक्किल से बोल रहे हैं तूं बैनामा ले लिए हो नऽ हम तोहके कब्जा दिलवा कर छोड़ेंगे। एक से कब्जा न छोड़ने की बात अउर दूसरे से कब्जा दिलाने की बात, का मतलब है यार बबुआ! तूं कुछ समझे के नाहीं।’
‘नाहीं सरवन! हमैं कुछ नाहीं बुझाया के वकील साहब का बोल रहे हैं अउर का होगा मुकदमा में। ई जो नियाव है नऽ राम जाने केहर जायेगा बांये के दांये...हमैं तो जान पड़ता है के ई जो नियाव है नऽ वह घुमक्कड़ किसिम का है, घूमता रहता है एहर ओहर कब्बउं बायें तऽ कब्बउं दांयें।’
‘हं यार तूं सही बोल रहा है, नियाव एक जगह लंगड़-लूज होके बइठ गया तऽ कइसे काम चलेगा दुनिया का? सरवन को भी कुछ समझ में नहीं आया। वह नहीं समझ पाया कि जमीन पर कब्जा जरूरी है कि बैनामा, का जरूरी है दोनों में से, कभी वकील साहब कब्जे की बात कर रहे हैं तो कभी बैनामे की इन दोनों में कौन कानूनी है अउर कौन गैरकानूनी हमैं तऽ कुछ नाहीं बुझाय रहा है।’
वकील साहब पहले से आये मुवक्किलों से जब खाली हो कर सरवन से बतियाने लगे...
‘का हो सरवन, खतौनिया लाये हो का?’ हां साहेब आजुयय लिये हैं लेखपाल
से अउर लेकर आये हैं, ई है खतौनी साहेब। सरवन ने खतौनी दे दिया वकील साहब को।
खतौनी देख कर वकील साहब बोले...
‘अबहीं तऽ एपर किसी का नाम नाहीं चढ़ा है, हमैं डर था के कहीं चोरी चोरी ऊ पारटी ने आपन नाम तऽ नाहीं चढ़वाय लिया है। चलो अब देखते हैं आगे का होता है? हं यार सरवन! कुछ खर्चा-पानी लाये हो का? आजकल बड़ा ठाला चल रहा है, कउनो कामै नाहीं होय रहा है कचहरी में, रोज रोज हड़ताल हो रही है हमलोग तऽ परेशान हैं हड़ताल से।’
सरवन दो सौ रुपया लाया था वकील को देने के लिए, दो तारीख पर कुछ नहीं दे पाया था उन्हें, वही रुपया सरवन ने वकील साहब को दे दिया...
‘एतनै जुटा पाये हैं साहेब कोई नाहीं दे रहा है ए समय, कुल बाकी जोड़ कर हम दे देंगे आप को फसल होने दीजिए।’
सरवन ने अपनी सुना दिया वकील साहब को जो एकदम सही था। गॉव भर घूम कर उसने रुपया मांगा था पर एक दो लोग ही दिए रुपया बाकी लोग बाद में देने के लिए बोले... किसी तरह से सरवन ने दो सौ रुपये का इन्तजाम किया।
‘चलो कोई बात नाहीं है, बाद में दे देना, ई कम थोड़ै है के तूं लोग मुकदमा लड़ि रहे हो अउर हर तारीख पर आ जाते हो, हमैं तूं लोगन का काम कइसहूं करना है अउर तूं लोगन कऽ नाम जमीन पर कराना है, हम सब कागज पत्तर निकाल लिए हैं। जवन पहिले वाली संस्थवा है नऽ उहय फर्जी है, ओकर नाम तूं लोगन के गायें के जमीनी पर दर्ज होना ही नहीं चाहिए था, ओ समय के तहसीलदार को पावर ही नहीं था किसी का नाम काट कर किसी का नाम चढ़ा देना। जब संस्था का नाम ही गलत तरीके से दर्ज किया गया है तूं लोगन के जमीन पर फेर ऊ संस्था जमीन कैसे बेच सकती है? एही बाती पर हम ओ पारटी के मुकदमा को खतम कराय देंगें।’
सरवन का मन लह लहा गया वकील साहब की बातों से, बबुआ भी खुश खुश हो गया, अबही आस मरी नाहीं है, आस बाकी है नाहीं तऽ जाने का होता जमीन का, ऊ पारटी काफी सरहंग है, पैसे वाली है, रुपिया-पैसा दे कर कचहरी को घुमा सकती है एहर ओहर...
सरवन खुशी के मारे बोल उठा...
वकील साहब आपै पर हमलोग भरोसा किए हुए हैं, जौन करेंगे आपै करेंगे, हमलोग गरीब गुरबा का जानैं कायदा-कानून। अच्छा तऽ हमलोग चलते हैं। मोटर साइकिल भी देना है मंत्राी जी को।’
अच्छा जाओ अगली तारीख पर जरूर आना, ओ दिना हमैं लिखित बहस देनी है कचहरी में। साहेब ने दोनों पारटी को मुकदमे में लिखित बहस दाखिल करने के लिए आदेश दिया हुआ है, हमीं ने साहब से कहा था कि मुकदमा में लिखित बहस लीजिए साहब फिर फैसला कीजिए जिससे काई गड़बड़ न होने पाये।’
‘ठीक है साहब हमलोग जाय रहे हैं अउर तारीख के दिन आयेंगे हमलोग साहब।’
वकील साहब के यहां से खाली होकर सरवन गॉव जाने के लिए चल दिया। रास्ते में मोटरसाइकिल में तेल भी डलवा लिया कहीं कम न हो जाये तेल।
का रे! बबुआ हमलोगों के वकील साहब तो बढ़िया आदमी हैं, रुपये के लिए कुछ नाहीं बोलते हैं जो हमलोग ओन्है दे देते हैं मान जाते हैं। वकील साहब बोल तो रहे हैं के जमीन हमलोगों की बची रह जायेगी, हमलोगों के नामे से होय जायेगी देखो का होता है...?
‘तूं निराश काहे हो जाता है सरवन! ई जमीनिया पहिले भी हमलोगों की थी अउर बादौ में रहेगी। ऊ पारटी के बैनामा करा लेने से का हो जायेगा। संस्था वाले भी कहां काबिज हो पाये थे जमीनी पर, कब्जा तो हमीलोगों का ही है।’
सरवन शाहगंज से आगे कुछ दूर निकला ही होगा कि दो मोटर साइकिल वालों ने अपनी मोटर साइकिल उसकी मोटर साइकिल के सामने लगा दिया... सरवन आगे मोटर साइकिल देख कर चकरा गया का हो रहा है? काहे छेंक लिए हमार रास्ता? सरवन ने अपनी मोटर साइकिल रोक दिया...
‘का बात है भइया! आपलोग मोटर साइकिल हमरे सामने काहे लगाय दिये?’
तभी उधर से चारो लड़के अपनी अपनी मोटर साइकिल से उतरे और उनमें से एक ने सरवन का गला पकड़ लिया...
‘उतर साले मोटर साइकिल से फेर बताते हैं...’
बबुआ नाहीं समझ पाया कि हो का रहा है, कौन हैं ये लड़के, काहे हमलोगों की मोटर साइकिल के सामने अपनी मोटर साइकिल लगा दिय,े का बात है? बबुआ आव न देखा ताव, सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के का गला पकड़ लिया...
‘बोल बे का बात है बबुआ ने सरवन का गला पकड़ने वाले लड़के से पूछा.. तब तक सरवन मोटर साइकिल से उतर चुका था, वह भी नहीं समझ पाया कि हो क्या रहा है। उधर से बकिया तीनो लड़के चले आये और मार-पीट करने लगे।
सरवन और बबुआ भी कम न थे, ये दोनों भी मार का जबाब मार से देने लगे। कुछ देर तक दोनों ओर से घूंसे चले, दोनो तरफ चोटें लगीं, इसी दौरान बबुआ ने उस तरफ के एक लड़के के मुह पर ऐसा घूंसा मारा कि वह जमीन पर भहरा गया फिर क्या था...
वे लड़के मोटर साइकिल स्टार्ट किये और भाग खड़े हुए। पर वह लड़का जिसे बबुआ ने घूंसा मारा था जो जमीन पर गिर गया था वह कैसे भागता...
बबुआ ने उसे उठाया, वह होश में था, चोट के कारण गिर गया था जमीन पर, बता क्या बात है?
शाहगंज से घोरावल तक जाने वाली सड़क वैसे भी व्यस्त रहती है, तमाम गाड़ियां चलती रहती हैं उस पर, वहां भीड़ हो गई, कुछ भले मानुष मार-पीट देख कर रूक गये थे... उनमें से एक जन ने पूछा बबुआ से...
‘का बात है हो काहे मार-पीट हो रही है और कौन है ये जिसे पकड़े हुए हो?
‘हमैं नाहीं मालूम साहेब, हम लोग तऽ रापटगंज से आय रहे हैं, अउर एहीं पर ई सब हमलोगों को अपनी मोटर साइकिल तिरिछिया कर रोक लिए अउर लगे मारने, ई सब चार ठो थे, दो मोटर साइकिल थी, एके हम पकड़ि लिये हैं, एकरे अलावा बकिया तीनों भाग गये..’
वहां पर रूका हुआ यात्राी कुछ तेज किसिम का था...
‘बोल बे! काहे मार-पीट करने लगे वह भी ऐसी चालू जगह पर का बात है बताओे। वह तो... वह गुंग बना हुआ था...
यात्राी ने उसे धमकियाया...
भइया आप लोग ऐसा करो के एके थाने लेके चलो, शाहगंज थाना दो किलोमीटर ही पीछे है, चलो हम एके बैठाय लेते हैं अपनी मोटर साइकिल पर...मार करने वाला लड़का थाने का नाम सुनते ही सकपका गया..फिर बोलने लगा...
‘नाहीं भाई साहब! हमैं थाने मत ले चलिए, हमार कउनो गल्ती नाहीं है।’ लड़का रिरियाने लगा। पूछने पर उसने बता दिया कि मार करने वाले लड़कों का किसने भेजा था। उनमें से दो लोगों को बसौना के रामलाल ने भेजा था। उन लोगों का नाम क्या है उसे नहीं पता, केवल एक लड़के का नाम उसे मालूम है जो उसके साथ काम करता है गुजरात में। रामलाल ने ही आपलोगों की मोटर सयाइकिल पहिचनवाया था। जब आपलोग लेखपाल के यहां गये हुए थे तब्बै से हमलोग आपका पीछा कर रहे थे, इहां सुनसान देख कर हमलोगों ने आपकी माटर साइकिल छेंक लिया बाद में जो हुआ आप जानते ही हैं।
यात्राी लड़के को किसी भी हाल में थाने ले चलना चाहता है पर सरवन का मिजाज बदल गया है, भाई साहब! जाने दीजिए का होगा इसे थाने ले जा कर, छोड़ देते हैं इसे। बबुआ भी चाहता था कि लड़के को थाने ले चलना चाहिए.. पर सरवन नहीं चाहता था सो लड़के को वहीं छोड़ दिया सरवन ने।
‘अच्छा भइया जाओ, अब कभी किसी से मार-पीट न करना वह भी किसी के कहने पर, हमलोग तोहैं छोड़ दिये नाहीं तऽ जेल चले जाते, तोहार अइया-बपई परेशान होते, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’
लड़का हॉ में हॉ मिलाता रहा।
जब सरवन मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगा तब लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया...और हाथ जोड़ कर बोला...
‘एक बात तऽ भइया हम तोहें बताये नाहीं...
ऊ ई है कि का कउनो तोहार मुकदमा चलि रहा है का बसौना के रामलाल से?
‘हॉ चल तो रहा है।’
ओही खातिर रामलाल तोहैं जान से मरवाना चाहता है, ओसे संभल कर रहना भइया! तूं हमैं दयालु जान पड़ रहे हो, एही से हम गुने के तोहैं ई बात बताय देना चाहिए। रामलाल हमलोगों से जान मारने के लिए ही बोल रहा था पर हमलोग नकार गये। जौन लडिकवा हमरे संघे गुजरात में काम करता है ओसे जान-पहचान है रामलाल की। ओही लड़िकवा से बोले थे रामलाल कि मरवा दो उसे जान से पर लड़िकवा मुकर गया...
‘अरे बाप रे बाप! हम केहू के जान से नाहीं मार सकते, थोड़ा-बहुत मार-पीट कर लेते हैं बस एतनै पर कतल नाहीं कर सकते। रामलाल काका अइसन है कतल केहू दूसरे से करवाय लो, हम ओके छेक के धमकियाय देंगे बस एतनै कर सकते हैं हमलोग। उहै करने के लिए हमलोग छेंके आपलोगों को पर आपने हमैं पकड़ि लिया ऊ सब भाग गये। हम पकड़ा गये, हम बताय रहे हैं भइया आपको अब आप सावधान होके चला करिए।’
बबुआ और सरवन दोनों परेशान यह रामलाल वही है जिसने संस्था वाली जमीन का बैनामा कराया है।
सरवन देख! ‘हमलोगों को सावधान रहना चाहिए अउर साथ में लेकर कुछ चलना चाहिए ऊ पारटी तऽ खूनी कतली है ही।’
‘हॉ बबुआ! आगे से हम लोग सावधान रहेंगे।’
मुकदमे की अगली तारीख पर आयेंगे सरवन और बबुआ कचहरी, तारीख अभी बहुत दूर है, तब तक खेती-बारी का काम और रात के खेलों में डूब जाने का एक अलग और मजेदार काम। एक ऐसा काम जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता। उसे पूरा करने की जितनी कोशिश करो उसका काम आगे बढ़ता ही जाता है। सुगनी एक तरफ तो दूसरी तरफ बिफनी, दोनों के मन की धुनंेे एक जैसी, एक ही तरह की अलाप वाली, बिफनी न सुगनी से कम और न सुगनी बिफनी से कम, इसी लिए दोनों के बीच खाली देह का फासला है, मन तो एक्कै है गलबहियां करता हुआ, सरवन और बबुबा की तरह।
सरवन की मोटर साइकिल जब उसके घर पर पहुंची तब सुगनी गाय को चारा लगा रही थी और उसके बपई खाट पर पड़े हुए थे।
‘का हो होय गया काम रापटगंज का?’
पूछा सुगनी ने सरवन से...
‘हां होय गया, लेखपाल से मिले अउर वकीलौ से मिल लिए। चलो बइठो अंगना में हम हाथ धोय के आ रहे हैं अरे बबुआ! आपौ बइठो, चाह-पानी करके तब जाना।’
‘नाहीं हो भउजी! चाह-पानी में देरी होगी, हम जाय रहे हैं, सबेरहीं एक बोझ बरसीम काटि के ले आये थे, ओके चारा मशीन से कटवाना होगा, अकेलै बिफनी नाहीं काट पायेगी हमैं जोह रही होगी।’
‘ऊ तऽ जोहबै करेगी देवर जी! नाहीं जोहेगी तऽ कइसे चलेगा, हमहूं तऽ जोही रहे हैं, पहिले एहर कऽ जोहार पूरा करिलो फेर ओहर जाना, का बेजांय बोल रही हूॅ देवर जी! आप काहे गंुग बने हुए हैं काहे नाहीं समझाते बबुआ को।’
सुगनी ने टोका सरवन को...
बबुआ रूक गया और चाह पानी करके तब सरवन के घर से निकला...
‘अब काल्हु भेट होगी सरवन, खेत पर जाने के पहिले हम तोहसे मिल लेंगे, काल्हु तऽ तूं समिति के कार्यालय पर भी जाओगे नऽ।’
‘हॉ मोटरसइकिलियो तऽ पहुंचाना होगा।’
‘हॉ सही बोल रहे हो...’
धरती-माई को का पता कि उनकी कथा लिखी जा रही है और उसे ऐसे लोग लिख रहे हैं जिनसे इतिहास, संस्कृति और सभ्यता लगातार घृणा करती रही है फिर भी वे समाज के सक्रिय हिस्सा हैं। उनके पसीने से ही समाज में अभिजात्यता की हसीन चादरंे तना करती हैं, हवेलियां बना करती हैं, कल्याणकारी बदरियां नाचती हैं, फिर जो वैभव की रिम-झिम बरसात होती है, उससे गौरव-गाथायें खुद को अभिसिंचित कर मुदित होती हैं...
‘जीना है एक साथ, मरना है एक साथ,
फिर खेती काहे अलग अलग?’
‘धरती-कथा चल रही हैं गॉव की खुरदुरी पगडंडियों पर, पार करना पड़ रहा है उसे कई कई ढूह, पॉवों में छाले उभर आये हैं, कैसे चले आगे..अहा ग्राम्य जीवन वाला गॉव तो उसे कहीं दीख नहीं रहा, यहां की हवायें भी गुस्सैल जान पड़ती हैं, जला रही हैं देह, देह जल जायेगी तो बचेगा क्या? पॉव तो जल ही चुके हैं....पर चलना तो है ही इन्हीं पगडंडियों पर...संभव है आगे चल कर धरती-कथा विद्रोह कर दे धरती-माई से, नहीं चलना तुम्हारे साथ, तूॅ तो देवी है, माला-फूल और सुगंध पीने वाली, हवन-पूजन पर थिरकने वाली पर हम तो कथा हैं, हमारा पेट है, हमारा जनम भूख से हुआ है, यातना, दमन, शोषण से हुआ है, हमारे पास केवल हाथ-पैर ही हमारे हथियार हैं, ये चोटिल और घायल हो जायेंगे फिर हम कैसे बचा पायेंगे अपनी जान, जरा सोचो तो धरती-माई...’
बबुआ अपने घर लौट आया सरवन के घर से। थोड़ी ही दूरी पर घर था बबुआ का। बरामदे में पड़े हुए थे उसके बपई बुझावन। वे बबुआ की राह देख रहे थे।
‘का हो बबुआ! वकील से भेट हुई के नाहीं, कचहरी का काम होय गया?’
‘हॉ बपई काम होय गया कचहरी का। अब अगली तारीख पर जाना होगा कचहरी।’
‘अच्छा जाओ कुछ दाना-पानी करि लो, बिफनी तो अब्बै गई है घरे में गाय-गोरू को दाना-पानी दे कर।’
बबुआ घरे में चला गया, बिफनी चने का दाना भूज रही थी, बपई ने मांगा था
उससे ‘एकदम दाल बना कर देना बिफनी।’ का हो मिल गये लेखपाल साहब?’ बबुआ से पूछा बिफनी ने।
‘हॉ मिल गये कचहरी का कुल काम होय गया’, बबुआ ने बिफनी को बताया
‘‘चाह’ बनायें का हो! आजु सबेरे गइया ने टांग उठा दिया, दूहने ही नाहीं दिया लगा कि मार देगी टांग से, हम ओके नोये भी नाहीं थे, नोय कर बांध देते नऽ दुन्नौ टंगिया तऽ दूह लेते, बछरुआ बांध दिये हैं अलगे। दूध नाहीं है घरे में, करिययी ‘चाह’ बनाय दें का?
‘नाहीं हो! एक काम करो कि गइया को लगाय के देखो तो, बछरुआ बांधे हैं अलग, जरा देखि लो का करती है, लगती है कि नाहीं।’
‘रहने दो, ‘चाह’ जीन बनाओ, हम सरवन कीहें पी के आय रहे है चाह। हॅऽ गइया लगाय के देखते हैं, दूध नाहीं होगा तऽ बपई को का दिया जायेगा?’
गाय लग गई और बबुआ ने दूह लिया दूध।
बबुआ को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है जबसे घर आया है तब से सोच रहा है सरवन के बारे में तथा रास्ते में हुई मार-पीट के बारे में ही। सरवन ने उसे लौटते समय रास्ते में ही सहेजा था कि गॉयें में केहू के नाहीं बताना है, रस्ते में हुई मार-पीट के बारे में, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात, सब डेराय जायेंगे कउनो मुकदमा लड़ने का फेर नाम न लेंगे। का करे बबुआ! बिफनी को बताये के नाहीं, वह नाहीं बतायेगा बिफनी से भी सरवन ने मना भी किया हुआ है।
चाह पी कर वह घर से निकल गया खेत की तरफ, खेत पर कुछ काम था खेती-बारी का, एक बोझ घांस भी लेता आयेगा। एह साल मौसम का रुख सही नाहीं है, खेती-किसानी तऽ ‘दउए’ के सहारे पर होती है।
सरवन से काल्हु बोलेगा बबुआ मार-पीट के बारे में, ए बाती के छिपाना ठीक नाहीं है। सरवन सबको अपने माफिक बूझता है जो गलत हैै। ई दुनिया नीक नाहीं है, अपने मतलब में सब आन्हर होय गये हैं। बहुत गलती होय गई, रामलाल के खिलाफ हमलोगों को रपट लिखवा देना चाहिए था। सरवन ने गलती किया हमैं रोक कर, चलो काल्हु बात होगी सरवन से रपट लिखवाने के बारे में। रामलाल को के नाहीं जानता है, अपने गायें में कई लोगों से मार-पीट कर चुका है।
बबुआ अन्दर अन्दर ही घबराया हुआ है, बिफनी से बता देता मार-पीट के बारे में तऽ घबराहट कुछ कम हो जाती पर सरवन ने मना किया हुआ है कैसे बताये बिफनी को। कसमसा कर रह जाता है बबुआ और खुद को रोकता है। कइसहूं रात बीत जाती फिर वह सरवन के पास जाता और उसे रपट लिखवाने के बारे में समझाता। काहे नाहीं मानेगा सरवन बात, जरूर मानेगा।
रात होने में देर नहीं थी, होने वाली ही थी। बिफनी खाना बना रही थी, रोटी और भंटा की तरकारी। भंटा की तरकारी उसे ठीक लगती है।
‘घर में दारू है कि नाहीं! अगर होती तऽ रात बीत जाती, मन बहुत परेशान है।’
बपई के यहां से उठ कर वह आंगन में जाता है, आंगन क्या पीछे के हाते में, पीछे कमरे तो हैं नहीं केवल दो ही तरफ तो बने हुए हैं घर, बकिया हाता है, बांस की टाटी से घेरा हुआ। टाटी पर जाड़े में सेम अउर नेनुआ खूब फरता है, टाटी दोनों काम करती है घोरान अउर तरकारी का। बबुआ सीधे अपने कमरे में जाता है और खोजने लगता है दारू, उसे पता है कि कहां छिपा कर रख सकती है, बिफनी जानती है कि छिपा कर न रखो तो कभी भी ढकेलने लगंेगे मुहे में।
बबुआ घर के कोनों को देख रहा है, कोनों में कई किसिम के झोले टंगे हुए हैं झोलों में कई चीजंे हैं अलग-अलग कहीं धनिया है तो कहीं मर्चा है, कहीं किसी चीज का बंेगा है तो कहीं गुड़ कहीं चीनी पर किसी में दारू नहीं है। दारू कहीं दूसरी जगह पर रखी होगी पर घर में दूसरी जगह है कौन? बबुआ को कहीं भी दारू नहीं मिलती वह परेशान हो जाता है फिर आंगन में आता है बिफनी की सिफारिश करने...
‘कारे बिफनी कुछ रखी हो का?’
‘का रखी हो’...पूछा बिफनी ने
‘उहय समझ लो,’ बबुबा ने इशारा किया
‘का उहय?’ बुझौवल न बुझाओ बोलो साफ साफ
‘अरे अब का बतावैं, बूझि लो कुछ चाही मन हरियाने के लिए, आजु दिमाग
बहुत खराब है।’
‘हम नाहीं बूझ पा रहे हैं तूं साफ साफ बताओ तो हम बतायें के रखे हैं के नाहीं’ं
‘हम का बतावैं तोहसे, उहय समझ लो जउने से चनरमा दिखाने लगता है अउर.... इसके आगे नहीं बोलता बबुआ, सीधे जकड़ लेता है बिफनी को गोदी में...
‘ई का करि रहे हो हम हल्ला कर देंगे बपई अबहीं सोये नाहीं हैं फेर तूं समझना, का है, का है चिल्लाने लगेंगे, का बताओगे ओन्है तब तऽ मुह चोराय के भाग जाओगे, न दिन देखते हो नऽ रात।’
बिफनी जोर लगा कर निकल आती है बबुआ के अॅकवार से बाहर और भाग जाती है गोइठउर की तरफ, जहां भूसा रखा हुआ है और खरी-दाना। वहां से निकाल ले आती है एक बोतल दारू जिसे छिपा कर रखा हुआ था बिफनी ने। दारू वह तब निकालती जब उसका भाई आता, भाई के लिए छिपा कर रखे हुई थी।
बबुआ के हाथ में दारू की बोतल थमाते हुए बिफनी ने मजाक किया...
‘लो इहै चाहिए नऽ’
नाहीं रे इहय नाहीं, चाही तऽ अउर कुछ, चल ऊ बाद में बतियायेंगे। चनवा भुजाय गया नऽ ओमे नून, तेल पियाज मिलाय के दो तब न खोलैं बोतल। हं एक बात अउर अकेलै नाहीं पियंेगे बूझ रही हो नऽ’
‘केके बोलाओगे राती में का सरवन भइया के आ खेलावन भइया के,’
अरे पगली केहूे के नाहीं आजु ताहरे संगे पियय के मन है, ढेरै दिन होय गया जल्दी से खाना-पीना का काम निपटाय लो, बपई के खाना खिलाय के आजाओ, खाना
खाने के पहिले पीना है, बूझ रही नऽ हमार बात।’
बबुआ की रात जिसे गजरना था गुजर गई, रात के साथ बबुआ भी गुजरता रहा एक फायदा हुआ दारू पीने से कि रामलाल का खियाल उसे नहीं आया। रामलाल का खियाल न आये इसी लिए उसने दारू पिया भी था। रात में जब तक जाग थी तब तक बिफनी परास के लाल लाल फूलों की तरह उसे दिख रही थी मुलायम और कोमल। बबुआ की यह दुनिया किराये वाली नहीं थी, अपनी थी, एकदम कुदरती, कुदरती भाव-बोधों वाली, सरस और मधुर। समय भी दोनों के साथ साथ था, प्यार से सना एक कदम आगे वे चलते तो समय दो कदम आगे चल देता फिर तो देह वाली दुनिया तन से होते हुए मन को समाधिस्त कर देती।
रात का गुजरना दोनों के लिए काफी संगीतमय था जंगल के रात वाले संगीत की धुनों की तरह, हल्की सी हवा चली नहीं कि पेड़ झूमने लगते हैं और पत्ते आपस में संगीत की धुनंे छेड़ देते हैं सर सर वाली। उसी सर-सराहट में दोनों की रात गुजर गई। दोनों रात भर झूमते रहे, सर-सराते रहे।
सबेरे जब बबुबा जागा तब उसे देह में मन्द मन्द दर्द महसूस हुआ..
लगता है रात की खुमारी वाला दरद है, ज्यादा दारू हो गई थी का? या दरद कुछ और का है? उसी का हो सकता है दरद, नर-नाश्ता करने के बाद बबुबा सरवन के घर गया, सरवन घर पर नहीं था। सरवन बगल के गॉव में गया हुआ था, समिति के मंत्राी जी ने सबेरे ही सरवन के पास समिति का एक कार्यकर्ता भेजा था। समिति के काम से वह बगल के गॉव में गया हुआ था, लौट ही रहा होगा, दुइ घंटा हो गया होगा, बुधनी काकी ने बबुआ को बताया। सुगनी घर के भीतर गई थी खरी लाने के लिए गोय-गोरू को सानी लगाना था, सबेरहीं सानी भूसा लगाय दो तो दिन भर की छुट्टी होय जाती है, गाय दुहा ही गई है, दुई ठो बैल हैं ओनकर सेवा-टहल भी तो करनी पड़ती है।
‘अरे! देवर जी बइठिये ओसारे में, इहां काहे खड़े हैं, ऊ आय रहे होंगे,बोल के गये हैं कि एक घंटे में आ जायेंगे। कउनो काम तऽ नाहीं है न घरे, जब काम नाहीं है घरे तब का, बइठिये ऊ अइयय जायेंगे।’
बबुआ सोमारू काका के पास बैठ गया। सोमारू काका आराम से थे, दर्द वगैरह नहीं था, कायदे से बोल-बतिया रहे थे, काका ने बबुआ से पूछा...
‘का हो बबुआ! का होय रहा है मुकदमा में, काल्हु तूं लोग गये थे कचहरी नऽ?
‘हां काका हमलोग गये थे काल्हु कचहरी, वकील साहब को खतौनी देना था। वकील साहब बोल रहे थे कि मुकदमा हमलोगों को ही जीतना है, ओन्है कउनो जोर-दार पाइन्ट मिल गया है।’
‘चलो ठीक है, हं एक बात अउर बताओ, का हुआ सामूहिक खेती वाले काम का, का गॉयें कऽ सब लोग तैयार हो गये हैं?’ पूछा सोमारू काका ने बबुआ से
‘हं काका सब लोग तैयार ही हैं पर काका तूं का तो बोल रहे थे, तूं तैयार हो
कि नाहीं काका?’सोमारू से पूछा बबुआ ने
हस पड़े सोमारू काका..
‘का बोलते हो बबुआ! हम काहे नाहीं तैयार होंगे, ऊ तऽ अइसही बोल दिये थे सरवन से देखने के लिए कि वह का बोलता है?
कुछ ही देर में सरवन चला आया...
‘का हो बबुआ! कब आये हो?’ पूछा सरवन ने बबुआ से
होय गया एक-डेढ़ घंटा, कहां गये थेे हो, का काम था.. पूछा बबुआ ने
अरे यार! समिति का काम था
हमरे गॉये के जोड़ लिए हैं मंत्राी जी समिति के कार्य-क्षेत्रा में, घरे घरे का सर्वे करना है, सर्वे वाला फरमवा तऽ हम तोहैं देखाये हैं नऽ’
‘सरवन! ऐसा है चलो खेत की तरफ चलते हैं। कई दिन होय गया ओहर हमलोग नाहीं गये।’
‘हां यार! ठीक बोलते हो चलो चलते हैं...’
फिर दोनों खेत की तरफ चल दिये, खेत बहुत दूर नहीं था। खेत के बीच में नीम का एक झखनार पेड़ था, उसके नीचे एक चबूतरा था, दोनों चबूतरे पर बैठ गये और बतियाने लगे...बबुआ जोर देने लगा कि रामलाल पर रपट लिखवाना है, सरवन नकारने लगा। दोनों एक दूसरे की राय से अलग थे...
‘काहे नाहीं रपट लिखवाना है?’
का होगा रपट लिखवा कर, थाना का कर लेगा, रामलाल थाने पर रुपया उझील देगा फिर ठांय ठांय फिस्स। अउर दुश्मनी अलग से बढ़ जायेगी। मार के दिन जो लड़का पकड़ाया था पता नहीं वह झूठ बोल रहा था कि सही, का पता....
सो हम तऽ गुन रहे हैं कि रपट लिखवाना ठीक नाहीं होगा अउर तूहों भुला जाओ ओके, के का हुआ था ओ दिन।
बबुआ कैसे समझाये सरवन को उसे कुछ समझ नाहीं आय रहा। सरवन तो समझना ही नहीं चाह रहा।
‘देख सरवन, तूं हमार बात नाहीं समझ रहा है, समझना चाह भी नाहीं रहा है, ई ठीक नाहीं हैै, रामलाल सरहंग है कुछ भी कर सकता है फेर का होगा? तब का करोगे, एसे हम बोल रहे हैं कि अजुए चलो थाने अउर रपट लिखवा दिया जाये।’
सरवन तो तय किए हुए था कि जो होना होगा होय जायेगा, ओके केहू नाहीं रोक सकता सो काहे परेशान होना, वे लोग चाहे जौन करें, हमें शान्ति से काम करना है अउर मार-पीट नाहीं करना है तऽ नाहीं करना है।
‘जौन किस्मत में लिखा होगा ऊ तऽ होइबै करेगा, बूझ रहे हो नऽ बबुआ!’
‘हं अब काम के बारे में सोचो, समिति के मंत्राी जी बोले हैं कि गॉयें की सूची बनाय लो, केकर केकर केतना खेत है ओकर रकबा लिख लो, कुल केतना खेती समूह में होगी ओकर पूरा कागज बनाय लो, दो ठो रजिस्टर भी दिए हैं मंत्राी जीं तूं तऽ खाली
हो गये किसानी से काल्हु से इहय काम करना है।
‘हं यार! ई बताओ के बिफनी केतना पढ़ी है?’
‘आठ पास है’
‘आठ पास है, स्कूल पढ़ कर के घरहीं से बिना पढ़े’
‘नाहीं हो स्कूल जा कर, ओकरे बुद्धि से नाहीं अन्दाजा लगता का तोहैं...’
‘कायदे से लिख पढ़ि लेती है नऽ।’
‘अउर नाहीं तऽ का?’
‘तब तऽ ठीक रहेगा सुगनी अउर बिफनी दोनों मिल कर समूह के हिसाब-किताब के लिखा-पढ़ी का काम कर लेंगी, ई ठीक रहेगा।’
सरवन किसी भी तरह से रपट लिखवाने के लिए तैयार नहीं हुआ फिर बबुबा ने उस पर जोर नहीं दिया...
‘ठीकै बोल रहा है सरवन का होगा रपट लिखवा कर थाना-थूनी का कर लेगा, रामलाल का रुपिया खा कर बइठ जायेगा।’
कुछ देर के बाद दोनों लौट आये अपने अपने घर। अगले दिन से ही सरवन ने सामूहिक खेती करने के लिए समूह के गठन का काम शुरू कर दिया। इस साल धान की खेती समूह में ही होगी अलग अलग नाहीं। समूह तो गॉव में पहले से ही बना हुआ था केवल दो-तीन लोग ऐसे थे जो समूह से अलग थे। एक दिन गॉव में समिति के मंत्राी जी आये मीटिंग होनी थी। गॉव का आर्थिक सर्वेक्षण पहले ही सरवन कर चुका था तथा समिति के पास गॉव के जोत-दारों के नाम भी दर्ज हो चुके थे। उसी के आधार पर ही समिति को फन्ड मिलना था जो एक महीने पहले ही समिति के खाते में आ गया था।
समिति को सामूहिक खेती कैसे होगी, कौन कौन से संसाधन चाहिए खेती के लिए, कितना बीज लगेगा तथा अगली खेती के लिए धन की कितनी आवश्यकता होगी? सारा विवरण मंत्राी जी को तैयार करना था तथा उस विवरण को फन्डर के पास एक सप्ताह के भीतर ही भेजना था सो मंत्राी जी गॉव में थे और समूह के सभी सदस्यों के साथ बैठक कर रहे थे।
सारा विवरण तैयार करने में करीब तीन घंटे लग गये फिर मीटिंग समाप्त हो पाई। मीटिंग समाप्त होते ही गॉव के वे कुछ लोग भी वहीं आ गये जो समूह की खेती में भाग नहीं लेना चाहते थे, वे सीधे मंत्राी जी से मिले...बकिया जो अलग थे वे तो अलग थे ही।
‘साहब हमलोग भी समूह की खेती में रहना चाहते हैं, जब आपकी तरफ से खाद और बीज मिल रहा है तब हम अपनी खाद क्यों लगायें, क्यों लगायें अपना बीज। हमलोगन के भी समूह में शामिल कर लीजिए।’
मंत्राी जी ने तो खेती में लगने वाले अनुमानित खार्चो का विवरण तैयार कर लिया
था। अब क्या करें... कुछ सोच कर उन्होंने उन लोगों का नाम भी रजिस्टर पर
चढ़ा लिया। चलो काई बात नहीं फिर से पूरा विवरण बनाना होगा। आपलोग भी इस फारम पर दस्तखत बनाय दीजिए, यह फारम हिस्से वाला है ताकि बाद में झगड़ा झंझट न हो, सबका हिस्सा बिगहे पर तय है जिसका जितना खेत होगा उसे उसके अनुसार ही लाभ मिलेगा। मजदूरी सभी को बराबर मिलेगी केवल लाभ में अन्तर होगा और लाभ निकलेगा खेती का पूरा खर्चा काट कर।
‘हमलोग सब जान गये हैं मंत्राी जी, सरवन ने बताया था हम लोगों को समूह की खेती के बारे में, आप हमलोगों को समूह में किसी तरह शामिल कर लीजिए बस एतनै कीजिए।’
मंत्राी जी ने उन लोगों का नाम रजिस्टर पर लिख लिया। उन लोगों ने संस्था का फारम भी भर दिया।
मंत्राी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि हम आपलोगों का फारम भेज देंगे अगर मंजूर हो गया तो ठीक है, इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जायंेगे नहीं तो अगले साल तो हम आपलोगों का नाम प्रयास करके समूह में जोड़वा ही देंगे। बढ़िया मौका था इसी साल आपलोग समूह के सदस्य हो जाते पर आप लोग इनकार कर दिये...
सरवन ने तो बहुत प्रयास किया कि दोनों टोले एक हो जांयें। पर सोचने से का होता है?
सोचना, गुनना तो धरती-माई को है, धरती-कथा को का पड़ी कि वह गुने धरती-माई के बारे में, उसका तो काम है जैसा दीख रहा है वैसा ही लिख देना कथा की तरह, जगह जगह उसमें मनोरंजकता का जादुई छौंक लगा दे, कहीं कहीं कथा को रहस्य की तरफ भी मोड़ दे, कुछ कुछ बन्द बन्द जैसा खुले भी तो दिमाग लगाने के बाद। आखिर हर खुली चीज अच्छी भी तो नहीं होती आकाश की तरह, धरती की तरह पर धरती भी कहां खुली खुली है वह भी तो बन्द बन्द है संप्रभुताओं में, भूगोलों में। कथा को भी तो बन्द होना ही पड़ता है किसी न किसी दिन पर वह दिन अभी बहुत दूर है...कोई ऐसी कथा नहीं जो बन्द न होती हो चाहे कोई कथा देख लो, राम की कथा बन्द हो जाती है रावण के वध के साथ तो कृष्ण की कथा भी बन्द हो जाती है कंस वध के साथ।
‘एक नई सोच, नई अवधारणा
और समूह की खेती यानि कंधे से कंधा मिला कर चलो’
बिना राजसी सिंगार के धरती कथा गॉव में घुस रही है, माथे का मुकुट तथा गले का हार भी उसने उतार दिया है, उसके पॉवों में पैजनी भी नहीं है, राजसी वस्त्रा भी उतार दिया है देह से। देह से महलों वाली गंध भी नहीं फूट रही...चली जा रही है पगडंडियों पर उसका लक्ष्य क्या है, क्यों जा रही है गॉवों की तरफ, महलों में तो वह राज-रानी थी, स्वर्ग में भी पूज्य और आराध्य थी, आखिर ‘धरती माई’ का बनने जा रही है का गॉवों की तरफ.. का बन जायेगी धरती-माई?
समय बीतते देर नहीं लगती, जेठ खतम होय गया, अषाढ़ माथे पर खड़ा है फिर भी मौसम में आग है, कहीं नरमी का नाम नहीं, बादल जाने कहॉ छिपे हुए हैं, कुछ तो रिम-झिम शुरू होना चाहिए।
कुछ रिमझिम होगा तभी तो करइल माटी ठंडायेगी, गरम होते ही फट जाती है, दर्रे फट जाते हैं हर तरफ, गाय-गोरू घुस जांये ओमे। आदमी न देखे तो वह भी घुस जाय दर्रे में। ‘इन्नर’ भगवान का खेल के जानता है? उहय पानी के देवता हैं। एक बात एह साल ठीक हुई है चॉपा-कल का पानी नीचे नाहीं उतरा है अउर पोखरवौ में निपटान के बाद चुत्तर धोने लायक पानी बचा हुआ है। ये महीने में एतना पानी भी कहां बचा रहता है पोखरा में। वैसे अन्दाजा तो है कि मौसम ठीक रहेगा पर भगवान की गति के बारे में के जानै। समूह की खेती का काम शुरू हो चुका है।
सभी लोग मिल कर गोबर-राख के ढेरों को खेतों में डालने लगे हैं, गोबर और राख का घूर रख कर का होगा घर पर? बिअड़ा में चला जायेगा तो बंेगा अच्छा जामेगा, बेंगा अच्छा अउर पोढ़ होगा तो धान की पैदावार भी अच्छी होगी।
‘एक नामी ‘पतिवाह’ अहिरान टोले में आये थे, गाय-गोरू का जमावड़ा हो गया था पर ओतना नाहीं जेतना पहिले हुआ करता था। अब गाय-गोरू कौन रख रहा है किसानी वाला सारा काम टेक्टर से होय रहा है। पतिवाह बाबा बोले हैं कि यह साल बरसात का अच्छा जोग है, फसल भी अच्छी होगी। अन्न-धन भरा रहेगा हर घर में।
बरसात तो होनी ही थी कुछ ही दिनों के बाद बरसात होने लगी। खेतों ने जोत लायक पानी पी लिया फिर क्या था समूह के लोग अपने अपने हल चलाने लगे खेतों में। खेत भी समूह के लोगों का करीब करीब एक साथ ही मिला हुआ था इस लिए खेती करने में आसानी थी। केवल उतराहाटोले वालों के खेत अलग थे एक सिवान के बाद। बेंगा डाला जा चुका था जो काफी पोढ़ हुआ था केवल रोपाई बाकी थी। जब रोपाई शुरू हुई तो वह भी पन्द्रह-बीस दिन के अन्दर ही खतम हो गई।
अचरज हो गया पूरे समूह में, पहिले तो एक महीना नाहीं तऽ बीस दिन लग ही जाता था, एह साल जल्दी हो गई रोपाई। जल्दी काहे नाहीं होगी पन्द्रह हल जोत रहे थे खेत। रोपाई तो जल्दी खतम होनी ही थी। समूह की ताकत का असर था, नई जोश थी, किसी भी तरह से उतराहाटोले से पहले रोपाई खतम करनी ही होगी ऐसा भाव था।
रोपाई के समय ही समिति का फन्डर भी आया था और उसने खेत की सामूहिक जोताई तथा रोपाई का बी.डी.ओ. बनाया था कुछ फोटो मोबाइल से तो कुछ साधारण कैमरे से खींचा था। फन्डर काफी खुश खुश हुआ था। उसे लगा था कि समूह की खेती करवा कर वह किसी दिन सामूहिक खेती केअभियान को पूरे देश में चलवा सकेगा, उसके इस अभियान के प्रति तमाम दूसरे फन्डर भी आकर्षित होंगे और अपने अपने कार्य-क्षेत्रा में सामहिक खेती को बढ़ावा देंगे। सामूहिक खेती वाले अभियान को फन्डर ने देश के बड़े पत्राकारों से भी दिल्ली जा कर साझा कर लिया। बड़े बड़े पत्राकारों के लिए सामूहिक खेती का अभियान अचरज भरा था.. वे मान कर चल रहे थे कि भारतीय समाज आज के समय में एकल परिवार की अवधारणा पर चल रहा है ऐसी स्थिति में सामूहिक खेती का का मतलब? जरूर कोई बात होगी। पत्राकार तो पत्राकार, नई बातों को समाज के सामने लाने वाले तभी तो उनकी पत्राकारिता का मकसद सफल होगा... सामूहिक खेती का वी.डी.ओ. देख कर वे ललच उठे...
सोनभद्र चर्चित हो गया पूरे देश में। पत्राकार जो चाहें चर्चित करा दें ‘समूह की खेती देखने चलना है सोनभद्र, वह भी जनता की स्वस्फूर्तता से, उनकी अपनी चेतना और इच्छा से...पत्राकारों ने मन बना लिया। और एक दिन फन्डर के साथ वे गॉव चले आये। रोपाई खतम हो चुकी थी और सोहनी हो रही थी, खड़-पतवार निकाले जा रहे थे रोपे हुए खेतों से, करीब पचासों लोग खेतों में थे, कुछ जवान कुछ वृद्ध तो कुछ अधेड़, औरत मर्द दोनों, उनके काम को देखने वाला वहां कोई नहीं। वहां कोई देखने वाला होता भी कैसे, वे तो सबके सब मालिक थे और मजूर भी। पत्राकारों के लिए वहां का दृश्य अद्भुत था, सामूहिक खेती की बातंे उन लोगों ने किताबों में पढ़ा था पर व्यावहारिक रूप उसका वे यहीं देख रहे थे। दिल्ली लौटने पर पत्राकारों ने सामूहिक खेती के अभियान को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित करने का काम किया। उससे फन्डर को बहुत लाभ मिला कुछ दूसरे उदार घन-दाताओं ने फन्डर को धन भी दिया और बोला भी कि उ.प्र. के पिछड़े जिले सोनभद्र में सामूहिक खेती के काम को दूसरे गॉवों में भी बढ़ाओ, कोशिश करो कि वहां गॉवों में सामूहिक खेती होने लगे, जितना संभव हो सके गरीबों को सामूहिक खेती के अभियान से जोड़ो। बाहर ही नहीं अगल-बगल गॉव वालों के लिए भी हल्दीघाटी गॉव में हो रही सामूहिक खेती का काम अचरज भरा था। का हो गया गॉव में, कैसे बन गई ऐसी एकता, कहते हैं गरीबों में एकता बन ही नहीं सकती।
वैसे एकता तो हल्दीघाटी वाले गॉव में भी नहीं थी, वहां जो समूह की खेती वाली एकता बनी है वह महज तीस-पैंतीस लोगांे की ही है बकिया उतराहाटोले के करीब बीसों लोग समूह की खेती में शामिल नहीं हुए थे। वे एकता में यकीन करने वालों में नहीं थे, वे, अलग अलग तरीके से चलने की चाह और अभिलाषा वाले थे सो पहिले की तरह अलग अलग अपनी खेती कर रहे थे। पर सरवन के समूह की खेती देख कर वे लोग परेशान हो गये। उन्हें पता चल गया था कि समूह की खेती के लिए जो जन कल्याण समिति है वह खाद और बीज दे रही है। कम नहीं है खाद और बीज की मदत, इस मदत के कारण खेती अच्छी होगी और खेती का खर्चा भी कम आयेगा। जो लोग समूह से अलग थे उन्हें खाद तथा बीज दोनों का इन्तजाम अपने स्तर से करना पड़ रहा था। वैसे भी खाद खरीदना आसान नहीं था, यूरिया और डाई दोनों के दाम बढ़े हुए थे, खाद उसी को मिलती जो रुपया खरचता, और रुपया तो
एक ऐसी चीज है जो गॉवों से एकदम अलग रहने वाली चीज है। रुपया कहॉ होता है गरीब खेतिहर किसानों के पास। सो उतराहाटोले के लोग परेशान थे।
नन्हकू काका के जमाने में भी उतराहाटोले वाले अलग थे खान-पान, शादी, बिआह सभी कामों में अलग। अलगाव उन लोगों में इतना था कि किसी भी प्रयोजन में वे एक साथ नहीं जुटते थे। नन्हकू काका ने उतराहाटोले के लोगों को एक साथ जोड़ने का बहुत प्रयास किया था पर सब बेकार था। कई बार तो नन्हकू काका उतराहाटोले में शादी आदि के मौके पर बिना बुलाये भी चले जाया करते थे पर वे लोग थे कि बुलाने पर भी दखिनाहा टोले केआयोजनों में शमिल नहीं हुआ करते थे। नन्हकू काका चाहते थे कि पूरा गॉव एक हो कर मुकदमा लड़े जमीन का, आयोजनों में एक साथ रहे, पहले का हुआ था भूल जायंे पर नहीं वे लोग तो भूलना जानते ही नहीं थे वे पुरानी बातों को याद रखने में यकीन करते थे...भला वे कैसे भूल जाते कि उनके परिवार के कुछ लोगों को बिरादरी से निकाल दिया गया था, उन्हें अछूत बना दिया गया था, उनसे माड़-भात लिया गया उनके मान-सम्मान को पूरी बिरादरी में गिराया गया, कई कई लड़के जो अब बुढ़ाय गये हैं वे बिना शादी के रह गये, कौन शादी करता उनसे, बिरादरी से गिरे आदमी को कौन पूछता है, कई तरह की यादों को पकड़े हुए उतराहाटोले के लोग न तो कभी एक साथ नन्हकू काका के साथ चले और न ही अब सरवन के साथ चल रहे हैं, कभी एक साथ आयोजनों में शामिल भी नहीं हुए और न ही मुकदमा लड़ने के लिए राजी हुए। नन्हकू काका का दखिनाहा टोला था वह एक साथ उनके जमाने में भी था और सरवन के जमाने में भी एक साथ है। यही टोला जमीन का मुकदमा भी लड़ रहा है। सरवन ने भी उतराहाटोले के कई लोगों से समूह की खेती के बारे में बातें किया था पर किसी ने नहीं सुनी उसकी बातें.सुनता भी कौन? उन लोगों के मन में तो बहुत पहले से ही नन्हकू काका के दखिनाहा टोले वालों से जलन थी, जलन काहे नाहीं होती, नन्हकू काका के टोले वालों का रियासत में मान था, इसी टोले का आदमी बिरादरी का चौधरी हुआ करता था हर बार। बुझावन काका के बपई चौधरी थे उनके देहान्त के बाद बुझावन काका ने इनकार कर दिया चौधराहट करने से तब नन्हकू काका चौधराहट करने लगे। जाति बिरादरी में भी नन्हकू काका के टोले वाले ऊॅची कूरी के माने जाते थे और वैसे ही उन्हें सम्मान भी मिलता था। वैसे अब तो चौधरी वाली कोई बात बिरादरी में है नहीं, नहीं तो सरवन ही बिरादरी का चौधरी होता, वही गॉव की पंचायत निपटाता।
उतराहाटोले वालों को जाति बिरादरी में उतना मान नहीं था चाहे मामला बिआह का हो या और किसी चीज का पहले नन्हकू काका के टोले वालों की पूछ होती थी बाद में उतराहाटोले वालों की।
उतराहाटोले वालों में कुछ ऐसे लोग थे जिसके कारण उनका मान-सम्मान बिरादरी में गिर गया था। कुछ लोगों ने बिआह ऐसा कर लिया था जो बिरादरी के लिए मान्य नहीं था। किसी ने अपनी जाति से अलग चेरो बिरादरी की लड़की रख
लिया तो कोई कहीं से धांगर बिरादरी की लड़की उठा लाया। ऐसा करना पहले के दौर में बहुत भयानक सामाजिक अपराध था भले ही कानूनी नहीं था तो क्या हुआ? पहले के जमाने में जाति के नियमों का अनुपालन सामूहिक रूप से गॉव के लोग ही करवाया करते थे। भला किसी की मजाल जो बिरादरी के सामाजिक नियमों को तोड़ दे! आज के कानून का प्रभाव तथा परिणाम दोनों पहले के सामाजिक नियमों के मुकाबिले में कुछ नहीं दिख रहा। कानून तोड़ने वाले अपराधी गॉव में खुले-आम घूम रहे हैं इतना ही नहीं गॉव में हीरो बने हुए हैं, वे ग्रामनायक की तरह गॉव की राजनीति का संचालन कर रहे हैं, मस्त मस्त हैं, कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा पर सामाजिक नियम तोड़ने वालों के लिए मुश्किल था उस जमाने में ग्राम-नायक बन कर गॉव में जमे रहना। उन्हें दण्ड भोगना पड़ता था, दण्ड भी गॉव ही उन्हें दिया करता था। जाति से बाहर शादी हो गई तो बाल-बुतरू भी होंगे। ऐसे बाल-बुतरूओं को बिरादरी मान्यता नहीं देती थी, उन्हें नाजायज मानती है। बिरादरी का हजारों साल वाला रीति-रिवाज कानूनी ढंग से भले हीे गलत हो पर बिरादरी के लिए गलत नहीं होता है। वह सामाजिक न्याय आज भी पहले की तरह से कम अधिक चल रहा है हमारे समाज में।
बिरादरी काहे स्वीकारे एसेे बाल-बुतरूओं का जिससे जाति का खून गन्दा हो गया हो या मिश्रित हो गया हो। बिरादरी तो बिरादरी उसे क्या पता कि मानव समाज में शुद्ध खून वाला मामला अब कहीं नहीं है, हमारा पूरा समाज खून की पवित्राता का आज के समय में दावा नहीं कर सकता। नन्हकू काका समाज की इस सचाई को जानते थे सो वे दखिनाहा टोले के लोगों को उतराहा टोले के लोगों के साथ जोेेड़ने का लगातार प्रयास करते रहे थे, चाहते थे कि सबमें खान-पान का नाता बन जाये पर नहीं बन सका उनके जमाने तक। सरवन भी थक कर बैठ गया।
उतराहाटोला अतीत के साथ चल रहा था, और अतीत था कि उनके लिए अपमान-जनक था जिसे गढ़ा था दखिनाहा टोले वालों ने, कई बार उन दोनों टोलों में खेत के बटवारे को लेकर मार-पीट भी हो चुकी थी, यह मार-पीट आग में घी डालने जैसा था सो वे दखिनाहा टोले से काफी दूरी बना कर चला करते थे और मानते थे कि दुश्मन हमेशा दुश्मन ही रहता है, मौका मिलने पर वह कभी नहीं छोड़ेगा।
तो हल्दी घाटी वाले गॉव में भी अतीत किसी खतरनाक इतिहास की तरह सक्रिय था हालांकि उस इतिहास का भूगोल बहुत ही सीमित था कुछ ही एकड़ तक के विस्तारित क्षेत्रा वाला पर अतीत तो था ही। इतिहास चाहे कितनाहू बड़े भू-भाग का हो या कितनाहू बड़े मानव समूह का हो या कि छोटे मानव समूह का हो उसका काम हर जगह बराबरी का होता है, मन में जलन, डाह, ईर्ष्या पैदा करना और बदला लेना। इतिहास के इस खतरनाक पक्ष के साथ ही हल्दीघाटी वाले गॉव का उतराहाटोला था पर मानव सभ्यता के इतिहास का वह पक्ष जो सहयोग, सहभागिता तथा प्रेम पर टिका होता है वह उस टोले में नहीं था। इतिहास का यह दूसरा पक्ष केवल हल्दीघाटी गॉव में ही नहीं पूरे सोनभद्र में नहीं था हर जगह पहला पक्ष ही था कि उनके साथ अन्याय किया गया है, उन्हें अछूत बना दिया गया है। खरवार बिरादरी में तो यह है कि उन्हें अगोरी व बिजयगढ़ राज से बेदखल किया गया है नहीं तो किसी जमाने में ये दोनों रियासतें उनकी हुआ करती थीं। तो मानव समूहों को आपस में अलग बनाये रखने वाला इतिहास का पुराना खतरनाक खेल हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था।
सरवन समझता है इस बात को और मानता भी है कि उसके पुरखों ने अपने ही लोगों को अछूत बना कर गलत किया था पर वह अतीत तो बदल नहीं सकता। समूह की खेती के लिए उसकी जितनी अक्ल थी सब लगा दिया... सबसे माफी मांगा, उतराहाटोले वालों के पैरों पर गिरा पर वे राजी नहीं हुए।
उतराहाटोले के लोग दखिनाहा टोले वालों के साथ नहीं जुड़ पाये। सरवन के टोले वालों ने ही समूह में खेती किया और काफी फायदा भी हुआ। समिति के मंत्राी ने एक काम बहुत अच्छा किया था कि वे लगातार समूह की खेती की निगरानी कर रहे थे। दूसरी समितियों के मंत्रियों की तरह समूह वालांे को घन की सहायता करके खुद अलग नहीं हो गये थे। वे लगातार खेती के खर्चों का हिसाब किताब देख रहे थे इतना ही नहीं, पैदावार का बटवारा भी अपनी देख-रेख में ही उन्होंने करवाया। पहले खेती का खर्च निकाला गया, मजूरी निकाली गई शेष बची पैदावार को लाभ में माना गया। दखिनाहा टोले के समूह वाले गद गद थे...
बुधनी काकी तो सरवन का पीठ ठोंकने लगीं...
‘वाह बेटा! बड़ा नीक काम किये समूह बना कर, पहिले हमलोग खेती करते थे तो केवल खाने भर का ही अनाज मिल पाता था इस बार तो बेचने के लिए भी मिल गया है।’
सोमारू काका और बुझावन काका भी खुश खुश थे। सोमारू काका ने तो एक दिन सरवन से कहा भी...‘हम तो बुझ रहे थे कि तूं समूह बना कर घरवौं की खेतिया चौपट कर दोगे, एही कारण हम मना किए थे कि समूह के चक्कर में न पड़ो पर अब समझ में आय गया कि कउनो काम जवन दस लोगों के द्वारा हो जायेगा एक आदमी उसे नहीं कर पायेगा सो यह ठीक हुआ सरवन।’
उतराहाटोले वाले समूह की खेती में हुए लाभ को सुनकर परेशान थे, वे अफसोस कर रहे थे कि वे भी अगर समूह की खेती में शामिल हुए होते तो उन्हें भी लाभ मिलता। उनमें से एक दो लोग जो समूह की खेती में शामिल होना चाहते थे वे अपने टोले के लोगों को कोस रहे थे...जिन्होंने समूह की खेती में शामिल होने का विरोध किया था...
‘सरवन तो हमरे टोले में आया था सबको एक साथ जोड़ने के लिए, सबके गोड़े पर गिरा था पर नाहीं, वो तो दुश्मन है, अरे जब दुश्मनी थी तो थी अब तो नाहीं है फेर का परेशानी थी समूह में शामिल होने में। दखिनाहा टोले वालों को खाद-बीज मुफत में मिल गया, फसल काहे नाहीं अच्छी होती, फसल तो खाद से अच्छी होती
है, हम लोग खरीद कर कितना डालते खाद इसलिए फसल अच्छी नाहीं हुई।’
उतराहाटोले के लोग एक दिन समिति के मंत्राी जी के यहां गये थे और दूसरा समूह बनाने के लिए रिरिया रहे थे। मंत्राी जी ने अपनी मजबूरी उन्हें बता दिया कि वे एक गॉव में दूसरा समूह नहीं बनवा सकते, एक गॉव में एक ही समूह काम करेगा। ई तो हम पहले ही बता चुके हैं आपलोगों को, हॉ अगली फसल के लिए हम आप लोगों का नाम सरवन के समूह के साथ जोड़ सकते हैं, अगर आप लोग राजी हैं तो अगली फसल के समय आइए और एक फार्म है उसे भर दीजिए फिर समूह से जुड़ जायेंगे आप लोग।
उतराहाटोले के लोग लौट आये मंत्राी जी से बतिया कर... अगली फसल तक हमलोगों को भी समूह से जुड़ जाना चाहिए, समूह की खेती से बहुत लाभ है, मजूरी भी दाम के दाम मिल जाती है और फायदा भी होता है, खाद-बीज का दाम नहीं देना पड़ता। सरवन अच्छा लड़का है वह भी कोशिश करेगा हमलोगों को समूह के साथ जोड़ने के लिए।
जोड़ना-घटाना तो कथा में भी पड़ता है, बिना जोड़े-घटाये कथा बन ही नहीं सकती, धरती-कथा में वैसे ही अनेक पात्रा हैं? अलग अलग चित्त और चेतना वाले, अलग विचार और धारणा वाले उन्हें एक साथ जोड़ना तथा कुछ को उनमें से घटाना, करिश्मा माफिक? धरती-माई मगन हैं धरती-पुत्रों को कथा में एक साथ देख कर, उनके द्वारा समूह की खेती देख कर, समूह की खेती के लिए सहायता करने वाला फन्डर धरती-माई का कहीं भक्त तो नहीं...!
‘हिंसा के पंख लग गयेे,
उड़ने लगे आदमी?’
‘धरती-कथा गॉव पहुंच कर मंत्रा पढ़ रही है, नभ, जल, क्षितिज, वायु, अग्नि तथा खुद धरती का भी..सब कुशल-मंगल रहे, ओम शान्तिः, ओम शान्तिः। धरती-कथा को धरती पर देखते ही धरती-पुत्रा धन्य हो गये हैं, वे पूजा कर रहे हैं अपनी धरती माई की, आरती उतार रहे हैं, अक्षत-पुष्प चढ़ा रहे हैं, धन्य हो ‘धरती माई’ आपने दर्शन तो दिया धरती पर...पर क्या सचमुच....’
सरवन खेती का काम निपटा कर मस्त मस्त था। वह मस्त काहे नाहीं रहता खेती में फायदा हुआ था, समूह के लोग मस्त मस्त थे तो वह भी मस्त मस्त था। पर पहले वह डर रहा था अगर समूह की खेती से लाभ न मिला तो वह अपने टोले में मुह दिखाने लायक नहीं रहेगा, लोग थूकेंगे उस पर, पर नहीं समूह को लाभ मिला। सरवन एक दिन खेती में लगी खाद और बीज का हिसाब कर रहा था... अगर उसका कुल दाम निकाल दिया जाये तो लाभ हुआ कि नाहीं, मंत्राी जी भी इस हिसाब को जानना चाह रहे थे... हिसाब निकाला गया, फिर भी खेती में लाभ था...
खेलावन सरवन के साथ था हिसाब के समय बोल पड़ा..
‘हम बोल रहे थे के, कान एहर से पकड़ो चाहे ओहर से लाभ ही लाभ मिलेगा।’
सरवन और उसके मित्रा खेती हो जाने के बाद घर के कामों में जुट गये, कोई दीवारों का लेवरन करने लगा तो कोई नया घर बनाने लगा, कोई छाजन ठीक करने लगा। सरवन भी अपने काम में लग गया था तथा कुछ दिनों के लिए रिश्तेदारी में भी चला गया था। वह भूल चुका था मुकदमे की तारीख के बारे में सो सरवन अगली तारीख पर नहीं जा पाया रापटगंज और एक दिन अचानक...
खेत पर जमीन कब्जा करने वालों का जमावड़ा हो गया। सरवन एक दिन पहले ही रिश्तेदारी से गॉव पर आया था। गॉव में खेत पर लोगों के जमावड़े की खबर आग की तरह फैल गई फिर क्या था सरवन तथा उसके मित्रा बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवान खेत पर हाजिर हो गये, लड़कों के साथ सुगनी, बिफनी, तेतरी, बैसाखी, बुधनी काकी तथा अन्य औरतें भी खेत पर हाजिर।
‘का होय रहा है, आपलोग हमलोगों का खेत काहे जोत रहे हैं, एक साथ औरतों और मर्दों के मिश्रित सवाल...’
‘हमारा खेत है, खेत पर हमारा नाम चढ़ गया है, हमने बैनामा कराया है इस जमीन का अब हम ही इस खेत को जातेंगे’ आरोपियों ने कड़ियल जबाब दिया..
‘कैसे जोतेंगे आप लोग हमारा खेत, हमलोगों ने अपील किया हुआ है, मुकदमा चल रहा है, मुकदमे में फैसला हो जाये तब जोतिएगा खेत अबहीं नाहीं।’
सरवन, बबुआ, बुद्धन ने एक साथ प्रतिवाद किया....
ट्रेक्टर चल रहा था उसके सामने ओरतें खड़ी हो गई, ड्राइबर ने ट्रेक्टर चलाना बन्द कर दिया तब तक दूसरा ट्रेक्टर गरजने लगा उसके सामने भी कुछ लोग खड़े हो गये...फिर तीसरा ट्रेक्टर... उसके सामने भी गॉव के लड़के तनेन हो गयेे।
हमारे ऊपर चलाओ टेक्टर... एक सम्मिलित आवाज...
‘हमलोग खेत कइसहूं नाहीं जोतने देंगे, चाहे जो करोे, सैकड़ों साल से हमलोग इसी खेत पर खेती कर रहे हैं, बाप-दादे के जमाने से, कउने कानून से खेत आपका होय गया.. जे जोतै कोड़ै खेत ओकर, फेर तूं लोग कैसे आ गये खेत पर। सरवन अकड़ गया, बुद्धन तनेन हो गया...डट गये सारे लड़के..
‘निकालो अपना टेक्टर हमलोगों के खेत से, हमलोगों का खेत काहे जोतोगे, भागो इहां से हमलोग डरने वाले नाहीं हैं।’
हल्दीघाटी गॉव के लोग अपना खेत बचाने के लिए प्रतिवाद कर रहे थे, उन्हें पता था कि बात-चीत से समस्याओं के हल निकल आते हैं पर वहां तो संवाद था ही नहीं वहां केवल ताकत थी, कानून का खेल था, सैकड़ों साल के लगातार कब्जे और जोत-कोड़ का कोई मतलब नहीं था।
मतलब होता भी क्यों? आरोपी ताकतवर थे, उनके पास ताकत के सारे सामान
थे, बन्दकें थीं, शासन-प्रशासन पर प्रभाव था, रुपया था दूसरी तरफ सरवन, बुद्धन, खेलावन, रजुआ कलुआ जैसे गॉव के दूसरे लोगों के पास क्या था, कुछ नहीं, वे खाली हाथ थे, खाली पेट थे, शासन-प्रशासन से उनके रिश्ते नहीं थे। वे ट्रेक्टर के सामने लोट सकते थे तो लोट रहे थे, वे रिरिया सकते थे तो रिरिया रहे थे पर उनकी सुनता कौन?
सुनने के बजाय घॉय, घॉय, शुरू हो गया, गरज उठीं बन्दूकें, चल पड़ीं लाठियां और गड़ासे, दमन-संस्कृति की मध्यकालीन भाषा, लोकतंत्रा में स्व ‘तंत्रा’ का अद्भुत आख्यान उतर आया धरती पर और दस आदमी कतल कर दिए गये, आदमी और भी मारे जाते पर फरियादियों की भीड़ अपनी जान गॅवाना नहीं चाहती थी, वे जीना चाहते थे सो गोली की डर से भागने लगे थे। ललकार भगाने की थी भी...कृ
‘भागो जितना भाग सकते हो’ यह ललकार की मध्यकालीन क्रूर धारा थी। पर आदिवासी भाग भी नहीं पाये, आखिर कितना भागते.. गोलियों ने उनके जिस्मों को छलनी कर दिया...फिर भी आदिवासी भागे, भागने में कोई कहीं गिरा कोई कहीं गिरा, किसी का माथा फूटा तो किसी का ठेहुना, चोटिल सभी हुए। औरतें उस समय भूल र्गइं अपना ऑचल संभालना, बच्चों को सहेजना, बच्चे भी भागे जो भाग सकते थे।
मारे गये आदिवासी अपने अधिकारों की फरियादी भीड़ का हिस्सा थे। वे अपना खेत बचाना चाह रहे थे, हमारा खेत है इसे मत जोतो, हमारा कब्जा रहनेे दो, बस इतना ही...उन्हें नहीं पता था कि उनकी जिन्दगी गोलियों का निशाना बन जायेगी। आदिवासी इक्कीसवी शदी के लोग थे, एक देश एक कानून वाले, समता और बन्धुत्व के समाज वाले। ‘मानेंगे नहीं मारेंगे भी नहीं’ के वसूल वाले।
उनकी भीड़ पर निशाना साध कर बन्दूकंे चली थीं, भीड़ कभी नहीं मरती, मरते हैं भीड़ के कुछ लोग। और वे मरे थे। कुछ घायल हुए थे। उन्हें मारने के लिए ही बन्दूकें चलाई गई थीं। बन्दूकंे खुद नहीं चलतीं उसे चलाता है आदमी। बन्दूकें अपने लिए शिकार का चुनाव नहीं करतीं, शिकार का चुनाव करता है आदमी। ���
आदमी बन्दूकों का भी चुनाव करता है तथा समय और स्थान का भी। बन्दूकें चलाने वाला आदमी सुनिश्चित करके चलाता है बन्दूकें कि वह बचा रहे साबूत, मर मुकदमे से भी बच जाये। बन्दूकें चलाने का मामला चुनाव का है, चुनाव समय का, स्थान का, प्रयोजन का तथा उससे हासिल हो सकने वाले लाभ का।
आदमी बहुत सारी चीजों का चुनाव करता है। चुनाव करना एक खास मनोवैज्ञानिक उद्यम है जिसे बाजार ने काफी विस्तारित कर दिया है। वह चुनाव करता है नौकरी का, व्यवसाय का, खेती-बारी का, कुर्सी पर बैठाने वाली राजनीति का, इहलोक का परलोक का, मार-पीट तथा कतल का भी।
तो बन्दूकधारियों ने चुनाव कर लिया था कि बन्दूकंे चलानी हैं, गोलियों से सीना छलनी कर देना है दुश्मनों का। अब यह अलग बात है कि कौन सी बन्दूक? बन्दूकंे भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं देशी भी विदेशी भी। गोलियॉ भी कई जात-पात वाली हुआ करती हैं रायफल की अलग, बारह बोर की अलग। बन्दूकों में गोलियॉ होती हैं, वही गोलियॉ जब तोपों में होती हैं तो गोलों में बदल जाती हैं आदमी की तरह। आदमी भी भेष-भूसा और परिवेश से जैसे बदल जाता है वैसे ही गोलियॉ भी बदल जाया करती हैं। खलिहान का आदमी अलग होता है, संसद में बैठा आदमी अलग होता है, आफिस में बैठा आदमी साहब होता हैऔर उसके सामने खड़ा आदमी फरियादी होता है। तो आदमी भी अलग-अलग होते हैं, अलग-अलग अधिकार व कर्तव्य वाले, वैसे अधिकार वाले आदमी हर तरफ मिल जांयेंगे पर कर्तव्य वाले आदमी तो खोज के विषय हैं, ये खोज करने पर भी शायद ही मिल पायें।
बन्दूकधारी संपदा वाले थे, शासन, प्रशासन पर उनका असर था, हत्या करना उनका लक्ष्य था, कोई का बिगाड़ लेगा उनका। उन्होंने आदिवासियों की जमीन खरीद लिया था जिस पर आदिवासी पुश्त दर पुश्त से काबिज थे, वे उस जमीन पर खेती करते थे, उसे हरा-भरा बनाये रखते थे। विवादित जमीन बहुत पहले नहीं जमीनदारी टूटने के समय तक ढूहों वाली थी, जगह जगह पलाश के पेड़ उगे हुए थे, कही पांच फीट ऊपर थी तो कहीं दस फीट गहरी थी जमीन। आदिवासियों ने उसे समतल किया था, कियारियॉ गढ़ा था पसीना बहा कर। तब मशीनों का जमाना नहीं था।
तो हत्या का चुनाव करने के बाद ही बन्दूकें चलाई गईं थीं फिर दस आदमी मारे गये बहुत से घायल हुए, इक्कीसवीं शदी में मध्यकाल का आदिम प्रयोग सफल हुआ। दस आदमियों का मारा जाना चूंकि मध्यकाल की परिघटना माफिक है इस लिए आधुनिक समय के लिए बड़ी खबर है, परिपूर्ण खबर है। खबर के सारे तत्व जैसे घटना, अचरज, अचानक, उन्माद, भयानक, मानवताविरोधी, कानून विरोधी, कानून अपने हाथ में लेना आदि आदि इसमें हैं। खबर में किसी अच्छी कहानी तथा कविता का भी स्वाद होना चाहिए सो इस खबर में भला कैसे नहीं होती!
एक चौंकाने वाली खबर,कृखबर का काम है फैलना, चौंकाना, पसर जाना दिल दिमाग पर। खबरनवीशों ने पूरी ताकत के साथ खबर को फैलाया भी।
खबर ने अचानक जकड़ लिया प्रशासन को, खबर का चरित्रा भी जकड़ने वाला था। और प्रशासन जकड़ गया इस खबर से।कृचूॅकि यह खबर है इस लिए इसमें खबर का कारण है जमीन कब्जा करना। फिर भी जॉच होगी। जॉच पड़ताल का क्या... यह तो सत्ता का कौतुक भरा उद्यम है। कुछ न कुछ तो पता चल ही जायेगा। दस आदमी मारे गये यही सच है, इस सच के अगल बगल ही जॉच, मुकदमे, उचित, अनुचित, न्यायायिक, अन्यायायिक आदि मुद्दे स्वतः खड़े हो जायेंगे। आदमियों का मारा जाना मानव सभ्यता के लिए कोई नई बात नहीं है। आदमी तो हर काल में मारे जाते रहे हैं चाहे सत्ता किसी भी मिजाज की रही हो, मुगलों की या अंग्रेजों की किसी की भी। वही दस आदमी अगर आतंकवादी होते तो बात दूसरी हो जाती। झूम उठता पूरा देश, नाचने लगती शहरों की गलियॉ, ढोल-नगाड़े बजने लगते, कवितायें सड़कों पर टहलने लगतीं किताबों से बाहर निकल कर। पर वे आतंकवादी नहीं थे,
वे आदमी थे, गरीब थे, किसान थे, आदिवासी थे, उनके चेहरों पर गरीबी की झुर्रियॉ थीं, ऑखों में विकसित होने की काली बदरियॉ थीं, वे भगवान भरोसे रहने वाले लोग थे। जीवन जीने के मनोरमों व उत्सवों को वे प्रार्थना-गीतों के जरिए मनाने वाले थे सो मारे गये। कॉप गया पूरा जनपद। हल्दीघाटी गॉव भी कॉप गया। कवितायें वहीं कहीं कोने में दुबकी पड़ी रह गईं लाशों के अगल-बगल। कई सवाल आसमान में परिन्दों की तरह उड़ने लगे। परिन्दे भी कॉप गये होंगे जब आवाज सुने होंगे बन्दूकों की, बन्दूकों की आवाज होती भी है कॅप-कॅपाने वाली, डराने वाली। आसमान में उड़ते सवालों ने जनपद के परिक्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया। एक चेहरे से दूसरे चेहरे तक सवाल कूदने-डाकने लगे, लगे डराने लोगों को। बन्दूकों की आवाजें अचानक भयानक सवालों में बदल गईं सवाल भी यक्ष-प्रश्न की तरह जिसका उत्तर देना करीब करीब मुश्किल।कृ
क्यों गरज गईं बन्दूकें? एक ही जबाब था....जमीन कब्जियाने के लिए... जमीन कब्जियाने के लिए या देश कब्जियाने के लिए ही बन्दूकंे चलती हैं, यही तो खेल है धरती का और उसकी कथा का।
‘बन्दूकें क्यांे चलाई जाती हैं? कौन चला सकता है बन्दूकें, बन्दूकें लोंगों को आखिर क्यों दी जाती हैं, क्या बन्दूकों ने मानव सभ्यता का कभी भला किया है? आखिर वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने बन्दूकें बनाईं होगी, क्या वह सुन रहा होगा बन्दूकों की धॉय धॉय, कहीं बहरा तो नहीं हो गया होगा, पता नहीं, वह बन्दूक का निर्माण कर विलीन हो गया प्रकृति में। उसे क्या पड़ी कि आये मानवों की धरती पर और अपने उत्पाद का बाजार बनाये, उसकी समीक्षा करेकृबम, बन्दूक, बारूद बनाने की कला का खोज करने वाले आखिर क्यों आयें धरती पर, अपनी लिखी धरती-कथा पढ़ने के लिए। उनकी बनाई बन्दूकें उन पर भी चल सकती हैं किसी दिन।आखिर क्या करती हैं बन्दूकें? कैसी होती हैं बन्दूकें? सवाल भी किसिम किसिम के, लोग भी किसिम किसिम के, बन्दूकें भी किसिम की। बन्दूकों से पैदा किया गया एक सवाल तथा सबसे जरूरी सवाल कि बन्दूकें क्यों चलाई गईं? क्या जरूरत थी बन्दूकों को चलाने की यह कैसे पता चलेगा कि बन्दूकें क्यों गरजीं, उनमें से गोलियॉ क्यों निकली, किसने चलाया बन्दूकें, क्यों चलाया बन्दूकें क्या बात-चीत के द्वारा बन्दूकों को चलाया जाना रोका नहीं जा सकता था। कहते हैं संवाद के जरिए हर किसिम के प्रतिवाद को रोका जा सकता है, संवाद ही तो कर रहे थे हल्दीघाटी के सरवन, बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू, रजुआ, सुमेरना,लखना,कलुआ, नन्दू,बुद्धन, नगेशर, बलेशर तथा दूसरे नौजवानभी पर क्या हुआ? संवाद गायब हो गये, मर-बिला गये कहीं, वहां बन्दूकी संवाद आ गया, धॉय धॉय वाला।
आदमी और आदमी के बीच संवाद गायब हो चुके हैं। आज का आदमी संवाद नहीं करता, वह बन्दूकों से संवाद करता है तथा बन्दूकी समाधान का विकल्प चुनता है। आखिर ऐसा क्यों करता है आदमी?
क्या आप यह नहीं जानना चाहेंगे कि बन्दूकें कहां चलीं? क्या किसी पानीपत के मैदान में या हल्दीघाटी के मैदान में। इसकी जरूरत क्या है? बन्दूकें कहीं भी चल सकती हैं, किसी गॉव में, किसी शहर में, किसी मुहल्ले में। हल्दीघाटी जैसा मैदान कहीं भी बनाया जा सकता है और एक शान्तिप्रिय आदिवासी गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया तभी तो बन्दूकें चलीं।
आप अहिंसक हैं तो भी कल्पना कर सकते हैं कि बन्दूकें अधिकांश मामलों में सत्ता हासिल करने के लिए ही चलाई जाती हैं आत्मरक्षा के लिए नहीं के बराबर। मान लेते हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव में बन्दूकें चलीं। एक ऐसे गॉव में जिसका भूगोल हजारों एकड़ के रकबे वाला है। फिर आप जानना चाहेंगे कि वह गॉव क्या है? राजस्व गॉव या वन ग्राम। गॉव भी बटे हुए हैं किस्मों में। फिलहाल हल्दीघाटी का मैदान बना वह गॉव राजस्व ग्राम है।
खैर छोड़िए कानूनी लफड़ों को आइए चलते हैं उसी गॉव में। उस गॉव का नाम अपनी समझ के लिए कुछ भी रख सकते हैं आप। यहां गॉव का नाम बताना जरूरी इसलिए नहीं है कि वहां सरकारी जॉच चल रही है, सरकार पता लगा रही है कि उस गॉव में जमीन का जो झगड़ा है वह किस लिए है? कब से है क्या जमीनदारी विनाश अधिनियम के लागू होने के पहले से है या उसके बाद से है? कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, मुकदमे कायम हो चुके हैं। गॉव के भूगोल को कानूनी बनाये जाने का प्रस्ताव है सरकार के पास। गॉव के इतिहास के बारे में सरकार चिन्तित नहीं है, इतिहास तो बनता बिगड़ता रहता है पर भूगोल नहीं बिगड़ना चाहिए।
मान कर चलिए कि वह गॉव भी ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला गॉव है, जंगल से घिरा, चारो तरफ खेत ही खेत, हर तरफ फसलें हसी ठिठोली करती मुस्कराती, अपने उन्माद में कजरी, करमा गाती, खुद को दुलारती सहलाती, गॉव वाले भी मगन, अमन चैन से निवसते, खेती-बाड़ी करते।कृ
किसी जमाने में राजा की दान की हुई जमीन,बाप-दादों से आबाद अपने फुसहा मकानों के साथ। एक घर दूसरे घर की निगरानी करता, गलियॉ घरों के मोड़ों को बाटती, अलगियाती। गॉव केवल गॉव था, गॉव खुले आसमान के नीचे था पास ही में जंगल हर-हराता, जंगल में आने वालों को गुदगुदाता। गॉव कागज पर था कि नहीं किसे पता, अगर गॉव है तो उसे कागज पर होना चाहिए। हम सभ्य हैं हमारे यहॉ कागज बोलते हैं, वे अधिकार हक-हकूक बाटते हैं, गॉव को नहीं पता और गॉव वालों को भी नहीं पता।कृ
एस.डी.एम. तथा डी.एम. परेश्शान परेशान, परेश्शान तो एस.पी. भी हैं।कृबातें हो रही हैं, बातें ओर-छोर वाली हैं जो केवल क्यों पर टिकी हुई हैं।कृएक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी का मैदान क्यों बना दिया गया? कैसे उतरा गया उस गॉव में मघ्यकाल? आज के लोक-तांत्रिक समय में।कृकृ
यह क्या हो गया? दस लोग मारे गये, आखिर क्यों?कृ
यह ‘क्यों’ चाहे किसी को मालूम हो न हो पर राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को तो मालूम ही था, मालूम था कि गॉव में जमीन के बाबत विवाद है, मुकदमा चल रहा है। जमीन का कब्जा करने के लिए बन्दूकधारी आये और लोगों को गोलियों से भून कर चले गये।
एस.डी.एम. ज्यादा परेशान हैं, वह गॉव उनके क्षेत्राधिकार में पड़ता है। खबर सुनते ही बेहोश हो गये....कृ
‘अब तो नौकरी गई’ नौकरी टूट जाने की कराह निकली’कृबेमतलब मास्टरी छोड़कर राजस्व विभाग में चले आये। इस तरह के बवाल मास्टरी में तो नहीं थे। वहां केवल छात्रों को पढ़ाना था और यहां तो किसिम किसिम के बवाल।’कृ
बिना देर किए जिले के आला अधिकारी गॉव के पीड़ित भूगोल पर हाजिर हो गये। फिर तो गॉव का भूगोल घिर गया बूटों से, सत्ता के ओहदेदारों से, कानून के रखवालों से, प्रतिभा-परीक्षा पास कर चुके अधिकारियों से। गॉव के आकाश में कानूनी राज के अभिलेख खुद बखुद फड़फड़ाने लगे परिन्दों की मानिन्द। कदम कदम पर भीख मॉगती कानून की धारायें, गिड़गिड़ाती कानून व्यवस्थाओं की मान्यतायें तथा अदालती फैसले, वहीं कहीं कोने में दुबके बैठे खुद पर तरस खाते और आसमान सभी को निहारता उन आदमियों को ताकता जो कुछ देर पहले सॉसें ले रहे थे, हस बोल रहे थे, प्रार्थनायें कर रहे थे...कृ
‘हमें मत मारो,कृहमें मत मारो’ रिरिया रहे थे’कृकृ
‘यह जमीन न तुम ले कर जाओगे और न ही हम ले कर जायेंगे, हमारे बाल-बच्चे अनाथ हो जायेंगे। हम आपस में लड़ कर मर जायेंगे पर जमीन नहीं मरेगी। मुगल चले गये, अंग्रेज चले गये पर यह मुई जमीन आज भी है जस के तस है। सो भइया मत मारो, मत मारो किसी को। मुकदमा चल रहा है चलने दो उसका फैसला तुम भी मानो हम भी मानें।’
पर कौन सुनता है रिरियाते चिचियाते आदमी की फरियाद।
बन्दूकें कहां सुनती हैं किसी की चीखें, गोलियॉ कहां सहलाती हैं किसी का शरीर, वे तो छेदती हैं और छेदती हैं सिर्फ छेदती हैं। महज तीन घंटे के भीतर गॉव का भूगोल हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हो गया। वहां की घरती पर उतर आया मध्यकाल, हमलों व हमल वाला, सिर्फ मारो-काटो, जीतो और जीतो। बहुत मुश्श्किल से हमल तथा हमले के खिलाफ मानव सभ्यता ने भाई-चारा विकसित किया था, लोकतंत्रा आया था। खतम हो गया लोकतंत्रा, खतम हो गया भाई-चारा। रोने लगा पूरा गॉव। मारने वाले भाग गये, उन्हें भागना ही था। वे जानते थे कि वे अपराधी हैं, वे किसी को गोलियों से भून नहीं सकते, अपने हाथ में कानून नहीं ले सकते। वे आश्रयदाताओं की तलाश करेंगे। वे उन पनाहगाहों में शरण लेंगेे जहॉ वे हर तरह से सुरक्षित रह सकें, उनका बाल-बॉका न हो सके।
वैसे ऐसे पनाहगाहों की कमी नहीं, हर तरफ बिखरे पड़े हैं। ये पनाहगाह आज
के नहीं हैं आदिम जमाने से हैं। अब तो इनकी शक्लें बदल गई हैं, नये रंग रूप के हो गये हैं इनके मालिक। लगभग सभी जगह हैं, छोटे से कस्बे से लेकर राजधानी तक हैं। पनाहगाहों के मालिकों में अधिकारी हैं तो कुछ लोकप्रतिनिधि तथा कुछ धन्ना सेठ वगैरह भी हैं। पनाहगाहों की पहचान करना भी एक विशेष कार्ययोजना का प्रस्ताव करता है ये चूॅकि रंग रूप, चाल चलन आदि बदलने में माहिर हुआ करते हैं इसलिए इन्हें सरलता से नहीं पहचाना जा सकता। ये तो इक्कीसवीं शदी है इस शदी में तो कुछ देश भी अच्छे पनाहगाह की योग्यता वाले हैं। देखते ही देखते उस जंगली गॉव के भूगोल पर शोकगीतों वाली, ऑसुओं वाली, यातना के जख्मों वाली एक नई दुनिया उतर आई। पूरा परिदृश्य ही बदल गया गॉव का। जगह जगह बिखरी पड़ी लाशों के रूप में मानव देह, देह पर चीखते वंशज, भाई, पत्नी, बच्चे, गोतिया, पड़ोसी..।कृ
देह संवेदनहीन, वह नहीं बोलेगी, वह नहीं बतायेगी अपने बारे में, देह का काम खतम, देह का बस यही काम है एक दिन बोलना बन्द कर दो विलीन हो जाओ अनन्त में। दमन का पुराना इतिहास आधुनिक ढंग से उतर आया था उस गॉव के भूगोल पर। मानो वहां आदमी और आदमी का युद्ध नहीं इतिहास और भूगोल का युद्ध हुआ हो, सहनशीलता बनाम दुःसाहस का युद्ध हुआ हो।
भूगोल परवाह नहीं करता इतिहास का, वह तो चौहद्दी से बंधा होता है, भूगोल निर्मित करने की संस्कृति युद्ध कराती है और इतिहास निर्मिति की संस्कृति युद्धों को टालती है। यह अलग बात है कि भूगोल गढ़ने के लिए इतिहास में मनमुताबिक दरारंे पैदा कर दी जाती हैं।
इतिहास की दरारों में फसा भाई क्या करे, मॉ क्या करे, पत्नी क्या करे, बच्चे क्या करें? समय की बात है, समय गोलियों के साथ आया और निरीह तथा निहत्थे लोगों को भून कर चला गया। दमन की आधुनिक दुनिया की तस्वीर व पोस्टर फैल गये धरती पर। गॉव का एक एक कोना दमन के पोस्टर में तब्दील हो गया। ये पोस्टर फड़फड़ायेंगे, नाचेंगे, कूदेंगे। धरती पर मध्यकाल की हमले की लिखी कहानियॉ लिखी हुई हैं पोस्टरों पर, उसे कोई पढ़ेगा, कोई उसे कुचलते हुए निकल जायेगा। इतिहास बन चुकी धरती-कथा कोई पढ़े चाहे न पढ़़े का फरक पड़ता है भूगोल पर, भूगोल तो खुद इतिहास बनाता रहता है, कभी मुगलों का, कभी अंग्रेजों का, कभी किसी का। पर नहीं धरती पर लिखी धरती-कथा को पढ़ने अहिंसक व उदार लोग हैं जो पढ़ेंगे धरती-कथा को या कि पत्थरों पर लिखे पत्थर-कथा को। यही कथायें तो इतिहास बनाती हैं और भूगोलों के पार चली जाती हैं। जिसे सब पढ़ते हैं पर आदमी सारे अधिकारी परेश्शान हैं, उन्हें नहीं सूझ रहा कि क्या करें? अपराधी भाग चुके हैं वहां केवल पीड़ित लोग हैं बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू हैं, सारेे परिजन हैं। अधिकारियों की समझ में आ चुका है कि वे उलझन में फस गये हैं, इस उलझन को सुलझाना आसान नहीं होगा। उन्हें पता है कि वे किसी समय यहां से हटाये जा सकते हैं, ट्रान्सफर हो सकते हैंे, कहीं दूसरी जगह पोस्टिंग हो सकती है। फिर नये अधिकारी आयेंगे उनके सामने यह घटना नहीं होगी, जाने वे किस तरह से इस घटना को विश्लेषित करें, यह सब उनके विवेक पर निर्भर करेगा। अरे! ट्रान्सफर ही क्यों सस्पेन्ड भी किया जा सकता है उन्हें, पता नहीं किस तरह की जॉच हो, जॉच भी तो किसिम किसिम की हुआ करती हैं। अधिकारी मन ही मन थर-थरा रहे हैं पर थर-थराना रोके हुए हैं कहीं गॉव वाले देख न लंे फिर क्या होगा उनके रोब-दाब का?कृरोब-दाब ही तो प्रशासन चलाता है, जिले की चौदह पन्द्रह लाख की आबादी को महज सौ, दौ सौ अधिकारी कैसे संभल सकते हैं?
लाशें जगह जगह पड़ी हुई हैं, कहीं सरवन की लाश है तो कहीं रजुआ की, तो कहीं सुमेरना की, कहीं लखना की, कहीं कलुआ की तो कहीं नन्दू की, कहीं बुद्धन की तो कहीं बलेशर और सन्तू की।
पुलिस एक एक लाश का मुआयना कर रही है, देख रही है गोलियों के घाव। लाशें नहीं बोलतीं पर पुलिस वालों के लिए बोल रही हैं, वे लाशों की बोली समझने में माहिर होते हैं। समझ रहे हैं कि इन निहत्थों की हत्या करके अपराधियों ने जघन्य काम किया है, वे मन ही मन तय कर रहे हैं कि अपराधियों को किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। वे जुट गये हैं सबूत इकठ्ठा करने में पोस्टमार्टम भी कराना होगा, इसके पहले सबूतों को सहेज लेना ठीक होगा। अधिकारी संकेतों में बोल-बतिया रहे हैं, ये करो वो करो आदि, आदि। कोई खुल नहीं रहा है। वे जानते हैं आज के हल्दीघाटी के मैदान का मामला राणाप्रताप वाले हल्दीघाटी जैसा नहीं है, उस मामले में तो पुलिस की कोई भूमिका थी ही नहीं। वह तो वीर-गाथा काल की घटना थी। उसमें सभी वीर थे जो मारे गये वे भी जो बचे रह गये थे वे भी। युद्धों की जॉच-पड़ताल का चलन पहले तो था ही नहीं, उस समय की सभ्यता को जॉच पड़ताल स्वीकार्य नहीं था। जॉच-पड़ताल तो लोकतंत्रा का एक विशेष उपक्रम है। अब लोकतंत्रा है, ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस को ही जिम्मेवार ठहराये जाने का चलन है। सो पुलिस वाले कॉप रहे हैं पर मजा यह कि उनकी कॅप-कॅपी दिख नहीं रही है। कॅप-कॅपी विलुप्त है वर्दी में। वे बहादुरों की तरह लाशों का मुआइना कर रहे हैैं, तलाश रहे हैं सबूत, बन्दूकें तलाश रहे हैं, गोलियों के निशान तलाश रहे हैं।
अब क्या तलाश रहे हो भाई! कतल के बाद मुआइना कर रहे हो अगर पहले ही चेहरे पर की झुर्रियों का इतिहास पढ़ना तुम्हें आता तो सारा कुछ बूझ जाते पर करोगे क्या... चेहरे की झुर्रियों का इतिहास पढ़ते हैं कवि, लेखक जिनके पढ़ने न पढ़ने का कानूनी, सामाजिक, राजनीतिक अर्थ नहीं। धरती पर लिखे हमले के आख्यानों को तो केवल भूगोल ही पढ़ सकता है, वही कर सकता है इन्द्राज के रूप में उसका लिप्यातंरण। पर सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू तो कुछ भी नहीं पढ़ पायेंगे, उनका नाम धरती-कथा में दर्ज होगा कि नहीं क्या पता...वे तो शहीद हो चुके हैं अपनी ‘धरती मॉ’ को बचाते हुए, मिल
चुके हैं माटी में, माटी बन चुके हैं। कुछ कहा नहीं जा सकता...
आइए देखते हैं क्या होता है आगे?
‘नाचने लगीं वर्दियॉ ‘करमा नाच’ का कहीं
अता-पता नहीं आइए देखते हैं किधर हैं करम बाबा?’
‘धरती माई’ रो रही हैं अपनी कथा के पात्रों को लाशों में तब्दील हुआ देख कर, उन्हें अपने होने पर दुख हो रहा है, उन्हांेने तो अपना रूप उर्वर इसलिए सृजित किया है कि लोग खेती कर सकें, अन्न पैदा कर सकें, भूख मिटा सकें पर नहीं...लोग तो खुद धरती पैदा करने वाले बन गये हैं, कागज पर मालिकाना चढ़वा ले रहे हैं, धरती माई कराह उठीं.. इस दुनिया ने मुझे धरती के बजाय कागज बना दिया है। धरती से तो स्वर्ग ही अच्छा था भले ही कुछ लोग वहां उन पर ताने मारा करते थे तो क्या हुआ यहां जैसा खून-खराबा तो वहां नहीं था।’
गॉव के सरवन, रजुआ, सुमेरन, लखना, कलुआ, नन्दू, बुद्धन, नगेशर, व सन्तू गोली के शिकार हो चुके हैं वे बेचारे अपनी जान बचाने के लिए भाग भी नहीं सके थे। प्रशासन सक्रिय हो गया है। बूटों व बन्दूकांे की गंध पूरे गॉव में पसर चुकी है। वर्दियॉ इधर उधर नाच-कूद रही हैं वे कभी लाशों की तरफ जा रही हैं तो कभी किसी तरफ। शासन के रंग से रंगी वर्दियों की धमक सूरज की किरणों की तरह फैल चुकी है धरती पर। मृतकों के आश्रित शोक-गीत में तब्दील हो चुके हैं। आसमान में चीखें तडपड़ा रही हैं उन्हें भविष्य दीख रहा है क्या होगा अब आगे?
आगे जॉच है, मुकदमा है, मुकदमे के अगल-बगल गुगली करती कहानियॉ हैं, गवाही है, बहस है फिर फैसला है। कब तक चलेगा मुकदमा? मुकदमे में क्या होगा अदालत को भी नहीं पता...पता होगा भी कैसे सारा कुछ निर्भर है गवाहों पर, गवाहों का क्या? वे न भी बदलना चाहें तो भी समय के खेल का शिकार तो हो ही सकते हैं, समय किसे नहीं बदल सकता, समय बदल देता है सारा कुछ, यह समय ही है जिसने एक शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना दिया।
कुछ पुलिस वाले लाशों की पहचान में जुटे हुए हैं। परिजन एक एक लाश की पहचान करा रहे हैं पुलिस को। सभी के नाम मय वल्दियत दर्ज किया जा रहा है कागज पर साथ ही साथ उमर, रंग-रूप, कद आदि भी लिखा जा रहा है। गनीमत है कि लाशें छत-विछत नहीं हुई हैं, वे साबूत हैं, देखने पर लग रहा है कि बोल देंगी घटना के बारे में बता देंगी कि कैसे उन्हें भूना गया गोलियों से। अगर वे जिन्दा हो जायें तो बता देंगी हत्यारों के बारे में, लाशों को पता है कि हत्यारे कहीं और जगह के नहीं गॉव के ही हैं। पर लाशें तो लाशें हैं, वे नहीं बोल सकतीं कुछ भी, वे इहलोक से बाहर निकल चुकी हैं। इहलोक तो जिनका है वे जानें, समझें।
जॉच-पड़ताल से जुडे़ सारे काम सिपाही कर रहे हैं। सिपाही भी किसी न किसी गॉव के लोग ही हैं गोबर-माटी से सने, लिपे-पुते, सरकारी काम करते हुए गरिया भी
रहे हैं, उन्हें बाप-दादों की कथनी याद आ रही है...‘झगड़ा लगावैं तीन, जर, जोरू औ’ जमीन’ साले मार-कतल करेंगे और परेश्शान हम लोग होंगे फिर उन्हें ख्याल आता है कि वे इसी काम के लिए ही तो नियुक्त किये गये हैं, यही सब करना है उन्हें। सिपाही तो सिपाही, कम पढ़े-लिखे, बाप-दादों की कथनी को दार्शनिकता से जोड़ सकते तो वे आगे की गुनते फिर बोलते...जर, जोरू, जमीन ही नहीं, विवेकाधिकार, विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार भी लोकतंत्रा के लिए नहीं किसी भी मानव-सभ्यता के लिए बहुत ही घातक हैं, इन्हें खतम होना चाहिए। उनमें एक सिपाही तो माथा पकड़ कर बैठा हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे। साल भर पहले ही वह सिपाही के पद पर भर्ती हुआ है। उसे नहीं पता कि सबूत क्या क्या होते हैं, सबूतों की शक्लें क्या होती हैं? उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा। अपने से सीनियरों के साथ वह लगा हुआ है, सीनियर जैसा उसे सहेज रहे हैं वैसा ही वह कर रहा है।
लाशों को कपड़े में बॉधा जाना है, कैसे बंधायेगा कपड़ा जो खुल न पाये और उस पर पुलिस की सील भी लग जाये, वह सोच कर कॉप रहा है तथा छिपाने की कोशिश भी कर रहा है कि उसकी कमजोरी उसके सीनियर ताड़ न जायें सो वह चालाकी से इधर-उधर सरक जाया करता है। लाशें महकनी शुरू हो चुकी हैं, मक्खियॉ मडरा ही रही हैं अगल-बगल। बड़े अधिकारी मौंके पर हैं पर इधर-उधर वे लाशों से दूर हैं उनके पास तक महक जा रही है कि नहीं सिपाही अनुमान लगा रहे हैं। महक तो उनके पास भी जा रही होगी। नया सिपाही कुछ काल्पनिक किस्म का है, परमात्मा के करतबों पर यकीन करने वाला वह समझना चाह रहा है आखिर मार-पीट और कतल काहे हुआ कोई न कोई कारण तो रहा होगा ही पर पूछे किससे, यह भी भला पूछने की बात है।
वैसे पुलिस विभाग में हर तरह के काम के लिए कुछ विशेषज्ञ तो होते ही हैं। दो तीन सिपाही विशेषज्ञ हैं भी जो सभी लाशों की निगरानी कर रहे हैं। उन्हें कपड़ों से बंधवा रहे हैं उन पर सील-मुहर लगवा रहे हैं। और जो दूसरे किस्म के विशेषज्ञ सिपाही हैं वे सबूत, बयान आदि इकठ्ठा करने में जुटे हुए हैं। पुलिस की सक्रियता तथा तत्परता अपने आप उद्धरणीय बनती जा रही है। एस.पी. तथा डी.एम. पीड़ितों के परिजनों को दुलारने, सहलाने में लगे हुए हैं तथा समझा रहे हैं कि किसी भी हाल में अपराधियों को छोड़ा नहीं जायेगा। अपने पद की कथित गरिमाओं से अलग वे धर्म-गुरुओं की तरह बन चुके हैं, उनके मीठे बोल मनोचिकित्सकों को भी धत्ता पढ़ा सकने की क्षमता वाले हैं। डी.एम. साहब तो एस.पी. साहब से दो बॉस आगे निकलते जा रहे हैं।कृवे मृतकों के छोटे-छोटे बच्चों के साथ हैं, मृतकांें की पत्नियॉ भी उनके पास ही हैं, मॉ की गोदी में बच्चा रो रहे हैं, उन्हें दुलार रहे हैं डी.एम. साहब।
सारी लाशों को कपड़े से ढका जा चुका है। कपड़े खुले न रहें इस लिए उसे बॉध भी दिया गया है शवदाह के लिए ले जाने वाली अर्थियों की तरह। कपड़े गब गब सफेद हैं उन पर खून के धब्बे लगते जा रहे हैं चूूॅकि लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाया जाना है इसलिए काफी सतर्कता बरती जा रही है जिससे कि लाशेें सुरक्षित ढंग से पोस्टमार्टम घर तक ले जाई जा सकें।
डी.एम. व एस.पी. दोनों वर्तमान में नहीं हैं। उनसे उनका वर्तमान इस भयानक तथा आतंककारी घटना ने छीन लिया है। वे कल देख रहे हैं उसी के बारे में सोच रहे हैं। कल क्या होगा इसके बारे में वे लोग अनुमान लगा रहे हैं। अनुमान बहुत ही खतरनाक रास्ते पर दौड़ रहा है बिना विराम। वे कॉप रहे हैं आने वाले कल के अनुमानों को विखंडित करते हुए चूॅकि वे जिले के आला अधिकारी हैं इसलिए अपने कॉपने को प्रदर्शित नहीं होने दे सकने के वे बड़े कलाकार भी हैं सो उनकी कॅप-कपियॉ उनके चेहरे पर दबी कुचली पड़ी हुई हैं। परिजन दुखों में हैं, मरद तो कुछ ठीक भी हैं पर ओरतें...औरतें तो लगातार विलपने व कलपने में हैं। एक वरिष्ठ महिला बुधनी अपने बेटे सरवन की लाश के पास में है, स्वस्थ है, वह पूछती है एस.पी.साहब से...कृ
‘अब का होगा साहेब! लोग बोल रहे हैं कि लाशों का पोसटमारटम होगा। काहे करायेंगे साहेब पोसटमारटम? पोसटमारटम माने चीर फाड़ नऽ। अब लशिया काहे चीरेंगे-फाड़ेंगे साहेब! उसे तऽ साबूत रहने दीजिए। लाश चीरने-फाड़ने से का फरक पड़ि जायेगा साहेब! हम लोग बोल रहे हैं नऽ गोली चलाने व झगड़ा लगाने वालों के नाम। किसने गॉव में बवाल करवाया सभै कुछ तऽ हम लोग बताय रहे हैं साहेब! फेर काहे होगा चीर-फाड़, चाहे पोसटमारटम।’
सरवन की मतारी एस.पी. साहब से बतिया ही रही थी कि एक दूसरी महिला तनबुड़ुक की भउजाई चीखने लगी.....
‘आप लोग चले जाइए साहेब! अब आगे कुछ नाहीं होगा हमलोग लाश नहीं ले जाने देंगे, लाश हमारी है, आपकी नाहीं है। आजु आपलोग आये हैं गॉयें में जब हम लोग चिल्लाय चिल्लाय के गोहार लगा रहे थेे कचहरी में के साहब नियाव करो, कुछ लोग हमार गॉव उजाड़ना चाह रहे हैं, जमीन कब्जियाने की धमकी दे रहे हैं, तब कउनो साहेब धियान नाहीं दिये। आपलोग पहिलहीं आय गये होते तो झगड़ा फरियाय गया होता। अब तो दस ठे लाल मरि गये तब आये हैं फूॅकने-तापने।’
रजुआ की मतारी रो रही है रजुआ की लाश के पास। एस.पी.साहब उस दूसरी महिला को समझाने में जुट गये..
