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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२०६
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Lohit Sathesh
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" />{{Chaltasir|""200""||""Palestine""}}</noinclude>२०० फिलस्तीन
जमीन दे दी । साथ ही फिनलैंड ने रूस के विरुद्ध किसी गुटबन्दी मे
शामिल न होना स्वीकार किया ।
बाद में, उसी साल, जर्मन फौजे फ़िनलैंड में बुला ली गई । वहाना यह
किया गया कि जर्मनी अपनी फौजे फिनलैंड में रखना चाहता है । और जब
२२ जून १९४१ को नात्सी सेना ने रूस पर धावा बोला तो फिनिश सरकार ने
उनको अपने अड्डे इस्तेमाल करने की ग्राजा दे दी थोर २७ जून को रूम
के विरुद्ध, जर्मनी के पक्ष में, फिनलैंड
ने युद्ध घोषणा करदी | वरतानिया
अमरीका ने १६४१ के पतझड काल मे
फिनलैंड को, रूस के विरुद्ध लडाई छेडने
के कारण, चेतावनी दी। किन्तु, तब तक
फिनलैंड रूस द्वारा लिये गये अपने भू-
भाग को ही वापस नही ले चुका था
बल्कि रूस की भूमि तक जा पहुँचा था ।
उसने इस परामर्श को भी नही माना
कि फिनलैंड अपनी १६३६ वाली सीमाओ
पर ही वापस आ जाय । ऐग्लो-सोवियत
सहयोग को दृष्टिगत रखकर ६ दिसम्बर
१९४१ को ब्रिटेन ने फिनलैंड के विरुद्ध
लडाई का ऐलान कर दिया ।
फिलस्तीन — क्षेत्रफल १०,४३० वर्गमील, जनसख्या १४,८०,००० ।
इनमे १०,००,००० अरव तथा ४,८०,००० यहूदी हैं । पहले यह तुर्किस्तान
के अधीन प्रदेश था । विगत युद्ध के बाद सन् १९१८ की सधि मे, राष्ट्रसंघ के
शासनादेश के अनुकूल, ब्रिटिश सरकार के संरक्षण मे, कर दिया गया । सन्
१६१७ की बालफोर घोषणा के अनुसार कि "फिलस्तीन मे यहूदियो के लिये
राष्ट्रीय प्रदेश की स्थापना की जायगी", फिलस्तीन का द्वार प्रवासी यहूदियों
के लिये खुल गया । अरबो ने इस नीति का विरोध किया । उन्होने कहा कि
'गरेजो ने तो १६१५ के मैकमैहन-पत्र-व्यवहार मे प्रतिज्ञा की थी कि फिल-<noinclude></noinclude>
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सौरभ तिवारी 05
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />{{Chaltasir|""200""||""Palestine""}}</noinclude>२०० फिलस्तीन
जमीन दे दी । साथ ही फिनलैंड ने रूस के विरुद्ध किसी गुटबन्दी मे
शामिल न होना स्वीकार किया ।
बाद में, उसी साल, जर्मन फौजे फ़िनलैंड में बुला ली गई । वहाना यह
किया गया कि जर्मनी अपनी फौजे फिनलैंड में रखना चाहता है । और जब
२२ जून १९४१ को नात्सी सेना ने रूस पर धावा बोला तो फिनिश सरकार ने
उनको अपने अड्डे इस्तेमाल करने की ग्राजा दे दी थोर २७ जून को रूम
के विरुद्ध, जर्मनी के पक्ष में, फिनलैंड
ने युद्ध घोषणा करदी | वरतानिया
अमरीका ने १६४१ के पतझड काल मे
फिनलैंड को, रूस के विरुद्ध लडाई छेडने
के कारण, चेतावनी दी। किन्तु, तब तक
फिनलैंड रूस द्वारा लिये गये अपने भू-
भाग को ही वापस नही ले चुका था
बल्कि रूस की भूमि तक जा पहुँचा था ।
उसने इस परामर्श को भी नही माना
कि फिनलैंड अपनी १६३६ वाली सीमाओ
पर ही वापस आ जाय । ऐग्लो-सोवियत
सहयोग को दृष्टिगत रखकर ६ दिसम्बर
१९४१ को ब्रिटेन ने फिनलैंड के विरुद्ध
लडाई का ऐलान कर दिया ।
फिलस्तीन — क्षेत्रफल १०,४३० वर्गमील, जनसख्या १४,८०,००० ।
इनमे १०,००,००० अरव तथा ४,८०,००० यहूदी हैं । पहले यह तुर्किस्तान
के अधीन प्रदेश था । विगत युद्ध के बाद सन् १९१८ की सधि मे, राष्ट्रसंघ के
शासनादेश के अनुकूल, ब्रिटिश सरकार के संरक्षण मे, कर दिया गया । सन्
१६१७ की बालफोर घोषणा के अनुसार कि "फिलस्तीन मे यहूदियो के लिये
राष्ट्रीय प्रदेश की स्थापना की जायगी", फिलस्तीन का द्वार प्रवासी यहूदियों
के लिये खुल गया । अरबो ने इस नीति का विरोध किया । उन्होने कहा कि
'गरेजो ने तो १६१५ के मैकमैहन-पत्र-व्यवहार मे प्रतिज्ञा की थी कि फिल-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२६
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Vanshiikaa
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|२२०||ब्रिटिश-सेना}}</noinclude>
ब्रिटिश-सेना—वर्तमान महायुद्ध आरंभ होने से पूर्व ब्रिटिश-सेना के तीन अंग थेः—
( १ ) स्थायी सेना—इसमे सैनिक सात वर्ष के लिये भर्ती किये जाते हैं, किन्तु आगामी ५ वर्ष तक, रक्षित सैन्य की मॉति , आवश्यकता पड़ने पर, इसके सैनिकों को बुलाया जा सकता है । इसमें १,६४,००० सैनिक रहते थे । जिनमे ५७,००० सैनिक भारत में थे और इनका व्यय भारत-सरकार को देना पड़ता था ।
( २ ) देश-रक्षिणी सेना—यह नागरिको की सेना है। इसमें चार वषों तक शिक्षण की व्यवस्था है । इस सेना के सैनिकों के व्यावसायिक अथवा नागरिक धन्धो मे कोई बाधा नहीं पड़ती थी, सायकाल की कवायद में केवल सप्ताह में एक बार अथवा सालाना शिविर में शामिल होना पड़ता था । अप्रैल १६३६ मे यह सेना दूनी कर दी गई और इसकी सख्या ४,४०,००० होगई । इस सेना में एक स्त्री-सेना की शाखा भी हैं, जो असैनिक सहायक कार्य करती हैं।
( ३ ) अनिवार्य नागरिक सेना । २६ मई १९३९ के मिलिटरी ट्रेनिग् ऐक्ट (सैनिक-शिक्षण कानून) के अनुसार प्रत्येक २० वर्ष के या इससे अधिक आयु के स्वस्थ पुरुष को इसमे ६ महीने के लिये भर्ती होना अनिवार्य हैं ।
युद्ध आरम्भ होजाने पर यह समस्त सेनाएँ मिलाकर एक कर दी गई । १८ से ४१ वर्ष के लोगों को सेना में भर्ती होना अनिवार्य कर दिया गया । १६४१ के पतझड़ तक २० और ३६ वर्ष के बीच की आयु वाले लगभग ६० लाख आदमी इसमे भरती हुए और २० लाख सशस्त्र सैनिक तैयार होगये । १६४१ के दिसम्बर मे अनिवार्य भरती की उम्र पुरुषों के लिये ५० और स्त्रियो के लिये ३० वर्ष कर दीगई । जून १६४० मे नागरिक स्वयसेवको का मुल्की गारद जर्मन छतरी-सैनिको से लड़ने के लिये बना। इसके सदस्य अपना कारबार करते हुए फालतू समय में सैनिक कार्य करते हैं। आवश्यकता के अवसर पर पूरे समय के लिये बुला लिये जाते हैं। इनकी सेवाओं को अनिवार्य भी बनाया जा सकता है । इन सेनाओं के अतिरिक्त समुद्र पार की भारतीय तथा अनेक उपनिवेशो की सेनाएँ अलग हैं ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी भाषा.djvu/१५०
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सौरभ तिवारी 05
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<noinclude><pagequality level="3" user="Krupal (OKI)" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''पहला अध्याय'''}}<br>
{{larger|'''विषय-प्रवेश'''}}}}
मनुष्य मात्र की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि वह अपने भावों तथा विचारों को दूसरों पर प्रकट करे और स्वयं बड़ी उत्सुकता से दूसरे के भावों और विचारों को सुने और समझे। वह अपनी कल्पना
{{float box|align=center|width=8em|साहित्य की मूल मनोवृत्तियाँ}} की सहायता से ईश्वर, जीव तथा जगत् के विविध विषयों के संबंध में कितनी ही बातें सोचता है तथा वाणी के द्वारा उन्हें व्यक्त करने की चेष्टा करता है। वाणी का वरदान उसे चिर काल से प्राप्त है और उसका उपयोग भी वह चिरकाल से करता आ रहा है। प्रेम, दया, करुणा, द्वेष, घृणा तथा क्रोध आदि मानसिक वृत्तियों का अभिव्यंजन तो मानव समाज अत्यंत प्राचीन काल से करता ही है, साथ ही प्रकृति के नाना रूपों से उद्भूत अपने मनोविकारों तथा जीवन की अन्यान्य परिस्थितियों के संबंध में अपने अनुभवों को व्यक्त करने में भी उसे एक प्रकार का संतोष, तृप्ति अथवा आनंद प्राप्त होता है। यह सत्य है कि सब मनुष्यों में न तो अभिव्यंजन की शक्ति एक-सी होती है और न सब मनुष्यों के अनुभवों की मात्रा तथा विचारों की गंभीरता ही एक-सी होती है, परंतु साधारणतः यह प्रवृत्ति प्रत्येक मनुष्य में पाई जाती है। मनुष्य की इसी प्रवृत्ति की प्रेरणा से ज्ञान और शक्ति के उस भांडार का सृजन, संचय और संवर्द्धन होता है जिसे हम साहित्य कहते हैं।
साहित्य के मूल में स्थित इन मनोवृत्तियों के अतिरिक्त एक दूसरी प्रवृत्ति भी है जो सभ्य मानव-समाज में सर्वत्र पाई जाती है और जिससे साहित्य में एक अलौकिक चमत्कार तथा मनोहारिता आ जाती है। इसे हम सौंदर्य-प्रियता की भावना कह सकते हैं। सौंदर्य-प्रियता की ही सहायता से मनुष्य अपने उद्गारों में "रस" भर देता है जिससे एक प्रकार के अलौकिक और अनिर्वचनीय आनंद की उपलब्धि होती है और जिसे साहित्यकारों ने "ब्रह्मानंद-सहोदर" की उपाधि दी है। सौंदर्य-प्रियता की भावना ही शुद्ध साहित्य को एक ओर तो जटिल और नीरस दार्शनिक तत्त्वों से अलग करती तथा दूसरी ओर उसे मानव मात्र के<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२३
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सौरभ तिवारी 05
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" /></noinclude>
{{c|{{larger|''':३:'''}}<br>
{{xx-larger|'''विभाजन की सात योजनायें'''}}}}
सम्पत्ति के विभाजन की सब से अच्छी योजना क्या है, यह मालूम करने के लिए हमको सभी सम्भव योजनानों पर विचार कर लेना चाहिए।
यह योजना बहुधा पेश की जाती हैं कि प्रत्येक को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, सम्पत्ति का उतना भाग मिल जाया करे, जितना उसने अपने श्रम से पैदा किया हो। वैसे दिखने में यह
{{float box|align=center|width=8em|पहली योजना}} योजना ठीक प्रतीत होती है; किन्तु जब हम इसको व्यावहारिक रूप देने लगते हैं तो अनेक कठिनाइयाँ खड़ी हो जाती हैं। प्रथम तो यह मालूम करना ही कठिन होता है कि हर एक ने कितना पैदा किया। दूसरे ठोस पदार्थों का निर्माण ही दुनिया में एकमात्र काम नहीं है। समाज में अधिकतर काम सेवा के रूप में होता है।
एक पिन बनाने का कारख़ाना है। उसमें एक मशीन से लाखों पिनें तैयार होती हैं और सैकड़ों आदमी काम करते हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि मशीन चलाने वाले व्यक्ति के श्रम से कितनी पिनें बनीं; कितनी पिनें मशीन के आविष्कारक को और कितनी मशीन के इञ्जीनियर को मिलनी चाहिएं। एकान्त जंगल में रहने वाला कह सकता है कि अपनी कुटिया मैंने खुद बनाई है। उसमें किसी दूसरे का श्रम नहीं लगा; किन्तु सभ्य समाज में रहने वाला कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि कुर्सी, मेज़, मोटर आदि जिन वस्तुओं का वह नित्य उपयोग करता है, वे उसके अकेले के श्रम से बनी हैं। वास्तव में उन चीज़ों के बनाने में उसके निजी श्रम के अलावा दर्जनों आदमियों का श्रम लगा होता है। ऐसी दशा में जो जितना पैदा करे, उसको उतना ही देने की कोशिश करना ठीक वैसा ही सिद्ध होगा जैसा किसी तालाब में से पानी की<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२६
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Chahar 009
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center='''विभाजन की सात योजनायें'''|right='''१६'''}}</noinclude>
मिलेगा और वे नष्ट हो जायेंगे तथा जो कुछ सम्पत्ति होगी, वह भले,
परिश्रमी और क्रियाशील लोगों को मिलेगी और वे फले-फूलेंगे ।
जोलोग आराम से रहते हैं, उन में से बहुत से समझते हैं कि
आज-कल ऐसा ही होता है। उनकी यह धारणा रहती हैं कि परिश्रमी,
समझधार और मितव्ययी लोगों को कभी प्रभाव का सामना नहीं करना
<div style="float: left;text-align: center; margin-right: 15px;font-size: 100%;line-height: inherit;">{{float box|width=8em|दूसरी योजना}}</div>पढता और अलसी, शराबखोर, जुपुयाज, बेईमान और दुश्चरित्र कंगाल होते हैं। वे कह सकते हैं कि सदाचारी मज़दूर की अपेक्षा दुराचारी
मज़दूर को काम प्राप्त करने में अधिक कठिनाई होती है; जो किसान या
ज़मींदार जुआ खेलता है और अनाप-शनाप खर्च करता है उसकी जमीन
हाथ से निकल जाती है और वह कंगाल हो जाता है तथा जो व्यापारी
सुस्त होता है और अपने धन्धे की तरफ़ ध्यान नहीं देता, वह दिवालिया
हो जाता है; किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उन को जो कुछ
मिलता है वह उनका योग्य हिस्सा होता है। इससे इतना ही पता चलता
है कि कुछ कमजोरियों और बुराइयों के कारण मनुष्य दरिद्र हो जाता है।
किन्तु साथ ही कुछ ऐसी बुराइयाँ भी हैं जिनके कारण मनुष्य धनी यन
जाता है । कठोर, स्वार्थी, लालची, निर्दयी और अपने पडोसियों से लाभ
उठाने के लिए सदा तत्पर रहने वाले लोग, यदि इतने बुद्धिमान हों कि
अपने हाथों से अपने पाँवों पर कुल्हाड़ी न मारें तो, शीघ्र ही धनवान
बन जाते हैं । इस के विपरीत ग़रीब घर में पैदा हुए उदारचेता,
समाज-सेवी और मिलनसार लोग, जबतक उन में असाधारण प्रतिभा
न हो, ग़रीब ही रहते हैं। इतना ही नहीं, आज जैसी स्थिति है, उस में
कुछ ग़रीब ही पैदा होते हैं और कुछ सोने के पालने में जन्म लेते हैं ।
कहने का मतलब यह है कि वे चरित्र-निर्माण के पहले ही धनी और गरीब
की श्रेणियों में बंट जाते हैं। यह स्पष्ट है कि आज योग्यतानुसार सम्पत्ति
का विभाजन नहीं होता। इस समय आम हालत यह हैं कि थोड़े से
आलसी बहुत मालदार हैं और अनेको कठोर परिश्रम करने वाले अत्यन्त
कंगाल हैं । भारतीय किसान, जिनको भरपेट भोजन और तन ढंकने<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२७
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Chahar 009
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|left=२०|center=समाजवाद : पूंजीवाद}}</noinclude>
लायक़ काफ़ी कपडा भी नहीं मिलता ओर जो मिट्टी के मामूली कच्चे
घरों और झोपड़िय में दिन बिताते हैं, वे उन दुकानदारों और धनवानों से
अधिक चरित्रवान् हैं जो कुछ श्रम नहीं करते, खूब खाते, पहनने और
बर्बाद करते हैं और ऊँची-ऊँची हवेलियों में रहते हैं ।
यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि यदि आज सम्पत्ति का विभाजन
योग्यता के आधार पर नहीं होता है तो क्यों न ऐसी कोशिश करें जिससे
भले आदमी धनी और बुरे आदमी दरिद्र हो जाये ? किन्तु इसमें कई
कठिनाइयाँ हैं । प्रथम तो किसी की योग्यता का मूल्य रुपयों में कैसे
योका जा सकता है ? एक गाँव है, जिसमें लुहार भी रहता है और पुजारी
भी । योग्यता के अनुसार उन दोनों में हमको सम्पत्ति का विभाजन
करना है। लुहार को पुजारी जितना दिया जाय या पुजारी से दूना या
आधा या कितना कम या कितना अधिक ? पुजारी का दावा है कि वह
'हनुमान चालीसा का पाठ करके भूत-प्रेत को भगा सकता है; किन्तु
लुहार के पास तो अपने धन के सिवा कुछ नहीं। हो, यह घोदे की नाल
अवश्य बना सकता है। यह काम पुजारी सात जन्म में भी नहीं कर
सकता । तो सवाल यह है कि 'हनुमान चालीसा' की कितनी चौपाइयों
घोड़े की एक नाल के बराबर मानी जाये ! हम यह मालूम कर सकते हैं
कि बाजार में सेर भर घी के बदले कितना श्रन्न मिल सकता है, किन्तु जब
हम मानव प्राणियों का मूल्य थोकेंगे तो हमें मानना होगा कि ईश्वर के
दरवार में उन सब का समान मृत्य है। उनकी योग्यता के अनुसार
सम्पत्ति का बंटवारा करना मनुष्य की माप और निर्णय-शक्ति के
बाहर की बात है ।
सम्पत्ति के विभाजन की तीसरी योजना उन लोगों की है जो 'जिसकी
लाठी उसकी भैंस' वाले उसी पुराने और सीधे-सादे नियम में विश्वास
<div style="float: left; margin-right: 15px; text-align: center; width: 10em;">{{float box|width=10em|तीसरी योजना}}</div>
रखते है; किन्तु इस नियम की घोषणा आजकल
क्वचित ही की जाती है। वे कहते हैं कि हरएक अपनी-
अपनी शक्ति के अनुसार ले-ले; किन्तु इससे दुनिया
में शान्ति और सुरक्षितता का नामोनिशान भी न रहेगा । यदि हम सब<noinclude></noinclude>
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Chahar 009
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|left='''२०'''|center='''समाजवाद : पूंजीवाद'''}}</noinclude>
लायक़ काफ़ी कपडा भी नहीं मिलता ओर जो मिट्टी के मामूली कच्चे
घरों और झोपड़िय में दिन बिताते हैं, वे उन दुकानदारों और धनवानों से
अधिक चरित्रवान् हैं जो कुछ श्रम नहीं करते, खूब खाते, पहनने और
बर्बाद करते हैं और ऊँची-ऊँची हवेलियों में रहते हैं ।
यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि यदि आज सम्पत्ति का विभाजन
योग्यता के आधार पर नहीं होता है तो क्यों न ऐसी कोशिश करें जिससे
भले आदमी धनी और बुरे आदमी दरिद्र हो जाये ? किन्तु इसमें कई
कठिनाइयाँ हैं । प्रथम तो किसी की योग्यता का मूल्य रुपयों में कैसे
योका जा सकता है ? एक गाँव है, जिसमें लुहार भी रहता है और पुजारी
भी । योग्यता के अनुसार उन दोनों में हमको सम्पत्ति का विभाजन
करना है। लुहार को पुजारी जितना दिया जाय या पुजारी से दूना या
आधा या कितना कम या कितना अधिक ? पुजारी का दावा है कि वह
'हनुमान चालीसा का पाठ करके भूत-प्रेत को भगा सकता है; किन्तु
लुहार के पास तो अपने धन के सिवा कुछ नहीं। हो, यह घोदे की नाल
अवश्य बना सकता है। यह काम पुजारी सात जन्म में भी नहीं कर
सकता । तो सवाल यह है कि 'हनुमान चालीसा' की कितनी चौपाइयों
घोड़े की एक नाल के बराबर मानी जाये ! हम यह मालूम कर सकते हैं
कि बाजार में सेर भर घी के बदले कितना श्रन्न मिल सकता है, किन्तु जब
हम मानव प्राणियों का मूल्य थोकेंगे तो हमें मानना होगा कि ईश्वर के
दरवार में उन सब का समान मृत्य है। उनकी योग्यता के अनुसार
सम्पत्ति का बंटवारा करना मनुष्य की माप और निर्णय-शक्ति के
बाहर की बात है ।
सम्पत्ति के विभाजन की तीसरी योजना उन लोगों की है जो 'जिसकी
लाठी उसकी भैंस' वाले उसी पुराने और सीधे-सादे नियम में विश्वास
<div style="float: left; margin-right: 15px; text-align: center; width: 10em;">{{float box|width=10em|तीसरी योजना}}</div>
रखते है; किन्तु इस नियम की घोषणा आजकल
क्वचित ही की जाती है। वे कहते हैं कि हरएक अपनी-
अपनी शक्ति के अनुसार ले-ले; किन्तु इससे दुनिया
में शान्ति और सुरक्षितता का नामोनिशान भी न रहेगा । यदि हम सब<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२८
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Chahar 009
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center='''विभाजन की सात योजनायें'''|right='''२९'''}}</noinclude>
चल और चालाकी में समान हों तो हमे समान अवसर मिल जाएँगे;
किन्तु जिम दुनिया में पालक, वृद्ध और रोगी भी रहते हो और समान
यवस्था तथा शक्ति वाले तन्दुरुस्त वयस्क लोग भी लालच और दुष्टता
मैं एक-दूसरे से बहुत भिन्न हॉ उसमें यह योजना नहीं चल सकती ।
कुछ ही समय में हमें उससे हार माननी होगी । समुद्री लुटेरों और
जंगली डाकुओं के दल तक लूट के माल के विभाजन के लिए धींगामस्ती
के बजाय शान्ति पूर्ण निर्धारित समझौते को पसन्द करते हैं ।
हमारे सभ्य समाज में यद्यपि ढकैती और हिंसा का निषेध हैं, फिर
भी हम व्यवसाय को ऐसे सिद्धान्त पर चलने देते हैं जिसके अनुसार
दूसरे का कुछ भी खयाल किए बिना हर एक चाहे जितना नफा कमा
सकता है। एक दूकानदार या व्यापारी हमारी जेब भले ही न काटे; किन्तु
वह अपनी चीज़ों की इच्छानुसार मनमानी क़ीमत ले सकता है ।
व्यवसाय में इस बात की स्वतन्त्रता मिली हुई है कि वह जिस हद तक
ग्राहक को राजी कर सके उस हद तक थपने रुपए के बदले अधिक ले
सकता है या कम दे सकता है। मकानों की क़ीमत अथवा किरायेदारों
की दरिद्रता का कुछ भी खयाल किये बिना मकानों का किराया
चढ़ाया जा सकता है। दुनिया की उद्योग-धन्धों में धागे बढ़ी हुई
जातियाँ अपनी तैयार चीज़े उद्योग-धन्धों में पिछड़ी हुई जातियों पर थोप
कर मालदार हो सकती हैं।
सम्पत्ति के विभाजन की चौथी योजना यह है कि केवल कुछ लोगों
को बिना कुछ परिश्रम कराये धनी बना दिया जाय और बाक़ी सब से
<div style="float: left; margin-right: 15px; text-align: center; width: 10em;">{{float box|width=10em|चौथी योजना}}</div>
खूब मेहनत कराई जाय। उनके परिश्रम से जो पैदा
हो उसमें से उन्हें केवल इतनी मज़दूरी दी जाय कि वे
जीवित भर रह सकें और मरने या बुड्ढे होने के बाद
ग़ुलामी करने के लिए बाल-बच्चे पैदा कर जायें। मोटे तौर पर आजकल
यही होता है। दस प्रतिशत लोग देश की ९० प्रतिशत सम्पत्ति पर
अधिकार जमाये हुए हैं। शेष ९० प्रतिशत में से अधिकांश के पास कोई
सम्पत्ति नहीं है । वे अत्यंत अल्प मजदूरी पर कंगाली की हालत में<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२९
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Chahar 009
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|left='''२२'''|center='''समाजवाद : पूंजीवाद'''}}</noinclude>
जीवन निर्वाह करते हैं । इस योजना का यह लाभ यतलाया जाता है कि
वह उनके बीच में धनिकों का एक वर्ग पैदा कर देती है जो खर्चीली
शिक्षा द्वारा अपने को सुसंस्कृत बना लेता है और उससे ऐसी योग्यता
प्राप्त कर लेता है कि देश पर शासन कर सके; कानून वना कर उनकी
रक्षा कर सके; राष्ट्र की रक्षा के लिए सेना मंगठित कर उसका संचालन
कर सके; विद्या, विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, धर्म और उन सब चीजों
को जो महान् सभ्यता और ग्रामीण जीवन के अन्तर को स्पष्ट करती हैं,
संरचाण देकर जीवित रख सके; विशाल भवन निर्माण करा सके भद-
कीली पोशाकें पहिन सके; गंवारों पर रौब गाँठ सके और सभ्यना नया
शौक़ीनी के जीवन का उदाहरण पेश कर सके । जैसा कि व्यवसायी खयाल
करते है, सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि वे आवश्यकता से अधिक देकर
उन्हें बड़ी मात्रा में अतिरिक्त रुपया बचाने का अवसर देते हैं। इसी
रुपये को पूंजी कहते हैं।
यह योजना, जिसे अल्प जन-सत्तावाद कहते हैं, समाज को भद्र और
साधारण दो भागों में विभक्त करती है। भद्र लोग सम्पत्ति पर और
साधारण लोग श्रम पर जीवन-निर्वाह करते हैं । यह कुछ को धनी और
बहुतों को कंगाल बना देने वाली योजना है, जो दीर्घकाल से चली आई
है और अब भी चल रही है । यह स्पष्ट है कि यदि धनिकों की आमदनी
छीन कर गरीबों में बाँट दी जाय तो भी उनकी गरीबी में विशेष अन्तर
नहीं पड़ेगा; किन्तु इससे पूंजी का मिलना बन्द हो जायगा, कारण फिर
कोई कुछ भी वचा न पायगा । धनिकों की ग्रामीण अट्टालिकाश्री की
हालत विगढ जायगी और विज्ञान, कला, साहित्य तथा सारी संस्कृति का
लोप हो जायगा । यही कारण है कि इतने अधिक लोग वर्तमान पद्धति
का समर्थन करते हैं और स्वयं कंगाल होते हुए भी धनिक वर्ग का
साथ देते है।
किंतु इस योजना से भयंकर बुराइयों पैदा होती हैं। ये भद्र
लोग उन कामो को नहीं करते जिनको करने के लिए उन्हें बड़ा
बनाया गया था। उद्देश्य श्रेष्ठ होते हुए भी वे देश का शासन बुरी तरह<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/३४
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Chahar 009
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||'''निर्धनता या धनिकता?'''|'''२७'''}}</noinclude>
है कि वह खराय है, उसको ज्यों-की-त्यों रहने देना स्वीकार न करेगा ।
जब स्थिति ज्यों-की-त्या नहीं रहेगी, वह बदलेगी, तब उसकी तरफ से
आँखें मुँद लेने से काम न चलेगा। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि
हम स्थिति को यों ही लुढ़कने न दें। रोक कर ठीक दिशा में चलाएँ ।
विचारपूर्वक सम्पत्ति का विभाजन करै । जैसा विभाजन इस समय हो
रहा है वह ठीक नहीं है।
सम्पत्ति विभाजन की सातवी योजना साम्यवादी योजना है और वह यह
है कि विना इस बात का विचार किए कि अमुक आदमी कैसा है, उसकी
<div style="float: left; margin-right: 15px; text-align: center; width: 10em;">{{float box|width=10em|सातवी योजना}}</div>
कितनी उम्र है, किस तरह का काम करता है, कौन है,
उसका पिता कौन था, हरएक को बरावर-बरावर
हिस्सा दे दिया जाय । केवल यही योजना ठीक-ठीक.
