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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>उपदेशनिरत थे । जन-साधारण के सम्मुख वे मुझे उस समय
दिखलाई पड़ते हैं, जब उनको सुध बुध हो गई थी और जब
वे तिलक इत्यादि लगाकर राम नाम जपने में लीन हो रहे
थे। यह भी लिखा मिलता है कि इसी समय उनसे कहा गया
कि तुम निगुरे हो; इसलिये जब तक तुम कोई गुरु न कर
लोगे, तब तक तिलक मुद्रा देने अथवा राम राम जपने से
पूरे फल की प्राप्ति न होगी। यह एक हिंदू विचार है। इसमें
एक अच्छे पथ-प्रदर्शक से अभिलषित मार्ग में सहायता ग्रहण
करने के सिद्धांत की ओर संकेत है। कथन है कि कबीर
साहब पर लोगों के इस कहने का प्रभाव पड़ा और उन्हें
गुरु करने की आवश्यकता समझ पड़ी। ये बातें भो यही
प्रकट करती हैं कि जिस काल की ये घटनाएँ हैं, उस
समय कबीर सुबोध हो चुके थे और बाल्यावस्था उत्तीर्ण
हो गई थी ।
<center>{{x-larger|'''मंत्र-ग्रहण'''}}</center>
कबीर साहब हिंदू थे या मुसल्मान, वे स्वामी रामानंद
जी के शिष्य वैष्णव थे, या किसी मुसल्मान फ़कीर के चेले
सूफी, इस विषय में "कबीर ऐंड दी कबीर पंथ” के दूसरे
अध्याय में उसके विद्वान् रचयिता ने एक अच्छी विवेचना की
है। मैं उनके कुल विचारों को यहाँ नहीं उठा सकता; परन्तु
उनके मुख्य स्थानों को उठाऊँगा और इस बात की मीमांसा
करूँगा कि उनके विचार कहाँ तक युक्तिसंगत हैं।
उक्त ग्रंथ के २५-२६ पृष्ठ में एक स्थान पर उन्होंने लिखा है-
"ख़जीनतुल अस्फिया” में कहा गया है कि “शेख
१-यह पुस्तक मौलवी गुलाम सर्वर की बनाई हुई है और
१८६८ ई० में लाहौर में छपी थी ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१८
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>( १२ )
विद्वान् हिंदू महात्मा के सत्संग द्वारा ज्ञानार्जन किया था;
और स्वामी रामानंद के अतिरिक्त उस समय ऐसा महात्मा
कोई दूसरा नहीं था ।
एक बात और है। वह यह कि हम उनके प्रमाणिक ग्रंथों
में कहीं कहीं ऐसा वाक्य पाते हैं, जो उनको हिंदुओं का
पक्षपाती बनाते हैं या मुसल्मान जाति पर उनकी घृणा प्रकट
करते हैं, और जिन्हें मुसल्मान धर्माचार्य्य का शिष्य कभी कथन
नहीं कर सकता। नीचे के पदों को पढ़िए-
"सुनत कराय तुरुक जो होना, औरत को का कहिए ।
अरध शरीरी नारि बखाने, ताते हिंदू रहिए॥”
कबोर बीजक, पृष्ठ ३६३, शब्द ८४
कितो मनावै पायँ परि, कितो मनावें रोइ ।
हिंदू पूजें देवता, तुरूक न काहुक होइ ।।
साखी १८७, कबीर बीजक, पृष्ठ ५९३
मैंने अब तक जो कुछ कहा, उससे इसी सिद्धांत पर उप-नीत
होना पढ़ता है कि कबीर साहब स्वामी रामानंद के शिष्य
थे; किंतु उनके मंत्रग्रहण की वार्त्ता से मैं सहमत नहीं हूँ।
भक्तमाल और उसी के अनुसार दूसरे ग्रंथों में लिखा हुआ
है कि गुरु करने की इच्छा उदित होने पर कबीर साहब ने
स्वामी रामानंद को गुरु करना विचारा; किंतु यवन होने के
कारण वे स्वामी रामानंद जी तक नहीं पहुँच सकते थे;
अतएव उनसे मंत्र ग्रहण करने के लिये उन्होंने दूसरी युक्ति
निकाली । स्वामी रामानंद शेष रात्रि में गंगा स्नान के लिये
नित्य मणिकर्णिका घाट पर जाया करते थे। एक दिन उसी
समय कबीर साहब घाट की सीढ़ियों में जाकर पड़ रहे । जब
स्वामी जी आए, तब सीढ़ियों से उतरते समय उनका पाँव
कबीर साहब पर पड़ा। वे कुलबुलाए । स्वामी जी ने जाना<noinclude></noinclude>
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>( १२ )
विद्वान् हिंदू महात्मा के सत्संग द्वारा ज्ञानार्जन किया था;
और स्वामी रामानंद के अतिरिक्त उस समय ऐसा महात्मा
कोई दूसरा नहीं था ।
एक बात और है। वह यह कि हम उनके प्रमाणिक ग्रंथों
में कहीं कहीं ऐसा वाक्य पाते हैं, जो उनको हिंदुओं का
पक्षपाती बनाते हैं या मुसल्मान जाति पर उनकी घृणा प्रकट
करते हैं, और जिन्हें मुसल्मान धर्माचार्य्य का शिष्य कभी कथन
नहीं कर सकता। नीचे के पदों को पढ़िए-
"सुनत कराय तुरुक जो होना, औरत को का कहिए ।
अरध शरीरी नारि बखाने, ताते हिंदू रहिए॥”
कबोर बीजक, पृष्ठ ३६३, शब्द ८४
कितो मनावै पायँ परि, कितो मनावें रोइ ।
हिंदू पूजें देवता, तुरूक न काहुक होइ ।।
कबीर बीजक, साखी १८७, पृष्ठ ५९३
मैंने अब तक जो कुछ कहा, उससे इसी सिद्धांत पर उप-नीत
होना पढ़ता है कि कबीर साहब स्वामी रामानंद के शिष्य
थे; किंतु उनके मंत्रग्रहण की वार्त्ता से मैं सहमत नहीं हूँ।
भक्तमाल और उसी के अनुसार दूसरे ग्रंथों में लिखा हुआ
है कि गुरु करने की इच्छा उदित होने पर कबीर साहब ने
स्वामी रामानंद को गुरु करना विचारा; किंतु यवन होने के
कारण वे स्वामी रामानंद जी तक नहीं पहुँच सकते थे;
अतएव उनसे मंत्र ग्रहण करने के लिये उन्होंने दूसरी युक्ति
निकाली । स्वामी रामानंद शेष रात्रि में गंगा स्नान के लिये
नित्य मणिकर्णिका घाट पर जाया करते थे। एक दिन उसी
समय कबीर साहब घाट की सीढ़ियों में जाकर पड़ रहे । जब
स्वामी जी आए, तब सीढ़ियों से उतरते समय उनका पाँव
कबीर साहब पर पड़ा। वे कुलबुलाए । स्वामी जी ने जाना<noinclude></noinclude>
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>( १२ )
विद्वान् हिंदू महात्मा के सत्संग द्वारा ज्ञानार्जन किया था;
और स्वामी रामानंद के अतिरिक्त उस समय ऐसा महात्मा
कोई दूसरा नहीं था ।
एक बात और है। वह यह कि हम उनके प्रमाणिक ग्रंथों
में कहीं कहीं ऐसा वाक्य पाते हैं, जो उनको हिंदुओं का
पक्षपाती बनाते हैं या मुसल्मान जाति पर उनकी घृणा प्रकट
करते हैं, और जिन्हें मुसल्मान धर्माचार्य्य का शिष्य कभी कथन
नहीं कर सकता। नीचे के पदों को पढ़िए-
"सुनत कराय तुरुक जो होना, औरत को का कहिए ।
अरध शरीरी नारि बखाने, ताते हिंदू रहिए॥”
{{right|कबोर बीजक, पृष्ठ ३६३, शब्द ८४}}
कितो मनावै पायँ परि, कितो मनावें रोइ ।
हिंदू पूजें देवता, तुरूक न काहुक होइ ।।
{{right|कबीर बीजक, साखी १८७, पृष्ठ ५९३ }}
मैंने अब तक जो कुछ कहा, उससे इसी सिद्धांत पर उप-नीत
होना पढ़ता है कि कबीर साहब स्वामी रामानंद के शिष्य
थे; किंतु उनके मंत्रग्रहण की वार्त्ता से मैं सहमत नहीं हूँ।
भक्तमाल और उसी के अनुसार दूसरे ग्रंथों में लिखा हुआ
है कि गुरु करने की इच्छा उदित होने पर कबीर साहब ने
स्वामी रामानंद को गुरु करना विचारा; किंतु यवन होने के
कारण वे स्वामी रामानंद जी तक नहीं पहुँच सकते थे;
