विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.46.0-wmf.22 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/९७ 250 72168 662600 662592 2026-03-31T13:59:47Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662600 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( ९१ )}} {| class="wikitable sortable" |- |+ '''कबीर वचनावली की आधार भूत पुस्तकों का विवरण''' !सं० !नाम पुस्तक !विवरण |- |१ |आदि ग्रंथ | उपनाम ग्रंथसाहब, गुरुमुखी पुस्तक, गुरु अर्जुनदेव संगृहीत, सन् १९०३ में नवलकिशोर प्रेस में नागरी अक्षरों में मुद्रित। |- |२ |कबीर योजक |हिंदी पुस्तक - महाराज विश्वनाथसिंह कृत टीका सहित, सन् १९०७ में नवलकिशोर प्रेस लखनऊ में मुद्रित। |- |३ |कबीर शब्दावली (प्रथम भाग) |हिंदी पुस्तक स्वामी बेलवेडियर प्रेस इलाहाबाद संगृहीत-सन् १९१३ में उक्त प्रेस में मुद्रित। |- |४ |कबीर शब्दावली (द्वितीय भाग) |औजन सन् १९०८ में मुद्रित। |- |५ |कबीर शब्दावली (तृतीय भाग) |औजन सन् १९१३ में मुद्रित। |- |६ |कबीर शब्दावली (चतुर्थ भाग) |औजन सन् १९१४ में मुद्रित। |- |७ |कबीर कसौटी |हिंदी पुस्तक - बाबू लहनासिंह कबीरपंथी डिप्टी कंसरवेटर जंगलात कृत, सन् १९०६ में श्रीवेंकटेश्वर प्रेस बंबई में मुद्रित। |- |}<noinclude></noinclude> qjkr8cs549jn4fr9zkugwfsfz3np5qx पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/९८ 250 72169 662601 554938 2026-03-31T14:12:24Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662601 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( ९२. )}} {| class="wikitable sortable" |- !सं० !नाम पुस्तक !विवरण |- |८ |कबीर ऐंड दी कबीर पंथ |अँग्रेजी पुस्तक-रेवरेंड जी. एच. वेस्कट एम. ए. विरचित, सन् १९०७ में क्राइष्ट चर्च मिशन प्रेस कानपुर में मुद्रित । |- |९ |चौरासी अंग की साखी |प्राचीन हस्तलिखित हिंदी पुस्तक कबीरपंथी साधु बिहारीदास आज़मगढ़ निवासी से प्राप्त। |- |१० |भारतवर्षीय उपासक संप्रदाय |बँगला पुस्तक - श्रीयुत् अक्षयकुमार दत्त प्रगीत, सन् १८८८ में नूतन यंत्रालय कलकत्ता में मुद्रित। |- |११ |भक्ति सुधाबिंदु स्वाद |हिंदी पुस्तक - महात्मा सीताराम शरण भगवानप्रसाद विरचित, संवत् १९६५-६६ में हितचिंतक प्रेस बनारस में मुद्रित। |- |१२ |मिश्रबंधु विनोद ( प्रथम खंड ) |हिंदी पुस्तक - मिश्रबंधु विरचित, इंडियन प्रेस इलाहाबाद में संवत् १९७० में मुद्रित। |- |१३ |रहनुमायान हिंद |उर्दू पुस्तक-श्रीयुत मन्मथनाय दत्त एम. ए. की अँग्रेजी पुस्तक प्राफ़ेट्स आफ़ इंडिया का अनुवाद, बाबू नारायणप्रसाद वर्मा अनुवादित अहमदी प्रेस अलीगढ़ में सन् १९०४ में मुद्रित। |- |१४ |सटीक कबीर बीजक |हिंदी पुस्तक- कबीरपंथी साधु पूरनदास विरचित, संवत् १९६७ में श्रीवेंकटेश्वर प्रेस बंबई, में मुद्रित। |- |}<noinclude></noinclude> 4g69yfz2wvbq7692b9f879lxp22mgqy पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/९९ 250 72170 662602 554939 2026-03-31T14:18:03Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662602 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|( ९३ )}} {| class="wikitable sortable" |- !सं० !नाम पुस्तक !विवरण |- |१५ |संप्रदाय |उर्दू पुस्तक-क्रिश्चियन विद्वान् प्रोफ़ेसर वी. बी. राय रचित, मिशन प्रेस लुधियाना में सन् १९०६ में मुद्रित। |- |१६ |साखी संग्रह |हिंदी पुस्तक - स्वामी बेलवेडियर प्रेस इलाहाबाद संगृहीत उक्त प्रेस में सन् १९१२ में मुद्रित। |- |१७ |ज्ञानगुदड़ी वो रेखते |भैजन सन् १९१० में मुद्रित। |- |}<noinclude></noinclude> m637fxum5x7p5d7cgk9r3aff9tp4872 पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१०० 250 72171 662603 554663 2026-03-31T14:30:07Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662603 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="निधिलता तिवारी" /></noinclude>{{c|{{x-larger|'''कबीर वचनावली'''}}}} {{c|'''प्रथम खंड'''}} {{c|कर्त्ता-निर्णय}} {{block center|दोहा}} {{block center|<poem> अझै पुरुष इक पेड़ है निरंजन वाकी डार । तिरदेवा साखा भये पात भया संसार ॥ १ ॥ साहेब मेरा एक है दूजा कहा न जाय । दूजा साहेब जो कहूँ साहेब खरा रिसाय ॥ २ ॥ जाके मुँह माथा नहीं नाहीं रूप कुरूप । पुहुप बास तें पातरा ऐसा तत्त्व अनूप ॥ ३ ॥ देहीं माहिं विदेह है साहेब सुरति सरूप । अनंत लोक में रभि रहा जाके रंग न रूप ॥ ४ ॥ चार भुजा के भजन में भूलि परे सब संत । कबिरा सुमिरै तासु को जाके भुजा अनंत ॥ ५ ॥ जनम मरन से रहित है मेरा साहेब सोय । बलिहारी वहि पीव की जिन सिरजा सब कोय ।। ६ ॥ एक कहौं तो है नहीं दोय कहौं तौ गारि । है जैसा तैसा रहै कहै कबीर विचारि ॥ ७ ॥ रेख रूप जेहि है नहीं अधर घरो नहिं देह । गगन मॅडल के मध्य में रहता पुरुष बिदेह ॥ ८ ॥ </poem>}}<noinclude></noinclude> s2td4v0ipoo9qft396zpwccdxaoyn9v पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१३२ 250 72315 662625 554698 2026-03-31T15:54:41Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662625 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( १२२ )}} {{c|{{x-larger|'''संतजन'''}}}} {{block center|<poem> साध बड़े परमारथी घन ज्यों बरसैं आय । तपन बुझावें और की अपनो पारस लाय ॥३२६॥ सिंहों के लेहँड़े नहीं हंसों की नहिं पाँत । लालों की नहिं बोरियाँ साध न चलै जमात ॥३२७॥ सब बन तौ चंदन नहीं सूरा का दल नाहिं । सब समुद्र मोती नहीं यों साधू जग माहिं ॥ ३२८।। साध कहावत कठिन है लंबा पेड़ खजूर । चढ़े तो चाखै प्रेमरस गिरै तो चकनाचूर ।।३२९।। गाँठी दाम न बाँधई नहिं नारी सों नेह । कह कबीर ता साध की हम चरनन की खेह ॥३३०॥ वृच्छ कबहुँ नहिं फल भखें नदी न संचै नीर । परमारथ के कारने साधुन धरा सरीर ॥३३१॥ साधु साधु सबही बड़े अपनी अपनी ठौर । शब्द विवेकी पारखी ते माथे के मौर ॥३३२।। साधु साधु सब एक हैं ज्यों पोस्ते का खेत । कोइ विवेकी लाल है नहीं सेत का सेत ॥३३३॥ निराकार की आरसी साधौ ही की देह । लखा जो चाहै अलख को इनहीं में लखि लेह ।।३३४।। कोई आवै भाव ले कोई आव अभाव । साध दोऊ को पोषते गिनै न भाव अभाव ।।३३५।। नहिं शीतल है चंद्रमा हिम नहिं शीतल होय । कबिरा शीतल संतजन नाम सनेही सोय ॥३३६॥ जाति न पूछो साध की पूछ लीजिये ज्ञान । मोल करो तरवार का पड़ा रहन दो म्यान ॥३३७।।</poem>}}<noinclude></noinclude> 9ydi2cc48bopbmvtqa5oq71bg955qcs पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१३० 250 72317 662624 554696 2026-03-31T15:48:33Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662624 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( १२० )}} {{block center|<poem> सब धरती कागद करूँ लेखनि सब बनराय । सात समुद की मसि करूँ गुरु गुन लिखा न जाय ॥३०२॥ तन मन ताको दीजिये जाके विषया नाहिं । आपा सबहीं डारि कै राखै साहेब माहिं ॥३०३॥ तत मन दिया तो क्या हुआ निज मन दिया न जाय । कप कबीर ता दास सों कैसे मन पतियाय ॥३०४। गुरु सिकलीगर कीजिये मनहिं मस्कला देय । मन की मैल छुड़ाइ कै चित दरपन करि लेय ॥३०५।। गुरु धोबी सिष कापड़ा साबुन सिरजनहार । सुरति सिला पर धोइये निकसै जोसि अपार ।।३०६।। गुरु कुम्हार सिष कुंभ है गढ़ गढ़ काढ़े खोट । अन्तर हाथ सहार दै बाहर बाहै चोट ॥३०७॥ कबिरा ते नर अंध हैं गुरु को कहते और । हरि रूठे गुरु ठौर हैं गुरु रूठे नहिं ठौर ॥३०८॥ गुरु हैं बड़े गोविंद तें मन में देखु विचार । हरि सुमिरै सो वार है गुरु सुमिरे सो पार ॥३०९॥ गुरु पारस गुरु परस है चंदन बास सुबास । सतगुरु पारस जीव को दीन्हों मुक्ति निवास ॥३१०॥ पंडित पढ़ि गुन पचि मुए गुरु बिन मिलै न ज्ञान । ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है सत्त शब्द परमान ॥३११॥ तोन लोक नौ खंड में गुरु ते बड़ा न कोइ । करता करै न करि सकै गुरू करै सो होइ ॥३१२॥ कबिरा हरि के रूठते गुरु के सरने जाय । कह कबीर गुरु रूठते हरि नहिं होत सहाय ॥३१३।। बस्तु कहीं ढूँढ़े कहीं केहि बिधि आवै हाथ । कह कबीर तब पाइये भेदी लीजे साथ ॥३१४॥</poem>}}<noinclude></noinclude> ksx37caks2nkaxbszmbc3vpprilmtbi पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२९ 250 72318 662623 554694 2026-03-31T15:43:02Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662623 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|(११९ )}} {{block center|<poem> जो यह एक न जानिया बहु जाने का होव । एक ते सव होत हैं सव ते एक न होय ॥