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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>ब्रह्मा २११
के योग्य बनाने की घोषणा की थी । तात्कालिक वर्मा-सरकार- कानून १९३५ के
अनुसार ब्रह्मा मे व्यवस्थापक- मण्डल बना दिया गया था, जिसकी सीनेट के
३६ सदस्यों में से आधो को ब्रिटिश गवर्नर नियुक्त करता था तथा शेष
प्रतिनिधि सभा द्वारा चुने जाते थे । प्रतिनिधि सभा मे १३२ सदस्य थे,
जिनका चुनाव होता था । शासन-प्रणाली भारतीय प्रान्तों के अनुकूल थी ।
ब्रह्मा का राष्ट्रीय नेता डा० वा मौ वहाँ का सर्वप्रथम प्रधान मन्त्री बना ।
ब्रह्मा-चीन-पथ बनाये जाने के संबंध मे मतभेद होजाने के कारण डा० मौ ने
त्याग पत्र दे दिया । वह कदाचित् जापानी प्रभाव मे था और नही चाहता था
कि यह सडक बने । उसका कहना था कि इस सड़क के जरिये ब्रह्मा मे चीनियो
के प्रवास का मार्ग खुल जायगा । १९४० मे उसे, वर्मा - रक्षा क़ानून के अनुसार,
एक साल क़ैद की सजा दी गई। बर्मा के गवर्नर ने घोषित किया कि वर्मा
को स्वराज्य देने के विषय पर लड़ाई के बाद बातचीत कीजायगी । ऊ सा
वर्मा का प्रधान मन्त्री बना । अक्टूबर ४१ मे वह, लढाई के उपरान्त ब्रह्मा
को तत्काल औपनिवेशिक पद दिये
जाने का वचन प्राप्त करने के लिये
लन्दन गया, किन्तु चर्चिल की सरकार
ने उसकी एक न सुनी । लन्दन से
लौटते समय ऊ सा को बीच मे ही
पकड़कर केंद्र वर लिया गया ।
शान रियासते ३४ हैं । इनके राजा,
ब्रिटिश अफसरों की सलाह से, अपना
शासन चलाते थे । जापानी आक्रमण
के समय कुछ वर्मा फ़ौज शत्रु से मिल
गई। वर्मा के पतन के बाद वर्मा-सरकार
भारत भागई और शिमला में उसके
दफ्तर कायम है । सम्मिलित
राष्ट्रों
( अमेरिका, ब्रिटेन और चीन ) ने
पिछले अगस्त ४२ से ब्रह्मा को वापस<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२१९
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|बाल्टिक राष्ट्र-समूह||३१३}}</noinclude>पूरे तीन साल लगे । २०० इंजीनियर तथा १,६०,००० मज़दूरों ने काम किया। इसके बनाने मे १ करोड ६० लाख डालर व्यय हुए ।
चीनी सरकार को सयुक्त-राष्ट्र अमरीका, भारत, ब्रह्मा तथा ब्रिटेन से मदद न मिले——इस विचार से जापान ने, फ्रान्स के पतन के वाद, हिन्द-चीन की सरकार से हेपहांंग्-हैनोई-कुमनिंग्-रेलवे मार्ग को बन्द करने के लिये आग्रह किया और विशी-सरकार ने, २० जून १६४० को, उसे बंद कर दिया । चीन के समुद्र-तट पर जापान को अधिकार होगया था। यह मार्ग फ्रान्स ने बन्द करा दिया। तब चीन के लिये ब्रह्मा-चीन-मार्ग ही रह गया था।
वार्डिया——लीबिया( अफ्रीका ) मे, जो इटली के अधीन था, एक बन्दरगाह । इसकी क़िलेबन्दी को अंग्रेजों ने तोड़ दिया और ७ जनवरी १६४१ को इस पर अपना अधिकार जमा लिया ।
वालफोर घोषणा———२ नवम्बर १६१७ को ब्रिटेन के तात्कालिक वैदेशिक मंत्री मि० जे० ए० बालफोर द्वारा, ब्रिटिश यहूदी संघ के अध्यक्ष, लार्ड राथ्सचाइल्ड, को लिखा गया पत्र, जिसमे मि० बालफोर ने लिखा——“ब्रिटिश सरकार यह चाहती है कि फिलस्तीन मे यहूदी जनता के लिये एक राष्ट्रीय उपनिवेश स्थापित किया जाय । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह भरसक प्रयत्न करेगी । यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि कोई ऐसा कार्य नहीं किया जायेगा जिससे फिलस्तीन-अधिवासी दूसरी जनता के नागरिक तथा धार्मिक अधिकारी में हस्तक्षेप हो अथवा दूसरे देशों में यहूदियो की जो स्थिति है, उस पर कोई असर पड़े । इसी पत्र के आधार पर यहूदी अपना आन्दोलन फिलस्तीन में कर रहे हैं ।
वाल्टिक राष्ट्र-समृह———लिथुआनिया, लैटविया एस्टोनिया और फिनलैण्ड बाल्टिक राष्ट्र कहलाते हैं । सन् १६१८ से पूर्व यह रूस के प्रान्त थे । तब से यह राज्य सोवियत रूस और पश्चिमी योरप के बीच स्वतन्त्र राष्ट्र बने रहे । स्वभावतः ही रूस इन देशों पर अपना पुनराधिकार प्राप्त करके बाल्टिक सागर पर अपना प्रभुत्व चाहता था । अक्टूबर १६३६ में रूस ने, इस युद्ध भे, अवसर से लाभ उठा लिया । दिसम्बर १६३६ में फिनलैंड पर उसने आक्रमण किया और मार्च १६४० में उसके बहुत से प्रदेशों पर अधिकार कर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२०
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|'''२१४'''||'''ब्राज़ील'''}}</noinclude>लिया । १६४० के जून-जुलाई में लिथुआनिया, एस्टोनिया और लैटविया में रूस ने पूर्ण अधिपत्य करके अपनी नौ-सेना के अड्डे बना लिये तथा किलेबन्दी क़ायम करदी । तीनों देशो मे सोवियत ( जनता की पचायती )-शासन-प्रणाली क़ायम करके रूसी पचायती राज में इनको मिला लिया। बाल्टिक राष्ट्रो मे रूस का प्रभुत्व है । जर्मन प्रभाव को रूस ने यहाँ से उखाड़ फेका, साथ ही यहाँ बसी हुई अल्पसंख्यक जर्मन जाति को जर्मनी भेज दिया।
ब्राजील-( ब्राजील का ) सयुक्त राज्य । दक्षिण अमरीका का सबसे बडा प्रजातत्र । क्षेत्रफल ३२,८५,००० वर्गमील, जनसख्या ४,५०,००,०००; राजधानी रियो द-जनीरो, राष्ट्रभाषा पुर्तगाली । सन् १८८६ से इस देश का विधान संयुक्त राज्य अमरीका जैसा रहा, किन्तु १६३० मे राष्ट्रपति बरगस ने सत्ता अपने हाथ में लेली और एक कानून बनाकर दो धारासभाएँ स्थापित करदी । १६३७ मे सैनिक-विद्रोह के बल पर बरगस यहाँ का अधिनायक बन गया । वह जर्मनी और इटली का मित्र था, किन्तु १६३८ में नात्सीवाद तथा फासिज्म के विरुद्ध होगया और देश के फासिस्त दल का दमन किया । अब ब्राजील संयुक्त-राज्य अमरीका का मित्र देश है ।
ब्राजील देश की गणना ससार के सबसे बडे धनी देशो मे है । किन्तु अपेक्षाकृत वह अविकसित है। वहाँ कहवा ( काफी ) सबसे अधिक मात्रा में पैदा होता है । इसकी अधिक पैदावार तथा सस्ते मूल्य के कारण कई बार यहाँ उथल-पुथल होचुकी है । क़हवा यहाँ की राजनीतिक समस्या बना हुआ है । साथ ही ब्राजीली सयुक्त-राज्य के अन्तर्गत बीस राज्यो की भी समस्या है । यह रियासते, केन्द्रीय सरकार के अधीन न रहकर, स्थानिक स्वायत्त के लिए, सदैव आन्दोलन करती रहती हैं। लाखो टन क़हवा प्रतिवर्ष इसलिए समुद्र
मे बहाकर नष्ट कर दिया जाता है - कि उसका मूल्य महँगा होजाय ।
[ब्राजील का मानचित्र]
* शैदिक मार्म *रभर अरू ।
क
।
मूर, स्था-
/
दक्षिणी प्रशान्तमहासा,
बोलीवया ।
|
म;
•
कलित
44 F<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२२
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|२१६||ब्रिटिश साम्राज्य}}</noinclude>है, और अब इनकी सख्या, युध्द की पूर्वकालीन सख्या से, बहुत अधिक है । १६४० के पतभ्कड मे सयुक्त-राष्ट्र अमरीका से ५० विब्बन्सक ब्रिटिश जल-सेना को मिले । युध्द से पूर्व नौ-सेना मे १,३३,००० सैनिक थे। इनके अतिरित्क ७०,००० सुरक्षित नौ-सैनिक थे । उपर्युक्त अंको मे आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैएड और कनाडा की युध्द-पूर्व संख्या भी शामिल है।
ब्रिटिश नौ-सेना ससार में सबसे शक्तिशाली थी । सयुक्त-राष्ट्र अमरीका का नम्बर प्रथम मान लिया गया है, किन्तु, वास्तव में, लड़ाई से पूर्व, वजन मे अमरीकी नौ-सेना के युध्द-पोत आदि कुछ कम थे । अब तो अमरीका मित्र राष्ट्रो के लिये बहुत बडी मात्रा मे युध्द-सामग्री तेजी से बना रहा है, जिनमे नौ सेना की सामग्री भी है । ब्रिटेन लन्दन नौ-सेना-सन्धि का एक सदस्य है ।
ब्रिटिश युनियन— सर ओसवाल्ड मोसले का फासिस्त आन्दोलन ।
ब्रिटिश साम्राज्य— ( ब्रिटिश ऐम्पायर, किन्तु 'ब्रिटिश कामनवैल्थ' जिसे अब अधिकतर कहा जाता है ) क्षेत्रफल १,३२,६०,००० वर्गमील अथवा समस्त भूमंडल का पॉचवॉ भाग । जन-संख्या ४८,७०,००,००० अर्थात् मानव-जाति का पचमाश । ब्रिटिश-साम्राज्य अथवा ब्रिटिश राष्ट्र-समूह (कामन-वैल्थ) मे, भूमंडल के विभिन्न भूमागो मे, निम्नलिखित देश हैं—
योरप— ग्रेटब्रिटेन और उत्तरी आयलैंएड, आयर, जिब्राल्टर, माल्टा ।
एशिया— अदन, पैरिम और बन्दरगाह, बाहरीन द्वीप-समूह, वोर्नियो ( जापान द्वारा, अप्रैल '४२ मे विजित ), ब्रुनी और सारावाक, ब्रम्हा (अप्रैल '४२ मे जापान द्वारा विजित,किन्तु जिसे वापस लेने के लिये, अगस्त '४२ से सयुक्त-राष्ट्र प्राणपन से चेष्टा कर रहे है), लड्का, साइप्रस, हाग्कांग ( जापान द्वारा विजित ), भारत, स्टेट्स सेट्लमेएट ( जापान के विश्वास-घात का शिकार ), मलय स्टेट्स ( सघशासित और असघ-शासित दोनो, सुदूरपूर्व के युध्द मे जापानी-साम्राज्य-लिप्सा के शिकार ), फिलस्तीन ।
अफ्रीका— केन्या उपनिवेश और बन्दरगाह, यूगाएडा, जॅजीवार ( पैम्बा के भाग सहित ); मारीशस, न्यासालैएड, सेन्ट हैलीना और असेन्शन; सेच— शुमालीलैएड; बसुतोलैएड,बेचुआनालैएड, दक्षिण रोडेशिया, उत्तरी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२४
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|२१८||ब्रिटिश साम्राज्य}}</noinclude>समानता-स्वाधीनता की मॉग पेश की । सन १६२६ मे साम्राज्य-परिषद् मे उपनिवेशो की व्याख्या निम्न प्रकार स्वीकार की गई :—
"उपनिवेश ब्रिटिश-साम्राज्य मे स्वाधीन राज्य हैं, जो पद में समान हैं और किसी प्रकार भी किसीके अधीन नही हैं; वे अपने बाह्य तथा आन्तरिक शासन-प्रबंध मे स्वतंत्र हैं तथा ब्रिटिश राजसत्ता के प्रति भक्ति के एक साधारण बन्धन मे बॅधे हुए हैं ।" उपनिवेश ब्रिटिश पार्लमेन्ट की सर्वोपरि महत्ता को खत्म करने की मॉग करते रहे । फलतः वैस्टमिन्स्टर विधान बना । सन् १६३१ की साम्राज्य-परिपद ने इस विधान को बनाया, जिसके अनुसार उपनिवेशो की पार्लमेन्टो को यह अधिकार मिल गया कि उन पर लागू होनेवाले ब्रिटिश पार्लमेन्ट के किसी भी कानून को वे रद या उसमे संशोधन कर सकती हैं । साथ ही बिना उपनिवेश की सहमति के वैस्टमिन्स्टर-पार्लमेन्ट द्वारा स्वीकृत किया गया कोई कानून उस पर लागू न होगा । उपनिवेशों पर लागू हो सकने की सम्भावना को दूर करने के लिये एतत्सम्बन्धी एक पुराना कानून भी हटा लिया गया । इस समय राजनीतिक दृष्टि से उपनिवेश स्वाधीन तथा प्रभू राज्य हैं । उनकी अपनी पार्लमेन्ट तथा सरकारे हैं । अलबत्ता ब्रिटेन का राजा, उपनिवेश के सम्बन्ध में, उसके मन्त्री की सलाह से काम करता है और उपनिवेश का भी राजा कहलाता है। प्रत्येक उपनिवेश को शान्ति तथा युद्ध के सम्बन्ध मे निर्णय करने का अधिकार है । इस समय समस्त उपनिवेशो ने ब्रिटेन के साथ जर्मनी के विरुध्द युद्ध-घोषणा कर दी है, केवल आयर तटस्थ है । प्रत्येक उपनिवेश मे, आयर को छोड़कर, राजा का एक प्रतिनिधि रहता है, जो गवर्नर-जनरल कहलाता है । उसके सुपुर्द कुछ शाही काम रहता है । प्रत्येक उपनिवेश की ओर से लन्दन मे एक हाई कमिश्नर रहता है और ब्रिटिश सरकार भी प्रत्येक उपनिवेश मे एक हाई कमिश्नर रखती है ।
ब्रिटिश मंत्री मंडल-मएडल का एक सदस्य उपनिवेशो का मंत्री भी होता है । समस्त साम्राज्य के प्रश्नो पर विचार करने के लिए एक साम्राज्य-परिषद भी है, जिसकी बैठक कभी-कभी होती है । सन १६०७ से इसमे भारत के प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं, यद्यपि ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे महान देश- उसके मुकुटमणि- भारत का, साम्राज्यान्तर्गत अभी कोई पद नही है ।<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२६८||ब्रिटिश साम्राज्य}}</noinclude>समानता-स्वाधीनता की माँग पेश की। सन १९२६ मे साम्राज्य-परिषद् में उपनिवेशों की व्याख्या निम्न प्रकार स्वीकार की गई :—
"उपनिवेश ब्रिटिश-साम्राज्य मे स्वाधीन राज्य हैं, जो पद में समान हैं और किसी प्रकार भी किसीके अधीन नही हैं; वे अपने बाह्य तथा आन्तरिक शासन-प्रबंध मे स्वतंत्र हैं तथा ब्रिटिश राजसत्ता के प्रति भक्ति के एक साधारण बन्धन में बँधे हुए हैं।" उपनिवेश ब्रिटिश पार्लमेन्ट की सर्वोपरि महत्ता को खत्म करने की माँग करते रहे। फलतः वैस्टमिन्स्टर विधान बना। सन् १९३१ की साम्राज्य-परिषद् ने इस विधान को बनाया, जिसके अनुसार उपनिवेशों की पार्लमेन्टों को यह अधिकार मिल गया कि उन पर लागू होनेवाले ब्रिटिश पार्लमेन्ट के किसी भी कानून को वे रद्द या उसमे संशोधन कर सकती हैं। साथ ही बिना उपनिवेश की सहमति के वैस्टमिन्स्टर-पार्लमेन्ट द्वारा स्वीकृत किया गया कोई कानून उस पर लागू न होगा। उपनिवेशों पर लागू हो सकने की सम्भावना को दूर करने के लिये एतत्सम्बन्धी एक पुराना कानून भी हटा लिया गया। इस समय राजनीतिक दृष्टि से उपनिवेश स्वाधीन तथा प्रभू राज्य हैं। उनकी अपनी पार्लमेन्ट तथा सरकारे हैं। अलबत्ता ब्रिटेन का राजा, उपनिवेश के सम्बन्ध में, उसके मन्त्री की सलाह से काम करता है और उपनिवेश का भी राजा कहलाता है। प्रत्येक उपनिवेश को शान्ति तथा युद्ध के सम्बन्ध मे निर्णय करने का अधिकार है। इस समय समस्त उपनिवेशों ने ब्रिटेन के साथ जर्मनी के विरुद्ध युद्ध-घोषणा कर दी है, केवल आयर तटस्थ है। प्रत्येक उपनिवेश मे, आयर को छोड़कर, राजा का एक प्रतिनिधि रहता है, जो गवर्नर-जनरल कहलाता है। उसके सुपुर्द कुछ शाही काम रहता है। प्रत्येक उपनिवेश की ओर से लन्दन मे एक हाई कमिश्नर रहता है और ब्रिटिश सरकार भी प्रत्येक उपनिवेश मे एक हाई कमिश्नर रखती है।
ब्रिटिश मंत्री मंडल-मएडल का एक सदस्य उपनिवेशों का मंत्री भी होता है। समस्त साम्राज्य के प्रश्नों पर विचार करने के लिए एक साम्राज्य-परिषद् भी है, जिसकी बैठक कभी-कभी होती है। सन १९०७ से इसमें भारत के प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं, यद्यपि ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे महान देश उसके मुकुटमणि—भारत का, साम्राज्यान्तर्गत अभी कोई पद नही है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२६
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अजीत कुमार तिवारी
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/* शोधित नहीं */ बिना ठीक से शोधित किए पन्ने की स्थिति न बदलें.
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|२२०||ब्रिटिश-सेना}}</noinclude>
ब्रिटिश-सेना—वर्तमान महायुद्ध आरंभ होने से पूर्व ब्रिटिश-सेना के तीन अंग थेः—
( १ ) स्थायी सेना—इसमे सैनिक सात वर्ष के लिये भर्ती किये जाते हैं, किन्तु आगामी ५ वर्ष तक, रक्षित सैन्य की मॉति , आवश्यकता पड़ने पर, इसके सैनिकों को बुलाया जा सकता है । इसमें १,६४,००० सैनिक रहते थे । जिनमे ५७,००० सैनिक भारत में थे और इनका व्यय भारत-सरकार को देना पड़ता था ।
( २ ) देश-रक्षिणी सेना—यह नागरिको की सेना है। इसमें चार वषों तक शिक्षण की व्यवस्था है । इस सेना के सैनिकों के व्यावसायिक अथवा नागरिक धन्धो मे कोई बाधा नहीं पड़ती थी, सायकाल की कवायद में केवल सप्ताह में एक बार अथवा सालाना शिविर में शामिल होना पड़ता था । अप्रैल १६३६ मे यह सेना दूनी कर दी गई और इसकी सख्या ४,४०,००० होगई । इस सेना में एक स्त्री-सेना की शाखा भी हैं, जो असैनिक सहायक कार्य करती हैं।
( ३ ) अनिवार्य नागरिक सेना । २६ मई १९३९ के मिलिटरी ट्रेनिग् ऐक्ट (सैनिक-शिक्षण कानून) के अनुसार प्रत्येक २० वर्ष के या इससे अधिक आयु के स्वस्थ पुरुष को इसमे ६ महीने के लिये भर्ती होना अनिवार्य हैं ।
युद्ध आरम्भ होजाने पर यह समस्त सेनाएँ मिलाकर एक कर दी गई । १८ से ४१ वर्ष के लोगों को सेना में भर्ती होना अनिवार्य कर दिया गया । १६४१ के पतझड़ तक २० और ३६ वर्ष के बीच की आयु वाले लगभग ६० लाख आदमी इसमे भरती हुए और २० लाख सशस्त्र सैनिक तैयार होगये । १६४१ के दिसम्बर मे अनिवार्य भरती की उम्र पुरुषों के लिये ५० और स्त्रियो के लिये ३० वर्ष कर दीगई । जून १६४० मे नागरिक स्वयसेवको का मुल्की गारद जर्मन छतरी-सैनिको से लड़ने के लिये बना। इसके सदस्य अपना कारबार करते हुए फालतू समय में सैनिक कार्य करते हैं। आवश्यकता के अवसर पर पूरे समय के लिये बुला लिये जाते हैं। इनकी सेवाओं को अनिवार्य भी बनाया जा सकता है । इन सेनाओं के अतिरिक्त समुद्र पार की भारतीय तथा अनेक उपनिवेशो की सेनाएँ अलग हैं ।<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२२०||ब्रिटिश-सेना}}</noinclude>
ब्रिटिश-सेना—वर्तमान महायुद्ध आरंभ होने से पूर्व ब्रिटिश-सेना के तीन अंग थेः—
'''(१) स्थायी सेना'''—इसमें सैनिक सात वर्ष के लिये भर्ती किये जाते हैं, किन्तु आगामी ५ वर्ष तक, रक्षित सैन्य की भाँति, आवश्यकता पड़ने पर, इसके सैनिकों को बुलाया जा सकता है। इसमें १,६४,००० सैनिक रहते थे। जिनमें ५७,००० सैनिक भारत में थे और इनका व्यय भारत-सरकार को देना पड़ता था।
'''(२) देश-रक्षिणी सेना'''—यह नागरिकों की सेना है। इसमें चार वषों तक शिक्षण की व्यवस्था है। इस सेना के सैनिकों के व्यावसायिक अथवा नागरिके धन्धों में कोई बाधा नहीं पड़ती थी, सायकाल की कवायद में केवल सप्ताह में एक बार अथवा सालाना शिविर में शामिल होना पड़ता था। अप्रैल १९३६ मे यह सेना दूनी कर दी गई और इसकी सख्या ४,४०,००० होगई। इस सेना में एक स्त्री-सेना की शाखा भी हैं, जो असैनिक सहायक कार्य करती हैं।
'''(३) अनिवार्य नागरिक सेना।''' २६ मई १९३९ के मिलिटरी ट्रेनिग् ऐक्ट (सैनिक-शिक्षण कानून) के अनुसार प्रत्येक २० वर्ष के या इससे अधिक आयु के स्वस्थ पुरुष को इसमे ६ महीने के लिये भर्ती होना अनिवार्य हैं।
युद्ध आरम्भ होजाने पर यह समस्त सेनाएँ मिलाकर एक कर दी गई। १८ से ४१ वर्ष के लोगों को सेना में भर्ती होना अनिवार्य कर दिया गया। १९४१ के पतझड़ तक २० और ३६ वर्ष के बीच की आयु वाले लगभग ६० लाख आदमी इसमे भरती हुए और २० लाख सशस्त्र सैनिक तैयार होगये। १९४१ के दिसम्बर मे अनिवार्य भरती की उम्र पुरुषों के लिये ५० और स्त्रियों के लिये ३० वर्ष कर दीगई। जून १९४० मे नागरिक स्वयसेवको का मुल्की गारद जर्मन छतरी-सैनिकों से लड़ने के लिये बना। इसके सदस्य अपना कारबार करते हुए फालतू समय में सैनिक कार्य करते हैं। आवश्यकता के अवसर पर पूरे समय के लिये बुला लिये जाते हैं। इनकी सेवाओं को अनिवार्य भी बनाया जा सकता है। इन सेनाओं के अतिरिक्त समुद्र पार की भारतीय तथा अनेक उपनिवेशों की सेनाएँ अलग हैं।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२६४
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>२१८ मंचूको
की और प्रजातंत्र की स्थापना। तब से बाहरी मंगोलिया, एक प्रकार से, सोवियत रूस के आश्रित है। चीन बराबर इसका दावा करता है। सन् १९२४ की रूस-चीन-सन्धि में नाममात्र को इसे मान भी लिया गया है। बाहरी मंगोलिया की सोवियत रूस के साथ सन्धि है और मंचूको से इस देश पर किये गये जापानी-हमलों का इन दोनो देशो ने मुक़ाबला किया है। यहाँ एक छोटी पर आधुनिक ढंग की सेना है। शासन-प्रणाली सोवियत ढ़ाँचे की है। बड़ी 'हुरलदान' यानी मंगोलिया की रूसी ढंग की कांग्रेस छोटी 'हुरलदान' या कार्य-कारिणी समिति का चुनाव करती है, और यह समिति सरकार को चुनती है। मंगोलियन चीनियो से विभिन्न है और तुर्की से मिलती-जुलती भाषा बोलते हैं। साइबेरिया की सीमा पर स्थित होने के कारण यह देश, रूस के लिये, विशेष सामरिक महत्व का है। आबादी अधिकांश खानाबदोश और पशु-पालन पर जीवित रहने वाली है, इसलिये समाजवादी-कार्यक्रम का प्रश्न ही नहीं उठता।
मंचूको--चीन का पूर्वकालिक मंचूरिया प्रान्त; क्षेत्र ४,६०,००० वर्ग०; जनसंख्या ३,००,००,०००। जापान का सन् १९०५ से ही इस प्रान्त पर दौंत था, जबकि, पीकिन-सन्धि के अनुसार, उसे वहाँ विशेषाधिकार मिल चुके थे। १९१५ ई० मे हुई सन्धि के अनुसार जापान को विशेष रिआयती अधिकार मंचूको में और मिले। इस प्रदेश पर रूस भी अपना प्रभुत्व जमाना चाहता<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२६५
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>मज़दूर दल
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था। उसने इस प्रान्त में पूर्वी-चीनी-रेलवे बनाई थी जो व्लादीवोस्तक तक जाती है। १८ सितम्बर १९३१ को, क़ब्ज़ा करने के लिये, जापान ने अपनी सेनाएँ मंचूरिया में भेजदीं। चीनी लडे, किन्तु हार गये। १८ फरवरी १९३२ को चीनी सेनाएँ इस प्रान्त से निकाल दीगईं। मंचूरिया तथा जेहोल प्रान्तो को मिलाकर 'मंचूको' नाम से स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। मंचू-वंश का अन्तिम चीन सम्राट, पू यी, जो १९११ में, बाल्यावस्था में ही, राज-सिहासन से उतार दिया गया था, तथा जापान में जिसका पालन-पोषण हुआ था, मंचूको का राष्ट्रपति बना दिया गया। १ मार्च १९३४ को, कांग् तेह नाम रखकर, उसने सम्राट पद धारण किया। यह राज्य नाम मात्र के स्वतंत्र है। इस पर जापान का पूर्ण नियंत्रण है। जापानी सेना रहती है और हर सरकारी सीगे में जापानी सलाहकार तैनात हैं। देश की कृषि और खनिज उद्योगो को जापानी बढ़ा रहे हैं। अनेक जापानी धन्धे वहाँ क़ायम होगये है। किन्तु प्रवासी जापानियो को वहाँ का जलवायु अनुकूल नहीं है। रूस ने चीनी रेलवे लाइन, मार्च १९३५ में, १ करोड़ पौड मे जापान को बेचदी। मंचूको-सरकार को न तो चीन ने स्वीकार किया है और न जर्मनी, इटली, स्पेन तथा त्रिगुट के हिमायती छोटे देशो के सिवा अन्य देशो ने। सोवियत रूस, अप्रैल १९४१ में जापान के साथ की हुई निरपेक्षता-सन्धि के आधार पर, मंचूको की अखण्डता को स्वीकार कर चुका है। दिसम्बर १९४१ मे मंचूको, बरतानिया और अमरीका के विरुद्ध जापान के साथ युद्ध में शामिल होचुका है।
मज़दूर दल--बरतानवी 'समाजवादी' दल; द्वितीय साम्यवादी अन्त-<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>२६० मज़दूर दल
राष्ट्रीय-सघ का सदस्य। सन् १९३५ के पार्लमेन्ट के चुनाव में कुल २,२०,००,००० मतो मे से ८३,२५,००० प्राप्त किये तथा ६१५ कामन्स सभा के सदस्यों मे से १५४ सदस्य चुने गये। इस दल मे मज़दूर-संघों (ट्रेड यूनियनो), समाजवादी तथा सहकारी सघों और स्थानिक राजनीतिक संस्थाओं का प्रतिनिधित्व है। कार्य-कारिणी में मज़दूर-संघों के सदस्यों का बहुमत है। इस दल का कार्य-क्रम फेवियन, नरम (माडरेट), विकासवादी तथा प्रजातत्रात्मक है। इसका उद्देश्य है उद्योग-धन्धों और यातायात का राष्ट्रीयकरण, सुगठित अर्थ-व्यवस्था और सर्वहितकारी आधार पर वर्ग-भेद का उन्मूलन। इन उद्देश्यों की सिद्धि का आधार क्रान्ति नहीं बल्कि क्रमिक विकास, सामाजिक कानून और राष्ट्र के आर्थिक-जीवन पर राज्य का धीरे-धीरे नियंत्रण माना गया है। यह मार्क्सवाद तथा क्रान्ति से बहुत दूर है। यह दल ब्रिटिश-राष्ट्रसमूह (साम्राज्य) को बरक़रार रखने का समर्थक है, परन्तु भारत को स्वराज दिये जाने तथा अन्य देशो को, जिन पर बरतानिया का आधिपत्य है, क्रमिक स्वराज्य दिये जाने के पक्ष मे है। इसके "तात्कालिक" कार्य-क्रम मे यह कार्य शामिल है : राजस्व, भूमि, यातायात, कोयला, बिजली पर राष्ट्रीय नियंत्रण, आयात-व्यापार पर नियंत्रण, कम घंटों के सप्ताह, मकानों की व्यवस्था, सामाजिक कानूनों का निर्माण तथा बेकारों की सहायता। दल ने उग्र शान्तिवाद और युद्ध-विरोधी अपने पहले उद्देश्यों को, नात्सी खतरे की आशंका से, बहुत पहले ही, छोड़ दिया है और वह बरतानिया की वैदेशिक-नीति में नात्सी-विरोध को सबल बनाने का प्रचार भी पहले से ही कर रहा है। मज़दूर-सरकार दो बार ब्रिटेन में शासन कर चुकी है : सन् १९२४ में और १९२९-३१ में। किन्तु दोनो बार, अल्पमत में रहने के कारण, राष्ट्रीयकरण के अपने उद्देश्य के लिये वह कुछ न कर सकी। दल के तात्कालिक नेता, भूत जेम्स रैमज़े मैकडोनाल्ड, दोनो बार प्रधान-मन्त्री बने। शासन-सत्ता में बने रहने से उन्हे मोह होगया। १९३१ की नेशनल गवर्नमेंट में, जो वस्तुतः दकियानूसियों की सरकार थी, उन्होने बने रहना ही तय किया--और प्रधान-मन्त्री की हैसियत से। इस पर दल ने उन्हें निकाल दिया। तब उन्होने छोटा-सा राष्ट्रीय मज़दूर दल कायम किया। सन् १९३१ से मज़दूर दल के सदस्य सरकार में पद-ग्रहण के विरोधी<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>मालवीय
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हैं; यहाँ तक कि वर्तमान युद्ध आरम्भ होजाने पर चेम्बरलेन की सरकार मे शामिल होने से भी उन्होने इनकार कर दिया, अगरचे युद्ध-प्रयत्नो में सरकार से पूर्ण सहयोग करते रहे। चेम्बरलेन की सरकार के हटने के बाद, जून १९४० मे, जब चर्चिल की सर्व-दल-सरकार बनी, तब युद्ध-मन्त्रिमण्डल के ६ स्थानो मे से दो मज़दूर-दली सदस्यो (एटली और ग्रीनवुड) को मिले तथा दल के कई सदस्य मन्त्री बनाये गये। दल के प्रमुख नेता मेजर सी० आर० एटली (लार्ड प्रिवी सील) हैं; दल के नेता हैं आर्थर ग्रीनवुड (मिनिस्टर); दल के उप नेता हरबर्ट मारीसन (स्वदेश मन्त्री), ह्यू डाल्टन (सामरिक मितव्ययिता-मन्त्री), लार्ड स्नैल, लार्ड पैसफ़ील्ड, पी० नाइल-बेकर, ऐलिन विल्किन्सन, जे० एस० मिडिलूटन, सर वाल्टर सिट्राइन (मज़दूर-संघ के प्रधान मन्त्री), जे० आर० क्लाइन्स, अरनैस्ट बीविन (मिनिस्टर मज़दूर विभाग)।
मत्सुओका--१९४० तक जापान का वैदेशिक मन्त्री, जिसकी आकाक्षा और प्रयत्न से ही जापान और जर्मनी, इटली का गठजोड़ा हुआ। मत्सुओका अत्यन्त महत्वाकाक्षी है और वह जापान का हिटलर बनने की फ़िराक़ में रहा है। यद्यपि इस समय वह जापान का वैदेशिक मन्त्री नही है, किन्तु जापान आज उसीकी योजना को कार्यान्वित कर रहा है। एम० मत्सुओका, अपने बचपन मे ही, अमरीका चला गया था। वही के एक विश्वविद्यालय मे उसने शिक्षा पाई, अंग्रेज़ी का वह विद्वान् है।
मालवीय, महामना पंडित मदनमोहन--देश के अवसर-प्राप्त राष्ट्रीय नेता। जन्म २५ दिसम्बर १८६१ ई०। म्योर सेंट्रल कालिज, प्रयाग, मे शिक्षा प्राप्त की। सन् १८८४ से १८८७ तक गवर्नमेण्ट हाई स्कूल मे अध्यापक रहे। कालाकॉकऱ के हिन्दी दैनिक 'हिन्दुस्तान' तथा प्रयाग के साप्ताहिक 'इंडियन ओपिनियन' का संपादन किया। सन् १८९१ मे क़ानून की परीक्षा पास की। सन् १९०२-१२ तक संयुक्त-प्रदेश की प्रान्तीय धारासभा के सदस्य रहे। कांग्रेस की दूसरी बैठक से ही आप उसमे सम्मिलित रहे। सन् १९०९ और १९१८ मे उसके अध्यक्ष हुए। सन् १९३२-१९३३ मे भी वे इस महान पद पर चुने गये, किन्तु अधिवेशन से पहले ही गिरफ़्तार कर लिये गये। १९१०-१६ तक इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल (अब केन्द्रीय असे-<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>२६२
मालवीय
म्बली ) के सदस्य रहे। सन् १९१९ में रौलट मसविदे के विरोध में त्याग-पत्र दे दिया। सन् १९१६-१८ तक भारतीय औद्योगिक कमीशन के सदस्य रहे। इसमें आपने, मत-विरोध के कारण, अलग अपनी रिपोर्ट लिखी। सन् १९१६ मे काशी हिन्दू विश्व-विद्यालय की स्थापना की और प्रारम्भ से ही वह उसके वाइस-चांसलर रहे। सन् १९२२-२३ मे हिन्दू महासभा के प्रधान चुने गये। सन् १९२४ से केन्द्रिय व्यवस्थापक सभा के सदस्य और वहाँ विरोधी दल के नेता रहे। तटकर (टैरिफ)-बिल के विरोध में त्याग-पत्र दे दिया। सन् १९३२ के सितम्बर मे, जब महात्मा गांधी ने यरवदा-जेल मे अछूत कहे जाने वाले वर्ग को उसके विशाल वर्ग से काटनेवाली योजना के सम्बन्ध मे, साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध, आमरण व्रत रखा तब तुरन्त ही मालवीयजी बम्बई गये और वहाँ हिन्दू नेताओं का सम्मेलन किया, जिसके अध्यक्ष मालवीयजी ही थे। फलतः समझौता होगया। आप कांग्रेस को मा के समान आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखते रहे हैं। किन्तु अपने विचारो के प्रकट करने मे वे कभी नही चूके। पूर्वकाल मे जब कांग्रेस नरमदलवालों की संस्था थी, उस समय, पूर्णरूप से नरमदल से अलग न रह सके। गांधीजी के उदय के समय भी आपका कांग्रेस से मतभेद हुआ, जिसके कारण आप असहयोग-आन्दोलन से अलग ही नही रहे बल्कि उसका विरोध किया। किन्तु सन् '३०-३३ मे पूर्ण रूप से देश का नेतृत्व किया और जेल-यात्रा की। तदुपरान्त भी ऐसे अवसर आते रहे जब आप कांग्रेस की, विशेषकर उसकी मुसलमानो के प्रति, नीति से असहमत रहे। आपका हिन्दू-भाव सदैव ही जाग्रत रहा है। आपके जीवन का शिक्षा-प्रसार-सम्बन्धी रचनात्मक कार्य, हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप मे, चिरस्थायी है। यह संस्था महान् है, और भविष्य मे भी उससे अनेक आशाएँ हैं, किन्तु मालवीयजी के लिये वह जिस प्रकार गले का हार बनी, उससे उनका कार्य क्षेत्र समस्त देश के सुविशाल क्षेत्र से सिमट कर बहुत कुछ काशी विश्वविद्यालय तक सीमित हुआ। सम्भवतः इसीलिये यह कभी-कभी सुनाई पडता है कि यदि उन्होने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना न की होती तो आज, शरीर से जीर्ण होते हुए भी, न केवल मालवीयजी बल्कि उनके कारण भारतीय राष्ट्र भी अधिक महान् होता। महामना मे वह प्रेरक शक्ति है।<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>मनरो - सिद्धान्त
फिर भी मालवीयजी महान् हैं, देश के लिये उनकी अर्द्धशताब्दी से अधिक काल तक निरन्तर की हुई सेवाएँ महान् हैं। उनका तपोमय जीवन महान् है। देश के प्रारम्भिक राजनीतिक-विकास के युग मे मालवीयजी एक प्रेरणा रहे हैं। उनकी जिह्वा पर सरस्वती विराजती है, और उनके भाषण मे सरस रसधारा प्रवाहित हो उठती है। हज़ारों उनसे प्रभावित और पुनीत हुए है। देश के जीवित नेताओं में मालवीयजी ही इस समय सबसे पुरातन है।
मध्य युग--योरोप के इतिहास मे, आठवीं शताब्दी के बाद से १४वीं शताब्दी तक का समय, मध्ययुग कहलाता है।
मध्य योरोप--मध्य योरोप में पोलैंड, चैकोस्लोवाकिया, आस्ट्रिया-हंगरी तथा बलगारिया आदि देश शामिल हैं।
मनरो-सिद्धान्त--संयुक्त-राज्य अमरीका का एक राजनीतिक सिद्धान्त है, जिसके अनुसार वह अमरीकी महाद्वीप के किसी भी मामले मे योरोप के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करता। इस सिद्धान्त के जन्मदाता संयुक्त-राज्य अमरीका के राष्ट्रपति मनरो हैं, जिन्होंने, २ दिसम्बर १८२३ को, अपने एक भाषण मे कहा-- "अमरीका के महाद्वीपो मे, जिन्होंने अब स्वाधीन तथा स्वतंत्र स्थिति प्राप्त कर ली है, भविष्य मे किसी भी योरोपीय राष्ट्र को अपने उपनिवेश बनाने का अधिकार न होगा। × × × इन महाद्वीपो मे जो आन्दोलन चल रहे हैं उनसे हमारा घनिष्ठ संबंध है। उन (योरोपीय) राष्ट्रों की शासन-पद्धति अमरीका की शासन-प्रणाली से भिन्न है। × × × उनके द्वारा अमरीका मे अपनी प्रणाली के स्थापित करने के प्रयत्न को हमे अमरीका की शान्ति तथा सुरक्षा के लिये खतरा समझना चाहिये।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७०
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>दक्षिण-(लातीनी) अमरीका के राज्यों में यह सिद्धान्त लोकप्रिय नहीं है। वे इसे संयुक्त-राज्य अमरीका का प्राधान्य स्थापित करने का एक साधन समझते हैं। वास्तव में मनरो सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय विधान नहीं है, प्रत्युत संयुक्त-राज्य अमरीका की राष्ट्रीय-नीति का अंश है।
मनोवैज्ञानिक युद्ध-प्रणाली--इस प्रणाली में ईस्पात के बने शस्त्रास्त्रों से नहीं लड़ना पड़ता। यह युद्ध-प्रणाली कूटनीतिपूर्ण मनोवैज्ञानिक साधनों के प्रयोग पर निर्भर करती है। जो देश इस प्रणाली का आश्रय लेता है, वह संसार में, विशेषकर अपने अधीन देशों और अपने मित्रराष्ट्रों में, अपने पक्ष में तथा शत्रु के विरुद्ध, लोकमत बनाने का प्रचण्ड प्रयत्न करता है। इस प्रणाली का मुख्य कार्य संसार के लोकमत के सामने शत्रु को हेय सिद्ध करना तथा संसार को यह विश्वास करा देना है कि अपनी रक्षा के लिये वह राष्ट्र जो उद्योग कर रहा है वह एकदम पवित्र और मानव-हितकामना से प्रेरित है। वह शत्रुदेश की प्रजा को भी, उसकी सरकार के विरुद्ध, उत्तेजित करता है, और वह उसको यह बतलाता है कि संसार में शान्ति और व्यवस्था स्थापित होनी चाहिये और हमारा पक्ष सर्वथा अनुमोदनीय है। यह युद्ध-प्रणाली तटस्थ राष्ट्रों के सामने भी यही बात प्रस्तुत करती है कि शत्रु-राष्ट्र अन्याय कर रहे हैं और हमारा देश न्याय के पक्ष में है। इस प्रणाली की सफलता के लिये विज्ञापन, समाचार-पत्र, रेडियो तथा गुप्तचर दल का खूब प्रयोग किया जाता है। मनोवैज्ञानिक युद्ध-प्रणाली का आश्रय लेनेवाला देश, अपने प्रचार के समय, शेष संसार को बिल्कुल मूर्ख समझ बैठता है।
मरक्को--(की) सल्तनत, क्षेत्र० लगभग २,१३,००० वर्ग०, जन० ७२,००,००० है, अफ्रीका के उत्तर-पश्चिमी कोण में स्थित। योरोप के अनेक साम्राज्यवादी देशों में, इस प्रदेश के लिये, बहुत दिनों तक, बड़ी प्रतिस्पर्धा रही। सन् १९०४ में ब्रिटेन ने मरक्को को फ्रांस का प्रभाव-क्षेत्र स्वीकार कर लिया और बदले में फ्रांस ने मिस्र को बरतानिया का प्रभाव-क्षेत्र मान लिया। जर्मनी में इससे रोष फैला और १९०५ में कैसर मरक्को के टेंजियर बन्दरगाह की दिखावटी सैर करने, किन्तु वास्तव में मरक्को पर जर्मन-दावे की पुष्टि के लिये,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७१
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{Rh|'''मरको'''||''' २६५'''}}
गया। इस देश में पाया जानेवाला कई प्रकार का कच्चा लोहा जर्मनी के लोहे के कारखानो के लिये दरकार था। साम्राज्यवादियो द्वारा मरक्को की तकाबोटी किये जाने का यह पहला अवसर था। ७ अप्रैल १९०६ को, मरक्को की बॉट-चोट के लिये, "मुक्त द्वार" नीति साम्राज्यवादियो ने तय की और १९११ मे फ्रांस ने मरक्को के फैज़ प्रान्त मे क़ब्ज़ा करने के लिये सेना भेज दी। जर्मनी क्यो पीछे रहता, उसने भी अगादिर बन्दर पर एक हथियारबन्द जहाज़ रवाना कर दिया। मरक्को की नोच-खसोट का दूसरा युग आरम्भ हुआ। तत्कालीन बरतानवी वज़ीरे-आज़म लायड जार्ज ने कहा कि बरतानिया जर्मनी की इस हरकत को बरदाश्त नही कर सकता। लडाई होते-होते बची। फ्रांस-जर्मनी मे समझौता होगया। मरक्को पर फ्रांस का अधिकार क़बूल कर लिया गया, बदले मे जर्मनी को फ्रान्सीसी कांगो मे रिआयते मिल गई।
सन् १९१२ से मरक्को तीन भागो में बँटा हुआ है, एक स्पेनी-क्षेत्र तथा दूसरा फ्रान्सीसी-क्षेत्र। टेंजियर का तीसरा तटस्थ क्षेत्र १९२३ मे बना है और अन्तर्राष्ट्रीय-व्यवस्था के अधीन है। यह तीनो क्षेत्र, नाममात्र को, सुल्तान के प्रभुत्व मे हैं। वर्त्तमान सुल्तान, शरीफी राज-वंश का, सिद्दीक़ मुहम्मद, है। परन्तु फ्रान्सीसी-क्षेत्र मे फ्रान्सीसी रेज़ीडेंट-जनरल ही वास्तविक शासक है। समस्त सरकारी आदेश उसीके द्वारा जारी किये जाते हैं। सारे देश मे फ्रान्सीसी सेनाएँ हैं। रेज़ीडेंट फ्रांस के वैदेशिक मंत्री के प्रति उत्तरदायी है। स्पेनी-क्षेत्र का शासन सुल्तान द्वारा नियुक्त ख़लीफ़ा के हाथ मे है, परन्तु इसकी नामज़दगी स्पेनी सरकार करती है। इस क्षेत्र का असली शासक स्पेन का रेज़ीडेंट है। फ्रान्सीसी-मरक्को का क्षेत्र० २ लाख वर्ग० और स्पेनी-मरक्को का १३ हज़ार वर्गमील है। स्पेनी-क्षेत्र मे भी लडाकू रीफ क़बीले की कुछ आबादी है। रीफ १९२४ से '२७ तक, अपने देश की आज़ादी के लिये, अब्दुलकरीम के नेतृत्व में, फ्रान्सीसी और हस्पानियो (स्पेनियो) से लड़ चुके हैं। फ्रान्सीसी संगीनो और गोलियो के बल पर वह क्रान्ति दबा दी गई थी और रीफ़ों का नेता, अब्दुलकरीम, अबतक एक फ्रान्सीसी टापू मे क़ैद है। सन् १९३६ मे जनरल फ्रान्को ने स्पेन के गृह-युद्ध की तैयारी इसी क्षेत्र मे की थी। मरक्को की सेना ने उसके साथ भाग लिया। सामरिक दृष्टि से यह वडा महत्व-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७२
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>पूर्ण प्रदेश है। यह भूमध्य-सागरके तट पर है। जिब्रालटरके ठीक सामने मरक्को का क़िले-बन्द क्यूटा बन्दरगाह है। 'मराकेश' मरक्को का असली नाम है।
टेंजियर क्षेत्र केवल २२५ वर्गमील लम्बा-चौड़ा है और आबादी ६०,०००। इस क्षेत्र का प्रबन्ध १८ दिसम्बर १९२३ के बरतानिया, फ्रांस और स्पेन के एक समझौते के अनुसार होता था। १९२८ में इटली भी इस समझौते में आ मिला। एक अन्तर्राष्ट्रीय कमिटी के हाथ में इसका प्रबन्ध था। यहाँ से सेनायें हटायी गई थीं तथा इसे तटस्थ देश क़रार दे दिया गया था। १९४० के जून में स्पेन ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया। बरतानिया और स्पेन में समझौता होगया कि वह इस पर क़िलेबन्दी नही करेंगे। मरक्को का अधिकांश भाग मरुस्थल है, किन्तु यहाँ कई प्रकार का कच्चा लोहा पाया जाता है। फ्रांस के पतन के बाद से अफ्रीका में नात्सियों और फासिस्तों ने लड़ाई छेड़ रखी है और मरक्को का भाग्य अभी अनिश्चित है। मरक्को-वासी 'बर्बर' जाति के हैं और अरबी की भाँति की भाषा बोलते हैं। अखिल-अरब-वाद और अखिल-इस्लामवाद का प्रभाव भी उन पर है।
मलान, डाक्टर डी० एफ०, एम० ए०, डी० डी०--दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रीय-दल का नेता। १८७४ में पैदा हुआ। १९२४ से '३३ तक यूनियन-सरकार में स्वराष्ट्र, स्वास्थ्य और शिक्षा-मन्त्री रहा। इसका राष्ट्रीय दल दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटेन से असम्बन्धित स्वतंत्र राज चाहता है। पार्लमेन्ट में<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>प्रथम राष्ट्रपति बनकर वह स्वदेश लौटा। सन् १९२०, '२८ तथा '३४ मे, क्रमश: तीन बार, वह राष्ट्रपति चुना गया। १४ दिसम्बर १९३५ को, स्वास्थ्य ख़राब होजाने के कारण राष्ट्रपति के पद से त्यागपत्र देदिया। १४ सितम्बर १९३७ को ८७ वर्ष की आयु मे उसका देहान्त होगया। चैकोस्लोवाकी अब तक, दन्तकाथाओ के रूप मे, उसके गुण गाते हैं। उसका पुत्र, इब्रान मसारिक, आजकल लन्दन-प्रवासी चैकोस्लोवाक-सरकार मे परराष्ट्र-मन्त्री है।
दार्शनिक के रूप मे टामस मसारिक बुद्धिवादी और मानवतावादी था। वह व्यावहारिक आचार का समर्थक था, किन्तु जर्मन आदर्शवादी दर्शन तथा मार्क्सवाद का आलोचक था। वह प्रजातत्र का पोषक और अपने देश का, पाश्चात्य देशों के आधार पर, पुनर्जागरण चाहता था।
मसारिक के यह वाक्य कैसे मार्के के हैं:--"प्रजातन्त्र आधारित है वाद-विवाद पर। राष्ट्र केवल उन आदर्शों के आश्रय पर जीवित रहते हैं, जिनके द्वारा उनके अस्तित्व का विकास हुआ--वह आदर्श ईसा के (प्रेममूलक) आदर्श है, (अत्याचारी) सीजर के नही। वितण्डावाद वस्तुतः कोई योजना नही है। इतिहास हमे सिखाता है कि सभी राष्ट्र अपनी हठधर्मी के कारण नष्ट हुए--फिर वह हठधर्मी जातिगत हो, राजनीतिक हो, धार्मिक हो अथवा वर्गगत। राष्ट्र की (आत्म) रक्षा के लिए क्रान्ति बिलकुल वैध साधन है। किन्तु अन्य सब साधनो के समाप्त होजाने पर ही क्रान्ति की आवश्यकता उत्पन्न होती है। मानवता अपने प्रत्येक रूप मे शान्तिवाद नही है।"
महादेव हरिभाई देसाई--लगभग ५१ वर्ष पूर्व सूरत जिले के एक गाँव मे जन्म हुआ। बम्बई से बी० ए० पास किया और वही प्रान्तीय सरकार के सेक्रेटरियट मे अनुवादक नियुक्त होगये। यही काम करते समय क़ानून की परीक्षा उत्तीर्ण की और अहमदाबाद मे वकालत शुरू की। इस पेशे से<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{Rh|'''महेन्द्रप्रताप'''||''' २६९'''}}
शीघ्र ही अरुचि होगई और प्रान्तीय सहयोग-विभाग मे इन्सपेक्टर होगये। १९१७ मे महात्मा गांधी की निगाहो में चढ़ गये। वह उन्हे साबरमती आश्रम ले आये। महादेव देसाई महात्मा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी बने। १९१९ में 'यंग इंडिया' और गुजराती 'नवजीवन' के सम्पादन मे महात्माजी के सहकारी बने, जबकि गांधीजी ने 'यंगइंडिया' को श्री जमुनादास द्वारकादास से ले लिया था। १९२० में महात्माजी ने प्रयाग के 'इन्डिपेन्डेन्ट' का सम्पादन करने के लिये देसाईजी को भेजा। १९३१ में, गांधीजी के सेक्रेटरी की हैसियत से, राउन्ड टेबल कान्फरेन्स के अवसर पर, विलायत गये। सन् १९३३ के गांधीजी के आमरण-व्रत के समय, यरवदा जेल में, उनके साथ बन्दी थे। गांधीजी की नीति को हृदयंगम कर लेने के कारण ही उन्होने महादेव देसाई को 'हरिजन' का सम्पादक बना दिया था, और इस पत्र मे तथा अन्यत्र वह 'एम० डी०' नाम से ख़ूब लिखा करते थे। गुजराती और अंग्रेज़ी शैली पर उनका समान रूप से अधिकार था। गांधीजी जैसे विश्व-विख्यात महापुरुष के दैनिक पत्र-व्यवहार को वही संभाल पाते थे। गांधीजी के निकट सामीप्य मे रहने का उन्हे अद्वितीय, अलभ्य अवसर प्राप्त हुआ। महादेव भाई की मृत्यु मे अपने युग का तुलसीदास चला गया और राष्ट्र की इस साहित्यिक क्षति की पूर्ति अब असम्भव है।
