विकिसूक्ति hiwikiquote https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.2 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिसूक्ति विकिसूक्ति वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk वृक्ष 0 6378 32860 31892 2026-05-14T17:40:58Z अनुनाद सिंह 658 32860 wikitext text/x-wiki '''वृक्ष''' अर्थात पेड़ । तरु, उद्भिद आदि इसके पर्याय हैं। == उद्धरण == * ''अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश पुष्पजातीः। : ''द्वे द्वे तथा दाडिममातुलिङ्गे पञ्चाम्ररोपी नरकं न याति॥'' -- वाराहपुराण / विष्णुधर्मोत्तरपुराण : जो व्यक्ति जो एक पीपल, एक नीम, एक बरगद, दस फूलवाले पौधो अथवा लताएं, दो अनार, दो नारंगी और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह नरक में नहीं जाता है। * ''अश्वत्थमेकं पिचुमर्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश चिञ्चिणीकाः । : ''कपित्थबिल्वामलकत्रयञ्च पञ्चाम्ररोपी नरकं न पश्येत् ॥'' -- स्कन्दपुराण, नागरखण्ड / भविष्यपुराण, उत्तरपर्व / शार्ङ्गधर, उपवनविनोदः : जो मनुष्य एक पीपल, एक नीम, एक वट, दस इमली, कैथ_बिल्व_आँवला तीनों या पाँच आम के वृक्ष लगाता है उसे कभी नरक के दर्शन नहीं होते । * ''अश्वत्थ एकः पिचुमर्द्द एको द्वौ चम्पकौ त्रीणि च केशराणि । : '' सप्ताथ ताला नव नारिकेलाः पञ्चाम्ररोपी नरकं न याति ॥'' -- तिथितत्त्वम् : अर्थ - जो एक पीपल, एक नीम, दो चम्पक, तीन केशर, सात ताड़, नौ नारियल तथा पाँच आम के वृक्ष लगाता है, वह नरक नहीं जाता। * ''पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः : ''स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। : ''नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः : ''परोपकाराय सतां विभूतयः॥ (सुभाषितरनभाण्डागरम्) : अर्थ : नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती हैं। पेड़ फल खुद नहीं खाते हैं। बादल भी फसल नहीं खाते हैं। उसी प्रकार सज्जनों की सम्पत्ति परोपकार के लिए होती है। * तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान। : कह रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान॥ (रहीम) : अर्थ: रहीम कहते हैं कि वृक्ष कभी स्वयं अपने फल नहीं खाते और तालाब कभी अपना पानी नहीं पीते। उसी तरह सज्जन लोग दूसरे के हित के लिये संपत्ति का संचय करते हैं। * ''नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः। : ''शुष्क काष्ठश्च मूर्खश्च, न नमन्ति कदाचन्॥ : अर्थ : फलदार वृक्ष झुक जाते हैं और गुणी जन झुकते हैं। परन्तु सूखी लकड़ी और मूर्ख लोग कभी नहीं झुकते। * ''छायां ददाति शशिचन्दनशीतलां यः सौगन्धवन्ति सुमनांसि मनोहराणि । : ''स्वादूनि सुन्दरफलानि च पादपं तं छिन्दन्ति जाङ्गलजना अकृतज्ञता हा ॥ : जो वृक्ष चन्द्रमा और चन्दन के समान शीतल छाया प्रदान करता है, सुन्दर एवं मन को मोहित करने वाले पुष्पों से वातावरण सुगन्धमय बना देता है, आकर्षक तथा स्वादिष्ट फलों को मानवजाति पर न्यौछावर करता है, उस वृक्ष को जंगली असभ्य लोग काट डालते हैं । अहो मनुष्य की यह कैसी कृतघ्नता है! * ''सेचनादपि वृक्षस्य रोपितस्य परेण तु। : ''महत्फलमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥'' -- विष्णुधर्मोत्तरपुराण (3.296.17) : दूसरे