अतएव उनसे मंत्र ग्रहण करने के लिये उन्होंने दूसरी युक्ति
निकाली । स्वामी रामानंद शेष रात्रि में गंगा स्नान के लिये
नित्य मणिकर्णिका घाट पर जाया करते थे। एक दिन उसी
समय कबीर साहब घाट की सीढ़ियों में जाकर पड़ रहे । जब
स्वामी जी आए, तब सीढ़ियों से उतरते समय उनका पाँव
कबीर साहब पर पड़ा। वे कुलबुलाए । स्वामी जी ने जाना<noinclude></noinclude>
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( १२ )}}
विद्वान् हिंदू महात्मा के सत्संग द्वारा ज्ञानार्जन किया था;
और स्वामी रामानंद के अतिरिक्त उस समय ऐसा महात्मा
कोई दूसरा नहीं था ।
एक बात और है। वह यह कि हम उनके प्रमाणिक ग्रंथों
में कहीं कहीं ऐसा वाक्य पाते हैं, जो उनको हिंदुओं का
पक्षपाती बनाते हैं या मुसल्मान जाति पर उनकी घृणा प्रकट
करते हैं, और जिन्हें मुसल्मान धर्माचार्य्य का शिष्य कभी कथन
नहीं कर सकता। नीचे के पदों को पढ़िए-
"सुनत कराय तुरुक जो होना, औरत को का कहिए ।
अरध शरीरी नारि बखाने, ताते हिंदू रहिए॥”
{{right|कबोर बीजक, पृष्ठ ३६३, शब्द ८४}}
कितो मनावै पायँ परि, कितो मनावें रोइ ।
हिंदू पूजें देवता, तुरूक न काहुक होइ ।।
{{right|कबीर बीजक, साखी १८७, पृष्ठ ५९३ }}
मैंने अब तक जो कुछ कहा, उससे इसी सिद्धांत पर उप-नीत
होना पढ़ता है कि कबीर साहब स्वामी रामानंद के शिष्य
थे; किंतु उनके मंत्रग्रहण की वार्त्ता से मैं सहमत नहीं हूँ।
भक्तमाल और उसी के अनुसार दूसरे ग्रंथों में लिखा हुआ
है कि गुरु करने की इच्छा उदित होने पर कबीर साहब ने
स्वामी रामानंद को गुरु करना विचारा; किंतु यवन होने के
कारण वे स्वामी रामानंद जी तक नहीं पहुँच सकते थे;
अतएव उनसे मंत्र ग्रहण करने के लिये उन्होंने दूसरी युक्ति
निकाली । स्वामी रामानंद शेष रात्रि में गंगा स्नान के लिये
नित्य मणिकर्णिका घाट पर जाया करते थे। एक दिन उसी
समय कबीर साहब घाट की सीढ़ियों में जाकर पड़ रहे । जब
स्वामी जी आए, तब सीढ़ियों से उतरते समय उनका पाँव
कबीर साहब पर पड़ा। वे कुलबुलाए । स्वामी जी ने जाना<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/२०
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>( १४ )
सोचते हैं, प्रवहमान मरुत्, सुशीतल जल, और सूर्य्यदेव की
ज्योतिर्माला तुल्य भगवद्भक्ति पर प्रत्येक मानव का समान
अधिकार है। भारतवर्ष के उत्तर काल में वे पहले महात्मा
हैं, जो नितांत उदार हृदय लेकर सामने आते हैं और उसी
सहृदयता से जाट, नाई, जोलाहे और चमार को अंक में
ग्रहण करते हैं, जिस प्यार से किसी सजातीय ब्राह्मण बालक
को वे हृदय से लगाते हैं। आँख उठाकर देखिए, किस की
शिष्यमंडली में एक साथ इतने महात्मा और मतप्रवर्त्तक हुए
जितने कि इस महानुभाव के सदुपदेश-आलोक से आलोकित
सत्पुरुषों में पाए जाते हैं। जब इस महात्मा की पूत कार्या-वली
पर दृष्टि डालते हैं, और फिर सुनते हैं कि उनके सन्नि-कट
कोई मनुष्य जोलाहा होने के कारण नहीं पहुँच सका, तो
हृदय को बड़ी व्यथा होती है। यदि रैदास चमार उनके द्वारा
अंगीकृत हुआ तो कबीर जोलाहा कैसे तिरस्कृत हो सकता
था ? वास्तविक बात यह है कि इन कथाओं के गढ़नेवाले
संकुचित विचार के कतिपय वे ही अदूरदर्शी जन हैं, जिनके
अविवेक से प्रति दिन हिंदू समाज का ह्रास हो रहा है। मुझे
इन कथाओं का स्वीकार करना युक्तिसंगत नहीं ज्ञात होता।
मैं महसिन फ़नी के इस विचार से सहमत हूँ कि "आध्या-त्मिक
पथप्रदर्शक मिले, इस इच्छा से कबीर साहब हिंदू
साधुओं एवं मुसल्मान फ़कीरों दोनों के पास गए और अंत
में स्वामी रामानंद के शिष्य हुए।"
जो लोग मणिकर्णिकाघाट की घटना ही को सत्य मानते
हैं, उनसे में कोई विवाद नहीं करना चाहता; किंतु इतनी
विनीत प्रार्थना अवश्य करता हूँ कि इस घटना को लक्ष्य कर
जो मनीषी स्फीतवक्ष से "पुनंतु मां ब्राह्मण-पादरेणवः” वाक्य
पर गर्व करते हैं, उनकी मनीषिता केवल गर्व करने में ही पर्य्य-<noinclude></noinclude>
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चाहर धर्मेंद्र
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<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( १४ )}}
{{block center|<poem>
सोचते हैं, प्रवहमान मरुत्, सुशीतल जल, और सूर्य्यदेव की
ज्योतिर्माला तुल्य भगवद्भक्ति पर प्रत्येक मानव का समान
अधिकार है। भारतवर्ष के उत्तर काल में वे पहले महात्मा
हैं, जो नितांत उदार हृदय लेकर सामने आते हैं और उसी
सहृदयता से जाट, नाई, जोलाहे और चमार को अंक में
ग्रहण करते हैं, जिस प्यार से किसी सजातीय ब्राह्मण बालक
को वे हृदय से लगाते हैं। आँख उठाकर देखिए, किस की
शिष्यमंडली में एक साथ इतने महात्मा और मतप्रवर्त्तक हुए
जितने कि इस महानुभाव के सदुपदेश-आलोक से आलोकित
सत्पुरुषों में पाए जाते हैं। जब इस महात्मा की पूत कार्या-वली
पर दृष्टि डालते हैं, और फिर सुनते हैं कि उनके सन्नि-कट
कोई मनुष्य जोलाहा होने के कारण नहीं पहुँच सका, तो
हृदय को बड़ी व्यथा होती है। यदि रैदास चमार उनके द्वारा
अंगीकृत हुआ तो कबीर जोलाहा कैसे तिरस्कृत हो सकता
था ? वास्तविक बात यह है कि इन कथाओं के गढ़नेवाले
संकुचित विचार के कतिपय वे ही अदूरदर्शी जन हैं, जिनके
अविवेक से प्रति दिन हिंदू समाज का ह्रास हो रहा है। मुझे
इन कथाओं का स्वीकार करना युक्तिसंगत नहीं ज्ञात होता।
मैं महसिन फ़नी के इस विचार से सहमत हूँ कि "आध्या-त्मिक
पथप्रदर्शक मिले, इस इच्छा से कबीर साहब हिंदू
साधुओं एवं मुसल्मान फ़कीरों दोनों के पास गए और अंत
में स्वामी रामानंद के शिष्य हुए।"
जो लोग मणिकर्णिकाघाट की घटना ही को सत्य मानते
हैं, उनसे में कोई विवाद नहीं करना चाहता; किंतु इतनी
विनीत प्रार्थना अवश्य करता हूँ कि इस घटना को लक्ष्य कर
जो मनीषी स्फीतवक्ष से "पुनंतु मां ब्राह्मण-पादरेणवः” वाक्य
पर गर्व करते हैं, उनकी मनीषिता केवल गर्व करने में ही पर्य्य-</poem>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/२२
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>(१६)
मिलते हैं कि 'हम घर सूत तनहिं नित ताना' इत्यादि जिनसे
उनका यही व्यवसाय करके अपना जीवन बिताना सिद्ध
होता है। इस विषय में उनका एक बड़ा सुंदर शब्द है; उसे
नीचे लिखता हूँ-
मुसि मुसि रोवै कबीर की माय,
ए बालक कैसे जीवहिं रघुराय ।
तनना बुनना सब तज्यो है कबीर,
