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पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/११४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{blockcenter|बिरहा आया दरस को कडुत्रा लागा काम ।
काया लागी काल होय मीठा लागा नाम ॥१६॥
हँस हँस कंत न पाइया जिन पाया तिन रोय ।
हाँसी खेले पिय मिलें कौन दुहागिन होय ॥१६॥
माँस गया पिंजर रहा ताकन लागे काग ।
साहेव आजहुँ न आइया मंद हमारे भाग ॥१६३।।
अँखियाँ प्रेम बसाइया जनि जाने दुखदाय ।
नाम सनेही कारने रो रो रात विताय ।।१६४।।
हवस करै पिय मिलन की औ सुख चाहै अंग ।
पीर सहे विनु पदमिनी पूत न लेत उछंग ।।१६५।।
विहिन अोदी लाकड़ी सपचे औ धुंधुप्राय ।
छूट पड़ों या विरह से जो सगरो जरि जाय ॥१६६।।
परवत परवत मैं फिरी नैन गँवायो रोय ।
सो वूटी पाई नहीं जाते जीवन होय ॥ १६७ ॥
हिरदे भीतर दव वलै धुआँ न परगट होय ।
जाके लागी सो लखै की जिन लाई सोय ॥१६८।।
सवही तरु तर जाइके सव फल लीन्हो चीख ।
फिरि-फिरि माँगत कविर है दरसन ही की भीख ॥१६९॥
पिय विन जियतरसत रहै पल पल विरह सताय ।
रैन दिवस मोहिं कल नहीं सिसकसिलक जियजाय ॥१७०
साँई सेवत जल गई मास न रहिया देह ।
साँई जब लगि सेइहों यह तन होय न बह ।।१७।।
विरहा विरहा मत कहो विरहा है मुल्तान ।
जा घट विरह न संचरै सो घट जान मसान ॥१७॥
देखत देखत दिन गया निस भी देखत जाय ।
विरहिन पिव पात्र नहीं केवल जिय घबराय ॥१७३॥
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<noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{block center|<poem>बिरहा आया दरस को कडुत्रा लागा काम ।
काया लागी काल होय मीठा लागा नाम ॥१६॥
हँस हँस कंत न पाइया जिन पाया तिन रोय ।
हाँसी खेले पिय मिलें कौन दुहागिन होय ॥१६॥
माँस गया पिंजर रहा ताकन लागे काग ।
साहेव आजहुँ न आइया मंद हमारे भाग ॥१६३।।
अँखियाँ प्रेम बसाइया जनि जाने दुखदाय ।
नाम सनेही कारने रो रो रात विताय ।।१६४।।
हवस करै पिय मिलन की औ सुख चाहै अंग ।
पीर सहे विनु पदमिनी पूत न लेत उछंग ।।१६५।।
विहिन अोदी लाकड़ी सपचे औ धुंधुप्राय ।
छूट पड़ों या विरह से जो सगरो जरि जाय ॥१६६।।
परवत परवत मैं फिरी नैन गँवायो रोय ।
सो वूटी पाई नहीं जाते जीवन होय ॥ १६७ ॥
हिरदे भीतर दव वलै धुआँ न परगट होय ।
जाके लागी सो लखै की जिन लाई सोय ॥१६८।।
सवही तरु तर जाइके सव फल लीन्हो चीख ।
फिरि-फिरि माँगत कविर है दरसन ही की भीख ॥१६९॥
पिय विन जियतरसत रहै पल पल विरह सताय ।
रैन दिवस मोहिं कल नहीं सिसकसिलक जियजाय ॥१७०
साँई सेवत जल गई मास न रहिया देह ।
साँई जब लगि सेइहों यह तन होय न बह ।।१७।।
विरहा विरहा मत कहो विरहा है मुल्तान ।
जा घट विरह न संचरै सो घट जान मसान ॥१७॥
देखत देखत दिन गया निस भी देखत जाय ।
विरहिन पिव पात्र नहीं केवल जिय घबराय ॥१७३॥
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<noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{block center|<poem>बिरहा आया दरस को कडुत्रा लागा काम ।
काया लागी काल होय मीठा लागा नाम ॥१६१॥
हँस हँस कंत न पाइया जिन पाया तिन रोय ।
हाँसी खेले पिय मिलें कौन दुहागिन होय ॥१६२॥
माँस गया पिंजर रहा ताकन लागे काग ।
साहेव आजहुँ न आइया मंद हमारे भाग ॥१६३।।
अँखियाँ प्रेम बसाइया जनि जाने दुखदाय ।
नाम सनेही कारने रो रो रात विताय ॥१६४॥
हवस करै पिय मिलन की औ सुख चाहै अंग ।
पीर सहे विनु पदमिनी पूत न लेत उछंग ॥१६५॥
विहिन अोदी लाकड़ी सपचे औ धुंधुप्राय ।
छूट पड़ों या विरह से जो सगरो जरि जाय ॥१६६।।
परवत परवत मैं फिरी नैन गँवायो रोय ।
सो वूटी पाई नहीं जाते जीवन होय ॥ १६७ ॥
हिरदे भीतर दव वलै धुआँ न परगट होय ।
जाके लागी सो लखै की जिन लाई सोय ॥१६८।।
सवही तरु तर जाइके सव फल लीन्हो चीख ।
फिरि-फिरि माँगत कविर है दरसन ही की भीख ॥१६९॥
पिय विन जियतरसत रहै पल पल विरह सताय ।
रैन दिवस मोहिं कल नहीं सिसकसिलक जियजाय ॥१७०॥
साँई सेवत जल गई मास न रहिया देह ।
साँई जब लगि सेइहों यह तन होय न बह ।।१७।।
विरहा विरहा मत कहो विरहा है मुल्तान ।
जा घट विरह न संचरै सो घट जान मसान ॥१७॥
देखत देखत दिन गया निस भी देखत जाय ।
विरहिन पिव पात्र नहीं केवल जिय घबराय ॥१७३॥
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