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गुरु
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अनुनाद सिंह
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/* उक्तियाँ */
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'''गुरु''' किसी "शिक्षक" के लिए, विशेष रूप से [[:w:भारत में धर्म|भारतीय धर्मों]] में, [[:w:संस्कृत भाषा|संस्कृत]] का एक शब्द है। [[:w:हिन्दू धर्म|हिन्दू]] संस्कृति में [[:w:गुरु-शिष्य परम्परा|गुरु-शिष्य परम्परा]] एक शिक्षक द्वारा छात्र को [[:w:वाचिक परम्परा|मौखिक]] तौर पर बताए गए धार्मिक सिद्धांत एवम् अनुभवात्मक ज्ञान का नाम है। [[:w:संयुक्त राज्य अमेरिका|संयुक्त राज्य अमेरिका]] में गुरु का अभिप्राय ऐसे व्यक्ति के लिए होता है जिसने कई लोगों को, संभवतः उनके भोलेपन का दोहन करते हुए, अपना अनुयायी बना लिया हो। आमूमन यह धार्मिक नेता स्वयं को गुरु कहलाना पसंद करते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''को गुरुः अधिगततत्त्वः शिष्यहितायोद्यतं सततम्।'' -- आद्य शंकराचार्य कृत 'प्रश्नोत्तररत्नमालिका'
: (प्रश्न :) गुरु कौन है?
: (उत्तर :) जिसने सत्य को पा लिया है और जो सदा अपने शिष्य के हित के लिये काम करता है।
* ''धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः ।
: ''तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते ॥
: अर्थ : धर्म को जाननेवाले, धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले, धर्मपरायण, और सब शास्त्रों में से तत्त्वों का आदेश करनेवाले गुरु कहे जाते हैं।
* ''निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते ।
: ''गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरुर्निगद्यते ॥
: अर्थ :जो दूसरों को प्रमाद करने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते से चलते हैं, हित और कल्याण की कामना रखनेवाले को तत्त्वबोध कराते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं।
: ''प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा ।
: ''शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः ॥
: अर्थ : प्रेरक (प्रेरणा देनेवाले), सूचक (सूचना देनेवाले), वाचक (सच बतानेवाले), दर्शक (मार्ग दिखानेवाले), शिक्षक (शिक्षा देनेवाले), और बोधक (बोध करानेवाले) – ये छः गुरु समझे जाते हैं।
* ''सर्वाभिलाषिणः सर्वभोजिनः सपरिग्रहाः ।
: ''अब्रह्मचारिणो मिथ्योपदेशा गुरवो न तु ॥
: अर्थ : अभिलाषा रखनेवाले, सब भोग करनेवाले, संग्रह करनेवाले, ब्रह्मचर्य का पालन न करनेवाले, और मिथ्या उपदेश करनेवाले, गुरु नहीं है।
* ''अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया ।
: ''चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
: जिसने ज्ञान-अंजन-शलाका से, अज्ञानरुप अंधकार से अंध हुए लोगों की आँखें खोली, उन गुरु को नमस्कार।
* ''गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
:''गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
: (अर्थ : गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शिव है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम है।
* ''ज्ञान शक्ति समारूढ़ः तत्व माला विभूषितः।
: '' भुक्ति मुक्ति प्रदाता च तस्मै श्री गुरवे नमः॥
: उन गुरु को नमस्कार है जो ज्ञान अर्थात् शक्ति में स्थित हैं, सत्य की माला से सुशोभित हैं तथा मोक्षरूपी आनन्द के दाता हैं।
* ''आत्मनो गुरुः आत्मैव पुरुषस्य विशेषतः ।
: ''यत प्रत्यक्षानुमानाभ्याम श्रेयसवनुबिन्दते ॥
: (अर्थ : आप ही स्वयं अपने गुरू हैं क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा पुरुष जान लेता है कि अधिक उपयुक्त क्या है।
* ''शत्रोरपि गुणा वाच्या दोषा वाच्या गुरोरपि।
: ''सर्वदा सर्वयत्नेन पुत्रे शिष्यवदाचरेत्॥
: शत्रु यदि गुणवान है तो उसके गुण को स्वीकार करना चाहिए , और गुरु में यदि दोष हो तो उसको प्रकट करने में संकोच नही करना चाहिए। हमेशा सभी प्रयत्न से पुत्र को भी शिष्य के समान गिनना चाहिए।
* ''विद्वत्त्वं दक्षता शीलं सङ्कान्तिरनुशीलनम् ।
: ''शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता ॥
: अर्थ : विद्वता, दक्षता, शील, संकान्ति, अनुशीलन, सचेतत्त्व, और प्रसन्नता – ये सात शिक्षक के गुण हैं।
* ''योगीन्द्रः श्रुतिपारगः समरसाम्भोधौ निमग्नः सदा
: ''शान्ति क्षान्ति नितान्त दान्ति निपुणो धर्मैक निष्ठारतः ।
: ''शिष्याणां शुभचित्त शुद्धिजनकः संसर्ग मात्रेण यः
: ''सोऽन्यांस्तारयति स्वयं च तरति स्वार्थं विना सद्गुरुः ॥
: भावार्थ : योगीयों में श्रेष्ठ, श्रुतियों के पार गया हुआ (जिसने वेदों को अच्छी तरह समझ लिया हो) , समरसता के समुद्र में डुबा हुआ, शांति-क्षमा-दमन ऐसे गुणोंवाला, धर्म में एकनिष्ठ, अपने संसर्ग से शिष्यों के चित्त को शुद्ध करनेवाले, ऐसे सद्गुरु, बिना स्वार्थ अन्य को तारते हैं, और स्वयं भी तर जाते हैं।
* ''विनयफलं शुश्रूषा गुरुशुश्रूषाफलं श्रुतज्ञानम् ।
: ''ज्ञानस्य फलं विरतिः विरतिफलं चाश्रवनिरोधः ॥
: अर्थ : विनय का फल सेवा है, गुरुसेवा का फल ज्ञान है, ज्ञान का फल विरक्ति है, और विरक्ति का फल आश्रवनिरोध है।
* ''दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवनजठरे सद्गुरोर्ज्ञानदातुः
: ''स्पर्शश्चेत्तत्र कलप्यः स नयति यदहो स्वहृतामश्मसारम् ।
: ''न स्पर्शत्वं तथापि श्रितचरगुणयुगे सद्गुरुः स्वीयशिष्ये
: ''स्वीयं साम्यं विधते भवति निरुपमस्तेवालौकिकोऽपि ॥
: अर्थ : तीनों लोक, स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल में ज्ञान देनेवाले गुरु के लिए कोई उपमा नहीं दिखाई देती। गुरु को पारसमणि के जैसा मानते हैं, तो वह ठीक नहीं है, कारण पारसमणि केवल लोहे को सोना बनाता है, पर स्वयं जैसा नहीं बनाता। सद्गुरु तो अपने चरणों का आश्रय लेनेवाले शिष्य को अपने जैसा बना देता है; इसलिए गुरु के लिए कोई उपमा नहीं है, गुरु तो अलौकिक है।
* ''गुरुवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः ।
: ''दुर्लभः स गुरुर्लोके शिष्यचित्तापहारकः ॥'' -- समयोचितपद्यमालिका
: शिष्य के धन को अपहरण करनेवाले गुरु तो बहुत हैं, लेकिन शिष्य के हृदय का संताप हरनेवाला एक गुरु भी दुर्लभ है।
* ''सर्वाभिलाषिणः सर्वभोजिनः सपरिग्रहाः ।
: ''अब्रह्मचारिणो मिथ्योपदेशा गुरवो न तु ॥
: सभी प्रकार की अभिलाषा रखनेवाले, सब कुछ खाने वाले, संग्रह करनेवाले, ब्रह्मचर्य का पालन न करनेवाले, और मिथ्या उपदेश करनेवाले, गुरु नहीं हैं।
* ''गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
: ''उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥'' -- [[महाभारत]] (उद्योग पर्व और शांति पर्व)
: यदि गुरु भी घमंडी हो जाए, सही-गलत का भेद भूल जाए और गलत रास्ते पर चल पड़े, तो उसका त्याग कर देना ही धर्मसंगत है।
=== मनीषापञ्चकम् ===
* ''ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्रविस्तारितं
: ''सर्वं चैतदविद्यया त्रिगुणयाशेषं मया कल्पितम् ।
: ''इत्थं यस्य दृढा मतिः सुखतरे नित्ये परे निर्मले
: ''चण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ २ ॥
: मैं ब्रह्म ही हूँ। चेतन मात्र से व्याप्त यह समस्त जगत भी ब्रह्मरूप ही है । समस्त दृष्यजाल मेरे द्वारा ही त्रिगुणमय अविद्या से कल्पित है । मैं सुखी, सत्य, निर्मल, नित्य, पर ब्रह्म रूप में हूँ जिसकी ऐसी दृढ बुद्धि है वह चांडाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है ॥२॥
* ''शश्वन्नश्वरमेव विश्वमखिलं निश्चित्य वाचा गुरोः
: ''नित्यं ब्रह्म निरन्तरं विमृशता निर्व्याज शान्तात्मना ।
: ''भूतं भावि च दुष्कृतं प्रदहता संविन्मये पावके
: ''प्रारब्धाय समर्पितं स्ववपुरित्येषा मनीषा मम ॥ ३ ॥
: जिसने अपने गुरु के वचनों से यह निश्चित कर लिया है कि परिवर्तनशील यह जगत अनित्य है; जो अपने मन को वश में करके शांत आत्मना है ; जो निरन्तर ब्रह्म चिन्तन में स्थित है ; जिसने परमात्म रुपी अग्नि में अपनी सभी भूत और भविष्य की वासनाओं का दहन कर लिया है और जिसने अपने प्रारब्ध का क्षय करके देह को समर्पित कर दिया है ; वह चाण्डाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है ॥३॥
* ''या तिर्यङ्नरदेवताभिरहमित्यन्तः स्फुटा गृह्यते
: ''यद्भासा हृदयाक्षदेहविषया भान्ति स्वतो चेतनाः ।
: ''ताम् भास्यैः पिहितार्कमण्डलनिभां स्फूर्तिं सदा भावय
: ''न्योगी निर्वृतमानसो हि गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ ४ ॥
: सर्प आदि तिर्यक, मनुष्य देवादि द्वारा "अहम्" मैं ऐसा गृहीत होता है । उसी के प्रकाश से स्वतः जड़, हृदय, देह और विषय भाषित होते हैं । मेघ से आवृत सूर्यमंडल के समान विषयों से आच्छादित उस ज्योतिरूप आत्मा की सदा भावना करने वाला आनंदनिमग्न योगी मेरा गुरु है । ऐसी मेरी मनीषा है ॥४॥
* ''यत्सौख्याम्बुधि लेशलेशत इमे शक्रादयो निर्वृता
: ''यच्चित्ते नितरां प्रशान्तकलने लब्ध्वा मुनिर्निर्वृतः।
: ''यस्मिन्नित्य सुखाम्बुधौ गलितधीर्ब्रह्मैव न ब्रह्मविद्
: ''यः कश्चित्स सुरेन्द्रवन्दितपदो नूनं मनीषा मम ॥ ५ ॥
: प्रशान्त काल में एक योगी का अंतःकरण जिस परमानन्द कि अनुभूति करता है जिसकी एक बूँद मात्र इन्द्र आदि को तृप्त और संतुष्ट कर देती है ; जिसने अपनी बुद्धि को ऐसा परमानन्द सागर में विलीन कर लिया है ; वह मात्र ब्रह्मविद् ही नहीं स्वयं ब्रह्म है । वह अति दुर्लभ है जिसके चरणों की वन्दना देवराज भी करते हैं वह मेरा गुरु है । ऐसी मेरी मनीषा है ॥५॥
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* ग्यान सरीखा गिरु ना मिलिया, चित्त सरीखा चेला।
: मन सरीखा मेलु ना मिलिया, ताथै गोरख फिरै अकेला -- गुरु गोरखनाथ
: ज्ञान जैसा कोई गुरु नहीं है और चित्त अपने कहने में चले तो उसके जैसा कोई चेला नहीं है। मन विकारों से बचे तो उसके जैसा कोई मित्र नहीं है। इसलिये गोरख अकेला फिरता है।
* तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार ।
: सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ॥ -- कबीरदास
: कबीरदास विचार करके कहते हैं कि तीर्थयात्रा से एक फल मिलता है, कोई सन्त मिल जाय तो चार फल मिलते हैं। लेकिन कोई सच्चा गुरु मिल जाय तो अनेक फल मिल जाते हैं।
* रचनात्मक अभिव्यक्ति और ज्ञान में आनन्द जगाना ही गुरु की सर्वोच्च कला है। -- अल्बर्ट आइंस्टीन
* गुरु दो तरह के होते हैं- एक वो जो आपको इतना डरा देते हैं कि आप हिल ना सकें, और एक वो जो जिनके आपकी पीठ पर थोडा सा थपथपा देने से आप आसमान छू लेते हैं। -- रॉबर्ट फ्रोस्ट
* चीजों की रोशनी में आगे आओ, प्रकृति को अपना गुरु बनने दो। -- विलियम वर्ड्सवर्थ
* अनुभव एक कठोर गुरु है क्योंकि वह पहले परीक्षा लेता है, बाद में पाठ पढ़ाता हैं। -- Vernon Law
* मुझे एक गुरु पसन्द है जो आपको होमवर्क के अलावा घर ले जाने के लिए कुछ सोचने के लिए भी कुछ देता है। -- Lily Tomlin
* गुरु वह मोमबत्ती है जो खुद जलाकर सबको उजाला देता है
* गुरु केवल वह नहीं जो हमें कक्षा में पढ़ाते हैं बल्कि हर वो व्यक्ति जिससे हम सीखते हैं वह हमारा गुरु है।
* एक अच्छा शिक्षक आशा को जगाता है, कल्पना को प्रज्वलित करता है, और सीखने का प्यार बढ़ाता है।
* माँ बच्चो की सबसे पहली शिक्षक होती है
* हमारा अनुभव भी एक अच्छा शिक्षक है, जो की कठिन परिस्थतियो से गुजरने के बाद प्राप्त होता है।
* '''पढ़ाने का पेशा एक ऐसा पेशा है जो बाकी सब व्यवसायों को जन्म देता है।'''
* में एक शिक्षक नहीं हूँ, में तो लोगो को जगाने वाला हूँ। -- रोबर्ट फ्रॉस्ट
* शिक्षा देने की कला वास्तव में खोज में सहायता करने की कला है। -- मार्क वेन डोरेन्
* गुरु गोविंद दोनों खड़े, किसके लागों पाँय।
: बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दिया बताय॥
* कबीर हरि के रूठते, गुरु के शरने जाय।
: कह कबीर गुरु रूठते, हरि नहिं होत सहाय॥ -- ''[[कबीर]]
== आचार्य ==
* हर किसी को महापुरुष, आचार्य वा ऋषि नहीं कहा जा सकता, वा माना जा सकता है। अज्ञ जनता में इन शब्दों का दुरुपयोग वा मिथ्या प्रयोग होते प्रायः देखा जाता है। शास्त्र तो ‘साक्षात्कृतधर्मा’ जिसे धर्म का साक्षात्कार हो, उसे ही ‘ऋषि’ कहता है। जिसको जिस विषय का साक्षात् ज्ञान है, वह उस विषय का ऋषि कहाता है। वैदिक साहित्य में तो ’ऋषिर्दर्शनात् स्तोमान् ददर्श’ (निरुक्त २।११) मन्त्रार्थद्रष्टा को ऋषि है। संसार को मार्ग दर्शानेवाले को ऋषि कहते हैं। महामुनि पतञ्जलि महाभाष्य में ’ऋषिर्वेदे पठति शृणोत ग्रावाणः’ में ‘ऋषिर्वेदः’ वेद को ही ऋषि बतलाते हैं। -- पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
* आचार्य’ शब्द यद्यपि ऋग्वेद, यजुः, साम तीनों में नहीं पाया। वेद ११।५ ब्रह्मचर्यसूक्त में ’आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त’ (अथर्व० ११।५।३) ‘आचार्य’ का जो निरूपण किया गया है, उसके आधार पर ही सभी धर्मशास्त्रों ने आचार्य का लक्षण प्रायः समान ही किया है। -- पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
* ''उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः।
: ''सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते॥'' -- मानवधर्मशास्त्र २।१४०
: भावार्थ : जो ८ वर्ष से लेकर कम से कम २५ वर्ष की आयु तक बालक के आचार-व्यवहार तथा उसके समस्त ज्ञान-विज्ञान का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले, सङ्कल्प और सरहस्य वेद का अध्ययन करावे, वही ‘आचार्य’ कहाता है।
* ''आचार्यः कस्मात्? आचारं ग्राहयति, आचिनोत्यर्थान्। आचिनोति बुद्धिमिति वा॥'' -- निरुक्त अ० १।४
* ''आचार्य उसको कहते हैं, जो साङ्गोपाङ्ग वेदों के शब्द, अर्थ, संबंध और क्रिया का जाननेहारा, छल-कपट रहित, अतिप्रेम से सबको विद्या का दाता, परोपकारी, तन-मन और धन से सबको सुख बढ़ाने में जो तत्पर, महाशय, पक्षपात किसी का न करे और सत्योपदेष्टा, सबका हितैषी, धर्मात्मा, जितेन्द्रिय हो।'' -- ऋषि दयानन्द, संस्कारविधि, उपनयन संस्कार
== इन्हें भी देखें ==
* [[ज्ञान]]
* [[शिष्य]]
* [[शिक्षा]]
* [[अनुभव]]
* [[शिक्षक]]
== बाह्य सूत्र ==
*[https://hindihaat.com/2021/09/guru-quotes-in-hindi-गुरु-पर-अनमोल-वचन.html गुरु पर अनमोल वचन]
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अनुनाद सिंह
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'''गुरु''' किसी "शिक्षक" के लिए, विशेष रूप से [[:w:भारत में धर्म|भारतीय धर्मों]] में, [[:w:संस्कृत भाषा|संस्कृत]] का एक शब्द है। [[:w:हिन्दू धर्म|हिन्दू]] संस्कृति में [[:w:गुरु-शिष्य परम्परा|गुरु-शिष्य परम्परा]] एक शिक्षक द्वारा छात्र को [[:w:वाचिक परम्परा|मौखिक]] तौर पर बताए गए धार्मिक सिद्धांत एवम् अनुभवात्मक ज्ञान का नाम है। [[:w:संयुक्त राज्य अमेरिका|संयुक्त राज्य अमेरिका]] में गुरु का अभिप्राय ऐसे व्यक्ति के लिए होता है जिसने कई लोगों को, संभवतः उनके भोलेपन का दोहन करते हुए, अपना अनुयायी बना लिया हो। आमूमन यह धार्मिक नेता स्वयं को गुरु कहलाना पसंद करते हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''को गुरुः अधिगततत्त्वः शिष्यहितायोद्यतं सततम्।'' -- आद्य शंकराचार्य कृत 'प्रश्नोत्तररत्नमालिका'
: (प्रश्न :) गुरु कौन है?