हरि का नाम लिखि लियो शरीर ।
जब लग तागा बाहउँ बेही,
तब लग बिसरै राम सनेही ।
ओछी मति मेरी जाति जोलाहा,
हरि का नाम लह्यों मैं लाहा ।
कहत कबीर सुनहु मेरी माई,
हमारा इनका दाता एक रघुराई ।
{{right|आदि ग्रंथ, पृष्ठ २८५}}
किंतु इनके विवाह और संतानोत्पत्ति के विषय में मतांतर
है। कबीरपंथ के विद्वान् कहते हैं कि लोई नाम की स्त्री उनके
साथ आजन्म रही, परंतु उससे उन्होंने विवाह नहीं किया।
इसी प्रकार कमाल उनके पुत्र और कमाली उनकी पुत्री के
विषय में भी वे लोग विचित्र बातें कहते हैं। उनका कथन है
कि ये दोनों अन्य की संतान थे, जो मृतक हो जाने के कारण
त्याग दिए गए थे; परंतु कबीर साहब ने उनको पुनः जिलाया
और पाला; इसी लिये ये दोनों उनकी संतान करके प्रख्यात
हुए। यह कदाचित् वे लोग इसलिये कहते हैं कि कबीर साहब
ने स्त्री संग को बुरा कहा है। यथा-
नारि नसावै तीन गुन, जो नर पासे होय ।
भक्ति मुक्ति निज ध्यान में, पैठि सकै नहिं कोय ॥<noinclude></noinclude>
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>(१६)
मिलते हैं कि 'हम घर सूत तनहिं नित ताना' इत्यादि जिनसे
उनका यही व्यवसाय करके अपना जीवन बिताना सिद्ध
होता है। इस विषय में उनका एक बड़ा सुंदर शब्द है; उसे
नीचे लिखता हूँ-
मुसि मुसि रोवै कबीर की माय,
ए बालक कैसे जीवहिं रघुराय ।
तनना बुनना सब तज्यो है कबीर,
हरि का नाम लिखि लियो शरीर ।
जब लग तागा बाहउँ बेही,
तब लग बिसरै राम सनेही ।
ओछी मति मेरी जाति जोलाहा,
हरि का नाम लह्यों मैं लाहा ।
कहत कबीर सुनहु मेरी माई,
हमारा इनका दाता एक रघुराई ।
{{right|आदि ग्रंथ, पृष्ठ २८५}}
किंतु इनके विवाह और संतानोत्पत्ति के विषय में मतांतर
है। कबीरपंथ के विद्वान् कहते हैं कि लोई नाम की स्त्री उनके
साथ आजन्म रही, परंतु उससे उन्होंने विवाह नहीं किया।
इसी प्रकार कमाल उनके पुत्र और कमाली उनकी पुत्री के
विषय में भी वे लोग विचित्र बातें कहते हैं। उनका कथन है
कि ये दोनों अन्य की संतान थे, जो मृतक हो जाने के कारण
त्याग दिए गए थे; परंतु कबीर साहब ने उनको पुनः जिलाया
और पाला; इसी लिये ये दोनों उनकी संतान करके प्रख्यात
हुए। यह कदाचित् वे लोग इसलिये कहते हैं कि कबीर साहब
ने स्त्री संग को बुरा कहा है। यथा-
नारि नसावै तीन गुन, जो नर पासे होय ।
भक्ति मुक्ति निज ध्यान में, पैठि सकै नहिं कोय ॥<noinclude></noinclude>
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>(१६)
मिलते हैं कि 'हम घर सूत तनहिं नित ताना' इत्यादि जिनसे
उनका यही व्यवसाय करके अपना जीवन बिताना सिद्ध
होता है। इस विषय में उनका एक बड़ा सुंदर शब्द है; उसे
नीचे लिखता हूँ-
मुसि मुसि रोवै कबीर की माय,
ए बालक कैसे जीवहिं रघुराय ।
तनना बुनना सब तज्यो है कबीर,
हरि का नाम लिखि लियो शरीर ।
जब लग तागा बाहउँ बेही,
तब लग बिसरै राम सनेही ।
ओछी मति मेरी जाति जोलाहा,
हरि का नाम लह्यों मैं लाहा ।
कहत कबीर सुनहु मेरी माई,
हमारा इनका दाता एक रघुराई ।
{{right|आदि ग्रंथ, पृष्ठ २८५}}
किंतु इनके विवाह और संतानोत्पत्ति के विषय में मतांतर
है। कबीरपंथ के विद्वान् कहते हैं कि लोई नाम की स्त्री उनके
साथ आजन्म रही, परंतु उससे उन्होंने विवाह नहीं किया।
इसी प्रकार कमाल उनके पुत्र और कमाली उनकी पुत्री के
विषय में भी वे लोग विचित्र बातें कहते हैं। उनका कथन है
कि ये दोनों अन्य की संतान थे, जो मृतक हो जाने के कारण
त्याग दिए गए थे; परंतु कबीर साहब ने उनको पुनः जिलाया
और पाला; इसी लिये ये दोनों उनकी संतान करके प्रख्यात
हुए। यह कदाचित् वे लोग इसलिये कहते हैं कि कबीर साहब
ने स्त्री संग को बुरा कहा है। यथा-
नारि नसावै तीन गुन, जो नर पासे होय ।
भक्ति मुक्ति निज ध्यान में, पैठि सकै नहिं कोय ॥<noinclude></noinclude>
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>(१६)
मिलते हैं कि 'हम घर सूत तनहिं नित ताना' इत्यादि जिनसे
उनका यही व्यवसाय करके अपना जीवन बिताना सिद्ध
होता है। इस विषय में उनका एक बड़ा सुंदर शब्द है; उसे
नीचे लिखता हूँ-
{{c|मुसि मुसि रोवै कबीर की माय,
ए बालक कैसे जीवहिं रघुराय ।
तनना बुनना सब तज्यो है कबीर,
हरि का नाम लिखि लियो शरीर ।
जब लग तागा बाहउँ बेही,
तब लग बिसरै राम सनेही ।
ओछी मति मेरी जाति जोलाहा,
हरि का नाम लह्यों मैं लाहा ।
कहत कबीर सुनहु मेरी माई,
हमारा इनका दाता एक रघुराई ।}}
{{right|आदि ग्रंथ, पृष्ठ २८५}}
किंतु इनके विवाह और संतानोत्पत्ति के विषय में मतांतर
है। कबीरपंथ के विद्वान् कहते हैं कि लोई नाम की स्त्री उनके
साथ आजन्म रही, परंतु उससे उन्होंने विवाह नहीं किया।
इसी प्रकार कमाल उनके पुत्र और कमाली उनकी पुत्री के
विषय में भी वे लोग विचित्र बातें कहते हैं। उनका कथन है
कि ये दोनों अन्य की संतान थे, जो मृतक हो जाने के कारण
त्याग दिए गए थे; परंतु कबीर साहब ने उनको पुनः जिलाया
और पाला; इसी लिये ये दोनों उनकी संतान करके प्रख्यात
हुए। यह कदाचित् वे लोग इसलिये कहते हैं कि कबीर साहब
ने स्त्री संग को बुरा कहा है। यथा-
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भक्ति मुक्ति निज ध्यान में, पैठि सकै नहिं कोय ॥}}<noinclude></noinclude>
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>(१६)
<poem>
मिलते हैं कि 'हम घर सूत तनहिं नित ताना' इत्यादि जिनसे
उनका यही व्यवसाय करके अपना जीवन बिताना सिद्ध
होता है। इस विषय में उनका एक बड़ा सुंदर शब्द है; उसे
</poem>
नीचे लिखता हूँ-
{{c|मुसि मुसि रोवै कबीर की माय,
ए बालक कैसे जीवहिं रघुराय ।
तनना बुनना सब तज्यो है कबीर,
हरि का नाम लिखि लियो शरीर ।
जब लग तागा बाहउँ बेही,
तब लग बिसरै राम सनेही ।
ओछी मति मेरी जाति जोलाहा,
हरि का नाम लह्यों मैं लाहा ।
कहत कबीर सुनहु मेरी माई,
हमारा इनका दाता एक रघुराई ।}}
{{right|आदि ग्रंथ, पृष्ठ २८५}}
<poem>
किंतु इनके विवाह और संतानोत्पत्ति के विषय में मतांतर
है। कबीरपंथ के विद्वान् कहते हैं कि लोई नाम की स्त्री उनके
साथ आजन्म रही, परंतु उससे उन्होंने विवाह नहीं किया।
इसी प्रकार कमाल उनके पुत्र और कमाली उनकी पुत्री के
विषय में भी वे लोग विचित्र बातें कहते हैं। उनका कथन है
कि ये दोनों अन्य की संतान थे, जो मृतक हो जाने के कारण
त्याग दिए गए थे; परंतु कबीर साहब ने उनको पुनः जिलाया
