विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.7 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२१७ 250 2459 663054 643459 2026-06-16T13:49:23Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663054 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>ब्रह्मा २११ के योग्य बनाने की घोषणा की थी । तात्कालिक वर्मा-सरकार- कानून १९३५ के अनुसार ब्रह्मा मे व्यवस्थापक- मण्डल बना दिया गया था, जिसकी सीनेट के ३६ सदस्यों में से आधो को ब्रिटिश गवर्नर नियुक्त करता था तथा शेष प्रतिनिधि सभा द्वारा चुने जाते थे । प्रतिनिधि सभा मे १३२ सदस्य थे, जिनका चुनाव होता था । शासन-प्रणाली भारतीय प्रान्तों के अनुकूल थी । ब्रह्मा का राष्ट्रीय नेता डा० वा मौ वहाँ का सर्वप्रथम प्रधान मन्त्री बना । ब्रह्मा-चीन-पथ बनाये जाने के संबंध मे मतभेद होजाने के कारण डा० मौ ने त्याग पत्र दे दिया । वह कदाचित् जापानी प्रभाव मे था और नही चाहता था कि यह सडक बने । उसका कहना था कि इस सड़क के जरिये ब्रह्मा मे चीनियो के प्रवास का मार्ग खुल जायगा । १९४० मे उसे, वर्मा - रक्षा क़ानून के अनुसार, एक साल क़ैद की सजा दी गई। बर्मा के गवर्नर ने घोषित किया कि वर्मा को स्वराज्य देने के विषय पर लड़ाई के बाद बातचीत कीजायगी । ऊ सा वर्मा का प्रधान मन्त्री बना । अक्टूबर ४१ मे वह, लढाई के उपरान्त ब्रह्मा को तत्काल औपनिवेशिक पद दिये जाने का वचन प्राप्त करने के लिये लन्दन गया, किन्तु चर्चिल की सरकार ने उसकी एक न सुनी । लन्दन से लौटते समय ऊ सा को बीच मे ही पकड़कर केंद्र वर लिया गया । शान रियासते ३४ हैं । इनके राजा, ब्रिटिश अफसरों की सलाह से, अपना शासन चलाते थे । जापानी आक्रमण के समय कुछ वर्मा फ़ौज शत्रु से मिल गई। वर्मा के पतन के बाद वर्मा-सरकार भारत भागई और शिमला में उसके दफ्तर कायम है । सम्मिलित राष्ट्रों ( अमेरिका, ब्रिटेन और चीन ) ने पिछले अगस्त ४२ से ब्रह्मा को वापस<noinclude></noinclude> gmkevl122nkcsztx96rit8iaatbczs8 पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२६४ 250 2510 663055 573268 2026-06-16T14:04:34Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663055 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>२१८ मंचूको की और प्रजातंत्र की स्थापना। तब से बाहरी मंगोलिया, एक प्रकार से, सोवियत रूस के आश्रित है। चीन बराबर इसका दावा करता है। सन् १९२४ की रूस-चीन-सन्धि में नाममात्र को इसे मान भी लिया गया है। बाहरी मंगोलिया की सोवियत रूस के साथ सन्धि है और मंचूको से इस देश पर किये गये जापानी-हमलों का इन दोनो देशो ने मुक़ाबला किया है। यहाँ एक छोटी पर आधुनिक ढंग की सेना है। शासन-प्रणाली सोवियत ढ़ाँचे की है। बड़ी 'हुरलदान' यानी मंगोलिया की रूसी ढंग की कांग्रेस छोटी 'हुरलदान' या कार्य-कारिणी समिति का चुनाव करती है, और यह समिति सरकार को चुनती है। मंगोलियन चीनियो से विभिन्न है और तुर्की से मिलती-जुलती भाषा बोलते हैं। साइबेरिया की सीमा पर स्थित होने के कारण यह देश, रूस के लिये, विशेष सामरिक महत्व का है। आबादी अधिकांश खानाबदोश और पशु-पालन पर जीवित रहने वाली है, इसलिये समाजवादी-कार्यक्रम का प्रश्न ही नहीं उठता। मंचूको--चीन का पूर्वकालिक मंचूरिया प्रान्त; क्षेत्र ४,६०,००० वर्ग०; जनसंख्या ३,००,००,०००। जापान का सन् १९०५ से ही इस प्रान्त पर दौंत था, जबकि, पीकिन-सन्धि के अनुसार, उसे वहाँ विशेषाधिकार मिल चुके थे। १९१५ ई० मे हुई सन्धि के अनुसार जापान को विशेष रिआयती अधिकार मंचूको में और मिले। इस प्रदेश पर रूस भी अपना प्रभुत्व जमाना चाहता<noinclude></noinclude> 5m0krdoonzenpz9hp6iq2pg8kdqweb4 पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२६५ 250 2511 663056 573269 2026-06-16T14:07:47Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663056 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>मज़दूर दल २५६ था। उसने इस प्रान्त में पूर्वी-चीनी-रेलवे बनाई थी जो व्लादीवोस्तक तक जाती है। १८ सितम्बर १९३१ को, क़ब्ज़ा करने के लिये, जापान ने अपनी सेनाएँ मंचूरिया में भेजदीं। चीनी लडे, किन्तु हार गये। १८ फरवरी १९३२ को चीनी सेनाएँ इस प्रान्त से निकाल दीगईं। मंचूरिया तथा जेहोल प्रान्तो को मिलाकर 'मंचूको' नाम से स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। मंचू-वंश का अन्तिम चीन सम्राट, पू यी, जो १९११ में, बाल्यावस्था में ही, राज-सिहासन से उतार दिया गया था, तथा जापान में जिसका पालन-पोषण हुआ था, मंचूको का राष्ट्रपति बना दिया गया। १ मार्च १९३४ को, कांग् तेह नाम रखकर, उसने सम्राट पद धारण किया। यह राज्य नाम मात्र के स्वतंत्र है। इस पर जापान का पूर्ण नियंत्रण है। जापानी सेना रहती है और हर सरकारी सीगे में जापानी सलाहकार तैनात हैं। देश की कृषि और खनिज उद्योगो को जापानी बढ़ा रहे हैं। अनेक जापानी धन्धे वहाँ क़ायम होगये है। किन्तु प्रवासी जापानियो को वहाँ का जलवायु अनुकूल नहीं है। रूस ने चीनी रेलवे लाइन, मार्च १९३५ में, १ करोड़ पौड मे जापान को बेचदी। मंचूको-सरकार को न तो चीन ने स्वीकार किया है और न जर्मनी, इटली, स्पेन तथा त्रिगुट के हिमायती छोटे देशो के सिवा अन्य देशो ने। सोवियत रूस, अप्रैल १९४१ में जापान के साथ की हुई निरपेक्षता-सन्धि के आधार पर, मंचूको की अखण्डता को स्वीकार कर चुका है। दिसम्बर १९४१ मे मंचूको, बरतानिया और अमरीका के विरुद्ध जापान के साथ युद्ध में शामिल होचुका है। मज़दूर दल--बरतानवी 'समाजवादी' दल; द्वितीय साम्यवादी अन्त-<noinclude></noinclude> 935s6ui305h38nweesnl9o1p4czcvn7 पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२६६ 250 2512 663057 642860 2026-06-16T14:19:05Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663057 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>२६० मज़दूर दल राष्ट्रीय-सघ का सदस्य। सन् १९३५ के पार्लमेन्ट के चुनाव में कुल २,२०,००,००० मतो मे से ८३,२५,००० प्राप्त किये तथा ६१५ कामन्स सभा के सदस्यों मे से १५४ सदस्य चुने गये। इस दल मे मज़दूर-संघों (ट्रेड यूनियनो), समाजवादी तथा सहकारी सघों और स्थानिक राजनीतिक संस्थाओं का प्रतिनिधित्व है। कार्य-कारिणी में मज़दूर-संघों के सदस्यों का बहुमत है। इस दल का कार्य-क्रम फेवियन, नरम (माडरेट), विकासवादी तथा प्रजातत्रात्मक है। इसका उद्देश्य है उद्योग-धन्धों और यातायात का राष्ट्रीयकरण, सुगठित अर्थ-व्यवस्था और सर्वहितकारी आधार पर वर्ग-भेद का उन्मूलन। इन उद्देश्यों की सिद्धि का आधार क्रान्ति नहीं बल्कि क्रमिक विकास, सामाजिक कानून और राष्ट्र के आर्थिक-जीवन पर राज्य का धीरे-धीरे नियंत्रण माना गया है। यह मार्क्सवाद तथा क्रान्ति से बहुत दूर है। यह दल ब्रिटिश-राष्ट्रसमूह (साम्राज्य) को बरक़रार रखने का समर्थक है, परन्तु भारत को स्वराज दिये जाने तथा अन्य देशो को, जिन पर बरतानिया का आधिपत्य है, क्रमिक स्वराज्य दिये जाने के पक्ष मे है। इसके "तात्कालिक" कार्य-क्रम मे यह कार्य शामिल है : राजस्व, भूमि, यातायात, कोयला, बिजली पर राष्ट्रीय नियंत्रण, आयात-व्यापार पर नियंत्रण, कम घंटों के सप्ताह, मकानों की व्यवस्था, सामाजिक कानूनों का निर्माण तथा बेकारों की सहायता। दल ने उग्र शान्तिवाद और युद्ध-विरोधी अपने पहले उद्देश्यों को, नात्सी खतरे की आशंका से, बहुत पहले ही, छोड़ दिया है और वह बरतानिया की वैदेशिक-नीति में नात्सी-विरोध को सबल बनाने का प्रचार भी पहले से ही कर रहा है। मज़दूर-सरकार दो बार ब्रिटेन में शासन कर चुकी है : सन् १९२४ में और १९२९-३१ में। किन्तु दोनो बार, अल्पमत में रहने के कारण, राष्ट्रीयकरण के अपने उद्देश्य के लिये वह कुछ न कर सकी। दल के तात्कालिक नेता, भूत जेम्स रैमज़े मैकडोनाल्ड, दोनो बार प्रधान-मन्त्री बने। शासन-सत्ता में बने रहने से उन्हे मोह होगया। १९३१ की नेशनल गवर्नमेंट में, जो वस्तुतः दकियानूसियों की सरकार थी, उन्होने बने रहना ही तय किया--और प्रधान-मन्त्री की हैसियत से। इस पर दल ने उन्हें निकाल दिया। तब उन्होने छोटा-सा राष्ट्रीय मज़दूर दल कायम किया। सन् १९३१ से मज़दूर दल के सदस्य सरकार में पद-ग्रहण के विरोधी<noinclude></noinclude> no26q00r9ne3ke893cv1xpp2k41jr7t पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२६७ 250 2513 663058 573271 2026-06-16T14:23:53Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663058 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>मालवीय २६१ हैं; यहाँ तक कि वर्तमान युद्ध आरम्भ होजाने पर चेम्बरलेन की सरकार मे शामिल होने से भी उन्होने इनकार कर दिया, अगरचे युद्ध-प्रयत्नो में सरकार से पूर्ण सहयोग करते रहे। चेम्बरलेन की सरकार के हटने के बाद, जून १९४० मे, जब चर्चिल की सर्व-दल-सरकार बनी, तब युद्ध-मन्त्रिमण्डल के ६ स्थानो मे से दो मज़दूर-दली सदस्यो (एटली और ग्रीनवुड) को मिले तथा दल के कई सदस्य मन्त्री बनाये गये। दल के प्रमुख नेता मेजर सी० आर० एटली (लार्ड प्रिवी सील) हैं; दल के नेता हैं आर्थर ग्रीनवुड (मिनिस्टर); दल के उप नेता हरबर्ट मारीसन (स्वदेश मन्त्री), ह्यू डाल्टन (सामरिक मितव्ययिता-मन्त्री), लार्ड स्नैल, लार्ड पैसफ़ील्ड, पी० नाइल-बेकर, ऐलिन विल्किन्सन, जे० एस० मिडिलूटन, सर वाल्टर सिट्राइन (मज़दूर-संघ के प्रधान मन्त्री), जे० आर० क्लाइन्स, अरनैस्ट बीविन (मिनिस्टर मज़दूर विभाग)। मत्सुओका--१९४० तक जापान का वैदेशिक मन्त्री, जिसकी आकाक्षा और प्रयत्न से ही जापान और जर्मनी, इटली का गठजोड़ा हुआ। मत्सुओका अत्यन्त महत्वाकाक्षी है और वह जापान का हिटलर बनने की फ़िराक़ में रहा है। यद्यपि इस समय वह जापान का वैदेशिक मन्त्री नही है, किन्तु जापान आज उसीकी योजना को कार्यान्वित कर रहा है। एम० मत्सुओका, अपने बचपन मे ही, अमरीका चला गया था। वही के एक विश्वविद्यालय मे उसने शिक्षा पाई, अंग्रेज़ी का वह विद्वान् है। मालवीय, महामना पंडित मदनमोहन--देश के अवसर-प्राप्त राष्ट्रीय नेता। जन्म २५ दिसम्बर १८६१ ई०। म्योर सेंट्रल कालिज, प्रयाग, मे शिक्षा प्राप्त की। सन् १८८४ से १८८७ तक गवर्नमेण्ट हाई स्कूल मे अध्यापक रहे। कालाकॉकऱ के हिन्दी दैनिक 'हिन्दुस्तान' तथा प्रयाग के साप्ताहिक 'इंडियन ओपिनियन' का संपादन किया। सन् १८९१ मे क़ानून की परीक्षा पास की। सन् १९०२-१२ तक संयुक्त-प्रदेश की प्रान्तीय धारासभा के सदस्य रहे। कांग्रेस की दूसरी बैठक से ही आप उसमे सम्मिलित रहे। सन् १९०९ और १९१८ मे उसके अध्यक्ष हुए। सन् १९३२-१९३३ मे भी वे इस महान पद पर चुने गये, किन्तु अधिवेशन से पहले ही गिरफ़्तार कर लिये गये। १९१०-१६ तक इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल (अब केन्द्रीय असे-<noinclude></noinclude> 523ilpp7kmp0mpbvm44a82upy7elqw4 पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२६८ 250 2514 663059 573272 2026-06-16T14:28:38Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663059 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>२६२ मालवीय म्बली ) के सदस्य रहे। सन् १९१९ में रौलट मसविदे के विरोध में त्याग-पत्र दे दिया। सन् १९१६-१८ तक भारतीय औद्योगिक कमीशन के सदस्य रहे। इसमें आपने, मत-विरोध के कारण, अलग अपनी रिपोर्ट लिखी। सन् १९१६ मे काशी हिन्दू विश्व-विद्यालय की स्थापना की और प्रारम्भ से ही वह उसके वाइस-चांसलर रहे। सन् १९२२-२३ मे हिन्दू महासभा के प्रधान चुने गये। सन् १९२४ से केन्द्रिय व्यवस्थापक सभा के सदस्य और वहाँ विरोधी दल के नेता रहे। तटकर (टैरिफ)-बिल के विरोध में त्याग-पत्र दे दिया। सन् १९३२ के सितम्बर मे, जब महात्मा गांधी ने यरवदा-जेल मे अछूत कहे जाने वाले वर्ग को उसके विशाल वर्ग से काटनेवाली योजना के सम्बन्ध मे, साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध, आमरण व्रत रखा तब तुरन्त ही मालवीयजी बम्बई गये और वहाँ हिन्दू नेताओं का सम्मेलन किया, जिसके अध्यक्ष मालवीयजी ही थे। फलतः समझौता होगया। आप कांग्रेस को मा के समान आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखते रहे हैं। किन्तु अपने विचारो के प्रकट करने मे वे कभी नही चूके। पूर्वकाल मे जब कांग्रेस नरमदलवालों की संस्था थी, उस समय, पूर्णरूप से नरमदल से अलग न रह सके। गांधीजी के उदय के समय भी आपका कांग्रेस से मतभेद हुआ, जिसके कारण आप असहयोग-आन्दोलन से अलग ही नही रहे बल्कि उसका विरोध किया। किन्तु सन् '३०-३३ मे पूर्ण रूप से देश का नेतृत्व किया और जेल-यात्रा की। तदुपरान्त भी ऐसे अवसर आते रहे जब आप कांग्रेस की, विशेषकर उसकी मुसलमानो के प्रति, नीति से असहमत रहे। आपका हिन्दू-भाव सदैव ही जाग्रत रहा है। आपके जीवन का शिक्षा-प्रसार-सम्बन्धी रचनात्मक कार्य, हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप मे, चिरस्थायी है। यह संस्था महान् है, और भविष्य मे भी उससे अनेक आशाएँ हैं, किन्तु मालवीयजी के लिये वह जिस प्रकार गले का हार बनी, उससे उनका कार्य क्षेत्र समस्त देश के सुविशाल क्षेत्र से सिमट कर बहुत कुछ काशी विश्वविद्यालय तक सीमित हुआ। सम्भवतः इसीलिये यह कभी-कभी सुनाई पडता है कि यदि उन्होने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना न की होती तो आज, शरीर से जीर्ण होते हुए भी, न केवल मालवीयजी बल्कि उनके कारण भारतीय राष्ट्र भी अधिक महान् होता। महामना मे वह प्रेरक शक्ति है।<noinclude></noinclude> hgmpuoc0han5zkbrp6lcual9devjf3h पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२६९ 250 2515 663060 573273 2026-06-16T14:31:13Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663060 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>मनरो - सिद्धान्त फिर भी मालवीयजी महान् हैं, देश के लिये उनकी अर्द्धशताब्दी से अधिक काल तक निरन्तर की हुई सेवाएँ महान् हैं। उनका तपोमय जीवन महान् है। देश के प्रारम्भिक राजनीतिक-विकास के युग मे मालवीयजी एक प्रेरणा रहे हैं। उनकी जिह्वा पर सरस्वती विराजती है, और उनके भाषण मे सरस रसधारा प्रवाहित हो उठती है। हज़ारों उनसे प्रभावित और पुनीत हुए है। देश के जीवित नेताओं में मालवीयजी ही इस समय सबसे पुरातन है। मध्य युग--योरोप के इतिहास मे, आठवीं शताब्दी के बाद से १४वीं शताब्दी तक का समय, मध्ययुग कहलाता है। मध्य योरोप--मध्य योरोप में पोलैंड, चैकोस्लोवाकिया, आस्ट्रिया-हंगरी तथा बलगारिया आदि देश शामिल हैं। मनरो-सिद्धान्त--संयुक्त-राज्य अमरीका का एक राजनीतिक सिद्धान्त है, जिसके अनुसार वह अमरीकी महाद्वीप के किसी भी मामले मे योरोप के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करता। इस सिद्धान्त के जन्मदाता संयुक्त-राज्य अमरीका के राष्ट्रपति मनरो हैं, जिन्होंने, २ दिसम्बर १८२३ को, अपने एक भाषण मे कहा-- "अमरीका के महाद्वीपो मे, जिन्होंने अब स्वाधीन तथा स्वतंत्र स्थिति प्राप्त कर ली है, भविष्य मे किसी भी योरोपीय राष्ट्र को अपने उपनिवेश बनाने का अधिकार न होगा। × × × इन महाद्वीपो मे जो आन्दोलन चल रहे हैं उनसे हमारा घनिष्ठ संबंध है। उन (योरोपीय) राष्ट्रों की शासन-पद्धति अमरीका की शासन-प्रणाली से भिन्न है। × × × उनके द्वारा अमरीका मे अपनी प्रणाली के स्थापित करने के प्रयत्न को हमे अमरीका की शान्ति तथा सुरक्षा के लिये खतरा समझना चाहिये।"