: (उत्तर :) जिसने सत्य को पा लिया है और जो सदा अपने शिष्य के हित के लिये काम करता है।
* ''धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः ।
: ''तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते ॥
: अर्थ : धर्म को जाननेवाले, धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले, धर्मपरायण, और सब शास्त्रों में से तत्त्वों का आदेश करनेवाले गुरु कहे जाते हैं।
* ''निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते ।
: ''गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरुर्निगद्यते ॥
: अर्थ :जो दूसरों को प्रमाद करने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते से चलते हैं, हित और कल्याण की कामना रखनेवाले को तत्त्वबोध कराते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं।
: ''प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा ।
: ''शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः ॥
: अर्थ : प्रेरक (प्रेरणा देनेवाले), सूचक (सूचना देनेवाले), वाचक (सच बतानेवाले), दर्शक (मार्ग दिखानेवाले), शिक्षक (शिक्षा देनेवाले), और बोधक (बोध करानेवाले) – ये छः गुरु समझे जाते हैं।
* ''सर्वाभिलाषिणः सर्वभोजिनः सपरिग्रहाः ।
: ''अब्रह्मचारिणो मिथ्योपदेशा गुरवो न तु ॥
: अर्थ : अभिलाषा रखनेवाले, सब भोग करनेवाले, संग्रह करनेवाले, ब्रह्मचर्य का पालन न करनेवाले, और मिथ्या उपदेश करनेवाले, गुरु नहीं है।
* ''अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया ।
: ''चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
: जिसने ज्ञान-अंजन-शलाका से, अज्ञानरुप अंधकार से अंध हुए लोगों की आँखें खोली, उन गुरु को नमस्कार।
* ''गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
:''गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
: (अर्थ : गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शिव है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम है।
* ''ज्ञान शक्ति समारूढ़ः तत्व माला विभूषितः।
: '' भुक्ति मुक्ति प्रदाता च तस्मै श्री गुरवे नमः॥
: उन गुरु को नमस्कार है जो ज्ञान अर्थात् शक्ति में स्थित हैं, सत्य की माला से सुशोभित हैं तथा मोक्षरूपी आनन्द के दाता हैं।
* ''आत्मनो गुरुः आत्मैव पुरुषस्य विशेषतः ।
: ''यत प्रत्यक्षानुमानाभ्याम श्रेयसवनुबिन्दते ॥
: (अर्थ : आप ही स्वयं अपने गुरू हैं क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा पुरुष जान लेता है कि अधिक उपयुक्त क्या है।
* ''शत्रोरपि गुणा वाच्या दोषा वाच्या गुरोरपि।
: ''सर्वदा सर्वयत्नेन पुत्रे शिष्यवदाचरेत्॥
: शत्रु यदि गुणवान है तो उसके गुण को स्वीकार करना चाहिए , और गुरु में यदि दोष हो तो उसको प्रकट करने में संकोच नही करना चाहिए। हमेशा सभी प्रयत्न से पुत्र को भी शिष्य के समान गिनना चाहिए।
* ''विद्वत्त्वं दक्षता शीलं सङ्कान्तिरनुशीलनम् ।
: ''शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता ॥
: अर्थ : विद्वता, दक्षता, शील, संकान्ति, अनुशीलन, सचेतत्त्व, और प्रसन्नता – ये सात शिक्षक के गुण हैं।
* ''योगीन्द्रः श्रुतिपारगः समरसाम्भोधौ निमग्नः सदा
: ''शान्ति क्षान्ति नितान्त दान्ति निपुणो धर्मैक निष्ठारतः ।
: ''शिष्याणां शुभचित्त शुद्धिजनकः संसर्ग मात्रेण यः
: ''सोऽन्यांस्तारयति स्वयं च तरति स्वार्थं विना सद्गुरुः ॥
: भावार्थ : योगीयों में श्रेष्ठ, श्रुतियों के पार गया हुआ (जिसने वेदों को अच्छी तरह समझ लिया हो) , समरसता के समुद्र में डुबा हुआ, शांति-क्षमा-दमन ऐसे गुणोंवाला, धर्म में एकनिष्ठ, अपने संसर्ग से शिष्यों के चित्त को शुद्ध करनेवाले, ऐसे सद्गुरु, बिना स्वार्थ अन्य को तारते हैं, और स्वयं भी तर जाते हैं।
* ''विनयफलं शुश्रूषा गुरुशुश्रूषाफलं श्रुतज्ञानम् ।
: ''ज्ञानस्य फलं विरतिः विरतिफलं चाश्रवनिरोधः ॥
: अर्थ : विनय का फल सेवा है, गुरुसेवा का फल ज्ञान है, ज्ञान का फल विरक्ति है, और विरक्ति का फल आश्रवनिरोध है।
* ''दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवनजठरे सद्गुरोर्ज्ञानदातुः
: ''स्पर्शश्चेत्तत्र कलप्यः स नयति यदहो स्वहृतामश्मसारम् ।
: ''न स्पर्शत्वं तथापि श्रितचरगुणयुगे सद्गुरुः स्वीयशिष्ये
: ''स्वीयं साम्यं विधते भवति निरुपमस्तेवालौकिकोऽपि ॥
: अर्थ : तीनों लोक, स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल में ज्ञान देनेवाले गुरु के लिए कोई उपमा नहीं दिखाई देती। गुरु को पारसमणि के जैसा मानते हैं, तो वह ठीक नहीं है, कारण पारसमणि केवल लोहे को सोना बनाता है, पर स्वयं जैसा नहीं बनाता। सद्गुरु तो अपने चरणों का आश्रय लेनेवाले शिष्य को अपने जैसा बना देता है; इसलिए गुरु के लिए कोई उपमा नहीं है, गुरु तो अलौकिक है।
* ''गुरुवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः ।
: ''दुर्लभः स गुरुर्लोके शिष्यचित्तापहारकः ॥'' -- समयोचितपद्यमालिका
: शिष्य के धन को अपहरण करनेवाले गुरु तो बहुत हैं, लेकिन शिष्य के हृदय का संताप हरनेवाला एक गुरु भी दुर्लभ है।
* ''सर्वाभिलाषिणः सर्वभोजिनः सपरिग्रहाः ।
: ''अब्रह्मचारिणो मिथ्योपदेशा गुरवो न तु ॥
: सभी प्रकार की अभिलाषा रखनेवाले, सब कुछ खाने वाले, संग्रह करनेवाले, ब्रह्मचर्य का पालन न करनेवाले, और मिथ्या उपदेश करनेवाले, गुरु नहीं हैं।
* ''गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
: ''उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥'' -- [[महाभारत]] (उद्योग पर्व और शांति पर्व)
: यदि गुरु भी घमंडी हो जाए, सही-गलत का भेद भूल जाए और गलत रास्ते पर चल पड़े, तो उसका त्याग कर देना ही धर्मसंगत है।
=== मनीषापञ्चकम् ===
निम्नलिखित चार श्लोक मनीषापञ्चकम् के हैं जिसमें आदि शंकाराचार्य चाण्डाल का उत्तर देते हुए कहते हैं कि वे किसको गुरु मानते हैं। चाण्डाल कोई और नहीं बल्कि स्वयं शिव ने यह रूप धारण किया था।
* ''ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्रविस्तारितं
: ''सर्वं चैतदविद्यया त्रिगुणयाशेषं मया कल्पितम् ।
: ''इत्थं यस्य दृढा मतिः सुखतरे नित्ये परे निर्मले
: ''चण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ २ ॥
: मैं ब्रह्म ही हूँ। चेतन मात्र से व्याप्त यह समस्त जगत भी ब्रह्मरूप ही है । समस्त दृष्यजाल मेरे द्वारा ही त्रिगुणमय अविद्या से कल्पित है । मैं सुखी, सत्य, निर्मल, नित्य, पर ब्रह्म रूप में हूँ जिसकी ऐसी दृढ बुद्धि है वह चांडाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है ॥२॥
* ''शश्वन्नश्वरमेव विश्वमखिलं निश्चित्य वाचा गुरोः
: ''नित्यं ब्रह्म निरन्तरं विमृशता निर्व्याज शान्तात्मना ।
: ''भूतं भावि च दुष्कृतं प्रदहता संविन्मये पावके
: ''प्रारब्धाय समर्पितं स्ववपुरित्येषा मनीषा मम ॥ ३ ॥
: जिसने अपने गुरु के वचनों से यह निश्चित कर लिया है कि परिवर्तनशील यह जगत अनित्य है; जो अपने मन को वश में करके शांत आत्मना है ; जो निरन्तर ब्रह्म चिन्तन में स्थित है ; जिसने परमात्म रुपी अग्नि में अपनी सभी भूत और भविष्य की वासनाओं का दहन कर लिया है और जिसने अपने प्रारब्ध का क्षय करके देह को समर्पित कर दिया है ; वह चाण्डाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है ॥३॥
* ''या तिर्यङ्नरदेवताभिरहमित्यन्तः स्फुटा गृह्यते
: ''यद्भासा हृदयाक्षदेहविषया भान्ति स्वतो चेतनाः ।
: ''ताम् भास्यैः पिहितार्कमण्डलनिभां स्फूर्तिं सदा भावय
: ''न्योगी निर्वृतमानसो हि गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ ४ ॥
: सर्प आदि तिर्यक, मनुष्य देवादि द्वारा "अहम्" मैं ऐसा गृहीत होता है । उसी के प्रकाश से स्वतः जड़, हृदय, देह और विषय भाषित होते हैं । मेघ से आवृत सूर्यमंडल के समान विषयों से आच्छादित उस ज्योतिरूप आत्मा की सदा भावना करने वाला आनंदनिमग्न योगी मेरा गुरु है , ऐसी मेरी मनीषा है ॥४॥
* ''यत्सौख्याम्बुधि लेशलेशत इमे शक्रादयो निर्वृता
: ''यच्चित्ते नितरां प्रशान्तकलने लब्ध्वा मुनिर्निर्वृतः।
: ''यस्मिन्नित्य सुखाम्बुधौ गलितधीर्ब्रह्मैव न ब्रह्मविद्
: ''यः कश्चित्स सुरेन्द्रवन्दितपदो नूनं मनीषा मम ॥ ५ ॥
: प्रशान्त काल में एक योगी का अंतःकरण जिस परमानन्द कि अनुभूति करता है जिसकी एक बूँद मात्र इन्द्र आदि को तृप्त और संतुष्ट कर देती है ; जिसने अपनी बुद्धि को ऐसा परमानन्द सागर में विलीन कर लिया है ; वह मात्र ब्रह्मविद् ही नहीं स्वयं ब्रह्म है । वह अति दुर्लभ है जिसके चरणों की वन्दना देवराज भी करते हैं वह मेरा गुरु है , ऐसी मेरी मनीषा है ॥५॥
----
* ग्यान सरीखा गिरु ना मिलिया, चित्त सरीखा चेला।
: मन सरीखा मेलु ना मिलिया, ताथै गोरख फिरै अकेला -- गुरु गोरखनाथ
: ज्ञान जैसा कोई गुरु नहीं है और चित्त अपने कहने में चले तो उसके जैसा कोई चेला नहीं है। मन विकारों से बचे तो उसके जैसा कोई मित्र नहीं है। इसलिये गोरख अकेला फिरता है।
* तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार ।
: सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ॥ -- कबीरदास
: कबीरदास विचार करके कहते हैं कि तीर्थयात्रा से एक फल मिलता है, कोई सन्त मिल जाय तो चार फल मिलते हैं। लेकिन कोई सच्चा गुरु मिल जाय तो अनेक फल मिल जाते हैं।
* रचनात्मक अभिव्यक्ति और ज्ञान में आनन्द जगाना ही गुरु की सर्वोच्च कला है। -- अल्बर्ट आइंस्टीन
* गुरु दो तरह के होते हैं- एक वो जो आपको इतना डरा देते हैं कि आप हिल ना सकें, और एक वो जो जिनके आपकी पीठ पर थोडा सा थपथपा देने से आप आसमान छू लेते हैं। -- रॉबर्ट फ्रोस्ट
* चीजों की रोशनी में आगे आओ, प्रकृति को अपना गुरु बनने दो। -- विलियम वर्ड्सवर्थ
* अनुभव एक कठोर गुरु है क्योंकि वह पहले परीक्षा लेता है, बाद में पाठ पढ़ाता हैं। -- Vernon Law
* मुझे एक गुरु पसन्द है जो आपको होमवर्क के अलावा घर ले जाने के लिए कुछ सोचने के लिए भी कुछ देता है। -- Lily Tomlin
* गुरु वह मोमबत्ती है जो खुद जलाकर सबको उजाला देता है
* गुरु केवल वह नहीं जो हमें कक्षा में पढ़ाते हैं बल्कि हर वो व्यक्ति जिससे हम सीखते हैं वह हमारा गुरु है।
* एक अच्छा शिक्षक आशा को जगाता है, कल्पना को प्रज्वलित करता है, और सीखने का प्यार बढ़ाता है।
* माँ बच्चो की सबसे पहली शिक्षक होती है
* हमारा अनुभव भी एक अच्छा शिक्षक है, जो की कठिन परिस्थतियो से गुजरने के बाद प्राप्त होता है।
* '''पढ़ाने का पेशा एक ऐसा पेशा है जो बाकी सब व्यवसायों को जन्म देता है।'''
* में एक शिक्षक नहीं हूँ, में तो लोगो को जगाने वाला हूँ। -- रोबर्ट फ्रॉस्ट
* शिक्षा देने की कला वास्तव में खोज में सहायता करने की कला है। -- मार्क वेन डोरेन्
* गुरु गोविंद दोनों खड़े, किसके लागों पाँय।
: बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दिया बताय॥
* कबीर हरि के रूठते, गुरु के शरने जाय।
: कह कबीर गुरु रूठते, हरि नहिं होत सहाय॥ -- ''[[कबीर]]
== आचार्य ==
* हर किसी को महापुरुष, आचार्य वा ऋषि नहीं कहा जा सकता, वा माना जा सकता है। अज्ञ जनता में इन शब्दों का दुरुपयोग वा मिथ्या प्रयोग होते प्रायः देखा जाता है। शास्त्र तो ‘साक्षात्कृतधर्मा’ जिसे धर्म का साक्षात्कार हो, उसे ही ‘ऋषि’ कहता है। जिसको जिस विषय का साक्षात् ज्ञान है, वह उस विषय का ऋषि कहाता है। वैदिक साहित्य में तो ’ऋषिर्दर्शनात् स्तोमान् ददर्श’ (निरुक्त २।११) मन्त्रार्थद्रष्टा को ऋषि है। संसार को मार्ग दर्शानेवाले को ऋषि कहते हैं। महामुनि पतञ्जलि महाभाष्य में ’ऋषिर्वेदे पठति शृणोत ग्रावाणः’ में ‘ऋषिर्वेदः’ वेद को ही ऋषि बतलाते हैं। -- पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
* आचार्य’ शब्द यद्यपि ऋग्वेद, यजुः, साम तीनों में नहीं पाया। वेद ११।५ ब्रह्मचर्यसूक्त में ’आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त’ (अथर्व० ११।५।३) ‘आचार्य’ का जो निरूपण किया गया है, उसके आधार पर ही सभी धर्मशास्त्रों ने आचार्य का लक्षण प्रायः समान ही किया है। -- पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
* ''उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः।
: ''सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते॥'' -- मानवधर्मशास्त्र २।१४०
: भावार्थ : जो ८ वर्ष से लेकर कम से कम २५ वर्ष की आयु तक बालक के आचार-व्यवहार तथा उसके समस्त ज्ञान-विज्ञान का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले, सङ्कल्प और सरहस्य वेद का अध्ययन करावे, वही ‘आचार्य’ कहाता है।
* ''आचार्यः कस्मात्? आचारं ग्राहयति, आचिनोत्यर्थान्। आचिनोति बुद्धिमिति वा॥'' -- निरुक्त अ० १।४
* ''आचार्य उसको कहते हैं, जो साङ्गोपाङ्ग वेदों के शब्द, अर्थ, संबंध और क्रिया का जाननेहारा, छल-कपट रहित, अतिप्रेम से सबको विद्या का दाता, परोपकारी, तन-मन और धन से सबको सुख बढ़ाने में जो तत्पर, महाशय, पक्षपात किसी का न करे और सत्योपदेष्टा, सबका हितैषी, धर्मात्मा, जितेन्द्रिय हो।'' -- ऋषि दयानन्द, संस्कारविधि, उपनयन संस्कार
== इन्हें भी देखें ==
* [[ज्ञान]]
* [[शिष्य]]
* [[शिक्षा]]
* [[अनुभव]]
* [[शिक्षक]]
== बाह्य सूत्र ==