और पाला; इसी लिये ये दोनों उनकी संतान करके प्रख्यात
हुए। यह कदाचित् वे लोग इसलिये कहते हैं कि कबीर साहब
ने स्त्री संग को बुरा कहा है। यथा-
</poem>
{{c|नारि नसावै तीन गुन, जो नर पासे होय ।
भक्ति मुक्ति निज ध्यान में, पैठि सकै नहिं कोय ॥}}<noinclude></noinclude>
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662579
662578
2026-03-30T14:45:24Z
चाहर धर्मेंद्र
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>(१६)
<poem>
मिलते हैं कि 'हम घर सूत तनहिं नित ताना' इत्यादि जिनसे
उनका यही व्यवसाय करके अपना जीवन बिताना सिद्ध
होता है। इस विषय में उनका एक बड़ा सुंदर शब्द है; उसे
</poem>
नीचे लिखता हूँ-
<poem>
{{c|मुसि मुसि रोवै कबीर की माय,
ए बालक कैसे जीवहिं रघुराय ।
तनना बुनना सब तज्यो है कबीर,
हरि का नाम लिखि लियो शरीर ।
जब लग तागा बाहउँ बेही,
तब लग बिसरै राम सनेही ।
ओछी मति मेरी जाति जोलाहा,
हरि का नाम लह्यों मैं लाहा ।
कहत कबीर सुनहु मेरी माई,
हमारा इनका दाता एक रघुराई ।}}
</poem>
{{right|आदि ग्रंथ, पृष्ठ २८५}}
<poem>
किंतु इनके विवाह और संतानोत्पत्ति के विषय में मतांतर
है। कबीरपंथ के विद्वान् कहते हैं कि लोई नाम की स्त्री उनके
साथ आजन्म रही, परंतु उससे उन्होंने विवाह नहीं किया।
इसी प्रकार कमाल उनके पुत्र और कमाली उनकी पुत्री के
विषय में भी वे लोग विचित्र बातें कहते हैं। उनका कथन है
कि ये दोनों अन्य की संतान थे, जो मृतक हो जाने के कारण
त्याग दिए गए थे; परंतु कबीर साहब ने उनको पुनः जिलाया
और पाला; इसी लिये ये दोनों उनकी संतान करके प्रख्यात
हुए। यह कदाचित् वे लोग इसलिये कहते हैं कि कबीर साहब
ने स्त्री संग को बुरा कहा है। यथा-
</poem>
<poem>
{{c|नारि नसावै तीन गुन, जो नर पासे होय ।
भक्ति मुक्ति निज ध्यान में, पैठि सकै नहिं कोय ॥}}
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2026-03-30T15:11:07Z
चाहर धर्मेंद्र
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|(१६)}}
<poem>
मिलते हैं कि 'हम घर सूत तनहिं नित ताना' इत्यादि जिनसे
उनका यही व्यवसाय करके अपना जीवन बिताना सिद्ध
होता है। इस विषय में उनका एक बड़ा सुंदर शब्द है; उसे
</poem>
नीचे लिखता हूँ-
<poem>
{{c|मुसि मुसि रोवै कबीर की माय,
ए बालक कैसे जीवहिं रघुराय ।
तनना बुनना सब तज्यो है कबीर,
हरि का नाम लिखि लियो शरीर ।
जब लग तागा बाहउँ बेही,
तब लग बिसरै राम सनेही ।
ओछी मति मेरी जाति जोलाहा,
हरि का नाम लह्यों मैं लाहा ।
कहत कबीर सुनहु मेरी माई,
हमारा इनका दाता एक रघुराई ।}}
</poem>
{{right|आदि ग्रंथ, पृष्ठ २८५}}
<poem>
किंतु इनके विवाह और संतानोत्पत्ति के विषय में मतांतर
है। कबीरपंथ के विद्वान् कहते हैं कि लोई नाम की स्त्री उनके
साथ आजन्म रही, परंतु उससे उन्होंने विवाह नहीं किया।
इसी प्रकार कमाल उनके पुत्र और कमाली उनकी पुत्री के
विषय में भी वे लोग विचित्र बातें कहते हैं। उनका कथन है
कि ये दोनों अन्य की संतान थे, जो मृतक हो जाने के कारण
त्याग दिए गए थे; परंतु कबीर साहब ने उनको पुनः जिलाया
और पाला; इसी लिये ये दोनों उनकी संतान करके प्रख्यात
हुए। यह कदाचित् वे लोग इसलिये कहते हैं कि कबीर साहब
ने स्त्री संग को बुरा कहा है। यथा-
</poem>
<poem>
{{c|नारि नसावै तीन गुन, जो नर पासे होय ।
भक्ति मुक्ति निज ध्यान में, पैठि सकै नहिं कोय ॥}}
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पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/५४
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चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|(४८. ).}}
<poem>
इसके अतिरिक्त उनके पद्यों में सैकड़ों स्थानों पर रघुनाथ,
रघुराय, राजाराम, गोविंद, मुरारि इत्यादि अवतार-संबंधो
नामों का प्रयोग उनको अवतारवाद का प्रतिपादक बतलाता
है। किंतु जिस दृढ़ता और व्यापक भाव से वे अवतारवाद
का विरोध करते हैं, उसे देखकर मैं उनके विरोधमूलक विचार
को ही मुख्य और दूसरे विचार को गौण मानता हूँ।
एक और प्रकार से इसका समाधान किया जाता है। वह यह
कि जब वे परमात्मा का निरूपण करने लगते हैं, तब उस
आवेश में अवतारों को साधारण मनुष्य सा वर्णन करें जाते
हैं; किंतु जब स्वयं प्रेम में भरकर अवतारों के सामने आते
हैं, तब उनमें ईश्वर भाव ही प्रकट करते हैं। यह बात
स्वीकार भी कर ली जाय, तो भी इस विचार में गौणता ही
पाई जाती है।
मायावाद, देववाद, हिंसावाद, मूर्तिपूजा, कम्मकांड, व्रत-उपवास,
तीर्थयात्रा, वर्णाश्रम धर्म के अनुकूल कुछ कहते
उनको कदाचित् ही देखा जाता है। वे इन विचारों के
विरोधी हैं। इस ग्रंथ की मायाप्रपंच और मिथ्याचार
शीर्षक शब्दावली पढ़िए; उस समय आपको ज्ञात होगा कि
किस प्रकार वे इनः सिद्धांतों की प्रतिकूलता करते हैं।
</poem>
{{x-larger|{{c|'''विचार-परंपरा'''}}}}
<poem>
श्रीमान् वेस्कट कहते हैं कि संभवतः कबीर पंथ हमको
एक ऐसा धर्म मिलता है, जिस पर हिंदू, मुसल्मान और
ईसाई इन तीनों धर्मों का थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ा है।
परंतु जब मैं देखता हूँ कि कबीर साहब को ईसाई
</poem>
* देखो कबीर ऐण्ड दी कबीर पंथ, प्रिफ़ेस पंक्ति १६-२२।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/५८
250
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2026-03-30T15:42:26Z
चाहर धर्मेंद्र
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( ५२ )}}
<poem>
{{c|
आनंदो द्विभुजः प्रोक्तो मूत्र्त्तश्चामूर्त्त एव च ।
अमूर्त्तस्याश्रयो मूर्त्त परमात्मा नराकृतिः ॥}}</poem>
{{right|- कबीर बीजक, पृष्ठ ३३}}
महारामायण में श्रीरामचंद्र को सत्यलोकेश ही लिखा है-
<poem>
{{c|
वाङ्गनो गोचरातीतः सत्यलोकेश ईश्वरः ।
तस्य नामादिकं सर्वं रामनाम्ना प्रकाश्यते ॥}}
{{right|- कबीर बीजक, पृष्ठ २४८}}</poem>
<poem>
एक स्थान पर कबीर साहब ने भी कह दिया है कि उनका
स्वामी 'साकेत' निवासी है। नीचे के पदों को देखिए</poem>
<poem>
{{c|
जाय जाहूत में खुद खाविंद जहँ वहीं मकान 'साकेत' साजी ।
कहै कबीर ह्वाँ भिश्त दोज्जन थके बेद कीताब काहूत काजी ॥}}</poem>
{{right|- कबीर बोजक, पृ० २६७}}
<poem>
इसलिये जिस प्रभु की कल्पना कबीर साहब ने की है,
