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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|'''ग्रंथावली'''}}{{right|[ ५४१ ]}}
प्राप्त करूँगा और मैं इस प्रकार कर्मों को ज्ञान की साधना में परिणत करता हुआ मृत्यु का आलिंगन करने को सदैव तैयार रहूँगा।
कुम्हार होकर मैं सुन्दर वर्तन बना दूँगा। धोबी होकर मैं कपड़ो का मैल अच्छी तरह धो दूँगा। चमार होकर मैं चमड़ा जैसी घिनौनी वस्तु को अच्छी तरह रँगूँगा और इस प्रकार जाति-पाँति और कुल के कारण उत्पन्न हीनत्व भावना को समाप्त कर दूँगा। तैली होने पर मैं अपने शरीर को कोल्हू बनाकर उसमें पाप-पुण्यों को पेरूँगा तथा भक्ति रूपी तैल निकालूँगा। अपनी पाँचों इन्द्रियों को कोल्हू का बैल बना दूँगा और राम-प्रेम की रस्सी से नाथ कर उसे (पंचइन्द्रिय रूपी बैल) को भक्ति के सीधे मार्ग पर चलाऊँगा। क्षत्रिय होने पर मैं विवेक की तलवार चला दूँगा तथा योग एवं ज्ञान दोनों को सिद्ध करूँगा। (विवेक पूर्वक दुष्टों को दण्ड दूँगा तथा दण्ड निर्धारित करते समय तटस्थ की भाँति व्यवहार करूँगा। यही ज्ञान एवं योग की साधना है।) नाई होने पर मैं मन की समस्त वासनाओं को मूँड दूँगा। बढ़ई होकर मैं कर्मों के बंधन को काटूँगा। अवधूत होने पर मैं इस शरीर के मल को धोकर साफ करूँगा और वधिक के रूप में इस वासनामय मन को ही मार डालूँगा। व्यापारी बनने पर मैं परम तत्त्व का व्यापार करूँगा। जुवारी होने पर मैं मृत्यु भय को ही दाव पर लगाकर हार जाऊँगा (मैं अपने शरीर की नौका और मन का केवट एवं जिह्वा की पतवार बनाकर भव-सागर के पार जाऊँगा)। कबीर कहते हैं कि इस प्रकार मैं स्वयं तिरूँगा और अपने पूर्वजों (अन्य व्यक्तियों) का भी उद्धार कर दूँगा।
अलंकार—(१) रूपक—तन कोल्हू, राम जेवरिया। पंच बैल तन करि डारूँ।
(२) भव सागर।
(३) अनुप्रास—तरिहै, तिहूँ, तारूँ।
विशेष—(१) कर्म की महिमा का प्रतिपादन है। निष्ठापूर्वक कार्य ही मोक्ष का साधन बनता है। "योगः कर्मसु कौशलम्" (गीता)
(२) कबीर की यह मान्यता प्रकट है कि सभी जातियों के व्यक्ति अपने व्यावसायिक कर्मों को आध्यात्मिक रूप प्रदान करके परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। यही समन्वय एवं तत्त्व दृष्टि है। वह स्वयं जुलाहे थे और अपने कर्म को निष्ठापूर्वक करते हुए परमपद के अधिकारी बने थे।
(३) इस पद में सभी जातियों के कर्मों का साधना-परक अर्थ किया गया है। व्यक्ति चाहे जिस सामाजिक स्थिति में हो उसे ईश्वर-भक्ति का पूर्ण अधिकार एवं अवसर प्राप्त है। यह मान्यता भारतीय दृष्टिकोण के अनुरूप है। तुलना करें—
(क) श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।
श्री मदभगवद्गीता, ३/३५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४६७
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|अखरावट}}{{right|२८५}}
{{block center|<poem>
{{center|दोहा}}
:::अस जानै है सब महँ औ सब भावहि सोइ ।
:::हौं कोंहाँर कर माटी, जो चाहै सो होइ ॥
{{center|सोरठा}}
:::सिद्ध पदारथ तीनि, बुद्धि पावै औ सिर, कया ।
:::पुनि लेइहि सब छीनि, मुहमद तब पछिताव मैं ॥ ३७ ॥
सा साहस जाकर जग पूरी। सो पावा वह अमृत मूरी ॥
कहाँ मंत्र जो आपनि पूँजी। खोलु केवारा ताला कूँजी ॥
साठि बरिस जो लपई झपई। छन एक गुपुत जाप जो जपई ॥
जानहुँ दुर्वा बराबर सेवा। ऐसन चलै मुहमदी खेवा ॥
करनी करै जो पूजै आसा। सँवरे नावँ जो लेइ लेइ साँसा ॥
काठी घँसत उठै जस आगी। दरसन देखि उठै तस जागी ॥
जस सरवर महँ पंकज देखा। हिय कें आँखि दरस सब लेखा ॥
{{center|दोहा}}
:::जासु कथा दरपन कै, देखु आप मुँह आप ।
:::आपुहि आपु जाइ मिलु, जहँ नहिं पुन्नि न पाप ॥
{{center|सोरठा}}
:::मनुवाँ चंचल ढाँप, बरजे अहथिर ना रहै ।
:::पाल पेटारे साँप, मुहमद तेहि बिधि राखिए ॥ ३८ ॥
हा हिय ऐसन बरजे रहई। बाँड़ न जाइ, बूड़ अति अहई ॥
सोइ हिरदय कै सीढ़ी चढ़ई। जिमि लोहार घन दरपन गढ़ई ॥
चिनगि जोति करसी तें भागै। परम तंतु परचावै लागै ॥
पाँच दूत लोहा गति तावैं। दुहूँ साँस भाठी सुलगावैं ॥
कया ताइ कै खरतर१ करई। प्रेम के सँड़सी पोढ़ कै धरई ॥
हनि हथैव हिय दरसन साजै। छोलनी जाप हिये तन माँजै ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(३८) लपई झपई = पचे, हैरान हो । साठि बरिस...जपई = साठ बरस
अनेक यत्न करके हैरान होना और एक क्षण भर गुप्त मंत्र का जाप करना दोनों
बराबर हैं । मुहमदी खेवा = मुहम्मद का मत या मार्ग । काठी = लकड़ी ।
घँसत = घिसते हुए । मनुवाँ = मन । अहथिर = स्थिर । (३९) जिमि =
लोहार...गढ़ई = जैसे लोहार घन की चोट मार मारकर दरपन गढ़ता है (पुराने
समय में लोहे को खूब माँज और चमकाकर दर्पण बनाए जाते थे, बिहारी ने जो
'दरपन का मोरचा' कहा है वह लोहे के दर्पण के संबंध में है। चिनगि...भागै =
उपले की राख में चिनगारी नहीं रह सकती । परम तंतु = मूल मंत्र से ।
लोहा गति = लोहे के समान । खरतर = खूब खरा या लाल ।
१. पाठ 'केकरि दर' है, जिसका कुछ अर्थ नहीं लगता ।
पोढ़ कै = मजबूती से । हनि = मारकर । हथैव = हथौड़ा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४६८
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|२८६|अखरावट|}}</noinclude>{{left|२८६}}{{center|अखरावट}}
{{block center|<poem>
तिल तिल दिस्टि जोति सहुँ ठानै । साँस चढ़ाइ कै ऊपर आनै ॥
{{center|दोहा}}
:::तौ निरमल मुख देखै जोग होइ तेहि ऊप ।
:::होइ डिठियार सो देखै अंधन के अंधकूप ॥
{{center|सोरठा}}
:::जेकर पास अनफाँस, कहु हिय फिकिर सँभारि कै ।
:::कहत रहै हर साँस, मुहमद निरमल होइ तब ॥ ३९ ॥
खा खेलन औ खेल पसारा । कठिन खेल औ खेलनहारा ॥
आपुहि आपुहि चाह देखावा । आदम रूप भेस धरि आवा ॥
अलिफ एक अल्ला बड़ सोई । दाल दीन दुनिया सब कोई ॥
मीम मुहम्मद प्रीति पियारा । तिनि आखर यह अरथ बिचारा ॥
मुख बिधि अपने हाथ उरेहा । दुइ जग साजि सँवारा देहा ॥
कै दरपन अस रचा बिसेखा । आपन दरस आप महँ देखा ॥
जो यह खोज आप महँ कीन्हा । तेइ आपुहि खोजा, सब चीन्हा ॥
{{center|दोहा}}
:::भागि किया दुइ मारग, पाप पुन्नि दुइ ठाँव ।
:::दहिने सौ सुठि दाहिनें, बाएँ सो सुठि बावैं ॥
{{center|सोरठा}}
:::भा अपूर सब ठावैं, गुड़िला मोम सँवारि कै ।
:::राखा आदम नावैं, मुहमद सब आदम कहै ॥ ४० ॥
औ उन्ह नाँव सीखि जौ पावा । अलख नाव लेइ सिद्ध कहावा ॥
अनहद ते भा आदम दूजा । आप नगर करवावै पूजा ॥
घट घट महँ होइ निति सब ठाऊँ । लाग पुकारै आपन नाऊँ ॥
अनहद सुन्न रहै सब लागे । कबहुँ न विसरै सोए जागे ॥
लिखि पुरान महँ कहा बिसेखी । मोहि नहि देखहु, मैं तुम्ह देखी ॥
तू तस सोइ न मोहि बिसारसि । तू सेवा जीतै, नहि हारसि ॥
अस निरमल जस दरपन आगे । निसि दिन तोर दिस्टि मोहि लागे ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
ऊप = ओप, प्रकास । पास अनफाँस = बंधन और मोक्ष । फिकिर = फ़िक्र,
सामीप्य प्राप्त करने के लिये चिंतन । (४०) आपुहि...देखावा = अपना रूप
अपने को ही दिखाना चाहा । अलिफ = अरबी का आकारसूचक वर्ण ।
दाल = 'द' सूचक वर्ण । मीम = 'म' सूचक वर्ण । तिनि = 'आदम' शब्द के
तीन अक्षर । भागि = विभाग करके, बाँटकर । गुड़िला = पुतला, मूर्ति ।
मोम = मोम का । (४१) अनहद = नादब्रह्म । मोहि नहीं देखहु...देखी =
तुम मुझे नहीं देखते हो, मैं तुम्हें देखता हूँ । सेवा = सेवा से ।<noinclude></noinclude>
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तिल तिल दिस्टि जोति सहुँ ठानै । साँस चढ़ाइ कै ऊपर आनै ॥
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:::तौ निरमल मुख देखै जोग होइ तेहि ऊप ।
:::होइ डिठियार सो देखै अंधन के अंधकूप ॥
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:::जेकर पास अनफाँस, कहु हिय फिकिर सँभारि कै ।
:::कहत रहै हर साँस, मुहमद निरमल होइ तब ॥ ३९ ॥
खा खेलन औ खेल पसारा । कठिन खेल औ खेलनहारा ॥
आपुहि आपुहि चाह देखावा । आदम रूप भेस धरि आवा ॥
अलिफ एक अल्ला बड़ सोई । दाल दीन दुनिया सब कोई ॥
मीम मुहम्मद प्रीति पियारा । तिनि आखर यह अरथ बिचारा ॥
मुख बिधि अपने हाथ उरेहा । दुइ जग साजि सँवारा देहा ॥
कै दरपन अस रचा बिसेखा । आपन दरस आप महँ देखा ॥
जो यह खोज आप महँ कीन्हा । तेइ आपुहि खोजा, सब चीन्हा ॥
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:::भागि किया दुइ मारग, पाप पुन्नि दुइ ठाँव ।
:::दहिने सौ सुठि दाहिनें, बाएँ सो सुठि बावैं ॥
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:::भा अपूर सब ठावैं, गुड़िला मोम सँवारि कै ।
:::राखा आदम नावैं, मुहमद सब आदम कहै ॥ ४० ॥
औ उन्ह नाँव सीखि जौ पावा । अलख नाव लेइ सिद्ध कहावा ॥
अनहद ते भा आदम दूजा । आप नगर करवावै पूजा ॥
घट घट महँ होइ निति सब ठाऊँ । लाग पुकारै आपन नाऊँ ॥
अनहद सुन्न रहै सब लागे । कबहुँ न विसरै सोए जागे ॥
लिखि पुरान महँ कहा बिसेखी । मोहि नहि देखहु, मैं तुम्ह देखी ॥
तू तस सोइ न मोहि बिसारसि । तू सेवा जीतै, नहि हारसि ॥
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ऊप = ओप, प्रकास । पास अनफाँस = बंधन और मोक्ष । फिकिर = फ़िक्र,
सामीप्य प्राप्त करने के लिये चिंतन । (४०) आपुहि...देखावा = अपना रूप
अपने को ही दिखाना चाहा । अलिफ = अरबी का आकारसूचक वर्ण ।
दाल = 'द' सूचक वर्ण । मीम = 'म' सूचक वर्ण । तिनि = 'आदम' शब्द के
तीन अक्षर । भागि = विभाग करके, बाँटकर । गुड़िला = पुतला, मूर्ति ।
मोम = मोम का । (४१) अनहद = नादब्रह्म । मोहि नहीं देखहु...देखी =
तुम मुझे नहीं देखते हो, मैं तुम्हें देखता हूँ । सेवा = सेवा से ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४६९
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{center|अखरावट}}{{right|२८७}}
{{block center|<poem>
{{center|दोहा}}