‘माता जी! आप लोगों के साथ अन्याय नहीं होगा धीरज रखिए।’
रजुआ की मतारी समझदार है, है तो भुच्च देहाती फिर भी...कृ
‘का धीरज रखें साहेब! धीरज ही तो धरे हुए हैं अब तक। जब बारह साल की थी तबै बिआह कर आई थी गॉव में। हम जवन खेत आजु जोत रहे हैं उहै हमरे ससुरो भी जोत रहे थे आजु ऊ नाहीं हैं, चार साल हुआ ऊ बेमारी में मरि गये। आजु हमार उमर सत्तर के पार है साहेब! हमार सासू भी इहै बताईं थीं हमको के हमारे पास दस बिगहा जमीन थी। हमरे ससुर दो भाई थे दोनों लोगों में पॉच पॉच बिगहा बट गई। उहै पॉच बिगहा हमरे पास है साहेब जउने के हम लोग जोत रहे हैं ओहू पर झगड़ा लग गया है। लेखपालउ बोल रहा है कि ऊ जमीन पर तूॅ लोगों का नाम नाहीं चढ़ा है। नामय चढ़वाने के लिए हमलोग कचहरी दौड़ रहे थे, नाम चढ़ि गया होता तऽ हमार बचवन मारे न जाते साहेब!’ फिर आगे नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, फफक फफक कर लगी रोने।कृ
रोने को तो वहां उपस्थित सारी औरतें रो रही थीं। उनके रिश्ते सिर्फ अलग थे, कोई मॉ थी तो कोई पत्नी, कोई बिटिया कोई बहन करीब करीब सभी रिश्तों में थीं। रिश्तों में काहे नाहीं होतीं। एक ही गॉव था, एक ही बिरादरी थी, रियासत के जमाने से ही पूरा गॉव रियासत के बफादारों में था। रियासत ने ही उस गॉव को बसाया था, खेती-बारी करने के लिए, सभी को जमीन दिया था। रियासत की परंपरा भी थी कि रियासत में बसने वाले सभी बालिगों को एक‘हल’ की जोत तक की जमीन खेती-बारी करने के लिए दी जाती थीे। रियासत का यह नियम जमीनदारी टूटने तक चलता रहा था। लेकिन विवादित गॉव का मामला अलग था। इस गॉव को रियासत के राजा ने बसाया था। दरअसल गॉव बसाने की एक कहानी है। राजा खुश तो खुश, नाराज तो नाराज। नाराज हुए तो गॉव के गॉव आग के हवाले करवा दिया खुश हुए तो गॉव को आबाद करा दिया, धन-दौलत दे दिया, जगह-जमीन दे दिया वही हुआ। राजा साहब खुश हो गये, खुश इस लिए हो गये क्योंकि उन्होंने शेर का शिकार कर लिया था और यह सब हुआ था विवादित गॉव के आदिवासियों के अथक प्रयास से। यह अलग बात है कि एक आदिवासी को जान गंवानी पड़ी थी। हॉका करना आसान होता नहीं। उस जमाने में गॉव के गॉव निकल पड़ता था रियासत के आदेश पर, गॉव वाले तैयार बैठे रहते थे हॉका करने के लिए। जब तक हॉका चलता है तब तक रियासत की तरफ से गॉव वालों को भोजन-पानी दिया जाता है।
राजा साहब निकल पड़े हैं शिकार की यात्रा पर। गॉव वालों को पता होता है कि शेर किधर से निकलते हैं, कहॉ पानी पीते हैं, कहॉ रहते हैं, कहॉ शिकार करते हैं। शेर होने के संभावित स्थान के आस-पास मचान बनाया जा चुका है। चार-पॉच दिन से वहां मचान बनाया जा रहा था। मचान काफी ऊॅचे बनाया गया है, राजा साहब और उनके कुछ खास उस पर बिराजेंगे।
हॉका शुरू हो गया है। ढोल-नगाड़े बजने लगे हैं, अलग किस्म का हल्ला भी किया जाने लगा है। करीब पचासों आदिवासी एक टोली में तो दूसरी टोली में भी करीब करीब उतने ही आदमी। जंगल दहल रहा है, पेड़ों की पत्तियॉ कॉपने लगी हैं, उनकी श्शाखायें हिल रही हैं, रियासत की धमक जंगल को अपनी जकड़ में ले चुकी है। राजा हैं तो सभी के राजा हैं पेड़, पौधे, नदी, नाले, पहाड़. सभी के, उनके सम्मान में जंगल की हरियाली नतमस्तक हो चुकी है, हवा मन्द-मन्द बहने लगी है पत्तियों की आपसी टकराहटें मादक धुनंे प्रवाहित कर रही हैं। यह हॉका जंगली शेर बनाम राजा रूपी मैदानी शेर के बीच का है। मैदानी शेर निकल चुका है जंगली शेर की तलाश में। जंगली शेर के राज में वीरता की कहानियों के अलग किस्से हैं तो मैदानी क्षेत्रा के शेर के राजा की भी वीरता की कहानियॉ अलग किस्मों की हैं। देखना बाकी है कि जंगली शेर अपनी माद से बाहर निकलता है कि नहीं..अनुमान तो है कि जंगली शेर अपनी मॉद से बाहर निकलेगा । हॉका हो रहा है, नगाड़े बज रहे हैं, जंगली शेर बेचैन हो जाएगा, उसकी बेचैनी उसे भागने के लिए विवश कर देगी फिर वह मॉद से बाहर निकलेगा और मारा जाएगा। वही हुआ, जंगली शेर अॅधेरा होते होते तक मॉद से बाहर निकला और सीधे मैदानी क्षेत्रा के राजा के मचान पर धावा बोल दिया फिर क्या था..राजा तो तैयार बैठे थे...धॉय, धॉय, धॉय और जंगली शेर ढेर। उस पर बरस गईं कई गोलियॉ वह भी एक साथ। हॉके के पांचवंे दिन राजा को शिकार मिला, राजा खुश खुश्श। गॉव वालों को राजा ने अपने महल पर दावत दे दी। दिन भी तय हो गया।
महल पर गॉव वाले बन-ठन कर पहुंचे। उन्हें महल के आहाते में बिठाया गया। दावत यानि खान-पान रात में था इसके पहले नाच-गाना वह भी मैदानी इलाके वाला नहीं आदिवासी इलाके वाला। ढोल-नगाड़े बज उठे, मानर भी बजने लगा। गैसें जल गईं। आदिवासी नाच करमा शुुरू हो गया। एक से एक गाने, एक से एक ताल, धुन बाहर निकल रही है, पूरा महल मादकता में डूबा जा रहा है। पैर के घुंघरू अलग तरह से मन मोह रहे हैं, आदिवासी महुआ के मादकता से सरोबार हैं उधर महल कीे रानियॉ खिड़कियों के सहारे हैं, वे भी झूमने लगी हैं पर अपना झूमना बचा बचा कर वे इधर उधर हो रही हैं कहीं कोई देख न ले। महल के आहाते में रीतिकाल उतर आया है, अजीब तरह का प्रेम-रस बरसने लगा है। अभी राजा बाहर नहीं निकले हैं ज्योही वे बाहर निकलेंगे दरवान महराज के आने की खबर देगा, दरबार में महाराज पधार रहे हैं की तर्ज से अलग हुजूर पधार रहे हैं।
महाराज महल से बाहर निकल आये हैं। आहाते में उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध किया गया है, वे उस पर बिराज गये हैं। उनके अगल बगल वाले भी महाराज के साथ बिराज चुके हैं।कृ
नृत्य-संगीत शुरू हो चुका है।
महाराज भी मगन हुए जा रहे हैं। संगीत की मादक घुनें उनके चेहरे को बदलने लगी हैं। नृत्य की मादकता उन्हें महल के अन्तःकक्ष में धकेले जा रही है पर करें क्या? कैसे जायें महल के अन्तःकक्ष की तरफ। उनकी परजा उनके लिए आई है, उनके लिए नाच रही है, राज-सम्मान भी तो काई चीज होती है, सो वे मन मसोस कर बैठे हुए हैं, अन्तःकक्ष के मनोरमों को नाच के मादक दृश्यों से मेल बिठा रहे हैं। मन बोल उठता है....
‘रानियॉ इस तरह का नृत्य नहीं कर सकतीं, वे सीखना भी चाहें तो भी नहीं सीख सकतीं। जो प्रकृति के साथ हैं वही पृकृति का नृत्य कर सकते हैं एकदम से कुदरती, बिना घालमेल वाला। ’
आदिवासियों के नृत्य में तो पता ही नहीं चल रहा कि नर और नारी दोनों अलग अलग हैं, इनका विलयन तो देखते ही बन रहा है। कितना कुदरती है इनका नृत्य! काश! वे कवि होते तो कविता फूट पड़ती पर वे कवि नहीं हैं फिर भी अन्तःमन से कविता का प्रस्फुटित होना वे महसूस रहे हैं।
नृत्य का कार्यक्रम देर रात तक चला फिर खाना-पीना हुआ। रियासत की कचहरी के सामने वाले हाल में आदिवासियों के सोने का प्रबंध किया गया था। रियासत के कारकून आदिवासियों की सेवा में लगे हुए थे। कुछ कारकून तो उनमें ऐसे भी थे जो आदिवासियों से भर मुह बात भी नहीं किया करते थे, हमेशा गालियों से बातें करते थे, वे भी शालीन और संस्कारी बने हुए थे। महाराज जाने क्या सोचें अगर शिकायत हो गई तो...
महाराज दूसरे दिन देर से जगे फिर महल से बाहर निकले, दरबार में आये जहॉ आदिवासी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। महाराज को सलाम करके ही निकलना है पहले कैसे वापस लौटा जा सकता है। आदिवासी महाराज को सलाम किए बिना महल से कैसे लौट सकते थे.. बाप-दादों की परंपरा भला वे कैसे भूलते, यही सब तो है सामंती अनुशासन।
बहुत ही उल्लास से महाराज आदिवासियों से मिले और उनसे खान-पान के बारे में तथा रात में सोने के बारे में पूछा....
आदिवासी गदगद हैं, भर पेट मास, मछली खाये थे, भर पेट दारू पिये थे, इससे अधिक चाहिए भी क्या एक स्वर से बोल उठे...कृ
‘भल खइलौं मालिक! भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’
महाराज ने उसी दिन सभी आदिवासियों को अंग-वस्त्रा तथा कुछ नगदी उपहार स्वरूप दिलवाया फिर आदिवासी चले गये। महाराज आदिवासियों की बात नहीं समझ पाये थे कि आदिवासी का बता गये उनको।कृका मतलब है भल खइलौं भल सुतलौं भर भुइयॉ भर खटिया’ उन्हांेने रियासत के मंत्राी से पूछा...कृ
मंत्राी कांपने लगा, राजा जाने का विचारें, सभी आदिवासी खटिया पर तो सोये नहीं थे जबकि राजा ने आदेश दिया था कि आदिवासियों के रहने खाने का प्रबंध मेहमान की तरह से किया जाये। डरते-डरते मंत्राी ने राजा को बताया...कृ
‘हजूर! भल खइलौं का मतलब... छक कर खाना, भल सुतलौं का मतलब अच्छी तरह से सोना, भर भुइयॉ भर खटिया का मतलब, खटिया पर भी सोये और जमीन पर भी।’‘हजूर! ऐसा था कि हाल में एक ही खटिया थी जिसे एक कोने में बिछा दिया गया था बकिया हाल में दरी बिछाई गई थी, आदिवासियों ने सोचा कि महाराज ने खटिया भी उनके सोने के लिए प्रबंध कराया हुआ है सो आदिवासी खटिया को हाल के बीच में बिछा दिये और खटिया के अगल बगल सो गये। पैरों को खटिया पर रख दिये। यही है हुजूर भर भुइयॉ और भर खटिया। मंत्राी का जबाब सुनते ही राजा आदिवासियों की स्वामिभक्ति के बारे में गुनने लगे...कृ
धन्य है मेरी परजा, फिर क्या था महाराज ने एक दिन आदिवासियों के गॉव जाने का कार्यक्रम बना लिया। कार्यक्रम बन गया और फिर राजा आदिवासियों के गॉव में। राजा ने आदिवासियों के लिए एक गॉव जो राजा के सीर का गॉव था जिस पर राजा की खेती-बारी हुआ करती थी, जो आदिवासियों के गॉव से करीब चार कोस की दूरी पर था, उसे आदिवासियों को माफी में देने की घोषणा कर दिया और आगे की कागजी कार्यवाही के लिए मंत्राी को आदेशित भी कर दिया।
आदिवासी तो आदिवासी कुदरती चेतना वाले, राजा को भगवान का अवतार मानने वाले, आदिवासी झूम उठे, ढोल नगाड़े बज उठे, राजा के जयकारे के साथ करम बाबा के गीत चल पड़े। एक महीने के भीतर ही राजा के आदेश का क्रियान्यन भी हो गया। तभी से आदिवासी विवादित गॉव की जमीन पर खेती-बारी करते चले आ रहे हैं। राजा की दी हुई जमीन पर बसा हुआ है आदिवासियों का हल्दीघाटी के मैदान में तब्दील हुआ यह गॉव। तब राजा ही जगह-जमीन के आला मालिक हुआ करते थे। वे ही अपनी परजा को जमीन बन्दोबस्त किया करते थे।
आजादी मिलने के बाद कई किसिम के मालिक पैदा हो गये हैं। कुछ लोगों का तो जमीन पर नाम भी चढ़ गया है। आदिवासी नहीं जानते जमीन के कागज के बारे में वे सिर्फ इतना जानते हैं कि महाराज ने इस गॉव की पूरी जमीन उनके पुरखों को माफी में दे दिया था इससे अधिक कुछ नहीं वे जानते। जाने कैसे किसिम किसिम की खतौनियॉ बनी हुई हैं। कागज लेकर कभी कोई चला आता है तो कभी कोई। आदिवासी उलझ चुके हैं कागज के खेल में। आदिवासियों ने भी मुकदमा दाखिल करा दिया है, अदालत में मुकदमा चल रहा है जाने कब फैसला हो। इस बीच दूसरे लोग भी आ गये जमीन पर कब्जा करने के लिए आदिवासी भिड़ गये उनसे...कृ
‘कागज आपका है तो लिए रहो आप! कागज ही जोतो, उसी पर खेती-बारी करो पर हमलोग जमीन पर से अपना कब्जा नाहीं छोड़ने वाले, हम मूरख गॅवार, हम का जानते हैं कि जोत-कोड़ करना मालिकना नाहीं है, मालिकाना है कागज, तो कागज जोतो, ईहां काहे आये हो भइया।’
‘साहब! आप लोग फूटो ईहां से, बेफजूल ईहां आये हो कब्जा करने, ई जमीन हमलोगों की है, पुरखों के जमाने से हमलोग जोत-कोड़ कर रहे हैं, बूझि गये के नाहीं।’ इतना ही तो बोल पाये थे सरवन, बुद्धन, रजुआ, कलुआ और उसके साथी।
कतल वाले दिन ऐसे लोग आये कब्जा करने के लिए जो खून-कतल पर आमादा थे। अपनी सेना लेकर आये थे। उनलोगों ने कागज बनवा लिया था अपने नामों से, वे कागज के सहारे ही गॉव में घुसे थे। कागजों के खेल में क्या क्या होता है उसका नमूना बन गया वह गॉव। लाशें बिछ गईं जमीन पर अब क्या होगा लाशों का? पोस्टमार्टम, चीर -फाड, फिर दाह-संस्कार, कर्म-काण्ड, यही सब तो होता है। यह कागजों की दुनिया है सारा कुछ कागज पर होता है। भूगोल, इतिहास जैसे सारा कुछ कागजों के खेल से बना हुआ है वैसे ही हल्दीघाटी की धरती की कथा भी टिकी हुई है कागजों के खेल पर, कतल का मुकदमा भी टिक जायेगा कागजों के खेल पर। चलिए, गॉव देख लिया जाये वहां का हो रहा है? फिर पोस्टमार्टम के जादू की तरफ चला जाये देखा जाये कि वहॉ कागज क्या बोलते हैं?’
‘यह दुनिया आधुनिक है, इस दुनिया में आदमी के बोलने का कुछ मतलब नहीं, कागजों के बोलने का मतलब होता है। कागज पर कानून होता है, कागज पर मकान होता है, कागज पर जमीन होती है और यह धरती-कथा भी कागज पर ही है उपन्यास के रूप में।’
‘हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं
कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है,
इस पर का लिखा पढ़ि लो...’
‘कागज पर लिखी अपनी कथा पढ़ते हुए उदास होती जा रही हैं धरती माई, वे आरोपियों को श्राप भी नहीं दे पा रही हैं, कैसे दें श्राप..! धरती से प्यार करने वाली पवित्रा आत्माओं ने रोका हुआ है उन्हें कि किसी को श्राप न देना पर उन्हें लग रहा है कि धरती पर निवसने वाले दुष्ट-जनों को श्राप देना ही होगा... यह जो श्राप है नऽ स्वर्ग में खूब प्रचलित था फिर भी उन्होंने किसी को श्राप नहीं दिया है, पता नहीं क्यों उन्हें दया आ जाती है ‘का श्राप देना’। किसी का जीवन बेकार बनाना, किसी को दण्डित करना, सभ्यता में किसी न किसी खोट के कारण ही तो कोई गलती कर देता है, अपराध कर देता है। उसे सुधारने के बजाय श्रापित करना यह तो अहं जैसा है, अहंकार ही किसी को दण्ड तथा अपराध की तरफ ले जाता है। वे अहंकारी नहीं बनेंगी फिर भी पूछ लेना चाहिए गॉव के बुजुर्गों से... ’
सोमारू व बुझावन दो ही तो बुजुर्ग हैं गॉव में पड़े हुए हैं खटिया पर जितना रो सकते थे रो रहे हैं। जो भी हाथ पॉव से ठीक थे, जवान थे, मन में कुछ कर गुजरने की सोच वाले थे, वे लाशों के पास थे।
गॉव में मवेशियां थीं अपनी जगह पर पड़ी हुई थीं, उन्हें कौन चारा-भूसा दे? फुसहा मकान थे वे देश की कानूनी बदरियों में विलाप कर रहे थे और आधुनिक सभ्यता की आधुनिकता में कराह रहे थे। एक तरह से पूरा गॉव दमन के किसी नमूने की तरह हो गया था एकदम सुन्न और सन्न जैसे वहां पहले कुछ न रहा हो और अब भी नहीं हो।
उसी गॉव में खटिया पर पड़े पड़े बुझावन व सोमारू दोनों अपने बाल-बुतरूओं को गरिया रहे हैं... वे कर भी क्या सकते हैं, एक सोच ही तो थी जो उनके पास कर्म और धर्म की तरह थी वह भी मुर्दा माफिक, फिर भी वे सोच रहे हैं....
‘दो तीन घंटे तो गुजर ही गये होंगे, कोई नहीं लौटा खेत से, खेत पर जाने का कर रहे हैं सारे लौंडे, कोई नाहीं बूझ रहा कि हमलोग केतना परेशान हैं, अरे कोई तो लौट आता और बता देता कि खेत पर का हुआ, काहे भगदड़ मची हुई है?’ मेहररुआ भी नाहीं आय रही हैं, वे भी वहीं पड़ी हुई हैं वहीं, जाने का हो रहा है वहां. सामने वाले घर के ओसारे में हैं सोमारू पूछ रहे हैं बुझावन से...
‘अरे बुझावन! कुछ तो बताओ का हुआ होगा खेत पर?’
‘का बतावैं भइया कुछ समझ में नाहीं आय रहा है...मार-पीट तो जरूर हुई होगी, कहीं गोली न चली हो, जो लोग संसथा वाली जमीनिया खरीदे हैं नऽ वे बहुत हरामी हैं। तोहैं तो खियाल होगा उन लोगों का एक आदमी गॉव आया था अउर बोल रहा था कि मुकदमा जीन लड़ो, खेत छोड़ दो, जमीन जोतना नहीं छोड़ोगे तो फिर समझ लेना, बहुत बुरा होगा। ओकर धमकी सुनते ही गॉव कऽ लड़कवे ओके दौड़ाय लिए थे, कइसहूं ऊ भागा था गॉयें से।’
‘हॉ तूं सही बोल रहे हो बुझावन! गोली ही चली होगी, वे सब तो पहिले से ही धमकियाय रहे थे, गोली-बारूद की कमी नाहीं है ओन्हने कीहें, कहकर सोमारू खामोश हो गये।’
दोनों वृद्ध सिकुड़े हुए हैं अपनी विवशताओं की खोल में, अगर ठीक होते, चलने फिरने लायक होते तो वे भी खेत पर होते...पर करें का...देह ने साथ छोड़ दिया है, खाली मन से का होता है, मन का करेगा सोचने के अलावा। बुझावन खुद को भगवान के सहारे छोड़ कर लगे सोचने... कि एक जमाना था..जमाने में किसिम किसिम की बातें होती हैं, बुझावन का जमाना राजा बड़हर से शुरू होकर हल्दीघाटी गॉव में आ कर खतम हो जाता था। इसी बीच गॉव की धरती-कथा भी खतम हो जाती थी पर धरती-कथा तो द्रोपदी की चीर की तरह बढ़ती जा रही है, बुझावन खटिया पर पड़े पड़े इस कथा में कौन सी भूमिका निभा पाते... केवल सोच सकते हैं गॉव के बारे में, गॉव की जमीन के बारे में...वे ननकू काका के बारे में सोच रहे हैं जो धरती-कथा के पुराने पात्रा हैं, उन्हीं के साथ अपने बारे में भी। वे हमेशा नन्हकू काका के साथ रहा करते थे। उन्हें पता है कि सोनभद्र जिला बन जाने के बाद ननकू काका ने ही जमीन का मुकदमा रापटगंज में दाखिल किया था और वे ही पैरवी करने के लिए रापटगंज जाया करते थे। कभी कभी वे भी चले जाया करते थे रापटगंज, वकील से मिल आया करते थे और वहां की खबर नन्हकू काका को बताया करते थे।
उनके जमाने में बहुत ही सपाट हुआ करती थी धरती-कथा, उस कथा से परेशान होने की बात न थी। जमीन के बारे में किसी तरह का हल्ला गुल्ला भी नहीं था जमीन किसकी है किसकी नहीं है। हमलोग बूझते थे कि राजा साहब की जमीन है, बस एतनै था। राजा साहेब ही धरती-कथा लिखते हैं।
पर हाल में ही जब संसथा वाले गॉव में आये तब पता चला के राजा साहब हमरे गॉव कऽ मालिक नाहीं हैं फेर घबरा गये हमलोग। संसथा वालों में एक आदमी था जो बार बार गॉव में आया करता था और गॉव वालों को बुलाकर समझाया करता था...आपलोग काहे मुकदमा लड़ रहे हो...छोड़ दो मुकदमा। संसथा का कागज पक्का बन गया है ओमे कोई शक नहीं है। हमलोग आपलोगों से जमीन थोड़ै छीन रहे हैं, जमीन पर आप लोगों का जोत-कोड़ है, आपलोग ही इसे जोतिए कोड़िए, हॉ उसके एवज में जो खरवन राजा साहब को आपलोग देते हैं वह हमारी संस्था को दिया करिए बात खतम, बूझ रहे हैं आपलोग नऽ हमारी बात।’ तब ननकू काका जिन्दा थे। नन्हकू काका ओ समय कुछु नाहीं बोले चुप लगा गये। उनकी समझ में नहीं आया कि संसथा वाला आदमी का बोल रहा है, अगर इसका कागज पहिलहीं बनि गया था तो अब तक का करि रहा था, पहिले तऽ कब्बौ नाहीं आया। जाने केतना साल बीत गया हमलोग लगातार राजा साहब को खरवन दे रहे हैं। जाने का बोल रहा है संसथा वाला...
संसथा वाले की बात से नन्हकू काका परेशान, ननकू काका को रात में नीन काहे आती बिना महाराज से पूछे कैसे वे बोलते संसथा वालों से.. का कहते ओनसे...किसी तरह से करवट बदल बदल कर रात बिताये और दूसरे दिन बड़हर महाराज के इहां भोरहरी में ही पहुंच गये नन्हकू काका। कहीं महाराज बाहर न निकल जायें, राजाओं का का, वे तो चिरई माफिक उड़ते रहते हैं।
महाराज महल पर ही थे। दस बजे दिन के बाद ननकू काका को दर्शन दिए महाराज.फिर काका ने संसथा वालों की बात महाराज को बताया... और पूछा...
‘हमलोग का करें महाराज...संसथा वाला बोल रहा था कि कागज उसका बनि गया है।’
महाराज तो महाराज...घीरज के देवता, एकदम शान्त और स्थिर..
‘जौन आपलोग सोचो गुनो, हम तऽ चाहते हैं कि ऊ जमीन आपलोग जोतते-कोड़ते रहो बस एतनै। वैसे जउन नीक लागै उहै करो। अगर संस्था वालों का कागज बनि गया है तो ओके देख लो तहसील जाय के...’
नन्हकू काका परेशान अब का करें। मीरजापुर के वकील को बोल ही आये थे कि कागज देख लो भइया। वकील दो चार दिन बाद ही बतायेगा। नन्हकू काका राजा साहब के महल से गॉव लौट आये।
गॉव वाले रियासत से नन्हकू का काका के लौटने की राह देख रहे थे। तीन चार घंटे का रास्ता है, पैदल ही आना है। महाराज से जाने मुलाकात हुई कि नाहीं। कई तरह के सवाल गॉव वालों के दिमाग में पउड़ रहे थे... एक विश्वास भी था कि नन्हकू काका होशियार आदमी हैं, महाराज को मना ही लेंगे, कउनो काम वे खराब नाहीं करते। संसथा वालों का कागज बनि गया होगा तब का होगा? पूरा गॉव डूबा हुआ था इसी चिन्ता में। यह कैसी धरती-कथा है जिसे कभी राजा साहब लिखे थे तो अब संसथा वाला लिख रहा है। राम जाने कल का होगा कोन लिखेगा धरती-कथा?
गॉव की औरतें थोड़ी मुखर थीं...
‘होगा का? कउनो हाल में हमलोग गॉव नाहीं छोड़ेंगे, अब ई का है के इहां बसो तो उहां बसो, बार बार उजड़ते रहो। ई जमीनिया का कोई के बाप की है, किसी ने जमीन बनाया है कि पेड़ पौधा बनाया है, का किया है किसी ने, हमलोग जमीन नाहीं छोड़ेंगे तो नाहीं छोड़ेंगे। हम लोगों ने कियारियॉ गढ़ी, ढूह काटे, खेत समतल किया अउर छोड़ दो खेत बोलते हैं, कागज बनि गया है, का होता है कागज, बताते काहे नाहीं? हम किसी का कहा नाहीं मानेंगे हम अपनी धरती-कथा खुद लिखेंगे वह भी कागज पर नाहीं धरती पर।’
एक दूसरी औरत जो पहली औरत के साथ थी वह थी तो संकोची पर बोलनेेे में तनेन थी, बोल पड़ी...’
‘सही बोल रही हो बहिन, कउनो तरह से हमलोग आपन खेत-कियारी नाहीं छोडं़ेगे। हम ठहरे गंवार, अनपढ़, हम का जानते हैं कागज-पत्तर, हमार कागज पत्तर तो जमीनियय है, एही पर हमलोग आपन जिनगी लिखते हैं अउर उहै लिखा पढ़ते हैं सहूर होय तऽ जमीनिया पर का लिखा-पढ़ा पढ़िलो, पर तब तो नानी मरि जायेगी। कलम से लिखो तो वह कानून अउर जो कुदारी, फरसा से लिखो वह कानून नाहीं ई कइसन नियाव है, हमैं तो कुछौ नाहीं बुझाय रहा है।’
नन्हकू काका समझाय रहे हैं...बुधिया काकी को..
‘का बक बक करती रहती रे! तोहसे कोई कुछ पूछ रहा है का? जमीन सब राजा की होती है, जउने राज में हमलोग रहते हैं ओ राजा की, हम सब उनकी ही परजा हैं। राजा ही धरती-कथा लिखते हैं। राज-काज नाहीं बूझती है तऽ न बोला कर। चली आई मुह निपोरने...।’
बुधिया काकी कम न थीं, हाड़ काठ से मजबूत और बात-विचार से भी मजबूत,काहे मानतीं और रुकतीं, टोक बैठीं...
‘हमैं जीन समझाओ राज-काज, राजा होंगे तो अपने महल के, कउनो देवता नाहीं हैं के सबकी देख-रेख कर रहे हैं... देवता ही सबको संभालता है, देख-रेख करता है। हमैं पता है के डंडा के जोर से राजा बने हैं। हमरे बपई कहते थे कि ई जो राज है नऽ खरवारन कऽ है। आजुकल के जो राजा हैं उनके बाप दादों ने खरवारों से राज छीन कर खुदै राजा बनि गये हैं।’ नन्हकू काका सुनते तो सबकी थे पर जब कभी गुसिया जाते थे तो किसी की नही ंसुनते थे...गुसिया गये काकी पर...
‘का बकबका रही है रे! तोहार बपई ने जो बताय दिया का ऊ पथरा की लकीर बन गया के नाहीं मेटा सकता...’
‘हमहूं एतना जानते हैं कि राजा हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं रियासत की खातिर। इहौ जो राजा हैं नऽ इनके बाबा को महाराज बनारस बलवन्त सिंह ने भगाय दिया था अउर बिजयगढ़ किला पर कब्जा कर लिया था...फेर जब अंग्रेज आये तब ई राजा बहाल हुए। का होगा एके जानकर। हमार राजा बड़हर हैं तो हैं अब तऽ सारे राजा खतम होय गये हैं अब कोई राजा नाहीं रहि गया है।’
अब नन्हकू काका या बुधिया काकी को का पता कि राजा कभी नहीं मरते, वे हमेशा खुखड़ी की तरह पैदा हो जाया करते हैं। एक राजा मरेगा तो दूसरा पैदा हो जायेगा। और आजकल किसिम किसिम के राजा पैदा भी हो गये हैं। एम.एल.ए.
एम.पी., मंत्राी आ जेतने नेतवा हैं नऽ सभै तऽ राजा हैं, ई जो कलक्टर होता है नऽ जिले का मालिक, का ऊ कउनो राजा से कम होता है? अब तो कलक्टर ही हवा, पानी, पहाड़, नदी, नाला सबकर मालिक है, ऊ जो लिख-पढ़ देता है जमीन के बारे में उहय धरती-कथा बन जाती है।
किसी तरह से नन्हकू काका ने बुधिया काकी को शान्त किया....चलो थोड़ी सी आश बची है कि जमीन छीनने की बात नाहीं कर रहे हैं संसथा वाले, ओन्हई लोगन के खरवन दिया जायेगा अउर का...?
‘हे डीह बाबा कउनो रहता निकालिए, आप तऽ सब बूझते अउर समझते हैं। गॉव वाले डूबे हुए हैं पुराने समय में वे जब इस गॉव में बसे थे। वे लगे सोचने जिन्दगी के बारे में....’
‘का था ईहां पर? हर तरफ बबूर का पेड थे़, झाड़ थे, झंखाड़ थे, माटी के बड़े बड़े ढूहे थे। पूरा गॉव मिलकर पेड़ों को काटता था, झाड़ों को साफ करता था। खेत साफ करनेे के बाद तब कियारियॉ गढ़ता था। कई साल पसीना बहाना पड़ा था फिर जाकर खेत बना था फसल बोने लायक।’
नन्हकू काका जब भी खेत की तरफ जाते हैं तब उन्हें बहते हुए पसीने की गमक एक अलग की तरह दुनिया में ले जाती है.. कोई हिसाब नहीं है उनके पास कि कितना पसीना बहा होगा कियारियॉ गढ़ने में। एक ही पल में पसीने का सारा मूल्य खतम हो गया कागजों के खेल में, कानूनी कागज सोख गये सारा पसीना। भीग भीग जाती थीं कुर्तियॉ, सूज जाते थे हाथ, छाले पड़ जाते थे हाथों में...अब कागजों की दुनिया को का पता कि वे सूजे हुए हाथ, सूजे हुए पंजे कहॉ हैं, का मिला उन्हें आखिर?
कागज तो सूजते नहीं, कागज तो रोते नहीं, उन्हें पसीना नहीं आता, उनकी ऑखों में लोर नहीं होता, कागज पर तो हुकूमत का नशा होता है मादक, उत्तेजक, आक्रामक। हुकूमत का नशा कागज पर उतराया रहता है, वही धरती पर उतरता है कानून की शक्ल में, लाठियॉ भॉजते हुए आता है, गॉव गॉव घूमने लगता है और कदम कदम पर कानून चिपकाये चलता है।
बुझावन कागज की सोच से निकल रहे हैं बाहर...जो होगा देखा जायेगा। उन्हें ‘खराई’ मारने की तास लगी है, कोई ‘खराई’ तो मरवा देता, चार दाना दे देता तो वे ‘खराई’ मार लेते। अबेर होने पर उन्हें खर-सेवर हो जाता है। बुझावन अपनी पतोहिया के बारे में गुन रहे हैं...वह भी नाहीं आई, आ जाती तो ‘खराई’ करा देती...पर कैसे डलाएगा दाना मुहे में। नहीं कर पायेंगे ‘खराई’ पर एक दो दाना डालना होगा ही मुह में। वह आती ही होगी भुलक्कड़ तो है नाहीं के भूल जायेगी।
कुछ ही देर में बुझावन की पतोह भागती भागती घर चली आई। दस दस लाशों को देखकर वह पगला गई थी, उसे नाहीं बुझा रहा था कि का करे का न करे...बहुत देर बाद उसे खियाल आया बुझावन का...बपई तो खटिया पर पड़े होंगे, ‘खराई’ का
टेम होय गया है, खूब खांस रहे होंगे, मन ही मन गरिया भी रहे होंगेे।
‘बड़ी गलती हो गई बपई, हम तऽ उहां से पहिलहीं चले आते पर का बतावैं पुलिस वाले एक एक आदमी से पूछ रहे थे, लाशों को किनारे रख रहे थे, कपड़े से ढक रहे थे, उहय सब देखने में भुला गये कि बपई तो घरे हैं, ओन्है दाना-पानी देना होगा। अबै ला रहे हैं कुछ बना कर।’
बुझावन की पतोह खेत से लौट कर ही बुझावन को बता चुकी थी कि किसको किसको गोली लगी है। सोमारू काका के लड़के को भी गोली लगी है। वही तो गॉव का अगुआ था।
बुझावन ने सहेजा पतोह को...
‘चली जाओ सोमारू के इहां, ओनसे बताय दो सरवन के बारे में अउर दाना पानी भी कराय दो ओन्है....बूझ रही हो हम दाना-पानी नाहीं करेंगे हमार मनै उचट गया सब सुन कर, एको कवर नाहीं जायेगा पेट में, ई जमीन ससुरी होती ही ऐसी हैै, हमेशा खून मांगती है, पता नहीं केतना खून पीएगी ई मुई जमीन! हमरे बाप-दादा जब इहां बसे थे तब भी इस जमीन ने खून पिया था, दो तीन खरवार मारे गये थे तब जाकर हमलोगों का कब्जा हुआ था ये गॉयें पर। अब देखो फेर उहय होय गया जउने का डर था, सोख गई दस लालों का खून... चली जाओ सोमारू के इहां ओन्हय दाना-पानी कराय दो, हम नाहीं खायेंगे कुछ भी।’
बुझावन की पतोह कसमसा गई... ‘काहे नाहीं खायेंगे बपई, एक तऽ बुढ़ाई की उमर, पेट में कुछ नाहीं जायेगा तऽ कइसे रहेंगे, बीमार हैं देह को ताकत चाहिए.’
आखिर सोमारू काका के इहां जा कर वह कैसे बोलेगी सरवन के बारे में का बताएगी ओन्है, हॅ दाना-पानी जरूर करा देगी, उ कुछ नाहीं बोल पाएगी सरवन के बारे में। सरवन की लाश देखते ही वह मुर्झा गई थी, गोली लगी थी उसकी छाती पर, छाती के आर-पार हो गई थी गोली। खूब खून बहा था, जमीनिया भीग गई थी। सरवन के मेहरिया सुगनी का तो न पूछो...
‘वह माथा पीटे जा रही थी मेड़ पर, फोड़ दिया सारी चूड़ी, निकाल दिया गले में का मंगल-सूत्रा, पथरा भी धस गया ओकरे माथे में, खूब खून बहा। किसी तरह से उसे उठाया गया, पानी का छींटा मराया उसके मुह पर। कुछ देर बाद वह होश में आयी। वह जायेगी सोमारू काका के ईहां पर बतायेगी कुछ नाहीं। ओन्है दाना-पानी कराय दंेगी, दतुइन कराय दंेगी, बिस्तरा झार-बिछाय दंेगी, बस एतन करंेगी पर कतल के बारे में कुछ नाहीं बोलंेगी। उसे तऽ जाना होगा खेत पर भी उसका मरद बबुआ उहंय है, ओन्है समझाना होगा पर सोमारू काका के घर से लौटने के बाद। बुझावन की पतोह अचानक सकपका जाती है...’
सोमारू काका से का बोलेगी, कैसे बोलेगी...
वह कुछ समझ नहीं पाती फिर भी जाना तो है ही, बपई को पहले दाना-पानी करा तो लें...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ फिर पिर्थबी के लिए
काहे मार-पीट कतल, बदल रहा देश, बदल रहा समाज’
‘तो मध्यकाल की धरती-कथा बीसवीं शदी के लोकतंत्रा की धरती पर मंचित हो रही है जैसे उसका सीधा प्रसारण किया जा रहा हो। लोकतंत्रा के आला-अधिकारी कुदरती भूमिका में हैं, उनकी भूमिका से पता ही नहीं चल रहा है कि वे विशेष योग्यता व प्रतिभा वाले हैं। वे दिखावे के लिए नहीं मन से सरल व तरल हो चुके हैं, उनकी सरलता देखने लायक है। मृतकों के परिजनों की ऑखें सूज गयी हैं, सूजी हुई उनकी ऑखों में लोर नहीं है हिलोर है और वहीं कोने में पड़ा हुआ एक सवाल है आखिर यह पिर्थवी कैसे किसी की हो जायेगी? पिर्थवी तो किसी ने नहीं पैदा किया...पिर्थबी तो उसकी जिसने इसे खेती करने लायक बनाया, कियारियॉ गढ़ी, जो इसे हरा-भरा बनाये रख सके...’
पिर्थबी को हरा-भरा बनाये रखने वालों का गॉव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है, हर तरफ पुलिस ही पुलिस दीख रही है, पुलिस के कई कैंप लगाये जा चुके हैं। पुलिस की भीड़ में मृतकों के परिजनों का कहीं अता-पता नहीं चल रहा, बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी सबके सब खोे गये हैं पुलिस की वर्दी में, उनके बोल भी विलीन हो चुके हैं पुलिस की धमक में। गॉव के एक मात्रा प्राथमिक स्कूल को पुलिस के आवास में तब्दील कर दिया गया है। पुलिस वाले उसमें अपना डेरा जमा चुके हैं, बड़े साहेब लोग मुख्यालय से आना-जाना कर लेंगे, बेचारे सिपाही तो रात भर की सेवा वाले हैं, फिर वे कैसे जा सकते हैं अपने अपने डेरे पर। सो वे स्कूल पर ही अपना डेरा जमा रहे हैं। साहबांे ने आदेश दिया हुआ है...
‘लाशों के पोस्टमार्टम आज ही हो जाने चाहिए’
जिले के बड़े हाकिमों ने फरमान पर पुलिस के मझोले व छोटे कर्मचारी हाउर हाउर कर रहे हैं। लाशों को सफेद कपड़ों में लपेटा जा चुका है, गाड़ियॉ भी आ चुकी हैं। जिले का अस्पताल तैयार बैठा हुआ है। वहां घायलों को ले जाया जा चुका है। जिला अस्पताल में घायलों केे लिए एक अलग वार्ड बना दिया गया है। सीरियस किस्म के घायलों को बनारस रेफर कर दिया गया है। अस्पताल के डाक्टर मुस्तैद हो चुके हैं। इस अवसर पर सारी दवाइयॉ जाने कहां से अस्पताल में लाई जा चुकी हैं वैसे तो वहां के डाक्टर अक्सर दवाइयॉ बाहर से खरीदने के लिए ही अस्पताल की पर्ची पर लिख दिया करते हैं। मरीज भी समझते हैं कि अस्पताल की दवाइयॉ घटिया किसिम की होती हैं। सो मरीज बाहर से दवाइयॉ खरीद लिया करते हैं। घायलों की दर-दवाई अस्पताल की तरफ से हो रही है। अस्पताल का सजग होना, सभी घायलों का मुस्तैदी से इलाज करना उल्लेखनीय है। अस्पताल तथा पुलिस दोनों की सक्रियतायें उदाहरण बन रही हैं। उदाहरण इस लिए क्योंकि आमतौर पर ऐसा देखा नहीं जाता। कामना की जा सकती है कि डाक्टरों तथा अस्पताल की सक्रियता हमेशा बनी रहे और लोकतांत्रिक जनता उनका गुण-गान गाती रहे। दवाइयां मुफ्त मिलती रहें केवल संकट की घड़ी में ही नहीं हमेशा।
नया सिपाही परेश्शान परेशान है। उसे कुछ पता नहीं है कि पोस्टमार्टम में होता क्या है, क्या पेट में से गोलियॉ निकाली जायेंगी पर पूछे किससे? वह खामोशी से लाशों को ट्रक में लदवाने के लिए तैयार है, उसके साथ चार पांच दूसरे सिपाही भी हैं जो अनुभवी हैं, वे जानते हैं कानूनी खेलों के बारे में सो वे तटस्थता के साथ अपना काम कर रहे हैं पर नया सिपाही तो घबराया हुआ है...कृ
‘बेकार है पुलिस की नौकरी अब चलो लाशें उठाओ और जाने का का करो...गॉव में तो मुर्दा छूने पर नहाना पड़ता था यहां जाने का करना पड़े, जैसा दूसरे सिपाही करेंगे वैसा ही वह भी करेगा, पर पहले यहां से तो खाली हो।’
औरतें लाशों को घेरी हुई हैं, सभी एक साथ बोल रही हैं...
‘साहेब लाशें ईहां से नाहीं जायेंगी, हमलोग एही जमीन पर लाशों को फूॅकंेगे, इहैं करम करेंगे। नाहीं होगा पोसटमारटम। केतना पोसटमारटम होगा साहेब। दो चार महीना बाद ऊ लोग फेर गोली चलायेंगे, जब हमलोग उनका विरोध करेंगे डंडा फरसा लेकर, जमीन पर कब्जा नाहीं होने देंगे। वे लोग फेर गोली चलायेंगे हम लोग फेर मारे जायेंगे। ओ लोगन के पास बारूद है, गोला है, हथियार है, कागज है, टेक्टर है, रुपया है, सोर्स है, फोर्स है, हमलोगन के पास का है साहेब? खाली माटी है, भुखायल पेट है, अउर का है साहेब? कउनो हाल में लाश नाहीं ले जाने देंगे साहेब! हमलोगों को मुकदमा नाहीं लड़ना है। जमीन वाला मुकदमा चल रहा है नऽ साहेब अगर ओमे फैसला हो गया होता फेर ई सब काहे होता साहेब।’
औरतें लेट गई हैं लाशों के अगल -बगल। वहां औरतों की कमी नही हैं, ढेर सारी औरतें वहां हैं, विलपती, रोती। महिला जागृति देखने लायक है वहॉ, आदवासी पुरुष तो अपनी बातें बोल भी नहीं पा रहे हैं, कुछ ही हैं जो बता रहे हैं घटना के बारे में। महिलायें बहुत आगे हैं, घटना का एक एक ब्योरा साफ-साफ बता रही हैं। डी.एम. एस.पी. महिलाओं की चेतना परख रहे हैं...उन्हें अचरज माफिक जान पड़ रहा है, सोनभद्र तो पिछड़ा हुआ जाना व माना जाता है पर यहां की आदिवासी महिलायें! ये तो काफी तेज हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी। दोनों अधिकारी खुश हैं महिलाओं पर।
महिला पुलिस सक्रिय हो गई है, बहुत ही मीठे बोल बोल रही है महिला पुलिस जैसे उन्हें यही सिखाया गया हो कि प्रताड़ितों से मीठे बोल बोलना चाहिए। एक महिला पुलिस समझाय रही है बुधनी काकी को....कृकृ
‘बहिन जी! लाशें जाने दीजिए, लाशों के पोस्टमार्टम होने के आधार पर मुकदमा होगा तभी तो अपराधियों को सजा मिल पायेगी, नहीं तो कैसे मिलेगी अपराधियों को सजा।’‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है। तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल देखाता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हमलोग लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव, नियाव मॉग रहा था।’
महिला सिपाही अनुभवी है, अधेड़ है, वह जानती है कि पुलिस का काम कैसे करना चाहिए और पीड़ितों को कैसे समझाया जाना चाहिए। इस बाबत उसे इनाम-उनाम मिला है कि नाहीं किसे पता पर इनाम लायक काम है उसका। नया सिपाही उसके काम को देख रहा है और मन ही मन महिला सिपाही के समझाने की कला पर मुग्ध भी हो रहा है। वह देख लेना चाहता है कि महिला सिपाही आगे क्या करती है? महिला सिपाही बहिन जी बहिन जी कहते कहते थक भी नहीं रही है वह लगातार है समझाने में तब तक उसकी बड़ी अधिकारी कोतवाल भी वहीं आ गईं हैं। कोतवाल दिखने में तो महिला की तरह ही दिख रही हैं पर हैं मरदों से भी कड़क, कट कट उनके बूटों की आवाज सभी का घ्यान खींच रही है।कृबोल भी टन-टन है एकदम कड़क... महिला सिपाही कोतवाल साहिबा को सैल्यूट बजाती है, कोतवाल साहिबा महिला सिपाही की तरफ हैं...कृ
‘का हुआ लाशों को लदवाओ ट्रक पर, अस्पताल वाले तैयार बैठे हैं, घायलों की चिकित्सा शुरू हो गई है, मरहम पट्टी हो रही है उनकी। दस लाशें हैं, चार-पांच डाक्टर लगेंगे तब जाकर पोस्टमार्टम हो पायेगा, हो सकता है दो दिन लग जायंे पोस्टमार्टम करने में, डाक्टर मशीन थोड़ै हैं, वे भी बेचारे घिनाते हैं पोस्टमार्टम करने में। अगर अस्पताल का सफाई-कर्मी न हो तो हो चुका पोस्टमार्टम, वही तो करता है सारा कुछ। सी.ओ. साहब ने लगा दिया है सदर के एक दारोगा को कि वह उस सफाई-कर्मी को अस्पताल से बाहर न जाने दे। महिला कोतवाल कड़क हैं.. वे जोर से बोल रही है, बोल क्या हुकूम दे रही हैं.‘का हुआ आप लोग काहे घेरी हुई है लाशों को, लाशों से दूर हटिए, लाशों को ले जाना है पोस्टमार्टम के लिए। चलिए हटिए, हटिए यहां से।’
महिला कोतवाल सख्ती के साथ महिला सिपाही को सहेज रही हैं...कृ
‘हटाओ जी इन लोगों को, काहे के लिए भीड़ जुटा रखा है? लाशों को घेर कर बैठी औरतें अनसुनी बनी हुई हैं, वे नहीं सुन रही है महिला कोतवाल का आदेश, वे जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही बैठी हुई हैं गोलबन्द। थाना, कोतवाली, प्रशासन को रोब-दाब वहॉ से फुर्र हो चुका है, समा गया है किसी गुफा में या जंगल के किसी कोने में। महिला सिपाही औरतों से आग्रह कर रही है...हटिए बहिन जी! हटिए बहिन जी! जाने कितनी बार वे बोल चुकी हैं पर दुखियारी महिलायें वहां से हटे तब नऽ। अब का कुछ ही देर का तो साथ है, जल जायेंगी सारी लाशें, मिट जायेगा मृतकों के होने का प्रमाण, मर जाने के बाद कुछ भी नहीं बचता, बचती हैं सिर्फ यादें। फिर अचानक जाने क्या समझ में आ जाता है महिला कोतवाल को कि वे एक महिला को लाशों के पास से अलग हटाकर ले जाती हैं। तभी डी.एम.और एस.पी भी वहीं चले आते हैं और वे समझाते हैं कि लाशों का पोस्टमार्टम कराना काहे जरूरी है? मुआवजा मिलेगा, सरकार घायलों की दवाइयॉ करायेगी बिना पोस्टमार्टम के कुछ नहीं मिलेगा। अब तो जो होना था हो चुका है। आपलोग धीरज से काम लीजिए, सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी आपलोगों के साथ न्याय होगा।
एस.पी. और डी.एम. नई उमर के हैं, पढ़ने-लिखने वाली प्रतिभा उनके चेहरों पर नाच-कूद रही है। आदिवासियों के समझ में है कि ये बड़े साहेब लोग हैं, राजाओं के बाद इन्हीं साहबों का जिले पर राज चलता है, ये चाह लें तो का नहीं हो सकता! ये आग को पानी बोलें तो पूरा जिला पानी बोले और जो पानी को आग बोलें तो पूरा जिला आग बोले। सो इनकी बात में दम है, आदिवासी मरद औरतों को समझाय रहे हैं...कृ
‘अरे जो सरकार लोग(डी.एम. व एस.पी.) कर रहे हैं करने दो, रापटगंज भी तो चलना है, जो घायल हुए हैं उनकी देख-भाल करनी है। दूसरा आदिवासी मरद भी समझाय रहा है महिला आदिवासियों को। महिलाओं की ऑखों सेऑसू अब सूखने भी लगे हैं आखिर कब तक रोयेंगी, रोने की भी तो सीमा है, एक सीमा के बाद थक जाना है और खुद को करम बाबा के हवाले कर देना है। सभी की ऑखें नम हैं, चेहरे मुर्झाये हुए हैं, करइल माटी जेैसे सख्त हो चुके हैं उनके चेहरे। आदिवासी महिलाओं में बुधनी थी जो पहले से ही बोल रही थी बकिया तो चुप्प थीं केवल रोने में थीं सीधे डी.एम. साहब के पास जा पहुंची....कृ
‘का बचवा! आप का बूझ रहे हैं के हम लोग गलत हैं? हमार बेटउना जो मारा गया साहेब नऽ उहौ आपय की उमर का था, आपय नीयर ओकर कद काठी थी, अपने काम से काम रखता था, केहू से झगड़ा झंझट नाहीं करता था, ओहू के मारि दिये हत्यरवा, ऊ तऽ सबके समझाया रहा था, झगड़ा बरकाय रहा था फेर भी मारा गया। ई कैसा नियाव है बचवा!’
डी.एम. साहब अवाक, का बोलें बुधनी से। वे जानते हैं कि जमीन का विवाद राजस्व के मुकदमे से शुरू तो होता है पर अन्त होता है फौजदारी के मुकदमे से। वही हुआ होगा इस मामले में फिर भी वे पता लगायेंगे कि असल झगड़ा काहे का है। काहे कतल हुआ? वे गंभीरता से पढ़ेंगे धरती-कथा, कहां से गलती हुई? डी.एम. साहेब ऊॅची प्रतिभा वाले हैं, वे समझाते हैं आदिवासी बोलाक महिला को.....
‘माता जी आप चिन्ता न कीजिए प्रशासन अपराधियों को नहीं छोड़ेगा एक दो दिन में सारे अपराधी जेल में होंगे, आप यकीन रखिए माता जी।’
वहां गॉव के ही क्या पास-पड़ोस के बहुत सारे लेाग थे, इस हत्याकाण्ड ने सभी के मन में विविध किस्मों वाली धरती-कथा अपने आप उपजा दिया था। दरअसल
कथा का मिजाज भी तो ऑसुओं वाला होता है, दमन के प्रतिरोध वाला होता है। दिल दिमाग से एक था राजा तथा एक थी रानी वाली कथायें कहीं दूर फेंका गई हैं। ऐसी कथायेंॅ उस समय वहां का करतीं का रंगमहल सजातीं अपना सिंगार पटार करतीं। उनमें बहुत सारे लोग ऐसे थे जो मौके पर बतौर प्रतिभागी खड़े थे, वे विवादित जमीन के पुराने जोतदार थे, वे भला कैसे चाहते कि उनकी जोत वाली जमीन उनसे छिन जाये सो वे भी वहां मुस्तैद थे। उन्हें क्या पता था कि जिस जमीन की वे जोत-कोड़ कर रहे हैं वही जमीन उन्हें मुर्दा बना देगी, बदल देगी लाश में, उनका खून चूसेगी। जिस धरती माई की वे पूजा करते हैं क्या वह उनका खून चूसेगी? मामला जोत का था, जमीन पर कब्जा करने का था। कहा जाता है जमीन हो या कोई भी चीज हो जो ताकतवर होता है वही उसका मालिक होता हैै। किसे नहीं पता कि ‘वीर भोग्या वसुन्धरा।’ डी.एम. और एस.पी.दोनों आला-अधिकारीधरती-कथा की कहानी जान कर खुद में खोये हुए हैं फिर भी धरती-कथा खुल रही है उनके मन में....
तो वहां मध्यकाल वाले वीर आ गये थे सैकड़ों की संख्या में, उनके साथ कई ट्रेक्टर थे। पूरा सिवान खाली था, सिवान के बाहर गॉव आबाद था। टेªेक्टर गरजने लगे एक दो नहीं करीब दस की संख्या में, टेªक्टरों का गरजना आदिवासियो के गॉव में घुसा, पहले तो उसका गरजना मधुर था पर बाद में आक्रामक हो गया। गॉव के लोगों ने ऑखें गड़ा दीं अपनी जमीनों पर...कृ
ट्रेक्टर उनकी जमीन पर चल रहे हैं... कब्जेदार जोत रहे हैं जमीन...कृ
लम्बे समय से चल रहे मुकदमे ने आदिवासियों को प्रशिक्षित कर दिया था कि राजस्व तथा दीवानी के मुकदमों में यह जो जमीन पर कब्जे का मामला है बहुत ही महत्वपूर्ण होता है सो वे सचेत थे किसी भी हाल में जमीन पर से जोत-कोड़, कब्जा-दखल नहीं छोड़ना है। पर उन्हें नहीं पता था कि कब्जा लेने के लिए प्रतिवादी अचानक एक दिन चले आयेंगे, घुस आयेंगे गॉव में। पर वे आ गये थे और ट्रेक्टर से खेत जोतने लगे थे। आदिवाससियों का मानना था कि मुकदमे के फैसले के बाद ही जो कुछ होगा होगा, उनके वकील ने भी यही समझाया था उन्हें।
कब्जाकर्ताओं को तो जल्दी थी, वे आनन-फानन में थे। आदिवासियों के वकील ने सर्वे अधिकारी के पास एक दरख्वास्त दिया था कि गॉव का मौके पर सर्वे किया जाये तथा कब्जों का इन्द्राज किया जाये। सर्वे अधिकारी ने आदिवासियों के दरख्वास्त को खारिज कर दिया था इसके बाद आदिवासियों के वकीलअपील अधिकारी कलक्टर की अदालत में अपील दाखिल कर दिया था यह दावा करते हुए कि बिना कब्जों के इन्द्राज के मुकदमे में अग्रिम कार्यवाही नहीं की जा सकती। तीन-चार महीने तक कलक्टर की अपीलीय अदालत में आदिवासियों का मुकदमा झूला झूलता रहा और एक दिन अचानक अपीलीय अधिकारी कलक्टर ने आदिवासियों की दरख्वास्त खारिज कर दिया। अपील का खारिज हो जाना कब्जाकर्ताओं के लिए वरदान माफिक हो गया जबकि अपील खारिज करना वह भी पक्ष-कारों की बिना सुनवाई के गलत था। आदिवासियों के दरख्वास्त का खारिज होना कब्जाकर्ताओं के अधिकारों की स्थापना कत्तई नहीं है। लेकिन कब्जाकर्ताओं ने अपील के खारिजा को अपने हित में माना और विवादित जमीन पर पूरी तैयारी के साथ कब्जा लेने पहुंच गये। फिर क्या था देखते देखते पूरा गॉव विवादित जमीन पर पर जमा हो गया, क्या बच्चे क्या औरतंे, क्या जवान, क्या बूढ़े सभी वहां हाजिर हो गये और उनमें से कुछ तो खेत पर लोट गये ठीक ट्रेक्टर के सामने। आदिवासियों के खेत पर लोट जाना अलग किस्म का सत्याग्रह था जिसे आदिवासियों ने किसी स्वयंसेवी संस्था की कार्यशाला से सीखा था। सत्याग्रह से कुछ नहीं हुआ, कुछ मिनटों में ही दस सत्याग्रही आदिवासियों को गालियों से भून दिया गया, ऐसा कभी सोनभद्र में नहीं हुआ था और न ही ऐसा कभी सुना गया था। इससे बड़ी दर्दनाक घटना केवल एक बार हुई थी वह भी अॅग्रेजों के जमाने में जब अॅग्रेजों ने विजयगढ़ किला पर कब्जा किया था। उस समय किले की सुरक्षा में जुटे दो सौ आदिवासियों को अॅग्रेजी सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। आदिवासी अपने तीर-धनुष के साथ भिड़ गये थे अंग्रेजी सेना से कि हम किला पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ेंगे।
एस.पी. तथा डी.एम. मौके पर आकर धरती कब्जा करने की धरती-कथा पढ़ चुके हैं धरती-कथा को, कथा के कथा बनने के कारणों को भी वे जान चुके हैं। वे जानते हैं कि यही दुखान्त कथा उन्हें बार बार सुनने के लिए मिलेगी सो दोनों मनोवैज्ञानिकों की तरह लाशों को ले जाने के बारे में सोच रहे हैं, मिला-जुला कर ही लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा सकता हैै। उसी के अनुसार वे बातें भी कर रहे हैं, एकदम से सन्तुलित किसी संरक्षक माफिक। देखने सेे लग ही नहीं रहा है कि वे दोनों जिले को हिला-डुला देने की क्षमता वाले अधिकारी हैं। बिना इनकी राय के एक पत्ता भी जिले में कहीं नहीं हिलता।
डी.एम. साहब तो पलथिया कर बैठ गये हैं कड़क आवाज वाली बोलाक़ महिला बुधनी के पास...
‘माता जी! लाशों को ले जाने दीजिए पोस्टमार्टम के लिए। अब तो जो होना था वह हो चुका है फिर आप जानती हैं कि होनी पर किसी का वश नहीं होता।’बुधनी के सामने डी.एम. ने डाटा था महिला कोतवाल को...
‘काहे हल्ला कर रही हो जी! यहां की महिलायें लाशों के पास नहीं बैठ्रेंगी तो का महिलायें किराये पर लाई जायेंगी यहां बैठने के लिए, इन्हीं महिलाओं के तो बाल-बच्चे मारे गये हैं गोलीकाण्ड में...।’
डी.एम.तो डी.एम. उसे समझने में देर नहीं लगी कि यह जो बोलाक आदिवासी महिला है इसमें नेतृत्व का कुदरती गुण है सो इससे संभल कर बोलना होगा। वैसे भी नेताओं कोे समझा लेना देहातियों को समझाने से सरल होता है। डी.एम. ने वही किया...बोलाक आदिवासी महिला को माता जी माता जी बोलकर आधा कर दिया। उसने कभी प्यार भरा बोल नहीं सुना था जो कोई उसेे पुकारता है रेरी मारकर ही,
साहब तो माता जी माता जी बोल रहे हैं। लड़कवे भी उसे पागल समझते हैं, नहीं सुनते उसकी बात। साहब धियान से सुन रहे हैं उसकी बात।
बोलाक आदिवासी महिला नरम हो गई है और डी.एम. से वादा ले रही है...साहेब आप जो बोल रहे हो ऊ करोगे नऽ, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए साहेब! आप काहे नाहीं बोल रहे हो साहेब! कुछ तो बालिए..... डी.एम. तो जैसे तैयार बैठे थे बोलने के लिए।...
‘हॉ माता जी, हॉ माता जी, सोलहो आने सजा होगी अपराधियों की देख लेना।’ फिर डी.एम. ने हाथ पकड़ कर उठा दिया बोलाक महिला को। तभी जाने का हुआ कि वहीं एक लड़का हल्ला करता हुआ आन खड़ा हुआ और चिल्लाने लगा...
आओ आओ गिनो लाशों को,
आओ आओ गिनो विधवाओं को,
आओ आओ गिनो अनाथ बच्चों को,
आओ आओ गिनो बूढ़े अइया-बपई को,
आओ आओ नापो जमीन को,
आओ आओ देखो बड़े बड़े हाकिमों को,
आओ आओ देखो अपने भाग को....,
होर्र, होर्र होर्र, कोन पकड़ कर चलो, हराई छूटने न पाये... होर्र होर्र हा हा हा जोत लिए खेत जोत लिए खेत, काट लिए धान, काट लिए धान, कोई भागने न पाये, मारो सालों को मारो सालों को, ठांय ठांय ठांय....
‘अरे इहां का करि रहे हो आपलोग... जाओ आफिस में बैठो’
‘मोटी तनखाह लो, मउज करो.. ईहां का करि रहे हो....साहब आपलोग?’
फिर वह लड़का हसने लगता है... हसते हुए ही अचानक एक आदिवासी गीत शुरू कर देता है...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई, पिर्थबी केहू कऽ न भई
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी
जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई
सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी,
दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी,
भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही
त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी,
ओहू के संग धरती हाथ भर न गई,
पिर्थबी केहू कऽ न भई.....’
सुरक्षा कर्मी गाना गाने वाले लड़के को घेर लेते हैं बहुत ही फुर्ती के साथ जैसा उन्हें सिखाया गया है वे वैसा ही करते हैं। मजाक है जो कोई आदमी डी.एम. के
सामने तनेन हो कर खड़ा हो जाये ही नहीं गाना-फाना भी गाने लगे और सुरक्षाकर्मी देखते रहें वह भी बक-बक करता हुआ, अनाप-सनाप गाता हुआ।
गाना गोते हुए ही अचानक वह लड़का गिर जाता है डी.एम. के सामने जमीन पर और बेहोश हो जाता है... सुरक्षाकर्मी जकड़ लिए हैं उस लड़के को...यही कोई अठारह बीस साल का लड़का, नाजुक, जवान होता हुआ..उसे उठा रहे हैं, सिपाही, वह खड़ा नहीं हो पा रहा है, एक सुरक्षाकर्मी उसका मुह सूंघ रहा है, संभव है दारू पिये हो। दारू की महक नहीं आ रही। गॉजा या हिरोइन पिये होगा.. सुरक्षाकर्मी उसे उठाकर कहीं दूर ले जाना चाह रहे हैं...
डी.एम. रोक रहे हैं सुरक्षाकर्मियों को..
‘कहीं न ले जाओ, पानी के छीटंे मारो, डाक्टर को बुलाओ...
डाक्टरों की टीम आई हुई है, घायलों की मरहम पट्टी कर रही है। उनमें से एक डाक्टर आता है, लड़के को देखता है, आला लगाता है, सीना ठोंकता है, नाड़ी देखता है, पेट देखता है, कुछ नहीं हुआ है इसे.. लगता है शाक लगा है साहेब! डाक्टर के साथ उसका सहायक भी है...
सहायक लड़के को इन्जेक्सन लगाता है...
डी.एम. जानना चाह रहे हैं, पूछते हैं...लड़के के बारे में, कौन है यह लड़का, स्कूल ड्रेस पहने हुए है, कहां पढ़ता है। क्या इसका दिमाग ठीक नहीं है? क्या हुआ है इसे?
बुधनी वहीं पर है लाश के साथ... अधिकांश लोग आ जाते हैं लड़के के पास, एक महिला लड़के का माथा सहलाने लगती है सभी लोग दूर खड़े हैं वही डी.एम. भी खड़े हैं...
बुधनी बताय रही है डी.एम. साहेब को।
‘अरे साहेब! ई हमरे गॉयें का तनबुड़ुक है। इसका भाई मारा गया है साहेब! गोली से बेधाया भाई का सीना देखते ही पगला गया। पगलाय तो हमलोग भी गये हैं साहेब पर का करें, कलेजा थाम कर खड़े हैं आपके सामने। इसका बाप तो बहुत पहले ही मर गया था। केवल इसकी अइया है घर में अउर भउजाई है। उहै भउजइया है साहेब जो उसका माथा सहलाय रही है। लड़िकवा कक्षा दस पास है साहेब! गियारह में पढ़ रहा है घोरावल कालेज में। इसका भाई इसको आगे पढ़ाना चाहता था। वह कहा करता था....
‘देख लेना तनबुड़ुका को सिपाही बनाके रहूंगा। इसका बड़ा भाई दो बिगहे खेत का जोतदार था, खेती के समय में खेती करता था बकिया टाइम में राजगिरी का काम करता था। बहुत ही भला लड़का था साहेब!’
‘अरे ऊ देखिए साहेब। तनबुड़ुका की अइया दौड़ती हुई आय रही हैं एहरै।’
डी.एम तनबुडु़क के गाने में घुस चुके हैं, लड़का होश में होने लगा है.... ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई....फिर काहे के लिए खून-कतल, मार-पीट बलबा। क्या यह हिन्दू
दर्शन आदिवासियों तक पहुंच चुका है।
डी.एम. साहब कहीं खो खो जाते हैं....
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ यह तो दर्शन है और दर्शन का क्या, वह तो कहीं भी पहुंच जाता है पर मानव व्यवहार-संस्कृति पर असर नहीं डाल पाता...असर होता तो पिर्थबी के लिए काहे कतल होती, मार-पीट होते? कुछ नहीं होता यही तो फर्क है दर्शन और प्रदर्शन का। हर तरफ कब्जा ही कब्जा, गॉव पर कब्जा, फिर देश पर कब्जा उसके बाद दुनिया पर कब्जा...एटम बम, हइड्रोजन बम, न्यूकिलियर बम, जाने कितने तरह के बम, सारे के सारे कब्जे के लिए ही तो...
‘लगता है धरती कथा ऐसे ही बढ़ती रहेगी’ अचानक एक आह निकलती है डी.एम. साहब के दिल से....
मुल्जिमान नामजद हैं,
गोलियॉ चली हैं फिर...
‘आह’ तो धरती-माई के दिल से भी निकल रही है इसी ‘आह’ के कारण ही तो धरती-कथा भी बढ़ रही है आगे और उसके साथ कदम मिला कर चले रहे हैं जिले के आला-अधिकारी‘आह’ छोड़ते हुए। आलाअधिकारियों के चलने से हिलने लगी है धरती। जहां जहां पॉव पड़ रहे हैं अधिकारियों के वहां वहां कानूनी धारायें उग जा रही हैं धरती पर। कानून की हर धारायें आपस में अपने होने को प्रमाणित भी कर रही हैं धरती की कुदरती कानूनों से अलग। जैसे जैसे कथा आगे बढ़ रही है वैसे वैसे ही कानूनी धाराओं का रंग, रूप भी बदलता जा रहा है...। धरती-माई पढ़ना चाह रही हैं कानूनी धाराओं को पर कानून की भाषा की वे जानकार नहीं हैं, कानून की लिपि भी उनके लिए अज्ञात है जाने किस लिपि में लिखा हुआ है सारा कुछ। धरती-माई माथा पकड़ का ‘आह’ भर रही हैं...‘उनके वश का कुछ भी नहीं’
वश में तो एस.पी. साहेब के भी कुछ नहीं वैसे कुछ महत्वपूर्ण प्रमाण मिल चुके हैं पुलिस को। एक दारोगा ने सहेज लिया है बारह बोर के कारतूस के खोखों को। रायफल वाले भी खोखे मिल जाते तो ठीक होता, पर रायफल वाले खोखे नहीं मिल रहे। मौके पर तीन कल्टीवेटर भी सबूत के तौर पर सहेज लिया है पुलिस ने जिससे अपराधी जमीन जोत रहे थे। ट्रेक्टर नहीं मिले उन्हें घर से उठाना पड़ेगा।
मौका मुआयना कर एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब की तरफ आ रहे हैं, उनसे कहना चाह रहे हैं कि चला जाये मुख्यालय, पोस्टमार्टम भी तो कराना है, उसमें काफी समय लगेगा सो जल्दी पहुंच लिया जाये। लखनऊ से लगातार निर्देश आ रहे हैं। एस.पी. व कलक्टर दोनों जिले के आला-अधिकारी हैं। उनका आला होना इस समय छिना गया है उनसे, इस दर्दनाक घटना ने साहबों से उनके रोब-दाब, अफसरई की ऐंठन सारा कुछ छीन लिया है। उन्हें महसूस ही नहीं हो रहा है कि वे जिले के आलाधिकारी हैं जिनके इशारों पर वसंत की मादक बदरियॉ हों या सावन की रिमझिम फुहारें हों उमड़-धुमड़ कर उतर जाया करती हैं धरती पर। वे परेशान परेशान हैं चाह रहे हैं बातें करना कि आगे क्या होगा...? सरकार जाने का करे...बहुत बड़ा मामला बन गया है। मुख्यमंत्राी जी सख्त हैं कुछ भी कर सकते हैं... घटना की सारी गाज उनलोगों पर गिर सकती है। वे दोनों अशुभ की संभावनाओं के ओर-छोर को पकड़ना चाह रहे हैं पर कुछ भी उन्हें आभास नहीं हो रहा। सारा कुछ आने वाले दिनों के गर्भ में है। संभव है कल का सूरज हसता, विहसता आये, संभव है दहाड़ता तथा गरियाता आये। सूरज का क्या है वह संप्रभु है किसी भी तरह से उतर सकता है धरती पर। पर दोनों अधिकारी मन में चल रहे हलचलों को रोके हुए हैं, मन की हलचलों को रोकने के वे कलाकार भी हैं, इसी कला की गुणवत्ता ने उन्हें जिले का ेेेेेेआला-अधिकारी बनाया हुआ है। वे मन के संवेगों को दबाये हुए हैं कहीं निकल न जायें बाहर... दोनों आला-अधिकारीएक दूसरे के सामने खुलना नहीं चाह रहे हैं, एस.पी. के सामने डी.एम. खुद खुलने से बचाये हुए हैं तो, एस.पी. भी डी.एम. से कम नहीं, वे भी खुद को खुलने से बचाये हुए हैं डी.एम. के सामने। वे नौकरी में आते ही सीख गये हैं गोपनीयता के मंत्रा को। यह गोपनीयता ही है जो सरकार दर सरकार एक ही नाप-तौल पर चला करती है, यही गोपनीयता ब्यूरोक्रेसी के प्रपंचों को भी खुलने से मौके गर मौके बचाया करती है। सो दोनों अधिकारी मन ही मन सोच रहे हैं इस धरती-कथा के बाबत सरकार जाने का करती है..? सरकारों के करनी के कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण उनकी ऑखों में उतराये जा रहे हैं। उनकी सोच अपने बाबत है, क्या उनकी नौकरी इस बर्बर घटना के बाद सुरक्षित है?
उन्हें कभी कंुभ मेले का ख्याल आता है तो कभी किसी दूसरे मेले का, भगदड़ में ढेर सारे लोग मारे गये थे.. वे बनारस के संकटमोचन मन्दिर के सामने हुए बम धमाके के बारे में भी गुन रहे हैं और खुद ही काट दे रहे हैं बीते उद्धरणों को। वे मामले ऐसे न थेे। आतंकवादी हमलों का चरित्रा दूसरा होता है और उसके लिए दायित्वों का चरित्रा भी दूसरे किस्म का हो जाता है। आतंकवादी हमलों का दायित्व हालांकि होता है जिले के आलाअधिकारियों पर फिर भी उन हमलों के कारण आलाअधिकारियों की लापरवाही नहीं मानी जाती। उन घटनाओं को दैवीय मान लिया जाता है करीब करीब ‘एक्ट आफ गाड’ की तरह। उसके लिए पूरे सुरक्षातंत्रा की जिम्मेवारी मान ली जाती है फिर उसी दृष्टि से मंथन होता है घटना के घटित के बारे में कि कहॉ चूक हो गई, इन्टेलिजेन्स से, कहॉ लापरवाही हो गई, आतंकवादी घटना के कई कोण बन जाते हैं सो जिले के आलाधिकारी जिम्मेवारी से करीब करीब बच जाते हैं।
एस.पी. साहेब कलक्टर साहेब के पास आ चुके हैं... दोनों जन एक दूसरे को देख रहे हैं.. वहां तो भीड़ है, एक लड़के को घेरे हुए हैं सभी लोग। डी.एम. साहेब भी घिरे हुए हैं लोगों से। एस.पी. साहेब नहीं समझ पा रहे हैं कि लड़के को क्या हुआ? संभव है यह लड़का भी घायल हुआ हो पर नहीं... कलक्टर साहेब बताते हैं
लड़के के बारे में एस.पी. साहेब को।
एस.पी. साहेब चकरा रहे हैं...
‘तो लड़का पागल हो गया है, इसे भी ले चलना चाहिए मुख्यालय पर, दर-दवाई हो जायेगी अभी इसकी उमर ही क्या है?’ वे खुद को समझाते हैं...‘इस गॉव का यह हमला तो पूरी तरह से स्थानीय है, नागरिकों के बीच का है, भारत माता की जय बोलने वालों के बीच का है, जमीन के जोतदारों के बीच का है, अज्ञाकारी तथा अनुशासित जनता के बीच का है, यहां के हमले को आतंकवादी हमलों की तरह नहीं लिया जा सकता। सो उन्हें काहे के लिए चिन्ता करना। पर उन्हें सन्देह भी है क्योंकि घटना उनके क्षेत्राधिकार की है, उन्हें भी फसाया जा सकता है इस काण्ड को नियंत्रित न कर पाने के कारण। इस जघन्य हत्याकाण्ड के लिए उन्हें जिम्मेवार माना जा सकता है। अगर राजस्व के मुकदमे का निपटारा सही समय पर हो गया होता तो हमला शायद नहीं होता। यहां के काण्ड में मुकदमे वाला पेंच फसा हुआ है। सो दोनों आलाधिकारी परेशान हैं। भीतर भीतर डरे हुए हैं, सरकारें कभी भी खुद को दोषी नहीं मानतीं, दोषी मानती हैं अधिकारियों व कर्मचारियों को। अधिकारियों व कर्मचारियों को दण्डित भी करती हैं सरकारें, किसी को ससपेन्ड कर देती हैं तो किसी को बर्खास्त, कुछ न कुछ तो प्रदेश की सरकार करेगी ही.. वैसे भी सरकारों की यही कार्य-संस्कृति भी रही है। अपने अपने डरों के साथ दोनों आलाधिकारी एक दूसरे के साथ कदम मिलाते हुए चल रहे हैं।
डी.एम., एस.पी. के साथ जुटे हुए हैं तो एस.डी.एम., तहसीलदार भी वहीं आगे-पीछे कर रहे हैं। वे भी धुधकियॉ पी रहे हैं, आग बरसा सकती है सरकार उनकी नौकरियों पर, और जब आग की वारिश होगी फिर तो जलना ही होगा सभी को। आग तो चेहरा पहचान कर नहीं जलाती, जलाती है सभी को।
अधिकारियों के दिल दिमाग ही नहीं राजस्व विभाग के सारे अहलाकारानों के दिमाग उड़े हुए हैं, वे जहां हैं जिस हाल में हैं, कंपकंपियॉ पी रहे हैं। हल्के का लेखपाल तो सुबह से ही अपना कागज-पत्तर सहेज रहा है, खतौनी के तमाम इन्द्राजों की जॉच पड़ताल कर रहा है। शंकर भोले दानी के मन्दिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ा आया है भगवान भला करना...’वह हिसाब किताब कर रहा है अपने काम का...
‘लेखपाल आत्म-संवाद में है...मैंने कुछ गलत नहीं किया है, खतौनी में वही इन्द्राज किया है जिस पर तहसीलदार साहब या डिप्टी साहब के आदेश रहे हैं। मनमानी कुछ भी नहीं किया है। लेखपाल आने वाले कल के बारे में गुन ही रहा है कि एक मुलायम सी भरोसे वाली हवा उसे सहला जाती है...
‘तेरा कुछ नहीं होगा रे! जब तूने कुछ किया ही नहीं है, तूंने तो हाल में ही यहां का चारज लिया है, तब भी साल भर तो हो ही गया होगा। यहां का मामला तो बहुत पुराना है जमीनदारी विनाश के समय का है। सारी गड़बड़ी उसी समय की है। वैसे भी मुकदमा चल रहा था, उसमें तूं का कर लेगा। ऐसा तो है नहीं कि तूंने जमीन की नापी नहीं किया, तूं तो केवल नापी ही कर सकता है वह भी तब जब साहबों के आदेश हों। वैसे गॉव की नापी का आदेश ही नहीं हुआ था फिर काहे की नापी होती। ऐसा आदेश तो उसे कभी मिला ही नहीं, न ही उसे कचहरी में जाकर कब्जा के बाबत कभी बयान ही देना पड़ा फिर का होगा उसका... कुछ नाहीं होगा, बेमतलब वह डर रहा है।’
खुद को संभाल रहा है लेखपाल, पर उसे अपनी औकात पता है। पन्द्रह साल से लेखपाली कर रहा है, ऐसे मामलों में कभी तहसीलदारांे या डिप्टी साहेबों को कानून के घेरों में नहीं लिया जाता, कानून के घेरे में लिया जाता है लेखपालों को, कानूनगोओं को, जॉच-पड़ताल का बहाना बना कर उन्हें घर बिठा दिया जाता है। तो ऐसे ही होता है सरकारी काम। बड़े साहेब लोग थोड़ै नपेंगे, उनका कुछ नहीं होगा, वैसे भी बड़ों का कुछ नहीं होता। बड़े तो पहाड़ की नाईं होते हैं सरकार का हथौड़ा उनका भला का बिगाड़ पायेगा। अदालत की तराजू में भी बड़ों के मामलों में पासंग हो जाता है।
लेखपाल मौके पर जाने के पहले अपने आराध्यों की पूजा कर लेना चाहता है। तहसीलदार ने उसे सुबह ही फोन से निर्देश दे दिया था कि तुम कागज-पत्तर के साथ मौका-ए-वारदात पर उपस्थित रहना। सो वह मौके-ए-वारदात पर जाने की तैयारी कर रहा है। आराघ्यों की पूजा-पाठ से वह खाली हो चुका है। पत्नी ने नाश्ता की जगह पर खाना ही बना दिया है जाने कब तक लौटना हो। सरकारी काम का क्या, वही कभी भी शुरू हो सकता है और कभी खतम हो सकता है। लेखपाल भी खाना खा लेना चाहता है और वह खाने के लिए जमीन पर पल्थी मार कर बैठ चुका है। वह जमीन पर बैठ कर ही खाना खाता है, जमीन पर बैठ कर खाना खाते समय सुविधा रहती है। परोसे हुए भोजन की पूजा करना और देवताओं के लिए खाना निकालना, फिर जल से थाली को शुद्ध करना,आग पर खाना-रूपी प्रसाद को चढ़ाना। लगभग दो मिनट का यह अनुष्ठान देखने लायक होता है। लेखपाल इस अनुष्ठान का कलाकार है, शादी होने के बाद से ही कर रहा है इसे, भोजन की पूजा करने के अनुष्ठान को उसने बाप से सीखा है।
लेखपाल पूजा का कार्य निपटा चुका है, अब वह खाना खाने लगा है। खाना खा लेने के बाद ही वह मौका-ए-वारदात पर हाजिर हो जायेगा।
लेखपाल मौका-ए-वारदात पर आला अधिकारियों के पहुंचनेे के पहले ही हाजिर हो चुका है। वह भी प्रताड़ितों की भीड़ में शामिल हो गया है। सिपाही दारोगा आ चुके हैं वे अपना काम कर रहे हैं, दिख रहा है कि कई थाने उजड़ कर आ गये हैं मौके पर। प्रशासनिक अमला भी काम करने में जुटा हुआ है। हर विभाग के किसिम किसिम के काम हैं, लेखपाल गॉव के कागज-पत्तर को मोटरसाइकिल की डिग्गी में संभाल कर धरे हुए है। पता नही कब किस रिकार्ड की जरूरत पड़ जाये।
लेखपाल मौके पर इधर-उधर घूम रहा है, वह कभी लाशों की तरफ जा रहा है
तो कभी किसी तरफ यह सोचते हुए कि तहसीलदार साहेब उसे देख लेते तो ठीक होता। उसकी हाजिरी पक्की हो जाती। उसकी ऑखें नवछेड़ुआ तहसीलदार को तलाश
रही हैं, यहां पहली पोस्टिंग है तहसीलदार की। तहसीलदार हैं वहीं पर, पर वे खो गये हैं प्रशासनिक अमले में, नहीं दिख रहे कहीं, सामने कानूनगो दिख रहे हैं, पहले वे भी खोये हुए थे जनता की भीड़ में अब दीख रहे हैं सामने। लेखपाल कानूनगो की तरफ जा रहा है वह कुछ दूर पहुंच ही चुका था कि एस.पी. साहेब आ गये, जनता की भीड़ उनके साथ थी, फिर लेखपाल खो गया भीड़ में, कैसे देखे कानूनगो साहब को...वह आगे की तरफ बढ़ना चाह ही रहा था कि डी.एम. साहेब आ गये, रेंगने लगे खेतों में, उनके साथ दोनों किस्म की भीड़ थी, पीड़ितों की भी तथा दर्शकों की भी। लेखपाल की ऑखें तलाश रही हैं भीड़ में से तहसीलदार साहेब को, कोई बात नहीं अगर वे नहीं दिखें तो कम से कम डिप्टी साहब तो दिख जायें, पर वे भी नहीं दिख रहे। लेखपाल की ऑखें तनी हुई हैं जैसे वे किसी खोई हुई चीज की तलाश कर रही हों। आखिर कहां विलुप्त हो जायेंगे तहसीलदार साहेब तथा डिप्टी साहेब, होंगे कहीं आस-पास ही पर वे दिखने में नहीं आ रहे। लेखपाल परेशान है कि साहब लोग उसे देख लें...मालूम हो जाये उन्हें कि वह अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद है।
सामने से एस.पी.साहेब खेतों को राैंदते हुए आते दीख रहे हैं, उनकी चाल बता रही है कि वे डी.एम. साहेब से मिलने के लिए आ रहे हैं। वही हुआ फिर तो लेखपाल कहीं खो गया भीड़ में उसकी बद्किस्मती थी कि वह अपना चेहरा तहसीलदार साहेब को नहीं दिखा पाया। भीड़ में खोने का एक फायदा लेखपाल को मिल गया.. लगता है उसके आराध्य उस पर प्रसन्न हैं भीड़ में ही खोये हुए थे कानूनगो साहेब, उनके उदास चेहरे को लेखपाल की ऑखों ने पकड़ लिया।
‘अरे साहेब! बहुत देर से अपको तलाश रहा हूॅ और आप हैं कि मेरी तलाश से बाहर हुए जा रहे हैं, कहॉ थे साहेब...?’
‘कहॉ क्या, यहीं तो था, का करता इधर-उधर नाच रहा था। यहां हमलोगों का क्या काम है, सारा काम तो पुलिस विभाग का है। कोई जमीन की पैमाइश तो करनी है नहीं फिर भी तहसीलदार साहेब ने बुला लिया। मुझे लगा था कि साहब-सूबों के लिए इन्तजाम करना होगा चाय-नाश्ता आदि का पर नहीं आज किसी को चाय-नाश्ते की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमलोग तो राजस्व विभाग से हैं पर जानते हो यहॉ जो स्कूल का मास्टर है नऽ वह तो घटना के समय से ही पड़ा हुआ है बिना खाये-पिये नहीं तो जानते हो मास्टरों को वे कहीं रुकते हैं भला। स्कूल का टाइम खतम वे छोड़ देते हैं स्कूल।’
कानूनगो अधेड़ किस्म का आदमी है। वह जानता है मार-पीट-कतल आदि के मामले में राजस्व विभाग के कर्मचारियों का कोई काम नहीं होता। ऐसे मामलों में पुलिस का ही काम होता है, छान-बीन करना, लाशों का पोस्टमार्टम कराना, मुकदमा लिखना, अपराधियों की गिरफ्तारी करना आदि आदि पर कानूनगो तथा लेखपाल को तो कोई काम होता ही नहीं फिर भी साहेब लोग बुला लिया करते हैं, और हम लोगों को मजबूरन आना ही पड़ता है। साहबों का तो काम होता है ऐसे मामलों में, कानून व्यवस्था का मामला खड़ा हो जाता है, खासतौर से डी.एम. साहेब के जिम्मे सारा काम आ जाता है डी.एम. साहब के काम का मतलब... एस.डी.एम., तहसीलदार, कानून गो तथा लेखपाल का काम। पूरा प्रशासन एक जाल है, इसी जाल में से समस्यायें निकलती है तो समाधान भी निकलते हैं। हम सभी एक जाल में है और जाल की अलग अलग छोटी छोटी जालियॉ हैं।
‘संयोग ठीक था कि कानूनगो साहेब को तहसीलदार साहेब की ऑखों ने देख लिया है। उन्होंने कानूनगो को सहेजा है कि वहीं स्कूल के आस-पास ही रहना, लेखपाल भी आ गया होगा, मिले तो उसे भी अपने साथ रोक लेना, जाने कब कौन सा काम आ जाये, बूझ रहे हो नऽ।’
‘हॉ हॉ साहेब मैं वही रहूंगा स्कूल के आस-पास ही फिर फोन नंबर तो है ही बुला लीजिएगा साहेब।’
कानूनगो साहब फिर उस तरफ चले गये जिधर बड़े अधिकारी गण विचार-विमर्श कर रहे थे कि गॉव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए क्या क्या उपाय किये जा सकते हैं? दरअसल मामला था भी बहुत ही गंभीर। दस आदमी की हत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो थी नहीं, बड़ी घटना थी। गॉव में आगे जाने क्या हो सो शान्ति-व्यवस्था की स्थापना के लिए ठोस प्रबंध किए जाने के बारे में निर्णय तो लेना ही होगा। इसी लिए सारे आलाधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे। वे कभी एक रास्ते की तरफ सोचते फिर कभी दूसरे रास्ते के बारे में सोचने लगते। एक बात जो आम राय बन कर निकली वह थी कि गॉव में सक्षम पुलिस बल की स्थापना अनिवार्य है। जिसके लिए एस.पी. साहब ने आदेश जारी कर दिया था और तमाम थानों से पुलिस बल एवं पी.ए.सी. के गार्डों को भी बुलवा लिया गया था। यानि शान्ति-व्वस्था की स्थापना के लिए पर्याप्त पुलिस बल वहां हाजिर आ गये थे।
शान्ति स्थापना के साथ साथ जो दूसरी राय बनी थी वह यह कि गॉव में पीड़ितों की सुरक्षा तथा उनके लिए खाने-पीने के सामानों का भी प्रबंध किया जाना चाहिए। शवदाह तथा कर्मकाण्ड के लिए भी विशेष सहायता दी जानी चाहिए। कई स्तर पर प्रशासन की तैयारी चल रही थी। गोया वहां एक तरह से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूरे गॉव में टहलने लगी थी। पुलिस भाई-चारे के स्वभाव वाली हो चुकी थी। राजस्व विभाग के आलाधिकरियों का स्वभाव व भाव दोनों कुदरती हो गया था, सहभागिता वाला। सहभागिता का भाव तो तभी आता है अधिकारियों में जब साहेबपना उनसे छिन जाता है। उनकी बात-चीत से उनका साहब होना छिन गया था, उस समय तो काम से भी छिना हुआ ही दीख रहा था। घटना-स्थल पर न कोई साहब रह गया था न कोई प्रजा, सारे लोग प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद ‘आदमी’ बन चुके थे। इस जघन्य हत्याकाण्ड ने अधिकारियों की नश्ल बदल कर उन्हें आदमी
बना दिया था।
प्रशासन के लोगों में यह भाव तो है ही कि घटनास्थल पर उपस्थित रहना है।
पर उनमें जो कुछ नये हैं वे परेशान हैं आखिर उनका काम क्या है यहॉ पर। यहॉ तो केवल पुलिस का काम है जिसे पुलिस कर रही है। पूरे गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया हैै, हर तरफ बूटों की आवाजें धमक पैदा कर रही हैं, सिपाहियों के कैम्प भी लग चुके हैं। फिर उनकी यहां काहे की जरूरत वे समझ नहीं पा रहे हैं।
अचानक सारी चीजंे नये कर्मचारियों की समझ में आने लगीं जब वहां सप्लाई विभाग के लोगों को देखा गया, कहीं से वे सुन भी लिए कि गॉव को राशन भी दिया जाना है, गॉव वालों में पूड़ियॉ भी बाटी जानी है तथा शवदाह के लिए आर्थिक सहायता भी दिया जाना है। गोया प्रशासन हर तरह से वहां कल्याणकारी राज्य की मजबूत बुनियाद की अवधारणाओं को फलित कर देना चाहता है।
जब सारे मुल्जिमान नामजद हैं, किसी का नाम तो पता लगाना है नहीं, जाहिर है गोलियॉ चली हैं फिर काहे पोस्टमार्टम कराना? नया सिपाही इतना जानता है कि कतल आदि के मामले में मृतक का पोस्टमार्टम किया जाता है पर काहे किया जाता है नहीं जानता। का यह नियम कुदरती है, मार के बदले मार वाले मध्यकालीन नियम से अलग। उस दौर में तो पोस्टमार्टम होता ही नहीं था। घटना तो मध्यकालीन जैसी ही है फिर काहे होगा पोस्टमार्टम?
पर नहीं पोस्टमार्टम तो होगा ही, मध्यकालीन जैसी घटना घटी है वह भी बीसवीं शदी के लोकतांत्रिक समय में? धरती-माई यही गुन रही हैं कि यह जो मार-पीट कतल का मामला है आखिर है क्या? सभ्यता को संचालित करने वाले सारे सुभाषित और उपदेश कहां बिला गये, वेदों, उपनिषदों के मंत्रा कहां चले गये? क्या उनकी धार कमजोर हो गई है? धरती-माई सोच में पड़ गई हैं...
‘वंशवाद की जड़ें हाय!
कितनी गहरी हैं!’
‘सोच में तो धरती-कथा के पात्रा भी हैं कि आरोप लग सकता है उन पर कि किसिम किसिम के पात्रों के कारण कथा का कहन गड़बड़ा गया है, एकरूपता खतम हो गई है कथा की। पर विवशता है कि धरती-कथा लोकतांत्रिक समय की है सो कथा में सत्ता प्रबंधन से जुड़े लोग समय समय पर आवा-जाही करते ही रहेंगे...जाहिर है सत्ता-प्रबंधन से जुड़े लोगों की कथा में हिस्सेदारी से कथा का मूल-रूप तो कुछ बदलेगा ही फिर भी धरती-माई उनमें संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं पर...’
सोनभद्र का प्रशासन तो कंपकंपियों में है ही राज्य सरकार भी लखनऊ में जमी हुई माथे का पसीना पोछ रही है। कभी हिल रही है तो कभी कांप रही है आखिर मध्य-काल कैसे उतर गया सोनभद्र में? एक ही दिन मार दिये गये दस आदमी, सैकड़ों की निहत्थे सत्याग्रहियों पर चला दी गईं गोलियॉ वह भी जमीन के कब्जे के सवाल को लेकर। जमीन के सवाल पर तो सोनभद्र में पहले भी माननीय उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश पर सर्वे किया जा चुका है। वन-भूमि तथा काश्तकारी के भूमि के बाबत किसिम किसिम केे बवालों को हल करने के लिए ही सर्वे किया गया था। इस तरह केे हत्याकाण्ड के बारे में सोनभद्र में कभी नहीं सुना गया था। वह तो आदिवासियों का परिक्षेत्रा है, आदिवासी कभी मनुष्यता-विरोधी काम नहीं करते फिर भी ऐसा हुआ। आदिवासियों का समाज सदैव से सहभागितापूर्ण संबन्धों का अनुगामी रहा है। सरल तथा सहज किस्म के सत्याग्रही आदिवासियों पर इतना बड़ा अत्याचार...! यह तो शासन व प्रशासन दोनों के लिए शर्मनाक है। मुख्यमंत्राी जी विचारों से सख्त होते जा रहे हैं, वे सख्ती को प्रशासन का गुणधर्म भी मानते हैं आखिर सरकार का रोब-दाब ही खतम फिर काहे की सरकार। वे आला-अधिकारियों को चैन से बैठने नहीें देंगे।
प्रदेश की राजधानी भी परेशान थी पर अखबारों तथा टी.वी. से शासन के लोकतांत्रिक ऑसुओं की धारा फूटती हुई नहीं दिख रही थी। अखबार तथा टी.वी. वाले पूरे प्रकरण को अपने तरीके से दिखा रहे थे तथा प्रमाणित कराना चाह रहे थे कि सोनभद्र के भूमि-प्रबंधन का मामला जनहित में नहीं है जिसे लोकतांत्रिक ढंग से विधि-पूर्वक हल किया जाना चाहिए।
दिल्ली की नई नई नई सरकार बनी है, दिल्ली की पुरानी सरकार ही दुबारा पूरे बहुमत के साथ चुन कर सत्ता में आई है। उसका दुबारा सत्ता में आना और सत्ता पर जम जाना लोकतंत्रा के लिए इतिहास बन चुका है सो सरकार मस्त मस्त है। जश्न में डूबी हुई है। जीत की खुशी में बजाये जाने वाले ढोल नगाड़ों की आवाजें अभी भी सरकार के कानों में जमी हुई हैं। प्रधानमंत्राी जी विदेशी सत्ता केन्द्रों पर अपने व्यक्तित्व का सिक्का जमाने की योजनाओं को गति प्रदान कर रहे हैं। गति है तो प्रगति है। विदेशी सत्ता प्रमुखों को समझ लेना चाहिए कि नया भारत उग आया है धरती पर, अब भारत में सत्ता के पुराने केन्द्र पूरी तरह से शाकाहारी तर्कों व कार्यक्रमों के कारण जमीनदोज हो चुके हैं। वे अब जमीन से बाहर कभी नहींे निकल पायेंगे। जो गया वो चला गया सदा सदा के लिए ऐसा ही कुछ। दिल्ली पर काबिज सरकार सत्ता में वंशवाद की पक्षधारता के समापन के लिए पूरा जोर लगाती हुई दीख रही है पर दिक्कत है कि वंशवाद को समाप्त कर देने के बाद समाज के उन हिस्सों का क्या होगा जो वंशवाद की जमीन पर ही खड़े हैं, बढ़े हैं, पले हैं और तने हुए हैं, तनेन हैं जो वंशवाद को भाग्य-फल मानते हैं तथा उत्तराधिकार को गठरी की तरह पीठ पर बांधे चल रहे हैं। वंशवाद तो अपने समाज की माटी में धसा हुआ है, इसकी जड़ें काफी गहरे तक हैं उद्योगपतियों से लेकर सामान्य खेतिहर किसानों तक, नाम से लेकर जाति तक, धर्म से लेकर कर्म तक, मजदूरों से लेकर मालिकों तक। वंशवाद कहां नहीं है खोज का विषय है। कैसे खतम करेंगे वंशवाद को आखिर...मारे गये दस सत्याग्रही आदिवासियों के साथ यहां आखिर है कौन, सब तो वंशवादी ही हैं नऽ, वंश के लोग ही मृतकों को कॉधा दंेगे, करमकाण्ड करेंगे, गवाही देंगे, मुकदमा लड़ेंगेे अगर मुकदमरा चला तो....!
केन्द्र और प्रदेश में एक ही पारटी की सरकार है जो वर्षों की आराधाना व पूजा-पाठ के फलस्वरूप स्थापित हुई है, एक तरह से भग्वत-कृपा से हासिल हुई है सत्ता। सत्ताधारी पारटी वाले प्रदेश की सरकार को भी भग्वत प्रसाद ही मानते हैं तथा जोर जोर से नारा उछालते हैं ‘जहॉ सत्य है वहां विजय है’, सत्य कभी नहीं हारता, विजय किसी न किसी दिन सत्य की ही होती है। इस पारटी में भी बहुत सारे लोग वंशवादी प्रक्रिया तथा सुविधाओं से अलग नहीं हैं। इनके बारे में पारटी का करने वाली है किसी को नहीं पता। गनीमत है कि भग्वत-कृपा वाली सरकार ने सोनभद्र की हत्याकाण्ड वाली घटना को दैवीय नहीं माना। माना कि ऐसे कुकृत्य इहलौकिक हैं। सरकार ने यह भी मान लिया कि ऐसा काम भूमाफियाओं ने ही किया है किसी दूसरे ने नहीं। साथ ही साथ इस कुकृत्य की पूरी जिम्मेवारी पुरानी सरकार पर आरोपित कर दिया। पुरानी सरकारों ने ही सोनभद्र के जमीन के सवालों को जनमाया है जाहिर है पहले की सरकारें अपनी पीठ पर सेकुलर विचारधारा लाद कर चला करतीं थीं पर सेकुलर नहीं थीं, सेकुलर दिखने का नाटक किया करती थीं। भूमाफियाओं तथा बड़े जोतकांे की पक्षधरता ही पुरानी सरकार का लक्ष्य था। पूरे देश में भूमाफियाओं को पुरानी सरकारों ने ही हर जगह जनमाया है। उनका लक्ष्य अपना विकास था सबका विकास नहीं पर प्रदेश की नई सरकार किसी भी भूमाफिया को नहींे छोड़ेगी। नई सरकार सबके विकास के लिए काम करती है।
मौजूदा सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा लगाती है। उसे सेकुलर शब्द से ही घिन है मानो यह शब्द अनायास ही धरती पर उतर आया हो, अनायास ही धरती पर उतरने वाली अन्य चीजों की तरह। प्रदेश की सरकार परेशान परेशान हो गई है आखिर मामला क्या है...सरकार सतर्क है, किसी भी हाल में लापरवाही नहीं बरतना चाहती। स्थानीय प्रशासन की नकेल कस दी गई है सो स्थानीय प्रशासन के आलाधिकारी कॉपते हुए सक्रिय हो उठे हैं। नागरिकों की सुरक्षा को लेकर वे मन ही मन प्रार्थनायें कर रहे हैं। हत्याकाण्ड की जॉच-पड़ताल के लिए राज्य-स्तर की कई कमेटियॉ सक्षम अधिकारियों के नेतृत्व में गठित कर दी गई हैं। राज्य स्तर पर गठित कमेटियों के बारे में जिले के आला-अधिकारियों को पता है सो वे जहां है वहीं से सतर्क हो गये हैं और भविष्य के कर्म-फल के बारे में गुनने लगे हैं। कर्म-फल के बारे में क्या गुनेंगे अधिकारी, अभी तो वे हत्याकाण्ड वाले गॉव पर ही हैं, उसी के सीमित भूगोल की जॉच-पड़ताल कर रहे हैं, खाता राज, खाता व्यक्तिगत, खाता सहकारी, खाता वन जिरायत की जॉच-पड़ताल तो बाद में की जायेगी पोस्टमार्टम के बाद। अधिकारी मन बना चुके हैं पहले पोस्टमार्टम, एफ.आइ.आर.,आरोपियों की गिरफ्तारी फिर जमीन के कागजों की जॉच-पड़ताल। सरकार को रिपोर्ट भी भेजना है सरकार को, पहला काम है शान्ति-व्यवस्था का जिसे वे करीने से प्रबंधित कर रहे हैं। लाशों को पोस्टमार्टम घर ले जाना है, रपटें लिखनी हैं। प्रशासन को कई टुकड़ों में बाटा जा चुका है जिससे काम के अलग अलग खण्डों को विधिवत किया जा सके। एस.डी.एम. घोरावल रपट लिखवाने के काम की निगरानी कर रहे हैं, तहसीलदार घोरावल उनके साथ हैं, दारोगा घोरावल आरोपियों की सूची बनाने में लगे हुए हैं। गॉव वाले नाम याद करके सूची बनवा रहे हैं कुछ के नाम तो उन्हें याद हैं पर बहुत आरोपी ऐसे है जिनके नाम गॉव वालों का नहीं मालूम सो गॉव वाले तथा मृतकों के परिजन मिल कर आरोपियों के नाम याद कर रहे हैं जैसे जैसे उन्हें नाम याद आ रहे हैं वे दारोगा को बता रहे हैं।
पुलिस का एक निपुण दस्ता आरोपियों को पकड़ने में लग चुका है। आरोपियों के गॉव में पुलिस इधर-उधर घूम रही है। आरोपियों का गॉव सन्नाटा पी रहा है। वहां चहल-पहल नहीं है, न ही ‘अहा ग्राम्य जीवन’ वाला वसंत है। इसी सन्नाटे के बीच से पुलिस वालों को आरोपियों को खोज निकालना है। वे जायेंगे कहां भाग कर इस तरह की उम्मीद है पुलिस वालों को। वे भगवान की प्रार्थनाओं में हैं, एक भी आरोपी मिल जाता तो सारे आरोपियों को पकड़ लिया जाता...पर एक भी आरोपी मिले कैसे इसका संकेत प्रार्थनाओं में नहीं है केवल कामना है। आरोपी का मिलना भगवान के ऊपर है वे चाह लेंगे तो सारे आरोपी धर लिए जायेंगे। पुलिस टीम में एक अनुभवी है उसने कई बार जमीन में गड़े आरोपियों को खोज निकाला है, जो नहीं मिल पा रहे थे उन्हें भी, उसके लिए उन पनाहगाहों तक पहुंचना आसान हो जाता है जहां माना जाता है कि पुलिस पहुंच ही नहीं सकती।
उसके कारनामों को पुलिस बल का मुखिया जानता है। मुखिया उसे सहेज रहा है.‘यार! कुछ तो उपाय बताओ..कैसे तलाशा जाये आरोपियों को कम से कम एक तो मिल जाता...तुम तो जानते ही हो कि नामजद आरोपियों को न तलाश पाना पुलिस महकमे के लिए बहुत बड़ी बदनामी है। कोई अज्ञात कतल वाला यह मामला नहीं है, दसियों नामजद हैं, और भी नामजद किए जा सकते हैं अज्ञात आरोपियों को छोड़ो उन्हें बाद में तलाशा जायेगा। दारोगा गंभीर है और दिल से चाहता है कि आरोपी पकड़ लिए जायें, उसका कद व पद दोनों बढ़ जायेगा, एस.पी. साहेब इनाम देंगे अलग से।
अनुभवी सिपाही आगे बढ़ आया है..वह आरोपियों को पकड़ने के बारे में गुन रहा है तथा उन सूत्रों पर विचार कर रहा है जिसके लिए पुलिस के मुखवीर जाने जाते हैं। वह सोच रहा है कि पुलिस के मुखवीर तो होंगे ही, घोरावल थाने को वह नहीं जानता तो क्या हुआ वहां के लोग तो जानते ही होंगे मुखवीरों के बारे में वैसे भी बना मुखवीरों के कोई थाना कैसे चल सकता है? मुखवीर जासूसी करने के मामलों में किसी व्यावसायिक जासूस से कम नहीं होते, वे बांए चलने वालों के बारे में जितना जानते हैं दाहिने चलने वालों के बारे में उससे कम नहीं जानते। वे तो उन तटस्थों के बारे में भी जानकारियां जुटाये रखते हैं जो समाज में साधुता की गठरी
पीठ पर लादे हुए चला करते हैं।
मुखवीरों की जासूसी कला का नमूना आपातकाल के दौर में देखने को मिला था जब महज दो दिन के भीतर ही तत्कालीन सरकार विरोधी दलों के तमाम नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसने का रिकार्ड बना दिया था। उस दौर में मुखवीरों की चॉदी थी, लोग-बाग उन्हें देखते ही डर पीने लगते थे। पुलिस के ये मुखवीर पनाहगाहों से उपजते हैं। पनाहगाहों के लिए मुखवीर मेहमान की तरह होते हैं, कहा जाता है कि मुखवीर न हों तो पनाहगाह न हों। पनाहगाह मुखवीरों की सुरक्षा करते हैं तो मुखवीर पनाहगाहों को पुलिसिया सूचनाओं से मालामाल किए रहते हैं सो दोनों के रिश्ते अन्योन्याश्रित होते हैं एक दूसरे के पूरक।
अनुभवी सिपाही आरोपियों को पकड़ने के दायित्व को पा कर मस्त मस्त है..आरोपी जायेंगे कहां रहेंगे तो इसी धरती पर। कुर्की होने के पहले आरोपियों को गिरफ्तार कर लेना है। कुर्की की कार्यवाही के बाद तो आरोपी खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया करते हैं जिससे पुलिस की बदनामी होती है। सो आरोपियों को कुर्की की कार्यवाही होने के पहले ही पकड़ना आवश्यक है।
अनुभवी सिपाही गॉव में भी इधर उधर घूम रहा है, गॉव के लोगों से पूछ-गछ कर रहा है। गॉव वालों को तो पता है ही कि आरोपी कौन हैं और कहां के रहने वाले हैं। वह हत्याकाण्ड कोई अज्ञात मामला नहीं है, दिन के उजाले में सूरज देवता को प्रणाम करते हुए गॉव को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया गया था एक तरह से समय को मध्यकाल का समय बना दिया गया था। मजाक नहीं है गॉव में दो तीन सौ आदमियों का गोलबन्द होकर आ जाना, कई ट्रेक्टरों से खेत जोतना, फिर गॉव वालों का वहां हाजिर हो जाना, बहस मुबाहिसा होना, तूॅ तूॅ मैं मैं होना और फिर बन्दूकों का निकल जाना और लगारतार धॉय धॉय धॉय, जाहिर है धॉय धॉय होने के बाद लाशें गिरने लगीं, एक लाश गिरी फिर दूसरी गिरी इसी तरह दस लाशें जमीन पर गिरा दी गईं।
अनुभवी सिपाही कुछ कुछ मनोवैज्ञानिक किस्म का है, वह जानता है कि इस तरह किसी गॉव पर हमला करना वह भी दिन के उजाले मे आसान नहीं है, आरोपियों के कुछ लोग इस गॉव में होगे जरूर, बिना गॉव के निवासियों के संपर्क के इतनी बड़ी घटना की कोई तैयारी नहीं कर सकता। आरोपियों के गहरे जुड़ाव गॉव के कुछ लोगों से होंगे जरूर। उन जुड़ावों को पता करना पहला काम है। जुड़ाव का पता चल गया समझ लो आरोपियों का पता चल गया।
अनुभवी सिपाही भीड़ से बाहर निकल जाता है, आरोपियों के जुड़ावों की गन्ध सूंघने। उसके जिम्मे आरोपियों को गिरफ्तार करने का दायित्व दिया गया है सो वह वहां क्यों रहे? लाशों को उठाने का काम दूसरे सिपाही कर ही रहे हैं। कुछ ही देर में लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए चली जायेंगी रापटगंज। दारोगा चोपन ने
आरोपियों की सूची बना लिया है केवल रपट लिखाना ही बाकी है। वह भी लिख
जायेगी कुछ घंटों में। अनुभवी सिपाही भीड़ से कुछ दूर आगे निकला ही था कि सी.ओ. रापटगंज ने उसे बुला लिया।
‘कहां जा रहे हो, लाशों को ले चलना है रापटगंज और तुम चले जा रहे हो’ पूछा सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही से...
