विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.7 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२२ 250 2465 663260 663241 2026-06-18T12:07:15Z Vanshiikaa 6602 663260 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|२१६||ब्रिटिश साम्राज्य}}</noinclude>है, और अब इनकी सख्या, युध्द की पूर्वकालीन सख्या से, बहुत अधिक है । १६४० के पतभ्कड मे सयुक्त-राष्ट्र अमरीका से ५० विब्बन्सक ब्रिटिश जल-सेना को मिले । युध्द से पूर्व नौ-सेना मे १,३३,००० सैनिक थे। इनके अतिरित्क ७०,००० सुरक्षित नौ-सैनिक थे । उपर्युक्त अंको मे आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैएड और कनाडा की युध्द-पूर्व संख्या भी शामिल है। ब्रिटिश नौ-सेना ससार में सबसे शक्तिशाली थी । सयुक्त-राष्ट्र अमरीका का नम्बर प्रथम मान लिया गया है, किन्तु, वास्तव में, लड़ाई से पूर्व, वजन मे अमरीकी नौ-सेना के युध्द-पोत आदि कुछ कम थे । अब तो अमरीका मित्र राष्ट्रो के लिये बहुत बडी मात्रा मे युध्द-सामग्री तेजी से बना रहा है, जिनमे नौ सेना की सामग्री भी है । ब्रिटेन लन्दन नौ-सेना-सन्धि का एक सदस्य है । ब्रिटिश युनियन— सर ओसवाल्ड मोसले का फासिस्त आन्दोलन । ब्रिटिश साम्राज्य— ( ब्रिटिश ऐम्पायर, किन्तु 'ब्रिटिश कामनवैल्थ' जिसे अब अधिकतर कहा जाता है ) क्षेत्रफल १,३२,६०,००० वर्गमील अथवा समस्त भूमंडल का पॉचवॉ भाग । जन-संख्या ४८,७०,००,००० अर्थात् मानव-जाति का पचमाश । ब्रिटिश-साम्राज्य अथवा ब्रिटिश राष्ट्र-समूह (कामन-वैल्थ) मे, भूमंडल के विभिन्न भूमागो मे, निम्नलिखित देश हैं— योरप— ग्रेटब्रिटेन और उत्तरी आयलैंएड, आयर, जिब्राल्टर, माल्टा । एशिया— अदन, पैरिम और बन्दरगाह, बाहरीन द्वीप-समूह, वोर्नियो ( जापान द्वारा, अप्रैल '४२ मे विजित ), ब्रुनी और सारावाक, ब्रम्हा (अप्रैल '४२ मे जापान द्वारा विजित,किन्तु जिसे वापस लेने के लिये, अगस्त '४२ से सयुक्त-राष्ट्र प्राणपन से चेष्टा कर रहे है), लड्का, साइप्रस, हाग्कांग ( जापान द्वारा विजित ), भारत, स्टेट्स सेट्लमेएट ( जापान के विश्वास-घात का शिकार ), मलय स्टेट्स ( सघशासित और असघ-शासित दोनो, सुदूरपूर्व के युध्द मे जापानी-साम्राज्य-लिप्सा के शिकार ), फिलस्तीन । अफ्रीका— केन्या उपनिवेश और बन्दरगाह, यूगाएडा, जॅजीवार ( पैम्बा के भाग सहित ); मारीशस, न्यासालैएड, सेन्ट हैलीना और असेन्शन; सेच— शुमालीलैएड; बसुतोलैएड,बेचुआनालैएड, दक्षिण रोडेशिया, उत्तरी<noinclude></noinclude> 2ovu03algh86vd5p9fm8ci4dngvzdmm पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२८ 250 2470 663262 573228 2026-06-18T12:37:41Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 663262 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''२२२'''||'''वुदेनी'''}}</noinclude>वुर्जआ–फरान्सीसी भाषा का शब्द, अर्थ नागरिक समुदाय । मार्क्सवादी सोशलिस्ट, खेतिहर समुदाय को