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अनुनाद सिंह
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'''[[:w:हिन्दी|हिन्दी भाषा]]''' विश्व की तीसरी और [[भारत]] में यह सबसे अधिक बोले जाने वाली [[भाषा]] है। इसके मातृ भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या 50 करोड़ से भी अधिक है। यह भारत में 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक है। भारतीय संविधान में इसे संघ की राजभाषा स्वीकार किया गया है।
== उद्धरण ==
'''आज पहली ही बार ऐसा संविधान बना है जब कि हमने अपने संविधान में एक भाषा रखी है, जो संघ के प्रशासन की भाषा होगी। इस अपूर्व अध्याय का देश के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ेगा।''' -- डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, 14 सितम्बर की शाम को संविधान सभा में हुई बहस के समापन के बाद
'''यह मानसिक दशा का भी प्रश्न है जिसका हमारे समस्त जीवन पर प्रभाव पड़ेगा। हम केन्द्र में जिस भाषा का प्रयोग करेंगे उससे हम एक-दूसरे के निकटतर आते जाएँगे। आख़िर अंग्रेज़ी से हम निकटतर आए हैं, क्योंकि वह एक भाषा थी। अब उस अंग्रेज़ी के स्थान पर हमने एक भारतीय भाषा को अपनाया है। इससे अवश्यमेव हमारे संबंध घनिष्ठतर होंगे, विशेषतः इसलिए कि हमारी परम्पराएँ एक ही हैं, हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता में सब बातें एक ही हैं। अतएव यदि हम इस सूत्र को स्वीकार नहीं करते तो परिणाम यह होता कि या तो इस देश में बहुत-सी भाषाओं का प्रयोग होता या वे प्रांत पृथक हो जाते जो बाध्य होकर किसी भाषा विशेष को स्वीकार करना नहीं चाहते थे। हमने यथासम्भव बुद्धिमानी का कार्य किया है और मुझे हर्ष है, मुझे प्रसन्नता है और मुझे आशा है कि भावी संतति इसके लिए हमारी सराहना करेगी।''' -- डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, 14 सितम्बर की शाम को संविधान सभा में हुई बहस के समापन के बाद के वक्तव्य के उपसंहार में
'''राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है।''' - अवनीन्द्रकुमार विद्यालंकार <br/> <br/>
'''हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है।''' - बाबूराम सक्सेना <br/> <br/>
'''समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है।''' - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर <br/> <br/>
'''हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है।''' - शंकरराव कप्पीकेरी <br/> <br/>
'''अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू।''' -रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।''' - अनंत गोपाल शेवड़े <br/> <br/>
'''दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है।''' - के.सी. सारंगमठ <br/> <br/>
'''हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।''' - वी. कृष्णस्वामी अय्यर <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है।''' - बालकृष्ण शर्मा '''नवीन''' <br/> <br/>
'''विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है।''' - वाल्टर चेनिंग <br/> <br/>
'''हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये।''' - बेरिस कल्यएव <br/> <br/>
'''अंग्रेजी सिर पर ढोना डूब मरने के बराबर है।''' - सम्पूर्णानंद <br/> <br/>
'''एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित।''' - केशवचंद्र सेन <br/> <br/>
'''देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है।''' -सर जार्ज ग्रियर्सन <br/> <br/>
'''मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है।''' - नलिनविलोचन शर्मा <br/> <br/>
'''जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी।''' - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह <br/> <br/>
'''यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है।''' - शिवनंदन सहाय <br/> <br/>
'''प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है।''' - (राजा) कीर्त्यानंद सिंह <br/> <br/>
'''अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई।''' - भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/>
'''यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये?''' - चंद्रशेखर मिश्र <br/> <br/>
'''साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है।''' - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा <br/> <br/>
'''जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है।''' - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल <br/> <br/>
'''भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है।''' - टी. माधवराव <br/> <br/>
'''हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/>
'''यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं।''' - [[राजेन्द्र प्रसाद]] <br/> <br/>
'''उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है।''' - मुहम्मद हुसैन '''आजाद''' <br/> <br/>
'''समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है।''' - जनार्दनप्रसाद झा '''द्विज''' <br/> <br/>
'''मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है।''' - शिवप्रसाद सितारेहिंद <br/> <br/>
'''हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है।''' - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह <br/> <br/>
'''वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके।''' - पीर मुहम्मद मूनिस <br/> <br/>
'''भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहुँचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै।''' - बेनी कवि <br/> <br/>
'''यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा।''' - ब्रजनंदन दास <br/> <br/>
'''देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है।''' - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है।''' - छविनाथ पांडेय <br/> <br/>
'''देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''हमारी नागरी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपि है।''' - [[राहुल सांकृत्यायन]] <br/> <br/>
'''नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है।''' - [[गणेशशंकर विद्यार्थी]] <br/> <br/>
'''अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती।''' - पं. कृ. पिल्लयार <br/> <br/>
'''उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है।''' - जगन्नाथप्रसाद मिश्र <br/> <br/>
'''हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है।''' - देवव्रत शास्त्री <br/> <br/>
'''हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'''। - गोविन्दवल्लभ पंत <br/> <br/>
'''भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय।''' - ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह <br/> <br/>
'''भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/>
'''संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है।''' - डॉ. फादर कामिल बुल्के <br/> <br/>
'''भाषा विचार की पोशाक है।''' - डॉ. जानसन <br/> <br/>
'''रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है।''' - यशोदानंदन अखौरी <br/> <br/>
'''साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/>
'''कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं।''' - श्रीनारायण चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया।''' - राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/>
'''देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है?''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता।''' - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद <br/> <br/>
'''कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप।''' - राधाचरण गोस्वामी <br/> <br/>
'''हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है।''' - कमलापति त्रिपाठी <br/> <br/>
'''मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता।''' - मनोरंजन प्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है।''' - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/>
'''नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है।''' - (प्रो.) तान युन् शान <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है।''' - कमलापति त्रिपाठी <br/> <br/>
'''सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए।''' - श्रीधर पाठक <br/> <br/>
'''भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।''' - धीरेन्द्र वर्मा <br/> <br/>
'''जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।''' - शेली <br/> <br/>
'''भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है।''' - लक्ष्मीनारायण '''सुधांशु''' <br/> <br/>
'''भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है।''' - सम्पूर्णानन्द <br/> <br/>
'''हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है।''' - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल <br/> <br/>
'''परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें।''' - हरगोविंद सिंह <br/> <br/>
'''अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं।''' - अनंतशयनम् आयंगार <br/> <br/>
'''वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।''' - [[मैथिलीशरण गुप्त]] <br/> <br/>
'''दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।''' - बिस्मार्क <br/> <br/>
'''हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।''' - हजारी प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है।''' - भूदेव मुखर्जी <br/> <br/>
'''हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। ''' - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/>
'''हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है।''' - नन्ददुलारे वाजपेयी <br/> <br/>
अकबर की सभा में सूर के '''जसुदा बार-बार यह भाखै''' पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।'''- राधाचरण गोस्वामी <br/> <br/>
'''देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है।''' - सुधाकर द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी।''' - (डॉ.) भगवानदास <br/> <br/>
'''हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है।''' - ठाकुरदत्त शर्मा <br/> <br/>
'''निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है।''' - पंडित सुधाकर पांडेय <br/> <br/>
'''अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है।''' - भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/>
'''यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है।''' - दरियाये लताफत <br/> <br/>
'''भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है।''' - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह <br/> <br/>
'''अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता।''' - देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/>
'''बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती।''' - [[संपूर्णानंद]] <br/> <br/>
'''भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है।''' - बदरीनाथ शर्मा <br/> <br/>
'''तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/>
'''हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।'''- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है।''' - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/>
'''हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।'''- मथुरा प्रसाद दीक्षित <br/> <br/>
'''भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।'''- रवींद्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता।''' - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल <br/> <br/>
'''संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है।''' - केशवचंद्र सेन <br/> <br/>
'''हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है।''' - गोविंदबल्लभ पंत <br/> <br/>
'''हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है।''' - (डॉ.) रामविलास शर्मा <br/> <br/>
'''जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/>
'''साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है।''' - (म. म.) सत्यनारायण शर्मा <br/> <br/>
'''जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं।''' - शिवनंदन सहाय <br/> <br/>
'''उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दूदाँ तक तंग आ गए हैं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है।''' - ब्रजभूषण पांडेय <br/> <br/>
'''लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है।''' - कंक <br/> <br/>
'''मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/>
'''देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके।''' - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री <br/> <br/>
'''साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है।''' - अंबाप्रसाद सुमन <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है।''' - पं. गिरिधर शर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।''' - [[वासुदेवशरण अग्रवाल]] <br/> <br/>
'''भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है।''' - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री <br/> <br/>
'''क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था।''' - विष्णुदेव पौद्दार <br/> <br/>
'''सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है।''' - वाल्टर चेनिंग <br/> <br/>
'''हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है।''' - जहूरबख्श <br/> <br/>
'''किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा।''' - सैयद इंशा अल्ला खाँ <br/> <br/>
'''अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है''' - संपूर्णानंद <br/> <br/>
'''हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/>
'''हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है।''' - छविनाथ पांडेय <br/> <br/>
'''साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है।''' - पार्वती देवी <br/> <br/>
'''विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता''' - वासुदेवशरण अग्रवाल <br/> <br/>
'''पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती।''' - पं. सुधाकर पांडेय <br/> <br/>
'''तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती।''' - मौलाना मुहम्मद अली <br/> <br/>
'''भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/>
'''हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है।''' - शांतानंद नाथ <br/> <br/>
'''भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए।''' - नाथूराम '''शंकर''' शर्मा <br/> <br/>
'''राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए।''' - राजकुमार वर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है।''' - सुनीति कुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/>
'''स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है।''' - निराला <br/> <br/>
'''कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।''' - सुमित्रानंदन पंत <br/> <br/>
'''बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।''' - गोविंद शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/>
'''उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है।''' - रामरणविजय सिंह <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है।''' - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव <br/> <br/>
'''बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी।''' - पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि।''' - देवी प्रसाद गुप्त <br/> <br/>
'''हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है।''' - शांतानंद नाथ <br/> <br/>
'''आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है।''' - [[माखनलाल चतुर्वेदी]] <br/> <br/>
'''विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है।''' - सूर्यनारायण व्यास <br/> <br/>
'''कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती।''' - सैयद अमीर अली '''मीर''' <br/> <br/>
'''हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है।''' - ब्रजनंदन सहाय <br/> <br/>
'''कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है।''' - सू. च. धर <br/> <br/>
'''मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता।''' - विनोबा भावे <br/> <br/>
'''आज का आविष्कार कल का साहित्य है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती।''' - माधव राव सप्रे <br/> <br/>
'''हिंदी विश्व की महान भाषा है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''मैंने नाम बदला, वेशभूषा बदली, खान-पान बदला लेकिन हिन्दी के संबंध में मैंने विचारों में कोई परिवर्तन नहीं किया।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है।''' - ब्रजनंदन सहाय <br/> <br/>
'''जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो।''' - संत रामदास <br/> <br/>
'''पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा।''' - लीलावती मुंशी <br/> <br/>
'''हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए।''' - देवी प्रसाद गुप्त <br/> <br/>
'''साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है।''' - पं. वागीश्वर जी <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है।''' - डॉ. राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।''' - सूर्य कांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है।''' - [[सुभाषचन्द्र बोस|सुभाषचंद्र बसु]] <br/> <br/>
'''पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है।''' - पं. वागीश्वर जी <br/> <br/>
'''विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है।''' - बी. सी. जोशी <br/> <br/>
'''हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे।''' - बृजनंदन सहाय <br/> <br/>
'''भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है।''' - म. म. रामावतार शर्मा <br/> <br/>
'''साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है।''' - रघुवरप्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें।''' - एक फ्रांसीसी बालिका <br/> <br/>
'''निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है।''' - पंडित सुधाकर पांडेय <br/> <br/>
'''हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो।''' - सैयद अमीर अली मीर <br/> <br/>
'''इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है।''' - [[जयचंद्र विद्यालंकार]] <br/> <br/>
'''सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है।''' - अमरनाथ झा <br/> <br/>
'''हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं।''' - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं।''' - अयोध्याप्रसाद वर्मा <br/> <br/>
'''किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है।''' - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री <br/> <br/>
'''जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो।''' - सकलनारायण पांडेय <br/> <br/>
'''संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी।''' - मौलवी महमूद अली <br/> <br/>
'''संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है।''' - ताराचंद्र दूबे <br/> <br/>
'''सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं।''' - राजा कृत्यानंद सिंह <br/> <br/>
'''जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है।''' - नरोत्तम व्यास <br/> <br/>
'''भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है।''' - बदरीनाथ भट्ट <br/> <br/>
'''साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा।''' - बिहारीलाल चौबे <br/> <br/>
'''देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है।''' - मन्नन द्विवेदी <br/> <br/>
'''है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा।''' - हरिऔध <br/> <br/>
'''हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें।''' - पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है।''' - गिरजाकुमार घोष <br/> <br/>
'''यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो।''' - डॉ. श्यामसुंदर दास <br/> <br/>
'''बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है।''' - रमेशचंद्र दत्त <br/> <br/>
'''वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है।''' - सैयद अमीर अली '''मीर''' <br/> <br/>
'''दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है।''' - गिरींद्रमोहन मित्र <br/> <br/>
'''समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है।''' - म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है।''' - बाबू राव विष्णु पराड़कर <br/> <br/>
'''अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है।''' - अनादिधन वंद्योपाध्याय <br/> <br/>
'''व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता।''' - अनंतराम त्रिपाठी <br/> <br/>
'''स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए।''' - रामजी लाल शर्मा <br/> <br/>
'''गुणवान '''खानखाना''' सदृश प्रेमी हो गए '''रसखान''' और '''रसलीन''' से हिंदी प्रेमी हो गए।''' - राय देवीप्रसाद <br/> <br/>
'''वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है।''' - गणपति जानकीराम दूबे <br/> <br/>
'''हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/>
'''अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''कवि का हृदय कोमल होता है।''' - गिरिजाकुमार घोष <br/> <br/>
'''श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं।''' - शैलजाकुमार घोष <br/> <br/>
'''हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।''' - चंद्रबली पाण्डेय <br/> <br/>
'''भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है।''' - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री <br/> <br/>
'''पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे।''' - सत्यदेव परिव्राजक <br/> <br/>
'''खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है।''' - बदरीनाथ भट्ट <br/> <br/>
'''भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है।''' - विनयकुमार सरकार <br/> <br/>
'''हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है।''' - बदरीनारायण चौधरी '''प्रेमधन''' <br/> <br/>
'''हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।''' - भारतेन्द्न्दु हरिश्चंद्र <br/> <br/>
'''आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है।''' - वीम्स साहब <br/> <br/>
'''क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे।''' - हरिऔध <br/> <br/>
'''जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती।''' - विष्णु दिगंबर <br/> <br/>
'''जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/>
'''जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है।''' - [[महात्मा गांधी]] <br/> <br/>
'''जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है।''' - डॉ. भगवानादास <br/> <br/>
'''विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय।''' - भीमसेन शर्मा <br/> <br/>
'''भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था।''' - छोटूलाल मिश्र <br/> <br/>
'''नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है।''' - गोपालदास गहमरी <br/> <br/>
'''किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है।''' - '''निराला''' <br/> <br/>
'''देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है।''' - '''चकोर''' <br/> <br/>
'''शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है।''' - पं. रामनारायण मिश्र <br/> <br/>
'''भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए।''' - श्यामसुंदर दास <br/> <br/>
'''विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो।''' - पं. गिरधर शर्मा <br/> <br/>
'''विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं।''' - लक्ष्मण नारायण गर्दे <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते।''' - म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं।''' - साहित्याचार्य रामावतार शर्मा <br/> <br/>
'''जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती।''' - पांडेय रामवतार शर्मा <br/> <br/>
'''नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है।''' - नाथूराम शंकर शर्मा <br/> <br/>
'''जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है।''' - घनश्याम सिंह <br/> <br/>
'''विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती।''' - डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/>
'''यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है।''' - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है।''' - मोहनलाल महतो वियोगी <br/> <br/>
'''युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है।''' - सु. च. धर <br/> <br/>
'''हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना।''' - नूर मुहम्मद <br/> <br/>
'''आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है।''' - गिरधर शर्मा <br/> <br/>
'''भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/>
'''जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।''' - गोविन्ददास <br/> <br/>
'''नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/>
'''देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो।''' - पं. गिरधर शर्मा <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है।''' - जगन्नाथप्रसाद मिश्र <br/> <br/>
'''साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे।''' - चंद्रशेखर मिश्र <br/> <br/>
'''सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है।''' - शरच्चंद <br/> <br/>
'''सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी।''' - संतराम शर्मा <br/> <br/>
'''हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है।''' - मौलाना हसरत मोहानी <br/> <br/>
'''भारतीय भाषाएं नदियां हैं जबकि हिन्दी महानदी।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/>
'''लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है।''' - मिश्रबंधु <br/> <br/>
'''हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।''' - अरविंद <br/> <br/>
'''हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें।''' - विनोबा भावे <br/> <br/>
'''साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/>
'''एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है।''' - वी. सी. जोशी <br/> <br/>
'''हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।''' - [[स्वामी दयानन्द सरस्वती|स्वामी दयानंद]] <br/> <br/>
'''इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना।''' - [[जयशंकर प्रसाद]] <br/> <br/>
'''विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है।''' - अरस्तु <br/> <br/>
'''अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं।''' - डिजरायली <br/> <br/>
'''जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी।''' - श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् <br/> <br/>
'''शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज।''' - कबीर <br/> <br/>
'''यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है।''' - सुभाषचन्द्र बसु <br/> <br/>
'''प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है।''' - एक जपानी सूक्ति <br/> <br/>
'''संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं।''' - यशेदानंदन अखौरी <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -'''स्वत्व''' का रक्षण हो।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है।''' - जयशंकर प्रसाद <br/> <br/>
'''जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती।''' - बाबूराव विष्णु पराड़कर <br/> <br/>
'''वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/>
'''पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है।''' - मैक्सिम गोर्की <br/> <br/>
'''कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है।''' - महादेवी वर्मा <br/> <br/>
'''क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है।''' - माघ <br/> <br/>
'''प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।''' - पास्कल <br/> <br/>
'''हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।''' - धीरेन्द्र वर्मा <br/> <br/>
'''साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है।''' - अज्ञात <br/> <br/>
'''बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।''' - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/>
'''विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है।''' - बागीश्वरजी <br/> <br/>
'''श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।''' - शेली <br/> <br/>
'''भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है।''' - प्रेमचंद <br/> <br/>
'''वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।''' - बिस्मार्क <br/> <br/>
'''रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है।''' - पंडितराज जगन्नाथ <br/> <br/>
'''प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/>
'''अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है।''' - भास्कर गोविन्द धाणेकर <br/> <br/>
'''यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/>
'''भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/>
'''कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।''' - हजारी प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/>
'''हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी।''' - पं. नेहरू <br/> <br/>
'''भाषा विचार की पोशाक है।''' - डॉ. जोनसन <br/> <br/>
'''हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है।''' - सेठ गोविन्ददास <br/> <br/>
'''अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है।''' - लक्ष्मीनारायण सिंह '''सुधांशु''' <br/> <br/>
'''आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे।''' - चन्द्रबली पांडेय <br/> <br/>
'''जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है।''' - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/>
'''हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/>
'''हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/>
'''भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/>
'''हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है।''' - ग्रियर्सन <br/> <br/>
'''मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/>
'''मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।''' - राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन <br/> <br/>
'''संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता।''' - डॉ. सम्पूर्णानन्द <br/> <br/>
'''उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए।''' - मौलाना मुहम्मद अली <br/> <br/>
'''राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है।''' - लक्ष्मण नारायण गर्दे <br/> <br/>
'''प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।''' - पास्कल <br/> <br/>
'''विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य।''' - मन्नन द्विवेदी <br/> <br/>
'''जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/>
'''हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/>
'''सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है।''' - रणवीर सिंह जी <br/> <br/>
'''वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है।''' - ठाकुरदत्त शर्मा <br/> <br/>
'''हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है।''' - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी <br/> <br/>
'''हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/>
'''नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान।''' - मिश्रबंधु <br/> <br/>
'''साहित्य ही हमारा जीवन है।''' - डॉ. भगवानदास <br/> <br/>
'''मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है।''' - मुकुन्दस्वरूप वर्मा <br/> <br/>
'''बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/>
'''हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है।''' - अंबिका प्रसाद वाजपेयी <br/> <br/>
'''हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/>
'''भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।''' - अरविंद <br/> <br/>
'''राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये।''' - शारदाचरण मित्र (जस्टिस) <br/> <br/>