<noinclude></noinclude> bzvtbmsxcrlgl7ev0wpxwg4sqvjbrqu पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७० 250 2517 663061 573275 2026-06-16T14:32:28Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663061 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>दक्षिण-(लातीनी) अमरीका के राज्यों में यह सिद्धान्त लोकप्रिय नहीं है। वे इसे संयुक्त-राज्य अमरीका का प्राधान्य स्थापित करने का एक साधन समझते हैं। वास्तव में मनरो सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय विधान नहीं है, प्रत्युत संयुक्त-राज्य अमरीका की राष्ट्रीय-नीति का अंश है। मनोवैज्ञानिक युद्ध-प्रणाली--इस प्रणाली में ईस्पात के बने शस्त्रास्त्रों से नहीं लड़ना पड़ता। यह युद्ध-प्रणाली कूटनीतिपूर्ण मनोवैज्ञानिक साधनों के प्रयोग पर निर्भर करती है। जो देश इस प्रणाली का आश्रय लेता है, वह संसार में, विशेषकर अपने अधीन देशों और अपने मित्रराष्ट्रों में, अपने पक्ष में तथा शत्रु के विरुद्ध, लोकमत बनाने का प्रचण्ड प्रयत्न करता है। इस प्रणाली का मुख्य कार्य संसार के लोकमत के सामने शत्रु को हेय सिद्ध करना तथा संसार को यह विश्वास करा देना है कि अपनी रक्षा के लिये वह राष्ट्र जो उद्योग कर रहा है वह एकदम पवित्र और मानव-हितकामना से प्रेरित है। वह शत्रुदेश की प्रजा को भी, उसकी सरकार के विरुद्ध, उत्तेजित करता है, और वह उसको यह बतलाता है कि संसार में शान्ति और व्यवस्था स्थापित होनी चाहिये और हमारा पक्ष सर्वथा अनुमोदनीय है। यह युद्ध-प्रणाली तटस्थ राष्ट्रों के सामने भी यही बात प्रस्तुत करती है कि शत्रु-राष्ट्र अन्याय कर रहे हैं और हमारा देश न्याय के पक्ष में है। इस प्रणाली की सफलता के लिये विज्ञापन, समाचार-पत्र, रेडियो तथा गुप्तचर दल का खूब प्रयोग किया जाता है। मनोवैज्ञानिक युद्ध-प्रणाली का आश्रय लेनेवाला देश, अपने प्रचार के समय, शेष संसार को बिल्कुल मूर्ख समझ बैठता है। मरक्को--(की) सल्तनत, क्षेत्र० लगभग २,१३,००० वर्ग०, जन० ७२,००,००० है, अफ्रीका के उत्तर-पश्चिमी कोण में स्थित। योरोप के अनेक साम्राज्यवादी देशों में, इस प्रदेश के लिये, बहुत दिनों तक, बड़ी प्रतिस्पर्धा रही। सन् १९०४ में ब्रिटेन ने मरक्को को फ्रांस का प्रभाव-क्षेत्र स्वीकार कर लिया और बदले में फ्रांस ने मिस्र को बरतानिया का प्रभाव-क्षेत्र मान लिया। जर्मनी में इससे रोष फैला और १९०५ में कैसर मरक्को के टेंजियर बन्दरगाह की दिखावटी सैर करने, किन्तु वास्तव में मरक्को पर जर्मन-दावे की पुष्टि के लिये,<noinclude></noinclude> ga31g9zlr08c6ezusb2jpqwrpbd639a पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७१ 250 2518 663062 573276 2026-06-16T14:34:28Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663062 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>मरको २६५ गया। इस देश में पाया जानेवाला कई प्रकार का कच्चा लोहा जर्मनी के लोहे के कारखानो के लिये दरकार था। साम्राज्यवादियो द्वारा मरक्को की तकाबोटी किये जाने का यह पहला अवसर था। ७ अप्रैल १९०६ को, मरक्को की बॉट-चोट के लिये, "मुक्त द्वार" नीति साम्राज्यवादियो ने तय की और १९११ मे फ्रांस ने मरक्को के फैज़ प्रान्त मे क़ब्ज़ा करने के लिये सेना भेज दी। जर्मनी क्यो पीछे रहता, उसने भी अगादिर बन्दर पर एक हथियारबन्द जहाज़ रवाना कर दिया। मरक्को की नोच-खसोट का दूसरा युग आरम्भ हुआ। तत्कालीन बरतानवी वज़ीरे-आज़म लायड जार्ज ने कहा कि बरतानिया जर्मनी की इस हरकत को बरदाश्त नही कर सकता। लडाई होते-होते बची। फ्रांस-जर्मनी मे समझौता होगया। मरक्को पर फ्रांस का अधिकार क़बूल कर लिया गया, बदले मे जर्मनी को फ्रान्सीसी कांगो मे रिआयते मिल गई। सन् १९१२ से मरक्को तीन भागो में बँटा हुआ है, एक स्पेनी-क्षेत्र तथा दूसरा फ्रान्सीसी-क्षेत्र। टेंजियर का तीसरा तटस्थ क्षेत्र १९२३ मे बना है और अन्तर्राष्ट्रीय-व्यवस्था के अधीन है। यह तीनो क्षेत्र, नाममात्र को, सुल्तान के प्रभुत्व मे हैं। वर्त्तमान सुल्तान, शरीफी राज-वंश का, सिद्दीक़ मुहम्मद, है। परन्तु फ्रान्सीसी-क्षेत्र मे फ्रान्सीसी रेज़ीडेंट-जनरल ही वास्तविक शासक है। समस्त सरकारी आदेश उसीके द्वारा जारी किये जाते हैं। सारे देश मे फ्रान्सीसी सेनाएँ हैं। रेज़ीडेंट फ्रांस के वैदेशिक मंत्री के प्रति उत्तरदायी है। स्पेनी-क्षेत्र का शासन सुल्तान द्वारा नियुक्त ख़लीफ़ा के हाथ मे है, परन्तु इसकी नामज़दगी स्पेनी सरकार करती है। इस क्षेत्र का असली शासक स्पेन का रेज़ीडेंट है। फ्रान्सीसी-मरक्को का क्षेत्र० २ लाख वर्ग० और स्पेनी-मरक्को का १३ हज़ार वर्गमील है। स्पेनी-क्षेत्र मे भी लडाकू रीफ क़बीले की कुछ आबादी है। रीफ १९२४ से '२७ तक, अपने देश की आज़ादी के लिये, अब्दुलकरीम के नेतृत्व में, फ्रान्सीसी और हस्पानियो (स्पेनियो) से लड़ चुके हैं। फ्रान्सीसी संगीनो और गोलियो के बल पर वह क्रान्ति दबा दी गई थी और रीफ़ों का नेता, अब्दुलकरीम, अबतक एक फ्रान्सीसी टापू मे क़ैद है। सन् १९३६ मे जनरल फ्रान्को ने स्पेन के गृह-युद्ध की तैयारी इसी क्षेत्र मे की थी। मरक्को की सेना ने उसके साथ भाग लिया। सामरिक दृष्टि से यह वडा महत्व-<noinclude></noinclude> bwm56r6o90tn2mkfrnebz3h2lwey6j5 663065 663062 2026-06-16T14:47:24Z Lohit Sathesh 6558 663065 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>मरको २६५ गया। इस देश में पाया जानेवाला कई प्रकार का कच्चा लोहा जर्मनी के लोहे के कारखानो के लिये दरकार था। साम्राज्यवादियो द्वारा मरक्को की तकाबोटी किये जाने का यह पहला अवसर था। ७ अप्रैल १९०६ को, मरक्को की बॉट-चोट के लिये, "मुक्त द्वार" नीति साम्राज्यवादियो ने तय की और १९११ मे फ्रांस ने मरक्को के फैज़ प्रान्त मे क़ब्ज़ा करने के लिये सेना भेज दी। जर्मनी क्यो पीछे रहता, उसने भी अगादिर बन्दर पर एक हथियारबन्द जहाज़ रवाना कर दिया। मरक्को की नोच-खसोट का दूसरा युग आरम्भ हुआ। तत्कालीन बरतानवी वज़ीरे-आज़म लायड जार्ज ने कहा कि बरतानिया जर्मनी की इस हरकत को बरदाश्त नही कर सकता। लडाई होते-होते बची। फ्रांस-जर्मनी मे समझौता होगया। मरक्को पर फ्रांस का अधिकार क़बूल कर लिया गया, बदले मे जर्मनी को फ्रान्सीसी कांगो मे रिआयते मिल गई। सन् १९१२ से मरक्को तीन भागो में बँटा हुआ है, एक स्पेनी-क्षेत्र तथा दूसरा फ्रान्सीसी-क्षेत्र। टेंजियर का तीसरा तटस्थ क्षेत्र १९२३ मे बना है और अन्तर्राष्ट्रीय-व्यवस्था के अधीन है। यह तीनो क्षेत्र, नाममात्र को, सुल्तान के प्रभुत्व मे हैं। वर्त्तमान सुल्तान, शरीफी राज-वंश का, सिद्दीक़ मुहम्मद, है। परन्तु फ्रान्सीसी-क्षेत्र मे फ्रान्सीसी रेज़ीडेंट-जनरल ही वास्तविक शासक है। समस्त सरकारी आदेश उसीके द्वारा जारी किये जाते हैं। सारे देश मे फ्रान्सीसी सेनाएँ हैं। रेज़ीडेंट फ्रांस के वैदेशिक मंत्री के प्रति उत्तरदायी है। स्पेनी-क्षेत्र का शासन सुल्तान द्वारा नियुक्त ख़लीफ़ा के हाथ मे है, परन्तु इसकी नामज़दगी स्पेनी सरकार करती है। इस क्षेत्र का असली शासक स्पेन का रेज़ीडेंट है। फ्रान्सीसी-मरक्को का क्षेत्र० २ लाख वर्ग० और स्पेनी-मरक्को का १३ हज़ार वर्गमील है। स्पेनी-क्षेत्र मे भी लडाकू रीफ क़बीले की कुछ आबादी है। रीफ १९२४ से '२७ तक, अपने देश की आज़ादी के लिये, अब्दुलकरीम के नेतृत्व में, फ्रान्सीसी और हस्पानियो (स्पेनियो) से लड़ चुके हैं। फ्रान्सीसी संगीनो और गोलियो के बल पर वह क्रान्ति दबा दी गई थी और रीफ़ों का नेता, अब्दुलकरीम, अबतक एक फ्रान्सीसी टापू मे क़ैद है। सन् १९३६ मे जनरल फ्रान्को ने स्पेन के गृह-युद्ध की तैयारी इसी क्षेत्र मे की थी। मरक्को की सेना ने उसके साथ भाग लिया। सामरिक दृष्टि से यह वडा महत्व-<noinclude></noinclude> 1qai3epri6kwy48kinbfl9enxnvj3zx 663067 663065 2026-06-16T14:51:03Z Lohit Sathesh 6558 663067 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>{{Rh|'''मरको'''||''' २६५'''}} गया। इस देश में पाया जानेवाला कई प्रकार का कच्चा लोहा जर्मनी के लोहे के कारखानो के लिये दरकार था। साम्राज्यवादियो द्वारा मरक्को की तकाबोटी किये जाने का यह पहला अवसर था। ७ अप्रैल १९०६ को, मरक्को की बॉट-चोट के लिये, "मुक्त द्वार" नीति साम्राज्यवादियो ने तय की और १९११ मे फ्रांस ने मरक्को के फैज़ प्रान्त मे क़ब्ज़ा करने के लिये सेना भेज दी। जर्मनी क्यो पीछे रहता, उसने भी अगादिर बन्दर पर एक हथियारबन्द जहाज़ रवाना कर दिया। मरक्को की नोच-खसोट का दूसरा युग आरम्भ हुआ। तत्कालीन बरतानवी वज़ीरे-आज़म लायड जार्ज ने कहा कि बरतानिया जर्मनी की इस हरकत को बरदाश्त नही कर सकता। लडाई होते-होते बची। फ्रांस-जर्मनी मे समझौता होगया। मरक्को पर फ्रांस का अधिकार क़बूल कर लिया गया, बदले मे जर्मनी को फ्रान्सीसी कांगो मे रिआयते मिल गई। सन् १९१२ से मरक्को तीन भागो में बँटा हुआ है, एक स्पेनी-क्षेत्र तथा दूसरा फ्रान्सीसी-क्षेत्र। टेंजियर का तीसरा तटस्थ क्षेत्र १९२३ मे बना है और अन्तर्राष्ट्रीय-व्यवस्था के अधीन है। यह तीनो क्षेत्र, नाममात्र को, सुल्तान के प्रभुत्व मे हैं। वर्त्तमान सुल्तान, शरीफी राज-वंश का, सिद्दीक़ मुहम्मद, है। परन्तु फ्रान्सीसी-क्षेत्र मे फ्रान्सीसी रेज़ीडेंट-जनरल ही वास्तविक शासक है। समस्त सरकारी आदेश उसीके द्वारा जारी किये जाते हैं। सारे देश मे फ्रान्सीसी सेनाएँ हैं। रेज़ीडेंट फ्रांस के वैदेशिक मंत्री के प्रति उत्तरदायी है। स्पेनी-क्षेत्र का शासन सुल्तान द्वारा नियुक्त ख़लीफ़ा के हाथ मे है, परन्तु इसकी नामज़दगी स्पेनी सरकार करती है। इस क्षेत्र का असली शासक स्पेन का रेज़ीडेंट है। फ्रान्सीसी-मरक्को का क्षेत्र० २ लाख वर्ग० और स्पेनी-मरक्को का १३ हज़ार वर्गमील है। स्पेनी-क्षेत्र मे भी लडाकू रीफ क़बीले की कुछ आबादी है। रीफ १९२४ से '२७ तक, अपने देश की आज़ादी के लिये, अब्दुलकरीम के नेतृत्व में, फ्रान्सीसी और हस्पानियो (स्पेनियो) से लड़ चुके हैं। फ्रान्सीसी संगीनो और गोलियो के बल पर वह क्रान्ति दबा दी गई थी और रीफ़ों का नेता, अब्दुलकरीम, अबतक एक फ्रान्सीसी टापू मे क़ैद है। सन् १९३६ मे जनरल फ्रान्को ने स्पेन के गृह-युद्ध की तैयारी इसी क्षेत्र मे की थी। मरक्को की सेना ने उसके साथ भाग लिया। सामरिक दृष्टि से यह वडा महत्व-<noinclude></noinclude> 98wedxrygwuthu22uhx6n9g6m7at8gb पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७२ 250 2519 663063 573277 2026-06-16T14:42:22Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663063 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>पूर्ण प्रदेश है। यह भूमध्य-सागरके तट पर है। जिब्रालटरके ठीक सामने मरक्को का क़िले-बन्द क्यूटा बन्दरगाह है। 'मराकेश' मरक्को का असली नाम है। टेंजियर क्षेत्र केवल २२५ वर्गमील लम्बा-चौड़ा है और आबादी ६०,०००। इस क्षेत्र का प्रबन्ध १८ दिसम्बर १९२३ के बरतानिया, फ्रांस और स्पेन के एक समझौते के अनुसार होता था। १९२८ में इटली भी इस समझौते में आ मिला। एक अन्तर्राष्ट्रीय कमिटी के हाथ में इसका प्रबन्ध था। यहाँ से सेनायें हटायी गई थीं तथा इसे तटस्थ देश क़रार दे दिया गया था। १९४० के जून में स्पेन ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया। बरतानिया और स्पेन में समझौता होगया कि वह इस पर क़िलेबन्दी नही करेंगे। मरक्को का अधिकांश भाग मरुस्थल है, किन्तु यहाँ कई प्रकार का कच्चा लोहा पाया जाता है। फ्रांस के पतन के बाद से अफ्रीका में नात्सियों और फासिस्तों ने लड़ाई छेड़ रखी है और मरक्को का भाग्य अभी अनिश्चित है। मरक्को-वासी 'बर्बर' जाति के हैं और अरबी की भाँति की भाषा बोलते हैं। अखिल-अरब-वाद और अखिल-इस्लामवाद का प्रभाव भी उन पर है। मलान, डाक्टर डी० एफ०, एम० ए०, डी० डी०--दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रीय-दल का नेता। १८७४ में पैदा हुआ। १९२४ से '३३ तक यूनियन-सरकार में स्वराष्ट्र, स्वास्थ्य और शिक्षा-मन्त्री रहा। इसका राष्ट्रीय दल दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटेन से असम्बन्धित स्वतंत्र राज चाहता है। पार्लमेन्ट में<noinclude></noinclude> r8fed3h525qkt6w8xm781d1j5tlog66 पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७४ 250 2521 663064 573279 2026-06-16T14:45:58Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663064 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>प्रथम राष्ट्रपति बनकर वह स्वदेश लौटा। सन् १९२०, '२८ तथा '३४ मे, क्रमश: तीन बार, वह राष्ट्रपति चुना गया। १४ दिसम्बर १९३५ को, स्वास्थ्य ख़राब होजाने के कारण राष्ट्रपति के पद से त्यागपत्र देदिया। १४ सितम्बर १९३७ को ८७ वर्ष की आयु मे उसका देहान्त होगया। चैकोस्लोवाकी अब तक, दन्तकाथाओ के रूप मे, उसके गुण गाते हैं। उसका पुत्र, इब्रान मसारिक, आजकल लन्दन-प्रवासी चैकोस्लोवाक-सरकार मे परराष्ट्र-मन्त्री है। दार्शनिक के रूप मे टामस मसारिक बुद्धिवादी और मानवतावादी था। वह व्यावहारिक आचार का समर्थक था, किन्तु जर्मन आदर्शवादी दर्शन तथा मार्क्सवाद का आलोचक था। वह प्रजातत्र का पोषक और अपने देश का, पाश्चात्य देशों के आधार पर, पुनर्जागरण चाहता था। मसारिक के यह वाक्य कैसे मार्के के हैं:--"प्रजातन्त्र आधारित है वाद-विवाद पर। राष्ट्र केवल उन आदर्शों के आश्रय पर जीवित रहते हैं, जिनके द्वारा उनके अस्तित्व का विकास हुआ--वह आदर्श ईसा के (प्रेममूलक) आदर्श है, (अत्याचारी) सीजर के नही। वितण्डावाद वस्तुतः कोई योजना नही है। इतिहास हमे सिखाता है कि सभी राष्ट्र अपनी हठधर्मी के कारण नष्ट हुए--फिर वह हठधर्मी जातिगत हो, राजनीतिक हो, धार्मिक हो अथवा वर्गगत। राष्ट्र की (आत्म) रक्षा के लिए क्रान्ति बिलकुल वैध साधन है। किन्तु अन्य सब साधनो के समाप्त होजाने पर ही क्रान्ति की आवश्यकता उत्पन्न होती है। मानवता अपने प्रत्येक रूप मे शान्तिवाद नही है।" महादेव हरिभाई देसाई--लगभग ५१ वर्ष पूर्व सूरत जिले के एक गाँव मे जन्म हुआ। बम्बई से बी० ए० पास किया और वही प्रान्तीय सरकार के सेक्रेटरियट मे अनुवादक नियुक्त होगये। यही काम करते समय क़ानून की परीक्षा उत्तीर्ण की और अहमदाबाद मे वकालत शुरू की। इस पेशे से<noinclude></noinclude> mkgnz58o544c4cfwossrbxbo90ct3eg पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७५ 250 2522 663066 573280 2026-06-16T14:50:03Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663066 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>{{Rh|'''महेन्द्रप्रताप'''||''' २६९'''}} शीघ्र ही अरुचि होगई और प्रान्तीय सहयोग-विभाग मे इन्सपेक्टर होगये। १९१७ मे महात्मा गांधी की निगाहो में चढ़ गये। वह उन्हे साबरमती आश्रम ले आये। महादेव देसाई महात्मा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी बने। १९१९ में 'यंग इंडिया' और गुजराती 'नवजीवन' के सम्पादन मे महात्माजी के सहकारी बने, जबकि गांधीजी ने 'यंगइंडिया' को श्री जमुनादास द्वारकादास से ले लिया था। १९२० में महात्माजी ने प्रयाग के 'इन्डिपेन्डेन्ट' का सम्पादन करने के लिये देसाईजी को भेजा। १९३१ में, गांधीजी के सेक्रेटरी की हैसियत से, राउन्ड टेबल कान्फरेन्स के अवसर पर, विलायत गये। सन् १९३३ के गांधीजी के आमरण-व्रत के समय, यरवदा जेल में, उनके साथ बन्दी थे। गांधीजी की नीति को हृदयंगम कर लेने के कारण ही उन्होने महादेव देसाई को 'हरिजन' का सम्पादक बना दिया था, और इस पत्र मे तथा अन्यत्र वह 'एम० डी०' नाम से ख़ूब लिखा करते थे। गुजराती और अंग्रेज़ी शैली पर उनका समान रूप से अधिकार था। गांधीजी जैसे विश्व-विख्यात महापुरुष के दैनिक पत्र-व्यवहार को वही संभाल पाते थे। गांधीजी के निकट सामीप्य मे रहने का उन्हे अद्वितीय, अलभ्य अवसर प्राप्त हुआ। महादेव भाई की मृत्यु मे अपने युग का तुलसीदास चला गया और राष्ट्र की इस साहित्यिक क्षति की पूर्ति अब असम्भव है। 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव के बाद ९ अगस्त १९४२ को महादेव भाई भी, गांधीजी आदि नेताओ सहित, पकड़े गये और बम्बई सरकार की विज्ञप्ति से पता चला कि, ६ दिन बाद, १५ अगस्त '४२ के प्रातःकाल, नज़रबन्दी के अज्ञात स्थान में, हृदयगति रुक जाने से, उनका देहान्त होगया। वहीं उनका दाह हुआ। महादेव भाई ने पच्चीस वर्षों तक, गांधीजी के सहायक और उनके परम विश्वासपात्र रहकर राष्ट्र की बहुमूल्य सेवा की। उनका जीवन देश की स्वाधीनता के लिये लड़नेवाले एक सैनिक की भाँति आरम्भ हुआ और उसी की भाँति समाप्त भी। अपने देश और देवता पर वह बलिदान होगये। महेन्द्रप्रतापसिंह, राजा--भारत के निर्वासित देशभक्त। जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल ५, सम्वत् १९४३ वि०। पिता का नाम राजा घनश्यामसिंह। जन्म स्थान मुरसान (ज़िला अलीगढ़)। राजा हरनारायण सिंह के दत्तक<noinclude></noinclude> 8zkbf2ncb81h58ogeso8etgoldd75x3 पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७६ 250 2523 663068 573281 2026-06-16T14:54:34Z Lohit Sathesh 6558 663068 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Deepthi." /></noinclude>{{Rh|'''२७०'''||''' मार्क्सवाद'''}} पुत्र । ६ वर्ष की आयु मे ही पिता का देहान्त होगया । रियासत कोर्ट ग्राफ् वाड्स के संरक्षण मे होगई । बी० ए० तक शिक्षा प्राप्त की । १९०३ में सपत्नीक योरप यात्रा की । सन् १६०६ मे औद्योगिक शिक्षा के प्रचारार्थ, जिसमे राजा साहब की विशेष रुचि थी, वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की । २०,०००) सालाना की ग्रामदनी की जमीदारी तथा निजी राजभवन विद्यालय को दान मे दे दिये । गुरुकुल वृन्दावन को अक्टूबर १६११ मे, १५,००० मूल्य की भूमि दी । इसी भूमि पर गुरुकुल विश्वविद्या- लय का भवन बनाया गया है । हिन्दी साप्ताहिक 'प्रेम' की स्थापना की तथा उसका सपादन किया । सन् १६१२ में दूसरी बार योरप गये तथा सन् १६१४ मे तीसरी बार । साथ मे गुरुकुल कॉगडी के प्रथम स्नातक, महात्मा मुन्शीराम ( स्व ० स्वामी श्रद्धानन्द ) के वडे पुत्र हरिश्चन्द्र विद्या- लङ्कार को अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बनाकर लेगये । उसी समय से वह स्विट्- ज़रलैण्ड, जर्मनी, फ्रान्स, तुर्किस्तान, सोवियत रूस, अफगानिस्तान, जापान यदि मे भ्रमण कर भारतीय स्वाधीनता के पक्ष में लोकमत बनाते और विश्वबन्धुत्व का प्रचार करते रहे हैं । राजा साहब मानवतावाद के प्रबल समर्थक हैं । इसी भावना से प्रेरित होकर, सन् १६१२ मे, सबसे पूर्व, अछूत कहे जानेवाले सम्प्रदाय को इस प्रेम- पुजारी ने व्यावहारिक रूप मे अपनाया । विश्व बन्धुत्व तथा अन्तर्राष्ट्रीयता के वह पोषक और राष्ट्रीय स्वाधीनता के सच्चे उपासक हैं । उन्हे स्वदेश वापस आने की आज्ञा नहीं है । केन्द्रीय असेम्बली मे इस प्रतिबंध के हटाने का प्रयत्न किया गया, परन्तु सफलता नही मिली । पिछले तीन वर्षों से उनके सम्बन्ध मे कोई समाचार नहीं सुना गया । मार्क्सवाद -- कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तानुसार समाजवादी विचारधारा । मार्क्स का, यहूदी वश मे, जर्मनी मे, सन् १८१८ मे, जन्म हुआ और सन् १८८३ मे, लन्दन मे, मृत्यु । मार्क्सवाद भौतिकतावादी समाज-शास्त्र है । वह जर्मन दार्शनिक, हीगल, और अँगरेज अर्थशास्त्री, रिकार्डो, के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर आश्रित है । उसकी दृष्टि मे मानव की समस्त श्राध्यात्मिक, मानसिक और सासारिक उन्नति तथा उसके विकास का मूलाधार आर्थिक है ।