‘नाहीं साहेब हम कहां जायेंगे, हम तो पुलिस का ही काम करने जा रहे हैं’ अनुभवी सिपाही ने सी.ओ. रापटगंज को बताया
‘उधर का काम है पुलिस का भीड़ से अलग, काम तो यहां है, लाशों को उठाना है, रापटगंज ले चलना है, रपट लिखवाना है।’
सी.ओ. रापटगंज ने अनुभवी सिपाही को उसका काम बताया, सीओ. को का पता कि अनुभवी सिपाही को आरोपियों के बारे में सूचना इकठ्ठा करने के काम पर लगाया गया है। अनुभवी सिपाही ने विनम्रता से सी.ओ. को बताया....
‘साहेब!आरोपियों को पकड़ना भी तो पुलिस का काम है, मुझे इसी काम पर लगाया गया है। सो मैं गॉव में जाकर पता करूंगा कि आरोपी कहां है, कहां तक भाग सकते हैं, कैसे पकड़ा जा सकता है उनको आदि आदि।’
सी.ओ. रापटगज एकदम नया है रंगरूट महज चार पांच साल पुराना, एस.डी.एम. घोरावल की तरह। दोनों पहली या दूसरी परीक्षा में ही क्वालीफाई कर गये हैं। सी.ओ. रापटगंज अनुभवी सिपाही की बातें सुनकर गंभीर हो जाता है वह चाहता है सिपाही से पूछना कि वह कैसे पता कर पायेगा अन्डरग्राउन्ड हो चुके आरोपियों के बारे में, उनका पता-ठिकाना कैसे मालूम करेगा...पर उसे अपने पद का ख्याल आ जाता है। एक अदना से सिपाही से पूछना यह उचित नहीं होगा सो सी.ओ. चुप लगा जाता है पर मन में उसके हलचल है.. पूछ लेना ही ठीक होगा संभव है उसे भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम पर लगा दिया जाये हालांकि यह मामला उसके क्षेत्राधिकार के भीतर का नहीं है फिर भी, एस.पी के विवेक पर है वह जैसा उचित समझेगा निर्णय ले सकता है और जब एस.पी. का आदेश हो जायेगा फिर तो उसे भी आरोपियों के पकड़ का काम करना ही होगा।
सी.ओ. का मन सिकुड़ गया है अफसरी फैलावों से, वह कुदरती आदमी बनने लगा है, बिना अधिकार-फधिकार वाला। बिना अधिकार-फधिकार वाले आदमी की तरह वह तमाम तरह के डरों से घिरने लगा है, कुछ भी हो सकता है अगर वह अपराधियों की पकड़ नहीं कर पाया। वह अपने आरध्य को याद करता है, वही बचायेंगे जो होना होगा वह होगा ही फिर काहे डरना। उसने खुद को संभाला और सिपाही से विनम्रता से पूछा..
‘का हो कैसे पता लगाओगे यार! आरोपियों का’
अनुभवी सिपाही तो जानता है कि ये साहेब लोग हाथी दांत की तरह होते हैं इन्हें का पता कि आदमी कई कई परतों वाला होता है, एक परत होती है मनुष्यता वाली, उसी परत के सहारे हम आरोपियों तक पहुंच पाते हैं। कभी कभी लालच देनी पड़ती है मुखवीरों को और कभी दूसरे किस्म की सहायता, जिले पर उसका कोई काम है तो उसे करवा दिया। मनुष्यता वाली परत छू लीजिए बस काम हो गया।
सिपाही ने अपने अनुभव को सी.ओ. साहेब के सामने उड़ेल दिया...
सी.ओ. अनुभवी सिपाही का मुह देखता रह गया...
‘पढ़ाई की गरिमा से कम नही होती अनुभव की गरिमा’। सिपाही भले सिपाही है पर जानकार है.. सी.ओ के मन में सिपाही के बाबत जबाब उछला।
साहब से बोल-बतिया कर सिपाही चला गया। वह अब उन पनाहगाहों तक जाना चाहेगा जहां आरोपियों के होने की सभावनायें होंगी। आरोपी आखिर कहां तक जा सकते हैं उसे इसका अनुमान है। वह उन्हीं अनुमानों के साथ आरोपियों को पकड़ने का प्रयास करेगा...
‘देखिए क्या होता है क्या आरोपी पकड़ में आ पायेंगे उसके? वह सिपाही भी धरती-माई का भक्त है, चारपाई छोड़ते ही हर सुबह वह धरती को स्पर्श कर प्रणाम करता है फिर जमीन पर पॉव रखता है, प्रार्थना करता है कि दिन अच्छा बीते। धरती-माई भी ऐसे भक्तों का बहुत ध्यान रखती हैं पर इस समय संकट में हैं धरती-माई, उन्हें समझ नहीं आ रहा किस भक्त की प्रार्थना सुनें किसकी नहीं। प्रार्थना तो सभी कर रहे हैं..धरती-माई व्यथित होकर प्रार्थनाओं से बाहर निकल कर प्रकृति का एक उत्पाद बनना चाह रही हैं...’
‘लाशें बोलने लगीं...
हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया!’
‘पर लाशों की सुनेगा कौन? धरती-कथा के पात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है, कुछ की भूमिका तो लाश बन कर खतम हो चुकी है। लाशों की भूमिका प्रशासन के आलाअधिकारियों की भूमिका के साथ जुड़ चुकी है एकमएक हो गई है। वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं, अपने संवाद रट रहे हैं, अधिकारियत के अभिनय को संवार रहे हैं, जिससे किसी भी सार्वजनिक दृश्य में कमजोर न दिखें। धरती-कथा अभी तो शुरू हुई है तरह तरह के दृश्य आयेंगे इस कथा में। विरोधी-दलों के नेताओं के विरोध वाले दृश्य, सरकार के बड़े अफसरों, मंत्रियों कीे डाट-फटकार वाले दृश्य, जॉच के दृश्य, कई तरह के दृश्यों से टकराना होगा उन्हें। अगर अफसरियत का अभिनय कमजोर हुआ तो वे पिट जायेंगे फिर उनकी भूमिका ही छीन ली जायेगी। आला-अधिकारियों से जुड़े छोटे कर्मचारी भी कथा में कहीं कहीं किसी दृश्य की तरह दीख रहे हैं बिना किसी भूमिका के....धरती-कथा में अभिनय करने वालों को नहीं पता कि कथा का अंत कैसे होगा। भला ऐसी कथाओं के अंत के बारे में किसे पता चलेगा वह चाहे कोई हो।’ नया सिपाही लाशों का मुआयना कर रहा है और लाशें हैं कि उससे बतियाने के लिए बांया-दांया कर रही हैं। सिपाही अचरजों में है, हो क्या रहा है उसके साथ, भला लाशें कभी बोलती-बतियाती हैं? वह तो केवल इतना देखना चाहता है कि लाशें ठीक से बंधी हैं कि नहीं, ठीक से नहीं बंधीं तो पोस्टमार्टम घर तक ले जाना मुश्किल होगा। नये सिपाही को खुद पर गुस्सा आया.‘जो मर गया, मर गया वह बोलने-बतियाने के लिए काहे आयेगा धरती पर, बोलने-बतियाने वालों की धरती पर कमी तो है नहीं, भरे पड़े है हर तरफ।’
नया सिपाही समझ चुका है कि लाशों के पोस्टमार्टम के बाद ही वह पुलिसिया जिम्मेवारी से मुक्त हो सकेगा। ड्यूटी से मुक्त होने के बाद अपने आवास पर जायेगा, अपने घर वालों से बातें करेगा। नया सिपाही अचानक मुड़ गया उसे लगा कि उत्तर तरफ वाली लाश के कपड़े ठीक से बॉधे नहीं गये हैं। वह उस लाश की तरफ जाता है और देखता है..कपड़े तो बंधे हुए है ठीक से ही’ वह आश्वस्त हो गया। लाश का कपड़ा ठीक से बंधा देखकर वह लौट ही रहा था कि उसे लगा लाश उसे बुला रही है... वह चिढ़ जाता है.. अधिकारी तो उसे बुलाते ही हैं अब यह लाश भी उसे बुला रही है।
‘का है भाई! कुछ तो बोलो काहे बुला रहे हो’...उसने सामने बंधी लाश से पूछा’भला लाश बोलती है! पर उसे लगा कि लाश बोल रही है और साफ साफ बोल रही है....‘हम कुछौ नाहीं किए हैं भइया! हम तो झगड़ा बरकाय रहे थे तब्बै बन्दूक चला दिया हत्यारों ने, अब आपसे का बतावैं भइया! हम भागौ नाहीं पाये अउर लाश बन गये, हमरी लाश जीन काटना-पीटना सिपाही बाबू!’
नया सिपाही वहीं ठमक गया, उसने दिमाग पर जोर दिया, लाश नहीं बोल रही, बोल तो उसका मन रहा है। वह कल्पना चित्रा बनाने लगा है हालांकि वह चित्राकार नहीं है। उसने कपड़ा बांधते समय लाश को देखा था, गठीला बदन, मोटी नाक, फैला माथा, गंदुम सांवला रंग, करीब पौने छह फीट की ऊॅचाई यही कोई तीस-पैंतीस की उमर। एक बार तो सिपाही को लगा कि लाश कुछ बताना चाहती है, शायद बयान देना चाहती हो पर बयान देकर का मिलेगा उसे, वह साहेब तो है नहीं, मरते आदमी का बयान केवल मजिस्ट्रेट ही लेता है मजिस्ट्रेट को बुलाना होगा क्या?
‘पागल हो क्या जी! वह खुद को फटकारता है, मजिस्ट्रेट तेरे बुलाने से आयेगा क्या? वह हाकिम होता है और हाकिमों के अपने तौर-तरीके होते हैं, वे उन्हीं तौर-तरीकों से चला करते हैं, तुझे जो काम मिला है उसे कर। तूॅ मृतक के आखिरी बयान के चक्कर में मत पड़। वह मर गया वही उसका आखिरी बयान है इस बयान को कानून, अदालत, सरकार समझे न समझे तूॅ का कर लेगा समझ कर। नये सिपाही ने अपने विचारों के खोल में दुबक जाना उचित समझ कर खुद को विषयान्तरित किया...
‘ये सब काम सिपाही के थोड़ै हैं, ये सब तो साहबों के काम हैं, मृतक का बयान लेना, जॉच करना तथा अपराधिक कृत्यों की समीक्षा आदि करना। उसका तो काम है साहबों के आदेशों का पालन करना, उनके कहे के अनुसार धूप हो गर्मी कहीं भी
खड़े रहना, जब तक ड्यूटी है तब तक उसे लगातार देखते रहना है साहब की ऑखों को, समझते रहना है उनके इशारों को, उनके हिलते हुए होठों की चालों को समझ सकने की योग्यता हासिल करना है उसे।
अचानक वह हिल गया... अरे! उसे नौकरी भी तो संभालनी है, बहुत मुश्किल से मिली है। जब वह पढ़ रहा था काशी हिन्द विश्वविद्यालय में तब उसे यह पता नहीं था कि यह जो नौकरी वाली दुनिया है कितनी कठिन है...वह चाहता था कहीं अध्यापकी करना पर पूरी ताकत लगा देने के बाद भी उसे अध्यापकी हासिल नहीं हो सकी। कई तरह की प्रतिययोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया पर हाय री किस्मत! लगातार उससे कोसों दूर भागती रही थी। एक दिन अचानक उसने निर्णय लिया कि सिपाही वाली भर्ती को आजमाया जाये और संयोग देखिए कि वह चुन लिया गया उसमें। तमाम कठिनाइयों से मिली इस नौकरी को वह नहीं गवां सकता अगर नौकरी गंवा दिया फिर तो सारा कुछ चला जायेगा, नौकरी है तो जीने का आसरा है। केसे संभालेगा अपना घर वह बिना नौकरी के।
लोग दुनिया को जाने कैसे खूबसूरत और हसीन मानते हैं, कैसे है यह दुनिया हसीन, इसकी हसीनी तो कहीं नहीं दिख रही, हर तरफ खुरदुरी ही दिख रही है। वह सोचते सोचते विश्वविद्यालय की यात्रा पर निकल गया पढ़ाई के दिनों में। एक कवि-गोष्ठी में प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह की सुनी एक कविता की मार्मिक पंक्तियों ने उसे पकड़ लिया.. कवि भी दुनिया को सुन्दर और गर्म देखना चाहते हैं उस हाथ की तरह जिसे उन्होंने हाथ में लिया हुआ है।
‘उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह सुन्दर और गर्म होना चाहिए’
विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान तमाम विद्वानों के लिखे को पढ़ते हुए उसे भी लगा था कि दुनिया को सुन्दर और गर्म होना चाहिए पर कैसे? उसे समझ नहीं आया। उसका अनुभव केदार जी से कुछ भिन्न है। मॉ का चरण स्पर्श करते हुए उसे लगातार महसूस होता रहा है कि दुनिया को मॉ की चरणों की तरह ममत्व से पूर्ण होना चाहिए भले ही गर्म हो न हो पर ममत्व-पूर्ण दुनिया को तो होना ही चाहिए। वह लगातार अपने चित्त को ममता से ओत-प्रोत बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसा करने के कारण उसे सभी का प्यार व दुलार भी मिलता रहा है पर अब वह सोचता है कि कवि केदारनाथ जी सही कहते हैं कि दुनिया को सुन्दर ही नहीं गर्म भी होना चाहिए जिससे अवश्यक होने पर आकाश की तरफ मुठ्ठियॉ लहराई जा सकें।
विश्वविद्यालय की सोच से बाहर निकल कर एक बार फिर वह लाशों की तरफ मुड़ता है और पूरी तरह से सहेज लेना चाहता है कि सारी लाशें ठीक से बंधी हुई हैं कि नहीं..
लाशें ठीक से बंधी हुई देख कर वह खुश होता है, भले ही वह नया सिपाही है तो का हुआ काम करने के मामले में नया नहीं है। धीरे-धीरे वह सीख लेगा सिपाही-गिरी।
घटना-स्थल पर जितने लोग थे सभी के दिल-दमाग पर घटना का आतंक पसरा हुआ था सो वे जल्दी जल्दी सारी कार्यवाही निपटा लेना चाहते थे, सभी जल्दी में थे। नया सिपाही पान मसाला वगैरह नहीं खाता था पर सुुर्ती खाता था इसके लिए वह सुर्ती पहले से ही बना कर एक डिब्बी में रखे हुए था। उसने डिब्बी खोला, उसमें से सुर्ती निकाला फिर मला और मुह में डाल लिया। उसके पास ही में राजस्व विभाग के एक जन और भी खड़े थे उनसे नहीं रहा गया...
‘भाई साहब! और है क्या...?’
‘हॉ और है’
‘थोड़ा दीजिए’
‘थोड़ा नहीं पूरी डिब्बी लीजिए मन भर खा लीजिए’
राजस्व विभाग का कर्मचारी खुश हो गया। उसके पहले उसने गॉव के एक आदमी को सुर्ती मलते हुए देखा था उसके मन में आया था कि उससे सुर्ती मॉगे पर उसने खुद को रोका...पता नहीं इसका हाथ साफ है कि नहीं सो उसने नहीं मॉगा उस गवईं आदमी से। इस बार वह खुद को नहीं रोक सका और मॉग लिया। यह मानकर कि सिपाही है इसका हाथ तो साफ होगा ही पर उसको क्या पता कि जिनके हाथ साफ दीखते हैं उनके दिल दिमाग बहुत गन्दे होते हैं। सुर्ती का खेल हाथ का है दिमाग का नहीं। केवल हाथ साफ रहना चाहिए दिमाग का क्या.. उसकी जरूरत सुर्ती बनाने में थोड़ै पड़ती है।
राजस्व विभाग के आदमी ने नये सिपाही से सुर्ती मांगा और खाया फिर सुर्ती की डिब्बी उसे लौटा दिया। राजस्व विभाग का आदमी भी वहां ड्यूटी बजा रहा था। उसके साहब ने कहा था कि जब तक लाशें पोस्टमार्टम के लिए रवाना न हो जायें तब तक तुझे वहीं घटना स्थल पर डटे रहना है। सो वह ड्यूटी स्थल पर डटा हुआ था। करीब दो घंटे से वह वहीं हैं तथा नहीं समझ पा रहा है कि वह वहां क्यों है? सिवाय इसके कि उसे ड्यूटी करनी है तो करनी है नहीं तो साहेब लोग उसके खिलाफ कार्यवाही कर सकते हैं, उसका हल्का बदल सकते हैं, तनख्वाह काट सकते हैं, भला-बुरा बोल सकते हैं। वह घटना-स्थल के अगल बगल मडरा रहा है। घटना स्थल पर हाजिर होने के लिए जब उसे आदेश दिया गया था तभी बोल दिया गया था कि वह सफेद रंग का साठ मीटर कपड़ा तथा कुछ रस्सी खरीद लेगा जिसे लाशों बाधा जा सके। घर से निकलते ही उसने वही काम किया खरीददारी वाला। सुबह के समय दुकानंे तो खुली नहीं थी। घोरावल आकर उसने एक परिचित की दुकान खुलवाया और कपड़ा तथा रस्सी खरीद लिया। रुपये की उसे चिन्ता नहीं थी विभाग से उसे नगद कभी भी मिल जायेगा। खंजाची बाबू बहुत ही अच्छे आदमी हैं। कई
बार उसने अपनी टेट से रुपया खर्चा है। पी.डब्लू.डी. के बंगले पर जब मंत्राी वगैरह आते हैं तब उसे ही वहां ड्यूटी पर लगाया जाता है, वह उनके खान-पान का इन्तजाम करता है। साहब लोग तो केवल इन्तजाम देखने आते हैं। मंत्राी वगैरह भी उसे कुछ न कुछ दे ही जाते हैं पर सब नहीं देते कुछ तो एकदम चिरकुट होते हैं मक्खी-चूस। वे कायदे से सलाम भी नहीं कबूलते ऐंठे रहते हैं।
राजस्व विभाग के कर्मचारी को अचानक हसी आ गई... वह यहां आकर काहे परेशान हुआ जा रहा है, यहां भी तो इन्तजार करना है, वहां भी इन्तजार ही तो करते हो आखिर का फर्क है यहां के इन्तजार में और डाकबंगले के इन्तजार में, इन्तजार करो, जब साहब लोग बोलेंगे तब निकल लेना यहां से और क्या.. वह फिर हस रहा है अपने पर आखिर तुम्हारा काम क्या है?
‘खड़े रहना और खड़े रहना...’
‘इन्तजार करना और इन्तजार करना...’
फिर तुझे यह जो इन्तजार है काहे बुरा लग रहा? इन्ताजर तो अच्छी बात है लेकिन हॉ ड्यूटी वाला इन्तजार अच्छा नहीं होता, अच्छा होता है प्रेमिका का इन्तजार करना या बुरी हालत में पत्नी का वह फिर हसने लगता है अपने आप पर...
‘बेटा! जब नौकरी किए हो तो यह सब करना ही पड़ेगा।’
हस लेने के बाद वह खुद से संवाद करने लगता है...
‘अरे! डाकबंगले वाले इन्तजार और यहां के इन्तजार में जमीन आसमान का फर्क है वहां का इन्तजार तो इतना मनोरम और हसीन होता है कि क्या कहने... एकदम स्वर्ग माफिक, सिर्फ मेहमानों का दिल-दिमाग रंगीन हो बस। मेहमानों के साथ यह जो रात है नऽ अपने आप रंगीन हो जाती है, मुझे ही देखना होता है कि मेहमान को कोई छेड़ने न आ जाये, रात का मनोरम कहीं से घायल न होने पाये। साहब सो रहे हैं, इतना ही बोलना पड़ता है। आहाते के गेट पर ताला चढ़ा कर मैं भी आराम से सो जाता हूॅ, खाने-पीने का सारा सामान होता ही है, मंहगी दारू होती है, चिकन होता है, पोलाव होता है, अरे क्या नहीं होता उस समय किचन में, चाहे जो खाओ, जितना खाओ, खाने से कुछ कम नहीं होता, यह मुझे डाक बंगले की मेहमाननवाजी से ही समझ आया।’
राजस्व विभाग का कर्मचारी एकदम खाली खाली है तथा उसे समझ आया कि यह जो नया सिपाही है वह भी खाली खाली ही होगा। उसके जिम्मे भी कोई काम नहीं दिख रहा केवल लाशों की निगरानी कर रहा है..यही ड्यूटी है शायद उसकी।
राजस्वविभाग के कर्मचारी ने नये सिपाही को टोका...
‘सिपाही जी आप किस थाने से हैं?’
‘मैं रापटगज कोतवाली पर तैनात हूॅ’
‘वहां कब से हैं?’
‘अभी पहली पोस्टिंग है साल भर से हूॅ’
‘कहां के रहने वाले हैं?’
‘जौनपुर के’
इसके आगे जाति आदि पूछना ठीक नहीं है सो राजस्व विभाग का आदमी खुद को रोक लेता है...जाति पूछना ठीक नहीं। जाति पूछना उसने जान-बूझ कर रोका मन में तो था ही कि जाति पूछ ले, पर असभ्यता हो जाती। वह राजस्व विभाग का छोटा कर्मचारी है तो का हुआ असभ्य थोड़ै है। वह जब रुक जाता है फिर नया सिपाही उससे पूछता है कि चलो जान-पहचान हो जायेगी। विभाग पूछ लेना चाहिए।
‘और भाई साहेब! आप किस विभाग से हैं...?
नये सिपाही ने राजस्व विभाग के कर्मचारी से पूछा...
उधर से उत्तर आया....
‘भइया मैं राजस्व विभाग से हूॅ जो सभी विभागों का मालिक होता है। हमारा ही अधिकारी जिले का मुखिया होता है, जो सभी विभागों पर हुकूमत करता है। उसी विभाग का हूॅ भाई साहेब! पर का करें ड्यूटी ऐसी है कि खड़े रहना है दिन भर, बिना खाये, बिना पिये। भोर में ही निकला हूॅ घर से। वो तो मेरी पत्नी घुर देहाती है, मुझे परमेश्वर मानने वाली। उसने भोर में ही नाश्ता क्या खाना बना दिया उसे खाकर घर से निकला नहीं तो यहॉ मर ही जाता। घोरावल में कर-कपड़ा खरीदा लाशों को तोपने तापने के लिए फिर यहॉ आया। लाशें चली जायें फिर थोड़ा आराम मिले।’
‘यही हाल मेरा भी है, कोतवाल साहेब यहीं ड्यूटी लगा गये हैं। वैसे लाशें बंध गई हैं, कुछ ही समय में यहां से चली जायेंगी भी, दिवान जी बोल कर गये हैं।’
नया सिपाही राजस्व विभाग के कर्मचारी से कुछ विशेष बतियाना नहीं चाहता। का होगा बतियाकर, राजस्व विभाग का है बहुत होगा तो लेखपाल होगा और का होगा। कानूनगो भी होता तो साहबों के साथ रहता, यहां थोड़ै रहता। वह भी साहबों की जाति का होता है। मेरे दिवान जी भी साहबों की जाति वाले हो गये हैं। कक्षा दस पास हैं, बोली सुनो तो जान पड़ता है कि आदिशंकराचार्य बोल रहे हैं पर काम देखो तो घिन आती है। रात में अगर कंजड़ टोले वाली छमिया नहीं आती तो परेशान हो जाते हैं। उन्हें नींद ही नहीं आती। छमिया है भी तो गजब की, कौन नहीं लुभा जायेगा उस पर। दिवान जी के लिए छमिया पाकेट खर्च है तो प्रमोशन का कागज भी। थाने के दारोगा लोग दिवान जी पर फिदा रहते हैं। दारोगा भी का करंे, घर से दूर, मार-पीट वाले कामों की रोक-थाम, रपट, मुकदमा, गिरफ्तारी, दिन भर की ड्यूटी, अक्सर साहबों के यहां सलामी करना तो कभी अदालत में गवाही साक्षी के लिए हाजिर रहना, पूरी तरह से नीरस और उबाऊ जिन्दगी। सूरज कैसे उगता है कैसे अस्त होता है दारोगा नहीं जानते, कौन सा महीना वसंत का है, कौन सा महीना सावन का है, कैसे होते हैं सावन के गीत बेचारे दारोगाओं को क्या पता, वे तो रोबोट की तरह वर्दी पहने रिवाल्वर खोंसे और चल दिये ड्यूटी पर।
अरे वो तो दिवान जी हैं कि दारोगाओं को सावन के गीतों से दो-चार करवा देते हैं, फगुनहटी गुलाल लगवा देते हैं उनके गालों पर, नहीं तो बेचारे दारोगा किसी शोक-कविता की तरह केवल रोजनामचा ही लिखते रह जाते हैं।
तो मेरे दिवान जी थाने की रौशनी हैं, वे नहीं हैं थाने पर तो बूझो कि थाना अन्धेरे में घिर गया है। थाने पर चाहे कोई हो दिवान जी ही सबकी जेबों को बाजार में खरीद की योगयता वाला बनाते हैं, रोज का खर्चा किसी न किसी बहाने डाल दिया करते हैं जेबों में। मैं भी उन्हीं के आगे-पीछे परछाईं की तरह डोलता रहता हूॅ। मेरा भी काम चल जाया करता है।
नया सिपाही अब परेशान हुआ जा रहा है, काफी देर हो गई अभी दिवान जी नहीं आये। बड़े साहब लोग जाने का कर रहे हैं। अरे अब काहे के लिए देरी हो रही है नया सिपाही देर होने के कारण को जानना चाह रहा है पर उसे बताये कौन? तभी एक सिपाही उसकी तरफ जोर जोर से रेंगता आता दिखा... जरूर कोई सन्देश ला रहा होगा लाशों को ले जाये जाने के बारे में...
बात सही थी वह सूचित करने ही आया था उसे कि अब लाशें ले जाई जायेंगी, बड़े साहेब लोग भी इधर ही आ रहे हैं।
‘देखो कहीं हिलना नहीं, बड़े साहब लोग अब खाली हो गये हैं इधर ही आ रहे हैं। सिपाही माथा ठोंकते हुए जैसे काफी दुखी हो बताने लगा...
‘अरे! का करें साहेब लोग, एक से एक नेता-परेता आ गये हैं। साबित कर रहे हैं कि वे आदिवासियों के हितुआ हैं। इसके पहले जाने कहॉ थे? अब जब दस सत्याग्रही आदिवासी मार दिए गये फिर चले आये प्रशासन को हड़काने। अब का करोगे हड़काकर जो होना था वह तो हो चुका।
‘एक दूसरा नेता था विरोधी पारटी का शायद आदिवासी नेता था बक बक कर रहा था। बोल रहा था कि प्रशासन की लापरवाही से ऐसा हुआ। हमार मन तो किया कि साहेब से बोल दूॅ इसका नाम भी लिखवा दो साहेब एफ.आई.आर. में पर हम का बोलते सो चुप रहे। का बतावैं यार! जमीन का मामला पुलिस का थोड़ै है यह मामला तो राजस्व विभाग का है। जमीन का इन्तजाम कायदे कानून से करोगे नहीं और पुलिस को दोष दोगे, पुलिस का कर लेगी जमीन के झगड़े में।’
‘एक बात बतायें, हमारे साहेब लोग जो इस समय जिले पर तैनात हैं बहुत ही होशियार हैं। यार! मेरे तो समझ में नहीं आया कि उनमें से कौन अधिक बुद्धिमान हैं, एस.पी. के डी.एम., दोनों लोग एक से बढ़ कर एक हैं। लगता है डी.एम. साहेब एस.पी. साहेब से ज्यादा काबिल हैं फिर लगता है कि एस.पी. साहेब डी.एम. साहेब से ज्यादा काबिल हैं। खूब खूब समझाये नेताओं को, समझाये का यार! उल्लू बनाये और बेचारे नेता अपना मुह लिए बोलना बन्द कर दिये। यार! साहेब साहेब होते हैं। नेताओं की पंचाइत में काफी देर हो गई।
‘मुझे तो लगा था कि नेतवा मिल कर हल्ला बोल देंगेे, नहीं ले जाने देगे लाशों को गॉव की भीड़ नेताओं के साथ हो ही जाती पर वाह रे हमारे साहेब लोग! तब्बै सरकार ओनपर पैसा खरचती है और राजसी सुविधायें देती है नाहीं तऽ सरकार पूछती है भला किसी को। साहब लोग भी बेचारे का करते, वे मजबूर थे, समझा-बुझा कर ही उन्हें काम निकालना था।’
‘पर एक नेतवा बेचारा ठीक बोल रहा था। वह शुरू से बोल रहा था कि साहेब जमीन का सर्वे फिर से करवाओ। नया सर्वे हो जायेगा सारा कुछ ठीक हो जायेगा। येही बीच एक बात और हो गई थी किसी तरह से डी.एम. साहेब को मालूम हो गया था कि कोई मंत्राी भी घटनास्थल पर आने वाला है सो साहेब जल्दी करना चाहते थे। सी.एम.ओ. साहेब का फोन भी आ गया कि वे तैयार हैं, पोस्टमार्टम करने की सभी व्यवस्था हो चुकी है। पूरा अस्पताल परेशान था घायलों का इलाज करने में, अस्पताल के एक एक कर्मचारी जुटे हुए थे वे अपने स्तर से प्रयास कर रहे थे घायलों का इलाज करने में। गंभीर रूप से कुछ घायलों को बी.एच.यू. भिजवा दिया गया सभी के लिए एम्बुलेस का प्रबंध किया गया था।
दौड़ कर आते हुए सिपाही के बातें सुनकर नया सिपाही आश्वस्त हुआ, नहीं तो वह घबड़ाया हुआ था। घटनास्थल पर लाशें पड़ी रहने का अब कोई मतलब नहीं, पोस्टमार्टम जितना जल्दी संभव हो सके करा लेना चाहिए। घर के लोग लाश को अधिक देर तक जैसे घर में नहीं रखना चाहते वैसे ही पुलिस भी नहीं चाहती लाशों को अपने कब्जे में रखना, निपटा देती है दाह या दफन करके। चट-पट पंचनामा फिर मृतक-संस्कार। कुछ न कुछ उपाय करती ही है पुलिस।
नया सिपाही खुश खुश है कि लाशों की निगरानी तथा उसे बांधने का उसका काम खतम होने वाला है...
यानि कि लाशों की जॉच और मुआयना की कथा का अन्त होने वाला है पर क्या होगा असल कथा का जिसके लिए ऐसा जघन्य काण्ड हुआ? राम जानें, वह कुछ नहीं बता सकता...
‘बताने को तो धरती-माई भी नहीं बता सकती अगर वे देवी रूप में होतीं, स्वर्ग वाली तो पराशक्ति से बता देतीं शायद पर नहीं वे तो मानव रूप में हैं भले ही अदृश्य हैं, उन्हें कोई देख नहीं सकता, सो कैसे परगट हो सकती हैं? वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं अब उनका स्वर्ग से कोई नाता भी नहीं, हॉ एक काम कर सकती हैं संकट निवारण की क्षमता संपन्न किसी देवता को याद कर सकती हैं। आह्वान के मंत्रों के द्वारा विघ्न-बाधा निवारण देव को आमंत्रित कर सकती हैं पृथ्वी पर। पर सन्देह है यह शदी आधुनिकता-बोध वाली है। इस शदी में देवताओं केआह्वान के जो पुराने मंत्रा हैं उनकी क्षमता पहले वाली है कि नहीं, संभव है वे शक्ति-हीन हो चुके हों। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता...
ऐसे में धरती-माई अपनी कथा के विस्तार के लिए कैसी कार्य-योजना बनाती हैं यह देखना काफी कौतुक भारा होगा...
वे कोई न कोई योजना तो बनायेंगी ही.....
‘हमलोग काहे डरैं,
डरै ऊ जे मजूरों के सहारे है’
‘कौतुक भरा तो धरती-कथा का आगे बढ़ना भी है फिर भी कथा बढ़ रही है असली कथा-पात्रों के सहारे। वैसे भी दुखान्त वाली कथाओं के कुछ चालू किसिम के पात्रा ऐसे होते भी हैं जो कथा को दुखात्मक होते ही भाग खड़े होते हैं, छोड़ देते हैं कथा की अपनी निर्धारित भूमिका। वे तो कथा में तभी तक रहते हैं जब तक उसमें मनारमों, व आनन्द दायक उत्सवों की बदरियां हर दृश्य को घेरे रहती हैं, मनोरमों की बदरियां हटीं के वे भागे कथा छोड़ कर पर कथा के असली पात्रा कहां जायें, उन्हें तो कथा के साथ ही चलना है वे चल भी रहें हैं कथा के साथ। धरती से जुड़े, धरती को धरती-माई मानने व पूजने वाले, धरती पर कभी वसंत तो कभी फागुन उगाने वाले, धरती से अनाज के दाने उगाने वाले, भूख और भोजन की दूरी पाटने वाले, वे कहां जायेंगे, ये चिल्ला रहे हैं, ललकार रहे हैं, पूरी मानव सभ्यता को, उसके कानून को...का यही लोकतंतर का कानून है?’
बुझावन काका की पतोह अपने ससुर की सेवा करने में देर नहीं की। घर आते ही उनकी सेवा-टहल में जुट गई। खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख फेंका और उसमें साफ राख डाल कर ससुर की खटिया के नीचे रख दिया। उनका बिछावन बदल दिया। उसे ख्याल है अस्पताल की बातें....
उसकी अइया एक बार जब रापटगंज सरकारी अस्पताल में भर्ती थीं उस समय नर्स उनके बेड का कपड़ा रोज बदल दिया करती थी। सो बपई जो लगातार खटिया पर पड़े हुए हैं उनका बिस्तरा बदल देना चाहिए। बिस्तरा बदल देने के बाद उसने रोटी बनाया। रोटी बनाने में थोड़ी दिक्कत हुई, आग जलाना था, घर में लकड़ी थी नहीं, केवल ‘गोइठा’ था जो बिना लकड़ी के जलता नहीं, वह का करे? वह घर से बाहर निकली, बाहर युकिलिपटस का पेड़ था, उसके पत्ते जमीन पर गिरे थे, एक भउकी में उसने उसे बटोरा और चूल्हे में डालना शुरू किया। युकिलिप्टस का पत्ता बारूद की तरह जलता है। मिट्टी के चूल्हे के पास ही सरकार की तरफ से दिया गया गैस का सिलेन्डर भी था, उसे देखते ही गुसिया गई वह..
‘ई मुआ इहां का कर रहा है, जगह घेरे हुए है। आज निकाल देती हूं इसे, एतना महंगी गैस कौन खरीदेगा साढ़े नौ सौ रुपये का, बीस रुपया उपरौढ़ा भी देना पड़ता है गैस लाने वाले को, कुल एक हजार पड़ ही जाता है। उतने में तो महीने भर का खर्चा निकस जायेगा। बने जा कर जलावन नाहीं बीन लूंगी! हमैं नाहीं जलाना गैस। बुझावन की पतोह ने सिलिन्डर उठाया और उसे बरामदे में फेंक दिया। फिर रोटी सेकने लगी। रोटी और ‘सिलहट’ की तरकारी बनाकर वह बुझावन के पास ले आई।
बुझावन से कई बार उसने कहा... कि दो रोटी खा लीजिए पर बुझावन काहे सुनते उसकी बात.. वे तो दुखी थे, गॉव के दस लड़के बिना कारण मार दिये गये थे, ऐसे में का खाना, का पीना...किस मुह से खवाएगा आखिर...
बुझावन की पतोह बिना बुझावन से पूछे काली चाय बना कर ससुर के सामने ले आई...रोटी नाहीं खाये तो कम से कम चाह तो पी लीजिए, कुछ तो कंठ में जायेगा। दिन भर का टेम है खाली पेट कैसे रहेंगे?
‘लो चाह तो पी लो बपई! वह ससुर को बपई ही बोलती है। आखिर ससुर बापै नऽ होता है।’
‘तूॅ नाहीं मानेगी, अरे काहे बनाई चाह, हमार सही में कुछ मन नाहीं है खाने-पीने का, हम सोच रहे है ई सब देखै-सुनै के पहिले हम मरि काहे नाहीं गये, काहे बदे हम जिन्दा हैं, हे करम बाबा! अइसन दिन केहू के न देखना पड़े... कराह उठे बुझावन।’
बपई की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सोमारू के यहां जा पहुंची... उनकी भी तो देख-रेख करनी होगी आखिर ये समय के है ओनकरे घरे, सरवन था जिसे हत्यारों ने गोली मार दिया, ओकर मेहरारू सुगनी है जो वहीं पड़ी हुई है सरवन की लाश के पास। अउर घरे में कौन है सरवन की मतारी बुधनी काकी हैं भला वह लाश छोड़ कर घर कैसे आतीं!
‘काका हम रोटी अउर सिलहट की तरकारी लाये हैं, पहिले मुह हाथ धो लो फेर रोटी खाय लो...ई दतुइन लो मुह धोय लो...’
बुझावन की पतोह ने सोमारू के हाथ में सिल पर कूंची हुई दतुइन थमा दिया.
‘काका मुह नाहीं धोय रहे हो, धोओ मुह, हम चापा कल से पानी लाय देते हैं।’
दोड़ कर वह गई और एक बाल्टी पानी चापा कल से ले आई। सोमारू के घर के सामने ही था चापा कल।
सोमारू कभी गबरू जवान थे... खूब खूब रियाज मारा करते थे, एक सास में सौ-दो सौ डंड और पॉच सौ बैठक किया करते थे। रियासत को जब कभी राज-काज की सुरक्षा के लिए गबरू जवानों की जरूरत पड़ा करती थी तब राजा साहेब सोमारू को जरूर याद किया करते थे। जाने कितने लोगों को सोमारू ने राजा साहब के कहने पर अपने लोहबन्दा से पीटा होगा पर कभी किसी का कतल नाहीं किया है। एक बार एक मामला फस गया था, नौबत कतल की आय गई थी, रियासत का मंत्राी अपने किसी दुश्मन का कतल कराना चाहता था। ओ जमाने में दो सौ रुपया दे रहा था पर सोमारू टस्स से मस्स नहीं हुए। दस पॉच रुपये के लिए लोग तब जाने का कर दिया करते थे।
‘हम केहू कऽ जिनगी नाहीं ले सकते। हमैं नाहीं चाही रुपिया...’
रियासत का मंत्राी नाराज होय गया था और उनकी जोत की जमीन छिनवाय लिया था। राजा साहब के कहने पर दुबारा जमीन मिली थी और छोटके राजा ने जमीन दिलवाया था उन्हें।
सोमारू खटिया पर पड़े पड़े बीते दिनों की करनी को कोस रहे हैं...
‘ओही करनी कऽ पाप लगा है, बिना गुनाहे हमने जाने कितनों को मारा-पीटा हैै रियासत के कहने पर, ओही कारण आज हम खटिया पर पड़े हुए हैं, एकलंगिया लकवा मारि गया है, एको कदम रेंग नाहीं सकते, कइसहूं करवट बदल लेते हैं, पड़े हुए हैं खटिया पर, अब देखो आगे का होता है...’
रोटी खाते हुए बुझावन की पतोह से पूछा सोमारू ने...
‘का बिटिया! सरवन की मेहर काहे नाहीं आई, सरवन की मतारी भी नाहीं आई, का करि रही हैं ऊ सब उहां... हमैं सरवन के बारे में डर लगा रहता है, वही मर-मुकदमा लड़ि रहा है जमीन का, वह दुश्मनों के निशाने पर है, ओके कुछ नाहीं हुआ नऽ, हमैं साफ साफ बताना, उहां सब ठीक है नऽ ’
‘हॉ काका सब ठीक है उहां, सुगनी भी वहीं है, सरवन भी वहीं हैं, काकी भी वहीं हैं...सबलोग ठीक हैं काका, घबराने की कोई बात नाहीं है।’
बुझावन की पतोह कैसे बताती सोमारू को सरवन के बारे में, छिपाना जरूरी था, बताने पर जाने कैसी हालत होती काका की। वह छिपा गई सारा कुछ।
‘तब ई बताओ.. के के, के के गोली लगी है....’
‘का बतावैं काका उहां लाशंे पड़ी हैं, हम सबके नाहीं देख पाये, बहुत भीड़ है पुलिस ने घेर लिया है सारी लाशों को, केहू को नाहीं जाने दे रहे हैं पुलिस वाले देखने भी नाहीं दे रहे हैं किसी को।’
‘जरूर कउनो बात है, नाहीं तऽ सरवन की मेहरारू सुगनी अब तक घरे आय गई होती, ऊ नाहीं मानने वाली... सरवन की मतारी का करि रही है उहां, कुछ तो बताओ....’
बुझावन की पतोह चुप थी तो चुप थी, वह कुछ भी नहीं बताती बुझावन काका को, का होगा बता कर, ख्टिया पर पड़े पड़े कहीं जिनगी न छोड़ दें, कउन ठेकाना है जिनगी का...?
चार महीना पहले की ही तो बात है, का हुआ था काका को, वे तो हल जोत रहे थे, एक बैल जुआठ से बाहर निकल गया, लगा भागने, काका ओके पछियाय लिए, कुछ दूर गये होंगे कि भहरा गये जमीन पर... लगे चिल्लाने...
‘बचाओ बचाओ..’
आगे वाले खेत में हमरे ससुर हल जोत रहे थे, चिल्लाहट सुन कर दौड़े चले आये सोमारू काका के पास.. उन्हें लगे उठाने..
पर काहे के लिए उठें सोमारू काका, उन्हें तो लकवा मार गया था एकलंगिया। जबरी खड़ा किए अउर बुलवाये सरवन को... गॉव के कई लड़के तब तक पहुंच गये खेत पर, मिलकर सब काका को उठा कर घर ले आये। ऐसे में सरवन के बारे में बता दे तो जाने का हो जाये... नाहीं नाहीं वह नाहीं बतायेगी काका को।
पूरा गॉव कई टोलों में बटा हुआ है, कहीं दो घर हैं तो कई तीन, टोलों की दूरी आधे किलोमीटर से कम नहीं। सोमारू का घर बुझावन के टोले में ही है, एक तरफ
बुझावन का घर है तो सामने सोमारू का घर।
बुझावन की पतोह का मन हुआ कि वह दूसरे टोले में भी जाये और वहां का हाल-अहवाल ले, पर नाहीं देर हो जायेगी, सुगनी उहां परेशान होगी, उसे तुरन्त लौट जाना चाहिए खेत की तरफ और सुगनी को संभालना चाहिए।
सोमारू काका की सेवा-टहल करके बुझावन की पतोह सीधे घर आ गई। घर पर आते ही बुझावन ने उसे रोक लिया...
‘अरे बता तो गोलीकाण्ड में के के, के के गोली लगी है...’
हम नाहीं जानते पुलिस वाले लाशों के पास नहीं जाने दे रहे हैं। अब हम जाय रहे है उहां बपई, मालूम करके आयेंगे तब बतायेंगे।
‘बबुआ कहां है रे! ऊ नाहीं आया, का करि रहा है उहां, बुझावन ने अपने बेटे के बारे में पूछा पतोहू से...’
‘ऊ ओहीं ठे हैं बपई, सबको शान्त करा रहे हैं, समझाय रहे हैं सबको, वहां बहुत किच किच हो रही है, पुलिस अलग तरह तरह से कन्ट्रोल कर रही है तो दूसरे भी अलग तरह से किच किच कर रहे हैं। सबको समझाना-बुझाना पड़ि रहा है, एही लिए ऊ वहीं रूक गये हैं...’
खेत से घर आते समय बुझावन की पतोह ने अपने पति को समझाया था...
‘देखो पुलिस वालों से रार जीन लेना, वे केहू कऽ नाहीं होते, तूॅ गोली चालाने वालो में से केहू कऽ नाम जीन बताना, चिल्ला रहे थे कि गोली चलाने वाले फला फला थे... तूं काहे चिल्लाय रहे थे, मुंहें पर ताला लगाय लो, बूझ रहे हो नऽ हमारी बात।’
‘अरे तोहसे का मतलब, तूं काहे के लिए नांउ बताय रहे हो, पुलिस पता लगाये अउर नाम निकासे। तूं एकदम चुप्प रहना जैसे तूने कुछ देखा ही नाहीं, गोली से बचि गये, करम बाबा की किरपा है, तूंहांे तो डाक रहे थे, घर से भागे भागे निकसे थे सरवन भइया के साथ....’
‘अरे गोली के आगे तू लोग का करि लेते, भाग जाना चाहिए था बन्दूक देखते ही, बहुत होता तो हमलावर जमीन जोत लेते, अउर का करते। ओनके लौट जाने के बाद हमलोग जमीन में बंेगा डाल देते, पर अकल तो है नाहीं... फसल हो जाती तऽ हम लोग ओके काट लेते, ऊ लोग जब तक फसल काटने आते खेत पर तब तक फसल कट चुकी होती। हमलोगों को कउनो मजूरों के सहारे फसल थोड़ै कटवाना है जो हमलोग डरैं’, डरैं ऊ जे मजूरों के सहारे है, जेकरे इहां किसिम किसिम के मजूरे हैं, खेत जोतने के लिए कोई, तो सेवा-टहल के लिए कोई।’
बुझावन की पतोह बहुत कुछ बोलती अपने पति से पर उसे बुझावन का खियाल था, ओन्है खराई कराना होगा, सो लौट आई घर पर।
बुझावन को खराई करा लेने के बाद बुझावन की पतोह सीधे भागी खेत की तरफ। वहां सुगनी अब भी बेसुध पड़ी हुई है। नन्हकी की तरह नौ और औरतें हैं
जो अपना सुध बुध खो चुकी हैं, सब विलाप कर रही हैं। तीन ठो तो दुइ-तीन साल की बिआही हैं, तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी पूरी जिनगी ओनकर पड़ी है। गॉव की दूसरी औरतंे उन्हें समझाय रही हैं...
पर समझाने से का होता है, इसे जानते सभी हैं फिर भी समझाना बन्द नहीं होता। सरवन की मतारी बुधनी बेटे की लाश से अलग होकर पुलिस वालों को फटकार रही हैैंं.‘आपलोग पहिलहीं धियान दिये होते तो कतल नाहीं होता, अब चले हैं लाश उठाने पोसटमार्टम कराने, पहिले मरि गये थे का, अब का करोगे, भागो इहां से हमलोग जनमाये हैं तां लाश भी फूंक लेंगे।’
बुझावन की पतोह सीधे सुगनी के पास जाती है और उसे गोदी में ले लेती है.
‘मत रोओ सुगानी, अब सोच के आगे का करना है... जो होना था वह हो चुका है, हमलोगों को अब आगे के काम के बारे में सोचना है...सरवन भइया तो नाहीं रहे पर ओनकर काम तऽ हमैं ही करना है, हमरे मरद को तो तूॅ जानती ही है, खाली लठ्ठ चलाना जानते हैं, लठ्ठ के अलाव कुछ जानते ही नाहीं, एक ठो बुधनी काकी हैं अउर परमू हैं, खेलावन, बंधू अउर पुनवासी बच हुऐ हैं ओनके अलावा गॉये में है ही कौन जेकरे भरोसे मर-मुकदमा का काम होगा। तनबुड़ुक तो पगला ही गया है, ओकर भाई बुद्धन भी मरि गये हैं गोली से। उहो बेचारा ईमानदार थे, उनके बारे में कब्बउ एहर-ओहर नाहीं सुना गया...’
सुगनी चुप्प थी तो चुप्प थी। उसने भी कई बार अपने पति को रोका था अउर समझाया था...
‘देखो ऊ लोग बहुत ही खतरनाक हैं, संसथा वालों की तरह नाहीं हैं। ओन्है झगड़ा झंझट का डर होता तो संस्था वालों की जमीन काहे खरीदते? ऊ जमीन नाहीं झगड़ा खरीदे हैं, अउर जमीन पर कब्जा करने के लिए मार-पीट कतल कुछ भी कर सकते हैं, पर ओन्हय तऽ बुझाता था कि जमीन खरीदने वाले साधू हैं..’
तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी वहीं कोने में कराह रही हैं, गॉव की कुछ सयानी लड़कियॉ उन्हें संभाल रही हैं।
बुझावन का लड़का बबुआ सरवन की लाश के पास है, वह रो रहा है और अपना माथा पीट रहा है। पुलिस वाले उसे वहां से हटा रहे हैं। बबुआ की औरत बिफनी बबुआ को पकड़े हुए है...
‘पुलिस को अपना काम करने दो, अपना मुंह सिल लो..’पर बबुआ अपना मुह कैसे सिल लेता... ‘उसे पता है कि गॉव के लिए सरवन का था? गॉव के लिए सरवन लेखपाल था, तो तहसीलदार भी था, वह विधवा पेंशन था तो बृद्धा पेंशन भी था, कभी कभी तो वह थाना भी बन जाता था...मजाल है कोई सिपाही गॉव में घुस जाये अउर किसी की बहिन बेटी पकड़ि ले। सरवन के कारण पुलिस का सारा अत्याचार रुक गया था गॉव में। नाहीं तो पहिले का नाहीं होता था गॉये में बात बात पर सिपाही घुस आते थे गॉयें में....’
फोकेट की दारू लेते थे...अनाज पानी वसूलते थेे, दारू का रेट बंधा होता था उनका पर सरवन ने सब रोकवा दिया, भले ही उसे मुकदमा लड़ना पड़ा। गॉव की जमीन का मुकदमा भी वही लड़ रहा है, पहिले नन्हकू काका मुकदमे का काम देखते थे उनके साथ बुधिया काकी थीं। अब कौन देखेगा मुकदमा, सरवन तो चला गया पूरा गॉव अनाथ छोड़ कर।
बबुआ परेशान है पर करे का.. पुलिस वाले अलग से दबाव बना रहे हैं। वे लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहते हैं रापटगंज...।
बिफनी प्यार से समझाती है बबुआ को... बबुआ अब शान्त है खुद में खोया हुआ, आकाश ताकता.. आकाश में तो कुछ होगा ही जमीन के बारे में, शायद हो वहां कुछ, पर नहीं बबुआ तो खोया हुआ है सरवन की याद में...
अब वह अकेला हो गया है, खेलावन, बंधू और पुनवासी हैं पर वे तो पीछे चलने वाले हैं, आगे चलने वाला तो खाली सरवन था चला गया। मुसीबत की घड़ी में पता चलता था कि सरवन है तो का करेगी मुसीबत। वह चढ़ जाता था थाने पर, तहसील पर। हमलोगों के जमीन का मुकदमा जिस दिन खारिज हुआ था वह तनेन हो गया था डिप्टी साहेब के सामने, किसी तरह से उसे समझाया गया था तब शान्त हुआ था।
बिफनी फिर समझाती है उसे...आगे की सोचोे....
बबुआ आगे की का सोचे उसे समझ नहीं आ रहा। वह घटनास्थल पर पड़े पड़े खुद में डूबा हुआ है। उसके साथी खेलावन, बंधू, पुनवासी हैं उसके साथ वे उसे समझाय रहे हैं...
‘आगे का करना है बबुआ! एकरे बारे में गुनो, बुधनी काकी तो लड़ रही हैं अधिकारियों से के लाश नाहीं ले जाने देंगे, का होगा? लाशें जायेंगी के नाहीं बताओ तो... बबुआ खामोश तो खामोश, वह भी लाश बन चुका है, वह कुछ नहीं बोल पा रहा है, सरवन ही तो था उसके लिए सबकुछ.... वह तो केवल उसके साथ लगा रहता था।
गोली से मारे गये और घायल हुए सभी धरती-पुत्रा हैं और धरती-कथा के प्रमुख पात्रा भी पर वे लाश बन चुके हैं तथा जो घायल हैं वे अस्पताल की प्रयोगशाला में जीनेउऔर मरने के बीच अस्पताल की दवाइयॉ खा रहे हैं। धरती-कथा के पात्रा तो और भी लोग हैं जो गॉव में हैं, रो रहे हैं कराह रहे हैं। उनकी कराहों से किसिम किसिम की कहानियॉ निकल रही हैं पर उन कहानियों को कौन सुनेगा..?
शासन, प्रशासन या गोली चलाने वाले आरोपी!
वह धरती जिसे जोतने कोड़ने वाले लाश बन गये!
या वे जो बन्दूकंे चला रहे थे!
कौन सुनेगा चीखों, कराहों तथा ऑसुओं सेे लिखी धरती-कथा।कौन सुनेगा धरती कथा की चीखें? कोई नहीं...शायद समय सुने उनकी चीखें!
‘यह जो संपत्ति का मामला है
हल होगा का?’
‘कोई नहीं सुनता चीखें जबकि कभी न कभी चीखते सभी हैं। इसी चीख की सिसिकती परतों पर गोल गोल घूम रही है धरती, कराह रही है धरती-कथा भी। इसके सारे पात्रों को पता है कि धरती और प्रकृति से प्यार करना चाहिए, यही कुदरत का सच है पर पता नहीं कहां गायब हो चुका है वह सच। अब जो प्यार है धरती से धरती का संपत्ति/ पूंजी में रूपान्तरण के कारण, जिसे बेचा जा सकता है, खरीदा जा सकता है, इससे लाभ कमाया जा सकता है। किसे नहीं पता कि पूंजी हमेशा किसिम किसिम के खेल खेला करती है। पूंजी धरती की चीखों व कराहों को भी खेल बना सकती है, इससे लाभ कमा सकती है। फिर तो जहां लाभ आ गया, वहां लाभ हासिल करने के लिए क्या नहीं हो सकता? खून-कतल, मार-पीट, बेइमानी ये सब भी तो पूंजी के ही उत्पाद हैं, सत्ता के खेल हैं। हल्दीघाटी गॉव भी पूंजी केे लाभ-हानि का खेल बन चुका है, क्रय-विक्रय की युद्व-भूमि हो गया है। संपत्ति है कि उसके खेल खेले जातेे हैं अदालतों में, थानों पर, न्याय अन्याय की जमीन पर, कानून के रंगीन कागजों पर वैसे इस कथा में कहीं रंग महल का आतंक तो नहीं पर अदालत, थाना, कानून का आतंक है, जो किसी रंग-महल से कम नहीं..’
ऐसे मंे बबुआ का करे, अपनेे मित्रों के साथ लाश की तरह घटना-स्थल पर खड़ा है, उन्हें नहीं बुझा रहा है कि आगे का करना होगा। वे अधिकारियों को देख रहे हैं और मन ही मन गुन रहे हैं कि ये अधिकारी पहले ही गॉव में आ गये होते तो दस लड़के न मारे जाते। यह धरती माई भी केतना खेल खेलती हैं तब्बै नऽ तनबुड़का गाय रहा था....
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’
धरती माई ने बलि ले ही लिया है, अब तो मन भर गया होगा धरती माई का। बबुआ आपने साथियों के साथ जा रहा है अधिकारियों की भीड़ की तरफ वह देख रहा है उसकी छल-छलाई ऑखों में वहां का पूरा दृश्य भर गया है, ऑखों के कोनों से लोर भी निकल रहा है पर करे का, देखना तो है ही, वह देख भी रहा है, ऑखें इनकार कर रही हैं कि न देखो कुछ फिर भी वह देख रहा है...
नया सिपाही लाशों को उठवा रहा है, उसके साथ चार-पांच सिपाही और भी हैं, सामने एम्बुलेन्स खड़ी है। ढेर सारे सिपाही वहां और भी हैं जो सुरक्षा के प्रतीक जैसे बने खड़े हैं। हर सिपाही जरूरत के अनुसार पुलिसिया ड्यूटी पर लगा हुआ है, कोई लाश उठवा रहा है तो कोई एम्बुलेन्स में लाशों को रखने की व्यवस्था कर रहा है, कोई आला-अधिकारियों के अगल-बगल सुरक्षा घेरे में शामिल है। नया सिपाही पहले गुन रहा था कि कोई ट्रक आयेगी और सभी लाशों को एक साथ उठवाया जायेगा, लाशों को ट्रक से ही रापटगज ले जाया जायेगा पर नहीं साहबों के कहने पर एम्बुलेन्संे आई हैं। एम्बुलेन्स से ही पोस्टमार्टम के लिए लाशें जायेंगी। लाशें एम्बुलेन्सों पर बहुत ही सावधानी तथा मर्यादापूर्ण तरीके से रखी जा रही हैं ऐसा नहीं कि उठाया और झोंक दिया एम्बुलेन्स में। वहां भीड़ इकठ्ठा है और अलग-अलग तरीके से घटना के बारे में बोल-बतिया रही है। सारे आला-अधिकारी भी मौके पर आ चुके हैं उनके चेहरांे पर उदासियॉ नाच रही हैं। वे परेशान हैं कि जाने क्या हो उनका? प्रदेश की सरकार का रूख अभी साफ नहीं दीख रहा है पर लगता है कि प्रदेश की सरकार इस मामले में कड़ा रूख ही अख्तिायार करेगी।
डी.एम. साहेब, एस.पी साहेब के साथ भीड़ में अधिकारियत से अलग हटकर भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। एस.पी. साहेब तो वर्दी में हैं सो उनका रोब-दाब, प्रशासनिक क्षमता सारा कुछ जोति की तरह भीड़ में भी फूट रहा है पर डी.एम. साहब तो सामान्यों की तरह प्राकृतिक बने हुए हैं एकदम कुदरती मनुष्य की तरह। पर भीड़ है कि जानती है कि वे आला-अधिकारी हैं। इशारों से पूरे जिले को हिलाने-डुलाने व चलाने वाले सो भीड़ उनसे दूर किसी आभामंडल के घेरे की तरह अगल-बगल खड़ी है। भीड़ में बबुआ और उसके साथी हैं तो मृतकों के परिजन भी हैं। बाहरी दर्शकों की भीड़ भी है वहां। उनमें से एक-दो जन हैं जो आला-अधिकारियों की हॉ में हॉ तथा ना में ना मिला रहे हैं सामान्य प्रवृत्ति की तरह। किसी भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं वे आला-अधिकारियों के अगल-बगल खड़े हो कर उनकी प्रशासनिक गंध सूंघने के मौके नहीं छोड़ते सो वे मस्त मस्त हैं अगल-बगल मडराते हुए। आलाधिकारी भी जल्दी में हैं वे झट-पट पोस्टमार्टम करवा लेना चाहते हैं, जिले से कई बार सी.एम.ओ. का फोन भी आ चुका है।
लाशें आ रही है अस्पताल पर सो अस्पताल पर भी मरीजों के अलावा बहुत सारे लोग हाजिर हो चुके हैं जो देखना चाहते हैं मृतकों को, सो वे इन्तजार में हैं। उनके लिए भी यह घटना हृदय-विदारक है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे शासन की किस दुनिया के वे नागरिक हैं। कहा जाता है कानूनी-राज का जमाना है, यहां सारा कुछ कानून के मुताबिक चलता हैै पर कहां दिख रहा कानून! वे व्यथित और चिन्तित हैं। वैसे उन्हें पता है कि सोनभद्र में जमीन के गैर-कानूनी आवंटन का सवाल बहुत बड़ा सवाल है। भीड़ में से जो जंगलों के निवासी हैं वे भोग चुके हैं वन-बन्दोबस्त वाले कानून को। उनके पास जितनी पुश्तैनी जमीनें थीं वे भी छीन ली गईं मिला केवल पन्द्रह पन्द्रह बिस्वा जमीन का छोटा सा टुकड़ा। जितना कब्जा था उतनी भी जमीन उन्हें बन्दोबस्त नहीं की गई। हल्ला मचा था कि नये वन-बन्दोबस्त कानून 2005 के जरिए आदिवासियों का बहुत भला होगा पर भला होना तो दूर नुकसान कर दिया गया। जिस जमीन को वे पुरखों के जमाने से जोतते-कोड़ते चले आ रहे थे उसे भी छीन लिया गया। जहां जहां जंगल के रिश्ते गॉवों से जुड़े हुए हैं हर जगह मार-पीट है, जंगल हर जगह अपना कब्जा जमाये हुए है। वन-विभाग के खिलाफ कोई बोलने वाला नहीं है। जंगल-विभाग के लोग मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यहां के जो आदिवासी हैं पुराने जमाने से अपनी अपनी जमीनों पर खेती-बारी कर रहे हैं अंग्रेजों के पहलेे से। उस जमाने से जब सोनभद्र में ‘डहिया’ खेती का प्रचलन था। आदिवासी समूह के लोग जमीनों को खेती करने लायक बनाते थे, जमीन पर के झाड़-झंखाड़ पर ‘डहिया’ लगा कर साफ करते थे, कियारियां गढ़ते थे फिर उस पर खेती किया करते थे। पुरखे बताया करते थे कि सोनभद्र में पहले था ही क्या.. चारो तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे, नाले थे, नदियॉ थीं, झाड़-झंखाड़ थे। जोत लायक जमीन बनाने के लिए वे जंगली पेड़ों को नहीं काटते थे केवल समतलीकरण करते थे तथा झाड़-झंखाड़ ही आग लगा कर साफ किया करते थे। अब जब आदिवासी समूह के मिहनती लोगों ने जमीनों को खेती लायक बना दिया फिर जंगल विभाग ने उस पर अपना कब्जा जमा लिया।
‘यह जमीन हमारी है,’ जंगल विभाग लगा पैमाइश करने।
वन-अधिनियम की धारा चार और बीस लगा दिया। मार-पीट कर आदिवासियों को जमीनों से बेदखल कर दिया। जंगल के निवासी अपने विस्थापन की गाथाओं में हैं उन्हीं गाथाओं के साथ वे लाशों को देख लेना चाहते हैं, अस्पताल में दाखिल घायलों से मिल चुके हैं, कोई कराह रहा है तो कोई बता रहा है कि बहुत ही बेरहमी से हत्यारों ने उन्हें मारा-पीटा। बताने वाला बता रहा है कि वह तो बच गया करम बाबा की कृपा से, बन्दूक चलाने वाला हमलावर तो उसके सामने ही था। हमलावरों में से किसी ने रोका था बन्दूक चलाने वाले को, गोली न चलाओ यार! पर उसके ऊपर तो खून सवार था काहे रुकता...बताने वाला हालांकि वह जमीन पर गिर गया था फिर भी सुन सकता था हमलावरों में शामिल हमलावर की बातें...
हमलावरों की गोल में शामिल आदमी चीख रहा है ..‘भागो, भागो यहॉ से, अब कितनों को मारोगे? बीसों गिर चुके हैं जमीन पर, बहुत सारे घायल हो चुके हैं सभी छितराये हुए दिख रहे हैं।’
‘देखो तो गॉव वालों की भीड़ भाग रही है, भागती भीड़ पर हमला नहीं करना चाहिए।’
हमलावरों के साथियों में कुछ संवेदित है, उनमें से एक जो अज्ञात था, वह गाली दे रहा है, कब्जा करने वाले आयोजकांे को....‘सालों ने कहा था कि कब्जा कराने के लिए पुलिस आयेगी, मुकदमे में जीत हो चुकी है। कहीं पुलिस नहीं दिख रही! पुलिस काहे दिखेगी? कोर्ट का आदेश हुआ होता तो पुलिस आती। कौन जानता है कि मुकदमे में जीत हुई है कि नहीं, झूठ भी तो बोल सकता है कब्जा करने का आयोजक। बोला था कि सारा मामला हल हो गया है।’
‘अरेे! मेरी तो बुद्धि मारी जा चुकी थी। मुझे तो तभी समझ जाना चाहिए था जब ढेर सारे आदमी गोलबन्द होने लगे थे, दसियों ट्रेक्टर आ चुके थे। जब सारा कुछ हल हो ही गया था फिर सौ-डेढ़ सौ आदमियों की जरूरत क्या थी यहां लाने की। पूरी फौज ले आया है कब्जा करने वाला आयोजक। दस ट्रेक्टर आये हैं कितना खेत जोतना है केवल सौ डेढ़ सौ बिगहा ही नऽ फिर दस ट्रेक्टर की जरूरत क्या थी लाने की।’
घायल आदमी को होश आ चुकी है, उसकी ऑखों में घटनास्थल का सजीव दृश्य घूमने लगा है। वह पूरी तरह से बोलने-बतियाने की स्थिति में आ चुका है। कहीं हमलावर यहां भी न आ जायें, वे समर्थ हैं, शासन, प्रशासन उनके हाथ में है वह शंकित है पर नहीं समझ रहा है कि वह अस्पताल में है, यहां हमलावर नहीं आ सकते। वह बोल बतिया रहा है उसे देखने वालों से। हालांकि वह महाभारत वाले संजय की वुद्धि का नहीं है फिर भी बता रहा हैं कि मौके पर क्या हुआ और कैसे हुआ? घायलों में से दो तीन और भी बोलने की स्थिति में आ चुके हैं पुलिस उनका बयान ले चुकी है। बबुआ, खेलावन, पुनवासी का बयान भी पुलिस ले चुकी हैं, ये बेचारे थोड़ा दूर थे गोली चालाने वालों से, ये टेªेक्टर के पास थे, खेत जोतने से मना कर रहे थे तभी गोलियॉ चलाई र्गइं और घटना घटी। लाशें जमीन पर गिर जाने के बाद फटा फट आरोपी भाग निकलेे। यही बात वे अस्पताल में आने वालों को भी बता रहे हैं घटना के बारे में जो पुलिस को बता चुके हैं। जमीन के मुकदमे की सामान्य घटना देखते देखते जघन्य घटना में तब्दील हो गई। अदालत का आदेश अगर हमलावर दिखा देते तो ऐसी घटना ही न घटती पर अदालत का आदेश उनके पास तो था नहीं सो वे का दिखाते? जमीन पर बलपूर्वक कब्जा करने का आदेश अदालत किसी भी हाल में न देती।
एक घायल जो कुछ मुखर किस्म का था.. वह कुछ चलाक जान पड़ता है और अपना पक्ष रखने में समर्थ भी.. उसका बताया सारा कुछ किसी खोजी कहानी की तरह है। जादुई याथार्थ से काफी ऊपर...देखे गये सच का यथार्थ यानि कोरा यथार्थ कोई मिलावट नहीं। सुबह सुबह ही गॉव में हल्ला मचा कि हम लोगों की जमीन जोती जा रही है, हल्ला सही था। फिर क्या था पूरा गॉव मौके पर आन डटा, थोड़ी बात-चीत हुई...‘काहे जोत रहे हैं आपलोग हमलोगों की पुश्तैनी जमीन, राजा साहब ने यह जमीन हमलोगों को दिया है।’
गॉव वालों ने ट्रेक्टर चलाने वालों से पूछा...
‘हमलोगों ने इस जमीन का बैनामा करा लिया है सो जोत रहे हैं जमीन।’
‘आपलोगों का बैनामा फर्जी है हम लोग उस बैनामे को सही नहीं मानते, अदालत में मुकदमा चल रहा है, जमीन पर कब्जा करने का आदेश अदालत ने तो दिया ही होगा। अदालत का आदेश देखाइए।’
‘तूॅ लोग कौन होते हो आदेश देखने वाले, हमलोग जमीन जोत रहे हैं अगर यह ‘जमीन तुम लोगों की है तो अदालत से ले आओ सटे(स्थगन) फिर हम लोग नहीं जोतेंगे जमीन।’
‘हम लोग काहे जायें अदालत आप लोग जाओ और जमीन कब्जा करने का आदेश ले आओ। हम लोग तो इस जमीन को बाप-दादे के जमाने से जोत-कोड़ कर रहे हैं। आप नये नये जमीनदार बने हो तो आप जाओ कब्जा करने का आदेश ले आओ।’
सरवन इतना ही बोल पाया था कि हमलावरों ने उसे गोली मार दिया और वह गिर पड़ा जमीन पर... एक ही गोली से ढेर हो गया, उसकी सांसें हवा में टंग गईं।
जमीन कब्जा करने वाले तो अपनी तैयारी में थे, पूरी ताकत इकठ्ठा करके आये थे, वे भला काहे मानते गरीब सत्याग्रहियों की बातें। वे जोर-जबर के सहारे जमीन कब्जियाना चाहते थे। ट्रेक्टर जमीन जोत रहे थे, बातें दूसरे लोग कर रहे थे जिनके हाथ में बैनामा था। बन्दूक चलाने वाले बन्दूक चला रहे थे...
तेतरी, फगुनी, और बैसाखी के पति को भी गोली लगी, वे सरवन के साथ ही थे मौके पर ही मर गये। रजुआ, सुमेरना और लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी गोली से मारे गये, का कउनो देरी लगी। वे सब सामने थे हमलावरों के पास... गोली चली और सब जमीन पर गिर कर चल बसे। गायें कऽ सब लड़िकवे भिड़ गये थे हमलावरों से।
जमीन का जोता जाना जब बन्द नहीं हुआ फिर तो आदिवासी ट्रेक्टरों के आगे सत्याग्रहियों की तरह लेट गये, वे जानते थे ट्रेक्टर के आगे लेट जाने से से जमीन का जोता जाना रुक जायेगा पर नहीं, एक दो आदमी ट्रेक्टर के पहियों के नीचे आ भी गये फिर भी टेªक्टर का चलना बन्द नहीं हुआ कुछ लोग दब भी गये।
शुरुआत हुई थी बात-चीत से बात-चीत जा पहुंची धॉय धॉय तक। बन्दूकंे गरज उठीं और दस सत्याग्रही ढेर हो गये। कुछ लोग गोली से तो कुछ लोग ट्रेक्टर से दब कर मर गये...।
घायल आदमी अपनी बात को कहानी का रूप नहीं दे पा रहा था फिर भी उसकी बातों तथा बताने की शैली में कहानी की ही गंध थी, मन को कंपा कंपा देने वाली। पूरी घटना घटने में मुश्किल से पन्द्रह बीस मिनट लगे होंगे और क्या! इतनी ही देर में कई आदमी गोली लगने से मर गये कई घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े, हर तरफ चीखें उठ गईं, कोई कहीं चीख रहा है तो कोई कराह रहा है, किसी के समझ में ही नहीं आ रहा है कि किस तरफ भागें, कोई कोना सुरक्षित नहीं, खतरा हर तरफ से मुहबाये खड़ा। पर भागना तो था ही। कब्जाधारकों में भी कुछ थे जो मार-पीट रोकना चाह रहे थे वे कोशिश भी कर रहे थे पर उनकी कौन सुनता है खासतौर से वे जिन पर खून के भूत सवार हो गये हों।
घायल आदमी ने बताना रोक दिया है, उसके दवाई खाने का समय हो गया है वैसे भी अस्पताल पर लाशें आ चुकी हैं, अगर वह दो-चार कदम भी चल पाया तो लाशें देखने जायेगा हालांकि उसके घर वालों ने उसे बता दिया है कि गॉव का कौन कौन मरा है।
सभी घायलों का एक ही बयान है बिना मिलावट वाला, बिना वकील की सलाह वाला, अनगिनत बार दुहराये जाने वाला बयान, घायलों के बयान आदलती बयानों
से एकदम अलग हैं, पवित्रा, पूरी तरह से एक, किसी रटे हुए पाठ की तरह, जैसा देखा वैसा बताया, सभी एक ही तरह का बयान दे रहे हैं। आदलतों में तो बयानों के चरित्रा ही पलट जाते हैं, वकीलों की जिरहें तोड़ देती है बयानों को खण्ड खण्ड।
अस्पताल में एम्बुलेन्स की गाड़ियॉ दाखिल होते ही अस्पताल की मरीजिहा भीड़ ने एम्बुलेन्स को घेर लिया है, होड़ लग गई है उनमें कि कौन पहले देख ले मृतकों को। अधिकारी-गण पहले ही अस्पताल आ चुके थे। अस्पताल की व्यवस्था ठीक थी। नहीं ठीक होती तो उसे ठीक रखना सी.एम.एस. की जिम्मेवारी थी। सो वे बेचारे सूचना मिलते ही अस्पताल को व्यवस्थित रखने में जुटे गये थे। वे जानते हैं कि इस समय की लापरवाही की सजा उन्हें मिल सकती है। कुछ डाक्टर जो छुट्टियों पर थे उन्हें भी सी.एम.एस. ने बुलवा लिया है। दस लाशों का पोस्टमार्टम करना कोई सरल काम नहीं है। सी.एम.एस. सचेत हैं वे मन ही मन डाक्टरों की टीम के बारे में विचार चुके थे। पहली टीम में फला फला तो दूसरी टीम में तीसरी टीम में फला फला इसी तरह हर टीम में फला फला। अपने आफिस में बैठे-बैठे वे टीम बनाने के विचार कर लेने के बाद सोच रहे हैं कि और बेहतर क्या किया जा सकता है? कुछ सलाह भी दे रहे हैं उनके साथ बैठे दूसरे डाक्टर। सूची करीब करीब बना ली गई है और तत्संबधी डाक्टरों को बता भी दिया गया है, डाक्टर भी तैयार हैं।
अस्पताल की तैयारी तो है पर तैयारी में निराशा तथा हताशा भी है। ऐसा कभी तथा कहीं भी नहीं सुना गया था एक अचरजनुमा वाक्य डाक्टरों के दिमाग में उधम मचाये हुए है आखिर काहे ऐसा हुआ..? वही जमीन का मामला। एक पुरानी कहावत उनके दिमाग को जकड़ रही है ‘झगड़ा लगावैं तीन, जर जोरू औ जमीन’ तो जमीन का मामला बहुत ही टेढ़ा है। आधा वैज्ञानिक हो चुका डाक्टरों का दिमाग काम नहीं कर रहा है। ऐसे हमलों के बारे में वह भी लोकतांत्रिक समाज में समाजशास्त्राीय ढंग से वे नहीं सोच पा रहे हैं, राजनीतिक ढंग से सोचना तो उनके अध्ययनों से काफी दूर का मामला है। वे कभी भी समाज के सामाजिक अध्ययनों को अपनी चेतना का हिस्सा नहीं बना पाते जबकि वे डाक्टर हैं, मानव शरीर के एक एक हिस्से को जानते हैं, वैज्ञाानिक ढंग से वे बता सकते हैं कि यह जो मानव शरीर के भीतर दिल है किस तरह से क्रिया करता है, आमाशय भोजन को कैसे पचाता है, किडनी गन्दे खून को कैसे साफ करती है। वैसे ही दिमाग क्यों हिंसक हो जाता है? मानव शरीर के एक एक अंग की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के बारे में गुणवत्तापूर्ण जानकारियां रखने के बाद भी वे वे मानव-समाज के भीतर होने वाली मानसिक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं, घातों-प्रतिघातों को नहीं जानते। शायद इस बात को मनोचिकित्सक समझते हों।
वे डाक्टर हैं शरीर विज्ञानी, अर्थविज्ञानी वे नहीं हैं, न ही वे दर्शनशास्त्राी हैं सो वे एक साधरण मनुष्य की तरह गुन रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जाहिर है कि मनुष्य की तरह सोचना एक अलग बात है और मनुष्य बन कर सोचना अलग बात है। डाक्टर मनुष्य भी हैं और डाक्टर भी हैं सो संवदनाओं की उनके पास कमी नहीं, वे चाहते हैं कि जिस मरीज का वे इलाज कर रहे हैं वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाय। घायलों की देख-रेख वे कर चुके हैं अब वे तैयार हैं मृतकों के पोस्टमार्टम के लिए। डाक्टर हल नहीं निकाल पा रहे हैं कि यह जो संपत्ति का मामला है कैसे हल होगा? जिसकेे लिए हर तरफ मार-काट मची हुई हैं। डाक्टर थक जाते हैं और मान लेते हैं कि संपत्ति की लालच वाले रोग को समझना उनके वश का नहीं, वे देह का रोग ठीक कर लें यही बहुत है लालच का रोग ठीक करना उनके कूवत में नहीं।
लाशें आ चुकी हैं अस्पताल में। उन्हंे रखने के लिए एक हाल जैसे कमरे को खाली करा लिया गया है, बारी बारी से ही तो पोस्टमार्टम होगा। लाशें रखी जा रही हैं कमरे में। अस्पताल में शोक वाला सन्नटा पसर हुआ है सभी लोग अपनी अपनी खोलों में दुबके हुए हैं। वहां हर कोई गुन रहा है अपने बारे में कि वह मध्यकाल का नागरिक नहीं है पर क्या सच में? लोगों के दिलोदिमाग से मध्यकाल मिट चुका है, लोकतंत्रा की सहभागिता, सहयोग की कुदरती भावना ने लोगों के दिल दिमाग को हरा भरा बना दिया है, लोग एक व्यक्ति से समष्टि वाली चेतना में खुद को स्थापित या नियोजित कर पाये हैं अगर ऐसा हैे फिर तो वाह वाह क्या कहने? कोई हर्ज नहीं बोलने में कि हमारा लोकतंत्रा अमर रहे, अमर रहे और अमर रहेे।
पोस्टमार्टम करने वाली डाक्टरों की टीम अपने अपने काम में लग चुकी है। डी.एम.व एस.पी. साहेब भी पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहे हैं। वे नहीं चाहते कि किसी भी तरह का बवाल हो। बवाल का क्या वह कहीं भी हो सकता है।
हल्दीघाटी वाले गॉव से लाशें चली आईं कोई बवाल नहीं मचा यह बड़ी बात है, कुछ नेता तो वहां पहुंच ही गये थे बवाल करने के लिए। दोनों अधिकारी अपनी कार्यकुशलता से खुश खुश हैं। अब पोस्टमार्टम हो जाये फिर देखा जायेगा। इसके पहले दोनों आलाअधिकरी घायलों से मिल कर उनका हाल-अहवाल ले चुके हैं तथा जिन जिन घायलों को बनारस भेजा गया है उनके बारे में भी जानकारी भी ले चुके हैं।
अस्पताल से जुड़ा हुआ एक कर्मचारी है जिसे जमादार बोला जाता है जिसकी सहायता के बिना डाक्टर पोस्टमार्टम कर ही नहीं सकते उसे भी सी.एम.एस. साहेब ने पहले से ही अस्पताल पर बुलवा लिया है। वह तैयार बैठा हुआ है। उसकी तैयारी कुछ कुछ अलग किस्म की है वह पोस्टमार्टम के पहले खुद को साधता है, मन को चीर-फाड़ के लिए तैयार करता है। तैयारी के लिए उसे दारू का सहारा लेना पड़ता है। जब वह दारू पी लेता है फिर किसी की नहीं सुनता अपनी धुन में रहता है। इस काम को करते हुए उसे पचीस साल हो चुके हैं अभी तक सोनभद्र के अस्पताल में उसके जैसी योग्यता कोई हासिल नहीं कर सका है, वह अकेलुआ है अपने काम में सो एंेठता भी खूब है। उसकी ऐंठ के आगे डाक्टर भी झुके रहते हैं।
‘हमसे नहीं बनेगा साहेब! गले से लेकर पेट तक शरीर को दो हिस्सों में बाटना, शरीर के चीर-फाड़ वाले हिस्सों की गठरी बनाना फिर लाश को कपड़े में बाधना। मन कांप जाता है साहेब! चीड़-फाड़ वाली लाश देख कर। चेहरा तो साफ देखाता है पर शरीर कटा हुआ थुथुराया हुआ, भर्ता माफिक। डाक्टर भी नाक-मुह सिकोड़ कर चीरते फाड़ते हैं लाशों को। मुझे डर लगता है कि लाश कहीं जिन्दा न हो जाये। रात में सपने आते हैं, सपने में लाशें मुझे ताने मारती हैं..
‘अरे कोई दूसरा काम नाहीं है का जो पोस्टमार्टम करवाते हो, कभी कभी तो डरवाती भी हैं लाशें। अभी एक महीना भी नाहीं बीता होगा... एक लाश के पोस्टमार्टम के काम में मैं था अरे का तो नाम है डाक्टर साहेब का याद आया पाड़े डाक्टर साहेब के साथ। एक जवान लड़की का मामला था। उसने आत्महत्या कर लिया था। डाक्टर साहेब उस लाश का पोस्टमार्टम कर रहे थे। लड़की के पेट में से एक साबूत बच्चा निकला देखने में जिन्दा लग रहा था पर था मरा हुआ। डाक्टर साहेब कांपने लगे, पसीना पसीना हो गये, लगे माथा पोछने, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे को पेट में से कैसे निकालें। बच्चा देखते ही भक्क हो गये। मेरी तरफ देखने लगे। अब इतनी समझ मुझे आ ही गई है कि पोस्टमार्टम में का करना होता है और कैसे करना होता है। डाक्टर साहेब पसीना पसीना थे... बच्चे को पेट में एकदम साबूत देख कर, ‘देख यार! का करूं इसका?’ डाक्टर साहेब ने मुझसे पूछा...
फिर मैंने बच्चे को पेट में से बाहर निकाला हालांकि वह मरा हुआ था, कहीं चीरा नहीं लगा उसकी देह पर।’। पोस्टमार्टम हो जाने के बाद डाक्टर साहेब ने पोस्टमार्टम का कागज-पत्तर बनाया फिर जब खाली हुए तब मुझे पकड़ लिए... अभी जाना नहीं, चलो मेरे साथ मेरे क्वार्टर पर। क्वार्टर पर जाने के बाद पूछने लगे.
‘तुम खुद को कैसे कन्ट्रोल किए रहतेे हो भाई! पोस्टमार्टम के समय, घबड़ाते नहीं हो का?’ पूछा डाक्टर साहेब ने
‘मैं उन्हें का बताता कि साधू हूॅ जो मन को साध लेता हूॅ या तांत्रिक हूॅ। मैं कुछ नाहीं हूॅ साहेब! साधारण आदमी हूॅ। उपाय क्या है मेरे पास और का उपाय करूंगा एक ही काम करता हूॅ। छक कर दारू पीता हूॅ। सी.एम.एस. साहेब से दो बोतल का दाम ले लिया था और दारू खरीद कर रख दिया हूॅ कमरे पर। चिखना भी लाकर रख दिया हूॅ, अब कुछ नाहीं करना है। दारू की बोतल खोलना है और चिखना के साथ बुत भर पीना है। बड़ा आनन्द आता है साहेब पहले चिखना फिर घीरे धीरे दारू, दोनों का मेल गजब का होता है साहेब!
‘दारू तब तक पीते रहना है साहेब! जब तक दारू न बोलने लगे। और जब दारू बोलने लगती है नऽ फिर तो यह जो दुनिया है बहुत ही छोटी हो जाती है। वो समय कोई आ जाये वह बौना ही देखाता है मुझे साहेब! खाली डर लगता है सिपाहियों से वे दारू पीने के बाद भी राक्षसै देखाते हैं मरखनहा की तरह। एक ही उपाय है साहेब! मन को कन्ट्रोल करने का वह है छक कर दारू पीना और दारू में डूब जाना। फिर तो आपको कुछ नाहीं करना है, दारू ही सारा काम करने लगती है और सब कुछ आगे या पीछे का भुला जाता है।’
‘मैं तो कहता हूॅ साहेब कि अगर खुद को भूल जाना है तो दारू पियो और उसी में गोते लगाते रहोे।’
डाक्टर पाण्डेय जमादार का मुह देखते रह गये थे। फिर उन्हांेने ने भी वही किया था जैसा पोस्टमार्टम कराने वाला जमादार किया करता था।
पोस्टमार्टम घर के सामने हैं गॉव वाले, पुलिस उन्हें थोड़ा दूर हटने का आदेश दे रही है उतना ही दूर जितना दूर उनसे कानून है, कानून की प्रक्रियायें हैं, अब मृतक कानूनी प्रक्रियाओं के हिस्से हैं कानून उन्हें देखेगा...
घटना की जॉच करेगा,
कारणों की जॉच करेगा,
कानूनों के उलंघन की जॉच करेगा,
क्या सचमुच?
‘निपटने की भी तमीज नहीं
बनते हैं बड़का आदमी’
‘जॉच में उलझ गई हैं धरती-कथा, उसके पॉव भी रूक गये हैं, छाले पड़ गये हैं पॉवों में, एक कदम भी आगे नहीं चल पायेगी जबकि जाना है उसे बहुत दूर तक, मानव सभ्यता के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बीच में पड़ने वाली तमाम सभ्यताओं से दो-चार होते हुए। सभ्यता का दूसरा किनारा कहां है धरती-कथा को नहीं पता, ‘चरैवेति चरैवेति’ ही उसे याद है सो कथा चल रही है गॉव की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर। पर उसका चलना गणेश-परिक्रमा की तरह जान पड़ रहा है हल्दीघाटी वाले गॉव से निकल जाये फिर पता चले कि वह सभ्यता के दूसरे छोर की तरफ जा रही है। धरती-कथा शंकित भी कम नहीं है क्या सभ्यता के भी ओर-छोर होते हैं, ओर-छोर तो विभाजन जैसा होगा जबकि सभ्यता में तो विभाजन होता ही नहीं। आदमी का अहंकार ही सभ्यता को अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े, गरीब-अमीर में बाटता है। धरती-माई जानती हैं कि आदमी का अहंकार ही भेद-उपभेद पैदा करता है सो अहंकार से बचना चाहिए, हल्दीघाटी गॉव में तो सब तरफ अहंकार ही पसरा हुआ है एसी स्थित में वे क्या करें....कुछ समझ नहीं आ रहा।
समझ में तो पोटमार्टम घर पर मृतकों के जो परिजन है उन्हें भी कुछ नहीं आ रहा है पर वे वहां हैं दर्शक की तरह, देखो जितना देख सकते हो, वहां प्रशासन का काम है, पुलिस का काम है, उसके बाद अदालत का काम शुरू होगा, लोकतंत्रा की
यही मान्य प्रक्रिया है। फिर भी गॉव के लोग तथा मृतकों व घायलों के परिजन वहां हाजिर हैं, वे देख रहे है पूरा दृश्य,उनका वहां देखना भी दृश्य ही है गोलीकाण्ड की घटना तो वेसे भी किसी भयानक दृश्य में बदल चुकी है। दृश्य है कि वह घूम रहा है...दृश्य का काम है घूमते रहना, दृश्य के साथ गॉव के लोग तथा परिजन भी घूम रहे हैं...उनकी ऑखों में दृश्य उतरा चुका है पूरी तरह, वे देख रहे हैं कि...
जमादार पहंुच गया है पोस्टमार्टम घर। जमादार देखने में सामान्य लग रहा है अगर कोई पहचानना चाहे उसे कि वह नशे में है कि नहीं तो नहीं पहचान सकता। वह आधा बोतल से ऊपर की देशी दारू पी लेने के बाद भी सामान्य बना रहने का कलाकार है। उसके जैसे दूसरे भी हो सकते हैं कलाकार पर अस्पताल में उसके जैसा कोई नहीं है। उसके माफिक तो कुछ नेता ही हो सकते हैं जो जनता का सारा कुछ छीन लेते हैं पर सामान्य बने रहते हैं। परमात्मा ने उसकी शक्ल भी कुछ ऐसी बनाई है कि सोख ले मन की सारी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को, कुछ न उभरने दे चेहरे पर। चेहरे पर के उभारों को वह सोख लिया करता है।
डाक्टर भी पहुंच चुके हैं। पोस्टमार्टम घर खुली जगह पर है मुख्य अस्पताल से करीब पचास मीटर दूर एकदम किनारे। डाक्टरों के रहायशी क्वार्टर भी उससे काफी दूर हैं। सामान्य रूप से माना जाता है कि पोस्टमार्टम घर से रात में आवाजें निकलती हैं सो उसके आस-पास रहायशी क्वार्टर नहीं होने चाहिए। अस्पताल की तरफ से दसियों कुर्सियॉ बाहर रखवा दी गई हैं वहीं बाहर एस.पी.साहेब और डी.एम. साहेब बैठे हुए हैं। उनके साथ नगर के सक्रिय लोगों की जमात भी है कई तो उनमें जन-प्रतिनिधि भी हैं। कुछ जन-प्रतिनिधि जो हल्दीघाटी वाले गॉव से लौट चुके हैं वे कहीं क्षेत्रा-भ्रमण पर जा चुके हैं वे यहां नहीं हैं। नगरपालिका के चेयरमैन बैठे हुए हैं आला-अधिकारियों के साथ।
वैसे भी जहॉ आला-अधिकारी विराजमान होते हैं वहां लोग अपने आप जुट जाया करते हैं और आला-अधिकारियों की बातों से खुद को संतुष्ट किया करते हैं। अधिकारियों की हसी में हसी मिलाना यह लोगों की सामान्य क्रिया है, गोया वे आलाअधिकारियों के रूपक बने होते हैं। आला-अधिकारी हसे तो वे हसे नहीं तो हॉ में हॉ में बोलते रहना है। आला-अधिकारी हैं कि खामोशी ओढ़े हुए हैं, वे कुछ नहीं बोल रहे हैं। वैसे भी आला-अधिकारी बातों को कंजूसी से बोलते हैं, वे जानते हैं अपनी बोली का मूल्य, जब तक बोली का पूरा दाम न मिले न बोलो। जितना संभव हो कम बोलो, लोगों को बोलने दो, जब लोग बोलेंगे तभी तो उन्हें तोला जा सकता है। लोगों को तोल कर बोलो तो लोग समझते हैं कि साहेब बहुत ही प्रतिभाशाली हैं।
जमादार चकराया हुआ है आलाअधिकारियों को पोस्टमार्टम घर पर देख कर। ‘इनकी का जरूरत है इहॉ पर पोस्टमार्टम के समय? बहुत हुआ तो दारोगा आ गया नहीं तो सिपाही आते हैं और पोस्टमार्टम करा कर चले जाते हैं।’
जमादार अपना दिमाग ठीक कर रहा है, होगा कोई मतलब, एक गॉव के दस आदमी मारे गये हैं, यह बड़ा मामला है, शायद इसीलिए आला-अधिकारी भी हाजिर हैं नाहीं तो काहे आते यहां, आफिस में बैठ कर फोन घरघरा रहे होते।’
पोस्टमार्टम घर के बाहर हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना छितराई हुई है। सभी एक ही तरह का कारण बता रहे हैं हत्याकाण्ड का जैसे रटे हुए हों। जमीन के कब्जे को लेकर घटना घटी। कोई सलाह दे रहा है कि हमलावरों को झगड़े वाली जमीन खरीदनी ही नहीं चाहिए थी। हमलावरों ने जमीन नहीं वहां झगड़ा खरीदा है। सोनभद्र में तो झगड़े वाली जमीन खरीदना आसान सा काम है। जिस किसी का शासन-प्रशासन तक जोगाड़ है, शरीर की ताकत है, वह औने-पौने दाम में झगड़े वाली जमीन खरीद लिया करता है, भले ही उस जमीन का मामला अदालत में लम्बित हो। सोनभद्र के दक्षिण में ऐसे हजारों मामले होंगे जो बीसियों साल से चल रहे होंगे। जमीनदारी टूटने के बाद से ऐसे मामले बढ़े ही हैं, घटे कत्तई नहीं हैं। हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीन भी इसी लिए हमलावरों ने खरीद लिया और फस गये बवाल में सोचा होगा कि आदिवासी हैं का कर लेंगे? कोई बस्तर या झारखण्ड तो है नहीं? वैसे भी उनके नाम से कागज-पत्तर है ही नहीं, पर नहीं, आदिवासी डट गये और मामला कतल तक जा पहुंचा। कई लोग मार दिये गये। आतंक फैल गया चारो तरफ। पूरा क्षेत्रा कंपकपियों में चला गया जैसे सुन्न हो गया हो सारा कुछ। सुन्न हो भी गया था पूरा क्षेत्रा। हमले को कभी भी किसी भी तरह की जनता उचित नहीं मानती।
जमादार पोस्टमार्टम घर में घुस चुका है, मेज वगैरह ठीक कर रहा है, छूरा, चाकू आदि एक ट्रे में रख रहा है, उसे मालूम है कितने औजारों की जरूरत पड़ेगी। सारे औजार हैंे वहां बस उन्हें सहेजना है, साफ करके रख देना है। वह एक एक औजार साफ कर रख रहा है ट्रे में। पोस्मार्टम के बाद फर्श साफ करने के लिए पानी चाहिए, जमादार नल की टोटी खोल रहा है, उसमें से पानी आ रहा है गनीमत है कि टंकी में पानी है, नहीं तो पानी भी खतम हो जाता है फिर उसे कहीं बाहर से लाना पड़ता है।
पोस्टमार्टम के लिए सारे जरूरी औजारों को सहेज कर जमादार वहां से बाहर निकल रहा है, वह अगल-बगल देख रहा है, कहीं कोई आड़ वाला कोना मिल जाता तो.. पर वहां कोई आड़ वाली जगह नहीं दिख रही जमादार को। फिर वह अस्पताल के बाहर वाले यार्ड की तरफ जाता है, उसे मालूम है कि वहां कोई नहीं होगा। वह एक गन्दी जगह है सो वहां सुनसान भी है, जहां अस्पताल के इलाज वाले कचरे सूइयां, बोतलंे वगैरह फेके जाते हैं। जमानदार उसी जगह पर पहुंच चुका है कुछ ही देर में वह आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहता है। ऐसा नहीं कि वह खुद को विलीन कर देगा मन के करतबों में, संभाले रहेगा खुद को। होश नहीं खोयेगा सिर्फ डूबेगा मन की मौजों में।
हालांकि अपने कमरे से निकलने के पहले ही वह आध्यात्मिकता में डूब चुका था। काम भर की दारू की खुराक लेकर कमरे से निकला था। फिर भी लाल परी की उसे तलब लग गई है कि थोड़ा और ढरका लेते हैं पेट के भीतर। का हो जायेगा पेट में तो जाने कितनी चीजें जाते ही हजम हो जाती हैं फिर भी भूखा रहता है पेट। यह ससुरा कभी भरता ही नहीं।
जमादार पेट को गरियाता है...
‘साला यह पेट नहीं होता तो ऐसा घिनौना काम जिस्म के चीर-फाड़ वाला हम थोड़ै करते। हमरे बाप भी यही करते थे साल भर का खाना नहीं जुटा पाते थे। जाने कितनी बार अइया ने रोका था बपई को कि ऐसा काम न करो, हमरे घरे की बढ़न्तरी रूक गई है। झाड़ू-बहारू वाला काम ही हमलोगों के लिए ठीक है। झाड़ू-बहारू के काम में बहुत आराम है, सड़कै तो साफ करनी होती है, झाड़ू उठाये और साफ कर दिए गली, सड़क। सड़क का कूड़ा-कचरा झाड़ू से ही घसीटते हुए सड़क के एक किनारे लगा दिए। कूड़ा उठाने वाला आयेगा और कूड़ा उठा ले जायेगा। सबरे सबेरे का काम है, काम पूरा करके दस बजे तक खाली हो गये फिर नहा लिए, भगवान का ध्यान लगा लिए, मनौती भी कर लिए भगवान की कि अगले जनम में हमैं ‘मेहतर’ न बनाना, झर-झाड़ू न करना पड़े।’
पर अइया की बातें बपई मानते कहां थे?
जमादार निराश नहीं है..भगवान सुनते कहॉ हैं सबकी, पर नाहीं भगवान ने सुना है हमारी फरियाद। भगवान ने नाहीं सुना होता तो हमलोग आज भी उठउआ पाखाना साफ कर रहे होते। अब तो उठउआ पाखाना के बारे में सोचते ही घिन आती है। हमरे अइया-बपई तथा सास-ससुर उठउआ पाखाना साफ किया करते थे। अइया ने बताया था कभी कि जब वह बिआह कर आई थी तब की बात...बताती थी अइया कि रापटगंज में जहॉ देखो वहां उठउआ पाखाने ही थे। घर के पिछवाड़े मालिक लोग पाखाने को बनवाया करते थे। एक बार हमारी सासू बिमार हो गईं अउर ससुर कही नातेदारी में गये हुए थे। ओ समय दस घरे का काम हमरे ससुर के इहां था। अब हम का करें थोड़ी देर हो गई तब तक एक मालिक हमरे घरे आ गये...
ससुर का नाम लेकर हल्ला करने लगे... हम मड़हा से बाहर निकले
‘का है साहेब!’ हमने पूछा मालिक से
‘अरे! आजु पाखाना साफ नाहीं होगा का? ’...मालिक ने पूछा
‘ काहे नाहीं साफ होगा साहेब। आप चलिए हम आय रहे हैं साफ कर देते हैं।’
का बतावैं उहां का हुआ था, सारा पाखाना महक रहा था, हर तरफ छितराया हुआ था पाखाना, जाने कैसा आदमी गया था निपटने, देखने में लगता था कि उसने हर तरफ पाखाना कर दिया है, जेहर देखो ओहर मैला। लोगों को निपटने की भी तमीज नहीं फिर का करेंगे ऊ। बनते हैं बड़का आदमी अउर सहूर नर-निपटान करने का भी नाहीं, बड़का बनते हैं। बहुत ही घिन आ रही थी पर करते का.. पाखाना साफ तो करना ही था। घिनाते घिनाते साफ किए पाखाना अउर घर आते ही उल्टी करने लगे। खूब उल्टी हुई फिर गिर गये बिस्तरा पर अकल आ गई थी कि नहा लिए थे नहीं तो पूरा घरा बसा जाता।’
अइया तो बपई को रोज ही फटकारती थीं कि पोसटमार्टम वाला काम न करो
ओसे अच्छा है झाड़ू-बहारू वाला काम, पर बपई अइया की बातें सुनते कहां थे उन्होंने ही मुझे भी फसा दिया इस काम में वैसे भी हम दूसर काम करते भी का? सो हमैं तो करना ही था पोसटमार्टम वाला काम।
‘हमार लड़कवे भी मना करते हैं, न करो इस काम को, घर बैठो अउर दो रोटी खाओ। दोनों मजूरी करते हैं। बड़का मोटरसाइकिल का मिस्त्राी हो गया है अउर दुसरका बिजली का काम करता है। दोनों अपने काम में बहुत आगे हैं। बिजली वाला मिस्त्राी तो मकान के बिजली के काम का ठीका लिया करता है, बढ़िया पैसा कमा रहा है। दोनों ठीक-ठाक हैं। हम बूझते हैं कि दोनों मुझे अपना बाप बताने में भी लजाते होंगे पर सही सही नाहीं पता। हमरे बिरादरी का एक लड़का जो मास्टर हो गया है वह कभी आपन जाति नाहीं बताता। वह बताता है कि वह रावत है। अरे जाति का नाम न बताने से का हो जायेगा कउन नाहीं जानता कि राउत का होते हैं। सभै जानते हैं राउत के बारे में। जाति बदल तो लोगे पर बिआह शादी कहां करोगे, मरनी करनी में कौन आयेगा तोहरे इहां लाश उठाने यह सब तो बिरादरियय में करना होगा फेर बिरादरी का नाम बदलने से का फायदा?’
‘हमने समझाय दिया है अपने लड़कों को कि कभी बिरादरी का नाम न छुपाना, काहे छिपाओगे बिरादरी का नाम, कउनो तूने गढ़ा है बिरादरी का नाम, जिसने गढ़ा है ऊ जाने। हम तो साफ साफ बताते हैं अपनी बिरादरी। हमरे बपई भी बिरादरी का नाम नाहीं छिपाते थे पूरा रापटगंज ओन्हैं जानता था। हमरे बाप की बिरादरी में सबसे ऊॅची कूरी थी सो हमरे बाप के पास मुहल्ला भी अधिक थे, अधिक गहकी भी थे। पहले रापटगंज आज की तरह से बड़ा तो था नहीं, छोटा था चौराहे के आस-पास ही बस्ती थी। बिरादरी की पंचाइत वही किया करते थे।
रापटगंज में जबसे पोस्टमार्टम का काम होने लगा तब से बपई पोस्टमार्टम का काम करने लगे डाक्टरों के साथ। पोस्टमार्टम का काम जब आ जाता था तब हमैं भी साथै रख लिया करते थे, अपने दारू पीते थे तो हमैं भी जबरिया पिला दिया करते थे। तबै से लत पड़ गई है अब छोड़ने से थोड़ै छुटने वाली है। जमादार मन के मौजों में डूब चुका है तथा पूरी तरह से होश में भी है, यही तो उसे विशेष बनाती है तथा औरों से अलग भी करती हैै।
जमादार झूमता हुआ पोस्टमार्टम घर की तरफ जा रहा है। अस्पताल के सी.एम.एस. भी उसके सामने से आ रहे हैं। सी.एम.एस. ने जमादार को देखा..
‘ज्यादा पी लिया है का?’ उन्हें जमादार पर शक होता है। उन्हें शक तो पहले से ही था इसी लिए उन्होंने कम्पउन्डर पाडे़ को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि जमादार का ध्यान रखिएगा मौका मिलते ही वह दारू छान लेगा फिर किसी के वश का नहीं कि पोस्टमार्टम हो जाये बिना उसकी मदत के। पोस्टमार्टम हो ही नही सकता। सी.एम.एस. की ऑखों में कम्पाउन्डर पाड़े तैरने लगे, कहॉ हैं पाड़े कितना समझाया था उनको कि जमादार का ध्यान रखिएगा पर नहीं.. छोड़ दिए उसके
अकेला...सी.एम.एस. मन में बुदबुदा रहे हैं....
इधर उधर ही होंगे पाड़े जायेंगे कहां? सामने से आता अस्पताल का एक कर्मचारी दिखता है उन्हें.. वे उसे बुलाकर सहेजते हैं पाड़े को मिलवाइए मुझसे..
पाड़े लाश घर में थे लाशों के साथ, वहां भी तो होना चाहिए किसी को, वहां हाजिर भीड़ को दूर भगाये रखने का बड़ा काम था सो पाड़े लाशों की निगरानी पर थे।
कर्मचारी ने बता दिया है पाड़े को कि सी.एम.एस. साहब ने बुलाया है सो पाड़े भागे भागे आय रहे हैं सोच भी रहे हैं...
‘काहे बुलवा लिया साहेब ने’ कोई काम आ गया होगा तभी तो बुलवाया है। अब पाड़े को का पता कि काम क्या है? जमादार ने अधिक दारू पी लिया है, उसे संभालना है, वह होश में रहेगा तभी तो पोस्टमार्टम हो पायेगा।
सी.एम.एस. ठहरे हुए हैं अस्पताल और पोस्टमार्टम घर के बीचो बीच, पाड़े से बातें हो जायें फिर वे आगे बढ़ें और लाशों को पोस्टमार्टम घर में भेजना शुरू हो।
पाड़े आ गये हैं और सी.एम.एस. साहेब के सामने खड़े हैं फिर सी.एम.एस. साहेब पाड़े से पूछ रहे हैं...