'''समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिन्द भाषी जाति की एकता आवश्यक है।''' - रामविलास शर्मा <br/> <br/>
'''हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ।''' - आचार्य क्षितिमोहन सेन <br/> <br/>
'''हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं।''' - अनंत गोपाल शेवड़े <br/> <br/>
'''अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं।''' - सैयदअली बिलग्रामी <br/> <br/>
'''हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए।''' - शचींद्रनाथ बख्शी <br/> <br/>
'''अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/>
'''हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है।''' - विनयमोहन शर्मा <br/> <br/>
'''अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं।''' - अवनींद्र कुमार विद्यालंकार <br/> <br/>
'''हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा।''' - अनंतशयनम् आयंगार <br/> <br/>
'''संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी।''' - राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन <br/> <br/>
'''(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया।''' - अमृतलाल नागर <br/> <br/>
* हिंदी की प्रतिस्पर्धा स्थानीय भाषाओं से नहीं है। सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने से ही देश सशक्त होगा। ... प्रधानमंत्री मोदी ने 10 भाषाओं में इंजीनियरिंग और मेडिकल पाठ्यक्रम शुरू करने की पहल की है और जल्द ही ये पाठ्यक्रम सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होंगे। वह क्षण स्थानीय भाषाओं और आधिकारिक भाषाओं के उत्थान की शुरुआत का प्रतीक होगा। -- भारतीय गृहमन्त्री [[अमित शाह]], राजभाषा पर संसद की समिति की 38वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए (4 अगस्त 2023)
* भारत वर्षों से ही विविध भाषाओं का देश रहा है और हिंदी को एक जनतांत्रिक भाषा के रूप में माना जाता है। इसने अलग-अलग भारतीय भाषाओं और बोलियों के साथ कई वैश्विक भाषाओं को सम्मान देने का भी काम किया है।... हिंदी भाषा ने देश की स्वतंत्रता के दौरान देशवासियों को एकसूत्र में बांधने और अनेक भाषाओं में बंटे देश में एकता की भावना को स्थापित करने का भी काम किया था।... हमारी सभी भारतीय भाषाएं और बोलियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं और हमें इसे लेकर चलना है। हिंदी की किसी भी भाषा न कभी स्पर्धा थी और न कभी होगी। हमारी सभी भाषाओं को सशक्त करने से एक ही सशक्त राष्ट्र बनेगा और मुझे यकीन है कि हिंदी सभी भाषाओं को सशक्त बनाने का काम करेगी। -- भारतीय गृहमन्त्री अमित शाह, १४ सितम्बर २०२३ को अपने हिन्दी दिवस सम्बोधन में
* मेरी कामना है कि हिंदी भाषा राष्ट्रीय एकता और सद्भावना की डोर को निरंतर मजबूत करती रहे।''' भारतीय प्रधानमन्त्री [[नरेन्द्र मोदी]], १४ सितम्बर २०२३ को अपने हिन्दी दिवस सम्बन्धी एक सोसल मिडिया पोस्ट में
* तमिलनाडु में हमारे लिए हिन्दी न जानना बहुत ही बड़ी बाधा हो जाती है। हमारे लिए हिन्दी सीखना 'स्मार्ट' है। -- [[श्रीधर वम्पू]], तमिलनाडु में जन्मे जोहो के संस्थापक एवं प्रसिद्ध उद्योगपति<ref>[https://panchjanya.com/2025/02/27/393047/bharat/tamil-nadu/hindi-v-controversy-zoho-founder-urges-hindi-learning/ तमिलनाडु के उद्योगपतियों ने सरकार से कहा “हिन्दी को पढ़ाने दें!”]</ref>
* कड़वी सच्चाई है कि हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है, लेकिन सरकारी विभागों में हिंदी में काम करने का दिखावा हो रहा है। अधिकतर अफसरशाही अंग्रेजी में काम कर रहे हैं। हिंदी का पत्रकार परिचय-पत्र अंग्रेजी में बनाकर पेश करता है। जबकि लोगों को समझना चाहिए कि जब चुनाव होता है तो नेता हिंदी में जनता से संवाद करते हैं। क्योंकि उन्हें पता है भारत में अंग्रेजी में बात करके लोगों से जुड़ा नहीं जा सकता। हमें तो हिंदी में काम करने पर गर्व होता है। देहरादून कॉलेज में था, तभी संकल्प लिया था कि अपना हस्ताक्षर हिंदी में करेंगे। राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण की 10 साल बाद हिंदी में वेबसाइट बनवाया। हिंदी दिवस मनाना शुरू किया। अब हिंदी में काम करने के लिए प्रेरित किए जाने से कर्मचारी भी खुश हैं। अब प्राधिकरण का विधि उपनियम हिंदी में बनाकर वेब साइट पर डाला जा रहा है। -- तरुण विजय, अध्यक्ष, राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण
* साहित्य अकादमी के साथ काम करते हुए यह अनुभव किया है कि हिंदी देश की 24 क्षेत्रीय भाषाओं के लिए पुल है। गुजराती भाषा की पुस्तक का मणिपुरी में सीधा अनुवाद कराना आसान नहीं है। लेकिन गुजराती से हिंदी में अनुवाद कराने के बाद हिंदी से मणिपुरी में अनुवाद आसानी से हो जाता है। करीब सभी क्षेत्रीय साहित्यकारों के लिए हिंदी समझना आसान है। हिंदी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बनकर उभरी है। विदेशी शक्तियां भारत में व्यापार करने के लिए अपने लोगों को हिंदी सिखा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर हिंदी में भाषण देकर वैश्विक पटल पर हिंदी का दबदबा और बढ़ा दिया है। देश में करीब 50 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं। दुनिया में कई देशों की इतनी आबादी है। अब बिना देर किए संयुक्त राष्ट्र को हिंदी को आधिकारिक भाषा की मान्यता देनी चाहिए। -- के. श्रीनिवासराव, सचिव, साहित्य अकादमी
* भारत बहुभाषायी देश है, लंबे समय से हिंदी या उसका कोई स्वरूप इसके बहुत बड़े भाग पर सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होता था। स्वतंत्रता आन्दोलन में हिंदी पत्रकारिता ने अहम भूमिका अदा की है। यह समस्त भारत में आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक सम्पर्क माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए सक्षम है, इसे सारे देश के लिए सीखना आवश्यक है। संविधान सभा में लंबी चर्चा के बाद 14 सितम्बर सन् 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकारा गया। इसके बाद संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के सम्बन्ध में व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये 14 सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज लगभग प्रत्येक कार्यालय में एक राजभाषा विभाग है, जो राजभाषा हिंदी में काम करने के लिए नीतियों, नियमों और पुरस्कार प्रोत्साहन आदि की न केवल जानकारी प्रदान करता है, बल्कि कार्यालयों के सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए तत्पर है। दिल्ली हिंदी भाषी क्षेत्र है। हिंदी में काम करना हमारा संवैधानिक उत्तरदायित्व भी है। हिंदी बहुआयामी भाषा है इसकी खूबी है कि ये सभी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात कर लेती है। हिंदी में काम करना बहुत सरल है क्योंकि जो बोलना है वही लिखना है। आप अपनी बात आसानी से दूसरे तक पहुंचा सकते हैं। विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी दूसरे स्थान पर है। हमारी रेलवे में भी हिंदी में बहुत कार्य किया जा रहा है, विशेष रूप से स्टेशनों पर। हिंदी का प्रचार प्रसार बढ़ाने में राजभाषा विभाग भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है। -- डिंपी गर्ग, दिल्ली रेल मंडल प्रबंधक
===अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ===
* जिसने जग में जन्म दिया औ पोसा, पाला।
: जिसने यक यक लहू बूँद में जीवन डाला।
: उस माता के शुचि मुख से जो भाषा सीखी।
: उसके उर से लग जिसकी मधुराई चीखी।
: क्या उस भाषा का मोह कुछ हम लोगों को है नहीं।
: दो सूबों के भिन्न भिन्न बोली वाले जन।
: जब करते हैं खिन्न बने, मुख भर अवलोकन।
: जो भाषा उस समय काम उनके है आती।
: जो समस्त भारत भू में है समझी जाती।
: उस अति सरला उपयोगिनी हिन्दी भाषा के लिए।
: हम में कितने हैं जिन्होंने तन मन धान अर्पण किए।
: गुरु गोरख ने योग साधाकर जिसे जगाया।
: औ कबीर ने जिसमें अनहद नाद सुनाया।
: प्रेम रंग में रँगी भक्ति के रस में सानी।
: जिस में है श्रीगुरु नानक की पावन बानी।
: हैं जिस भाषा से ज्ञान मय आदि ग्रंथसाहब भरे।
: क्या उचित नहीं है जो उसे निज सर आँखों पर धारे।
: करामात जिसमें है चंद-कला दिखलाती।
: जिसमें है मैथिल-कोकिल-काकली सुनाती।
: सूरदास ने जिसे सुधामय कर सरसाया।
: तुलसी ने जिसमें सुर-पादप फलद लगाया।
: जिसमें जग पावन पूत तम रामचरित मानस बना।
: क्या परम प्रेम से चाहिए उसे न प्रति दिन पूजना।
: बहुत बड़ा, अति दिव्य, अलौकिक, परम मनोहर।
: दशम ग्रंथ साहब समान बर ग्रंथ बिरच कर।
: श्रीकलँगीधार ने जिसमें निज कला दिखाई।
: जिसमें अपनी जगत चकित कर ज्योति जगाई।
: वह हिन्दी भाषा दिव्यता-खनि अमूल्य मणियों भरी।
: क्या हो नहिं सकती है सकल भाषाओं की सिर-धारी।
: यह कविता हिन्दी को माँ के समान बताते हुए, उसे पूरे भारत की समझी जाने वाली भाषा के रूप में स्थापित करती है और गोरख, कबीर, नानक, सूर, और तुलसी जैसे महान संतों व कवियों की साहित्यिक विरासत से जोड़कर उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव को व्यक्त करती है।
=== हिन्दी की विकासयात्रा ===
* कोई कहानी ऐसी कहिये कि जिसमें हिंदो को छुट और किसी बोली की पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली रूप खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उनके बीच में न हो। हिन्दवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो। जितने भले लोग आपस में बोलते-चलाते हैं, ज्यों का त्यों डोल रहे और छाँह किसी की न दे। -- इंशाअल्ला खाँ, 'रानी केतकी की कहानी' की भाषा के सम्बन्ध में
* हमारे मत में हिंदी और उर्दू दो बोली न्यारी न्यारी हैं। हिंदी इस देश के हिंदू वालते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमानों और फारसी पढ़े हुए हिंदुओं की बोलचाल है। हिंदी में संस्कृत के शब्द बहुत आते हैं, उर्दू में अरबी फारसी के। परन्तु कुछ आवश्यक नहीं कि अरबी-फारसी के शब्दों के बिना हिन्दी न बोली जाय और न हम उस भाषा को हिन्दी कहते हैं जिसमें अरबी-फारसी के शब्द भरे हों। -- राजा लक्ष्मण सिंह, संस्कृत महाकाव्य "रघुवश" के अनुवाद के प्राक्कथन में
* हिन्दी नई चाल से ढली सन् १८७३ ई०। -- [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]]
* समय के साथ, [[संस्कृत]] से प्राकृत भाषाए विकसित हुईं, जो आम जनता की बोलचाल की भाषाएं थीं। -- डॉ भोलानाथ तिवारी की पुस्तक “भारतीय भाषाओं का इतिहास”
* प्राकृत से आगे चलकर अपभ्रंश (लगभग 6ठी से 12वीं शताब्दी) का विकास हुआ, जो हिंदी और अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं का आधार बनी। अपभ्रंश में शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी जैसी बोलियां शामिल थीं। -- ग्रियर्सन के अध्ययन और केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशनों के अनुसार
* उत्तरी भारत में, विशेष रूप से दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के क्षेत्र में, शौरसेनी अपभ्रंश से हिंदी की प्रारंभिक बोलियाँ जैसे खड़ी बोली, ब्रज, अवधी और भोजपुरी उभरीं। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक “हिंदी साहित्य का इतिहास”
* 10वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान मुस्लिम शासकों (दिल्ली सल्तनत और मुगल काल) के प्रभाव से हिंदी में फारसी, अरबी और तुर्की शब्दों का समावेश हुआ. इससे हिंदुस्तानी भाषा का विकास हुआ, जो हिंदी और उर्दू का साझा रूप थी। -- सतीश चंद्रा की पुस्तक “मध्यकालीन भारत का इतिहास”
* भक्ति और सूफी आंदोलनों ने हिंदी को लोकप्रिय बनाया। कबीर, सूरदास, तुलसीदास और मलिक मुहम्मद जायसी जैसे कवियों ने अवधी, ब्रज और अन्य बोलियों में साहित्य रचकर हिंदी को समृद्ध किया। -- हजारीप्रसाद द्विवेदी की पुस्तक “हिंदी साहित्य का आदिकालीन इतिहास”
* 18वीं शताब्दी में खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में अपनाया गया। इसे दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में बोला जाता था। -- नंददुलारे वाजपेयी की पुस्तक “आधुनिक हिंदी साहित्य”
* मुगल दरबारों और बाजारों में हिंदुस्तानी के रूप में इसका प्रयोग बढ़ा। -- “द कैंब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया”
* ब्रिटिश शासन के दौरान 19वीं शताब्दी में हिंदी को देवनागरी लिपि के साथ मानकीकृत करने का प्रयास हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र को “आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक” माना जाता है, जिन्होंने खड़ी बोली में नाटक, कविता और निबंध लिखे। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल
* 20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी को राष्ट्रीय एकता की भाषा के रूप में बढ़ावा दिया गया। महात्मा गांधी और अन्य नेताओं ने हिंदी को जन-जन की भाषा बनाने की वकालत की। -- “द नेशनल मूवमेंट इन इंडिया”
* प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और अन्य लेखकों ने खड़ी बोली में उपन्यास, कहानी और कविता लिखकर हिंदी को आधुनिक साहित्यिक भाषा बनाया। -- साहित्य अकादमी और नंददुलारे वाजपेयी
* 20वीं शताब्दी में हिंदी अखबारों, पत्रिकाओं, रेडियो और बाद में टेलीविजन ने हिंदी के प्रसार को बढ़ाया। -- “बीबीसी हिंदी” की रिपोर्ट्स
* हिंदी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली प्रमुख भाषा बनी। -- केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशनों के अनुसार
* 21वीं शताब्दी में इंटरनेट, सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे मंचों ने हिंदी को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया। -- “स्टैटिस्टिता” और “गूगल ट्रेंड्स” के आंकड़ों के अनुसार
* हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स और बॉलीवुड ने भी हिंदी के प्रसार में योगदान दिया। -- “द टाइम्स ऑफ इंडिया” और “बीबीसी हिंदी” की रिपोर्ट्स के अनुसार
* वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केंद्रीय हिंदी संस्थान और अन्य संगठनों ने हिंदी के शब्दकोश, व्याकरण और शब्दावली को मानकीकृत करने में मदद की।
* हिंदी का विकास जनता के बीच संचार की जरूरत से हुआ। -- डॉ भोलानाथ तिवारी के अध्ययनों के अनुसार
* २०१४ के बाद भारत में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व काल में सभी मंचों पर हिन्दी में विचारविमर्श को अत्यधिक बढ़ावा मिला।
==इन्हें भी देखें==
* [[हिन्दी साहित्य]]
* [[देवनागरी]]
* [[संस्कृत]]
* [[भाषा]]
==बाह्य सूत्र==
{{wikipedia}}
*[http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2009/hindi.htm हिंदी के विषय में विदेशियों के विचार] - बदरीनारायण तिवारी
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
[[श्रेणी:हिन्दी]]
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चीन
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2026-04-15T16:13:22Z
अनुनाद सिंह
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text/x-wiki
{{विकिपीडिया|चीन}}
'''चीन''' एशिया में स्थित एक देश है। जिसकी जनसंख्या विश्व में सबसे अधिक है और स्थान में यह दूसरा है।
==सूक्ति==
* जब हमारे हजारो विद्यार्थी दूसरे देश से चीन में आएंगे तो आप देखोगे की चीन किस तरह अपने आप को बदलता है। -- जियोंग पिंग डेंग
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सूर्य
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अनुनाद सिंह
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/* उक्तियाँ */
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wikitext
text/x-wiki
'''सूर्य''' सौरमण्डल के केन्द्र में स्थित तारा है। वह धरती पर ऊष्मा और प्रकाश का सम्पूर्ण स्रोत है। सूर्य के प्रकाश से पत्तियाँ भोजन बनाती हैं। इसी भोजन से किसी न किसी रूप में सभी जन्तु अपना पोषण और ऊर्जा प्राप्त करते हैं। सूर्य ही [[वर्षा]] का भी कारक है । सनातन धर्म में सूर्य को देवता माना गया है।
== उक्तियाँ ==
* ''ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।'' -- ऋग्वेद, ३-६२-१०
: जो प्रणव के अर्थभूत सच्चिदानन्दमय तथा भूः, भुवः और स्व: स्वरूप से त्रिभुवनमय एवं सम्पूर्ण जगत की सृष्टि करनेवाले हैं, उन भगवान् सूर्यदेव के सर्वश्रेष्ठ तेज का हम ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धियों को प्रेरणा दें।
: (दूसरे शब्दों में- उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे। )
* ''हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
: ''तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥'' -- ईशोपनिषद्
: सत्य का मुख स्वर्ण के पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन् (हे पोषन देने वाले सूर्य) ! उस सत्यधर्म के दिखाई देने के लिए तू उस आवरण को हटा दे। (इन भौतिक पदार्थों की चकाचौंध ने मनुष्य की आँख से सत्य को ओझल कर दिया है। भक्त सत्य के दर्शन करना चाहता है। सांसारिकता सोने का ढक्कन है और आत्म-परमात्म-चिन्तन वह सत्य है जिसे सांसारिकता छिपा देती है।)
* ''ॐ आदित्याय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्यः प्रचोदयत।'' -- (सूर्य गायत्री)
: ओम! हे सूर्य देव, मैं आपकी पूजा करता हूं, आप मुझे ज्ञान के प्रकाश से रोशन करते हैं। हे दिन के निर्माता! मुझे ज्ञान दें और मेरे मन को हल्का करें।
* ''सूर्याद्भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु ।
: ''सूर्ये लयं प्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च ॥'' -- सूर्योपनिषद्
: सूर्य से सम्पूर्ण चराचर जीव उत्पन्न होते हैं, सूर्य के द्वारा ही उनका पालन होता है और फिर सूर्य मे ही वे लय को प्राप्त होते हैं । और जो सूर्यनारायण हैं, वह मैं ही हूँ।
* ''सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । सूर्याद्वै खल्विमानि भूतानि जायन्ते । सूर्याद्यज्ञः पर्जन्योऽन्नमात्मा नमस्त आदित्य ।'' -- सूर्योपनिषद्
: सूर्य सम्पूर्ण जंगम तथा स्थावर-जगत के आत्मा हैं। निश्चयपूर्वक सूर्यनारायण से ही ये भूत उत्पन्न होते हैं। सूर्य से यज्ञ, मेघ, अन्न (बल-वीर्य) और आत्मा (चेतना) का आविर्भाव होता है। आदित्य ! आपको हमारा नमस्कार है।
* ''त्वमेव प्रत्यक्षं कर्मकर्तासि । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वमेव प्रत्यक्षं विष्णुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं रुद्रोऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षमृगसि । त्वमेव प्रत्यक्षं यजुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं सामासि । त्वमेव प्रत्यक्षमथर्वासि । त्वमेव सर्वं छन्दोऽसि ।'' -- सूर्योपनिषद्
: आप ही प्रत्यक्ष कर्म करने वाले हैं। आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं । आप ही प्रत्यक्ष विष्णु हैं। आप ही प्रत्यक्ष रुद्र हैं । आप ही प्रत्यक्ष ऋक् हैं। आप ही प्रत्यक्ष यजुः हैं । आप ही प्रत्यक्ष साम हैं । आप ही प्रत्यक्ष अथर्व हैं । आप ही समस्त छन्द हैं।
* ''आदित्याद्वायुर्जायते । आदित्याद्भूमिर्जायते । आदित्यादापो जायन्ते । आदित्याज्ज्योतिर्जायते । आदित्याद्व्योम दिशो जायन्ते । आदित्याद्देवा जायन्ते । आदित्याद्वेदा जायन्ते ।'' -- सूर्योपनिषद्
: आदित्य से वायु उत्पन्न होती है। आदित्य से भूमि उत्पन्न होती है। आदित्य से जल उत्पन्न होता है। आदित्य से ज्योति (अग्नि) उत्पन्न होती है। आदित्य से आकाश और दिशाएँ उत्पन्न होती हैं। आदित्य से देवता उत्पन्न होते हैं। आदित्य से वेद उत्पन्न होते हैं।
* ''आदित्यो वा एष एतन्मण्डलं तपति । असावादित्यो ब्रह्म । आदित्योऽन्तःकरणमनोबुद्धिचित्ताहङ्काराः । आदित्यो वै व्यानः समानोदानोऽपानः प्राणः । आदित्यो वै श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनघ्राणाः । आदित्यो वै वाक्पाणिपादपायूपस्थाः । आदित्यो वै शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः । आदित्यो वै वचनादानागमनविसर्गानन्दाः । आनन्दमयो ज्ञानमयो विज्ञानानमय आदित्यः ।'' -- सूर्योपनिषद्
: निश्चय ही ये आदित्य देवता इस ब्रह्माण्ड-मण्डल को तपाते (गर्मी देते) हैं। वे आदित्य ब्रह्म हैं । आदित्य ही अन्तःकरण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्काररूप हैं । आदित्य ही प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान-इन पाँचौ प्राणो के रूप मे विराजते हैं। आदित्य ही श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और घ्राण-इन पाँच इन्द्रियो के रूप में कार्य कर रहे हैं। आदित्य ही वाक, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ-ये पॉचो कर्मेन्द्रिय हैं । आदित्य ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये ज्ञानेन्द्रियो के पॉच विषय हैं । आदित्य ही वचन, आदान, गमन, मल-त्याग और आनन्द-ये कर्मेन्द्रियो के पाँच विषय बन रहे हैं। आनन्दमय, ज्ञानमय और विज्ञानमय आदित्य ही हैं।
* ''आदित्यस्य नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने।
: ''आयुः प्रज्ञा बलं वीर्यं तेजस्तेषां च जायते ॥
: जो लोग प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करते हैं, उनकी आयु, प्रज्ञा, बल, वीर्य और तेज बढ़ता है।
* ''उदेति सविता ताम्रः ताम्र एव अस्तमेति च ।
: ''संपत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ॥'' -- [[कालिदास]]
: सूर्य उदय के समय लाल रंग का होता है और अस्त के समय भी लाल रंग का होता है। उन्नति और विपत्ति दोनों में महान लोग एक ही तरह से रहते हैं।
* ''नमस्ते देवदेवेश सहस्रकिरणोज्ज्वल ।
: ''लोकदीप नमस्तेऽस्तु नमस्ते कोणवल्लभ ॥
: ''भास्कराय नमो नित्यं खषोल्काय नमोनमः ।
: ''विष्णवे कालचक्राय सोमायामिततेजसे ॥'' -- भविष्यपुराण, ब्राह्मपर्व : १५३.५०-५१
: सहस्र किरणों से उज्ज्वल, हे देवों के देव ! आप को नमस्कार है। हे संसार के दीपक, आपको नमस्कार है। हे कोणवल्लभ! आप को नमस्कार करता हूँ। संसार को प्रकाश देने वाले को नित्य नमस्कार है। हे अन्तरिक्ष में विचरण करने वाले (खषोल्क), आपको नमस्कार है। हे विष्णु, हे कालचक्र, हे सोम, हे अमित तेज से युक्त, आपको नमस्कार है
*''प्रलयः प्रभवश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः
:''ईश्वरात्परतो विद्या विद्यायाः परत: शिवः।
:''शिवात्परतरो देवस्त्वमेव परमेश्वरः
:''सर्वत:पाणिपादान्तः सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः।
:''सहस्त्रांशु: सहस्त्रास्यः सहस्त्रचरणेक्षण:
:''भूतादिर्भूर्भुवः स्वश्च महः सत्यं तपो जनः।
:''प्रदीप्तं दीपनं दिव्य सर्वलोकप्रकाशकम्
:''दुर्निरीक्षं सुरेन्द्राणां यद्रूपं तस्य ते नमः।।
:हे सूर्य भगवान्! ' प्रलय, सृष्टि, व्यक्त, अव्यक्त एवं सनातन पुरुष आप ही हैं। साक्षात् परमेश्वर आप ही हैं।आपके हाथ और पैर सब ओर हैं। नेत्र, मस्तक और मुख भी सब ओर हैं। आपके सहस्त्रों किरणें, सहस्त्रों मुख, सहस्त्रो चरण और सहस्त्रों नेत्र हैं।आप सम्पूर्ण भूतों के आदिकारण हैं। भू: , भुव:, स्व:, मह:,जन:,तप: और सत्यम् - यह सब आपके ही स्वरूप हैं। आपका जो स्वरूप अत्यंत तेजस्वी, सबका प्रकाशक, दिव्य, सम्पूर्ण लोकों में प्रकाश बिखेरने वाला और देवेश्वरों के द्वारा भी कठिनता से देखे जाने योग्य है, उसको हमारा नमस्कार है।
* माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
: देव दनुज किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनी ॥ -- [[तुलसीदास]]
: सूर्य जब मकर रशि में प्रवेश करते हैं, तो तीर्थराज प्रयाग में सब लोग आते हैं। देवता, दानव, किन्नर, मानव आदि सभी त्रिवेणी में स्नान करते हैं।
* असफलता को इजाज़त दें की वो आपको बड़ा कुछ सिखाये, क्योकि प्रत्येक सूर्यास्त के बाद एक बहुत बड़ा सूर्योदय होता है। -- श्री चिन्मय
* जब भी तुम मुझे देखना चाहते हो, तो हमेशा सूर्यास्त देखना मैं वहाँ रहूँगा। -- ग्रेस ओगेट
* ये सिर्फ सूर्यास्त नहीं है, ये तो चाँद के उगने का वक्त भी है। -- पी सी. कास्ट
* हर सूर्यास्त फिरसे शुरुवात करने का अवसर होता है। -- रिची नॉर्टन
* हर सूर्यास्त एक नई सुबह का वादा लाता है। -- [[राल्फ वाल्डो इमर्सन]]
* ये ना भूलो की सुंदर सूर्यास्त के लिए आसमान में बादल होने भी जरुरी होते है। -- [[पाउलो कोइल्हो]]
* एक स्वस्थ दिन खत्म करने के लिए सुंदर सूर्यास्त जैसा कुछ भी नहीं है। -- [[राहेल बोस्टन]]
* हर एक अच्छे दिन का भी एक सूर्यास्त होता ही है। -- अज्ञात
* जब सूरज डूबने के लिए आया हो, हाथ का हर काम छोड़ दीजिये और उसे देखे। -- मेहमत मूरत इल्दान
* शाम धीरे धीरे सूर्यास्त ले आती है। -- हेनरी वाड्सवर्थ लोंगफेलो
* जब सूरज ढल चूका होता है तो कोई मोमबत्ती उसका स्थान नहीं ले सकती। -- जॉर्ज आर. आर. मार्टिन
* मै आपको सूर्यास्त का समय नहीं दे सकता लेकिन रात दे सकता हु। -- एरिन मैकार्थी
* सूर्यास्त आकाश में रंग भर देता है जैसे कल ऐसा नहीं था। -- एंथोनी हिंक्स
* सूर्यास्त का रंग अभी भी मेरा पसंदीदा रंग है और बाद में इंद्रधनुष का। -- मैटी स्टेपैनेक
* सूर्यास्त देखना और सपने ना दिखना लगभग असंभव है। -- बर्न विलियम्स
* मुझे लगता है की सूर्यादय मेरे लिए बहोत दुर्लभ होगा, पर सूर्यास्त मेरा पसंदीदा समय है। -- जॉन फोरमैन
* सूर्यास्त जीवन का सार बताता है। -- अज्ञात
* सूर्यास्त के बाद आकाश ऐसे प्रकाश में बदल जाता है, जैसे की चांदी के तारों से लिपटा हुआ हल्का बैंगनी रंग। -- जे.के. रोलिंग
==इन्हें भी देखें==
*[[सूर्य नमस्कार]]
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पाणिनि
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''[[:w:'पाणिनि|'पाणिनि]]''' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) [[संस्कृत]] के महान [[व्याकरण|वैयाकरण]] थे जिन्होंने [[अष्टाध्यायी]] नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की।
== उक्तियाँ ==
* ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥'' -- अष्टाध्यायी
: अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।
* "'''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'''" — '''[[अष्टाध्यायी]]'''
: अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।
== पाणिनि पर उद्धरण ==
* "सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान् प्रियान् पणिनेः।" — '''[[पञ्चतन्त्र]]'''
: सिंह ने व्याकरण के रचयिता पाणिनि के प्रिय प्राणों को हर लिया।
* "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — '''ए एल बाशम''', *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३)
* "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — '''ऋषि राजपुरोहित''', *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)*
== देखें भी ==
* [[अष्टाध्यायी]]
* [[संस्कृत]]
* [[भारतीय दर्शन]]
* [[व्याकरण]]
* [[शब्द]]
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी संस्कृत विकिस्रोत पर अष्टाध्यायी]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Panini_(grammarian) पाणिनि का अंग्रेज़ी विकिपीडिया पृष्ठ]
* [https://hi.wikipedia.org/wiki/पाणिनि हिंदी विकिपीडिया पर पाणिनि]
== श्रेणियाँ ==
[[Category:संस्कृत विद्वान]]
[[Category:भारतीय दर्शन]]
[[Category:वैयाकरण]]
[[Category:प्राचीन भारत]]
[[Category:शिक्षा]]
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/* पाणिनि पर उद्धरण */
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''[[:w:'पाणिनि|'पाणिनि]]''' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) [[संस्कृत]] के महान [[व्याकरण|वैयाकरण]] थे जिन्होंने [[अष्टाध्यायी]] नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की।
== उक्तियाँ ==
* ''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥'' -- अष्टाध्यायी
: अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।
* "'''अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्'''" — '''[[अष्टाध्यायी]]'''
: अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।
== पाणिनि पर उद्धरण ==
* "सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान् प्रियान् पणिनेः।" — '''[[पंचतंत्र|पञ्चतन्त्र]]'''
: सिंह ने व्याकरण के रचयिता पाणिनि के प्रिय प्राणों को हर लिया।
* ''येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् ।
: ''कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥
: जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला (अक्षर-ज्ञान) प्राप्त करके संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन (महर्षि) पाणिनि को नमस्कार है।
* ''येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः ।
: ''तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥
: जिन्होंने शब्दों रूपी निर्मल जल के द्वारा मनुष्यों की वाणी के दोषों को धो दिया और अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर दिया, उन पाणिनि को नमस्कार है।
* ''वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् ।
: ''पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥
: वाक्यकार वररुचि (कात्यायन), भाष्यकार पतंजलि और सूत्रकार पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ।
* ''विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ।
: ''काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे मुग्धा निबध्नन्ति किमत्र चित्रम् ॥
: विचारवान पाणिनि ने अपने एक ही सूत्र में कुत्ते (श्वान), युवक (युवन) और इंद्र (मघवन) को एक साथ रख दिया है (यहाँ पाणिनीय सूत्र 'श्वयुवमघोनां तद्धिते' का संदर्भ है)। इसमें आश्चर्य कैसा? जैसे भोली-भाली स्त्रियाँ काँच, मणि और सोने को एक ही धागे में पिरो देती हैं, वैसे ही पाणिनि ने भी किया है।
* "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — '''ए एल बाशम''', *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३)
* "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — '''ऋषि राजपुरोहित''', *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)*
== देखें भी ==
* [[अष्टाध्यायी]]
* [[संस्कृत]]
* [[भारतीय दर्शन]]
* [[व्याकरण]]
* [[शब्द]]
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी संस्कृत विकिस्रोत पर अष्टाध्यायी]
* [https://en.wikipedia.org/wiki/Panini_(grammarian) पाणिनि का अंग्रेज़ी विकिपीडिया पृष्ठ]
* [https://hi.wikipedia.org/wiki/पाणिनि हिंदी विकिपीडिया पर पाणिनि]
== श्रेणियाँ ==
[[Category:संस्कृत विद्वान]]
[[Category:भारतीय दर्शन]]
[[Category:वैयाकरण]]
[[Category:प्राचीन भारत]]
[[Category:शिक्षा]]
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गुरुकुल
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अनुनाद सिंह
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/* इन्हें भी देखें */
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प्राचीन काल के भारतीय विद्यालय जहाँ विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर कई वर्षों तक विद्या सीखते थे।
== उद्धरण ==
* ब्राह्मण शिक्षकों ने जिस शिक्षा प्रणाली का विकास किया, वह न केवल साम्राज्यों के पतन और समाज के परिवर्तनों से अप्रभावित रही, वरन् उसने हजारों वर्षों तक उच्च शिक्षा की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा। -- डॉ० एफ० ई० केई (FE. Keay)
==इन्हें भी देखें==
*[[शिक्षा]]
*[[भारतीय ज्ञान परम्परा]]
==बाहरी कड़ियाँ==
*[https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.62024 Report On The State Of Education In Bengal (1941)] by William Adam
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भारतीय ज्ञान परम्परा
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अनुनाद सिंह
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/* न्याय-दर्शन */
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'''[[:w:भारतीय ज्ञान परम्परा|भारतीय ज्ञान परम्परा]]''' हजारों वर्ष पुरानी है। इस ज्ञान परंपरा में आधुनिक विज्ञान के प्रबंधन सहित सभी क्षेत्रों के लिए अदभुत खजाना है।
किसी भी सभ्यता या संस्कृति का उत्थान-पतन उसकी आर्थिक स्थिति और राजनैतिक स्थिति नहीं होती बल्कि ज्ञान परम्परा होती है। भारतीय संस्कृति ने हमेशा ही ज्ञान परम्परा को महत्त्व दिया है। चिन्तन की प्राचीन परम्परा ‘[[उपनिषद]]’ अर्थात गुरु के पास बैठकर अज्ञान की स्थितियों को नष्ट कर ज्ञान को निरंतर संवाद द्वारा पाने की परम्परा रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा का सबसे बड़ा आधार [[वेद]] हैं। ज्ञान का यह स्वरूप तर्कमूलक, मूल्यनिष्ठ और आचरण सापेक्ष है, जिज्ञासामूलक है, और सामाजिक उद्देश्यों से बंधा हुआ है। चिन्तन का अर्थ यहाँ मुक्तकामी है। [[मुक्ति]] का तात्पर्य यहाँ रूढ़ अर्थों में आध्यात्मिक मुक्ति नहीं है, बल्कि सब प्रकार के बंधनों से मुक्ति है। 'सा विध्या या विमुक्तये' अर्थात विद्या वह नहीं जो बांधती है, बल्कि वह है जो मुक्त करती है। बौद्ध चिन्तन-परम्परा में भी शिष्य के अनुभव और मानवीय विवेक को ही प्रमुखता दी गई है। बुद्ध का कहना है कि मनुष्य कि बुद्धि परिक्षणात्मक होनी चाहिए। उसे किसी के कहे पर पूरा विश्वास न करके स्वयं उस बात या तथ्य को परखना चाहिए। चिन्तन के मूल्यनिष्ठ लोकवादी पक्ष की यह धारा [[वेद|वेदों]], उपनिषदों महाकाव्यों, तथा बौद्ध ग्रन्थों से आगे बढ़ती हुई धर्मशास्त्रों तक चली आई है। इनमें सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों कि शिक्षा दी गई है।<ref>[https://gyanvividha.com/भारतीय-ज्ञान-परंपरा/ भारतीय ज्ञान परम्परा]</ref>
== उद्धरण ==
=== ज्ञान/विद्या/शिक्षा ===
* ''आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः'' -- [[वेद]]
: अर्थात सभी दिशाओं से विचारों को आने दो!