व्यक्ति द्वारा रोपित वृक्ष का सिंचन करने से भी महान् फलों की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नही है। * '' दशकूपसमावापी दशवापी समो हृदः। : ''दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः॥'' -- मत्स्यपुराण (154.511-512) : दस कुओं के बराबर एक बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र है और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष। * ''वायूनां शोधकाः वृक्षाः रोगाणामपहारकाः । : ''तस्माद् रोपणमेतेषां रक्षणं च हितावहम् ॥ : वृक्ष वायु को शुद्ध करते हैं और रोगों को दूर भगाने में सहयोगी होते हैं । इसलिए वृक्षों का रोपण और रक्षण प्राणीमात्र के लिए हितकारी है । * ''त्वक्शाखापत्रमूलैश्च पुष्पफलरसादिभिः। : प्रत्यङ्गरुपकुर्वन्ति वृक्षाः सद्भिः समं सदा ॥ : सन्तों के समान ही वृक्ष अपनी त्वचा शाखा पत्ते मूल , पुष्प फल रस आदि सभी अंगों से प्राणियों का उपकार करते है । * ''पश्यैतान् महाभागान् पराबैंकान्तजीवितान्। : वातवर्षातपहिमान सहन्तरे वारयन्ति नः॥ : वृक्ष इतने महान होते हैं कि परोपकार के लिये ही जीते हैं। ये आँधी, वर्षा और शीत को स्वयं सहन करते हैं। * ''अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीवनम्। : ''सुजनस्यैव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः॥ : इनका जन्म बहुत अच्छा है क्योंकि इन्हीं के कारण सभी प्राणी जीवित हैं। जिस प्रकार किसी सज्जन के सामने से कोई याचक खाली हाथ नहीं जाते उसी प्रकार इन वृक्षों के पास से भी कोई खाली हाथ नहीं जाता। * ''"पुत्रपुष्यफलच्छाया मूलवल्कलदारुभिः। : ''गन्धनिर्यासभस्मास्थितौस्मैः कामान वितन्वते॥ : ये हमें पत्र, पुष्प, फल, छाया, मूल, बल्कल, इमारती और जलाऊ लकड़ी, सुगंध, राख, गुठली और अंकुर प्रदान करके हमारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। * ''"एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। : ''प्राणैरर्थधिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सहा॥ : हर प्राणी का कर्तव्य है कि वह अपने प्राण, धन, बुद्धि तथा वाणी से अन्यों के लाभ हेतु कल्याणकारी कर्म करे। * ''पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् । : ''वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च ॥ : फलों और फूलों वाले वृक्ष मनुष्यों को तृप्त करते हैं । वृक्ष देने वाले अर्थात् समाजहित में वृक्षरोपण करने वाले व्यक्ति का परलोक में तारण भी वृक्ष करते हैं । * ''अहो एषां वरं जन्म सर्व प्राण्युपजीवनम् । : ''धन्या महीरूहा येभ्यो निराशां यान्ति नार्थिनः ॥ : सब प्राणियों पर उपकार करने वाले वृक्षों का जन्म श्रेष्ठ है। ये वृक्ष धन्य हैं कि जिनके पास से याचक कभी निराश नहीं लौटते। * ''पुष्प-पत्र-फलच्छाया. मूलवल्कलदारुभिः। : ''धन्या महीरुहा येषां. विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ : वे वृक्ष धन्य हैं जिनके पास से याचक फूल, पत्ते, फल, छाया, जड़, छाल और लकड़ी से लाभान्वित होते हुए कभी भी निराश नहीं लौटते। * ''तस्मात् तडागे सवृक्षा रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा। : ''पुत्रवत् परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ॥ : इसलिए श्रेयस् यानी कल्याण की इच्छा रखने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह तालाब के पास अच्छे-अच्छे पेड़ लगाए और उनका पुत्र की भांति पालन करे। वास्तव में धर्मानुसार वृक्षों को पुत्र ही माना गया है। * ''छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। : ''फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुषा ईव ॥ : दूसरे को छाँव देता है, खुद धूप में खड़ा रहता है, फल भी दूसरों के लिए होते हैं; सचमुच वृक्ष सत्पुरुष जैसे होते हैं। * ''तडागकृत् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः । : ''एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ॥ : तालाब बनवाने, वृक्षरोपण करने, और यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले द्विज को स्वर्ग में महत्ता दी जाती है; इसके अतिरिक्त सत्य बोलने वालों को भी महत्व मिलता है। * ''नाप्सु मूत्रं पुरीष वाष्ठीवनं वा समुत्सृजेत्। : ''अमेध्यमलिप्तमन्यद्वा लोहतं वा विषाणि वा। : जल में मल मूत्र, कूड़ा, रक्त तथा विष आदि नहीं बहाना चाहिये। इससे पानी विषाक्त हो जाता है और पर्यावरण पर इसका बुरा प्रभाव दिखाई देता है। इससे मनुष्य तथा अन्य जीवों को स्वास्थ्य भी खराब होता है। * ''चेष्टा वायुः खमाकाशमूष्माग्निः सलिलं द्रवः। : ''पृथिवी चात्र सङ्कातः शरीरं पाञ्चभौतिकम्॥ : महर्षि भृगु कहते हैं कि इन वृक्षों के शरीर में चेष्टा अर्थात् गतिशीलता वायु का रूप है,खोखलापन आकाश का रूप है,गर्मी अग्नि का रूप है, तरल पदार्थ सलिल का रूप है, ठोसपन पृथ्वी का रूप है। इस प्रकार (इन वृक्षों का यह) शरीर पाँच महाभूतों (वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी तत्त्वों) से बना है। * ''छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। : ''फलान्यापि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥ : वृक्ष दूसरों को छाँव देते हैं। खुद धूप में खडे रहते हैं। इनके फल भी दूसरों के लिए होते हैं। सचमुच वृक्ष सत्पुरुष जैसे होते हैं। *''पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या : ''नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्। : ''आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः : ''सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैर्नुज्ञायताम्॥'' -- [[कालिदास]], अभिज्ञान शाकुन्तलम् के चतुर्थ अंक में, शकुन्तला के पतिगृहगमन के समय : अर्थ - हे तपोवन के वृक्षो! जो तुम्हें पानी दिए स्वयं पानी नहीं पीती थी, जिसको अलङ्कार अधिक प्रिय होने पर भी तुम्हारे प्रति अगाध प्रेम होने के कारण जो तुम्हारे नये पत्तों को नहीं तोड़ती थी, तुम्हारे नवपुष्पोद्भव के समय जिसका उत्सव होता था, वह शकुन्तला अब पतिगृह को जा रही है । इसलिए तुम सभी अपनी स्वीकृति दो। * ''क्षौमं केनचिदिन्दुपाण्डुतरुणा माङ्गल्यमाविष्कृतं : ''निष्ठयूस्तचरणोपरागसुभगो लाक्षारसः केनचित्। : ''अन्येभ्यो वनदेवताकरतत्तलैरापर्वभागोत्थितै : ''दत्तान्याभरणानिन: किसलयोद्भेदप्रतिद्वन्द्विभिः॥'' -- [[कालिदास]], अभिज्ञान शाकुन्तलम् में, शकुन्तला के पतिगृहगमन के समय : किसी वृक्ष ने चन्द्रमा के सदश शुभ्र माङ्गलिक रेखमी वस्त्र दिया, किसी वृक्ष ने चरणों में लगाने योग्य महावर निकालकर दिया तथा अन्य वृक्षों ने कलाई तक बाहर निकले हुए वन देवताओं के करतलों द्वारा जोकि उन वृक्षों