छोडकर, अन्य समुदायों के लिये, इस शब्द का प्रयोग करते हैं । अन्य समुदायों में पॅूंजीपति, मृदख़ोर, कारखानेदार, सौदागर, ज़मीदार और इन्ही केसमान मोटी आमदनी, शिक्षा, सामाजिक स्थिति आदि रखनेवाले पेशेवर-वकील, डाक्टर, प्रोफेसर, तिजारत-पेशी लोग-अर्थात् जो लोक-संग्रह अथवा सामाजिक-विकास के लिये स्वयं श्रम नहीं करते और मजदूरो और साधनहीन श्रमजीवी समुदाय की कमाई पर पलते-पनपते हैं । बुर्जुश्रा के विपरीत सर्वहारा है जिसके पास कोई ज़मीन-जायदाद, रुपयापैसा नहीं है, और जो अपने गाढे पसीने की कमाई से अपना और अपने आश्रितो का पेट भरता है । बुर्जुआ समुदाय के भी दो अग हैं : अधिक सम्पन्न, जिनमें काखानेदार और धनिक लोग हैं, दूसरे छुटभय्ये, जिनमें कारीगर और दूकानदार आदि हैं, जिनका जीवन-माप एक मजदूर से अच्छा नहीं होता । मशीनों और कारखानों की बढोतरी के साथ, तमाम उद्योगवादी देशों में, बुर्जुआ समुदाय की बन आई और वह पुरातन शासक सामन्तशाही और उसकी लुप्तप्राय आर्थिक व्यवस्था के स्थान पर सर्वेसर्वा बन बैठा । बुर्जुआई के विकास के साथ समाज मे, आवश्यक रूप से, सामन्तशाही-दासता के विरुद्ध उदार विचारों का प्रसार हुआ । मार्क्सवाद के अनुसार इस बुर्जुआ सम्प्रदाय का भी समाज से लोप होगा और उसका स्थान समाजवादी मज़दूर वर्ग को मिलेगा । किन्तु बुर्जुआ सम्प्रदाय, अपने इस सम्भवनीय उत्तराधिकारी से कशमकश करते हुए, अपनी तथाकथित उदार विचारधारा को छोड वैठता और अपने अधिकार को अक्षुण्ण रखने के लिये अधिनायक-प्रणाली का पोषक बन बैठता है। ऐसी परिस्थिति में छोटे बुर्जुआ समुदाय के विचार बदलने लगते हैं और वह मज़दूर सम्प्रदाय का हामी होजाता है, बडे बुर्जुआ, एक मुट्ठी भर सशक्त पॅूंजीपति की शकल मे, रह जाते हैं और वह राष्ट्र के साधनो का नियन्त्रण करने लगते हैं । बुदेनी, मार्शल-आप सोवियत रूस के राष्ट्र रक्षा-विभाग के सहकारी अधिकारी ( Deputy People's Commissar for Defence )<noinclude></noinclude> nc06xb8h3pxgq35scerijlhrfvbct67 663263 663262 2026-06-18T13:30:34Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* शोधित नहीं */ बिना ठीक से शोधित किए पन्ने की स्थिति न बदलें. 663263 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|'''२२२'''||'''वुदेनी'''}}</noinclude>वुर्जआ–फरान्सीसी भाषा का शब्द, अर्थ नागरिक समुदाय । मार्क्सवादी सोशलिस्ट, खेतिहर समुदाय को छोडकर, अन्य समुदायों के लिये, इस शब्द का प्रयोग करते हैं । अन्य समुदायों में पॅूंजीपति, मृदख़ोर, कारखानेदार, सौदागर, ज़मीदार और इन्ही केसमान मोटी आमदनी, शिक्षा, सामाजिक स्थिति आदि रखनेवाले पेशेवर-वकील, डाक्टर, प्रोफेसर, तिजारत-पेशी लोग-अर्थात् जो लोक-संग्रह अथवा सामाजिक-विकास के लिये स्वयं श्रम नहीं करते और मजदूरो और साधनहीन श्रमजीवी समुदाय की कमाई पर पलते-पनपते हैं । बुर्जुश्रा के विपरीत सर्वहारा है जिसके पास कोई ज़मीन-जायदाद, रुपयापैसा नहीं