'भारत छोड़ो' प्रस्ताव के बाद ९ अगस्त १९४२ को महादेव भाई भी, गांधीजी आदि नेताओ सहित, पकड़े गये और बम्बई सरकार की विज्ञप्ति से पता चला कि, ६ दिन बाद, १५ अगस्त '४२ के प्रातःकाल, नज़रबन्दी के अज्ञात स्थान में, हृदयगति रुक जाने से, उनका देहान्त होगया। वहीं उनका दाह हुआ।
महादेव भाई ने पच्चीस वर्षों तक, गांधीजी के सहायक और उनके परम विश्वासपात्र रहकर राष्ट्र की बहुमूल्य सेवा की। उनका जीवन देश की स्वाधीनता के लिये लड़नेवाले एक सैनिक की भाँति आरम्भ हुआ और उसी की भाँति समाप्त भी। अपने देश और देवता पर वह बलिदान होगये।
महेन्द्रप्रतापसिंह, राजा--भारत के निर्वासित देशभक्त। जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल ५, सम्वत् १९४३ वि०। पिता का नाम राजा घनश्यामसिंह। जन्म स्थान मुरसान (ज़िला अलीगढ़)। राजा हरनारायण सिंह के दत्तक<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२७६
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{Rh|'''२७०'''||''' मार्क्सवाद'''}}
पुत्र । ६ वर्ष की आयु मे ही पिता का देहान्त होगया । रियासत कोर्ट ग्राफ्
वाड्स के संरक्षण मे होगई । बी० ए० तक शिक्षा प्राप्त की । १९०३ में
सपत्नीक योरप यात्रा की । सन् १६०६ मे औद्योगिक शिक्षा के प्रचारार्थ,
जिसमे राजा साहब की विशेष रुचि थी, वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की
स्थापना की । २०,०००) सालाना की ग्रामदनी की जमीदारी तथा निजी
राजभवन विद्यालय को दान मे दे दिये । गुरुकुल वृन्दावन को अक्टूबर
१६११ मे, १५,००० मूल्य की भूमि दी । इसी भूमि पर गुरुकुल विश्वविद्या-
लय का भवन बनाया गया है । हिन्दी साप्ताहिक 'प्रेम' की स्थापना की
तथा उसका सपादन किया । सन् १६१२ में दूसरी बार योरप गये तथा
सन् १६१४ मे तीसरी बार । साथ मे गुरुकुल कॉगडी के प्रथम स्नातक,
महात्मा मुन्शीराम ( स्व ० स्वामी श्रद्धानन्द ) के वडे पुत्र हरिश्चन्द्र विद्या-
लङ्कार को अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बनाकर लेगये । उसी समय से वह स्विट्-
ज़रलैण्ड, जर्मनी, फ्रान्स, तुर्किस्तान, सोवियत रूस, अफगानिस्तान, जापान
यदि मे भ्रमण कर भारतीय स्वाधीनता के पक्ष में लोकमत बनाते और
विश्वबन्धुत्व का प्रचार करते रहे हैं ।
राजा साहब मानवतावाद के प्रबल समर्थक हैं । इसी भावना से प्रेरित
होकर, सन् १६१२ मे, सबसे पूर्व, अछूत कहे जानेवाले सम्प्रदाय को इस प्रेम-
पुजारी ने व्यावहारिक रूप मे अपनाया । विश्व बन्धुत्व तथा अन्तर्राष्ट्रीयता के
वह पोषक और राष्ट्रीय स्वाधीनता के सच्चे उपासक हैं । उन्हे स्वदेश वापस
आने की आज्ञा नहीं है । केन्द्रीय असेम्बली मे इस प्रतिबंध के हटाने का प्रयत्न
किया गया, परन्तु सफलता नही मिली । पिछले तीन वर्षों से उनके सम्बन्ध मे
कोई समाचार नहीं सुना गया ।
मार्क्सवाद -- कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तानुसार समाजवादी विचारधारा ।
मार्क्स का, यहूदी वश मे, जर्मनी मे, सन् १८१८ मे, जन्म हुआ और सन्
१८८३ मे, लन्दन मे, मृत्यु । मार्क्सवाद भौतिकतावादी समाज-शास्त्र है । वह
जर्मन दार्शनिक, हीगल, और अँगरेज अर्थशास्त्री, रिकार्डो, के द्वन्द्वात्मक
भौतिकवाद पर आश्रित है । उसकी दृष्टि मे मानव की समस्त श्राध्यात्मिक,
मानसिक और सासारिक उन्नति तथा उसके विकास का मूलाधार आर्थिक है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८०
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{Rh|'''२७४'''||'''मिस्र'''}}
संघ की लाल सेना के मार्शल तुख़ाचेवस्की तथा सात जनरलों पर तीसरा ऐसा ही मामला चला कि वे जर्मन-सेनानायकों से मिलकर रूस तथा स्तालिन के विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे थे। इनका मुक़दमा बन्द अदालत में, गोपनीय ढंग से, हुआ। सरकारी बयान के मुताबिक इन्होने भी अपना अपराध स्वीकार किया और इन सबको गोली मार दी गई। ऐसा विचार किया जाता है कि यह मुक़दमे साम्यवादी दल की शुद्धि के लिये चलाये गये थे, जिनके अनुसार अन्य अनेक विरोधी कम्युनिस्टों को भी मौत की सज़ाएं दी गई।
मिण्टो-मार्ले-सुधार--१९०९ के नाम-मात्र के सुधारों के बाद, सन् १९०६ में, भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड मिण्टो तथा भारत-मंत्री लार्ड मार्ले ने भारतीय शासन-सुधार की एक योजना बनाई, जिसके अनुसार भारत के प्रत्येक प्रान्त में धारासभाएँ स्थापित की गई तथा उनमें थोड़े-से चुने हुए प्रतिनिधियों के लिये भी स्थान रखा गया। कुछ स्थानीय स्वायत्त भी थोड़ा बढ़ा दिया गया। सबसे प्रथम पृथक् साम्प्रदायिक निर्वाचन-प्रणाली का इसी योजना में स्थान दिया गया, और इसी के अनुसार सिखों को, हिन्दुओं से अलग सम्प्रदाय मानकर, उन्हें पृथक् निर्वाचनाधिकार दिया गया।
मिस्र--अफ्रीका स्थित 'स्वतंत्र' राज्य, क्षेत्रफल ३,४८,००० वर्ग०; जन० १,६०,००,०००, भाषा अरबी, राजधानी काहिरा, बादशाह फ़ारूक अव्वल (राजवंश अलवानी तुर्क, मुहम्मदअली शाखा), जिसका जन्म ११ फरवरी सन् १९२० को हुआ। १८४१ से १९१६ तक मिस्र, तुर्की के अधीन, अर्द्ध-स्वतंत्र देश रहा। तुर्की की ओर से एक ख़ान्दानी ख़दीव (वाइसराय) इस पर हुकूमत किया करता था। सन् १८८२ में अंग्रेज़ों ने इस देश पर आधिपत्य कर लिया। १८ दिसम्बर १९१४ को यह ब्रिटिश संरक्षित राज्य घोषित कर दिया गया और जर्मन-हिमायती ख़दीव अब्बास हिलमी को हटा दिया गया और उसके स्थान पर, सुल्तान की उपाधि धारण कर, हुसैन कमाल ख़दीव बना। कमाल १९१७ में मर गया, तब उसका भाई फ़ुआद ख़दीव बनाया गया और १९२२ में इसे मिस्र का बादशाह घोषित कर दिया गया। मिस्र में, इसके बाद, देश की पूर्ण स्वाधीनता के लिये, ज़बरदस्त राष्ट्रीय आन्दोलन शुरू होगया। २६ अगस्त १९३६ को मिस्र-ब्रिटेन-सन्धि द्वारा।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८२
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>और बरतानिया मे युद्ध छिड़ जाने की आशका होउठी। उस समय बरतानिया के राजनीतिज्ञों ने मिस्र को संतुष्ट करना ही उचित समझा और १९३६ मे, पूर्वोक्त परस्पर संधि करली। गत वर्ष जर्मन जनरल रोमेल जब लीबिया से बढ़ता-बढ़ता मिस्र के समीप तक आ गया था, तब काहिरा आदि पर धुरी वायुयानों ने बमवर्षा की थी। स्वेज बरतानिया के पूर्व-देशीय साम्राज्य की धमनी है; उसकी रक्षा के लिये युद्ध-काल मे मिस्र को संतुष्ट रखना आवश्यक है।
मिस्र मे निरक्षरता बहुत है, साधारण जनता ९० फी० निरक्षर है। १९२३ के मिस्त्री शासन-विधान के अनुसार यहाँ दो धारासभाएँ हैं: मजलिसुश-व्यूक (बड़ी) जिसके १५० सदस्यों का, ५ साल के लिये, सार्वजनिक चुनाव होता है। दूसरी मजलिसुल-नवाब (छोटी), जिसके १०० सदस्यों मे से ६० को बादशाह नामज़द करता है, ४० का चुनाव होता है, सरकार मजलिसुश-व्यूक के प्रति ज़िम्मेदार है।
मुकर्जी, डा० श्यामाप्रसाद--आप अ० भा० हिन्दू महासभा के कार्य-कर्त्ता-प्रधान हैं। हिन्दू महासभा के नेताओं मे आपका महत्वपूर्ण स्थान है। विगत नवम्बर १९४१ मे बंगाल-सरकार के प्रधान मंत्री मियाँ फ़ज़लुलहक़ ने आपको अपने मंत्रि-मंडल मे अर्थ-सचिव के पद पर नियुक्त किया। इससे पूर्व आप कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर के पद पर भी कई वर्षों तक रह चुके हैं। आप प्रसिद्ध शिक्षा-विज्ञ तथा विद्वान् है। अगस्त १९४२ मे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८३
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{Rh|'''मुद्रा विनिमय'''||''' २७७'''}}
'भारत छोड़ो' प्रस्ताव के बाद देश मे हुई अशान्ति के समय सरकार द्वारा किये गये दमन के विरोध मे डा० मुकर्जी ने प्रान्तीय गवर्नर के नाम एक मार्मिक पत्र लिखा (जो सरकार द्वारा ज़ब्त कर लिया गया) और मंत्रि-मंडल से इस्तीफा दे दिया। भारत की वर्तमान समस्या के निपटारे के प्रयत्न करनेवालो मे आपका स्थान मुख्य है।
मुक्त अर्थनीति--अर्थशास्त्रियो के एक दल का यह सिद्धान्त है कि आर्थिक-संकटो के निवारण के लिये एक नवीन मुद्रा-प्रणाली स्थापित कीजाय। इसका आधारभूत सिद्धान्त यह है कि ऐसी व्यवस्था की जाय कि मुद्रा का मूल्य स्वतः हर मास कम होता रहे और उसके स्थान पर नवीन मुद्रा का प्रचलन होता रहे। इससे मुद्रा-संचालन का प्रचलन बड़ी तीव्र गति से होगा, लोग मुद्रा का मूल्य घटने के कारण, उसका वेग से प्रचलन करेंगे। जब स्थायी रूप से मुद्रा का प्रचलन होगा तो बेकारी न रहेगी; आर्थिक संकट भी उत्पन्न न होगा।
मुक्त बन्दरगाह--किसी देश के बन्दरगाह को, उस देश द्वारा, दूसरे देश को प्रयोग करने का अधिकार देना। अन्य देश अपना माल उस बन्दरगाह से भेज सके तथा उस बन्दरगाह पर मँगा सके। उसे न कोई आयात-निर्यात कर देना पड़े और न इस प्रयोग के लिये उसपर किसी प्रकार का दायित्व या बंधन लगाया जाय।
मुक्त व्यापार--मुक्त व्यापार से यह प्रयोजन है कि सब देश स्वतंत्र रूप से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार करे और कम-से-कम तट-कर (टैरिफ) आयात-निर्यात पर उनको देना पड़े।
मुद्रा-विनिमय--प्रत्येक देश मे भिन्न-भिन्न प्रकार की मुद्राएँ प्रचलित हैं:<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८४
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>जैसे भारत में रुपया, अमरीका में डालर, इंग्लैंड में पाँट तथा शिलिंग, जर्मनी में मार्क, जापान में येन, रूस में रूबल। परस्पर देशों में व्यापार होता है और किसी वस्तु के मूल्य के भुगतान के लिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक देश के मुद्रा की दर नियत कर दीजाय। देश की सामाजिक-राजनीतिक अवस्था का मुद्रा की दर पर भी प्रभाव पड़ता रहता है।
मुंजे, डाक्टर बालकृष्ण शिवराम--हिन्दू महासभा को पुनर्संगठित करनेवाले और महासभा के प्रथम दल के नेता। नागपुर के प्रसिद्ध चिकित्सक। असहयोग आन्दोलन, सन् १९२० में, भाग लिया और जेल-यात्रा की। बाद को हिन्दू महासभा में शामिल हुए। सन् १९३१ की दूसरी गोलमेज-परिषद् में प्रतिनिधि होकर गए। आपकी सैनिक शिक्षा में विशेष रुचि है। इसीलिए आपने नासिक में भोंसले मिलिटरी कालेज की स्थापना कराई है। हिन्दू महासभा के सभापति भी रह चुके हैं। देश-हितकारी कार्यों में पूर्व से ही भाग ले रहे हैं। १९१९ के फौजी-शासन के बाद पीडित पंजाब की सहायतार्थ स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानन्दजी के साथ आप भी अमृतसर गये थे। आजकल हिन्दू महासभा के प्रधान मंत्री हैं।
मुंशी, कन्हैयालाल माणिकलाल--जन्म सन् १८८७ ई०। बड़ौदा और बम्बई में शिक्षा प्राप्त की। बम्बई हाईकोर्ट में वकालत शुरू की। सन् १९१५ में मि० जमुनादास-द्वारकादास के साथ 'यंग इंडिया' का संपादन किया। सन् १९१७-१६ में होमरूल लीग बम्बई के मंत्री रहे। बम्बई विश्वविद्यालय की सीनेट तथा सिंडीकेट के सदस्य हैं। सन् १९३० के सत्याग्रह-आन्दोलन के समय से राष्ट्रीय क्षेत्र में हैं, और अपनी धर्मपत्नी, श्रीमती लीलावती, के साथ<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>जेल-यात्रा भी की है। अ० भा० कांग्रेस कमिटी के पुराने सदस्य रहे हैं। आप गुजराती के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, लेखक, पत्रकार और उच्च कोटि के उपन्यासकार हैं। गुजराती साहित्य-कोष का सम्पादन भी आपने किया है। सन् १९३७-१९३८ तक बम्बई की कांग्रेसी प्रान्तीय सरकार के स्वराष्ट्र-मंत्री (Home Minister) रहे। युद्ध के प्रश्न पर कांग्रेस मंत्रि-मंडल के साथ आपने भी त्यागपत्र दे दिया। सन् १९४१ मे कांग्रेस की साम्प्रदायिक-निर्णय-सम्बन्धी नीति पर गांधीजी से आपका मतभेद होगया और आपने कांग्रेस को त्याग कर 'पाकिस्तान' के निराकरण मे 'अखंड हिन्दुस्तान' आन्दोलन की नींव डाली। 'सोशल वैलफेयर' नामक साप्ताहिक आपने निकाला है, जिसके द्वारा आप अपने विचारो का प्रतिपादन कर रहे है।
मुफ्ती आज़म--(यरूशलम का), इस्लाम का धर्माचार्य, अरब का राष्ट्रीय नेता, नाम हज अमीन एफन्दी अल् हुसैनी, अवस्था ४५ वर्ष, काहिरा, यरूशलम और कुस्तुन्तुनिया मे तालीम पाई, अपने भाई के बाद, सन् १९२१ मे, यरूशलम का मुफ्ती बना, सन् १९२३ मे सुप्रीम मुस्लिम कौंसिल का अध्यक्ष हुआ, १९३१ ई० मे यरूशलम मे मुस्लिम कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। विगत विश्वयुद्ध मे मुफ्ती ने, तुर्कों के ख़िलाफ़, बरतानिया का पक्ष लिया किन्तु, फ़िलस्तीन मे यहूदियो को बसाने के प्रश्न पर, वह ब्रिटेन के विरुद्ध हो गया। आज बीस वर्षों से वह, फ़िलस्तीन मे यहूदी उपनिवेश बसाये जाने के प्रतिरोध मे, बरतानिया के विरुद्ध, अरबों मे आन्दोलन कर रहा है। उसे १० साल क़ैद की सज़ा दी गई थी, परन्तु बाद मे रिहा कर दिया गया। उसका फ़िलस्तीन-अरब दल, जो मुफ्ती दल भी कहलाता है, फ़िलस्तीन मे सबसे बडा दल है। सन् १९३७ मे मुफ्ती अरब की उच्च संस्था का अध्यक्ष बना। दूसरे अरब नेताओं के साथ मुफ्ती पर फ़िलस्तीन मे प्रवेश-निषेध लगाया<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२८६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>गया, तब वह शाम (सीरिया) में जाकर रहने लगा। शाम से भी वह अरब-आन्दोलन का सचालन करता रहा। फरवरी १९३७ में मुफ़्ती ने, लन्दन के फ़िलस्तीन-सम्मेलन में, अरब-सभ्य-मंडल भेजा था। अप्रैल '४१ में, रशीद अली के नेतृत्व में इराक में उठे अंग्रेज़-विरोधी विद्रोह में भी मुफ़्ती ने भाग लिया। विद्रोह के दवा दिये जाने पर मुफ़्ती ईरान को चला गया, और जब इराक पर अंग्रेज़ों ने क़ब्ज़ा कर लिया तो मुफ़्ती इटली जा पहुँचा। दिसम्बर १९४१ में वह जर्मनी में था, जहाँ उसने हिटलर से भेंट की थी।
मुसोलिनी, बैनितो--इटली का अधिनायक; फ़ासिज्म का संस्थापक; २६ जुलाई सन् १८८३ को पैदा हुआ, इसका बाप लुहार था; थोड़ा-सा इसने पढ़ा-लिखा; बड़ा होने पर मुसोलिनी समाजवादी बन गया। सन् १९०२ में इटली से भाग गया और स्विट्ज़रलैंड जाकर रहने लगा। इटली वापस आया। समाजवादी दल में उग्र कार्यक्रम का प्रचार किया। १९१२ में दल के मुख-पत्र 'अवन्ती' का सचालक नियुक्त किया गया। १९१४ में जब पिछला विश्वयुद्ध आरम्भ हुआ तो मुसोलिनी राष्ट्रवादी बन गया और इटली के युद्ध में सम्मिलित होने का प्रचार करने लगा। समाजवादी दल ने, इस कारण, उसे अपने में से निकाल बाहर किया। नवम्बर १९१४ में उसने 'पोपोलो द'इतालिया' नामक अपना पत्र निकाला; लड़ाई में हस्तक्षेप करने के अनुयायी दल का नेता बनगया; मई १९१५ में, इटली के लड़ाई में शामिल होने पर, मुसोलिनी इटालियन सेना में भरती होकर साधारण सैनिक बना; कारपोरल के पद पर पहुँचा, फरवरी १९१७ में युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और अच्छा होजाने पर लौटा तथा समाचार-पत्र के सचालन में लग पड़ा। लड़ाई के बाद, वर्साई में जब संधि हुई तो, इटली को विजय की लूट में संतोषजनक भाग न मिला और देश में वाम-पक्षी क्रान्तिवाद अधिक बढ़ा तब, २३ मार्च १९१९ को, मुसोलिनी ने 'मिलान' नगर में, फ़ासिस्त दल की स्थापना की, जिसमें उस समय सिर्फ़ ४० सदस्य भरती हुए। इस दल का कार्यक्रम राष्ट्रीय और साम्यवाद-विरोधी रखा गया। १९१९ के चुनाव में उसके दल के उम्मीदवारो को सिर्फ़ ४,००० मत मिले, किन्तु बाद में यह आन्दोलन तेजी से बढ़ा। सन् १९२१ में उसने लिबरल दल के नेता से समझौता किया।<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२८०||मुसोलिनी}}</noinclude>गया, तब वह शाम (सीरिया) में जाकर रहने लगा। शाम से भी वह अरब-आन्दोलन का सचालन करता रहा। फरवरी १९३७ में मुफ़्ती ने, लन्दन के फ़िलस्तीन-सम्मेलन में, अरब-सभ्य-मंडल भेजा था। अप्रैल '४१ में, रशीद अली के नेतृत्व में इराक में उठे अंग्रेज़-विरोधी विद्रोह में भी मुफ़्ती ने भाग लिया। विद्रोह के दवा दिये जाने पर मुफ़्ती ईरान को चला गया, और जब इराक पर अंग्रेज़ों ने क़ब्ज़ा कर लिया तो मुफ़्ती इटली जा पहुँचा। दिसम्बर १९४१ में वह जर्मनी में था, जहाँ उसने हिटलर से भेंट की थी।
'''मुसोलिनी, बैनितो'''—इटली का अधिनायक; फ़ासिज्म का संस्थापक; २६ जुलाई सन् १८८३ को पैदा हुआ, इसका बाप लुहार था; थोड़ा-सा इसने पढ़ा-लिखा; बड़ा होने पर मुसोलिनी समाजवादी बन गया। सन् १९०२ में इटली से भाग गया और स्विट्ज़रलैंड जाकर रहने लगा। इटली वापस आया। समाजवादी दल में उग्र कार्यक्रम का प्रचार किया। १९१२ में दल के मुख-पत्र 'अवन्ती' का संचालक नियुक्त किया गया। १९१४ में जब पिछला विश्वयुद्ध आरम्भ हुआ तो मुसोलिनी राष्ट्रवादी बन गया और इटली के युद्ध में सम्मिलित होने का प्रचार करने लगा। समाजवादी दल ने, इस कारण, उसे अपने में से निकाल बाहर किया। नवम्बर १९१४ में उसने 'पोपोलो द'इतालिया' नामक अपना पत्र निकाला; लड़ाई में हस्तक्षेप करने के अनुयायी दल का नेता बन गया; मई १९१५ में, इटली के लड़ाई में शामिल होने पर, मुसोलिनी इटालियन सेना में भरती होकर साधारण सैनिक बना; कारपोरल के पद पर पहुँचा, फरवरी १९१७ में युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और अच्छा होजाने पर लौटा तथा समाचार-पत्र के सचालन में लग पड़ा। लड़ाई के बाद, वर्साई में जब संधि हुई तो, इटली को विजय की लूट में संतोषजनक भाग न मिला और देश में वाम-पक्षी क्रान्तिवाद अधिक बढ़ा तब, २३ मार्च १९१९ को, मुसोलिनी ने 'मिलान' नगर में, फ़ासिस्त दल की स्थापना की, जिसमें उस समय सिर्फ़ ४० सदस्य भरती हुए। इस दल का कार्यक्रम राष्ट्रीय और साम्यवाद-विरोधी रखा गया। १९१९ के चुनाव में उसके दल के उम्मीदवारो को सिर्फ़ ४,००० मत मिले, किन्तु बाद में यह आन्दोलन तेजी से बढ़ा। सन् १९२१ में उसने लिबरल दल के नेता से समझौता किया।<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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/* शोधित नहीं */ बिना ठीक से शोधित किए पन्ने की स्थिति न बदलें.
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>________________
<noinclude>{{rh|४१६||स्लोवेनीज़}}</noinclude>लेण्ड, हंगरी और जर्मनी के समाजवादी मजदूर दल सोशल डेमोक्रेटन कहलाते हैं । जर्मनी मे, नात्सीवाद के उदय के समय से, यह दल गैर-कानूनी करार दे दिया गया है।
स्कोदा कारखाना-वद बोहेमिया मे,पिल्सेन नामक स्थान पर, अन्नशस्त्र बनाने और लोहे की ढलाई करने वाले बड़े कारखानो का विशाल समूह है । युद्ध का सामान बनाने वाले यह संसार के बड़े कारखानों में से है। लड़ाई से पूर्व इसमे २२,००० मजदूर काम करते थे। फ्रान्सीसी कम्पनी-समूह शनीदर-क्रूसत का यह कारखाना चैकोल्लोवाकिया पर जर्मन-याविपत्य स्थापित होने के बाद जर्मनी के अधिकार में चला गया है ।
स्लोवाक-यह जाति स्लाव कौम के अन्तर्गत है, जो चैक-जाति से बहुत मिलती-जुलती है । स्लोवाक लोग सदियों तक हगरी के तावे रहे और पिछले युद्ध के फलस्वरूप, १६१८ मे, चेकोस्लोवाकिया के निर्माण के समय, इन
का उद्वार हुआ । २० साल तक स्लोवाक चैको के साथ एक राज्य में रहते रहे, किन्तु उसके बाद वह अपनी राजनीतिक स्वाधीनता अलग मॉगने लगे, जो म्युनिख समझौते के अनुसार, अक्टूबर १६३८ मे, चेकोस्लोवाकिया का पुनसंगठन होते समय, उनको मिल गई और नात्सी-ढंग की डिक्टेटरशाही वहाँ कायम हुई। १० मार्च १६३६ को स्लोवाक राजधानी, वातीस्लावा, मे जर्मनी के नास्तियों ने विद्रोह करा दिया और स्लोवाक पूर्ण-स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी गई, तब से स्लोवाकिया में, जर्मन-संरक्षण मे, एक कठपुतली सरकार कायम है । जर्मन फौजे वहाँ काबिज हैं और स्लोवाक लोगो को, जर्मनी के पक्ष में, पोलेण्ड और रूस से लडना पडा है । प्रवासी स्लोवाक चैको से मिलकर मित्रराष्ट्रो की सहायता कर रहे हैं और वह लन्दन-प्रवासी डाक्टर बेनेश की अस्थायी चेकोस्लोवाकी सरकार के सचालन में भाग ले रहे हैं।
स्लोवेनीज-दक्षिणी स्लाव जन-समूह जो आल्प्स पर्वत के दक्षिण-पूर्व भाग मे बसा हुआ है, इनकी संख्या दस लाख, रोमन कैथलिक ईसाई । सदियों तक यह जाति आस्ट्रिया के अधीन रही है। पिछले महायुद्ध के बाद यह लोग यूगोस्लावी राज्य के अन्तर्गत सर्बिया, क्रोशिया तथा अन्य दक्षिणी स्लाव देशों के साथ मिला दिये गये और इनके प्रदेश का नाम स्लोवेनिया रख<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||नवमस्कन्ध-९|(७१)}}
{{border|maxwidth=500px|bstyle=double|bthickness=8px|align=justified|padding=20px|</noinclude>
रघुवीर ॥ १४ ॥ अयोध्या बाजत आज बधाई । गर्भ मुच्यो कौशल्या माता रामचन्द्र
निधि आई ॥ गावैं सखी परस्पर मंगल ऋषि अभिषेक कराई । भीर भई दशरथके आंगन साम
वेद ध्वनि गाई ॥ पूछत ऋषिहि अयोध्याको पति कहि हो जन्म गुसाईं । बुद्धवार नौमी तिथि
नीकी चौदह भुवन बड़ाई ॥ चारि पुत्र दशरथ के उपजे तिहूँलोक ठकुराई । सदा सर्वदा राज
राम को सूरदादि तहां पाई ॥ १५ ॥ रघुकुल प्रगटे हैं रघुवीर । देश देश ते टीका
आयो रतन कनक मनि हीर ॥ घर घर मंगल होत बधाई अति पुरवासिन भीर । आनंद
मगन भये सब डोलत कछू न शोध शरीर ॥ मागध बंदी सूत लुटाए गज गयंद हय चीर । देत
अशीश सूर चिरजीयो रामचन्द्र रणधीर ॥ १६॥ शर क्रीडा वर्णन । राग विहावल ॥ करतल सोभितः
बान धनुहियां । खेलत फिरत कनक मय आंगन पहिरे लाल पनाहियां ॥ दशरथ कौशल्या के
आगे लसत सुमन की छहियां । मानो चारि हंस सरवर ते बैठे आइ सदहियां ॥ रघुकुल कुमुद
चंद चिंतामणि प्रगटे भूतल महिया । यहै देन आए रघुकुल को आनंद निधि सब गहियां ॥ ये
सुख तीनि लोकमें नाहीं जो पाए प्रभु पहियां । सूरदास हरि बोलि भगतको निरवाहतदै बहियां
॥१७॥ राग विहावल॥ धनुही बान लये कर डोलत । चारोबीर संग इक सोहत बचन मनोहर बोलत
लछिमन भरत शत्रुघन सुंदर राजिवलोचन राम । अति सुकुमार परम पुरुषारथ मुक्ति धर्म धन
काम॥ कटि पट पीत पिछौरी बांधे काग पच्छ शिप शीश । शर क्रीड़ा दिन देखत आवत नारद-
सुर तैंतीस ॥ शिवमन शोच इन्द्रमन आनंद सुख दुख ब्रह्म समान ॥ दिति दुर्बल अति
अदिति हृष्ट चित देखि सूर संधान ॥ १८ ॥ <small> विश्वामित्र यज्ञ रक्षा ताडका वध सीतास्वयंवर । वन ।
॥ राग सारंग ॥ </small> दशरथसों ऋषि आनि कह्यो । असुरन सों यज्ञ होन न पावत राम लछन तब संग
दयो ॥ मारि ताड़का यज्ञ करायो विश्वामित्र आनंद भयो । सीय स्वयंवर जानि सूर प्रभुको
ऋषिलै ता ठौर गयो ॥ १९ ॥ सीतापति दर्शन ॥ राग विहावल॥ देखनको मंदिर आनि चढ़ी । रघुपति
पूरनचंद विलोकत मानो उदधि तरंग बढ़ी ॥ पिय दरशन प्यासी अति आतुर निशिवासर गुन
आन रढ़ी । तजिं कुलकानि पीय मुख निरखत शीशनाइ आशीश पढ़ी ॥भई देह जों खेह करम-
वश ज्यों तट गंगा अनलदढ़ी । सूरदास प्रभु दृष्टिं सुधानिधि मानो फेरिं बनाइ गढ़ी ॥ २० ॥
सीता मनोरथ पूरण ॥ राग सारंग ॥ चितै रघुनाथ बदनकी ओर । रघुपतिसों अब नेम हमारो विधि सों
करति निहोर ॥ यह अति दुसह पिनाक पिताप्रण राघव वयस किशोर । इहते दीरघ धनुष चढ़ै
क्यों यह सखि संशयमोर ॥ सिय अंदेश जानि सूरज प्रभु लियो करजकी कोर । टूटत धनु
नृप लुके जहां तहां ज्यों तारागण भोर ॥ २१ ॥ दशरथ को जनकपुर आगमन रामजूके विवाहहेतु ॥
महाराज दशरथ तहँ आये । ठाढे जाय जनक मंदिरमें मोतिन चौक पुराये ॥ विप्र लगे
ध्वनि वेद उचारन युवतिन मंगल गाये । सुर गंधर्वगन कोटिक आए गगन विमानन छाये ॥ राम
लक्ष्मण भरत शत्रुघन ब्याह निरखि सुखपाये । सूर भयो आनंद नृपतिमन दिवि दुंदुभी बजाए
॥ २२ ॥ कंगना छोडन ॥ राग आसावरी ॥ कर कंपै कंगन नहिं छूटै । राम सुपरस मगन भय कौतुक
निरखि सखी सुख लूटै ॥ गावत नारि गारि सब दैदै तात भ्रात की कौन चलावै । तब कर डोर
छुटै रघुपति जूं जो कौशल्या माइ बुलावै ॥ पुंगीफल युत जल निर्मल धरि आनी भरि कुंडी जु
कनककी । खेलत जूप युगल युवतिनमें हारे रघुपति जीति जनककी ॥ घेरे निशान अजिर गृह
मंगल विप्रवेद अभिषेक करायो । सूर अमित आनं दकुशलपुर सोई शुकदेव पुराणनि गायो॥२३॥<noinclude>}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|'''454 : प्रेमचंद रचनावली-5'''||}}</noinclude>एक ही सांस में अपने हृदय का सारा मालिन्य उंडेल देने के बाद लालाजी दम लेने
के लिए रुक गए। जो कुछ इधर-उधर लग्-चिपटी रह गया हो, शायद उसे भी खुरचकर
निकाल देने का प्रयत्न कर रहे थे।
सुखदा ने पूछा-तो आप वहां कब जा रहे हैं?
लालाजी ने तत्परता से कहा-आज ही, इधर ही से चला जाऊंगा। सुना है, वहां जोरों
से दमन हो रहा है। अब तो वहां का हाल समाचार-पत्रों में भी छपने लगा। कई दिन हुए, मुन्नी
नाम की कोई स्त्री भी कई आदमियों के साथ गिरफ्तार हुई है। कुछ इसी तरह की हलचल
सारे प्रांत, बल्कि सारे देश में मची हुई हैं। सभी जगह पकड-धकड़ हो रही हैं।
बालक कमरे के बाहर निकल गया था। लालाजी ने उसे पुकारा, तो वह सड़क की ओर
भागा। समरकान्त भी उसके पीछे दौड़े। बालक ने समझा, खेल हो रहा है। और तेज दौड़ा।
ढाई-तीन साल के बालक की तेजी ही क्या, कितु समरकान्त जैसे स्थूल आदमी के लिए पूरी
कसरत थी। बड़ी मुश्किल से उसे पकड़ा ।
एक मिनट के बाद कुछ इस भाव से बोले, जैसे कोई सारगर्भित कथन हो-मैं तो
सोचता हैं, जो लोग जाति-हित के लिए अपनी जान होम करने को हरदम तैयार रहते हैं, उनकी
बुराइयों पर निगाह ही न डालनी चाहिए।
सखुदा ने विरोध किया-यह न कहिए, दादा । ऐसे मनष्यों का चरित्र आदर्श होरा
चाहिए नहीं तो उनके परोपकार में भी स्वार्थ और वासना की गंध आने लगेगी।
समरकान्त ने तत्त्वज्ञान की बात कही-स्वार्थ मैं उसी को कहता हूं, जिसके मिलने में
चित्त को हर्ष और न मिलने से क्षोभ हो। ऐसा प्राणी, जिम हर्ष और क्षोभ हो ही नहीं, मनुष्य
नहीं, देवता भी नहीं, जड़ हैं।
सुखदा मुस्कराई– तो संसार में कोई निस्वार्थ हो ही नहीं सकता?
"असंभव ! स्वार्थ छोटा हो, तो स्वार्थ है, बड़ी हो, तो उपकार है। मेरा तो विचार हे,
ईश्वर-भक्ति भी स्वार्थ है।"
मुलाकात की समय कब का गुजर चुका था। मेट्रन अब और रिआयत न कर मकती
थी। समरकान्त ने बालक को प्यार किया, बहू को आशीर्वाद दिया और बाहर निकले।
बहुत दिनों के बाद आज उन्हें अपने भीतर आनंद और प्रकाश का अनुभव हुआ, माना
चन्द्रदेव के मुख से मेघों का आवरण हट गया हो।
{{rh||'''दो'''|}}
सुखदा अपने कमरे में पहुंची, तो देखा-एक युवती कैदियों के कपड़े पहने उसके कमरे की
सफाई कर रही है। एक चौकीदारिन बीच-बीच में उसे डांटती जाती है।
चौकीदारिन ने कैदिन की पीठ पर लात मारकर कहा-रांड, तुझे झाडू लगाना भी नहीं
आता ! गर्द क्यों उड़ाती है? हाथ दबाकर लगा।
कैदिन ने झाडू फेंक दी और तमतमाते हुए मुख से बोली- मैं यहां किसी की टहन करने
नहीं आई हूं।
"तब क्या रानी बनकर आई है?"<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:455}}</noinclude>कर्मभूमि : 455
''हां, रानी बनकर आई हूं। किसी की चाकरी करना मेरा काम नहीं है।''
"तू झाडू लगाएगी कि नहीं?''
" भलमनसी से कहो, तो मैं तुम्हारे भंगी के घर में भी झाडू लगा दूंगी; लेकिन भार
का भय दिखाकर तुम मुझसे राजा के घर में भी झाडू नहीं लगवा सकतीं। इतना समझ रखो।''
''तू न लगाएगी झाडू?"
'नहीं ।
चौकीदारिन ने कैदिन के केश पकड़ लिए और खींचती हुई कमरे के बाहर ले चली।
रह-रहकर गालों पर तमाचे भी लगाती जाती थी।
"चल जेलर साहब के पास।''
''हां, ले चलो। मैं यही उनसे भी कहूगी। मार-गाली खाने नहीं आई हूं।''
सुखदा के लगातार लिखा-पढ़ी करने पर यह टहलनी दी गई थी, पर यह कांड देखकर
सुखदा का मन क्षुब्ध हो उठा। इस कमरे में कदम रखना भी उसे बुरा लग रहा था।
| कैदिन ने उसकी ओर सजले आंखों से देखकर कहा-तुम गवाह म्हन} इस चौकीदारिन
ने मुझे कितना मारा है।
| सखुदा ने समीप जाकर चौकीदारिन को हटाया और कैदिन का हाथ पकड़कर कमरे
में ले गई।
चौकीदार ने धमकाकर कहा--राज समरे यहां आ जाया कर। जो काम यह कहें, वह
किया कर नहीं इंडे पड़ेंगे।
| कैदिन क्रोध में कांप रही थी-मैं किसी को नोंडी नहीं हूँ और न यह काम करूंगी।
किसी रानी- महारानी की टहल करने नहीं आई। जेल म मय बराबर हैं ।
| सुखदा ने देखा, युवती में आत्म-सम्मान की कमी नहीं। लज्जत होकर बोली-यहां
कोई रानी-महारानी नहीं है बहन, मेरा जी अकेले घबराया करता था, इसलिए तुम्हें बुला लिया।
हम दोनों यहां बहनों की तरह रहेगी। क्या नाम है तुम्हारा
युवती की कठोर मुद्रा नर्म पड़ गई। बोनी--में राम मुन्नी हैं। दार से आई हूँ।
सुखदा चौंक पड़ी। लाला समरकान्त ने यही नाम तो लिया था। पूछा-वहां किस
अपराध में सजा हुई?
| "अपराध क्या था? सरकार जमीन का लगान नहीं कम करती थी। चार आने की छुट
हुई। जिंस का दाम आधा भी नहीं उतरा। हम किसके घर से ला के देत? इस बात पर हमने
फरियाद को। बस, सरकार ने सजा देना शुरू कर दिया।''
मुन्नी को सुखदा अदालत में कई बार देख चुकी थी। तब से उसकी सूरत बहुत
कुछ बदल गई थी। पूछा-तुम बाबू अमरकान्त को जानती हो? वह भी इसी मुआमले में
गिरफ्तार हुए हैं।
| मुन्नी प्रसन्न हो गई-जनिती क्यों नहीं, वह तो मेरे ही घर में रहते थे। तुम उन्हें कैसे
जानती हो? वही तो हमारे अगुआ हैं।
सुखदा ने कहा- मैं भी काशी की रहने वाली हूं। उसी मुहल्ले में उनका भी घर है। तुम
क्या ब्राह्मणी हो?
‘हूं तो ठकुरानी, पर अब कुछ नहीं हूं। जात-पात, पूत-भतार सबको खो बैठी।''<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|456:प्रेमचंद रचनावली-5||}}</noinclude>456 : प्रेमचंद रचनावली-5
"अमर बाबू कभी अपने घर की बातचीत नहीं करते थे?''
"कभी नहीं। कभी आना न जाना, न चिट्ठी, न पत्तर।''
सुखदा ने कनखियों से देखकर कहा-मगर वह तो बड़े रसिक आदमी हैं। वहां गांव
में किसी पर डोरे नहीं डाले?
मुन्नी ने जीभ दांतों तले दबाई-कभी नहीं बहूजी, कभी नहीं। मैंने तो उन्हें कभी किसी
मेहरिया की ओर ताकते या हंसते नहीं देखा। न जाने किस बात पर घरवाली से रूठ गए। तुम
तो जानती होगी?
| सुखदा ने मुस्कराते हुए कहा-रूठ क्या गए, स्त्री को छोड़ दिया। छिपकर घर से भाग
गए। बेचारी औरत घर में बैठी हुई है। तुमको मालूम न होगा। उन्होंने जरूर कहीं-ने-केही दिन
लगाया होगा।
मुन्नी ने दाहिने हाथ को सांप के फन की भाँति हिलाते हुए कहा-ऐसी बात होती, तो
गांव में छिपी न रहती, बहुजी ! मैं तो रोज ही दो-चार बार उनके पास जाती थी। कभी मिर
ऊपर न उठाते थे। फिर उस देहात में ऐसी थी ही कौन, जिस पर उनका मन चलता। न कोई
पढ़ी-लिखी, न गुन, न सहूर।
| सुखदा ने नब्ज टटोली--मदं गुन-सहूर, पढ़ना लिखना नहीं देखते। वह तो रूप-रम्
देखते हैं और वह तुम्हें भगवान् ने दिया ही है। जवान भी हो।
मुन्नी ने मुंह फेरकर कहा-तुम तो गाली देती हां, बहुजी । मरी और भला वह क्या
देखते, जो उनके पांव की जूतियों के बराबर नहीं, लेकिन तुम कौन हो बहजो, तुम यहा के
आई?
जैसे तुम आई वैसे ही मैं भी आई।''
''तो यहां भी वही हलचले हैं?''
" हां, कुछ उसी तरह की है।''
मुन्नी को यह दर्खकर आश्चर्य हुआ कि ऐसी विदुषी देवियां भी जेल में भेजी गई हैं।
भन्ना इन्हें किस बात का दु: हागा?
उसने डरते-डरने पूछा--तुम्हा स्वामी भी सजा पा गा हो ।
''हां, तभी तो में आई।''
मुन्नी ने छत की ओर देखकर आशीर्वाद दिया-भगवान् तुम्हारा मनोरथ पूरा करे
बहुजी । गद्दी--मसनद लगाने वाली रानियां जब तपस्या करने लगी, तो भगवान् वरदाने भी
जल्दी ही देंगे। कितने दिन की मजा हुई है? मुझे तो छ: महीने की है।
सुखदा ने अपनी मजा की मियाद बताकर कहा- तुम्हारे जिन्ने में बड़ी मंख्तिया हो रही
होंगी। तुम्हारा क्या विचार है, लोग मरती से दब जाएंगे?
मुन्नी ने मानो क्षमा-याचना को-मेरे सामने तो लोग यही कहते थे कि चाहे फांसी पर
चढ़ जाएं, पर आधे से बेशी लगान न देंगे, लेकिन दिन से सोचो, जब बैलं बधिए छीने जाने
लग, सिपाही घरों में घुसेंगे, मरदों पर इंडे और गोलियों की मार पड़ेगी, तो आदमी कहा
तक सहेगा? मुझे पकड़ने के लिए तो पूरी फौज गई थी। पचास आदमियों से कम न होंगे।
गोली चलते-चलते बची। हजारों आदमी जमा हो गए। कितना समझाती थी-- भाइयो, अपने-
अपने घर जाओ, मुझे जाने दो, लेकिन कौन सुनता है? आखिर जब मैंने कसम दिलाई, तो<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:457}}</noinclude>कर्मभूमि : 457
ग लौटे: नहीं, उसी दिन दस-पांच की जान जाती। न जाने भगवान् कहां सोए हैं कि इतना
याय देखते हैं और नहीं बोलते। साल में छ: महीने एक जून खाकर बेचारे दिन काटते हैं,
चीथड़े पहनते हैं, लेकिन सरकार को देखो, तो उन्हीं की गरदन पर सवार ! हाकिमों को तो
अपने लिए बंगला चाहिए, मोटर चाहिए, हर नियमित खाने को चाहिए, मैर-तमाशा चाहिए,
पर गरीबों का इतना सुख भी नहीं देखा जाता है जिसे देखो, गरीबों ही का रक्त चूसने को
तैयार है। हम जमा करने को नहीं मांगते, न हमें भोग-विलास की इच्छा है, लेकिन पेंट को
रोटी और तन ढकने को कपड़ा तो चाहिए। सान-भर खाने-पहनने को छोड़ दो, गृहस्थी का
जो कुछ खरच पड़े वह दे दो। बाकी जितना बचे, उठा ले जाओ। मृदा गरीबों को कौन सुनता
सुखदा ने देखा, इस गंवारन 4. दय में कितनी सहानभूति, कितनी दया, कितनी
जागृति भरी हुई है। अमर क त्याग और सेवा की उसने जिन शब्दों में सराहना की, उसने जैसे
सखदा के अंत:करण की सारी मलिनताओं को धोकर निर्मल कर दिया, जैसे उसके मन में
प्रकाश आ गया हो, और उसकी सारी शंकाएं और चिंताएं अंधकार की भांति मिट गई हों।
अमरकान्त का कल्पना-चित्र उसकी आंखों के सामने आ खड़ा हुआ-कैदियों का जाँघिया-
कंटोप पहने, बड़े-बड़े बाल बढ़ाए, मुख मन्निन, कैदियों के बीच में चक्की पीसता हुआ। वह
११यभीत हो रही। उमका हदय कभी इतना कोमल न था।
| मेट्रन ने आकर कहा--अब तो आपको नौकरानी मिल गई। इसमें खुव काम ली।
सुखदा धीमे स्वर में बोली--मुझे अब नौकरानी की इच्छा नहीं है मेमसाहब, मैं यहां
रहना भी नहीं चाहती। आप मुझे मामूली कैदियों में भेज दीजिए।
मेट्न छोटे कद की एंग्लो-इंडियन महिन्ना थी। मुंह, छोटी-छोटी आंखे, तराशे हुए
बाल, घुटनों के ऊपर तक का स्कर्ट पहने हुए। विस्मय से बोली- यह क्या कहती हो,
मुख़दादेवी? नौकरानी मिल गया और जिस चीज का तकलीफ हो हमसे कहो, हम जेलर
साहब से कहेगा।
| सुखदा ‘ने नम्रता से कहा- आपकी इम कृपा के लिए मैं आपक’ ! यवाद देती हूं। मैं
अब किसी तरह की रियायत नहीं चाहती। मैं चाहती हूं कि मुझे मामूल रूदियों की तरह
रखी जाय।
''नीच औरतों के साथ रहना पड़ेगा। खाना भी वही मिलेगा।''
''यहीं तो मैं चाहती हूं।''
''काम भी वही करना पड़ेगा। शायद चक्की पीसने का काम दे दें।''
“कोई हरज नहीं।''
"घर के आदमियों से तीसरे महीने मुलाकात हो सकेगी।''
'मालूम है।''
मेट्रन की लाला समरकान्त ने खूब पूजा की थी। इस शिकार के हाथ से निकल जाने
का दु:ख हो रहा था। कुछ देर समझाती रही। जब सुखदा ने अपनी राय न बदली, तो पछताती
हुई चली गई।
मुन्नी ने पूछा--मेम साहब क्या कहती थी?
सुखदा ने मुन्नी को स्नेह-भरी आंखों से देखी--अब मैं तुम्हारे ही साथ रहूंगी, मुन्नी ।<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|458:प्रेमचंद रचनावली-5||}}</noinclude>458 : प्रेमचंद रचनावली-६
मुन्नी ने छाती पर हाथ रखकर कहा-यह क्या करती हो, बहू? वहां तुमसे न रहा
जाएगा।
सुखदा ने प्रसन्न मुख से कहा-जहां तुम रह सकती हो, वहां मैं भी रह सकती हैं।
एक घंटे के बाद जब सुखदा यहां से मुन्नी के साथ चली, तो उसका मन आशा और
भय से कांप रहा था, जैसे कोई बालक परीक्षा में सफल होकर अगली कक्षा में गयी हो।
तीन
पुलिस ने उस पहाड़ी इलाके की घेरा डाल रखा था। सिपाही और सवार चौबीसों घंटे घूमते
रहते थे। पांच आदमियों से ज्यादा एक जगह जमा न हो सकते थे। शाम को आठ बजे के बाद
कोई घर से निकल न सकता था। पुलिस को इत्तिला दिए बगैर घर में मेहमान को ठहराने को
भी मनाही थी। फौजी कानून जारी कर दिया गया था। कितने ही घर जला दिए गए थे और
उनके रहने वाले हचूड़ों की भांति वृक्षों के नीचे बाल-बच्चों को लिए पड़े थे। पाठशला में
आग लगा दी गई थी और उसकी आधी-आधी काली दीवारें मानो केश खन्ने मातम कर रहा
थीं। स्वामी आत्मानन्द बांस की छतरी लगाए अब भी वहां डटे हुए थे। जरा-सा मौका पा
ही इधर-उधर से दस-बोस आदमी आकर जमा हो जाते, पर सवारों को आते देखा और गायव
सहसा लाला समरकान्त एक गट्ठर पीठ पर लादं मदरसे के सामने आकर खड़े हो ,
स्वामी ने दौड़कर उनका बिस्तर ले लिया और खाट की फिक्र में दो हैं। गांव- भर में बिजली
की तरह खबर दौड़ गई- भैया के बाप आए हैं। हैं तो वृद्ध, मगर अभी टमन हैं। मेल-राहकार
से लगते हैं। एक क्षण में बहुत से आदमियों ने आकर घेर लिया। किये के सिर में पट्टी में
थी, किसी के हाथ में। कई लंगड़ा रहे थे। शाम हो गई और आज कोई विशेष छुटको न देखकर
और सारे इलाके में इंडे के बल से शांति स्थापित करके पुलिस विश्राम कर रही थी। बेचार
रात-दिन दौड़ने-दौड़ते अधमरे हो गए थे।
गुदड़ ने लाठी टेकते हुए आकर समग्कान्न के चरण छू और बोले- अमर या +7
समाचार तो आपको मिला होगा। आजकल तो पुलिस का धावा है। हाकिम कहता है- चाह
आने लगे, हम कहते हैं हमारे पास है ही नहीं, दें कहां से? बहुत-से लोग तो गांव छोड़कर
भाग गए। जो हैं, उनकी दसा आप देख ही रहे हैं। मनी बहू को पकड़कर जेल में डाल दिया।
आप ऐसे समय में आए कि आपकी कुछ खातिर भी नहीं कर सकते।
समरकान्त मदरसे के चबूतरे पर बैठ गए और सिर पर हाथ रखकर सोचने लगे इन
गरीबों की क्या सहायता करें? क्रोध की एक ज्वाला-सी उठकर रोम-रोम में व्याप्त हो ।
पूछा--यहां कोई अफसर भी तो होगा?
गूदड़ ने कहा-हां, अफसर तो एक नहीं, पच्चीस हैं जी। सबमें बड़ा अफसर तो वही
मियांजी हैं, जो अमर भैया के दोस्त हैं।
| "तुम लोगों ने उस लफंगे से पूछा नहीं मारपीट क्यों करते हो, क्या यह भी कानून
है?''
गूदड़ ने सलोनी की मया की ओर देखकर कहा- भैया, कहते तो सब कुछ हैं, जये
कोई सुने ! सलीम साहब ने खुद अपने हाथों से इंटर मारे। उनकी बेदर्दी देखकर पुलिस वान्ने<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:459}}</noinclude>कर्मभूमि : 459
भी दांतों तले उंगली दबाते थे। सलोनी मेरी भावज लगती है। उसने उनके मुंह पर थूक दिया
था। यह उसे न करना चाहिए था। पागलपन था और क्या? मियां साहब आग हो गए और बुदिया
को इतने हंटर जमाए कि भगवान् ही बचाए तो बचे। मुदा वह भी है अपनी धुन की पक्की,
हरेक हंटर पर गाली देती थी। जब बेदम होकर गिर पड़ी, तब जाकर उसका मुंह बंद हुआ।
चैया उसे काकी.-काकी करते रहते थे। कहीं से आवें. सबसे पहले काकी के पास जाते थे।
उठने लायक होती तो जरूर-से-जरूर आती।
आत्मानन्द ने चिढ़कर कहा-अरे तो अब रहने भी दे, क्या सब आज ही कह डालोगे?
पानी मंगवा, आप हाथ-मुंह धोए, जरा आराम करने दे, थके-मांदे आ रहे हैं वह देखो,
सलोनी को भी खबर मिल गई, लाठी टेकती चली आ रही है ।
सलोनी ने पास आकर कहा-कहां हा देवरजी, मावन में आने तो तुम्हारे साथ झूला
झलती, चले हो कातिक में । जिसका ऐसा सरदार र एप बेटा, उसे किसको डर और
किसकी चिंता ! तुम्हें देखकर सारा दु:ख भूल गई, देवरजी ।।
समरकान्त ने देखा-सलोनी की भारी दह मूज उठी है और साः। पर लहू के दाग
रकर कत्थई हो गए हैं। मुंह मूजा हुआ है। इस मुद्दे पर इतना क्रोध | उस पर विद्वान् बनता
है। उनकी आंखों में त्रिने उतर आया। हिंसा- विना मन में प्रचंड हो उठ। निर्बल क्रोध और
चाहे कुछ न कर सके, भगवान का बुबा जरूर लेता है। तुम अंत हो. अर्वशक्तिमान हो
ना के रक्षक हो और तुम्हारी आं के सामने यह अधेर | इस जगत का नियंता कोई नहीं
कोई दयामय भगवान मृरिट का वादा होता, तो यह अत्याचार न होता । अच्छे सर्वशक्तिमान
T! क्यों नरिपशाचों के हृदय में नहीं पैठ जात, या वहां तुमारी पहुंच नहीं हैं? कहते हैं, यह
पत्र भगवान् की लीला है। अच्छी नीला हे ! अगर तुम्हें इस व्यापार की खबर नहीं हैं, तो
*** सर्वव्यापी क्यों कहलाते हो।
| समरकान्त धार्मिक प्रवृत्ति के दिनों में। धर्म-ग्रंथों का अध्ययन किया था। भगवद्गीता
का नित्य पाठ किया करते थे, पर इसे ममय वह मारा धर्मज्ञान उन्हें पाखंर -या प्रतीत हुआ।
| वह उसी तरह उड़ खड़े हुए और पुछा- सलीम तो सदर में होगा?