के नूतन किसलयों से प्रतिस्पर्धा करने वाले थे, आभूषण प्रदान किये। (डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही लिखा है- "कालिदास ने मनुष्य की परिपूर्णता प्रकृति के साहचर्य में देखी है।) * अगर एक पेड़ मर जाता है, तो उसके स्थान पर एक और पौधा लगाओ। -- कैरोलस लिनियस * अपने पिछले इतिहास, उत्पत्ति व संस्कृति के ज्ञान के बिना व्यक्ति वैसे ही है जैसे जड़ों के बिना पेड़। -- मारकु गर्वे * आज कोई छाया में बैठा है क्योंकि किसी ने बहुत पहले एक पेड़ लगाया था। -- वारेन बफे * आप जड़ों के बिना फल नहीं खा सकते हैं। -- स्टीफन कोवे * इस पृथ्वी पर कुछ भी स्थिर नहीं है। यह या तो बढ़ रहा है या यह मर रहा है। फिर चाहे वो पेड़ हो या इंसान। -- लू होल्त्ज़ * एक एकड़ में एक हजार जंगलों का निर्माण होता है। -- राल्फ वाल्डो इमर्सन * एक पेड़ – एक जीवन। * एक मुरझाए हुए पेड़ जो पूरे जंगल को जलने का कारण बनता है, उसी तरह एक दुष्ट बेटा एक पूरे परिवार को नष्ट कर देता है। -- चाणक्य * एक वृक्ष दस पुत्र समान । * कठोर पेड़ सबसे आसानी से टूट जाता है, जबकि बांस हवा के साथ झुकने से जीवित रहता है। -- ब्रूस ली * जिस तरह से एक मुरझाया पेड़ पूरे जंगल के जलने का कारण बनता है, उसी तरह एक दुष्ट बेटा एक पूरे परिवार को नष्ट कर देता है। -- चाणक्य * जीवन का सही अर्थ पेड़ लगाना है, जिसकी छाँव में आप बैठने की उम्मीद नहीं करते हैं। -- नेल्सन हेंडरसन * जो पेड़ लगाता है, वह आशा रखता है। -- लुसी लारकॉम * देशभक्त का रक्त आजादी के पेड़ का बीज है। -- थॉमस कैंपबेल * पेड़ लगाने का सबसे अच्छा समय 20 साल पहले था। दूसरा सबसे अच्छा समय अब है। -- चीनी कहावत * प्यार के बिना जीवन उस पेड़ की तरह होता है, जिसमे न फूल होते है और फल। -- खलील जिब्रान * प्रेम फूल की तरह होता है, जबकि मैत्री एक आश्रय के पेड़ की तरह। -- सैमुअल टेलर कोलरिज * मिट्टी के बंधन से मुक्ति पेड़ के लिए कोई आजादी नहीं है। -- रविन्द्रनाथ टैगोर * मिट्टी के बंधन से मुक्ति पेड़ के लिए कोई स्वतंत्रता नहीं है। -- रविंद्रनाथ टैगोर * मैं एक पेड़ की तरह हूं। मेरे पत्ते रंग बदल सकते हैं, लेकिन मेरी जड़ें समान हैं। -- रोज नमाजें * जो पेड़ लगाता है, अपने अलावा दूसरों से भी प्यार करता है। -- थॉमस फुलर * सभी धर्म, कला और विज्ञान एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं। -- अल्बर्ट आइंस्टीन * हर दो चीड़ के पेड़ों के बीच एक दरवाजा है जो जीवन के एक नए रास्ते की ओर जाता है। -- जॉन मुइर === वृक्षों पर भीष्म पितामह के विचार === महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह बाणों की शैया पर विराजमान थे। उसी समय धर्मराज युधिष्ठिर विनीत जिज्ञासु भाव से जकर पूछते हैं पितामह यह बताइए वृक्षों में जीवात्मा का निवास है या नहीं? वृक्षों की गणना हम किस श्रेणी में करें ? भीष्म इन प्रश्नों का समाधान देते हैं जो शांति पर्व में ७ श्लोकों में वर्णित है। भीष्म कहते हैं कि भृगु ऋषि का यह मत है कि- (1) यद्यपि वृक्ष ठोस जान पड़ते हैं, फिर भी उनमें आकाश (spase) है, इसमें संदेह नहीं है। आकाश होने से ही उनमें नित्य प्रति फूल फल आदि की उत्पत्ति संभव हो सकती है। ( 2) वृक्षों के भीतर जो ऊष्मा गर्मी होती है उससे उनके पत्ते छाल फूल फल मुरझा जाते हैं झड़ जाते