:::पूहप बास जस हिरदय, रहा नैन भरिपूरि ।
:::नियरे से सुठि नीयरे, ओहट से सुठि दूरि ॥
{{center|सोरठा}}
:::दुवौ दिसटि टक लाइ, दरपन जो देखा चहै ।
:::दरपन जाइ देखाइ, मुहमद तौ मुख देखिए ॥ ४१ ॥
छा छाड़ेहु कलंक जेहि नाहीं । केहु न बराबरि तेहि परछाहीं ॥
सूरज तपै परै अति घामू । लागै गहन गहन होइ सामू ॥
ससि कलंक का पटतर दीन्हा । घटै बढ़ै औ गहनैं लीन्हा ॥
आगि बुझाइ जो पानी परई । पानि सूख, माटी सब सरई ॥
सब जाइहि जो जग महँ होई । सदा सरबदा अहथिर सोई ॥
निहकलंक निरमल सब अंगा । अस नाहीं केहु रूप न रंगा ॥
जो जानै सो भेद न कहई । मन महँ जानि बूझि चुप रहई ॥
{{center|दोहा}}
:::मति ठाकुर कै सुनि कै, कहै जो हिय मझियार ।
:::बहुरि न मत तासों करै, ठाकुर दूजी बार ॥
{{center|सोरठा}}
:::गगरी सहस पचास, जो कोउ पानी भरि धरै ।
:::सूरज दिपै अकास, मुहमद सब महँ देखिए ॥ ४२ ॥
ना नारद तब रोइ पुकारा । एक जोलाहै सौं मैं हारा ॥
प्रेम तंतु निति ताना तनई । जप तप साधि सैकरा भरई ॥
दरब गरब सब देइ बिथारी । गनि साथी सब लेहिं सँभारी ॥
पाँच भूत माँडी गनि मलई । ओहि सों मोर न एकौ चलई ॥
बिधि कहैं सबरि साज सो साजै । लेइ लेइ नावँ कूँच सौ माँजै ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
ओहट = अलग, दूर । मुख = ईश्वर का रूप । (४२) छाड़ेहु...नाहीं =
तुमने उस ईश्वर को छोड़ दिया जो निष्कलंक है । केहु = कोई । सामू = श्याम,
काला । गहनै लीन्हा = गहन से लिया गया, ग्रस्त हुआ (यह प्रयोग बहुत
प्राचीन है, इसी कर्मवाच्य प्रयोग से आजकल के कर्तृवाच्य प्रयोग बने हैं) ।
सरई = सड़ती है । रूप न रंगा = न रूप में, न रंग में । मति ठाकुर...बार =
अपने अंतःकरण में ईश्वर की सलाह सुनकर जो उस हृदय की बात को बाहर
कहता है उससे फिर ईश्वर दूसरी बार सलाह नहीं करता । गगरी सहस =
प्रतिबिंबवाद का यह उदाहरण बहुत पुराना है ।
(४३) तंतु = तागा । बिथारी = बिखेर दे । माँडी = कलप जो कपड़े पर
दिया जाता है । कूँच = जुलाहो की कूँची ।
{{left|२८}}<noinclude></noinclude>
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:::पूहप बास जस हिरदय, रहा नैन भरिपूरि ।
:::नियरे से सुठि नीयरे, ओहट से सुठि दूरि ॥
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:::दुवौ दिसटि टक लाइ, दरपन जो देखा चहै ।
:::दरपन जाइ देखाइ, मुहमद तौ मुख देखिए ॥ ४१ ॥
छा छाड़ेहु कलंक जेहि नाहीं । केहु न बराबरि तेहि परछाहीं ॥
सूरज तपै परै अति घामू । लागै गहन गहन होइ सामू ॥
ससि कलंक का पटतर दीन्हा । घटै बढ़ै औ गहनैं लीन्हा ॥
आगि बुझाइ जो पानी परई । पानि सूख, माटी सब सरई ॥
सब जाइहि जो जग महँ होई । सदा सरबदा अहथिर सोई ॥
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ना नारद तब रोइ पुकारा । एक जोलाहै सौं मैं हारा ॥
प्रेम तंतु निति ताना तनई । जप तप साधि सैकरा भरई ॥
दरब गरब सब देइ बिथारी । गनि साथी सब लेहिं सँभारी ॥
पाँच भूत माँडी गनि मलई । ओहि सों मोर न एकौ चलई ॥
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ओहट = अलग, दूर । मुख = ईश्वर का रूप । (४२) छाड़ेहु...नाहीं =
तुमने उस ईश्वर को छोड़ दिया जो निष्कलंक है । केहु = कोई । सामू = श्याम,
काला । गहनै लीन्हा = गहन से लिया गया, ग्रस्त हुआ (यह प्रयोग बहुत
प्राचीन है, इसी कर्मवाच्य प्रयोग से आजकल के कर्तृवाच्य प्रयोग बने हैं) ।
सरई = सड़ती है । रूप न रंगा = न रूप में, न रंग में । मति ठाकुर...बार =
अपने अंतःकरण में ईश्वर की सलाह सुनकर जो उस हृदय की बात को बाहर
कहता है उससे फिर ईश्वर दूसरी बार सलाह नहीं करता । गगरी सहस =
प्रतिबिंबवाद का यह उदाहरण बहुत पुराना है ।
(४३) तंतु = तागा । बिथारी = बिखेर दे । माँडी = कलप जो कपड़े पर
दिया जाता है । कूँच = जुलाहो की कूँची ।
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|२८८|अखरावट|}}</noinclude>{{left|२८८}}{{center|अखरावट}}
{{block center|<poem>
मन मुरी देइ सब अँग मोरै । तन सो विनै दोउ कर जोरै ॥
सूत सूत सो कया मँजाई । सीझा१ काम विनत सिधि पाई ॥
{{center|दोहा}}
:::राउर आगे का कहै, जो सँवरै मन लाइ ।
:::तेहि राजा निति सँवरै, पूछै धरम बोलाइ ॥
{{center|सोरठा}}
:::तेहि मुख लावा लूक, समुझावै समुझै नहीं ।
:::परै खरी२ तेहि चूक, मुहमद जेहि जाना नहीं ॥ ४३ ॥
मन सों देइ कढ़नी दुइ गाढ़ी । गाढ़े छीर रहै होइ साढ़ी ॥
ना ओहि लेखे राति न दिना । करगह बैठि साट सो बिना ॥
खरिका लाड करै तन घीसू३ । नियर न होइ, डरै इबलीसू ॥
भरै साँस जब नावै नरी । निसरै छूछी, पैठे भरी ॥
लाइ लाइ कै नरी चढ़ाई । इललिलाह कै ढारि चलाई ॥
चित डोलै नहिं खूँटी इरई । पल पल पेखि आग अनुसरई ॥
सीधे मारग पहुँचै जाई । जो एहि भाँति करै सिधि पाई ॥
{{center|दोहा}}
:::चलै साँस तेहि मारग, जेहि से तारन होइ ।
:::धरै पावँ तेहि सीढ़ी, तुरतै पहुँचै सोइ ॥
{{center|सोरठा}}
:::दरपन बालक हाथ, मुख देखै दूसर गनै ।
:::तस भा दुइ एक साथ, मुहमद एकै जानिए ॥ ४४ ॥
कहा मुहम्मद प्रेम कहानी । सुनि सो ज्ञानी भए धियानी ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
मुरी = ऐंठन । विनै = (क) बुने, (ख) विनय करके । पाई = पतली छड़ियों
का ढाँचा जिसपर ताने का सूत फैलाते हैं । राउर = आपके । आगे = सामने ।
धरम = धर्म से ।
१. पाठांतर--'सीया' । २. पाठांतर--'घड़ी' ।
(४४) कढ़नी = मथानी में लगाने की डोरी, नेती । गाढ़े छीर...
साढ़ी = नहीं तो गाढ़ा दूध मलाई हो जाता है । साट = वस्त्र, धोती ।
खरिका = कमाची ? घीसू = माँजा, रगड़ । इबलीस = शैतान ।
३. पाठ 'चीसू' है, जिसका कुछ अर्थ नहीं जान पड़ता ।
नरी = ढरकी के भीतर की नली जिसपर तार लपेटा रहता है । इललिलाह =
ईश्वर का नाम । ढारि = ढरकी । खूँटी = जिसमें ताना लपेटा रहता है ।
आग अनुसरई = आगे बढ़ता है । चलै साँस तेहि मारग = इड़ा और पिंगला
दोनों से दहिने और बाएँ श्वास का चलना हठयोगवाले मानते हैं । तारन =
उद्धार । (४५) ज्ञानी = तत्त्वज्ञ ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|२८८|अखरावट|}}</noinclude>
{{block center|<poem>
मन मुरी देइ सब अँग मोरै । तन सो विनै दोउ कर जोरै ॥
सूत सूत सो कया मँजाई । सीझा१ काम विनत सिधि पाई ॥
{{center|दोहा}}
:::राउर आगे का कहै, जो सँवरै मन लाइ ।
:::तेहि राजा निति सँवरै, पूछै धरम बोलाइ ॥
{{center|सोरठा}}
:::तेहि मुख लावा लूक, समुझावै समुझै नहीं ।
:::परै खरी२ तेहि चूक, मुहमद जेहि जाना नहीं ॥ ४३ ॥
मन सों देइ कढ़नी दुइ गाढ़ी । गाढ़े छीर रहै होइ साढ़ी ॥
ना ओहि लेखे राति न दिना । करगह बैठि साट सो बिना ॥
खरिका लाड करै तन घीसू३ । नियर न होइ, डरै इबलीसू ॥
भरै साँस जब नावै नरी । निसरै छूछी, पैठे भरी ॥
लाइ लाइ कै नरी चढ़ाई । इललिलाह कै ढारि चलाई ॥
चित डोलै नहिं खूँटी इरई । पल पल पेखि आग अनुसरई ॥
सीधे मारग पहुँचै जाई । जो एहि भाँति करै सिधि पाई ॥
{{center|दोहा}}
:::चलै साँस तेहि मारग, जेहि से तारन होइ ।
:::धरै पावँ तेहि सीढ़ी, तुरतै पहुँचै सोइ ॥
{{center|सोरठा}}
:::दरपन बालक हाथ, मुख देखै दूसर गनै ।
:::तस भा दुइ एक साथ, मुहमद एकै जानिए ॥ ४४ ॥
कहा मुहम्मद प्रेम कहानी । सुनि सो ज्ञानी भए धियानी ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
मुरी = ऐंठन । विनै = (क) बुने, (ख) विनय करके । पाई = पतली छड़ियों
का ढाँचा जिसपर ताने का सूत फैलाते हैं । राउर = आपके । आगे = सामने ।
धरम = धर्म से ।
१. पाठांतर--'सीया' । २. पाठांतर--'घड़ी' ।
(४४) कढ़नी = मथानी में लगाने की डोरी, नेती । गाढ़े छीर...
साढ़ी = नहीं तो गाढ़ा दूध मलाई हो जाता है । साट = वस्त्र, धोती ।
खरिका = कमाची ? घीसू = माँजा, रगड़ । इबलीस = शैतान ।
३. पाठ 'चीसू' है, जिसका कुछ अर्थ नहीं जान पड़ता ।
नरी = ढरकी के भीतर की नली जिसपर तार लपेटा रहता है । इललिलाह =
ईश्वर का नाम । ढारि = ढरकी । खूँटी = जिसमें ताना लपेटा रहता है ।
आग अनुसरई = आगे बढ़ता है । चलै साँस तेहि मारग = इड़ा और पिंगला
दोनों से दहिने और बाएँ श्वास का चलना हठयोगवाले मानते हैं । तारन =
उद्धार । (४५) ज्ञानी = तत्त्वज्ञ ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|अखरावट}}{{right|२८९}}
{{block center|<poem>
चेले समुझि गुरू सों पूँछा । देखहुँ निरखि भरा औ छूछा ॥
दुहूँ रूप है एक अकेला । औ अनबन परकार सो खेला ॥
औ भा चहै दुवौ मिलि एका । को सिख देइ काहि, को टेका ॥
कैसे आपु बीच सो मेटै ? । कैसे आप हेराइ सो भेंटै ? ॥
जौ लहि आपु न जीवत मरई । हँसै दूरि सों बात न करई ॥
तेहि कर रूप बदन सब देखैं । उठै घरी महँ भाँति बिसेखैं ॥
{{center|दोहा}}
:::सो तौ आपु हेरान है, तन मन जीवन खोइ ।
:::चेला पूछै गुरु कहैं, तेहि कस अगरे होइ ? ॥
{{center|सोरठा}}
:::मन अहथिर कै टेकु, दूसर कहना छाँड़ि दे ।
:::आदि अंत जो एक, मुहमद कहु, दूसर कहाँ ॥ ४५ ॥
सुनु चेला ! उत्तर गुरु कहई । एक होइ सो लाखन लहई ॥
अहथिर कै जो पिंडा छाड़ै । औ लेइकै धरतो महँ गाड़ै ॥
काह कहौं जस तू परछाहीं । जौ पै किछु आपन बस नाहीं ॥
जो बाहर सो अंत समाना । सो जानै जो ओहि पहचाना ॥
तू हेरै भीतर सों मिता । सोइ करै जेहि लहै न चिंता ॥
अस मन बूझि छाँड़ु, को तोरा ? । होहु समान, करहु मति 'मोरा' ॥
दुइ हुँत चलै न राज न रैयत । तब वेइ सीख जो होइ मग ऐयत ॥
{{center|दोहा}}
:::अस मन बूझहु अब तुम, करता है सो एक ।
:::सोइ सूरत सोइ मूरत, सुनै गुरु सों टेक ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
धियानी = योग साधनेवाले । चेले = चेले ने । देखहुँनिरखि...छूछा = इस
संसार में ईश्वर को व्याप्त देखता भी हूँ नहीं भी देखता हूँ । अनबन = अनेक,
नाना । को टेका = कौन वह शिक्षा ग्रहण करता है ? बीच = अंतर (ईश्वर
और जीव के बीच का) । हँसै = वह प्रियतम ईश्वर हँसता है । तेहि कर रूप...