आत्मानन्द ने कहा- आजकल त यहीं पड़ाव है। डाक बंगले में ठहरे हुए हैं।
"मैं जरा उनसे मिलेगा।''
''अभी वह क्रोध में हैं, आप मिलकर क्या कीजिए। आपको भी अपशब्द कह
न।''
“यही देखने तो जाता हूँ कि मनुष्य को पशुता किस सीमा तक जा सकती है।''
'' तो चलिए, मैं भी आपके साथ चलता हूं।''
गृदड़ बोल उठे-नहीं-नहीं, तुम न जइयो, स्वामीजी भैया, इ हैं तो संन्यासी और
दया के अवतार, मुदा क्रोध में भी दुर्वासा मुनि से कम नहीं हैं। जब हाकिम साह ? सलोनी
की मार रहे थे, तब चार आदमी इन्हें पकड़े हुए थे, नह। उस बखत मियां का खून चूस
नते, चाहे पीछे से फांसी हो जाती। गांव भर की मरहम-पट्टी इन्हीं के सुपुर्द है।
सलोनी ने समरकान्त का हाथ पकड़कर कहा-मैं चलूंगी तुम्हारे साथ देवरजी। उसे
दिखा दूगी कि बुदिया तेरी छाती पर मूंग दलने को बैठी हुई है । तू मारनहार है, तो कोई तुझसे
बेड़ा रोखनहार भी है। जब तक उसका हुकम न होगा, तू क्या मार सकेगा ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|460:प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude>
भगवान् में उसकी यह अपार निष्ठा देखकर समरकान्त की आंखें सजल हो गईं, सोचा
-मुझसे तो ये मूर्ख ही अच्छे जो इतनी पीड़ा और दु:ख सहकर भी तुम्हारा ही नाम रटते हैं।
बोले-नहीं भाभी, मुझे अकेले जाने दो। मैं अभी उनसे दो-दो बातें करके लौट आता हूं।
सलोनी लाठी संभाल रही थी कि समरकान्त चल पड़े। तेजा और दुरजन आगे-आगे
डाक बंगले का रास्ता दिखाते हुए चले।
तेजा ने पूछा-दादा, जब अमर भैया छोटे-से थे, तो बड़े शैतान थे न?
समरकान्त ने इस प्रश्न का आशय न समझकर कहा-नहीं तो, वह तो लड़कपन ही
से बड़ा सुशील था।
दरजन ताली बजाकर बोला- अब कहो तेज, हारे कि नहीं? दादा, हमारी-इनका यह
झगड़ा है कि यह कहते हैं, जो लड़के बचपन में बड़े शैतान होते हैं, वही बड़े होकर सुशील
हो जाते हैं, और मैं कहता हूं, जो लड़कपन में सुशील होते हैं, वही बड़े होकर भी सुशील
रहते हैं। जो बात आदमी में है नहीं वह बीच में कहां से आ जाएगी?
तेजा ने शंका की-लड़के में तो अकल भी नहीं होती, जवान होने पर कहां से आ जाती
है? अखुवे में तो खाली दो दल होते हैं, फिर उनमें डाल-पात कहां से आ जाते हैं? यह कोई
बात नहीं। मैं ऐसे कितने ही नामी आदमियों के उदाहरण दे सकता हैं, जो बचपन में बड़े पाजी
थे, पर आगे चलकर महात्मा हो गए।
समरकान्त को बालकों के इस तर्क में बड़ा आनंद आया। मध्यस्थ बनकर दोनों ओर
कुछ सहा त ज थे। रास्ते में एक जगह कीचड़ भरा हुआ था। समरकान्त के जूते कीचड़
में फंसकर पांव से निकल गए। इस पर बड़ी हंसी हुई।।
सामने से पांच सवार आते दिखाई दिए। तेजा ने एक पत्थर उठाकरे एक सवार प
निशाना मारा। उसकी पगड़ी जमीन पर गिर पड़ी। वह तो घोड़े से उतरकर पगड़ी उठाने लगा.
बाकी चारों घोड़े दौड़ाते हुए समरकान्त के पास आ पहुंचे।
| तेजा दौड़कर एक पेड़ पर चढ़ गया। दो सवार उसके पीछे दौड़े और नीचे से गालिया
देने लगे। बाकी तीन सवारों ने समरकान्त को घेर लिया और एक ने हंटर निकालकर ऊपर
उठाया ही था कि एकाएक चौंक पड़ा और बोला-अरे ! आप हैं सेठजी । आप यहां कहा?
सेठजी ने सलीम को पहचानकर कहा–हां-हां, चला दो हंटर, रुक क्यों गए? अपनी
कारगुजारी दिखाने का ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? हाकिम होकर गरीबों पर हंटर न चला,
तो हाकिमी किस काम की?
सलीम लुज्जित हो गया-आप इन लौंडों की शरारत देख रहे हैं, फिर भी मुझी का
कसूरवार ठहराते हैं। उसने ऐसा पत्थर मारा कि इन दारोगाजी की पगड़ी गिर गई। खैरियत हुई
कि आंख में न लगा।
| समरकान्त आवेश में औचित्य को भूलकर बोले-ठीक तो है, जब उस लडे ने पत्थर
चलाया, जो अभी नादान है, तो फिर हमारे हाकिम साहब जो विद्या के सागर हैं, क्या हंटर
भी न चलाएं ? कह दो दोनों सवार पेड़ पर चढ़ जाएं, लौंडे को ढकेल दें, नीचे गिर पड़े। मर
जाएगा, तो क्या हुआ, हाकिम से बेअदबी करने की सजा तो पा जाएगा।
| सलीम ने सफाई दी–आप तो अभी आए हैं, आपको क्या खबर यहां के लोग कितने
मुफसिद हैं? एक बुढ़िया ने मेरे मुंह पर थूक दिया, मैंने जब्त किया, वरना सारा गांव जेल<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:461}}</noinclude>कर्मभूमि : 46i
में होती।
समरकान्त यह बमगोला खाकर भी परास्त न हुए-तुम्हारे जब्त की बानगी देखे ॥
रहा हूँ बेटा, अब मुंह न खुलवाओ। वह अगर जाहिल बेसमझ औरत थी, तो तुम्हीं ने आलिम-
फाजिल होकर कौन-सी शराफत की? उसकी सारी देह लहू-लुहान हो रही है। शायद बचेगी
भी नहीं। कुछ याद है कितने आदमियों के अंग-भंग हुए? सब तुम्हारे नाम की दुआएं दे रहे
हैं। अगर उनसे रुपये न वसूल होते थे, तो बेदखल कर सकते थे, उनकी फसल कुर्क कर सकते
थे। मार-पीट को कानूनी कहां से निकला?
| "बेदखली से क्या नतीजा, जमीन का यहां कौन खरीददार है? आखिर सरकारी रकम
कैसे वसूल की जाए।
"तो मार डालो सारे गांव को, देखो कितने रुपये वसूल होते हैं। तुमसे मुझे ऐसी आशा
न थी, मगर शायद हुकूमत में कुछ नशा होता है।''
| "आपने अभी इन लोगों को बट्माशी नहीं देखी। मेरे साथ आए तो मैं सारी दास्तान
सुनाऊ आप इस वक्त आ कहां से रहे हैं?''
| समरकान्त ने अपने लखनऊ आने और सुखदा से मिलने का हाल कही। फिर मतलब
की बात छेडी--अमर तो यहीं होगा? मुना, तीसरे देरजे में रखा गया है।
अंधेरा ज्यादा हो गया था। कुछ ठंडे भी पड़ने लगी थी। चार मवार तो गांव की तरफ
चले गए, सलीम घोर्ड की रस थामे हुए पांव-पांव समरकान्त के साथ डाक बंगले चला।
कुछ दूर चलने के बाद समरकान्त बोले-तुमने दोस्त के साथ खूब दोस्ती निभाई। जेल
भेज दिया, अच्छा किया, मगर कम-से-कम उसे कोई अच्छा दरजा तो दिला देते। मगर
हाकिम ठहरे, अपने दोस्त की सिफारिश कैसे करते?
सलीम ने व्यथित कंठ से कहा-आप तो लालाजी, मुझी पर सारा गुस्सा उतार रहे हैं।
मैंने तो दूसरा दर्जा दिला दिया था, मगर अमर खुद मामूली कैदियों के साथ रहने पर जिद
करने लगे. तो मैं क्या करता? मेरी बदनसीबी है कि यहां आते ही मुझे वह सब कुछ करना
पड़ा, जिससे मुझे नफरत थी।
डाक बंगले पहुंचकर सेठजी एक आरामकुरसी पर लेट गए और बोले-तो मेरा यहां
आना व्यर्थ हुआ। जब वह अपनी खुशी से तीसरे दरजे में है, तो चारी है। मुलाकात हो
जाएगी?
सलीम ने उत्तर दिया- मैं आपके साथ चलूंगा। मुलाकात की तारीख तो अभी नहीं आई
है, मगर जेल वाले शायद मान जाएं। हां, अंदेशा अमर की तरफ से है। वह किसी किस्म की
रिआयत नहीं चाहते।
उसने जरा मुस्कराकर कहा-अब तो आप भी इन कामों में शरीक होने लगे?
सेठजी ने नम्रता से कहा-अब मैं इस उम्र में क्या काम करूंगा। बूढे दिल में जवानी
को जोश कहां से आए? बहू जेल में है, लड़का जेल है, शायद लड़की भी जल की तैयारी
कर रही है और मैं चैन से खाता-पीता हूं। आराम से सोता हूं। मेरी औलाद मेरे पापों का
प्रायश्चित कर रही है, मैंने गरीबों का कित्तुना खून चूसा है, कितने घर तबाह किए हैं। उसकी
याद करके खुद शर्मिदा हो जाती हैं। अगर जवानी में मसझ आ गई होती, तो कुछ अपना सुधार
करता। अब क्या करूंगा? बाप संतान का गुरु होता है। उसी के पीछे लड़के चलते हैं। मुझे<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|462 : प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude>
अपने लड़कों के पीछे चलना पड़ा। मैं धर्म की असलियत को न समझकर धर्म के स्वांग को
धर्म समझे हुए था। यही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। मुझे तो ऐसा मालूम होता है।
कि दुनिया का कैंडा ही बिगड़ा हुआ है। जब तक हमें जायदाद पैदा करने की धुन रहेगी, हम
धर्म से कोसों दूर रहेंगे। ईश्वर ने संसार को क्यों इस ढंग पर लगाया, यह मेरी समझ में नहीं
आता। दुनिया को जायदाद के मोह-बंधन से छुड़ाना पड़ेगा, तभी आदमी आदमी होगा, तभी
दुनिया से पाप का नाश होगा।
सलीम ऐसी ऊंची बातों में न पड़ना चाहता था। उसने सोचा–जब मैं भी इनकी तरह
जिंदगी के सुख भोग लगा तो मरते-समय फिलासफर बन जाऊंगा। दोनों कई मिनट तक
चुपचाप बैठे रहे। फिर लालाजी स्नेह से भरे स्वर में बोले-नौकर हो जाने पर आदमी को
मालिक का हुक्म मानना ही पड़ता है। इसकी मैं बुराई नहीं करता। हां, एक बात कहूंगा। जिन
पर तुमने जुल्म किया है, चलकर उनके आंसू पोंछ दो। यह गरीब आदमी थोडी-सी भलमन
से काबू में आ जाते हैं। सरकार की नीति तो तुम नहीं बदल सकते, लेकिन इतना तो कर सके.'
हो कि किसी पर बेजा सख्ती न करो।
सलीम ने शरमाते हुए कहा--लोगों को गुस्ताखी पर गुस्सा आ जाता है, वरना मैं तो -
नहीं चाहता कि किसी पर सख्ती करू। फिर सिर पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी हैं। नगरान ।
वसूल हुआ, तो मैं कितना नालायक समझा जाऊंगा?
समरकान्त ने तेज होकर कहा-तो बेटा, लमान तो न वसूल होगा, ह आदमयों के ?
से हाथ रंग सकते हो।।
''यही तो देखना है।''
'देख लेना। मैंने भी इसी दुनिया में बाल सफेद किए हैं। हमारे किमान अफस
सूरत से कांपते थे, लेकिन जमाना बदल रहा है। अब उन्हें भी मान-अपमान को ख़या हो ।
है। तुम मुफ्त में बदनामी उठा रहे हो।'
''अपना फर्ज अदा करना बेदनामी है, तो मुझे उसको परवाह नहीं।''
समरकान्त ने अफसरों के इस अभिमान पर हंसकर कहा-फर्ज में थोड़ी ..मी मि.
मिला देने से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, हां, बन बहुत कुछ जाता है, यह बेचारे कि । ।
ऐसे गरीब हैं कि थोड़ी-सी हमदर्दी करके उन्हें अपना गुलाम बना सकते हो। हुकमत वह ३ ।
छ भलमनमो का बरताव चाहते हैं। जिस ओरत को तुम्मन हंटरों से मार, ३
एक बार माता कहकर उसकी गरदन काट सकते थे। यह मन मुमझा कि तुम उन पर हुक
करने आए हो। यह समझो कि उनकी सेवा करने आए हो । मान लिया, तुम्हें तलब मक
से मिलती है, लेकिन आती तो है इन्हीं की गांठ में। कोई मूर्ख हो तो उसे समझाऊँ। तुम भगवः ।
की कृपा से आप ही विद्वान् हो। तुम्हें क्या समझाऊ? तुम पुलिस वालों की बातों में भी ।
यही बात है न?
सलीम भला यह कैसे स्वीकार करता?
लेकिन समरकान्त अड़े रहे- मैं इसे नहीं मान सकता। तुम तो किसी से नज़र नहीं नन्।
चाहते, लेकिन जिन लोगों को रोटियां नोच-खसोट पर चलती हैं। उन्होंने जरूर हुम्हें भरा हो ।
तुम्हारा चेहरा कहे देता है कि तुम्हें गरीबों पर जुल्म करने का अफसोस है। मैं यह तो ना!
चाहता कि आठ आने से एक मई भी ज्यादा वसूल करो, लेकिन दिलजोई के साथ तुम 7<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:463}}</noinclude>कर्मभूमि : 463
भी वसूल कर सकते हो। जो भूखों मरने हैं, चिथड़े पहनकर और पुआल में सोकर दिन काटने
हैं उनसे एक पैसा भी दबाकर लेना अन्याय है। जब हम और तुम दो-चार घंटे आरमि से कम
करके आराम से रहना चाहते हैं, जासटें बनाना चाहते हैं, शौक की चीजें जमा करते हैं, तो
क्या यह अन्याय नहीं है कि जो लोग मंत्री -बच्च ममत अठारह घंटे रोज काम करें, वह रोटी--
कपड़े को तरसे? बेचारे गरीब हैं, वेजबान हैं, अपने को संगठित नहीं कर सकते, इमलिए सभी
छोटे-बड़े उन पर रोब जमाते हैं। मगर तुम जैम सहदट और विद्वान् लोग भी वही करने लगे,
जो मामनी अमले करते हैं, तो अफसोस होता है। अपने साथ किसी को मन लो, मी माध
चलो। मैं जिम्मा लेता हूं कि कोई तुम गुप्ताबी न करे। उनके जख्म पर मरहम रख दो,
में इतना ही चाहता है। जब तक नि बार तुम्हें याद करते। पदभाव में मम्भाहन को
सा अमर होता है।
सलीम का हृदय अभी इन्-ना कन! न ह ४ कि 'द पर क्राईम ही ; चन्दतः।
पकचाता हु अ बोला--रि तरफ से आए हैं? को 47 पड़ा।
"हा हांयह सब में कह दूंगा, भकिन ; न हा, मैं उधर चलू इधर तुम हटरबाजी
शुरू करो।'
“अब ज्यादा शर्मिदः न कीnि।'
न राष्ट्र तजवीज क्यों नही करते हैं, माघ का ग्लन १ ३ का जाय। अगर
बंद करके हुक्म मानन म्हारा काम हां, हमें अपना मन तो कर ना + 4 बईमाफी
न नहीं कर रहे हो? तुम्न ग्बुद र रिपो २ नहीं लिखते? मुमकिन है हुक्माम इसे पसंद
- करं, लेकिन हक के लिए कुछ नपान नाना पट्ट. तो क्या न्त्रता?''
सन्म को यह बातें न्याय मात्र न पड़ी। र' की पत्नी नोक जर्मन के अंदर पहुच
चुकी थी। बा.-३म बुजुर्गाना माह के लिए आपका एहसानमंद है और उस पर अमल करन
की कोशिश की ।
भोजन की ममय आ गया है। लोम् न - आपके लिए क्या ना जनवाउ,
" जो चाहे बनवाओ, पर टा यद वो कि में हिन्दू है और इरान जभान का आदमी
है। अभी तक इन छात को मान! ।'
"शप कृत - छान को अन्छा मुन्नत हैं
" अन्डा ना नहीं ममता पर पता है।''
''तव मानते ही क्यों है?''
"मला कि संस्कारों को मिटा मुश्किल हैं। अगर जरूरत पड़े, तो में जम्हारा मन
उठाकर फेंक देगा, लेकिन तुम्हारो थाली में मुझस ने खाया जाएगा।''
*' में तो आज आपको अपने साथ बेटा खिला?''
'तुम प्याज़, मास, अंई खाते हो। मुझसे जो उन बातों में वाया ही न जाएगा।''
"आप गह सब कुछ न खाएगई मगर मर साथ बेटना पड़ेगा। मैं रोज साबुन लगाव
नहाता है।''
''वरतों को खूब साफ कर लेनः।''
"आपका खाना हिन्दु बनाएगा, उहब ! बस एक मेज पर बैठकर खा लेना।''
"अच्छा खा लूंगा, भाई । में दृध और घी सृव रखता है।''<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|464:प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude>सेठजी तो संध्योपासन करने बैठे, फिर पाठ करने लगे। इधर सलीम के साथ के एक
हिन्दु कांस्टेबल ने पूरी, कचौरी, हलवा, खीर पकाई। दही पहले ही से रखा हुआ था। सलीग
खुद आज यही भोजन करेगा। सेठजी संध्या करके लौटे, तो देखा दो कंबल बिछे हुए हैं और
थालियां रखी हुई हैं। ।
सेठजी ने खुश होकर कहा-यह तुमने बहुत अच्छा इन्तजाम किया।
सलीम ने हंसकर कहा--मैंने सोचा, आपका धर्म क्यों लें, नहीं एक ही कंबल रखती।
''अगर यह खयाल है, तो तुम मेरे कंबल पर आ जाओ। नहीं, मैं ही आता हूं।''
वह धाली उठाकर सलीम के कंबल पर आ बैठे। अपने विचार में अजि उन्होंने अपने
जीवन का सबसे महानु त्याग किया। सारी संपत्ति दान देकर भी उनका हृदय इतना गौरवान्वित
न होता!
सलीम ने चुटकी ली–अब तो आप मुसलमान हो गए।
सेठजी बोले—मैं मुसलमान नहीं हुआ। तुम हिन्दू हो गए।
चार
प्रात:काल समकान्त और सलीम डाकबंगले से गांव की ओर चले। पहाड़ियों से नीली भाप
उठ रही थी और प्रकाश का हृदय जैसे किसी अव्यक्त वेदना से भारी हो रहा था। चारों और
सन्नाटा था। पृथ्वी किसी रोगों की मौत कोहरे के नीचे पड़ी सिहर रही थी। कुछ लोग बंदरों
की भाति छप्परों पर बैठे उसकी मरम्मत कर रहे थे और कहीं-कहीं स्त्रियो गोबर पाथ रही
थीं। दोनों आदमी पहले सलोनी के घर गए।
सलोनी की वो चढ़ा हुआ था और सारी देह फोड़े की भांति दख रही थी मगर उसे
गाने को धुन सवार थी-- :
सन्तो देखत जग बौराना।
सच कहो तो मारन घावे, झुठ जगत पतिआना, सन्तो देखत...
मनोव्यथा जब असह्य और अपार हो जाती है, जब उसे कहीं जाण नहीं मिलती; जब वह
रुदन और अंदन की गोद में भी आश्रय नहीं पाती, तो वह संगीत के चरणों पर जा गिरती है।
समरकान्त ने पकारा--भाभी, जरा बाहर तो आओ।
सलोनी चटपट उठकर पके बालों को घूघट से छिपाती, नवयौवना की भाँति लजाती
आकर खड़ी हो गई और पूछा--तुम कहां चले गए थे, देवरजी? ।
सहसा सलीम को देखकर वह एक पम पीछे हट गई और जैसे गाली दी-यह तो हाकिम
| फिर सिंहनी की भांति झपटक उसने सलीम को ऐसा धक्का दिया कि वह गिरते-
गिरते बचा, और जब तक समरकान्त उसे हटाएं-हटाएं, सलीम की गरदन पकड़कर इस तरह
दबाई, मानो पँट देगी।
सेठजी ने उसे बल-पुर्वक हटाकर कहा-पगला गई है क्या, भाभी? अलग हट जा,
सुनती नहीं?
सलोनी ने फटी-फटी प्रज्वलित आंखों से सलीम को घूरते हुए कहा-मार तो दिखा<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:465}}</noinclude>कर्मभूमि : 465
दं, आज मेरा सरदार आ गया है। सिर कुचलकर रख देगा ।
समरकान्त ने तिरस्कार भरे स्वर में कहा—सरदार के मुंह में कालिख नगा रही हो और
क्या? बूढी हो गई, मरने के दिन आ गए और अभी लड़कपन नहीं गया। यही तुम्हारा धर्म
है कि कोई हाकिम द्वार पर आए तो उसको अपमान करो ।
सलोनी ने मन में कहा-यह लाला भी ठकुरसुहाती करते हैं। लड़की पकड़ गया है न,
इसी से। फिर दुराग्रह से बोली-पूछो इसने सबको पीटा नहीं था?
सेठजी बिगड़कर बोले—तुम हाकिम होती और गांव वाले तुम्हें देखते ही लाठियां ले-
लेकर निकल आते, तो तुम क्या करतीं? जब प्रजा लड़ने पर तैयार हो जाय, तो हाकिम क्या
पूजा करे 1 अमर होता तो वह लाठी लेकर न दौड़ता? गांव वालों को लाजिम था कि हाकिम
के पास आकर अपना-अपना हाल कहते, अरज विनती करते, अदब से, नम्रती मे। यह नहीं
कि हाकम को देखा और मारने दौड़े, मानो वह तुम्हारा दुश्मन है। मैं इन्हें समझा-बुझाकर
लाया था कि मेल करा दें, दिलों की सफाई हो जाय, और तुम उनसे लड़ने पर तैयार हो गई।
यहां की हलचल सुनकर गांव के और कई आदमी जमा हो गए पर किसी ने सलीम
को सलाम नहीं किया। सेबकी त्यारियां चढी हुई थीं।।
समरकान्त ने उन्हें संबोधित किया-तुम्ही लोग मोची। यह साहब तुम्हारे हाकिम हैं।
जब रियाया हाकिम के साथ गस्ताखो करती हैं, तो हाकिम को भी कधि 37 जाय तो कोई
ताज्जुब नहीं। यह बेचारे तो अपने को हाकिम समझत ही नहीं। लेकिन इज्जन तो सभी चाहते
हैं. हाकिम हो या न हों। कोई आदमी अपनी बेइजती नहीं देख सकता। बोलो गदड़, कुछ
गलत कहता हूँ?
गूदड़ ने सिर झुकाकर कहा–नहीं मालिक, सच ही कहते हो। मुदा वह तो बावली है।
उसकी किसी बात का बरी न मानो। स्रबके मंह में कालिख लगा रही है और क्या।
“यह हमारे लड़के के बराबर हैं। अमर के साथ पढे, उन्हीं के माध खेले। तुमने अपनी
आंखों देखा कि अमर को गिरफ्तार करने यह अकेले आए थे। क्या सफर | क्या पुलिस
को भेजकर न पकड़वा सकते थे? सिपाही हुक्म पाते ही आते ओर धक्के दर बांध ले जाते।
इनकी शराफत थी कि खुद आए और किसी पुलिस को साथ न लाए। अमर ने भी यहो किया,
‘ो उसका धर्म था। अले आदमी को बेइज्जत करना चाहते तो क्या मश्किल था? अब तक
जी कुछ हुआ, उसका इन्हें रज हैं, हालांकि कसूर तुम लोगों का भी था? अब तुम भी पिछली
बातों को भूल जाओ। इनकी तरफ से अब किसी तरह की सख्ती न होगा। इन्हें तुम्हारी जायदाद
नो पाम करने का हुक्म मिलेगा, नीलाम करेगे गिरफ्तार करने का हुक्म पिलेगा रिफ्तार
करेंगे, तुम्हें बुरा न लगना चाहिए। तुम धर्म की लड़ाई लड़ रहे हो। लड़ाई नहीं, यह तपस्या
हैं। तपस्या में क्रोध और द्वेष आ जाता है, तो तपस्या भंग हो जाती है।''
स्वामीजी बोले-धर्म की रक्षा एक ओर से नहीं होती । सरकार नीति बनाने है। उसे
नीति की रक्षा करनी चाहिए। जब उसके कर्मचारी नीति का पैरों से कुचलते हैं, तो फिर जनता
कैसे नीति की रक्षा कर सकती हैं?
समरकान्त ने फटकार बताई-आप संन्यासी होकर ऐसा कहते हैं, स्वामीजी ! आपको
अपनी नीतिपरकता से अपने शासकों को नीति पर लाना है। यदि वह नीति पर ही होते, तो
आपको यह तपस्या क्यों करनी पड़ती? आप अनीति पर अनीति से नहीं, नीति से विजय<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|466 : प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude>
पा सकते हैं।
स्वामीजी का मुह जरा-सा निकल आया। जबान बंद हो गई।
सलोनी की पीडित हृदय पक्षी के समान पिंजरे से निकलकर भी कोई आश्रय खोज
रहा था। सज्जनता और मत्प्रेणा से भरा हुआ यह तिरस्कार उसके सामने जैसे दाने बिखेरन
लगा। पक्षी ने दो-चार बार गग्दन झुकाकर दानों को सतर्क नेत्रों से देखा, फिर अपने रक्षक,
को ‘ आ आ' करते सुना और पैर फैलाकर दान पर उतर आया।
सलोनी आखों में आसू भरे दोनों हाथ जोड़े, सलीम के सामने अाकर बोली -सरवार
मुझसे बड़ी रखता हो गई। माफी दीजिए। मुझे जूतो से पीटिए
सेठजी ने कहा—सरकार नही बेटा कहो।
*"बेटा मुझसे बड़ा अपराध हुआ। मृरख है बावली है। जो चाहें सजा दी।''
सलीम के युवा नत्र भी सजल हो गए। हुकमन का रोल और अधिकार का ३ ।
गया। बोला-माताजी मुझे शर्मिदा न करो। यह जितने लोग बड़हे में उन सबमें गै? "
यां नहीं है उन्को भी अपनी खेत 3 को मुफी चाना है ।
गृदट्ट ने कहा- हम तुम्हारे नाम है भैया लेकिन मृतु जो उ आदमी
तो क्यों इतनी बात होती?
भ्वामीजं ने मकान के कान में कहा मुझे नी सा जा रहा है कि " ।'
सनी ने अश्विानि दिगो कभी नहीं। नौकरी चाहे चला जाय पर तुम मा १ र
शरई अदमी है।
''तो क्या हम पूरी लगाने देना पड़ा?''
।' जब कुछ है ही नहीं, ! दा" का म?'
त्रामीजी अट तो भलाभ ने अर्को पटना के कान में कुछ कहा।
मेठजी मुस्कराकर बाल-यह य म नागर के दवा -दारू के लिए कि म ।
कर रह हे! ३ ) में मम नी मा कय दिन' है। रामो ? ३" ।
चलकर मुझसे कार्य ल ना।
र न कृतज्ञता को दबाने गा कह; 'भैया' पर मुग्न ३ क पद भी न । '
ममरकान्त बाले- यह मा मुन्ना कि यह मा म्पर्य है। मैं अपने बाप त घर छ ।
लय। नदी में ना हो गला दबा नि ६ वह न लौटा रहा है।
| गाव जहामियप्पा या इ ! था वा निक नजर आने ल ! । कमि 1 /
म हुन्न यः हो ।
पांच
अमाकान्त झा "जन में राज जि का समाचार किमी-न-किमी तरह मिल आता था। 1 217।
दिन मार-पीट और अग्रकार की उर्वर पिन उपके क्रोध का वगपार न रहा और में ।
बुझकर राख हो जाती है। श्री दा के बाद क्रोध की जगह केवल नैराश्य रह गया। लगा।
रोन-पीटने के दर्द भई हाय राय जैम भूमान् हा उपक सामने सिर पीट रही थी। ॐ '
हए घरों की नट जैसे उसे मुन्नमा आनी थी। वह सा भपण दुश्य कल्पनातति हो<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:467}}</noinclude>कर्मभूमि :467
सर्वनाश के समीप जा पहुंचा था और इसकी जिम्मेदारी किस पर थी? रुपये तो यों भी वसूल
किए जाते, पर इतना अत्याचार तो न होता, कुछ रिआत तो की जाती। मरकार इस विद्रोह
के बाद किसी तरह भी गर्मी का बर्ताव न कर सकती थी, लेकिन कृपया न दे सकना तो किसी
मनुष्य का दोष नहीं ! यह मंदी की बला कहां से आई, 'कन जाने? ग्रह ना एसा ही है कि
आंधी में किसी को छपर उड़ जाए और सरकार में दंड दे। यह न किसके हित के
लिए हे? इसका उद्देश्य क्या हैं?
इन विचारों में तंग आकर उसने नैराश्य में मुंह छिपाया। अत्याचार हो रहा है। होने दी।
मैं क्या करू) कर ही क्या सकता है। में कौन है? मुझसे मनवा कमजोरी के भाग्य में जय
तन्क मार खाना लिखी है, मार खाएंगे। में हो यहा या फूलों की मेज पर साया हुआ हैं? अगर
संसार के मारे प्रारी प्रश) हो जाए, तो मैं या कर्जा कु रा , होग'। यह भी ईश्वर की
लीला है ! वाह रे तेरी लीनः । अगर ऐम ही लीना भी नई ग? अता है, तो दम दयामय
स्यां अनने ही 2 जबर्दम्त का उा {भा र २ , भ वाय रा?
जब सामने कोई विकट पमन्या 37: जानी , नी उफ! भन लिका की ओर झुक
जाना था। पर विश्व ग्वन हान, अव्यवस्थि, प्य ज्ञान दृतः ।।
उसने बान चटना शुरू किया ?किन भारत्र: मन क पा ? अपनय के हा
था- 'रई। 7।।, यि के बाल के ? ना पा रहा है। इस कदर के
कर पराका वन कार में रान दर्ग। पिर मनी के प्रति समर ! स्त्री हुई। म
सिपहियों न गिरफ्तार कर यो में आप च निरा न स ह उनके मुंह में अनायास हा
निल्न --हाय 7 यह क्या करने र । न मन हो गया - चान बनगा:
। गत का 57 यह ः 3 में फिर वही ३न कान: ६ जा बना। इस सारी
*वन का भर अपन मिर पर ला = देव हा ग्र; इस पर कल के लिए
* पास कई =धन ? था। देशवः का हप्का केक इन मान का का एरित्या कर
दिया था और अथाह नन इवा " रा ४११ । ३ जना उम कमा निनक का सहारा
न न दर्त? थी। वह इधर "न' रहा है और अपने " " 'Yखा नि उणियों को किध
लिए जा रहा है ? 'सका स्यः अत् होगा? इस का धरा को कहीं चाँद *? झन्नुर है। वह
चाहता था, कहीं से अनाज आर. बड़े + । बन्दै अ'' पर ध। रास्ता है पर चारों
तरफ निंत्रि, मन का था। कडी में कोई आज ना तो कई प्रकाश नहीं मिलता।
जब वह वयं 33धकार में डा हुआ हैं वयं भी पता अपने स्व: की शीतल छाया है,
या विवंम की भीषण ज्वाला, न इसे का अधिकार ? कि इन प्राणियों की जान अफ़त
में डाले। 'इभी भनिम्पिक पराभव की दशा में उसई अत:कर' में निकला :-ईश्वर, मु प्रकाश
दा, मुझे उबारी। और वह रोने लगा।
मुह का वक्त था, केंदियों की हाजिर हो गई थी। अपर का मन कुछ शांत था। वह
प्रचंड़े आवेग शांत हो गया था और आकाश में आ गई गई बैठ गई थी। ये ; साफ-साफ
दिखाई देने लगी थी। अमर मन में पिछली घटना की आलोचना कर रहा था। कारण और
कार्य के सत्रों को मिलाने की चेष्टा करते हा सहसा उसक ठकिर- सी लगी-नैना का यह
पत्र और सुखदा की गिरफ्तारी। इसी से तो वह आवेश में आ गया था और समझौते का मुसाध्य
मार्ग छोड़कर उस दुर्गम पथ की ओर झुॐ पड़ा था। इस ठोकर ने जैसे उसकी आंखें खोल<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|468:प्रेमचंद रचनावली-5||}}</noinclude>
दीं। मालूम हुआ, यह यश-लालसा का, व्यक्तिगत स्पर्द्ध का, सेवा के आवरण में छिपे हुए
अहंकार का खेल था। इसे अविचार और आवेश का परिणाम इसके सिवा और क्या होता?
अमर के समीप एक कैदी बैठा बाने बट रहा था। अमर ने पूछा-तुम कैसे आए, भई?
उसने कौतूहल से देखकर कहा–''पहले तुम बताओ।''
"मुझे तो नाम की धुन थी।''
"मुझे धन की धुन थी ।'
उसी वक्त जेलर ने आकर अमर से कहा-तुम्हारी तबादला लखनऊ हो गया है। तुम्हारे
बाप आए थे। तुमसे मिलना चाहते थे। तुम्हारी मुलाकात की तारीख न थी। साहब ने इंकार
कर दिया।
अमर ने आश्चर्य से पूछा–मेरे पिताजी यहां आए थे?
''हां-हां, इसमें ताज्जुब की क्या बात है? मि. सलीम भी उनके साथ थे।'
''इलाके की कुछ नई खबर?''
''तुम्हारे बाप ने शायद सलीम साहब को समझाकर गांव वालों से मेल करा दिया है।
शरीफ आदमी हैं, गांव वालों के इलाज वगैरह के लिए एक हजार रुपये दे दिए।''
अमर मुस्कराया।
'उन्हीं की कोशिश से तुम्हारा तबादला हो रहा है। लखनऊ में तुम्हारी बीवी भी आ
गई हैं। शायद उन्हें छ: महीने की सजा हुई है।''
| अमर खड़ा हो गया-सुखदा भी लखनऊ में है।
अमर को अपने मन में विलक्षण शांति का अनुभव हुआ। वह निराशा कहां गई? दुर्बलता
कहीं गई?
| वह फिर बैठकर बान बटने लगा। उसके हाथों में आज गजब की फुर्ती है। ऐसा
कायापलट । ऐसा मंगलमय परिवर्तन ! क्या अब भी ईश्वर की दया में कोई संदेह हो सकता
है? उसने काटे बोए थे। वह सब फुल हो गए।
सुखदा आज जेल में है। जो भोग-विलास पर आसक्त थी, वह आज दोनों की सेवा
में अपना जीवन सार्थक कर रही है। पिताजी, जो पैसों को दांत से पकड़ते थे; वह आज
परोपकार में रत हैं। कोई दैवी शक्ति नहीं है तो यह सब कुछ किसको प्रेरणा से हो रहा है।
उसने मन को संपूर्ण श्रद्धा से ईश्वर के चरणों में वंदना की। वृह भार, जिसके बोझ
से वह दबा जा रहा था, उसके सिर से उतर गया था। उसको देह हल्की थी, मन हल्का था
और आगे आने वाली ऊपर को चढ़ाई, मानो उसका स्वागत कर रही थी।
अमरकान्त को लखनऊ जेल में आए आज तीसरा दिन है। यहां उसे चक्की का काम दिया
गया है। जेल के अधिकारियों को मालूम है, वह धनी का पुत्र है, इसलिए उसे कठिन परिश्रम
देकर भी उसके साथ कुछ रिआयत की जाती है।
| एक छप्पर के नीचे चक्कियों की कतारें लगी हुई हैं। दो-दो कैदी हरेक चक्की के पास
खड़े आटा पीस रहे हैं। शाम को आटे की तौल होगी। आटा कम निकला तो दंड मिलेगा।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:469}}</noinclude>कर्मभूमि : 469
अमर ने अपने संगी से कहा-जरा ठहर जाओ भाई, दम ले , मेरे हाथ नहीं चलते।
क्या नाम है तुम्हारा? मैंने तो शायद तुम्हें कहीं देखा है।
संगी गठीला, काला, लाल आंखों वाला, कठोर आकृति का मनुष्य था, जो परिश्रम से
थकना न जानता था। मुस्कराकर बोला-मैं वही काले खां हैं, एक बार तुम्हारे पास सोने के
कड़े बेचने गया था। याद कगे लेकिन तुम यहां कैसे आ फंसे, मुझे यह ताज्जुब हो रहा है।
परसों से ही पूछना चाहता था पर सोचता था, कहीं धोखा न हो रहा हो।
अमर ने अपनी कथा संक्षेप में कह सुनाई और पूछा-तुम कैसे आए?
काले खां हंसकर बोला-मेरी क्या पृछते हो लाला, यहां तो छ: महीने बाहर रहते हैं,
तो छ: सील भीतर। अब तो यही आरजू है कि अल्लाह यहीं से बुला ले। मेरे लिए बाहर रहना
मुसीबत है। सबको अच्छा-अच्छा पहनते, अच्छा- अच्छा खाते देखता हूं, तो हसद होता है,
पर मिले कहां से? कोई हुनर आता नहीं, इलम है नहीं। चोरी न करू, डाक न मारू. तो खाऊ
क्या? यहां किसी से हसद नहीं होता, न किमी को अच्छा पहनते देखता हूं, न अच्छा खते।
सब अपने ही जैसे हैं, फिर डाह और जलन क्यों हो? इसीलिए अल्लाहताला से दुआ करती
हूं कि यहीं से बुला ले। छूटने की आरजू नहीं है। तुम्हारे हाथ दुख गए हो तो रहने दो। मैं अकेला
ही 'पीस डालेगा। तुम्हें इन लोगों ने यह काम दिया ही क्यों? तुम्हारे भाई-बंद तो हम लोगों
से अलग, । " से रखे जाते हैं। तुम्हें यहां क्यों डाल दिया? हट जाओ।
अमर ने चक्की की मुठिया जोर से पकड़कर कहा--नहीं-नहीं, मैं थका नहीं है। दो--
चार दिन में आदत पटु जाएगी, तो तुम्हारे बराबर काम करूगा।।
कारने खां ने उसे पीछे हटाते हुए कहा–मगर यह तो अच्छा नहीं लगता कि तुम मेरे
साथ चक्को पोम्यो। तुमने जुर्म नहीं किया है। रिआया के पीछे सरकार से लड़े हो, तुम्हें में
न पीसने दूंगा। मालूम होता है तुम्हारे लिए ही अल्लाह ने मुझे यहां भेजा है। वह तो बड़ा
कारसाज आदमी हैं। उमकी कुदरत कुछ समझ में नहीं आती। आप ही आदमी से बुराई
करवाता है, आप ही उसे सजा देता है, और आप ही उसे मुआफ कर देता है।
अमर ने आपत्ति की-बुराई खुदा नहीं करात', हम खुद कर *
काले खां ने ऐसी निगाहों में उसकी ओर देखा, जो कह रही थी, तुम इस रहस्य को
अभी नहीं समझ सकते-ना-ना, मैं यह नहीं मानूंगा। तुमने तो पढ़ा होगा, उसके हुक्म के बगैर
एक पता भी नहीं हिल सकता, बुराई कौन करेगा सब कुछ वही करवाता है, और फिर माफ
भी कर देता है। यह मैं मुंह से कह रहा हूं। जिस दिन मेरे ईमान में यह बात जम जाएगी, उसी
दिन बुराई बंद हो जाएगी। तुम्हीं ने उस दिन मुझे वह नसीहत सिखाई थी। मैं तुम्हें अपना
पीर समझता हूँ। दो सौ की चीज तुमने तीस रुपये में न ली। उसी दिन मुझे मालूम हुआ, बदी
क्या चीज है। अब सोचता हूं. अल्लाह को क्या मुंह दिखाऊंगा? जिंदगी में इतने गुनाह किए
हैं कि जब उनकी याद आती है, तो रोए खड़े हो जाते हैं। अब तो उसी की ९०मी का भरोसा
है। क्यों भैया, तुम्हारे मजहब में क्या लिखा है? अल्लाह गुनहगारों को मुआई कर देता है?
काले खां की कठोर मुद्रा इस गहरी, सजीव, सरल भक्ति से प्रदीप्त हो उठी, आंखों
में कोमल छटा उदय हो गई। और वाणी इतनी मर्मस्पर्शी, इतनी आई थी कि अमर का हुदय
पुलकित हो उठा-सुनता तो हू खां साहब, कि वह बड़ा दयालु है।
| काले खां दूने वेग से चक्की घुमाता हुआ बोला-बड़ा दयालु है, भैया । मां के पेट में
बच्चे को भोजन पहुंचाता है। यह दुनिया ही उसकी रहीमी का आईना है। जिधर आंखें उठाओ,<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|470:प्रेमचंद रचनावली-5||}}</noinclude>
उसकी रहीमी के जलवे। इतने खूनी-डाकू यहां पड़े हुए हैं, उनके लिए भी आराम का सामान
कर दिया। मौका देता है, बार-बार मौका देता है कि अब भी संभल जावें। उसका गुस्सा कौन
सहेगा, भैया? जिस दिन उसे गुस्सा आवेगा, यह दुनिया जहन्नुम को चली जाएगी। हमारे-
तुम्हारे ऊपर वह क्यों गुस्सा करेगा? हम चींटी को पैरों तले पड़ते देखकर किनारे से निकल
जाते हैं। उसे कुचलते रहम आता है। जिस अल्लाह ने हमको बनाया, जो हमको पालता है,
वह हमारे ऊपर कभी गुस्सा कर सकता है? कभी नहीं।
अमर को अपने अंदर आस्था की एक लहरे-सी उठती हुई जान पड़ी। इतने अटल
विश्वास और सरल श्रद्धा के साथ इस विषय पर उसने किसी को बाते करते न सुना था। बात
वही थी, जो वह नित्य छोटे-बड़े के मुंह से सुना करता था, पर निष्ठा ने उन शब्दों में जान
सी डाल दी थी।
जरा देर बाद वह फिर बोला-भैया, तुमसे चक्की चलवाना तो ऐसे ही है, जैसे कोई
तलवार से चिड़िए को हलाल करे। तुम्हें अस्पताल में रखना चाहिए थी, बोमारी में दवा से
उतना फायदा नहीं होता, जितना मीठी बात से हो जाता है। मेरे सामने यहां कई कैदी बीमार
हुए, पर एक भी अच्छा न हुआ। बात क्या है? दवा कैदी के सिर पर पेटक दी जाती है, वह
चाहे पिए चाहे फेंक दें।
| अमर को इस काली-कलुटी काया में स्वर्ण-जैसा हृदय चमकता दीख पड़ा।
मुस्कराकर बोला–लेकिन दोनों काम साथ-साथ कैसे करूगा?
''मैं अकेला चक्की चला लूंगा और पूरा आटा तुलवा दूंगा।''
*तब तो सार! सवाब तुम्हीं को मिलेगा।''
काले खां ने साधु-भाव से कहा--भैया, कोई काम सवाब समझकर नहीं करना चाहिए।
दिल को ऐसा बना लो कि सवाब में उसे वहीं मजा आव, जो गाने या खेनने में आता है। कोई
काम इसलिए करना कि उममनजात मिलेगी, राजगार है, फिर मैं तुम्हें क्या समझाऊ । तुम
खुद इन बातों को मुझसे ज्यादा समझते हो। मैं तो मरीज की तीमारदारी करने के लायक हो
नहीं है। मुझे बड़ी जल्दी गुम्मा आ जाता हैं। कितना चाहता हूँ कि गुम्सी न आए, परे जहां
किसी ने दो-एक बार मेरी बातें न मानीं और मैं बिगड़ा।
वहीं इाक, जिसे अमर ने एक दिन अधमता के पैरों के नीचे लोटते देखा था, आज
देवल्व के पद पर पहुंच गया था। उसकी आत्मा से मानो एक प्रकाश-सा निकलकर अमर के
अंत:करण को अवलोकित करने लगा।
उसने कहा-लेकिन यह तो बुरा मालूम होता है कि मेहनत का काम तुम करो और मैं
काले खां ने बात कीटी-भैया, इन बातों में क्या रखा है? तुम्हारा काम इस चक्की से
कहीं कठिन होगा। तुम्हें किसी के बात करने तक को मुहलत न मिलेगी। मैं रात को मीठी
नींद सोऊंगा। तुम्हें रातें जागकर काटनी पड़ेंगी। जान•जोखिम भी तो है। इस चक्की में क्यों
रखा है? यह काम तो गधा भी कर सकती हैं, लेकिन जो काम तुम करोगे, वह विरले कर
सकते हैं।
सूर्यास्त हो रहा था। काले खां ने अपने पूरे गेहूं पीस इाले थे और दूसरे कैदियों के पास
जा-जाकर देख रहा था, किसको कितना काम बाकी है। कई कैदियों के गेहूं अभी समाप्त
नहीं हुए थे। जेल कर्मचारी आटा तौलने आ रहा होगा। इन बेचारों पर आफत आ जाएगी, मार<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:471}}</noinclude>कर्मभूमि : 47।
पड़ने लगेगी। काले खां ने एक-एक चक्की के पास जाकर कैदियों की मदद करनी शुरू की।
इसकी फुर्ती और मेहनत पर नागों को विस्मय होता था। आध घंटे में उसने फिड्डियों की
कमी पूरी कर दी। अमर अपना चक्की के पास खड़ा सेवा के पुतले को श्रद्धा - भरी आंखों
से देख रहा था, मानो दिव्य दर्शन कर रहा हो।
काले खां इधर से फुरसत पाकर नमाज पढ़ने लगा। वहीं बरामदे में उसने वजू किया,
अपना कबल जमीन पर बिछा दिया और नमाज शुरू की। उम्मी वक्त जेलर साहब चार वार्ड
के साथ आटा तुलवाने में पहुंचे। कैदियों ने अपना-अपना आटा बोरियों में भरा और तराजू
के पास आकर खड़ा हो गए। 3ाटा तुलने भग।।
जनर ने अमर से पूछा--तुम्हारा साथी कहा गया?
अमर ने बनाया, नमाज पढ़ रहा है।
* उसे बुलाओ। पहले आटा तुलवा ले, फिर नमाज पढे। बट्टा नमाज को दुम बना है।
कह गया है नमाज पढ़न?''
अमर ने शेड के पीछे की तरफ इशारा करके कहा..उन्हें नमाज़ इन दें, आप आटा
ल ले।
अलर यह रव देव मकना था कि को केटो ग सक्न नमाज पढ़ने जाय, जब जेल
*, साक्षात प्रभू पधार हों । गद के पछि नाक बन्न - अत्र से नमाज के बच्चे, आटा क्यों
नहीं तलवता? बचा, हि चचा 'गए हो । नऊ का हाना करने लग, चना चटपट, वरना
मारे हंटरों के चमड़ी उधेड़ दृगा।।
काले खां दूसरी ही दुनिया में था।
जेलर ने समीप जाकर अपनी ही उसकी पीठ में भने इराक -बहरा हो गया है।
क्या बै? शामते तो नहीं आई हैं ।
काले र नमाज में मग्न था। पीछे फिरकर भी न देखा।
जेलर ने इाल्नाक 'नात "पाई। काल मिजदे के लिए झुक टू , ' । लात खाकर
भी मुंह गिर पड़ा पर तरक्ष 'भलकर फिर शिद में झुक गया। जलर क द जिद पड़
गई कि उसकी नमाज बंद कर दे। एभव हे काले रखा को 2ी जिद पड़ गई हो कि नमाज पूरी
किए बगैर न उगा। वह जो मिजद में थी। जलर ने उसे बूटदार ठोकरें जम्मानो शुरू की, एक
यार ने नपककर दो गारद सिपाही बुला लिए। दूसरा जेलर साहेब को कुमक पर दाङ। काले
jां पर एक तरफ से टकरे पड़ रही थीं, दूसरी तरफ से लकडियां, पर वह सिजदे में सिर
7 उठाता था। हां, प्रत्येक आघात पर उसके मुंह से 'अल्लाह अकबर !' को दल हिला देने
त्रान्नी सदा निकल जाती थी। उधर अघातकारियों को उत्तेजना भी बढ़ती जाती थी। जेल का
कैदी जेल के बुदा को सिजदा न करके अपने खुद को सिजदा करे, इसे बड़ा जेलर साहब
का क्या अपमान हो सकता था। यहां तक कि काले खां के सिर से रुधिर बहने लगा। रकान्त
उसकी रक्षा करने के लिए चला था कि एक वाईर ने उसे मजबूती से पकड़ लिया। उधर बराबर
आघात हो रहे थे और काले खां बराबर 'अल्लाहो अकबर ।' की सदा लगाए जाता था। आखिर
वह आवाज क्षीण होते-होते एक बार बिल्कल बंद हो गई और काले खां रक्त बहने से शिथिल
है। गया। मगर चाहे किसी के कानों में आवाज न जाती हो, उसके होंठ अब भी खुले रहे
थे और अब भी 'अल्लाहो अकबर' को अन्य ध्वनि निकल रही थी।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४७२
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|472:प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude>जेलर ने खिसियाकर कहा-पड़ा रहने दो बदमाश को यहीं । कल से इसे बड़ी बेटी
दूंगा और तनहाई भी। अगर तब भी ने सीधा हुआ, तो उलटी होगी? इसपः। नमाजोपन निकाल
न दें तो नाम नहीं।
| एक मिनट में वार्डर, जेलर, सिपाही सब चले गए। कैदियों के भोजन का समय आया,
सब-के-सब भोजन पर जा बैठे। मगर काले खां अभी वहीं औंधा पड़ा था। सिर और नाक
तथा कानों से खून बह रहा था। अमरकान्त बैठा उसके घावों को पानी से धो रहा था और खुन
बंद करने का प्रयास कर रहा था। आत्मशक्ति के इस कल्पनातीत उदाहरण ने उसकी भौतिक
बुद्धि को जैसे आक्रांत कर दिया। ऐसी परिस्थिति में क्या वह इस भाति निश्चल और संयमित
बैठा रहता? शायदं पहले ही आधात में उसने गा तो प्रतिकार किया होता या नमाज छोड़कर
अलग हो जाता। विज्ञान और नीति और देशानुराग की वेदी पर बलिदानों की कमी नहीं। पर
यह निश्चल धैर्य ईश्वर-निष्ठा ही का प्रसाद है।
| कैदी भोजन करके लौटे। काले खां अब भी वहीं पड़ा हुआ था। सभी ने उसे उठाकर
बैरक में पहुंचाया और डॉक्टर को सूचना दी, पर उन्होंने रात को कष्ट उठाने की जरूरत न
समझी। वहां और कोई दवा भी न थी। गर्म पानी तक न मयस्सर हो सका।
उस बैरक के कैदियों ने रात बैठकर काटी। कई आदमी आमादा थे कि सुबह होते ही
जेलर साहब की मरम्मत की जाय। यही न होगा, साल-साल भर की मियाद और बढ़ जाएगी।
क्या परवाह | अमरकान्त शांत प्रकृति की आदमी था, पर इस समय वह भी उन्हीं लोगों में
मिला हुआ था। रात-भर उसके अंदर पर् और मनुष्य में इंद्व होता रहा। वह जानता था, आ
आग से नहीं, पानी से शांत होती है। इंसान कितना ही हैवान हो जाय उसमें कुछ न कुछ
आदमीयत रहती ही है। वह आदमीयत अगर जा सकती है, तो ग्लानि से, या पश्चताप से।
अमर अकेला होता, तो वह अब भी विचलित न होता, लेकिन सामुहिक आवंश ने उसे भी
अस्थिर कर दिया। समूह के साथ हम कितने हो ऐसे अच्छे-बुरे काम कर जाते हैं, जो हम
अकेले में कर सकते। और काले खां की दशा जितनी ही खराब होती जाती थी, उतनी ही
प्रतिशोध की ज्वाला भी प्रचंड होती जाती थी।
एक डाके के कैदी ने कहा-खून पी जाऊंगा, खुन । उसने समझा क्या है। यहीं न होगा,
फांसी हो जाएगी?