*[https://hindihaat.com/2021/09/guru-quotes-in-hindi-गुरु-पर-अनमोल-वचन.html गुरु पर अनमोल वचन]
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राष्ट्र
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अनुनाद सिंह
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'''राष्ट्र''' या आधुनिक युग का 'नेशन' ।
== उक्तियाँ ==
* ''भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वः विदुः तपः दीक्षाम् उपनिषदुः अग्रे।
: ''ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातं तदस्मै देवा उप संनमन्तु॥'' -- अथर्ववेद
: कल्याण की इच्छा रखने वाले ज्ञानियों ने पहले तप और साधना की। उसी तप से राष्ट्र, उसका बल और तेज पैदा हुआ। इसलिए सब लोग राष्ट्र के सामने झुककर उसकी सेवा करें।
* ''आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्'' -- यजुर्वेद
: अर्थात् हमारे राष्ट्र में क्षत्रिय, वीर, धनुषधारी, लक्ष्यवेधी और महारथी हों। <ref>[http://www.aryamantavya.in/vedon-men-rashtra/ वेदों में राष्ट्र की संकल्पना एवं राष्ट्रीय एकता का स्वरुप]</ref>
* ''माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः'' -- अथर्ववेद
: भूमि माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।
* ''श्रेष्ठं यविष्ट भारताग्ने द्युमन्तमा भर।
: ''वसो पुरुस्पृहं रयिम ॥'' -- ऋग्वेद 2.7.1
: अर्थात भारत वह देश है जहां के ऊर्जावान युवा सब विद्याओं में अग्नि के समान तेजस्वी विद्वान हैं, सब का भला करने वाले हैं, सुखी हैं और जिन्हें ऋषिगण उपदेश देते हैं कि वे कल्याणमयी, विवेकशील तथा सर्वप्रिय लक्ष्मी को धारण करें। वैदिक परंपरा में ब्राह्मण के लिए लक्ष्मी ज्ञान है, क्षत्रिय के लिए बल है, वैश्य के लिए धन है और शूद्र के लिए सेवा है।
* ''समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:
: ''समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति।। -- (ऋग्वेद 10/191/4)
: तुम्हारी भावना या संकल्प समान हो, तुम्हारे हृदय समान हों। तुम्हारा मन समान हो, जिससे तुम लोग परस्पर सहकार कर सको। <ref>[https://panchjanya.com/2012/02/11/200169/archive/rabcd34cc/ वेदों में राष्ट्र चिंतन]</ref>
* ''देशरक्षा समं पुण्यं देशरक्षा समं व्रतम् ।
: ''देशरक्षासम योगो दृष्टो नैव च नैवच ॥
: देश की रक्षा के समान पुण्य, देशरक्षा के समान व्रत, और देशरक्षा के समान योग नहीं देखा गया है।
* राष्ट्र लम्बे समय के संघर्ष, बलिदानों और भक्ति भाव की परिणिति है। गर्व से भर देने वाली कथाओं, शौर्य की गाथाओं, और महानायकों का इतिहास ही वो सामाजिक पूँजी है जिस पर एक राष्ट्र की भावना का आधार रखा जाता है। एक राष्ट्र की भावना को समाज में समाहित करने को गौरवशाली इतिहास की जरुरत होती है, अपने महानायक चाहिए। साझा सांस्कृतिक विरासत और भविष्य में, साथ मिलकर, ऐसे ही गौरवशाली कार्यों को अंजाम देने की मंशा ही राष्ट्र को जन्म देती है। एक राष्ट्र के नागरिक होने को ये जरूरी कारण हैं। राष्ट्र के नागरिक इसी एकीकरण की भावना से जुड़े होते हैं। इसलिए किसी राष्ट्र के बारे में जानना है और राष्ट्र की भावना के बारे में जानना है तो उसका एकमात्र तरीका है, जनमत संग्रह। राष्ट्र उसके नागरिक होते हैं, नागरिकों के अलावा कोई भी राष्ट्र का निर्धारण नहीं कर सकता। -- अर्नेस्ट रेनन, 1882 में सोरेबोन्न विश्वविद्यालय में दिए गए व्याख्यान में
* राष्ट्र वह समाज है जो अपने पूर्वजों से सम्बन्धित भ्रमपूर्ण ज्ञान तथा अपने पड़ोसियों के प्रति समान घृणा के माध्यम से एकीकृत होता है। -- विलियम राल्फ इंगे, द एन्द ऑफ ऐन एज ऐण्ड अदर एस्सेज (1948), पृष्ट 127.
* कोई भी देश अपने भूत को समझे बिना अपने भविष्य की योजना नहीं बना सकता। -- अमीर ताहेरी, "Opinion: Iran must confront its past to move forwards", Ashraq Al-Awsat (February 6, 2015).
* जिस प्रकार मनुष्य का बचपन होता है, वैसे ही राष्ट्रों का भी बचपन होता है। -- Henry Bolingbroke, Letters on Study and Use of History (1752)
* महान राष्ट्र अपनी आत्मकथा तीन पाण्डुलिपियों के रूप मे लिखते हैं- एक अपने कर्मों की पुस्तक, एक अपने भाषा की पुस्तक और एक अपने कला की पुस्तक। इनमें से कोई भी पुस्तक अन्य दो को पढ़े बिना समझी नहीं जा सकती। लेकिन इनमें से सबसे विश्वसनीय कला की पुस्तक ही होती है। -- जॉन रस्किन, सेंट मार्क्स रेस्ट, द हिस्ट्री ऑफ वेनिस, प्राक्कथन पृष्ट १ (1885)
* शिक्षा, राष्ट्र की सस्ती सुरक्षा है।
* बड़े देशों ने सदा गिरोहबाजों की तरह काम किया है और छोटे देशों ने वेश्याओं की तरह। -- स्टैनली कुब्रिक, द गार्जियन (1963)
==इन्हें भी देखें==
* [[राष्ट्रवाद]]
* [[संस्कृति]]
* [[स्वतंत्रता]]
* [[देशप्रेम]]
* [[राज्य]]
==सन्दर्भ==
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'''राष्ट्र''' या आधुनिक युग का 'नेशन' ।
== उक्तियाँ ==
* ''भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वः विदुः तपः दीक्षाम् उपनिषदुः अग्रे।
: ''ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातं तदस्मै देवा उप संनमन्तु॥'' -- अथर्ववेद
: कल्याण की इच्छा रखने वाले ज्ञानियों ने पहले तप और साधना की। उसी तप से राष्ट्र, उसका बल और तेज पैदा हुआ। इसलिए सब लोग राष्ट्र के सामने झुककर उसकी सेवा करें।
* ''आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्'' -- यजुर्वेद
: अर्थात् हमारे राष्ट्र में क्षत्रिय, वीर, धनुषधारी, लक्ष्यवेधी और महारथी हों। <ref>[http://www.aryamantavya.in/vedon-men-rashtra/ वेदों में राष्ट्र की संकल्पना एवं राष्ट्रीय एकता का स्वरुप]</ref>
* ''माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः'' -- अथर्ववेद
: भूमि माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।
* ''श्रेष्ठं यविष्ट भारताग्ने द्युमन्तमा भर।
: ''वसो पुरुस्पृहं रयिम ॥'' -- ऋग्वेद 2.7.1
: अर्थात भारत वह देश है जहां के ऊर्जावान युवा सब विद्याओं में अग्नि के समान तेजस्वी विद्वान हैं, सब का भला करने वाले हैं, सुखी हैं और जिन्हें ऋषिगण उपदेश देते हैं कि वे कल्याणमयी, विवेकशील तथा सर्वप्रिय लक्ष्मी को धारण करें। वैदिक परंपरा में ब्राह्मण के लिए लक्ष्मी ज्ञान है, क्षत्रिय के लिए बल है, वैश्य के लिए धन है और शूद्र के लिए सेवा है।
* ''समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:
: ''समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति।। -- (ऋग्वेद 10/191/4)
: तुम्हारी भावना या संकल्प समान हो, तुम्हारे हृदय समान हों। तुम्हारा मन समान हो, जिससे तुम लोग परस्पर सहकार कर सको। <ref>[https://panchjanya.com/2012/02/11/200169/archive/rabcd34cc/ वेदों में राष्ट्र चिंतन]</ref>
* ''देशरक्षा समं पुण्यं देशरक्षा समं व्रतम् ।
: ''देशरक्षासम योगो दृष्टो नैव च नैवच ॥
: देश की रक्षा के समान पुण्य, देशरक्षा के समान व्रत, और देशरक्षा के समान योग नहीं देखा गया है।
* राष्ट्र लम्बे समय के संघर्ष, बलिदानों और भक्ति भाव की परिणिति है। गर्व से भर देने वाली कथाओं, शौर्य की गाथाओं, और महानायकों का इतिहास ही वो सामाजिक पूँजी है जिस पर एक राष्ट्र की भावना का आधार रखा जाता है। एक राष्ट्र की भावना को समाज में समाहित करने को गौरवशाली इतिहास की जरुरत होती है, अपने महानायक चाहिए। साझा सांस्कृतिक विरासत और भविष्य में, साथ मिलकर, ऐसे ही गौरवशाली कार्यों को अंजाम देने की मंशा ही राष्ट्र को जन्म देती है। एक राष्ट्र के नागरिक होने को ये जरूरी कारण हैं। राष्ट्र के नागरिक इसी एकीकरण की भावना से जुड़े होते हैं। इसलिए किसी राष्ट्र के बारे में जानना है और राष्ट्र की भावना के बारे में जानना है तो उसका एकमात्र तरीका है, जनमत संग्रह। राष्ट्र उसके नागरिक होते हैं, नागरिकों के अलावा कोई भी राष्ट्र का निर्धारण नहीं कर सकता। -- अर्नेस्ट रेनन, 1882 में सोरेबोन्न विश्वविद्यालय में दिए गए व्याख्यान में<ref>[https://harinayak.in/145055-2/ भारत सनातन राष्ट्र है]</ref>
* राष्ट्र वह समाज है जो अपने पूर्वजों से सम्बन्धित भ्रमपूर्ण ज्ञान तथा अपने पड़ोसियों के प्रति समान घृणा के माध्यम से एकीकृत होता है। -- विलियम राल्फ इंगे, द एन्द ऑफ ऐन एज ऐण्ड अदर एस्सेज (1948), पृष्ट 127.
* कोई भी देश अपने भूत को समझे बिना अपने भविष्य की योजना नहीं बना सकता। -- अमीर ताहेरी, "Opinion: Iran must confront its past to move forwards", Ashraq Al-Awsat (February 6, 2015).
* जिस प्रकार मनुष्य का बचपन होता है, वैसे ही राष्ट्रों का भी बचपन होता है। -- Henry Bolingbroke, Letters on Study and Use of History (1752)
* महान राष्ट्र अपनी आत्मकथा तीन पाण्डुलिपियों के रूप मे लिखते हैं- एक अपने कर्मों की पुस्तक, एक अपने भाषा की पुस्तक और एक अपने कला की पुस्तक। इनमें से कोई भी पुस्तक अन्य दो को पढ़े बिना समझी नहीं जा सकती। लेकिन इनमें से सबसे विश्वसनीय कला की पुस्तक ही होती है। -- जॉन रस्किन, सेंट मार्क्स रेस्ट, द हिस्ट्री ऑफ वेनिस, प्राक्कथन पृष्ट १ (1885)
* शिक्षा, राष्ट्र की सस्ती सुरक्षा है।
* बड़े देशों ने सदा गिरोहबाजों की तरह काम किया है और छोटे देशों ने वेश्याओं की तरह। -- स्टैनली कुब्रिक, द गार्जियन (1963)
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==इन्हें भी देखें==
* [[राष्ट्रवाद]]
* [[संस्कृति]]
* [[स्वतंत्रता]]
* [[देशप्रेम]]
* [[राज्य]]
==सन्दर्भ==
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भारतीय ज्ञान परम्परा
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अनुनाद सिंह
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text/x-wiki
'''[[:w:भारतीय ज्ञान परम्परा|भारतीय ज्ञान परम्परा]]''' का अर्थ है भारत में कई सहस्राब्दियों से चली आ रही ज्ञान, दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य और सांस्कृतिक विचारों की समृद्ध परंपरा से उपजी ग्रन्थ-राशि। यह परंपरा धार्मिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक और साहित्यिक ज्ञान का समुच्चय है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता आया है। इस ज्ञान परंपरा में आधुनिक विज्ञान के प्रबंधन सहित सभी क्षेत्रों के लिए अदभुत खजाना है।
'ज्ञान' - सत्य, अनुभव और आत्मबोध का समन्वय है।<ref>[https://www.chemexplorers.in/bhartiya-gyan-parampara/ 'भारतीय ज्ञान परम्परा' : परिचय और अवधारणा]</ref>
किसी भी सभ्यता या संस्कृति का उत्थान-पतन उसकी आर्थिक स्थिति और राजनैतिक स्थिति नहीं होती बल्कि ज्ञान परम्परा होती है। भारतीय संस्कृति ने हमेशा ही ज्ञान परम्परा को महत्त्व दिया है। चिन्तन की प्राचीन परम्परा ‘[[उपनिषद]]’ अर्थात गुरु के पास बैठकर अज्ञान की स्थितियों को नष्ट कर ज्ञान को निरंतर संवाद द्वारा पाने की परम्परा रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा का सबसे बड़ा आधार [[वेद]] हैं। ज्ञान का यह स्वरूप तर्कमूलक, मूल्यनिष्ठ और आचरण सापेक्ष है, जिज्ञासामूलक है, और सामाजिक उद्देश्यों से बंधा हुआ है। चिन्तन का अर्थ यहाँ मुक्तकामी है। [[मुक्ति]] का तात्पर्य यहाँ रूढ़ अर्थों में आध्यात्मिक मुक्ति नहीं है, बल्कि सब प्रकार के बंधनों से मुक्ति है। 'सा विध्या या विमुक्तये' अर्थात विद्या वह नहीं जो बांधती है, बल्कि वह है जो मुक्त करती है। बौद्ध चिन्तन-परम्परा में भी शिष्य के अनुभव और मानवीय विवेक को ही प्रमुखता दी गई है। बुद्ध का कहना है कि मनुष्य कि बुद्धि परिक्षणात्मक होनी चाहिए। उसे किसी के कहे पर पूरा विश्वास न करके स्वयं उस बात या तथ्य को परखना चाहिए। चिन्तन के मूल्यनिष्ठ लोकवादी पक्ष की यह धारा [[वेद|वेदों]], उपनिषदों महाकाव्यों, तथा बौद्ध ग्रन्थों से आगे बढ़ती हुई धर्मशास्त्रों तक चली आई है। इनमें सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों कि शिक्षा दी गई है।<ref>[https://gyanvividha.com/भारतीय-ज्ञान-परंपरा/ भारतीय ज्ञान परम्परा]</ref>
;भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रमुख अवयव
* '''वेद''' -- चार वेद
* '''उपनिषद''' -- सौ से अधिक उपनिषद हैं जिनमें गहन दार्शनिक चिन्तन है।
* '''दर्शनशास्त्र''' -- न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत सहित अनेकानेक दार्शनिक ग्रन्थ
* '''गणित, विज्ञान और आयुर्वेद''' - प्राचीन भारतीय विज्ञान, गणित, ज्योतिष और आयुर्वेदिक चिकित्सा के ग्रंथ
* '''व्याकरण, शब्दकोश एवं भाषाज्ञान''' -- अष्टाध्यायी, निरुक्त, छन्दशास्त्र, काव्यशास्त्र
* '''लोक साहित्य और कथाएँ''' -- [[पंचतंत्र]], गाथासप्तशती, कथासरित्सागर, वेत्ताल पंचविंशति (वेत्ताल पच्चीसी) आदि।
* '''राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र''' -- अर्थशास्त्र, सुभाषित के ग्रन्थ, कामशास्त्र
* '''अन्यान्य''' -- अन्य नाटक, हास्य, व्यंग्य, संगीत के ग्रन्थ, कृषि सम्बन्धी ग्रन्थ, पशुपालन सम्बन्धी ग्रन्थ आदि।
== उद्धरण ==
=== ज्ञान/विद्या/शिक्षा ===
* ''आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः'' -- [[वेद]]
: अर्थात सभी दिशाओं से विचारों को आने दो!