२९॥ सत आए उस एक में डार पात फल फूल । अव कहु पाछे क्या रहा गहि पकड़ा जव मूल ||२९१॥ प्रीति वड़ी है तुझ से वहु गुनियाला कंत। जो हँस बोलों और से नील रँगाओं दंत ।।२९२।। कविरा रेख सिंदूर अरु काजर दिया न जाय । नैनन प्रीतम रमि रहा दूजा कहाँ समाय ॥२९३।। आठ पहर चौंसठ घड़ी मेरे और न कोय । नैना माहीं तू वसै नींद को ठौर न होय ||२९४।। अव तो ऐसी है परी मन अति निर्मल कीन्ह । मरने का डर छाँड़िके हाथ निधोरा लीन्ह ॥२९५।। सती विचारी सत किया काँटो सेज विछाय। लै सूनी पिय आपना चहुँ दिस अगिन लगाय ।।२९६।। सती न पीसै पीसना जो पीसै सो राँड़। साधू भीख न माँगई जो मागै सो भाँड़ ॥२६७।। सेज विछावै सुंदरी अंतर परदा होय। ' तन सौंपे मन दे नहीं सदासुहागिन सोय ॥२९८।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''सतगुरु'''}}}} {{block center|<poem> सतगुरु सम को है सगा साधू सम को दात । हरि समान को हितू है हरिजन सम को जात ॥२९९॥ गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाय। बलिहारी गुरु आपने गोविद दियो वताय ॥३०॥ बलिहारी गुरु आपने घड़ि घड़ि सौ सौ वार । मानुष से देवता किया करत न लागी वार ॥३०॥</poem>}}<noinclude></noinclude> rgdkyoobxd3giisoj0td2sx63qy5wby पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२८ 250 72319 662620 554693 2026-03-31T15:38:48Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662620 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( ११८ )}} {{block center|<poem> तीर तुपक से जो लड़े सो तो सूर न होय । माया तजि भक्ती करै सूर कहावै सोय ॥२७८।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''पातिव्रत'''}}}} {{block center|<poem> पतिवरता मैली भली काली कुचित कुरूप । पतिवरता के रूप पर वारों कोटि सरूप ॥२७९।। पतिवरता पति को भजै और न आन सुहाय । सिंह वचा जो लंघना तो भी घास न खाय ।।२८०।। नैनों अंतर श्राव तु नैन झाँपि तोहि लेव । ना मैं देखों और को ना तोहि देखन देव ॥२८॥ कविरा सीप समुद्र की रटै पियास पियास । और वृंद को ना गहै स्वाति बूँद की आस ।।२८२।। पपिहा का पन देखकर धीरज रहै न रंच । मरते दम जल में पड़ा तऊ न बोरी चंच ।।२८३।। सुंदर तो साँई भजे तजै पान की आस । ताहि न कबहूँ परिहरै पलक न छाँड़े पास ||२८|| चढ़ी अखाड़े सुंदरी माँडा पिव सो दल । दीपक जोया ज्ञान का काम करें या तेल ।।२८५।। सूग के तो सिर नहीं दाता के धन नाहि । पतिवरता के तन नहीं मुरति बसें मन माहि ।।२८।। पतिवरता मैली भली गले काँच का पोत । सब सखियन में या दिप ज्यां रविससि की जान 1२८७। पतिवरता पति को भज पति पर घर विश्वास । आन दिसा चित नहीं नदा पाय को श्रास ॥२८८।। नाम न रटा तो क्या पुत्रा जो अंतरहिन । पतियरता पति को भज मुम्ब से नाम न संत ।।२८।।</poem>}} .<noinclude></noinclude> ecbe4nlaxuhxrb2i5vest822zaj3awg पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२७ 250 72320 662618 554692 2026-03-31T15:35:41Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662618 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|(११९ )}} {{block center|<poem> जो यह एक न जानिया बहु जाने का होव । एक ते सव होत हैं सव ते एक न होय ॥२९॥ सत आए उस एक में डार पात फल फूल । अव कहु पाछे क्या रहा गहि पकड़ा जव मूल ||२९१॥ प्रीति वड़ी है तुझ से वहु गुनियाला कंत। जो हँस बोलों और से नील रँगाओं दंत ।।२९२।। कविरा रेख सिंदूर अरु काजर दिया न जाय । नैनन प्रीतम रमि रहा दूजा कहाँ समाय ॥२९३।। आठ पहर चौंसठ घड़ी मेरे और न कोय । नैना माहीं तू वसै नींद को ठौर न होय ||२९४।। अव तो ऐसी है परी मन अति निर्मल कीन्ह । मरने का डर छाँड़िके हाथ निधोरा लीन्ह ॥२९५।। सती विचारी सत किया काँटो सेज विछाय। लै सूनी पिय आपना चहुँ दिस अगिन लगाय ।।२९६।। सती न पीसै पीसना जो पीसै सो राँड़। साधू भीख न माँगई जो मागै सो भाँड़ ॥२६७।। सेज विछावै सुंदरी अंतर परदा होय। ' तन सौंपे मन दे नहीं सदासुहागिन सोय ॥२९८।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''सतगुरु'''}}}} {{block center|<poem> सतगुरु सम को है सगा साधू सम को दात । हरि समान को हितू है हरिजन सम को जात ॥२९९॥ गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाय। बलिहारी गुरु आपने गोविद दियो वताय ॥३०॥ बलिहारी गुरु आपने घड़ि घड़ि सौ सौ वार । मानुष से देवता किया करत न लागी चार ॥३०॥</poem>}}<noinclude></noinclude> t6z6q3lhqe2n39jwpi1fjsyfb8myqd2 662619 662618 2026-03-31T15:37:18Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662619 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|(११९ )}} {{block center|<poem> जो यह एक न जानिया बहु जाने का होव । एक ते सव होत हैं सव ते एक न होय ॥२९॥ सत आए उस एक में डार पात फल फूल । अव कहु पाछे क्या रहा गहि पकड़ा जव मूल ||२९१॥ प्रीति वड़ी है तुझ से वहु गुनियाला कंत। जो हँस बोलों और से नील रँगाओं दंत ।।२९२।। कविरा रेख सिंदूर अरु काजर दिया न जाय । नैनन प्रीतम रमि रहा दूजा कहाँ समाय ॥२९३।। आठ पहर चौंसठ घड़ी मेरे और न कोय । नैना माहीं तू वसै नींद को ठौर न होय ||२९४।। अव तो ऐसी है परी मन अति निर्मल कीन्ह । मरने का डर छाँड़िके हाथ निधोरा लीन्ह ॥२९५।। सती विचारी सत किया काँटो सेज विछाय। लै सूनी पिय आपना चहुँ दिस अगिन लगाय ।।२९६।। सती न पीसै पीसना जो पीसै सो राँड़। साधू भीख न माँगई जो मागै सो भाँड़ ॥२६७।। सेज विछावै सुंदरी अंतर परदा होय। ' तन सौंपे मन दे नहीं सदासुहागिन सोय ॥२९८।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''सतगुरु'''}}}} {{block center|<poem> सतगुरु सम को है सगा साधू सम को दात । हरि समान को हितू है हरिजन सम को जात ॥२९९॥ गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाय। बलिहारी गुरु आपने गोविद दियो वताय ॥३०॥ बलिहारी गुरु आपने घड़ि घड़ि सौ सौ वार । मानुष से देवता किया करत न लागी वार ॥३०॥</poem>}}<noinclude></noinclude> rgdkyoobxd3giisoj0td2sx63qy5wby पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२६ 250 72321 662617 554691 2026-03-31T15:33:31Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662617 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( ११८ )}} {{block center|<poem> तीर तुपक से जो लड़े सो तो सूर न होय । माया तजि भक्ती करै सूर कहावै सोय ।।२७८।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''पातिव्रत'''}}}} {{block center|<poem> पतिवरता मैली भली काली कुचित कुरूप । पतिवरता के रूप पर वारों कोटि सरूप ।।२७९।। पतिवरता पति को भजै और न आन सुहाय । सिंह वचा जो लंघना तो भी घास न 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/></noinclude>{{c|( ૧૨૭ )}} {{c|{{x-larger|'''मध्य पथ'''}}}} {{block center|<poem> पाया कहैं ते वावरे खोया कहें ते कूर। पाया खोया कछु नहीं ज्यों का त्यों भरपूर ॥२६७।। भनूँ तो को है भजन को तनँ तो का है श्रोन । भजन तजन के मध्य में सो कवीर मन मान ॥२६८।। अति का भला न बोलना अति का भला न चूप । अति का भला न वरसना अति की भली न धूप १२६९।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''शूर धर्म'''}}}} {{block center|<poem> गगन दमामा वाजिया पड़त निसाने घाव । खेत पुकारै शूरमा अव लड़ने का दाँव ॥२७॥ सूरा सोइ सराहिए लड़े धनी के हेत। पुरजा पुरजा होइ रहै तऊ न छाँडै खेत ।।२७१॥ सूरा सोइ सराहिए अंग न पहिरै लोह । जूझै सव बंद खोलिकै छाँड़े तन का मोह ।।२७२।। खेत न छाँडै सूरमा जूझै दो दल माहि । श्रासा जीवन मरन की मन में श्रानै नाहिं ॥२७३।। अब तो जूझै ही वनै मुड़ चाले घर दूर। सिर साहेव को सौंपते सोच न कीजै सूर ॥२७॥ सिर राखे सिर जात है सिर काटे सिर सोय। जैसे वाती दीप की कटि उँजियारा होय ॥२७॥ जो हारों तो सेव गुरु जो जीतो तो दाँव। सत्तनाम से खेलता जो सिर जाव तो जाप ॥२७॥ खोजी को डर वहुत है पल पल पड़े। विजोग । अन राखत जो तन गिरै सो तन साहेव जोग ।।२७७।।</poem>}}<noinclude></noinclude> 49lytfqwqawkljuyf746vrbaonwq8bx पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२४ 250 72323 662615 554689 2026-03-31T15:27:56Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662615 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( ११६ )}} {{block center|<poem> डुबकी मारी समुंद में निकसा जाय अकास । गगन मँडल में घर किया हीरा पाया दास ॥