‘कैसे होगा पोस्टमार्टम जमादार तो नशे में धुत्त दीख रहा है, अभी अभी गया है पोस्टमार्टम घर की तरफ।’
‘नाहीं साहब ओके हम समझाय दिये हैं। मोटरसाइकिल पर बैठा कर ओके हम घरे से लाये हैं। हमारी बात वह नाहीं टालेगा साहेब। एक बात अउर है ओकर शकलियो तो नशे में धुत्त माफिक देखाती है। आप चिन्ता न करें साहेब ऊ ठीक ठाक होगा, एकाध बोतल दारू पी लेने से वह बहक थोड़ै जायेगा। हम जायके ओके देखते हैं।’
सी.एम.एस. साहब गंभीर बने हुए हैं जैसे कुछ सोच रहे हों फिर उन्होंने पाड़े को सहेेजा....
‘जाइए आप पोस्टमार्टम घर की तरफ, इधर-उधर न घूमिए, वहीं पर रहना आपके लिए जरूरी है, आपही संभाल सकते हैं जमादार को कोई दूसरा नहीं, उससे बोल दीजिएगा कि उसके लिए बढ़िया इन्तजाम हो जायेगा पोस्टमार्टम हो जाने के बाद, जो मांगेगा मिलेगा भी।’
हाउर हाउर जा रहे हैं पाड़े पोस्टमार्टम घर की तरफ। पोस्टमार्टम घर कितना दूर ही है मुश्किल से पचास कदम पर।
सी.एम.एस. भी वहां से चले गये अस्पताल की तरफ। सी.एम.एस. के जाने के बाद पाड़े को ख्याल आया कि उन्होंने गुटखा तो लिया नहीं, जमादार मांगेगा गुटखा, का देंगे उसे? बच-बचाकर खुद भी खाना है। पाड़े जा तो रहे हैं पोस्टमार्टम घर की तरफ पर किसी को देख भी रहे हैं पर कोई नहीं दिख रहा, लगता है खुद ही जाना पड़ेगा अस्पताल के बाहर, बाहर कई दुकानें हैं पान-गुटखा वाली। पाड़े पहुंच चुके हैं पोस्टमार्टम घर, बस दस कदम और चलना है। तभी वहां उन्हें एक मुहलगा मरीज दिख जाता है..
वह दो महीने से अपना इलाज करा रहा है, पता नहीं क्या है कि उसे बार बार मलेरिया और टाइफाइड हो जाया करता है, अभी नई उमर है। पाड़े ने ही उसे एक डाक्टर को दिखवाया है। इलाज से उसे फायदा है। पाड़े उसे बुलाते हैं और रुपया देते हैं गुटखा लाने के लिए जाओ गुटखा ले आओ...
मरीज रुपया नहीं लेता है, रुपया है साहब हम ले आते हैं आप रहने दीजिए, कुछ तो मौका दीजिए सेवा करने का। मरीज भावुकता में है...
‘अगर पाड़े जी न होते तो उसकी दर-दवाई न हो पाती। पाड़े जी ने ही उसे अस्पताल में भर्ती करवाया, दवाई करवाया तब जाकर वह ठीक हुआ। कई दवाइयां अस्पताल में नहीं होती थीं उसे बाहर से खरीदना होता था। पाड़े जी उसे बाहर से खरीदवा दिया करते थे पाड़े जी के कारण पन्द्रह परसेन्ट की दाम में छूट मिल जाती है बच जाता है दो-तीन सौ रुपया। सो वह भला कैसे ले सकता है पाड़े जी से रुपया वह भी गुटखा के लिए।’
मरीज ने पाड़े जी से रुपया नहीं लिया और चला गया गुटखा खरीदने अस्पताल के बाहर। मरीज के जाने के बाद पाड़े जी पोस्टमार्टम घर.. वहां जमादार था और सचेत था...वह भी लाश आने की प्रतीक्षा में था।
पाड़े जी ने जमादार के चेहरे का सरसरी मुआयना किया...
चेहरा तो ठीक ठाक दिख रहा है, कहीं नशे की खुमारी नहीं छलक रही, फिर साहेब का बोल रहे थे...
साहब तो बोलेंगे ही, दस लाश का पोस्टमार्टम कराना साधारण बात है। पूरे कार्यकाल में अपने इस तरह से तो कभी न फसे होंगे, बहुत हुआ होगा तो एक दो पोस्टमार्टम किए करवाये होंगे इससे अधिक नहीं। घबरा गये हैं साहेब। कोई भी घबरा जायेगा। सारी लाशें यहीं ला दी गईं। अस्पताल तो घोरावल भी है वहां से लाशों को रेफर किया जाना चाहिए था, वहीं पर कागज-पत्तर बन गया होता पर नहीं ले चलो रापटगंज और ले आये सभी लाशों को। प्रशासन को काहे की चन्ता, मरें अस्पताल के लोग उनका काम खत्म। सोचना चाहिए था कि खाली पोस्टमार्टम ही तो नहीं करना है नऽ, परेशानी तो उसके बाद है, रिपोर्ट बनाओ, मुकदमे के दौरान अदालत में हाजिरी दो, वकीलों के बेतुके जिरहों को झेलो, अदालत न जाओ तो वारंट झेलो गोया हर तरफ से बवाल...मरीज गुटखा लेकर आ गया है और पाड़े को दे रहा है। वह भी पोस्टमार्टम घर पर रुक गया है वैसे भी वहां काफी भीड़ है, न अधिकारी वहां से हट रहे हैं और न ही भीड़ हट रही है। कुछ ही देर में पोस्टमार्टम होना शुरू हो जायेगा। जमादार खुद को तैयार किये हुए है उसके साथ पाड़े जमे हुए हैं... उसे छोड़ कर कहीं नहीं जायेंगे। पाड़े को भी डर है, जाने जमादार का करे?
कहीं भाग गया तो...कैसे हो पायेगा पोस्टमार्टम?
‘हम सभी लाश ही तो
हैं एकदम खामोश, चुप, खुद में डूबे’
‘पोस्टमार्टम तो होगा ही, कहीं न कहीं से बुला लिया जायेगा कोई दूसरा जमादार पर धरती और उसकी कथा का क्या होगा? हमारी सभ्यता में धरती खुद एक पात्रा है, इसकी खूबसूरती, इसकी उर्वरा सभी को आकर्षित कर लेती है और लोग हैं कि इसे हासिल करने के लिए, कुछ भी करने की सीमा तक चले जाते हैं और धरती को ही नहीं इसके असल कथा-पात्रों को भी पहुंचा देते हैं पोस्टमार्टम घर तक...वैसे पोस्टमार्टम किस चीज का नहीं होता, यह पोस्टमार्टम ही तो है हमारे कथित सभ्य समाज का जो जाने कितने खानों और परतों में बटा हुआ है। कहते हैं हमारे यहां विभिन्नता में एकता है जो हमारी विशेषता है पर कोई नहीं बताता कि यह जो हमारे समाज में विभिन्नता है उसकी सामाजिक जरूरत क्या है? धरती-माई धरती का समाज देख व समझ कर दुखी हैं, वे चाहती है कि यह जो आदमी ने अपने अहंकारों के संरक्षण के लिए मानव समाज को खानों में बाटा हुआ है गलत है, मानव समाज का हर आदमी बराबर है सभी मायनों में। इस मानव-कृत विभिन्नता के खिलाफ धरती-माई लोक-कल्याण के देवता शिव से शिकायत भी कर चुकी हैं, उनके पास सामाजिक भिन्नता के बाबत ढेर सारी शिकायतें पहुंची हैं पर अभी तक शिव जी ने उन शिकायतों का निस्तारण नहीं किया है... देखिए क्या होता हे आगे...
आगे यही है कि आला-अधिकारी डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर के सामने उनके साथ शोकातुर लोगों की भीड़ भी डटी हुई है साथ ही साथ कुछ ऐसे लोग भी हैं भीड़ में जो सिर्फ देखने के लिए आये हुए हैं कि हो क्या रहा है वहॉ। वैसे वे लोग तमाम तमाशबीनों से अलग मिजाज वाले हैं जो कहीं भी भीड़ का हिस्सा बन जाया करते हैं। वे दुखी हैं और जानना चाह रहे हैं आखिर ऐसा क्या हो गया कि दस लोग भून दिये गये गोलियों से। पर पोस्टमार्टम घर के सामने जबाब तो था नहीं उनके सवालों का, कि वे जान जाते और पोस्टमार्टम घर सवालों के जबाब दे देता लोगों को।
असल बात तो यह भी है कि जबाब किसी के पास नहीं है, थाना भी चुप है और उससे जुड़ा प्रशासन भी चुप है। सरकार के सभी विभाग खामोशी में डूबे हुए हैं। सरकारी ओहदेदारों में किसी को कुछ भी नहीं पता कि हल्दीघाटी वाले मैदान में क्यों खेली गई खून की होली केवल इतना ही पता है कि कैसे खेली गई खून की होली इससे अधिक कुछ भी नहीं। हर तरफ से एक ही बात छन कर आ रही है कि जमीन के कब्जे को लेकर गोलियॉ चलीं, गोली खाने वालों ने कब्जेदारों को रोका, कब्जा नहीं करने दिया जमीन पर, कब्जे का प्रतिरोध किया और चल पड़ी गोलियॉ। जमीन के कब्जे के सवालों को लेकर गोलियॉ चला ही करती हैं, पूरे देश में जमीन के कब्जे को लेकर चलने वाली गोलियों का इतिहास पुराना है। यह जो कब्जे की गोली वाली संस्कृति है आदिम है इसे न तो मुगल रोक पाये, न अंग्रेज रोक पाये और न ही इसे मौजूदा हुकूमत ही रोक पा रही है। गोलियॉ लगातार चल रही हैं कभी कहीं तो कभी कहीं, सोनभद्र में पहली बार चली हैं गोलियॉ। एक बार और गोलियॉ चली थीं सोनभद्र में जब अंग्रेज कलक्टर टक्कर ने चलवाया था माची और सुअरसोत वाले जंगल में। 1857 के स्वतंत्राता संग्राम सेनानी राजा लक्ष्मण सिंह मारे गये थे उनके साथ दो सौ स्वतंत्राता-संग्राम सेनानी भी मारे गये थे। बहरहाल वह मामला अंग्रेजी हुकूमत से बगावत वाला था पर यह मामला तो सीधे सीधे जमीन के कब्जे को लेकर था बगावत या आतंक का नहीं था।
सी.एम.एस. साहब लाशों को भिजवा रहे हैं पोस्टमार्टम घर, पाड़े तैयार हैं वहां दो डाक्टर भी हाजिर हैं। लाश नं.1 जा रही है पोस्टमार्टम घर में। लाश पोस्टमार्टम घर के भीतर जाने के बाद दरवाजा बन्द हो चुका है। जमादार लाश पर ढके कपड़े को हटा चुका है, डाक्टर लाश का मुआयना कर रहे हैं, जख्मों की नापी कर रहे हैं। साबूत लाश पड़ी हुई है आपरेशन टेबुल पर। जैसे बोल ही देगी कि का हुआ था उसके साथ पर लाश नहीं बोलने वाली। गनीमत है कि लाश गन्धा नहीं रही है और न ही उसमें सड़न आई है। कभी कभी तो एकदम सड़ी हुई लाशें भी पोस्टमार्टम के लिए आ जाया करती हैं। हाथ अलग तो पैर अलग पूरी देह बजबजाती गंधाती, कही सबूत नहीं देह का।
डाक्टर जखमांे का नाप ले रहे हैं सामने पड़े कागज पर नाप चढ़ा रहे हैं, चेहरे तथा शरीर के तमाम कुदरती चिन्हों को चढ़ा चुके हैं कागज पर, इन नापों की जरूरत पड़ती है अदालत में। डाक्टर के लिखने की लिपि अंग्रेजी है पर शिनाख्त वाली लिपि उर्दू है। मृतक की पूरी शिनाख्त लिख रहे हैं कागज पर, सावधानी बरत रहे हैं कि एक भी चिन्ह छूटने न पाये हल्के से हल्के तिलों या काले चकत्तों कटे-फटे-टूटे को जोड़ कर लिख रहे हैं। दागों-तिलों को चढ़ा लेने के बाद मृतक की कद-काठी का हिसाब उतार रहे हैं कागज पर। सांवला रंग, भरा भरा सा चेहरा, हटटा-कठठा शरीर, उमर पचीस साल, जवान, इकहरा बदन बस इतना ही कोई बड़ा निशान कटे-फटे का नहीं दिख रहा शरीर पर। इतना तो काफी है और क्या लिखा जायेगा। फारम पूरी तरह से भर चुका है कोई कालम छूटा नहीं है डाक्टर खुद को आश्वस्त कर रहे हैं। क्लीनिकल परीक्षण तो हो ही रहा है यहां पर। फोरंन्सिक परीक्षण के लिए बिसरा वगैरह फोरेन्सिक लैब में भेजना होगा। वे बिसरा को जमा कर चुके हैं अस्पताल का काम है बिसरे को फोरेन्सिक लैब भेजना।
जमादार लाश को गले से लेकर पेट तक जरूरत के हिसाब से चीरा लगा रहा है उसके बाद डाक्टर गोलियॉ तलाशेंगे पेट के भीतर या ऑत वगैरह में। डाक्टर के माथे पर लकीरे उभर गई हैं, वे गोलियॉ तलाश रहे हैं पर वहां गोलियॉ नहीं मिल रही हैं...शरीर को आर-पार छेद कर निकल गई होंगी शरीर से बाहर। गोली के निशान वाली जगह पाइपनुमा बन चुकी हैं उसी जगह के भीतर डाक्टर तलाश रहे हैं गोलियॉ। डाक्टर बुदबुदा रहे हैं कि रायफल की गोली होगी, वह घूमते हुए निकल
जाती है शरीर से बाहर। अगल बगल का सारा मास छील देती है, तभी तो इतना बड़ा खोखला हो गया है। किडनी, लीवर तथा फेफड़ा भी आ गया है गोली के चपेट में। यह आदमी तो तुरंत मर गया होगा मौके पर एक दो मिनट भी जिन्दा नहीं रहा होगा। डाक्टर डाक्टरी का काम करते हुए भावुक हुआ जा रहा है वह अपनी भावुकता जबरिया रोकता है उससे का लेना-देना यह सब तो होता रहता है। वैसे भावुकता रोकना सरल नहीं होता फिर भी डाक्टर रोक रहा है खुद को...
‘तुझसे क्या मतलब तूॅ अपना काम कर, तेरा काम है पोस्टमार्टम करना, रिपोर्ट बनाना इससे अधिक नहीं करना है तुझे कुछ। लाश की उमर क्या है, किस जाति का है, इसके बाल बच्चे हैं कि नहीं, इसके घर में कौन कौन हैं, क्या करेगा यह सब जानकर तूॅ, चल आगे बढ़ और आपना काम कर। पता लगा कि गोली कैसे लगी, किस तरफ से लगी, कितनी गोलियॉ लगीं, गोली लगने के बाद कितनी देर में मरा होगा आदमी यह सब पता कर अगर कर सकता है तो, नहीं तो छोड़ केवल बिसरा इकठ्ठा कर ले और भिजवा दे फोरेन्सिक लैब। कोई अज्ञात मर्डर का मामला नहीं है कि कानूनी झंझट खड़े होंगे मामला बहुत ही क्लीयर है। मारने वाले ज्ञात हैं तो मरने वाले भी ज्ञात हैैं, हत्या के कारण का भी पता है अब इससे अधिक कानून को चाहिए क्या, कानून इतने से अपना काम निपटा लेगा?’
डाक्टर पेशेवर बन चुका है, अनुमान लगा रहा है, लगता है कि एकदम पास में ही रहा होगा मृतक और हमलावर ने पास से ही गोली मारा होगा इसे। दूर रहा होता तो इतना बड़ा जखम नहीं होता। लगता नहीं कि दो गोलियॉ लगी हैं इसे, एक ही गोली में मर गया होगा। माथे वाली चोट तो जमीन पर गिरने के कारण लगी होगी क्योंकि थुथुरा गई है चोट, कुछ खरोंच भी है शरीर पर ये सब भी जमीन पर गिरने के कारण आई होंगी। गोली लगने के बाद दो मिनट भी जीवित नहीं बचा रहा होगा मृतक, कराह कर गिर गया होगा जमीन पर। एक दो हिचकियॉ आई होंगी, संभव है करवट भी बदला हो, संभव यह भी कि है कुछ न हुआ हो, न हिचकियां आई हों और न ही करवट बदला हो, जैसे गिरा होगा जमीन पर उसी तरह मर गया होगा। गोली लगते ही मृतक के प्राण-पखेरू उड़ गये होंगे।
डाक्टर महसूस कर रहा है कि वह अपने पेशे के नियत कामों से अलग जा रहा है, वह किसी वकील या किसी सोसल-वर्कर की तरह सोच रहा है। उससे इस तरह की सोचों से का लेना-देना, उसके सामने एक लाश पड़ी हुई है, उसे इसी लाश का पोस्टमार्टम करना है केवल। कुछ दूसरा नहीं करना है और न ही सोचना है। पर नहीं डाक्टर फिर बहका जा रहा है उसके अन्तःमन में कुछ चित्रा उभर रहे हैं, सारी दुनिया उसे लाश की तरह दीख रही है, वह भीतर संवाद करता है हम सभी लाश ही तो हैं एकदम खामोश। हम कहां जानते हैं अपना पक्ष रखना, अपने पक्ष के लिए संवाद करना। कुछ लाशें बोलती-बतियाती हुई जान पड़ती हैं तो कुछ खोमाशी ओढ़े हुए रहती हैं, हम सभी खोमोशी ओढ़े हुए लाश की मानिन्द ही तो हैं।’
डाक्टर हालांकि वैज्ञानिक हैं, विज्ञान ने ही उसे गढ़ा हुआ है, विज्ञान की पढ़ाई किया है उसने फिर भी दार्शनिक हुआ जा रहा है, उसका दार्शनिक होना अस्वाभाविक नहीं जान पड़ रहा, कोई भी लाश देख कर खुद के जीवन के बारे में सोचने लगेगा, जीवन का मतलब निकालने लगेगा। जीवन तो यही है कि उसे लाश बनना है किसी न किसी दिन।
डाक्टर खुद को जबरिया संभालता है और अपने पेशे की मनःस्थिति की तरफ लौटता है...ऐसा करने के लिए डाक्टर को खुद से संवाद करना पड़ता है...
‘यह तो दुनिया है, दुनिया में लोग मरते-जीते रहते हैं, यह जो मरना-जीना है शारीरिक क्रिया है। बहुत सारे तत्व आपस में मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं तो वही तत्व क्षीण होने पर शरीर को समाप्त भी कर देते हैं, मरना-जीना एक प्रक्रिया है इससे अधिक कुछ भी नहीं।’
डाक्टर तमाम अस्पतलिहा कामों को निपटा रहे है जो कि एकदम अलग तरह का होता है। डाक्टर को चिन्ता है अदालत की, अदालत में भी तो जाना होगा सो सारा काम वह विधिपूर्वक करना चाह रहा है। विधिपूर्वक काम हुआ रहेगा तो परेशानी नहीं होगी। कुछ दिन बाद ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मांग शुरू हो जायेगी। डाक्टर जल्दी में है उसे पता है कि नौ और लाशों का पोस्टमार्टम करना होगा। सी.एम.एस. साहब ने कहा भी है कि पोस्टमार्टम जल्दी करना है जितना संभव हो सके। इसका मतलब यह नहीं कि जरूरी जॉचों को छोड़ देना है।
पोस्टमार्टम घर के सामने की भीड़ जमी हुई थी अधिकारी भी जमे हुए थे। कोई हिलने का नाम नहीं ले रहा था। अधिकारियों को कहीं से सूचना मिली थी कि कुछ आदिवासी संगठन हत्या का विरोध करने के लिए अस्पताल की तरफ आने वाले हैं, अस्पताल के बाद वे मुख्यालय पर जायेंगे वहां कोई ज्ञापन देंगे। सो अधिकारी भी वहीं जमे हुए थे। अधिकारियों का मानना था कि जो घट चुका है वह तो घट ही चुका है पर उसके बाद कोई अप्रिय घटना न घटने पाये। वे सतर्कता बरतने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते थे। सो वे ऑखें खोले हुए थे तथा कानों को सतर्क किए हुए थे।
करीब दो घंटे गुजरे होंगे कि हल्दीघाटी वाले गॉव में ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ गाने वाला वह लड़का तनबुड़ुक भी पोस्टमार्टम घर आ धमका। वहां उपस्थित लोगों में से किसी ने उसे पहचाना नहीं पर जो हल्दीघाटी वाले गॉव के थे वे पहचान रहे थे। वह लाशें जहां रखी हुई थीं वहां से लौटा था अपने भाई को ढूढ रहा था पर वह अपने भाई को कैसे पहचानता सारी लाशें तो कपड़े से ढंकी हुई थीं।
अस्पताल आने के बाद वह वहां सभी से पूछता...गॉव वालों से भी पूछता...
‘मेरा भाई कहां है?’
जहां लाशें रखी हुई थीं वहां किसी को नही पता कि उसका भाई कौन है। लाशों पर नंबर लगाने वाले को ही पता था कि कौन लाश किसकी है जिसे रजिस्टर पर चढ़ा लिया गया था। अब वहां कौन खाली है जो बताता कि उसका भाई कौन है। वह अस्पताल में चिल्ला रहा है ...
कैसा अस्पताल है यह? मेरा भाई भर्ती है यहां और कोई नहीं बता रहा कि मेरा भाई कहां है। कहीं छिपा दिया है अस्पताल वालों ने। गॉव पर तो उसे बताया गया था कि उसके भाई को अस्पताल वाले ले गये हैं।
‘अस्पताल वाले चोर हैं, ये मरीजों की किडनी निकाल लेते है, ऑखें निकाल लेते हैं और बेच देते हैैंं, इसी लिए मेरे भाई के बारे में नहीं बता रहे हैं लगता है कहीं छिपा दिये हैं पर मैं अपने भाई को तलाश कर रहूंगा। अस्पताल के बड़े साहब से मिलूंगा, कलक्टर साहब से मिलूंगा, कैसे छिपाओगे मेरे भाई को।’
उस लड़के को लाश घर के सामने से दूर हटाया जा रहा है वह विरोध नहीं करता, निकल रहा है वहां से।
वहां से निकलने के बाद वह सीधे भीड़ की तरफ जा रहा है यानि पोस्टमार्टम घर की तरफ। तब तक जाने क्या हुआ कि वह पीछे लौट आया...
पीछे आने पर उसे एक आदमी मिला जिसके कंधे पर एक बैग लटक रहा था। लड़के ने अनुमान लगाया कि इस आदमी के पास सादा कागज होगा और कलम भी। अस्पताल के काम से आता तो बैग लेकर नहीं आता। लड़के का अनुमान सही निकला। लड़के ने उस आदमी से एक दरखास लिखने के लिए निवेदन किया...
‘भाई साहब एक दरखास लिख दीजिए।’
कैसी दरखास पूछा अनजान आदमी ने..
‘मेरे भाई को अस्पताल वाले जाने कहां छिपा दिए हैं, गॉव पर लोगों ने बताया कि उन्हें अस्पताल वाले ले गये हैं रापटगंज। गॉव से भागा भागा में यहां आया हूॅ अस्पताल। अस्पताल में सभी से पूछ चुका हूं कोई नहीं बता रहा मेरे भाई के बारे में, आप जानते हैं ये अस्पताल वाले बहुत बड़े चोर होते हैं, ये किडनी निकाल कर बेच देते हैं इसी लिए मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हैं।’
लड़के की बातें सुनकर अनजान आदमी चकरा गया। का बोल रहा है यह लड़का, लगता है कि इसका दिमाग ठीक नहीं है..
उसने लड़के को समझाया...
‘ऐसा नही होता भाई! का बोल रहे हो, जाओ अपना काम करो, घर चले जाओ और आराम करो। किसी डाक्टर को दिखा कर दर-दवाई ले लो।’
अनजान आदमी लड़के को समझाकर आगे बढ़ना चाहा तभी लड़के ने उसे रोक लिया और बोला..
‘अरे भाई साहब! मेरी कोई नहीं सुन रहा आप तो सुनिए मेरी बात। भाई साहब!
आप मेरी चिन्ता न करें, मैं पूरी तरह से ठीक हूॅ, मैं जानता हूूॅ कि अस्पताल वालों ने मेरे भाई को कहीं छिपा दिया है। आप दरखास तो लिखिए फिर देखिए तमाशा। जब कलक्टर साहब आयेंगे नऽ तब पता चलेगा इन लोगों को। आप नहीं जानते कि इस समय जो कलक्टर साहब हैं नऽ बहुत ही ईमानदार हैं, वे अस्पताल वालों की खटिया खड़ी कर देंगे। आप दरखास लिखिए आगे मेरे ऊपर छोड़ दीजिए।’
‘लड़का रिरियाने लगा।’
अनजान आदमी कुछ ठीक ठाक था नहीं तो दूसरा होता तो सरक लेता दूसरे का बवाल अपने सिर काहे लेता।
‘अच्छा बताओ का बात है तेरे भाई को असपताल वाले कब यहां ले आये?’ अनजान ने सवाल पूछा...
लड़का संयत था...
‘आज ही ले आये हैं सरकारी गाड़ी से भाई साहब! मैं भी उसके पीछे पीछे आ रहा हूॅ बस पकड़ कर।’
‘तेरा भाई बिमार था क्या...?’
‘नाहीं भाई साहेब वह बिमार नहीं था वह बेसुध पड़ा हुआ था। मैंने उसे गॉव पर देखा था फिर जाने का हुआ कि गॉव वालों ने मुझे वहां से भगा दिया। लोग बता रहे थे कि वह गोली लगने से मर चुका है पर वे झूठ बोल रहे थे। मेरा भाई कभी नहीं मर सकता, गोली भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वह मुझे देखते ही जिन्दा हो जायेगा पर साले मुझे नहीं देखने दे रहे है मेरे भाई को। इसी लिए तो बोल रहा हूॅ कि आप दरखास लिख दीजिए मुझे दरखास देना है कलक्टर साहब को। मैं अपने भाई को यहां से लौटाकर ले जाने के लिए आया हूॅ।’
अनजान आदमी समझ नहीं पा रहा है कि वह का करे। लड़का पागल भी नहीं समझ में आ रहा है लगता है, भाई को मरा देख कर घबरा गया है सो बक बक कर रहा है। अनजान आदमी ने लड़के का गॉव पूछा...क्योंकि उसे पता था कि एक गॉव में गालियॉ चली हैं जिसमें कई आदमी मारे गये हैं..संभव है लड़का उसी गॉव का हो।
लड़के ने गॉव का नाम बताया फिर अनजान आदमी समझ गया कि लड़का सुध-बुध खो चुका है, इसे ढंग से समझाना होगा। पर ढंग से अनजान आदमी लड़के को का समझाता। उसे तो अन्दाजा हो गया था कि लड़के केे भाई की लाश पोस्टमार्टम के लिए लाई गई होगी और लड़का समझ रहा है कि दर-दवाई के लिए लाया गया है उसका भाई। पोस्टमार्टम के बारे में लड़के को बताना ठीक नहीं होगा। फिर दरखास ही लिख देते हैं यही ठीक होगा। बिना दरखास लिखवाये लड़का उसे छोड़ने वाला नहीं है।
अनजान आदमी ने अपने बैग से एक पेज कागज निकाला, कलम जेब से निकाल लिया फिर दरखास लिखना शुरू कर दिया...
बोलो का लिखें दरखास में... लड़का भी तो बताये कुछ।
लड़का बताने लगा...लड़के के बताने के अनुसार अनजान ने दरखास लिख दिया और दरखास लड़के को थमा दिया। लड़का वहीं खड़ा खड़ा इधर उधर देख रहा था कि उसे गॉव के दो चार लोग दिखे...
लड़का उस तरफ दौड़ पड़ा...
लड़के ने गॉव वालों से पूछा अपने भाई के बारे में.....
‘कहां है मेरा भाई, ले चलो मुझे मेरे भाई के पास’
गॉव वाले तो जानते ही थे कि भाई की लाश देख कर ही लड़का सुध-बुध खो चुका है....वे भी भला लड़के को का बताते... लड़का गॉव वालों से नाराज हो जाता है, लगता है गॉव वालों को गरियाने...
‘साले! तुम लोग मेरे भाई को कहीं छिपा दिये हो और बोल रहे हो कि मर गया मेरा भाई। मेरा भाई मर गया है तो उसकी लाश तो दिखाओ। मेरा भाई तो देवता था देवता, देवता भला कभी मरते हैं। अस्पताल वालों ने उसे छिपा दिया है कहीं, तुमलोग भी अस्पताल वालों से मिले हुए हो।’
लड़का गॉव वालों से नाराज हो कर चल देता है पोस्टमार्टम घर की तरफ मन में बुदबुदाते हुए... ‘कोई किसी का नहीं होता सब अपने में आन्हर हैं।’
‘दृश्य पलट रहा है..
सरकार और प्रशासन के काम की तरफ’
‘आन्हर तो हैं ही सभी, कुछ जान-बूझ कर आन्हर हैं तो कुछ कुदरती आन्हर हैंं। परेशानी जान-बूझ कर बने आन्हरों से है, वे देखते हुए भी नहीं देखते, वे वही देखते है जो उन्हें देखना होता है या जो उनके अगुआ उन्हें दिखाते हैं। उनके पास ऑखें होते हुए भी ऑखें नहीं होतीं और यह जो देखना है... देखते वे ही हैं जिनके पास ऑखें होती है। लोग देखते हैं क्योंकि उसके पास ऑखें हैं, गलत है। यह धरती-कथा भी नहीं दिखेगी ऐसे लोगों को जो देखना ही नहीं चाहते, वे सक्रिय ऑखों वाले अन्धे हैं। पर धरती-माई की ऑखें खुली हुई हैं वे सारा कुछ देख व समझ रही हैं, वे उस गीत को भी सुन रही हैं जिसे कथा में एक लड़का बराबर गाता हुआ चल रहा है। धरती-माई उस लड़के के गीत से प्रसन्न हैं, मन ही मन उसे आशीर्वाद दे रही हैं, इतनी कम उमर और इस तरह का गीत, उनकी अस्मिता का वर्णन करता ‘कैसे किसी की हो सकती है धरती भला...’
नहीं यह तो गलत है कैसे बाट लोगे धरती को, आकाश नहीं बट सकता फिर धरती कैसे बट जायेगी?
पोस्टमार्टम घर के सामने पहले की तरह ही भीड़ जमी हुई है। सात लाशों का पोस्टमार्टम हो चुका है। आला-अधिकारी भी डटी हुई भीड़ में खोये हुए हैं, वे डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर। लग नहीं रहा है कि वहां आला-अधिकारी भी हैं। आला अधिकारियों के चेहरे छिप से गये हैं भीड़ में, नहीं दिख रही उनकी गरिमा। वही अधिकारी जब अपने दफ्तरों में होते हैं तब उनके चेहरों से जोति निकलती रहती है गरिमा की। पर पोस्टमार्टम घर पर तो उनकी जोति कहीं बिला सी गई है।
सी.एम.एस. साहब भी खोए हुए हैं भीड़ में, वे समझ नहीं पा रहे हैं कि ये आला-अधिकारी यहां का कर रहे हैं? अधिकारियों की जोति में वे इधर उधर उछल रहे हैं पता नहीं कब और क्या आदेश जारी कर दें। वे मन ही मन सोच रहे हैं कि आला-अधिकारी चले जाते तो ठीक होता।
पोस्टमार्टम का क्या है वह तो हो ही जायेगा। यह सब तो पहले से ही सोचना चाहिए था कि मुख्यालय पर भीड़ जुटाना ठीक नहीं होगा। मर्डर का मामला है सारी लाशों को मुख्यालय के अस्पताल पर भिजवा दिया यह भी कोई तरीका है? वहीं पास ही में घोरावल की पी.एच.सी. थी वहीं रोक लेते, घायलों का इलाज वहीं हो जाता बकिया को रेफर कर देते पर नहीं घायलों को भी यहीं संभालो और लाशों का पोस्टमार्टम भी यहीं करो। सी.एम.ओ. साहब हैं कि उन्हें तनिक भी चिन्ता नहीं कहीं छिप कर सिगरेट फूंक रहे होंगे। वे तो चिकित्सा विभाग के आला-अधिकारी हैं उनका काम है यहां का सारा इन्तजाम करना, पर नहीं सारा कुछ थोप दिया सी.एम.एस. पर? अब भुगतो सारा बवाल। वो तो अच्छा हुआ कि सभी डाक्टरों को बुलवा लिया अस्पताल नहीं तो का होता! कोई बता रहा था कि लखनऊ से कोई मंत्राी जी आ रहे हैं, वे हल्दीघाटी वाले गॉव जायेंगे खैर उससे मेरा क्या लेना-देना, उसे डी.एम. साहब जानें। सी.एम.एस. झुंझलाये हुए हैं, उन्हें अच्छा नहीं लग रहा सी.एम.एस. होना यह भी क्या तरक्की है केवल मेडिकल आफिसर ही रहते तो ठीक था। ड्यूटी करते और घर निकल जाते।
बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी गॉव के लोगों के साथ डटे हुए हैं पोस्टमार्टम घर पर, उन्हें चीर-फाड़ के बाद लाशें ले जाना है गॉव पर, भला वे लाशें छोड़कर कैसे वापस लौटते। डी.एम और एस.पी. दोनों फुसफुसाकर राय बना चुके हैं कि पोस्टमार्टम के बाद लाशों को गॉव तक भिजवाना है और कुछ आर्थिक सहायता भी उनलोगों की करना है जिससे गॉव में तनाव न बढ़ने पाये। दोनों आला-अधिकारी हैं उन्हें इसी बात की शिक्षा भी दी गई है कि विपरीत परिस्थितियों का जन-भावना के अनुसार कैसे अनुकूलन किया जाये। विपरीत परिस्थितियों के अनुकूलन में उन्हें महारथ हासिल है। मातहत अधिकारियों से विमर्श करके आला-अधिकारियों ने अगले कार्यक्रम की रूप-रेखा बना लिया है।
अगले कार्यक्रम में तय था कि लाशों के कफन-दफन के लिए मृतकों के परिजनों की आर्थिक सहायता करना है जिससे उन्हें तकलीफ न हो। खर्च-वर्च की व्यवस्था सदर तहसीलदार के जिम्मे लगा दिया गया है वे अपने काम में लग चुके हैं।
एस.पी. साहब पोस्टमार्टम घर से थोड़ा आगे निकल चुके हैं शायद वहां से मोबाइल का टावर काम नहीं कर रहा था। वे कोई नम्बर मिला रहे हैं तथा जानना चाह रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव की क्या स्थिति है? हालांकि वहां पर सुरक्षा का
पोख्ता इन्तजाम कर दिया गया है एक तरह से गॉव को पुलिस की छावनी में तब्दील कर दिया गया है। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस का यह आजमाया हुआ तरीका होता है कि पूरे गॉव को घेर लो, गॉव में बाहरियों को घुसने ही न दो। गॉव में आने वाले एक एक आदमी की चेकिंग करो। यहां तक कि मृतकों के रिश्तेदारों को भी गॉव में बिना चेकिंग के न घुसने दो। पुलिस ऐसे मामलों में कत्तई कोताही नहीं बरतती, पुलिस की चेकिंग पुलिस सक्रियता के उदाहरण माफिक होता है। एकदम चुश्त तथा दुरूश्त पशु-पक्षी भी उनकी सतर्कता देख कर कॉपने लगें।
पुलिस का सक्रिय दस्ता आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए निकल चुका है, किसी भगोड़े आरोपी को ढूढ निकालना उन्हें आता है, इस कला में वे माहिर होते हैं। दिक्कत तब होती है जब वे खुद आरोपी को नहीं पकड़ना चाहते, चाहे कारण जायज हो या नाजायज नहीं तो पुलिस की पकड़ से आरोपियों का बचना मुश्किल होता है। वे एक दो दिन में पकड़ ही लिए जायेंगे पर आरोपियों की संख्या पचास के पार है यही एक दिक्कत-तलब बात है नहीं तो कोई दूसरी बात नहीं। एस.पी.साहब इसी लिए परेशान हैं तथा लगातार कोशिश कर रहे हैं कि देर रात तक किसी भी हाल में मुख्य आरोपी की पकड़ हो जानी चाहिए। वे बार बार सक्षम अधिकारियों तथा दारोगाओं से बतिया रहे हैं, कलक्टर साहब कई बार मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारियों के बारे में एस.पी से बातें कर चुके हैं।
पोस्टमार्टम घर के सामने से एस.पी. तथा डी.एम. दोनों निकल रहे हैं। वे पैदल चलते हुए मुख्य अस्पताल के बगल वाले जन-औषधालय केन्द्र के आस-पास आ चुके हैं, दोनों लोग देखने में गंभीर दीख रहे हैं वैसे अधिकारी गंभीर दिखते भी हैं। उनके पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी लेफ्ट-राइट कर रहे हैं। सुरक्षाकर्मी सावधान हैं पर उनकी सावधानी का कोई काम अस्पताल परिसर में नहीं दिख रहा पर वे करें क्या सावधान दिखने तथा दिखते रहने का ही तो उन्हें वेतन मिलता है सो वे अपना काम कर रहे हैं।
डी.एम. साहब अचानक एक जगह पर खड़े हो जाते हैं और अपना मोबाइल एस.पी. साहब को दे देते हैं, इसे पढ़ लें मैसेज आया है...
एस.पी. साहब मोबाइल का मैसेज पढ़ रहे हैं। मैसेज पढ़ लेने के बाद मोबाइल लौटा देते हैं डी.एम. साहब को...
‘चलिए अच्छा हुआ आज मंत्राी जी नहीं आ रहे हैं’ एस.पी.साहब प्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं, डी.एम. साहब से तभी डी.एम. साहब का मोबाइल घनघना उठा...
फिर तो डी.एम. साहब... लगे जबाब देने...
‘हॉ सर! सर, सर, सर, हॉ सर,! सारा इन्तजाम हो चुका है सर! लाशों की वापसी के बाद मुझे भी हल्दीघाटी वाले गॉव जाना है सर! हॉ सर, एस.पी. साहब भी जायेंगे सर, मेरे साथ ही हैं। कफन-दफन के बाद ही लौटंेगे हम लोग। हॉ सर, वहां शान्ति है सर! वहां धारा 144 लगा दिया गया है सर! विरोधी पारटी के तमाम नेता परेता
वहां जाने का प्रोग्राम बना चुके थे सर! इन्टेलिजेन्स से मुझे जैसे ही खबर मिली तुरन्त मैंने धारा 144 लगवा दिया। पुलिस और प्रशासन दोनों एकमत हैं 144 लगाने के बाबत, 144 लगाने में देर नहीं की गई। घटना की खबर लगते ही 144 लगवा दिया गया। ए.डी.एम. साहब तो सुबह से ही लगे हुए हैं शान्ति-व्यवस्था के काम में। सारे अधिकारी तथा फोर्स के लोग सुबह से ही बिना खाये-पिये जुटे हुए हैं सुरक्षा के काम में। लाशों का शव-दाह हो जाने के बाद ही सभी के खाने के लिए इन्तजाम किया जायेगा।’
‘हॉ हॉ सर! शव-दाह के लिए आर्थिक सहायता सभी को दी जायेगी सर! सरकारी बजट तो बहुत ही कम है सर! दूसरे तरीके से इन्तजाम करके सभी को पॉच पॉच हजार दिया जा रहा है। एस.डी.एम. व तहसीलदार घोरावल के जिम्मे लगा दिया गया है शव-दाह का काम। तहसीलदार घोरावल ने तीन चार ट्राली सूखी लकड़ी जंगल विभाग की चौकी से मंगवा लिया है जिससे लाशों के शव-दाह में दिक्कत न हो सभी लाशों का शव-दाह ही होना है सर! कोई मुसलमान नहीं है उनमें सर! आदिवासी हैं सभी सर! हॉ हॉ सर! वे भी शव-दाह ही करते हैं लाशों का। वहां सारी तैयारी हो चुकी है सर! अभी तीन मृतकों का पोस्टमार्टम किया जाना है जो रात ढलने तक हो जायेगा सर!’
‘आप निश्चिंत रहंे सर! अगर मंत्राी जी आ रहे हैं तो आयें उन्हें कोई शिकायत नहींे मिलेगी... हॉ हॉ सर! हमलोग किसी भी तरह से विरोधी दल के नेताओं को वहां जाने नहीं देंगे। हॉ हॉ सर! घायलों की देख रेख हो रही है उनमें जो ज्यादा सीरियस थे उन्हें बी.एच.यू. रेफर कर दिया गया है।’
‘अरे नहीं सर! क्या मुख्यमंत्राी जी!’
‘तो ठीक है सर! वे दो तीन दिन बाद आ रहे हैं, कोई बात नहीं सर! आयें यहां सारा इन्तजाम उन्हें ठीक मिलेगा। कुछ बड़े पत्राकारों तथा विरोधी दलों के नेताओं से मेरी और एस.पी.साहब की बातें हो चुकी हैं वे लोग भी इस घटना को एक संयोग ही मान रहे हैं सो उनकी तरफ से कोई परेशानी नहीं आने वाली। पत्राकार तो गये थे मौके पर गॉव वालों ने झगड़े का कारण जमीन पर कब्जे को बताया जो सच है सर! सारा झगड़ा जमीन कब्जाने को लेकर हुआ।’
‘हॉ हां सर! रात में ही मुख्य आरोपी पकड़ लिया जायेगा उसकी पकड़ के बाद सारे आरोपी पकड़ लिए जायेंगे। आरोपियों के बारे में जानकारी रखने वाला एक चालाक मुखवीर पुलिस के संपर्क में है सर!’
‘क्या सर! झगड़ा कैसे हुआ, मार-पीट क्यों हो गई? इसकी जॉच हमलोग कर रहे हैं। दोनों पक्षों के वकीलों को भी हम लोग जॉच के दायरे में रखे हुए हैं।
‘क्या सर! वकीलों ने...’
‘नहीं नहीं सर! ऐसा नही जान पड़ता, आरोपी कोई मूर्ख नहीं जो वकीलों के कहने पर इतना गंभीर काण्ड कर देंगे। आरोपी काफी धनी-मानी और सरहंग किस्म के हैं
ये अपने मन से बवाल किए हैं। वकीलों के फोन को सर्विलान्स पर लगा दिया गया है। सर! सारी काल डिटेल निकल जायेगी। हमलोग इस मामले का हर ऐन्गिल से देख रहे हैं सर!’ कुछ पत्राकार जो प्रशासन के काफी करीब हैं वे भी प्रशासन की मदत कर रहे हैं सर!’
मोबाइल पर हुई सारी बातों का हवाला डी.एम. साहब ने संक्षेप में एस.पी. साहब को बताया। एस.पी.साहब हॉ में हॉ कर रहे थे। उनके अपने लोग बार बार उन्हें बता रहे थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला टी.वी. तथा अखबारों के लिए बहुत बड़ा बन चुका है। तमाम चैनलों से खबरें दिखाई जा रही हैं। गनीमत है कि खबरंे सारी की सारी शाकाहारी हैं उनमें घटना के लिए किसी अधिकारी को जिम्मेवार नहीं बताया जा रहा। अभी तो केवल खबरंे ही दिखाई जा रही हैं। संभव है टी.वी. के पत्राकार घटना-स्थल के दौरे के बाद अधिकारियों से तथा पक्ष-विपक्ष के वकीलों से भी मिलें और घटना के बारे में जानकारी जुटा कर फिर कुछ दूसरा प्रसारित करें।
वैसे भी पुलिस के लिए यह मामला रहस्यमय तो था नहीं आतंकवादी हमलों की तरह जो पुलिस के लिए दिक्कत होती पूरा मामला खुला खुला था। जमीन का मामला था और गोली चलाने वाला पक्ष सभी के सामने था। कुछ अज्ञात थे उनका पता चल ही जायेगा।
फिर भी डी.एम. साहब को अनुमान लग चुका है कि अब उन्हें इस जिले में नहीं रहने दिया जायेगा चाहे जिस दिन उनका ट्रान्सफर हो जाये, एस.पी. भी नहीं रहने वाले, वे भी जायेंगे। यह सरकारों का पुराना तरीका होता है बड़ी घटना घट जाने के बाद कि कम से कम आला-अधिकारियों को जनपद से रवाना कर दो। बाद में आगे की कार्यवाही करते रहो।
डी.एम.साहब तथा एस.पी.साहब दोनों लोग पोस्टमार्टम घर की तरफ लौट रहे हैं वे सोच रहे हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम का काम खतम हो जाये। हालांकि वहां दूसरे अधिकारी लगे हुए हैं, सी.एम.एस. साहब भी वहीं हैं वे भी प्रयासरत हैं कि जल्दी से पोस्टमार्टम खतम हो फिर वे चैन की सांस लें। सुबह से लेकर अभी तक एक प्याली चाय भी नहीं पी पाये हैं, कैसे पियें चाय? पाड़े कम्पाउन्डर ने दो तीन बार पूछा है चाय के लिए कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब के लिए चाय मंगवा देते हैं या तो आफिस में ही बनवाय देते हैं। सी.एम.एस. आफिस में पूरी व्यवस्था है चाय बनाने की। सी.एम.एस. ने ही मना कर दिया...
‘नहीं रहने दो इस भीड़ में चाय क्या पीना, लोेग अच्छा नहीं मानेंगे।’
वैसे सी.एम.एस. के मन में दो-तीन बार आया कि डी.एम. साहब तथा एस.पी.साहब को दफ्तर में ले जा कर ही चाय पिला दी जाये पर उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। वे नहीं बोल पाये आला-अधिकारियों से। यही तो रूआब होता है अधिकारियों का जो मातहतों को अदब में रखे रहता है और वे बेचारे चाय वगैरह के लिए भी नहीं पूछ पाते अधिकारियों से, कहीं नाराज न हो जायें साहब!
डी.एम. साहब पूछ रहे हैं सी.एम.एस. साहब से...
‘कितनी देर लगेगी पोस्टमार्टम में अभी, जल्दी निपटवाइए यहां का काम। उनके साथ एस.पी.साहब भी...हॉ भाई जल्दी निपटाओ अभी बहुत काम है.. अब यहां तो कोई बवाल नहीं होने वाला... आदिवासी हैं बेचारों के साथ चलेगा भी कौन, कोई नहीं दिख रहा उनके साथ वैसे भी गरीबों के साथ चलता ही कौन है?..
‘अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. डी.एम. साहब बोल पड़े...’
दो-तीन दलित व आदिवासी नेता मेरे पास आये थे, वे बहुत बक-बक कर रहे थे। बोल रहे थे कि प्रशासन की गलती के कारण इतना बड़ा काण्ड हो गया सोनभद्र में...
‘इसमें प्रशासन की का गलती है?’ थोड़ा ऐंठ कर मैंने पूछा था उनसे
‘जमीन के विवाद के मुकदमे का निपटारा हो गया होता तो ऐसा नहीं होता. नेता बोल रहे थे...
‘मुकदमे का निपटारा प्रशासन करेगा क्या? वह भी दीवानी के मुकदमे का..’
‘राजस्व का मुकदमा भी तो चल रहा है...’ नेताओं ने प्रतिवाद किया
‘उससे क्या हुआ, मुकदमे नियम कायदे से निस्तारित होते हैं उसमें प्रशासन क्या कर लेगा? फिर अब तक आप लोग कहॉ थे, जब दस आदिवासी सत्याग्रही मौत के घाट उतार दिये गये फिर आये है लाशों पर राजनीति करने। पहले काहे नहीं आवाज उठाये जो अब बोल रहे हैं। मैं तो कहूंगा आप नेताओं की खामोशी के कारण इतना जघन्य काण्ड हुआ नहीं तो आप लोग अगर सतर्क होते तो यह घटना न घटती। बहरहाल आप अपना काम करें और प्रशासन को अपना काम करने दें यही उचित होगा।’ तब जाकर दलित नेता खामोश हुए थे।
एस.पी. और डी.एम. बतिया ही रहे थे कि तनबुड़ुक थाली बजाते हुए वहां हाजिर हो गया... यह वही लड़का था गॉव वाला।
यह वही लड़का था जो एक अनजान से दरखास लिखवा रहा था..
दरख्वास्त उसकी जेब में थी और थाली की आवाज के साथ गाना गाने लगा, गाने के बोल को थाली के बोल के साथ मिलाते हुए... अद्भुत संयोजन था गीत और थाली के वाद्य धुन का...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी केहू कऽ न भई’
अधिकारी उसके गीत को एक बार हल्दीघाटी वाले गॉव में सुन चुके थे, रोमांचित करने वाला गीत था। डी.एम. और एस.पी दोनों डूबे जा रहे थे गीत के धुनों में। उन्हें पता था कि लड़के का भाई गोलीकाण्ड में मारा गया है सो उनकी मानवीय संवेदना लड़के के साथ जुड़ गई थी तथा गीत का दर्शन भी उनके साथ जुड़ गया। जो उन्हें ‘सब धन धूरि समान’ की तरफ ले जा रहा था। ‘रुपया हाथ का मैल’ होता है, ‘माया महा ठगिन हम जानी’ के दर्शन में दोनों आलाधिकारी उतर चुके थे। तभी .....
सुरक्षाकर्मियों ने लड़के को पकड़ लिया.. उसके मुह पर हाथ लगा दिया...
‘चुप कर यह क्या कर रहे हो, यहां गाना गा रहे हो...’
सुरक्षकर्मियों से लड़का खुद को छुड़ाने लगता है, पर वह खुद को नहीं छुड़ा पाता. तभी डी.एम. साहब ने सुरक्षाकर्मियों को रोक दिया...
‘उसे गाने दो...’
लड़का गाना फिर से शुरू करता है बीच में सुरक्षाकर्मियों ने उसे रोक दिया था। इस बार वह कुदरती चेतना में है तथा कुदरती धुन के साथ। लड़का जैसे अधिकारियों से संवाद कर रहा हो...कि इस दुनिया में क्या है सभी को मर जाना है, गॉव के दस सत्याग्रही मर गये, मेरे भइया का पता नहीं का हुआ उनका? धन-दौलत के पहाड़ का का मतलब, पिर्थबी का का मतलब, काहे लोगों की जान ले रहे हो जमीन की खातिर.
पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी केहू कऽ न भई
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई,
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी,
जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई,
सत!जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी,
दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी,
भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही
त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी,
ओहू के संग धरती हाथ भर न गई,
पिर्थबी केहू कऽ न भई।’
आदिवासी गीत का गीतमय संदेश निराला था जो अधिकारियों तथा वहां उपस्थित लोगों को मजबूर कर रहा था कि वे सोचें गीत के द्वारा भी जीवन दर्शन की बातें की जा सकती हैं जिसे किसी दूसरे माध्यम से नहीं कहा जा सकता। गोली के दमनकारी संवाद के प्रतिरोध में कुदरती गीत का संवाद काफी अर्थयुक्त था जो समझना चाहे समझे जो न समझना चाहे उसे मजाक बना दे।
धरती-माई भी सुन रही हैं तनबुड़ुक का गीत, यही तो सच है उनका, धरती तो सभी की है, सभी के लिए है। धरती का मालिक बन जाना यह गलत है, पूरी मनुष्यता के खिलाफ है पर...
मनुष्य तो लालची हो गया है और लालच क्या नहीं करा सकती। मानव-सभ्यता में यह जो लालच है कैसे घुस गई आखिर? लालच ही तो पसरी हुई हर तरफ, हुकूमत करने वाले हों या नियाव करने वाले सभी ने ओढ़ा हुआ है लालच की मुलायम चादर, उस मुलायम चादर से बाहर कोई नहीं निकलना चाहता, दिक्कत यही है जो कभी खतम नहीं होने वाली।
‘नियाव देखिए, नाचेगा अब
कानून की चुनरी ओढ़ कर’
‘मानव-सभ्यता में लालच, भोग, विलास अहंकार, भेद-उपभेद, अपना-पराया जैसे दुर्गुण प्रभावकारी स्थान बना कर समाज का संचालन करने लगेंगे, नेतृत्व करने लगेंगे और सभ्यता की परिभाषा गढ़ने लगेंगे। बताने लगेंगे कि सत्य तथा असत्य, न्याय तथा अन्याय क्या है फिर तो हो चुका मानव सभ्यता का भला। धरती-माई सोच सोच कर कॉप रही हैं तथा रास्ता तलाश रही हैं कि धरती को दुर्गुणों से कैसे मुक्त करें पर क्या वे धरती को दुर्गुणों से मुक्त कर पायेंगी!
अभी तो वे उलझी हुई हैं धरती-कथा में। कथा के प्रमुख पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, जो धरती पर अधिकार जमाने वाले लोभियों की क्रूरता के कारण लाशों में तब्दील हो चुके हैं, उनके खून से धरती का कर्ज चुकता हो पाया कि नहीं, पता नहीं, शायद कहानी कुछ बोले इस बाबत...’
कहानी कुछ नहीं बोलती बोलते हैं उसके पात्रा, और पात्रा हैं कि लाश बन चुके हैं जो जीवित हैं वेपोस्टमार्टम घर के सामने खड़े हैं, बैठे हैं, वे भीड़ बन चुके है। पुलिस के लोग उन्हें व्यवस्थित किए हुए हैं, दो सिपाही लगे हुए हैं इस काम में। कोई किसी को समझा रहा है तो कोई डाट रहा है...हल्ला न करो, चुप रहो, पोस्टमार्टम के बाद लाशें मिल जायेंगी। बबुआ अपने साथियों के साथ लोगों की भीड़ में दुबका पड़ा है...वह मनुष्य न हो कर दृश्य बन चुका है एक ऐसा दृश्य जिसे देखते ही ऑखें भर जायें, चेहरा उतर जाये पर करे क्या, उसे तो दृश्य बनाना ही था..दृश्य में सरवन है पर वह तो चला गया कई सत्याग्रहियों के साथ। वह अब नहीं लौटेगा धरती पर। अब उसे ही मुकदमा देखना होगा, इस कतल का भी। समूह की खेती देखनी होगी पर जब जमीन बची रहेगी तब न समूह की खेती होगी, पता नाहीं का करने वाली है धरती-माई। धरती माई की कहनी भी गजब है, खून से रंगी हुई। गॉव को संभालना होगा। वह खुद को मन ही मन तैयार कर रहा है। गुटखा पर गुटखा खाये जा रहा है। उसकी मेहरारू भी साथै है उसके साथ सुगनी भी है। बबुआ नाराज हो रहा है अपनी बीबी पर...
‘का रे! बिफनी!’
‘गुटखा खाने से भी रोक रही है तूं, का कउनो दारू पी रहे हैं, अब का दारू पियेंगे हम, अब कबउ दारू नाहीं पियेंगे’
बिफनी बोल पड़ी...
‘हम गुटका खाने से थोड़ै रोक रहे हैं, ये ही बोल रहे हैं कि कम खाओ’
सुगनी, बिफनी, तेतरी,फगुनी और बैसाखी सभी साथ बैठी हुई हैं पोस्टमार्टम घर से थोड़ी दूर पर। बुधनी काकी और परमू दोनों घायलों को देखने गये हैं अस्पताल के वार्ड में। घायल ठीक-ठाक हैं उनका इलाज चल रहा है। दो चार दिन में सब ठीक
होकर घर चले जायेंगे। दो लोग जो बनारस भेजे गये हैं दवाई के लिए उनकी खबर है कि वे ठीक हैं, उनके घर वाले गये हैं उनके साथ...
तेतरी तो साल भर पहले ही बिआही थी अउर फगुनी तथा बैसाखी का बिआह दो साल पहले हुआ था। तेतरी का पति होमगार्ड की नौकरी पा गया था और फगुनी का पति एक स्कूल में चपरासी पर लग गया था, बैसाखी का पति टेम्पो चलाता था। तीनों अच्छी कमाई कर रहे थे पर किस्मत भी तो होती है कुछ।
सरवन के साथ ये तीनों लड़के पूरी जोश के साथ भिड़ गये थे हमलावरों से..भिड़ने को तो रजुआ, सुमेरना, लखना, कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन भी भिड़ गये थे। सरवन ही सबका नेता था, नेता आगे आगे और दूसरे जवान उसके पीछे पीछे। उन्हें भी पता नहीं था कि आरोपी बन्दूकंे चला देगे, मार देंगे गोली पर नहीं, गोली चली और वे मारे गयेे। मौके पर बुद्धन ने समझाया था सरवन को..
‘देखो हमैं मार-पीट नाहीं करनी है तो नाहीं करनी है, मुकदमा चल रहा है तो हम काहे फिकिर करें...हमें डंडा नाहीं चलाना है चाहे जो भी हो।’
‘हॉ यार! बुद्धन, हम मार-पीट नहींे करेंगे पर खेत पर भी न जायें ई कइसे होगा चलो खेत पर चलते हैं...हम केहू पर हमला नाहीं करेंगे पर आपन बात तो कहेंगे नऽ ओ लोगन से..’
बात ही बोल रहे थे बुद्धन और सरवन, इहय बोल रहे थे के गलत होय रहा है, आपलोग हम लोगों की जमीन जीन जोतो, मुकदमा चल रहा है ओकर फैसला होय जाने दो...’
पर बात केवल बात तो होती नहीं, जहां स्वार्थ होता है, वहां बात ताकत तक जा पहुंचती है, आरोपी तो तैयार बैठे थे सो वे बात काहे सुनते... उन्हें ताकत के परदर्शन का मौका चाहिए था, मौका मिल गया और धॉय धॉय। कलुआ, नन्दू और तनबुड़ुक का भाई बुद्धन सभी मारे गये, सभी सामने थे हमलावरों के, तनेन थे मानो उन्हें डर ही न हो... का होगा मरि जायेंगे अउर का? गोलियां चल र्गइं... सबसे पहले गोली सरवन को लगी और वह जमीन पर भहरा गया फिर एक गोली और लगी, उसके साथ तेतरी का पति रजुआ जो होमगार्ड था वह सरवन की लाश पर लोट गया और फगुनी का पति सुमेरना तथा बैसाखी का पति लखना दोनों हमलावरों से बन्दूक छीनने लगे गॉव के दूसरे लड़के भी हमलावरों से बचाव में भिड़ गये थे, लखना तथा सुमेरना बन्दूक छीन ही रहे थे कि हमलावरों की तरफ से धुआधार गोलियॉ चलने लगीं। सरवन की लाश के एक तरफ लखना और दूसरी तरफ सुमेरना दोनों गिर पड़े जमीन पर और सांसंे छोड़ बैठे। बुद्धन तो पहले ही सरवन की लाश के पास गिर कर सांसें छोड़ चुका था...
गॉव की भीड़... का करती उहां, भागी गॉव की तरफ, हमलावरों ने उनका पीछा कर उन्हें लाठी डंडांे से पीटा वे जितना पीट सकते थे...
सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी और बैसाखी के साथ बैठी हुई हैं। उनमें केवल
बिफनी ही बची हुई है उसका पति बबुआ किसी तरह से बच गया है जबकि वह सरवन के साथ ही था उस समय। वह पेशाब करने चला गया था और सरवन लखना, नन्दू और सुमेरन एक साथ हमलावरों से बतिया रहे थे उन्हें का पता था कि गोलियॉ चल जायेंगी।
मृतकों व घायलों के परिजनों की ऑखों तथा मन में घटनास्थल का दृश्य स्थायी तौर पर अंकित हो गया है, बात बात पर उभर आता है और निहत्थे मृतक तो बात कर रहे थे अपनी बोली में, और हमलावर गोली से बतिया रहे थे।
बिफनी परेशान है आखिर कब तक होगा पोस्टमार्टम? वह बबुआ को देख रही है वह आ जाता तो कुछ पता चलता पोस्टमार्टम के बारे में। सामने से आता दिख रहा है बबुआ.. उसके साथ गॉव के दो लड़के और हैं।
‘का हो केतना देरी है पोसटमार्टम में अपने पति से पूछा बिफनी ने। सात लाशों का पोसटमार्टम होय चुका है तीन अउर बाकी हैं। डाक्टर बताय रहे हैं के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका की लाशें अब जायेंगी पोसटमार्टम के लिए। ये बेचारे तो वहां झगड़ा छोड़ाय रहे थे ओही में एहूलोगन के गोली लग गई। इनकी मेहरारू अउर लड़कवे भी अस्पताल पर डटे हुए हैं।
सुगनी अपने पति का चेहरा देखना चाहती है, तेतरी, फगुनी और बैसाखी वे तीनों बिफनी से बोल रही हैं... तीनों मौके पर लाशों पर लेट गई थीं। सुगनी कुछ पढ़ी लिखी है, घोरावल बाजार की है, बोलना-बतियाना जानती है, वह भिड़ गई थी महिला दारोगा से मौके पर...
‘काहे लाश ले जायेंगी मैडम! अब जब गोली चल गई तब आई हैं देखाने के हमरे राज में पुलिस है, पुलिस नियाव करती है, कमजोरों की मदत करती है, हमरे अजिया ससुर के जमाने से मुकदमा चल रहा है तब कउनो अधिकारी के नाहीं बुझाया के मामला ठंडा करो, गॉव में चलि के पंचाइत करो अउर मामला के निपटाय दो पर नाहीं... अब आई हैं लाश लेजाने के लिए जमराज की तरह। सब देखा भी रहे हैं जमराज की तरह, ऊ तो एस.पी. साहब ने अकिल से काम लिया..’
‘अरे तूं हमार बिटिया की तरह है, लाश ले जाने दो बिटिया! तूं लोगन के संघे नियाव होगा, हमसे जवन चाहे किरिया खवाय लो’
एस.पी. साहब की बोल में जैसे जादू था सुगनी सरवन की लाश से अलग होय गई, मेहरारू दरोगवा तो कुरूछ थी, बेरुखी थी, अउर कड़क बोलती थी गरियाने लायक।
‘सुगनी भी रिरिया रही है अपने पति का मुह देखने के लिए कि एक बार मुहवां देखवाय देती बहिन...’
मुह देखाने की बात सुनते ही लगा बिफनी रो पड़ेगी, उसकी ऑखें डब डबा गईं, वह दौड़ी बबुआ की तरफ, बबुआ वहीं पोस्टमार्टम घर के सामने था..
‘का हो तनिक सुनो तो’ बिफनी ने पति से कहा
‘का है, का बात है...पूछा बबुआ ने बिफनी से..
सुगनी, तेतरी, बैसाखी अपने मरदों का मुह देखना चाहती हैं एक बार कइसहूं मुंह देखवाय देते...
‘कइसे होगा इहां, इहां कइसे मुह देखाई होगी.. पुलिस वाले देखने नाहीं देंगे, कपडा से बंधी हैं लाशें, सील, मोहर लगी है ओन पर, अच्छा देखते हैं के का होता है?’
बबुआ पोसटमार्टम घर की तरफ गया और वहां ड्यूटी दे रहे एक सिपाही से निवेदन किया...
‘साहब एक मेहरारू है ओकर पति कऽ लाश है ईहां, ऊ अपने पति का मुह देखना चाह रही है, एक बार देखवाय दो साहेब।’ सिपाही थोड़ा नरम मिजाज का था उसने बबुआ को समझाया..
‘काहे घबराय रहे हो, कुछ देर की ही तो बात है, पोस्टमार्टम होय चुका है फिर सारी लाशें पंचनामे के बाद तूं लोगों को मिल जायेंगी। गॉव ले जा कर शवदाह के पहले औरतों को मुह देखवा देना। यहां कौन खोलेगा कपड़ा, यहां संभव नहीं है।’
बबुआ लौट आया पोस्टमार्टम घर से...उसे देखते ही बिफनी पूछ बैठी उससे. ‘का हुआ मुह देखने देंगे नऽ साहब लोग’
नाहीं हो ईहो नाहीं देखने देंगे, बोल रहे हैं गॉव ले जा कर मुह देखवा देना, हमहूं देखना चाहते थे सरवन का मुह, जब से इहां आये हैं तब से फेरा में पड़े हैं के कइसहूं देख लें पर कउनो नाहीं देखने दिए, जाने दो चलो घरे देख लेंगे हम लोग। लशिया नहलवाना होगा नऽ ओही समय सबके देखवाय देंगे, इहय ठीक रहेगा। जायके ओन्हने के समझाय दो के जवन हौवे के होता है होय जाता है, ओमें केहू का जोर नाहीं है। कुछ देर की अउर बात है सभै के गांयें ही चलना है।’
‘अरे बिफनी एक काम करती तऽ जायके देख लेती के नगेशर, बलेशर अउर सन्तू काका के परिवार वाले कहां हैं, एक घंटा पहले तो मिले थे सबको गोलियाय लो, सब एक साथ रहें, देख रही हो अस्पताल में बहुत भीड़ है पूरा अस्पताल भरा है खचाखच, जाओ देख कर आओ, सबके एही बोलवाय लो, एहरै एम्बुलेन्स भी आयेगी।’
‘हां हां अब्बै जाय के ओ लोगन केे देख रही हूं, चल सुगनी तूंहो चल इहां बइठ कर का करेगी? नाहीं दीदी तूं जाओ हमार मन नाहीं कर रहा है कहीं आने-जाने का, हम नाहीं जायेंगे। बिफनी अकेली जा रही है नगेशर, बलेशर अउर सन्तू के परिवार वालों को देखने के लिए, कहां होंगे ऊ लोग... फटकवा के तरफ होंगे ओहरै पान-गुटखा अउर चाह-पानी की दुकान है। एहर तो नाहीं देखा रहे कहां चले गये? सामने से आती एक औरत दिखी जो नगेशर की मेहरारू की तरह दिख रही थी, वहीं होगी नगेशर बो काकी...।
वह औरत नगेशर बो काकी ही थीं, हाउर हाउर बिफनी पहुंची आने वाली औरत
के पास... ‘का हो काकी चलो पोसटमार्टम घरे की तरफ, ओहरै रहना है, हं इ बताओ बलेशर अउर सन्तू बो काकी कहां हैं?’
‘का बतावैं बिफनी! दोनों बेसुध पड़ी हैं अउर जहां जच्चा-बच्चा वाला बरामदा है नऽ ओही लेटी हुई हैं, ओही जगह खाली है, नाहीं तऽ सब जगह भीड़ ही भीड़ है। दोनों का रोते रोते बुरा हाल है, कइसहूं हम अपने को संभाले हैं, का करें बाल-बुतरू हैं ओन्हय तऽ संभालना होगा ही नऽ’
बिफनी गॉव के लोगों को गोलिया कर ले आई है पोस्टमार्टम घर के सामने, वहीं सब बैठे हुए हैं, एम्बुलेन्संे आने लगी हैं, तीन एम्बुलेन्स का इन्तजाम प्रशासन ने किया हुआ है। यह एम्बुलेन्स कुछ दूसरे तरह की है लगता है लाशें ढोने वाली है। कुछ ही देर में लाशों को गॉव भेजा जायेगा, अभी अभी बबुआ बता कर गया है गॉव वालों को...
धरती माई को कितना खून चाहिए पीने के लिए बबुआ! खेलावन, बंधू, पुनवासी को नहीं पता, क्या ये जीवित लोग भी बलि चढ़ जायेंगे धरती-माई के नाम पर?
‘सरहंग लील चुके हैं उजाले को
गॉव है तो रहे अन्धेरे में’
‘धरती-माई किसी का बलि नहीं स्वीकारतीं, बलि क्या होती है वे जानती तक नहीं। बलि की परंपरा को तो धरती के लोभियों ने सृजित किया है, शास्त्रों तक में लिख दिया है। धरती-माई नाराज हैं इस परंपरा से, उनका वश चलता तो वे मिटा देतीं इस परंपरा को तथा इसके अनुयायियों को कठोर से कठोर दण्ड भी देतीं पर किसी परंपरा को मिटाना तथा किसी को दण्ड देना उनके अधिकार में नहीं है। वे तो धरती का केवल हरा-भरा रखने की देवी हैं, न्याय की देवी नहीं हैं वे। फिर भी धरती पर चालित बलि जैसी कुप्रथा के बारे में न्याय की देवी से वे बातें करेंगी। फिलहाल वे खामोश हैं तथा मंथन कर रही हैं। वे देख रही हैं कि धरती-कथा के अधिकारीनुमा पात्रा प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का देहान्तरण आश्चर्य-जनक लग रहा है उन्हें, नाटकीय तो है ही। भला अधिकारी यानि उनके योग्य पुत्रा प्रताड़ितों की काया में कैसे रूपान्तरित हो सकते हैं..उनकी देह, उनके दिमाग, उनके चिन्तन तो सब के सब सुविधाओं के गुलाम हैं, भला ये कैसे लौट सकते हैं अपने कुदरती स्वरूप में..!’
कोई नहीं लौटना चाहता कुदरती स्वरूप में, कुदरती स्वरूप में लौट कर का होगा? धरती कथा के पात्रों का पोस्टमार्टम हो चुका है, लाशों को हल्दीघाटी वाले गॉव भेजा जा रहा है। गॉव से आये परिजनों को भी गॉव भेजने का प्रबंध प्रशासन ने किया हुआ था। लाशों के साथ सुरक्षा का तगड़ा प्रबंध था, कई गाड़ियां प्रशासन की आगे पीछे थीं, कहीं कोई अवरोध न आने पाये। पूरा रास्ता विलापों तथा चीखों से सना हुआ था कहीं ऐसा नहीं था कि मृतकों के परिजनों की ऑखें बरस न रही हों। पूरी वारिश हो रही थी ऑखों से। गाड़ियों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी भी खुद को संयत नहीं रख पा रहे थे, वे भी ऑसुओं में थे, केवल रो नहीं रहे थे। वे वर्दीधारी थे, वे खुद को भावुकताओं में डूबने से बचाए हुए थे। उनमें जो मुखर थे वे आरोपियों को गालियॉ दे रहे थे...
‘बहादुरी का इतना ही जुनून था तो फौज में चले जाते, निहत्थों पर गोली चलाने से राणाप्रताप बन जाओगे का..? पुलिस को चाहिए पहले आरोपियों को पकड़े तथा यातना-गृह में डाल कर अधिकतम यातना दे, फिर अदालत में हाजिर कराये.. कठोर से कठोर सजा देने का काम पुलिस ही कर सकती है। अदालत का क्या है... जाने का करें, वहां तो गवाही-साखी होगी, बहसें होंगी, किताबें पलटी जायेंगी, जाने कितने साल लगे फैसला आने में, वैसे कोई आरोपी बचेगा नहीं, एक उम्मीद है।’
मृतकांे के परिजनों के साथ चलने वाले सुरक्षाकर्मी अश्रुपूरित हो चुके हैं। परिजनों को रोता देख कर वे सुरक्षाकर्मी के कर्तव्यों से अलग होकर एक मनुष्य बन चुके हैं, वे समझा रहे हैं परिजनों को...
किसी को काका जी तो किसी को बहिन जी तो किसी को माता जी यही संबोधन है उनका, पूरी तरह से कुदरती, वहां प्रशासन की शासकीय भाषा तथा बोली का कहीं अता-पता नहीं...
‘मत रोइए माता जी! आपकी तबियत खराब हो जायेगी।’
‘मत रोइए काका जी! आप वैसे ही बीमार दिख रहे हैं।’
‘बहिन जी! आपके छोटे छोटे बच्चे हैं, इन्हें संभालिए, इन्हें देखिए, देखिए यह बच्चा कितना रो रहा है... इसे संभालिए।’
सुरक्षाकर्मी खुद से बोल रहा है...
‘कुछ खाना-पीना तो बच्चों को मिला नहीं होगा, कौन देगा खाना पीना इन्हें। सभी बेचारे हत्याकाण्ड के बाद से ही लाशों के साथ लाश बने हुए हैं। कौन है इन्हें संभालने वाला। रिश्तेदार भी सारे के सारे रो रहे हैं। ऐसे में खाने-पीने का ख्याल कहां...
सुरक्षाकर्मी स्वविवेक से एक जगह पुलिस वैन रोकवा देता है और गाड़ी से उतर कर एक दुकान में जाता है, कई पैकेट बिस्कुट खरीदता है फिर गाड़ी पर सवार होता है। वह बिस्कुट बच्चों में बाटता है... उसे पता था कि बीच रास्ते में पुलिस वैन रोकवाना गलत है फिर भी उसने रोकवा दिया पुलिस वैन... का हो जायेगा वैन रोकवाने से...
‘बहिन जी बिस्कुट खिला दीजिए बच्चों को।’
बिस्कुट देखते ही बच्चे खिल जाते हैं, कुछ तो खाने के लिए मिलेगा, लालच में उनकी जीभें हिलने लगती हैं।..
सुरक्षाकर्मी बच्चों का खिलना देख कर अपने खुद के जीवन में दाखिल हो जाता
है। वह भी दलित परिवार का हैै, नया नया भर्ती हुआ है पुलिस में। उसने देखा है अपने गॉव में सरहंगों के कारनामों को। वह जानता है कि सरहंगों का वश चले तो सूरज का उजाला लील जायें कहीं रौशनी ही न होने दें। जगह-जमीन पर जो काबिज हैैंं ही, वश चले तो चॉद-तारों को भी कब्जिाया लें, पूरी दुनिया पर कब्जा कर लें। वे नहीं चाहते कि उनके सामने कोई दलित दो जून की रोटी भी खाये और अपने पैर पर खड़ा हो जाये। वैसे अब काफी गनीमत है कहीं मार-काट नहीं हो रही है, दलित अपने पट्टे वाली जमीनों पर काबिज हो कर खेती कर रहे हैं लेकिन सब जगह ऐसा नहीं है।
नया सिपाही हल्दीघाटी वाले गॉव में भी था, गया था लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लाने के लिए, पूरा गॉव चीख रहा था, रो रहा था। हालांकि गॉव के आकाश में बादल नहीं थे, आसमान साफ था पर उसे लगता था कि आसमान पर खून के लाल लाल चकत्ते उभर आये हैं, उन चकत्तों में से मानव सभ्यता की क्रूरता की दर्दनाक कहानियॉ झॉक रही हैं।
वैसे नया सिपाही कर भी क्या सकता था वह केवल भावुकता में डूब सकता था सो डूब गया था। वह कोई कवि तो था नहीं कि इस जघन्य हत्याकाण्ड पर कवितायें लिखता। उसे जो काम मिला था कर रहा था।
आला-अधिकारी भी पोस्टमार्टम हो जाने के बाद जा चुके थे अपने अपने बंगलों पर। पर वे पहले की तरह खिले हुए नहीं थे, उनके चेहरे मुर्झाये हुए थे। उनके चेहरों को तमाम तरह के प्रशासनिक तनावों ने जकड़ लिया था। प्रशासनिक तनावों के अलावा भी मनुष्य होने के जो तनाव थे वे भी चेहरों पर चस्पा हो चुके थे। वे पहले मनुष्य थे बाद में अधिकारी थे, मनुष्यता-बोध में उनका डूबना उन्हें तनावग्रस्त किए हुए था फिर आदिवासी लड़के तनबुड़ुक का गाया गीत ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई’ भी उन्हें परेशान किए हुए था।
घर पर थोड़ा रिलैक्स होने पर अधिकारी जीवन-दर्शन की तमाम धारणाओं में गोते लगाने लगे...जिसमें निर्गुण अधिक था सगुण था ही नहीं। यह धन-दौलत का मामला समझ से बाहर है, थोडी सी जमीन के लिए भी चल जाया करती है गोलियॉ, किसी भी क्षेत्रा को हल्दीघाटी का मैदान बना दिया जाता है। कहा जाता है कि सोनभद्र ठण्डा परिक्षेत्रा है, यहां खून के चकत्तांे वाली बदरियॉ नही दिखतीं, यहॉ तो हर तरफ वसंत नाचता-कूदता रहता है गॉव-गॉव गली-गली, यहां की हवायें भी बेधक और मादक हुआ करती हैं सो यहां के लागों का चित्त शान्त तथा संगीत-मय होता है मादर की धुन की तरह, पर नहीं झूठ बोलते हैं लोग।
जीवन का मतलब क्या है...? जनमना और मर जाना फिर संपत्ति का का मतलब, काहे के लिए संपत्ति। देह और दिमाग के द्वन्द में अधिकारी ऐसा उलझ चुके थे कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे मन को कैसे हसायें? प्रशासनिक दायित्वों का तनाव अलग से था। सुबह ही रिपोर्ट भेजना है सरकार को, सरकार सख्त है, मुख्यमंत्राी जी खुद काफी सख्त हैं, वे किसी की नहीं सुनते, सामान्य सी गलती
पर भी कठोर दण्ड देतेे हैं। किसी की भी सफाई उनके यहां पहुंच कर बौनी हो जाती है, सफाई से बचाव होने के बजाय दण्ड की ही अधिक संभवना रहती है। सो कोई भी अधिकारी सफाई देने से बचता है।
डी.एम. साहब के यहां देर रात तक फोन आते रहे कभी मुख्य सचिव का तो कभी किसी का। इन्टिेलिजेन्स वाले भी उन्हें लगातार फोन करते रहे। वे किसी से कुछ तो किसी से कुछ बतियाते रहे। देर रात हो जाने के कारण उनसे नींद भी दूर छिटक गई थी। नींद में डूबने के लिए उनके पास साधन भी नहीं थे।
साधन होता भी कैसे? बेचारे अकेले रहते थे। पत्नी बच्चों को बढ़िया शिक्षा दिलवाने के लिए लखनऊ में जमी हुई थीं। डी.एम. साहब साहित्यकार भी नहीं थे अगर होते तो कवितायें लिख कर खुद को बहला लेते या कोई कहानी ही लिखते पर ऐसा नहीं था। वे पढा़कू थे तथा पढाई के दौरान उन्हीं किताबों को पढ़ा करते थे जिससे परीक्षा में अधिक नंबर आये। उन्हें नंबर मिला भी करते थेे। कभी नंबर की कमी ने उन्हें परेशान नहींे किया बल्कि उससे उन्हें और पढ़ने की प्रेरणा ही मिली। अक्सर वे नंबर वाले विषयों को रट लिया करते थे उसे बार बार दुहराया करते थे। हालांकि उन रटे हुए विषयों की उन्हें अब कभी आवश्यकता नहीं पड़ती वे सब के सब बिला गये हैं नौकरी की माया में। केवल एक विषय ही काम में आता है वह है प्रबंध-शास्त्रा वाला, उसका अक्सर काम पड़ जाया करता है। मनःस्थिति समझनी पड़ती है सभी की, चाहे कोई नेता हो, आन्दोलनकारी हो, फरियादी हो कोई भी हो सभी के दिमागों की संभावित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को तौल कर उन्हें समझाना पड़ता है किसी शिक्षक की तरह, किसी मुखिया की तरह। इसी तरह पूरा जिला संभालना होता है, नेताओं-परेताओं को समझाना होता है, गरीबों बेरोजगारों को सहलाना होता है ऐसे समय में मैनेजमेन्ट की पढ़ाई काम आ जाया करती है पर नंबर दिलाने वाले विषयों का तो कोई काम ही नहीं आता।
डी.एम. साहब खुद को खुद को तलाशते हुए अपने मन में गोते लगा रहे थे फिर उन्हांेने टी.वी. आन कर दिया पर अचानक उन्हें झटका लगा। टी.वी. पर तो केवल हल्दीघाटी वाला मैदान ही आ रहा था। लगातार लाशें दिखाई जा रही थीं। टी.वी. के पत्राकार सजग थे। वे हल्दीघाटी वाले गॉव की एक एक बातें सचित्रा दिखा रहे थे। मृतकों की कतार में रखी लाशें देख कर द्रवित हो गये डी.एम. साहेब।
डी.एम. साहब का माथा ठनका ‘यहां भी वही हाल है... कहीं चैन नहीं’ चैनल बदलनेे का भी उन्हें ध्यान आया, बदल देना चाहिए चैनेल। कोई फिल्म लगा देना चाहिए पर फिल्में तो उलझा दिया करती हैं मार-काट में वहां भी कोई राहत नहीं।
डी.एम. साहब की ऑखों में हल्दीघाटी वाले गॉव का पूरा दृश्य उभर जाता है, दर्दनाक, भयानक, मानवता विरोधी... हर तरफ उन्हें चीखें ही सुनाई दे रही हैं, उनके मुह से एक आह निकलती है...
किसी तरह से तो गॉव वालों को संभाल पाये थे। गॉव में आक्रामक तनाव था।
लगता था कि मारने-पीटने पर उतर जायेंगे आदिवासी। वैसे भी वह नक्सली क्षेत्रा है, आदिवासी अपने हक के लिए लड़ना सीख चुके हैं। आदिवासी डट गये थे कि लाशें नहीं ले जाने देंगे। वे लाशों पर लोट जा रहे थे। उनके भीतर कुदरती प्रतिरोध जनम चुका था ऐसी स्थिति में उन्हें मनाना आसान नहीं था। किसी तरह एस.पी.साहब तथा मेरे समझाने-बुझाने से मामला शान्त हुआ।
डी.एम. साहब खुद को संतुलित करते हैं। खुद को सन्तुलित कर लेने के बाद अन्तर भी महसूस करते हैं कि लोगों को संतुलित करना आसान है पर खुद को संतुलित करना कठिन है।
करें तो करंे क्या..? नींद आ नहीं रही अचानक उन्हें एक किताब का ख्याल आता है उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्रा का। पाउल फ्रेरे की किताब थी जो एक विदेशी किताब थी पर उसे डी.एम. साहब काफी गंभीरता से पढ़ा करते थे तथा समझना चाहते थे कि समाज में जो उत्पीड़ित हैं वे अपने उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध करना क्यों नहीं चाहते? अगर वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर प्रतिरोध करने लगंे तो शायद सामंती ताकतें उनके खिलाफ दमनात्मक गतिविधियॉ न कर पायें। पर दमन का प्रतिरोध करना क्या सरल है?
प्रतिरोध तो तभी संभव है जब मानवीय सभ्यता ने प्रतिरोध करने की शिक्षा दी हो। ऐसी शिक्षा दी ही नहीं जाती। शिक्षा तो दी जाती है कि कान है तो वही सुनो, जो दमनकारी सुनाना चाहते हैं, ऑखें हैं तो वही देखो जिसे दमनकारी दिखाना चाहते हैं, मुह है तो वही बोलो जो वे बोलवाना चाहते हैं, अपने मन से न कुछ देखो, न बोलो न सुनो। ऐसे सुभाषितों की शिक्षा से भला उत्पीड़ित अपने अधिकारों के लिए कैसे प्रतिरोध कर पायेंगे। सो वे दमन की असहनीय पीड़ा भले ही बर्दास्त कर लें पर प्रतिरोध तो कत्तई नहीं कर सकते।
डी.एम. साहब उठे और किताबों की आलमारी से उत्पीड़ितों का शिक्षा-शास्त्रा किताब निकाल ले आये। हालांकि उस किताब को उन्होंने कई बार पढ़ा था पर इस बार पढ़ने का अर्थ था हल्दीघाटी वाले गॉव के दमन के बारे में वैचारिक स्तर से खुद को मजबूत बनाना। वे जाने अनजाने पीड़ितों की संवेदनाओं, प्रताड़नाओं के साथ होते चले जा रहे थे हालांकि उन्हें पता था कि प्रशासनिक स्तर पर संवेदन-शील हो जाने से वे पीड़ितों का कुछ भी भला नहीं कर सकते, वे कानूनी विधानों के बांए-दांए किसी भी हाल में नहीं जा सकते उन्हें वही सब करना होगा जिसे हुकूमत उनसे करवाना चाहेगी। हुकूमत तो वही चाहेगी जिससे जनमत उनके साथ लगातार बना रहे भले ही ऊपरी तौर पर हमदर्दी का लेप लगाये, सहलाये पीड़ितों की पीठें, उनकी ऑखें पांेछे। डी.एम. साहब किताब हाथ में ले लिए, एकदम पहले की तरह ही है किताब कई बार के ट्रान्सफर होते रहने के कारण सबसे ज्यादा असर पड़ता है किताबों पर, दूसरे सामान तो ठीक ठाक रह जाते हैं पर किताबें ठीक से नहीं रह पातीं, वे खराब हो जाया करती हैं। वे किताब का एक पन्ना भी नहीं खोल पाये थे कि सोचों में डूब गये...सोचों का क्या किसी भी हाल में रहो चढ़ बैठती हैं माथे पर।
‘का होगा किताब पढ़ कर, इसके अनुसार तो वे एक कदम भी नहीं चल पायेंगे, किसी भी तरह की सहायता वे नहीं कर पायेंगे पीड़ितों की। कानूनी परंपरायें उनके सामने आ कर तनेन हो जायेंगी खुद सवाल पूछने लगंेगी....’
‘क्या तूॅ पीड़ितों के पक्ष में है? पीड़ितों के पक्ष में तूॅ कैसे हो सकता है? तेरा पक्ष तो तुझे नियुक्त करने वाली सरकार है। तूॅ जिले के इतने बड़े ओहदे पर है, इस ओहदे पर रहते हुए भला तूॅ कैसे सोहदा बन सकता है, तुझे पता है कि नहीं तूॅ आला-अधिकारी है, तेरी सोच भी सरकारी होनी चाहिए, सरकारी होने के कारण ही तेरी गरिमा है। का तूॅ उस गरिमा को तोड़ना चाहता है?’
डी.एम. साहब अचानक सरकारी ओहदे की खोल में दुबक जाते हैं फिर जाने क्या होता है कि उनके भीतर का आदमी तनेन हो जाता है...वह उन्हें फटेकारने लगता है... उनके हाथ में पड़ी किताब कांपने लगती है...
‘तूॅ कैसा आदमी है रे! खुद को नहीं जान सकता, तेरी अस्मिता केवल तेरा ओहदा नहीं है, तॅू इस ओहदे से अलग एक आदमी भी है जिसके पास कुदरती अस्मिता होती है। कुदरत की तरह, पेड़ों की हरियाई हुई पत्तियों की तरह, उनकी शाखाओं की तरह, बिना भेद-भाव किए सभी को छांह देने वाली, सभी को फल देने वाली। तूॅ तो एक आदमी है जो सोच सकता है तथा अपने सोचे हुए के अनुसार दो-चार कदम चल भी सकता है। निकल अपने सरकारी ओहदे की खोल से और अपनी अस्मिता बचा।’
डी.एम. साहब अपना माथा पकड़ लेते हैं... यह क्या हो रहा उनके साथ। जब आई.एस. में चुने गये थे तब कितना आनन्द मिला था उन्हें, जैसे सारी दुनिया फतह करके आये हों, ऐसा था भी सभी जगहों पर उनकी पीठ थपथपाई गईं, बहुत शाबासियां मिलीं पर आज क्या हुआ जा रहा है उनके साथ...
आखिर ऐसा क्या घटित हो गया हल्दीघाटी वाले गॉव में जिससे वे आहत हुए जा रहे हैं, यह सब तो होता रहता है कौन सी नई बात है इसमें। वे हाकिम हैं उन्हें हाकिमों की तरह ही सोचना चाहिए। पर वे तो प्रताड़ितों की काया में रूपान्तरित हुए चले जा रहे हैं इस तरह का व्यक्तित्वांतरण उचित नहीं। वे भला कैसे सोच सकते हैं एक प्रताड़ित की तरह... यह कोरी भावुकता है और अगर आलाधिकारी भावुकता में आ गया फिर तो हो चुका प्रशासन का काम।
डी.एम. साहब खुद को संयत करने लगे, उन्हीें यह सब नहीं सोचना, गुनना। पर वे खुद को संयत नही कर पा रहे हैं। संयत करने की जगह पर कई तरह के सवाल उभरते जा रहे हैं, ऐसे सवाल जिसे प्रशासन कभी सुनना ही नहीं चाहता। प्रशासन में बने रहना है तो मानवीय संवेदनाओं से खुद को अलगियाना होगा और
एक कमोडिटी की तरह प्रशासन की एक इकाई बन कर रहना होगा, आज्ञाकारी और बफादार, जो सरकार बोले, सोचे वही सच, उसके अलाव कोई दूसरा सच नहीं। वे
एक भावुक आदमी की तरह क्यों सोच रहे हैं, भावुकता तो साहित्यकारों के पास होती है, साहित्यकार सोचें, कहानियॉ लिखें, वे साहित्यकार नहीं ऐसा काहे सोच रहे हैं।
डी.एम.साहब को कई तरह के मानवीय संवेदनाओं के सवालों ने जकड़ लिया। अरे वे तो भावुकता में यहां तक पहुंच गये और खुद से पूछने लगे कि अगर उनका भाई इस गोलाकाण्ड में मारा गया होता तो वे का करते?
डी.एम. साहब अपनी अन्तरात्मा खंगालने लगे। शायद वहां कुछ मिले, आत्मा तो झूठ नहीं बोलती पर वहां कुछ भी नहीं था। वहां तो खाली खाली था कुछ भी पहले से लिखा हुआ था ही नहीें। उन्हें लगा था कि उनकी अन्तरात्मा में आह्लाद भरे होगे, प्रतिभा की चमचमाती चमकें होंगी, उनके पद की गरिमा होगी, प्रफुल्ल्तायें पूरी जोश में उछल-कूद रही होंगी पर वहां कुछ भी नहीं था, खाली खाली था खेतों की तरह, जैसे खेत खाली खाली हुआ करते हैं, खेत लहलहाते तब हैं जब उसे किसान जोतता कोड़ता है फिर बीज डालता है, खेतों में, बालियॉ निकलती हैं पौधों में...।
अन्तरात्मा तो खाली खाली है... डी.एम. साहब को अपनी अन्तरात्मा में कुछ नहीं दिखा। वे खुद से पूछते हैं...‘अन्तरात्मा खाली कैसे हो गई, वहां तो जीवन का पूरा पूरा सच होता है, उसे तो भरा होना चाहिए, तमाम भरी हुई चीजों की तरह। उन्होंने जो चाहा, जब चाहा उसे हासिल कर लिया, आज के समय की हर खुशियॉ तथा सहूलियतें उनके पास हैं, सारी सुख-सुविधायें हैं उनके पास किसी चीज की कमी नहीं, मान-सम्मान भी कम नहीं फिर भी अन्तरात्मा खाली खाली है, उनकी कमाई हुुई चीजें कहां चली गईं, वे किताबंे भी वहां नहीं हैं जिन्हें पवित्रा-पोथी के रूप में उन्होंने पढ़ा था आखिर ऐसा कैसे हो गया...? उन्हें यकीन नहीं आ रहा, उनसे देखने में गलती हो गई होगी। कुछ चीजें ऐसी होती है जो देखने में नहीं आतीं कहीं ऐसा तो नहीं! ’
वे अपनी अन्तरात्मा की जॉच-पड़ताल में दुबारा निकल पड़ते हैं एक अधिकारी की तरह। वे सतर्क निगाहों से अन्तरात्मा का मुआयना कर रहे हैं...अन्तरआत्मा का एक एक कोना गंभीरता से देख रहे हैं, उनकी कमाई हुई कोई चीज वहां उन्हें नहीे दिख रही। उनका वह आलीशान मकान जो हाल ही में बन कर तैयार हुआ है लखनऊ वाला, वह भी नहीं दिख रहा, उनके पासबुक वाले खाते भी नहीं दिख रहे, कंपनियों के वे तमाम शेयर भी नहीं दिख रहे। वह आलमारी भी नहीं दिख रही जिसमें अनमोल गहने रखे हुए थे, तमाम रत्न रखे हुए थे, किसिम किसिम की उपाधियॉ रखी हुई थीं। कहां चली गईं सब। उनकी दुबारा कोशिश भी बेकार गई, उन्हें आभास हुआ कि सारी चीजें यहां से हटा दी गई हैं। उन्हें चीजों के होने का तो आभास होता है पर दिखता कुछ भी नहीं। कौन हटा सकता है यहां से सारी चीजों को, अन्तरात्मा में चोर दरवाजे तो होते नहीं जिससे कोई गैर यहां आकर दाखिल हो जाये और यहां की चीजें हटा दे...चीजंे खुद से तो अदृश्य हो नहीं सकतीं, चीजों में अदृश्य होने की क्षमता तो होती नहीं।
वे अपनी अन्तरात्मा को स्वविवेक से परिभाषित करते हैं...अन्तरात्मा तो उनकी अपनी एकाधिकार वाली पूॅजी है भला इसे कौन हाथ लगा सकता है? कोई नहीं हटा सकता उनकी चीजों को, कुछ न कुछ उनके साथ गड़बड़ हो रहा है...।
डी.एम.साहब चौंक जाते हैं अपनी अन्तरात्मा का वैचारिक भूगोल देख कर। वे पुनः मौजूदा भौतिक दुनिया में लौट आते हैं अन्तरात्मा से बाहर निकल कर। अब वे किताब पढ़ना चाहते हैं... किताब के कुछ पन्ने पढ़ते हैं तथा उत्पीड़िन की परिभाषा में डूब जाते हैं। लगते हैं सोचने कि यह जो हमारा समाज है वही उत्पीड़ित तथा उत्पीड़क दोनों को निर्मित करता है। दोनों की निर्मिति के अवसर हमारे समाज के पास ही होते हैं, समाज ही उन्हें रचता तथा गढ़ता हैै। समाज जिस तरह का समाज बनाना चाहता है बना लेता है। यानि जैसा समाज वैसा व्यक्ति। व्यक्ति अकेले अपना निर्माण नहीं कर सकता व्यक्ति को बनाता समाज ही है।
डी.एम. साहब सोचों में हैं तथा अपने होने के कारणों के बारे में गुन रहे हैं फिर उन्हें किसने रचा, गढ़ा?
इसका उत्तर उनके पास पहले से ही था। वे जानते हैं कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से अलगियाया गया है, उन्हें गरिमा के एक कटघरे का नागरिक बना दिया गया है आम नागरिकता से पूरी तरह अलग। जिस कटघरे में उन्हें स्थापित किया गया है उसी तरह के तमाम कटघरे हैं, जो भिन्न भिन्न रंग-रूप आकार-प्रकार वाले हैं। उनके जैसे लोग जिन कटघरों में रखे गये हैं उनमें वे मस्त मस्त हैं पर ऐसा है नहीं वे तो उनकी तरह से परेशान भी होंगे बहुत पर उन्हें अपनी परेशानी का आभास नहीं है सिर्फ इतना ही है।
डी.एम साहब की ऑखें भर्राने लगी हैं आखिर कब तक नींद उनसे दूर रहती। उतर रही है नींद उनकी ऑखों में वैसे भी एक सचेतन आदमी खुद को बहुत समय तक भुलावे में नहीं रख सकता, उसे अपनी स्थिति में लौटना ही होता है।
डी.एम. साहब लौट आये हैं अपने स्वरूप में, ओढ़ी गई भावुकता उनसे कहीं दूर फेंका गई है। नींद तो उतर रही है उनकी ऑखों में, पर यह क्या वह लड़का भी नींद के साथ उतर रहा है अपने गाने के साथ...गाना गाता हुआ ‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।’ शायद नहीं, वे फिर शासकीय कटघरे का नागरिक बन जायेंगे और फुफकारने लगेंगे शासन की नीतियां। शासन की नतियों के बारे में डी.एम. साहब को क्या बताना, उनकी प्रतिभा का कठिन इम्तहान लिया जा चुका है, अब आज्ञाकारिता वाली यांत्रिकता का इम्तहान लिया जाना है, इसमें भी वे सफल ही होंगे।
वे खुश हैं कि शान्तिपूर्ण ढंग से पोस्टमार्टम का काम निपट गया और पंचनामे के बाद लाशें हल्दीघाटी गॉव भेज दी गईं। पर उनकी खुशी अभी तो जॉच में फसेगी, जॉच के समय रोने लगेगी मृतकों के परिजनों की तरह। कई कई जॉच टीमें आयंेगी उन्हीं की तरह की प्रतिभा वाले होंगे उन टीमों में, टीमें किस तरह से उनके कामों का पोस्टमार्टम करेंगी..अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।
ऊॅची ऊॅची प्रतिभा वाले अधिकारी अवतार ले चुके हैं धरती-कथा में, कुछ तो काम शुरू भी कर चुके हैं अधिकारियत वाला, इनमें भी पदेन व्यवस्था है वंश-परंपरा की रियासत वाली, वही परंपरा जॉच के बहाने उतरने वाली है सोनभद्र की धरती पर। धरती-माई सारा कुछ देख रही हैं तथा धरती पर अपने अवतार के बारे में गुन भी रही हैं आखिर वे किस लिए अवतरित हुई धरती पर उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा।
‘संस्कृति, सभ्यता और अपराध
जोड़ कर देखिए...’
‘धरती-माई को कैसे समझ आता, भले ही वे धरती-माई हैं, धरती की देवी हैं इससे क्या हुआ धरती तो उसकी होती है जो ताकतवर होता है यही तो मानव सभ्यता है। धरती-पुत्रों को धरती सौंप देने के बाद वे कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि धरती-पुत्रा उनके मन-मिजाज से चलें, आपस में बन्धुत्वपूर्ण रिश्ता बनायें, सहभागी एवं सहयोगी व्यवहार संस्कृति बनायें पर नहीं वे तो आधुनिक हैं, अपने अनुसार चलेंगे। वे चल भी रहे हैं, अपनी नई यांत्रिक आधुनिकता रच रहे हैं। आधुनिक समय में इसीलिए कथा कोई भी हो उसमें थाना, कचहरी, नेता, वकील, पत्राकार, अधिकारी, भूमि, संपत्ति और नारी का प्रसंग न आये ऐसा नहीं होता। ये सारे कुदरती कथा पात्रा अपनी जरूरी भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए ही तो बढ़ा रहे हैं धरती-कथा को....
वैसे एस.पी. साहब धरती-कथा को बढ़ाना नहीं चाह रहे पर करें क्या? धरती की कथा ही ऐसी है जो खुद बढ़ती जा रही है पर वे खुश हैं कि पोस्टमार्टम का काम निपट गया मन ही मन वे तारीफ कर रहे हैं मेडिकल स्टाफ की तथा खासतौर से सी.एम.एस. साहब की। अस्पताल वालों ने बहुत परीश्रम किया और काम करने में शीघ्रता भी पर वे अपने ढंग से परेशान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कौन सी रणनीति उन्हें अख्तियार करनी चाहिए? जिस किसी रणनीति के बारे में वे गुनते हैं उसके नकारात्मक पक्ष सामने आकर तनेन हो जाते हैं। उन्हें यकीन है कि आरोपी किसी न किसी पनाहगाह के संरक्षण में होंगे। पर उन्हें किस पनाहगाह से संरक्षण मिल रहा है इसे वे सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं इसे सुनिश्चित करने के लिए ही कल सभी दारोगाओं की मीटिंग भी उन्हांेने बुलवाया है। सभी दारोगाओं को सचेत करना है कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए वे हर संभव प्रयास करें तथा उन सूत्रों के बारे में जानकारी जुटायें जो आरोपियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इस काम को बहुत ही तत्परता से करना होगा।
इस तरह का बर्बर काण्ड उनके पूर कार्य-काल में कहीं नहीं घटित हुआ। सोनभद्र आकर वे निश्चिन्त जैसे हो गये थे...एक महीने बाद ही उन्हें महसूस होने लगा था कि इस जनपद में अपराध तो कहीं है ही नहीं। छोटे-मोटे अपराध तो मानव सभ्यता के उत्पादन हैं वे तो होते रहते हैं। बहुत ही आसानी से उनका खुलासा भी हो जाया करता है। पता नहीं कैसे सोनभद्र में ऐसा बर्बर गोलीकाण्ड, वे माथा पकड़ लेते हैं। प्रदेश के कुछ जिलों का अनुभव उन्हें डरा डरा देता है, कदम कदम पर माफियाओं का डर। वे पुलिस को घास-फूस की तरह एक ही फूॅक में उड़ा दिया करते हैं। माफियाओं के गैंग खुले-आम अपराध किया करते हैं और पुलिस असहाय की तरह अपनी खोल में दुबकी रहती है। उन्हें अपने एक मित्रा एस.पी. का किस्सा आज भी याद है। वे गरम मिजाज के तनेन आदमी थे, अपराधी है तो है उसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उसे जेल में होना चाहिए। यह क्या है कि वह खुले में घूमता फिरता रहे और पुलिस उसका मुह ताकती रहे। एक माफिया किस्म का अपराधी था, उसके ऊपर जनता के दबाव से बलात्कार का एफ.आई आर.एक थाने में दर्ज हुआ था। एफ.आई.आर. ने माफिया को उत्तेजित कर दिया और वह पूरे दल-बल के साथ एस.पी. साहब के कार्यालय पर आ धमका...
‘वह वहीं नारा लगाने लगा कि दम हो तो गिरफ्तार करो....’
उसके समर्थक भी चिल्लाने लगे... इस दृश्य को बाकायदा टी.वी. वाले भी कवर कर रहे थे, वह सभी से अपने निर्दोष होने के बारे में बताता...