वह वैष्णव विचार-परंपरा ही से प्रसूत है; वह वैष्णव धर्म
के एकेश्वरवाद का रूपांतर मात्र है।
जब वैष्णव धर्म का यही विशेषत्व है कि वह एक मात्र
भगवान् की ही भक्ति करता है (देखो सिद्धांत २) और जब
श्रीमद्भागवत को उच्च कंठ से यह कहते सुनते हैं- </poem>
<poem>
{{c|
वासुदेवं परित्यज्य योऽन्यदेवमुपासते ।
तृषितो जान्हवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः ॥}}</poem>
<poem>
जब वह यही कहता है कि किसी कर्म वा ज्ञान के द्वारा
नहीं, केवल भक्ति के द्वारा जन्मपरिग्रह रुकता है (देखो-सिद्धांत ३)
और जब भक्ति की महिमा यों गाई जाती है- </poem>
<poem>
{{c|
हरिभक्ति बिना कर्म न स्याद्धीशुद्धिकारणम् ।
न वा सिद्धयेद् विवेकादि न ज्ञानं नापि मुक्तता ।।}}</poem>
<poem>
तो मायावाद, बहुदेवबाद, कर्मकांड, व्रत-उपवास, तीर्थ-यात्रा
आदि आप ही उपेक्षित हो गए। चतुर्थ सिद्धांत के</poem><noinclude></noinclude>
58riqtf5tcxm8hho8qlohi19f4ttxib
पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/६०
250
72131
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2026-03-30T15:54:49Z
चाहर धर्मेंद्र
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( ५४ )}}
<poem>
आर्य्य धर्म का अवलंबन करके ही अवतारवाद और मूर्तिपूजा
को विरोध किया है; किंतु यह काम स्वामी दयानंद सरस्वती
का था, कबीर साहब का नहीं। अपठित होने के कारण उनको
वेदों और उपनिषदों की शिक्षाओं का ज्ञान न था; इसलिये
इतनी दूर पहुँचना उनका काम न था। उनके काल में
पौराणिक शिक्षा का ही अखंड राज्य था, जो अवतारवाद
और मूर्त्ति-पूजा की जड़ है। इसलिये यह अवश्य स्वीकार
करना पड़ता है कि ये दोनों बातें उनके हृदय में मुसल्मान
धर्म के प्रभाव से उदित हुई।
कबीर साहब जन्मकाल से ही मुसल्मान के घर में पले
थे, अपक्व वय तक उनके हृदय में अनेक मुसल्मानी संस्कार
परोक्ष एवं प्रत्यक्ष भाव से अंकित होते रहे। वय प्राप्त होने पर
वे धर्मजिज्ञासु बनकर देश देश फिरे; बलख्ख तक गए। उन्होंने
अनेक मुसल्मान धर्माचार्यों के उपदेश सुने। ऊँजी के पीर
और शेख तक़ी में उनकी श्रद्धा होने का भी पता चलता है।
इसलिये स्वामी रामानंद का सत्संग लाभ करने पर भी
उनके कुछ पूर्व संस्कारों का न बदलना आश्चर्यजनक
नहीं। जो संस्कार हृदय में बद्धमूल हो जाते हैं, वे जीवन
पर्यंत साथ नहीं छोड़ते। अवतारवाद और मूत्तिपूजा का
विरोध आदि कबीर साहब के कुछ ऐसे ही संस्कार हैं।
स्वामी रामानंद की यह महत्ता अल्प नहीं है कि उन्होंने
कबीर साहब के अधिकांश विचारों पर वैष्णव धम्म का रंग
चढ़ा दिया।
</poem>
{{x-larger|{{c|'''स्वतंत्र पथ'''}}}}
<poem>
श्रीमान् वेस्कट कहते हैं- "साधारणतः यह बात मान
ली गई है कि समस्त बड़े बड़े हिंदू संस्कारकों में कबीर
</poem><noinclude></noinclude>
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2026-03-30T15:58:09Z
चाहर धर्मेंद्र
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( ५४ )}}
<poem>
आर्य्य धर्म का अवलंबन करके ही अवतारवाद और मूर्तिपूजा
का विरोध किया है; किंतु यह काम स्वामी दयानंद सरस्वती
का था, कबीर साहब का नहीं। अपठित होने के कारण उनको
वेदों और उपनिषदों की शिक्षाओं का ज्ञान न था; इसलिये
इतनी दूर पहुँचना उनका काम न था। उनके काल में
पौराणिक शिक्षा का ही अखंड राज्य था, जो अवतारवाद
और मूर्त्ति-पूजा की जड़ है। इसलिये यह अवश्य स्वीकार
करना पड़ता है कि ये दोनों बातें उनके हृदय में मुसल्मान
धर्म के प्रभाव से उदित हुई।
कबीर साहब जन्मकाल से ही मुसल्मान के घर में पले
थे, अपक्व वय तक उनके हृदय में अनेक मुसल्मानी संस्कार
परोक्ष एवं प्रत्यक्ष भाव से अंकित होते रहे। वय प्राप्त होने पर
वे धर्मजिज्ञासु बनकर देश देश फिरे; बलख्ख तक गए। उन्होंने
अनेक मुसल्मान धर्माचार्यों के उपदेश सुने। ऊँजी के पीर
और शेख तक़ी में उनकी श्रद्धा होने का भी पता चलता है।
इसलिये स्वामी रामानंद का सत्संग लाभ करने पर भी
उनके कुछ पूर्व संस्कारों का न बदलना आश्चर्यजनक
नहीं। जो संस्कार हृदय में बद्धमूल हो जाते हैं, वे जीवन
पर्यंत साथ नहीं छोड़ते। अवतारवाद और मूत्तिपूजा का
विरोध आदि कबीर साहब के कुछ ऐसे ही संस्कार हैं।
स्वामी रामानंद की यह महत्ता अल्प नहीं है कि उन्होंने
कबीर साहब के अधिकांश विचारों पर वैष्णव धम्म का रंग
चढ़ा दिया।
</poem>
{{x-larger|{{c|'''स्वतंत्र पथ'''}}}}
<poem>
श्रीमान् वेस्कट कहते हैं- "साधारणतः यह बात मान
ली गई है कि समस्त बड़े बड़े हिंदू संस्कारकों में कबीर
</poem><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/९०
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2026-03-30T16:11:10Z
चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|(१८४ )}}
<poem>
उसके लिये स्थान विशेष नियत कर देना क्या अल्पज्ञता है?
धर्मकृत्यों के पुनीत दिनों को छोड़ दीजिए, उपासना के लिये
कोई समय और पद्धति न नियत कीजिए, मसजिद, मंदिर,
गिरिजाघरों को तुड़वा डालिए, देखिए देश और समाज का
कितना उपकार होता है? वास्तव में इन बातों में कुछ
तत्व है, तमी यह प्रणाली सर्वसम्मत है। व्यासदेव कहते हैं-
</poem>
<poem>
{{c|
रूप रूपविवर्जितस्य भवतो ध्यानेन यद्ङ्कल्पितम् ।
स्तुत्या निर्वचनीयताखिल गुरो दूरीकृता यन्मया ।।
व्यापित्वञ्च निराकृतं भगवतो यत्तीर्थयात्रादिना ।
क्षंतव्यं जगदीश तद्विकलता दोषत्रयं मत्कृतम् ।।}}</poem>
<poem>हे परमात्मन् ! तुम अरूप हो, परंतु ध्यान द्वारा मैंने
तुम्हारे रूप की कल्पना की, स्तुति द्वारा तुम्हारी अनिर्वच
नीयता दूर की, तीर्थयात्रा करके तुम्हारी व्यापकता निराकृत
की, अतएव तुम इन तीनों विकलता (अस्वाभाविकता या असंपूर्णता)
दोषों को क्षमा करो। किंतु इतना ज्ञान होने
पर भी उन्होंने ध्यान किया, स्तुति और तीर्थयात्रा की, तब
तो क्षमा माँगने की आवश्यकता हुई। क्यों? इसलिये कि
उपासना का मार्ग यही तो है। ध्यानधारण भी सदोष,
स्तुतिप्रार्थना भी सदोष, मूर्तिपूजा भी सदोष; फिर परमात्मा
की उपासना कैसे हो? आप कहेंगे कि उपासना की आवश्यकता
ही क्या? ब्रह्म सद्भाव ही ठीक है, जो कि उत्तम
और निर्दोष है परंतु ब्रह्म सद्भाव दस पाँच करोड़ मनुष्यों
में भी किसी एक को होता है; फिर शेष लोग क्या करें?