बिसेखै = कभी तो वह सब को उसी रूप का देखता है और फिर वही दूसरे क्षण
में (व्यवहार में) भिन्न भिन्न रूप और प्रकार निदिष्ट करता है । तेहि अगरे =
उसके सामने । (४६) लाखन लहई = लाखों रूप धारण करता है । अहथिर
कै = जीवात्मा को स्थिर करके । जौ पै किछु...नाहीं = जो वास्तव में कुछ है
वह अपने वश के बाहर है, अर्थात् वस्तुसत्ता तक हमारी पहुँच नहीं ।
चिंता = सांसारिक चिंता । छाँड़ु = सब को छोड़ दे । को तोरा = तेरा कौन
है ? समान = समदर्शी । करहु मति 'मोरा' = 'मेरा मेरा' मत कर । हुँत =
से । तब वेइ...ऐयत = वे ही सीखते हैं जो सच्चे मार्ग पर आ जाते हैं ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७२
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|२९०|अखरावट|}}</noinclude>{{left|२९०}}{{center|अखरावट}}
{{block center|<poem>
{{center|सोरठा}}
:::नवरस गुरु पहँ भीज, गुरु परसाद सो पिउ मिलै ।
:::जामि उठै सो बीज, मुहमद सोई सहस बुँद ॥ ४६ ॥
माया जरि अस आपुहि खोई । रहै न पाप, मैलि गई धोई ॥
गौं दूसर भा सुन्नहि सुन्नू । कहैं कर पाप, कहाँ कर पुन्नू ॥
आपुहि गुरु, आपु भा चेला । आपुहि सब औ आपु अकेला ॥
अहै सो जोगी, अहै सो भोगी । अहै सो निरमल, अहै सो रोगी ॥
अहै सो कड़ुवा, अहै सो मीठा । अहै सो आमिल, अहै सो सीठा ॥
वै आपुहि कहँ सब महँ मेला । रहै सो सब महँ खेलै खेला ॥
उहै दोउ मिलि एकै भएउ । बात करत दूसर होइ गएऊ ॥
{{center|दोहा}}
:::जो किछु है सो है सब, ओहि बिनु नाहिन कोइ ॥
:::जो मन चाहा सो किया, जो चाहै सो होइ ॥
{{center|सोरठा}}
:::एक से दूसर नाहिं, बाहर भीतर बूझि ले ।
:::खाँड़ा दुइ न समाहिं, मुहमद एक मियान महँ ॥ ४७ ॥
पूँछौं गुरु बात एक तोहीं । हिया सोच एक उपजा मोहीं ॥
तोहि अस कतहुँ न मोहिं अस कोई । जो किछु है सो ठहरा सोई ॥
तस देखा मैं यह संसारा । जस सब भाँड़ा गढ़ै कोहाँरा ॥
काहू माँझ खाँड़ भरि धरई । काहू माँझ सो गोबर भरई ॥
वह सब किछु कैसे कै कहई । आपु बिचारि बूझि चुप रहई ॥
मानुष तौ नीके सँग लागै । देखि घिनाइ त उठि कै भागै ॥
सीझ चाम सब काहू भावा । देखि सरा सो नियर न आवा ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
टेक = निश्चित बचन । सोई सहस बुँद = आत्मतत्त्व या जीव (जिसका अठारह
हजार बूँदों से बरसना पहले कह आए हैं) । (४७) गौं दूसर = दूसरे पक्ष में,
अध्यात्म पक्ष में । आमिल = अम्ल, खट्टा । सीठा = नीरस । बात करत =
संसार के व्यवहार में, कहने सुनने को । खाँड़ा दुइ...महँ = अद्वैतवाद का तर्क
कि अपरिच्छिन्न सत्ता एक ही हो सकती है, एक से अधिक होने से सब
परिच्छिन्न होंगी । (४८) तोहि अस...कोई = न मेरा रूप सत्य है, न तेरा ।
वह सब किछु...कहई = जब देखते हैं कि कोई अच्छा है, कोई बुरा तब सब
कुछ वही है यह कैसे कहा जाय । क्योंकि ऐसा कहने से बुराई भी उसमें लग
जाती है । सीझ = सीझा हुआ । सरा = सड़ा हुआ । सब चाहि = सब से
बढ़कर ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|२९०|अखरावट|}}</noinclude>{{block center|<poem>
{{center|सोरठा}}
:::नवरस गुरु पहँ भीज, गुरु परसाद सो पिउ मिलै ।
:::जामि उठै सो बीज, मुहमद सोई सहस बुँद ॥ ४६ ॥
माया जरि अस आपुहि खोई । रहै न पाप, मैलि गई धोई ॥
गौं दूसर भा सुन्नहि सुन्नू । कहैं कर पाप, कहाँ कर पुन्नू ॥
आपुहि गुरु, आपु भा चेला । आपुहि सब औ आपु अकेला ॥
अहै सो जोगी, अहै सो भोगी । अहै सो निरमल, अहै सो रोगी ॥
अहै सो कड़ुवा, अहै सो मीठा । अहै सो आमिल, अहै सो सीठा ॥
वै आपुहि कहँ सब महँ मेला । रहै सो सब महँ खेलै खेला ॥
उहै दोउ मिलि एकै भएउ । बात करत दूसर होइ गएऊ ॥
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:::जो किछु है सो है सब, ओहि बिनु नाहिन कोइ ॥
:::जो मन चाहा सो किया, जो चाहै सो होइ ॥
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:::एक से दूसर नाहिं, बाहर भीतर बूझि ले ।
:::खाँड़ा दुइ न समाहिं, मुहमद एक मियान महँ ॥ ४७ ॥
पूँछौं गुरु बात एक तोहीं । हिया सोच एक उपजा मोहीं ॥
तोहि अस कतहुँ न मोहिं अस कोई । जो किछु है सो ठहरा सोई ॥
तस देखा मैं यह संसारा । जस सब भाँड़ा गढ़ै कोहाँरा ॥
काहू माँझ खाँड़ भरि धरई । काहू माँझ सो गोबर भरई ॥
वह सब किछु कैसे कै कहई । आपु बिचारि बूझि चुप रहई ॥
मानुष तौ नीके सँग लागै । देखि घिनाइ त उठि कै भागै ॥
सीझ चाम सब काहू भावा । देखि सरा सो नियर न आवा ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
टेक = निश्चित बचन । सोई सहस बुँद = आत्मतत्त्व या जीव (जिसका अठारह
हजार बूँदों से बरसना पहले कह आए हैं) । (४७) गौं दूसर = दूसरे पक्ष में,
अध्यात्म पक्ष में । आमिल = अम्ल, खट्टा । सीठा = नीरस । बात करत =
संसार के व्यवहार में, कहने सुनने को । खाँड़ा दुइ...महँ = अद्वैतवाद का तर्क
कि अपरिच्छिन्न सत्ता एक ही हो सकती है, एक से अधिक होने से सब
परिच्छिन्न होंगी । (४८) तोहि अस...कोई = न मेरा रूप सत्य है, न तेरा ।
वह सब किछु...कहई = जब देखते हैं कि कोई अच्छा है, कोई बुरा तब सब
कुछ वही है यह कैसे कहा जाय । क्योंकि ऐसा कहने से बुराई भी उसमें लग
जाती है । सीझ = सीझा हुआ । सरा = सड़ा हुआ । सब चाहि = सब से
बढ़कर ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|अखरावट}}{{right|२९१}}
{{block center|<poem>
{{center|दोहा}}
:::पुनि साईं सब जन रमै, औ निरमल सब चाहि ।
:::जेहि न मैलि किछु लागै, लावा जाइ न ताहि ॥
{{center|सोरठा}}
:::जोगि, उदासी दास, तिन्हहिं न दुख औ सुख हिया ।
:::घरही माहँ उदास, मुहमद सोइ सराहिए ॥ ४८ ॥
सुनु चेला ! जस सब संसारू । ओहि भाँति तुम कथा विचारू ॥
जौ जिउ कथा तौ दुख सों भीजा । पाप कै ओट पुन्नि सब छीजा ॥
जस सूरज उग्र देख अकासू । सब जग पुन्नि उहै परगासू ॥
भल औ मंद जहाँ लगि होई । सब पर धूप रहै पुनि सोई ॥
मंदे पर वह दिसटि जो परई । ताकर मैलि नैन सों ढरई ॥
अस वह निरमल धरति अकासा । जैसे मिली फूल महँ बासा ॥
सबै ठाँव औ सब परकारा । ना वह मिला, न रहै निनारा ॥
{{center|दोहा}}
:::ओहि जोति परछाहीं, नवौ खंड उजियार ।
:::सुरुज चाँद कै जोती, उदित अहै संसार ॥
{{center|सोरठा}}
:::जेहि कै जोति सरूप, चाँद सुरुज तारा भए ।
:::तेहि कर रूप अनूप, मुहमद बरनि न जाइ किछु ॥ ४९ ॥
चेलै समुझि गुरू सों पूछा । धरती सरग बीच सब छूँछा ॥
कीन्ह न थूनी, भीति, न पाखा । केहि बिधि टेकि गगन यह राखा ॥
कहाँ से आइ मेघ बरिसावैं । सेत साम सब होइ कै धावैं ? ॥
पानी भरै समुद्रहि जाई । कहाँ से उतरै, बरसि बिलाई ? ॥
पानी माँझ उठैं बजरागी । कहाँ से लौकि बीजु भुइँ लागी ? ॥
कहँवाँ सूर, चंद औ तारा । लागि अकास करहि उजियारा ? ॥
सुरुज उवै बिहानहि आई । पुनि सो अथै कहाँ कहँ जाई ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
जेहि न मैलि...ताहि = जो निष्कलंक है उसमें कलंक या बुराई का आरोप करते
नहीं बनता । घरही माहँ उदास = जो गृहस्थी में रहकर अपना कर्म करता हुआ
भी उदासीन या निष्काम रहता है । (४९) ओहि भाँति...बिचारू = जैसे जीवात्मा
शुद्ध आनंदस्वरूप है पर शरीर के संयोग में दुःख आदि से युक्त दिखाई पड़ता है
वैसे ही शुद्ध ब्रह्म संसार के व्यावहारिक क्षेत्र में भला बुरा आदि कई रूपों में
दिखाई पड़ता है (शरीर और जगत् की एकता पहले कह आए हैं) ।
परछाहीं = परछाईं से । (५०) चेलै = चेले ने । थूनी = टेक । बजरागी =
बज्राग्नि, बिजली । लौकि, चमककर । मूर = मूल नक्षत्र । कोह = क्रोध ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|२९२|अखरावट|}}</noinclude>{{block center|<poem>
{{center|दोहा}}
:::काहे चंद घटत है, काहे सूरज पूर ।
:::काहे होइ अमावस, काहे लागै मूर ॥
{{center|सोरठा}}
:::जस किछु माया मोह, तैसे मेघा, पवन, जल ।
:::बिजुरी जैसे कोह, मुहमद तहाँ समाइ यह ॥ ५० ॥
सुनु चेला ! एहि जग कर अवना । सब बाहर भीतर है पवना ॥
सुन्न सहित बिधि पवनहि भरा । तहाँ आप होइ निरमल करा ॥
पवनहि महँ जो आप समाना । सब भा बरन ज्यों आप समाना ॥
जैस डोलाए बेना डोलै । पवन सबद होइ किछुहु न बोलै ॥
पवनहि मिला मेघ जल भरई । पवनहि मिला बुँद भुइँ परई ॥
पवनहि माँह जो बुल्ला होई । पवनहि फुटै, जाइ मिलि सोई ॥
पवनहि पवन अंत होइ जाई । पवनहि तन कहँ छार मिलाई ॥
{{center|दोहा}}
:::जिया जंतु जत सिरजा, सब महँ पवन सो पूरि ।
:::पवनहि पवन आइ मिलि, आगि, बाउ, जल, धूरि ॥
{{center|सोरठा}}
:::निति सो आयसु होइ, साई जो आज्ञा करै ।
:::पवन परेवा सोइ, मुहमद बिधि राखे रहै ॥ ५१ ॥
बड़ करतार जिवन कर राजा । पवन बिना किछु करत न छाजा ॥
तेहि पवन सों बिजुरी साजा । ओहि मेघ परबत उपराजा ॥
उहै मेघ सों निकरि देखावै । उहै माँझ पुनि जाइ छपावै ॥
उहै चलावै चहुँ दिसि सोई । जस जस पाँव धरै जो कोई ॥
जहाँ चलावै तहवाँ चलई । जस जस नावै तस तस नवई ॥
बहुरि न आवै छिटकत झाँपै । तेहि मेघ सँग खन खन काँपै ॥
जस पिउ सेवा चूकै रूठै । परै गाज पुहुमी तपि कूटै ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
तहाँ = जहाँ माया मोह है । (५१) अवना = आना, आ जाना । बिधि =
ईश्वर । पवनहि = पवन में । करा = कला, ज्योति । सब भा बरन...
