विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.46.0-wmf.23 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:काव्य-निर्णय.djvu/६५३ 250 68094 662664 662396 2026-04-09T18:46:30Z ममता साव9 2453 साँचा:Block center में सुधार. 662664 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|६१८|काव्य-निर्णय|}}</noinclude>सभी ने अपनी-अपनी प्रतिभा के कारण इस क्षेत्र में जोर-अजमाई की है...। अस्तु, ब्रजभाषा में कुछ विशिष्ट विद्वानों-आचार्यों द्वारा मान्य संख्या इस प्रकार है, जैसे—आचार्य केशवदास ३७, भाषाभूषण-रचयिता महाराज जसवंतसिंह (जोधपुर) १०४, मतिराम त्रिपाठी ६७, आपके भाई कविवर भूषण ६५, देव ३९ .....इत्यादि। अन्य आचार्य जैसे——पद्माकर, ग्वाल, नवनीत-आदि के भी नाम लिये जा सकते हैं। इन महानुभावों ने भी अलंकार-संख्या में पार्थक्य का पल्ला नहीं पकड़ा है, सबने अपनी-अपनी राह अलग-अलग बनायी है। फिर भी दासजी मान्य संख्या सबसे अधिक है, यह निर्विवाद सिद्ध है। ज्ञात होता है आचार्य भिखारी दासजी ने अलंकार निदेर्शन में——उसके शास्त्र के अध्ययन में गहरी दृष्टि से काम लिया है। आप अपने से पूर्व और पर सभी ब्रजभाषा-रीति आचार्यों से आगे बढ़ गये हैं। अलंकारों का आपने सुंदर विकास किया है——उन्हें संस्कृत के अलंकार शास्त्र-निष्णात आचार्य उद्भट के समान अपनी पैनी दृष्टि से निरख-परखकर एक निराली वेष-भूषा में प्रस्तुत किया है।” {{block center|<small><poem>{{gap}}'''इति श्रीसकलकलाधरकलाधरबंसावतंस श्रीमन्महाराज कुँमार''' {{gap}}{{gap}}'''श्रीबाहिदूपति बिरचिते ‘काव्य-निरनए’ चित्र-काव्य-''' {{gap}}{{gap}}{{gap}}'''बरनोननाम इकबिंसतिमोल्लासः॥”'''</poem></small>}} {{dhr}} {{C|{{rule|2em}}}}<noinclude></noinclude> lib9kbi9anzbd9r1c9jipucnqdf0n9o