है, और जो अपने गाढे पसीने की कमाई से अपना और अपने आश्रितो का पेट भरता है । बुर्जुआ समुदाय के भी दो अग हैं : अधिक सम्पन्न, जिनमें काखानेदार और धनिक लोग हैं, दूसरे छुटभय्ये, जिनमें कारीगर और दूकानदार आदि हैं, जिनका जीवन-माप एक मजदूर से अच्छा नहीं होता । मशीनों और कारखानों की बढोतरी के साथ, तमाम उद्योगवादी देशों में, बुर्जुआ समुदाय की बन आई और वह पुरातन शासक सामन्तशाही और उसकी लुप्तप्राय आर्थिक व्यवस्था के स्थान पर सर्वेसर्वा बन बैठा । बुर्जुआई के विकास के साथ समाज मे, आवश्यक रूप से, सामन्तशाही-दासता के विरुद्ध उदार विचारों का प्रसार हुआ । मार्क्सवाद के अनुसार इस बुर्जुआ सम्प्रदाय का भी समाज से लोप होगा और उसका स्थान समाजवादी मज़दूर वर्ग को मिलेगा । किन्तु बुर्जुआ सम्प्रदाय, अपने इस सम्भवनीय उत्तराधिकारी से कशमकश करते हुए, अपनी तथाकथित उदार विचारधारा को छोड वैठता और अपने अधिकार को अक्षुण्ण रखने के लिये अधिनायक-प्रणाली का पोषक बन बैठता है। ऐसी परिस्थिति में छोटे बुर्जुआ समुदाय के विचार बदलने लगते हैं और वह मज़दूर सम्प्रदाय का हामी होजाता है, बडे बुर्जुआ, एक मुट्ठी भर सशक्त पॅूंजीपति की शकल मे, रह जाते हैं और वह राष्ट्र के साधनो का नियन्त्रण करने लगते हैं । बुदेनी, मार्शल-आप सोवियत रूस के राष्ट्र रक्षा-विभाग के सहकारी अधिकारी ( Deputy People's Commissar for Defence )<noinclude></noinclude> 7fo31pki4cd2bjxcr15nzbimmqbpq1n 663264 663263 2026-06-18T13:53:11Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 663264 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२२२||बुदेनी}}</noinclude> '''बुर्जुआ'''–फरान्सीसी भाषा का शब्द, अर्थ नागरिक समुदाय। मार्क्सवादी सोशलिस्ट, खेतिहर समुदाय को छोड़कर, अन्य समुदायों के लिये, इस शब्द का प्रयोग करते हैं। अन्य समुदायों में पूँजीपति, सूदख़ोर, कारखानेदार, सौदागर, ज़मीदार और इन्हीं केसमान मोटी आमदनी, शिक्षा, सामाजिक स्थिति आदि रखनेवाले पेशेवर—वकील, डाक्टर, प्रोफेसर, तिजारत-पेशी लोग-अर्थात् जो लोक-संग्रह अथवा सामाजिक-विकास के लिये स्वयं श्रम नहीं करते और मजदूरों और साधनहीन श्रमजीवी समुदाय की कमाई पर पलते-पनपते हैं। बुर्जआ के विपरीत सर्वहारा है जिसके पास कोई ज़मीन-जायदाद, रुपयापैसा नहीं है, और जो अपने गाढे पसीने की कमाई से अपना और अपने आश्रितों का पेट भरता है। बुर्जुआ समुदाय के भी दो अंग हैं : अधिक सम्पन्न, जिनमें काखानेदार और धनिक लोग हैं, दूसरे छुटभय्ये, जिनमें कारीगर और दूकानदार आदि हैं, जिनका जीवन-माप एक मजदूर से अच्छा नहीं होता। मशीनों और कारखानों की बढ़ोतरी के साथ, तमाम उद्योगवादी देशों में, बुर्जुआ समुदाय की बन आई और वह पुरातन शासक सामन्तशाही और उसकी लुप्तप्राय आर्थिक व्यवस्था के स्थान पर सर्वेसर्वा बन बैठा। बुर्जुआई के विकास के साथ समाज में, आवश्यक रूप से, सामन्तशाही-दासता के विरुद्ध उदार