समाना = आप या उस ईश्वर के अनुकूल सब का रूप रंग हुआ । पवनहि फुटै =
पवन ही से वह बुलबुला फूटता है । जाइ मिलि = जल में फिर मिल जाता है ।
पवनहि पवन जाइ मिलि = कवि ने प्राचीन पाश्चात्य तत्त्वज्ञों के अनुसार वायु
को ही सबसे सूक्ष्म तत्त्व माना है और उसी को सबके मूल में रखा है (उपनिषद्
में आकाश आदिम और मूलभूत कहा गया है) । परेवा = पक्षी, दूत । (५२)
ओहि = उसी पवन से । उपराजा = उत्पन्न किया । उहै = वही ईश्वर । जाइ
छपावै = जाकर अपने को छिपाता है ? नावै = झुकाता है, प्रवृत्त करता है ।
छिटकत...झाँपै = (बिजली) छिटकते ही फिर छिप जाती है । सेवा = सेवा
में । चूकै = चूकने पर । कूटै = मारता है, पीटता है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|अखरावट}}{{right|२९३}}
{{block center|<poem>
{{center|दोहा}}
:::अगिनि, पानि औ माटी, पवन फूल कर मूल ।
:::उहई सिरजन कीन्हा, मारि कीन्ह अस्थूल ॥
{{center|सोरठा}}
:::देखु गुरु, मन चीन्ह, कहाँ जाइ खोजत रहै ।
:::जानि परै परबीन, मुहमद तेहि सुधि पाइए ॥ ५२ ॥
चेला चरचत गुरु गुन गावा । खोजत पूछि परम गति पावा ॥
गुरु बिचारि चेला जेहि चीन्हा । उत्तर कहत भरम लेइ लीन्हा ॥
जगमग देख उहै उजियारा । तीनि लोक लहि किरिन पसारा ॥
ओहि ना बरन, न जाति अजाती । चंद न सुरुज, दिवस ना राती ॥
कथा न कहै, अकथ भा रहई । बिना बिचार समुझि का परई ? ॥
सोहं सोहं बसि जो करई । जो बूझै सो धीरज धरई ॥
कहै प्रेम कै बरनि कहानी । जो बूझै सो सिधि गियानी ॥
{{center|दोहा}}
:::माटी कर तन भाँड़ा, माटी महँ नव खंड ।
:::जे केहु खेलैं माटि कहँ, माटी प्रेम प्रचंड ।
{{center|सोरठा}}
:::गलि सोइ माटी होइ, लिखनहारा बापुरा ।
:::जी न मिटावै कोइ, लिखा रहै बहुतै दिना ॥ ५३ ॥
</poem>}}
{{center|-:०:-}}
मारि = वश में करके । अस्थूल = स्थूल । कहाँ जाइ खोजत रहै = बिना गुरु
के कहाँ इधर उधर भटकता रहा । जानि परै = जो समझ पड़े । तेहि सुधि
पाइए = उनसे ईश्वर से मिलने के मार्ग का पता मिल जायगा । (५३)
चरचत = पहचानते ही । पूछि = जिज्ञासा करके । चेला = अधिकारी शिष्य ।
लहि = तक । जे केहु = जो कोइ । खेलै माटि कहँ = शरीर को लेकर प्रेम
का खेल खेल डाले । माटी = मिट्टी में, शरीर में ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|'''आखिरी कलाम'''}}
{{block center|<poem>
पहिले नावँ दैउ कर लीन्हा । जेइ जिउ दीन्ह, बोल मुख कीन्हा ॥
दिन्हेसि सिर जो सँवारै पागा । दिन्हेसि कया जो पहिरै बागा ॥
दिन्हेसि नयन जोति, उजियारा । दिन्हेसि देखै कहँ संसारा ॥
दिन्हेसि स्रवन बात जेहि सुनै । दिन्हेसि बुद्धि, ज्ञान बहु गुनै ॥
दिन्हेसि नासिक लीजै बासा । दिन्हेसि सुमन सुगंध बिरासा ॥
दीन्हेसि जीभ बैन रस भाखै । दीन्हेसि भुगुति, साध सब राखै ॥
दीन्हेसि दसन, सुरंग कपोला । दीन्हेसि अधर जे रचै तँबोला ॥
{{center|दोहा}}
:::दीन्हेसि बदन सुरूप रँग, दिन्हेसि माथे भाग ।
:::देखि दयाल, 'मुहम्मद', सीस नाइ पद लाग ॥ १ ॥
दीन्हेसि कंठ बोल जेहि माहाँ । दीन्हेसि भुजादंड, बल बाहाँ ॥
दीन्हेसि हिया भोग जेहि जमा । दीन्हेसि पाँच भूत, आतमा ॥
दीन्हेसि बदन सीत औ घामू । दीन्हेसि सुक्ख नींद बिसरामू ॥
दीन्हेसि हाथ चाह जस कीजै । दीन्हेसि कर पल्लव गहि लीजै ॥
दीन्हेसि रहस कूद बहु तेरा । दीन्हेसि हरष हिया बहु मेरा ॥
दीन्हेसि बैठक आसन मारै । दीन्हेसि बूत जो उठैं सँभारै ॥
दीन्हेसि सबै सँपूरन काया । दीन्हेसि दोइ चलै कहँ पाया ॥
{{center|दोहा}}
:::दीन्हेसि नौ नौ फाटका, दिन्हेसि दसवँ दुवार ।
:::सो अस दानि 'मुहम्मद', तिन्ह कै हौं बलिहार ॥ २ ॥
मरम नैन कर अँधरै बूझा । तेहि बिहरै संसार न सूझा ॥
मरम स्रवन कर बहिरै जाना । जो न सुनै, किछु दीजै साना ॥
मरम जीभ कर गूँगै पावा । साध मरै, पै निकर न नावाँ ॥
मरम बाहँ कै लूलै चीन्हा । जेहि बिधि हाथन्ह पाँगुर दीन्हा ॥
मरम कया कै कुस्टी भेंटा । नित चिरकुट जो रहै लपेटा ॥
मरम बैठ उठ तेहि पै गुना । जो रे मिरिग कस्तूरी पहाँ ॥ ( ? )
मरम पावँ कै तेहि पै दीठा । होइ अपाय भुइँ चलै बईठा ॥
{{center|दोहा}}
:::अति सुख दीन्ह बिधातै, औ सब सेवक ताहि ।
:::आपन मरम 'मुहम्मद', अबहूँ समुझ कि नाहि ॥ ३ ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(१) बागा = पहनाव, पोशाक । बिरासा = बिलास । रचैं = रँग जाते
हैं । (२) रहस = आनंद । मेर = मेल, भाँति । फाटका = नव द्वार । (३)
बिहरै = फूटने पर । सान दीजै = इशारा कीजिए (तो समझैं) (अवधी) ।
चिरकुट = चीथड़ा । बिधातै = बिधाता ने ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७७
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ReetiSingh14
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|'''आखिरी कलाम'''}}{{right|२९५}}
{{block center|<poem>
भा औतार मोर नौ सदी । तीस बरिस ऊपर कबि बदी ॥
आवत उधत चार बिधि ठाना । भा भूकंप जगत अकुलाना ॥
धरती भवाँइ दीन्ह चक्र बिधि लाई । फिरै अकास रहँट कै नाई ॥
गिरि पहार मेदिनि तस हाला । जस चाला चलनी भरि चाला ॥
मिरित लोक ज्यौं रचा हिंडोला । सरग पताल पवन खट डोला ॥
गिरि पहार परबत ढहि गए । मान समुद्र कीच मिलि भए ॥
धरती फाटि, सात भँहरानी । पुनि भइ सवा जौ सिस्टि समानी ॥
{{center|दोहा}}
:::जो अस खंभन्ह गाड़ कै, सहस जीभ गहिराई ।
:::सो अस कीन्ह 'मुहम्मद', तोहि अस बपुरे काई ॥ ४ ॥
सुरुज (अस) सेवक ताकर अहै । आठौ पहर फिरत जो रहै ॥
आयसु लिए रात दिन धावै । सरग पताल दुवौ फिरि आवै ॥
दगधि आगि महँ होइ अँगारा । तेहि कै आँच धिकै संसारा ॥
सो अस बपुरै गहनें लीन्हा । औ अरि बाँधि चंडालै दीन्हा ॥
भा अलोप होइ, भा अँधियारा । दीसै दिनहि सरग महँ तारा ॥
उबतै भखि लीन्ह, धुप चाँपै । लाग सरग जिउ थर थर काँपै ॥
जिउ कहँ परे जान सब छूटै । तब होइ मोख गहन जौ छूटै ॥
{{center|दोहा}}
:::ताकहँ एता तरास, जो सेवक अस नित ।
:::अबहूँ न डरसि 'मुहम्मद', काह रहसि निहचिंत ॥ ५ ॥
ताकै अस्तुति कीन्हि न जाई । कौने जीभ मैं करौं बड़ाई ? ॥
जगत पताल जो सैंते कोई । लेखनी बिरिख, समुद मसि होई ॥
लागै लिखै सिस्टि मिलि जाई । समुद घटै, पै लिखि न सिराई ॥
साँचा सोइ और सब झूठे । ठावँ न कतहुँ ओहि कै रूठे ॥
आयसु इबलीस हु जौ टारा । नारद होइ नरक महँ पारा ॥
सौ दुइ कटक, कटक लखि घोरा । फरऊँ रोधि नील महँ बोरा ॥
जौ शदाद बैकुंठ सँवारा । पैठत पौरि बीच गहि मारा ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(४) उधत चार = उद्धतचार, उत्पात । आवत...अकुलाना = जान पड़ता
है, जिस दिन मसिह मुहम्मद पैदा हुए थे उस दिन भारी भूकंप आया था
भवाँइ दीन्ह = फिराया । चाला = छलनी में डाला हुआ अनाज । पवन खट =
पवन खटोला । खंभन्ह = अर्थात् पहाड़ों को (धरती पहाड़ों से कीली कही गई
है) । गहिराई = गहराई या पाताल में थामे हैं । (५) धिकै = तपता है । औ
अरि...चंडालै दीन्हा = प्रवाद है कि सूर्य चंद्र डोमों या चंडालों के ऋणी हैं इसी से
ग्रहण द्वारा बार बार सताए जाते हैं । धुप = अंधकार ।
(६) सैंते = इकट्ठी करे । सिराई = चुके, पूरा हो । इबलीस = फरिश्ता
जो पीछे शैतान हुआ । फरऊँ = मिस्र का बादशाह जिसने इसराइल के वंश-
वालों को सताया था । शदाद = शद्दा, एक प्रतापी बादशाह जिसने खुदाई
का दावा किया था और बिहिश्त के नमूने पर 'इरम' नाम का बाग बनवाया
था । यह बाग हजरमूत में बारह कोस लंबा था । इसमें अनेक प्रकार के सुंदर<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|२९६|आखिरी कलाम|}}</noinclude>
{{block center|<poem>
:::जो ठाकुर अस दारुन, सेवक तहँ निरदोख ।
:::माया करै 'मुहम्मद', तौ पै होइहि मोख ॥ ६ ॥
रतन एक बिधनै अवतारा । नावँ 'मुहम्मद' जग उजियारा ॥
चारि मीत चहुँ दिसि गजमोती । माँझ दिपै मनु मानिक जोती ॥
जेहि हित सिरजा सात समुंदा । सातहु दीप भए एक बंदा ॥
तर पर चौदह भुवन उसारे । बिच बिच खंड बिखंड सँवारे ॥
धरती औ गिरि मेरु पहारा । सरग चाँद सूरज औ तारा ॥
सहस अठारह दुनिया सिरजैं । आवत जात जातरा करैं ॥
जेइ नहिं लीन्ह जनम महँ नाऊँ । तेहि कहँ कीन्ह नरक महँ ठाऊँ ॥
{{center|दोहा}}
:::सो अस दैउ न राखा, जेहि कारन सब कीन्ह ।
:::दहूँ तुम काह 'मुहम्मद' एहि पृथिवी चित दीन्ह ॥ ७ ॥
बाबर साह छत्रपति राजा । राज पाट उन कहँ बिधि साजा ॥
मुलुक सुलेमाँ कर ओहि दीन्हा । अदल दुनी ऊमर जस कीन्हा ॥
अली केर जस कीन्हेसि खाँड़ा । लीन्हेसि जगत समुद भरि डाँड़ा ॥
बल हमजा कर जैस सँभारा । जो बरियार उठा तेहि मारा ॥
पहलवान नाए सब आदी । रहा न कतहु बाद करि बादी ॥
बड परताप आप तप साधे । धरम के पंथ दई चित बाँधे ॥
दरब जोरि सब काहुहि दिए । आपुन बिरह आउ जस लिए ॥
{{center|दोहा}}
:::राजा होइ करै, सब, छाँड़ि, जगत महँ राज ।
:::तब अस कहँ 'मुहम्मद', वै कीन्हा किछु काज ॥ ८ ॥
मानिक एक पाएउँ उजियारा । सैयद असरफ पीर पियारा ॥
जहाँगीर चिस्ती निरमरा । कुल जग महँ दीपक बिधि धरा ॥
औ निहंग दरिया जल माहाँ । बूड़त कहँ धरि काढ़त बाहाँ ॥
समुद माहँ जो बोहति फिरई । लेतै नावँ सीधैं होइ तरई ॥
तिन्ह घर हौं मुरीद, सो पीरू । सँवरत बिनु गुन लावै तीरू ॥
कर गहि धरमपंथ देखावा । गा भुलाइ तेहि मारग लावा ॥
जो अस पुरुपहि मन चित लावै । इच्छा पूजै , आस तुलावै ॥
{{center|दोहा}}
:::जौ चालिस दिन सेवै, बार बुहारै कोइ ।
:::दरसन होइ 'मुहम्मद', पाप जाइ सब धोइ ॥ ९ ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
अनुपम वृक्ष और भवन थे । इसके तैयार हो जाने पर ज्योंहीं वह इसके
भीतर घुसना चाहता था कि ईश्वर के कोप से दरवाजे पर ही उसके प्राण
निकल गए । सेवक तहँ = अपने बंदों या भक्तों के लिये । निरदोख = अच्छे
स्वभाव का, सुशील । (७) तर पर = नीचे ऊपर । उसारे = खड़े किए, स्थापित
किए (८) ऊमर = खलीफा उमर । पहलवान = योद्धा, वीर । नाए = झुकाए ।
आदी = पूरे, बिलकुल । आउ जस = आयु भर की कीर्ति । (९) निहंग =
बिलकुल । बार = द्वार ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|'''आखिरी कलाम'''}}{{right|२९७}}
{{block center|<poem>
जायस नगर मोर अस्थानू । नगर क नावँ आदि उदयानू ॥
तहाँ दिवस दस पहुने आएउँ । भा बैराग बहुत सुख पाएउँ ॥
सुख भा, सोचि एक दिन मानौं । ओहि बिनु जिवन मरन कै जानौं ॥
नैन रूप सो गएउ समाई ॥ रहा पूरि भर हिरदय छाई ॥
जहवाँ देखौं तहँवाँ सोई । और न आव दिसटि तर कोई ॥
आपुन देखि देखि मन राखौं । दूसर नाहि, सो कासों भाखौं ॥
सबै जगत दरपन कै लेखा । आपन दरसन आपुहि देखा ॥
{{center|दोहा}}
:::अपने कौकुत कारन, मीर पसारिन हाट ।
:::मलिक मुहम्मद बिहनै, होइ निकसिन तेहि बाट ॥ १० ॥
धूत एक मारग गनि गुना । कपट रूप नारद करि चूना ॥
'नावँ न साधु', साधि कहवावै । तेहि लगि चलै जौ गारी पावै ॥
भाव गाँठि अस मुख, कर भाँजा । कारिख तेल घालि मुख माँजा ॥
परतहि दीठि छरत मोहिं लेखे । दिनहिं माँझ अँधियर मुख देखे ॥
लीन्हे चंग राति दिन रहई । परपंच कीन्ह लोगन मह चहई ॥
भाइ बंधु महँ लाई लावै । बाप पूत महँ कहै कहावै ॥
मेहरी भैंस रैनि कै आवै । तरपड़ कै पूरुख ओनावै ॥
{{center|दोहा}}
:::मन मैली कै ठगि, ठगै, ठगै न पायौ काहु ।