२५५।। हरि हीरा क्यों पाइहै जिन जीवे की आस । गुरु दरिया सो काढ़सी कोइ मरजीवा दास ॥२५६।। खरी कसौटी नाम की खोटा टिकै न कोय । नाम कसौटी सो टिकै जीवत मिरतक होय ॥२५७॥ मरते मरते जग मुआ औरस मुश्रा न कोय । दास कवीरा यो मुत्रा बहुरि न मरना होय ।।२५८।। जा मरने से जग डरै मेरे मन आनंद । कव मरिहों कव पाइहौं पूरन परमानंद ॥२५९।। घर जारे घर ऊवरे घर राखे घर जाय । एक अचंभा देखिया मुश्रा काल को खाय ।।२६०।। रोड़ा भया तो क्या भया पंथी को दुख देय । साधू ऐसा चाहिए ज्यों पैड़े की खेह ।।२६।। खेह भई तो क्या भया उड़ि उड़ि लागे अंग । साधू ऐसा चाहिए जैसे नीर निपंग ।।२६।। नीर भया तो क्या भया ताता सीरा जोय । साधू ऐसा चाहिए जो हरि जैसा होय ॥२६।। हरी भया तो क्या भया करता हरता होय । साधू ऐसा चाहिए हरि भज निरमल होय ॥२६॥ निरमल भया तो क्या भया निरमल माँग ठौर । मल निरमल से रहित है ते साधू कोर और ॥२६५।। ढारस लखु मरजीव को धंसिके पैटि पताल । जीव अटक माने नहीं गहि ले निको लाल ।।२६६।।</poem>}}<noinclude></noinclude> 1yegpqhh3aasgmrny9t1meh6f074pi1 पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२३ 250 72324 662612 554688 2026-03-31T14:56:08Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662612 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( ११५ )}} {{c|{{x-larger|'''सहज भाव'''}}}} {{block center|<poem> सहज सहज सव कोउ कहै सहज न चीन्है कोय । जा सहजै साहेब मिलै सहज कहात्रै सोय ॥२४॥ सहजै सहजै सब गया सुत वित काम निकाम । एकमेक है मिलि रहा दास कीरा नाम ॥२४६।। जो कछु आवे सहज में सोई मीठा जान । कडुवा लागै नीम सा जामें पेंचातान ॥२४॥ सहज मिलै सो दूध सम माँगा मिले सो पानि । कह कवीर वह रक्त सम जामें ऐंचातानि ॥२४८।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''मौन भाव'''}}}} {{block center|<poem> भारी कहूँ तो वहु डरूँ हलका कहूँ तो भाट । मैं का जानें पीव को नैना कळू न दीठ ।।२४९।। दीठा है तो कस कहूँ कहूँ तो को पतियाय । साँई जस तैसा रहो हरखि हरखि गुन गाय ॥२५०।। ऐसो अद्भुत मत कथो कथो तो धरो छिपाय । वेद कुराना ना लिखी कहूँ तो को पतियाय ॥२५॥ 'जो देखे सो कहै नहिं कहै सो देखै नाहि । सुनै सो समझा नहीं रसना दुग श्रुति काहिं ॥२५२॥ वाद विवादे विप धना वोले बहुत उपाध। मौन गहे सवकी सहै सुमिरै नाम अगाध ॥२५३॥</poem>}} {{c|{{x-larger|'''जीवन्मृत ( मरजीवा)'''}}}} {{block center|<poem> मैं मरजीव समुंद्र का डुबकी मारी एक। मूठी, लाया ज्ञान की जामें वस्तु अनेक ॥२५४॥</poem>}}<noinclude></noinclude> 42a6c08x8b7imdflqm3c60yu23g6znd पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२२ 250 72325 662611 554687 2026-03-31T14:53:36Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662611 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( ११४ )}} {{block center|<poem> कथनी वदनी छाँड़ि के करनी सो चित लाय । नरहिं नीर प्याए विना कवहूँ प्यास न जाय ॥२३२।। करनी विन कथनी कयै अज्ञानी दिन रात । कूकर ज्यों मूंकत फिरै सुनी सुनाई वात ।।२३३।। लाया साखि वनाय कर इत उत अच्छर काट । कह कवीर कब लग जिए जूठी पत्तल चाट ।।२३४॥ पानी मिलै न आप को औरन वकसत छीर । आपन मन निसचल नहीं और बँधावत धीर ।।२३५॥ कथनी थोथी जगत में करनी उत्तम सार। कह कवीर करनी सवल उतरै भी-जल पार ॥२३॥ पद जोरै साखी कहै साधन परि गई रौस । काढ़ा जल पीवै नहीं काढ़ि पियन की हौस ।।२३७।। साखी कह गहै नहीं चाल चली नहिं जाय । सलिल मोह नदिया वहै पाँव नहीं ठहराय ॥२३८॥ मारग चलते जो गिरै ताको नाहीं दोस । कह कवीर बैठा रहै ता सिर करड़े कोस ॥२३९।। कहता तो वहुता मिला गहता मिला न कोई। सो कहता वहि जान दे जो नहिं गहता होइ ।।२४०।। एक एक निरवारिया जो निरवारी जाय । दुइ दुइ मुख का बोलना बने तमाचा स्वाय ॥२४१।। मुख की मीठी जो कहें हृदया है मति यान । कद्द कबीर तेहि लोग सो रामो बड़े सयान ॥२४२।। जस कथनी तन करनियो जस चुंबक तस नाम । कह कबीर चुंबक बिना क्यों छूटे संग्राम ।।२४३।। श्रोता तो बरही नहीं वक्ता व सो बाद । श्रोता वक्ता पक घर नव कथनी को स्वाद ।।२४८।।