काम देगी। सबसे सन्तोषजनक योजना यही है । विमानन की पहेली का
यही साम्यवादी हल है। समान धाय में हमें भले ही सुन्दरता दिखाई
न दे; किन्तु हम आसमान थाय के भयंकर दुप्परिणामों को देख सकते
हैं। जिन बुराइयों से हम नित्य संघर्ष करना पड़ता है वे असमान थाय
के कारण ही पैदा होती हैं। इसलिए हमें राष्ट्रीय सम्पत्ति का विभाजन
सब में समान ही करना चाहिए।
<center>{{xx-larger|: ४ :}}
<center>{{xx-larger|निर्धनता या धनिकता?}}
कुछ साधु-सन्तों के अलावा हरएक आदमी यही कहेगा कि जो योजना दरिद्रता का नाश न कर सके वह ग्राह्य नहीं हो सकती। (उन लोगों की दरिद्रता भी मज़बूरन नहीं, स्वेच्छा से ग्रहण की हुई होती है।) इसलिए सबसे पहिले थोड़ी देर के लिए हम दरिद्रता का ही विचार कर लें।
यह आम तौर पर माना जाता है कि गरीब लोगों के लिए दरिद्रता
अत्यन्त कष्ट-दायक और अभिशाप रूप सिद्ध होती है, किन्तु ग़रीब लोग<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/४७
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Chahar 009
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh|'''४०'''|'''समाजवाद : पूंजीवाद'''|}}</noinclude>के काम करवाने के लिये ख़ासी मजदूरी देता है। इस तरह की मजदूरी
पाने वाले सब लोग कठोर परिश्रम क्यों न करते हो; किन्तु उसका
फल यह होता है कि भूखो को भोजन मिलने के बजाय धनिकों के धन
में ही वृद्धि होती हैं। वह श्रम उचित स्थान पर नहीं होता, न्यर्थ
जाता है और देश को ग़रीब बनाए रखता है।
इस स्थिति के पक्ष में यह दलील नहीं दी जा सकती कि धनी लोगों
को काम देते हैं | काम देने में कोई विशेषता नहीं । हत्यारा फांसी
लटकाने वाले को काम देता है और मोटर चलाने वाला बच्चों पर
मोटर चलाकर ढोली ले जाने वाले को, डाक्टर को, कफ़न बनाने वाले
को, पादरी को, शोकसूचक पोशाक सोने वालों को, गाड़ी खींचने वाले
को, कम खोदने वाले को । संक्षेप में, इतने सारे योग्य लोगों को काम देता
है कि जब वह आत्म-हत्या करके मर जाता है तो सार्वजनिक हित-साधक
के नाते उसकी मूर्ति खड़ी न करना कृतघ्नता की निशानी प्रतीत होती
है ! यदि रुपए का समान विभाजन हो तो जिस रुपए से धनी ग़लत
काम करवाते हैं उससे योग्य काम करवाया जा सकेगा ।
यदि भविष्य की साधारण स्त्रियां आज की उच्च से उच्च धनी
महिलाओं से अच्छी न होंगी तो वह सुधार हमारे घोर असन्तोष
का कारण होगा, और वह सन्तोष होगा देवी असन्तोष ! अतः हम
'विचार करें कि मानव प्राणी होने की हैसियत से लोगों के चरित्र पर समान
थाय का क्या असर होगा ।
कुछ लोग कहते हैं कि यदि हम लोग अधिक अच्छे आदमी चाहते
हैं तो जिस तरह पश्चिम में उत्तम घोड़ों की और उत्तम सूथरों की नस्ल
पैदा करते हैं, उसी तरह आदमियों की भी पैदा करें। निस्सन्देह
हमको ऐसा करना चाहिए, किन्तु इस में दो कठिनाइयां हैं । पहिले तो
जैसे हम गाय-बैलों, घोड़े-घोड़ियों, स्थर-सूचरियों की जोड़ियां मिलाते
हैं, वेसे स्त्री-पुरुषों की जोड़ियां बिना उनको इस विषय में चुनाव की
स्वतंत्रता दिए नहीं मिला सकते। दूसरे यदि मिला भी सकें तो जोड़ियां
कैसे मिलानी चाहिएं, इसका हमें ज्ञान न होगा । कारण, हमको पता<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/४८
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Chahar 009
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||'''आसमान श्राय के दुष्परिणाम'''|'''९१'''}}</noinclude>न होगा कि हम किस तरह के आदमी पैदा करना चाहते हैं ।
किसी घोढे या सूथर का मामला बहुत सीधा है। डौट के लिये बहुत
तेज़ और बोमा सींचने के लिये बहुत मजबूत घोडे की ज़रूरत होती हैं ।
और सुधर के लिये तो इतना ही चाहिए कि वह खूब मोटा हो । यह
मय सीधा होते हुए भी इन जानवरों की नस्ल पैदा करने वाले किसी
के भी मुह मे हम सुन सकते हैं कि चाहे जितना सावधान रहने पर भी
बहुत बार वान्छनीय परिणाम नहीं निकलता ।
यदि हम स्वयं भी सोचें कि हमें कैसा बालक चाहिए तो लड़के
या लड़की की पसन्द करने के अलावा उसी क्षण हमें स्वीकार करना
पड़ेगा कि हमको मालूम नहीं । अधिक-से-अधिक हम कुछ प्रकार
गिना सकते हैं जो हमें नहीं चाहिएं। उदाहरण के लिए हमको लूले-
लंगड़े. गुंगे-बहरे, अन्थे, नामर्द, मिरगी के रोगी और शराय बच्च
नहीं चाहिएं। किन्तु हमको यह नहीं मालूम कि ऐसे बच्चों की उत्पत्ति
रोकी कैसे जाय । कारण, इन अभागों के माता-पिताओं में बहुधा कोई
रस्य सुराबी नहीं होती । थय जो हमें नहीं चाहिएं उनको छोड़ कर जो
हमें चाहिएं हम उन पर थाएं । हम कह सकते हैं कि हमें अच्छे बालक
चाहिएं। किन्तु अच्छे घालक की परिभाषा यह है कि वह अपने माता-
पिता को कोई कष्ट न देना हो, और कुछ बहुत उपयोगी स्त्री-पुरुष
चालकपन में बहुत उत्पाती रहे हैं । क्रियाशील, बुद्धिशाली, उद्यमी
और बहादुर लड़के अपने माता-पिताओं की दृष्टि में हमेशा शरारती
होते हैं, और प्रतिभावान पुरुष मरने से पहिले क्वचित ही पसन्द किए
जाते हैं । हमने मुकरात को विप पिलाया, ईसा को सूली दी और जॉन
आव आर्क को लोगों की हपं ध्वनि के बीच जीवित जला दिया; क्योंकि
जिम्मेदार विधान-बेतार्थो और पादरियों द्वारा मुक्तदमे करवाने के बाद
हमने तय किया कि वे इतने दुष्ट हैं कि उन्हें जीवित नहीं रहने दिया
जा सकता। इस सब को ध्यान में रखते हुए हम शायद ही अच्छाई के
निर्णायक हो सकते हैं और उसके लिए हृदय में सच्चा प्रेम रख
सकते हैं<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२९
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2026-06-15T14:31:46Z
Niyatii.jain
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Niyatii.jain" />{{Rh||'''अकबर'''|'''२७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:तान हाशिम, उस्ताद मोहम्मद आमीन, और उस्ताद मोहम्मद हुसेन तानपूरा बजाते थे। ग्वालियरके वीरमण्डलखां स्वरमण्डल बजाते थे। शहाब खां और पुर्ब्बीन खां बीन, शेख़ दाबानी करनाई, उस्ताद दोस्त सहनाई, मीर सैयद अली और बहरामकुली घिचक, तास बेग कुञ्ज, कासिम रबाब और उस्ताद शाह महम्मद सुर्ना आदि भांति-भांतिके बाजे बजाते थे। अबुलफ़ज़लके भाई फैज़ी सम्राट् अकबरकी सभामें एक प्रधान कवि थे। फैज़ीने ब्राह्मण-वेशसे काशीमें संस्कृत पढ़ी थी और अच्छा पाण्डित्य लाभ किया था।
:{{gap}}अकबर ने साहित्यके प्रचारमें भी अच्छा उद्योग किया था। उन्होंने अपने राज्यभरमें पाठशालायें स्थापित करादी थीं। उनमें धार्मिक शिक्षाका कुछ विशेष प्रभाव नहीं था)
:{{gap}}अकबर धार्मिक भी थे। जिस समय सूर्य मेष राशिमें आते, तो उन्नीस दिनोंतक सौराग्नि आहरण करते थे। उसकी प्रणाली यह है:—दोपहरके समय अकबरके नौकर धूपमें सूर्यकान्तमणि रखकर आग जला लेते थे। सालभरतक उस आगकी रक्षा करनेके लिये विश्वासी मनुष्य नियत किये गये थे। सम्राट्के लिये रसोई उसी अग्निपर होती थी। पौर्णमासीके दिन चन्द्रकान्तमणि द्वारा वे चन्द्रमा से अमृत हरण कराते थे। वह अमृतकणा साफ ओसके समान रहती थी।
:{{gap}}रात के समय अकबरके घरमें ३६ दीपक जलते थे। उनमें १२ सफ़ेद, बारह चांदीके शमादान और बारह सोनेके शमादान रहते थे। एक-एक शमादान वज़नमें दस मनसे कम न था। उनमें छः २ बड़ी लम्बी मोमबत्ती लगाई जाती थीं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीयातक एक, दूसरी पीतलसोज़में आठ बत्तियां जलती थीं, चतुर्थीको सात और पञ्चमीको छः बत्तियां रहती थीं। इसी तरह नित्य एक बत्ती कम करके दशमीको केवल एक बत्ती रह जाती थी। इसके बाद पूर्णिमातक एक बत्ती ही जला करती थी। फिर कृष्णपक्षकी प्रतिपदाको एक, द्वितीयाको दो,
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:तृतीयाको तीन, और चतुर्थीको चार और पञ्चमीको भी चार ही बत्तियां जलती थीं। षष्ठीको पांच, सप्तमीको छः; इसी तरह एक दिन नागा करके दो दिनोंतक संख्या बढ़ाई जाती थी। एक सेर रूई की एक एक बत्ती बनती थी और एक बत्तीमें एक सेर तेल लगता था।
:{{gap}}अकबरने अपने राज्यमें सब तरह का प्रबन्ध किया था। वे सती होने की प्रथा के विरोधी थे। वे स्वयम् बहुत थोड़ी शराब पीते थे और अपने सभासदोंको भी बहुत थोड़ी पीने देते थे।
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:{{gap}}अकबर रूपमें बहुत ही सुन्दर थे। छाछठ वर्ष को अवस्था हो जाने पर भी वे बूढ़े से नहीं मालूम होते थे। उनके पक्के केश मात्र उनकी वृद्धावस्थाके चिन्ह थे। गोआ से कई पादरिये उनकी सभा में आये थे। पादड़ियों की इच्छा थी कि, सम्राट् कृस्तान हो जायँ, पर उनको इच्छा पूर्ण न हो सकी।
:{{gap}}१६०६ ईस्वीमें सुलतान दानियालका विवाह बड़े समारोहसे हुआ; परन्तु कुछ दिन बाद ही दानियाल शराब पोनेके कारण मर गया। दानियाल की मृत्युसे अकबर बहुत ही शोकान्वित हुए। वे दिन-दिन क्षीण
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Niyatii.jain
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:तान हाशिम, उस्ताद मोहम्मद आमीन, और उस्ताद मोहम्मद हुसेन तानपूरा बजाते थे। ग्वालियरके वीरमण्डलखां स्वरमण्डल बजाते थे। शहाब खां और पुर्ब्बीन खां बीन, शेख़ दाबानी करनाई, उस्ताद दोस्त सहनाई, मीर सैयद अली और बहरामकुली घिचक, तास बेग कुञ्ज, कासिम रबाब और उस्ताद शाह महम्मद सुर्ना आदि भांति-भांतिके बाजे बजाते थे। अबुलफ़ज़लके भाई फैज़ी सम्राट् अकबरकी सभामें एक प्रधान कवि थे। फैज़ीने ब्राह्मण-वेशसे काशीमें संस्कृत पढ़ी थी और अच्छा पाण्डित्य लाभ किया था।
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:{{gap}}अकबर धार्मिक भी थे। जिस समय सूर्य मेष राशिमें आते, तो उन्नीस दिनों तक सौराग्नि आहरण करते थे। उसकी प्रणाली यह है:—दोपहरके समय अकबरके नौकर धूपमें सूर्यकान्तमणि रखकर आग जला लेते थे। सालभरतक उस आगकी रक्षा करने के लिये विश्वासी मनुष्य नियत किये गये थे। सम्राट्के लिये रसोई उसी अग्निपर होती थी। पौर्णमासी के दिन चन्द्रकान्तमणि द्वारा वे चन्द्रमा से अमृत हरण कराते थे। वह अमृतकणा साफ ओसके समान रहती थी।
:{{gap}}रात के समय अकबरके घर में ३६ दीपक जलते थे। उनमें १२ सफ़ेद, बारह चांदीके शमादान और बारह सोनेके शमादान रहते थे। एक-एक शमादान वज़न में दस मन से कम न था। उनमें छः २ बड़ी लम्बी मोमबत्ती लगाई जाती थीं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया तक एक, दूसरी पीतलसोज़ में आठ बत्तियां जलती थीं, चतुर्थी को सात और पञ्चमी को छः बत्तियां रहती थीं। इसी तरह नित्य एक बत्ती कम करके दशमी को केवल एक बत्ती रह जाती थी। इसके बाद पूर्णिमातक एक बत्ती ही जला करती थी। फिर कृष्णपक्षकी प्रतिपदा को एक, द्वितीया को दो,
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:तृतीयाको तीन, और चतुर्थीको चार और पञ्चमीको भी चार ही बत्तियां जलती थीं। षष्ठीको पांच, सप्तमीको छः; इसी तरह एक दिन नागा करके दो दिनोंतक संख्या बढ़ाई जाती थी। एक सेर रूई की एक एक बत्ती बनती थी और एक बत्तीमें एक सेर तेल लगता था।
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:{{gap}}अकबर रूपमें बहुत ही सुन्दर थे। छाछठ वर्ष को अवस्था हो जाने पर भी वे बूढ़े से नहीं मालूम होते थे। उनके पक्के केश मात्र उनकी वृद्धावस्थाके चिन्ह थे। गोआ से कई पादरिये उनकी सभा में आये थे। पादड़ियों की इच्छा थी कि, सम्राट् कृस्तान हो जायँ, पर उनको इच्छा पूर्ण न हो सकी।
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/३
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2026-06-15T12:11:12Z
Arnav Bharadwaj
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Arnav Bharadwaj" /></noinclude>१
पहिली भेंट
रात बहुत अंधेरी थी । रास्ता पहाड़ी और ऊबड़-
खाबड़ था । आकाश पर बदली छाई हुई थी, और अभी
कुछ देर पूर्व जोर की वर्षा हो चुकी थी । जव जोर की
हवा से वृक्ष और बड़ी-बड़ी घास सांय-सांय करती थी,
तव जंगल का सन्नाटा और भी भयानक मालूम होता था ।
इस समय उस जंगल में दो घुड़सवार बढ़े चले जारहे
थे । दोनों के घोड़े खूब मजबूत थे, पर वे पसीने में लथपथ
थे । घोड़े पग-पग पर ठोकरें खाते थे, पर उन्हें ऐसे बीहड़
रास्तों में, ऐसे संकट के समय, अपने स्वामी को ले जाने
का अभ्यास था । सवार भी असाधारण धैर्यवान् और वीर
पुरुष थे । वे चुपचाप चल रहे थे । घोड़ों की टापों और
उनकी प्रगति से कमर में लटकती हुई उनकी तलवारों
और बछ की खरखराहट उस सन्नाटे के आलम में एक
भयपूर्ण रव उत्पन्न कर रही थी ।
हठात् घोड़े ने एक ठोकर खाई, और एक मंद आत -
नाद अग्रग्रामी सवार के कान में पड़ा । उसने
घोड़े की
बाग खींचते हुए कहा - "घांघूजी !"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/४
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2026-06-15T12:12:46Z
Arnav Bharadwaj
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रोशनी चौबे जे" /></noinclude>"महाराज !”
पीछे आने वाला सवार क्षण भर में अग्रगामी सवार के सन्निकट
आगया, और उसने विजली की भांति अपनी तलवार खींच ली । अग्रगामी
सवार का घोड़ा खड़ा हो गया था। उसने भी तलवार नंगी करके कहा-
"देखो, क्या है ? घोड़े ने ठोकर खाई है, यह श्रार्त्तनाद कैसा है ?"
घांघूजी घोड़े से उतर पड़े, उन्होंने झुककर देखा और कहा-
“महाराज, एक मनुष्य है ।"
"क्या घायल है ?"
" खून में लथपथ प्रतीत होता है ।"
"जीवित है ?"
इसी समय पड़े हुए व्यक्ति ने फिर आनाद किया । महाराज
उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही घोड़े से कूद पड़े । उन्होंने बांधूजी को
प्रकाश करने का आदेश दिया, और स्वयं मार्ग में पड़े व्यक्ति के सिर-
हाने घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने उसका सिर गोद में रख लिया,
नाड़ी देखी, हृदय का स्पंदन देखा, और कहा - "जीवित है । पर मालूम
होता है, बहुत घाव खाए हैं, रक्त बहुत निकल गया है ।"
धांवूजी ने तब तक चकमक पत्थर से अबरख की बनी, चोर-
लालटेन जला ली थी । वह उसे घायल के मुख के पास लाए। देखकर
कहा–“अरे, बड़ा अल्पवयस्क वालक है !”
" परन्तु अंग-अंग में घाव हैं, मालूम होता है, वीरतापूर्वक युद्ध
किया है ।"
मुमूर्षु ने प्रकाश और मनुष्य मूर्ति को देखा, और जल का संकेत
किया । महाराज ने स्वयं उसके मुख में जल डाला । जल पीकर उसने
नांखें खोलीं, और क्षीण स्वर में कहा - "आप कौन हैं, प्राणरक्षक ?”
और फिर कुछ ठहर कर कहा - " आप चाहे जो भी हों, यह प्रारण और
शरीर आपके हुए।" उसके होठों पर मंद हास्य की रेखा आई ।<noinclude></noinclude>
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2026-06-15T14:21:54Z
VishnudevButla
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude> "महाराज !”
पीछे आने वाला सवार क्षण भर में अग्रगामी सवार के सन्निकट
आगया, और उसने विजली की भांति अपनी तलवार खींच ली । अग्रगामी
सवार का घोड़ा खड़ा हो गया था। उसने भी तलवार नंगी करके कहा-
"देखो, क्या है ? घोड़े ने ठोकर खाई है, यह श्रार्त्तनाद कैसा है ?"
घांघूजी घोड़े से उतर पड़े, उन्होंने झुककर देखा और कहा-
“महाराज, एक मनुष्य है ।"
"क्या घायल है ?"
"खून में लथपथ प्रतीत होता है ।"
"जीवित है ?"
इसी समय पड़े हुए व्यक्ति ने फिर आनाद किया । महाराज
उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही घोड़े से कूद पड़े । उन्होंने बांधूजी को
प्रकाश करने का आदेश दिया, और स्वयं मार्ग में पड़े व्यक्ति के सिर-
हाने घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने उसका सिर गोद में रख लिया,
नाड़ी देखी, हृदय का स्पंदन देखा, और कहा - "जीवित है । पर मालूम
होता है, बहुत घाव खाए हैं, रक्त बहुत निकल गया है ।"
धांवूजी ने तब तक चकमक पत्थर से अबरख की वनी, चोर-
लालटेन जला ली थी । वह उसे घायल के मुख के पास लाए। देखकर
कहा–“अरे, बड़ा अल्पवयस्क वालक है !”
"परन्तु अंग-अंग में घाव हैं, मालूम होता है, वीरतापूर्वक युद्ध
किया है ।"
मुमूर्षु ने प्रकाश और मनुष्य मूर्ति को देखा, और जल का संकेत
किया । महाराज ने स्वयं उसके मुख में जल डाला । जल पीकर उसने
नांखें खोलीं, और क्षीण स्वर में कहा - "आप कौन हैं, प्राणरक्षक ?”
और फिर कुछ ठहर कर कहा - " आप चाहे जो भी हों, यह प्रारण और
शरीर आपके हुए।" उसके होठों पर मंद हास्य की रेखा आई ।<noinclude></noinclude>
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2026-06-15T14:23:09Z
VishnudevButla
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude> "महाराज !”
पीछे आने वाला सवार क्षण भर में अग्रगामी सवार के सन्निकट
आगया, और उसने विजली की भांति अपनी तलवार खींच ली । अग्रगामी
सवार का घोड़ा खड़ा हो गया था। उसने भी तलवार नंगी करके कहा-
"देखो, क्या है ? घोड़े ने ठोकर खाई है, यह श्रार्त्तनाद कैसा है ?"
घांघूजी घोड़े से उतर पड़े, उन्होंने झुककर देखा और कहा-
“महाराज, एक मनुष्य है ।"
"क्या घायल है ?"
"खून में लथपथ प्रतीत होता है ।"
"जीवित है ?"
इसी समय पड़े हुए व्यक्ति ने फिर आनाद किया । महाराज
उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही घोड़े से कूद पड़े । उन्होंने बांधूजी को
प्रकाश करने का आदेश दिया, और स्वयं मार्ग में पड़े व्यक्ति के सिर-
हाने घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने उसका सिर गोद में रख लिया,
नाड़ी देखी, हृदय का स्पंदन देखा, और कहा - "जीवित है । पर मालूम
होता है, बहुत घाव खाए हैं, रक्त बहुत निकल गया है ।"
धांवूजी ने तब तक चकमक पत्थर से अबरख की वनी, चोर-
लालटेन जला ली थी । वह उसे घायल के मुख के पास लाए। देखकर
कहा–“अरे, बड़ा अल्पवयस्क वालक है !”
"परन्तु अंग-अंग में घाव हैं, मालूम होता है, वीरतापूर्वक युद्ध
किया है ।"
मुमूर्षु ने प्रकाश और मनुष्य मूर्ति को देखा, और जल का संकेत
किया । महाराज ने स्वयं उसके मुख में जल डाला । जल पीकर उसने
नांखें खोलीं, और क्षीण स्वर में कहा - "आप कौन हैं, प्राणरक्षक ?”
और फिर कुछ ठहर कर कहा - " आप चाहे जो भी हों, यह प्रारण और
शरीर आपके हुए।" उसके होठों पर मंद हास्य की रेखा आई ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>महाराज ने कहा-“घांघूजी, इसका रक्त बंद होना चाहिए।
देखिए, सिर से अब तक रक्त वह रहा है । और, पार्श्व का यह घाव भी
भयानक है।" इसके बाद दोनों व्यक्तियों ने उसके सभी घाव बांधकर
उसे स्वस्थ किया। फिर वे सलाह करने लगे-"अब इसे कहां ले जाया
जाय ? समय कम है और हमारा गंतव्य पथ लम्बा ।"
युवक ने स्वयं कहा-“यदि मुझे घोड़े पर बैठा दिया जाय, तो
मैं मजे में चल सकूँगा।"
"क्या निकट कोई गांव है ?"
"है, पर एक कोस के लगभग है।"
"वहां कोई मित्र है ?"
"है। वहां मेरी बहन का घर था, बहनोई हैं।" युवक का
स्वर कंपित था।
महाराज ने कहा-“वहिन नहीं है ?"
"नहीं।" युवक का कंठ अवरुद्ध हुआ। उसके नेत्रों से झर-झर
आंसू बहने लगे । वह फिर बोला-"उसे आज तीसरे पहर विदा कराके
घर ले आ रहा था। बहनोई उस बाग तक साथ आए थे। उन्हें लौटते
देर न हुई, ज्यों ही हम लोग इस खेड़े के निकट पहुंचे, कोई पांच सौ
यवन सैनिकों ने धावा बोल दिया। मेरे साथ केवल आठ आदमी थे।
शायद सभी मारे गए। मैंने यथासाध्य विरोध किया, पर कुछ न कर
सका, वे बहन का डोला ले गए। मैंने मूच्छित होने से पूर्व अच्छी
तरह देखा, पर मैं तलवार पकड़ ही न सका, फिर मेरी तलवार टूट भी
गई थी ।" युवक उद्वेग से मानो मूर्छित हो गया। महाराज ने होंठ
चवाया । एक बार उन्होंने अपने सिंह के समान नेत्रों से उस चोर-
लालटेन के प्रकाश में चारों और देखा-टूटी तलवार, वर्धा, दो-चार
लाशें और रक्त की धार ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>उन्होंने युवक से कहा-"तुम्हारे घर पर कौन है ?"
"वृद्धा विधवा माता।"
"गांव कौन है ?"
"मौरावां।"
" दूर है?"
"आठ कोस होगा।"
"तुम्हारा नाम ?"
"तानाजी ।"
"घोड़े पर चढ़ सकोगे ?"
"जी।"
महाराज और धांवूजी ने युवक को घोड़े पर लादा। घांघूजी
उनके पीछे बैठे, और महाराज भी अपने घोड़े पर सवार हुए।
इस बार ये यात्री अपना पथ छोड़कर युवक के आदेशानुसार गांव
की ओर बढ़े, पगडंडी संकरी और बहुत खराव थी। जगह-जगह पानी
भरा था, पर जानवर सधे हुए और बहुत असील थे। धीरे-धीरे गांव
निकट आ गया। युवक के बताए मकान के द्वार पर जाकर घांघूजी ने
थपकी दी। एक युवक ने आकर द्वार खोला । धांघूजी ने उसकी सहायता
से तानाजी को उतार कर घर में पहुंचाया। संक्षेप में दुर्घटना का हाल
मुनकर गृहपति युवक मर्माहत हुआ। धांघूजी ने अवकाश न देखकर कहा-
"तुम लोग परसों इसी समय हमारे यहां आने की प्रतीक्षा करना और
घटना का कहीं भी जिक्र न करना।"
तानाजी ने व्यग्र होकर कहा-“महोदय, आपका परिचय ? मैं
किसके प्रति कृतज्ञ होऊ ?"
"छत्रपति हिंदू-कुल-सूर्य महाराजाधिराज शिवाजी के प्रति ।"
घांघूजी ने अव विलम्ब न किया, वह लपककर घोड़े पर चढ़े, और दोनों
असाधारण सवार उस अंधकार में विलीन हो गए।
.