:::बरजेउ सबहिं 'मुहम्मद', अस जिन तुम पतियाहु ॥ ११ ॥
अंग चढ़ावहु सूरी भारा । जाइ गहौ तब चंग अधारा ॥
जौ काहू सों आनि चिहूँटै । सुनहु मोर बिधि कैसे छूटै ॥
उहै नावँ करता कर लेऊ । पढ़ौ पलीता धूवाँ देऊ ॥
जौ यह धुवाँ नासिकहि लागै । मिनती करै औ उठि उठि भागै ॥
धरि बाई लट सीस झकोरै । करि पाँ तर, गहि हाथ मरोरै ॥
तवहि सँकोच अधिक ओहि होवै । 'छाँड़हु, छाँड़हु !' कहि कै रोवै ॥
घरि बाहीं लै थुवा उड़ावै । तासों डरे जो ऐस छोड़ावै ॥
{{center|दोहा}}
:::है नरकी औ पापी, टेढ़ बदन औ आँखि ।
:::चीन्हत उहै 'मुहम्मद', झूठ भगी सब साखि ॥ १२ ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(१०) उदयानू = 'जायस' का यही पुराना नाम वहाँ के लोग बतलाते हैं ।
कौकुत = कौतुक (अवध) । मीर = सरदार, यहाँ परमेश्वर । बिहनै = सबेरे
सबेरे, प्रातकाल ही । (११) धूत = धूर्त । नारद = शैतान । नावँ न साधु =
ईश्वर का नाम न जप । भाव गाँठि......भाँजा = मुँह पर ऐसा हाव बनाकर हाथ
से ऐसे ऐसे इशारे करती है । कारिख = काजल, मिस्सी, तेल आदि स्त्रियों
का श्रृंगार । अँधियर = अँधेरा । लाई लावै = झगड़ा लगाती है । मेहरी = स्त्री,
जोरू । तरपड़ = नीचे । ओनावै = झुकाती है । कै ठगि = ठग करके । (१२)
भारा = भाला । चिहूँटै = चिमटे, लगे । लेऊ = ले । देऊ = दे (अवधी) ।
थुवा उड़ावै = थू थू करे; थूके । साखि = विश्वास दिलाकर कहे हुए बचन ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|२९८|आखिरी कलाम|}}</noinclude>
{{block center|<poem>
नौ सै बरस छतीस जो भए । तब एहि कथा क आखर कहे ॥
देखौं जगत धुंध कलि माहाँ । उवत धूप धरि आवत छाहाँ ॥
यह संसार पवन कर लेखा । माँगत बदन नैन भरि देखा ॥
लाभ, दिए बिनु भोग, न पाउब । परिहि डाँड़ जहँ मर गँवाउब ॥
राति क सपन जागि पछिताना । ना जानौं कब होइ बिहाना ॥
अस मन जानि बेसाहहु सोई । मूर न घटै, लाभ जेहि होई ॥
ना जानेहु बाढ़त दिन जाई । तिल तिल घटै आउ नियराई ॥
{{center|दोहा}}
:::अस जिन जानेहु बढ़त है, दिन आवत नियरात ।
:::कहै सो बूझि 'मुहम्मद', फिर न कहाँ असि बात ॥ १३ ॥
अबहिं अंत कर परलै आई । धरमी लोग रहैं ना पाई ॥
जबही सिद्ध साधु गए पारा । तबहीं चलै चोर बटपारा ॥
जाइहि मया मोह सब केरा । मच्छ रूप कै आवहिं बेरा ॥
उठिहैं पंडित बेद पुराना । दत्त सत्त दोउ करिहिं पयाना ॥
धूम बरन सूरज होइ जाई । कृस्न बरन सब सिस्टि दिखाई ॥
दधा पुरुष दिसि उवहै जहाँ । पुनि फिरि आइ अथवहै तहाँ ॥
चढ़ि गदहा निकसै धरि जालू । हाथ खाँड होइ, आवै कालू ॥
{{center|दोहा}}
:::जो रे मिलै तेहि मारै, फिर फिरि आइ कै गाज ।
:::सबही मारि 'मुहम्मद', भूज अरहिता राज ॥ १४ ॥
पुनि धरती कहँ आयसु होई । उगिलै दरब, लेइ सब कोई ॥
'मोर मोर' करि उठिहैं भारी । आपु आपु महँ करिहैं गारी ॥
अस न कोइ आवै मन माहाँ । जो यह साँचा अहै सो कहाँ ॥
सेंति सेंति लेइ लेइ घर भरहीं । रहस कूद अपने जिउ करहीं ॥
खनहिं उतंग, खनहिं फिर सांतो । नितहि हुलंब उठै बहु भाँती ॥
पुनि एक अचरज मँजरै आई । नावँ 'मजारी' भँवै बिलाई ॥
ओहि कै सूंघे जियै न कोई । जो न मरै तेहि भक्खै सोई ॥
{{center|दोहा}}
:::सब संसार फिराइ औ, लावै गाहिरी धात ।
:::उनहूँ कहँ 'मुहम्मद', बार न लागिहि जात ॥ १५ ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(१३) माँगत......देखा = सबको मुँह से माँगते ही देखा ।
(१४) आई = आइहि, आएगा । मच्छ रूप......बेरा = जैसे बड़ी मछलियाँ
छोटी मछलियों को पकड़कर खा जाती हैं, वैसा ही व्यवहार मनुष्यों के
बीच हो जायगा । दत्त सत्त = दान और सत्य । दधा = जला हुआ । खाँड =
खाँड़ा । भूज = भोगेगा । अरहिता = निर्जन, निष्कंटक । (१५) भारी = सब
के सब, बिलकुल । साँचा = संचित किया, जुटाया । सेंति = समेटकर, सहेजकर ।
उतंग = उभार, जोर शोर । सांतो = शांति । हुलंब = हुल्लड़, हल्ला, हलचल ।
भँवै = फिरती है । बिलाई = बिल्ली । फिराइँ = फिरते हैं । उनहूँ कहँ =
उनको भी ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|'''आखिरी कलाम'''}}{{right|२९९}}
{{block center|<poem>
पुनि मैकाइल आयसु पाए । उन बहु भाँति मेघ बरसाए ॥
पहिले लागै परै अँगारा । धरती सरग होइ उजियारा ॥
लागी सबै पिरथिवीं जरै । पाछे लागे पाथर परै ॥
सौ सौ मन कै एक एक सिला । चलैं पिंड घुटि आवैं मिला ॥
बजर गोट तस छूटैं भारी । टूटैं रूख बिरुख सब झारी ॥
परत धमाकि धरति सब हालै । उधिरत उठै सरग लौं सालै ॥
अधाधार बरसें बहु भाँती । लागि रहै चालिस दिन राती ॥
{{center|दोहा}}
:::जिया जंतु सब मरि घटे, जित सिरजा संसार ।
:::कोइ न रहै 'मुहम्मद', होइ बीता संसार ॥ १६ ॥
जिबरईल पाउब फरमानू । आइ सिस्टि देखब मैदानू ॥
जियत न रहा जगत केउ ठाढ़ा । मारा झोरि कचरि सब गाढ़ा ॥
मरि गंधाहि, साँस नहिं आवै । उठे बिगंध, सड़ाईंध भावै ॥
जाइ दैउ से करहु बिनाती । कहब जाइ जस देखत भाँती ॥
देखहु जाइ सिस्टि बेवहारू । जगत उजाड़ सून संसारू ॥
अस्ट दिसा उजारि सब मारा । कोइ न रहा नावँ लेनिहारा ॥
मारि माछ जस पिरथिवीं पाटी । परै पिछानि न, दीखै माटी ॥
{{center|दोहा}}
:::सून पिरथिवीं होइ गई, दहूँ धरती सब लीप ।
:::जेतनी सिस्टि 'मुहम्मद', सबै भाइ जल दीप ॥ १७ ॥
मकाईल पुनि कहब बुलाई । बरसहुँ मेघ पिरथिवीं जाई ॥
उनै मेघ भरि उठिहैं पानी । गरजि गरजि बरसहिं अ्रतवानी ॥
झरी लागि चालिस दिन राती । घरी न निबुसै एकहु भाँती ॥
छूटि पानि परलय की नाईं । चढ़ा छापि सगरिउँ दुनियाईं ॥
बूड़हिं परबत मेरु पहारा । जल हुलि उमड़ि चलै असरारा ॥
जहँ लगि मगर माछ जित होई । लेइ बहाइ जाहि भुइँ धोई ॥
{{center|दोहा}}
:::सून पिरथिवीं होइहि, बूझे हँसै उठाइ ।
:::एतनि जो सिस्टि 'मुहम्मद', सो कहँ गई हेराइ ॥ १८ ॥
पुनि इसराफीलहिं फरमाए । फूँकै, सब संसार उड़ाए ॥
दै मुख सूर भरै जो साँसा । डोलै धरती, लपत अकासा ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(१६) मैकाइल = मकाईल नामक फरिश्ता । घुटि = जमकर । गोट = गोले ।
उधिरत उठै = उधड़ती या उचटती जाती है । (१७) जिबरईल = एक फरिश्ता ।
केउ = कोई (अवधी) । बिगंध = दुर्गंध । भाड = भासित होती है, जान पड़ती
है । जल दीप = नदी या समुद्र के बीच पड़ा सुनसान टापू । (१८)
मकाईल = एक फरिश्ता । अ्रत- वानी = (?) । निबुसै = (मेह) थमता है,
निकलता है । हुलि = ठिलकर । असरारा = लगातार । (१६) इसराफील =
एक फरिश्ता । सूर = तुरही बाजा (अरबी) ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४८२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|३००|आखिरी कलाम|}}</noinclude>
{{block center|<poem>
भुवन चौदहो गिरि मनु डोला । जानौ घालि झुलाव हिंडोला ॥
पहिले एक फूँक जो आई । ऊँच नीच एक सम होइ जाई ॥
नदी नार सब जैहैं पाटी । अस होइ मिलै ज्यौं ठाढ़ो माटी ॥
दूसरि फूँक जो मेरु उड़ैहैं । परबत समुद एक होइ जैहैं ॥
चाँद सुरुज तारा घट टूटै । परतहि खंभ सेस घट फूटै ॥
{{center|दोहा}}
:::तिसरे बजर महाउब, अस भुइँ लेब महाइ ।
:::पूरब पछिउँ 'मुहम्मद', एक रूप होइ जाइ ॥ १९ ॥
अजराइल कहँ बेगि बोलावै । जीउ जहाँ लगि सबै लियावै ॥
पहिले जिउ जिबरैल क लेई । लोटि जीउ मैकाइल देई ॥
पुनि जिउ देइहि इसराफीलू । तीनिहु कहँ मारै अजराईल ॥
काल फिरिस्तन केर जौ होई । कोइ न जागै, निसि असि होई ॥
पुनि पूछब जम ? सब जिउ लीन्हा । एकौ रहा बाँचि जो दीन्हा ? ॥
सुनि अजराइल आगे होइ आउब । उत्तर देब, सीस भुइँ नाउब ॥
आयसु होइ करौ अब सोई । की हम, की तुम, और न कोई ॥
{{center|दोहा}}
:::जौ जम आन जिउ लेत हैं, संकर तिन्हहु कर जिउ लेब ।
:::सो अवतरें 'मुहम्मद', देखु तहूँ जिउ देब ॥ २० ॥
पुनि फरमाए आपु गोसाईं । तुमहूँ दैउ जिवाइहि नाहीं ॥
सुनि आयसु पाछे कहँ ढाए । तिसरी पौरि नाँघि नहिं पाए ॥
परत जीउ जब निसरन लागै । होइ बड़ कस्ट, घरी एक जागै ॥
प्रान देत सँवरै मन माहाँ । उवत धूप धरि आवत छाहाँ ॥
जस जिउ देत मोहिं दुख होई । ऐसे दुखै अहा सब कोई ॥
जी जनत्यों अस दुख जिउ देता । तौ जिउ काहू केर न लेता ॥
लौटि काल तिन्हहूँ कर होवै । आइ नींद, निधरक होइ सोवै ॥
{{center|दोहा}}
:::भंजन, गढ़न सँवारन, जिन खेला सब खेल ।
:::सब कहँ टारि 'मुहम्मद', अब होइ रहा अकेल ॥ २१ ॥
चालिस बरस जबहिं होइ जैहैं । उठिहि मया, पछिले सब ऐहैं ॥
मया मोह कै किरपा आए । आपहि काढ़ि आप फरमाए ॥
मैं संसार जो सिरजा एता । मोर नावँ कोई नहिं लेता ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
लपत = लपता है । खंभ = स्तंभ रूप पर्वत । बजर = बज्र । महाउब = मथाएगा ।
(२०) अजराईल = मारनेवाला फरिश्ता । पुनि पूछब = खुदा फिर पूछेगा ।
बाँचि जो दीन्हा = जिसको बचा दिया । की हम की तुम = अब तो बस हम
हैं ! या तुम हो । जम = यमराज जो पैगंबरी मजहबों में अजराईल कहलाता
है । संकर = शंकर, शिव जो महाकाल हैं । तहूँ = तू भी । (२१) ढाए = ढह
पड़े, गिर पड़े । उवत धूप छाहाँ = अंत समय में जब ज्ञान होता है तब मृत्यु
का अंधकार घेर लेता है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{left|३०१}}{{center|'''आखिरी कलाम'''}}
{{block center|<poem>
जेतने परे सब सबहिं उठावौं । पुल सरात कर पंथ रँगावौं ॥
पाछे जिए पूछौं अब लेखा । नैन माहँ जेता हौं देखा ॥
जस जाकर स्रवन मैं सुना । धरम पाप, गुन औगुन गुना ॥
कै निरमल कौसर अन्हवावौं । पुनि जीउन्ह बैकुंठ पठावौं ॥
{{center|दोहा}}
:::मरन गँजन घन होइ जस, जस दुख देखत लोग ।
:::तस सुख होइ 'मुहम्मद', दिन दिन मानै भोग ॥ २२ ॥
पहिले सेवक चारि जियाउब । तिन्ह सब काजै काज पठाउब ॥
जिबरईल औ मैकाईलू । असराफील औ अजराईलू ॥
जिबरईल पिरथिवीं महँ आए । आइ मुहम्मद कहँ गोहराए ॥
जिबरईल जग आइ पुकारब । नावँ मुहम्मद लेत हँकारब ॥
होइहैं जहाँ मुहम्मद नाऊँ । कहउ लाख बोलिहैं एक ठाऊँ ॥
ढूँढ़त रहै, कतहुँ नहिं पावै । फिरि कै जाइ मारि गोहरावै ॥
कहै 'गोसाँईं ! कहाँ वै पावौं । लाखन बोलैं जौ रे बोलावौं ॥
{{center|दोहा}}
:::सब धरती फिरि आएउँ, जहाँ नावँ सो लेउँ ॥
:::लाखन उठैं मुहम्मद, केहि कहँ उत्तर देउँ ?' ॥ २३ ॥
जिबराइल पुनि आयसु पावै । सूँघै जगत ठाँव सो पावै ॥
बास सुबास लेउ है जहाँ । नावँ रसूल पुकरसि तहाँ ॥
जिबराइल फिरि पिरथिवीं आए । सूँघत जगत ठाँव सो पाए ॥
उठहु मुहम्मद, होहु बड़ नेगी । दैन जोहार बोलावहिं बेगी ॥
बेगि हँकारेउ उमत समेता । आवहु तुरत साथ सब लेता ॥
एतने बचन ज्योहिं मुख काढ़े । सुनत रसूल भए उठि ठाढ़े ॥
जहँ लगि जीव मुकहि सब पाए । अपने अपने पिंजरे आए ॥
{{center|दोहा}}
:::कइउ जुगन के सोवत, उठे लोग मनो जागि ।
:::अस सब कहैं 'मुहम्मद', नैन पलक ना लागि ॥ २४ ॥
उठत उमत कहँ आलस लागै । नींद भरी सोवत नहिं जागै ॥
पौढ़त बार न हम कहँ भएऊ । अबहिंन अवधि आइ कब गएऊ ॥
जिबराइल तब कहब पुकारी । अबहूँ नींद न गई तुम्हारी ॥
सोवत तुमहि कइउ जुग बीते । ऐसे तौ तुम मोहे, न चीते ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(२२) पुल सरात = वह पुल जिसे कयामत के दिन सब जीवों को पार
करना पड़ेगा और जो पुण्यात्माओं के लिये खास चौड़ा और पापियों के लिये
बाल बराबर पतला हो जायगा । कौसर = बिहिश्त (स्वर्ग) की एक नदी या