* ''ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्'' । ([[गायत्री मंत्र]])
: हम उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
* ''युक्तियुक्तं वचो ग्राह्यं बालादपि शुकादपि।
: ''युक्तिहीनं वचस् त्याज्यं वृद्धादपि शुकादपि॥'' -- प्रबन्धचिन्तामणि
: यदि कोई बात युक्तियुक्त (तर्कसम्मत) हो तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिये, चाहे वह बालक या आये या तोते से।
: किन्तु युक्तिहीन बात को त्याग देना चाहिये, चाहे वह वृद्ध से आयी हो या शुक (शुकदेव) से।
* ''तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
: ''आयासायापरं कर्म विद्याऽन्या शिल्पनैपुणम् ॥'' -- विष्णुपुराण १-१९-४१
: कर्म वह है जो बन्धन में न डाले ; विद्या वह है जो मुक्त कर दे। अन्य कर्म करना मात्र श्रम करना है तथा अन्य विद्याएँ शिल्प में निपुणता मात्र हैं।
* ''आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यः, मन्तव्यः, निदिध्यासितव्यः।'' -- बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से
: अर्थात्, आत्मा को पहले जानना (दर्शन), फिर सुनना (श्रवण), उस पर विचार करना (मनन), और अंततः गहन ध्यान (निदिध्यासन) करना चाहिए।
* ''श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः।
: ''मत्वा च सततं ध्येयः एते दर्शन हेतवः॥
: अर्थात् आत्मतत्त्व का श्रवण वेद वाक्यों के द्वारा करना चाहिए, मनन तार्किक युक्तियों के सहारे करना चाहिए तथा मनन करने के बाद उसका सतत ध्यान करना चाहिये। ये तीनों (श्रवण, मनन, ध्यान) दर्शन के हेतु हैं।
* ''अज्ञानमेव बन्धः ज्ञानमेव मोक्षः। -- उपनिषद
: अज्ञान ही बन्धन है और ज्ञान ही मोक्ष।
* ''सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः'' -- आचार्य उमास्वाति द्वारा रचित तत्त्वार्थसूत्र १-१
: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं।
* ''वादे वादे जायते तत्त्वबोधः।'' -- रम्भा-शुक सम्वाद
: संवाद से सत्य का बोध हो रहा है।
* ''अधीयानोऽपि तन्त्राणि तन्त्रयुक्त्यविचक्षणः।
: ''नाधिगच्छति तन्त्रार्थमर्थं भाग्यक्षये यथा॥'' -- (अष्टांगहृदय की आचार्य अरुणदत्त कृत 'सर्वाङ्गसुन्दरा' टीका, पृष्ठ ९२)
: जिस प्रकार भाग्य के क्षय होने पर व्यक्ति को अर्थ (धन) की प्राप्ति नहीं होती है, उसी प्रकार यदि किसी ने तन्त्र (शास्त्र) का अध्ययन किया है किन्तु वह '''तन्त्रयुक्ति''' का उपयोग करना नहीं जानता तो वह शास्त्र का अर्थ नहीं समझ पाता है।
* ''अक्रोधो वैराग्यो जितेन्द्रियश्च क्षमा दया सर्वजनप्रियश्च।
: ''निर्लोभो मदभयशोकरहितो ज्ञानस्य एतत् दश लक्षणानि॥
: ज्ञान के ये दस लक्षण हैं- क्रोध न करना, वैराग्य, इन्द्रियों पर विजय, क्षमा, दया, सभी जनों को प्रिय होना, लोभ रहित होना, मद से रहित होना, भयरहित होना, शोकरहित होना।
* ''मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः ।
: ''मुक्तिकैवल्यनिर्वाणश्रेयोनिःश्रेयसामृतम् ॥'' -- अमरकोष
: मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर बुद्धि को 'ज्ञान' कहते हैं जबकि शिल्प और शास्त्र की ओर उन्मुख बुद्धि को 'विज्ञान'।
* '' ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम् ।
: '' अनुभवाख्यं द्वितीयं तुं ज्ञानं तदुर्लभं नृप ॥
: हे राजा ! ज्ञान दो प्रकार के होते हैं; एक तो स्मृतिजन्य शाब्दिक ज्ञान, और दूसरा अनुभवजन्य ज्ञान जो अत्यन्त दुर्लभ है।
* ''अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा, ग्रंथिभ्यो धारिणो वराः।
: ''धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा, ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः॥
: अनपढ़ों की अपेक्षा पुस्तक पढ़ने वाले श्रेष्ठ हैं। पुस्तक पढ़ने वालों की अपेक्षा अर्थ को धारण करने वाले श्रेष्ठ हैं। ग्रंथों के अर्थ को धारण करने वालों की अपेक्षा ज्ञानी श्रेष्ठ हैं। ज्ञानियों की अपेक्षा अर्थ को क्रियान्वित करने वाले श्रेष्ठ हैं।
*''यो हि वेदे च शास्त्रे च ग्रन्थधारणतत्परः।
: ''न च ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञस्तस्य तद्धारणं वृथा॥
: ''भारं स वहते तस्य ग्रन्थस्यार्थं न वेत्ति यः ।
: ''यस् तु ग्रन्थार्थ तत्त्वज्ञो नास्य ग्रन्थागमो वृथा ॥ -- [[महाभारत]]
: जो वेद और शास्त्र के ग्रन्थों को कण्ठस्थ करने में तत्पर रहता है और उन ग्रन्थों के अर्थ के तत्त्व को नहीं समझता, उसका कण्ठस्थ करना व्यर्थ है।
: यदि कोई किसी ग्रन्थ का सही अर्थ नहीं जानता है तो वह उस ग्रन्थ का भार ढोता है। जो उस ग्रन्थ का अर्थ समझ गया है उसका उस ग्रन्थ को पढ़ना व्यर्थ नहीं है।
* ''अनन्तं शास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पश्चकालो बहुविघ्नता च।
: ''यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥'' -- चाणक्यनीति
: शास्त्र अनंत हैं, विद्याएँ अनेक हैं, जीवन की अवधि थोड़ी हैं और विघ्न बहुत हैं। अतः जिस प्रकार हंस पानी अलग कर केवल दूध ही ले लेता हैं, वैसे ही हमें भी इन शास्त्रों में से जो सार तत्व हैं, वहीं ग्रहण करके उसकी उपासना में लग जाना चाहिए।
* ''गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
: ''गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
: गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शिव है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम है।
* उत्तम विद्या लीजिये जदपि नीच पै होय।
: परौ अपावन ठौर में कंचन त्यजत न कोय॥ -- [[कबीरदास]]
=== सत्य ===
* ''सत्यं ब्रह्म ।
: सत्य ही ब्रह्म है।
* ''सत्यमेवेश्वरो लोके सत्यं पद्माश्रिता सदा।
: ''सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्॥'' -- वाल्मीकि रामायण
: संसार में सत्य ही ईश्वर है। सत्य ही लक्ष्मी (= धन-धान्य) का निवास है। सत्य ही सभी (अच्छाइयों) का मूल है। संसार में सत्य से बढ़कर और कोई परम पद नहीं है।
*''सत्यमेव परं मित्रं स्वीकृते सति मानवे ।
:''सत्यमेव परं शत्रुः धिक्कृते सति मानवे ।।
: हम सत्य को स्वीकार करते है तो सत्य हमारा सबसे श्रेष्ठ मित्र बन जाता है। लेकिन अगर हम सत्य का स्वीकार न करके धिक्कारते है, तो जीवन में आगे चलकर वही सत्य हमारे लिए परं शत्रु बन जाता है।
* ''नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ।
: ''अतः सर्वेषु कार्येषु सत्यमेव विशिष्यते ॥'' -- महाभारत, आदि पर्व में शकुन्तला का कथन
: सत्य से बढ़कर धर्म और असत्य से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। अतः सभी कार्यों में सत्य को ही श्रेष्ठ माना गया है।
* ''सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
: ''येनाक्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥ -- मुण्डकोपनिषद्
: सत्य की ही विजय होती है असत्य की नहीं ; 'सत्य' के द्वारा ही देवों का यात्रा-पथ विस्तीर्ण हुआ, जिसके द्वारा आप्तकाम ऋषिगण वहां आरोहण करते हैं जहाँ 'सत्य' का परम धाम है।
* ''हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
: ''तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥'' -- ईशोपनिषद्
: सत्य का मुख स्वर्ण के पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन् ! उस सत्यधर्म के दिखाई देने के लिए तू उस आवरण को हटा दे। (इन भौतिक पदार्थों की चकाचौंध ने मनुष्य की आँख से सत्य को ओझल कर दिया है। भक्त सत्य के दर्शन करना चाहता है। सांसारिकता सोने का ढक्कन है और आत्म-परमात्म-चिन्तन वह सत्य है जिसे सांसारिकता छिपा देती है।)
* ''सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः ।
: ''सत्येन वायवो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
: सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है । सब सत्य पर आधारित है ।
* ''नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम् ।
: ''न हि तीव्रतरं किञ्चिदनृतादिह विद्यते ॥
: सत्य जैसा अन्य धर्म नहीं । सत्य से पर कुछ नहीं । असत्य से ज्यादा तीव्रतर कुछ नहीं ।
* ''सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
: ''येनाक्रमत् मनुष्यो ह्यात्मकामो यत्र तत् सत्यस्य परं निधानं ॥
: जय सत्य का होता है, असत्य का नहीं । दैवी मार्ग सत्य से फैला हुआ है । जिस मार्ग पे जाने से मनुष्य आत्मकाम बनता है, वही सत्य का परम् धाम है ।
* ''नानृतात्पातकं किञ्चित् न सत्यात् सुकृतं परम् ।
: ''विवेकात् न परो बन्धुः इति वेदविदो विदुः ॥
: वेदों के जानकार कहते हैं कि अनृत (असत्य) के अलावा और कोई पातक नहीं; सत्य के अलावा अन्य कोई सुकृत नहीं और विवेक के अलावा अन्य कोई भाई नहीं।
=== न्याय-दर्शन===
* ''प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्त अवयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभास च्छल जति निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निश्श्रेयसाधिगमः ॥'' -- अक्षपाद गौतम, न्यायसूत्र
: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अयवय, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान के तत्वज्ञान से निःश्रेयस (मोक्ष) प्राप्त होता है।
* ''प्रमाणैर्थपरीक्षणं न्यायः।'' -- न्यायसूत्र के भाष्यकार महर्षि वात्स्यायन
: प्रमाण के द्वारा किसी अर्थ (सिद्धान्त) की परीक्षा करना ही न्याय है।
* ''प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि।'' -- न्यायसूत्र
: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द - ये (चार) प्रमाण हैं।
* ''इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् '' -- न्यायसूत्र १।१।४
: प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न ज्ञान है जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारी और व्यवसायात्मक होता है।
* ''आत्म शरीरेन्द्रियार्थ बुद्धि मनः प्रवृत्ति दोष प्रेत्यभाव फल दुःखापवर्गाः तु प्रमेयम् '' -- न्यायसूत्र
: आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ , बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग -- ये प्रमेय हैं।
* ''अविज्ञाततत्तवेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्तवज्ञानार्थमूहस्तर्कज्जः'' -- (न्याय दर्शन 1.1.42)
: जिस अर्थ का तत्व निर्णीत न हो उसके तत्त्वज्ञान के लिए युक्ति पूर्वक किए जानेवाले "ऊह" ज्ञान का नाम है "तर्क"।
* ''प्रमाणतर्कसाधनोपलम्भः सिद्धान्त-अविरुद्धः पञ्चवयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः।'' -- न्यायसूत्र
: प्रमाण और तर्क जैसे साधनों का उपयोग करके, सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए, पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच पञ्चावयवी (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन) वाक्यों की सहायता से हुई चर्चा ही 'वाद' है।
* ''प्ररदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्।
: ''आश्रयः सर्वधर्माणां शाश्वदान्वीक्षिकी मता॥ -- वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य 1/1/1 तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र, विद्योद्देश प्रकरण
: आन्विक्षिकी (न्यायविद्या) समस्त विद्याओं का प्रदीप,सब कर्मों का उपाय, तथा सब धर्मों का आश्रय मानी गयी है।
* ''नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थेन्यायः प्रवर्तते किं तर्हि संशयितेऽर्थे '' -- वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य
: उपलब्ध अथवा निर्णीत अर्थ में न्याय की प्रवृत्ति नहीं होती, अपितु सन्दिग्ध अर्थ में ही न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति होती है।
===मीमांसा===
* ''धर्माख्यं विषयं वक्तुं मीमांसायाः प्रयोजनम्।'' -- कुमारिल भट्ट
: [[धर्म]] नामक विषय का प्रतिपादन (व्याख्या) करना ही मीमांसा का मुख्य प्रयोजन (उद्देश्य) है।
*''मीमांसा तु विद्येयं बहुविद्यान्तराश्रिता ।
: ''न शुश्रूषयितुं शक्या प्रागनुक्त्वा प्रयोजनम् ॥'' -- भट्टपाद
: सम्पूर्ण कार्यकलापों के मूलभूत [[वेद]] का विकृष्ट वाक्यार्थ वर्णन करने के लिए यह द्वादशलक्षणी मीमांसा प्रायः सभी विद्याओं (समयविद्या, न्याय अथवा तर्कविद्या, मीमांसा, तन्त्रविद्या, पूर्वमीमांसा, पूर्वतन्त्र, विचारशास्त्र, अध्वरमीमांसा एवं वाक्यशास्त्र एवं धर्मशास्त्र आदि) को अनेक रूपों में प्रभावित करती है।
*''विषयो विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरम् ।
: ''निर्णयश्चेति पञ्चाङ्गं शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ॥'' -- कुमारिल भट्ट, श्लोकवार्तिक में
: विषय, संशय (विशय), पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और निर्णय—इन पाँच अंगों से मिलकर ही शास्त्र में एक 'अधिकरण' बनता है।
* ''श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये परदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्।'' -- मीमांसा 3.3.14
: अन्वय : ''श्रुति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यम् अर्थविप्रकर्षात् ।
: अर्थ : श्रुति (Scripture), लिंग (Characteristics), वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्य (Celebrity) के समवाय में से जो बाद में रखे गये हैं वे पहले लिखे गये गुणों से दुर्बल है।
* ''सत्यं नित्यैव मीमांसा न्यायपिण्डात्मिकेष्यते।
: ''सङ्क्षेपविस्तरग्रन्थैः कृत्रिमैस्तु निबध्यते॥'' -- तन्त्रवार्त्तिक
: मीमांसा (तर्कपूर्ण विचार) वास्तव में नित्य है और इसे न्याय (तर्कों) के समूह के रूप में स्वीकार किया जाता है।
: कुमारिल भट्ट यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मीमांसा केवल एक ग्रन्थ नहीं, बल्कि सत्य और धर्म की व्याख्या के लिए उपयोग की जाने वाली एक शाश्वत तर्क पद्धति है।