{{ center | ४ }}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{center | २}}
{{larger|{{center | महाराष्ट्र भूमि और मराठे}}}}
{{blockcenter|महाराष्ट्र भूमि तीन भौगोलिक भागों में विभक्त है। पश्चिमी
घाट और हिन्द महासागर के बीच एक लम्बी किन्तु संकरी जमीन का
हिस्सा बहुत लम्बा चला गया है । इसकी चौड़ाई कहीं ज्यादा कहीं कम
है। वम्बई और गोपा के बीच का प्रदेश कोंकरण कहाता है।
गोआ के दक्षिण में कन्नड़ प्रदेश है। कोंकरण में प्रति वर्ष १०० से २००
इंच तक वर्षा होती है। यहां की मुख्य उपज चावल है। आम, केले
और नारियल के वाग यहां वहुत हैं । घाट पार करने पर पूर्व की ओर
लगभग २० मील चौड़ा धरती का एक लम्बा टुकड़ा पड़ता है-इसे
मावल कहते हैं। यहां की धरती बहुत ही ऊँची-नीची है, दूर तक
टेढ़ी-मेडी घाटियों में जहां-तहां समतल भूमि पाई जाती है । इसके आगे
पूर्व की ओर बढ़ने पर पश्चिमी घाट की पहाड़ियों की ऊँचाई कम
होने लगती है। और नदियों के कछार चौड़े और समतल होने लगते
हैं । यहीं से वह प्रदेश शुरू होता है जिसे देश कहते हैं। यह दक्षिण के
मध्य में स्थित दूर तक फैला हुआ एक विस्तृत उपजाऊ मैदान है ।
यहां की मिट्टी काली है।
प्रकृति ने इस प्रान्त को ऐसा रूप दिया है कि विलासिता और
कला वहां नहीं पनप सकती। परन्तु इन अभावों की पूर्ति वहां की जल-
वायु के कारण वहां के निवासियों में आत्मविश्वास, साहस, अध्यवसाय,
सादगी और सहिष्णुता के रूप में मिलती है । आत्मसम्मान और सामा-
जिक समता यहाँ की आधारभूत विशेषताएँ हैं । १५वीं-१६वीं शताब्दी
के लोकप्रिय सन्तों ने यहां जन्म की श्रेष्ठता की अपेक्षा चरित्र की पवित्रता
को अधिक महत्व दिया, और यही कारण था कि शिवाजी को १७वीं
शताब्दी में महाराष्ट्रियों की राजनैतिक एकता स्थापित करने में विशेष}}
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{center | २}}
{{larger|{{center | महाराष्ट्र भूमि और मराठे}}}}
{{blockcenter|
महाराष्ट्र भूमि तीन भौगोलिक भागों में विभक्त है। पश्चिमी
घाट और हिन्द महासागर के बीच एक लम्बी किन्तु संकरी जमीन का
हिस्सा बहुत लम्बा चला गया है । इसकी चौड़ाई कहीं ज्यादा कहीं कम
है। वम्बई और गोपा के बीच का प्रदेश कोंकरण कहाता है।
गोआ के दक्षिण में कन्नड़ प्रदेश है। कोंकरण में प्रति वर्ष १०० से २००
इंच तक वर्षा होती है। यहां की मुख्य उपज चावल है। आम, केले
और नारियल के वाग यहां वहुत हैं । घाट पार करने पर पूर्व की ओर
लगभग २० मील चौड़ा धरती का एक लम्बा टुकड़ा पड़ता है-इसे
मावल कहते हैं। यहां की धरती बहुत ही ऊँची-नीची है, दूर तक
टेढ़ी-मेडी घाटियों में जहां-तहां समतल भूमि पाई जाती है । इसके आगे
पूर्व की ओर बढ़ने पर पश्चिमी घाट की पहाड़ियों की ऊँचाई कम
होने लगती है। और नदियों के कछार चौड़े और समतल होने लगते
हैं । यहीं से वह प्रदेश शुरू होता है जिसे देश कहते हैं। यह दक्षिण के
मध्य में स्थित दूर तक फैला हुआ एक विस्तृत उपजाऊ मैदान है ।
यहां की मिट्टी काली है।
प्रकृति ने इस प्रान्त को ऐसा रूप दिया है कि विलासिता और
कला वहां नहीं पनप सकती। परन्तु इन अभावों की पूर्ति वहां की जल-
वायु के कारण वहां के निवासियों में आत्मविश्वास, साहस, अध्यवसाय,
सादगी और सहिष्णुता के रूप में मिलती है । आत्मसम्मान और सामा-
जिक समता यहाँ की आधारभूत विशेषताएँ हैं । १५वीं-१६वीं शताब्दी
के लोकप्रिय सन्तों ने यहां जन्म की श्रेष्ठता की अपेक्षा चरित्र की पवित्रता
को अधिक महत्व दिया, और यही कारण था कि शिवाजी को १७वीं
शताब्दी में महाराष्ट्रियों की राजनैतिक एकता स्थापित करने में विशेष}}
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>कठिनाई नहीं हुई । क्योंकि उनसे पहले ही महाराष्ट्र में समान भाषा,
समान धर्म और समान जीवन के आधार पर एक मुगठित जाति का
निर्माण हो चुका था। शिवाजी की सेना में मराठा और कुनवी जाति के
लोगों की अधिकता थी। ये जातियां निष्कपट, स्वावलम्बी, परिश्रमी और
वीर थीं।
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{{x-larger|शाहजी भोंसले}}}}
चौदहवीं शताब्दी में जब मुसलमानों ने दक्षिण को जीता और
महाराष्ट्र के अन्तिम हिन्दू राज्य का भी अन्त हो गया, तब यहां की योद्धा
जातियों के छोटे-छोटे दल भिन्न नायकों के दल में संगठित हो गए, जिन्हें
नए मुसलमान शासक धन देकर अपनी सहायता के लिए बुलाते रहे, और
उनका सहयोग लेते रहे। इस तरह मुसलमानी राज्यों के सहयोग से
कुछ मराठा घराने धन और शक्ति से सम्पन्न बन गए। ऐसा ही एक घराना
मोंसले का था जो पूना प्रान्त के अन्तर्गत पाटस ताल्लुके में रहता था
और वहां के दो गांवों की पटेली भी करता था। आरम्भ में यह घराना
खेती करके निर्वाह करता रहा । इसी घराने में एक पुरुष हुए, जिनका
नाम मल्लूजी था। वे देशल ग्राम में रहते थे। परन्तु उनका विवाह
एक ऐसे प्रतिष्ठित वंश में हुआ था जो धनवान भी था और प्राचीन भी।
इस समय निजामशाही में सबसे प्रमुख मराठा घराना सामन्त लखूजी
जादोराय का था। जादोराय निजामशाही में १० हजार के जागीरदार
ये। उनके वंश में सदा से देशमुखी चली आती थी। मल्लूजी की
ससुराल वालों का घराना दूसरे नम्बर पर था। परन्तु मल्लूजी का साला
अपने समय का बड़ा नामी लड़ाका और वीर था। उसका नाम जयपाल
था। वह सदा लड़ाइयाँ तथा लूटमार करता रहता था ।
मल्लूजी भोंसले का बड़ा पुत्र शाहजी था। शाहजी का ब्याह
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>कठिनाई नहीं हुई । क्योंकि उनसे पहले ही महाराष्ट्र में समान भाषा,
समान धर्म और समान जीवन के आधार पर एक मुगठित जाति का
निर्माण हो चुका था। शिवाजी की सेना में मराठा और कुनवी जाति के
लोगों की अधिकता थी। ये जातियां निष्कपट, स्वावलम्बी, परिश्रमी और
वीर थीं।
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{{x-larger|शाहजी भोंसले}}}}
चौदहवीं शताब्दी में जब मुसलमानों ने दक्षिण को जीता और
महाराष्ट्र के अन्तिम हिन्दू राज्य का भी अन्त हो गया, तब यहां की योद्धा
जातियों के छोटे-छोटे दल भिन्न नायकों के दल में संगठित हो गए, जिन्हें
नए मुसलमान शासक धन देकर अपनी सहायता के लिए बुलाते रहे, और
उनका सहयोग लेते रहे। इस तरह मुसलमानी राज्यों के सहयोग से
कुछ मराठा घराने धन और शक्ति से सम्पन्न बन गए। ऐसा ही एक घराना
मोंसले का था जो पूना प्रान्त के अन्तर्गत पाटस ताल्लुके में रहता था
और वहां के दो गांवों की पटेली भी करता था। आरम्भ में यह घराना
खेती करके निर्वाह करता रहा । इसी घराने में एक पुरुष हुए, जिनका
नाम मल्लूजी था। वे देशल ग्राम में रहते थे। परन्तु उनका विवाह
एक ऐसे प्रतिष्ठित वंश में हुआ था जो धनवान भी था और प्राचीन भी।
इस समय निजामशाही में सबसे प्रमुख मराठा घराना सामन्त लखूजी
जादोराय का था। जादोराय निजामशाही में १० हजार के जागीरदार
ये। उनके वंश में सदा से देशमुखी चली आती थी। मल्लूजी की
ससुराल वालों का घराना दूसरे नम्बर पर था। परन्तु मल्लूजी का साला
अपने समय का बड़ा नामी लड़ाका और वीर था। उसका नाम जयपाल
था। वह सदा लड़ाइयाँ तथा लूटमार करता रहता था ।
मल्लूजी भोंसले का बड़ा पुत्र शाहजी था। शाहजी का ब्याह
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>कठिनाई नहीं हुई । क्योंकि उनसे पहले ही महाराष्ट्र में समान भाषा,
समान धर्म और समान जीवन के आधार पर एक मुगठित जाति का
निर्माण हो चुका था। शिवाजी की सेना में मराठा और कुनवी जाति के
लोगों की अधिकता थी। ये जातियां निष्कपट, स्वावलम्बी, परिश्रमी और
वीर थीं।
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चौदहवीं शताब्दी में जब मुसलमानों ने दक्षिण को जीता और
महाराष्ट्र के अन्तिम हिन्दू राज्य का भी अन्त हो गया, तब यहां की योद्धा
जातियों के छोटे-छोटे दल भिन्न नायकों के दल में संगठित हो गए, जिन्हें
नए मुसलमान शासक धन देकर अपनी सहायता के लिए बुलाते रहे, और
उनका सहयोग लेते रहे। इस तरह मुसलमानी राज्यों के सहयोग से
कुछ मराठा घराने धन और शक्ति से सम्पन्न बन गए। ऐसा ही एक घराना
मोंसले का था जो पूना प्रान्त के अन्तर्गत पाटस ताल्लुके में रहता था
और वहां के दो गांवों की पटेली भी करता था। आरम्भ में यह घराना
खेती करके निर्वाह करता रहा । इसी घराने में एक पुरुष हुए, जिनका
नाम मल्लूजी था। वे देशल ग्राम में रहते थे। परन्तु उनका विवाह
एक ऐसे प्रतिष्ठित वंश में हुआ था जो धनवान भी था और प्राचीन भी।
इस समय निजामशाही में सबसे प्रमुख मराठा घराना सामन्त लखूजी
जादोराय का था। जादोराय निजामशाही में १० हजार के जागीरदार
ये। उनके वंश में सदा से देशमुखी चली आती थी। मल्लूजी की
ससुराल वालों का घराना दूसरे नम्बर पर था। परन्तु मल्लूजी का साला
अपने समय का बड़ा नामी लड़ाका और वीर था। उसका नाम जयपाल
था। वह सदा लड़ाइयाँ तथा लूटमार करता रहता था ।
मल्लूजी भोंसले का बड़ा पुत्र शाहजी था। शाहजी का ब्याह
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VishnudevButla
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>जादोराय की कन्या जीजावाई से हुआ। जादोराय और मल्लूजी पुराने
मित्र थे। एक बार वे अपने पुत्र शाहजी को संग लेकर जादोराय के घर
गए । तब वालिका जीजाबाई आकर शाहजी के पास बैठ गई। जादोराय
ने हंसकर कहा-"अच्छी जोड़ी है"। उसने लड़की से पूछा-"क्या तू
शाहजी से व्याह करेगी ?" यह सुनते ही मल्लूजी उछलकर खड़ा हो
गया और कहा-"देखो भई, सबके सामने जादोराय ने आज अपनी कन्या
का वाग्दान मेरे पुत्र शाहजी के साथ कर दिया है। अब जीजाबाई
शाहजी की हुई ।” परन्तु जादोराय विगड़ गया, और इसी बात पर दोनों
में अनबन भी हो गई। बाद में मल्लूजी को खेतों में गढ़ा हुआ कुछ धन
प्राप्त हो गया, जिससे उन्होंने कुछ घोड़े और हथियार खरीद लिए और
निजामशाही की एक सेना के सेनानायक बन गए।
उन्हें पांचहजारी का मनसब भी मिल गया। बाद में अहमद-
नगर के दरबारियों ने बीच में पड़कर जादोराय से उनका मेल करा दिया
और अन्त में जीजाबाई का व्याह भी शाहजी से हो गया ।
मल्लूजी के मरने पर शाहजी को अहमदनगर के दरवार से अपने
पिता के अधिकार और जागीर मिली। शाहजी बड़े हौसले के आदमी थे।
शीघ्र ही लोगों ने देखा कि बेटा वाप से बढ़-चढ़ कर है । यह वह समय
था जब वादशाह जहांगीर के सेनापति दक्षिरग विजय करने की
धुन
में
थे। और अहमदनगर के प्रसिद्ध सेनापति वजीर मलिक अम्बर उनसे
लड़ रहा था। मलिक अम्बर अबीसीनिया का निवासी था। अपनी
योग्यता से वह अहमदनगर की निजामशाही सेना का सेनापति व प्रधान
वजीर बन गया था। वह बहुत अच्छा प्रबन्धक और मालमन्त्री
तथा उच्चकोटि का सेनानायक था। उसने मराठों की सेना संगठित कर
उन्हें गुरिल्ला युद्ध की शिक्षा दे सैन्य संचालन में आश्चर्यजनक उन्नति
की थी। जहाँगीर ने अब्दुररहीम खानखाना को उसे परास्त करने भेजा
था, पर उन्हें हार कर भागना पड़ा । तब उसने शाहजादा परवेज को
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>खानदेश व गुजरात के सूबेदार अब्दुल्ला के साथ भेजा । परन्तु जव
इसका भी कुछ परिणाम न हुआ तो शाहजादा खुर्रम को भेजा।
यह सन् १६२० की बात है । शाहजी अपने कुटुम्बियों की एक
छोटी-सी सैनिक टुकड़ी लेकर इस युद्ध में शामिल हुए, तथा वड़ी वीरता
प्रकट की। उनका नाम भी प्रसिद्ध हो गया। इस युद्ध में उनके श्वसुर
सामन्त लक्खूजी जादोराय भी लड़ रहे थे । यद्यपि इस युद्ध में मलिक
अम्बर की पराजय हुई, पर लक्खूजी जादोराय ने और शाहजी ने जो
वीरता और शौर्य का प्रदर्शन किया, उससे मुगलों की सेना में मराठों की
धाक बैठ गई। मुगल सेनापति ने तव मरहठों को तोड़-फोड़ कर अपने
साथ मिलाना चाहा, जादोराय मुगलों से जा मिले। वहां उन्हें बड़ा
रुतबा और जागीर मिली, पर शाहजी ने श्वसुर का साथ नहीं दिया ।
वे अपनी पुरानी सरकार के साथ ही रहे ।
१६२७ में जहांगीर मर गया और इसके बाद १६२८ में
शाह-
जहाँ वादशाह हुआ । उसने सेनापति खानजहाँ को दक्षिण से वापस बुला
लिया, पर खानजहाँ से शाहजहाँ खुश न था। इसलिए वह भाग कर
फिर दक्षिण आ गया और निजामशाह की शरण में पहुँचा । शाहजहाँ
ने उसे पकड़ने को सेना भेजी, पर शाहजी भोंसले ने सब हिन्दु सरदारों
को लेकर शाही सेना को खदेड़ दिया। इससे क्रुद्ध होकर शाहजहाँ ने
खुद एक बड़ी सेना लेकर दक्षिण पर चढ़ाई की । अन्ततः खानजहाँ भाग
खड़ा हुआ । इसी समय मलिक अम्बर की भी मृत्यु हो गई । तब शाहजी
ने भी अपनी सेवाएं शाहजहाँ को अर्पित कर दीं। शाहजहाँ ने उन्हें छः
हजारी जात का मनसव और पाँच हजार सवारों का सेनापति बना
दिया। साथ ही बहुत-सी नई जागीरें भी दीं। परन्तु वह निजामशाह के
शुभचिन्तक बने रहे। कुछ काल बाद निजामशाही के वजीर मलिक
अम्बर के पुत्र फतहखाँ ने अपने बादशाह को कत्ल करके शाहजहाँ से
सन्धि करली । तब शाहजी निजामशाही छोड़कर बीजापुर दरबार की
सेवा में आ गए।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>
शाहजी बड़े अवसरवादी थे। वे अवसर कभी नहीं चूकते
थे। इस समय उनका नाम इतना प्रसिद्ध हो गया था कि बीजापुर के
आदिलशाह ने उनकी पूरी आवभगत की। यह वह समय था जब फतहखा
ने मुगल सेनापति महावतम्खा से मिलकर बीजापुर की राजवानी दौलता-
बाद पर चढ़ाई की थी । शाहजी ने इस युद्ध में बड़ी वीरता प्रकट की।
वाद में जव वीजापुर और फतहखां में सन्धि हुई तो सन्धि की एक शर्त
यह भी थी कि शाहजी को वीरता के उपलक्ष्य में पुरस्कार मिले ।
फतहखाँ ने वीजापुर से संधि होते ही मुगलों पर धावा बोल दिया ।
परन्तु फतहखाँ को मुंह की खानी पड़ी और महावतखाँ ने उसे कैद कर
लिया। अहमदनगर राज्य का मुगल साम्राज्य में विलय हो गया। अब
महावतखाँ ने यह योजना बनाई कि शाहजी को भी जीत लिया जाय तो
बीजापुर और अहमदनगर के दोनों राज्यों पर मुगलों का अधिकार हो
जाय। उसने अवसर पाकर शाहजी की पत्नी जीजावाई और वालक
शिवाजी को पकड़ लिया । परन्तु मराठों ने उन्हें छुड़ाकर कोन्डाना दुर्ग में
भिजवा दिया। इसी समय आगरे में साम्राज्ञी मुमताजमहल का देहान्त
हो गया और शाहजहाँ ताजमहल निर्माण में व्यस्त होगया। इधर अव-
सर पाकर शाहजी ने अब दूसरा पैतरा वदला। फतहखाँ कैद हो चुका
था और उसने जो बादशाह तख्त पर बैठाया था, उसे भी गिरफ्तार
करके महावतखाँ ने ग्वालियर के किले में भेज दिया था। शाहजी ने
तत्काल अहमदनगर के शाही खानदान के एक अल्प-वयस्क वालक को
सिंहासन पर बैठाकर उसका राज्याभिषेक कर दिया और पूना तथा
चाकण से लेकर बालाघाट तक के सारे प्रदेश तथा गुन्नूर के आस-पास
का सारा निजामी इलाका छीन कर अपने अधिकार में कर लिया और
जुन्नर शहर को राजधानी बनाकर उसी सुलतान के नाम पर शासन
करना प्रारम्भ कर दिया।
बीजापुर राज्य में इस समय दो बलशाली सामन्त थे-अदरुल्लाखाँ
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>और मुन्दुपंत । दोनों ही शाहजी के समर्थक थे। गुप्त रूप से वीजापुर
का शाह भी उनका समर्थक और सहायक था। इन सब बातों को सुन-
कर शाहजहाँ बहुत ऋद्ध हो उठा । उसका वहुत रुपया और समय दक्षिण
में व्यय हुआ था। बीजापुर इस समय भी मुगलों से उलझा हुआ था।
अनः उसे शाहजी जैसे सुलझे हुए सेनापति की सहायता अपेक्षित थी।
उधर मुगल बादशाह दो पीढ़ियों से दक्षिण की सिरदर्दी उठा रहे थे ।
इन सब घटनाओं ने शाहजी को सब उत्तरी-दक्षिणी शक्तियों का केन्द्र
बना दिया । अन्ततः शाहजहां ने ४० हजार सैन्य देकर शाइस्ताखाँ और
अलीवर्दीखों को दक्षिण भेजा । उन्होंने दक्षिण की मुगल सेना से मिलकर
वीजापुर और शाहजी दोनों ही को जड़-मूल से खोद फेंकने का निश्चय
किया। शाहजी ने तीन वरस तक इस संयुक्त मोर्चे से लोहा लिया ।
बहुत-से किले और इलाके शाहजी के हाथ से निकल गए, पर शाहजी
को पकड़ने के उनके सब प्रयल विफल हुए। वह लड़ते हुए कोंकण तक
चले गए । अन्ततः बीजापुर ने शाहजहाँ से संधि कर ली और उस संधि
के
अनुसार शाहजी ने भी वालक शाह को मुगलों को सौंपकर बीजापुर
के अली आदिलशाह की नौकरी कर ली । बीजापुर ने शाहजी का अच्छा
सत्कार किया। उन्हें उनकी पूरी जागीर दे दी गई जिसमें पूना की
जागीर भी सम्मिलित थी। वाद में कुहार-रूसकटी-बंगलौर-वालापुर
और सूमा भी उनके अधिकार में आ गए और वरार के २२ गाँवों की
देशमुखी भी उन्हें देदी गई । इस प्रकार शाहजी को बहुत-सी जागीर और
इलाका मिल गया और वे एक प्रकार से राजा की भाँति रहने लगे।
{{left|{{larger|
४
शिवाजी}}}}
शाहजी का पहिला विवाह जीजावाई के साथ हुआ था।
जीजावाई की पहिली संतान शम्भाजी थे, वह अपने पिता के साथ ही
रहते थे।
{{blockcenter|१०}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>शिवाजी, शाहजी और जीजाबाई के दूसरे पुत्र थे । इनका जन्म
जुन्नर शहर के पास शिवनेर के पहाड़ी किले में सन् १६२७ में हुआ
इस समय शाहजी और उनके श्वसुर लक्खूजी जादौराय एक-दूसरे के
विरुद्ध लड़ रहे थे । जादोराय मुगलों से मिल गए थे, पर शाहजी अपनी
पुरानी सरकार के ही साथ थे। इस पैतृक झगड़े के कारण जीजाबाई
और शाहजी में वैमनस्य हो गया। इसी समय जीजाबाई और उनके शिशु
पुत्र को मुसलमानों ने कब्जे में कर लिया। जीजाबाई को किसी तरह
कोन्डाना दुर्ग में भेज दिया गया जहाँ वह एक प्रकार से नजरबन्द रहती
थीं, पर उन्होंने अपने पुत्र को छिपा दिया ताकि वह मुसलमानों के हाथ न
लगे । आजकल जब कि पाँच-छः वर्ष के बच्चे खेल-कूद में मस्त रहते हैं,
तब ६ वर्ष के शिवाजी मुसलमानों के भय से इधर-उधर छिपते फिर रहे
थे। सन् १६३६ तक शिवाजी अपने पिता का मुख तक न देख सके ।
सन् १६३० ही में शाहजी ने एक दूसरे खानदान में विवाह कर लिया था।
शाहजी जब फिर बीजापुर राज्य की नौकरी में गए तो उस
समय शिवाजी की आयु १० वर्ष की थी। शाहजी बीजापुर के लिए
नए प्रदेश जीतने और अपने लिए नई जागीर प्राप्त करने के लिए तुङ्ग-
भद्रा और मैसूर के पठार की ओर बढ़े और वहाँ से मद्रास के समुद्र तट
की ओर बढ़ गए । इस चढ़ाई के बाद उन्होंने जीजावाई और शिवाजी को
मुक्त किया और आकर पहली बार पुत्र का मुंह देखा और उसका विवाह
किया। शिवाजी का विवाह करके वे कर्नाटक की लड़ाई को प्रस्थान
कर गए और पत्नी तथा पुत्र को अपनी जायदाद के कारभारी दादाजी
कोंगदेव की देखरेख में पूना भेज दिया; और अपनी दूसरी पत्नी तुकावाई
और उसके पुत्र व्यंकोजी को अपने साथ रखा। पति की इस उपेक्षा का
जीजाबाई के मन पर भारी प्रभाव पड़ा, और उनकी वृत्ति अन्तर्मुखी
होकर धार्मिक हो गई, जिसका प्रभाव शिवाजी पर भी पड़ा। इस समय
शिवाजी के साथ खेलने के लिए न कोई बालक साथी था, न भाई-बहन
{{blockcenter|११ }}<noinclude></noinclude>
dhn9kq4zie63lz64wd2i59x83qlx7uj
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>
थे, न पिता का सहवास था । विवाह का वे महत्व न समझते थे। इस
एकाकीपन ने शिवाजी को अपनी माता के अधिक निकट ला दिया और
वे मातृप्रेम में अभिभूत हो माता को देवी के समान पूजने लगे। इस
उपेक्षा और एकाकी जीवन ने शिवाजी को स्वावलम्बी, दबंग ओर
स्वतन्त्र विचारक बना दिया । उनमें एक ऐसी अन्तःप्रेरणा उत्पन्न हो गई
कि वे आगे चलकर सब काम अन्तःप्रेरणा से ही करने लगे। दूसरे के
आदेश-निर्देश की उन्हें परवाह न रही । घुड़सवारी, शिकार और युद्ध में
वे पूरे मनोयोग से प्रवीण हो गए। साथ ही माता ने उन्हें पुराणों की
कहानियाँ और धर्मोपाख्यान सुनाकर उनकी वृत्ति को कट्टर हिन्दू बना
दिया । पूना जिले का यह पश्चिमी भाग जो सह्याद्रि पर्वत
तलहटी में घने जंगलों के किनारे-किनारे दूर तक चला गया था, मावल
कहलाता था। यहाँ मावले किसान रहते थे, जो बड़े परिश्रमी और
साहसी थे। शिवाजी ने उन्हीं मावले तरुणों को चुनकर एक छोटी-सी
टोली बनाई और उनके साथ सह्याद्रि की चोटियों, घाटियों और नदी
किनारे जंगलों में चक्कर काटना आरम्भ किया, जिससे उनका दैनिक
जीवन कठोर और सहिष्णु हो गया। धर्म-भावना के साथ चरित्र की
दृढ़ता ने उनमें स्वातन्त्र्य प्रेम की स्थापना की, और उनके मन में
विदेशियों के हाथ से महाराष्ट्र का उद्धार करने की भावना पनपती गई।
{{left|{{x-larger|५
बचपन का उठान
}}}}
मुरारजी पन्त ने वीजापुर दरवार से आकर जीजावाई को मुजरा
किया और कहा-"महाराज की आज्ञा है कि शिवाजी बीजापुर दरवार
में उपस्थित होकर शाह को सलाम करें। शाह की भी यही मर्जी है ।
अतः आप उन्हें मेरे साथ भेज दीजिए।"
परन्तु यह प्रस्ताव बालक शिवाजी ने अस्वीकार कर दिया।
कहा-“मैं सलाम नहीं करूंगा।"
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>बादशाह ने भी हँसकर पूछा-"शिवा की शादी हुई या नहीं ?"
"जी हां, पूना में इसका व्याह हुआ है ।"
"लेकिन उसने मां-बदौलत को अपना बाप कहा है । बस, उसकी
एक शादी हमारे हुजूर में होगी और हम खुद वाप की सब रसम अदा
करेंगे। लड़की की तलाश करो।"
शाहजी ने मुककर बादशाह को सलाम किया और कहा-
"हुक्म तामील होगा।" और दरवार से चले आए।
शिवाजी ने डेरे पर लौटकर स्नान किया। वीजापुर में शिवा का
दूसरा विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ । बादशाह आदिलशाह ने खुद सव
अमीर-उमराव के साथ शरीक होकर सब नेग भुगताए। शाहजी ने भी
वादशाह की खूब आवभगत की।
नया ब्याह कर शिवाजी शीघ्र ही पूना लौट आए। परन्तु दरवार
में अपने पिता की शाह के सामने दासता देख उनका जी दुख से भर
गया। वे खिन्न रहने लगे।
दादा कोंगादेव बड़े अच्छे मुत्सद्दी और राजनीति-विचक्षरण पुरुप
थे। उन्होंने शिवाजी में महापुरुषों के लक्षण देख लिए थे। वे कहा
करते थे - हमारा शिवा शिव का साक्षात् अवतार है और भवानी का
वरद पुत्र है । उन्होंने उन्हें राज्य प्रबन्ध, धर्मशास्त्र, युद्ध-कौशल की बहुत
अच्छी शिक्षा दी। उनके ही अध्यवसाय से इलाके की आय और आवादी
बढ़ गई थी। वे बीच-बीच में शिवाजी को नीति, धर्म और रियासत के
काम की भी शिक्षा देते थे। इस इलाके में मावली लोगों की वस्ती थी
जो दरिद्र किन्तु वीर होते थे। दादा ने उन्हें अनुशासन की शिक्षा दी
थी। बहुत-सी जमीन देकर उन्हें मेहनती कृषक बनाया था। उन दिनों
मरहठों में लिखने-पढ़ने का रिवाज विलकुल न था, पर दादा ने शिवाजी
की रुचि पढ़ने-लिखने में देखी। घुड़सवारी, तीर, नेजा, तलवार चलाने
तथा मल्लयुद्ध में शिवाजी इसी उम्र में चाक-चौबन्द हो गए थे।
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>सबसे बड़ा प्रभाव उन पर रामायण और महाभारत का पड़ा
था। यह शिक्षा उन्हें दादा तो देते ही थे, परन्तु उनकी माता भी देती
थीं। वे बड़ी भारी रामभक्त थीं। शिवाजी बड़े प्रेम से रामायण-
महाभारत की कथा-वार्ता मुनते और उस पर चर्चा करते थे ।
धीरे-धीरे मावले तरुणों से शिवाजी की जान-पहचान और
घनिष्ठता होती गई। अब वह कभी-कभी दिन-दिन भर घर से गायब
रहते और इन्हीं मावले तरुणों के साथ वन-पर्वतों में घूमा करते,
शिकार करते या शस्त्राभ्यास करते थे। उनकी यह जमात अपने को
सब वन्धनों से मुक्त समझती थी। वह किसी भी राज-व्यवस्था की
पावन्द नहीं थी । वह पूर्णतया स्वतन्त्र थी । यदा कदा यह
मंडली कभी बीजापुर और कभी मुगलों की अमलदारी में घुस जाती
और लूटमार करके भाग आती। धीरे-धीरे प्रसिद्ध हो गया कि शाहजी
का लड़का शिवा डाकू हो गया है और वह लूटपाट करता फिरता है।
दादा कोंगदेव के पास ऐमी शिकायतें आती, तो वे उन्हें सुनी.
अनमुनी कर देते, परन्तु शिवाजी के चरित्र पर वे नजर अवश्य रखते
थे। धीरे-धीरे रियासत की देखभाल का बोझ वे उन पर डालने लगे।
और इसमें शिवाजी का बहुत-सा समय लगने लगा|
शाहजी की जागीर में कोई किला न था और शिवाजी के मन
में यह अभिलाषा थी कि कोई किला उन्हें हथियाना चाहिए। वस
उन्होंने साथियों को अपने अभिप्राय से अवगत किया और उन्होंने उसका
समर्थन किया। अब वे इमी धुन में रहने लगे कि कैसे कोई किला उनके
हाथ लगे।
{{right |
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माता और पुत्र}}}}
"क्यों रे शिव्वा, अभी तू १८ वरस का भी नहीं हुआ और
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>सबसे बड़ा प्रभाव उन पर रामायण और महाभारत का पड़ा
था। यह शिक्षा उन्हें दादा तो देते ही थे, परन्तु उनकी माता भी देती
थीं। वे बड़ी भारी रामभक्त थीं। शिवाजी बड़े प्रेम से रामायण-
महाभारत की कथा-वार्ता मुनते और उस पर चर्चा करते थे ।
धीरे-धीरे मावले तरुणों से शिवाजी की जान-पहचान और
घनिष्ठता होती गई। अब वह कभी-कभी दिन-दिन भर घर से गायब
रहते और इन्हीं मावले तरुणों के साथ वन-पर्वतों में घूमा करते,
शिकार करते या शस्त्राभ्यास करते थे। उनकी यह जमात अपने को
सब वन्धनों से मुक्त समझती थी। वह किसी भी राज-व्यवस्था की
पावन्द नहीं थी । वह पूर्णतया स्वतन्त्र थी । यदा कदा यह
मंडली कभी बीजापुर और कभी मुगलों की अमलदारी में घुस जाती
और लूटमार करके भाग आती। धीरे-धीरे प्रसिद्ध हो गया कि शाहजी
का लड़का शिवा डाकू हो गया है और वह लूटपाट करता फिरता है।
दादा कोंगदेव के पास ऐमी शिकायतें आती, तो वे उन्हें सुनी.
अनमुनी कर देते, परन्तु शिवाजी के चरित्र पर वे नजर अवश्य रखते
थे। धीरे-धीरे रियासत की देखभाल का बोझ वे उन पर डालने लगे।
और इसमें शिवाजी का बहुत-सा समय लगने लगा|
शाहजी की जागीर में कोई किला न था और शिवाजी के मन
में यह अभिलाषा थी कि कोई किला उन्हें हथियाना चाहिए। वस
उन्होंने साथियों को अपने अभिप्राय से अवगत किया और उन्होंने उसका
समर्थन किया। अब वे इमी धुन में रहने लगे कि कैसे कोई किला उनके
हाथ लगे।
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माता और पुत्र}}}}
"क्यों रे शिव्वा, अभी तू १८ वरस का भी नहीं हुआ और
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>अभी से इतना उद्दण्ड हो गया। दादा के पास शिकायतें आई हैं।
तू दिन-दिन भर रहता कहां है, बोल ?"
"माता, मैं तो तुम्हारी गोद में ही रहता हूँ।"
"भूठा कहीं का । मैंने तुझे इतनी कथा भागवत सुनाई सो ?"
"मो वह व्यर्थ नहीं जायगी, माता । आप ही तो मेरी आदि
"अरे, मैंने तो तुझमे शंभा से भी अधिक आशा की थी। तेरे
पिता ने तो ग्यारह बरस तेरा मुंह भी नहीं देखा, मैंने ही तुझे आंख का
तारा बना कर रखा।"
"तो माता, क्या पिताजी ने मेरे विषय में कुछ लिखा है ?"
"अरे, तूने उनकी प्रतिष्ठा में बट्टा लगा दिया । उस दिन तूने
दरबार में जाकर गाह को मलाम नहीं किया। सलाम करता तो तुझे
शाही स्तबा मिलता। बादशाह ने तेरी तारीफ सुनकर ही बुलाया था।
बेचारे मुरारजी पन्त को कितना लजित होना पड़ा, यह तो देख ।"
"माता, जिस दिन मैं पिता की प्रतिष्ठा को बट्टा लगाऊंगा,
उसी दिन प्राण त्याग दूंगा । पर शाह को सलाम तो मैं नहीं करूंगा।"
"अरे वे हमारे मालिक
यह भी तो देख।"
"वे गौ-ब्राह्मण के शत्रु हैं, और मैं उनका रक्षक, मैं तो यही
जानता हूँ।"
"लेकिन शिव्या, तेरे वाबा मालोजी भोंसले और उनके भाई
बिठोजी एक साधारण किलेदार थे। पर थे बड़े वीर । अब तुम्हारे पिता
के बाहुबल से आज हम इतने बड़े जागीरदार हुए । पर सब शाही
कृपा से । निजामशाह ने उन्हें बारह हजारी का मनसब और राजा
की उपाधि दी, तथा पूना और सूमा के जिले दिए।"
“यह तो मैं जानता हूँ, मां।"
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>"तो देख, तेरे दादा और पिता भी तो हिन्दू हैं । धर्म मे डिगे
तो नहीं, फिर भी समय देख कर काम करना पड़ता है । पहाड़ में मिर
मारने से पहाड़ नहीं टूटता, सिर ही फूटता है।"
"परन्तु मां, धर्म भी एक वस्तु है । आप ही ने मुझे धर्म की
शिक्षा दी है।"
"तो अब क्या मैं तुझे धर्म से विमुख होने को कहती हूँ ?"
"पर हमारा धर्म तो गौ-ब्राह्मण की रक्षा करना है।"
"तू वड़ा जिद्दी है शिव्वा, यथागक्ति गौ-ब्राह्मण की भी रक्षा की
जायगी। पर राजधर्म का भी तो पालन होना चाहिए।"
"तो हम प्रजापीड़कों की सहायता करके राजधर्म कैसे पालन
करेंगे ?"
'तो तू क्या समझना है, तू आदिलगाही को ध्वंस कर देगा।"
"माता, नुम क्या समझती हो ?"
"मैं तो वेटा, यही समझती हूँ कि तू जिस मार्ग पर चल रहा है,
उससे अपना पुश्तैनी वैभव जायगा।"
"माता, उनर और दक्षिण की शादियों में यही अन्तर है ।
उत्तर की मुगलशाही विदेशी तुर्क-तातार-पठानों के बल पर पनपी, पर
यहां दक्षिण में ये आदिलशाही और कुतुबशाहियां हम मराठों के बल पर
ही पनप रही हैं।"
"अरे तो अकेला तू क्या कर लेगा ? जब भगवान ही की यह
इच्छा है कि म्लेच्छ भारत पर राज्य करें, तो तू क्या करेगा।"
"तो माता, तुम समझती हो भगवान विट्ठल म्लेच्छों के
सहायक हैं ?"
“हे ही । ऐसा न होता तो हम हारते क्यों ? मरहठे क्या मुसल-
मानों से वीरता में कम हैं ?"
"कोरी वीरता से क्या होता है। हमारी वीरता में दासता का
जो पुट लगा है ?"
स.च.२
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>तलवार सुवा देते थे। अंत में युवक का दम बिलकुल फूल गया। उसने
तलवार गुरु के चरणों में रख दी, और स्वयं भी लोट गया । गुरु ने उसे
छाती से लगाया और कहा-"वत्स, आज ही श्रावणी पूर्णिमा है,
महाराज अभी आते होंगे । आज तुम्हें इस सन्यासी को त्यागना होगा
और जिस पवित्र व्रत को तुमने लिया है, उसमें अग्रसर होना होगा।
यद्यपि मैं जैसा चाहता था, वैसा तो नहीं, पर फिर भी तुम पृथ्वी पर
अजेय योद्धा हो, तुम्हारी तलवार और बर्खे के सम्मुख कोई वीर स्थिर
नहीं रह सकता।"
युवक फिर गुरु-चरणों में लोट गया। उसने कहा-"प्रभो, अभी
मुझे और कुछ सेवा करने दीजिए।"
"नहीं, वत्स ! अभी तुम्हें बहुत कार्य करना है, उसकी साधना
ही मेरी चरण-सेवा है।"
हठात् वज्र-ध्वनि हुई-"छत्रपति महाराज शिवाजी की जय ।"
दोनों ने देखा, महाराज घोड़े से उतर रहे हैं। उन्होंने धीरे-
धीरे आकर सन्यासी की चरण-रज ली और सन्यासी ने उन्हें उठा कर
आशीर्वाद दिया। युवक ने आकर महाराज के सम्मुख घुटनों के बल
बैठकर प्रणाम किया। महाराज ने कहा-"युवक, आज वही श्रावणी
पूर्णिमा है।"
"जी।"
"आज उस घटना को तीन वर्ष हो गए, जब तुम्हें घायल करके
शत्रु तुम्हारी बहन को हरण कर ले गए थे, तुम्हें स्मरण है ?"
"हां महाराज, और आपने मुझे जीवन-दान दिया था, मैंने यह
प्राण और शरीर आपको भेंट किए थे।"
"और तुमने प्रतिशोध की प्रतिज्ञा की थी ?"
