विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.6 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२९९ 250 3167 662763 637732 2026-06-12T18:11:03Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662763 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|६१४ | | [ कबीर}} {{outdent|देता है। गाय घास खाकर अमृतोपम दूध देती है और इसको चाटकर सर्प भी बल प्राप्त करता है—उसके भी विष की वृद्धि होती है। अभिप्रेत अर्थ यह है कि दुष्ट जन अच्छी से अच्छी बात का दुरुपयोग करते हैं। अनेक प्रकार के उपायों द्वारा वासना को दमन करने पर भी विषयों के प्रति आसक्ति निःशेष नहीं हो पाती है। जो साधु-वेष धारण करके भी दुष्टों की संगति करता है, उसके लिए क्या कहा जाए और क्या किया जाए? कबीरदास कहते हैं कि जो व्यक्ति भगवान राम में पूर्ण रूप से अनुरक्त होते हैं, उन्हीं का मोह भ्रम नष्ट होता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार''' — (i) सम्बन्धातिशयोक्ति — राम ॰॰॰ जाई । :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) पदमैत्री — जस तस । :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) दृष्टान्त — कहता न जाई । :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) विभावना — अनेक ॰॰॰ जाई । :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) रूपकातिशयोक्ति — अमृत, भवगम । :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vi) सभंग पद यमक — सन्त असन्त । :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vii) गूढोक्ति — तासू ॰॰॰ वसाई । :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष''' — जैसी कहै ॰॰॰ अपारा । :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''तुलना कीजिए''' — :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कर्म प्रधान विश्व कर राखा । जो जस करइ सो तस फल चाखा । {{outdent|तथा — परउपदेस कुसल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ।}} {{right|(गोस्वामी तुलसीदास)}} {{center|( २०१ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कथणीं वदणीं सब जंजाल, &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;भाव भगति अरु रांम निराल ॥ टेक ॥ कथै वदै सुणै सब कोई, कथ्यै न होई कीयें होइ । कूड़ी करणी रांम न पावै, साच टिकै निज रूप दिखावै ॥ घट मै अगिनि घर जल अवास, चेति बुझाइ कबीरादास ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ''' — कथणी = कहना, धर्मोपदेश । वदणी = देश सम्बन्धी आचरण अर्थात् बाह्योपचार । कूड़ी = निकामी, व्यर्थ की । करणी = आचरण । बदै = विवाद । अवास = निवास स्थान । अग्नि = वासनाओं की अग्नि । जल = आनन्द रूपी जल ।}} {{outdent|'''संदर्भ''' — कबीरदास कहते हैं कि आत्म-ज्ञान के द्वारा ही कल्याण सम्भव है।}} {{outdent|'''भावार्थ''' — धर्मोपदेश एवं बाह्योपचार सब व्यर्थ का झमेला है। भगवान राम का स्वरूप एवं उनके प्रति भक्ति भाव — ये दोनों अनोखी वस्तु हैं। धर्मोपदेश, विचार तथा भाव सब करते हैं, परन्तु वास्तविक लाभ तो धर्मानुसार आचरण (धर्माचरण) से होता है, इसी करने पर ही मोह नष्ट होता है। विकारों के निष्कास्य आचरणों (दुष्कर्मों) से}}<noinclude></noinclude> 7jenk2jx5ylszh4csup04uxpq3mufao पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३०१ 250 3171 662764 592453 2026-06-12T18:14:28Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662764 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|६१६ | | [ कबीर}} {{outdent|के अनुसार अन्य शरीर मे प्रवेश कर सकता है। उस साधक को स्वर्ण-निर्माण, की सामर्थ्य और गुप्तधन की दृष्टि भी प्राप्त होजाती है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''सन्दर्भ'''—इस पद मे हठयोग के साधक अवधूत का कथन है। कुण्डलिनी से ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचने की प्रक्रिया का वर्णन है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''भावार्थ'''—ऊपर सहस्रार का कूप है और नीचे रहने वाली कुण्डलिनी इसका पानी भरती है। जब तक सहस्रार रूपी गगन मे शुद्धात्मा की ज्योति प्रति-फलित होकर साधक को दिखाई नही देती तब तक अविनाशी ब्रह्म के प्रति उसका मन अनुरक्त नही होता है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कबीरदास अपने आपको साधक मानकर कहते है कि जब तक मुझे ब्रह्मरन्ध्र का ज्ञान प्राप्त न हो, तब तक भला मुझे (अथवा किसी साधक को) किस प्रकार संतोष प्राप्त हो सकता है ? जब तक साधक त्रिकुटी की संधि से परिचित होकर सहस्रार स्थित चन्द्र और मूलाधार स्थित सूर्य को पास-पास नही लाता है—पिंगला और इडा नाडियो के मध्य समन्वय स्थापित नही करता है, जब तक वह नाभि-स्थित मणिपूरक चक्र का चिंतन नही करता है, तब तक वह शुद्ध चित्त रूपी हीरे द्वारा शुद्धात्मा रूपी हीरे को कैसे वेध सकता है ? अभिप्रेत भाव यह है कि आज्ञा-चक्र मे स्थित त्रिकुटी का ज्ञान प्राप्त होजाने पर इडा और पिंगला का अन्तर समाप्त हो जाता है तथा मणिपूरक चक्र पर चिन्तन करने पर ही ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव होती है। सोलह कला से युक्त चन्द्र जहाँ सहस्रार पर सुशोभित रहता है, वही अनाहत का वाद्य भी बजता है। भाव यह है कि ब्रह्मरन्ध्र वाले सहस्रदल कमल मे ब्रह्म का निवास है। सिद्धि प्राप्त कर लेने पर योगी को वही पर अनाहदनाद (The voice of the silence) सुनाई पड़ता है। सिद्धि मिलने पर ही सुषुम्ना मे आनन्द उत्पन्न होता है तथा सहस्रार के उलटे कमल मे गोविन्द को प्राप्त करता है। साधन द्वारा जब मन और प्राण वायु मिल जाते है, तब मन और परमात्मा मिलकर इस प्रकार एक होजाते हैं जिस प्रकार नाले-नालियो का जल गंगा के बहते हुए जल मे मिलकर एक मेल होजाते है। कबीरदास कहते हैं कि इस प्रकार अपने शरीर के भीतर ही सब कुछ समझलो तथा सहस्रार के घाट-रहित स्थान मे मोक्ष की प्यारी को आनन्दामृत से सींच लो। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''—(i) असंगति—ऐसी ॰॰॰ वाणी। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) रूपक—भवर गुफा, नाभि कमल, हीरै मन, हीरै पवन, :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;औघट घाट प्यारी। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) विरोधाभास की व्यंजना—औघट घाट। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) यमक—हीरै हीरा। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) उदाहरण—ज्यूं भइया। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''—(१) कबीरदास ने हठयोग की प्रक्रिया को बड़े ही सविस्तारपूर्ण ढंग {{outdent|पर रोचक शैली में समझा कर सुगम बनाया है कि किस प्रकार इसी शरीर में}}<noinclude></noinclude> f4q2myxyamvkrm65dweztkcey426s4w पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३०५ 250 3174 662767 592456 2026-06-12T18:21:42Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662767 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|६२० | | [ कबीर}} {{outdent|वह ज्ञान और भक्ति के समन्वय से उत्पन्न प्रेम के महारस का पान करने लगता है और कायायोग एवं ध्यान योग द्वारा प्राप्त होने वाले अमृत का पान करता है। वह ज्ञान की अग्नि में शरीर को जलाने वाली वासनाओं को भस्म कर देता है तथा अजपा जाप (अनहद नाद) मे लवलीन रहता है। वह जगत् से विमुख होकर चेतना को त्रिकुटी में स्थित कर देता है और इस प्रकार समाधिस्थ हो जाता है। सहज समाधि में स्थित होकर वह समस्त विषयों को त्याग देता है। वह इडा, पिंगला एव सुषुम्ना के मिलन-बिन्दु रूप त्रिवेणी मे अवगाहन करता है तथा आनन्द की विभूति को अपने अन्त करण मे रमाकर मन को वासनाओं से रहित करके पवित्र करता है। कबीर अलख निरंजन प्रभु की भक्ति करता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) रूपक—महारस अमृत, ब्रह्म अग्नि, त्रिवेणी विभूति। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) विरोधाभास—अजपा जाप। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) भक्तों की भाँति कबीरदास निर्गुण ब्रह्म की भक्ति करते हैं और सेव्य-सेवक भाव का आरोप करते हैं। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) कायायोग, ज्ञान एव भक्ति की त्रिवेणी दृष्टव्य है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) अमृत—देखें टिप्पणी पद सं० ४ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अजपा जाप—देखें टिप्पणी पद सं० १५७ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;उन्मनी—देखें टिप्पणी पद सं० २०३ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;त्रिकुटी—देखें टिप्पणी पद सं० ४ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अलख निरंजन—देखें टिप्पणी पद सं० १४२ व १६० :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;सहज समाधि—देखें टिप्पणी पद सं० ७ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) त्रिवेणी—देखें टिप्पणी पद सं० ४, ७ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) इस पद मे कायायोग और भक्ति का सुन्दर समन्वय है। {{center|( २०५ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;या जोगिया की जुगति जु वूझै, &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;रांम रमै ताकौ त्रिभुवन सूझै ॥ टेक ॥ प्रगट कथा गुपत अघारी, तामै मूरति जीवनि प्यारी ॥ है प्रभू नेरै खोजै दूरि, ग्यान गुफा मै सींगी पूरि ॥ अमर वेलि जो छिन छिन पीवै, कहै कबीर सो जुगिजुगि जीवै ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''—कंथा = गुदड़ी। कंथा धारी = योगी। अघारी = गगन-मण्डल की। नेरै = पास। सींगी = शृंगी, योगियों द्वारा प्रयुक्त सींग का वाद्य। अमरवेलि = ज्ञानरूपी बेलि।}} {{outdent|'''संदर्भ'''—कबीरदास कायायोग की महिमा का वर्णन करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''—इस कायायोग की साधना करने वाले साधक योगी के विषय में रहस्य को समझ कर जो राम में रमण करता है अर्थात् जो राममय हो जाता है, उसको तीनों लोक दिखाई देने लगते हैं अर्थात् वह त्रिकालदर्शी बन जाता है।}}<noinclude></noinclude> 74srkpos22qokzelvxv7wrlicy7ggfn 662768 662767 2026-06-12T18:22:21Z Manvikesarwani09 6620 662768 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude> {{outdent|वह ज्ञान और भक्ति के समन्वय से उत्पन्न प्रेम के महारस का पान करने लगता है और कायायोग एवं ध्यान योग द्वारा प्राप्त होने वाले अमृत का पान करता है। वह ज्ञान की अग्नि में शरीर को जलाने वाली वासनाओं को भस्म कर देता है तथा अजपा जाप (अनहद नाद) मे लवलीन रहता है। वह जगत् से विमुख होकर चेतना को त्रिकुटी में स्थित कर देता है और इस प्रकार समाधिस्थ हो जाता है। सहज समाधि में स्थित होकर वह समस्त विषयों को त्याग देता है। वह इडा, पिंगला एव सुषुम्ना के मिलन-बिन्दु रूप त्रिवेणी मे अवगाहन करता है तथा आनन्द की विभूति को अपने अन्त करण मे रमाकर मन को वासनाओं से रहित करके पवित्र करता है। कबीर अलख निरंजन प्रभु की भक्ति करता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) रूपक—महारस अमृत, ब्रह्म अग्नि, त्रिवेणी विभूति। