विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.6 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२१९ 250 2461 662807 643460 2026-06-14T12:10:20Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 662807 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|बाल्टिक राष्ट्र-समूह||३१३}}</noinclude><noinclude>{{rh|बाल्टिक राष्ट्र-समूह||२१२}}</noinclude> पूरे तीन साल लगे । २०० इंजीनियर तथा १,६०,००० मज़दूरों ने काम किया। इसके बनाने मे १ करोड ६० लाख डालर व्यय हुए । चीनी सरकार को सयुक्त-राष्ट्र अमरीका, भारत, ब्रह्मा तथा ब्रिटेन से मदद न मिले——इस विचार से जापान ने, फ्रान्स के पतन के वाद, हिन्द-चीन की सरकार से हेपहांंग्-हैनोई-कुमनिंग्-रेलवे मार्ग को बन्द करने के लिये आग्रह किया और विशी-सरकार ने, २० जून १६४० को, उसे बंद कर दिया । चीन के समुद्र-तट पर जापान को अधिकार होगया था। यह मार्ग फ्रान्स ने बन्द करा दिया। तब चीन के लिये ब्रह्मा-चीन-मार्ग ही रह गया था। वार्डिया——लीबिया( अफ्रीका ) मे, जो इटली के अधीन था, एक बन्दरगाह । इसकी क़िलेबन्दी को अंग्रेजों ने तोड़ दिया और ७ जनवरी १६४१ को इस पर अपना अधिकार जमा लिया । वालफोर घोषणा———२ नवम्बर १६१७ को ब्रिटेन के तात्कालिक वैदेशिक मंत्री मि० जे० ए० बालफोर द्वारा, ब्रिटिश यहूदी संघ के अध्यक्ष, लार्ड राथ्सचाइल्ड, को लिखा गया पत्र, जिसमे मि० बालफोर ने लिखा——“ब्रिटिश सरकार यह चाहती है कि फिलस्तीन मे यहूदी जनता के लिये एक राष्ट्रीय उपनिवेश स्थापित किया जाय । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह भरसक प्रयत्न करेगी । यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि कोई ऐसा कार्य नहीं किया जायेगा जिससे फिलस्तीन-अधिवासी दूसरी जनता के नागरिक तथा धार्मिक अधिकारी में हस्तक्षेप हो अथवा दूसरे देशों में यहूदियो की जो स्थिति है, उस पर कोई असर पड़े । इसी पत्र के आधार पर यहूदी अपना आन्दोलन फिलस्तीन में कर रहे हैं । वाल्टिक राष्ट्र-समृह———लिथुआनिया, लैटविया एस्टोनिया और फिनलैण्ड बाल्टिक राष्ट्र कहलाते हैं । सन् १६१८ से पूर्व यह रूस के प्रान्त थे । तब से यह राज्य सोवियत रूस और पश्चिमी योरप के बीच स्वतन्त्र राष्ट्र बने रहे । स्वभावतः ही रूस इन देशों पर अपना पुनराधिकार प्राप्त करके बाल्टिक सागर पर अपना प्रभुत्व चाहता था । अक्टूबर १६३६ में रूस ने, इस युद्ध भे, अवसर से लाभ उठा लिया । दिसम्बर १६३६ में फिनलैंड पर उसने आक्रमण किया और मार्च १६४० में उसके बहुत से प्रदेशों पर अधिकार कर<noinclude></noinclude> 24o6wn21aotmgakq2mqe8655ubp9dgo 662810 662807 2026-06-14T12:19:36Z Vanshiikaa 6602 662810 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|बाल्टिक राष्ट्र-समूह||३१३}}</noinclude>पूरे तीन साल लगे । २०० इंजीनियर तथा १,६०,००० मज़दूरों ने काम किया। इसके बनाने मे १ करोड ६० लाख डालर व्यय हुए । चीनी सरकार को सयुक्त-राष्ट्र अमरीका, भारत, ब्रह्मा तथा ब्रिटेन से मदद न मिले——इस विचार से जापान ने, फ्रान्स के पतन के वाद, हिन्द-चीन की सरकार से हेपहांंग्-हैनोई-कुमनिंग्-रेलवे मार्ग को बन्द करने के लिये आग्रह किया और विशी-सरकार ने, २० जून १६४० को, उसे बंद कर दिया । चीन के समुद्र-तट पर जापान को अधिकार होगया था। यह मार्ग फ्रान्स ने बन्द करा दिया। तब चीन के लिये ब्रह्मा-चीन-मार्ग ही रह गया था। वार्डिया——लीबिया( अफ्रीका ) मे, जो इटली के अधीन था, एक बन्दरगाह । इसकी क़िलेबन्दी को अंग्रेजों ने तोड़ दिया और ७ जनवरी १६४१ को इस पर अपना अधिकार जमा लिया । वालफोर घोषणा———२ नवम्बर १६१७ को ब्रिटेन के तात्कालिक वैदेशिक मंत्री मि० जे० ए० बालफोर द्वारा, ब्रिटिश यहूदी संघ के अध्यक्ष, लार्ड राथ्सचाइल्ड, को लिखा गया पत्र, जिसमे मि० बालफोर ने लिखा——“ब्रिटिश सरकार यह चाहती है कि फिलस्तीन मे यहूदी जनता के लिये एक राष्ट्रीय उपनिवेश स्थापित किया जाय । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह भरसक प्रयत्न करेगी । यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि कोई ऐसा कार्य नहीं किया जायेगा जिससे फिलस्तीन-अधिवासी दूसरी जनता के नागरिक तथा धार्मिक अधिकारी में हस्तक्षेप हो अथवा दूसरे देशों में यहूदियो की जो स्थिति है, उस पर कोई असर पड़े । इसी पत्र के आधार पर यहूदी अपना आन्दोलन फिलस्तीन में कर रहे हैं । वाल्टिक राष्ट्र-समृह———लिथुआनिया, लैटविया एस्टोनिया और फिनलैण्ड बाल्टिक राष्ट्र कहलाते हैं । सन् १६१८ से पूर्व यह रूस के प्रान्त थे । तब से यह राज्य सोवियत रूस और पश्चिमी योरप के बीच स्वतन्त्र राष्ट्र बने रहे । स्वभावतः ही रूस इन देशों पर अपना पुनराधिकार प्राप्त करके बाल्टिक सागर पर अपना प्रभुत्व चाहता था । अक्टूबर १६३६ में रूस ने, इस युद्ध भे, अवसर से लाभ उठा लिया । दिसम्बर १६३६ में फिनलैंड पर उसने आक्रमण किया और मार्च १६४० में उसके बहुत से प्रदेशों पर अधिकार कर<noinclude></noinclude> 71sutq0mtb9cg3c32qobu1kcowt5uhg पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२० 250 2463 662873 573221 2026-06-15T04:41:31Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 662873 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''२१४'''||'''ब्राज़ील'''}}</noinclude>लिया । १६४० के जून-जुलाई में लिथुआनिया, एस्टोनिया और लैटविया में रूस ने पूर्ण अधिपत्य करके अपनी नौ-सेना के अड्डे बना लिये तथा किलेबन्दी क़ायम करदी । तीनों देशो मे सोवियत ( जनता की पचायती )-शासन-प्रणाली क़ायम करके रूसी पचायती राज में इनको मिला लिया। बाल्टिक राष्ट्रो मे रूस का प्रभुत्व है । जर्मन प्रभाव को रूस ने यहाँ से उखाड़ फेका, साथ ही यहाँ बसी हुई अल्पसंख्यक जर्मन जाति को जर्मनी भेज दिया। ब्राजील-( ब्राजील का ) सयुक्त राज्य । दक्षिण अमरीका का सबसे बडा प्रजातत्र । क्षेत्रफल ३२,८५,००० वर्गमील, जनसख्या ४,५०,००,०००; राजधानी रियो द-जनीरो, राष्ट्रभाषा पुर्तगाली । सन् १८८६ से इस देश का विधान संयुक्त राज्य अमरीका जैसा रहा, किन्तु १६३० मे राष्ट्रपति बरगस ने सत्ता अपने हाथ में लेली और एक कानून बनाकर दो धारासभाएँ स्थापित करदी । १६३७ मे सैनिक-विद्रोह के बल पर बरगस यहाँ का अधिनायक बन गया । वह जर्मनी और इटली का मित्र था, किन्तु १६३८ में नात्सीवाद तथा फासिज्म के विरुद्ध होगया और देश के फासिस्त दल का दमन किया । अब ब्राजील संयुक्त-राज्य अमरीका का मित्र देश है । ब्राजील देश की गणना ससार के सबसे बडे धनी देशो मे है । किन्तु अपेक्षाकृत वह अविकसित है। वहाँ कहवा ( काफी ) सबसे अधिक मात्रा में पैदा होता है । इसकी अधिक पैदावार तथा सस्ते मूल्य के कारण कई बार यहाँ उथल-पुथल होचुकी है । क़हवा यहाँ की राजनीतिक समस्या बना हुआ है । साथ ही ब्राजीली सयुक्त-राज्य के अन्तर्गत बीस राज्यो की भी समस्या है । यह रियासते, केन्द्रीय सरकार के अधीन न रहकर, स्थानिक स्वायत्त के लिए, सदैव आन्दोलन करती रहती हैं। लाखो टन क़हवा प्रतिवर्ष इसलिए समुद्र मे बहाकर नष्ट कर दिया जाता है। - कि उसका मूल्य महँगा होजाय । [ब्राजील का मानचित्र] * शैदिक मार्म *रभर अरू । क । मूर, स्था- / दक्षिणी प्रशान्तमहासा, बोलीवया । | म; • कलित 44 F<noinclude></noinclude> sv2n3lgunq13pbpqptbg9z6y0sw6jgw 662874 662873 2026-06-15T04:41:54Z Vanshiikaa 6602 662874 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''२१४'''||'''ब्राज़ील'''}}</noinclude>लिया । १६४० के जून-जुलाई में लिथुआनिया, एस्टोनिया और लैटविया में रूस ने पूर्ण अधिपत्य करके अपनी नौ-सेना के अड्डे बना लिये तथा किलेबन्दी क़ायम करदी । तीनों देशो मे सोवियत ( जनता की पचायती )-शासन-प्रणाली क़ायम करके रूसी पचायती राज में इनको मिला लिया। बाल्टिक राष्ट्रो मे रूस का प्रभुत्व है । जर्मन प्रभाव को रूस ने यहाँ से उखाड़ फेका, साथ ही यहाँ बसी हुई अल्पसंख्यक जर्मन जाति को जर्मनी भेज दिया। ब्राजील-( ब्राजील का ) सयुक्त राज्य । दक्षिण अमरीका का सबसे बडा प्रजातत्र । क्षेत्रफल ३२,८५,००० वर्गमील, जनसख्या ४,५०,००,०००; राजधानी रियो द-जनीरो, राष्ट्रभाषा पुर्तगाली । सन् १८८६ से इस देश का विधान संयुक्त राज्य अमरीका जैसा रहा, किन्तु १६३० मे राष्ट्रपति बरगस ने सत्ता अपने हाथ में लेली और एक कानून बनाकर दो धारासभाएँ स्थापित करदी । १६३७ मे सैनिक-विद्रोह के बल पर बरगस यहाँ का अधिनायक बन गया । वह जर्मनी और इटली का मित्र था, किन्तु १६३८ में नात्सीवाद तथा फासिज्म के विरुद्ध होगया और देश के फासिस्त दल का दमन किया । अब ब्राजील संयुक्त-राज्य अमरीका का मित्र देश है । ब्राजील देश की गणना ससार के सबसे बडे धनी देशो मे है । किन्तु अपेक्षाकृत वह अविकसित है। वहाँ कहवा ( काफी ) सबसे अधिक मात्रा में पैदा होता है । इसकी अधिक पैदावार तथा सस्ते मूल्य के कारण कई बार यहाँ उथल-पुथल होचुकी है । क़हवा यहाँ की राजनीतिक समस्या बना हुआ है । साथ ही ब्राजीली सयुक्त-राज्य के अन्तर्गत बीस राज्यो की भी समस्या है । यह रियासते, केन्द्रीय सरकार के अधीन न रहकर, स्थानिक स्वायत्त के लिए, सदैव आन्दोलन करती रहती हैं। लाखो टन क़हवा प्रतिवर्ष इसलिए समुद्र मे बहाकर नष्ट कर दिया जाता है। - कि उसका मूल्य महँगा होजाय । [ब्राजील का मानचित्र] * शैदिक मार्म *रभर अरू । क । मूर, स्था- / दक्षिणी प्रशान्तमहासा, बोलीवया । | म; • कलित 44 F<noinclude></noinclude> 1os81gevlqq8apmp6v5xt7g0v384ubb 662875 662874 2026-06-15T04:42:21Z Vanshiikaa 6602 662875 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''२१४'''||'''ब्राज़ील'''}}</noinclude>लिया । १६४० के जून-जुलाई में लिथुआनिया, एस्टोनिया और लैटविया में रूस ने पूर्ण अधिपत्य करके अपनी नौ-सेना के अड्डे बना लिये तथा किलेबन्दी क़ायम करदी । तीनों देशो मे सोवियत ( जनता की पचायती )-शासन-प्रणाली क़ायम करके रूसी पचायती राज में इनको मिला लिया। बाल्टिक राष्ट्रो मे रूस का प्रभुत्व है । जर्मन प्रभाव को रूस ने यहाँ से उखाड़ फेका, साथ ही यहाँ बसी हुई अल्पसंख्यक जर्मन जाति को जर्मनी भेज दिया। ब्राजील-( ब्राजील का ) सयुक्त राज्य । दक्षिण अमरीका का सबसे बडा प्रजातत्र । क्षेत्रफल ३२,८५,००० वर्गमील, जनसख्या ४,५०,००,०००; राजधानी रियो द-जनीरो, राष्ट्रभाषा पुर्तगाली । सन् १८८६ से इस देश का विधान संयुक्त राज्य अमरीका जैसा रहा, किन्तु १६३० मे राष्ट्रपति बरगस ने सत्ता अपने हाथ में लेली और एक कानून बनाकर दो धारासभाएँ स्थापित करदी । १६३७ मे सैनिक-विद्रोह के बल पर बरगस यहाँ का अधिनायक बन गया । वह जर्मनी और इटली का मित्र था, किन्तु १६३८ में नात्सीवाद तथा फासिज्म के विरुद्ध होगया और देश के फासिस्त दल का दमन किया । अब ब्राजील संयुक्त-राज्य अमरीका का मित्र देश है । ब्राजील देश की गणना ससार के सबसे बडे धनी देशो मे है । किन्तु अपेक्षाकृत वह अविकसित है। वहाँ कहवा ( काफी ) सबसे अधिक मात्रा में पैदा होता है । इसकी अधिक पैदावार तथा सस्ते मूल्य के कारण कई बार यहाँ उथल-पुथल होचुकी है । क़हवा यहाँ की राजनीतिक समस्या बना हुआ है । साथ ही ब्राजीली सयुक्त-राज्य के अन्तर्गत बीस राज्यो की भी समस्या है । यह रियासते, केन्द्रीय सरकार के अधीन न रहकर, स्थानिक स्वायत्त के लिए, सदैव आन्दोलन करती रहती हैं। लाखो टन क़हवा प्रतिवर्ष इसलिए समुद्र मे बहाकर नष्ट कर दिया जाता है - कि उसका मूल्य महँगा होजाय । [ब्राजील का मानचित्र] * शैदिक मार्म *रभर अरू । क । मूर, स्था- / दक्षिणी प्रशान्तमहासा, बोलीवया । | म; • कलित 44 F<noinclude></noinclude> jciyuisnb2wwsm33szr5ohx38hwxubr पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२२ 250 2465 662876 642919 2026-06-15T05:15:12Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 662876 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|२१६||ब्रिटिश साम्राज्य}}</noinclude>है, और अब इनकी सख्या, युध्द की पूर्वकालीन सख्या से, बहुत अधिक है । १६४० के पतभ्कड मे सयुक्त-राष्ट्र अमरीका से ५० विब्बन्सक ब्रिटिश जल-सेना को मिले । युध्द से पूर्व नौ-सेना मे १,३३,००० सैनिक थे। इनके अतिरित्क ७०,००० सुरक्षित नौ-सैनिक थे । उपर्युक्त अंको मे आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैएड और कनाडा की युध्द-पूर्व संख्या भी शामिल है। ब्रिटिश नौ-सेना ससार में सबसे शक्तिशाली थी । सयुक्त-राष्ट्र अमरीका का नम्बर प्रथम मान लिया गया है, किन्तु, वास्तव में, लड़ाई से पूर्व, वजन मे अमरीकी नौ-सेना के युध्द-पोत आदि कुछ कम थे । अब तो अमरीका मित्र राष्ट्रो के लिये बहुत बडी मात्रा मे युध्द-सामग्री तेजी से बना रहा है, जिनमे नौ सेना की सामग्री भी है । ब्रिटेन लन्दन नौ-सेना-सन्धि का एक सदस्य है । ब्रिटिश युनियन— सर ओसवाल्ड मोसले का फासिस्त आन्दोलन । ब्रिटिश साम्राज्य— ( ब्रिटिश ऐम्पायर, किन्तु 'ब्रिटिश कामनवैल्थ' जिसे अब अधिकतर कहा जाता है ) क्षेत्रफल १,३२,६०,००० वर्गमील अथवा समस्त भूमंडल का पॉचवॉ भाग । जन-संख्या ४८,७०,००,००० अर्थात् मानव-जाति का पचमाश । ब्रिटिश-साम्राज्य अथवा ब्रिटिश राष्ट्र-समूह (कामन-वैल्थ) मे, भूमंडल के विभिन्न भूमागो मे, निम्नलिखित देश हैं— योरप— ग्रेटब्रिटेन और उत्तरी आयलैंएड, आयर, जिब्राल्टर, माल्टा । एशिया— अदन, पैरिम और बन्दरगाह, बाहरीन द्वीप-समूह, वोर्नियो ( जापान द्वारा, अप्रैल '४२ मे विजित ), ब्रुनी और सारावाक, ब्रम्हा (अप्रैल '४२ मे जापान द्वारा विजित,किन्तु जिसे वापस लेने के लिये, अगस्त '४२ से सयुक्त-राष्ट्र प्राणपन से चेष्टा कर रहे है), लड्का, साइप्रस, हाग्कांग ( जापान द्वारा विजित ), भारत, स्टेट्स सेट्लमेएट ( जापान के विश्वास-घात का शिकार ), मलय स्टेट्स ( सघशासित और असघ-शासित दोनो, सुदूरपूर्व के युध्द मे जापानी-साम्राज्य-लिप्सा के शिकार ), फिलस्तीन । अफ्रीका— केन्या उपनिवेश और बन्दरगाह, यूगाएडा, जॅजीवार ( पैम्बा के भाग सहित ); मारीशस, न्यासालैएड, सेन्ट हैलीना और असेन्शन; सेच— शुमालीलैएड; बसुतोलैएड,बेचुआनालैएड, दक्षिण रोडेशिया, उत्तरी<noinclude></noinclude> hb7j3kh1yzro7tdch8rz1nic7acit0g पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२४ 250 2466 662878 642917 2026-06-15T05:43:18Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 662878 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|२१८||ब्रिटिश साम्राज्य}}</noinclude>समानता-स्वाधीनता की मॉग पेश की । सन १६२६ मे साम्राज्य-परिषद् मे उपनिवेशो की व्याख्या निम्न प्रकार स्वीकार की गई :— "उपनिवेश ब्रिटिश-साम्राज्य मे स्वाधीन राज्य हैं, जो पद में समान हैं और किसी प्रकार भी किसीके अधीन नही हैं; वे अपने बाह्य तथा आन्तरिक शासन-प्रबंध मे स्वतंत्र हैं तथा ब्रिटिश राजसत्ता के प्रति भक्ति के एक साधारण बन्धन मे बॅधे हुए हैं ।" उपनिवेश ब्रिटिश पार्लमेन्ट की सर्वोपरि महत्ता को खत्म करने की मॉग करते रहे । फलतः वैस्टमिन्स्टर विधान बना । सन् १६३१ की साम्राज्य-परिपद ने इस विधान को बनाया, जिसके अनुसार उपनिवेशो की पार्लमेन्टो को यह अधिकार मिल गया कि उन पर लागू होनेवाले ब्रिटिश पार्लमेन्ट के किसी भी कानून को वे रद या उसमे संशोधन कर सकती हैं । साथ ही बिना उपनिवेश की सहमति के वैस्टमिन्स्टर-पार्लमेन्ट द्वारा स्वीकृत किया गया कोई कानून उस पर लागू न होगा । उपनिवेशों पर लागू हो सकने की सम्भावना को दूर करने के लिये एतत्सम्बन्धी एक पुराना कानून भी हटा लिया गया । इस समय राजनीतिक दृष्टि से उपनिवेश स्वाधीन तथा प्रभू राज्य हैं । उनकी अपनी पार्लमेन्ट तथा सरकारे हैं । अलबत्ता ब्रिटेन का राजा, उपनिवेश के सम्बन्ध में, उसके मन्त्री की सलाह से काम करता है और उपनिवेश का भी राजा कहलाता है। प्रत्येक उपनिवेश को शान्ति तथा युद्ध के सम्बन्ध मे निर्णय करने का अधिकार है । इस समय समस्त उपनिवेशो ने ब्रिटेन के साथ जर्मनी के विरुध्द युद्ध-घोषणा कर दी है, केवल आयर तटस्थ है । प्रत्येक उपनिवेश मे, आयर को छोड़कर, राजा का एक प्रतिनिधि रहता है, जो गवर्नर-जनरल कहलाता है । उसके सुपुर्द कुछ शाही काम रहता है । प्रत्येक उपनिवेश की ओर से लन्दन मे एक हाई कमिश्नर रहता है और ब्रिटिश सरकार भी प्रत्येक उपनिवेश मे एक हाई कमिश्नर रखती है । ब्रिटिश मंत्री मंडल-मएडल का एक सदस्य उपनिवेशो का मंत्री भी होता है । समस्त साम्राज्य के प्रश्नो पर विचार करने के लिए एक साम्राज्य-परिषद भी है, जिसकी बैठक कभी-कभी होती है । सन १६०७ से इसमे भारत के प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं, यद्यपि ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे महान देश- उसके मुकुटमणि- भारत का, साम्राज्यान्तर्गत अभी कोई पद नही है ।<noinclude></noinclude> sp82f3h49qrqbdblrinhmg90eiwht2l पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३११ 250 3181 662824 592463 2026-06-14T18:15:20Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662824 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|६२६ ] | | [ कबीर}} {{outdent|और फिर सत्य रूप अविकारी निरंजन की खोज करो। कबीरदास कहते हैं कि मेरे मतानुसार ब्रह्म की गति का ज्ञान प्राप्त किए बिना यह शरीर कच्चे घड़े के समान निष्प्रयोजन सिद्ध होता है अर्थात् जो व्यक्ति ब्रह्म की खोज मे नही लगता है, उसका जीवन व्यर्थ है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सांग रूपक——पूरा पद। शरीर और वाद्य के मध्य :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;साम्य द्वारा। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) पदमैत्री——सत तत। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) सभंग पद यमक——रस रसना, गति जुगति। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) कबीरदास संन्यासियों को सच्चा योगी बनने को कहते हैं। बाह्याचार के प्रति कबीर का विरोध स्पष्ट है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) योग की प्रक्रियाओं के लिए देखें टिप्पणी पद संख्या ४, १५७, १६४ तथा २०२। {{center|( २०६ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अवधू ऐसा ज्ञांन विचारी, &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;ज्यूं बहुरि न ह्वै संसारी ॥ टेक ॥ च्यत न सोज चित बिन चितवै, बिन मनसा मन होई । अजपा जपत सुनि अभि अंतरि, यहु तत जानै सोई ॥ कहै कबीर स्वाद जब पाया, बंक नालि रस खाया ॥ अमृत झरै ब्रह्म परकासै, तब ही मिलै रांम राया ॥ }} {{outdent|'''संदर्भ'''——कबीरदास राम-मिलन के मार्ग का वर्णन करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——रे साधक योगी ! तुम ऐसा ज्ञान धारण करो जिससे तुम्हें इस संसार मे फिर दोबारा न आना पड़े। उस परम तत्त्व का चिन्तन करो जो बिना चित्त के ही सम्पूर्ण विश्व की चिन्ता करता है तथा जिसका मन तृष्णा आदि के विक्षेपों से रहित है। जो योगी अपने हृदय एवं शून्य मण्डल मे अपने माया रहित आत्मस्वरूप मे अवस्थित रह कर अजपा (बिना बोले) जाप करता है, वही परम तत्त्व को जानता है। कबीर कहते हैं कि जब व्यक्ति इस तत्त्व के साक्षात्कार का स्वाद एक बार चख लेता है तो वह आध्यात्मिकता की ब्रह्मनाल का रस पीने के लिए निरन्तर आतुर बना रहता है और उसका स्वाद लेता रहता है। जब ज्ञान का यह अमृत निरन्तर झरता रहता है और ब्रह्म ज्योति का प्रकाश होता रहता है तभी यह मानना चाहिए कि भगवान राम मिल गये हैं। कायायोग का ब्रह्मनाल से प्राप्त रस तथा कमलों से प्राप्त ज्योति माया के विषय-जगत् की ही वस्तुएँ हैं।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) विभावना——च्यत ॰॰॰ होई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) विरोधाभास——अजपा जाप। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——'अजपा जाप' से तात्पर्य है 'अनाहद नाद'। देखें टिप्पणी पद {{outdent|सं० १५७।}}<noinclude></noinclude> 73i2kpytdxl86ckrhiosu4wfn17qqan 662825 662824 2026-06-14T18:16:47Z Manvikesarwani09 6620 662825 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|६२६ ] | | [ कबीर}} {{outdent|और फिर सत्य रूप अविकारी निरंजन की खोज करो। कबीरदास कहते हैं कि मेरे मतानुसार ब्रह्म की गति का ज्ञान प्राप्त किए बिना यह शरीर कच्चे घड़े के समान निष्प्रयोजन सिद्ध होता है अर्थात् जो व्यक्ति ब्रह्म की खोज मे नही लगता है, उसका जीवन व्यर्थ है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सांग रूपक——पूरा पद। शरीर और वाद्य के मध्य :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;साम्य द्वारा। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) पदमैत्री——सत तत। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) सभंग पद यमक——रस रसना, गति जुगति। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) कबीरदास संन्यासियों को सच्चा योगी बनने को कहते हैं। बाह्याचार के प्रति कबीर का विरोध स्पष्ट है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) योग की प्रक्रियाओं के लिए देखें टिप्पणी पद संख्या ४, १५७, १६४ तथा २०२। {{center|( २०६ )}} {{ &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अवधू ऐसा ज्ञांन विचारी, &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;ज्यूं बहुरि न ह्वै संसारी ॥ टेक ॥ च्यत न सोज चित बिन चितवै, बिन मनसा मन होई । अजपा जपत सुनि अभि अंतरि, यहु तत जानै सोई ॥ कहै कबीर स्वाद जब पाया, बंक नालि रस खाया ॥ अमृत झरै ब्रह्म परकासै, तब ही मिलै रांम राया ॥ }} {{outdent|'''संदर्भ'''——कबीरदास राम-मिलन के मार्ग का वर्णन करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——रे साधक योगी ! तुम ऐसा ज्ञान धारण करो जिससे तुम्हें इस संसार मे फिर दोबारा न आना पड़े। उस परम तत्त्व का चिन्तन करो जो बिना चित्त के ही सम्पूर्ण विश्व की चिन्ता करता है तथा जिसका मन तृष्णा आदि के विक्षेपों से रहित है। जो योगी अपने हृदय एवं शून्य मण्डल मे अपने माया रहित आत्मस्वरूप मे अवस्थित रह कर अजपा (बिना बोले) जाप करता है, वही परम तत्त्व को जानता है। कबीर कहते हैं कि जब व्यक्ति इस तत्त्व के साक्षात्कार का स्वाद एक बार चख लेता है तो वह आध्यात्मिकता की ब्रह्मनाल का रस पीने के लिए निरन्तर आतुर बना रहता है और उसका स्वाद लेता रहता है। जब ज्ञान का यह अमृत निरन्तर झरता रहता है और ब्रह्म ज्योति का प्रकाश होता रहता है तभी यह मानना चाहिए कि भगवान राम मिल गये हैं। कायायोग का ब्रह्मनाल से प्राप्त रस तथा कमलों से प्राप्त ज्योति माया के विषय-जगत् की ही वस्तुएँ हैं।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) विभावना——च्यत ॰॰॰ होई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) विरोधाभास——अजपा जाप। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——'अजपा जाप' से तात्पर्य है 'अनाहद नाद'। देखें टिप्पणी पद {{outdent|सं० १५७।}}<noinclude></noinclude> pan10gc74qnkjwvekjmpmawqxmrqckf पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३१३ 250 3183 662826 592465 2026-06-14T18:19:35Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662826 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|८ ] | | [ कबीर}} {{outdent|नहीं पहुँच पाते हैं। केवल ज्ञानी साधक ही सहजावस्था को प्राप्त हो पाता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सांग रूपक——सम्पूर्ण पद। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) पुनरुक्ति प्रकाश——रुचि-रुचि। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) पदमैत्री——स्थान वान। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) द्वितीय पंक्ति का पाठान्तर इस प्रकार है——'रचिहौ रवि मेलै'। का अर्थ होता है कि जिसमें इसे तूने भली भाँति रचकर भेज दिया है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) षट्चक्र——देखें टिप्पणी पद संख्या ४, ७ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) गगन मण्डल——देखें टिप्पणी पद संख्या १६४ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) सहज रूप——देखें टिप्पणी पद संख्या ५, १५५ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) पवन खेदा——देखें टिप्पणी पद संख्या ८ :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vi) तुलना करें——कूटस्थ चित्त ही कबीर का साधक मन है—— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;रघुवर कहेउ लखन भल घाटू। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;करहु कतहूँ अब ठाहर ठाटू॥ &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;लखन दीख पय उतर फरारा। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥ &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;नदी पनच सर सम दम नाना। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;सकल कलुष कलि साउज नाना॥ &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;चित्रकूट जनु अचल अहेरी। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;चुकइ न घात मार मूठ भेरी॥ {{right|(रामचरितमानस, गोस्वामी तुलसीदास)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;}} {{outdent|'''द्रष्टव्य'''——योग साधना के अन्तर्गत प्रायः अष्टचक्रों का उल्लेख प्राप्त होता है परन्तु कबीर प्रायः षट्चक्रों का ही वर्णन करते हैं। इन्होंने शून्यचक्र एवं सुरति तत्व को छोड़ दिया है। कबीर के द्वारा संकेतित षट्चक्र निम्नस्थ प्रकार हैं——}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(१) '''मूलाधार'''——इसका स्थिति-स्थान योनि माना गया है। इसमें चार दल होते हैं। यह रक्त वर्ण का होता है। इसका लोक 'भूः' है। इसका ध्यान करने से ब्रह्म की ध्वनि होती है, वह क्रमशः वं, शं, षं, सं की होती है। इसके सिद्ध होने पर मनुष्य वक्ता, सर्वविद्या विनोदी, आरोग्य, मनुष्यों में श्रेष्ठ, अमित मेधा तथा काव्य-प्रबंध में समर्थ हो जाता है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(२) '''स्वाधिष्ठान चक्र'''——इसका स्थिति-स्थान पेडू माना गया है। इसमें छह दल होते हैं। यह सिन्दूर वर्ण का होता है। इसका लोक 'भुवः' है। इसका ध्यान करने से जो द्वितीय प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है, वह क्रमशः बं, भं, मं, यं, रं, लं की होती है। इसके सिद्ध होने से अहंकार विकार का नाश, योगियों में श्रेष्ठ, गति और मल-क्षय की क्षमता में समर्थ विशेष गुण मनुष्य में उत्पन्न हो जाते हैं। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(३) '''मणिपूरक चक्र'''——इसका स्थिति-स्थान नाभि कहा गया है। इसमें दस दल होते हैं।<noinclude></noinclude> qy1fzpg90rppu1e08423hvawr9yjmsz पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३१४ 250 3184 662827 632269 2026-06-14T18:21:32Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662827 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" />{{Rh|ग्रन्थावली||}}</noinclude>{{outdent|ग्रन्थावली ]}} {{outdent|दस दल होते हैं। यह नील वर्ण का होता है। इसका लोक 'स्व' है। इसका ध्यान करने से क्रमशः ड, ढ, ण, त, th, द, ध, न, प, फ, की ध्वनियाँ झंकृत होती हैं। इसके सिद्ध लाभ होने से मनुष्य संहार पालन मे समर्थ तथा वचन-रचना मे समर्थ हो जाता है, और उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) '''अनाहत चक्र'''——इसका स्थिति-स्थान हृदय मे होता है। इसमें बारह दल होते हैं। यह अरुण वर्ण का होता है। इसका लोक 'मह' है। इसका ध्यान करने से एक प्रकार का अनहद नाद झंकृत होता है। वह क्रमशः क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ का होता है। इसके सिद्ध लाभ होने मे मनुष्य वचन रचना मे समर्थ, ईशित्व सिद्धि प्राप्त योगेश्वर, ज्ञानवान, इन्द्रियजित्, शक्ति सम्पन्न हो जाता है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) '''विशुद्ध चक्र'''——यह चक्र कण्ठ-स्थान मे स्थित होता है। इसके सोलह दल होते हैं। यह धूम्र वर्ण का होता है। इसका लोक 'जन' है। इसका ध्यान करने से क्रमशः अ से लेकर अः तक सोलह स्वरों की अनहद ध्वनि झंकृत होती है। ध्यान सिद्ध होने पर मनुष्य काव्य-रचना मे समर्थ, ज्ञानवान्, उत्तम वक्ता, शुद्ध चित्त, त्रिलोकदर्शी, सर्वहितकारी, नीरोग, चिरजीवी और तेजस्वी होता है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vi) '''आज्ञा चक्र'''——इसका स्थिति-स्थान दोनों भ्रुवों के मध्य है। इसमें दो दल होते हैं। यह श्वेतवर्ण होता है। इसका लोक तप है। इसका ध्यान करने से ह, क्ष का अनहद नाद क्रमशः ध्वनित होता है। इसके सिद्ध लाभ से योगी को वाक्य सिद्धि प्राप्त होती है। {{center|( २११ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;साधन कछू हरि न उतारै, &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अनभै ह्वै तौ अर्थ बिचारै ॥ टेक ॥ बांणी सुंरंग सोधि करि आणौ, आणौ नौ रंग धागा । चन्द सूर एकन्तरि कीया, सोवत बहु दिन लागा ॥ पंच पदार्थ छोड़ि समानां, हीरै मोती जड़िया । कोटि बरस लूं कछू सीया, सुर नर धंधै पड़िया ॥ निस बासुर जे सोवै नांही, ता नरि काल न खाई । कहै कबीर गुर परसादै, सहजै रह्या समाई ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——कछू = कचुकी। अनभै = अभय, भय रहित।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीर कहते हैं कि साधना और गुर की कृपा के द्वारा स्वरूप की प्राप्ति होती है।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——भगवान से यही प्रार्थना है कि वह साधन-चाम शरीर रूपी कचुकी को आत्मा से विलग न करे। जो जन्म-मरण के भय से मुक्त है, वही मेरे इस पद के वास्तविक अर्थ को समझ सकता है, (क्योंकि प्रभु की प्राप्ति अनेक साधना के फलस्वरूप प्राप्त होती है तथा साधना के लिए 'साधन धाम'}}<noinclude></noinclude> c9evezayjyfpmg7wf5dtjr4rjujscap पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३१५ 250 3185 662828 592467 2026-06-14T18:22:56Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662828 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|६३० ] | | [ कबीर}} {{outdent|द्वारा' मानव शरीर नितान्त आवश्यक है। जन्म-मरण वस्त्र-परिवर्तन मात्र है)। इस शरीर रूपी कंचुकी के वस्त्र को बनाने के लिए खोज कर बहुत सुन्दर करघा तथा नौ रंग के धागे लाए गए हैं। अर्थात् इस शरीर को साधना के योग्य बनाने के लिए गुरु के सुन्दर उपदेश रूपी धागे द्वारा नव-द्वारों को आपूरित किया गया है। चन्द्र और सूर्य नाड़ियों को एक स्थान पर सुषुम्ना के साथ मिलाया गया है। इस प्रकार से साधन योग्य यह शरीर तैयार करने मे बहुत समय लगा है। पाँचों इन्द्रियों के विषयों (रूप, रस, शब्द, स्पर्श, गंध) का त्याग करके साधना रूपी वस्त्र को ज्ञान और भक्ति के हीरे-मोतियों से युक्त किया गया है। जिन दिनों अनेक देवता और अन्य मनुष्य सांसारिक विषयों मे फँसे हुए थे, उन दिनों करोड़ों वर्षों तक साधना करके इस साधना योग्य शरीर को तैयार किया गया है। जो व्यक्ति रात-दिन सजगता पूर्वक साधना करके इस शरीर के द्वारा साधना करता है, उसको काल नहीं खाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है। कबीर कहते हैं कि गुरु की कृपा के फलस्वरूप वही व्यक्ति सहज-स्वरूप को प्राप्त होता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सांग रूपक——सम्पूर्ण पद मे। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) रूपकातिशयोक्ति——साधन, नौ रंग, हीरे मोती। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) छेकानुप्रास——सहजै, समाई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) 'कंचुकी' से ईश्वर के प्रति पतिभाव की व्यंजना है। साधक निष्ठापूर्वक पतिरूपी परमेश्वर की आराधना करे। अन्तःकरण को भक्ति-भावना और ईश्वर-प्रेम के उपयुक्त बना लेना ही इस शरीर रूपी कंचुकी को तैयार करना है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) कोटि वरस ॰॰॰ सीया——तुलना कीजिए—— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कोटि जन्म मुनि जतन कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥ {{right|(गोस्वामी तुलसीदास)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;}} &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ {{right|(श्रीमद्भगवद्गीता ७/१९)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) निस बासुर सोवै नाही——तुलना कीजिए—— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥ {{right|(श्रीमद्भगवद्गीता २/६९)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;}} {{center|( २१२ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;जीवत् जिनि मारै मुवा मनि न्यायै, &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;मास विहूणां घरि मत आचै हो कंता ॥ टेक ॥ सूर बिन पुर बिन बपु विहनां गोई । सो स्वावन जिनि मारि कता, जाकै ग्यान माम न होई ॥ }}<noinclude></noinclude> 8077ehmfpzca04wro6tjj4uw35eyoud पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३१७ 250 3187 662829 592469 2026-06-14T18:25:56Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662829 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{outdent|६३२ ] | | [ कबीर}} {{outdent|के समय मेरे पास स्वानुभूति रूपी बेल मात्र है, उसके विक्षेप रूपी पत्ते नष्ट हो चुके हैं।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सांग रूपक——सम्पूर्ण पद। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) विरोधाभास——जीवन ॰॰॰॰॰॰ 'कता, मार्या ॰॰॰॰॰॰ राख्‍या, बेलि ॰॰॰ पात नही। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) विभावना की व्यंजना——उर बिन ॰॰॰॰ ॰॰॰ सोई, मृग के सीस नही रे, धुनही पिनच नही रे। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) अनुप्रास——तृतीय पंक्ति, व की आवृत्ति। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) वैराग्य की कुछ साधनाओं मे मन को कुचल कर विषयों से असम्पृक्त करना न उचित है और न सम्भव ही है। कबीरदास ने इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य का प्रतिपादन किया है। उनका कहना है कि भावनाओं का उन्नयन करके विषयों को भक्तिमय बना देना ही काम्य है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) उर बिन ॰॰॰ विहूना——मन का हृदय उसकी सरसता है, 'खुर' आदि से व्यंजित आकार भी संकल्प-विकल्प एवं वासना रूप ही हैं। वे सब इस कृच्छ साधना से छिप गए हैं। ऐसे पशु का शिकार ही क्या करना, क्योंकि विषयों से वंचित की गई इन्द्रियाँ मृतवत् प्रतीत होती हैं। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) रगत न मारा——उस साधना मे तल्लीन मत होओ जिसमें केवल ज्ञान-वैराग्य की शुष्कता है और प्रेम भक्ति के रस का अभाव है। इन पंक्तियों में कबीर का भावुक भक्त उभर आया है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) ता बेल को ॰॰॰ ली——विक्षेपरहित माया पर साधक मन का अधिकार होगया है—उसको वह देख भर रहा है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) तुम्हरे मिलन ॰॰॰ पात नही रे——अब मेरी मनस्थिति विक्षेपरहित है। पत्ते रहने पर बेन के वृक्ष को परिवेष्टित करने मे कुछ व्यवधान रहता है, परन्तु पत्तों के अभाव मे बेल पूरी तरह से वृक्ष से लिपट सकती है। अतएव विक्षेप रहित जीवात्मा अपने साध्य प्रियतम से पूर्णतया आबद्ध (एकाकार) होने की स्थिति को प्राप्त होगई है। मायारहित जीव अपने पति परमेश्वर मे पूर्णत तदाकार होने को प्रस्तुत है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vi) इन पंक्तियों में सूफियों के रहस्यवाद की व्यंजना है। भक्तजन भी बाह्यसाधनरहित होकर ही प्रभु-मिलन को काम्य मानते हैं। ब्रज की गोपियों ने भी कृष्ण को तभी प्राप्त किया था, जब उन्होंने पूर्ण शरणावस्था को सहर्ष स्वीकार कर लिया था। द्रौपदी के रक्षार्थ कृष्ण तभी आए थे जब उसने अपनी धोती की गाँठ का ध्यान छोड़कर दोनों हाथ ऊँचे करके मुरारी को पुकारा था। अहंकाररहित मर्मज्ञ मन ही इस अनुभूति का क्षेत्र है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vii) कबीरदास ने इन पंक्तियों में वासना से (हठयोगी साधना) का ॰॰॰॰ ॰॰॰ और मोक्षरूपी फल प्राप्ति की प्रेरणा दी है।<noinclude></noinclude> cqzr70mf2xs9zy1av6uhb50uewft6gn पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३१९ 250 3189 662830 592471 2026-06-14T18:30:13Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662830 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|६३४ ] | | [ कबीर}} {{center|मन मधुकर मन के तुलसी रघुपति-पद-कमल बसैहौ।<br>——गोस्वामी तुलसीदास}} {{center|( २१४ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;पारब्रह्म देख्या हो तत बाड़ी फूली, फल लागा बडहूली । &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;सदा सदाफल दाख बिजौरा कौतिकहारी भूली ॥ टेक ॥ द्वादस कूंवा एक बनमाली, उलटा नीर चलावै । सहजि सुषमनां कूल भरावै, दह दिसि बाड़ी पावै ॥ ल्यौकी लेज पवन का ढीकू, मन मटका ज बनाया । सत की पाटि सुरति का चाठा, सहजि नीर मुकलाया ॥ त्रिकुटी चढ़्यौ पाव ढौ ढारे, अरध उरध की क्यारी ॥ चंद सूर दोऊ पांणति करिहै, गुर मुषि वीज बिचारी ॥ भरी छावड़ी मन बैकुंठा, सांई सूर हिया रगा । कहै कबीर सुनहु रे संतौ, हरि हम एकै सगा ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——बडहूली = बड़हल, बड़े-बड़े। सदाफल = हमेशा फलने वाला। दाख = अंगूर। द्वादस कूंवा = बारह कुएँ, यहाँ १२ पंखुड़ी वाले अनाहत चक्र से तात्पर्य है। कूल = किनारा। लौ = ध्यान। तेज = रस्सी। पवन = प्राणायाम। ढीकू = ढीकुली। पाटि = पाटी। चाठा = कुएँ का किनारा। मुकलाया = मुक्त किया, बहाया। पाव ढौ ढारे = पानी बहाकर क्यारियों को भलीभाँति भरना। अरध = नीचे। उरध = ऊपर। पांणति = पानी को फैलाना। मुषि = मुख। छावड़ी = डलिया। बैकुंठा = वैकुंठ को प्राप्त, अत्यधिक उल्लसित। सूर = शूर। हिया रगा = हृदय प्रेम मे रंग गया।