"जी हां।"
{{blockcenter|२२}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>
"तो तू क्या चाहता है, वह कह ।"
"माता, आशीर्वाद दो कि मरहठों की वीरता को दासता की
कालिन्त्र से मुक्त करने में तुम्हारा शिव्या समर्थ हो।"
"आशीर्वाद देती हूं। पर बेटे, अपने बलाबल का भी तो ध्यान
रख । व्यर्थ शाहियों को छेड़-छाड़ कर अपने सिर बला न बुला। तेरे
पिता ने जैसे अपना यश और मान बढ़ाया है, वैसे ही तू भी बढ़ा । समय
बलवान है यह मत भूल।"
"यह तो मुझसे न हो सकेगा मां, तुम कहो तो मैं कहीं देश से
वाहर चला जाऊं।"
"चल, फिर मैं भी तेरे साथ चलूं।"
"पाप क्यों चलेंगी?"
"तो मैं क्या तुझे छोड़ दूंगी? सुख-दुख में मैं तेरे साथ ही
रहूंगी। मैं जानती हूँ, मेरी कोख में तू अवतारी जन्मा है । तुझे मैं क्या
समझाऊं, मैं तो प्रेमवश कहती हूँ।"
शिवाजी माता के चरणों में लोट गए और बोले -"माता,
आश्वस्त रहो । तुम्हारा शिवा प्राण रहते ऐसा कोई काम न करेगा जो
तुम्हारी कोख को लजाए।"
माता पुत्र को छाती से लगाकर प्रेम के आंसू बहाती रही।
{{left|
{{x-larger|९
शिवाजी का उदय}}}}
सन् १६४६ में दादाजी कोंगदेव की मृत्यु होजाने पर शिवाजी
ने अपनी स्वतन्त्रता की हुंकार भरी और पहला वार तोरण के किले पर
किया । यह किला पूना के पश्चिम में २० मील पर था । वहाँ के किलेदार
से उन्होंने किला छीन लिया। किले में बीजापुर राज्य के खजाने के दो
लाख हूण शिवाजी के हाथ लगे । उन्होंने वकील भेजकर बीजापुर दरवार
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/२१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>में प्रकट किया कि उन्होंने यह काम राज्य के हित की दृष्टि से किया है।
दूत ने शिवाजी की बहुत प्रशंसा की, और निवेदन किया कि शिवाजी
पहले जागीरदारों की अपेक्षा दुगना लगान देंगे।
इसके बाद उन्होंने तोरण से कोई पांच मील दूर पूर्व में पहाड़ी
की एक चोटी पर राजगढ़ नाम का एक नया किला बनवाया और उसे
अपना कन्द्रस्थान निश्चित किया। कुछ दिन बाद उन्होंने वीजापुर का
कोण्डाना किला भी कब्जे में कर लिया और शाहजी की पश्चिमी जागीर
के उन सभी भागों को अपने अधिकार में कर लिया जिनकी देखभाल
दादाजी कोंगदेव करते थे ।
जब शिवाजी की इन हरकतों की सूचनाएं लगातार वीजापुर
पहुंची तो वहाँ से शिवाजी के नाम इस प्रकार के परवाने जारी किए गए
कि वह अपनी हरकतों से बाज आए। परन्तु शिवाजी ने उनकी कोई
परवाह नहीं की, न कोई जवाब दिया । तब शाह ने कर्नाटक में शाहजी
को लिखा कि वह अपने लड़के को समझाए । परन्तु उन्होंने साफ जवाव
दे दिया कि शिवाजी ने मेरी सम्मति के बिना ही यह काम किया है।
पर मैं और मेरे सब सम्बन्धी भी दरबार के शुभचिन्तक हैं। और शिवाजी
भी जो कुछ कर रहा है, वह जागीर की उन्नति के लिए ही है।
शाहजी ने शिवाजी को भी खत लिखा कि ऐसी कार्यवाहियों से वाज
आए। पर शिवाजी के हृदय में जो आग दहक रही थी, उसे वे क्या
जानते थे। उन्होंने मालगुजारी का हिसाब भी मांगा, क्योंकि अब सव
रियासत की देखभाल शिवाजी ही करते थे, परन्तु शिवाजी ने लिख दिया
कि इलाका निर्धन है और उसकी आय खर्च के लिए ही काफी नहीं है।
बचत की कोई गुंजाइश नहीं है । इस समय जागीर में दो आदमी
शिवाजी के विरोधी थे, एक तो था चाकरण का किलेदार-दूसरा शिवाजी
का सौतेला मामा था जो सोमा जिले का जिलेदार था। चाकरण के
किलेदार को तो आसानी से शिवाजी ने आधीन कर लिया, पर दूसरे को
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<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>कैद करना पड़ा । अब शिवाजी ने सिंहगढ़, कर्णाटक और पुरन्दर के किले
भी अपने आधीन कर लिए । बीजापुर का शाह इस समय रोगशय्या पर
पड़ा-पड़ा महल और मकबरे वनवा रहा था, और सेनापति शाहजी
कर्णाटक की लड़ाइयों में दौड़धूप कर रहे थे|
निरन्तर शिवाजी की इन विजयों से विचलित होकर आदिलशाह
क्रुद्ध हो गया और उसने एक बड़ी सेना शिवाजी के विरुद्ध भेजने का
इरादा किया । पर दरवार में शाहजी के मित्र भी थे, उन्होंने उसे सम-
झाया कि शिवाजी की यह हलचल रियासत के लिए लाभदायक है।
इससे राज्य की दक्षिणी सीमाएं सुरक्षित और दृढ़ होती हैं।
शिवाजी की हरकतें जारी रहीं। उन्होंने कोलाबा पर आक्रमण
करके वहां के मरदारों को मिला लिया ।परन्तु जब उन्होंने आगे बढ़कर
कल्याण दुर्ग भी अधिकृत कर लिया, तब तो आदिलगाह एकदम आपे
से बाहर हो गया। उसने शिवाजी को दण्ड देने को एक बड़ी सेना भेजी।
{{left|{{x-larger|गुरु और शिष्य}}}}
पूना से पश्चिम की ओर, सह्याद्रि शृङ्ग के एक दुरुह शिखर पर
एक अति प्राचीन, शायद बौद्धकालीन, गुफा है। उसके निकट घने वृक्षों
का झुरमुट है। अमृत के समान मीठे पानी का एक झरना भी है। इसी
गुफा के सम्मुख, कोई एक तीर के अंतर पर, एक विस्तृत मैदान है ।
उसे खास तौर पर साफ और समतल बनाया गया है ।
वहां एक बलिष्ठ युवक बा फेंकने का अभ्यास कर रहा था ।
युवक गोर-वर्ण, सुन्दर, ठिंगना और लोहे के समान ठोस था। उसने
अपने सुगठित हाथों में वज़ उठाया, और तौल कर एक वृक्ष को लक्ष्य
करके फेंका । वा वृक्ष को चीरता हुआ पार निकल गया। गंभीर स्वर
में किसी ने कहा-"ठीक नहीं हुआ, तुम्हारा लक्ष्य चलित हो गया ।"<noinclude></noinclude>
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VishnudevButla
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>युवक ने माये का पसीना पोंछकर पीछे फिरकर देखा। एक
जटिल संन्यासी तीव्र दृष्टि से युवक को ताक रहे थे। युवक ने सिर झुका
लिया । सन्यासी अग्रसर हुए। उन्होंने ब→ को क्षण भर तौला और
विद्युत्-वेग से फेंक दिया। वा स्थूल वृक्ष को चीरता हुआ क्षण भर ही
में धरती में घुस गया। उत्साहित होकर युवक ने एक ही झटके में वळ
उखाड़ा, और महावेग मे फेंका । इस बार वी वृक्ष को चीरकर धरती
में घुस गया। सन्यासी ने मुस्कराते हुए कहा- "हां, यह कुछ हुआ।
वत्स, मैं तो वृद्ध हुआ, युवक-सा पौरुष कहां ? हां, तुम अभी और भी
स्फूर्ति उत्पन्न करो।"
युवक ने गुरु के चरणों में प्रणाम किया, और दोनों ने तलवार
निकाल ली। प्रथम मंद, फिर वेग और उसके बाद प्रचंड गति से दोनों
गुरु-शिष्य तलवारें चलाने लगे, मानो विजलियां टकरा रही हों। दोनों
महाप्राण पुरुष पसीने से लथपथ हो गए । श्वास चढ़ गया, परन्तु उनका
युद्ध-वेग कम न हुआ। दोनों ही चीते की भांति उछल-उछल कर वार
कर रहे थे। तलवार झनझना रही थीं। गुरु ने ललकार कर कहा-
"बेटे, लो, एक सच्चा वार तो करो । देखें शत्रु को तुम किस भांति हनन
करोगे।"
युवक ने आवेश में आकर सन्यासी के मोढ़े पर एक भरपूर वार
किया । सन्यासी ने कतराकर एक जनेवा का हाथ जो दिया तो युवक
की तलवार झन्नाकर दस हाथ दूर जा पड़ी। सन्यासी ने युवक के कंठ
पर तलवार रख कर कहा-"वत्स बस, यही तुम्हारा कौशल है ? इस
समय शत्रु क्या तुम्हें जीवित छोड़ता ?"
युवक ने लज्जा से लाल होकर गुरु के चरण छूए, और फिर
तलवार उठा ली। इस बार उसने अंधाधुन्ध वार किए, पर सन्यासी
मानो विदेह पुरुष थे । उनका शरीर मानो दैवकवच से रक्षित था। वह
वार बचाते, युवक को सावधान करते और तत्काल उसके शरीर पर
{{blockcenter|२१ }}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
दो०--भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं, मनसहुँ राम रजाइ।
करिय न सोच सनेह बस, कहेउ भूप बिलखाइ॥२८९॥
रामचन्द्र की आज्ञा को भरत भूल कर मन से भी न टालेंगे। राजा ने अच्छी तरह लखा कर कहा कि स्नेह के अधीन होकर सोच न करना चाहिये॥२८९॥
चौ०--राम-भरत-गुन-गनत सप्रीती। निसि दम्पतिहि पलक सम बीती॥
राजसमाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे॥१॥
रामचन्द्र और भरत के गुणों को प्रेम से विचार करते हुए रात राजा-रानी की पलक के समान बीत गई। दोनों राजसमाज प्रातःकाल जगे और नहा नहा कर देव-पूजन करने लगे॥१॥
गे नहाइ गुरु पहिँ रघुराई। बन्दि चरन बोले रुख पाई॥
नाथ भरत पुरजन महँतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी॥२॥
रघुनाथजी स्नान कर गुरुजी के पास गये, चरणों की बन्दना करके रुख पाकर बोले। हे नाथ! भरत, नगर के लोग और माताएँ एक तो शोक से विकल, दूसरे वन के निवास से दुःखी हैं॥२॥
सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भये सहत कलेसू॥
उचित होइ सोइ कीजिय नाथा। हित सबही कर रउरे हाथा॥३॥
समाज के सहित राजा जनकजी को बहुत दिन कष्ट सहते हो गया। हे नाथ! जो उचित हो वह कीजिये, सभी की भलाई आप ही के हाथ में है॥३॥
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सील सुभाऊ॥
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहुँ राज-समाजो॥४॥
ऐसा कह कर रघुनाथजी, बहुत लजा गये, उनका शील स्वभाव देख मुनि पुलकित होकर बोले। हे रामचन्द्र! आप के बिना सम्पूर्ण सुख का सामान दोनों राजसभाओं के लिये नरक के बराबर (दुःखदायी) है॥४॥
दो०--प्रान प्रान के जीव के, जिव सुख के सुख राम।
तुम्ह तजि तात सुहास गृह, जिन्हहिं तिन्हहिं बिधि बाम॥२९०॥
हे रामचन्द्रजी! आप प्राण के प्राण, जीव के जीव और सुख के भी सुख हैं। हे तात! आप को छोड़ कर जिन्हें घर सुहाता हो, उन पर विधाता बाम (टेढ़े) हैं॥२९०॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०६
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Hemish22
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
चौ०-सो सुख करम धरम जरि जाऊ। जहँ न राम-पद-पङ्कज भाऊ॥
जोग कुजोग ज्ञान अज्ञानू। जहँ नहिँ राम प्रेम परधानू॥१॥
वह सुख, कर्म और धर्म जल जाय जहाँ रामचन्द्र के चरण कमलों में प्रीति न हो। वह योग कुयोग है और ज्ञान अज्ञान है जहाँ रामचन्द्र के प्रति प्रेम की प्रधानता नहीं है॥१॥
सुख, कर्म, धर्म, योग और ज्ञान आदरणीय वस्तु हैं, परन्तु रामचन्द्रजी के चरण-कमलों में प्रीति के बिना अनादर योग्य ठहराना तिरस्कार अलंकार है।
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेही। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केही॥
राउर आयसु सिर सबही के। बिदित कृपालहि गति सब नीके॥२॥
जो आप बिना दुःखी और आप ही से सुखी रहते हैं, जिसके जी में जो है वह आप जानते ही हैं। आप की आज्ञा सभी के सिर पर है, हे कृपालु! आप को सब की गति अच्छी तरह मालूम है॥२॥
यहाँ लक्षणामूलक गूढव्यङ्ग्य है कि आप के धर्मवत पालन में (भरत या जनक) कोई भी बाधक न होंगे। आप की आज्ञा शिरोधार्य करेंगे, यह आप को अच्छी तरह ज्ञात है।
आपु आश्रमहिं धारिय पाऊ। अयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥
करि प्रनाम तब राम सिधाये। रिषि धरि धीर जनक पहिँ आये॥३॥
आप आश्रम में पधारिये, यह कह कर मुनिराज स्नेह से शिथिल हो गये। तब प्रणाम करके रामचन्द्रजी चले आये और वशिष्ठजी धीरज धर कर राजा जनक के पास गये॥३॥
राम बचन गुरु नृपहि सुनाये। सील सनेह सुभाय सुहाये॥
महाराज अब कीजिय सोई। सब कर धरम सहित हित होई॥४॥
गुरुजी ने शील और स्नेह से भरे लहज सुहावने रामचन्द्रजी के वचन राजा को सुनाये और कहा-महाराज! अब वही कीजिये जिसमें सब का धर्म के सहित कल्याण हो अर्थात् हित भी हो और धर्म भी बना रहे॥४॥
दो०-ज्ञान-निधान सुजान सुचि, धरम धीर नरपाल।
तुम्ह बिनु असमजस समन, को समरथ एहि काल॥२९१॥
ज्ञान के मन्दिर, चतुर, पवित्र धर्मवाले, धीरवान राजा, आप के बिना इस समय असमञ्जस मिटाने में कौन समर्थ है?॥२९१॥
असमञ्जस मिटाने के लिये एक ज्ञान निधान होना पर्याप्त कारण है। तिस पर सुजान, सुचिधर्म, धैर्यवान, राजा, आदि अन्य प्रबल हेतुओं का विद्यमान रहना 'द्वितीय समुच्चय अलंकार' है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
चौ०-सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ज्ञान बिराग बिरागे॥
सिथिल सनेह गुनत मन नाहीं। आये इहाँ कीन्ह भल नाहीं॥१॥
मुनि के वचनों को सुन कर जनकजी प्रेमासक्त हो गये, उनकी दशा देख कर ज्ञान और वैराग्य को भी विराम हो गया। स्नेह से शिथिल हुए मन में विचारते हैं कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया॥१॥
ज्ञान-वैराग्य को विरागी कह कर, राजा के प्रेम वर्णन में 'प्रमात्युक्ति अलंकार' है।
रामहिं राय कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥
हम अब बन ते बनहिँ पठाई। प्रमुदित फिर बिबेक बढ़ाई॥२॥
राजा दशरथ ने रामचन्द्र को वन जाने के लिये कहा, अपने प्रिय प्रेम को सुधा किया अर्थात् प्राण त्याग दिया। अब हम वन से भी वन को भेज कर बड़ी प्रसन्नता से ज्ञान बढ़ा कर लौटेंगे॥२॥
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भये प्रेम बस बिकल बिसेखी॥
समउ समुझि धरि धीरज राजा। चले भरत पहिँ सहित समाजा॥३॥
तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण (राज का विषाद) देख सुन कर प्रेम के अधीन विशेष व्याकुल हो गये। अवसर समझ राजा धीरज धर कर समाज के सहित भरतजी के पास चले॥३॥
भरत आइ आगे भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे॥
तात भरत कह तिरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ॥४॥
भरतजी आगे से आ कर लिवा लाये गये और समयानुसार सुन्दर आसन दिये। तिरहुति राज ने कहा-हे तात भरत! आप को रघुनाथजी का स्वभाव मालूम है॥४॥
दो०-राम सत्यव्रत धरम-रत, सब कर सील सनेहु।
सङ्कट सहत संकोच बस, कहिये जो आयसु देहु॥२९२॥
रामचन्द्र सत्यव्रत और धर्म में तत्पर हैं, हम सब के शील-स्नेह के वश संकोच से सङ्कट सहते हैं, इसलिये जो आज्ञा दीजिये वह मैं उनसे कहूँ॥२९२॥
चौ०-सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरत धीर धरि भारी॥
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू॥१॥
सुन कर पुलकित शरीर से नेत्रों में जल भर कर भारी धीरज धारण करके भरतजी बोले। हे प्रभो! आप मेरे प्रिय-पूज्य माता-पिता के समान हैं और कुल-गुरु वशिष्ठजी के समान हितकारी माता-पिता भी नहीं॥१॥
पिता-माता का हितकारित्व गुण इसलिये निषेध किया गया कि उसका धर्म कुल-गुरु स्थापन करना इष्ट है। यह पर्य्यस्तापह्नुति अलंकार है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
कासिकादि मुनि सचिव समाजू। ज्ञानअम्बुनिधि आपुन आजू॥
सिसु-सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइय स्वामी॥२॥
विश्वामित्र आदि मुनि, मन्त्रि मण्डल के सहित आज ज्ञानसागर आप विद्यमान हैं। मुझे बालक (अबोध) सेवक आज्ञा के अनुसार चलनेवाला जान कर हे स्वामिन्! शिक्षा दीजिये॥२॥
एहि समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर॥
छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि धाम बिधाता॥३॥
इस सभा स्थान में आप का पूछना, मुझ मलिन के लिये चुप रहना ठीक है, बोलना तो पागलपन होगा। हे तात! छोटे मुँह से बड़ी बात कहता हूँ, विधाता को टेढ़ा लख कर क्षमा कीजियेगा॥३॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवा-धरम कठिन जग जाना॥
स्वामि-धरम स्वारथहि बिरोधू। बैर-अन्ध प्रेमहिं न प्रबोधू॥४॥
वेद, शास्त्र और पुराणों में विख्यात है और संसार जानता है कि सेवा-धर्म कठिन है। स्वामिधर्म (निःस्वार्थ भाव से स्वामी की सेवा करना) और स्वार्थ (खुद-गरज़ी) से बैर का विरोध है, जैसे वैरभाव से अन्धे हुए मनुष्य के हृदय में प्रेम का यथार्थ ज्ञान नहीं होता॥४॥
उत्तरार्ध में प्रथम उपमेय वाक्य है, दूसरा उपमान वाक्य है। दोनों वाक्यों में बिना वाचकपद के बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव झलकना 'दृष्टान्त अलंकार' है।
दो०-राखि राम रुख धरम-व्रत, पराधीन मोहि जानि।
सब के सम्मत सर्व हित, करिय प्रेम पहिचानि॥२९३॥
रामचन्द्रजी के रुख और धर्म-व्रत की रक्षा करके मुझे पराधीन जान कर सब की सम्मति और सब के भलाई की बात प्रेम को पहचान कर कीजिये॥२९३॥
चौ०-भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ॥
सुगम अगम मृदु मञ्जु कठोरे। अरथ अमित अति ओखर थोरे॥१॥
भरतजी के वचन सुन कर और उनके स्वभाव को देख कर समाज के सहित राजा सराहते हैं। भरतजी की वाणी:-सुगम है और दुर्गम है, सुन्दर कोमल है और कठिन भी है, अर्थ बड़ा गम्भीर है और अक्षर बहुत थोड़े हैं॥१॥
ज्यों मुखमुकुर मुकुर निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥
भूप भरत मुनि साधु समाजू। गे जहँ बिबुध-कुमुद-द्विजराजू॥२॥
जैसे आइने में मुख देख पड़ता है और वह दर्पण अपने हाथ में रहता है, परन्तु पकड़ा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
नहीं जाता; ऐसी अद्भुत वाणी है। राजा जनक, भरतजी, वशिष्ठमुनि और साधु-मण्डली जहाँ देवतारूपी कुमुद वन के चन्द्रमा (रामचन्द्रजी) हैं; वहाँ गये॥२॥
सुनि सुनि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीन-गन नव जल जोगा॥
देव प्रथम कुल-गुरु गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेखी॥३॥
इस (सभा की) खबर को सुन कर सब लोग सोच से विकल हैं, ऐसा मालूम होता है मानों मछलियों का समूह नवीन जल के संयोग से व्याकुल हो। देवता पहले कुलगुरु वशिष्ठजी की दशा देखी, फिर विदेहजी के विशेष स्नेह को लखा॥३॥
राम भगति-मय भरत निहारे। सुर स्वारथी हहरि हिय हारे॥
सब कोउ राम-प्रेम-मय पेखा। भये अलेख सोच बस लेखा॥४॥
रामचन्द्रजी की भक्ति में लीन भरतजी को निहारा, अपने मतलबी देवता डर कर हृदय में हार गये। सब किसी को रामचन्द्रजी के प्रेम में तत्पर देखा, इससे देवता अनन्त सोच के अधीन हुए॥४॥
लेखा अलेख सोच वश हुए 'पदार्थावृत्ति दीपक अलंकार' है।
दो०-राम सनेह सकोच बस, कह ससोच सुरराज।
चहु प्रपञ्चहि पञ्च मिलि, नाहिँ त भयउ अकाज॥२९४॥
देवराज इन्द्र सोच से कहते हैं कि रामचन्द्रजी स्नेह और सकोच के वश में हैं (यहाँ सब प्रेमी और सकोची इकट्ठे हुए हैं) सब पञ्च मिल कर छल का विस्तार करो, नहीं तो अकाज हुआ॥२९४॥
चौ०-सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥
फेरि भरत-मति करि निज माया। पालु बिबुध-कुल करि छल छाया॥१॥
देवताओं ने सरस्वती का स्मरण कर स्तुति की, (वे ब्रह्म लोक से आईं, इन्द्र ने कहा) हे देवि! हम सब देवता आप की शरण आये हैं, रक्षा कीजिये। अपनी माया से भरत की बुद्धि फेर कर छल की छाँह करके देव-कुल का पालन कीजिये॥१॥
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानीं। बोलीं सुर स्वारथ जड़ जानीं॥
मोसन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥२॥
देवताओं की बिनती सुन कर और उन्हें स्वार्थ में मूर्ख हुए समझ कर चतुर देवि बोली। मुझसे कहते हो कि भरत की बुद्धि पलट दो! हज़ार आँख से भी तुम्हें सुमेरु पर्वत नहीं सूझता है?॥२॥
सरस्वती का प्रस्तुत वर्णन तो यह है कि हे इन्द्र! भरतजी की महिमा तुम्हें अब भी नहीं देख पड़ी कि गुरुवशिष्ठ, योगिराज जनक और परमात्मा रामचन्द्र उनकी भक्ति के वश में<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
हुए हैं। इसे न कह कर उसका प्रतिबिम्ब मात्र कहना कि हज़ार नेत्र से सुमेरु नहीं सूझता 'ललित अलंकार' है।
बिधि-हरि-हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत-मति सकइ निहारी॥
सो मति मोहि कहत करु भोरी। चन्दिनि कर कि चंडकर चोरी॥३॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माया बहुत बड़ी है, वह भी भरतजी की बुद्धि की ओर नहीं निहार सकती। उस बुद्धि को मुझ से कहते हो कि भोली कर दो, क्या चाँदनी सूर्य की चोरी कर सकती है? (कदापि नहीं)॥३॥
पूर्वार्द्ध में व्यङ्ग्यार्थ द्वारा काव्यार्थापत्ति अलंकार है कि जब बहुत बड़ी माया विष्णु आदि की उनकी मति को नहीं भुला सकती, तब मेरी तुच्छ माया क्या चीज़ है! सभा की प्रति में चाँदिनकर कि चन्द कर चोरी पाठ है। उसका अर्थ किया गया है कि--"भला कभी चाँदनी भी चन्द्रमा को चुरा सकती है?" चाँदिनि और चन्दकर दोनों एक ही वस्तु हैं, चन्द्रमा का घुमा कर किया गया है। गुटका और राजापुर की प्रति में उपर्युक्त का पाठ है, इससे यही कविकृत विशुद्ध पाठ है।
भरत हृदय सिय-राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥
अस कहि सारद गइ बिधि-लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥४॥
भरतजी के हृदय में सीताराम का निवास है, जहाँ सूर्य का प्रकाश है क्या वहाँ अन्धकार रह सकता है? (कदापि नहीं)। ऐसा कह कर शारदा ब्रह्मलोक को चली गई, देवता ऐसे मालूम होते हैं मानों रात में चकवा पक्षी व्याकुल हो)॥४॥
दो०--सुर स्वारथी मलीन मन, कीन्ह कुमन्त्र कुठार।
रचि प्रपञ्च माया प्रबल, सय भ्रम अरति उचार॥२९५॥
मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओं ने खोटी सलाह करके कुप्रबन्ध कर ही डाला। अपनी प्रबल माया से कपट का जाल रच कर ऐसा किया कि लोगों को भय, भ्रम, मन न लगना और उचाट हो॥२९५॥
चौ०--करि कुचाल सोचत सुरराजू। भरत हाथ सब काज अकाजू॥
गये जनक रघुनाथ समीप। सनमाने सब रविकुल-दीपा॥१॥
कुचाल करके इन्द्र सोचते हैं कि सब काज अकाज तो भरतजी के हाथ में है। जनकजी रघुनाथजी के समीप गये, सूर्यकुल के दीपक रामचन्द्रजी ने सब का सनमान कर आसन दिये॥१॥
समय समाज धरम अविरोधा। बोले तब रघुबंस-पुरोधा॥
जनक भरत सम्बाद सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई॥२॥
रघुकुल के पुरोहित (वशिष्ठजी) समय, समाज और धर्म के अनुकूल बोले। जनक और भरत का सम्वाद सुनाया, भरतजी की सुहावनी कहनूति कहीं॥२॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
तात राम जस आयसु देहू। सो सब करइ मोर मत एहू॥
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी॥३॥
प्रिय रामचन्द्र! जैसी आज्ञा देओ, वह सब करे, मेरी यही सम्मति है। सुन कर रघुनाथजी दोनों हाथ जोड़ कर सच्ची सीधी और कोमल बाणी बोले॥३॥
बिद्यमान आपुन मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥
राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई॥४॥
जहाँ आप और मिथिलेश्वर विराजमान (मौजूद) हैं, वहाँ मेरा कहना सब तरह से भद्दा है। आप की और राजा जनकजी जो आज्ञा हो, मैं आप की सौगन्द कर कहता हूँ मुझे ठीक वही शिरोधार्य होगी॥४॥
दो०-राम सपथ सुनि सुनि जनक, सकुचे सभा समेत।
सकल बिलोकत भरत मुख, बनइ न ऊतर देत॥२९६॥
रामचन्द्रजी की सपथ सुन कर वशिष्ठ मुनि, जनकजी सभा के सहित सकुचा गये। सब भरतजी का मुख देखने लगे, किसी से उत्तर देते नहीं बनता है॥२९६॥
चौ०-सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबन्धु धरि धीरज भारी॥
कुसमउ देखि सनेह सँभारा। बढ़त बिन्धि जिमि घटज निवारा॥१॥
सभा सकुच वश भरतजी को देख रही है, अथवा भरतजी सभा को सकुच वश निहार कर रामचन्द्रजी के भाई हैं, हृदय में भारी धीरज धारण किया। कुसमय देख कर स्नेह को सम्हाला, जैसे बढ़ते हुए विन्ध्याचल को अगस्त्य मुनि ने निवारण किया था॥१॥
बढ़ते हुए प्रेम को भरतजी ने सम्हाला, इस सामान्य बात की समता विशेष से दिखाना कि जैसे विन्ध्याचल की बाढ़ को कुम्भज मुनि ने रोका था 'उदाहरण अलंकार' है।
पौराणिक कथा है कि एक बार विन्ध्य पर्वत सूर्य का मार्ग रोकने के लिये ऊपर उठा, देवताओं ने निरुपाय समझ कर अगस्त मुनि से प्रार्थना की। क्योंकि विन्ध्याचल उनका शिष्य है, तब मुनि पर्वत के सामने आये, उसने दण्डवत करते हुए पूछा मेरे लिये क्या आज्ञा है? अगस्तजी ने कहा कि जब तक मैं लौट कर न आऊँ तब तक तुम इसी तरह पड़े रहो। ऐसा कह कर मुनि दक्षिण दिशा को गये और लौटे नहीं।
सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन-गन जगजानी॥
भरत-बिबेक बराह बिसाला। अनायास उधरो तेहि काला॥२॥
शोक रूपी हिरण्याक्ष ने सभा की बुद्धि रूपिणी धरती को हर लिया, निर्मल गुण-गण रूपी ब्रह्मा से भरतजी के ज्ञान रूपी विशाल शूकर ने उस समय उत्पन्न होकर अनायास ही उद्धार किया॥२॥
विष्णुपुराण और श्रीमद्भागवत में हिरण्याक्ष का इतिहास इस प्रकार वर्णन है कि वह<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
बल से मदोन्मत्त हो कर पृथ्वी को लेकर रसातल में चला गया। सृष्टि का कार्य बन्द हो जाने से ब्रह्मा चिन्तित हुए। नारायण की स्तुति करने लगे कि, उसी समय उन्हें छींक आई और नाक के छिद्र से एक छोटा सा मक्खी के बराबर शूकर गिरा। देखते ही देखते वह बहुत बड़ा रूप का शूकर हो गया। तब ब्रह्मा जान गये कि ये शूकर रूप धारी हरि हैं। शूकर भगवान पाताल में जा दैत्य का संहार कर पृथ्वी को जहाँ की वहाँ स्थित करके अपने लोक को गये। इसी कथा का साङ्गरूपक ऊपर वर्णन किया गया है।
करि प्रनाम सब कहूँ कर जोरे। राम राउ गुरु साधु निहोरे॥
छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा॥३॥
प्रणाम करके सब को हाथ जोड़कर रामचन्द्रजी, राजा जनक, गुरूजी और सज्जनों का निहोरा करके भरतजी बोले। आज मेरे बड़े अनुचित को क्षमा कीजिये, कोमल मुख से कठोर बातें कहता हूँ॥३॥
हिय सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तैं मुख-पङ्कज आई॥
बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती सज्जु मराली॥४॥
हृदय में सुन्दर सरस्वती का स्मरण किया, वे मानस से मुख कमल में आई। भरतजी की वाणी निर्मल ज्ञान, धर्म और नीति से मिली हुई मनोहर राजहंसिनी के समान है॥४॥
यहाँ राजहंसिनी की समता देना साभिप्राय है कि जैसे मरालिनी मिले हुए दूध-पानी को अलगा देती है, तैसे भरतजी की वाणी गुण-दोष को पृथक् पृथक् करनेवाली है।
दो०--निरखि बिबेक बिलोचनन्हि, सिथिल सनेह समाज।
करि प्रनाम बोले भरत, सुमिरि सीय-रघुराज॥२९७॥
ज्ञान रूपी नेत्रों से समाज को स्नेह से शिथिल देख सीताजी और रघुनाथजी का स्मरण कर प्रणाम करके भरतजी बोले॥२९७॥
चौ०--प्रभुपितुमातुसुहृद गुरु स्वामी। पूज्य परमहित अन्तरजामी॥
सरल सुसाहिब सील-निधानू। प्रनत-पाल सर्बज्ञ सुजानू॥१॥
हे प्रभो! आप मेरे पिता, माता, मित्र, गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितकारी और मन की बात जानने वाले हैं। सीधे, सुन्दर साहिब, शील के स्थान, शरणागतों के रक्षक, चतुर और सबके ज्ञाता हैं॥१॥
आप मेरे पिता, माता, मित्र, गुरु और स्वामी हैं, बहुतों के उत्कृष्ट गुणों को एक रामचन्द्रजी में समता लाना 'तृतीय तुल्ययोगिता अलंकार' है।
समरथ सरनागत हितकारी। गुन गाहक अवगुन-अध-हारी॥
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाँई। मोहि समान मैं साँइ-दोहाई॥२॥
समर्थ शरणागतों के हितकारी, गुणों के ग्राहक, दुर्गुण और पापों के हरनेवाले हैं। स्वामी आप के समान आप ही हैं और स्वामिद्रोही मुझ समान मैं ही हूँ॥२॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
उदार गुणवाले स्वामी आप आप के समान आपही हैं और स्वामिद्रोहियों में मेरे समान मैं ही हूँ। उपमेय ही को उपमान बनाना 'अनन्वय अलंकार' है। कुछ टीकाकारों ने 'साँइ-दोहाई' शब्द का अर्थ-"मैं स्वामी की सौगन्ध खाकर कहता हूँ" किया है। परन्तु यहाँ सौगन्द से प्रयोजन नहीं है, यह 'स्वामि-द्रोहाई' का अपभ्रष्ट रूप है।
प्रभु-पितु-बचन लोह अस पेली। आयेउँ इहाँ समाज सकेली॥
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिय अमर-पद माहुर मीचू॥३॥
(इससे बढ़ कर स्वामि-द्रोहिता और क्या हो सकती है कि) स्वामि और पिता की बात को सम्मान वश न मान कर उलटे समाज बटोर कर यहाँ आया। संसार में भले, बुरे, ऊँच और नीच जितने हैं अमृत को अमरत्व प्रदान करना तथा विष को मृत्यु कराना (स्वामी की आज्ञा जिसको जैसी है, वह उसी सीमा के भीतर आज्ञानुसार कार्य करता) है॥३॥
अमिय को अमरपद और माहुर को मीचु, इसमें पद और अर्थ दोनों की आवृत्ति होने से पदार्थावृत्ति दीपक अलंकार है। स्वामी की आज्ञा सुमन्त्र के द्वारा मेरे लिये यह हुई थी कि-"कछु लँदेस भरत के आये। नीति न तजिय राज-पद पाये॥" और पिताजी की आज्ञा थी कि--"मुदित सोधि सब साज सजाई। दे भरत कह राज बजाई॥" मैं ने इन आज्ञाओं के विपरीत कार्य किया।
राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं॥
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई॥४॥
रामचन्द्रजी की आज्ञा को मन में मेटना कहीं कोई देखा सुना नहीं जाता। वह करके मैं ने सब प्रकार की ढिठाई की अर्थात् रामाज्ञा को मिटा दिया, परन्तु आपने (मेरे उस दुर्गुण को) स्नेह और सेवकाई मान ली॥४॥
दो०-कृपा भलाई आपनी, नाथ कीन्ह भल मोर।
दूषन से भूषन सरिस, सुजस चारु चहुँ ओर॥२९८॥
हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया। दोष आभूषण के समान हुए और चारों ओर सुन्दर यश फैल रहा है॥२९८॥
स्वामी की कृपा से मेरे दोष भूषण रूप हो गये 'लेश अलंकार' है।
चौ०-राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥
कूर कुटिल खल कुमति कलङ्की। नीच निसील निरीस निसङ्की॥१॥
आप की रीति, सुन्दर बानि और बड़ाई संसार में प्रसिद्ध है तथा वेद शास्त्रों ने गाई है। निर्दय, कुटिल, दुष्ट, खोटी बुद्धिवाले, कलङ्की, नीच, शील रहित, नास्तिक और बुरा कर्म करने में किसी का डर न माननेवाले॥१॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
तेउ सुनि सरन सामुहे आये। सकृत प्रनाम किये अपनाये॥
देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु-समाज बखाने॥२॥
वे भी यश सुन कर सामने शरण आये और एक बार प्रणाम किया, इन्हें आपने अपना लिया। शरणागतों के दोष आँख से देख कर कभी हृदय में नहीं लाये और सुने सुनाये गुणों को श्रीमुख से साधु-मण्डली में बखान किये॥२॥
को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समान साज सब साजी॥
निज करतूति न समुझिय सपने। सेवक सकुच सोच उर अपने॥३॥
ऐसा दूसरा कौन स्वामी है जो सेवक पर इतनी मिहरबानी करता हो कि उसका सब सामान अपने बराबर बनाता हो। अपने उपकार की करनी को सपने में भी नहीं समझते, उलटे सोच से हृदय में सकुचाते रहते हैं कि मैं ने इसका कोई उपकार नहीं किया॥३॥
सो गोसाँइ नहिं दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥४॥
वह स्वामी (आप के सिवा) दूसरा कोई भी नहीं है, इस बात को मैं भुजा उठा कर और प्रतिज्ञा-पूर्वक कहता हूँ। पशु नाचते हैं और सुआ पढ़ने में प्रवीण होता है, उन दोनों के गुणों की गति नचानेवाले और पढ़ानेवाले के अधीन है।
पशु को नाचने में अभ्यस्त करना नट का काम और सुग्गे को पाठ में प्रवीण करने में पाठक प्रशंसा योग्य है न कि पशु और शुक 'यथासंख्य अलंकार' है।
दो०-यों सुधारि सनमानि जन, किये साधु सिरमौर।
को कृपाल बिनु पालिहै, बिरदावलि बरजोर॥२९९॥
इस प्रकार आपने इस सेवक को सुधार कर और सम्मान करके साधु-शिरोमणि बना दिया। हे कृपालु! आप के बिना ऐसी प्रबल नामवरी कौन पालन करेगा? (कोई नहीं)॥२९९॥
जैसे नट-पाठक पशु-शुक को सुधार कर गुणवान बनाते हैं, तैसे आपने मेरे दुर्गुणों को दूर कर साधुओं का सिरमौर बना दिया। प्रथम चौपाई में उपमेय वाक्य है। दूसरे दोहे के पूर्वार्ध में उपमान वाक्य है। बिना वाचकपद के दोनों वाक्यों में बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव झलकना 'दृष्टान्त अलंकार' है।
चौ०-सोक सनेह कि बाल सुभायें। आयउँ लाइ रजायसु बायें॥
तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा॥१॥
शोक से, स्नेह वश या कि बाल-स्वभाव से मैं आप की आज्ञा को बाँयें लगा कर यहाँ आया। हे कृपालु! तब भी आपने अपनी ओर देख कर सभी तरह से मेरी भलाई मान ली॥१॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
देखेउँ पाय सुमङ्गल-मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला॥
बड़े समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ी चूक साहिब अनुरागू॥२॥
सुन्दर मङ्गल-मूल चरणों को देखा, स्वामी को सहज प्रसन्न जाना। इस बड़े समाज में अपने बड़े भाग्य को देखता हूँ कि बड़ी चूक पर भी स्वामी की इतनी घनिष्ट प्रीति! (मेरा अहोभाग्य है)॥२॥
कृपा अनुग्रह अङ्ग अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई॥
राखा मोर दुलार गोसाँई। अपने सील सुभाय भलाई॥३॥
हे कृपानिधान! आपने सब तरह से बड़ी कृपा की, इस अनुग्रह से मेरा अङ्ग परिपूर्ण हो गया। स्वामी ने अपने शील, स्वभाव और भलाई से मेरा दुलार रक्खा॥३॥
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि-समाज सकोच बिहाई॥
अबिनय बिनय जथा रुचि बानी। छमिहि देउ अति आरत जानी॥४॥
हे नाथ! मैं ने अत्यन्त ढिठाई की कि स्वामी की सभा में लाज छोड़ कर उद्दण्डता और विनती की बातें जैसी मुझे रुची वह कही है, हे देव! अत्यन्त दुःखी जान कर क्षमा कीजिये॥४॥
दो०-सुहृद सुजान सुसाहिबहि, बहुत कहब बड़ि खोरि।
आयसु देइय देव अब, सब्बइ सुधारिय मोरि॥३००॥
सुन्दर हृदय, चतुर और अच्छे स्वामी से बहुत कहना बड़ा अपराध है। हे देव! अब आज्ञा दे कर मेरी सब तरह से सुधारिये॥३००॥
यहाँ वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ बराबर है कि जैसे मेरे सम्पूर्ण दुर्गुणों को गुण मान कर स्वामीने मुझे कृतार्थ किया, वैसे यह भी सुधारिये कि आज्ञा पालन कर मैं कृतकृत्य होऊँ।
चौ०-प्रभु-पद-पदुम पराग दोहाई। सत्य-सुकृत-सुख-सींव सुहाई॥
सो करि कहउँ हिये अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥१॥
स्वामी के चरण-कमलों की धूलि जो सत्य पुण्य और सुख की सुन्दर सीमा है, उसका सौगन्द करके अपने हृदय की जागते, सोते और अपने की रुचि कहता हूँ॥१॥
सहज सनेह स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥
अज्ञा सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसाद जन पावइ देवा॥२॥
सहज स्नेह से स्वामी की सेवकाई स्वार्थ रूपी छल और चारों फल की इच्छा त्याग कर करूँ! आज्ञा-पालन के समान अच्छे स्वामी की दूसरी सेवा नहीं है, हे देव! वही प्रसाद यह सेवक पावे॥२॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
अस कहि प्रेम बिबस भये भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥
प्रभु-पद-कमल गहे अकुलाई। समउ सनेह न सो कहि जाई॥३॥
ऐसा कह कर अत्यन्त प्रेम के अधीन हो गये, शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में जल भर आया। अकुला कर स्वामी चरण-कमलों को पकड़ लिया, उस समय का स्नेह कहा नहीं जाता है॥३॥
कृपासिन्धु सनमानि सुबानी। बैठाये समीप गहि पानी॥
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेह सभा रघुराऊ॥४॥
कृपासागर रामचन्द्रजी ने सुन्दर वाणी से सन्मान करके हाथ पकड़ कर समीप में बैठा लिया। भरतजी की विनती सुन कर और उनका स्वभाव देख कर सभा के सहित रघुनाथजी स्नेह से शिथिल हो गये॥४॥
हरिगीतिका-छन्द।
रघुराउ सिथिल सनेह साधु-समाज मुनि मिथिला-धनी।
मन महँ सराहत भरत भायप, भगति की महिमा घनी॥
भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत, सुमन मानस मलिन से।
तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से॥१२॥
रघुनाथजी, सज्जन-मण्डली, मुनि और मिथिलेश्वर स्नेह से शिथिल हैं। भरतजी का भाईचारा और उनके भक्ति की घनी महिमा मन में सराहते हैं! देवता भरतजी की प्रशंसा करके फूल बरसाते हैं; किन्तु उनका मन मलिनता से भरा है। तुलसीदासजी कहते हैं कि सब लोग सुन कर व्याकुलता से रात्रि के आगमन में कमल के समान सिकुड़ गये हैं॥१२॥
दो०-देखि दुखारी दीन, दुहुँ समाज नर नारि सब।
मघवा महा मलीन, मुये सारि मङ्गल चहत॥३०१॥
दोनों समाज के सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषों को दीन दुःखी देख कर महा मलिन इन्द्र मुर्दे को मार कर अपना कल्याण चाहता है॥३०१॥
भावी राम-वियोग के ख्याल से लोग दुःख से यों ही मृतक तुल्य हो रहे हैं, तिस पर स्वार्थी इन्द्र के कपट-प्रयोग मुर्दे को मारना है।
चौ०-कपट-कुचालि-सींव सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन-काजू॥
काक समान पाकरिपुरीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती॥१॥
देवराज कपट और कुचाल का हद है, उसको पराये का अकाज और अपना काज प्यारा है। इन्द्र की रीति कौए के समान छली, मलिन और कहीं विश्वास न करने की है॥१॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
प्रथम कुमत करि कपट सकेला। सो उचाट सब के सिर मेला॥
सुर-माया सब लोग बिमोहे। राम-प्रेम अतिसय न बिछोहे॥२॥
पहले खोटी सलाह करके कपट का इकट्ठा किया, वह उचाटन सब के सिर पर कर रखा था। उस देव-माया से सब लोग विमोहित हुए, परन्तु रामचन्द्रजी के अतिशय प्रेम से उनका विछोह नहीं हुआ अर्थात् रघुनाथजी को छोड़ कर कोई भी घर लौटना नहीं चाहते॥२॥
उचाट बस मन घर नाहीं। छन चल रुचि छन सदन सुहाहीं॥
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिन्धु सङ्गम जनु बारी॥३॥
परन्तु भय और उचाट के वश मन किसी का स्थिर नहीं है, क्षण में धन की इच्छा होती और क्षण में घर चलना अच्छा लगता है। मन की गति दुविधा में पड़ने से प्रजा दुःखी है, ऐसा मालूम होता है मानों नदी और समुद्र के सङ्गम का पानी चञ्चल हो।
दुचित कतहुँ परितोष न लहहीं। एक एक सन मरम न कहहीं॥
लखि हिय हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥४॥
चित्त में दुविधा होने से कहीं प्रसन्नता नहीं पाते हैं और एक दूसरे से (मन का यह) भेद नहीं कहते हैं। लोगों की दशा देख कर कृपानिधान रामचन्द्रजी हृदय में हँस कर कहते हैं कि कुत्ता, इन्द्र और युवा की प्रकृति बराबर है।
इन्द्र-उपमेय और स्वान जवान-उपमान दोनों का एक धर्म चञ्चल प्रकृति कथन करना 'दीपक अलंकार' है। प्रजावर्ग परस्पर मन का भेद इसलिये नहीं कहते हैं कि कोई यह न जान ले कि इन्हें रामचन्द्रजी को छोड़ कर घर सुहा रहा है। 'श्वयुवमघोनामतद्धिते' पाणिनि अष्टाध्यायी के इस सूत्र में श्वन्, युवन्, मघवन् तीनों शब्दों के रूप एक से बतलाये हैं।
दो०-भरत जनक मुनिजन सचिव, साधु सचेत बिहाइ।
लागि देव-माया सबहि, जथाजोग जन पाइ॥३०२॥
भरतजी, राजा जनक, मुनिजन, मन्त्री और चैतन्य महात्माओं को छोड़ कर यथायोग्य मनुष्यों को पा कर न्यूनाधिक्य रूप में सभी को देव-माया लगी॥३०२॥
एक ही देव-माया के प्रभाव से कुछ लोगों का बच जाना और कुछ का मोहित होना अर्थात् एक ही वस्तु से विरोधी कार्य का प्रकट होना 'प्रथम व्याघात अलंकार' है।
चौ०-कृपासिन्धु लखि लोग दुखारे। निज सनेह सुरपति छल भारे॥
सभा राउ गुरु महिसुर मन्त्री। भरत भगति सब के मति जन्त्री॥१॥
कृपा के समुद्र रामचन्द्रजी ने देखा कि लोग हमारे स्नेह और इन्द्र के भारी छल से दुःखी हैं। सभासद, राजा जनक, गुरुजी, ब्राह्मण और मन्त्री सब की बुद्धि को भरतजी की भक्ति ने यन्त्रित (जकड़) कर रखा है॥१॥<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
रामहिँ चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥२॥
लिखी हुई तसवीर के समान रामचन्द्रजी को देख रहे हैं और वचन बोलने में सिखाये हुए के समान सकुचाते हैं। भरतजी की प्रीति, नम्रता, बिनती और बड़ाई सुनने में सुख देनेवाली तथा वर्णन करने में कठिनता है॥२॥
जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनि-गन मिथिलेसू॥
महिमा तासु कहइ किमि तुलसी। भगति सुभाय सुमति हिय हुलसी॥३॥
जिनकी लवलेश मात्र भक्ति को देख कर मुनि-समूह और मिथिलेश्वर प्रेम में मग्न हैं। उनकी महिमा तुलसी कैसे कह सकता है? यद्यपि स्वाभाविक भक्ति-भाव से (उस महिमा को कहने के लिये) हृदय में सुबुद्धि हुलस रही है॥३॥
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कविकुल-कानि मानि सकुचानी॥
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल-बचन की नाँई॥४॥
अपने को छोटी और महिमा को बड़ी समझ कर कविकुल की मर्यादा के ध्यान से लज्जित हो रही है। कह नहीं सकती, गुणों में रुचि बहुत बड़ी है, बुद्धि की गति बालक के वचन के समान हो गई है॥४॥
दो०-भरत बिमल जस बिमल-बिधु, सुमति चकोर-कुमारि।
उदित बिमल जन हृदय नभ, एक टक रही निहारि॥३०३॥
भरतजी का विमल यश निर्मल चन्द्रमा रूप है, वह इस जन (तुलसीदास) के हृदय रूपी स्वच्छ आकाश में उदय हुआ है। सुबुद्धि रूपिणी चकोरिणी एक टक होकर देख रही है॥३०३॥
भरतजी के यश पर निर्मल चन्द्रमा का आरोप, अपनी बुद्धि पर चकोर की कन्या का आरोप करके हृदय पर स्वच्छ आकाश का आरोपण करना परम्परित का ढङ्ग लिये 'अधिक अभेद रूपक अलंकार' है।
चौ०-भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥
कहत सुनत सतिभाउ भरत को। सीय-राम-पद होइ न रत को॥१॥
भरतजी का स्वभाव कहना वेदों को भी सहज नहीं है, मेरी तुच्छ बुद्धि की चञ्चलता को कविजन क्षमा करेंगे। भरतजी का सच्चा प्रेम कहने सुनने से सीता और रामचन्द्रजी के चरणों में कौन न अनुरक्त होगा? अर्थात् सभी प्रीतिवान् होंगे॥१॥
सुमिरत भरतहि प्रेम राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को॥
देखि दयाल दसा सब ही की। राम सुजान जानि जन जी की॥२॥
भरतजी का स्मरण करने से जिसको रामचन्द्रजी का प्रेम न सुलभ हो, उसके समान<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
अभागा दूसरा कौन है? दयालु सुजान रामचन्द्रजी ने सब की दशा देख और अन (भरतजी) के मन की बात जान कर कि ये स्पष्ट मेरी आज्ञा पा कर ही सन्तुष्ट होंगे॥२॥
धरम-धुरीन धीर नय-नागर। सत्य सनेह सील सुख-सागर॥
देस कोल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू॥३॥
धर्मधुरन्धर, धीरवान्, नीति में चतुर, सत्य, स्नेह, शील और सुख के समुद्र नीति तथा प्रीति के पालनेवाले रघुनाथजी देश, काल, समय और समाज देख कर बोले॥३॥
बोले बचन बानि सरबस से। हित परिनाम सुनत ससि-रस से॥
तात भरत तुम्ह धरम-धुरीना। लोक बेद-बिद प्रेम-प्रबीना॥४॥
वाणी के सर्वस्व सरीखे वचन बोले, जो परिणाम में हितकारी और सुनने में चन्द्रमा के रस (अमृत) के समान हैं। हे प्यारे भरत! आप धर्म-धुरन्धर, लोक वेद के ज्ञाता और प्रेम में प्रवीण हैं॥४॥
सभा की प्रति में 'लोक वेद बिद परम-प्रबीना' पाठ है!
दो०-करम बचन मानस बिमल, तुम्ह समान तुम्ह तात।
गुरु-समाज लघुबन्धु-गुन, कुसमय किमि कहि जात॥३०४॥
हे तात! कर्म, वचन और मन से निर्मल आप के समान आप ही हैं। गुरु-समाज में दुर्दिन के समय छोटे भाई का गुण कैसे कहा जा सकता है?॥३०४॥
आप के समान आप ही हैं अर्थात् उपमेय ही को उपमान बनाना अनन्वय अलंकार है।
चौ०-जानहु तात तरनि-कुल रीती। सत्यसन्ध पितु कीरति प्रीती॥
समउ समाज लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥१॥
हे तात! आप सूर्यकुल की रीति जानते हो और सत्यवादी पिता की कीर्ति, उन की प्रीति, समय, समाज, गुरुजनों की लाज, मध्यस्थ, मित्र तथा शत्रु के मन की॥१॥
तुम्हहिं बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम-हित धरमू॥
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥२॥
अपना और मेरा परम हितकारी धर्म, आप को सभी के कर्तव्य मालूम हैं। मुझे आप को सब तरह भरोसा है, तो भी समय के अनुसार कहता हूँ॥२॥
तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरु-कुल-कृपा सँभारी॥
नतरु प्रजा पुरजन परिवारू। हमहिँ सहित सब होत खुआरू॥३॥
हे भाई! पिताजी के बिना हमारी बात को केवल कुलगुरु की कृपा ने सम्हाला है। नहीं तो प्रजा, पुरवासी और परिवार के सहित हम सब दुर्दशा-ग्रस्त हो आवे॥३॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
जौं बिनु अवसर अथव दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥
तस उतपात तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सब लीन्हा॥४॥
यदि बिना समय सूर्य अस्त हो जाय तो कहिये, संसार में किसको कष्ट न होगा? विधाता ने वैसा ही उत्पात किया, पर हे तात! मुनि वशिष्ठजी और मिथिलेश्वर ने सब तरह से रखवाली किया॥४॥
कहना तो यह है कि बिना समय की मृत्यु से सभी को बड़ा कष्ट हुआ। सीधे इसे न कह कर अनवसर सूर्यास्त की बात कह कर असली वृत्तान्त प्रकट करना 'ललित अलंकार' है।
दो०-राजकाज सब लाज पति, धरम धरनि धन धाम।
गुरु प्रभाउ पालिहि सबहि, भल होइहि परिनाम॥३०५॥
सब राज्य का कार्य, लाज, प्रतिष्ठा, धर्म, धरती, धन और महल गुरुजी के प्रभाव से सभी का पालन कीजिये, इसका फल (नतीजा) अच्छा होगा॥३०५॥
चौ०-सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुरुप्रसाद रखवारा॥
मातु पिता गुरु स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनी-धर-सेसू॥१॥
समाज के सहित तुम्हारा हमारा घर वन में रक्षा करनेवाला गुरुजी का अनुग्रह है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा जो पालन करता है वह सम्पूर्ण धर्म रूपी धरती का धारण करनेवाला शेषनाग है॥१॥
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू॥
साधन एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूति-मय बेनी॥२॥
वह (धर्म-पालन) आप करें और मुझे कराकर सूर्यकुल के रक्षक हों। एक यही साधन सम्पूर्ण सिद्धियों का देनेवाला है, कीर्ति, सुन्दर गति (मोक्ष) और ऐश्वर्य से भरी त्रिवेणी है॥२॥
सो बिचारि सहि सङ्कट भारी। करहु प्रजा परिवार सुखारी॥
बाँटी बिपति सबहि मोहि भाई। तुम्हहिं अवधिभरि बड़ि कठिनाई॥३॥
वह (धर्म) सोच कर भारी सङ्कट सहन करके प्रजा और परिवार को सुखी कीजिये। हे भाई! आपने मुझ से सभी विपत्ति बाँट लो, अवधि (१४ वर्ष) पर्यन्त आप को बड़ी कठिनता है॥३॥
सभा की प्रति में 'बाढ़ि बिपति' पाठ है और 'बाँटी बिपति' को पाठान्तर कहा गया है। परन्तु जब राजापुर की प्रति में 'बाँटी' पाठ है, तब सभा की प्रति का पाठ पाठान्तर सिद्ध होता है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७२१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
जानि तुम्हहिं मृदु कहउँ कठोरा। कुसमय तात न अनुचित मोरा॥
होहिं कुठाँय सुबन्धु सहाये। ओड़ियहि हाथ असनि के घाये॥४॥
आप को कोमल जान कर मैं कठोर वचन कहता हूँ, हे तात! कुसमय कहलाता है इसमें मेरा दोष नहीं है। अच्छे भाई कुजगह में सहाय होते हैं, (जैसे) वज्र की चोट से शरीर को बचाने के लिये हाथ उसको अपने ऊपर औजता है।
कुजगह में सुन्दर बन्धु सहायक होते हैं, यह उपमेय वाक्य है। वज्र की चोट को हाथ अपने ऊपर ओड़ लेता है, यह उपमान वाक्य है। दोनों वाक्यों में बिना वाचक पद के बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव झलकना 'दृष्टान्त अलंकार' है। सारांश यह कि सुबन्धु गाढ़े दिन में इस तरह सहायक होते हैं, जैसे शरीर पर वज्र का धार होते देख यह जानते हुए कि मैं नष्ट हो जाऊँगा फिर भी हाथ उसे अपने ऊपर ओड़ लेता है।
दो०-सेवक कर-पद-नयन से, मुख सो साहिब होइ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि, सुकबि सराहहिं सोइ॥३०६॥
सेवक हाथ, पाँव और नेत्र के समान हो, स्वामी मुख के समान होना चाहिये। तुलसीदासजी कहते हैं कि इनकी प्रीति की रीति को सुन कर अच्छे कवि उसकी बड़ाई करते हैं॥३०६॥
व्यङ्ग्यार्थ द्वारा दृष्टान्त का भाव है जैसे आँखों ने कोई फल देखा, पाँव चल कर उसके समीप गये, हाथ ने उठा कर मुख रूपी मालिक को दे दिया और उसने अकेले उसे खा लिया। परन्तु उससे उसने हाथ, पाँव, नेत्रादि रूपी सेवकों को शक्ति संचार समान रूप से करके वितरण कर दिया।
चौ०-सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम-पयोधि अमिय जनु सानी॥
सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी॥१॥
रघुनाथजी की वाणी सुन कर सारी सभा प्रेम के समुद्र में मग्न हो गई, ऐसा मालूम होता है मानों वह अमृत-रस से मिली हो। स्नेह की समाधि से समाज शिथिल हो गया, यह दशा देख कर सरस्वती ने मौन साधन कर लिया (सनाटा छा गया)॥१॥
वाणी ऐसी वस्तु नहीं जो अमृत में सानी जा सके, यह केवल कवि की कल्पनामात्र 'अनुक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार' है।
भरतहि भयउ परम सन्तोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। मा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥२॥
भरतजी को परम सन्तोष हुआ, स्वामी की अनुकूलता से दुःख दोष पीछे पड़ गये। मुख प्रसन्न है और मन का विषाद मिट गया, ऐसे खुश मालूम होते हैं मानों गूँगे को सरस्वती का प्रसाद हुआ हो अर्थात् बोलने की शक्ति आ गई हो॥२॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७२२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
राजापुर की प्रति में इस चौपाई का उत्तरार्ध यहाँ नहीं है, वह ३०८ दोहे के पूर्व इस प्रकार है। "सुनि प्रभु वचन भरत सुख पावा। मुनि-पद-कमल मुदित सिर नावा॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जड़ गूँगेहि गिरा प्रसादू॥" किन्तु काशी की प्रति में, गुटका और सभा की प्रति में, यह इसी स्थान में है।
कीन्ह सप्रेम प्रनाम बहोरी। बोले पानि-पङ्कुरुह जोरी॥
नाथ भयउ सुख साथ गये को। लहउँ लाहु जग जनम भये को॥३॥
भरतजी ने फिर प्रेम के साथ प्रणाम किया और कर-कमलों को जोड़ कर बोले। हे नाथ! मुझे आप के साथ चलने का सुख हुआ और संसार में जन्म लेने का लाभ पाया॥३॥
अब कृपाल जस आयसु होई। करउँ सीस धरि सादर सोई॥
सो अवलम्ब देव मोहि देई। अवधि पार पावउँ जेहि सेई॥४॥
हे कृपालु! अब जैसी आज्ञा होती है, वही आदर के साथ सिर पर धारण करके करूँगा। हे देव! मुझे वह सहाय दीजिये जिसकी सेवा करके अवधि से पार पाऊँ॥४॥
दो०-देव देव अभिषेक हित, गुरु अनुसासन पाइ।
आनउँ सब तीरथ-सलिल, तेहि कह काह रजाइ॥३०७॥
हे देव! आप के राज्याभिषेक के लिये गुरुजी की आज्ञा पा कर सब तीर्थों का जल ले आया हूँ, उसके लिये क्या आज्ञा है?॥३०७॥
चौ०-एक मनोरथ बड़ मन माहीं। समय सकोच जात कहि नाहीं॥
कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥१॥
एक बड़ा मनोरथ मन में है, वह भय और सकोच से कहा नहीं जाता है। प्रभु रामचन्द्रजी ने कहा--हे तात! कहिये, आज्ञा पा कर सुन्दर स्नेह भरी वाणी बोले॥१॥
चित्रकूट मुनि-थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निझर गिरिगन॥
प्रभु-पद अङ्कित अवनि बिसेखी। आयसु होइ त आवउँ देखी॥२॥
चित्रकूट पर्वत, मुनियों के आश्रम, तीर्थ, वन, पक्षी, मृग, तालाब, नदी, झरना और पर्वत-समूह, विशेष कर स्वामी के चरण-चिह्नित धरती को आज्ञा हो तो देख आऊँ॥२॥
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगत-भय कानन चरहू॥
मुनि प्रसाद बन मङ्गल-दाता। पावन परम सुहावन भ्राता॥३॥
रामचन्द्रजी ने कहा--हे तात! अत्रि मुनि की आज्ञा शिरोधार्य कर अवश्य वन में निर्भय विचरिये। मुनि की कृपा से हे भाई! यह वन अत्यन्त सुहावना, पवित्र और मङ्गल का देनेवाला है॥३॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
भरतजी के गुणों का ऐश्वर्य उपमेय और गङ्गाजी तथा अमृत-उपमान हैं। उपमान से उपमेय में अधिक गुण वर्णन करना 'व्यतिरेक अलंकार' है।
दो०--निरवधि-गुन निरुपम-पुरुष, भरत भरत सम जानि।
कहिय सुमेरु कि सेर सम, कबि-कुल-मति सकुचानि॥
उनके गुणों की सीमा नहीं, वे उपमान रहित पुरुष हैं, भरत के समान भरत ही को जानना चाहिये। क्या सुमेरु पर्वत की सेर (८० रुपये भर का पत्थर का बटखरा) के समान कहा जा सकता है? इसी से कवि-कुल की बुद्धि लज्जित हो गई॥ २८८॥
भरत के समान भरत ही हैं, यह 'अनन्वय अलंकार' है।
चौ०--अगम सबहि बरनत बर बरनी। जिमि जल-हीन मीन गम घरनी॥
भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं राम न सकहिँ बखानी॥१॥
हे श्रेष्ठ वर्णवाली प्रिये! यह वर्णन करने में सभी को दुर्गम है। जैसे बिना जल के मछली का धरती पर चलना। हे रानी! सुनो, भरत की अपार महिमा को रामचन्द्र जानते हैं, परन्तु कहना चाहें तो वे भी नहीं बखान कर सकते॥१॥
वाच्यसिद्धा गुणीभूत व्यङ्ग्य है कि रामचन्द्रजी सर्वेश होने से उस महिमा को जानते हैं, परन्तु अपार होने से वे भी नहीं कह सकते।
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ॥
बहुरहिँ लखन भरत बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं॥२॥
प्रीति के साथ भरतजी के प्रभाव को वर्णन कर स्त्री के जी की इच्छा लख कर राजा कहते हैं कि लक्ष्मण लौट चलें और भरत वन को जाँय, इसमें सब की भलाई है, यहा सब के मन में है (मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ)॥२॥
देबि परन्तु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी॥
भरत अवधि सनेह ममता की। जद्यपि राम सीम समता की॥३॥
परन्तु हे देवि! भरत और रघुनाथ की प्रीति तथा विश्वास की विवेचना (दलील) नहीं की जा सकती। यद्यपि रामचन्द्र समता के हद हैं, तो भी भरत उनके स्नेह और ममता की अवधि हैं॥३॥
परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥
साधन सिद्धि राम-पग-नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥४॥
परमार्थ और स्वार्थ सम्बन्धी समस्त सुखों को भरत ने सपने में भी मन से नहीं निहारा। मुझे भरत का सिद्धान्त यही लख पड़ता है कि सब साधनों की सिद्धि (मन वा फल का मिलना) रामचन्द्र के चरणों का स्नेह है॥४॥<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" />{{rh||द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।|६४३}}</noinclude>
भरतजी के गुणों का ऐश्वर्य्य-उपमेय और गङ्गाजी तथा अमृत-उपमान हैं। उपमान से उपमेय में अधिक गुण वर्णन करना 'व्यतिरेक अलंकार' है।
{{block center|<poem>{{outdent|{{larger|'''दो॰—निरवधि-गुन निरुपम-पुरुष, भरत भरत सम जानि।'''
'''कहिय सुमेरु कि सेर सम, कबि-कुल-मति सकुचानि ॥२८८॥'''}}}}</poem>}}
उनके गुणों की सीमा नहीं, वे उपमान रहित पुरुष हैं, भरत के समान भरत ही को जानना चाहिये। क्या सुमेरु पर्वत की सेर (८० रुपये भर का पत्थर का बटखरा) के समान कहा जा सकता है? इसी से कवि-कुल की बुद्धि लज्जित हो गई ॥२८८॥
भरत के समान भरत ही हैं, यह 'अनन्वय अलंकार' है।
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हे श्रेष्ठ वर्णवाली प्रिये! यह वर्णन करने में सभी को दुर्गम है। जैसे बिना जल के मछली का धरती पर चलना। हे रानी! सुनो, भरत की अपार महिमा को रामचन्द्र जानते हैं, परन्तु कहना चाहैं तो तो वे भी नहीं बखान कर सकते ॥१॥
वाच्यसिद्धान्त गुणीभूत व्यङ्ग है कि रामचन्द्रजी सर्वज्ञ होने से उस महिमा को जानते हैं, परन्तु अपार होने से वे भी नहीं कह सकते।
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Hemish22" /></noinclude>रामचरित-मानस।
रिषि-नायक जहँ आयसु देहौं। राखेहु तीरथ-जल थल तेहीं॥
सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि-पद-कमल मुदित सिर नावा॥४॥
ऋषिराज जहाँ आज्ञा दें, इस तीर्थ-जल को उसी स्थान में रखना। प्रभु रामचन्द्रजी के वचन सुन कर भरतजी सुखी हुए और मुनि के चरण-कमलों में प्रसन्नता से सिर नवाया॥४॥
दो०-भरत-राम-सम्बाद सुनि, सकल सुमङ्गल-मूल।
सुर स्वारथी सराहि कुल, बरषत सुरतरु फूल॥३०८॥
सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलों का मूल भरतजी और रामचन्द्रजी का सम्बाद सुन कर स्वार्थी देवता सूर्यकुल की प्रशंसा करके कल्पवृक्ष का फूल बरसते हैं॥३०८॥
चौ०-धन्य भरत जय राम गोसाँई। कहत देव हरषत बरिआँई॥
मुनि मिथिलेस सभा सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥१॥
भरतजी धन्य हैं; स्वामी रामचन्द्रजी की जय हो, देवता ऐसा कहते हुए परवस प्रसन्न होते हैं। भरतजी के वचनों को सुन कर वशिष्ठ मुनि, मिथिलेश्वर और सब सभासदों को उत्साह हुआ॥१॥
भरत राम गुन-ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ-बिदेहू॥
सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेम प्रेम अति पावन पावन॥२॥
भरतजी और रामचन्द्रजी के गुण-समूह तथा स्नेह की पुलकित शरीर से राजा जनक प्रशंसा करते हैं। सेवक और स्वामी का सुहावना स्वभाव एवम् नेम प्रेम अत्यन्त पवित्र से भी पवित्र है॥२॥
मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे॥
सुनि सुनि राम-भरत-सम्बादू। दुहुँ समाज हिय हरष बिषादू॥३॥