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) विरोधाभास—अजपा जाप। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) भक्तों की भाँति कबीरदास निर्गुण ब्रह्म की भक्ति करते हैं और सेव्य-सेवक भाव का आरोप करते हैं। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) कायायोग, ज्ञान एव भक्ति की त्रिवेणी दृष्टव्य है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) अमृत—देखें टिप्पणी पद सं० ४ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अजपा जाप—देखें टिप्पणी पद सं० १५७ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;उन्मनी—देखें टिप्पणी पद सं० २०३ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;त्रिकुटी—देखें टिप्पणी पद सं० ४ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अलख निरंजन—देखें टिप्पणी पद सं० १४२ व १६० :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;सहज समाधि—देखें टिप्पणी पद सं० ७ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) त्रिवेणी—देखें टिप्पणी पद सं० ४, ७ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) इस पद मे कायायोग और भक्ति का सुन्दर समन्वय है। {{center|( २०५ )}} &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;या जोगिया की जुगति जु वूझै, &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;रांम रमै ताकौ त्रिभुवन सूझै ॥ टेक ॥ प्रगट कथा गुपत अघारी, तामै मूरति जीवनि प्यारी ॥ है प्रभू नेरै खोजै दूरि, ग्यान गुफा मै सींगी पूरि ॥ अमर वेलि जो छिन छिन पीवै, कहै कबीर सो जुगिजुगि जीवै ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''—कंथा = गुदड़ी। कंथा धारी = योगी। अघारी = गगन-मण्डल की। नेरै = पास। सींगी = शृंगी, योगियों द्वारा प्रयुक्त सींग का वाद्य। अमरवेलि = ज्ञानरूपी बेलि।}} {{outdent|'''संदर्भ'''—कबीरदास कायायोग की महिमा का वर्णन करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''—इस कायायोग की साधना करने वाले साधक योगी के विषय में रहस्य को समझ कर जो राम में रमण करता है अर्थात् जो राममय हो जाता है, उसको तीनों लोक दिखाई देने लगते हैं अर्थात् वह त्रिकालदर्शी बन जाता है।}}<noinclude></noinclude> ii9q8lrpd055at0nemhn7zpfnywawzb पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३०६ 250 3175 662769 592457 2026-06-12T18:24:46Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662769 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{ ६२१}} {{outdent|साक्षात्कार करता है। बाहर से दिखाई देने वाली गुदड़ी वस्तुतः योगी के शरीर का प्रतीक है। उसकी लकड़ी नामक 'अधारी' वह आधार है जिसमें अवस्थित होकर परम तत्त्व की साधना करता है। उसी मूल तत्त्व मे उसकी प्राण-प्यारी मूर्ति विराजमान है। वे प्रभु जीव के सदैव पास (हृदय) मे ही रहते हैं, परन्तु जीव उनको इधर-उधर (अपने आप से पृथक् स्थलों मे) खोजता रहता है। अनहद नाद रूपी संगीत अन्तःकरण (सहस्रार) रूपी गुफा मे उपलब्ध है, परन्तु जीव शृंगी मे शब्द के उस अनहद नाद को सुनना चाहता है अर्थात् वह अपने स्वरूप मे प्रतिष्ठित होने की अपेक्षा शृंगीनाद का श्रवण करता है। अभिप्रेत अर्थ यह है कि इस प्रकार का योगी आत्म स्वरूप मे प्रतिष्ठित होने की अपेक्षा बहिरंग मे ही उलझा रहता है, परन्तु जो साधक ज्ञान और भक्ति रूपी महारस की अमर बेलि के रस को प्रतिक्षण पीता रहता है, वह अमरत्व को प्राप्त होता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) छेकानुप्रास——जोगिया जुगति। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) रूपकातिशयोक्ति—कथा, अधारी, गुफा। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) रूपक——अमर बेलि। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) पुनरुक्ति प्रकाश——छिन छिन, जुगि जुगि। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) कंथा, शृंगी, अधारी——ये योगियों की साधना एवं वेष के बाहरी उपकरण हैं। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) कबीर ने अपने स्वभावानुसार इस पद मे भी बाह्याचार के प्रति विरोध प्रकट किया है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) है प्रभु ॰॰॰ दूरि—तुलना करें— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माँहि। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;ऐसे घट घट राम हैं, दुनियाँ देखै नाहिं।&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;— कबीरदास &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;—&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अपुनपौ आपुन ही में पायो। {{center|✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕}} &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;राजकुमारि कंठ मनि-भूषन, भ्रम भयौ, कहूँ गवायो। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;दियो बताइ और सखियन, तब तन को ताप नसायो।&nbsp;&nbsp;—सूरदास :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) राम रमै ॰॰॰ सूझै—प्रभु का साक्षात्कार विश्व-चेतना की प्राप्ति करा देता है। श्रीमद्भगवद्गीता के 'विश्वरूप-दर्शन योग' के अन्तर्गत यही बात स्पष्ट की गई है। भगवान राम के मुख मे प्रविष्ट करने वाले कागभुसुंडि भी समस्त ब्रह्माण्ड का दर्शन करते हैं— <br> {{gap}}उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेऊँ बहु ब्रह्मांड निकाया। {{center|✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕}} {{gap}}भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान। {{gap}}अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन। {{center|✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕}} {{gap}}तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया। (रामचरितमानस)<noinclude></noinclude> ldg2att13ua9bc728xcqubybocjkr49 662770 662769 2026-06-12T18:25:10Z Manvikesarwani09 6620 662770 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>६२१ {{outdent|साक्षात्कार करता है। बाहर से दिखाई देने वाली गुदड़ी वस्तुतः योगी के शरीर का प्रतीक है। उसकी लकड़ी नामक 'अधारी' वह आधार है जिसमें अवस्थित होकर परम तत्त्व की साधना करता है। उसी मूल तत्त्व मे उसकी प्राण-प्यारी मूर्ति विराजमान है। वे प्रभु जीव के सदैव पास (हृदय) मे ही रहते हैं, परन्तु जीव उनको इधर-उधर (अपने आप से पृथक् स्थलों मे) खोजता रहता है। अनहद नाद रूपी संगीत अन्तःकरण (सहस्रार) रूपी गुफा मे उपलब्ध है, परन्तु जीव शृंगी मे शब्द के उस अनहद नाद को सुनना चाहता है अर्थात् वह अपने स्वरूप मे प्रतिष्ठित होने की अपेक्षा शृंगीनाद का श्रवण करता है। अभिप्रेत अर्थ यह है कि इस प्रकार का योगी आत्म स्वरूप मे प्रतिष्ठित होने की अपेक्षा बहिरंग मे ही उलझा रहता है, परन्तु जो साधक ज्ञान और भक्ति रूपी महारस की अमर बेलि के रस को प्रतिक्षण पीता रहता है, वह अमरत्व को प्राप्त होता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) छेकानुप्रास——जोगिया जुगति। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) रूपकातिशयोक्ति—कथा, अधारी, गुफा। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) रूपक——अमर बेलि। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) पुनरुक्ति प्रकाश——छिन छिन, जुगि जुगि। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) कंथा, शृंगी, अधारी——ये योगियों की साधना एवं वेष के बाहरी उपकरण हैं। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) कबीर ने अपने स्वभावानुसार इस पद मे भी बाह्याचार के प्रति विरोध प्रकट किया है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) है प्रभु ॰॰॰ दूरि—तुलना करें— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माँहि। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;ऐसे घट घट राम हैं, दुनियाँ देखै नाहिं।&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;— कबीरदास &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;—&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अपुनपौ आपुन ही में पायो। {{center|✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕}} &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;राजकुमारि कंठ मनि-भूषन, भ्रम भयौ, कहूँ गवायो। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;दियो बताइ और सखियन, तब तन को ताप नसायो।&nbsp;&nbsp;—सूरदास :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) राम रमै ॰॰॰ सूझै—प्रभु का साक्षात्कार विश्व-चेतना की प्राप्ति करा देता है। श्रीमद्भगवद्गीता के 'विश्वरूप-दर्शन योग' के अन्तर्गत यही बात स्पष्ट की गई है। भगवान राम के मुख मे प्रविष्ट करने वाले कागभुसुंडि भी समस्त ब्रह्माण्ड का दर्शन करते हैं— <br> {{gap}}उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेऊँ बहु ब्रह्मांड निकाया। {{center|✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕}} {{gap}}भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान। {{gap}}अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन। {{center|✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕}} {{gap}}तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया। (रामचरितमानस)<noinclude></noinclude> gsf224ba0vee9pmjx5orjkbgl61pr87 पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३०९ 250 3178 662771 592460 2026-06-12T18:29:18Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662771 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude> {{outdent|तीनों अर्थों में गृहीत शब्द था। (i) भू-स्पर्श आदि अंग-स्थिति रूप मुद्रा, (ii) कुण्डल आदि शरीर पर धारण करने वाली वस्तुएँ, (iii) मैथुन तथा बिन्दु रक्षा के तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए स्वीकृत सह-साधिका नारी। कबीर इन तीनों को तत्त्व प्राप्ति का साधन नहीं मानते। ऐसी शृंगी और खपरा के वाह्य रूप भी तत्त्व प्राप्ति के साधन नहीं। अतः कबीर इनको आध्यात्मिक अर्थ दे रहे हैं।"}} {{center|( २०७ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;वावा जोगी एक अकेला, &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;जाकें तीर्थ व्रत न मेला ॥ टेक ॥ झोली पत्र बिभूती न बटवा, अनहद बेन बजावै ॥ मांगी न खाइ न भूखा सोवै, घर अगनां फिरि आवै ॥ पांच जनां की जमाति चलावै, तास गुरू मै चेला ॥ कहै कबीर उनि देसि सिधाये, बहुरि न इहि जगि मेला ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''—पंच जना = पाँच जन = पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। जमाति = समूह। चलावै = नियन्त्रित करता है।