</poem>}}<noinclude></noinclude> 5jr9gxg44cx15zcjpwke9s5csm2kkcw पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२१ 250 72326 662610 554686 2026-03-31T14:50:58Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662610 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( ११५ )}} {{c|{{x-larger|'''सहज भाव'''}}}} {{block center|<poem> सहज सहज सव कोउ कहै सहज न चीन्है कोय । जा सहजै साहेब मिलै सहज कहात्रै सोय ॥२४॥ सहजै सहजै सब गया सुत वित काम निकाम । एकमेक है मिलि रहा दास कीरा नाम ॥२४६।। जो कछु आवे सहज में सोई मीठा जान । कडुवा लागै नीम सा जामें पेंचातान ॥२४॥ सहज मिलै सो दूध सम माँगा मिले सो पानि । कह कवीर वह रक्त सम जामें ऐंचातानि ॥२४८।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''मौन भाव'''}}}} {{block center|<poem> भारी कहूँ तो वहु डरूँ हलका कहूँ तो भाट । मैं का जानें पीव को नैना कळू न दीठ ।।२४९।। दीठा है तो कस कहूँ कहूँ तो को पतियाय । साँई जस तैसा रहो हरखि हरखि गुन गाय ॥२५०।। ऐसो अद्भुत मत कथो कथो तो धरो छिपाय । वेद कुराना ना लिखी कहूँ तो को पतियाय ॥२५॥ 'जो देखे सो कहै नहिं कहै सो देखै नाहि । सुनै सो समझा नहीं रसना दुग श्रुति काहिं ॥२५२॥ वाद विवादे विप धना वोले बहुत उपाध। मौन गहे सवकी सहै सुमिरै नाम अगाध ॥२५३॥</poem>}} {{c|{{x-larger|'''जीवन्मृत ( मरजीवा)'''}}}} {{block center|<poem> मैं मरजीव समुंद्र का डुबकी मारी एक। मूठी, लाया ज्ञान की जामें वस्तु अनेक ॥२५४॥</poem>}}<noinclude></noinclude> 42a6c08x8b7imdflqm3c60yu23g6znd पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२० 250 72327 662609 554685 2026-03-31T14:48:03Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662609 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( ११४ )}} {{block center|<poem> कथनी वदनी छाँड़ि के करनी सो चित लाय । नरहिं नीर प्याए विना कबहूँ प्यास न जाय ॥२३२।। करनी विन कथनी कथै अज्ञानी दिन रात । कूकर ज्यों भुंकत फिरै सुनी सुनाई बात ॥२३३।। लाया साखि वनाय कर इत उत अच्छर काट । कह कवीर कव लग जिए जूठी पत्तल चाट ॥२३४॥ पानी मिलै न श्राप को औरन वकसत छीर । आपन मन निसचल नहीं और बँधावत धीर ।।२३५॥ कथनी थोथी जगत में करनी उत्तम सार। कह कवीर करनी सवल उतरै भौ-जल पार ॥२३३॥ पद जोरै साखी कहै साधन परि गई रौस । काढ़ा जल पीवै नहीं काढि पियन की हौस ॥२३७।। साखी कहें गहै नहीं चाल चली नहिं जाय । सलिल मोह नदिया वहै पॉव नहीं ठहराय ॥२३८॥ मारग चलते जो गिरै ताको नाहीं दोस। कह कवीर वैठा रहै ता सिर करड़े कोस ।।२३९!। कहता तो वहुता मिला गहता मिला न कोई। सो कहता वहि जान दे जो नहिं गहता होइ ॥२४०।। एक एक निरवारिया जो निरवारी जाय । दुइ दुइ मुख का बोलना घने तमाचा स्वाय ॥२४॥ सुख की मीठी जो कहें हृदया है मति यान । कह कवीर तेहि लोग सो रामौ बड़े सयान ॥२४२।। जम कथनी तस करनियो जस चुंबक तन नाम । कह कवीर चुंबक बिना क्यों छूटे संग्राम ।।२४३।। श्रोता तो बरही नहीं वक्ता वदे मो बाद । श्रोता वक्ता पक घर तब कथनी को स्वाद ।।२४८।।</poem>}}<noinclude></noinclude> alulbxm0gv9tkbhxba40epdcxq2hv2n पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/११९ 250 72328 662608 554683 2026-03-31T14:47:02Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662608 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( ११३ )}} {{block center|<poem> जैसा हूँढ़त मैं फिरौं तैसा मिला न कोय । ततवेता तिरगुन रहित निरगुन से रत होय ।।२२२।। सहि दूध पिलाइए सोई विष है जाय । ऐसा कोई ना मिला आपे ही विप खाय ।।२२३।। जिन हूँढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठि । मैं वपुरा वूड़न डरा रहा किनारे वैठि ।।२२४।। हेरत हेरत हेरिया रहा कवीर हिराय। बुंद समानी समुंद में सो कित हेरी जाय ॥२२५।। एक समाना सकल में सकल समाना ताहि । कविर समाना बूझ में तहाँ दूसरा नाहिं ।।२२६।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''दुबिधा'''}}}} {{block center|<poem> हिरदे माहीं पारसी मुख देखा नहिं जाय । मुख तौ तवहीं देखई दुविधा देइ वहाय ॥२२७॥ पढ़ा गुना सीखा सभी मिटा न संसय सूल । । कह कवीर कासों कहूँ यह सव दुख का मूल ॥२२८।। चींटी चावल ले चली विच में मिलि गइ दार। कह कवीर दोउ ना मिलै एक ले दूजी डार ।।