* ''न कदाचिदनीदृशं जगत् तस्य निमित्तपरीष्टिः।'' -- जैमिनीय सूत्र १.१.३
: (अथातो धर्मजिज्ञासा, चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः)
: संसार कभी भी इससे भिन्न (जैसा आज है) नहीं था।
: कुमारिल भट्ट इस विचार का खंडन करते हैं कि सृष्टि का कभी कोई "आदि" (शुरुआत) या "प्रलय" (पूर्ण विनाश) हुआ था। मीमांसा के अनुसार, यह जगत प्रवाह रूप में नित्य है। यह जैसा आज दिख रहा है—जन्म, मृत्यु, सुख, दुख और व्यवस्था के साथ—यह अनादि काल से ऐसा ही चला आ रहा है।
*''चतुर्दशसु विद्यासु मीमांसैव गरीयसी।
: चतुर्दश विद्यास्थानो में मीमांसा ही अत्यंत महत्वपूर्ण है।
=== गणित ===
* ''यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
:''तथा वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्ध्नि स्थितम्॥'' -- वेदाङ्ग ज्योतिष
: जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है।
* ''बहुभिर्प्रलापैः किम् त्रयलोके सचरारे।
: ''यद् किंचिद् वस्तु तत्सर्वम् गणितेन् बिना न हि॥'' -- [[:w:महावीराचार्य|महावीराचार्य]], जैन गणितज्ञ
: बहुत प्रलाप करने से क्या लाभ है? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है वह गणित के बिना नहीं है। उसको गणित के बिना नहीं समझा जा सकता।
* ''लौकिके वैदिके वापि तथा सामयिकेऽपि यः।
: ''व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते॥'' -- महावीराचार्य द्वारा रचित गणितसारसङ्ग्रह में गणितशास्त्रप्रशंसा के अन्तर्गत
: अर्थ: लौकिक, वैदिक तथा सामयिक में जो व्यापार है वहाँ सर्वत्र संख्या का ही उपयोग होता है।
* ''गण्यते संख्यायते तद्गणितम्। तत्प्रतिपादकत्वेन तत्संज्ञं शास्त्रं उच्यते।'' -- भारतीय गणितज्ञ गणेश दैवज्ञ, अपने ग्रन्थ बुद्धिविलासिनी में
: जो परिकलन करता और गिनता है, वह गणित है तथा वह विज्ञान जो इसका आधार है वह भी गणित कहलाता है।
* '' भोज्यं यता सर्वरसं विनाज्यं राज्यं यथा राजविवर्जितं च।
: ''सभा न भातीव सुवक्तृहीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथात्र॥ -- भास्कराचार्य, सिद्धान्तशिरोमणि, गोलाध्याय, श्लोक 4
: खगोल तथा गणित में एक दूसरे से अनभिज्ञ पुरुष उसी प्रकार महत्त्वहीन है जैसे घृत के बिना व्यंजन, राजा के बिना राज्य, तथा अच्छे वक्ता के बिना सभा महत्वहीन होती है।
=== व्याकरण ===
* ''उदाहरणं प्रत्युदाहरणं वाक्याध्याहारः इत्येतत्समुदितं व्याकरणं भवति'' -- महाभाष्य (पश्पशाह्निक)
: उदाहरण और प्रत्युदाहरण, वाक्याध्याहार (पूर्व प्रकरणस्थ पदों की अनुवृत्ति) से युक्त व्याकरण होता है।
* ''कानि पुनः शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि? रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम् ।'' -- महाभाष्य
: शब्दानुशासन के प्रयोजन क्या-क्या है? रक्षा, ऊह, आगम, लघु, असंदेह - ये (व्याकरण के) प्रयोजन हैं।
* ''चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादाः द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।
: ''त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यां आविवेश॥'' -- ऋग्वेद ४.५८.३
: इस मन्त्र में व्याकरण की तुलना वृषभ (बैल) से की गयी है जिसके चार सींग, तीन पैर, दो सिर तथा सात हाथ हैं तथा जो तीन प्रकार से बँधा है। वह वृषभ रोता है। वह महादेव मनुष्यों में प्रविष्ट है।
: उस महान देवता के चार सींग (नाम-आख्यात-उपसर्ग-निपात) , तीन पैर (भूत-वर्तमान-भविष्यत् काल), दो सिर (नित्य और अनित्य शब्द), सात हाथ (सात विभक्तियाँ) , तीन स्थान (उर, कण्ठ, सिर) से बधा हुआ है।
=== धर्म ===
* ''यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।'' -- वैशेषिक सूत्र
: जिससे वर्तमान जीवन में अभ्युदय और भावी जीवन में निःश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि हो, वही धर्म है। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि जिससे भौतिक उन्नति और अध्यात्मिक उन्नति दोनों प्राप्त होतीं हैं, वही धर्म है।
* ''स धर्मो यो निरुपधः सोऽर्थो यो न विरुध्यते ।
: ''स कामः सङ्गहीनो यः स मोक्षो योऽपुनर्भवः ॥
: धर्म वही हैं जिस में कोई छल न हो , अर्थ वही हैं जिस में कोई विरोध न हो , काम वही हैं जिस मे कोई बन्धन न हो और मोक्ष वही है जहाँ कभी भी पुनर्जन्म न हो।
* ''धर्मार्थकामाः सम सेव्यमानाः एको हि भजते स नरः जघन्यः॥
: धर्म, अर्थ और काम समान रूप से सेवन करना अच्छा है। जो केवल एक का सेवन करता है, वह मनुष्य जघन्य है।
===कर्म ===
* ''कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
: ''अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥'' -- श्रीमद् भगवद्गीता, ४-१७
: कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्म की गति गहन है।
* ''ननुनाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
: ''अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥'' -- ब्रह्मवैवर्तपुराण १/४४/७४
: मनुष्य जो कुछ अच्छा या बुरा कार्य करता है, उसका फल उसे भोगना ही पड़ता है। अनन्त काल बीत जाने पर भी कर्म, फल को प्रदान किए बिना नाश को प्राप्त नहीं होता।
* ''यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते ।
: ''तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्धयति ॥'' -- वाल्मीकि रामायण
:पराक्रम दिखाने का समय आने पर जो पीछे हट जाता है, उस तेजहीन का पुरुषार्थ सिद्ध नही होता।
* ''कर्मणा सिद्धिः ।
: कर्म से ही सिद्धि मिलती है।
* ''ज्ञानं भारः क्रियां बिना।'' -- हितोपदेश
: आचरण के बिना ज्ञान केवल भार होता है।
* ''यः क्रियावान् स पण्डितः ।
: जो क्रियावान है , वही पण्डित (ज्ञानी) है।
=== काम ===
* ''काममय एवायं पुरुष इति। स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति। यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते। यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते॥
: यह पुरुष काममय ही है। वह जैसी काम्ना करता है वैसा करने का यत्न करता है, जैसा करना चाहता है, वैसा ही कर्म करता है, जैसा कर्म करता है वैसा ही काम होता है।
* ''अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः कामातुराणां न भयं न लज्जा ।
: ''विद्यातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न वपुर्न तेजः ॥
: अर्थ के लिये आतुर मनुष्य का कोई मित्र होता है न कोई भाई, काम के लिये आतुर व्यक्ति को न कोई भय होता है न लज्जा, विद्या के लिये आतुर व्यक्ति को न सुख होत है न निद्रा, और भूख से आतुर मनुष्य के पास न तो स्वास्थ्य होता है न तेज।
*'' न पश्यति च जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति।
: ''न पश्यति मदोन्मत्तो स्वार्थी दोषान्न पश्यति॥'' -- सुभाषितरत्नाकर
: जन्म से अन्धे को दिखायी नहीं पड़ता, काम से अन्धा भी नहीं देखता है। नशे में चूर व्यक्ति नहीं देख पाता, स्वार्थी दोषों को नहीं देख पाता।
* ''न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
: ''हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ॥'' -- [[मनुस्मृति]]
: इच्छाएँ कभी भी उपभोग करने से शान्त नहीं होतीं। ये वैसे ही बढ़ जतीं हैं जैसे आग में घी डालने पर अग बढ़ जाती है, शान्त नहीं होती।
=== समय ===
* ''आयुषः क्षणमेकमपि न लभ्यः स्वर्णकोटिभिः ।
: ''स वृथा नीयते येन तस्मै नृपशवे नमः ॥'' -- महासुभाषितसङ्ग्रह
: करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं के द्वारा आयु का एक क्षण भी नहीं पाया जा सकता। वह ( क्षण ) जिसके द्वारा व्यर्थ नष्ट किया जाता है, ऐसे नर-पशु को नमस्कार ।
* ''कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।
: ''इति ते संशयो मा भूद्राजा कालस्य कारणम् ॥'' -- [[महाभारत]], शान्ति पर्व
: (भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि) काल राजा को बनाता है या राजा काल को बनाता है- इसमें तुम कभी संशय मत करना। जान लो कि राजा ही काल को बनाता है। अर्थात् जैसा राजा होगा, वैसा समय होगा और वैसी ही नीतियाँ व परिस्थितियाँ ।
* ''क्षणशः कणशश्चैव विद्याधनं अर्जयेत्।
: क्षण-क्षण का उपयोग करके विद्या का और कण-कण का उपयोग करके धन का अर्जन करना चाहिये।
*''आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः ।
: ''क्षिप्रम् अक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥'' -- [[हितोपदेश]]
:: लेने, देने और करने योग्य कार्य यदि तुरन्त नहीं कर लिया जाता तो समय उसका रस पी जाता है।
=== अर्थशास्त्र ===
* ''मनुष्याणां वृत्तिरर्थः ; मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः । तस्याः लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रमिति ।'' -- कौटिलीय अर्थशास्त्रम्, १८०वाँ प्रकरण (तन्त्रयुक्तयः)
: मनुष्यों की जीविका को अर्थ कहते हैं। मनुष्यों से युक्त भूमि को भी अर्थ कहते हैं। इस प्रकार, भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने वाले उपायों का निरूपण करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र कहलाता है।
* ''श्रुतिस्मृत्यविरोधेन राजवृत्तादिशासनम्।
: ''सुयुक्त्यार्थार्जनं यत्र ह्यर्थशास्त्रं तदुच्यते॥'' -- शुक्रनीति ४-५५, विद्याकलानिरुपणप्रकरण
: अर्थशास्त्र वह है जिसमें राजाओं के आचरण की शिक्षा हो, जो श्रुति-स्मृति से भिन्न हो, और जिसमें बड़ी दक्षता के साथ सम्पत्ति प्राप्त करने की शिक्षा दी गयी हो।<ref>[https://core.ac.uk/download/pdf/144527882.pdf बृहत्त्रयीगत सूक्तियाँ : एक विश्लेषण] (शोधपत्र, २०११)</ref>
* ''अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः।
: ''पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या ह्येता चतुर्दश॥
: ''आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चैव ते त्रयः।
: ''अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्या ह्यष्टादशैव ताः ॥'' -- [[महाभारत]], शान्तिपर्व ; विष्णुपुराण 3.6.28-29<ref>[https://vyasonmukh-in.translate.goog/2021/01/12/arthashastra-origin-tradition-and-veneration-2/?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc Arthashastra – Origin, Tradition and Veneration]</ref>
:
* ''धर्ममर्थे च कामं च प्रवर्तयति पाति च l
: ''अधर्मानर्थविद्वेषानिदं शास्त्रं निहन्ति च ll'' -- कौटिलीय अर्थशास्त्रम् 15.1.72
:
* ''यतः सर्वप्रयोजनसिद्धिः सोऽर्थः।'' -- नीतिवाक्यामृतम्, अर्थसमुद्देश्य, १
: जिसके द्वारा सभी प्रयोजनों की सिद्धि होती है, वह अर्थ है।
* ''अर्थमूलौ धर्मकामौ।'' -- कौटिल्य अर्थशास्त्र
: धर्म और काम का मूल अर्थ है। ( अर्थ के बिना धर्म और काम भी प्राप्त नहीं नहीं होते।)
=== आयुर्वेद<ref>[https://d1wqtxts1xzle7.cloudfront.net/48254909/ayurveda_and_themimamsa_philosophy-libre.pdf?1471955978=&response-content-disposition=attachment%3B+filename%3DAyurveda_and_the_Mimamsa_Philosophy.pdf&Expires=1769869891&Signature=cST94OJVBe~yXSpE2ti9bYfYzNyyqOBYNSkLTjzQfROYEfIGnnZt1XU5y01hSL8SLkg-nmb4tCFLU3WkvYYjMMmMNfqijFfhFT8KE56as3X1zEirVkcO2E41vxv19f5mfOsYdsH9SKWEN0mq35OmDRrM3kD2D6ksfajv1KJ-JH-EjemYOUROs5ABYC4BaCn8hVI~8KCMfw5XYn2HO96ODfIv8SBId8yd7X5Lm7PQa8~wVbkjtIaphkpkMkkdeLKNBcdMOZpzuz~LnHmCxaxMdPpfqZTRuLxYkcpZg148aEAgdEetfBcGxWkQSHnUpaeGmaZkUf3fa2N3lt6Wcnr1Tw__&Key-Pair-Id=APKAJLOHF5GGSLRBV4ZA Ayurveda and Mimansa Philosophy]</ref> ===
* ''हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम्।
: ''त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः॥'' -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान
: हेतु (कारण), लिंग (लक्षण) और औषधि का ज्ञान - यह शाश्वत पुण्य त्रिसूत्र (तीन सूत्र) स्वस्थ एवं अस्वस्थ दोनों के लिये है जिसे पितामह (ब्रह्मा) ने कहा है। (आयुर्वेद में कुल तीन प्रकार के सूत्र हैं।)
* ''रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता ।
: ''रोगा दुःखस्य दातारो ज्वरप्रभृतयो हि ते ॥'' -- भावप्रकाश-पूर्वखण्ड-मिश्रप्रकरण
: यह आयुर्वेद का आधारभूत नियम है, त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) का साम्यावस्था मे रहना आरोग्य है, और विषम होना ही रोग का कारण है। रोग, दुख देते हैं। ज्वरादि रोग हैं।
* ''कालार्थकर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकः।
: ''सम्यग्गोगश्च विज्ञेयो रोगारोग्यैककारणम्॥'' -- वाग्भटसंहिता, सूत्रस्थान -19
: काल, अर्थ, और कर्म का हीनयोग, मिथ्या योग, अतियोग ही रोग का और सम्यक योग आरोग्य का एकमात्र कारण है।
* '' शास्त्रं ज्योतिः प्रकाशार्थं दर्शनं बुद्धिः आत्मनः ।
: ''ताभ्यां भिषक् सुयुक्ताभ्यां चिकित्सत् न अपराध्यति ॥'' -- चरकसंहिता
: शास्त्र ज्योति के समान होते हैं जो (वस्तुओं को) प्रकाशित करता है। बुद्धि आँख के समान है। इन दोनों से युक्त वैद्य चिकित्सा करते समय गलती नहीं करता।
* ''एकस्मिन्नेव यस्येह शास्त्रे लब्धास्पदा मतिः।
: ''स शास्त्रमन्यदप्याशु युक्तिज्ञत्वात्प्रबुध्यते ॥'' -- चरकसंहिता, सिद्धिस्थान १२.४७
: यदि किसी व्यक्ति ने एक ही शास्त्र का अच्छी तरह से अध्ययन किया है, तो वह अपनी तार्किक क्षमता (युक्तिज्ञता) के कारण अन्य शास्त्रों को भी आसानी से समझ सकता है।
* ''अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानाम् अर्थवशात्तेषां तद्विद्येभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यम्। कस्मात्?