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''—कबीरदास सिद्ध योगी का वर्णन करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''—योगी संसार मे अपने ढंग का एक अनोखा ही व्यक्ति होता है। उसको तीर्थ, व्रत, मेला इत्यादि से कोई प्रयोजन नहीं होता है। उसे झोली, पत्र, बटुआ, विभूति आदि बहिरंग साधनों की कोई आवश्यकता नहीं होती है। वह तो आत्म-स्वरूप में स्थित होकर अनहद-नाद रूपी वीणा बजाता है। वह न तो भीख माँगता है और न भूखा ही सोता है। (उसको अपने स्थान पर बैठे-बैठे और बिना माँगे हुए जीवन-यापन के साधन उपलब्ध हो जाते हैं)। वह अपने घट रूपी घर के हृदय रूपी आँगन में ही वापस आ जाता है अर्थात् यह सब ओर से अपना मन हटा कर आत्म स्वरूप मे स्थित हो जाता है। वह अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के समूह को अपने नियन्त्रण मे रखता है। कबीरदास ऐसे ही योगी के चेले बनने को तैयार हैं, जो अपनी साधना के द्वारा इस संसार को छोड़कर उस देश को चले गये हैं अर्थात् जिन्होंने परमतत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है और पुनः इस संसार में नहीं आएँगे अर्थात् जो आवागमन के चक्र में फिर नहीं पड़ेंगे।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) भेदकातिशयोक्ति की व्यंजना—एक अकेला। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) रूपक—अनहद बेन। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) विरोधाभास—मांगी खाइ ॰॰॰ भूखा। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) रूपकातिशयोक्ति—पांच जना। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''—(i) इस पद में भी बाह्य साधना के प्रतीकों (तीर्थ, व्रत, मेला, झोली, पत्र, विभूति, बटुआ, बेन) को बाह्यन्तर-साधना-परक अर्थ दिए गए हैं। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) आत्म स्वरूप स्थिति एवं निस्पृहता योगी के प्रमुख लक्षण हैं।<noinclude></noinclude> bzczazorax8f0fbkeemvjqhqjodc2wk पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३०३ 250 39292 662765 160866 2026-06-12T18:16:48Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662765 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|६१८ | | [ कबीर}} {{outdent|'''भावार्थ'''—मन की साधना के द्वारा ही मन मे व्याप्त भ्रम समाप्त हो गया है तथा जीव अपने सहज आनन्द रूप को प्राप्त करके परमात्मा के रूप मे क्रीडा करने लगा है अर्थात् 'मैं'—जीव और 'तू' ब्रह्म एक हो गए हैं—पृथक् नहीं रह गए हैं। यह विश्वास दृढ़ हो गया है कि 'मैं' और 'तू'—जीव और ब्रह्म अथवा 'मैं' और 'मैं नहीं'—ये दो नहीं हैं तथा मायारहित वह अखण्ड परम तत्व ही समस्त अन्त करणो मे तथा सर्वत्र व्याप्त है। जब से इस मन ने उस मन को जान लिया है अर्थात् व्यष्टि-जीव ने समष्टि-जीव का साक्षात्कार कर लिया अर्थात् मन योग की 'उन्मनि' अवस्था को प्राप्त हो गया है, तब से जीव रूप-रेखा तथा आकारादि की मर्यादाओ के ऊपर उठकर उस मायातीत अवस्था मे तन्मय हो गया है। अब शरीर उस चेतन मे समा गया है और चेतन का प्रकाश सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त हो गया है। इस निर्भय परम तत्त्व के साक्षात्कार की अवस्था मे व्यष्टि-चेतन उस परम चेतन मे समाहित हो गया है। कबीर कहते हैं कि मन आत्म-लीन होकर अखण्ड परमात्मा-रूप राम और हरि मे तन्मय हो गया है। यही मेरी सिद्धा-वस्था है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''—(i) विरोधाभास की व्यंजना—मन का भ्रम ॰॰॰ भागा, मैं तै ॰॰॰ नाही। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) रूपक—सहज रूप हरि। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) पदमैत्री—सकल अकल, इनमन उनमन, तन मन मन तन। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) सभंग पद यमक—इन मन उन मन। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) वृत्यानुप्रास—मन मन माँहैं मन माना। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''—(i) अद्वैतावस्था का वर्णन है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) विश्व चेतना स्वरूप राम की प्राप्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है। गीताकार ने इसी को लक्ष्य करते हुए कहा है कि—'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम अथवा सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।' :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) सहज रूप ॰॰॰ लागा—भावुक कवि इस अद्वैतावस्था का वर्णन काव्योचित रसरिक्त शैली मे करते आए हैं। यथा— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;राधिका, कान्ह को ध्यान धरै, तब कान्ह ह्वै, राधिका के गुन गावै। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;त्यो अँसुवा ढरकै बरसाने को पाती लिखै लिखि राधिकै ध्यावै। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;राधे ह्वै आवत है छिन में वह प्रेम की पाती लै छाती लगावै। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;आपु मैं आपुन ही उरझै, सुरझै, विरझै समुझै, समुझावै। {{right|(देव)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;यह पूर्ण आत्म-लोप की अवस्था है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) मन, उन्मन आदि नाथ-सम्प्रदाय की पारिभाषिक शब्दावली के माध्यम से परम तत्त्व की प्राप्ति का वर्णन किया गया है।<noinclude></noinclude> 5bk41duc10stqi4l4pohfinsbkz3f8h 662766 662765 2026-06-12T18:18:46Z Manvikesarwani09 6620 662766 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude> {{outdent|'''भावार्थ'''—मन की साधना के द्वारा ही मन मे व्याप्त भ्रम समाप्त हो गया है तथा जीव अपने सहज आनन्द रूप को प्राप्त करके परमात्मा के रूप मे क्रीडा करने लगा है अर्थात् 'मैं'—जीव और 'तू' ब्रह्म एक हो गए हैं—पृथक् नहीं रह गए हैं। यह विश्वास दृढ़ हो गया है कि 'मैं' और 'तू'—जीव और ब्रह्म अथवा 'मैं' और 'मैं नहीं'—ये दो नहीं हैं तथा मायारहित वह अखण्ड परम तत्व ही समस्त अन्त करणो मे तथा सर्वत्र व्याप्त है। जब से इस मन ने उस मन को जान लिया है अर्थात् व्यष्टि-जीव ने समष्टि-जीव का साक्षात्कार कर लिया अर्थात् मन योग की 'उन्मनि' अवस्था को प्राप्त हो गया है, तब से जीव रूप-रेखा तथा आकारादि की मर्यादाओ के ऊपर उठकर उस मायातीत अवस्था मे तन्मय हो गया है। अब शरीर उस चेतन मे समा गया है और चेतन का प्रकाश सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त हो गया है। इस निर्भय परम तत्त्व के साक्षात्कार की अवस्था मे व्यष्टि-चेतन उस परम चेतन मे समाहित हो गया है। कबीर कहते हैं कि मन आत्म-लीन होकर अखण्ड परमात्मा-रूप राम और हरि मे तन्मय हो गया है। यही मेरी सिद्धा-वस्था है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''—(i) विरोधाभास की व्यंजना—मन का भ्रम ॰॰॰ भागा, मैं तै ॰॰॰ नाही। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) रूपक—सहज रूप हरि। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) पदमैत्री—सकल अकल, इनमन उनमन, तन मन मन तन। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) सभंग पद यमक—इन मन उन मन। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) वृत्यानुप्रास—मन मन माँहैं मन माना। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''—(i) अद्वैतावस्था का वर्णन है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) विश्व चेतना स्वरूप राम की प्राप्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है। गीताकार ने इसी को लक्ष्य करते हुए कहा है कि—'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम अथवा सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।' :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) सहज रूप ॰॰॰ लागा—भावुक कवि इस अद्वैतावस्था का वर्णन काव्योचित रसरिक्त शैली मे करते आए हैं। यथा— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;राधिका, कान्ह को ध्यान धरै, तब कान्ह ह्वै, राधिका के गुन गावै। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;त्यो अँसुवा ढरकै बरसाने को पाती लिखै लिखि राधिकै ध्यावै। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;राधे ह्वै आवत है छिन में वह प्रेम की पाती लै छाती लगावै। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;आपु मैं आपुन ही उरझै, सुरझै, विरझै समुझै, समुझावै। {{right|(देव)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;यह पूर्ण आत्म-लोप की अवस्था है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) मन, उन्मन आदि नाथ-सम्प्रदाय की पारिभाषिक शब्दावली के माध्यम से परम तत्त्व की प्राप्ति का वर्णन किया गया है।<noinclude></noinclude> gks2cb2elxqcq5qzpie64g84ih5fbdl पृष्ठ:हिंदी भाषा.djvu/१६ 250 53116 662745 608520 2026-06-12T17:06:14Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662745 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>प्राचीन भाषाएँ १६ की इतनी प्राचीनता नहीं स्वीकार करते। कालिदास के 'विक्रमोर्वशीय' त्रोटक में विक्षिप्त पुरूरवा की उक्ति में छंद और रूप दोनों के विचार से कुछ कुछ अपभ्रंश की छाया देख पड़ती है, और इसलिये अपभ्रंश का काल और भी दो सौ वर्ष पहले चला जाता है, पर उसमें अपभ्रंश के अत्यंत साधारण लक्षण—जैसे, पदांतर्गत 'म' के स्थान में 'वँ' और स्वार्थिक प्रत्यय 'इल्ल' 'अल्ल' तथा 'ड'—न मिलने के कारण उसे भी याकोबी आदि बहुत से विद्वान् पाठांतर या प्रक्षिप्त मानते हैं। जो कुछ हो, पर यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अपभ्रंश के बीज ईसा की दूसरी शताब्दी में प्रचलित प्राकृत में अवश्य विद्यमान थे। आरंभ में अपभ्रंश शब्द किसी भाषा के लिये नहीं प्रयुक्त होता था। साक्षर लोग निरक्षरों की भाषा के शब्दों को अपभ्रंश, अपशब्द या अपभाषा कहा करते थे। पतंजलि मुनि ने अपभ्रंश शब्द का प्रयोग महाभाष्य में इस प्रकार किया है—भूयांसोऽपशब्दाः अल्पीयांसः शब्दाः। एकैकस्य शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः। तद्यथा। गौरित्यस्य गावी गोणी गोता गोपातलिकेत्येवमादयोऽपभ्रंशाः। अर्थात् अपशब्द बहुत हैं और शब्द थोड़े हैं। एक एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश पाए जाते हैं; जैसे—गो शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपालतालिका आदि अपभ्रंश हैं। यहाँ अप- भ्रंश शब्द से पतंजलि उन शब्दों का ग्रहण करते हैं जो उनके समय में संस्कृत के बदले स्थान स्थान पर बोले जाते थे। ऊपर के अवतरण में जिन अपभ्रंशों का उल्लेख है, उनमें 'गावी' बँगला में 'गाभी' के रूप में और 'गोणी' पाली से होता हुआ सिंधी में ज्यों का त्यों अब तक प्रच- लित है। शेष शब्दों का पता अन्वेषकों को लगाना चाहिए। आर्य अपने शब्दों की विशुद्धता के कट्टर पक्षपाती थे। वे पहले अपशब्द ही के लिये म्लेच्छ शब्द का प्रयोग करते थे। पतंजलि ने लिखा है—न म्लेच्छितवै नापभाषितवै म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः। अर्थात् म्लेच्छ या अपभाषण न करना चाहिए, क्योंकि अपशब्द ही म्लेच्छ है। अमर ने इसी धातु से उत्पन्न म्लिष्ट शब्द का अर्थ 'अविस्पष्ट' किया है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि आर्य शुद्ध उच्चारण करके अपनी भाषा की रक्षा का बड़ा प्रयत्न करते थे; और जो लोग उनके शब्दों का ठीक उच्चा- रण न कर सकते थे, उन्हें और उनके द्वारा उच्चरित शब्दों को म्लेच्छ कहते थे। म्लेच्छ शब्द उस समय आजकल की भाँति घृणा या निंदा- व्यंजक नहीं था। अस्तु; जब मध्यवर्ती भाषाओं (पाली, शौरसेनी, तथा अन्य प्राकृतों) का रूप स्थिर होकर साहित्य में अवरुद्ध हो गया एवं संस्कृत<noinclude></noinclude> pfysthaqmryx5cknr0k4roo1mlcsvyg पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६१ 250 82724 662746 345881 2026-06-12T17:11:57Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662746 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>अक्षरलिपि ५६ युक्तिका समर्थन किसी तरह किया जा नहीं सकता, कि सन् ई० से पहले की ८वीं शताब्दीके बाद फिनिक (Phoenician) नामक बणिकोंसे भारतवासियोंने अक्षरज्ञान प्राप्त किया था। सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें शाक्य बुद्धका अभ्युदय हुआ। उनके निर्वाण प्राप्त होनेसे कुछ ही पीछे उनके धर्मोपदेशकी रक्षा करनेके लिये उनके प्रधान-प्रधान शिष्यों ने इकट्ठा हो पहला बौद्धसङ्घ आ- ह्वान किया। फ्रान्सीसी पण्डित फूको (Foucaux) और राजा राजेन्द्रलाल मित्र महाशयने ललितविस्तर- की समालोचनाके समय लिखा था, कि ललित- विस्तरमें जो गाथा हैं, वह इसी समय (सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें) बनाई और संग्रह की गई थीं। उन गाथाओंमें इस तरह वर्णन किया गया है— "सा गाथलेखलिखिते गुण अर्थयुक्ता या कन्य ईदृश भवेन्मम तां वरयेथाः।" (ललितविस्तर १२ अ०) (शाक्यसिंहने कहा) जो कन्या गाथालेख लिखने और गाथाका अर्थ समझनेमें चतुर होगी, उससे मैं विवाह करूँगा। कही हुई गाथासे क्या हम नहीं जान सकते, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले इस देशमें लिपिज्ञानकुशला महिलाओंका भी अभाव न था। यह बात सहज ही अनुमेय है, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले जहाँ कन्या लिखनेमें निपुण न होनेसे राजकुमारकी पत्नी बननेके योग्य न समझी जाती थी, उस देशके लिये अक्षर- लिपिकी चर्चा कितनी पुरानी है। ललितविस्तरकी गाथामें लिपिशाल१ और लिपिशास्त्र२ का उल्लेख होनेसे स्पष्ट मालूम होता है, कि उस पुराने समयमें भी लिपि सिखानेकी पाठशालाएं और नाना देशीय लिपिज्ञानके उपयुक्त लिपि-शास्त्र (Palaeogra- phy and Epigraphy) प्रचलित था। ब्राह्मी आदि लिपियोंका उत्पत्ति-काल। इस समय यहाँ आलोच्य है, कि जिस प्राचीन कालकी बात चल रही है, उस समय भारतमें कैसे अक्षर प्रचलित थे। पूर्वोक्त ललितविस्तरमें चौंसठ प्रकारकी लिपिका उठ्लेख देख पड़ता है। यथा— १ ब्राह्मी, २ खरोष्ठी, ३ पुष्करसारी, ४ अङ्ग, ५ वङ्ग, ६ मगध, ७ माङ्गल्य, ८ मनुष्य, ९ अङ्गुलीय, १० शकारि, ११ ब्रह्मवल्ली, १२ द्राविड़, १३ कनारी, १४ दक्षिण, १५ उग्र, १६ संख्या, १७ अनुलोम, १८ अवधनु, १९ दरद, २० खास्य, २१ चीन, २२ हूण, २३ मध्याक्षरविस्तर, २४ पुष्प, २५ देव, २६ नाग, २७ यक्ष, २८ गन्धर्व, २९ किन्नर, ३० महोरग, ३१ असुर, ३२ गरुड़, ३३ मृगचक्र, ३४ चक्र, ३५ वायुमरुत्, ३६ भौमदेव, ३७ अन्तरीक्षदेव, ३८ उत्तरकुरुद्वीप, ३९ अपरगौड़ादि, ४० पूर्वविदेह, ४१ उत्क्षेप, ४२ निक्षेप, ४३ विक्षेप, ४४ प्रक्षेप, ४५ सागर, ४६ वज्र, ४७ लेख- प्रतिलेख, ४८ अनुद्रुत, ४९ शास्त्रावर्त्त, ५० गणनावर्त्त, ५१ उत्क्षेपावर्त्त, ५२ विक्षेपावर्त्त, ५३ पादलिखित, ५४ द्विरुत्तरपदसन्धि, ५५ दशोत्तरपदसन्धि, ५६ अध्या- हारिणी, ५७ सर्वभूतसंग्रहणी, ५८ विद्यानुलोम, ५९ विमिश्रित, ६० ऋषितपस्तप्ता, ६१ धरणीप्रप्रेक्षण, ६२ सर्वौषधिनिष्यन्दा, ६३ सर्वसारसंग्रहणी और ६४ सर्वभूतरुतग्रहणी। (ललितविस्तर १० अ०) जिस ललितविस्तरमें पूर्वोक्त लिपिमालाका नाम उद्धृत हुआ है, उसी ग्रंथका चू-फ-लन्ने सन् ६५ ई० के समय चीन-भाषामें अनुवाद किया था।* ऐसे स्थलमें मूल ग्रंथके सब जगह फैलने और इसके बाद चीनदेश पहुँचनेमें अल्प समय न लगा होगा। पाश्चात्य और इस देशके राजा राजेन्द्रलाल मित्र-प्रमुख† -------------------------------------------------------------------------------------- * Beal's Romantic Legend of Sakya Buddha, Intro- duction. † Dr. Rajendralal Mitra's Lalita Vistara, Intro. p. 56. १ "शास्त्राणि यानि प्रचरन्ति च देवलोके संख्या लिपिच गणनाऽपि च धातुतन्त्रः। ये शिल्पयोगपृथु लौकिक अप्रमेया- स्तेष्वेषु शिक्षितु पुरा बहुकल्पकोट्यः। किन्तु जनस्य अनुवर्त्तनतां करोति लिपिशालमागतु सुशिक्षितशिक्षणार्थं"॥ (ललितविस्तर १० अ०) २ "लोकोत्तरेषु चतुःसत्यपथविधिज्ञो हेतुप्रतीत्यकुशली यथ सम्भवति। यथ चानिरोधक्षयु संस्कृ तसोऽस्तिभावस्तस्मिन् विधिज्ञः किमथो लिपिशास्त्रमात्रे"॥ (ललितविस्तर १० अ०)<noinclude></noinclude> qrwh3xx83hhzysbepfdvbgh42rtxt5d 662758 662746 2026-06-12T17:53:49Z Manvikesarwani09 6620 662758 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|५६}}&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अक्षरलिपि'''<br> {{outdent|युक्तिका समर्थन किसी तरह किया जा नहीं सकता, कि सन् ई० से पहलेकी ८वीं शताब्दीके बाद फिनिक (Phoenician) नामक बणिकोंसे भारतवासियोंने अक्षरज्ञान प्राप्त किया था।<br> {{gap}}सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें शाक्य बुद्धका अभ्युदय हुआ। उनके निर्वाण प्राप्त होनेसे कुछ ही पीछे उनके धर्मोपदेशकी रक्षा करनेके लिये उनके प्रधान-प्रधान शिष्यों ने इकट्ठा हो पहला बौद्धसङ्घ आह्वान किया। फ्रान्सीसी पण्डित फूको (Foucaux) और राजा राजेन्द्रलाल मित्र महाशयने ललितविस्तर-की समालोचनाके समय लिखा था, कि ललितविस्तरमें जो गाथा हैं, वह इसी समय (सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें) बनाई और संग्रह की गई थीं।* उन गाथाओंमें इस तरह वर्णन किया गया है— {{center|{{smaller|"सा गाथलेखलिखिते गुण अर्थयुक्ता<br>या कन्य ईदृश भवेन्मम तां वरयेथाः।" (ललितविस्तर १२ अ०)}}}} (शाक्यसिंहने कहा) जो कन्या गाथालेख लिखने और गाथाका अर्थ समझनेमें चतुर होगी, उससे मैं विवाह करूँगा।<br> {{gap}}कही हुई गाथासे क्या हम नहीं जान सकते, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले इस देशमें लिपिज्ञानकुशला महिलाओंका भी अभाव न था। यह बात सहज ही अनुमेय है, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले जहाँ कन्या लिखनेमें निपुण न होनेसे राजकुमारकी पत्नी बननेके योग्य न समझी जाती थी, उस देशके लिये अक्षर-लिपिकी चर्चा कितनी पुरानी है। ललितविस्तरकी गाथामें लिपिशाल† और लिपिशास्त्र‡ का उल्लेख}} <br> <hr> {{smaller|* Dr. Rajendralal Mitra's Lalita Vistara, Intro. p. 56.<br> † "शास्त्राणि यानि प्रचरन्ति च देवलोके<br>संख्या लिपिच गणनाऽपि च धातुतन्त्रः।<br>ये शिल्पयोगपृथु लौकिक अप्रमेया-<br>स्तेष्वेषु शिक्षितु पुरा बहुकल्पकोट्यः।<br>किन्तु जनस्य अनुवर्त्तनतां करोति<br>लिपिशालमागतु सुशिक्षितशिक्षणार्थं"॥ (ललितविस्तर १० अ०)<br> ‡ "लोकोत्तरेषु चतुःसत्यपथविधिज्ञो हेतुप्रतीत्यकुशली यथ सम्भवति।<br>यथ चानिरोधक्षयु संस्कृ तसोऽस्तिभावस्तस्मिन् विधिज्ञः किमथो लिपिशास्त्रमात्रे"॥<br>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ललितविस्तर १० अ०)}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|होनेसे स्पष्ट मालूम 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उत्क्षेपावर्त्त, ५२ विक्षेपावर्त्त, ५३ पादलिखित, ५४ द्विरुत्तरपदसन्धि, ५५ दशोत्तरपदसन्धि, ५全面५६ अध्या-हारिणी, ५७ सर्वभूतसंग्रहणी, ५८ विद्यानुलोम, ५९ विमिश्रित, ६० ऋषितपस्तप्ता, ६१ धरणीप्रप्रेक्षण, ६२ सर्वौषधिनिष्यन्दा, ६३ सर्वसारसंग्रहणी और ६४ सर्वभूतरुतग्रहणी। (ललितविस्तर १० अ०)<br> {{gap}}जिस ललितविस्तरमें पूर्वोक्त लिपिमालाका नाम उद्धृत हुआ है, उसी ग्रंथका चू-फ-लन्ने सन् ६५ ई० के समय चीन-भाषामें अनुवाद किया था।\* ऐसे स्थलमें मूल ग्रंथके सब जगह फैलने और इसके बाद चीनदेश पहुँचनेमें अल्प समय न लगा होगा। पाश्चात्य और इस देशके राजा राजेन्द्रलाल मित्र-प्रमुख†}} <br> <hr> {{smaller|\* Beal's Romantic Legend of Sakya Buddha, Intro-duction.}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 3cxput7a6dup37h1iff4yvuc0uuavaa 662759 662758 2026-06-12T17:55:16Z Manvikesarwani09 6620 662759 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="display: flex; gap: 20px; align-items: flex-start; justify-content: 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ललितविस्तरमें जो गाथा हैं, वह इसी समय (सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें) बनाई और संग्रह की गई थीं।* उन गाथाओंमें इस तरह वर्णन किया गया है— {{center|{{smaller|"सा गाथलेखलिखिते गुण अर्थयुक्ता<br>या कन्य ईदृश भवेन्मम तां वरयेथाः।" (ललितविस्तर १२ अ०)}}}} (शाक्यसिंहने कहा) जो कन्या गाथालेख लिखने और गाथाका अर्थ समझनेमें चतुर होगी, उससे मैं विवाह करूँगा।<br> {{gap}}कही हुई गाथासे क्या हम नहीं जान सकते, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले इस देशमें लिपिज्ञानकुशला महिलाओंका भी अभाव न था। यह बात सहज ही अनुमेय है, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले जहाँ कन्या लिखनेमें निपुण न होनेसे राजकुमारकी पत्नी बननेके योग्य न समझी जाती थी, उस देशके लिये अक्षर-लिपिकी चर्चा कितनी पुरानी है। ललितविस्तरकी गाथामें लिपिशाल† और लिपिशास्त्र‡ का उल्लेख}} <br><br> <hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;"> {{smaller|* Dr. Rajendralal Mitra's Lalita Vistara, Intro. p. 56.<br> † "शास्त्राणि यानि प्रचरन्ति च देवलोके<br>संख्या लिपिच गणनाऽपि च धातुतन्त्रः।<br>ये शिल्पयोगपृथु लौकिक अप्रमेया-<br>स्तेष्वेषु शिक्षितु पुरा बहुकल्पकोट्यः।<br>किन्तु जनस्य अनुवर्त्तनतां करोति<br>लिपिशालमागतु सुशिक्षितशिक्षणार्थं"॥ (ललितविस्तर १० अ०)<br> ‡ "लोकोत्तरेषु चतुःसत्यपथविधिज्ञो हेतुप्रतीत्यकुशली यथ सम्भवति।<br>यथ चानिरोधक्षयु संस्कृ तसोऽस्तिभावस्तस्मिन् विधिज्ञः किमथो लिपिशास्त्रमात्रे"॥<br>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ललितविस्तर १० अ०)}} </div> <div style="width: 48%; float: right; padding-left: 10px;"> {{outdent|होनेसे स्पष्ट मालूम होता है, कि उस पुराने समयमें भी लिपि सिखानेकी पाठशालाएं और नाना देशीय लिपिज्ञानके उपयुक्त लिपि-शास्त्र (Palaeography and Epigraphy) प्रचलित था।<br> {{center|{{smaller|ब्राह्मी आदि लिपियोंका उत्पत्ति-काल।}}}} {{gap}}इस समय यहाँ आलोच्य है, कि जिस प्राचीन कालकी बात चल रही है, उस समय भारतमें कैसे अक्षर प्रचलित थे।