अमरकान्त बोला—उस वक्त क्या समझे थे कि मारे ही डान्नता है ।
षड्यंत्र रचा गया, आपातकारियों का चुनाव हुआ, उनका कार्य विधान
निश्चय किया गया। सफाई की दलीलें सोच निकाली गई। ।
सहसा एक ठिगने कैदी ने कहा-तुम लोग समझते हो, सवेरे तक उसे खबर नै हो
जाएगी?
अमर ने पूछा-खबर कैसे होगी? यहां ऐसा कौन है, जो उसे खबर दे दे?
| ठिगने कैदी ने दाएं-बाएं आंखें घुमाकर कहा-ख़नर देने वाले न जाने कहां से निकल
आते हैं, भैया? किसी के माथे पर तो कुछ लिखी नहीं, कौन जाने हम में से कोई जाकर इत्तिलो
कर दे? रोज ही तो लोगों को मुखबिर बनते देखते हो। वही लोग जो अगुआ होते हैं, अवसर
पड़ने पर सरकारी गवाह बन जाते हैं। अगर कुछ करना है, तो अभी कर डालो। दिन को वारदात
करोगे, सब-के-सव पकड़ लिए जाओगे। पांच-पांच साल की सजा दुक जाएगी।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४७३
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|||कर्मभूमि:473}}</noinclude>अमर ने संदेह के स्वर में पूछा-लेकिन इस वक्त तो वह अपने क्वार्टर में सो रहा होगा?
ठिगने कैदी ने राह बताई--यह हमारा काम है भैया, तुम क्या जानो?
सबों ने मुंह मोड़कर कनफुमकियों में बातें शुरू कीं। फिर पांचों आदमी खड़े हो गए।
ठिगने कैदी ने कहा-हममें से जो फूटे, उसे गऊ हत्या !
यह कहकर उसने बड़े जोर से हाय-हाय करना शुरू किया। और भी कई आदमी चीखने
चिल्लाने लगे। एक क्षण में वार्डर ने द्वार पर आकर पृछा-तुम लोग क्यों शोर कर रहे हो? क्या
बात है?
ठिगने कैदी ने कहा- बात क्या है, काले खां की हालत खराब है। जाकर जेलर साहब
को बुला लाओ। चटपट।
वार्डर बोला—वाह बे । चुपचाप पड़ा रह 1 बड़ा नवाब का बेटा बना है।
''हम कहते हैं जाकर उन्हें भेज़ दो, नहीं, ठीक नहीं होगा।''
काले खां ने आंखें खोलीं और क्षीण स्वर में बलिा-क्यों चिल्लाते हो यारो, मैं अभी
मग 'नहीं हू। जान पड़ता है, पीठ की हड्डी में चोट है।
| ठिगने कैदी ने कही-उसी को बदला चुकाने की तैयारी है पठान ।
| काले वा निरस्कार के स्वर में बोला-क्रिसम वदला चक्रा भाई, अल्लाह से?
अल्लाह की यही मरजी है, तो उसमें दृमरा कौन दखल दे सकता है? अल्लाह की मर्जी के
बिना कहीं एक पती भी हिल सकती है? जर मुझे पानी पिला दी। और देखो, जब मैं मर
जाऊ, तो यहां जितने भाई हैं, सब मेरे लिए खुदा से दुआ करना। और दुनिया में मेरा कौन
है? शायद तुम लोगों की दुआ से मेरी निजात । जाय।
अमर ने उसे गोद में संभालकर पानी पिलाना चाहा, मगर घंटे कंठ के नीचे न उतरा।
वहे जार में कराहकर फिर लेट गया।
ठिगने कैदी ने दांत पीसकर कहा--ऐसे बदमाम की गरदन तो उलटी छरी से काटनी
चाहिए ।
काले खां दीनभाव से रुक-रुककर बोला-क्यों मेरी नजात को द्वः बद करते हो,
भाई ! दुनिया तो बिगड़ गई, क्या आकबत भी बिगाड़ना चाहते हो? अल्लाह से दुआ करो,
सब पर रहम करे। जिंदगी में क्या कम गुनाह किए हैं कि मरने के पीछे पांव में बेड़ियां पड़ी
रहें । या अल्लाह, रहम करे।।
इन शब्दों में मरने वाले की निर्मल आत्मा मानो व्याप्त हो गई थी। बातें वही थीं, तो
रोज सुना करते थे, पर इस समय इनमें कुछ ऐसे द्रावक, कुछ ऐसी हिला देने वाली सिद्धि
थी कि सभी जैसे उसमें नहा उठे। इस चुटको भर राख ने जैसे उनके तापमय विकारों को शांत
कर दिया।
। प्रात:काल जब काले खां ने अपनी जीवन-लीला समाप्त कर दी तो ऐसा कोई कैदी
ने था, जिसकी आंखों से आंसू न निकल रहे हों, पर और को रोना दु:ख को धा, अपर को
रना सुख का था। औरों को किसी आत्मीय के खो देने का सदमा था, अमर को उसके और
ममीप हो जाने का अनुभव हो रहा था। अपने जीवन में उसने यही एक नवरत्न पाया था,
जिसके सम्मुख वह श्रद्धा से सिर झुका सकता था और जिससे वियोग हो जाने पर उसे एक
वरदान पा जाने का भान होता था।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:प्रेमचंद रचनावली ५.pdf/४७४
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="कन्हाई प्रसाद चौरसिया" />{{rh|474:प्रेमचंद रचनावली-5}}</noinclude>इस प्रकाश-स्तंभ ने आज उसके जीवन को एक दूसरी ही धारा में डाल दिया जहां
संशय की जगह विश्वास, और शंका की जगह सत्य मूर्तिमान हो गया था।
सात
लाला समरकान्त के चले जाने के बाद सलीम ने हर एक गांव का दौरा करके असामियों की
आर्थिक दशा की जांच करनी शुरू की। अब उसे मालूम हुआ कि उनकी दशा उससे कहीं
हीन है, जितनी वह समझे बैठा था। पैदावर का मूल्य लागत और लगाने से कहीं कम था।
खाने-कपड़े की भी गुंजाइश न थी, दूसरे खर्चे का क्या जिक्र? ऐसा कोई बिरला ही किसान
था, जिसका सिर ऋण के नीचे न दबा हो। कॉलेज में उसने अर्थशास्त्र अवश्य पढ़ा था और
जानता था कि यहां के किसानों की हालत खराब है, पर अब ज्ञात हुआ है कि पुस्तक-ज्ञान
और प्रत्येक्ष व्यवहार में वही अंतर है, जो किसी मनुष्य और उसके चित्र में है। ज्यों-ज्यों असली
हालत मालूम होती जाती थी, उसे असामियों से सहानुभूति होती जाती थी। कितनी अन्याय
है कि जो बेचारे रोटियों को मुंहताज हों, जिनके पास तुन ढकने को केवल चीथड़े हों, जो
बीमारी में एक पैसे की दवा भी न कर सकते हों। जिनके घरों में दीपक भी न जलते हों, उनमें
पूरा लगान वसूल किया जाए। जब जिंस मंहगी थी, तब किसी तरह एक जून रोटियां मिल
जाती थीं। इस मंदो में तो उनकी दशा वर्णनातीत हो गई है। जिनके लड़के पांच-छ: बरस की
उम्र से मेहनत-मजूरी करने लगे, जो ईंधन के लिए हार में गोबर चुनते फिरें, उनमें पूरा लगान
वसूल करना, मानो उनके मुंह से रोटी का टुकड़ा छीन लेना है, उनकी रक्त-हीन देह से खून
चूसना है।
परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान होते ही सलीम ने अपने कर्तव्य का निश्चय कर लिया। वह
उन आदमियों में न था, जो स्वार्थ के लिए अफसरों के हर एक हुक्म की पाबंदी करते हैं।
वह नौकरी करते हुए भी आत्मा की रक्षा करना चाहता था। कई दिन एकांत में बैठकर उसने
विस्तार के साथ अपनी रिपोर्ट लिखी और मि गजनवी के पास भेज दी। मि० गजनवी ने उसे
तुरंत लिखा-आकर मुझसे मिल जाओ। सलीम उनसे मिलना न चाहता था। डरती थी, कहीं
यह मेरी रिपोर्ट को दबाने का प्रस्ताव न करें, लेकिन फिर सोचा-चलने में हर्ज ही क्या है?
अगर मुझे कायल कर दें, तब तो कोई बात नहीं, लेकिन अफ़सरों के भय से मैं अपनी रिपोर्ट
को कभी न दबने दूंगा। उसी दिन वह संध्या समय सदर पहुंचा।
| मिः गजनवी ने तपाक से हाथ बढ़ाते हुए कहा–मिः अमरकान्त के साथ तो तुमने दोस्ती
का हक खुब अदा किया। वह खुद शायद इतनी मुफस्सिल रिपोर्ट न लिख सकते लेकिन तुम
क्या समझते हो, सरकार को यह बातें मालूम नहीं?
सलीम ने कहा-मेरा तो ऐसा ही ख़याल है। उसे जो रिपोर्ट मिलती है, वह खुशामदी
अहलकारों से मिलती है, जो रिआया का खून करके भी सरकार का घर भरना चाहते हैं। मेरी
रिपोर्ट वाकयात पर लिखी गई है।
दोनों अफसरों में बहस होने लगी। गजनवी कहता था-हमारा काम केवल अफसरों की
आज्ञा मानना है। उन्होंने लगान वसूल करने की आज्ञा दी। हमें लगाने वसूल करनी चाहिए।
प्रजा को कष्ट होता है तो हो, हमें इससे प्रयोजन नहीं। हमें खुद अपनी आमदनी का टैक्स<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२३
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|ब्रिटिश साम्राज्य||२१७}}</noinclude>रोडेशिया, स्वाज़ीलैएड; दक्षिण अफ्रिकी यूनियन; नाइजीरिया, गैम्बिया; गोल्ड-कोस्ट, सीराल्योन; सूदान, टंगान्यिका, दक्षिण-पश्चिमी अफ्रिका, कैमरून, टोगोलैएड ।
अमरीका—बरमुडास, कनाडा की डोमिनियन, फाकलैएड द्वीपसमूह, दक्षिण जार्जिया, बरतानवी गायना, बरतानवी होन्डुरास; न्यूफाउएडलैएड; लेब्राडर; बहामस; बारबाडस, जमैका; लीवार्ड द्वीपसमूह, ट्रिनीडाड, टुबागो, विएडवार्ड द्वीपसमूह ।
महासागरीय— आस्ट्रेलिया की कामनवैल्थ, पापुआ ( जिसे जनवरी १६४३ में जापान से वापस जीता चुका है ), न्यूजीलैंड, फीजी, प्रशान्त महासागर के द्वीपसमूह, न्यूगिनी, पश्चिमी समोआ, नौरू । इनमे
(१) स्वाधीन उपनिवेश— कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैएड, दक्षिण अफरीका, आयर (आयरिश स्वतंत्र राज्य), न्यूफाउन्डलैएड जिसका औपनिवेशिक पद १६३३ से स्थगित कर दिया गया है ।
(२) उपनिवेश अथवा अधीन साम्राज्य, जिसमे शाही नौ-आबादियॉ ( उपनिवेश ), संरक्षित राज्य तथा चिन्हाड्कित बिगत विश्वयुध्द के बाद, वार्सेई की सन्धि के अनुसार, शासनादेश द्वारा शासित देश ( Mandated Territories ) शामिल है ।
ब्रिटिश राष्ट्र-समूह एक विचित्र राजनीतिक रचना है । राजनीतिक अर्थ मे न वह राष्ट्र है और न संघ ही । उसका न कोई लिखित शासन-विधान है, न उसकी कोई पार्लमेन्ट है और न अपनी सरकार ही । न उसकी रक्षा करने-वाली केन्द्रिय सेना और न प्रबन्धक-शक्ति ही । वास्तव मे यह इतिहास और विकास की रचना है जो अपने आप बढी, योजना बनाकर उसका निर्माण नही किया गया,और जिसके सदस्यो के पारस्परिक सम्बन्ध अभी विकास की अवस्था मे हैं । स्वाधीन उपनिवेशो का विधान बरतानवी सरकार के द्वारा बना, लेकिन वास्तव मे कालक्रम द्वारा वह स्वाधीन बन गये । १६२६ तक वैस्टमिस्टर पार्लमेट समस्त साम्राज्य की सर्वोच्च धारासभा मानी जाती रही; वही अधिकार दे सकती और उन्हे वापस ले सकती थी । पिछले महायुध्द मे उपनिवेशो ने साम्राज्य को पूरी मदद दी और उपनिवेशो ने साम्राज्यान्तर्गत<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|ब्रिटिश साम्राज्य||२१७}}</noinclude>रोडेशिया, स्वाज़ीलैएड; दक्षिण अफ्रिकी यूनियन; नाइजीरिया, गैम्बिया; गोल्ड-कोस्ट, सीराल्योन; सूदान, टंगान्यिका, दक्षिण-पश्चिमी अफ्रिका, कैमरून, टोगोलैएड।
'''अमरीका'''—बरमुडास, कनाडा की डोमिनियन, फाकलैएड द्वीपसमूह, दक्षिण जार्जिया, बरतानवी गायना, बरतानवी होन्डुरास; न्यूफाउएडलैएड; लेब्राडर; बहामस; बारबाडस, जमैका; लीवार्ड द्वीपसमूह, ट्रिनीडाड, टुबागो, विएडवार्ड द्वीपसमूह।
'''महासागरीय'''—आस्ट्रेलिया की कामनवैल्थ, पापुआ (जिसे जनवरी १६४३ में जापान से वापस जीता चुका है), न्यूजीलैंड, फीजी, प्रशान्त महासागर के द्वीपसमूह, न्यूगिनी, पश्चिमी समोआ, नौरू। इनमे
(१) स्वाधीन उपनिवेश—कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैएड, दक्षिण अफरीका, आयर (आयरिश स्वतंत्र राज्य), न्यूफाउन्डलैएड जिसका औपनिवेशिक पद १६३३ से स्थगित कर दिया गया है।
(२) उपनिवेश अथवा अधीन साम्राज्य, जिसमे शाही नौ-आबादियँ (उपनिवेश), संरक्षित राज्य तथा चिन्हाड्कित बिगत विश्वयुध्द के बाद, वार्सेई की सन्धि के अनुसार, शासनादेश द्वारा शासित देश (Mandated Territories) शामिल है।
ब्रिटिश राष्ट्र-समूह एक विचित्र राजनीतिक रचना है। राजनीतिक अर्थ मे न वह राष्ट्र है और न संघ ही। उसका न कोई लिखित शासन-विधान है, न उसकी कोई पार्लमेन्ट है और न अपनी सरकार ही। न उसकी रक्षा करने-वाली केन्द्रिय सेना और न प्रबन्धक-शक्ति ही। वास्तव मे यह इतिहास और विकास की रचना है जो अपने आप बढी, योजना बनाकर उसका निर्माण नही किया गया,और जिसके सदस्यो के पारस्परिक सम्बन्ध अभी विकास की अवस्था मे हैं। स्वाधीन उपनिवेशों का विधान बरतानवी सरकार के द्वारा बना, लेकिन वास्तव मे कालक्रम द्वारा वह स्वाधीन बन गये। १६२६ तक वैस्टमिस्टर पार्लमेट समस्त साम्राज्य की सर्वोच्च धारासभा मानी जाती रही; वही अधिकार दे सकती और उन्हे वापस ले सकती थी। पिछले महायुध्द मे उपनिवेशो ने साम्राज्य को पूरी मदद दी और उपनिवेशो ने साम्राज्यान्तर्गत<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|ब्रिटिश साम्राज्य||२१७}}</noinclude>रोडेशिया, स्वाज़ीलैएड; दक्षिण अफ्रिकी यूनियन; नाइजीरिया, गैम्बिया; गोल्ड-कोस्ट, सीराल्योन; सूदान, टंगान्यिका, दक्षिण-पश्चिमी अफ्रिका, कैमरून, टोगोलैएड।
'''अमरीका'''—बरमुडास, कनाडा की डोमिनियन, फाकलैएड द्वीपसमूह, दक्षिण जार्जिया, बरतानवी गायना, बरतानवी होन्डुरास; न्यूफाउएडलैएड; लेब्राडर; बहामस; बारबाडस, जमैका; लीवार्ड द्वीपसमूह, ट्रिनीडाड, टुबागो, विएडवार्ड द्वीपसमूह।
'''महासागरीय'''—आस्ट्रेलिया की कामनवैल्थ, पापुआ (जिसे जनवरी १६४३ में जापान से वापस जीता चुका है), न्यूजीलैंड, फीजी, प्रशान्त महासागर के द्वीपसमूह, न्यूगिनी, पश्चिमी समोआ, नौरू। इनमें
(१) स्वाधीन उपनिवेश—कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैएड, दक्षिण अफरीका, आयर (आयरिश स्वतंत्र राज्य), न्यूफाउन्डलैएड जिसका औपनिवेशिक पद १६३३ से स्थगित कर दिया गया है।
(२) उपनिवेश अथवा अधीन साम्राज्य, जिसमे शाही नौ-आबादियँ (उपनिवेश), संरक्षित राज्य तथा चिन्हाड्कित बिगत विश्वयुध्द के बाद, वार्सेई की सन्धि के अनुसार, शासनादेश द्वारा शासित देश (Mandated Territories) शामिल है।
ब्रिटिश राष्ट्र-समूह एक विचित्र राजनीतिक रचना है। राजनीतिक अर्थ मे न वह राष्ट्र है और न संघ ही। उसका न कोई लिखित शासन-विधान है, न उसकी कोई पार्लमेन्ट है और न अपनी सरकार ही। न उसकी रक्षा करने-वाली केन्द्रिय सेना और न प्रबन्धक-शक्ति ही। वास्तव में यह इतिहास और विकास की रचना है जो अपने आप बढ़ी, योजना बनाकर उसका निर्माण नही किया गया,और जिसके सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्ध अभी विकास की अवस्था मे हैं। स्वाधीन उपनिवेशों का विधान बरतानवी सरकार के द्वारा बना, लेकिन वास्तव मे कालक्रम द्वारा वह स्वाधीन बन गये। १६२६ तक वैस्टमिस्टर पार्लमेट समस्त साम्राज्य की सर्वोच्च धारासभा मानी जाती रही; वही अधिकार दे सकती और उन्हे वापस ले सकती थी। पिछले महायुध्द मे उपनिवेशो ने साम्राज्य को पूरी मदद दी और उपनिवेशों ने साम्राज्यान्तर्गत<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी भाषा.djvu/१५
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />प्राचीन भाषाए
१३</noinclude>
की भाषा भी मानते हैं । किंतु प्राचीन ग्रंथों में पिशाच के नाम से कई
देश गिनाए गए हैं---- <br>
<poem>पाण्ड्य केनाहूलीक सिंहनेपालकुन्तलाः ।
सुदेष्ण-वोट- गन्धार - हैव कन्नौजनास्तथा ।
एते पिशाचादेशाः स्युस्तद्दश्यस्तद्गुणेो भवेत् ॥</poem>
{{gap}}इसमें कई नाम ऐसे भी हैं जिनकी पहचान अब तक नहीं हो सकी ।
मार्कंडेय ने अपने व्याकरण 'प्राकृतसर्वस्व' में पैशाची के जो नियम लिखे
हैं, उनमें से एक है--' पञ्चस्वाधा वितरयेाः' । इसका अर्थ यह है-
पांचों वर्गों में तृतीय और चतुर्थ वर्णों के स्थान में प्रथम और द्वितीय
वर्ण होते हैं। इसकी प्रवृत्ति पंजाबी भाषा में देख पड़ती है । उसमें
साधारणतः लोग भाई का पाई, अध्यापक का हत्तापक, घर का कर,
धन्य का तन्न या इससे कुछ मिलता जुलता उच्चारण करते हैं। उसमें
एक और नियम "युक्त विकर्पो बहुलम्” (संयुक्त वर्णों का विश्लेषण )
भी देस पड़ता है । कसर, सनान, परस, पतनी श्रादि उदाहरण पंजाबी
में दुर्लभ नहीं । इससे जान पड़ता है कि चाहे पैशाची पंजाब की भाषा
न भी रही हो, पर उसका प्रभाव श्रवश्य पंजाबी पर पड़ा है।
राजशेखर ने, जो विक्रम संवत् की दसवीं शताब्दी के मध्य भाग
था, अपनी काव्यमीमांसा में एक पुराना श्लोक उद्धृत किया है जिसमें
उस समय की भाषाओं का स्थल-निर्देश है— गौड़ ( बंगाल ) श्रादि
संस्कृत में स्थित हैं, लाट (गुजरात) देशियों की रुचि प्राकृत में परि
मित है, मरुभूमि, टक्क ( टांक, दक्षिण पश्चिमी पंजाब) और भादानक
(संभवतः यह राजपूताना का कोई प्रांत था ) के वासी भूत भाषा की
सेवा करते हैं, जो कवि मध्यदेश ( कन्नौज, अंतर्वेद, पंचाल श्रादि ) में
रहता है, वह सर्व भाषाओं में स्थित है। इससे उस समय किस भाषा
का कहाँ अधिक प्रचार था, इसका पता चल जाता है। मार्कडेय और <br>
{{gap}}रामशर्मा ने अपने व्याकरणों में इस भाषा का विशेष रूप से उल्लेख किया
है। डाक्टर ग्रियर्सन ने अपने एक लेख में रामशर्मा के प्राकृत कल्पतरु
के उस श्रंश का विशेष रूप से वर्णन किया है, जिसमें पैशाची भाषा का
विवरण है। उस लेख में बतलाया गया है कि रामशर्मा के अनुसार
पैशाची या पैशाचिका भाषा के दो मुख्य भेद हैं-- एक शुद्ध और दूसरा
संकीर्ण । पहली तो शुद्ध पैशाची, जैसा कि उसके नाम से ही प्रकट
होता है, और दूसरी मिश्र पैशाची है। पहली के सात और दूसरी के
चार उपभेद गिनाए गए हैं, जो इस प्रकार हैं-<br>
{{gap}}{{gap}}(१) कैकेय पैशाचिका,<noinclude></noinclude>
iq2e1nyv6m6v4prj6h07x34dunqkbw5
पृष्ठ:हिंदी भाषा.djvu/१६
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>प्राचीन भाषाएँ १६
की इतनी प्राचीनता नहीं स्वीकार करते। कालिदास के 'विक्रमोर्वशीय'
त्रोटक में विक्षिप्त पुरूरवा की उक्ति में छंद और रूप दोनों के विचार से
कुछ कुछ अपभ्रंश की छाया देख पड़ती है, और इसलिये अपभ्रंश का
काल और भी दो सौ वर्ष पहले चला जाता है, पर उसमें अपभ्रंश के
अत्यंत साधारण लक्षण—जैसे, पदांतर्गत 'म' के स्थान में 'वँ' और
स्वार्थिक प्रत्यय 'इल्ल' 'अल्ल' तथा 'ड'—न मिलने के कारण उसे भी
याकोबी आदि बहुत से विद्वान् पाठांतर या प्रक्षिप्त मानते हैं। जो कुछ
हो, पर यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अपभ्रंश के बीज ईसा की
दूसरी शताब्दी में प्रचलित प्राकृत में अवश्य विद्यमान थे।
आरंभ में अपभ्रंश शब्द किसी भाषा के लिये नहीं प्रयुक्त होता
था। साक्षर लोग निरक्षरों की भाषा के शब्दों को अपभ्रंश, अपशब्द
या अपभाषा कहा करते थे। पतंजलि मुनि ने अपभ्रंश शब्द का प्रयोग
महाभाष्य में इस प्रकार किया है—भूयांसोऽपशब्दाः अल्पीयांसः शब्दाः।
एकैकस्य शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः। तद्यथा। गौरित्यस्य गावी गोणी गोता
गोपातलिकेत्येवमादयोऽपभ्रंशाः। अर्थात् अपशब्द बहुत हैं और शब्द
थोड़े हैं। एक एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश पाए जाते हैं; जैसे—गो
शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपालतालिका आदि अपभ्रंश हैं। यहाँ अप-
भ्रंश शब्द से पतंजलि उन शब्दों का ग्रहण करते हैं जो उनके समय में
संस्कृत के बदले स्थान स्थान पर बोले जाते थे। ऊपर के अवतरण में
जिन अपभ्रंशों का उल्लेख है, उनमें 'गावी' बँगला में 'गाभी' के रूप में
और 'गोणी' पाली से होता हुआ सिंधी में ज्यों का त्यों अब तक प्रच-
लित है। शेष शब्दों का पता अन्वेषकों को लगाना चाहिए। आर्य
अपने शब्दों की विशुद्धता के कट्टर पक्षपाती थे। वे पहले अपशब्द ही
के लिये म्लेच्छ शब्द का प्रयोग करते थे। पतंजलि ने लिखा है—न
म्लेच्छितवै नापभाषितवै म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः। अर्थात् म्लेच्छ या
अपभाषण न करना चाहिए, क्योंकि अपशब्द ही म्लेच्छ है। अमर ने
इसी धातु से उत्पन्न म्लिष्ट शब्द का अर्थ 'अविस्पष्ट' किया है। इससे
यह बात सिद्ध होती है कि आर्य शुद्ध उच्चारण करके अपनी भाषा की
रक्षा का बड़ा प्रयत्न करते थे; और जो लोग उनके शब्दों का ठीक उच्चा-
रण न कर सकते थे, उन्हें और उनके द्वारा उच्चरित शब्दों को म्लेच्छ
कहते थे। म्लेच्छ शब्द उस समय आजकल की भाँति घृणा या निंदा-
व्यंजक नहीं था।
अस्तु; जब मध्यवर्ती भाषाओं (पाली, शौरसेनी, तथा अन्य
प्राकृतों) का रूप स्थिर होकर साहित्य में अवरुद्ध हो गया एवं संस्कृत<noinclude></noinclude>
fxweyot37mggqgqolcivy7yelgehag7
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{Rh||'''अकबर'''|'''२७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:तान हाशिम, उस्ताद मोहम्मद आमीन, और उस्ताद मोहम्मद हुसेन तानपूरा बजाते थे। ग्वालियरके वीरमण्डलखां स्वरमण्डल बजाते थे। शहाब खां और पुर्ब्बीन खां बीन, शेख़ दाबानी करनाई, उस्ताद दोस्त सहनाई, मीर सैयद अली और बहरामकुली घिचक, तास बेग कुञ्ज, कासिम रबाब और उस्ताद शाह महम्मद सुर्ना आदि भांति-भांतिके बाजे बजाते थे। अबुलफ़ज़लके भाई फैज़ी सम्राट् अकबरकी सभामें एक प्रधान कवि थे। फैज़ीने ब्राह्मण-वेशसे काशीमें संस्कृत पढ़ी थी और अच्छा पाण्डित्य लाभ किया था।
:{{gap}}अकबर ने साहित्य के प्रचारमें भी अच्छा उद्योग किया था। उन्होंने अपने राज्यभर में पाठशालायें स्थापित करा दी थीं। उनमें धार्मिक शिक्षाका कुछ विशेष प्रभाव नहीं था।
:{{gap}}अकबर धार्मिक भी थे। जिस समय सूर्य मेष राशिमें आते, तो उन्नीस दिनों तक सौराग्नि आहरण करते थे। उसकी प्रणाली यह है:—दोपहरके समय अकबरके नौकर धूपमें सूर्यकान्तमणि रखकर आग जला लेते थे। सालभरतक उस आगकी रक्षा करने के लिये विश्वासी मनुष्य नियत किये गये थे। सम्राट्के लिये रसोई उसी अग्निपर होती थी। पौर्णमासी के दिन चन्द्रकान्तमणि द्वारा वे चन्द्रमा से अमृत हरण कराते थे। वह अमृतकणा साफ ओसके समान रहती थी।
:{{gap}}रात के समय अकबरके घर में ३६ दीपक जलते थे। उनमें १२ सफ़ेद, बारह चांदीके शमादान और बारह सोनेके शमादान रहते थे। एक-एक शमादान वज़न में दस मन से कम न था। उनमें छः २ बड़ी लम्बी मोमबत्ती लगाई जाती थीं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया तक एक, दूसरी पीतलसोज़ में आठ बत्तियां जलती थीं, चतुर्थी को सात और पञ्चमी को छः बत्तियां रहती थीं। इसी तरह नित्य एक बत्ती कम करके दशमी को केवल एक बत्ती रह जाती थी। इसके बाद पूर्णिमातक एक बत्ती ही जला करती थी। फिर कृष्णपक्षकी प्रतिपदा को एक, द्वितीया को दो,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:तृतीयाको तीन, और चतुर्थीको चार और पञ्चमीको भी चार ही बत्तियां जलती थीं। षष्ठीको पांच, सप्तमीको छः; इसी तरह एक दिन नागा करके दो दिनोंतक संख्या बढ़ाई जाती थी। एक सेर रूई की एक एक बत्ती बनती थी और एक बत्तीमें एक सेर तेल लगता था।
:{{gap}}अकबरने अपने राज्यमें सब तरह का प्रबन्ध किया था। वे सती होने की प्रथा के विरोधी थे। वे स्वयम् बहुत थोड़ी शराब पीते थे और अपने सभासदोंको भी बहुत थोड़ी पीने देते थे।
{{Css image crop
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}}
:{{gap}}अकबर रूपमें बहुत ही सुन्दर थे। छाछठ वर्ष को अवस्था हो जाने पर भी वे बूढ़े से नहीं मालूम होते थे। उनके पक्के केश मात्र उनकी वृद्धावस्थाके चिन्ह थे। गोआ से कई पादरिये उनकी सभा में आये थे। पादड़ियों की इच्छा थी कि, सम्राट् कृस्तान हो जायँ, पर उनको इच्छा पूर्ण न हो सकी।
:{{gap}}१६०६ ईस्वीमें सुलतान दानियालका विवाह बड़े समारोहसे हुआ; परन्तु कुछ दिन बाद ही दानियाल शराब पोनेके कारण मर गया। दानियाल की मृत्युसे अकबर बहुत ही शोकान्वित हुए। वे दिन-दिन क्षीण
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude><noinclude><div style="display: flex; gap: 20px; align-items: flex-start; justify-content: space-between; border-left: 1px solid transparent;"></noinclude>
<div style="width: 48%; float: left; padding-right: 10px; border-right: 1px solid black; min-height: 600px;">
{{outdent|५६}} '''अक्षरलिपि'''<br>
{{outdent|युक्तिका समर्थन किसी तरह किया जा नहीं सकता, कि सन् ई० से पहलेकी ८वीं शताब्दीके बाद फिनिक (Phoenician) नामक बणिकोंसे भारतवासियोंने अक्षरज्ञान प्राप्त किया था।<br>
{{gap}}सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें शाक्य बुद्धका अभ्युदय हुआ। उनके निर्वाण प्राप्त होनेसे कुछ ही पीछे उनके धर्मोपदेशकी रक्षा करनेके लिये उनके प्रधान-प्रधान शिष्यों ने इकट्ठा हो पहला बौद्धसङ्घ आह्वान किया। फ्रान्सीसी पण्डित फूको (Foucaux) और राजा राजेन्द्रलाल मित्र महाशयने ललितविस्तर-की समालोचनाके समय लिखा था, कि ललितविस्तरमें जो गाथा हैं, वह इसी समय (सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें) बनाई और संग्रह की गई थीं।* उन गाथाओंमें इस तरह वर्णन किया गया है—
{{center|{{smaller|"सा गाथलेखलिखिते गुण अर्थयुक्ता<br>या कन्य ईदृश भवेन्मम तां वरयेथाः।" (ललितविस्तर १२ अ०)}}}}
(शाक्यसिंहने कहा) जो कन्या गाथालेख लिखने और गाथाका अर्थ समझनेमें चतुर होगी, उससे मैं विवाह करूँगा।<br>
{{gap}}कही हुई गाथासे क्या हम नहीं जान सकते, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले इस देशमें लिपिज्ञानकुशला महिलाओंका भी अभाव न था। यह बात सहज ही अनुमेय है, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले जहाँ कन्या लिखनेमें निपुण न होनेसे राजकुमारकी पत्नी बननेके योग्य न समझी जाती थी, उस देशके लिये अक्षर-लिपिकी चर्चा कितनी पुरानी है। ललितविस्तरकी गाथामें लिपिशाल† और लिपिशास्त्र‡ का उल्लेख}}
<br><br>
<hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;">
{{smaller|* Dr. Rajendralal Mitra's Lalita Vistara, Intro. p. 56.<br>
† "शास्त्राणि यानि प्रचरन्ति च देवलोके<br>संख्या लिपिच गणनाऽपि च धातुतन्त्रः।<br>ये शिल्पयोगपृथु लौकिक अप्रमेया-<br>स्तेष्वेषु शिक्षितु पुरा बहुकल्पकोट्यः।<br>किन्तु जनस्य अनुवर्त्तनतां करोति<br>लिपिशालमागतु सुशिक्षितशिक्षणार्थं"॥ (ललितविस्तर १० अ०)<br>
‡ "लोकोत्तरेषु चतुःसत्यपथविधिज्ञो हेतुप्रतीत्यकुशली यथ सम्भवति।<br>यथ चानिरोधक्षयु संस्कृ तसोऽस्तिभावस्तस्मिन् विधिज्ञः किमथो लिपिशास्त्रमात्रे"॥<br> (ललितविस्तर १० अ०)}}
</div>
<div style="width: 48%; float: right; padding-left: 10px;">
{{outdent|होनेसे स्पष्ट मालूम होता है, कि उस पुराने समयमें भी लिपि सिखानेकी पाठशालाएं और नाना देशीय लिपिज्ञानके उपयुक्त लिपि-शास्त्र (Palaeography and Epigraphy) प्रचलित था।<br>
{{center|{{smaller|ब्राह्मी आदि लिपियोंका उत्पत्ति-काल।}}}}
{{gap}}इस समय यहाँ आलोच्य है, कि जिस प्राचीन कालकी बात चल रही है, उस समय भारतमें कैसे अक्षर प्रचलित थे।<br>
{{gap}}पूर्वोक्त ललितविस्तरमें चौंसठ प्रकारकी लिपिका उल्लेख देख पड़ता है। यथा—<br>
{{gap}}१ ब्राह्मी, २ खरोष्ठी, ३ पुष्करसारी, ४ अङ्ग, ५ वङ्ग, ६ मगध, ७ माङ्गल्य, ८ मनुष्य, ९ अङ्गुलीय, १० शकारि, ११ ब्रह्मवल्ली, १२ द्राविड़, १३ कनारी, १४ दक्षिण, १५ उग्र, १६ संख्या, १७ अनुलोम, १८ अवधनु, १९ दरद, २० खास्य, २१ चीन, २२ हूण, २३ मध्याक्षरविस्तर, २४ पुष्प, २५ देव, २६ नाग, २७ यक्ष, २८ गन्धर्व, २९ किन्नर, ३० महोरग, ३१ असुर, ३२ गरुड़, ३३ मृगचक्र, ३४ चक्र, ३५ वायुमरुत्, ३६ भौमदेव, ३७ अन्तरीक्षदेव, ३८ उत्तरकुरुद्वीप, ३९ अपरगौड़ादि, ४० पूर्वविदेह, ४१ उत्क्षेप, ४२ निक्षेप, ४३ विक्षेप, ४४ प्रक्षेप, ४५ सागर, ४६ वज्र, ४७ लेख-प्रतिलेख, ४८ अनुद्रुत, ४९ शास्त्रावर्त्त, ५० गणनावर्त्त, ५१ उत्क्षेपावर्त्त, ५२ विक्षेपावर्त्त, ५३ पादलिखित, ५४ द्विरुत्तरपदसन्धि, ५५ दशोत्तरपदसन्धि, ५६ अध्या-हारिणी, ५७ सर्वभूतसंग्रहणी, ५८ विद्यानुलोम, ५९ विमिश्रित, ६० ऋषितपस्तप्ता, ६१ धरणीप्रप्रेक्षण, ६२ सर्वौषधिनिष्यन्दा, ६३ सर्वसारसंग्रहणी और ६४ सर्वभूतरुतग्रहणी। (ललितविस्तर १० अ०)<br>
{{gap}}जिस ललितविस्तरमें पूर्वोक्त लिपिमालाका नाम उद्धृत हुआ है, उसी ग्रंथका चू-फ-लन्ने सन् ६५ ई० के समय चीन-भाषामें अनुवाद किया था।\* ऐसे स्थलमें मूल ग्रंथके सब जगह फैलने और इसके बाद चीनदेश पहुँचनेमें अल्प समय न लगा होगा। पाश्चात्य और इस देशके राजा राजेन्द्रलाल मित्र-प्रमुख†}}
<br><br>
<hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;">
{{smaller|\* Beal's Romantic Legend of Sakya Buddha, Intro-duction.}}
</div>
<noinclude></div><div style="clear:both;"></div></noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>अक्षरलिपि
पण्डितोंने ललितविस्तरको सन् ई० से पहलेकी दूसरी
शताब्दिका ग्रन्थ माना है। किन्तु हम इससे भी
पुराना समझते हैं। सम्राट् अशोकके यत्नसे जैसे बौद्ध
धर्म फैलानेके लिये पश्चिममें यूनान, उत्तरमें मङ्गोलिया,
पूर्वमें कम्बोज और दक्षिणमें लङ्कातक धर्माचार्य भेजे
गये, वैसे ही सभ्य जगत्के प्रायः सभी स्थानोंसे लोग
सम्राट् अशोकके साम्राज्यमें नाना कार्योपलक्ष्यसे बसने
लगे थे; हम नहीं समझते, कि इस समय भारतमें
नाना विदेशीय संस्रवोंसे जितने प्रकारकी लिपि या
अक्षरमाला प्रचलित हुई थी, पहले और किसी
समय उतने प्रकारकी लिपि या अक्षरमाला देखनेमें
आई हो।* भारतीय बौद्धोंके इसी सुवर्णयुगमें यहाँ
जितने प्रकारकी लिपि प्रचलित हुई थी, सम्भवतः
ललितविस्तरके बनानेवालोंने उतने प्रकारकी लिपिका
उल्लेख किया है।
लङ्का, ब्रह्म और श्याम देशवाले बौद्ध ग्रन्थोंके
मतसे सन् ई० से ५४३ वर्ष पहले बुद्धदेवका निर्वाण
और निर्वाणसे २१८ वर्ष पीछे यानी सन् ई० से ३२५
वर्ष पहले अशोकका साम्राज्याभिषेक कार्य सम्पन्न
हुआ था। [प्रियदर्शी शब्दमें विस्तृत विवरण देखना चाहिये।]
इसके बाद अशोककी राजधानीमें ६४ प्रकारकी
लिपिका चलना कुछ विचित्र नहीं। इस समयके यूनानी
नियर्खस (Nearchus) की विवरणीमें लिखा है, कि
भारतवासी रूईके वस्त्र या काग़ज़ पर अक्षरयोजना
करते थे। उनसे कुछ समय पीछे यूनान-दूत मेगस्थि-
निस् मगधराज्यकी वर्णनाके उपलक्ष्यमें लिख गये हैं,
कि भारतवासी १० स्टेडियाम् दूर शाखापथ और
उसके अन्तर्वर्ती स्थानकी दूरी बतानेवाला कोसके
अंकोंसे युक्त प्रस्तरफलक (mile-stone) रखते थे।
पत्थरमें अक्षर-खोदनेकी प्रथा उस समय खूब प्रचलित
थी। अशोकके अनुशासन और उससे भी बहुत
पहले कपिलवस्तुके निकटवर्ती पिपरावा गांवसे
आविष्कृत बुद्धदेवके देहावशेषकी रक्षा करनेवाले
पत्थर पर खुदी हुई लिपि इस बातकी गवाही देती
है। पिपरावा-लिपि देख इस समय दृढ़ विश्वास
होता है, कि सन् ई० से पहलेकी छठी शताब्दीसे भी
पहले भारतवर्षमें पत्थरपर अक्षर खोदनेकी प्रथा
प्रचलित थी। मगधपति जरासन्धकी राजधानी गिरि-
व्रजमें जरासन्धकी बैठक और भीम जरासन्धकी रण-
रंगकी भूमिपर चित्रलिपि और कौन-सा शिल्पलिपि-
के बीचकी लिपि पर्वतगात्रमें उत्कीर्ण रही है। उसके
ऊपर बहुत समयसे गो और महिष आदिके आने-
जानेकी राह होनेसे वह प्राचीनतर लिपि कितनी ही
अस्पष्ट और अबोध्य हो गई है। हमें विश्वास
होता है, कि आज तक भारतमें जितने प्रकारकी
लिपि आविष्कृत हुई है, उनमें वह मगधलिपि सबसे
पुरानी है। कौन कह सकता है, कि वह जरासन्धके
समयकी लिपि नहीं है?
जो हो, हम समझते हैं, कि २२०0 वर्ष पहले
भारतवासी ६४ प्रकारकी लिपि जानते थे। इन ६४
लिपियोंमें कितनी ही सम्राट् अशोकसे भी बहुत
पहले भारतमें प्रचलित थीं। जैनियोंके सुप्रसिद्ध
"समवायसूत्र" नामक ४थे अङ्गमें लिखा है—
"बम्भीए णम अट्ठारसविहे लिक्खविहाणे******
लेक्खं करेड्। जं बम्भीए, जवणाणिया, दोसाउरिया,†
खरोट्टिया, पुक्खरसारिया, पायहसा, कत्थइया,
गन्धव्विया, आदरसणिणवि, माहेसरणिणवि, दामिलिणिवि, पोलिंदिणिवि।"
ब्राह्मी प्रभृति १८ प्रकारकी लेखन प्रक्रियाओंके
नाम यह हैं—१ ब्राह्मी, २ यवनानी, ३ दोषौतरिका,
४ खरोष्ट्रिका, ५ पुष्करसारिका, ६ पावर्त्तिका, ७
उत्तरकुरुका, ८ अक्षरपुस्तिका, ९ भोगवइया, १०
विक्षेपिका, ११ निक्षेपिका, १२ अङ्ग, १३ गणित, १४
गन्धर्व, १५ आदर्शा, १६ माहेश्वरी, १७ द्राविड़ी
और १८ बोलिन्दी (?) लिपि।
--------------------------------------------------------------------------------------
* शकाधिप कनिष्कका अधिकार उत्तरमें खुतन, पश्चिममें ईरान और
पूर्वमें पूर्ववङ्ग तक फैल गया था सही, किन्तु वे सन् ई० की पहली शताब्दी-
में विद्यमान अवश्य थे। यह बात सन् ई० से पहली शताब्दीके चीन-अनु-
वादसे प्रमाणित है, कि इससे पहले ललितविस्तर बनाया गया था।
* 'खरसारिया'—पाठान्तर।
† 'दोसउरिया'—पाठान्तर।
‡ 'भोगवयत्ता'—पाठान्तर।
†† 'वयनतिया, निराहत्या, बङ्गगिया, निहत्या'—पाठान्तर।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६३
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>अक्षरलिपि
जैनियोंके ४थे उपाङ्ग पन्नवणा (प्रज्ञापना)-सूत्रमें
पूर्वोक्त अट्ठारह लिपियोंका उल्लेख वर्तमान है।
लिपिकरोंके दोषसे विभिन्न पुस्तकोंमें कुछ पाठ-
भेद देख पड़ता है। प्रज्ञापनासूत्रके टीकाकार मलय-
गिरिने लिखा है—
"ब्राह्मी यवनानीत्यादयो लिपिभेदास्तु सम्प्रदायादवशेषः"
अर्थात् ब्राह्मी, यवनानी इत्यादि अट्ठारह प्रकार-
की लिपि विभिन्न सम्प्रदायोंसे उद्भूत हुई है।
जैनशास्त्रके मतसे जैनाङ्गसमूह महावीर स्वामी-
के समय पहले फैला और वीर-निर्वाणके १६४ वर्ष
बाद (सन् ई० से ३६३ वर्ष पहले) पाटलिपुत्रके
श्रीसङ्घमें संग्रहीत हुआ। ऐसे स्थलमें कहा जा
सकता है, कि सम्राट् अशोकसे पहले भारतमें ब्राह्मी-
प्रभृति १८ प्रकारकी लिपि चलती थी।
यवनानी।
यवनानी नाम देख कोई-कोई कहना चाहते हैं,
कि मकदूनिया-वीर सिकन्दरके समय इस देशमें
यूनानी यवनोंने जो लिपि चलाई वही यवनानी लिपि
है। इस यूनानी शब्दका उल्लेख देखकर मोक्षमूलर-
प्रभृति कोई-कोई पाश्चात्य अध्यापक अष्टाध्यायीके सूत्र-
कार पाणिनिको भी इसी समयका व्यक्ति बताना
चाहते हैं। किन्तु पाणिनिसूत्रके वार्त्तिककार और
महाभाष्यकारके 'यवनानी' शब्दका लिपि* अर्थ करते
भी पाणिनिने कहीं स्पष्टतः यह अर्थ नहीं प्रकाश
किया। स्त्रीलिङ्गमें जिन शब्दोंके उत्तर 'आनुक्' होता
है, उन्होंने दृष्टान्तकी तरह उन्हीं शब्दोंका उल्लेख
किया है—
"इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलआचार्याणामानुक्"
(पा० ४।१।४९)
जो हो, यवनानी शब्दमें आधुनिक सन्देहके
करनेका कोई कारण नहीं देखा जाता। यवनों
(Ionian) का अभ्युदय बहुत पुराना है। हमने दूसरी
जगह दिखाया है, कि सन् ई० से पहलेकी १०वीं
शताब्दिमें यवन या योन जातिका पराक्रम सब जगह
--------------------------------------------------------------------------------------
* 'यवनाल्लिप्याम् इति वक्तव्यम्'—वार्त्तिक। दीपौ यवौ यवानी।
यवनाल्लिप्याम्। यवनानी लिपिः।—(महाभाष्य ४।१।४९)
विघोषित हुआ। इससे पहले यवन जातिका अभ्युदय
हुआ था। रामायण, महाभारत प्रभृति पुराने संस्कृत
ग्रन्थोंमें भी यवन जातिका विशेष उल्लेख वर्तमान है।
यवनानी कहनेसे बहुत पुरानी कीलरूपा (Cuneiform)
लिपि ही समझी जाती थी। यवन देखो।
पुष्करसारी।
समवायाङ्ग और ललितविस्तरमें जिस "पुष्करसारी"
लिपिकी बात लिखी है, वह भी भारतकी एक बहुत
पुरानी लिपि है। पाणिनिने पुष्करसादीका उल्लेख
किया है।
उत्तरकुरुका और गन्धर्वलिपि प्रभृति।
ऐतरेय-ब्राह्मणमें उत्तरकुरु और उत्तरमद्रकी
बात लिखी है। ऐतरेय ब्राह्मणसे यह भी मालूम
होता है कि, वहाँ वैदिक यागयज्ञ प्रचलित था। याग-यज्ञका
निर्धारण करनेके लिये जैसे ज्योतिषका प्रयोजन पड़ता,
वैसे ही उसके लिये शुल्व-सूत्र भी जानना आवश्यक
है। [शुल्वसूत्र देखो!] इसीलिये अंकलिपि और गणित-
लिपि भी उसी प्राचीनकालमें चली थी। गन्धारमें
प्रचलित लिपि ही सम्भवतः गन्धर्व लिपि है। कन्धारके
साथ बहुत पुराने समयसे ही वैदिक आर्योंका संस्रव
रहा है। वहाँकी लिपि भी नितान्त आधुनिक नहीं
है। खरोष्ठी-लिपिकी प्रसङ्गमें यह बात पीछे बताई
जायगी।
माहेश्वरलिपि।
पाणिनिसूत्रमें जो चौदह प्रत्याहार हैं, उन्हींको
वररुचि, पतञ्जलि प्रभृति वैयाकरण शिवसूत्र कहकर
मानते हैं। देशमें सर्वसाधारण वैयाकरणोंको विश्वास
है, कि महेश्वरने ही सबसे पहले व्याकरण प्रकाशित
किया था। वेदाङ्गके अन्तर्गत जो शिक्षा है, उसमें देखा
जाता है, कि महेश्वरने ही चौंसठ अक्षर प्रकाशित
किये। जो हो, इसमें सन्देह नहीं, कि पाणिनिसे
बहुत पहले शिवसूत्र उत्पन्न हुए थे। चीन-परिव्राजक
इत्सिङ्गने सन् ई० की ७वीं शताब्दीके अन्तिम भाग-
में भारत आ संस्कृत पढ़ी। उन्होंने लिखा है, 'सिद्धि-
रस्तु' से आरम्भकर अक्षरमाला-सम्बन्धीय जो महेश्वर-
के रचे 'सिद्धान्त' छः वर्षके बालक पहले मुखस्थ<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>अक्षरलिपि
करते, उनमें उनचास अक्षर हैं। उनके मिले हुए
अक्षर अट्ठारह भागों में बंटे और इस तरह इस
सिद्धान्तमें दश हजार शब्द और अनुष्टुप् छन्दके तीन-
सौ श्लोक वर्तमान हैं।' अध्यापक मोक्षमूलरका*
विश्वास है, कि यही 'शिवसूत्र' हैं। किन्तु इत्सिङ्गने
पाणिनि-रचित एक हजार सूत्रोंको ही शिवके प्रत्या-
दिष्ट सूत्र मान अपनी सम्मति प्रकाशित की है।
यही शिवसूत्र जिस लिपिमें लिखे गये थे,
सम्भवतः वही माहेश्वर लिपि होगी। अथवा पाणिनिने
जिस माहेश्वर सम्प्रदायकी बात लिखी और वह जिस
लिपिका व्यवहार करती थी, वही माहेश्वर लिपि है।
आदर्शकलिपि।
पतञ्जलिने महाभाष्यमें आर्यावर्त्त वाली सीमा-
निर्देशके समय लिखा है,—
"प्रागादर्शात् प्रत्यक्कालकवनाद्दक्षिणेन हिमवन्तमुत्तरेण पारियात्रम्॥"
आदर्शके पूर्व और कालकवनके पश्चिम, हिमा-
लयके दक्षिण और पारियात्रके उत्तर आर्यावर्त्त
प्रदेश अवस्थित है। यानी आर्यावर्त्तो पश्चिम-सीमा
पर आदर्श है। मनुसंहितामें आर्यावर्त्तके पश्चिम भी
समुद्र माना गया है।† ऐसे स्थलमें समुद्रके
पूर्व-किनारेसे आर्यावर्त्तका अवस्थान स्थिर करना
पड़ता है। विष्णुपुराणादिमें भी भारतकी पश्चिम-सीमा
यवन (Ionia) बताई गई है। इससे मालूम होता है,
कि सम्भवतः आदर्श पुराना मिस्र या रूम राज्य ही है
और वहाँकी सुप्राचीन लिपि ही आदर्शक-लिपि है।
उसी लिपिका आदर्श ग्रहणकर पाश्चात्य सभ्य जातियों-
की लिपि उत्पन्न होनेसे उस सुप्राचीन चित्रलिपिका
"आदर्शकलिपि" नाम होना कुछ विचित्र नहीं।
द्राविड़ी लिपि।
दाक्षिणात्यके लिपितत्त्वप्रणेता बूलर साहबके बताये
मतसे द्राविड़ी लिपि अशोककी (ब्राह्मी) लिपिसे स्वतन्त्र
होते भी उसी एक मूल लिपि या सेमेटिक लिपिसे
निकली है। द्राविड़की बट्टेलेत्तु नामक पुरानी
--------------------------------------------------------------------------------------
* Max Müller's India, what can it teach us, p. 343.