<noinclude></noinclude> kq0j3kmwzo41l2p8h22knhk8xlyl4bz 663069 663068 2026-06-16T14:54:41Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663069 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>{{Rh|'''२७०'''||''' मार्क्सवाद'''}} पुत्र । ६ वर्ष की आयु मे ही पिता का देहान्त होगया । रियासत कोर्ट ग्राफ् वाड्स के संरक्षण मे होगई । बी० ए० तक शिक्षा प्राप्त की । १९०३ में सपत्नीक योरप यात्रा की । सन् १६०६ मे औद्योगिक शिक्षा के प्रचारार्थ, जिसमे राजा साहब की विशेष रुचि थी, वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की । २०,०००) सालाना की ग्रामदनी की जमीदारी तथा निजी राजभवन विद्यालय को दान मे दे दिये । गुरुकुल वृन्दावन को अक्टूबर १६११ मे, १५,००० मूल्य की भूमि दी । इसी भूमि पर गुरुकुल विश्वविद्या- लय का भवन बनाया गया है । हिन्दी साप्ताहिक 'प्रेम' की स्थापना की तथा उसका सपादन किया । सन् १६१२ में दूसरी बार योरप गये तथा सन् १६१४ मे तीसरी बार । साथ मे गुरुकुल कॉगडी के प्रथम स्नातक, महात्मा मुन्शीराम ( स्व ० स्वामी श्रद्धानन्द ) के वडे पुत्र हरिश्चन्द्र विद्या- लङ्कार को अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बनाकर लेगये । उसी समय से वह स्विट्- ज़रलैण्ड, जर्मनी, फ्रान्स, तुर्किस्तान, सोवियत रूस, अफगानिस्तान, जापान यदि मे भ्रमण कर भारतीय स्वाधीनता के पक्ष में लोकमत बनाते और विश्वबन्धुत्व का प्रचार करते रहे हैं । राजा साहब मानवतावाद के प्रबल समर्थक हैं । इसी भावना से प्रेरित होकर, सन् १६१२ मे, सबसे पूर्व, अछूत कहे जानेवाले सम्प्रदाय को इस प्रेम- पुजारी ने व्यावहारिक रूप मे अपनाया । विश्व बन्धुत्व तथा अन्तर्राष्ट्रीयता के वह पोषक और राष्ट्रीय स्वाधीनता के सच्चे उपासक हैं । उन्हे स्वदेश वापस आने की आज्ञा नहीं है । केन्द्रीय असेम्बली मे इस प्रतिबंध के हटाने का प्रयत्न किया गया, परन्तु सफलता नही मिली । पिछले तीन वर्षों से उनके सम्बन्ध मे कोई समाचार नहीं सुना गया । मार्क्सवाद -- कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तानुसार समाजवादी विचारधारा । मार्क्स का, यहूदी वश मे, जर्मनी मे, सन् १८१८ मे, जन्म हुआ और सन् १८८३ मे, लन्दन मे, मृत्यु । मार्क्सवाद भौतिकतावादी समाज-शास्त्र है । वह जर्मन दार्शनिक, हीगल, और अँगरेज अर्थशास्त्री, रिकार्डो, के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर आश्रित है । उसकी दृष्टि मे मानव की समस्त श्राध्यात्मिक, मानसिक और सासारिक उन्नति तथा उसके विकास का मूलाधार आर्थिक है ।<noinclude></noinclude> dmxm2y14y7wm2d7mdnpp5qe1jgbszh2 पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८० 250 2528 663070 573286 2026-06-16T14:57:58Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663070 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>{{Rh|'''२७४'''||'''मिस्र'''}} संघ की लाल सेना के मार्शल तुख़ाचेवस्की तथा सात जनरलों पर तीसरा ऐसा ही मामला चला कि वे जर्मन-सेनानायकों से मिलकर रूस तथा स्तालिन के विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे थे। इनका मुक़दमा बन्द अदालत में, गोपनीय ढंग से, हुआ। सरकारी बयान के मुताबिक इन्होने भी अपना अपराध स्वीकार किया और इन सबको गोली मार दी गई। ऐसा विचार किया जाता है कि यह मुक़दमे साम्यवादी दल की शुद्धि के लिये चलाये गये थे, जिनके अनुसार अन्य अनेक विरोधी कम्युनिस्टों को भी मौत की सज़ाएं दी गई। मिण्टो-मार्ले-सुधार--१९०९ के नाम-मात्र के सुधारों के बाद, सन् १९०६ में, भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड मिण्टो तथा भारत-मंत्री लार्ड मार्ले ने भारतीय शासन-सुधार की एक योजना बनाई, जिसके अनुसार भारत के प्रत्येक प्रान्त में धारासभाएँ स्थापित की गई तथा उनमें थोड़े-से चुने हुए प्रतिनिधियों के लिये भी स्थान रखा गया। कुछ स्थानीय स्वायत्त भी थोड़ा बढ़ा दिया गया। सबसे प्रथम पृथक् साम्प्रदायिक निर्वाचन-प्रणाली का इसी योजना में स्थान दिया गया, और इसी के अनुसार सिखों को, हिन्दुओं से अलग सम्प्रदाय मानकर, उन्हें पृथक् निर्वाचनाधिकार दिया गया। मिस्र--अफ्रीका स्थित 'स्वतंत्र' राज्य, क्षेत्रफल ३,४८,००० वर्ग०; जन० १,६०,००,०००, भाषा अरबी, राजधानी काहिरा, बादशाह फ़ारूक अव्वल (राजवंश अलवानी तुर्क, मुहम्मदअली शाखा), जिसका जन्म ११ फरवरी सन् १९२० को हुआ। १८४१ से १९१६ तक मिस्र, तुर्की के अधीन, अर्द्ध-स्वतंत्र देश रहा। तुर्की की ओर से एक ख़ान्दानी ख़दीव (वाइसराय) इस पर हुकूमत किया करता था। सन् १८८२ में अंग्रेज़ों ने इस देश पर आधिपत्य कर लिया। १८ दिसम्बर १९१४ को यह ब्रिटिश संरक्षित राज्य घोषित कर दिया गया और जर्मन-हिमायती ख़दीव अब्बास हिलमी को हटा दिया गया और उसके स्थान पर, सुल्तान की उपाधि धारण कर, हुसैन कमाल ख़दीव बना। कमाल १९१७ में मर गया, तब उसका भाई फ़ुआद ख़दीव बनाया गया और १९२२ में इसे मिस्र का बादशाह घोषित कर दिया गया। मिस्र में, इसके बाद, देश की पूर्ण स्वाधीनता के लिये, ज़बरदस्त राष्ट्रीय आन्दोलन शुरू होगया। २६ अगस्त १९३६ को मिस्र-ब्रिटेन-सन्धि द्वारा।<noinclude></noinclude> 8jmc2qpk44kteydw9ygkiaji9ur2frh पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८२ 250 2530 663079 573288 2026-06-16T17:21:49Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663079 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>और बरतानिया मे युद्ध छिड़ जाने की आशका होउठी। उस समय बरतानिया के राजनीतिज्ञों ने मिस्र को संतुष्ट करना ही उचित समझा और १९३६ मे, पूर्वोक्त परस्पर संधि करली। गत वर्ष जर्मन जनरल रोमेल जब लीबिया से बढ़ता-बढ़ता मिस्र के समीप तक आ गया था, तब काहिरा आदि पर धुरी वायुयानों ने बमवर्षा की थी। स्वेज बरतानिया के पूर्व-देशीय साम्राज्य की धमनी है; उसकी रक्षा के लिये युद्ध-काल मे मिस्र को संतुष्ट रखना आवश्यक है। मिस्र मे निरक्षरता बहुत है, साधारण जनता ९० फी० निरक्षर है। १९२३ के मिस्त्री शासन-विधान के अनुसार यहाँ दो धारासभाएँ हैं: मजलिसुश-व्यूक (बड़ी) जिसके १५० सदस्यों का, ५ साल के लिये, सार्वजनिक चुनाव होता है। दूसरी मजलिसुल-नवाब (छोटी), जिसके १०० सदस्यों मे से ६० को बादशाह नामज़द करता है, ४० का चुनाव होता है, सरकार मजलिसुश-व्यूक के प्रति ज़िम्मेदार है। मुकर्जी, डा० श्यामाप्रसाद--आप अ० भा० हिन्दू महासभा के कार्य-कर्त्ता-प्रधान हैं। हिन्दू महासभा के नेताओं मे आपका महत्वपूर्ण स्थान है। विगत नवम्बर १९४१ मे बंगाल-सरकार के प्रधान मंत्री मियाँ फ़ज़लुलहक़ ने आपको अपने मंत्रि-मंडल मे अर्थ-सचिव के पद पर नियुक्त किया। इससे पूर्व आप कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर के पद पर भी कई वर्षों तक रह चुके हैं। आप प्रसिद्ध शिक्षा-विज्ञ तथा विद्वान् है। अगस्त १९४२ मे।<noinclude></noinclude> azns0whygl5xzldwjwhjquiun83dpju पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८३ 250 2531 663080 573289 2026-06-16T17:23:19Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663080 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>{{Rh|'''मुद्रा विनिमय'''||''' २७७'''}} 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव के बाद देश मे हुई अशान्ति के समय सरकार द्वारा किये गये दमन के विरोध मे डा० मुकर्जी ने प्रान्तीय गवर्नर के नाम एक मार्मिक पत्र लिखा (जो सरकार द्वारा ज़ब्त कर लिया गया) और मंत्रि-मंडल से इस्तीफा दे दिया। भारत की वर्तमान समस्या के निपटारे के प्रयत्न करनेवालो मे आपका स्थान मुख्य है। मुक्त अर्थनीति--अर्थशास्त्रियो के एक दल का यह सिद्धान्त है कि आर्थिक-संकटो के निवारण के लिये एक नवीन मुद्रा-प्रणाली स्थापित कीजाय। इसका आधारभूत सिद्धान्त यह है कि ऐसी व्यवस्था की जाय कि मुद्रा का मूल्य स्वतः हर मास कम होता रहे और उसके स्थान पर नवीन मुद्रा का प्रचलन होता रहे। इससे मुद्रा-संचालन का प्रचलन बड़ी तीव्र गति से होगा, लोग मुद्रा का मूल्य घटने के कारण, उसका वेग से प्रचलन करेंगे। जब स्थायी रूप से मुद्रा का प्रचलन होगा तो बेकारी न रहेगी; आर्थिक संकट भी उत्पन्न न होगा। मुक्त बन्दरगाह--किसी देश के बन्दरगाह को, उस देश द्वारा, दूसरे देश को प्रयोग करने का अधिकार देना। अन्य देश अपना माल उस बन्दरगाह से भेज सके तथा उस बन्दरगाह पर मँगा सके। उसे न कोई आयात-निर्यात कर देना पड़े और न इस प्रयोग के लिये उसपर किसी प्रकार का दायित्व या बंधन लगाया जाय। मुक्त व्यापार--मुक्त व्यापार से यह प्रयोजन है कि सब देश स्वतंत्र रूप से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार करे और कम-से-कम तट-कर (टैरिफ) आयात-निर्यात पर उनको देना पड़े। मुद्रा-विनिमय--प्रत्येक देश मे भिन्न-भिन्न प्रकार की मुद्राएँ प्रचलित हैं:<noinclude></noinclude> ingogyetikum06x2zv3evm1tvfjkn1d पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८४ 250 2532 663082 573290 2026-06-16T17:36:55Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663082 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>जैसे भारत में रुपया, अमरीका में डालर, इंग्लैंड में पाँट तथा शिलिंग, जर्मनी में मार्क, जापान में येन, रूस में रूबल। परस्पर देशों में व्यापार होता है और किसी वस्तु के मूल्य के भुगतान के लिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक देश के मुद्रा की दर नियत कर दीजाय। देश की सामाजिक-राजनीतिक अवस्था का मुद्रा की दर पर भी प्रभाव पड़ता रहता है। मुंजे, डाक्टर बालकृष्ण शिवराम--हिन्दू महासभा को पुनर्संगठित करनेवाले और महासभा के प्रथम दल के नेता। नागपुर के प्रसिद्ध चिकित्सक। असहयोग आन्दोलन, सन् १९२० में, भाग लिया और जेल-यात्रा की। बाद को हिन्दू महासभा में शामिल हुए। सन् १९३१ की दूसरी गोलमेज-परिषद् में प्रतिनिधि होकर गए। आपकी सैनिक शिक्षा में विशेष रुचि है। इसीलिए आपने नासिक में भोंसले मिलिटरी कालेज की स्थापना कराई है। हिन्दू महासभा के सभापति भी रह चुके हैं। देश-हितकारी कार्यों में पूर्व से ही भाग ले रहे हैं। १९१९ के फौजी-शासन के बाद पीडित पंजाब की सहायतार्थ स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानन्दजी के साथ आप भी अमृतसर गये थे। आजकल हिन्दू महासभा के प्रधान मंत्री हैं। मुंशी, कन्हैयालाल माणिकलाल--जन्म सन् १८८७ ई०। बड़ौदा और बम्बई में शिक्षा प्राप्त की। बम्बई हाईकोर्ट में वकालत शुरू की। सन् १९१५ में मि० जमुनादास-द्वारकादास के साथ 'यंग इंडिया' का संपादन किया। सन् १९१७-१६ में होमरूल लीग बम्बई के मंत्री रहे। बम्बई विश्वविद्यालय की सीनेट तथा सिंडीकेट के सदस्य हैं। सन् १९३० के सत्याग्रह-आन्दोलन के समय से राष्ट्रीय क्षेत्र में हैं, और अपनी धर्मपत्नी, श्रीमती लीलावती, के साथ<noinclude></noinclude> bnbmzk6c0nl3gas1njtbytjgt7bd6pt पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८५ 250 2533 663083 573291 2026-06-16T17:38:32Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663083 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>जेल-यात्रा भी की है। अ० भा० कांग्रेस कमिटी के पुराने सदस्य रहे हैं। आप गुजराती के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, लेखक, पत्रकार और उच्च कोटि के उपन्यासकार हैं। गुजराती साहित्य-कोष का सम्पादन भी आपने किया है। सन् १९३७-१९३८ तक बम्बई की कांग्रेसी प्रान्तीय सरकार के स्वराष्ट्र-मंत्री (Home Minister) रहे। युद्ध के प्रश्न पर कांग्रेस मंत्रि-मंडल के साथ आपने भी त्यागपत्र दे दिया। सन् १९४१ मे कांग्रेस की साम्प्रदायिक-निर्णय-सम्बन्धी नीति पर गांधीजी से आपका मतभेद होगया और आपने कांग्रेस को त्याग कर 'पाकिस्तान' के निराकरण मे 'अखंड हिन्दुस्तान' आन्दोलन की नींव डाली। 'सोशल वैलफेयर' नामक साप्ताहिक आपने निकाला है, जिसके द्वारा आप अपने विचारो का प्रतिपादन कर रहे है। मुफ्ती आज़म--(यरूशलम का), इस्लाम का धर्माचार्य, अरब का राष्ट्रीय नेता, नाम हज अमीन एफन्दी अल् हुसैनी, अवस्था ४५ वर्ष, काहिरा, यरूशलम और कुस्तुन्तुनिया मे तालीम पाई, अपने भाई के बाद, सन् १९२१ मे, यरूशलम का मुफ्ती बना, सन् १९२३ मे सुप्रीम मुस्लिम कौंसिल का अध्यक्ष हुआ, १९३१ ई० मे यरूशलम मे मुस्लिम कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। विगत विश्वयुद्ध मे मुफ्ती ने, तुर्कों के ख़िलाफ़, बरतानिया का पक्ष लिया किन्तु, फ़िलस्तीन मे यहूदियो को बसाने के प्रश्न पर, वह ब्रिटेन के विरुद्ध हो गया। आज बीस वर्षों से वह, फ़िलस्तीन मे यहूदी उपनिवेश बसाये जाने के प्रतिरोध मे, बरतानिया के विरुद्ध, अरबों मे आन्दोलन कर रहा है। उसे १० साल क़ैद की सज़ा दी गई थी, परन्तु बाद मे रिहा कर दिया गया। उसका फ़िलस्तीन-अरब दल, जो मुफ्ती दल भी कहलाता है, फ़िलस्तीन मे सबसे बडा दल है। सन् १९३७ मे मुफ्ती अरब की उच्च संस्था का अध्यक्ष बना। दूसरे अरब नेताओं के साथ मुफ्ती पर फ़िलस्तीन मे प्रवेश-निषेध लगाया<noinclude></noinclude> 4s5t2okz7gofy24b3edd96xdcx9cmo8 पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८६ 250 2534 663084 573292 2026-06-16T17:39:56Z Lohit Sathesh 6558 /* शोधित */ 663084 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lohit Sathesh" /></noinclude>गया, तब वह शाम (सीरिया) में जाकर रहने लगा। शाम से भी वह अरब-आन्दोलन का सचालन करता रहा। फरवरी १९३७ में मुफ़्ती ने, लन्दन के फ़िलस्तीन-सम्मेलन में, अरब-सभ्य-मंडल भेजा था। अप्रैल '४१ में, रशीद अली के नेतृत्व में इराक में उठे अंग्रेज़-विरोधी विद्रोह में भी मुफ़्ती ने भाग लिया। विद्रोह के दवा दिये जाने पर मुफ़्ती ईरान को चला गया, और जब इराक पर अंग्रेज़ों ने क़ब्ज़ा कर लिया तो मुफ़्ती इटली जा पहुँचा। दिसम्बर १९४१ में वह जर्मनी में था, जहाँ उसने हिटलर से भेंट की थी। मुसोलिनी, बैनितो--इटली का अधिनायक; फ़ासिज्म का संस्थापक; २६ जुलाई सन् १८८३ को पैदा हुआ, इसका बाप लुहार था; थोड़ा-सा इसने पढ़ा-लिखा; बड़ा होने पर मुसोलिनी समाजवादी बन गया। सन् १९०२ में इटली से भाग गया और स्विट्ज़रलैंड जाकर रहने लगा। इटली वापस आया। समाजवादी दल में उग्र कार्यक्रम का प्रचार किया। १९१२ में दल के मुख-पत्र 'अवन्ती' का सचालक नियुक्त किया गया। १९१४ में जब पिछला विश्वयुद्ध आरम्भ हुआ तो मुसोलिनी राष्ट्रवादी बन गया और इटली के युद्ध में सम्मिलित होने का प्रचार करने लगा। समाजवादी दल ने, इस कारण, उसे अपने में से निकाल बाहर किया। नवम्बर १९१४ में उसने 'पोपोलो द'इतालिया' नामक अपना पत्र निकाला; लड़ाई में हस्तक्षेप करने के अनुयायी दल का नेता बनगया; मई १९१५ में, इटली के लड़ाई में शामिल होने पर, मुसोलिनी इटालियन सेना में भरती होकर साधारण सैनिक बना; कारपोरल के पद पर पहुँचा, फरवरी १९१७ में युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और अच्छा होजाने पर लौटा तथा समाचार-पत्र के सचालन में लग पड़ा। लड़ाई के बाद, वर्साई में जब संधि हुई तो, इटली को विजय की लूट में संतोषजनक भाग न मिला और देश में वाम-पक्षी क्रान्तिवाद अधिक बढ़ा तब, २३ मार्च १९१९ को, मुसोलिनी ने 'मिलान' नगर में, फ़ासिस्त दल की स्थापना की, जिसमें उस समय सिर्फ़ ४० सदस्य भरती हुए। इस दल का कार्यक्रम राष्ट्रीय और साम्यवाद-विरोधी रखा गया। १९१९ के चुनाव में उसके दल के उम्मीदवारो को सिर्फ़ ४,००० मत मिले, किन्तु बाद में यह आन्दोलन तेजी से बढ़ा। सन् १९२१ में उसने लिबरल दल के नेता से समझौता किया।<noinclude></noinclude> eylqfba7kfj63rjqq1y190bj1m5bpnb पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/२३४ 250 13581 663074 630161 2026-06-16T16:40:00Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663074 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" /></noinclude>&nbsp; {{Dhr|5em}} {{c|{{Xxxx-larger|'''''कर्मभूमि'''''}}}} {{Dhr|5em}} {{Rule|5em}} {{Dhr|5em}} {{c|{{Larger|'''लेखक'''}}<br>{{Xx-larger|'''प्रेमचन्द'''}}}} {{Dhr|5em}} {{Rule|5em}} {{Dhr|5em}} {{c|{{Larger|'''प्रकाशक'''}}<br>{{Xx-larger|'''सरस्वती-प्रेस, बनारस सिटी'''}}}} {{Dhr|2em}} {|width=100% !{{Gap|8em}}प्रथम !! सन् !!{{Gap|6em}}मूल्य |- !{{Gap|7em}}संस्करण !! १९३२ !!