२२९।। सत्त नाम कडुवा लगै मीठा लागे दाम । दुविधा में दोऊ गए माया मिली न राम ।।२३०॥</poem>}} {{c|{{x-larger|'''कथनी और करनी'''}}}} {{block center|<poem> कथनी मीठी खाँड़ सी करनी विष की लोय । कथनी तजि करनी करै विष से अमृत होय ।।२३।।</poem>}}<noinclude></noinclude> 2wc3nwmnn6i9l2ik4fik9bv1iffwb60 पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/११८ 250 72329 662607 554682 2026-03-31T14:44:24Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662607 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|(११२ )}} {{block center|<poem> पारस रूपी जीव है, लोह रूप. संसार ।' पारस ते पारस भया परख भया संसार ॥२१०।। अमृत केरी पूरिया बहु विधि लीन्हें छोर । आप सरीखा जो मिले ताहि पियाऊँ घोरि ।।२१।। काजर ही की कोठरी काजर ही का कोट । तौ भी कारो ना भई रही जो भोटाहिं ओट ॥२१२।। ज्ञान रतन की कोठरी चुप करि दीन्हों ताल । पारखि आगे खोलिए कुंजी वचन रसाल ॥२१३।। नग पखान जग सकल है लखि आवै सव कोइ । नग ते उत्तम पारखी जग में विरला कोइ ॥२१४।। बलिहारी तेहि पुरुप की पर चित परखनहार । साई दीन्हों खाँड़ को खारी बूझ गँवार ॥२१५।। हीरा वही सराहिए सहै घनन की चोट । कपट कुरंगी मानवा परखत निकसा खोट ॥२१६।। हरि हीरा जन जौहरी सवन पसारी हाट । जव आवै जन जौहरी तव हीरौ की साट ।।२१७॥ हीरा परा वजार में रहा छार लपटाय । वहुतक मूरख चलि गए पारखि लिया उठाय ।।२१८।। कलि खोटा जग आँधरा शब्द न मानै कोइ । जाहि कहीं हित श्रापना सो उठि वैरी होय ।।२१९।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''जिज्ञासु'''}}}} {{block center|<poem> पेला कोऊ ना मिला हमको दे उपदेस । भव सागर में इयता कर गहि काढ़े केस ।।२२०।। पना कोई ना मिला जासे रहिए लाग । सब जग जलता देखिया अपनी अपनी श्राग ।।२२।।</poem>}}<noinclude></noinclude> 6v4fgeapmtj9e2042wch7vra9182emo पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/११७ 250 72330 662606 554681 2026-03-31T14:43:00Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662606 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( १११)}} {{block center|<poem> 'नाँव न जाने गाँव का विन जाने कित जाँव । चलता चलता जुग भया पाच कोस पर गाँव ॥१९८।। चलन चलन सब कोइ कहै मोहिं अंदेसा और। साहेब सो परिचय नहीं पहुँचगे केहि ठौर ।।१९९।। जहा न चींटी चढ़ि सकै राई ना ठहराय । मनुवाँ तहँ लै राखिए तहई पहुँचे जाय ॥२०॥ वाट विचारी क्या करै पथी न चले सुधार। राह आपनी छाडिकै चलै उजार उजार ॥२०१।। मरिये तो मरि जाइये छूटि परै जंजार । ऐसा मरना को मरै दिन में सौ सौ बार ॥२०२।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''परीक्षक [पारखी]'''}}}} {{block center|<poem> हीरा तहाँ न खोलिए जहँ खोटी है हाट । कस करि वाँधो गाठरी उठ कर चालो वाट ।।२०३।। 'हीरा पाया परखि के धन में दीया प्रान । चोट सही फूटा नहीं तव पाई पहिचान ||२०४।। जो हंसा मोती चुगै काँकर क्यों पतियाय । काँकर माथा ना नवै मोती मिले तो खाय ।।२०५।। हंसा वगुला एक सा मानसरोवर माहिं । वगा ढंढोरे माछरी हंसा मोती खाहिं ॥२०६।। चंदन गया विदेसड़े सव कोइ कहै पलास । ज्यों ज्यों चूल्हे झोकिया त्यों त्यों अधकी वास ।।२०७।। एक अचंभो देखिया हीरा हाट विकाय । परखनहारा वाहिरी कौड़ी वदले जाय ॥२०८।। दाम रतन धन पाइकै गाँठि चाँधि ना खोल। नाहिं पटन नहिं पारखी नहि गाहक नहिं मोल ॥२०९।।</poem>}}<noinclude></noinclude> itpkxq9l6ct8b94o8zbejrhk3hts7lh पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/११६ 250 72331 662605 554680 2026-03-31T14:40:57Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662605 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( ११० )}} {{block center|<poem> क्या मुख लै विनती करौं लाज श्रावत है मोहिं । तुम देखत अवगुन करौं कैसे भावो तोहि ।।१८।। मैं अपराधी जनम का नख सिख भरा विकार । तुम दाता दुख-भंजना मेरी करो सम्हार ।।१८७॥ अवगुन मेरे वाप जी वकस गरीव-निवाज । जो मैं पूत कपूत हौं तऊ पिता को लाज ||१८८।। अवगुन किए तो बहु किए करत न मानी हार। भावें बंदा वकसिए भा गरदन मार ॥