वही ध्यान- धारणा, स्तुतिप्रार्थना आदि उनको करनी ही
पड़ेगी, चाहे वह सदोष हो; परंतु इसी क्रिया द्वारा उनको
परमपुरुष की प्राप्ति होगी। अध्यापक रेखागणित की शिक्षा
के लिये खड़ा होकर एक रेखा खौंचता है, और एक बिंदु </poem><noinclude></noinclude>
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662586
662585
2026-03-30T16:13:49Z
चाहर धर्मेंद्र
4225
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|(१८४ )}}
<poem>
उसके लिये स्थान विशेष नियत कर देना क्या अल्पज्ञता है?
धर्मकृत्यों के पुनीत दिनों को छोड़ दीजिए, उपासना के लिये
कोई समय और पद्धति न नियत कीजिए, मसजिद, मंदिर,
गिरिजाघरों को तुड़वा डालिए, देखिए देश और समाज का
कितना उपकार होता है? वास्तव में इन बातों में कुछ
तत्व है, तमी यह प्रणाली सर्वसम्मत है। व्यासदेव कहते हैं-
</poem>
<poem>
{{c|
रूपं रूपविवर्जितस्य भवतो ध्यानेन यद्ङ्कल्पितम् ।
स्तुत्या निर्वचनीयताखिल गुरो दूरीकृता यन्मया ।।
व्यापित्वञ्च निराकृतं भगवतो यत्तीर्थयात्रादिना ।
क्षंतव्यं जगदीश तद्विकलता दोषत्रयं मत्कृतम् ।।}}</poem>
<poem>हे परमात्मन् ! तुम अरूप हो, परंतु ध्यान द्वारा मैंने
तुम्हारे रूप की कल्पना की, स्तुति द्वारा तुम्हारी अनिर्वच
नीयता दूर की, तीर्थयात्रा करके तुम्हारी व्यापकता निराकृत
की, अतएव तुम इन तीनों विकलता (अस्वाभाविकता या असंपूर्णता)
दोषों को क्षमा करो। किंतु इतना ज्ञान होने
पर भी उन्होंने ध्यान किया, स्तुति और तीर्थयात्रा की, तब
तो क्षमा माँगने की आवश्यकता हुई। क्यों? इसलिये कि
उपासना का मार्ग यही तो है। ध्यानधारण भी सदोष,
स्तुतिप्रार्थना भी सदोष, मूर्तिपूजा भी सदोष; फिर परमात्मा
की उपासना कैसे हो? आप कहेंगे कि उपासना की आवश्यकता
ही क्या? ब्रह्म सद्भाव ही ठीक है, जो कि उत्तम
और निर्दोष है परंतु ब्रह्म सद्भाव दस पाँच करोड़ मनुष्यों
में भी किसी एक को होता है; फिर शेष लोग क्या करें?
वही ध्यान- धारणा, स्तुतिप्रार्थना आदि उनको करनी ही
पड़ेगी, चाहे वह सदोष हो; परंतु इसी क्रिया द्वारा उनको
परमपुरुष की प्राप्ति होगी। अध्यापक रेखागणित की शिक्षा
के लिये खड़ा होकर एक रेखा खौंचता है, और एक बिंदु </poem><noinclude></noinclude>
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2026-03-30T16:16:06Z
चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|(૮૪ )}}
<poem>
उसके लिये स्थान विशेष नियत कर देना क्या अल्पज्ञता है?
धर्मकृत्यों के पुनीत दिनों को छोड़ दीजिए, उपासना के लिये
कोई समय और पद्धति न नियत कीजिए, मसजिद, मंदिर,
गिरिजाघरों को तुड़वा डालिए, देखिए देश और समाज का
कितना उपकार होता है? वास्तव में इन बातों में कुछ
तत्व है, तमी यह प्रणाली सर्वसम्मत है। व्यासदेव कहते हैं-
</poem>
<poem>
{{c|
रूपं रूपविवर्जितस्य भवतो ध्यानेन यद्ङ्कल्पितम् ।
स्तुत्या निर्वचनीयताखिल गुरो दूरीकृता यन्मया ।।
व्यापित्वञ्च निराकृतं भगवतो यत्तीर्थयात्रादिना ।
क्षंतव्यं जगदीश तद्विकलता दोषत्रयं मत्कृतम् ।।}}</poem>
<poem>हे परमात्मन् ! तुम अरूप हो, परंतु ध्यान द्वारा मैंने
तुम्हारे रूप की कल्पना की, स्तुति द्वारा तुम्हारी अनिर्वच
नीयता दूर की, तीर्थयात्रा करके तुम्हारी व्यापकता निराकृत
की, अतएव तुम इन तीनों विकलता (अस्वाभाविकता या असंपूर्णता)
दोषों को क्षमा करो। किंतु इतना ज्ञान होने
पर भी उन्होंने ध्यान किया, स्तुति और तीर्थयात्रा की, तब
तो क्षमा माँगने की आवश्यकता हुई। क्यों? इसलिये कि
उपासना का मार्ग यही तो है। ध्यानधारण भी सदोष,
स्तुतिप्रार्थना भी सदोष, मूर्तिपूजा भी सदोष; फिर परमात्मा
की उपासना कैसे हो? आप कहेंगे कि उपासना की आवश्यकता
ही क्या? ब्रह्म सद्भाव ही ठीक है, जो कि उत्तम
और निर्दोष है परंतु ब्रह्म सद्भाव दस पाँच करोड़ मनुष्यों
में भी किसी एक को होता है; फिर शेष लोग क्या करें?