{{Gap|5em}}तीन रुपये |} {{Dhr|2em}} {{c|(प्रथम संस्करण का मुख पृष्ठ)}}<noinclude></noinclude> 9im7wp1pcqto78kpqwv2n1ehql2fl8s पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४५४ 250 37868 663085 637276 2026-06-16T18:25:50Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663085 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|'''454 : प्रेमचंद रचनावली-5'''||}}</noinclude>एक ही सांस में अपने हृदय का सारा मालिन्य उंडेल देने के बाद लालाजी दम लेने के लिए रुक गए। जो कुछ इधर-उधर लग्-चिपटी रह गया हो, शायद उसे भी खुरचकर निकाल देने का प्रयत्न कर रहे थे। सुखदा ने पूछा-तो आप वहां कब जा रहे हैं? लालाजी ने तत्परता से कहा-आज ही, इधर ही से चला जाऊंगा। सुना है, वहां जोरों से दमन हो रहा है। अब तो वहां का हाल समाचार-पत्रों में भी छपने लगा। कई दिन हुए, मुन्नी नाम की कोई स्त्री भी कई आदमियों के साथ गिरफ्तार हुई है। कुछ इसी तरह की हलचल सारे प्रांत, बल्कि सारे देश में मची हुई हैं। सभी जगह पकड-धकड़ हो रही हैं। बालक कमरे के बाहर निकल गया था। लालाजी ने उसे पुकारा, तो वह सड़क की ओर भागा। समरकान्त भी उसके पीछे दौड़े। बालक ने समझा, खेल हो रहा है। और तेज दौड़ा। ढाई-तीन साल के बालक की तेजी ही क्या, कितु समरकान्त जैसे स्थूल आदमी के लिए पूरी कसरत थी। बड़ी मुश्किल से उसे पकड़ा । एक मिनट के बाद कुछ इस भाव से बोले, जैसे कोई सारगर्भित कथन हो-मैं तो सोचता हैं, जो लोग जाति-हित के लिए अपनी जान होम करने को हरदम तैयार रहते हैं, उनकी बुराइयों पर निगाह ही न डालनी चाहिए। सखुदा ने विरोध किया-यह न कहिए, दादा । ऐसे मनष्यों का चरित्र आदर्श होरा चाहिए नहीं तो उनके परोपकार में भी स्वार्थ और वासना की गंध आने लगेगी। समरकान्त ने तत्त्वज्ञान की बात कही-स्वार्थ मैं उसी को कहता हूं, जिसके मिलने में चित्त को हर्ष और न मिलने से क्षोभ हो। ऐसा प्राणी, जिम हर्ष और क्षोभ हो ही नहीं, मनुष्य नहीं, देवता भी नहीं, जड़ हैं। सुखदा मुस्कराई– तो संसार में कोई निस्वार्थ हो ही नहीं सकता? "असंभव ! स्वार्थ छोटा हो, तो स्वार्थ है, बड़ी हो, तो उपकार है। मेरा तो विचार हे, ईश्वर-भक्ति भी स्वार्थ है।" मुलाकात की समय कब का गुजर चुका था। मेट्रन अब और रिआयत न कर मकती थी। समरकान्त ने बालक को प्यार किया, बहू को आशीर्वाद दिया और बाहर निकले। बहुत दिनों के बाद आज उन्हें अपने भीतर आनंद और प्रकाश का अनुभव हुआ, माना चन्द्रदेव के मुख से मेघों का आवरण हट गया हो। {{rh||'''दो'''|}} सुखदा अपने कमरे में पहुंची, तो देखा-एक युवती कैदियों के कपड़े पहने उसके कमरे की सफाई कर रही है। एक चौकीदारिन बीच-बीच में उसे डांटती जाती है। चौकीदारिन ने कैदिन की पीठ पर लात मारकर कहा-रांड, तुझे झाडू लगाना भी नहीं आता ! गर्द क्यों उड़ाती है? हाथ दबाकर लगा। कैदिन ने झाडू फेंक दी और तमतमाते हुए मुख से बोली- मैं यहां किसी की टहन करने नहीं आई हूं। "तब क्या रानी बनकर आई है?"<noinclude></noinclude> r3vxchutwhwew09srtahu168qbluoyz पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४५५ 250 37869 663086 639593 2026-06-16T18:31:26Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663086 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:455}}</noinclude>कर्मभूमि : 455 ''हां, रानी बनकर आई हूं। किसी की चाकरी करना मेरा काम नहीं है।'' "तू झाडू लगाएगी कि नहीं?'' " भलमनसी से कहो, तो मैं तुम्हारे भंगी के घर में भी झाडू लगा दूंगी; लेकिन भार का भय दिखाकर तुम मुझसे राजा के घर में भी झाडू नहीं लगवा सकतीं। इतना समझ रखो।'' ''तू न लगाएगी झाडू?" 'नहीं । चौकीदारिन ने कैदिन के केश पकड़ लिए और खींचती हुई कमरे के बाहर ले चली। रह-रहकर गालों पर तमाचे भी लगाती जाती थी। "चल जेलर साहब के पास।'' ''हां, ले चलो। मैं यही उनसे भी कहूगी। मार-गाली खाने नहीं आई हूं।'' सुखदा के लगातार लिखा-पढ़ी करने पर यह टहलनी दी गई थी, पर यह कांड देखकर सुखदा का मन क्षुब्ध हो उठा। इस कमरे में कदम रखना भी उसे बुरा लग रहा था। | कैदिन ने उसकी ओर सजले आंखों से देखकर कहा-तुम गवाह म्हन} इस चौकीदारिन ने मुझे कितना मारा है। | सखुदा ने समीप जाकर चौकीदारिन को हटाया और कैदिन का हाथ पकड़कर कमरे में ले गई। चौकीदार ने धमकाकर कहा--राज समरे यहां आ जाया कर। जो काम यह कहें, वह किया कर नहीं इंडे पड़ेंगे। | कैदिन क्रोध में कांप रही थी-मैं किसी को नोंडी नहीं हूँ और न यह काम करूंगी। किसी रानी- महारानी की टहल करने नहीं आई। जेल म मय बराबर हैं । | सुखदा ने देखा, युवती में आत्म-सम्मान की कमी नहीं। लज्जत होकर बोली-यहां कोई रानी-महारानी नहीं है बहन, मेरा जी अकेले घबराया करता था, इसलिए तुम्हें बुला लिया। हम दोनों यहां बहनों की तरह रहेगी। क्या नाम है तुम्हारा युवती की कठोर मुद्रा नर्म पड़ गई। बोनी--में राम मुन्नी हैं। दार से आई हूँ। सुखदा चौंक पड़ी। लाला समरकान्त ने यही नाम तो लिया था। पूछा-वहां किस अपराध में सजा हुई? | "अपराध क्या था? सरकार जमीन का लगान नहीं कम करती थी। चार आने की छुट हुई। जिंस का दाम आधा भी नहीं उतरा। हम किसके घर से ला के देत? इस बात पर हमने फरियाद को। बस, सरकार ने सजा देना शुरू कर दिया।'' मुन्नी को सुखदा अदालत में कई बार देख चुकी थी। तब से उसकी सूरत बहुत कुछ बदल गई थी। पूछा-तुम बाबू अमरकान्त को जानती हो? वह भी इसी मुआमले में गिरफ्तार हुए हैं। | मुन्नी प्रसन्न हो गई-जनिती क्यों नहीं, वह तो मेरे ही घर में रहते थे। तुम उन्हें कैसे जानती हो? वही तो हमारे अगुआ हैं। सुखदा ने कहा- मैं भी काशी की रहने वाली हूं। उसी मुहल्ले में उनका भी घर है। तुम क्या ब्राह्मणी हो? ‘हूं तो ठकुरानी, पर अब कुछ नहीं हूं। जात-पात, पूत-भतार सबको खो बैठी।''<noinclude></noinclude> e8j8h2beryympgf8jr6efidypuaimij पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४५६ 250 37870 663087 596044 2026-06-16T18:33:42Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663087 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|456:प्रेमचंद रचनावली-5||}}</noinclude>456 : प्रेमचंद रचनावली-5 "अमर बाबू कभी अपने घर की बातचीत नहीं करते थे?'' "कभी नहीं। कभी आना न जाना, न चिट्ठी, न पत्तर।'' सुखदा ने कनखियों से देखकर कहा-मगर वह तो बड़े रसिक आदमी हैं। वहां गांव में किसी पर डोरे नहीं डाले? मुन्नी ने जीभ दांतों तले दबाई-कभी नहीं बहूजी, कभी नहीं। मैंने तो उन्हें कभी किसी मेहरिया की ओर ताकते या हंसते नहीं देखा। न जाने किस बात पर घरवाली से रूठ गए। तुम तो जानती होगी? | सुखदा ने मुस्कराते हुए कहा-रूठ क्या गए, स्त्री को छोड़ दिया। छिपकर घर से भाग गए। बेचारी औरत घर में बैठी हुई है। तुमको मालूम न होगा। उन्होंने जरूर कहीं-ने-केही दिन लगाया होगा। मुन्नी ने दाहिने हाथ को सांप के फन की भाँति हिलाते हुए कहा-ऐसी बात होती, तो गांव में छिपी न रहती, बहुजी ! मैं तो रोज ही दो-चार बार उनके पास जाती थी। कभी मिर ऊपर न उठाते थे। फिर उस देहात में ऐसी थी ही कौन, जिस पर उनका मन चलता। न कोई पढ़ी-लिखी, न गुन, न सहूर। | सुखदा ने नब्ज टटोली--मदं गुन-सहूर, पढ़ना लिखना नहीं देखते। वह तो रूप-रम् देखते हैं और वह तुम्हें भगवान् ने दिया ही है। जवान भी हो। मुन्नी ने मुंह फेरकर कहा-तुम तो गाली देती हां, बहुजी । मरी और भला वह क्या देखते, जो उनके पांव की जूतियों के बराबर नहीं, लेकिन तुम कौन हो बहजो, तुम यहा के आई? जैसे तुम आई वैसे ही मैं भी आई।'' ''तो यहां भी वही हलचले हैं?'' " हां, कुछ उसी तरह की है।'' मुन्नी को यह दर्खकर आश्चर्य हुआ कि ऐसी विदुषी देवियां भी जेल में भेजी गई हैं। भन्ना इन्हें किस बात का दु: हागा? उसने डरते-डरने पूछा--तुम्हा स्वामी भी सजा पा गा हो । ''हां, तभी तो में आई।'' मुन्नी ने छत की ओर देखकर आशीर्वाद दिया-भगवान् तुम्हारा मनोरथ पूरा करे बहुजी । गद्दी--मसनद लगाने वाली रानियां जब तपस्या करने लगी, तो भगवान् वरदाने भी जल्दी ही देंगे। कितने दिन की मजा हुई है? मुझे तो छ: महीने की है। सुखदा ने अपनी मजा की मियाद बताकर कहा- तुम्हारे जिन्ने में बड़ी मंख्तिया हो रही होंगी। तुम्हारा क्या विचार है, लोग मरती से दब जाएंगे? मुन्नी ने मानो क्षमा-याचना को-मेरे सामने तो लोग यही कहते थे कि चाहे फांसी पर चढ़ जाएं, पर आधे से बेशी लगान न देंगे, लेकिन दिन से सोचो, जब बैलं बधिए छीने जाने लग, सिपाही घरों में घुसेंगे, मरदों पर इंडे और गोलियों की मार पड़ेगी, तो आदमी कहा तक सहेगा? मुझे पकड़ने के लिए तो पूरी फौज गई थी। पचास आदमियों से कम न होंगे। गोली चलते-चलते बची। हजारों आदमी जमा हो गए। कितना समझाती थी-- भाइयो, अपने- अपने घर जाओ, मुझे जाने दो, लेकिन कौन सुनता है? आखिर जब मैंने कसम दिलाई, तो<noinclude></noinclude> loucuk7imn2umnk7ustmp5tx0m99vjz पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४५७ 250 37871 663088 596045 2026-06-16T18:34:49Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663088 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:457}}</noinclude>कर्मभूमि : 457 ग लौटे: नहीं, उसी दिन दस-पांच की जान जाती। न जाने भगवान् कहां सोए हैं कि इतना याय देखते हैं और नहीं बोलते। साल में छ: महीने एक जून खाकर बेचारे दिन काटते हैं, चीथड़े पहनते हैं, लेकिन सरकार को देखो, तो उन्हीं की गरदन पर सवार ! हाकिमों को तो अपने लिए बंगला चाहिए, मोटर चाहिए, हर नियमित खाने को चाहिए, मैर-तमाशा चाहिए, पर गरीबों का इतना सुख भी नहीं देखा जाता है जिसे देखो, गरीबों ही का रक्त चूसने को तैयार है। हम जमा करने को नहीं मांगते, न हमें भोग-विलास की इच्छा है, लेकिन पेंट को रोटी और तन ढकने को कपड़ा तो चाहिए। सान-भर खाने-पहनने को छोड़ दो, गृहस्थी का जो कुछ खरच पड़े वह दे दो। बाकी जितना बचे, उठा ले जाओ। मृदा गरीबों को कौन सुनता सुखदा ने देखा, इस गंवारन 4. दय में कितनी सहानभूति, कितनी दया, कितनी जागृति भरी हुई है। अमर क त्याग और सेवा की उसने जिन शब्दों में सराहना की, उसने जैसे सखदा के अंत:करण की सारी मलिनताओं को धोकर निर्मल कर दिया, जैसे उसके मन में प्रकाश आ गया हो, और उसकी सारी शंकाएं और चिंताएं अंधकार की भांति मिट गई हों। अमरकान्त का कल्पना-चित्र उसकी आंखों के सामने आ खड़ा हुआ-कैदियों का जाँघिया- कंटोप पहने, बड़े-बड़े बाल बढ़ाए, मुख मन्निन, कैदियों के बीच में चक्की पीसता हुआ। वह ११यभीत हो रही। उमका हदय कभी इतना कोमल न था। | मेट्रन ने आकर कहा--अब तो आपको नौकरानी मिल गई। इसमें खुव काम ली। सुखदा धीमे स्वर में बोली--मुझे अब नौकरानी की इच्छा नहीं है मेमसाहब, मैं यहां रहना भी नहीं चाहती। आप मुझे मामूली कैदियों में भेज दीजिए। मेट्न छोटे कद की एंग्लो-इंडियन महिन्ना थी। मुंह, छोटी-छोटी आंखे, तराशे हुए बाल, घुटनों के ऊपर तक का स्कर्ट पहने हुए। विस्मय से बोली- यह क्या कहती हो, मुख़दादेवी? नौकरानी मिल गया और जिस चीज का तकलीफ हो हमसे कहो, हम जेलर साहब से कहेगा। | सुखदा ‘ने नम्रता से कहा- आपकी इम कृपा के लिए मैं आपक’ ! यवाद देती हूं। मैं अब किसी तरह की रियायत नहीं चाहती। मैं चाहती हूं कि मुझे मामूल रूदियों की तरह रखी जाय। ''नीच औरतों के साथ रहना पड़ेगा। खाना भी वही मिलेगा।'' ''यहीं तो मैं चाहती हूं।'' ''काम भी वही करना पड़ेगा। शायद चक्की पीसने का काम दे दें।'' “कोई हरज नहीं।'' "घर के आदमियों से तीसरे महीने मुलाकात हो सकेगी।'' 'मालूम है।'' मेट्रन की लाला समरकान्त ने खूब पूजा की थी। इस शिकार के हाथ से निकल जाने का दु:ख हो रहा था। कुछ देर समझाती रही। जब सुखदा ने अपनी राय न बदली, तो पछताती हुई चली गई। मुन्नी ने पूछा--मेम साहब क्या कहती थी? सुखदा ने मुन्नी को स्नेह-भरी आंखों से देखी--अब मैं तुम्हारे ही साथ रहूंगी, मुन्नी ।<noinclude></noinclude> 1c06pllcmyh7uyxd5pfcl1umazdjbjd पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४५८ 250 37872 663089 596046 2026-06-16T18:35:33Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663089 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|458:प्रेमचंद रचनावली-5||}}</noinclude>458 : प्रेमचंद रचनावली-६ मुन्नी ने छाती पर हाथ रखकर कहा-यह क्या करती हो, बहू? वहां तुमसे न रहा जाएगा। सुखदा ने प्रसन्न मुख से कहा-जहां तुम रह सकती हो, वहां मैं भी रह सकती हैं। एक घंटे के बाद जब सुखदा यहां से मुन्नी के साथ चली, तो उसका मन आशा और भय से कांप रहा था, जैसे कोई बालक परीक्षा में सफल होकर अगली कक्षा में गयी हो। तीन पुलिस ने उस पहाड़ी इलाके की घेरा डाल रखा था। सिपाही और सवार चौबीसों घंटे घूमते रहते थे। पांच आदमियों से ज्यादा एक जगह जमा न हो सकते थे। शाम को आठ बजे के बाद कोई घर से निकल न सकता था। पुलिस को इत्तिला दिए बगैर घर में मेहमान को ठहराने को भी मनाही थी। फौजी कानून जारी कर दिया गया था। कितने ही घर जला दिए गए थे और उनके रहने वाले हचूड़ों की भांति वृक्षों के नीचे बाल-बच्चों को लिए पड़े थे। पाठशला में आग लगा दी गई थी और उसकी आधी-आधी काली दीवारें मानो केश खन्ने मातम कर रहा थीं। स्वामी आत्मानन्द बांस की छतरी लगाए अब भी वहां डटे हुए थे। जरा-सा मौका पा ही इधर-उधर से दस-बोस आदमी आकर जमा हो जाते, पर सवारों को आते देखा और गायव सहसा लाला समरकान्त एक गट्ठर पीठ पर लादं मदरसे के सामने आकर खड़े हो , स्वामी ने दौड़कर उनका बिस्तर ले लिया और खाट की फिक्र में दो हैं। गांव- भर में बिजली की तरह खबर दौड़ गई- भैया के बाप आए हैं। हैं तो वृद्ध, मगर अभी टमन हैं। मेल-राहकार से लगते हैं। एक क्षण में बहुत से आदमियों ने आकर घेर लिया। किये के सिर में पट्टी में थी, किसी के हाथ में। कई लंगड़ा रहे थे। शाम हो गई और आज कोई विशेष छुटको न देखकर और सारे इलाके में इंडे के बल से शांति स्थापित करके पुलिस विश्राम कर रही थी। बेचार रात-दिन दौड़ने-दौड़ते अधमरे हो गए थे। गुदड़ ने लाठी टेकते हुए आकर समग्कान्न के चरण छू और बोले- अमर या +7 समाचार तो आपको मिला होगा। आजकल तो पुलिस का धावा है। हाकिम कहता है- चाह आने लगे, हम कहते हैं हमारे पास है ही नहीं, दें कहां से? बहुत-से लोग तो गांव छोड़कर भाग गए। जो हैं, उनकी दसा आप देख ही रहे हैं। मनी बहू को पकड़कर जेल में डाल दिया। आप ऐसे समय में आए कि आपकी कुछ खातिर भी नहीं कर सकते। समरकान्त मदरसे के चबूतरे पर बैठ गए और सिर पर हाथ रखकर सोचने लगे इन गरीबों की क्या सहायता करें? क्रोध की एक ज्वाला-सी उठकर रोम-रोम में व्याप्त हो । पूछा--यहां कोई अफसर भी तो होगा? गूदड़ ने कहा-हां, अफसर तो एक नहीं, पच्चीस हैं जी। सबमें बड़ा अफसर तो वही मियांजी हैं, जो अमर भैया के दोस्त हैं। | "तुम लोगों ने उस लफंगे से पूछा नहीं मारपीट क्यों करते हो, क्या यह भी कानून है?'' गूदड़ ने सलोनी की मया की ओर देखकर कहा- भैया, कहते तो सब कुछ हैं, जये कोई सुने ! सलीम साहब ने खुद अपने हाथों से इंटर मारे। उनकी बेदर्दी देखकर पुलिस वान्ने<noinclude></noinclude> 3cnbg5ulbzuo2mx2xdgmvsmeqplb6gt पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४५९ 250 37873 663090 596047 2026-06-16T18:36:13Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663090 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:459}}</noinclude>कर्मभूमि : 459 भी दांतों तले उंगली दबाते थे। सलोनी मेरी भावज लगती है। उसने उनके मुंह पर थूक दिया था। यह उसे न करना चाहिए था। पागलपन था और क्या? मियां साहब आग हो गए और बुदिया को इतने हंटर जमाए कि भगवान् ही बचाए तो बचे। मुदा वह भी है अपनी धुन की पक्की, हरेक हंटर पर गाली देती थी। जब बेदम होकर गिर पड़ी, तब जाकर उसका मुंह बंद हुआ। चैया उसे काकी.-काकी करते रहते थे। कहीं से आवें. सबसे पहले काकी के पास जाते थे। उठने लायक होती तो जरूर-से-जरूर आती। आत्मानन्द ने चिढ़कर कहा-अरे तो अब रहने भी दे, क्या सब आज ही कह डालोगे? पानी मंगवा, आप हाथ-मुंह धोए, जरा आराम करने दे, थके-मांदे आ रहे हैं वह देखो, सलोनी को भी खबर मिल गई, लाठी टेकती चली आ रही है । सलोनी ने पास आकर कहा-कहां हा देवरजी, मावन में आने तो तुम्हारे साथ झूला झलती, चले हो कातिक में । जिसका ऐसा सरदार र एप बेटा, उसे किसको डर और किसकी चिंता ! तुम्हें देखकर सारा दु:ख भूल गई, देवरजी ।। समरकान्त ने देखा-सलोनी की भारी दह मूज उठी है और साः। पर लहू के दाग रकर कत्थई हो गए हैं। मुंह मूजा हुआ है। इस मुद्दे पर इतना क्रोध | उस पर विद्वान् बनता है। उनकी आंखों में त्रिने उतर आया। हिंसा- विना मन में प्रचंड हो उठ। निर्बल क्रोध और चाहे कुछ न कर सके, भगवान का बुबा जरूर लेता है। तुम अंत हो. अर्वशक्तिमान हो ना के रक्षक हो और तुम्हारी आं के सामने यह अधेर | इस जगत का नियंता कोई नहीं कोई दयामय भगवान मृरिट का वादा होता, तो यह अत्याचार न होता । अच्छे सर्वशक्तिमान T! क्यों नरिपशाचों के हृदय में नहीं पैठ जात, या वहां तुमारी पहुंच नहीं हैं? कहते हैं, यह पत्र भगवान् की लीला है। अच्छी नीला हे ! अगर तुम्हें इस व्यापार की खबर नहीं हैं, तो *** सर्वव्यापी क्यों कहलाते हो। | समरकान्त धार्मिक प्रवृत्ति के दिनों में। धर्म-ग्रंथों का अध्ययन किया था। भगवद्गीता का नित्य पाठ किया करते थे, पर इसे ममय वह मारा धर्मज्ञान उन्हें पाखंर -या प्रतीत हुआ। | वह उसी तरह उड़ खड़े हुए और पुछा- सलीम तो सदर में होगा? आत्मानन्द ने कहा- आजकल त यहीं पड़ाव है। डाक बंगले में ठहरे हुए हैं। "मैं जरा उनसे मिलेगा।'' ''अभी वह क्रोध में हैं, आप मिलकर क्या कीजिए। आपको भी अपशब्द कह न।'' “यही देखने तो जाता हूँ कि मनुष्य को पशुता किस सीमा तक जा सकती है।'' '' तो चलिए, मैं भी आपके साथ चलता हूं।'' गृदड़ बोल उठे-नहीं-नहीं, तुम न जइयो, स्वामीजी भैया, इ हैं तो संन्यासी और दया के अवतार, मुदा क्रोध में भी दुर्वासा मुनि से कम नहीं हैं। जब हाकिम साह ? सलोनी की मार रहे थे, तब चार आदमी इन्हें पकड़े हुए थे, नह। उस बखत मियां का खून चूस नते, चाहे पीछे से फांसी हो जाती। गांव भर की मरहम-पट्टी इन्हीं के सुपुर्द है। सलोनी ने समरकान्त का हाथ पकड़कर कहा-मैं चलूंगी तुम्हारे साथ देवरजी। उसे दिखा दूगी कि बुदिया तेरी छाती पर मूंग दलने को बैठी हुई है । तू मारनहार है, तो कोई तुझसे बेड़ा रोखनहार भी है। जब तक उसका हुकम न होगा, तू क्या मार सकेगा ।