हैं ,अतः उनमें स्पर्श का होना भी सिद्ध होता है। (3) वायु अग्नि और विद्युत की कड़क आदि भीषण शब्द होने पर वृक्षों के फूल फल झड़ जाते हैं। शब्द का ग्रहण कान से ही होता है अतः यह सिद्ध होता है कि वृक्ष सुनते भी हैं। (4) लता वृक्ष को चारों ओर से लपेट लेती है तथा उसके ऊपरी भाग तक चढ जाती है। बिना देखे किसी को अपने जाने का मार्ग नहीं मिल सकता, इससे सिद्ध होता है कि वृक्ष देखते भी हैं। (5) पवित्र तथा अपवित्र गंध से तथा नाना प्रकार की धूपों की सुगंध से वृक्ष निरोग होकर फूलने फलने लग जाते हैं। अतः वृक्षों में सूंघने की शक्ति भी सिद्ध है। ( 6) वृक्ष अपनी जड़ से जल पीते हैं तथा कोई रोग हो जाने पर उनकी जड़ में औषधि डालकर उनकी चिकित्सा भी की जाती है इससे प्रमाणित होता है कि वृक्ष में रस इंद्री भी है। (7) वृक्ष के कट जाने पर उनमें नया अंकुर फूट जाता है तथा वह सुख दुख को ग्रहण करते हैं इससे मैं समझता हूं कि वृक्षों में जीव है वह जड़ नहीं है। == इन्हें भी देखें == * [[वन]] * [[पर्यावरण]] * [[प्रकृति]] 6zi585xhzubp208hpmjv9szgfqp25kw कालिदास 0 7028 32859 30797 2026-05-14T17:23:25Z अनुनाद सिंह 658 /* सूक्तियाँ */ 32859 wikitext text/x-wiki '''कालिदास''' [[संस्कृत]] के महान कवि थे। उनकी रचनात्मक प्रतिभा असाधारण थी। उनके साहित्य को अनेक देशी एवं विदेशी विद्वानों ने मुक्त कण्ठ से सराहा है। विश्व की प्रायः प्रमुख भाषाओँ में इनकी रचनाओं का अनुवाद हो चुका है। 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' उनकी महान नाट्य काव्य रचना है। इसके अतिरिक्त उन्होंने मेघदूतम्, कुमारसम्भवम्, ऋतुसंहारम् आदि अनेक कालजयी रचनाएँ की। == सूक्तियाँ == ; अभिज्ञान शाकुन्तलम् के चतुर्थ-अंक के '''श्लोकचतुष्टय''' * (१) ''यास्त्यद्येति शंकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया : ''कण्ठः स्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्। : ''वैकल्व्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः : ''पीड्यन्ते गृहीणः कथं नु तनयाविश्लेषेदुःखैर्नवैः॥ : अर्थ - प्रकृत श्लोक में ऋषि कण्व पतिगृह को जाती शकुन्तला को देखते हुए कहते हैं कि आज शकुन्तला विदा हो जायेगी, इसलिए मेरा हृदय दुःख से भर रहा है। आंसुओं को रोकने के कारण मेरा गला रुंध रहा है। मेरी दृष्टि चिन्ता के कारण जड़ हो गयी है। वनवासी होने के कारण भी मेरा शकुन्तला के प्रति इतना प्रेम है, जिस कारण इस प्रकार का दुःख मुझे हो रहा है, तो गृहस्थ जन पहली बार अपनी पुत्री के वियोग होने के दुःख से कितना अधिक दुःखी होते होंगे। * (२) ''पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या : ''नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्। : ''आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः : ''सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैर्नुज्ञायताम्॥ : अर्थ - हे तपोवन के वृक्षो! जो तुम्हें पानी दिए स्वयं पानी नहीं पीती थी, जिसको अलङ्कार अधिक प्रिय होने पर भी तुम्हारे प्रति अगाध प्रेम होने के कारण जो तुम्हारे नये पत्तों को नहीं तोड़ती थी, तुम्हारे नवपुष्पोद्भव के समय जिसका उत्सव होता था, वह शकुन्तला अब पतिगृह को जा रही है । इसलिए तुम सभी अपनी स्वीकृति दो। *(३) ''अस्मान् साधु विचिन्त्य संयधनानुच्चैः कुलं चात्मन- : ''स्त्वय्यस्याः कथमप्यबान्धवकृतां स्नेहप्रवृत्तिं च ताम्। : ''सामान्यप्रतिपत्तिपूर्वकमियं दारेषु दृश्या त्वया : ''भाग्यायत्तमतः परं न खलु तद् वाच्यं वधूबन्धूभिः॥ : अर्थ - संयमरूपी धन से युक्त हम तपस्वियों की निश्छलता अपने ऊँचे कुल का तथा बिना अनुमति के इसके द्वारा तुमसे किये गये प्रेम का अच्छी तरह विचार करके तुम्हें इसके साथ अपनी अन्य पत्नियों के समान ही व्यवहार करना। इससे आगे जो होगा वह भाग्य के अधीन है, वह हम वधू के सम्बन्धीजनों को नहीं कहना चाहिए। * (४) ''शुश्रूषस्व गुरुन्कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने : ''भर्तुर्विप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः । : ''भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी : ''यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामाः कुलस्याध्यः ॥'' -- शकुन्तला को विदा करते हुए कण्व ऋषि का उपदेश (अभिज्ञान शाकुन्तलम्) : तू गुरुजनों की सेवा करना, अपनी सपत्नीयों (सौतों) के साथ प्रिय सखियों जैसा व्यवहार करना, तिरस्कृत होने पर भी क्रोधवश अपने पति के प्रतिकूल व्यवहार मत करना, अपने आश्रितों के साथ उदार व्यवहार करना, समृद्धियुक्त होने पर अभिमान न करना। इस प्रकार आचरण करने वाली स्त्रियां ही गृहलक्ष्मी के पद को प्राप्त करती हैं तथा इसके विपरीत आचरण करने वाली कुल को मानसिक पीड़ा देने वाली (अभिशाप) होती हैं। * ''पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यम् नवमित्यवद्यम् । : ''सन्ताः परिक्ष्यान्य तरद्भजन्ते मूढाः परप्रत्ययनेय बुद्धिः ॥ : कोई वस्तु पुरानी होने से अच्छी नहीं हो जाती और न ही कोई काव्य नया होने से निन्दनीय हो जाता है। संत जन विवेक मार्ग से सत्य का परीक्षण करते हैं पर न्यून बुद्धि दूसरों की बातों पर ही विश्वास करते हैं। * इस पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- जल, अन्न और सुभाषित; लेकिन अज्ञानी पत्थरों के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं। * अनर्थ अवसर की ताक में रहते हैं। * अपनी आत्मा की पीड़ा को अपने वश में करें क्योकि सुख और दुख हर किसी के भाग्य में होता है और ये जीवन का पहिया ऊपर-नीचे लेता रहता है। * अपनी बात के धनी लोगों के निश्चय मन को और नीचे गिरते हुए पानी के वेग को भला कौन फेर सकता है। * अवगुण नाव की पेंदी में छेद के समान है, जो चाहे छोटा हो या बड़ा, एक दिन उसे डुबो देगा। * आज अच्छी तरह से जीने वाले हर कल को खुशियों की याद दिलाते हैं और हर आने वाले कल को एक उम्मीद की निशानी बनाते हैं। * आह, मेरी इच्छाएं आशा बन जाती हैं। * सज्जन लोग बादलों की तरह हैं जो कोई चीज देने के लिए ही कोई चीज लेते हैं। * काम की समाप्ति यदि संतोषजनक हो तो परिश्रम की थकान याद नहीं रहती। * बुद्धिमत्ता वहीं फलती है जहाँ विनम्रता हो। * किसे हमेशा सुख मिला है और किसे हमेशा दुःख मिला है। सुख-दुख सबके साथ लगे हुए हैं। * कोई वस्तु पुरानी होने से अच्छी नहीं हो जाती और न ही कोई काव्य नया होने से निंदनीय हो जाता है। * गुण से ही व्यक्ति की पहचान होती है, गुणी व्यक्ति सब जगह अपना आदर करा लेता है। * जल तो आग की गर्मी पाकर ही गर्म होता है। उसका अपना स्वभाव तो ठंडा ही होता है। * जितेन्द्रिय पुरूष के मन