<br> {{gap}}पूर्वोक्त ललितविस्तरमें चौंसठ प्रकारकी लिपिका उल्लेख देख पड़ता है। यथा—<br> {{gap}}१ ब्राह्मी, २ खरोष्ठी, ३ पुष्करसारी, ४ अङ्ग, ५ वङ्ग, ६ मगध, ७ माङ्गल्य, ८ मनुष्य, ९ अङ्गुलीय, १० शकारि, ११ ब्रह्मवल्ली, १२ द्राविड़, १३ कनारी, १४ दक्षिण, १५ उग्र, १६ संख्या, १७ अनुलोम, १८ अवधनु, १९ दरद, २० खास्य, २१ चीन, २२ हूण, २३ मध्याक्षरविस्तर, २४ पुष्प, २५ देव, २६ नाग, २७ यक्ष, २८ गन्धर्व, २९ किन्नर, ३० महोरग, ३१ असुर, ३२ गरुड़, ३३ मृगचक्र, ३४ चक्र, ३५ वायुमरुत्, ३६ भौमदेव, ३७ अन्तरीक्षदेव, ३८ उत्तरकुरुद्वीप, ३९ अपरगौड़ादि, ४० पूर्वविदेह, ४१ उत्क्षेप, ४२ निक्षेप, ४३ विक्षेप, ४४ प्रक्षेप, ४५ सागर, ४६ वज्र, ४७ लेख-प्रतिलेख, ४८ अनुद्रुत, ४९ शास्त्रावर्त्त, ५० गणनावर्त्त, ५१ उत्क्षेपावर्त्त, ५२ विक्षेपावर्त्त, ५३ पादलिखित, ५४ द्विरुत्तरपदसन्धि, ५५ दशोत्तरपदसन्धि, ५६ अध्या-हारिणी, ५७ सर्वभूतसंग्रहणी, ५८ विद्यानुलोम, ५९ विमिश्रित, ६० 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हैं। सम्राट् अशोकके यत्नसे जैसे बौद्ध धर्म फैलानेके लिये पश्चिममें यूनान, उत्तरमें मङ्गोलिया, पूर्वमें कम्बोज और दक्षिणमें लङ्कातक धर्माचार्य भेजे गये, वैसे ही सभ्य जगत्के प्रायः सभी स्थानोंसे लोग सम्राट् अशोकके साम्राज्यमें नाना कार्योपलक्ष्यसे बसने लगे थे; हम नहीं समझते, कि इस समय भारतमें नाना विदेशीय संस्रवोंसे जितने प्रकारकी लिपि या अक्षरमाला प्रचलित हुई थी, पहले और किसी समय उतने प्रकारकी लिपि या अक्षरमाला देखनेमें आई हो।* भारतीय बौद्धोंके इसी सुवर्णयुगमें यहाँ जितने प्रकारकी लिपि प्रचलित हुई थी, सम्भवतः ललितविस्तरके बनानेवालोंने उतने प्रकारकी लिपिका उल्लेख किया है। लङ्का, ब्रह्म और श्याम देशवाले बौद्ध ग्रन्थोंके मतसे सन् ई० से ५४३ वर्ष पहले बुद्धदेवका निर्वाण और निर्वाणसे २१८ वर्ष पीछे यानी सन् ई० से ३२५ वर्ष पहले अशोकका साम्राज्याभिषेक कार्य सम्पन्न हुआ था। [प्रियदर्शी शब्दमें विस्तृत विवरण देखना चाहिये।] इसके बाद अशोककी राजधानीमें ६४ प्रकारकी लिपिका चलना कुछ विचित्र नहीं। इस समयके यूनानी नियर्खस (Nearchus) की विवरणीमें लिखा है, कि भारतवासी रूईके वस्त्र या काग़ज़ पर अक्षरयोजना करते थे। उनसे कुछ समय पीछे यूनान-दूत मेगस्थि- निस् मगधराज्यकी वर्णनाके उपलक्ष्यमें लिख गये हैं, कि भारतवासी १० स्टेडियाम् दूर शाखापथ और उसके अन्तर्वर्ती स्थानकी दूरी बतानेवाला कोसके अंकोंसे युक्त प्रस्तरफलक (mile-stone) रखते थे। पत्थरमें अक्षर-खोदनेकी प्रथा उस समय खूब प्रचलित थी। अशोकके अनुशासन और उससे भी बहुत पहले कपिलवस्तुके निकटवर्ती पिपरावा गांवसे आविष्कृत बुद्धदेवके देहावशेषकी रक्षा करनेवाले पत्थर पर खुदी हुई लिपि इस बातकी गवाही देती है। पिपरावा-लिपि देख इस समय दृढ़ विश्वास होता है, कि सन् ई० से पहलेकी छठी शताब्दीसे भी पहले भारतवर्षमें पत्थरपर अक्षर खोदनेकी प्रथा प्रचलित थी। मगधपति जरासन्धकी राजधानी गिरि- व्रजमें जरासन्धकी बैठक और भीम जरासन्धकी रण- रंगकी भूमिपर चित्रलिपि और कौन-सा शिल्पलिपि- के बीचकी लिपि पर्वतगात्रमें उत्कीर्ण रही है। उसके ऊपर बहुत समयसे गो और महिष आदिके आने- जानेकी राह होनेसे वह प्राचीनतर लिपि कितनी ही अस्पष्ट और अबोध्य हो गई है। हमें विश्वास होता है, कि आज तक भारतमें जितने प्रकारकी लिपि आविष्कृत हुई है, उनमें वह मगधलिपि सबसे पुरानी है। कौन कह सकता है, कि वह जरासन्धके समयकी लिपि नहीं है? जो हो, हम समझते हैं, कि २२०0 वर्ष पहले भारतवासी ६४ प्रकारकी लिपि जानते थे। इन ६४ लिपियोंमें कितनी ही सम्राट् अशोकसे भी बहुत पहले भारतमें प्रचलित थीं। जैनियोंके सुप्रसिद्ध "समवायसूत्र" नामक ४थे अङ्गमें लिखा है— "बम्भीए णम अट्ठारसविहे लिक्खविहाणे****** लेक्खं करेड्। जं बम्भीए, जवणाणिया, दोसाउरिया,† खरोट्टिया, पुक्खरसारिया, पायहसा, कत्थइया, गन्धव्विया, आदरसणिणवि, माहेसरणिणवि, दामिलिणिवि, पोलिंदिणिवि।" ब्राह्मी प्रभृति १८ प्रकारकी लेखन प्रक्रियाओंके नाम यह हैं—१ ब्राह्मी, २ यवनानी, ३ दोषौतरिका, ४ खरोष्ट्रिका, ५ पुष्करसारिका, ६ पावर्त्तिका, ७ उत्तरकुरुका, ८ अक्षरपुस्तिका, ९ भोगवइया, १० विक्षेपिका, ११ निक्षेपिका, १२ अङ्ग, १३ गणित, १४ गन्धर्व, १५ आदर्शा, १६ माहेश्वरी, १७ द्राविड़ी और १८ बोलिन्दी (?) लिपि। -------------------------------------------------------------------------------------- * शकाधिप कनिष्कका अधिकार उत्तरमें खुतन, पश्चिममें ईरान और पूर्वमें पूर्ववङ्ग तक फैल गया था सही, किन्तु वे सन् ई० की पहली शताब्दी- में विद्यमान अवश्य थे। यह बात सन् ई० से पहली शताब्दीके चीन-अनु- वादसे प्रमाणित है, कि इससे पहले ललितविस्तर बनाया गया था। * 'खरसारिया'—पाठान्तर। † 'दोसउरिया'—पाठान्तर। ‡ 'भोगवयत्ता'—पाठान्तर। †† 'वयनतिया, निराहत्या, बङ्गगिया, निहत्या'—पाठान्तर।<noinclude></noinclude> 5bqkfnbjw0esqmlzj3y0hln9v1a8n60 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६३ 250 82727 662748 345884 2026-06-12T17:16:14Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662748 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>अक्षरलिपि जैनियोंके ४थे उपाङ्ग पन्नवणा (प्रज्ञापना)-सूत्रमें पूर्वोक्त अट्ठारह लिपियोंका उल्लेख वर्तमान है। लिपिकरोंके दोषसे विभिन्न पुस्तकोंमें कुछ पाठ- भेद देख पड़ता है। प्रज्ञापनासूत्रके टीकाकार मलय- गिरिने लिखा है— "ब्राह्मी यवनानीत्यादयो लिपिभेदास्तु सम्प्रदायादवशेषः" अर्थात् ब्राह्मी, यवनानी इत्यादि अट्ठारह प्रकार- की लिपि विभिन्न सम्प्रदायोंसे उद्भूत हुई है। जैनशास्त्रके मतसे जैनाङ्गसमूह महावीर स्वामी- के समय पहले फैला और वीर-निर्वाणके १६४ वर्ष बाद (सन् ई० से ३६३ वर्ष पहले) पाटलिपुत्रके श्रीसङ्घमें संग्रहीत हुआ। ऐसे स्थलमें कहा जा सकता है, कि सम्राट् अशोकसे पहले भारतमें ब्राह्मी- प्रभृति १८ प्रकारकी लिपि चलती थी। यवनानी। यवनानी नाम देख कोई-कोई कहना चाहते हैं, कि मकदूनिया-वीर सिकन्दरके समय इस देशमें यूनानी यवनोंने जो लिपि चलाई वही यवनानी लिपि है। इस यूनानी शब्दका उल्लेख देखकर मोक्षमूलर- प्रभृति कोई-कोई पाश्चात्य अध्यापक अष्टाध्यायीके सूत्र- कार पाणिनिको भी इसी समयका व्यक्ति बताना चाहते हैं। किन्तु पाणिनिसूत्रके वार्त्तिककार और महाभाष्यकारके 'यवनानी' शब्दका लिपि* अर्थ करते भी पाणिनिने कहीं स्पष्टतः यह अर्थ नहीं प्रकाश किया। स्त्रीलिङ्गमें जिन शब्दोंके उत्तर 'आनुक्' होता है, उन्होंने दृष्टान्तकी तरह उन्हीं शब्दोंका उल्लेख किया है— "इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलआचार्याणामानुक्" (पा० ४।१।४९) जो हो, यवनानी शब्दमें आधुनिक सन्देहके करनेका कोई कारण नहीं देखा जाता। यवनों (Ionian) का अभ्युदय बहुत पुराना है। हमने दूसरी जगह दिखाया है, कि सन् ई० से पहलेकी १०वीं शताब्दिमें यवन या योन जातिका पराक्रम सब जगह -------------------------------------------------------------------------------------- * 'यवनाल्लिप्याम् इति वक्तव्यम्'—वार्त्तिक। दीपौ यवौ यवानी। यवनाल्लिप्याम्। यवनानी लिपिः।—(महाभाष्य ४।१।४९) विघोषित हुआ। इससे पहले यवन जातिका अभ्युदय हुआ था। रामायण, महाभारत प्रभृति पुराने संस्कृत ग्रन्थोंमें भी यवन जातिका विशेष उल्लेख वर्तमान है। यवनानी कहनेसे बहुत पुरानी कीलरूपा (Cuneiform) लिपि ही समझी जाती थी। यवन देखो। पुष्करसारी। समवायाङ्ग और ललितविस्तरमें जिस "पुष्करसारी" लिपिकी बात लिखी है, वह भी भारतकी एक बहुत पुरानी लिपि है। पाणिनिने पुष्करसादीका उल्लेख किया है। उत्तरकुरुका और गन्धर्वलिपि प्रभृति। ऐतरेय-ब्राह्मणमें उत्तरकुरु और उत्तरमद्रकी बात लिखी है। ऐतरेय ब्राह्मणसे यह भी मालूम होता है कि, वहाँ वैदिक यागयज्ञ प्रचलित था। याग-यज्ञका निर्धारण करनेके लिये जैसे ज्योतिषका प्रयोजन पड़ता, वैसे ही उसके लिये शुल्व-सूत्र भी जानना आवश्यक है। [शुल्वसूत्र देखो!] इसीलिये अंकलिपि और गणित- लिपि भी उसी प्राचीनकालमें चली थी। गन्धारमें प्रचलित लिपि ही सम्भवतः गन्धर्व लिपि है। कन्धारके साथ बहुत पुराने समयसे ही वैदिक आर्योंका संस्रव रहा है। वहाँकी लिपि भी नितान्त आधुनिक नहीं है। खरोष्ठी-लिपिकी प्रसङ्गमें यह बात पीछे बताई जायगी। माहेश्वरलिपि। पाणिनिसूत्रमें जो चौदह प्रत्याहार हैं, उन्हींको वररुचि, पतञ्जलि प्रभृति वैयाकरण शिवसूत्र कहकर मानते हैं। देशमें सर्वसाधारण वैयाकरणोंको विश्वास है, कि महेश्वरने ही सबसे पहले व्याकरण प्रकाशित किया था। वेदाङ्गके अन्तर्गत जो शिक्षा है, उसमें देखा जाता है, कि महेश्वरने ही चौंसठ अक्षर प्रकाशित किये। जो हो, इसमें सन्देह नहीं, कि पाणिनिसे बहुत पहले शिवसूत्र उत्पन्न हुए थे। चीन-परिव्राजक इत्सिङ्गने सन् ई० की ७वीं शताब्दीके अन्तिम भाग- में भारत आ संस्कृत पढ़ी। उन्होंने लिखा है, 'सिद्धि- रस्तु' से आरम्भकर अक्षरमाला-सम्बन्धीय जो महेश्वर- के रचे 'सिद्धान्त' छः वर्षके बालक पहले मुखस्थ<noinclude></noinclude> 6eofpqkbg9zh7h424i0dgvbi3htlg7f पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६४ 250 82728 662749 345885 2026-06-12T17:17:27Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662749 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>अक्षरलिपि करते, उनमें उनचास अक्षर हैं। उनके मिले हुए अक्षर अट्ठारह भागों में बंटे और इस तरह इस सिद्धान्तमें दश हजार शब्द और अनुष्टुप् छन्दके तीन- सौ श्लोक वर्तमान हैं।' अध्यापक मोक्षमूलरका* विश्वास है, कि यही 'शिवसूत्र' हैं। किन्तु इत्सिङ्गने पाणिनि-रचित एक हजार सूत्रोंको ही शिवके प्रत्या- दिष्ट सूत्र मान अपनी सम्मति प्रकाशित की है। यही शिवसूत्र जिस लिपिमें लिखे गये थे, सम्भवतः वही माहेश्वर लिपि होगी। अथवा पाणिनिने जिस माहेश्वर सम्प्रदायकी बात लिखी और वह जिस लिपिका व्यवहार करती थी, वही माहेश्वर लिपि है। आदर्शकलिपि। पतञ्जलिने महाभाष्यमें आर्यावर्त्त वाली सीमा- निर्देशके समय लिखा है,— "प्रागादर्शात् प्रत्यक्कालकवनाद्दक्षिणेन हिमवन्तमुत्तरेण पारियात्रम्॥" आदर्शके पूर्व और कालकवनके पश्चिम, हिमा- लयके दक्षिण और पारियात्रके उत्तर आर्यावर्त्त प्रदेश अवस्थित है। यानी आर्यावर्त्तो पश्चिम-सीमा पर आदर्श है। मनुसंहितामें आर्यावर्त्तके पश्चिम भी समुद्र माना गया है।† ऐसे स्थलमें समुद्रके पूर्व-किनारेसे आर्यावर्त्तका अवस्थान स्थिर करना पड़ता है। विष्णुपुराणादिमें भी भारतकी पश्चिम-सीमा यवन (Ionia) बताई गई है। इससे मालूम होता है, कि सम्भवतः आदर्श पुराना मिस्र या रूम राज्य ही है और वहाँकी सुप्राचीन लिपि ही आदर्शक-लिपि है। उसी लिपिका आदर्श ग्रहणकर पाश्चात्य सभ्य जातियों- की लिपि उत्पन्न होनेसे उस सुप्राचीन चित्रलिपिका "आदर्शकलिपि" नाम होना कुछ विचित्र नहीं। द्राविड़ी लिपि। दाक्षिणात्यके लिपितत्त्वप्रणेता बूलर साहबके बताये मतसे द्राविड़ी लिपि अशोककी (ब्राह्मी) लिपिसे स्वतन्त्र होते भी उसी एक मूल लिपि या सेमेटिक लिपिसे निकली है। द्राविड़की बट्टेलेत्तु नामक पुरानी -------------------------------------------------------------------------------------- * Max Müller's India, what can it teach us, p. 343. † "आसमुद्रात् तु वै पूर्वात् आसमुद्रात् तु पश्चिमात्। तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त्तं विदुर्बुधाः॥" (मनु २।