चश्मा । गँजन = गंजन, पीड़ा, क्लेश । (२३) काजै काज = एक एक काम
पर । गोहराए = पुकारा । मारि गोहरावै = बहुत पुकारता है (अवधी)
(२४) नेगी = प्रसाद या इनाम पानेवाले । जुहार देन = बंदगी के लिये ।
उमत = उम्मत, पैगंबर के अनुयायियों का समूह । मुकहि पाए = कब्रों से छूट
पाए । पिंजरे = अर्थात् शरीर । (२५) पौढ़त = लेटते या सोते । बार = देर ।
अबहिन = अभी ही; इतनी जल्दी ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|३०२|आखिरी कलाम|}}</noinclude>
{{block center|<poem>
कइउ करोरि बरस भुइँ परे । उठहु न बेगि मुहम्मद खरे ॥
सुनि कै जगत उठिहि सब भारी । जेतना सिरजा पुरुष औ नारी ॥
नँगा नाँग उठिहैं संसारू । नैना होइहैं सब के तारू ॥
:::कोइ न केहु तन हेरै, दिसटि सरग सब केरि ।
:::ऐसे जतन 'मुहम्मद', सिस्टि चलै सब घेरि ॥ २५ ॥
पुनि रसूल जैहैं होइ आगे । उम्मत चलि सब पाछे लागै ॥
अंध गियान होइ सब केरा । ऊँच नीच जहँ होइ अभेरा ॥
सबहीं जियत चहैं संसारा । नैनन नीर चलै असरारा ॥
सो दिन सँवरि उमत सब रोवै । ना जानौं आगे कस होवै ॥
जो न रहै, तेहि का यह संगा ? । मुख सूखै तेहि पर यह दंगा ॥
जेहि दिन कहँ नित करत डरावा । सोइ दिवस अब आगे आवा ॥
जौ पै हमसे लेखा लेबा । का हम कहब, उत्तर का देबा ॥
:::एत सब सँवरि कै मन महँ, चहैं जाइ सो भूलि ।
:::पैगहि पैग 'मुहम्मद', चित्त रहै सब भूलि ॥ २६ ॥
पुल सरात पुनि होइ अभेरा । लेखा लेब उमत सब केरा ॥
एक दिसि बैठि मुहम्मद रोइहैं । जिबरईल दूसर दिसि होइहैं ॥
बार पार किछु सूझत नाहीं । दूसर नाहिं, को टेकै बाहीं ? ॥
तीस सहस कोस कै बाटा । अस साँकरि जेहि चलै न चींटा ॥
बारह तें पतरा अस भीना । खड़ग धार से अधिकौ पैना ॥
दोउ दिसि नरक कुंड है भरे । खोज न पाउब तिन्ह महँ परे ॥
देखत काँपै लागै जाँघा । सो पथ कैसे जैहै नाँघा ॥
:::तहाँ चलत सब परखब, को रे पूर, को ऊन ।
:::अवहि को जान 'मुहम्मद', भरे पाप औ पून ॥ २७ ॥
जो धरमी होइहि संसारा । चमकि बीजु अस जाइहि पारा ॥
बहुतक जनौं तुरँग भल धइहैं । बहुतक जानु पखेरु उड़इहैं ॥
बहुतक चाल चलै महँ जइहैं । बहुतक मरि मरि पाँव उठइहैं ॥
बहुतक जानु पखेरु उड़इहैं । पवन कै नाईं तेहि महँ जइहैं ॥
बहुतक जानौं रेंगहिं चींटी । बहुतक बहैं दाँत धरि माटी ॥
बहुतक नरक कुंड महँ गिरहीं । बहुतक रकत पीब महँ परहीं ॥
जेहि के जाँघ भरोस न होई । सो पंथी निभरोसी रोई ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
खरे = खड़े । तारू = तालू में । केहु तन = किसी की ओर । ऐसे जतन =
इस ढंग से, इस प्रकार । (२६) असरारा = लगातार । चित्त भूलि
रहै = मन में बार बार आया करता है । (२७) अभेरा = सामना । चींटा =
चींटी । खोज = पता, निशान । ऊन = त्रुटिपूर्ण, ओछा । (२८) बीजु =
बिजली । चाल चलै महँ = मनुष्य की साधारण चाल से । तरास = त्रास ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{left|३०३}}{{center|'''आखिरी कलाम'''}}
{{block center|<poem>
:::परै तरास जो नाँघत, कोइ रे वार, कोइ पार ।
:::कोइ तिर रहा 'मुहम्मद', कोइ बूड़ा मझधार ॥ २८ ॥
लौटि हँकारब वह तब भानू । तपै कहैं होइहि फरमानू ॥
पूछब कटक जेता है आवा । को सेवक, को बैठे खावा ? ॥
जेहि जस आउ जियन मैं दीन्हा । तेहि तस संबर चाहौं लीन्हा ॥
अब लगि राज देस कर भूजा । अब दिन आइ लेखा कर पूजा ॥
छह मास कर दिन करौं आजू । आउ क लेउँ औ देखौं साजू ॥
से चौराहै बैठे आवै । एक एक जन कें पूछि पकरावै ॥
नीर खीर हुँत काढ़ब छानी । करब निनार दूध औ पानी ॥
:::धरम पाप फरियाउब, गुन औगुन सब जोख ।
:::दुखी न होहु 'मुहम्मद', जोखि लेब धरि जोख ॥ २९ ॥
पुनि कस होइहि दिसव छ भासू । सूरज आइ तपहिं होइ पासू ॥
कै सउहँ नियरे रथ हाँकै । तेहिकै आँच गूद सिर पाकै ॥
बजरागिन अस लागै तैसे । बिलखैं लोग पियासन वैसे ॥
उनै अगिन अस बरसै घामू । भूँज देह, जरि आवै चामू ॥
जेइ किछु धरम कीन्ह जग माहाँ । तेहि सिर पर किछु आवै छाहाँ ॥
धरमिहि आनि पियाउब पानी । पापी बपुरहि छाहँ न पानी ॥
जो राजता सो काज न आवै । इहाँ क दीन्ह उहाँ सो पावै ॥
:::जो लखपती कहावै, लहै न कौड़ी आधि ।
:::चौदह धजा 'मुहम्मद' ठाढ़ करहिं सब बाँधि ॥ ३० ॥
सवा लाख पैगंबर जेते । अपने अपने पाए तेते ॥
एक रसूल न बैठहिं छाहाँ । सबही धूप लेहिं सिर माहाँ ॥
घामै दुखी उमत जेहि केरी । सो का मानै सुख अबसेरी ? ॥
दुखी उमत तौ पुनि मैं दुखी । तेहि सुख होइ तौ पुनि मैं सुखी ॥
पुनि करता कै आयसु होई । उमत हँकारु लेखा मोहि देई ॥
कहब रसूल कि आयसु पावौं । पहिले सब धरमी लै आवौं ॥
होइ उतर 'तिन्ह हौं ना चाहौं । पापी घालि नरक मह बाहौं ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(२९) तपै कहै तपन को (अवध) । संबर सामान, कमाई । भूजा भोग
किया । से वह; सूर्य । एक एक....पकरावै एक एक प्राणी से सवाल जवाब
करके उसे पकड़ाए । कै कहूँ, को । जोख तराजू ।
(३०) सउहँ सामने । गूद सिर पाकै खोपड़ी का गूदा पक जाता है
तैसे बैठे । बपुरहि बेचारे को । राजता राजत्व, राजापन । चौदह
धजा चौदह ध्वजियों या बंधनों से । (३१) पाए पाए या आसन पर ।
अबसेरी दुःख से व्यग्र, चिंताग्रस्त । बाहौं फेकूँ, डालूँ ।
{{left|३०}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|३०४|आखिरी कलाम|}}</noinclude>{{block center|<poem>
:::पाप पुन्नि कै तखरी, होइ चाहत है जोख ।
:::अस मन जानि 'मुहम्मद', हिरदै मानेउ सोच ॥ ३१ ॥
पुनि जैहैं आदम के पासा । 'पिता ! तुम्हारि बहुत मोहि आसा ॥
'उमत मोरि गाढ़े है परी । भा न दान; लेखा का धरी ? ॥
'दुखिया पूत होत जो अहै । सब दुख पै बापें सों कहै ॥
'बाप बाप कै जो कछु खाँगै । तुमहिं छाँड़ि कासों पुनि माँगै ? ॥
'तुम जठेर पुनि सबहिन्ह केरा । अहौं संतति, मुख तुम्हरै हेरा ॥
'जेठ जठेर जो करिहैं बिनती । ठाकुर तबहीं सुनिहैं मिनती ॥
'जाइ दैउ सो बिनवौं रोई । मुख दयाल दाहिन तोहि होई ॥
:::'कहहु जाइ अस देखेउ, जेहि होवै उदघाट ।
:::'बहु दुख दुखी 'मुहम्मद', बिधि ! संकट तेहि काट' ॥ ३२ ॥
'सुनहु पूत , आपन दुख कहऊँ । हौं अपने दुख बाउर रहऊँ ॥
'होइ बैकुंठ जो आयसु ठेलेउँ । दूत के कहे मुख गोहूँ मेलेउँ ॥
'दुखिया पेट लागि सँग धावा । काढ़ि बिहिस्त से मैल ओढ़ावा ॥
'परलै जाइ मंडल संसारा । नैन न सूझै, निसि अँधियारा ॥
'सकल जगत मैं फिरि फिरि रोवा । जीउ अजान बाँधि कै खोवा ॥
'भएँ उजियार पिरथिवीं जइहौं । औ गोसाई कै अस्तुति कहिहौं ॥
'लौटि मिलै जौ हौवा आई । तौ जिउ कहँ धीरज होइ जाई ॥
:::'तेहि हुत लाजि उठै जिउ, मुँह न सकौं दरसाइ ।
:::'सो मुँह लेइ, 'मुहम्मद' ! बात कहौं का जाइ' ? ॥ ३३ ॥
पुनि जैहैं मूसा क दोहाई । 'ऐ बंधू ! मोहिं उपकरु आई ॥
तुम कह बिधिना आयसु दीन्हा । तुम नेरे होइ बातैं कीन्हा ॥
'उम्मत मोरि बहुत दुख देखा । भा न दान, माँगत है लेखा ॥
'अब जौ भाइ मोर तुम अहौ । एक बात मोहिं कारन कहौ ॥
'तुम अस ठटै बात का कोई । सोई कहौ बात जेहि होई ॥
'गाढ़े मीत ! कहौं का काहू ? । कहहु आइ जेहि होइ निबाहू ॥
'तुम सँवारि कै जानहु बाता । मकु सुनि माया करै बिधाता ॥
:::मिनती करहु मोर हुँत सीस नाइ, कर जोरि' ।
:::हा हा करै 'मुहम्मद' 'उमत दुखी है मोरि' ॥ ३४ ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
तखरी = तकड़ी, तराजू (पंजाबी) । (३२) गाढ़े = संकट में । धरी = धरिहि,
धरेगी (अवध) । खाँगै = घटता है । जठेर = बड़ा जेठा, बुजुर्ग । उदघाट =
छुटकारा. उद्धार ।
(३३) बाउर = बावला । मैल ओढ़ावा = कलंक लगा दिया । भए = होने
पर । तेहिहुत = उसी से, उसी कारण । (३४) उपकरु = उपकार कर । ठटै =
बनाए । बात जेहि होई = जिससे काम हो जाय । कै जानहु बाता = बात
करना जानते हो । मकु = कदाचित्, शायद । मोर हुत = मेरी ओर से ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{center|'''आखिरी कलाम'''}}{{right|३०५}}
{{block center|<poem>
'सुनहु रसूल बात का कहौं । हौं अपने दुख बाउर रहौं ॥
'कै कै देखेउ बहुत ढिठाई । मुँह गरुवाना खात मिठाई ॥
'पहिले मो कहँ आयसु दीन्हा । फरऊँ से मैं झगरा कीन्हा ॥
'रोधि नील कै डारेसि भूरा । फुर भा झूठ, झूठ भा फुरा ॥
'पुनि देखे बैकुंठ पठाएउँ । एकौ दिसि कर पंथ न पाएउँ ॥
'पुनि जो मो कह दरसन भएऊ । कोह तूर रावट होइ गएऊ ॥
'भाँति अनेक मै फिर फिर जापा । हर दावँन कै लीन्हेसि झाँपा ॥
:::'निरखि नैन मैं देखौं, कतहुँ परै नहि सूझि ।
:::'रहौं लजाइ, मुहम्मद ! बात कहौं का बूझि' ? ॥ ३५ ॥
दौरि दौरि सबहीं पहँ जैहैं । उतर देइ सब फिरि बहरैहैं ॥
ईसा कहिन कि कस ना कहत्यों । जौ किछु कहै क उत्तर पवत्यों ॥
मैं मुए मानुस बहुत जियावा । औ बहुतै जिउ दान दियावा ॥
इब्राहिम कह, कस ना कहत्यों । बात कहे बिन मैं ना रहत्यों ॥
मोसों खेल बंधु जो खेला । सर रचि बाँधि अगिन महँ मेला ॥
तहाँ अगिन हुँत भइ फुलवारी । अपडर डरौं, न परहि सँभारी ॥
नूह कहिन, जब परलै आवा । सब जग बूड़, रहेउँ चढ़ि नावा ॥
:::काह कहै काहू से, सबै ओड़ाउब भार ।
:::जस पै बनै 'मुहम्मद', करु आपन निस्तार ॥ ३६ ॥
सबै भार अस ठेलि ओड़ाउब । फिरि फिरि कहब, उतर ना पाउब ॥
पुनि रसूल जैहैं दरबारा । पैंग मारि भुइँ करब पुकारा ॥
तूँ सब जानसि एक गोसाईं । कोइ न आब उमत के ताईं ॥
जेहि सों कहौं सो चुप होइ रहै । उमत लाइ केहु बात न कहै ॥
मोर चाँड़ केहु नहिं चाँड़ा । देखा दुख, सबही मोहि छाँड़ा ॥
मोहि अस तहीं लाग करतारा । तोहिं होइ भल साँइ निस्तारा ॥
जो दुख चहसि उमत कहँ दीन्हा । सो सब मैं अपने सिर लीन्हा ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(३५) मुँह गरुवाना...मिठाई = कृपा की भिक्षा माँगते माँगते मुँह भारी
हो गया है, अब और मुँह नहीं खुलता । फरऊँ = मिस्र का बादशाह जिसने
इसराईल की संतानों को बहुत सताया था और वे मूसा के नायकत्व में मिस्र से
भागे थे (जब मिस्र की सेना ने उनका पीछा किया था तब खुदा ने उनके लिये
तो नील नद या समुद्र का पानी हटा दिया था, पर मिस्री सेना के सामने उसे और
बढ़ा दिया था) । रोधि = रोककर । फुर = सच, सत्य । कोह तूर = वह पहाड़
जिसपर मूसा को ईश्वर की ज्योति दिखाई पड़ी थी । रावट महल,
जगमगाता स्थान । जापा, पुकारा । हर दाँवन = हर अवसर पर । झाँपा =
परदा, ओट । (३६) बहरैहैं = बहलाएगा । सर = चिता । (३७) मारि ठेलि
ओड़ाउब = भार मुहम्मद पर ही डालेंगे । पैंग मारि = आसन मारकर । केहु =
कोई (अवधी) चाँड़ = चाह, कामना । तहीं = तू ही । गँजन = पीड़ा, साँसत ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|३०६|आखिरी कलाम|}}</noinclude>
{{block center|<poem>
:::लेखि जोखि जो आवै, मरन गँजन दुख दाहू ।
:::सो सब सहै 'मुहम्मद', दुखी करहु जनि काहू ॥ ३७ ॥
पुन रिसाइ कै कहै गोसाईं । फातिम कह ढूँढ़हु दुनियाईं ॥
का मोसौं उन झगरा पसारा । हसन हुसैन कहौं को मारा ॥
ढूँढ़ै जगत कतहुँ ना पैहँ । फिरि कै जाइ मारि गोहरे हैं ॥
ढूँढ़ि जगत दुनिया सब आएउँ । फातिम खोज कतहु ना पाएउँ ॥
'आयसु होइ, अहँ पुनि कहाँ' । उठा नाद हैं धरती महाँ ॥
'मुँदै नैन सकल संसार । बीबी उठै, करै निस्तारा ॥
जो कोइ देखै नैन उधारी । तेहि कह छार करौं धरि जारी' !