में विघ्न कर वस्तुएँ थोडा भी क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकतीं । * जिस प्रकार जब सूरज निकलता है तब लालिमा युक्त होता है और अस्त होता है तो भी लालिमायुक्त होता है। इसी प्रकार महान पुरुष भी सुख और दुःख में एकरूपता रखता है। * जिस प्रकार बड़ा छेद हो या छोटा वो नाव को डुबो देता है उसी तरह दुष्ट व्यक्ति की दुस्टता उसे बर्बाद कर देती है। * जिस व्यक्ति की आखें दर्द कर रही हैं उसे बहुत सुन्दर दीपशिखा भी अच्छी नहीं लगती है उसी प्रकार जो व्यक्ति हृदय से दुखी है वो सुख की अनुभूति नहीं कर सकता अर्थात उसे कहीं भी खुशी नहीं मिलेगा। * जिसने इंद्रियों पर विजय पा ली है उसके मन में विघन्कार वस्तुएं थोड़ा भी छोभ उत्पन्न नहीं कर सकतीं। * जो महापुरूषों की निंदा करता है, वही नहीं अपितु जो उस निंदा को सुनता है, वह भी पाप का भागी होता है। * जो सुख-दुःख के पश्चात होता है, वह साधारण सुख से अधिक सुखमय होता है। * जो स्वयं सुंदर है, उसकी सुन्दरता किसी अन्य वस्तु से नहीं बढती। * ऋतुओं का वर्णन जीवन के चक्र का प्रतीक है। * तुमने निंदायुक्त वचनों को उत्तम मानकर जो यहां कहा है उनसे कोई कार्य तो सिद्ध हुआ नहीं, केवल तुम्हारे स्वरूप का स्पष्टीकरण हो गया है। * दान पुण्य केवल परलोक में सुख देता है पर योग्य सन्तान अपनी सेवा द्वारा इस लोक और परलोक दोनों में ही सुख देती है। * दु:ख में अपने स्वजनों को देखते ही दु:ख उसी प्रकार बढ़ जाता है, जैसे रुकी वस्तु को बाहर निकलने के लिए बड़ा द्वार मिल जाए। * दुःख या सुख किसी पर सदा ही नहीं रहते। ये तो पहिए के घेरे के समान कभी नीचे, कभी ऊपर यों ही होते रहते हैं। * दुखती आँखों वाले को सामने दीपशिखा अच्छी नहीं लगती। * दुष्ट अपकार से नहीं, उपकार से ही शांत रहता है। * धरती पर केवल तीन रत्न हैं। अन्न जल, और सुभाषित। लेकिन कुछ अज्ञानी पत्थर के टुकड़ो को ही रत्न करते रहते है। * नम्रता के संसर्ग से ऐश्वर्य की शोभा बढ़ती है। * पृथ्वी पर तीन रत्न हैं। जल, अन्न और सुभाषित वचन, परन्तु मूढ़जन पत्थर के टुकड़े को रत्न कहते हैं। * प्रत्येक व्यक्ति की रुचि एक दूसरे से भिन्न होती है। * फल आने पर पेड़ झुक जाते हैं, वर्षा के समय बादल झुक जाते हैं। सम्पति आने पर सज्जन लोग विनम्र हो जाते हैं – परोपकारियों का स्वाभाव ऐसा ही है। * बुराई बिल्कुल नाव में छेद समान होती है, वह चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, एक दिन नाव को डूबा ही देती है। * भगवान की शोभा नम्रता से ही बढ़ती है। * मन को विचलित करने वाली कितनी भी परिस्थितियाँ क्यों न हों पर एक धैर्यवान पुरुष कभी भी विचलित नहीं होता। * यदि आज अच्छे से रहते हो। तो कल ख़ुशी का सपना बना देता है। * यदि प्यार अधिक हो तो पाप की शंका होती ही है। * रथचक्र की अरों के समान मनुष्य के जीवन की दशा ऊपर-नीचे हुआ करती है। कभी के दिन बड़े कभी की रात। * वास्तविक धीर पुरूष वे ही हैं जिनका चित्त विकार उत्पन्न करने वाली परिस्थितिओं में भी अस्थिर नहीं होता। * विद्वानों की संगति से मूर्ख भी विद्वान् बन जाता है जैसे निर्मली के बीज से मटमैला पानी स्वच्छ हो जाता है। * विपत्ति में पड़े हुए पुरुषों की पीड़ा हर लेना ही सत्पुरुषों की संपत्ति का सच्चा फल है। संपत्ति पाकर भी मनुष्य अगर विपत्ति-ग्रस्त लोगों के