पुलिस ने जान-बूझ कर उस पर एफ.आई.आर. किया है... उसका कहना था कि बलात्कार तो दूर वह लड़की को तो जानता तक नहीं। पुलिस ने उसे जान-बूझ कर बद्नियती से फसाया है।
खूब खूब नारे लगे थे। एस.पी. कार्यालय से बाहर निकल आये थे फिर वे मिले थे माफिया से। एस.पी. तथा माफिया का मिलन और उस समय हुई बात-चीत केवल टी.वी. चैनल पर ही नहीं वरन् सोशल मीडिया पर भी खूब खूब उछाल पाया था। तकरीबन दिन भर उस बाबत किसिम किसिम की टिप्पड़ियां टी.वी. पर आती रहीं थीं। कुछ पक्ष में तो बहुत कुछ विपक्ष में पर दोनों पक्षों की चर्चाओं में सरकार कटघरे में असहाय सी खड़ी दिखती थी, और एस.पी. गूंगे बहरे की तरह कोने में खड़ा दिखता था।
वह उस समय गूंगा क्यों बना हुआ था आज भी रहस्य ही बना हुआ है। उसने किसी को नहीं बताया उसके बारे में पर एक अनुमान प्रदेश स्तर पर फैल चुका था कि सरकार का पूरा पूरा दबाव था एस.पी पर नहीं तो वह चुप नहीं रहता वैसे भी अगर एस.पी. वैधानिक विवशताओं से खुद को मुक्त कर लेता तो बात ही दूसरी हो जाती और माफिया उसके दफ्तर के सामने सड़क पर गिर कर कराह रहा होता या नजदीकी थाने में बन्द सिसक रहा होता। एस.पी. का करता वह तो केवल पद का एस.पी. है। असल काम तो प्रदेश सरकार का गृह-मंत्रालय ही करता है।
तो एस.पी. साहब के सामने अपने समकक्षों की पिछली कहानियॉ भी जस के
तस खड़ी हैं वे जान चुके हैं कि अपराध की दुनिया में आरोपियों की पकड़ का मामला सरकार की नियति पर निर्भर करता है। सरकार जिसे बचाना चाहती है उसे बचा
ही लेती है अधिकारियों पर नाजायज दबाव बना कर। लेकिन हल्दीघाटी वाले गावॅ का मामला ऐसा नहीं जान पड़ता है। नहीं जान पड़ता कि इस मामले में सरकार दखल देने वाली है क्योंकि यह मामला माफियाओं से जुड़ा हुआ नहीं है न ही यह मामला राजनीतिक रंजिश का लगता है सो इस मामले को सरकार दबाने वाली नहीं। यह अलग बात है कि कुछ आरोपियों को बचाव वाले आधार भले ही खड़े हो जायें जिसके बारे में फिलहाल नहीं कहा जा सकता यह तो जॉच के बाद ही पता चलेगा।
एस.पी. साहब पिछली कहानियों से बाहर सप्रयास निकलते हैं और मौजूदा बर्बर हत्याकाण्ड के बारे में गुनने लगते हैं।
वे आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जिले के जाबांज अधिकारियों को लगा चुके हैं तथा उन खास मुखबीरों को भी सहेज चुके हैं कि जैसे भी हो आरोपियों की पकड़ करो।
पोस्टमार्टम घर से वे डी.एम. साहब के साथ निकले थे। आवास पर आते ही धम्म से पसर गये थे बिस्तरे पर। आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे से लम्बे दौरे पर जाया करते थे पर आवास पर आते ही दिन भर के काम-काज का ब्योरा लेकर ही बेड-रूम की तरफ जाते थे पर आज तो कोई हाल-चाल नहीं लिए सीधे बेड-रूम में घुस गये। वे भी डी.एम. साहब की तरह अकेले रहते हैं उनका परिवार दिल्ली में रहता है, उनका घर भी दल्ली के आस-पास ही पड़ता है। पता नहीं क्या है कि सोनभद्र को कमाई का बेहतर ठिकाना मानने वाले बड़े अधिकारी अपनी पत्नियों को यहां नहीं रखते, उनकी पत्नियां कहीं दूर रहती हैं भले ही कुछ अधिकारी अपवाद रहे हों वह भी कार्यकाल के आखिरी पड़ाव वाले उनको छोड़ कर बकिया जो जवान होते हैं जिनकी पत्नियां जवान होती हैं किसी के बारे में ऐसा नहीं देखा गया कि वे सोनभद्र में सपरिवार रहते हों। कुछ न कुछ कारण तो होगा ही, संभव है उनकी पत्नियों को सोनभद्र का रापटगंज बाजार रूचता न हो, मौके गर मौके आती हों और कुछ दिनों बाद निकल जाया करती हों। रापटगंज बाजार वैसे भी काफी सिकुड़ा सिकुड़ा सा है, यहां न तो फाइव स्टार होटल हैं और न ही मन-भावन क्लब वगैरह हैं, पार्क वगैरह तो हैं ही नहीं। यहां की सड़कंे भी वीरान दिखती हैं, सड़कांे पर टहलने वालों में आधुनिकता नहीं दिखती, वे गंवार जान पड़ते हैं। बड़े शहरों में तो सड़कें भी आधुनिकता में डूबी कैबरे नाचती हुई दिखती हैं एक में एक गुत्थम-गुत्था।
सुरक्षाकर्मी मन ही मन सोच रहे हैं कि हल्दीघाटी वाले गॉव ने एस.पी. साहब को तनावग्रस्त कर दिया है।
रात गुजर जाती है। एस.पी. साहब सुबह जग जाते हैं और सीधे पुलिसिया काम पर लग जाते हैं। घटना घटने के कारणों का पता शायद पक्ष-विपक्ष के वकीलों से
चल जाये। मुकदमा तो चल ही रहा था। उन्हांेने पहले दिन ही दोनों वकीलों के फोन नंबरों का पता लगाने के लिए मातहतों को निर्देशित कर दिया था। मातहतों ने
वकीलों का फोन नंबर मालूम कर लिया था। जब साहब दफ्तर में आयेंगे उन्हें बता दिया जायेगा।
सुबह सुबह ही साहब अपने कैम्प कार्यालय में हाजिर हो गये। दूसरे दिन सुबह मिलने के लिए उन्होंने अपने खास पत्राकारों से भी बोला था। उन्हें अनुमान था कि पत्राकार उनके काम को आसान बना सकते हैं। कुछ ही देर में वे पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय पर हाजिर हो गये जिसकी सूचना सुरक्षाकर्मी ने एस.पी. साहब को तत्काल दे दिया। पर एस.पी साहब ने पत्राकारों को करीब आधे घंटे बाद बुलवाया। अधिकारियों का किसी से मिलने-मिलाने का यह पुराना तरीका होता है वे तत्काल किसी से नहीं मिलते, मिलने के लिए भले ही उन्होंने ही किसी को बुलवाया हुआ हो। कुछ देर आगन्तुकों को बैठाए रखना उनकी कार्य-संस्कृति का हिस्सा होता है, अदब का कुछ पाठ मातहतों को भी तो पढ़ाना होता है, वे क्या साचेंगे कि साहब ने आगंतुक को तुरंत बुलवा लिया, कोई दमदार आदमी जान पड़ता है।
पत्राकार पूरी जानकारी के साथ थे।
कुछ पता चला क्या कि एक शान्तिप्रिय गॉव हल्दीघाटी में कैसे बदल गया? ‘केवल जमीन के कब्जाने का मामला था सर! आरोपियों ने उस जमीन का बैनामा करा लिया है और उस पर कब्जा करना चाहते थे। बैनामा भी कानूनी ढंग से आरोपियों ने कराया है। सुनने में आया है सर! कि आरोपियों ने कब्जा करने के लिए पुलिस बल की मॉग किया था जिसके लिए जो कानूनी खर्च होता है उसे भी आरोपियों ने जमा करवा दिया है, घटना के एक सप्ताह पहले ही।’
‘इसके अलावा कोई खास बात... आप लोग तो उनके वकीलों से भी मिले होंगे।’ वकीलों का का कहना है इस बारे में?
‘हॉ सर! कल ही हमलोग वकीलों से मिले थे वकील भी इस घटना को अप्रत्याशित ही मान रहे हैं सर! घट गई अचानक। घटना के पूर्वनियोजित होने के बारे में वकीलों ने भी कुछ नहीं बताया। हमलोगों को जान पड़ा कि उनके वकीलों को भी घटना के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं हैं। हमलोग हर तरह से पूछ चुके हैं उनसे। वैसे भी सर! दोनों पक्षों के वकील केवल वकालत से ही मतलब रखा करते हैं उनसे दूसरी बातों से कोई मतलब नहीं। वे लोग सरल मिजाज के भी हैं केवल वकालत से मतलब रखने वाले।’
एस.पी. अचरज में पड़ गये...
उन्हें पता था कि जमीन के मामलांे में कुछ वकील विधि-व्यवस्था से अलग हटकर काम किया करते हैं तथा अपने मुवक्किलों को अक्सर जमीन पर से कब्जा न छोड़ने की हिदायतें दे दिया करते हैं। क्योंकि जमीन पर काबिज होना कानून के अनुसार एक नये तरह का अधिकार साबित करता है और काबिज न होना मुकदमे को कहीं न कहीं कमजोर बना दिया करता है। वैसे राजस्व या दीवानी का मुकदमा लड़ने वाला हर आदमी इस सचाई को जानता है कि जमीन खरीद लेना कोई खास
बात नहीं है, खास बात है जमीन पर कब्जा हासिल कर लेना। सो हर आदमी जमीन पर कब्जे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। कब्जा करना है चाहे जैसे। ऐसी हालतों में मार-पीट हो जाया करती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि वकीलों ने आरोपियों को सहेजा नहीं होगा.. अपने मुवक्किलों को, इतनी बड़ी घटना, दस दस टेªक्टर और दो तीन सौ आदमी अचानक कैसे पहुंच जायेंगे जमीन कब्जा करने के लिए? वकीलों ने आरोपियों को तथा मृतकों को कब्जा छोड़ने न छोड़ने के लिए अवश्य ही कुछ न कुछ सहेजा होगा।
‘आप लोग गंभीरता से पता लगायें। समझ रहे हैं नऽ मेरी बात। कोई न कोई सूत्रा तो होगा ही घटना घटने का, देखना यह होगा कि वह सूत्रा क्या है?’
एस.पी. एक ही सांस में सारा कुछ बोल गये...
पत्राकार तो जैसे तैयार बैठे थे... बोल उठे...अपनी सफाई में
‘हमलोगों को तो काई विशेष जानकारी नहीं मिल सकी सर। वैसे भी प्रताड़ितों का वकील टी.वी. चैनल के पत्राकारों से घिरा हुआ था। वे कई तरह के सवाल पूछ रहे थे प्रताड़ितों के वकील से। सभी से वकील एक ही तरह की बात बता रहा था कि प्रताड़ितों ने आरोपियों को कब्जा नहीं करने दिया। चलते ट्रेक्टर के सामनेे पूरे खेत पर प्रताड़ित लेटे हुए। अजीब तरह का सत्याग्रह जिधर देखो उधर प्रताड़ित खेत पर लेटे हुए एक ईंच भी जमीन खाली नहीं, आरोपी प्रताड़ितों को खेत पर से उठाते पर वे दुबारा लेट जाते जमीन पर। प्रताड़ितों का पूरा गॉव प्रतिरोध में खड़ा हो गया फिर आरोपियों ने फायर छोड़ दिया और आगे का तो आप जानते ही है सर! आज भी वकील की बाइट चल रही है टी.वी. पर। किसी तरह से मौका निकाल कर प्रताड़ितों के वकील ने हमलोगों से बातें किया।’
दूसरी तरफ आरोपियों का वकील फुर्सत में था। पत्राकारों की भीड़ उसके पास नहीं थी। वैसे भी वह साफ साफ बोल के पिण्ड छुड़ा लेता था कि वह आरोपियों का वकील अदालती कामों के लिए है, आरोपी बाहर का करते हैं इससे उसका कोई मतलब नहीं। वह आरोपियों के बाहरी कृत्यों का वकील नहीं है सो आप लोग आरोपियों से ही पूछें घटना के बारे में। मैं उसके बारे में कुछ भी जानकारी आप लोगों को नहीं दे सकता। यही बातंे उसने हमलोगों से भी बताया कि वह कुछ भी नहीं जानता घटना के बारे में।
एस.पी. से बातें हो जाने के बाद पत्राकार एस.पी. के कैम्प कार्यालय से वापस लौट आये और एस.पी. साहब पुलिस अधिकारियों की बैठक में जाने के लिए तैयार होने लगे। उनके पास समय भी कम था, मीटिंग लेनी थी अधिकारियों की। मीटिंग का एजेण्डा एक मातहत को लिखवाकर वे कार्यालय से उठ गये। तभी एक फोन आ गया उनका मोबाइल घनघना गया...
फोन डी.एम.साहब का था...
डी.एम. साहब जानना चाह रहे थे आरोपियों के पकड़ के बारे में।
‘अभी किसी की पकड़ नहीं हो पाई सर! आज किसी न किसी की पकड़ अवश्य ही हो जायेगी, सूत्रा पक्के हैं सर! बहुत ही जाबांज दारोगा लगाये गये हैं आरोपियों की पकड़ के काम पर।’
‘हॉ सर! किसी भी विरोधी दल के नेता को हल्दीघाटीवाले गॉव की यात्रा नहीं करने दी जायेगी, अधिकारी मुस्तैद हैं।’
खबर मिली है सर! कि समाजबादी पारटी के जिले स्तर के कुछ नेता हल्दीघाटी वाले गॉव जाना चाहते हैं पर उन्हें घोरावल में ही रोक लिया जायेगा, मैंने निर्देशित कर दिया है सर! अधिकारियों को।’
फिर एस.पी. साहब अपने आवास पर चले गये, नाश्ता वगैरह करने के बाद अधिकारियों की मीटिंग में भाग लेने के लिए निकलेंगे। कैम्प कार्यालय से ही जुडा हुआ था एस.पी. का आवास।
एस.पी. मीटिंग में भाग लेने के लिए निकल ही रहे थे कि कैम्प कार्यालय के सामने भीड़ इकठ्ठा हो गई...
भीड़ एक लड़के के गाने में डूबी हुई थी। इस बार लड़के ने थाली बदल कर ढपली ले लिया था और झूम झूम कर नृत्य के साथ गा भी रहा था। एस.पी को देखते ही वह ठनक गया... ‘साहब आ गये...’
उसने गाना रोक दिया और झोले में से कुछ निकालने लगा। झोले में एक कागज था, वह वही कागज था जिसे पहले दिन ही लड़के ने एक अनजान आदमी से अस्पताल में लिखवाया था।
उसने कागज निकाल कर हाथ में लिया और एस.पी. साहब के सामने जा खड़ा हुआ...एस.पी. साहब ने उसे पोस्टमार्टम घर के सामने देखा था गाना गाते हुए, उन्होंने लड़के को पहचान लिया और सुरक्षाकर्मियों को रोक कर आदेश दिया उसे आने दो...
‘क्या बात है?’ लड़के से एस.पी.साहब ने बहुत ही दुलार से पूछा
‘सर! दरखास देनी है,’ लड़के ने बताया
लड़के ने एस.पी.साहब को दरख्वास्त दे दिया
एस.पी.साहब दरख्वास्त पढ़ने लगे...
दरख्वास्त में वही सारी बातें लिखी थीं जिसे एस.पी.साहब जानते थे...
‘हॉ तुम्हारा भाई कुछ दिन बाद तुम्हारे गॉव चला जायेगा, तुम चिन्ता न करो, हम लोग उसे खोज निकालेंगे। हमने तुम्हारी दरख्वास्त रख लिया है अब तूं अपने गॉव चले जाओ...’
एस.पी. ने झूठा बहाना बनाया लड़के की विक्षिप्तता के कारण जबकि उन्हें पता था कि लड़के का भाई बुद्धन गोली काण्ड में मारा जा चुका है।
‘नाहीं साहेब अब हम गॉव नाहीं जायेंगे, वे लोग हमैं जान से मार डालेंगे।’
एस.पी. साहब उसे देखने में थे। उस दिन तो उसके हाथ में थाली थी और आज
डफली है। इसने अपना रूप बदल लिया है, गा, गा कर खुद को बहला रहा है। लगता है इसे पता चल गया है अपने भाई के बारे में, नहीं पता चला होता तो दरख्वास्त काहे देता...नहीं पता चला होगा तभी तो परेशान है।
‘अभी तुम गॉव नहीं गये का?’ लड़के से पूछा एस.पी.साहब ने
‘गॉव का जाना साहेब!’
एस.पी.साहब से बता कर लड़का रोने लगा...
एस.पी.साहब लड़के के रोने में चले गये, वे किसी शोक-कविता की तरह पुलिस की वर्दी में ही विलापने लगे... ‘कितना असहज हो जाता है किसी का जाना, और जाने हुए का जाना वह तो बहुत ही असहज होता है।’
एस.पी.साहब किसी अधिकारी को बुलाते हैं... उसे निर्देशित करते हैं... ‘इस लड़के को इसके गॉव पहुंचवा दो तुरंत। गॉव वाले तो लाश के साथ चले गये होंगे गॉव।’
‘हॉ साहेब’
एस.पी. साहब तनबुड़ुक के गाने में खो गये अचानक...
‘धरती केहू कऽ न भई’
‘एस.पी. साहब की अनिवार्य भूमिका है धरती-कथा में, वे जानते हैं कि मानवीय रिश्ते पूॅजी-संबंधों से ही बनते बिगड़ते हैं और यही व्यवहार-संस्कृति का निर्माण भी करते हैं कुदरती व्यवहार-संस्कृति से एकदम अलग। यह संस्कृति मनुष्यता की सारी हदें छलांग कर पूंजी-संचयन, पूंजी-निर्माण के लिए कुछ भी करना गलत नहीं मानती फिर तो पूॅजी कहीं न कहीं हल्दीघाटी उगायेगी ही... पर क्या धरती-माई स्व-रचित धरती की व्यवहार-संस्कृति को जानती हैं?’
‘कथा का शोक-पक्ष विधवायें हैं यानि
सुगनी तेतरी, फगुनी और बैसाखी!’
‘धरती माई का जानंेगी धरती की व्यवहार-संस्कृति के बारे में, वे तो देवी हैं स्वर्ग वाली वैसे भी धरती-कथा पारंपरिक मृतक-अनुष्ठान में अभी उलझी हुई है। धरती-माई सतर्क हैैं और मृतक-अनुष्ठान देख रही हैं। उन्हें प्रभावकारी लग रहा है मृतक-अनुष्ठान। मृतक-अनुष्ठान के बहाने कम से कम मृतक को सम्मान तो दिया जा रहा है धरती पर। इस अनुष्ठान से पारलौकिक लाभ मृतक को मिलेगा कि नहीं यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। अनुष्ठान के बाद कथा आगे बढ़ेगी, कथा किस तरफ बढ़ती है देखना जरूरी होगा...’
गॉव में सारी लाशें पहुंच चुकी हैं। गॉव के जो लोग अस्पताल गये हुए थे उन्हें भी प्रशासन ने एक बस से गॉव पहुंचवा दिया है। सुगनी, तेतरी, बिफनी,फगुनी सब साथ हैं। बबुआ लाशों के साथ ही गॉव आया हुआ है गॉव के वे सभी परिजन लाशों के साथ हैं जो जघन्य गोलीकाण्ड से हताहत हुए थे। पुनवासी, खेलावन और
बन्धू भी साथ में हैं वे एक मिनट के लिए भी लोगों से अलग नहीं हुए घटना के दिन से लगातार साथ में हैं। ऐसे समय में का खेती-बारी देखना, क्या गाय-गोरू का इन्तजाम देखना, गॉव पर जो लोग हैं वे संभाल रहे होंगे सारा कुछ।
गॉव एकदम सुनसान हो गया है। थोड़े बहुत वही लोग बचे रह गये हैं गॉव में जो गाय-गोरू का इन्तजाम संभाल सकें आखिर मवेशियों को तो बिना निगरानी के नहीं छोड़ा जा सकता, वे अबोला जीव हैं, बोलेंगे कुछ थोड़ै, न शिकायत करंेगे। बिफनी और सुगनी दोनों एम्बुलेल्स से उतर कर सीधे भाग रही हैं अपने अपने घरों की तरफ। सुगनी को चिन्ता है सुमेरन की और बिफनी को चिन्ता है बुझावन की। रापटगंज जाते समय दोनों अपने अपने पड़ोसी को सहेज कर गई थीं उन लोगों की देख-रेख करते रहने की। यहां औरतों का कोई काम नहीं सारा काम मर्दों का है।
पुलिस की गाड़ी रुक गई है गॉव की तिमुहानी पर उससे आगे जाने का रास्ता नहीं है, आगे खडंजा बिछा है जो गाड़ी जाने लायक नहीं है संकरा है। पुलिस की गाड़ी रुकने में भले ही कुछ देर हुई हो पर गॉव वालों को वहां जुटने में तनिक भी देर नहीं हुई... सारा गॉव तिमुहानी पर जुट गया, गॉव ही नहीं पास-पड़ोस के टोले भी। देखते ही देखते भीड़ सैकड़ा पार कर गई, क्या मरद, क्या औरतें, क्या बच्चे.अधिकांश रोते बिलखते, कराहते, सभी की ऑखें डबडबाई जैसे अब रो देंगी तब रो देंगी। औरतों का बिलाप गूंज रहा है हवा में, आकाश भी मानो नीचे उतर कर विलाप सुनने के लिए बेताब हो, खडंजे सिसक रहे हैं, गॉव के सिवान तो रोते-रोते इतने आक्रामक हो चुके हैं कि वे मानो गरिया रहे हों इक्कीसवीं शदी को...
‘यही है तेरी इक्कीसवीं शदी, यही है तेरा लोकतंत्रा, यही है तेरी मानव सभ्यता! सिवानों के जलते सवालों के साथ सुगनी का विलाप है तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी का विलाप भी है, तीनों विधवा हो चुकी हैं। रापटगंज से लौटते ही तीनों ने चूड़ियॉ फोड़ दी हैं और माथे का सेन्हुर भी पोछ दिया है। विधवायें तो कई हो चुकी है गॉव में पर ये तीनों तो ऐसी विधवायें हैं जिनका सधवा जीवन महज दो तीन साल का रहा है, ये खिलती कली की तरह हैं फूल बन कर खिलने के समय ही गोलीकाण्ड ने लील लिया, इनके माथे का सेन्हुर मिटाय दिया, चूड़ियां फोड़ दिया...
‘हाय री किस्मत...!’
किस्मत भी जाने कैसा कैसा खेल खेलती है।
सामाजिक परंपराओं के रूपों का यह नामकरण सधवा और विधवा, औरत तो हमेशा औरत रहती है पर नहीं सुगनी, फगुनी और तेतरी अब विधवा हो चुकी हैं। उनका सधवा होना गोलीकाण्ड ने ही नहीं परंपरा ने भी छीन लिया है उनसे। वे आदिवासी हैं जो अभी भी लोक-संस्कृति और लोक-व्यवहार के काफी करीब हैं उनके
यहां विधवाओं को सवर्ण-संस्कृति की तरह परित्यक्त नहीं किया जाता, उन्हें हक मिला हुआ है कि वे चाहें तो किसी से सलट सकती हैं यह सलटना विवाह का ही
एक रूप है पर क्या वे सलटेंगी किसी से....पता नहीं। वे तीनों भी लाशों के पास ही हैं, रो रही हैं सिसक रही हैं... बिफनी और सुगनी दोनों गई हैं अपने अपने ससुरों का हाल-अहवाल लेने लौट कर आयेंगी कुछ देर में, बोल कर गई हैं तेतरी, फगुनी और बैसाखी से।
रोते सिसकते गॉव में अब कर्म-क्रिया किया जाना है इस पारंपरिक क्रिया को नहीं रोका जा सकता। गॉव के समझदार लगे हुए हैं इस काम में। प्रशासन भी सक्रिय है, गॉव का लेखपाल लकड़ी मगवा चुका है। एक ही साथ जलाना है लाशों को यह तय हो चुका है। लाशों को पहले की तरह बगइचा में नहीं जहां कतल हुआ है वहीं जलाना है।
लाशें उतारी जा चुकी हैं पुलिस की गाड़ी से... रख दी गई हैं तिमुहानी पर एक कतार में। लाशों को उनके घरों तक ले जाने का कोई मतलब नहीं...
बबुआ यही समझा रहा है पुनवासी, खेलावन और बंधू को। घरे, घरे लाशें ले जाने का का मतलब है? मान गये है गॉव के लोग भी, चलो यहीं सब क्रिया-करम कर लेते हैं लाशों के जलाने के पहले वाले। पंडित किस्म का एक आदमी भी बुलाया जा चुका है, वह अपने काम में लग गया है, दूब घांस वगैरह उसके हाथ में है और कुछ फूल भी।
कुछ दूसरे लोग है जो हरे बांस की तिख्ती बना रहे हैं, दस तिख्तियां चाहिए, बांस काटती टंगारी की आवाज भयानक हुई जा रही है, टंगारी के कट और खट की आवाज दहला दे रही है, एक आर्तनाक सुर... फिर भी बांस काटना है और तिख्ती बनानी ही है, उसी पर लाशें रखी जायेंगी, लोग इसी तिख्ती के सहारे कॉधा दंेगे, दो लोग आगे दो लोग पीछे तिख्ती कॉधे पर ले कर चलेंगे।
लाशों के पास खड़ी हैं औरतें उनमें से कुछ हैं जो कुछ ही देर में विधवा बन जाने वाली हैंें, उन्हें वहां से हटाया जा रहा है, वे हटें तब लाशों को नहलवाया जाये.औरतें नहीं हट रही हैं..
‘हम नाहीं हटेंगे, हमैं मुह देखाओ, हमैं मुह देखाओ एक बार तो देख लें फेर कैसे देखेंगे, चले गये हमैं अनाथ छोड़ कर हमरे नाथ। जिनगी सपना बन गई हाय री किस्मत! ऐसे ही बहुत कुछ...’ यह परंपरा का विरोध है।
औरतें अपने वश में नहीं हैं, समय के यथार्थ ने उनसे उनका सोचना और समझना दोनों हड़प लिया है, केवल शरीर बचा हुआ है उनके पास, उनसे छिन गई हैं जीवन जीते रहने की अभिालाषा, आकांक्षा। देह है वह बेचारी का करेगी अकेली...वे समझ रही हैं कि उनकी आकाक्षायें कुछ ही देर में चढ़ा दी जायेंगी चिता पर, देखते देखते ही सारा कुछ आग की लपटों में जल जायेगा।
बबुआ लाशों पर से बंधा सरकारी कपड़ा हटाय रहा है उसके साथ पुनवासी, खेलावन और बंधू भी हैं चारों एक एक लाश पर से कपड़ा हटाय रहे हैं। सभी चेहरे गॉव के हैं, उनमें कोई अजाना नहीं है परिजन देख रहे हैं लाशों को, बबुआ भी देख रहा है सरवन को, सुगनी भी वहीं है वह भी सरवन को देख रही है, तेतरी, फगुनी
और बैसाखी सभी अपने पतियों के सामने हैं, वे देख रही हैं....
वे देख रही है कि उनका वर्तमान भविष्य बन गया है, हसती खिलखिलाती देह मुर्दा बन चुकी है, ये न नाराज होगी न खुश, गालियां भी नहीं दे सकती न गुदगुदा सकती है, बात बात में गुदगुदाने वाले जाने कहां चले गये छोड़ कर। यह धरती तो यहीं है, इसका कुछ नहीं बिगड़ा, इसी धरती के लिए परेशान थे लोग....
औरतें लाशों का मुह देख ही रही थीं कि तनबुड़ुक जाने किधर से चला आया,
‘का हो रहा इहां....’
वह सभी से पूछ रहा है मेरे भइया कहां हैं, नाहीं दिख रहे हैं?
उसे कोई नहीं बता रहा, सभी जानते हैं कि उसका भाई बुद्धन गोली का शिकार हो चुका है, उसकी लाश आई है, कोई नहीं बता रहा उसे। बता देने पर जाने कैसा उसका मन हो जाये।
तनबुड़ुक बढ़ रहा है लाशों की तरफ, वह वहीं देखता है बबुआ को...
‘का भइया! हमार भइया नाहीं आये का’
वह बबुआ से पूछता है। तनबुड़ुक की भउजाई रमेशरी वहीं है वह बेसुध है वैसे भी वह दो दिन से बिना खाये-पिये है, घटना के पहले से ही बीमार चल रही है, उसे मियादी बुखार हो गया है, एक कदम भी चलना उसके लिए मुश्किल है।
तनबुड़क अपनी भउजाई रमेशरी को देखता है और...
‘अरे! भउजी...तूं यहीं हो का, तूं तो बीमार है इहां काहे के लिए आई हो...
उसकी भउजाई रमेशरी तनबुड़ुक को देख कर रोने लगती है, उसकी ऑखें वैसे ही पहले से ही डबडबाई हुई हैं...
‘का हो तूं कहां चले गये थे, इहां का से का हो गया अउर तोहार कुछ पता नाहीं, इहौ नाहीं बूझे के तोहार भउजाई अकेली का करेगी।’
तनबुड़ुक भउजाई को देख कर खुद को संभाल रहा है।
‘नाहीं भउजी! हम कहीं नाहीं गये थे, रापटगंज गये थे भइया को खोजने, वहां भी भइया नाहीं मिले तऽ हम चले गये कप्तान साहब के इहां दरखास देने उहै हमके इहां भेजे हैं, एक सिपाही आया था वही पहुंचा गया है हमैं। मोटरसाइकिल से था पहुंचा कर वह लौट गया। ई देखो हम तोहरे सामने खड़े हैं एकदम साबूत।’
‘तूं इहां का देख रही हो भउजी! भइया घरे आ गये हैं का बताओ तो हम भइया से मिले बिना परेशान हैं जाने कहां चले गये हैं भइया, कुछ तो बताओ भउजी भइया के बारे में, काहे नाहीं बोल रही कुछ।’
तनबुड़ुक ने अपनी भउजी को उलाहा...
भउजी सोच में पड़ गई, का करे, तनबुड़ुक को बताये कि नाहीं उसके भइया के बारे में... कौनो न कौनो दिन तो बताना ही पड़ेगा। रमेशरी जानती है कि भइया को गोली लगी है सुनते ही तनबुड़ुक का दिमाग खराब हो गया है पहले ऐसा नहीं था। वह पढ़ता था, पढ़ने में भी ठीक था। इहां तो साबूत लाश पड़ी हुई उसके भइया
की..
रमेशरी असमंजस में पड़ गई तभी बबुआ वहां आ जाता है और तनबुड़ुक को वहां से हटा कर कुछ दूर ले जाता है उसे समझाता है कि उसका भाई बुद्धन बनारस गया हुआ है। ई तो जानते ही हो कि हमरे गांये में गोली चली है कुछ लोग मारे गये हैं, गोली से कुछ घायल हो गये हैं ओन्हय देखने के लिए बुद्धन बनारस गया हुआ है, घायल लोग वहीं अस्पताल में हैं।’
तनबुड़ुक स्थिर हो रहा है, जैसे कुछ सोच रहा हो... उस दिन किसी ने कहा था कि तोहार भइया बुद्धन गोली लगने से मर गये... यानि वे लोग गलत बोल रहे थे, बबुआ भइया तऽ हमरे भइया के दोस्त हैं, ई गलत नाहीं बोलेंगे’
‘सही सही बोल रहे हो नऽ बबुआ भइया! तोहैं हमार किरिया, सही सही बोलो हमसे जीन छिपाओ कुछ भी’
‘नाहीं रे तनबुड़ुक तोहसे हम झूठ थोड़ै बोलेंगे, अब तूं इहां से खेते चले जाओ ओहीं ठे हम लोग भी आय रहे है। शवदाह वहीं होगा नऽ’ खेतवै। पर।
अच्छा बबुआ भइया हम ओहरै जाय रहे हैं। तनबुड़ुक का मिजाज स्थिर हो गया है, उसे महसूस हो रहा है कि उसका भाई गोलीकाण्ड में नाहीं मरा है। वह जा रहा कतल वाली जगह की तरफ गुनगुनाते हुए...‘धरती केहू कऽ नाहीं भई’ पर बबुआ परेशान हो रहा है उसने तनबुड़ुक से झूठ बोल कर अच्छा नहीं किया किसी न किसी दिन उसको पता चल ही जायेगा बुद्धन के बारे में तब का होगा?
का हो बबुआ, तनबुड़ुक केहर गया हो?’ पूछा रमेशरी ने बबुआ से
‘ओके हम खेत की तरफ भेज दिये हैं अउर समझाय दिये हैं कि कुछ नाहीं हुआ है तोहार भइया के संघे, ऊ बनारस गये हुए हैं घायलों को देखने के लिए, दो तीन दिन में लौट आयेंगे। हम कुछ गलत किये का भउजी?’
‘नाहीं हो बबुआ तूं सही समझाये ओके, तोहरे जगह पर केहू होता तऽ ऊ इहय समझाता जौन तूं समझाये, ओकर खियाल करना बबुआ, ओकरे अलावा अउर के है हमरे घरे में।’
बबुआ रमेशरी से बतिया ही रहा था कि पुनवासी, खेलावन और बंधू उसे भीड़ में खोजते हुए आ गये...
‘का हो बबुआ भइया! अब का देरी है इहां, चलो खेत की तरफ, वहां चितायें तैयार हो गई हैं। खेत पर चितायें देख कर हैरान हो गये हैं अधिकारी, यहां तो शव-दाह नहीं होता फिर...फिर क्या? कतल ईहां हुआ है तो लाशें भी यहीं जलंेगी, अउर का। बबुआ ने तो पहले से ही साथियों से सलाह कर लिया था कि लाशें कतल वाली जगह पर ही जलेंगी अउर उहां समाधि भी बनेगी सबकी। कानूनगो साहब चिताओं के पास ही डटे हुए हैं वे का बोलें चिताओं के बारे में चाहे जहां जलें।
काननूगो साहब के पास फोन आ गया है की राशन वाली टरक आय रही है, ओमे अनाज पानी है, सब घरे में बटवाना है, स्कूल के मास्टर को फोन किए हैं कानूनगो साहब, कि सरा अनाज कमरों में रखवा दें कल सुबह बटेगा।
‘उहां चिता बन गई है दसो’, पूछा बबुआ ने पुनवासी से
हॉ अउर का, गॉव भर के लड़के चिउंटा माफिक लग गये काम में, लकड़ी बने से तहसीलदार साहब भेजवाय ही दिये थे, का करना था, खाली बोटियाना था अउर सजा देना था, बस एतनै। सब होय गया है। इहां नहलवाकर सबको ले चलो बुद्धू भइया। दुई रात अउर दुई दिन होय गया है माथा फटा जाय रहा है।
‘माथा तऽ हमरौ फटि रहा है पर करें का हमहूं तऽ परेशानै हैं चलो नहलवाते हैं सबको..।’
एक तरफ लाशों को नहलवाया जा रहा है तो दूसरी तरफ मृतकों के परिजनों में से दस लोग एक कतार में बैठे हुए हैं। नाऊ उनके माथे का बाल उतार रहा है उनके पहनने के लिए मारकीन का कपड़ा आया हुआ है वहीं पहनना तथा ओढ़ना है। एक एक गंजी आई है पहनने के लिए। लेखपाल मगवा लिए हैं सारा सामान घोरावल से बंधू भी लेखपाल के साथ गया था बाजार। जिनके सर के बाल मूड़े जा चुके हैं ये लोग ही अगदेउआ(चिता में आग देने वाले) हैं। ये दस दिन तक अलग तरह की जिन्दगी जियेंगे, अलग खाना-पीना सारा कुछ।
बबुआ, खेलावन, बंधू तथा कुछ दूसरे लोग भी लाशों को नहलवाने में जुट गये हैं, सामने एक ड्राम रख हुआ है उसमें लड़के पानी भर रहे हैं, पानी सामने वाले चॉपा कल से लाया जा रहा है, जवान होते लड़के पानी निकाल रहे हैं चॉपा कल से। उसी समय बिफनी और सुगनी भी गॉव में से लौट आती हैं।
ठीक हैं बुझावन और सोमारू। सोमारू को अभी नहीं बताया गया है सरवन के बारे में। कुछ समय बीत जाने के बाद बताया जायेगा। सुगनी समझती है कि बपई को सरवन के बारे में अगर बता दिया गया तो शायद ही बच पायें बपई सो नाहीं बताना है। समय किसी न किसी दिन उन्हें बता ही देगा।
समय सारा कुछ बता देगा सोमारू को तो जो होगा, होगा।
‘होगा क्या?’
वे डूब जायेंगे अपनी गाथा में, कोसेंगे करम बाबा को, अपने जीवन को, सामंती समाज को, सरकार को, गॉव के किनारे बैठे हुए बरम बाबा को, डीह बाबा को फिर माथा पकड़ लेंगे। धरती-माई को कोसेंगे कि नहीं...!
जरूर कोसेंगे, फटकारेंगे... काहे की देवी हो?
‘काहे के लिए बनाया तूने धरती को?’
‘काहे हाथ पकड़ कर सिखाया हल जोतना, खेती करना?’
जब अपनी पूजा करने वालों को ही नहीं बचा सकती फिर काहे की माई हो, काहे धूप-दसांग की गंध पीती हो, किसिम किसिम के फल परसाद में काहे चढ़ावा लेती हो, नाराज होकर वे कहीं धरती-माई की चौरी ही न उखाड़ दें....उनका का ठिकाना कुछ भी कर सकते हैं।
‘कानून के मजूरे आ गये हैं गॉव में
देखिए क्या करते हैं’
‘धरती-कथा का पूर्वार्ध शोक-गाथा है धरती को हरा-भरा रखने वालों का। धरती को हरा-भरा रखने वालेे प्रमुख पात्रों की कथा-भूमिकायें चिताओं पर चढ़ चुकी हैं, उसी स्थान पर जहां उनकी हत्यायें की गईं। वहीं उनकी समाधियां भी बनाई जानी हैं इसके अलावा उनकी मृत-आत्मा की शान्ति के लिए अनुष्ठान किए जा रहे हैं। इहलोक तो उनके लिए ठीक-ठाक नहीं था कम से कम परलोक तो उनका ठीक हो जाये। अब इस कथा से नये पात्रा बबुआ, बंधू और पुनवासी तथा शासन के कुछ कारकून भी जुड़ चुके हैं, देखना दिलचस्प होगा कि ये कथा पात्रा धरती-कथा को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं...आगे बढ़ते हैं तो कितनी दूर तक और कब तक’
माथा पकड़ कर बैठे हुए लोग खड़े हो गये हैं ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, ‘राम नाम सत्य है’, राम नाम सत्य है’ के बोल बोल रहे हैं। बोल हवा में तैरने लगे हैं। इस ‘राम नाम सत्य है’ के उच्चरण में कई तरह की दर्दनाक घ्वनियों का समायोजन है। कितना कष्टकर है ‘राम नाम सत्य है’ केवल एक वाक्य का लय बन जाना, गॉव के महाप्रलय के बाद। ‘राम नाम सत्य है’ धुन महाप्रलय के बाद पूरे गॉव की लय बन चुकी है जो गॉव में हुई गोलीकाण्ड के कारण पैदा हुई है। यह लय उर्फ प्रलय कब से है मानव इतिहास में पता नहीं, शायद किसी को पता हो, वे पारंपरिक रूप से इस बोल को बोलते चलते हैं शव वाली तिख्ती के साथ किसी के मर जाने के बाद। क्या यह लय मृत्यु का सत्य है? जीवन जीते रहने और न जी पाने के बीच का सत्य है? क्या है इस लय में? क्या इस लय में जीवन की सत्ता है, व्यक्ति की अस्मिता की सत्ता है, जीवन जीते रहने और उसे समाप्त हो जाने के बीच की मारक चीखें हैं, आज है, कल भी थी और परसों भी। इसी लय के साथ पूरे गॉव कीं चीखें हैं, कराहे हैं तथा ऑसू हैं जो जाने कितने समय तक गॉव वालों की ऑखों को डब-डबाये रहेंगी। क्या पता!
गोलीकाण्ड और ‘राम नाम सत्य है’ के बीच छिपी हुई बातें मानवीय सभ्यता के उन दरारों से उपजती हैं जो आदमी और आदमी में संपत्ति-मोह के कारण पैदा होती हैं, मेरा, तेरा करती हैं और ‘हम’ तथा ‘हमारे’ वाले लोकबोध को लील कर मैं में बदल जाती हैं। इसी संपत्ति-मोह तथा अधिकतम धन-अर्जन की चाहनाओं के कारण बन्दूकें चलती है, कतल होते हैं और मानव समीपता, एकता वाली सभ्यता कहीं कोने में दुबकी पड़ी कराह रही होती है।
‘राम नाम सत्य है’ बोल रहे हैं लोग, बोलने का भी एक क्रम है, तिख्ती उठाये हुए लोग पहले बोल रहे हैं फिर तिख्ती के साथ चलने वाले दूसरे लोग उसे दुहरा रहे हैं, बोल सभी रहे हैं। पूरी भीड़ ‘राम नाम सत्य’ में डूबी हुई है पर क्या है सत्य? सत्य को कैसे जाना जा सकता है? फिर यह सत्य क्या जीते जी नहीं जाना जा सकता, देह के समापन के बाद ही यह सत्य क्यों उभरता है बाहर लय बन कर?
औरतें रुक गई हैं गॉव में, वे नहीं जा सकतीं शव-दाह स्थल तक पर सुगनी अड़ गई है, उसके साथ तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी...सभी अड़ी हुई हैं।
‘नाहीं हम जायेंगे, हम दाह दंेगे, हम मेहरारू हैं, अपने पति का दाह नाहीं देंगे तऽ कौन दाह देगा? नेम नाहीं है दाह का, तऽ न रहे, का होता है नेम से, हम नेम सेम नाहीं मानते, हमैं दाह देना है तो देना है, कोई दूसर काहे दाह करेगा।’
औरतें अड़ी हुई हैं अपनी बात पर, बबुआ, खेलावन और बन्धू समझा रहे हैं औरतों को पर औरतें नहीं समझ रही है उनकी बातें, वे जिद पर अड़ी हुई हैं, बिफनी भी समझा रही है सुगनी को...
‘देख सुगनी तोहके बहुत काम करना है जौने के सरवन बबुआ नाहीं कर पाये हैं ओके तऽ तूंहै पूरा करेगी नऽ, फेर काहे जिद कर रही है उहां जाने के लिए, जिद छोड़ दे, तूं जिद नाहीं करेगी तऽ तेतरी, फगुनी अउर बैसाखी भी जिद नाहीं करेगी। वे अबोध हैं, अजान हैं, ओन्है तऽ जौने समझा दिया जायेगा, मान जायेंगी। हमरे समाज कऽ जौन नेम है, ओके मानना चाहिए हमैं, बूझ रही है नऽ हमार बात के हम का बोल रहे हैं।’
सुगनी गुम-सुम है खुद में खोई, सुन रही है बिफनी की कही बातें, फिर बोलने लगी-
‘यही तो समझा रहे थे बबुआ अउर पुनवासी भइया, पर हमरे समझ में नाहीं आ रहा कुछ के हम का करें, काहे न जायें अपने पति केे दाह में, एक बुन्न पानी भी नाहीं पिलाय पाये हम ओन्हैं, हमैं जीन रोक बिफनी दीदी! हम जायेंगे जरूर।’
गॉव के कई सयाने जुट गये हैं वहां, सभी समझाय रहे हैं, बिरादरी के पंडित जी भी आय गये हैं वे भी औरतों को समझाय रहे हैं, कर-किताब का हवाला बताय रहे हैं, धरम-करम की बातें बताय रहे हैं, इशारे इशारे में बताय रहे हैं के कोई अशगुन होय गया तो...
अशगुन का डर सभी को है, सुगनी, तेतरी, बिफनी, बैसाखी, फगुनी सभी डरों में हो जाती हैं, अशगुन होय सकता है, पता नाहीं कौन अशगुन था के यह सब हुआ गोली चल गई, दस दस जवान मरद मरि गये आगे जाने का हो... अशगुन तो होता ही है और वह तरह तरह का खेल भी खेलता है...
अशगुन का नाम सुनते ही सुगनी बीते समय में चली जाती है जिसे उसने देखा है। उसके नैहर में एक अशगुन होय गया था, बरम बाबा के इहां उसकी काकी ने अपने लड़के का मुंडन बरम बाबा के यहां नहीं करवाया था, घर पर ही करवा लिया था और कथा भी सुन लिया था.. लड़का तीसरे दिन ही बीमार हो गया, ऊ तऽ पुजैती हुई के बचि गया लड़का नाहीं तऽ जाने का होता, तो अशगुन बड़ा खतरनाक होता है...।
ढली उमर वाली औरतों को बुरा लग रहा है, ई सब का बोल रही हैं, मेहरारू दाह
नाहीं देतीं, वे भी समझाय रही हैं, सुगनी मान जाती है फिर तो तेतरी, फगुनी और बैसाखी भी मान जाती हैं।
बबुआ तिख्ती उठवाने लगता है कुछ ही देर में तिख्ती चल पड़ती है तिमुहानी से कतल वाले स्थान की तरफ, ‘राम नाम सत्य है’ गूंजने लगता है हर तरफ... पॉच पड़ाव के बाद तिख्तियां पहुंच जायेंगी वहां। हर पड़ाव पर पंडित कुछ अनुष्ठान करते हैं, चावल के दाने और फूल छिड़के जाते हैं, एक मिनट का विश्राम होता है, तिख्ती पर के कांधे बदले जाते हैं, दूसरे लोग अपने कांधे पर उठा लेते हैं तिख्ती, तिख्ती चल पड़ती है कतल वाले स्थान की तरफ।
पंडित का अनुष्ठान देख रहा है बबुआ, पहले उसके समाज में ऐसा नाहीं होता था, ई तिख्ती रोक रोक कर अनुष्ठान कराना यह का है बाभनों-ठाकुरों वाला काम, औन्हई लोगन की तरह बिआह-शादी भी कराना। बबुआ घबरा रहा है बे मतलब देरी करा रहा है पंडित। बपई तो बोलते हैं के हमलोगन की बिरादरी में ई सब नाटक नाहीं होता है, दाह देने वाले का मंुडन हो गया फिर तिख्ती पर लाश ले गये अउर भगवान का नाम लेके जलाय दिये। दस दिन बरकाय के गियारहवें दिन करम-काण्ड कर दिये। ओही समय महापातर आते हैं, ओन्हय दान-दक्षिणा दे दिये होय गया काम खतम। अब तऽ सब करना पड़ता है बाभनों-ठाकुरों की तरह। बबुआ परेशान है, उसे दाह के बाद स्कूल पहुंचना है, वहां कानूनगो साहब उसकी राह देख रहे हैं, कलक्टर साहब की तरफ से गॉव में बाटने के लिए राशन आया है, उसे बटवाने के लिए कानूनगो साहब से बात करनी होगी। कैसे बटेगा राशन, का पूरे गॉव वालों को या जेकरे घरे मरे हैं लोग वोही घरे वालों को, लेखपाल तो बोल रहे थे पूरे गॉव वालों को राशन दिया जायेगा।
तिख्ती को कतल वाले स्थान तक लेकर चलने के बीच के सारे अनुष्ठान खतम हो चुके हैं, खून से सना वह स्थान भी पास आ चुका है, दूर से ही दिखाई दे रही हैं चिता के लिए सजाई गई लकड़ियां। वहां तिख्ती जमीन पर उतारी जा रही है और पंडित जी फिर कोई अनुष्ठान कर रहे हैं। पंडित जी का अनुष्ठान खतम होते ही दाह की तैयारी शुरू हो गई... दस परिजन तैयार हैं वहां मुंडन करा कर, किसी भिक्षु की तरह एक सफेद कपड़े में दीख रहे हैं वे।
दाह दिया जा रहा है, कुछ ही देर में सारी चितायें एक ही साथ जल उठेंगी और दस आदमी विलीन हो जायेंगे धरती में...
लकड़ियों ने आग पकड़ लिया है, लपटें उठ रही हैं आकाश की तरफ, वहां बैठे लोग आग की गर्मी से इधर-उधर खिसक रहे हैं, लगभग दो घंटे के बाद वहां राख बचेगी, दस लोगों का जीवन राख में विलीन हो जायेगा। कुछ समय बाद उनकी यादें भी राख में तब्दील हो जायेंगी। गोलीकाण्ड की घटना भी कुछ समय बाद चिता की राख बन जायेगी फिल-हाल तो ताजी है घटना, कुछ दिन, कुछ महीने, कुछ साल जीवित रहेगी।
तनबुड़ुक भी वहीं पहुंच गया है, ‘धरती केहू कऽ न भई वाला गीत’ उसे पगलाये हुए है, लगा कि वह गाने लगेगा, खुद को संभाल रहा है तनबुड़ुक, यहां नहीं गाना
है उस गीत को। तनबुड़ुक जाने कैसे दो दिन के लिए विक्षिप्त हो गया था... अपने भाई बुद्धन को देखते ही उसका माथा घूम गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि का हो गया उसे...
रमेशरी भउजी भी समझाय रही थीं के तूं संभल के रहोगे तभी तो आगे का काम संभाल पाओगे, अपना माथा ठीक रखो बचवा! अब तऽ ऊ नाहीं रहे।’
रमेशरी ने बुबआ से बोल दिया था कि तनबुड़ुक से दाह जीन दिलवाना उसके चचेरे भाई से दिलवा देना। वही हुआ। तनबुड़ुक का चचेरा भाई दाह दे चुका है बुद्धन का। गॉव के दूसरे लोग तनबुड़ुक को देख रहे हैं, तनबुड़ुक शान्त, स्थिर और खुद में डूबा हुआ है। शायद उसकी समझ में आ गया है कि अब उसका भाई वापस नहीं आने वाला, उसे समय से टकराने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।
रात काफी गुजर चुकी है अभी पोखरे में नहाने के लिए औरतों को आना होगा, बबुआ फिकिर में है, इहां से जल्दी लौटना चाहिए पर लाशें जल जायेंगी तभी नऽ। जितने गोतिया हैं उन सभी के घरों की औरतंे पोखरे में नहाने के लिए आयेंगी। लाशें जल जाने के बाद मरद लोग पोखरे में नहायेंगे फिर गॉव आ कर ऑगन में बैठेंगे, ऑगन में भी एक अनुष्ठान होगा, वहां टंगारी होगी, उस पर पैर रखना होगा, कूसे से रखे पात्रा में से जल लेकर पावों पर छिड़कना होगा, जब तक इस तरह की क्रिया सभी बैठने वाले कर लेंगे तभी सब उठेंगे वहां से फिर अपने अपने घरों की तरफ लौटेंगे।
ऑगन वाले अनुष्ठान के बाद सभी लोग अपने अपने घर चले गये। औरतें भी पोखरे में से नहा कर वापस लौट चुकी हैं। बबुआ खेलावन, बंधू और पुनवासी के साथ स्कूल पर आ गया है। राशन की ट्रक आई थी और राशन उतार कर चली गई है। राशन स्कूल के बाहर ही बोरों में पड़ा हुआ है। स्कूल के मास्टर के साथ कानूनगो तथा लेखपाल सोये हुए हैं एक दरी पर। दो तीन कमरों में पुलिस के लोग सोये हुए हैं दरी पर, स्कूल में खटिया तो थी नहीं।
बबुआ सोचने लगा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं, सबह ही रखा जायेगा सारा राशन कमरों में पर सुबह तो गॉव वाले राशन लेने आ जायेंगे, तहसीलदार साहब की बातें गॉव वाले पहले ही सुन चुके हैं...
बबुआ नहीं सोच पा रहा है कि कानूनगो साहब को जगाये कि नाहीं...
वह पूछता है खेलावन से..
का हो खेलावन! का करना है, का कानूनगो साहब को जगा दें, कल सुबह ही तो राशन बटवाना होगा, राशन बटवा कर खाली हो जाना ठीक होगा, घायल लोगों को भी तो देखने जाना है, ओनेके लिए खर्चा-पानी भेजना है, सरकार खर्चा-पानी थोड़ै देगी घायलों को खाना दे दे यही बहुत है फेर काल्हु दुधमुही भी तो है।
‘बबुआ देख, हमैं कुछ नाहीं बुझा रहा है जौन तोके नीक लगे उहै कर, जगाना हो तो जगा दे कानूनगो साहब को नाहीं तऽ चल इहां से, थोड़ा करवट बदल लें, नींद आ रही है पर लगेगी नाहीं, इहौ ससुरी एकदम नरम अउर मुलायम दिमाग चाहती है’ खेलावन ने स्पष्ट किया। साथ में ही बन्धू था वह बबुआ को समझाने लगा...
‘अरे बबुआ काहे जगायेगा कानूनगो साहब को, वे बेचारे भी तो आगे पीछे कर रहे है दो दिना से, अपना लेखपाल बेचारा तो घटना के दिन से ही धुक-धुका रहा है, ये सब ही तो डाक-कूद कर रहे हैं, साहब लोग थोड़ै कुछ करते है खाली हकूम देते हैं, फोन करते हैं। लेखपाल, कानूनगो, अमीन ये सब तो मजूरे होते हैं साहबों के हम लोगों की तरह, रहने दो जीन जगाओ कानूनगो साहब को, घरे चालो, थोड़ा करवट बदल लिया जाये’
बबुआ असमंजस में पड़ गया है, उसके साथी बोल तो सही रहे हैं, रात काफी हो गई है, बची ही कितनी है, बबुआ ने मोबाइल देखा, अरे चार बज रहा है, टैम का पता ही नहीं चलता। मोबाइल तो बन्धू के पास भी है पर उसका स्वीच आफ हो गया है, गॉव में बिजली नाहीं है।
‘चार बज गया हो, जाने दो अब नाहीं जगाना है कानूनगो साहब को चलो घर चलते हैं, बपई को भी तो संभालना होगा..’
‘अरे! बन्धू तूं चले जाना सोमारू काका के इहां ओनकर हाल-चाल ले लेना हम नाहीं जाय पा रहे हैं ओनकरे इहां, हां जाना जरूर, अरे आपन मोबाइल हमैं दे दो हम अपने इहां सौर ऊर्जा वाली बैटरी में लगाय देंगे चारज हो जायेगा।’
बन्धू अपना मोबाइल बबुआ को दे देता है और फिर तीनों अपने अपने घर की तरफ चले जाते हैं।
बुझावन काका खटिया पर पड़े हुए हैं। बिफनी ने सबेरे ही खराई कराना चाहा था ओन्है, बहुत जोर दिया था के बपई खराई मार लो पर काका कुछ खराई नाहीं मारे। बिफनी पोखरे से नहा कर जब घर लौटी तब उन्हें उनकी दवाई खिलाया था और खटिया के नीचे पड़ी बोरसी की राख भी बदल दिया था। उसके बाद वह कुछ आराम करने के लिए अपने किनारे वाले कमरे में गयी थी, कुछ आराम कर ले... पर आराम कहां बबुआ आया नाहीं था, वह तो स्कूल पर गया हुआ था।
बबुआ काफी देर में आया तब भोरहरी होने वाली थी, तारे डूबने लगे थे चनरमा तो पहले ही डूब गया था, कुछ ही देर में मुर्गे बांग देने लगेंगे। बबुआ बपई को सोया जान कर घर के अन्दर जाना चाहा तभी पूछ बैठे बुझावन..
‘का हो बबुआ! सब काम निपट गया, खेलावन, बन्धू अउर पुनवासी कहां हैं? ये सब तोहरे साथै थे नऽ। देख! बबुआ! जौन हो गया होय गया अब आगे की देख, आगे संभल के चलना होगा। देखे नऽ सरवन का का हुआ? ऊ पारटी बहुत हरामी है बबुआ! बात-बात पर कतल-मार करने वाली, कब्बउ कुछ कर सकती है।
धन-दौलत की भी कमी नाहीं है ओ लोगन के पास, दस पॉच लाख खरच देंगे बच जायेंगे मर-मुकदमा से।’
बुझावन बैठ चुके हैं खटिया पर, सांसे फूल रही हैं उनकी, खांस भी रहे हैं, फिर भी बोलना चाह रहे हैं और बोल रहे हैं...
‘हम कब्बै से तोहार राह देख रहे हैं, तोहैं समझाने के लिए के संभल कर रहना। ऊ पारटी सरहंग है कुछौ कर सकती है, देखे नऽ कतल होय गया दस लालन कऽ। ऊ सब तऽ सरवन के पहिलहीं से निशाना बनाय लिए थे अउर...’
‘खैर छोड़ो संभल के रहना बबुआ! मर-मुकदमा सब कुछ छोड़ि दो, हम लोग ई गॉव छोड़ देंगे, बहत बडी दुनिया है कहीं भी गुजर-बसर कर लेंगे पर ईहां नाहीं रहेंगे इहय हम बिफनी को भी समझाय रहे हैं पर ऊ नाहीं मान रही है कुछ भी, बोल रही है....
‘काहे गॉव छोड़ दें बपई! हमलोग एहीं रहेंगे, अउर ओनकर मुकाबला करेंगे। देखना पुलिस ओ लोगन के कइसहूं नाहीं छोड़ेगी। बपई तूं नाहीं गये थे नऽ रापटगंज, पुलिस वाले सबै अफसर गरिया रहे थे उन बदमाशों को। एतना गुस्सा तऽ हम कब्बौ नाहीं देखे थे पुलिस कऽ बपई।’
बुझावन फिर खामोश हो गये, नया जमाना है, नई उमर है, इतना बड़ा काण्ड हुआ है आखिर कैसे चुप रह जायेंगे आज के जमाने के लड़के फिर सरवन तो बबुआ का हाथ पैर था, मुह था, जुबान था। अबहीं कुछ भी समझाना बबुआ को ठीक नाहीं होगा। बुझावन चुप लगा गये और चादर ओढ़ कर मुह तोप लिए।
बबुआ घर में दाखिल हो गया देखा कि बिफनी करवट बदल रही है, नीन उसे नहीं आई, नीन में होती तो करवट थोड़ै बदलती। वही हुआ...
‘आ गये का हो... पूछा बिफनी ने
‘हां आ तो गया, तोहैं नीन नाहीं आई का?’
नीन कैसे आती, सरवन भइया चले गये हमलोगन के छोड़ि के, तोहार जेतने संगी साथी थे सभै तो चले गये गोली सेे, दो तीन जने अउर बचे हैं, हम तऽ काफी घबराय रहे हैं, आगे का होगा, सब तोहरे कपारे पर आय गया है।
‘छोड़ एके का लेके बैठ गई?’
‘का स्कूल पर सारा सामान रखा गया’
‘हॉ रखा गया सब काल्हु सबेरही बटेगा भी’
फिर बबुआ खटिया पर पसर गया, रात बीत जाये, कल सबेरे राशन बटवाना होगा गायें में। पर रात का अंधेरा उसकी ऑखों में नींद बन कर नहीं उतर पाया, उसे दिखता कि सरवन उसके सामने खड़ा है और बुला रहा है...
धरती-माई भी नहीं जा पा रही है नींद में। जब स्वर्ग में थीं तब नींद के बारे में उन्हें सोचना नहीं पड़ता था। वहां तो जागना भी नींद माफिक होता था और सोना भी जागने जैसा होता था। मौसम का भी वहां पता नहीं होता था, जाड़ा, गर्मी, बरसात सभी मौसम आपस में घुले-मिले होते थे, ऋतुयें भी बराबर होती थीं क्या वसंत, क्या फागुन, क्या जेठ क्या अषाढ़।
‘नियाव का पोसटमार्टम
कैसे नापेगा भूख और भोजन की दूरी’
‘भूख और भोजन यानि जीवन और जीविका के लिए किए जाने वाले प्रतिरोध की तरफ बढ़ रही है धरती-कथा, धरती-माई भी कथा के साथ चल रही हैं। पर किस बात का प्रतिरोध, किसका प्रतिरोध। प्रतिरोध का मतलब क्या है कोई सत्ता भला प्रतिरोध से हिलती है? प्रतिरोध से तो वही सत्ता हिला करती हैं जो विनम्र होती हैं, जो जीवन और जीविका के उपायों को हर सामान्य के हित में उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हुआ करती है। प्रतिरोध और अनुरोध दोनों तो धरती के व्यवहार कौतुक हैं इससे धरती-माई का क्या लेना-देना। वे तो स्वर्ग की वासी हैं यहां धरती पर प्रवासी हैं। स्वर्ग में तो तप और तपस्या को चलन है, तन को तपाओ और मन को साधना में। धरती पर तो तप और तपस्या का कोई मतलब ही नहीं।’
तप और तपस्या से सरवन और बबुआ का भी कोई मतलब नहीं, वे धरती-कथा के पात्रा हैं केवल इतना ही। बेर चढ़ गई तब नींद खुली बबुआ की हालांकि वह साधना में नहीं था, बिफनी पहले ही जाग गई थी, उसका मन हुआ कि जगा दे बबुआ को पर नाहीं थके हैं काफी, थोड़ा आराम कर लेने देते हैं तब तक हम चाय बना लेते हैं। बर्तन तो पहले से ही मजाया हुआ है। रात अउर दिन का खाना तो बनना था नहीं, खाना बनता भी कैसे गमी पड़ गई है। दुधमुहीं के बाद ही खाना बनेगा। बपई के लिए अहिरान से खाना आ गया था अउर सोमारू काका को भी वे लोग ही रोटी खिला आये थे। इतना तो है ही हमरे गॉयें में...
‘कउनो दुख-सुख पड़ता है गॉयें में अहिरान अउर चेरवान सभै जुट जाते हैं। जात पात का फेर-फार ऊ लोग नाहीं मानते। आजउ कऽ रोटी ओही लोगन के घरे से आयगी बुढ़वा लोगन अउर बाल-बुतरूओं के लिए, हमहन के घरे तऽ रोटी तब बनेगी जब दुधमुहीं बीत जायेगी। एकरे पहिले चूल्हे में आगी नाहीं जलेगी। पहिला चूल्हा जलेगा ‘अगदेउआ’ का जिसने दाह दिया है फेर बाद में घर का।’
बन्धू भइया तऽ बोल रहे थे के दुधमुहिंयो एक्कय जगह पर करना चाहिए देखो का होता है। ई सब के बारे में बुधनी काकी से पूछना होगा, परमू काका भी बताय देंगे। सबेरे हम बोलेंगे बन्धू भइया से एकरे बारे में।
बिफनी सबेरे उठ कर चाय बना रही है, चाय बन जायेगी तब जगायेगी बबुआ को पहले बपई को पिलाना होगा...
बिफनी चाय बना ही रही थी कि खेलावन, बन्धू और पुनवासी उसके घर पर चले आये। नीन तो आई नाहीं फेर का सोना चलो बबुआ के ईहां चलते हैं, फेर स्कूले पर चल कर राशन बटवा देते हैं, कोटेदार आय गया होगा। बंधू ने घोराय दिया था खेलावन को, उनके पास ही घर है पुनवासी का फिर तीनों साथ चले आये बबुआ के पास। ...
उन लोगों को देखते ही बिफनी चाय बनाने के लिए पानी बढ़ा देती है, पर चीनी तो कम है का होगा, गुड़ की बनाय देते हैं वोही में मरीच डील देंगे अउर तुलसी का पत्ता.
तुलसी का पत्ता.. ‘गमी’ में कैसे तोडं़ेगे, नाहीं तोड़ना चाहिए तुलसी का पत्ता गमी में। बिना तुलसी का पत्ता के ही बनाय देते हैं चाय।’
घर में खटर-पटर सुन कर जाग जाता है बबुआ...
‘का खट-पट कर रही है, नीन उचट गई,’
कुछौ नाहीं कर रहे हैं चाय बना रहे हैं, अउर खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया आय गये हैं, का तऽ स्कूल जाना है नऽ, राशन बटवाने के लिए। थोड़य देर में बुधनी काकी अउर परमू काका भी आय जायंेगे तब बात होगी दुधमुहीं के बारे में, इहो तय करना होगा, कैसे होगी दुधमुहीं, घरे, घरे होगी के एकय जगह पर होगी।
बबुआ उठो अब चाय पी लो, बपई के पासै बैठाय दिए है खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भइया के।
बबुआ कसमसाकर खटिया छोड़ता है, उसे सरवन दिखता है पर वहां सरवन नहीं है। खुद को सचेत करता है..आराम करने का समय नाहीं है उसके पास पर देह का क्या, वह तो कभी भी अपनी मांग लेकर तनेन हो जाती है लगती है गर्ु्राने। बबुआ किसी तानाशाह की तरह देह की गुर्राहट का दमन कर देता है...
‘बैठी रह किनारे, चुप अउर खामोश।’
उसकी देह बबुआ की एक ही घुड़की में ठंडा गई फिर बबुआ ऑगन में आ गया और बरामदे की तरफ चल दिया।
‘का हो बबुआ! भुलाय गये थे का स्कूल पर चलना है।’
‘नाहीं हो खियाल था पर नीन का का करें उसने जकड़ लिया।’
बिफनी गिलासों में चाय ले आई। सबसे पहिले उसने बपई को गिलास थमाया फिर सभी को...
बुझावन इस बीच समझाय रहे थे खेलावन, बंधू अउर पुनवासी को। वही समझाइस जो वे रात में ही बबुआ को समझाय चुके थे। बुझावन करते भी क्या खटिया पर पड़े पड़े, वे तो केवल समझा ही सकते थे। उन्हांेने सामंती जीवन देखा था, उसकी यातना को भी भोगा था, वे जानते थे कि ये जो जगह जमीन के मालिक हुआ करते हैं उनका मन और दिमाग सामंती रंगंों से रंगा होता है, वे मार-पीट और दमन को अपने लिए किसी औजार की तरह से इस्तेमाल करते हैं फिर करें क्यों नऽ सरकार भी तो उनके जैसे लोगों की ही तो होती है।
बबुआ को आता देख एकदम से चुप हो गये बुझावन, मन में सोचने लगे...बबुआ नाहीं मानने वाला, आजु के समय का जवान है, गरम दिमाग का, गरम दिमाग वाले आर-पार की बात करते हैं, या तो एहर या तो ओहर, बीच में कुछ होता ही नाहीं एहर-ओहर के बीच में तऽ हमलोगन के समय में होता था...जाने दो का हुआ, अगर मार दिया मालिक ने तो का पीठ खिया जायेगी? भला आज के समय का लड़का एके मानेगा, वह भिड़ जायेगा, मार खायेगा तो मारेगा भी, खाली मार खाकर घरे नाहीं लौटैगा। हे भगवान! हम का करि सकते हैं, बबुआ की रक्षा करना। कहते हुए बुझावन चुप हो गये और चाय पीने लगे।
चाय पी चुकने के बाद बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी स्कूल पर पहुंचे। स्कूल पर जगरन थी। कानूनगो तथा लेखपाल सभी जागे हुए थे, पुलिस के लोग भी जाग चुके थे और दतुइन-कुल्ला कर रहे थे। स्कूल के मास्टर और राशन का कोटेदार भी आ चुका था। स्कूल के सामने भीड़ भी कम न थी। लोग थे वहां पर राशन बटना था गॉव में।
लेखपाल ने बबुआ को सहेजा कि सूची बन गई है और सूची के अनुसार एक एक लोगों को राशन लेने के लिए भेजें, कोटेदार तराजू का काटा खड़ा कर चुका था। उपभोक्ता सूची लेखपाल ने ले लिया था, काननू गो साहब भी वहीं निगरीनी में मास्टर के साथ बैठ चुके थे...
तभी अचानक वहीं बुधनी काकी और परमू काका भी आ गये...
का होय रहा है इहां, काहे आये हो तूं लोग का बात है?
‘राशन बंाटना है’
‘केकरे पेटे में आग लगी है? ऊ तऽ सामने आये, दस दस लड़िका मरि गये हमरे गॉयें कऽ अउर तूं लोगन के पेट में आग लगी है। खाली राशन से काम चलि जायेगा का? हम पूछ रहे हैं तूं लोगन से, जरा बताओ हमैं खाली राशन से पेट भरि जायेगा, के जौन लोग हमरे लालन के मारे हैं ओनकर गिरफ्तारी भी होयगी।’
स्कूल के सामने की भीड़ शान्त और स्थिर..
‘परमू काका बोल तो सही रहे हैं अपराधिन कऽ गिरफ्तारी होय के चाही, का होगा राशन लेय के...’
सामने ही बुधनी काकी भी थीं...
‘सही बोल रहे हो परमू भइया! हमैं राशन नाहीं लेना है तऽ नाहीं लेना है। दस दस लाल हमारे मरि गये, तऽ चले हैं राशन बाटने, काहे बाट रहे हो राशन भइया। हम लोग तऽ मुकदमा निपटाने के लिए बोल रहे थे, नहीं निपटाये, मुकदमवै निपटाय दिये होते तऽ कतल नाहीं होता नऽ। अब जब कतल हो गया तऽ चले हैं राशन बांटै। ई लोग रोटी खिालय के गोली मारते हैं परमू भइया। मुकदमा की गोली से मारि दिये हमरे लालन के।
भीड़ तो भीड़ होती है, उसका मिजाज बदलने के लिए भीड़ के किसी कोने से थोड़ी सी हवा चाहिए जो भीड़ के माथे को सहला सके या उसे गरम कर सके और कुछ नहीं, हवा बह गई कोने से, उठने वाली हवा गरम थी, उत्तेजक थी। सो हवा ने भीड़ को गरम कर दिया।
हालांकि गॉव में गमी थी, शोक था, साथ ही साथ भूख थी गॉव में, गरीबी थी,
बेरोजगारी थी और उन पर गमी का असर नहीं था। भूख, गरीबी और बेरोजगारी की भाषा, संस्कृति और सभ्यता नहीं पहचानती, कथित सभ्यता से इसका नाता नहीं होता, भूख की अपनी अलग भाषा होती है, अलग चीखें होती हैं, लगी चीखने गॉव की भूख, भूख की चीख भी भूखी थी सो इसका सुर थोड़ा कड़क और उत्तेजक था, इसने स्कूल पर बैठे सरकारी अहलकारों को परेशान कर दिया...
स्कूल पर जमे सिपाहियों के कान खड़े हो गये, बवाल होगा का? दारोगा जी भी नहीं हैं ईहां, रातै में चले गये सब कुछ ठंडा देख कर, का होगा आगे?
कानूनगो साहब भीड़ के सामने खड़े हो गये...
‘का बात है आप लोग नारा काहे लगा रहे हैं, का राशन नहीं लेना है आपलोगों को, सरकार ने आपलोगों के लिए ही तो राशन भेजा है... गॉव में कोई भूखा न रहे।’ बुधनी काकी पास ही में थीं..
‘हम बूझ रहे हैं साहेब के सरकार ने हमलोगों के लिए ही राशन भेजा है पर कब भेजा है? हम पूछ रहे हैं आपसे, ई भी तो बतावैं सरकार! ई नाहीं बता रहे हैं बोल रहे हैं के सरकार ने राशन भेजा है।
‘जब दस लाल मरि गये तब राशन लाये हैं। मुकदमवा नाहीं निपटाय दिये, मुकदमवा निपटाय दिये होते। हमैं राशन नाहीं चाहिए, धरती-माई हमलोगन के राशन दे देती हैं, जांगर है तऽ राशन की का कमी। हमार धरती हमैं दिलवाय दो हमैं आपन धरती माई चाहिए, हम अपने धरती-माई को बेइज्जत नाहीं होने देंगे। जेही आवै उहै लूट ले इज्जत। हमलोग धरती-माई को पूजते हैं हर साल। जाइए उन हत्यारों को दे दीजिए जिन लोगों ने हम लोगांे के लालों को मार दिया है, हमलोग नाहीं लेंगे राशन, हम लोग करम कराने वाले महापातर नाहीं है कि करम करवाने का दान लें।’
बुधनी काकी जोर जोर से चिल्ला ही रहीं थीं कि गॉव के दूसरे लोग भी चिल्लाने लगे, हम पिण्ड दान लेने वाले महापातर नहीं हैं, आपन राशन ले जाओ, हम लोग राशन नाहीं लेंगे हमैं आपन धरती-माई चाहिए।
बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान परेशान, हो का रहा है गॉव में हालांकि बबुआ जानता था कि गॉव जितना ठंडा दिखता है उतना है नहीं, गरम होना भी जानता है गॉव। उसने तो यह सोच कर सरकारी राशन उतरवा दिया था गॉव में कि हो सकता है गॉव वाले ले लें, गॉव वालों को राशन लेने के लिए मना करना ठीक नहीं होगा वैसे उसका मन नहीं था। पर संकोच भी तो होता है कुछ। बबुआ का संकोच टूट गया किसी भी हाल में सरकार का खैरात नहीं लेना तो नहीं लेना। वैसे भी गॉव में राशन की कोई कमी नाहीं खाने भर का अनाज सभी को दे देती है धरती-मइया।
कानूनगो और लेखपाल अलग से परेशान अब का करंे?
कानूनगो ने लेखपाल से पूछा...
‘का हो अब का करना है, गॉव वाले तो राशन नाहीं ले रहे हैं। कानूनगो को तो पता ही है कि यही गॉव वाले लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भी नहीं जाने दे रहे थे। एक औरत थी जो भिड़ गई थी महिला पुलिस इन्सपेक्टर से...लगता है यह वही महिला है... काननूगो साहब को पूरा ख्याल आ गया, कुछ कुछ बुधनी काकी का चेहरा भी.. चेहरा तो वैसा ही दिख रहा..वही है घटना के दिन वाली बोलाक महिला।
‘चुप रहो बहिन जी! हम गांवार हैं तो का एतना नाहीं जानते हैं कि पुलिस लाश पोसटमार्टम के लिए काहे ले जाती है, तोहार पति मरा होता अउर ओकर पोसटमार्टम होता तब समझ में आता कि पोसटमार्टम के बाद लाश तरकारी माफिक काटी हुई मिलती है दाह करने के लिए। पूरा अंतड़ियय निकाल लेते हैं बहरे, अउर रख देते हैं मेज पर। फेर बॉध देते है गठरी नीयर। जेहर देखो ओहर खून छितरायल दिखता है। हम तो देखे हैं अपने नइहरे में। हमैं नाहीं कराना है पोसटमार्टम, हम लाश नाहीं जाने देंगे। जब दस आदमी मरि गये तब आये हैं कानून सिखाने, तब कहां थे जब पूरा गॉव तहसील पर नियाव नियाव मॉग रहा था।’
कानूनगो की ऑखों में घटना का दिन पूरी तरह से तैर गया। बुधनी तो उनकी ऑखों में तैरने ही लगी, एस.पी.और डी.एम.साहब भी तैरने लगे। बहुत ही चालाकी से दोनों आला-अधिकारियों ने उस महिला को समझाया था और न्याय दिलाने का वादा भी किया था। कानूनगो साहब को लगा कि उन्हें भी उसी प्रलोभनिया तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। वे आगे बढ़े और बुधनी काकी तक जा पहुंचे...
‘माता जी ऐसा है नऽ राशन ले लीजिए आप लोग और जो लड़ाई लड़नी है आप लोगों को वह बड़े साहबों से लड़िये। हम तो आपैलोगन की तरह कानून के मजूरे हैं, हम कउनो साहब थोड़ै हैं, हम कुछ नाहीं कर सकते।’
‘तो काहे के लिए इहां आय गये, जौन साहब हांेय ओन्है बुलाय लो’
बुधनी काकी गरज उठीं...
फिर भीड़ से एक ही बोल उठी... ‘साहब को बुलाय लो फेर बटवाओ राशन’
कानूनगो साहब परेशान, वे तहसील के सबसे चतुर एवं अनुभवी कानूनगोओं में हैं, उनकी बुद्धि भीड़ में राख की तरह उड़ गई अब का करें...
लेखपाल ने भी उन्हें सलाहा कि तहसीलदार साहब को फोन से बता दीजिए। काननूनगो साहब फोन जैसे ही मिला रहे थे गॉव में तैनात पुलिस वाले आय गये। पुलिस वाले चालाक थे, उन्हें ऐसी घटनाओं को निपटाने का अनुभव था..वे खामोश हो गये कुछ नहीं बोले। इस समय कुछ बोलना ठीक नहीं होगा, पूरा गॉव आग के तवे पर है समझाना-बुझाना आग ही लगाएगा।
संयोग अच्छा था तहसीलदार साहब का फोन मिल गया। कानूनगो ने गॉव के लोगों के द्वारा राशन न लेने का प्रकरण उन्हें बताया। उनके साथ एस.डी.एम. भी थे दोनों लोग मुख्यालय जा रहे थे। लखनऊ से जॉच कमेटी आई थी, उनके सामने हाजिर होना था। मुख्यालय को सूचित करके दोनों जन हल्दीघाटी वाले गॉव चले आये। हल्दीघटी वाला गॉव तनाव में था। साहबों को आता देख गॉव खामोश हो गया इतना तो होता ही है कहीं भी हो साहबियत का रूआब बोलक्कड़ों तक का मुह सिल दिया करता है, ऑखंे बन्द कर दिया करता है। गॉव एकदम खामोश...
एस.डी.एम.नई उमर के हैं। वे जब घटना स्थल पर मौका मुआइना के लिए आये थे तब उन्होने देखा था कि औरतों ने लाशों को घेर लिया था। लाशों को पोस्टमार्टम कराने के लिए औरतें नहीं ले जाने दे रही थीं, झगड़ बैठी थीं अधिकारियों से। वे भला कैसे भूल सकते हैं औरतों द्वारा किए जाने वाले प्रतिवाद को। औरतों का प्रतिवाद सुनकर उन्हें अचरज हुआ था...
यह सोनभद्र आखिर कैसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है? वे वैसे ही हिले हुए हैं, रात भर सो नहीं पाये हैं जॉच होगी पता नहीं जॉच में क्या हो... ट्रान्सफर हो जायेगा तो कोई बात नहीं कहीं सस्पेन्ड न होना पड़े, सरकार का क्या है जनमत बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है। एस.डी.एम. खुद को संभाल रहे हैं जनता के सामने मानवीय कमजोरी नहीं दिखनी चाहिए...
‘का है कानूनगो साहब! का बात है?’
‘साहब! गॉव के लोग राशन नाहीं ले रहे हैं, बोल रहे हैं कि हमैं राशन नाहीं लेना, हमै न्याय चाहिए, मुजरिमों की गिरफ्तारी चाहिए...हमैं धरती-माई चाहिए’
हॉ तो इसमें का है, इनकी मॉग तो सही है, गिरफ्तारी तो होनी ही चाहिए मुल्जिमों की। आपकी धरती-माई को कोई नाहीं छीन सकता, यकीन मानिए, ई धरती आपकी थी और आपकी ही रहेगी। एस.डी.एम. साहब ने तत्काल फोन मिलाया...
हॉ कोतवाल साहब!
अच्छा अच्छा, का हुआ मुल्जिमों की गिरफ्तारी का?
‘का एक मुल्जिम पकड़ लिया गया है, सभी मुल्जिमों का नाम उसने बताय दिया है, एक बन्दूक भी बरामद हो गई है का बोल रहे हैं कोतवाल साहब...’
‘हॉ साहेब सही बोल रहा हूॅ। बहुत पक्का मुखवीर मिल गया है।’
एस.डी.एम. साहब संयत हो चुके हैं उनका यकीन बढ़ रहा है कि वे गॉव वालों को समझा लेंगे। वे भीड़ की तरफ मुड़े, सामने ही बुधनी और परमू थे, वहीं बगल में बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी भी थे।
एस.डी.एम. साहब बुधनी के सामने हैं...
‘का हो माता जी! आपलोग राशन काहे नाहीं ले रही हो, पेट भरेगा तभी तो जान बचेगी, सरकार से लड़ने के लिए भी तो ताकत चाहिए, खाली पेट सरकार से लड़ने का का मतलब? आपलोग राशन ले लीजिए, मुल्जिमों की गिरफ्तरी एक दो दिन में हो जायेगी, एक मुल्जिम गिरफ्तर हो चुका है, आपलोग घबरायें नहीं।’ का एक मुल्जिम गिरफ्तार हो चुका है?
और नहीं तो का, कोतवाल साहब से अभी अभी बात हुई है, पूरे जिले की पुलिस
लगी हुई है इस काम में, माता जी! आप तो होशियार हैं आप समझिए मेरी बात। मैंने देखा था आपको मौके पर, आपके कहने पर ही गॉव वाले लाश ले जाने दिए थे पोस्टमार्टम के लिए। आप बोल देंगी तो गॉव वाले राशन ले लेंगे। राशन बटवा दीजिए फिर हमारे साथ चलिए घोरावल थाने पर वहां गिरफ्तार मुल्जिम को हम देखवाय देते हैं आपको।’
बुधनी काकी जितना बोलाक थीं उससे चालाक भी कम न थीं...
‘बोल पड़ीं, साहेब! हमलोगन कीहें राशन की कमी नाहीं है, धरती-माई खाने भर से जादा राशन दे देती हैं हमलोगन के, हमलोग बेचते-बिकीनते भी हैं, हमैं तऽ आपन धरती-माई चाहिए। मुकदमवा में नियाव करावैं साहेब।’
एस.डी.एम. नये थे और भूख की भाषा से परिचित थे, उनके कुदरती चरित्रा को प्रशासनिक करतबों ने बदला नहीं था सो वे गॉव वालों की भावना के अनुसार चल रहे थे पर वे कर क्या सकते थे, वे जानते थे अपनी सीमा, पर गॉव वालों को किसी तरह से समझाना है तो समझाना है।
‘हॉ हॉ माता जी! आपकी धरती-माई आपकी ही रहेंगी, हमलोग लगे हैं उस काम में बस आप लोग प्रशासन का साथ दें। डी.एम. साहब सरकार को लिख रहे हैं, सरकार ने भी आश्वासन दिया है आपलोग घबरायें नहीं’
एस.डी.एम. साहब के रिरियाने में प्रशासन था सो बुधनी को प्रभावकारी लगा बुधनी सहम गई... साहब बोल रहे हैं तो बात मान लेनी चाहिए, बात नहीं भी मानेंगे तो का कर लेंगे हमलोग प्रशासन का? बुधनी ने खुद से पूछा और राशन बटवाने के लिए राजी हो गई।
राशन बट गया तब बबुआ खाली हुआ फिर वह गॉव में लौट आया। यह बात मृतकों के परिजनों ने मान लिया था कि सुगनी के घर पर ही दुधमुही का आयोजन किया जायेगा, आयोजन में सभी ने भागीदारी दिया जो एक उदाहरण जैसा था। गॉव वालों की एकजुटता सराहनीय थी। राशन बट जाने के बाद एस.डी.एम. तथा दूसरे कर्मचारी वापस लौट गये। गॉव के प्रतिरोध के सामने प्रशासन कुछ कुछ झुकता सा दिख रहा था पर क्या आगे भी झुकेगा इस धरती-कथा में धरती का जीवित पात्रा बन कर...
‘सारा खेल धरती-माई देख रही हैं जो उनकी अपनी धरती पर हो रहा है पर उस खेल को धरती-माई न तो रोक पा रही हैं और न ही उसमें प्रतिभाग कर पा रही हैं केवल तमाशा देख रही हैं वैसे भी धरती के प्रपंचों के बारे में उन्हें क्या पता उनके लिए जो भी लोग धरती पर हैं सभी प्रिय हैं।’
दिक्कत भी यही है किसी कथा की, कथा अपने आप मुड़ जाती है भले लोगों की तरफ, उसे नायक बनाने के लिए मजबूर होती है कथा करेगी भी क्या, सरवन
तो मारा गया, बबुआ, खेलावन या उनमें से कोई नायक बन पायेगा..पता नहीं।
‘अन्धेरे में का दिखेगा...
देखते हैं क्या दिखता है?’
‘प्रिय तो धरती पर बहुत कुछ है, नदियॉ, पहाड़, जंगल, हरे-भरे मैदान, फसलों से लदी मुस्कराती धरती, पेड़ों के पत्तों से छन कर आती मन्द-मन्द हवा ऐसे ही बहुत कुछ पर गड़बड़ भी बहुत कुछ है उसी गड़बड़ी ने जनमा दिया है इस धरती-कथा को जिसका कथात्मक रूप भी बन चुका है, कथा आगे बढ़ भी रही है, कथा को बढ़ा सकने की क्षमता वाले पत्राकार रूपी धरती-पुत्रों ने संभाल लिया है अपना मोर्चा धरती-कथा को शासन प्रशासन तक पहुंचवाने का, उन्हें पढ़वाने का, कथा पर आवश्यक कार्यवाही करने का...’
धरती-माई के लिए है कि धरती के पुत्रा अपना अपना काम कर रहे हैं स्वर्ग के वासियों की तरह श्राप या आशीर्वाद तो नहीं दे रहे हैं और स्वर्ग के मनारेमों में केवल डूबे हुए तो नहीं हैं।
धरती की कथा प्रवेश कर चुकी है मीडिया में सो दर्दनाक घटना का दूसरा दिन अखबार वालों के नाम था। जनपद में आने वाले सारे अखबार घटना की चर्चाओं से भरे पड़े थे सभी पर हल्दीघाटी की घटना अपने अखबारिया कलेवर में काबिज थी। अखबारों के रंगीन व सादे पन्नों पर खबरें थीं, खबरें नाच रही थीं तो कहीं मुसिकया रही थीं जैसे खबरों का दिन उतर आया हो धरती पर। खबरों का रंग-रूप ठीक उसी तरह से था जिस तरह से काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद खबरों ने अपना रंग-रूप व साज-सज्जा धारण कर लिया था। कभी कभी ही देखने में आता है कि खबरों को भी सजाया जा सकता है, उसे नये कपड़े पहनाये जा सकते हैं, वही हुआ था। खबरें थीं कि नये परिधान में थीं और तमाम तरह की क्रियाओं-प्रतिक्रयाओं से सजी हुई थीं। खूबसूरत दिख रही थीं कि नहीं, पता नहीं....
खबरें अपनी साज-सज्जा से प्रभावित कर रही थीं पर उनका चरित्रा देख कर लगता था कि वे कुछ अनहोनी किसिम की घटनाओं के घटने के इन्तजार में रहा करती हैं। अनहोनी किसिम की घटनाओं के अलावा दसूरे तरह की घटनाओं से खबरों का पेट नहीं भरता। वे सोनभद्र के आदिवासियों की तरह भूखी रह जाया करती हैं बिना कुछ खाये पिये। उनका पेट तो तब भरता है जब कुछ अनहोनी हो जाती है, न कुछ हो तो बलात्कार ही हो। यह क्या है कि सत्कार, सत्कार चिल्लाते रहो, शुभ, शुभ बोलते रहो, उससेे खबरों का पेट भला कैसे भरेगा? कुछ लोगों ने तो काश्मीर से 370 हटाये जाने के बाद प्रकाशित होने वाले कई अखबारों को इकठ्ठा भी किया हुआ है, काश्मीर से 370 का हटाया जाना तो ऐतिहासिक था सो उसे संभाल कर रखना चाहिए, जाने कब काम आ जाये।
भला यह भी भूलने वाली बात है कि हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ माह पहले ही काश्मीर से 370 हटाया गया था, संभवतः स्वतंत्राता-दिवस के कुछ दिन पहले ही। बाद में स्वतंत्राता-दिवस का जश्न मनाया गया था। उस दिन के अखबार भी क्या खूब थे, माननीय गृहमंत्राी जी के चित्रों व बयानों से पूरे अखबार रंगे हुए थे। लगता था कि पन्द्रह अगस्त1947 वाला दिन भी उस दिन के मकाबिले काफी फीका रहा होगा, असली आजादी तो अब मिली है काश्मीर से 370 हटाये जाने के दिन।
अब यह किसे पता कि आजादी मिलने के बाद तबके गृहमंत्राी जी की फोटो प्रधान मंत्राी जी की तुलना में बराबरी पर अखबारों में छपी थी कि नहीं।
कानून समझने वाली तथा कानूनों से लाभ उठा सकने वाली सोनभद्र की जनता भी उस दिन गद्गद् हो उठी थी मानो वे नये स्वर्ग में दाखिल हो गये हों और पूरे देश को एक कानून, एक विधान, एक झण्डा मिल गया हो। वैसे एक कानून, एक विधान, एक झण्डा तो होना ही चाहिए पूरे देश में, अगर इसी के साथ एक पढ़ाई, एक दवाई तथा कमाई के एक दाम की भी बात हो जाती तो ठीक था। एक तरह से पूरा समाजवादी नारा ही उतर आया था 370 हटाये जाने के दिन घरती पर। कामन सिविल कोड से होते हुए कामन एजूकेशन कोड तक की यात्रा पर ही किसी जमाने में खॉटी समाजवादी चला करते थे, हर जगह इसी के नारे भी लगाया करते थे। कामन एजूकेशन कोड की तरफ हम कब बढ़ेंगे? देखना होगा कि हमारी सभ्यता ‘जैसा काम वैसा दाम’ ‘आवश्यकता के अनुसार दाम तथा योग्यता के अनुसार काम’ इसकी तरफ कब बढ़ती है? ऐसी आकांक्षाओं वाली खबरें अखबारों में नहीं थी। संपादकीय भी केवल 370 पर ही केन्द्रित थे विषय के अनुरूप।
विपक्ष के लोग बेचारे अखबार में कहीं नहीं थे। 370 पर पर विपक्ष की क्या भूमिका थी, या क्या होने वाली थी इसका कुछ पता नहीं चलता था अखबार से। संभव है विपक्ष भयभीत हो गया हो कि उसे ‘पाकिस्तानी’ बोल दिया जायेगा। बोला जायेगा कि जैसा पाकिस्तान बोल रहा है वैसा ही विपक्ष भी बोल रहा है। संभव है विपक्ष की उपेक्षा किया हो मीडिया ने और उसके बारे में खबर न दी हो। कौन अपनी पीठ पर पाकिस्तानी होने की मुहर लगवाये!
हल्दीघाटी वाले गॉव की खबर भी 370 हटाये जाने वाले दिन की तरह ही प्रकाशित हुई थी बल्कि उससे बढ़ चढ़ कर। कभी कभी प्रकाशित होने वाले अखबारों ने भी हल्दीघाटी वाले गॉवकी घटना पर केन्द्रित अंक प्रकाशित किये थे। आखिर खबरों में इससे अधिक क्या प्रकाशित किया जा सकता है? सारे मृतकों की फोटो छपी थी, घटना किस कारण से घटी वह भी प्रकाशित था। मौके पर हाजिर लोगों के बयान भी सचित्रा प्रकाशित किए गये थे गोया कुल मिलाकर अखबारों के करीब दो पन्नों पर हल्दीघाटी वाला गॉव छाया हुआ था बादलों की तरह। बकिया पन्नों पर ही देश-विदेश की खबरें जगह पा पाई थीं। उस दिन अचानक अखबार खरीदने वालों की संख्या भी काफी बढ़ गई थी सो अखबार कम पड़ गये थे। प्रशासन की सतर्कता तथा सचेतनता के बारे में भी शुभ, शुभ प्रकाशित था यानि अखबार में समय की जागरूकता मुखर थी।
घटना का दिन दमन के इतिहास का दिन बन चुका था ऐसा कभी नहीं सुना गया था सोनभद्र में। बहरहाल दिन चाहे कोई भी हो शुभ या अशुभ उसे हर हाल में गुजर जाना ही होता है और हल्दीघाटी की घटना वाला दिन भी गुजर चुका था। दिन तो होते ही हैं गुजर जाने के लिए। घटना के दिन रापटगंज के लोगों के कान खड़े हो गये थे और ऑखें सतर्क, दूसरे दिन ऐसा नहीं था, पूरा नगर पहले की तरह ही सामान्य बना हुआ था, नगर की न तो दुकानें बन्द हुईं थीं और न ही हल्दीघाटी वाले गॉव को लेकर कहीं प्रदर्शन वगैरह ही हुए थे। गोया जनपद का मुख्यालय पहले की तरह खामोश तथा अपने मुह पर पट्टी बांधे हुए था ऐसी उम्मीद पहले से ही थी। जनपद का एकमात्रा यह नगर अपनी खामोशी के लिए विशेष पहचान के रूप में जाना जाता है। वैसे भी हल्दीघाटी वाले गॉव से रापटगंज कस्बे से क्या लेना-देना था, वह मामला तो ग्रामीणों का था, आदिवासियों के दमन का था, सामान्य मार-पीट का था, ऐसे ममले तो होते रहते हैं हर जगह, पुलिस का मामला है पुलिस अपना काम करेगी।
एक उम्मीद थी कि संभव है रापटगंज काश्मीर से 370 हटाये जाने वाले दिन गरम हो जाये पर नहीं, उस दिन भी बर्फ की तरह ठंडा बना रहा, कहीं एक पत्ता तक नहीं हिला, नगर की सारी दुकानें हसती, गाती बजाती रहीं, गलियॉ आने जाने वालों को देख कर झूमती रहीं। सड़कों के बारे में तो न पूछिए वे भी मौसम के नशे से नहीं खुद की साधना में मस्त मस्त थीं। पर एक बात है जो गुनने लायक पहले भी थी और आज भी है कि जी.एस.टी. के विरोध में राबर्ट्सगंज की गलियों में आक्रोश की धमक फैल गई थी और पूरा नगर सरकार की नतियों पर थूकने लगा था हर तरफ हाय हाय होने लगी थी। गजब की गर्मी पसर गई थी नगर में, लगा कि विरोध मरता नहीं, वह लोगों के दिल-दिमाग में जिन्दा रहता है। रापटगंज भी विरोध में तनेन हो सकता है ऐसा पहली बार महसूस हुआ था।
भले ही रापटगंज शान्त दिख रहा था पर नगर के कुछ राजनीतिक लोग थे जो हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना से बेहद आक्रोशित थे तथा दुखी थे। हो क्या रहा है इस देश में पहले तीन तलाक का कानून आया, फिर अचानक 370 आ गया जाने और क्या क्या आयेगा? पर उनके भीतर जो कुछ था वह बाहर नहीं निकल रहा था सब के सब भीतर भीतर चाहे जो गुन रहे हों सरकार की नियति के बारे में पर खामोश थे तो खामोश थे। उनकी चुप्पी विशेष तरह की समझ के प्रस्ताव की तरह थी।
हल्दीघाटी वाले गॉव का मामला सरकार से सीधे नहीं जुड़ा था सो जनपद के विरोधी नेताओं के लिए वहां का मामला राजनीतिक लाभ वाला जान पड़ा। इसका विरोध करने पर सरकार प्रताड़ित नहीं करेगी। इस मामले को उछालने से राजनीतिक लाभ मिल सकता है और जनता में पहचान भी बढ़ सकती है फिर क्या था... पहले दिन ही विरोधी-दलों के नेताओं ने भीतर भीतर तैयारी कर लिया कि घटनास्थल पर जाना चाहिए, प्रताड़ितों के परिजनों से मिलना चाहिए। उन विरोधी नेताओं में अधिकतर लोग खुद को गरीब जनता का हितैषी मानते थे तथा प्रताड़ितों के हितों की रक्षा के लिए किए जाने वाले राजनीतिक प्रयासों को अपना कर्म समझते थे। उनके साथ कुछ ऐसे भी लोग थे जो मध्यवर्ग यानि खेती-किसानी से जुड़े हुए लोगों के हितों के लिए कार्य किया करते थे यानि कामरेड तथा समाजबादी किस्म के लोग थे। ये लोग जाने कैसे बिना किसी पूर्व सूचना के हल्दीघाटी वाले गॉव की यात्रा बना लिए। ये लोग घोरावल तक तो पहुंच गये पर उसके आगे नहीं जा पायेे। पुलिस ने उन्हें वहीं घेर लिया और कस्टडी में ले लिया। कस्टडी में लिए जाने के बाद ये लोग सरकार विरोधी धुन वाले रटे-रटाये नारे लगाने लगे जो पचासों साल से लगातार लगाये जा रहे हैंऔर जाने कब तक सरकार के विरोध में लगाये जाते रहेंगे। हालांकि मौजूदा सरकार भी तो उन्हीं नारों के सहारे ही सरकार पर काबिज हुई है, नारों की नश्वरता के बारे में कोई सवाल नहीं। सरकार को क्या बताना उन नारों के मूल्यों के बारे में।
ये नारे भी क्या खूब हैं जब लगाये जाते हैं तब गर्मी पैदा कर देते हैं, पता नहीं किसने गढ़ा है इन नारों को। शायद ही किसी को पता हो। ये नारे उन लोक-गीतों की तरह के आस्वाद वाले होते हैं जिसके रचयिता को कोई नहीं जानता पर गीतों को याद किए रहता है। लोक-गीतों की तरह ये नारे भी अमर हैं।
कस्टडी में लिए गये लोगों में एक पूर्व विधायक जी भी थे, नौजवान, चेहरे से दुरूस्त, नई सरकार के पहले उनकी पारटी की ही सरकार थी। वे भी सरकार विरोधी नारों की धुनों में थे। लेकिन वही नारे जब उनकी सरकार में लगाये जाते थे तब विधायक जी का चेहरा बदरंग हो जाया करता था केवल इतना था कि वे गुसियाते नहीं थे अपनी शान्ति-प्रियता बचाये रखते थे। हल्दीघाटी वाले गॉव में जो कुछ थोड़े से दूसरे जाने वाले थे वे कामरेडियत से लबालब थे। उनकी तो बात ही और थी वे नारों के साथ उछल रहे थे। जितना नारे की धुनें उछलतीं उससे कई गुना ज्यादा वे उछलते। उनके नारों से लगता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव में वे क्रान्ति की फसलें उगाकर ही रहेंगे। आरोपी तो खेतों पर कब्जा नहीं कर पाये पर वे प्रताड़ितों के दिल-दमाग पर कब्जा जरूर पा जायेंगे। उनके साहस की निरीहता देखने लायक थी जिसे सरकार विरोधी नारों ने ही सजाया-दुलारा था। सो वे बेचारे काहे खामोश रहते उन्हें पुलिस भी नहीं पहचानती थी। दो तीन सुरक्षा-कर्मियों ने उन्हें पकड़ा और सीधे पुलिस की वैन में बिठा दिया...
‘यहीं नारा लगाओ चाहे जो करो, बाहर भीड़ न इकठ्ठा करो।’
पूर्व विधायक जी की बात दूसरी थी उनका राजनीतिक चेहरा चमकदार था सो उस चमक में पुलिस के लोग भी थे। पुलिस उनसे आग्रह कर रही थी कि...
‘विधायक जी! हमलोग आपको हल्दीघाटी गॉव तक तक नहीं जाने दे सकते जब तक कि वहां की स्थिति सकारात्मक नहीं हो जाती। वहां जाने पर आपको भी खतरा
है सो पुलिस किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले सकती। वैसे भी वहां धारा 144 लगी हुई है, आप तो कानून मानने वाले पूर्व विधायक हैं, आप कानून का सम्मान नहीं करेंगे फिर कौन करेगा? आप ही सोचिए...’
पुलिस की निवेदनिहा शैली से पूूर्व विधायक जी संकोच में पड़ गये। पुलिस की मुलायमियत ने उन्हें गुनने के लिए विवश कर दिया कि अभी उनके विधायकी वाला सम्मान मरा नहीं है वरना पुलिस तो भर मुह किसी से बात तक नहीं करती।
पूर्व विधायक ने सीधे एस.पी. को फोन मिलाया संयोग ठीक था फोन मिल गया। एस.पी. ने भी उनसे वही बताया जिसे पुलिस पहले ही बता चुकी थी। अब विधायक जी का करते? धारा 144 तोड़ना उनके वश का नहीं था उन्हें पता था कि अगर पुलिस अपने पर आ गई फिर तो मार-पीट, कितने डंडे पडं़ेगे गिनना मुश्किल हो जायेगा सो पूर्व विधायकी की खोल में दुबक जाना ही विधायक जी ने समयोचित समझा और चुप हो गये। आदमी ही क्या जो समय की चाल न बूझे, बे मतलब पिट-पिट करता रहे और मार खाता रहे। सम्मान अगर एक बार गिर गया फिर उसे उठाया नहीं जा सकता। बहुत ही नाजुक होता है सम्मान।
पूर्व विधायक जी एक चिन्ता से दुबले हो रहे थे कि पत्राकारों ने उनसे बातें नहीं की ऐसा गुनते ही वे नारा लगाने लगे, नारे वही पुराने थे पचासों साल पहले वाले ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ ‘दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे’ इसके साथ ही राममनोहर लोहिया का नारा...‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं कर सकतीं’।
‘धन-धरती बट कर रहेगी, कमाने वाला खायेगा, लूटने वाला जायेगा’ इस तरह के नारे वहां नहीं थे। इनकी जगह पर एक ऐसा नारा था जिसे सभी लगा रहे थे कि.