:::आयसु होइहि दैउ कर, नैन रहैं सब भाँपि ।
:::एक ओर डरै 'मुहम्मद', उमत मरै डर काँपि ॥ ३८ ॥
उठिन बीबी तब रिस किन्हें । हसन हुसैन दुबी सँग लिन्हें ॥
'तैं करता हरता सब जानसि । झूठ फुरै नीक पहिचानसि ॥
हसन हुसैन दुबी मोर बारे । दुनहु यजीद कौन गुन मारे ? ॥
'पहिले मोर नियाव निवारू । तेहि पाछ छेतना संसारू ॥
समुझै जीउ आगि महँ दहौं । देहु दादि तौ चुप कै रहौं ॥
'नाहि त देत सराप रिसाई । मारौं आइ अर्श जरि आई ॥
'बहु संताप उठै निज, कैसहुँ समुझि न जाइ ।
:::बरजहु मोह 'मुहम्मद', अधिक उठै दुख दाइ ॥ ३९ ॥
पुनि रसूल कहँ आयसु होई । फातिम कहँ समुझाबहु सोई ॥
'मारें आइ अर्श जरि जाइ ! तेहि पाछ आपुहि पछिताई ॥
'जो नहिं बात क करै बिबादू । जानौ मोहिं दीन्ह परसादू ॥
'जो बीबी छाँड़हि यह दोख । तौ मैं करौं उमत कै मोख ॥
'नाहि त घालि नरक मह जागै । लोटि जिआइ मुए पर मारै ॥
'अग्नि खंभ देखहु जस आए । हिरकत हार होइ तेहि लागे ॥
'चहु दिसि फेरि सरग लै लाबौं । मुँगरन्ह मारौं, लोह जटावौं ॥
:::तेहि पाछै धरि मारौं, घालि नरक के काठ ।
:::बीबी कहँ समुझाबहु, जौ रे उमत कै चाँट ॥ ४० ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(३८) फातिम = बीबी फातिमा, मुहम्मद साहब की कन्या जिसके दो
लड़के हसन और हुसैन करबला के मैदान में कष्ट से मारे गए और कोई खड़ा
न हुआ । मारि = बहुत (अवध) । गोहरइहैं = पुकारेंगे । नाद = आकाश-
वाणी । (३९) किहँ, = लिहैं = किए लिए (अवध) । बारे = बालक, लड़के ।
दादि देहु = इंसाफ करो । अर्श = आसमान (का सबसे ऊँचा तबक) । दुख-
दाद = दुखदाह । (४०) जानौ मोहिं...परसाद = ता समझो कि मैं प्रसन्न हो
गया या मैंने बख्श दिया । लौटि = फिर फिर । हिरकर = सटते ही । काठ =
किनारे, तट पर । जो रे...चाँट = यदि तुम्हें अपनी उम्मत की इतनी चाह है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४८९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{left|३०७}}{{center|'''आखिरी कलाम'''}}
{{block center|<poem>
पुनि रसूल तलफत तह जैहैं । बीबिकहि बार बार समुझैहैं ॥
'बोदी कहब, घाम कत सहहु ? । कस ना बैठि छाह महँ रहहु ? ॥
'सब पैगंबर बैठे छाहीं । तुम कस तपौ बजर अस माहाँ ? ॥
'कहब रसूल, छाँह का बैठौं ? । उमत लागि धूपह नहिं बैठी ॥
'तिन्ह सब बाँधि घाम मह, मेले । का भा मोरे छाह अकेले ॥
'तुम्हरे कोह सबहि जो मरे । समुझहु जीउ, तवहि निस्तरे ॥
'जो मोहिं वही निवारहु कोहू । तब बिधि करे उमत पर छोहू' ॥
:::वह दुख देखि पिता कर, बीबी समुझा जीउ ।
:::जाइ मुहम्मद विनवा, ठाढ़ पाग के गोउ ॥ ४१ ॥
तव रसूल के कहँ भइ माया । जिन चिंता मानहु, भइ दाया ॥
जी बीबी अबहूँ रिसिआई । सबहि उमत सिर आड बिसाई ॥
अब फातिम कह बेगि बोलावह । देइ दाद तौ उमत छोड़ावह ॥
फातिम आइ कै पार लगावा । धरि यजीद दोजख मह गवा ॥
अंत कहा, धरि ज्ञान से मारै । जीउ देइ देइ पुनि लोटि पछारै ॥
तस मारब जेहि भुइँ गड़ि जाई । खन खन मारै लोटि जियाई ॥
बजर अगिन जारब के छारा । लोटि दहै जस दहै लोहारा ॥
:::मारि मारि घिसियावैं, धरि दोजख मह देव ।
:::जेतनी सिस्टि 'मुहम्मद', सबहि पुकारै लेब ॥ ४२ ॥
पुनि सब उमत लेब बुलाई । हरु गुरु लागब बहिराई ॥
निरखि रहैती काढ़ब छानी । करब निनार दूध औ पानी ॥
बाप क पूत, न पूत क बापू । पाइहि तहाँ न पुत्रि न पापू ॥
आपहि आप आइ कै परी । कोउ न कोउ क धरहरि करी ॥
कागज काढ़ि लेब सब लेखा । दुख सुख जो पिरथथी महँ देखा ॥
पुनि पियाला लेखा माँगब । उतर देत उन पानी खाँगब ॥
नैन क देखा स्रवन क सुना । कहब, करब, औगुन औ गुना ॥
:::हाथ, पाँव, मुख, काया, स्रवन, सीस औ आँखि ।
:::पाप न छुपै 'मुहम्मद', आइ भरै सब साखि ॥ ४३ ॥
देह क रोवाँ बैरी होइहैं । बजर बिया एहि जीउ क रोइहैं ॥
पाप पुन्नि निरमल कै धोउब । राखब पुन्नि, पाप सब खोउब ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(४१) बजर धूप । समुझहु जीउ अपने जी में ढ़ाढ़स बाँधो ।
पाग के गोउ = गले में पगड़ी डालकर, बड़ी अधीनता से । (४२) यजीद =
जिसने हसन हुसैन को मारा था । गवा = गया । घिसियावैं = घसीटते हैं ।
पुकारै लेब = पुकार लेंगे । (४३) हरु = हलका, ओछा । गुरु = भारी, गंभीर ।
बहिराइ लागब = निकलने लगेंगे । रहैती = रहन सहन, आचरण । निनार =
न्यारा, अलग । धरहरि = धर पकड़, सहायता । करो = करिहि, करेगा ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|३०८|आखिरी कलाम|}}</noinclude>{{block center|<poem>
पुनि कौसर पठउब अन्हवाव । जहाँ कया निरमल सब पाव ॥
बुड़की देब देह सुख लागी । पलुहब उठि, सोवत अस जागी ॥
खोरि न्हाइ धोइ सब दुंदू । होइ निबरहिं पुनिउ के चंदू ॥
सब क सरीर गुवास बसाई । चंदन के अस घानी आई ॥
झूठे सबहि, आप पुनि साँचे । सबहि नबी के पीछे वाँचे ॥
नविहि छाँड़ि होइहि सबहि, बारह बरस क राह ।
:::सब अस जान 'मुहम्मद', होइ बरस के राइ ॥ ४४ ॥
पुनि रसूल नेवतब जेवनारा । बहुत भाँति होइहि परकारा ॥
ना अस देखा, ना अस सुना । जौ सरहीं तौ है दस गुना ॥
पुनि अनेक बिस्तर तहँ डासब । बास सुबास कपूर ते बासब ॥
है आयसु जौ बेगि बोलाव । औ सब उमत साथ लेइ आउब ॥
जिबरईल आगे होइ जइहैं । पग डारै कहँ आयसु देइहैं ॥
चलब रसूल उमत लेइ साथा । परग परग पर नावत माथा ॥
'आबहु भीतर' बेगि बोलाव । बिस्तर जहाँ तहँ बैठाउब ॥
:::भारि उमत सब बैठी, जोरि के एकै पाँति !
:::सब के माझ 'मुहम्मद', जानौ दुलह बराति ॥ ४५ ॥
पुनि जेवन कह आवै लागी । सबके आगे धरत न खाँगी ॥
भाँति भाँति कर देखब धारा । जानब ना दहू कौन प्रकारा ॥
पुनि फरमाउब आप गोसाईं । बहुतै दुख देखेउ दुनियाईं ॥
हाथन्ह से जेवन मुख डारत । जीभ प्रसारत दाँत उघारत ॥
कूँचत खात बहुत दुख पाए । तहँ ऐसे जेवनार जेवैं ॥
अब जिन लँटि कस्ट जिउ करहू । सुख सवाद औ इंद्री भरहू ॥
पाँच भूत आतमा सेराई । बैठि अघाउ, उदर ना भाई ॥
:::ऐस करब पहुनाई, तब होइहि संतोख ।
:::दुखी न होहु 'मुहम्मद', पोखि लेहु फुर पोख ॥ ४६ ॥
हाथन्ह से केहु और न लेई । जो चाह मुख पैठे सोई ॥
दाँत, जीभ, मुख किछु न डोलाव । जस जस रचि है तस तस खाउब ॥
जेस अन्न बिन कूँचे रँचै । तैस सिठाइ जी कोऊ कूँचै ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(४४) कौसर = स्वर्ग की एक नदी या चश्मा । बुड़की = गोता । पलु-
हेर । (४५) जौ सरहीं...दस गुना = यदि सराहता हूँ तो उसका दसगुना
ठहरता है ।
(४६) तहँ संसार में । लँटि = स्वर्ग में लौट आकर । सेराई = शीतल
तुष्टि । उदर ना भाई = यहाँ पेट नहीं है जिसे भरना पड़े । (४७) तैस सिठाइ...