† "आसमुद्रात् तु वै पूर्वात् आसमुद्रात् तु पश्चिमात्।
तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त्तं विदुर्बुधाः॥" (मनु २।२२)
लिपिके 'इ' और 'उ' यह दोनों स्वर 'य' और 'व' से
कुछ ही पृथक् हैं, और सेमेटिक लिपिमें सादृश्य
रखते हैं। भारतके व्यवहारोपयोगी बना लिये
जानेपर भी उनमें असम्पूर्णता रह गई है। डाक्टर
बूलर कहते हैं, कि दाक्षिणात्य के भट्टीप्रोलुमें जो
सुप्राचीन अशोकाक्षरीकी लिपि निकली है, उत्तर-
भारतीय अशोकलिपिसे उसका कुछ ही पार्थक्य लक्षित
होता है। दक्षिण भारतीय उक्त लिपिका 'दा' उत्तर
भारतीय 'अ'कार जैसा है; उत्तर भारतीय अशोक-
लिपिके व्यञ्जनके साथ आकारका चिह्न एक समानान्तर
रेखा होती, किन्तु दक्षिण भारतीय लिपिमें ऐसी
समानान्तर रेखाके बदले व्यञ्जनके शिरपर (।) ऐसी
एक खड़ी रेखा बनी है। इससे मालूम होता है, कि
बहुत पहले समयसे ही इन दोनों लिपियोंमें कुछ कुछ
अलगाव रहा है। पूर्वोक्त पाश्चात्य पण्डित कहते हैं,
कि फिनिकीय बणिकोंके साथ दक्षिण भारतका सा-
क्षात् सम्बन्ध हो गया था। बाइबिलमें सोलोमनका मोर
'तुकी' नामसे परिचित था; द्राविड़में आज भी मोर-
को 'तोकै' ही कहते हैं। इसलिये इस बातमें सन्देह
नहीं, कि बाइबिलोक्त 'तुकी' दक्षिण भारतसे ही गया
था। इसी तरह दक्षिण-भारतमें वाणिज्य कार्य द्वारा
फिनिकोंके यत्नसे जो लिपि चला था, वही उत्तर
भारतमें धीरे-धीरे फैल गई।
सिवा अनुमानके इस बातका स्पष्ट प्रमाण नहीं
मिलता कि, द्राविड़के साथ फ़िनिकोंका बहुत पहले
समयसे संस्रव रहते भी फिनिक लिपि द्राविड़ोंने
ग्रहण की। रामायणके समयमें द्राविड़में वैदिक
आर्य-सभ्यता फैल गई थी। वाल्मीकिकी रामायणमें
दाक्षिणात्यवासी हनुमान् सर्वशास्त्रदर्शी और वेदान्त-
ज्ञाता परिकीर्तित हुए हैं; वे रामनामाङ्कित
अँगुठी ले लङ्काको गये थे। ऐसे स्थलमें हम इसमें
सन्देह करनेका कारण नहीं देखते, कि सोलोमनसे
बहुत पहले दक्षिणापथके कृतविद्य लोगोंमें अक्षरलिपि
प्रचलित थी। यह बात सभी पुराविद मानते हैं, कि
द्राविड़ी सभ्यता अतीव पुरातन है। यह भी असम्भव
नहीं है, कि द्राविड़ी सभ्यतासे फिनिक लोग आलो-<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>अक्षरलिपि ६३
कित हो गये हों। इसके सम्बन्धमें यहाँ दो-एक बातें कहना हम अप्रासङ्गिक नहीं समझते।
फिनिक (Phoenician) लोग पुराने यूनानियों और जर्मनजोंके निकट फोनिक या फनिक नामसे परिचित थे। फणिक जातिको आदि बणिक जाति कहा जा सकता है। फणिक और बणिक शब्दमें उच्चारणका कुछ अधिक अलगाव नहीं। सेमेटिक फ = प।
ऋग्वेदके बहुतसे स्थानोंमें 'पणि' शब्द लिखा है। ५वें मण्डलवाले ३२ सूक्तके भाष्यमें सायणाचार्यने 'पणि' शब्दका 'बणिक्' अर्थ बताया है। इधर पाणिनि-के उणादि-सूत्रके अनुसार भी 'पण' धातुसे बणिक शब्द निष्पन्न हुआ है; सुतरां पणिक और बणिक एक ही बात है। ऋग्वेदमें पणि लोग गोदुग्ध-व्यवसायी और समृद्धिशाली जातिरूपसे ही परिचित हैं। दूध, दही, और घी बनानेके लिये, उनके पास 'चतुःशृङ्ग' और 'दशयन्त्र उत्स' (ऋक् ६।४४।२४) नामक यन्त्र थे। अङ्गिरा प्रभृति वेदोक्त याज्ञिक उनके घोर शत्रु थे; सदा उनका गोधन छीन लेते थे। इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब pणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।* फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व-
भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद-में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।† गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों-के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर-पर उनका अधिकार हुआ।
अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार-तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग-के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)-का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है।
वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने-पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर
* Pococke's India in Greece, p. 218.
† "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४)<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude><noinclude><div style="display: flex; gap: 20px; align-items: flex-start; justify-content: space-between; border-left: 1px solid transparent;"></noinclude>
<div style="width: 48%; float: left; padding-right: 10px; border-right: 1px solid black; margin-top: 25px; min-height:850px;">
{{outdent|६४}} <span style="position: relative; top: -35px;">'''अक्षरलिपि'''</span><br>
{{outdent|हैं। खरोष्ठी लिपिमालाके उत्पत्ति-प्रसङ्गमें इस विषयकी आलोचना की जायगी। द्राविड़ीय सभ्यता समुद्रको राह सुदूर पाश्चात्य और प्राच्य जनपदों-में फैल कर भी भारतमें आर्यवैदिकोंके प्रभावसे ठहर न सकी। यहां अगस्त्यादि आर्य-ऋषियोंने द्राविड़ी समाजका संस्कार कर लोगों को आर्यभावापन्न बना लिया था। इसीसे आज भो अगस्त्य ऋषि अक्षरमाला और व्याकरणके बनाने वाले बताये और गिने जाते हैं और द्राविड़ीि लिपिमें ब्राह्मी लिपिके आदर्शसे अक्षरमालाकी संख्या भी बढ़ गई है।<br>
{{center|{{smaller|ब्राह्मी लिपिकी उत्पत्ति।}}}}
{{gap}}अल् बरुणी, भारतीय पण्डितोंके मुंहसे सुनकर लिख गये हैं, कि पराशरपुत्र वेदव्यास ही अक्षर-लिपिके उद्भावयिता थे। जैनियोंके मतसे ऋषभदेवने दाहने हाथसे अट्ठारह प्रकारकी जो लिपि सिखाई थीं,* उनमें से आदि लिपिका नाम ब्राह्मी है। भागवतके मतसे ऋषभदेव भगवान्का आठवां अवतार हैं (१।३।१३)। वह लोक, वेद, ब्राह्मण और गो सबके परम गुरु थे और उन्होंने सकल धर्मके मूल गुह्य ब्राह्म-धर्म (वेदरहस्य)का ब्राह्मणदर्शित मार्गके अनुसार उपदेश दिया था (५।६।अः) । ब्रह्मावर्तमें ब्रह्मर्षियोंको सभाके बीच उन्होंने ब्राह्मधर्मका प्रचार किया (५।४।१६-१८)। राजर्षि भरत उन्हीं ऋषभदेवके पुत्र थे। उन्हींके नामपर इस देशका नाम भारतवर्ष रखा गया है। वह ब्रह्माक्षरका जप करते थे (५।८।११)।<br>
{{gap}}महाभारतमें लिखा है—
{{center|{{smaller|"इत्येते चतुरो वर्णा एषा ब्राह्मी सरखती।<br>विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात्त्वज्ञानतां गताः॥" (शान्तिपर्व १८८।१५)}}}}
चारो वर्ण ब्राह्मणसे ही वर्णान्तरको प्राप्त हुए हैं और पूर्वकालसे ही ब्रह्माने इन चारो वर्णोंको ब्राह्मी भाषा निर्दिष्ट कर रखी है।<br>
{{gap}}उद्धृत प्रमाणसे अच्छी तरह जान पड़ता है, कि ब्रह्म शब्दका अर्थ वेद और ब्राह्मीका अर्थ वैदिकी है।}}
<br><br>
<hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;">
{{smaller|* "अथ श्रीऋषभदेवेन ब्राह्मी दक्षिणहस्तेन अष्टादश लिपयो दर्शिताः।"<br> (लक्ष्मीवल्लभगणिरचितकल्पसूत्रकल्पद्रुमकलिका)}}
</div>
<div style="width: 48%; float: right; padding-left: 10px; margin-top: 15px;">
{{outdent|ऋषभदेवने ही सम्भवतः लिपिविद्याके लिये लिपि कौशलका उद्भावन किया था। इसलिये देखते हैं, कि ब्राह्मोलिपि कहनेसे पुराकालमें वैदिकी लिपि हो समझी जाती रही। यह पहले ही प्रमाणित हो चुका है, कि वेद अवश्य लिपिवद्ध होते थे। ऋषभदेवने ही सम्भवतः ब्रह्मविद्याशिक्षाकी उपयोगी बाह्मोलिपिका प्रचार किया ; हो न हो, इसीलिये वह अष्टम अवतार बताये जाकर परिचित हुए। ब्राह्मोलिपि नामसे भी लोगोंका यह कहना सच मालूम पड़ता है, कि पहले यह लिपि ब्रह्मावर्तमें आविष्कृत हुई थी। वेदव्यास भी यह बात कहनेसे लिपि-प्रचारक गिने जा सकते हैं, कि उन्होंने वेद-सङ्कलनकालमें इस लिपिस काम लिया।<br>
{{gap}}जो हो, ब्राह्मीलिपि ही भारतीय आर्योंकी आदि लिपि है, इस ब्राह्मी लिपिसे ही भारतकी सब लिपि निकली हैं।<br>
{{gap}}डाकर बूहलरने अशोकलिपिको ही ब्राह्मी कह कर गणना की है। निःसन्देह, हम यह स्वीकार नहीं कर सकते। अशोकके समय भारतमें चौसठ प्रकारकी लिपि चलती थीं, उस समय पाटलिपुत्र उनकी राज-धानी थी। ऐसे स्थलमें उनके अनुशासनीको मागध-ब्राह्मोलिपि कहकर ग्रहण कर सकते हैं; इसे छोड़ विभिन्न प्रदेशोंसे जो अशोकलिपि निकली हैं, उनके अक्षर और उनकी शब्दयोजना अविकल एक तरह नहीं। विहारके बराबरकी गिरिलिपिमें 'अनपितम्', दाक्षिणात्यको स्तम्भलिपिमें 'आनपयिमति' और उत्तर-पश्चिम-प्रदेशकी स्तम्भलिपिमें 'आनापपितं' पाठ देख पड़ता है। यह कैसा अक्षरविपर्याय है, कि दक्षिण-देशीय लिपिमें 'एतारिसम्' और 'अनपयम्' किन्तु उत्तर-देशीय लिपिमें 'एतादिसम्' और 'अनपियं' लिखा मिलता है। इसे छोड़ दक्षिण-देशीय और उत्तर-देशीय लिपिके बीच भी व्यञ्जनसे मिले आकार और इकारका प्रमेद देख पड़ता है। इससे सहजमें ही समझा जायगा, कि देशभेदसे जैसे भाषामें कुछ अल-गाव हो गया था, वैसे ही अक्षरलिपि भी सामान्य रूपसे बदल गई थी। मालूम होता है, कि अशोकसे पहले ऐसी कोई लिपि वर्त्तमान थी। अक्षरयोजनाके}}
</div>
<noinclude></div><div style="clear:both;"></div></noinclude><noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|६४|अक्षरलिपि|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
हैं। खरोष्ठी लिपिमालाके उत्पत्ति-प्रसङ्गमें इस विषयको आलोचना की जायगी। द्राविड़ीय सभ्यता समुद्रको राह सुदूर पाश्चात्य और प्राच्च जनपदों-में फैल कर भी भारतमें आर्यवैदिकोंके प्रभावसे ठहर न सको। यहां अगस्त्यादि आय्य-ऋषियोंने द्राविड़ी समाजका संस्कार कर लोगों को आर्य्यवापन्न बना लिया था। इसीसे आज भी अगस्त्य ऋषि अक्षरमाला और व्याकरणके बनाने वाले बताये और गिने जाते है' और द्राविड़ी लिपिमें ब्राह्मी लिपिके आदर्शसे अक्षरमालाको संख्याःभी बढ़ गई है।
{{c|{{smaller|ब्राह्मी लिपिकी उत्पत्ति।}}}}
अल् बेरुणी, भारतीय पण्डितोंके मुंहसे सुनकर लिख गये हैं, कि पराशरपुत्र वेदव्यास हो अक्षर-लिपिके उद्भावयिता थे। जैनियोंके मतसे ऋषभदेवने दाहने हाथसे अठारह प्रकारको जो लिपि सिखाई थीं<ref>अथ श्रीऋषभदेवेन ब्राह्मी दचिणहस्ते न अष्टादश लिपयो दर्शिताः।”<br>
(लक्ष्मीवल्लभगणिरचितकल्यसूवकल्पद्रुमकलिका)</ref>, उनमेंसे आदि लिपिका नाम ब्राह्मी है। भागवत के मतसे ऋषभदेव भगवान्का आठवां अवतार हैं (१।३।१३)। वह लोक, वेद, बाह्मण और गो सबके परम गुरु थे और उन्होंने सकल धम्र्मके मूल गुह्य ब्राह्म-धर्म्मा (वेदरहस्य) का ब्राह्मणदर्शित मार्गके अनुसार उपदेश दिया था (५।६।अः)। ब्रह्मावर्त्तमें बुह्मर्षियोंको सभाके बीच उन्होंने ब्राह्मधर्मका प्रचार किया (५।४।१६-१८। राजर्षि भरत उन्हीं ऋषभदेवके पुत्र थे। उन्होंके नामपर इस देशका नाम भारतवर्ष रखा गया है। वह ब्रह्माक्षरका जप करते थे (५।८।११)।
महाभारतमें लिखा है—
{{block center|<poem>{{smaller|"इत्य ते चतुरो वर्णा येषां ब्राह्मी सरखती।
विहिता ब्रह्मणा पूर्व लोभात्त्वन्नानतां गताः॥" (शान्तिपव्र्व १८८११५)}}</poem>
चारो वर्ण ब्राह्मणसे ही वर्णान्तरको प्राप्त हुए हैं और पूर्व कालसे ही ब्रह्माने इन चारो वर्षों को ब्राह्मी भाषा निद्दष्ट कर रखो है। उद्धृत प्रमाणसे अच्छी तरह जान पड़ता है, कि ब्रह्म शब्दका अर्थ वेद और बाह्मोका अर्थ वैदिकी है
<noinclude>}}{{Multicol-break}}</noinclude>
ऋषभदेवने हो सम्भवतः लिपिविद्याके लिये लिपि कौशलका उद्भावन किया था। इसलिये देखते हैं, कि ब्राह्मोलिपि कहनेसे पुराकालमें वैदिको लिपि ही समझी जातो रही। यह पहले हो प्रमाणित हो चुका है, कि वेद अवश्य लिपिवद्ध होते थे। ऋषभदेवने हो सम्भवतः बुह्मविद्याशिक्षाकी उपयोगी ब्राह्मोलिपिका प्रचार किया; हो न हो, इसीलिये वह अष्टम अवतार बताये जाकर परिचित हुए। ब्राह्मौलिपि नामसे भो लोगोंका यह कहना सच मालूम पड़ता है, कि पहले यह लिपि ब्रह्मावत्त में आविष्कृत हुई थी। वेदव्यास भी यह बात कहनेसे लिपि-प्रचारक गिने जा सकते हैं, कि उन्होंने वेद-सङ्कलनकालमें इस लिपिस काम लिया। जो हो, ब्राह्मीलिपि ही भारतीय आयाँको आदि लिपि है, इस बाह्मी लिपिसे हो भारतको सब लिपि निकली हैं।
डाकर बूलरने अशोकलिपिको ही बाह्मी कह कर गणना की है। निःसन्देह, हम यह स्वीकार नहीं कर सकते। अशोकके समय भारतमें चौसठ प्रकारको लिपि चलती थीं, उस समय पाटलिपुत्र उनको राजधानी थी। ऐसे स्थलमें उनके अनुशामनींको मागध-ब्राह्मीलिपि कहकर ग्रहण कर सकते हैं; इसे छोड़ पाठ विभिन्न प्रदेशोंसे जो अशोकलिपि निकली हैं, उनके अक्षर और उनकी शब्दयोजना अविकल एक तरह नहीं। विहारके बरावरको गिरिलिपिमें अनपितम्', दाक्षिणात्यको स्तम्भलिपिमें 'आनपचिमति' और उत्तर-पश्चिम-प्रदेशको स्तम्भलिपिमें 'आना पसति' देख पड़ता है। यह कैसा अक्षरविपर्य्यय है, कि दक्षिण-देशीय लिपिमें 'एतारिसम्' और 'अनर्थभू' किन्तु उत्तर-देशीय लिपिमें 'एतादिसम्' और 'अर्थ' लिखा मिलता है। इसे छोड़ दक्षिण-देशीय और उत्तर-देशीय लिपिके बीच भी व्यञ्ज्ञ्जनसे मिले आकार और इकारका प्रमेद देख पड़ता है। इससे सहजमें ही समझा जायगा, कि देशभेदसे जैसे भाषामें कुछ अल-गाव हो गया था, वैसे ही अक्षरलिपि भी सामान्य रूपसे बदल गई थी। मालूम होता है, कि अशोकसे पहले ऐसी कोई लिपि वर्त्तमान थी। अक्षरयोजनाके
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/३
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<noinclude><pagequality level="1" user="रोशनी चौबे जे" /></noinclude><noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>
{{right|{{x-larger|१{{gap|1em}}<br>पहिली भेंट}}}}
रात बहुत अंधेरी थी। रास्ता पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ था। आकाश पर बदली छाई हुई थी, और अभी कुछ देर पूर्व जोर की वर्षा हो चुकी थी। जब जोर की हवा से वृक्ष और बड़ी-बड़ी घास सांय-सांय करती थी, तब जंगल का सन्नाटा और भी भयानक मालूम होता था।
इस समय उस जंगल में दो घुड़सवार बढ़े चले जारहे थे। दोनों के घोड़े खूब मजबूत थे, पर वे पसीने में लथपथ थे। घोड़े पग-पग पर ठोकरें खाते थे, पर उन्हें ऐसे बीहड़ रास्तों में, ऐसे संकट के समय, अपने स्वामी को ले जाने का अभ्यास था। सवार भी असाधारण धैर्यवान् और वीर पुरुष थे। वे चुपचाप चल रहे थे। घोड़ों की टापों और उनकी प्रगति से कमर में लटकती हुई उनकी तलवारों और बर्छों की खरखराहट उस सन्नाटे के आलम में एक भयपूर्ण रव उत्पन्न कर रही थी।
हठात् घोड़े ने एक ठोकर खाई, और एक मंद आर्तनाद अग्रग्रामी सवार के कान में पड़ा। उसने घोड़े की
बाग खींचते हुए कहा—"घाँघूजी!"<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>
{{right|{{x-larger|१{{gap|1em}}<br>पहिली भेंट}}|1em}}
रात बहुत अंधेरी थी। रास्ता पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ था। आकाश पर बदली छाई हुई थी, और अभी कुछ देर पूर्व जोर की वर्षा हो चुकी थी। जब जोर की हवा से वृक्ष और बड़ी-बड़ी घास सांय-सांय करती थी, तब जंगल का सन्नाटा और भी भयानक मालूम होता था।
इस समय उस जंगल में दो घुड़सवार बढ़े चले जारहे थे। दोनों के घोड़े खूब मजबूत थे, पर वे पसीने में लथपथ थे। घोड़े पग-पग पर ठोकरें खाते थे, पर उन्हें ऐसे बीहड़ रास्तों में, ऐसे संकट के समय, अपने स्वामी को ले जाने का अभ्यास था। सवार भी असाधारण धैर्यवान् और वीर पुरुष थे। वे चुपचाप चल रहे थे। घोड़ों की टापों और उनकी प्रगति से कमर में लटकती हुई उनकी तलवारों और बर्छों की खरखराहट उस सन्नाटे के आलम में एक भयपूर्ण रव उत्पन्न कर रही थी।
हठात् घोड़े ने एक ठोकर खाई, और एक मंद आर्तनाद अग्रग्रामी सवार के कान में पड़ा। उसने घोड़े की
बाग खींचते हुए कहा—"घाँघूजी!"<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="ममता साव9" /></noinclude>
{{right|{{x-larger|१{{gap|1em}}<br>पहिली भेंट}}|1em}}
रात बहुत अंधेरी थी। रास्ता पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ था। आकाश पर बदली छाई हुई थी, और अभी कुछ देर पूर्व जोर की वर्षा हो चुकी थी। जब जोर की हवा से वृक्ष और बड़ी-बड़ी घास सांय-सांय करती थी, तब जंगल का सन्नाटा और भी भयानक मालूम होता था।
इस समय उस जंगल में दो घुड़सवार बढ़े चले जारहे थे। दोनों के घोड़े खूब मजबूत थे, पर वे पसीने में लथपथ थे। घोड़े पग-पग पर ठोकरें खाते थे, पर उन्हें ऐसे बीहड़ रास्तों में, ऐसे संकट के समय, अपने स्वामी को ले जाने का अभ्यास था। सवार भी असाधारण धैर्यवान् और वीर पुरुष थे। वे चुपचाप चल रहे थे। घोड़ों की टापों और उनकी प्रगति से कमर में लटकती हुई उनकी तलवारों और बर्छों की खरखराहट उस सन्नाटे के आलम में एक भयपूर्ण रव उत्पन्न कर रही थी।
हठात् घोड़े ने एक ठोकर खाई, और एक मंद आर्त्तनाद अग्रग्रामी सवार के कान में पड़ा। उसने घोड़े की बाग खींचते हुए कहा—"घाँघूजी!"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/४
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude> "महाराज !”
पीछे आने वाला सवार क्षण भर में अग्रगामी सवार के सन्निकट
आगया, और उसने विजली की भांति अपनी तलवार खींच ली । अग्रगामी
सवार का घोड़ा खड़ा हो गया था। उसने भी तलवार नंगी करके कहा-
"देखो, क्या है ? घोड़े ने ठोकर खाई है, यह श्रार्त्तनाद कैसा है ?"
घांघूजी घोड़े से उतर पड़े, उन्होंने झुककर देखा और कहा-
“महाराज, एक मनुष्य है ।"
"क्या घायल है ?"
"खून में लथपथ प्रतीत होता है ।"
"जीवित है ?"
इसी समय पड़े हुए व्यक्ति ने फिर आनाद किया । महाराज
उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही घोड़े से कूद पड़े । उन्होंने बांधूजी को
प्रकाश करने का आदेश दिया, और स्वयं मार्ग में पड़े व्यक्ति के सिर-
हाने घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने उसका सिर गोद में रख लिया,
नाड़ी देखी, हृदय का स्पंदन देखा, और कहा - "जीवित है । पर मालूम
होता है, बहुत घाव खाए हैं, रक्त बहुत निकल गया है ।"
धांवूजी ने तब तक चकमक पत्थर से अबरख की वनी, चोर-
लालटेन जला ली थी । वह उसे घायल के मुख के पास लाए। देखकर
कहा–“अरे, बड़ा अल्पवयस्क वालक है !”
"परन्तु अंग-अंग में घाव हैं, मालूम होता है, वीरतापूर्वक युद्ध
किया है ।"
मुमूर्षु ने प्रकाश और मनुष्य मूर्ति को देखा, और जल का संकेत
किया । महाराज ने स्वयं उसके मुख में जल डाला । जल पीकर उसने
नांखें खोलीं, और क्षीण स्वर में कहा - "आप कौन हैं, प्राणरक्षक ?”
और फिर कुछ ठहर कर कहा - " आप चाहे जो भी हों, यह प्रारण और
शरीर आपके हुए।" उसके होठों पर मंद हास्य की रेखा आई ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५८
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>५७
गढ़ आया, पर सिंह गया
शुभ मुहूर्त में छत्रपति महाराज ने सिंहगढ़ में प्रवेश किया ।
प्राङ्गण में विषण्ण-वदन सैनिक नीची गर्दन किए खड़े थे । घोड़े से उतरते
हुए शिवाजी ने कहा-"मेरा मित्र तानाजी कहाँ है ?"
एक अधिकारी ने गम्भीर मुद्रा से कहा--"वह वीर वहाँ
वरामदे में श्रीमान् की अभ्यर्थना को बैठे हैं।"
अधिकारी रोता हुआ पीछे हट गया । महाराज ने पैदल आगे
बढ़कर देखा।
वह निश्चल मूत्ति सैकड़ों घाव छाती और शरीर पर खाकर
वीरासन से विराजमान थी। महाराज की आँखों से टपाटप आँसू
गिरने लगे। उन्होंने शोक-कम्पित स्वर में कहा-“गढ़ आया, पर
सिंह गया।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/५
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>महाराज ने कहा-“घांघूजी, इसका रक्त बंद होना चाहिए।
देखिए, सिर से अब तक रक्त वह रहा है । और, पार्श्व का यह घाव भी
भयानक है।" इसके बाद दोनों व्यक्तियों ने उसके सभी घाव बांधकर
उसे स्वस्थ किया। फिर वे सलाह करने लगे-"अब इसे कहां ले जाया
जाय ? समय कम है और हमारा गंतव्य पथ लम्बा ।"
युवक ने स्वयं कहा-“यदि मुझे घोड़े पर बैठा दिया जाय, तो
मैं मजे में चल सकूँगा।"
"क्या निकट कोई गांव है ?"
"है, पर एक कोस के लगभग है।"
"वहां कोई मित्र है ?"
"है। वहां मेरी बहन का घर था, बहनोई हैं।" युवक का
स्वर कंपित था।
महाराज ने कहा-“वहिन नहीं है ?"
"नहीं।" युवक का कंठ अवरुद्ध हुआ। उसके नेत्रों से झर-झर
आंसू बहने लगे । वह फिर बोला-"उसे आज तीसरे पहर विदा कराके
घर ले आ रहा था। बहनोई उस बाग तक साथ आए थे। उन्हें लौटते
देर न हुई, ज्यों ही हम लोग इस खेड़े के निकट पहुंचे, कोई पांच सौ
यवन सैनिकों ने धावा बोल दिया। मेरे साथ केवल आठ आदमी थे।
शायद सभी मारे गए। मैंने यथासाध्य विरोध किया, पर कुछ न कर
सका, वे बहन का डोला ले गए। मैंने मूच्छित होने से पूर्व अच्छी
तरह देखा, पर मैं तलवार पकड़ ही न सका, फिर मेरी तलवार टूट भी
गई थी ।" युवक उद्वेग से मानो मूर्छित हो गया। महाराज ने होंठ
चवाया । एक बार उन्होंने अपने सिंह के समान नेत्रों से उस चोर-
लालटेन के प्रकाश में चारों और देखा-टूटी तलवार, वर्धा, दो-चार
लाशें और रक्त की धार ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४६
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>कारगुजारी समझने लगे। कर वसूल करने के लिए प्रायः बल का प्रयोग
आवश्यक हो जाता था। इससे चारों ओर हाहाकार मच गया।
जजिया कर लगाने के प्रत्यक्ष फल' दो हुए सरकार की प्राय
बढ़ गई और नए मुसलमानों की संख्या में वृद्धि होने लगी। बहुत से
स्थानों में ६ मास के अन्दर-ही-अन्दर सरकारी खजाने की आय चौगुनी
हो गई । औरंगजेब ने प्रान्त-शासकों को लिख दिया था, “तुम्हें अन्य
सब प्रकार के करों को माफ करने का अधिकार है, परन्तु जजिया किसी
को माफ नहीं किया जा सकता।" गुजरात में केवल जजिया से जो आय
थी, वह शेष सारी आय का लगभग ३१ फीसदी थी। इस प्रकार जजिया
लगाने का तुरन्त परिणाम यह हुआ कि राज्य की आय बढ़ गई।
दूसरा परिणाम यह हुआ कि नौ-मुसलिमों की संख्या बढ़ने
लगी। बहुत से हिन्दू, जो नहीं दे सकते थे, मुसलमान बना गए औरंग-
जेब प्रसन्न होता था कि कठोर उगाही से हिन्दू लोग इस्लाम ग्रहण करने
लिए बाधित होते थे।
ये दोनों जजिया के प्रत्यक्ष और तत्काल परिणाम थे । परन्तु
उसके जो अप्रत्यक्ष और अन्तिम परिणाम थे, वे इनसे कहीं अधिक
महत्वपूर्ण थे। सोने के अंडे देने वाली चिड़िया जिन्दा रहकर अंडा दे
सकती है.। यदि उसमें से एक बार ही सब अंडे लेने का प्रयत्न किया जाय
तो वह स्वयं ही न रहेगी, फिर अण्डे कहाँ से आएँगे। जजिया का बोझ
पड़ने से हिन्दू व्यापारी शहरों को छोड़कर भागने लगे, क्योंकि शहरों
में ही वसूली का जोर था। इससे व्यापार थोड़े ही दिनों में चौपट हो
गया। छावनियों में विशेष दिक्कत होने लगी। हिन्दू व्यापारियों के
भाग जाने से फौजों को अन्न मिलना भी कठिन हो गया। जब प्रान्तों
के शासकों या सेनापतियों की ओर से यह सिफारिश आती कि कुछ
समय के लिए जजिया वसूल न किया जाय, तो औरंगजेब का जोरदार
इन्कार पहुंच जाता । अन्तिम फल यह हुआ कि शहरों का व्यापार
१४४<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४७
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>जड़ ने लगा, जिससे केवल जजिया कर की ही नहीं, वस्तुतः हर प्रकार
की सरकारी आमदनी घटने लगी।
चौसर का दाव
वसन्त के सुन्दर दिन थे। शिवाजी इन दिनों राजगढ़ में रहकर
औरंगजेब की जबर्दस्त संग्राम-योजना की जवाबी तैयारी कर रहे थे।
परन्तु जीजाबाई इन दिनों प्रतापगढ़ दुर्ग में थीं। एक दिन सायंकाल के
समय एक बुर्ज पर खड़ी वे सूर्यास्त का सुन्दर दृश्य देख रही थीं कि
दूर से उन्हें सिंहगढ़ का बुर्ज दीख पड़ा। उसे देखते ही उनके मन में
विचार आया कि मेरे शिवा के रहते मेरी आँखों के सन्मुख यह शत्रु का
किला खड़ा है। उन्होंने तत्काल एक दूत शिवाजी के पास रवाना
किया । शिवाजी को तत्क्षण ही चले आने की आज्ञा थी।
शिवाजी माता का आदेश पाते ही ताबड़तोड़ आ हाजिर हुए।
आकर उन्होंने माता की वन्दना की और आज्ञा का कारण जानना चाहा।
जीजाबाई ने कहा-"प्राओ बेटे, एक वाजी चौसर. खेलें ;"*
शिवाजी ने समझा, माता का कोई गूढ आशय है। वे
चौसर खेलने लगे।
उन्होंने कहा-"माता, पहला पासा आप डालें।"
"नहीं बेटे, राजा की विद्यमानता में कोई पहल नहीं कर सकता।
यह राजपदवी का अधिकार है।"
शिवाजी ने हंसकर पासा फेंका पर पासा अच्छा न पड़ा।
तब जीजाबाई ने पासा फेंका। वह अच्छा निकला।
शिवाजी ने कहा-"मैं हार गया । कहिए, क्या भेंट करूं।"
"मुझे सिंहगढ़ चाहिए।"
१४५<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>शिवाजी सन्न रह गए । उन्होंने कहा-"बड़ा कठिन वचन
मांगा, माता।"
"पुत्र, यह शत्रु का किला मेरी ही आँखों के सामने शूल वनकर
खड़ा है। इसे बिना जय किए तेरा राज्य अधूरा है।"
कुछ देर शिवाजी चुपचाप खड़े सोचते रहे। फिर उन्होंने पालकी
लाने की आज्ञा दी और माँ से कहा-"चलिए माताजी, राजगढ़ चलें।"
राजगढ़ में आकर भोर ही शिवाजी ने दरबार किया। सब
सामन्त सरदार एकत्र हुए। दरबार में १० पानों का बीड़ा चादर विद्या
कर रखा गया । शिवाजी ने कहा-'कौन वीर प्राणों की बाजी लगाकर
किला सर करेगा।"
परन्तु सिंहगढ़ का नाम सुनकर सब सन्नाटे में आ गए। प्रथम
तो सिंहगढ़ अजेय दुर्ग था। दूसरे इस समय उदयभानु उसका किलेदार
था जो शारीरिक बल' में राक्षस के समान था। दुर्ग में दुर्दान्त पठानों
की सेना थी वह भी अजेय समझी जाती थी। इसके अतिरिक्त इसी दुर्ग में
वह पठान सेनापति भी था जिसने तानाजी की बहन को हरण
किया था ।
जव बड़ी देर तक सभा में सन्नाटा रहा और किसी ने बीड़ा
नहीं उठाया तो शिवाजी ने शेर की भाँति दहाड़ कर कहा- “तानाजी
मालूसरे को बुलाना होगा। वही वीर यह वीड़ा उठाएगा।" तत्काल
एक तीव्रगामी साँड़नी-सवार तानाजी को बुलाने रवाना हो गया जहाँ
वे अपने पुत्र के ब्याह के लिए छुट्टी लेकर अभी कुछ दिन पूर्व गए थे।
५४
साँड़नी-सवार का सन्देश
ग्राम में बड़ा कोलाहल' था। बालक धूम मचा रहे थे और
विविध वस्त्र पहने स्त्री-पुरुष काम-काज में व्यस्त इधर-से-उधर दौड़-धूप
१४६<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>कर रहे थे। तानाजी के पुत्र का विवाह था । द्वार पर नौबत वज रही
थी। आगत जनों की काफी भीड़ थी।
सन्ध्या होने में अभी विलम्ब था। एक श्रमिक, शिथिल साँड़नी
सवार ने नगर में प्रवेश किया। थोड़े-से वालक कौतूहल-वश उसके पीछे
हो लिए। ग्राम के चौराहे पर जाकर उसने अपनी बगल से छोटी-सी
तुरही निकाल कर फूंकी। देखते-देखते दस-बीस नर-नारी और बहुत से
वालक एकत्र हो गए। सवार ने एक वृद्ध को लक्ष्य करके कहा-"मुझे
तानाजी मकान पर अभी पहुँचना है ।"
तुरन्त दस-पाँच आदमी साथ हो लिए। सन्मुख ही तानाजी का
पर था। वहाँ पहुँच कर उसने फिर तुरही बजाई । कोलाहल वन्द हो
गया । सभी व्यत्र होकर आगन्तुक को देखने लगे। उसने जरा उच्च
स्नर से पुकारकर कहा- "छत्रपति शिवाजी महाराज की जय हो ।
मैं तानाजी के पास महाराज का अत्यावश्यक सन्देश लेकर आया हूँ।
तानाजी अभी चानकर महाराज से मुलाकात करें।"
उपस्थित जन-मण्डल ने चिल्लाकर कहा-"छत्रपति महाराज
की जय।"
हल्दी से शरीर लपेटे, व्याह का कंगना हाथ में बाँधे पुत्र को
छोड़कर तानाजी बाहर निकल आए। धावन ने उन्हें पत्र दिया । पत्र
पढ़कर तानाजी क्षण भर को विचलित हुए। इसके बाद ही उन्होंने
अग्निमय नेत्रों से उपस्थित जन-समूह को देखा। वह उछलकर एक ऊँचे
स्थान पर चढ़ गए, और उन्होंने गंभीर व उच्च स्वर से कहना प्रारम्भ
किया--"सज्जनो ! महावीर छत्रपति महाराज ने मुझे इसी क्षण बुलाया
है । यह शरीर और प्राण महाराज का है। फिर वहिन के प्रतिशोध का
भी यही महायोग है। मैं इसी क्षण जाऊँगा । आप लोग कल प्रातःकाल
ही प्रस्थान करें। विवाह समारोह अनिश्चित समय के लिए स्थगित
किया गया।"
।
१४७<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>तानाजी बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए चीते की भांति उछलकर
कूद पड़े और घर में चले गए। कुछ ही क्षण बाद वह अपने प्यारे बचें
और विशाल तलवार के साथ सज्जित होकर घोड़े पर सवार हुए ।
विवाह का आनन्द-समारोह स्तब्ध हो गया। गुरुजनों को प्रणाम कर पुत्र
को छाती से लगा उन्होंने बढ़ते हुए सन्ध्या के अन्धकार में डूवते हुए सूर्य
को लक्ष्य कर उन दुर्गम पर्वत-उपत्यकाओं में घोड़ा छोड़ दिया।
५५
बीड़ा-ग्रहण
तानाजी के आने पर शिवाजी ने उन्हें माता की आज्ञा सुना दी।
माता की आज्ञापालन कर तानाजी ने बीड़ा आदरपूर्वक उठा पगड़ी में
रख लिया। जीजाबाई ने आकर वीर की आरती उतारी। दूसरे ही
दिन एक हजार जुझाऊ वीरों की सेना लेकर उन्होंने सिंहगढ़ की ओर
प्रस्थान किया और एक सघन जङ्गल में डेरा डाला ।
सिंहगढ़ किले में समाचार ले जाने पहुँचाने वाले लोग कोली
और कुम्हार लोग थे। उन्हें हर समय किले से बाहर और बाहर से
किले में आने-जाने की छूट थी। तानाजी ने उनसे मिलकर काम
निकालने की युक्ति सोची। दैवयोग से अनुकूल अवसर भी मिल
गया। कोलियों के सरदार रायजी की पुत्री का ब्याह पूना निवासी
दौलतराय के पुत्र के साथ था। दौलतराय तानाजी के परिचित थे ।
दौलतराय की सहमति से तानाजी एक कलावन्त की हैसियत से बारात
में सम्मिलित हो गए। दौलतराय ने तानाजी को प्रसिद्ध कलावन्त
गोन्धाजी तोताराम बताया। जव उन्होंने मधुर स्वर में शिवाजी का
स्तवन गाया तो श्रोता मुग्ध होकर शिवाजी की चर्चा करने लगे।
गायन का अभिप्राय था कि शिवाजी शिव के अवतार हैं । अम्बावाई
१४८<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/६
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>उन्होंने युवक से कहा-"तुम्हारे घर पर कौन है ?"
"वृद्धा विधवा माता।"
"गांव कौन है ?"
"मौरावां।"
" दूर है?"
"आठ कोस होगा।"
"तुम्हारा नाम ?"
"तानाजी ।"
"घोड़े पर चढ़ सकोगे ?"
"जी।"
महाराज और धांवूजी ने युवक को घोड़े पर लादा। घांघूजी
उनके पीछे बैठे, और महाराज भी अपने घोड़े पर सवार हुए।
इस बार ये यात्री अपना पथ छोड़कर युवक के आदेशानुसार गांव
की ओर बढ़े, पगडंडी संकरी और बहुत खराव थी। जगह-जगह पानी
भरा था, पर जानवर सधे हुए और बहुत असील थे। धीरे-धीरे गांव
निकट आ गया। युवक के बताए मकान के द्वार पर जाकर घांघूजी ने
थपकी दी। एक युवक ने आकर द्वार खोला । धांघूजी ने उसकी सहायता
से तानाजी को उतार कर घर में पहुंचाया। संक्षेप में दुर्घटना का हाल
मुनकर गृहपति युवक मर्माहत हुआ। धांघूजी ने अवकाश न देखकर कहा-
"तुम लोग परसों इसी समय हमारे यहां आने की प्रतीक्षा करना और
घटना का कहीं भी जिक्र न करना।"
तानाजी ने व्यग्र होकर कहा-“महोदय, आपका परिचय ? मैं
किसके प्रति कृतज्ञ होऊ ?"
"छत्रपति हिंदू-कुल-सूर्य महाराजाधिराज शिवाजी के प्रति ।"
घांघूजी ने अव विलम्ब न किया, वह लपककर घोड़े पर चढ़े, और दोनों
असाधारण सवार उस अंधकार में विलीन हो गए।
.
{{ center | ४ }}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{center | २}}
{{larger|{{center | महाराष्ट्र भूमि और मराठे}}}}
{{blockcenter|
महाराष्ट्र भूमि तीन भौगोलिक भागों में विभक्त है। पश्चिमी
घाट और हिन्द महासागर के बीच एक लम्बी किन्तु संकरी जमीन का
हिस्सा बहुत लम्बा चला गया है । इसकी चौड़ाई कहीं ज्यादा कहीं कम
है। वम्बई और गोपा के बीच का प्रदेश कोंकरण कहाता है।
गोआ के दक्षिण में कन्नड़ प्रदेश है। कोंकरण में प्रति वर्ष १०० से २००
इंच तक वर्षा होती है। यहां की मुख्य उपज चावल है। आम, केले
और नारियल के वाग यहां वहुत हैं । घाट पार करने पर पूर्व की ओर
लगभग २० मील चौड़ा धरती का एक लम्बा टुकड़ा पड़ता है-इसे
मावल कहते हैं। यहां की धरती बहुत ही ऊँची-नीची है, दूर तक
टेढ़ी-मेडी घाटियों में जहां-तहां समतल भूमि पाई जाती है । इसके आगे
पूर्व की ओर बढ़ने पर पश्चिमी घाट की पहाड़ियों की ऊँचाई कम
होने लगती है। और नदियों के कछार चौड़े और समतल होने लगते
हैं । यहीं से वह प्रदेश शुरू होता है जिसे देश कहते हैं। यह दक्षिण के
मध्य में स्थित दूर तक फैला हुआ एक विस्तृत उपजाऊ मैदान है ।
यहां की मिट्टी काली है।
प्रकृति ने इस प्रान्त को ऐसा रूप दिया है कि विलासिता और
कला वहां नहीं पनप सकती। परन्तु इन अभावों की पूर्ति वहां की जल-
वायु के कारण वहां के निवासियों में आत्मविश्वास, साहस, अध्यवसाय,
सादगी और सहिष्णुता के रूप में मिलती है । आत्मसम्मान और सामा-
जिक समता यहाँ की आधारभूत विशेषताएँ हैं । १५वीं-१६वीं शताब्दी
के लोकप्रिय सन्तों ने यहां जन्म की श्रेष्ठता की अपेक्षा चरित्र की पवित्रता
को अधिक महत्व दिया, और यही कारण था कि शिवाजी को १७वीं
शताब्दी में महाराष्ट्रियों की राजनैतिक एकता स्थापित करने में विशेष}}
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>कठिनाई नहीं हुई । क्योंकि उनसे पहले ही महाराष्ट्र में समान भाषा,
समान धर्म और समान जीवन के आधार पर एक मुगठित जाति का
निर्माण हो चुका था। शिवाजी की सेना में मराठा और कुनवी जाति के
लोगों की अधिकता थी। ये जातियां निष्कपट, स्वावलम्बी, परिश्रमी और
वीर थीं।
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{{x-larger|शाहजी भोंसले}}}}
चौदहवीं शताब्दी में जब मुसलमानों ने दक्षिण को जीता और
महाराष्ट्र के अन्तिम हिन्दू राज्य का भी अन्त हो गया, तब यहां की योद्धा
जातियों के छोटे-छोटे दल भिन्न नायकों के दल में संगठित हो गए, जिन्हें
नए मुसलमान शासक धन देकर अपनी सहायता के लिए बुलाते रहे, और
उनका सहयोग लेते रहे। इस तरह मुसलमानी राज्यों के सहयोग से
कुछ मराठा घराने धन और शक्ति से सम्पन्न बन गए। ऐसा ही एक घराना
मोंसले का था जो पूना प्रान्त के अन्तर्गत पाटस ताल्लुके में रहता था
और वहां के दो गांवों की पटेली भी करता था। आरम्भ में यह घराना
खेती करके निर्वाह करता रहा । इसी घराने में एक पुरुष हुए, जिनका
नाम मल्लूजी था। वे देशल ग्राम में रहते थे। परन्तु उनका विवाह
एक ऐसे प्रतिष्ठित वंश में हुआ था जो धनवान भी था और प्राचीन भी।
इस समय निजामशाही में सबसे प्रमुख मराठा घराना सामन्त लखूजी
जादोराय का था। जादोराय निजामशाही में १० हजार के जागीरदार
ये। उनके वंश में सदा से देशमुखी चली आती थी। मल्लूजी की
ससुराल वालों का घराना दूसरे नम्बर पर था। परन्तु मल्लूजी का साला
अपने समय का बड़ा नामी लड़ाका और वीर था। उसका नाम जयपाल
था। वह सदा लड़ाइयाँ तथा लूटमार करता रहता था ।
मल्लूजी भोंसले का बड़ा पुत्र शाहजी था। शाहजी का ब्याह
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>जादोराय की कन्या जीजावाई से हुआ। जादोराय और मल्लूजी पुराने
मित्र थे। एक बार वे अपने पुत्र शाहजी को संग लेकर जादोराय के घर
गए । तब वालिका जीजाबाई आकर शाहजी के पास बैठ गई। जादोराय
ने हंसकर कहा-"अच्छी जोड़ी है"। उसने लड़की से पूछा-"क्या तू
शाहजी से व्याह करेगी ?" यह सुनते ही मल्लूजी उछलकर खड़ा हो
गया और कहा-"देखो भई, सबके सामने जादोराय ने आज अपनी कन्या
का वाग्दान मेरे पुत्र शाहजी के साथ कर दिया है। अब जीजाबाई
शाहजी की हुई ।” परन्तु जादोराय विगड़ गया, और इसी बात पर दोनों
में अनबन भी हो गई। बाद में मल्लूजी को खेतों में गढ़ा हुआ कुछ धन
प्राप्त हो गया, जिससे उन्होंने कुछ घोड़े और हथियार खरीद लिए और
निजामशाही की एक सेना के सेनानायक बन गए।
उन्हें पांचहजारी का मनसब भी मिल गया। बाद में अहमद-
नगर के दरबारियों ने बीच में पड़कर जादोराय से उनका मेल करा दिया
और अन्त में जीजाबाई का व्याह भी शाहजी से हो गया ।
मल्लूजी के मरने पर शाहजी को अहमदनगर के दरवार से अपने
पिता के अधिकार और जागीर मिली। शाहजी बड़े हौसले के आदमी थे।
शीघ्र ही लोगों ने देखा कि बेटा वाप से बढ़-चढ़ कर है । यह वह समय
था जब वादशाह जहांगीर के सेनापति दक्षिरग विजय करने की
धुन
में
थे। और अहमदनगर के प्रसिद्ध सेनापति वजीर मलिक अम्बर उनसे
लड़ रहा था। मलिक अम्बर अबीसीनिया का निवासी था। अपनी
योग्यता से वह अहमदनगर की निजामशाही सेना का सेनापति व प्रधान
वजीर बन गया था। वह बहुत अच्छा प्रबन्धक और मालमन्त्री
तथा उच्चकोटि का सेनानायक था। उसने मराठों की सेना संगठित कर
उन्हें गुरिल्ला युद्ध की शिक्षा दे सैन्य संचालन में आश्चर्यजनक उन्नति
की थी। जहाँगीर ने अब्दुररहीम खानखाना को उसे परास्त करने भेजा
था, पर उन्हें हार कर भागना पड़ा । तब उसने शाहजादा परवेज को
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>खानदेश व गुजरात के सूबेदार अब्दुल्ला के साथ भेजा । परन्तु जव
इसका भी कुछ परिणाम न हुआ तो शाहजादा खुर्रम को भेजा।
यह सन् १६२० की बात है । शाहजी अपने कुटुम्बियों की एक
छोटी-सी सैनिक टुकड़ी लेकर इस युद्ध में शामिल हुए, तथा वड़ी वीरता
प्रकट की। उनका नाम भी प्रसिद्ध हो गया। इस युद्ध में उनके श्वसुर
सामन्त लक्खूजी जादोराय भी लड़ रहे थे । यद्यपि इस युद्ध में मलिक
अम्बर की पराजय हुई, पर लक्खूजी जादोराय ने और शाहजी ने जो
वीरता और शौर्य का प्रदर्शन किया, उससे मुगलों की सेना में मराठों की
धाक बैठ गई। मुगल सेनापति ने तव मरहठों को तोड़-फोड़ कर अपने
साथ मिलाना चाहा, जादोराय मुगलों से जा मिले। वहां उन्हें बड़ा
रुतबा और जागीर मिली, पर शाहजी ने श्वसुर का साथ नहीं दिया ।
वे अपनी पुरानी सरकार के साथ ही रहे ।
१६२७ में जहांगीर मर गया और इसके बाद १६२८ में
शाह-
जहाँ वादशाह हुआ । उसने सेनापति खानजहाँ को दक्षिण से वापस बुला
लिया, पर खानजहाँ से शाहजहाँ खुश न था। इसलिए वह भाग कर
फिर दक्षिण आ गया और निजामशाह की शरण में पहुँचा । शाहजहाँ
ने उसे पकड़ने को सेना भेजी, पर शाहजी भोंसले ने सब हिन्दु सरदारों
को लेकर शाही सेना को खदेड़ दिया। इससे क्रुद्ध होकर शाहजहाँ ने
खुद एक बड़ी सेना लेकर दक्षिण पर चढ़ाई की । अन्ततः खानजहाँ भाग
खड़ा हुआ । इसी समय मलिक अम्बर की भी मृत्यु हो गई । तब शाहजी
ने भी अपनी सेवाएं शाहजहाँ को अर्पित कर दीं। शाहजहाँ ने उन्हें छः
हजारी जात का मनसव और पाँच हजार सवारों का सेनापति बना
दिया। साथ ही बहुत-सी नई जागीरें भी दीं। परन्तु वह निजामशाह के
शुभचिन्तक बने रहे। कुछ काल बाद निजामशाही के वजीर मलिक
अम्बर के पुत्र फतहखाँ ने अपने बादशाह को कत्ल करके शाहजहाँ से
सन्धि करली । तब शाहजी निजामशाही छोड़कर बीजापुर दरबार की
सेवा में आ गए।<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>
शाहजी बड़े अवसरवादी थे। वे अवसर कभी नहीं चूकते
थे। इस समय उनका नाम इतना प्रसिद्ध हो गया था कि बीजापुर के
आदिलशाह ने उनकी पूरी आवभगत की। यह वह समय था जब फतहखा
ने मुगल सेनापति महावतम्खा से मिलकर बीजापुर की राजवानी दौलता-
बाद पर चढ़ाई की थी । शाहजी ने इस युद्ध में बड़ी वीरता प्रकट की।
वाद में जव वीजापुर और फतहखां में सन्धि हुई तो सन्धि की एक शर्त
यह भी थी कि शाहजी को वीरता के उपलक्ष्य में पुरस्कार मिले ।
फतहखाँ ने वीजापुर से संधि होते ही मुगलों पर धावा बोल दिया ।
परन्तु फतहखाँ को मुंह की खानी पड़ी और महावतखाँ ने उसे कैद कर
लिया। अहमदनगर राज्य का मुगल साम्राज्य में विलय हो गया। अब
महावतखाँ ने यह योजना बनाई कि शाहजी को भी जीत लिया जाय तो
बीजापुर और अहमदनगर के दोनों राज्यों पर मुगलों का अधिकार हो
जाय। उसने अवसर पाकर शाहजी की पत्नी जीजावाई और वालक
शिवाजी को पकड़ लिया । परन्तु मराठों ने उन्हें छुड़ाकर कोन्डाना दुर्ग में
भिजवा दिया। इसी समय आगरे में साम्राज्ञी मुमताजमहल का देहान्त
हो गया और शाहजहाँ ताजमहल निर्माण में व्यस्त होगया। इधर अव-
सर पाकर शाहजी ने अब दूसरा पैतरा वदला। फतहखाँ कैद हो चुका
था और उसने जो बादशाह तख्त पर बैठाया था, उसे भी गिरफ्तार
करके महावतखाँ ने ग्वालियर के किले में भेज दिया था। शाहजी ने
तत्काल अहमदनगर के शाही खानदान के एक अल्प-वयस्क वालक को
सिंहासन पर बैठाकर उसका राज्याभिषेक कर दिया और पूना तथा
चाकण से लेकर बालाघाट तक के सारे प्रदेश तथा गुन्नूर के आस-पास
का सारा निजामी इलाका छीन कर अपने अधिकार में कर लिया और
जुन्नर शहर को राजधानी बनाकर उसी सुलतान के नाम पर शासन
करना प्रारम्भ कर दिया।
बीजापुर राज्य में इस समय दो बलशाली सामन्त थे-अदरुल्लाखाँ
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>की प्रार्थना पर जीजाबाई के गर्भ से मुगलों का सर्वनाश करने को
उन्होंने अवतार लिया है। वे गौ-ब्राह्मण के रक्षक हैं। अन्तिम चरण
गाया-“जे जे मोगलाँच चाकर थूरे थूमचा जिनगी बर।"
गाने के मधुर स्वर और हृदयग्राही भाव सुनकर रावजी मुग्ध हो
गए और तानाजी को अंक में भर कर कहा-"मांग, क्या मांगता है।"
तब एकान्त में ताना ने अपना परिचय देकर रावजी से कोलियों-
कुम्हारों की सहायता मिलने का वचन लिया ।
कृतकृत्य होकर तानाजी अपनी छावनी में लौट आए।
तीज का चन्द्रमा उदय हुआ। उसकी क्षीण चाँदनी पर्वतों पर
फैल गई। आकाश में असंख्य नक्षत्र उदित थे। तानाजी छावनी के
एकान्त भाग में खड़े हुए अजेय सिंहगढ़ की ओर ध्यान से देख रहे थे।
उन्होंने अकस्मात् देखा--एक मनुष्य मूर्ति किले से निकल कर धीरे-धीरे
पहाड़ से नीचे उतर रही है। तानाजी ने अपनी कमर में लटकती
तलवार को भलीभांति परखा और चुपचाप उस ओर को चल दिए
जिधर वह मनुष्य आ रहा था। निकट पहुँच एक झाड़ी में छिप गए
और अवसर पाकर तलवार उसके कण्ठ पर रखकर कहा-"सच कह,
तू कौन है ?"