‘आरोपियों को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो’
‘जो खेत को जोते कोड़ै वह जमीन का मालिक होवै’
यह नारा भी खूब खूब उछला था।
विधायक जी को तो पता था कि कोई दूसरा पत्राकार उन्हें कवर करने के लिए आये न आये उनका चहेता पत्राकार तो अवश्य ही आयेगा पर वह भी नहीं दिख रहा, प्रचार का एक सुनहरा मौका उनके हाथ से निकला जा रहा था। पत्राकार वगैरह आ जाते तो उनकी फोटो अखबार में छप जाती, किसी चैनल पर उनकी बाइट भी आ जाती पर पत्राकार नहीं थे वहां। संभव है पत्राकारों को उनकी गिरफ्तारी की खबर ही न मिली हो, ऐसा ही होगा, नहीं तो उनके चहेते पत्राकार तो आन पहुंचते वहां।
विधायक जी परेशान थे, अब क्या करें, उन्हें उस समय तात्कालिकता का एक ही कर्म समझ में आया कि नारे लगाओ? नारों की आवाज दूर तक जाती है, वह जायेगी ही। नारे लगाने के लिए अच्छा परिवेश था, भीड़ थी, उत्सुक जनता थी फिर क्या था विधायक जी जोर-जोर से नारा लगाने लगे। उनके साथ भीड़ के रूप में जो
कामरेड थे वे भी लगे नारा लगाने लगे। नारा लगाने में सभी आगे थे पर कांग्रेसी थोड़ा कमजोर थे, वे विरोधी राजनीति का क,ख,ग, सीख रहे थे पर वे बेचारे भी अपनी क्षमतानुसार नारे लगा रहे थे।
पत्राकारों का क्या वे तो खबरें सूंघते रहते हैं। विधायक जी की गिरफ्तरी की गंध पूरे घोरावल क्षेत्रा में पसर चुकी थी, उस गंध को पत्राकारों ने भी कहीं से सूंघ लिया फिर वे भागे भागे चले आये विद्यालय पर जहां विधायक जी नारे लगाने में मस्त मस्त थे। विधायक जी ने पत्राकारों को देख कर राहत की सांस ली...उधर उनके चहेते पत्राकार ने भी राहत की सांस लिया। विधायक जी का बयान घटना के बाबत बहुत ही महत्वपूर्ण होगा।
पत्राकारों ने विधायक जी का बयान लिया उनका बयान सरकारी नीतियों के खिलाफ था तथा प्रशासन के खिलाफ भी। प्रशासन ने सतर्कता बरता होता तो ‘हल्दीघाटी’ नहीं होता। राजस्व न्यायालय ने पूरी सतर्कता के साथ वहां का मामला हल नहीं किया नहीं तो संतोषजनक परिणाम निकल ही आता। इसी बयान को टी.वी. के पत्राकारों ने भी अपने कैमरे में कैद कर लिया बाद में जितना जरूरी होगा उतना प्रसारित करेंगे नहीं तो बकिया काट देंगे।
पत्राकारों के बयान लेने के बाद सरकार विरोधी दल के लोगों को घोरावल के माध्यमिक विद्यालय के भवन के एक कक्ष में ले जा कर बिठा दिया गया और पुलिस बल उनकी निगरानी में लग गया। जो भी हल्दीघाटी वाले क्षेत्रा की तरफ जाना चाहता उसे पुलिस कस्टडी में ले लेती और विद्यालय ले जाकर उन्हें बिठा देती। दिन भर यही क्रम चलता रहा। पुलिस साफ कहती कि हल्दीघाटी वाले गॉव में कफर््यू लगा हुआ है सो आप लोग वहां नहीं जा सकते।
पत्राकारों का जत्था स्वतंत्रा था वे सभी जगह पर बराबरी से बने हुए थे, उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था, वे जहां चाहते थे चले जाया करते थे। इसी बीच अंग्रेजी चैनल वालों के पत्राकार भी हल्दीघाटी वाले गॉव आ धमके। वे भेष-भूषा बोल-चाल सभी सेे अलग दिखते थे जिससे यह पता लगाना मुश्किल था कि वे चाल-चेहरे तथा चरित्रा में कैसे होंगे फिर उसकी जरूरत भी क्या थी कि पता लगाया जाये किसका चरित्रा कैसा है? वे पत्राकार थे इतना ही काफी था।
वही पत्राकार पहले दिन भी हल्दीघाटी वाले गॉव में थे। दूसरे दिन के लिए पत्राकारों ने अपना शेड्यूल अलग बना लिया था। मृतकों के परिजनों से मिलकर वे जानने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें सरकारी सुविधायें क्या क्या मिलीं। वे एक एक परिजन से उस बाबत पूछते... दाह संस्कार वगैरह के लिए प्रशासन से सहायता मिली कि नहीं, वहां सुरक्षा कैसी है, कुछ राशन वगैरह मिला कि नहीं आदि आदि। परिजनों का उत्तर सुनकर पत्राकार संतुष्ट हो गये थे। सारी सहूलियतें हल्दीघाटी वाले गॉव में पहुंचा दी गई थीं। दो नायब तहसीलदारों की ड्यूटी वहां लगा दी गई थी पुलिस के सी.ओ और दारोगा तो वहां थे ही। सरकारी सस्ते गल्ले का दुकानदार घर-
घर घूम कर खाद्यान्न बाट रहा था, मिट्टी का तेल पहुंचा रहा था। नायब तहसीलदार वगैरह परिजनों के लिए कंबल वगैरह बाट रहे थे, स्वयंसेवी संस्थाओं के कुछ लोग थे जो परिजनों के दुखों पर मरहम लगा रहे थे गोया प्रशासनिक सेवा का कुदरती भाव वहां हर कदम पर पसरा हुआ दीख रहा था। वहां की व्यवस्था देख कर लगता था कि एक नई तरह की लोक वाली दुनिया ही उतर आई है हल्दीघाटी वाले गॉव में। पर देखना यह था कि आरोपी कब पकड़े जाते हैं इस खबर को गॉव में पहुंचने में कितना समय लगेगा पता नहीं था... पत्राकार भी अनुमान लगाने में असमर्थ थे, वे अधिकारियों से सवाल दर सवाल पूछ रहे थे। अधिकारी आरोपियों के पकड़ के बारे में चुप रहते वे इतना ही बताते प्रयास हो रहा है, एक आरोपी पकड़ लिया गया है, दूसरे आरोपी शीघ्र ही पुलिस की पकड़ में हांेगे। बस इतना ही।
‘आइए अब गॉव से बाहर निकलते हैं और प्रशासन की तरफ चलते हैं। प्रशासन के हाल-अहवाल केे बाद बुझावन और सुमेर काका का भी हाल लेते हैं गॉव वालों के साथ। धरती-कथा में उनकी पात्राता ही तो वह पुल है जिस पर से होकर सभी पात्रों को अपनी अपनी भूमिका का कथा में निर्वहन करना है।’
‘समय कराह रहा है
कानून तोड़ने और लागू करवाने वालों के बीच’
‘उम्मीदों पर कभी हथौडे नहीं चलाने चाहिए, यही तो एक पूंजी है जो जीवन को बचाये रखती है, उम्मीद की भूमिका धरती-कथा में किसी विशेष प्रयोजन की तरह उपस्थित हो चुकी है, देखिए यह जो उम्मीद है का करती है कथा में...मृतकों के परिजनों की उम्म्मीदें थीं कि वे प्रशासनिक अधिकारियों की गलबहियां करने लगी थीं। अपने भक्त-पुत्रों की उम्मीदें देख कर धरती-माई मगन हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानना चाहिए बल्कि उसके अनुकूलन का प्रयास करना चाहिए और उनके धरती-पुत्रा धरती पर खेले जाने वाले खेलों का मुकाबिला कर रहे हैं।’
खेल तो सरकारें खेलती हैं पर लगता है कि उ.प्र. की सरकार खेल नहीं खेलेगी, वह सतर्क है तथा मन बना लिया है कि हल्दीघाटी वाली घटना को बहुत ही गंभीरता से देखना होगा। साथ ही साथ मुख्यमंत्राी जी विशेष रूप से यह भी पता लगवाना चाहते थे कि सोनभद्र में भूमि-प्रबंधन की हालत कैसे गड़बड़ हो गई? जाने कैसे मुख्यमंत्राी जी ने महसूस कर लिया था कि भूमि-प्रबंधन के द्वारा बनने वाले मानवीय संबंध ही मानव सभ्यता का निर्माण करते हैं सो मुख्यमंत्राी जी खुद रूचि लेने लगे थे घटना के बारे में।
जनपद में एक दिन खबर फैल गई कि मुख्यमंत्राी जी एक दो दिन के अन्दर ही घटना स्थल का दौरा करने वाले हैं।
जनपद का प्रशासन तो घटना के दिन से ही कॉप रहा था जाने क्या हो, प्रशासन स्तर पर घटना की रिपोर्ट भी तैयार की जा रही थी। मुकदमे से लकर राजस्व विभाग के कागजों को देखा जाने लगा था। सभी अधिकारी हिले हुए थे, उनके ओहदे कांपने लगे थे, मुख्यमंत्राी जी का दौरा होने वाला है जाने क्या पूछ दें मुख्यमंत्राी जी।
हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना अपने कद में काफी बड़ी हो चुकी थी जबकि घटना के सजीव पात्रा उल्लेखनीय समूहों के नहीं थे फिर भी। ‘सबका बिकास, सबका साथ, सबका विश्वास’ तो हर हाल में चाहिए होता है लोकतांत्रिक सरकारों को, सरकार भी लोकमूल्यों की परिधि पर घूमने और थिरकने वाली हुआ करती हैं।
डी.एम. साहब घटना के बाद से ही सचेत हो चुके थे जो हो चुका था उसे तो अब ठीक नहीं किया जा सकता पर आगे भी कुछ गड़बड़ न हो जाये सो वे मन ही मन अपने दायित्वों को सही ढंग से निभाना चाहते थे। मुख्यमंत्राी जी के द्वारा पूछे जा सकने वाले संभावित सवालों की सूची उन्होंने बना लिया था और उसके अनुसार राजस्व के कागजों की निगरानी में जुट गये थे। वे किसी सहायक के भरोसे रहना ठीक नहीं समझ रहे थे। करीब चार-पांच घंटे डी.एम. साहब के बीत गये मुख्यालय वाले रिकार्ड रूम में उतना ही तहसील के रिकार्ड रूम में। पर कोई खास कागज उन्हें हासिल नहीं हुआ। हां एक बात उन्हें समझ आई कि रिकार्ड रूम में दस्तावेज सही ढंग से नहीं रखे गये हैं जिसके लिए उन्हांेने मातहतों को फटकारा भी। ए.डी.एम को लगाया गया था कि मुकदमे के दोनों पक्षों के वकीलों से मिलकर जघन्य हत्या काण्ड के बाबत जानकारियॉ जुटायें। इसी दौरान एस.पी.साहब वकीलों के फोन काल-डिटेल खंगाल चुके थे।
काल-डिटेलों से वकीलों पर आरोप नहीं लगाया जा सकता था कि वकीलों ने आरोपियों को या प्रताड़ितांे को भड़काया है जिसके कारण घटना घटित हुई। एस.पी. साहब ने फोन के द्वारा डी.एम. साहब को बता भी दिया था कि दोनों पक्षों के वकीलों का घटना में संलिप्त होना उनके काल डिटेलों से नहीं जान पड़ता। वैसे भी इस समय वकीलों पर सन्देह करना या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना गलत होगा सारे वकील हल्ला करते हुए घेराव कर देंगे प्रशासन का। बात सही भी थी, वकीलों को छेड़ना भौरों के खोते पर ढेला मारना होगा। सो बेचारे वादी-प्रतिवादी दोनों के वकील जॉच के दायरों सेअपने आप बाहर हो गये।
मुकदमों की जानकारी के लिए वकीलों से बात करनी चाहिए। अचानक डी.एम. साहब ने सोचा और किसी मातहत को लगा दिया कि प्रताड़ितों के वकील से मिलवाओ आज ही।
प्रताड़ितों का वकील कचहरी में था वह चैनल वालों को बाइट देने में परेशान था। वह खुद को लेकर परेशान था कि वह बहुत बड़े बवाल में फस गया है। उसके एक मित्रा पत्राकार ने उसे बताया भी था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पुलिस के सन्देह के दायरे में कैसे हो सकता है उसने किया क्या है? वकील अपना माथा ठांेक लेता है, पता नहीं समय किस किस तरह का खेल खेलता है, वह तो केवल वकील है प्रताड़ितों का, उससे हल्दीघाटी
की घटना से क्या लेना-देना। भला उसके कहने पर कोई झगड़ा-फसाद करेगा! यह जो लड़ाई-झगड़ा का मामला होता है खुद की इच्छाशाक्ति से होता है।
चैनल वालों की बाइट जैसे ही समाप्त होती है प्रताड़ितों का वकील चैन की सांस लेता है और चाय पीने के लिए कैन्टीन की तरफ चल देता है तभी उसे तहसील के एक नायब तहसीलदार ने घेर लिया... नायब तहसीलदार ने वकील से दुआ-सलाम किया फिर असल मकसद पर आ गया...
‘सर जी! आपको डी.एम.साहब ने तुरंत बुलवाया है और गाड़ी भी भेजा है।’
‘काहे के लिए बुलवाया है डी.एम. साहब ने वह भी मुझेे?
वकील ने पूछा नायब तहसीलदार से’ हालांकि वह जानता था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के मुकदमे के बारे में कुछ पूछना होगा।
‘पर इस समय तो मैं नहीं जा पाऊंगा कई मुकदमे लगे हैं बिना उनको निपटाये उनके पास जाना संभव नहीं।’
प्रताड़ितों के वकील ने विनम्रता से नायब तहसीलदार को बताया...
नायब तहसीलदार अनुभवी था तथा किसी को मनमुताबिक चला सकने का कलाकार भी...
‘अरे तुरंत छोड़ देंगे हम आपको, हम भी आपके साथ चल रहे हैं, मुकदमा तो आपके जूनियर ही देख लेंगे वैसे भी आज जज साहब हैं नहीं, केवल छोटी अदालतें चालू हैं, मुकदमों में तारीखें पड़ जायंेगी फिर अदालतों में काम ही कितना होता है, चलिए लौट आया जायेगा जल्दी ही।’
प्रताड़ितों का वकील असमंजस में पड़ गया का करे का न करे, कैसे नायब तहसीलदार को मना कर दे, तहसील का पूरा काम तो नायब तहसीलदार ही करता है, प्रभावशाली अधिकारी है जो काम चाहता है उसे करा लेता है, कई काम प्रताड़ितों के वकील का भी उसने निपटवाया है।
अच्छा एक काम है उसे करके चलते हैं। फिर प्रताड़ितों का वकील एक अदालत की तरफ चला गया। कुछ ही देर में प्रताड़ितों का वकील लौट आया और नायब तहसीलदार के साथ डी.एम. साहब के यहां जाने के लिए निकल लिया।
इतना करने कराने में बारह से पार हो चुका था और डी.एम. साहब अपना कार्यालय छोड़ चुके थे। वे अपने आवास पर थे। डी.एम. के आवास पर ही प्रताड़ितों के वकील की मुलाकात डी.एम. साहब से हुई। बात-चीत से लगा कि प्रताड़ितों के वकील की वे प्रतीक्षा कर रहे थे।
डी.एम. साहब के चेहरे पर तनाव की तमाम रेखायें उछल-कूद कर रही थीं देखने से लगता था कि डी.एम. साहब हल्दीघाटी की घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी तनाव से बाहर नहीं निकल पाये हैं जबकि वहां का वातावरण करीब करीब सामान्य हो चुका है केवल जॉच-पड़ताल तथा आरोपियों को गिरफ्तर करने का काम बचा हुआ है।
डी.एम. साहब ने प्रताड़ितों के वकील से बहुत ही विनम्रता से बातें की जो मुकदमे के बाबत थीं। प्रताड़ितों के वकील ने भी डी.एम. साहब को साफ साफ बताया कि वह पहले प्रताड़ितों का वकील नहीं था इधर साल भर से वह प्रताड़ितों के मुकदमे की पैरवी कर रहा है। वह प्रताड़ितों के मुकदमे में वकील तब बना जब विवादित जमीन का बैनामा आरोपियों ने ले लिया। सबसे पहले प्रताड़ितों की तरफ से वह खारिज-दाखिल वाले मुकदमे में हाजिर हुआ था। खरीदी गई जमीन पर आरोपी अपना नाम पहले के दर्ज नामों को खारिज करा कर आरोपी अपना नाम दर्ज कराना चाहते थे। उसके बाद फिर वह परगनाअधिकारी की अदालत में हाजिर हुआ। वहां उसने एक आवेदन पत्रा के द्वारा परगना अधिकारी से निवेदन किया था कि मौके पर चल कर कब्जों की परताल कर लें, मेरे मुवक्किलों का विवादित जमीन पर पुश्तैनी कब्जा-दखल एवं जोत-कोड़ है, आजादी के पहले से चल रहे लगातार कब्जों के आधर पर खारिज-दाखिल वाले मुकदमे का निस्तारण करें। परगना अधिकारी के यहां महीनों तारीखें चली, तारीख पर तारीख दे दिया करते थे परगनाअधिकारी और एक तारीख पर उन्हांेने मेरे प्रार्थनापत्रा को मुझे बिना सुने ही खारिज कर दिया। उसके बाद मैंने आपकी अदालत में अपील दाखिल किया जिसे आपने कई तारीखों के बाद खारिज कर दिया। उसी अपील के खारिजा के बाद ही तो हल्दीघाटी वाले गॉव में बवाल हुआ। अगर दाखिल खारिज वाले मुकदमे का वैधानिक तरीके से निपटारा हो गया होता तो शायद हल्दीघाटी वाला मामला न होता।’
मुकदमे का जो सच था उसे प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को बता दिया। वैसे डी.एम. डी.एम. होता है, किसी के भी माथे की रेखाओं को पढ़ सकने की योग्यता वाला, उसने प्रताड़ितों के वकील को पढ़ लिया था फिर क्या था डी.एम. साहब अपने बारे में गुनने लगे कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हो गई! कुछ सोचने के बाद अपील वाला मुकदमा उन्हें भी ख्याल में आ गया..
‘हॉ एक अपील तो मैंने खारिज किया था... पर परगना अधिकारी का निर्णय देखने के बाद, वह मामला तो मेन्टेनेबुल ही नहीं था। कुछ कुछ ख्याल आ रहा है।’
डी.एम. साहब कुछ ही देर में अपनी पूर्व स्थिति में आगये फिर उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से पूछा...
‘वकील साहब! यह बताइए विवादित जमीन किसकी है जिसका बैनामा आरोपियों के पक्ष में किया गया है... क्या बैनामा करने वाला जमीन का असल मालिक नहीं है? क्या विवादित जमीन प्रताड़ितों की है... अगर दूसरे की है तो किसकी है?’
प्रताड़ितों का वकील राजस्व विभाग के कागजों का कीडा़ था। उसे तो पता ही था कि जमीन के घपलों के मामलों में सोनभद्र बहुत ही आगे है। सोनभद्र आगे न होता तो जमीन के सवालों को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया
होता। तथा वन-प्रबंधन को आदेश जारी किया होता कि सोनभद्र के दक्षिणी हिस्से में वन अधिनियम की धारा 20 की कार्यवाही स्थगित कर दी जाये तथा धारा 4 के निपटारे के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया जाये जिसमें हाई कोर्ट के रिटायर न्यायाधीश हों। माननीय उच्चतम न्यालय नेअपने फैसले में उसकी प्रक्रिया भी उल्लिखित कर दिया था। प्रताड़ितों का वकील राजस्व-भूमि के सरकारी घपलों के बारे में जानता था उसे यह भी पता था कि कैमूर के दक्षिणी भाग में ग्राम-सभाओं में अनिवार्य रूप से निहित होने वाली भूमिप्रबंधक समितियां भी गठित नहीं की गई हैं। आज तक ग्राम-सभाओं में भूमिप्रबंधक समितियों के गठन के बारे में निर्णय नहीं लिया जा सका है।
प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब को ब्यारेवार बताना शुरू किया...
‘हॉ साहब! जिन लोगों ने जमीन का बैनामा आरोपियों को किया है वे लोग कागजात माल में दर्ज थे पर कागजात माल में उनका दर्ज होना ही गलत है साहब! और घपला भी इसी बिन्दु पर हुआ है। बैनामा करने वाले लोग आखिर किस कानून के द्वारा विवादित जमीनों पर दर्ज कागजात माल हैं? पुरानी खतौनी बताती है कि हल्दीघाटी वाले गॉव की पूरी जमीन ‘जंगल जिरायत’ के नाम से दर्ज है फिर वह जमीन किसी संस्था के नाम से कैसे दर्ज हो सकती है, क्या संस्था ने उस जमीन को खरीदा या जमीनदारी टूटते समय क्या संस्था उस जमीन पर काबिज थी? संस्था का नाम तत्कालीन तहसीलदार द्वारा जंगल जिरायत की जमीन पर नामांतरित कैसे कर दिया जाता है जब कि उस समय नामांतरण का अधिकार ही तहसीलदार को नहीं था। वहां सारी कानूनी गलतियॉ उसी एक गलत नामांतरण के कारण हुई जान पड़ती हैं, इससे अधिक मुझे कुछ भी नहीं मालूम सर!
डी.एम. साहब अपनी गंभीरता में थे तथा कुछ सोच भी रहे थे। वे सोच रहे थे कि अगला सवाल प्रताड़ितों के वकील से क्या किया जाये...
‘तो वकील साहब क्या जमीन के कागजात तथा मुकदमे की पूरी पत्रावली मुझे दिखाने की कृपा करेंगे आप!’
वकील तो तैयार बैठा था तथा चाहता था कि देर से सही डी.एम.साहब हल्दीघाटी वाले गॉव की जमीनों के विवाद की सचाई जानने के लिए कम से कम राजी तो हो गये, यह बहुत ही अच्छी बात है, वहां की जमीन की सचाई ही तो वह जनाना चाह रहा था एस.डी.एम. तथा डी.एम. साहब को पर वे लोग तो तैयार ही नहीं थे कुछ सुनने तथा विचारने के लिए। बिना मेरे प्रतिवाद को सुने ही मेरे प्रार्थना-पत्रों को खारिज कर दिये। कम से कम अब तो तैयार हैं वहां की जमीनों का खाता-वृतान्त सुनने के लिए। उसका तो काम ही है मुकदमे के तथ्यों को सक्षम अधिकारियों के समक्ष विधि-पूर्वक प्रस्तुत करना। वह बतायेगा जरूर, अच्छा मौका मिला है...
उसने तत्काल डी.एम. साहब से कहा...
‘हॉ सर! पूरी पत्रावली दिखा दूंगा। अब आप जिस दिन कहें उस दिन में आ जाऊॅ आपके कार्यालय पर या आवास पर ही।’
‘आप अपना फोन नंबर दे दीजिए मुझे, मैं आपको काल कर दूंगा सारे कागजात लाइएगा, प्लीज! कुछ भूलिएगा नहीं संभव है मैं आज ही आपको शाम को बता दूॅ कि आपको कब आना है।’
यह डी.एम. साहब थे पूरी विनम्रता के साथ..
‘तो मैं जाऊॅ सर!’ प्रताड़ितों के वकील ने डी.एम. साहब से पूछा
‘कैसे आये हैं गाड़ी से आये हैं या...’ डी.एम. ने जानना चाहा वकील से
‘नहीं सर! मैं नायब साहब के साथ आया हूॅ ’ वकील ने उन्हें बताया
‘कहां है वह! और तुरंत डी.एम. साहब ने कालबेल बजा दिया..
‘नायब घोरावल को भेजो!’
नायब घोरावल हाजिर, एक भारी भरकम देह काया वाले।
‘जी सर!’ नायब घोरावल डी.एम. के सामने हाजिर हो गये।
‘कल वकील साहब को दुबारा ले आना है मेरे आवासीय कार्यालय पर। कब लाना है इसकी सूचना तुम्हंे मिल जायेगी सारे कागजात भी साथ में लाना है वकील साहब को याद दिला देना कहीं वकील साहब कोई कागज भूल न जायें।’
डी.एम. साहब ने नायब तहसीलदार को निर्देशित किया।
‘जी सर! जी सर!’
प्रताड़ितों का वकील सीधे कचहरी लौट आया डी.एम. कार्यालय से...कचहरी पर पहले से ही कुछ पत्राकार जमे हुए थे वे भी जानना चाहते थे प्रताड़ितों के मुकदमे के बारे में। वहां जमीन का कैसा लफड़ा है? जमीनदारी के बाद तो जमीन के सारे लफड़े खतम हो चुके हैं, अब यह कैसा मामला है? प्रताड़ितों के वकील ने उन पत्राकारों को भी वही बताया जो पहले के पत्राकारों से बताता रहा था। प्रताड़ितों के वकील के पास तो एक ही नश्ल वाली बात थी कि उसके मुवक्किलों का विवादित जमीन पर गुलामी के पहले से ही कब्जा-दखल मय जोत-कोड़ लगातार चला आ रहा है कागजों में चाहे जिसका नाम हो। दिक्कत यही है कि जमीनदारी टूटते समय भी उनके मुवक्किलों के कब्जों का विधिक रूप से संज्ञान नहीं लिया गया अगर संज्ञान लिया गया होता तो उसके मुवक्किल विवादित जमीन के सीरदार हो चुके होते तथा मालगुजारी का दस गुना ट्रेजरी में जमा करके भूमिधर बन जाते। आदिवासियों को न तो सीरदार बनने का मौका दिया गया और न ही भूमिधर क्योंकि अशिक्षित आदिवासियों का मामला था कौन सुनता है उनकी। वे बेचारे जस के तस पड़े हुए हैं अब तो उनके दस लोग कतल भी कर दिये गये।
प्रताड़ितों के वकील से मिलने के लिए जो बाहरी पत्राकार आये हुए थे वे खबरें सूंघ कर आये थे क्योंकि खबरें दो दिन से लगातार देश के भूगोल में ही नहीं विदेश के भूगोलों में भी घूमने लगीं थींे और उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन पर सवाल उठानेे लगीं थीं। कैसा है वह परिक्षेत्रा जहां जमीन के विवाद में दस दस आदमी मार दिये जा रहे हैं। क्या कर रहा है वहां का प्रशासन। क्या वहां ‘हल्दीघाटी’ और ‘चौसा’ वाली युद्धगत स्थितियां फिर से जनम लेने लगी हैं?
प्रताड़ितों का वकील मुकदमे के फाइलों को कचहरी से खाली हो कर सहेजने में जुट गया। कल ही डी.एम. साहब के यहां ले चलना होगा सभी फाइलों को। उसकी फाइलंे दुरूस्त थीं उसमें सर्वे अधिकारी/एस.डी.एम.का खारिजा वाला आदेश तथा डी.एम. साहब का अपील खारिजा वाला आदेश भी था। उनकी पक्की नकलंे प्रताड़ितों के वकील के पास थीं तथा वह खतौनी भी थी जो विवादित जमीन को ‘जंगल जिरायत’ साबित करती थी।
तो हल्दीघाटी गॉव की खबरों ने पूरे मानव समाज को सचेत कर दिया था खासतौर से प्रशासन तथा सरकार को। इसी लिए सरकार के कान खड़े हो गये थे और मुख्यमंत्राी जी ने घटनास्थल के दौरे का कार्यक्रम बना लिया था।
दौरे के तमाम कार्यक्रम विरोधी दलों के नेताओं ने भी बना लिए थे। एक दो नेता तो आये भी थे सोनभद्र में घटना-स्थल पर जाने के लिए पर प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते से ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। विरोधी दलों के नेता थे कि हल्दीघाटी वाले गॉव का दौरा करने की जिदों पर अड़े हुए थे फिर पुलिस ने उन नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस जानती थी कि ये नेता हैं, ऐसे नहीं मानने वाले इन्हें गिरफ्तार करो। देर रात तक उन्हें रिहा भी कर दिया गया था। जब प्रदेश स्तर के विरोधी दलों के नेताओं को हल्दीघाटी वाले गॉव नहीं जाने दिया गया फिर बेचारे सोनभद्र के विरोधी दलों के नेता-परेता कैसे हिम्मत जुटा पातेे सो वे अपनी खोलों में दुबके पड़े हुए थे तथा समय के गति की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कभी न कभी उनके दिन भी बहुरेंगे। वे जायेंगे किसी न किसी दिन हल्दीघटी वाले गॉव, कितने दिनों तक सरकार पाबन्दी लगाये रहेगी।
‘धरती-माई जानती हैं कि समय बहुत ही चंचल होता है, कभी दुखों का पहाड़ उठाये स्वर्ग और धरती का चक्क्र काटने लगता है तो कभी सुखों की मनोरम व हसीन बदरियों के साथ सबको आनन्दित करता रहता है। हल्दीघटी वाले गॉव में भले ही दुखों को लेकर समय टहल रहा है पर किसी न किसी दिन इन दुखों को समय लील जायेगा फिर तो हर तरफ सुख ही सुख।’ गॉव में दुख पसरा हुआ है तभी तो कई तरह के राजनीतिक लोग भी गॉव में आवा-जाही करना चाहते हैं नहीं तो वे भला गॉव में आते, मुख्यमंत्राी जी आने का प्रोग्राम बनाते...
धरती-माई उत्सुक हो चुकी हैं धरती के देवता रूपी राजा मुख्यमंत्राी जी को देखने के लिए...
आखिर वे कैसे हैं?
स्वर्ग के राजा ईन्द्र की तरह ठाट-बाट वाले या
किसी और की तरह... एकदम सरल औघण-दानी शिव की तरह, जमीन से उपजे जमीन वाले’
उनको देखना अद्भुत होगा।
‘यादें मिट रही है अनुष्ठान में
और अनुष्ठान कहानी बनता जा रहा है’
‘जीवन जीने के तरीकों में ये जो अनुष्ठान होते हैं बहुत ही मनोवैज्ञानिक भूमिका का निर्वाह करते हैं, मन को शान्ति पहुंचाने वाले होते हैं पर अनुष्ठान केवल अनुष्ठान नहीं होते, ये भी रुपयों पर टिके होते हैं, उसी के द्वारा पूरे होते हैं। एक तो गॉव में शोक-गाथा फैली हुई है हर तरफ और ये अनुष्ठान! बहुत ही संकट का समय है देखिए कैसे कटता है यह समय धरती-कथा के साथ या उससे अलग। धरती-माई भी देख रही हैं सारे अनुष्ठानों को जो स्वर्ग में किए जाने वााले अनुष्ठानों से एकदम अलग हैं। उन्हें खुशी हो रही है कि धरती-पुत्रों ने भी जीवन जीते रहने के लिए अनुष्ठानों को अपने माफिक सिरज लिया है पर यह जो अनुष्ठान कराने वाला व्यक्ति है वह है कौन किसी देव-दूत की तरह बना ठना उसकी क्या जरूरत है अनुष्ठानों के लिए?’
बबुआ दुधमुही का अनुष्ठान निपटाने में है। सभी की सहमति से एक ही स्थान पर यानि सोमारू काका के घर के सामने वाले दलान में किया गया है दुधमुही का कार्यक्रम। यह भी तय हो चुका है कि मरनी का पूरा कार्यक्रम एक साथ मिल कर यहीं किया जायेगा। अलग अलग घरे नाहीं होगा मरनी का कायक्रम। वैसे भी सरवन ने पहले से ही पूरे गॉव को एक रसरी में बांधा हुआ था, वे लोग गॉव के लोगों से अलग होकर कुछ सोच भी नहीं सकते थे। विआह हो, अन्नप्रासन हो, तीज हो खिचड़ी हो सारे कार्यक्रम एक ही साथ किए जाते रहे हैं समझना मुश्किल है कि आज की बटी हुई दुनिया में जब भाई भाई अलग अलग रहो चुकेे हैं, अलग अलग खाना-पीना कर रहे हैैं फिर गॉव का मरनी वाला कार्यक्रम एक साथ कैसे हो रहा है? बुझावन काका देख रहे हैं खटिया पर पड़े पड़े सारा कार्यक्रम, देखने को तो सोमारू काका भी देख रहे हैं...उन्हें अच्छा लग रहा है गॉव की एकता खतम नाहीं हुई है, समूह की खेती ने सिखा दिया है लोगों को एक साथ मिल कर काम करने से लाभ ही लाभ है। सभी लोग एक साथ मिल कर अनुष्ठान कर रहे हैं। लगता है अब बबुआ संभल लेगा पूरे गॉव को। नाहीं तऽ जान पड़ता था के सरवन चला गया, गॉव की एकता भी चली गई उसके साथ।
‘इसी तरह की एकता गॉव में बनी रहे तब नऽ’, दोनों बुढ़वा सोच रहे हैं। सोचने को तो बबुआ, बंधू, पुनवासी और खेलावन भी सोच रहे हैं। अगर वे न सोच रहे होते तो दुधमुही का कार्यक्रम एक जगह निपटाना मुश्किल हो जाता। खाली दुधमुहियय नाहीं करना था उसमें खर्चा-बरचा भी लगना था। ऊ तो खेलावन था कि घोरावल बाजार से सारा सामान खरीद लाया। बबुआ को भी पता नहीं था कि मरनी के अनुष्ठान का सारा सामान एक साथ ही खरीदा जाता है। सोमारू काका ने सबेरे ही बता दिया था और बुझावन काका रात ही में बोल दिए थे। बुधनी काकी नेे भी सहेजा था बबुआ को...
‘मरनी का सारा सामान एक साथ खरीदाता है। ‘एकै साथ सारा सामान खरीदाता है’ सुन कर बबुआ परेशान हो गया था, का करे, उसके पास उतना रुपया नाहीं हैं, थोड़ा बहुत है तऽ ओसे का काम चलेगा। गॉव में किससे मॉगे, कौन दे सकता है, कोई नाहीं है, सारा रुपया तो खेती-बारी में लग चुका है...खेलावन, बंधू अउर पुनवासी से बतियायेंगे, कउनो रस्ता निकलबै करेगा।’
‘यह जो मरनी का अनुष्ठान है नऽ का बतावैं...गमी का दुख और ऊपर से रुपये का दुख अलग से। दूसरे कार्यक्रम होते हैं विआह, अन्नचिखउआ वाले तो पता रहता है कि कार्यक्रम करना है, सो तैयारी होती रहती है, पर मरनी वाले का क्या... इसका किसे पता चलेगा, अचानक होता है और कुल कार्यक्रम तेरह दिन में ही निपटाना होता है। पता नाहीं कैसे सरवन निपटाया करता था सारा काम। सरवन होता तो किसी को कुछ नाहीं करना पड़ता... बबुआ उदास हो चुका है।
‘सामान एकै साथ खरीदाता है,’ बिफनी भी जानती है।
कैसे खरीदायेगा कुल सामान एकै साथ, केतने का खर्चा-बर्चा आयेगा.. सरकारी रुपया तो आने वाला है, बोल रहा था लेखपाल, कल ही आ जाना चाहिए था रुपया पर नाहीं आया हो सकता है आज आ जाये। सुनने में आ रहा है कि घायलों को पचास पचास हजार और मृतकों के परिवार को एक एक लाख रुपये की सहायता दी जायेगी।
रुपया जब आयेगा तब आयेगा, काम तो तत्काल आ गया है रुपयों का, कैसे होगा, कुल सामान एकै साथ खरीदना है.. बबुआ परेशान है। वह अपने मित्रों से सलाह कर रहा है, खेलावन समझाय रहा है बबुआ को...
‘अरे एमें का है, सारा सामान उधारी ले लेंगे, फसल तैयार होजाने पर बेच कर चुका देंगे दुकानदार का। एक काम अउर हो सकता है। हमलोगों के नाम जमीन होती तो ग्रीन कार्ड बना होता उससे रुपया निकाल लेते पर जमीनी पर हमलोगों का नाम ही नाहीं है।’
‘हमरे बपई के नाम से खाते में कुछ रुपया था, खेती के समय ही निकसि गया सारा रुपया, अब एक छदाम भी नाहीं है।’
बबुआ ने अपनी मजबूरी बताया....
‘तो का करना होगा? करना का होगा हमैं तो लगता है कि बन्धू अउर पुनवासी के खाते में कुछ न कुछ रुपया तो होगा ही, बन्धू मोटर साइकिल खरीदने के लिए रुपया रखा हुआ था खाते में, ओकर बड़का लड़िकवा बताय रहा था कि जीजा को विआहे में मोटर साइकिल नाहीं दिलाया था गौना में खरीद कर देना है। ऊ रुपया होगा ओकरे पास।’
बोल पड़ा सोमारू...
‘का फुसुर-फुसुर करि रहे हो तूं लोग, हमहूं तऽ जानें। रुपिया कऽ बात है नऽ तब्बै बबुआ का मुह लटकि गया है, बबुआ केहू से रुपिया मांगेगा नाहीं अउर काम भी चल जाना चाहिए...’
बोल बोल बबुआ! केतना रुपिया चाही करम काण्ड करने में, खर्चा-बर्चा कऽ हिसाब बनाय लो अउर खरीद लो घोरावल बाजार से। हमरहूं कीहें पन्द्रह हजार रुपया है रखे थे काट-कपट कर, कुंअरकी लडिकिया के बिआहे के लिए कनफुल अउर मॉग टीका खरीद लेंगे पर जाने दो ऊ सब बाद में खरीदायेगा। ये साल हम बिआहौ नाहीं करेंगे, सब ठीक हो जायेगा तब बिआह करेंगे।’
दुधमुही का खाना-पीना बनाने में जुटी हुई है बिफनी। गॉव की कई औरतंे हैं जो काम निपटाय रही हैं। बुधनी काकी सभी नवछेड़ुआ औरतों को बताय रही है कि का का करना होता है। नवछेड़ुओं का का पता कि का होता है रीति-रिवाज। बाहर बैठे हुए है रामखेलावन, बन्धू, पुनवासी और परमू काका। परमू काका चीलम भर रहे हैं...
‘दो दिन होय गया दम लगाये, आजु लगा लेते हैं, ससुरा मनै नाहीं किया के दम लगाना है, दम लगाना भी भुलाय गया हैै।’
‘केसे पूछि रहे हो काका’ बन्धू ने छेड़ा.. काका...दम लगाना है तो लगा लो कउन रोक रहा है तोहैं।’
‘हमैं कउन रोकेगा बे! रजवाडी के जमाने में तऽ कोई नाहीं रोक पाया अब का कोई रोकेगा, हमार मनै नाहीं किया समझि लो मुर्दा बनि गये थे हम, रहि रहि के सरवन अॅखियै पर चढ़ जाता था... गजब लड़िका था। खाली सरवनै का दुख नाहीं चढ़ा था कपारे सब लड़िकवन कऽ चढ़ा था पर सरवन की बात अउर है? उहय पूरे गॉये के एक किये था, ओकरे कारण गॉये कऽ रगड़-झगड़ा भी खतम हो गया था अब आगे का होगा राम जानैं।’
परमू काका चीलम भर चुके हैं... लगा बे बन्धुआ! चीलम में फाहा, ई सलाई है अउर फाहा थामो...
बन्धू ने फाहे में आगी लगाय दिया है, फाहा भभक उठा है और परमू काका...बम बम औघड़दानी बम बम.. एक दम लगाया परमू काका ने, दम ठीक से नहीं लगा, ठीक से लगा होता तो भर मुह धुआं निकलता फिर दम खींचते हैं परमू काका. इस बार दम ठीक से लगा, भर गया पूरा मुह काका का...
परमू काका ने मुह से धुआं उगला और...
‘ले रे खेलौना! लगा ले एक दम, बन्धुआ तूं लेगा, तूंहो ले ले बेटा, औघड़ दानी बम भोले का परसाद है?’
फिर तो सभी ने एक एक दम लगा लिया लेकिन बबुआ दम लगाने से किनारे रह गया वह वहां नहीं था। बन्धू पकड़ लाया बबुआ को...
‘ले मार ले एक दम...’
‘नाहीं हमार मन नाहीं कर रहा’
‘मन कैसे करेगा, मन को मनाओगे तब नऽ मन करेगा, मन को तऽ तनेन कर दिये हो...’
‘ले मार एक फूंक’
बबुआ भी मार लेता है एक फूंक....
दुधमुही का अनुष्ठान दो बजे दिन तक निपट गया।
बबुआ सोच में है, दम का जोर भी होय गया है उसे, जो सोचना है उससे अधिक सोचेगा.....दूसरे दिन घारोवल बाजार जाना है और मरनी का सारा सामान खरीदना है। रुपये का इन्तजाम भी होय गया है, कल तक रुपया हाथ में आ जायेगा केवल सोमारू को ही बैंक से निकालना है रुपया। बन्धू का तो घर पर ही रखा हुआ है। खेलावन को बाजार जाना ही होगा सामान खरीदने वहीं रुपया भी निकाल लेगा खेलावन। महंगी का जमाना है बहुत कम खर्चा होगा तो कम से कम चालीस हजार रुपया तो लग ही जायेगा। दस लोगों का करम है इतना तो लगेगा ही, दुधमुयिय में दुइ हजार लग गया, पुरवा पर्तन दाल-साल, तेल- पानी लेकर, सिलेन्डर भराइयय लग गया एक हजार रुपया सौ रुपिया ऊपर से घूस देना पड़ा तब मिला सिलेन्डर।
बिफनी अभी खाली नहीं हुई है, दुधमुही का सारा जूठा बर्तन पड़ा हुआ है माजना है उसे। बबुआ को नाहीं देख पाई है खाना खाते समय देखा था, उसे चिन्ता लगी हुई है मरनी का सामान कैसे खरीदायेगा... बबुआ ने का किया?
बबुआ ही बता सकता है कुछ न कुछ उपाय तो किया ही होगा, चलते हैं ओसारे की तरफ, एक बार गये थे देखने तो वह बपई को खाना खिला रहा था और खेलावन गये थे सोमारू काका को खिलाने। बात नाहीं हो पाई लौट आये...
बबुआ सोमारू काका के दालान में है उसके संगी-साथी सब चले गये हैं अपने अपने घर।
‘ईहां का कर रहे हो, घरहीं चले जाते अउर करिहांय सोझ कर लेते, बपई को भी देख लेते।’
बिफनी ने टोका बबुआ को..
‘हॉ रे घरहीं जाय रहे हैं, खाना खा लेने के बाद आजु खाली सोना है अउर कुछ नाहीं करना है। अबहीं तऽ खाना खाने आना ही होगा’
‘का हुआ रुपिया का इन्तजाम होय गया, कइसे खरीदायेगा मरनी का सारा सामान?
पूछा बिफनी ने बबुआ से...
‘तूं काहे फिकिर करती है बबुआ के रहते रुपिया की कमी नाहीं पड़ेगी।’
‘उ हम जानते हैं पर रुपिया का मामला है, विपत्ति में कोई रुपिया नाहीं देता है, सब मजाक उड़ाते हैं अलग से, एही से पूछ रहे हैं अउर का...’
‘तूं जा इहां से, उहां से खाली होय के जल्दी से घरे आय जा, बर्तन-फर्तन सब मजवाय देना, कुछ जूठा न रहे बूझ रही हो नऽ हमार बात। अबहीं केतना देर लगेगी उहां? हमहूं आय रहे हैं देह सोझ कर के।’
‘एक घंटे का टाइम तो लगेगा ही’ बिफनी ने बताया बबुआ को
‘काम पूरा करके आय जाना’, कहते हुए बबुआ अपने घर चला गया। बबुआ घर पहुंचा ही था कि बुधनी काकी आ गईं...
‘का रे! बबुआ आराम करने जा रहे हो का?’
‘हॉ काकी थोड़ा करिहांय सोझ करलें, अईंठ गई है खड़े खड़े।’
‘ऊ तऽ ठीक है दुई दिन होय गया करिहांय अईठ तऽ जायेगी ही। हम ए बदे तोहरे कीहां आये हैं के कइसे होगा कुल मरनी का काम, सुने हैं के एकै संघे करना है सब कुछ, ढेरै रुपिया लगेगा ओमें कइसे करोगे सब?’
बुधनी काकी बबुआ से बतिया ही रही थीं कि परमू काका चले आये... वे भी जानने के लिए ही आये हुए हैं, कइसे करना है तेरही तक के खर्चा-बर्चा का इन्तजाम?
बबुआ ने बताय दिया...
‘देखो काकी खेलावन कीहां मोटर साइकिल का रुपिया पड़ा हुआ है अउर बन्धू कीहां भी रुपिया है, दोनों देय रहे हैं, फसल तैयार हो जायेगी तऽ लौटाय देंगे दोनों जने कऽ रुपिया।’
बात तो ठीक है पर एक काम अउर है, सभी बोल रहे थे के मरनी का काम है सब घरे से रुपिया लगना चाहिए, अउर बबुआ सब घरे से रुपिया आय गया है ओके तूं कागज पर चढ़ाय लो, जौन घटै ओही के खेलावन से चाहे बंधू से ले लो। का हम गलत बोल रहे हैं। तोहरे कीहां दुइ तीन बार ऊ लोग आये पर तोहैं काम में देखि के कुछ नाहीं बोले, हमरे इहां जायके दे दिये रुपिया अउर हम लेय लिए।’
‘नाहीं रे काकी, तोहार बात सही है पर हम ई समझे के एतना बड़ा संकट आय गया है अइसने में केहू से रुपिया का मांगे, एही खातिर हम केहू से कुछ नाहीं बोले अउर चुप लगा गये। अब तऽ सरवन है नाहीं, हमहीं के सब देखना है नऽ काकी।’
बुधनी काकी के हाथ में एक झोला था ओही में रुपिया रखा हुआ था। काकी ने झोला उझील दिया, रुपया निकलि गया बाहर...
‘रे बबुआ कुल गिन के अहतियाय ले अउर सब कर नाम भी लिख ले सबका एक कागज पर हम बताय रहे हैं के, के के दिया है गॉवै भर तऽ दिया है।
बबुआ बोल पड़ा, ‘परमू काका तूंहय गिन दो रुपिया...’
‘नाहीं रे तूं गिन कर सब सहेज ले, हम का गिनें।’
बबुआ रुपिया गिनने लगा...
कुल पन्द्रह हजार रुपिया था, काकी ने उन लोगों का नाम भी बताय दिया जिनके घरों से रुपया आया था। बुधनी काकी और परमू काका ने पांच पांच हजार रुपया दिया था, जिसके पास जितना था सभी ने जोड़ कर दे दिया था।
बिफनी भी काम निपटा कर आ गई, बबुआ को रुपया गिनता देख कर वह
अपने कमरे में गई और पांच हजार रुपया ले आई..।
ई हमरे तरफ से रख लो काकी, एतने है हमरे ईहां...
बुधनी काकी बिफनी का मुह देखने लगीं... एकरे घरे कऽ तऽ कोई नाहीं मरा है फिर भी मरनी के काम के लिए दे रही है रुपिया..
‘ओसे का हुआ गॉव तऽ एकै है तऽ मरनी का काम भी सबके मिल के ही निपटाना होगा।’
बुधनी काकी ने रुपया देने वालों का नाम लिखवा दिया, कागज पर सबका नाम लिख लिया बबुआ ने।
तऽ हम लोग जाय रहे हैं बबुआ! काल्हु सामान खरीदने के लिए के जायेगा घोरावल? सुमेरना कऽ टेम्पो खड़ा है बैसाखी के दुआरे पर, ओके ले लेना बन्धू चलाता है टेम्पो ओही से सारा सामान ढोआ जायेगा। बैसाखी कऽ ससुई बोल रही थी के बबुआ को बोल देना बहिन।
‘काकी हम तऽ सोच रहे है कि खेलावन, बंधू अउर पुनवासी के भेज देते हैं बजारे, उहां भीड़ लगाने की का जरूरत है।’
‘हां बबुआ तूं ठीकै सोच रहा है ओही लोगन के भेज देना, हम तऽ सरवन के छोटका भइयवा के भी भेज देते पर ऊ तऽ सुध-बुध खोकर पड़ा हुआ है खटिया पर कहीं ओकर हालत तनबुड़ुक वाली न हो जाय, हमैं बहुत डर लग रहा है बबुआ।’
‘नाहीं काकी नन्हका कऽ हालत तनबुड़ुक नीयर नाहीं होगी, तनबुड़ुक भी ठीक होय जायेगा गमी बीत जाने तो दो। नन्हका समझदार है, बूझता है सब कुछ। ऊ दिमाग से ठीक-ठाक रहेगा। पता नाहीं कैसे तनबुड़ुक गड़बड़ाय गया दिमाग से पहिले तऽ उहौ ठीकै था।’
‘हां बबुआ! अब तऽ सब बोझा नन्हका पर आय गया है, अकेली सुगनी का करेगी। उहो बेचारी दिन-रात रो रही है, के समझावै ओके, अउर का समझायेगा कोई, ओकर बपई आया था, ओकर अइया भी आई थी, दोनों गुंग हो गये थे, कुछ बोलते नाहीं बना दुन्नौ से। सुगनी जइसे हमरे घरे कऽ बड़की पतोह वैसहीं ओनकरे घरे कऽ बड़की बिटिया। बेचारे का बोलते। हम तऽ बबुआ ओही दिना से सुगनी के समझाय रहे हैं पर ऊ कुछ बोलबै नाहीं करती है, हम ओके समझाय रहे हैं भोले बाबा चाहेंगे तऽ ऊ समझ जायेगी हमरी बात।’
पूरा गॉव भर गया था नाते-दारों से, सब आजु लउट रहे हैं अपने अपने घरे अब आयेंगे तेरही के दिन। हं एक बात तऽ भूलियै गये हम, तेतरी के घरे ओकर भाई आया था, हमै तऽ जान पड़ा के ऊ गरम मिजाज का है, बड़ा गड़बड़ बोल रहा था के मार कऽ बदला मार। हम अपने जीजा के मारने वालों को नाहीं छोडं़ेगे, करम-काण्ड बीत जाय बस एकरे बाद हम देख लेंगे ऊ लोगन के।’
‘हम उहां नाहीं थे बबुआ नाहीं तऽ ओन्हय समझाय देते के मार कऽ बदला मार का का मतलब होता है। हमलोगन कऽ गॉव राड़-रहकारों वाला गॉव नाहीं है, हमलोग
खूनी-कतली नाहीं हैं। हम तऽ देखि चुके हैं मार-काट वाला जमाना भी...नन्हका के बपई के बारे में के नाहीं जानता, घूमि घूमि के मारै किया करते थे, रियासत के कहने पर, ऊ तऽ जब हम बिआह के आये तब ओन्है संभाले, आदत ऐसन है कि आजउ गरमाय जाते हैं। देख बबुआ! मार-काट के बारे में कब्बउ न सोचना।’
बबुआ को पता है के गॉयें के जवान लड़कवन के दिल-दमाग में गुस्सा है पर नाहीं, गुस्सा से का होगा? हमार बपई हमेशा इहय समझाते हैं कि बबुआ!
‘गुस्सा आदमी को खाय जाता है, गुस्सा कुछ देता नाहीं है अउर छीन लेता है सारा कुछ, एसे आदमी उहय है जे अपने गुस्सा पर काबू रखै। आदमी अउर जिनावर में तऽ कुछ फरक होना चाहिए।’
बबुआ ने काकी की बात में हॉ मिलाया....‘हंऽ काकी तूं सही बोल रही हो, का होगा झगड़ा करके, झगड़ा से कुछ नाहीं निकसेगा पर एक बात बताओ काकी हमरौ मन कभी कभी गड़बड़ा जाता है पर सरवन का खियाल आते ही ठीक हो जाता है। सरवन चाहा होता नऽ तऽ पहिलहीं फरियाय गया होता...पर जाने दो काकी जौन करम बाबा करेंगे, करेंगे हमैं विसवास है भगवान पर।’
दुधमुही का खाना-पीना दिन रहते ही निपट गया। औरतें देह सोझ कर रही हैं और मरद अपने अपने घर चले गये हैं।
बबुआ भीतर से परेशान है मार का बदला मार या चुप बैठना, कहने को तो वह भी कहता है कि मार का बदला मार ठीक नाहीं है पर क्या ऐसा ही है.. हॉ ऐसा ही है पर वह फसा हुआ है, उसका मन नहीं मान रहा, डोल रहा है उसका मन, खून का बदला तो लेना ही होगा, दस साथियों का खून हुआ है...।
नाहीं नाहीं खून का बदला खून से सोचना गलत है..
‘हम हथियार नाहीं उठायेंगे, हम कानून के सहारे अपनी लड़ाई लड़ेंगे और आरोपियों को सजा दिलवाकर ही रहेंगे। कानून को हमलोगों की फरियाद किसी भी हाल में सुननी ही पड़ेगी।’
‘और कानून है कि घुस चुका है, धरती-कथा में भी, किधर से घुस गया वांयें से या दांये से, पूरब से कि पश्चिम से किसी को नहीं पता। पता तो धरती-माई को भी नहीं, उन्हें तो यह भी नहीं पता कि धरती के समाज पर जब कानून उतरता है तब वह अदालत साथ लेकर लेकर आता है। अदालत ही कानून की व्याख्या करती है, अपराधियों को दण्डित करती है। स्वर्ग में तो ऐसा चलन है नहीं, वहां तो श्रापों से ही काम चल जाता है। हल्दीघाटी वाली घटना अगर स्वर्ग में घटी होती तो वहां का कोई भी देवता श्राप दे देता, स्वर्ग से निष्काशन करा देता, ढकेल देता धरती की तरफ पर वहां तो घटना हुई ही नहीं। घटना हुई है धरती पर, धरती-माई श्राप दे नहीं सकतीं उनके पास श्राप देने का अधिकार हैं ही नहीं, अगर देंगी भी तो उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ेगा। सो वे खामोश हैं...
बिना अधिकार के कुछ भी करना बेकार है।
‘सॉसें थम गई हैं
पर जीना तो है ही, पार करना है जीवन की नदी’
‘धरती-कथा अनुष्ठानों में उलझी हुई है, और उसके पात्रा हैं कि कई तरह की योजनायें बना रहे हैं। कथा में एक ही तरह की पात्राता निभाना उन्हें ठीक नहीं जान पड़ रहा, वे भूमिका बदलने के लिए परेशान हैं, वे हिंसा और अहिंसा के बीच में फस गये हैं...आखिर हम काहे बर्दास्त करें? हिंसा और अहिंसा भी क्या खूब है, जाने कितने इसके रूप हैं। हिंसा हुई है हल्दीघाटी वाले गॉव में, वहीं हिंसा गॉव के नौजवान लड़कों का सहला रही है, दुलार रही है, हमदर्दी दिखा रही है ‘मार का बदला मार’, ‘कतल का बदला कतल’ इसी वसूल से समाज बदलता है, मानव सभ्यता में बदला लेना हमेशा से बहादुरी का कार्य माना गया है, इतिहास भी इसकी पैरवी करता है.इन्हीं सोचों के बीच सिकुड़ी सी द्रोपदी माफिक अहिंसा भी अपनी साड़ी थामे विलाप कर रही है। धरती-माई तो जानती हैं कि हिंसा का क्या मतलब होता है? सुर-असुर का संग्राम उनकी ऑखों के सामने नाचने लगा... वे कराह उठीं..
किसी भी तरह से वे युद्ध नहीं होने देंगी पर राम और कृष्ण भी मानव रूप में अवतार लेकर कहां रोक पाये युद्ध? फिर वे कैसे रोक पायेंगी?
बुधनी काकी जा रही हैं अपने घर, बिफनी भी उनके साथ जा रही है गायंे में। रात का खाना बनाना नाहीं है, दुधमुही के दिन केवल एक बार ही खाना बनता है सबेरे। अब एक साथ खाना तो बरहो अउर तेरही के दिन ही बनेगा। तेरही के पहिले का खाना अलग अलग अपने अपने घरों में बनेगा।
बिफनी मिलना चाहती है तेतरी, फगुनी, बैसाखी अउर सुगनी से। बेचारी सबके सब कम उमिर की हैं अउर पहाड़ नीयर जिनगी है। बोलने-बतियाने से मन बदल जायेगा। उन सबों से बोल-बतिया कर आ जायेगी सुगनी कीहें। सुगनी से मिलना जरूरी है, ऊ जिद्दी है किसी की नाहीं सुनती, उसकी बातें मानती है, उमिर भी बराबरै होगी, समझाने-बुझाने से कुछ तो फरक पड़ेगा उसके दिमाग पर।
तेतरी का घर फगुनी अउर बैसाखी के घरे से कुछ दूरी पर है, पर है आमने सामने ही, एक दो ढूह पार करना होता है फिर पहुंच जाओ तेतरी के घर। तेतरी घर पर ही थी बुधनी काकी ने सहेजा था सभी को कि अब खेती का काम भी तूं लोग देखो। जेतना होय सके ओतना करो, खेती के काम करोगी तो मन बदलता रहेगा।
‘खेती-बारी, गाय-गोरू का काम गमी से नाहीं रूकता, ओके तऽ कइसहूं करना होता है, चाहे जउने हाल में रहो, गाय-गोरू पियासे अउर बिना खाये-पिये थोड़ै रहेंगे ओइसहीं खेती कऽ काम है, कउनो हाल में रहो ओके निपटाना ही पड़ता है। चैती की फसल की तैयारी करनी है, खेतों में डहिया लगाना है, खेतवा उखड़ जायेगा तब कैसे होगी ओमे जोतनी, मरद लोग तो तेरही के बाद ही जोतनी का काम शुरू कर सकते हैं एकरे पहिले नाहीं। तब नऽ बोआएगा गेहूं, मटर। बुधनी काकी ने गॉव वालों से यह भी कहा था कि जवन जवन पतोहिया ‘बेवा’ होय गई हैं ओन्हनन के काम पर नाहीं भेजना है कम से कम तेरह दिन तक।
आजु काम पर नाहीं जाना है। सो आज ही मिल लेना चाहिए सबसे, कल से तो डहिया का काम शुरू हो जायेगा, जाना होगा काम पर, मरद लोग चले जायेंगे तेरही का बाजार करने। बिफनी तेतरी के घर पहुंच चुकी है, तेतरी कोने में बैठी हुई है माथा थामे, उसकी सासू हाथ में हुक्का लिये हुए हैं...
‘का रे बिफनी! सब काम हो गया, मजाय गया सारा बर्तन, बड़का तसलवा अउर भगौनवा अउर एक ठे करहियवा पहुंचाना होगा रे अहिराने, अहिराने से ही बर्तन आया था, जाने दो काल्हु हम आयेंगे ओहरै, बर्तन पहुंचाय देंगे अहिराने।’
‘हॉ काकी सब काम निपट गया, सारा बर्तन सहेज कर हम चले घरे से, काल्हु मौका नाहीं मिलेगा, बुधनी काकी सहेजी हैं कि काल्हु से डहिया लगाना होगा खेते में।’
‘हां रे हमहूं चलेंगे, कुछ काम करेंगे तबै भुलाय पायेंगे रजुआ की यादें, हमेशा बोलता था रजुआ कि अइया हम तोहके चारो धाम करायेंगे। आगे कुछ नहीं बोल पाई रजुआ की मतारी, बोलतीं भी का? बचा ही का था?’
तेतरी की सासू से बतिया कर बिफनी तेतरी के पास जा कर बैठ गई.. वह जमीन पर बैठी हुई थी। खामोश अपने में खोई...
‘का रे तेतरी का सोच रही है?’ तेतरी से पूछा बिफनी ने
‘का सोचना है दीदी! सोचने के लिए का बचा ही है। सब कुछ तऽ करम बाबा ने छीन लिया जाने कउन अपराध हमलोग किए थे, कुछ समझ में नाहीं आय रहा है दीदी!’
तेतरी की ऑखें भर आईं, बिफनी ने उसे संभाला...
‘रोना-धोना बन्द करो तेतरी, जौन करम में लिखा होता है उहै मिलता है, अब आगे का देखो।’
आगे का देखती तेतरी उससे बोल कर गये था रजुआ कि वे ड्यूटी पर जाय रहा है पर पता नाहीं कैसे चले गये खेते पर...हम तऽ जानि रहे थे कि रजुआ ड्यूटी पर गये हुए हैं बाद में पता चला कि खेत पर गये थे अउर...
चुप हो गई तेतरी, आगे का बोलती, बोलने के लिए था ही क्या?
‘हॉ तेतरी हमरे गॉये में कोई भी मार-पीट करने वाला नाहीं है, हम तोहरे पति रजुआ को अच्छी तरह से जानते हैं, सरवन भइया को भी जानते हैं। तूं ई समझ लो कि जे जे मरे हैं नऽ ओमे से कोई मरखनहा नाहीं था पर का बतायें, मारने वाले तो मारने के लिए ही आये थे मार के चले गये। जाने दो ओ सभन कऽ कब्बउं भला नाहीं होगा, सब मरेंगे अपनी करनी से।’
‘बिफनी दीदी! देखो ऐसन है नऽ कि ऊ सब जब मरेंगे तब मरेंगे, हमार मॉग तऽ सूनी होय गई नऽ, पोछाय गया नऽ हमरे माथे का सेन्हुर, केतना मानते थे हमके,
बोलते थे कि घर में तोहरे आते ही देखो हमके होमगारड वाली नौकरी मिल गई, हमार भाग ठीक है पर अब का होगा दीदी! कइसे काटेंगे हम आपन जिनगी?’
बिफनी तेतरी की बातें सुन कर सन्न और सुन्न। उसे समझ नहीं आ रहा था कि का बतावै तेतरी को, उसकी बातों का का जबाब दे। बिफनी जबाब का देती, जबाब था ही नहीं, ऐसे सवालों के जबाब तो होते ही नहीं। पर समझाता है सब कोई ऐसा ही। बिफनी भी समझा रही थी पर वह जानती थी कि बिधवा होकर जीवन जीना फर्जी लांक्षनों, उलाहनों, तानों के साथ होता है।
बात-बात पर ताने मिलते हैं, बिआह-शादी का कोई काम विधवाओं को नहीं करने दिया जाता, आयोजनों के अवसर पर मुह देखना भी पाप माना जाता है बिधवाओं का। वह जानती है अपनी काकी के बारे में...
काकी पर का का लांक्षन नाहीं लगा, कभी किसी के साथ जोड़ दिया गया काकी को तो कभी किसी के साथ। एक बार तो काकी को उनके ममेरेे भाई के साथ ही जोड़ दिया गया, बेचारे मामा सल्फास खा कर मर गये तीसरे दिन। काकी भी मर जातीं, उन्होंने सल्फास खाया भी था पर सल्फास खाने के बाद भी नहीं मर पाईं, बचा लिया डाक्टरों ने उनको। तो बिफनी जानती है बिधवा होकर जीवन जीना बहुत ही कठिन होता है। फिर भी वह समझा रही है तेतरी को...
बिफनी जानती है कि ओकरे बिरादरी में सलटने का रिवाज है, जेसे जोगाड़ बनि जाये ओसे सलट लो, बाभनों ठाकुरांे वाला मामला नाहीं है देखावा वाला। बिधवा बनी रहो अउर जिनगी बिताओ सधवा की तरह। घूमि घूमि के बिस्तरा बदलती रहो, कबहूं ए खटिया पर तऽ कबहूं ओ खटिया पर, कबहूं एक मरद के संघे तऽ कबहूं दूसरे मरद के संघे। हमरे बिरादरी का मामला ठीक है। न बनै बिधवा बनि के रहना, तऽ सलट लो जेकरे संघे मन होय ओकरे संघे, का होगा? बहुत होगा तऽ भात-माड़ देना होगा अउर का? मन मसोस कर जिन्दा रहना ठीक नाहीं है।
‘ये समय तेतरी से ये बारे में कुछ बोलना ठीक नाहीं होगा, सुगनी, बेसाखी, फगुनी से भी वह कुछ नाहीं बोलेगी। बोलना होगा तऽ करम-काण्ड बीत जाने के बाद बोलेगी। अउर जो बिधवा हो गई हैं गॉयें में ओनकर चिन्ता नाहीं है, ऊ सब बाल-बच्चे वाली हैं, ऊ सब सलटने के बारे में नाहीं गुनेंगी, ओनकर उमर भी हो गई है सब अधेड़ से अधिक हैं, अब उमिर ही केतनी बची है कि सलटेंगी किसी से। बाल-बुतरू लेकर कोई के संघे सलटना ठीक भी नाहीं होता। पर तेतरी, बैसाखी, फगुनीे, सुगनी बेचारी तो बिना बाल-बुतरू वाली हैं एकदम बिटिहिन माफिक, एन्है कोई देख के नाहीं कह सकता कि ये सब बिअहुती हैं। कइसे गुजारेंगी सब जिनगी बिना मरद के सहारे। खाली जिनगियै गुजारना होता तब्बौ ठीक था पर खाली जिनगियै गुजारना नाहीं है नऽ। मन की भी तो बात होती है, मन कुछ मांगता है तो तन भी तो कुछ मांगता है, दोनों की मांग बिना मरद के कैसे पूरी हो सकती है?’
बिफनी उलझ गई है अपने समाज में, अपने समाज के चाल-चलन में। उसका
समाज भी वही है जो सभ्य लोगों का समाज है। मरद साथ में रहे तो चाहे जो करो, जेकरे संघे करो, चाहे खटिया पर टॉगे फैलाती रहो, छिप-छिपा कर चुम्मा-चाटी करती रहो। मॉग में बस सेन्हुर लगाये रहो कियारी की मेड़ की तरह गब गब लाल, दूर से ही दिखाई देता रहे। बड़की बिरादरी में भी इहय होय रहा है अउर ओकरे बिरादरी में भी। बड़की बिरादरी में तऽ हमरे बिरादरी से भी गड़बड़ है, बिधवा भउजाई के के कहै भयहु तक तार जोड़ ले रही हैं कभी देवर से तो कभी जेठ से।
बिफनी तेतरी को देख रही है, उसकी उदासी परख रही है और मन के गहरे में उठ रहे बुलबुलों के बारे में भी गुन रही है। वह पढ़ी-लिखी नहीं है, पर समाज का चाल-चलन देख रही है कि औरतें किस हाल में हैं, समाज में उनका कितना मान-सम्मान है। पर बबुआ तो उसे मानता है, उसकी फिकिर करता है पर सब मरद तो बबुआ की तरह नाहीं हैं। दारू पी कर बाहर से आये अउर घरे में पसर गये खटिया पर, मेहरारू का कर रही है, ओके का चाही ऐसे मतलब नाहीं, ऐसे थोड़ै चलती है जिनगी। जिनगी तो चलती है बोल-चाल से, मन की बतियाने से, एक दूसरे को समझने से, ई सब कहां होता है हमरे समाज में?
बिफनी घिना जाती है कुछ मरदों को देख कर, वे न तो घर के लिए सही होते हैं और न अपनी घरनी के लिए, ओन्है केवल दारू चाहिए, पी लिए और लोटने लगे। जिनगी का होती है ओनसे का मतलब?
तेतरी के घर से निकलनेे के पहले वह देख लेना चाहती है कि तेतरी का मन बदला कि नाहीं..
‘कारे तेतरी! घरहीं में बैठी रहोगी के एहर-ओहर निकलोगी भी, घर में बैठे बैठे अनवा के बनवा सोचाता रहता है मन। तोहरे घरे के आगे तऽ काफी जगह है, तर-तरकारी भी लगी है, ओही कोलवा में जायके कुछ किया कर, लहसुन है, आलू है, भंटा है, ओमे कर-कोड़ा दिया कर, खाली रहा करो तो गइयय छोड़ दिया करो बहरे, कुछ घास-फूस चर लिया करेगी। बूझ रही हो नऽ के हम का बोल रहे हैं....’
‘पर दीदी अइसने में हम बहरे निकलेंगे तऽ लोग का बोलेंगे, तेरहो दिन नाहीं बीता, लगी हरिना माफिक डाकने, भइया हमार आया था बोल रहा था कि तेरही के बाद लिवा ले जायेगा हमैं गायें पर, अइया बुलाई है। हम तऽ जाने के लिए सोच रहे हैं पर अइया जाने का करें, जाने दें या न जाने दें, अब तऽ उनकी मर्जी कऽ बात है।’
‘हं तूं ठीक गुन रही है नइहरे चली जाओगी तऽ मन-फेर हो जायेगा, ई ठीक रहेगा अबहीं इहां कउनो खास कामौ नाहीं है खेती-बारी का। चैती का काम है थोड़ा बहुत तऽ ऊ सपर जायेगा। धान की खेती के पहले आ ही जाओगी, तब का हरज है।’
बिफनी तेतरी से बोल-बतिया कर अपने घर चली आई। बबुआ घर पर था और सो गया था, बपई ओसारे में बैठ कर बिफनी का इन्तजार कर रहे थे...
‘कारे बिफनी कहां गई थी रे! बबुआ का भी पता नहीं चल रहा, कहीं बाहर गया
है का...’
‘घरवा में होंगे बपई’
‘का कउनो काम है’
‘नाहीं रे, समिति का एक आदमी आया था, वह पूछ रहा था बबुआ के बारे में हमैं तऽ पता ही नाहीं था सो हम का बताते ओसे। कह कर गया है कि काल्हु समिति के मंत्राी जी बोलाये हैं समिति के कार्यालय पर।’
‘अच्छा बपई! हम बोल देंगे ओनसे, घरवा में होंगे तऽ अब्बै बोल देते हैं अउर आपको बताय देते हैं।’
बबुआ घर में नहीं था, बिफनी ने अनुमान लगाया था कि चार दिना से छट-पटा रहे हैं, कब्बंउ ई काम तऽ कब्बंउ ऊ काम, थक गये हैं काफी, हो सकता है घरे में जायके सो रहे हों पर घरे में तऽ नाहीं हैं, आखिर कहां चले गये। कहीं गये होंगे। कहां जा सकते हैं, हो सकता है कि खेलावन भइया के यहां गये हों नाहीं तऽ पुनवासी भइया के यहा गये होंगे, कहीं दूसरी जगह गॉव में तो जाते ही नाहीं। बिफनी नहीं सोच पाई कि बबुआ कहां गये होंगे, अन्हार होते होते तऽ अइये जायेंगे।
समिति का आदमी काहे के लिए खोज रहा था बबुआ को... बिफनी सोचने लगी. कउनो काम आ गया होगा। जौने दिन चितायें जल रही थीं ओहू दिन तऽ समिति के मंत्राी जी आये थे खेते पर, दाह के बाद लौटे अपने कार्यालय पर। इहौ बोल रहे थे कि श्मशान पर चितायें न जलाकर कतल वाले स्थान पर चितायें जला कर अच्छा किया आप लोगों ने। पोस्टमार्टम के दिन भी अस्पताल पर थे मंत्राी जी। बहुत बढ़िया आदमी हैं, गॉये के मेहरारून के भी अपनी समिति से जोड़ने के लिए बोले थे पर का करें, खूनै-कतल होय गया, ए समय ऊ कैसे समिति का काम करते।
बिफनी भी कई दिन से खटिया पर आराम से लेटी नहीं थी, कई तरह के काम थे, उसे ही करना था, उसका साथ देने वाली तो अपना माथा पीट रहीं थीं, ऊ कैसे काम करतीं अउर के ओनसे करवाता। बिफनी तत्काल खटिया पर पसर गई, कुछ ही देर में नींद में चली गई।
बबुआ समिति के आदमी से मिल कर अपने घर आ चुका था। उसने देखा कि बिफनी नींद की फुफकार में है...
‘का होगा उसे जगा कर, बेचारी लगातार छट-पटा ही तो रही है, थोड़ा आराम कर ले। बबुआ उसे खटिया पर सोता छोड़ कर ओसारे में चला आया...वहां बपई लेटे हुए थे खटिया पर, पर सोये हुए नहीं थे...
‘का बपई सो रहे हो का’ पूछा बबुआ ने बपई से
‘नाहीं हो बबुआ! मुई नींद कहां आती है, आती भी है तो किसिम किसिम का सपना ले कर आती है, मन घबरा जाता है। तोहार मंत्राी जी के आदमी से भेंट हुई कि नाहीं।’ पूछा बुझावन ने बबुआ से...
‘हॉ बपई भेंट हो गई है, काल्हु बोलाये हैं अपने कार्यालय पर मंत्राी जी।’
‘काहे के लिए बुलाये हैं हो?’
‘पता नाहीं बपई! होगा कउनो काम, कुछ अन्दाज नाहीं लग रहा है, अब काल्हु जायेंगे कार्यालय पर तब पता चलेगा।’
बुझावन खटिया पर बैठ गये मानो उन्हें विशेष बातें करनी हैं बबुआ से, बात तो करनी ही थी...
बुझावन बताने लगे...
‘अरे!बबुआ जौने दिन तूं लोग रापटगंज थे पोसटमार्टम कराने के लिए ओ दिना मंत्राी जी आये थे हमरे कीहें, सोमारू से भी मिले थे। लखनऊ से जब ऊ लौटे तब ओन्है खबर लगी कि गॉयें में कतल होय गया है वह भी अखबार पढ़ कर। पहिले इहां आये फिर रापटगंज गये, तूं लोगन से मिले थे के नाहीं..?’
‘मिले थे बपई! अउर हमके पॉच हजार रुपया भी दिए थेे...।’
‘बाले कि इसे रख लो बबुआ! कउनो काम आ सकता है रुपये का...’ हम नाहीं ले रहे थे पर नाहीं माने। लगे कहने कि बबुआ हम पराये नाहीं हैं, हमैं तूं लोग अपने घरे का मानो, दुख-सुख का साथी। साथी दुख में काम नाहीं देगा तब कब काम देगा हमसे जो भी बन पड़ेगा तूं लोगन के लिए हमेशा तैयार रहेंगे, हमसे फोन से बातें करते रहना लगातार। यहां पर मेरा कोई काम हो तो रुक जाते हैं।’
‘नाहीं मंत्राी जी आप का कउनो काम इहां नाहीं है, आप जाइए समित पर, कउनो काम पड़ेगा तऽ फोन से बतायेंगे आपको।’
‘करीब दुई घंटा थे रापटगंज में फेर उहां से चले थे। बहत अच्छे आदमी हैं बपई! सरवन के तऽ आपन लइका जइसन मानते थे, मानने को तो हमके भी मानते हैं, ओनके संघे रहो तऽ बुझइबै नाहीं करता है के कउनो अधिकारी के संघे हैं।’
‘अरे! बबुआ का बोल रहे हो, मंत्राी जी तोहैं पॉच हजार रुवया भी दिये!’ चकरा गये बुझावन।
‘हॉ बपई रुपया भी दिये।’
‘काल्हु काहे के लिए बुलाये हैं, हमके भी अच्छा आदमी जान पड़े, बोल-चाल से ही बुझा जाता है के के कइसन है।’
कउनो काम होगा बपई! बपई से बतिया कर बबुबा अपने कमरे में चला आया। कमरे में आकर वह खटिया पर लेट गया, लगा खपरैल का छाजन देखने...
‘नाहीं नाहीं हम केहू कऽ बात नाहीं मानेंगे, हमार जौन मन करेगा उहै करेंगे। केहू के कहने पर हम रामलाल अउर ओनकरे भाई कऽ कतल नाहीं करेंगे। ई खून-कतल ठीक नाहीं है।’
खटिया पर पड़े पड़े बबुआ बड़-बड़ा रहा है... उसी समय बिफनी भी चली आई उसने बबुआ का बड़-बड़ाना सुन लिया...
‘का बड़-बड़ा रहे हैं हो, का बात है कइसन खून-कतल.. केकर कतल नाहीं
करेंगे, का बात है बताओ तो....’
बबुआ सहम गया, का पूछ रही है बिफनी, कैसे सुन लिया उसने कतल की बात। गॉव के लड़कवे तऽ मार कऽ बदला मार वाले हैं, बोल रहे थेे सब कि रामलाल का खलिहान फूंक देना चाहिए ओनकरे घरे में आ्रग लगा देनी चाहिए। ओनकर गॉव खाली है, सब भाग गये हैं गॉव छोड़ कर पुलिस के डर से।
‘कउनो बात नाहीं है हो।’ बबुआ ने कुछ नहीं बताया बिफनी को बड़बड़ाने के बारे में पर बिफनी तो बिफनी थी...
वह सीधे अपने कमरे में गई और एक बोतल दारू ले आई। दो दिन पहले ही उसने दारू मंगवा लिया था चेरवान से। जब तक करम-काण्ड का आयोजन है तब तक तो घरे में दारू चुआई नहीं जायेगी। चेरवान में तो रोजै बनती है। हमरे कीहें बनेगी तब भेजवा देंगे, लेन-देन चलता रहता है।
लगता है कि बबुआ के मने में कुछ है जौने के ऊ बताना नाहीं चाह रहे हैं, दारू पियेंगे तऽ सब बकर देंगे बिना कुछ पूछे।
दारू देखते ही उछल पड़ा बबुआ, ‘रखी थी का रे बिफनी! ओ दिना भी एक बोतल तूने दिया था अउर आजउ, कहां से जोगाड़ बनाई हो?’
‘चेरवाने से अउर कहां से’
‘रहिला भी है घरे में के नाहीं’
‘पहिलहीं का है भूजा हुआ है एहर कहां भुजा पाया...’
‘तनिक नून अउर हरियर मर्चा भी ‘बूक’ देती’
‘बूक देते हैं....’
दारू की बोतल खुल गई उसके साथ बबुआ भी खुल गया, एकदम साफ साफ आजादी के पहले वाले गंगा-जल की तरह निर्मल और पवित्रा...
‘नाहीं नाहीं रामलाल को तो मारना ही है उसने सरवन का कतल किया है, हमलोग काहे सहैं?
बिफनी ने माथा पकड़ लिया.. अब का होगा, गॉये वालों का मिजाज खराब होय गया फिर तो कतल होगा ही, लाठी-डंडा में हमार गॉव कमजोर नाहीं है, ओ लोगन से सरदारी भी हमरे गॉयें में अधिक है। गॉव के लड़कों को समझाना होगा कि कतल ठीक नाहीं है पर के समझायेगा गॉव के लड़कांे को? समिति के मंत्राी जी....वे समझा सकते हैं पर का लड़के मान जायंेगे मंत्राी जी की बातें...
‘धरती-माई गॉव के लड़कों के मिजाज के बारे में जान चुकी हैं, वे अपने आराध्य शिव जी से प्रार्थना कर रही हैं कि गॉव में शान्ति बनी रहे, दुबारा मार-काट न मचे। मार-काट से का मिलेगा?’
हे प्रभु! गॉव के लड़कों को बुद्धि दो, समझ दो, वे मार-पीट के बारे में न सोचे,
गुनें’
धरती-माई शिव जी की प्रार्थना में हैं, देखिए का होता है आगे....?
आग पर चलने वाली है धरती-कथा
पर यह आग कैसे पैदा हो गयी?
‘धरती-माई नहीं चाहतीं कि गॉव में मार-काट हो, लोग लड़ें एक दूसरे का गला काटें पर उनके चाहने से का होता है? वे कैसे नियंत्रित कर सकती हैं लोगों को, उनकी सुनेगा कौन, सभी तो स्यंभू हैं। गॉव में आग लगेगी तो धरती-कथा को भी आग में जलना होगा, किसी भी तरह से आग के खेल को रोकना होगा...धरती-माई अचानक ध्यान में चली जाती हैं। उनके घ्यान में स्वर्ग उतर आता है वहां एक से एक देवता हैं उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी वेदना किस देवता से बोलें वहां इन्द्र हैं, शिव हैं, शनिदेव हैं, ब्रह्मा जी हैं कई देवताओं से भरा हुआ है स्वर्ग, वहां पूर्ण शान्ति है जो वीरानी से अलग है, सुहाना मौसम है, मधुर मधुर सुगंध फैली हुई है हर तरफ। धरती-माई धरती पर आ कर काफी थक चुकी थीं स्वर्ग में पहुंचते ही उनकी थकान फुर्र हो गयी...
स्वर्ग में पहुच कर उनके मन ने कहा, तुम शिव से बातें करो वे लोक-कल्याण के देवता हैं धरती के प्रपंचों को हल करने का दायित्व उनका है...धरती-माई सीधे शिव जी से मिलती हैं और धरती का पूरा हाल उन्हें बताती हैैंं...शिव जी तो ठहरे औघड़दानी उन्हें किसका संकोच साफ साफ बोले...
देखो धरती! धरती पर बसने वाले सभी प्राणियों के भाग्य-फल और कर्म-फल पूर्व निर्धारित हैं उसे नहीं बदला जा सकता। वहां तो जो हो रहा है वही तो धरती को धरती बनाता है, वहां इसी लिए प्रेम है तो विरह भी है, सुख है तो दुख भी है, लाभ है तो हानि भी है, यश है तो अपयश भी है क्योंकि धरती पर मृत्य के देवता का राज है और ये सब मृत्यु के कार्य-कारण हैं। तुम तो धरती की मॉ हो वहां की रानी नहीं हो सो जो हो रहा है वहां उसे सिर्फ देखती जाओ...’
धरती-माई धरती पर होने वाले खेलों को देख रही हैं, वे देख रही हैं कि समिति के आदमी से मिल कर बबुआ गॉव में चला आया था। गॉव में हर तरफ आग ही आग थी, गॉव के लड़कों की बातें सुन कर उसे लगा कि वे आग की भठ्ठी में से तप कर निकले हुए हैं सबकी ऑखें चढ़ी हुई र्हैं, उनकी सॉसंे भी तप रही हैं, और दिमाग तो लाल लाल हैं ही आग में तपे हुए लोहे की तरह। गॉव के लड़के मार का बदला मार से लेने के लिए मन बना चुके हैं।
बबुआ सहम गया उन्हें देख कर, उसे डर लगने लगा। का होगा आगे! मार होगी तो सारे लड़के फस जायेंगे कानून के मकड़ जाल में। पुलिस मान लेगी कि बदला लिया गया है। पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं, का होगा गॉव का? समूह की खेती तब्बै हो पाई थी जब हमारे टोला के लोग एक साथ जुड़े थे...खेती से फायदा भी हुआ था। मार होते ही हमारा टोला बिखर जायेगा, मार करना तो आसान है पर मर मुकदमा, थाना-पुलिस झेलना आसान नाहीं है। वैसे भी मार का बदला मार से यह कौन सी बात है। हमारे बपई हमेशा कहते हैं कि खून-कतल से कुछ नहीं होता, बस एतनै होता है कि हमने बदला ले लिया। अरे! बदला लेने से का हो जायेगा, तूॅ मरो चाहे कोई दूसरा मरे का फरक पडेगा? कब्बौं नाहीं कभी भी मार-पीट, कतल के बारे में नाहीं सोचना चाहिए।
सरवन हमेशा सपना देखा करता था पूरा गॉव एक होने का, एक साथ चलने का, मिल कर एक साथ खेती करने का पर दखिनाहा टोले के लोग तैयार नहीं हुए नाहीं तऽ ऊ गॉयें के एक कर दिया होता। वह हमेशा कहता था जो बात मिल कर, एक साथ रह कर जीवन जीने में है वह बात अलग अलग रहने में नाहीं है।
दारू काम भर पीने के बाद भी वह नींद में नहीं जा पाया, नींद में गोते लगाने के लिए ही उसने दारू पिया था पर रह गया करवट बदलते ही, नींद उसके पास जो नहीं आई तो नहीं आई। पास ही में बिफनी भी थी वह सो गई थी उसे का पता कि बबुआ का सोच रहा है? बिफनी उसके पास ही में थी पर बिफनी का उसके पास में होना बबुआ को नहीं दिख रहा था, दिखता भी कैसे, उसकी ऑखों में तो मार-पीट चढ़ा हुआ था, सरवन, रजुआ, सुमुरना आदि का चेहरा दीख रहा था...फूटा हुआ माथा, गोली से छेदाई छातियॉ दिख रही थीं, बन्दूक और भाले दिख रहे थे, पोस्टमार्टम घर दिख रहा था। फिर खून बहवायेंगी का धरती-माई, का करने वाली हैं धरती-माई? धरती-माई भी कैसा कैसा रूप बदलती रहती हैं अपना।
‘काहे नाहीं परगट हो जातीं धरती-माई, धरती पर अउर जो बवाल हो रहा है गॉयें में काहे नाहीं रोक रही हैं? धरती तो ओनकरै है, ओन्है चाहिए कि धरती पर अवतार ले कर संभालैं इपने धरती पुतरन के। ओनकर दस पुत्तर तो मर गये गोली खा कर अब केतना पुतरन के अउर मरवाना चाहती हैं धरती-माई, केतना खून पीना चाह रही हैं, कउनो हिसाब किताब है कि नाहीं।’
बबुआ सोने की कोशिश करता, पर उसकी ऑखों में धरती-माई तैरने लगतीं, वह धरती-माई से सवाल-जबाब करने लगता। धरती-माई को फटकारता...
‘कैसी धरती-माई हैं आप! माई तो अपने पुतरन को संभालती है, दुलारती हैं, लोरी सुनाती हैं और एक आप हैं कि खून पर खून कराये जा रही हैं। लगता है कि आप किसी की माई नाहीं हैं अउर न किसी की माई हो सकती हैं। आप का हैं आप ही जानें। बेकार हो गई सारी पूजा... हमार अइया हमेशा आपको अरघ देती थी, हमार बपई जब भी खटिया छोड़ते हैं आपको गोड़े गिर कर ही अपना पैर जमीन पर रखते हैं। बपई की तरह हम भी करते हैं, कभी भूल-चूक हो जाती है तऽ माफी मॉगते हैं आप से। बिफनी आज भी आपके नाम पर दिया-बाती करती है। अइया बोलती थी कि जो सती माई हैं नऽ, नीबिया के पेड़वा के नाचे जेकर पक्का चौतरा बना है,उहै धरती-माई भी हैं, दुन्नौ जने बहिन हैं आपस में। बिफना गुसिया जाता है धरती-माई पर...
‘आप माई नाहीं हैं, आप कसाई हैं, अपने पुतरन कऽ खून पीने वाली, माई कैसे
हो सकती है? कब्बौं नाहीं हो सकतीं माई आप।’
बबुआ की ऑखों से जब धरती-माई हट जाती तब गॉव के लड़के उतरा जाते.लगते फटकारने बबुआ को, मार का बदला मार ही होता है बबुआ...
फिर बबुआ खुद को समझाता....
‘ऐसा काहे सोच रहा है तूॅ, लड़के हैं मान जायेंगे, ओन्है ठीक से समझाना होगा। सोचते सोचते तथा करवट बदलते बदलते रात बीत गई। बबुआ सुबह उठा और चाय-पानी करके सीधे मंत्राी जी के यहां साइकिल से जा पहुंचा।
मंत्राी जी कार्यालय पर ही थे और कुछ कागजी काम निपटा रहे थे। उनके सामने उनका लैपटाप पड़ा हुआ था। कार्यालय भी उनका किसी आश्रम जैसा ही था, उसकी दीवारें हालांकि ईंट की थी पर उसका छाजन खपरैल का था। पतले-पतले बॉसों का छाजन था उस पर सीमेन्ट के साथ खपरैल छाया गया था जिससे छत चिकनी दिखे। छत चिकनी दिखती भी थी। मंत्राी जी का कार्यालय षटकोण के आकार का था जो बाहर से करीब करीब गोल दिखता था।
मंत्राी जी अपने कार्यालय में जमीन पर बैठे हुए थे, वे बैठते भी जमीन पर ही थे उनके सामने एक दरी बिछी हुई थी जिस पर वहां आने-जाने वाले बैठा करते थे। बिफना मंत्राी जी के सामने जा कर बैठ गया...
दुआ-सलाम के बाद मंत्राी जी ने बिफना से हाल-चाल पूछा फिर बातें शुरू हुईं।
‘का हो सब ठीक चल रहा है नऽ’ तेरही के खर्चे-बर्चे का इन्तजाम हुआ कि नाहीं।’
‘ इन्तजाम हो गया मंत्राी जी, खेलावन, बंधू, पुनवासी घोरावाल जायेंगे आज अउर सारा सामान खरीदा जायेगा।’
‘कुछ रुपया उपया चाही के नाहीं? चाहै तऽ बताओ हम प्रबंध कर देंगे, तूं रुपये के लिए परेशान न होना।’
‘नाहीं मंत्राी जी! रुपया का इन्तजाम होय गया है।’
‘चलो ठीक है, पर शरम न करना। मरनी का आयोजन अचानक होता है, पहले से तो रुपयों का कुछ प्रबंध तो रहता नहीं इसलिए दिक्कत हो जाती है।’
‘बबुआ तोहके आज हम एक जरूरी काम से बुलवाये हैं, तोहके एक खबर देनी है। हमारे पास कल रामलाल का एक आदमी आया था और धमकिया रहा था कि जो हल्दीघाटी के गॉव वालों के साथ चलेगा ओकरे संघें उहय किया जायेगा जो दस लोगों के साथ किया गया है। और एक बात बोला है हमसे, मंत्राी जी! आप बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को मना कर दें कि वे मुकदमे की पैरवी न करें, थाना-थूनी पर जा कर गवाह न बनें नाहीं तऽ गड़बड़ै होगा, हम आपको समझाय दे रहे हैं फिर जीन बोलिएगा कि तूं लोग बताये नाहीं थे। बूझ रहे हैं नऽ हमरी बात।’
मैंने डाट-डपट कर उस आदमी को अपने यहां से भगा दिया।
‘देख बबुआ! डरने की बात नहीं हैं। वे धमका रहें हैं धमकाते रहें पर तूॅ कानून
का साथ मत छोड़ना। हत्यारों ने इतना बड़ा अपराध किया है कि सरकार ही उन्हें नहीं छोड़ने वाली। हल्दीघटी गॉव का यह बर्बर हत्याकाण्ड देश-विदेश तक फैल चुका है संसद व विधान सभा में भी सवाल उठाया गया है। एक दो दिन में मुख्य मंत्राी जी भी आने वाले हैं गॉव में.... तूं देख लेना कोई नहीं बचेगा, सबकी सजा होगी वे जैसा किए हैं वैसा ही भोगेंगे भी।’
‘हॉ मंत्राी जी आप ठीक बोल रहे हैं, हमलोग नाहीं डर रहे हैं ओ लोगन से पर एक बात अउर है मंत्राी जी, हमैं राती में नींद नाहीं आई, इहय सोचते रह गये हम रात भर...’
‘का बात है हो बबुआ बताओ तो सही..’ पूछा मंत्राी जी ने बबुआ से
बबुआ सहमा हुआ है, मंत्राी जी को बताये कि नाहीं, बतायेगा मंत्राी जी को, भला मंत्राी जी किसी से बोलेंगे...
मंत्राी जी ऐसा है नऽ गॉव के लड़कवे हैं नऽ सब बदला लेने के लिए बोल रहे हैं कउनो बोल रहा है कि...
‘कुछ नाहीं कर सकते हैं ये समय में तऽ ऊ लोगन का खलिहान फूंक तो सकते हैं नऽ’
’ऊ लोगन के लड़कों का पकड़ि के मार सकते हैं नऽ’
‘घरै में आग लगाय सकते हैं नऽ’
‘जब हम ओ लोगन से बोले कि मार-पीट ठीक नाहीं है और घर फूंकना, खलिहान में आग लगाना, उनके लड़कों को मारना ई सब गलत है, हमैं अइसन नाहीं सोचना चाहिए, तब ऊ सब हमरे पर गरमाय गये, बोलने लगे कि तूं गद्दार है। हमैं तऽ लगता है मंत्राी जी हमरे टोला के लडकों का उतराहाटोले के लोगों ने बहकाय दिया है। आप तो जानते ही हैं कि उतराहाटोले वाले न तो जमीन का मुकदमा लड़ि रहे हैं और न ही ओ दिना खेते पर थे। सब लोग हमारे टोले के मारे भी गये हैं, घायल हुए हैं। ओ टोले वाले तो मजाक उड़ाते हैं हमरे टोले वालों का। समूह की खेती का लाभ देख कर तथा कुछ पुरानी बातों के कारण उतराहाटोले वाले हमारे टोले वालों से खार खाये बैठे हैं, अइसने में हम का करंे कुछ बुझा नाहीं रहा है, आप बतावैं कुछ।’
मंत्राी जी बबुआ की बातें सुनकर गंभीर हो गये।
‘बात तो गड़बड़ है, तुम्हारे टोले के लड़कों का बदला लेने के बारे में सोचना एकदम गलत है। देखो बबुआ! बदला लेने से का हो जायेगा... का सरवन जिन्दा हो जायेगा, का बुद्धन जिन्दा हो जायेगा? रजुआ, सुमेरन,लखना, कलुआ, नन्दू,नगेशर, बलेशर और सन्तू जिन्दा हो जायेंगे फिर किस कस कतल करोगे? हत्याकाण्ड में केवल रामलाल का ही तो परिवार शामिल नहीं था, तमाम बाहरी थे फिर बदला लेना यह मनुष्यता नहीं है। कानून काहे के लिए है, अदालत काहे के लिए है, जो काम कानून का है, अदालत का है वह काम आखिर हम काहे करें। हमें सोचना चाहिए इस बारे में।’
बबुआ सुन रहा है मंत्राी जी की बातें, यही तो वह कह रहा है गॉव के लड़कों से पर लड़के हैं कि उसे ही गलत बता रहे हैं। एसी स्थिति में का करे का न करे नहीं समझ पा रहा बबुआ। मंत्राी जी अब आप ही कउनो रास्ता निकालिए हमैं तऽ कुछौ नाहीं बुझा रहा है।
मंत्राी जी जहां बैठे थे वहां से उठे और बबुआ के पास आ गये... उसकी पीठ पर हाथ रख कर उसे समझाने लगे...
‘देख! बबुआ ऐसा है जो बात अपने वश में न हो उसे समय पर टाल देना चाहिए, यह मान कर चलना चाहिए कि समय हर चीज का फैसला करता है बस तूॅ गॉव के लड़कों को समझाते-बुझाते रहो। हॉ एक बात बताओ...
बन्धू, पुनवासी और खेलावन का का हाल है, का ऊ सब भी गॉव के लड़कों के साथ हो गये हैं? ऊ सब तो तोहार दोस्त हैं।’
मंत्राी जी ने पूछा बबुआ से...
‘नाहीं मंत्राी जी ऊ सब भी हमरे संघंे बोल रहे थे, ऊ तो वहां हम थे रोक लिए बंधू को नाहीं तऽ मार-पीट भी हो जाती, खेलावन भी तनेन होय गया था।’
समिति के मंत्राी जी से बतियाकर बबुआ लौट आया अपने गॉव। गॉव तो गॉव कोई बात गॉव में छिपी नहीं रहती, एक कान से दूसरे कान तक पहुंच ही जाती है मार-पीट की बातें भी पहुंच गई गॉव के परमू काका, बुधनी काकी, सोमारू काका, और बबुआ के बपई बुझावन तक...
परमू काका और बुधनी काकी दोनों सीधी राह चलने वाले हैं दोनों बांये-दायें नहीं चला करते। दोनों ने लड़कों की बातों को आसमान में उठा लिया...
‘अबहीं तेरही नाहीं बीती अउर लगे पहाड़ा पढ़ने, ओ दिना कहां थे जब हमरे टोला के लड़कवे डट गये थे खेत पर। आज मरद बन रहे हो ओ दिना मरद नाहीं बने थे, पकड़ि लिये होते बनूकिया अउर मार दिये होते ओ सभन के। पर नाहीं ओ दिना तऽ बीली में लुकाय गये थे अब निकसे हैं बीली में से। चले हैं बदला लेने, केसे केसे बदला लोगे, तीन सौ आदमी थे, कुछ अकिल है कि नाहीं। मुकदमा लड़ने के लिए रापटगंज जाना होता है तऽ बबुआ जाता है, कबहूं खेलावन तऽ कबहूं बंधू चला जाता है, कइ ठे रुपया लगाये हो अब तक मुकदमा में, कुछ खियाल हो तो बताओ।’
‘अरे! तूं लोग का बोलोगे, तूं लोग तो मेहरारून से भी कमजोर हो ओ दिना काहे नाहीं बोले अधिकरियन से हम तऽ लाशौ ले जाने से रोक दिए थे...जब अधिकारी बोले कि अपराधियों को किसी भी हाल में नाहीं छोड़ा जायेगा, आपलोग लाशों को ले जाने दीजिए, मत रोकिए तब हम माने।’
‘का बूझते हो हमैं दरद नाहीं है हमरौ लड़िका मर गया है, ओकरे छाती में गोली लगी है, सामने से मरा है तनेन हो कर, बबुआ भी ओही दिना मर जाता पर वह
टेक्टर रोक रहा था इहां हत्यारों ने गोली चला दिया। लड़के तो दस ठे मरे हैं ओनकरे घरे लोग नाहीं हैं का बदला लेने के लिए, पर नाहीं ऊ लोग तूं लोगन नीयर नाहीं हैं के खाली हल्ला करना है...’
अरे! बुधनी काहे एतना बोल रही है, तूं चुप लगा जा, ई लोगन से पूछो कउने दिन हत्यारों का खलिहान फूंकना है...?
‘हं भइया बताओ तूं लोग के कउने दिना रामलाल का खलिहान फूंकना है..?’
‘बताओ बताओ, नाहीं बोल रहे हो कुछ, काहे चुप हो गये तूं लोग, कुछ तऽ बोलो लड़के सुन्न तो सुन्न, का पूछ रहे हैं परमू काका...
परमू काका के बारे में लड़कों को पता है कि वे जो बोलते हैं वही करते हैं फिर रूकते नाहीं हैं।
परमू काका लड़कों से पूछ रहे हैं पर लड़के चुप तो चुप, उन्हें तो सॉप सूंघ गया हो जैसे.... जबकि वे गोल-बन्द थे छह की संख्या में, उन लड़कों में उतराहाटोले के लड़के भी थे...
परमू काका चुप रहने वालों में नहीं थे...
‘काहे का हो गया, काहे नाहीं बोल रहे हो तूं लोग...?’
‘चलो अजुयै फूंक दिया जाये ओ लोगन कऽ खलिहान, ओ लोगन कऽ लड़िकवे स्कूल जाते होंगे वहीं से उठा लिया जाये या वहीं मार दिया जाय ओन्है। का बोलते हो, हम बोलाय लेते हैं बुझावन, पुनवासी, खेलावन अउर बंधू के भीे, का बोलते हो चला जाय खलिहान फूंकनेे। ओ लोगन कऽ गॉव सुन्न पड़ा है, मौका बढ़िया है गॉयें में कोई नाहीं है, सिपाहियो चले गये होंगे, एक दो दिन सिपाही गॉव अगोर दिये बहुत होय गया। हमरे गॉयें में भी अब ओतना सिपाही नाहीं हैं, सब धीरे धीरे लौट रहे हैं।’
लड़के चुप तऽ चुप। वे कुछ नहीं बोले और धीरे धीरे वहां से सरक लिए। परमू काका बुधनी के साथ बबुआ के घर पर आ गये। बबुआ से मिलकर समझाने लगे बबुआ को..
‘देख बबुआ! तूं आपन काम कर, तूं घबरा जीन, कोई कुछ करने वाला नाहीं है। हमारे टोले की जो एकता बनी है नऽ उतराहाटोले वालों को अच्छी नाहीं लग रही है, वे जल रहे हैं, खेती में फायदा सुन कर सब डाह करने लगे हैं और चाहते हैं कि मार-पीट हो जाये रामलाल के लोगों से। देख! बबुआ हमरे समझ में एक बात अउर आय रही है, हमैं तऽ लगता है कि रामलाल से उतराहाटोले वाले मिले हुए हैं। खियाल करो जौने दिना मार-पीट अउर कतल हुआ ओ दिना ऊ सब मौके पर नाहीं थे। केवल दुई आदमी थे अउर दूर से मार-पीट देख रहे थे। सबसे पहिले उहै सब भागे थे खेलावन हमसे ईहय बताय रहा था... आखिर ओ दिना उतराहाटोले के लोग कहां चले गये थेे, सोचने की बात है कि नाहीं। खैर छोड़ो ई सब बात, एके हम गॉयें में देख लेंगे, तूं आगे का काम देखो अउर ओही के बारे में सोचो...रपट वगैरह
लिखाई गया है, ओमे गवाह सब अपने दखिनाहा टोले के ही हैैं। थाना जाते जाते सोमारू भइया ने हमैं सहेजा था...।
‘देखना परमू उतराहाटोले वालों का नाम गवाही में जीन देना, ऊ सब मिल सकते हैं रामलाल से, कुछ रुपया-पानी दे देगा सब बदल जायेंगे गवाही के दिन। गवाही में अपने टोले के लोगों का ही नाम देना। ओनकरे कहने पर ही ही हम गवाही में अपने टोले के लोगों का नाम दिये हैं नाहीं तऽ गड़बड़ा जाता, भगवान ने अकिल दे दिया।’
‘हं यार एक बात बताओ, तूं मंत्राी जी के ईहां गये थे नऽ, का बोल रहे थे मंत्राी जी ओनसे कुछ बताये के नाहीं ये बारे में..’
‘ओनसे सब बता दिए काका, वे बोल रहे थे के मार का बदला मार से का होगा, कानून अउर अदालत खुदै बदला लेगी, कोई नहीं बचेगा सबकी फॉसी नाहीं तऽ उमिर भर की सजा जरूर होगी। देखे नाहीं कलक्टर अउर एस.पी. साहब का चेहरा अउर मनवै उतर गया था उनलोगों का। कउनो अखबार नाहीं है जौने में खबर न छपी हो। किसी का वश नहीं है कि ये घटना के दबा दे।’
‘ईहै तऽ हमरौ मन कह रहा है काका! कोई नाहीं बचेगा सजा से, सबकी सजा होगी जरूर, देर है पर अन्धेर नाहीं है। हमरे टोला के लड़कवे ठीक हैं ये बवाल नाहीं करेंगे ओ टोला वाले भी का कर लंेगे खाली बड़-बड़ा रहे हैं।’
घरती-माई परेशान हैं अपनी ही धरती पर अवतार लेकर, धरती को उर्वरा संपन्न बना कर, धरती पर नदियॉ और उपजाऊ जमीन बना कर, पेड़-पौधे उगा कर, जीव-जन्तु पैदा कर... वे अपने धरती-पुत्रों से निराश व हताश हैं उनके पुत्रा किसिम किसिम की भूमिका निभानेे लगे हैं, मनमाना करने लगे हैं। उन्हांेने सुन लिया है उतराहाटोले के लड़कों की बातें..‘वे मार का बदला मार से लेना चाहते हैं।’
‘धरती-माई ध्यान से बाहर आ चुकी हैं, स्वर्ग से उन्हें राहत नहीं मिली। वे जा रही हैं गॉव से बाहर नाले की तरफ, वहीं पीपर का एक पेड़ है, उसी के नीचे बैठना चाहती हैं कुछ देर। संभव है कि वहां पीपर के पेड़ के पत्तों पर निवास करने वाले देवी-देवता मिल जांये। कहते हैं पीपर के हर पत्ते पर भगवान का वास होता है, भगवान मिलेंगे जरूर। कोई न कोई देवता वहां होंगे ही, सभी एक साथ अपना पवित्रा निवास थोड़ै छोड़ देंगे, उनसे बातें करेंगी धरती-माई अपने पुत्रों के बारे में। भले ही शिव जी से बातें हो गयी है तो का हुआ? दूसरे देवता भी तो यहीं पीपर के पत्तों पर अपना डेरा जमाये हुए हैं उन्हें तो धरती पर फैल रही क्रो्रधों तथा बदलों की प्रचण्ड आग के बारे में पता होगा ही। धरती-माई कुछ ही देर में पहुंच गयीं पीपर के पेड़ के नीचे..। वहां शान्ति थी, हवा भी नहीं बह रही थी, पीपर के पेड़ के पत्ते भी स्थिर थे, वे हिल-डुल नहीं रहे थे। धरती-माई पद्मासन लगा कर पेड़ के नीचे बैठ गईं और भुन-भुनाने जैसा कुछ करने लगीं जो सामान्यों की समझ से बाहर था। उस क्रिया को तो समर्थ वैज्ञानिक भी नहीं समझ सकता...’
‘कागज उड़ रहे हैं
उड़ते कागजों ने ही सिरजा है धरती-कथा’
‘समझने को तो धरती-माई भी नहीं समझ पा रही हैं कि वे धरती पर आकर क्या कर रही हैं, बस पड़ी हुई हैं एक किनारे, कभी पीपर के पेड़ के नीचे तो कभी अपनी चौरी पर। हल्दीघाटी गॉव में जब से कतल हुआ है तबसे उनकी कोई पूजा भी नहीं कर रहा, अक्षत-पुष्प और दसांग-घी की सुगंध भी नहीं मिल रही उन्हें। बिना पूजा की सुगन्ध पिये वे कैसे जीवित रहें संकट खड़ा हो गया है उनके सामने। स्वर्ग से भी उन्हें निराश और हताश हो कर लौटना पड़ा, वहां कोई नहीं सुनने वाला उनकी। और यह जो धरती की कथा है कि उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं, धरती-कथा अपनी कथा खुद सिरज रही हैं, उसे सिरजने में मस्त मस्त है और इसके जो पात्रा हैं वे तो पहले से ही स्वतंत्रा और निरकुंश हैं वे किसी की नहीं सुनने वाले, सुने भी क्यों? वे अपनी आजादी बेचकर कथा में भूमिका थोड़ै निभायेंगे कुछ बिके हुए लोगों की तरह। वे अपनी भूमिका खुद गढ़ रहे हैं और कथा को आगे बढ़ा रहे हैं। इसीलिए तो धरती-माई परेशान हैं आखिर उनकी कोई सुन क्यों नहीं रहा?’ फिर सरकार उनकी क्या सुनेगी?
वैसे भी सरकार तो सरकार होती है। उसके कई कई हाथ होते हैं, कई कई मुह होते हैं, काम करने की शैली भी रंगबिरंगी होती है। अपनी जनता पर हुकूमत का रूआब दिखाने में माहिर भी। प्रदेश की नई सरकार तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों की गर्मी से भरी हुई थी। हल्दीघाटी वाली घटना की जॉच-पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी नई सरकार ने बिना देर किए गठित कर दिया। उस कमेटी में बिना दाग वाले कड़ियल अधिकारियों को नियुक्त कर दिया गया। जिससे मामले की विधिक जॉच सही सही हो पाये। जॉच में घपले न होने पायें।
कमेटी वाले ऐसे अधिकारी थे जो सीधी राह चलने वाले थे वे बाएं-दाएं नहीं देखा करते थे। वे जिधर से गुजरते थे रास्ते कांपने लगते थे, गलियां सिकुड़ जाया करती थीं तथा विकास के जो प्रोजेक्ट चल रहे होते थे वे अपना पूरा लेखा-जोखा हाथ में ले कर उनकेे सामने नतमस्तक हो जाया करते थे।
उच्चस्तरीय कमेटी की सरकारी घोषणा ने अखबारों को रंगीन बदरियों की तरह ढक लिया फिर क्या था सोनभद्र की जनता में खुशियां उछलने लगीं। चलो यह काम तो अच्छा हुआ अब कोई नहीं बचेगा, मुख्यमंत्राी जी इतने कड़ियल हैं कि वे पूरे सोनभद्र के भमि-प्रबंधन की खामियों की जॉच करा कर ही छोड़ेंगे, वे जनता की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
सरकार की उच्चस्तरीय कमेटी एक दिन जिला मुख्यालय पर आ धमकी। कमेटी के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव की कागज पर उतरी घटना भर थी। घटना कैसे घटी क्यों घटी इसकी पूरी जॉच रिपोर्ट नहीं थी कमेटी के सामने, केवल प्राथमिक जॉच के कुछ रिपोर्टें थीं। एफ.आई.आर. थी इसके अलावा कोई दूसरे साक्ष्य न थे। केवल एफ.आई.आर. तथा कुछ प्राथमिक रिपोर्टाें से कैसे पता चलता कि जमीन के झगड़े के मुख्य कारण क्या थे? जमीन के सारे साक्ष्य तो रिकार्ड रूम में थे जिसे डी.एम. साहब देख और दिखवा चुके थे। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों को उन सभी कागजी साक्ष्यों को दिया भी। कमेटी के अधिकारी दुविधा में पड़ते जा रहे थे। बैनामा तो ठीक जान पड़ता है, बैनामा जिसने किया है जमीन उसके नाम से है वह जमीन का असल खाता घारक भी है, असल खाता घारक होने के कारण वह जमीन का बैनामा कर सकता है। जिसके नाम से हालिया जमीन का नामांतरण हुआ है वह भी दर्ज कागजात माल हो चुका है। नामंतरण होने के बाद ही वह जमीन का कब्जा लेने पहुंचा हल्दीघाटी वाले गॉव फिर हत्यायें हुई। दूसरी तरफ कब्जाधारक कब्जे के आधार पर जमीन को अपना मानते थे, आजादी के पहले से ही उनका कब्जा-दखल व जोत-कोड़ विवदित जमीन पर लगातार चलता आ रहा है। कमेटी के अधिकारी जोत-कोड़ वाले विन्दु पर उलझ गये। आदिवासियों का विवादित जमीन पर आजादी के पहले से ही लगातार कब्जा-दखल व जोत-कोड़ चला आ रहा है फिर विवादित जमीन उनके नाम से कागजात माल में जमीनदारी विनाश के तहत दर्ज क्यों नहीं हुई? आखिर कैसे की गई यहां पर जमीनदारी विनाश की कार्यवाही? वे जमीन पर कब्जे व जोत-कोड़ का एक सिरा पकड़ते तो बैनामे वाला सिरा अपनेआप छूट जाता फिर वही सवाल ‘लगातार कब्जे वाला’ उनके सामने आकर तनेन हो जाता...
आखिर मार-पीट काहे हुई, कौन गलत है कोन सही है? किसके नाम वाली जमीन सही है, फिलहाल तो आरोपी तथा प्रताड़ित ही पक्ष हैं, लगता है तीसरे पक्ष के रूप में राजस्व अधिकारी भी हैं, राजस्व का मुकमा निर्णित करने में भी तो गलतियां हो सकती हैं! राजस्व के मुकदमों को देखना होगा...। जमीनदारी विनाश अधिनियम को भी यहां विधिक ढंग से लागू किया गया कि नहीं उसे भी समझना होगा।
कमेटी के विचारण के लिए तीन पक्ष हो गये, पहले तो दो ही पक्ष थे आरोपी तथा प्रताड़ित, राजस्व अधिकारी भी एक तीसरे पक्ष के रूप में सवाल जैसे दीखने लगे। कमेटी के विद्वान अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों की भूमिका तथा जमीनदारी विनाश अधिनियम के क्रियान्ययन पर भी गंभीरता से विचार करने लगे।
देखना यह होगा कि विवादित जमीन आरोपी के नाम से कब और कैसे आई?
