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पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/६४९
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{{c|अस्य उदाहरण}}
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| मु{{gap}} वाँ{{gap}} नी || नि{{gap}} वाँ {{gap}}नी || स्रि {{gap}}डाँ{{gap}} जी || भ{{gap}} वाँ{{gap}} नी।
|-
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|सु{{gap}} चं{{gap}} डी || प्र{{gap}} चं {{gap}}डी || अ {{gap}}खं{{gap}} डी || अ{{gap}} डं{{gap}} डी॥
|}
{{c|अथ सरबतोमुख चित्रालंकार जथा—}}
{{block center|<poem>'''मारा रामु; मुरा रामा, रास जाँनि निजाँ खरा।
'''राजा रबी, बीर जारा, मुनि बीसु सुबी निम्॥</poem>}}
{{c|अस्य उदाहरन}}
{| class= "wikitable center"
|१मा||रा|| रा||मु|| मु||रा||रा|| मा
|-
|२रा||स||जाँ||नि||नि||जाँ||स|| रा
|-
|३रा||जा|| र||बी|| बी||र||जा|| रा
|-
|४मु ||नि|| बी|| सु ||सु|| बी|| नि|| मु
|-
|मु|| नि|| बी|| सु|| सु ||बी|| नि ||मु४
|-
|रा||जा|| र||बी|| बी||र||जा|| रा३
|-
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|-
|मा||रा|| रा||मु|| मु||रा||रा|| मा१
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| मु वाँ नी || नि वाँ नी || स्रि डाँ जी || भ वाँ नी।
|-
|द या लीं || क्रि पा ली || सु चा ली || वि सा ली॥
|-
|वि रा जै || सु रा जै || ख ला जै || सु सा जै।
|-
|सु चं डी || प्र चं डी || अ खं डी || अ डं डी॥
|}
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|मु|| नि|| बी|| सु|| सु ||बी|| नि ||मु<sub>४</sub>
|-
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|-
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{{c|अथ सरबतोमुख चित्रालंकार जथा—}}
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'''राजा रबी, बीर जारा, मुनि बीसु सुबी निम्॥</poem>}}
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पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/६४८
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||काव्य-निर्णय|६१३}}</noinclude>और बा" द्वितीय चरण का दूसरा, चौथा, छठवाँ, आठवाँ, दसत्रों, बारहवाँ, चौदहवाँ और सोलहवाँ अक्षर हाँ, हाँ, रे, रें, रें, थ, तु, न" से संयोग करने पर "मंत्र-गति” रूप में यह अलंकार बनता है। संस्कृत में इसका दूसरा नाम—"गोमूत्रिका चित्रालंकार" है।
{{c|अथ अस्व-गति चित्रालंकार जथा—}}
{{block center|<poem>'''जहाँ-जहाँ प्यारे फिरे, घरे हाथ धँन-बाँन।
'''तहाँ-तहाँ तारे बिरे, करें' साथ मँनु प्राँन॥</poem>}}
{{c|अस्य उदाहरन}}
{|class = "wikitable center"
|ज<sup>१</sup>||हाँ<sup>१८</sup>||ज<sup>३ ०</sup>||हाँ<sup>५</sup>|| प्या<sup>५</sup>||लें<sup>२३</sup>||फि<sup>७</sup>||रें<sup>२४</sup>
|-
|घ<sup>९</sup>||रें<sup>२६</sup>||हा<sup>११</sup>||थ<sup>२८</sup>||धँ<sup>१३</sup>||नु<sup>३०</sup>||बाँ<sup>१५</sup>||न<sup>३२</sup>
|-
|त<sup>१७</sup>||हाँ<sup>२</sup>||तो<sup>१९</sup>||हाँ<sup>४</sup>||ता<sup>३१</sup>||रे<sup>६</sup>||घि<sup>२३</sup>||रेंं<sup>८</sup>
|-