वह पुरुष प्रथम तो तनिक घबराया। फिर उसने कहा-"मैं
राजपूत हूँ, मेरा नाम जगतसिंह है। आप कौन हैं जो अकारण ही
शत्रुवत् व्यवहार कर रहे हैं ?"
"मैं जानना चाहता हूँ कि तुम शत्रु हो या मित्र ।":
"यदि आप इस किले के निवासी हैं तो मैं आपका शत्रु हूँ।'
यदि नहीं हैं तो मित्र हूँ।"
"जब किले वाले तुम्हारे शत्रु हैं तब तुम किले में क्यों
गए थे ?"
"यह बात मैं केवल मित्र को बता सकता हूँ।"
१४६<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>"तो मित्र समझ कर ही वतारो।"
"किन्तु आप कौन हैं ? आपका नाम क्या है ?"
"अभी इतना ही जानो कि मित्र हूँ। धोखा नहीं होगा।"
"आप केवल यह बता दीजिए कि क्या आप महाराज शिवाजी
के आदमी हैं ?"
"तुम्हारा अनुमान ठीक है।"
"तव सुनिए । दुरात्मा उदयभानु इस दुर्ग का स्वामी है। उसके
पिता उदयपुर के एक सामन्त थे। उन्हीं का बाँदी पुत्र यह है। इसने
उदयपुर
के एक बड़े सामन्त की पुत्री कमलकुमारी से जबर्दस्ती
ब्याह
करना चाहा था । पर उसके पिता ने घृणापूर्वक अस्वीकार कर दिया ।
इस पर वह आगरे औरङ्गजेब के पास पहुँचा और अपने को उदयपुर
का राजकुमार बताकर मुसलमान हो गया जिससे औरङ्गजेब इस पर
प्रसन्न हो गया और महाराज जसवन्तसिंह के स्थान पर यहाँ भेज दिया ।
उधर कमलकुमारी का विवाह भी हो गया और वह विधवा भी हो गई।
निस समय यह सेना सहित मेवाड़ की सीमा पार कर रहा था।
कमलकुमारी सती होने जा रही थी। इसने तत्काल धावा मारा और
कमलकुमारी को मार-काट करके ले भागा। उसके साथ मेरी पत्नी
भी थी। वह भी उसने पकड़ ली और दोनों को यहाँ ले आया तथा दोनों
को बन्दी करके यहाँ रखा है। बादमाह ने उसका विवाह रोक दिया
था । पर अब आज्ञा मिल गई है और कल पहर रात गए विवाह होगा।
उसके इस घृगित काम से सभी हिन्दू-मुसलमान उससे घृणा करते हैं ।
मैंने अपना वैर चुकाने को उसकी नौकरी की है। बस, यही मेरी
दास्तान है।"
सब हाल सुनकर तानाजी ने भी अपना अभिप्राय कह सुनाया।
सुनकर राजपूत ने कहा-"मैं आपकी सहायता करूंगा। किन्तु आपको
मेरी पत्नी मुक्त कराना होगा।"<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>"मैं तलवार की शपयलेक र प्रतिज्ञा करता हूँ, पर तुम्हें भी
मेर एक काम करना होगा। किले में मेरा एक शत्रु है उसे मुझे
पहचनवा देना होगा।"
"वह कौन है ?"
“खान अब्दुस्समद फौजदार।"
"मैं उसे बखूबी जानता हूँ । वह उदयभानु का दाहिना
हाथ है।"
"मैं तलवार की शपथ लेकर प्रतिज्ञा करता हूँ।"
दोनों में और भी गुप्त परामर्श हुए। राजपूत ने कहा-"कल
एक पहर रात जाने पर कल्याण बुर्ज पर मेरा पहरा है । मेरा साथी
एक तुर्क है। उससे मैं निबट लूंगा। आप जैसे बने एक पहर रात गए
बुर्ज पर चढ़ जाय।"
"गवश्य आऊँगा, मित्र" कहकर तानाजी ने जगतसिंह को विदा
किया।
अभियान
स्तब्ध रात्रि के सन्नाटे में सैनिकों का प्रशान्त दल चुपचाप आगे
बड़ा जा रहा था । संकरी पगडण्डी के दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे सरकण्डे के
झाड़ खड़े थे। तारों के क्षीण प्रकाश में घोड़ों को कष्ट होता था, पर
सेना की अवाध गति जारी थी।
हठात् सैनिक रुक गए । अग्रगामी सैनिक ने पंक्ति से पीछे
हटकर कहा- "श्रीमान्, वस यही स्थान है।"
"आगे रास्ता नहीं ?"
"नहीं, श्रीमान् !"
"तब यहाँ से क्या उपाय किया जाय ?"
१५१<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>कोलाहल मच गया। जगह-जगह योद्धा शस्त्र बाँधने और चिल्लाने लगे
तथा मशालों के प्रकाश में इधर-उधर घूमने लगे।
बारहों व्यक्ति चारों ओर से घिर गए। उनके आगे तानाजी
और जगतसिंह थे। वे भीम वेग से फाटक की ओर बढ़े जा रहे थे।
प्रहरी मन में भयभीत थे। तानाजी ने एक बार प्रचण्ड जयघोष किया
और उछलकर फाटक पर चढ़ बैठे। साथियों ने प्रहरियों को तलवार
के वल चीर डाला, तब तानाजी ने साहस करके फाटक खोल दिया।
हर हर महादेव का घोष करती मराठों की सेना सूर्याजी के नेतृत्व में
किले में घुस गई।
इस समय महल में उदयभानु के ब्याह की तैयारी हो रही थी।
काजी साहेव चुके थे। कमलकुमारी सिसक-सिसक कर रो रही थी।
काजी साहेब उसे दम-दिलासा दे रहे थे। इसी समय हर हर महादेव
का शब्द सुनकर उदयभानु चौंक पड़ा। जब उसने सुना कि शत्रु किले
में घुस आए हैं तब उसने चीख कर कहा-“सिद्दी हलाल' को भेजो,
चन्द्रावल हथिनी को तैयार करो। खाँ साहेब को खबर करो"। काजी
से उसने कहा, "झटपट निकाह पढ़ो।"
परन्तु सिद्दी हलाल का जगतसिंह ने सिर काट कर महल में
फेंक दिया, इसी समय तानाजी ने हाथी की एक सूंड़ काट कर उसके
पैरों को जख्मी कर दिया। हाथी चिंघाड़ता हुआ भागा। तब उदयभानु
ने अपने वारह वेटों को भेजा। परन्तु वे भी देखते-देखते काम आए।
मराठे ऐसी प्रचण्डता से तलवार चला रहे थे कि बड़े-बड़े सूरमाओं का
धैर्य भंग हो रहा था निकाह सम्पन्न नहीं हुआ । जगतसिंह और
तानाजी महल में घुस आए। अन्ततः उदयभानु तलवार लेकर उनसे
जूझने लगा। इसी समय मराठा वीरों ने महल में आग लगा दी।
भयानक चीत्कार और रोना-पीटना मच गया। अवसर पाकर उदयभान
ने ताककर तलवार का भरपूर हाथ तानाजी के सिर पर दिया, तानाजो
१५३<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>का भी एक भरपूर हाथ पड़ा। दोनों वीर एक साथ गिर कर गुथ गए :
इसी समय सूर्याजी ने उदयभानु का सिर काट लिया।
हर-हर महादेव करती हुई महाराष्ट्रीय सेना मारकाट करने लगी।
वड़ा भारी घमासान मच गया। रुण्ड-मुण्ड डोलने लगे । घोड़ों की
चीत्कार, योद्धाओं की ललकार और तलवारों की झनकार ने भयानक
दृश्य उपस्थित कर दिया। इसी समय खान पठानों की सेना को लेकर
आगे बढ़ा । जगतसिंह ने संकेत किया।
तानाजी ने ललकार कर कहा-'इधर आ यवन सेनापति, मद
की भाँति युद्ध कर । आज बहुत दिन का लेन-देन चुकाऊँगा।"
यवन सेनापति ने जोर से कहा-"काफिर, मैं यहाँ हूँ। सामने.
पा, गरीब सिपाहियों को क्यों कटाता है।"
तानाजी उछलकर खान के सन्मुख गए। दोनों में घमासान युद्ध
होने लगा। दोनों तलवार के धनी थे । पर तानाजी घायल थे। मशालों
धुंधले प्रकाश में दोनों योद्धाओं का असाधारण युद्ध देखने को सेना
स्तब्ध खड़ी हो गई। तानाजी ने कहा- "सेनापति, पहले तुम वार करो,
आज मैं तुम्हें मारूंगा।"
"काफिर, अभी तेरे टुकड़े किए डालता हूँ।" उसने तलवार का
भरपूर वार किया।
"अरे यवन, आज बहुत दिन की साध पूरी होगी।" बदले में
तलवार का जनेवा हाथ फेंकते हुए तानाजी ने कहा--"लो।"
सेनापति के मोढ़े पर तलवार लगी, और रक्त की धार बहने
लगी। उसने तड़पकर एक हाथ तानाजी की जाँघ में मारा । जाँघ
कट गई।
तानाजी ने गिरते-गिरते एक बर्छा सेनापति की छाती में पार
कर दिया। दोनों वीर घोड़ों से गिर पड़े।
१५४.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१५७
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>अव फिर सेना में घमासान मच गया। उदयभानु की राजदूत
सेना और यवन-सेना परास्त हुई। सूर्योदय से पूर्व ही किले पर भगवा
झण्डा फहराने लगा । तोपों की गर्जना से पहाड़ियाँ थर्रा उठीं।
लाशों के ढेर से तानाजी का शरीर निकाला गया। अभी तक
उसमें प्राण था। थोड़े उपचार से होश में आकर उन्होंने कहा-"क्या
किला फतह हो गया ?"
"हाँ महाराज।".
“यवन सेनापति क्या जीवित है ?"
यवन सेनापति भी जीवित था। उसका शरीर भी वहीं था।
तानाजी ने क्षीण स्वर में पुकारा–“यवन सेनापति !"
"काफिर ?"
"पहचानते हो?"
"दुश्मन को पहचानना क्या है ? तुम कौन हो ?"
"पन्द्रह वर्ष प्रथम जिसे आक्रान्त करके तुमने उसकी बहन का
हरण किया था ।"
सेनापति उत्तेजना के मारे खड़ा हो गया। फिर धड़ाम से गिर
उसके
मुख
से निकला--"तानाजी ?"
"आज बहन का बदला मिल गया।"
यवन-सेनापति मर रहा था, उसका श्वास ऊर्ध्वगत हो रहा था,
और आँखें पथरा रही थीं। उसने टूटते स्वर में कहा-"तुम्हारी
हमशीरा और बच्चे इसी किले में हैं, उनकी हिफाजत...
यवन-सेनापति मर गया। तानाजी की दशा भी अच्छी नहीं
थी, ये शब्द मानो वह सुन नहीं सके। उन्होंने टूटते स्वर में कहा-
"महाराज से कहना, तानाजी ने जीवन सफल कर लिया। महाराज
बहिन की रक्षा करें तथा जगतसिंह का वचन पूरा करें।"
तानाजी ने अन्तिम श्वास ली।
गया,
१५५<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>और मुन्दुपंत । दोनों ही शाहजी के समर्थक थे। गुप्त रूप से वीजापुर
का शाह भी उनका समर्थक और सहायक था। इन सब बातों को सुन-
कर शाहजहाँ बहुत ऋद्ध हो उठा । उसका वहुत रुपया और समय दक्षिण
में व्यय हुआ था। बीजापुर इस समय भी मुगलों से उलझा हुआ था।
अनः उसे शाहजी जैसे सुलझे हुए सेनापति की सहायता अपेक्षित थी।
उधर मुगल बादशाह दो पीढ़ियों से दक्षिण की सिरदर्दी उठा रहे थे ।
इन सब घटनाओं ने शाहजी को सब उत्तरी-दक्षिणी शक्तियों का केन्द्र
बना दिया । अन्ततः शाहजहां ने ४० हजार सैन्य देकर शाइस्ताखाँ और
अलीवर्दीखों को दक्षिण भेजा । उन्होंने दक्षिण की मुगल सेना से मिलकर
वीजापुर और शाहजी दोनों ही को जड़-मूल से खोद फेंकने का निश्चय
किया। शाहजी ने तीन वरस तक इस संयुक्त मोर्चे से लोहा लिया ।
बहुत-से किले और इलाके शाहजी के हाथ से निकल गए, पर शाहजी
को पकड़ने के उनके सब प्रयल विफल हुए। वह लड़ते हुए कोंकण तक
चले गए । अन्ततः बीजापुर ने शाहजहाँ से संधि कर ली और उस संधि
के
अनुसार शाहजी ने भी वालक शाह को मुगलों को सौंपकर बीजापुर
के अली आदिलशाह की नौकरी कर ली । बीजापुर ने शाहजी का अच्छा
सत्कार किया। उन्हें उनकी पूरी जागीर दे दी गई जिसमें पूना की
जागीर भी सम्मिलित थी। वाद में कुहार-रूसकटी-बंगलौर-वालापुर
और सूमा भी उनके अधिकार में आ गए और वरार के २२ गाँवों की
देशमुखी भी उन्हें देदी गई । इस प्रकार शाहजी को बहुत-सी जागीर और
इलाका मिल गया और वे एक प्रकार से राजा की भाँति रहने लगे।
{{left|{{larger|
४
शिवाजी}}}}
शाहजी का पहिला विवाह जीजावाई के साथ हुआ था।
जीजावाई की पहिली संतान शम्भाजी थे, वह अपने पिता के साथ ही
रहते थे।
{{blockcenter|१०}}<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>शिवाजी, शाहजी और जीजाबाई के दूसरे पुत्र थे । इनका जन्म
जुन्नर शहर के पास शिवनेर के पहाड़ी किले में सन् १६२७ में हुआ
इस समय शाहजी और उनके श्वसुर लक्खूजी जादौराय एक-दूसरे के
विरुद्ध लड़ रहे थे । जादोराय मुगलों से मिल गए थे, पर शाहजी अपनी
पुरानी सरकार के ही साथ थे। इस पैतृक झगड़े के कारण जीजाबाई
और शाहजी में वैमनस्य हो गया। इसी समय जीजाबाई और उनके शिशु
पुत्र को मुसलमानों ने कब्जे में कर लिया। जीजाबाई को किसी तरह
कोन्डाना दुर्ग में भेज दिया गया जहाँ वह एक प्रकार से नजरबन्द रहती
थीं, पर उन्होंने अपने पुत्र को छिपा दिया ताकि वह मुसलमानों के हाथ न
लगे । आजकल जब कि पाँच-छः वर्ष के बच्चे खेल-कूद में मस्त रहते हैं,
तब ६ वर्ष के शिवाजी मुसलमानों के भय से इधर-उधर छिपते फिर रहे
थे। सन् १६३६ तक शिवाजी अपने पिता का मुख तक न देख सके ।
सन् १६३० ही में शाहजी ने एक दूसरे खानदान में विवाह कर लिया था।
शाहजी जब फिर बीजापुर राज्य की नौकरी में गए तो उस
समय शिवाजी की आयु १० वर्ष की थी। शाहजी बीजापुर के लिए
नए प्रदेश जीतने और अपने लिए नई जागीर प्राप्त करने के लिए तुङ्ग-
भद्रा और मैसूर के पठार की ओर बढ़े और वहाँ से मद्रास के समुद्र तट
की ओर बढ़ गए । इस चढ़ाई के बाद उन्होंने जीजावाई और शिवाजी को
मुक्त किया और आकर पहली बार पुत्र का मुंह देखा और उसका विवाह
किया। शिवाजी का विवाह करके वे कर्नाटक की लड़ाई को प्रस्थान
कर गए और पत्नी तथा पुत्र को अपनी जायदाद के कारभारी दादाजी
कोंगदेव की देखरेख में पूना भेज दिया; और अपनी दूसरी पत्नी तुकावाई
और उसके पुत्र व्यंकोजी को अपने साथ रखा। पति की इस उपेक्षा का
जीजाबाई के मन पर भारी प्रभाव पड़ा, और उनकी वृत्ति अन्तर्मुखी
होकर धार्मिक हो गई, जिसका प्रभाव शिवाजी पर भी पड़ा। इस समय
शिवाजी के साथ खेलने के लिए न कोई बालक साथी था, न भाई-बहन
{{blockcenter|११ }}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>
थे, न पिता का सहवास था । विवाह का वे महत्व न समझते थे। इस
एकाकीपन ने शिवाजी को अपनी माता के अधिक निकट ला दिया और
वे मातृप्रेम में अभिभूत हो माता को देवी के समान पूजने लगे। इस
उपेक्षा और एकाकी जीवन ने शिवाजी को स्वावलम्बी, दबंग ओर
स्वतन्त्र विचारक बना दिया । उनमें एक ऐसी अन्तःप्रेरणा उत्पन्न हो गई
कि वे आगे चलकर सब काम अन्तःप्रेरणा से ही करने लगे। दूसरे के
आदेश-निर्देश की उन्हें परवाह न रही । घुड़सवारी, शिकार और युद्ध में
वे पूरे मनोयोग से प्रवीण हो गए। साथ ही माता ने उन्हें पुराणों की
कहानियाँ और धर्मोपाख्यान सुनाकर उनकी वृत्ति को कट्टर हिन्दू बना
दिया । पूना जिले का यह पश्चिमी भाग जो सह्याद्रि पर्वत
तलहटी में घने जंगलों के किनारे-किनारे दूर तक चला गया था, मावल
कहलाता था। यहाँ मावले किसान रहते थे, जो बड़े परिश्रमी और
साहसी थे। शिवाजी ने उन्हीं मावले तरुणों को चुनकर एक छोटी-सी
टोली बनाई और उनके साथ सह्याद्रि की चोटियों, घाटियों और नदी
किनारे जंगलों में चक्कर काटना आरम्भ किया, जिससे उनका दैनिक
जीवन कठोर और सहिष्णु हो गया। धर्म-भावना के साथ चरित्र की
दृढ़ता ने उनमें स्वातन्त्र्य प्रेम की स्थापना की, और उनके मन में
विदेशियों के हाथ से महाराष्ट्र का उद्धार करने की भावना पनपती गई।
{{left|{{x-larger|५
बचपन का उठान
}}}}
मुरारजी पन्त ने वीजापुर दरवार से आकर जीजावाई को मुजरा
किया और कहा-"महाराज की आज्ञा है कि शिवाजी बीजापुर दरवार
में उपस्थित होकर शाह को सलाम करें। शाह की भी यही मर्जी है ।
अतः आप उन्हें मेरे साथ भेज दीजिए।"
परन्तु यह प्रस्ताव बालक शिवाजी ने अस्वीकार कर दिया।
कहा-“मैं सलाम नहीं करूंगा।"
{{blockcenter|१२}}<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>बादशाह ने भी हँसकर पूछा-"शिवा की शादी हुई या नहीं ?"
"जी हां, पूना में इसका व्याह हुआ है ।"
"लेकिन उसने मां-बदौलत को अपना बाप कहा है । बस, उसकी
एक शादी हमारे हुजूर में होगी और हम खुद वाप की सब रसम अदा
करेंगे। लड़की की तलाश करो।"
शाहजी ने मुककर बादशाह को सलाम किया और कहा-
"हुक्म तामील होगा।" और दरवार से चले आए।
शिवाजी ने डेरे पर लौटकर स्नान किया। वीजापुर में शिवा का
दूसरा विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ । बादशाह आदिलशाह ने खुद सव
अमीर-उमराव के साथ शरीक होकर सब नेग भुगताए। शाहजी ने भी
वादशाह की खूब आवभगत की।
नया ब्याह कर शिवाजी शीघ्र ही पूना लौट आए। परन्तु दरवार
में अपने पिता की शाह के सामने दासता देख उनका जी दुख से भर
गया। वे खिन्न रहने लगे।
दादा कोंगादेव बड़े अच्छे मुत्सद्दी और राजनीति-विचक्षरण पुरुप
थे। उन्होंने शिवाजी में महापुरुषों के लक्षण देख लिए थे। वे कहा
करते थे - हमारा शिवा शिव का साक्षात् अवतार है और भवानी का
वरद पुत्र है । उन्होंने उन्हें राज्य प्रबन्ध, धर्मशास्त्र, युद्ध-कौशल की बहुत
अच्छी शिक्षा दी। उनके ही अध्यवसाय से इलाके की आय और आवादी
बढ़ गई थी। वे बीच-बीच में शिवाजी को नीति, धर्म और रियासत के
काम की भी शिक्षा देते थे। इस इलाके में मावली लोगों की वस्ती थी
जो दरिद्र किन्तु वीर होते थे। दादा ने उन्हें अनुशासन की शिक्षा दी
थी। बहुत-सी जमीन देकर उन्हें मेहनती कृषक बनाया था। उन दिनों
मरहठों में लिखने-पढ़ने का रिवाज विलकुल न था, पर दादा ने शिवाजी
की रुचि पढ़ने-लिखने में देखी। घुड़सवारी, तीर, नेजा, तलवार चलाने
तथा मल्लयुद्ध में शिवाजी इसी उम्र में चाक-चौबन्द हो गए थे।
{{blockcenter|१४}}<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>सबसे बड़ा प्रभाव उन पर रामायण और महाभारत का पड़ा
था। यह शिक्षा उन्हें दादा तो देते ही थे, परन्तु उनकी माता भी देती
थीं। वे बड़ी भारी रामभक्त थीं। शिवाजी बड़े प्रेम से रामायण-
महाभारत की कथा-वार्ता मुनते और उस पर चर्चा करते थे ।
धीरे-धीरे मावले तरुणों से शिवाजी की जान-पहचान और
घनिष्ठता होती गई। अब वह कभी-कभी दिन-दिन भर घर से गायब
रहते और इन्हीं मावले तरुणों के साथ वन-पर्वतों में घूमा करते,
शिकार करते या शस्त्राभ्यास करते थे। उनकी यह जमात अपने को
सब वन्धनों से मुक्त समझती थी। वह किसी भी राज-व्यवस्था की
पावन्द नहीं थी । वह पूर्णतया स्वतन्त्र थी । यदा कदा यह
मंडली कभी बीजापुर और कभी मुगलों की अमलदारी में घुस जाती
और लूटमार करके भाग आती। धीरे-धीरे प्रसिद्ध हो गया कि शाहजी
का लड़का शिवा डाकू हो गया है और वह लूटपाट करता फिरता है।
दादा कोंगदेव के पास ऐमी शिकायतें आती, तो वे उन्हें सुनी.
अनमुनी कर देते, परन्तु शिवाजी के चरित्र पर वे नजर अवश्य रखते
थे। धीरे-धीरे रियासत की देखभाल का बोझ वे उन पर डालने लगे।
और इसमें शिवाजी का बहुत-सा समय लगने लगा|
शाहजी की जागीर में कोई किला न था और शिवाजी के मन
में यह अभिलाषा थी कि कोई किला उन्हें हथियाना चाहिए। वस
उन्होंने साथियों को अपने अभिप्राय से अवगत किया और उन्होंने उसका
समर्थन किया। अब वे इमी धुन में रहने लगे कि कैसे कोई किला उनके
हाथ लगे।
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माता और पुत्र}}}}
"क्यों रे शिव्वा, अभी तू १८ वरस का भी नहीं हुआ और
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>अभी से इतना उद्दण्ड हो गया। दादा के पास शिकायतें आई हैं।
तू दिन-दिन भर रहता कहां है, बोल ?"
"माता, मैं तो तुम्हारी गोद में ही रहता हूँ।"
"भूठा कहीं का । मैंने तुझे इतनी कथा भागवत सुनाई सो ?"
"मो वह व्यर्थ नहीं जायगी, माता । आप ही तो मेरी आदि
"अरे, मैंने तो तुझमे शंभा से भी अधिक आशा की थी। तेरे
पिता ने तो ग्यारह बरस तेरा मुंह भी नहीं देखा, मैंने ही तुझे आंख का
तारा बना कर रखा।"
"तो माता, क्या पिताजी ने मेरे विषय में कुछ लिखा है ?"
"अरे, तूने उनकी प्रतिष्ठा में बट्टा लगा दिया । उस दिन तूने
दरबार में जाकर गाह को मलाम नहीं किया। सलाम करता तो तुझे
शाही स्तबा मिलता। बादशाह ने तेरी तारीफ सुनकर ही बुलाया था।
बेचारे मुरारजी पन्त को कितना लजित होना पड़ा, यह तो देख ।"
"माता, जिस दिन मैं पिता की प्रतिष्ठा को बट्टा लगाऊंगा,
उसी दिन प्राण त्याग दूंगा । पर शाह को सलाम तो मैं नहीं करूंगा।"
"अरे वे हमारे मालिक
यह भी तो देख।"
"वे गौ-ब्राह्मण के शत्रु हैं, और मैं उनका रक्षक, मैं तो यही
जानता हूँ।"
"लेकिन शिव्या, तेरे वाबा मालोजी भोंसले और उनके भाई
बिठोजी एक साधारण किलेदार थे। पर थे बड़े वीर । अब तुम्हारे पिता
के बाहुबल से आज हम इतने बड़े जागीरदार हुए । पर सब शाही
कृपा से । निजामशाह ने उन्हें बारह हजारी का मनसब और राजा
की उपाधि दी, तथा पूना और सूमा के जिले दिए।"
“यह तो मैं जानता हूँ, मां।"
{{blockcenter|१६ }}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>.
आलसी, विलासी और शक्तिहीन मुअज्जम से शिवाजी को
किसी प्रकार का भय न था। उसके साथ जोधपुर के महाराज जसवन्त-
सिंह भी शिवाजी के भीतर ही भीतर मित्र थे। उधर रुहेला सेनापति
दिलेरखां वृद्धावस्था में बहुत घमण्डी हो गया था । शाहजादा मुअज्जम
के आदेशों की वह तनिक भी परवाह न करता था और महाराज
जसवन्तसिंह का खुलेआम अपमान करता था। इस प्रकार मुगलों का
यह दक्षिणी पड़ाव आपसी ईर्ष्या-द्वष और गृहयुद्ध का अखाड़ा बना
हुआ था । यही कारण था कि आगरे से लौटने के बाद तीन साल तक
शिवाजी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई। शिवाजी भी अपनी दूर-
दर्शिता के कारण झगड़े-टंटे के सब अवसरों को टालते रहे। और
अपनी पूरी शक्ति भविष्य की तैयारियों में लगा दी। उन्होंने अपने
राज्य के शासन-प्रबन्ध को सुव्यवस्थित किया, किलों की मरम्मत की,
आवश्यक युद्ध सामग्री एकत्र की और पश्चिमी तट पर बीजापुर राज्य
और जंजीरा के सिद्धियों को पराजित किया और अपनी सीमाएँ सुदृढ़
की। बीच-बीच में वे महाराज जसवन्तसिंह की लल्ली-पत्ती करते रहे
और निरन्तर यही कहते रहे कि मेरे बुजुर्ग मिर्जा राजा मर चुके
हैं, अब आप ही मेरे एकमात्र हितैषी हैं । मुगल दरबार से मुझे क्षमा करा
दीजिए तो मैं सब प्रकार की शाही सेवा करने को तैयार हूँ। शिवाजी
की इस विनय से सन्तुष्ट होकर मुअज्जम और जसवन्तसिंह ने शिवाजी
के लिए औरंगजेब से सिफारिश की। अन्त में सन् १६६८ के प्रारम्भ
में एक संधि हुई जो दो वर्षों तक कायम रही। इस संधि के अनुसार
औरंगजेब ने शिवाजी को राजा कहना स्वीकार कर लिया और मराठों
द्वारा समर्पित किलों में से चाकण का किला उन्हें लौटा दिया। इसी
संधि के अनुसार शिवाजी ने नीराजी रावजी की अधीनता में एक
मराठा सेना औरंगाबाद भेज दी। शंभुजी को पंचहजारी मनसब दे
दिया गया और मनसब की जागीरें बरार में दे दी गई। परन्तु, हकी-
१३२<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>"तो देख, तेरे दादा और पिता भी तो हिन्दू हैं । धर्म मे डिगे
तो नहीं, फिर भी समय देख कर काम करना पड़ता है । पहाड़ में मिर
मारने से पहाड़ नहीं टूटता, सिर ही फूटता है।"
"परन्तु मां, धर्म भी एक वस्तु है । आप ही ने मुझे धर्म की
शिक्षा दी है।"
"तो अब क्या मैं तुझे धर्म से विमुख होने को कहती हूँ ?"
"पर हमारा धर्म तो गौ-ब्राह्मण की रक्षा करना है।"
"तू वड़ा जिद्दी है शिव्वा, यथागक्ति गौ-ब्राह्मण की भी रक्षा की
जायगी। पर राजधर्म का भी तो पालन होना चाहिए।"
"तो हम प्रजापीड़कों की सहायता करके राजधर्म कैसे पालन
करेंगे ?"
'तो तू क्या समझना है, तू आदिलगाही को ध्वंस कर देगा।"
"माता, नुम क्या समझती हो ?"
"मैं तो वेटा, यही समझती हूँ कि तू जिस मार्ग पर चल रहा है,
उससे अपना पुश्तैनी वैभव जायगा।"
"माता, उनर और दक्षिण की शादियों में यही अन्तर है ।
उत्तर की मुगलशाही विदेशी तुर्क-तातार-पठानों के बल पर पनपी, पर
यहां दक्षिण में ये आदिलशाही और कुतुबशाहियां हम मराठों के बल पर
ही पनप रही हैं।"
"अरे तो अकेला तू क्या कर लेगा ? जब भगवान ही की यह
इच्छा है कि म्लेच्छ भारत पर राज्य करें, तो तू क्या करेगा।"
"तो माता, तुम समझती हो भगवान विट्ठल म्लेच्छों के
सहायक हैं ?"
“हे ही । ऐसा न होता तो हम हारते क्यों ? मरहठे क्या मुसल-
मानों से वीरता में कम हैं ?"
"कोरी वीरता से क्या होता है। हमारी वीरता में दासता का
जो पुट लगा है ?"
स.च.२
{{blockcenter|१७ }}<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>कत यह थी कि मुगल और शिवाजी के बीच की यह सन्धि एक अल्प-
कालीन युद्ध-विराम मात्र थी क्योंकि औरंगजेब को इस समय सदैव
अपने बेटों से विद्रोह का खतरा बना रहता था और न जाने क्यों उसके
शक्की मिज़ाज में यह विश्वास घरं करता जाता था कि कहीं मुअज्जम-
शिवाजी से मिलकर विद्रोह का झंडा खड़ा न कर दे। अन्त में उसने
शिवाजी को पकड़ने या उसके लड़के को कैद करके धरोहर के रूप में
अपने अधिकार में रखने का एक गुप्त षड़यन्त्र करना प्रारम्भ
किया । इसी समय एक ऐसी घटना घटी जो चिनगारी का काम
कर गई। शाही दरबार में जाने के लिए शिवाजी को जो एक लाख
रुपये दिये गये थे, उनकी वसूली के सिलसिले में बरार में दी गई
शिवाजी की नई जागीर का एक अंश कुर्क कर लिया गया । वस,
शिवाजी ने एक बारगी ही मुगल साम्राज्य
पर धावे बोल
दिए, उनके दल के दल दूर-दूर तक धावा करके मुगल' प्रदेश
को लूटने लगे। पुरन्दर की सन्धि के समय औरङ्गजेब को जो
किले सौंपे गए थे, वे एक-एक करके वापस ले लिए। साथ ही
सन् १६६० के अन्त तक शिवाजी ने अहमदनगर, जुन्नर और परेण्डा
के आसपास के ५१ गाँवों को भी लूट लिया ।
इस समय शाहजादा मुअज्जम और दिलेरखाँ का पारस्परिक
विरोध बहुत बढ़ गया था । स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि दिलेरखाँ को
विश्वास हो गया कि यदि वह मुअज्जम की सेवा में उपस्थित हुआ तो
या तो वह कैद कर लिया जायगा या मार दिया जायगा। उसकी
अवज्ञाओं से क्रुद्ध होकर और जसवन्तसिंह के बढ़ावे में आकर मुअज्जम
ने औरङ्गजेब से शिकायत की कि दिलेरखाँ विद्रोही हो गया है।
उधर दिलेरखाँ ने औरङ्गजेब को सूचना दी कि शाहजादा मुअज्जम और
जसवन्तसिंह शिवाजी से मिलकर शाही तख्त के लिए खटपट कर रहे
हैं। इस समय मुअज्जम अपनी मनमानी कर रहा था और शाही
१३३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४५
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>यह ठीक है कि इस्लाम और हिन्दूधर्म एक-दूसरे के विरोधी भाव के
प्रदर्शक हैं । वे असल में चित्र भरने के लिए केवल दो जुदा-जुदा रंग हैं ।
यदि यह मस्जिद है, तो वहां उसी की याद करने के लिए दुआ की जाती
है । यदि वह मन्दिर है, तो उसमें, उसी की तलाश में घण्टा बजाया
जाता है । किसी भी मनुष्य के धार्मिक विश्वास या धार्मिक क्रिया-कलाप
के साथ दुश्मनी करना पवित्र पुस्तक के शब्दों को बदलने के समान है।
"पूरे न्याय की दृष्टि से देखा जाय, तो जजिया उचित नहीं है।
राजनीतिक दृष्टि से केवल उसी दशा में जजिया को माना जा सकता है,
जब सुन्दर स्त्रियाँ आभूषणों से अलंकृत होकर राज्य के एक भाग से
दूसरे भाग में जा सकें । परन्तु आज जब कि शहर तक लूटे जा रहे हैं,
तव खुली आबादी का क्या कहना है ? जजिया केवल अन्यायपूर्ण ही नहीं
है, यह भारत में एक नई वस्तु है, और समय के विरुद्ध है ।
“यदि आप समझते हों कि हिन्दू प्रजा को दबाना और डराना
धर्म है, तो आपको चाहिए कि आप पहले राणा राजसिंह से जजिया कर
वसूल करें क्योंकि वह हिन्दुओं का शिरोमरिण है । उसके बाद मुझसे
भी जजिया लेना आपको कठिन न होगा, क्योंकि मैं आपका सेवक हूँ।
परन्तु
और मक्खियों को सताने में कोई बहादुरी नहीं है ।
"मैं आपके नौकरों की अद्भुत स्वामिभक्ति पर आश्चर्यान्वित
हूँ कि वह आपको राज्य की ठीक-ठीक दशा नहीं बतलाते और आग को
फूस से ढंकना चाहते हैं। मैं चाहता हूँ कि आपके बड़प्पन का सूर्य
आकाश में चिरकाल तक चमकता रहे।"
और भी कई हिन्दू राजाओं ने औरंगजेब की आँखें खोलने की
चेष्टा की परन्तु कुछ सफलता न मिली। जजिया लगाने का हुक्म लेकर
हरकारे चारों ओर फैल गए। गरीब प्रजा के लिए तो मानो मृत्यु का
सन्देश आ गया । सूबे के शासक अधिक-से-अधिक जजिया उगाहने में
१४३<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>बढ़ चला। सिपाहियों के घोड़ों ने भी बहुतों को रौंद डाला । जब यह
खबर चारों तरफ फैली तो हिन्दुओं में रोष की ज्वाला धधक उठी।
शिवाजी ने औरंगजेब को एक खत लिखा-
"मैंने सुना है कि मेरे साथ युद्ध करने के कारण खजाने खाली
हो जाने से तंग आकर हुजूर ने हिन्दुओं पर जजिया नाम का कर लगा
दिया है ताकि शाही खर्च चल सके । जनावे आली, जलालुद्दीन अकबर
बादशाह ने ५२ वर्ष तक पूरी शक्ति के साथ राज्य किया। उसने ईसाई,
यहूदी, मुसलमान, दादूपन्थी, फलकिया, मलकिया, अन्सारिया, दहरिया,
ब्राह्मण और जैनों के साथ समान व्यवहार जारी रखा। उसके हृदय
का भाव यह था कि सब प्रजा प्रसन्न और सुरक्षित रहे । इसी कारण
वह 'जगद्गुरु' नाम से विख्यात हो गया था।
"उसके पश्चात् बादशाह नूरुद्दीन जहांगीर ने दुनियां और उसके
निवासियों पर २२ वर्ष तक अपनी शीतल छाया फैलाए रखी । उसने
अपना हृदय मित्रों को और हाथ कार्य को सौंपा, जिससे उसे हरेक
अभीष्ट वस्तु प्राप्त हुई । बादशाह शाहजहाँ ने ३२ वर्ष तक राज्य किया
और अनन्त जीवन का फल प्राप्त किया, जो नेकी और यश का दूसरा
नाम है।
"परन्तु हुजूर के राज्य-काल में बहुत से किले और सूबे हाथ से
निकल गए हैं, और शेष भी निकल जाँयगे, क्योंकि मेरी ओर से उनके
नष्ट करने में कोई कसर न छोड़ी जायगी । आपके राज्य में किसान
कुचले गए हैं, हरेक गांव की आमदनी कम हो गई है, एक लाख की
जगह एक हजार और एक हजार की जगह दस, और वह भी बहुत
कठिनाई से वसूल होता है।
"हुजूर, यदि आप इलहामी किताब और खुदा के कलाम पर विश्वास
रखते हों, तो देखिये वहां खुदा को रब-उल-आलमीन ( संसार भर का
खुदा ) कहा है, रब-उल-मुसलमीन ( मुसलमानों का खुदा ) नहीं कहा ।
4
.१४२<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>पूर्ण स्थानों में जनता के सदाचार की देखभाल करने के लिए मोहतसिव
नियुक्त किए जिनका वास्तविक काम था हिन्दुओं के तीर्थों का विध्वंस
करना । उसने हिन्दुओं पर जजिया लगाया; स्त्रियों, चौदह वर्ष के बच्चों
और गुलामों को ही इससे छूट मिलती थी । धनवान, लंगड़ों, अंधों,
पागलों और महन्तों को भी यह कर देना पड़ता था। एक बार दिल्ली
और उसके आसपास के रहने वालों ने इस कर का विरोध भी किया।
उन्होंने बड़ी करुणाजनक प्रार्थनाएं भी कीं परन्तु कोई सुनवाई नहीं हुई।
इस कर से बहुत बड़ी रकम शाही खजाने में जाती थी। इससे बचने के
लिए बहुत से हिन्दू मुसलमान हो गए। इसके अतिरिक्त हिन्दुओं से विक्री
कर लिया जाता था और मुसलमानों से नहीं। मुसलमान होने पर उन्हें
ऊंचे पद, जायदाद व दूसरे प्रलोभन दिए जाते थे । उसने अपने सब
शासकों और ताल्लुकेदारों को आज्ञा दी थी कि अपने हिन्दू पेशकारों को
निकाल कर मुसलमानों को भर्ती करें। उसने हिन्दुओं के मेलों को भी
रोक दिया और त्यौहारों पर भी रोक-टोक लगाई।
Mies
५२
जजिया
शिवाजी के आगरे से निकल भागने से क्रुद्ध होकर औरंगजेब ने
सब हिन्दुओं पर जजिया का कर लगा दिया । इस समाचार से सारे
हिन्दुओं में हलचल मच गई । हिन्दू सामूहिक रूप से अपनी फरियाद
लेकर बादशाह की सेवा में पहुँचे । बादशाह हाथी पर सवार हो जुमे की
नमाज़ पढ़ने को जुम्मा मस्जिद की ओर रवाना हुआ तो लाखों हिन्दू
राह पर लोट गए । उन्होंने रो-धोकर अपनी फरियाद बादशाह से अर्ज
की पर औरंगजेब यों पसीजने वाला आदमी न था। उसने हाथी आगे
बढ़ाने का हुक्म दिया और हाथी नर-नारियों को कुचलता हुआ आगे
१४१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१४२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>परन्तु यह सबकुछ अपवाद के रूप में ही हुआ और इस प्रकार
की सारी कार्यवाही मुस्लिम दृष्टि से एक निन्दनीय आचरण था और
यह समझा जाता था कि शासक ने अपने प्रधान शासक की अवहेलना
की है। सच्चे मुस्लिम शासक की सारी सत्ता मुस्लिम सेना पर
आधारित थी। मुस्लिम राज्य के आधारभूत साधनों की दृष्टि से गैर-
मुसलमानों की वृद्धि और उन्नति और निरन्तर अस्तित्व बना रहना
सर्वथा असंगत था । ऐसे राजनैतिक समाज में एक अनिश्चित और
अस्थायी भावना उत्पन्न होती गई तथा शासक और शासितों के बीच
परम्परागत विरोधी भावना निरन्तर बनी रही जिसका परिणाम यह
हुआ कि विधर्मी मुस्लिम राज्य का अन्त में विनाश हुआ और यह कार्य
औरंगजेब के शासनकाल में हुआ।
५१
औरंगजेब को कट्टर राजनीति
औरंगजेब एक धूर्त और कुटिल राजनीतिज्ञ था । अपने राज्य
के पहले ही वर्ष में उसने नए मन्दिरों के निर्माण का निषेध कर दिया।
बाद में तो उसने अनेक मन्दिरों को भ्रष्ट किया, नष्ट किया और उनके
स्थानों पर मस्जिदें वनवाई । उसने कटक से लेकर मेदिनीपुर तक उड़ीसा
के स्थानीय हाकिम को सारे मन्दिर गिरवा देने की आज्ञा दी और
हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं पर रोक लगवाई । उसने गुजरात का
सोमनाथ का मन्दिर, काशी का विश्वनाथ का मन्दिर, मथुरा का केशव-
राय का मन्दिर ढा दिए, जिन्हें सारे भारत की जनता आदर और श्रद्धा
की दृष्टि से देखती थी। उसने मथुरा शहर का नाम बदलकर इस्लामा-
बाद रख दिया और साम्राज्य के सब सूबों, परगनों, शहरों और महत्व-
१४०<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>और शान्तिकालीन उद्योग-धन्धों और कला-कौशल को बढ़ावा दे सकें।
इस्लामी राज्य की इस नीति का परिणाम यह हुआ कि मुसल-
मानों को एक विशेषाधिकार प्राप्त जाति का स्थान मिल गया । अतः इस
अधिकारी वर्ग का भरणपोषण राज्य अधिकारी द्वारा ही होता था।
इसलिए शांतिकालीन समय में वे आलसी होते चले गए। जीवन के
क्षेत्र में उनमें अपने पैरों पर खड़े होने की शक्ति न रही। राज्य के ऊंचे-
ऊंचे ओहदों पर बैठना उनका जन्मसिद्ध अधिकार था। उन्हें न योग्यता
के प्रदर्शन करने की आवश्यकता थी, न शौर्य की। इस प्रकार मुस्लिम
साम्राज्य एक ऐसी जाति के हाथ में रह गया जो अयोग्य और आलसी
थी और इस कारण मुस्लिम राज्यों की जड़ खोखली होती चली गई।
धन से आलस्य और विलासप्रियता वढ़ी जो इस समूची जाति को
दुर्व्यसन और कुकर्मों की ओर ले गई और जव साम्राज्य की समृद्धि का
अन्त हुआ तो एक बार ही सर्वनाश वज्र की भांति उन पर आ टूटा ।
हिन्दू प्रजा, जो उनके आश्रित थी और जिसके साथ सब प्रकार
के दुर्व्यवहार किए जा रहे थे, का उपयोग राज्य की उन्नति और
विकास के लिए न किया जा सका। उन पर खुलेग्राम कानून के
द्वारा या हाकिमों की स्वेच्छाचारिता के कारण दवाब डालकर
उनके विकास को रोक दिया गया था। वे पशुओं की भांति किसी
प्रकार जीवन व्यतीत कर रहे थे। वे शासकों की चाकरी करते और
पैसा कमा कर उन्हें सोंप देते। अपनी गाढ़ी कमाई में से भी अपने
लिए बचा रखने का उनको अधिकार न था। यही कारण था कि-
मुस्लिम काल में उनका शारीरिक और मानसिक विकास न हुआ ।
ज्ञान और चिन्तन के क्षेत्र में भी वे पिछड़ गए। जिन मुसलमान बाद-
शाहों ने हिन्दुओं के साथ सहिष्णुता की नीति वरती, उन्हें धन और
ऊचे पद दिए, उनके साहित्य और कला को उत्साहित किया, उनके
राज्य समृद्धिपूर्ण और शक्तिशाली हुए।
१३६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/२४
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>तलवार सुवा देते थे। अंत में युवक का दम बिलकुल फूल गया। उसने
तलवार गुरु के चरणों में रख दी, और स्वयं भी लोट गया । गुरु ने उसे
छाती से लगाया और कहा-"वत्स, आज ही श्रावणी पूर्णिमा है,
महाराज अभी आते होंगे । आज तुम्हें इस सन्यासी को त्यागना होगा
और जिस पवित्र व्रत को तुमने लिया है, उसमें अग्रसर होना होगा।
यद्यपि मैं जैसा चाहता था, वैसा तो नहीं, पर फिर भी तुम पृथ्वी पर
अजेय योद्धा हो, तुम्हारी तलवार और बर्खे के सम्मुख कोई वीर स्थिर
नहीं रह सकता।"
युवक फिर गुरु-चरणों में लोट गया। उसने कहा-"प्रभो, अभी
मुझे और कुछ सेवा करने दीजिए।"
"नहीं, वत्स ! अभी तुम्हें बहुत कार्य करना है, उसकी साधना
ही मेरी चरण-सेवा है।"
हठात् वज्र-ध्वनि हुई-"छत्रपति महाराज शिवाजी की जय ।"
दोनों ने देखा, महाराज घोड़े से उतर रहे हैं। उन्होंने धीरे-
धीरे आकर सन्यासी की चरण-रज ली और सन्यासी ने उन्हें उठा कर
आशीर्वाद दिया। युवक ने आकर महाराज के सम्मुख घुटनों के बल
बैठकर प्रणाम किया। महाराज ने कहा-"युवक, आज वही श्रावणी
पूर्णिमा है।"
"जी।"
"आज उस घटना को तीन वर्ष हो गए, जब तुम्हें घायल करके
शत्रु तुम्हारी बहन को हरण कर ले गए थे, तुम्हें स्मरण है ?"
"हां महाराज, और आपने मुझे जीवन-दान दिया था, मैंने यह
प्राण और शरीर आपको भेंट किए थे।"
"और तुमने प्रतिशोध की प्रतिज्ञा की थी ?"
"जी हां।"
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>अदालतों में गवाही देने, फौजदारी कानून, विवाह आदि के मामलों में
उस पर अनेक अयोग्यताएँ लादी गई हैं। उसे अदालत में गवाही देने
का अधिकार नहीं है।
एक तरफ तो विधर्मियों के लिए ऐसे कठोर और अपमानजनक
नियम थे, दूसरी ओर धर्म छोड़ कर इस्लाम स्वीकार कर लेने वालों
को धन अथवा नौकरी दिए जाने के प्रलोभन भी थे।
अरब के विजेताओं ने सर्वत्र सहनशीलता के नियमों का पालन
किया था किन्तु वाद में तुर्कों के शासन काल में विर्मियों के लिए यह
कठोर नियम अपनाए गए और इस प्रकार जिहाद में काफिरों को मारना
और उनके धार्मिक स्थानों को नष्ट करना पुण्य कार्य माना गया। इससे
मुसलमानों में एक ऐसी मनोवृत्ति पैदा हो गई कि उनके स्वभाव में
लूटमार और नरहत्या एक धार्मिक कार्य और ईश्वरीय आदेश की भांति
माना जाने लगा। यहाँ तक कि वासनाओं को वश में करने और
इन्द्रियों को दमन करने की अपेक्षा काफिर को कत्ल करना और उसका
धन लूट लेना एक मुसलमान के लिए स्वर्ग प्राप्ति का कारण बन गया।
यही कारण था कि इस्लाम के आदर्श अपने अनुयायियों के सच्चे हितों
की उन्नति में सहायक नहीं हुए.। इस्लाम की इस नीति के कारण
सम्पूर्ण इस्लामी संस्था एक ऐसा संगठन बन गई जिसका कार्य केवल
युद्ध था।
मुसलमान नए-नए स्थानों को जीतने और लूटने की मनोवृत्ति
को मन में पनपाते रहे। भारत में जब मुसलमानी राज्य विस्तार की
चरम सीमा को पहुँच गया और आसाम और चटगांव की पहाड़ियों से
जा टकराया तो उसने दक्षिण की ओर रुख करके महाराष्ट्र की सूखी
चट्टानों में अपनी राह बनाने की निष्फल चेष्टा की। परन्तु राज्य का
कोई स्थायी आर्थिक आधार न था। इन मुस्लिम नेताओं और विजे-
ताओं में योग्यता भी न थी कि वे निरन्तर चलने वाले युद्धों में टिक भी सकें
१३८<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>
"तो तू क्या चाहता है, वह कह ।"
"माता, आशीर्वाद दो कि मरहठों की वीरता को दासता की
कालिन्त्र से मुक्त करने में तुम्हारा शिव्या समर्थ हो।"
"आशीर्वाद देती हूं। पर बेटे, अपने बलाबल का भी तो ध्यान
रख । व्यर्थ शाहियों को छेड़-छाड़ कर अपने सिर बला न बुला। तेरे
पिता ने जैसे अपना यश और मान बढ़ाया है, वैसे ही तू भी बढ़ा । समय
बलवान है यह मत भूल।"
"यह तो मुझसे न हो सकेगा मां, तुम कहो तो मैं कहीं देश से
वाहर चला जाऊं।"
"चल, फिर मैं भी तेरे साथ चलूं।"
"पाप क्यों चलेंगी?"