* ''ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्'' । ([[गायत्री मंत्र]])
: हम उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
* ''युक्तियुक्तं वचो ग्राह्यं बालादपि शुकादपि।
: ''युक्तिहीनं वचस् त्याज्यं वृद्धादपि शुकादपि॥'' -- प्रबन्धचिन्तामणि
: यदि कोई बात युक्तियुक्त (तर्कसम्मत) हो तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिये, चाहे वह बालक या आये या तोते से।
: किन्तु युक्तिहीन बात को त्याग देना चाहिये, चाहे वह वृद्ध से आयी हो या शुक (शुकदेव) से।
* ''तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
: ''आयासायापरं कर्म विद्याऽन्या शिल्पनैपुणम् ॥'' -- विष्णुपुराण १-१९-४१
: कर्म वह है जो बन्धन में न डाले ; विद्या वह है जो मुक्त कर दे। अन्य कर्म करना मात्र श्रम करना है तथा अन्य विद्याएँ शिल्प में निपुणता मात्र हैं।
* ''आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यः, मन्तव्यः, निदिध्यासितव्यः।'' -- बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से
: अर्थात्, आत्मा को पहले जानना (दर्शन), फिर सुनना (श्रवण), उस पर विचार करना (मनन), और अंततः गहन ध्यान (निदिध्यासन) करना चाहिए।
* ''श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः।
: ''मत्वा च सततं ध्येयः एते दर्शन हेतवः॥
: अर्थात् आत्मतत्त्व का श्रवण वेद वाक्यों के द्वारा करना चाहिए, मनन तार्किक युक्तियों के सहारे करना चाहिए तथा मनन करने के बाद उसका सतत ध्यान करना चाहिये। ये तीनों (श्रवण, मनन, ध्यान) दर्शन के हेतु हैं।
* ''अज्ञानमेव बन्धः ज्ञानमेव मोक्षः। -- उपनिषद
: अज्ञान ही बन्धन है और ज्ञान ही मोक्ष।
* ''सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः'' -- आचार्य उमास्वाति द्वारा रचित तत्त्वार्थसूत्र १-१
: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं।
* ''वादे वादे जायते तत्त्वबोधः।'' -- रम्भा-शुक सम्वाद
: संवाद से सत्य का बोध हो रहा है।
* ''अधीयानोऽपि तन्त्राणि तन्त्रयुक्त्यविचक्षणः।
: ''नाधिगच्छति तन्त्रार्थमर्थं भाग्यक्षये यथा॥'' -- (अष्टांगहृदय की आचार्य अरुणदत्त कृत 'सर्वाङ्गसुन्दरा' टीका, पृष्ठ ९२)
: जिस प्रकार भाग्य के क्षय होने पर व्यक्ति को अर्थ (धन) की प्राप्ति नहीं होती है, उसी प्रकार यदि किसी ने तन्त्र (शास्त्र) का अध्ययन किया है किन्तु वह '''तन्त्रयुक्ति''' का उपयोग करना नहीं जानता तो वह शास्त्र का अर्थ नहीं समझ पाता है।
* ''अक्रोधो वैराग्यो जितेन्द्रियश्च क्षमा दया सर्वजनप्रियश्च।
: ''निर्लोभो मदभयशोकरहितो ज्ञानस्य एतत् दश लक्षणानि॥
: ज्ञान के ये दस लक्षण हैं- क्रोध न करना, वैराग्य, इन्द्रियों पर विजय, क्षमा, दया, सभी जनों को प्रिय होना, लोभ रहित होना, मद से रहित होना, भयरहित होना, शोकरहित होना।
* ''मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः ।
: ''मुक्तिकैवल्यनिर्वाणश्रेयोनिःश्रेयसामृतम् ॥'' -- अमरकोष
: मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर बुद्धि को 'ज्ञान' कहते हैं जबकि शिल्प और शास्त्र की ओर उन्मुख बुद्धि को 'विज्ञान'।
* '' ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम् ।
: '' अनुभवाख्यं द्वितीयं तुं ज्ञानं तदुर्लभं नृप ॥
: हे राजा ! ज्ञान दो प्रकार के होते हैं; एक तो स्मृतिजन्य शाब्दिक ज्ञान, और दूसरा अनुभवजन्य ज्ञान जो अत्यन्त दुर्लभ है।
* ''अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा, ग्रंथिभ्यो धारिणो वराः।
: ''धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा, ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः॥
: अनपढ़ों की अपेक्षा पुस्तक पढ़ने वाले श्रेष्ठ हैं। पुस्तक पढ़ने वालों की अपेक्षा अर्थ को धारण करने वाले श्रेष्ठ हैं। ग्रंथों के अर्थ को धारण करने वालों की अपेक्षा ज्ञानी श्रेष्ठ हैं। ज्ञानियों की अपेक्षा अर्थ को क्रियान्वित करने वाले श्रेष्ठ हैं।
*''यो हि वेदे च शास्त्रे च ग्रन्थधारणतत्परः।
: ''न च ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञस्तस्य तद्धारणं वृथा॥
: ''भारं स वहते तस्य ग्रन्थस्यार्थं न वेत्ति यः ।
: ''यस् तु ग्रन्थार्थ तत्त्वज्ञो नास्य ग्रन्थागमो वृथा ॥ -- [[महाभारत]]
: जो वेद और शास्त्र के ग्रन्थों को कण्ठस्थ करने में तत्पर रहता है और उन ग्रन्थों के अर्थ के तत्त्व को नहीं समझता, उसका कण्ठस्थ करना व्यर्थ है।
: यदि कोई किसी ग्रन्थ का सही अर्थ नहीं जानता है तो वह उस ग्रन्थ का भार ढोता है। जो उस ग्रन्थ का अर्थ समझ गया है उसका उस ग्रन्थ को पढ़ना व्यर्थ नहीं है।
* ''अनन्तं शास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पश्चकालो बहुविघ्नता च।
: ''यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥'' -- चाणक्यनीति
: शास्त्र अनंत हैं, विद्याएँ अनेक हैं, जीवन की अवधि थोड़ी हैं और विघ्न बहुत हैं। अतः जिस प्रकार हंस पानी अलग कर केवल दूध ही ले लेता हैं, वैसे ही हमें भी इन शास्त्रों में से जो सार तत्व हैं, वहीं ग्रहण करके उसकी उपासना में लग जाना चाहिए।
* ''गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
: ''गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
: गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शिव है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम है।
* उत्तम विद्या लीजिये जदपि नीच पै होय।
: परौ अपावन ठौर में कंचन त्यजत न कोय॥ -- [[कबीरदास]]
=== सत्य ===
=== न्याय-दर्शन===
* ''प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास च्छल जति निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निश्श्रेयसाधिगमः ॥'' -- अक्षपाद गौतम, न्यायसूत्र
: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष) प्राप्त होता है।
* ''प्रमाणैर्थपरीक्षणं न्यायः।'' -- न्यायसूत्र के भाष्यकार महर्षि वात्स्यायन
: प्रमाण के द्वारा किसी अर्थ (सिद्धान्त) की परीक्षा करना ही न्याय है।
* ''प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि।'' -- न्यायसूत्र
: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द - ये (चार) प्रमाण हैं।
* ''इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् '' -- न्यायसूत्र १।१।४
: प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न ज्ञान है जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी और व्यवसायात्मक होता है।
* ''आत्म शरीरेन्द्रियार्थ बुद्धि मनः प्रवृत्ति दोष प्रेत्यभाव फल दुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् '' -- न्यायसूत्र
: आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ , बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग -- ये प्रमेय हैं।
* ''अविज्ञाततत्तवेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्तवज्ञानार्थमूहस्तर्कज्जः'' -- (न्याय दर्शन 1.1.42)
: जिस अर्थ का तत्व निर्णीत न हो उसके तत्त्वज्ञान के लिए युक्ति पूर्वक किए जानेवाले "ऊह" ज्ञान का नाम है "तर्क"।
* ''प्रमाणतर्कसाधनोपलम्भः सिद्धान्त-अविरुद्धः पञ्चवयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः।'' -- न्यायसूत्र
: प्रमाण और तर्क जैसे साधनों का उपयोग करके, सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए, पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच पञ्चावयवी (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन) वाक्यों की सहायता से हुई चर्चा ही 'वाद' है।
* ''प्ररदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्।
: ''आश्रयः सर्वधर्माणां शाश्वदान्वीक्षिकी मता॥ -- वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य 1/1/1 तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र, विद्योद्देश प्रकरण
: आन्विक्षिकी (न्यायविद्या) समस्त विद्याओं का प्रदीप,सब कर्मों का उपाय, तथा सब धर्मों का आश्रय मानी गयी है।
* ''नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थेन्यायः प्रवर्तते किं तर्हि संशयितेऽर्थे '' -- वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य
: उपलब्ध अथवा निर्णीत अर्थ में न्याय की प्रवृत्ति नहीं होती, अपितु सन्दिग्ध अर्थ में ही न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति होती है।
===मीमांसा===
* ''धर्माख्यं विषयं वक्तुं मीमांसायाः प्रयोजनम्।'' -- कुमारिल भट्ट
: [[धर्म]] नामक विषय का प्रतिपादन (व्याख्या) करना ही मीमांसा का मुख्य प्रयोजन (उद्देश्य) है।
*''मीमांसा तु विद्येयं बहुविद्यान्तराश्रिता ।
: ''न शुश्रूषयितुं शक्या प्रागनुक्त्वा प्रयोजनम् ॥'' -- भट्टपाद
: सम्पूर्ण कार्यकलापों के मूलभूत [[वेद]] का विकृष्ट वाक्यार्थ वर्णन करने के लिए यह द्वादशलक्षणी मीमांसा प्रायः सभी विद्याओं (समयविद्या, न्याय अथवा तर्कविद्या, मीमांसा, तन्त्रविद्या, पूर्वमीमांसा, पूर्वतन्त्र, विचारशास्त्र, अध्वरमीमांसा एवं वाक्यशास्त्र एवं धर्मशास्त्र आदि) को अनेक रूपों में प्रभावित करती है।
*''विषयो विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरम् ।
: ''निर्णयश्चेति पञ्चाङ्गं शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ॥'' -- कुमारिल भट्ट, श्लोकवार्तिक में
: विषय, संशय (विशय), पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और निर्णय—इन पाँच अंगों से मिलकर ही शास्त्र में एक 'अधिकरण' बनता है।
* ''श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये परदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्।'' -- मीमांसा 3.3.14
: अन्वय : ''श्रुति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यम् अर्थविप्रकर्षात् ।
: अर्थ : श्रुति (Scripture), लिंग (Characteristics), वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्य (Celebrity) के समवाय में से जो बाद में रखे गये हैं वे पहले लिखे गये गुणों से दुर्बल है।
* ''सत्यं नित्यैव मीमांसा न्यायपिण्डात्मिकेष्यते।
: ''सङ्क्षेपविस्तरग्रन्थैः कृत्रिमैस्तु निबध्यते॥'' -- तन्त्रवार्त्तिक
: मीमांसा (तर्कपूर्ण विचार) वास्तव में नित्य है और इसे न्याय (तर्कों) के समूह के रूप में स्वीकार किया जाता है।
: कुमारिल भट्ट यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मीमांसा केवल एक ग्रन्थ नहीं, बल्कि सत्य और धर्म की व्याख्या के लिए उपयोग की जाने वाली एक शाश्वत तर्क पद्धति है।
* ''न कदाचिदनीदृशं जगत् तस्य निमित्तपरीष्टिः।'' -- जैमिनीय सूत्र १.१.३
: (अथातो धर्मजिज्ञासा, चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः)
: संसार कभी भी इससे भिन्न (जैसा आज है) नहीं था।
: कुमारिल भट्ट इस विचार का खंडन करते हैं कि सृष्टि का कभी कोई "आदि" (शुरुआत) या "प्रलय" (पूर्ण विनाश) हुआ था। मीमांसा के अनुसार, यह जगत प्रवाह रूप में नित्य है। यह जैसा आज दिख रहा है—जन्म, मृत्यु, सुख, दुख और व्यवस्था के साथ—यह अनादि काल से ऐसा ही चला आ रहा है।
*''चतुर्दशसु विद्यासु मीमांसैव गरीयसी।
: चतुर्दश विद्यास्थानो में मीमांसा ही अत्यंत महत्वपूर्ण है।
=== गणित ===
* ''यथा शिखा मयूराणां , नागानां मणयो यथा।
:''तथा वेदांगशास्त्राणां , गणितं मूर्ध्नि स्थितम्॥'' -- वेदाङ्ग ज्योतिष
: जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है।
* ''बहुभिर्प्रलापैः किम् त्रयलोके सचरारे।
: ''यद् किंचिद् वस्तु तत्सर्वम् गणितेन् बिना न हि॥'' -- [[:w:महावीराचार्य|महावीराचार्य]], जैन गणितज्ञ
: बहुत प्रलाप करने से क्या लाभ है? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है वह गणित के बिना नहीं है। उसको गणित के बिना नहीं समझा जा सकता।
* ''लौकिके वैदिके वापि तथा सामयिकेऽपि यः।
: ''व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते॥'' -- महावीराचार्य द्वारा रचित गणितसारसङ्ग्रह में गणितशास्त्रप्रशंसा के अन्तर्गत
: अर्थ: लौकिक, वैदिक तथा सामयिक में जो व्यापार है वहाँ सर्वत्र संख्या का ही उपयोग होता है।
* ''गण्यते संख्यायते तद्गणितम्। तत्प्रतिपादकत्वेन तत्संज्ञं शास्त्रं उच्यते।'' -- भारतीय गणितज्ञ गणेश दैवज्ञ, अपने ग्रन्थ बुद्धिविलासिनी में
: जो परिकलन करता और गिनता है, वह गणित है तथा वह विज्ञान जो इसका आधार है वह भी गणित कहलाता है।
* '' भोज्यं यता सर्वरसं विनाज्यं राज्यं यथा राजविवर्जितं च।
: ''सभा न भातीव सुवक्तृहीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथात्र॥ -- भास्कराचार्य, सिद्धान्तशिरोमणि, गोलाध्याय, श्लोक 4
: खगोल तथा गणित में एक दूसरे से अनभिज्ञ पुरुष उसी प्रकार महत्त्वहीन है जैसे घृत के बिना व्यंजन, राजा के बिना राज्य, तथा अच्छे वक्ता के बिना सभा महत्वहीन होती है।
=== व्याकरण ===
* ''उदाहरणं प्रत्युदाहरणं वाक्याध्याहारः इत्येतत्समुदितं व्याकरणं भवति'' -- महाभाष्य (पश्पशाह्निक)
: उदाहरण और प्रत्युदाहरण, वाक्याध्याहार (पूर्व प्रकरणस्थ पदों की अनुवृत्ति) से युक्त व्याकरण होता है।
* ''कानि पुनः शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि? रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम् ।'' -- महाभाष्य
: शब्दानुशासन के प्रयोजन क्या-क्या है? रक्षा, ऊह, आगम, लघु, असंदेह - ये (व्याकरण के) प्रयोजन हैं।
* ''चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादाः द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।
: ''त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यां आविवेश॥'' -- ऋग्वेद ४.५८.३
: इस मन्त्र में व्याकरण की तुलना वृषभ (बैल) से की गयी है जिसके चार सींग, तीन पैर, दो सिर तथा सात हाथ हैं तथा जो तीन प्रकार से बँधा है। वह वृषभ रोता है। वह महादेव मनुष्यों में प्रविष्ट है।
: उस महान देवता के चार सींग (नाम-आख्यात-उपसर्ग-निपात) , तीन पैर (भूत-वर्तमान-भविष्यत् काल), दो सिर (नित्य और अनित्य शब्द), सात हाथ (सात विभक्तियाँ) , तीन स्थान (उर, कण्ठ, सिर) से बधा हुआ है।
=== धर्म ===
* ''यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।'' -- वैशेषिक सूत्र
: जिससे वर्तमान जीवन में अभ्युदय और भावी जीवन में निःश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि हो, वही धर्म है। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि जिससे भौतिक उन्नति और अध्यात्मिक उन्नति दोनों प्राप्त होतीं हैं, वही धर्म है।
* ''स धर्मो यो निरुपधः सोऽर्थो यो न विरुध्यते ।
: ''स कामः सङ्गहीनो यः स मोक्षो योऽपुनर्भवः ॥
: धर्म वही हैं जिस में कोई छल न हो , अर्थ वही हैं जिस में कोई विरोध न हो , काम वही हैं जिस मे कोई बन्धन न हो और मोक्ष वही है जहाँ कभी भी पुनर्जन्म न हो।
* ''धर्मार्थकामाः सम सेव्यमानाः एको हि भजते स नरः जघन्यः॥
: धर्म, अर्थ और काम समान रूप से सेवन करना अच्छा है। जो केवल एक का सेवन करता है, वह मनुष्य जघन्य है।
===कर्म ===
* ''कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
: ''अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥'' -- श्रीमद् भगवद्गीता, ४-१७
: कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है।
* ''ननुनाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
: ''अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥'' -- ब्रह्मवैवर्तपुराण १/४४/७४
: मनुष्य जो कुछ अच्छा या बुरा कार्य करता है, उसका फल उसे भोगना ही पड़ता है। अनन्त काल बीत जाने पर भी कर्म, फल को प्रदान किए बिना नाश को प्राप्त नहीं होता।
* ''यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते ।
: ''तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्धयति ॥'' -- वाल्मीकि रामायण
:पराक्रम दिखाने का समय आने पर जो पीछे हट जाता है, उस तेजहीन का पुरुषार्थ सिद्ध नही होता।
* ''कर्मणा सिद्धिः ।
: कर्म से ही सिद्धि मिलती है।
* ''ज्ञानं भारः क्रियां बिना।'' -- हितोपदेश
: आचरण के बिना ज्ञान केवल भार होता है।
* ''यः क्रियावान् स पण्डितः ।
: जो क्रियावान है , वही पण्डित (ज्ञानी) है।
=== काम ===
* ''काममय एवायं पुरुष इति। स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति। यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते। यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते॥
: यह पुरुष काममय ही है। वह जैसी काम्ना करता है वैसा करने का यत्न करता है, जैसा करना चाहता है, वैसा ही कर्म करता है, जैसा कर्म करता है वैसा ही काम होता है।
* ''अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः कामातुराणां न भयं न लज्जा ।
: ''विद्यातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न वपुर्न तेजः ॥
: अर्थ के लिये आतुर मनुष्य का कोई मित्र होता है न कोई भाई, काम के लिये आतुर व्यक्ति को न कोई भय होता है न लज्जा, विद्या के लिये आतुर व्यक्ति को न सुख होत है न निद्रा, और भूख से आतुर मनुष्य के पास न तो स्वास्थ्य होता है न तेज।
*'' न पश्यति च जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति।
: ''न पश्यति मदोन्मत्तो स्वार्थी दोषान्न पश्यति॥'' -- सुभाषितरत्नाकर
: जन्म से अन्धे को दिखायी नहीं पड़ता, काम से अन्धा भी नहीं देखता है। नशे में चूर व्यक्ति नहीं देख पाता, स्वार्थी दोषों को नहीं देख पाता।
* ''न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
: ''हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ॥'' -- [[मनुस्मृति]]
: इच्छाएँ कभी भी उपभोग करने से शान्त नहीं होतीं। ये वैसे ही बढ़ जतीं हैं जैसे आग में घी डालने पर अग बढ़ जाती है, शान्त नहीं होती।
=== समय ===
* ''आयुषः क्षणमेकमपि न लभ्यः स्वर्णकोटिभिः ।
: ''स वृथा नीयते येन तस्मै नृपशवे नमः ॥'' -- महासुभाषितसङ्ग्रह
: करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं के द्वारा आयु का एक क्षण भी नहीं पाया जा सकता। वह ( क्षण ) जिसके द्वारा व्यर्थ नष्ट किया जाता है, ऐसे नर-पशु को नमस्कार ।
* ''कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।
: ''इति ते संशयो मा भूद्राजा कालस्य कारणम् ॥'' -- [[महाभारत]], शान्ति पर्व
: (भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि) काल राजा को बनाता है या राजा काल को बनाता है- इसमें तुम कभी संशय मत करना। जान लो कि राजा ही काल को बनाता है। अर्थात् जैसा राजा होगा, वैसा समय होगा और वैसी ही नीतियाँ व परिस्थितियाँ ।
* ''क्षणशः कणशश्चैव विद्याधनं अर्जयेत्।
: क्षण-क्षण का उपयोग करके विद्या का और कण-कण का उपयोग करके धन का अर्जन करना चाहिये।
*''आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः ।
: ''क्षिप्रम् अक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥'' -- [[हितोपदेश]]
:: लेने, देने और करने योग्य कार्य यदि तुरन्त नहीं कर लिया जाता तो समय उसका रस पी जाता है।
=== अर्थशास्त्र ===
* ''मनुष्याणां वृत्तिरर्थः ; मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः । तस्याः लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रमिति ।'' -- कौटिलीय अर्थशास्त्रम्, १८०वाँ प्रकरण (तन्त्रयुक्तयः)
: मनुष्यों की जीविका को अर्थ कहते हैं। मनुष्यों से युक्त भूमि को भी अर्थ कहते हैं। इस प्रकार, भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने वाले उपायों का निरूपण करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र कहलाता है।
* ''श्रुतिस्मृत्यविरोधेन राजवृत्तादिशासनम्।
: ''सुयुक्त्यार्थार्जनं यत्र ह्यर्थशास्त्रं तदुच्यते॥'' -- शुक्रनीति ४-५५, विद्याकलानिरुपणप्रकरण
: अर्थशास्त्र वह है जिसमें राजाओं के आचरण की शिक्षा हो, जो श्रुति-स्मृति से भिन्न हो, और जिसमें बड़ी दक्षता के साथ सम्पत्ति प्राप्त करने की शिक्षा दी गयी हो।<ref>[https://core.ac.uk/download/pdf/144527882.pdf बृहत्त्रयीगत सूक्तियाँ : एक विश्लेषण] (शोधपत्र, २०११)</ref>
* ''अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः।
: ''पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येता चतुर्दश॥
: ''आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।
: ''अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः ॥'' -- [[महाभारत]], शान्तिपर्व ; विष्णुपुराण 3.6.28-29<ref>[https://vyasonmukh-in.translate.goog/2021/01/12/arthashastra-origin-tradition-and-veneration-2/?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc Arthashastra – Origin, Tradition and Veneration]</ref>
:
* ''धर्ममर्थे च कामं च प्रवर्तयति पाति च l
: ''अधर्मानर्थविद्वेषानिदं शास्त्रं निहन्ति च ll'' -- कौटिलीय अर्थशास्त्रम् 15.1.72
:
* ''यतः सर्वप्रयोजनसिद्धिः सोऽर्थः।'' -- नीतिवाक्यामृतम्, अर्थसमुद्देश्य, १
: जिसके द्वारा सभी प्रयोजनों की सिद्धि होती है, वह अर्थ है।
* ''अर्थमूलौ धर्मकामौ।'' -- कौटिल्य अर्थशास्त्र
: धर्म और काम का मूल अर्थ है। ( अर्थ के बिना धर्म और काम भी प्राप्त नहीं नहीं होते।)
=== आयुर्वेद<ref>[https://d1wqtxts1xzle7.cloudfront.net/48254909/ayurveda_and_themimamsa_philosophy-libre.pdf?1471955978=&response-content-disposition=attachment%3B+filename%3DAyurveda_and_the_Mimamsa_Philosophy.pdf&Expires=1769869891&Signature=cST94OJVBe~yXSpE2ti9bYfYzNyyqOBYNSkLTjzQfROYEfIGnnZt1XU5y01hSL8SLkg-nmb4tCFLU3WkvYYjMMmMNfqijFfhFT8KE56as3X1zEirVkcO2E41vxv19f5mfOsYdsH9SKWEN0mq35OmDRrM3kD2D6ksfajv1KJ-JH-EjemYOUROs5ABYC4BaCn8hVI~8KCMfw5XYn2HO96ODfIv8SBId8yd7X5Lm7PQa8~wVbkjtIaphkpkMkkdeLKNBcdMOZpzuz~LnHmCxaxMdPpfqZTRuLxYkcpZg148aEAgdEetfBcGxWkQSHnUpaeGmaZkUf3fa2N3lt6Wcnr1Tw__&Key-Pair-Id=APKAJLOHF5GGSLRBV4ZA Ayurveda and Mimansa Philosophy]</ref> ===
* ''हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम्।
: ''त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः॥'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान
: हेतु (कारण), लिंग (लक्षण) और औषधि का ज्ञान - यह शाश्वत पुण्य त्रिसूत्र (तीन सूत्र) स्वस्थ एवं अस्वस्थ दोनों के लिये है जिसे पितामह (ब्रह्मा) ने कहा है। (आयुर्वेद में कुल तीन प्रकार के सूत्र हैं।)
* ''रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता ।
: ''रोगा दुःखस्य दातारो ज्वरप्रभृतयो हि ते ॥'' -- भावप्रकाश-पूर्वखण्ड-मिश्रप्रकरण
: यह आयुर्वेद का आधारभूत नियम है, त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) का साम्यावस्था मे रहना आरोग्य है, और विषम होना ही रोग का कारण है। रोग, दुख देते हैं। ज्वरादि रोग हैं।
* ''कालार्थकर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः।
: ''सम्यग्गोगश्च विज्ञेयो रोगारोग्यैककारणम्॥'' -- वाग्भटसंहिता, सूत्रस्थान -19
: काल, अर्थ, और कर्म का हीनयोग, मिथ्या योग, अतियोग ही रोग का और सम्यक योग आरोग्य का एकमात्र कारण है।
* '' शास्त्रं ज्योतिः प्रकाशार्थं दर्शनं बुद्धिः आत्मनः ।
: ''ताभ्यां भिषक् सुयुक्ताभ्यां चिकित्सत् न अपराध्यति ॥'' -- चरकसंहिता
: शास्त्र ज्योति के समान होते हैं जो (वस्तुओं को) प्रकाशित करता है। बुद्धि आँख के समान है। इन दोनों से युक्त वैद्य चिकित्सा करते समय गलती नहीं करता।
* ''एकस्मिन्नेव यस्येह शास्त्रे लब्धास्पदा मतिः।
: ''स शास्त्रमन्यदप्याशु युक्तिज्ञत्वात्प्रबुध्यते ॥'' -- चरकसंहिता, सिद्धिस्थान १२.४७
: यदि किसी व्यक्ति ने एक ही शास्त्र का अच्छी तरह से अध्ययन किया है, तो वह अपनी तार्किक क्षमता (युक्तिज्ञता) के कारण अन्य शास्त्रों को भी आसानी से समझ सकता है।
* ''अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानाम् अर्थवशात्तेषां तद्विद्येभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यम्। कस्मात्?
: ''न ह्येकस्मिञ्छास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् ।
: ''तस्माद्बहुश्रुतः शास्त्रं विजानीयाच्चिकित्सकः।'' -- सु. सं. सू. ४, ६-७
: आयुर्वेद में प्रयुक्त अन्य विद्याओं के सिद्धांतों को उन विषयों के विशेषज्ञों से समझना चाहिए।
* कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः शत्रुश्चाबुद्धिमताम्। अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमायुष्यं पौष्टिकं लौक्यमभ्युपदिशता वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यञ्च'' -- च. सं. वि. ८.१४
: बुद्धिमानों के लिए यह सारा संसार ही आचार्य (शिक्षक) है।
* ''श्रुते पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता।
: ''दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम्॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान ९.६
: एक कुशल वैद्य (चिकित्सक) में सिद्धांतों का पूर्ण ज्ञान, व्यापक व्यावहारिक अनुभव, कुशलता, और शारीरिक एवं मानसिक स्वच्छता - ये चार गुण होने चाहिए।
* ''तस्मान्निःसंशयं ज्ञानं हर्त्रा शल्यस्य वाञ्छता । शोधयित्वा मृतं सम्यग्द्रष्टव्यो अङ्गविनिश्चयः ॥ प्रत्यक्षतो हि यद् दृष्टं शास्त्रदृष्टं च यद् भवेत् । समासतस्तदुभयं भूयो ज्ञानविवर्धनम् ॥ प्रत्यक्षवेत्ता हि शास्त्राणां स स्यात् कार्येषु निष्कम्पः ।'' -- सुश्रुतसंहिता, शारीरस्थान, अध्याय 5
: इसलिए, वह शल्य-चिकित्सक (Surgeon) जो पूर्णतः 'निःसंदेह' ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे मृत शरीर का शोधन करके (विच्छेदन/Dissection द्वारा) उसके अंगों और प्रत्यंगों का अच्छी तरह से निरीक्षण करना चाहिए। क्योंकि जो ज्ञान प्रत्यक्ष देखा गया है (Practical Observation) और जो शास्त्रों में पढ़ा गया है (Theoretical Knowledge)—जब इन दोनों का मिलन होता है, तभी ज्ञान का वास्तविक विस्तार होता है। जो शास्त्रों के ज्ञान को अपनी आँखों से (प्रायोगिक रूप से) देख लेता है, वही अपने कार्यों (चिकित्सा या सर्जरी) में 'निष्कम्प' यानी पूर्ण आत्मविश्वासी और अडिग होता है।
* ''यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य।
: ''एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीत्य चार्थेषु मूढाः खरवद्वहन्ति॥'' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान ४.४
: जैसे चंदन के भार को उठाता हुआ गधा बस उस के भार को ही समझता है और चंदन के मूल्य को नहीं समझता, वैसे ही वे लोग हैं जो बहुत से शास्त्रों को पढ़ लेते हैं किन्तु उसके सही अर्थ से अनभिज्ञ हैं।
*''अतश्च प्रकृतं बुध्वा देशकालान्तराणि च।
: ''तन्त्रकर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत्॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान २६.३७
: प्रकरण (विषय), देश (स्थान) और काल (समय) की भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए, तंत्रकार (ग्रन्थकार) के अभिप्राय (उद्देश्य) को समझकर ही निर्णय या अर्थ (उपचार/निष्कर्ष) बताना चाहिए।
* ''अधीयानोऽपि शास्त्राणि तन्त्रयुक्त्या विना भिषक् ।
: ''नाधिगच्छति शास्त्रार्थानर्थान् भाग्यक्षये यथा॥'' -- चरकसंहिता सिद्धिस्थान १२.४८
: तंत्रयुक्ति (शास्त्र के अर्थ को समझने के तर्क/उपकरण) के बिना, चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करने वाला वैद्य (भिषक्) भी उसके सही अर्थ को नहीं समझ पाता, जैसे भाग्य क्षीण होने पर मनुष्य संपत्ति को नहीं पा पाता है।
* ''अत्रासां तन्त्रयुक्तीनां किं प्रयोजनम् ? उच्यते। वाक्ययोजनमर्थयोजनञ्च ।
: ''भवन्ति चात्र श्लोकाः।
: ''असद्द्वादिप्रयुक्तानां वाक्यानां प्रतिषेधनम्।
: ''स्ववाक्यसिद्धिरपि च क्रियते तन्त्रयुक्तितः॥
: ''व्यक्ता नोक्तास्तु ये ह्यर्था लीना ये चाप्यनिर्मलाः।
: ''लेशोक्ता ये च केचित्स्युस्तेषाञ्चापि प्रसाधनम्॥'' -- सुश्रुतसंहिता उत्तरस्थान ६५.५
* ''अधिकरणम्, योगः, पदार्थः, हेत्वर्थः, उद्देशः,उपदेशः, अपदेशः,
:''अपवर्जः, वाक्यशेषः, अर्थापत्तिः, विपर्ययः प्रसङ्गः, एकान्तः,
:''अनेकान्तः, पूर्वपक्षः, निर्णयः, अनुमतम्,, विधानम्, अनागतावेक्षणम्,
:''अतिक्रान्तावेक्षणम्, संशयः, व्याख्यानम्, स्वसंज्ञा, निर्वचनम्, निदर्शनम्,
:''नियोगः विकल्पः, समुच्चयः, ऊह्यम् '' -- सु.सं.सू.६५)
* ''अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानाम् अर्थवशात्तेषां तद्विद्येभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यम्। कस्मात्?
: ''न ह्येकस्मिञ्छास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम्।
: ''तस्माद्बहुश्रुतः शास्त्रं विजानीयाच्चिकित्सकः॥'' -- सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान ४, ६-७
: एक ही शास्त्र या विषय का अध्ययन करने वाला व्यक्ति शास्र के निर्णय को नही समझ सकता इसलिये बहुत शास्त्रों को सुनने पढने वाला चिकित्सक, शास्त्र के तत्त्व को जान सकता।
* ''तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिबाह्येन भेषजम्।
: ''धीमता किञ्चिदादेयं जीवितारोग्यकाङ्क्षिणा॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान १.१२७
: इसलिए, जीवन और आरोग्य (स्वास्थ्य) की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसे वैद्य से कोई भी औषधि ग्रहण नहीं करनी चाहिए जो 'युक्ति' (तर्क और वैज्ञानिक विवेक) से शून्य हो।
*''अज्ञातशास्त्रसद्भावान् शास्त्रमात्रपरायणान्।
: ''त्यजेद्दराद् भिषक्पाशान् पाशान् वैवस्वतानिव ॥
: ''सिद्धान्तो नाम परीक्षकैः बहुविधं परीक्ष्य हेतुभिश्च साधयित्वा निश्चितोऽर्थः।'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान १.१२७
: वे चिकित्सक जो शास्त्रों के वास्तविक अर्थ और गहराई (सद्भाव) से अनभिज्ञ हैं, और केवल रटे-रटाए ग्रंथों (शास्त्रमात्र) पर निर्भर रहते हैं, वे वास्तव में वैद्य कहलाने योग्य नहीं हैं।
=== विविध / प्रकीर्ण ===
* ''अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
: ''यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥'' -- चाणक्यनीति
: शास्त्र अनन्त हैं, विद्याएँ अनेक हैं, जीवन की अवधि थोड़ी हैं और विघ्न बहुत हैं। अतः जिस प्रकार हंस पानी अलग कर केवल दूध ही ले लेता हैं, वैसे ही हमें भी इन शास्त्रों में से जो सार तत्व हैं, वहीं ग्रहण करके उसकी उपासना में लग जाना चाहिए।
* ''तर्कोऽप्रतिष्ठः स्मृतयो विभिन्नाः
: ''नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्।
: ''धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्
: ''महाजनो येन गतः स पन्थाः॥'' -- महाभारतम्
: जीने का वास्तविक तरीका निर्धारित करने के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं हैं। स्मृतियाँ भी अलग-अलग बातें करती हैं। कोई भी एक विचारवन्त (मुनि) नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें। जीवन का वास्तविक तरीका गुप्त है, मानो किसी गुफा में छिपा हो। इसलिए महान लोग जिस मार्ग पर चले थे उसी मार्ग से जाना लाभकारी है।
* ''तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणा क्षारं जलं कापुरुषा पिवन्ति।'' -- योगवासिष्ठ (उत्तरार्ध) / भोजप्रबन्ध
: 'यह मेरे पिता का बनाया हुआ कुँआ है' ऐसा कहने वाले खारा जल पीते हैं।
* ''अकुलीनोऽपि शास्त्रज्ञो दैवतेरपि पूज्यते'' -- हितोपदेश
: नीच कुल वाला भी यदि शास्त्र जानता हो तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है।
* ''काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
: ''व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥
: बुद्धिमान व्यक्ति काव्य, शास्त्र आदि का पठन करके अपना मनोविनोद करते हुए समय को व्यतीत करते हैं और मूर्ख व्यक्ति व्यसन में, सोकर या कलह करके समय बिताते हैं।
* ''यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
: ''लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥
: जिस मनुष्य में स्वयं का विवेक, चेतना एवं बोध नहीं है, उसके लिए शास्त्र क्या कर सकता है। आंखों से हीन अर्थात् अंधे मनुष्य के लिए दर्पण क्या कर सकता है?