मन्त्री, सभासद सब प्रेम से अपनी बुद्धि के अनुसार सराहने लगे। रामचन्द्रजी और भरतजी का सम्बाद सुन सुन कर दोनों समाजों के हृदयों में हर्ष और विषाद हो रहा है॥३॥
हर्ष भरतजी की स्वामि-भक्ति पर और रामचन्द्रजी के न लौटने का विषाद, दोनों भावों का साथ ही हृदय में उत्पन्न होना 'प्रथम समुच्चय अलंकार' है।
राम-मातु दुख सुख सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधी रानी॥
एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई॥४॥
रामचन्द्रजी की माता दुःख और सुख को समान समझ कर रामचन्द्रजी के गुणों को कह कर रानियों को समझाया। कोई रघुनाथजी की बड़ाई करते हैं और कोई भरतजी की भलाई को सराहते हैं॥४॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(६)}}
जनमत तक इनकी शक्ति का नाश नहीं हुआ था। यदि ये सब एक होजाते, यदि रूसटे और भी इनके साथी होजाते और इस तरह की संयुक्त शक्ति से काम लिया जाता तो हिंदुओं का पुराना प्रतिष्टा जमाना फिर भी एक बार छाने की आशा होसकती थी। परंतु इस संसार नाटक के सूत्रधार को यहाँ बात इष्ट नहीं थी। वह जानता था कि हिन्दू इस कार्य के अयोग्य हैं। बस इसीलिये उसने देश के दुःसाध्यकार्यी प्रजापथप्रदर्शकों का विनाश करके समग्र ही दोषमय दिवसकर का उदय किया। यदि उसका अभ्युदय न होता तो न मालूम भारतवर्ष की आज दिन क्या दुर्दशा होती। किन्तु उसे अनेक राजविपत्तियों के अभ्यास रहित के अन्तर में सुख हुआ था। फिर उस दिन के दिवसकरों या सूर्योंने इस धर्मभूमि का शासन, एक ऐसी जाति को दिया गया जो संसार में अपने सुखभोग के लिये विख्यात है। जो लोग उस समय के इतिहास पर दृष्टि किये बिना भारतवर्ष के ब्रिटिश साम्राज्य पर दोष लगाते हैं वे इस पुस्तक को पढ़कर स्वयं दृष्टि से उस जमाने की वर्तमान समय से तुलना करें तब उन्हें भली भाँति निश्चित होजायगा कि ऐसा युग नहीं आयेगा। भारत हमारे लिये कितना सुखकर है। सर्वशक्तिमान् करुणाकरुणालय इस शासनको इस देश में चिरस्थायी करें और इससे राजा प्रजाका कल्याण हो। भगवान् करें श्रीमान् सम्राट् पंचम जार्जका कल्याण हो और उनके युवराजमें राजा प्रजा सुखी रहें।
"उम्मेदसिंह चरित्र" यद्यपि बूँदी राज्य के उद्धारक, हाड़ाधिराजियों के कुलकमल दिवाकर महाराज राजा उम्मेदसिंहजी का चरित्र है किन्तु केवल इसीसे मालूम होजायगा कि मेरी इस उक्ति में कहाँतक सत्यता है। इनके पिता महाराज राजा बुद्धसिंहजी के बढ़ते विक्रमसे जब इस राज्य की वृद्धि हुई तो अवस्थापुरुष और उनके हाथ से यदि राज्य निकल गया तो यहाँ तक कि एक जगह बैठकर दुःख के दिन बिताने के लिये गाँठकी एक सौँपड़ी भी न रही। ऐसी विपत्ति हुए राज्य को वीर यह उठाकर, वर्षों के अविश्रान्त परिश्रम से, समयसूचि से तलवार के हाथ दिखाते रहे, तीन चार युद्धों के अनन्तर इन्होंनें प्राप्त किया। राज्य पाकर इन्होंनें न उसे बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित कर उसके भीतरी काँटों को निकाला। राज्य निष्कंटक होजाने के बाद पहले पुत्र को और उनका देहान्त होजाने पर पौत्र को राज्य देकर आप अलग होगये। अलग होकर भारत वर्ष के समस्त तीर्थों की अनेक बार यात्रा की।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२
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2026-06-15T12:08:21Z
Skirti.codes
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(७)}}
इस समय भी बूँदी की रक्षा का अटूट व्रत इन्होंने हृदय में धारण और ईश्वर से इन्होंने आजीवन निर्वाह किया। युवराज पाकर इन्होंने जब तब प्रातःकाल उठ गोशों में से हाथ फेर दिया जो अवश्य प्रत्येक कार्य में दिखलायीये—जिसका पालन किया जायते। और इनके पूर्वजों के बनाये कितने ही विशाल भवनों के सिवाय बूँदी राज्य में जो कुछ आजतक दिखलायी देता है केवल इन्होंने बनवाया। तब ऐसे ही ठोस पोथों में इस पोथी में जो वंश-प्रकार—गंगो चन्द्रसे हैं। इनके युवकों के कारण यही जो साक्ष्य कहलाते हैं।
इसमें केवल महाराव राव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही चरित्र हो—सो नहीं। यह चार खण्डों में विभक्त है। प्रथम खण्ड में चौहान क्षत्रियों की शाखा शाखा के—बूँदी राज्य के संक्षिप्त इतिहास का दिग्दर्शन, दूसरे में वर्तमान नायक के पिता महाराज राजा बुद्धसिंहजी का संक्षेप में जीवनचरित्र, तीसरे में उम्मेदसिंहजी को राज्य प्राप्ति से लेकर इनके वनप्रस्थ आश्रम ग्रहण करने तक का हाल और चौथे में उनके राज्य त्याग करने के अनंतर उनका धर्मजीवन धूत और साथ ही महाराव राजा श्रीविष्णुसिंहजी तथा महाराव राजा श्रीरामसिंहजी का चरित्र।
केवल इतना ही क्यों—इसमें उस समय की और २ अनेक सामाजिक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। इस ग्रंथ के लिखते समय मेरा विचार यह था कि इसमें महाराव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही जीवन चरित्र से और आश्रय से लेकर महाराव राजा विष्णुसिंहजी तक का हाल संक्षेप से लिखवायाजाय। ऐसा करने के अनंतर महाराव राजा रामसिंहजी बहादुर जी. सी. आई., सी. आई. ई. का चरित्र लिखकर बूँदी का इतिहास समाप्त कियाजाय। इस उद्देश्य से यह पोथी लिखी गई और मैंने महाराव विष्णुसिंहजी का भी चरित्र होनहार की गोद में है। किन्तु अब मेरा विचार बदल गया। इस पुस्तक के प्रथमखण्ड में इस राज्य का संक्षिप्त इतिहास लिखकर मेरा संतोष नहीं हुआ। इस कारण मैंने राव राजा रतनसिंहजी, राव राजा शत्रुशल्यजी, राव राजा भावसिंहजी और राव राजा भीमसिंहजी का विस्तृत चरित्र लिखकर “वंशभास्कर” के नाम से पोथी तैयार की है और संकल्प यह है कि ठेठ से अबतक का इतिहास ही तैयार करदियाजाय। इस काम में सफलता होगी वा नहीं—सो भगवान जाने किन्तु “पराक्रमी हाड़ाराव” के<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३
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प्रकाशित होने से इन दोनों पुस्तकों को मिलाकर पढ़ने में राव राजा रतनसिंहजी से लेकर महाराव राजा विष्णुसिंहजी तक का पूरा हाल मिल जायगा।
प्रथम खंड को संक्षिप्त—परन्तु संक्षिप्त करने से उसमें कितनी ही त्रुटियाँ रह गईं। मैं समझता हूँ कि त्रुटि रहित न मालूम इस पोथी में कितनी त्रुटियाँ रही होंगी सो राम जानें। परंतु पृष्ठ १३ में राव बुद्धसिंहजी का तीर्थों दौरा मारवा लिखा गया है किन्तु उन्होंने मारा अपनी ससुराल में था। पृष्ठ २० में राव राजा रतनसिंहजी का मारा जाना लिखा गया है किन्तु यह मारे नहीं गये मृत्यु से परलोकवासी हुए थे। पृष्ठ २२ में राव राजा शत्रुशल्यजी का तलवार से काम आना लिखा गया है किन्तु यह तलवार से नहीं गोली लगने से वीर गति को प्राप्त हुए थे। पृष्ठ ४७ में बुद्धसिंहजी पर जयपुर की नाहक चढ़ी सेना की लड़ाई लिख दी गई है किन्तु जयपुर में सेना दादू पंथियों की है। पृष्ठ १०५ में श्री जी साहब के पुत्र रामसिंहजी लिखाये हैं किन्तु उनके यह प्रपौत्र थे। और पृष्ठ १२२ में विष्णुसिंहजी का शिरपर माला फैला छपाया किन्तु माला नहीं यह झाला फैला करते थे।
इस्तरह की त्रुटियों के सिवाय मेरे ही दृष्टिदोष से एक बड़ी भारी गलती छप गई। वह यह कि पृष्ठ ४८ से पृष्ठ १५१ तक के ३५ पृष्ठों में संवत् १८०१ से संवत् १८०७ तक की घटनाओं का उल्लेख है परंतु वहाँ भूल से १८०० के बदले १९०० मुद्रित हो गया। इनके अतिरिक्त छापे की भूल से बैसरोड़ गढ़का बैसरोड़गढ़, उपकारी की जगह उपारक, मथुरा के बदले मंथर, होल्कर का होलकरा—इत्यादि छप गया सो जुदा।
इस पुस्तक में कई जगह उदयपुर, कोटा, जयपुर और जोधपुर के उस समय के नरेशों पर, इन्द्रगढ़ के महाराजा देवीसिंहजी पर, राजनीति निपुण झालिमसिंहजी पर और ऐसे ही औरों पर कटाक्ष करता पड़ा है परंतु यह कटाक्ष वास्तव में कटाक्ष नहीं। न्याय दृष्टि से किया गया है...<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
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प्रकाशित होने से इन दोनों पुस्तकों को मिलाकर पढ़ने में राव राजा रतनसिंहजी से लेकर महाराव राजा विष्णुसिंहजी तक का पूरा हाल मिल जायगा।
प्रथम खंड को संक्षिप्त—परन्तु संक्षिप्त करने से उसमें कितनी ही त्रुटियाँ रह गईं। मैं समझता हूँ कि त्रुटि रहित न मालूम इस पोथी में कितनी त्रुटियाँ रही होंगी सो राम जानें। परंतु पृष्ठ १३ में राव बुद्धसिंहजी का तीर्थों दौरा मारवा लिखा गया है किन्तु उन्होंने मारा अपनी ससुराल में था। पृष्ठ २० में राव राजा रतनसिंहजी का मारा जाना लिखा गया है किन्तु यह मारे नहीं गये मृत्यु से परलोकवासी हुए थे। पृष्ठ २२ में राव राजा शत्रुशल्यजी का तलवार से काम आना लिखा गया है किन्तु यह तलवार से नहीं गोली लगने से वीर गति को प्राप्त हुए थे। पृष्ठ ४७ में बुद्धसिंहजी पर जयपुर की नाहक चढ़ी सेना की लड़ाई लिख दी गई है किन्तु जयपुर में सेना दादू पंथियों की है। पृष्ठ १०५ में श्री जी साहब के पुत्र रामसिंहजी लिखाये हैं किन्तु उनके यह प्रपौत्र थे। और पृष्ठ १२२ में विष्णुसिंहजी का शिरपर माला फैला छपाया किन्तु माला नहीं यह झाला फैला करते थे।
इस्तरह की त्रुटियों के सिवाय मेरे ही दृष्टिदोष से एक बड़ी भारी गलती छप गई। वह यह कि पृष्ठ ४८ से पृष्ठ १५१ तक के ३५ पृष्ठों में संवत् १८०१ से संवत् १८०७ तक की घटनाओं का उल्लेख है परंतु वहाँ भूल से १८०० के बदले १९०० मुद्रित हो गया। इनके अतिरिक्त छापे की भूल से बैसरोड़ गढ़का बैसरोड़गढ़, उपकारी की जगह उपारक, मथुरा के बदले मंथर, होल्कर का होलकरा—इत्यादि छप गया सो जुदा।
इस पुस्तक में कई जगह उदयपुर, कोटा, जयपुर और जोधपुर के उस समय के नरेशों पर, इन्द्रगढ़ के महाराजा देवीसिंहजी पर, राजनीति निपुण झालिमसिंहजी पर और ऐसे ही औरों पर कटाक्ष करता पड़ा है परंतु यह कटाक्ष वास्तव में कटाक्ष नहीं। न्याय दृष्टि से किया गया है। इसका कारण मैं ऊपर लिखचुका हूँ। मैं फिर भी मानताहूँ कि यदि उस समय के नरेश आपसमें लड़मरने की जगह, अपने भाइयों का, नातेदारों का और जाति भाइयों का विनाश करने के बदले मिलकर चलते तो भारतवर्ष की ऐसी दुर्दशा न होती।
परंतु उन लोगों ने अपनी राजनीति का—अपनी शक्ति का उपयोग उस व्यक्ति पर किया जिसका राज्य छूट गया था, घर बार छूट गया था और जिसे विपत्ति सागर में पड़कर जंगल में झखमारनी फलों पर कालक्षेप करना पड़ता था। टाड साहब से बढ़कर इसकी गवाही क्या हो? नहीं तो मेरी उन नरेशों पर परम<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(९)}}
पूज्य बुद्धि है। मैंने उनकी प्रशंसा के समय प्रशंसा और निन्दा के समय निन्दा की है। इसपर भी यदि किसी को आपत्ति मालूम हो तो मैं उनसे क्षमा मांगताहूँ। परमेश्वर की कृपा से ब्रिटिश राज्य की छत्र छाया में सब रजवाड़ों का परस्पर का वैषम्य जाकर स्नेह की वृद्धि हो रही है।
अवश्य ही उन लोगों का यह कार्य देश दृष्टि के विचार से और नातेदारों के खयाल से अनुचित था और इसी कारण समय पड़ने पर उनके लिये—उनकी शक्ति के दुरुपयोग को देखकर कुछ लिखना पड़ा किन्तु “सत्यमेव महीपतेः” के सिद्धान्त से उनका कार्य अनुचित भी नहीं कहा जासकता। इसी लक्ष्य से जब टाड साहब ने इन्द्रगढ़वालों का वध करने पर अथवा महाराणा अजबजी के मारे जाने पर महाराव राजा उम्मेदसिंहजी की और अनुक्रम से अजितसिंहजी की निन्दा की है तब ऐसे अवसर पर भारतवर्ष में अंग्रेजी साम्राज्य के संस्थापक लार्ड क्लाइव और वारेन हेस्टिंग्स के वृत्तांत की याद दिलानी पड़ी है और वह भी इसलिये पड़ी है कि दुनिया भर के इतिहास में शायद ऐसा कोई भी राज्य का संस्थापक नहीं निकल सकता जिसके चरित्र में इस प्रकार का धब्बा न हो किन्तु जिनका उद्देश्य राज्य संस्थापन है उन्हें समय आने पर ऐसे कार्य करने पड़ते हैं। इतना लिखने से पाठक यह न समझ लें कि मैं इन बातों का अनुमोदक हूँ। जो कार्य भला सो भला और बुरा सो बुरा ही है।
इस पुस्तक की रचना बूँदी के सुप्रसिद्ध इतिहास “वंश भास्कर” के स्वर्गीय कवि शिरोमणि सूर्यमल्लजी के उक्त ग्रंथ के आधार पर, सर्व शास्त्र निष्णात, राजकार्य धुरंधर, बूँदी के भूतपूर्व अमात्य पंडित गंगासहायजी के बनाये “वंशप्रकाश” को आगे रखकर राजपूताने के जगत प्रसिद्ध इतिहास लेखक महामान्य टाड साहब कृत “एनल्स एंड एंटीक्विटीज आफ राजस्थन” का मिलान करके की गई है। इसमें समय २ पर मथुरानिवासी बाबू हरिचरणसिंह चौहान कृत “बूँदी राजवंशावली” का भी आश्रय लिया गया है और कहीं २ जनश्रुति का भी आधार है। इन सज्जनों के लिये मेरा हार्दिक धन्यवाद है।
विभक्ति प्रत्यय को मैं सर्व नाम के शामिल और संज्ञा से अलग लिखना पसन्द करताहूँ। इस पुस्तक में भी जहाँ तक बन सका इस तरह का उपयोग किया गया है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(१०)}}
यह पोथी संवत् १९६३ में तैयार हुई थी और प्रकाशित होने का सौभाग्य उसे अब प्राप्त हुआ है। इतना विलम्ब होने का कुछ भी कारण हो उसे यहाँ लिखने की आवश्यकता नहीं। हाँ! “श्रीवेंकटेश्वर” यंत्रालय के स्वामी सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी को भी मैं धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने ने मुझ जैसे अकिंचन की पोथियों प्रकाशित करने का अनुग्रह किया है। मेरी पूर्व प्रकाशित और पुस्तकों की तरह इसे छापने, प्रकाशित करने और दुबारा छापने का अधिकार भी उन्हीं को है।
इतिहास अथवा जीवनचरित्र लिखने में यह मेरा तीसरा उद्योग है। इस से पहिले श्रीमती महारानी विक्टोरिया का चरित्र और काबुल के अमीर अब्दुर्रहमानखाँ का चरित्र—यों दो पुस्तकें प्रकाशित होचुकी हैं। इसके अतिरिक्त दो पुस्तकें अभी अप्रमुद्रित हैं सो समय पड़ने पर छपेंगी ही गई। अब रहा आगे लिखने का कार्य सो उसका आधार पाठकों के—समालोचकों के अनुग्रह पर है। यदि समय मिला, यदि सामग्री मिली और साथ ही यदि उत्साह बढ़ाया गया तो शारीर आरोग्य रहने पर फिर भी उद्योग करना मनुष्य का कर्तव्य है। परमेश्वर ऐसी ही कृपा करें।
इस भूमिका को समाप्त करते पूर्व उन हिन्दी रसिकों को भी मैं धन्यवाद देता हूँ जो “अंगीकरोंति सुकृतिनः परिपालयन्ति” के अनुसार मेरी पुस्तकों का आदर करते हैं और जिन समालोचकों की तीव्र क्षीर को अलग कर देनेवाली बुद्धि है वे भी धन्यवाद के भागी हैं।
{{left|
बूँदी राजपुताना
माघ कृष्ण ७
सं० १९६९ वि०
}}
{{right|
हिन्दी का एक तुच्छ सेवक—
लज्जाराम शर्म्मा.
}}
{{blockcenter|[अलंकरण]}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|महता लज्जाराम शर्म्मा रचित पुस्तकें।}}
(१) श्रीमती महारानी विक्टोरिया का चरित्र ॥१॥
(२) काबुल के अमीर अब्दुर्रहमानखाँ का चरित्र ॥१॥
(३) उम्मेद सिंह चरित्र
(४) बीरबल विनोद ॥१॥
(५) धूर्तरसिकलाल ॥१॥
(६) स्वतंत्र रमा और परतंत्र लक्ष्मी ॥१॥
(७) हिन्दू गृहस्थ ॥१॥
(८) आदर्श दम्पती ॥१॥
(९) सुशीला विधवा ॥१॥
(१०) बिगड़े का सुधार ॥१॥
(११) विपत्ति की कसौटी (छपरही है)
(१२) पराक्रमी हाड़ाराव (तैयार है)
(१३) विचित्र स्त्रीचरित्र ॥१॥
(१४) भारत की कारीगरी ॥१॥
{{blockcenter|
पुस्तक मिलने का ठिकाना—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम प्रेस—बम्बई।
}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|श्रीहरिः।}}
{{larger|{{blockcenter|उम्मेदसिंहचरित्र की}}}}
{{blockcenter|विषयानुक्रमणिका।}}
{| class="wikitable" style="width:100%;"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| १
| १
| वंशपरिचय
|
|-
|
|
| चौहानों और हाड़ाओं की उत्पत्ति
| १
|-
|
|
| अग्निकुल के चारों क्षत्रियों की उत्पत्ति
|
|-
|
|
| अजमेर का किला बनवानेवाले अजयपालजी
| ४
|-
|
|
| जाहिर पीर-गोगाजी
|
|-
|
|
| अचलेश्वर के आगे अपना मस्तक काटकर चढ़ानेवाले समरणजी
|
|-
|
|
| झाकमरी का सांभर में मंदिर बनवानेवाले महानन्दजी
|
|-
|
|
| चित्तौड़ का किला बनवानेवाले चित्रांगजी
|
|-
|
|
| बीसल सागर तालाब अजमेर में बनवानेवाले बीसलदेवजी
|
|-
|
|
| आना सागर तालाब अजमेर में बनवानेवाले आनाजी
|
|-
|
|
| भारतवर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराजजी
|
|-
|
|
| शरणागत वत्सल हम्मीरजी
|
|-
|
|
| हाड़ा वंश के मूल पुरुष अस्थिपालजी
| ५
|-
|
|
| पृथ्वीराजजी के रूठे सामन्त हम्मीरजी और गम्भीरजी
| ७
|-
|
|
| मांडलगढ़ बसानेवाले मंडनजी
|
|-
|
|
| बूँदी राज्य स्थापन करनेवाले देवसिंहजी
|
|-
| १
| २
| बूँदी राज्य का संस्थापन
|
|-
|
|
| देवसिंहजी ने बादशाह को धोखा न दिया
| ८
|-
|
|
| बाँदू के नले में बूँदी ३०० घरों की बस्ती थी
|
|-
|
|
| देवसिंहजी ने मीणों से बूँदी छीन ली
|
|-
|
|
| कोटा बसा
|<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>|-
|
|
| बूँदी के चार राजाओं का नाममात्र आधिपत्य
| ९
|-
|
|
| गणगौरि झील देखा
|
|-
|
|
| गणगौरि और रानी को बूँदीगढ़ के राजा से हामाजी छीनलाये
|
|-
|
|
| जय संग्राम में कोई मारनेवाला न मिला तब हालूजी ने शिर काट कर भद्रकाली को चढ़ा दिया
| १०
|-
|
|
| धायपुत्रे दामाद रानाजी की मारा
|
|-
|
|
| रानाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके
|
|-
|
|
| अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले सांडाजी
| ११
|-
|
|
| समरकंद (श्यामजी)
|
|-
|
|
| नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया
| १२
|-
|
|
| नारायणदासजी की बहादुरी
|
|-
|
|
| मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने साँई के बादशाह का इक्का मारा
|
|-
|
|
| अफीम न मिलने से साँई की जोड़ी
| १३
|-
|
|
| बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई
|
|-
|
|
| अपना बात करनेवाले रानाजी को सात आदमियों सहित मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये
| १४
|-
|
|
| माता के स्तनों से दूध की धारा
| १५
|-
| १
| ३
| बूँदी राज्य की उन्नति
|
|-
|
|
| सुरतानजी के अत्याचार
| १६
|-
|
|
| सुरजनजी की गद्दी
|
|-
|
|
| कोटा और रणथंभौर में सुरजनजी का अधिकार
|
|-
|
|
| जलालुद्दीन के वेश में बादशाह अकबर
|
|-
|
|
| बादशाह से सात या दस घोड़े लिखवाकर और सात परगने लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया
|
|-
|
|
| गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसहित बावन परगने पाये
| १७
|-
|
|
| सुरजनजी की कार्यावधि
|
|-
|
|
| राजमन्दिर आदि बनाये गये
|<noinclude></noinclude>
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2026-06-15T12:43:53Z
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>|-
|
|
| बूँदी के चार राजाओं का नाममात्र आधिपत्य
| ९
|-
|
|
| गणगौरि झील देखा
|
|-
|
|
| गणगौरि और रानी को बूँदीगढ़ के राजा से हामाजी छीनलाये
|
|-
|
|
| जय संग्राम में कोई मारनेवाला न मिला तब हालूजी ने शिर काट कर भद्रकाली को चढ़ा दिया
| १०
|-
|
|
| धायपुत्रे दामाद रानाजी की मारा
|
|-
|
|
| रानाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके
|
|-
|
|
| अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले सांडाजी
| ११
|-
|
|
| समरकंद (श्यामजी)
|
|-
|
|
| नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया
| १२
|-
|
|
| नारायणदासजी की बहादुरी
|
|-
|
|
| मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने साँई के बादशाह का इक्का मारा
|
|-
|
|
| अफीम न मिलने से साँई की जोड़ी
| १३
|-
|
|
| बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई
|
|-
|
|
| अपना बात करनेवाले रानाजी को सात आदमियों सहित मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये
| १४
|-
|
|
| माता के स्तनों से दूध की धारा
| १५
|-
| १
| ३
| बूँदी राज्य की उन्नति
|
|-
|
|
| सुरतानजी के अत्याचार
| १६
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|
|
| सुरजनजी की गद्दी
|
|-
|
|
| कोटा और रणथंभौर में सुरजनजी का अधिकार
|
|-
|
|
| जलालुद्दीन के वेश में बादशाह अकबर
|
|-
|
|
| बादशाह से सात वा दस घोड़े लिखवाकर और सात परगने लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया
|
|-
|
|
| गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसहित बावन परगने पाये
| १७
|-
|
|
| सुरजनजी की कार्यावधि
|
|-
|
|
| राजमन्दिर आदि बनाये गये
|<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>|- ||| बूँदी के चार राजाओं का नाममात्र आधिपत्य | ९
|- ||| गणगौरि झील देखा ||
|- ||| गणगौरि और रानी को बूँदीगढ़ के राजा से हामाजी छीन लाये ||
|- ||| जय संग्राम में कोई मारनेवाला न मिला तब हालूजी ने शिर काट कर भद्रकाली को चढ़ा दिया | १०
|- ||| धायपुत्र दामाद राणाजी की मारा ||
|- ||| राणाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके ||
|- ||| अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले साँडाजी | ११
|- ||| समरकंद (श्यामजी) ||
|- ||| नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया | १२
|- ||| नारायणदासजी की बहादुरी ||
|- ||| मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने साँई के बादशाह का इक्का मारा ||
|- ||| अफीम न मिलने से साँई की जोड़ी | १३
|- ||| बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई ||
|- ||| अपना बात करनेवाले राणाजी को सात आदमियों सहित मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये | १४
|- ||| माता के स्तनों से दूध की धारा | १५
|- |२|३| बूँदी राज्य की उन्नति |
|- ||| सुलतानजी के अत्याचार | १६
|- ||| सुरजनजी की गद्दी ||
|- ||| कोटा और रणथंभौर में सुरजनजी का अधिकार ||
|- ||| जलालुद्दीन के वेश में बादशाह अकबर ||
|- ||| बादशाह से सात वा दूसरे घोड़े लिखवाकर और सात परगने लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया ||
|- ||| गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसहित बावन परगने पाये | १७
|- ||| सुरजनजी की कायरता ||
|- ||| राजमन्दिर आदि बनवाये गये ||<noinclude></noinclude>
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सदस्य वार्ता:Chahar 009
3
193482
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2026-06-15T16:54:37Z
सौरभ तिवारी 05
49
स्वागत संदेश।
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सौरभ तिवारी 05
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:दयानवाद मुझे बताने के लिए वो मुझे पहले नहीं पता था की मै वॉइलेट और रेड कलर को बिना बदले भी बदलाव क्र सकती हु आज मेरी टीचर ने मुझे बताय ह तो म उनको ठीक करूंगी मुझे लगा था की कोई भी बदलावे करने के बाद रंग बदलना होता ह [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) १७:१०, १५ जून २०२६ (UTC)
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सौरभ तिवारी 05
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:दयानवाद मुझे बताने के लिए वो मुझे पहले नहीं पता था की मै वॉइलेट और रेड कलर को बिना बदले भी बदलाव क्र सकती हु आज मेरी टीचर ने मुझे बताय ह तो म उनको ठीक करूंगी मुझे लगा था की कोई भी बदलावे करने के बाद रंग बदलना होता ह [[सदस्य:Chahar 009|Chahar 009]] ([[सदस्य वार्ता:Chahar 009|वार्ता]]) १७:१०, १५ जून २०२६ (UTC)
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सदस्य:Lohit Sathesh
2
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Lohit Sathesh
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"नमस्ते, मैं लोहित हूँ।" के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
नमस्ते, मैं लोहित हूँ।
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सदस्य वार्ता:Hemish22
3
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सौरभ तिवारी 05
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text/x-wiki
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सौरभ तिवारी 05
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text/x-wiki
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३६
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Skirti.codes
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{center|'''चौहानों और हाड़ाओंकी उत्पत्ति।'''}} (१)
बात का यहाँ निर्णय करके मुझे अपनी असली बात नहीं छोड़ना है। महर्षि वशिष्ठने आबू पहाड़पर जिस जगह यज्ञ किया था वहाँ अग्नि आदि-कुण्ड मौजूद है। उन्होंने इस यज्ञ में प्रह्लादिक देवताओं का आवाहन किया और शास्त्र की मर्यादा के अनुसार महर्षि मनु, च्यवन, वत्स और जमदग्निने अनुक्रमसे अग्नि, होता, सामपाठी और अध्वर्यु का कार्य करके यज्ञ कुण्ड से चार क्षत्रिय उत्पन्न किये।
इन चारों में प्रतिहार, चालुक्य और परमार नाम के क्षत्रिय वीर अवश्य ही महावीर थे, अवश्य ही इन्होंने पैदा होकर म्लेच्छों को आर्य के अनुसार देशों का विनाश किया परंतु ये यज्ञ की सौम्य हवि से उत्पन्न हुए थे। इस कारण इनमें सीधापन अधिक और वीरता कम थी।
एकके बाद दूसरा और दूसरेके बाद तीसरा यज्ञकुण्ड में से निकलकर दैत्यों से घोर संग्राम करने पर भी जब उनको न हरा सके तब महर्षि वशिष्ठजी से भगवान् ब्रह्माजी ने कहा कि—“मैंने ब्राह्मणों को वरदान दिया है कि तुम दो हाथवालोंके हाथ से न मारे जा सकोगे इसलिये किसी चार हाथवाले को पैदा करो।”
पितामहकी आज्ञा को माथे चढ़ाकर इन महर्षियोंने फिर उस द्रव्य से यज्ञ किया और उससे खलमदमंजन,धर्मरंजन, महाराज चाहुवानजी का जन्म हुआ। इनके चार हाथ थे इसलिये ये चतुर्बाहुमान कहलाये और इसीका भाषा में अपभ्रंश होकर “चाहुवान” नाम होगया।
कर्नल टाड साहिब चाहे इस कथाको काल्पनिक मानते हों परंतु उन्हें अग्निकुण्ड में से उत्पन्न होनेकी बात बनावटी मानने पर भी सारी कथा झूठी माननेका साहस नहीं हुआ है। उनके कथन से मालूम होता है कि उन्होंने चार पुरुषोंमें क्षत्रियत्वका प्रयोग करना माना है। खैर कुछ भी हो परंतु इन्हीं चारोंके वंशधर प्रतिहार, सोलंकी, पवार और चौहान कहलाते हैं।
इन चौहानोंकी वीरता का नमूना इसीसे समझ लीजिये और इसीसे एक चौहानको मूल कर हिंदू भारतका निश्चय होता है कि टाड साहिब जैसे विदेशी इतिहासलेखकने अपनी किताबमें लिखा है कि “अग्निकुलसे जो शाखायें निकलीं उनमें चौहान शाखा विशेष बलवती थी, एक समय चौहान इतने बलवान होगये थे कि उनकी प्रचण्ड वीरताके आगे भारतवर्ष भरके और राजपूतोंका गौरव...<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२०२
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/* अशोधित */ "{{blockcenter|'''यात्रा का दिग्दर्शन ।''' {{right|('''१७१''')}}}} स्नात बतरसी गिरनार की पुण्य भूमि में जाकर कृत कृत्य हुए । इन्होंने अपना जन्न सफल समझा । जीवन भर में कभी पाप न करने से इनके पुण..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter|'''यात्रा का दिग्दर्शन ।'''
{{right|('''१७१''')}}}}
स्नात
बतरसी गिरनार की पुण्य भूमि में जाकर कृत कृत्य हुए । इन्होंने
अपना जन्न सफल समझा । जीवन भर में कभी पाप न करने से इनके पुण्यपुंज की
वृद्धि हुई । वहां पांडव छत्री में गुप्त वन चढाकर इन्होंने अपस्मृति कुंड
किया और तत्र जूनागढ से चलकर माघ कृष्ण ३० को गोमती में जा स्नान
किया । उस समय आज कल की तरह रेल नहीं थी और सड़कें भी नहीं थीं,
तथापि केवल दो मास में इन्होंने इतनी बडी यात्रा कर ली । वहांसे ज्योतिर्लिंग के
दर्शन करके रामहङापुर होतेहुए माघशुक्ला ७ को नौका द्वारा '''द्वारका पहुँचे !'''