"तो मैं क्या तुझे छोड़ दूंगी? सुख-दुख में मैं तेरे साथ ही
रहूंगी। मैं जानती हूँ, मेरी कोख में तू अवतारी जन्मा है । तुझे मैं क्या
समझाऊं, मैं तो प्रेमवश कहती हूँ।"
शिवाजी माता के चरणों में लोट गए और बोले -"माता,
आश्वस्त रहो । तुम्हारा शिवा प्राण रहते ऐसा कोई काम न करेगा जो
तुम्हारी कोख को लजाए।"
माता पुत्र को छाती से लगाकर प्रेम के आंसू बहाती रही।
{{left|
{{x-larger|९
शिवाजी का उदय}}}}
सन् १६४६ में दादाजी कोंगदेव की मृत्यु होजाने पर शिवाजी
ने अपनी स्वतन्त्रता की हुंकार भरी और पहला वार तोरण के किले पर
किया । यह किला पूना के पश्चिम में २० मील पर था । वहाँ के किलेदार
से उन्होंने किला छीन लिया। किले में बीजापुर राज्य के खजाने के दो
लाख हूण शिवाजी के हाथ लगे । उन्होंने वकील भेजकर बीजापुर दरवार
{{blockcenter|१८}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१३६
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>आज्ञाओं का भी पालन नहीं करता था, जिससे औरङ्गजेब अत्यन्त
चिन्तित और शंकित हो गया था। मुगल दरबार आगरे में यह आम
बात थी कि मुअज्जम शिवाजी से मिलकर बादशाह को तख्त से उतारने
की साठ-गांठ में है। इसी से शेर होकर शिवाजी के मुगल प्रदेशों पर
आक्रमण सफल होते जा रहे हैं और शाहजादा मुअज्जम चुपचाप बैठा
देख रहा है।
इधर दिलेरखाँ ने जव अपनी स्थिति को असहनीय देखा और
अपने मार डाले जाने या कैद किए जाने का उसे अंदेशा हो गया तो
उसने दक्षिण से भाग चलने में ही अपनी कुशल समझी। उसने गुजरात
के सूबेदार बहादुरखाँ से एक खत बादशाह को लिखवाया जिसमें यह
सिफारिश की गई थी कि दिलेरखाँ को उसकी अधीनता में काठियावाड़
का फौजदार नियुक्त किया जाय । वादशाह ने यह प्रस्ताव स्वीकार
किया और दिलेरखाँ ने दक्षिण से कूच कर दिया।
सितम्बर सन् १६७० के अन्त में दिलेरखाँ ने दक्षिण छोड़ा और
इसके तत्काल बाद २०,००० घुड़सवार और इतने ही पैदलों को लेकर
शिवाजी ने सूरत को जा घेरा । अब यह वह लुटेरा शिवाजी न था जो
पहले चोर की तरह आया था और लूटमार करके भाग गया था। अब
उसकी कमान में ३०,००० मराठों की अजेय सेना थी और वह शाहजादे
की छाती पर पैर रखकर सूरत पहुंचा था। ३ अक्तूबर को शिवाजी ने
नगर पर धावा बोल दिया। शिवाजी के सूरत पर पहले धावे से सचेत
होकर औरङ्गजेब ने शहर के चारों ओर शहरपनाह बना दी थी। परन्तु
इससे कुछ लाभ न हुआ। नगररक्षक थोड़ी देर तक ही रक्षा कर सके
अंत में वे किले की ओर भाग चले । शिवाजी ने आनन-फानन शहर को
अपने अधिकार में कर लिया। केवल अंग्रेज, डच व फ्रांसीसी व्यापारियों
की कोठियाँ, तुर्की व ईरानी व्यापारियों की बड़ी नई सराय और अंग्रेजों
तथा फ्रांसीसियों कोठी के में स्थित तातार सराय जिसमें मक्का
,
१३४,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/२१
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>में प्रकट किया कि उन्होंने यह काम राज्य के हित की दृष्टि से किया है।
दूत ने शिवाजी की बहुत प्रशंसा की, और निवेदन किया कि शिवाजी
पहले जागीरदारों की अपेक्षा दुगना लगान देंगे।
इसके बाद उन्होंने तोरण से कोई पांच मील दूर पूर्व में पहाड़ी
की एक चोटी पर राजगढ़ नाम का एक नया किला बनवाया और उसे
अपना कन्द्रस्थान निश्चित किया। कुछ दिन बाद उन्होंने वीजापुर का
कोण्डाना किला भी कब्जे में कर लिया और शाहजी की पश्चिमी जागीर
के उन सभी भागों को अपने अधिकार में कर लिया जिनकी देखभाल
दादाजी कोंगदेव करते थे ।
जब शिवाजी की इन हरकतों की सूचनाएं लगातार वीजापुर
पहुंची तो वहाँ से शिवाजी के नाम इस प्रकार के परवाने जारी किए गए
कि वह अपनी हरकतों से बाज आए। परन्तु शिवाजी ने उनकी कोई
परवाह नहीं की, न कोई जवाब दिया । तब शाह ने कर्नाटक में शाहजी
को लिखा कि वह अपने लड़के को समझाए । परन्तु उन्होंने साफ जवाव
दे दिया कि शिवाजी ने मेरी सम्मति के बिना ही यह काम किया है।
पर मैं और मेरे सब सम्बन्धी भी दरबार के शुभचिन्तक हैं। और शिवाजी
भी जो कुछ कर रहा है, वह जागीर की उन्नति के लिए ही है।
शाहजी ने शिवाजी को भी खत लिखा कि ऐसी कार्यवाहियों से वाज
आए। पर शिवाजी के हृदय में जो आग दहक रही थी, उसे वे क्या
जानते थे। उन्होंने मालगुजारी का हिसाब भी मांगा, क्योंकि अब सव
रियासत की देखभाल शिवाजी ही करते थे, परन्तु शिवाजी ने लिख दिया
कि इलाका निर्धन है और उसकी आय खर्च के लिए ही काफी नहीं है।
बचत की कोई गुंजाइश नहीं है । इस समय जागीर में दो आदमी
शिवाजी के विरोधी थे, एक तो था चाकरण का किलेदार-दूसरा शिवाजी
का सौतेला मामा था जो सोमा जिले का जिलेदार था। चाकरण के
किलेदार को तो आसानी से शिवाजी ने आधीन कर लिया, पर दूसरे को
{{blockcenter| १६ }}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१३७
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>की तीर्थयात्रा से हाल ही में लौटा हुआ काशगर का सिंहासन-च्युत ।
बादशाह ठहरा हुआ था, शिवाजी के आक्रमण से बच रहे ।
फ्रांसीसियों ने बहुमूल्य उपहार देकर मराठों को प्रसन्न कर लिया।
अंग्रेजों व तातारों ने दिन भर वहादुरी से मराठों का सामना किया।
अन्त में तातार लोग अपने बादशाह को लेकर किले में भाग गए और
उनकी सारी वहुमूल्य सामग्री मराठों ने लूट ली । अन्त में तीन दिन तक
लूटमार तथा आग लगाने के काण्ड करके तथा आधे शहर को जलाकर:
राख करके और ६६ लाख रुपया नकद लूटकर शिवाजी सूरत से लौटे।
भारत के सबसे धनवान वन्दरगाह का सारा धन चौपट हो गया और
शिवाजी और मराठों का आतंक ऐसा फैला कि जब-जब मराठों के
आने 'की झूठी-सच्ची अफवाहें नगर में फैलती, सूरत नगर भय से
आतंकित हो उठता।
व्यापारी लोग हड़बड़ा कर जल्द-जल्दी अपना सामान जहाजों
पर रखाते, नागरिक गाँवों को भाग जाते और यूरोपियन व्यापारी.
सुआली पहुँच कर आश्रय लेते थे। इस प्रकार मराठों के आक्रमण और
लूट के आतंक का ऐसा प्रभाव हुआ कि उनके भय से सूरत का सारा
विदेशी व्यापार पूर्णतया लुप्त हो गया ।
4
५०
मुस्लिम धर्मानुशासन
इस्लामी धार्मिक असूलों के अनुसार प्रत्येक मुसलमानी राज्य की
नीति धर्मप्रधान होनी चाहिए । सच्चा बादशाह और अधिकारी एकमात्र
खुदाताला है । और बादशाह खुदा का प्रतिनिधि । इस हिसाब से बाद-
शाह का यह कर्तव्य है कि वह ईश्वरीय नियमों का सब प्रजा से पालन
कराए। इस नीति का दूसरा व्यावहारिक स्वरूप यह बन जाता है कि
१३५<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>सच्चे इस्लामधर्म को राज्य में फैलाए और राजकीय शासन द्वारा प्रजा
से उसका पालन कराए। इस प्रकार के राज्य में इस्लाम में अविश्वास
करना नियमानुसार राज-द्रोह समझा जाता है और यह मान लिया
जाता है कि विधर्मी व्यक्ति ने ईश्वर के संसारी पार्थिव प्रतिनिधि बाद-
शाह की सत्ता का अपमान करके ईश्वर के प्रतिद्वन्द्वी झूठे देवी-देवताओं
की पूजा की । इसलिए वह दण्ड का अधिकारी है । ऐसी हालत में कट्टर
इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य जाति या धर्म के प्रति किसी प्रकार
की दया या उदारता प्रकट करना अनुचित माना जाता है । इस्लामी
धर्म के अनुसार ईश्वर के साथ अन्य देवताओं पर विश्वास रखना भी
कुफ है। इसलिए इस्लामी धर्म के अनुसार सच्चे इस्लाम धर्म के अनु-
यायी का जिहाद करना एक प्रथम और महत्वपूर्ण कर्तव्य बन जाता
है। जिहाद के सम्बन्ध में सच्चे मुसलमानों के लिए ये आदेश हैं कि जब
पवित्र माह समाप्त हो जाए तब उन सब आदमियों को जो ईश्वर के
साथ दूसरे देवताओं के नाम जोड़ते और पूजते हैं, जहाँ मिलें, मार
डालो । पर यदि वे धर्म परिवर्तित कर लें तो उन्हें अपनी राह जाने दो
और उनसे कहो कि वे तोबा करें और यदि वे फिर विधर्मी हो जाएं तो
उनसे लड़ो। इस्लामी आदेश यह भी है कि काफिरों के देश में उस समय
तक युद्ध करो जब तक कि वे इस्लामी राज्य के दायरे में पूर्ण रूप से
न आ जाएं।
इन धार्मिक एवं राजनैतिक सिद्धान्तों के अनुसार ऐसी विजय के
बाद उस देश के काफिरों की सारी आबादी मुसलमानों की गुलाम बन
जाती है । सम्पूर्ण मनुष्यों को इस्लाम के झण्डे के नीचे ले आना और
उन्हें मुस्लिम बना कर उनके हर प्रकार के धार्मिक मतभेदों को मिटा
देना ही इस्लामी राज्य का आदर्श है। यति इस्लामी राज्य के अन्तर्गत
कोई काफिर रहने दिया जाय तो वह केवल अपवाद ही माना जाना
चाहिए परन्तु ऐसी परिस्थिति देर तक नहीं रह सकती, कुछ काल तक<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>कैद करना पड़ा । अब शिवाजी ने सिंहगढ़, कर्णाटक और पुरन्दर के किले
भी अपने आधीन कर लिए । बीजापुर का शाह इस समय रोगशय्या पर
पड़ा-पड़ा महल और मकबरे वनवा रहा था, और सेनापति शाहजी
कर्णाटक की लड़ाइयों में दौड़धूप कर रहे थे|
निरन्तर शिवाजी की इन विजयों से विचलित होकर आदिलशाह
क्रुद्ध हो गया और उसने एक बड़ी सेना शिवाजी के विरुद्ध भेजने का
इरादा किया । पर दरवार में शाहजी के मित्र भी थे, उन्होंने उसे सम-
झाया कि शिवाजी की यह हलचल रियासत के लिए लाभदायक है।
इससे राज्य की दक्षिणी सीमाएं सुरक्षित और दृढ़ होती हैं।
शिवाजी की हरकतें जारी रहीं। उन्होंने कोलाबा पर आक्रमण
करके वहां के मरदारों को मिला लिया ।परन्तु जब उन्होंने आगे बढ़कर
कल्याण दुर्ग भी अधिकृत कर लिया, तब तो आदिलगाह एकदम आपे
से बाहर हो गया। उसने शिवाजी को दण्ड देने को एक बड़ी सेना भेजी।
{{left|{{x-larger|गुरु और शिष्य}}}}
पूना से पश्चिम की ओर, सह्याद्रि शृङ्ग के एक दुरुह शिखर पर
एक अति प्राचीन, शायद बौद्धकालीन, गुफा है। उसके निकट घने वृक्षों
का झुरमुट है। अमृत के समान मीठे पानी का एक झरना भी है। इसी
गुफा के सम्मुख, कोई एक तीर के अंतर पर, एक विस्तृत मैदान है ।
उसे खास तौर पर साफ और समतल बनाया गया है ।
वहां एक बलिष्ठ युवक बा फेंकने का अभ्यास कर रहा था ।
युवक गोर-वर्ण, सुन्दर, ठिंगना और लोहे के समान ठोस था। उसने
अपने सुगठित हाथों में वज़ उठाया, और तौल कर एक वृक्ष को लक्ष्य
करके फेंका । वा वृक्ष को चीरता हुआ पार निकल गया। गंभीर स्वर
में किसी ने कहा-"ठीक नहीं हुआ, तुम्हारा लक्ष्य चलित हो गया ।"<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>युवक ने माये का पसीना पोंछकर पीछे फिरकर देखा। एक
जटिल संन्यासी तीव्र दृष्टि से युवक को ताक रहे थे। युवक ने सिर झुका
लिया । सन्यासी अग्रसर हुए। उन्होंने ब→ को क्षण भर तौला और
विद्युत्-वेग से फेंक दिया। वा स्थूल वृक्ष को चीरता हुआ क्षण भर ही
में धरती में घुस गया। उत्साहित होकर युवक ने एक ही झटके में वळ
उखाड़ा, और महावेग मे फेंका । इस बार वी वृक्ष को चीरकर धरती
में घुस गया। सन्यासी ने मुस्कराते हुए कहा- "हां, यह कुछ हुआ।
वत्स, मैं तो वृद्ध हुआ, युवक-सा पौरुष कहां ? हां, तुम अभी और भी
स्फूर्ति उत्पन्न करो।"
युवक ने गुरु के चरणों में प्रणाम किया, और दोनों ने तलवार
निकाल ली। प्रथम मंद, फिर वेग और उसके बाद प्रचंड गति से दोनों
गुरु-शिष्य तलवारें चलाने लगे, मानो विजलियां टकरा रही हों। दोनों
महाप्राण पुरुष पसीने से लथपथ हो गए । श्वास चढ़ गया, परन्तु उनका
युद्ध-वेग कम न हुआ। दोनों ही चीते की भांति उछल-उछल कर वार
कर रहे थे। तलवार झनझना रही थीं। गुरु ने ललकार कर कहा-
"बेटे, लो, एक सच्चा वार तो करो । देखें शत्रु को तुम किस भांति हनन
करोगे।"
युवक ने आवेश में आकर सन्यासी के मोढ़े पर एक भरपूर वार
किया । सन्यासी ने कतराकर एक जनेवा का हाथ जो दिया तो युवक
की तलवार झन्नाकर दस हाथ दूर जा पड़ी। सन्यासी ने युवक के कंठ
पर तलवार रख कर कहा-"वत्स बस, यही तुम्हारा कौशल है ? इस
समय शत्रु क्या तुम्हें जीवित छोड़ता ?"
युवक ने लज्जा से लाल होकर गुरु के चरण छूए, और फिर
तलवार उठा ली। इस बार उसने अंधाधुन्ध वार किए, पर सन्यासी
मानो विदेह पुरुष थे । उनका शरीर मानो दैवकवच से रक्षित था। वह
वार बचाते, युवक को सावधान करते और तत्काल उसके शरीर पर
{{blockcenter|२१ }}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/१३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Manisha yadav12" /></noinclude>ही अस्थायी रूप से रह सकती है । ऐसे विधर्मी को इस्लामी धर्म के
नियमानुसार सव राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों से वंचित कर
दिया जाना चाहिए जिससे बह शीघ्र ही उस अनोखी इस्लामी आध्या-
त्मिक ज्योति को प्राप्त कर ले और उसका नाम एक सच्चे मुसलमान की
सूची में लिख दिया जाय ।
इस धार्मिक दृष्टिकोण से कोई भी अन्य धर्मावलम्बी मुसलमानी
राज्य का नागरिक कदापि नहीं बन सकता । वह उस राज्य के दलित
समाज का एक ऐसा सदस्य बन जाता है जिसकी स्थिति लगभग
गुलामों जैसी होती है । और यह मान लिया जाता है कि ईश्वर ने जो
उसे जीवन और धन दिया है, जिसका कि वह उपभोग कर रहा है, और
इसके लिए इस्लामी शासक उसे जो प्राणदान देते हैं उसके बदले में उसे
अनेक राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों का त्याग करना अनिवार्य
हो जाता है और जो शासक उसे विधर्मी होने पर भी जीवित रहने देता
है उसके इस उपकार के बदले उसे एक कर देना उसका कर्तव्य हो जाता
है जिसे 'जजिया' कहते हैं । इसके अतिरिक्त यदि वह जमीन का मालिक
है तो उस पर उसे खिराज देना चाहिए और सेना के खर्च के लिए भी
अलग कर देना चाहिए। यदि वह स्वयं सेना में भरती होना चाहे तो
वह ऐसा नहीं कर सकता। विधर्मी को 'जिम्मी' कहते हैं। कोई भी
जिम्मी किसी प्रकार का बढ़िया और महीन कपड़ा नहीं पहन सकता,
न वह घोड़े पर चढ़ सकता है, न वह शस्त्र धारण कर सकता है । प्रत्येक
मुसलमान के साथ उसे सम्मानपूर्वक पूरी दीनता दिखाते हुए दरिद्र वेश
में रहना चाहिए, और अपने आचरणों से यह प्रमाणित करना
चाहिए कि वह विधर्मी और विजित जाति का आदमी है।
कोई भी जिम्मी किसी भी हालत में मुसलमानी राज्य का
नागरिक नहीं है। वह अपनी धार्मिक क्रियाओं, पूजा-पाठ आदि के
सम्बन्ध में सार्वजनिक रूप में न तो बात ही कर सकता है और न प्रदर्शन ।
१३७ .<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०५
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
दो०--भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं, मनसहुँ राम रजाइ।
करिय न सोच सनेह बस, कहेउ भूप बिलखाइ॥२८९॥
रामचन्द्र की आज्ञा को भरत भूल कर मन से भी न टालेंगे। राजा ने अच्छी तरह लखा कर कहा कि स्नेह के अधीन होकर सोच न करना चाहिये॥२८९॥
चौ०--राम-भरत-गुन-गनत सप्रीती। निसि दम्पतिहि पलक सम बीती॥
राजसमाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे॥१॥
रामचन्द्र और भरत के गुणों को प्रेम से विचार करते हुए रात राजा-रानी की पलक के समान बीत गई। दोनों राजसमाज प्रातःकाल जगे और नहा नहा कर देव-पूजन करने लगे॥१॥
गे नहाइ गुरु पहिँ रघुराई। बन्दि चरन बोले रुख पाई॥
नाथ भरत पुरजन महँतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी॥२॥
रघुनाथजी स्नान कर गुरुजी के पास गये, चरणों की बन्दना करके रुख पाकर बोले। हे नाथ! भरत, नगर के लोग और माताएँ एक तो शोक से विकल, दूसरे वन के निवास से दुःखी हैं॥२॥
सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भये सहत कलेसू॥
उचित होइ सोइ कीजिय नाथा। हित सबही कर रउरे हाथा॥३॥
समाज के सहित राजा जनकजी को बहुत दिन कष्ट सहते हो गया। हे नाथ! जो उचित हो वह कीजिये, सभी की भलाई आप ही के हाथ में है॥३॥
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सील सुभाऊ॥
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहुँ राज-समाजो॥४॥
ऐसा कह कर रघुनाथजी, बहुत लजा गये, उनका शील स्वभाव देख मुनि पुलकित होकर बोले। हे रामचन्द्र! आप के बिना सम्पूर्ण सुख का सामान दोनों राजसभाओं के लिये नरक के बराबर (दुःखदायी) है॥४॥
दो०--प्रान प्रान के जीव के, जिव सुख के सुख राम।
तुम्ह तजि तात सुहास गृह, जिन्हहिं तिन्हहिं बिधि बाम॥२९०॥
हे रामचन्द्रजी! आप प्राण के प्राण, जीव के जीव और सुख के भी सुख हैं। हे तात! आप को छोड़ कर जिन्हें घर सुहाता हो, उन पर विधाता बाम (टेढ़े) हैं॥२९०॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
चौ०-सो सुख करम धरम जरि जाऊ। जहँ न राम-पद-पङ्कज भाऊ॥
जोग कुजोग ज्ञान अज्ञानू। जहँ नहिँ राम प्रेम परधानू॥१॥
वह सुख, कर्म और धर्म जल जाय जहाँ रामचन्द्र के चरण कमलों में प्रीति न हो। वह योग कुयोग है और ज्ञान अज्ञान है जहाँ रामचन्द्र के प्रति प्रेम की प्रधानता नहीं है॥१॥
सुख, कर्म, धर्म, योग और ज्ञान आदरणीय वस्तु हैं, परन्तु रामचन्द्रजी के चरण-कमलों में प्रीति के बिना अनादर योग्य ठहराना तिरस्कार अलंकार है।
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेही। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केही॥
राउर आयसु सिर सबही के। बिदित कृपालहि गति सब नीके॥२॥
जो आप बिना दुःखी और आप ही से सुखी रहते हैं, जिसके जी में जो है वह आप जानते ही हैं। आप की आज्ञा सभी के सिर पर है, हे कृपालु! आप को सब की गति अच्छी तरह मालूम है॥२॥
यहाँ लक्षणामूलक गूढव्यङ्ग्य है कि आप के धर्मवत पालन में (भरत या जनक) कोई भी बाधक न होंगे। आप की आज्ञा शिरोधार्य करेंगे, यह आप को अच्छी तरह ज्ञात है।
आपु आश्रमहिं धारिय पाऊ। अयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥
करि प्रनाम तब राम सिधाये। रिषि धरि धीर जनक पहिँ आये॥३॥
आप आश्रम में पधारिये, यह कह कर मुनिराज स्नेह से शिथिल हो गये। तब प्रणाम करके रामचन्द्रजी चले आये और वशिष्ठजी धीरज धर कर राजा जनक के पास गये॥३॥
राम बचन गुरु नृपहि सुनाये। सील सनेह सुभाय सुहाये॥
महाराज अब कीजिय सोई। सब कर धरम सहित हित होई॥४॥
गुरुजी ने शील और स्नेह से भरे लहज सुहावने रामचन्द्रजी के वचन राजा को सुनाये और कहा-महाराज! अब वही कीजिये जिसमें सब का धर्म के सहित कल्याण हो अर्थात् हित भी हो और धर्म भी बना रहे॥४॥
दो०-ज्ञान-निधान सुजान सुचि, धरम धीर नरपाल।
तुम्ह बिनु असमजस समन, को समरथ एहि काल॥२९१॥
ज्ञान के मन्दिर, चतुर, पवित्र धर्मवाले, धीरवान राजा, आप के बिना इस समय असमञ्जस मिटाने में कौन समर्थ है?॥२९१॥
असमञ्जस मिटाने के लिये एक ज्ञान निधान होना पर्याप्त कारण है। तिस पर सुजान, सुचिधर्म, धैर्यवान, राजा, आदि अन्य प्रबल हेतुओं का विद्यमान रहना 'द्वितीय समुच्चय अलंकार' है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०७
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
चौ०-सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ज्ञान बिराग बिरागे॥
सिथिल सनेह गुनत मन नाहीं। आये इहाँ कीन्ह भल नाहीं॥१॥
मुनि के वचनों को सुन कर जनकजी प्रेमासक्त हो गये, उनकी दशा देख कर ज्ञान और वैराग्य को भी विराम हो गया। स्नेह से शिथिल हुए मन में विचारते हैं कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया॥१॥
ज्ञान-वैराग्य को विरागी कह कर, राजा के प्रेम वर्णन में 'प्रमात्युक्ति अलंकार' है।
रामहिं राय कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥
हम अब बन ते बनहिँ पठाई। प्रमुदित फिर बिबेक बढ़ाई॥२॥
राजा दशरथ ने रामचन्द्र को वन जाने के लिये कहा, अपने प्रिय प्रेम को सुधा किया अर्थात् प्राण त्याग दिया। अब हम वन से भी वन को भेज कर बड़ी प्रसन्नता से ज्ञान बढ़ा कर लौटेंगे॥२॥
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भये प्रेम बस बिकल बिसेखी॥
समउ समुझि धरि धीरज राजा। चले भरत पहिँ सहित समाजा॥३॥
तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण (राज का विषाद) देख सुन कर प्रेम के अधीन विशेष व्याकुल हो गये। अवसर समझ राजा धीरज धर कर समाज के सहित भरतजी के पास चले॥३॥
भरत आइ आगे भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे॥
तात भरत कह तिरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ॥४॥
भरतजी आगे से आ कर लिवा लाये गये और समयानुसार सुन्दर आसन दिये। तिरहुति राज ने कहा-हे तात भरत! आप को रघुनाथजी का स्वभाव मालूम है॥४॥
दो०-राम सत्यव्रत धरम-रत, सब कर सील सनेहु।
सङ्कट सहत संकोच बस, कहिये जो आयसु देहु॥२९२॥
रामचन्द्र सत्यव्रत और धर्म में तत्पर हैं, हम सब के शील-स्नेह के वश संकोच से सङ्कट सहते हैं, इसलिये जो आज्ञा दीजिये वह मैं उनसे कहूँ॥२९२॥
चौ०-सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरत धीर धरि भारी॥
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू॥१॥
सुन कर पुलकित शरीर से नेत्रों में जल भर कर भारी धीरज धारण करके भरतजी बोले। हे प्रभो! आप मेरे प्रिय-पूज्य माता-पिता के समान हैं और कुल-गुरु वशिष्ठजी के समान हितकारी माता-पिता भी नहीं॥१॥
पिता-माता का हितकारित्व गुण इसलिये निषेध किया गया कि उसका धर्म कुल-गुरु स्थापन करना इष्ट है। यह पर्य्यस्तापह्नुति अलंकार है।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
कासिकादि मुनि सचिव समाजू। ज्ञानअम्बुनिधि आपुन आजू॥
सिसु-सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइय स्वामी॥२॥
विश्वामित्र आदि मुनि, मन्त्रि मण्डल के सहित आज ज्ञानसागर आप विद्यमान हैं। मुझे बालक (अबोध) सेवक आज्ञा के अनुसार चलनेवाला जान कर हे स्वामिन्! शिक्षा दीजिये॥२॥
एहि समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर॥
छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि धाम बिधाता॥३॥
इस सभा स्थान में आप का पूछना, मुझ मलिन के लिये चुप रहना ठीक है, बोलना तो पागलपन होगा। हे तात! छोटे मुँह से बड़ी बात कहता हूँ, विधाता को टेढ़ा लख कर क्षमा कीजियेगा॥३॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवा-धरम कठिन जग जाना॥
स्वामि-धरम स्वारथहि बिरोधू। बैर-अन्ध प्रेमहिं न प्रबोधू॥४॥
वेद, शास्त्र और पुराणों में विख्यात है और संसार जानता है कि सेवा-धर्म कठिन है। स्वामिधर्म (निःस्वार्थ भाव से स्वामी की सेवा करना) और स्वार्थ (खुद-गरज़ी) से बैर का विरोध है, जैसे वैरभाव से अन्धे हुए मनुष्य के हृदय में प्रेम का यथार्थ ज्ञान नहीं होता॥४॥
उत्तरार्ध में प्रथम उपमेय वाक्य है, दूसरा उपमान वाक्य है। दोनों वाक्यों में बिना वाचकपद के बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव झलकना 'दृष्टान्त अलंकार' है।
दो०-राखि राम रुख धरम-व्रत, पराधीन मोहि जानि।
सब के सम्मत सर्व हित, करिय प्रेम पहिचानि॥२९३॥
रामचन्द्रजी के रुख और धर्म-व्रत की रक्षा करके मुझे पराधीन जान कर सब की सम्मति और सब के भलाई की बात प्रेम को पहचान कर कीजिये॥२९३॥
चौ०-भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ॥
सुगम अगम मृदु मञ्जु कठोरे। अरथ अमित अति ओखर थोरे॥१॥
भरतजी के वचन सुन कर और उनके स्वभाव को देख कर समाज के सहित राजा सराहते हैं। भरतजी की वाणी:-सुगम है और दुर्गम है, सुन्दर कोमल है और कठिन भी है, अर्थ बड़ा गम्भीर है और अक्षर बहुत थोड़े हैं॥१॥
ज्यों मुखमुकुर मुकुर निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥
भूप भरत मुनि साधु समाजू। गे जहँ बिबुध-कुमुद-द्विजराजू॥२॥
जैसे आइने में मुख देख पड़ता है और वह दर्पण अपने हाथ में रहता है, परन्तु पकड़ा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७०९
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अजीत कुमार तिवारी
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/* शोधित नहीं */ बिना ठीक से शोधित किए पन्ने की स्थिति न बदलें.
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
नहीं जाता; ऐसी अद्भुत वाणी है। राजा जनक, भरतजी, वशिष्ठमुनि और साधु-मण्डली जहाँ देवतारूपी कुमुद वन के चन्द्रमा (रामचन्द्रजी) हैं; वहाँ गये॥२॥
सुनि सुनि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीन-गन नव जल जोगा॥
देव प्रथम कुल-गुरु गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेखी॥३॥
इस (सभा की) खबर को सुन कर सब लोग सोच से विकल हैं, ऐसा मालूम होता है मानों मछलियों का समूह नवीन जल के संयोग से व्याकुल हो। देवता पहले कुलगुरु वशिष्ठजी की दशा देखी, फिर विदेहजी के विशेष स्नेह को लखा॥३॥
राम भगति-मय भरत निहारे। सुर स्वारथी हहरि हिय हारे॥
सब कोउ राम-प्रेम-मय पेखा। भये अलेख सोच बस लेखा॥४॥
रामचन्द्रजी की भक्ति में लीन भरतजी को निहारा, अपने मतलबी देवता डर कर हृदय में हार गये। सब किसी को रामचन्द्रजी के प्रेम में तत्पर देखा, इससे देवता अनन्त सोच के अधीन हुए॥४॥
लेखा अलेख सोच वश हुए 'पदार्थावृत्ति दीपक अलंकार' है।
दो०-राम सनेह सकोच बस, कह ससोच सुरराज।
चहु प्रपञ्चहि पञ्च मिलि, नाहिँ त भयउ अकाज॥२९४॥
देवराज इन्द्र सोच से कहते हैं कि रामचन्द्रजी स्नेह और सकोच के वश में हैं (यहाँ सब प्रेमी और सकोची इकट्ठे हुए हैं) सब पञ्च मिल कर छल का विस्तार करो, नहीं तो अकाज हुआ॥२९४॥
चौ०-सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥
फेरि भरत-मति करि निज माया। पालु बिबुध-कुल करि छल छाया॥१॥
देवताओं ने सरस्वती का स्मरण कर स्तुति की, (वे ब्रह्म लोक से आईं, इन्द्र ने कहा) हे देवि! हम सब देवता आप की शरण आये हैं, रक्षा कीजिये। अपनी माया से भरत की बुद्धि फेर कर छल की छाँह करके देव-कुल का पालन कीजिये॥१॥
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानीं। बोलीं सुर स्वारथ जड़ जानीं॥
मोसन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥२॥
देवताओं की बिनती सुन कर और उन्हें स्वार्थ में मूर्ख हुए समझ कर चतुर देवि बोली। मुझसे कहते हो कि भरत की बुद्धि पलट दो! हज़ार आँख से भी तुम्हें सुमेरु पर्वत नहीं सूझता है?॥२॥
सरस्वती का प्रस्तुत वर्णन तो यह है कि हे इन्द्र! भरतजी की महिमा तुम्हें अब भी नहीं देख पड़ी कि गुरुवशिष्ठ, योगिराज जनक और परमात्मा रामचन्द्र उनकी भक्ति के वश में<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
हुए हैं। इसे न कह कर उसका प्रतिबिम्ब मात्र कहना कि हज़ार नेत्र से सुमेरु नहीं सूझता 'ललित अलंकार' है।
बिधि-हरि-हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत-मति सकइ निहारी॥
सो मति मोहि कहत करु भोरी। चन्दिनि कर कि चंडकर चोरी॥३॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माया बहुत बड़ी है, वह भी भरतजी की बुद्धि की ओर नहीं निहार सकती। उस बुद्धि को मुझ से कहते हो कि भोली कर दो, क्या चाँदनी सूर्य की चोरी कर सकती है? (कदापि नहीं)॥३॥
पूर्वार्द्ध में व्यङ्ग्यार्थ द्वारा काव्यार्थापत्ति अलंकार है कि जब बहुत बड़ी माया विष्णु आदि की उनकी मति को नहीं भुला सकती, तब मेरी तुच्छ माया क्या चीज़ है! सभा की प्रति में चाँदिनकर कि चन्द कर चोरी पाठ है। उसका अर्थ किया गया है कि--"भला कभी चाँदनी भी चन्द्रमा को चुरा सकती है?" चाँदिनि और चन्दकर दोनों एक ही वस्तु हैं, चन्द्रमा का घुमा कर किया गया है। गुटका और राजापुर की प्रति में उपर्युक्त का पाठ है, इससे यही कविकृत विशुद्ध पाठ है।
भरत हृदय सिय-राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥
अस कहि सारद गइ बिधि-लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥४॥
भरतजी के हृदय में सीताराम का निवास है, जहाँ सूर्य का प्रकाश है क्या वहाँ अन्धकार रह सकता है? (कदापि नहीं)। ऐसा कह कर शारदा ब्रह्मलोक को चली गई, देवता ऐसे मालूम होते हैं मानों रात में चकवा पक्षी व्याकुल हो)॥४॥
दो०--सुर स्वारथी मलीन मन, कीन्ह कुमन्त्र कुठार।
रचि प्रपञ्च माया प्रबल, सय भ्रम अरति उचार॥२९५॥
मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओं ने खोटी सलाह करके कुप्रबन्ध कर ही डाला। अपनी प्रबल माया से कपट का जाल रच कर ऐसा किया कि लोगों को भय, भ्रम, मन न लगना और उचाट हो॥२९५॥
चौ०--करि कुचाल सोचत सुरराजू। भरत हाथ सब काज अकाजू॥
गये जनक रघुनाथ समीप। सनमाने सब रविकुल-दीपा॥१॥
कुचाल करके इन्द्र सोचते हैं कि सब काज अकाज तो भरतजी के हाथ में है। जनकजी रघुनाथजी के समीप गये, सूर्यकुल के दीपक रामचन्द्रजी ने सब का सनमान कर आसन दिये॥१॥
समय समाज धरम अविरोधा। बोले तब रघुबंस-पुरोधा॥
जनक भरत सम्बाद सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई॥२॥
रघुकुल के पुरोहित (वशिष्ठजी) समय, समाज और धर्म के अनुकूल बोले। जनक और भरत का सम्वाद सुनाया, भरतजी की सुहावनी कहनूति कहीं॥२॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
तात राम जस आयसु देहू। सो सब करइ मोर मत एहू॥
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी॥३॥
प्रिय रामचन्द्र! जैसी आज्ञा देओ, वह सब करे, मेरी यही सम्मति है। सुन कर रघुनाथजी दोनों हाथ जोड़ कर सच्ची सीधी और कोमल बाणी बोले॥३॥
बिद्यमान आपुन मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥
राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई॥४॥
जहाँ आप और मिथिलेश्वर विराजमान (मौजूद) हैं, वहाँ मेरा कहना सब तरह से भद्दा है। आप की और राजा जनकजी जो आज्ञा हो, मैं आप की सौगन्द कर कहता हूँ मुझे ठीक वही शिरोधार्य होगी॥४॥
दो०-राम सपथ सुनि सुनि जनक, सकुचे सभा समेत।
सकल बिलोकत भरत मुख, बनइ न ऊतर देत॥२९६॥
रामचन्द्रजी की सपथ सुन कर वशिष्ठ मुनि, जनकजी सभा के सहित सकुचा गये। सब भरतजी का मुख देखने लगे, किसी से उत्तर देते नहीं बनता है॥२९६॥
चौ०-सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबन्धु धरि धीरज भारी॥
कुसमउ देखि सनेह सँभारा। बढ़त बिन्धि जिमि घटज निवारा॥१॥
सभा सकुच वश भरतजी को देख रही है, अथवा भरतजी सभा को सकुच वश निहार कर रामचन्द्रजी के भाई हैं, हृदय में भारी धीरज धारण किया। कुसमय देख कर स्नेह को सम्हाला, जैसे बढ़ते हुए विन्ध्याचल को अगस्त्य मुनि ने निवारण किया था॥१॥
बढ़ते हुए प्रेम को भरतजी ने सम्हाला, इस सामान्य बात की समता विशेष से दिखाना कि जैसे विन्ध्याचल की बाढ़ को कुम्भज मुनि ने रोका था 'उदाहरण अलंकार' है।
पौराणिक कथा है कि एक बार विन्ध्य पर्वत सूर्य का मार्ग रोकने के लिये ऊपर उठा, देवताओं ने निरुपाय समझ कर अगस्त मुनि से प्रार्थना की। क्योंकि विन्ध्याचल उनका शिष्य है, तब मुनि पर्वत के सामने आये, उसने दण्डवत करते हुए पूछा मेरे लिये क्या आज्ञा है? अगस्तजी ने कहा कि जब तक मैं लौट कर न आऊँ तब तक तुम इसी तरह पड़े रहो। ऐसा कह कर मुनि दक्षिण दिशा को गये और लौटे नहीं।
सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन-गन जगजानी॥
भरत-बिबेक बराह बिसाला। अनायास उधरो तेहि काला॥२॥
शोक रूपी हिरण्याक्ष ने सभा की बुद्धि रूपिणी धरती को हर लिया, निर्मल गुण-गण रूपी ब्रह्मा से भरतजी के ज्ञान रूपी विशाल शूकर ने उस समय उत्पन्न होकर अनायास ही उद्धार किया॥२॥
विष्णुपुराण और श्रीमद्भागवत में हिरण्याक्ष का इतिहास इस प्रकार वर्णन है कि वह<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
बल से मदोन्मत्त हो कर पृथ्वी को लेकर रसातल में चला गया। सृष्टि का कार्य बन्द हो जाने से ब्रह्मा चिन्तित हुए। नारायण की स्तुति करने लगे कि, उसी समय उन्हें छींक आई और नाक के छिद्र से एक छोटा सा मक्खी के बराबर शूकर गिरा। देखते ही देखते वह बहुत बड़ा रूप का शूकर हो गया। तब ब्रह्मा जान गये कि ये शूकर रूप धारी हरि हैं। शूकर भगवान पाताल में जा दैत्य का संहार कर पृथ्वी को जहाँ की वहाँ स्थित करके अपने लोक को गये। इसी कथा का साङ्गरूपक ऊपर वर्णन किया गया है।
करि प्रनाम सब कहूँ कर जोरे। राम राउ गुरु साधु निहोरे॥
छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा॥३॥
प्रणाम करके सब को हाथ जोड़कर रामचन्द्रजी, राजा जनक, गुरूजी और सज्जनों का निहोरा करके भरतजी बोले। आज मेरे बड़े अनुचित को क्षमा कीजिये, कोमल मुख से कठोर बातें कहता हूँ॥३॥
हिय सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तैं मुख-पङ्कज आई॥
बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती सज्जु मराली॥४॥
हृदय में सुन्दर सरस्वती का स्मरण किया, वे मानस से मुख कमल में आई। भरतजी की वाणी निर्मल ज्ञान, धर्म और नीति से मिली हुई मनोहर राजहंसिनी के समान है॥४॥
यहाँ राजहंसिनी की समता देना साभिप्राय है कि जैसे मरालिनी मिले हुए दूध-पानी को अलगा देती है, तैसे भरतजी की वाणी गुण-दोष को पृथक् पृथक् करनेवाली है।
दो०--निरखि बिबेक बिलोचनन्हि, सिथिल सनेह समाज।
करि प्रनाम बोले भरत, सुमिरि सीय-रघुराज॥२९७॥
ज्ञान रूपी नेत्रों से समाज को स्नेह से शिथिल देख सीताजी और रघुनाथजी का स्मरण कर प्रणाम करके भरतजी बोले॥२९७॥
चौ०--प्रभुपितुमातुसुहृद गुरु स्वामी। पूज्य परमहित अन्तरजामी॥
सरल सुसाहिब सील-निधानू। प्रनत-पाल सर्बज्ञ सुजानू॥१॥
हे प्रभो! आप मेरे पिता, माता, मित्र, गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितकारी और मन की बात जानने वाले हैं। सीधे, सुन्दर साहिब, शील के स्थान, शरणागतों के रक्षक, चतुर और सबके ज्ञाता हैं॥१॥
आप मेरे पिता, माता, मित्र, गुरु और स्वामी हैं, बहुतों के उत्कृष्ट गुणों को एक रामचन्द्रजी में समता लाना 'तृतीय तुल्ययोगिता अलंकार' है।
समरथ सरनागत हितकारी। गुन गाहक अवगुन-अध-हारी॥
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाँई। मोहि समान मैं साँइ-दोहाई॥२॥
समर्थ शरणागतों के हितकारी, गुणों के ग्राहक, दुर्गुण और पापों के हरनेवाले हैं। स्वामी आप के समान आप ही हैं और स्वामिद्रोही मुझ समान मैं ही हूँ॥२॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
उदार गुणवाले स्वामी आप आप के समान आपही हैं और स्वामिद्रोहियों में मेरे समान मैं ही हूँ। उपमेय ही को उपमान बनाना 'अनन्वय अलंकार' है। कुछ टीकाकारों ने 'साँइ-दोहाई' शब्द का अर्थ-"मैं स्वामी की सौगन्ध खाकर कहता हूँ" किया है। परन्तु यहाँ सौगन्द से प्रयोजन नहीं है, यह 'स्वामि-द्रोहाई' का अपभ्रष्ट रूप है।
प्रभु-पितु-बचन लोह अस पेली। आयेउँ इहाँ समाज सकेली॥
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिय अमर-पद माहुर मीचू॥३॥
(इससे बढ़ कर स्वामि-द्रोहिता और क्या हो सकती है कि) स्वामि और पिता की बात को सम्मान वश न मान कर उलटे समाज बटोर कर यहाँ आया। संसार में भले, बुरे, ऊँच और नीच जितने हैं अमृत को अमरत्व प्रदान करना तथा विष को मृत्यु कराना (स्वामी की आज्ञा जिसको जैसी है, वह उसी सीमा के भीतर आज्ञानुसार कार्य करता) है॥३॥
अमिय को अमरपद और माहुर को मीचु, इसमें पद और अर्थ दोनों की आवृत्ति होने से पदार्थावृत्ति दीपक अलंकार है। स्वामी की आज्ञा सुमन्त्र के द्वारा मेरे लिये यह हुई थी कि-"कछु लँदेस भरत के आये। नीति न तजिय राज-पद पाये॥" और पिताजी की आज्ञा थी कि--"मुदित सोधि सब साज सजाई। दे भरत कह राज बजाई॥" मैं ने इन आज्ञाओं के विपरीत कार्य किया।
राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं॥
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई॥४॥
रामचन्द्रजी की आज्ञा को मन में मेटना कहीं कोई देखा सुना नहीं जाता। वह करके मैं ने सब प्रकार की ढिठाई की अर्थात् रामाज्ञा को मिटा दिया, परन्तु आपने (मेरे उस दुर्गुण को) स्नेह और सेवकाई मान ली॥४॥
दो०-कृपा भलाई आपनी, नाथ कीन्ह भल मोर।
दूषन से भूषन सरिस, सुजस चारु चहुँ ओर॥२९८॥
हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया। दोष आभूषण के समान हुए और चारों ओर सुन्दर यश फैल रहा है॥२९८॥
स्वामी की कृपा से मेरे दोष भूषण रूप हो गये 'लेश अलंकार' है।
चौ०-राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥
कूर कुटिल खल कुमति कलङ्की। नीच निसील निरीस निसङ्की॥१॥
आप की रीति, सुन्दर बानि और बड़ाई संसार में प्रसिद्ध है तथा वेद शास्त्रों ने गाई है। निर्दय, कुटिल, दुष्ट, खोटी बुद्धिवाले, कलङ्की, नीच, शील रहित, नास्तिक और बुरा कर्म करने में किसी का डर न माननेवाले॥१॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
तेउ सुनि सरन सामुहे आये। सकृत प्रनाम किये अपनाये॥
देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु-समाज बखाने॥२॥
वे भी यश सुन कर सामने शरण आये और एक बार प्रणाम किया, इन्हें आपने अपना लिया। शरणागतों के दोष आँख से देख कर कभी हृदय में नहीं लाये और सुने सुनाये गुणों को श्रीमुख से साधु-मण्डली में बखान किये॥२॥
को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समान साज सब साजी॥
निज करतूति न समुझिय सपने। सेवक सकुच सोच उर अपने॥३॥
ऐसा दूसरा कौन स्वामी है जो सेवक पर इतनी मिहरबानी करता हो कि उसका सब सामान अपने बराबर बनाता हो। अपने उपकार की करनी को सपने में भी नहीं समझते, उलटे सोच से हृदय में सकुचाते रहते हैं कि मैं ने इसका कोई उपकार नहीं किया॥३॥
सो गोसाँइ नहिं दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥४॥
वह स्वामी (आप के सिवा) दूसरा कोई भी नहीं है, इस बात को मैं भुजा उठा कर और प्रतिज्ञा-पूर्वक कहता हूँ। पशु नाचते हैं और सुआ पढ़ने में प्रवीण होता है, उन दोनों के गुणों की गति नचानेवाले और पढ़ानेवाले के अधीन है।
पशु को नाचने में अभ्यस्त करना नट का काम और सुग्गे को पाठ में प्रवीण करने में पाठक प्रशंसा योग्य है न कि पशु और शुक 'यथासंख्य अलंकार' है।
दो०-यों सुधारि सनमानि जन, किये साधु सिरमौर।
को कृपाल बिनु पालिहै, बिरदावलि बरजोर॥२९९॥
इस प्रकार आपने इस सेवक को सुधार कर और सम्मान करके साधु-शिरोमणि बना दिया। हे कृपालु! आप के बिना ऐसी प्रबल नामवरी कौन पालन करेगा? (कोई नहीं)॥२९९॥
जैसे नट-पाठक पशु-शुक को सुधार कर गुणवान बनाते हैं, तैसे आपने मेरे दुर्गुणों को दूर कर साधुओं का सिरमौर बना दिया। प्रथम चौपाई में उपमेय वाक्य है। दूसरे दोहे के पूर्वार्ध में उपमान वाक्य है। बिना वाचकपद के दोनों वाक्यों में बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव झलकना 'दृष्टान्त अलंकार' है।
चौ०-सोक सनेह कि बाल सुभायें। आयउँ लाइ रजायसु बायें॥
तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा॥१॥
शोक से, स्नेह वश या कि बाल-स्वभाव से मैं आप की आज्ञा को बाँयें लगा कर यहाँ आया। हे कृपालु! तब भी आपने अपनी ओर देख कर सभी तरह से मेरी भलाई मान ली॥१॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
देखेउँ पाय सुमङ्गल-मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला॥
बड़े समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ी चूक साहिब अनुरागू॥२॥
सुन्दर मङ्गल-मूल चरणों को देखा, स्वामी को सहज प्रसन्न जाना। इस बड़े समाज में अपने बड़े भाग्य को देखता हूँ कि बड़ी चूक पर भी स्वामी की इतनी घनिष्ट प्रीति! (मेरा अहोभाग्य है)॥२॥
कृपा अनुग्रह अङ्ग अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई॥
राखा मोर दुलार गोसाँई। अपने सील सुभाय भलाई॥३॥
हे कृपानिधान! आपने सब तरह से बड़ी कृपा की, इस अनुग्रह से मेरा अङ्ग परिपूर्ण हो गया। स्वामी ने अपने शील, स्वभाव और भलाई से मेरा दुलार रक्खा॥३॥
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि-समाज सकोच बिहाई॥
अबिनय बिनय जथा रुचि बानी। छमिहि देउ अति आरत जानी॥४॥
हे नाथ! मैं ने अत्यन्त ढिठाई की कि स्वामी की सभा में लाज छोड़ कर उद्दण्डता और विनती की बातें जैसी मुझे रुची वह कही है, हे देव! अत्यन्त दुःखी जान कर क्षमा कीजिये॥४॥
दो०-सुहृद सुजान सुसाहिबहि, बहुत कहब बड़ि खोरि।
आयसु देइय देव अब, सब्बइ सुधारिय मोरि॥३००॥
सुन्दर हृदय, चतुर और अच्छे स्वामी से बहुत कहना बड़ा अपराध है। हे देव! अब आज्ञा दे कर मेरी सब तरह से सुधारिये॥३००॥
यहाँ वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ बराबर है कि जैसे मेरे सम्पूर्ण दुर्गुणों को गुण मान कर स्वामीने मुझे कृतार्थ किया, वैसे यह भी सुधारिये कि आज्ञा पालन कर मैं कृतकृत्य होऊँ।
चौ०-प्रभु-पद-पदुम पराग दोहाई। सत्य-सुकृत-सुख-सींव सुहाई॥
सो करि कहउँ हिये अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥१॥
स्वामी के चरण-कमलों की धूलि जो सत्य पुण्य और सुख की सुन्दर सीमा है, उसका सौगन्द करके अपने हृदय की जागते, सोते और अपने की रुचि कहता हूँ॥१॥
सहज सनेह स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥
अज्ञा सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसाद जन पावइ देवा॥२॥
सहज स्नेह से स्वामी की सेवकाई स्वार्थ रूपी छल और चारों फल की इच्छा त्याग कर करूँ! आज्ञा-पालन के समान अच्छे स्वामी की दूसरी सेवा नहीं है, हे देव! वही प्रसाद यह सेवक पावे॥२॥<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
अस कहि प्रेम बिबस भये भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥
प्रभु-पद-कमल गहे अकुलाई। समउ सनेह न सो कहि जाई॥३॥
ऐसा कह कर अत्यन्त प्रेम के अधीन हो गये, शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में जल भर आया। अकुला कर स्वामी चरण-कमलों को पकड़ लिया, उस समय का स्नेह कहा नहीं जाता है॥३॥
कृपासिन्धु सनमानि सुबानी। बैठाये समीप गहि पानी॥
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेह सभा रघुराऊ॥४॥
कृपासागर रामचन्द्रजी ने सुन्दर वाणी से सन्मान करके हाथ पकड़ कर समीप में बैठा लिया। भरतजी की विनती सुन कर और उनका स्वभाव देख कर सभा के सहित रघुनाथजी स्नेह से शिथिल हो गये॥४॥
हरिगीतिका-छन्द।
रघुराउ सिथिल सनेह साधु-समाज मुनि मिथिला-धनी।
मन महँ सराहत भरत भायप, भगति की महिमा घनी॥
भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत, सुमन मानस मलिन से।
तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से॥१२॥
रघुनाथजी, सज्जन-मण्डली, मुनि और मिथिलेश्वर स्नेह से शिथिल हैं। भरतजी का भाईचारा और उनके भक्ति की घनी महिमा मन में सराहते हैं! देवता भरतजी की प्रशंसा करके फूल बरसाते हैं; किन्तु उनका मन मलिनता से भरा है। तुलसीदासजी कहते हैं कि सब लोग सुन कर व्याकुलता से रात्रि के आगमन में कमल के समान सिकुड़ गये हैं॥१२॥
दो०-देखि दुखारी दीन, दुहुँ समाज नर नारि सब।
मघवा महा मलीन, मुये सारि मङ्गल चहत॥३०१॥
दोनों समाज के सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषों को दीन दुःखी देख कर महा मलिन इन्द्र मुर्दे को मार कर अपना कल्याण चाहता है॥३०१॥
भावी राम-वियोग के ख्याल से लोग दुःख से यों ही मृतक तुल्य हो रहे हैं, तिस पर स्वार्थी इन्द्र के कपट-प्रयोग मुर्दे को मारना है।
चौ०-कपट-कुचालि-सींव सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन-काजू॥
काक समान पाकरिपुरीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती॥१॥
देवराज कपट और कुचाल का हद है, उसको पराये का अकाज और अपना काज प्यारा है। इन्द्र की रीति कौए के समान छली, मलिन और कहीं विश्वास न करने की है॥१॥<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
प्रथम कुमत करि कपट सकेला। सो उचाट सब के सिर मेला॥
सुर-माया सब लोग बिमोहे। राम-प्रेम अतिसय न बिछोहे॥२॥
पहले खोटी सलाह करके कपट का इकट्ठा किया, वह उचाटन सब के सिर पर कर रखा था। उस देव-माया से सब लोग विमोहित हुए, परन्तु रामचन्द्रजी के अतिशय प्रेम से उनका विछोह नहीं हुआ अर्थात् रघुनाथजी को छोड़ कर कोई भी घर लौटना नहीं चाहते॥२॥
उचाट बस मन घर नाहीं। छन चल रुचि छन सदन सुहाहीं॥
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिन्धु सङ्गम जनु बारी॥३॥
परन्तु भय और उचाट के वश मन किसी का स्थिर नहीं है, क्षण में धन की इच्छा होती और क्षण में घर चलना अच्छा लगता है। मन की गति दुविधा में पड़ने से प्रजा दुःखी है, ऐसा मालूम होता है मानों नदी और समुद्र के सङ्गम का पानी चञ्चल हो।
दुचित कतहुँ परितोष न लहहीं। एक एक सन मरम न कहहीं॥
लखि हिय हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥४॥
चित्त में दुविधा होने से कहीं प्रसन्नता नहीं पाते हैं और एक दूसरे से (मन का यह) भेद नहीं कहते हैं। लोगों की दशा देख कर कृपानिधान रामचन्द्रजी हृदय में हँस कर कहते हैं कि कुत्ता, इन्द्र और युवा की प्रकृति बराबर है।
इन्द्र-उपमेय और स्वान जवान-उपमान दोनों का एक धर्म चञ्चल प्रकृति कथन करना 'दीपक अलंकार' है। प्रजावर्ग परस्पर मन का भेद इसलिये नहीं कहते हैं कि कोई यह न जान ले कि इन्हें रामचन्द्रजी को छोड़ कर घर सुहा रहा है। 'श्वयुवमघोनामतद्धिते' पाणिनि अष्टाध्यायी के इस सूत्र में श्वन्, युवन्, मघवन् तीनों शब्दों के रूप एक से बतलाये हैं।
दो०-भरत जनक मुनिजन सचिव, साधु सचेत बिहाइ।
लागि देव-माया सबहि, जथाजोग जन पाइ॥३०२॥
भरतजी, राजा जनक, मुनिजन, मन्त्री और चैतन्य महात्माओं को छोड़ कर यथायोग्य मनुष्यों को पा कर न्यूनाधिक्य रूप में सभी को देव-माया लगी॥३०२॥
एक ही देव-माया के प्रभाव से कुछ लोगों का बच जाना और कुछ का मोहित होना अर्थात् एक ही वस्तु से विरोधी कार्य का प्रकट होना 'प्रथम व्याघात अलंकार' है।
चौ०-कृपासिन्धु लखि लोग दुखारे। निज सनेह सुरपति छल भारे॥
सभा राउ गुरु महिसुर मन्त्री। भरत भगति सब के मति जन्त्री॥१॥
कृपा के समुद्र रामचन्द्रजी ने देखा कि लोग हमारे स्नेह और इन्द्र के भारी छल से दुःखी हैं। सभासद, राजा जनक, गुरुजी, ब्राह्मण और मन्त्री सब की बुद्धि को भरतजी की भक्ति ने यन्त्रित (जकड़) कर रखा है॥१॥<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
रामहिँ चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥२॥
लिखी हुई तसवीर के समान रामचन्द्रजी को देख रहे हैं और वचन बोलने में सिखाये हुए के समान सकुचाते हैं। भरतजी की प्रीति, नम्रता, बिनती और बड़ाई सुनने में सुख देनेवाली तथा वर्णन करने में कठिनता है॥२॥
जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनि-गन मिथिलेसू॥
महिमा तासु कहइ किमि तुलसी। भगति सुभाय सुमति हिय हुलसी॥३॥
जिनकी लवलेश मात्र भक्ति को देख कर मुनि-समूह और मिथिलेश्वर प्रेम में मग्न हैं। उनकी महिमा तुलसी कैसे कह सकता है? यद्यपि स्वाभाविक भक्ति-भाव से (उस महिमा को कहने के लिये) हृदय में सुबुद्धि हुलस रही है॥३॥
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कविकुल-कानि मानि सकुचानी॥
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल-बचन की नाँई॥४॥
अपने को छोटी और महिमा को बड़ी समझ कर कविकुल की मर्यादा के ध्यान से लज्जित हो रही है। कह नहीं सकती, गुणों में रुचि बहुत बड़ी है, बुद्धि की गति बालक के वचन के समान हो गई है॥४॥
दो०-भरत बिमल जस बिमल-बिधु, सुमति चकोर-कुमारि।
उदित बिमल जन हृदय नभ, एक टक रही निहारि॥३०३॥
भरतजी का विमल यश निर्मल चन्द्रमा रूप है, वह इस जन (तुलसीदास) के हृदय रूपी स्वच्छ आकाश में उदय हुआ है। सुबुद्धि रूपिणी चकोरिणी एक टक होकर देख रही है॥३०३॥
भरतजी के यश पर निर्मल चन्द्रमा का आरोप, अपनी बुद्धि पर चकोर की कन्या का आरोप करके हृदय पर स्वच्छ आकाश का आरोपण करना परम्परित का ढङ्ग लिये 'अधिक अभेद रूपक अलंकार' है।
चौ०-भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥
कहत सुनत सतिभाउ भरत को। सीय-राम-पद होइ न रत को॥१॥
भरतजी का स्वभाव कहना वेदों को भी सहज नहीं है, मेरी तुच्छ बुद्धि की चञ्चलता को कविजन क्षमा करेंगे। भरतजी का सच्चा प्रेम कहने सुनने से सीता और रामचन्द्रजी के चरणों में कौन न अनुरक्त होगा? अर्थात् सभी प्रीतिवान् होंगे॥१॥
सुमिरत भरतहि प्रेम राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को॥
देखि दयाल दसा सब ही की। राम सुजान जानि जन जी की॥२॥
भरतजी का स्मरण करने से जिसको रामचन्द्रजी का प्रेम न सुलभ हो, उसके समान<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
अभागा दूसरा कौन है? दयालु सुजान रामचन्द्रजी ने सब की दशा देख और अन (भरतजी) के मन की बात जान कर कि ये स्पष्ट मेरी आज्ञा पा कर ही सन्तुष्ट होंगे॥२॥
धरम-धुरीन धीर नय-नागर। सत्य सनेह सील सुख-सागर॥
देस कोल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू॥३॥
धर्मधुरन्धर, धीरवान्, नीति में चतुर, सत्य, स्नेह, शील और सुख के समुद्र नीति तथा प्रीति के पालनेवाले रघुनाथजी देश, काल, समय और समाज देख कर बोले॥३॥
बोले बचन बानि सरबस से। हित परिनाम सुनत ससि-रस से॥
तात भरत तुम्ह धरम-धुरीना। लोक बेद-बिद प्रेम-प्रबीना॥४॥
वाणी के सर्वस्व सरीखे वचन बोले, जो परिणाम में हितकारी और सुनने में चन्द्रमा के रस (अमृत) के समान हैं। हे प्यारे भरत! आप धर्म-धुरन्धर, लोक वेद के ज्ञाता और प्रेम में प्रवीण हैं॥४॥
सभा की प्रति में 'लोक वेद बिद परम-प्रबीना' पाठ है!