* ''केवलं शास्त्रं आश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः
: ''युक्तिहीने विचारे तु धर्महानिः प्रजायते॥'' -- बृहस्पतिस्मृति
: केवल कानून की किताबों व पोथियों मात्र के अध्ययन के आधार पर निर्णय देना उचित नहीं होता। इसके लिए ‘युक्ति’ का सहारा लिया जाना चाहिए। युक्तिहीन विचार से तो धर्म की हानि होती है।
* अमंत्रं अक्षरं नास्ति नास्ति मूलं अनौषधम्।
: ''अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः॥
: कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं।
* ''यस्य कस्य तरोर्मूलं येन केनापि मिश्रित ( घार्षित ) म् ।
: ''यस्मै कस्मै प्रदातव्यं यद्वा तद्वा भविष्यति॥
: जिस-तिस वृक्ष का मूल ले लिया, जिस-किस ने उसका मिश्रण बना दिया, जिस-तिस को उसे दे दिया गया (सेवन करा दिया गया), (तो परिणाम भी) ऐसा-वैसा ही होगा।
* ''दाने तपसि शौर्ये वा विज्ञाने विनये नये ।
: ''विस्मयो नहि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा ॥'' -- चाणक्यनीतिदर्पणः
: दान, तप, शौर्य, विनय और राजनय के क्षेत्र में विस्मय नहीं करना चाहिये। यह धरती बहुत से रत्नों से भरी हुई है।
* ''अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।'' -- गीता
: मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या हूँ;और परस्पर वाद करनेवालों का तत्त्व(सत्य)निर्णय के लिये किया जानेवाला वाद हूँ।
* ''सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायात् मा प्रमद।''
: सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना, स्वाध्याय से प्रमाद मत करना।
* ''तीर्थे तीर्थे निर्मलं ब्रह्मवृन्दं।
: ''वृन्दे वृन्दे तत्त्वचिन्तानुवादः॥
: ''वादे वादे जायते तत्त्वबोधः।
: ''बोधे बोधे भासते चन्द्रचूडः॥'' -- रम्भा शुक संवाद
: प्रत्येक तीर्थ में निर्मल ब्रह्मणों का संघ है। प्रत्येक संघ में तत्त्व-चिन्तन संवाद चल रहा है।
: संवाद से सत्य का बोध होता है। बोध में शिव का आभास होता है।
* ''एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
: सत्य एक ही है। विप्र लोग इसे अलग-अलग प्रकार से कहते हैं।
* ''इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
: ''यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद॥'' -- ऋग्वेद 10.129.7 (नासदीय सूक्त)
: यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुई इसका मुख्य कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता। इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है। हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उसके अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।
* सत्य का मुख स्वर्ण पात्र से ढका है-- ईशावास्योपनिषद
* ''असतो मा सदगमय
: ''तमसो मा ज्योतिर्गमय
: '' मृत्योर्माऽमृतम गमय।
* ''नेति नेति'' । -- [[उपनिषद]]
: ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है।
* ''अपूर्वः कोऽपि कोषोयं विद्यते तव भारति ।
: ''व्ययतो बृद्धिमायाति क्षयं आयाति संचयात्॥
: हे सरस्वती आपके पास कोई अपूर्व कोष है जो व्यय करने पर बढ़ता है और संचय करने पर घटता है।
* ''युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं बालकादपि ।
: ''अन्यत्तृणवत्त्याज्यं अप्युक्तं पद्मजन्मना॥'' -- योगवासिष्ठ
: कोई युक्तियुक्त (तर्कयुक्त) बात बालक द्वारा भी कही गयी हो तो भी उपादेय (ग्रहण करने योग्य) है। किन्तु कमल से जन्मे (ब्रह्मा) द्वारा कही गयी बात भी यदि अयुक्त हो तो वह तृण के समान त्याज्य है।
* ''इति खो, कालामा, यं तं अवोचुंह एथ तुम्हे, कालामा, मा अनुस्सवेन, मा परम्पराय, मा इतिकिराय, मा पिटकसम्पदानेन, मा तक्कहेतु, मा नयहेतु, मा आकार परिवितक्केन , मा दिट्ठिनिज्झानक्खन्तिया, मा भब्बरूपताय, मा समणो नो गरूति। यदा तुम्हे, कालामा, अत्तनाव जानेय्याथ – इमे धम्मा कुसला, इमे धम्मा सावज्जा, इमे धम्मा विञ्ञुगरहिता, इमे धम्मा समत्ता समादिन्ना अहिताय दुक्खाय संवत्तन्तीsति, अथ तुम्हें, कालामा, पजहेय्याथ।'' -- केसमुत्ति सुत्त, त्रिपिटक
: अर्थ : हे कालामाओ ! ये सब मैंने तुमको बताया है, किन्तु तुम इसे स्वीकार करो, इसलिए नहीं कि वह एक अनुविवरण है, इसलिए नहीं कि एक परम्परा है, इसलिए नहीं कि पहले ऐसे कहा गया है, इसलिए नहीं कि यह धर्मग्रन्थ में है। यह विवाद के लिए नहीं, एक विशेष प्रणाली के लिए नहीं, सावधानी से सोचविचार के लिए नहीं, असत्य धारणाओं को सहन करने के लिए नहीं, इसलिए नहीं कि वह अनुकूल मालूम होता है, इसलिए नहीं कि तुम्हारा गुरु एक प्रमाण है, किन्तु तुम स्वयं यदि यह समझते हो कि ये धर्म (धारणाएँ) शुभ हैं, निर्दोष हैं, बुद्धिमान लोग इन धर्मों की प्रशंसा करते हैं, इन धर्मों को ग्रहण करने पर यह कल्याण और सुख देंगे, तब तुम्हें इन्हें स्वीकर करना चाहिए।
* ''गणिकचिकित्सकतार्किकपौराणिकवास्तुशब्दशास्त्रमर्मज्ञाः।
: ''संगीतादिषु निपुणाः सुलभाः न हि तत्त्ववेत्तारः॥'' -- भट्टारक ज्ञानभूषण, तत्त्वज्ञानतरंगिणी
: गणित, चिकित्सा, तर्क (कुतर्क, वाद-विवाद), पुराण, वास्तु, शब्द और संगीत के शास्त्रों में निपुण लोग तो आसानी से मिल जाते हैं, परन्तु तत्त्व के ज्ञाता पुरुष मिलना बहुत कठिन है।<ref>[https://forum.jinswara.com/uploads/short-url/jkC87OhJkjheA4guE8b2fdEO8XZ.pdf न्यायमन्दिर]</ref>
* ''सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः'' -- तत्त्वार्थसूत्र १-१
: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं।
* उत्तम बिद्या लीजिये जदपि नीच पै होय।
: परौ अपावन ठौर में चन्दन त्यजत न कोय। -- कबीरदास
* जिन बूड़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठि।
: मैं बपुरा बूड़न डरा रहा किनारे बैठि। -- कबीरदास
* ज्ञान ‘वर्धमान वृक्ष’ है। -- अश्वघोष, ‘बुद्धचरित’ में
* 'ज्ञान' - सत्य, अनुभव और आत्मबोध का समन्वय है।<ref>[https://www.chemexplorers.in/bhartiya-gyan-parampara/ 'भारतीय ज्ञान परम्परा' : परिचय और अवधारणा]</ref>
* भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक काल से संवाद का महत्व है। समाज में संवाद अब बहुत कम बचा है। याज्ञवलक्य और मैत्रेयी के बीच संवाद (बृहदारण्यक उपनिषद) में दो महत्वपूर्ण विचार हैं। याज्ञवल्क्य ने जब अपनी सारी संपत्ति मैत्रेयी को देने की इच्छा व्यक्त की, मैत्रेयी ने कहा, ‘जिन चीजों से मेरी आत्मा में समृद्धि और असीमता नहीं आएगी, उन्हें लेकर मैं क्या करूंगी?’ इसके विपरीत, आज की गैर-रोमांटिक दुनिया ने ‘भौतिक अमीरी और संवेदना की दरिद्रता का युग्म’ चुना है।
* भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक साहित्य के शुनःशेप और नचिकेता जैसे चरित्र हैं। वे भौतिक सुखों की उपेक्षा करके बड़े [[प्रश्न|प्रश्नों]] के साथ जीना चाहते हैं।
* कठोपनिषद का नचिकेता भौतिक सुख-ऐश्वर्य और सत्ता की तरफ से मुंह फेरकर ज्ञान पाना चाहता है। वह मृत्यु के दरवाजे पर खड़ा है, भूखा-प्यासा और नींदें गंवाकर। उसकी जिज्ञासा ही उसका सहाय है।
=== अंग्रेजों के शासन के पहले की भारतीय शिक्षा ===
* ब्राह्मण शिक्षकों ने जिस शिक्षा प्रणाली का विकास किया, वह न केवल साम्राज्यों के पतन और समाज के परिवर्तनों से अप्रभावित रही, वरन् उसने हजारों वर्षों तक उच्च शिक्षा की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा। -- डॉ० एफ० ई० केई (FE. Keay)
* ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ ज्ञान के प्रति प्रेम इतने प्राचीन समय में प्रारम्भ हुआ हो, या जिसने इतना स्थायी ओर शक्तिशली प्रभाव उत्पन्न किया हो, जितना भारत में। -- एफ डब्ल्यु थॉमस
* विद्यारम्भ संस्कार, उपनयन संस्कार के अनेक वर्षों बाद उस समय आरम्भ हुआ, जब वैदिक संस्कृत, जनसाधारण की बोलचाल की भाषा नहीं रह गई थी। -- डॉ० ए० एस० अल्तेकर
* यह संस्कार पाँच वर्ष की आयु में होता था और साधारणतः सब जातियों के बालकों के लिए था। -- डॉ० वेद मित्र, विद्यारम्भ संस्कार के सम्बन्ध में
* ‘प्रेसीडेंसी के सभी गावों में पाठशालाएं हैं’। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६)
* (मद्रास) प्रेसीडेंसी में 12,498 पाठशालाएं हैं, जिन में 1,88,650 विद्यार्थी पढ़ते हैं। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६)
* पूरे प्रेसीडेन्सी में मुश्किल से कोई छोटा या बड़ा गाँव होगा जिसमें कम से कम एक विद्यालय न हो। -- जी एल प्रेण्डरगास्ट की बॉम्बे प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति के बारे में रपट, मार्च १८२४
* बंगाल और बिहार में एक लाख के लगभग स्कूल्स हैं। इन दोनों प्रान्तों की जनसंख्या चार करोड़ के बराबर है। अर्थात प्रति 400 व्यक्तियों पर एक शाला है। -- विलियम एडम्स की बंगाल प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर पहली रपट, 1835 से 1838 तक
* भारत में बड़ी अच्छी विकेंद्रित शिक्षा व्यवस्था है। लगभग प्रत्येक गांव की अपनी पाठशाला हैं, जो गांव वाले चलाते हैं। इन पाठशालाओं को जमीनें आवंटित हैं, जिनकी आमदनी से पाठशाला का खर्चा निकलता है। ... ‘इन में से अनेक स्कूलों का स्तर तो हमारे ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के बराबर का है। शिक्षकों को अच्छा वेतन दिया जाता हैं।' -- ब्रिटिश आई सी एस अधिकारी जी. डब्लू. लेटनर "History of Indigenous Education in Punjab : Since Annexation and in 1882" में पंजाब में शिक्ष की स्थिति के बारे में सन १८८२ में
* इस होशियारपुर जिले में साक्षरता की दर 84% है। -- जी. डब्लू. लेटनर, उत्तरी पंजाब के होशियारपुर जिले के बृहद सर्वेक्षण के आधार पर, १८७०-७५
* मालाबार के साहित्य का आधार एक जैसा है और इसमें सभी हिंदू राष्ट्रों (भारत क सभी भागों) की तरह ही शिक्षा-सामग्री शामिल है। शिक्षा हर परिवार में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। उनकी कई महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है। बच्चों को हिंसा के बिना और विशेष रूप से सरल प्रक्रिया द्वारा शिक्षा दी जाती है। .... शिष्य एक-दूसरे के मॉनिटर हैं और अक्षरों/ अंकों को रेत पर उंगली से लिखा जाता है। -- ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी, अलेक्जेंडर वॉकर (1764 – 1831) अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 263 पर
* ...ब्रिटिश प्रशासक, जब भारत आये, तो चीज़ों को ज्यों का त्यों अपने कब्जे में लेने के बजाय, उन्हें जड़ से उखाड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने जड़ से मिट्टी हटायी और जड़ को देखने लगे, और जड़ को वैसे ही (बिना मिट्टी के) छोड़ दिया। और वह सुन्दर वृक्ष नष्ट हो गया। -- महात्मा गांधी, 20 अक्टूबर, 1931 को चैथम हाउस, लंदन में
* हालाँकि, तेरहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के आरम्भ तक की अवधि के दौरान इतिहास या शिक्षा की स्थिति पर बहुत कम लिखा गया है। -- डॉ [[धरमपाल|धर्मपाल]], 'द ब्युटीफुल ट्री' की प्रस्तावना में
* इस बात पर ज़ोर देना ज़रूरी है कि स्वदेशी शिक्षा पाठशालाओं, मदरसों और गुरुकुलों के माध्यम से दी जाती थी। इन पारंपरिक संस्थानों का कर्यकलाप 'शिक्षा' कहलाता था और इसे सारे लोग वित्तीय सहयोग देकर जीवित रखते थे। यहाँ तक कि उन लोगों से भी सहयोग मिलता था जो स्वयं अशिक्षित थे। इस शिक्षा में प्रज्ञा, शील और समाधि के विचार शामिल थे। वास्तव में ये संस्थाएँ उस कूप के समान थीं जो समाज की जड़ों को सींचने का कार्य करतीं थीं। इसलिए ये संस्थाएँ आजकल के 'स्कूल' की अपेक्षा बहुत बड़ी भूमिका निभातीं थीं। -- 'द ब्युटीफुल ट्री' में
* प्राचीन "गुरुकुल" प्रणाली को अधिक समालोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है और पहला कदम इन गुरुकुलों के इतिहास के रिकार्डों से यह ढूँढना होगा कि उनके क्रियाकलाप क्या-क्या थे। इसके बिना हम प्राचीन गौरव के बारे में ये निरर्थक बातचीत करते रहेंगे और वर्तमान स्कूल प्रणाली को ऐसी दिशा में धकेलते रहेंगे जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि वह कैसी होगी। -- डॉ धर्मपाल, 'द ब्युटीफुल ट्री' में
== भारतीय ज्ञान के बारे में विद्वानों के विचार ==
* यदि मुझसे पूछा जाये कि किस आकाश के नीचे मानवीय मस्तिष्क ने अपने कुछ चुनिन्दा उपहारों को विकसित किया है, जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर गहन विचार किया है और उनके हल निकाले है, तो मैं भारत की तरफ़ इशारा करूँगा। -- [[मैक्स मूलर]]
* भारत हमारी सम्पूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है। भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है, अरबों के रास्ते हमारे अधिकांश गणित की जननी है, बुद्ध के रास्ते इसाईयत मे निहित आदर्शों की जननी है, ग्रामीण समाज के रास्ते स्व-शाशन और लोकतंत्र की जननी है। अनेक प्रकार से भारत माता हम सबकी माता है। -- [[विल्ल डुरन्ट]] , अमरीकी इतिहासकार
* हम भारतीयों के बहुत ऋणी हैं जिन्होने हमे गिनना सिखाया, जिसके बिना कोई भी मूल्यवान वैज्ञानिक खोज सम्भव नही होती। -- [[अलबर्ट आइन्स्टीन]]
* जब यूरोप के लोग भरतीय दर्शन के सम्पर्क में आयेंगे तो उनके विचार और आस्थाएँ बदलेंगी। वे बदले हुवे लोग यूरोप के विचारों और विश्वास को प्रभावित करेंगे। आगे चलकर यूरोप में ही ईसाई-धर्म को संकट उत्पन्न हो जाएगा। -- प्रसिद्ध दार्शनिक आर्थर शापेनहावर
* भारत मानव जाति का पलना है , मानव-भाषा की जन्मस्थली है , इतिहास की जननी है , पौराणिक कथाओं की दादी है, और प्रथाओं की परदादी है। मानव इतिहास की हमारी सबसे कीमती और सबसे ज्ञान-गर्भित सामग्री केवल भारत में ही संचित है। -- [[मार्क ट्वेन]]
* यदि इस धरातल पर कोई स्थान है जहाँ पर जीवित मानव के सभी स्वप्नों को तब से घर मिला हुआ है जब मानव अस्तित्व के सपने देखना आरम्भ किया था , तो वह भारत ही है। -- फ्रान्सीसी विद्वान [[रोमां रोलां]]
* भारत अपनी सीमा के पार एक भी सैनिक भेजे बिना चीन को जीत लिया और लगभग बीस शताब्दियों तक उस पर सांस्कृतिक रूप से राज किया। -- हू शिह , अमेरिका में चीन के भूतपूर्व राजदूत
* वेदों से हम सर्जरी, चिकित्सा, संगीत, घर बनाना, जिसमे यंत्रीकृत कला शामिल है, की व्यवहारिक कला सीखते हैं। वे जीवन के हर एक पहलू , संस्कृति, धर्म, विज्ञान, नैतिकता, कानून, ब्रह्माण्ड विज्ञान और मौसम विज्ञान के विश्वकोश हैं। -- [[विलियम जोन्स]]
* कुछ सन्दर्भों में प्राचीन भारत की न्यायिक प्रणाली सैद्धान्तिक रूप से हमारी आज की न्यायिक प्रणाली से उन्नत थी। -- जॉन डब्ल्यू स्पेलमैन (John W. Spellman)
* जब तक हमारे विद्वान, विचारक और शिक्षाविद संस्कृत से अनभिज्ञ रहेंगे तब तक हमारी सम्पूर्ण संस्कृति, साहित्य और जीवन अपूर्ण बना रहेगा। -- भारत के प्रथम राष्ट्रपति [[राजेन्द्र प्रसाद|डॉ राजेन्द्र प्रसाद]]
* संस्कृत साहित्य का यूरोप पर इतना अधिक बौद्धिक ऋण है कि उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। आने वाले वर्षों में यह ऋण और बढ़ने की सम्भावना है। हम तो अपनी वर्णमाला तक को परिपूर्ण नहीं बना पाए हैं। (प्रोफ मैक्डोनेल)
* संस्कृत में जितनी स्पष्टता और दार्शनिक परिशुद्धता है, उतनी ग्रीक सहित विश्व की किसी भी भाषा में नहीं है। -- Friedrich von Schlegel
* संस्कृत भाषा की प्राचीनता जो भी हो, इसकी संरचना आश्चर्यजनक है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण (दोषरहित) है, लैटिन से अधिक शब्दबहुल है, और इन दोनों की अपेक्षा अधिक उत्कृष्टतापूर्वक परिशोधित है; फिर भी क्रियाओं के मूलों के रूप में और व्याकरण के रूपों में, इसका इन दोनों भाषाओं के साथ बहुत दृढ़ सम्बन्ध दिखता है, जिसके केवल संयोग से उत्पन्न होने की स्म्भावना कम है। इन तीनों में इतना दृढ़ सम्बन्ध है कि इनका विश्लेषण करके कोई भी भाषाशास्त्री इनके समान स्रोत से निकलने के ही निष्कर्ष पर पहुंचेगा। किन्तु वह स्रोत अब शायद बचा नहीं नहीं है। -- [[विलियम जोन्स]]
* भारत हमारी सम्पूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है। भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है, अरबों के रास्ते हमारे अधिकांश गणित की जननी है, बुद्ध के रास्ते इसाईयत मे निहित आदर्शों की जननी है, ग्रामीण समाज के पथ स्व-शाशन और लोकतंत्र की जननी है। अनेक प्रकार से भारत माता हम सबकी माता है। -- [[विल डुरन्ट|विल्ल डुरन्ट]] , अमरीकी इतिहासकार
* संस्कृत न केवल जीवित है बल्कि यह मृत को जीवित करने की औषधि भी है। -- [[सम्पूर्णानन्द]]
* संस्कृत भाषा, देवभाषा है। यह सत्य युग की भाषा है जो वाक् और अर्थ के सत्य और पूर्ण सम्बन्ध पर आधारित है। इसके प्रत्येक स्वर और व्यञ्जन में एक विशेष अन्तर्भूत शक्ति है जो उनकी प्रकृति के कारण है, किसी विकास के कारण या मानव द्वारा चुना हुआ नहीं है। -- [[अरविन्द घोष|श्री अरविन्द]] , ‘Hymns to the Mystic Fire’)
* सभ्यता के इतिहास में, पुनर्जागरण के बाद, अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संस्कृत साहित्य की खोज से बढकर विश्वव्यापी महत्व की कोई दूसरी घटना नहीं घटी है। (आर्थर अन्थोनी मैक्डोनेल्ड)
* जब हम संस्कृत साहित्य पर ध्यान डालते हैं तो अनन्त की संकल्पना हमारे सामने आ जाती है। सबसे लंबा जीवन भी उन कार्यों के अवलोकन के लिए पर्याप्त नहीं होगा जो भारत की सीमा से परे हिमालय की तरह हर देश की विशालतम संरचना से ऊपर उभरे और फूले हुए हैं। -- [[विलियम जोन्स]]
* पाणिनि का व्याकरण, विश्व के व्याकरणों में सर्वश्रेष्ठ है। यह मानव आविष्कार और उद्योग की सबसे शानदार उपलब्धियों में से एक है। -- सर डब्ल्यू हन्टर
* संस्कृत की संरचना की अप्रतिम पारदर्शिता इसे भारत-यूरोपीय परिवार की भाषाओं में प्रथम स्थान का निर्विवाद अधिकार देती है। -- प्रो० ह्विटनी
* संस्कृत, योरप की आधुनिक भाषाओं की जननी है। - M. Dukois
* सभी लोग पाणिनि के व्याकरण को विश्व का सबसे छोटा और पूर्ण व्याकरण स्वीकार करते हैं। -- प्रो० वेबर
* हिन्दुओं के अलावा कोई भी राष्ट्र अभी तक ध्वनिविज्ञान की इतनी उत्तम प्रणाली की खोज नहीं कर सका है। -- प्रो० विल्सन
* संस्कृत के व्यंजनों का विन्यास, मानव प्रतिभा का अद्वितीय उदाहरण है। -- प्रो० थॉम्पसन
* यदि आप इस कठिनाई ([[संस्कृत]] भाषा सीखने की) से पार पाना चाहते हैं तो यह आसान नहीं होगा क्योंकि अरबी भाषा की तरह शब्दों तथा विभक्तियों, दोनों में ही इस भाषा (संस्कृत) की पहुंच बहुत विस्तृत है। इसमें एक ही वस्तु के लिए कई शब्द, मूल तथा व्युत्पन्न, दोनों प्रयुक्त होते हैं और एक ही शब्द का प्रयोग कई वस्तुओं के लिए होता है। -- अलबरूनी, संस्कृत के बारे में, अपनी पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' में
* उस समय बड़ी संख्या में गुरुकुलों के अलावा, बंगाल और बिहार के प्रत्येक जिले में उच्च शिक्षा के लगभग सौ संस्थान भी थे। दुर्भाग्य से, उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान पूरे भारत में ये संख्या तेज़ी से कम हो गई। अंग्रेजों ने यह भी देखा कि व्याकरण, कोश, गणित, आयुर्वेद, तर्कशास्त्र, कानून और दर्शन को पढ़ाने के लिए संस्कृत पुस्तकों का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा था। ....इसके अलावा, भारत में ब्रिटिश शासन के आरम्भिक काल में, ब्रिटिश अधिकारियों ने देखा कि भारत में आम लोगों की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैंड की तुलना में अधिक उन्नत और व्यापक थी। ...[[धरमपाल|धर्मपाल]] के अनुसार, अंग्रेजों ने बाद में इस संस्कृत-आधारित प्रणाली को अपनी अंग्रेजी-आधारित प्रणाली से बदल दिया, जिसका लक्ष्य ब्रिटिश प्रशासन के लिए निम्न-स्तर के क्लर्क तैयार करना था। -- [[राजीव मल्होत्रा]]
==इन्हें भी देखें==
*[[भारतीय गणित]]
*[[आयुर्वेद]]
*[[भारत]]
*[[संस्कृत]]
*[[ज्ञान]]
*[[गुरु]]
*[[शास्त्रार्थ]]
*[[तर्क]]
*[[विद्या]]
*[[पाण्डित्य]]
*[[प्रश्न]]
==सन्दर्भ==
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32779
32778
2026-04-16T06:20:37Z
अनुनाद सिंह
658
/* सत्य */
32779
wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:भारतीय ज्ञान परम्परा|भारतीय ज्ञान परम्परा]]''' हजारों वर्ष पुरानी है। इस ज्ञान परंपरा में आधुनिक विज्ञान के प्रबंधन सहित सभी क्षेत्रों के लिए अदभुत खजाना है।
किसी भी सभ्यता या संस्कृति का उत्थान-पतन उसकी आर्थिक स्थिति और राजनैतिक स्थिति नहीं होती बल्कि ज्ञान परम्परा होती है। भारतीय संस्कृति ने हमेशा ही ज्ञान परम्परा को महत्त्व दिया है। चिन्तन की प्राचीन परम्परा ‘[[उपनिषद]]’ अर्थात गुरु के पास बैठकर अज्ञान की स्थितियों को नष्ट कर ज्ञान को निरंतर संवाद द्वारा पाने की परम्परा रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा का सबसे बड़ा आधार [[वेद]] हैं। ज्ञान का यह स्वरूप तर्कमूलक, मूल्यनिष्ठ और आचरण सापेक्ष है, जिज्ञासामूलक है, और सामाजिक उद्देश्यों से बंधा हुआ है। चिन्तन का अर्थ यहाँ मुक्तकामी है। [[मुक्ति]] का तात्पर्य यहाँ रूढ़ अर्थों में आध्यात्मिक मुक्ति नहीं है, बल्कि सब प्रकार के बंधनों से मुक्ति है। 'सा विध्या या विमुक्तये' अर्थात विद्या वह नहीं जो बांधती है, बल्कि वह है जो मुक्त करती है। बौद्ध चिन्तन-परम्परा में भी शिष्य के अनुभव और मानवीय विवेक को ही प्रमुखता दी गई है। बुद्ध का कहना है कि मनुष्य कि बुद्धि परिक्षणात्मक होनी चाहिए। उसे किसी के कहे पर पूरा विश्वास न करके स्वयं उस बात या तथ्य को परखना चाहिए। चिन्तन के मूल्यनिष्ठ लोकवादी पक्ष की यह धारा [[वेद|वेदों]], उपनिषदों महाकाव्यों, तथा बौद्ध ग्रन्थों से आगे बढ़ती हुई धर्मशास्त्रों तक चली आई है। इनमें सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों कि शिक्षा दी गई है।<ref>[https://gyanvividha.com/भारतीय-ज्ञान-परंपरा/ भारतीय ज्ञान परम्परा]</ref>
== उद्धरण ==
=== ज्ञान/विद्या/शिक्षा ===
* ''आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः'' -- [[वेद]]
: अर्थात सभी दिशाओं से विचारों को आने दो!