}} {{outdent|'''संदर्भ'''——पूर्व पद के समान।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——परब्रह्म के दर्शन से अन्तःकरण रूपी बगिया आनन्दित होगई है और उसमे विभिन्न सिद्धियों के बड़े-बड़े फल लग गए हैं अर्थात् वह पुरुषार्थ चतुष्टय रूपी बड़े फलों से युक्त होगई है। अथवा यों कहिए कि उसमे मोक्ष-रूपी बड़हल का फल लग गया है।}} {{outdent|उसमे सत्य संकल्प आदि के प्रतीक सदाफल, अंगूर, बिजौरे जैसे फल हमेशा के लिए लग गए हैं। जीवात्मा इन विभिन्न ऐश्वर्यों एवं सिद्धियों के फलों को देख कर आश्चर्यचकित है। मन रूपी बारह कुएँ हैं और चेतना साधक मन रूपी केवल एक माली है। अथवा यह कहिए कि हृदयरूपी अनाहत चक्र के द्वादश दल ही बारह कुएँ हैं। साधक मन उसके आनन्द रूप जल को नीचे से खींच कर उलटा बहाता है। इससे जल ऊपर से गिरता है नीचे से नहीं। इस साधना में चेतना का प्रवाह आनन्द की खोज में बहिर्मुख न रहकर अन्तर्मुखी एवं आत्ममुखी होजाता है। यही उलटा नीर बहाना है।}} {{outdent|इस साधना के माध्यम से मूल रूप से प्रेम और भक्ति की भावना घर कर जाती है।}}<noinclude></noinclude> eop6iu36ha0eeh5dzj6umk0wvq3ypbq 662832 662830 2026-06-14T18:32:52Z Manvikesarwani09 6620 662832 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude>{{शिरोभाग|६३४ ] | | [ कबीर}} {{center|मन मधुकर मन के तुलसी रघुपति-पद-कमल बसैहौ।<br>——गोस्वामी तुलसीदास}} {{center|( २१४ )}} &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;पारब्रह्म देख्या हो तत बाड़ी फूली, फल लागा बडहूली । &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;सदा सदाफल दाख बिजौरा कौतिकहारी भूली ॥ टेक ॥ द्वादस कूंवा एक बनमाली, उलटा नीर चलावै । सहजि सुषमनां कूल भरावै, दह दिसि बाड़ी पावै ॥ ल्यौकी लेज पवन का ढीकू, मन मटका ज बनाया । सत की पाटि सुरति का चाठा, सहजि नीर मुकलाया ॥ त्रिकुटी चढ़्यौ पाव ढौ ढारे, अरध उरध की क्यारी ॥ चंद सूर दोऊ पांणति करिहै, गुर मुषि वीज बिचारी ॥ भरी छावड़ी मन बैकुंठा, सांई सूर हिया रगा । कहै कबीर सुनहु रे संतौ, हरि हम एकै सगा ॥ {{outdent|'''शब्दार्थ'''——बडहूली = बड़हल, बड़े-बड़े। सदाफल = हमेशा फलने वाला। दाख = अंगूर। द्वादस कूंवा = बारह कुएँ, यहाँ १२ पंखुड़ी वाले अनाहत चक्र से तात्पर्य है। कूल = किनारा। लौ = ध्यान। तेज = रस्सी। पवन = प्राणायाम। ढीकू = ढीकुली। पाटि = पाटी। चाठा = कुएँ का किनारा। मुकलाया = मुक्त किया, बहाया। पाव ढौ ढारे = पानी बहाकर क्यारियों को भलीभाँति भरना। अरध = नीचे। उरध = ऊपर। पांणति = पानी को फैलाना। मुषि = मुख। छावड़ी = डलिया। बैकुंठा = वैकुंठ को प्राप्त, अत्यधिक उल्लसित। सूर = शूर। हिया रगा = हृदय प्रेम मे रंग गया।}} {{outdent|'''संदर्भ'''——पूर्व पद के समान।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——परब्रह्म के दर्शन से अन्तःकरण रूपी बगिया आनन्दित होगई है और उसमे विभिन्न सिद्धियों के बड़े-बड़े फल लग गए हैं अर्थात् वह पुरुषार्थ चतुष्टय रूपी बड़े फलों से युक्त होगई है। अथवा यों कहिए कि उसमे मोक्ष-रूपी बड़हल का फल लग गया है।}} {{outdent|उसमे सत्य संकल्प आदि के प्रतीक सदाफल, अंगूर, बिजौरे जैसे फल हमेशा के लिए लग गए हैं। जीवात्मा इन विभिन्न ऐश्वर्यों एवं सिद्धियों के फलों को देख कर आश्चर्यचकित है। मन रूपी बारह कुएँ हैं और चेतना साधक मन रूपी केवल एक माली है। अथवा यह कहिए कि हृदयरूपी अनाहत चक्र के द्वादश दल ही बारह कुएँ हैं। साधक मन उसके आनन्द रूप जल को नीचे से खींच कर उलटा बहाता है। इससे जल ऊपर से गिरता है नीचे से नहीं। इस साधना में चेतना का प्रवाह आनन्द की खोज में बहिर्मुख न रहकर अन्तर्मुखी एवं आत्ममुखी होजाता है। यही उलटा नीर बहाना है।}} {{outdent|इस साधना के माध्यम से मूल रूप से प्रेम और भक्ति की भावना घर कर जाती है।}}<noinclude></noinclude> o6qwxqa11ly8e3n8w5kgnf6q7ltwvqd पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३२१ 250 3192 662833 592474 2026-06-14T18:35:03Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662833 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६३६ ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> {{center|( २१५ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;रांम नांम रंग लागौ, कुरंग न होई । &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;हरि रंग सौ रंग और न कोई ॥ टेक ॥ और सबै रंग इहि रंग थै छूटै, हरि रंग लागा कदे न खूटै ॥ कहै कबीर मेरे रंग रांम राई, और पतंग रंग उडि जाई ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——कुरंग = फीका, भद्दा। कदे = कभी। खूटै = छूटता है। पतंग = पतंगी, कच्चा।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीरदास राम-प्रेम की महिमा का प्रतिपादन करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——राम नाम के प्रति प्रेम हो जाने पर अन्य किसी के प्रति आसक्ति उत्पन्न नहीं होती है। राम प्रेम एक ऐसा रंग है जो कभी हल्का नहीं होता है। भगवान के प्रेम के समान अन्य किसी का प्रेम नहीं है। हरि-प्रेम हो जाने पर अन्य समस्त वस्तुओं के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है। हरि प्रेम का रंग एक बार लगने पर कभी भी कहीं छूटता है। कबीर कहते हैं कि भगवान राम का प्रेम रूपी रंग मेरे ऊपर चढ़ गया है। अन्य समस्त रंग तो अस्थायी हैं। वे सब उड़ जाते हैं। अभिप्रेत यह है कि राम के प्रति प्रेम स्थायी रहता है। इसी से कबीरदास ने राम से प्रेम कर लिया है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सभंग पद यमक——रंग कुरंग। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) अनन्वय——हरि रंग सौ ॰॰॰ कोई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) अनुप्रास——अन्तिम दो चरण। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) विशेषोक्ति की व्यंजना——कदे न खूटै। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) रूपक——हरि रंग। {{center|( २१६ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कबीरा प्रेम कूल ढरै, हमारे राम बिना न सरै । &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;वांघि लै घोरा सींचि लै क्यारी ज्यूँ तू पेड़ भरै ॥ टेक ॥ काया बाड़ी माँहैं माली, टहल करै दिन राती । कबहूँ न सोवै काज सवांरै, पांणतिहारी माती ॥ सेझ कूवा स्वाँति अति सीतल, कबहूँ फुवा वनहीं रे । भाग हमारे हरि रखवाले, कोई उजाड़ नहीं रे ॥ गुर बीज जमाया कि रखि न पाया, मन की आपदा खोई । औरै स्यावट फरै पारिसा, सिला करै सब कोई ॥ जो घरि आया तो सब ल्याया, सबहो काज सवारया । कहै कबीर सुनहू रे संतौ, थकित भया मैं हारचा ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——घोरा = ढिकुली। मरै = पानी डालना है। घोरा = घड़ा। विहारी = पानी की धार। मो = पारसनाथ मनि। मती = लक्ष्मी। ध्यानी = ध्यानी।}}<noinclude></noinclude> 84lt6vp2p4ragbcvw2j3vabk01ngq4j 662839 662833 2026-06-14T18:45:43Z Manvikesarwani09 6620 662839 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६३६ ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> {{center|( २१५ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;रांम नांम रंग लागौ, कुरंग न होई । &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;हरि रंग सौ रंग और न कोई ॥ टेक ॥ और सबै रंग इहि रंग थै छूटै, हरि रंग लागा कदे न खूटै ॥ कहै कबीर मेरे रंग रांम राई, और पतंग रंग उडि जाई ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——कुरंग = फीका, भद्दा। कदे = कभी। खूटै = छूटता है। पतंग = पतंगी, कच्चा।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीरदास राम-प्रेम की महिमा का प्रतिपादन करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——राम नाम के प्रति प्रेम हो जाने पर अन्य किसी के प्रति आसक्ति उत्पन्न नहीं होती है। राम प्रेम एक ऐसा रंग है जो कभी हल्का नहीं होता है। भगवान के प्रेम के समान अन्य किसी का प्रेम नहीं है। हरि-प्रेम हो जाने पर अन्य समस्त वस्तुओं के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है। हरि प्रेम का रंग एक बार लगने पर कभी भी कहीं छूटता है। कबीर कहते हैं कि भगवान राम का प्रेम रूपी रंग मेरे ऊपर चढ़ गया है। अन्य समस्त रंग तो अस्थायी हैं। वे सब उड़ जाते हैं। अभिप्रेत यह है कि राम के प्रति प्रेम स्थायी रहता है। इसी से कबीरदास ने राम से प्रेम कर लिया है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सभंग पद यमक——रंग कुरंग। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) अनन्वय——हरि रंग सौ ॰॰॰ कोई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) अनुप्रास——अन्तिम दो चरण। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) विशेषोक्ति की व्यंजना——कदे न खूटै। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) रूपक——हरि रंग। {{center|( २१६ )}} {{outdent| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कबीरा प्रेम कूल ढरै, हमारे राम बिना न सरै । वांघि लै घोरा सींचि लै क्यारी ज्यूँ तू पेड़ भरै ॥ टेक ॥ काया बाड़ी माँहैं माली, टहल करै दिन राती । कबहूँ न सोवै काज सवांरै, पांणतिहारी माती ॥ सेझ कूवा स्वाँति अति सीतल, कबहूँ फुवा वनहीं रे । भाग हमारे हरि रखवाले, कोई उजाड़ नहीं रे ॥ गुर बीज जमाया कि रखि न पाया, मन की आपदा खोई । औरै स्यावट फरै पारिसा, सिला करै सब कोई ॥ जो घरि आया तो सब ल्याया, सबहो काज सवारया । कहै कबीर सुनहू रे संतौ, थकित भया मैं हारचा ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——घोरा = ढिकुली। मरै = पानी डालना है। घोरा = घड़ा। विहारी = पानी की धार। मो = पारसनाथ मनि। मती = लक्ष्मी। ध्यानी = 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फीका, भद्दा। कदे = कभी। खूटै = छूटता है। पतंग = पतंगी, कच्चा।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीरदास राम-प्रेम की महिमा का प्रतिपादन करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——राम नाम के प्रति प्रेम हो जाने पर अन्य किसी के प्रति आसक्ति उत्पन्न नहीं होती है। राम प्रेम एक ऐसा रंग है जो कभी हल्का नहीं होता है। भगवान के प्रेम के समान अन्य किसी का प्रेम नहीं है। हरि-प्रेम हो जाने पर अन्य समस्त वस्तुओं के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है। हरि प्रेम का रंग एक बार लगने पर कभी भी कहीं छूटता है। कबीर कहते हैं कि भगवान राम का प्रेम रूपी रंग मेरे ऊपर चढ़ गया है। अन्य समस्त रंग तो अस्थायी हैं। वे सब उड़ जाते हैं। अभिप्रेत यह है कि राम के प्रति प्रेम स्थायी रहता है। इसी से कबीरदास ने राम से प्रेम कर लिया है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सभंग पद यमक——रंग कुरंग। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) अनन्वय——हरि रंग सौ ॰॰॰ कोई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) अनुप्रास——अन्तिम दो चरण। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) विशेषोक्ति की व्यंजना——कदे न खूटै। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) रूपक——हरि रंग। {{center|( २१६ )}} {{outdent| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कबीरा प्रेम कूल ढरै, हमारे राम बिना न सरै । वांघि लै घोरा सींचि लै क्यारी ज्यूँ तू पेड़ भरै ॥ टेक ॥ काया बाड़ी माँहैं माली, टहल करै दिन राती । कबहूँ न सोवै काज सवांरै, पांणतिहारी माती ॥ सेझ कूवा स्वाँति अति सीतल, कबहूँ फुवा वनहीं रे । भाग हमारे हरि रखवाले, कोई उजाड़ नहीं रे ॥ गुर बीज जमाया कि रखि न पाया, मन की आपदा खोई । औरै स्यावट फरै पारिसा, सिला करै सब कोई ॥ जो घरि आया तो सब ल्याया, सबहो काज सवारया । कहै कबीर सुनहू रे संतौ, थकित भया मैं 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:&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) भेदकातिशयोक्ति——औरै स्यावट। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) प्रतीकों का प्रयोग है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) 'स्यावट' एवं 'मिला' शब्दों के द्वारा जैन एवं हिन्दू धर्मावलम्बी साधकों के प्रति संकेत है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) 'घर आना' मुहावरा है। तात्पर्य है स्व-स्वरूप-स्थिति। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) हरि से तात्पर्य आत्माराम है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) भाग हमारे ॰॰॰ खोई——भाव साम्य देखिए—— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;जतन बिनु मिरगनि खेत उजारे। {{center|✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕}} &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;बुधि मेरी किरवी, गुरु मेरो विभुका, अखिर दोउ रखवारे। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कहै कबीर अब जान न देहूँ, बरियाँ भली सँभारे। {{right|(कबीरदास)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;}} {{center|( २१७ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;राजा राम विनां तकती धो धो । &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;राम विनां नर क्यूं छूटोगे, जम करै नग धो धो धो ॥ टेक ॥ मुद्रा पहरयाँ जोग न होई, घूँघट काढ़याँ सती न कोई । माया कै संगि हिलि मिलि आया, फोकट साटै जनम गँवाया ॥ कहै कबीर जिनि पद हरि चीन्हाँ, मलन प्यंड थै निरमल कीन्हा ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——साटै = सट्टा। फोकट = व्यर्थ। प्यंड = शरीर। नग = श्रेष्ठ व्यक्ति।}} {{outdent|'''संदर्भ'''——कबीर का कहना है कि राम नाम के बिना जीवन व्यर्थ है।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——राम की कृपा के बिना मनुष्य का शरीर "धो-धो" करके जलता है और दुनिया देखती रहती है अथवा कोई भी उसकी रक्षा नहीं कर सकता है। राम की कृपा के बिना मनुष्य किसी तरह भी मृत्यु के फंदे से नहीं बच सकता है। यमराज बड़े-बड़े को धो-धो कर (असहाय बनाकर) जला देता है। केवल मुद्रा धारण करने मात्र से योग की साधना नहीं होती है। घूँघट निकाल लेने मात्र से कोई स्त्री सती नहीं कहलाती है। जीव भगवान मे ध्यान न लगाकर माया के साथ हिल-मिल जाता है, और इस प्रकार सट्टे के व्यापार की भाँति अपने जन्म को व्यर्थ ही नष्ट कर देता है। कबीरदास कहते हैं कि जिन्हें भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है, अथवा जिन्होंने हरि के चरणों में ध्यान लगा लिया है, उन्हीं का जन्म सार्थक है, उन्होंने इस पाप-मलिन शरीर को पुण्य-स्थान बना लिया है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) पुनरुक्तिप्रकाश——धो धो। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) वक्रोक्ति——नर क्यूं छूटोगे। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) पदमैत्री——हिलि मिलि। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——प्रभु का साक्षात्कार अन्तर्मुखी साधना का विषय है। कबीर बार-बार बाहरी पाखण्डों का विरोध करते हैं।<noinclude></noinclude> tg5y1f6g3xbsagoez3owwta8gzspoek 662838 662834 2026-06-14T18:44:44Z Manvikesarwani09 6620 662838 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६३८ ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) भेदकातिशयोक्ति——औरै स्यावट। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) प्रतीकों का प्रयोग है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) 'स्यावट' एवं 'मिला' शब्दों के द्वारा जैन एवं हिन्दू धर्मावलम्बी साधकों के प्रति संकेत है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) 'घर आना' मुहावरा है। तात्पर्य है स्व-स्वरूप-स्थिति। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) हरि से तात्पर्य आत्माराम है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) भाग हमारे ॰॰॰ खोई——भाव साम्य देखिए—— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;जतन बिनु मिरगनि खेत उजारे। {{center|✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕}} &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;बुधि मेरी किरवी, गुरु मेरो विभुका, अखिर दोउ रखवारे। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कहै कबीर अब जान न देहूँ, बरियाँ भली सँभारे। {{right|(कबीरदास)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;}} {{center|( २१७ )}} {{outdent| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;राजा राम विनां तकती धो धो । राम विनां नर क्यूं छूटोगे, जम करै नग धो धो धो ॥ टेक ॥ मुद्रा पहरयाँ जोग न होई, घूँघट काढ़याँ सती न कोई । माया कै संगि हिलि मिलि आया, फोकट साटै जनम गँवाया ॥ कहै कबीर जिनि पद हरि चीन्हाँ, मलन प्यंड थै निरमल कीन्हा ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——साटै = सट्टा। फोकट = व्यर्थ। प्यंड = शरीर। नग = श्रेष्ठ व्यक्ति।}} {{outdent|'''संदर्भ'''——कबीर का कहना है कि राम नाम के बिना जीवन व्यर्थ है।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——राम की कृपा के बिना मनुष्य का शरीर "धो-धो" करके जलता है और दुनिया देखती रहती है अथवा कोई भी उसकी रक्षा नहीं कर सकता है। राम की कृपा के बिना मनुष्य किसी तरह भी मृत्यु के फंदे से नहीं बच सकता है। यमराज बड़े-बड़े को धो-धो कर (असहाय बनाकर) जला देता है। केवल मुद्रा धारण करने मात्र से योग की साधना नहीं होती है। घूँघट निकाल लेने मात्र से कोई स्त्री सती नहीं कहलाती है। जीव भगवान मे ध्यान न लगाकर माया के साथ हिल-मिल जाता है, और इस प्रकार सट्टे के व्यापार की भाँति अपने जन्म को व्यर्थ ही नष्ट कर देता है। कबीरदास कहते हैं कि जिन्हें भगवान के स्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है, अथवा जिन्होंने हरि के चरणों में ध्यान लगा लिया है, उन्हीं का जन्म सार्थक है, उन्होंने इस पाप-मलिन शरीर को पुण्य-स्थान बना लिया है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) पुनरुक्तिप्रकाश——धो धो। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) वक्रोक्ति——नर क्यूं छूटोगे। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) पदमैत्री——हिलि मिलि। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——प्रभु का साक्षात्कार अन्तर्मुखी साधना का विषय है। कबीर बार-बार बाहरी पाखण्डों का विरोध करते हैं।<noinclude></noinclude> 4b7v5l8ztzoa2o93ylmhz72eeudwodj पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३२५ 250 3196 662835 592478 2026-06-14T18:38:31Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662835 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६४० ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> <div style="text-align: center;">जगु पेखन तुम देखनहारे । विधि हरि संभु नचावनिवारे ॥<br>सोउ न जानइ मरमु तुम्हारा । औरु तुम्हहि को जाननिहारा ॥<br>——गोस्वामी तुलसीदास</div> {{center|( २१६ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;गोव्यंदे तूं निरंजन तूं निरंजन राया । &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;तेरे रूप नहीं रेख नाही मुद्रा नहीं माया ॥ टेक ॥ समद नाही सिषर नाहीं, धरती नाहीं गगनां । रवि ससि दोउ एकै नांही, बहत नांही पवनां ॥ नाद नाही ब्यंद नाही, काल नांही काया । जब तं जल ब्यब न होते, तब तू ही राम राया ॥ जप नांही तप नांही, जोग ध्यांन नहीं पूजा । सिव नांही सक्ती नांही, देव नही दूजा ॥ रुग न जुग न स्यांस अथरवन, बेद नहीं ब्याकरनां । तेरी गति तूंही जांनै, कबीर तो सरनां ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——निरंजन = निर्लिप्त। मुद्रा = भावसूचक मुखचेष्टा। समद = समुद्र। सिषर = शिखर, पर्वत या पर्वत की चोटी। ब्यंद = बिंदु, शरीर।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीर भगवान को शब्दातीत अथवा वर्णनातीत बताते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——हे परमात्मा ! तू सब प्रकार माया से अतीत एवं निर्लिप्त तथा अलक्ष्य है। न तुम्हारा कोई आकार है और न तुम्हारे आकार की कोई रूप-रेखा ही है। तुम्हें प्राप्त करने के लिए कोई शारीरिक चेष्टा एवं मन की मुद्रा ही निर्धारित नहीं की जा सकती है। तुम्हें माया भी नहीं व्यापती है। न तुम्हारे शुद्ध स्वरूप मे समुद्र है, न शिखर (पर्वत) है, न पृथ्वी है और न आकाश ही है। उसमें सूर्य तथा चन्द्र में एक भी नहीं है, न वहाँ पवन की गति है, न वहाँ शब्द है, न रूप है, न काल है, न काया है। तुम्हारे शुद्ध स्वरूप मे न जल रह जाता है और न उसमें पड़ने वाला प्रतिबिम्ब रह जाता है। उस समय न जप रहता है न तप रहता है, न योग रहता है न ध्यान और उपासना का ही अस्तित्व रह जाता है। उस समय न शिव रह जाते हैं और न शक्ति रह जाती है। उस समय तेरे अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा देवता रह ही नहीं जाता है। उस समय ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा शब्द या प्रतिपाद्य व्याकरण कुछ भी नहीं रह जाते हैं। कबीरदास कहते हैं कि हे प्रभु ! अपनी सीमा तू ही जानता है। मैं तो केवल तेरी शरण मे आया हूँ।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——अनुप्रास——आद्यन्त। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) अद्वैतवाद का सहज-स्वाभाविक प्रतिपादन है। अद्वैतावस्था में ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान का भेद मिट ही जाता है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) तू निरंजन ॰॰॰ राया——मन-वचन-कर्म तीनों में अगम्यता बताई है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) काव्योचित भाषा में 'नेति नेति' की शैली पर 'ब्रह्म' का प्रतिपादन है।<noinclude></noinclude> 4f82ackkhpri8mhqp6w6jhw3pk3fp31 662836 662835 2026-06-14T18:41:39Z Manvikesarwani09 6620 662836 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६४० ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> <div style="text-align: center;">जगु पेखन तुम देखनहारे । विधि हरि संभु नचावनिवारे ॥<br>सोउ न जानइ मरमु तुम्हारा । औरु तुम्हहि को जाननिहारा ॥<br>——गोस्वामी तुलसीदास</div> {{center|( २१६ )}} {{outdent| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;गोव्यंदे तूं निरंजन तूं निरंजन राया । &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;तेरे रूप नहीं रेख नाही मुद्रा नहीं माया ॥ टेक ॥ समद नाही सिषर नाहीं, धरती नाहीं गगनां । रवि ससि दोउ एकै नांही, बहत नांही पवनां ॥ नाद नाही ब्यंद नाही, काल नांही काया । जब तं जल ब्यब न होते, तब तू ही राम राया ॥ जप नांही तप नांही, जोग ध्यांन नहीं पूजा । सिव नांही सक्ती नांही, देव नही दूजा ॥ रुग न जुग न स्यांस अथरवन, बेद नहीं ब्याकरनां । तेरी गति तूंही जांनै, कबीर तो सरनां ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——निरंजन = निर्लिप्त। मुद्रा = भावसूचक मुखचेष्टा। समद = समुद्र। सिषर = शिखर, पर्वत या पर्वत की चोटी। ब्यंद = बिंदु, शरीर।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीर भगवान को शब्दातीत अथवा वर्णनातीत बताते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——हे परमात्मा ! तू सब प्रकार माया से अतीत एवं निर्लिप्त तथा अलक्ष्य है। न तुम्हारा कोई आकार है और न तुम्हारे आकार की कोई रूप-रेखा ही है। तुम्हें प्राप्त करने के लिए कोई शारीरिक चेष्टा एवं मन की मुद्रा ही निर्धारित नहीं की जा सकती है। तुम्हें माया भी नहीं व्यापती है। न तुम्हारे शुद्ध स्वरूप मे समुद्र है, न शिखर (पर्वत) है, न पृथ्वी है और न आकाश ही है। उसमें सूर्य तथा चन्द्र में एक भी नहीं है, न वहाँ पवन की गति है, न वहाँ शब्द है, न रूप है, न काल है, न काया है। तुम्हारे शुद्ध स्वरूप मे न जल रह जाता है और न उसमें पड़ने वाला प्रतिबिम्ब रह जाता है। उस समय न जप रहता है न तप रहता है, न योग रहता है न ध्यान और उपासना का ही अस्तित्व रह जाता है। उस समय न शिव रह जाते हैं और न शक्ति रह जाती है। उस समय तेरे अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा देवता रह ही नहीं जाता है। उस समय ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा शब्द या प्रतिपाद्य व्याकरण कुछ भी नहीं रह जाते हैं। कबीरदास कहते हैं कि हे प्रभु ! अपनी सीमा तू ही जानता है। मैं तो केवल तेरी शरण मे आया हूँ।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——अनुप्रास——आद्यन्त। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) अद्वैतवाद का सहज-स्वाभाविक प्रतिपादन है। अद्वैतावस्था में ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान का भेद मिट ही जाता है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) तू निरंजन ॰॰॰ राया——मन-वचन-कर्म तीनों में अगम्यता बताई है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) काव्योचित भाषा में 'नेति नेति' की शैली पर 'ब्रह्म' का प्रतिपादन है।<noinclude></noinclude> 2sfwa2ejy51ju2ude7ggl2z2najrbft 662837 662836 2026-06-14T18:43:57Z Manvikesarwani09 6620 662837 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६४० ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> <div style="text-align: center;">जगु पेखन तुम देखनहारे । विधि हरि संभु नचावनिवारे ॥<br>सोउ न जानइ मरमु तुम्हारा । औरु तुम्हहि को जाननिहारा ॥<br>——गोस्वामी तुलसीदास</div> {{center|( २१६ )}} {{outdent| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;गोव्यंदे तूं निरंजन तूं निरंजन राया । तेरे रूप नहीं रेख नाही मुद्रा नहीं माया ॥ टेक ॥ समद नाही सिषर नाहीं, धरती नाहीं गगनां । रवि ससि दोउ एकै नांही, बहत नांही पवनां ॥ नाद नाही ब्यंद नाही, काल नांही काया । जब तं जल ब्यब न होते, तब तू ही राम राया ॥ जप नांही तप नांही, जोग ध्यांन नहीं पूजा । सिव नांही सक्ती नांही, देव नही दूजा ॥ रुग न जुग न स्यांस अथरवन, बेद नहीं ब्याकरनां । तेरी गति तूंही जांनै, कबीर तो सरनां ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——निरंजन = निर्लिप्त। मुद्रा = भावसूचक मुखचेष्टा। समद = समुद्र। सिषर = शिखर, पर्वत या पर्वत की चोटी। ब्यंद = बिंदु, शरीर।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीर भगवान को शब्दातीत अथवा वर्णनातीत बताते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——हे परमात्मा ! तू सब प्रकार माया से अतीत एवं निर्लिप्त तथा अलक्ष्य है। न तुम्हारा कोई आकार है और न तुम्हारे आकार की कोई रूप-रेखा ही है। तुम्हें प्राप्त करने के लिए कोई शारीरिक चेष्टा एवं मन की मुद्रा ही निर्धारित नहीं की जा सकती है। तुम्हें माया भी नहीं व्यापती है। न तुम्हारे शुद्ध स्वरूप मे समुद्र है, न शिखर (पर्वत) है, न पृथ्वी है और न आकाश ही है। उसमें सूर्य तथा चन्द्र में एक भी नहीं है, न वहाँ पवन की गति है, न वहाँ शब्द है, न रूप है, न काल है, न काया है। तुम्हारे शुद्ध स्वरूप मे न जल रह जाता है और न उसमें पड़ने वाला प्रतिबिम्ब रह जाता है। उस समय न जप रहता है न तप रहता है, न योग रहता है न ध्यान और उपासना का ही अस्तित्व रह जाता है। उस समय न शिव रह जाते हैं और न शक्ति रह जाती है। उस समय तेरे अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा देवता रह ही नहीं जाता है। उस समय ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा शब्द या प्रतिपाद्य व्याकरण कुछ भी नहीं रह जाते हैं। कबीरदास कहते हैं कि हे प्रभु ! अपनी सीमा तू ही जानता है। मैं तो केवल तेरी शरण मे आया हूँ।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——अनुप्रास——आद्यन्त। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) अद्वैतवाद का सहज-स्वाभाविक प्रतिपादन है। अद्वैतावस्था में ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान का भेद मिट ही जाता है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) तू निरंजन ॰॰॰ राया——मन-वचन-कर्म तीनों में अगम्यता बताई है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) काव्योचित भाषा में 'नेति नेति' की शैली पर 'ब्रह्म' का प्रतिपादन है।<noinclude></noinclude> dwp8c60v08x3qapcxrs6lwpeusi80zw पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३२७ 250 3198 662841 592480 2026-06-14T18:52:17Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662841 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६४२ ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> {{outdent|भी प्रकार के बाह्याचार द्वारा उसके रूप का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता है। कबीरदास कहते हैं कि फिर वह तीनों लोकों से परे है। वह परम तत्त्व ऐसा अनोखा है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) भवनातिशयोक्ति——मरम न जानै कोई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) पुनरुक्तिप्रकाश——घट-घट। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) पदमैत्री——विबर्जित की पुनरावृत्ति। {{center|( २२१ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;रांम रांम रांम रमि रहिये, &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;साषित सेती भूलि न कहिये ॥ टेक ॥ का सुनहां कौं सुमृत सुनाये, का साषित पै हरि गुन गांये । का कऊवा कौं कपूर खवांये, का बिसहर कौं दूध पिलांये ॥ साषित सुनहां दोऊ भाई, बो नीदै वौ भौंकत जाई । अंमृत ले ले नींब स्यंचाई, कहै कबीर वाकी बांनि न जाई ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——साषित = शाक्त। सेती = से। सुनहा = श्वान, कुत्ता। सुमृत = धर्मशास्त्र। बिसहर = सर्प। नींब = नीम। स्यंचाई = सींचा जाए। बांनि = स्वाभाविक गुण।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीरदास शाक्तों के प्रति अपना विरोध प्रकट करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——राम मे मन, वचन, कर्म से (सब प्रकार) रमे रहो परन्तु भूलकर भी राम नाम की चर्चा शाक्त से मत करो। वह इसका पात्र नहीं है, उससे राम नाम की चर्चा करना व्यर्थ है। जैसे कुत्ते को धर्मशास्त्र सुनाने से क्या लाभ है, वैसे ही उस ज्ञानहीन के समक्ष हरिगुण-गान का क्या उपयोग हो सकता है ? कौए को कपूर खिलाने से तथा सर्प को दूध पिलाने से क्या लाभ है ? शाक्त और कुत्ता दोनों भाई हैं। शाक्त सदैव भगवान के भक्तों की निन्दा करता है और कुत्ता सदैव दूसरों पर भौंकता रहता है। कबीर कहते हैं कि नीम के वृक्ष को चाहे अमृत से सींचा जाए, परन्तु वह अपनी स्वाभाविक कड़वाहट नहीं छोड़ता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) पुनरुक्तिप्रकाश——राम राम राम, ले-ले। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) अनुप्रास——राम राम रमि, सुनहा, सुमृत साषित। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) भ्रम——साषित सुनहा ॰॰॰ नीदै भौंकत। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) उदाहरण——का साषित ॰॰॰ गांये। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) दृष्टान्त——का कऊआ ॰॰॰ पिलांये। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vi) वक्रोक्ति——का सुनहां ॰॰॰ पिलांये। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vii) विशेषोक्ति——अमृत ले ॰॰॰ न जाई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) अमृत से सींचे जाने पर भी इस पंक्ति में लोक प्रचलित ढंग से भक्ति की महिमा रूप में प्रयुक्त किया गया है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) जाकै हरी सुभाव नाहिं जाई। नीम न मीठ होइ सींचि गुड़ घी सौं।<noinclude></noinclude> ok49swvxyqn5quh3wgkf051kgt2rmd8 662842 662841 2026-06-14T18:52:48Z Manvikesarwani09 6620 662842 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६४२ ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> {{outdent|भी प्रकार के बाह्याचार द्वारा उसके रूप का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता है। कबीरदास कहते हैं कि फिर वह तीनों लोकों से परे है। वह परम तत्त्व ऐसा अनोखा है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) भवनातिशयोक्ति——मरम न जानै कोई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) पुनरुक्तिप्रकाश——घट-घट। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) पदमैत्री——विबर्जित की पुनरावृत्ति। {{center|( २२१ )}} {{poem| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;रांम रांम रांम रमि रहिये, साषित सेती भूलि न कहिये ॥ टेक ॥ का सुनहां कौं सुमृत सुनाये, का साषित पै हरि गुन गांये । का कऊवा कौं कपूर खवांये, का बिसहर कौं दूध पिलांये ॥ साषित सुनहां दोऊ भाई, बो नीदै वौ भौंकत जाई । अंमृत ले ले नींब स्यंचाई, कहै कबीर वाकी बांनि न जाई ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——साषित = शाक्त। सेती = से। सुनहा = श्वान, कुत्ता। सुमृत = धर्मशास्त्र। बिसहर = सर्प। नींब = नीम। स्यंचाई = सींचा जाए। बांनि = स्वाभाविक गुण।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीरदास शाक्तों के प्रति अपना विरोध प्रकट करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——राम मे मन, वचन, कर्म से (सब प्रकार) रमे रहो परन्तु भूलकर भी राम नाम की चर्चा शाक्त से मत करो। वह इसका पात्र नहीं है, उससे राम नाम की चर्चा करना व्यर्थ है। जैसे कुत्ते को धर्मशास्त्र सुनाने से क्या लाभ है, वैसे ही उस ज्ञानहीन के समक्ष हरिगुण-गान का क्या उपयोग हो सकता है ? कौए को कपूर खिलाने से तथा सर्प को दूध पिलाने से क्या लाभ है ? शाक्त और कुत्ता दोनों भाई हैं। शाक्त सदैव भगवान के भक्तों की निन्दा करता है और कुत्ता सदैव दूसरों पर भौंकता रहता है। कबीर कहते हैं कि नीम के वृक्ष को चाहे अमृत से सींचा जाए, परन्तु वह अपनी स्वाभाविक कड़वाहट नहीं छोड़ता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) पुनरुक्तिप्रकाश——राम राम राम, ले-ले। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) अनुप्रास——राम राम रमि, सुनहा, सुमृत साषित। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) भ्रम——साषित सुनहा ॰॰॰ नीदै भौंकत। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) उदाहरण——का साषित ॰॰॰ गांये। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) दृष्टान्त——का कऊआ ॰॰॰ पिलांये। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vi) वक्रोक्ति——का सुनहां ॰॰॰ पिलांये। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vii) विशेषोक्ति——अमृत ले ॰॰॰ न जाई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) अमृत से सींचे जाने पर भी इस पंक्ति में लोक प्रचलित ढंग से भक्ति की महिमा रूप में प्रयुक्त किया गया है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) जाकै हरी सुभाव नाहिं जाई। नीम न मीठ होइ सींचि गुड़ घी सौं।<noinclude></noinclude> 2c7483zo1mluc8qourtknr2178ywe4a 662843 662842 2026-06-14T18:53:11Z Manvikesarwani09 6620 662843 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६४२ ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> {{outdent|भी प्रकार के बाह्याचार द्वारा उसके रूप का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता है। कबीरदास कहते हैं कि फिर वह तीनों लोकों से परे है। वह परम तत्त्व ऐसा अनोखा है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) भवनातिशयोक्ति——मरम न जानै कोई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) पुनरुक्तिप्रकाश——घट-घट। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) पदमैत्री——विबर्जित की पुनरावृत्ति। {{center|( २२१ )}} {{outdent| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;रांम रांम रांम रमि रहिये, साषित सेती भूलि न कहिये ॥ टेक ॥ का सुनहां कौं सुमृत सुनाये, का साषित पै हरि गुन गांये । का कऊवा कौं कपूर खवांये, का बिसहर कौं दूध पिलांये ॥ साषित सुनहां दोऊ भाई, बो नीदै वौ भौंकत जाई । अंमृत ले ले नींब स्यंचाई, कहै कबीर वाकी बांनि न जाई ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——साषित = शाक्त। सेती = से। सुनहा = श्वान, कुत्ता। सुमृत = धर्मशास्त्र। बिसहर = सर्प। नींब = नीम। स्यंचाई = सींचा जाए। बांनि = स्वाभाविक गुण।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''——कबीरदास शाक्तों के प्रति अपना विरोध प्रकट करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——राम मे मन, वचन, कर्म से (सब प्रकार) रमे रहो परन्तु भूलकर भी राम नाम की चर्चा शाक्त से मत करो। वह इसका पात्र नहीं है, उससे राम नाम की चर्चा करना व्यर्थ है। जैसे कुत्ते को धर्मशास्त्र सुनाने से क्या लाभ है, वैसे ही उस ज्ञानहीन के समक्ष हरिगुण-गान का क्या उपयोग हो सकता है ? कौए को कपूर खिलाने से तथा सर्प को दूध पिलाने से क्या लाभ है ? शाक्त और कुत्ता दोनों भाई हैं। शाक्त सदैव भगवान के भक्तों की निन्दा करता है और कुत्ता सदैव दूसरों पर भौंकता रहता है। कबीर कहते हैं कि नीम के वृक्ष को चाहे अमृत से सींचा जाए, परन्तु वह अपनी स्वाभाविक कड़वाहट नहीं छोड़ता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) पुनरुक्तिप्रकाश——राम राम राम, ले-ले। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) अनुप्रास——राम राम रमि, सुनहा, सुमृत साषित। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) भ्रम——साषित सुनहा ॰॰॰ नीदै भौंकत। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) उदाहरण——का साषित ॰॰॰ गांये। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) दृष्टान्त——का कऊआ ॰॰॰ पिलांये। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vi) वक्रोक्ति——का सुनहां ॰॰॰ पिलांये। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vii) विशेषोक्ति——अमृत ले ॰॰॰ न जाई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) अमृत से सींचे जाने पर भी इस पंक्ति में लोक प्रचलित ढंग से भक्ति की महिमा रूप में प्रयुक्त किया गया है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) जाकै हरी सुभाव नाहिं जाई। नीम न मीठ होइ सींचि गुड़ घी सौं।<noinclude></noinclude> 718ll9fqqqomh03nhth403z064muhie पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३२९ 250 3200 662844 592482 2026-06-14T18:54:32Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662844 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६४४ ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> {{outdent|चतुर हैं—इससे प्रत्येक कर्म का पूरा हिसाब देना पड़ता है यानी यहाँ कारण-कार्य का नियम ऐसे निर्बाध रूप मे कार्य करता है कि प्रत्येक कर्म का उपयुक्त फल मिलता है। यह एक ऐसा नगर है जहाँ रहने वाले प्रत्येक जीवात्मा का धर्म भ्रष्ट होगया है और यहाँ पाँच किसान (नेत्र, कान, नाक, मुँह तथा त्वचा) रहते हैं, जो जीव रूपी स्वामी का कहना नहीं मानते हैं। इस गाँव का ठाकुर काल समय-समय पर इस शरीर रूपी खेत को नापता रहता है और मन रूपी पटवारी अपना हिस्सा नहीं छोड़ता है। भाव यह है कि काल तो प्रत्येक क्षण सिर पर सवार रह कर यह देखता है कि शरीर कहीं खराब तो नहीं हो गया है और मन रूपी पटवारी मुझसे शरीर का ब्यौरा माँगता रहता है। वस्तुस्थिति यह है कि यह शरीर प्रत्येक क्षण क्षीण होता रहता है और इस कारण काल ठाकुर का भय मुझे हर घड़ी सताता रहता है। साथ ही पटवारी के डर के कारण मैं मनचाहे ढंग पर शरीर का उपभोग भी नहीं कर सकता हूँ। मेरे मन ने मेरे इस शरीर को विषय-वासनाओं के जर्जर बंधनों से बुरी तरह जकड़ दिया है जिसके कारण मेरे शरीर को अत्यधिक कष्ट होता रहता है। इस गाँव का उधार देने वाला मेहता अर्थात् प्रारब्ध कर्म अत्यन्त दुष्ट है और क्रियमाण कर्मरूपी बलाही (कर्मचारी) भी बड़ा दुष्ट है। वह मुझे विषम मार्गों में उलझाता रहता है। वह तो अच्छे-अच्छे जमींदारों के सिर के बाल भी नोच लेता है—उनसे प्रेम एवं सद्वृत्तियों की निधि छीन कर उन्हें दरिद्र कर देता है। इस नगर का बुद्धि-रूप दीवान भी व्यथाओं के प्रति सहानुभूति रखता हुआ न्याय नहीं कर पाता है। पिछले जन्मों का अनुभव यह है कि शरीरांत होने के अवसर पर धर्मराज ने जब मुझसे इस शरीर का पूरा हिसाब-किताब माँगा तो मेरी ओर बहुत बकाया निकला था। उस समय मेरे शरीर रूपी खेत को नष्ट करने वाले इन्द्रिय रूपी पाँचों किसान मुझे छोड़ कर भाग गए और हे राम ! बेचारा जीवात्मा ही सब प्रकार के बन्धनों मे बाँध दिया गया। इसीलिए कबीरदास कहते हैं कि हे साधुओ ! मेरा कहना गाँठ बाँधलो और भगवान (हरि) का भजन करके इस भवसागर से पार उतरने के लिए बेड़ा बाँधो। इसके पश्चात् वह भगवान से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे राम ! इस बार तो इस जीव (मुझको) क्षमा कर दीजिएगा। अगले जन्म में मैं आपका पूरा हिसाब चुकता कर दूँगा—अपने शरीर को विषय-भोगों से बचाकर अधिक अच्छा करके रखूँगा।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सांग रूपक——पूरा पद। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) रूपकातिशयोक्ति——गाँठ। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) नाथ सम्प्रदाय के अनेक प्रतीकों का प्रयोग है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) कबीरदास ने ज्ञानेन्द्रियों के नाम इस प्रकार लिए हैं मानो उनके प्रति उपालम्भ प्रकट कर रहे हों। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) 'बेड़ा बाँधना' और 'गाँठ बाँधना' मुहावरों का सटीक प्रयोग किया गया है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) साधना मे रत रहने से ही ईश्वर प्राप्ति हो सकती है। इसी को काल द्वारा खेत का मापा जाना कहा गया है। 'खेत नापना' एक नया मुहावरा है।<noinclude></noinclude> akt8uadzdcw1zi8axvj5fpovvpdrrmt पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३३१ 250 3203 662845 592485 2026-06-14T18:56:31Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662845 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६४६ ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> {{outdent|'''भावार्थ'''—हे प्रभु राम ! संसार अथवा जन्म-mरण के भय के कारण यह मेरा मन तुम्हारे प्रति अनुरक्त हो रहा है। माता के गर्भ मे रहने पर मैंने बहुत दुःख सहा था। उस कष्ट का स्मरण मुझे अभी तक है और उसका भय मेरे हृदय मे समा गया है। दिन प्रति दिन यह शरीर क्षीण हो रहा है और मुझे वृद्धावस्था के आगमन का ज्ञान कराता है। काल मेरे बाल पकड़कर मृदंग बजा रहा है अर्थात् मृत्यु मेरे सिर पर सवार है और मेरे अन्त समय को निकट आता देखकर आनन्द मना रही है। कबीर कहते हैं कि अब मैं करुणामय भगवान की शरण मे हूँ। हे भगवान ! तुम्हारी कृपा के बिना इस संसार का दुःख दूर नहीं हो सकता है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''—पुनरुक्तिप्रकाश — दिन दिन। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''—कबीर इस पद मे एक सच्चे भक्त के रूप मे दिखाई देते हैं। दैन्य भक्तों का बड़ा बल है। वे सदा से प्रभु की कृपा पर अवलम्बित रहते आए हैं। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;यथा— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(i) तुलसिदास रघुनाथ-विमुख नहिं मिटै विपति कबहूँ। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) तुलसिदास बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;तथा— &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अब हौं नाची बहुत गोपाल। {{center|✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;✕}} &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;सूरदास की सबै अविद्या, पूरि करौ नन्दलाल।<span style="float: right;">—सूरदास&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</span> {{center|( २२४ )}} {{outdent| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;कब देखूँ मेरे राम सनेही, हूँ तेरा पथ निहारूँ स्वामी, कब रमि लहुगे अंतरजामीं । जैसें जल बिन मीन तलफै, ऐसें हरि बिन मेरा जियरा कलफै ॥ कहै कबीर अब बिलब न कीजै, अपनौ जांनि मोहि दरसन दीजै ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''—रमि = रमण करके। लहुगे = अपनाओगे। कलफै = व्यथित होता है। मनु = मन, मृग-शावक।}} {{outdent|'''सन्दर्भ'''—कबीरदास भगवान के साक्षात्कार के प्रति अपनी आतुरता व्यक्त करते हैं।}} {{outdent|'''भावार्थ'''—मैं अपने प्रिय राम का कब दर्शन करूँगा ? उनके बिना मेरा यह भौतिक शरीर (स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर एवं मन का समुच्चय) अत्यन्त कष्ट का अनुभव कर रहा है। हे स्वामी, मैं तुम्हारी बाट देख रहा हूँ। हे अन्तर्यामी, आप मेरे हृदय में रमण करके मुझको अपनाने की कृपा कब करेंगे ? जैसे जल के अभाव में मछली तड़पती है, वैसे ही राम के दर्शन के बिना मेरा मन व्यथित हो रहा है। राम के वियोग में मुझे रात-दिन नींद नहीं आती है। राम के दर्शनों के अभाव में यह दुःख किस प्रकार दूर हो सकता है ? कबीर की विरहिणी जीवात्मा}}<noinclude></noinclude> nevy6xe64n2s2zo6b96emirbj114yz4 पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३३५ 250 3207 662846 660511 2026-06-14T18:58:04Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662846 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" />{{Rh|६५० ]||[ कबीर}}</noinclude><div style="text-align: right;">६५० ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> {{outdent|अपने हाथों ही चिता बनाने तथा तुरी बजाकर मोक्षधाम को जाने की बात कहती है।<br> &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vii) पूरि—दूलह—जीव की संज्ञा होना और जीव का ब्रह्म से विमुख या विलग हो जाना दोनों ही कार्य एक साथ होते हैं। शुद्ध चैतन्य माया से सम्पृक्त होते ही 'जीव' कहलाता है। माया का आवरण पड़ते ही जीव का शुद्ध बुद्ध आनन्द स्वरूप तिरोहित हो जाता है। इसी से कहते हैं कि जीवात्मा चौक पर बैठते ही विधवा हो जाती है। इस रूपक मे कबीर की दार्शनिक-दृष्टि की तीक्ष्णता सचमुच स्पृहणीय है।}} {{center|( २२७ )}} {{outdent| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;धीरे धीरे खाइबौ अनत न जाइबौ, रांम रांम रांम रमि रहिबौ ॥ टेक ॥ खाया देवर खाया जेठ, सब खाया सुसर का पेट ॥ खाया सब पटण का लोग, कहै कबीर तब पाया जोग ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——खाइबौ = नष्ट करना। अनत = अन्यत्र, और कहीं। माई = माता, माया से तात्पर्य है। जवाई = जीव से तात्पर्य है। पटण = नगर।}} {{outdent|'''संदर्भ'''——कबीर का कहना है कि माया तथा माया से उत्पन्न विकारों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् ही योगावस्था प्राप्त हो सकती है।}} {{outdent|'''भावार्थ'''——कबीर कहते हैं कि धीरे-धीरे करके माया तथा सांसारिक सम्बन्धों को समाप्त करना है। इसके लिए केवल राम-नाम का स्मरण करते हुए उस परम तत्त्व राम में ही रमण करना है। अन्य किसी साधना को अपनाने की आवश्यकता नहीं है। मैं इसी कल्याण मार्ग को अपनाऊँगा। पहले माया-रूपी माता तथा धाय को खाया। फिर माया से उत्पन्न विषय-वासना रूपी पुत्री के पति जीव रूपी जमाई को समाप्त किया। साधक जीव ने अहंकार रूपी जेठ तथा चंचल मन रूपी देवर को भी खा लिया। इसके पश्चात् अज्ञान-रूपी श्वसुर के पेट से उत्पन्न समस्त परिवार (लोभ, मोह, क्रोध, काम इत्यादि) को खाया। इसके बाद मैंने इस शरीर रूपी नगर में माया से उत्पन्न जो अनेक विकार रूपी नगरवासी रहते थे, मैंने उन सबको खाया। कबीर कहते हैं कि इन विकारों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् ही मुझे योग दशा की प्राप्ति हुई है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) पुनरुक्ति प्रकाश——धीरे धीरे। राम राम राम। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) पदमैत्री——खाइबौ जाइबौ, खाई माई, माई जवाई। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) रूपकातिशयोक्ति——आई माई जवाई देवर जेठ श्वसुर। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) कायायोग——योग से योगावस्था तथा ईश्वर-प्राप्ति दोनों ही अर्थ समन्वित हैं। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) प्रतीकों के प्रयोग द्वारा सुन्दर रूपक ढाला है।<noinclude></noinclude> ib0dx26pnusd3rt872pr0sm2h236mf5 पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/३३७ 250 3209 662847 592491 2026-06-14T18:59:46Z Manvikesarwani09 6620 /* शोधित */ 662847 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Manvikesarwani09" /></noinclude><div style="text-align: right;">६५२ ] &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; [ कबीर</div> {{outdent|अन्तिम पंक्ति का अर्थ एक अन्य प्रकार भी किया जा सकता है। कबीर कहते हैं कि मैंने यह जीवन सूत्र अच्छी प्रकार काता है। मुझे यह सामान्य चरखा नहीं अपितु परम पद का दाता—'साधन धाम मोक्ष का द्वार'—प्रतीत हुआ है।}} :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अलंकार'''——(i) सांगरूपक——पूरे पद मे। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) पुनरुक्ति प्रकाश——लै लै। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) छेकानुप्रास——चारि चमरख, काति कातै। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) गूढोक्ति——निसतरिबो कैसें। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(v) अपन्हुति——रहटा नही परम पद दाता। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(vi) पदमैत्री——लाई चलाई, ऐसै कैसें, काता दाता। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''विशेष'''——(i) पाठान्तर——चौथी पंक्ति——'द्यो माल तागा बरिस दिन कुकुरी, लोग बोलै भल कातल वपुरी।' :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ii) सासू—इसका अभिप्राय गुरु के उपदेश-श्रवण से उत्पन्न 'बोधवृत्ति' भी हो सकता है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iii) 'बिन कातै निवरतैबो कैसे'—इसका अभिप्राय यह भी हो सकता है—मनन, निदिध्यासन, निरन्तर के नाम स्मरण एवं अनुराग के बिना इस जीवन में निस्तार नहीं है। :&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(iv) कबीर जुलाहे का काम करते थे। यहाँ उन्होंने जुलाहे के काम आने वाली सामग्री को लेकर प्रतीक-विधान किया है। यह प्रतीक विधान सर्वथा सार्थक और सफल है। जीवन सचमुच एक चरखा है जिसकी सार्थकता सुन्दर सूत कातने मे ही है। ज्ञान और भक्ति मय जीवन ही मानव-योनि की सार्थकता है। मानव-तन बड़े भाग्य से मिलता है। यह पाप का हेतु भी हो सकता है और मोक्ष का द्वार भी बनाया जा सकता है। कबीर कहते हैं कि मैंने इसको परम पद प्राप्ति का साधन बना लिया है। तुम भी मेरे अनुभव से लाभान्वित होने का प्रयत्न करो। {{center|( २२६ )}} {{outdent| &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अब की घरी मेरो घर करसौ, गाध मगति ले मोकौं तिरसौ ॥ टेक ॥ पहली को चाल्यौ भरमत डोल्यौ, सच कबहूँ नहीं पायौ । अब की धरनि धरी जा दिन थें, सगली भरम गमायौ ॥ पहली नारि सदा कुलवंती, सासू सुसरा मांनै । देवर जेठ सबनि की प्यारी, पिय कौ मरम न जांनै ॥ अब की धरनि धरी जा दिन थें, पीय सूं वांन बन्यूँ रे । कहै कबीर भई भल बपुरी कौ, आदरु रांम सुन्यूँ रे ॥ }} {{outdent|'''शब्दार्थ'''——घरी = घड़ी, अब इस जन्म में। घर करसौ = घर बसाएगी। गाध मगति = गाध भगति = गाढ़ भक्ति, दृढ़ भक्ति। मन = मृग-शावक। कुलवंती = माया।}}<noinclude></noinclude> qf1pa9jruqdcs4mi7t9yeoqugxkutwh पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१३ 250 12550 662935 591237 2026-06-15T08:39:19Z Krupal (OKI) 6598 /* प्रमाणित */ 662935 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Krupal (OKI)" />{{rh||(५)|}}</noinclude>उच्चारण नहीं रह गए थे, दोनों स्वर मिलकर 'ए' और 'औ' के समान उच्चरित होने लग थे। प्राकृत के 'दैत्यादिष्वउ' और 'पौरादिष्वउ' नियम सब दिन के लिये स्थायी नहीं हो सकते थे। प्राकृत और अपभ्रंश अवस्था पार करने पर उलटी गंगा वही। प्राकृत के 'अइ' और 'अउ' के स्थान पर 'ए' और 'औ' उच्चारण में आए—जैसे प्राकृत और अपभ्रंश रूप 'चलइ', 'पट्ट', 'कइसे', 'चउक्कोर' इत्यादि हमारी भाषा में पाकर 'चलै', 'पैट', 'वैसे', 'चौकोन' इस प्रकार वोले जाने लगे। यदि कहिए कि इनका उच्चारण आजकल तो ऐसा होता है पर जायसी बहुत पुराने हैं, संभवतः उस समय इनका उच्चारण प्राकृत के अनुसार ही होता रहा हो, तो इसका उत्तर यह है कि अभी तुलसीदास जी के थोडे ही दिनों पीछे को लिखी 'मानस' की कुछ पुरानी प्रतियाँ मौजद हैं जिनमें बराबर 'कैसे', 'जैसे', 'तैसे', 'कै', 'करै', 'चौथे', 'करौं', 'श्रावौं' इत्यादि अवध की चलती भाषा के रूप पाए जाते हैं। जायसी और तुलसी ने चलती भाषा में रचना की है. प्राकृत के समान व्याकरण के अनुसार गड़ी हुई भाषा में नहीं। यह दूसरी बात है कि प्राचीन रूपों का व्यवहार परंपरा के विचार से उन्होंने बहुत जगह किया है, पर भाषा उनकी प्रचलित भाषा ही है। डाक्टर ग्रियर्सन ने 'करइ', 'चलइ', आदि रूपों को ही कविप्रयक्त सिद्ध करने के लिये 'करई', 'धावई' आदि चरण के अंत में आनेवाले रूपों का प्रमाण दिया है। पर 'चलै', 'गनै' आदि रूप भी चरण के अंत में बरवर पाए हैं, जैसे— :(क) इहै बहुत जौ बोहित पाबौं।—जायसी। :(ख) रघबीर बल गर्वित विभीषतु घाल नहि ताकहँ गर्ने।—तुलसी। चरणांत में ही नहीं, वर्णवृत्तों के बीच में भी ये चलते रूप बराबर दिखाए जा सकते हैं जैसे— एक एक को न सँभार। करै तात भ्रात पुकार।—तुलसी। जब एक ही कवि को रचना में नए और पुराने दोनों रूपों का प्रयोग मिलता है, तब यह निश्चित है कि नए रूप का प्रचार कवि के समय में हो गया था और पुराने रूप का प्रयोग या तो उसने छंद की आवश्यकता वश किया है अथवा परंपरापालन के लिये। हाँ, 'ए' और 'नौ' के संबंध में ध्यान रखने की बात यह है कि इनके 'पूरबी' और 'पच्छिमी' दो प्रकार के उच्चारण होते हैं। पुरको उच्चारण संस्कृत के समान 'अइ' और 'उ' से मिलता जलता और पच्छिमो उच्चारण 'अय' और 'अव' से मिलता जुलता होता है। अवधो भाषा में शब्द के आदि के 'ए' और 'ओ' का अधिकतर पूरवी तथा अंत में पड़नेवाले 'ए' 'औ' का उच्चारण पच्छिमी दंग पर होता है। 'हि' विभक्ति का प्रयोग प्राचीन पद्धति के अनुसार जायसी में सब कारकों के लिये मिलेगा। पर कर्ता कारक में केवल सकर्मक भूतकालिक क्रिया के सर्वनाम कर्ता में तथा आकारांत संज्ञा कर्ता में मिलता है। इन दोनों स्थलों में मैंने प्रायः वैकल्पिक रूप 'इ' (जो 'हि' का ही विकार है) रखा है, जैसे केइ, जेइ, तेइ, राजै, सूए, गौरै, (किसने ,जिसने, उसने, राजा ने, सूए ने, गौरा ने)।<noinclude></noinclude> i44hz9mphswsn38o5qdyin29kify59o पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२३ 250 38717 662877 642918 2026-06-15T05:29:40Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 662877 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|ब्रिटिश साम्राज्य||२१७}}</noinclude>रोडेशिया, स्वाज़ीलैएड; दक्षिण अफ्रिकी यूनियन; नाइजीरिया, गैम्बिया; गोल्ड-कोस्ट, सीराल्योन; सूदान, टंगान्यिका, दक्षिण-पश्चिमी अफ्रिका, कैमरून, टोगोलैएड । अमरीका—बरमुडास, कनाडा की डोमिनियन, फाकलैएड द्वीपसमूह, दक्षिण जार्जिया, बरतानवी गायना, बरतानवी होन्डुरास; न्यूफाउएडलैएड; लेब्राडर; बहामस; बारबाडस, जमैका; लीवार्ड द्वीपसमूह, ट्रिनीडाड, टुबागो, विएडवार्ड द्वीपसमूह । महासागरीय— आस्ट्रेलिया की कामनवैल्थ, पापुआ ( जिसे जनवरी १६४३ में जापान से वापस जीता चुका है ), न्यूजीलैंड, फीजी, प्रशान्त महासागर के द्वीपसमूह, न्यूगिनी, पश्चिमी समोआ, नौरू । इनमे (१) स्वाधीन उपनिवेश— कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैएड, दक्षिण अफरीका, आयर (आयरिश स्वतंत्र राज्य), न्यूफाउन्डलैएड जिसका औपनिवेशिक पद १६३३ से स्थगित कर दिया गया है । (२) उपनिवेश अथवा अधीन साम्राज्य, जिसमे शाही नौ-आबादियॉ ( उपनिवेश ), संरक्षित राज्य तथा चिन्हाड्कित बिगत विश्वयुध्द के बाद, वार्सेई की सन्धि के अनुसार, शासनादेश द्वारा शासित देश ( Mandated Territories ) शामिल है । ब्रिटिश राष्ट्र-समूह एक विचित्र राजनीतिक रचना है । राजनीतिक अर्थ मे न वह राष्ट्र है और न संघ ही । उसका न कोई लिखित शासन-विधान है, न उसकी कोई पार्लमेन्ट है और न अपनी सरकार ही । न उसकी रक्षा करने-वाली केन्द्रिय सेना और न प्रबन्धक-शक्ति ही । वास्तव मे यह इतिहास और विकास की रचना है जो अपने आप बढी, योजना बनाकर उसका निर्माण नही किया गया,और जिसके सदस्यो के पारस्परिक सम्बन्ध अभी विकास की अवस्था मे हैं । स्वाधीन उपनिवेशो का विधान बरतानवी सरकार के द्वारा बना, लेकिन वास्तव मे कालक्रम द्वारा वह स्वाधीन बन गये । १६२६ तक वैस्टमिस्टर पार्लमेट समस्त साम्राज्य की सर्वोच्च धारासभा मानी जाती रही; वही अधिकार दे सकती और उन्हे वापस ले सकती थी । पिछले महायुध्द मे उपनिवेशो ने साम्राज्य को पूरी मदद दी और उपनिवेशो ने साम्राज्यान्तर्गत<noinclude></noinclude> 3rlaotvuv2zay9xxuxkh9gbg80bbn86 पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२३ 250 77024 662808 565806 2026-06-14T12:15:22Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662808 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ३ :'''|}}</noinclude><center>{{xx-larger|'''विभाजन की सात योजनायें'''}} <Br> सम्पत्ति के विभाजन की सब से अच्छी योजना क्या है, यह मालूम करने के लिए हमको सभी सम्भव योजनानों पर विचार कर लेना चाहिए। यह योजना बहुधा पेश की जाती है कि प्रत्येक को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, सम्पत्ति का उतना भाग मिल जाया करे, जितना उसने अपने श्रम से पैदा किया हो। वैसे दिखने में यह पहली योजना योजना लीक प्रतीत होती है; किन्तु जब हम इसको न्यावहारिक रूप देने लगते हैं तो अनेक कठिनाइयाँ खड़ी हो जाती है । प्रथम तो यह मालूम करना ही कठिन होता है कि हर एक ने कितना पैदा किया । दूसरे ठोस पदायों का निर्माण ही दुनिया में एकमात्र काम नहीं है। समाज में अधिकतर काम मेवा के रूप में होता है। एक पिन बनाने का कारख़ाना है। उसमें एक मशीन से लाखॉ पिने तैयार होती हैं और सैकड़ों आदमी काम करते हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि मशीन चलाने वाले व्यक्ति के श्रम से कितनी पिनें बनीं; कितनी पिनें मशीन के आविष्कारक को और कितनी मशीन के इंजीनियर को मिलनी चाहिएं । एकान्त जंगल में रहने वाला कह सकता है कि अपनी कुटिया मैंने खुद वनाई है। उसमें किसी दूसरे का श्रम नहीं लगा; किन्तु सम्य समाज में रहने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि कुर्सी, मेज़, मोटर आदि जिन वस्तुओं का वह नित्य उपयोग करता है, वे उसके अकेले के श्रम से बनी हैं । वास्तव में उन चीज़ों के बनाने में उसके निजी श्रम के अलावा दर्जनों आदमियों का श्रम लगा होता है। ऐसी दशा में जो जितना पैदा करे, उसको उतना ही देने की कोशिश करना ठीक वैसा ही सिद्ध होगा जैसा किसी तालाब में से पानी की<noinclude></noinclude> jaszvj6ev8qga3q75kmkvj2gnwim5j0 662809 662808 2026-06-14T12:19:27Z Chahar 009 6627 662809 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ३ :'''|}}</noinclude><center>{{xx-larger|'''विभाजन की सात योजनायें'''}} <Br> सम्पत्ति के विभाजन की सब से अच्छी योजना क्या है, यह मालूम करने के लिए हमको सभी सम्भव योजनानों पर विचार कर लेना चाहिए। {{Indent}}यह योजना बहुधा पेश की जाती है कि प्रत्येक को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, सम्पत्ति का उतना भाग मिल जाया करे, जितना उसने {{Indent}}अपने श्रम से पैदा किया हो। वैसे दिखने में यह पहली योजना योजना लीक प्रतीत होती है; किन्तु जब हम इसको {{Indent}}न्यावहारिक रूप देने लगते हैं तो अनेक कठिनाइयाँ खड़ी हो जाती है । प्रथम तो यह मालूम करना ही कठिन होता है कि हर एक ने कितना पैदा किया । दूसरे ठोस पदायों का निर्माण ही दुनिया में एकमात्र काम नहीं है। समाज में अधिकतर काम मेवा के रूप में होता है। {{Indent}}एक पिन बनाने का कारख़ाना है। उसमें एक मशीन से लाखॉ पिने तैयार होती हैं और सैकड़ों आदमी काम करते हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि मशीन चलाने वाले व्यक्ति के श्रम से कितनी पिनें बनीं; कितनी पिनें मशीन के आविष्कारक को और कितनी मशीन के इंजीनियर को मिलनी चाहिएं । एकान्त जंगल में रहने वाला कह सकता है कि अपनी कुटिया मैंने खुद वनाई है। उसमें किसी दूसरे का श्रम नहीं लगा; किन्तु सम्य समाज में रहने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि कुर्सी, मेज़, मोटर आदि जिन वस्तुओं का वह नित्य उपयोग करता है, वे उसके अकेले के श्रम से बनी हैं । वास्तव में उन चीज़ों के बनाने में उसके निजी श्रम के अलावा दर्जनों आदमियों का श्रम लगा होता है। ऐसी दशा में जो जितना पैदा करे, उसको उतना ही देने की कोशिश करना ठीक वैसा ही सिद्ध होगा जैसा किसी तालाब में से पानी की<noinclude></noinclude> rmgn6zjb8b145m5vl0asst61bh4vbnq 662811 662809 2026-06-14T12:20:58Z Chahar 009 6627 662811 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ३ :'''|}}</noinclude><center>{{xx-larger|'''विभाजन की सात योजनायें'''}} <Br>{{Indent}}सम्पत्ति के विभाजन की सब से अच्छी योजना क्या है, यह मालूम करने के लिए हमको सभी सम्भव योजनानों पर विचार कर लेना चाहिए। {{Indent}}यह योजना बहुधा पेश की जाती है कि प्रत्येक को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, सम्पत्ति का उतना भाग मिल जाया करे, जितना उसने {{Indent}}अपने श्रम से पैदा किया हो। वैसे दिखने में यह पहली योजना योजना लीक प्रतीत होती है; किन्तु जब हम इसको {{Indent}}न्यावहारिक रूप देने लगते हैं तो अनेक कठिनाइयाँ खड़ी हो जाती है । प्रथम तो यह मालूम करना ही कठिन होता है कि हर एक ने कितना पैदा किया । दूसरे ठोस पदायों का निर्माण ही दुनिया में एकमात्र काम नहीं है। समाज में अधिकतर काम मेवा के रूप में होता है। {{Indent}}एक पिन बनाने का कारख़ाना है। उसमें एक मशीन से लाखॉ पिने तैयार होती हैं और सैकड़ों आदमी काम करते हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि मशीन चलाने वाले व्यक्ति के श्रम से कितनी पिनें बनीं; कितनी पिनें मशीन के आविष्कारक को और कितनी मशीन के इंजीनियर को मिलनी चाहिएं । एकान्त जंगल में रहने वाला कह सकता है कि अपनी कुटिया मैंने खुद वनाई है। उसमें किसी दूसरे का श्रम नहीं लगा; किन्तु सम्य समाज में रहने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि कुर्सी, मेज़, मोटर आदि जिन वस्तुओं का वह नित्य उपयोग करता है, वे उसके अकेले के श्रम से बनी हैं । वास्तव में उन चीज़ों के बनाने में उसके निजी श्रम के अलावा दर्जनों आदमियों का श्रम लगा होता है। ऐसी दशा में जो जितना पैदा करे, उसको उतना ही देने की कोशिश करना ठीक वैसा ही सिद्ध होगा जैसा किसी तालाब में से पानी की<noinclude></noinclude> gncl1enr4qtv4adumu8ya536968avnb 662812 662811 2026-06-14T12:23:09Z Chahar 009 6627 662812 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ३ :'''|}}</noinclude><center>{{xx-larger|'''विभाजन की सात योजनायें'''}} <Br>{{Indent}}सम्पत्ति के विभाजन की सब से अच्छी योजना क्या है, यह मालूम करने के लिए हमको सभी सम्भव योजनानों पर विचार कर लेना चाहिए। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;यह योजना बहुधा पेश की जाती है कि प्रत्येक को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, सम्पत्ति का उतना भाग मिल जाया करे, जितना उसने {{Indent}}अपने श्रम से पैदा किया हो। वैसे दिखने में यह पहली योजना योजना लीक प्रतीत होती है; किन्तु जब हम इसको {{Indent}}न्यावहारिक रूप देने लगते हैं तो अनेक कठिनाइयाँ खड़ी हो जाती है । प्रथम तो यह मालूम करना ही कठिन होता है कि हर एक ने कितना पैदा किया । दूसरे ठोस पदायों का निर्माण ही दुनिया में एकमात्र काम नहीं है। समाज में अधिकतर काम मेवा के रूप में होता है। {{Indent}}एक पिन बनाने का कारख़ाना है। उसमें एक मशीन से लाखॉ पिने तैयार होती हैं और सैकड़ों आदमी काम करते हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि मशीन चलाने वाले व्यक्ति के श्रम से कितनी पिनें बनीं; कितनी पिनें मशीन के आविष्कारक को और कितनी मशीन के इंजीनियर को मिलनी चाहिएं । एकान्त जंगल में रहने वाला कह सकता है कि अपनी कुटिया मैंने खुद वनाई है। उसमें किसी दूसरे का श्रम नहीं लगा; किन्तु सम्य समाज में रहने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि कुर्सी, मेज़, मोटर आदि जिन वस्तुओं का वह नित्य उपयोग करता है, वे उसके अकेले के श्रम से बनी हैं । वास्तव में उन चीज़ों के बनाने में उसके निजी श्रम के अलावा दर्जनों आदमियों का श्रम लगा होता है। ऐसी दशा में जो जितना पैदा करे, उसको उतना ही देने की कोशिश करना ठीक वैसा ही सिद्ध होगा जैसा किसी तालाब में से पानी की<noinclude></noinclude> kf6kmg4othn4dyosagel9eshmhtc5eb 662813 662812 2026-06-14T12:24:14Z Chahar 009 6627 662813 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ३ :'''|}}</noinclude><center>{{xx-larger|'''विभाजन की सात योजनायें'''}} <Br>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;सम्पत्ति के विभाजन की सब से अच्छी योजना क्या है, यह मालूम करने के लिए हमको सभी सम्भव योजनानों पर विचार कर लेना चाहिए। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;यह योजना बहुधा पेश की जाती है कि प्रत्येक को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, सम्पत्ति का उतना भाग मिल जाया करे, जितना उसने &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;अपने श्रम से पैदा किया हो। वैसे दिखने में यह पहली योजना योजना लीक प्रतीत होती है; किन्तु जब हम इसको &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;न्यावहारिक रूप देने लगते हैं तो अनेक कठिनाइयाँ खड़ी हो जाती है । प्रथम तो यह मालूम करना ही कठिन होता है कि हर एक ने कितना पैदा किया । दूसरे ठोस पदायों का निर्माण ही दुनिया में एकमात्र काम नहीं है। समाज में अधिकतर काम मेवा के रूप में होता है। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;एक पिन बनाने का कारख़ाना है। उसमें एक मशीन से लाखॉ पिने तैयार होती हैं और सैकड़ों आदमी काम करते हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि मशीन चलाने वाले व्यक्ति के श्रम से कितनी पिनें बनीं; कितनी पिनें मशीन के आविष्कारक को और कितनी मशीन के इंजीनियर को मिलनी चाहिएं । एकान्त जंगल में रहने वाला कह सकता है कि अपनी कुटिया मैंने खुद वनाई है। उसमें किसी दूसरे का श्रम नहीं लगा; किन्तु सम्य समाज में रहने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि कुर्सी, मेज़, मोटर आदि जिन वस्तुओं का वह नित्य उपयोग करता है, वे उसके अकेले के श्रम से बनी हैं । वास्तव में उन चीज़ों के बनाने में उसके निजी श्रम के अलावा दर्जनों आदमियों का श्रम लगा होता है। ऐसी दशा में जो जितना पैदा करे, उसको उतना ही देने की कोशिश करना ठीक वैसा ही सिद्ध होगा जैसा किसी तालाब में से पानी की<noinclude></noinclude> bbvdhwo4n2u7pucnnfetyh8iyaq176h 662814 662813 2026-06-14T12:25:20Z Chahar 009 6627 662814 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ३ 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इंजीनियर को मिलनी चाहिएं । एकान्त जंगल में रहने वाला कह सकता है कि अपनी कुटिया मैंने खुद वनाई है। उसमें किसी दूसरे का श्रम नहीं लगा; किन्तु सम्य समाज में रहने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि कुर्सी, मेज़, मोटर आदि जिन वस्तुओं का वह नित्य उपयोग करता है, वे उसके अकेले के श्रम से बनी हैं । वास्तव में उन चीज़ों के बनाने में उसके निजी श्रम के अलावा दर्जनों आदमियों का श्रम लगा होता है। ऐसी दशा में जो जितना पैदा करे, उसको उतना ही देने की कोशिश करना ठीक वैसा ही सिद्ध होगा जैसा किसी तालाब में से पानी की<noinclude></noinclude> anziqc91n1thtrlaqrfrgxh1tatrfcy 662821 662814 2026-06-14T17:26:36Z Chahar 009 6627 662821 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ३ :'''|}}</noinclude><center>{{xx-larger|'''विभाजन की सात योजनायें'''}} <Br>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;सम्पत्ति के विभाजन की सब से अच्छी योजना क्या है, यह मालूम करने के लिए हमको सभी सम्भव योजनानों पर विचार कर लेना चाहिए। यह योजना बहुधा पेश की जाती है कि प्रत्येक को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, 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कारख़ाना है। उसमें एक मशीन से लाखॉ पिने तैयार होती हैं और सैकड़ों आदमी काम करते हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि मशीन चलाने वाले व्यक्ति के श्रम से कितनी पिनें बनीं; कितनी पिनें मशीन के आविष्कारक को और कितनी मशीन के इंजीनियर को मिलनी चाहिएं । एकान्त जंगल में रहने वाला कह सकता है कि अपनी कुटिया मैंने खुद वनाई है। उसमें किसी दूसरे का श्रम नहीं लगा; किन्तु सम्य समाज में रहने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि कुर्सी, मेज़, मोटर आदि जिन वस्तुओं का वह नित्य उपयोग करता है, वे उसके अकेले के श्रम से बनी हैं । वास्तव में उन चीज़ों के बनाने में उसके निजी श्रम के अलावा दर्जनों आदमियों का श्रम लगा होता है। ऐसी दशा में जो जितना पैदा करे, उसको उतना ही देने की कोशिश करना ठीक वैसा ही सिद्ध होगा जैसा किसी तालाब में से पानी की<noinclude></noinclude> q3rcwme3ffwmc9nlc32fa98wfefnxam 662860 662858 2026-06-15T04:11:38Z Chahar 009 6627 662860 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ३ :'''|}} <center>{{xx-larger|'''विभाजन की सात योजनायें'''}} <br></noinclude>सम्पत्ति के विभाजन की सब से अच्छी योजना क्या है, यह मालूम करने के लिए हमको सभी सम्भव योजनानों पर विचार कर लेना चाहिए। यह योजना बहुधा पेश की जाती है कि प्रत्येक को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, सम्पत्ति का उतना भाग मिल जाया करे, जितना उसने अपने श्रम से पैदा किया हो। वैसे दिखने में यह पहली योजना योजना लीक प्रतीत होती है; किन्तु जब हम इसको न्यावहारिक रूप देने लगते हैं तो अनेक कठिनाइयाँ खड़ी हो जाती है । प्रथम तो यह मालूम करना ही कठिन होता है कि हर एक ने कितना पैदा किया । दूसरे ठोस पदायों का निर्माण ही दुनिया में एकमात्र काम नहीं है। समाज में अधिकतर काम मेवा के रूप में होता है। एक पिन बनाने का कारख़ाना है। उसमें एक मशीन से लाखॉ पिने तैयार होती हैं और सैकड़ों आदमी काम करते हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि मशीन चलाने वाले व्यक्ति के श्रम से कितनी पिनें बनीं; कितनी पिनें मशीन के आविष्कारक को और कितनी मशीन के इंजीनियर को मिलनी चाहिएं । एकान्त जंगल में रहने वाला कह सकता है कि अपनी कुटिया मैंने खुद वनाई है। उसमें किसी दूसरे का श्रम नहीं लगा; किन्तु सम्य समाज में रहने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि कुर्सी, मेज़, मोटर आदि जिन वस्तुओं का वह नित्य उपयोग करता है, वे उसके अकेले के श्रम से बनी हैं । वास्तव में उन चीज़ों के बनाने में उसके निजी श्रम के अलावा दर्जनों आदमियों का श्रम लगा होता है। ऐसी दशा में जो जितना पैदा करे, उसको उतना ही देने की कोशिश करना ठीक वैसा ही सिद्ध होगा जैसा किसी तालाब में से पानी की<noinclude></noinclude> mc9k09ffqivuimlf2yx52eit9eiwxt7 पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२४ 250 77025 662815 565807 2026-06-14T13:47:27Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662815 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{center}विभाजन की मान योजनायें १० उतनी ही निकालने की कोशिश करना जितनी वर्षा के समय उसमें गिरी हो । यह सम्भव हो सकता है कि हरएक को काम के घंटों के हिसाब से पैसा दे दिया जाय; किन्तु उस दशा में कुछ चार पैसे घन्टा माँगेंगे, कुछ चार रपया घन्टा और कुछ चार सौ रुपया घन्टे में भी राजी न होंगे। ये भाव इस बात पर निर्भर रहते हैं कि काम करने वालों की संख्या कितनी हैं और वे ग़रीब हैं या धनी । जय मजदूरों की संख्या अधिक होती है। और उन्हें काम नहीं मिलता तो वे इतनी थोडी मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं कि जिससे वे दो समय केवल अपना पेट भर सकें कुछ स्थानों में तो नित्य की बेकारी के कारण साधारण मज़दूरी की दर इतनी थोड़ी रह गई है कि लोगों का पेट भी नहीं भरता । उदाहरण के लिए चार पैसे में हम एक मजदूर से घंटा भर लकडी सकते हैं। श्रथवा एक नील घोभा उठवा सक्ने हैं। इसके विपरीत हमारा डाक्टर हम से एक घन्टे के चार रुपये मांग सकता है और एक वैरिस्टर एक घंटा पैरवी करने के लिए चार सौ पए में भी थानाकानी कर सकता है। हम डाक्टरों और वैरिस्टरों को इतना अधिक क्यों देते हैं ? इसलिए कि ऐसे लोगों की मंग्या कम होती है और दुनिया में ऐसे मरीजों और मुवक्किलों की कमी नहीं है जो उन्हें बड़ी-बड़ी रकमे देते रहते हैं । जो बड़ी रकम नहीं दे पाते, उन्हें उनकी मदद भी नहीं मिलती। अर्थशास्त्र की भाषा में यह उत्पत्ति और माँग का नियम कहलाता है । किन्तु इस नियम से जो परिणाम पैदा होते हैं, उनको हम चांदनीय नहीं कह सकते। यदि एक व्यक्ति को एक घंटे में सिर्फ चार पैसा मिले और दूसरे को चार सौ रुपया तो क्या सम्पत्ति का यह विभाजन रचित होगा, नैतिक होगा ? पश्चिमी देशों में सुन्दर मुखाकृति और हाव-भाव वाला एक बालक, जो अभिनय कला में थोड़ी गति रखता हो. साधारण व्यवसाय में दिन-रात घिस बिस करने वाले अपने बाप की अपेक्षा सैकड़ो गुना अधिक कमा सकता है। आज कौन नहीं जानना २<noinclude></noinclude> 7ytiisgo4efw9nxevis3snwmbcq1066 662816 662815 2026-06-14T13:50:13Z Chahar 009 6627 662816 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{{RunningHeader|center=विभाजन की मान योजनायें|right=१०}} उतनी ही निकालने की कोशिश करना जितनी वर्षा के समय उसमें गिरी हो । यह सम्भव हो सकता है कि हरएक को काम के घंटों के हिसाब से पैसा दे दिया जाय; किन्तु उस दशा में कुछ चार पैसे घन्टा माँगेंगे, कुछ चार रपया घन्टा और कुछ चार सौ रुपया घन्टे में भी राजी न होंगे। ये भाव इस बात पर निर्भर रहते हैं कि काम करने वालों की संख्या कितनी हैं और वे ग़रीब हैं या धनी । जय मजदूरों की संख्या अधिक होती है। और उन्हें काम नहीं मिलता तो वे इतनी थोडी मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं कि जिससे वे दो समय केवल अपना पेट भर सकें कुछ स्थानों में तो नित्य की बेकारी के कारण साधारण मज़दूरी की दर इतनी थोड़ी रह गई है कि लोगों का पेट भी नहीं भरता । उदाहरण के लिए चार पैसे में हम एक मजदूर से घंटा भर लकडी सकते हैं। श्रथवा एक नील घोभा उठवा सक्ने हैं। इसके विपरीत हमारा डाक्टर हम से एक घन्टे के चार रुपये मांग सकता है और एक वैरिस्टर एक घंटा पैरवी करने के लिए चार सौ पए में भी थानाकानी कर सकता है। हम डाक्टरों और वैरिस्टरों को इतना अधिक क्यों देते हैं ? इसलिए कि ऐसे लोगों की मंग्या कम होती है और दुनिया में ऐसे मरीजों और मुवक्किलों की कमी नहीं है जो उन्हें बड़ी-बड़ी रकमे देते रहते हैं । जो बड़ी रकम नहीं दे पाते, उन्हें उनकी मदद भी नहीं मिलती। अर्थशास्त्र की भाषा में यह उत्पत्ति और माँग का नियम कहलाता है । किन्तु इस नियम से जो परिणाम पैदा होते हैं, उनको हम चांदनीय नहीं कह सकते। यदि एक व्यक्ति को एक घंटे में सिर्फ चार पैसा मिले और दूसरे को चार सौ रुपया तो क्या सम्पत्ति का यह विभाजन रचित होगा, नैतिक होगा ? पश्चिमी देशों में सुन्दर मुखाकृति और हाव-भाव वाला एक बालक, जो अभिनय कला में थोड़ी गति रखता हो. साधारण व्यवसाय में दिन-रात घिस बिस करने वाले अपने बाप की अपेक्षा सैकड़ो गुना अधिक कमा सकता है। आज कौन नहीं जानना २<noinclude></noinclude> rq2y1584ex85ik1lit9zzrfzlluybfg 662820 662816 2026-06-14T17:25:39Z Chahar 009 6627 662820 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{{RunningHeader|center=विभाजन की मान योजनायें|right=१०}} उतनी ही निकालने की कोशिश करना जितनी वर्षा के समय उसमें गिरी हो । यह सम्भव हो सकता है कि हरएक को काम के घंटों के हिसाब से पैसा दे दिया जाय; किन्तु उस दशा में कुछ चार पैसे घन्टा माँगेंगे, कुछ चार रपया घन्टा और कुछ चार सौ रुपया घन्टे में भी राजी न होंगे। ये भाव इस बात पर निर्भर रहते हैं कि काम करने वालों की संख्या कितनी हैं और वे ग़रीब हैं या धनी । जय मजदूरों की संख्या अधिक होती है। और उन्हें काम नहीं मिलता तो वे इतनी थोडी मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं कि जिससे वे दो समय केवल अपना पेट भर सकें कुछ स्थानों में तो नित्य की बेकारी के कारण साधारण मज़दूरी की दर इतनी थोड़ी रह गई है कि लोगों का पेट भी नहीं भरता । उदाहरण के लिए चार पैसे में हम एक मजदूर से घंटा भर लकडी सकते हैं। श्रथवा एक नील घोभा उठवा सक्ने हैं। इसके विपरीत हमारा डाक्टर हम से एक घन्टे के चार रुपये मांग सकता है और एक वैरिस्टर एक घंटा पैरवी करने के लिए चार सौ पए में भी थानाकानी कर सकता है। हम डाक्टरों और वैरिस्टरों को इतना अधिक क्यों देते हैं ? इसलिए कि ऐसे लोगों की मंग्या कम होती है और दुनिया में ऐसे मरीजों और मुवक्किलों की कमी नहीं है जो उन्हें बड़ी-बड़ी रकमे देते रहते हैं । जो बड़ी रकम नहीं दे पाते, उन्हें उनकी मदद भी नहीं मिलती। अर्थशास्त्र की भाषा में यह उत्पत्ति और माँग का नियम कहलाता है । किन्तु इस नियम से जो परिणाम पैदा होते हैं, उनको हम चांदनीय नहीं कह सकते। यदि एक व्यक्ति को एक घंटे में सिर्फ चार पैसा मिले और दूसरे को चार सौ रुपया तो क्या सम्पत्ति का यह विभाजन रचित होगा, नैतिक होगा ? पश्चिमी देशों में सुन्दर मुखाकृति और हाव-भाव वाला एक बालक, जो अभिनय कला में थोड़ी गति रखता हो. साधारण व्यवसाय में दिन-रात घिस बिस करने वाले अपने बाप की अपेक्षा सैकड़ो गुना अधिक कमा सकता है। आज कौन नहीं जानना २<noinclude></noinclude> gahgmdza4wzqy7mk488ri4vb6njz730 662822 662820 2026-06-14T17:27:15Z Chahar 009 6627 662822 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{{RunningHeader|center=विभाजन की मान योजनायें|right=१०}} उतनी ही निकालने की कोशिश करना जितनी वर्षा के समय उसमें गिरी हो । यह सम्भव हो सकता है कि हरएक को काम के घंटों के हिसाब से पैसा दे दिया जाय; किन्तु उस दशा में कुछ चार पैसे घन्टा माँगेंगे, कुछ चार रपया घन्टा और कुछ चार सौ रुपया घन्टे में भी राजी न होंगे। ये भाव इस बात पर निर्भर रहते हैं कि काम करने वालों की संख्या कितनी हैं और वे ग़रीब हैं या धनी । जय मजदूरों की संख्या अधिक होती है। और उन्हें काम नहीं मिलता तो वे इतनी थोडी मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं कि जिससे वे दो समय केवल अपना पेट भर सकें कुछ स्थानों में तो नित्य की बेकारी के कारण साधारण मज़दूरी की दर इतनी थोड़ी रह गई है कि लोगों का पेट भी नहीं भरता । उदाहरण के लिए चार पैसे में हम एक मजदूर से घंटा भर लकडी सकते हैं। श्रथवा एक नील घोभा उठवा सक्ने हैं। इसके विपरीत हमारा डाक्टर हम से एक घन्टे के चार रुपये मांग सकता है और एक वैरिस्टर एक घंटा पैरवी करने के लिए चार सौ पए में भी थानाकानी कर सकता है। हम डाक्टरों और वैरिस्टरों को इतना अधिक क्यों देते हैं ? इसलिए कि ऐसे लोगों की मंग्या कम होती है और दुनिया में ऐसे मरीजों और मुवक्किलों की कमी नहीं है जो उन्हें बड़ी-बड़ी रकमे देते रहते हैं । जो बड़ी रकम नहीं दे पाते, उन्हें उनकी मदद भी नहीं मिलती। अर्थशास्त्र की भाषा में यह उत्पत्ति और माँग का नियम कहलाता है । किन्तु इस नियम से जो परिणाम पैदा होते हैं, उनको हम चांदनीय नहीं कह सकते। यदि एक व्यक्ति को एक घंटे में सिर्फ चार पैसा मिले और दूसरे को चार सौ रुपया तो क्या सम्पत्ति का यह विभाजन रचित होगा, नैतिक होगा ? पश्चिमी देशों में सुन्दर मुखाकृति और हाव-भाव वाला एक बालक, जो अभिनय कला में थोड़ी गति रखता हो. साधारण व्यवसाय में दिन-रात घिस बिस करने वाले अपने बाप की अपेक्षा सैकड़ो गुना अधिक कमा सकता है। आज कौन नहीं जानना २<noinclude></noinclude> du7wpn15dwkmt7g35dr7lzbw8p7zw7i 662861 662822 2026-06-15T04:12:17Z Chahar 009 6627 662861 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center=विभाजन की मान योजनायें|right=१०}}</noinclude>उतनी ही निकालने की कोशिश करना जितनी वर्षा के समय उसमें गिरी हो । यह सम्भव हो सकता है कि हरएक को काम के घंटों के हिसाब से पैसा दे दिया जाय; किन्तु उस दशा में कुछ चार पैसे घन्टा माँगेंगे, कुछ चार रपया घन्टा और कुछ चार सौ रुपया घन्टे में भी राजी न होंगे। ये भाव इस बात पर निर्भर रहते हैं कि काम करने वालों की संख्या कितनी हैं और वे ग़रीब हैं या धनी । जय मजदूरों की संख्या अधिक होती है। और उन्हें काम नहीं मिलता तो वे इतनी थोडी मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं कि जिससे वे दो समय केवल अपना पेट भर सकें कुछ स्थानों में तो नित्य की बेकारी के कारण साधारण मज़दूरी की दर इतनी थोड़ी रह गई है कि लोगों का पेट भी नहीं भरता । उदाहरण के लिए चार पैसे में हम एक मजदूर से घंटा भर लकडी सकते हैं। श्रथवा एक नील घोभा उठवा सक्ने हैं। इसके विपरीत हमारा डाक्टर हम से एक घन्टे के चार रुपये मांग सकता है और एक वैरिस्टर एक घंटा पैरवी करने के लिए चार सौ पए में भी थानाकानी कर सकता है। हम डाक्टरों और वैरिस्टरों को इतना अधिक क्यों देते हैं ? इसलिए कि ऐसे लोगों की मंग्या कम होती है और दुनिया में ऐसे मरीजों और मुवक्किलों की कमी नहीं है जो उन्हें बड़ी-बड़ी रकमे देते रहते हैं । जो बड़ी रकम नहीं दे पाते, उन्हें उनकी मदद भी नहीं मिलती। अर्थशास्त्र की भाषा में यह उत्पत्ति और माँग का नियम कहलाता है । किन्तु इस नियम से जो परिणाम पैदा होते हैं, उनको हम चांदनीय नहीं कह सकते। यदि एक व्यक्ति को एक घंटे में सिर्फ चार पैसा मिले और दूसरे को चार सौ रुपया तो क्या सम्पत्ति का यह विभाजन रचित होगा, नैतिक होगा ? पश्चिमी देशों में सुन्दर मुखाकृति और हाव-भाव वाला एक बालक, जो अभिनय कला में थोड़ी गति रखता हो. साधारण व्यवसाय में दिन-रात घिस बिस करने वाले अपने बाप की अपेक्षा सैकड़ो गुना अधिक कमा सकता है। आज कौन नहीं जानना २<noinclude></noinclude> fazuuugcc02xdsgzhzhj8iyu3e59907 662863 662861 2026-06-15T04:13:35Z Chahar 009 6627 662863 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center=विभाजन की मान योजनायें|right=१०}}</noinclude>उतनी ही निकालने की कोशिश करना जितनी वर्षा के समय उसमें गिरी हो । यह सम्भव हो सकता है कि हरएक को काम के घंटों के हिसाब से पैसा दे दिया जाय; किन्तु उस दशा में कुछ चार पैसे घन्टा माँगेंगे, कुछ चार रपया घन्टा और कुछ चार सौ रुपया घन्टे में भी राजी न होंगे। ये भाव इस बात पर निर्भर रहते हैं कि काम करने वालों की संख्या कितनी हैं और वे ग़रीब हैं या धनी । जय मजदूरों की संख्या अधिक होती है। और उन्हें काम नहीं मिलता तो वे इतनी थोडी मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं कि जिससे वे दो समय केवल अपना पेट भर सकें कुछ स्थानों में तो नित्य की बेकारी के कारण साधारण मज़दूरी की दर इतनी थोड़ी रह गई है कि लोगों का पेट भी नहीं भरता । उदाहरण के लिए चार पैसे में हम एक मजदूर से घंटा भर लकडी सकते हैं। श्रथवा एक नील घोभा उठवा सक्ने हैं। इसके विपरीत हमारा डाक्टर हम से एक घन्टे के चार रुपये मांग सकता है और एक वैरिस्टर एक घंटा पैरवी करने के लिए चार सौ पए में भी थानाकानी कर सकता है। हम डाक्टरों और वैरिस्टरों को इतना अधिक क्यों देते हैं ? इसलिए कि ऐसे लोगों की मंग्या कम होती है और दुनिया में ऐसे मरीजों और मुवक्किलों की कमी नहीं है जो उन्हें बड़ी-बड़ी रकमे देते रहते हैं । जो बड़ी रकम नहीं दे पाते, उन्हें उनकी मदद भी नहीं मिलती। अर्थशास्त्र की भाषा में यह उत्पत्ति और माँग का नियम कहलाता है । किन्तु इस नियम से जो परिणाम पैदा होते हैं, उनको हम चांदनीय नहीं कह सकते। यदि एक व्यक्ति को एक घंटे में सिर्फ चार पैसा मिले और दूसरे को चार सौ रुपया तो क्या सम्पत्ति का यह विभाजन रचित होगा, नैतिक होगा ? पश्चिमी देशों में सुन्दर मुखाकृति और हाव-भाव वाला एक बालक, जो अभिनय कला में थोड़ी गति रखता हो. साधारण व्यवसाय में दिन-रात घिस बिस करने वाले अपने बाप की अपेक्षा सैकड़ो गुना अधिक कमा सकता है। आज कौन नहीं जानना<noinclude>२</noinclude> 66efqs968f6s0tsousmh0qe6yqpv0s1 662940 662863 2026-06-15T09:15:52Z Chahar 009 6627 /* समस्याकारक */ 662940 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="2" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center=विभाजन की मान योजनायें|right=१०}}</noinclude>उतनी ही निकालने की कोशिश करना जितनी वर्षा के समय उसमें गिरी हो । यह सम्भव हो सकता है कि हरएक को काम के घंटों के हिसाब से पैसा दे दिया जाय; किन्तु उस दशा में कुछ चार पैसे घन्टा माँगेंगे, कुछ चार रपया घन्टा और कुछ चार सौ रुपया घन्टे में भी राजी न होंगे। ये भाव इस बात पर निर्भर रहते हैं कि काम करने वालों की संख्या कितनी हैं और वे ग़रीब हैं या धनी । जय मजदूरों की संख्या अधिक होती है। और उन्हें काम नहीं मिलता तो वे इतनी थोडी मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं कि जिससे वे दो समय केवल अपना पेट भर सकें कुछ स्थानों में तो नित्य की बेकारी के कारण साधारण मज़दूरी की दर इतनी थोड़ी रह गई है कि लोगों का पेट भी नहीं भरता । उदाहरण के लिए चार पैसे में हम एक मजदूर से घंटा भर लकडी सकते हैं। श्रथवा एक नील घोभा उठवा सक्ने हैं। इसके विपरीत हमारा डाक्टर हम से एक घन्टे के चार रुपये मांग सकता है और एक वैरिस्टर एक घंटा पैरवी करने के लिए चार सौ पए में भी थानाकानी कर सकता है। हम डाक्टरों और वैरिस्टरों को इतना अधिक क्यों देते हैं ? इसलिए कि ऐसे लोगों की मंग्या कम होती है और दुनिया में ऐसे मरीजों और मुवक्किलों की कमी नहीं है जो उन्हें बड़ी-बड़ी रकमे देते रहते हैं । जो बड़ी रकम नहीं दे पाते, उन्हें उनकी मदद भी नहीं मिलती। अर्थशास्त्र की भाषा में यह उत्पत्ति और माँग का नियम कहलाता है । किन्तु इस नियम से जो परिणाम पैदा होते हैं, उनको हम चांदनीय नहीं कह सकते। यदि एक व्यक्ति को एक घंटे में सिर्फ चार पैसा मिले और दूसरे को चार सौ रुपया तो क्या सम्पत्ति का यह विभाजन रचित होगा, नैतिक होगा ? पश्चिमी देशों में सुन्दर मुखाकृति और हाव-भाव वाला एक बालक, जो अभिनय कला में थोड़ी गति रखता हो. साधारण व्यवसाय में दिन-रात घिस बिस करने वाले अपने बाप की अपेक्षा सैकड़ो गुना अधिक कमा सकता है। आज कौन नहीं जानना<noinclude>{{rh||२||}}</noinclude> 93vlidk63mqtsylq9wjsuo2h5yn680y 662941 662940 2026-06-15T09:33:23Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662941 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center='''विभाजन की मान योजनायें'''|right='''१०'''}}</noinclude>उतनी ही निकालने की कोशिश करना जितनी वर्षा के समय उसमें गिरी हो । यह सम्भव हो सकता है कि हरएक को काम के घंटों के हिसाब से पैसा दे दिया जाय; किन्तु उस दशा में कुछ चार पैसे घन्टा माँगेंगे, कुछ चार रपया घन्टा और कुछ चार सौ रुपया घन्टे में भी राजी न होंगे। ये भाव इस बात पर निर्भर रहते हैं कि काम करने वालों की संख्या कितनी हैं और वे ग़रीब हैं या धनी । जय मजदूरों की संख्या अधिक होती है। और उन्हें काम नहीं मिलता तो वे इतनी थोडी मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं कि जिससे वे दो समय केवल अपना पेट भर सकें कुछ स्थानों में तो नित्य की बेकारी के कारण साधारण मज़दूरी की दर इतनी थोड़ी रह गई है कि लोगों का पेट भी नहीं भरता । उदाहरण के लिए चार पैसे में हम एक मजदूर से घंटा भर लकडी सकते हैं। श्रथवा एक नील घोभा उठवा सक्ने हैं। इसके विपरीत हमारा डाक्टर हम से एक घन्टे के चार रुपये मांग सकता है और एक वैरिस्टर एक घंटा पैरवी करने के लिए चार सौ पए में भी थानाकानी कर सकता है। हम डाक्टरों और वैरिस्टरों को इतना अधिक क्यों देते हैं ? इसलिए कि ऐसे लोगों की मंग्या कम होती है और दुनिया में ऐसे मरीजों और मुवक्किलों की कमी नहीं है जो उन्हें बड़ी-बड़ी रकमे देते रहते हैं । जो बड़ी रकम नहीं दे पाते, उन्हें उनकी मदद भी नहीं मिलती। अर्थशास्त्र की भाषा में यह उत्पत्ति और माँग का नियम कहलाता है । किन्तु इस नियम से जो परिणाम पैदा होते हैं, उनको हम चांदनीय नहीं कह सकते। यदि एक व्यक्ति को एक घंटे में सिर्फ चार पैसा मिले और दूसरे को चार सौ रुपया तो क्या सम्पत्ति का यह विभाजन रचित होगा, नैतिक होगा ? पश्चिमी देशों में सुन्दर मुखाकृति और हाव-भाव वाला एक बालक, जो अभिनय कला में थोड़ी गति रखता हो. साधारण व्यवसाय में दिन-रात घिस बिस करने वाले अपने बाप की अपेक्षा सैकड़ो गुना अधिक कमा सकता है। आज कौन नहीं जानना<noinclude> {{rh|२||}}</noinclude> juate8f907n18umjovg48f6mkjr2bop 662942 662941 2026-06-15T09:36:38Z Chahar 009 6627 662942 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center='''विभाजन की मान योजनायें'''|right='''१०'''}}</noinclude> उतनी ही बुँदे निकालने की कोशिश करना जितनी वर्षा के समय उसमें गिरी हो । यह सम्भव हो सकता है कि हरएक को काम के घंटों के हिसाब से पैसा दे दिया जाय; किन्तु उस दशा में कुछ चार पैसे घन्टा माँगेंगे, कुछ चार रपया घन्टा और कुछ चार सौ रुपया घन्टे में भी राजी न होंगे। ये भाव इस बात पर निर्भर रहते हैं कि काम करने वालों की संख्या कितनी हैं और वे ग़रीब हैं या धनी । जय मजदूरों की संख्या अधिक होती है। और उन्हें काम नहीं मिलता तो वे इतनी थोडी मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं कि जिससे वे दो समय केवल अपना पेट भर सकें कुछ स्थानों में तो नित्य की बेकारी के कारण साधारण मज़दूरी की दर इतनी थोड़ी रह गई है कि लोगों का पेट भी नहीं भरता । उदाहरण के लिए चार पैसे में हम एक मजदूर से घंटा भर लकडी सकते हैं। श्रथवा एक नील घोभा उठवा सक्ने हैं। इसके विपरीत हमारा डाक्टर हम से एक घन्टे के चार रुपये मांग सकता है और एक वैरिस्टर एक घंटा पैरवी करने के लिए चार सौ पए में भी थानाकानी कर सकता है। हम डाक्टरों और वैरिस्टरों को इतना अधिक क्यों देते हैं ? इसलिए कि ऐसे लोगों की मंग्या कम होती है और दुनिया में ऐसे मरीजों और मुवक्किलों की कमी नहीं है जो उन्हें बड़ी-बड़ी रकमे देते रहते हैं । जो बड़ी रकम नहीं दे पाते, उन्हें उनकी मदद भी नहीं मिलती। अर्थशास्त्र की भाषा में यह उत्पत्ति और माँग का नियम कहलाता है । किन्तु इस नियम से जो परिणाम पैदा होते हैं, उनको हम चांदनीय नहीं कह सकते। यदि एक व्यक्ति को एक घंटे में सिर्फ चार पैसा मिले और दूसरे को चार सौ रुपया तो क्या सम्पत्ति का यह विभाजन रचित होगा, नैतिक होगा ? पश्चिमी देशों में सुन्दर मुखाकृति और हाव-भाव वाला एक बालक, जो अभिनय कला में थोड़ी गति रखता हो. साधारण व्यवसाय में दिन-रात घिस बिस करने वाले अपने बाप की अपेक्षा सैकड़ो गुना अधिक कमा सकता है। आज कौन नहीं जानना<noinclude> {{rh|२||}}</noinclude> 9plvy0afspjnvq70cwytghw2bnuyxef पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२५ 250 77027 662818 565808 2026-06-14T17:22:42Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662818 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{{RunningHeader|left=१८|center=समाजवाद : पूंजीवाद}} कि एक सुन्दर युवती पतिव्रता स्त्री की तुलना में दुराचरण द्वारा कहीं अधिक कमा सकती है ? डाक्टर और वैरिस्टर जब सामान्य मजदूर की अपेक्षा अधिक पैसा माँगते हैं तो वे कह सकते है कि उनके एक-एक मिनट के पीछे उनकी वर्णों की मेहनत लगी हुई है। हरएक आदमी यह स्वीकार करेगा कि साधारण मजदूर और डाक्टर-वैरिस्टर की मजदूरियों में अन्तर रहता है; किन्तु यह कह सकना बड़ा कठिन है कि समय अथवा रुपये-पैसे के रूप में उस अन्तर का ठीक परिमाण क्या है और क्या होना चाहिए। इसी लिए हमको उत्पत्ति और मांग के नियम का श्राश्रय लेना पडता है। कुछ कामों का ठोस परिणाम निकलता है और कुछ का नहीं । उदाहरण के लिए किसी खाती ने जानवरों को खेत में जाने से रोकने के लिए लकड़ी का एक फाटक बनाया। यह उसकी मेहनत का ठोस फल हुआ, जिसको तबतक वह अपने कब्जे में रख सकता है जबतक उस को उसके बनाने की मजदूरी न मिल जाय । किन्तु वह देहाती लट्का, जो खेत पर पक्षी उड़ाने के लिए हल्ला किया करता है,अपने काम का ऐसा कोई परिणाम नहीं बता सकता; हालाँकि उसका काम खाती के काम जितना ही आवश्यक होता है । डाकिया कुछ नहीं बनाता, वह चिट्टियाँ और पार्सलें बांटता है। पुलिस का सिपाही कोई चीज़ नहीं बनाता और सैनिक न केवल वनाता ही नहीं है, उल्टा पदार्थों को नष्ट करता है। डाक्टर, वकील, पुरोहित, धारा-समाश्रों के सदस्य, नौकर, राजा-रानी और अभिनेता- ये सभी कौनसी ठोस चीजें बनाते हैं ? जब ये काम कर चुकते हैं तो उनके पास ऐसा कुछ नहीं होता, जिसे तोला या मापा जा सके और तदनुसार उनको मजदूरी दी जा सके । अतः यह स्पष्ट है कि हरएक अपने श्रम से जितना पैदा करे, उम्मको उतना देने की अथवा हरएक के समय का मूल्य रुपये, श्राने, पाई में श्रांकने की कोशिश करना बेकार है। उसमें हम सफल नहीं हो सकते । कुछ लोगों का यह कहना है किं योग्यता के अनुसार सम्पत्ति का विभाजन होना चाहिए । उस दशा में आलसियों और दुष्टों को कुछ न<noinclude></noinclude> 2tnw6lst5vti0a9a4w7umhtqzm3htq4 662819 662818 2026-06-14T17:24:55Z Chahar 009 6627 662819 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{{RunningHeader|left=१८|center=समाजवाद : पूंजीवाद}} कि एक सुन्दर युवती पतिव्रता स्त्री की तुलना में दुराचरण द्वारा कहीं अधिक कमा सकती है ? डाक्टर और वैरिस्टर जब सामान्य मजदूर की अपेक्षा अधिक पैसा माँगते हैं तो वे कह सकते है कि उनके एक-एक मिनट के पीछे उनकी वर्णों की मेहनत लगी हुई है। हरएक आदमी यह स्वीकार करेगा कि साधारण मजदूर और डाक्टर-वैरिस्टर की मजदूरियों में अन्तर रहता है; किन्तु यह कह सकना बड़ा कठिन है कि समय अथवा रुपये-पैसे के रूप में उस अन्तर का ठीक परिमाण क्या है और क्या होना चाहिए। इसी लिए हमको उत्पत्ति और मांग के नियम का श्राश्रय लेना पडता है। कुछ कामों का ठोस परिणाम निकलता है और कुछ का नहीं । उदाहरण के लिए किसी खाती ने जानवरों को खेत में जाने से रोकने के लिए लकड़ी का एक फाटक बनाया। यह उसकी मेहनत का ठोस फल हुआ, जिसको तबतक वह अपने कब्जे में रख सकता है जबतक उस को उसके बनाने की मजदूरी न मिल जाय । किन्तु वह देहाती लट्का, जो खेत पर पक्षी उड़ाने के लिए हल्ला किया करता है,अपने काम का ऐसा कोई परिणाम नहीं बता सकता; हालाँकि उसका काम खाती के काम जितना ही आवश्यक होता है । डाकिया कुछ नहीं बनाता, वह चिट्टियाँ और पार्सलें बांटता है। पुलिस का सिपाही कोई चीज़ नहीं बनाता और सैनिक न केवल वनाता ही नहीं है, उल्टा पदार्थों को नष्ट करता है। डाक्टर, वकील, पुरोहित, धारा-समाश्रों के सदस्य, नौकर, राजा-रानी और अभिनेता- ये सभी कौनसी ठोस चीजें बनाते हैं ? जब ये काम कर चुकते हैं तो उनके पास ऐसा कुछ नहीं होता, जिसे तोला या मापा जा सके और तदनुसार उनको मजदूरी दी जा सके । अतः यह स्पष्ट है कि हरएक अपने श्रम से जितना पैदा करे, उम्मको उतना देने की अथवा हरएक के समय का मूल्य रुपये, श्राने, पाई में श्रांकने की कोशिश करना बेकार है। उसमें हम सफल नहीं हो सकते । कुछ लोगों का यह कहना है किं योग्यता के अनुसार सम्पत्ति का विभाजन होना चाहिए । उस दशा में आलसियों और दुष्टों को कुछ न<noinclude></noinclude> nasv8y89gkxaunv4iur312498swzqu2 662862 662819 2026-06-15T04:13:02Z Chahar 009 6627 662862 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|left=१८|center=समाजवाद : पूंजीवाद}}</noinclude> कि एक सुन्दर युवती पतिव्रता स्त्री की तुलना में दुराचरण द्वारा कहीं अधिक कमा सकती है ? डाक्टर और वैरिस्टर जब सामान्य मजदूर की अपेक्षा अधिक पैसा माँगते हैं तो वे कह सकते है कि उनके एक-एक मिनट के पीछे उनकी वर्णों की मेहनत लगी हुई है। हरएक आदमी यह स्वीकार करेगा कि साधारण मजदूर और डाक्टर-वैरिस्टर की मजदूरियों में अन्तर रहता है; किन्तु यह कह सकना बड़ा कठिन है कि समय अथवा रुपये-पैसे के रूप में उस अन्तर का ठीक परिमाण क्या है और क्या होना चाहिए। इसी लिए हमको उत्पत्ति और मांग के नियम का श्राश्रय लेना पडता है। कुछ कामों का ठोस परिणाम निकलता है और कुछ का नहीं । उदाहरण के लिए किसी खाती ने जानवरों को खेत में जाने से रोकने के लिए लकड़ी का एक फाटक बनाया। यह उसकी मेहनत का ठोस फल हुआ, जिसको तबतक वह अपने कब्जे में रख सकता है जबतक उस को उसके बनाने की मजदूरी न मिल जाय । किन्तु वह देहाती लट्का, जो खेत पर पक्षी उड़ाने के लिए हल्ला किया करता है,अपने काम का ऐसा कोई परिणाम नहीं बता सकता; हालाँकि उसका काम खाती के काम जितना ही आवश्यक होता है । डाकिया कुछ नहीं बनाता, वह चिट्टियाँ और पार्सलें बांटता है। पुलिस का सिपाही कोई चीज़ नहीं बनाता और सैनिक न केवल वनाता ही नहीं है, उल्टा पदार्थों को नष्ट करता है। डाक्टर, वकील, पुरोहित, धारा-समाश्रों के सदस्य, नौकर, राजा-रानी और अभिनेता- ये सभी कौनसी ठोस चीजें बनाते हैं ? जब ये काम कर चुकते हैं तो उनके पास ऐसा कुछ नहीं होता, जिसे तोला या मापा जा सके और तदनुसार उनको मजदूरी दी जा सके । अतः यह स्पष्ट है कि हरएक अपने श्रम से जितना पैदा करे, उम्मको उतना देने की अथवा हरएक के समय का मूल्य रुपये, श्राने, पाई में श्रांकने की कोशिश करना बेकार है। उसमें हम सफल नहीं हो सकते । कुछ लोगों का यह कहना है किं योग्यता के अनुसार सम्पत्ति का विभाजन होना चाहिए । उस दशा में आलसियों और दुष्टों को कुछ न<noinclude></noinclude> 6kd3wzq927rofbpb8jgjnj4nuv7f2wx पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२६ 250 77029 662823 565809 2026-06-14T17:44:28Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662823 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{{RunningHeader|center=विभाजन की सात योजनायें|right=१६}} मिलेगा और वे नष्ट हो जायेंगे तथा जो कुछ सम्पत्ति होगी, वह भले, परिश्रमी और क्रियाशील लोगों को मिलेगी और वे फले-फूलेंगे । जो लोग आराम से रहते हैं, उन में से बहुत से समझते हैं कि आज-कल ऐसा ही होता है। उनकी यह धारणा रहती हैं कि परिश्रमी, समझधार और मितव्ययी लोगों को कभी प्रभाव का सामना नहीं करना पढता और अलसी, शराबखोर, जुपुयाज, बेईमान दूसरी योजना और दुश्चरित्र कंगाल होते हैं। वे कह सकते हैं कि सदाचारी मज़दूर की अपेक्षा दुराचारी मज़दूर को काम प्राप्त करने में अधिक कठिनाई होती है; जो किसान या ज़मींदार जुआ खेलता है और अनाप-शनाप खर्च करता है उसकी जमीन हाथ से निकल जाती है और वह कंगाल हो जाता है तथा जो व्यापारी सुस्त होता है और अपने धन्धे की तरफ़ ध्यान नहीं देता, वह दिवालिया हो जाता है; किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उन को जो कुछ मिलता है वह उनका योग्य हिस्सा होता है। इससे इतना ही पता चलता है कि कुछ कमजोरियों और बुराइयों के कारण मनुष्य दरिद्र हो जाता है। किन्तु साथ ही कुछ ऐसी बुराइयाँ भी हैं जिनके कारण मनुष्य धनी यन जाता है । कठोर, स्वार्थी, लालची, निर्दयी और अपने पडोसियों से लाभ उठाने के लिए सदा तत्पर रहने वाले लोग, यदि इतने बुद्धिमान हों कि अपने हाथों से अपने पाँवों पर कुल्हाड़ी न मारें तो, शीघ्र ही धनवान बन जाते हैं । इस के विपरीत ग़रीब घर में पैदा हुए उदारचेता, समाज-सेवी और मिलनसार लोग, जबतक उन में असाधारण प्रतिभा न हो, ग़रीब ही रहते हैं। इतना ही नहीं, आज जैसी स्थिति है, उस में कुछ ग़रीब ही पैदा होते हैं और कुछ सोने के पालने में जन्म लेते हैं । कहने का मतलब यह है कि वे चरित्र-निर्माण के पहले ही धनी और गरीब की श्रेणियों में बंट जाते हैं। यह स्पष्ट है कि आज योग्यतानुसार सम्पत्ति का विभाजन नहीं होता। इस समय आम हालत यह हैं कि थोड़े से आलसी बहुत मालदार हैं और अनेको कठोर परिश्रम करने वाले अत्यन्त कंगाल हैं । भारतीय किसान, जिनको भरपेट भोजन और तन ढंकने<noinclude></noinclude> or5mu0hbjfmy1gdug1c7321047oy9oo 662864 662823 2026-06-15T04:14:21Z Chahar 009 6627 662864 proofread-page text/x-wiki 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ऐसी बुराइयाँ भी हैं जिनके कारण मनुष्य धनी यन जाता है । कठोर, स्वार्थी, लालची, निर्दयी और अपने पडोसियों से लाभ उठाने के लिए सदा तत्पर रहने वाले लोग, यदि इतने बुद्धिमान हों कि अपने हाथों से अपने पाँवों पर कुल्हाड़ी न मारें तो, शीघ्र ही धनवान बन जाते हैं । इस के विपरीत ग़रीब घर में पैदा हुए उदारचेता, समाज-सेवी और मिलनसार लोग, जबतक उन में असाधारण प्रतिभा न हो, ग़रीब ही रहते हैं। इतना ही नहीं, आज जैसी स्थिति है, उस में कुछ ग़रीब ही पैदा होते हैं और कुछ सोने के पालने में जन्म लेते हैं । कहने का मतलब यह है कि वे चरित्र-निर्माण के पहले ही धनी और गरीब की श्रेणियों में बंट जाते हैं। यह स्पष्ट है कि आज योग्यतानुसार सम्पत्ति का विभाजन नहीं होता। इस समय आम हालत यह हैं कि थोड़े से आलसी बहुत मालदार हैं और अनेको कठोर परिश्रम करने वाले अत्यन्त कंगाल हैं । भारतीय किसान, जिनको भरपेट भोजन और तन ढंकने<noinclude></noinclude> tqxvvj1axtchv19qp3aaj11on433us7 पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२७ 250 77031 662855 565810 2026-06-15T03:03:41Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662855 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{{RunningHeader|left=२०|center=समाजवाद : पूंजीवाद}} लायक़ काफ़ी कपडा भी नहीं मिलता ओर जो मिट्टी के मामूली कच्चे घरों और झोपड़िय में दिन बिताते हैं, वे उन दुकानदारों और धनवानों से अधिक चरित्रवान् हैं जो कुछ श्रम नहीं करते, खूब खाते, पहनने और बर्बाद करते हैं और ऊँची-ऊँची हवेलियों में रहते हैं । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि यदि आज सम्पत्ति का विभाजन योग्यता के आधार पर नहीं होता है तो क्यों न ऐसी कोशिश करें जिससे भले आदमी धनी और बुरे आदमी दरिद्र हो जाये ? किन्तु इसमें कई कठिनाइयाँ हैं । प्रथम तो किसी की योग्यता का मूल्य रुपयों में कैसे योका जा सकता है ? एक गाँव है, जिसमें लुहार भी रहता है और पुजारी भी । योग्यता के अनुसार उन दोनों में हमको सम्पत्ति का विभाजन करना है। लुहार को पुजारी जितना दिया जाय या पुजारी से दूना या आधा या कितना कम या कितना अधिक ? पुजारी का दावा है कि वह 'हनुमान चालीसा का पाठ करके भूत-प्रेत को भगा सकता है; किन्तु लुहार के पास तो अपने धन के सिवा कुछ नहीं। हो, यह घोदे की नाल अवश्य बना सकता है। यह काम पुजारी सात जन्म में भी नहीं कर सकता । तो सवाल यह है कि 'हनुमान चालीसा' की कितनी चौपाइयों घोड़े की एक नाल के बराबर मानी जाये ! हम यह मालूम कर सकते हैं कि बाजार में सेर भर घी के बदले कितना श्रन्न मिल सकता है, किन्तु जब हम मानव प्राणियों का मूल्य थोकेंगे तो हमें मानना होगा कि ईश्वर के दरवार में उन सब का समान मृत्य है। उनकी योग्यता के अनुसार सम्पत्ति का बंटवारा करना मनुष्य की माप और निर्णय-शक्ति के बाहर की बात है । सम्पत्ति के विभाजन की तीसरी योजना उन लोगों की है जो 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाले उसी पुराने और सीधे-सादे नियम में विश्वास रखते है; किन्तु इस नियम की घोषणा आजकल तीसरी योजना क्वचित ही की जाती है। वे कहते हैं कि हरएक अपनी- अपनी शक्ति के अनुसार ले-ले; किन्तु इससे दुनिया में शान्ति और सुरक्षितता का नामोनिशान भी न रहेगा । यदि हम सब<noinclude></noinclude> 30npig0irzu3em3xrs82rhba74igltn 662865 662855 2026-06-15T04:14:58Z Chahar 009 6627 662865 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|left=२०|center=समाजवाद : पूंजीवाद}}</noinclude> लायक़ काफ़ी कपडा भी नहीं मिलता ओर जो मिट्टी के मामूली कच्चे घरों और झोपड़िय में दिन बिताते हैं, वे उन दुकानदारों और धनवानों से अधिक चरित्रवान् हैं जो कुछ श्रम नहीं करते, खूब खाते, पहनने और बर्बाद करते हैं और ऊँची-ऊँची हवेलियों में रहते हैं । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि यदि आज सम्पत्ति का विभाजन योग्यता के आधार पर नहीं होता है तो क्यों न ऐसी कोशिश करें जिससे भले आदमी धनी और बुरे आदमी दरिद्र हो जाये ? किन्तु इसमें कई कठिनाइयाँ हैं । प्रथम तो किसी की योग्यता का मूल्य रुपयों में कैसे योका जा सकता है ? एक गाँव है, जिसमें लुहार भी रहता है और पुजारी भी । योग्यता के अनुसार उन दोनों में हमको सम्पत्ति का विभाजन करना है। लुहार को पुजारी जितना दिया जाय या पुजारी से दूना या आधा या कितना कम या कितना अधिक ? पुजारी का दावा है कि वह 'हनुमान चालीसा का पाठ करके भूत-प्रेत को भगा सकता है; किन्तु लुहार के पास तो अपने धन के सिवा कुछ नहीं। हो, यह घोदे की नाल अवश्य बना सकता है। यह काम पुजारी सात जन्म में भी नहीं कर सकता । तो सवाल यह है कि 'हनुमान चालीसा' की कितनी चौपाइयों घोड़े की एक नाल के बराबर मानी जाये ! हम यह मालूम कर सकते हैं कि बाजार में सेर भर घी के बदले कितना श्रन्न मिल सकता है, किन्तु जब हम मानव प्राणियों का मूल्य थोकेंगे तो हमें मानना होगा कि ईश्वर के दरवार में उन सब का समान मृत्य है। उनकी योग्यता के अनुसार सम्पत्ति का बंटवारा करना मनुष्य की माप और निर्णय-शक्ति के बाहर की बात है । सम्पत्ति के विभाजन की तीसरी योजना उन लोगों की है जो 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाले उसी पुराने और सीधे-सादे नियम में विश्वास रखते है; किन्तु इस नियम की घोषणा आजकल तीसरी योजना क्वचित ही की जाती है। वे कहते हैं कि हरएक अपनी- अपनी शक्ति के अनुसार ले-ले; किन्तु इससे दुनिया में शान्ति और सुरक्षितता का नामोनिशान भी न रहेगा । यदि हम सब<noinclude></noinclude> itnxr0hqbwz12i0kjj94judi5opqr3p पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२८ 250 77033 662856 565811 2026-06-15T03:24:39Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662856 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{{RunningHeader|center=विभाजन की सात योजनायें|right=२९}} चल और चालाकी में समान हों तो हमे समान अवसर मिल जाएँगे; किन्तु जिम दुनिया में पालक, वृद्ध और रोगी भी रहते हो और समान यवस्था तथा शक्ति वाले तन्दुरुस्त वयस्क लोग भी लालच और दुष्टता मैं एक-दूसरे से बहुत भिन्न हॉ उसमें यह योजना नहीं चल सकती । कुछ ही समय में हमें उससे हार माननी होगी । समुद्री लुटेरों और जंगली डाकुओं के दल तक लूट के माल के विभाजन के लिए धींगामस्ती के बजाय शान्ति पूर्ण निर्धारित समझौते को पसन्द करते हैं । हमारे सभ्य समाज में यद्यपि ढकैती और हिंसा का निषेध हैं, फिर भी हम व्यवसाय को ऐसे सिद्धान्त पर चलने देते हैं जिसके अनुसार दूसरे का कुछ भी खयाल किए बिना हर एक चाहे जितना नफा कमा सकता है। एक दूकानदार या व्यापारी हमारी जेब भले ही न काटे; किन्तु वह अपनी चीज़ों की इच्छानुसार मनमानी क़ीमत ले सकता है । व्यवसाय में इस बात की स्वतन्त्रता मिली हुई है कि वह जिस हद तक ग्राहक को राजी कर सके उस हद तक थपने रुपए के बदले अधिक ले सकता है या कम दे सकता है। मकानों की क़ीमत अथवा किरायेदारों की दरिद्रता का कुछ भी खयाल किये बिना मकानों का किराया चढ़ाया जा सकता है। दुनिया की उद्योग-धन्धों में धागे बढ़ी हुई जातियाँ अपनी तैयार चीज़े उद्योग-धन्धों में पिछड़ी हुई जातियों पर थोप कर मालदार हो सकती हैं। सम्पत्ति के विभाजन की चौथी योजना यह है कि केवल कुछ लोगों को बिना कुछ परिश्रम कराये धनी बना दिया जाय और बाक़ी सब से खूब मेहनत कराई जाय। उनके परिश्रम से जो पैदा चौथी योजना हो उसमें से उन्हें केवल इतनी मज़दूरी दी जाय कि वे जीवित भर रह सकें और मरने या बुड्ढे होने के बाद ग़ुलामी करने के लिए बाल-बच्चे पैदा कर जायें। मोटे तौर पर आजकल यही होता है। दस प्रतिशत लोग देश की ९० प्रतिशत सम्पत्ति पर अधिकार जमाये हुए हैं। शेष ९० प्रतिशत में से अधिकांश के पास कोई सम्पत्ति नहीं है । वे अत्यंत अल्प मजदूरी पर कंगाली की हालत में<noinclude></noinclude> 1pn2hffxuhs76wsluv58ma23bfygrrm 662866 662856 2026-06-15T04:15:29Z Chahar 009 6627 662866 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center=विभाजन की सात योजनायें|right=२९}}</noinclude> चल और चालाकी में समान हों तो हमे समान अवसर मिल जाएँगे; किन्तु जिम दुनिया में पालक, वृद्ध और रोगी भी रहते हो और समान यवस्था तथा शक्ति वाले तन्दुरुस्त वयस्क लोग भी लालच और दुष्टता मैं एक-दूसरे से बहुत भिन्न हॉ उसमें यह योजना नहीं चल सकती । कुछ ही समय में हमें उससे हार माननी होगी । समुद्री लुटेरों और जंगली डाकुओं के दल तक लूट के माल के विभाजन के लिए धींगामस्ती के बजाय शान्ति पूर्ण निर्धारित समझौते को पसन्द करते हैं । हमारे सभ्य समाज में यद्यपि ढकैती और हिंसा का निषेध हैं, फिर भी हम व्यवसाय को ऐसे सिद्धान्त पर चलने देते हैं जिसके अनुसार दूसरे का कुछ भी खयाल किए बिना हर एक चाहे जितना नफा कमा सकता है। एक दूकानदार या व्यापारी हमारी जेब भले ही न काटे; किन्तु वह अपनी चीज़ों की इच्छानुसार मनमानी क़ीमत ले सकता है । व्यवसाय में इस बात की स्वतन्त्रता मिली हुई है कि वह जिस हद तक ग्राहक को राजी कर सके उस हद तक थपने रुपए के बदले अधिक ले सकता है या कम दे सकता है। मकानों की क़ीमत अथवा किरायेदारों की दरिद्रता का कुछ भी खयाल किये बिना मकानों का किराया चढ़ाया जा सकता है। दुनिया की उद्योग-धन्धों में धागे बढ़ी हुई जातियाँ अपनी तैयार चीज़े उद्योग-धन्धों में पिछड़ी हुई जातियों पर थोप कर मालदार हो सकती हैं। सम्पत्ति के विभाजन की चौथी योजना यह है कि केवल कुछ लोगों को बिना कुछ परिश्रम कराये धनी बना दिया जाय और बाक़ी सब से खूब मेहनत कराई जाय। उनके परिश्रम से जो पैदा चौथी योजना हो उसमें से उन्हें केवल इतनी मज़दूरी दी जाय कि वे जीवित भर रह सकें और मरने या बुड्ढे होने के बाद ग़ुलामी करने के लिए बाल-बच्चे पैदा कर जायें। मोटे तौर पर आजकल यही होता है। दस प्रतिशत लोग देश की ९० प्रतिशत सम्पत्ति पर अधिकार जमाये हुए हैं। शेष ९० प्रतिशत में से अधिकांश के पास कोई सम्पत्ति नहीं है । वे अत्यंत अल्प मजदूरी पर कंगाली की हालत में<noinclude></noinclude> 34z8pld7141z1mqsttgr9tw8dps69uy पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२९ 250 77035 662857 565812 2026-06-15T03:43:07Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662857 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>{{RunningHeader|left=२२|center=समाजवाद : पूंजीवाद}} जीवन निर्वाह करते हैं । इस योजना का यह लाभ यतलाया जाता है कि वह उनके बीच में धनिकों का एक वर्ग पैदा कर देती है जो खर्चीली शिक्षा द्वारा अपने को सुसंस्कृत बना लेता है और उससे ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि देश पर शासन कर सके; कानून वना कर उनकी रक्षा कर सके; राष्ट्र की रक्षा के लिए सेना मंगठित कर उसका संचालन कर सके; विद्या, विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, धर्म और उन सब चीजों को जो महान् सभ्यता और ग्रामीण जीवन के अन्तर को स्पष्ट करती हैं, संरचाण देकर जीवित रख सके; विशाल भवन निर्माण करा सके भद- कीली पोशाकें पहिन सके; गंवारों पर रौब गाँठ सके और सभ्यना नया शौक़ीनी के जीवन का उदाहरण पेश कर सके । जैसा कि व्यवसायी खयाल करते है, सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि वे आवश्यकता से अधिक देकर उन्हें बड़ी मात्रा में अतिरिक्त रुपया बचाने का अवसर देते हैं। इसी रुपये को पूंजी कहते हैं। यह योजना, जिसे अल्प जन-सत्तावाद कहते हैं, समाज को भद्र और साधारण दो भागों में विभक्त करती है। भद्र लोग सम्पत्ति पर और साधारण लोग श्रम पर जीवन-निर्वाह करते हैं । यह कुछ को धनी और बहुतों को कंगाल बना देने वाली योजना है, जो दीर्घकाल से चली आई है और अब भी चल रही है । यह स्पष्ट है कि यदि धनिकों की आमदनी छीन कर गरीबों में बाँट दी जाय तो भी उनकी गरीबी में विशेष अन्तर नहीं पड़ेगा; किन्तु इससे पूंजी का मिलना बन्द हो जायगा, कारण फिर कोई कुछ भी वचा न पायगा । धनिकों की ग्रामीण अट्टालिकाश्री की हालत विगढ जायगी और विज्ञान, कला, साहित्य तथा सारी संस्कृति का लोप हो जायगा । यही कारण है कि इतने अधिक लोग वर्तमान पद्धति का समर्थन करते हैं और स्वयं कंगाल होते हुए भी धनिक वर्ग का साथ देते है। किंतु इस योजना से भयंकर बुराइयों पैदा होती हैं। ये भद्र लोग उन कामो को नहीं करते जिनको करने के लिए उन्हें बड़ा बनाया गया था। उद्देश्य श्रेष्ठ होते हुए भी वे देश का शासन बुरी तरह<noinclude></noinclude> 6rt8v6y8hvymbsbsjr77thgze9ma1ru 662867 662857 2026-06-15T04:17:09Z Chahar 009 6627 662867 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|left=२२|center=समाजवाद : पूंजीवाद}}</noinclude> जीवन निर्वाह करते हैं । इस योजना का यह लाभ यतलाया जाता है कि वह उनके बीच में धनिकों का एक वर्ग पैदा कर देती है जो खर्चीली शिक्षा द्वारा अपने को सुसंस्कृत बना लेता है और उससे ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि देश पर शासन कर सके; कानून वना कर उनकी रक्षा कर सके; राष्ट्र की रक्षा के लिए सेना मंगठित कर उसका संचालन कर सके; विद्या, विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, धर्म और उन सब चीजों को जो महान् सभ्यता और ग्रामीण जीवन के अन्तर को स्पष्ट करती हैं, संरचाण देकर जीवित रख सके; विशाल भवन निर्माण करा सके भद- कीली पोशाकें पहिन सके; गंवारों पर रौब गाँठ सके और सभ्यना नया शौक़ीनी के जीवन का उदाहरण पेश कर सके । जैसा कि व्यवसायी खयाल करते है, सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि वे आवश्यकता से अधिक देकर उन्हें बड़ी मात्रा में अतिरिक्त रुपया बचाने का अवसर देते हैं। इसी रुपये को पूंजी कहते हैं। यह योजना, जिसे अल्प जन-सत्तावाद कहते हैं, समाज को भद्र और साधारण दो भागों में विभक्त करती है। भद्र लोग सम्पत्ति पर और साधारण लोग श्रम पर जीवन-निर्वाह करते हैं । यह कुछ को धनी और बहुतों को कंगाल बना देने वाली योजना है, जो दीर्घकाल से चली आई है और अब भी चल रही है । यह स्पष्ट है कि यदि धनिकों की आमदनी छीन कर गरीबों में बाँट दी जाय तो भी उनकी गरीबी में विशेष अन्तर नहीं पड़ेगा; किन्तु इससे पूंजी का मिलना बन्द हो जायगा, कारण फिर कोई कुछ भी वचा न पायगा । धनिकों की ग्रामीण अट्टालिकाश्री की हालत विगढ जायगी और विज्ञान, कला, साहित्य तथा सारी संस्कृति का लोप हो जायगा । यही कारण है कि इतने अधिक लोग वर्तमान पद्धति का समर्थन करते हैं और स्वयं कंगाल होते हुए भी धनिक वर्ग का साथ देते है। किंतु इस योजना से भयंकर बुराइयों पैदा होती हैं। ये भद्र लोग उन कामो को नहीं करते जिनको करने के लिए उन्हें बड़ा बनाया गया था। उद्देश्य श्रेष्ठ होते हुए भी वे देश का शासन बुरी तरह<noinclude></noinclude> 93pbollkxze0e2eeqf3y4xfjxqnyak5 पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/३४ 250 77046 662859 565818 2026-06-15T04:08:57Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662859 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||'''निर्धनता या धनिकता?'''|'''२७'''}}</noinclude> है कि वह खराय है, उसको ज्यों-की-त्यों रहने देना स्वीकार न करेगा । जब स्थिति ज्यों-की-त्या नहीं रहेगी, वह बदलेगी, तब उसकी तरफ से आँखें मुँद लेने से काम न चलेगा। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि हम स्थिति को यों ही लुढ़कने न दें। रोक कर ठीक दिशा में चलाएँ । विचारपूर्वक सम्पत्ति का विभाजन करै । जैसा विभाजन इस समय हो रहा है वह ठीक नहीं है। सम्पत्ति विभाजन की सातवी योजना साम्यवादी योजना है और वह यह है कि विना इस बात का विचार किए कि अमुक आदमी कैसा है, उसकी कितनी उम्र है, किस तरह का काम करता है, कौन है, सातवी योजना उसका पिता कौन था, हरएक को बरावर-बरावर . हिस्सा दे दिया जाय । केवल यही योजना ठीक-ठीक. काम देगी। सबसे सन्तोषजनक योजना यही है । विमानन की पहेली का यही साम्यवादी हल है। समान धाय में हमें भले ही सुन्दरता दिखाई न दे; किन्तु हम आसमान थाय के भयंकर दुप्परिणामों को देख सकते हैं। जिन बुराइयों से हम नित्य संघर्ष करना पड़ता है वे असमान थाय के कारण ही पैदा होती हैं। इसलिए हमें राष्ट्रीय सम्पत्ति का विभाजन सब में समान ही करना चाहिए। <center>{{xx-larger|: ४ :}} <center>{{xx-larger|निर्धनता या धनिकता?}} कुछ साधु-सन्तों के अलावा हरएक आदमी यही कहेगा कि जो योजना दरिद्रता का नाश न कर सके वह ग्राह्य नहीं हो सकती। (उन लोगों की दरिद्रता भी मज़बूरन नहीं, स्वेच्छा से ग्रहण की हुई होती है।) इसलिए सबसे पहिले थोड़ी देर के लिए हम दरिद्रता का ही विचार कर लें। यह आम तौर पर माना जाता है कि गरीब लोगों के लिए दरिद्रता अत्यन्त कष्ट-दायक और अभिशाप रूप सिद्ध होती है, किन्तु ग़रीब लोग<noinclude></noinclude> gv8bb3kn10dxwxc9o3en5e8m7qp646w पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/३५ 250 77048 662869 565819 2026-06-15T04:28:11Z Chahar 009 6627 662869 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|'''२८'''|'''समाजवाद:पूँँजीवाद'''|}}</noinclude>जो कडी भूब और ठंड से पीडित न हो धनियाँ से अधिक दुखी नहीं होते । बहुधा वे सुखी ही अधिक होते हैं। हमें ऐसे लोग आसानी से मिल सकते हैं जो बीस वर्ष की अवस्था की अपेक्षा साठ वर्ष की अवस्था में इस गुने अधिक धनी हो गए हैं; किन्तु उनमें से एक भी नहीं कह सकेगा कि उसके सुख की मात्रा भी दस गुनी बढ़ गई है। सभी विचार- शील लोग हमको विश्वास दिलाएँगे कि सुख-दुख मन और शरीर की स्थिति पर निर्भर करते हैं, रुपये के साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। रुपया भूख का इलाज कर सकता है; किन्तु दुख को दूर नहीं कर सकता । भोजन सुधा को मिटा सकता है; किन्तु श्रात्मा को सन्तोप नहीं दे सकता । प्रसिद्ध जर्मन समाजवादी फ़र्डिनेएड लासाले ने कहा है कि ग़रीबों को दरिद्रता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए उत्तेजन देने के मेरे प्रयत्न इसलिए सफल नहीं होते कि ग़रीब किसी बात की आवश्यकता ही अनुभव नहीं करते । अवश्य ही वे सन्तुष्ट नहीं है; किन्तु वे इतने असन्तुष्ट नहीं हैं कि अपनी स्थिति को बदलने के लिए भारी कष्ट उठाने को तैयार हो जायँ । रहने के लिए थालीशान कोठी हो, इशारा पाते ही दौड़ने के लिए दस- बीस नौकर हॉ, पहिनने के लिए नित्य नये-नये वस्त्राभूषण मिलते हॉ और खूब स्वादिष्ट पकवान खाने को मिले तो कौन ऐसा मन्दभागी धनी होगा जो अपने को सुखी न समझे ? किन्तु बात यह है कि धनी इन चीज़ों से भी श्रधा जाते हैं। सवेरे दिन चढ़े उठना, शौच जाने और मुखमार्जन करने से पहिले ही चाय पान करना, उबटन और स्नान, भोजन और आराम, हवाखोरी और रात के बारह बजे तक नाटक-सिनेमा में वक्त गुज़ार देना अधिक सुखी होने की निशानी नहीं है। पश्चिमी देशों में यदि ग़रीब औरत को एक बड़ा मकान, बहुत सारे नौकर, दर्जनों पोशाक, सुन्दर चेहरा और अच्छे बाल मिल जाएँ तो वह फूली न समावेगी; किन्तु धनी महिला जिसको ये सब चीजें उपलब्ध होती हैं, बहुधा उन चीज़ों से दूर रहने के लिए अपने समय का बड़ा भाग कष्टकर स्थानों में श्रमण करने में बिताती है। ग्राम तौर पर एक नौकरानी की सहायता से नहाने-धोने, कॉच कंघी करने और बनने-ठनने में दिन के दो-तीन घंटे<noinclude></noinclude> 7szxaja1fgjerupikobvmxapfpg0m0q 662870 662869 2026-06-15T04:28:29Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662870 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh|'''२८'''|'''समाजवाद:पूँँजीवाद'''|}}</noinclude>जो कडी भूब और ठंड से पीडित न हो धनियाँ से अधिक दुखी नहीं होते । बहुधा वे सुखी ही अधिक होते हैं। हमें ऐसे लोग आसानी से मिल सकते हैं जो बीस वर्ष की अवस्था की अपेक्षा साठ वर्ष की अवस्था में इस गुने अधिक धनी हो गए हैं; किन्तु उनमें से एक भी नहीं कह सकेगा कि उसके सुख की मात्रा भी दस गुनी बढ़ गई है। सभी विचार- शील लोग हमको विश्वास दिलाएँगे कि सुख-दुख मन और शरीर की स्थिति पर निर्भर करते हैं, रुपये के साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। रुपया भूख का इलाज कर सकता है; किन्तु दुख को दूर नहीं कर सकता । भोजन सुधा को मिटा सकता है; किन्तु श्रात्मा को सन्तोप नहीं दे सकता । प्रसिद्ध जर्मन समाजवादी फ़र्डिनेएड लासाले ने कहा है कि ग़रीबों को दरिद्रता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए उत्तेजन देने के मेरे प्रयत्न इसलिए सफल नहीं होते कि ग़रीब किसी बात की आवश्यकता ही अनुभव नहीं करते । अवश्य ही वे सन्तुष्ट नहीं है; किन्तु वे इतने असन्तुष्ट नहीं हैं कि अपनी स्थिति को बदलने के लिए भारी कष्ट उठाने को तैयार हो जायँ । रहने के लिए थालीशान कोठी हो, इशारा पाते ही दौड़ने के लिए दस- बीस नौकर हॉ, पहिनने के लिए नित्य नये-नये वस्त्राभूषण मिलते हॉ और खूब स्वादिष्ट पकवान खाने को मिले तो कौन ऐसा मन्दभागी धनी होगा जो अपने को सुखी न समझे ? किन्तु बात यह है कि धनी इन चीज़ों से भी श्रधा जाते हैं। सवेरे दिन चढ़े उठना, शौच जाने और मुखमार्जन करने से पहिले ही चाय पान करना, उबटन और स्नान, भोजन और आराम, हवाखोरी और रात के बारह बजे तक नाटक-सिनेमा में वक्त गुज़ार देना अधिक सुखी होने की निशानी नहीं है। पश्चिमी देशों में यदि ग़रीब औरत को एक बड़ा मकान, बहुत सारे नौकर, दर्जनों पोशाक, सुन्दर चेहरा और अच्छे बाल मिल जाएँ तो वह फूली न समावेगी; किन्तु धनी महिला जिसको ये सब चीजें उपलब्ध होती हैं, बहुधा उन चीज़ों से दूर रहने के लिए अपने समय का बड़ा भाग कष्टकर स्थानों में श्रमण करने में बिताती है। ग्राम तौर पर एक नौकरानी की सहायता से नहाने-धोने, कॉच कंघी करने और बनने-ठनने में 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सुन्दर युवतियां समझें (वे समझती हैं) कि ईमानदारी से काम करने की अपेक्षा वे दुराचरण द्वारा अधिक रुपया कमा सकती हैं तो वे धनी युवकों के रक्त को विपमय कर देंगी। ये ही युवक जब शादी करेंगे तो अपनी पत्रियों और बच्चों को भी उसी बीमारी को छूत लगा देंगे और उनको हर तरह के कष्ट पहुँचाने के कारण बनेंगे। कभी-कभी अंग-अंग, नेत्र- हीनता और मृत्यु तक की नौवत पहुंचेगी। अन्यथा कुछ-न-कुछ उत्पात तो सदा होगा ही। यह पुराना खयाल है कि लोग अपने आप में मस्त रह सकते हैं और पड़ोस में या सौ मील दूर होने वाली घटनाओं का उन 'पर कुछ असर न होगा; किन्तु यह बहुत ग़लत खयाल है। हम आपस में भाई-भाई हैं। यह कोरी धार्मिक उक्ति नहीं है जो बिना किसी मतलब के धर्म स्थान में दुहराए जाने की ग़रज़ से कह दी गई हो । वह मूर्तिमान सत्य है । नगर का धनी हिस्सा ग़रीब हिस्से से दूर रह सकता है, किन्तु जब प्लेग पाएगी तो ग़रीब हिस्से के साथ वह भी मरेगा, वच नहीं सकेगा । दरिद्रता का अन्त कर चुकने के बाद ही लोग अपने आप में मस्त रह सकेंगे । जबतक ऐसा नहीं होता, वे दरिद्रता के दृश्यों, शोर-गुल और दुर्गन्ध को नित्य घूमने जाते समय अपनी आँखों से दूर नहीं रख सकेंगे और न सुख की नींद सो सकेंगे। दरिद्रता-जनित अत्यन्त भयानक<noinclude></noinclude> lkpt8gi3bxrczcryz4942zg7df5vkod पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/३८ 250 77053 662894 565822 2026-06-15T06:41:45Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662894 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||'''निर्धनता या धनिकता?'''|'''३१'''}}</noinclude> और घातक बुराइ‌यों का उन्हें सदा डर रहेगा जो उनकी मज़बूत पुलिस- चौकियों को पार करके कभी भी उन तक पहुँच सकती हैं। साथ ही जबतक दरिद्रता की सम्भावना रहेगी, हम विश्वासपूर्वक यह नहीं कह सकते कि हम कभी भी उस के शिकार न होंगे। यदि हम दूसरों के लिए खड्डा खोदें तो स्वयं भी उस में गिर सकते हैं। यदि हम दरार को खुली छोड़ दूँ तो खेलते समय हमारे बच्चे उस में गिर सकते हैं। हम रोज़ ही देखते हैं कि अत्यन्त निर्दोष और भले कुटुम्ब दरिद्रता के खुले हुए खड्ढे में गिर रहे हैं, ऐसी दशा में हम कैसे कह सकते हैं कि अगली दफ़ा हमारी बारी नहीं होगी ? जिन अपराधों के लिए लोगों को जेल भेजना चाहिए उन अपराधों के लिए दरिद्रता के रूप में सजा देने की कोशिश करना किसी भी राष्ट्र के लिए सम्भवतः सब से बडी मूर्खता होगी। किसी आलसी आदमी के बारे में यह कहना आसान है-रहने दो उसको गरीब, आदमी होने का उसे उचित पुरस्कार मिला है। गरीबी उसको अच्छा सबक सिखा देगी । ऐसा कह कर हम स्वयं इतने श्रालमी वन जाते हैं कि नियम बनाने के पहले थोड़ा भी नहीं सोचते । चाहे वे सुस्त हॉ या तेज़, मद्यपी हॉ या मद्यविरोधी, धर्मात्मा हॉ या दुरात्मा, मितव्ययी हॉ या लापरवाह, बुद्धिमान हो या मूर्ख, हम किसी भी अवस्था में लोगों को गरीब नहीं रहने दे सकते। यदि वे सजा के पात्र हैं तो उन्हें और किसी तरीके से सजा देंगे; कारण, केवल दरिद्रता जितना नुकसान उनके निर्दोष पडोसियों को पहुँचाएगी उसका आधा भी उनको न पहुँचाएगी। यह सार्वजनिक खतरा और व्यक्तिगत दुर्भाग्य दोनों ही हैं। इस को सहन करना राष्ट्रीय अपराध है। अतः हम को यह मान लेना चाहिए कि सम्पत्ति के उचित विभाजन की यह एक आवश्यक शर्त है कि हरएक को उस का इतना हिस्सा मिले कि वह गरीबी से दूर रह सके। इंग्लैण्ड में यह कोई बिल्कुल नई बात नहीं है । रानी ऐलिजाबेथ के जमाने से इंग्लैण्ड का यह कानून रहा है कि किसी को भी दरिद्वावस्था में न रहने दिया जाय। कोई भी चाहे वह<noinclude></noinclude> n7jv6melrmpesh5vv8yu2aegn00hb57 पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/३९ 250 77055 662899 565823 2026-06-15T06:58:45Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662899 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh|'''३२'''|'''समाजवाद : पूंजीवाद'''|}}</noinclude>कितना ही नालायक क्यों न हो यदि गरीबों के संरक्षकों के पास कंगाल की हैसियत से सहायता मॉगने जाय तो उन्हें उसके भोजन-वस्त्र और निवास के लिए प्रबन्ध करना ही पड़ता है। वे अनिच्छा और कठोरता से काम ले सकते हैं, जितनी उनसे बने उतनी नागवार और अपमान- जनक शर्तें जोड़ सकते हैं, वे कंगाल को यदि वह स्वस्थ हो तो घृणास्पद और अर्थहीन काम में लगा सकते हैं और इन्कार करने पर जेल भेज सकते हैं, रहने के लिए ऐसा मकान दे सकते हैं जिस में बुड्ढे और जवान, स्वस्थ और रोगो, निर्दोष बालक-बालिकाएँ तथा पुरानी वेश्याएं और भिखारी एक दूसरे को बिगाड़ने के लिए भेड़-बकरियों की तरह बेतरतीब से भर दिए जाते हैं । यदि कंगाल को मत देने का अधिकार हो तो मताधिकार छीन कर उस पर सामाजिक कलंक लगा सकते हैं और कुछ सरकारी नौकरियाँ या पद पाने से वंचित कर सकते है । संक्षेप में, अधिकारी और सम्पन्न पुरुष गरीब को इतना मजबूर कर दे सकते हैं कि वह हर तरह की कठिनाइयों झेलना मंजूर कर ले; किन्तु महायता न माँगे । यह सब कुछ होते हुए भी यदि कंगाल मदद माँगे ही तो उन्हें झख मार कर देनी पडेगी । इस सीमा तक इंग्लैण्ड का विधान मूलतः साम्यवादी विधान है । किन्तु जिस कठोरता और दुष्टता के साथ उस पर अमल होता है, वह गम्भीर दोष है, कारण कि इंग्लैण्ड को दरिद्रता के गर्त से उबारने के बजाय वह दरिद्रता को और भी पतनकारी बना देता है। फिर भी मूल सिद्धान्त तो उस में है ही। रानी एलिजावेथ ने कहा था कि इंग्लैण्ड में भूख के कारण या आश्रय के अभाव में कोई न मरने पाए । धनी या दरिद्र समस्त जाति पर होने वाले दरिद्रता के भीषण दुष्परिणामों का अनुभव ले चुकने के बाद आज हम को और आगे बढ़ कर कहना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति गरीब न रहे। जब हम नित्य प्रति सम्पत्ति का विभाजन करें तो सब से पहले इस बात का ध्यान रक्खें कि हरएक को इतना तो मिल ही जाय कि जिससे वह साधारणतः सम्मान और आराम के साथ रह सके। यदि वे कोई ऐसा काम करें या न करें जिससे कहा जा सके कि वे कुछ भी पाने के अधिकारी नहीं हैं तो जिस<noinclude></noinclude> q6mjocwn2e35b8ja351dgsrucwq840q पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/४० 250 77056 662934 565825 2026-06-15T08:38:34Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662934 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||'''निर्धनता या धनिकता'''|'''३३'''}}</noinclude>प्रकार हम दूसरी तरह के अपराधियों को रोकते या विवश करते हैं उसी प्रकार उनको भी रोका या विवश किया जा सकता है । किन्तु उनको गरीब रहने देकर हम ऐसी स्थिति उत्पन्न न करें कि अपनी कमियों के वे कारण और सबको नुकसान पहुँचा सकें। अव हम यह मान सकते हैं कि किसी भी दशा में लोगों को गरीब नहीं रहने देना चाहिए, फिर भी हमको इस प्रश्न पर विचार करना होगा कि उन्हें धनी बनने दिया जाय या नहीं। जय दरिद्रता न रहेगी तो क्या हम भोग-विलास और फिजूलखर्ची होने देंगे ? इसका उत्तर देना मुश्किल हैं, कारण भोग-विलास की अपेक्षा दरिद्रता को परिभाषा आसानी से की जा सकती है। यदि कोई व्यक्ति भूखा हो, फटे कपड़े पहिने हो और उसके पास आवश्यक सामग्री से युक्त एक भी स्वतन्त्र कमरा न हो जिसमें वह सो सके तो कहना होगा कि स्पष्टतः वह दरिद्रता से पीड़ित है । यदि एक जिले में दूसरे की अपेक्षा बाल-मृत्युय अधिक होनी हों, लोगों की औसत थायु प्राचीन धर्म पुस्तकों में वर्णित सौ वर्ष से बहुत कम हो, भले प्रकार लालित-पालित होने वाले बच्चों की अपेक्षा उन बच्चों का औसत वज़न, जो किसी तरह मृत्यु के प्रास से बच जाते हैं, कम हो तो हम दृढ़तापूर्वक कह सकते हैं कि उस जिले के लोग दरिद्रता से पीड़ित हैं । किन्तु धन से होने वाली पीढ़ा इतनी आसानी से नहीं नापी जा सकती। जो लोग धनिकों के निकट सम्पर्क में आए हैं उनसे यह बात छिपी नहीं हैं कि वे भी काफी दुख भोगते हैं । वे इतने अस्वस्थ रहते हैं कि सदा किसी-न-किसी तरह के इलाज के पीछे दौड़ते रहते हैं । बीमार नही होते हैं तो भी समझ लेते हैं कि वे बीमार हैं। उनको हजारों तरह की चिन्ताएं घेरे रहती हैं। सम्पत्ति की, नौकरों की, दरिद्र सम्बन्धियों की, कारवार में लगी हुई पूँजी की, सामाजिक मान-मर्यादा कायम रखने की, कई बच्चे हों तो सब के लिए सुखोपभोग के साधन जुटाने की और न जाने किस-किस बात की उन्हें चिन्ता नहीं रहती । बच्चों का सवाल सब से टेढ़ा है । इंग्लैण्ड में यदि पचास हजार वार्षिक श्राय वाले एक धनी के ३<noinclude></noinclude> 5lpllrs75kd6s8lbq95qsoxisivt1hq 662936 662934 2026-06-15T08:42:02Z Chahar 009 6627 662936 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||'''निर्धनता या धनिकता'''|'''३३'''}}</noinclude>प्रकार हम दूसरी तरह के अपराधियों को रोकते या विवश करते हैं उसी प्रकार उनको भी रोका या विवश किया जा सकता है । किन्तु उनको गरीब रहने देकर हम ऐसी स्थिति उत्पन्न न करें कि अपनी कमियों के वे कारण और सबको नुकसान पहुँचा सकें। अव हम यह मान सकते हैं कि किसी भी दशा में लोगों को गरीब नहीं रहने देना चाहिए, फिर भी हमको इस प्रश्न पर विचार करना होगा कि उन्हें धनी बनने दिया जाय या नहीं। जय दरिद्रता न रहेगी तो क्या हम भोग-विलास और फिजूलखर्ची होने देंगे ? इसका उत्तर देना मुश्किल हैं, कारण भोग-विलास की अपेक्षा दरिद्रता को परिभाषा आसानी से की जा सकती है। यदि कोई व्यक्ति भूखा हो, फटे कपड़े पहिने हो और उसके पास आवश्यक सामग्री से युक्त एक भी स्वतन्त्र कमरा न हो जिसमें वह सो सके तो कहना होगा कि स्पष्टतः वह दरिद्रता से पीड़ित है । यदि एक जिले में दूसरे की अपेक्षा बाल-मृत्युय अधिक होनी हों, लोगों की औसत थायु प्राचीन धर्म पुस्तकों में वर्णित सौ वर्ष से बहुत कम हो, भले प्रकार लालित-पालित होने वाले बच्चों की अपेक्षा उन बच्चों का औसत वज़न, जो किसी तरह मृत्यु के प्रास से बच जाते हैं, कम हो तो हम दृढ़तापूर्वक कह सकते हैं कि उस जिले के लोग दरिद्रता से पीड़ित हैं । किन्तु धन से होने वाली पीढ़ा इतनी आसानी से नहीं नापी जा सकती। जो लोग धनिकों के निकट सम्पर्क में आए हैं उनसे यह बात छिपी नहीं हैं कि वे भी काफी दुख भोगते हैं । वे इतने अस्वस्थ रहते हैं कि सदा किसी-न-किसी तरह के इलाज के पीछे दौड़ते रहते हैं । बीमार नही होते हैं तो भी समझ लेते हैं कि वे बीमार हैं। उनको हजारों तरह की चिन्ताएं घेरे रहती हैं। सम्पत्ति की, नौकरों की, दरिद्र सम्बन्धियों की, कारवार में लगी हुई पूँजी की, सामाजिक मान-मर्यादा कायम रखने की, कई बच्चे हों तो सब के लिए सुखोपभोग के साधन जुटाने की और न जाने किस-किस बात की उन्हें चिन्ता नहीं रहती । बच्चों का सवाल सब से टेढ़ा है । इंग्लैण्ड में यदि पचास हजार वार्षिक श्राय वाले एक धनी के<noinclude> {{rh|३||}}</noinclude> ax6xnzw6fto7mtkjfn5qmrhx0362eo0 पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/४१ 250 77058 662937 565826 2026-06-15T08:53:37Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662937 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh|'''३४'''|'''समाजवाद : पूँजीवाद'''|}}</noinclude>पाँच बच्चे हों तो उनका पालन-पोपण पचास हजार के हिसाब से होगा और वे वैसे ही समाज में प्रवेश करेंगे, किन्तु बाद में हरएक को १० हजार वार्षिक से अधिक न मिलेगा। धनी कुटुम्बों में उनकी शादियाँ हो जायं तो दूसरी बात है, अन्यथा इसका फल यह होगा कि वे अपनी चाय से अधिक खर्च करेंगे और शीघ्र ही सिर तक क़र्ज़ में डूब जायेंगे । कारण, उनको क्या पता कि कम खर्च में कैसे काम चलाया जाता है। वे अपनी सन्तति को विरासत में और कुछ दें या न दें। खर्चीली चाटते, घनी मित्र और कर्ज़ — ये तीन चीजें तो दे ही जाते हैं । इस तरह पीढ़ी-दर- पीढ़ी हालत अधिकाधिक खराब होती जाती है। यही कारण है कि वहाँ हर जगह ऐसी महिलाएं और भद्र पुरुष दिखाई देते हैं जिनके पास अपनी मान-मर्यादा को कायम रखने के साधन नहीं होते और इसलिए वे साधारण ग़रीबों से कहीं अधिक संकट में रहते हैं । हम जानते हैं कि कुछ ऐसे सम्पन्न कुटुम्ब भी हैं जो धनिकता के कारण पीड़ित नहीं हैं। वे ठूँस-ठूँस कर नहीं खाते, ऐसे काम करते हैं। जिससे स्वस्थ रह सकें । मान-मर्यादा की चिन्ता नहीं करते, सुरक्षित स्थान में पूँजी लगाते हैं, कम व्याज पर ही सन्तोष कर लेते हैं और अपने बच्चों को सादगी से रहने और उपयोगी काम करने की शिक्षा देते हैं । किन्तु इसका तो यह अर्थ हुआ कि वे धनी आदमियों की तरह बिल्कुल नहीं रहते । इसलिए उनको मामूली चाय भी काफ़ी हो सकती है। अधिकांश धनी नहीं जानते कि उन्हें क्या करना चाहिए, फलतः वे समाज में होने वाले नाच -रंगों के चक्कर में पढ़ जाते हैं। उन के लिए यह चक्कर इतना कठिन होता है कि वे नौकरों से भी अधिक थक जाते है। चाहे खेलों के प्रति उन की रुचि न हो; किन्तु अपनी सामाजिक स्थिति के कारण घुड़दौड़ और शिकार पार्टियों में जाने के लिए वे विवश होते हैं। गाना सुनने का शौक न हो तो भी उन्हें नाटकों और रंगीन गायन मंडलियों में जाना पडता है। वे न तो इच्छानुसार पोशाक ही पहिन सकते हैं और न इच्छानुसार काम ही कर सकते हैं। वे धनी हैं, इसलिए जो दूसरे धनी करें वही उन्हें भी करना<noinclude></noinclude> 6pcpjzeezwdwrn66kqcxm8a6ohsn4fb पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/४२ 250 77059 662938 565827 2026-06-15T09:05:39Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662938 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||'''निर्धनता या धनिकता'''|'''३५'''}}</noinclude>चाहिए। और करें भी तो क्या करें ? करने के लिए कुछ हो भी ? काम वे चलवता कर सकते हैं, किन्तु काम को हाथ लगाया नहीं, और वे मामूली आदमी बने नहीं ! इस प्रकार इच्छानुसार वे कर नहीं सकते । इसलिए जो करते हैं उसी को पसन्द करने की चेष्टा करते हैं और कल्पना करते हैं कि हम मौज में हैं । किन्तु असलियत यह है कि चहल-पहल से उनका जी उचटा रहता है, डाक्टर उनको बेवकूफ बनाते रहते हैं और व्यापारी लूटते रहते हैं तथा अपने से अधिक धनियों के हाथों हुए अपमान के बदले उन्हें गरीबों का अपमान कर बुरी तरह सन्तोष मानना पड़ता है। इस चोक से बचने के लिए वहाँ के योग्य और उत्साही धनिक पार्लमेंट में, राजनैतिक विभाग में या सेना में दाखिल हो जाते हैं। या अपनी जागीर और कारवार को अपने वकीलों, दलालों और प्रतिनिधियों के भरोसे छोडने के बजाय उसका स्वयं प्रबन्ध और विकास करते हैं या भारी परिश्रम और खतरों का सामना कर अज्ञात देशों की भोज करते हैं । फलस्वरूप उनका जीवन उन लोगों के जीवन से बहुत भिन्न नहीं होता, जिन्हें ये सब काम अपनी जीविका के लिए करने होते हैं। इस तरह वे धनी हो जाते हैं और यदि हमारी भाँति उनको भी गरीब वन जाने का लगातार डर न बना रहता तो वे अधिक सम्पत्ति की चिन्ता रखने के फेर में न पड़ते। दूसरों की अपेक्षा अधिक धनी होने में वे लोग ही विशेष सन्तोष अनुभव करते हैं जो आलस्य में पढ़े रहने में आनन्द मानते हैं, अपने पड़ोसियों से अपने को बडा मानते हैं और उनसे तदनुसार व्यवहार की आशा रखते हैं। किन्तु कोई भी देश इस प्रमाद को सन्तुष्ट नहीं कर सकता । आलस्य और मिध्याभिमान कोई गुण नहीं हैं कि जिनको प्रोत्साहन दिया जाय। वे दुर्गुण है और दूर किए जाने चाहिएँ । इसके अलावा आलसी और निकम्मे पड़े-पडे गरीबों पर हुक्म चलाते रहने की इच्छा उचित भी हो तो भी यदि ग़रीब न हो तो वह कैसे तृप्त की जा सकती है ? हम न ग़रीब आदमी चाहते हैं और न धनी आदमी, हम खाली आदमी चाहते हैं जिनके पास काफी सम्पत्ति<noinclude></noinclude> ksb0zqupljwd8fuhy84lccd27ewmg6v 662939 662938 2026-06-15T09:08:11Z Chahar 009 6627 662939 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||'''निर्धनता या धनिकता'''|'''३१'''}}</noinclude>चाहिए। और करें भी तो क्या करें ? करने के लिए कुछ हो भी ? काम वे चलवता कर सकते हैं, किन्तु काम को हाथ लगाया नहीं, और वे मामूली आदमी बने नहीं ! इस प्रकार इच्छानुसार वे कर नहीं सकते । इसलिए जो करते हैं उसी को पसन्द करने की चेष्टा करते हैं और कल्पना करते हैं कि हम मौज में हैं । किन्तु असलियत यह है कि चहल-पहल से उनका जी उचटा रहता है, डाक्टर उनको बेवकूफ बनाते रहते हैं और व्यापारी लूटते रहते हैं तथा अपने से अधिक धनियों के हाथों हुए अपमान के बदले उन्हें गरीबों का अपमान कर बुरी तरह सन्तोष मानना पड़ता है। इस चोक से बचने के लिए वहाँ के योग्य और उत्साही धनिक पार्लमेंट में, राजनैतिक विभाग में या सेना में दाखिल हो जाते हैं। या अपनी जागीर और कारवार को अपने वकीलों, दलालों और प्रतिनिधियों के भरोसे छोडने के बजाय उसका स्वयं प्रबन्ध और विकास करते हैं या भारी परिश्रम और खतरों का सामना 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2026-06-15T09:49:36Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662943 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ५ :'''|}} {{Center}}{{Xx-larger|'''असमान आय के दुष्परिणाम'''}}</noinclude>किसी भी गृहस्थ को सव से पहिले यह तय करना पड़ता है कि उसको किन-किन चीज़ों की सबसे अधिक आवश्यकता है और कौनसा काम वह बिना कष्ट उठाए कर सकता है। इसका यह अर्थ हुआ कि गृहस्थ को अपनी आवश्यकतानुसार चीज़ों का क्रम प्राथमिक नियत कर लेना चाहिए। उदाहरण के लिए, घर में आवश्यकताओं तो काफी भोजन भी न हो और घर की मालकिन की उपेक्षा इत्र की शीशी और नकली मोतियों की माला खरीदने में अपना सारा रुपया खर्च कर दे तो वह मिथ्याभिमानिनी, मूर्खा और कुमाता कहलायगी, किन्तु दूरदर्शी महिला केवल इतना ही कहेगी कि वह कुप्रबन्धक है जिसे यह भी नहीं मालूम कि रुपया पास हो तो पहिले क्या खरीदना चाहिए । जिस स्त्री में यह समझने की भी शक्ति न हो कि पहिले भोजन, वस्त्र, मकान आदि की आवश्यकता होती है और इत्र की शीशी और नकली अथवा असली मोतियों की माला की बाद में, वह गृहस्थो का भार ग्रहण करने योग्य नहीं है। हमारा यह मतलव नहीं कि सुन्दर चीजें उपयोगी नहीं होती । अपने उचित क्रम में वे बहुत उपयोगी और बिल्कुल ठीक है, किन्तु उनका नम्बर पहिले नहीं पाता । किसी बालक के लिए उसकी धर्म-पुस्तक बहुत उपयोगी हो सकती है, किन्तु भूखे बालक को दूध-रोटी के बजाय धर्म-पुस्तक देना पागलपन होगा । स्त्री के शरीर को अपेक्षा उसका मन अधिक आश्चर्यजनक होता है, किन्तु यदि शरीर को भोजन न दिया जाय तो मन कैसे टिक सकता है ? इसके विपरीत यदि उसके शरीर को भोजन दें तो मन अपनी और शरीर दोनों की चिंता कर लेगा। भोजन का नम्बर पहिला है। हम को समस्त देश को एक बड़ा घर और सारी जाति को एक बड़ा कुटुम्ब मान कर चलना चाहिए (वास्तव में यह है भी ऐसा ही ।) और<noinclude></noinclude> lktkrcfjl18u64cfy4zwf3cw6ww166h 662944 662943 2026-06-15T09:54:52Z Chahar 009 6627 662944 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||''': ५ :'''|}} {{Center|{{Xx-larger|'''असमान आय के दुष्परिणाम'''}}}}</noinclude>किसी भी गृहस्थ को सव से पहिले यह तय करना पड़ता है कि उसको किन-किन चीज़ों की सबसे अधिक आवश्यकता है और कौनसा काम वह बिना कष्ट उठाए कर सकता है। इसका यह अर्थ हुआ कि गृहस्थ को अपनी आवश्यकतानुसार चीज़ों का क्रम प्राथमिक नियत कर लेना चाहिए। उदाहरण के लिए, घर में आवश्यकताओं तो काफी भोजन भी न हो और घर की मालकिन की उपेक्षा इत्र की शीशी और नकली मोतियों की माला खरीदने में अपना सारा रुपया खर्च कर दे तो वह मिथ्याभिमानिनी, मूर्खा और कुमाता कहलायगी, किन्तु दूरदर्शी महिला केवल इतना ही कहेगी कि वह कुप्रबन्धक है जिसे यह भी नहीं मालूम कि रुपया पास हो तो पहिले क्या खरीदना चाहिए । जिस स्त्री में यह समझने की भी शक्ति न हो कि पहिले भोजन, वस्त्र, मकान आदि की आवश्यकता होती है और इत्र की शीशी और नकली अथवा असली मोतियों की माला की बाद में, वह गृहस्थो का भार ग्रहण करने योग्य नहीं है। हमारा यह मतलव नहीं कि सुन्दर चीजें उपयोगी नहीं होती । अपने उचित क्रम में वे बहुत उपयोगी और बिल्कुल ठीक है, किन्तु उनका नम्बर पहिले नहीं पाता । किसी बालक के लिए उसकी धर्म-पुस्तक बहुत उपयोगी हो सकती है, किन्तु भूखे बालक को दूध-रोटी के बजाय धर्म-पुस्तक देना पागलपन होगा । स्त्री के शरीर को अपेक्षा उसका मन अधिक आश्चर्यजनक होता है, किन्तु यदि शरीर को भोजन न दिया जाय तो मन कैसे टिक सकता है ? इसके विपरीत यदि उसके शरीर को भोजन दें तो मन अपनी और शरीर दोनों की चिंता कर लेगा। भोजन का नम्बर पहिला है। हम को समस्त देश को एक बड़ा घर और सारी जाति को एक बड़ा कुटुम्ब मान कर चलना चाहिए (वास्तव में यह है भी ऐसा ही ।) और<noinclude></noinclude> p18qbwytcz8wphyu38674rvpihckw20 पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/४५ 250 77062 662945 565829 2026-06-15T10:13:10Z Chahar 009 6627 /* शोधित */ 662945 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh|'''३८'''|'''समाजवाद : पूँजीवाद'''|}}</noinclude>तब हमें उसका प्रबन्ध करना चाहिए। हम को क्या दिखाई देता हैं ? सर्वत्र बालक अधभूखे, फटे-टूटे कपड़े पहिने, गन्दे घरों में पढ़े हैं। जो रुपया उनको योग्य भोजन, वस्त्र और मकान देने में खर्च होना चाहिए, वही लाखों की तादाद में इत्र की शीशियों, मोतियों की मालाओं, पालतू कुत्तों, मोटर गाडियों और हर तरह के व्यर्थ कामों में खुर्च होता है। इंग्लैण्ट में एक बहिन के पास केवल एक फटा-टूटा जूता है, सर्दी के मारे उसकी नाक सदा वहती रहती है, उसको पोंछने के लिए एक रूमाल का चिथड़ा भी उसके पास नहीं है। दूसरी के पास चालीसों जूते जोड़ियां और दर्जनों रूमाल हैं। एक ओर एक छोटा भाई है जो पैसे के चनों पर गुज़र करता है और अधिक के लिए बार-बार मांगता रहता है और इस तरह अपनी मां के दिल की तोड़ता रहता है और उसके धैर्य को थका देता है। दूसरी ओर एक मोटा भाई है। जो एक बढ़िया होटल में प्रातःकाल के भोजन पर पाँच-छः गिनियां खर्च कर देता है, शाम को रात्रिकल्य में खाता है और डाक्टर की दवा लेता है, कारण, वह बहुत अधिक खाता है ! यह अत्यन्त बुरी अर्थ-व्यवस्था है। जब विचारहीन लोगों से इसका कारण पूछा जाता है तो वे कहते हैं : श्रोह, चालीस जूते-जोडियां रखने वाली महिला और रात्रि क्लब में शराब पीने वाले आदमी को उनके पिता द्वारा रुपया मिला है। यह रुपया उसने रबड़ के सट्टे में कमाया था । और फटे-टूटे जूते बाली लड़की और अपनी मां के हाथों मार खाने वाला उत्पाती लड़का दोनों मजदूर मुहल्ले के केवल कूड़ा- कर्कट मान्न हैं । यह सही है, किन्तु जो जाति अपने बच्चों के लिए पर्याप्त दूध का प्रबन्ध करने से पहिले ही शेम्पेन शराब पर रुपया खुर्च करती हैं अथवा जब काफी पोषण न मिलने के कारण हज़ारों ही बच्चे काल के ग्रास बन रहे हों, तब भी सिलिहेम, अलसेशियन और पेकिंगी कुत्तों को बढिया बढ़िया भोजन देती हैं, वह निस्सन्देह अव्यवस्थित, हतबुद्धि, मिथ्याभिमानी, मूर्ख और यज्ञ है। उसका पतन निश्चित है। किन्तु इन सब हानिकारक बेहूदगियों का कारण क्या है ? किसी<noinclude></noinclude> mcibqeq4lk06d180myu5k6thyoa6iur पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/४६ 250 77063 662946 565830 2026-06-15T10:37:30Z Chahar 009 6627 /* समस्याकारक */ 662946 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="2" user="Chahar 009" />{{rh||'''असमान प्राय के दुष्परिणाम'''|'''३६'''}}</noinclude>समझदार आदमी ने कभी भी इनकी इच्छा नहीं की । बात यह है कि जब कभी दूसरो की थपेण कुछ कुटुम्ब बहुत अधिक धनी होंगे तभी इन बुराइयों का जन्म होना निश्चित है। धनी आदमी जब पति और पिता बन कर सी को अपने साथ घमीटता है नय यह भी यही करता है। तब धन्य लोगों की भांति यह भी पहिले भोजन, वस्त्र और मकान का प्रबन्ध परता है । ग़रीय आदमी भी यही करता है। किन्तु अपनी शक्तिभर गुर्च कर डालने पर भी ग़रीब आदमी की ये आवश्यकतायें पूर्णतः पूरी नहीं होतीं, भोजन पूरा नहीं पड़ता, कपड़े पुराने और मैले राहते हैं, रहने के लिये एक कोटरी या उसका कुछ भाग मिल पाता है और यह भी अस्वास्थ्यकर होता है। दूसरी ओर धनी आदमी शानदार कोटी में रहता है, खूब खाता और पहनता है। फिर भी उसके पास अपनी रुचियों और कल्पनाथों को मन्तुष्ट करने तथा दुनिया में यदप्पन जमाने के लिये फाफी रपया बच रहता है। ग़रीब आदमी कहता है- 'मुके और रोटी, और कपढे, तथा अपने कुटुम्ब के लिये अधिक अवदा घर चाहिए, किन्तु मेरे पास उसके लिये खर्ज करने को कुछ नहीं है।" धनी आदमी कहता है- "मुझे कई मोटरें जल-नौकाएं, पत्नी और पुत्रों के लिये हीरे-मोती और घने जंगल में एक शिकारगाट चाहिए ।" स्वभावतः व्यवसायी मोटरें और जल-नौकाएं बनाने में जुट पड़ते हैं, अफरीका में जाकर हीरे बुदवाते हैं, समुद्र की नह मे मोती निकलवाते हैं और मिनटों में शिकारगाह सड़ी कर देते हैं। ग़रीब आदमी की ओर कोई ध्यान नहीं देता जिसकी आवश्यकतायें तात्कालिक होती हैं, किन्तु जिसकी जेब खाली रहती हैं। इसी बात को दूसरे में यों कह सकते हैं। गरीब आदमी जिन चीजों का कभी अनुभव करना है उनको यनाने के लिए मज़दूर लगाना चाहता है। वह चाहता है कि लोग पकाने, घुनने, सीने और मकान बनाने का काम करें। किन्तु यह पाक-शास्त्रियों और सुनकर मास्टरों को इतना रुपया नहीं दे सकता जिससे वे अपने अधीन काम करने वालों को मजदूरी चुका सकें। उधर धनी आदमी ग्रपनी पसन्द<noinclude></noinclude> 0sbn6vzst4r7mbcy8t7q34j6kcbcum8 विषयसूची:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu 252 106363 662868 376467 2026-06-15T04:20:18Z सौरभ तिवारी 05 49 पृष्ठसूची अद्यतन। 662868 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=सह्याद्रि की चट्टानें |Language=hi |Volume= |Author=आचार्य चतुरसेन शास्त्री |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=प्रभात प्रकाशन |Address=दिल्ली |Year=1960 |Key= |ISBN= |Source=djvu |Image=1 |Progress=अ |Pages=<pagelist 1=आवरण-पृष्ठ 2=प्रकाशक 3=1 157=- /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:उपन्यास]] khld5sayinw2830umauqqws45r41jez पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५८ 250 108328 662910 376163 2026-06-15T07:48:53Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662910 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>५७ गढ़ आया, पर सिंह गया शुभ मुहूर्त में छत्रपति महाराज ने सिंहगढ़ में प्रवेश किया । प्राङ्गण में विषण्ण-वदन सैनिक नीची गर्दन किए खड़े थे । घोड़े से उतरते हुए शिवाजी ने कहा-"मेरा मित्र तानाजी कहाँ है ?" एक अधिकारी ने गम्भीर मुद्रा से कहा--"वह वीर वहाँ वरामदे में श्रीमान् की अभ्यर्थना को बैठे हैं।" अधिकारी रोता हुआ पीछे हट गया । महाराज ने पैदल आगे बढ़कर देखा। वह निश्चल मूत्ति सैकड़ों घाव छाती और शरीर पर खाकर वीरासन से विराजमान थी। महाराज की आँखों से टपाटप आँसू गिरने लगे। उन्होंने शोक-कम्पित स्वर में कहा-“गढ़ आया, पर सिंह गया।"