कूँचै = कूँचने पर वह वैसा ही सीठी सा नीरस लगता है ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{left|३०९}}{{center|'''आखिरी कलाम'''}}
{{block center|<poem>
एक एक परकार जो आए । सत्तर सत्तर स्वाद सो पाए ॥
जहँ जहँ जाइ के परै जुड़ाई । इच्छा पूजै ,खाइ अघाई ॥
अनचाखे राते फर चाखा । सब अस लेइ अपरस रस चाखा ॥
जलम जलम कै भूख बुझाई । भोजन केरे साथै जाई ॥
जेवन अचवन होइ पुनि, पुनि होइहि खिलवान ।
अमृत भरा कटार, पियहु 'मुहम्मद' पान ॥ ४३ ॥
एक तौ अमृत, वास कपूरा । तेहि कह रहा शराव तहुरा ॥
लागब भरि भरि देइ कटोरा । पुरुष ज्ञान अस भरै महोरा ॥
ओहि के मिठाइ भाँति एक दऊँ । जलम न मानब होइ अब काहूँ ॥
सचु मतवार रहब होइ सदा । रहसै कूदै सदा सरबदा ॥
कबहु न खोवै जलम खुमारी । जनौ बिहान उठै भरि बारी ॥
ततखन बासि बासि जनु धाला । घरी घरी जस लेब पियाला ॥
सबहि क भा मन सो मद पिया । नव अवतार भवा औ जिया ॥
फिरें तंबोल, मया से, कहब 'अपन लेइ खाहु ।
भा परसाद, 'मुहम्मद', उठि बिहिस्त महँ जाहु' ॥ ४४ ॥
कहब रसूल, 'बिहिस्त न जाऊँ । जौ लगि दरस तुम्हार न पाऊँ ॥
उघर न नैन तुम्हि बिनु देखे । सबहि अबिरथा मोरे लेखे ॥
तौ लै केहु बैकुंठ न जाई । जौ लै तुम्हारा दरस न पाई ॥
करु दीदार, देखौं मैं तोही । तौ है जीउ जाइ सुख मोहीं ॥
देखें दरस नैन भरि लेऊँ । सीस नाइ पै झुड़ कह देऊँ ॥
जलम मोर लागा सब थारा । पलै जीउ जो गोउ उभाग ॥
होइ दयाल करु दिसिट फिगवा । तोहि छाँड़ि मोहिं और न भावा ॥
सीस पाय भुइ लावीं, जौ देखौं तोहि आँखि ।
दरसन देखि 'मुहम्मद', हिवे भरीं तोरि साखि ॥ ४५ ॥
सुनहु रसूल ! होत फरमानु । बोल तुम्हार कीन्ह परमानु ॥
तहाँ हुतेंउ जह हुतेंउ न ठाऊँ । पहिले रचेउ मुहम्मद नाऊँ ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
सिठाइ = सीठी सा फीका लगता है । अपरस = अछूता । जलम = जन्म
(अवध) । खिलवान = खिलारी (धनिया, खरबूज आदि के तले बीज जो भोजन
के पोछ दिए जाते हैं) । (४४) शराव तहुरा = शरावतहुरा, स्वर्ग की शराव ।
महोरा = महुअरा, मधु, मद्य । सचु मतवार = आनंद से मतवाला । बिहान
बारी = मानो नित्य सुह तक भरा प्याला मिल जाता है । परसाद = प्रसन्नता,
कृपा । (४५) अबिरथा = वृथा, व्यर्थ । जाई = जाइहि, जायगा । पाई = पाइहि,
पाएगा । जाइ = उत्पन्न हो । जलम = जन्म । थारा = थाला (जिसमें पौधा
लगाया जाता है) । गीउ उभाय = गर्दन ऊपर की, ऊपर दृष्टि की । (५०)
हुतेंउ = मैं था । हुतेंउ न ठाऊँ = जहाँ कोई स्थान न था, लामकान ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|३१०|आखिरी कलाम|}}</noinclude>
{{block center|<poem>
तुम बिनु अबहूँ न परगट कीन्ह । सहस अठारह कहँ जिउ दीन्ह ॥
चौदह खंड ऊपर तर राखे । नाद बनाइ भेद बहु भाखे ॥
चार फिरिस्तन बड़ अवतारे । सात खंड बैकुंठ सँवारे ॥
सवा लाख पैगंबर सिरजे । कर करतुति ओहहि थे बेधे ॥
औरन्ह कर आगे कत लेखा । जेतना सिरजा सो ओह देखा ॥
तुम तहँ एसा सिरजा, आप के अंतरहेत ।
देखहु दरस 'मुहम्मद' ! आपनि उमत समेत ॥ ५० ॥
सुनि फरमान हरण जिउ बाढ़े । एक पाँव से भए उठि ठाढ़े ॥
भारि उमत लागी तब तारी । जेतना सिरजा पुरुष औ नारी ॥
लाग सबन्ह सहूँ दरसन होई । ओह बिनु देखे रहा न कोई ॥
एक चनकार होइ उजियारा । छपै बीजु तेहि के चमकारा ॥
चाँद सुरुज ठपिहैं बहूँ जोती । रतन पदारथ मानिक मोती ॥
सो मनि दिगँ जो कीन्हि थिराई । छपा सो रंग गात पर आई ॥
ओह रूप निरमल होइ जाई । और रूप ओह रूप समाई ॥
ना अस कबहुँ देखा, ना केहु ओह भाँति ।
दरसन देखि 'मुहम्मद' मोहि परे बहु भाँति ॥ ५१ ॥
दुइ दिन लहि बोड़ मुधि न सँभारे । धिनु सुधि रहे, न नैन उधारे ॥
तिसरे दिन जिबरैल जी आए । सब पदमाने आनि जगाए ॥
जे हिय भेदि सुदरसन राते । परे परे लौटि जस माते ॥
सब अस्तुति कै करै बिमेखा । ऐस रूप हम कतहूँ न देखा ॥
अब सब गए जलम दुख धोरे । जो चाहिय हुति पाबा सोई ॥
अरु निहचिंत जीउ बिधि कीन्हा । जी पिय आपन दरसन दीन्हा ॥
मन कै जेति आस सब पूजी । रही न कोई आस गति दूजी ॥
मरन, गँजन औ परिहस, दुख, दलिट्र सब भाग ।
सब सुख देखि 'मुहम्मद', रहस कूद जिउ लाग ॥ ५२ ॥
जिबरैल कह आयसु होइहि । अठरिन्ह आइ आगे पय जोइहि ॥
उमत रसूल केर बहिराउब । के असवार बिहिस्त पहुँचाउब ॥
सात बिहिस्त बिधिन अवतारा । औ आठई शदाद सवारा ॥
सो सब देव उमत कह बाँटी । एक बराबर सब कहँ आँटी ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
अबहूँ = अब तक । नाद = कलाम । कहि करनुति = कर्तव्य बतलाकर ।
अंतरहेत = अंतर्हित, ओट में, अदृश्य । (५१) भारि = सारी, कुल ।
तारी लागी = टकटकी लग गई, पलकों का गिरना बंद हो गया ।
सहुँ = संमुख, साक्षात् । चमकार = चमत्कार, ज्योति । कीन्हि थिराई =
स्थिर रह सके । छपा सो रंग आई = उनके शरीर पर उस ज्योति की
छाप लग गई । (५२) लहि = तक । परिहरा = ईर्ष्या, डाह, कुढ़न (अवध) ।
रहम = आनंद । (५३) अठरी = अप्सरा । बहिराउब = निकालेंगे, चलाएंगे ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{left|३११}}{{center|'''आखिरी कलाम'''}}
{{block center|<poem>
एक एक कह दीन्ह निवासू । जगत लोक विरसें क बिलासू ॥
चालिस चालिस हूरें सोई । ओ सँग लागि बियाही जोई ॥
औ सेवा कहँ अछरिन्ह केरी । एक एक जनि कहँ सौ सौ चेरी ॥
:::ऐसे जतन बियाहें, जस साजै वरियात ।
:::दूलह जतन 'मुहम्मद', बिहिस्त चले बिहँसात ॥ ५३ ॥
जिबराइल इतात कह धाए । चोल आनि उम्मत पहिराए ॥
पिरहहु दगल सुरंग रँग राते । करहु सोहाग जनहुँ मद माते ॥
ताज कुलह सिर मुहम्मद सोहे । चंद बदन औ कोकब मोहे ॥
न्हाइ खोरि अस बनी बराता । नबी तंबोल खात मुख राता ॥
तुम्हरे रुचे उमत सब आनब । ओ सँवारि बहु भाँति बखानब ॥
खड़े गिरत मदमाते ऐहैं । चढ़ि कै घोड़न कहँ कुदरैहैं ॥
जिन भरि जलम बहुत हिय जारा । बैठि पाँव देइ जम ते पारा ॥
:::जैसे नबी सवारे, तैसे बने पुनि साज ।
:::दूलह जतन 'मुहम्मद', बिहिस्त करै सुख राज ॥ ५४ ॥
तानब छत्र मुहम्मद माथे । ओ पहिरै फूलन्ह बिनु गाँथे ॥
दूलह जतन होब असवारा । लिए बरात जैहैं संसारा ॥
रचि रचि अछरिन्ह कीन्ह सिंगारा । बास सुबास उठै महकारा ॥
आज रसूल बियाहन ऐहैं । सब दुलहिन दूलह सह नेहैं ॥
आरति करि सब आगे ऐहैं । नंद सरोदन सब मिलि गैहैं ॥
मंदिरन्ह होइहि सेज बिछावन । आजु सबहि कहँ मिलिहैं रावन ॥
बाजन बाजै बिहिस्त दुवारा । भीतर गीत उठै झनकारा ॥
:::बनि बनि बैठो अछरी, बैठि जोहैं कबिलास ।
:::बेगिहि आउ 'मुहम्मद', पूजै मन कै आस ॥ ५५ ॥
जिबराइल पहिले से जैहैं । जाइ रसूल बिहिस्त नियरैहैं ॥
खुलिहैं आठौ पँवरि दुवारा । ओ पैठे लागे असवारा ॥
सकल लोग जब भीतर जैहैं । पाछे होइ रसूल सिधैहैं ॥
मिलि हूरें नेवछावर करिहैं । सबके मुखन्ह फूल अस झरिहैं ॥
रहसि रहसि तिन करब किरीड़ा । अगर कुंकुमा भरा सरीरा ॥
बहुत भाँति कर नंद सरोदू । बास सुबास उठै परमोदू ॥
अगर, कपूर, बेना, कस्तूरी । मंदिर सुबास रहब भरपूरी ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
विरसें = विलास करते हैं । हूर = बिहिश्त की अप्सरा । जोई = जोय, स्त्री ।
ऐसे जतन = ऐसे ढंग से, इस प्रकार । (५४) इतात = आज्ञापालन । चोल
= वस्त्र, पहनावा । दगल = लंबा अगरखा । कुलह = टोप । बहुत हिय जारा
= ईश्वर के विरह में लीन रहे । जतन = प्रकार, समान । (५५) नंद =
आनंद । सरोद = स्वर । (फारसी) । रावन = रमण करनेवाला, प्रियतम ।
(५६) पँवरि = ड्योढ़ी ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" /></noinclude>{{right|३११}}{{center|'''आखिरी कलाम'''}}
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एक एक कह दीन्ह निवासू । जगत लोक विरसें क बिलासू ॥
चालिस चालिस हूरें सोई । ओ सँग लागि बियाही जोई ॥
औ सेवा कहँ अछरिन्ह केरी । एक एक जनि कहँ सौ सौ चेरी ॥
:::ऐसे जतन बियाहें, जस साजै वरियात ।
:::दूलह जतन 'मुहम्मद', बिहिस्त चले बिहँसात ॥ ५३ ॥
जिबराइल इतात कह धाए । चोल आनि उम्मत पहिराए ॥
पिरहहु दगल सुरंग रँग राते । करहु सोहाग जनहुँ मद माते ॥
ताज कुलह सिर मुहम्मद सोहे । चंद बदन औ कोकब मोहे ॥
न्हाइ खोरि अस बनी बराता । नबी तंबोल खात मुख राता ॥
तुम्हरे रुचे उमत सब आनब । ओ सँवारि बहु भाँति बखानब ॥
खड़े गिरत मदमाते ऐहैं । चढ़ि कै घोड़न कहँ कुदरैहैं ॥
जिन भरि जलम बहुत हिय जारा । बैठि पाँव देइ जम ते पारा ॥
:::जैसे नबी सवारे, तैसे बने पुनि साज ।
:::दूलह जतन 'मुहम्मद', बिहिस्त करै सुख राज ॥ ५४ ॥
तानब छत्र मुहम्मद माथे । ओ पहिरै फूलन्ह बिनु गाँथे ॥
दूलह जतन होब असवारा । लिए बरात जैहैं संसारा ॥
रचि रचि अछरिन्ह कीन्ह सिंगारा । बास सुबास उठै महकारा ॥
आज रसूल बियाहन ऐहैं । सब दुलहिन दूलह सह नेहैं ॥
आरति करि सब आगे ऐहैं । नंद सरोदन सब मिलि गैहैं ॥
मंदिरन्ह होइहि सेज बिछावन । आजु सबहि कहँ मिलिहैं रावन ॥
बाजन बाजै बिहिस्त दुवारा । भीतर गीत उठै झनकारा ॥
:::बनि बनि बैठो अछरी, बैठि जोहैं कबिलास ।
:::बेगिहि आउ 'मुहम्मद', पूजै मन कै आस ॥ ५५ ॥
जिबराइल पहिले से जैहैं । जाइ रसूल बिहिस्त नियरैहैं ॥
खुलिहैं आठौ पँवरि दुवारा । ओ पैठे लागे असवारा ॥
सकल लोग जब भीतर जैहैं । पाछे होइ रसूल सिधैहैं ॥
मिलि हूरें नेवछावर करिहैं । सबके मुखन्ह फूल अस झरिहैं ॥
रहसि रहसि तिन करब किरीड़ा । अगर कुंकुमा भरा सरीरा ॥
बहुत भाँति कर नंद सरोदू । बास सुबास उठै परमोदू ॥
अगर, कपूर, बेना, कस्तूरी । मंदिर सुबास रहब भरपूरी ॥
</poem>}}
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विरसें = विलास करते हैं । हूर = बिहिश्त की अप्सरा । जोई = जोय, स्त्री ।
ऐसे जतन = ऐसे ढंग से, इस प्रकार । (५४) इतात = आज्ञापालन । चोल
= वस्त्र, पहनावा । दगल = लंबा अगरखा । कुलह = टोप । बहुत हिय जारा
= ईश्वर के विरह में लीन रहे । जतन = प्रकार, समान । (५५) नंद =
आनंद । सरोद = स्वर । (फारसी) । रावन = रमण करनेवाला, प्रियतम ।
(५६) पँवरि = ड्योढ़ी ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh|३१२|आखिरी कलाम|}}</noinclude>
{{block center|<poem>
सोवन आजु जो चाहै, साजन मरदन होइ ।
देहि सोहाग 'मुहम्मद', सुख विरसै सब कोड़ ॥ ५७ ॥
बैठि बिहिस्त जौ नौनिधि पैहँ । अपने अपने मैंदिर सिधैहैं ॥
एक एक मंदिर सात दुवारा । अगर नँदन के लाग केवारा ॥
हरे हरे बहु खंड सँवारे । बहुत भाँति दइ आपु सँवारे ॥
सोने रूपै घालि उचावा । निरमल कहँ कहँ लाग गिलावा ॥
हीरा रतन पदारथ जरै । तेहि क जोति दीपक जस बरै ॥
नदी दूध अतरन क बहहीं । मानिक मोति परे भुड़ रहहीं ॥
ऊपर गा अव छाह सोहाई । एक एक खंड चहा दुनियाई ॥
तात न जुड़ न कुनकुन, दिवस रात नहिं दुख ।
नींद न भूख 'मुहम्मद', सब विरसै अति सुख ॥ ५७!
देखत अछरिन केरि निकाई । रूप तें मोहि रहत मुरछाई ॥
लाल करत मुख जोहब पासा । कीन्ह चहँ किछु भोग बिलासा ॥
ऐ सब आवै मोरे निवासा । तुम आगे लेउ अब कबिलासा ॥
जो अस रूप पाट परधानी । औ सबहिन्ह चेरन्ह क रानी ॥
बदन जोति मनि माथे भागु । औ बिधि आगर दीन्ह सोहागु ॥
साहस करै सिंगार सँवारी । रूप सुरुस पदमिनी नारी ॥
पाट बैठि नित जोहैं, बिरहन्ह जारै माँस ॥
दीन दयाल 'मुहम्मद', मानहु भोग बिलास ॥ ५८ ॥
सुनहिं सुरुस अवहि बहु भाँती । इनहि चाहि जो है रूपवँती ॥
सातों पँवरि नवत तिन्ह पेखब । सातूँ आए सो कौकुत देखब ॥
चले जाब आगे तेहि आसा । जाइ परब भीतर कबिलासा ॥
तखत बैठि सब देखब रानी । जे सब चाहि पाट परधानी ॥
दसन जोति उठै चमकारा । सकल बिहिस्त होइ उजियारा ॥
बारहबानी कर जो सोना । तेहि तें चाहि रूप अति लोना ॥
निरमल बदन चंद क जोती । सब क सरीर दिपै जस मोती ॥
बास सुबास छुवै जेहि बेधि भँवर कहँ जात ।
बर सो देखि 'मुहम्मद' हिरदै महँ न समात ॥ ५९ ॥
पैग पैग जस जस नियराउब । अधिक सवाद मिलै कर पाउब ॥
समाइ रहै चुप लागे । सब कहँ आइ लेहिं होइ आगे ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
साजन = स्वजन, प्रियतम । मरदन = आलिंगन । विरसै = बिलसे (५७)
आधा गरम । (५८) तात = गरम । कुनकुन = कुनकुना
= रूपवती । कौकुत = कौतुक, चमत्कार । चाहि = बढ़कर । बास सुबास
जात = जिस भौंरे को बढ़कर छूने के लिये सुगंध जाती है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४९५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ReetiSingh14" />{{rh||आखिरी कलाम|३१३}}</noinclude>
{{block center|<poem>
बिसरहु दूलह जोबन बारी । पाएउ दुलहिन राजकुमारी ॥
एहि महँ सो कर गहि लेइ जैहैं । आध तखत पै लै बैठैहैं ॥
सब अछूत तुम कहँ भरि राखै । महै सवाद होइ जौ चाखै ॥
नित पिरीत, नित नव नव नेहु । नित उठि चौगुन होइ सनेहु ॥
[[नित्तिहि नित्त जो बारि बियाहै । बीसौ बीस अधिक ओहि चाहै ॥
तहाँ न मीचु, न नींद, दुख, रह न देह महँ रोग ।
सदा अनंद 'मुहम्मद', सब सुख मानै भोग ॥ ६० ॥
</poem>}}
{{rule|align=left|10em}}
(६०) जोबन बारी (क) यौवन की वाटिका, (ख) युवती बालाएँ ।
महै = बहुत ही । बीसौ बीस = पहले से और बढ़कर ।<noinclude></noinclude>
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