* ''ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्'' । ([[गायत्री मंत्र]])
: हम उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
* ''युक्तियुक्तं वचो ग्राह्यं बालादपि शुकादपि।
: ''युक्तिहीनं वचस् त्याज्यं वृद्धादपि शुकादपि॥'' -- प्रबन्धचिन्तामणि
: यदि कोई बात युक्तियुक्त (तर्कसम्मत) हो तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिये, चाहे वह बालक या आये या तोते से।
: किन्तु युक्तिहीन बात को त्याग देना चाहिये, चाहे वह वृद्ध से आयी हो या शुक (शुकदेव) से।
* ''तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
: ''आयासायापरं कर्म विद्याऽन्या शिल्पनैपुणम् ॥'' -- विष्णुपुराण १-१९-४१
: कर्म वह है जो बन्धन में न डाले ; विद्या वह है जो मुक्त कर दे। अन्य कर्म करना मात्र श्रम करना है तथा अन्य विद्याएँ शिल्प में निपुणता मात्र हैं।
* ''आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यः, मन्तव्यः, निदिध्यासितव्यः।'' -- बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से
: अर्थात्, आत्मा को पहले जानना (दर्शन), फिर सुनना (श्रवण), उस पर विचार करना (मनन), और अंततः गहन ध्यान (निदिध्यासन) करना चाहिए।
* ''श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः।
: ''मत्वा च सततं ध्येयः एते दर्शन हेतवः॥
: अर्थात् आत्मतत्त्व का श्रवण वेद वाक्यों के द्वारा करना चाहिए, मनन तार्किक युक्तियों के सहारे करना चाहिए तथा मनन करने के बाद उसका सतत ध्यान करना चाहिये। ये तीनों (श्रवण, मनन, ध्यान) दर्शन के हेतु हैं।
* ''अज्ञानमेव बन्धः ज्ञानमेव मोक्षः। -- उपनिषद
: अज्ञान ही बन्धन है और ज्ञान ही मोक्ष।
* ''सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः'' -- आचार्य उमास्वाति द्वारा रचित तत्त्वार्थसूत्र १-१
: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं।
* ''वादे वादे जायते तत्त्वबोधः।'' -- रम्भा-शुक सम्वाद
: संवाद से सत्य का बोध हो रहा है।
* ''अधीयानोऽपि तन्त्राणि तन्त्रयुक्त्यविचक्षणः।
: ''नाधिगच्छति तन्त्रार्थमर्थं भाग्यक्षये यथा॥'' -- (अष्टांगहृदय की आचार्य अरुणदत्त कृत 'सर्वाङ्गसुन्दरा' टीका, पृष्ठ ९२)
: जिस प्रकार भाग्य के क्षय होने पर व्यक्ति को अर्थ (धन) की प्राप्ति नहीं होती है, उसी प्रकार यदि किसी ने तन्त्र (शास्त्र) का अध्ययन किया है किन्तु वह '''तन्त्रयुक्ति''' का उपयोग करना नहीं जानता तो वह शास्त्र का अर्थ नहीं समझ पाता है।
* ''अक्रोधो वैराग्यो जितेन्द्रियश्च क्षमा दया सर्वजनप्रियश्च।
: ''निर्लोभो मदभयशोकरहितो ज्ञानस्य एतत् दश लक्षणानि॥
: ज्ञान के ये दस लक्षण हैं- क्रोध न करना, वैराग्य, इन्द्रियों पर विजय, क्षमा, दया, सभी जनों को प्रिय होना, लोभ रहित होना, मद से रहित होना, भयरहित होना, शोकरहित होना।
* ''मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः ।
: ''मुक्तिकैवल्यनिर्वाणश्रेयोनिःश्रेयसामृतम् ॥'' -- अमरकोष
: मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर बुद्धि को 'ज्ञान' कहते हैं जबकि शिल्प और शास्त्र की ओर उन्मुख बुद्धि को 'विज्ञान'।
* '' ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम् ।
: '' अनुभवाख्यं द्वितीयं तुं ज्ञानं तदुर्लभं नृप ॥
: हे राजा ! ज्ञान दो प्रकार के होते हैं; एक तो स्मृतिजन्य शाब्दिक ज्ञान, और दूसरा अनुभवजन्य ज्ञान जो अत्यन्त दुर्लभ है।
* ''अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा, ग्रंथिभ्यो धारिणो वराः।
: ''धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा, ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः॥
: अनपढ़ों की अपेक्षा पुस्तक पढ़ने वाले श्रेष्ठ हैं। पुस्तक पढ़ने वालों की अपेक्षा अर्थ को धारण करने वाले श्रेष्ठ हैं। ग्रंथों के अर्थ को धारण करने वालों की अपेक्षा ज्ञानी श्रेष्ठ हैं। ज्ञानियों की अपेक्षा अर्थ को क्रियान्वित करने वाले श्रेष्ठ हैं।
*''यो हि वेदे च शास्त्रे च ग्रन्थधारणतत्परः।
: ''न च ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञस्तस्य तद्धारणं वृथा॥
: ''भारं स वहते तस्य ग्रन्थस्यार्थं न वेत्ति यः ।
: ''यस् तु ग्रन्थार्थ तत्त्वज्ञो नास्य ग्रन्थागमो वृथा ॥ -- [[महाभारत]]
: जो वेद और शास्त्र के ग्रन्थों को कण्ठस्थ करने में तत्पर रहता है और उन ग्रन्थों के अर्थ के तत्त्व को नहीं समझता, उसका कण्ठस्थ करना व्यर्थ है।
: यदि कोई किसी ग्रन्थ का सही अर्थ नहीं जानता है तो वह उस ग्रन्थ का भार ढोता है। जो उस ग्रन्थ का अर्थ समझ गया है उसका उस ग्रन्थ को पढ़ना व्यर्थ नहीं है।
* ''अनन्तं शास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पश्चकालो बहुविघ्नता च।
: ''यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥'' -- चाणक्यनीति
: शास्त्र अनंत हैं, विद्याएँ अनेक हैं, जीवन की अवधि थोड़ी हैं और विघ्न बहुत हैं। अतः जिस प्रकार हंस पानी अलग कर केवल दूध ही ले लेता हैं, वैसे ही हमें भी इन शास्त्रों में से जो सार तत्व हैं, वहीं ग्रहण करके उसकी उपासना में लग जाना चाहिए।
* ''गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
: ''गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
: गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शिव है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम है।
* उत्तम विद्या लीजिये जदपि नीच पै होय।
: परौ अपावन ठौर में कंचन त्यजत न कोय॥ -- [[कबीरदास]]
=== सत्य ===
* ''सत्यं ब्रह्म ।
: सत्य ही ब्रह्म है।
* ''सत्यमेवेश्वरो लोके सत्यं पद्माश्रिता सदा।
: ''सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्॥'' -- वाल्मीकि रामायण
: संसार में सत्य ही ईश्वर है। सत्य ही लक्ष्मी (= धन-धान्य) का निवास है। सत्य ही सभी (अच्छाइयों) का मूल है। संसार में सत्य से बढ़कर और कोई परम पद नहीं है।
*''सत्यमेव परं मित्रं स्वीकृते सति मानवे ।
:''सत्यमेव परं शत्रुः धिक्कृते सति मानवे ।।
: हम सत्य को स्वीकार करते है तो सत्य हमारा सबसे श्रेष्ठ मित्र बन जाता है। लेकिन अगर हम सत्य का स्वीकार न करके धिक्कारते है, तो जीवन में आगे चलकर वही सत्य हमारे लिए परं शत्रु बन जाता है।
* ''नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ।
: ''अतः सर्वेषु कार्येषु सत्यमेव विशिष्यते ॥'' -- महाभारत, आदि पर्व में शकुन्तला का कथन
: सत्य से बढ़कर धर्म और असत्य से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। अतः सभी कार्यों में सत्य को ही श्रेष्ठ माना गया है।
* ''सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
: ''येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥ -- मुण्डकोपनिषद्
: सत्य की ही विजय होती है असत्य की नहीं ; 'सत्य' के द्वारा ही देवों का यात्रा-पथ विस्तीर्ण हुआ, जिसके द्वारा आप्तकाम ऋषिगण वहां आरोहण करते हैं जहाँ 'सत्य' का परम धाम है।
* ''हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
: ''तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥'' -- ईशोपनिषद्
: सत्य का मुख स्वर्ण के पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन् ! उस सत्यधर्म के दिखाई देने के लिए तू उस आवरण को हटा दे। (इन भौतिक पदार्थों की चकाचौंध ने मनुष्य की आँख से सत्य को ओझल कर दिया है। भक्त सत्य के दर्शन करना चाहता है। सांसारिकता सोने का ढक्कन है और आत्म-परमात्म-चिन्तन वह सत्य है जिसे सांसारिकता छिपा देती है।)
* ''सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः ।
: ''सत्येन वायवो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
: सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है । सब सत्य पर आधारित है ।
* ''नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम् ।
: ''न हि तीव्रतरं किञ्चिदनृतादिह विद्यते ॥
: सत्य जैसा अन्य धर्म नहीं । सत्य से पर कुछ नहीं । असत्य से ज्यादा तीव्रतर कुछ नहीं ।
* ''सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
: ''येनाक्रमत् मनुष्यो ह्यात्मकामो यत्र तत् सत्यस्य परं निधानं ॥
: जय सत्य का होता है, असत्य का नहीं । दैवी मार्ग सत्य से फैला हुआ है । जिस मार्ग पे जाने से मनुष्य आत्मकाम बनता है, वही सत्य का परम् धाम है ।
* ''नानृतात्पातकं किञ्चित् न सत्यात् सुकृतं परम् ।
: ''विवेकात् न परो बन्धुः इति वेदविदो विदुः ॥
: वेदों के जानकार कहते हैं कि अनृत (असत्य) के अलावा और कोई पातक नहीं; सत्य के अलावा अन्य कोई सुकृत नहीं और विवेक के अलावा अन्य कोई भाई नहीं।
=== न्याय-दर्शन===
* ''प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास च्छल जति निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निश्श्रेयसाधिगमः ॥'' -- अक्षपाद गौतम, न्यायसूत्र
: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष) प्राप्त होता है।
* ''प्रमाणैर्थपरीक्षणं न्यायः।'' -- न्यायसूत्र के भाष्यकार महर्षि वात्स्यायन
: प्रमाण के द्वारा किसी अर्थ (सिद्धान्त) की परीक्षा करना ही न्याय है।
* ''प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि।'' -- न्यायसूत्र
: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द - ये (चार) प्रमाण हैं।
* ''इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् '' -- न्यायसूत्र १।१।४
: प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न ज्ञान है जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी और व्यवसायात्मक होता है।
* ''आत्म शरीरेन्द्रियार्थ बुद्धि मनः प्रवृत्ति दोष प्रेत्यभाव फल दुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् '' -- न्यायसूत्र
: आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ , बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग -- ये प्रमेय हैं।
* ''अविज्ञाततत्तवेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्तवज्ञानार्थमूहस्तर्कज्जः'' -- (न्याय दर्शन 1.1.42)
: जिस अर्थ का तत्व निर्णीत न हो उसके तत्त्वज्ञान के लिए युक्ति पूर्वक किए जानेवाले "ऊह" ज्ञान का नाम है "तर्क"।
* ''प्रमाणतर्कसाधनोपलम्भः सिद्धान्त-अविरुद्धः पञ्चवयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः।'' -- न्यायसूत्र
: प्रमाण और तर्क जैसे साधनों का उपयोग करके, सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए, पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच पञ्चावयवी (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन) वाक्यों की सहायता से हुई चर्चा ही 'वाद' है।
* ''प्ररदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्।
: ''आश्रयः सर्वधर्माणां शाश्वदान्वीक्षिकी मता॥ -- वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य 1/1/1 तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र, विद्योद्देश प्रकरण
: आन्विक्षिकी (न्यायविद्या) समस्त विद्याओं का प्रदीप,सब कर्मों का उपाय, तथा सब धर्मों का आश्रय मानी गयी है।
* ''नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थेन्यायः प्रवर्तते किं तर्हि संशयितेऽर्थे '' -- वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य
: उपलब्ध अथवा निर्णीत अर्थ में न्याय की प्रवृत्ति नहीं होती, अपितु सन्दिग्ध अर्थ में ही न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति होती है।
===मीमांसा===
* ''धर्माख्यं विषयं वक्तुं मीमांसायाः प्रयोजनम्।'' -- कुमारिल भट्ट
: [[धर्म]] नामक विषय का प्रतिपादन (व्याख्या) करना ही मीमांसा का मुख्य प्रयोजन (उद्देश्य) है।
*''मीमांसा तु विद्येयं बहुविद्यान्तराश्रिता ।
: ''न शुश्रूषयितुं शक्या प्रागनुक्त्वा प्रयोजनम् ॥'' -- भट्टपाद
: सम्पूर्ण कार्यकलापों के मूलभूत [[वेद]] का विकृष्ट वाक्यार्थ वर्णन करने के लिए यह द्वादशलक्षणी मीमांसा प्रायः सभी विद्याओं (समयविद्या, न्याय अथवा तर्कविद्या, मीमांसा, तन्त्रविद्या, पूर्वमीमांसा, पूर्वतन्त्र, विचारशास्त्र, अध्वरमीमांसा एवं वाक्यशास्त्र एवं धर्मशास्त्र आदि) को अनेक रूपों में प्रभावित करती है।
*''विषयो विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरम् ।
: ''निर्णयश्चेति पञ्चाङ्गं शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ॥'' -- कुमारिल भट्ट, श्लोकवार्तिक में
: विषय, संशय (विशय), पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और निर्णय—इन पाँच अंगों से मिलकर ही शास्त्र में एक 'अधिकरण' बनता है।
* ''श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये परदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्।'' -- मीमांसा 3.3.14
: अन्वय : ''श्रुति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यम् अर्थविप्रकर्षात् ।
: अर्थ : श्रुति (Scripture), लिंग (Characteristics), वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्य (Celebrity) के समवाय में से जो बाद में रखे गये हैं वे पहले लिखे गये गुणों से दुर्बल है।
* ''सत्यं नित्यैव मीमांसा न्यायपिण्डात्मिकेष्यते।
: ''सङ्क्षेपविस्तरग्रन्थैः कृत्रिमैस्तु निबध्यते॥'' -- तन्त्रवार्त्तिक
: मीमांसा (तर्कपूर्ण विचार) वास्तव में नित्य है और इसे न्याय (तर्कों) के समूह के रूप में स्वीकार किया जाता है।
: कुमारिल भट्ट यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मीमांसा केवल एक ग्रन्थ नहीं, बल्कि सत्य और धर्म की व्याख्या के लिए उपयोग की जाने वाली एक शाश्वत तर्क पद्धति है।
* ''न कदाचिदनीदृशं जगत् तस्य निमित्तपरीष्टिः।'' -- जैमिनीय सूत्र १.१.३
: (अथातो धर्मजिज्ञासा, चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः)
: संसार कभी भी इससे भिन्न (जैसा आज है) नहीं था।
: कुमारिल भट्ट इस विचार का खंडन करते हैं कि सृष्टि का कभी कोई "आदि" (शुरुआत) या "प्रलय" (पूर्ण विनाश) हुआ था। मीमांसा के अनुसार, यह जगत प्रवाह रूप में नित्य है। यह जैसा आज दिख रहा है—जन्म, मृत्यु, सुख, दुख और व्यवस्था के साथ—यह अनादि काल से ऐसा ही चला आ रहा है।
*''चतुर्दशसु विद्यासु मीमांसैव गरीयसी।
: चतुर्दश विद्यास्थानो में मीमांसा ही अत्यंत महत्वपूर्ण है।
=== गणित ===
* ''यथा शिखा मयूराणां , नागानां मणयो यथा।
:''तथा वेदांगशास्त्राणां , गणितं मूर्ध्नि स्थितम्॥'' -- वेदाङ्ग ज्योतिष
: जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है।
* ''बहुभिर्प्रलापैः किम् त्रयलोके सचरारे।
: ''यद् किंचिद् वस्तु तत्सर्वम् गणितेन् बिना न हि॥'' -- [[:w:महावीराचार्य|महावीराचार्य]], जैन गणितज्ञ
: बहुत प्रलाप करने से क्या लाभ है? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है वह गणित के बिना नहीं है। उसको गणित के बिना नहीं समझा जा सकता।
* ''लौकिके वैदिके वापि तथा सामयिकेऽपि यः।
: ''व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते॥'' -- महावीराचार्य द्वारा रचित गणितसारसङ्ग्रह में गणितशास्त्रप्रशंसा के अन्तर्गत
: अर्थ: लौकिक, वैदिक तथा सामयिक में जो व्यापार है वहाँ सर्वत्र संख्या का ही उपयोग होता है।
* ''गण्यते संख्यायते तद्गणितम्। तत्प्रतिपादकत्वेन तत्संज्ञं शास्त्रं उच्यते।'' -- भारतीय गणितज्ञ गणेश दैवज्ञ, अपने ग्रन्थ बुद्धिविलासिनी में
: जो परिकलन करता और गिनता है, वह गणित है तथा वह विज्ञान जो इसका आधार है वह भी गणित कहलाता है।
* '' भोज्यं यता सर्वरसं विनाज्यं राज्यं यथा राजविवर्जितं च।
: ''सभा न भातीव सुवक्तृहीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथात्र॥ -- भास्कराचार्य, सिद्धान्तशिरोमणि, गोलाध्याय, श्लोक 4
: खगोल तथा गणित में एक दूसरे से अनभिज्ञ पुरुष उसी प्रकार महत्त्वहीन है जैसे घृत के बिना व्यंजन, राजा के बिना राज्य, तथा अच्छे वक्ता के बिना सभा महत्वहीन होती है।
=== व्याकरण ===
* ''उदाहरणं प्रत्युदाहरणं वाक्याध्याहारः इत्येतत्समुदितं व्याकरणं भवति'' -- महाभाष्य (पश्पशाह्निक)
: उदाहरण और प्रत्युदाहरण, वाक्याध्याहार (पूर्व प्रकरणस्थ पदों की अनुवृत्ति) से युक्त व्याकरण होता है।
* ''कानि पुनः शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि? रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम् ।'' -- महाभाष्य
: शब्दानुशासन के प्रयोजन क्या-क्या है? रक्षा, ऊह, आगम, लघु, असंदेह - ये (व्याकरण के) प्रयोजन हैं।
* ''चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादाः द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।
: ''त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यां आविवेश॥'' -- ऋग्वेद ४.५८.३
: इस मन्त्र में व्याकरण की तुलना वृषभ (बैल) से की गयी है जिसके चार सींग, तीन पैर, दो सिर तथा सात हाथ हैं तथा जो तीन प्रकार से बँधा है। वह वृषभ रोता है। वह महादेव मनुष्यों में प्रविष्ट है।
: उस महान देवता के चार सींग (नाम-आख्यात-उपसर्ग-निपात) , तीन पैर (भूत-वर्तमान-भविष्यत् काल), दो सिर (नित्य और अनित्य शब्द), सात हाथ (सात विभक्तियाँ) , तीन स्थान (उर, कण्ठ, सिर) से बधा हुआ है।
=== धर्म ===
* ''यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।'' -- वैशेषिक सूत्र
: जिससे वर्तमान जीवन में अभ्युदय और भावी जीवन में निःश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि हो, वही धर्म है। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि जिससे भौतिक उन्नति और अध्यात्मिक उन्नति दोनों प्राप्त होतीं हैं, वही धर्म है।
* ''स धर्मो यो निरुपधः सोऽर्थो यो न विरुध्यते ।
: ''स कामः सङ्गहीनो यः स मोक्षो योऽपुनर्भवः ॥
: धर्म वही हैं जिस में कोई छल न हो , अर्थ वही हैं जिस में कोई विरोध न हो , काम वही हैं जिस मे कोई बन्धन न हो और मोक्ष वही है जहाँ कभी भी पुनर्जन्म न हो।
* ''धर्मार्थकामाः सम सेव्यमानाः एको हि भजते स नरः जघन्यः॥
: धर्म, अर्थ और काम समान रूप से सेवन करना अच्छा है। जो केवल एक का सेवन करता है, वह मनुष्य जघन्य है।
===कर्म ===
* ''कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
: ''अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥'' -- श्रीमद् भगवद्गीता, ४-१७
: कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है।
* ''ननुनाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
: ''अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥'' -- ब्रह्मवैवर्तपुराण १/४४/७४
: मनुष्य जो कुछ अच्छा या बुरा कार्य करता है, उसका फल उसे भोगना ही पड़ता है। अनन्त काल बीत जाने पर भी कर्म, फल को प्रदान किए बिना नाश को प्राप्त नहीं होता।
* ''यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते ।
: ''तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्धयति ॥'' -- वाल्मीकि रामायण
:पराक्रम दिखाने का समय आने पर जो पीछे हट जाता है, उस तेजहीन का पुरुषार्थ सिद्ध नही होता।
* ''कर्मणा सिद्धिः ।
: कर्म से ही सिद्धि मिलती है।
* ''ज्ञानं भारः क्रियां बिना।'' -- हितोपदेश
: आचरण के बिना ज्ञान केवल भार होता है।
* ''यः क्रियावान् स पण्डितः ।
: जो क्रियावान है , वही पण्डित (ज्ञानी) है।
=== काम ===
* ''काममय एवायं पुरुष इति। स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति। यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते। यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते॥
: यह पुरुष काममय ही है। वह जैसी काम्ना करता है वैसा करने का यत्न करता है, जैसा करना चाहता है, वैसा ही कर्म करता है, जैसा कर्म करता है वैसा ही काम होता है।
* ''अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः कामातुराणां न भयं न लज्जा ।
: ''विद्यातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न वपुर्न तेजः ॥
: अर्थ के लिये आतुर मनुष्य का कोई मित्र होता है न कोई भाई, काम के लिये आतुर व्यक्ति को न कोई भय होता है न लज्जा, विद्या के लिये आतुर व्यक्ति को न सुख होत है न निद्रा, और भूख से आतुर मनुष्य के पास न तो स्वास्थ्य होता है न तेज।
*'' न पश्यति च जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति।
: ''न पश्यति मदोन्मत्तो स्वार्थी दोषान्न पश्यति॥'' -- सुभाषितरत्नाकर
: जन्म से अन्धे को दिखायी नहीं पड़ता, काम से अन्धा भी नहीं देखता है। नशे में चूर व्यक्ति नहीं देख पाता, स्वार्थी दोषों को नहीं देख पाता।
* ''न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
: ''हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ॥'' -- [[मनुस्मृति]]
: इच्छाएँ कभी भी उपभोग करने से शान्त नहीं होतीं। ये वैसे ही बढ़ जतीं हैं जैसे आग में घी डालने पर अग बढ़ जाती है, शान्त नहीं होती।
=== समय ===
* ''आयुषः क्षणमेकमपि न लभ्यः स्वर्णकोटिभिः ।
: ''स वृथा नीयते येन तस्मै नृपशवे नमः ॥'' -- महासुभाषितसङ्ग्रह
: करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं के द्वारा आयु का एक क्षण भी नहीं पाया जा सकता। वह ( क्षण ) जिसके द्वारा व्यर्थ नष्ट किया जाता है, ऐसे नर-पशु को नमस्कार ।
* ''कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।
: ''इति ते संशयो मा भूद्राजा कालस्य कारणम् ॥'' -- [[महाभारत]], शान्ति पर्व
: (भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि) काल राजा को बनाता है या राजा काल को बनाता है- इसमें तुम कभी संशय मत करना। जान लो कि राजा ही काल को बनाता है। अर्थात् जैसा राजा होगा, वैसा समय होगा और वैसी ही नीतियाँ व परिस्थितियाँ ।
* ''क्षणशः कणशश्चैव विद्याधनं अर्जयेत्।
: क्षण-क्षण का उपयोग करके विद्या का और कण-कण का उपयोग करके धन का अर्जन करना चाहिये।
*''आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः ।
: ''क्षिप्रम् अक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥'' -- [[हितोपदेश]]
:: लेने, देने और करने योग्य कार्य यदि तुरन्त नहीं कर लिया जाता तो समय उसका रस पी जाता है।
=== अर्थशास्त्र ===
* ''मनुष्याणां वृत्तिरर्थः ; मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः । तस्याः लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रमिति ।'' -- कौटिलीय अर्थशास्त्रम्, १८०वाँ प्रकरण (तन्त्रयुक्तयः)
: मनुष्यों की जीविका को अर्थ कहते हैं। मनुष्यों से युक्त भूमि को भी अर्थ कहते हैं। इस प्रकार, भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने वाले उपायों का निरूपण करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र कहलाता है।
* ''श्रुतिस्मृत्यविरोधेन राजवृत्तादिशासनम्।
: ''सुयुक्त्यार्थार्जनं यत्र ह्यर्थशास्त्रं तदुच्यते॥'' -- शुक्रनीति ४-५५, विद्याकलानिरुपणप्रकरण
: अर्थशास्त्र वह है जिसमें राजाओं के आचरण की शिक्षा हो, जो श्रुति-स्मृति से भिन्न हो, और जिसमें बड़ी दक्षता के साथ सम्पत्ति प्राप्त करने की शिक्षा दी गयी हो।<ref>[https://core.ac.uk/download/pdf/144527882.pdf बृहत्त्रयीगत सूक्तियाँ : एक विश्लेषण] (शोधपत्र, २०११)</ref>
* ''अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः।
: ''पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येता चतुर्दश॥
: ''आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।
: ''अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः ॥'' -- [[महाभारत]], शान्तिपर्व ; विष्णुपुराण 3.6.28-29<ref>[https://vyasonmukh-in.translate.goog/2021/01/12/arthashastra-origin-tradition-and-veneration-2/?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc Arthashastra – Origin, Tradition and Veneration]</ref>
:
* ''धर्ममर्थे च कामं च प्रवर्तयति पाति च l
: ''अधर्मानर्थविद्वेषानिदं शास्त्रं निहन्ति च ll'' -- कौटिलीय अर्थशास्त्रम् 15.1.72
:
* ''यतः सर्वप्रयोजनसिद्धिः सोऽर्थः।'' -- नीतिवाक्यामृतम्, अर्थसमुद्देश्य, १
: जिसके द्वारा सभी प्रयोजनों की सिद्धि होती है, वह अर्थ है।
* ''अर्थमूलौ धर्मकामौ।'' -- कौटिल्य अर्थशास्त्र
: धर्म और काम का मूल अर्थ है। ( अर्थ के बिना धर्म और काम भी प्राप्त नहीं नहीं होते।)
=== आयुर्वेद<ref>[https://d1wqtxts1xzle7.cloudfront.net/48254909/ayurveda_and_themimamsa_philosophy-libre.pdf?1471955978=&response-content-disposition=attachment%3B+filename%3DAyurveda_and_the_Mimamsa_Philosophy.pdf&Expires=1769869891&Signature=cST94OJVBe~yXSpE2ti9bYfYzNyyqOBYNSkLTjzQfROYEfIGnnZt1XU5y01hSL8SLkg-nmb4tCFLU3WkvYYjMMmMNfqijFfhFT8KE56as3X1zEirVkcO2E41vxv19f5mfOsYdsH9SKWEN0mq35OmDRrM3kD2D6ksfajv1KJ-JH-EjemYOUROs5ABYC4BaCn8hVI~8KCMfw5XYn2HO96ODfIv8SBId8yd7X5Lm7PQa8~wVbkjtIaphkpkMkkdeLKNBcdMOZpzuz~LnHmCxaxMdPpfqZTRuLxYkcpZg148aEAgdEetfBcGxWkQSHnUpaeGmaZkUf3fa2N3lt6Wcnr1Tw__&Key-Pair-Id=APKAJLOHF5GGSLRBV4ZA Ayurveda and Mimansa Philosophy]</ref> ===
* ''हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम्।
: ''त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः॥'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान
: हेतु (कारण), लिंग (लक्षण) और औषधि का ज्ञान - यह शाश्वत पुण्य त्रिसूत्र (तीन सूत्र) स्वस्थ एवं अस्वस्थ दोनों के लिये है जिसे पितामह (ब्रह्मा) ने कहा है। (आयुर्वेद में कुल तीन प्रकार के सूत्र हैं।)
* ''रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता ।
: ''रोगा दुःखस्य दातारो ज्वरप्रभृतयो हि ते ॥'' -- भावप्रकाश-पूर्वखण्ड-मिश्रप्रकरण
: यह आयुर्वेद का आधारभूत नियम है, त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) का साम्यावस्था मे रहना आरोग्य है, और विषम होना ही रोग का कारण है। रोग, दुख देते हैं। ज्वरादि रोग हैं।
* ''कालार्थकर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः।
: ''सम्यग्गोगश्च विज्ञेयो रोगारोग्यैककारणम्॥'' -- वाग्भटसंहिता, सूत्रस्थान -19
: काल, अर्थ, और कर्म का हीनयोग, मिथ्या योग, अतियोग ही रोग का और सम्यक योग आरोग्य का एकमात्र कारण है।
* '' शास्त्रं ज्योतिः प्रकाशार्थं दर्शनं बुद्धिः आत्मनः ।
: ''ताभ्यां भिषक् सुयुक्ताभ्यां चिकित्सत् न अपराध्यति ॥'' -- चरकसंहिता
: शास्त्र ज्योति के समान होते हैं जो (वस्तुओं को) प्रकाशित करता है। बुद्धि आँख के समान है। इन दोनों से युक्त वैद्य चिकित्सा करते समय गलती नहीं करता।
* ''एकस्मिन्नेव यस्येह शास्त्रे लब्धास्पदा मतिः।
: ''स शास्त्रमन्यदप्याशु युक्तिज्ञत्वात्प्रबुध्यते ॥'' -- चरकसंहिता, सिद्धिस्थान १२.४७
: यदि किसी व्यक्ति ने एक ही शास्त्र का अच्छी तरह से अध्ययन किया है, तो वह अपनी तार्किक क्षमता (युक्तिज्ञता) के कारण अन्य शास्त्रों को भी आसानी से समझ सकता है।
* ''अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानाम् अर्थवशात्तेषां तद्विद्येभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यम्। कस्मात्?
: ''न ह्येकस्मिञ्छास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् ।
: ''तस्माद्बहुश्रुतः शास्त्रं विजानीयाच्चिकित्सकः।'' -- सु. सं. सू. ४, ६-७
: आयुर्वेद में प्रयुक्त अन्य विद्याओं के सिद्धांतों को उन विषयों के विशेषज्ञों से समझना चाहिए।
* कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः शत्रुश्चाबुद्धिमताम्। अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमायुष्यं पौष्टिकं लौक्यमभ्युपदिशता वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यञ्च'' -- च. सं. वि. ८.१४
: बुद्धिमानों के लिए यह सारा संसार ही आचार्य (शिक्षक) है।
* ''श्रुते पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता।
: ''दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम्॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान ९.६
: एक कुशल वैद्य (चिकित्सक) में सिद्धांतों का पूर्ण ज्ञान, व्यापक व्यावहारिक अनुभव, कुशलता, और शारीरिक एवं मानसिक स्वच्छता - ये चार गुण होने चाहिए।
* ''तस्मान्निःसंशयं ज्ञानं हर्त्रा शल्यस्य वाञ्छता । शोधयित्वा मृतं सम्यग्द्रष्टव्यो अङ्गविनिश्चयः ॥ प्रत्यक्षतो हि यद् दृष्टं शास्त्रदृष्टं च यद् भवेत् । समासतस्तदुभयं भूयो ज्ञानविवर्धनम् ॥ प्रत्यक्षवेत्ता हि शास्त्राणां स स्यात् कार्येषु निष्कम्पः ।'' -- सुश्रुतसंहिता, शारीरस्थान, अध्याय 5
: इसलिए, वह शल्य-चिकित्सक (Surgeon) जो पूर्णतः 'निःसंदेह' ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे मृत शरीर का शोधन करके (विच्छेदन/Dissection द्वारा) उसके अंगों और प्रत्यंगों का अच्छी तरह से निरीक्षण करना चाहिए। क्योंकि जो ज्ञान प्रत्यक्ष देखा गया है (Practical Observation) और जो शास्त्रों में पढ़ा गया है (Theoretical Knowledge)—जब इन दोनों का मिलन होता है, तभी ज्ञान का वास्तविक विस्तार होता है। जो शास्त्रों के ज्ञान को अपनी आँखों से (प्रायोगिक रूप से) देख लेता है, वही अपने कार्यों (चिकित्सा या सर्जरी) में 'निष्कम्प' यानी पूर्ण आत्मविश्वासी और अडिग होता है।
* ''यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य।
: ''एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीत्य चार्थेषु मूढाः खरवद्वहन्ति॥'' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान ४.४
: जैसे चंदन के भार को उठाता हुआ गधा बस उस के भार को ही समझता है और चंदन के मूल्य को नहीं समझता, वैसे ही वे लोग हैं जो बहुत से शास्त्रों को पढ़ लेते हैं किन्तु उसके सही अर्थ से अनभिज्ञ हैं।
*''अतश्च प्रकृतं बुध्वा देशकालान्तराणि च।
: ''तन्त्रकर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत्॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान २६.३७
: प्रकरण (विषय), देश (स्थान) और काल (समय) की भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए, तंत्रकार (ग्रन्थकार) के अभिप्राय (उद्देश्य) को समझकर ही निर्णय या अर्थ (उपचार/निष्कर्ष) बताना चाहिए।
* ''अधीयानोऽपि शास्त्राणि तन्त्रयुक्त्या विना भिषक् ।
: ''नाधिगच्छति शास्त्रार्थानर्थान् भाग्यक्षये यथा॥'' -- चरकसंहिता सिद्धिस्थान १२.४८
: तंत्रयुक्ति (शास्त्र के अर्थ को समझने के तर्क/उपकरण) के बिना, चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करने वाला वैद्य (भिषक्) भी उसके सही अर्थ को नहीं समझ पाता, जैसे भाग्य क्षीण होने पर मनुष्य संपत्ति को नहीं पा पाता है।
* ''अत्रासां तन्त्रयुक्तीनां किं प्रयोजनम् ? उच्यते। वाक्ययोजनमर्थयोजनञ्च ।
: ''भवन्ति चात्र श्लोकाः।
: ''असद्द्वादिप्रयुक्तानां वाक्यानां प्रतिषेधनम्।
: ''स्ववाक्यसिद्धिरपि च क्रियते तन्त्रयुक्तितः॥
: ''व्यक्ता नोक्तास्तु ये ह्यर्था लीना ये चाप्यनिर्मलाः।
: ''लेशोक्ता ये च केचित्स्युस्तेषाञ्चापि प्रसाधनम्॥'' -- सुश्रुतसंहिता उत्तरस्थान ६५.५
* ''अधिकरणम्, योगः, पदार्थः, हेत्वर्थः, उद्देशः,उपदेशः, अपदेशः,
:''अपवर्जः, वाक्यशेषः, अर्थापत्तिः, विपर्ययः प्रसङ्गः, एकान्तः,
:''अनेकान्तः, पूर्वपक्षः, निर्णयः, अनुमतम्,, विधानम्, अनागतावेक्षणम्,
:''अतिक्रान्तावेक्षणम्, संशयः, व्याख्यानम्, स्वसंज्ञा, निर्वचनम्, निदर्शनम्,
:''नियोगः विकल्पः, समुच्चयः, ऊह्यम् '' -- सु.सं.सू.६५)
* ''अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानाम् अर्थवशात्तेषां तद्विद्येभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यम्। कस्मात्?
: ''न ह्येकस्मिञ्छास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम्।
: ''तस्माद्बहुश्रुतः शास्त्रं विजानीयाच्चिकित्सकः॥'' -- सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान ४, ६-७
: एक ही शास्त्र या विषय का अध्ययन करने वाला व्यक्ति शास्र के निर्णय को नही समझ सकता इसलिये बहुत शास्त्रों को सुनने पढने वाला चिकित्सक, शास्त्र के तत्त्व को जान सकता।
* ''तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिबाह्येन भेषजम्।
: ''धीमता किञ्चिदादेयं जीवितारोग्यकाङ्क्षिणा॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान १.१२७
: इसलिए, जीवन और आरोग्य (स्वास्थ्य) की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसे वैद्य से कोई भी औषधि ग्रहण नहीं करनी चाहिए जो 'युक्ति' (तर्क और वैज्ञानिक विवेक) से शून्य हो।
*''अज्ञातशास्त्रसद्भावान् शास्त्रमात्रपरायणान्।
: ''त्यजेद्दराद् भिषक्पाशान् पाशान् वैवस्वतानिव ॥
: ''सिद्धान्तो नाम परीक्षकैः बहुविधं परीक्ष्य हेतुभिश्च साधयित्वा निश्चितोऽर्थः।'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान १.१२७
: वे चिकित्सक जो शास्त्रों के वास्तविक अर्थ और गहराई (सद्भाव) से अनभिज्ञ हैं, और केवल रटे-रटाए ग्रंथों (शास्त्रमात्र) पर निर्भर रहते हैं, वे वास्तव में वैद्य कहलाने योग्य नहीं हैं।
=== विविध / प्रकीर्ण ===
* ''अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
: ''यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥'' -- चाणक्यनीति
: शास्त्र अनन्त हैं, विद्याएँ अनेक हैं, जीवन की अवधि थोड़ी हैं और विघ्न बहुत हैं। अतः जिस प्रकार हंस पानी अलग कर केवल दूध ही ले लेता हैं, वैसे ही हमें भी इन शास्त्रों में से जो सार तत्व हैं, वहीं ग्रहण करके उसकी उपासना में लग जाना चाहिए।
* ''तर्कोऽप्रतिष्ठः स्मृतयो विभिन्नाः
: ''नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्।
: ''धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्
: ''महाजनो येन गतः स पन्थाः॥'' -- महाभारतम्
: जीने का वास्तविक तरीका निर्धारित करने के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं हैं। स्मृतियाँ भी अलग-अलग बातें करती हैं। कोई भी एक विचारवन्त (मुनि) नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें। जीवन का वास्तविक तरीका गुप्त है, मानो किसी गुफा में छिपा हो। इसलिए महान लोग जिस मार्ग पर चले थे उसी मार्ग से जाना लाभकारी है।
* ''तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणा क्षारं जलं कापुरुषा पिवन्ति।'' -- योगवासिष्ठ (उत्तरार्ध) / भोजप्रबन्ध
: 'यह मेरे पिता का बनाया हुआ कुँआ है' ऐसा कहने वाले खारा जल पीते हैं।
* ''अकुलीनोऽपि शास्त्रज्ञो दैवतेरपि पूज्यते'' -- हितोपदेश
: नीच कुल वाला भी यदि शास्त्र जानता हो तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है।
* ''काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
: ''व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥
: बुद्धिमान व्यक्ति काव्य, शास्त्र आदि का पठन करके अपना मनोविनोद करते हुए समय को व्यतीत करते हैं और मूर्ख व्यक्ति व्यसन में, सोकर या कलह करके समय बिताते हैं।
* ''यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
: ''लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥
: जिस मनुष्य में स्वयं का विवेक, चेतना एवं बोध नहीं है, उसके लिए शास्त्र क्या कर सकता है। आंखों से हीन अर्थात् अंधे मनुष्य के लिए दर्पण क्या कर सकता है?