<noinclude></noinclude> 11v51azmo9sp2gw9dunvnliwzjnigkk पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६० 250 37874 663091 596049 2026-06-16T18:36:48Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663091 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|460:प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude> भगवान् में उसकी यह अपार निष्ठा देखकर समरकान्त की आंखें सजल हो गईं, सोचा -मुझसे तो ये मूर्ख ही अच्छे जो इतनी पीड़ा और दु:ख सहकर भी तुम्हारा ही नाम रटते हैं। बोले-नहीं भाभी, मुझे अकेले जाने दो। मैं अभी उनसे दो-दो बातें करके लौट आता हूं। सलोनी लाठी संभाल रही थी कि समरकान्त चल पड़े। तेजा और दुरजन आगे-आगे डाक बंगले का रास्ता दिखाते हुए चले। तेजा ने पूछा-दादा, जब अमर भैया छोटे-से थे, तो बड़े शैतान थे न? समरकान्त ने इस प्रश्न का आशय न समझकर कहा-नहीं तो, वह तो लड़कपन ही से बड़ा सुशील था। दरजन ताली बजाकर बोला- अब कहो तेज, हारे कि नहीं? दादा, हमारी-इनका यह झगड़ा है कि यह कहते हैं, जो लड़के बचपन में बड़े शैतान होते हैं, वही बड़े होकर सुशील हो जाते हैं, और मैं कहता हूं, जो लड़कपन में सुशील होते हैं, वही बड़े होकर भी सुशील रहते हैं। जो बात आदमी में है नहीं वह बीच में कहां से आ जाएगी? तेजा ने शंका की-लड़के में तो अकल भी नहीं होती, जवान होने पर कहां से आ जाती है? अखुवे में तो खाली दो दल होते हैं, फिर उनमें डाल-पात कहां से आ जाते हैं? यह कोई बात नहीं। मैं ऐसे कितने ही नामी आदमियों के उदाहरण दे सकता हैं, जो बचपन में बड़े पाजी थे, पर आगे चलकर महात्मा हो गए। समरकान्त को बालकों के इस तर्क में बड़ा आनंद आया। मध्यस्थ बनकर दोनों ओर कुछ सहा त ज थे। रास्ते में एक जगह कीचड़ भरा हुआ था। समरकान्त के जूते कीचड़ में फंसकर पांव से निकल गए। इस पर बड़ी हंसी हुई।। सामने से पांच सवार आते दिखाई दिए। तेजा ने एक पत्थर उठाकरे एक सवार प निशाना मारा। उसकी पगड़ी जमीन पर गिर पड़ी। वह तो घोड़े से उतरकर पगड़ी उठाने लगा. बाकी चारों घोड़े दौड़ाते हुए समरकान्त के पास आ पहुंचे। | तेजा दौड़कर एक पेड़ पर चढ़ गया। दो सवार उसके पीछे दौड़े और नीचे से गालिया देने लगे। बाकी तीन सवारों ने समरकान्त को घेर लिया और एक ने हंटर निकालकर ऊपर उठाया ही था कि एकाएक चौंक पड़ा और बोला-अरे ! आप हैं सेठजी । आप यहां कहा? सेठजी ने सलीम को पहचानकर कहा–हां-हां, चला दो हंटर, रुक क्यों गए? अपनी कारगुजारी दिखाने का ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? हाकिम होकर गरीबों पर हंटर न चला, तो हाकिमी किस काम की? सलीम लुज्जित हो गया-आप इन लौंडों की शरारत देख रहे हैं, फिर भी मुझी का कसूरवार ठहराते हैं। उसने ऐसा पत्थर मारा कि इन दारोगाजी की पगड़ी गिर गई। खैरियत हुई कि आंख में न लगा। | समरकान्त आवेश में औचित्य को भूलकर बोले-ठीक तो है, जब उस लडे ने पत्थर चलाया, जो अभी नादान है, तो फिर हमारे हाकिम साहब जो विद्या के सागर हैं, क्या हंटर भी न चलाएं ? कह दो दोनों सवार पेड़ पर चढ़ जाएं, लौंडे को ढकेल दें, नीचे गिर पड़े। मर जाएगा, तो क्या हुआ, हाकिम से बेअदबी करने की सजा तो पा जाएगा। | सलीम ने सफाई दी–आप तो अभी आए हैं, आपको क्या खबर यहां के लोग कितने मुफसिद हैं? एक बुढ़िया ने मेरे मुंह पर थूक दिया, मैंने जब्त किया, वरना सारा गांव जेल<noinclude></noinclude> ildpgx7gj1f5oly8ppaprzxhv1bclty पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६१ 250 37875 663092 596050 2026-06-16T18:37:25Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663092 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:461}}</noinclude>कर्मभूमि : 46i में होती। समरकान्त यह बमगोला खाकर भी परास्त न हुए-तुम्हारे जब्त की बानगी देखे ॥ रहा हूँ बेटा, अब मुंह न खुलवाओ। वह अगर जाहिल बेसमझ औरत थी, तो तुम्हीं ने आलिम- फाजिल होकर कौन-सी शराफत की? उसकी सारी देह लहू-लुहान हो रही है। शायद बचेगी भी नहीं। कुछ याद है कितने आदमियों के अंग-भंग हुए? सब तुम्हारे नाम की दुआएं दे रहे हैं। अगर उनसे रुपये न वसूल होते थे, तो बेदखल कर सकते थे, उनकी फसल कुर्क कर सकते थे। मार-पीट को कानूनी कहां से निकला? | "बेदखली से क्या नतीजा, जमीन का यहां कौन खरीददार है? आखिर सरकारी रकम कैसे वसूल की जाए। "तो मार डालो सारे गांव को, देखो कितने रुपये वसूल होते हैं। तुमसे मुझे ऐसी आशा न थी, मगर शायद हुकूमत में कुछ नशा होता है।'' | "आपने अभी इन लोगों को बट्माशी नहीं देखी। मेरे साथ आए तो मैं सारी दास्तान सुनाऊ आप इस वक्त आ कहां से रहे हैं?'' | समरकान्त ने अपने लखनऊ आने और सुखदा से मिलने का हाल कही। फिर मतलब की बात छेडी--अमर तो यहीं होगा? मुना, तीसरे देरजे में रखा गया है। अंधेरा ज्यादा हो गया था। कुछ ठंडे भी पड़ने लगी थी। चार मवार तो गांव की तरफ चले गए, सलीम घोर्ड की रस थामे हुए पांव-पांव समरकान्त के साथ डाक बंगले चला। कुछ दूर चलने के बाद समरकान्त बोले-तुमने दोस्त के साथ खूब दोस्ती निभाई। जेल भेज दिया, अच्छा किया, मगर कम-से-कम उसे कोई अच्छा दरजा तो दिला देते। मगर हाकिम ठहरे, अपने दोस्त की सिफारिश कैसे करते? सलीम ने व्यथित कंठ से कहा-आप तो लालाजी, मुझी पर सारा गुस्सा उतार रहे हैं। मैंने तो दूसरा दर्जा दिला दिया था, मगर अमर खुद मामूली कैदियों के साथ रहने पर जिद करने लगे. तो मैं क्या करता? मेरी बदनसीबी है कि यहां आते ही मुझे वह सब कुछ करना पड़ा, जिससे मुझे नफरत थी। डाक बंगले पहुंचकर सेठजी एक आरामकुरसी पर लेट गए और बोले-तो मेरा यहां आना व्यर्थ हुआ। जब वह अपनी खुशी से तीसरे दरजे में है, तो चारी है। मुलाकात हो जाएगी? सलीम ने उत्तर दिया- मैं आपके साथ चलूंगा। मुलाकात की तारीख तो अभी नहीं आई है, मगर जेल वाले शायद मान जाएं। हां, अंदेशा अमर की तरफ से है। वह किसी किस्म की रिआयत नहीं चाहते। उसने जरा मुस्कराकर कहा-अब तो आप भी इन कामों में शरीक होने लगे? सेठजी ने नम्रता से कहा-अब मैं इस उम्र में क्या काम करूंगा। बूढे दिल में जवानी को जोश कहां से आए? बहू जेल में है, लड़का जेल है, शायद लड़की भी जल की तैयारी कर रही है और मैं चैन से खाता-पीता हूं। आराम से सोता हूं। मेरी औलाद मेरे पापों का प्रायश्चित कर रही है, मैंने गरीबों का कित्तुना खून चूसा है, कितने घर तबाह किए हैं। उसकी याद करके खुद शर्मिदा हो जाती हैं। अगर जवानी में मसझ आ गई होती, तो कुछ अपना सुधार करता। अब क्या करूंगा? बाप संतान का गुरु होता है। उसी के पीछे लड़के चलते हैं। मुझे<noinclude></noinclude> tduhjndqz99cbh9goeuthtr8jbobena पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६२ 250 37876 663093 596051 2026-06-16T18:38:15Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663093 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|462 : प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude> अपने लड़कों के पीछे चलना पड़ा। मैं धर्म की असलियत को न समझकर धर्म के स्वांग को धर्म समझे हुए था। यही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। मुझे तो ऐसा मालूम होता है। कि दुनिया का कैंडा ही बिगड़ा हुआ है। जब तक हमें जायदाद पैदा करने की धुन रहेगी, हम धर्म से कोसों दूर रहेंगे। ईश्वर ने संसार को क्यों इस ढंग पर लगाया, यह मेरी समझ में नहीं आता। दुनिया को जायदाद के मोह-बंधन से छुड़ाना पड़ेगा, तभी आदमी आदमी होगा, तभी दुनिया से पाप का नाश होगा। सलीम ऐसी ऊंची बातों में न पड़ना चाहता था। उसने सोचा–जब मैं भी इनकी तरह जिंदगी के सुख भोग लगा तो मरते-समय फिलासफर बन जाऊंगा। दोनों कई मिनट तक चुपचाप बैठे रहे। फिर लालाजी स्नेह से भरे स्वर में बोले-नौकर हो जाने पर आदमी को मालिक का हुक्म मानना ही पड़ता है। इसकी मैं बुराई नहीं करता। हां, एक बात कहूंगा। जिन पर तुमने जुल्म किया है, चलकर उनके आंसू पोंछ दो। यह गरीब आदमी थोडी-सी भलमन से काबू में आ जाते हैं। सरकार की नीति तो तुम नहीं बदल सकते, लेकिन इतना तो कर सके.' हो कि किसी पर बेजा सख्ती न करो। सलीम ने शरमाते हुए कहा--लोगों को गुस्ताखी पर गुस्सा आ जाता है, वरना मैं तो - नहीं चाहता कि किसी पर सख्ती करू। फिर सिर पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी हैं। नगरान । वसूल हुआ, तो मैं कितना नालायक समझा जाऊंगा? समरकान्त ने तेज होकर कहा-तो बेटा, लमान तो न वसूल होगा, ह आदमयों के ? से हाथ रंग सकते हो।। ''यही तो देखना है।'' 'देख लेना। मैंने भी इसी दुनिया में बाल सफेद किए हैं। हमारे किमान अफस सूरत से कांपते थे, लेकिन जमाना बदल रहा है। अब उन्हें भी मान-अपमान को ख़या हो । है। तुम मुफ्त में बदनामी उठा रहे हो।' ''अपना फर्ज अदा करना बेदनामी है, तो मुझे उसको परवाह नहीं।'' समरकान्त ने अफसरों के इस अभिमान पर हंसकर कहा-फर्ज में थोड़ी ..मी मि. मिला देने से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, हां, बन बहुत कुछ जाता है, यह बेचारे कि । । ऐसे गरीब हैं कि थोड़ी-सी हमदर्दी करके उन्हें अपना गुलाम बना सकते हो। हुकमत वह ३ । छ भलमनमो का बरताव चाहते हैं। जिस ओरत को तुम्मन हंटरों से मार, ३ एक बार माता कहकर उसकी गरदन काट सकते थे। यह मन मुमझा कि तुम उन पर हुक करने आए हो। यह समझो कि उनकी सेवा करने आए हो । मान लिया, तुम्हें तलब मक से मिलती है, लेकिन आती तो है इन्हीं की गांठ में। कोई मूर्ख हो तो उसे समझाऊँ। तुम भगवः । की कृपा से आप ही विद्वान् हो। तुम्हें क्या समझाऊ? तुम पुलिस वालों की बातों में भी । यही बात है न? सलीम भला यह कैसे स्वीकार करता? लेकिन समरकान्त अड़े रहे- मैं इसे नहीं मान सकता। तुम तो किसी से नज़र नहीं नन्। चाहते, लेकिन जिन लोगों को रोटियां नोच-खसोट पर चलती हैं। उन्होंने जरूर हुम्हें भरा हो । तुम्हारा चेहरा कहे देता है कि तुम्हें गरीबों पर जुल्म करने का अफसोस है। मैं यह तो ना! चाहता कि आठ आने से एक मई भी ज्यादा वसूल करो, लेकिन दिलजोई के साथ तुम 7<noinclude></noinclude> t7t7yg34ecmycpttohvj52ukysch550 पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६३ 250 37877 663094 596052 2026-06-16T18:38:52Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663094 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:463}}</noinclude>कर्मभूमि : 463 भी वसूल कर सकते हो। जो भूखों मरने हैं, चिथड़े पहनकर और पुआल में सोकर दिन काटने हैं उनसे एक पैसा भी दबाकर लेना अन्याय है। जब हम और तुम दो-चार घंटे आरमि से कम करके आराम से रहना चाहते हैं, जासटें बनाना चाहते हैं, शौक की चीजें जमा करते हैं, तो क्या यह अन्याय नहीं है कि जो लोग मंत्री -बच्च ममत अठारह घंटे रोज काम करें, वह रोटी-- कपड़े को तरसे? बेचारे गरीब हैं, वेजबान हैं, अपने को संगठित नहीं कर सकते, इमलिए सभी छोटे-बड़े उन पर रोब जमाते हैं। मगर तुम जैम सहदट और विद्वान् लोग भी वही करने लगे, जो मामनी अमले करते हैं, तो अफसोस होता है। अपने साथ किसी को मन लो, मी माध चलो। मैं जिम्मा लेता हूं कि कोई तुम गुप्ताबी न करे। उनके जख्म पर मरहम रख दो, में इतना ही चाहता है। जब तक नि बार तुम्हें याद करते। पदभाव में मम्भाहन को सा अमर होता है। सलीम का हृदय अभी इन्-ना कन! न ह ४ कि 'द पर क्राईम ही ; चन्दतः। पकचाता हु अ बोला--रि तरफ से आए हैं? को 47 पड़ा। "हा हांयह सब में कह दूंगा, भकिन ; न हा, मैं उधर चलू इधर तुम हटरबाजी शुरू करो।' “अब ज्यादा शर्मिदः न कीnि।' न राष्ट्र तजवीज क्यों नही करते हैं, माघ का ग्लन १ ३ का जाय। अगर बंद करके हुक्म मानन म्हारा काम हां, हमें अपना मन तो कर ना + 4 बईमाफी न नहीं कर रहे हो? तुम्न ग्बुद र रिपो २ नहीं लिखते? मुमकिन है हुक्माम इसे पसंद - करं, लेकिन हक के लिए कुछ नपान नाना पट्ट. तो क्या न्त्रता?'' सन्म को यह बातें न्याय मात्र न पड़ी। र' की पत्नी नोक जर्मन के अंदर पहुच चुकी थी। बा.-३म बुजुर्गाना माह के लिए आपका एहसानमंद है और उस पर अमल करन की कोशिश की । भोजन की ममय आ गया है। लोम् न - आपके लिए क्या ना जनवाउ, " जो चाहे बनवाओ, पर टा यद वो कि में हिन्दू है और इरान जभान का आदमी है। अभी तक इन छात को मान! ।' "शप कृत - छान को अन्छा मुन्नत हैं " अन्डा ना नहीं ममता पर पता है।'' ''तव मानते ही क्यों है?'' "मला कि संस्कारों को मिटा मुश्किल हैं। अगर जरूरत पड़े, तो में जम्हारा मन उठाकर फेंक देगा, लेकिन तुम्हारो थाली में मुझस ने खाया जाएगा।'' *' में तो आज आपको अपने साथ बेटा खिला?'' 'तुम प्याज़, मास, अंई खाते हो। मुझसे जो उन बातों में वाया ही न जाएगा।'' "आप गह सब कुछ न खाएगई मगर मर साथ बेटना पड़ेगा। मैं रोज साबुन लगाव नहाता है।'' ''वरतों को खूब साफ कर लेनः।'' "आपका खाना हिन्दु बनाएगा, उहब ! बस एक मेज पर बैठकर खा लेना।'' "अच्छा खा लूंगा, भाई । में दृध और घी सृव रखता है।''<noinclude></noinclude> ta2877pphfwtqdue2dwboq3hu78rh29 पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६४ 250 37878 663095 596053 2026-06-16T18:40:14Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663095 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|464:प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude>सेठजी तो संध्योपासन करने बैठे, फिर पाठ करने लगे। इधर सलीम के साथ के एक हिन्दु कांस्टेबल ने पूरी, कचौरी, हलवा, खीर पकाई। दही पहले ही से रखा हुआ था। सलीग खुद आज यही भोजन करेगा। सेठजी संध्या करके लौटे, तो देखा दो कंबल बिछे हुए हैं और थालियां रखी हुई हैं। । सेठजी ने खुश होकर कहा-यह तुमने बहुत अच्छा इन्तजाम किया। सलीम ने हंसकर कहा--मैंने सोचा, आपका धर्म क्यों लें, नहीं एक ही कंबल रखती। ''अगर यह खयाल है, तो तुम मेरे कंबल पर आ जाओ। नहीं, मैं ही आता हूं।'' वह धाली उठाकर सलीम के कंबल पर आ बैठे। अपने विचार में अजि उन्होंने अपने जीवन का सबसे महानु त्याग किया। सारी संपत्ति दान देकर भी उनका हृदय इतना गौरवान्वित न होता! सलीम ने चुटकी ली–अब तो आप मुसलमान हो गए। सेठजी बोले—मैं मुसलमान नहीं हुआ। तुम हिन्दू हो गए। चार प्रात:काल समकान्त और सलीम डाकबंगले से गांव की ओर चले। पहाड़ियों से नीली भाप उठ रही थी और प्रकाश का हृदय जैसे किसी अव्यक्त वेदना से भारी हो रहा था। चारों और सन्नाटा था। पृथ्वी किसी रोगों की मौत कोहरे के नीचे पड़ी सिहर रही थी। कुछ लोग बंदरों की भाति छप्परों पर बैठे उसकी मरम्मत कर रहे थे और कहीं-कहीं स्त्रियो गोबर पाथ रही थीं। दोनों आदमी पहले सलोनी के घर गए। सलोनी की वो चढ़ा हुआ था और सारी देह फोड़े की भांति दख रही थी मगर उसे गाने को धुन सवार थी-- : सन्तो देखत जग बौराना। सच कहो तो मारन घावे, झुठ जगत पतिआना, सन्तो देखत... मनोव्यथा जब असह्य और अपार हो जाती है, जब उसे कहीं जाण नहीं मिलती; जब वह रुदन और अंदन की गोद में भी आश्रय नहीं पाती, तो वह संगीत के चरणों पर जा गिरती है। समरकान्त ने पकारा--भाभी, जरा बाहर तो आओ। सलोनी चटपट उठकर पके बालों को घूघट से छिपाती, नवयौवना की भाँति लजाती आकर खड़ी हो गई और पूछा--तुम कहां चले गए थे, देवरजी? । सहसा सलीम को देखकर वह एक पम पीछे हट गई और जैसे गाली दी-यह तो हाकिम | फिर सिंहनी की भांति झपटक उसने सलीम को ऐसा धक्का दिया कि वह गिरते- गिरते बचा, और जब तक समरकान्त उसे हटाएं-हटाएं, सलीम की गरदन पकड़कर इस तरह दबाई, मानो पँट देगी। सेठजी ने उसे बल-पुर्वक हटाकर कहा-पगला गई है क्या, भाभी? अलग हट जा, सुनती नहीं? सलोनी ने फटी-फटी प्रज्वलित आंखों से सलीम को घूरते हुए कहा-मार तो दिखा<noinclude></noinclude> ag1mtyrhpca9cl539wbfe9u1xho04gi पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६५ 250 37879 663096 596054 2026-06-16T18:41:14Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663096 