इस सवाल का उत्तर ही हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना का मुख्य कारण हो सकता है। इसका उत्तर डी.एम. साहब के पास था। वे काफी होमवर्क कर चुके थे इस मामले में। उन्होंने कमेटी के अधिकारियों के सामने हल्दीघाटी वाले गॉव के सभी खातों का पूरा वृतांत जो धरती-कथा की तरह था सप्रमाण प्रस्तुत कर दिया।
अब कमेटी के अधिकारियों के पास खातों का खुला खुला वृतान्त था, यानि पूरी कथा थी पर वह कथा-वृतान्त नहीं था जिससे मालूम होता कि जिस कथित संस्था ने आरोपियों को जमीन का बैनामा किया उस संस्था का नाम विवादित जमीन पर
‘जंगल जिरायत’ काट कर कैसे और कब नामांतरित हो गया? संस्था वालों ने आरोपियों को जमीन बेचा था उसी आधार पर आरोपियों का नाम जमीन पर चढ़ गया। वैसे डी.एम. साहब की जानकारी पक्की थी कि आरोपियों के नाम से जमीन कब और कैसे नमांतरित हुई? जानकारी होते हुए भी डी.एम. साहब ने कमेटी के अधिकारियों को नहीं बताया। वे बताते भी क्यों? उसी विन्दु पर तो फसान था जिसके कारण डी.एम. साहब तथा एस.डी.एम. साहब जांच के घेरे में आ जाते। आरोपियों के नाम से जमीन का नामांतरण एस.डी.एम. ने किया था तथा उसपर हुई आपत्ति को डी.एम.साहब ने खारिज किया था। गंभीरता से जॉच करने पर मुकदमों को निर्णित करने में कुछ वैधानिक खामियॉ निकल सकती हैं। प्रताड़ितों के वकील के प्रतिवाद को आखिर क्यों ध्यान में नहीं रखा गया तथा उसे बिना सुने ही आरोपियों के नामों को पूर्व खातेदार का नाम काट कर दर्ज कागजात-माल कर दिया गया।
कमेटी वाले अधिकारी जिले के राजस्व अधिकारियों से जिरह करके हल्दीघाटी वाले गॉव के काण्ड के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे पर असल बातें जिसे वे जानना चाहते थे पर्दे में थीं। कारणों पर ढके पर्दों को हटाने में कमेटी वाले दूसरे दिन जुट गये इस क्रम में कमेटी वालों की समझ में आया कि प्रताड़ितों के वकील से मिल कर ही विवाद के कारणों पर से पर्दा हटाया जा सकता है। स्थानीय राजस्व विभाग के अफसर तो कारण वही बतायेंगे जिससे उन पर ऑच न आने पाये। प्रताड़ितों का जो वकील है बहुत कुछ जानता होगा जमीन विवाद के बारे में उसके तर्क हांेगे तथा प्रतिवाद के आधार भी होंगे उसके पास। सो रास्ता उससे मिलकर ही निकलेगा।
दूसरे दिन ही कमेटी वालों ने प्रताड़ितों के वकील को बुलावा भेज दिया... प्रताड़ितों का वकील उस दिन नगर में नहीं था वह कहीं गया हुआ था। प्रशासन ने उसी नायब तहसीलदार को लगा दिया प्रताड़ितों के वकील को कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कराने का। नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील से रात में उसके आवास पर मिला और कमेटी के अधिकारियों से मिलने का प्रस्ताव उसे दिया।
दूसरे दिन करीब ग्यारह बजे दिन के आसपास नायब तहसीलदार प्रताड़ितों के वकील को जिला मुख्यालय ले गया फिर प्रताड़ितों का वकील कमेटी वालों के समक्ष हाजिर हुआ। उसके साथ कुछ फाइलें भी थीं, वही फाइलंे जिसे उसे डी.एम. साहब को दिखाना था। प्रताड़ितों का वकील खुद को तैयार कर चुका था कि कमेटी वालों को अपनी बातों से किस तरह प्रभावित करना है। कमेटी वाले प्रदेश के बडे़-बड़े़े अधिकारी थे, कई तरह के अनुभवों वाले, कानूनों के जानकार तथा गूॅगों से भी सच उगलवा सकने वाले सो प्रताड़ितों के वकील को भी तो हर तरह से खुद को तैयार करना था जिससे वह वहां गूॅगा न रह जाये।
कमेटी भी अधिकारियों की ही थी। मानव सभ्यता के अलग नश्ल वाली, वे किसी से तय समय पर मिल लें ऐसा अपवाद ही होता है वैसे भी कमेटी वाले पुलिस के अधिकारियों से सवाल-जबाब कर रहे थे। करीब दो घंटे बाद वे खाली हुए फिर
प्रताड़ितों के वकील की कमेटी वालों से मुलाकात हुई।
कमेटी वाले सज्जन थे उनके चेहरे पर सामान्य लोगों की तरह ही चमक थी अधिकारियों वाला रूआब कहीं गायब था। वे भाषा तथा भूसा से भी सरल जान पड़ रहे थे काई दिखावा नहीं। कोट, पैन्ट, टाई का तो दूर दूर तक पता नहीं था। वे सामान्य से लिवास में थे मानो तरकारी खरीदने जा रहे हों। उनमें एक महिला अधिकारी भी थीं वही कमेटी की मुखिया थीं। वे शालीन थीं तथा उनकी बोली बहुत ही मीठी थी।
अपनी मीठी बोली में ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से बैठने के लिए बोला.
‘अरे वकील साहब काहे खड़े हैं बैठिए’
प्रताड़ितों का वकील कहां बैठे? वहां एक ही दो सीटर सोफा था जिस पर वे बैठी हुई थीं सामने कमेटी के दूसरे लोग बैठे हुए थे...
प्रताड़ितों के वकील की समझ में नहीं आया कि वह कहां बैठे तभी महिला अधिकारी बोल उठीं तथा अपने पास ही बैठने का इशारा किया फिर प्रताड़ितों का वकील उनके पास ही बैठ गया। प्रताड़ितांे के वकील को आभास हुआ कि वह असहज हुआ जा रहा है और महिला अधिकारी की प्रतिभा में कहीं विलुप्त होता जा रहा है। ऐसा पहली बार उसके साथ हुआ था जब वह किसी आलाधिकारी के साथ ही नहीं बिल्कुल बगल में बैठा हो। प्रताड़ितों के वकील ने खुद को संयत किया।
महिला अधिकारी ने विनम्रता से कहा वकील से...
‘देखिए वकील साहब! यह कमेटी हल्दीघाटी वाले गॉव की घटना की सचाई जानना व समझना चाहती है, आपसे आग्रह है कि कमेटी को वह विधिक रास्ता बतायें जिससे कमेटी सचाई तक पहुंच सके, हम लोग तो उलझ चुके हैं भूमि प्रबंधन के माया जाल वाले धरती-कथा में...। समझ में नहीं आ रहा है कि यह जो खाता-वृतांत है कब का है तथा किस बिन्दु से जॉच प्रारंभ करें। मुख्यमंत्राी जी हैं कि वे मन बना चुके हैं यहां के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने के लिए। किसी भी हाल में वे नहीं मानते कि प्रताड़ितों ने कुछ गैर कानूनी किया होगा, गैर कानूनी कार्य किया है आरोपियों ने। हमलोगों को भी यही जान पड़ रहा है।’
महिला अधिकारी से ऐसी मीठी बोली की आशा प्रताड़ितों के वकील को न थी।
उसे तो अनुमान था कि जिले के दूसरे आलाधिकरियों की तरह ही कमेटी वाले कड़क होंगे और बेधक बोली वाले होंगे, वह तो चकरा गया...
‘हॉ मैडम! जितना में जानता हूॅ उतना बता सकता हूॅ आप सवाल पूछें फिर मैं बताऊॅ, ऐसे का बताऊंगा? मुझे क्या पता कि आप क्या जानना चाह रही हैं।’
फिर महिला अधिकारी ने सवाल पूछना शुरू किया, उनके एक एक सवाल का प्रताड़ितों के वकील ने सप्रमाण उत्तर दिया। महिला अधिकारी वकील के बताये सारे उत्तरों को नोट करती जा रही थीं। एक जगह जा कर महिला अधिकारी की कलम रूक गई... कलम रूकते ही उन्होंने प्रताड़ितों के वकील से साफ पूछा...
‘तो क्या बैनामा वाली जमीन का खारिज-दाखिल आरोपियों के नाम से हो चुका है?’
‘हॉ मैडम तभी तो आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया.. और गोलियॉ चल गईं दस लोग मारे गये।’
‘यह बताइए वकील साहब! बैनामे वाली जमीन का खारिज-दाखिल कब हुआ और उसे किसने किया?’
महिला अधिकारी ने दूसरा सवाल पूछा प्रताड़ितों के वकील से..
‘हल्दीघाटी वाली घटना के कुछ दिन पहले ही आरोपियों के नाम दर्ज कागजात माल हो चुके थे, घटना उसके बाद ही घटित हुई। आरापियों का नाम दर्ज कागजात माल हो जाने के कारण उसकी खतौनी भी उन्हें मिल चुकी थी। सो वे तत्काल जमीन पर कब्जा ले लेना चाहते थे उसी के कारण घटना घटित हुई।’
प्रताड़ितों के वकील ने महिला अधिकारी को बताया तथा उसका प्रमाण भी दे दिया।
कमेटी के अधिकारियों के दिल-दिमाग में सन्देह पैदा हो चुका था वे मान चुके थे कि कुछ न कुछ प्रशासनिक स्तर पर भी गड़बड़ हुआ है। कमेटी वाले राजस्व विभाग के कागजों तथा उसमें किए गये फैसलों को मुख्य आधार बनाने के बारे में सोचने लगे। कमेटी वालों ने आपस में बातें की और प्रताड़ितों के वकील को घन्यवाद दिया तथा निवेदन भी किया कि हमलोग आपसे एक बार दुबारा मिलना चाहेंगे।
कमेटी वालों के पास कम ही समय था उन्हें सरकार को रिपोर्ट देना था सो वे जल्दी में थे और दूसरे कामों में संलग्न हो गये।
प्रताड़ितों का वकील प्रसन्न होकर वहां से लौट आया। उसे लगा कि कमेटी वाले प्रताड़ितों के पक्ष की तरफ खड़े जान पड़ रहे हैं। उन्हें आभास हो चुका है कि खारिज दाखिल वाले राजस्व के मुकदमे में वैधानिक गल्ती हुई है। फिर वह कचहरिया कामों में लग गया। कचहरी से वह अपने आवास पर लौटने वाला ही था कि पीड़ितों के परिजनों ने उसे घेर लिया...
‘का हो रहा है वकील साहेब! हमलोग तो बर्बाद हो गये।’
प्रताड़ितों के वकील को कहीं से सूचना मिली थी कि सरकार की तरफ से उन्हें आर्थिक सहायता मिलने वाली है और कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। सरकार पूरी तरह से आपलोगों के साथ है, मुख्यमंत्राी जी आने वाले हैं, संभव है उसी दिन कुछ आर्थिक सहायता आपलोगों को मिले। आपलोग गॉव में शान्ति बनाये रखें और सरकार पर भरोसा रखें।’
प्रताड़ितों का वकील पीड़ितों के परिजनों को समझा कर अपने आवास पर चला गया और परिजन सीधे अपने अपने घर लौट गये।
हल्दीघाटी वाली घटना का असर कचहरी पर तनिक भी न था असर होता तो कम से कम एक दिन के लिए कचहरी के कार्य का बहिष्कार वकीलों ने किया होता
और कचहरी बन्द हो जाती। पर ऐसा नहीं हुआ था। कोई दूसरा कारण होता तो वकील न चूकते वे कार्य बहिष्कार अवश्य ही करते। दर असल हल्दीघाटी वाला मामला दो पक्षों का था वह भी जमीन के मालिकाने के सवाल को ले कर सो उस मामले के आधार पर वकीलों को कचहरी के कार्य का बहिष्कार करना उचित न लगा था। ऐसे मामले तो जनपद में होते रहते हैं।
यह जमीन ही है जिसका मामला शुरू तो होता है राजस्व के मुकदमे से पर पहुंच जाता है दिवानी तथा फौजदारी के मुकदमे तक। जमीन का मामला हो या मकान का, दौरान मुकदमा इन मामलों में मार-पीट कतल हो जाना किसी हिंसक संस्कृति की तरह है जो फैली हुई है हर तरफ। लोग मुकदमा लड़ते लड़ते परेशान तथा हलकान हो जाते हैं फिर विवाद के आखिरी हिंसक समाधान मार-पीट, कतल पर उतर जाते हैं। कतल हो जाने के बाद उन्हें अगर कुछ समझ में आया भी तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला? तब तक तो दोनों पक्ष खुद की गृहस्थी मटियामेट कर चुके होते हैं। रोते रहने के अलावा उनके पास फिर से गृहस्थी संभालने की क्षमता नहीं बची रहती, वे सड़क पर आ चुके होते हैं।
प्रताड़ितों का वकील कमेटी के अधिकारियों से मिल कर कचहरी लौट आया था और कमेटी के सभी अधिकारी कलक्टरी पर ही थे। कलक्टरी का माहौल पहले की तरह था शान्त और स्थिर। लम्बे चोड़े घेरे वाली कलक्टरी अपने आप एक अलग शान का प्रतीक थी पुराने जमाने के किलों की तरह नई नई बनी भी थी। किलों में जैसे अदब और शान हर तरफ पसरा होता है, रियासत की गरिमा अलग तरीके से प्रभावित कर रही होती है वैसेे ही आज के समय की कलक्टरी की गरिमा भी राजशाही के अतीत में झोंकने वाली होती है। वहां पहुंचो तो भूल जाना ही होता है अपनी अस्मिता अपना सारा कुछ जो याद रहता है वहां याद नहीं रहता। कलक्टरी कुछ दे न दे अदब जरूर सिखा देती है समझ में आने लगती है बातें कि शासन यूॅ ही नहीं चला करता शासन चलता है, अदब से और अदब सिखाने वाली केवल एक संस्था है, वह है प्रशासन। लोक-समाज वाली संस्था तो जाने कब की बिला चुकी है, उसके गीत-संगीत, वार्तायें, उसकी व्यवहार-संस्कृति गायब हो चुकी हैं। अदब की उस पाठशाला में चाहे जो पहुंचे वह किसी योग्य भिक्षु की तरह हाथ जोड़े ही खड़ा मिलेगा। अधिकारियों के चपरासियों के अदबी स्वभाव वे तो हस हस कर सूचित कर रहे होते हैं कि यहां आये हो तो अदब से खड़े रहो, अदब से बोलो, अदब से सुनो और अदब से देखो...
पर जाने कैसे वहां गॉव का वह लड़का तनबुड़ुक भी पहुंच गया जबकि एस.पी. साहब ने उसे घर भिजवा दिया था एक सिपाही के साथ। क्या फिर चला आया गॉव से?
कुछ न कुछ हुआ ही होगा तभी तो कलक्टरी आ गया अपने वाद्य यंत्रा के साथ। कलक्टर साहब के कार्यालय के सामने काफी खुली जगह है। अमूमन वहां भीड़ का पता नहीं चलता, सौ-दो सौ आदमी रहें तो भी। कुछ थोड़े से लोग होते हैं जो कलक्टर आफिस के अगल-बगल मडराते रहते हैं, कुछ होते हैं जो कलक्टर साहब के आफिस के अन्दर या उनके स्टेनो के पास बैठे होते हैं कुछ कलक्टरी के दूसरे कार्यालयों की तरफ छिटक जाते हैं।
तनबुड़ुक भीड़ का मोहताज नहीं है न ही उसे अपनी कला दिखाने का कोई शौक है वह तो जाने किस ऊर्जा से जहां जाता है वहीं गाने लगता है.... वह कलक्टरी आफिस के ठीक सामने नाचने व गाने लगा इस बार उसका वाद्य-यंत्रा बदल चुका था हाथ में डफली आ गई थी। किसी ने उसके गाने से प्रभावित हो कर दे दिया हो उसे डफली शायद। गॉव का लड़का गाना शुरू कर देता है...
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी,
जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई।
सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी,
दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी,
भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही
त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी,
ओहू के संग धरती हाथ भर न गई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।’
गाने की धुन कलक्टरी के अन्तःपुर तक पहुंच रही थी शायद गाने की धुन तथा उसके राग वहीं कहीं दफन हो जाते पर डफली की थापों से प्रस्फुटित होने वाली धुन भला कैसे न जाती कलक्टरी के अन्तःपुर तक। वह सरसरा कर कलक्टरी के अन्तःपुर में अपनी सुमधुरता के साथ दाखिल हो गई। कलक्टरी के अन्तःपुर में प्रदेश के आलाधिकारी थे हालांकि वे सरकारी कार्यों की कानाफूसियों में थे फिर भी लड़के के गाने की मधुरता ने उन्हें अपनी ओर खींचा...वे खुद को न रोक पाये भूल गये कि कलक्टरी का अनुशासन क्या होता है, वे गाना सुनने के लिए बाहर आखिर कैसे निकल सकते हैं? वे तो आफिस में बैठे बैठे घंटी बजा देते चपरासी आ जाता फिर गाना गाने वाले लड़के को रोकवा देते पर वे ऐसा नही किए। वे अधिकारियत से बाहर निकल कर गाने की धुन की तरफ बढ़ जाते हैं। आफिस से बाहर निकल आते हैं आफिस के कलात्मक बारामदे में। गाने की कुदरती धुन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया था फिर वे गाना सुनने लगे। पर वहां तैनात चपरासियों तथा सुरक्षा
कर्मियों को बुरा लगा वे गॉव के लड़के को रोकने लगे एक दो बार पहले भी गॉव
के लड़के को वे रोक चुके थे...
‘गाना न गाओ, साहबों को बुरा लगेगा लखनऊ से बड़े बड़े साहब आये हुए
हैं। फूटो इहां से जाओ कहीं दूसरी जगह गाना-बजाना करो’
कलक्टरी के कर्मचारी भी कम नहीं होते उनमें अधिकारियत का रोग पूरी तरह से संक्रमित हो चुका रहता है। गॉव का लड़का तो अपनी धुन में था, कुछ धुनंे जो पेट की आग से बनी होती हैं जो आत्मा की घेरे बन्दी से निकल कर आजाद हो चुकी होती हैं, वे धुनंे किसी के रोकने से नहीं रूकतीं बिना प्रस्फुटित हुए वे कहीं नहीं ठहरतीं।
गॉव का लड़का किसी की नहीं सुनता वह अपनी धुन में गाये जा रहा है...
पिर्थबी केहू कऽ न भई....
कमेटी के अधिकारियों के लिए वह गाना तथा उसकी कुदरती धुन अद्भुत थी, पूरा गाना सुन चुकने के बाद कमेटी वालों में जो महिला अधिकारी थीं वे गाना गाने वाले लड़के से प्रभावित हो जाती हैं और लड़के को बुलवाती हैं। पढ़ाई के दिनों में महिला अधिकारी भी लोक-गीत गाया करती थीं, कालेज के कई प्रोग्राम में वह बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग किया करती थीं... पर उन्होंनेे कभी इस तरह का लोक-गीत जन-जागृति वाला नहीं सुना था...वह अचानक मन में सोचती हैं... यह गीत तो अद्भुत है...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई...’
मन ही मन महिला अधिकारी गीत को दुहराती हैं लड़के की धुन में,लोकधुन में डूब जाती हैं महिला अधिकारी, मानो गाने लगेंगी पर नहीं कैसे गायेंगी, वे तो जॉच में आई हुई हैं। पूर्रा आिर्थक-दर्शन है इस गीत में। पर आज की दुनिया तो केवल अपने स्वार्थ में है...‘उससे दर्शन से क्या लेना-देना।’
एक संतप्त ‘आह’ निकली उनके मुह से जो कुदरती थी।
भला ‘आह’ को कैसे रोक पातीं वे...‘आह रूकती भी तो नहीं’
उन्होंने खुद को संयत किया, वे कैसे गा सकती हैं कोई लोक-गीत, अधिकारियत ने उन्हें रोक दिया फिर भी मन में गुनगुनाते हुए वे दाखिल हो गईं कार्यालय में। उन्होेंने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि वह कौन लड़का था जो कलक्टरी परिसर में लोक-गीत गा रहा था।
तनबुड़ुक लोक-गीत का गायन पूरा करके वहां से लौट गया, कहां गया क्या पता?
‘तनबुड़ुक को धरती-माई देख रही हैं अपनी चौरी पर बैठे हुए कि तनबुड़ुक लोक-गीत गा रहा है वह भी उन्हीं के बारे में कि पृथ्बी किसी की नहीं होती, सच में पृथ्बी किसी की नहीं होती! धरती-माई सोच में पड़ जाती हैं। इसका मतलब जो किसी का नहीं होता वह तो अपना भी नहीं होता शायद यही कारण है कि वे खुद
धरती की भी नहीं हो पा रही हैं धरती-माई होकर भी।’
धरती-माई कितना विश्लेषित करतीं खुद को, यह जो भौतिक जगत का आर्थिक प्रपंच है उसके बारे में उन्हें क्या पता?
‘दृश्य पलट रहा है
किसी के लिए दृश्य है तो किसी के लिए अदृश्य’
‘धरती-माई रापटगंज काहे के लिए आतीं, वे गॉव पर ही हैं, गॉव में चल रहे हल-चलों को देख रही हैं। वे निराश हैं धरती-पुत्रों से सो पीपर के पेड़ के नीचे बैठ कर खुद के बारे में गुन रही हैं कि उनकी भी तो वही हालत है जो धरती पर रहने वाली दूसरी माताओं की है जो खाना-दाना के लिए भी मोहताज हैं, गालियां सुन रही हैं मार खा रही हैं। धरती-माई समझ रही हैं कि दिखावे के लिए धरती-पुत्रा उनकी पूजा करते हैं, दिया-बाती करते हैं, माला-फूल चढ़ाते हैं...धरती-माई पसीना पसीना हो चुकी हैं। ऑचल से पसीना पोंछ रही हैं पसीना है कि बहता ही जा रहा है, का करें, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा....खुद से सवाल पूछ रही हैं, का इसी लिए परगट हुई थीं धरती पर? स्वर्ग में उन्हें कोई मार तो नहीं रहा था, वहां के कुछ निर्विभागीय देवता केवल ताने ही तो मार रहे थे, कतल व खून-खराबा धरती पर जैसा तो नहीे कर रहे थे।’
वे तो परगट हुई थीं धरती पर कि अनाज पैदा करेंगी, फल-फूल पैदा करेंगी, जीव-जन्तु सभी के लिए भोजन का प्रबंध करेंगी किसी के लिए अनाज तो किसी के लिए घांस-फूस। खैर अनाज, फल-फूल, घांस-फूस तो पैदा हो ही रहा है धरती पर। पर यह मार-पीट, खून-कतल धरती पर कब्जा करना चाहे जैसे, यह क्या है? धरती जब किसी ने बनाया नहीं फिर काहे के लिए कब्जा और मार-पीट... वे किससे पूछें... विफना, खेलावन, बंधू किससे या उस रामलाल से जो आरोपी है, जिसने धरती कब्जा करने के लिए हल्दीघाटी वाले गॉव में खून-खराबा किया, आखिर किससे पूछें... अगर किसी से वे पूछें भी तो क्या कोई बतायेगा उन्हें मार-पीट की सचाई?
धरती-माई तय नहीं कर पा रही हैं। अचानक उन्हें समझ आया कि सारा खेल लालच और लोभ का है, धरती के लोग लालची हो गये हैं पर पहले ऐसा नहीं था। पहले के लोग जब गुफाओं में रहते थे, खेती करना सीख रहे थे तब अपनी सहूलियत के हिसाब से जमीनों को आवश्यकता के अनुसार मिल कर बाट लिया करते थे। हर बालिग को आवश्यकतानुसार जमीन मिलती थी। वे उतने से ही संतुष्ट रहा करते थे। वे मार-पीट नहीं करते थे, गुफाओं से बाहर निकल कर शान्तिपूर्वक खेती-बारी करने लगे थे। खैर यह जो लालच है नऽ वह तो उन्हें स्वर्ग में भी दिखा था, कुछ देवता भी अपने क्षेत्राधिकारों के विस्तार के लिए आपस में झगड़ जाया करते थे खासतौर से लोक-मंगल वाले क्षेत्राधिकार के संदर्भ में, झगड़ते थे पर मार-पीट नहीं करते थे। वे सोचते थे कि लोक-मंगल वाला कार्य बहुसंख्यक सामाजिक जुड़ाव के कारण लोक-प्रियता वाला क्षेत्रा है, इसमें काम करने की संभावना भी अधिक है सो वहां के देवता इस विभाग को अपने अधिकार में रखने के लिए लालायित रहा करते थे।
पीपर के पेड ़के नीचे बैठे बैठे धरती-माई अचानक ध्यान में चली गई फिर उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि समाधि से बाहर निकलना है कि बीत गये तेरह दिन, चौदहवां दिन आ गया तेरही के बाद वाला दिन। धरती-माई अभी भी समाधि में हैं पीपर के पेड़ के नीचे। वे जांयें भी तो कहां जांयें सो समाधि में हैं। समाधि के लिए पीपर के पेड़ सेे अच्छी जगह दूसरी नहीं।
धरती-माई समाधि में हैं फिर भी अपने धरती-पुत्रों को देख रही हैं पर बिफना, पुनवासी, बंधू, खेलावन में से कोई भी उन्हें नहीं दिख रहा। जाने कहां चले गये हैं सब। गॉव में तो सब ठीक है नऽ! धरती-माई गुन रही हैं...उन्हें सन्देह हो रहा है समय पर। समय भी तरह तरह का खेल खेलता रहता है। यह समय का खेल ही है जो खेल कर चला गया और दस लड़के गॉव के मार दिये गये पता नहीं आगे क्या करे समय? बहुत ही खराब हालत है धरती-पुत्रों की, धरती-जोतक समाज की। धरती पर काबिज होने के लिए धरती-लोक पर हर जगह मार-काट मची हुई है कोई इसी गॉव में थोड़ै। धरती पर तो अब पॉव रखने की भी जगह नहीं जहां झगड़े न हों। वे ऐसी जगह तलाश रही हैं हल्दीघटी गॉव में जहां आराम से बैठ सकें, अपने मन को समझा सकें, कुछ राहत महसूस कर सकें पर ऐसी जगह उन्हें कहीं नहीं दिख रही धरती पर। अचानक उन्हें समझ आया कि पीपर के पेड़ क नीचे की जगह ही ठीक है तथा पवित्रा भी है, यहां शान्ति भी है।
धरती-माई जानती हैं कि पीपर पेड़ के हर पत्ते पर देवताओं का वास होता है, इसी लिए यहां शान्ति है, शान्ति थी भी। वहीं बैठे बैठे वे देख रही हैं गॉव को, वे उस दिन भी थीं गॉव में ही जब प्रशासन का पूरा अमला गॉव में कदम मार्च कर रहा था... हर तरफ पुलिस नाच-कूद रही थी।
उस दिन पोस्टमार्टम के लिए लाशें ले जाई जा रहीं थीं रापटगंज। धरती-माई उस समय पीपर के पेड़ के पास वाली अपनी चौरी पर बैठ कर रो रही थीं, विलाप कर रही थीं पर उनका विलाप कोई नहीं सुन रहा था। वे देवी हैं, सो देवी-देवता का रोना- धोना भी उनकी तरह गुप्त होता है कोई नहीं सुन सकता। वैसे भी धरती पर निवास करने वालों ने तो कभी भी किसी देवता को सांसारिक कारणों के कारण रोते-विलखते देखा नहीं है। देवता तो अधिआत्मिक होते हैं, उनसे अधिभौतिक सुखों-दुखों से क्या लेना-देना, वे पराशक्तियों के स्वामी होते हैं, सो वे काहे रोयेंगे?
बुधनी काकी अभी अभी लौटी हैं पीपर के पेड़ के पास से ‘बरम बाबा’ व धरती-माई की चौरी पर माथा नवा कर...
‘गॉव का भला करना बाबा! भला करना माई’ पर उन्हें भी नहीं दिखीं धरती-माई व बरम बाबा, दिखतीं कैसे भला देवी-देवता भी दिखते हैं! कहीं चली गई होंगी। धरती-माई की पूरी दुनिया है, भला वे एक जगह पर पल्थियाकर बैठी रहेंगी तो दुनिया का काम कैसे चलेगा? धरती-माई कभी गॉव में रह लेती हैं तो कभी दफ्तरों की तरफ भी चली जाती हैं। दफ्तरों में उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा रहते हैं, वे अधिकारी, कर्मचारी, नेता-परेता हैं, किसिम किसिम के काम हैं उनके उन पुत्रों के जिम्मेे...
धरती-माई एक दिन रापटगंज में कलक्टर दफ्तर में चली गई थीं और खुश खुश थीं कि उनके पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा न्याय के रास्ते पर चल रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि हल्दीघाटी गॉव में अन्याय हुआ है, बर्बरता हुई है। हालांकि कलक्टर दफ्तर में उन्हें माला-फूल नहीं चढ़ाया गया और न ही उनकी पूजा-अर्चना की गई। धरती-माई को बुरा भी नहीं लगा... कोई बात नहीं पूजा-अर्चना तो घर में होती है, आफिस में उनके अधिकारी, कर्मचारी पुत्रों के घर तो हैं नहीं, वे अपने अपने घरों से ही पूजा-अर्चना करके ही दफ्तर आये होंगे सो दफ्तर में का पूजा करना सो धरती-माई ने उस तरफ घ्यान नहीं दिया।
लखनऊ से आये हुए जॉच-अधिकारी हत्याकाण्ड के बाबत सरकार को एक रिपोर्ट भी भेज चुके हैं सो धरती-माई खुश खुश हैं कि ये जो पढ़े-लिखे प्रतिभा परीक्षा पास उनके योग्य पुत्रा हैं.. ये संभाल लेंगे धरती को, धरती के प्रबंधन को कहीं से गड़बड़ न होने देंगे। धरती-माई खुद को सहला रही हैं, हल्दीघाटी वाली घटना से उन्हें विचलित नहीं होना चाहिए। दफ्तरों में कार्यरत उनके ये जो पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा हैं, कानूनों के जानकार हैं, संस्कृति और परंपरा के अनुपालक हैं, वे सामाजिक, समरस्ता तथा भाई-चारे को किसी भी हाल में खण्डित न होने देंगे। गॉव के अशिक्षित पुत्रों को भले ही ‘समत्वम् बोध’ वाली संस्कृति और परंपरा के बारे में जानकारी न हो पर ये जो उनके पढ़े-लिखे पुत्रा हैं ये तो संस्कृत व सभ्यता का सारा व्याकरण जानते हैं। इनसे संस्कृति और सभ्यता के व्याकरण को चाहे जहां से पूछ लो, कहीं इनसे गलती नहीं होगी बताने में। गॉव के पुत्रा तो केवल खेत जोतना, तथा जोते हुए खेत में बीज डालना ही जानते हैं, फसल तैयार हो जाती है तब काट लेते हैं, अनाज के दाने निकाल लेते हैं, चूल्हे पर खाना बना लेते हैं, रहने के लिए कच्चा-पक्का घर बना लेते हैं, कभी कभार पोलिंग बूथ पर जा कर किसी को भी मत-दान कर देते हैं, इससे अधिक सामाजिक ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक जानकारी उन्हें नहीं है, जानकारी हो भी नहीं सकती? वे कैसे समझ सकते हैं कि यह जो हमारा भारतीय समाज है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वाला है। हमारे समाज में कानूनी, सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से भेद-भाव न तो कभी रहा है और न ही आगे रहेगा। इस सत्य को तो केवल हमारे पढ़े-लिखे योग्य पुत्रा ही भली-भांति समझते हैं और इसी के अनुसार चलते भी हैं।
धरती-माई का रोम रोम सन्तुलन से पूर्ण है, वे सबका भला तथा सबका विकास की सोच वाली हैं। एकतरफा विकास की बातें वे सोच ही नहीं सकतीं आखिर माई हैं तो सबकी माई हैं गरीब-अमीर, साक्षर-निरक्षर, बड़ा-छोटा, सबकी। सो सबके विकास के बारे में गुनेंगी, सबके विकास की मंगल-कामना करेंगी। हल्दीघाटी गॉव में जो बर्बर हत्याकाण्ड हुआ उस एक घटना के आधार पर पूरी धरती को कोसना, उसे उपेक्षित करना यह तो ठीक नहीं होगा। धरती-जोतक पुत्रा भी तो उनके ही पुत्रा
ही हैं फिर भी पढ़े-लिखे पुत्रों से उनकी तुलना करना यह तो गलत होगा। कहॉ पढ़े लिखे, योग्य, प्रतिभा परीक्षा पास, कहॉ गोबर-माटी कीचड़ से लिपे-पुते मुर्झाये चेहरे वाले, हल-जोतने वाले, फावड़ा चलाने वाले, बैंक का कर्जा न चुका पाने वाले, सरकारी राशन से पेट भरने वाले, चौदह दिन के लिए हवालात में बन्द होने की योग्यता वाले, थाने के सामने रिरियाने वाले, अफसरों के सामने गुलामों से भी बद्तर हालत में फरियाद करने वाले, ये सब का जानेंगे धरती के बारे में, धरती के प्रबंधन के बारे में। आपस में झगड़ रहे हैं, मार-काट कर रहे हैं... यह सब देखने के लिए वे थोड़ै परगट हुईं थीं धरती पर, उनकेे लिए आकाश में तैरता स्वर्ग बुरा थोड़ै था। धरती-माई धरती से जुड़े धरती-पुत्रों को कोस रही हैं पर उन्हें यह भी ध्यान है कि ये जो धरती से जुड़े उनके पुत्रा हैं भले ही अशिक्षित हैं, गोबर-माटी से सने हुए हैं ये ही तो उन्हें अक्षत-पुष्प चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं। शादी-बिआह चाहे जो भी अवसर हो ये धरती-पुत्रा उनकी पूजा करना नहीं भूलते। यही सब गुन कर ही तो वे अवतरित हुई थीं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के साथ रहने के लिए पर धरती के समाज कोे देख कर वे सोच में पडी़ जा रही हैं आखिर वे करें क्या? कहां जायें, अब तो स्वर्ग में भी वापस नहीं जा सकतीं, स्वर्ग के रहवासियों को धमकिया कर अवतरित हुई थीं धरती पर... स्वर्ग की अप्सराओं से ही नहीं, केवल देवियों से ही नहीं, बिना क्षेत्राधिकार वाले देवताओं से भी झगड़ पड़ी थीं घरती-माई।
‘मैं तत्काल ही छोड़ रही हूॅ स्वर्ग और जा रही हूॅ अपनी धरती पर।..’
स्वर्ग की देवियॉ भी कम न थीं वे तनेन हो कर धरती-माई को उलाहती रहतीं थीं, स्वर्ग ऐसा तो वैसा, यह स्वर्ग ही है जो तमाम तरह के प्रवासी देवी, देवताओं को शरण दिए हुए है, वे अपना मूल स्थान छोड़ कर स्वर्ग में अपना ठिकाना बनाये हुए हैं, उनमें से तो कुछ ऐसे हैं जो स्वर्ग की नागरिकता भी हासिल कर चुके हैं। एक बार सवाल उठा था स्वर्ग की महा-सभा में कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को स्वर्ग से भगाओ। दोहरी नागरिकता वाले देवताओं की हालत यह है कि जब उनकी जरूरत स्वर्ग के कामों के लिए स्वर्ग में होती है तब धरती पर चले जाते हैं, काम-चोरों की तरह ऐसा नहीं चलेगा, ऐसी आवा-जाही नहीं चलेगी जब चाहो धरती पर जब चाहो स्वर्ग में। यह आवाज उठाई थी स्वर्ग के मूल वासियों ने जो आज के समय में स्वर्ग में अल्पमत में हैं। स्वर्ग में अब उनकी नहीं चलती, चलती है वहां दूसरे किसिम के जमात वालों की जो आधुनिक होने का दिखावा करते हैं और बोलते हैं कि वे पद, ओहदा तथा जाति आदि के रोग से बाहर हैं पर ऐसा नहीं है। बोलते हैं कि वे ‘समत्वम् बोध’ वाले हैं, आगे देखू लोग हैं पर हैं आदिम मन, मिजाज, चेतना वाले, वे कट्टर किस्म के लोग हैैंं एक ही रेखा पर चलने, नाचने, थिरकने वाले।’
धरती-माई को जाने कितनी बार इन कट्टर किसिम के लोगों से ताने सुनने पड़े हैं स्वर्ग में, एक बार तो बिना क्षेत्राधिकार वाले एक कट्टर देवता ने साफ साफ कह दिया था धरती-माई से...
‘आपका क्या है यहां पर धरती-माई! जो पड़ी हुई हैं यहां पर, हर काम में अड़ंगा डालती रहती हैं। धरती आपका क्षेत्रा है जिसे आपने स्वेच्छा से चुना है वहां जाइए और धरती के अपने पुत्रों को संभालिए, उनके सुखों दुखों में शामिल रहिए, उनके लोकमंगल की योजनायें क्रियान्वित कराइये। यहां पर आपका क्या काम है? आप यहां प्रवास कर दोहरी नागरिकता का बेजा लाभ उठा रही हैं? स्वर्ग के एक कोने से दूसरे कोने तक बिना किसी काम के घूमती रहती हैं। आपको तो खुद सोचना चाहिए इस बारे में पर नहीं, आप काहे सोचेंगी, आपको यहां जब बिना कुछ किए ही सारी सुख-सुविधा मिल रही है फिर धरती पर काहे जायेंगी?’
धरती-माई का मन हुआ कि बिना क्षेत्राधिकार वाले देवता को फटकारें तथा उससे साफ साफ बोलें कि जिस स्वर्ग की बात तुम कर रहे हो वह केवल तुम्हारा ही नहीं है पूरी सृष्टि का है, चर-अचर सभी का है, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सभी का है, यह स्वर्ग किसी की बपौती नहीं है। पर धरती-माई अपनी मर्यादा का ख्याल रखतेे हुए उस निर्विभागीय देवता सेे उसकी भाषा-शैली में फटकार नहीं सकती थीं, उन्हें अपनी मर्यादा का ख्याल था फिर भी बोल-अबोल सारा कुछ बोल गईं थीं....
‘तेरी का औकात है रे! जो तूॅ मुझसे बातें कर रहा है। आज तक तुझे कोई विभाग भी नहीं मिला स्वर्ग में, बिना विभाग के उछल-कूद कर रहे हो। ‘देवराज इन्द्र’ की कृपा से देवता बन गये हो नहीं तो तुम देवता बनने लायक हो ही नहीं, न कोई साधना न सिद्धि। कभी किसी विभाग वाले देवता के यहां तो कभी किसी देवता के यहां शीर्षासन करते फिरते हो फिर तेरा क्या है यहां पर। तुम तो बिना विभाग वाले देवता हो। तूॅ अपनी औकात समझ कि तूॅ किससे बातें कर रहा है। जिन देवताओं के हाथों में शक्तियॉ हैं, वे तो मेरा अभिवादन करते हैं, नहीं देखा है का तूने शक्ति संपन्न देवताओं को मेरा अनिनन्दन व अभिवादन करते हुए, चिकित्सा क्षेत्रा के देवता धन्वन्तरि हों, अर्थ-प्रबंधन के देवता कुबेर हों, लोक-कल्याण, लोक-मंगल, लोक-चेतना के देवता शिव हों, मानव-सृष्टि के देवता ब्रह्मा हों, ज्ञान-विज्ञान, सूचना, प्रसारण की देवी सरस्वती हों, मौसम, पर्यावरण, शान्तिव्यवस्था, विश्व-प्रबंधन के देवता इन्द्र हों सभी तो मेरा आदर करते हैं, वे अपनी मॉ समझते हैं मुझे और एक तूॅ है कि मुझे स्वर्ग से निकल जाने के लिए बोल रहा है, मुझे प्रवासी बोल रहा है, तेरी इतनी औकात कि तूं मुझसे मर्यादाहीन बातें करे...’
हालांकि धरती-माई सहनशील हैं पर उनके स्वाभिमान पर कोई चोट करे तो वे सहन नहीं करतीं। धरती-माई को गुस्सा आ गया और उसी दिन उन्होंने स्वर्ग वाला अपना ठिकाना छोड़ दिया...स्वर्ग वालों ने पहली बार धरती-माई का गुस्सा देखा था एकदम से काली बन गईं थीं, खूनी खप्पर वाली...
‘जाओ हमें नहीं रहना स्वर्ग में, हम आज ही छोड़ देते हैं स्वर्ग, चले जाते हैं धरती पर अपने धरती-पुत्रों के बीच। स्वर्ग में है ही क्या हमेशा आकाश में टंगे रहो, उड़ते रहो हवाओं के साथ, तमाम तरह के ग्रहों-उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों के बीच, किसिम
के मुकटधारियों, क्षत्रा, चॅवरधारियों, जादुई करिश्मा करने वालों के साथ इधर-उधर की बातें करते रहो, काम के नाम पर कुछ नहीं सिवाय आशीर्वाद व श्राप देने के...’
‘वत्स तुम्हारा कल्याण हो’ आशीर्वाद देने से अच्छा है धरती पर निवास करना, धरती-पुत्रों के साथ रहना।’
‘धरती-माई जानती हैं कि वे पढ़े-लिखे पुत्रों के साथ तो रह नहीं सकतीं, वेे पुत्रा तो उनके चेहरे तक को बिगाड़ देते हैं, कहीं खदान बनाने के लिए कई कई किलोमीटर तक उनका पेट खोद देते हैं, घुस जाते हैं उनकी ऑत तक, कलेजा तक निकाल लेते हैं जब उनका वश नहीं चलता तो रूक जाते हैं। उनके पेट में से कहीं कोयला, बालू, सोना, चूना ही नहीं अनेक किस्म के खनिज निकालने लगते हैं। बारूदों के धमाकों से उनके जिस्म को चलनी कर देते हैं। फट चुका है उनका पूरा सीना। ऊॅची, ऊॅची इमारतें बना कर बेमतलब का बोझ डाल देते हैं उनकी पीठ पर आखिर कितना बोझ वे उठा सकती हैं? इस बारे में उनके योग्य पुत्रा नहीं गुनते पता नहीं किस तरह का वे विकास करना चाहते हैं।’
धरती-माई कलक्टर के आफिस में बैठे बैठे थक चुकी हैं, उन्हें दया आ रही है पढ़े-लिखे अधिकारी पुत्रों पर। वे बैठे हुए हैं कुर्सी पर दिन भर से, काम भी नहीं दिख रहा कुछ, खाली एक जगह पर बैठे रहना है, यह मुश्किल काम है। सुबह से ही वे देख रही हैं कि काम के नाम पर वेे खाली गूं गा कर रहे हैं और किसीे कागज पर कुछ लिख दे रहे हैं बस इतना ही। पर बेचारे जो हल्दीघाटी की बर्बर घटना की जॉच के लिए लखनऊ से आये हुए हैं वे सुबह से ही काम कर रहे हैं, यह फाइल लाओ तो वह फाइल लाओ, वे पता कर रहे हैं आखिर हल्दीघटी गॉव में इतनी बर्बर घटना काहे घट गई? किसकी कमी के कारण, किसकी गलती के कारण। आखिर काहे ये अधिकारी नर-नाश्ते के लिए भी कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं जबकि किसी बढ़िया होटल से उनके लिए नाश्ता भी आ चुका है... नाश्ता परोस रहा है साफा वाला एक कर्मचारी...
धरती-माई का मातृत्व छलक उठता है..उनका मन हुआ कि वे ही जा कर अधिकारी पुत्रों को नाश्ता परोस दें पर वे कैसे अवतरित हो सकती हैं मानव देह में, नहीं नहीं वे मानवरूप में अवतरित होकर नाश्ता नहीं करा सकतीं। नाश्ता देख कर धरती-माई खुद को संयत कर रही हैं जबकि उनकी जीभ बायें-दायें करने लगी है, उन्हें भी कुछ खाने की ललक लग चुकी है पर वे कैसे खायेंगी धरती का खाना, नाश्ता... उनका तो धूप, दीप, अक्षत, फूल से ही पेट भर जाता हैै, आग पर घी, दशंाग का हवन, पूजन ही उनका भोजन है। फिर भी धरती-माई को प्लेटों में सजा कर लाया गया नाश्ता खींच रहा है अपनी ओर... वे नाश्ता करें न करें पर उनके योग्य पुत्रों को तो चाहिए कि उनसे बोलें नाश्ता करने के लिए या गोबर-माटी से सने पुत्रों की तरह कुछ पर-परसाद ही चढ़ायें या दीप-धूप करें पर नहीं... ये सब तो अपने में मगन हैं। उन्हें अपने योग्य पुत्रों पर थोड़ी घिन होती है, का मतलब है इस पढ़ाई-लिखाई का?
धरती-माई करें का? वे निराश हैं पर खुद को राजी करना ही उचित होगा...
‘का हो जायेगा अगर वे नाश्ता कर लंेगी तो, ये भी तो उनके ही पुत्रा ही हैं भले ही सांस्कृतिक व सामाजिक रूप से अलग चित्त व चेतना वाले हैं तो का हुआ? इससे का होता है, हैं तो देह-धारी ही एक मुह, एक नाक, एक कान, दो हाथ, दो पैर वाले एकदम से गॉव वाले धरती-पुत्रों की तरह।’
धरती-माई खुद को समझा रही हैं कि अपने जाये बेटों में किसी भी तरह का फर्क मॉ को नहीं करना चाहिए यह मातृ-धर्म व कर्म की अवहेलना है। पर उनके योग्य पुत्रा तो उनसे नाश्ते के लिए भी नहीं पूछ रहे हैं। कुछ ही देर में खाने का भी समय हो जायेगा। धरती-माई निराश हो जाती हैं तभी कहीं से सरसराती हवा ने उनको अपनी ओर खींच लिया...
‘अरे! इस हवा में तो हवन, दीप और पूजा की सुगंध है।’
अपनी पराशक्ति से धरती-माई ने जान लिया कि गॉव वाले गोबर-माटी से सने उनके धरती-पुत्रा पूजा कर रहे हैं, पूजा-अर्चना की ही सुगंध है। कल ही तो तेरही बीती है फिर भी उनके गॉव वाले पुत्रा नहीं भूले उनकी पूजा-अर्चना करना। ये वाकई आज्ञाकारी हैं, ठीक है इनमें कुछ कमियां हैं पर इनकी कमियां योग्य-पुत्रों द्वारा पैदा की हुई जान पड़ती हैं नहीं तो ये बेचारे किसी सिद्ध कर्मयोगी या साधक ऋषि से कम नहीं हैं।
तेरही बीत जाने के बाद हल्दीघाटी के गॉव के लोग मृतक अनुष्ठान के दायित्व से बाहर आ चुके थे फिर भी उन्हें परंपरा के अनुसार तमाम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करना था। सो वे देवताओं की पूजा-आराधना में जुट गये थेे....गमी में वैसे भी देवी-देवताओं की पूजा बन्द हो जाया करती है, सामाजिक मान्यता है कि मृत्यु के अनुष्ठान तक सारे परिजन अशुद्ध रहते हैं, मृत्यु का अनुष्ठान पूरा हो जाने के बाद ही देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए पूरी तरह पवित्रा होने के बाद।
तेरही के बाद वाले पहले शुभ दिन शुक्र्रवार को देवताओं की पूजा में गॉव के आस्तिक मर्द और पुरुष जुट गये। सभी देवताओं की पूजा की गई तथा मनौती भी कि अब गॉव में अनर्थ नहीं होने देना बाबा! उस दिन धरती-माई की खासतौर से पूजा की गई और मनौती भी...
‘माई यह गॉव तेरे हवाले है, अनर्थ नहीं होने देना। तूं तो सभी की रक्षक है, सभी की मॉ है, तेरे रहते गॉव में अनिष्ट काहे हो रहा है?’
धरती-माई धूप, दीप, दसांग, फूल की सुगन्ध में डूब गयी हैं, उन्हें महसूस हो रहा है कि धरती के जोतक उनके पुत्रा उनकी पूजा कर रहे हैं और मनौती भी कर रहे हैं पर धरती-माई तो बेवश हैं, वे क्या कर सकती हैं धरती-जोतक पुत्रों के लिए उनकी समझ में नहीं आ रहा। वे धरती-माई तो जरूर हैं, उन्हें सबकी रक्षा भी करनी चाहिए पर रक्षा तथा कल्याण का काम तो उनके हाथ में है नहीं पर कैसे बतायें कि धरती पर बसने वाली दूसरी माताओं की तरह ही वे भी बेवश हैं कोई नहीं सुन रहा उनकी।
धरती-पुत्रों के कल्याण के लिए ही एक बार घ्यान लगा कर वे स्वर्ग जा पहुंची थीं, वहां के वासी सभी देवताओं के दरवाजों को उन्होंने खट-खटाया भी पर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी सभी कहने लगे...
‘तोहार धरती है धरती को स्वर्ग के देवता काहे संभालें, तोहसे संभालते बने तो संभालो नाहीं तऽ छोड़ दो, वे जैसे चाहे जैसे रहें, मार-कतल चाहे जो करें, तूं काहे परेशान हो रही हो।’
वे स्वर्ग से उपेक्षित हो कर लौट आयीं धरती पर। धरती पर भी कोई ऐसा है नहीं जिससे धरती-माई का जोगाड़ हो, उनसे धरती-जोतकों की परेशानियों के हल के लिए बतिया सकें। वे निराश हो जाती हैं विपत्ति में कोई नहीं साथ देता। अचानक उन्हें ख्याल आता है आफिसों में काम करने वाले अफसर तथा जन-प्रतिनिधियों जैसे योग्य व कमाऊ पुत्रों का। पर वे भी उन्हें एक बार पहले फटकार चुके हैं...
‘तूं अपने धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहती हो, उन्हीं के बारे में सदैव सोचती हो, हमलोगों के बारे में तुम्हें कोई चिन्ता ही नहीं है फिर हमलोग तोहार मदत काहे करें? बात भी ठीक है उनकी।’
अपने योग्य पुत्रों की दलीलंे सुन कर धरती-माई हसने लगीं, जो चोर है वही खजाने का रखवाला है, क्या मजाक है। फिर उन्हें गुस्सा आ गया..लगीं फटकारने, ‘शासन, प्रशासन तो तुम लोगों के हाथ में है, तुम लोग ही कायदे-कानून बनाते हो, विधान-संविधान बनाते हो, संसद में तुम लोग हो, अदालत में तुम लोग हो, थाने पर तुम लोग हो, जहां देखो वहां तुम लोग हो पूरी धरती पर छितराये हुए फिर भी बोल रहे हो कि जाओ धरती-जोतक पुत्रों के साथ रहो। अरे सोचो तो बेचारे धरती-जोतकों के पास क्या है अधिकार तथा अस्मिता के नाम पर, वे तो पेट भर खाने के लिए भी मोहताज हैं। कुछ तो शर्म करो धरती पर का सारा नियम, कायदा, कानून संपत्ति तुम लोगों ने कब्जिया लिया है और बोल रहे हो कि धरती-जोतक पुत्रों का तुम ख्याल रखती हो, ताने मार रहे हो मुझ पर। थोड़ा पढ़-लिख लिए, कुछ किताबंे रट लिए और पूरी धरती के मालिक बन बैठे, किसी ने ठीक ही कहा है जब तक मूर्ख जिन्दा रहेंगे वुद्धिमान खाये बिना नहीं मरेगा। मैं सारा कुछ समझती हूॅ पर चुप हूॅ, क्योंकि मैं मॉ हूॅ मैंने ही जना है तुमलोगों को भी, तुम लोगों जैसे स्वर्थियों के लिए भी कुछ बुरा नही सोच सकती पर हॉ अगर ऐसा ही चलता रहा तो किसी न किसी दिन तुमलोगों का कागजी प्रपंच, कागजी घोखा, कागजी नियम, कागजी कायदे कानून, कागजी संस्कृति अपने आप जल जायेगी किसी ज्वालामुखी की तरह फिर तुम लोग दर-बदर रोते, विलखते, कराहते घूमते रहोगे, कोई नहीं पूछेगा तुम्हें।’
धरती-माई ने योग्य-पुत्रों को फटकार तो दिया पर उन्हें अच्छा नहीं लगा, वे डर गईं कहीं ये नुकसान न कर दें धरती-जोतक पुत्रों का, इन्हीं के हाथ में सारी ताकत है। आखिर जिन्हें वे योग्य-पुत्रा समझती हैं ये ही तो कुटिल और चतुर हैं, स्वार्थी हैं, लालची हैं, ये ही धरती पर फूट, वैमनस्य और फसाद उगा रहे हैं कागज के नाम पर विधान के नाम पर। योग्य-पुत्रों की मनःस्थिति तौल कर धरती-माई विचलित हो गईं और खुद को कोसने लगीं...
‘अरे! तूं काहे की धरती-माई है रे! जब तोहार कोई नाहीं सुन रहा धरती पर भी। उन्हें खुद पर सन्देह होता है कि वे ‘देवी’ है कि नहीं हैं। उनसे तो वे जो बिना विभाग वाले स्वर्ग केे देवता हैं बहुत अच्छे हैं, उनके भी अधिकार हैं, अपमान होने पर जब गुसिया जाते हैं तो श्राप दे देते हैं, खुश होते हैं तो वरदान देते हैं और एक वे हैं कि अधिकार के नाम पर उनके हाथ में कुछ भी नहीं, कहने को तो पूरी धरती की मालिकिन हैं। धरती पर जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य है सब उनका है केवल कहने के लिए जबकि है कुछ भी नहीं, धरती की मलिकिन कौन कहे वे तो एक मजदूर से भी बद्तर हैं। केवल बैठी रहो और पूजा करवाती रहो। धूप-दीप का सुगन्ध पीती रहो। अरे! कैसी मालकिन! जिसके अधिकार में कुछ हो ही नहीं, किसी को वरदान देना तो छोड़ो वे श्राप भी नहीं दे सकतीं किसी को। धरती पर रहने लायक नहीं है, यहां वे रह नहीं सकतीं और स्वर्ग वापस लौट नहीं सकतीं... फिर का करें?
धरती-माई सोचते-गुनते थक जाती हैं और चौरी पर जाकर चौरी में विलीन हो जाती हैं। चौरी में विलीन हो जाना उनके काम का साबित होता है.. पूरी धरती दिखने लगी एक साथ। धरती पर के चर-अचर, जीव-जन्तु सभी दिखने लगे। धरती-माई की ऑखें मनुष्यों पर केन्द्रित हो गई फिर तो मनुष्यों के चित्त और चेतना, मन और मस्तिष्क, वुद्धि और विवेक, भाव और भवना, दिल और दिमाग सभी कुछ साफ साफ दिखने लगा उन्हें जैसे उनकी ऑखें ऑखें न होकर कोई नई तकनीक वाली एक्स-रे मशीन हों। धरती पर का दृश्य देख कर धरती-माई चौरी में पड़ी हुई छटपटाने लगीं.
‘धरती पर तो कुछ भी शुभ शुभ नहीं दिख रहा...’
उन्हें अचरज हो रहा है मनुष्य का स्वभाव जान कर। क्या इतना लालची हो चुका है आदमी और झूठा भी और जो उनके योग्य पुत्रा हैं वे भी तो मनुष्यता का क,ख,ग भी नहीं जानते, वे केवल विधान जानते हैं और विधानों को अपने हितों में तोड़ना जानते हैं, वे स्वार्थी हो चुके हैं, कागजों के नाम पर शासन कर रहे हैं...मूर्ख बना रहे हैं लोगों को...कैसे बचेगी धरती की सभ्यता और संस्कृति, कैसे बचेगी मनुष्यता, कैसे बचेगा लोक-व्यवहार, लोक-परंपरा कैसे बचेगी? धरती-माई व्याकुल हो जाती हैं...वे गुनती हैं, धरती-जोतक पुत्रा तो अबोध हैं, अनपढ़ हैं, गंवार हैं पर ये जो पढ़े-लिखे कागजों, शास्त्रों, किताबों, विधानों वाले पुत्रा हैं ये तो धरती-जोतक पुत्रों से भी निकृष्ट और लालची हो चुके हैं।
धरती-माई खुद को संभालती हैं, घबराने से काम नहीं होता, यह जो समय है नऽ सभी को कुछ न कुछ रास्ता दिखाता है, समय ही हल करेगा सारा कुछ। फिर भी वे अपनी चौरी से बाहर कम से कम एक दो दिन बाद ही निकलेंगी, यहां आराम से रहेंगी एकान्त में शिव जी का घ्यान करेंगी, शिव जी दयालु हैं वे कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालेंगे। उनका शिव जी पर पूरा विश्वास है। वे किसी को निराश व हताश नहीं करते। जब वे स्वर्ग गयीं थी उसी समय उन्हें शिवजी के पास जाना चाहिए था, खैर कोई बात नहीं।
धरती-माई ने शिवजी के बारे में सोचा और शिव जी के घ्यान में चली गईं। उनका घ्यान में जाना था कि शिवजी डमरू बजाते हुए परगट हो गये। वैसे भी शिवजी धरती-माई का बहुत अधिक मान करते हैं। धरती-माई का मान करने का कारण भी है। शिव जी जानते हैं कि स्वर्ग का कोई देवता मानव रूप में धरती पर अवतरित नहीं होना चाहता। स्वर्ग में कई बार धरती की देख-रेख व प्रबंधन के बाबत सवाल उठ चुका है स्वर्ग की महा-सभा में। हर बार महा-सभा में धरती के प्रबंधन के बाबत कई देवताओं के नामों को प्रस्तावित भी किया गया है, खुद देवराज ने कई देवताओं को प्रस्तावित किया था पर सभी ने इनकार कर दिया पर धरती-माई ने इनकार नहीं किया उसी दिन से शिवजी के लिए धरती-माई सबसे प्रिय देवी बन गईं हैं। धरती-माई शिवजी का ध्यान करें और वे परगट न हों यह संभव नहीं, सारा काम छोड़ कर वे परगट होंगे ही।
ध्यान में ही शिव जी ने धरती-माई को रास्ता दिखाया तथा हल्दीघाटी गॉव में आगे क्या होने वाला है वह सब भी बताया। बता क्या दिया आने वाले समय के विविध घटना-क्रमों को सचित्रा दिखा भी दिया आज-कल के टी.वी.वालों की तरह। शिव जी ने धरती-माई को सुझाया भी कि तंू न्याय के देवता शनि की आराधना करो लोक-कल्याण का कार्य तो मैं अपने स्तर से निपटा दे रहा हूॅ पर न्याय वाला कार्य मैं नहीं कर सकता। न्याय करने व अपराधियों को दण्डित करने का कार्य शनि देव का है, उनके अधिकार क्षेत्रा में मैं दखल दे नहीं सकता। तूं शनि देव की आराधना करो, वे बहुत ही उदार किस्म के देवता हैं, मात्रा आराधना से ही खुश हो जाते हैं, उनकी आराधना करोगी तो वे आरोपियों को निश्चित ही दण्डित करेंगे जो धरती पर अशान्ति फैला रहे हैं, मार-कतल कर रहे हैं उन्हें शनि देव किसी हाल में नहीं छोड़ेंगे।
शिव जी का आश्वासन व आशीर्वाद पाकर धरती-माई का मातृत्व छलक उठा.फिर उन्हें महसूस हुआ कि वे तो मॉ है धरती-पुत्रों की, मॉ कभी निराश नहीं हो सकतीं अपने पुत्रों से वैसे भी वे स्वर्ग छोड़ चुकी हैं, उन्हें रहना तो अपने पुत्रों के साथ ही है। स्वर्ग छोड़ देने के बाद भी उनकी बातें लोक-कल्याण के देवता शिव जी ने गंभीरता से सुना और रास्ता भी सुझाया यह उनके लिए बड़ी बात है। वे जानती हैं शिवजी की परा-शक्ति के बारे में, वे चाह लेंगे तो धरती पर स्वर्ग उतर आयेगा, वे लोक-कल्याण के देवता हैं और शक्तिशाली भी हैं, कोई बनावट नहीं एकदम से सादा आम-आदमी की तरह। भला वे आम-आदमी के भले के लिए कैसे खामोश रह सकते हैं। वैसे भी शिवजी के कथनी-करनी तथा चाल-चरित्रा में कोई फर्क नहीं।
शिव जी के संतोषप्रद आश्वासन के बाद धरती-माई ने निश्चित कर लिया कि समाज में न्याय और सत्य की स्थापना के लिए वे शनि देव की भी आराधना करेंगी। फिर तो धरती-माई कल्पना में डूब गईं कि बुरे दिन चले गये। धरती को स्वर्ग जैसा बन जाने की कल्पना भर से धरती-माई की हताशा, निराशा कहीं फेका गई शायद नर्क में चली गई होगी। उन्हें लगा कि अभी कुछ दिन तक उन्हें चौरी में रह कर ही विश्राम करना चाहिए और घ्यान के द्वारा धरती का हाल-चाल लेते रहना चाहिए। हालांकि उनकी चौरी काफी छोटी थी, कम गहरी थी, लम्बाई चोड़ाई भी कम थी, पॉव पसारने तक की जगह नहीं थी उसमें लेकिन उनके लिए क्या, उन्हांेने ध्यान लगाया और चौरी देखते देखते ही सभी सुविधाओं से पूर्ण आधुनिक विश्राम-कक्ष में तब्दील हो गई। अब उनके लिए वहां दिक्कत नहीं थीं चाहे जितना दिन उसमें विश्राम करें। इस विश्राम कक्ष में एक खास बात यह भी थी कि धरती का सजीव चित्रा वे सोते, जागते किसी भी हाल में वहीं से देख सकती थीं, वहीं से किसी से बतिया सकती थीं। गोया पूरी दुनिया उनके सामने थी इस पराशक्ति के चमत्कार से धरती-माई अत्यन्त प्रसन्न हो गईं।
पर समय भी तो होता है कुछ जो अपने तरह का खेल खेलता रहता है किसी के भी साथ, समय के लिए क्या देवी, क्या देवता, क्या दानव, समय खेल खेल गया और धरती-माई की खुशी चौरी के सुविधा संपन्न विश्राम-कक्ष में तब्दील हो जाने के कुछ समय ही बाद ही फुर्र हो गई, वे खुद से सवाल पूछने लगीं...
‘जब उनकी चौरी पराशक्ति के चमत्कार से सुविधा पूर्ण हो सकती है, तमाम तरह की आधुनिक सुविधायें निर्मित हो सकती हैं इस छोटी सी चौरी में फिर हल्दीघाटी गॉव के जो दस लड़के मारे गये हैं उनके लिए सुविधायें क्यों नहीं मिल सकतीं, उनकी विधवाओं के लिए कल्याणकारी कार्य क्यों नहीं किए जा सकते... कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है, गड़बड़ क्या है उन्हें देखना होगा और एक बार फिर शिवजी का घ्यान करना होगा।
धरती-माई ने निश्चित किया कि वे दुबारा शिवजी का ध्यान लगायेंगी और अपने धरती-पुत्रों के लिए हर सारी सुविधायें उपलब्ध करवायेंगी जिसके वे हकदार हैं। साथ ही साथ उनके जो योग्य-पुत्रा हैं, जो लगातार निरंकुश होते जा रहे हैं मानवीयता छोड़ते जा रहे हैं, हर तरफ कागज उड़ा रहे हैं, बेमतलब कानूनों की वारिशें करा रहे हैं, जो धरती-जोतक पुत्रों को मनुष्य ही नहीं समझते उन्हंे मनुष्य बन जाने तथा मनुष्यता के निर्वहन का पात्रा बन जाने के लिए भी शिवजी से प्रार्थना करेंगी।
धरती पर हो रहे हलचलों को देखते झेलते धरती-माई काफी परेशान हो चुकी थीं ठीक है वे देवी हैं फिर भी थकान तो होती ही है चाहे कोई हो, देवी है तो का मतलब कि उन्हें थकान नहीं होगी, यह कैसे संभव है, थकान, हरारत, नींद, भूख, प्यास ये तो कुदरती प्रक्रिया हैं ये तो होंगे ही। धरती माई दो दिन के लिए पूरी तरह से विश्राम करने का मन बना लेती हैं और विश्राम के लिए चौरी में प्रवेश कर जाती हैं...
अब उन्हें कुछ भी नहीं देखना, कुछ भी नहीं सुनना, कुछ भी नहीं बोलना। पूरी तरह से शान्त, चित्त तथा चेतना को बांध कर रखना, मन तथा मस्तिष्क की गतिविधियों को रोक देना, तन तथा मन को निष्क्रिय बना देना। कुछ न तो पहले था और न अब है, कुछ भी शेष नहीं है सृष्टि में, सारा कुछ विलीन हो चुका है परमशक्ति में, उसकी ज्योति में। पर धरती-माई मुश्किल से एक दिन ही विश्राम कर पाई होंगी पूरी तरह आत्मलीन होकर दूसरे दिन ही धरती पर होने वाली आकस्मिक हल-चलों ने उनकी ऑखें खोल दीं....
हल्दीघाटी वाले गॉव में तो हल-चल हो रही है, भला वे कैसे विश्राम कर सकती हैं अपनी चौरी में, वे सतर्क हो जाती हैं। जहां पर दसों सत्याग्रहियों की चितायें जली थीं वहां तो केवल अधिकारी ही अधिकारी दिख रहे हैं, उन्हें दिख रहा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्राी जी गॉव में आये हुए हैं, बहुत ही आकर्षक मंच बनाया गया है सत्याग्रहियों के शवदाह स्थल के पास उनके लिए। इसी मंच से वे हल्दीघाटी गॉव में हुए हत्याकाण्ड पर दुख व्यक्त करते हुए अपने ढंग से कानूनी ऑसू बहायेंगे। हल्दीघाटी गॉव के प्रताड़ितों की याचनाभरी ऑखें एकटक निहार रहीं हैं मुख्यमंत्राी जी को...
‘कुछ राहत दे दे मौला!’
‘कुछ तो दे मालिक, भगवान तेरा भला करेगा।’
धरती-माई अपनी चौरी से बाहर निकल कर मुख्यमंत्राी को निहारने का मन बनाती हैं और फिर मन को रोक देती हैं...का होगा चौरी से बाहर निकल कर, वे तो अपनी चौरी में से ही सारा कुछ देख व सुन सकती हैं, सारी सुविधायें तो हो ही गई हैं चौरी में ही। सो वे चौरी से बाहर नहीं निकलतीं और सावधान होकर मुख्यमंत्राी जी केे हितोपदेशों को सुनने लगती हैं।
धरती-माई को समझ आया कि मुख्यमंत्राी जी के वाचित सारे हितोपदेश वैदिक हितोपदेशों के नकल जैसे हैं वे उन हितोपदेशों को ऐसे बोल रहे थे जैसे रट कर आये हों। मुख्यमंत्राी जी ने अपने हितोपदेशों के माध्यम सेे नोटों की गड्डियों को कुछ जादुई ढंग से उड़ाया कि हल्दीघाटी गॉव के लोग भूल गये कि उनके दस परिजनों की नृशंस हत्यायें की गई थीं, गॉव वाले नोटों के जादू में डूब गये। हत्याकाण्ड के आरोपियों की पकड़ के बारे में तो वे अपने संबोधन के प्रारंभ में ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों को आश्वस्त कर चुके थे।
मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों को सुनते हुए धरती-माई को जान पड़ा कि मंच से मुख्यमंत्राी जी नहीं साक्षात शिव जी ही बोल रहे हैं...उन्हीं की तरह खड़े हैं मंच पर, हाव-भाव भी शिवजी वाला ही है, भाषा व बोली भी उन्हीं की तरह, ये मुख्यमंत्राी नहीं ये तो शिवजी हैं, वही बोल रहे हैं। लौकिक जगत का कोई राज-नेता रूपांतरित होकर शिव जी की तरह उदार कैसे हो सकता है भला! इन गरीब आदिवासियों को खुश रखने से लोक-नेता को कोई राज-नीतिक लाभ तो मिलेगा नहीं फिर भी अगर मुख्यमंत्राी जी मृतकों के परिजनों की सहायता करने का वादा कर रहे हैं तो निश्चित ही वे शिवजी की कृपा से ही ऐसा कर रहे हैं। मुख्यमंत्राी जी के रूप में शिवजी का रूपांतरित होना धरती-माई को अचरज जैसा लगा पर शिवजी के लिए क्या है वे कभी भी किसी का रूप धर सकते हैं उन्होंने धर लिया होगा मुख्यमंत्राी जी का रूप।
मुख्यमंत्राी जी के सुभाषित हवा में तैर ही रहे थे कि मुख्यमंत्राी जी के मंच के सामने हो-हल्ला मच गया, धरती-माई चौंक गईं..
यह का हो रहा है, पोख्ता सुरक्षा प्रबंधन के बाद भी। धरती-माई ने अपना पूरा ध्यान हो-हल्ला की तरफ लगा दिया....
चकरा गई धरती-माई यह लड़का तो तनबुड़ुक है जिसका भाई गोलीकाण्ड में कतल किया गया है, यह लड़का यहां का कर रहा है?
अरे यह तो डफली बजा रहा है,
गाना गा रहा है, गाने के बोल तो एकदम कुदरती जान पड़ रहे हैं जैसे भजन हों और लोक के हितोपदेश हों। धरती-माई केन्द्रित हो जाती हैं लड़के की तरफ.
‘इसका गाना सुनना चाहिए लेकिन प्रशासन के लोग इस लड़के को गाने नहीं देंगे, वे उसे भगा देंगे यही हो रहा था, सिपाहियों ने घेर लिया लड़के को...धरती-माई भले ही खुद को बिना अधिकार वाली मानंे पर ऐसा नहीं है कि उनके पास अधिकार नहीं। मुख्यमंत्राी को ही संवेदित करना होगा... धरती-माई ने कोई मंत्रा पढ़ कर मुख्यमंत्राी जी की तरफ उछाल दिया...
फिर तो मुख्यमंत्राी जी गरज उठे, प्रशासन को फटकारने लगे...
‘लड़के को मंच की तरफ आने दो, वह गाना गा रहा है गाने दो, उसे ले आओ मेरे पास...’
तनबुड़ुक को प्रशासन के अधिकारी मुख्यमंत्राी जी के मंच के पास ले गये, वहां का माहौल भी शान्त हो गया.. का करने वाले हैं मुख्यमंत्राी जी, किसी की समझ से बाहर था। मुख्यमंत्राी जी तो लोक-मन के कलाकार थे उन्हें पता था कि जनता को जनता के तरीके से ही संवेदित करना चाहिए सो उन्होंनेे एक अधिकारी को आदेश दिया कि लड़के को मंच पर ले आओ...मुख्यमंत्राी का आदेश तो आदेश, राजा क्या नहीं कर सकता माफिक...
लड़का मंच पर... मुख्यमंत्राी का लोकव्यवहार मंच पर छल-छला उठा, लड़के का उन्हांेने नाम, पढ़ाई सारा कुछ पूछा और उसे मंच से गाने की अनुमति दे दिया। लड़का मंच से गाने लगा....
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी,
जे जे एके शिखा तर दाबै, तिल भर ओकरे संग न गई।
सत-जुग में हिरनाकुश राजा, खूब से राज करी,
दुआपर में दरजोधन राजा, खूब से राज करी,
भीम अर्जुन करऽत लड़ाई, खून कऽ नदी बही
त्रोता में रावन भये राजा, सोने की लंक जरी,
ओहू के संग धरती हाथ भर न गई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।’...
तनबुड़ुक को क्या पता था कि उसके गाने का उपयोग मुख्यमंत्राी जी अपनी छवि निखारने के लिए करेंगे वह तो जगह-जमीन लूटने वालों को सीख देने के लिए गा रहा था कि सुधर जाओ, धरती किसी की नहीं होती पर हुआ उल्टा। मुख्यमंत्राी जी ने तनबुड़ुक के गाने को अपनी छविनिर्माण का औजार बना लिया तथा साबित भी कर दिया कि ये जो किकुड़ियाये, सिकुड़े, टूटे हुए लोग हैं उनके अपने हैं, उनके दिल में हैं तथा वे उनके हित के लिए ही समर्पित हैं।
मुख्यमंत्राी जी के हितोपदेशों से हल्दीघाटी गॉव के लोगों की ऑखों में वसंत की बदरियां नाचने लगीं, वे झूमने लगे और किसिम किसम की कल्पनायें अपने विकसित होने के बाबत करने लगे। गॉव में एक दो लोग जो भावुक किस्म के थे वे तो सोचने लगे कि गॉव में मुख्यमंत्राी जी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए बरम बाबा की चौरी के पास और उन्हीं की पूजा-अर्चना भी करनी चाहिए। गॉव में तो पहले से कई देवी-देवता स्थापित हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं हम लोग पर उन देवी-देवताओं ने तो उनके कल्याण के लिए कुछ नहीं किया, बेकार है पहले से स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करके रुपया खरचना।
धरती-माई अपनी चौरी में से ही हल्दीघाटी गॉव के लोगों का मन तौल रही हैं, वे आक्रोशित हो चुके हैं, दूसरे देवी-देवताओं की कौन कहे गॉव के लोग उनकी भी पूजा करना बन्द कर सकते हैं। उनके जो अधिकारी रूपी योग्य पुत्रा हैं कागजों की दुनिया वाले वे तो पहले से ही उनकी पूजा नहीं करते और अब ये भूमि-जोतक पुत्रा भी उनकी पूजा छोड़ने वाले हैं। धरती-माई को लगा कि उनके अस्तित्व पर खतरा मडराने लगा है किसी भी तरह से धरती-जोतक पुत्रों की चेतना में आस्था तथा भक्ति वाला पुराना विश्वास जगाना होगा।
धरती के जोतक पुत्रों में विश्वास बहाल करने का एक ही रास्ता है उन्हें जादुई तरीके से भ्रमित करना होगा और वही हुआ...
दो दिन ही गुजरा होगा कि हल्दीघटी गॉव के लोग प्रतिरोधी हवा के झोंकों में बहने लगे। लोक-राज के प्रतिरोधी दल की एक नेत्राी ने पूरे गॉव का मन-मिजाज अपनी ओर खींच लिया। उक्त नेत्राी हल्दीघटी गॉव में आना चाहती थी बहरहाल उसे गॉव में नहीं आने दिया गया। उसे जिले के बाहर ही रोक दिया गया, उसके अगल-बगल पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया गया। उक्त नेत्राी राजनीति के सारे व्याकरण को जानती थी, सत्ता के किसिम किसिम के खेलों की जानकार थी पर उसे सत्ता के विरोध करने का जो कुदरती लडा़कू तरीका होता है उसे नहीं पता था फिर भी उसने सत्ता का प्र्रतिरोध किया और अहिंसक धरने पर बैठ गई।
सत्ता चाहे किसी भी मत-अभिमत वाली हो, बांये चलने वाली हो या दायें चलने वाली हो उसके पास एक तीसरी ऑख भी होती है। उसी तीसरी ऑख से सत्ता ने समझ लिया कि विरोधी दल की नेत्राी पर जिस भी प्रकार के शासकीय अंकुश लगाये जायेंगे उससे उक्त नेत्राी की लोक-प्रियता में गुणात्मक उछाल होगा शेयर मार्केट के उछालों से भी अधिक सो उक्त नेत्राी पर सत्ता के अंकुशों को उसी सीमा तक लगाया जाना चाहिए जिससे जनता में सकारात्मक प्रतिक्रिया हो कि विरोधी नेता तो सत्ता का प्रतिरोध किया ही करते हैं इसके अलावा उनके पास काम ही क्या है?
लेकिन उक्त नेत्राी भी कम नहीं थी। वह लोक-राजनीति का सारा व्याकरण कंठस्थ करके आई थी। सो उसने सत्ता के विरोध का कोमल व मुलायम हिस्सा ही अपने प्रतिरोध में शामिल किया जिससे प्रचार-प्रसार तो मिल जाये पर शासन की यातना न झेलनी पड़े। उक्त नेत्राी ने सत्ता द्वारा सुझाये गये सुझावों को मान लिया और उसकी जहां प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की गई थी वहीं हल्दीघाटी गॉव के ग्रामीणों को बुला दिया गया। मृतकों के परिजनों से मिलना तथा उनसे संवाद करना ही उक्त नेत्राी का लक्ष्य भी था, उक्त नेत्राी का मृतकों के परिजनों से मिलवाना तथा संवाद करनेे का लक्ष्य सरकार के लिए शाकाहारी किस्म का था सो सरकार ने फटाफट प्रबंध कर दिया। उक्त नेत्राी मृतकों के परिजनों से मिली और उनकी सहायता करने का आश्वासन देकर दिल्ली लौट गई।
उक्त नेत्राी के हल्दीघाटी वाले गॉव में दौरे के कार्यक्रम से भविष्य में राजनीतिक लाभ मिले न मिले पर आदिवासियों को लाभ तो मिला ही। आदिवासियों को मुआवजे के रूप में जो आर्थिक लाभ सरकार द्वारा मिलने वाला था उसमें गुणात्मक बदलाव आ गया, कई गुना राशि बढ़ गई। आदिवासियों को जो लाभ मिला वह मिला ही उक्त नेत्राी के राजनीतिक प्रतिरोधी तेवर का भरपूर लाभ उठाया मीडिया प्रतिष्ठानों ने। लगातार तीन दिनों तक सारे मीडिया प्रतिष्ठान उक्त नेत्राी को प्रमुखता से अपने अपने प्रतिष्ठानों के द्वारा समादरित करते रहे थे।
हल्दीघाटी गॉव की स्थिति सामान्य हो जाने के बाद दुबारा एक दिन उक्त नेत्राी हल्दीघाटी चली आई उस बार वह गॉव नहीं आ पाई थी और उसने देश की अनुकंपा की परंपराओं को धत्ता पढ़ाते हुए मृतकों के परिजनो व घायलों को अनुग्रह राशि प्रदान करने की घोषणा से मालामाल कर देने की पारटी स्तर पर घोषणा कर दिया।
उक्त नेत्राी के वापस लौटते ही उसके द्वारा घोषित की गई अनुग्रह राशि की मात्रा को संज्ञान में लेते ही प्रदेश की सरकार मूर्छा में चली गई, यह क्या कर दिया उक्त नेत्राी ने, इतनी अधिक अनुग्रह राशि! स्थानीय प्रशासन भी मूर्छित हो गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि विधिक प्राविधानों को कुचलते हुए उक्त नेत्राी द्वारा घोषित आर्थिक मुआवजे से कैसे अधिक मुआवजा दिया जाये गरीब आदिवासियों को... जिससे सरकार की छवि बची रह सके, धूमिल तथा मटियामेट न होने पाये। नहीं तो जनता का क्या है, वह तो सरकार की आलोचना करने के लिए तैयार बैठी होती ही है। ऐसी विकट स्थिति में मुआवजे की धन-राशि सरकार को उक्त विरोधी नेत्राी द्वारा घोषित घन-राशि से अधिक तो देनी ही थी साथ ही साथ भूमि-प्रबंधन के विभेदकारी प्रविधानों व प्रबंधनों को भी जनता से छिपाये रखना था कहीं जनता सरकारी धोखों को जान न जाये, जागृत हो कर आन्दोलन न कर बैठे कि भूमि- प्रबंधन के नाम पर उन्हें लूटा और ठगा गया है।
धरती-माई चौरी में विश्राम करती हुई धरती पर लोक-नायकों द्वारा सृजित राजनीतिक कौतुकों पर हस रही हैं...
‘अच्छा हुआ, गजब का खेल खेला है विपक्ष की नेत्राी ने, पहले वह सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर गई, वहां की माटी माथे पर लगाई फिर मृतक के परिजनों को आर्थिक मुआवजा देने की घोषणा किया। सरकार उक्त नेत्राी के कारण ही जाग उठी है और किसिम किसिम की घोषणायें कर रही है, सहायता करने का प्रदर्शन कर रही है, अब प्रदर्शन से काम नहीं चलने वाला सरकार उक्त नेत्राी द्वारा घोषित अनुग्रहराशि से अधिक देने के लिए विवश हो चुकी है। सरकार रोयेगी भी तो किसके सामने उक्त नेत्राी ने तो सरकार का रोना भी छीन लिया है वैसे तो सरकार रोने और सिसकने की कलाकार होती है पर इस अवसर पर उसे रोने का कोई तरीका ही नहीं सूझा। यह बात और है कि कहीं कोने में दुबक कर सिसक लिया हो। यह अनुमान तो पक्का हो ही गया कि मृतक के परिजनों को कुल जोड़ कर तीस तीस लाख रुपये तो अब मिल ही जायेंगे, दस दस लाख रुपयों के आस-पास घायलों को भी मिलंेगे। इस तरह से रुपयों की वारिश होगी उनके गॉव में हल्दीघाटी गॉव वाले कभी सोचे ही नहीं होंगे। वाह रे! शनि देव तेरे रहते किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता।
धरती-माई की हसी से उनकी चौरी भी मुसिकयाने लगी, चौरी में जिधर देखो उधर मुस्कुराहट पर धरती-माई को जाने क्या हुआ कि वे धरती-पुत्रों पर बरस रही कृपा के लिए शिवजी को धन्यवाद देने के बजाय कुंठित हो गईं...
‘तो क्या यह जो रुपयों की वारिश है उससे धरती-पुत्रों की सूजी ऑखें, किकुड़ियाये चेहरे खिल उठेंगे? वे भूल जायेंगे कि उनके दस लोग गोलियों से भून दिये गये हैं, उन्हें मारा-पीटा तथा कतल किया गया है। खैर जमीन तो उन्हें मिल जायेगी सरकार ने ऐलान कर दिया है पर का होगा उनका जिनकी जिन्दगी छीन ली गई?’
क्या यह अनुग्रह राशि जिन्दगी पर मलहम लगायेगी, जीवन लौटा देगी, नहीं नहीं धरती-लोक की यह गलत परंपरा है। धरती-माई दुखी हो जाती हैं।
उन्हें समझ आता है कि शिवजी से प्रार्थना करनी चाहिए, वे तो भोले दानी हैं पर नहीं, शिवजी मृतक धरती-जोतक पुत्रों को जीवित नहीं कर सकतेे, उनके या किसी के अधिकार में किसी मृतक को पुनः जीवित करने का अधिकार है ही नहीं, जो मर गया, मर गया। दुबारा जीवित होने की कुछ घटनायें भले ही किताबों में दर्ज हैं पर उससे क्या हुआ हल्दीघाटी गॉव के लिए ऐसा संभव नहीं। इतना जानते हुए भी धरती माई ने शिवजी से प्रार्थना किया...
‘हे लोक कल्याण के देवता शिव जी! आपने धरती-पुत्रों के लिए बहुत कुछ किया जिसकी आशा मुझे नहीं थी अब एक प्र्रार्थना और स्वीकार कर लीजिए, मेंरे मृतक धरती-जोतक पुत्रों को उनका जीवन लौटा दीजिए, उनकी सांसे मत छीनिए।’
शिवजी ने धरती-माई की प्राथना सुनते ही अपना मुह बाईं ओर घुमा लिया और ध्यानमग्न हो गये। धरती-माई को समझते देर न लगी कि शिवजी नहीं सुनने वाले। सो बेकार है इनसे रिरियाना।
गॉव के लोगों को देख कर धरती-माई मगन थीं, ये खुश तो वे भी खुश। वे शिवजी पर भी खुश थीं बहुत कुछ किया उन्होंने गॉव वालों के लिए। बहुत अच्छा हुआ और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा, ऐसा वाला गीतोक्त भाव महसूस कर चौरी में विश्राम करने लगीं...
वे नींद में गोते लगाना चाहती थीं, नींद आ जाती तो ठीक था पर नींद भी तो बहुत ही नाजुक चीज होती है, वह आती है तो अपने मन से मनाने पर तो तनेन हो जाती है। वही हुआ धरती-माई को नींद नहीं आई उल्टा यह हुआ कि वे हल्दी-घाटी गॉव की हवाई यात्रा पर निकल पड़ीं.. देखा जाये कि गॉव में क्या हो रहा है? रुपयों की वारिश हुई है, गॉव के लोग तो खुश हैं नऽ। वे मगन होंगे।
गॉव के लोग खुश थे, मगन थे, मृतकों के पुरुष परिजन खुश थे पर विधवायें अपने कुदरती ऑसुओं में भीगी हुई थीं, वे वैधव्य की चादर ओढ़े मन ही मन सिसक रहीं थीं, उनकी ऑखें पहले की तरह भीगी हुई थीं और ऑचल पर सामाजिक व कानूनी दागदार खूनी चकत्ते उभरे हुए थे। ऑचल ओढ़ते ही उन्हें लगता कि उनकी देह को खून से पोता जा रहा है, देह भी मरछहा गंध छोड़ रही है। वे जब नींद में चली जातीं तो नींद में ही चिल्लाने लगतीं। उनका चीखना-चिल्लाना हृदय विदारक होता।
धरती-माई गॉव में पसरा हुआ हृदय-विदारक दृश्य देख कर दुखी हो गईं और हवाई मार्ग से अपनी चौरी पर वापस चली आईं, अब फिर गॉव की तरफ नहीं जाना।
विधवाओं को रुपया प्रभावित नहीं कर पाया, कुछ लोग होते ही हैं जिनके दिल दिमाग को रुपयों का खेल अपने मुताबिक नहीं चला सकता, भीगी हुई ऑखें पोंछ नहीं सकता। वैसे यह जो रुपया है नऽ, है अजीब चीज, किसी को भी पकड़ लेता है, बांध लेता है, बांये-दांये नहीं होने देता। धन-शास्त्रा के आगे तमाम पवित्रा पोथियॉ पानी भरती जान पड़ती हैं, तमाम पवित्रा नदियॉ अपनी पवित्राता खो बैठती हैं, मान, स्वाभिमान, अस्मिता, विचार, चिन्तन, रीति-रिवाज, परंपरायें, अधिकार, कर्तव्य, यश, अपयश सारे के सारे तराजू पर एक साथ रख दिये जाने के बाद भी हवा में लटक कर ऊपर उठ जाते हैं, पलड़े पर और रुपया धरती के गुरूत्व से चिपक जाता है, इतना वजनी होता है रुपया कि सब पर भरी पड़ जाता है, रुपये की तुलना में सभी चीजें हवा में लटक जाती हैं गुरूत्वहीन हो कर। धरती-माई को अचानक महसूस हुआ कि उनकी देह पत्थर की हो रही है, चेतनाहीन, उनके सामने किसिम किसम के नोटों की गड्डियॉ हवा में उड़ रही हैं, कुछ तो उन्हें चोटिल भी कर रही हैं उनके सामने कुछ तनेन खड़ी हैं और उन्हें धमकियॉ रही हैं...
‘तो तूॅ है धरती माई! तूॅ नहीं बिकेगी तो ये बता तेरी चौरी कैसे बन गई? तुझे जो प्रसाद चढ़ता है वह कैसे आता है? तूं कैसे लेती है धूप-दीप की सुगंध और उस सुगंध में झूमती रहती हो कैसे होता है यह सब? नोटों से ही तो होता है, तेरी चौरी के भीतर जो आधुनिक सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं, ठीक है वे सब पराशक्ति के द्वारा निर्मित हुई हैं, जरा सोचो, वही काम तो नोटों की गड्डियॉ भी करती हैं तो का फर्क है नोटों की गड्डियों की ताकत और पराशक्ति में, दोनों शक्तियॉ तो एक ही काम करती हैं, सारी सुख-सुविधायें जुटाना, गॉव वाले अगर रुपयों की मादक गंध में डूब गये और भूल गये हत्याकाण्ड की घटना को तो का हुआ? कुछ बिगड़ तो नहीं गया? अरे! धरती-माई तेरा भी तो लक्ष्य है कि गॉव में मंगल रहे, वे खुश रहें, मौज से खाते-पीते रहें। देखो धरती-माई! संभल जाओ जो हो रहा है होने दो, यह धरती है यहां पर बिना नोटों के पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते, नदियों में पानी नहीं बहता, न किसी का जनम हो सकता है और न ही मरण। लेकिन तूं का जानेगी यह सब तेरी नोटों के प्रति नकारात्मक सोच के कारण ही तो तेरा आज तक कहीं मन्दिर भी नहीं बना। दूसरे देवी-देवताओं को देखो, कमजोर से कमजोर देवताओं के भी भव्य मन्दिर जगह जगह पर बने हुए हैं, आने वाले दिनों में मुख्यमंत्राी जी का भी मन्दिर बन सकता है, दूसरे लोगों के भी बन सकते हैं। उनके मन्दिरों में पूजा-आराधना हो रही है पर तुझे कोई पूछने व पूजने वाला ही नहीं है। हल्दीघाटी गॉव वाले जो तेरी पूजा कर रहे हैं वे भी छोड़ देंगे तेरी पूजा करना, देख लेना किसी न किसी दिन।’
धरती-माई को नोटों की गड्यिों ने ऐसा फटकारा कि वे पसीनी पसीना हो गईं, उनके पास तर्क तथा संवाद की जो पूंजी थी सब खतम हो गई, उन्हें कुछ नहीं सूझा जबाब देने के लिए। स्वर्ग में तो उन्हें हाजिर जबाब माना जाता था, तमाम बड़े बड़े देवता उनकी हाजिर जबाबी की तारीफ किया करते थे पर धरती पर का हुआ उन्हें कि नोटों की गड्डियों को जबाब तक नहीं दे पा रही हैं।
धरती-माई बेचैन हो जाती हैं का जबाब दंे नोटों की गड्डियों को, जबाब है भी नहीं शायद। धरती पर तो रुपयों का ही बोल-बाला है, खरीद-बिक्री की रीति है, यहॉ रुपये ही शस्त्रा हैं तो शास्त्रा भी हैं, रुपये ही कहानी, कविता हैं, रुपये ही विधि तथा विधान हैं, यहॉ सुबह भी रुपयों की मादकता में स्नान कर धरती पर उतरती है और सन्ध्या! उसका क्या कहने...वह तो झूमती-इठलाती वैभव के गीत गाती हुई अपने कोमल व हसीन पॉवों को आहिस्ते-आहिस्ते धरती पर धरती है। उसके अवतरित होते ही धरती के कण कण, जन गण उल्लिसित व हर्षित हो जाते हैं।
धरती-माई रुपयों के लोक-लुभावन कोतुकों से परिचित हैं फिर भी उनके मन में आधुनिक मानव-सभ्यता के विकास के पहले के लोक-सत्य पर आधारित एक विचार उद्वेलित कर रहा था कि रुपया सब कुछ नहीं होता और आज तक उसी वसूल पर डटी हुई हैं। पर जमाने ने करवट बदल लिया है और रुपया जीवन जीने के तरीकों का अनिवार्य औजार बन चुका है। फिर भी धरती-माई लोक-सत्य की कुदरती विचारों पर डटी हुई हैं। उनका मन्दिर बने न बने कोई बात नहीं पर वे रुपयों की नदी में नहाने नहीं जायेंगी, नहा लेंगी किसी कूंये पर, पी लेंगी किसी झरने का पानी, बिता लेंगी अपना जीवन, बन जायेंगी वनवासी, धूप-दीव की सुगंध पीने के बजाय पत्तों की हरियाली पी लेंगी पर कुदरती चेतना नहीं छोड़ेंगी।
धरती माई किसी तपस्वी की तरह ‘स्वरूप शून्य’ होना चाहती हैंं, न स्वरूप रहेगा और न ही उन्हें सांसारिक माया-जाल में फसना पड़ेगा। वे ‘शिशुबोध’ की तरफ लौटना चाह रही हैं पातंजलि के योगसूत्रा ‘प्रतिप्रसव’ की ओर। वे स्वर्ग लौट जाने का मन भी बना रही हैं...भले ही वहॉ ताने हैं, फटकारें हैं, आलोचनायें हैं फिर भी कम से कम धरती पर जैसा मार-काट व स्वार्थ तो नहीं है। वहां धरती से अधिक शान्ति है।
‘सभी नशे में हैं
कमाल की होती है रुपयों की मादकता’
बबुआ मुख्यमंत्राी जी के गॉव में आने वाले दिन गॉव में ही था और उसने देखा कि लोकतंत्रा की पूरी शक्ति उसके गॉव में उतरा गई है। उसे अच्छा लग रहा है गॉव के सिवान पर नोटों को उड़ता हुआ देख कर सो वह मगन है। उसे चिन्ता थी सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी जैसी विधवाओं की ‘उनका क्या होगा किसके सहारे वे जीवन जियेंगी?’
अब बबुआ को संतोष है मृतक और घायलों के परिजनों को काफी रुपया मिल रहा है किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। रुपया जब टेट में होता है तब किसी भी तरह की तकलीफ भी महसूस नहीं होती, दुख-दर्द भी खतम हो जाते हैं। मर-मुकदमे का झंझट भी करीब करीब खतम होय गया है। जमीन की नापी भी किसी दिन होय जायेगी कागज तो मिल ही गया है।
वह काफी खुश था और मगन भी चलो गॉव का सारा बवाल खतम होय गया। अब गरीबी नदारत हो जायेगी गॉव से, खुशी में वह इतना मगन हो गया कि सीधे सरकारी दारू की दुकान पर चला गया, वहां उसने छक कर दारू पिया और झूमते हुए घर लौटा। बुझावन ओसारे में चारपाई पर लेटे हुए थे। बुझावन ने देखा कि बबुआ के पैर डगमगा रहे हैं, स्वाभाविक ढंग से वह चल नहीं पा रहा है, उनके मन में हुआ कि बबुआ से बतियायें...
‘काहे इतनी दारू पी लिया रे!’ फिर भी कुछ नहीं पूछ पाये बबुआ से, मन मसोस कर रह गये।
बबुआ सीधे घर में चला गया और चारपाई पर जाकर धड़ाम हो गया। बिफनी गाय-गोरू के लिए सानी-भूसा कर रही थी। सानी-भूसा निपटा लेने के बाद वह सीधेे कमरे में गई उसने देखा कि चारपाई पर बबुआ उतान सोया हुआ है और उसकी सांसें चल रही हैं...
‘लगता है नींद में चले गये हैं।’ बबुआ को सोता देख कर बिफनी ने उसे नहीं जगाया सो लेने दो, तीन-चार दिन से लगातार दोड़-धूप कर रहे हैं, कभी किसी साहेब के साथ तो कभी किसी के साथ। कभी वारिशों की जॉच-पड़ताल तो कभी कुछ। रोज ही तो काई न कोई साहब गॉव चला आता था और बबुआ को ही पूछता था, उसे सहेज कर लौटता था कि बबुआ यह कर लेना तो वह कर लेना। विपक्ष की जो नेताइन आई थीं वे भी बबुआ को ही पूछ रही थीं, बबुआ से मिल लेने के बाद ही दूसरों से मिली थीं। बबुआ से उन्हांेने कहा था...
‘बबुआ हम तोहरे घरे चलेंगे’
हम तऽ ओनकर बात सुनकर कठ्ठ हो गये थे, हमरे घरे आयेंगी तऽ हम ओनके पनपियाव का करायेंगे? यह कैसे हो सकता है कि कोई बड़ बुड़का हमरे घरे आये अउर हम ओके पानी भी नाहीं पिलायें। तऽ का पियायेंगे ओन्हैं, गुड़ अउर चिरउंजी दे देंगे एक प्लेट में, दही-चीनी घोरि के सरबत पियाय देंगे, बोलेंगी तऽ चाह पियाय देंगे दूध वाली।
‘लेकिन गजब मेहरारू हैं, एकदम कड़क अउर तेज, हाउर हाउर चल रही थीं, कियारी के मेड़ पर भी ऐहर ओहर नाहीं हुईं, हमैं तऽ लगा कि भहरा जायेंगी खेते में, घाव लग जायेगा पर नाही गिरीं, कहीं भी नाहीं डगमगाईं,ं जबकि रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था पर ओन्हैं कउनो फरक नाहीं सीेधे अंगना में आईं अउर चारपाई पर पल्थियाकर बैठ गईं एकदम देहातिन माफिक तनिको नाहीं लगा कि ऊ देहातिन नाहीं हैं। गुड़ चिरउंजी तो खाई ही दही का सरबत भी पिया तनिकौ घिन नाही, एहर के बड़का लोग तऽ घिनाते हैं हमलोगों के यहां पानी पीने में भी, पानी पीते समय नाक-मुह सिकोड़ लेते हैं। अउर दारू पीने में नाहीं घिनाते। खूब छछाकर दारू पीते हैं मॉग मॉग कर।
हमार नाम पूछा था नेताइन ने हमने बताय दिया ओन्है फेर वे नाम से ही हमैं बोलाने लगीं। गुड़ चिरउंजी खा लेने के बाद उन्होंने मेरे कान में धीरे से बोला था-
‘का हो बिफनी! चाह नाहीं पिलाओगी का?’
‘पिलायेंगी साहेब!’ हमरे मुहें से अचानक साहबै निकल गया था फेर उन्होंने टोक दिया था...
‘हमैं बहिन जी बोलो, हम साहेब चाहे मैडम नाहीं हैं, हमहूं तोहार बहिनै हैं दूसरी बहिनों की तरह।’ बोलते हुए कलेजे से लिपटा लिया, हमैं बहुतै नीक लगा, हम तऽ घबराय रहे थे ओनसे लिपटने में, हम ठहरे मजूरिन, हमार देंिहंया गंधाती होगी पर नाहीं उन्होंने अपने अकवार में हमैं कस लिया। ओनकरे पारटी कऽ दूसर नेतवा ओनकरे सामने खड़े थे चाहते तो अंगना में बिछाई दरी चाहे खटिया पर बइठ सकते थे पर नाहीं बइठे, का बइठते बेचारे दरियो तो भींग गई थीं पानी से, ओलोगन कऽ लकदक सफेद कपड़ा खराब हो जाता, माटी लग जाती, कपड़ा सिकुड़ जाता। पर बहिन जी तो बहिन जी अपने घरे माफिक पल्थियाकर बैठ गईं खटिया पर।’
‘हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे आप लोग घबड़ाइएगा नहीं। अंगना में बैठी हुई एक एक मेहरारून से मिलीं, जो विधवा हो गई हैं ओनसे भी मिलीं पूछ कर सबसे हस हस कर बतर्याइं। सबको साहस दिलाईं कि आपन हक तबै मिलता है जब ओकरे बदे लड़ा जाये, चुप बइठने से कुछ नाहीं मिलता। बड़ा मीठ थी ओनकर बोली, बोली सुनकर मन लहक गया।’
बबुआ दूसरे दिन सुबह ही जाग गया, रात का खाना भी नहीं खाया। सुबह उसे ताजगी महसूस हुई। दैनिक क्रिया से निवृत्त हो कर वह बिफनी को उलाहने लगा।
‘रतिया में काहे नाहीं जगाई रे!’
‘रतिया में का जगाते हम तोहके, तूं होश में थे का? जाने कहां दारू पी लिए थे मरने माफिक, भला ये तरह से दारू पी जाती है, बेहोश होने लायक पर तोहैं के समझावै कउनो बहाना बनाय दोगे कि ई होय गया था तऽ ऊ होय गया था। अच्छा बताओ कहां पी लिए थे दारू, बपई तीन-चार बार पूछे होंगे तोहके।’
‘अइसही रे! कुलि संघी साथ जुट गये थेे अउर पी लिए। मनवौ तऽ गदगद था। कुल काम निपट गया। जेतना हमलोग सोचे नाहीं थे ओसे अधिक रुपिया मिला अउर खेतवा भी हमलोगों के नाम से होय गया। अब का चाही। एक बात जानि लो बिफनी अगर ऊ बहिन जी नाहीं आई होतीं हमरे गांये तऽ मनमाना रुपिया नाहीं मिलता अउर न खेतवा हमलोगों के नाम से होता।’
बिफनी अपने तथा अपने जैसे दूसरों के बारे में गुन रही थी ओन्हैं का मिला? मिला खाली ओ लोगन के जेकरे घरे के लोग मारे गये या घायल हुए बाकियों को का मिला, कुछौ नाहीं नऽ। जमीन की लड़ाई तऽ सब मिलकर लड़ रहे थे, आजउ जे जिन्दा बचा है ओकरे जान कऽ खतरा है, रामलाल केहू के छोड़ेगा थोड़ै।
सरकार तथा उक्त नेत्राी ने घायलों व मृतकों के परिजनों को चेक दे दिया था। इसी तरह से जो दूसरे सरकारी विभाग थे तथा जिन जिन विभागों से आर्थिक सहायता दी जाती है उन विभागों की तरफ से भी सारे चेक परिजनों को साैंप दिये गये थे। चेक भला कौन रोकता, कौन ना नुकूर करता जब मुख्यमंत्राी जी ही जुट गये हों कि आदिवासियों की पूरी मदत करनी चाहिए फिर क्या कहने! फटाफट सारा चेक मृतकों तथा घायलों के परिजनों को बाकायदा एक कार्यक्रम के जरिए सौप दिया गया। सुविधा के लिए एक अधिकारी ने उन सबका खाता पहले से ही बैंक में खुलवा दिया था मौके पर बैंक का एक कर्मचारी भी उपस्थित था जिससे कोई गड़गड़ी न होने पाये। परिजनों के आवास भी बनाये जाने लगे थे, गॉव की गलियां पक्की की जाने लगी थीं साथ ही साथ एक ऑगनवाड़ी केन्द्र का निर्माण भी शुरू हो गया था, गोया उद्घोषित विकास की सारी योजनायें गॉव में शुरू करा दी गई थीं। कुछ ही महीने में गॉव स्वर्ग माफिक दिखने लगेगा पर उन विधवाओं का क्या होगा जिन्हें वैधव्य झेलना पड़ेगा, उस बाबत क्या किया जा रहा था? या क्या किया जा सकता है विकासमूलक आधुनिक सभ्यता के पास इसका जबाब नहीं था। जबाब तो आधुनिक सभ्यता के पास इस बात का भी नहीं है कि यह जो जमीन का प्रबंधशास्त्रा है पूरे देश में विवादास्पद क्यों है? आखिर जमीन का यही विभेदकारी प्रबंधन ही तो किसी भी शान्तिप्रिय गॉव को हल्दीघाटी बना देता है।
बिफनी उलझी हुई है कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू जैसों का का मिला जो लोग उस घटना में बच गये थे, मौके पर तो बहुत से लोग थे, उन्हें का मिला? कुछ तो नहीं, जो मर गया, चाहे जो घायल होय गया उसे ही तो मिला। आज पूछेगी बबुआ सेअउर खेलावन से के का मिला तूं लोगन के?
बिफनी चाय बनाय चुकी थी, एक गिलास में चाय उसने बपई को दिया अउर दूसरी गिलास में बबुआ को...
‘लो चाह पी लो, ताजगी आ जायेगी, कइसन तऽ मुहवा झुराय गया है तोहार।’
अपने चेहरे पर हाथ फिरा कर बबुबा खखाकर बोला...
‘का बोल रही है रे, मुह कहां झुराया है एकदम से लकदक तऽ है।’
बिफनी तो अकबकाई हुई थी बबुआ से पूछने के लिए वह पूछने ही वाली थी कि खेलावन आ गये, उन्होंनेे दरवाजे से हॉक लगाया...