* ''केवलं शास्त्रं आश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः
: ''युक्तिहीने विचारे तु धर्महानिः प्रजायते॥'' -- बृहस्पतिस्मृति
: केवल कानून की किताबों व पोथियों मात्र के अध्ययन के आधार पर निर्णय देना उचित नहीं होता। इसके लिए ‘युक्ति’ का सहारा लिया जाना चाहिए। युक्तिहीन विचार से तो धर्म की हानि होती है।
* अमंत्रं अक्षरं नास्ति नास्ति मूलं अनौषधम्।
: ''अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः॥
: कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं।
* ''यस्य कस्य तरोर्मूलं येन केनापि मिश्रित ( घार्षित ) म् ।
: ''यस्मै कस्मै प्रदातव्यं यद्वा तद्वा भविष्यति॥
: जिस-तिस वृक्ष का मूल ले लिया, जिस-किस ने उसका मिश्रण बना दिया, जिस-तिस को उसे दे दिया गया (सेवन करा दिया गया), (तो परिणाम भी) ऐसा-वैसा ही होगा।
* ''दाने तपसि शौर्ये वा विज्ञाने विनये नये ।
: ''विस्मयो नहि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा ॥'' -- चाणक्यनीतिदर्पणः
: दान, तप, शौर्य, विनय और राजनय के क्षेत्र में विस्मय नहीं करना चाहिये। यह धरती बहुत से रत्नों से भरी हुई है।
* ''अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।'' -- गीता
: मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या हूँ;और परस्पर वाद करनेवालों का तत्त्व(सत्य)निर्णय के लिये किया जानेवाला वाद हूँ।
* ''सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायात् मा प्रमद।''
: सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना, स्वाध्याय से प्रमाद मत करना।
* ''तीर्थे तीर्थे निर्मलं ब्रह्मवृन्दं।
: ''वृन्दे वृन्दे तत्त्वचिन्तानुवादः॥
: ''वादे वादे जायते तत्त्वबोधः।
: ''बोधे बोधे भासते चन्द्रचूडः॥'' -- रम्भा शुक संवाद
: प्रत्येक तीर्थ में निर्मल ब्रह्मणों का संघ है। प्रत्येक संघ में तत्त्व-चिन्तन संवाद चल रहा है।
: संवाद से सत्य का बोध होता है। बोध में शिव का आभास होता है।
* ''एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
: सत्य एक ही है। विप्र लोग इसे अलग-अलग प्रकार से कहते हैं।
* ''इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
: ''यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद॥'' -- ऋग्वेद 10.129.7 (नासदीय सूक्त)
: यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुई इसका मुख्य कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता। इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है। हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उसके अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।
* सत्य का मुख स्वर्ण पात्र से ढका है-- ईशावास्योपनिषद
* ''असतो मा सदगमय
: ''तमसो मा ज्योतिर्गमय
: '' मृत्योर्माऽमृतम गमय।
* ''नेति नेति'' । -- [[उपनिषद]]
: ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है।
* ''अपूर्वः कोऽपि कोषोयं विद्यते तव भारति ।
: ''व्ययतो बृद्धिमायाति क्षयं आयाति संचयात्॥
: हे सरस्वती आपके पास कोई अपूर्व कोष है जो व्यय करने पर बढ़ता है और संचय करने पर घटता है।
* ''युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं बालकादपि ।
: ''अन्यत्तृणवत्त्याज्यं अप्युक्तं पद्मजन्मना॥'' -- योगवासिष्ठ
: कोई युक्तियुक्त (तर्कयुक्त) बात बालक द्वारा भी कही गयी हो तो भी उपादेय (ग्रहण करने योग्य) है। किन्तु कमल से जन्मे (ब्रह्मा) द्वारा कही गयी बात भी यदि अयुक्त हो तो वह तृण के समान त्याज्य है।
* ''इति खो, कालामा, यं तं अवोचुंह एथ तुम्हे, कालामा, मा अनुस्सवेन, मा परम्पराय, मा इतिकिराय, मा पिटकसम्पदानेन, मा तक्कहेतु, मा नयहेतु, मा आकार परिवितक्केन , मा दिट्ठिनिज्झानक्खन्तिया, मा भब्बरूपताय, मा समणो नो गरूति। यदा तुम्हे, कालामा, अत्तनाव जानेय्याथ – इमे धम्मा कुसला, इमे धम्मा सावज्जा, इमे धम्मा विञ्ञुगरहिता, इमे धम्मा समत्ता समादिन्ना अहिताय दुक्खाय संवत्तन्तीsति, अथ तुम्हें, कालामा, पजहेय्याथ।'' -- केसमुत्ति सुत्त, त्रिपिटक
: अर्थ : हे कालामाओ ! ये सब मैंने तुमको बताया है, किन्तु तुम इसे स्वीकार करो, इसलिए नहीं कि वह एक अनुविवरण है, इसलिए नहीं कि एक परम्परा है, इसलिए नहीं कि पहले ऐसे कहा गया है, इसलिए नहीं कि यह धर्मग्रन्थ में है। यह विवाद के लिए नहीं, एक विशेष प्रणाली के लिए नहीं, सावधानी से सोचविचार के लिए नहीं, असत्य धारणाओं को सहन करने के लिए नहीं, इसलिए नहीं कि वह अनुकूल मालूम होता है, इसलिए नहीं कि तुम्हारा गुरु एक प्रमाण है, किन्तु तुम स्वयं यदि यह समझते हो कि ये धर्म (धारणाएँ) शुभ हैं, निर्दोष हैं, बुद्धिमान लोग इन धर्मों की प्रशंसा करते हैं, इन धर्मों को ग्रहण करने पर यह कल्याण और सुख देंगे, तब तुम्हें इन्हें स्वीकर करना चाहिए।
* ''गणिकचिकित्सकतार्किकपौराणिकवास्तुशब्दशास्त्रमर्मज्ञाः।
: ''संगीतादिषु निपुणाः सुलभाः न हि तत्त्ववेत्तारः॥'' -- भट्टारक ज्ञानभूषण, तत्त्वज्ञानतरंगिणी
: गणित, चिकित्सा, तर्क (कुतर्क, वाद-विवाद), पुराण, वास्तु, शब्द और संगीत के शास्त्रों में निपुण लोग तो आसानी से मिल जाते हैं, परन्तु तत्त्व के ज्ञाता पुरुष मिलना बहुत कठिन है।<ref>[https://forum.jinswara.com/uploads/short-url/jkC87OhJkjheA4guE8b2fdEO8XZ.pdf न्यायमन्दिर]</ref>
* ''सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः'' -- तत्त्वार्थसूत्र १-१
: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं।
* उत्तम बिद्या लीजिये जदपि नीच पै होय।
: परौ अपावन ठौर में चन्दन त्यजत न कोय। -- कबीरदास
* जिन बूड़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठि।
: मैं बपुरा बूड़न डरा रहा किनारे बैठि। -- कबीरदास
* ज्ञान ‘वर्धमान वृक्ष’ है। -- अश्वघोष, ‘बुद्धचरित’ में
* 'ज्ञान' - सत्य, अनुभव और आत्मबोध का समन्वय है।<ref>[https://www.chemexplorers.in/bhartiya-gyan-parampara/ 'भारतीय ज्ञान परम्परा' : परिचय और अवधारणा]</ref>
* भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक काल से संवाद का महत्व है। समाज में संवाद अब बहुत कम बचा है। याज्ञवलक्य और मैत्रेयी के बीच संवाद (बृहदारण्यक उपनिषद) में दो महत्वपूर्ण विचार हैं। याज्ञवल्क्य ने जब अपनी सारी संपत्ति मैत्रेयी को देने की इच्छा व्यक्त की, मैत्रेयी ने कहा, ‘जिन चीजों से मेरी आत्मा में समृद्धि और असीमता नहीं आएगी, उन्हें लेकर मैं क्या करूंगी?’ इसके विपरीत, आज की गैर-रोमांटिक दुनिया ने ‘भौतिक अमीरी और संवेदना की दरिद्रता का युग्म’ चुना है।
* भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक साहित्य के शुनःशेप और नचिकेता जैसे चरित्र हैं। वे भौतिक सुखों की उपेक्षा करके बड़े [[प्रश्न|प्रश्नों]] के साथ जीना चाहते हैं।
* कठोपनिषद का नचिकेता भौतिक सुख-ऐश्वर्य और सत्ता की तरफ से मुंह फेरकर ज्ञान पाना चाहता है। वह मृत्यु के दरवाजे पर खड़ा है, भूखा-प्यासा और नींदें गंवाकर। उसकी जिज्ञासा ही उसका सहाय है।
=== अंग्रेजों के शासन के पहले की भारतीय शिक्षा ===
* ब्राह्मण शिक्षकों ने जिस शिक्षा प्रणाली का विकास किया, वह न केवल साम्राज्यों के पतन और समाज के परिवर्तनों से अप्रभावित रही, वरन् उसने हजारों वर्षों तक उच्च शिक्षा की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा। -- डॉ० एफ० ई० केई (FE. Keay)
* ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ ज्ञान के प्रति प्रेम इतने प्राचीन समय में प्रारम्भ हुआ हो, या जिसने इतना स्थायी ओर शक्तिशली प्रभाव उत्पन्न किया हो, जितना भारत में। -- एफ डब्ल्यु थॉमस
* विद्यारम्भ संस्कार, उपनयन संस्कार के अनेक वर्षों बाद उस समय आरम्भ हुआ, जब वैदिक संस्कृत, जनसाधारण की बोलचाल की भाषा नहीं रह गई थी। -- डॉ० ए० एस० अल्तेकर
* यह संस्कार पाँच वर्ष की आयु में होता था और साधारणतः सब जातियों के बालकों के लिए था। -- डॉ० वेद मित्र, विद्यारम्भ संस्कार के सम्बन्ध में
* ‘प्रेसीडेंसी के सभी गावों में पाठशालाएं हैं’। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६)
* (मद्रास) प्रेसीडेंसी में 12,498 पाठशालाएं हैं, जिन में 1,88,650 विद्यार्थी पढ़ते हैं। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६)
* पूरे प्रेसीडेन्सी में मुश्किल से कोई छोटा या बड़ा गाँव होगा जिसमें कम से कम एक विद्यालय न हो। -- जी एल प्रेण्डरगास्ट की बॉम्बे प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति के बारे में रपट, मार्च १८२४
* बंगाल और बिहार में एक लाख के लगभग स्कूल्स हैं। इन दोनों प्रान्तों की जनसंख्या चार करोड़ के बराबर है। अर्थात प्रति 400 व्यक्तियों पर एक शाला है। -- विलियम एडम्स की बंगाल प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर पहली रपट, 1835 से 1838 तक
* भारत में बड़ी अच्छी विकेंद्रित शिक्षा व्यवस्था है। लगभग प्रत्येक गांव की अपनी पाठशाला हैं, जो गांव वाले चलाते हैं। इन पाठशालाओं को जमीनें आवंटित हैं, जिनकी आमदनी से पाठशाला का खर्चा निकलता है। ... ‘इन में से अनेक स्कूलों का स्तर तो हमारे ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के बराबर का है। शिक्षकों को अच्छा वेतन दिया जाता हैं।' -- ब्रिटिश आई सी एस अधिकारी जी. डब्लू. लेटनर "History of Indigenous Education in Punjab : Since Annexation and in 1882" में पंजाब में शिक्ष की स्थिति के बारे में सन १८८२ में
* इस होशियारपुर जिले में साक्षरता की दर 84% है। -- जी. डब्लू. लेटनर, उत्तरी पंजाब के होशियारपुर जिले के बृहद सर्वेक्षण के आधार पर, १८७०-७५
* मालाबार के साहित्य का आधार एक जैसा है और इसमें सभी हिंदू राष्ट्रों (भारत क सभी भागों) की तरह ही शिक्षा-सामग्री शामिल है। शिक्षा हर परिवार में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। उनकी कई महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है। बच्चों को हिंसा के बिना और विशेष रूप से सरल प्रक्रिया द्वारा शिक्षा दी जाती है। .... शिष्य एक-दूसरे के मॉनिटर हैं और अक्षरों/ अंकों को रेत पर उंगली से लिखा जाता है। -- ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी, अलेक्जेंडर वॉकर (1764 – 1831) अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 263 पर
* ...ब्रिटिश प्रशासक, जब भारत आये, तो चीज़ों को ज्यों का त्यों अपने कब्जे में लेने के बजाय, उन्हें जड़ से उखाड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने जड़ से मिट्टी हटायी और जड़ को देखने लगे, और जड़ को वैसे ही (बिना मिट्टी के) छोड़ दिया। और वह सुन्दर वृक्ष नष्ट हो गया। -- महात्मा गांधी, 20 अक्टूबर, 1931 को चैथम हाउस, लंदन में
* हालाँकि, तेरहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के आरम्भ तक की अवधि के दौरान इतिहास या शिक्षा की स्थिति पर बहुत कम लिखा गया है। -- डॉ [[धरमपाल|धर्मपाल]], 'द ब्युटीफुल ट्री' की प्रस्तावना में
* इस बात पर ज़ोर देना ज़रूरी है कि स्वदेशी शिक्षा पाठशालाओं, मदरसों और गुरुकुलों के माध्यम से दी जाती थी। इन पारंपरिक संस्थानों का कर्यकलाप 'शिक्षा' कहलाता था और इसे सारे लोग वित्तीय सहयोग देकर जीवित रखते थे। यहाँ तक कि उन लोगों से भी सहयोग मिलता था जो स्वयं अशिक्षित थे। इस शिक्षा में प्रज्ञा, शील और समाधि के विचार शामिल थे। वास्तव में ये संस्थाएँ उस कूप के समान थीं जो समाज की जड़ों को सींचने का कार्य करतीं थीं। इसलिए ये संस्थाएँ आजकल के 'स्कूल' की अपेक्षा बहुत बड़ी भूमिका निभातीं थीं। -- 'द ब्युटीफुल ट्री' में
* प्राचीन "गुरुकुल" प्रणाली को अधिक समालोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है और पहला कदम इन गुरुकुलों के इतिहास के रिकार्डों से यह ढूँढना होगा कि उनके क्रियाकलाप क्या-क्या थे। इसके बिना हम प्राचीन गौरव के बारे में ये निरर्थक बातचीत करते रहेंगे और वर्तमान स्कूल प्रणाली को ऐसी दिशा में धकेलते रहेंगे जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि वह कैसी होगी। -- डॉ धर्मपाल, 'द ब्युटीफुल ट्री' में
== भारतीय ज्ञान के बारे में विद्वानों के विचार ==
* यदि मुझसे पूछा जाये कि किस आकाश के नीचे मानवीय मस्तिष्क ने अपने कुछ चुनिन्दा उपहारों को विकसित किया है, जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर गहन विचार किया है और उनके हल निकाले है, तो मैं भारत की तरफ़ इशारा करूँगा। -- [[मैक्स मूलर]]
* भारत हमारी सम्पूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है। भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है, अरबों के रास्ते हमारे अधिकांश गणित की जननी है, बुद्ध के रास्ते इसाईयत मे निहित आदर्शों की जननी है, ग्रामीण समाज के रास्ते स्व-शाशन और लोकतंत्र की जननी है। अनेक प्रकार से भारत माता हम सबकी माता है। -- [[विल्ल डुरन्ट]] , अमरीकी इतिहासकार
* हम भारतीयों के बहुत ऋणी हैं जिन्होने हमे गिनना सिखाया, जिसके बिना कोई भी मूल्यवान वैज्ञानिक खोज सम्भव नही होती। -- [[अलबर्ट आइन्स्टीन]]
* जब यूरोप के लोग भरतीय दर्शन के सम्पर्क में आयेंगे तो उनके विचार और आस्थाएँ बदलेंगी। वे बदले हुवे लोग यूरोप के विचारों और विश्वास को प्रभावित करेंगे। आगे चलकर यूरोप में ही ईसाई-धर्म को संकट उत्पन्न हो जाएगा। -- प्रसिद्ध दार्शनिक आर्थर शापेनहावर
* भारत मानव जाति का पलना है , मानव-भाषा की जन्मस्थली है , इतिहास की जननी है , पौराणिक कथाओं की दादी है, और प्रथाओं की परदादी है। मानव इतिहास की हमारी सबसे कीमती और सबसे ज्ञान-गर्भित सामग्री केवल भारत में ही संचित है। -- [[मार्क ट्वेन]]
* यदि इस धरातल पर कोई स्थान है जहाँ पर जीवित मानव के सभी स्वप्नों को तब से घर मिला हुआ है जब मानव अस्तित्व के सपने देखना आरम्भ किया था , तो वह भारत ही है। -- फ्रान्सीसी विद्वान [[रोमां रोलां]]
* भारत अपनी सीमा के पार एक भी सैनिक भेजे बिना चीन को जीत लिया और लगभग बीस शताब्दियों तक उस पर सांस्कृतिक रूप से राज किया। -- हू शिह , अमेरिका में चीन के भूतपूर्व राजदूत
* वेदों से हम सर्जरी, चिकित्सा, संगीत, घर बनाना, जिसमे यंत्रीकृत कला शामिल है, की व्यवहारिक कला सीखते हैं। वे जीवन के हर एक पहलू , संस्कृति, धर्म, विज्ञान, नैतिकता, कानून, ब्रह्माण्ड विज्ञान और मौसम विज्ञान के विश्वकोश हैं। -- [[विलियम जोन्स]]
* कुछ सन्दर्भों में प्राचीन भारत की न्यायिक प्रणाली सैद्धान्तिक रूप से हमारी आज की न्यायिक प्रणाली से उन्नत थी। -- जॉन डब्ल्यू स्पेलमैन (John W. Spellman)
* जब तक हमारे विद्वान, विचारक और शिक्षाविद संस्कृत से अनभिज्ञ रहेंगे तब तक हमारी सम्पूर्ण संस्कृति, साहित्य और जीवन अपूर्ण बना रहेगा। -- भारत के प्रथम राष्ट्रपति [[राजेन्द्र प्रसाद|डॉ राजेन्द्र प्रसाद]]
* संस्कृत साहित्य का यूरोप पर इतना अधिक बौद्धिक ऋण है कि उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। आने वाले वर्षों में यह ऋण और बढ़ने की सम्भावना है। हम तो अपनी वर्णमाला तक को परिपूर्ण नहीं बना पाए हैं। (प्रोफ मैक्डोनेल)
* संस्कृत में जितनी स्पष्टता और दार्शनिक परिशुद्धता है, उतनी ग्रीक सहित विश्व की किसी भी भाषा में नहीं है। -- Friedrich von Schlegel
* संस्कृत भाषा की प्राचीनता जो भी हो, इसकी संरचना आश्चर्यजनक है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण (दोषरहित) है, लैटिन से अधिक शब्दबहुल है, और इन दोनों की अपेक्षा अधिक उत्कृष्टतापूर्वक परिशोधित है; फिर भी क्रियाओं के मूलों के रूप में और व्याकरण के रूपों में, इसका इन दोनों भाषाओं के साथ बहुत दृढ़ सम्बन्ध दिखता है, जिसके केवल संयोग से उत्पन्न होने की स्म्भावना कम है। इन तीनों में इतना दृढ़ सम्बन्ध है कि इनका विश्लेषण करके कोई भी भाषाशास्त्री इनके समान स्रोत से निकलने के ही निष्कर्ष पर पहुंचेगा। किन्तु वह स्रोत अब शायद बचा नहीं नहीं है। -- [[विलियम जोन्स]]
* भारत हमारी सम्पूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है। भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है, अरबों के रास्ते हमारे अधिकांश गणित की जननी है, बुद्ध के रास्ते इसाईयत मे निहित आदर्शों की जननी है, ग्रामीण समाज के पथ स्व-शाशन और लोकतंत्र की जननी है। अनेक प्रकार से भारत माता हम सबकी माता है। -- [[विल डुरन्ट|विल्ल डुरन्ट]] , अमरीकी इतिहासकार
* संस्कृत न केवल जीवित है बल्कि यह मृत को जीवित करने की औषधि भी है। -- [[सम्पूर्णानन्द]]
* संस्कृत भाषा, देवभाषा है। यह सत्य युग की भाषा है जो वाक् और अर्थ के सत्य और पूर्ण सम्बन्ध पर आधारित है। इसके प्रत्येक स्वर और व्यञ्जन में एक विशेष अन्तर्भूत शक्ति है जो उनकी प्रकृति के कारण है, किसी विकास के कारण या मानव द्वारा चुना हुआ नहीं है। -- [[अरविन्द घोष|श्री अरविन्द]] , ‘Hymns to the Mystic Fire’)
* सभ्यता के इतिहास में, पुनर्जागरण के बाद, अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संस्कृत साहित्य की खोज से बढकर विश्वव्यापी महत्व की कोई दूसरी घटना नहीं घटी है। (आर्थर अन्थोनी मैक्डोनेल्ड)
* जब हम संस्कृत साहित्य पर ध्यान डालते हैं तो अनन्त की संकल्पना हमारे सामने आ जाती है। सबसे लंबा जीवन भी उन कार्यों के अवलोकन के लिए पर्याप्त नहीं होगा जो भारत की सीमा से परे हिमालय की तरह हर देश की विशालतम संरचना से ऊपर उभरे और फूले हुए हैं। -- [[विलियम जोन्स]]
* पाणिनि का व्याकरण, विश्व के व्याकरणों में सर्वश्रेष्ठ है। यह मानव आविष्कार और उद्योग की सबसे शानदार उपलब्धियों में से एक है। -- सर डब्ल्यू हन्टर
* संस्कृत की संरचना की अप्रतिम पारदर्शिता इसे भारत-यूरोपीय परिवार की भाषाओं में प्रथम स्थान का निर्विवाद अधिकार देती है। -- प्रो० ह्विटनी
* संस्कृत, योरप की आधुनिक भाषाओं की जननी है। - M. Dukois
* सभी लोग पाणिनि के व्याकरण को विश्व का सबसे छोटा और पूर्ण व्याकरण स्वीकार करते हैं। -- प्रो० वेबर
* हिन्दुओं के अलावा कोई भी राष्ट्र अभी तक ध्वनिविज्ञान की इतनी उत्तम प्रणाली की खोज नहीं कर सका है। -- प्रो० विल्सन
* संस्कृत के व्यंजनों का विन्यास, मानव प्रतिभा का अद्वितीय उदाहरण है। -- प्रो० थॉम्पसन
* यदि आप इस कठिनाई ([[संस्कृत]] भाषा सीखने की) से पार पाना चाहते हैं तो यह आसान नहीं होगा क्योंकि अरबी भाषा की तरह शब्दों तथा विभक्तियों, दोनों में ही इस भाषा (संस्कृत) की पहुंच बहुत विस्तृत है। इसमें एक ही वस्तु के लिए कई शब्द, मूल तथा व्युत्पन्न, दोनों प्रयुक्त होते हैं और एक ही शब्द का प्रयोग कई वस्तुओं के लिए होता है। -- अलबरूनी, संस्कृत के बारे में, अपनी पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' में
* उस समय बड़ी संख्या में गुरुकुलों के अलावा, बंगाल और बिहार के प्रत्येक जिले में उच्च शिक्षा के लगभग सौ संस्थान भी थे। दुर्भाग्य से, उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान पूरे भारत में ये संख्या तेज़ी से कम हो गई। अंग्रेजों ने यह भी देखा कि व्याकरण, कोश, गणित, आयुर्वेद, तर्कशास्त्र, कानून और दर्शन को पढ़ाने के लिए संस्कृत पुस्तकों का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा था। ....इसके अलावा, भारत में ब्रिटिश शासन के आरम्भिक काल में, ब्रिटिश अधिकारियों ने देखा कि भारत में आम लोगों की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैंड की तुलना में अधिक उन्नत और व्यापक थी। ...[[धरमपाल|धर्मपाल]] के अनुसार, अंग्रेजों ने बाद में इस संस्कृत-आधारित प्रणाली को अपनी अंग्रेजी-आधारित प्रणाली से बदल दिया, जिसका लक्ष्य ब्रिटिश प्रशासन के लिए निम्न-स्तर के क्लर्क तैयार करना था। -- [[राजीव मल्होत्रा]]
==इन्हें भी देखें==
*[[भारतीय गणित]]
*[[आयुर्वेद]]
*[[भारत]]
*[[संस्कृत]]
*[[ज्ञान]]
*[[गुरु]]
*[[शास्त्रार्थ]]
*[[तर्क]]
*[[विद्या]]
*[[पाण्डित्य]]
*[[प्रश्न]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
s3gwkjk3i3qhh55gtht4uyhdejel5xe
32780
32779
2026-04-16T06:32:19Z
अनुनाद सिंह
658
/* भारतीय ज्ञान के बारे में विद्वानों के विचार */
32780
wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:भारतीय ज्ञान परम्परा|भारतीय ज्ञान परम्परा]]''' हजारों वर्ष पुरानी है। इस ज्ञान परंपरा में आधुनिक विज्ञान के प्रबंधन सहित सभी क्षेत्रों के लिए अदभुत खजाना है।
किसी भी सभ्यता या संस्कृति का उत्थान-पतन उसकी आर्थिक स्थिति और राजनैतिक स्थिति नहीं होती बल्कि ज्ञान परम्परा होती है। भारतीय संस्कृति ने हमेशा ही ज्ञान परम्परा को महत्त्व दिया है। चिन्तन की प्राचीन परम्परा ‘[[उपनिषद]]’ अर्थात गुरु के पास बैठकर अज्ञान की स्थितियों को नष्ट कर ज्ञान को निरंतर संवाद द्वारा पाने की परम्परा रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा का सबसे बड़ा आधार [[वेद]] हैं। ज्ञान का यह स्वरूप तर्कमूलक, मूल्यनिष्ठ और आचरण सापेक्ष है, जिज्ञासामूलक है, और सामाजिक उद्देश्यों से बंधा हुआ है। चिन्तन का अर्थ यहाँ मुक्तकामी है। [[मुक्ति]] का तात्पर्य यहाँ रूढ़ अर्थों में आध्यात्मिक मुक्ति नहीं है, बल्कि सब प्रकार के बंधनों से मुक्ति है। 'सा विध्या या विमुक्तये' अर्थात विद्या वह नहीं जो बांधती है, बल्कि वह है जो मुक्त करती है। बौद्ध चिन्तन-परम्परा में भी शिष्य के अनुभव और मानवीय विवेक को ही प्रमुखता दी गई है। बुद्ध का कहना है कि मनुष्य कि बुद्धि परिक्षणात्मक होनी चाहिए। उसे किसी के कहे पर पूरा विश्वास न करके स्वयं उस बात या तथ्य को परखना चाहिए। चिन्तन के मूल्यनिष्ठ लोकवादी पक्ष की यह धारा [[वेद|वेदों]], उपनिषदों महाकाव्यों, तथा बौद्ध ग्रन्थों से आगे बढ़ती हुई धर्मशास्त्रों तक चली आई है। इनमें सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों कि शिक्षा दी गई है।<ref>[https://gyanvividha.com/भारतीय-ज्ञान-परंपरा/ भारतीय ज्ञान परम्परा]</ref>
== उद्धरण ==
=== ज्ञान/विद्या/शिक्षा ===
* ''आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः'' -- [[वेद]]
: अर्थात सभी दिशाओं से विचारों को आने दो!