<noinclude></noinclude> godt4jvt4vxhqfaezavpr5qgnb20pqw पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४६ 250 108363 662926 376201 2026-06-15T07:53:46Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662926 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>कारगुजारी समझने लगे। कर वसूल करने के लिए प्रायः बल का प्रयोग आवश्यक हो जाता था। इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। जजिया कर लगाने के प्रत्यक्ष फल' दो हुए सरकार की प्राय बढ़ गई और नए मुसलमानों की संख्या में वृद्धि होने लगी। बहुत से स्थानों में ६ मास के अन्दर-ही-अन्दर सरकारी खजाने की आय चौगुनी हो गई । औरंगजेब ने प्रान्त-शासकों को लिख दिया था, “तुम्हें अन्य सब प्रकार के करों को माफ करने का अधिकार है, परन्तु जजिया किसी को माफ नहीं किया जा सकता।" गुजरात में केवल जजिया से जो आय थी, वह शेष सारी आय का लगभग ३१ फीसदी थी। इस प्रकार जजिया लगाने का तुरन्त परिणाम यह हुआ कि राज्य की आय बढ़ गई। दूसरा परिणाम यह हुआ कि नौ-मुसलिमों की संख्या बढ़ने लगी। बहुत से हिन्दू, जो नहीं दे सकते थे, मुसलमान बना गए औरंग- जेब प्रसन्न होता था कि कठोर उगाही से हिन्दू लोग इस्लाम ग्रहण करने लिए बाधित होते थे। ये दोनों जजिया के प्रत्यक्ष और तत्काल परिणाम थे । परन्तु उसके जो अप्रत्यक्ष और अन्तिम परिणाम थे, वे इनसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे। सोने के अंडे देने वाली चिड़िया जिन्दा रहकर अंडा दे सकती है.। यदि उसमें से एक बार ही सब अंडे लेने का प्रयत्न किया जाय तो वह स्वयं ही न रहेगी, फिर अण्डे कहाँ से आएँगे। जजिया का बोझ पड़ने से हिन्दू व्यापारी शहरों को छोड़कर भागने लगे, क्योंकि शहरों में ही वसूली का जोर था। इससे व्यापार थोड़े ही दिनों में चौपट हो गया। छावनियों में विशेष दिक्कत होने लगी। हिन्दू व्यापारियों के भाग जाने से फौजों को अन्न मिलना भी कठिन हो गया। जब प्रान्तों के शासकों या सेनापतियों की ओर से यह सिफारिश आती कि कुछ समय के लिए जजिया वसूल न किया जाय, तो औरंगजेब का जोरदार इन्कार पहुंच जाता । अन्तिम फल यह हुआ कि शहरों का व्यापार १४४<noinclude></noinclude> s4hrjqfzbdmyxl582txpdzxl8g5ek2f पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४७ 250 108365 662927 376203 2026-06-15T07:54:00Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662927 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>जड़ ने लगा, जिससे केवल जजिया कर की ही नहीं, वस्तुतः हर प्रकार की सरकारी आमदनी घटने लगी। चौसर का दाव वसन्त के सुन्दर दिन थे। शिवाजी इन दिनों राजगढ़ में रहकर औरंगजेब की जबर्दस्त संग्राम-योजना की जवाबी तैयारी कर रहे थे। परन्तु जीजाबाई इन दिनों प्रतापगढ़ दुर्ग में थीं। एक दिन सायंकाल के समय एक बुर्ज पर खड़ी वे सूर्यास्त का सुन्दर दृश्य देख रही थीं कि दूर से उन्हें सिंहगढ़ का बुर्ज दीख पड़ा। उसे देखते ही उनके मन में विचार आया कि मेरे शिवा के रहते मेरी आँखों के सन्मुख यह शत्रु का किला खड़ा है। उन्होंने तत्काल एक दूत शिवाजी के पास रवाना किया । शिवाजी को तत्क्षण ही चले आने की आज्ञा थी। शिवाजी माता का आदेश पाते ही ताबड़तोड़ आ हाजिर हुए। आकर उन्होंने माता की वन्दना की और आज्ञा का कारण जानना चाहा। जीजाबाई ने कहा-"प्राओ बेटे, एक वाजी चौसर. खेलें ;"* शिवाजी ने समझा, माता का कोई गूढ आशय है। वे चौसर खेलने लगे। उन्होंने कहा-"माता, पहला पासा आप डालें।" "नहीं बेटे, राजा की विद्यमानता में कोई पहल नहीं कर सकता। यह राजपदवी का अधिकार है।" शिवाजी ने हंसकर पासा फेंका पर पासा अच्छा न पड़ा। तब जीजाबाई ने पासा फेंका। वह अच्छा निकला। शिवाजी ने कहा-"मैं हार गया । कहिए, क्या भेंट करूं।" "मुझे सिंहगढ़ चाहिए।" १४५<noinclude></noinclude> ksx4y0cacx2mxigynniylq3l4a9v4q5 पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४८ 250 108366 662928 376204 2026-06-15T07:54:20Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662928 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>शिवाजी सन्न रह गए । उन्होंने कहा-"बड़ा कठिन वचन मांगा, माता।" "पुत्र, यह शत्रु का किला मेरी ही आँखों के सामने शूल वनकर खड़ा है। इसे बिना जय किए तेरा राज्य अधूरा है।" कुछ देर शिवाजी चुपचाप खड़े सोचते रहे। फिर उन्होंने पालकी लाने की आज्ञा दी और माँ से कहा-"चलिए माताजी, राजगढ़ चलें।" राजगढ़ में आकर भोर ही शिवाजी ने दरबार किया। सब सामन्त सरदार एकत्र हुए। दरबार में १० पानों का बीड़ा चादर विद्या कर रखा गया । शिवाजी ने कहा-'कौन वीर प्राणों की बाजी लगाकर किला सर करेगा।" परन्तु सिंहगढ़ का नाम सुनकर सब सन्नाटे में आ गए। प्रथम तो सिंहगढ़ अजेय दुर्ग था। दूसरे इस समय उदयभानु उसका किलेदार था जो शारीरिक बल' में राक्षस के समान था। दुर्ग में दुर्दान्त पठानों की सेना थी वह भी अजेय समझी जाती थी। इसके अतिरिक्त इसी दुर्ग में वह पठान सेनापति भी था जिसने तानाजी की बहन को हरण किया था । जव बड़ी देर तक सभा में सन्नाटा रहा और किसी ने बीड़ा नहीं उठाया तो शिवाजी ने शेर की भाँति दहाड़ कर कहा- “तानाजी मालूसरे को बुलाना होगा। वही वीर यह वीड़ा उठाएगा।" तत्काल एक तीव्रगामी साँड़नी-सवार तानाजी को बुलाने रवाना हो गया जहाँ वे अपने पुत्र के ब्याह के लिए छुट्टी लेकर अभी कुछ दिन पूर्व गए थे। ५४ साँड़नी-सवार का सन्देश ग्राम में बड़ा कोलाहल' था। बालक धूम मचा रहे थे और विविध वस्त्र पहने स्त्री-पुरुष काम-काज में व्यस्त इधर-से-उधर दौड़-धूप १४६<noinclude></noinclude> 0ujsge64qd0v56oor4xjwafyo5trmli पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४९ 250 108367 662929 376205 2026-06-15T07:54:40Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662929 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>कर रहे थे। तानाजी के पुत्र का विवाह था । द्वार पर नौबत वज रही थी। आगत जनों की काफी भीड़ थी। सन्ध्या होने में अभी विलम्ब था। एक श्रमिक, शिथिल साँड़नी सवार ने नगर में प्रवेश किया। थोड़े-से वालक कौतूहल-वश उसके पीछे हो लिए। ग्राम के चौराहे पर जाकर उसने अपनी बगल से छोटी-सी तुरही निकाल कर फूंकी। देखते-देखते दस-बीस नर-नारी और बहुत से वालक एकत्र हो गए। सवार ने एक वृद्ध को लक्ष्य करके कहा-"मुझे तानाजी मकान पर अभी पहुँचना है ।" तुरन्त दस-पाँच आदमी साथ हो लिए। सन्मुख ही तानाजी का पर था। वहाँ पहुँच कर उसने फिर तुरही बजाई । कोलाहल वन्द हो गया । सभी व्यत्र होकर आगन्तुक को देखने लगे। उसने जरा उच्च स्नर से पुकारकर कहा- "छत्रपति शिवाजी महाराज की जय हो । मैं तानाजी के पास महाराज का अत्यावश्यक सन्देश लेकर आया हूँ। तानाजी अभी चानकर महाराज से मुलाकात करें।" उपस्थित जन-मण्डल ने चिल्लाकर कहा-"छत्रपति महाराज की जय।" हल्दी से शरीर लपेटे, व्याह का कंगना हाथ में बाँधे पुत्र को छोड़कर तानाजी बाहर निकल आए। धावन ने उन्हें पत्र दिया । पत्र पढ़कर तानाजी क्षण भर को विचलित हुए। इसके बाद ही उन्होंने अग्निमय नेत्रों से उपस्थित जन-समूह को देखा। वह उछलकर एक ऊँचे स्थान पर चढ़ गए, और उन्होंने गंभीर व उच्च स्वर से कहना प्रारम्भ किया--"सज्जनो ! महावीर छत्रपति महाराज ने मुझे इसी क्षण बुलाया है । यह शरीर और प्राण महाराज का है। फिर वहिन के प्रतिशोध का भी यही महायोग है। मैं इसी क्षण जाऊँगा । आप लोग कल प्रातःकाल ही प्रस्थान करें। विवाह समारोह अनिश्चित समय के लिए स्थगित किया गया।" । १४७<noinclude></noinclude> 2m84jt5y6qa4u9k3eq8lukklywx8shx पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५० 250 108368 662930 376206 2026-06-15T07:54:57Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662930 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>तानाजी बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए चीते की भांति उछलकर कूद पड़े और घर में चले गए। कुछ ही क्षण बाद वह अपने प्यारे बचें और विशाल तलवार के साथ सज्जित होकर घोड़े पर सवार हुए । विवाह का आनन्द-समारोह स्तब्ध हो गया। गुरुजनों को प्रणाम कर पुत्र को छाती से लगा उन्होंने बढ़ते हुए सन्ध्या के अन्धकार में डूवते हुए सूर्य को लक्ष्य कर उन दुर्गम पर्वत-उपत्यकाओं में घोड़ा छोड़ दिया। ५५ बीड़ा-ग्रहण तानाजी के आने पर शिवाजी ने उन्हें माता की आज्ञा सुना दी। माता की आज्ञापालन कर तानाजी ने बीड़ा आदरपूर्वक उठा पगड़ी में रख लिया। जीजाबाई ने आकर वीर की आरती उतारी। दूसरे ही दिन एक हजार जुझाऊ वीरों की सेना लेकर उन्होंने सिंहगढ़ की ओर प्रस्थान किया और एक सघन जङ्गल में डेरा डाला । सिंहगढ़ किले में समाचार ले जाने पहुँचाने वाले लोग कोली और कुम्हार लोग थे। उन्हें हर समय किले से बाहर और बाहर से किले में आने-जाने की छूट थी। तानाजी ने उनसे मिलकर काम निकालने की युक्ति सोची। दैवयोग से अनुकूल अवसर भी मिल गया। कोलियों के सरदार रायजी की पुत्री का ब्याह पूना निवासी दौलतराय के पुत्र के साथ था। दौलतराय तानाजी के परिचित थे । दौलतराय की सहमति से तानाजी एक कलावन्त की हैसियत से बारात में सम्मिलित हो गए। दौलतराय ने तानाजी को प्रसिद्ध कलावन्त गोन्धाजी तोताराम बताया। जव उन्होंने मधुर स्वर में शिवाजी का स्तवन गाया तो श्रोता मुग्ध होकर शिवाजी की चर्चा करने लगे। गायन का अभिप्राय था कि शिवाजी शिव के अवतार हैं । अम्बावाई १४८<noinclude></noinclude> fp7pxdx0i9j8v0j33memu3p8ogeqwmr पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५१ 250 108404 662931 376244 2026-06-15T07:55:33Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662931 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>की प्रार्थना पर जीजाबाई के गर्भ से मुगलों का सर्वनाश करने को उन्होंने अवतार लिया है। वे गौ-ब्राह्मण के रक्षक हैं। अन्तिम चरण गाया-“जे जे मोगलाँच चाकर थूरे थूमचा जिनगी बर।" गाने के मधुर स्वर और हृदयग्राही भाव सुनकर रावजी मुग्ध हो गए और तानाजी को अंक में भर कर कहा-"मांग, क्या मांगता है।" तब एकान्त में ताना ने अपना परिचय देकर रावजी से कोलियों- कुम्हारों की सहायता मिलने का वचन लिया । कृतकृत्य होकर तानाजी अपनी छावनी में लौट आए। तीज का चन्द्रमा उदय हुआ। उसकी क्षीण चाँदनी पर्वतों पर फैल गई। आकाश में असंख्य नक्षत्र उदित थे। तानाजी छावनी के एकान्त भाग में खड़े हुए अजेय सिंहगढ़ की ओर ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने अकस्मात् देखा--एक मनुष्य मूर्ति किले से निकल कर धीरे-धीरे पहाड़ से नीचे उतर रही है। तानाजी ने अपनी कमर में लटकती तलवार को भलीभांति परखा और चुपचाप उस ओर को चल दिए जिधर वह मनुष्य आ रहा था। निकट पहुँच एक झाड़ी में छिप गए और अवसर पाकर तलवार उसके कण्ठ पर रखकर कहा-"सच कह, तू कौन है ?" वह पुरुष प्रथम तो तनिक घबराया। फिर उसने कहा-"मैं राजपूत हूँ, मेरा नाम जगतसिंह है। आप कौन हैं जो अकारण ही शत्रुवत् व्यवहार कर रहे हैं ?" "मैं जानना चाहता हूँ कि तुम शत्रु हो या मित्र ।": "यदि आप इस किले के निवासी हैं तो मैं आपका शत्रु हूँ।' यदि नहीं हैं तो मित्र हूँ।" "जब किले वाले तुम्हारे शत्रु हैं तब तुम किले में क्यों गए थे ?" "यह बात मैं केवल मित्र को बता सकता हूँ।" १४६<noinclude></noinclude> 6r1im1t6ihlfqgwiifd0ylbm2pv253w पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५२ 250 108405 662932 376245 2026-06-15T07:55:48Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662932 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>"तो मित्र समझ कर ही वतारो।" "किन्तु आप कौन हैं ? आपका नाम क्या है ?" "अभी इतना ही जानो कि मित्र हूँ। धोखा नहीं होगा।" "आप केवल यह बता दीजिए कि क्या आप महाराज शिवाजी के आदमी हैं ?" "तुम्हारा अनुमान ठीक है।" "तव सुनिए । दुरात्मा उदयभानु इस दुर्ग का स्वामी है। उसके पिता उदयपुर के एक सामन्त थे। उन्हीं का बाँदी पुत्र यह है। इसने उदयपुर के एक बड़े सामन्त की पुत्री कमलकुमारी से जबर्दस्ती ब्याह करना चाहा था । पर उसके पिता ने घृणापूर्वक अस्वीकार कर दिया । इस पर वह आगरे औरङ्गजेब के पास पहुँचा और अपने को उदयपुर का राजकुमार बताकर मुसलमान हो गया जिससे औरङ्गजेब इस पर प्रसन्न हो गया और महाराज जसवन्तसिंह के स्थान पर यहाँ भेज दिया । उधर कमलकुमारी का विवाह भी हो गया और वह विधवा भी हो गई। निस समय यह सेना सहित मेवाड़ की सीमा पार कर रहा था। कमलकुमारी सती होने जा रही थी। इसने तत्काल धावा मारा और कमलकुमारी को मार-काट करके ले भागा। उसके साथ मेरी पत्नी भी थी। वह भी उसने पकड़ ली और दोनों को यहाँ ले आया तथा दोनों को बन्दी करके यहाँ रखा है। बादमाह ने उसका विवाह रोक दिया था । पर अब आज्ञा मिल गई है और कल पहर रात गए विवाह होगा। उसके इस घृगित काम से सभी हिन्दू-मुसलमान उससे घृणा करते हैं । मैंने अपना वैर चुकाने को उसकी नौकरी की है। बस, यही मेरी दास्तान है।" सब हाल सुनकर तानाजी ने भी अपना अभिप्राय कह सुनाया। सुनकर राजपूत ने कहा-"मैं आपकी सहायता करूंगा। किन्तु आपको मेरी पत्नी मुक्त कराना होगा।"<noinclude></noinclude> kzkutawuvbwfnhyza4cudsiqqjf03th पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५३ 250 108406 662933 376246 2026-06-15T07:56:45Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662933 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>"मैं तलवार की शपयलेक र प्रतिज्ञा करता हूँ, पर तुम्हें भी मेर एक काम करना होगा। किले में मेरा एक शत्रु है उसे मुझे पहचनवा देना होगा।" "वह कौन है ?" “खान अब्दुस्समद फौजदार।" "मैं उसे बखूबी जानता हूँ । वह उदयभानु का दाहिना हाथ है।" "मैं तलवार की शपथ लेकर प्रतिज्ञा करता हूँ।" दोनों में और भी गुप्त परामर्श हुए। राजपूत ने कहा-"कल एक पहर रात जाने पर कल्याण बुर्ज पर मेरा पहरा है । मेरा साथी एक तुर्क है। उससे मैं निबट लूंगा। आप जैसे बने एक पहर रात गए बुर्ज पर चढ़ जाय।" "गवश्य आऊँगा, मित्र" कहकर तानाजी ने जगतसिंह को विदा किया। अभियान स्तब्ध रात्रि के सन्नाटे में सैनिकों का प्रशान्त दल चुपचाप आगे बड़ा जा रहा था । संकरी पगडण्डी के दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे सरकण्डे के झाड़ खड़े थे। तारों के क्षीण प्रकाश में घोड़ों को कष्ट होता था, पर सेना की अवाध गति जारी थी। हठात् सैनिक रुक गए । अग्रगामी सैनिक ने पंक्ति से पीछे हटकर कहा- "श्रीमान्, वस यही स्थान है।" "आगे रास्ता नहीं ?" "नहीं, श्रीमान् !" "तब यहाँ से क्या उपाय किया जाय ?" १५१<noinclude></noinclude> 4sgy0hfithdbizetcmeqb2yl6o46t17 पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५४ 250 108407 662872 662744 2026-06-15T04:38:21Z सौरभ तिवारी 05 49 /* शोधित */ 662872 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude> "इस ढालू चट्टान पर चढ़ना होगा।" "यह बहुत कठिन है।" "परन्तु दूसरा उपाय ही नहीं है।" "तब चढ़ो।" तानाजी चट्टान को दोनों हाथों से दृढ़ता से पकड़ कर खड़े हो गए। देखते-देखते दूसरा सैनिक छलाँग मारकर चट्टान पर हो रहा, और सेना-नायक को खींच लिया। उस बीहड़ और सीधी खड़ी चट्टान पर धीरे-धीरे ये हठी सैनिक उस दुर्भेद्य अन्धकार में चढ़ने लगे। कल्याण बुर्ज के नीचे आकर तानाजी ने कहा—"अब कमन्द लाओ।" सन्दूकची में से शिवाजी की प्रसिद्ध घोर पड़ 'यशवन्त' गोह निकाली गई। उसके माथे पर तानाजी ने चन्दन का तिलक लगाया। गले में माला पहनाई और कमन्द में बाँधकर फेंका। परन्तु गोह स्थान पर न पहुँच सकी, वापस आ गई। तानाजी ने क्रोध करके कहा—"इस बार भी यशवन्त लौट आया तो इसे मारकर खा जाऊँगा।" उन्होंने पूरे जोर से उसे ऊपर फेंका। गोह ने बुर्ज पर पंजे गाढ़ दिए। तानाजी दाँतों में तलवार दबाए बुर्ज पर पहुँच गए। वहाँ जगतसिंह तैयार था। उसका साथी तुर्क मरा पड़ा था। रस्सियों को बुर्ज के कंगूरों में अटका दिया गया। अब एक के बाद दूसरा और फिर तीसरा। इस प्रकार बारह सैनिक बुर्ज पर पहुँच गए, इसी समय कमन्द टूट गया। नीचे के सिपाही नीचे रह गए। दुर्ग में सन्नाटा था। सब चुपचाप दीवारों की छाया में छिपते हुए फाटक की ओर बढ़ रहे थे। फाटक पर प्रहरी असावधान थे। एक ने सजग होकर पुकारा—"कौन?" दूसरे ही क्षण एक तलवार का भरपूर हाथ उस पर पड़ा। सभी प्रहरी सजग होकर आक्रमण करने लगे। देखते-ही-देखते किले में<noinclude>{{c|१५२}}</noinclude> rpquxd4pc8xbuc5fluk9qob9rujue05 पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५५ 250 108408 662906 376248 2026-06-15T07:44:57Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662906 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>कोलाहल मच गया। जगह-जगह योद्धा शस्त्र बाँधने और चिल्लाने लगे तथा मशालों के प्रकाश में इधर-उधर घूमने लगे। बारहों व्यक्ति चारों ओर से घिर गए। उनके आगे तानाजी और जगतसिंह थे। वे भीम वेग से फाटक की ओर बढ़े जा रहे थे। प्रहरी मन में भयभीत थे। तानाजी ने एक बार प्रचण्ड जयघोष किया और उछलकर फाटक पर चढ़ बैठे। साथियों ने प्रहरियों को तलवार के वल चीर डाला, तब तानाजी ने साहस करके फाटक खोल दिया। हर हर महादेव का घोष करती मराठों की सेना सूर्याजी के नेतृत्व में किले में घुस गई। इस समय महल में उदयभानु के ब्याह की तैयारी हो रही थी। काजी साहेव चुके थे। कमलकुमारी सिसक-सिसक कर रो रही थी। काजी साहेब उसे दम-दिलासा दे रहे थे। इसी समय हर हर महादेव का शब्द सुनकर उदयभानु चौंक पड़ा। जब उसने सुना कि शत्रु किले में घुस आए हैं तब उसने चीख कर कहा-“सिद्दी हलाल' को भेजो, चन्द्रावल हथिनी को तैयार करो। खाँ साहेब को खबर करो"। काजी से उसने कहा, "झटपट निकाह पढ़ो।" परन्तु सिद्दी हलाल का जगतसिंह ने सिर काट कर महल में फेंक दिया, इसी समय तानाजी ने हाथी की एक सूंड़ काट कर उसके पैरों को जख्मी कर दिया। हाथी चिंघाड़ता हुआ भागा। तब उदयभानु ने अपने वारह वेटों को भेजा। परन्तु वे भी देखते-देखते काम आए। मराठे ऐसी प्रचण्डता से तलवार चला रहे थे कि बड़े-बड़े सूरमाओं का धैर्य भंग हो रहा था निकाह सम्पन्न नहीं हुआ । जगतसिंह और तानाजी महल में घुस आए। अन्ततः उदयभानु तलवार लेकर उनसे जूझने लगा। इसी समय मराठा वीरों ने महल में आग लगा दी। भयानक चीत्कार और रोना-पीटना मच गया। अवसर पाकर उदयभान ने ताककर तलवार का भरपूर हाथ तानाजी के सिर पर दिया, तानाजो १५३<noinclude></noinclude> 9l7zbgoj29zq5p506ztiqep71ytrtdt पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५६ 250 108413 662907 376253 2026-06-15T07:46:37Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662907 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>का भी एक भरपूर हाथ पड़ा। दोनों वीर एक साथ गिर कर गुथ गए : इसी समय सूर्याजी ने उदयभानु का सिर काट लिया। हर-हर महादेव करती हुई महाराष्ट्रीय सेना मारकाट करने लगी। वड़ा भारी घमासान मच गया। रुण्ड-मुण्ड डोलने लगे । घोड़ों की चीत्कार, योद्धाओं की ललकार और तलवारों की झनकार ने भयानक दृश्य उपस्थित कर दिया। इसी समय खान पठानों की सेना को लेकर आगे बढ़ा । जगतसिंह ने संकेत किया। तानाजी ने ललकार कर कहा-'इधर आ यवन सेनापति, मद की भाँति युद्ध कर । आज बहुत दिन का लेन-देन चुकाऊँगा।" यवन सेनापति ने जोर से कहा-"काफिर, मैं यहाँ हूँ। सामने. पा, गरीब सिपाहियों को क्यों कटाता है।" तानाजी उछलकर खान के सन्मुख गए। दोनों में घमासान युद्ध होने लगा। दोनों तलवार के धनी थे । पर तानाजी घायल थे। मशालों धुंधले प्रकाश में दोनों योद्धाओं का असाधारण युद्ध देखने को सेना स्तब्ध खड़ी हो गई। तानाजी ने कहा- "सेनापति, पहले तुम वार करो, आज मैं तुम्हें मारूंगा।" "काफिर, अभी तेरे टुकड़े किए डालता हूँ।" उसने तलवार का भरपूर वार किया। "अरे यवन, आज बहुत दिन की साध पूरी होगी।" बदले में तलवार का जनेवा हाथ फेंकते हुए तानाजी ने कहा--"लो।" सेनापति के मोढ़े पर तलवार लगी, और रक्त की धार बहने लगी। उसने तड़पकर एक हाथ तानाजी की जाँघ में मारा । जाँघ कट गई। तानाजी ने गिरते-गिरते एक बर्छा सेनापति की छाती में पार कर दिया। दोनों वीर घोड़ों से गिर पड़े। १५४.<noinclude></noinclude> irk6mzxdsub0m2nj5xmt7lngjxyjzhc पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५७ 250 108414 662908 376254 2026-06-15T07:47:42Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662908 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>अव फिर सेना में घमासान मच गया। उदयभानु की राजदूत सेना और यवन-सेना परास्त हुई। सूर्योदय से पूर्व ही किले पर भगवा झण्डा फहराने लगा । तोपों की गर्जना से पहाड़ियाँ थर्रा उठीं। लाशों के ढेर से तानाजी का शरीर निकाला गया। अभी तक उसमें प्राण था। थोड़े उपचार से होश में आकर उन्होंने कहा-"क्या किला फतह हो गया ?" "हाँ महाराज।". “यवन सेनापति क्या जीवित है ?" यवन सेनापति भी जीवित था। उसका शरीर भी वहीं था। तानाजी ने क्षीण स्वर में पुकारा–“यवन सेनापति !" "काफिर ?" "पहचानते हो?" "दुश्मन को पहचानना क्या है ? तुम कौन हो ?" "पन्द्रह वर्ष प्रथम जिसे आक्रान्त करके तुमने उसकी बहन का हरण किया था ।" सेनापति उत्तेजना के मारे खड़ा हो गया। फिर धड़ाम से गिर उसके मुख से निकला--"तानाजी ?" "आज बहन का बदला मिल गया।" यवन-सेनापति मर रहा था, उसका श्वास ऊर्ध्वगत हो रहा था, और आँखें पथरा रही थीं। उसने टूटते स्वर में कहा-"तुम्हारी हमशीरा और बच्चे इसी किले में हैं, उनकी हिफाजत... यवन-सेनापति मर गया। तानाजी की दशा भी अच्छी नहीं थी, ये शब्द मानो वह सुन नहीं सके। उन्होंने टूटते स्वर में कहा- "महाराज से कहना, तानाजी ने जीवन सफल कर लिया। महाराज बहिन की रक्षा करें तथा जगतसिंह का वचन पूरा करें।" तानाजी ने अन्तिम श्वास ली। १५५<noinclude></noinclude> 5i9noqeymr4zld3r1qkuob3sbneky1e पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१३४ 250 108449 662911 376291 2026-06-15T07:49:57Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662911 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>. आलसी, विलासी और शक्तिहीन मुअज्जम से शिवाजी को किसी प्रकार का भय न था। उसके साथ जोधपुर के महाराज जसवन्त- सिंह भी शिवाजी के भीतर ही भीतर मित्र थे। उधर रुहेला सेनापति दिलेरखां वृद्धावस्था में बहुत घमण्डी हो गया था । शाहजादा मुअज्जम के आदेशों की वह तनिक भी परवाह न करता था और महाराज जसवन्तसिंह का खुलेआम अपमान करता था। इस प्रकार मुगलों का यह दक्षिणी पड़ाव आपसी ईर्ष्या-द्वष और गृहयुद्ध का अखाड़ा बना हुआ था । यही कारण था कि आगरे से लौटने के बाद तीन साल तक शिवाजी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई। शिवाजी भी अपनी दूर- दर्शिता के कारण झगड़े-टंटे के सब अवसरों को टालते रहे। और अपनी पूरी शक्ति भविष्य की तैयारियों में लगा दी। उन्होंने अपने राज्य के शासन-प्रबन्ध को सुव्यवस्थित किया, किलों की मरम्मत की, आवश्यक युद्ध सामग्री एकत्र की और पश्चिमी तट पर बीजापुर राज्य और जंजीरा के सिद्धियों को पराजित किया और अपनी सीमाएँ सुदृढ़ की। बीच-बीच में वे महाराज जसवन्तसिंह की लल्ली-पत्ती करते रहे और निरन्तर यही कहते रहे कि मेरे बुजुर्ग मिर्जा राजा मर चुके हैं, अब आप ही मेरे एकमात्र हितैषी हैं । मुगल दरबार से मुझे क्षमा करा दीजिए तो मैं सब प्रकार की शाही सेवा करने को तैयार हूँ। शिवाजी की इस विनय से सन्तुष्ट होकर मुअज्जम और जसवन्तसिंह ने शिवाजी के लिए औरंगजेब से सिफारिश की। अन्त में सन् १६६८ के प्रारम्भ में एक संधि हुई जो दो वर्षों तक कायम रही। इस संधि के अनुसार औरंगजेब ने शिवाजी को राजा कहना स्वीकार कर लिया और मराठों द्वारा समर्पित किलों में से चाकण का किला उन्हें लौटा दिया। इसी संधि के अनुसार शिवाजी ने नीराजी रावजी की अधीनता में एक मराठा सेना औरंगाबाद भेज दी। शंभुजी को पंचहजारी मनसब दे दिया गया और मनसब की जागीरें बरार में दे दी गई। परन्तु, हकी- १३२<noinclude></noinclude> 2mrryemebhpv61oocdopo09gu9mjjc9 पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१३५ 250 108454 662912 376296 2026-06-15T07:50:18Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662912 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>कत यह थी कि मुगल और शिवाजी के बीच की यह सन्धि एक अल्प- कालीन युद्ध-विराम मात्र थी क्योंकि औरंगजेब को इस समय सदैव अपने बेटों से विद्रोह का खतरा बना रहता था और न जाने क्यों उसके शक्की मिज़ाज में यह विश्वास घरं करता जाता था कि कहीं मुअज्जम- शिवाजी से मिलकर विद्रोह का झंडा खड़ा न कर दे। अन्त में उसने शिवाजी को पकड़ने या उसके लड़के को कैद करके धरोहर के रूप में अपने अधिकार में रखने का एक गुप्त षड़यन्त्र करना प्रारम्भ किया । इसी समय एक ऐसी घटना घटी जो चिनगारी का काम कर गई। शाही दरबार में जाने के लिए शिवाजी को जो एक लाख रुपये दिये गये थे, उनकी वसूली के सिलसिले में बरार में दी गई शिवाजी की नई जागीर का एक अंश कुर्क कर लिया गया । वस, शिवाजी ने एक बारगी ही मुगल साम्राज्य पर धावे बोल दिए, उनके दल के दल दूर-दूर तक धावा करके मुगल' प्रदेश को लूटने लगे। पुरन्दर की सन्धि के समय औरङ्गजेब को जो किले सौंपे गए थे, वे एक-एक करके वापस ले लिए। साथ ही सन् १६६० के अन्त तक शिवाजी ने अहमदनगर, जुन्नर और परेण्डा के आसपास के ५१ गाँवों को भी लूट लिया । इस समय शाहजादा मुअज्जम और दिलेरखाँ का पारस्परिक विरोध बहुत बढ़ गया था । स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि दिलेरखाँ को विश्वास हो गया कि यदि वह मुअज्जम की सेवा में उपस्थित हुआ तो या तो वह कैद कर लिया जायगा या मार दिया जायगा। उसकी अवज्ञाओं से क्रुद्ध होकर और जसवन्तसिंह के बढ़ावे में आकर मुअज्जम ने औरङ्गजेब से शिकायत की कि दिलेरखाँ विद्रोही हो गया है। उधर दिलेरखाँ ने औरङ्गजेब को सूचना दी कि शाहजादा मुअज्जम और जसवन्तसिंह शिवाजी से मिलकर शाही तख्त के लिए खटपट कर रहे हैं। इस समय मुअज्जम अपनी मनमानी कर रहा था और शाही १३३<noinclude></noinclude> q2vj6f7xmb7u6udl8mb63d7taor3zxs पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४५ 250 108460 662923 376302 2026-06-15T07:53:00Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662923 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>यह ठीक है कि इस्लाम और हिन्दूधर्म एक-दूसरे के विरोधी भाव के प्रदर्शक हैं । वे असल में चित्र भरने के लिए केवल दो जुदा-जुदा रंग हैं । यदि यह मस्जिद है, तो वहां उसी की याद करने के लिए दुआ की जाती है । यदि वह मन्दिर है, तो उसमें, उसी की तलाश में घण्टा बजाया जाता है । किसी भी मनुष्य के धार्मिक विश्वास या धार्मिक क्रिया-कलाप के साथ दुश्मनी करना पवित्र पुस्तक के शब्दों को बदलने के समान है। "पूरे न्याय की दृष्टि से देखा जाय, तो जजिया उचित नहीं है। राजनीतिक दृष्टि से केवल उसी दशा में जजिया को माना जा सकता है, जब सुन्दर स्त्रियाँ आभूषणों से अलंकृत होकर राज्य के एक भाग से दूसरे भाग में जा सकें । परन्तु आज जब कि शहर तक लूटे जा रहे हैं, तव खुली आबादी का क्या कहना है ? जजिया केवल अन्यायपूर्ण ही नहीं है, यह भारत में एक नई वस्तु है, और समय के विरुद्ध है । “यदि आप समझते हों कि हिन्दू प्रजा को दबाना और डराना धर्म है, तो आपको चाहिए कि आप पहले राणा राजसिंह से जजिया कर वसूल करें क्योंकि वह हिन्दुओं का शिरोमरिण है । उसके बाद मुझसे भी जजिया लेना आपको कठिन न होगा, क्योंकि मैं आपका सेवक हूँ। परन्तु और मक्खियों को सताने में कोई बहादुरी नहीं है । "मैं आपके नौकरों की अद्भुत स्वामिभक्ति पर आश्चर्यान्वित हूँ कि वह आपको राज्य की ठीक-ठीक दशा नहीं बतलाते और आग को फूस से ढंकना चाहते हैं। मैं चाहता हूँ कि आपके बड़प्पन का सूर्य आकाश में चिरकाल तक चमकता रहे।" और भी कई हिन्दू राजाओं ने औरंगजेब की आँखें खोलने की चेष्टा की परन्तु कुछ सफलता न मिली। जजिया लगाने का हुक्म लेकर हरकारे चारों ओर फैल गए। गरीब प्रजा के लिए तो मानो मृत्यु का सन्देश आ गया । सूबे के शासक अधिक-से-अधिक जजिया उगाहने में १४३<noinclude></noinclude> 48mybxeajzktb3pb180mb4f71fuvbhi पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४४ 250 108465 662922 376307 2026-06-15T07:52:45Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662922 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>बढ़ चला। सिपाहियों के घोड़ों ने भी बहुतों को रौंद डाला । जब यह खबर चारों तरफ फैली तो हिन्दुओं में रोष की ज्वाला धधक उठी। शिवाजी ने औरंगजेब को एक खत लिखा- "मैंने सुना है कि मेरे साथ युद्ध करने के कारण खजाने खाली हो जाने से तंग आकर हुजूर ने हिन्दुओं पर जजिया नाम का कर लगा दिया है ताकि शाही खर्च चल सके । जनावे आली, जलालुद्दीन अकबर बादशाह ने ५२ वर्ष तक पूरी शक्ति के साथ राज्य किया। उसने ईसाई, यहूदी, मुसलमान, दादूपन्थी, फलकिया, मलकिया, अन्सारिया, दहरिया, ब्राह्मण और जैनों के साथ समान व्यवहार जारी रखा। उसके हृदय का भाव यह था कि सब प्रजा प्रसन्न और सुरक्षित रहे । इसी कारण वह 'जगद्गुरु' नाम से विख्यात हो गया था। "उसके पश्चात् बादशाह नूरुद्दीन जहांगीर ने दुनियां और उसके निवासियों पर २२ वर्ष तक अपनी शीतल छाया फैलाए रखी । उसने अपना हृदय मित्रों को और हाथ कार्य को सौंपा, जिससे उसे हरेक अभीष्ट वस्तु प्राप्त हुई । बादशाह शाहजहाँ ने ३२ वर्ष तक राज्य किया और अनन्त जीवन का फल प्राप्त किया, जो नेकी और यश का दूसरा नाम है। "परन्तु हुजूर के राज्य-काल में बहुत से किले और सूबे हाथ से निकल गए हैं, और शेष भी निकल जाँयगे, क्योंकि मेरी ओर से उनके नष्ट करने में कोई कसर न छोड़ी जायगी । आपके राज्य में किसान कुचले गए हैं, हरेक गांव की आमदनी कम हो गई है, एक लाख की जगह एक हजार और एक हजार की जगह दस, और वह भी बहुत कठिनाई से वसूल होता है। "हुजूर, यदि आप इलहामी किताब और खुदा के कलाम पर विश्वास रखते हों, तो देखिये वहां खुदा को रब-उल-आलमीन ( संसार भर का खुदा ) कहा है, रब-उल-मुसलमीन ( मुसलमानों का खुदा ) नहीं कहा । 4 .१४२<noinclude></noinclude> oqefdlmcd9wgx39pymvo5880d1mgae2 पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४३ 250 108470 662921 376312 2026-06-15T07:52:29Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662921 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>पूर्ण स्थानों में जनता के सदाचार की देखभाल करने के लिए मोहतसिव नियुक्त किए जिनका वास्तविक काम था हिन्दुओं के तीर्थों का विध्वंस करना । उसने हिन्दुओं पर जजिया लगाया; स्त्रियों, चौदह वर्ष के बच्चों और गुलामों को ही इससे छूट मिलती थी । धनवान, लंगड़ों, अंधों, पागलों और महन्तों को भी यह कर देना पड़ता था। एक बार दिल्ली और उसके आसपास के रहने वालों ने इस कर का विरोध भी किया। उन्होंने बड़ी करुणाजनक प्रार्थनाएं भी कीं परन्तु कोई सुनवाई नहीं हुई। इस कर से बहुत बड़ी रकम शाही खजाने में जाती थी। इससे बचने के लिए बहुत से हिन्दू मुसलमान हो गए। इसके अतिरिक्त हिन्दुओं से विक्री कर लिया जाता था और मुसलमानों से नहीं। मुसलमान होने पर उन्हें ऊंचे पद, जायदाद व दूसरे प्रलोभन दिए जाते थे । उसने अपने सब शासकों और ताल्लुकेदारों को आज्ञा दी थी कि अपने हिन्दू पेशकारों को निकाल कर मुसलमानों को भर्ती करें। उसने हिन्दुओं के मेलों को भी रोक दिया और त्यौहारों पर भी रोक-टोक लगाई। Mies ५२ जजिया शिवाजी के आगरे से निकल भागने से क्रुद्ध होकर औरंगजेब ने सब हिन्दुओं पर जजिया का कर लगा दिया । इस समाचार से सारे हिन्दुओं में हलचल मच गई । हिन्दू सामूहिक रूप से अपनी फरियाद लेकर बादशाह की सेवा में पहुँचे । बादशाह हाथी पर सवार हो जुमे की नमाज़ पढ़ने को जुम्मा मस्जिद की ओर रवाना हुआ तो लाखों हिन्दू राह पर लोट गए । उन्होंने रो-धोकर अपनी फरियाद बादशाह से अर्ज की पर औरंगजेब यों पसीजने वाला आदमी न था। उसने हाथी आगे बढ़ाने का हुक्म दिया और हाथी नर-नारियों को कुचलता हुआ आगे १४१<noinclude></noinclude> 0ow06hu6f8u7vt7rjebij58nx6hkb0j पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४२ 250 108475 662920 376317 2026-06-15T07:52:18Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662920 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>परन्तु यह सबकुछ अपवाद के रूप में ही हुआ और इस प्रकार की सारी कार्यवाही मुस्लिम दृष्टि से एक निन्दनीय आचरण था और यह समझा जाता था कि शासक ने अपने प्रधान शासक की अवहेलना की है। सच्चे मुस्लिम शासक की सारी सत्ता मुस्लिम सेना पर आधारित थी। मुस्लिम राज्य के आधारभूत साधनों की दृष्टि से गैर- मुसलमानों की वृद्धि और उन्नति और निरन्तर अस्तित्व बना रहना सर्वथा असंगत था । ऐसे राजनैतिक समाज में एक अनिश्चित और अस्थायी भावना उत्पन्न होती गई तथा शासक और शासितों के बीच परम्परागत विरोधी भावना निरन्तर बनी रही जिसका परिणाम यह हुआ कि विधर्मी मुस्लिम राज्य का अन्त में विनाश हुआ और यह कार्य औरंगजेब के शासनकाल में हुआ। ५१ औरंगजेब को कट्टर राजनीति औरंगजेब एक धूर्त और कुटिल राजनीतिज्ञ था । अपने राज्य के पहले ही वर्ष में उसने नए मन्दिरों के निर्माण का निषेध कर दिया। बाद में तो उसने अनेक मन्दिरों को भ्रष्ट किया, नष्ट किया और उनके स्थानों पर मस्जिदें वनवाई । उसने कटक से लेकर मेदिनीपुर तक उड़ीसा के स्थानीय हाकिम को सारे मन्दिर गिरवा देने की आज्ञा दी और हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं पर रोक लगवाई । उसने गुजरात का सोमनाथ का मन्दिर, काशी का विश्वनाथ का मन्दिर, मथुरा का केशव- राय का मन्दिर ढा दिए, जिन्हें सारे भारत की जनता आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखती थी। उसने मथुरा शहर का नाम बदलकर इस्लामा- बाद रख दिया और साम्राज्य के सब सूबों, परगनों, शहरों और महत्व- १४०<noinclude></noinclude> 145w2c49rtw9qcsme7kxpm5ogjbrded पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४१ 250 108480 662919 376322 2026-06-15T07:52:07Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662919 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>और शान्तिकालीन उद्योग-धन्धों और कला-कौशल को बढ़ावा दे सकें। इस्लामी राज्य की इस नीति का परिणाम यह हुआ कि मुसल- मानों को एक विशेषाधिकार प्राप्त जाति का स्थान मिल गया । अतः इस अधिकारी वर्ग का भरणपोषण राज्य अधिकारी द्वारा ही होता था। इसलिए शांतिकालीन समय में वे आलसी होते चले गए। जीवन के क्षेत्र में उनमें अपने पैरों पर खड़े होने की शक्ति न रही। राज्य के ऊंचे- ऊंचे ओहदों पर बैठना उनका जन्मसिद्ध अधिकार था। उन्हें न योग्यता के प्रदर्शन करने की आवश्यकता थी, न शौर्य की। इस प्रकार मुस्लिम साम्राज्य एक ऐसी जाति के हाथ में रह गया जो अयोग्य और आलसी थी और इस कारण मुस्लिम राज्यों की जड़ खोखली होती चली गई। धन से आलस्य और विलासप्रियता वढ़ी जो इस समूची जाति को दुर्व्यसन और कुकर्मों की ओर ले गई और जव साम्राज्य की समृद्धि का अन्त हुआ तो एक बार ही सर्वनाश वज्र की भांति उन पर आ टूटा । हिन्दू प्रजा, जो उनके आश्रित थी और जिसके साथ सब प्रकार के दुर्व्यवहार किए जा रहे थे, का उपयोग राज्य की उन्नति और विकास के लिए न किया जा सका। उन पर खुलेग्राम कानून के द्वारा या हाकिमों की स्वेच्छाचारिता के कारण दवाब डालकर उनके विकास को रोक दिया गया था। वे पशुओं की भांति किसी प्रकार जीवन व्यतीत कर रहे थे। वे शासकों की चाकरी करते और पैसा कमा कर उन्हें सोंप देते। अपनी गाढ़ी कमाई में से भी अपने लिए बचा रखने का उनको अधिकार न था। यही कारण था कि- मुस्लिम काल में उनका शारीरिक और मानसिक विकास न हुआ । ज्ञान और चिन्तन के क्षेत्र में भी वे पिछड़ गए। जिन मुसलमान बाद- शाहों ने हिन्दुओं के साथ सहिष्णुता की नीति वरती, उन्हें धन और ऊचे पद दिए, उनके साहित्य और कला को उत्साहित किया, उनके राज्य समृद्धिपूर्ण और शक्तिशाली हुए। १३६<noinclude></noinclude> m5k4ds2p145z671hko3im6vag3x2obd पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४० 250 108486 662918 376328 2026-06-15T07:51:53Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662918 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>अदालतों में गवाही देने, फौजदारी कानून, विवाह आदि के मामलों में उस पर अनेक अयोग्यताएँ लादी गई हैं। उसे अदालत में गवाही देने का अधिकार नहीं है। एक तरफ तो विधर्मियों के लिए ऐसे कठोर और अपमानजनक नियम थे, दूसरी ओर धर्म छोड़ कर इस्लाम स्वीकार कर लेने वालों को धन अथवा नौकरी दिए जाने के प्रलोभन भी थे। अरब के विजेताओं ने सर्वत्र सहनशीलता के नियमों का पालन किया था किन्तु वाद में तुर्कों के शासन काल में विर्मियों के लिए यह कठोर नियम अपनाए गए और इस प्रकार जिहाद में काफिरों को मारना और उनके धार्मिक स्थानों को नष्ट करना पुण्य कार्य माना गया। इससे मुसलमानों में एक ऐसी मनोवृत्ति पैदा हो गई कि उनके स्वभाव में लूटमार और नरहत्या एक धार्मिक कार्य और ईश्वरीय आदेश की भांति माना जाने लगा। यहाँ तक कि वासनाओं को वश में करने और इन्द्रियों को दमन करने की अपेक्षा काफिर को कत्ल करना और उसका धन लूट लेना एक मुसलमान के लिए स्वर्ग प्राप्ति का कारण बन गया। यही कारण था कि इस्लाम के आदर्श अपने अनुयायियों के सच्चे हितों की उन्नति में सहायक नहीं हुए.। इस्लाम की इस नीति के कारण सम्पूर्ण इस्लामी संस्था एक ऐसा संगठन बन गई जिसका कार्य केवल युद्ध था। मुसलमान नए-नए स्थानों को जीतने और लूटने की मनोवृत्ति को मन में पनपाते रहे। भारत में जब मुसलमानी राज्य विस्तार की चरम सीमा को पहुँच गया और आसाम और चटगांव की पहाड़ियों से जा टकराया तो उसने दक्षिण की ओर रुख करके महाराष्ट्र की सूखी चट्टानों में अपनी राह बनाने की निष्फल चेष्टा की। परन्तु राज्य का कोई स्थायी आर्थिक आधार न था। इन मुस्लिम नेताओं और विजे- ताओं में योग्यता भी न थी कि वे निरन्तर चलने वाले युद्धों में टिक भी सकें १३८<noinclude></noinclude> tmkxtdg60ehmic79ep0b8q2zu8f0nff पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१३६ 250 108491 662913 376333 2026-06-15T07:50:32Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662913 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>आज्ञाओं का भी पालन नहीं करता था, जिससे औरङ्गजेब अत्यन्त चिन्तित और शंकित हो गया था। मुगल दरबार आगरे में यह आम बात थी कि मुअज्जम शिवाजी से मिलकर बादशाह को तख्त से उतारने की साठ-गांठ में है। इसी से शेर होकर शिवाजी के मुगल प्रदेशों पर आक्रमण सफल होते जा रहे हैं और शाहजादा मुअज्जम चुपचाप बैठा देख रहा है। इधर दिलेरखाँ ने जव अपनी स्थिति को असहनीय देखा और अपने मार डाले जाने या कैद किए जाने का उसे अंदेशा हो गया तो उसने दक्षिण से भाग चलने में ही अपनी कुशल समझी। उसने गुजरात के सूबेदार बहादुरखाँ से एक खत बादशाह को लिखवाया जिसमें यह सिफारिश की गई थी कि दिलेरखाँ को उसकी अधीनता में काठियावाड़ का फौजदार नियुक्त किया जाय । वादशाह ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया और दिलेरखाँ ने दक्षिण से कूच कर दिया। सितम्बर सन् १६७० के अन्त में दिलेरखाँ ने दक्षिण छोड़ा और इसके तत्काल बाद २०,००० घुड़सवार और इतने ही पैदलों को लेकर शिवाजी ने सूरत को जा घेरा । अब यह वह लुटेरा शिवाजी न था जो पहले चोर की तरह आया था और लूटमार करके भाग गया था। अब उसकी कमान में ३०,००० मराठों की अजेय सेना थी और वह शाहजादे की छाती पर पैर रखकर सूरत पहुंचा था। ३ अक्तूबर को शिवाजी ने नगर पर धावा बोल दिया। शिवाजी के सूरत पर पहले धावे से सचेत होकर औरङ्गजेब ने शहर के चारों ओर शहरपनाह बना दी थी। परन्तु इससे कुछ लाभ न हुआ। नगररक्षक थोड़ी देर तक ही रक्षा कर सके अंत में वे किले की ओर भाग चले । शिवाजी ने आनन-फानन शहर को अपने अधिकार में कर लिया। केवल अंग्रेज, डच व फ्रांसीसी व्यापारियों की कोठियाँ, तुर्की व ईरानी व्यापारियों की बड़ी नई सराय और अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों कोठी के में स्थित तातार सराय जिसमें मक्का , १३४,<noinclude></noinclude> ms36calrifpq4zijbek72wps1i50vjl पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१३७ 250 108496 662914 376338 2026-06-15T07:50:53Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662914 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>की तीर्थयात्रा से हाल ही में लौटा हुआ काशगर का सिंहासन-च्युत । बादशाह ठहरा हुआ था, शिवाजी के आक्रमण से बच रहे । फ्रांसीसियों ने बहुमूल्य उपहार देकर मराठों को प्रसन्न कर लिया। अंग्रेजों व तातारों ने दिन भर वहादुरी से मराठों का सामना किया। अन्त में तातार लोग अपने बादशाह को लेकर किले में भाग गए और उनकी सारी वहुमूल्य सामग्री मराठों ने लूट ली । अन्त में तीन दिन तक लूटमार तथा आग लगाने के काण्ड करके तथा आधे शहर को जलाकर: राख करके और ६६ लाख रुपया नकद लूटकर शिवाजी सूरत से लौटे। भारत के सबसे धनवान वन्दरगाह का सारा धन चौपट हो गया और शिवाजी और मराठों का आतंक ऐसा फैला कि जब-जब मराठों के आने 'की झूठी-सच्ची अफवाहें नगर में फैलती, सूरत नगर भय से आतंकित हो उठता। व्यापारी लोग हड़बड़ा कर जल्द-जल्दी अपना सामान जहाजों पर रखाते, नागरिक गाँवों को भाग जाते और यूरोपियन व्यापारी. सुआली पहुँच कर आश्रय लेते थे। इस प्रकार मराठों के आक्रमण और लूट के आतंक का ऐसा प्रभाव हुआ कि उनके भय से सूरत का सारा विदेशी व्यापार पूर्णतया लुप्त हो गया । 