‘का हो बबुआ कहां हो।’
‘एहरै चले आओ हम अॅगना में हैं।’
खेलावन अॅगना में आय गये, बिफनी के लिए ठीक था उनसे भी पूछ लेगी, उसने वही किया।
‘का हो खेलावन भइया! एक बात हम नाहीं समझ पाय रहे हैं कि जेकरे घरे कऽ कोई नाहीं कतल हुआ चाहे घायल नाहीं हुआ ओके का मिला? गया तो गॉव भर था मौके पर उतराहाटोला वालों को छोड़ कर। ओमे से केहू कऽ कतल होय सकता था, कोई घायल हो सकता था, हम समझ नाहीं पाय रहे हैं काहे से लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोले के लोग लड़े हैं फेर जो जो लड़ाई लड़े हैं सबके काहे नाहीं मिला कुछ। हमैं बताओ सबके सहायता मिलना चाहिए के नाहीं।’
बबुआ और खेलावन के पास बिफनी के सवाल का जबाब नहीं था, भला वे क्या जबाब देते यह सवाल तो सरकार चलाने और बनाने वालों से पूछना चाहिए। वे दोनों चुप थे तो चुप थे फिर भी बबुआ ने जबाब दिया वह भी गुसिया कर...
‘तूं का बूझेगी यह सब, ई का कम है कि जे, जे मरे हैं घटना में चाहे घायल हुए हैं ओन्है रुपया मिल गया, तोहके का पता! अगर ऊ नेताइन गॉव में नाहीं आई होती नऽ तऽ एतना थोड़ै मिलता जेतना ए समय मिला है, अधिकरिया चटनी की तरह चट कर जाते सारा रुपिया। कोई का कर लेता उनका, ओन्हई लोगन के कागज भरना, लिखना है, खुदै अपना लिखा हुआ पढ़ना भी है, लिखे-पढ़े के अनुसार रुपिया देना है, जॉच करना है। देखी नाहीं का? सब घायलों का नाम ही कहां लिख रहे थे कागज पर, हमलोग ओनसे झगड कर नाम लिखवाये सबका। हाथ पैर जिनका नाहीं टूटा था उन सबका भी। अधिकरिया तऽ बोल रहे थे कि जेकर माथा फूटा है, जेकर हाथ पैर टूटा है वोही का नाम लिखेंगे, जेकरे पीठी पर घाव लगा है, गोड़े में घाव लगा है अउर रंेगने लायक है ओकर नाम नाहीं लिखेंगे। रही बात ओ लोगन कऽ जे उहां था घटना के स्थान पर ओन्हैं काहे नाहीं रुपिया मिला? अरे! पगली एतनौ नाहीं जानती ओन्हैं कैसे रुपिया मिलेगा? वे तो जिन्दा हैं, सरकार जिन्दा आदमी का करम(मृत्यु संस्कार) नाहीं करती करम करती है मुर्दा का। सरकार खाली मुर्दे पर बिछाती है नोटों की गड्डियॉ। जा कर पूछ लो सुगनी, तेतरी, फगुनी, बैसाखी से चाहे ओमें कउनो से जेकर पति कतल होय गया है का ओकर पति जिन्दा हो जायेगा नोटों से? पागल है का रे! जान बच गई, का ई कम है, जान है तो जहान है एके समझाना पड़ेगा।’
बोलते बोलते बबुआ रूक गया, उसे जान पड़ा कि वह कुछ अधिक बोल गया है। बिफनी जो पूछ रही थी उसके सवाल का यह जबाब नहीं है क्योंकि बबुआ को भी अखर रहा था कि गॉव के दूसरे लोगों को किसी भी तरह की सहायता राशि नहीं दी गई जबकि सभी को दिया जाना चाहिए था। खेलावन पास ही में थे, वे काहे चुप रहते, बोल पड़े....
‘देख बबुआ! तूं गलत समझाय रहा है बिफनी को, जमीन की लड़ाई तो पूरा दखिनाहा टोला लड़ा है ऐसे में पूरे दखिनाहा टोले वालों को रुपिया देना चाहिए था थोड़ा कम चाहे अधिक पर देना सबको चाहिए था। जो जिन्दा है उसी को तो सब कुछ भोगना है। जिन्दा लोगों के लिए सरकार कुछ सहायता दे देती तो का उसका मान गिर जाता हम तो कहते हैं कि सरकार का मान बढ़ जाता। अब ई का है कि जेकर जान चली गई है ओही के परिवार के रुपिया दो, खतरा में तऽ ऊ है जेकर जान बची हुई है ओके रामलाल छोड़ेगा थोडै ओकरे बदे का हुआ?’
बबुआ भी तो वही चाहता है जो खेलावन बोल रहे हैं पर करे का, किसके सामने जा कर फरियाद करे। उसने खेलावन को समझाना चाहा...
‘ऐसा है खेलावन भइया! जिन्दा आदमी वह भी गरीब-गुरबा उसे कौन पूछता है, नाहीं, देख रहे हो कि उसकी पूछ मरने के बाद होती है, एक्सीडेन्ट में मर जाये चाहे कतल से मर जाये। नाहीं देखे भइया मुख्यमंत्राी जी का कार्यक्रम भी वहीं हुआ जहां हमलोग साथियों की लाशें जलाये थे। वहां जा कर मुख्यमंत्राी जी ने माथा नवाया, और धूल उठा कर माथे पर लगाया। ऐसा दिखावा दस साथियों के मरने के बाद ही तो सब आयेे दरोगा, कलक्टर, मंत्राी-संत्राी, पत्राकार/लेखक दौड़ने सभी वह भी रुपियों की भारी-भरकम गठरी ले कर। एकरे पहिले के आया था ए गॉयें में? चलो हम लोगों को का करना है, एही पर संतोष करना है कि मरने अउर घायल होने वालों के परिजनों को तो मिला नऽ रूपिया।’
खेलावन ने बबुआ की बात का समर्थन किया...
‘सही बोल रहे हो बबुआ तुम! गरीबन कऽ मान-सम्मान मरने के बाद ही होता है वह भी बर-बेमारी से मरने पर नाहीं, कतल अउर एक्सीडेन्ट होने पर मरने से।’
खेलावन और बबुआ ऑगन में बैठ कर बतिया ही रहे थे कि बुधनी काकी चली आईं उनके साथ परमू काका भी थे। बुधनी काकी बबुआ से मिलने के लिए परेशान थीं। जब से गॉव वालों को चेक मिला है तब से वे चैन से नाहीं हैं जाने कहां गायब होय गया है बबुआ, दिखाई ही नाहीं दे रहा है, बबुआ से मिलते ही बुधनी काकी पूछ बैठीं बबुआ से...
‘का रे बबुआ कहां गायब होय गया था रे! जब तक चेक नाहीं बना था तब तक तो तूं छटपटा रहा था, एक एक आदमी का चेक बनवा रहा था, नाम पता लिखवाय रहा था, आधार कारड सही करवाय रहा था अउर जउने दिन चेक मिलना हुआ ओ दिना गायब हो गया, कहां चला गया था ओ दिना से?’
बबुआ गंभीर था, वह जान-बूझ कर मौके से हट गया था, का होगा इहां रह कर उसे तो चेक मिलना नाही है, वह जिन्दा बच गया है इस लिए अमीर है, उसे रुपियों की का जरूरत? उसने धीरे से बताया बुधनी काकी को...
‘अरे! काकी हम भला कहां जायेंगे हम घरहीं पर थे? उहां हमार का जरूरत थी?’
बुधनी काकी तो बुधनी काकी बोल पड़ीं...
‘हां हो ताहार का जरूरत थी उहां पर, तोहार तो जरूरत थी मुकदमा लड़ने की, मुआवजा का चेक बनवाने की, आधार कारड सही करवाने की, एक एक आदमी की पहचान करवाने की, पोसटमार्टम करवाने की, घायलों का इलाज करवाने की, रापटगंज से लेकर बनारस तक दौड़ने की, कभी लेखपाल कीहें तऽ कभी तहसीलदार अउर दूसरे अधिकारी के यहॉ दौड़ लगाने की, एकरे बादौ बोल रहे हो कि तोहार का जरूरत है? अब हमैं जरूरत बताओगे तबै हम समझ पायेंगे?’
बिफनी, काकी के साथ ही बैठी हुई थी... काकी को उसने समझाना चाहा...
‘अरे काकी! बोल तो सहियय रहे हैं बबुआ, चेक लेते समय इनकर का जरूरत थी उहां पर सो घरही में सन्ना कर पड़े रह गये थे नाहीं गये उहां पर अउर कुछ दूसर बात नाहीं हैं काकी।’
‘अच्छा अच्छा चुप कर मत बोल कुछ एकरे आगे, हमार अइया नहीं है तूं, हम पेटे में की बातउ सुन लेते हैं अउर अरथ निकालि लेते हैं। अच्छा ई बताओ उहां मौके पर बबुआ नहीं गया सो नाहीं गया, खेलावन, बंधू अउर सोमारू भी काहे नाहीं गये मौके पर एकरे बारे में कुछ बताय सकती हो तो बताओ... तूं बोल खेलावन, काहे नाहीं थे जब चेक बट रहा था अउर सोमारू तथा बंधू कहां थे ओ दिना? तूं लोगन में से कोई नाहीं था उहां, कउनो न कउनो बात तो है, हमैं साफ साफ बताओ, इहै जानने के लिए हम तोहरे कीहें आये हैं।’
काकी बोलने में धरावाहिक थीं बबुआ उनकी बातें खामोशी से सुन रहा था और गुनता रहा कि काकी का बोल रही हैं। उसने काकी को बताया...
‘देखो काकी कउनो बात नाहीं है, हम उहां नाहीं गये थे ई सोचकर कि हमार कउनो काम तऽ उहां है नाहीं फेर काहे जायें, कागज का सारा काम हमने करवाय दिया था, चेक की लिस्ट भी बनवाय दिया था जौने हिसाब से चेक बटना था फेर बताओ काकी! उहां हमार कौन काम था?
बुधनी काकी तो गॉव भर की काकी थीं उन्हें कौन समझा सकता था, वे ही गॉव वालों को समझाया करती थीं। जिस दिन चेक गॉव वालों को दिया गया था उसी दिन सोमारू ने पूछा था बुधनी काकी से...
‘का हो केके केके चेक मिला? काकी ने बताया था चेक पाने वालों का नाम सोमारू को। सोमारू हसने लगे थे, खूब ठठाकर हसे थे, का परभू तोहार लीला कोई नाहीं बूझ सकता, काहे मजाक कर रहे हैं हम गरीबन के संघे, हमार लड़का तऽ चला गया दुनिया जहान छोड़ कर एकै बचा है बबुआ ओहू के काहे भगाय रहे हैं गॉयें से उहौ भाग जायेगा कउनो नऽ कउनो दिना गॉव छोड़ कर?’
बुधनी काकी चकराई हुई थीं कि बुढ़ऊ एतना हस काहे रहे हैं,अइसन तऽ कब्बौ नाहीं हसते थे, काकी ने पूछा सोमारू से...
‘काहे एतना हस रहे हो, का मिल गया तोहें।’
अरे ई पूछो का नाहीं मिला, रुपिया की गठरी मिल गई, अब ओही पर सूतो अउर हगो।
‘का बोल रहे हो साफ साफ काहे नाहीं बोलते।’ काकी गुसिया गई सोमारू पर
‘अच्छा बुधनी ई बताओ, बबुआ, खेलावन, पुनवासी तथा अउर दखिनाहा टोले वालों को का मिला? का जो जो मरे हैं उहै जमीनी के लिए लड़े हैं दूसर नाहीं लड़े हैं। लड़े तो सब हैं, एक साथ मिलकर लड़े हैैंं तो सबको सहायता मिलनी चाहिए के नाहीं। सरकार के नियाव पर हमैं एही से हसी आ गई। हम ओपर हसे फिर हसे कि चलो ठीक है कुछ लोग तो रुपयों के बिस्तरे पर सोयेंगे राजाओं की तरह, एहू पर हमैं हसी आ गई। सरवन तो चला ही गया अब बबुआ भी गॉव छोड़ देगा गॉव कहीं चला जायेगा भागकर, गॉव में परजा बन कर तो वह रहेगा नाहीं। अब तऽ ऊ गॉये में परजा बन कर रहेगा, रुपिया वाले तऽ राजा बनि गये, रुपिया पर नाचेंगे, कूदेंगे, रुपिया से बोलेंगे, बतियायेंगे। सरकार का तो काम ही है किसी को राजा बना देना और बकिया को परजा बना देना। कम से कम हमार गॉव तो राजा परजा में पहिले नाहीं बंटा था अब बंट गया बुधनी। गॉव में सब बराबर थे, दुख सुख के साथी थे अब तो गॉव की खेती भी समूह में ही होने लगी है। देखो का होता है आगे समूह की खेती तो नाहीं होगी।’
सोमारू की बातें बुधनी के दिल-दिमाग में धस गईं...
‘बुढ़वा ठीक बोल रहा है, बबुआ से मिलना चाहिए।’ बुधनी काकी उसी दिन बबुआ के घर आ गईं और उससे बतियाने लगीं। बबुआ का बोलता काकी से वह तो जानता ही था कि सरकार केवल कतल तथा घायल हुए लोगों के परिजनों को ही सहायता देती है वह भी काफी जोर-आजमाइश के बाद सो उसे कैसे मिलेगी रुपयों वाली सहायता?
बबुआ के जानने न जानने से का फर्क पड़ता है, हमारी सभ्यता भले ही आधुनिकता का दम भरती रहे पर है आदिम जमाने वाली ही। सरकारें भी विनम्र तथा उदार नहीं होतीं कि पूरे गॉव के बारे में सोचें, सबकी मदत करें, सरकारों की संस्कृति ‘सबका साथ सबका विश्वास’ केवल कागजों पर है, जमीन पर नाहीं।
बबुआ ने काकी को समझाया कि काकी कउनो बात नाहीं है... सरकार की सहायता उसे काहे मिलेगी, वह भी मरा होता चाहे चोटिल होता तो मिल ही जाती जैसे सबको मिल रही है।
बबुआ से बोल-बतियाकर काकी अपने घर चली गईं। उनके घर जाने पर सुगनी ने काकी से बबुआ का हाल-चाल पूछा...
‘का अइया बबुआ ठीक हैं नऽ, ओनके घरे आने के लिए नाहीं बोली हैं का? एहर तऽ ऊ अइबै छोड़ दिये हैं, रिसियाय तऽ नाहीं गये हैं।’
नाहीं रे! काहे रिसयायेगा बबुआ! हम बोल दिये हैं काल्हु घरे आना बबुआ कुछ काम है। देखो काल्हु शायद आये।
सुगनी जानती थी कि बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू या गॉव के किसी को भी कउनो तरह की सहायता नाहीं मिली है, बपई बोल रहे थे कि इहै नेम है, सरकार वोही के नाम पर सहायता देती है जेकर कतल हुआ है या जे घायल हुआ है, बकिया को छदाम भी नाहीं देती। सो नाहीं मिला छदाम भी किसी को...अरे! ई का है जेके जेके सहायता मिली ऊ तऽ राजा होय गया, ओकर पैर जमीन पर नाहीं पड़ रहा है।
सुगनी एक दिन गॉये में गयी थी। जाने के पहिले उसने हल्ला सुना था कि नगेशर काका के लड़के कार खरीदे हैं। नगेशर काका के दुआरे पर गॉव की भीड़ जुटी हुई थी, सबको परसाद बाटा जा रहा था। परसाद नगेशर बो काकी ने सुगनी को भी दिया। सुगनी भीड़ से हट कर नगेशर काका के परधानमंत्राी आवास की तरफ चली गई जो उनके माटी वाले मकान के बगल में ही था। वहां उनके बड़े लड़के कार रखने के लिए एक गैरेज बनवा रहे थे। नगेशर काका के घरे पर ही उसे मालूम हुआ कि कुछ और लोग कार या मोटर साइकिल खरीदने वाले हैं। अइया ने तो पहले ही बता दिया था...
‘देखना सुगनीे! जैसे रुपियवा मिला है न ऽ वैसही फुर्र भी हो जायेगा, ई रुपिया कइ दिन रहेगा लोगन के पास, रुपिया अउर मेहरारुन की खूबसूरती दोनों को छिपा कर रखना पड़ता है, तब्बै बचता है।’
सुगनी निश्चित कर चुकी है कि वह कार नहीं खरीदवायेगी, उसमें से कुछ खर्चेगी भी नाहीं, उसका जो सूद मिलेगा उसी से काम चलायेगी पर का करेगी रुपिया बचा कर सोचते ही सुगनी रूऑसा हो जाती है, बाल-बुतरू तो हैं नाहीं किसके लिए बचा कर रखेगी रुपिया पर खरचेगी भी तो कहां किस काम से?
सुगनी ने बुधनी काकी से साफ साफ पूछा बबुआ के बारे में कि वे आयेंगे कि नाहीं। बबुआ आयेगा रे थोड़ा दुखी होय जाना पड़ा हमैं, दुखी तो खेलावन, बंधू अउर पुनवासी भी हैं, केहू के छदाम भी नाहीं मिला।
सुगनी गाय के लिए सानी-भूसा कर रही थी कि बबुआ आ गया।
‘का हो भउजी काकी कहां हैं घरे पर ही के नाहीं’ सुगनी से पूछा बबुआ ने
अउर कहां जायेंगी, अॅगने में गोहूॅ किरियाय रही हैं सब मटिहन हो गया है। बबुआ जी! अगना में चलिए ओही बतियायंेगे हमहूूं सानी लगाय के आ रहे हैं।
सुगनी भी थोड़ी देर में अॅगने में आ गई, आते ही उसने बबुआ से पूछा...
‘का हो बबुआ जी! हमलोगन के तऽ भुलाय गये, जब ऊ थे तो दिनवा भर एहरै रहते थे अब का हो गया, रिसियाये हैं का?
बबुआ सुगनी या बुधनी काकी से काहे नाराज होता वह तो सामान्य था सुगनी से बोला...
का बोल रही हो भउजी! हम काहे बदे रिसियायेंगे, अइसही मौका नाहीं मिल रहा था सो नाहीं आये, भला हम तूं लोगन से कबहूं रिसियाय सकते हैं।
बुधनी काकी ने गेहूॅ किरियाना छोड़ दिया बबुआ के अॅगना में आते ही। बुधनी काकी ने सुगनी को सहेजा... ‘अरे सुगनी का करि रही है रे एतना दिना बाद हमरे घरे में हमार भतीजा आया है, चाह-पानी तो कराओ।’
‘हॉ अइया! हम चाह बनाय रहे हैं, लेकर आते हैं।’ सुगनी ने बताया बुधनी काकी को।
चाह आ गई, बबुआ चाह पीने लगा...बुधनी काकी ने मतलब से बुलाया था बबुआ को, कई दिन से सुगनी कह रही थी कि बबुआ हमेशा ओकरे पति का साथ दिए हैं, ओनके लिए मरने मिटने के लिए तैयार रहते थे, ओन्हैं कुछ नाहीं मिला हम तऽ सोच रहे हैं कि हमैं जो रुपिया मिला है ओमे से कुछ रुपया बबआ को दे देना चाहिए, हमलोगों की देख-रेख करने वाला अब है कौन, वहीं हैं नऽ।
बुधनी काकी मुस्किया गईं थीं, वे तो पहले से ही गुन रही थीं कि कोई बबुआ को दे न दे वे जरूर देंगी पर रुपिया तऽ सुगनी के नामे से है, सुगनी दे या न दे। बुधनी काकी खुश हो गई हैं लगा कि खुशी में रोने लगेेंगी... जइसन सरवन था ओइसनै सुगनी है, बूझती है नाता, उसने बूझ लिया कि सरवन होता तो वह भी बबुआ को रुपिया देता अकेलै रुपिया ले कर बैठ नहीं जाता।
बुधनी काकी ने बबुआ से सुगनी के मन की बताया...
देख बबुआ! एक बात हम बोलने जा रहे हैं ओकेे मान जाना, मना जीन करना अउर हम उहै बोल रहे हैं जौन सुगनी चाहती है..
सुगनी का चाहती है, बबुआ सोचने लगा... का सलटना चाहती है कहीं, फिर किससे, सलट सकती है, बाल-बुतरू हैं नाहींे, अबही उमिरियो का है, एकाध साल बड़ी होगी बिफनी से अउर का?
बुधनी काकी ने बबुआ को साफ साफ बताया कि सुगनी का चाहती है। बबुआ ने सुनते ही इनकार कर दिया... ‘नाहीं काकी हम सरवन भइया का रुपिया नाहीं लेंगे, ऊ ओनके जान खतम होने के बदले में मिला है।’
सुगनी ने बबुआ को बातों में घेर लिया...
‘का बोल रहे हैं, ऊ ओनके मिला है कि हमैं मिला हैै ठीक है रुपिया ओनके नाम पर हमैं मिला हैं एक बात पूछें...
‘अगर तोहार भइया जिन्दा होते अउर तोहसे रुपिया लेने के लिए बोलते तऽ का तब्बौ मना कर देते, बोलिए हमार किरिया खाकर बोलिए।’
बबुआ खामोश था, उसकी ऑखें छल-छला गईं। ऑसुआंे में सरवन का प्यारा चेहरा तैरने लगा, जाने कितनी बार सरवन न उसे संभाला था। बिफनी की बीमारी में रुपिया तो लगाया ही दस दिन तक अस्पताल भी नाहीं छोड़ा हमरे साथय पड़ा रहा अस्पताल में। अइया की दवाई कराने के लिए भी सरवन ने अपना अनाज खरिहाने से ही बेच दिया और एक बोतल खून भी दिया था अइया को। का बोले सुगनी से कि रुपिया लेगा कि नाहीं।
अन्त तक बबुआ सुगनी को नहीं बता पाया रुपया लेने के बारे में वह खामोश था तो खामोश था। सुगनी ही नहीं बुधनी काकी भी उससे बार बार पूछती रह गईं थीं। बुधनी काकी बबुआ की खामोशी से परेशान होने वाली नाहीं थीं। वे जो सोचती, गुनती थीं वैसा करती भी थीं, उन्होंने निश्चित कर लिया था कि बबुआ के बैंक खाते में पॉच लाख रुपिया डालना है। बुधनी काकी ने अनुमान लगा लिया कि बबुआ कभी भी रुपिया लेने के लिए हॉ नाहीं बोलेगा, लालची होता तो बोल देता। पॉच लाख रुपिया...कम नाहीं होता!
चकरा गईं बुधनी काकी, ‘जिनगी बीत जायेगी इतना कमाने में तब्बौ नाहीं जुटेगा इतना रुपिया फिर भी नाहीं बोल रहा बबुआ कुछ भी। ओके अपने तन अउर मन पर यकीन है। मन आसमान पर न टांगो तो पेट भरने के लिए दो रोटी अउर तन ढकने के लिए गज भर कपडा़ बस एतनै तऽ चाहिए आदमी को। धरती-माई एतना जोगाड़ कर देती हैं, पेट-परदा चल जाता है।’
बबुआ उथल-पुथल में था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि सुगनी से रुपिया लेने के लिए हॉ बोले या ना बोले फिर भी उसने बुधनी काकी से कहा...
‘देखो काकी हमैं रुपिया नाहीं चाहिए, हम आपन काम जैसे पहिले चला लेते थे ओइसहीं आगे भी चला लेंगे सो रहने दो रुपिया सुगनी के खाते में पड़ा है सुगनी को काम देगा।’
सुगनी के घर कुछ देर रुकने के बाद बबुआ अपने घर चला आया, रास्ते भर सरवन का चेहरा उसकी ऑखों में तैरता रहा था...सरवन भी यही करता जो सुगनी कर रही है, सुगनी का दिल-दिमाग भी सरवन माफिक ही है पर...सोचते ही बबुआ ठमक गया...का होगा सुगनी का, बेचारी विधवा होय गई, पूरी जिनगी पड़ी है, कैसे काटेगी, कहीं सलट लेती तो ठीक था, पर सलटेगी नाहीं, किसी से सलटने वाली ऊ मेहरारू नाहीं है। बबुआ गंभीर हो गया...भगवान कम जुरूम नाहीं करते, जुरूम ओही संघे करते हैं जो सबका भला चाहने वाला होता है। केतना बढ़िया मेहरारू है सुगनी ओके देखते ही हमार अॅखिया भर जाती है लोरों से।’
बिफनी घर पर ही थी और बुझावन को सतघरिया (सुबह का नाश्ता) करा रही थी। बबुआ को देख कर बुझावन ने उससे पूछा..
‘का हो कहां चले गये थे सबेरे सबेरे, सुगनी के घरे गये थे का?’
‘हॉ बपई ओहीं गये थे बुधनी काकी ने बुलाया था।’
‘का कउनो काम था।’
‘नाहीं अइसहीं’
अइसहीं काहे, अब तऽ सब काम निपट गया है, सबके रुपिया की गठरी मिल गई है अब का काम है तोहार, सब राजा बनि गये हैं अब तूू परजा माफिक ये गॉये में रहो अउर का?’
‘का बोल रहे हो बपई! हमहूं मरि गये होते तऽ बिफनी के रुपिया नाहीं मिलता का, जिनगी से बढ़ कर रुपिया नाहीं होता बपई।’
बीच में बिफनी बोल पड़ी.. ‘का बोल रहे हैं बपई हमैं मरधन नाहीं चाहिए, बबुआ ही हमार रुपिया हैं, ई जीयत रहैं तऽ हमैं कुछ नाहीं चाही। भगवान ने बचा लिया ओ दिना। ई तो है नऽ बपई कि कइसहू हमलोगन के दुइ ठे रोटी की कमी नाहीं पड़ेगी, चूल्हा घरे में जलता रहे अउर का चाही।’
हॉ रे बिफनी तूं ठीक बोल रही... कोई जाके पूछे सुमेरन से कि सरवन के तउल के बराबर रुपिया मिल गया अब तो ठीक हो नऽ सुमेरन! कोई पूछे सुगनी से...सुगनी का बोलेगी। तूं ठीक बोल रही है जिनगी बची रहे बहुत है, रुपिया तो आता जाता रहेगा, जिनगी से बढ़ कर रुपिया थोड़ै है।
बुझावन का कलेजा फूल गया बिफनी की बातें सुनकर। वे तो तौलना चाह रह थे बिफनी और बबुआ को। कहीं इन दोनों के मन में रुपयों का मलाल तो नही, सबको मिला, और एन्है नाहीं मिला। खुश हो गये बुझावन।
रुपयों की गंध में थिरकने लगा समय
झूम रही जनता
समय शान्त था, गॉव में रुपयों की गंध घरों से लेकर गलियों व खड़न्जों तक गमक रही थी। सरकारी विकास की देवी मगन हो कर गॉव में उछल-कूद रही थी, उसने बिकास का पीला कपड़ा पहना हुआ था। वह लोकराज के मनोरम गीतों को गुनगुनाते हुए कभी उतराहा टोले की तरफ जातीं तो कभी दखिनाहा टोले की तरफ। अब वह विकास की देवी हैं तो गोबर-माटी से सनी गलियों में कैसे चलेगी, उसके कोमल पॉव मैले न हो जायेंगे! सो गॉव की सारी गलियॉ खड़न्जों में बदल दी गई थीं, गॉव को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया था, परधानमंत्राी आवास तो बन ही चुके थे। विकास की देवी तो कोई धरती-माई है नहीं जो चौरी में पड़ी पड़ी कराहती रहतीं।
उन्हें तो थिरकना था, चहकना था सो वह चहक रही थीं। बबुआ भी घरेलू काम में जुटा हुआ घर-द्वार का छर-छाजन सही करने में लगा था। अगर छाजन सही नहीं हुआ तो बरसात का एक बूंद पानी भी छाजन से बाहर नहीं निकलेगा, चूता रहेगा घर में। बिफनी हत्याकाण्ड के पहले से ही बबुआ से बोल रही थी कि एक गाय खरीद लो, पुरनकी गाय बिसुकने वाली है, बेचारी बुढ़ा भी गई है। कई लोग बोले कि बिसुकने के बाद गइया को पहाड़े भेज देना, बुढ़न्ठ गाय घरे में रख कर किस कमाई से उसे सानी-भूसा खिलायेगा? गॉये के लोगों ने बुढ़ाये पशुओं को पहाड़ पर भेज भी दिया है, पहिले तो बेचा जाते थे अब कोई नाहीं खरीदता। बुड़ांठ गाय-गोरू केवल कसाई खीरदते हैं, सरकार ने रोक लगा दिया है। चाहे कुछौ हो वह अपनी गाय पहाड़े पर तो कभी नाहीं भेजेगी मरने के लिए।
बबुआ गाय खरीदने के लिए एक गॉव में गया हुआ था। उसे सूचना मिली थी कि दूसरी बियान की एक गाय है वहां जो एक महीना पहले ही बियाई हुई है, गब गब करिया है कहीं कउनो दाग नाहीं है, धरती-माई की पूजा में करिया गाय का ही दूध चढ़ता है अइया भी करिया गाय रखती थी घरे पर। बबुआ के साथ में पुनवासी भी है, किसी बन्हुआ गाय को हॉक कर लाना आसान नहीं होता, गायें अपना ठिकाना नहीं छोड़ना चाहती हैं, वे रास्ते भर अपने ठिकाने पर लौटने के लिए पगहा तोड़ाती रहती हैं, दो आदमी रहने पर गाय को हकाने में ठीक रहता है, वे भाग नहीं पाती हैं नहीं तो उन्हें पकड़ना बहुत ही मुश्किल का काम हो जाता है।
बिफनी घर पर है, बबुआ उससे बोल कर गया हुआ है कि गाय का मोल-तोल सही हो गया तो गाय लेकर वह शाम तक वापस आ जायेगा नहीं तो वह एक दूसरे गॉव चला जायेगा जो दस किलोमीटर दूर है घोरावल से सो वह दूसरे दिन ही वापस लौटेगा गाय लेकर ही। बिफनी बपई को सतघरिया करा रही थी कि खेलावन बबुआ को खोजते हुए आ गये...
‘का रे बिफनी बबुआ कहा है? का ओन्है नाहीं मालूम था कि आजु खेते की नापी होगी अउर कब्जा मिलेगा। लेखपाल तो आये हुए हैं गॉव में वे बबुआ को खोज रहे हैं, हमके भेजे हैं बबुआ को बोलाने के लिए। तहसील के लोग स्कूल पर रुके हुए हैं, तहसीलदार अउर परगना हाकिम भी हैं वहीं पर।’
खेलावन को देखते ही बिफनी ने ऑचल माथे पर चढ़ा लिया और ऑचल के कोने से बोली...
‘नाहीं भइया जी! ऊ तऽ गये हैं गाय खरीदने के लिए ओनके संघे पुनवासी भइया भी गये हुए हैं।’
खेलावन थे तो बोलाक पर खेत कियारी के नाप-तौल का हिसाब उन्हें नहीं आता था। गॉव में पहले नापी का काम सरवन किया करता था अब बबुआ करता है, कैसे होगी नापी? खेलावन घबरा गये। जाकर लेखपाल से बोल देते हैं कि बबुआ गॉये पर नाहीं है, कहीं गया हुआ है गाय खरीदने के लिए वपिस आयगा तऽ नापी होगी।
खेलावन ने स्कूल जाकर लेखपाल को बता दिया कि बबुआ कहीं गया हुआ है गॉव पर नाहीं है। तहसील के लोग बहुत चालाक होते हैं। हर प्रशासनिक काम को वे राजनीति के हिसाब से करते हैं। एस.डी..एम. सहब ने पहले ही बोल दिया था तहसीलदार को कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति के किसी नेता को जमीन की नापी के समय जरूर बुलवा लेना। संयोग अच्छा था कि हल्दीघाटी वाले गॉव के लोगों की जाति का एक आदमी जो जिलापंचायत सदस्य था और घोरावल के पास का रहने वाला था, वह पढ़ा-लिखा था साथ ही साथ वह प्रशासन के लोगों के अगल-बगल मडाराते रहने वाला भी था। तहसीलदार उसे जानते थे और बुलवा लिए थे। तहसीलदार की गाड़ी में बैठ कर उसे भी लगा था कि वह भी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है साहब की तरह साहबी में सना-पुता।
जमीन की नापी का काम लगभग दो दिन चला होगा। दूसरे दिन जमीन की नापी हो जाने के बाद बबुआ अपने घर आया उसके साथ एक गाय भी थी एकदम करिया रंग की। गॉव आने पर उसे पता चला कि जमीन की नापी हो चुकी है और अधिकारी वापस लौट चुके हैं। खेलावन और बंधू बबुआ की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह कब आता है?
जमीन नापी हो जाने के बाद उतराहा टोला मगन हो गया पर दखिनाहा टोले में तो तूफान आ गया। दखिनाहा टोले वाले बबुआ की प्रतीक्षा में थे कि वह आये तब बात हो। दखिनाहा टोले के लोग नापने वाले अधिकारियों को भला-बुरा बोल रहे थे का ऐसही नापी करना था पहले तो तय था कि जहां जिसकी जोत है वही जमीन मिलेगी पर नाहीं जोत की जमीन किसी की और मिली किसी को। बंधू और खेलावन तथा बुधनी काकी नापी के समय ही उलझ गईं अधिकारियों से...
‘ई का करि रहे हो साहेब! हमार जमीन उतराहा टोले वालों को काहे दे रहे हो, उतराहा टोले वालों की जमीन तो गॉव के उत्तर की तरफ है। हमलोगों का कब्जा-दखल मत बदलो साहेब! पसीना बहा बहा कर हमलोगों ने खेत समतल किया है खाद-पानी डालकर उपजाऊ बनाया है।’
अधिकारी तो अधिकारी भला वे किसी की सुनते हैं। वे तो किसिम किसिम का कागजी खेल खेलते हैं। दफ्तर में बैठे-बैठे ही अधिकारी कागजों का खेल खेल गये और जमीन के कब्जों को किनारे कर दिया। गॉव की उर्वर जमीनंे उतराहा टोले वालों को दे दिया तथा कम उर्वर जमीन को दखिनाहा टोले वालों को दे दिया। अधिकारियों ने सारी भूमि को एक ही नंबर में रहने दिया उसी नंबर में से सभी को जमीन देना था सो दे दिया अब कोई कर लेगा अधिकारियों का। सभी जमीनों का नंबर तो एक ही है चाहे जहां जोतो-कोड़ो। उतराहा टोले के भी कुछ लोग थे जिन्हें उनके कब्जे वाली जमीन नहीं मिली थी सो वे भी दखिनाहा टोले वालों की तरह से परेशान थे। बबुआ घर आ कर चाह पानी भी नहीं कर पाया था कि उसके घर पर भीड़ जमा हो गई..
भीड़ गुस्से में थी उनके चेहरे से चेक पाने वाली खुशियां गायब थीं, उनके चेहरांे को प्रशासन के न्याय ने जिसे आदिवासी नियाव बोलते हैं खुरच दिया था।
बात चाहे गंभीर हो या छिछली किसी न किसी दिन खुलती जरूर है। नापी के दूसरे दिन ही लेखपाल ने जमीन बन्दोबस्त में हुए खेल को बबुआ से बता दिया।
‘हमैं भी नाहीं मालूम था हो बबुआ! और न मालूम होता, ईहां के बन्दोबस्ती का काम सब चोरी चोरी किया गया है, लेनी-देनी भी खूब हुई है, एक बड़का साहेब हैं ओन्हई किए-कराये हैं सब, कलक्टरौ साहब के नाहीं पता है।’
बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी परेशान, ई तो बहुतै गड़बड़ हुआ है आखिर उतराहा टोले वालों ने जमीन के लिए किया क्या है? जॉगर को कौन कहे एक धेला भी नाहीं लगाया है मुकदमे में, कतल वाले दिन भी ऊ सब तमाशा देख रहे थे पुरबारा लाठे पर बइठ कर। पहिले तऽ बोल रहे थे कि मार कऽ बदला मार से लेंगे एकर मतलब ऊ सब खेतवै के लिए बोल रहे थे, मार का करेंगे? ए काम में रामलाल के आदमी जरूर लगे होंगे।
खेलावन बोल पड़े...
‘सही बोल रहे हो बबुआ! रामलाल जेहल में है तो का हुआ ओकर आदमी तो हैं जेहल से बाहर, उहै जोगाड़ बनाये होंगे खेत के बन्दोबस्ती का।’
पुनवासी तो पुनवासी वे काहे चुप रहते...
‘ठीक बोल रहे हो खेलावन भइया! हमलोग तऽ करम-काण्ड निपटाने में लगे थे अउर ऊ सब जमीन के बन्दोबस्ती में लगे थे। अच्छा एक बात है हमलोग आपन कब्जा छोड़ेंगे तब न ऊ सब कब्जा करेंगे, हमलोग कइसहूं आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे। एक बार अउर मार-पीट हो जाये भले।’
बबुआ जमीन की बन्दोबस्ती के बारे में सुन कर सन्न हो गया। वह उलझना नहीं चाहता था, मामला आगे तक जायेगा, चुप रहना ही उसके हित में होगा। बबुआ तो अपने मन के भीतर था पर दखिनाहा टोला मन के भीतर नहीं था। टोले में संघर्ष की बातें हर छोटे बड़े के दिल-दिमाग में घुस चुकी थीं.. ‘हम अपना कब्जा नाही’ं छोड़ेंगे पर उन्हें यह नहीं पता था कि जो नापी हुई है जमीन की उसका क्या होगा, नापी का नक्शा बन चुका है, इसमें फेर-बदल कैसे होगा? सरकार से लड़ना बहुत मुश्किल है, कौन लड़ेगा आखिर?
दखिनाहा टोले के लोग चैन से नहीं थे, बुधनी काकी कभी आगे की गुनती तो कभी सरवन की हत्या की तरफ लौट जातीं। दखिनाहा टोलेे के दस लोग मारे गये थे, भला टोले के लोग उसे कैसे भूलते?
करना क्या है? इसकी पंचायत एक दिन बबुआ के घर पर हुई। दखिनाहा टोले के सभी लोग उस पंचायत में शामिल हुए। बुझावन काका और सोमारू काका को भी टोले के लड़के उन्हें खटिया सहित पंचायत में उठा लाये। बुधनी काकी मुखर थीं...
‘उतराहा टोले वाले का बूझते हैं कि हमारे दस लड़के मर गये तऽ पूरा टोला मर गया, हमरे ईहां सरदारी नाहीं है, एक ठे हमहीं काफी है उतराहा टोले वालों के लिए, हमार सरदारी भी कम नाहीं है, हमलोग मरनी-करनी में फसे थे अउर ऊ सब चोरी चोरी हमलोगों का खेत पर अपना नाम चढ़वाने में लगे थे। सब बेइमान हैं बेइमान, तब्बै तऽ नन्हकू काका कहा करते थे... सबसे दोस्ती कर लेना पर उतराहा टोले वालों से नाहीं करना, ऊ सब पीठ में छूरा भोंकते हैं।’
सोमारू काका ने बुधनी को रोका...
‘का बक बक कर रही है रे! पूरा टोला जमा हुआ है, सबको बोलने दे। अकेली बक-बका रही है।’
बुझावन काका को बुधनी की बातें ठीक लग रही थीं, बोल तो सही रही हैं। सोमारू भइया काहे रोक रहे हैं बुधनी भउजाई को, का गलत बोल रही हैं?
‘अरे बुधनी भउजाई तूं सही बोल रही है, हमलोग आपन कब्जा छोड़ कर दूसरे जगह कब्जा काहे लेंगे, हम उत्तर तरफ जायेंगे भी नाहीं, हमार दक्खिन तरफ है अउर ओहरै रहेगा चाहे जौन कुछ करना पड़े। हं सोमारू भइया तूं ऐसे मत बोलो, नियाव की बात है कि जेकर जहॉ पहिले से कब्जा है वहीं रहे, कब्जा काहे बदलेगा?
खेलावन, बंधू, पुनवासी कूद पड़े बीच में...
‘काका तूं सही बोल रहे हो, हमलोग आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे।’ फिर तो पूरा दखिनाहा टोला बोल पड़ा करीब करीब नारा लगाने की तरह...‘आपन कब्जा नाहीं छोड़ेंगे तऽ नाहीं छोड़ेंगे।’
बबुआ धीर गंभीर है किसी मूर्ति माफिक, का बोले का न बोले। वह देख रहा है कि टोले वालों के साथ सुगनी, तेतरी, फगुनी भी हैं और बिफनी भी सब मिलकर बोल रही है मानो नारा लगा रही हों। एक तरफ परमू काका हैं, वे भी नारे के साथ हैं। कुछ नौजवान लड़के हैं, उनके चेहरे तमतमाये हुए हैं। अतीत का आधुनिक संस्करण लोगों के मन मिजाज में उतर चुका है। उतराहा टोला न पहले कभी साथ रहा है और न ही रहेगा, वह पहले भी धोखा देता रहा है और इस बार भी धोखा दे दिया। बबुआ को अचरज हुआ बिफनी पर वह भी लोगों के साथ हो गई है घर में तो शान्ति का जाप करती है, का शान्ति से अपनी जमीन मिलेगी? कुछ न कुछ तो करना ही होगा।
परमू काका सीधे बोल रहे हैं बबुआ से...
‘का हो बबुआ! तूं काहे खामोश है हो, कुछ काहे नाहीं बोल रहे हो, पूरा दखिनाहा टोला तोहरे दुआरे पर जुटा हुआ है अउर तूं गंभीर हो, का बात है? सरकार जैसे कब्जा दे रही है का ओही पर रहना है, तोहरौ खेतवा तऽ फेंकाय गया ताले के उत्तर एक कियारी हाथ भर ऊंच तऽ दुसरकी कियारी हांथ भर नीच, कइसे खेती करोगे। अइसहीं तऽ सबके संघे भया है।’
बुधनी काकी भी दोहराय रही हैं परमू काका की बातें, खटिया पर लेटे लेटे सोमारू काका भी बोल रहे हैं बबुआ से....
‘देख बबुआ! ई बहुत बड़ी आफत आय गई है, ये आफत के सब मिल कर ही खतम कर सकते हैं। दखिनाहा टोले में जैसे पहले एकता थी वह नहीं टूटनी चाहिए कइसहूं।’
बबुआ अचानक बोल उठा..
‘काका हमलोगन कऽ जौन जमीन कब्जे वाली है उहै रहेगी चाहे एकरे बदे जौन कुछ करना पड़े, परेशान होने की कउनो बात नाहीं है।’
बहुत देर तक गंभीर बने रहने के बाद अचानक बबुआ का माथा ठनक गया सुगनी को देखते ही.. उसे जान पड़ा कि वह सुगनी नाहीं है सरवन है, सरवन जिन्दा है और उससे पूछ रहा है जमीन बन्दोबस्ती के बारे में...
‘बोल बबुआ! का करना है उतराहा टोले वालों ने तो हमलोगों की जमीन अपने नाम से बंटवा लिया।’
बबुआ घबरा गया, यह कैसे हो सकता है कि सरवन जिन्दा हो कर मुझसे पूछे फिर भी उसे लगा कि सरवन ही उससे पूछ रहा है, उससे पूछता ही ऐसे मौके पर, बिना उससे पूछे-जाने वह कुछ नाहींे करता। पूरा दखिनाहा टोले ओकरे दुआरे पर है अउर वह खामोश है। उसे बोलना ही होगा वह बोलने वाला ही था कि जन-कल्याण समिति के मंत्राी जी बबुआ के दुआरे पर चले आये।
मंत्राी जी को पता था कि दखिनाहा टोले वालों के जोत की अधिकांश जमीनें उतराहा टोले वालों के नाम से आवंटित कर दी गई हैं। सरकारी कर्मचारियों ने जमीन की बन्दोबस्ती में लेन-देन का खेल किया है। इस खेल को खेलने में स्थानीय विधायक ने भी सक्रिय भूमिका निभाया है। मंत्राी जी को भी प्रशासन का यह कृत्य काफी बुरा लगा था। उन्होंने आदिवासियों के एक प्रमुख नेता को इस बारे में बताया भी था पर तब तक प्रशासन बन्दोबस्ती का काम निपटा चुका था।
मंत्राी जी से उस आदिवासी नेता ने हल्दीघाटी में आने के लिए बोला भी था कि वह उस गॉव में आयेगा और बन्दोबस्ती के मामले का विधिक प्रतिरोध करेगा जन आन्दोलन के माध्यम से। वह आदिवासी नेता आज ही गॉव में आने वाला है, करीब बारह बजे तक आ जायेगा। मंत्राी जी उस नेता के आने के पहले दखिनाहा टोले वालों को उस नेता के आने के बारे में बताने के लिए गॉव में आये हुए हैं।
उस आदिवासी नेता के गॉव में आने की खबर सुन कर दखिनाहा टोले वाले खुश खुश हो गये... चलो अच्छा है।
वह आदिवासी नेता दिन में करीब दो बजे तक गॉव आ गया और दखिनाहा टोले वालों के साथ एक मीटिंग किया, प्रतिरोध की रणनीति बनाया। तय किया गया कि यह जन-प्रतिरोध केवल महिलाओं का होगा, महिलायें ही जन-प्रतिरोध का नेतृत्व करेंगी। इस प्रतिरोध में खासतौर से वे महिलायें शामिल होंगी जो हत्याकाण्ड के कारण विधवा हो चुकी हैं। बबुआ, पुनवासी, बंधू और खेलावन प्रतिरोध की तैयारी मंे महिलाओं का मार्ग-दर्शन करेंगे।
मंत्राी जी तो जन-प्रतिरोध के आयोजनों व संचालनों के कलाकार थे। पूरे तीन दिन लग गये महिलाओं को प्रतिरोध करने की क्षमता से लैश करने में, बबुआ और उसके मित्रों ने रात-दिन एक कर दिया, मंत्राी जी भी समिति के कार्यालय से सुबह चले आते और देर रात तक वापस लौटते।
सुगनी, बिफनी और तेतरी ने तो दूसरे दिन ही प्रतिरोध के सारे नारों को रट लिया, इतना ही नहीं करीब दो मिनट तक खड़े होकर भीड़ के सामने बोलना भी सीख लिया। बोलने में था कि वे प्रतिरोध क्यों कर रही हैं तथा प्रशासन से क्या चाहती हैं, उनकी मॉगंे क्या हैं?
वह आदिवासी नेता तीसरे दिन भी गॉव आया और एक कार्य-शाला किया जॉचने के लिए कि महिलायें अपनी बात प्रशासन के सामने ठीक से रख पाती हैं कि नहीं। वही कार्यशाला प्रदर्शन और नारे बाजी के बाद एक सभा में बदल गई। सभा का संचालन तेतरी करने लगी.. सभा में सबसे पहले बिफनी अपनी बातें रखी, फिर सुगनी, तेतरी तथा फगुनी ने उसके बाद बुधनी काकी ने प्रतिरोध के सारे निचोड़ों का खुलासा किया।
वह आदिवासी नेता ही नहीं मंत्राी जी भी आश्चर्यचकित थे, बबुआ भी हैरान था। सोमारू काका और बुझावन काका तो एकदम चुप्पी में चले गये...
‘का हमार पतोहिया एतना तेज हैं एतना तऽ हमलोग नाहीं बोल सकते जेतना सुगनी, तेतरी, बिफनी अउर फगुनी बोल रही हैं, बुधनी तो पहिलहीं से बोलाक है ओकर कउनो बात नाहीं है।’
दोनों वृद्ध चारपाई पर पड़े पड़े खुश हैं और गर्वान्वित भी...
‘अब हमलोगों की जमीन कोई नहीं ले सकता हमैं विश्वास हो गया है।’
आदिवासी नेता ने बबुआ की पीठ ठोंकते हुए उसे शाबासी दी...
‘वाह बेटा! तूने तो कमाल कर दिया, तूने तो वह कर दिखाया जो लम्बे समय के प्रयासों के बाद भी नहीं हो पाता वह भी केवल तीन दिन में।
जन-प्रतिरोध की तारीख निश्चित कर आदिवासी नेता लौट गया। वह प्रतिरोध के दिन कलक्टरी पर रहेगा। मंत्राी जी बबुआ के घर पर खाना खाने के बाद वापस हुए। लौटते समय उन्होंने बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को सहेजा कि महिलाओं की कार्यशाला रोज करते रहना है, छोड़ना नहीं है, कार्यशाला से उनकी कुदरती प्रतिभा में निखार आ जायेगा, हमारा काम है महिलाओं की प्रतिभा निखारना तथा उन्हें जन-प्रतिरोध लायक बनाना।’
समय गुजरते देर नहीं लगती, गुजर गये प्रतीक्षा के दिन और जन-प्रतिरोध तथा आदिवासियों की सहनशीलता के परीक्षण का दिन आ गया। और कलक्टर का मुख्यालय आदिवासियों से घिर गया...जिधर देखो उधर आदिवासी ही आदिवासी, शिवजी की बारातियों की तरह, कोई केश-धारी तो कोई मुंडन वाला, किसी की दाढ़ी जटियायी हुई तो किसी की घंुघराली, स्त्रिायां भी साफ साफ अलग पहचान वाली गोया आदिवासियों की सारी नश्लें अपनी आदिवासियत के साथ आदिवासी होने को प्रमाणित करती हुई। पर वे जो नारे लगा रहे थे जमीन के बाबत वे आधुनिक थे, उनमें आदिमपना नहीं था, उन्हें पता था कि जमाना बदल गया है राजाआंे-महाराजाओं वाला नहीं है, जिसे चाहा, जब चाहा निकाल दिया अपनी रियासत से।
आदिवासी कैसे आ गये मुख्यालय पर वह भी भारी संख्या में प्रशासन के लिए सवाल बन गया। आदिवासी नारे-नूरी के बाद भाषण देने लगे, बारी बारी से औरतें भीड़ से बाहर निकलतीं और अपनी बातें टूटी-फूटी बोली में बोलतीं। आदिवासी नेता तथा जन-कल्याण समिति के मंत्राी भीड़ से दूर खड़े थे तथा महिलाओं के प्रस्तुुतीकरण पर मगन भी...
‘सटीक बातंे बोल रही हैं महिलायें बिना घबराये, इतने कम समय में महिलाओं ने बोलना कैसे सीख लिया, अचरज है। बुधनी काकी ने तो कमाल कर दिया, पोस्टमार्टम से लेकर जमीन की बन्दोबस्ती तक बोल गईं एकदम साफ साफ।
वह भाषण ही था पर था संवाद शैली में,औरतें संवाद की तरह बोल रही थीं, फिर भी उन नेताओं से काफी प्रभावकारी था जो लिखा हुआ पढ़ा करते हैं। सुगनी, बिफनी, तेतरी, फगुनी ने पहले से टाइप किया हुआ एक मॉग-पत्रा कलक्टर आफिस में पहले ही दे दिया था फिर भी प्रदर्शन स्थल पर कोई अधिकारी नहीं आया। सामान्यतया अधिकारी किसी की सुनते कहां हैं? वे भी आदिवासियों के बीच आयंे और उनकी बातें सुनें, ऐसा नहीं देखा गया है। आदिवासी कितना बोलते, कितनी फरियाद करते जब कोई सुनने वाला ही नहीं।
जन-संवाद का कार्यक्रम करीब तीन घंटे तक चला इसके बाद भीड़ जुलूस में बदल गई। जुलूस पूरे रापटगंज में घूमा और कलक्टरी पहुंच कर धरने में तब्दील हो गया। कलक्टरी कैम्पस के अन्दर आदिवासियों को धरने पर नहीं बैठने दिया गया। पोस्टमार्टम के समय जो नया सिपाही हल्दीघाटी गॉव गया हुआ था उसकी ड्यूटी लगी थी कि आदिवासियों को किसी भी हाल में कैम्पस के अन्दर न आने दिया जाये। नये सिपाही के साथ वह महिला दारोगा भी थी जो हल्दीघाटी गॉव में थी। आदिवासियों ने तो तय कर लिया था कि जब तक उनकी मॉगे नहीं मान ली जातीं तब तक वे धरने पर बैठे रहेंगे। नया सिपाही तथा महिला दारोगा आदिवासियों को कभी एक तरफ तो कभी दूसरी तरफ ले जाते और धरना देने की जगह बताते, आदिवासी डटे हुए थे कि वे कलक्टरी के मेन गेट के सामने वाली खाली जगह पर ही बैठेंगे और वे वहीं बैठे भी।
सोनभद्र में आदिवासियों का धरना देना तथा धरने पर बैठे रहना प्रशासन के लिए नई बात थी सो प्रशासन ने अपने कान खड़े कर लिए। कहीं आदिवासियों का धरना दिल्ली के शाहीनबाग की तरह न हो जाये, धरने का क्या वह लम्बा खिंच सकता है अनिश्चित काल तक। सोनभद्र में उग आये दूसरे शाहीनबाग ने क्षेत्रा की जनता को भी चौंका दिया। प्रशासन सतर्क हो गया और उसने घोरावल क्षेत्रा के उस सी.ओ. की ड्यूटी वही पर लगा दिया जो हल्दीघाटी गॉव में हुए बर्बर हत्याकाण्ड के कारण सेवा से सस्पेन्ड कर दिया गया था।
उक्त सी.ओ. सस्पेन्शन के कुछ महीने बाद ही बहाल हो गया था और सदर तहसील का सी.ओ. बन गया था। वह प्रभावशाली व्यक्ति था तथा सरकार में उसके कई आश्रयदाता थे सो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था सो जल्दी ही बहाल हो गया। मौजूदा कलक्टर राजनीति के चक्रव्यूहों को तोड़ने में माहिर था वह जानता था कि हल्दीघाटी गॉव वालों का मामला है इसे सावधानी से देखना होगा, मुख्यमंत्राी जी ही नहीं विपक्ष की बड़ी नेत्राी की ऑखें भी इस मामले की तरफ लगी हुई हैं। बहुत कुछ सोच समझ कर उसने सस्पेन्ड हुए सी.ओ. को ही वहां ड्यूटी पर लगाया, इसका कोई क्या बिगाड़ लेगा? हालांकि कलक्टर साबित करता था कि वह डरने वाला आदमी नहीं है पर हरदम डरता रहता था कि उसे भी पहले की कलक्टर की तरह सस्पेन्ड किया जा सकता है सो हमेशा सतर्क रहा करता था।
आदिवासी सत्याग्रहियों के समाधिस्थल पर कसम खा कर आये थे कि वे प्रशासन से डर कर घरना खत्म नहीं करेंगे सो डटे हुए थे। वे नारे-बाजी कर रहे थे, पम्फलेट बांट रहे थे, जगह जगह पोस्टर चिपका रहे थे। धरने दूसरा दिन आ गया, नगर की दिवारें भूमि-प्रबंधन में प्रशासन द्वारा की गई धॉधली के बाबत छपे पोस्टरों से रंग गई। चार पॉच रिक्सों पर प्रचार करता माइक भी नगर में घूमने लगा, कलक्टर सतर्क हो गया मामला आगे तक जा सकता है, अब आदिवासी कमजोर नहीं हैं, उनके पास रुपया है, और वे धरने के कार्यक्रम को आगे तक ले जा सकते हैं। आदिवासियों का एक प्रतिनिधि मंडल लखनऊ भी जाने वाला है मुख्यमंत्राी जी को ज्ञापन देने के लिए संभव है विपक्ष की उक्त महिला नेत्राी भी प्रतिनिधि मंडल में शामिल हो जो हल्दीघाटी गॉव गई थी फिर तो बवाल बढ़ेगा ही।
कलक्टर सावधान ही नहीं सतर्क था उसने धरना स्थल पर अपनी ऑखें टिका दिया था तथा वहां की निगरानी के लिए जिम्मेवार कर्मचारियों व अधिकारियों को तैनात करवा दिया था इतना नहीं उसने हल्दीघाटी गॉव की गतिविधियों की निगरानी के लिए हल्कापुलिस को निर्देशित भी कर दिया था।
सो धरना स्थल से लेकर गॉव तक के आदिवासी प्रशासन की निगरानी में थे जिससे प्रशासन की ऑच कहीं से कमजोर न होने पाये, आग पर चढ़ेे तवे की तरह तपता रहे प्रशासन।
धरने कर दूसरा दिन जैसे-तैसे गुजर गया पर तीसरा दिन....
तीसरा दिन तो तूफान का दिन था...
प्रशासन के करतबों का था...
सहनशीलता, विनम्रता छीनने का दिन था...
लाकडाउन लागू करने का दिन था....
काहे के लिए यहां पुलिस आ गई? हो क्या रहा है, पुलिस सक्रिय हो गई, धरने पर बैठे हुए आदिवासियों को तितर बितर करने लगी आदिवासी चकराये हुए थे, हर तरफ भागो भागो, वही आर्त-बोल जिससे हत्याकाण्ड वाले दिन हल्दीघाटी का आकाश भीग गया था, धरती पर खून बहने लगा था। रो पड़ी थीं खून देख कर धरती-माई भी।
‘भागो यहां से, हटाओ सारा सामान, धरना खतम करो, यहां धरना नहीं होगा।’ लोकतंत्रा के सत्ता प्रमुख ने पूरे देश में लाकडाउन घोषित कर दिया है, देश में कोरोना वायरस फैल रहा है, उससे बचाव का एक ही उपाय है देश को बन्द रखना, आवा-जाही को खतम कर देना, पूरे देश में धारा 144 या कफर््यू लागू करना आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को कम करना, सभी को खुद अपने घर में बन्द कर लेना है। कोरोना एक संकक्रामक रोग है यह संपर्क से फैलता है सो आदमी और आदमी के बीच के संपर्क को रोकना होगा।
पहले लाकडाउन का दिन उतर चुका था धरती पर तमाम तरह के अनुशासनों व प्रतिबंधों को लेकर इसी तरह से कभी आपात-काल भी उतरा था अचानक एक दिन धरती पर...और पूरे देश के मुह पर पट्यिां बांध दी गई थीं, बहुतों को गिरफ्तार कर लिया गया था रातो रात। यह धरती भी अजीब है, इस धरती से अचानक उतरने वाली चीजों को बहुत मुहब्बत है मुहब्बत इतनी कि नोटों की गड्डियां भी फालतू के कागज की तरह उड़ने लगीं थी एक दिन धरती पर सारे नोट बेकार हो गये थे पुराने नोटों को कोई पूछने वाला नहीं रह गया था धरती पर।
तो यह जो एक दिन है कम से हमारे देश के लिए बहुत ही आक्रामक होता है क्योंकि यह रात में ही उतरता है बिना सूचना दिये, बिना जागरण किए एकदम से अचानक वाह रे! हमारा देश! इस एक दिन को अपनाने में कत्तई देर नही करता, सभी एक सुर से एक दिन के पक्ष में बोलने लगते हैं, कुछ तो वाहवाही के लिए ‘जय हो’ ‘जय हो’ भी बोलने लगते हैं।
पूरे देश में लाकडाउन लागू हो गया हो और सोनभद्र में आदिवासी धरना प्रदर्शन करें भला यह कैसे संभव है, प्रशासन मूक, बधिर और लंगड़ा तो है नहीं, उसके हाथ में शक्ति है, बुद्धि चातुर्य है, प्रतिभा है, क्षमता है, शिक्षित-प्रशिक्षित पुलिस बल है, इस तरह के धरनों-प्रदर्शनों को रोकने, खंडित करने का उसके पास व्यावहारिक कुशलता है सो आदिवासियों के धरने को क्यों चालू रहने दिया जाये?
प्रशासन के सामने धरने को लेकर सवाल खड़े थे। जमीन बन्दा्रबस्ती का मामला मुख्यमंत्राी जी तक जायेगा बहुत बुरा होगा। वैसे भी किसी भी तरह से यहां शाहीनबाग नहीं बनने देना। चलो लाक डाउन के बहाने धरना-प्रदर्शन खतम करने का मौका तो मिला।
प्रशासन ने तय किया कि पहले बात-चीत यानि संवाद के जरिए धरने को समाप्त कराया जाये। यह लोक-तंत्रा का बहुत ही दुलरुआ उपाय है।
बात-चीत होने लगी, आदिवासियों के हितैषियों को भी खोज कर प्रशासन ले आया और उन्हें बात-चीत में शामिल कर लिया। आदिवासी नेता और जन-कल्याण समिति के मंत्राी को भी बात-चीत में शामिल कर लिया गया। बात-चीत आगे बढ़ कर जमीन बन्दोबस्ती में सुधार तक जा पहुंचती कि कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये। कब्जे के आधर पर ही जमीन बन्दोबस्त किया जाये जब बात यहां तक पहंुचती प्रशासन मूक हो जाता, वह बांये-दांये देखने लगता। कलक्टर गंभीर बना रहता...आखिर गड़बड़ी हुई कैसे? पर उसके पास समय नहीं था, अब वह लाकडाउन के सफल क्रियान्वयन के बारे में कोई व्यवस्था बनाये कि चले जमीन के बन्दोबस्ती की जॉच करने आखिर का करे वह?
आदिवासियों एवं प्रशासन में धरने को समाप्त किए जाने के बाबत बात-चीत हो ही रही थी कि तनबुड़ुक वहीं चला आया...और लगा गाना गाने...
‘पिर्थबी केहू कऽ न भई।
पिर्थबी केहू कऽ न भई।
चित्त से सुनऽ महराज, पिर्थबी केहू कऽ न भई
पिर्थबी पर पिर्थबीपति राजा, पिर्थबी जतन करी,
तनबुड़ुक गाना गा ही रहा था कि एक सिपाही ने उसे पकड़ लिया। का कर रहे हो? उसके हाथ में जो डफली थी उसे छीन कर दूर फेंक दिया। चल इधर... उधर दूसरे सिपाही थे जो घेरा बना कर खड़े थे। तनबुड़ुक को घेरे में खड़ा कर दिया गया। एक दो सिपाही कौन कहे करीब बीसों सिपाही थे उन्हीं सिपाहियों में से पोस्टमार्टम वाले दिन का नया सिपाही भी था। वह दूसरे सिपाहियों की तरह सक्रिय नहीं दिख रहा था लगता था कि वह केवल फर्ज अदायगी कर रहा है।
तत्काल ही जाने क्या हुआ कि सिपाही लाठियॉ भाजने लगे। बबुआ, खेलावन, बंधू कुछ समझ पहीं पाये फिर देखे कि समिति के मंत्राी जी जमीन पर गिर गये हैं और आदिवासी नेता लाठियों से चोटिल हो चुका है। देखते देखते ही बबुआ, खेलावन, बंधू, पुनवासी सभी लाठियों की चपेट में आ गये। वहां भगदड़ मच गई पर तेतरी, बिफनी, फगुनी, सुगनी और बुधिया काकी वही डटी हुई थीं और नारे लगा रही थीं
‘और मारो! मारने के अलावा तुम कर क्या सकते हो, तुम्हें तो मारना ही सिखाया गया है, मारने की ही पढ़ाई किये हो, बोलते हो जनता कऽ राज है, का इहै जनता कऽ राज है?’
बुधनी काकी अपनी रौ में थीं, उनके साथ सुगनी और बिफनी भी, वे किसी की
नहीं सुन रही थीं केवल बोल रही थीं। तभी बुधनी काकी ने सी.ओ.को देख लिया वह पोस्टमार्टम वाले दिन हल्दीघाटी गॉव में भी था फिर क्या था बुधनी काकी ने उसे घेर लिया...
‘का हो इहै नियाव है, हमलोगों का कब्जा छीन कर दूसरों को दे दिये, बात तो हुई थी कि जो जमीन हमारी है वही हमारी रहेगी फिर कब्जा काहे छीन लिए?’
पर काकी या सुगनी कितना लड़तीं सिपाहियों से, पुलिस की लाठियों से..
संवाद के द्वारा कोई हल नहीं निकला, आदिवासी धरना तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए। लाठियॉ चाहे जहां चलें, गोलियां चाहे जहां चलंे, करामात करती हैं अद्भुत किस्म का। धरती ही नहीं आकाश भी कॉपने लगता है, अगल-बगल के पेड़-पौधे हिलने लगते हैं, मौसम तो बेहोश सा हो जाता है न गर्मी का पता चलता है न ही ठंड का। लाठियॉ काम कर गईं और धरना को लाठी और बन्दूकों के जोर से समाप्त कर दिया गया जैसे वहां कभी धरना हुआ ही न हो।
लाठियों, बन्दूकों के सामने धरने को तो समाप्त होना ही था। बबुआ, खेलावन, बंधू पुनवासी जैसे कुछ कर्मठ आदिवासी लड़कों को ही नहीं तेतरी, सुगनी, बिफनी, फगुनी,आदिवासी नेता और जनकल्याण समिति के मंत्राी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने धरना पर बैठे आदिवासियों को डंडे के जोर से इधर-उधर भागने पर विवश कर दिया, कितनों को चोटें लगी कौन गिने? कुछ का माथा फूटा तो कुछ की पीठंे लाल हुईं और कुछ के पैर चलने काबिल नहीं रह पाये। जब डंडे भाजे जा रहे हों, किसिम किसिम की गालियां दी जा रही हों, गोली मारने का परिवेश बनाया जा रहा हो फिर ऐसी आक्रामक परिस्थिति में भला वहां कौन टिका रहता सो देखते देखते आदिवासियों का धरना उखड़ गया, कोई कहीं भागा और कोई कहीं, धरने पर बैठे लोग तितर-बितर हो गये। आदिवासियों को तितर-बितर करना ही तो पुलिस का लक्ष्य था जो सफल हुआ और धरना-स्थल खाली हो गया।
पर आदिवासी तो आदिवासी जो ठान लेते हैं उसे कर गुजरने वाले। आदिवासी जो गिरफ्तार नहीं हुए थे वे कलक्टरी से खिसक लिए और कहीं चले गये फिर जाने क्या हुआ कि शाम पांच बजे के आस-पास गोलबन्द हो कर वे कोतवाली पर चले आये और नारे लगाने लगे...
उनका नारा प्रशासन विरोधी था, नारा लगाने वालों में महिलायें आगे थीं एक तरह
से वहां महिलायें ही थीं उनमें पुरुषों की संख्या बहुत ही कम थी। महिलाओं का नारा लगाना अद्भुत था, चकराये हुए थे कोतवाल साहब!
‘हो क्या रहा है पुरुषों को तो मार-पीट कर खदेड़ दिया गया इनका क्या किया जाये? महिलाओं को कैसे तितर-बितर किया जाये?’
वैसे सच है कि पुलिस जो तय कर लती हैे उसे कर डालती है और वही हुआ, महिलाओं के नेतृत्व वाले घेरेबन्दी को पुलिस ने तोड़ दिया। और उन्हें एक बस में लदवा कर कहीं दूर भेज दिया गया वहां से दूसरे दिन उन्हें उनके घर भेजा गया। दरअसल पुलिस उन्हें उनके घर शायद नहीं भिजवाती पर शासन की तरफ से निर्देश अचानक आ गया कि सभी आदिवासियों को बाइज्जत छोड़ो। शासन के निर्देश के पहले उक्त विरोधी नेत्राी जो हल्दीघाटी गॉव गयी थी उसका एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया... ‘आदिवासियों के साथ अत्याचार... ‘उन्हें उनकी जमीन नहीं दी जा रही, उन्हें उनके कब्जे से अलग किया जा रहा।’
किसे नहीं पता कि शासन की नाक जनप्रतिरोधी गंध सूंघने में काफी तेज हुआ करती है खासतौर से सरकार विरोधी गंध। शासन ने सूंघ लिया और आदिवासी रिहा हो गये पर प्रशासन दुबारा जॉच के घरे में आ गया। शासन ने माना कि स्थानीय प्रशासन ने गड़बड़ किया है जिसका जहां कब्जा था जमीन वहीं देनी चाहिए थी।
आदिवासी अपने अपने घर लौट गये। ‘अब जो होगा लाकडाउन समाप्त होने के बाद ही होगा। इस साल की खेती कब्जे के आधार पर ही हमलोग करेंगे। उतराहा टोले वाले विरोध करेंगे तो उन्हें देख लिया जायेगा, हमलोग कमजोर थोडै़ हैं।’
आदिवासियों के गॉव लौटने के पहले ही एक तूफानी हलचल गॉव में पसर चुकी थी, गॉव के सभी लोग ‘का हुआ’ ‘का हुआ’ की धुन में थे वे एक दूसरे से जानना चाह रहे थे गॉव में पसरी हुई हलचल के बारे में। गॉव में था ही कौन केवल सोमारू और बुझावन थे, दोनों परेशान थे जानने के लिए। ये लोग देख रहे थे कि कुछ नौजवान गॉव में आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैं, मकानों के दिवारों पर चस्पा कर रहे हैं, नारे लगा रहे हैं इन्कलाब जिन्दाबाद का। सोमारू ने उनसे पूछा था..
‘का करि रहे हो भइया! काहे के लिए नारे लगा रहे हो, लाल पर्चा भी बाट रहे हो, पर्चे में का लिखा है कुछ तो बताओ...?
‘दादा! हमलोग आपलोगों के साथ हैं और चाहते हैं कि जमीन पर कब्जा तथा जोत-कोड़ पहले जैसे था वैसे ही रहे, किसी भी हाल में कब्जा न बदले। प्रशासन से मिल कर उतरहा टोले वालों ने मनमाने ढंग से जमीन का आबंटन करवाया है, उतराहा टोले वाले मिले हुए हैं रामलाल से, हमलोग जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर चाहते हैं इसीलिए हमलोग पर्चा बाट रहे हैं।’
लाल पर्चा बाटने वाले पर्चा बाट कर चले गये। उनके जाने के बाद गॉव में गजब
की शान्ति छा गई। बबुआ, सोमारू, बंधू, खेलावन जब गॉव लौटे तो गॉव का हाल जानकर धक्क रह गये...उतराहा टोले वाले लाल पर्चा देख और पढ़ कर कॉपने लगे। यह क्या हो गया? लाल सलाम वालों से कैसे निपटा जायेगा? ये तो किसी को नहीं छोड़ते, छह ईंच छोटा कर देते हैं, का होगा अब? अधिकारियों को मिला कर उपजाऊ जमीनों का पट्टा तो करा लिया गया पर अब उस पर कब्जा कैसे होगा। अधिकारियों ने जमीन भी नाप दिया, कौन जायेगा खेती करने, हर तरफ लाल लाल झण्डियां गाड़ दिया है लाल सलाम वालों ने। उतराहा टोले वाले लाल पर्चा पढ़ कर कॉपने लगे।
बबुआ भी लाल पर्चा पढ़ कर सहम गया, जो वह नहीं चाहता था वही हो रहा
है।
खेलावन तो लाल पर्चा पढ़ते ही बोल पड़े....
‘देख बबुआ! ई लाल सलाम वाले हमरे गॉव में आ ही गये, जिसे हमलोग जाने कबसे बचाय रहे हैं, हालांकि ये लोग हमलोगों का फायदा ही करायेंगे फिर भी यह ठीक नहीं हो रहा...’
‘हॉ भइया खेलावन पर हमलोग ‘लाल सलाम’ वालों को कैसे रोक सकते हैं, सो हमलोगों को चुप ही रहना है अउर समय के चाल को देखते रहना है।’
धरती-माई ने भी देखा था कि गॉव में लाल सलाम वाले आये हुए हैं और लाल पर्चा बांट रहे हैैंं जमीन के कब्जा के बारे में। धरती माई नहीं समझ पा रहीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? उनके तो दो ही पुत्रा हैं धरती जोतने-कोड़ने वाले और दूसरे कायदा कानून जानने व बनाने वाले, पर ये तीसरे किसिम के पुत्रा कौन हैं?
धरती माई चकरा जाती हैं लाल सलाम वालों को देख कर...वे नहीं समझ पातीं कि लाल सलाम वाले कौन हैं? किसके पुत्रा हैं? जो धरती जोतक-पुत्रों के भले की बातें बोल रहे हैं, प्रशासन द्वारा किए गये गलत कामों को दुरूस्त करने के बारे में पर्चा बाट रहे हैं।
अचानक धरती-माई को लगता है कि कहीं लाल सलाम वाले उनके मानस-पुत्रा तो नहीं क्योंकि उनके मन में भी है कि धरती-जोतक पुत्रों को उनके कब्जे की जमीन ही मिले। संभव है कि लाल सलाम वाले उनके मानस पुत्रा ही हों जो स्वतः पैदा हो गये हों। प्रकृति का क्या है वह तो लीला करती रहती है समाज में सन्तुलन बनाने के लिए।
धरती-माई गंभीर होकर लाल सलाम वालों को देखने लगती हैं। लाल सलाम वाले गॉव में पर्चा बाट लेने के बाद धरती-माई की चौरी के पास आकर पीपर के पेड़ के नीचे आराम से बैठ जाते हैं और आगे क्या करना है गॉव में उसकी रण-नीति बनाने लगते हैं। अगले सप्ताह गॉव में आ कर सभी की जमीन कब्जे के आधार पर बांट देना है।
धरती-माई लाल सलाम वालों की रणनीति सुनने में गंभीर हैं, उन्हें समझ आता
हैैे कि ये जो लाल सलाम वाले हैं, ये धरती-जोतक समाज के हितों के लिए मौजूदा सरकार से टकराने के लिए तैयार हैं, ये चाहते हैं कि तमाम तरह की पर्तों में बटा
समाज हर हाल में बदलना ही चाहिए पर कैसे? इसे धरती-माई नहीं समझ पातीं, उन्हें समझ में आता भी नहीं। वैसे भी देश में चल रहे राजनीतिक प्रबंधन को भला धरती-माई कैसे समझ पातीं, यही तो आज की दुनिया का सबसे जटिल मामला है कि यह जो धरती है यह आखिर कैसे बंट गई, किन लोगों ने किस नियम से इसे बांट लिया? प्रकृति की सारी संपदा कुछ लोगों ने आपस में मिल कर बांट लिया है और बटी हुई संपत्ति की सुरक्षा के लिए कानून भी बना लिया है।
धरती-माई धरती पर प्रचलित प्रकृति की संपदा के प्रबंधन पर हसने लगती है,
उन्हें लगा कि उनकी हसी रुकने वाली नहीं है पर उन्होंने अपनी हसी रोका जिससे कि लाल सलाम वाले सुन न लें और शान्त होकर लाल सलाम वालों की बातें सुनने लगीं। गंभीरता से सुनने के बाद लाल सलाम वालों की कुछ बातें धरती-माई की समझ में आने भी लगीं जैसे यही कि प्रकृति की संपदा पर सबकी हिस्सेदारी है, सरकार में जनसंख्या के आधर पर हिस्सेदारी होनी चाहिए जिस वर्ग समूह की जितनी संख्या
है सरकार में उसी के अनुपात में हिस्सेदारी भी होनी चाहिए, विशेषाधिकार, उत्तराधिकार समाप्त होना चाहिए। इसी तरह की तमाम बातें लाल सलाम वाले कर रहे थे उनमें से कुछ बातें धरती-माई समझ रहीं थीं...
ये लाल सलाम वाले बोल तो सही रहे हैं पर करेंगे कैसे? समाज में बराबरी कैसे लायेंगे? धरती-माई गंभीर हो जाती हैं सुनने के लिए.... लाल सलाम वालों में से कोई आदमी कड़क आवाज में बोलता है...
‘कितना देर आराम करोगे भाई अभी बहुत काम है, दूसरे गॉव भी जाना है, दो दिन बाद ही इस गॉव में एक सभा करनी है, सभी को समझाना है, अब चलो बहुत हो गया आराम।’
लाल सलाम वाले जल्दी से उठ खड़े होते हैं और अपने गंतब्य की ओर चले जाते हैं, धरती माई लाल सलाम वालों की कार्य-योजना नहीं सुन पातीं। कैसे सुनतीं वे, लाल सलाम वाले अपनी कार्य-योजना के बारे में कुछ बात ही नहीं किए। धरती-माई खुद विचारने लगीं आखिर ये लाल सलाम वाले करेंगे क्या...कुछ बात भी नहीं कर रहे, इनका पीछा करना चाहिए, और वे उनके पीछे पीछे चल पड़ीं, देखो कहां जाते हैं ये लोग, और हैं कौन? इनके बारे में जानना जरूरी है...
धरती-माई के लिए उनका पीछा करना आसान था, वे तो देवी हैं, अदृश्य हैं जल, थल, नभ सभी मार्ग उनके लिए सहज है। उन्हांेने देखा कि लाल सलाम वाले एक गॉव के सामने हैं, वहां एक बोलेरो खड़ी है, वे उसी पर सवार हो रहे हैं, अरे! यह क्या ये तो फुर्र हो गये। धरती-माई भी कम न थीं, वे उनके पीछे पीछे...
चकरा गई धरती-माई, यह तो दफ्तर जैसा जान पड़ता है या कोई बंगला, बंगला ही होगा, बंगला ही था वह। घोरावल से करीब डेढ़ सौ किलामीटर दूर होगा ही, धरती-माई ने अनुमान लगाया। धरती-माई बंगले के अन्दर घुस गईं, वहां की बातें सुन कर दंग रह गईं। बंगले के अन्दर के लोग उन्हें उनके योग्य पुत्रों की तरह जान पड़े, पढ़े-लिखे, कायदे-कानून के जानकार, समाज को चलाने वाले, प्रतिभा परीक्षा पास योग्य पुत्रों की तरह।
धरती-माई चकित तो थीं ही सो यह जानने के लिए उत्सुक हो गईं कि ये हैं कौन और इनका लाल सलाम वालों संे रिश्ता क्या है?
किसी का किसी से रिश्ता जानना आसान तो नहीं पर धरती-माई के लिए क्या है, उन्होंने मन को साधा और पता कर लिया कि ये लोग काफी पढ़े-लिखे लोग हैं और मौजूदा सरकार के समानान्तर सत्ता चलाने के लिए प्रयास-रत हैं। धरती-माई धरती के इस राजनीतिक सत्ताग्रही खेल से फिर चकरा गईं।अरे यह क्या? एक सत्ता तो चल ही रही है उसी में फेर-बदल करो, दूसरी सत्ता की स्थापना के लिए काहे जान दे रहे हो? सत्ता तो एक ही होनी चाहिए एक देश में, एक राष्ट्र में। एक ही राष्ट्र में दो तरह की सत्ता, यह तो राष्ट्र-द्रोह है। तो क्या ये राष्ट्र-द्रोही हैं? बंगले में बैठे लोगों की कुछ बातें धरती-माई को याद हो गई थीं जैसे यही कि सत्ता पर कमकरों, गरीबों, मजूरों का अधिकार होना चाहिए उनका नहीं जो अपने हाथ से उठा कर एक गिलास पानी भी नहीं पीते, बात बात पर नौकर चाहिए जिन्हें, खाना बनाने वाला अलग, खिलाने वाला अलग, खेत जोतने वाला अलग, कार चालाने वाला अलग गोया हर काम के लिए नौकर, जो अपना काम करने में भी शर्म महसूसते हैं यानि यह जो मालिक और नौकर वाली दुनिया है यह प्रथा मिटनी ही चाहिए हर हाल में, मौजूदा सत्ता नौकर बनाती है, गुलाम बनाती है, सो इस सरकार को उखाड़ फेंकना है।
धरती-माई बंगले में बैठे हुए लाल सलाम वालों को देखती रह गई, वही रंग-रूप, वैसे ही चेहरे, बोल-चाल भी वैसी ही, सूट-बूट भी वही, वैसे ही अदब और अनुशासन, ये लोग तो उनके योग्य पुत्रों की तरह ही जान पड़ रहे हैं, काफी पढ़े-लिखे, शासन, प्रशासन को चलाने वालों की तरह। ये अपनी सत्ता चाहते हैं सो प्रशासन का विरोध करने के लिए हल्दीघाटी गॉव तक भी जा पहुंचे, आगे जाने का करें ये लोग वहां, लगता है उनके धरती-जोतक पुत्रों को ये बहकायेंगे, सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करेंगे और का कर ही सकते हैं। धरती-माई चकरा गईं...
अरे यह धरती! बहुत अजीब है, यहां किसिम किसिम के खेल चल रहे हैैं, यहां का हर आदमी खिलाड़ी है और अपने स्वार्थ के खेल खेल रहा है, यहां कोई आरोपी रामलाल की तरह का मार-काट वाला खेल खेल रहा है तो कोई लाल सलाम वालों की तरह का सत्ता-बदल वाला खेल तो कोई सरवन जैसा है, जो अपने अधिकार की रक्षा के संघर्ष में कतल कर दिया गया। इनके अलावा वे लोग हैं जो शासन की कुर्सी पर विराजे हुए हैं, मंत्राी अधिकारी बन कर ये लोग भी कागजांे पर विधानों का खेल खेल रहे हैं, हर तरफ कागजों पर लिखे कानूनों की पतंगे हवा में उड़ा रहे हैं, धरती पर शान्ति व्यवस्था के नाम पर बन्दूकों से बारूदें उगलवा रहे हैं।
धरती-माई घिना जाती हैं धरती पर चल रही व्यवस्था से। इस धरती पर बबुआ,
खेलावन, बंधू, सोमारू और बुझावन की कोई नहीं सुनने वाला। तेतरी, फगुनी जैसी विधवाओं की भी कोई सुधि लेने वाला नहीं। वे बंगले से बाहर निकल जाती हैं, यहां रहना बेकार है, का होगा इनका प्रवचन सुन कर, ये भी अपने निहित विचारों के सुभाषित ही उचारेंगे, अपने विचारों को प्रकृति का नियम साबित करेंगे एकदम कुदरती लोकबोध की तरह। ऐसी हालत में तो अपनी चौरी में ही रहना ठीक होगा पर चौरी में क्या रहना, सीधे स्वर्ग लौट जाना ठीक होगा, वे धरती का स्वार्थ-मूलक, व्यक्ति-मूलक, निजता-मूलक छल-छद्म वाला प्रबंधन संभालने में समर्थ नहीं, फिर उनकी कोई सुनने वाला भी तो नहीं। लाल सलाम वालों के पीछे पड़ने से कोई लाभ नहीं, ये भी भाषण-वीर ही जान पड़ रहे हैं। वे समझ चुकी हैं कि धरती का प्रबंधन काफी जटिल और उलझन भरा है तभी तो ‘देवराज इन्द्र’ के कहने पर भी स्वर्ग का कोई देवता धरती के प्रबंधन के लिए तैयार नहीं हुआ, स्वर्ग के देवता जानते थे धरती के प्रबंधन के बारे में, यहां कोई किसी का नहींे, सभी अपने अपने कबूतर उड़ाने में जुटे हुए हैं। यहां कोई किसी का होना भी चाहे तो धरती की जो सत्ता है नऽ वह किसी को किसी के साथ जुड़ने ही नहीं देगी। वैसे भी संपत्ति का काम ही है पूरे समाज को खानों में बांट देना, उनमें किसिम किसिम की श्रेणियॉ बना देना खैर श्रेणियॉ तो देवताओं में भी विभाजित हैं, श्रेणीकरण के रोग से तो स्वर्ग भी नहीं बचा है। कहां देवराज इन्द्र और कहां शिव, दोनों के रहन- सहन, चाल-चलन, चरित्रा और चेहरा, एक वैभव और ऐश्वर्य का मालिक दूसरा जन सामान्य की तरह औघड़, फक्कड़, भभूत और भस्म लगाये। बहुत फर्क है दोनों देवों में। धरती पर तो स्वर्ग से कहीं अधिक विकृत रूपों में यह श्रेण्ीाकरण हर जगह पसरा हुआ है। सो धरती पर अब नहीं रहना भले ही स्वर्ग के देवताओं के ताने सुनने पड़ें फिर भी।
धरती-माई तत्काल अपनी चौरी में लौट आईं। उनकी चौरी पर भीड़ थी। हल्दीघाटी गॉव के दखिनाहा टोले वाले अपने कुशल-मंगल के लिए धरती-माई की पूजा-अर्चना कर रहे थे कि पुलिस उन्हें परेशान न करे। लाल सलाम वाले लाल पर्चा बाट कर बवाल खडा़ कर दिए पुलिस किसी को छोड़ेगी नहीं। हालांकि लाल पर्चे में उनके हित की ही बातें थी, कब्जों के आधार पर जमीन आवंटित करने की धमकी थी जिसके लिए दखिनाहा टोले वालों ने कलक्टरी पर परदर्शन किया था और धरना दिया था फिर भी वे अशांत थे। कई तरह के सन्देहों ने उन्हें जकड़ लिया था। पुलिस को जिस दिन मालूम होगा पुलिस उनके पीछे पड़ जायेगी, लाल सलाम वालों से उनके जुड़ावों के बारे में पूछेगी और न जाने का का करेगी, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी कर सकती है। दखिनाहा टोले वालों को मालूम है कि जसौली में का हुआ था? जसौली के पनबासा गॉव में ऐसे ही लाल सलाम वालों ने एक रात डेरा जमा दिया था, उसी गॉव में खाना-पीना भी किए थे और दूसरे दिन अल्ल-सुबह कहीं चले भी गये थे पर.......दूसरे दिन...
दूसरे दिन तो पुलिस वालों ने पूरे गॉव को घेर लिया और पॉच लड़कों को पकड़
लिया। गॉव से थाने लाकर हवालात में डाल दिया। एक महीने तक हो-हल्ला मचा तब जा कर पुलिस वालों ने गॉव वालों को छोड़ा। पुलिस वाले उन लड़कों को नक्सली साबित करने पर तुले हुए थे। पर उस समय की सरकार जनता के प्रति कुछ संवेदनशील व विनम्र थी सो सरकार ने पुलिस की दलील अनसुनी कर दिया और लड़कों कोे छोड़ने का आदेश दे दिया पर अब जो सरकार है वह किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाली वह विशाल बहुमत की ताकत को बारूद की तरह इस्तेमाल करती है। वैसे भी कोरोना की महामारी में अदालतें बन्द है, अस्पताल बन्द हैं, हर सरकारी काम लंगड़ा रहे हैं अपाहिज की तरह, कोई किसी की नहीं सुनने वाला। अगर गॉव में पुलिस आ गई तो का होगा कुछ लड़कों को गिरफ्तार करेगी ही, बिना गिरफ्तारी किए पुलिस कहीं से लौटती कहां है?
पूरा दखिनाहा टोला कॉप रहा है लाल सलाम वालों के गॉव में आने से। गॉव वालों का कॉपना गलत भी नहीं था। गॉव वाले तो लाल सलाम वालों से पहले से ही कॉप रहे थे कुछ भी हो जाये गॉव के जमीन के झगड़े के मामले को लाल सलाम वालों तक नहीं ले जाना है। सरवन भी हमेशा सावधान रहा करता था लाल सलाम वालों से। उसका तो एक दो बार लाल सलाम वालों से झगड़ा भी हो चुका था। आज अगर सरवन जिन्दा होता तो लाल सलाम वाले गॉव में नहीं आते। सरवन भिड़ जाता लाल सलाम वालों से। वह हमेशा उनसे बोलता देखो! हम कोई भी फैसला बन्दूक की नोक वाला नहीं चाहते, भले ही हमें नमक रोटी तक की मोहताजगी झेलनी पड़े। हमें सपना मत दिखओ, यह मत बताओ कि हमारा सोनभद्र में कभी राज था और हम राजा हुआ करते थे। लाल सलाम वाले गॉव में आये और पर्चा बाट कर चले गये जो मिला उन्हें समझाते गये कि जमीन की बन्दोबस्ती कब्जे के आधार पर ही होगी अगर कोई कब्जे का विरोध केरेगा तो उसकी खैर नहीं। गॉव वालों के लिए लाल सलाम वालों की धमकी का मतलब था, छह ईच गरदन को कटवाना, तुरन्त फैसला और भी बहुत कुछ, उनकी अदालत फैसला लेने तथा दण्ड देने में देरी नहीं करती, चाहे कोड़े मारना हो या गरदन ही काटनी हो पूरे गॉव के सामने वह भी डुगडुगिया पिटवा कर, गॉव वालों को बुलवा कर। लाल सलाम वालों के इसी न्याय की परंपरा से सरवन चिढ़ा करता था और उसका लाल सलाम वालों से झगड़ा होता रहता था।
लाल सलाम वालों के हल्दीघटी गॉव में आने की खबर पुलिस ने सूंघ लिया और फटाफट आदिवासी नेता तथा जन कल्याण समिति के मंत्राी जी को पकड़ लिया। काहे पकड़ लिया किसी को कोई सूचना नहीं बस पकड़ लिया उसके तत्काल बाद पुलिस गॉव में चली आई और बबुआ, खेलावन, बंधू और पुनवासी को पकड़ कर थाने ले गई।
थाने पर पूछ-ताछ होने लगी, वहीं पर आदिवासी नेता और जन कल्याण समिति के मंत्राी भी थे। पूरे सोनभद्र में कोरोना का लाक डाउन था, सारा जनपद डिब्बे में बन्द जैसा हो गया था, कोई कुछ बोल नहीं सकता था, न कहीं निकल सकता था। वैसे भी आदिवासियों के सवाल पर बोलने वाले न के बराबर हैं सोनभद्र में। सोनभद्र में भले ही खामोशी छाई हुई थी, चुप्पी पसरी हुई थी पर सोनभद्र के बाहर चुप्पी नहीं थी। प्रदेश और देश के विरोध पक्ष के बड़े नेता ट्वीटर युद्ध में सक्रिय हो गये थे, एक से एक ट्वीटर के बाण सत्ता पक्ष पर दागने लगे थे। प्रतिपक्ष के सक्रिय होने से हल्दीघाटी गॉव एक बार फिर देश के बड़े नेताओं के ट्वीटर युद्ध का प्रतिभागी बन गया। प्रदेश ही नहीं देश के भी प्रतिपक्ष के लोगों ने पुलिस की कार्यवाही की निन्दा करना शुरू कर दिया। शाम होते होते तक एक दो न्यूज चैनल वालों ने भी मामले की विवेचना अपनी कार्य-सूची में जोड़ लिया। चैनल पर बहस होने लगी सोनभद्र के साथ पूरे उ.प्र. के भमि-प्रबंधन पर। यह पहला अवसर था जब बबुआ, खेलावन, पुनवासी, बंधू तथा आदिवासी नेता और संस्था के मंत्राी जी को टी.वी. पर लाइव प्रस्तुत किया जा रहा था। उनके बयान सुनवाये जा रहे थे। हल्दीघाटी गॉव में जब बर्बर हत्याकाण्ड हुआ था तब भी इस तरह का प्रसारण टी.वी. पर नहीं हुआ था। उस बार तो कुछ खास लोगों तथा प्रशासनिक अधिकारियों को ही चैनल वालों ने कवर किया था पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार तो सभी के बयान लिए जा रहे थे हालांकि बुधनी काकी, बिफनी और तेतरी को पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था फिर भी उनके बयानों को अक्षरशः चैनल वाले प्रसारित कर रहे थे। एक चैनल वाले ने तो उ.प्र. के भूमि-प्रबंधन की बखिया उधेड़ दिया था। भूमि-प्रबंधन की बहस चैनल पर तो हुई बहुत ही जोर-शोर से पर उस बहस से यह निष्कर्ष निकालना कठिन था आखिर जब सोनभद्र जनपद आजादी के पहले आदिवासियों का परिक्षेत्रा था फिर इस जनपद को संविधान की अनुसूची पॉच को लाभ क्यों नहीं दिया गया। चैनल की पूरी बहस आजादी के बाद वाले भूमि-प्रबंधन पर टिकी रह गई। चैनल पर सोनभद्र में आजादी के पहले के भूमि-प्रबंधन के बारे में किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। फिर भी हल्दीघाटी गॉव की घटना को प्रचार तो मिल ही गया।
चैनल पर चर्चा होते ही प्रदेश की सरकार के कान खड़े हो गये, हो क्या रहा है सोनभद्र में, मुख्यमंत्राी जी ने तो हल्दीघाटी गॉव के मामले को निपटवा दिया था, मुआवजा भी नियमों के विपरीत जाकर बहुत अधिक दिलवाया था, जमीन के आवंटन को भी पूरा कर लिया गया था फिर कौन सी बाधा खड़ी हो गई? वहां के आदिवासियों को कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन काहे करना पड़ा, बात क्या है?
वाकई हल्दीघाटी गॉव में घटी मौजूदा घटना से जिले के वुद्धिजीवी ही नहीं सामान्य लोग भी चकित थे, सरकार को तो चकित होना ही था। जगह जगह लोग उस पर चर्चा कर रहे थे पर लाक डाउन होने के कारण सभी अपने भीतर खामोश थे। वैसे केवल सोनभद्र ही नहीं पूरा देश खामोश था कौन बोले कोरोना की महामारी में। अगर देखा जाये तो हमारी सभ्यता में खामोश रहना, प्रतिक्रिया-हीन रहना एक तरह से गुण है जिसे हम पैदा होते ही सीख जाते हैं कोई कसर बाकी रहती है तो हमारी परंपरायें, आज्ञाकारिता वाली शिक्षायें सिखा देती हैं। जनता तो खामोश थी पर सरकार खामोश नहीं थी, सरकार के सुजानों का मानना था कि हल्दीघाटी के लिए सरकारी स्तर पर जितना किया जा सकता था उससे अघिक ही किया गया फिर भी वहां असंतोष है आखिर आदिवासी चाहते क्या हैं? निश्चित ही स्थानीय प्रशासन ने कुछ गड़बड़ जरूर किया होगा।
प्रदेश की सरकार प्रतिपक्ष के ट्वीटर बाणों से आहत हो चुकी थी। सरकार ने फटा-फट मौजूदा कलक्टर को जिले से हटा दिया। कलक्टर को जिले से हटाना सरकार के लिए तात्कालिक समाधान जैसा था। कलक्टर को हटा देने से आदिवासी खुश खुश हो जायेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। आदिवासी तो पट्टे में वही जमीन चाहते थे जिस पर उनका आजादी के पहले से ही जोत-कोड़ था, जिस पर वे काबिज थे। स्थानीय प्रशासन ने जमीन तो आदिवासियों को दिया जरूर पर कब्जे से अलग, अब यह किसे नहीं मालूम कि जमीन का चरित्रा अलग अलग होता है सभी जमीन तो उपजाऊ होती नहीं। स्थानीय प्रशासन ने उपजाऊ तथा अनउपजाऊ के वितरण में मुहदेखी तथा लेन-देन वाला अधिकारियत का खेल किया था।
शासन के सतर्क होने के पहले ही स्थानीय प्रशासन जो प्रशासनिक कलाकारिता में आगे था उसने कमाल कर दिया। थाने पर बिठाये गये आदिवासियों तथा संस्था के मंत्राी व आदिवासी नेता पर कोई मुकदमा कायम न करके उन्हें सीधे क्वारेनटाइन कर जिले के एक क्वरेनटाइन केन्द्र में रखवा दिया। आदिवासी नेता, संस्था के मंत्राी, बबुआ, व खेलावन को कोरोना पाजिटिव घोषित कर दिया फिर क्या था उन्हें जिले के कोरोना अस्पताल में ले जाकर अस्पताल के बिस्तरों पर सुलवा दिया। अपना अधिकार मांगने वाले कोरोना मरीज बन कर बिस्तरे पर पड़े थे। प्रशासन अपने विशेष तरीके से कोरोना की महामारी के जरिए धरती-कथा लिख रहा था।
इतना ही होता तब भी ठीक था इसके आगे बढ़ कर अस्पताल के तमाम कर्मचारियों ने पुलिस के साथ हल्दीघाटी गॉव को घेर लिया। पूरे गॉव की बॉस-बल्लियों से घेरे-बन्दी कर दिया। गॉव की गलियों के हर मुहाने पर होमगार्ड तथा सिपाही को बिठा दिया। कोई भी गॉव से बाहर नहीं निकल सकता था और न ही कोई गॉव में आ सकता था। गॉव में आवाजाही पर पूरी तरह से पाबन्दी।
सोनभद्र का कलक्टर यहां से जाते जाते हल्दीघाटी गॉव की घेरे-बन्दी करवा गया था। नया कलक्टर जिले में दूसरे दिन ही आ गया। वह एक नौजवान था और औसत कद-काठी का था, शकल से तो कलक्टर नहीं जान पड़ता था पर बात-चीत से मालूम हो जाता था कि वह प्रतिभा-परीक्षा पास एक होनहार अधिकारी है, उसकी ऑखों से कुछ विशेष कर गुजरने की तड़प निकलती दीखती थी। जिले का चार्ज लेते ही उसने हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावली तलब कर लिया। कलक्टर ने अपनी प्रतिभा की दिव्य-ज्योति सारी पत्रावलियों पर फैला दिया फिर क्या था पत्रावली पर दर्ज सारी बातें कलक्टर को साफ साफ दिखने लगीं। पत्रावली की टिप्पड़ियॉ स्वतः बोल्ड हो गई... उसे कोई भी पढ़ सकता था। नया कलक्टर प्रशासन की हेरा-फरी वाली कलाओं को तो समझ गया पर उसे साबित करना रोक लिया। किसी दूसरे अधिकारी को पता नहीं चलना चाहिए कि उसे हल्दीघाटी गॉव में खेले गये प्रशासनिक हेर-फेर वाले खेल की जानकारी हो चुकी है। कलक्टर नया तो जरूर था पर नियमों, कानूनों के क्रियान्वयनों तथा उनकी व्याख्याओं में किए जा सकने वाले जन-विरोधी पालनाओं को अच्छी तरह से समझता था। हल्दीघाटी गॉव की जमीन आवंटन की पत्रावली पढ़ लेने के बाद उसे समझने में देर नहीं लगी कि आवंटन करने वाले अधिकारी ने जन-विरोधी कार्य किया है। पर वह निश्चित नहीं कर पा रहा था कि हल्दीघाटी के मामले को कैसे हल कर सकता है सो वह उलझन में था। कोरोना का समय चल रहा है, सोनभद्र जो पहले ग्रीन जोन में था धीरे धीरे रेड जोन में बदलता जा रहा है। जिले के कई कस्बे और शहर कोरोना के प्रभाव में हैं।
‘इस समय तो कुछ भी नहीं हो सकता, हल्दीघाटी गॉव भी कोराना प्रभावित हो गया है, पूरे गॉव को क्वेरेन्टाइन करके उसे बांस-बल्लियों से घेर दिया गया है ऐसी स्थिति में वह जमीन के आवंटन के बारे में कुछ भी नहीं कर सकता फिलहाल तो सोनभद्र को कोराना मुक्त कराना है। बाद में देखा जायेगा कि सोनभद्र में ये जो जमीन बन्दोबस्ती के मामले हैं उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अगर नये भूमि बन्दोबस्ती करने की आवश्यकता समझ में आयेगी तो वह सरकार को एक प्रतिवेदन भी देगा। पर नहीं वह एक कलक्टर की तरह कुछ भी नहीं कर पायेगा, ज्योंही वह सोनभद्र के भूमिप्रबंधन को दुरूस्त करने का प्रयास करेगा उसे यहां से हटा दिया जायेगा।
नया कलक्टर कुछ ही देर में कलक्टर की पद-गर्भित भावनाओं की यात्रा से लौट आया और अपनी कुर्सी पर जम गया। उसके मुह से एक आह निकली ‘वह कुछ नहीं कर सकता, वह सरकार का महज एक पुर्जा है जिसे सरकार अपनी ऊर्जा से चलाती है।’ उसने घंटी बजाई वहां एक चपरासी हाजिर हुआ...
‘स्टेनो बाबू और पेशकार को बुलाओ’
स्टेनो बाबू और पेशकार हाजिर हो गये
‘हल्दीघाटी गॉव की सारी पत्रावलियॉ ले जाइए और ए.डी.एम. साहब से इन पत्रावलियों पर रिपोर्ट तैयार करवाइए कि आदिवासियों में जमीन बन्दोबस्ती के कारण फैली अशान्ति को विधिक रूप से कैसे रोका जा सकता है तथा आदिवासियों के कब्जे की जमीनें उन्हें किन कारणों से आवंटित नहीं की गईं जिसके कारण आदिवासियों ने कलक्टरी पर धरना-प्रदर्शन किया था। इसकी भी जॉच होनी चाहिए कि पुलिस ने हल्दीघाटी गॉव के लोगों को क्यों गिरफ्तार किया?
स्टेनो बाबू और और पेशकार को आदेशित करने के बाद कलक्टर ने अचरज भरा एक आदेश खुद को दिया.. खुद के लिए...
‘हे कलक्टर! अपनी औकात में रह, वुद्धिमान न बन, हल्दीघाटी गॉव में हुई भूमि आवंटन की धांधली सुधारने के चक्क्र में तुझे ही हटा दिया जायेगा, सो ऑख मूंद ले, कान बन्द कर ले और जुबान पर चाटुकारिता की पालिस चढ़ा ले, कोरोना की महामारी को अपनी प्रगति का अवसर बना ले, मुह में अपनी जीभ डाल कर इसका लाभ उठा। कभी भी धरती-कथा लिखने ही नहीं पढ़ने की भी कोशिश न करना।’
कलक्टर अपने अवचेतन के आदेश से हिल गया... ‘बात तो ठीक ही है।’
धरती-माई लाल सलाम वालों के बारे में पता कर खामोश हो गईं थी, उसी खामोशी में उन्हें पता चला कि हल्दीघाटी के कई लोगों को कोरोना हो गया है। गॉव को हाटस्पाट घोषित करके उसे सील कर दिया गया है, उनकी चौरी भी हाटस्पाट में है। धरती-माई नहीं समझ रहीं कि कोरोना क्या है, यह कैसी महामारी है, लोग दूरी बना रहे हैं, नहीं मिल रहे हैं एक दूसरे से, आवागमन बन्द है, बाजार बन्द हैं, आफिस बन्द है। उनकी चौरी पर जो लोग पूजा करने आये थे वे भी मुह बाधे हुए थे, दूर दूर बैठे हुए थे, एक दूसरे से फैलता है यह रोग।
धरती-माई अपनी चौरी से निकलीं और सीधे कलक्टर के बंगले पर पहुंच गइं, उनके पहुंचते ही कलक्टर का बंगला तेज दुधिया रौशनी से नहा उठा... कलक्टर चौंक गया.. उसने रौशनी की तरफ देखा....
एक नई आभा, सफेद साड़ी में लिपटी, छत्राधारी...साक्षात देवी की तरह आभा बिखेरती... कलक्टर उन्हें देख कर चकरा गया...
‘देवी कौन हैं आप?’
‘मैं धरती-माई हूॅ, धरती पर आई हूॅ धरती का हाल सुधारने के लिए, अनपढ़ और पढ़े लिखे लोगों, गरीबों और अमीरों की बीच की खाईं पाटने के लिए पर यहां तो गड़बड़ ही गड़बड़ है, मुझे कुछ और करना होगा। गरीबों के हितों के लिए नयेे ढंग से लड़ाई लड़नी होगी। मेरे साथ तुझे भी उस लड़ाई में शामिल होना होगा।’
कलक्टर धरती-माई की आभा में सम्मोहित हो गया। वह धरती-माई के चरणों में तत्तकाल झुका और उसने शपथ लिया...
‘मॉ चाहे जो हो जाये मैं हल्दीघाटी गॉव वालों को न्याय दिलवाकर रहूंगा। कलक्टर हैरान, धरती माई गरीबों को न्याय दिलाने के लिए जब धरती पर उतर सकती हैं फिर मैं क्यों नहीं आदिवासियों का भला कर सकता, मैं भी तो एक घरती पुत्रा ही हूॅ, धरती की गोदी में पला-बढ़ा....’
‘सरकार चाहे जो करे, चिन्ता नहीं, मुझे वही करना है जिसे मेरी आत्मा बोल रही है, नौकरी किया है, गुलामी नहीं’। उसने स्टेनो को तत्काल बुलवाकर आदेशित किया, ‘हल्दीघाटी वाले गॉव की आवंटन पत्रावली ले आओ और आदिवासियों की वह दरख्वास्त भी जो आवंटन के विरोध की है...’
पत्रावली पर उसने ए.डी.एम. को आदेशित किया..‘हल्दीघाटी गॉव की जमीन का आवंटन आवंटियों के कब्जे के आधार पर दुबारा किया जाये तथा कृत कार्यवाही से मुझे अवगत कराया जाये।’
यह आदेश उसकी पवित्रा आत्मा का था पक्षपातहीन। एक सप्ताह गुजरा होगा कि पता चला कि कलक्टर का ट्रान्सफर कर दिया गया। फिर जमीन का आवंटन खटाई में पड़ गया। देखिए नया कलक्टर कब आता है, कोराना कब खत्म होता है उसके पहले तो कुछ नहीं होगा और धरती-माई का करती हैं, धरती पर रहती हैं या स्वर्ग लौट जाती हैं।
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