|क<sup>२५</sup>||रें<sup>१०</sup>||सा<sup>२७</sup>||थ<sup>१३</sup>||में<sup>२९</sup>||नु<sup>१४</sup>||प्राँ<sup>३१</sup>||न<sup>१६</sup>॥
|}
वि॰—'यह दासजी कृत "अश्व-गति"—शतरंज (खेल) के घोड़े की भाँति ढाई घर चलने की चाल से पढ़ा जाने वाला 'चित्रालंकार है, जो बत्तीस-कोष्ठकों (घरों) में विभक्त है। इसे चित्र में दिये गये अंकानुसार पढ़ने से ऊपर उद्धृत दोहा-छंद बनता है।"
{{c|अथ सुमुख-बंध चित्रालंकार जथा—}}
{{block center|<poem>'''सुबाँनी, निदाँनी, स्रिड़ाँनी भबाँनी।
'''दयाली, क्रिपाली{{ref|१}}, सुचाली, बिसाली॥
'''बिराजै, सुराजै, खलाजै, सु साजै।
'''सु चंडी, प्रचंडी, अखंडी, अदंडी॥</poem>}}
वि॰—"दासजी कृत यह "सुमुख-बद्ध" चित्रालंकार नीचे लिखे अनुसार सोलह प्रकार से छंद (भुजंगप्रयात) बनाता है। चाहें जहाँ से चरण-गत चार-चार शब्दों को लेकर उलटते-पलटते क्रमशः (अनेक) छंद बन सकते हैं।" यह उदाहरण—कामधेनु, सर्वतोमुख या भद्र रूप से भी लिखा, या कहा जा सकता है।"
<noinclude>पा॰— <small>{{Note|१}} (प्र॰) कपाली<sup>. . .</sup>।</small></noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||काव्य-निर्णय|६१३}}</noinclude>और बा" द्वितीय चरण का दूसरा, चौथा, छठवाँ, आठवाँ, दसत्रों, बारहवाँ, चौदहवाँ और सोलहवाँ अक्षर हाँ, हाँ, रे, रें, रें, थ, तु, न" से संयोग करने पर "मंत्र-गति” रूप में यह अलंकार बनता है। संस्कृत में इसका दूसरा नाम—"गोमूत्रिका चित्रालंकार" है।
{{c|अथ अस्व-गति चित्रालंकार जथा—}}
{{block center|<poem>'''जहाँ-जहाँ प्यारे फिरे, घरे हाथ धँन-बाँन।
'''तहाँ-तहाँ तारे बिरे, करें' साथ मँनु प्राँन॥</poem>}}
{{c|अस्य उदाहरन}}
{|class = "wikitable center"
|ज<sup>१</sup>||हाँ<sup>१८</sup>||ज<sup>३ ०</sup>||हाँ<sup>२</sup>|| प्या<sup>५</sup>||ले<sup>२३</sup>||फि<sup>७</sup>||रें<sup>२४</sup>
|-
|घ<sup>९</sup>||रें<sup>२६</sup>||हा<sup>११</sup>||थ<sup>२८</sup>||धँ<sup>१३</sup>||नु<sup>३०</sup>||बाँ<sup>१५</sup>||न<sup>३२</sup>
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|त<sup>१७</sup>||हाँ<sup>२</sup>||त<sup>१९</sup>||हाँ<sup>४</sup>||ता<sup>३१</sup>||रे<sup>६</sup>||घि<sup>२३</sup>||रेंं<sup>८</sup>
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|}
वि॰—'यह दासजी कृत "अश्व-गति"—शतरंज (खेल) के घोड़े की भाँति ढाई घर चलने की चाल से पढ़ा जाने वाला 'चित्रालंकार है, जो बत्तीस-कोष्ठकों (घरों) में विभक्त है। इसे चित्र में दिये गये अंकानुसार पढ़ने से ऊपर उद्धृत दोहा-छंद बनता है।"
{{c|अथ सुमुख-बंध चित्रालंकार जथा—}}
{{block center|<poem>'''सुबाँनी, निदाँनी, स्रिड़ाँनी भबाँनी।
'''दयाली, क्रिपाली{{ref|१}}, सुचाली, बिसाली॥
'''बिराजै, सुराजै, खलाजै, सु साजै।
'''सु चंडी, प्रचंडी, अखंडी, अदंडी॥</poem>}}
वि॰—"दासजी कृत यह "सुमुख-बद्ध" चित्रालंकार नीचे लिखे अनुसार सोलह प्रकार से छंद (भुजंगप्रयात) बनाता है। चाहें जहाँ से चरण-गत चार-चार शब्दों को लेकर उलटते-पलटते क्रमशः (अनेक) छंद बन सकते हैं।" यह उदाहरण—कामधेनु, सर्वतोमुख या भद्र रूप से भी लिखा, या कहा जा सकता है।"
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