दो०-करम बचन मानस बिमल, तुम्ह समान तुम्ह तात।
गुरु-समाज लघुबन्धु-गुन, कुसमय किमि कहि जात॥३०४॥
हे तात! कर्म, वचन और मन से निर्मल आप के समान आप ही हैं। गुरु-समाज में दुर्दिन के समय छोटे भाई का गुण कैसे कहा जा सकता है?॥३०४॥
आप के समान आप ही हैं अर्थात् उपमेय ही को उपमान बनाना अनन्वय अलंकार है।
चौ०-जानहु तात तरनि-कुल रीती। सत्यसन्ध पितु कीरति प्रीती॥
समउ समाज लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥१॥
हे तात! आप सूर्यकुल की रीति जानते हो और सत्यवादी पिता की कीर्ति, उन की प्रीति, समय, समाज, गुरुजनों की लाज, मध्यस्थ, मित्र तथा शत्रु के मन की॥१॥
तुम्हहिं बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम-हित धरमू॥
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥२॥
अपना और मेरा परम हितकारी धर्म, आप को सभी के कर्तव्य मालूम हैं। मुझे आप को सब तरह भरोसा है, तो भी समय के अनुसार कहता हूँ॥२॥
तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरु-कुल-कृपा सँभारी॥
नतरु प्रजा पुरजन परिवारू। हमहिँ सहित सब होत खुआरू॥३॥
हे भाई! पिताजी के बिना हमारी बात को केवल कुलगुरु की कृपा ने सम्हाला है। नहीं तो प्रजा, पुरवासी और परिवार के सहित हम सब दुर्दशा-ग्रस्त हो आवे॥३॥<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
जौं बिनु अवसर अथव दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥
तस उतपात तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सब लीन्हा॥४॥
यदि बिना समय सूर्य अस्त हो जाय तो कहिये, संसार में किसको कष्ट न होगा? विधाता ने वैसा ही उत्पात किया, पर हे तात! मुनि वशिष्ठजी और मिथिलेश्वर ने सब तरह से रखवाली किया॥४॥
कहना तो यह है कि बिना समय की मृत्यु से सभी को बड़ा कष्ट हुआ। सीधे इसे न कह कर अनवसर सूर्यास्त की बात कह कर असली वृत्तान्त प्रकट करना 'ललित अलंकार' है।
दो०-राजकाज सब लाज पति, धरम धरनि धन धाम।
गुरु प्रभाउ पालिहि सबहि, भल होइहि परिनाम॥३०५॥
सब राज्य का कार्य, लाज, प्रतिष्ठा, धर्म, धरती, धन और महल गुरुजी के प्रभाव से सभी का पालन कीजिये, इसका फल (नतीजा) अच्छा होगा॥३०५॥
चौ०-सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुरुप्रसाद रखवारा॥
मातु पिता गुरु स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनी-धर-सेसू॥१॥
समाज के सहित तुम्हारा हमारा घर वन में रक्षा करनेवाला गुरुजी का अनुग्रह है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा जो पालन करता है वह सम्पूर्ण धर्म रूपी धरती का धारण करनेवाला शेषनाग है॥१॥
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू॥
साधन एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूति-मय बेनी॥२॥
वह (धर्म-पालन) आप करें और मुझे कराकर सूर्यकुल के रक्षक हों। एक यही साधन सम्पूर्ण सिद्धियों का देनेवाला है, कीर्ति, सुन्दर गति (मोक्ष) और ऐश्वर्य से भरी त्रिवेणी है॥२॥
सो बिचारि सहि सङ्कट भारी। करहु प्रजा परिवार सुखारी॥
बाँटी बिपति सबहि मोहि भाई। तुम्हहिं अवधिभरि बड़ि कठिनाई॥३॥
वह (धर्म) सोच कर भारी सङ्कट सहन करके प्रजा और परिवार को सुखी कीजिये। हे भाई! आपने मुझ से सभी विपत्ति बाँट लो, अवधि (१४ वर्ष) पर्यन्त आप को बड़ी कठिनता है॥३॥
सभा की प्रति में 'बाढ़ि बिपति' पाठ है और 'बाँटी बिपति' को पाठान्तर कहा गया है। परन्तु जब राजापुर की प्रति में 'बाँटी' पाठ है, तब सभा की प्रति का पाठ पाठान्तर सिद्ध होता है।<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
जानि तुम्हहिं मृदु कहउँ कठोरा। कुसमय तात न अनुचित मोरा॥
होहिं कुठाँय सुबन्धु सहाये। ओड़ियहि हाथ असनि के घाये॥४॥
आप को कोमल जान कर मैं कठोर वचन कहता हूँ, हे तात! कुसमय कहलाता है इसमें मेरा दोष नहीं है। अच्छे भाई कुजगह में सहाय होते हैं, (जैसे) वज्र की चोट से शरीर को बचाने के लिये हाथ उसको अपने ऊपर औजता है।
कुजगह में सुन्दर बन्धु सहायक होते हैं, यह उपमेय वाक्य है। वज्र की चोट को हाथ अपने ऊपर ओड़ लेता है, यह उपमान वाक्य है। दोनों वाक्यों में बिना वाचक पद के बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव झलकना 'दृष्टान्त अलंकार' है। सारांश यह कि सुबन्धु गाढ़े दिन में इस तरह सहायक होते हैं, जैसे शरीर पर वज्र का धार होते देख यह जानते हुए कि मैं नष्ट हो जाऊँगा फिर भी हाथ उसे अपने ऊपर ओड़ लेता है।
दो०-सेवक कर-पद-नयन से, मुख सो साहिब होइ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि, सुकबि सराहहिं सोइ॥३०६॥
सेवक हाथ, पाँव और नेत्र के समान हो, स्वामी मुख के समान होना चाहिये। तुलसीदासजी कहते हैं कि इनकी प्रीति की रीति को सुन कर अच्छे कवि उसकी बड़ाई करते हैं॥३०६॥
व्यङ्ग्यार्थ द्वारा दृष्टान्त का भाव है जैसे आँखों ने कोई फल देखा, पाँव चल कर उसके समीप गये, हाथ ने उठा कर मुख रूपी मालिक को दे दिया और उसने अकेले उसे खा लिया। परन्तु उससे उसने हाथ, पाँव, नेत्रादि रूपी सेवकों को शक्ति संचार समान रूप से करके वितरण कर दिया।
चौ०-सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम-पयोधि अमिय जनु सानी॥
सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी॥१॥
रघुनाथजी की वाणी सुन कर सारी सभा प्रेम के समुद्र में मग्न हो गई, ऐसा मालूम होता है मानों वह अमृत-रस से मिली हो। स्नेह की समाधि से समाज शिथिल हो गया, यह दशा देख कर सरस्वती ने मौन साधन कर लिया (सनाटा छा गया)॥१॥
वाणी ऐसी वस्तु नहीं जो अमृत में सानी जा सके, यह केवल कवि की कल्पनामात्र 'अनुक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार' है।
भरतहि भयउ परम सन्तोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। मा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥२॥
भरतजी को परम सन्तोष हुआ, स्वामी की अनुकूलता से दुःख दोष पीछे पड़ गये। मुख प्रसन्न है और मन का विषाद मिट गया, ऐसे खुश मालूम होते हैं मानों गूँगे को सरस्वती का प्रसाद हुआ हो अर्थात् बोलने की शक्ति आ गई हो॥२॥<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।
राजापुर की प्रति में इस चौपाई का उत्तरार्ध यहाँ नहीं है, वह ३०८ दोहे के पूर्व इस प्रकार है। "सुनि प्रभु वचन भरत सुख पावा। मुनि-पद-कमल मुदित सिर नावा॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जड़ गूँगेहि गिरा प्रसादू॥" किन्तु काशी की प्रति में, गुटका और सभा की प्रति में, यह इसी स्थान में है।
कीन्ह सप्रेम प्रनाम बहोरी। बोले पानि-पङ्कुरुह जोरी॥
नाथ भयउ सुख साथ गये को। लहउँ लाहु जग जनम भये को॥३॥
भरतजी ने फिर प्रेम के साथ प्रणाम किया और कर-कमलों को जोड़ कर बोले। हे नाथ! मुझे आप के साथ चलने का सुख हुआ और संसार में जन्म लेने का लाभ पाया॥३॥
अब कृपाल जस आयसु होई। करउँ सीस धरि सादर सोई॥
सो अवलम्ब देव मोहि देई। अवधि पार पावउँ जेहि सेई॥४॥
हे कृपालु! अब जैसी आज्ञा होती है, वही आदर के साथ सिर पर धारण करके करूँगा। हे देव! मुझे वह सहाय दीजिये जिसकी सेवा करके अवधि से पार पाऊँ॥४॥
दो०-देव देव अभिषेक हित, गुरु अनुसासन पाइ।
आनउँ सब तीरथ-सलिल, तेहि कह काह रजाइ॥३०७॥
हे देव! आप के राज्याभिषेक के लिये गुरुजी की आज्ञा पा कर सब तीर्थों का जल ले आया हूँ, उसके लिये क्या आज्ञा है?॥३०७॥
चौ०-एक मनोरथ बड़ मन माहीं। समय सकोच जात कहि नाहीं॥
कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥१॥
एक बड़ा मनोरथ मन में है, वह भय और सकोच से कहा नहीं जाता है। प्रभु रामचन्द्रजी ने कहा--हे तात! कहिये, आज्ञा पा कर सुन्दर स्नेह भरी वाणी बोले॥१॥
चित्रकूट मुनि-थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निझर गिरिगन॥
प्रभु-पद अङ्कित अवनि बिसेखी। आयसु होइ त आवउँ देखी॥२॥
चित्रकूट पर्वत, मुनियों के आश्रम, तीर्थ, वन, पक्षी, मृग, तालाब, नदी, झरना और पर्वत-समूह, विशेष कर स्वामी के चरण-चिह्नित धरती को आज्ञा हो तो देख आऊँ॥२॥
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगत-भय कानन चरहू॥
मुनि प्रसाद बन मङ्गल-दाता। पावन परम सुहावन भ्राता॥३॥
रामचन्द्रजी ने कहा--हे तात! अत्रि मुनि की आज्ञा शिरोधार्य कर अवश्य वन में निर्भय विचरिये। मुनि की कृपा से हे भाई! यह वन अत्यन्त सुहावना, पवित्र और मङ्गल का देनेवाला है॥३॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७२३
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>रामचरित-मानस।
रिषि-नायक जहँ आयसु देहौं। राखेहु तीरथ-जल थल तेहीं॥
सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि-पद-कमल मुदित सिर नावा॥४॥
ऋषिराज जहाँ आज्ञा दें, इस तीर्थ-जल को उसी स्थान में रखना। प्रभु रामचन्द्रजी के वचन सुन कर भरतजी सुखी हुए और मुनि के चरण-कमलों में प्रसन्नता से सिर नवाया॥४॥
दो०-भरत-राम-सम्बाद सुनि, सकल सुमङ्गल-मूल।
सुर स्वारथी सराहि कुल, बरषत सुरतरु फूल॥३०८॥
सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलों का मूल भरतजी और रामचन्द्रजी का सम्बाद सुन कर स्वार्थी देवता सूर्यकुल की प्रशंसा करके कल्पवृक्ष का फूल बरसते हैं॥३०८॥
चौ०-धन्य भरत जय राम गोसाँई। कहत देव हरषत बरिआँई॥
मुनि मिथिलेस सभा सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥१॥
भरतजी धन्य हैं; स्वामी रामचन्द्रजी की जय हो, देवता ऐसा कहते हुए परवस प्रसन्न होते हैं। भरतजी के वचनों को सुन कर वशिष्ठ मुनि, मिथिलेश्वर और सब सभासदों को उत्साह हुआ॥१॥
भरत राम गुन-ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ-बिदेहू॥
सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेम प्रेम अति पावन पावन॥२॥
भरतजी और रामचन्द्रजी के गुण-समूह तथा स्नेह की पुलकित शरीर से राजा जनक प्रशंसा करते हैं। सेवक और स्वामी का सुहावना स्वभाव एवम् नेम प्रेम अत्यन्त पवित्र से भी पवित्र है॥२॥
मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे॥
सुनि सुनि राम-भरत-सम्बादू। दुहुँ समाज हिय हरष बिषादू॥३॥
मन्त्री, सभासद सब प्रेम से अपनी बुद्धि के अनुसार सराहने लगे। रामचन्द्रजी और भरतजी का सम्बाद सुन सुन कर दोनों समाजों के हृदयों में हर्ष और विषाद हो रहा है॥३॥
हर्ष भरतजी की स्वामि-भक्ति पर और रामचन्द्रजी के न लौटने का विषाद, दोनों भावों का साथ ही हृदय में उत्पन्न होना 'प्रथम समुच्चय अलंकार' है।
राम-मातु दुख सुख सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधी रानी॥
एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई॥४॥
रामचन्द्रजी की माता दुःख और सुख को समान समझ कर रामचन्द्रजी के गुणों को कह कर रानियों को समझाया। कोई रघुनाथजी की बड़ाई करते हैं और कोई भरतजी की भलाई को सराहते हैं॥४॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३५
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अजीत कुमार तिवारी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र}}</noinclude>उम्मेदसिंह चरित्र
जीरे जो राजा पचास साठ वा इससे अधिक वर्ष राज्य करता है वह अपने पुत्र पौत्र के राज्य के समय को छीन लेता है । विचारपूर्वक देखने पर इग्लैंड के और भारतवर्ष के मुसलमान राजाओं के राजत्वकाल की तुलना से यह बात प्रमाणित होती है और इसीलिये सर्वशास्त्रनिष्णात राजकार्यधुरंधर बूँदी राज्य के भूतपूर्व अमात्य श्रीपण्डित गंगासहायजी ने अपने ग्रंथ "वंशप्रकारा" में अभिकुल की उत्पत्ति का समय कलियुग के हजार वर्ष बीतने पर माना है और मेरी समझ में बहुत ही ठीक माना है । अब रहा कर्नल टाड साहब का अग्निकुल को तक्षकवंशीय बतलाने का विचार । यह भी मेरी समझ में ठीक नहीं है क्योंकि प्रथम तो जब उनका समय विचार ठीक नहीं तब यह भी अटकल मिथ्या होना चाहिये और दूसरे उन्होंने अग्निकुल की आबू पहाड़ पर उत्पत्ति का वर्णन लिखते हुए जो राय दी है वह भी उनके इस लेख को काटती है । थोड़ासा आगे चलने पर मालूम हो जायगा । इन बातों से सिद्ध है कि चाहुवान वंश की उत्पत्ति को आज दिन चार हजार वर्ष से ऊपर हुए ।
खैर । कुछ भी हो परंतु जिस समय भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के धाम पधार जाने के अनंतर दैत्यों और बौद्धों का अत्याचार बढ़ा, जिस समय बाणासुर के पुत्र धूम्रकेतु और यंत्रकेतन को आदि लेकर अनेक असुर ब्राह्मण के यज्ञों का नाश करके प्रजा को सताने लगे तब महर्षि वशिष्ठजी ने आबू पहाड़ पर अभिकुल की उत्पत्ति के लिये यज्ञ किया । भविष्यपुराण में लिखा है :—
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दूषयिष्यति यवनाः सहस्राब्दे गते कलेः ।
तदा रक्षां करिष्यन्ति याज्ञिकाः क्षत्रियर्षभाः ॥
}}
अर्थात् कलि के हजार वर्ष बीतने पर यवन (बौद्ध) पृथ्वी को दूषित करेंगे तब यज्ञ से उत्पन्न होनेवाले क्षत्रिय उसकी रक्षा करेंगे । इसके साथ जो कथा लिखी है वह अभिकुल के चारों क्षत्रियवंशों की उत्पत्ति से मिलती हुई है । अवश्य ही आजकल के पढ़े लिखे लोग ऐसी कथाओं को कल्पित बतलाते हैं और टाड साहब ने भी इस बात को कल्पित माना है परंतु आश्चर्य यह है कि चंद्रमा में खाई पहाड़ और मंगलग्रह में मनुष्यों की वस्ती की अटकल ऐसे लोगों के विचार से सही और प्राचीन कथायें उनके विचार से कल्पित हैं । खैर इस पक्ष-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१
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अजीत कुमार तिवारी
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३
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अजीत कुमार तिवारी
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/* आवश्यक नहीं */
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{blockcenter|
'''भूमिका'''
}}
{{blockcenter|
यं पश्यति यस्य नाभिविरुद्धचरणं सन्तुष्टं न चेति ।<br />
कर्णो वदाति शिरो चोद्वहति वचसि मुखं चारुचामण्डितम् ॥<br />
अन्तस्थं यस्य विश्वं सुरसरसगन्धगन्धितं चित्तवृत्तेः ।<br />
चित्रं रंगयते तं त्रिभुवनगुरुं त्रिगुणातीतं नमामि ॥
}}
इतिहास प्राचीनों के अनुभव का खजाना है। व्यक्तिगत का, समाज का और देश का चरित्र संगठन करने के लिये इतिहास ही एक पथदर्शक है। लाखों, करोड़ों का अदृष्ट खजाना नष्ट प्राप्त होकर राजा से रंक हो सकता है किन्तु अनुभव की धरोहर यदि लिपिबद्ध कर ली जाय तो वह अटल, अविचल और वृद्धिमान सम्पत्ति है। बस इसी उद्देश्य से इतिहास ग्रन्थों की सृष्टि हुई है। मैं इसमें कहाँ तक कृतार्थ हुआ हूँ—सो कह नहीं सकता, परन्तु जब मैं कुलेखक नहीं, विद्वान नहीं और बुद्धिमान नहीं और इसी तरह इतिहास लेखन की सामग्री भी पूर्णतया उपलब्ध नहीं तब कहना चाहिये कि मेरा यह कार्य अपूर्ण होगा—अनुचित साहस कहलावेगा। हाँ! एक बात अवश्य है। यदि मैं इस उद्योग में सफल न होऊँ तो न सही किन्तु मुझे भरोसा है कि मेरे बाद कोई महाशय बूँदी के इतिहास लिखने का यदि उद्योग करेंगे तो उन्हें इस पोथी से बहुत सामग्री मिल जायगी। यदि मुझे इतनी भी सफलता प्राप्त हो जायगी तो मैं अपने को कृतार्थ समझूँगा।
जब यह “उम्मेदसिंह चरित्र” पाठकों के सामने है तब इस ग्रन्थ में क्या है—सो दिखलाने की आवश्यकता नहीं और भूमिका में पुस्तक का आशय लिख देने की प्रायः चाल भी नहीं है। हाँ! इस जगह इतना अवश्य लिख देना चाहिये कि इसमें विक्रमसंवत् १७३१ से १८६८ तक के १३६ वर्षों का इतिहास है। उस समय मुसलमानी बादशाहत का रवाबता होकर त्यों-त्यों कर देशभर में शान्ति फैल गई थी, क्यों कर “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की कहावत चरितार्थ होती थी और क्योंकर सातवर्ष के उस प्रारम्भ पर्व में राजपूताने के क्षत्रिय नरेशों ने आपस के द्वेष से, दुश्मनों से और इसी प्रकार के अनेक कारणों से आपस में लड़कर, अपने भाइयों का नाश करके देश के नाश करने का उद्योग किया। परमेश्वर की कृपा से उस<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{blockcenter|(६)}}
जनमत तक इनकी शक्ति का नाश नहीं हुआ था। यदि ये सब एक होजाते, यदि रूसटे और भी इनके साथी होजाते और इस तरह की संयुक्त शक्ति से काम लिया जाता तो हिंदुओं का पुराना प्रतिष्टा जमाना फिर भी एक बार छाने की आशा होसकती थी। परंतु इस संसार नाटक के सूत्रधार को यहाँ बात इष्ट नहीं थी। वह जानता था कि हिन्दू इस कार्य के अयोग्य हैं। बस इसीलिये उसने देश के दुःसाध्यकार्यी प्रजापथप्रदर्शकों का विनाश करके समग्र ही दोषमय दिवसकर का उदय किया। यदि उसका अभ्युदय न होता तो न मालूम भारतवर्ष की आज दिन क्या दुर्दशा होती। किन्तु उसे अनेक राजविपत्तियों के अभ्यास रहित के अन्तर में सुख हुआ था। फिर उस दिन के दिवसकरों या सूर्योंने इस धर्मभूमि का शासन, एक ऐसी जाति को दिया गया जो संसार में अपने सुखभोग के लिये विख्यात है। जो लोग उस समय के इतिहास पर दृष्टि किये बिना भारतवर्ष के ब्रिटिश साम्राज्य पर दोष लगाते हैं वे इस पुस्तक को पढ़कर स्वयं दृष्टि से उस जमाने की वर्तमान समय से तुलना करें तब उन्हें भली भाँति निश्चित होजायगा कि ऐसा युग नहीं आयेगा। भारत हमारे लिये कितना सुखकर है। सर्वशक्तिमान् करुणाकरुणालय इस शासनको इस देश में चिरस्थायी करें और इससे राजा प्रजाका कल्याण हो। भगवान् करें श्रीमान् सम्राट् पंचम जार्जका कल्याण हो और उनके युवराजमें राजा प्रजा सुखी रहें।
"उम्मेदसिंह चरित्र" यद्यपि बूँदी राज्य के उद्धारक, हाड़ाधिराजियों के कुलकमल दिवाकर महाराज राजा उम्मेदसिंहजी का चरित्र है किन्तु केवल इसीसे मालूम होजायगा कि मेरी इस उक्ति में कहाँतक सत्यता है। इनके पिता महाराज राजा बुद्धसिंहजी के बढ़ते विक्रमसे जब इस राज्य की वृद्धि हुई तो अवस्थापुरुष और उनके हाथ से यदि राज्य निकल गया तो यहाँ तक कि एक जगह बैठकर दुःख के दिन बिताने के लिये गाँठकी एक सौँपड़ी भी न रही। ऐसी विपत्ति हुए राज्य को वीर यह उठाकर, वर्षों के अविश्रान्त परिश्रम से, समयसूचि से तलवार के हाथ दिखाते रहे, तीन चार युद्धों के अनन्तर इन्होंनें प्राप्त किया। राज्य पाकर इन्होंनें न उसे बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित कर उसके भीतरी काँटों को निकाला। राज्य निष्कंटक होजाने के बाद पहले पुत्र को और उनका देहान्त होजाने पर पौत्र को राज्य देकर आप अलग होगये। अलग होकर भारत वर्ष के समस्त तीर्थों की अनेक बार यात्रा की।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{blockcenter|(७)}}
इस समय भी बूँदी की रक्षा का अटूट व्रत इन्होंने हृदय में धारण और ईश्वर से इन्होंने आजीवन निर्वाह किया। युवराज पाकर इन्होंने जब तब प्रातःकाल उठ गोशों में से हाथ फेर दिया जो अवश्य प्रत्येक कार्य में दिखलायीये—जिसका पालन किया जायते। और इनके पूर्वजों के बनाये कितने ही विशाल भवनों के सिवाय बूँदी राज्य में जो कुछ आजतक दिखलायी देता है केवल इन्होंने बनवाया। तब ऐसे ही ठोस पोथों में इस पोथी में जो वंश-प्रकार—गंगो चन्द्रसे हैं। इनके युवकों के कारण यही जो साक्ष्य कहलाते हैं।
इसमें केवल महाराव राव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही चरित्र हो—सो नहीं। यह चार खण्डों में विभक्त है। प्रथम खण्ड में चौहान क्षत्रियों की शाखा शाखा के—बूँदी राज्य के संक्षिप्त इतिहास का दिग्दर्शन, दूसरे में वर्तमान नायक के पिता महाराज राजा बुद्धसिंहजी का संक्षेप में जीवनचरित्र, तीसरे में उम्मेदसिंहजी को राज्य प्राप्ति से लेकर इनके वनप्रस्थ आश्रम ग्रहण करने तक का हाल और चौथे में उनके राज्य त्याग करने के अनंतर उनका धर्मजीवन धूत और साथ ही महाराव राजा श्रीविष्णुसिंहजी तथा महाराव राजा श्रीरामसिंहजी का चरित्र।
केवल इतना ही क्यों—इसमें उस समय की और २ अनेक सामाजिक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। इस ग्रंथ के लिखते समय मेरा विचार यह था कि इसमें महाराव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही जीवन चरित्र से और आश्रय से लेकर महाराव राजा विष्णुसिंहजी तक का हाल संक्षेप से लिखवायाजाय। ऐसा करने के अनंतर महाराव राजा रामसिंहजी बहादुर जी. सी. आई., सी. आई. ई. का चरित्र लिखकर बूँदी का इतिहास समाप्त कियाजाय। इस उद्देश्य से यह पोथी लिखी गई और मैंने महाराव विष्णुसिंहजी का भी चरित्र होनहार की गोद में है। किन्तु अब मेरा विचार बदल गया। इस पुस्तक के प्रथमखण्ड में इस राज्य का संक्षिप्त इतिहास लिखकर मेरा संतोष नहीं हुआ। इस कारण मैंने राव राजा रतनसिंहजी, राव राजा शत्रुशल्यजी, राव राजा भावसिंहजी और राव राजा भीमसिंहजी का विस्तृत चरित्र लिखकर “वंशभास्कर” के नाम से पोथी तैयार की है और संकल्प यह है कि ठेठ से अबतक का इतिहास ही तैयार करदियाजाय। इस काम में सफलता होगी वा नहीं—सो भगवान जाने किन्तु “पराक्रमी हाड़ाराव” के<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{blockcenter|(८)}}
प्रकाशित होने से इन दोनों पुस्तकों को मिलाकर पढ़ने में राव राजा रतनसिंहजी से लेकर महाराव राजा विष्णुसिंहजी तक का पूरा हाल मिल जायगा।
प्रथम खंड को संक्षिप्त—परन्तु संक्षिप्त करने से उसमें कितनी ही त्रुटियाँ रह गईं। मैं समझता हूँ कि त्रुटि रहित न मालूम इस पोथी में कितनी त्रुटियाँ रही होंगी सो राम जानें। परंतु पृष्ठ १३ में राव बुद्धसिंहजी का तीर्थों दौरा मारवा लिखा गया है किन्तु उन्होंने मारा अपनी ससुराल में था। पृष्ठ २० में राव राजा रतनसिंहजी का मारा जाना लिखा गया है किन्तु यह मारे नहीं गये मृत्यु से परलोकवासी हुए थे। पृष्ठ २२ में राव राजा शत्रुशल्यजी का तलवार से काम आना लिखा गया है किन्तु यह तलवार से नहीं गोली लगने से वीर गति को प्राप्त हुए थे। पृष्ठ ४७ में बुद्धसिंहजी पर जयपुर की नाहक चढ़ी सेना की लड़ाई लिख दी गई है किन्तु जयपुर में सेना दादू पंथियों की है। पृष्ठ १०५ में श्री जी साहब के पुत्र रामसिंहजी लिखाये हैं किन्तु उनके यह प्रपौत्र थे। और पृष्ठ १२२ में विष्णुसिंहजी का शिरपर माला फैला छपाया किन्तु माला नहीं यह झाला फैला करते थे।
इस्तरह की त्रुटियों के सिवाय मेरे ही दृष्टिदोष से एक बड़ी भारी गलती छप गई। वह यह कि पृष्ठ ४८ से पृष्ठ १५१ तक के ३५ पृष्ठों में संवत् १८०१ से संवत् १८०७ तक की घटनाओं का उल्लेख है परंतु वहाँ भूल से १८०० के बदले १९०० मुद्रित हो गया। इनके अतिरिक्त छापे की भूल से बैसरोड़ गढ़का बैसरोड़गढ़, उपकारी की जगह उपारक, मथुरा के बदले मंथर, होल्कर का होलकरा—इत्यादि छप गया सो जुदा।
इस पुस्तक में कई जगह उदयपुर, कोटा, जयपुर और जोधपुर के उस समय के नरेशों पर, इन्द्रगढ़ के महाराजा देवीसिंहजी पर, राजनीति निपुण झालिमसिंहजी पर और ऐसे ही औरों पर कटाक्ष करता पड़ा है परंतु यह कटाक्ष वास्तव में कटाक्ष नहीं। न्याय दृष्टि से किया गया है। इसका कारण मैं ऊपर लिखचुका हूँ। मैं फिर भी मानताहूँ कि यदि उस समय के नरेश आपसमें लड़मरने की जगह, अपने भाइयों का, नातेदारों का और जाति भाइयों का विनाश करने के बदले मिलकर चलते तो भारतवर्ष की ऐसी दुर्दशा न होती।
परंतु उन लोगों ने अपनी राजनीति का—अपनी शक्ति का उपयोग उस व्यक्ति पर किया जिसका राज्य छूट गया था, घर बार छूट गया था और जिसे विपत्ति सागर में पड़कर जंगल में झखमारनी फलों पर कालक्षेप करना पड़ता था। टाड साहब से बढ़कर इसकी गवाही क्या हो? नहीं तो मेरी उन नरेशों पर परम<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४
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2026-06-18T09:06:09Z
अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{blockcenter|(९)}}
पूज्य बुद्धि है। मैंने उनकी प्रशंसा के समय प्रशंसा और निन्दा के समय निन्दा की है। इसपर भी यदि किसी को आपत्ति मालूम हो तो मैं उनसे क्षमा मांगताहूँ। परमेश्वर की कृपा से ब्रिटिश राज्य की छत्र छाया में सब रजवाड़ों का परस्पर का वैषम्य जाकर स्नेह की वृद्धि हो रही है।
अवश्य ही उन लोगों का यह कार्य देश दृष्टि के विचार से और नातेदारों के खयाल से अनुचित था और इसी कारण समय पड़ने पर उनके लिये—उनकी शक्ति के दुरुपयोग को देखकर कुछ लिखना पड़ा किन्तु “सत्यमेव महीपतेः” के सिद्धान्त से उनका कार्य अनुचित भी नहीं कहा जासकता। इसी लक्ष्य से जब टाड साहब ने इन्द्रगढ़वालों का वध करने पर अथवा महाराणा अजबजी के मारे जाने पर महाराव राजा उम्मेदसिंहजी की और अनुक्रम से अजितसिंहजी की निन्दा की है तब ऐसे अवसर पर भारतवर्ष में अंग्रेजी साम्राज्य के संस्थापक लार्ड क्लाइव और वारेन हेस्टिंग्स के वृत्तांत की याद दिलानी पड़ी है और वह भी इसलिये पड़ी है कि दुनिया भर के इतिहास में शायद ऐसा कोई भी राज्य का संस्थापक नहीं निकल सकता जिसके चरित्र में इस प्रकार का धब्बा न हो किन्तु जिनका उद्देश्य राज्य संस्थापन है उन्हें समय आने पर ऐसे कार्य करने पड़ते हैं। इतना लिखने से पाठक यह न समझ लें कि मैं इन बातों का अनुमोदक हूँ। जो कार्य भला सो भला और बुरा सो बुरा ही है।
इस पुस्तक की रचना बूँदी के सुप्रसिद्ध इतिहास “वंश भास्कर” के स्वर्गीय कवि शिरोमणि सूर्यमल्लजी के उक्त ग्रंथ के आधार पर, सर्व शास्त्र निष्णात, राजकार्य धुरंधर, बूँदी के भूतपूर्व अमात्य पंडित गंगासहायजी के बनाये “वंशप्रकाश” को आगे रखकर राजपूताने के जगत प्रसिद्ध इतिहास लेखक महामान्य टाड साहब कृत “एनल्स एंड एंटीक्विटीज आफ राजस्थन” का मिलान करके की गई है। इसमें समय २ पर मथुरानिवासी बाबू हरिचरणसिंह चौहान कृत “बूँदी राजवंशावली” का भी आश्रय लिया गया है और कहीं २ जनश्रुति का भी आधार है। इन सज्जनों के लिये मेरा हार्दिक धन्यवाद है।
विभक्ति प्रत्यय को मैं सर्व नाम के शामिल और संज्ञा से अलग लिखना पसन्द करताहूँ। इस पुस्तक में भी जहाँ तक बन सका इस तरह का उपयोग किया गया है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५
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2026-06-18T09:06:43Z
अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{blockcenter|(१०)}}
यह पोथी संवत् १९६३ में तैयार हुई थी और प्रकाशित होने का सौभाग्य उसे अब प्राप्त हुआ है। इतना विलम्ब होने का कुछ भी कारण हो उसे यहाँ लिखने की आवश्यकता नहीं। हाँ! “श्रीवेंकटेश्वर” यंत्रालय के स्वामी सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी को भी मैं धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने ने मुझ जैसे अकिंचन की पोथियों प्रकाशित करने का अनुग्रह किया है। मेरी पूर्व प्रकाशित और पुस्तकों की तरह इसे छापने, प्रकाशित करने और दुबारा छापने का अधिकार भी उन्हीं को है।
इतिहास अथवा जीवनचरित्र लिखने में यह मेरा तीसरा उद्योग है। इस से पहिले श्रीमती महारानी विक्टोरिया का चरित्र और काबुल के अमीर अब्दुर्रहमानखाँ का चरित्र—यों दो पुस्तकें प्रकाशित होचुकी हैं। इसके अतिरिक्त दो पुस्तकें अभी अप्रमुद्रित हैं सो समय पड़ने पर छपेंगी ही गई। अब रहा आगे लिखने का कार्य सो उसका आधार पाठकों के—समालोचकों के अनुग्रह पर है। यदि समय मिला, यदि सामग्री मिली और साथ ही यदि उत्साह बढ़ाया गया तो शारीर आरोग्य रहने पर फिर भी उद्योग करना मनुष्य का कर्तव्य है। परमेश्वर ऐसी ही कृपा करें।
इस भूमिका को समाप्त करते पूर्व उन हिन्दी रसिकों को भी मैं धन्यवाद देता हूँ जो “अंगीकरोंति सुकृतिनः परिपालयन्ति” के अनुसार मेरी पुस्तकों का आदर करते हैं और जिन समालोचकों की तीव्र क्षीर को अलग कर देनेवाली बुद्धि है वे भी धन्यवाद के भागी हैं।
{{left|
बूँदी राजपुताना
माघ कृष्ण ७
सं० १९६९ वि०
}}
{{right|
हिन्दी का एक तुच्छ सेवक—
लज्जाराम शर्म्मा.
}}
{{blockcenter|[अलंकरण]}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{blockcenter|महता लज्जाराम शर्म्मा रचित पुस्तकें।}}
(१) श्रीमती महारानी विक्टोरिया का चरित्र ॥१॥
(२) काबुल के अमीर अब्दुर्रहमानखाँ का चरित्र ॥१॥
(३) उम्मेद सिंह चरित्र
(४) बीरबल विनोद ॥१॥
(५) धूर्तरसिकलाल ॥१॥
(६) स्वतंत्र रमा और परतंत्र लक्ष्मी ॥१॥
(७) हिन्दू गृहस्थ ॥१॥
(८) आदर्श दम्पती ॥१॥
(९) सुशीला विधवा ॥१॥
(१०) बिगड़े का सुधार ॥१॥
(११) विपत्ति की कसौटी (छपरही है)
(१२) पराक्रमी हाड़ाराव (तैयार है)
(१३) विचित्र स्त्रीचरित्र ॥१॥
(१४) भारत की कारीगरी ॥१॥
{{blockcenter|
पुस्तक मिलने का ठिकाना—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम प्रेस—बम्बई।
}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८
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193480
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2026-06-18T09:07:46Z
अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{blockcenter|श्रीहरिः।}}
{{larger|{{blockcenter|उम्मेदसिंहचरित्र की}}}}
{{blockcenter|विषयानुक्रमणिका।}}
{| class="wikitable" style="width:100%;"
! खंड
! अध्याय
! विषय
! पृष्ठ
|-
| १
| १
| वंशपरिचय
|
|-
|
|
| चौहानों और हाड़ाओं की उत्पत्ति
| १
|-
|
|
| अग्निकुल के चारों क्षत्रियों की उत्पत्ति
|
|-
|
|
| अजमेर का किला बनवानेवाले अजयपालजी
| ४
|-
|
|
| जाहिर पीर-गोगाजी
|
|-
|
|
| अचलेश्वर के आगे अपना मस्तक काटकर चढ़ानेवाले समरणजी
|
|-
|
|
| झाकमरी का सांभर में मंदिर बनवानेवाले महानन्दजी
|
|-
|
|
| चित्तौड़ का किला बनवानेवाले चित्रांगजी
|
|-
|
|
| बीसल सागर तालाब अजमेर में बनवानेवाले बीसलदेवजी
|
|-
|
|
| आना सागर तालाब अजमेर में बनवानेवाले आनाजी
|
|-
|
|
| भारतवर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराजजी
|
|-
|
|
| शरणागत वत्सल हम्मीरजी
|
|-
|
|
| हाड़ा वंश के मूल पुरुष अस्थिपालजी
| ५
|-
|
|
| पृथ्वीराजजी के रूठे सामन्त हम्मीरजी और गम्भीरजी
| ७
|-
|
|
| मांडलगढ़ बसानेवाले मंडनजी
|
|-
|
|
| बूँदी राज्य स्थापन करनेवाले देवसिंहजी
|
|-
| १
| २
| बूँदी राज्य का संस्थापन
|
|-
|
|
| देवसिंहजी ने बादशाह को धोखा न दिया
| ८
|-
|
|
| बाँदू के नले में बूँदी ३०० घरों की बस्ती थी
|
|-
|
|
| देवसिंहजी ने मीणों से बूँदी छीन ली
|
|-
|
|
| कोटा बसा
|<noinclude></noinclude>
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663236
663232
2026-06-18T09:46:34Z
ममता साव9
2453
/* शोधित */
663236
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र की|}}</noinclude>
{|width=100%
|+{{c|{{larger|श्रीहरिः।}}<br>
{{xxx-larger|'''उम्मेदसिंहचरित्र की-'''}}<br>
{{Custom rule|sp|40|fy1|40|sp|40}}
{{c|{{larger|विषयानुक्रमणिका।}}}}
|-
!खंड अध्याय!!विषय!!पृष्ठ
|-
|१{{gap}}||१ वंशपरिचय ।||
|-
|{{ditto}}|| १ चौहानों और हाडाओं की उत्पत्ति।||१
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||अजमेर का किला बनानेवाले अजयपालजी||४
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||जाहिर पीर गोगाजी ||{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||अचलेश्वर के आगे अपना मस्तक काटकर चढानेवाले|| {{ditto}}
|-
| ||रमणेशजी||{{ditto}}
|-
| {{ditto}}{{ditto}}||चितोड का किला बनानेवाले चित्रांगजी||{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| बीसल सागर तालाव अजमेर में बनानेवाले वीसलदेवजी|| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}{{ditto}}||आाना सागर तालाव अजमेर में बनानेवाले आनाजी||{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| भारतवर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट् पृथ्वीराजजी||{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| शरणागत वत्सल हम्मीरजी|{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| हाडा वंश के मूल पुरुष अस्थिपालजी ||५
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||पृथ्वीराजजी के शूर सामन्त हम्मीरजी और गम्भीरजी||७
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| मांडलगढ बसानेवाले मंडनजी|| {{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| बूंदी राज्य स्थापन करनेवाले देवसिंहजी||{{ditto}}
|-
|१{{gap}}{{gap}}२|| बूंदी राज्य का संस्थापन । ||
|-
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ममता साव9
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!खंड अध्याय!!विषय!!पृष्ठ
|-
|१{{gap}}||१ वंशपरिचय ।||
|-
|{{ditto}}|| १ चौहानों और हाडाओं की उत्पत्ति।||१
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||अजमेर का किला बनानेवाले अजयपालजी||४
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||जाहिर पीर गोगाजी ||{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||अचलेश्वर के आगे अपना मस्तक काटकर चढानेवाले|| {{ditto}}
|-
| ||रमणेशजी||{{ditto}}
|-
| {{ditto}}{{ditto}}||चितोड़ का किला बनानेवाले चित्रांगजी||{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| बीसल सागर तालाव अजमेर में बनानेवाले वीसलदेवजी|| {{ditto}}
|-
| {{ditto}}{{ditto}}||आाना सागर तालाव अजमेर में बनानेवाले आनाजी||{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| भारतवर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट् पृथ्वीराजजी||{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| शरणागत वत्सल हम्मीरजी|{{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| हाडा वंश के मूल पुरुष अस्थिपालजी ||५
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||पृथ्वीराजजी के शूर सामन्त हम्मीरजी और गम्भीरजी||७
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| मांडलगढ़ बसानेवाले मंडनजी|| {{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| बूंदी राज्य स्थापन करनेवाले देवसिंहजी||{{ditto}}
|-
|१{{gap}}{{gap}}२|| बूंदी राज्य का संस्थापन । ||
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||देवसिंहजी ने बादशाह को घोड़ा न दिया|| ८
|-
| {{ditto}}{{ditto}}||बाँदू के नले में बूंदी ३०० घरों की बस्ती थी|| {{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}||देवसिंहजी ने मीनों से बूंदी छीन ली|| {{ditto}}
|-
|{{ditto}}{{ditto}}|| कोटा बसा||{{ditto}}
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९
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WikiPBR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="WikiPBR" /></noinclude>|- ||| बूँदी के चार राजाओं का नाममात्र आधिपत्य | ९
|- ||| गणगौरि झील देखा ||
|- ||| गणगौरि और रानी को बूँदीगढ़ के राजा से हामाजी छीन लाये ||
|- ||| जय संग्राम में कोई मारनेवाला न मिला तब हालूजी ने शिर काट कर भद्रकाली को चढ़ा दिया | १०
|- ||| धायपुत्र दामाद राणाजी की मारा ||
|- ||| राणाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके ||
|- ||| अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले साँडाजी | ११
|- ||| समरकंद (श्यामजी) ||
|- ||| नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया | १२
|- ||| नारायणदासजी की बहादुरी ||
|- ||| मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने साँई के बादशाह का इक्का मारा ||
|- ||| अफीम न मिलने से साँई की जोड़ी | १३
|- ||| बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई ||
|- ||| अपना बात करनेवाले राणाजी को सात आदमियों सहित मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये | १४
|- ||| माता के स्तनों से दूध की धारा | १५
|- |२|३| बूँदी राज्य की उन्नति |
|- ||| सुलतानजी के अत्याचार | १६
|- ||| सुरजनजी की गद्दी ||
|- ||| कोटा और रणथंभौर में सुरजनजी का अधिकार ||
|- ||| जलालुद्दीन के वेश में बादशाह अकबर ||
|- ||| बादशाह से सात वा दूसरे घोड़े लिखवाकर और सात परगने लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया ||
|- ||| गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसहित बावन परगने पाये | १७
|- ||| सुरजनजी की कायरता ||
|- ||| राजमन्दिर आदि बनवाये गये ||<noinclude></noinclude>
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अजीत कुमार तिवारी
12
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>|- ||| बूँदी के चार राजाओं का नाममात्र आधिपत्य | ९
|- ||| गणगौरि झील देखा ||
|- ||| गणगौरि और रानी को बूँदीगढ़ के राजा से हामाजी छीन लाये ||
|- ||| जय संग्राम में कोई मारनेवाला न मिला तब हालूजी ने शिर काट कर भद्रकाली को चढ़ा दिया | १०
|- ||| धायपुत्र दामाद राणाजी की मारा ||
|- ||| राणाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके ||
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|- ||| समरकंद (श्यामजी) ||
|- ||| नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया | १२
|- ||| नारायणदासजी की बहादुरी ||
|- ||| मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने साँई के बादशाह का इक्का मारा ||
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|- ||| बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई ||
|- ||| अपना बात करनेवाले राणाजी को सात आदमियों सहित मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये | १४
|- ||| माता के स्तनों से दूध की धारा | १५
|- |२|३| बूँदी राज्य की उन्नति |
|- ||| सुलतानजी के अत्याचार | १६
|- ||| सुरजनजी की गद्दी ||
|- ||| कोटा और रणथंभौर में सुरजनजी का अधिकार ||
|- ||| जलालुद्दीन के वेश में बादशाह अकबर ||
|- ||| बादशाह से सात वा दूसरे घोड़े लिखवाकर और सात परगने लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया ||
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|- ||| सुरजनजी की कायरता ||
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>|-
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|
| बूँदी के चार राजाओं का नाममात्र आधिपत्य
| ९
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| गणगौरि झील देखा
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| गणगौरि और रानी को बूँदीगढ़ के राजा से हामाजी छीनलाये
|
|-
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|
| जय संग्राम में कोई मारनेवाला न मिला तब हालूजी ने शिर काट कर भद्रकाली को चढ़ा दिया
| १०
|-
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| धायपुत्रे दामाद रानाजी की मारा
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| रानाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके
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| अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले सांडाजी
| ११
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| समरकंद (श्यामजी)
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| नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया
| १२
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| नारायणदासजी की बहादुरी
|
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| मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने साँई के बादशाह का इक्का मारा
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| अफीम न मिलने से साँई की जोड़ी
| १३
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| बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई
|
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| अपना बात करनेवाले रानाजी को सात आदमियों सहित मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये
| १४
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| माता के स्तनों से दूध की धारा
| १५
|-
| १
| ३
| बूँदी राज्य की उन्नति
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| सुरतानजी के अत्याचार
| १६
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| सुरजनजी की गद्दी
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| कोटा और रणथंभौर में सुरजनजी का अधिकार
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| जलालुद्दीन के वेश में बादशाह अकबर
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| गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसहित बावन परगने पाये
| १७
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ममता साव9
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text/x-wiki
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!खंड अध्याय!! विषय!! पृष्ठ
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|{{ditto}}{{ditto}}|| बूँदी के चार राजाओं का नाममात्र आधिपत्य|| ९
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|-
| ||मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये|| १४
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पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३६
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अजीत कुमार तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{center|'''चौहानों और हाड़ाओंकी उत्पत्ति।'''}} (१)
बात का यहाँ निर्णय करके मुझे अपनी असली बात नहीं छोड़ना है। महर्षि वशिष्ठने आबू पहाड़पर जिस जगह यज्ञ किया था वहाँ अग्नि आदि-कुण्ड मौजूद है। उन्होंने इस यज्ञ में प्रह्लादिक देवताओं का आवाहन किया और शास्त्र की मर्यादा के अनुसार महर्षि मनु, च्यवन, वत्स और जमदग्निने अनुक्रमसे अग्नि, होता, सामपाठी और अध्वर्यु का कार्य करके यज्ञ कुण्ड से चार क्षत्रिय उत्पन्न किये।
इन चारों में प्रतिहार, चालुक्य और परमार नाम के क्षत्रिय वीर अवश्य ही महावीर थे, अवश्य ही इन्होंने पैदा होकर म्लेच्छों को आर्य के अनुसार देशों का विनाश किया परंतु ये यज्ञ की सौम्य हवि से उत्पन्न हुए थे। इस कारण इनमें सीधापन अधिक और वीरता कम थी।
एकके बाद दूसरा और दूसरेके बाद तीसरा यज्ञकुण्ड में से निकलकर दैत्यों से घोर संग्राम करने पर भी जब उनको न हरा सके तब महर्षि वशिष्ठजी से भगवान् ब्रह्माजी ने कहा कि—“मैंने ब्राह्मणों को वरदान दिया है कि तुम दो हाथवालोंके हाथ से न मारे जा सकोगे इसलिये किसी चार हाथवाले को पैदा करो।”
पितामहकी आज्ञा को माथे चढ़ाकर इन महर्षियोंने फिर उस द्रव्य से यज्ञ किया और उससे खलमदमंजन,धर्मरंजन, महाराज चाहुवानजी का जन्म हुआ। इनके चार हाथ थे इसलिये ये चतुर्बाहुमान कहलाये और इसीका भाषा में अपभ्रंश होकर “चाहुवान” नाम होगया।
कर्नल टाड साहिब चाहे इस कथाको काल्पनिक मानते हों परंतु उन्हें अग्निकुण्ड में से उत्पन्न होनेकी बात बनावटी मानने पर भी सारी कथा झूठी माननेका साहस नहीं हुआ है। उनके कथन से मालूम होता है कि उन्होंने चार पुरुषोंमें क्षत्रियत्वका प्रयोग करना माना है। खैर कुछ भी हो परंतु इन्हीं चारोंके वंशधर प्रतिहार, सोलंकी, पवार और चौहान कहलाते हैं।
इन चौहानोंकी वीरता का नमूना इसीसे समझ लीजिये और इसीसे एक चौहानको मूल कर हिंदू भारतका निश्चय होता है कि टाड साहिब जैसे विदेशी इतिहासलेखकने अपनी किताबमें लिखा है कि “अग्निकुलसे जो शाखायें निकलीं उनमें चौहान शाखा विशेष बलवती थी, एक समय चौहान इतने बलवान होगये थे कि उनकी प्रचण्ड वीरताके आगे भारतवर्ष भरके और राजपूतोंका गौरव...<noinclude></noinclude>
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