4 ५० मुस्लिम धर्मानुशासन इस्लामी धार्मिक असूलों के अनुसार प्रत्येक मुसलमानी राज्य की नीति धर्मप्रधान होनी चाहिए । सच्चा बादशाह और अधिकारी एकमात्र खुदाताला है । और बादशाह खुदा का प्रतिनिधि । इस हिसाब से बाद- शाह का यह कर्तव्य है कि वह ईश्वरीय नियमों का सब प्रजा से पालन कराए। इस नीति का दूसरा व्यावहारिक स्वरूप यह बन जाता है कि १३५<noinclude></noinclude> mtvhk9ajihl4pb90wqpyqzaxkb9an5a पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१३८ 250 108497 662915 376339 2026-06-15T07:51:07Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662915 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>सच्चे इस्लामधर्म को राज्य में फैलाए और राजकीय शासन द्वारा प्रजा से उसका पालन कराए। इस प्रकार के राज्य में इस्लाम में अविश्वास करना नियमानुसार राज-द्रोह समझा जाता है और यह मान लिया जाता है कि विधर्मी व्यक्ति ने ईश्वर के संसारी पार्थिव प्रतिनिधि बाद- शाह की सत्ता का अपमान करके ईश्वर के प्रतिद्वन्द्वी झूठे देवी-देवताओं की पूजा की । इसलिए वह दण्ड का अधिकारी है । ऐसी हालत में कट्टर इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य जाति या धर्म के प्रति किसी प्रकार की दया या उदारता प्रकट करना अनुचित माना जाता है । इस्लामी धर्म के अनुसार ईश्वर के साथ अन्य देवताओं पर विश्वास रखना भी कुफ है। इसलिए इस्लामी धर्म के अनुसार सच्चे इस्लाम धर्म के अनु- यायी का जिहाद करना एक प्रथम और महत्वपूर्ण कर्तव्य बन जाता है। जिहाद के सम्बन्ध में सच्चे मुसलमानों के लिए ये आदेश हैं कि जब पवित्र माह समाप्त हो जाए तब उन सब आदमियों को जो ईश्वर के साथ दूसरे देवताओं के नाम जोड़ते और पूजते हैं, जहाँ मिलें, मार डालो । पर यदि वे धर्म परिवर्तित कर लें तो उन्हें अपनी राह जाने दो और उनसे कहो कि वे तोबा करें और यदि वे फिर विधर्मी हो जाएं तो उनसे लड़ो। इस्लामी आदेश यह भी है कि काफिरों के देश में उस समय तक युद्ध करो जब तक कि वे इस्लामी राज्य के दायरे में पूर्ण रूप से न आ जाएं। इन धार्मिक एवं राजनैतिक सिद्धान्तों के अनुसार ऐसी विजय के बाद उस देश के काफिरों की सारी आबादी मुसलमानों की गुलाम बन जाती है । सम्पूर्ण मनुष्यों को इस्लाम के झण्डे के नीचे ले आना और उन्हें मुस्लिम बना कर उनके हर प्रकार के धार्मिक मतभेदों को मिटा देना ही इस्लामी राज्य का आदर्श है। यति इस्लामी राज्य के अन्तर्गत कोई काफिर रहने दिया जाय तो वह केवल अपवाद ही माना जाना चाहिए परन्तु ऐसी परिस्थिति देर तक नहीं रह सकती, कुछ काल तक<noinclude></noinclude> cngq6gkykkl5rgy48fls5uz0l9qqaic पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१३९ 250 108511 662916 376354 2026-06-15T07:51:25Z Arnav Bharadwaj 6588 /* शोधित */ 662916 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>ही अस्थायी रूप से रह सकती है । ऐसे विधर्मी को इस्लामी धर्म के नियमानुसार सव राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाना चाहिए जिससे बह शीघ्र ही उस अनोखी इस्लामी आध्या- त्मिक ज्योति को प्राप्त कर ले और उसका नाम एक सच्चे मुसलमान की सूची में लिख दिया जाय । इस धार्मिक दृष्टिकोण से कोई भी अन्य धर्मावलम्बी मुसलमानी राज्य का नागरिक कदापि नहीं बन सकता । वह उस राज्य के दलित समाज का एक ऐसा सदस्य बन जाता है जिसकी स्थिति लगभग गुलामों जैसी होती है । और यह मान लिया जाता है कि ईश्वर ने जो उसे जीवन और धन दिया है, जिसका कि वह उपभोग कर रहा है, और इसके लिए इस्लामी शासक उसे जो प्राणदान देते हैं उसके बदले में उसे अनेक राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों का त्याग करना अनिवार्य हो जाता है और जो शासक उसे विधर्मी होने पर भी जीवित रहने देता है उसके इस उपकार के बदले उसे एक कर देना उसका कर्तव्य हो जाता है जिसे 'जजिया' कहते हैं । इसके अतिरिक्त यदि वह जमीन का मालिक है तो उस पर उसे खिराज देना चाहिए और सेना के खर्च के लिए भी अलग कर देना चाहिए। यदि वह स्वयं सेना में भरती होना चाहे तो वह ऐसा नहीं कर सकता। विधर्मी को 'जिम्मी' कहते हैं। कोई भी जिम्मी किसी प्रकार का बढ़िया और महीन कपड़ा नहीं पहन सकता, न वह घोड़े पर चढ़ सकता है, न वह शस्त्र धारण कर सकता है । प्रत्येक मुसलमान के साथ उसे सम्मानपूर्वक पूरी दीनता दिखाते हुए दरिद्र वेश में रहना चाहिए, और अपने आचरणों से यह प्रमाणित करना चाहिए कि वह विधर्मी और विजित जाति का आदमी है। कोई भी जिम्मी किसी भी हालत में मुसलमानी राज्य का नागरिक नहीं है। वह अपनी धार्मिक क्रियाओं, पूजा-पाठ आदि के सम्बन्ध में सार्वजनिक रूप में न तो बात ही कर सकता है और न प्रदर्शन । १३७ .<noinclude></noinclude> qgev9arxsur395kqtb2yoc0xmrujcl0 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२ 250 130143 662879 412740 2026-06-15T05:51:13Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662879 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''प्रथम संस्करण की भूमिका'''}} गत वर्ष मुझे हिंदी के विद्वानों के सम्मुख "साहित्यालोचन" उपस्थित करने का श्रवसर प्राप्त हुआ था। श्राज कोई चौदह मास के श्रनंतर मैं यह 'दूसरा ग्रंथ लेकर उपस्थित होता हूँ' । जिन कारणों के वशीभूत होकर मुझे पहले ग्रंथ की रचना का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, उन्हीं कारणों ने यह ग्रंथ उपस्थित करने में भी मुझे बाध्य किया है। भाषा-विज्ञान पर एक उत्तम ग्रंथ लिखने का भार मेरे परम मित्र स्वर्ग-वासी पंडित चंद्रधर जी गुलेरी ने अपने ऊपर लिया था। वे अभी इसे श्रारंभ भी न कर सके थे कि कराल-काल ने उन्हें श्रचानक कवलित कर लिया। मैंने बहुत चाहा कि कोई दूसरा विद्वान् गुलेरी जी का यह कार्य संपन्न करे; पर इस संबंध में मैंने जो कुछ उद्योग किया, वह सब निष्फल हुआ। कहीं से श्राशा या श्राश्वासन न मिला श्रौर न किसी प्रकार की यथेष्ट सहायता ही प्राप्त हुई। इधर काशी-विश्वविद्यालय के एम० ए० हिंदी क्लास के विद्यार्थियों की शांत किंतु दृढ़ पुकार बहुत दिनों तक उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखी जा सकती थी। श्रंत में मैंने गत सितंबर मास में सामग्री इकट्ठा करना श्रारंभ किया श्रौर मैं क्रमशः यह ग्रंथ लिखने तथा विद्यार्थियों को लिखे अंश पढ़ाने में लग गया। इस कार्य में अनेक बाधाएँ उपस्थित हुईं। स्वास्थ्य ने सबसे अधिक धोखा दिया। साथ ही विद्यार्थियों के अभाव की चिंता श्रौर उनके सम्मुख यथासमय उपयुक्त सामग्री उपस्थित करने में अपनी ढिलाई अथवा असमर्थता मुझे श्रौर भी व्यग्र करने लगी। दोनों ने मिलकर, जहाँ तक हो सका, बाधाएँ उपस्थित कीं श्रौर कम से कम इस पुस्तक के लिखने श्रौर प्रकाशित होने में तीन महीने का समय श्रधिक लगा दिया। इस अवस्था में भी पढ़ने श्रौर लिखने का काम करते रहने से आँखों ने भी श्रसहयोग कर देने की सूचना उपस्थित कर दी श्रौर उनकी शक्ति क्षीण हो गई। परंतु फिर भी मेरे लिये यह कम श्रानंद श्रौर संतोष की बात नहीं है कि यह पुस्तक यथासमय लिखी गई श्रौर छप गई।<noinclude></noinclude> rg2bn6d7fjhg6bcbuz0htodg1q1tjlr 662882 662879 2026-06-15T06:06:50Z Navishth 6636 662882 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''प्रथम संस्करण की भूमिका'''}} गत वर्ष मुझे हिंदी के विद्वानों के सम्मुख "साहित्यालोचन" उपस्थित करने का अवसर प्राप्त हुआ था। आज कोई चौदह मास के अनंतर मैं यह 'दूसरा ग्रंथ लेकर उपस्थित होता हूँ'। जिन कारणों के वशीभूत होकर मुझे पहले ग्रंथ की रचना का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, उन्हीं कारणों ने यह ग्रंथ उपस्थित करने में भी मुझे बाध्य किया है। भाषा-विज्ञान पर एक उत्तम ग्रंथ लिखने का भार मेरे परम मित्र स्वर्ग-वासी पंडित चंद्रधर जी गुलेरी ने अपने ऊपर लिया था। वे अभी इसे आरंभ भी न कर सके थे कि कराल-काल ने उन्हें अचानक कवलित कर लिया। मैंने बहुत चाहा कि कोई दूसरा विद्वान् गुलेरी जी का यह कार्य संपन्न करे; पर इस संबंध में मैंने जो कुछ उद्योग किया, वह सब निष्फल हुआ। कहीं से आशा या आश्वासन न मिला और न किसी प्रकार की यथेष्ट सहायता ही प्राप्त हुई। इधर काशी-विश्वविद्यालय के एम० ए० हिंदी क्लास के विद्यार्थियों की शांत किंतु दृढ़ पुकार बहुत दिनों तक उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखी जा सकती थी। अंत में मैंने गत सितंबर मास में सामग्री इकट्ठा करना आरंभ किया और मैं क्रमशः यह ग्रंथ लिखने तथा विद्यार्थियों को लिखे अंश पढ़ाने में लग गया। इस कार्य में अनेक बाधाएँ उपस्थित हुईं। स्वास्थ्य ने सबसे अधिक धोखा दिया। साथ ही विद्यार्थियों के अभाव की चिंता और उनके सम्मुख यथासमय उपयुक्त सामग्री उपस्थित करने में अपनी ढिलाई अथवा असमर्थता मुझे और भी व्यग्र करने लगी। दोनों ने मिलकर, जहाँ तक हो सका, बाधाएँ उपस्थित कीं और कम से कम इस पुस्तक के लिखने और प्रकाशित होने में तीन महीने का समय अधिक लगा दिया। इस अवस्था में भी पढ़ने और लिखने का काम करते रहने से आँखों ने भी असहयोग कर देने की सूचना उपस्थित कर दी और उनकी शक्ति क्षीण हो गई। परंतु फिर भी मेरे लिये यह कम आनंद और संतोष की बात नहीं है कि यह पुस्तक यथासमय लिखी गई और छप गई।<noinclude></noinclude> spfp9d8r9g2qpjweys73umdo9wlxo4v पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/३ 250 130792 662880 413565 2026-06-15T06:04:28Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662880 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( २ )}} मैने इस पुस्तक के लिखने में अपने सम्मुख यह उद्देश्य रखा था कि भाषा-विज्ञान के मूल सिद्धांतों का दिग्दर्शन मात्र करा दिया जाय और भारतवर्ष को प्राचीन भाषाओं का आधुनिक आर्य-भायात्रों तथा विशेषकर हिंदी से जो कुछ संबंध है, वह दिखला दिया जाय । न मैंने किसी ऐसे ग्रंथ के लिखने का विचार ही किया था जो भाषा-वैज्ञानिकों के लिये श्रादर की वस्तु हो और न ऐसा करने की मुझमें सामर्थ्य ही थी। मैं चाहता था कि हिंदी भाषा में इस विज्ञान की दृद नींव रख दी जाय, जिसमें समय पाकर अन्य विद्वान उस पर सुंदर प्रासाद निर्मित करने का सफलतापूर्वक उद्योग कर सकें और उन्हें नींव खोदने तथा उसे भरकर दृढ़ करने की आवश्यकता न रहे । इस उद्देश्य में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, इसके विषय में मैं कुछ कह नहीं सकता और न इसका निश्चय करना मेरा काम ही है। यह दूसरों का काम है। पर मुझे श्राशा है कि मैं विद्वानों को असंतुष्ट करने का कारण न होऊँगा। जिस उद्देश्य से प्रेरित होकर मैंने इस अंथ का लिखना श्रारंभ किया था, उसके लिये सामग्री की प्रचुरता थी। पर मेरी कठिनता यही थी कि किस सामग्री का उपयोग करूँ, उसे किस रूप में संचित करूँ, और किसे छोड़ दूं। जैसा कि पहले कह चुका हूँ, मैं भाषा-विज्ञान की प्रारंभिक पुस्तक अथवा प्रवेशिका उपस्थित करना चाहता था और इसके लिये यह आवश्यक नहीं था कि मैं सूक्ष्म विषयों के विवेचन में दत्तचित्त होता। मैंने बॉप, मंहारकर, मैक्समूलर, प्रियर्सन, हार्नली, बीम्स, केलांग, उलनर, गुगो, देवतिया, हेमचंद्र, लक्ष्मीधर, ग्लूमफील्ड, स्वीट, लकोटे आदि विद्वानों को पुस्तकों तथा लेखों से अमूल्य सहायता पाई है और सामग्री ली है। अतएव मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद देता हूँ। यदि इन महानुभावों की कृतियां मुझे प्रास न होती, तो जो मैं लिख सका हूँ, वह भी उपस्थित करने में मैं सफल नहीं हो सकता था। मैने अनुमान किया था कि रेद-दो सौ पृष्ठों में इस ग्रंथ को समास कर गगा । पर व्या ज्यों मैं अपने कार्य में अग्रसर होता गया, त्या त्यों इसका प्राकार रदता गया, यहाँ तक कि यह अनुमान से दूने से भी अधिक<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> f1fn7t55ck741guco9g7t312hw3x97c 662881 662880 2026-06-15T06:04:55Z Navishth 6636 662881 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( २ )}} मैने इस पुस्तक के लिखने में अपने सम्मुख यह उद्देश्य रखा था कि भाषा-विज्ञान के मूल सिद्धांतों का दिग्दर्शन मात्र करा दिया जाय और भारतवर्ष को प्राचीन भाषाओं का आधुनिक आर्य-भायात्रों तथा विशेषकर हिंदी से जो कुछ संबंध है, वह दिखला दिया जाय । न मैंने किसी ऐसे ग्रंथ के लिखने का विचार ही किया था जो भाषा-वैज्ञानिकों के लिये श्रादर की वस्तु हो और न ऐसा करने की मुझमें सामर्थ्य ही थी। मैं चाहता था कि हिंदी भाषा में इस विज्ञान की दृद नींव रख दी जाय, जिसमें समय पाकर अन्य विद्वान उस पर सुंदर प्रासाद निर्मित करने का सफलतापूर्वक उद्योग कर सकें और उन्हें नींव खोदने तथा उसे भरकर दृढ़ करने की आवश्यकता न रहे । इस उद्देश्य में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, इसके विषय में मैं कुछ कह नहीं सकता और न इसका निश्चय करना मेरा काम ही है। यह दूसरों का काम है। पर मुझे श्राशा है कि मैं विद्वानों को असंतुष्ट करने का कारण न होऊँगा। जिस उद्देश्य से प्रेरित होकर मैंने इस अंथ का लिखना श्रारंभ किया था, उसके लिये सामग्री की प्रचुरता थी। पर मेरी कठिनता यही थी कि किस सामग्री का उपयोग करूँ, उसे किस रूप में संचित करूँ, और किसे छोड़ दूं। जैसा कि पहले कह चुका हूँ, मैं भाषा-विज्ञान की प्रारंभिक पुस्तक अथवा प्रवेशिका उपस्थित करना चाहता था और इसके लिये यह आवश्यक नहीं था कि मैं सूक्ष्म विषयों के विवेचन में दत्तचित्त होता। मैंने बॉप, मंहारकर, मैक्समूलर, प्रियर्सन, हार्नली, बीम्स, केलांग, उलनर, गुगो, देवतिया, हेमचंद्र, लक्ष्मीधर, ग्लूमफील्ड, स्वीट, लकोटे आदि विद्वानों को पुस्तकों तथा लेखों से अमूल्य सहायता पाई है और सामग्री ली है। अतएव मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद देता हूँ। यदि इन महानुभावों की कृतियां मुझे प्रास न होती, तो जो मैं लिख सका हूँ, वह भी उपस्थित करने में मैं सफल नहीं हो सकता था। मैने अनुमान किया था कि रेद-दो सौ पृष्ठों में इस ग्रंथ को समास कर गगा । पर व्या ज्यों मैं अपने कार्य में अग्रसर होता गया, त्या त्यों इसका प्राकार रदता गया, यहाँ तक कि यह अनुमान से दूने से भी अधिक<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 0ycmte1tr3dag1uuai4e6ayyjqm7ilc पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/४ 250 130793 662883 413566 2026-06-15T06:08:26Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662883 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( ३ )}} पृष्ठों में समाप्त हुआ है। यही बात साहित्यालोचन के संबंध में भी हुई थी। अतएव मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि आरंभ में मैं यह ठीक ठीक अनुमान नहीं कर सकता था कि किस प्रकार के ग्रंथ के लिए कितने विस्तार की आवश्यकता होगी। अतएव भविष्य में यदि किसी और ग्रंथ के लिखने का मुझे आयोजन करना पड़ा तो अनुमान के इस दांव-पेंच से बचने की चेष्टा करूँगा। इस ग्रंथ में कई बातें कई बार कही गई हैं। यह बहुत कुछ जान-बूझकर किया गया है। भाषा-विज्ञान का विषय सरल नहीं है। वह बहुत उलझन डालनेवाला है। अतएव स्थान स्थान पर आवश्यकतानुसार बातों के दोहराने में मैंने संकोच नहीं किया है; क्योंकि मैं विषय को यथासंभव सरल बनाना चाहता था, जिसमें पढ़नेवालों का जी न ऊबे और उन्हें हृदयंगम करने में कठिनता न हो। यदि इस कारण से समालोचकों की दृष्टि में पुनरुक्ति-दोष आ गया हो, तो उसके लिये मुझे पश्चात्ताप नहीं है। जो बात जान-बूझकर किसी विशेष उद्देश्य से की जाय, उसके लिये पश्चात्ताप होना तो दूर रहा, कुछ आगा-पीछा भी होना अस्वाभाविक है। निदान यह ग्रंथ समाप्त हो गया और अब हिंदी के विद्वानों, विशेषकर भाषा-विज्ञान-वेत्ताओं की सेवा में उपस्थित है। यदि इस ग्रंथ से विश्वविद्यालयों की उच्च कक्षा के हिंदी पढ़नेवाले विद्यार्थियों का कुछ भी उपकार हो सका, तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूँगा और इस पुस्तक के प्रस्तुत करने में जो कुछ शारीरिक कष्ट मुझे उठाना पड़ा है, उसे भूल जाऊँगा। इस ग्रंथ के दसवें प्रकरण के संबंध में पंडित रामचंद्र शुक्ल ने कई आवश्यक परामर्श देने की कृपा की है। साथ ही बाबू धीरेंद्र वर्मा ने इसकी विषयानुक्रमणिका तैयार करने का कष्ट उठाया है। बाबू रामचंद्र वर्मा ने इस पुस्तक की तैयारी में जो उत्साह दिखाया है और मेरी सहायता की है, वह विशेष उल्लेख-योग्य है। इसलिए इन महाशयों को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ। श्रीरामनवमी } सं० १९८१ वि० } श्यामसुंदरदास<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 5t4kjhxtfsz8asflum4ignrp0cdu7o4 662884 662883 2026-06-15T06:13:14Z Navishth 6636 662884 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( ३ )}} पृष्ठों में समाप्त हुआ है। यही बात साहित्यालोचन के संबंध में भी हुई थी। अतएव मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि आरंभ में मैं यह ठीक ठीक अनुमान नहीं कर सकता था कि किस प्रकार के ग्रंथ के लिए कितने विस्तार की आवश्यकता होगी। अतएव भविष्य में यदि किसी और ग्रंथ के लिखने का मुझे आयोजन करना पड़ा तो अनुमान के इस दांव-पेंच से बचने की चेष्टा करूँगा। इस ग्रंथ में कई बातें कई बार कही गई हैं। यह बहुत कुछ जान-बूझकर किया गया है। भाषा-विज्ञान का विषय सरल नहीं है। वह बहुत उलझन डालनेवाला है। अतएव स्थान स्थान पर आवश्यकतानुसार बातों के दोहराने में मैंने संकोच नहीं किया है; क्योंकि मैं विषय को यथासंभव सरल बनाना चाहता था, जिसमें पढ़नेवालों का जी न ऊबे और उन्हें हृदयंगम करने में कठिनता न हो। यदि इस कारण से समालोचकों की दृष्टि में पुनरुक्ति-दोष आ गया हो, तो उसके लिये मुझे पश्चात्ताप नहीं है। जो बात जान-बूझकर किसी विशेष उद्देश्य से की जाय, उसके लिये पश्चात्ताप होना तो दूर रहा, कुछ आगा-पीछा भी होना अस्वाभाविक है। निदान यह ग्रंथ समाप्त हो गया और अब हिंदी के विद्वानों, विशेषकर भाषा-विज्ञान-वेत्ताओं की सेवा में उपस्थित है। यदि इस ग्रंथ से विश्वविद्यालयों की उच्च कक्षा के हिंदी पढ़नेवाले विद्यार्थियों का कुछ भी उपकार हो सका, तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूँगा और इस पुस्तक के प्रस्तुत करने में जो कुछ शारीरिक कष्ट मुझे उठाना पड़ा है, उसे भूल जाऊँगा। इस ग्रंथ के दसवें प्रकरण के संबंध में पंडित रामचंद्र शुक्ल ने कई आवश्यक परामर्श देने की कृपा की है। साथ ही बाबू धीरेंद्र वर्मा ने इसकी विषयानुक्रमणिका तैयार करने का कष्ट उठाया है। बाबू रामचंद्र वर्मा ने इस पुस्तक की तैयारी में जो उत्साह दिखाया है और मेरी सहायता की है, वह विशेष उल्लेख-योग्य है। इसलिए इन महाशयों को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ। श्रीरामनवमी } सं० १६८१ वि० } श्यामसुंदरदास<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> lh4fiu0jlkj78tritq5x22xnr5f8wap 662886 662884 2026-06-15T06:17:51Z Navishth 6636 662886 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( ३ )}} पृष्ठों में समाप्त हुआ है। यही बात साहित्यालोचन के संबंध में भी हुई थी। अतएव मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि आरंभ में मैं यह ठीक ठीक अनुमान नहीं कर सकता था कि किस प्रकार के ग्रंथ के लिए कितने विस्तार की आवश्यकता होगी। अतएव भविष्य में यदि किसी और ग्रंथ के लिखने का मुझे आयोजन करना पड़ा तो अनुमान के इस दांव-पेंच से बचने की चेष्टा करूँगा। इस ग्रंथ में कई बातें कई बार कही गई हैं। यह बहुत कुछ जान-बूझकर किया गया है। भाषा-विज्ञान का विषय सरल नहीं है। वह बहुत उलझन डालनेवाला है। अतएव स्थान स्थान पर आवश्यकतानुसार बातों के दोहराने में मैंने संकोच नहीं किया है; क्योंकि मैं विषय को यथासंभव सरल बनाना चाहता था, जिसमें पढ़नेवालों का जी न ऊबे और उन्हें हृदयंगम करने में कठिनता न हो। यदि इस कारण से समालोचकों की दृष्टि में पुनरुक्ति-दोष आ गया हो, तो उसके लिये मुझे पश्चात्ताप नहीं है। जो बात जान-बूझकर किसी विशेष उद्देश्य से की जाय, उसके लिये पश्चात्ताप होना तो दूर रहा, कुछ आगा-पीछा भी होना अस्वाभाविक है। निदान यह ग्रंथ समाप्त हो गया और अब हिंदी के विद्वानों, विशेषकर भाषा-विज्ञान-वेत्ताओं की सेवा में उपस्थित है। यदि इस ग्रंथ से विश्वविद्यालयों की उच्च कक्षा के हिंदी पढ़नेवाले विद्यार्थियों का कुछ भी उपकार हो सका, तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूँगा और इस पुस्तक के प्रस्तुत करने में जो कुछ शारीरिक कष्ट मुझे उठाना पड़ा है, उसे भूल जाऊँगा। इस ग्रंथ के दसवें प्रकरण के संबंध में पंडित रामचंद्र शुक्ल ने कई आवश्यक परामर्श देने की कृपा की है। साथ ही बाबू धीरेंद्र वर्मा ने इसकी विषयानुक्रमणिका तैयार करने का कष्ट उठाया है। बाबू रामचंद्र वर्मा ने इस पुस्तक की तैयारी में जो उत्साह दिखाया है और मेरी सहायता की है, वह विशेष उल्लेख-योग्य है। इसलिए इन महाशयों को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ। श्रीरामनवमी } सं० १९८१ वि० } श्यामसुंदरदास<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 5t4kjhxtfsz8asflum4ignrp0cdu7o4 662888 662886 2026-06-15T06:19:25Z Navishth 6636 662888 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( ३ )}} पृष्ठों में समाप्त हुआ है। यही बात साहित्यालोचन के संबंध में भी हुई थी। अतएव मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि आरंभ में मैं यह ठीक ठीक अनुमान नहीं कर सकता था कि किस प्रकार के ग्रंथ के लिए कितने विस्तार की आवश्यकता होगी। अतएव भविष्य में यदि किसी और ग्रंथ के लिखने का मुझे आयोजन करना पड़ा तो अनुमान के इस दांव-पेंच से बचने की चेष्टा करूँगा। इस ग्रंथ में कई बातें कई बार कही गई हैं। यह बहुत कुछ जान-बूझकर किया गया है। भाषा-विज्ञान का विषय सरल नहीं है। वह बहुत उलझन डालनेवाला है। अतएव स्थान स्थान पर आवश्यकतानुसार बातों के दोहराने में मैंने संकोच नहीं किया है; क्योंकि मैं विषय को यथासंभव सरल बनाना चाहता था, जिसमें पढ़नेवालों का जी न ऊबे और उन्हें हृदयंगम करने में कठिनता न हो। यदि इस कारण से समालोचकों की दृष्टि में पुनरुक्ति-दोष आ गया हो, तो उसके लिये मुझे पश्चात्ताप नहीं है। जो बात जान-बूझकर किसी विशेष उद्देश्य से की जाय, उसके लिये पश्चात्ताप होना तो दूर रहा, कुछ आगा-पीछा भी होना अस्वाभाविक है। निदान यह ग्रंथ समाप्त हो गया और अब हिंदी के विद्वानों, विशेषकर भाषा-विज्ञान-वेत्ताओं की सेवा में उपस्थित है। यदि इस ग्रंथ से विश्वविद्यालयों की उच्च कक्षा के हिंदी पढ़नेवाले विद्यार्थियों का कुछ भी उपकार हो सका, तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूँगा और इस पुस्तक के प्रस्तुत करने में जो कुछ शारीरिक कष्ट मुझे उठाना पड़ा है, उसे भूल जाऊँगा। इस ग्रंथ के दसवें प्रकरण के संबंध में पंडित रामचंद्र शुक्ल ने कई आवश्यक परामर्श देने की कृपा की है। साथ ही बाबू धीरेंद्र वर्मा ने इसकी विषयानुक्रमणिका तैयार करने का कष्ट उठाया है। बाबू रामचंद्र वर्मा ने इस पुस्तक की तैयारी में जो उत्साह दिखाया है और मेरी सहायता की है, वह विशेष उल्लेख-योग्य है। इसलिए इन महाशयों को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ। श्रीरामनवमी } सं० १९८१ वि० } श्यामसुंदरदास<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 0zveh9qcki7xt1zmptsrq7u1gdzcu75 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/५ 250 130794 662885 413567 2026-06-15T06:17:21Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662885 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''द्वितीय संस्करण की भूमिका'''}} भाषा-विज्ञान का पहला संस्करण सं० १९८१ में प्रकाशित हुआ था। जिन परिस्थितियों के वश में होकर मुझे यह पुस्तक तैयार करनी पड़ी थीं उनका उल्लेख उसकी भूमिका में, जो इस नवीन संस्करण में भी प्रकाशित की जाती है, कर दिया गया है। उनको ध्यान में रखकर पुस्तक जैसी बन पड़ी तैयार की गई, पर वह संतोषजनक न हुई। एक तो समय की संकीर्णता के कारण उस समय अधिक जाँच-पड़ताल न की जा सकी। दूसरे उस समय पर्याप्त सामग्री भी उपलब्ध न हो सकी। इस स्थिति में उसमें बहुत सी त्रुटियों का रह जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। पहले मेरा विचार एक नई पुस्तक लिखने का था और इस उद्देश्य से भाषा-रहस्य का पहला भाग प्रस्तुत किया गया था। पर अनेक विघ्न-बाधाओं के उपस्थित होने के कारण उसका दूसरा भाग अब तक न लिखा जा सका। इस अवस्था में भाषा-विज्ञान को ही नया रूप देने का निश्चय किया गया। इस नए रूप में अब यह प्रस्तुत है। इस संस्करण में सात प्रकरण हैं। पहले प्रकरण में शास्त्र की महत्ता, उसका विस्तार तथा अन्य शास्त्रों से उसका संबंध दिखाया गया है और संक्षेप में भाषा-विज्ञान के विकास का इतिहास दिया गया है। दूसरे प्रकरण में भाषा और भाषण के संबंध में विचार किया है। इसमें भाषा और भाषण का भेद तथा भाषा की उत्पत्ति का इतिहास दिया गया है। तीसरे प्रकरण में आकृतिमूलक तथा वंशानुक्रम से भाषाओं का वर्गीकरण किया गया है और किंचित् विस्तार से भारोपीय-वर्ग की भाषाओं का विवरण दिया गया है। यहाँ तक भाषा-विज्ञान की भूमिका समझनी चाहिए। भाषा-विज्ञान के मुख्य अंग तीन हैं—ध्वनि-विचार, रूप-विचार और अर्थ-विचार। इन्हीं तीन अंगों का चौथे, पाँचवें और छठे प्रकरणों में विवेचन किया गया है। अब तक भाषा-विज्ञान में रूप-विचार और अर्थ-विचार पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था पर अब ये अंग महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं और इन पर अधिकाधिक<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> c5897ximksiqnghbdxkkzp1b7y7cobw 662887 662885 2026-06-15T06:18:40Z Navishth 6636 662887 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''द्वितीय संस्करण की भूमिका'''}} भाषा-विज्ञान का पहला संस्करण सं० १९८१ में प्रकाशित हुआ था। जिन परिस्थितियों के वश में होकर मुझे यह पुस्तक तैयार करनी पड़ी थीं उनका उल्लेख उसकी भूमिका में, जो इस नवीन संस्करण में भी प्रकाशित की जाती है, कर दिया गया है। उनको ध्यान में रखकर पुस्तक जैसी बन पड़ी तैयार की गई, पर वह संतोषजनक न हुई। एक तो समय की संकीर्णता के कारण उस समय अधिक जाँच-पड़ताल न की जा सकी। दूसरे उस समय पर्याप्त सामग्री भी उपलब्ध न हो सकी। इस स्थिति में उसमें बहुत सी त्रुटियों का रह जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। पहले मेरा विचार एक नई पुस्तक लिखने का था और इस उद्देश्य से भाषा-रहस्य का पहला भाग प्रस्तुत किया गया था। पर अनेक विघ्न-बाधाओं के उपस्थित होने के कारण उसका दूसरा भाग अब तक न लिखा जा सका। इस अवस्था में भाषा-विज्ञान को ही नया रूप देने का निश्चय किया गया। इस नए रूप में अब यह प्रस्तुत है। इस संस्करण में सात प्रकरण हैं। पहले प्रकरण में शास्त्र की महत्ता, उसका विस्तार तथा अन्य शास्त्रों से उसका संबंध दिखाया गया है और संक्षेप में भाषा-विज्ञान के विकास का इतिहास दिया गया है। दूसरे प्रकरण में भाषा और भाषण के संबंध में विचार किया है। इसमें भाषा और भाषण का भेद तथा भाषा की उत्पत्ति का इतिहास दिया गया है। तीसरे प्रकरण में आकृतिमूलक तथा वंशानुक्रम से भाषाओं का वर्गीकरण किया गया है और किंचित् विस्तार से भारोपीय-वर्ग की भाषाओं का विवरण दिया गया है। यहाँ तक भाषा-विज्ञान की भूमिका समझनी चाहिए। भाषा-विज्ञान के मुख्य अंग तीन हैं—ध्वनि-विचार, रूप-विचार और अर्थ-विचार। इन्हीं तीन अंगों का चौथे, पाँचवें और छठे प्रकरणों में विवेचन किया गया है। अब तक भाषा-विज्ञान में रूप-विचार और अर्थ-विचार पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था पर अब ये अंग महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं और इन पर अधिकाधिक<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 8f67wy3yq5kwn86f14hnff9i4y417id पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/६ 250 130795 662889 413568 2026-06-15T06:22:22Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662889 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( ५ )}} विचार किया जाता है। अर्थ-विचार का प्रकरण तो अभी तक आरंभिक अवस्था में है, पर अब भाषा-शास्त्रियों का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ है और दिनों दिन इस अंग का अध्ययन तथा विवेचन किया जाने लगा है। सातवें प्रकरण को उपसंहार स्वरूप मानना चाहिए। इसमें आर्यों के मूल निवास-स्थान, उनके विच्छेद तथा अनेक देशों में जाकर बस जाने का वर्णन है। भाषा-विज्ञान की सहायता से प्रागैतिहासिक काल का इतिहास किस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है, इसका दिग्दर्शन भी करा दिया गया है। आशा है कि इस पुस्तक से भाषा-विज्ञान का आरंभिक ज्ञान भली भाँति प्राप्त हो जायगा और इस शास्त्र के विशेष अध्ययन का मार्ग बहुत कुछ प्रशस्त हो जायगा। इस पुस्तक के पहले, दूसरे, तीसरे और सातवें प्रकरणों के प्रस्तुत करने में मेरे पुत्र गोपाललाल खन्ना ने मेरी सहायता की है, चौथा प्रकरण भाषा-रहस्य के आधार पर उसके इसी प्रकरण का संक्षिप्त रूप है और पाँचवें तथा छठे प्रकरणों के प्रस्तुत करने में पंडित पद्मनारायण आचार्य का सहयोग मुझे प्राप्त हुआ है। अनुक्रमणिका तैयार करने का श्रेय पंडित रमापति शुक्ल को है। ये सभी व्यक्ति आशीर्वाद तथा धन्यवाद के पात्र हैं। मुझे इस बात का अभिमान है कि मेरे कतिपय विद्यार्थी सदा मेरी सहायता को तैयार रहते हैं और प्रेमपूर्वक मेरे कार्यों में सहयोग देते हैं। इस पुस्तक की समाप्ति के साथ मेरी तीन पुस्तकों—हिंदी भाषा और साहित्य, साहित्यालोचन और भाषा-विज्ञान—के परिवर्धित और संशोधित संस्करणों की त्रिवेणी प्रस्तुत हो गई है। आशा है कि इस त्रिवेणी में अवगाहन कर विशेष कर हिंदी तथा साधारणतः अन्य आधुनिक भाषाओं के विद्यार्थी यथेष्ट फल प्राप्त कर सकेंगे। काशी } ज्येष्ठ शु० १०, १९९५ } '''श्यामसुंदरदास'''<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> henusoicqog9i31w5kqnlpevd6vqnrr पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/७ 250 130796 662890 413569 2026-06-15T06:36:42Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662890 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''तृतीय संस्करण की भूमिका'''}} यह भाषा-विज्ञान का तीसरा संस्करण प्रकाशित हो रहा है। पहले दो संस्करणों में बहुत संशोधन किया गया था । इस संस्करण में एक प्रकरण बदा दिया गया है। इसमें लेखन कला तथा नागरी लिपि के विकास का इतिहास दिया गया है। यह लेख (स्वर्गीय) महामहोपाध्याय रायबहादुर डाक्टर गौरीशंकर हीराचंद शोमा लिखित प्राचीन-लिपि-माला नामक ग्रंथ के अाधार पर मेरे पुत्र गोगाजलाल खन्ना के उद्योग से लिखा गया है। यह अंध-रत्न अव अप्राप्य है। काशी } ३-४-४४ } श्यामसुंदरदास<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 2l6io013a1tas4cvb2g0az6ymhr63xc पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/८ 250 130797 662891 413570 2026-06-15T06:37:40Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662891 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''पारिभाषिक शब्द'''}} अनुपयोगी रूपों का विनाश—Extinction of useless forms. अपश्रुति—Ablaut, vowel-gradation. अमूर्तीकरण—Abstraction. अर्थ—Meaning, thing. अर्थ का मूर्तीकरण—Concretion of meaning. अर्थ-नियम—Semantic law. अर्थमात्र—Semanteme. अर्थ-अपकर्ष—Deterioration of meaning. अर्थ-विचार—Semantics. अर्थापदेश—Indirect expression. अर्थोत्कर्ष—Elevation of meaning. उद्योतन—Irradiation. उपमान—Analogy. एकोच्चरित समूह—Articulated group. कृत्प्रत्यय—Primary affixes. तद्धित प्रत्यय—Secondary affixes. ध्वनि-नियम—Phonetic law. ध्वनि-विचार—Phonology. नये लाभ—New acquisitions. प्रत्यय—Affix. पर-प्रत्यय—Suffix. पुरःप्रत्यय—Prefix. बुद्धि-नियम—Intellectual law.<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> rujiki0k2960h7ys16c5ssvh96gzorg 662892 662891 2026-06-15T06:38:26Z Navishth 6636 662892 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''पारिभाषिक शब्द'''}} अनुपयोगी रूपों का विनाश—Extinction of useless forms.<br /> अपश्रुति—Ablaut, vowel-gradation.<br /> अमूर्तीकरण—Abstraction.<br /> अर्थ—Meaning, thing.<br /> अर्थ का मूर्तीकरण—Concretion of meaning.<br /> अर्थ-नियम—Semantic law.<br /> अर्थमात्र—Semanteme.<br /> अर्थ-अपकर्ष—Deterioration of meaning.<br /> अर्थ-विचार—Semantics.<br /> अर्थापदेश—Indirect expression.<br /> अर्थोत्कर्ष—Elevation of meaning.<br /> उद्योतन—Irradiation.<br /> उपमान—Analogy.<br /> एकोच्चरित समूह—Articulated group.<br /> कृत्प्रत्यय—Primary affixes.<br /> तद्धित प्रत्यय—Secondary affixes.<br /> ध्वनि-नियम—Phonetic law.<br /> ध्वनि-विचार—Phonology.<br /> नये लाभ—New acquisitions.<br /> प्रत्यय—Affix.<br /> पर-प्रत्यय—Suffix.<br /> पुरःप्रत्यय—Prefix.<br /> बुद्धि-नियम—Intellectual law.<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> j2c3aph0j8qdawr8a5fy1wqtddf5rd9 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/९ 250 130798 662893 413571 2026-06-15T06:41:37Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662893 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( ८ )}} भाव—Feeling, emotion, action, becoming.<br /> भेदभाव का नियम—Law of differentiation.<br /> मिथ्या प्रतीति—False Perception.<br /> रूपमात्र—Morpheme.<br /> रूप-विचार—Morphology.<br /> रूप-साधक—Inflectional.<br /> वाक्य-विचार—Syntax.<br /> वाक्यांश—Phrase, word.<br /> विभक्तियों के भग्नावशेष—Survival of inflections.<br /> विशेष भाव का नियम—Law of specialisation.<br /> शब्द—Word.<br /> शब्द-साधक—Word-building or formative.<br /> शब्द-साधन—Accidence.<br /> संबंध—Relation, connection.<br /> संसर्ग—Association.<br /> सत्त्व—Existence, being.<br /> साधन शब्द—Form word.