वही ध्यान- धारणा, स्तुतिप्रार्थना आदि उनको करनी ही
पड़ेगी, चाहे वह सदोष हो; परंतु इसी क्रिया द्वारा उनको
परमपुरुष की प्राप्ति होगी। अध्यापक रेखागणित की शिक्षा
के लिये खड़ा होकर एक रेखा खौंचता है, और एक बिंदु </poem><noinclude></noinclude>
c5ldxi47kyvz5faga5ws0n0v8j512wi
पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/९२
250
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662590
554932
2026-03-31T05:07:27Z
चाहर धर्मेंद्र
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( ૮૬ )}}
{{block center|<poem>
पढ़िये, देखिये उनमें विचार की कितनी प्रौढ़ता है। बिना
पूर्ण-तया उस सिद्धांत पर आरूढ़ हुए विचार में इतनी प्रौढ़ता
आ नहीं सकती । प्रोफेसर वी० बी० राय लिखते हैं-</poem>}}
{{block center|<poem>
"कबीरपंथियों की मुख्तलिफ किताबों से और आदि ग्रन्थ
में जो कबीर की बातों का इक्तिबास है, उनसे साफ जाहिर
होता है कि कबीरपंथी तालीम वेदांती तालीम की एक दूसरी
सूरत है इस अम्र में सूफियों से भी उनको बड़ी मदद मिली,
क्योंकि दोनों तालोम क़रीब करीब एकसाँ हैं।”</poem>}}
{{right|- सम्प्रदाय, पृष्ठ ६९}}
{{block center|<poem>
वैष्णव और वेदांत धर्म दोनों प्रकांड वैदिक धर्म
अर्थात् हिन्दू धर्म की विशाल शाखाएँ हैं। यह वही उदार
और महान् धर्म है कि जिससे वसुन्धरा के समग्र पुनीत
ग्रन्थों ने कतिपय व्यापक सार्वभौम सिद्धान्त का संग्रह करके
अपने अपने कलेवर को समुज्वल किया है । कबीर साहब
चाहे वैष्णव हों या वेदांती, चाहे सन्त मत के हों, चाहे अपने
को और कुछ बतलावें, किन्तु वे भी उसी धर्म के ऋणी हैं;
और उसी के आलोक से उन्होंने अपना प्रदीप प्रज्वलित
किया।</poem>}}
{{x-larger|{{c|'''शेष वक्तव्य'''}}}}
{{block center|<poem>
श्रीयुत् मैक्समूलर जैसे असाधारण विदेशी विद्वान् और
श्रीमती एनी बेसेंट जैसी परमं विदुषी विजातीय महिला
ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि हिंदू धर्म के
सिद्धांत बहुत ही उदार, व्यापक और सर्व-देशदर्शी हैं।
वास्तव में जैसे ही हिंदू धर्म के सिद्धांत महान् और गंभीर
हैं, वैसे ही पूर्ण, सार्वभौम और सार्वजनिक भी हैं।</poem>}}<noinclude></noinclude>
sorfyupy3ix277vfiqa1j1hcyj0i80m
पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/९७
250
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554937
2026-03-31T05:36:38Z
चाहर धर्मेंद्र
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( ९१ )}}
<center>{{x-larger|'''कबीर वचनावली की आधार भूत पुस्तकों का विवरण'''}}</center>
{{Multicol}}
'''सं'''
<br>१
<br>२
<br>३
<br>४
<br>५
<br>६
<br>७
{{multicol-break}}
'''नाम पुस्तक'''
<br>आदि ग्रंय
<br>कबोर बीजक
<br>कबीर शब्दावली (प्रथम भाग)
<br>कबीर शब्दावली (द्वितीय भाग)
<br>कबीर शब्दावली (तृतीय भाग)
<br>कबीर शब्दावली (चतुर्थ भाग)
<br>कबीर कसौटी
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'''विवरण'''
<br>उपनाम ग्रंथसाहब, गुरुमुखी पुस्तक, गुरु अर्जुनदेव संगृहीत, सन् १९०३ में नवलकिशोर प्रेस में नागरी अक्षरों में मुद्रित।
<br>हिंदी पुस्तक - महाराज विश्वनाथसिंह कृत टीका सहित, सन् १९०७ में नवलकिशोर प्रेस लखनऊ में मुद्रित।
<br>हिंदी पुस्तक स्वामी बेलवेडियर प्रेस इलाहाबाद संगृहीत-सन् १९१३ में उक्त प्रेस में मुद्रित।
<br>औजन सन् १९०८ में मुद्रित।
<br>औजन सन् १९१३ में मुद्रित।
<br>औजन सन् १९१४ में मुद्रित।
<br>हिंदी पुस्तक - बाबू लहनासिंह कबीरपंथी डिप्टी कंसरवेटर जंगलात कृत, सन् १९०६ में श्रीवेंकटेश्वर प्रेस बंबई में मुद्रित।
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<noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( ९१ )}}
<center>{{x-larger|'''कबीर वचनावली की आधार भूत पुस्तकों का विवरण'''}}</center>
{{Multicol}}
'''सं'''
<br>१</br>
<br>२</br>
<br>३</br>
<br>४</br>
<br>५</br>
<br>६</br>
<br>७</br>
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'''नाम पुस्तक'''
<br>आदि ग्रंय</br>
<br>कबोर बीजक</br>
<br>कबीर शब्दावली (प्रथम भाग)</br>
<br>कबीर शब्दावली (द्वितीय भाग)</br>
<br>कबीर शब्दावली (तृतीय भाग)</br>
<br>कबीर शब्दावली (चतुर्थ भाग)</br>
<br>कबीर कसौटी</br>
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'''विवरण'''
<br>उपनाम ग्रंथसाहब, गुरुमुखी पुस्तक, गुरु अर्जुनदेव संगृहीत, सन् १९०३ में नवलकिशोर प्रेस में नागरी अक्षरों में मुद्रित।</br>
<br>हिंदी पुस्तक - महाराज विश्वनाथसिंह कृत टीका सहित, सन् १९०७ में नवलकिशोर प्रेस लखनऊ में मुद्रित।</br>
<br>हिंदी पुस्तक स्वामी बेलवेडियर प्रेस इलाहाबाद संगृहीत-सन् १९१३ में उक्त प्रेस में मुद्रित।</br>
<br>औजन सन् १९०८ में मुद्रित।</br>
<br>औजन सन् १९१३ में मुद्रित।</br>
<br>औजन सन् १९१४ में मुद्रित।</br>
<br>हिंदी पुस्तक - बाबू लहनासिंह कबीरपंथी डिप्टी कंसरवेटर जंगलात कृत, सन् १९०६ में श्रीवेंकटेश्वर प्रेस बंबई में मुद्रित।</br>
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English language ka hai
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>{{Rh||'''कर्बला'''}}
{{Rh||'''दूसरा दृश्य'''}}
{{Rh||'''[रात का समय-मदीने का गवर्नर वलीद अपने'''}}
{{Rh||'''दरबार में बैठा हुआ है।]'''}}
वलीद-(स्वगत) मरवान कितना खुदग़रज़ आदमी है । मेरा मातहत होकर भी मुझ पर रोब जमाना चाहता है। उसकी मरज़ी पर चलता, तो आज सारा मदीना मेरा दुश्मन होता। उसने रसूल के खानदान से हमेशा दुश्मनी की है।
{{Rh||'''[कासिद का प्रवेश]'''}}
क़ासिद-या अमीर, यह खलीफ़ा यज़ीद का खत है।
वलीद-(घबराकर) ख़लीफ़ा यज़ीद ! अमीर मुआविया को क्या ।
हुआ?
क़ासिद-आपको पूरी कैफियत इस खत से मालूम होगी।
{{Rh||'''[खत वलीद के हाथ में देता है।]'''}}
वलीद-(खत पढ़कर) अमीर मुबाबिया की रूह को खुदा जन्नत में दाखिल करे । मगर समझ में नहीं आता कि यजीद क्योंकर खलीफा हुए। कौम के नेताओं की कोई मजलिस नहीं हुई, और किसी ने उनके हाथ पर बैयत नहीं ली । मदीने भर में यह खबर फैलेगी, तो ग़ज़ब हो जायगा । हुसैन यज़ीद को कभी न खलीफ़ा मानेंगे।
क़ासिद-(दूसरा खत देकर) हुजूर, इसे भी देख लें।
{{Rh||'''[वलीद ख़त लेकर पढ़ता है ]'''}}
"वलीद, हाकिम मदीना को ताकीद की जाती है कि इस खत को देखते ही हुसैन से मेरे नाम पर बैयत लें । अगर हुसैन बैयत न लें, तो उन्हें क़त्ल कर दें, और उनका सिर मेरे पास भेज दें।"
{{Rh||'''[वलीद सदं साँस लेकर फर्श पर लेट जाता है ।]''}}
क़ासिद-मुझे क्या हुक्म होता है ?
वलीद-तुम जाकर बाहर ठहरो । (दिल में) खुदा वह दिन न लाये
कि मुझे रसूल के नवासे के साथ यह घृणित व्यवहार करना पड़े। वलीद
[[चित्र:Ayaan Khan Mohammad Khan|अंगूठाकार|पाठ=English language ka hai kya baat |English language ka hai ]]<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>{{Rh||'''कर्बला'''}}
{{Rh||'''दूसरा दृश्य'''}}
{{Rh||'''[रात का समय-मदीने का गवर्नर वलीद अपने'''}}
{{Rh||'''दरबार में बैठा हुआ है।]'''}}
वलीद-(स्वगत) मरवान कितना खुदग़रज़ आदमी है । मेरा मातहत होकर भी मुझ पर रोब जमाना चाहता है। उसकी मरज़ी पर चलता, तो आज सारा मदीना मेरा दुश्मन होता। उसने रसूल के खानदान से हमेशा दुश्मनी की है।
{{Rh||'''[कासिद का प्रवेश]'''}}
क़ासिद-या अमीर, यह खलीफ़ा यज़ीद का खत है।
वलीद-(घबराकर) ख़लीफ़ा यज़ीद ! अमीर मुआविया को क्या ।
हुआ?