२२) लिपिके 'इ' और 'उ' यह दोनों स्वर 'य' और 'व' से कुछ ही पृथक् हैं, और सेमेटिक लिपिमें सादृश्य रखते हैं। भारतके व्यवहारोपयोगी बना लिये जानेपर भी उनमें असम्पूर्णता रह गई है। डाक्टर बूलर कहते हैं, कि दाक्षिणात्य के भट्टीप्रोलुमें जो सुप्राचीन अशोकाक्षरीकी लिपि निकली है, उत्तर- भारतीय अशोकलिपिसे उसका कुछ ही पार्थक्य लक्षित होता है। दक्षिण भारतीय उक्त लिपिका 'दा' उत्तर भारतीय 'अ'कार जैसा है; उत्तर भारतीय अशोक- लिपिके व्यञ्जनके साथ आकारका चिह्न एक समानान्तर रेखा होती, किन्तु दक्षिण भारतीय लिपिमें ऐसी समानान्तर रेखाके बदले व्यञ्जनके शिरपर (।) ऐसी एक खड़ी रेखा बनी है। इससे मालूम होता है, कि बहुत पहले समयसे ही इन दोनों लिपियोंमें कुछ कुछ अलगाव रहा है। पूर्वोक्त पाश्चात्य पण्डित कहते हैं, कि फिनिकीय बणिकोंके साथ दक्षिण भारतका सा- क्षात् सम्बन्ध हो गया था। बाइबिलमें सोलोमनका मोर 'तुकी' नामसे परिचित था; द्राविड़में आज भी मोर- को 'तोकै' ही कहते हैं। इसलिये इस बातमें सन्देह नहीं, कि बाइबिलोक्त 'तुकी' दक्षिण भारतसे ही गया था। इसी तरह दक्षिण-भारतमें वाणिज्य कार्य द्वारा फिनिकोंके यत्नसे जो लिपि चला था, वही उत्तर भारतमें धीरे-धीरे फैल गई। सिवा अनुमानके इस बातका स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता कि, द्राविड़के साथ फ़िनिकोंका बहुत पहले समयसे संस्रव रहते भी फिनिक लिपि द्राविड़ोंने ग्रहण की। रामायणके समयमें द्राविड़में वैदिक आर्य-सभ्यता फैल गई थी। वाल्मीकिकी रामायणमें दाक्षिणात्यवासी हनुमान् सर्वशास्त्रदर्शी और वेदान्त- ज्ञाता परिकीर्तित हुए हैं; वे रामनामाङ्कित अँगुठी ले लङ्काको गये थे। ऐसे स्थलमें हम इसमें सन्देह करनेका कारण नहीं देखते, कि सोलोमनसे बहुत पहले दक्षिणापथके कृतविद्य लोगोंमें अक्षरलिपि प्रचलित थी। यह बात सभी पुराविद मानते हैं, कि द्राविड़ी सभ्यता अतीव पुरातन है। यह भी असम्भव नहीं है, कि द्राविड़ी सभ्यतासे फिनिक लोग आलो-<noinclude></noinclude> 4ij6fg8rd578mwe4croo03ltminlpb7 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६५ 250 82729 662750 345886 2026-06-12T17:19:00Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662750 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>अक्षरलिपि कित हो गये हों। इसके सम्बन्धमें यहाँ दो-एक बातें कहना हम अप्रासङ्गिक नहीं समझते। फिनिक (Phoenician) लोग पुराने यूनानियों और रोमजोंके निकट फोनिक या फनिक नामसे परिचित थे। फणिक् जातिको आदि बणिक् जाति कहा जा सकता है। फणिक् और बणिक् शब्दमें उच्चारणका कुछ अधिक अलगाव नहीं। सेमेटिक फ = प। ऋग्वेदके बहुत स्थानोंमें 'पणि' शब्द लिखा है। ६ मण्डल वाले ३२ सूक्तके भाष्यमें सायणाचार्यने 'पणि' शब्दका 'बणिक्' अर्थ बताया है। इधर पाणिनि- के उणादि-सूत्रके अनुसार भी 'पण' धातुसे बणिक् शब्द निष्पन्न हुआ है; सुतरां पणिक् और बणिक् एक ही बात है। ऋग्वेदमें पणि लोग गोदुग्ध-व्यवसायी और समृद्धिशाली जातिरूपसे ही परिचित हैं। दूध, दही, और घी बनानेके लिये, उनके पास 'चतुःशृङ्ग' और 'दशयन्त्र उत्स' (ऋक् ६।४४।२४) नामक यन्त्र थे। अङ्गिरा प्रभृति वेदोक्त याज्ञिक उनके घोर शत्रु थे; सदा उनका गोधन छीन लेते थे। इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब पणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।* फिनिक 'केदमस्' (Cadmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व- -------------------------------------------------------------------------------------- * Pococke's India in Greece, p. 218. भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद- में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।† गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों- के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर- पर उनका अधिकार हुआ। अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार- तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग- के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)- का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है। वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने- पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर -------------------------------------------------------------------------------------- † "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४)<noinclude></noinclude> eqae03t7r56attkeaeru4qj1xjyfbly 662751 662750 2026-06-12T17:20:46Z Manvikesarwani09 6620 662751 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>अक्षरलिपि ६३ कित हो गये हों। इसके सम्बन्धमें यहाँ दो-एक बातें कहना हम अप्रासङ्गिक नहीं समझते। फिनिक (Phoenician) लोग पुराने यूनानियों और जर्मनजोंके निकट फोनिक या फनिक नामसे परिचित थे। फणिक जातिको आदि बणिक जाति कहा जा कहा जा सकता है। फणिक और बणिक शब्दमें उच्चारणका कुछ अधिक अलगाव नहीं। सेमेटिक फ = प। ऋग्वेदके बहुतसे स्थानोंमें 'पणि' शब्द लिखा है। ५वें मण्डलवाले ३२ सूक्तके भाष्यमें सायणाचार्यने 'पणि' शब्दका 'बणिक्' अर्थ बताया है। इधर पाणिनि- के उणादि-सूत्रके अनुसार भी 'पण' धातुसे बणिक् शब्द निष्पन्न हुआ है; सुतरां पणिक और बणिक एक ही बात है। ऋग्वेदमें पणि लोग गोदुग्ध-व्यवसायी और समृद्धिशाली जातिरूपसे ही परिचित हैं। दूध, दही, और घी बनानेके लिये, उनके पास 'चतुःशृङ्ग' और 'दशयन्त्र उत्स' (ऋक् ६।४४।२४) नामक यन्त्र थे। अङ्गिरा प्रभृति वेदोक्त याज्ञिक उनके घोर शत्रु थे; सदा उनका गोधन छीन लेते थे। इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब पणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।* फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व- -------------------------------------------------------------------------------------- * Pococke's India in Greece, p. 218. भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद- में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।† गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों- के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर- पर उनका अधिकार हुआ। अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार- तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग- के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)- का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है। वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने- पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर -------------------------------------------------------------------------------------- † "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४)<noinclude></noinclude> 7mnf57hm2ghtadlf7xsajqfu2hr9zgr 662752 662751 2026-06-12T17:22:27Z Manvikesarwani09 6620 662752 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>अक्षरलिपि ६३ कित हो गये हों। इसके सम्बन्धमें यहाँ दो-एक बातें कहना हम अप्रासङ्गिक नहीं समझते। फिनिक (Phoenician) लोग पुराने यूनानियों और जर्मनजोंके निकट फोनिक या फनिक नामसे परिचित थे। फणिक जातिको आदि बणिक जाति कहा जा सकता है। फणिक और बणिक शब्दमें उच्चारणका कुछ अधिक अलगाव नहीं। सेमेटिक फ = प। ऋग्वेदके बहुतसे स्थानोंमें 'पणि' शब्द लिखा है। ५वें मण्डलवाले ३२ सूक्तके भाष्यमें सायणाचार्यने 'पणि' शब्दका 'बणिक्' अर्थ बताया है। इधर पाणिनि- के उणादि-सूत्रके अनुसार भी 'पण' धातुसे बणिक् शब्द निष्पन्न हुआ है; सुतरां पणिक और बणिक एक ही बात है। ऋग्वेदमें पणि लोग गोदुग्ध-व्यवसायी और समृद्धिशाली जातिरूपसे ही परिचित हैं। दूध, दही, और घी बनानेके लिये, उनके पास 'चतुःशृङ्ग' और 'दशयन्त्र उत्स' (ऋक् ६।४४।२४) नामक यन्त्र थे। अङ्गिरा प्रभृति वेदोक्त याज्ञिक उनके घोर शत्रु थे; सदा उनका गोधन छीन लेते थे। इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब पणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।* फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व- — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — * Pococke's India in Greece, p. 218. भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद- में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।† गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों- के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर- पर उनका अधिकार हुआ। अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार- तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग- के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)- का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है। वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने- पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — † "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४)<noinclude></noinclude> ams8tmn4ldhg8lmdnof4ie1iofj7czf 662753 662752 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इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब pणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।* फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व- भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद-में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।† गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों-के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर-पर उनका अधिकार हुआ। अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार-तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग-के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)-का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है। वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने-पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर * Pococke's India in Greece, p. 218. † "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४)<noinclude></noinclude> ely2mvnxc488vmju5jdl373hgcuvfgr 662754 662753 2026-06-12T17:28:50Z Manvikesarwani09 6620 662754 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>अक्षरलिपि                           ६३ कित हो गये हों। इसके सम्बन्धमें यहाँ दो-एक बातें कहना हम अप्रासङ्गिक नहीं समझते। फिनिक (Phoenician) लोग पुराने यूनानियों और जर्मनजोंके निकट फोनिक या फनिक नामसे परिचित थे। फणिक जातिको आदि बणिक जाति कहा जा सकता है। फणिक और बणिक शब्दमें उच्चारणका कुछ अधिक अलगाव नहीं। सेमेटिक फ = प। ऋग्वेदके बहुतसे स्थानोंमें 'पणि' शब्द लिखा है। ५वें मण्डलवाले ३२ सूक्तके भाष्यमें सायणाचार्यने 'पणि' शब्दका 'बणिक्' अर्थ बताया है। इधर पाणिनि-के उणादि-सूत्रके अनुसार भी 'पण' धातुसे बणिक शब्द निष्पन्न हुआ है; सुतरां पणिक और बणिक एक ही बात है। ऋग्वेदमें पणि लोग गोदुग्ध-व्यवसायी और समृद्धिशाली जातिरूपसे ही परिचित हैं। दूध, दही, और घी बनानेके लिये, उनके पास 'चतुःशृङ्ग' और 'दशयन्त्र उत्स' (ऋक् ६।४४।२४) नामक यन्त्र थे। अङ्गिरा प्रभृति वेदोक्त याज्ञिक उनके घोर शत्रु थे; सदा उनका गोधन छीन लेते थे। इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब pणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।* फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व- भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद-में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।† गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों-के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर-पर उनका अधिकार हुआ। अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार-तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग-के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)-का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है। वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने-पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर * Pococke's India in Greece, p. 218. † "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४)<noinclude></noinclude> 6j3dzsuip8o5qqdyf8iob0fs3zbftl5 662755 662754 2026-06-12T17:47:13Z Manvikesarwani09 6620 662755 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|कित हो गये हों। 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ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।<ref>Pococke's India in Greece, p. 218.</ref> फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व-}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद-में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।<ref>"किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४)</ref> गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों-के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर-पर उनका अधिकार हुआ।<br> {{gap}}अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार-तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग-के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)-का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है।<br> 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धातुसे बणिक शब्द निष्पन्न हुआ है; सुतरां पणिक और बणिक एक ही बात है। ऋग्वेदमें पणि लोग गोदुग्ध-व्यवसायी और समृद्धिशाली जातिरूपसे ही परिचित हैं। दूध, दही, और घी बनानेके लिये, उनके पास 'चतुःशृङ्ग' और 'दशयन्त्र उत्स' (ऋक् ६।४४।२४) नामक यन्त्र थे। अङ्गिरा प्रभृति वेदोक्त याज्ञिक उनके घोर शत्रु थे; सदा उनका गोधन छीन लेते थे। इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब pणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।* फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व- भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद-में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।† गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों-के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर-पर उनका अधिकार हुआ। अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार-तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग-के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)-का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है। वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने-पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर * Pococke's India in Greece, p. 218. † "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४)<noinclude></noinclude> ely2mvnxc488vmju5jdl373hgcuvfgr पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६६ 250 82730 662757 345887 2026-06-12T17:52:11Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662757 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|६४}}&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अक्षरलिपि'''<br> {{outdent|हैं। खरोष्ठी लिपिमालाके उत्पत्ति-प्रसङ्गमें इस विषयकी आलोचना की जायगी। द्राविड़ीय सभ्यता समुद्रको राह सुदूर पाश्चात्य और प्राच्य जनपदों-में फैल कर भी भारतमें आर्यवैदिकोंके प्रभावसे ठहर न सकी। यहां अगस्त्यादि आर्य-ऋषियोंने द्राविड़ी समाजका संस्कार कर लोगों को आर्यभावापन्न बना लिया था। इसीसे आज भो अगस्त्य ऋषि अक्षरमाला और व्याकरणके बनाने वाले बताये और गिने जाते हैं और द्राविड़ी लिपिमें ब्राह्मी लिपिके आदर्शसे अक्षरमालाकी संख्या भी बढ़ गई है।<br> {{center|{{smaller|ब्राह्मी लिपिकी उत्पत्ति।}}}} {{gap}}अल् बरुणी, भारतीय पण्डितोंके मुंहसे सुनकर लिख गये हैं, कि पराशरपुत्र वेदव्यास ही अक्षर-लिपिके उद्भावयिता थे। जैनियोंके मतसे ऋषभदेवने दाहने हाथसे अट्ठारह प्रकारकी जो लिपि सिखाई थीं,<ref>"अथ श्रीऋषभदेवेन ब्राह्मी दक्षिणहस्तेन अष्टादश लिपयो दर्शिताः।"<br>(लक्ष्जीवल्लभगणिरचितकल्पसूत्रकल्पद्रुमकलिका)</ref> उनमें से आदि लिपिका नाम ब्राह्मी है। भागवतके मतसे ऋषभदेव भगवान्का आठवां अवतार हैं (१।३।१३)। वह लोक, वेद, ब्राह्मण और गो सबके परम गुरु थे और उन्होंने सकल धर्मके मूल गुह्य ब्राह्म-धर्म (वेदरहस्य)का ब्राह्मणदर्शित मार्गके अनुसार उपदेश दिया था (५।६।अः)। ब्रह्मावर्तमें ब्रह्मर्षियोंको सभाके बीच उन्होंने ब्राह्मधर्मका प्रचार किया (५।४।१६-१८)। राजर्षि भरत उन्हीं ऋषभदेवके पुत्र थे। उन्हींके नामपर इस देशका नाम भारतवर्ष रखा गया है। वह ब्रह्माक्षरका जप करते थे (५।८।११)।<br> {{gap}}महाभारतमें लिखा है— {{center|{{smaller|"इत्येते चतुरो वर्णा एषा ब्राह्मी सरस्वती।<br>विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात्त्वज्ञानतां गताः॥" (शान्तिपर्व १८८।५)}}}} चारो वर्ण ब्राह्मणसे ही वर्णान्तरको प्राप्त हुए हैं और पूर्वकालसे ही ब्रह्माने इन चारो वर्णोंको ब्राह्मी भाषा निर्दिष्ट कर रखी है।<br> {{gap}}उद्धृत प्रमाणसे अच्छी तरह जान पड़ता है, कि ब्रह्म शब्दका अर्थ वेद और ब्राह्मीका अर्थ वैदिकी है।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|ऋषभदेवने ही सम्भवतः लिपिविद्याके लिये लिपि कौशलका उद्भावन किया था। इसलिये देखते हैं, कि ब्राह्मोलिपि कहनेसे पुराकालमें वैदिकी लिपि हो समझी जाती रही। यह पहले ही प्रमाणित हो चुका है, कि वेद अवश्य लिपिवद्ध होते थे। ऋषभदेवने ही सम्भवतः ब्रह्मविद्याशिक्षाकी उपयोगी बाह्मोलिपिका प्रचार किया ; हो न हो, इसीलिये वह अष्टम अवतार बताये जाकर परिचित हुए। ब्राह्मोलिपि नामसे भी लोगोंका यह कहना सच मालूम पड़ता है, कि पहले यह लिपि ब्रह्मावर्तमें आविष्कृत हुई थी। वेदव्यास भी यह बात कहनेसे लिपि-प्रचारक गिने जा सकते हैं, कि उन्होंने वेद-सङ्कलनकालमें इस लिपिस काम लिया। जो हो, ब्राह्मीलिपि ही भारतीय आर्योंकी आदि लिपि है, इस ब्राह्मी लिपिसे हो भारतकी सब लिपि निकली हैं।<br> {{gap}}डाकर बूहलरने अशोकलिपिको ही ब्राह्मी कह कर गणना की है। निःसन्देह, हम यह स्वीकार नहीं कर सकते। अशोकके समय भारतमें चौसठ प्रकारकी लिपि चलती थीं, उस समय पाटलिपुत्र उनकी राज-धानी थी। ऐसे स्थलमें उनके अनुशासनीको मागध-ब्राह्मोलिपि कहकर ग्रहण कर सकते हैं; इसे छोड़ विभिन्न प्रदेशोंसे जो अशोकलिपि निकली हैं, उनके अक्षर और उनकी शब्दयोजना अविकल एक तरह नहीं। विहारके बराबरकी गिरिलिपिमें 'अनपितम्', दाक्षिणात्यको स्तम्भलिपिमें 'आनपयिमति' और उत्तर-पश्चिम-प्रदेशकी स्तम्भलिपिमें 'आनापपितं' पाठ देख पड़ता है। यह कैसा अक्षरविपर्याय है, कि दक्षिण-देशीय लिपिमें 'एतारिसम्' और 'अनपयम्' किन्तु उत्तर-देशीय लिपिमें 'एतादिसम्' और 'अनपियं' लिखा मिलता है। इसे छोड़ दक्षिण-देशीय और उत्तर-देशीय लिपिके बीच भी व्यञ्जनसे मिले आकार और इकारका प्रमेद देख पड़ता है। इससे सहजमें ही समझा जायगा, कि देशभेदसे जैसे भाषामें कुछ अल-गाव हो गया था, वैसे ही अक्षरलिपि भी सामान्य रूपसे बदल गई थी। मालूम होता है, कि अशोकसे पहले ऐसी कोई लिपि वर्त्तमान थी। अक्षरयोजनाके}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bgiqggbt1dalf8y2j0tu36asoalckfa 662760 662757 2026-06-12T18:02:13Z Manvikesarwani09 6620 662760 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="display: flex; gap: 20px; align-items: flex-start; 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{{center|{{smaller|ब्राह्मी लिपिकी उत्पत्ति।}}}} {{gap}}अल् बरुणी, भारतीय पण्डितोंके मुंहसे सुनकर लिख गये हैं, कि पराशरपुत्र वेदव्यास ही अक्षर-लिपिके उद्भावयिता थे। जैनियोंके मतसे ऋषभदेवने दाहने हाथसे अट्ठारह प्रकारकी जो लिपि सिखाई थीं,* उनमें से आदि लिपिका नाम ब्राह्मी है। भागवतके मतसे ऋषभदेव भगवान्का आठवां अवतार हैं (१।३।१३)। वह लोक, वेद, ब्राह्मण और गो सबके परम गुरु थे और उन्होंने सकल धर्मके मूल गुह्य ब्राह्म-धर्म (वेदरहस्य)का ब्राह्मणदर्शित मार्गके अनुसार उपदेश दिया था (५।६।अः) । ब्रह्मावर्तमें ब्रह्मर्षियोंको सभाके बीच उन्होंने ब्राह्मधर्मका प्रचार किया (५।४।१६-१८)। राजर्षि भरत उन्हीं ऋषभदेवके पुत्र थे। उन्हींके नामपर इस देशका नाम भारतवर्ष रखा गया है। वह ब्रह्माक्षरका जप करते थे (५।८।११)।<br> {{gap}}महाभारतमें लिखा है— {{center|{{smaller|"इत्येते चतुरो वर्णा एषा ब्राह्मी सरखती।<br>विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात्त्वज्ञानतां गताः॥" (शान्तिपर्व १८८।१५)}}}} चारो वर्ण ब्राह्मणसे ही वर्णान्तरको प्राप्त हुए हैं और पूर्वकालसे ही ब्रह्माने इन चारो वर्णोंको ब्राह्मी भाषा निर्दिष्ट कर रखी है।<br> {{gap}}उद्धृत प्रमाणसे अच्छी तरह जान पड़ता है, कि ब्रह्म शब्दका अर्थ वेद और ब्राह्मीका अर्थ वैदिकी है।}} <br><br> <hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;"> {{smaller|* "अथ श्रीऋषभदेवेन ब्राह्मी दक्षिणहस्तेन अष्टादश लिपयो दर्शिताः।"<br>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(लक्ष्मीवल्लभगणिरचितकल्पसूत्रकल्पद्रुमकलिका)}} </div> <div style="width: 48%; float: right; padding-left: 10px;"> {{outdent|ऋषभदेवने ही सम्भवतः लिपिविद्याके लिये लिपि कौशलका उद्भावन किया था। इसलिये देखते हैं, कि ब्राह्मोलिपि कहनेसे पुराकालमें वैदिकी लिपि हो समझी जाती रही। यह पहले ही प्रमाणित हो चुका है, कि वेद अवश्य लिपिवद्ध होते थे। ऋषभदेवने ही सम्भवतः ब्रह्मविद्याशिक्षाकी उपयोगी बाह्मोलिपिका प्रचार किया ; हो न हो, इसीलिये वह अष्टम अवतार बताये जाकर परिचित हुए। ब्राह्मोलिपि नामसे भी लोगोंका यह कहना सच मालूम पड़ता है, कि पहले यह लिपि ब्रह्मावर्तमें आविष्कृत हुई थी। वेदव्यास भी यह बात कहनेसे लिपि-प्रचारक गिने जा सकते हैं, कि उन्होंने वेद-सङ्कलनकालमें इस लिपिस काम लिया।<br> {{gap}}जो हो, ब्राह्मीलिपि ही भारतीय आर्योंकी आदि लिपि है, इस ब्राह्मी लिपिसे ही भारतकी सब लिपि निकली हैं।