काम न आया तो वह संपत्ति किस काम की। * विश्व महापुरुष को खोजता है न की महापुरुष विश्व को। * वृक्ष अपने सिर पर गर्मी झेल लेता है। किन्तु अपनी छाया से औरों को गर्मी से बचाता है। * वृक्ष के समान बनो जो कड़ी गर्मी झेलने के बाद भी सभी को छाया देता है। * शत्रु के छिद्र अर्थात दोष या कमजोरी को देख कर उसी पर आघात करने से विजय मिलती है। * सज्जन पुरुष बिना कहे ही दूसरों का भला कर देते हैं जिस प्रकार सूर्य घर घर जाकर प्रकाश देता है। * सभी व्यक्ति कठिनाईयों पर विजय प्राप्त कर सकें, सभी सबका भला सोचें, सबके कार्यों की पूर्ती का प्रयत्न करें और सब स्थानों पर सबकी प्रसन्नता का यत्न करें। * हंस पानी मिले दूध मे से दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है। == कालिदास के बारे में साहित्यकारों के विचार == * '' उपमा कालिदासस्य'' : उपमा में कालिदास बेजोड़ हैं। * ''पुरा कवीनां गणनाप्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदासः । : ''अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावात् अनामिका सार्थवती बभूव ॥ : भावर्थ यह है कि प्राचीन काल में कवियों की गणना के प्रसंग में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण कालिदास का नाम कनिष्ठिका पर आता था, किन्तु आज तक उनके समकक्ष कवि के अभाव के कारण, अनामिका पर किसी का नाम न आ सका और इस प्रकार अनामिका का नाम सार्थक हुआ। * ''काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला। : ''तत्राऽपि च चतुर्थोऽङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम्॥ : काव्य के जितने भी प्रकार हैं उनमें नाटक रम्य है। नाटकों में अभिज्ञान शाकुन्तलम् श्रेष्ठ है। उसमें भी चौथा अंक (श्रेष्ठ है) तथा उसमें भी चार-श्लोक सबसे अच्छे हैं। * '' कालिदास वाचः कुत्र व्याख्यातारो वयं क्व च। : ''तदिदं मन्ददीपेन राजवेश्म प्रकाशनम् ॥'' -- वल्लभ देव : कालिदास की वाणी कहाँ है और उसके व्याखाता हम कहाँ हैं। यह तो वैसे ही है जैसे किसी राजमहल को एक मन्द दीपक से प्रकाशित करना। * ''कालिदासकविता नवं वयो माहिषं दधि शर्करं पयः : ''शारदेन्दुरबला च कोमला स्वर्गसौख्यमुपभुज्यते नराः॥ : कालिदास की कविता नयी भैंस के दूध में शक्कर मिलाकर बनायी गयी दही के समान है। वह शरद ऋतु के चन्द्रमा की भांति कोमल है। इसको पढ़कर लोग स्वर्ग का सुख अनुभव करते हैं। * ''कालिदास गिरां सारं कालिदासः सरस्वती । : ''चतुर्मुखोऽथवा ब्रह्मा विदुर्नान्ये तु मादृशाः ॥ : कालिदास की वाणी के सार को केवल कालिदास, सरस्वती और चार मुख वाले ब्रह्मा समझते हैं। मेरे जैसे अन्य लोग नहीं जानते। * ''महाकविं कालिदासं वन्दे वाक्देवता गुरुम् । : ''यज्ञाने विश्वमाभाति दर्पणे प्रतिबिम्बवत् ॥ : वाणी के देवता महाकवि कालिदास की वन्दना करता हूँ। उनके ज्ञान में सारा विश्व वैसे ही दिखता है जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब। pv553khtzjeuw2dgazks6br4loeqcqb सदस्य वार्ता:किरण शर्मा 3 9253 32858 2026-05-14T13:47:15Z New user message 2225 स्वागत 32858 wikitext text/x-wiki {{साँचा:स्वागत|realName=|name=किरण शर्मा}} -- [[सदस्य:New user message|New user message]] ([[सदस्य वार्ता:New user message|वार्ता]]) १९:१७, १४ मई २०२६ (IST) jqbf7kupbk1b59qgasc6pafij0voi47