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:465}}</noinclude>कर्मभूमि : 465 दं, आज मेरा सरदार आ गया है। सिर कुचलकर रख देगा । समरकान्त ने तिरस्कार भरे स्वर में कहा—सरदार के मुंह में कालिख नगा रही हो और क्या? बूढी हो गई, मरने के दिन आ गए और अभी लड़कपन नहीं गया। यही तुम्हारा धर्म है कि कोई हाकिम द्वार पर आए तो उसको अपमान करो । सलोनी ने मन में कहा-यह लाला भी ठकुरसुहाती करते हैं। लड़की पकड़ गया है न, इसी से। फिर दुराग्रह से बोली-पूछो इसने सबको पीटा नहीं था? सेठजी बिगड़कर बोले—तुम हाकिम होती और गांव वाले तुम्हें देखते ही लाठियां ले- लेकर निकल आते, तो तुम क्या करतीं? जब प्रजा लड़ने पर तैयार हो जाय, तो हाकिम क्या पूजा करे 1 अमर होता तो वह लाठी लेकर न दौड़ता? गांव वालों को लाजिम था कि हाकिम के पास आकर अपना-अपना हाल कहते, अरज विनती करते, अदब से, नम्रती मे। यह नहीं कि हाकम को देखा और मारने दौड़े, मानो वह तुम्हारा दुश्मन है। मैं इन्हें समझा-बुझाकर लाया था कि मेल करा दें, दिलों की सफाई हो जाय, और तुम उनसे लड़ने पर तैयार हो गई। यहां की हलचल सुनकर गांव के और कई आदमी जमा हो गए पर किसी ने सलीम को सलाम नहीं किया। सेबकी त्यारियां चढी हुई थीं।। समरकान्त ने उन्हें संबोधित किया-तुम्ही लोग मोची। यह साहब तुम्हारे हाकिम हैं। जब रियाया हाकिम के साथ गस्ताखो करती हैं, तो हाकिम को भी कधि 37 जाय तो कोई ताज्जुब नहीं। यह बेचारे तो अपने को हाकिम समझत ही नहीं। लेकिन इज्जन तो सभी चाहते हैं. हाकिम हो या न हों। कोई आदमी अपनी बेइजती नहीं देख सकता। बोलो गदड़, कुछ गलत कहता हूँ? गूदड़ ने सिर झुकाकर कहा–नहीं मालिक, सच ही कहते हो। मुदा वह तो बावली है। उसकी किसी बात का बरी न मानो। स्रबके मंह में कालिख लगा रही है और क्या। “यह हमारे लड़के के बराबर हैं। अमर के साथ पढे, उन्हीं के माध खेले। तुमने अपनी आंखों देखा कि अमर को गिरफ्तार करने यह अकेले आए थे। क्या सफर | क्या पुलिस को भेजकर न पकड़वा सकते थे? सिपाही हुक्म पाते ही आते ओर धक्के दर बांध ले जाते। इनकी शराफत थी कि खुद आए और किसी पुलिस को साथ न लाए। अमर ने भी यहो किया, ‘ो उसका धर्म था। अले आदमी को बेइज्जत करना चाहते तो क्या मश्किल था? अब तक जी कुछ हुआ, उसका इन्हें रज हैं, हालांकि कसूर तुम लोगों का भी था? अब तुम भी पिछली बातों को भूल जाओ। इनकी तरफ से अब किसी तरह की सख्ती न होगा। इन्हें तुम्हारी जायदाद नो पाम करने का हुक्म मिलेगा, नीलाम करेगे गिरफ्तार करने का हुक्म पिलेगा रिफ्तार करेंगे, तुम्हें बुरा न लगना चाहिए। तुम धर्म की लड़ाई लड़ रहे हो। लड़ाई नहीं, यह तपस्या हैं। तपस्या में क्रोध और द्वेष आ जाता है, तो तपस्या भंग हो जाती है।'' स्वामीजी बोले-धर्म की रक्षा एक ओर से नहीं होती । सरकार नीति बनाने है। उसे नीति की रक्षा करनी चाहिए। जब उसके कर्मचारी नीति का पैरों से कुचलते हैं, तो फिर जनता कैसे नीति की रक्षा कर सकती हैं? समरकान्त ने फटकार बताई-आप संन्यासी होकर ऐसा कहते हैं, स्वामीजी ! आपको अपनी नीतिपरकता से अपने शासकों को नीति पर लाना है। यदि वह नीति पर ही होते, तो आपको यह तपस्या क्यों करनी पड़ती? आप अनीति पर अनीति से नहीं, नीति से विजय<noinclude></noinclude> rdyo1bvlg48xvqxtlig9mzobykhxz9y पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६६ 250 37880 663097 596055 2026-06-16T18:41:56Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663097 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|466 : प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude> पा सकते हैं। स्वामीजी का मुह जरा-सा निकल आया। जबान बंद हो गई। सलोनी की पीडित हृदय पक्षी के समान पिंजरे से निकलकर भी कोई आश्रय खोज रहा था। सज्जनता और मत्प्रेणा से भरा हुआ यह तिरस्कार उसके सामने जैसे दाने बिखेरन लगा। पक्षी ने दो-चार बार गग्दन झुकाकर दानों को सतर्क नेत्रों से देखा, फिर अपने रक्षक, को ‘ आ आ' करते सुना और पैर फैलाकर दान पर उतर आया। सलोनी आखों में आसू भरे दोनों हाथ जोड़े, सलीम के सामने अाकर बोली -सरवार मुझसे बड़ी रखता हो गई। माफी दीजिए। मुझे जूतो से पीटिए सेठजी ने कहा—सरकार नही बेटा कहो। *"बेटा मुझसे बड़ा अपराध हुआ। मृरख है बावली है। जो चाहें सजा दी।'' सलीम के युवा नत्र भी सजल हो गए। हुकमन का रोल और अधिकार का ३ । गया। बोला-माताजी मुझे शर्मिदा न करो। यह जितने लोग बड़हे में उन सबमें गै? " यां नहीं है उन्को भी अपनी खेत 3 को मुफी चाना है । गृदट्ट ने कहा- हम तुम्हारे नाम है भैया लेकिन मृतु जो उ आदमी तो क्यों इतनी बात होती? भ्वामीजं ने मकान के कान में कहा मुझे नी सा जा रहा है कि " ।' सनी ने अश्विानि दिगो कभी नहीं। नौकरी चाहे चला जाय पर तुम मा १ र शरई अदमी है। ''तो क्या हम पूरी लगाने देना पड़ा?'' ।' जब कुछ है ही नहीं, ! दा" का म?' त्रामीजी अट तो भलाभ ने अर्को पटना के कान में कुछ कहा। मेठजी मुस्कराकर बाल-यह य म नागर के दवा -दारू के लिए कि म । कर रह हे! ३ ) में मम नी मा कय दिन' है। रामो ? ३" । चलकर मुझसे कार्य ल ना। र न कृतज्ञता को दबाने गा कह; 'भैया' पर मुग्न ३ क पद भी न । ' ममरकान्त बाले- यह मा मुन्ना कि यह मा म्पर्य है। मैं अपने बाप त घर छ । लय। नदी में ना हो गला दबा नि ६ वह न लौटा रहा है। | गाव जहामियप्पा या इ ! था वा निक नजर आने ल ! । कमि 1 / म हुन्न यः हो । पांच अमाकान्त झा "जन में राज जि का समाचार किमी-न-किमी तरह मिल आता था। 1 217। दिन मार-पीट और अग्रकार की उर्वर पिन उपके क्रोध का वगपार न रहा और में । बुझकर राख हो जाती है। श्री दा के बाद क्रोध की जगह केवल नैराश्य रह गया। लगा। रोन-पीटने के दर्द भई हाय राय जैम भूमान् हा उपक सामने सिर पीट रही थी। ॐ ' हए घरों की नट जैसे उसे मुन्नमा आनी थी। वह सा भपण दुश्य कल्पनातति हो<noinclude></noinclude> cacnayufql4xgt97j5wa2uqw48g3i05 पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६७ 250 37881 663098 596056 2026-06-16T18:42:30Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663098 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:467}}</noinclude>कर्मभूमि :467 सर्वनाश के समीप जा पहुंचा था और इसकी जिम्मेदारी किस पर थी? रुपये तो यों भी वसूल किए जाते, पर इतना अत्याचार तो न होता, कुछ रिआत तो की जाती। मरकार इस विद्रोह के बाद किसी तरह भी गर्मी का बर्ताव न कर सकती थी, लेकिन कृपया न दे सकना तो किसी मनुष्य का दोष नहीं ! यह मंदी की बला कहां से आई, 'कन जाने? ग्रह ना एसा ही है कि आंधी में किसी को छपर उड़ जाए और सरकार में दंड दे। यह न किसके हित के लिए हे? इसका उद्देश्य क्या हैं? इन विचारों में तंग आकर उसने नैराश्य में मुंह छिपाया। अत्याचार हो रहा है। होने दी। मैं क्या करू) कर ही क्या सकता है। में कौन है? मुझसे मनवा कमजोरी के भाग्य में जय तन्क मार खाना लिखी है, मार खाएंगे। में हो यहा या फूलों की मेज पर साया हुआ हैं? अगर संसार के मारे प्रारी प्रश) हो जाए, तो मैं या कर्जा कु रा , होग'। यह भी ईश्वर की लीला है ! वाह रे तेरी लीनः । अगर ऐम ही लीना भी नई ग? अता है, तो दम दयामय स्यां अनने ही 2 जबर्दम्त का उा {भा र २ , भ वाय रा? जब सामने कोई विकट पमन्या 37: जानी , नी उफ! भन लिका की ओर झुक जाना था। पर विश्व ग्वन हान, अव्यवस्थि, प्य ज्ञान दृतः ।। उसने बान चटना शुरू किया ?किन भारत्र: मन क पा ? अपनय के हा था- 'रई। 7।।, यि के बाल के ? ना पा रहा है। इस कदर के कर पराका वन कार में रान दर्ग। पिर मनी के प्रति समर ! स्त्री हुई। म सिपहियों न गिरफ्तार कर यो में आप च निरा न स ह उनके मुंह में अनायास हा निल्न --हाय 7 यह क्या करने र । न मन हो गया - चान बनगा: । गत का 57 यह ः 3 में फिर वही ३न कान: ६ जा बना। इस सारी *वन का भर अपन मिर पर ला = देव हा ग्र; इस पर कल के लिए * पास कई =धन ? था। देशवः का हप्का केक इन मान का का एरित्या कर दिया था और अथाह नन इवा " रा ४११ । ३ जना उम कमा निनक का सहारा न न दर्त? थी। वह इधर "न' रहा है और अपने " " 'Yखा नि उणियों को किध लिए जा रहा है ? 'सका स्यः अत् होगा? इस का धरा को कहीं चाँद *? झन्नुर है। वह चाहता था, कहीं से अनाज आर. बड़े + । बन्दै अ'' पर ध। रास्ता है पर चारों तरफ निंत्रि, मन का था। कडी में कोई आज ना तो कई प्रकाश नहीं मिलता। जब वह वयं 33धकार में डा हुआ हैं वयं भी पता अपने स्व: की शीतल छाया है, या विवंम की भीषण ज्वाला, न इसे का अधिकार ? कि इन प्राणियों की जान अफ़त में डाले। 'इभी भनिम्पिक पराभव की दशा में उसई अत:कर' में निकला :-ईश्वर, मु प्रकाश दा, मुझे उबारी। और वह रोने लगा। मुह का वक्त था, केंदियों की हाजिर हो गई थी। अपर का मन कुछ शांत था। वह प्रचंड़े आवेग शांत हो गया था और आकाश में आ गई गई बैठ गई थी। ये ; साफ-साफ दिखाई देने लगी थी। अमर मन में पिछली घटना की आलोचना कर रहा था। कारण और कार्य के सत्रों को मिलाने की चेष्टा करते हा सहसा उसक ठकिर- सी लगी-नैना का यह पत्र और सुखदा की गिरफ्तारी। इसी से तो वह आवेश में आ गया था और समझौते का मुसाध्य मार्ग छोड़कर उस दुर्गम पथ की ओर झुॐ पड़ा था। इस ठोकर ने जैसे उसकी आंखें खोल<noinclude></noinclude> j6flebox88wkp2swofkdcbd8zc1v6vf पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६८ 250 37882 663099 596057 2026-06-16T18:43:02Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663099 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|468:प्रेमचंद रचनावली-5||}}</noinclude> दीं। मालूम हुआ, यह यश-लालसा का, व्यक्तिगत स्पर्द्ध का, सेवा के आवरण में छिपे हुए अहंकार का खेल था। इसे अविचार और आवेश का परिणाम इसके सिवा और क्या होता? अमर के समीप एक कैदी बैठा बाने बट रहा था। अमर ने पूछा-तुम कैसे आए, भई? उसने कौतूहल से देखकर कहा–''पहले तुम बताओ।'' "मुझे तो नाम की धुन थी।'' "मुझे धन की धुन थी ।' उसी वक्त जेलर ने आकर अमर से कहा-तुम्हारी तबादला लखनऊ हो गया है। तुम्हारे बाप आए थे। तुमसे मिलना चाहते थे। तुम्हारी मुलाकात की तारीख न थी। साहब ने इंकार कर दिया। अमर ने आश्चर्य से पूछा–मेरे पिताजी यहां आए थे? ''हां-हां, इसमें ताज्जुब की क्या बात है? मि. सलीम भी उनके साथ थे।' ''इलाके की कुछ नई खबर?'' ''तुम्हारे बाप ने शायद सलीम साहब को समझाकर गांव वालों से मेल करा दिया है। शरीफ आदमी हैं, गांव वालों के इलाज वगैरह के लिए एक हजार रुपये दे दिए।'' अमर मुस्कराया। 'उन्हीं की कोशिश से तुम्हारा तबादला हो रहा है। लखनऊ में तुम्हारी बीवी भी आ गई हैं। शायद उन्हें छ: महीने की सजा हुई है।'' | अमर खड़ा हो गया-सुखदा भी लखनऊ में है। अमर को अपने मन में विलक्षण शांति का अनुभव हुआ। वह निराशा कहां गई? दुर्बलता कहीं गई? | वह फिर बैठकर बान बटने लगा। उसके हाथों में आज गजब की फुर्ती है। ऐसा कायापलट । ऐसा मंगलमय परिवर्तन ! क्या अब भी ईश्वर की दया में कोई संदेह हो सकता है? उसने काटे बोए थे। वह सब फुल हो गए। सुखदा आज जेल में है। जो भोग-विलास पर आसक्त थी, वह आज दोनों की सेवा में अपना जीवन सार्थक कर रही है। पिताजी, जो पैसों को दांत से पकड़ते थे; वह आज परोपकार में रत हैं। कोई दैवी शक्ति नहीं है तो यह सब कुछ किसको प्रेरणा से हो रहा है। उसने मन को संपूर्ण श्रद्धा से ईश्वर के चरणों में वंदना की। वृह भार, जिसके बोझ से वह दबा जा रहा था, उसके सिर से उतर गया था। उसको देह हल्की थी, मन हल्का था और आगे आने वाली ऊपर को चढ़ाई, मानो उसका स्वागत कर रही थी। अमरकान्त को लखनऊ जेल में आए आज तीसरा दिन है। यहां उसे चक्की का काम दिया गया है। जेल के अधिकारियों को मालूम है, वह धनी का पुत्र है, इसलिए उसे कठिन परिश्रम देकर भी उसके साथ कुछ रिआयत की जाती है। | एक छप्पर के नीचे चक्कियों की कतारें लगी हुई हैं। दो-दो कैदी हरेक चक्की के पास खड़े आटा पीस रहे हैं। शाम को आटे की तौल होगी। आटा कम निकला तो दंड मिलेगा।<noinclude></noinclude> 29lhuhqt7z3f3mszca4dapct8v4deh7 पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४६९ 250 37883 663100 596058 2026-06-16T18:43:35Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663100 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:469}}</noinclude>कर्मभूमि : 469 अमर ने अपने संगी से कहा-जरा ठहर जाओ भाई, दम ले , मेरे हाथ नहीं चलते। क्या नाम है तुम्हारा? मैंने तो शायद तुम्हें कहीं देखा है। संगी गठीला, काला, लाल आंखों वाला, कठोर आकृति का मनुष्य था, जो परिश्रम से थकना न जानता था। मुस्कराकर बोला-मैं वही काले खां हैं, एक बार तुम्हारे पास सोने के कड़े बेचने गया था। याद कगे लेकिन तुम यहां कैसे आ फंसे, मुझे यह ताज्जुब हो रहा है। परसों से ही पूछना चाहता था पर सोचता था, कहीं धोखा न हो रहा हो। अमर ने अपनी कथा संक्षेप में कह सुनाई और पूछा-तुम कैसे आए? काले खां हंसकर बोला-मेरी क्या पृछते हो लाला, यहां तो छ: महीने बाहर रहते हैं, तो छ: सील भीतर। अब तो यही आरजू है कि अल्लाह यहीं से बुला ले। मेरे लिए बाहर रहना मुसीबत है। सबको अच्छा-अच्छा पहनते, अच्छा- अच्छा खाते देखता हूं, तो हसद होता है, पर मिले कहां से? कोई हुनर आता नहीं, इलम है नहीं। चोरी न करू, डाक न मारू. तो खाऊ क्या? यहां किसी से हसद नहीं होता, न किमी को अच्छा पहनते देखता हूं, न अच्छा खते। सब अपने ही जैसे हैं, फिर डाह और जलन क्यों हो? इसीलिए अल्लाहताला से दुआ करती हूं कि यहीं से बुला ले। छूटने की आरजू नहीं है। तुम्हारे हाथ दुख गए हो तो रहने दो। मैं अकेला ही 'पीस डालेगा। तुम्हें इन लोगों ने यह काम दिया ही क्यों? तुम्हारे भाई-बंद तो हम लोगों से अलग, । " से रखे जाते हैं। तुम्हें यहां क्यों डाल दिया? हट जाओ। अमर ने चक्की की मुठिया जोर से पकड़कर कहा--नहीं-नहीं, मैं थका नहीं है। दो-- चार दिन में आदत पटु जाएगी, तो तुम्हारे बराबर काम करूगा।। कारने खां ने उसे पीछे हटाते हुए कहा–मगर यह तो अच्छा नहीं लगता कि तुम मेरे साथ चक्को पोम्यो। तुमने जुर्म नहीं किया है। रिआया के पीछे सरकार से लड़े हो, तुम्हें में न पीसने दूंगा। मालूम होता है तुम्हारे लिए ही अल्लाह ने मुझे यहां भेजा है। वह तो बड़ा कारसाज आदमी हैं। उमकी कुदरत कुछ समझ में नहीं आती। आप ही आदमी से बुराई करवाता है, आप ही उसे सजा देता है, और आप ही उसे मुआफ कर देता है। अमर ने आपत्ति की-बुराई खुदा नहीं करात', हम खुद कर * काले खां ने ऐसी निगाहों में उसकी ओर देखा, जो कह रही थी, तुम इस रहस्य को अभी नहीं समझ सकते-ना-ना, मैं यह नहीं मानूंगा। तुमने तो पढ़ा होगा, उसके हुक्म के बगैर एक पता भी नहीं हिल सकता, बुराई कौन करेगा सब कुछ वही करवाता है, और फिर माफ भी कर देता है। यह मैं मुंह से कह रहा हूं। जिस दिन मेरे ईमान में यह बात जम जाएगी, उसी दिन बुराई बंद हो जाएगी। तुम्हीं ने उस दिन मुझे वह नसीहत सिखाई थी। मैं तुम्हें अपना पीर समझता हूँ। दो सौ की चीज तुमने तीस रुपये में न ली। उसी दिन मुझे मालूम हुआ, बदी क्या चीज है। अब सोचता हूं. अल्लाह को क्या मुंह दिखाऊंगा? जिंदगी में इतने गुनाह किए हैं कि जब उनकी याद आती है, तो रोए खड़े हो जाते हैं। अब तो उसी की ९०मी का भरोसा है। क्यों भैया, तुम्हारे मजहब में क्या लिखा है? अल्लाह गुनहगारों को मुआई कर देता है? काले खां की कठोर मुद्रा इस गहरी, सजीव, सरल भक्ति से प्रदीप्त हो उठी, आंखों में कोमल छटा उदय हो गई। और वाणी इतनी मर्मस्पर्शी, इतनी आई थी कि अमर का हुदय पुलकित हो उठा-सुनता तो हू खां साहब, कि वह बड़ा दयालु है। | काले खां दूने वेग से चक्की घुमाता हुआ बोला-बड़ा दयालु है, भैया । मां के पेट में बच्चे को भोजन पहुंचाता है। यह दुनिया ही उसकी रहीमी का आईना है। जिधर आंखें उठाओ,<noinclude></noinclude> p84kru3f28ygujjns2o5b1hijb5xnla पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४७० 250 37884 663101 596060 2026-06-16T18:44:54Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663101 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|470:प्रेमचंद रचनावली-5||}}</noinclude> उसकी रहीमी के जलवे। इतने खूनी-डाकू यहां पड़े हुए हैं, उनके लिए भी आराम का सामान कर दिया। मौका देता है, बार-बार मौका देता है कि अब भी संभल जावें। उसका गुस्सा कौन सहेगा, भैया? जिस दिन उसे गुस्सा आवेगा, यह दुनिया जहन्नुम को चली जाएगी। हमारे- तुम्हारे ऊपर वह क्यों गुस्सा करेगा? हम चींटी को पैरों तले पड़ते देखकर किनारे से निकल जाते हैं। उसे कुचलते रहम आता है। जिस अल्लाह ने हमको बनाया, जो हमको पालता है, वह हमारे ऊपर कभी गुस्सा कर सकता है? कभी नहीं। अमर को अपने अंदर आस्था की एक लहरे-सी उठती हुई जान पड़ी। इतने अटल विश्वास और सरल श्रद्धा के साथ इस विषय पर उसने किसी को बाते करते न सुना था। बात वही थी, जो वह नित्य छोटे-बड़े के मुंह से सुना करता था, पर निष्ठा ने उन शब्दों में जान सी डाल दी थी। जरा देर बाद वह फिर बोला-भैया, तुमसे चक्की चलवाना तो ऐसे ही है, जैसे कोई तलवार से चिड़िए को हलाल करे। तुम्हें अस्पताल में रखना