१८९।। साहेब तुम जनि वीसरो लाख लोग लगि जाहिं। हमसे तुमरे बहुत हैं तुम सम हमरे नाहि ।।१९०१ अंतरजामी एक तुम आतम के आधार । नो तुम छोड़ो हाथ तो कौन उतारै पार ॥१९॥ मेरा मन जो तोहिं सों तेरा मन कहिं और । कह कबीर कैसे निभै एक चित्त दुइ ठोर ।।१९२।। मन परतीत न प्रेम रस ना कछु तन में ढंग । ना जानौ उस पीव से क्योंकर रहसी रंग ॥१९३।। मेरा मुझमें कुछ नहीं जो कुछ है सो तोर । तेरा तुझको सौंपते क्या लागत है मोर ॥१९॥ 'तुम तो समरथ साँइयाँ दृढ़ करि पकरो वाँहि । धुरही लै पहुँचाइयो जनि छाँडो मग माहि ।।१९५।।</poem>}} {{c|{{x-larger|'''सूक्ष्म मार्ग'''}}}} {{block center|<poem> उत ते कोई न वाहुरा जासे दूम धाय । इत ने सवही जात है भार लदाय लदाय ॥१९॥ 'यार बुलावै भाव सो मोपे गया न जाय। 'धन मैली पिउ ऊजला लागि न सो पाय ।।१९७।।</poem>}}<noinclude></noinclude> 2zrjcj8wn3596f9hplrz8vpoxgfl1n5 पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/११५ 250 72332 662604 554679 2026-03-31T14:38:41Z चाहर धर्मेंद्र 4225 662604 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सनी प्रसाद चौरसिया" /></noinclude>{{c|( १०९ )}} {{block center|<poem> सो दिन कैसा होयगा गुरू गहेंगे वाहि । अपनाकर बैठावहीं चरनकँवल की छाँहि ।।१७४।। जो जन विरही नाम के सदा मगन मन माँहि । ज्यों दरपन की सुंदरी किन पकड़ी नाहिं ।।१७।। । चकई विछुरी रैन की श्राय मिली परभात । सतगुरु से जो वीछुरे मिले दिवस नहिं रात ।।१७।। विरहिन उठि उठि भुइँ परै दरसन कारन राम । मूए पीछे देहुगे सो दरसन केहि काम ।।१७।। मूए पाछे मत मिलौ कहै कवीरा राम । लोहा माटी मिलि गया तव पारस केहि काम ।।१७८।। सब रग ताँत रवाव तन विरह वजावै नित्त । और न कोई सुनि सकै कै. साँई कै चित्त ॥१७९|| तूं मति जानै वीसीं प्रीति घटै मम चित्त । । मरूँ तो तुम सुमिरत मरूँ जिऊँ तो सुमिरु नित्त ।।१८०॥ विरह अगिन तन मन जला लागिरहा तत जीव । कै वा जाने विरहिनी कै जिन भेंटा पीव ।।१८।। 'विरह कुल्हारी तन वहै घाव न वाँधै रोह । मरने का संसय नहीं छूटि गया भ्रम मोह ।।१८।। कविरा वैद · बुलाइया पकरि के देखी वाँहि । वैद न वेदन जानई करक कलेजे माहिं ॥१८३।। विरह वान जेहि लागिया औषध लगत न ताहि । सुसुकि सुसुकि मरि मरि जियै उठै कराहि कराहि ॥१८॥</poem>}} {{c|{{x-larger|'''विनय'''}}}} {{block center|<poem> सुरतिकरौ मेरे साँइयाँ हम हैं भव-जल माहि। आपे' ही 'वहि जायँगे जो नहिं पकरौ वाहि ।।१८५।।</poem>}}<noinclude></noinclude> o39che2b4myk7mn5qsb8orbh001qu7i पृष्ठ वार्ता:कबीर वचनावली.djvu/१२३ 251 193452 662613 2026-03-31T15:03:17Z चाहर धर्मेंद्र 4225 "[[पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२१]] दोनों की सामग्री बिल्कुल एक जैसा है।" के साथ नया पृष्ठ बनाया 662613 wikitext text/x-wiki [[पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२१]] दोनों की सामग्री बिल्कुल एक जैसा है। 14n2zo891dx5c7dumxldl6fwdbbe9ev पृष्ठ वार्ता:कबीर वचनावली.djvu/१२० 251 193453 662614 2026-03-31T15:24:46Z चाहर धर्मेंद्र 4225 "[[पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२२]] दोनों की सामग्री बिल्कुल एक जैसा है।" के साथ नया पृष्ठ बनाया 662614 wikitext text/x-wiki [[पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२२]] दोनों की सामग्री बिल्कुल एक जैसा है। 9s7srbmnhse05r317wecmiovgnepk1z पृष्ठ वार्ता:कबीर वचनावली.djvu/१२६ 251 193454 662621 2026-03-31T15:40:34Z चाहर धर्मेंद्र 4225 "[[पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२८]] दोनों की सामग्री बिल्कुल एक जैसा है।" के साथ नया पृष्ठ बनाया 662621 wikitext text/x-wiki [[पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२८]] दोनों की सामग्री बिल्कुल एक जैसा है। iyh4x0g5qn70k76ef7f1or9e5cof5p9 पृष्ठ वार्ता:कबीर वचनावली.djvu/१२७ 251 193455 662622 2026-03-31T15:42:08Z चाहर धर्मेंद्र 4225 "[[पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२९]] दोनों की सामग्री बिल्कुल एक जैसा है।" के साथ नया पृष्ठ बनाया 662622 wikitext text/x-wiki [[पृष्ठ:कबीर वचनावली.djvu/१२९]] दोनों की सामग्री बिल्कुल एक जैसा है। gomh9i7xo9t0wk6qg1vfkkxm2rfay4h