क़ासिद-आपको पूरी कैफियत इस खत से मालूम होगी।
{{Rh||'''[खत वलीद के हाथ में देता है।]'''}}
वलीद-(खत पढ़कर) अमीर मुबाबिया की रूह को खुदा जन्नत में दाखिल करे । मगर समझ में नहीं आता कि यजीद क्योंकर खलीफा हुए। कौम के नेताओं की कोई मजलिस नहीं हुई, और किसी ने उनके हाथ पर बैयत नहीं ली । मदीने भर में यह खबर फैलेगी, तो ग़ज़ब हो जायगा । हुसैन यज़ीद को कभी न खलीफ़ा मानेंगे।
क़ासिद-(दूसरा खत देकर) हुजूर, इसे भी देख लें।
{{Rh||'''[वलीद ख़त लेकर पढ़ता है ]'''}}
"वलीद, हाकिम मदीना को ताकीद की जाती है कि इस खत को देखते ही हुसैन से मेरे नाम पर बैयत लें । अगर हुसैन बैयत न लें, तो उन्हें क़त्ल कर दें, और उनका सिर मेरे पास भेज दें।"
{{Rh||'''[वलीद सदं साँस लेकर फर्श पर लेट जाता है ।]''}}
क़ासिद-मुझे क्या हुक्म होता है ?
वलीद-तुम जाकर बाहर ठहरो । (दिल में) खुदा वह दिन न लाये
कि मुझे रसूल के नवासे के साथ यह घृणित व्यवहार करना पड़े। वलीद<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>{{Rh|'''५४'''|'''कर्बला'''}}
.
वहब--मुझे अपने ईमान के मामले में किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं। मुझे यकीन है कि खिलाफ़त के हक़दार हज़रत हुसैन हैं । यज़ीद की बैयत कभी न क़बूल करूँगा,जायदाद रहे या न रहे, जान रहे या न रहे ।
क़मर--बेटा,तेरी मा तुझ पर फ़िदा हो,तेरी बातों ने दिल खुश कर दिया । आज मेरी-जैसी खुशनसीब मा दुनिया में न होगी। मगर बेटा,तुम्हारे अब्बाजान ठीक कहते हैं,नसीमा से पूछ लो, देखो,वह क्या कहती है। मैं नहीं चाहती कि हम लोगों की दीन-परवरी के बाइस उसे तकलीफ हो,और जंगलों की खाक छाननी पड़े । उसकी दिलजोई करना तुम्हारा फ़र्ज़ है।
वहब--आप फ़रमाती हैं,तो मैं उससे भी पूछ लूँगा । मगर मैं साफ कहे देता हूँ कि मैं उसकी रजा का गुलाम न बनूंगा । अगर उसे दोन के मुकाबले में ऐश व आराम ज़्यादा पसन्द है,तो शौक से रहे, लेकिन मैं बैयत की जिल्लत न उठाऊँगा।
{{C|'''[दरवाज़ा खोलकर बाहर चला जाता है।]'''}}
<center>{{x-larger|'''सातवाँ दृश्य'''}}</center>
[अरब का एक गाँव-एक विशाल मन्दिर बना हुआ है,वालाब है,जिसके पक्के घाट बने हुए हैं,मनोहर बागीचा,मोर,हरिण,गाय आदि पशु-पक्षी इधर-उधर विचर रहे हैं। साहसराय और उनके बन्धु तालाब के किनारे सन्ध्या-हवन,ईश्वर-प्रार्थना कर रहे हैं।]
{{C|'''गाना-स्तुति'''}}
{{C|आखरेश अनंत विधाता हो,मंगलमय मोदप्रदाता हो}}
{{C|मय-मंजन शिव जन त्राता हो,अविनाशी अद्भुत ज्ञाता हो ।}}
{{C|तेरा ही एकसहारा हो,}}
{{C|हरि,धर्म प्राण से प्यारा हो ।}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>{{Rh|'''५४'''|'''कर्बला'''}}
.
वहब--मुझे अपने ईमान के मामले में किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं। मुझे यकीन है कि खिलाफ़त के हक़दार हज़रत हुसैन हैं । यज़ीद की बैयत कभी न क़बूल करूँगा,जायदाद रहे या न रहे, जान रहे या न रहे ।
क़मर--बेटा,तेरी मा तुझ पर फ़िदा हो,तेरी बातों ने दिल खुश कर दिया । आज मेरी-जैसी खुशनसीब मा दुनिया में न होगी। मगर बेटा,तुम्हारे अब्बाजान ठीक कहते हैं,नसीमा से पूछ लो, देखो,वह क्या कहती है। मैं नहीं चाहती कि हम लोगों की दीन-परवरी के बाइस उसे तकलीफ हो,और जंगलों की खाक छाननी पड़े । उसकी दिलजोई करना तुम्हारा फ़र्ज़ है।
वहब--आप फ़रमाती हैं,तो मैं उससे भी पूछ लूँगा । मगर मैं साफ कहे देता हूँ कि मैं उसकी रजा का गुलाम न बनूंगा । अगर उसे दोन के मुकाबले में ऐश व आराम ज़्यादा पसन्द है,तो शौक से रहे, लेकिन मैं बैयत की जिल्लत न उठाऊँगा।
{{C|'''[दरवाज़ा खोलकर बाहर चला जाता है।]'''}}
<center>{{x-larger|'''सातवाँ दृश्य'''}}</center>
[अरब का एक गाँव-एक विशाल मन्दिर बना हुआ है,वालाब है,जिसके पक्के घाट बने हुए हैं,मनोहर बागीचा,मोर,हरिण,गाय आदि पशु-पक्षी इधर-उधर विचर रहे हैं। साहसराय और उनके बन्धु तालाब के किनारे सन्ध्या-हवन,ईश्वर-प्रार्थना कर रहे हैं।]
{{C|'''गाना-स्तुति'''}}
{{C|आखरेश अनंत विधाता हो,मंगलमय मोदप्रदाता हो}}
{{C|मय-मंजन शिव जन त्राता हो,अविनाशी अद्भुत ज्ञाता हो ।}}
{{C|तेरा ही एक सहारा हो,}}
{{C|हरि,धर्म प्राण से प्यारा हो ।}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>{{Rh|'''कर्बला'''||'''५५'''}}
{{C|वल,वीर्य,पराक्रम त्वेष रहे,सद्धर्म धरा पर शेष रहे ;}}
{{C|श्रुति भानु एकता वेश रहे,धन,ज्ञान,कलायुत देश रहे}}
{{C||सर्वत्र प्रेम की धारा हो,}}
{{C||हरि,धर्म प्राण से प्यारा हो ।}}
{{C|भारत तन-मन-धन सारा हो,उसकी सेवा सब द्वारा हो ।}}
{{C|निज मान समान दुलारा हो,सबकी आँखों का तारा हो ।}}
{{C|जीवन सर्वस्वहमारा हो,}}
{{C|हरि,धर्म प्राण से प्यारा हो ।}}
{{C|[साहसराय प्रार्थना करते हैं]}}
भगवन्,हमें शक्ति प्रदान कीजिए कि सदैव अपने व्रत का पालन करें। अश्वत्थामा की सन्तान का निरन्तर सेवा-मार्ग का अवलम्बन करें,उनका रक्त सदैव दीनों की रक्षा में बहता रहे,उनके सिर सदैव न्याय और सत्य पर बलिदान होते रहें। और प्रभो! वह दिन आये कि हम प्रायश्चित-संस्कार से मुक्त होकर तपोभूमि भारत को प्रयाण करें,और ऋषियों के सेवा-सत्कार में मग्न होकर अपना जीवन सफल करें । हे नाथ,हमें सद्बुद्धि दीजिए कि निरन्तर कर्म-पथ पर स्थिर रहें,और उस कलंक-कालिमा को,जो हमारे आदि पुरुष ने हमारे मुख पर लगा दी है,अपनी सुकीर्ति से धोकर अपना मुख उज्ज्वल करें । जब हम स्वदेश-यात्रा करें,तो हमारे मुख पर आत्मगौरव का प्रकाश हो,हमारे स्वदेश-बन्धु सहर्ष हमारा स्वागत करें,और हम वहाँ पतित बनकर नहीं,समाज के प्रतिष्ठित अंग बनकर जीवन व्यतीत करें।
{{C|'''[सेवक का प्रवेश]'''}}
सेवक--दीनानाथ,समाचार आया है,अमीर आबिया के बेटे यज़ीद
ने खिलाफ़त पर अधिकार कर लिया।
साहस०--यजीद ने खिलाफ़त पर अधिकार कर लिया ! यह कैसे ? उसका खिलाफत पर क्या स्वत्व था ? खिलाफ़त तो हजरत अली के बेटे इमाम हुसैन को मिलनी चाहिए थी ।<noinclude></noinclude>
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