* ''ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्'' । ([[गायत्री मंत्र]])
: हम उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
* ''युक्तियुक्तं वचो ग्राह्यं बालादपि शुकादपि।
: ''युक्तिहीनं वचस् त्याज्यं वृद्धादपि शुकादपि॥'' -- प्रबन्धचिन्तामणि
: यदि कोई बात युक्तियुक्त (तर्कसम्मत) हो तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिये, चाहे वह बालक या आये या तोते से।
: किन्तु युक्तिहीन बात को त्याग देना चाहिये, चाहे वह वृद्ध से आयी हो या शुक (शुकदेव) से।
* ''तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
: ''आयासायापरं कर्म विद्याऽन्या शिल्पनैपुणम् ॥'' -- विष्णुपुराण १-१९-४१
: कर्म वह है जो बन्धन में न डाले ; विद्या वह है जो मुक्त कर दे। अन्य कर्म करना मात्र श्रम करना है तथा अन्य विद्याएँ शिल्प में निपुणता मात्र हैं।
* ''आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यः, मन्तव्यः, निदिध्यासितव्यः।'' -- बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से
: अर्थात्, आत्मा को पहले जानना (दर्शन), फिर सुनना (श्रवण), उस पर विचार करना (मनन), और अंततः गहन ध्यान (निदिध्यासन) करना चाहिए।
* ''श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः।
: ''मत्वा च सततं ध्येयः एते दर्शन हेतवः॥
: अर्थात् आत्मतत्त्व का श्रवण वेद वाक्यों के द्वारा करना चाहिए, मनन तार्किक युक्तियों के सहारे करना चाहिए तथा मनन करने के बाद उसका सतत ध्यान करना चाहिये। ये तीनों (श्रवण, मनन, ध्यान) दर्शन के हेतु हैं।
* ''अज्ञानमेव बन्धः ज्ञानमेव मोक्षः। -- उपनिषद
: अज्ञान ही बन्धन है और ज्ञान ही मोक्ष।
* ''सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः'' -- आचार्य उमास्वाति द्वारा रचित तत्त्वार्थसूत्र १-१
: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं।
* ''वादे वादे जायते तत्त्वबोधः।'' -- रम्भा-शुक सम्वाद
: संवाद से सत्य का बोध हो रहा है।
* ''अधीयानोऽपि तन्त्राणि तन्त्रयुक्त्यविचक्षणः।
: ''नाधिगच्छति तन्त्रार्थमर्थं भाग्यक्षये यथा॥'' -- (अष्टांगहृदय की आचार्य अरुणदत्त कृत 'सर्वाङ्गसुन्दरा' टीका, पृष्ठ ९२)
: जिस प्रकार भाग्य के क्षय होने पर व्यक्ति को अर्थ (धन) की प्राप्ति नहीं होती है, उसी प्रकार यदि किसी ने तन्त्र (शास्त्र) का अध्ययन किया है किन्तु वह '''तन्त्रयुक्ति''' का उपयोग करना नहीं जानता तो वह शास्त्र का अर्थ नहीं समझ पाता है।
* ''अक्रोधो वैराग्यो जितेन्द्रियश्च क्षमा दया सर्वजनप्रियश्च।
: ''निर्लोभो मदभयशोकरहितो ज्ञानस्य एतत् दश लक्षणानि॥
: ज्ञान के ये दस लक्षण हैं- क्रोध न करना, वैराग्य, इन्द्रियों पर विजय, क्षमा, दया, सभी जनों को प्रिय होना, लोभ रहित होना, मद से रहित होना, भयरहित होना, शोकरहित होना।
* ''मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः ।
: ''मुक्तिकैवल्यनिर्वाणश्रेयोनिःश्रेयसामृतम् ॥'' -- अमरकोष
: मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर बुद्धि को 'ज्ञान' कहते हैं जबकि शिल्प और शास्त्र की ओर उन्मुख बुद्धि को 'विज्ञान'।
* '' ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम् ।
: '' अनुभवाख्यं द्वितीयं तुं ज्ञानं तदुर्लभं नृप ॥
: हे राजा ! ज्ञान दो प्रकार के होते हैं; एक तो स्मृतिजन्य शाब्दिक ज्ञान, और दूसरा अनुभवजन्य ज्ञान जो अत्यन्त दुर्लभ है।
* ''अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा, ग्रंथिभ्यो धारिणो वराः।
: ''धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा, ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः॥
: अनपढ़ों की अपेक्षा पुस्तक पढ़ने वाले श्रेष्ठ हैं। पुस्तक पढ़ने वालों की अपेक्षा अर्थ को धारण करने वाले श्रेष्ठ हैं। ग्रंथों के अर्थ को धारण करने वालों की अपेक्षा ज्ञानी श्रेष्ठ हैं। ज्ञानियों की अपेक्षा अर्थ को क्रियान्वित करने वाले श्रेष्ठ हैं।
*''यो हि वेदे च शास्त्रे च ग्रन्थधारणतत्परः।
: ''न च ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञस्तस्य तद्धारणं वृथा॥
: ''भारं स वहते तस्य ग्रन्थस्यार्थं न वेत्ति यः ।
: ''यस् तु ग्रन्थार्थ तत्त्वज्ञो नास्य ग्रन्थागमो वृथा ॥ -- [[महाभारत]]
: जो वेद और शास्त्र के ग्रन्थों को कण्ठस्थ करने में तत्पर रहता है और उन ग्रन्थों के अर्थ के तत्त्व को नहीं समझता, उसका कण्ठस्थ करना व्यर्थ है।
: यदि कोई किसी ग्रन्थ का सही अर्थ नहीं जानता है तो वह उस ग्रन्थ का भार ढोता है। जो उस ग्रन्थ का अर्थ समझ गया है उसका उस ग्रन्थ को पढ़ना व्यर्थ नहीं है।
* ''अनन्तं शास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पश्चकालो बहुविघ्नता च।
: ''यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥'' -- चाणक्यनीति
: शास्त्र अनंत हैं, विद्याएँ अनेक हैं, जीवन की अवधि थोड़ी हैं और विघ्न बहुत हैं। अतः जिस प्रकार हंस पानी अलग कर केवल दूध ही ले लेता हैं, वैसे ही हमें भी इन शास्त्रों में से जो सार तत्व हैं, वहीं ग्रहण करके उसकी उपासना में लग जाना चाहिए।
* ''गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
: ''गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
: गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शिव है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम है।
* उत्तम विद्या लीजिये जदपि नीच पै होय।
: परौ अपावन ठौर में कंचन त्यजत न कोय॥ -- [[कबीरदास]]
=== सत्य ===
* ''सत्यं ब्रह्म ।
: सत्य ही ब्रह्म है।
* ''सत्यमेवेश्वरो लोके सत्यं पद्माश्रिता सदा।
: ''सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्॥'' -- वाल्मीकि रामायण
: संसार में सत्य ही ईश्वर है। सत्य ही लक्ष्मी (= धन-धान्य) का निवास है। सत्य ही सभी (अच्छाइयों) का मूल है। संसार में सत्य से बढ़कर और कोई परम पद नहीं है।
*''सत्यमेव परं मित्रं स्वीकृते सति मानवे ।
:''सत्यमेव परं शत्रुः धिक्कृते सति मानवे ।।
: हम सत्य को स्वीकार करते है तो सत्य हमारा सबसे श्रेष्ठ मित्र बन जाता है। लेकिन अगर हम सत्य का स्वीकार न करके धिक्कारते है, तो जीवन में आगे चलकर वही सत्य हमारे लिए परं शत्रु बन जाता है।
* ''नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ।
: ''अतः सर्वेषु कार्येषु सत्यमेव विशिष्यते ॥'' -- महाभारत, आदि पर्व में शकुन्तला का कथन
: सत्य से बढ़कर धर्म और असत्य से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। अतः सभी कार्यों में सत्य को ही श्रेष्ठ माना गया है।
* ''सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
: ''येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥ -- मुण्डकोपनिषद्
: सत्य की ही विजय होती है असत्य की नहीं ; 'सत्य' के द्वारा ही देवों का यात्रा-पथ विस्तीर्ण हुआ, जिसके द्वारा आप्तकाम ऋषिगण वहां आरोहण करते हैं जहाँ 'सत्य' का परम धाम है।
* ''हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
: ''तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥'' -- ईशोपनिषद्
: सत्य का मुख स्वर्ण के पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन् ! उस सत्यधर्म के दिखाई देने के लिए तू उस आवरण को हटा दे। (इन भौतिक पदार्थों की चकाचौंध ने मनुष्य की आँख से सत्य को ओझल कर दिया है। भक्त सत्य के दर्शन करना चाहता है। सांसारिकता सोने का ढक्कन है और आत्म-परमात्म-चिन्तन वह सत्य है जिसे सांसारिकता छिपा देती है।)
* ''सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः ।
: ''सत्येन वायवो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
: सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है । सब सत्य पर आधारित है ।
* ''नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम् ।
: ''न हि तीव्रतरं किञ्चिदनृतादिह विद्यते ॥
: सत्य जैसा अन्य धर्म नहीं । सत्य से पर कुछ नहीं । असत्य से ज्यादा तीव्रतर कुछ नहीं ।
* ''सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
: ''येनाक्रमत् मनुष्यो ह्यात्मकामो यत्र तत् सत्यस्य परं निधानं ॥
: जय सत्य का होता है, असत्य का नहीं । दैवी मार्ग सत्य से फैला हुआ है । जिस मार्ग पे जाने से मनुष्य आत्मकाम बनता है, वही सत्य का परम् धाम है ।
* ''नानृतात्पातकं किञ्चित् न सत्यात् सुकृतं परम् ।
: ''विवेकात् न परो बन्धुः इति वेदविदो विदुः ॥
: वेदों के जानकार कहते हैं कि अनृत (असत्य) के अलावा और कोई पातक नहीं; सत्य के अलावा अन्य कोई सुकृत नहीं और विवेक के अलावा अन्य कोई भाई नहीं।
=== न्याय-दर्शन===
* ''प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास च्छल जति निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निश्श्रेयसाधिगमः ॥'' -- अक्षपाद गौतम, न्यायसूत्र
: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष) प्राप्त होता है।
* ''प्रमाणैर्थपरीक्षणं न्यायः।'' -- न्यायसूत्र के भाष्यकार महर्षि वात्स्यायन
: प्रमाण के द्वारा किसी अर्थ (सिद्धान्त) की परीक्षा करना ही न्याय है।
* ''प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि।'' -- न्यायसूत्र
: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द - ये (चार) प्रमाण हैं।
* ''इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् '' -- न्यायसूत्र १।१।४
: प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न ज्ञान है जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी और व्यवसायात्मक होता है।
* ''आत्म शरीरेन्द्रियार्थ बुद्धि मनः प्रवृत्ति दोष प्रेत्यभाव फल दुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् '' -- न्यायसूत्र
: आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ , बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग -- ये प्रमेय हैं।
* ''अविज्ञाततत्तवेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्तवज्ञानार्थमूहस्तर्कज्जः'' -- (न्याय दर्शन 1.1.42)
: जिस अर्थ का तत्व निर्णीत न हो उसके तत्त्वज्ञान के लिए युक्ति पूर्वक किए जानेवाले "ऊह" ज्ञान का नाम है "तर्क"।
* ''प्रमाणतर्कसाधनोपलम्भः सिद्धान्त-अविरुद्धः पञ्चवयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः।'' -- न्यायसूत्र
: प्रमाण और तर्क जैसे साधनों का उपयोग करके, सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए, पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच पञ्चावयवी (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन) वाक्यों की सहायता से हुई चर्चा ही 'वाद' है।
* ''प्ररदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्।
: ''आश्रयः सर्वधर्माणां शाश्वदान्वीक्षिकी मता॥ -- वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य 1/1/1 तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र, विद्योद्देश प्रकरण
: आन्विक्षिकी (न्यायविद्या) समस्त विद्याओं का प्रदीप,सब कर्मों का उपाय, तथा सब धर्मों का आश्रय मानी गयी है।
* ''नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थेन्यायः प्रवर्तते किं तर्हि संशयितेऽर्थे '' -- वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य
: उपलब्ध अथवा निर्णीत अर्थ में न्याय की प्रवृत्ति नहीं होती, अपितु सन्दिग्ध अर्थ में ही न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति होती है।
===मीमांसा===
* ''धर्माख्यं विषयं वक्तुं मीमांसायाः प्रयोजनम्।'' -- कुमारिल भट्ट
: [[धर्म]] नामक विषय का प्रतिपादन (व्याख्या) करना ही मीमांसा का मुख्य प्रयोजन (उद्देश्य) है।
*''मीमांसा तु विद्येयं बहुविद्यान्तराश्रिता ।
: ''न शुश्रूषयितुं शक्या प्रागनुक्त्वा प्रयोजनम् ॥'' -- भट्टपाद
: सम्पूर्ण कार्यकलापों के मूलभूत [[वेद]] का विकृष्ट वाक्यार्थ वर्णन करने के लिए यह द्वादशलक्षणी मीमांसा प्रायः सभी विद्याओं (समयविद्या, न्याय अथवा तर्कविद्या, मीमांसा, तन्त्रविद्या, पूर्वमीमांसा, पूर्वतन्त्र, विचारशास्त्र, अध्वरमीमांसा एवं वाक्यशास्त्र एवं धर्मशास्त्र आदि) को अनेक रूपों में प्रभावित करती है।
*''विषयो विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरम् ।
: ''निर्णयश्चेति पञ्चाङ्गं शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ॥'' -- कुमारिल भट्ट, श्लोकवार्तिक में
: विषय, संशय (विशय), पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और निर्णय—इन पाँच अंगों से मिलकर ही शास्त्र में एक 'अधिकरण' बनता है।
* ''श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये परदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्।'' -- मीमांसा 3.3.14
: अन्वय : ''श्रुति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यम् अर्थविप्रकर्षात् ।
: अर्थ : श्रुति (Scripture), लिंग (Characteristics), वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्य (Celebrity) के समवाय में से जो बाद में रखे गये हैं वे पहले लिखे गये गुणों से दुर्बल है।
* ''सत्यं नित्यैव मीमांसा न्यायपिण्डात्मिकेष्यते।
: ''सङ्क्षेपविस्तरग्रन्थैः कृत्रिमैस्तु निबध्यते॥'' -- तन्त्रवार्त्तिक
: मीमांसा (तर्कपूर्ण विचार) वास्तव में नित्य है और इसे न्याय (तर्कों) के समूह के रूप में स्वीकार किया जाता है।
: कुमारिल भट्ट यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मीमांसा केवल एक ग्रन्थ नहीं, बल्कि सत्य और धर्म की व्याख्या के लिए उपयोग की जाने वाली एक शाश्वत तर्क पद्धति है।
* ''न कदाचिदनीदृशं जगत् तस्य निमित्तपरीष्टिः।'' -- जैमिनीय सूत्र १.१.३
: (अथातो धर्मजिज्ञासा, चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः)
: संसार कभी भी इससे भिन्न (जैसा आज है) नहीं था।
: कुमारिल भट्ट इस विचार का खंडन करते हैं कि सृष्टि का कभी कोई "आदि" (शुरुआत) या "प्रलय" (पूर्ण विनाश) हुआ था। मीमांसा के अनुसार, यह जगत प्रवाह रूप में नित्य है। यह जैसा आज दिख रहा है—जन्म, मृत्यु, सुख, दुख और व्यवस्था के साथ—यह अनादि काल से ऐसा ही चला आ रहा है।
*''चतुर्दशसु विद्यासु मीमांसैव गरीयसी।
: चतुर्दश विद्यास्थानो में मीमांसा ही अत्यंत महत्वपूर्ण है।
=== गणित ===
* ''यथा शिखा मयूराणां , नागानां मणयो यथा।
:''तथा वेदांगशास्त्राणां , गणितं मूर्ध्नि स्थितम्॥'' -- वेदाङ्ग ज्योतिष
: जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है।
* ''बहुभिर्प्रलापैः किम् त्रयलोके सचरारे।
: ''यद् किंचिद् वस्तु तत्सर्वम् गणितेन् बिना न हि॥'' -- [[:w:महावीराचार्य|महावीराचार्य]], जैन गणितज्ञ
: बहुत प्रलाप करने से क्या लाभ है? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है वह गणित के बिना नहीं है। उसको गणित के बिना नहीं समझा जा सकता।
* ''लौकिके वैदिके वापि तथा सामयिकेऽपि यः।
: ''व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते॥'' -- महावीराचार्य द्वारा रचित गणितसारसङ्ग्रह में गणितशास्त्रप्रशंसा के अन्तर्गत
: अर्थ: लौकिक, वैदिक तथा सामयिक में जो व्यापार है वहाँ सर्वत्र संख्या का ही उपयोग होता है।
* ''गण्यते संख्यायते तद्गणितम्। तत्प्रतिपादकत्वेन तत्संज्ञं शास्त्रं उच्यते।'' -- भारतीय गणितज्ञ गणेश दैवज्ञ, अपने ग्रन्थ बुद्धिविलासिनी में
: जो परिकलन करता और गिनता है, वह गणित है तथा वह विज्ञान जो इसका आधार है वह भी गणित कहलाता है।
* '' भोज्यं यता सर्वरसं विनाज्यं राज्यं यथा राजविवर्जितं च।
: ''सभा न भातीव सुवक्तृहीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथात्र॥ -- भास्कराचार्य, सिद्धान्तशिरोमणि, गोलाध्याय, श्लोक 4
: खगोल तथा गणित में एक दूसरे से अनभिज्ञ पुरुष उसी प्रकार महत्त्वहीन है जैसे घृत के बिना व्यंजन, राजा के बिना राज्य, तथा अच्छे वक्ता के बिना सभा महत्वहीन होती है।
=== व्याकरण ===
* ''उदाहरणं प्रत्युदाहरणं वाक्याध्याहारः इत्येतत्समुदितं व्याकरणं भवति'' -- महाभाष्य (पश्पशाह्निक)
: उदाहरण और प्रत्युदाहरण, वाक्याध्याहार (पूर्व प्रकरणस्थ पदों की अनुवृत्ति) से युक्त व्याकरण होता है।
* ''कानि पुनः शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि? रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम् ।'' -- महाभाष्य
: शब्दानुशासन के प्रयोजन क्या-क्या है? रक्षा, ऊह, आगम, लघु, असंदेह - ये (व्याकरण के) प्रयोजन हैं।
* ''चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादाः द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।
: ''त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यां आविवेश॥'' -- ऋग्वेद ४.५८.३
: इस मन्त्र में व्याकरण की तुलना वृषभ (बैल) से की गयी है जिसके चार सींग, तीन पैर, दो सिर तथा सात हाथ हैं तथा जो तीन प्रकार से बँधा है। वह वृषभ रोता है। वह महादेव मनुष्यों में प्रविष्ट है।
: उस महान देवता के चार सींग (नाम-आख्यात-उपसर्ग-निपात) , तीन पैर (भूत-वर्तमान-भविष्यत् काल), दो सिर (नित्य और अनित्य शब्द), सात हाथ (सात विभक्तियाँ) , तीन स्थान (उर, कण्ठ, सिर) से बधा हुआ है।
=== धर्म ===
* ''यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।'' -- वैशेषिक सूत्र
: जिससे वर्तमान जीवन में अभ्युदय और भावी जीवन में निःश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि हो, वही धर्म है। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि जिससे भौतिक उन्नति और अध्यात्मिक उन्नति दोनों प्राप्त होतीं हैं, वही धर्म है।
* ''स धर्मो यो निरुपधः सोऽर्थो यो न विरुध्यते ।
: ''स कामः सङ्गहीनो यः स मोक्षो योऽपुनर्भवः ॥
: धर्म वही हैं जिस में कोई छल न हो , अर्थ वही हैं जिस में कोई विरोध न हो , काम वही हैं जिस मे कोई बन्धन न हो और मोक्ष वही है जहाँ कभी भी पुनर्जन्म न हो।
* ''धर्मार्थकामाः सम सेव्यमानाः एको हि भजते स नरः जघन्यः॥
: धर्म, अर्थ और काम समान रूप से सेवन करना अच्छा है। जो केवल एक का सेवन करता है, वह मनुष्य जघन्य है।
===कर्म ===
* ''कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
: ''अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥'' -- श्रीमद् भगवद्गीता, ४-१७
: कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है।
* ''ननुनाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
: ''अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥'' -- ब्रह्मवैवर्तपुराण १/४४/७४
: मनुष्य जो कुछ अच्छा या बुरा कार्य करता है, उसका फल उसे भोगना ही पड़ता है। अनन्त काल बीत जाने पर भी कर्म, फल को प्रदान किए बिना नाश को प्राप्त नहीं होता।
* ''यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते ।
: ''तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्धयति ॥'' -- वाल्मीकि रामायण
:पराक्रम दिखाने का समय आने पर जो पीछे हट जाता है, उस तेजहीन का पुरुषार्थ सिद्ध नही होता।
* ''कर्मणा सिद्धिः ।
: कर्म से ही सिद्धि मिलती है।
* ''ज्ञानं भारः क्रियां बिना।'' -- हितोपदेश
: आचरण के बिना ज्ञान केवल भार होता है।
* ''यः क्रियावान् स पण्डितः ।
: जो क्रियावान है , वही पण्डित (ज्ञानी) है।
=== काम ===
* ''काममय एवायं पुरुष इति। स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति। यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते। यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते॥
: यह पुरुष काममय ही है। वह जैसी काम्ना करता है वैसा करने का यत्न करता है, जैसा करना चाहता है, वैसा ही कर्म करता है, जैसा कर्म करता है वैसा ही काम होता है।
* ''अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः कामातुराणां न भयं न लज्जा ।
: ''विद्यातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न वपुर्न तेजः ॥
: अर्थ के लिये आतुर मनुष्य का कोई मित्र होता है न कोई भाई, काम के लिये आतुर व्यक्ति को न कोई भय होता है न लज्जा, विद्या के लिये आतुर व्यक्ति को न सुख होत है न निद्रा, और भूख से आतुर मनुष्य के पास न तो स्वास्थ्य होता है न तेज।
*'' न पश्यति च जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति।
: ''न पश्यति मदोन्मत्तो स्वार्थी दोषान्न पश्यति॥'' -- सुभाषितरत्नाकर
: जन्म से अन्धे को दिखायी नहीं पड़ता, काम से अन्धा भी नहीं देखता है। नशे में चूर व्यक्ति नहीं देख पाता, स्वार्थी दोषों को नहीं देख पाता।
* ''न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
: ''हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ॥'' -- [[मनुस्मृति]]
: इच्छाएँ कभी भी उपभोग करने से शान्त नहीं होतीं। ये वैसे ही बढ़ जतीं हैं जैसे आग में घी डालने पर अग बढ़ जाती है, शान्त नहीं होती।
=== समय ===
* ''आयुषः क्षणमेकमपि न लभ्यः स्वर्णकोटिभिः ।
: ''स वृथा नीयते येन तस्मै नृपशवे नमः ॥'' -- महासुभाषितसङ्ग्रह
: करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं के द्वारा आयु का एक क्षण भी नहीं पाया जा सकता। वह ( क्षण ) जिसके द्वारा व्यर्थ नष्ट किया जाता है, ऐसे नर-पशु को नमस्कार ।
* ''कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।
: ''इति ते संशयो मा भूद्राजा कालस्य कारणम् ॥'' -- [[महाभारत]], शान्ति पर्व
: (भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि) काल राजा को बनाता है या राजा काल को बनाता है- इसमें तुम कभी संशय मत करना। जान लो कि राजा ही काल को बनाता है। अर्थात् जैसा राजा होगा, वैसा समय होगा और वैसी ही नीतियाँ व परिस्थितियाँ ।
* ''क्षणशः कणशश्चैव विद्याधनं अर्जयेत्।
: क्षण-क्षण का उपयोग करके विद्या का और कण-कण का उपयोग करके धन का अर्जन करना चाहिये।
*''आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः ।
: ''क्षिप्रम् अक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥'' -- [[हितोपदेश]]
:: लेने, देने और करने योग्य कार्य यदि तुरन्त नहीं कर लिया जाता तो समय उसका रस पी जाता है।
=== अर्थशास्त्र ===
* ''मनुष्याणां वृत्तिरर्थः ; मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः । तस्याः लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रमिति ।'' -- कौटिलीय अर्थशास्त्रम्, १८०वाँ प्रकरण (तन्त्रयुक्तयः)
: मनुष्यों की जीविका को अर्थ कहते हैं। मनुष्यों से युक्त भूमि को भी अर्थ कहते हैं। इस प्रकार, भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने वाले उपायों का निरूपण करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र कहलाता है।
* ''श्रुतिस्मृत्यविरोधेन राजवृत्तादिशासनम्।
: ''सुयुक्त्यार्थार्जनं यत्र ह्यर्थशास्त्रं तदुच्यते॥'' -- शुक्रनीति ४-५५, विद्याकलानिरुपणप्रकरण
: अर्थशास्त्र वह है जिसमें राजाओं के आचरण की शिक्षा हो, जो श्रुति-स्मृति से भिन्न हो, और जिसमें बड़ी दक्षता के साथ सम्पत्ति प्राप्त करने की शिक्षा दी गयी हो।<ref>[https://core.ac.uk/download/pdf/144527882.pdf बृहत्त्रयीगत सूक्तियाँ : एक विश्लेषण] (शोधपत्र, २०११)</ref>
* ''अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः।
: ''पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येता चतुर्दश॥
: ''आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।
: ''अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः ॥'' -- [[महाभारत]], शान्तिपर्व ; विष्णुपुराण 3.6.28-29<ref>[https://vyasonmukh-in.translate.goog/2021/01/12/arthashastra-origin-tradition-and-veneration-2/?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc Arthashastra – Origin, Tradition and Veneration]</ref>
:
* ''धर्ममर्थे च कामं च प्रवर्तयति पाति च l
: ''अधर्मानर्थविद्वेषानिदं शास्त्रं निहन्ति च ll'' -- कौटिलीय अर्थशास्त्रम् 15.1.72
:
* ''यतः सर्वप्रयोजनसिद्धिः सोऽर्थः।'' -- नीतिवाक्यामृतम्, अर्थसमुद्देश्य, १
: जिसके द्वारा सभी प्रयोजनों की सिद्धि होती है, वह अर्थ है।
* ''अर्थमूलौ धर्मकामौ।'' -- कौटिल्य अर्थशास्त्र
: धर्म और काम का मूल अर्थ है। ( अर्थ के बिना धर्म और काम भी प्राप्त नहीं नहीं होते।)
=== आयुर्वेद<ref>[https://d1wqtxts1xzle7.cloudfront.net/48254909/ayurveda_and_themimamsa_philosophy-libre.pdf?1471955978=&response-content-disposition=attachment%3B+filename%3DAyurveda_and_the_Mimamsa_Philosophy.pdf&Expires=1769869891&Signature=cST94OJVBe~yXSpE2ti9bYfYzNyyqOBYNSkLTjzQfROYEfIGnnZt1XU5y01hSL8SLkg-nmb4tCFLU3WkvYYjMMmMNfqijFfhFT8KE56as3X1zEirVkcO2E41vxv19f5mfOsYdsH9SKWEN0mq35OmDRrM3kD2D6ksfajv1KJ-JH-EjemYOUROs5ABYC4BaCn8hVI~8KCMfw5XYn2HO96ODfIv8SBId8yd7X5Lm7PQa8~wVbkjtIaphkpkMkkdeLKNBcdMOZpzuz~LnHmCxaxMdPpfqZTRuLxYkcpZg148aEAgdEetfBcGxWkQSHnUpaeGmaZkUf3fa2N3lt6Wcnr1Tw__&Key-Pair-Id=APKAJLOHF5GGSLRBV4ZA Ayurveda and Mimansa Philosophy]</ref> ===
* ''हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम्।
: ''त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः॥'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान
: हेतु (कारण), लिंग (लक्षण) और औषधि का ज्ञान - यह शाश्वत पुण्य त्रिसूत्र (तीन सूत्र) स्वस्थ एवं अस्वस्थ दोनों के लिये है जिसे पितामह (ब्रह्मा) ने कहा है। (आयुर्वेद में कुल तीन प्रकार के सूत्र हैं।)
* ''रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता ।
: ''रोगा दुःखस्य दातारो ज्वरप्रभृतयो हि ते ॥'' -- भावप्रकाश-पूर्वखण्ड-मिश्रप्रकरण
: यह आयुर्वेद का आधारभूत नियम है, त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) का साम्यावस्था मे रहना आरोग्य है, और विषम होना ही रोग का कारण है। रोग, दुख देते हैं। ज्वरादि रोग हैं।
* ''कालार्थकर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः।
: ''सम्यग्गोगश्च विज्ञेयो रोगारोग्यैककारणम्॥'' -- वाग्भटसंहिता, सूत्रस्थान -19
: काल, अर्थ, और कर्म का हीनयोग, मिथ्या योग, अतियोग ही रोग का और सम्यक योग आरोग्य का एकमात्र कारण है।
* '' शास्त्रं ज्योतिः प्रकाशार्थं दर्शनं बुद्धिः आत्मनः ।
: ''ताभ्यां भिषक् सुयुक्ताभ्यां चिकित्सत् न अपराध्यति ॥'' -- चरकसंहिता
: शास्त्र ज्योति के समान होते हैं जो (वस्तुओं को) प्रकाशित करता है। बुद्धि आँख के समान है। इन दोनों से युक्त वैद्य चिकित्सा करते समय गलती नहीं करता।
* ''एकस्मिन्नेव यस्येह शास्त्रे लब्धास्पदा मतिः।
: ''स शास्त्रमन्यदप्याशु युक्तिज्ञत्वात्प्रबुध्यते ॥'' -- चरकसंहिता, सिद्धिस्थान १२.४७
: यदि किसी व्यक्ति ने एक ही शास्त्र का अच्छी तरह से अध्ययन किया है, तो वह अपनी तार्किक क्षमता (युक्तिज्ञता) के कारण अन्य शास्त्रों को भी आसानी से समझ सकता है।
* ''अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानाम् अर्थवशात्तेषां तद्विद्येभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यम्। कस्मात्?
: ''न ह्येकस्मिञ्छास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् ।
: ''तस्माद्बहुश्रुतः शास्त्रं विजानीयाच्चिकित्सकः।'' -- सु. सं. सू. ४, ६-७
: आयुर्वेद में प्रयुक्त अन्य विद्याओं के सिद्धांतों को उन विषयों के विशेषज्ञों से समझना चाहिए।
* कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः शत्रुश्चाबुद्धिमताम्। अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमायुष्यं पौष्टिकं लौक्यमभ्युपदिशता वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यञ्च'' -- च. सं. वि. ८.१४
: बुद्धिमानों के लिए यह सारा संसार ही आचार्य (शिक्षक) है।
* ''श्रुते पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता।
: ''दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम्॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान ९.६
: एक कुशल वैद्य (चिकित्सक) में सिद्धांतों का पूर्ण ज्ञान, व्यापक व्यावहारिक अनुभव, कुशलता, और शारीरिक एवं मानसिक स्वच्छता - ये चार गुण होने चाहिए।
* ''तस्मान्निःसंशयं ज्ञानं हर्त्रा शल्यस्य वाञ्छता । शोधयित्वा मृतं सम्यग्द्रष्टव्यो अङ्गविनिश्चयः ॥ प्रत्यक्षतो हि यद् दृष्टं शास्त्रदृष्टं च यद् भवेत् । समासतस्तदुभयं भूयो ज्ञानविवर्धनम् ॥ प्रत्यक्षवेत्ता हि शास्त्राणां स स्यात् कार्येषु निष्कम्पः ।'' -- सुश्रुतसंहिता, शारीरस्थान, अध्याय 5
: इसलिए, वह शल्य-चिकित्सक (Surgeon) जो पूर्णतः 'निःसंदेह' ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे मृत शरीर का शोधन करके (विच्छेदन/Dissection द्वारा) उसके अंगों और प्रत्यंगों का अच्छी तरह से निरीक्षण करना चाहिए। क्योंकि जो ज्ञान प्रत्यक्ष देखा गया है (Practical Observation) और जो शास्त्रों में पढ़ा गया है (Theoretical Knowledge)—जब इन दोनों का मिलन होता है, तभी ज्ञान का वास्तविक विस्तार होता है। जो शास्त्रों के ज्ञान को अपनी आँखों से (प्रायोगिक रूप से) देख लेता है, वही अपने कार्यों (चिकित्सा या सर्जरी) में 'निष्कम्प' यानी पूर्ण आत्मविश्वासी और अडिग होता है।
* ''यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य।
: ''एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीत्य चार्थेषु मूढाः खरवद्वहन्ति॥'' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान ४.४
: जैसे चंदन के भार को उठाता हुआ गधा बस उस के भार को ही समझता है और चंदन के मूल्य को नहीं समझता, वैसे ही वे लोग हैं जो बहुत से शास्त्रों को पढ़ लेते हैं किन्तु उसके सही अर्थ से अनभिज्ञ हैं।
*''अतश्च प्रकृतं बुध्वा देशकालान्तराणि च।
: ''तन्त्रकर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत्॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान २६.३७
: प्रकरण (विषय), देश (स्थान) और काल (समय) की भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए, तंत्रकार (ग्रन्थकार) के अभिप्राय (उद्देश्य) को समझकर ही निर्णय या अर्थ (उपचार/निष्कर्ष) बताना चाहिए।
* ''अधीयानोऽपि शास्त्राणि तन्त्रयुक्त्या विना भिषक् ।
: ''नाधिगच्छति शास्त्रार्थानर्थान् भाग्यक्षये यथा॥'' -- चरकसंहिता सिद्धिस्थान १२.४८
: तंत्रयुक्ति (शास्त्र के अर्थ को समझने के तर्क/उपकरण) के बिना, चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करने वाला वैद्य (भिषक्) भी उसके सही अर्थ को नहीं समझ पाता, जैसे भाग्य क्षीण होने पर मनुष्य संपत्ति को नहीं पा पाता है।
* ''अत्रासां तन्त्रयुक्तीनां किं प्रयोजनम् ? उच्यते। वाक्ययोजनमर्थयोजनञ्च ।
: ''भवन्ति चात्र श्लोकाः।
: ''असद्द्वादिप्रयुक्तानां वाक्यानां प्रतिषेधनम्।
: ''स्ववाक्यसिद्धिरपि च क्रियते तन्त्रयुक्तितः॥
: ''व्यक्ता नोक्तास्तु ये ह्यर्था लीना ये चाप्यनिर्मलाः।
: ''लेशोक्ता ये च केचित्स्युस्तेषाञ्चापि प्रसाधनम्॥'' -- सुश्रुतसंहिता उत्तरस्थान ६५.५
* ''अधिकरणम्, योगः, पदार्थः, हेत्वर्थः, उद्देशः,उपदेशः, अपदेशः,
:''अपवर्जः, वाक्यशेषः, अर्थापत्तिः, विपर्ययः प्रसङ्गः, एकान्तः,
:''अनेकान्तः, पूर्वपक्षः, निर्णयः, अनुमतम्,, विधानम्, अनागतावेक्षणम्,
:''अतिक्रान्तावेक्षणम्, संशयः, व्याख्यानम्, स्वसंज्ञा, निर्वचनम्, निदर्शनम्,
:''नियोगः विकल्पः, समुच्चयः, ऊह्यम् '' -- सु.सं.सू.६५)
* ''अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानाम् अर्थवशात्तेषां तद्विद्येभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यम्। कस्मात्?
: ''न ह्येकस्मिञ्छास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम्।
: ''तस्माद्बहुश्रुतः शास्त्रं विजानीयाच्चिकित्सकः॥'' -- सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान ४, ६-७
: एक ही शास्त्र या विषय का अध्ययन करने वाला व्यक्ति शास्र के निर्णय को नही समझ सकता इसलिये बहुत शास्त्रों को सुनने पढने वाला चिकित्सक, शास्त्र के तत्त्व को जान सकता।
* ''तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिबाह्येन भेषजम्।
: ''धीमता किञ्चिदादेयं जीवितारोग्यकाङ्क्षिणा॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान १.१२७
: इसलिए, जीवन और आरोग्य (स्वास्थ्य) की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसे वैद्य से कोई भी औषधि ग्रहण नहीं करनी चाहिए जो 'युक्ति' (तर्क और वैज्ञानिक विवेक) से शून्य हो।
*''अज्ञातशास्त्रसद्भावान् शास्त्रमात्रपरायणान्।
: ''त्यजेद्दराद् भिषक्पाशान् पाशान् वैवस्वतानिव ॥
: ''सिद्धान्तो नाम परीक्षकैः बहुविधं परीक्ष्य हेतुभिश्च साधयित्वा निश्चितोऽर्थः।'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान १.१२७
: वे चिकित्सक जो शास्त्रों के वास्तविक अर्थ और गहराई (सद्भाव) से अनभिज्ञ हैं, और केवल रटे-रटाए ग्रंथों (शास्त्रमात्र) पर निर्भर रहते हैं, वे वास्तव में वैद्य कहलाने योग्य नहीं हैं।
=== विविध / प्रकीर्ण ===
* ''अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
: ''यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥'' -- चाणक्यनीति
: शास्त्र अनन्त हैं, विद्याएँ अनेक हैं, जीवन की अवधि थोड़ी हैं और विघ्न बहुत हैं। अतः जिस प्रकार हंस पानी अलग कर केवल दूध ही ले लेता हैं, वैसे ही हमें भी इन शास्त्रों में से जो सार तत्व हैं, वहीं ग्रहण करके उसकी उपासना में लग जाना चाहिए।
* ''तर्कोऽप्रतिष्ठः स्मृतयो विभिन्नाः
: ''नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्।
: ''धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्
: ''महाजनो येन गतः स पन्थाः॥'' -- महाभारतम्
: जीने का वास्तविक तरीका निर्धारित करने के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं हैं। स्मृतियाँ भी अलग-अलग बातें करती हैं। कोई भी एक विचारवन्त (मुनि) नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें। जीवन का वास्तविक तरीका गुप्त है, मानो किसी गुफा में छिपा हो। इसलिए महान लोग जिस मार्ग पर चले थे उसी मार्ग से जाना लाभकारी है।
* ''तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणा क्षारं जलं कापुरुषा पिवन्ति।'' -- योगवासिष्ठ (उत्तरार्ध) / भोजप्रबन्ध
: 'यह मेरे पिता का बनाया हुआ कुँआ है' ऐसा कहने वाले खारा जल पीते हैं।
* ''अकुलीनोऽपि शास्त्रज्ञो दैवतेरपि पूज्यते'' -- हितोपदेश
: नीच कुल वाला भी यदि शास्त्र जानता हो तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है।
* ''काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
: ''व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥
: बुद्धिमान व्यक्ति काव्य, शास्त्र आदि का पठन करके अपना मनोविनोद करते हुए समय को व्यतीत करते हैं और मूर्ख व्यक्ति व्यसन में, सोकर या कलह करके समय बिताते हैं।
* ''यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
: ''लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥
: जिस मनुष्य में स्वयं का विवेक, चेतना एवं बोध नहीं है, उसके लिए शास्त्र क्या कर सकता है। आंखों से हीन अर्थात् अंधे मनुष्य के लिए दर्पण क्या कर सकता है?