: ''न ह्येकस्मिञ्छास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् ।
: ''तस्माद्बहुश्रुतः शास्त्रं विजानीयाच्चिकित्सकः।'' -- सु. सं. सू. ४, ६-७
: आयुर्वेद में प्रयुक्त अन्य विद्याओं के सिद्धांतों को उन विषयों के विशेषज्ञों से समझना चाहिए।
* कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः शत्रुश्चाबुद्धिमताम्। अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमायुष्यं पौष्टिकं लौक्यमभ्युपदिशता वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यञ्च'' -- च. सं. वि. ८.१४
: बुद्धिमानों के लिए यह सारा संसार ही आचार्य (शिक्षक) है।
* ''श्रुते पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता।
: ''दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम्॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान ९.६
: एक कुशल वैद्य (चिकित्सक) में सिद्धांतों का पूर्ण ज्ञान, व्यापक व्यावहारिक अनुभव, कुशलता, और शारीरिक एवं मानसिक स्वच्छता - ये चार गुण होने चाहिए।
* ''तस्मान्निःसंशयं ज्ञानं हर्त्रा शल्यस्य वाञ्छता । शोधयित्वा मृतं सम्यग्द्रष्टव्यो अङ्गविनिश्चयः ॥ प्रत्यक्षतो हि यद् दृष्टं शास्त्रदृष्टं च यद् भवेत् । समासतस्तदुभयं भूयो ज्ञानविवर्धनम् ॥ प्रत्यक्षवेत्ता हि शास्त्राणां स स्यात् कार्येषु निष्कम्पः ।'' -- सुश्रुतसंहिता, शारीरस्थान, अध्याय 5
: इसलिए, वह शल्य-चिकित्सक (Surgeon) जो पूर्णतः 'निःसंदेह' ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे मृत शरीर का शोधन करके (विच्छेदन/Dissection द्वारा) उसके अंगों और प्रत्यंगों का अच्छी तरह से निरीक्षण करना चाहिए। क्योंकि जो ज्ञान प्रत्यक्ष देखा गया है (Practical Observation) और जो शास्त्रों में पढ़ा गया है (Theoretical Knowledge)—जब इन दोनों का मिलन होता है, तभी ज्ञान का वास्तविक विस्तार होता है। जो शास्त्रों के ज्ञान को अपनी आँखों से (प्रायोगिक रूप से) देख लेता है, वही अपने कार्यों (चिकित्सा या सर्जरी) में 'निष्कम्प' यानी पूर्ण आत्मविश्वासी और अडिग होता है।
* ''यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य।
: ''एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीत्य चार्थेषु मूढाः खरवद्वहन्ति॥'' -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान ४.४
: जैसे चंदन के भार को उठाता हुआ गधा बस उस के भार को ही समझता है और चंदन के मूल्य को नहीं समझता, वैसे ही वे लोग हैं जो बहुत से शास्त्रों को पढ़ लेते हैं किन्तु उसके सही अर्थ से अनभिज्ञ हैं।
*''अतश्च प्रकृतं बुध्वा देशकालान्तराणि च।
: ''तन्त्रकर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत्॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान २६.३७
: प्रकरण (विषय), देश (स्थान) और काल (समय) की भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए, तंत्रकार (ग्रन्थकार) के अभिप्राय (उद्देश्य) को समझकर ही निर्णय या अर्थ (उपचार/निष्कर्ष) बताना चाहिए।
* ''अधीयानोऽपि शास्त्राणि तन्त्रयुक्त्या विना भिषक् ।
: ''नाधिगच्छति शास्त्रार्थानर्थान् भाग्यक्षये यथा॥'' -- चरकसंहिता सिद्धिस्थान १२.४८
: तंत्रयुक्ति (शास्त्र के अर्थ को समझने के तर्क/उपकरण) के बिना, चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करने वाला वैद्य (भिषक्) भी उसके सही अर्थ को नहीं समझ पाता, जैसे भाग्य क्षीण होने पर मनुष्य संपत्ति को नहीं पा पाता है।
* ''अत्रासां तन्त्रयुक्तीनां किं प्रयोजनम् ? उच्यते। वाक्ययोजनमर्थयोजनञ्च ।
: ''भवन्ति चात्र श्लोकाः।
: ''असद्द्वादिप्रयुक्तानां वाक्यानां प्रतिषेधनम्।
: ''स्ववाक्यसिद्धिरपि च क्रियते तन्त्रयुक्तितः॥
: ''व्यक्ता नोक्तास्तु ये ह्यर्था लीना ये चाप्यनिर्मलाः।
: ''लेशोक्ता ये च केचित्स्युस्तेषाञ्चापि प्रसाधनम्॥'' -- सुश्रुतसंहिता उत्तरस्थान ६५.५
* ''अधिकरणम्, योगः, पदार्थः, हेत्वर्थः, उद्देशः,उपदेशः, अपदेशः,
:''अपवर्जः, वाक्यशेषः, अर्थापत्तिः, विपर्ययः प्रसङ्गः, एकान्तः,
:''अनेकान्तः, पूर्वपक्षः, निर्णयः, अनुमतम्,, विधानम्, अनागतावेक्षणम्,
:''अतिक्रान्तावेक्षणम्, संशयः, व्याख्यानम्, स्वसंज्ञा, निर्वचनम्, निदर्शनम्,
:''नियोगः विकल्पः, समुच्चयः, ऊह्यम् '' -- सु.सं.सू.६५)
* ''अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानाम् अर्थवशात्तेषां तद्विद्येभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यम्। कस्मात्?
: ''न ह्येकस्मिञ्छास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम्।
: ''तस्माद्बहुश्रुतः शास्त्रं विजानीयाच्चिकित्सकः॥'' -- सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान ४, ६-७
: एक ही शास्त्र या विषय का अध्ययन करने वाला व्यक्ति शास्र के निर्णय को नही समझ सकता इसलिये बहुत शास्त्रों को सुनने पढने वाला चिकित्सक, शास्त्र के तत्त्व को जान सकता।
* ''तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिबाह्येन भेषजम्।
: ''धीमता किञ्चिदादेयं जीवितारोग्यकाङ्क्षिणा॥'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान १.१२७
: इसलिए, जीवन और आरोग्य (स्वास्थ्य) की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसे वैद्य से कोई भी औषधि ग्रहण नहीं करनी चाहिए जो 'युक्ति' (तर्क और वैज्ञानिक विवेक) से शून्य हो।
*''अज्ञातशास्त्रसद्भावान् शास्त्रमात्रपरायणान्।
: ''त्यजेद्दराद् भिषक्पाशान् पाशान् वैवस्वतानिव ॥
: ''सिद्धान्तो नाम परीक्षकैः बहुविधं परीक्ष्य हेतुभिश्च साधयित्वा निश्चितोऽर्थः।'' -- चरकसंहिता सूत्रस्थान १.१२७
: वे चिकित्सक जो शास्त्रों के वास्तविक अर्थ और गहराई (सद्भाव) से अनभिज्ञ हैं, और केवल रटे-रटाए ग्रंथों (शास्त्रमात्र) पर निर्भर रहते हैं, वे वास्तव में वैद्य कहलाने योग्य नहीं हैं।
=== विविध / प्रकीर्ण ===
* ''अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
: ''यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥'' -- चाणक्यनीति
: शास्त्र अनन्त हैं, विद्याएँ अनेक हैं, जीवन की अवधि थोड़ी हैं और विघ्न बहुत हैं। अतः जिस प्रकार हंस पानी अलग कर केवल दूध ही ले लेता हैं, वैसे ही हमें भी इन शास्त्रों में से जो सार तत्व हैं, वहीं ग्रहण करके उसकी उपासना में लग जाना चाहिए।
* ''तर्कोऽप्रतिष्ठः स्मृतयो विभिन्नाः
: ''नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्।
: ''धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्
: ''महाजनो येन गतः स पन्थाः॥'' -- महाभारतम्
: जीने का वास्तविक तरीका निर्धारित करने के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं हैं। स्मृतियाँ भी अलग-अलग बातें करती हैं। कोई भी एक विचारवन्त (मुनि) नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें। जीवन का वास्तविक तरीका गुप्त है, मानो किसी गुफा में छिपा हो। इसलिए महान लोग जिस मार्ग पर चले थे उसी मार्ग से जाना लाभकारी है।
* ''तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणा क्षारं जलं कापुरुषा पिवन्ति।'' -- योगवासिष्ठ (उत्तरार्ध) / भोजप्रबन्ध
: 'यह मेरे पिता का बनाया हुआ कुँआ है' ऐसा कहने वाले खारा जल पीते हैं।
* ''अकुलीनोऽपि शास्त्रज्ञो दैवतेरपि पूज्यते'' -- हितोपदेश
: नीच कुल वाला भी यदि शास्त्र जानता हो तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है।
* ''काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
: ''व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥
: बुद्धिमान व्यक्ति काव्य, शास्त्र आदि का पठन करके अपना मनोविनोद करते हुए समय को व्यतीत करते हैं और मूर्ख व्यक्ति व्यसन में, सोकर या कलह करके समय बिताते हैं।
* ''यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
: ''लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥
: जिस मनुष्य में स्वयं का विवेक, चेतना एवं बोध नहीं है, उसके लिए शास्त्र क्या कर सकता है। आंखों से हीन अर्थात् अंधे मनुष्य के लिए दर्पण क्या कर सकता है?
* ''केवलं शास्त्रं आश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः
: ''युक्तिहीने विचारे तु धर्महानिः प्रजायते॥'' -- बृहस्पतिस्मृति
: केवल कानून की किताबों व पोथियों मात्र के अध्ययन के आधार पर निर्णय देना उचित नहीं होता। इसके लिए ‘युक्ति’ का सहारा लिया जाना चाहिए। युक्तिहीन विचार से तो धर्म की हानि होती है।
* अमंत्रं अक्षरं नास्ति नास्ति मूलं अनौषधम्।
: ''अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः॥
: कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं।
* ''यस्य कस्य तरोर्मूलं येन केनापि मिश्रित ( घार्षित ) म् ।
: ''यस्मै कस्मै प्रदातव्यं यद्वा तद्वा भविष्यति॥
: जिस-तिस वृक्ष का मूल ले लिया, जिस-किस ने उसका मिश्रण बना दिया, जिस-तिस को उसे दे दिया गया (सेवन करा दिया गया), (तो परिणाम भी) ऐसा-वैसा ही होगा।
* ''दाने तपसि शौर्ये वा विज्ञाने विनये नये ।
: ''विस्मयो नहि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा ॥'' -- चाणक्यनीतिदर्पणः
: दान, तप, शौर्य, विनय और राजनय के क्षेत्र में विस्मय नहीं करना चाहिये। यह धरती बहुत से रत्नों से भरी हुई है।
* ''अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।'' -- गीता
: मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या हूँ;और परस्पर वाद करनेवालों का तत्त्व(सत्य)निर्णय के लिये किया जानेवाला वाद हूँ।
* ''सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायात् मा प्रमद।''
: सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना, स्वाध्याय से प्रमाद मत करना।
* ''तीर्थे तीर्थे निर्मलं ब्रह्मवृन्दं।
: ''वृन्दे वृन्दे तत्त्वचिन्तानुवादः॥
: ''वादे वादे जायते तत्त्वबोधः।
: ''बोधे बोधे भासते चन्द्रचूडः॥'' -- रम्भा-शुक संवाद
: प्रत्येक तीर्थ में निर्मल ब्रह्मणों का संघ है। प्रत्येक संघ में तत्त्व-चिन्तन संवाद चल रहा है।
: संवाद से सत्य का बोध होता है। बोध में शिव का आभास होता है।
* ''एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
: सत्य एक ही है। विप्र लोग इसे अलग-अलग प्रकार से कहते हैं।
* ''इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
: ''यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद॥'' -- ऋग्वेद 10.129.7 (नासदीय सूक्त)
: यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुई इसका मुख्य कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता। इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है। हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उसके अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।
* सत्य का मुख स्वर्ण पात्र से ढका है-- ईशावास्योपनिषद
* ''असतो मा सदगमय
: ''तमसो मा ज्योतिर्गमय
: '' मृत्योर्माऽमृतम गमय।
* ''नेति नेति'' । -- [[उपनिषद]]
: ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है।
* ''अपूर्वः कोऽपि कोषोयं विद्यते तव भारति ।
: ''व्ययतो बृद्धिमायाति क्षयं आयाति संचयात्॥
: हे सरस्वती आपके पास कोई अपूर्व कोष है जो व्यय करने पर बढ़ता है और संचय करने पर घटता है।
* ''युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं बालकादपि ।
: ''अन्यत्तृणवत्त्याज्यं अप्युक्तं पद्मजन्मना॥'' -- योगवासिष्ठ
: कोई युक्तियुक्त (तर्कयुक्त) बात बालक द्वारा भी कही गयी हो तो भी उपादेय (ग्रहण करने योग्य) है। किन्तु कमल से जन्मे (ब्रह्मा) द्वारा कही गयी बात भी यदि अयुक्त हो तो वह तृण के समान त्याज्य है।
* ''इति खो, कालामा, यं तं अवोचुंह एथ तुम्हे, कालामा, मा अनुस्सवेन, मा परम्पराय, मा इतिकिराय, मा पिटकसम्पदानेन, मा तक्कहेतु, मा नयहेतु, मा आकार परिवितक्केन , मा दिट्ठिनिज्झानक्खन्तिया, मा भब्बरूपताय, मा समणो नो गरूति। यदा तुम्हे, कालामा, अत्तनाव जानेय्याथ – इमे धम्मा कुसला, इमे धम्मा सावज्जा, इमे धम्मा विञ्ञुगरहिता, इमे धम्मा समत्ता समादिन्ना अहिताय दुक्खाय संवत्तन्तीsति, अथ तुम्हें, कालामा, पजहेय्याथ।'' -- केसमुत्ति सुत्त, त्रिपिटक
: अर्थ : हे कालामाओ ! ये सब मैंने तुमको बताया है, किन्तु तुम इसे स्वीकार करो, इसलिए नहीं कि वह एक अनुविवरण है, इसलिए नहीं कि एक परम्परा है, इसलिए नहीं कि पहले ऐसे कहा गया है, इसलिए नहीं कि यह धर्मग्रन्थ में है। यह विवाद के लिए नहीं, एक विशेष प्रणाली के लिए नहीं, सावधानी से सोचविचार के लिए नहीं, असत्य धारणाओं को सहन करने के लिए नहीं, इसलिए नहीं कि वह अनुकूल मालूम होता है, इसलिए नहीं कि तुम्हारा गुरु एक प्रमाण है, किन्तु तुम स्वयं यदि यह समझते हो कि ये धर्म (धारणाएँ) शुभ हैं, निर्दोष हैं, बुद्धिमान लोग इन धर्मों की प्रशंसा करते हैं, इन धर्मों को ग्रहण करने पर यह कल्याण और सुख देंगे, तब तुम्हें इन्हें स्वीकर करना चाहिए।
* ''गणिकचिकित्सकतार्किकपौराणिकवास्तुशब्दशास्त्रमर्मज्ञाः।
: ''संगीतादिषु निपुणाः सुलभाः न हि तत्त्ववेत्तारः॥'' -- भट्टारक ज्ञानभूषण, तत्त्वज्ञानतरंगिणी
: गणित, चिकित्सा, तर्क (कुतर्क, वाद-विवाद), पुराण, वास्तु, शब्द और संगीत के शास्त्रों में निपुण लोग तो आसानी से मिल जाते हैं, परन्तु तत्त्व के ज्ञाता पुरुष मिलना बहुत कठिन है।<ref>[https://forum.jinswara.com/uploads/short-url/jkC87OhJkjheA4guE8b2fdEO8XZ.pdf न्यायमन्दिर]</ref>
* ''सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः'' -- तत्त्वार्थसूत्र १-१
: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं।
* ज्ञान ‘वर्धमान वृक्ष’ है। -- अश्वघोष, ‘बुद्धचरित’ में
* उत्तम बिद्या लीजिये जदपि नीच पै होय।
: परौ अपावन ठौर में चन्दन त्यजत न कोय। -- कबीरदास
* जिन बूड़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठि।
: मैं बपुरा बूड़न डरा रहा किनारे बैठि। -- कबीरदास
* हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी।
: आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी॥ -- [[मैथिलीशरण गुप्त]], भारत-भारती में
* भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक काल से संवाद का महत्व है। समाज में संवाद अब बहुत कम बचा है। याज्ञवलक्य और मैत्रेयी के बीच संवाद (बृहदारण्यक उपनिषद) में दो महत्वपूर्ण विचार हैं। याज्ञवल्क्य ने जब अपनी सारी संपत्ति मैत्रेयी को देने की इच्छा व्यक्त की, मैत्रेयी ने कहा, ‘जिन चीजों से मेरी आत्मा में समृद्धि और असीमता नहीं आएगी, उन्हें लेकर मैं क्या करूंगी?’ इसके विपरीत, आज की गैर-रोमांटिक दुनिया ने ‘भौतिक अमीरी और संवेदना की दरिद्रता का युग्म’ चुना है।
* भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक साहित्य के शुनःशेप और नचिकेता जैसे चरित्र हैं। वे भौतिक सुखों की उपेक्षा करके बड़े [[प्रश्न|प्रश्नों]] के साथ जीना चाहते हैं।
* कठोपनिषद का नचिकेता भौतिक सुख-ऐश्वर्य और सत्ता की तरफ से मुंह फेरकर ज्ञान पाना चाहता है। वह मृत्यु के दरवाजे पर खड़ा है, भूखा-प्यासा और नींदें गंवाकर। उसकी जिज्ञासा ही उसका सहाय है।
=== अंग्रेजों के शासन के पहले की भारतीय शिक्षा ===
* ब्राह्मण शिक्षकों ने जिस शिक्षा प्रणाली का विकास किया, वह न केवल साम्राज्यों के पतन और समाज के परिवर्तनों से अप्रभावित रही, वरन् उसने हजारों वर्षों तक उच्च शिक्षा की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा। -- डॉ० एफ० ई० केई (FE. Keay)
* ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ ज्ञान के प्रति प्रेम इतने प्राचीन समय में प्रारम्भ हुआ हो, या जिसने इतना स्थायी ओर शक्तिशली प्रभाव उत्पन्न किया हो, जितना भारत में। -- एफ डब्ल्यु थॉमस
* विद्यारम्भ संस्कार, उपनयन संस्कार के अनेक वर्षों बाद उस समय आरम्भ हुआ, जब वैदिक संस्कृत, जनसाधारण की बोलचाल की भाषा नहीं रह गई थी। -- डॉ० ए० एस० अल्तेकर
* यह संस्कार पाँच वर्ष की आयु में होता था और साधारणतः सब जातियों के बालकों के लिए था। -- डॉ० वेद मित्र, विद्यारम्भ संस्कार के सम्बन्ध में
* ‘प्रेसीडेंसी के सभी गावों में पाठशालाएं हैं’। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६)
* (मद्रास) प्रेसीडेंसी में 12,498 पाठशालाएं हैं, जिन में 1,88,650 विद्यार्थी पढ़ते हैं। -- थॉमस मुनरो की मद्रास प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर रिपोर्ट (१८२२-२६)
* पूरे प्रेसीडेन्सी में मुश्किल से कोई छोटा या बड़ा गाँव होगा जिसमें कम से कम एक विद्यालय न हो। -- जी एल प्रेण्डरगास्ट की बॉम्बे प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति के बारे में रपट, मार्च १८२४
* बंगाल और बिहार में एक लाख के लगभग स्कूल्स हैं। इन दोनों प्रान्तों की जनसंख्या चार करोड़ के बराबर है। अर्थात प्रति 400 व्यक्तियों पर एक शाला है। -- विलियम एडम्स की बंगाल प्रेसीडेन्सी में शिक्षा की स्थिति पर पहली रपट, 1835 से 1838 तक
* भारत में बड़ी अच्छी विकेंद्रित शिक्षा व्यवस्था है। लगभग प्रत्येक गांव की अपनी पाठशाला हैं, जो गांव वाले चलाते हैं। इन पाठशालाओं को जमीनें आवंटित हैं, जिनकी आमदनी से पाठशाला का खर्चा निकलता है। ... ‘इन में से अनेक स्कूलों का स्तर तो हमारे ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के बराबर का है। शिक्षकों को अच्छा वेतन दिया जाता हैं।' -- ब्रिटिश आई सी एस अधिकारी जी. डब्लू. लेटनर "History of Indigenous Education in Punjab : Since Annexation and in 1882" में पंजाब में शिक्ष की स्थिति के बारे में सन १८८२ में
* इस होशियारपुर जिले में साक्षरता की दर 84% है। -- जी. डब्लू. लेटनर, उत्तरी पंजाब के होशियारपुर जिले के बृहद सर्वेक्षण के आधार पर, १८७०-७५
* मालाबार के साहित्य का आधार एक जैसा है और इसमें सभी हिंदू राष्ट्रों (भारत क सभी भागों) की तरह ही शिक्षा-सामग्री शामिल है। शिक्षा हर परिवार में एक प्रारंभिक और महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है। उनकी कई महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है। बच्चों को हिंसा के बिना और विशेष रूप से सरल प्रक्रिया द्वारा शिक्षा दी जाती है। .... शिष्य एक-दूसरे के मॉनिटर हैं और अक्षरों/ अंकों को रेत पर उंगली से लिखा जाता है। -- ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी, अलेक्जेंडर वॉकर (1764 – 1831) अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 263 पर
* ...ब्रिटिश प्रशासक, जब भारत आये, तो चीज़ों को ज्यों का त्यों अपने कब्जे में लेने के बजाय, उन्हें जड़ से उखाड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने जड़ से मिट्टी हटायी और जड़ को देखने लगे, और जड़ को वैसे ही (बिना मिट्टी के) छोड़ दिया। और वह सुन्दर वृक्ष नष्ट हो गया। -- महात्मा गांधी, 20 अक्टूबर, 1931 को चैथम हाउस, लंदन में
* हालाँकि, तेरहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के आरम्भ तक की अवधि के दौरान इतिहास या शिक्षा की स्थिति पर बहुत कम लिखा गया है। -- डॉ [[धरमपाल|धर्मपाल]], 'द ब्युटीफुल ट्री' की प्रस्तावना में
* इस बात पर ज़ोर देना ज़रूरी है कि स्वदेशी शिक्षा पाठशालाओं, मदरसों और गुरुकुलों के माध्यम से दी जाती थी। इन पारंपरिक संस्थानों का कर्यकलाप 'शिक्षा' कहलाता था और इसे सारे लोग वित्तीय सहयोग देकर जीवित रखते थे। यहाँ तक कि उन लोगों से भी सहयोग मिलता था जो स्वयं अशिक्षित थे। इस शिक्षा में प्रज्ञा, शील और समाधि के विचार शामिल थे। वास्तव में ये संस्थाएँ उस कूप के समान थीं जो समाज की जड़ों को सींचने का कार्य करतीं थीं। इसलिए ये संस्थाएँ आजकल के 'स्कूल' की अपेक्षा बहुत बड़ी भूमिका निभातीं थीं। -- 'द ब्युटीफुल ट्री' में
* प्राचीन "गुरुकुल" प्रणाली को अधिक समालोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है और पहला कदम इन गुरुकुलों के इतिहास के रिकार्डों से यह ढूँढना होगा कि उनके क्रियाकलाप क्या-क्या थे। इसके बिना हम प्राचीन गौरव के बारे में ये निरर्थक बातचीत करते रहेंगे और वर्तमान स्कूल प्रणाली को ऐसी दिशा में धकेलते रहेंगे जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि वह कैसी होगी। -- डॉ धर्मपाल, 'द ब्युटीफुल ट्री' में
== भारतीय ज्ञान के बारे में विद्वानों के विचार ==
* यदि मुझसे पूछा जाये कि किस आकाश के नीचे मानवीय मस्तिष्क ने अपने कुछ चुनिन्दा उपहारों को विकसित किया है, जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर गहन विचार किया है और उनके हल निकाले है, तो मैं भारत की तरफ़ इशारा करूँगा। -- [[मैक्स मूलर]]
* भारत हमारी सम्पूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है। भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है, अरबों के रास्ते हमारे अधिकांश गणित की जननी है, बुद्ध के रास्ते इसाईयत मे निहित आदर्शों की जननी है, ग्रामीण समाज के रास्ते स्व-शाशन और लोकतंत्र की जननी है। अनेक प्रकार से भारत माता हम सबकी माता है। -- [[विल्ल डुरन्ट]] , अमरीकी इतिहासकार
* हम भारतीयों के बहुत ऋणी हैं जिन्होने हमे गिनना सिखाया, जिसके बिना कोई भी मूल्यवान वैज्ञानिक खोज सम्भव नही होती। -- [[अलबर्ट आइन्स्टीन]]
* जब यूरोप के लोग भरतीय दर्शन के सम्पर्क में आयेंगे तो उनके विचार और आस्थाएँ बदलेंगी। वे बदले हुवे लोग यूरोप के विचारों और विश्वास को प्रभावित करेंगे। आगे चलकर यूरोप में ही ईसाई-धर्म को संकट उत्पन्न हो जाएगा। -- प्रसिद्ध दार्शनिक आर्थर शापेनहावर
* भारत मानव जाति का पलना है , मानव-भाषा की जन्मस्थली है , इतिहास की जननी है , पौराणिक कथाओं की दादी है, और प्रथाओं की परदादी है। मानव इतिहास की हमारी सबसे कीमती और सबसे ज्ञान-गर्भित सामग्री केवल भारत में ही संचित है। -- [[मार्क ट्वेन]]
* यदि इस धरातल पर कोई स्थान है जहाँ पर जीवित मानव के सभी स्वप्नों को तब से घर मिला हुआ है जब मानव अस्तित्व के सपने देखना आरम्भ किया था , तो वह भारत ही है। -- फ्रान्सीसी विद्वान [[रोमां रोलां]]
* भारत अपनी सीमा के पार एक भी सैनिक भेजे बिना चीन को जीत लिया और लगभग बीस शताब्दियों तक उस पर सांस्कृतिक रूप से राज किया। -- हू शिह , अमेरिका में चीन के भूतपूर्व राजदूत
* वेदों से हम सर्जरी, चिकित्सा, संगीत, घर बनाना, जिसमे यंत्रीकृत कला शामिल है, की व्यवहारिक कला सीखते हैं। वे जीवन के हर एक पहलू , संस्कृति, धर्म, विज्ञान, नैतिकता, कानून, ब्रह्माण्ड विज्ञान और मौसम विज्ञान के विश्वकोश हैं। -- [[विलियम जोन्स]]
* कुछ सन्दर्भों में प्राचीन भारत की न्यायिक प्रणाली सैद्धान्तिक रूप से हमारी आज की न्यायिक प्रणाली से उन्नत थी। -- जॉन डब्ल्यू स्पेलमैन (John W. Spellman)
* जब तक हमारे विद्वान, विचारक और शिक्षाविद संस्कृत से अनभिज्ञ रहेंगे तब तक हमारी सम्पूर्ण संस्कृति, साहित्य और जीवन अपूर्ण बना रहेगा। -- भारत के प्रथम राष्ट्रपति [[राजेन्द्र प्रसाद|डॉ राजेन्द्र प्रसाद]]
* संस्कृत साहित्य का यूरोप पर इतना अधिक बौद्धिक ऋण है कि उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। आने वाले वर्षों में यह ऋण और बढ़ने की सम्भावना है। हम तो अपनी वर्णमाला तक को परिपूर्ण नहीं बना पाए हैं। (प्रोफ मैक्डोनेल)
* संस्कृत में जितनी स्पष्टता और दार्शनिक परिशुद्धता है, उतनी ग्रीक सहित विश्व की किसी भी भाषा में नहीं है। -- Friedrich von Schlegel
* संस्कृत भाषा की प्राचीनता जो भी हो, इसकी संरचना आश्चर्यजनक है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण (दोषरहित) है, लैटिन से अधिक शब्दबहुल है, और इन दोनों की अपेक्षा अधिक उत्कृष्टतापूर्वक परिशोधित है; फिर भी क्रियाओं के मूलों के रूप में और व्याकरण के रूपों में, इसका इन दोनों भाषाओं के साथ बहुत दृढ़ सम्बन्ध दिखता है, जिसके केवल संयोग से उत्पन्न होने की स्म्भावना कम है। इन तीनों में इतना दृढ़ सम्बन्ध है कि इनका विश्लेषण करके कोई भी भाषाशास्त्री इनके समान स्रोत से निकलने के ही निष्कर्ष पर पहुंचेगा। किन्तु वह स्रोत अब शायद बचा नहीं नहीं है। -- [[विलियम जोन्स]]
* भारत हमारी सम्पूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है। भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है, अरबों के रास्ते हमारे अधिकांश गणित की जननी है, बुद्ध के रास्ते इसाईयत मे निहित आदर्शों की जननी है, ग्रामीण समाज के पथ स्व-शाशन और लोकतंत्र की जननी है। अनेक प्रकार से भारत माता हम सबकी माता है। -- [[विल डुरन्ट|विल्ल डुरन्ट]] , अमरीकी इतिहासकार
* संस्कृत न केवल जीवित है बल्कि यह मृत को जीवित करने की औषधि भी है। -- [[सम्पूर्णानन्द]]
* संस्कृत भाषा, देवभाषा है। यह सत्य युग की भाषा है जो वाक् और अर्थ के सत्य और पूर्ण सम्बन्ध पर आधारित है। इसके प्रत्येक स्वर और व्यञ्जन में एक विशेष अन्तर्भूत शक्ति है जो उनकी प्रकृति के कारण है, किसी विकास के कारण या मानव द्वारा चुना हुआ नहीं है। -- [[अरविन्द घोष|श्री अरविन्द]] , ‘Hymns to the Mystic Fire’)
* सभ्यता के इतिहास में, पुनर्जागरण के बाद, अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संस्कृत साहित्य की खोज से बढकर विश्वव्यापी महत्व की कोई दूसरी घटना नहीं घटी है। (आर्थर अन्थोनी मैक्डोनेल्ड)
* जब हम संस्कृत साहित्य पर ध्यान डालते हैं तो अनन्त की संकल्पना हमारे सामने आ जाती है। सबसे लंबा जीवन भी उन कार्यों के अवलोकन के लिए पर्याप्त नहीं होगा जो भारत की सीमा से परे हिमालय की तरह हर देश की विशालतम संरचना से ऊपर उभरे और फूले हुए हैं। -- [[विलियम जोन्स]]
* पाणिनि का व्याकरण, विश्व के व्याकरणों में सर्वश्रेष्ठ है। यह मानव आविष्कार और उद्योग की सबसे शानदार उपलब्धियों में से एक है। -- सर डब्ल्यू हन्टर
* संस्कृत की संरचना की अप्रतिम पारदर्शिता इसे भारत-यूरोपीय परिवार की भाषाओं में प्रथम स्थान का निर्विवाद अधिकार देती है। -- प्रो० ह्विटनी
* संस्कृत, योरप की आधुनिक भाषाओं की जननी है। - M. Dukois
* सभी लोग पाणिनि के व्याकरण को विश्व का सबसे छोटा और पूर्ण व्याकरण स्वीकार करते हैं। -- प्रो० वेबर
* हिन्दुओं के अलावा कोई भी राष्ट्र अभी तक ध्वनिविज्ञान की इतनी उत्तम प्रणाली की खोज नहीं कर सका है। -- प्रो० विल्सन
* संस्कृत के व्यंजनों का विन्यास, मानव प्रतिभा का अद्वितीय उदाहरण है। -- प्रो० थॉम्पसन
* यदि आप इस कठिनाई ([[संस्कृत]] भाषा सीखने की) से पार पाना चाहते हैं तो यह आसान नहीं होगा क्योंकि अरबी भाषा की तरह शब्दों तथा विभक्तियों, दोनों में ही इस भाषा (संस्कृत) की पहुंच बहुत विस्तृत है। इसमें एक ही वस्तु के लिए कई शब्द, मूल तथा व्युत्पन्न, दोनों प्रयुक्त होते हैं और एक ही शब्द का प्रयोग कई वस्तुओं के लिए होता है। -- अलबरूनी, संस्कृत के बारे में, अपनी पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' में
* उस समय बड़ी संख्या में गुरुकुलों के अलावा, बंगाल और बिहार के प्रत्येक जिले में उच्च शिक्षा के लगभग सौ संस्थान भी थे। दुर्भाग्य से, उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान पूरे भारत में ये संख्या तेज़ी से कम हो गई। अंग्रेजों ने यह भी देखा कि व्याकरण, कोश, गणित, आयुर्वेद, तर्कशास्त्र, कानून और दर्शन को पढ़ाने के लिए संस्कृत पुस्तकों का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा था। ....इसके अलावा, भारत में ब्रिटिश शासन के आरम्भिक काल में, ब्रिटिश अधिकारियों ने देखा कि भारत में आम लोगों की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैंड की तुलना में अधिक उन्नत और व्यापक थी। ...[[धरमपाल|धर्मपाल]] के अनुसार, अंग्रेजों ने बाद में इस संस्कृत-आधारित प्रणाली को अपनी अंग्रेजी-आधारित प्रणाली से बदल दिया, जिसका लक्ष्य ब्रिटिश प्रशासन के लिए निम्न-स्तर के क्लर्क तैयार करना था। -- [[राजीव मल्होत्रा]]
* भारत की ज्ञान परम्परा आज तक इतनी समृद्ध है, क्योंकि यह संरक्षण, नवाचार, परिवर्धन और अनुकूलन के चार मूलभूत स्तंभों पर आधारित है। -- [[नरेन्द्र मोदी]]
==इन्हें भी देखें==
*[[भारतीय साहित्य]]
*[[भारतीय गणित]]
*[[आयुर्वेद]]
*[[भारत]]
*[[संस्कृत]]
*[[ज्ञान]]
*[[गुरु]]
*[[शास्त्रार्थ]]
*[[तर्क]]
*[[विद्या]]
*[[पाण्डित्य]]
*[[प्रश्न]]
==सन्दर्भ==
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अस्पृश्यता
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अनुनाद सिंह
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'''अस्पृश्यता''' का शाब्दिक अर्थ है 'न छूने योग्य का विचार' । भारत के [[हिन्दू|हिन्दुओं]] के सन्दर्भ में, यह वह विचार है कि कुछ लोग छूने के योग्य नहीं हैं या उन्हें छूना पाप है। हिन्दी में '''छुआछूत''' का अर्थ है- 'छूने और न छूने योग्य' का विचार। भारतीय समाज में यह कब और कैसे आयी, और कितनी मात्रा में प्रचलित थी, आज इसका सही-सही ज्ञान नहीं है। आधुनिक युग के ही नहीं, सभी कालों के उदारचरित लोग अस्पृश्यता को एक सामाजिक कुरीति मानते रहे हैं।
== उद्धरण ==
* ''अन्नमयादन्नमयमथवा चैतन्यमेव चैतन्यात् ।
: ''द्विजवर दूरीकर्तुं वाञ्छसि किं ब्रूहि गच्छ गच्छेति॥'' -- मनीषापञ्चकम् (आदि शंकर से चाण्डाल का तीक्ष्ण प्रश्न)
: हे आचार्य , 'हटो-हटो' कह कर आप किसे दूर हटाना चाहते हैं ? (मेरे) अन्नमय शरीर से (अपने) अन्नमय शरीर को दूर हटाना चाहते हैं अथवा शरीर में स्थित उस चैतन्य से चैतन्य को दूर करना चाहते हैं? इन शब्दों के द्वारा आप किसे दूर करना चाहते हैं?