<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> n82zk3l4q2g9mi9p5tsijfgt2ryr8zi पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/१० 250 130799 662895 413572 2026-06-15T06:43:05Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662895 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''विषय-सूची'''}} {{center|'''पहला प्रकरण'''}} {{center|'''विषय-प्रवेश'''}} {{center|[ पृष्ठ १–१६ ]}} शास्त्र की परिभाषा—शास्त्र का महत्त्व—भाषा-विज्ञान का आरंभ—भारतवर्ष में भाषा-विज्ञान—भाषा-विज्ञान के ग्रंथ—भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन का प्रकार—भाषा-विज्ञान कला है या विज्ञान—भाषा-विज्ञान और व्याकरण—भाषा-विज्ञान और मनोविज्ञान—भाषा-विज्ञान और साहित्य—भाषा-विज्ञान और मानव-विज्ञान—भाषा-विज्ञान और अन्य शास्त्र—आधुनिक भाषा-विज्ञान का प्रारंभिक इतिहास—भाषा-विज्ञान की वर्तमान अवस्था । {{center|'''दूसरा प्रकरण'''}} {{center|'''भाषा और भाषण'''}} {{center|[ पृष्ठ २०–४१ ]}} भाषा के अंग—बोली, विभाषा और भाषा—राष्ट्रभाषा—भाषण का द्विविध आधार—भाषा परंपरागत संपत्ति है—भाषा अर्जित संपत्ति है—भाषा का विकास होता है—भाषा की उत्पत्ति—दिव्य उत्पत्ति—सांकेतिक उत्पत्ति—अनुकरणमूलकत्व वाद—मनोभावाभिव्यंजकतावाद—यो-हे-हो-वाद—डिंग-डोंग-वाद—विकासवाद का समन्वित रूप—अनुकरणात्मक शब्द—मनोभावाभिव्यंजक शब्द—प्रतीकात्मक शब्द—औपचारिक शब्द—भाषण का विकास—भाषा के प्रयोजन । {{center|'''तीसरा प्रकरण'''}} {{center|'''भाषाओं का वर्गीकरण'''}} {{center|[ पृष्ठ ४२–११४ ]}} वाक्य से भाषण का आरंभ—वाक्यों के चार भेद—( १ ) समास-प्रधान वाक्य—( २ ) व्यास-प्रधान वाक्य—( ३ ) प्रत्यय-प्रधान वाक्य—( ४ )<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 4vihszw15qi81cliemtr5g88mvmfxkn पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/१४ 250 130803 662896 413576 2026-06-15T06:45:57Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662896 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( ५ )}} {{center|'''सातवाँ प्रकरण'''}} {{center|'''भारतीय लिपियों का विकास'''}} {{center|[ पृष्ठ २८४–२९६ ]}} लेखन की उत्पत्ति—पौराणिक धारणा—विदेशी अनुसंधान—विदेशी मतों की परीक्षा—ब्राह्मी लिपि की सेमेटिक उत्पत्ति का खंडन—ब्राह्मी अक्षरों की स्वतंत्रता—भारत में लेखन का प्राचीन प्रचलन—प्राचीन ग्रंथ लिपिबद्ध न मिलने के कारण—लेखन की वेदकालीन उत्पत्ति—संख्या और अंक—बौद्ध काल के उल्लेख—परवर्ती प्रमाण—ब्राह्मी लिपि संबंधी निष्कर्ष—खरोष्ठी लिपि—देवनागरी तथा अन्य लिपियाँ । {{center|'''आठवाँ प्रकरण'''}} {{center|'''प्रागैतिहासिक खोज'''}} {{center|[ पृष्ठ २९७–३१२ ]}} भाषा और जाति—आर्यों का आदिम निवास-स्थान—आर्यों की पश्चिमी शाखा—आर्यों की दूसरी शाखा—आर्यों का विच्छेद—आर्यों की भाषाएँ—आदिम आर्यों की सभ्यता—गार्हस्थ्य और सामाजिक जीवन—वास—पेय पदार्थ—व्यवसाय और व्यापार—समय का विभाग—वंश—जाति आदि—दंड-विधान । {{center|'''परिशिष्ट'''}} {{center|'''हिंदी के स्वरों और व्यंजनों का भाषा-वैज्ञानिक वर्णन'''}} {{center|[ पृष्ठ ३१३–३२७ ]}} {{center|'''अनुक्रमणिका'''}} {{center|[ पृष्ठ ३२८–३४७ ]}}<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> eb4ye8wfgmslzjljreg3s567k5fjrvr पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/१६ 250 130805 662897 413578 2026-06-15T06:47:57Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662897 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''भाषा-विज्ञान'''}} {{center|——:o:——}} {{center|'''पहला प्रकरण'''}} {{center|'''विषय-प्रवेश'''}} भाषा-विज्ञान उस शास्त्र को कहते हैं जिसमें भाषामात्र के भिन्न भिन्न अंगों और स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया जाता है। मनुष्य किस प्रकार बोलता है, उसकी बोली का किस प्रकार विकास होता है, उसकी बोली और भाषा में कब, किस प्रकार और कैसे कैसे परिवर्तन होते हैं, किसी भाषा में दूसरी भाषाओं के शब्द आदि किन किन नियमों के अधीन होकर मिलते हैं, कैसे तथा क्यों समय पाकर किसी भाषा का रूप और का और हो जाता है तथा कैसे एक भाषा परिवर्तित या विकसित होकर पूर्णतया स्वतंत्र एक दूसरी भाषा का रूप धारण कर लेती है—इन विषयों तथा इनसे संबंध रखनेवाले और सब उप-विषयों का भाषा-विज्ञान में समावेश होता है। इसमें शब्दों की उत्पत्ति, रूप-विकास तथा वाक्यों की बनावट आदि सभी पर विचार किया जाता है। सारांश यह कि भाषा-विज्ञान की सहायता से हम किसी भाषा का वैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन, अध्ययन और अनुशीलन करना सीखते हैं, और जब<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 7bqzk4d94k51k99gkayxrab9jg4wscf 662898 662897 2026-06-15T06:48:23Z Navishth 6636 662898 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''भाषा-विज्ञान'''}} {{center|——:o:——}} {{center|'''पहला प्रकरण'''}} {{center|'''विषय-प्रवेश'''}} भाषा-विज्ञान उस शास्त्र को कहते हैं जिसमें भाषामात्र के भिन्न भिन्न अंगों और स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया जाता है। मनुष्य किस प्रकार बोलता है, उसकी बोली का किस प्रकार विकास होता है, उसकी बोली और भाषा में कब, किस प्रकार और कैसे कैसे परिवर्तन होते हैं, किसी भाषा में दूसरी भाषाओं के शब्द आदि किन किन नियमों के अधीन होकर मिलते हैं, कैसे तथा क्यों समय पाकर किसी भाषा का रूप और का और हो जाता है तथा कैसे एक भाषा परिवर्तित या विकसित होकर पूर्णतया स्वतंत्र एक दूसरी भाषा का रूप धारण कर लेती है—इन विषयों तथा इनसे संबंध रखनेवाले और सब उप-विषयों का भाषा-विज्ञान में समावेश होता है। इसमें शब्दों की उत्पत्ति, रूप-विकास तथा वाक्यों की बनावट आदि सभी पर विचार किया जाता है। सारांश यह कि भाषा-विज्ञान की सहायता से हम किसी भाषा का वैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन, अध्ययन और अनुशीलन करना सीखते हैं, और जब<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 7xxyjr5fzldni76qrs2cnz8yj4xx8k1 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/१८ 250 130807 662900 413580 2026-06-15T07:05:56Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662900 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|विषय-प्रवेश {{Right|३}}}} देता है। जिस प्रकार शब्दों के भिन्न भिन्न रूपों और अर्थों पर यह शास्त्र विचार करता है, उसी प्रकार भाषा के उद्भव, विकास और ह्रास की भी मनोरम कहानी सुनाने के लिये यह उत्सुक रहता है। कोई भाषा क्यों बाँझ रहती है और कोई क्यों संतानवती होकर प्रजाहित पालन में तत्पर हो जाती है; आदि विषय किस सहृदय को अनुरंजित नहीं करते ? अन्यान्त्य अधिकांश आधुनिक विज्ञानों की भाँति भाषा-विज्ञान का, इस संस्कृत रूप में, आरंभ भी पाश्चात्य देशों में ही हुआ है। पहले भाषाओं का अध्ययन बिलकुल साधारण रूप में ठीक उसी रूप में जिसमें बालकों को आधुनिक विद्यालयों में शिक्षा दी जाती है, हुआ करता था। अध्ययन का यह रूप शुद्ध साहित्यिक था, अर्थात् इस प्रकार का अध्ययन किसी भाषा के केवल साहित्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए होता था। किसी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उस भाषा के व्याकरण का अध्ययन करना आवश्यक होता है। अतएव किसी भाषा के अध्ययन के अंतर्गत उस भाषा के व्याकरण का अध्ययन भी आपसे आप आ जाता है। अनेक विद्वान् ऐसे भी होते थे जिन्हें केवल एक ही भाषा के अध्ययन से संतोष नहीं होता था और जो भाषाओं के पूर्ण पंडित होकर उन सबके साहित्य और व्याकरणों का विवेचनात्मक अनुशीलन करते थे। जब यूरोपीय लोगों ने संस्कृत भाषा का अध्ययन आरंभ किया, तब उन्हें संस्कृत के व्याकरण में कुछ नये और विशिष्ट नियम मिले। संस्कृत भाषा के अनेक शब्दों और व्याकरण के अनेक नियमों ने उन लोगों का ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट किया कि संस्कृत का लैटिन तथा उसकी वंशज अनेक दूसरी भाषाओं के साथ कई बातों में साम्य है। इसके अतिरिक्त आरंभ में ऐसे विद्वानों ने यह भी देखा कि बहुत पास के दो चार प्रदेशों की भाषाओं की जिस प्रकार शब्दों और व्याकरण के नियमों आदि में बहुत अधिक समानता होती है, उसी प्रकार, पर उससे कुछ कम अंशों में, दूर दूर के प्रदेशों की<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> gtcjo74iznnol0pxa6dp0kkjp9pku51 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२० 250 130809 662901 413582 2026-06-15T07:10:03Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662901 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|विषय-प्रवेश {{Right|५}}}} ध्यान भाषा-संबंधी ऐसे तत्त्वों की ओर न जाता जो साधारणतः स्वयं ही लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। भारतवर्ष में प्राचीन काल में ही शब्दों की व्युत्पत्ति और स्वरों के उच्चारण आदि पर विद्वानों का ध्यान गया था। ब्राह्मण-ग्रंथों तथा प्रातिशाख्यों में अनेक स्थानों पर इस प्रकार के विवेचन किए गए हैं। पीछे से यास्क ने अपने निरुक्त ग्रंथ में, जो वेदों के छह अंगों में से एक मुख्य अंग माना जाता है तथा जो वेदार्थ-ज्ञान का प्रधान साधन समझा जाता है, इस विषय का विस्तृत विवेचन किया है। वास्तव में यह निरुक्त भाषा-विज्ञान का ही दूसरा नाम था, और है। उन दिनों निरुक्त का बहुत व्यापक अर्थ लिया जाता था; आजकल की भाँति उसमें केवल 'यास्क-कृत निरुक्त' नामक ग्रंथ का ही अभिप्राय नहीं लिया जाता था। आजकल व्याकरण के अनेक ग्रंथ देखने में आते हैं; इसलिए 'व्याकरण' शब्द से किसी ग्रंथ-विशेष का बोध नहीं होता। उसी प्रकार निरुक्त-विषयक ग्रंथों की उतनी ही अधिकता थी, जितनी व्याकरण संबंधी ग्रंथों की है, और 'निरुक्त' शब्द किसी ग्रंथ-विशेष का परिचायक न होकर एक शास्त्र का बोधक होता था। ब्राह्मण आदि ग्रंथों में एक और प्राचीन शब्द मिलता है जो भाषा-विज्ञान का बोधक माना जा सकता है। यह शब्द है 'निर्वचन', जो निरुक्त शब्द का समानार्थक है। इसका साधारण अर्थ बोलना, उच्चारण करना, कहना, समझाना, व्याख्या करना, कहावत आदि है। निर्वचन का प्रचलित अर्थ है व्युत्पत्ति। निर्वचन के प्राचीन अर्थ का लोप हो गया है और अब साधारण अर्थ में ही उसका प्रयोग होता है। अतएव भाषा-विज्ञान के अर्थ में उसका प्रयोग करना समीचीन नहीं हो सकता। एक और पुराना शब्द 'शब्दशास्त्र' है जिससे आजकल व्याकरण का अर्थ लिया जाता है। यदि हम इसके अर्थ को समझें तो यह भी भली भाँति भाषा-विज्ञान का पर्याय हो सकता है; क्योंकि भाषा शब्दों से ही बनती है और 'भाषा-विज्ञान' 'भाषाशास्त्र' वास्तव में 'शब्द-विज्ञान' या 'शब्द-शास्त्र' ही है। पर यह 'शब्द-शास्त्र' पद एक<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> pbidw21tke32z8g10iof8gqbl4x6qfm पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२२ 250 130811 662902 413584 2026-06-15T07:17:03Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662902 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|विषय-प्रवेश {{Right|७}}}} नहीं रह जाती, तब मानो उनके प्राण निकल जाते हैं, केवल शरीर बचे रहते हैं। यद्यपि प्राकृतों के विकास को ध्यान में रखकर यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारतीय आर्य-भाषाएँ मृत नहीं हैं, उनमें निरंतर विकास हुआ है और वे आधुनिक देश-भाषाओं के रूप में वर्तमान हैं, परंतु संस्कृत इन्हीं आदिम बोल-चाल की भाषाओं की शाखा से सुधरकर बनी है और उसका रूप एक प्रकार से वैयाकरणों की कृपा से सर्वदा के लिये स्थिर हो गया है। कुछ भी हो, संस्कृत का अध्ययन इतने वैज्ञानिक और व्यवस्थित रूप से हुआ है कि संस्कृत व्याकरण आजकल के भाषा-वैज्ञानिकों के लिये भी आदर और आश्चर्य की वस्तु माना जाता है। विषय की दृष्टि से भाषा-विज्ञान के तीन अंग होते हैं—ध्वनि, रूप और अर्थ*। और इन्हीं तीनों अंगों के विवेचन की दृष्टि से ध्वनि-विचार, ध्वनि-शिक्षा, रूप-विचार, वाक्य-विचार, अर्थ-विचार और प्राचीन शोध भाषा-विज्ञान के प्रधान अंग हैं। ध्वनि-विचार अथवा ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत ध्वनि के परिवर्तनों का तात्त्विक विवेचन तथा ध्वनि-विकारों का इतिहास आदि सभी बातें आ जाती हैं। पर ध्वनि-शिक्षा का संबंध साक्षात् ध्वनियों के उच्चारण और विवेचन से रहता है। पुराने भाषा-शास्त्री ध्वनि का ऐतिहासिक तथा तात्त्विक विवेचन किया करते थे, पर आधुनिक वैज्ञानिक ध्वनि-शिक्षा की ओर अधिक ध्यान देते हैं। रूप-विचार, प्रकृति-प्रत्यय आदि भाषा का रूपात्मक विवेचन करता है। इसका प्रधान आधार व्याकरण है। वाक्य-विचार भी व्याकरण से संबंध रखता है, पर इसके ऐतिहासिक अध्ययन के लिये कई भाषाओं और साहित्यों का विशेष अभ्यास आवश्यक है। इसी से भाषा-विज्ञान का यह अंग अधिक उन्नत नहीं हो सका। अर्थ-विचार --- * पहले संस्करण में ध्वनि के स्थान पर नाद और अर्थ के स्थान पर भाव का प्रयोग हुआ था, पर अब हम ध्वनि और अर्थ का प्रयोग करेंगे।<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 6m796lo9n5raedbhqf0rt8oopdu3rds पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२४ 250 130813 662903 413586 2026-06-15T07:21:16Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662903 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|विषय-प्रवेश {{Right|९}}}} एक अन्वेषक ने पता लगाया कि अवेस्ता की भाषा में ग्रीष्म के लिये 'हमा' शब्द आया है। इससे स्पष्ट हो गया कि ये 'हमा' और 'समा' शब्द एक ही हैं। इसी प्रकार पिता शब्द का भी हाल है। तुलनात्मक अध्ययन में भाषा के अंत्यावयव वाक्य माने जाते हैं। अतएव तुलना वाक्यों की होनी चाहिए, शब्दों की नहीं। यह तुलना प्रवृत्ति-निवृत्ति, विधिनिषेध सूचक वाक्यों से होनी चाहिए। जहाँ ऐसे वाक्य न मिलें वहाँ सविभक्तिक शब्दों अर्थात् पदों द्वारा तुलना होनी चाहिए। प्रातिपदिक शब्दों द्वारा यह काम ठीक ठीक नहीं चल सकता। जब विभक्तियाँ और अर्थ दोनों एक हों तब शब्दों की समानता स्थिर की जा सकती है। अर्थ-साम्य और रूप-साम्य के निश्चित हो जाने पर ही कुछ परिणाम निकल सकता है। भाषा-शास्त्रियों ने तुलना के लिये पहले तीन प्रकार के शब्दों को लिया था—संख्यावाचक, संबंधवाचक (पिता, माता आदि) और गृहस्थीवाचक। तुलना के लिये संख्यावाचक शब्दों की उपयोगिता सर्वप्रधान है, क्योंकि उनमें परिवर्तन बहुत कम होता है। पहाड़ों की गिनती में अभी तक प्राचीन शब्द प्रचलित हैं। संबंधवाचक और गृहस्थीवाचक शब्द भी स्थायी हैं। इनके भी अंग स्थिर होते हैं। इनका भी लोप प्रायः कम होता है। तुलना तभी ठीक होगी जब ऐतिहासिक प्रक्रिया से शब्दों का परिवार निश्चित हो जाय। संख्यावाचक शब्दों के अतिरिक्त उत्तम और मध्यम पुरुष के सर्वनामों में भी यूरोपीय भाषाओं में बहुत साम्य है। वर्णसाम्य पर शब्दों की व्युत्पत्ति ढूँढ़ना या भिन्न भिन्न रूपों से भिन्न भिन्न मूलों अथवा एक मूल की कल्पना करना भ्रामक है। प्रश्‍न है कि भाषा-विज्ञान की गणना कला में की जाय या विज्ञान में। कला के अंतर्गत केवल मनुष्य की कृतियाँ ही आती हैं, जैसे चित्रकला, मूर्तिकला, काव्यकला आदि। विज्ञान उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर या प्रकृति की कृतियों की मीमांसा होती है, जैसे भौतिक-विज्ञान, वनस्पति-विज्ञान, जीव-विज्ञान, मनोविज्ञान आदि। भाषा-<noinclude></noinclude> ewamcn2ij4ik6mrbf1sufawxf9gkt7s पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२५ 250 130814 662904 413587 2026-06-15T07:38:42Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662904 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|{{Left|८}} भाषा-विज्ञान}} के अंतर्गत ये दो बातें आती हैं—व्युत्पत्ति-विचार और भाषा के बौद्ध नियमों की मीमांसा। आज व्युत्पत्ति-विचार अथवा निर्वचन एक शास्त्र बन गया है। ऐतिहासिक और ध्वनि-परिवर्तन संबंधी विचारों ने उसे वैज्ञानिक रूप दे दिया है। भाषा के बौद्ध नियमों का अनुशीलन भी अब एक सुन्दर विषय बन गया है। किस प्रकार शब्द अर्थ को छोड़ता और अपनाता है और किस प्रकार अर्थ शब्द का त्याग और ग्रहण करता है तथा कैसे इन अर्थों का संकोच या विस्तार होता है—इन सब बातों का अब स्वतंत्र विवेचन होने लगा है। इसी विषय को कुछ लोग अर्थातिशय का नाम भी देते हैं। इस अर्थ-विचार अर्थात् व्युत्पत्ति-शास्त्र तथा अर्थातिशय के आधार पर भाषा द्वारा प्राचीन इतिहास और संस्कृति की कल्पना की जाती है। ऐसी भाषामूलक प्राचीन खोज भाषा-विज्ञान का एक बड़ा महत्त्वपूर्ण अंग हो गई है। इन सब अंगों का विशेषज्ञों द्वारा पृथक् पृथक् अध्ययन किया जाता है। पर शास्त्र के सामान्य परिचय के लिये इन सब का साधारण ज्ञान अनिवार्य है। • भाषा-विज्ञान के मुख्य प्रकरण, भाषा का इतिहास, भाषा-विज्ञान का इतिहास, भाषा का वर्गीकरण, ध्वनि-शिक्षा, ध्वनि-विचार, रूप-विचार, अर्थ-विचार, वाक्य-विचार और भाषा-मूलक प्राचीन शोध हैं। अंतिम और सबसे आवश्यक प्रकरण है किसी एक भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन। ये सब मिलकर भाषा-विज्ञान को पूर्ण बनाते हैं। किसी भाषा का अध्ययन दो प्रकार से होता है। एक ऐतिहासिक और दूसरा तुलनात्मक। तुलनात्मक अध्ययन भी अधिकांश में ऐतिहासिक अध्ययन पर ही निर्भर है। जब तक किसी शब्द के अनेक प्राचीन और नवीन रूप न प्राप्त हों तब तक उनकी परस्पर तुलना करके किसी निश्चित सिद्धांत पर पहुँचना कठिन है। उदाहरण के लिये हम वेद में “वर्ष” के लिये आए हुए समा, शरद्, हिम, हेमंत, वर्ष आदि शब्द पाते हैं। ये सब शब्द ऋतुवाचक हैं, पर यह पता नहीं चलता था कि ग्रीष्म ऋतु-वाची ‘समा’ शब्द कहाँ से आया ? अन्त में<noinclude></noinclude> t7zoksf9wg25az696j3z9e88w766r1z पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२६ 250 130815 662905 413588 2026-06-15T07:41:41Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662905 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|विषय-प्रवेश {{Right|९}}}} एक अन्वेषक ने पता लगाया कि अवेस्ता की भाषा में ग्रीष्म के लिये 'हमा' शब्द आया है। इससे स्पष्ट हो गया कि ये 'हमा' और 'समा' शब्द एक ही हैं। इसी प्रकार पिता शब्द का भी हाल है। तुलनात्मक अध्ययन में भाषा के अंत्यावयव वाक्य माने जाते हैं। अतएव तुलना वाक्यों की होनी चाहिए, शब्दों की नहीं। यह तुलना प्रवृत्ति-निवृत्ति, विधिनिषेध सूचक वाक्यों से होनी चाहिए। जहाँ ऐसे वाक्य न मिलें वहाँ सविभक्तिक शब्दों अर्थात् पदों द्वारा तुलना होनी चाहिए। प्रातिपदिक शब्दों द्वारा यह काम ठीक ठीक नहीं चल सकता। जब विभक्तियाँ और अर्थ दोनों एक हों तब शब्दों की समानता स्थिर की जा सकती है। अर्थ-साम्य और रूप-साम्य के निश्चित हो जाने पर ही कुछ परिणाम निकल सकता है। भाषा-शास्त्रियों ने तुलना के लिये पहले तीन प्रकार के शब्दों को लिया था—संख्यावाचक, संबंधवाचक (पिता, माता आदि) और गृहस्थीवाचक। तुलना के लिये संख्यावाचक शब्दों की उपयोगिता सर्वप्रधान है, क्योंकि उनमें परिवर्तन बहुत कम होता है। पहाड़ों की गिनती में अभी तक प्राचीन शब्द प्रचलित हैं। संबंधवाचक और गृहस्थीवाचक शब्द भी स्थायी हैं। इनके भी अंग स्थिर होते हैं। इनका भी लोप प्रायः कम होता है। तुलना तभी ठीक होगी जब ऐतिहासिक प्रक्रिया से शब्दों का परिवार निश्चित हो जाय। संख्यावाचक शब्दों के अतिरिक्त उत्तम और मध्यम पुरुष के सर्वनामों में भी यूरोपीय भाषाओं में बहुत साम्य है। वर्णसाम्य पर शब्दों की व्युत्पत्ति ढूँढ़ना या भिन्न भिन्न रूपों से भिन्न भिन्न मूलों अथवा एक मूल की कल्पना करना भ्रामक है। प्रश्‍न है कि भाषा-विज्ञान की गणना कला में की जाय या विज्ञान में। कला के अंतर्गत केवल मनुष्य की कृतियाँ ही आती हैं, जैसे चित्रकला, मूर्तिकला, काव्यकला आदि। विज्ञान उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर या प्रकृति की कृतियों की मीमांसा होती है, जैसे भौतिक-विज्ञान, वनस्पति-विज्ञान, जीव-विज्ञान, मनोविज्ञान आदि। भाषा-<noinclude></noinclude> ewamcn2ij4ik6mrbf1sufawxf9gkt7s पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२७ 250 130816 662909 413589 2026-06-15T07:47:55Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662909 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|{{Left|१०}} भाषा-विज्ञान}} विज्ञान विज्ञान है या कला, इस पर यूरोप के विद्वानों ने बहुत कुछ विचार किया है और अंत में यही सिद्धांत निकाला है कि यह विज्ञान है, कला नहीं है; क्योंकि भाषा भी वास्तव में एक ईश्वरदत्त शक्ति है, और उसका आरंभ तथा विकास आदि भी प्राकृतिक रूप में ही होता है; मनुष्य अपनी शक्ति से और जान-बूझकर कदाचित् ही उसमें कोई परिवर्तन कर सकता है। यदि इस संबंध में वह कुछ कर भी सकता है, तो एक तो वह प्रायः नहीं के बराबर होता है, और दूसरे जो कुछ हो भी सकता है, वह व्यक्तिगत प्रयत्न से नहीं वरन् सामूहिक या सामाजिक रूप से होता है, और जो काम सामूहिक या सामाजिक रूप से हो, वह प्रायः प्राकृतिक के समान ही माना जाता है। इसके अतिरिक्त भाषा-विज्ञान में विज्ञान के और भी लक्षण पाए जाते हैं। इन्हीं कारणों से इसकी गणना कला में नहीं, विज्ञान में होती है। हम कह चुके हैं कि भाषा-विज्ञान और व्याकरण का घनिष्ठ संबंध है। व्याकरण एक कला है और भाषा-विज्ञान एक विज्ञान। व्याकरण भाषा में साधुता और असाधुता का विचार करता है, और भाषाविज्ञान भाषा की वैज्ञानिक व्याख्या करता है। व्याकरण दो प्रकार का होता है—वर्णनात्मक और व्याख्यात्मक। वर्णनात्मक व्याकरण लक्ष्यों का व्यवस्थित रूप में वर्गीकरण करता है और सामान्य नियमों का निर्माण करता है। व्याख्यात्मक व्याकरण इसका भाष्य करता है। यह भाषामात्र की प्रवृत्तियों की व्याख्या करता है। इसके भी तीन अंग होते हैं—ऐतिहासिक, तुलनात्मक और सामान्य व्याकरण। ऐतिहासिक व्याकरण भाषा के कार्यों को समझाने के लिये उसी भाषा में या उसकी पूर्ववर्ती भाषा में उसके कारणों के ढूँढ़ने की चेष्टा करता है, तुलनात्मक व्याकरण उसके कार्यों की व्याख्या के लिये उस भाषा की समकालीन या उसकी पूर्वज सजातीय भाषाओं की तुलनात्मक परीक्षा करता है और सामान्य व्याकरण सभी भाषाओं के—भाषा-मात्र के—मौलिक सिद्धांतों तथा तत्त्वों की मीमांसा करता है। यद्यपि यह सत्य<noinclude></noinclude> mxgemswd6apfkd826am9vz5p55xnwq3 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२८ 250 130817 662917 413590 2026-06-15T07:51:35Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662917 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|विषय-प्रवेश {{Right|११}}}} है कि व्याख्यात्मक व्याकरण वर्णनात्मक व्याकरण के आधार पर ही काम करता है तथापि भाषा-विज्ञान ने व्याकरण की व्याख्या को अपने अंतर्गत कर लिया है, और उसका आधार भी वर्णनात्मक व्याकरण हो जाता है। व्याकरण एक काल की किसी भाषा विशेष से सम्बन्ध रखता है। भाषा-विज्ञान किसी भाषा की अतीत काल की आलोचना करता है, तथा अन्य भाषाओं से उसकी तुलना करता है। व्याकरण नियम उपनियम और अपवाद का सविस्तर विवेचन करता है, और भाषा-विज्ञान प्रत्येक शब्द का इतिहास प्रस्तुत करता है। व्याकरण भाषा-विज्ञान का एक सहायक मात्र है। व्याकरण वर्ण-प्रधान होने के कारण भाषा-विज्ञान और व्याकरण में एक और भेद हो जाता है। व्याकरण सिद्ध और निष्पन्न रूप को लेकर ही अपना काम करता है। भाषा में जैसे रूप मिलते हैं उन्हीं पर वह विचार करता है। प्राचीन रूप वर्तमान रूप को कैसे प्राप्त हुआ, इसके कारणों पर भाषा-विज्ञान विचार करता है। भाषा-विज्ञान व्याकरण का व्याकरण है। उसका विकसित रूप है। इसी गुण के कारण इसको तुलनात्मक व्याकरण अथवा ऐतिहासिक तुलनात्मक व्याकरण भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त और भी ऐसे शास्त्र या विज्ञान हैं, जिनके साथ भाषा-विज्ञान का साधारण या घनिष्ठ सम्बन्ध है। भाषा की सृष्टि विचारों से होती है। पहले मन में किसी प्रकार का विचार उत्पन्न होता है और तब उस विचार के अनुकूल भाषा का सृजन होता है। भाषा वास्तव में विचाररूपी साध्य का साधन है। विचारों का सम्बन्ध मन या मस्तिष्क से है। इस प्रकार भाषा-विज्ञान का मनोविज्ञान के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित होता है। शब्दों के अर्थ आदि में जो परिवर्तन होते हैं उनके कारण और स्वरूप आदि के समझने के लिये भाषा-विज्ञान में मनोविज्ञान का आश्रय लिया जाता है।<noinclude></noinclude> 6ohv738kquliuow9a37b8k42hhv470h पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२९ 250 130818 662924 413591 2026-06-15T07:53:19Z Navishth 6636 662924 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बैजनाथ चौधरी" /></noinclude>{{center|{{Left|१२}} भाषा-विज्ञान}} साहित्य से भी भाषा-विज्ञान का कम घनिष्ठ संबंध नहीं है। भाषा-विज्ञान संबंधी अधिकांश नियमों और सिद्धांतों की रचना साहित्य के ही सहारे होती है, क्योंकि भाषा और रूप-परिवर्तन का ज्ञान करानेवाली समस्त सामग्री साहित्य में रक्षित रहती है। यदि साहित्य इन सब बातों को रक्षित न रखे तो भाषा-विज्ञान का कार्य कठिन हो जाय। साहित्य संपन्न भाषाएँ साहित्य-द्वारा रक्षित होकर अमर हो सकती हैं। ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन तो तुलनात्मक भाषाओं का ही हो सकता है। जो बोलियाँ साहित्य-हीन हैं, जिनके अतीत का हमें कुछ भी ज्ञान नहीं, उनके इतिहास की चर्चा कैसे हो सकती है ? यदि हमारे पास हमारे देश का क्रमबद्ध प्राचीन साहित्य न हो तो हमारा भाषा-विज्ञान कुछ रह ही न जाय। भिन्न शब्दों और उनके रूपों में क्या और कैसे परिवर्तन हुए, इसका ज्ञान केवल साहित्य से ही हो सकता है। आजकल जो भाषा का अध्ययन इतना समृद्धिशाली हो रहा है वह संस्कृत के ही ज्ञान का फल है इसी की कृपा से शब्दों के रूप और अर्थ का इतिहास इतना सरल और रोचक हो गया है। भाषा-विज्ञान के ज्ञाता के लिये ऐसे साहित्य और भाषा का अध्ययन भी सुगम हो जाता है जो अत्यंत प्राचीन हो अथवा जिससे उसका कभी किसी प्रकार का संघर्ष न रहा हो। भाषा-विज्ञान के विद्यार्थी के लिये वे भाषाएँ सहज और सरल हो जाती हैं। हिन्दी-भाषा के विकास के जिज्ञासु को हिंदी की पूर्वज अपभ्रंश, प्राकृत, संस्कृत आदि भाषाओं के साहित्य से परिचय प्राप्त करना पड़ता है और वह एक भाषा की अपेक्षा अनेक भाषाओं का कोविद स्वयं हो जाता है तथा अनेक साहित्यों से उसका परिचय हो जाता है। एक और विज्ञान है जो भाषा-विज्ञान का प्रधान आधार है। वह मानव-विज्ञान है जिसमें इस विषय का विवेचन होता है कि मनुष्य ने अपनी प्राकृतिक या आरंभिक अवस्था से किस प्रकार उन्नति करके अपनी वर्तमान उन्नत और सभ्य अवस्था प्राप्त की है। मनुष्यों में<noinclude></noinclude> 1uoxhg19pr7nba9tlz7blwbndfxvanr 662925 662924 2026-06-15T07:53:33Z Navishth 6636 /* शोधित */ 662925 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|{{Left|१२}} भाषा-विज्ञान}} साहित्य से भी भाषा-विज्ञान का कम घनिष्ठ संबंध नहीं है। भाषा-विज्ञान संबंधी अधिकांश नियमों और सिद्धांतों की रचना साहित्य के ही सहारे होती है, क्योंकि भाषा और रूप-परिवर्तन का ज्ञान करानेवाली समस्त सामग्री साहित्य में रक्षित रहती है। यदि साहित्य इन सब बातों को रक्षित न रखे तो भाषा-विज्ञान का कार्य कठिन हो जाय। साहित्य संपन्न भाषाएँ साहित्य-द्वारा रक्षित होकर अमर हो सकती हैं। ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन तो तुलनात्मक भाषाओं का ही हो सकता है। जो बोलियाँ साहित्य-हीन हैं, जिनके अतीत का हमें कुछ भी ज्ञान नहीं, उनके इतिहास की चर्चा कैसे हो सकती है ? यदि हमारे पास हमारे देश का क्रमबद्ध प्राचीन साहित्य न हो तो हमारा भाषा-विज्ञान कुछ रह ही न जाय। भिन्न शब्दों और उनके रूपों में क्या और कैसे परिवर्तन हुए, इसका ज्ञान केवल साहित्य से ही हो सकता है। आजकल जो भाषा का अध्ययन इतना समृद्धिशाली हो रहा है वह संस्कृत के ही ज्ञान का फल है इसी की कृपा से शब्दों के रूप और अर्थ का इतिहास इतना सरल और रोचक हो गया है। भाषा-विज्ञान के ज्ञाता के लिये ऐसे साहित्य और भाषा का अध्ययन भी सुगम हो जाता है जो अत्यंत प्राचीन हो अथवा जिससे उसका कभी किसी प्रकार का संघर्ष न रहा हो। भाषा-विज्ञान के विद्यार्थी के लिये वे भाषाएँ सहज और सरल हो जाती हैं। हिन्दी-भाषा के विकास के जिज्ञासु को हिंदी की पूर्वज अपभ्रंश, प्राकृत, संस्कृत आदि भाषाओं के साहित्य से परिचय प्राप्त करना पड़ता है और वह एक भाषा की अपेक्षा अनेक भाषाओं का कोविद स्वयं हो जाता है तथा अनेक साहित्यों से उसका परिचय हो जाता है। एक और विज्ञान है जो भाषा-विज्ञान का प्रधान आधार है। वह मानव-विज्ञान है जिसमें इस विषय का विवेचन होता है कि मनुष्य ने अपनी प्राकृतिक या आरंभिक अवस्था से किस प्रकार उन्नति करके अपनी वर्तमान उन्नत और सभ्य अवस्था प्राप्त की है। मनुष्यों में<noinclude></noinclude> 8zy7i9snqh89a0p36x3yoq82pp42wbf पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३५ 250 193468 662817 2026-06-14T16:42:06Z ऋतु मिश्रा 6631 /* अशोधित */ " जीरे जो राजा पचास साठ वा इससे अधिक वर्ष राज्य करता है वह अपने पुत्र पौत्र के राज्य के समय को छीन लेता है । विचारपूर्वक देखने पर इग्लैंड के और भारतवर्ष के मुसलमान राजाओ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 662817 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र}}</noinclude> जीरे जो राजा पचास साठ वा इससे अधिक वर्ष राज्य करता है वह अपने पुत्र पौत्र के राज्य के समय को छीन लेता है । विचारपूर्वक देखने पर इग्लैंड के और भारतवर्ष के मुसलमान राजाओं के राजत्वकाल की तुलना से यह बात प्रमाणित होती है और इसीलिये सर्वशास्त्रनिष्णात राजकार्यधुरंधर बूँदी राज्य के भूतपूर्व अमात्य श्रीपण्डित गंगासहायजी ने अपने ग्रंथ 66 वंशप्र- कारा" में अभिकुल की उत्पत्ति का समय कलियुग के हजार वर्ष बीतने पर माना है और मेरी समझ में बहुत ही ठीक मानाहै । अब रहा कर्नल टाडे साहब का अग्निकुल को तक्षकवंशीय बतलाने का विचार । यह भी मेरी समझ में ठीक नहीं है क्योंकि प्रथम तो जब उनका समय विचार ठीक नहीं तब यह भी अटकल मिथ्या होना चाहिये और दूसरे उन्होंने अग्निकुल की आबू पहाड पर उत्पत्ति का वर्णन लिखते हुए जो राय दी है वह भी उनके इस लेख को काटती है । थोडासा आगे चलने पर मालूम होजायगा । इन बातों से सिद्ध है कि चाहुवान वंश की उत्पत्ति को आजदिन चार हजार वर्ष से ऊपर हुए । खैर । कुछ भी हो परंतु जिस समय भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के धाम पधार जाने के अनंतर दैत्यों और बौद्धों का अत्याचार बढा, जिस समय बाणासुर के पुत्र घूम्रकेतु और यंत्रकेतन को आदि लेकर अनेक असुर ब्राह्मण के यज्ञों का नाश करके प्रजा को सताने लगे तब महर्षि वशिष्ठजी ने आबू पहाड़ पर अभिकुलकी उत्पत्ति के लिये यज्ञ किया । भविष्यपुराण में लिखा है :--- दूषयिष्यति यवनाः सहस्राब्दे गते कली । तदा रक्षां करिष्यंति याज्ञिकाः क्षत्रियर्षभाः ॥ अर्थात् कलि के हजार वर्ष बीतने पर यवन (बौद्ध) पृथ्वी को दूषित फरदेंगे तब यज्ञ से उत्पन्न होनेवाले क्षत्रिय उसकी रक्षा करेंगे । इसके साथ जो कथा लिखी है वह अभिकुल के चारों क्षत्रियवंशों की उत्पत्तिसे मिलती हुई है । - अवश्यही आजकल के पढे लिखे लोग ऐसी कथाओं को कल्पित बतलाते हैं और ढाडसाहब ने भी इस बात को कल्पित माना है परंतु आश्चर्य यह है कि चंद्रमा में खाई पहाड और मंगलग्रह में मनुष्यों की वस्ती की अटकल ऐसे लोगों के विचार से सबी और प्राचीन कथायें उनके विचार से कल्पितहैं । खैर इस पक्ष-<noinclude></noinclude> cnf3zqvnpiwzbc4kigig8s6rvku2gji 662948 662817 2026-06-15T11:51:43Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 662948 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र}}</noinclude>उम्मेदसिंह चरित्र जीरे जो राजा पचास साठ वा इससे अधिक वर्ष राज्य करता है वह अपने पुत्र पौत्र के राज्य के समय को छीन लेता है । विचारपूर्वक देखने पर इग्लैंड के और भारतवर्ष के मुसलमान राजाओं के राजत्वकाल की तुलना से यह बात प्रमाणित होती है और इसीलिये सर्वशास्त्रनिष्णात राजकार्यधुरंधर बूँदी राज्य के भूतपूर्व अमात्य श्रीपण्डित गंगासहायजी ने अपने ग्रंथ "वंशप्रकारा" में अभिकुल की उत्पत्ति का समय कलियुग के हजार वर्ष बीतने पर माना है और मेरी समझ में बहुत ही ठीक माना है । अब रहा कर्नल टाड साहब का अग्निकुल को तक्षकवंशीय बतलाने का विचार । यह भी मेरी समझ में ठीक नहीं है क्योंकि प्रथम तो जब उनका समय विचार ठीक नहीं तब यह भी अटकल मिथ्या होना चाहिये और दूसरे उन्होंने अग्निकुल की आबू पहाड़ पर उत्पत्ति का वर्णन लिखते हुए जो राय दी है वह भी उनके इस लेख को काटती है । थोड़ासा आगे चलने पर मालूम हो जायगा । इन बातों से सिद्ध है कि चाहुवान वंश की उत्पत्ति को आज दिन चार हजार वर्ष से ऊपर हुए । खैर । कुछ भी हो परंतु जिस समय भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के धाम पधार जाने के अनंतर दैत्यों और बौद्धों का अत्याचार बढ़ा, जिस समय बाणासुर के पुत्र धूम्रकेतु और यंत्रकेतन को आदि लेकर अनेक असुर ब्राह्मण के यज्ञों का नाश करके प्रजा को सताने लगे तब महर्षि वशिष्ठजी ने आबू पहाड़ पर अभिकुल की उत्पत्ति के लिये यज्ञ किया । भविष्यपुराण में लिखा है :— {{blockcenter| दूषयिष्यति यवनाः सहस्राब्दे गते कलेः । तदा रक्षां करिष्यन्ति याज्ञिकाः क्षत्रियर्षभाः ॥ }} अर्थात् कलि के हजार वर्ष बीतने पर यवन (बौद्ध) पृथ्वी को दूषित करेंगे तब यज्ञ से उत्पन्न होनेवाले क्षत्रिय उसकी रक्षा करेंगे । इसके साथ जो कथा लिखी है वह अभिकुल के चारों क्षत्रियवंशों की उत्पत्ति से मिलती हुई है । अवश्य ही आजकल के पढ़े लिखे लोग ऐसी कथाओं को कल्पित बतलाते हैं और टाड साहब ने भी इस बात को कल्पित माना है परंतु आश्चर्य यह है कि चंद्रमा में खाई पहाड़ और मंगलग्रह में मनुष्यों की वस्ती की अटकल ऐसे लोगों के विचार से सही और प्राचीन कथायें उनके विचार से कल्पित हैं । खैर इस पक्ष-<noinclude></noinclude> icalfjtrwns1lgy43j7a343h9h3rksp साँचा:Poem 10 193469 662831 2026-06-14T18:32:19Z Manvikesarwani09 6620 "सदा सदाफल दाख बिजौरा कौतिकहारी भूली ॥ टेक ॥ द्वादस कूंवा एक बनमाली, उलटा नीर चलावै । सहजि सुषमनां कूल भरावै, दह दिसि बाड़ी पावै ॥ ल्यौकी लेज पवन का ढीकू, मन मटका..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 662831 wikitext text/x-wiki सदा सदाफल दाख बिजौरा कौतिकहारी भूली ॥ टेक ॥ द्वादस कूंवा एक बनमाली, उलटा नीर चलावै । सहजि सुषमनां कूल भरावै, दह दिसि बाड़ी पावै ॥ ल्यौकी लेज पवन का ढीकू, मन मटका ज बनाया । सत की पाटि सुरति का चाठा, सहजि नीर मुकलाया ॥ त्रिकुटी चढ़्यौ पाव ढौ ढारे, अरध उरध की क्यारी ॥ चंद सूर दोऊ पांणति करिहै, गुर मुषि वीज बिचारी ॥ भरी छावड़ी मन बैकुंठा, सांई सूर हिया रगा । कहै कबीर सुनहु रे संतौ, हरि हम एकै सगा ॥ os9uip9snxb5cgjtyoylwqlunke49y5 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१ 250 193471 662947 2026-06-15T11:48:46Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 662947 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter| केन्द्रीय पुस्तकालय वनस्थली विद्यापीठ श्रेणी संख्या 954.42B4092 पुस्तक संख्या B409 S11U (H) प्रविष्टि क्रमांक 10957 }}<noinclude></noinclude> ttppbmz0eh0jick8ybmb20k14as7pvv पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३ 250 193472 662949 2026-06-15T11:52:15Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 662949 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude><noinclude></noinclude> dc84jm285cvwfe3vk7zx74f32a18ezn पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१० 250 193473 662950 2026-06-15T11:57:04Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 662950 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter| '''भूमिका''' }} यं पश्यति यस्य नाभिविरुद्धचरणं सन्तुष्टं न चेति । कर्णो वदाति शिरो चोद्वहति वचसि मुखं चारुचामण्डितम् ॥ अन्तस्थं यस्य विश्वं सुरसरसगन्धगन्धितं चित्तवृत्तेः । चित्रं रंगयते तं त्रिभुवनगुरुं त्रिगुणातीतं नमामि ॥ इतिहास प्राचीनों के अनुभव का खजाना है। व्यक्तिगत का, समाज का और देश का चरित्र संगठन करने के लिये इतिहास ही एक पथदर्शक है। लाखों, करोड़ों का अदृष्ट खजाना नष्ट प्राप्त होकर राजा से रंक हो सकता है किन्तु अनुभव की धरोहर यदि लिपिबद्ध कर ली जाय तो वह अटल, अविचल और वृद्धिमान सम्पत्ति है। बस इसी उद्देश्य से इतिहास ग्रन्थों की सृष्टि हुई है। मैं इसमें कहाँ तक कृतार्थ हुआ हूँ—सो कह नहीं सकता, परन्तु जब मैं कुलेखक नहीं, विद्वान नहीं और बुद्धिमान नहीं और इसी तरह इतिहास लेखन की सामग्री भी पूर्णतया उपलब्ध नहीं तब कहना चाहिये कि मेरा यह कार्य अपूर्ण होगा—अनुचित साहस कहलावेगा। हाँ! एक बात अवश्य है। यदि मैं इस उद्योग में सफल न होऊँ तो न सही किन्तु मुझे भरोसा है कि मेरे बाद कोई महाशय बूँदी के इतिहास लिखने का यदि उद्योग करेंगे तो उन्हें इस पोथी से बहुत सामग्री मिल जायगी। यदि मुझे इतनी भी सफलता प्राप्त हो जायगी तो मैं अपने को कृतार्थ समझूँगा। जब यह “उम्मेदसिंह चरित्र” पाठकों के सामने है तब इस ग्रन्थ में क्या है—सो दिखलाने की आवश्यकता नहीं और भूमिका में पुस्तक का आशय लिख देने की प्रायः चाल भी नहीं है। हाँ! इस जगह इतना अवश्य लिख देना चाहिये कि इसमें विक्रमसंवत् १७३१ से १८६८ तक के १३६ वर्षों का इतिहास है। उस समय मुसलमानी बादशाहत का रवाबता होकर त्यों-त्यों कर देशभर में शान्ति फैल गई थी, क्यों कर “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की कहावत चरितार्थ होती थी और क्योंकर सातवर्ष के उस प्रारम्भ पर्व में राजपूताने के क्षत्रिय नरेशों ने आपस के द्वेष से, दुश्मनों से और इसी प्रकार के अनेक कारणों से आपस में लड़कर, अपने भाइयों का नाश करके देश के नाश करने का उद्योग किया। परमेश्वर की कृपा से उस<noinclude></noinclude> cgmrvd1he63oa7yx075lh0xo4uaod20 662951 662950 2026-06-15T11:58:44Z Skirti.codes 6559 662951 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter| '''भूमिका''' }} {{blockcenter| यं पश्यति यस्य नाभिविरुद्धचरणं सन्तुष्टं न चेति ।<br /> कर्णो वदाति शिरो चोद्वहति वचसि मुखं चारुचामण्डितम् ॥<br /> अन्तस्थं यस्य विश्वं सुरसरसगन्धगन्धितं चित्तवृत्तेः ।<br /> चित्रं रंगयते तं त्रिभुवनगुरुं त्रिगुणातीतं नमामि ॥ }} इतिहास प्राचीनों के अनुभव का खजाना है। व्यक्तिगत का, समाज का और देश का चरित्र संगठन करने के लिये इतिहास ही एक पथदर्शक है। लाखों, करोड़ों का अदृष्ट खजाना नष्ट प्राप्त होकर राजा से रंक हो सकता है किन्तु अनुभव की धरोहर यदि लिपिबद्ध कर ली जाय तो वह अटल, अविचल और वृद्धिमान सम्पत्ति है। बस इसी उद्देश्य से इतिहास ग्रन्थों की सृष्टि हुई है। मैं इसमें कहाँ तक कृतार्थ हुआ हूँ—सो कह नहीं सकता, परन्तु जब मैं कुलेखक नहीं, विद्वान नहीं और बुद्धिमान नहीं और इसी तरह इतिहास लेखन की सामग्री भी पूर्णतया उपलब्ध नहीं तब कहना चाहिये कि मेरा यह कार्य अपूर्ण होगा—अनुचित साहस कहलावेगा। हाँ! एक बात अवश्य है। यदि मैं इस उद्योग में सफल न होऊँ तो न सही किन्तु मुझे भरोसा है कि मेरे बाद कोई महाशय बूँदी के इतिहास लिखने का यदि उद्योग करेंगे तो उन्हें इस पोथी से बहुत सामग्री मिल जायगी। यदि मुझे इतनी भी सफलता प्राप्त हो जायगी तो मैं अपने को कृतार्थ समझूँगा। जब यह “उम्मेदसिंह चरित्र” पाठकों के सामने है तब इस ग्रन्थ में क्या है—सो दिखलाने की आवश्यकता नहीं और भूमिका में पुस्तक का आशय लिख देने की प्रायः चाल भी नहीं है। हाँ! इस जगह इतना अवश्य लिख देना चाहिये कि इसमें विक्रमसंवत् १७३१ से १८६८ तक के १३६ वर्षों का इतिहास है। उस समय मुसलमानी बादशाहत का रवाबता होकर त्यों-त्यों कर देशभर में शान्ति फैल गई थी, क्यों कर “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की कहावत चरितार्थ होती थी और क्योंकर सातवर्ष के उस प्रारम्भ पर्व में राजपूताने के क्षत्रिय नरेशों ने आपस के द्वेष से, दुश्मनों से और इसी प्रकार के अनेक कारणों से आपस में लड़कर, अपने भाइयों का नाश करके देश के नाश करने का उद्योग किया। परमेश्वर की कृपा से उस<noinclude></noinclude> mh98o5ib20ixx2tzazimg4eqy1owiqq