* ''केवलं शास्त्रं आश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः
: ''युक्तिहीने विचारे तु धर्महानिः प्रजायते॥'' -- बृहस्पतिस्मृति
: केवल कानून की किताबों व पोथियों मात्र के अध्ययन के आधार पर निर्णय देना उचित नहीं होता। इसके लिए ‘युक्ति’ का सहारा लिया जाना चाहिए। युक्तिहीन विचार से तो धर्म की हानि होती है।
* अमंत्रं अक्षरं नास्ति नास्ति मूलं अनौषधम्।
: ''अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः॥
: कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं।
* ''यस्य कस्य तरोर्मूलं येन केनापि मिश्रित ( घार्षित ) म् ।
: ''यस्मै कस्मै प्रदातव्यं यद्वा तद्वा भविष्यति॥
: जिस-तिस वृक्ष का मूल ले लिया, जिस-किस ने उसका मिश्रण बना दिया, जिस-तिस को उसे दे दिया गया (सेवन करा दिया गया), (तो परिणाम भी) ऐसा-वैसा ही होगा।
* ''दाने तपसि शौर्ये वा विज्ञाने विनये नये ।
: ''विस्मयो नहि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा ॥'' -- चाणक्यनीतिदर्पणः
: दान, तप, शौर्य, विनय और राजनय के क्षेत्र में विस्मय नहीं करना चाहिये। यह धरती बहुत से रत्नों से भरी हुई है।
* ''अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।'' -- गीता
: मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या हूँ;और परस्पर वाद करनेवालों का तत्त्व(सत्य)निर्णय के लिये किया जानेवाला वाद हूँ।
* ''सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायात् मा प्रमद।''
: सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना, स्वाध्याय से प्रमाद मत करना।
* ''तीर्थे तीर्थे निर्मलं ब्रह्मवृन्दं।
: ''वृन्दे वृन्दे तत्त्वचिन्तानुवादः॥
: ''वादे वादे जायते तत्त्वबोधः।
: ''बोधे बोधे भासते चन्द्रचूडः॥'' -- रम्भा शुक संवाद
: प्रत्येक तीर्थ में निर्मल ब्रह्मणों का संघ है। प्रत्येक संघ में तत्त्व-चिन्तन संवाद चल रहा है।
: संवाद से सत्य का बोध होता है। बोध में शिव का आभास होता है।
* ''एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
: सत्य एक ही है। विप्र लोग इसे अलग-अलग प्रकार से कहते हैं।
* ''इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
: ''यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद॥'' -- ऋग्वेद 10.129.7 (नासदीय सूक्त)
: यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुई इसका मुख्य कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता। इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है। हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उसके अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।
* सत्य का मुख स्वर्ण पात्र से ढका है-- ईशावास्योपनिषद
* ''असतो मा सदगमय
: ''तमसो मा ज्योतिर्गमय
: '' मृत्योर्माऽमृतम गमय।
* ''नेति नेति'' । -- [[उपनिषद]]
: ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है।
* ''अपूर्वः कोऽपि कोषोयं विद्यते तव भारति ।
: ''व्ययतो बृद्धिमायाति क्षयं आयाति संचयात्॥
: हे सरस्वती आपके पास कोई अपूर्व कोष है जो व्यय करने पर बढ़ता है और संचय करने पर घटता है।
* ''युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं बालकादपि ।
: ''अन्यत्तृणवत्त्याज्यं अप्युक्तं पद्मजन्मना॥'' -- योगवासिष्ठ
: कोई युक्तियुक्त (तर्कयुक्त) बात बालक द्वारा भी कही गयी हो तो भी उपादेय (ग्रहण करने योग्य) है। किन्तु कमल से जन्मे (ब्रह्मा) द्वारा कही गयी बात भी यदि अयुक्त हो तो वह तृण के समान त्याज्य है।
* ''इति खो, कालामा, यं तं अवोचुंह एथ तुम्हे, कालामा, मा अनुस्सवेन, मा परम्पराय, मा इतिकिराय, मा पिटकसम्पदानेन, मा तक्कहेतु, मा नयहेतु, मा आकार परिवितक्केन , मा दिट्ठिनिज्झानक्खन्तिया, मा भब्बरूपताय, मा समणो नो गरूति। यदा तुम्हे, कालामा, अत्तनाव जानेय्याथ – इमे धम्मा कुसला, इमे धम्मा सावज्जा, इमे धम्मा विञ्ञुगरहिता, इमे धम्मा समत्ता समादिन्ना अहिताय दुक्खाय संवत्तन्तीsति, अथ तुम्हें, कालामा, पजहेय्याथ।'' -- केसमुत्ति सुत्त, त्रिपिटक
: अर्थ : हे कालामाओ ! ये सब मैंने तुमको बताया है, किन्तु तुम इसे स्वीकार करो, इसलिए नहीं कि वह एक अनुविवरण है, इसलिए नहीं कि एक परम्परा है, इसलिए नहीं कि पहले ऐसे कहा गया है, इसलिए नहीं कि यह धर्मग्रन्थ में है। यह विवाद के लिए नहीं, एक विशेष प्रणाली के लिए नहीं, सावधानी से सोचविचार के लिए नहीं, असत्य धारणाओं को सहन करने के लिए नहीं, इसलिए नहीं कि वह अनुकूल मालूम होता है, इसलिए नहीं कि तुम्हारा गुरु एक प्रमाण है, किन्तु तुम स्वयं यदि यह समझते हो कि ये धर्म (धारणाएँ) शुभ हैं, निर्दोष हैं, बुद्धिमान लोग इन धर्मों की प्रशंसा करते हैं, इन धर्मों को ग्रहण करने पर यह कल्याण और सुख देंगे, तब तुम्हें इन्हें स्वीकर करना चाहिए।
* ''गणिकचिकित्सकतार्किकपौराणिकवास्तुशब्दशास्त्रमर्मज्ञाः।
: ''संगीतादिषु निपुणाः सुलभाः न हि तत्त्ववेत्तारः॥'' -- भट्टारक ज्ञानभूषण, तत्त्वज्ञानतरंगिणी
: गणित, चिकित्सा, तर्क (कुतर्क, वाद-विवाद), पुराण, वास्तु, शब्द और संगीत के शास्त्रों में निपुण लोग तो आसानी से मिल जाते हैं, परन्तु तत्त्व के ज्ञाता पुरुष मिलना बहुत कठिन है।<ref>[https://forum.jinswara.com/uploads/short-url/jkC87OhJkjheA4guE8b2fdEO8XZ.pdf न्यायमन्दिर]</ref>
* ''सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः'' -- तत्त्वार्थसूत्र १-१
: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं।
* उत्तम बिद्या लीजिये जदपि नीच पै होय।
: परौ अपावन ठौर में चन्दन त्यजत न कोय। -- कबीरदास
* जिन बूड़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठि।
: मैं बपुरा बूड़न डरा रहा किनारे बैठि। -- कबीरदास
* ज्ञान ‘वर्धमान वृक्ष’ है। -- अश्वघोष, ‘बुद्धचरित’ में
* 'ज्ञान' - सत्य, अनुभव और आत्मबोध का समन्वय है।<ref>[https://www.chemexplorers.in/bhartiya-gyan-parampara/ 'भारतीय ज्ञान परम्परा' : परिचय और अवधारणा]</ref>
* भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक काल से संवाद का महत्व है। समाज में संवाद अब बहुत कम बचा है। याज्ञवलक्य और मैत्रेयी के बीच संवाद (बृहदारण्यक उपनिषद) में दो महत्वपूर्ण विचार हैं। याज्ञवल्क्य ने जब अपनी सारी संपत्ति मैत्रेयी को देने की इच्छा व्यक्त की, मैत्रेयी ने कहा, ‘जिन चीजों से मेरी आत्मा में समृद्धि और असीमता नहीं आएगी, उन्हें लेकर मैं क्या करूंगी?’ इसके विपरीत, आज की गैर-रोमांटिक दुनिया ने ‘भौतिक अमीरी और संवेदना की दरिद्रता का युग्म’ चुना है।
* भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक साहित्य के शुनःशेप और नचिकेता जैसे चरित्र हैं। वे भौतिक सुखों की उपेक्षा करके बड़े [[प्रश्न|प्रश्नों]] के साथ जीना चाहते हैं।
* कठोपनिषद का नचिकेता भौतिक सुख-ऐश्वर्य और सत्ता की तरफ से मुंह फेरकर ज्ञान पाना चाहता है। वह मृत्यु के दरवाजे पर खड़ा है, भूखा-प्यासा और नींदें गंवाकर। उसकी जिज्ञासा ही उसका सहाय है।
=== अंग्रेजों के शासन के पहले की भारतीय शिक्षा ===
* ब्राह्मण शिक्षकों ने जिस शिक्षा प्रणाली का विकास किया, वह न केवल साम्राज्यों के पतन और समाज के परिवर्तनों से अप्रभावित रही, वरन् उसने हजारों वर्षों तक उच्च शिक्षा की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा। -- डॉ० एफ० ई० केई (FE. Keay)
* ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ ज्ञान के प्रति प्रेम इतने प्राचीन समय में प्रारम्भ हुआ हो, या जिसने इतना स्थायी ओर शक्तिशली प्रभाव उत्पन्न किया हो, जितना भारत में। -- एफ डब्ल्यु थॉमस
* विद्यारम्भ संस्कार, उपनयन संस्कार के अनेक वर्षों बाद उस समय आरम्भ हुआ, जब वैदिक संस्कृत, जनसाधारण की बोलचाल की भाषा नहीं रह गई थी। -- डॉ० ए० एस० अल्तेकर
* यह संस्कार पाँच वर्ष की आयु में होता था और साधारणतः सब जातियों के बालकों के लिए था। -- डॉ० वेद मित्र, विद्यारम्भ संस्कार के सम्बन्ध में
* ‘प्रेसीडेंसी के सभी गावों में पाठशालाएं हैं’। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६)
* (मद्रास) प्रेसीडेंसी में 12,498 पाठशालाएं हैं, जिन में 1,88,650 विद्यार्थी पढ़ते हैं। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६)
* पूरे प्रेसीडेन्सी में मुश्किल से कोई छोटा या बड़ा गाँव होगा जिसमें कम से कम एक विद्यालय न हो। -- जी एल प्रेण्डरगास्ट की बॉम्बे प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति के बारे में रपट, मार्च १८२४
* बंगाल और बिहार में एक लाख के लगभग स्कूल्स हैं। इन दोनों प्रान्तों की जनसंख्या चार करोड़ के बराबर है। अर्थात प्रति 400 व्यक्तियों पर एक शाला है। -- विलियम एडम्स की बंगाल प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर पहली रपट, 1835 से 1838 तक
* भारत में बड़ी अच्छी विकेंद्रित शिक्षा व्यवस्था है। लगभग प्रत्येक गांव की अपनी पाठशाला हैं, जो गांव वाले चलाते हैं। इन पाठशालाओं को जमीनें आवंटित हैं, जिनकी आमदनी से पाठशाला का खर्चा निकलता है। ... ‘इन में से अनेक स्कूलों का स्तर तो हमारे ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के बराबर का है। शिक्षकों को अच्छा वेतन दिया जाता हैं।' -- ब्रिटिश आई सी एस अधिकारी जी. डब्लू. लेटनर "History of Indigenous Education in Punjab : Since Annexation and in 1882" में पंजाब में शिक्ष की स्थिति के बारे में सन १८८२ में
* इस होशियारपुर जिले में साक्षरता की दर 84% है। -- जी. डब्लू. लेटनर, उत्तरी पंजाब के होशियारपुर जिले के बृहद सर्वेक्षण के आधार पर, १८७०-७५
* मालाबार के साहित्य का आधार एक जैसा है और इसमें सभी हिंदू राष्ट्रों (भारत क सभी भागों) की तरह ही शिक्षा-सामग्री शामिल है। शिक्षा हर परिवार में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। उनकी कई महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है। बच्चों को हिंसा के बिना और विशेष रूप से सरल प्रक्रिया द्वारा शिक्षा दी जाती है। .... शिष्य एक-दूसरे के मॉनिटर हैं और अक्षरों/ अंकों को रेत पर उंगली से लिखा जाता है। -- ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी, अलेक्जेंडर वॉकर (1764 – 1831) अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 263 पर
* ...ब्रिटिश प्रशासक, जब भारत आये, तो चीज़ों को ज्यों का त्यों अपने कब्जे में लेने के बजाय, उन्हें जड़ से उखाड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने जड़ से मिट्टी हटायी और जड़ को देखने लगे, और जड़ को वैसे ही (बिना मिट्टी के) छोड़ दिया। और वह सुन्दर वृक्ष नष्ट हो गया। -- महात्मा गांधी, 20 अक्टूबर, 1931 को चैथम हाउस, लंदन में
* हालाँकि, तेरहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के आरम्भ तक की अवधि के दौरान इतिहास या शिक्षा की स्थिति पर बहुत कम लिखा गया है। -- डॉ [[धरमपाल|धर्मपाल]], 'द ब्युटीफुल ट्री' की प्रस्तावना में
* इस बात पर ज़ोर देना ज़रूरी है कि स्वदेशी शिक्षा पाठशालाओं, मदरसों और गुरुकुलों के माध्यम से दी जाती थी। इन पारंपरिक संस्थानों का कर्यकलाप 'शिक्षा' कहलाता था और इसे सारे लोग वित्तीय सहयोग देकर जीवित रखते थे। यहाँ तक कि उन लोगों से भी सहयोग मिलता था जो स्वयं अशिक्षित थे। इस शिक्षा में प्रज्ञा, शील और समाधि के विचार शामिल थे। वास्तव में ये संस्थाएँ उस कूप के समान थीं जो समाज की जड़ों को सींचने का कार्य करतीं थीं। इसलिए ये संस्थाएँ आजकल के 'स्कूल' की अपेक्षा बहुत बड़ी भूमिका निभातीं थीं। -- 'द ब्युटीफुल ट्री' में
* प्राचीन "गुरुकुल" प्रणाली को अधिक समालोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है और पहला कदम इन गुरुकुलों के इतिहास के रिकार्डों से यह ढूँढना होगा कि उनके क्रियाकलाप क्या-क्या थे। इसके बिना हम प्राचीन गौरव के बारे में ये निरर्थक बातचीत करते रहेंगे और वर्तमान स्कूल प्रणाली को ऐसी दिशा में धकेलते रहेंगे जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि वह कैसी होगी। -- डॉ धर्मपाल, 'द ब्युटीफुल ट्री' में
== भारतीय ज्ञान के बारे में विद्वानों के विचार ==
* यदि मुझसे पूछा जाये कि किस आकाश के नीचे मानवीय मस्तिष्क ने अपने कुछ चुनिन्दा उपहारों को विकसित किया है, जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर गहन विचार किया है और उनके हल निकाले है, तो मैं भारत की तरफ़ इशारा करूँगा। -- [[मैक्स मूलर]]
* भारत हमारी सम्पूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है। भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है, अरबों के रास्ते हमारे अधिकांश गणित की जननी है, बुद्ध के रास्ते इसाईयत मे निहित आदर्शों की जननी है, ग्रामीण समाज के रास्ते स्व-शाशन और लोकतंत्र की जननी है। अनेक प्रकार से भारत माता हम सबकी माता है। -- [[विल्ल डुरन्ट]] , अमरीकी इतिहासकार
* हम भारतीयों के बहुत ऋणी हैं जिन्होने हमे गिनना सिखाया, जिसके बिना कोई भी मूल्यवान वैज्ञानिक खोज सम्भव नही होती। -- [[अलबर्ट आइन्स्टीन]]
* जब यूरोप के लोग भरतीय दर्शन के सम्पर्क में आयेंगे तो उनके विचार और आस्थाएँ बदलेंगी। वे बदले हुवे लोग यूरोप के विचारों और विश्वास को प्रभावित करेंगे। आगे चलकर यूरोप में ही ईसाई-धर्म को संकट उत्पन्न हो जाएगा। -- प्रसिद्ध दार्शनिक आर्थर शापेनहावर
* भारत मानव जाति का पलना है , मानव-भाषा की जन्मस्थली है , इतिहास की जननी है , पौराणिक कथाओं की दादी है, और प्रथाओं की परदादी है। मानव इतिहास की हमारी सबसे कीमती और सबसे ज्ञान-गर्भित सामग्री केवल भारत में ही संचित है। -- [[मार्क ट्वेन]]
* यदि इस धरातल पर कोई स्थान है जहाँ पर जीवित मानव के सभी स्वप्नों को तब से घर मिला हुआ है जब मानव अस्तित्व के सपने देखना आरम्भ किया था , तो वह भारत ही है। -- फ्रान्सीसी विद्वान [[रोमां रोलां]]
* भारत अपनी सीमा के पार एक भी सैनिक भेजे बिना चीन को जीत लिया और लगभग बीस शताब्दियों तक उस पर सांस्कृतिक रूप से राज किया। -- हू शिह , अमेरिका में चीन के भूतपूर्व राजदूत
* वेदों से हम सर्जरी, चिकित्सा, संगीत, घर बनाना, जिसमे यंत्रीकृत कला शामिल है, की व्यवहारिक कला सीखते हैं। वे जीवन के हर एक पहलू , संस्कृति, धर्म, विज्ञान, नैतिकता, कानून, ब्रह्माण्ड विज्ञान और मौसम विज्ञान के विश्वकोश हैं। -- [[विलियम जोन्स]]
* कुछ सन्दर्भों में प्राचीन भारत की न्यायिक प्रणाली सैद्धान्तिक रूप से हमारी आज की न्यायिक प्रणाली से उन्नत थी। -- जॉन डब्ल्यू स्पेलमैन (John W. Spellman)
* जब तक हमारे विद्वान, विचारक और शिक्षाविद संस्कृत से अनभिज्ञ रहेंगे तब तक हमारी सम्पूर्ण संस्कृति, साहित्य और जीवन अपूर्ण बना रहेगा। -- भारत के प्रथम राष्ट्रपति [[राजेन्द्र प्रसाद|डॉ राजेन्द्र प्रसाद]]
* संस्कृत साहित्य का यूरोप पर इतना अधिक बौद्धिक ऋण है कि उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। आने वाले वर्षों में यह ऋण और बढ़ने की सम्भावना है। हम तो अपनी वर्णमाला तक को परिपूर्ण नहीं बना पाए हैं। (प्रोफ मैक्डोनेल)
* संस्कृत में जितनी स्पष्टता और दार्शनिक परिशुद्धता है, उतनी ग्रीक सहित विश्व की किसी भी भाषा में नहीं है। -- Friedrich von Schlegel
* संस्कृत भाषा की प्राचीनता जो भी हो, इसकी संरचना आश्चर्यजनक है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण (दोषरहित) है, लैटिन से अधिक शब्दबहुल है, और इन दोनों की अपेक्षा अधिक उत्कृष्टतापूर्वक परिशोधित है; फिर भी क्रियाओं के मूलों के रूप में और व्याकरण के रूपों में, इसका इन दोनों भाषाओं के साथ बहुत दृढ़ सम्बन्ध दिखता है, जिसके केवल संयोग से उत्पन्न होने की स्म्भावना कम है। इन तीनों में इतना दृढ़ सम्बन्ध है कि इनका विश्लेषण करके कोई भी भाषाशास्त्री इनके समान स्रोत से निकलने के ही निष्कर्ष पर पहुंचेगा। किन्तु वह स्रोत अब शायद बचा नहीं नहीं है। -- [[विलियम जोन्स]]
* भारत हमारी सम्पूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है। भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है, अरबों के रास्ते हमारे अधिकांश गणित की जननी है, बुद्ध के रास्ते इसाईयत मे निहित आदर्शों की जननी है, ग्रामीण समाज के पथ स्व-शाशन और लोकतंत्र की जननी है। अनेक प्रकार से भारत माता हम सबकी माता है। -- [[विल डुरन्ट|विल्ल डुरन्ट]] , अमरीकी इतिहासकार
* संस्कृत न केवल जीवित है बल्कि यह मृत को जीवित करने की औषधि भी है। -- [[सम्पूर्णानन्द]]
* संस्कृत भाषा, देवभाषा है। यह सत्य युग की भाषा है जो वाक् और अर्थ के सत्य और पूर्ण सम्बन्ध पर आधारित है। इसके प्रत्येक स्वर और व्यञ्जन में एक विशेष अन्तर्भूत शक्ति है जो उनकी प्रकृति के कारण है, किसी विकास के कारण या मानव द्वारा चुना हुआ नहीं है। -- [[अरविन्द घोष|श्री अरविन्द]] , ‘Hymns to the Mystic Fire’)
* सभ्यता के इतिहास में, पुनर्जागरण के बाद, अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संस्कृत साहित्य की खोज से बढकर विश्वव्यापी महत्व की कोई दूसरी घटना नहीं घटी है। (आर्थर अन्थोनी मैक्डोनेल्ड)
* जब हम संस्कृत साहित्य पर ध्यान डालते हैं तो अनन्त की संकल्पना हमारे सामने आ जाती है। सबसे लंबा जीवन भी उन कार्यों के अवलोकन के लिए पर्याप्त नहीं होगा जो भारत की सीमा से परे हिमालय की तरह हर देश की विशालतम संरचना से ऊपर उभरे और फूले हुए हैं। -- [[विलियम जोन्स]]
* पाणिनि का व्याकरण, विश्व के व्याकरणों में सर्वश्रेष्ठ है। यह मानव आविष्कार और उद्योग की सबसे शानदार उपलब्धियों में से एक है। -- सर डब्ल्यू हन्टर
* संस्कृत की संरचना की अप्रतिम पारदर्शिता इसे भारत-यूरोपीय परिवार की भाषाओं में प्रथम स्थान का निर्विवाद अधिकार देती है। -- प्रो० ह्विटनी
* संस्कृत, योरप की आधुनिक भाषाओं की जननी है। - M. Dukois
* सभी लोग पाणिनि के व्याकरण को विश्व का सबसे छोटा और पूर्ण व्याकरण स्वीकार करते हैं। -- प्रो० वेबर
* हिन्दुओं के अलावा कोई भी राष्ट्र अभी तक ध्वनिविज्ञान की इतनी उत्तम प्रणाली की खोज नहीं कर सका है। -- प्रो० विल्सन
* संस्कृत के व्यंजनों का विन्यास, मानव प्रतिभा का अद्वितीय उदाहरण है। -- प्रो० थॉम्पसन
* यदि आप इस कठिनाई ([[संस्कृत]] भाषा सीखने की) से पार पाना चाहते हैं तो यह आसान नहीं होगा क्योंकि अरबी भाषा की तरह शब्दों तथा विभक्तियों, दोनों में ही इस भाषा (संस्कृत) की पहुंच बहुत विस्तृत है। इसमें एक ही वस्तु के लिए कई शब्द, मूल तथा व्युत्पन्न, दोनों प्रयुक्त होते हैं और एक ही शब्द का प्रयोग कई वस्तुओं के लिए होता है। -- अलबरूनी, संस्कृत के बारे में, अपनी पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' में
* उस समय बड़ी संख्या में गुरुकुलों के अलावा, बंगाल और बिहार के प्रत्येक जिले में उच्च शिक्षा के लगभग सौ संस्थान भी थे। दुर्भाग्य से, उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान पूरे भारत में ये संख्या तेज़ी से कम हो गई। अंग्रेजों ने यह भी देखा कि व्याकरण, कोश, गणित, आयुर्वेद, तर्कशास्त्र, कानून और दर्शन को पढ़ाने के लिए संस्कृत पुस्तकों का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा था। ....इसके अलावा, भारत में ब्रिटिश शासन के आरम्भिक काल में, ब्रिटिश अधिकारियों ने देखा कि भारत में आम लोगों की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैंड की तुलना में अधिक उन्नत और व्यापक थी। ...[[धरमपाल|धर्मपाल]] के अनुसार, अंग्रेजों ने बाद में इस संस्कृत-आधारित प्रणाली को अपनी अंग्रेजी-आधारित प्रणाली से बदल दिया, जिसका लक्ष्य ब्रिटिश प्रशासन के लिए निम्न-स्तर के क्लर्क तैयार करना था। -- [[राजीव मल्होत्रा]]
* भारत की ज्ञान परम्परा आज तक इतनी समृद्ध है, क्योंकि यह संरक्षण, नवाचार, परिवर्धन और अनुकूलन के चार मूलभूत स्तंभों पर आधारित है। -- [[नरेन्द्र मोदी]]
==इन्हें भी देखें==
*[[भारतीय गणित]]
*[[आयुर्वेद]]
*[[भारत]]
*[[संस्कृत]]
*[[ज्ञान]]
*[[गुरु]]
*[[शास्त्रार्थ]]
*[[तर्क]]
*[[विद्या]]
*[[पाण्डित्य]]
*[[प्रश्न]]
==सन्दर्भ==
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स्मार्ट फोन
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"'''स्मार्ट फोन''' (smartphone) चल युक्ति है जो पारम्परिक मोबाइल फोन जैसा काम करने के साथ साथ इसमें उन्नत संगणन की भी सुविधा होती है। == उक्तियाँ == * आज हम वो य्क्तियाँ अपने थैली (पॉक..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''स्मार्ट फोन''' (smartphone) चल युक्ति है जो पारम्परिक मोबाइल फोन जैसा काम करने के साथ साथ इसमें उन्नत संगणन की भी सुविधा होती है।
== उक्तियाँ ==
* आज हम वो य्क्तियाँ अपने थैली (पॉकेट) में लेकर चलते हैं जिनमें गणना करने की शक्ति उन युक्तियों से भी अधिक है जिन युक्तियों ने कभी मानव को चन्द्रमा पर पहुँचाया था। -- NASA प्रौद्योगिकी रिपोर्ट (2020)
* स्मार्टफोन हमारे समय की प्रतिनिधि प्रौद्योगिकी है- वह शक्तिशाली, चलायमान, और वैश्विक स्तर पर मानव की आदतों को पुनः आकार देने में सक्षम है। -- MIT मानव-प्रौद्योगिकी इन्टरैक्शन सेमिनार, शेरी तुर्कले (2020)
* अरबों लोगों के लिये स्मार्ट फोन एक युक्ति मात्र नहीं है बल्कि उनको शिक्षा, वित्त, स्वास्थ्य और अवसर से जोड़ने का मुख्य साधन है। -- डिजिटल डेवलपमेन्ट रिपोर्ट, संयुक्त राष्ट्र संघ (2023)
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[[चित्र:Samsung Galaxy Fold7 Main Screen (cropped).jpg|right|thumb|300px|सामसुंग गैलेक्सी फोल्ड७ का मुख्य-पटल]]
'''स्मार्ट फोन''' (smartphone) चल युक्ति है जो पारम्परिक मोबाइल फोन जैसा काम करने के साथ साथ इसमें उन्नत संगणन की भी सुविधा होती है।
== उक्तियाँ ==
* आज हम वो य्क्तियाँ अपने थैली (पॉकेट) में लेकर चलते हैं जिनमें गणना करने की शक्ति उन युक्तियों से भी अधिक है जिन युक्तियों ने कभी मानव को चन्द्रमा पर पहुँचाया था। -- NASA प्रौद्योगिकी रिपोर्ट (2020)
* स्मार्टफोन हमारे समय की प्रतिनिधि प्रौद्योगिकी है- वह शक्तिशाली, चलायमान, और वैश्विक स्तर पर मानव की आदतों को पुनः आकार देने में सक्षम है। -- MIT मानव-प्रौद्योगिकी इन्टरैक्शन सेमिनार, शेरी तुर्कले (2020)
* अरबों लोगों के लिये स्मार्ट फोन एक युक्ति मात्र नहीं है बल्कि उनको शिक्षा, वित्त, स्वास्थ्य और अवसर से जोड़ने का मुख्य साधन है। -- डिजिटल डेवलपमेन्ट रिपोर्ट, संयुक्त राष्ट्र संघ (2023)
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[[चित्र:Samsung Galaxy Fold7 Main Screen (cropped).jpg|right|thumb|300px|सामसुंग गैलेक्सी फोल्ड७ का मुख्य-पटल]]
'''[[:w:स्मार्ट फोन|स्मार्ट फोन]]''' (smartphone) चल युक्ति है जो पारम्परिक मोबाइल फोन जैसा काम करने के साथ साथ इसमें उन्नत संगणन की भी सुविधा होती है।
== उक्तियाँ ==
* आज हम वो य्क्तियाँ अपने थैली (पॉकेट) में लेकर चलते हैं जिनमें गणना करने की शक्ति उन युक्तियों से भी अधिक है जिन युक्तियों ने कभी मानव को चन्द्रमा पर पहुँचाया था। -- NASA प्रौद्योगिकी रिपोर्ट (2020)
* स्मार्टफोन हमारे समय की प्रतिनिधि प्रौद्योगिकी है- वह शक्तिशाली, चलायमान, और वैश्विक स्तर पर मानव की आदतों को पुनः आकार देने में सक्षम है। -- MIT मानव-प्रौद्योगिकी इन्टरैक्शन सेमिनार, शेरी तुर्कले (2020)
* अरबों लोगों के लिये स्मार्ट फोन एक युक्ति मात्र नहीं है बल्कि उनको शिक्षा, वित्त, स्वास्थ्य और अवसर से जोड़ने का मुख्य साधन है। -- डिजिटल डेवलपमेन्ट रिपोर्ट, संयुक्त राष्ट्र संघ (2023)
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समुद्र
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"'''समुद्र''' या '''सागर''' क्षारीय जल का विशाल जलराशि है जो सम्पूर्णतः या अंशतः थल से घिरा होता है। == उक्तियाँ == * ''आसिन्धुसिन्धुपर्यंता यस्य भारतभूमिका । : ''पितृभूपुण्यभूश्..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''समुद्र''' या '''सागर''' क्षारीय जल का विशाल जलराशि है जो सम्पूर्णतः या अंशतः थल से घिरा होता है।
== उक्तियाँ ==
* ''आसिन्धुसिन्धुपर्यंता यस्य भारतभूमिका ।
: ''पितृभूपुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः ॥'' -- [[वीर सावरकर]]
: सिन्धु नदी के उद्गमस्थान से कन्याकुमारी के समुद्रतक (विस्तृत भूभाग को) भारत भूमि को जो पितृ भूमि (मातृ भूमि) और पुण्य भूमि मानते हैं, उन्हें ‘हिन्दू’ कहते हैं ।
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/* उक्तियाँ */
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'''समुद्र''' या '''सागर''' क्षारीय जल का विशाल जलराशि है जो सम्पूर्णतः या अंशतः थल से घिरा होता है।
== उक्तियाँ ==
* ''आसिन्धुसिन्धुपर्यंता यस्य भारतभूमिका ।
: ''पितृभूपुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः ॥'' -- [[वीर सावरकर]]
: सिन्धु नदी के उद्गमस्थान से कन्याकुमारी के समुद्रतक (विस्तृत भूभाग को) भारत भूमि को जो पितृ भूमि (मातृ भूमि) और पुण्य भूमि मानते हैं, उन्हें ‘हिन्दू’ कहते हैं ।
* ''समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले ।
: ''विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे ॥
: हे देवी, जो समुद्र को अपनी वस्त्र की तरह धारण करती हो, और जो पहाड़ों के तनों और शिखरों को अपने शरीर के समान संभाले हुए हैं, हे विष्णु की पत्नी, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
* ''रत्नाकरः किं कुरुते रत्नैः विन्ध्योऽपि किं करिष्यति हस्तिभिः ।
: ''धीरः पुरुषो लोके परोपकारं विना किं करिष्यति ॥''
: रत्नाकर (समुद्र) रत्नों का क्या करता है? विन्ध्य (पर्वत) भी हाथियों का क्या करता है? धीर पुरुष संसार में परोपकार के अलावा क्या करता है?
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