चाहिए थी, बोमारी में दवा से उतना फायदा नहीं होता, जितना मीठी बात से हो जाता है। मेरे सामने यहां कई कैदी बीमार हुए, पर एक भी अच्छा न हुआ। बात क्या है? दवा कैदी के सिर पर पेटक दी जाती है, वह चाहे पिए चाहे फेंक दें। | अमर को इस काली-कलुटी काया में स्वर्ण-जैसा हृदय चमकता दीख पड़ा। मुस्कराकर बोला–लेकिन दोनों काम साथ-साथ कैसे करूगा? ''मैं अकेला चक्की चला लूंगा और पूरा आटा तुलवा दूंगा।'' *तब तो सार! सवाब तुम्हीं को मिलेगा।'' काले खां ने साधु-भाव से कहा--भैया, कोई काम सवाब समझकर नहीं करना चाहिए। दिल को ऐसा बना लो कि सवाब में उसे वहीं मजा आव, जो गाने या खेनने में आता है। कोई काम इसलिए करना कि उममनजात मिलेगी, राजगार है, फिर मैं तुम्हें क्या समझाऊ । तुम खुद इन बातों को मुझसे ज्यादा समझते हो। मैं तो मरीज की तीमारदारी करने के लायक हो नहीं है। मुझे बड़ी जल्दी गुम्मा आ जाता हैं। कितना चाहता हूँ कि गुम्सी न आए, परे जहां किसी ने दो-एक बार मेरी बातें न मानीं और मैं बिगड़ा। वहीं इाक, जिसे अमर ने एक दिन अधमता के पैरों के नीचे लोटते देखा था, आज देवल्व के पद पर पहुंच गया था। उसकी आत्मा से मानो एक प्रकाश-सा निकलकर अमर के अंत:करण को अवलोकित करने लगा। उसने कहा-लेकिन यह तो बुरा मालूम होता है कि मेहनत का काम तुम करो और मैं काले खां ने बात कीटी-भैया, इन बातों में क्या रखा है? तुम्हारा काम इस चक्की से कहीं कठिन होगा। तुम्हें किसी के बात करने तक को मुहलत न मिलेगी। मैं रात को मीठी नींद सोऊंगा। तुम्हें रातें जागकर काटनी पड़ेंगी। जान•जोखिम भी तो है। इस चक्की में क्यों रखा है? यह काम तो गधा भी कर सकती हैं, लेकिन जो काम तुम करोगे, वह विरले कर सकते हैं। सूर्यास्त हो रहा था। काले खां ने अपने पूरे गेहूं पीस इाले थे और दूसरे कैदियों के पास जा-जाकर देख रहा था, किसको कितना काम बाकी है। कई कैदियों के गेहूं अभी समाप्त नहीं हुए थे। जेल कर्मचारी आटा तौलने आ रहा होगा। इन बेचारों पर आफत आ जाएगी, मार<noinclude></noinclude> f87o3vk5uwds5vshetpju2pwjgsikfy पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४७१ 250 37885 663102 596061 2026-06-16T18:45:46Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663102 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:471}}</noinclude>कर्मभूमि : 47। पड़ने लगेगी। काले खां ने एक-एक चक्की के पास जाकर कैदियों की मदद करनी शुरू की। इसकी फुर्ती और मेहनत पर नागों को विस्मय होता था। आध घंटे में उसने फिड्डियों की कमी पूरी कर दी। अमर अपना चक्की के पास खड़ा सेवा के पुतले को श्रद्धा - भरी आंखों से देख रहा था, मानो दिव्य दर्शन कर रहा हो। काले खां इधर से फुरसत पाकर नमाज पढ़ने लगा। वहीं बरामदे में उसने वजू किया, अपना कबल जमीन पर बिछा दिया और नमाज शुरू की। उम्मी वक्त जेलर साहब चार वार्ड के साथ आटा तुलवाने में पहुंचे। कैदियों ने अपना-अपना आटा बोरियों में भरा और तराजू के पास आकर खड़ा हो गए। 3ाटा तुलने भग।। जनर ने अमर से पूछा--तुम्हारा साथी कहा गया? अमर ने बनाया, नमाज पढ़ रहा है। * उसे बुलाओ। पहले आटा तुलवा ले, फिर नमाज पढे। बट्टा नमाज को दुम बना है। कह गया है नमाज पढ़न?'' अमर ने शेड के पीछे की तरफ इशारा करके कहा..उन्हें नमाज़ इन दें, आप आटा ल ले। अलर यह रव देव मकना था कि को केटो ग सक्न नमाज पढ़ने जाय, जब जेल *, साक्षात प्रभू पधार हों । गद के पछि नाक बन्न - अत्र से नमाज के बच्चे, आटा क्यों नहीं तलवता? बचा, हि चचा 'गए हो । नऊ का हाना करने लग, चना चटपट, वरना मारे हंटरों के चमड़ी उधेड़ दृगा।। काले खां दूसरी ही दुनिया में था। जेलर ने समीप जाकर अपनी ही उसकी पीठ में भने इराक -बहरा हो गया है। क्या बै? शामते तो नहीं आई हैं । काले र नमाज में मग्न था। पीछे फिरकर भी न देखा। जेलर ने इाल्नाक 'नात "पाई। काल मिजदे के लिए झुक टू , ' । लात खाकर भी मुंह गिर पड़ा पर तरक्ष 'भलकर फिर शिद में झुक गया। जलर क द जिद पड़ गई कि उसकी नमाज बंद कर दे। एभव हे काले रखा को 2ी जिद पड़ गई हो कि नमाज पूरी किए बगैर न उगा। वह जो मिजद में थी। जलर ने उसे बूटदार ठोकरें जम्मानो शुरू की, एक यार ने नपककर दो गारद सिपाही बुला लिए। दूसरा जेलर साहेब को कुमक पर दाङ। काले jां पर एक तरफ से टकरे पड़ रही थीं, दूसरी तरफ से लकडियां, पर वह सिजदे में सिर 7 उठाता था। हां, प्रत्येक आघात पर उसके मुंह से 'अल्लाह अकबर !' को दल हिला देने त्रान्नी सदा निकल जाती थी। उधर अघातकारियों को उत्तेजना भी बढ़ती जाती थी। जेल का कैदी जेल के बुदा को सिजदा न करके अपने खुद को सिजदा करे, इसे बड़ा जेलर साहब का क्या अपमान हो सकता था। यहां तक कि काले खां के सिर से रुधिर बहने लगा। रकान्त उसकी रक्षा करने के लिए चला था कि एक वाईर ने उसे मजबूती से पकड़ लिया। उधर बराबर आघात हो रहे थे और काले खां बराबर 'अल्लाहो अकबर ।' की सदा लगाए जाता था। आखिर वह आवाज क्षीण होते-होते एक बार बिल्कल बंद हो गई और काले खां रक्त बहने से शिथिल है। गया। मगर चाहे किसी के कानों में आवाज न जाती हो, उसके होंठ अब भी खुले रहे थे और अब भी 'अल्लाहो अकबर' को अन्य ध्वनि निकल रही थी।<noinclude></noinclude> aks9ye3hnwbn9ec8m8zojznsivklc3z पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४७२ 250 37886 663103 596062 2026-06-16T18:46:30Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663103 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|472:प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude>जेलर ने खिसियाकर कहा-पड़ा रहने दो बदमाश को यहीं । कल से इसे बड़ी बेटी दूंगा और तनहाई भी। अगर तब भी ने सीधा हुआ, तो उलटी होगी? इसपः। नमाजोपन निकाल न दें तो नाम नहीं। | एक मिनट में वार्डर, जेलर, सिपाही सब चले गए। कैदियों के भोजन का समय आया, सब-के-सब भोजन पर जा बैठे। मगर काले खां अभी वहीं औंधा पड़ा था। सिर और नाक तथा कानों से खून बह रहा था। अमरकान्त बैठा उसके घावों को पानी से धो रहा था और खुन बंद करने का प्रयास कर रहा था। आत्मशक्ति के इस कल्पनातीत उदाहरण ने उसकी भौतिक बुद्धि को जैसे आक्रांत कर दिया। ऐसी परिस्थिति में क्या वह इस भाति निश्चल और संयमित बैठा रहता? शायदं पहले ही आधात में उसने गा तो प्रतिकार किया होता या नमाज छोड़कर अलग हो जाता। विज्ञान और नीति और देशानुराग की वेदी पर बलिदानों की कमी नहीं। पर यह निश्चल धैर्य ईश्वर-निष्ठा ही का प्रसाद है। | कैदी भोजन करके लौटे। काले खां अब भी वहीं पड़ा हुआ था। सभी ने उसे उठाकर बैरक में पहुंचाया और डॉक्टर को सूचना दी, पर उन्होंने रात को कष्ट उठाने की जरूरत न समझी। वहां और कोई दवा भी न थी। गर्म पानी तक न मयस्सर हो सका। उस बैरक के कैदियों ने रात बैठकर काटी। कई आदमी आमादा थे कि सुबह होते ही जेलर साहब की मरम्मत की जाय। यही न होगा, साल-साल भर की मियाद और बढ़ जाएगी। क्या परवाह | अमरकान्त शांत प्रकृति की आदमी था, पर इस समय वह भी उन्हीं लोगों में मिला हुआ था। रात-भर उसके अंदर पर् और मनुष्य में इंद्व होता रहा। वह जानता था, आ आग से नहीं, पानी से शांत होती है। इंसान कितना ही हैवान हो जाय उसमें कुछ न कुछ आदमीयत रहती ही है। वह आदमीयत अगर जा सकती है, तो ग्लानि से, या पश्चताप से। अमर अकेला होता, तो वह अब भी विचलित न होता, लेकिन सामुहिक आवंश ने उसे भी अस्थिर कर दिया। समूह के साथ हम कितने हो ऐसे अच्छे-बुरे काम कर जाते हैं, जो हम अकेले में कर सकते। और काले खां की दशा जितनी ही खराब होती जाती थी, उतनी ही प्रतिशोध की ज्वाला भी प्रचंड होती जाती थी। एक डाके के कैदी ने कहा-खून पी जाऊंगा, खुन । उसने समझा क्या है। यहीं न होगा, फांसी हो जाएगी? अमरकान्त बोला—उस वक्त क्या समझे थे कि मारे ही डान्नता है । षड्यंत्र रचा गया, आपातकारियों का चुनाव हुआ, उनका कार्य विधान निश्चय किया गया। सफाई की दलीलें सोच निकाली गई। । सहसा एक ठिगने कैदी ने कहा-तुम लोग समझते हो, सवेरे तक उसे खबर नै हो जाएगी? अमर ने पूछा-खबर कैसे होगी? यहां ऐसा कौन है, जो उसे खबर दे दे? | ठिगने कैदी ने दाएं-बाएं आंखें घुमाकर कहा-ख़नर देने वाले न जाने कहां से निकल आते हैं, भैया? किसी के माथे पर तो कुछ लिखी नहीं, कौन जाने हम में से कोई जाकर इत्तिलो कर दे? रोज ही तो लोगों को मुखबिर बनते देखते हो। वही लोग जो अगुआ होते हैं, अवसर पड़ने पर सरकारी गवाह बन जाते हैं। अगर कुछ करना है, तो अभी कर डालो। दिन को वारदात करोगे, सब-के-सव पकड़ लिए जाओगे। पांच-पांच साल की सजा दुक जाएगी।<noinclude></noinclude> gu1gms9evwkg8xclr5exhkzglfmmms7 पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४७३ 250 37887 663104 596063 2026-06-16T18:47:41Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663104 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|||कर्मभूमि:473}}</noinclude>अमर ने संदेह के स्वर में पूछा-लेकिन इस वक्त तो वह अपने क्वार्टर में सो रहा होगा? ठिगने कैदी ने राह बताई--यह हमारा काम है भैया, तुम क्या जानो? सबों ने मुंह मोड़कर कनफुमकियों में बातें शुरू कीं। फिर पांचों आदमी खड़े हो गए। ठिगने कैदी ने कहा-हममें से जो फूटे, उसे गऊ हत्या ! यह कहकर उसने बड़े जोर से हाय-हाय करना शुरू किया। और भी कई आदमी चीखने चिल्लाने लगे। एक क्षण में वार्डर ने द्वार पर आकर पृछा-तुम लोग क्यों शोर कर रहे हो? क्या बात है? ठिगने कैदी ने कहा- बात क्या है, काले खां की हालत खराब है। जाकर जेलर साहब को बुला लाओ। चटपट। वार्डर बोला—वाह बे । चुपचाप पड़ा रह 1 बड़ा नवाब का बेटा बना है। ''हम कहते हैं जाकर उन्हें भेज़ दो, नहीं, ठीक नहीं होगा।'' काले खां ने आंखें खोलीं और क्षीण स्वर में बलिा-क्यों चिल्लाते हो यारो, मैं अभी मग 'नहीं हू। जान पड़ता है, पीठ की हड्डी में चोट है। | ठिगने कैदी ने कही-उसी को बदला चुकाने की तैयारी है पठान । | काले वा निरस्कार के स्वर में बोला-क्रिसम वदला चक्रा भाई, अल्लाह से? अल्लाह की यही मरजी है, तो उसमें दृमरा कौन दखल दे सकता है? अल्लाह की मर्जी के बिना कहीं एक पती भी हिल सकती है? जर मुझे पानी पिला दी। और देखो, जब मैं मर जाऊ, तो यहां जितने भाई हैं, सब मेरे लिए खुदा से दुआ करना। और दुनिया में मेरा कौन है? शायद तुम लोगों की दुआ से मेरी निजात । जाय। अमर ने उसे गोद में संभालकर पानी पिलाना चाहा, मगर घंटे कंठ के नीचे न उतरा। वहे जार में कराहकर फिर लेट गया। ठिगने कैदी ने दांत पीसकर कहा--ऐसे बदमाम की गरदन तो उलटी छरी से काटनी चाहिए । काले खां दीनभाव से रुक-रुककर बोला-क्यों मेरी नजात को द्वः बद करते हो, भाई ! दुनिया तो बिगड़ गई, क्या आकबत भी बिगाड़ना चाहते हो? अल्लाह से दुआ करो, सब पर रहम करे। जिंदगी में क्या कम गुनाह किए हैं कि मरने के पीछे पांव में बेड़ियां पड़ी रहें । या अल्लाह, रहम करे।। इन शब्दों में मरने वाले की निर्मल आत्मा मानो व्याप्त हो गई थी। बातें वही थीं, तो रोज सुना करते थे, पर इस समय इनमें कुछ ऐसे द्रावक, कुछ ऐसी हिला देने वाली सिद्धि थी कि सभी जैसे उसमें नहा उठे। इस चुटको भर राख ने जैसे उनके तापमय विकारों को शांत कर दिया। । प्रात:काल जब काले खां ने अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दी तो ऐसा कोई कैदी ने था, जिसकी आंखों से आंसू न निकल रहे हों, पर और को रोना दु:ख को धा, अपर को रना सुख का था। औरों को किसी आत्मीय के खो देने का सदमा था, अमर को उसके और ममीप हो जाने का अनुभव हो रहा था। अपने जीवन में उसने यही एक नवरत्न पाया था, जिसके सम्मुख वह श्रद्धा से सिर झुका सकता था और जिससे वियोग हो जाने पर उसे एक वरदान पा जाने का भान होता था।<noinclude></noinclude> 95otfxqiga4s4cch2qfgshbpsckpdpv पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४७४ 250 37888 663105 596064 2026-06-16T18:48:17Z Vinayak.Srivastava7 6647 /* शोधित */ 663105 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vinayak.Srivastava7" />{{rh|474:प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude>इस प्रकाश-स्तंभ ने आज उसके जीवन को एक दूसरी ही धारा में डाल दिया जहां संशय की जगह विश्वास, और शंका की जगह सत्य मूर्तिमान हो गया था। सात लाला समरकान्त के चले जाने के बाद सलीम ने हर एक गांव का दौरा करके असामियों की आर्थिक दशा की जांच करनी शुरू की। अब उसे मालूम हुआ कि उनकी दशा उससे कहीं हीन है, जितनी वह समझे बैठा था। पैदावर का मूल्य लागत और लगाने से कहीं कम था। खाने-कपड़े की भी गुंजाइश न थी, दूसरे खर्चे का क्या जिक्र? ऐसा कोई बिरला ही किसान था, जिसका सिर ऋण के नीचे न दबा हो। कॉलेज में उसने अर्थशास्त्र अवश्य पढ़ा था और जानता था कि यहां के किसानों की हालत खराब है, पर अब ज्ञात हुआ है कि पुस्तक-ज्ञान और प्रत्येक्ष व्यवहार में वही अंतर है, जो किसी मनुष्य और उसके चित्र में है। ज्यों-ज्यों असली हालत मालूम होती जाती थी, उसे असामियों से सहानुभूति होती जाती थी। कितनी अन्याय है कि जो बेचारे रोटियों को मुंहताज हों, जिनके पास तुन ढकने को केवल चीथड़े हों, जो बीमारी में एक पैसे की दवा भी न कर सकते हों। जिनके घरों में दीपक भी न जलते हों, उनमें पूरा लगान वसूल किया जाए। जब जिंस मंहगी थी, तब किसी तरह एक जून रोटियां मिल जाती थीं। इस मंदो में तो उनकी दशा वर्णनातीत हो गई है। जिनके लड़के पांच-छ: बरस की उम्र से मेहनत-मजूरी करने लगे, जो ईंधन के लिए हार में गोबर चुनते फिरें, उनमें पूरा लगान वसूल करना, मानो उनके मुंह से रोटी का टुकड़ा छीन लेना है, उनकी रक्त-हीन देह से खून चूसना है। परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान होते ही सलीम ने अपने कर्तव्य का निश्चय कर लिया। वह उन आदमियों में न था, जो स्वार्थ के लिए अफसरों के हर एक हुक्म की पाबंदी करते हैं। वह नौकरी करते हुए भी आत्मा की रक्षा करना चाहता था। कई दिन एकांत में बैठकर उसने विस्तार के साथ अपनी रिपोर्ट लिखी और मि गजनवी के पास भेज दी। मि० गजनवी ने उसे तुरंत लिखा-आकर मुझसे मिल जाओ। सलीम उनसे मिलना न चाहता था। डरती थी, कहीं यह मेरी रिपोर्ट को दबाने का प्रस्ताव न करें, लेकिन फिर सोचा-चलने में हर्ज ही क्या है? अगर मुझे कायल कर दें, तब तो कोई बात नहीं, लेकिन अफ़सरों के भय से मैं अपनी रिपोर्ट को कभी न दबने दूंगा। उसी दिन वह संध्या समय सदर पहुंचा। | मिः गजनवी ने तपाक से हाथ बढ़ाते हुए कहा–मिः अमरकान्त के साथ तो तुमने दोस्ती का हक खुब अदा किया। वह खुद शायद इतनी मुफस्सिल रिपोर्ट न लिख सकते लेकिन तुम क्या समझते हो, सरकार को यह बातें मालूम नहीं? सलीम ने कहा-मेरा तो ऐसा ही ख़याल है। उसे जो रिपोर्ट मिलती है, वह खुशामदी अहलकारों से मिलती है, जो रिआया का खून करके भी सरकार का घर भरना चाहते हैं। मेरी रिपोर्ट वाकयात पर लिखी गई है। दोनों अफसरों में बहस होने लगी। गजनवी कहता था-हमारा काम केवल अफसरों की आज्ञा मानना है। उन्होंने लगान वसूल करने की आज्ञा दी। हमें लगाने वसूल करनी चाहिए। प्रजा को कष्ट होता है तो हो, हमें इससे प्रयोजन नहीं। हमें खुद अपनी आमदनी का टैक्स<noinclude></noinclude> ha1umhqwx23q9u7ag4kbelynw6b7znw पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२५ 250 77027 663071 662862 2026-06-16T15:48:17Z Chahar 009 6627 663071 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|left='''१५'''|center='''समाजवाद : पूंजीवाद'''}}</noinclude>कि एक सुन्दर युवती पतिव्रता स्त्री की तुलना में दुराचरण द्वारा कहीं अधिक कमा सकती है ? डाक्टर और वैरिस्टर जब सामान्य मजदूर की अपेक्षा अधिक पैसा माँगते हैं तो वे कह सकते है कि उनके एक-एक मिनट के पीछे उनकी वर्षो की मेहनत लगी हुई है। हरएक आदमी यह स्वीकार करेगा कि साधारण मजदूर और डाक्टर-वैरिस्टर की मजदूरियों में अन्तर रहता है; किन्तु यह कह सकना बड़ा कठिन है कि समय अथवा रुपये-पैसे के रूप में उस अन्तर का ठीक परिमाण क्या है और क्या होना चाहिए। इसी- लिए हमको उत्पत्ति और मांग के नियम का आश्रय लेना पडता है। कुछ कामों का ठोस परिणाम निकलता है और कुछ का नहीं । उदाहरण के लिए किसी खाती ने जानवरों को खेत में जाने से रोकने के लिए लकड़ी का एक फाटक बनाया। यह उसकी मेहनत का ठोस फल हुआ, जिसको तबतक वह अपने कब्जे में रख सकता है जबतक उस को उसके बनाने की मजदूरी न मिल जाय । किन्तु वह देहाती लट्का, जो खेत पर पक्षी उड़ाने के लिए हल्ला किया करता है,अपने काम का ऐसा कोई परिणाम नहीं बता सकता; हालाँकि उसका काम खाती के काम जितना ही आवश्यक होता है । डाकिया कुछ नहीं बनाता, वह चिट्टियाँ और पार्सलें बांटता है। पुलिस का सिपाही कोई चीज़ नहीं बनाता और सैनिक न केवल बनाता ही नहीं है, उल्टा पदार्थों को नष्ट करता है। डाक्टर, वकील, पुरोहित, धारा-समाश्रों के सदस्य, नौकर, राजा-रानी और अभिनेता- ये सभी कौनसी ठोस चीजें बनाते हैं ? जब ये काम कर चुकते हैं तो उनके पास ऐसा कुछ नहीं होता, जिसे तोला या मापा जा सके और तदनुसार उनको मजदूरी दी जा सके । अतः यह स्पष्ट है कि हरएक अपने श्रम से जितना पैदा करे, उनको उतना