खोद्वार में स्नान किया, भगवान के दर्शन किये और चार दिन तक उस
: वित्र भूमि में निवास करके नाव द्वारा वहांसे प्रयाण कर गोपीतलाई में स्नान्द
किया । बस यहीं '''कावाजातिके''' डाकुओं से इनकी, जिसका वर्णन चौथे
अध्याय में टाउ साहब के आधार पर किया गया है, मुठभेड हुई।
केवल मुठभेड ही क्यों हुई कावापति नगमणि की आज्ञा से सैकडों काबों
इनकी '''मुट्ठीभर सेना''' को चारों ओर से इसतरह घेर लिया जिस तरह
बालक सूर्यको बादल ढांक लेते हैं अथवा जैसे अभिमन्यु को कौरवोंने घर
लिया था। वे लोग ऊँचे २ पहाड़ों पर चढकर इनपर बाणों की वर्षा करने लगे,
इनपर पर्वत के बडे २ पत्थर लुढका २ कर मारने लगे और गोलियों के ओलों से
इनके शरीर चटाचट घायल करने लगे । अतिवृद्ध होनेपर भी यह बहादुर थे,
और शत्रु सेना में घिरजाने पर भी यह हाडा थे । कायाओं ने इनसे बहुतेरा
कहा कि " अपने बूढ़े प्राणों को वृथा क्यों खोते हो, अपने पास का माल मता देकर
भाग जावो ।" परंतु वीर हाडा, अनेक लडाइयों में विजय पाने वाले, जयपुर
का पेट फाडकर बूँदी निकाल लेने वाले उम्मेदसिंहजी प्राणजाने तक भी
प्रणभंग करने वाले थोडे ही थे । चारों ओर से घिरजाने पर और शत्रु के हाथ में
पजाने पर हिम्मत टूटने के बदले इनका दूना साहस बढा । इन्होंने
अण वर्षा के बीच में, बाणों से, गोलियोंसे शरीर छिद २ कर चकनाचूर हो
गोली ऐसी मारी जिससे कावापति
गमणि का शरीर छिदगया । गोली उसे भेदकर दो और काबाओं को मारती हुई.
कल गई । नागमणि का चाचा इनके साथ के सरदार खैराडा के हाथ से मारा-
आने पर भी तककर एक ही<noinclude></noinclude>
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VishnudevButla
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter|'''यात्रा का दिग्दर्शन ।'''
{{right|('''१७१''')}}}}
स्नात
बतरसी गिरनार की पुण्य भूमि में जाकर कृत कृत्य हुए । इन्होंने
अपना जन्न सफल समझा । जीवन भर में कभी पाप न करने से इनके पुण्यपुंज की
वृद्धि हुई । वहां पांडव छत्री में गुप्त वन चढाकर इन्होंने अपस्मृति कुंड
किया और तत्र जूनागढ से चलकर माघ कृष्ण ३० को गोमती में जा स्नान
किया । उस समय आज कल की तरह रेल नहीं थी और सड़कें भी नहीं थीं,
तथापि केवल दो मास में इन्होंने इतनी बडी यात्रा कर ली । वहांसे ज्योतिर्लिंग के
दर्शन करके रामहङापुर होतेहुए माघशुक्ला ७ को नौका द्वारा '''द्वारका पहुँचे !'''खोद्वार में स्नान किया, भगवान के दर्शन किये और चार दिन तक उस
: वित्र भूमि में निवास करके नाव द्वारा वहांसे प्रयाण कर गोपीतलाई में स्नान्द
किया । बस यहीं '''कावाजातिके''' डाकुओं से इनकी, जिसका वर्णन चौथे
अध्याय में टाउ साहब के आधार पर किया गया है, मुठभेड हुई।
केवल मुठभेड ही क्यों हुई कावापति नगमणि की आज्ञा से सैकडों काबों
इनकी '''मुट्ठीभर सेना''' को चारों ओर से इसतरह घेर लिया जिस तरह
बालक सूर्यको बादल ढांक लेते हैं अथवा जैसे अभिमन्यु को कौरवोंने घर
लिया था। वे लोग ऊँचे २ पहाड़ों पर चढकर इनपर बाणों की वर्षा करने लगे,
इनपर पर्वत के बडे २ पत्थर लुढका २ कर मारने लगे और गोलियों के ओलों से
इनके शरीर चटाचट घायल करने लगे । अतिवृद्ध होनेपर भी यह बहादुर थे,
और शत्रु सेना में घिरजाने पर भी यह हाडा थे । कायाओं ने इनसे बहुतेरा
कहा कि " अपने बूढ़े प्राणों को वृथा क्यों खोते हो, अपने पास का माल मता देकर
भाग जावो ।" परंतु वीर हाडा, अनेक लडाइयों में विजय पाने वाले, जयपुर
का पेट फाडकर बूँदी निकाल लेने वाले उम्मेदसिंहजी प्राणजाने तक भी
प्रणभंग करने वाले थोडे ही थे । चारों ओर से घिरजाने पर और शत्रु के हाथ में
पजाने पर हिम्मत टूटने के बदले इनका दूना साहस बढा । इन्होंने
अण वर्षा के बीच में, बाणों से, गोलियोंसे शरीर छिद २ कर चकनाचूर हो
गोली ऐसी मारी जिससे कावापति
गमणि का शरीर छिदगया । गोली उसे भेदकर दो और काबाओं को मारती हुई.
कल गई । नागमणि का चाचा इनके साथ के सरदार खैराडा के हाथ से मारा-
आने पर भी तककर एक ही<noinclude></noinclude>
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VishnudevButla
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/* अशोधित */ "₹ १७२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | गया । वस इनके मारे जाते ही पहाडी लंगूरों की तरह लुटेरे काबा बेकाबू होकर भागगये इन्होंने जिन को मारा उनके शिर काट २ कर साथ लेलिये । इनका एक सिल..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>₹ १७२ )
उम्मेदसिंह चरित्र |
गया । वस इनके मारे जाते ही पहाडी लंगूरों की तरह लुटेरे काबा बेकाबू
होकर भागगये इन्होंने जिन को मारा उनके शिर काट २ कर साथ लेलिये । इनका
एक सिलहदार अमरा, इनका एक घोडा और इनका प्रधान खुशहालचंद्र सो-
नानी मारा गया । इनके सिवाय पांच सात आदमी घायल हुए । बस यह बेट
होकर रामहडापुर आगये । वहां के राजा ने जब इनसे बहुत बिनती की तब
. इन्होंने कात्राओं के कटे शिर उन्हें लौटादिये ।
इसतरह उस बार की लडाई अवश्य ही समाप्त होगई, परंतु आगे बढने पर फिर
कात्राओं ने इनका मार्ग रोकलिया । उस समय थोडी सी लडाई में दो आदमी
इधरके और एक उधरका घायल होने बाद नगमणि जो पहले घायल होकर
साग गया था पकडा गया । पकडे जाते ही वह श्रीजी साहब के पैरों में पड
गया । उसने हाथ जोडकर कहा :-
"महाराज, हमारे पुरखे इस जगह गांडीव धनुष त्राले अर्जुन को भी लूट चुके
हैं । किन्तु मैं आपकी शरण आया हूँ ।
1
"
(श्रीजी साहब ने उसे १०० ) और वस्त्र देकर उसका सत्कार किया क्योंकि
लुटेरा होने पर भी वह बहादुर था । उससे लिखवा लिया कि अब से
कोई भी कात्रा किसी भी यात्रीको न सतावैगा । बस वहां
चलकर नयानगर ( जामनगर ) के जाडेचा : यादव यशकरण जी राजा से
मिलते हुए संवत् १८३२ की चैत्र शुक्ला १ को बूँदी आपहुँचे । कुछ
दिन बडोदिये में विश्राम कर के रामनवमी के दिन केदारेश्वर के निकट
अपने निवास स्थान में प्रवेश किया। यहां पधारने के
अनंतर आपने बाग
कुंड और महल बनाने के लिये अपने पास से हजारों रुपया
खर्च करडाला ।
कात्राओं के विजय का जो वर्णन संक्षेप से टाड साहब ने किया है वही
कुछ विस्तार से "वंशभास्कर " में लिखा हुआ है । दोनों पाठकों के सामने हैं
केवल अंतर दोनों में इतना ही है कि टाड साहब ने यह बात विष्णुसिंहजी के
ही विराजने से पहले लिखी है और "वंशभास्कर" तथा "वंशप्रकाश" नामक ग्रं-
थों में बाद | मेरी समझ में यह घटना वाद की ही है और टाड साहब ने
-<noinclude></noinclude>
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VishnudevButla
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/* अशोधित */ "{{blockcenter|'''यात्रा का दिग्दर्शन {{right|( १७३ )}}'''}} इनकी यात्रा का वर्णन एक ही जगह किया है, इसलिये इसे भी उसी के शामिल करदिया है क्योंकि विष्णु सिंहजी को राज्य देते बाद जो इनकी यात्..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter|'''यात्रा का दिग्दर्शन
{{right|( १७३ )}}'''}}
इनकी यात्रा का वर्णन एक ही जगह किया है, इसलिये इसे भी उसी के शामिल
करदिया है क्योंकि विष्णु सिंहजी को राज्य देते बाद जो इनकी यात्रायें
हुई उनका भी टाड साहब ने अलग उल्लेख नहीं किया है । इस से मालूम
होता है कि टाड साहव ग्रंथ का संक्षेप कर के उसे रोचक बनाने के लिये
यात्रा संबंधी सब बातों को एक जगह लिख गये हैं । जिन दिनों यह यात्रा में थे
विष्णुसिंहजी के लिये जोधपुर से टीके का दस्तूर आया था ।
{{blockcenter|'''अध्याय ६.
बदरिकाश्रम की यात्रा |'''}}
बूँदी के सुप्रसिद्ध कवि सूर्यमल्लजी ने अपने ग्रंथ "वंशभास्कर'' में प्रसंग व
जयपुर उदयपुर के बिगाड बनाय की घटना का वर्णन करते हुए दो तीन
मयूख खर्च किये हैं। उन बातों का न तो श्रीजी साहब के चरित्र से संबंध है और
बूँदी के इतिहास से ही, इसलिये उनका यहां उल्लेख करने की कुछ आवश्य-
कता नहीं है परंतु वह इसी प्रसंग में एक बात ऐसी लिख गये हैं जिसका
इस चरित्र से संबंध न होने पर भी पाठकों के जानने योग्य है । मैं उसे अपने
शब्दों में न लिख कर कवि राजा सूर्यमलजी के वाक्य ज्यों के त्यों उद्धृत
करदेना उचित समझता हूँ । वह लिखते हैं कि :-
“संवत् के एक ऊन बीसम शतक समै कतिकगये रुभये देखो नये राज्य कति !.
पुण्यापुर, राघोगढ, सोपुर नलपुरादि ऐसे बड़े छोटे बने बिगरे प्रमत अति ।
लवपुर अलवर ज्यों ही टौंक जावरा रु पट्टनि, पुरोग यों नये के भये भूमिपति ।
उक्त काल नाव प्रताप इनही में राह, मिच्छन को वंचि के महीप बन्यो छद्ममति ॥
अल्प ग्रास याके पहिले हो मंचहेरी आदि, ताने देशकाल छलबल के सहाय तब !
जोर लहि छोटे बडे बावन गढन जीति,स्त्रीय कीन्हों दिल्ली सन दक्षिण प्रदेश सब।”
कवि राजा सूर्यमल्लजी के उक्त पद्य का मतलब यही है कि विक्र-
मादित्य की उन्नीसवीं शताब्दी में '''पूना''' का राज्य बिगड गया, रावव.
अहं बिगड गया, '''शिवपुर''' बिगड गया, '''नर वर''' बिगड गया और<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२०५
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VishnudevButla
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/* अशोधित */ "( १७४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | इसी तरह छोटे बडे अनेक राज्य बिगड गये । उक्त शताब्दि में लाहोर का नया राज्य स्थापित हुआ, अलवर हुआ, टोंक हुई, जावरा हुआ और झालावाड हुआ । जयपुर के..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>( १७४ )
उम्मेदसिंह चरित्र |
इसी तरह छोटे बडे अनेक राज्य बिगड गये । उक्त शताब्दि में लाहोर
का नया राज्य स्थापित हुआ, अलवर हुआ, टोंक हुई, जावरा हुआ
और झालावाड हुआ । जयपुर के आश्रित नरूका प्रताप सिंहजी ने छलबल
से दिल्ली, जयपुर और भरतपुर के परगने दबाकर दिल्ली से दक्षिण के प्रदेश
में अपना राज्य स्थापन करलिया । यही उस समय के रजवाडी इतिहास
का सारांश है । इस चरित्र से इस बात का संबंध न होने पर भी
मैंने समय का दिग्दर्शन कराने के
लिये यहां लिख दिया है । इसी वर्ष
में जयपुर से विष्णुसिंहजी के लिये राजतिलक का दस्तूर आया ।
द्वारका की यात्रा से लौटकर श्रीजी साहब ने बूंदी में केवल इसी लिये विश्राम
किया कि भाई सुखरामजी अधिक वीमार होगये थे । उन्होंने इनके सिवाय
दूसरा ऐसा कोई आदमी न देखा जिसके भरोसे यह . बूँदी राज्य को, बालक
नरेश को छोड जाते । धाभाईजी के आरोग्य होनेपर ठीक एक वर्षके विश्राम
के बाद इन्होंने संवत् १९३२ की चैत्र कृष्णा ६ को बदरीनारायण
की यात्रा के लिये प्रस्थान किया । द्वारका पधारते समय पहले जैसे जोधपुर
राज्य बीच में था वैसे इसबार जयपुर नगर आडे आया । इनके आगमन की
खबर जान जयपुर नरेश प्रतापसिंहजी नियत स्थान तक इनकी पेशवाई
के लिये आये । उन्होंने इनको अपने यहां लेजाकर बहुत बढकर सत्कार
किया । हाथी, घोडे, वस्त्र, शस्त्र, आभूषण भेंट किये । श्रीजी साहव अव राजा
नहीं थे, अब वह सब कुछ छोड़ चुके थे और अब वह राजर्षि थे इसलिये
उन्होंने इस भेट में से जयपुर नरेश के सम्मान के लिये एक कटार रखकर
शेष सब लौटा दिया | कुछ दिन वहां रहकर चैत्र शुक्ला ६ को वहांसे विदा हुए।
वहां से चल कर जन आप अचरोल पहुंचे तब वहां के
अधीश ने श्रीजी साहब से कहा:-
" आप इधर जनाने को लेकर पधारे तो हैं परंतु आजकल इस ओर उपद्रव
अधिक है इस लिये आपने यह काम अच्छा न किया "
इसपर श्रीजी साहव बोले:--
“नहीं मुख्य रानियां साथ नहीं हैं । उन्हें वहीं छोड आया हूँ । साथ में
कुछ दासियां आगई हैं। अब उन्हें लौटाकर तीर्थ लाभसे वंचित नहीं कर<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "(१०२) यात्र का हिग्दर्शन् । -कता । श्योंक्ि मने उनको बचन् दँडिया है । अब् तो जो क्रुछ कहदिया नर्वाह करूंगा । तीसरा आाश्रम ्रहण करने पर भी क्षत्रियबर्ण कर ८८ समान मने नह..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>(१०२)
यात्र का हिग्दर्शन् ।
-कता । श्योंक्ि मने उनको बचन् दँडिया है । अब् तो जो क्रुछ कहदिया
नर्वाह करूंगा । तीसरा आाश्रम ्रहण करने पर भी क्षत्रियबर्ण कर
८८
समान मने नहीं छोड़ा है । उदि मार्ग में किसी से लड़ाई होगी तो मररैं
८ गा
११
२ मर
अक्गेलसे ब्विदा होकर कोट प्रतली और रिवाड़ी होते
हर बहाडरड
ग्ये । शहां के नच्ाब ताज मुहम्मदखां ने इनकी विधिवत् भगवानी और
इतिथ्य करके नजरें की । इन्होने नजर न रक्खी तत्र उसने भी बही बात कही
जो अचरोल के ठकर ने कही थी और बिशेष यह कहा कि---
इन दास्यों क्े यहां छोउ जाइये ।
एरन्त् ल्स बत क्ो श्रीजी साहब ने स्त्रीकार न किया । बढ़ बहां से चलकर
शगक्ती यमुना में स्नान करते पंजाव के सामलीशहर क अधीश हीरा-
ज्िहजी सिक्ख क्रा आदर सत्कार प्रहण करते हरदार के निकट चालापुर
जा पह्ुचै । बहां से हरदार-हृषीकेश जाकर उन्होंने रय, बोड़, पालकी आदि
सबारियो क्ो बही छोड़ दिया औओर आगे क्ंपान में बठकर फहाड़की चढ़ाई
बरंम क ।
इ्स यात्रा में चालापुर से हरिद्वार, ओडारक, करखग, हृषीकेश, तपोव्न,
ङ्वपुरी, हुंगरगढ़, ब्राह्मण कोटी, बद्ी खोह, मनमंग, राज्य खाब, त्रिधारा
द्विबारा संगम, देवप्रयाग, मागीरयी, अलकनदा संगम और रानीबाग में मु-
कम करते इ्न तीरयों के दर्शन करते तया स्तान करते प्रीनगर पडारे । मार्ग
के दो तीन जगह ब्रलो पर चढ़कर नदियो के पार हए । जिस समय रानीबाग
रहुंचे श्रीनगर नरश ललितसाहजी ह्है लेने के ल्ये आये और
आकर श्रीनगर लिबा छगये । इ्न्होने पहले ही से श्रीनगरनरेश से कहलर
द्विया या कि हमारी पेशबाई न हो और न हमारी ताजीम की जाय
श्योंकि हम यात्री है, ह्म बानप्रस्य है और अब हम राजा नही
ई श्रीनगर नरेश ने ये सब बाते मान तो ली पर्तुं सत्कार बैसा ह
क्कया जैसा एक राजा का, राजर्षिं का और महात्मा का करना चाहिये १
श्ीनगर से चलकर अलकनंदा का बूले दारा बल्लघन करते हए आगे ब्हना<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "( १७६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | चाहते थे, स्त्रियां पार भी होगई थीं परंतु जिस समय पुरुष झूले पर चढे झूला टूट गया और सब लोग गिरते २ बच्चे । कुशल हुआ कि साथ के आद मियों ने झूले की..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>( १७६ )
उम्मेदसिंह चरित्र |
चाहते थे, स्त्रियां पार भी होगई थीं परंतु जिस समय पुरुष झूले पर चढे झूला
टूट गया और सब लोग गिरते २ बच्चे । कुशल हुआ कि साथ के आद
मियों ने झूले की रस्सी पकड़ ली । वहां से उदक ओघ, भरदार, मलय कोटि, --
चंद्रपुर, गुप्तकाशी, नारायण कोटी, गणेशकोटी, त्रियुगीनारायण, झलमल
पटना, मुंडकट, गौरीकुंड, भीमआडोरक और केदार गंगा होकर यहां फिर
झूले द्वारा गंगा पारकर केदारेश्वर पहुँचे । वहां भगवान भूतभावन केदार
नाथजी के दर्शन किये । यहां हिमालय पर्वत के बर्फ समुदाय में, बर्फ के ढेर में
सत्रह आदमियोंने घुस कर शरीर छोड दिये। मेवाड के एक सीसोदिया
सरदार और बूंदी राज्य के अंतर्गत वांसी के एक ब्राह्मण आदि सब को इन्होंने
बहुतेरा निषेध किया, बहुत कुछ समझाया बुझाया परंतु उन्होंने एक ढ
सुनी और मुक्ति पाने के लोभ से इन सब ने संदेह बर्फ में बैठकर
प्राण देदिया ।
भगवान केदार नाथजी के दर्शन से आनंद पाय अब उन्होंने बदरी नारा-
यण पवारने के लिये वहां से प्रयाण किया । वहां से भीम ओडार, झलमल
पटना हो, झूले पर चढ राजाकोटि गये । वहां से गुप्त काशी, धर्मशाला, तुंगेश,
ब्राह्मण कोटी, अलकनन्दा, पित्थल कोटी, गरुड गंगा, जोशीमठ और विष्णु
प्रयाग गये । यहां फिर झूले द्वारा अलकनंदा उत्तरे । इसके आगे ध्रुवछुरिका
और असिधारा को उतरना पडा । वहांसे कल्याण कोटी गये । आगे फिर
अलकनंदा को पार कर के बदरिकाश्रम पहुंचे । वहां पांच दिन
निवास कर भगवान् का दर्शन किया । वहांसे लौटने पर पंडकेश्वर, जोशीमठ
गुलाब कोटी, पीपल कोटी, गरुडगंगा, वैरागी कोटी, कर्णप्रयाग, शिवकोटी
और राजाबाग होकर श्रीजी साहव श्रीनगर पधारे। वहां के राजा ने इन
जैसे महात्मा राजर्षिकी अभ्यर्थना करके बडा ही आनंद लूटा। वहां से चलकर
देवप्रयाग और राजा खाल होकर हृषीकेश पधार आये । यहां से अपने रथ
चोडे साथ लेकर गंगालक्कड घाट जाने के लिये कनखल गये । वहां से गंगा-
जी को पार करने में बारह दिन लगे । वहां से चलकर जयपुर के राज्य में
होते हुए उणियारे की सीमा में पधारे आप वहां न पधारते परंतु बीच
.<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "यात्रा का दिग्दर्शन । ( १७७ ) ही में से नारी रोककर उणियारा नरेश सरदार सिंहजी इन्हें ले गये । यह उणि- चारे तो न गये परंतु दो घडी नगर में ठहर कर उनका संतोष किया । वहाँ से चलक..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>यात्रा का दिग्दर्शन ।
( १७७ )
ही में से नारी रोककर उणियारा नरेश सरदार सिंहजी इन्हें ले गये । यह उणि-
चारे तो न गये परंतु दो घडी नगर में ठहर कर उनका संतोष किया । वहाँ से
चलकर संवत् १८३३ की भाद्र कृष्ण १० को श्रीजी साहब कुशल मंगल से बूँदी
आ पहुंचे। यहां के राजा ने, राजकुटुंब ने, प्रजा ने और परिजनों ने आपका दर्शन
किया । दर्शन करके सब लोग कृतकृत्य हुए । सत्र ने आपके चरण छुये
और सबको ही आपने तीर्थ का प्रसाद दिया आशीर्वाद दिया ।
1
श्रीजी साहब उत्तर यात्रा के लिये बूँदी से प्रयाण करने पूर्व ही जिस तरह
प्रबंध कर गये थे उसी तरह महाराव राजा विष्णुसिंहजी का केवल चार
वर्ष की उमर में बीकानेर नरेश गज सिंहजी की चार हीं वर्ष की कन्या पत्रकुंब-
रिजी से विवाह हुआ ।
इस अध्याय में मैने श्रीजी साहब की उत्तर यात्रा का उल्लेख करते हुए उस
ओर के प्रायः सब ही तीर्थों के नाम लिख दिये हैं । ऐसा करने से विस्तार
अवश्य हुआ है परंतु मैंने ऐसा इसलिये किया है कि पाठकों को एक ही स्थल
पर उस ओर के तीर्थों के नाम मिलजायँ । और साथ ही यह भी विदित हो
कि जब रेल नहीं थी और जब सडकें नहीं थीं तब लोग किस मार्ग होकर
बदरीनारायण जाया करते थे ।
अध्याय ७.
रामेश्वर की यात्रा |
श्रीजी साहब सचमुच ही बडे यात्रा प्रिय थे। पहले राज्य लेने के
उद्योग में, फिर राज्य रक्षा के प्रयत्न में और अंव तीर्थ सेवन के लिये इनका
सारा जीवन यात्रा हीमें बोला । यदि हिसाब लगाकर देखा जाय तो
इनकी उमर का आधे से अधिक हिस्सा यात्रा में निकला होगा । यह
राजधानी में रहे थोडे और फिरने डौलने में अधिक । इन्होंने फिरने ही से
राज्य पाया और फिरने ही से मोक्ष | बदरीनारायण की एक वर्ष पांच मास
तक बडी लंबी चौडी यात्रा करके, इस यात्रा के अनेक कष्ट सहने पर भी इन्होंने
१२<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "( १७८) उम्मेदसिंह चरित्र | | बूँदी में रहकर अधिक समय तक विश्राम न लिया । विश्राम क्यों लेते ? यह विश्राम लेने के लिये, सुख भोगने के लिये जब पैदा ही नहीं हुए थे, जब यह कर्तव्य..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>( १७८)
उम्मेदसिंह चरित्र |
|
बूँदी में रहकर अधिक समय तक विश्राम न लिया । विश्राम क्यों लेते ?
यह विश्राम लेने के लिये, सुख भोगने के लिये जब पैदा ही नहीं हुए थे, जब
यह कर्तव्य के अनुचर थे, जब अपना कर्तव्य पालन कर बूँदी का उद्धार.