* ''किं गंगाम्बुनि बिम्बितेऽम्बरमनौ चण्डालवाटीपयः
: ''पूरे वाऽतरमस्ति काञ्चनघटी मृत्कुम्भयोर्वाम्बरे ।
: ''प्रत्यग्वस्तुनि निस्तरंगसहजानन्दावाबोधाम्बुधौ
: ''विप्रोऽयमं श्वपचोSयमित्यपि महान कोऽयं विभेदभ्रमः॥'' -- चाण्डाल, आदि शंकर से
: भगवान् भास्कर का प्रतिबिम्ब पवित्र गंगाजल में दिखाई दे अथवा घाट पर एकत्रित दूषित जल में, मिट्टी के घड़े में या स्वर्ण कलश में, इन जड़ वस्तुओं के संयोग से भगवान [[सूर्य]] को कोई दोष कैसे स्पर्श कर सकता है ?हे द्विज श्रेष्ठ! जो प्रज्ञानघन है, तरंगों से रहित सिन्धु के समान विक्षेपों से सर्वथा रहित परमानंद स्वरुप है, उसमें चाण्डाल और ब्राह्मण का भेद कैसा ?
* ''जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिषु स्फुटतरा या संविदुज्जृम्भते
: ''या ब्रह्मादि पिपीलिकान्त तनुषु प्रोता जगत्साक्षिणी,
: ''सैवाहं न च दृश्य वस्त्विति दृढ प्रज्ञापि यस्यास्तिचे-
: ''च्चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥'' -- आदि शंकर, मनीषापञ्चकम् में
: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में जो चेतना अपने को अभिव्यक्त कर रही है , जो चेतना ब्रह्मा- विष्णु- शिव आदि देवताओं से लेकर चींटी आदि में भी स्फुरित हो रही है । मैं स्वयं उसी चेतना में ओतप्रोत हूँ ,जिस दृढबुद्धि पुरुष की दृष्टि में सम्पूर्ण विश्व आत्मरूप से प्रकाशित हो रहा है, वह चाहे ब्राह्मण हो अथवा चांडाल हो, वह गुरु है- यह मेरी मनीषा है ।
=== [[स्वामी विवेकानन्द]] ===
* हमारा धर्म रसोईघर में है। हमारा भगवान खाना पकाने के बर्तन में है और हमारा धर्म है— 'मुझे मत छुओ, मैं पवित्र हूँ'। यदि यही सिलसिला एक शताब्दी तक और चला, तो हम सबको पागलखाने में होना पड़ेगा। -- स्वामी विवेकानन्द के पत्र
* गर्व से कहो, 'अज्ञानी भारतीय, ब्राह्मण भारतीय, चांडाल (अछूत) भारतीय, सब मेरे भाई हैं।' ... ऊँचे स्वर में घोषणा करो: 'मैं भारतीय हूँ और प्रत्येक भारतीय मेरा भाई है'। -- स्वामी विवेकानन्द ग्रंथावली, खण्ड ४
=== [[विनायक दामोदर सावरकर]] ===
* हमारे देश और समाज के माथे पर एक कलंक है – अस्पृश्यता । हिन्दू समाज के, धर्म के, राष्ट्र के करोड़ों हिन्दू बन्धु इससे अभिशप्त हैं। जब तक हम ऐसे बनाए हुए हैं, तब तक हमारे शत्रु हमें परस्पर लड़वाकर, विभाजित कर सफल होते रहेंगे। इस घातक बुराई को हमें त्यागना ही होगा।
* हम कुत्ते, भैंस, घोड़े, गधे जैसे पशुओं को छू सकते हैं। सर्प को दूध पिलाते हैं। प्रतिदिन चूहे का रक्त चूसने वाली बिल्ली के साथ बैठकर खाते हैं। तो फिर, हे हिन्दुओं ! अपने ही जैसे इन मनुष्यों को, जो तेरे ही राम और देवताओं के उपासक हैं, अपने ही देशबंधुओं को छूने में तुम्हें किस बात की शर्म आती है?<ref>[https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%95_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0#cite_note-1 राष्ट्रवाद के प्रेरक : वीर सावरकर]</ref>
===[[भीमराव अम्बेडकर]] ===
* वैदिक काल में, और उसके बाद शताब्दियों तक अस्पृश्यता का अस्तित्व नहीं मिलता है। इसका उद्गम बहुत बाद में हुआ और इसका सम्बन्ध [[बौद्ध धर्म]] के बाद परिवर्तनों से पैदा हुई परिस्थितियों से है। भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब बौद्ध धर्म ने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था। देश की जनता और सारा व्यापारी वर्ग बौद्ध धर्म में चला गया था। ब्राह्मणवाद का पतन हो गया था, जो शताब्दियों से राज कर रहा था। बुद्ध ने तीन शिक्षाएं दीं– सामाजिक समानता की, वर्ण व्यवस्था के उन्मूलन की और अहिंसा के सिद्धान्त की, जिसमें धर्म के नाम पर पशु बलि वर्जित थी। उस समय तक ब्राह्मण शाकाहारी नहीं हुए थे, वे गौओं और अन्य पशुओं की बलि देते थे और उनका मांस खाते थे। जब बुद्ध ने बलि का निषेध किया और गाय को कृषि और दूध के लिये उपयोगी पशु बताते हुए उसकी सुरक्षा की शिक्षा दी, तो जनता ने उसे अपना लिया। तब, ब्राह्मणों के सामने शाकाहारी बनने के सिवा कोई चारा नहीं था। अब गाय पवित्र हो गयी थी और उसकी बलि देने की प्रथा समाप्त हो गयी थी। बहुत सारी बुद्ध शिक्षाएं हिंदू धर्म में समाहित कर लीं गयी थीं। जो जनता बौद्ध धर्म में चली गयी थी, वह भी धीरे–धीरे वापिस आने लगी थी। बुद्ध की जो सबसे बड़ी शिक्षा ब्राह्मणों ने स्वीकार नहीं की, वह थी समानता और वर्ण व्यवस्था का उन्मूलन। न तो बुद्ध ने और न ब्राह्मणों ने मृतक पशु के मांस को खाने पर रोक लगायी थी। रोक केवल जीवित गाय का वध करने पर थी। पर, आज के अछूतों का एक बड़ा अपराध यह है कि वे गरीबों में सबसे गरीब और सामाजिक रूप से सबसे निचले स्तर के होने के कारण बौद्ध धर्म में लम्बे समय तक बने रहे और मृतक पशु का मांस खाते रहे। उनको सुधारने के लिये एक बड़ी शक्ति की जरूरत थी, जो उनके लिये लम्बे समय तक काम करती। पर ऐसा कोई काम तो नहीं हुआ, उलटे, सामाजिक बहिष्कार और अस्पृश्यता उन पर लागू कर दी गयी। -- 'दि बाम्बे क्रानिकल’ को दिए गये साक्षात्कार में जो 24 फरवरी 1940 के अंक में प्रकाशित हुआ।
* ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अस्पृश्यों की दयनीय स्थिति से दुखी हो यह चिल्ला कर अपना जी हल्का करते फिरते हैं कि 'हमें अस्पृश्यों के लिए कुछ करना चाहिए।' लेकिन इस समस्या को जो लोग हल करना चाहते हैं, उनमें से शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह कहता हो कि 'हमें स्पृश्य हिंदुओं को बदलने के लिए भी कुछ करना चाहिए।' यह धारणा बनी हुई है कि अगर किसी का सुधार होना है तो वह अस्पृश्यों का ही होना है। अगर कुछ किया जाना है तो वह अस्पृश्यों के प्रति किया जाना है और अगर अस्पृश्यों को सुधार दिया जाए, तब अस्पृश्यता की भावना मिट जाएगी। सवर्णों के बारे में कुछ भी नहीं किया जाना है। उनकी भावनाएँ, आचार- विचार और आदर्श उच्च हैं। वे पूर्ण हैं, उनमें कहीं भी कोई खोट नहीं है। क्या यह धारणा उचित है? यह धारणा उचित हो या अनुचित, लेकिन हिंदू इसमें कोई परिवर्तन नहीं चाहते? उन्हें इस धारणा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे इस बात से आश्वस्त हैं कि वे अस्पृश्यों की समस्या के लिए बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं हैं। -- '''अस्पृश्यता : उसका स्रोत''' नामक लेख में<ref>[https://www.hindisamay.com/content/7755/1/भीमराव-अंबेडकर-विमर्श-अस्पृश्यता---उसका-स्रोत.cspx अस्पृश्यता : उसका-स्रोत]</ref>
=== [[महात्मा गांधी]] ===
* अस्पृश्यता सौ सिरों वाला दैत्य है।
* अस्पृश्यता बुद्धि और सदाचार की विरोधी है।
* अस्पृश्यता, हिन्दू धर्म पर एक कलंक है।
* अस्पृश्यता मानवता के विरुद्ध एक जधन्य अपराध है।
* अस्पृश्यता हिन्दू धर्म के सुन्दर उपवन में उग आये अवांछित घास-पात की तरह है, जो इस तरह फैलती जा रही है कि इसके कारण इस उपवन के सुन्दर फूलों के मुरजाने का खतरा पैदा हो गया है।
* अस्पृश्यता के कारण ही अन्त्यजों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। इन्हें पेट के बल चलना, गांव से बाहर रखना, जूठा भोजन देना, भूमिहिन रखना और मंदिर प्रवेश जैसे कार्यो से वंचित किया जाता रहा है। इसलिए ऐसा धर्म हिन्दू कदापि नहीं हो सकता।
* अस्पृश्यता हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग नहीं है।
* एक स्वस्थ प्रकार की अस्पृश्यता सभी धर्मो में पाई जाती है, वह है स्वच्छता एवं सफाई का नियम । लेकिन भारत में आज जैसी अस्पृश्यता मानी जाती है उसका हिन्दू शास्त्रों में कोई प्रमाण नहीं है।
* अस्पृश्यता की उत्पत्ति कब हुई इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है। मैं भी केवल अनुमान ही लगा सकता हूँ, और वह सच या जूठ भी हो सकता है। लेकिन एक अंधा भी यह देख सकता है कि यह अधर्म है।
* वर्तमान अस्पृश्यता की उत्पत्ति हिन्दू धर्म के क्रमिक विकास की उस अवस्था में आई जब गाय की रक्षा करना हिन्दू धर्म का एक अंग बन गया और गाय को गौ-माता माना जाने लगा। उस काल में सामाजिक नियम बहुत कठोरता से लागू किए जाते थे। उस समय कुछ लोग ऐसे थे, जो अधिक सभ्य नहीं थे और गौ मांस खाते रहे, उन्हें समाज से तिरस्कृत कर दिया गया और वे तब से अस्पृश्य माने जाने लगे। इस कारण यह सामाजिक पाप, पिता से पुत्र को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होता रहा।
* इस प्रथा (अस्पृश्यता) की उत्पत्ति समाज की अवनति के दिनों में कुछ काल के लिए आपद धर्म के रूप में हुई।
* हिन्दू धर्म की अवनति के किसी अवस्था में जब भ्रष्टाचार आ गया और उंच-नीच की भावना ने इसमें प्रवेश करके इसे दूषित बना दिया, तब अस्पृश्यता की उत्पत्ति हुई।
* यह प्रथा हमारे बीच धर्म के नाम पर आई और हिन्दू धर्म में प्रविष्ट कर गई और इसका संबंध घृणा से रहा है। लेकिन इसका मूल आधार धर्म में नहीं है बल्कि उच्चता के झूठे अहंकार ने इसे जन्म दिया है।
* अस्पृश्यता-निवारण या दलितोत्थान के प्रश्न को हल करने के लिए सवर्ण हिन्दुओ की आत्मा को बदलना ही एकमात्र मार्ग है, चाहे सफलता मिलने में कुछ वर्ष क्यों न लग जाए।
* यह रोग ऐसा नहीं है जिसका कोई क़ानूनी इलाज किया जा सके या जिसे संसद के निर्णय से दूर किया जा सके, इसका उपचार तो पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने हृदय को बदलें।
* मैं जिस लक्ष्य को लेकर चल रहा हूँ, वह यह है कि हर सवर्ण हिन्दू अपने हृदय से अस्पृश्यता की भावना को निकाल दें और इस तरह अपना पूर्ण हृदय परिवर्नत करें।
=== आर्य समाज ===
* [[शूद्र]] भी वेद पढ़ सकता है, क्योंकि ईश्वर ने वेदों का प्रकाश सब मनुष्यों के लिए किया है। -- [[सत्यार्थ प्रकाश]], तृतीय समुल्लास
* जैसे ईश्वर ने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और सूर्य आदि पदार्थ सबके लिए बनाए हैं, वैसे ही वेद विद्या भी सबके लिए है। -- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
* यदि हम अपने सात करोड़ भाइयों (अछूतों) को गले नहीं लगाते, तो हमें स्वराज्य मांगने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। -- [[स्वामी श्रद्धानन्द]], भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन (अमृतसर, 1919) के दौरान दिए गए भाषण का अंश
* अस्पृश्यता केवल मानवीय दृष्टि से ही गलत नहीं है, बल्कि यह हमारे धर्म के मूल सिद्धांतों के भी विरुद्ध है। हम एक ओर वेदों की बात करते हैं और दूसरी ओर अपने ही भाइयों को छूने से कतराते हैं, यह पाखंड है। -- [[लाला लाजपत राय]] 'लाला लाजपत राय के लेख एवं भाषण' (The Depressed Classes, 1913)
* सच्चा आर्य वही है जो समाज के गिरे हुए लोगों को उठाकर अपने बराबर खड़ा करे। मानवता की सेवा ही ईश्वर की सबसे बड़ी स्तुति है। -- [[महात्मा हंसराज]], आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा के संबोधन से
* जाति-पाति का वर्तमान स्वरूप वेदों की आज्ञा नहीं, बल्कि स्वार्थ की उपज है। यदि हम जन्म के आधार पर किसी को अछूत मानते हैं, तो हम वेद के उस ऋषि का अपमान कर रहे हैं जिसने 'तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु' का गान किया था। -- पंडित चमूपति, लेख संग्रह
* आर्य समाज का उद्देश्य केवल मूर्ति पूजा छुड़ाना नहीं, बल्कि उस जीवित मूर्ति (मनुष्य) का सम्मान बहाल करना है जिसे समाज ने पैरों तले रौंद दिया है। अछूत कहलाने वाले भाई हमारी ही देह के अंग हैं। -- आर्य जगत (साप्ताहिक पत्रिका) के एक संपादन से
=== अन्य ===
* जब तक समाज में 'ऊंच-नीच' वाली जाति व्यवस्था बनी रहेगी, तब तक छुआछूत का अंत संभव नहीं है। छुआछूत जातिवाद की वह शाखा है जिसे केवल काटकर नहीं फेंका जा सकता, बल्कि हमें उस जातिवाद रूपी वृक्ष की जड़ को ही खोदना होगा। -- संतराम बी.ए. के लेखों का सारांश
* जाति-पाति के किले को केवल अंतरजातीय विवाहों के तोपखानों से ही ढहाया जा सकता है। जब रक्त का मेल होगा, तभी हृदय का मेल संभव है। -- सन्तराम बीए, 'जात-पांत तोड़क मंडल' के घोषणापत्र की प्रस्तावना में
==इन्हें भी देखें==
* [[आर्य समाज]]
* [[भीमराव आम्बेडकर]]
* [[समाज सुधार]]
* [[भारत में जाति प्रथा]]
==सन्दर्भ==
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