देने की अथवा हरएक के समय का मूल्य रुपये, आने, पाई में आंकने की कोशिश करना बेकार है। उसमें हम सफल नहीं हो सकते । कुछ लोगों का यह कहना है किं योग्यता के अनुसार सम्पत्ति का विभाजन होना चाहिए । उस दशा में आलसियों और दुष्टों को कुछ न<noinclude></noinclude> 6onuyg8hgo4rdb6ysrlbdq0qe9ului7 पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२६ 250 77029 663073 662999 2026-06-16T16:19:15Z Chahar 009 6627 663073 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center='''विभाजन की सात योजनायें'''|right='''१६'''}}</noinclude> मिलेगा और वे नष्ट हो जायेंगे तथा जो कुछ सम्पत्ति होगी, वह भले, परिश्रमी और क्रियाशील लोगों को मिलेगी और वे फले-फूलेंगे । जो लोग आराम से रहते हैं, उन में से बहुत से समझते हैं कि आज-कल ऐसा ही होता है। उनकी यह धारणा रहती हैं कि परिश्रमी, समझधार और मितव्ययी लोगों को कभी प्रभाव का सामना नहीं करना <div style="float: left; margin-right: 15px; font-size: 150%;text-align: center; width: 8em;">{{float box|width=8em|दूसरी योजना}}</div>पढता और अलसी, शराबखोर, जुआरी, बेईमान और दुश्चरित्र कंगाल होते हैं। वे कह सकते हैं कि सदाचारी मज़दूर की अपेक्षा दुराचारी मज़दूर को काम प्राप्त करने में अधिक कठिनाई होती है; जो किसान या ज़मींदार जुआ खेलता है और अनाप-शनाप खर्च करता है उसकी जमीन हाथ से निकल जाती है और वह कंगाल हो जाता है तथा जो व्यापारी सुस्त होता है और अपने धन्धे की तरफ़ ध्यान नहीं देता, वह दिवालिया हो जाता है; किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उन को जो कुछ मिलता है वह उनका योग्य हिस्सा होता है। इससे इतना ही पता चलता है कि कुछ कमजोरियों और बुराइयों के कारण मनुष्य दरिद्र हो जाता है। किन्तु साथ ही कुछ ऐसी बुराइयाँ भी हैं जिनके कारण मनुष्य धनी बन जाता है । कठोर, स्वार्थी, लालची, निर्दयी और अपने पडोसियों से लाभ उठाने के लिए सदा तत्पर रहने वाले लोग, यदि इतने बुद्धिमान हों कि अपने हाथों से अपने पाँवों पर कुल्हाड़ी न मारें तो, शीघ्र ही धनवान बन जाते हैं । इस के विपरीत ग़रीब घर में पैदा हुए उदारचेता, समाज-सेवी और मिलनसार लोग, जबतक उन में असाधारण प्रतिभा न हो, ग़रीब ही रहते हैं। इतना ही नहीं, आज जैसी स्थिति है, उस में कुछ ग़रीब ही पैदा होते हैं और कुछ सोने के पालने में जन्म लेते हैं । कहने का मतलब यह है कि वे चरित्र-निर्माण के पहले ही धनी और गरीब की श्रेणियों में बंट जाते हैं। यह स्पष्ट है कि आज योग्यतानुसार सम्पत्ति का विभाजन नहीं होता। इस समय आम हालत यह हैं कि थोड़े से आलसी बहुत मालदार हैं और अनेको कठोर परिश्रम करने वाले अत्यन्त कंगाल हैं । भारतीय किसान, जिनको भर-पेट भोजन और तन ढंकने<noinclude></noinclude> 41kzi8qygpzf9ts676si31ls9nz9sdf 663077 663073 2026-06-16T17:14:56Z Chahar 009 6627 663077 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center='''विभाजन की सात योजनायें'''|right='''१९ '''}}</noinclude> मिलेगा और वे नष्ट हो जायेंगे तथा जो कुछ सम्पत्ति होगी, वह भले, परिश्रमी और क्रियाशील लोगों को मिलेगी और वे फले-फूलेंगे । जो लोग आराम से रहते हैं, उन में से बहुत से समझते हैं कि आज-कल ऐसा ही होता है। उनकी यह धारणा रहती हैं कि परिश्रमी, समझधार और मितव्ययी लोगों को कभी प्रभाव का सामना नहीं करना <div style="float: left; margin-right: 15px; font-size: 140%;text-align: center; width: 8em;">{{float box|width=8em|दूसरी योजना}}</div>पढता और अलसी, शराबखोर, जुआरी, बेईमान और दुश्चरित्र कंगाल होते हैं। वे कह सकते हैं कि सदाचारी मज़दूर की अपेक्षा दुराचारी मज़दूर को काम प्राप्त करने में अधिक कठिनाई होती है; जो किसान या ज़मींदार जुआ खेलता है और अनाप-शनाप खर्च करता है उसकी जमीन हाथ से निकल जाती है और वह कंगाल हो जाता है तथा जो व्यापारी सुस्त होता है और अपने धन्धे की तरफ़ ध्यान नहीं देता, वह दिवालिया हो जाता है; किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उन को जो कुछ मिलता है वह उनका योग्य हिस्सा होता है। इससे इतना ही पता चलता है कि कुछ कमजोरियों और बुराइयों के कारण मनुष्य दरिद्र हो जाता है। किन्तु साथ ही कुछ ऐसी बुराइयाँ भी हैं जिनके कारण मनुष्य धनी बन जाता है । कठोर, स्वार्थी, लालची, निर्दयी और अपने पडोसियों से लाभ उठाने के लिए सदा तत्पर रहने वाले लोग, यदि इतने बुद्धिमान हों कि अपने हाथों से अपने पाँवों पर कुल्हाड़ी न मारें तो, शीघ्र ही धनवान बन जाते हैं । इस के विपरीत ग़रीब घर में पैदा हुए उदारचेता, समाज-सेवी और मिलनसार लोग, जबतक उन में असाधारण प्रतिभा न हो, ग़रीब ही रहते हैं। इतना ही नहीं, आज जैसी स्थिति है, उस में कुछ ग़रीब ही पैदा होते हैं और कुछ सोने के पालने में जन्म लेते हैं । कहने का मतलब यह है कि वे चरित्र-निर्माण के पहले ही धनी और गरीब की श्रेणियों में बंट जाते हैं। यह स्पष्ट है कि आज योग्यतानुसार सम्पत्ति का विभाजन नहीं होता। इस समय आम हालत यह हैं कि थोड़े से आलसी बहुत मालदार हैं और अनेको कठोर परिश्रम करने वाले अत्यन्त कंगाल हैं । भारतीय किसान, जिनको भर-पेट भोजन और तन ढंकने<noinclude></noinclude> 3bbxcevlhx39nfy1p6slb08ljq312sv पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२७ 250 77031 663075 663001 2026-06-16T16:47:38Z Chahar 009 6627 663075 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|left='''२०'''|center='''समाजवाद : पूंजीवाद'''}}</noinclude> लायक़ काफ़ी कपडा भी नहीं मिलता ओर जो मिट्टी के मामूली कच्चे घरों और झोपड़ियॉ में दिन बिताते हैं, वे उन दुकानदारों और धनवानों से अधिक चरित्रवान् हैं जो कुछ श्रम नहीं करते, खूब खाते, पहनने और बर्बाद करते हैं और ऊँची-ऊँची हवेलियों में रहते हैं । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि यदि आज सम्पत्ति का विभाजन योग्यता के आधार पर नहीं होता है तो क्यों न ऐसी कोशिश करें जिससे भले आदमी धनी और बुरे आदमी दरिद्र हो जाये ? किन्तु इसमें कई कठिनाइयाँ हैं । प्रथम तो किसी की योग्यता का मूल्य रुपयों में कैसे आँका जा सकता है ? एक गाँव है, जिसमें लुहार भी रहता है और पुजारी भी । योग्यता के अनुसार उन दोनों में हमको सम्पत्ति का विभाजन करना है। लुहार को पुजारी जितना दिया जाय या पुजारी से दूना या आधा या कितना कम या कितना अधिक ? पुजारी का दावा है कि वह 'हनुमान चालीसा का पाठ करके भूत-प्रेत को भगा सकता है; किन्तु लुहार के पास तो अपने धन के सिवा कुछ नहीं। हाँ, यह घोड़े की नाल अवश्य बना सकता है। यह काम पुजारी सात जन्म में भी नहीं कर सकता । तो सवाल यह है कि 'हनुमान चालीसा' की कितनी चौपाइयाँ घोड़े की एक नाल के बराबर मानी जाएँ ! हम यह मालूम कर सकते हैं कि बाजार में सेर भर घी के बदले कितना अन्न मिल सकता है, किन्तु जब हम मानव प्राणियों का मूल्य आँकेंगे तो हमें मानना होगा कि ईश्वर के दरवार में उन सब का समान मूल्य है। उनकी योग्यता के अनुसार सम्पत्ति का बंटवारा करना मनुष्य की माप और निर्णय-शक्ति के बाहर की बात है । सम्पत्ति के विभाजन की तीसरी योजना उन लोगों की है जो 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाले उसी पुराने और सीधे-सादे नियम में विश्वास <div style="float: left; margin-right: 15px; font-size: 140%;text-align: center; width: 8em;">{{float box|width=8em|तीसरी योजना}}</div>रखते है; किन्तु इस नियम की घोषणा आजकल क्वचित ही की जाती है। वे कहते हैं कि हर एक अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार ले-ले; किन्तु इससे दुनिया में शान्ति और सुरक्षितता का नामोनिशान भी न रहेगा । यदि हम सब<noinclude></noinclude> 9fk3tsq2q5a9ragokoai1xmll8gu62c पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/२८ 250 77033 663076 663002 2026-06-16T17:10:19Z Chahar 009 6627 663076 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center='''विभाजन की सात योजनायें'''|right='''२९'''}}</noinclude> छल और चालाकी में समान हों तो हमें समान अवसर मिल जाएँगे; किन्तु जिस दुनिया में बालक, वृद्ध और रोगी भी रहते हो और समान यवस्था तथा शक्ति वाले तन्दुरुस्त व्यवस्था लोग भी लालच और दुष्टता में एक-दूसरे से बहुत भिन्न हों उसमें यह योजना नहीं चल सकती । कुछ ही समय में हमें उससे हार माननी होगी । समुद्री लुटेरों और जंगली डाकुओं के दल तक लूट के माल के विभाजन के लिए धींगामस्ती के बजाय शान्ति पूर्ण निर्धारित समझौते को पसन्द करते हैं । हमारे सभ्य समाज में यद्यपि डकैती और हिंसा का निषेध है, फिर भी हम व्यवसाय को ऐसे सिद्धान्त पर चलने देते हैं जिसके अनुसार दूसरे का कुछ भी खयाल किए बिना हर एक चाहे जितना नफा कमा सकता है। एक दूकानदार या व्यापारी हमारी जेब भले ही न काटे; किन्तु वह अपनी चीज़ों की इच्छानुसार मनमानी क़ीमत ले सकता है । व्यवसाय में इस बात की स्वतन्त्रता मिली हुई है कि वह जिस हद तक ग्राहक को राजी कर सके, उस हद तक अपने रुपए के बदले अधिक ले सकता है या कम दे सकता है। मकानों की क़ीमत अथवा किरायेदारों की दरिद्रता का कुछ भी खयाल किये बिना मकानों का किराया चढ़ाया जा सकता है। दुनिया की उद्योग-धंधों में आगे बढ़ी हुई जातियाँ अपनी तैयार चीज़े उद्योग-धंधों में पिछड़ी हुई जातियों पर थोप कर मालदार हो सकती हैं। सम्पत्ति के विभाजन की चौथी योजना यह है कि केवल कुछ लोगों को बिना कुछ परिश्रम कराये धनी बना दिया जाय और बाक़ी सब से <div style="float: left; margin-right: 15px; font-size: 140%;text-align: center; width: 8em;">{{float box|width=8em|चौथी योजना}}</div>खूब मेहनत कराई जाय। उनके परिश्रम से जो पैदा हो उसमें से उन्हें केवल इतनी मज़दूरी दी जाय कि वे जीविन भर रह सकें और मरने या बुड्ढे होने के बाद ग़ुलामी करने के लिए बाल-बच्चे पैदा कर जायें। मोटे तौर पर आजकल यही होता है। दस प्रतिशत लोग देश की ९० प्रतिशत सम्पत्ति पर अधिकार जमाए हुए हैं। शेष ९० प्रतिशत में से अधिकांश के पास कोई सम्पत्ति नहीं है । वे अत्यंत अल्प मजदूरी पर कंगाली की हालत में<noinclude></noinclude> hnazl6877buv5qlqfrjw7ahwdaiygsi 663078 663076 2026-06-16T17:16:41Z Chahar 009 6627 663078 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{RunningHeader|center='''विभाजन की सात योजनायें'''|right='''२९'''}}</noinclude> छल और चालाकी में समान हों तो हमें समान अवसर मिल जाएँगे; किन्तु जिस दुनिया में बालक, वृद्ध और रोगी भी रहते हो और समान यवस्था तथा शक्ति वाले तन्दुरुस्त व्यवस्था लोग भी लालच और दुष्टता में एक-दूसरे से बहुत भिन्न हों उसमें यह योजना नहीं चल सकती । कुछ ही समय में हमें उससे हार माननी होगी । समुद्री लुटेरों और जंगली डाकुओं के दल तक लूट के माल के विभाजन के लिए धींगामस्ती के बजाय शान्ति पूर्ण निर्धारित समझौते को पसन्द करते हैं । हमारे सभ्य समाज में यद्यपि डकैती और हिंसा का निषेध है, फिर भी हम व्यवसाय को ऐसे सिद्धान्त पर चलने देते हैं जिसके अनुसार दूसरे का कुछ भी खयाल किए बिना हर एक चाहे जितना नफा कमा सकता है। एक दूकानदार या व्यापारी हमारी जेब भले ही न काटे; किन्तु वह अपनी चीज़ों की इच्छानुसार मनमानी क़ीमत ले सकता है । व्यवसाय में इस बात की स्वतन्त्रता मिली हुई है कि वह जिस हद तक ग्राहक को राजी कर सके, उस हद तक अपने रुपए के बदले अधिक ले सकता है या कम दे सकता है। मकानों की क़ीमत अथवा किरायेदारों की दरिद्रता का कुछ भी खयाल किये बिना मकानों का किराया चढ़ाया जा सकता है। दुनिया की उद्योग-धंधों में आगे बढ़ी हुई जातियाँ अपनी तैयार चीज़े उद्योग-धंधों में पिछड़ी हुई जातियों पर थोप कर मालदार हो सकती हैं। सम्पत्ति के विभाजन की चौथी योजना यह है कि केवल कुछ लोगों को बिना कुछ परिश्रम कराये धनी बना दिया जाय और बाक़ी सब से <div style="float: left; margin-right: 15px; font-size: 140%;text-align: center; width: 8em;">{{float box|width=8em|चौथी योजना}}</div>खूब मेहनत कराई जाय। उनके परिश्रम से जो पैदा हो उसमें से उन्हें केवल इतनी मज़दूरी दी जाय कि वे जीविन भर रह सकें और मरने या बुड्ढे होने के बाद ग़ुलामी करने के लिए बाल-बच्चे पैदा कर जायें। मोटे तौर पर आजकल यही होता है। दस प्रतिशत लोग देश की ९० प्रतिशत सम्पत्ति पर अधिकार जमाए हुए हैं। शेष ९० प्रतिशत में से अधिकांश के पास कोई सम्पत्ति नहीं है । वे अत्यंत अल्प मजदूरी पर कंगाली की हालत में<noinclude></noinclude> 193bdj5u9335kc0leapknn7d4s6fipe पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/३४ 250 77046 663081 663005 2026-06-16T17:36:47Z Chahar 009 6627 663081 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Chahar 009" />{{rh||'''निर्धनता या धनिकता?'''|'''२७'''}}</noinclude> है कि वह खराब है, उसको ज्यों-की-त्यों रहने देना स्वीकार न करेगा । जब स्थिति ज्यों-की-त्यों नहीं रहेगी, वह बदलेगी, तब उसकी तरफ से आँखें मूँद लेने से काम न चलेगा। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि हम स्थिति को यों ही लुढ़कने न दें। रोक कर ठीक दिशा में चलाएँ । विचारपूर्वक सम्पत्ति का विभाजन करें । जैसा विभाजन इस समय हो रहा है वह ठीक नहीं है । सम्पत्ति विभाजन की सातवीं योजना साम्यवादी योजना है और वह यह है कि बिना इस बात का विचार किए कि अमुक आदमी कैसा है, उसकी <div style="float: left; margin-right: 15px; font-size: 140%;text-align: center; width: 8em;">{{float box|width=8em|सातवीं योजना}}</div>कितनी उम्र है, किस तरह का काम करता है, कौन है, उसका पिता कौन था, हरएक को बरावर-बरावर हिस्सा दे दिया जाय । केवल यही योजना ठीक-ठीक. काम देगी। सबसे सन्तोषजनक योजना यही है । विभाजन की पहेली का यही साम्यवादी हल है। समान भाग में हमें भले ही सुन्दरता दिखाई न दे; किन्तु हम असमान आय के भयंकर दुष्परिणामों को देख सकते हैं। जिन बुराइयों से हमें नित्य संघर्ष करना पड़ता है वे असमान आय के कारण ही पैदा होती हैं। इसलिए हमें राष्ट्रीय सम्पत्ति का विभाजन सब में समान ही करना चाहिए। <center>{{xx-larger|: ४ :}} <center>{{xx-larger|निर्धनता या धनिकता?}} कुछ साधु-सन्तों के अलावा हरएक आदमी यही कहेगा कि जो योजना दरिद्रता का नाश न कर सके वह ग्राह्य नहीं हो सकती। (उन लोगों की दरिद्रता भी मज़बूरन नहीं, स्वेच्छा से ग्रहण की हुई होती है।) इसलिए सबसे पहले थोड़ी देर के लिए हम दरिद्रता का ही विचार कर लें। यह आम तौर पर माना जाता है कि गरीब लोगों के लिए दरिद्रता अत्यन्त कष्ट-दायक और अभिशाप रूप सिद्ध होती है, किन्तु ग़रीब लोग<noinclude></noinclude> 28wynkio5tgsd370vohjv95k2s85yvo पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२ 250 130143 663072 662882 2026-06-16T16:09:59Z Meghdhanu 4441 663072 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|'''प्रथम संस्करण की भूमिका'''}} {{gap}}गत वर्ष मुझे हिंदी के विद्वानों के सम्मुख "साहित्यालोचन" उपस्थित करने का अवसर प्राप्त हुआ था। आज कोई चौदह मास के अनंतर मैं यह 'दूसरा ग्रंथ लेकर उपस्थित होता हूँ'। जिन कारणों के वशीभूत होकर मुझे पहले ग्रंथ की रचना का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, उन्हीं कारणों ने यह ग्रंथ उपस्थित करने में भी मुझे बाध्य किया है। भाषा-विज्ञान पर एक उत्तम ग्रंथ लिखने का भार मेरे परम मित्र स्वर्ग-वासी पंडित चंद्रधर जी गुलेरी ने अपने ऊपर लिया था। वे अभी इसे आरंभ भी न कर सके थे कि कराल-काल ने उन्हें अचानक कवलित कर लिया। मैंने बहुत चाहा कि कोई दूसरा विद्वान् गुलेरी जी का यह कार्य संपन्न करे; पर इस संबंध में मैंने जो कुछ उद्योग किया, वह सब निष्फल हुआ। कहीं से आशा या आश्वासन न मिला और न किसी प्रकार की यथेष्ट सहायता ही प्राप्त हुई। इधर काशी-विश्वविद्यालय के एम० ए० हिंदी क्लास के विद्यार्थियों की शांत किंतु दृढ़ पुकार बहुत दिनों तक उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखी जा सकती थी। अंत में मैंने गत सितंबर मास में सामग्री इकट्ठा करना आरंभ किया और मैं क्रमशः यह ग्रंथ लिखने तथा विद्यार्थियों को लिखे अंश पढ़ाने में लग गया। इस कार्य में अनेक बाधाएँ उपस्थित हुईं। स्वास्थ्य ने सबसे अधिक धोखा दिया। साथ ही विद्यार्थियों के अभाव की चिंता और उनके सम्मुख यथासमय उपयुक्त सामग्री उपस्थित करने में अपनी ढिलाई अथवा असमर्थता मुझे और भी व्यग्र करने लगी। दोनों ने मिलकर, जहाँ तक हो सका, बाधाएँ उपस्थित कीं और कम से कम इस पुस्तक के लिखने और प्रकाशित होने में तीन महीने का समय अधिक लगा दिया। इस अवस्था में भी पढ़ने और लिखने का काम करते रहने से आँखों ने भी असहयोग कर देने की सूचना उपस्थित कर दी और उनकी शक्ति क्षीण हो गई। परंतु फिर भी मेरे लिये यह कम आनंद और संतोष की बात नहीं है कि यह पुस्तक यथासमय लिखी गई और छप गई।<noinclude></noinclude> t4qa9uqyp2ot3dv1tzsv6vo898knybc