करना, प्रजा का कल्याण करना और इस पुण्य से परलोक का मार्ग स्वच्छ
करना ही इनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था तब इन्ह विश्राम कहां ? बदरी
नारायण की यात्रा से लौटकर केवल साढे सात मास बूँदी में रहे । इतने
समय तक यहां रहकर भी इन्होंने चैन न लिया । इस अवसर में प्यारी बूँदी
के प्रबंध को संभाला, पौत्र के पठन पाठन की, शिक्षा की जांच की,
राज्य प्रबंध की विगडी बातों को सुधारने का काम किया और जब इन कामों
से छुट्टी पाई तव ही रामेश्वर की यात्रा के लिये चल दिये ।
श्रीजी साहब ने इसतरह संवत् १८३४ की चैत्र शुक्ला को बूँदी से दक्षिण यात्रा
लिये प्रयाण किया । आप बूँदी से विदा होकर केशवराय की पाटन होते हुए
उज्जैन पधारे। वहां दत्त के अखाडे में डेरा दिया, क्षिप्रा नदी में स्नान किया,
वहां पर श्राद्ध किया और ब्राह्मणोंको भरपूर दान दक्षिणा दी । जिस समय यह
दत्त के अखाड़े में थे वहां के संन्यासियों को मारने के लिये चार हजार
वैरागी उनपर चढ आये । इस बात से घबडाकर संन्यासी लोगोंने श्रीजी
साहब की शरण ली। उन्होंने हाथ जोडकर - बहुत
कर कहा :-
कुछ
गिडगिडा
" श्रीमान् हम आप की शरण आये हैं । आप इन बैरी वैरागियों से हमारे
प्राण बचाइये । हमें थोड जान कर ये लोग हमपर चढ आये हैं। यदि आप
हमारी रक्षा न करेंगे तो हम विना बात मारे जायेंगे ।"
इनकी गिडगिडाहट सुनकर करुणानिधान श्रीजी को करुणा आगई । आपने
संन्यासियों को अभय देकर वैरागियोंको ललकारा । इनकी ललकार से और
इनके सिंह गर्जन से शस्त्रधारी वैरागी ऐसे भागे जैसे बनराज सिंह के गर्जन
से भेडों का झुंड भागता है अथवा जैसे सूर्य नारायण के उदय होते ही बादल
विखर जाते हैं । इस प्रकार वैरागियों को भगाय संन्यासियों की प्राण
रक्षाकर उन्हें प्राण भिक्षा देने के बाद श्रीजी साहब श्रीरामेश्वर की<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "(१०२) त्रका दिग्दर्शन । गये, वहां दर्शनों का लाभ ल्या, यात्रा क लिये आगे बढ़े यह रानेभ्व अपने जने कृत कृत्य किया और तेरह मास की यात्रा कर ब्रंदी को लौट आयेो इन उत्र में इ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>(१०२)
त्रका दिग्दर्शन ।
गये, वहां दर्शनों का लाभ ल्या,
यात्रा क लिये आगे बढ़े यह रानेभ्व
अपने जने कृत कृत्य किया और तेरह मास की यात्रा कर ब्रंदी को लौट आयेो
इन उत्र में इन्होंने किस २ तीर्थ का अवनोकन किया यह कहां २ क्त २
गवे सो वंश मास्कर' में कविराज सूर्य मह्जी ने नहीं लिखा है । वह
लिखते कहां ते उन्दे मिला ही नही है क्योंकि वह स्वय लिखते हैं कि --
यात्रा यह कीनी ताको प्रतिदिन अत्र क्रम,
लेखित न जान्यों यातै वरन्यों समास लाइ ।
श्रीजी साहब के रामेधर की यात्रा से लौटने के अनतर इन्हीं की सम्मति
से महाराव राजा बिष्
हजी ने स्वत् १८४२ की मार्गशीर्ष कृष्ा
२ को करोली पघार कर अपने तेरह वर्ष के बय में करौली नरेश माणिक्य-
याकजी क्री कन्या अमृत क्रँवरिजी से अपना ह
बि
केयर
और सवत् १८४६ की आन्विन शुङ्गा १ बुधवार को श्रीजी साहब ने
ऊशपुर लरेश महाराज प्रताप सिहजी को अपने भाई दीप सिहजी को
त्री विचित्र कँवरिजी बिाह दी । इससे पूर्व श्रीजी साहव की सव रानि-
रें का स्वर्गवास होचुका था इसलिये इन्होने भाई दीप सिंहजा के ही हाय
से प्रताप सिहजी को कन्या दान दिलवाया । वरात के सकार में, प्रजा के
सम्मान में उस समय ज्योंनार ऐसी भारी हुई कि गढ़के फकाटक से लेकर
नगर के दक्षिण फाटक तक लोगो क भीड़ से नगर खचा खच मरगया ।
कविराजा सूर्यमलजी लिखते ह कि बी, खांड, और चांवल का सारे बाजार
भर मं कीच मचगया । इस विवाह के वहत ही थोड़े दिन बाद जयपुट
नरेश का अलवर राज्य सं बोर संप्राम हुआ । इसमें श्रीजी साहव ने वृँदी
ज्य की ओर सं जयपुर की सहायता के लिये विनय सिहजी को भेजा और वह
इसी युद्धमें काम आये ।
इसके बाद दो बर्ष तक बृँदीमें क्या हुआ सो लिखने योग्य नहीं है । साधा-
रण घटनाओं का उलेख करके प्रंयका विस्तार करना मुझे इष्ट नहीं है परंतु इस
चरित्र की घटनाओं का भारतवर्ष की विशेष घटनाओं सें मिलान कराने के<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "( १८० } उम्मेदसिंह चरित्र | लिये यहां एक बात लिखना आवश्यक है । वह यही कि संवत् १८४८ में दक्षिण में टीपू सुलतान से अंगरेजों का युद्ध हुआ था । एक ही मुठमेड में टीपू भाग गया औ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>( १८० }
उम्मेदसिंह चरित्र |
लिये यहां एक बात लिखना आवश्यक है । वह यही कि संवत् १८४८ में
दक्षिण में टीपू सुलतान से अंगरेजों का युद्ध हुआ था । एक ही मुठमेड में
टीपू भाग गया और उसका पिता, मैसूर का मंत्री हैदर अली मैसूर का आप
राजा बन बैठा । मुझे केवल समय का मिलान कराने के लिये संकेत मात्र करने की
आवश्यकता थी सो करदिया । मैसूर राज्य के तिहास रे न तो इस चरित्र -
का कुछ संबंध है और न बूँदी राज्य से । इसके सिवाय यह संकेत भी
केवल“ वंश भास्कर" के आवार पर किया गया है । उन्होंने लिखा है कि:--
"याही १८४८ उक्त संवत में दक्षिण प्रदेश इत
टीपू सुलतान अंगरेजन के त्रास डार,
युद्ध पहले ही में भज्यो शठ कहाइ जित
हैदरअली जो महिसूर मंत्री हुतो,
होजक टीपू को सु स्वामी को विगारि हित,
आप घरजोर महिसूर को वन्यो अधिप
चाल्यो मन माग त्यों गिनै न उचितानुचित,
किंवदंती जानै क्रिस्तान पकरे कहत
छ: अयुत ६०००० प्रान तिन में चतुर्थ १५००० छोरि,
क्रूर खिल पैंतालीस सहस ४५००० करे कतल,
वैरी सम भास्यो जो दया को अघ सिंधु बोरि,
ताके सुत टीपू भो कहायो सुल्तान तिम,
जो श्रीरंगपट्टन में राज धानी निज जोरि,
सो सुशक उक्त १८४८ बहकायो फरासीसन को,
शत्रु कंपनी को सियो मृध तैं तुरंग मौरि ।"
मैने उक्त पद्य इसी लिये लिख
महजी के कथन का भारतवर्ष के
पैंतालीस हजार सेना कतल होने की
दिया है कि इतिहास जानने वाले सूर्य-
इतिहास से मिलान करलें । इन्होंने
जो घटना लिखी है वह विचारणीय है ।
यदि यह सत्य हो तो वडी भयानक है । कुछ भी हो परंतु जब इस बात का इस<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "दादा नाती का मन मुटाव । (१८१ ) चरित्र से कुछ भी संबंध नहीं है और जब मैंने यह बात इस जगह केवल प्रसंगो दिखी है तब मुझे इस विषय की इस समय खोज करने की भी आवश्य- कता नहीं है । और न..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>दादा नाती का मन मुटाव ।
(१८१ )
चरित्र से कुछ भी संबंध नहीं है और जब मैंने यह बात इस जगह केवल प्रसंगो
दिखी है तब मुझे इस विषय की इस समय खोज करने की भी आवश्य-
कता नहीं है । और न मैं इस बात की खोज करके, इस विषय
में इस चरित्र के पृष्ठ रंगकर अपनी लेखनी को विषयान्तर में लेजाना
चाहता हूँ ।
आगामी अध्याय से पाठकों को विदित होगा कि किस
तरह बूँदी में
दादानाती का वैमनस्य हुआ, किस तरह इस मन सुटाव का सूत्रपात
ger और क्योंकर इसका अंत हुआ ।
अध्याय ८
झाला का चक्र ।
दादानाती का मनमुटाव ।
।
उम्मेदसिंहजी जैसे अनुभवी राजर्षि की आज्ञा से धाभाई सुखरामजी जैसे
अनुभवी कामदार के निरीक्षण में चाहे महारावराजा विष्णुसिंहजी की शिक्षा
दीक्षा अच्छी हुई थी । उन्हें उस समय के उपयोगी सब ही राजोचित काम
सिखाये गये थे । वह घोडे की सवारी में वडे चतुर थे, वह शस्त्र विद्या में
बहुत निपुण होगये थे, वह शिकार खेलने में बड़े नामी थे, वह शास्त्र से भी
खूब परिचित थे और वह राजकीय काम काज भी अच्छी तरह समझलेते थे
परंतु जवानी का जोर था, माता की गोदी में दूध पीते २ ही
राज्य मिलगया था राजर्षि उम्मेदसिंहजी तीर्थ यात्रा में अपना अधिक
समय विताने के कारण उनपर विशेष दवाव नहीं डाल सकते थे और
।
भाई जी बूढे और अनुभवी होने पर भी नौकर थे । बस इस लिये समझ
लेना चाहिये कि विष्णुसिंहजी उतने ही स्वतंत्र थे जितना मृगराज
सिंह स्वतंत्र होता है । उनके कामों में किसी की रोकटोक न थी । ऐसी<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "( १८२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | दशा में किसी राजा को बनाना बिगाडना उन्हीं लोगों के हाथ रहता है जो आठ पहर उसके पास आते जाते हैं। किसी को हजार अच्छी शिक्षा मिली- हो परंतु पास के..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>( १८२ )
उम्मेदसिंह चरित्र |
दशा में किसी राजा को बनाना बिगाडना उन्हीं लोगों के हाथ रहता है जो
आठ पहर उसके पास आते जाते हैं। किसी को हजार अच्छी शिक्षा मिली-
हो परंतु पास के रहने वाले यदि राजा को उलटे रस्ते चलाना चाहें तो उस
शिक्षा का कुछ असर नहीं होता । सच पूछो तो विद्या गुरुओं की
अपेक्षा ये ही लोग राजा के हजार गुरुओं के एक गुरु हैं, ये ही पूरे गुरु घंटाल
है। बस इसी तरह का एक गुरु विष्णुसिंहजी को भी मिलगया । उसने
इनको बिगाड कर किसी तरह के दुराचार में प्रवृत्त न किया, किसी
कुसंग में न डाला परंतु एक ऐसा काम करदिया जो इससे भी बढकर
कहला सकता है । उसने श्रीजी साहब जैसे प्रतापी, जगद्वंद्य महात्मा के
साथ, पिता के पिता के साथ, बूँदी के उद्धारक के साथ और अपने सच्चे प्रति
पालक के साथ विष्णुसिंहजी का मन मुटाब करादिया । जिन श्रीजी
साहब ने विष्णुसिंहजी को पाल पोस कर बडा किया था उन्हीं के साथ
विरोध करने की बुनियाद डाली । एक दिन महाराव राजा विष्णुसिंहजी को
नाथावत हम्मीरसिंहजी ने श्रीजी साहब की इच्छा के विरुद्ध समझाया कि:-
" आप राजा हैं, स्वतंत्र |
काम के रोकने की किसी में
जालिमसिंहजी झाला की
आप जो चाहे कर सकते हैं । आपके किसी
शक्ति नहीं है । आप कोटे के कामदार
कन्या से विवाह कर लीजिये । वह कहने
के तो कामदार है परंतु सच पूछो तो कोटे के राजा ही हैं। उनसे सितारा
और दिल्ली जैसे बडे २ राज्य डरते है और उनसे मेल रखने में अपना कल्याण
समझते हैं इसलिये उन्हें श्वशुर बनाकर मतलब गांठिये । "
इस बात की जब श्रीजी साहव को खबर हुई तब उन्होंने बहुतेरा समझाया
बुझाया, बहुतेरी नीच ऊंच दिखलाई, बहुतेरा कहा कि - " वह शक्तिमान् होने
पर भी हमारे छुटभैया का कामदार है । उसकी लडकी से विवाह करने में
हमारी शोभा नहीं है क्यों कि विवाह और वैर वरावर वालों ही के साथ अच्छा
होता है" परंतु विष्णुसिंहजी ने अनुभवी दादा की उचित बात
पर बिलकुल ध्यान न दिया । इन्होंने काम वही किया जो उस समय मंथर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२१४
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2026-06-16T09:37:43Z
VishnudevButla
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/* अशोधित */ "दादा नाती का मन मुटाव | ( १८३ ) बनकर नाथावत सरदार ने इन को सिखाया था । राजा दशरथ का घर कोडकर भगवान रामचंद्रजी को बनवास कराने का कारण जैसे दासी मंथरा बनी थी वैसे ही दादा नात..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>दादा नाती का मन मुटाव |
( १८३ )
बनकर नाथावत सरदार ने इन को सिखाया था । राजा दशरथ का घर
कोडकर भगवान रामचंद्रजी को बनवास कराने का कारण जैसे दासी मंथरा
बनी थी वैसे ही दादा नाती में बिगाड करा देनेका कारण हम्मीरसिंह-
जी बने । उन्होंने विष्णु सिंहजी के कान पहले ही इतने भरदिये थे जिससे
श्रीजी साव के हितवाक्य भी इन्हें अहित जान पडे । यद्यपि दादा के संकोच
से नाती ने उन के उचित उपदेश का टेढा उत्तर न दिया परंतु किया वही
जो इनको एक घरफोडन ने सिखाया था । इस तरह इन्हों ने दादा की इच्छा
के विरुद्ध कोटे के कामदार, बूँदी के छुट भैया राज्य के दीवान झाला जालिम
सिंहजी की कन्या से संवत् १८९० में विवाह किया । विवाह नांते में
आषाढ शुक्ला १० को हुआ । इन झाली रानीजी का नाम अजब कुंवरजी
था । यद्यपि जालिम सिंहजी ने दहेज में खूब मालताल दिया, हाथी, घोडे,
शस्त्र, वस्त्र, आभूषण आदि खूब सामान दिया और बूँदी तक दामाद को
पहुंचाने आये परंतु चुपचाप अपने आदमियों को राज काज में बुझेंड
दिया । यह बात इतिहास प्रसिद्ध है कि जालिमसिंहजी बडे जोरावर थे
बडे राजनीतिनिपुण थे, अंगुली पकडते पहुंचा पकडने वाले थे और बडा
ही दवदवा रखते थे । इस कारण भी उनका बूँदी से संबंध होने में श्रीजी
साहब अपनी प्राणप्रिया : बूँदी का कल्याण नहीं समझते थे परंतु उनके
मन का विचार मन ही में रहगया और पौत्र ने पितामह की इच्छा के विरुद्ध
कुचक्र में पड़कर दुष्टों के बहकाने से विवाह कर लिया, विवाह क्या करलिया
एक आपदा मोल ले ली। इसका परिणाम तो पाठकों को आगे चलकर
चिदित होगा हो परंतु इस मनोवेदना के समय
श्रीजी साहब के लिये एक
राजा विष्णुसिंहजी की
बडे आनन्द की बात यह हुई कि महाराव
पहली महारानी, बीकानेर नरेश की पुत्री राठोडजी के गर्भ से इसी
वर्ष महाराज कुमार इन्द्रसिंहजी का जन्म हुआ । श्रीजी साहब इस उमर
तक सब ही तरह के सुख दुःख देख चुके थे परंतु प्रपौत्रका मुख देखना
बडे भारी पुण्य का फल है । प्रपौत्र होने पर हिन्दुओं में वडा उत्सव होता है ।
इस उत्सव पर परदादा सोने की सीढी पर चढता है । बस श्रीजी साहब<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "( १८४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | के पुण्य से - प्रताप से उनकी भगवान ने यह भी इच्छा पूर्ण की। ऐसा शुभ अवसर जब साधारण लोगों को भी हजारों में, लाखों में एक दो को मिलता है तंव राजाओं..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>( १८४ )
उम्मेदसिंह चरित्र |
के पुण्य से - प्रताप से उनकी भगवान ने यह भी इच्छा पूर्ण की। ऐसा शुभ
अवसर जब साधारण लोगों को भी हजारों में, लाखों में एक दो को मिलता है
तंव राजाओं में कहां ? परंतु श्रीजी साहब वास्तव में पुण्यात्मा थे और
तपस्वी थे, जो उन्हें ऐसा सौभाग्य प्राप्त हुआ ।
इस तरह एक हर्ष और एक दुःख को तराजू पर तौलने पर दोनों को बराबर
पाकर श्रीजी साहब पौत्र से उदासीन होगये । इसी अवसर में अर्थात् संवत्
१८५२ में उन्होंने श्रीजगदीशकी दूसरी बार यात्रा की । यह चारों
धामों की यात्रा तो पहले ही कर चुके थे । यह पहले श्रीजगदीश के
दर्शन कर आये थे, द्वारका परस आये थे, बदरीनारायण हो आये थे और
रामेश्वर भी दरस आये थे परंतु प्रथम यात्रा में जो तीर्थ रहगये थे उन्हें आप
ने इस बार आते और जाते परस डाला । यह यात्रा से निवृत्त होकर जब
काशी आये तब पौत्र ने दो कर्मचारियों को भेजकर उनसे कहलाया:-
ra आप बूँदी न पधारिये । आप काशी ही में निवास कीजिये ।
आपके खर्च के लिये पांच सो रुपया नित्य वहां बैठे ही पहुंच जाया करेगा"
पौत्र का ऐसा संदेशा सुनकर पितामह को कैसा दुःख हुआ होगा सो
वट घट व्यापी नारायण जानता है । जिस वृक्ष को आंधी से, पाले से,
मेह से, धूप से और लू से बचाकर फल फूल पैदा किये तथा पैदाकरके जिनका
स्वाद आप चखने के बदले पुत्र पौत्र को चखाया, उसी के दर्शन करने से
रोकना कितना दुःखदायी होसकता है परंतु इन्हें बूँदी आने से किसी
शत्रुने नहीं टोका था । यदि कोई वैरी इनका अवरोध करता तो
यह तुरंत उसकी गर्दन पकड़कर चार चपत जमादेते । जब उन्हें बूँदी
हाथी के पेट में से निकालने में देर न लगी तत्र अपनी रक्षित, बूँदी को
अब दुशमन से छीनने में इन्हें विलंब ही क्या था परंतु दादा से रुष्ट होजाने
पर भी विष्णुसिंह जी इनके आत्मज के आत्मज थे। बाप बेटे की, स्त्री
पुरुष की, दादा नाती की लडाई शत्रुता नहीं है । यह एक प्रकार का प्रेम
कलह है । प्रेमकलह में समय २ पर आनंद भी होता है और दुःख भी होता<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "5 दादा नाती. का मत मुटाब । ( १८५) है । प्रेम कलह के आनंद में दुःख और दुःख में आनंद है । जो सिंह अपने पंजोंसे और अपनी डाढों से शिकार का विदारण करता है वही उन दांतों, उन पंजों स..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>5
दादा नाती. का मत मुटाब । ( १८५)
है । प्रेम कलह के आनंद में दुःख और दुःख में आनंद है । जो सिंह अपने
पंजोंसे और अपनी डाढों से शिकार का विदारण करता है वही उन दांतों, उन
पंजों से अपने बच्चों का प्यार करता है । उन्हें गुर्राने पर पुचकारता है और मुंह
से पकडने पर भी फाडता चीरता नहीं है । जिन लोगों को पति पत्नी में प्रेम
कलह देखने का और अनुभव करने का अवसर मिला है वे जानते हैं कि पत्नी
के रूठ जाने पर उसे मनाने में और उसका मान देखने में दुःख के भीतर
कसा आनंद होता है । दादा नाती के मनमुटाव में यद्यपि दम्पती का सा
प्रेमकलह नहीं होसकता है परंतु दादा का और पिता का, जो पुत्र पर
स्नेह होता है वह अपने ढंगका आप ही है और इसलिये इन दोनों का
प्रेम कलह भी अपना जोडा नहीं रखता था । वस इसी का विचार करके
श्रीजी साहब ने पौत्र के होनहार संकटों की चिंता करके उन्हें आप-
त्तियों में से बचाने की मंत्रणा करने के लिये कुछ काल तक काशी में
/ निवास किया । जो लोग यात्रा में इनके साथ थे उनसे उन्होंने बहुत
याग्रह के साथ कहा:-
25
जब राजा की ऐसी आज्ञा है तब मैं यहीं रहूँगा किन्तु तुम लोगों को घर
छोडे बहुत समय होगया है इसलिये तुम बूँदी जाकर अपने २ बालबच्चों से
मिलो । मेरे लिये जैला घर है वैसा ही बन है । मैं जब संसार छोड
चुका और राज्य छोड चुका तब मुझे क्या है ? "
।
1
श्रीजी की इस आज्ञा से कईएक घर गये किन्तु आप के गुरु ने कहा कि
भिक्षा मांग कर भी हम आपका साथ न छोडेंगे । खैर आपसे लखनऊ के
नवाब ने कहलाया कि मेरे दादा का आपके पितासे बहुत स्नेह है इसलिये
मेरे ही यहां रहकर मेरा घर पवित्र कीजिये । परंतु श्रीजी साहब वहां भी न गये
जिस समय श्रीजी साहब इसतरह काशी में निवास करते थे और जब से
आपने बूँदी से विदा होकर जगदीश यात्रा के लिये प्रयाण किया बूँदी की
क्या दशा हुई सो भी, यहां लिखने की आवश्यकता है । यहां विष्णुसिं-
हजी को बहकानेवाले नाथावत हम्मीरसिंहजी मरगये । उनके भाई मनोहर-<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "( १८६ ) उम्मेदसिंह चरित्र । सिंहजी और भतीजे कृष्णसिंहजी झांला जालिमसिंहजी से मिलकर राज्य का कामकाज करने लगे । इन्होंने श्रीजी साहब पर न मालूम कबका बैर निकालकर खूब मनक..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>( १८६ )
उम्मेदसिंह चरित्र ।
सिंहजी और भतीजे कृष्णसिंहजी झांला जालिमसिंहजी से मिलकर
राज्य का कामकाज करने लगे । इन्होंने श्रीजी साहब पर न मालूम कबका बैर
निकालकर खूब मनके फफोले फोडे । जालिमसिंहजी ने अपने दामाद को बहका-
कर अनुभवी स्वामिभक्त धाभाई सुखरामजी को काम से अलग करवा दिया
और उनपर एक लाख रुपया दंड करवाया । राजधानी और राज्यभर के प्रबंध
में सर्वत्र अपने आदमी भर दिये । उदास होकर विष्णुसिंहजी के चाचा
सरदारा सिंहजी अपने पुत्र ईश्वरीसिंहजी समेत जयपुर चलेगये । न्हों
६०० देशी सिपाहियों को नौकरी से छुडाकर खारी नदी के किनारे बसने वाले :
राठोड नौकर रक्खे । इस तरह चाहे जालिमसिंहजी का चक्र भीतर
ही भीतर राज्य भर में घुस गया परंतु अभीतक बूँदी राजधानी का किला तारागढ
बचा हुआ था । उसे भी हथियाने के लिये नाथावत सरदार ने विष्णुसिंहजी को
किले लेजाने का विचार किया । जब नरेश ने किलेदार सरवरसिंहजी से कह-
लाया तब उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि :-
" किला आपका है । आपकी जब इच्छा हो तब प्रसन्नता से पधारिये ।
परंतु में झाला पक्षवालों को किले में न घुसने दूंगा । यही मुझसे श्रीजी
साहब की आज्ञा है ।
"
इस उत्तर को पाकर लोगों को अवसर मिला । उन्होंने विष्णुसिंहजी को
बंहकाया “कि जिसकी आज्ञा शिर पर चढाई जाती है वही राजा है । आपकी
जब आज्ञा न मानी गई तब आप नरेश किसके आपकी आज्ञा में शक्ति बिलकुल
नहीं है ।" बस इसी बहकावट से विष्णुसिंहजी ने उम्मेदसिंहजी को
काशी में रोका और काशी ही में रहकर बूँदी न पधारने के लिये
कहलाया था ।
इस तरह श्रीजी साहव काशीजी में कबतक रहे सो निश्चय नहीं परंतु उनके
पीछे से बूँदी की बडी दुर्दशा हुई । राज्य भर में जालिम सिंहजी का चक्र चल गया,
यदि बाहरी चक्र होता तो विष्णुसिंहजी अवश्य चेत जाते और यदि किसी शत्रु ने
ढाई की होती तो वह अवश्य भिड पडते परंतु इन्हींके विश्वास पात्र सेवक<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "दादा नाती का मन सुटाव | ( १८७ ) बलिमसिंहजी में मिलगये थे । वह शत्रु नहीं किन्तु श्वशुर थे अपनी गृहिणी' के पिता थे, इसलिये विष्णुसिंहजी जानते थे कि जब हिन्दुओं में लड़कों-..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>दादा नाती का मन सुटाव |
( १८७ )
बलिमसिंहजी में मिलगये थे । वह शत्रु नहीं किन्तु श्वशुर थे अपनी गृहिणी'
के पिता थे, इसलिये विष्णुसिंहजी जानते थे कि जब हिन्दुओं में लड़कों-
नाद का धन हराम समझा जाता है तब जालिमसिंहजी मुझसे कपट क्या
गे । वह वुद्धिमान् होने पर भी अभी कम उमर थे इसलिये औरों के प्रपंच-
फंसगये । जालिमसिंहजी के चक्र में फंसना विष्णुसिंहजी के लिये कोई बडी बात
थी क्योंकि उस समय ऐसे बहुत ही कम रजवाडे होंगे जो उनसे न दबते हों !
पेटा नरेश उनके हाथ की गुडिया थे। उन्होंने, उनके पुत्र पौत्र ने जिस कौशल -
कोटे के कामदार होते हुएभी वहां का राज्य किया, जिस तरह उनके सताने से
:खित होकर महारावजी दो तीन बार बूँदी आये और जिस तरह उन्हों ने
मांटे से झालावाड का राज्य अलग करलिया ये बातें एक अलग ग्रंथ में लिखी
ने योग्य | झालावाड राज्य के संस्थापक जालिमसिंहजी का
गरिव भी यदि कोई लिखने का साहस करे तो बहुत रोचक है और
बहुत उपदेशप्रद है क्योंकि जालिमसिंहजी एक असाधारण पुरुष थे ।
अध्याय ९
कुचक्र का विनाश ।
दादा नाती में मेल ।
साथवालों के छोड २ कर चले आने से तथा छुट्टी दे देने से यों तो
धोजीसाहब के पास सेना में से फिर भी बहुत से आदमी उनके पास
धर्मा शर्मी से काशी में रहे परंतु सेवाधर्म का पालन करके सच्चे स्वामिभक्त
ही आदमी कहलाये । एक विक्रमसिंहजी और दूसरे गुरु कुशलरामजी !
दोनों हठ पूर्वक रहे और दोनों ने इस विपत्ति के समय भी मालिक का
नाथ न छोडा । जत्र कुछ काल तक काशी वास करके श्रीजी ने अपने होन-
कर्त्तव्य का विचार कर लिया और पका मनसूबा बाँध लिया तब अपने<noinclude></noinclude>
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/* अशोधित */ "( १८८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | अनेक दूत मार्ग में सहचरों सहित वहां से चल दिये । अनेक राजाओं के मिल कर अपने अपने राजाओं का संदेशा कह २ अपने राज्यों में कहीं न गये । .. लिवा ले जा..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>( १८८ )
उम्मेदसिंह चरित्र |
अनेक दूत मार्ग में
सहचरों सहित वहां से चल दिये । अनेक राजाओं के
मिल कर अपने अपने राजाओं का संदेशा कह २ अपने
राज्यों में
कहीं न गये । ..
लिवा ले जाने का श्रीजीसाहब से आग्रह करते रहे परंतु आप
आपने इस समय सीधे बूँदी आनेका संकल्प पक्का कर लिया था इसलिये -
कूच दर कूच चलते २ सवाई माधवपुर आ पहुंचे
की सवारी वहां आई श्रीमान् जयपुर नरेश के
।
जिस समय श्रीजी साहब
भेजे हुए विश्वास पात्र कर्म -
चारियों ने आकर आपसे जयपुर नरेश की ओर से निवेदन किया कि :-
"आप पहले बूँदी न जाइये । प्रथम जयपुर पधारिये । यदि आप न
पधारेंगे तो मैं आपको लेने के लिये
पवित्र कीजिये ।"
जिस समय जयपुर से इस तरह
आऊँगा । यहां पधार कर मेरे घर को
आग्रह का खरीता आया उसी समय
श्री जी साहब के पास जालिमसिंहजी के मंत्री भी उन के भेजे हुए
पहुंचे । उनसे झालाजी ने कहलाया कि:-
" इस में हमारा कुछ अपराध नहीं है । आपके पौत्र अपनी वय के
अनुसार आजकल मनमानी कर रहे हैं । जो कोई भली सलाह देता है तो
विलास में रत रहते हैं ।
"नहीं मानते हैं । सदा भोग
सुनकर श्रीजी साहब ने
कहा और
अपनी इष्ट सिद्धि के लिये ऐसा
ही कहना उचित समझा ।
नहीं २
इसमें आपका क्या अपराध है । "
इसके साथ कविराजा सूर्यमलजी ने अपनी कविता का एक चरण वडा मजेदार
लिखा है । उसके दो अर्थ हैं । उन्होंने लिखा है:-
" जालिम लॉ जै हरि कहायो नर्म गालियुत "
इसका एक अर्थ यह है कि - "जालिमसिंहजी ने दिल्लगी की गालीके साथ
( श्रीजी साहब ) से जै हारे ( जय श्रीकृष्ण ) कहलाया ।" - हजार श्रीजी साहब<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२०
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/* अशोधित */ "दादा नाती में मेल । (१८९ ) की इस विवाह में इच्छा न होने पर भी जालिमसिंह विष्णुसिंहजी के श्वसुर बन चुके थे तब समधीकी दिल्लगी करना अनुचित न था और हंसकर - कुछ दिल्लगी करके अ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="VishnudevButla" /></noinclude>दादा नाती में मेल ।
(१८९ )
की इस विवाह में इच्छा न होने पर भी जालिमसिंह विष्णुसिंहजी के श्वसुर बन
चुके थे तब समधीकी दिल्लगी करना अनुचित न था और हंसकर - कुछ
दिल्लगी करके अथवा हंसीफी गाली ही देकर जय श्रीकृष्ण कहलाना भी को,
बडी बात नहीं है | परंतु इस चरण में कवि का एक गंभीरभाव है इसका
दूसरा अर्थ उसी भावका बोधक है । कविराजा जी इस चरण में कहते हैं
कि- " जालिम सिंहजी भी दिल्लगी की गाली के साथ जयसिंहजी कहला गये ।"
गाली की दिल्लगी की बात वही है जो पहिले अर्थ में आ चुकी परंतु कवि का
प्रयोजन यह है कि जैसे बहनोई बुधसिंह जी का राज्य छीनकर जयसिंहजी ने
नाम पाया था वैसे ही दामाद का राज्य लेने का प्रयत्न कर जालिमसिंहजी
जयसिंहजी कहला गये अर्थात् उन्होंने भी जयसिंहजी का सा सुलूक किया
कुछ भी हो परंतु जयपुर नरेश का श्रीजी साहब को लिवा ले
जाने के लिये माधवपुर आने का पक्का विचार जान आप स्वयं दामाद से मिल-
ने के लिये जयपुर पधारे। महाराज प्रतापसिंहजी पेशवाई के लिये सामने
आकर जयपुर लिवा लेगये । वहां बडे सत्कार से रक्खा और महाराज ने
वडी नम्रता के साथ आप से कहा:-
" यदि आपकी इच्छा हो तो मैं जयपुरी सेना आपके साथ करके
बूँदी का राज्य आपको दिलवाहूँ । केवल आप की आज्ञा का विलंब है । "
यह सुन कर श्रीजी साहब बोले :- " बात किसी और की होती तो
मैं आपसे सहायता लेसकता था परंतु समझाना नातीको है । पेट
की आंतों को ठीक करना है । आप कुछ संशय न रखिये । मैं अब वहां
जाता हूँ। मैं ही समझाहूँगा । "
इस प्रकार का उत्तर देकर जयपुर नरेश से विदा होने बाद आपने
बूँदी कहला भेजा कि :-- " मैंने काशी का रहना निश्चय कर लिया है । मैं
वहां ही रहूगा। अभी केवल श्री रंगनाथजी के दर्शन करने बूँदी आता हूँ । .
दर्शन करके लौट जाऊंगा । "<noinclude></noinclude>
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