<br> {{gap}}डाकर बूहलरने अशोकलिपिको ही ब्राह्मी कह कर गणना की है। निःसन्देह, हम यह स्वीकार नहीं कर सकते। अशोकके समय भारतमें चौसठ प्रकारकी लिपि चलती थीं, उस समय पाटलिपुत्र उनकी राज-धानी थी। ऐसे स्थलमें उनके अनुशासनीको मागध-ब्राह्मोलिपि कहकर ग्रहण कर सकते हैं; इसे छोड़ विभिन्न प्रदेशोंसे जो अशोकलिपि निकली हैं, उनके अक्षर और उनकी शब्दयोजना अविकल एक तरह नहीं। विहारके बराबरकी गिरिलिपिमें 'अनपितम्', दाक्षिणात्यको स्तम्भलिपिमें 'आनपयिमति' और उत्तर-पश्चिम-प्रदेशकी स्तम्भलिपिमें 'आनापपितं' पाठ देख पड़ता है। यह कैसा अक्षरविपर्याय है, कि दक्षिण-देशीय लिपिमें 'एतारिसम्' और 'अनपयम्' किन्तु उत्तर-देशीय लिपिमें 'एतादिसम्' और 'अनपियं' लिखा मिलता है। इसे छोड़ दक्षिण-देशीय और उत्तर-देशीय लिपिके बीच भी व्यञ्जनसे मिले आकार और इकारका प्रमेद देख पड़ता है। इससे सहजमें ही समझा जायगा, कि देशभेदसे जैसे भाषामें कुछ अल-गाव हो गया था, वैसे ही अक्षरलिपि भी सामान्य रूपसे बदल गई थी। मालूम होता है, कि अशोकसे पहले ऐसी कोई लिपि वर्त्तमान थी। अक्षरयोजनाके}} </div> <noinclude></div><div style="clear:both;"></div></noinclude><noinclude></noinclude> r5fgcirbgk1so84pkje5no6zgy5il0g 662761 662760 2026-06-12T18:07:25Z Manvikesarwani09 6620 662761 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="display: flex; gap: 20px; align-items: flex-start; justify-content: space-between; border-left: 1px solid transparent;"></noinclude> <div style="width: 48%; float: left; padding-right: 10px; border-right: 1px solid black; margin-top: 25px; min-height:850px;"> {{outdent|६४}}&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;<span style="position: relative; top: -35px;">'''अक्षरलिपि'''</span><br> {{outdent|हैं। खरोष्ठी लिपिमालाके उत्पत्ति-प्रसङ्गमें इस विषयकी आलोचना की जायगी। द्राविड़ीय सभ्यता समुद्रको राह सुदूर पाश्चात्य और प्राच्य जनपदों-में फैल कर भी भारतमें आर्यवैदिकोंके प्रभावसे ठहर न सकी। यहां अगस्त्यादि आर्य-ऋषियोंने द्राविड़ी समाजका संस्कार कर लोगों को आर्यभावापन्न बना लिया था। इसीसे आज भो अगस्त्य ऋषि अक्षरमाला और व्याकरणके बनाने वाले बताये और गिने जाते हैं और द्राविड़ीि लिपिमें ब्राह्मी लिपिके आदर्शसे अक्षरमालाकी संख्या भी बढ़ गई है।<br> {{center|{{smaller|ब्राह्मी लिपिकी उत्पत्ति।}}}} {{gap}}अल् बरुणी, भारतीय पण्डितोंके मुंहसे सुनकर लिख गये हैं, कि पराशरपुत्र वेदव्यास ही अक्षर-लिपिके उद्भावयिता थे। जैनियोंके मतसे ऋषभदेवने दाहने हाथसे अट्ठारह प्रकारकी जो लिपि सिखाई थीं,* उनमें से आदि लिपिका नाम ब्राह्मी है। भागवतके मतसे ऋषभदेव भगवान्का आठवां अवतार हैं (१।३।१३)। वह लोक, वेद, ब्राह्मण और गो सबके परम गुरु थे और उन्होंने सकल धर्मके मूल गुह्य ब्राह्म-धर्म (वेदरहस्य)का ब्राह्मणदर्शित मार्गके अनुसार उपदेश दिया था (५।६।अः) । ब्रह्मावर्तमें ब्रह्मर्षियोंको सभाके बीच उन्होंने ब्राह्मधर्मका प्रचार किया (५।४।१६-१८)। राजर्षि भरत उन्हीं ऋषभदेवके पुत्र थे। उन्हींके नामपर इस देशका नाम भारतवर्ष रखा गया है। वह ब्रह्माक्षरका जप करते थे (५।८।११)।<br> {{gap}}महाभारतमें लिखा है— {{center|{{smaller|"इत्येते चतुरो वर्णा एषा ब्राह्मी सरखती।<br>विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात्त्वज्ञानतां गताः॥" (शान्तिपर्व १८८।१५)}}}} चारो वर्ण ब्राह्मणसे ही वर्णान्तरको प्राप्त हुए हैं और पूर्वकालसे ही ब्रह्माने इन चारो वर्णोंको ब्राह्मी भाषा निर्दिष्ट कर रखी है।<br> {{gap}}उद्धृत प्रमाणसे अच्छी तरह जान पड़ता है, कि ब्रह्म शब्दका अर्थ वेद और ब्राह्मीका अर्थ वैदिकी है।}} <br><br> <hr style="width:100%; border:0; 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ब्रह्मावर्तमें आविष्कृत हुई थी। वेदव्यास भी यह बात कहनेसे लिपि-प्रचारक गिने जा सकते हैं, कि उन्होंने वेद-सङ्कलनकालमें इस लिपिस काम लिया।<br> {{gap}}जो हो, ब्राह्मीलिपि ही भारतीय आर्योंकी आदि लिपि है, इस ब्राह्मी लिपिसे ही भारतकी सब लिपि निकली हैं।<br> {{gap}}डाकर बूहलरने अशोकलिपिको ही ब्राह्मी कह कर गणना की है। निःसन्देह, हम यह स्वीकार नहीं कर सकते। अशोकके समय भारतमें चौसठ प्रकारकी लिपि चलती थीं, उस समय पाटलिपुत्र उनकी राज-धानी थी। ऐसे स्थलमें उनके अनुशासनीको मागध-ब्राह्मोलिपि कहकर ग्रहण कर सकते हैं; इसे छोड़ विभिन्न प्रदेशोंसे जो अशोकलिपि निकली हैं, उनके अक्षर और उनकी शब्दयोजना अविकल एक तरह नहीं। विहारके बराबरकी गिरिलिपिमें 'अनपितम्', दाक्षिणात्यको स्तम्भलिपिमें 'आनपयिमति' और उत्तर-पश्चिम-प्रदेशकी स्तम्भलिपिमें 'आनापपितं' पाठ देख पड़ता है। यह कैसा अक्षरविपर्याय है, कि दक्षिण-देशीय लिपिमें 'एतारिसम्' और 'अनपयम्' किन्तु उत्तर-देशीय लिपिमें 'एतादिसम्' और 'अनपियं' लिखा मिलता है। इसे छोड़ दक्षिण-देशीय और उत्तर-देशीय लिपिके बीच भी व्यञ्जनसे मिले आकार और इकारका प्रमेद देख पड़ता है। इससे सहजमें ही समझा जायगा, कि देशभेदसे जैसे भाषामें कुछ अल-गाव हो गया था, वैसे ही अक्षरलिपि भी सामान्य रूपसे बदल गई थी। मालूम होता है, कि अशोकसे पहले ऐसी कोई लिपि वर्त्तमान थी। अक्षरयोजनाके}} </div> <noinclude></div><div style="clear:both;"></div></noinclude><noinclude></noinclude> snn2kew4li7lqze5yful74q7t5rj7m8 662762 662761 2026-06-12T18:08:30Z Manvikesarwani09 6620 662762 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><noinclude><div style="display: flex; gap: 20px; align-items: flex-start; justify-content: space-between; border-left: 1px solid transparent;"></noinclude> <div style="width: 48%; float: left; padding-right: 10px; border-right: 1px solid black; margin-top: 25px; min-height:850px;"> 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उद्भावयिता थे। जैनियोंके मतसे ऋषभदेवने दाहने हाथसे अट्ठारह प्रकारकी जो लिपि सिखाई थीं,* उनमें से आदि लिपिका नाम ब्राह्मी है। भागवतके मतसे ऋषभदेव भगवान्का आठवां अवतार हैं (१।३।१३)। वह लोक, वेद, ब्राह्मण और गो सबके परम गुरु थे और उन्होंने सकल धर्मके मूल गुह्य ब्राह्म-धर्म (वेदरहस्य)का ब्राह्मणदर्शित मार्गके अनुसार उपदेश दिया था (५।६।अः) । ब्रह्मावर्तमें ब्रह्मर्षियोंको सभाके बीच उन्होंने ब्राह्मधर्मका प्रचार किया (५।४।१६-१८)। राजर्षि भरत उन्हीं ऋषभदेवके पुत्र थे। उन्हींके नामपर इस देशका नाम भारतवर्ष रखा गया है। वह ब्रह्माक्षरका जप करते थे (५।८।११)।<br> {{gap}}महाभारतमें लिखा है— {{center|{{smaller|"इत्येते चतुरो वर्णा एषा ब्राह्मी सरखती।<br>विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात्त्वज्ञानतां गताः॥" (शान्तिपर्व १८८।१५)}}}} चारो वर्ण ब्राह्मणसे ही वर्णान्तरको प्राप्त हुए हैं और पूर्वकालसे ही ब्रह्माने इन चारो वर्णोंको ब्राह्मी भाषा निर्दिष्ट कर रखी है।<br> {{gap}}उद्धृत प्रमाणसे अच्छी तरह जान पड़ता है, कि ब्रह्म शब्दका अर्थ वेद और ब्राह्मीका अर्थ वैदिकी है।}} <br><br> <hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;"> {{smaller|* "अथ श्रीऋषभदेवेन ब्राह्मी दक्षिणहस्तेन अष्टादश लिपयो दर्शिताः।"<br>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(लक्ष्मीवल्लभगणिरचितकल्पसूत्रकल्पद्रुमकलिका)}} </div> <div style="width: 48%; float: right; padding-left: 10px; margin-top: 15px;"> {{outdent|ऋषभदेवने ही सम्भवतः लिपिविद्याके लिये लिपि कौशलका उद्भावन किया था। इसलिये देखते हैं, कि ब्राह्मोलिपि कहनेसे पुराकालमें वैदिकी लिपि हो समझी जाती रही। यह पहले ही प्रमाणित हो चुका है, कि वेद अवश्य लिपिवद्ध होते थे। ऋषभदेवने ही सम्भवतः ब्रह्मविद्याशिक्षाकी उपयोगी बाह्मोलिपिका प्रचार किया ; हो न हो, इसीलिये वह अष्टम अवतार बताये जाकर परिचित हुए। ब्राह्मोलिपि नामसे भी लोगोंका यह कहना सच मालूम पड़ता है, कि पहले यह लिपि ब्रह्मावर्तमें आविष्कृत हुई थी। वेदव्यास भी यह बात कहनेसे लिपि-प्रचारक गिने जा सकते हैं, कि उन्होंने वेद-सङ्कलनकालमें इस लिपिस काम लिया।<br> {{gap}}जो हो, ब्राह्मीलिपि ही भारतीय आर्योंकी आदि लिपि है, इस ब्राह्मी लिपिसे ही भारतकी सब लिपि निकली हैं।<br> {{gap}}डाकर बूहलरने अशोकलिपिको ही ब्राह्मी कह कर गणना की है। निःसन्देह, हम यह स्वीकार नहीं कर सकते। अशोकके समय भारतमें चौसठ प्रकारकी लिपि चलती थीं, उस समय पाटलिपुत्र उनकी राज-धानी थी। ऐसे स्थलमें उनके अनुशासनीको मागध-ब्राह्मोलिपि कहकर ग्रहण कर सकते हैं; इसे छोड़ विभिन्न प्रदेशोंसे जो अशोकलिपि निकली हैं, उनके अक्षर और उनकी शब्दयोजना अविकल एक तरह नहीं। विहारके बराबरकी गिरिलिपिमें 'अनपितम्', दाक्षिणात्यको स्तम्भलिपिमें 'आनपयिमति' और उत्तर-पश्चिम-प्रदेशकी स्तम्भलिपिमें 'आनापपितं' पाठ देख पड़ता है। यह कैसा अक्षरविपर्याय है, कि दक्षिण-देशीय लिपिमें 'एतारिसम्' और 'अनपयम्' किन्तु उत्तर-देशीय लिपिमें 'एतादिसम्' और 'अनपियं' लिखा मिलता है। इसे छोड़ दक्षिण-देशीय और उत्तर-देशीय लिपिके बीच भी व्यञ्जनसे मिले आकार और इकारका प्रमेद देख पड़ता है। इससे सहजमें ही समझा जायगा, कि देशभेदसे जैसे भाषामें कुछ अल-गाव हो गया था, वैसे ही अक्षरलिपि भी सामान्य रूपसे बदल गई थी। मालूम होता है, कि अशोकसे पहले ऐसी कोई लिपि वर्त्तमान थी। अक्षरयोजनाके}} </div> <noinclude></div><div style="clear:both;"></div></noinclude><noinclude></noinclude> bz6bvjyd7pw1rdyh0gmj0njya6gmzre पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५४ 250 108407 662744 662727 2026-06-12T14:11:27Z Saniya kousar 6615 /* समस्याकारक */ 662744 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="2" user="Saniya kousar" /></noinclude>" इस ढालू चट्टान पर चढ़ना होगा ।" "यह बहुत कठिन है ।" " परन्तु दूसरा उपाय ही नहीं है । " " तव चढ़ो ।" तानाजी चट्टान को दोनों हाथों से दृढ़ता से पकड़ कर खड़े हो गए । देखते-देखते दूसरा सैनिक छलाँग मारकर चट्टान पर हो रहा, और सेना नायक को खींच लिया। उस बीहड़ और सीधी खड़ी चट्टान पर धीरे-धीरे ये हठी सैनिक उस दुर्भेद्य अन्धकार में चढ़ने लगे । कल्याण बुर्ज के नीचे आकर तानाजी ने कहा - " अब कमन्द लाओ ।" सन्दूकची में से शिवाजी की प्रसिद्ध घोर पड़ ' यशवन्त' गोह निकाली गई । उसके माथे पर तानाजी ने चन्दन का तिलक लगाया । गले में माला पहनाई और कमन्द में पर न पहुँच सकी, वापस आ गई। बाँधकर फेंका । परन्तु गोह स्थान तानाजी ने क्रोध करके कहा- " इस बार भी यशवन्त लौट आया तो इसे मारकर खा जाऊँगा ।" उन्होंने पूरे जोर से उसे ऊपर फेंका । गोह ने बुर्ज पर पंजे गाढ़ दिए । तानाजी दाँतों में तलवार दबाए बुर्ज पर पहुँच गए। वहाँ जगतसिंह तैयार था । उसका साथी तुर्क मरा पड़ा था । रस्सियों को बुर्ज के कंगूरों में अटका दिया गया । अब एक के बाद दूसरा और फिर तीसरा । इस प्रकार बारह सैनिक बुर्ज पर पहुँच गए, इसी समय कमन्द टूट गया । नीचे के सिपाही नीचे रह गए । दुर्ग में सन्नाटा था । सब चुपचाप दीवारों की छाया में छिपते हुए फाटक की ओर बढ़ रहे थे । फाटक पर प्रहरी असावधान थे । एक ने सजग होकर पुकारा - " कौन ?” दूसरे ही क्षण एक तलवार का भरपूर हाथ उस पर पड़ा । सभी प्रहरी सजग होकर आक्रमण करने लगे । देखते-ही-देखते किले में १५२<noinclude><center>१५२</center></noinclude> 7bx5o1fcuc2e01l9fik5ulm8ocrwm9k