विचारों का प्रसार हुआ। मार्क्सवाद के अनुसार इस बुर्जुआ सम्प्रदाय का भी समाज से लोप होगा और उसका स्थान समाजवादी मज़दूर वर्ग को मिलेगा। किन्तु बुर्जुआ सम्प्रदाय, अपने इस सम्भवनीय उत्तराधिकारी से कशमकश करते हुए, अपनी तथाकथित उदार विचारधारा को छोड़ बैठता और अपने अधिकार को अक्षुण्ण रखने के लिये अधिनायक-प्रणाली का पोषक बन बैठता है। ऐसी परिस्थिति में छोटे बुर्जुआ समुदाय के विचार बदलने लगते हैं और वह मज़दूर सम्प्रदाय का हामी होजाता है, बड़े बुर्जुआ, एक मुट्ठी भर सशक्त पूँजीपति की शकल में, रह जाते हैं और वह राष्ट्र के साधनों का नियन्त्रण करने लगते हैं। '''बुदेनी, मार्शल'''—आप सोवियत रूस के राष्ट्र रक्षा-विभाग के सहकारी अधिकारी (Deputy People's Commissar for Defence.)<noinclude></noinclude> rk5cmd01ko53y9my7e3vfzlswc9sgju पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१० 250 193473 663265 663225 2026-06-18T18:28:27Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663265 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter| '''भूमिका''' }} {{blockcenter| पादौ यस्य नाभिर्वियद‌सुरशीतलचंद्रसूयों च नेत्र ।<br /> कर्णा वाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो, यस्य वासोऽयमच्छि ।<br /> अन्तस्थं यस्य विश्वं । सुरनरखगगो भोगिन्धिर्वदैत्यैः ।<br /> चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवनवपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ १॥ }} इतिहास प्राचीनों के अनुभव का खजाना है। व्यक्ति का, समाज का और देश का चरित्र संगठन करने के लिये इतिहास ही एक पथ दर्शक है। लाखों, करोड़ों का अटूट खजाना नष्ट-भ्रष्ट होकर राजा से रंक हो सकता है किन्तु अनुभव की धरोहर यदि लिपिबद्ध कर ली जाय तो वह अटल, अविचल और वर्द्धमान सम्पत्ति है। बस इसी उद्देश्यसे इतिहास ग्रंथों की सृष्टि हुई है। मैं इसमें कहां तक कृतार्थ हुआ हूं—सो कह नहीं सकता परंतु जब मैं सुलेख नहीं, विद्वान् नहीं और बुद्धिमान् नहीं और इसी तरह इतिहास लेखन की सामग्री भी पूर्णतया उपलब्ध नहीं तब कहना चाहिये कि मेरा यह कार्य अपूर्ण होगा—अनुचित साहस कहलावैगा। हाँ! एक वात अवश्य है। यदि मैं इस उद्योग में सफल न होसकूं तो न सही किन्तु मुझे भरोसा है कि मेरे बाद कोई महाशय बूंदी के इतिहास लिखने का यदि उद्योग करेंगे तो उन्हें इस पोथी से बहुत सामग्री मिल जायगी। यदि मुझे इतनी भी सफलता प्राप्त हो जायगी तो मैं अपने को कृतार्थ समझूंगा। जब यह "उम्मेदसिंह चरित्र" पाठकों के सामने है तब इस पोथी में क्या है—सो दिखलाने की आवश्यकता नहीं और भूमिका में पुस्तक का आशय लिख देने की प्रायः चाल भी नहीं है। हां! इस जगह इतना अवश्य लिख देना चाहिये कि इसमें विक्रमीय संवत् १७५२ से १८७८ तक के १२६ वर्षों का इतिहास है। उस समय मुसलमानी बादशाहद का सर्वनाश होकर क्यों-कर देशभर में अराजकता फैल गई थी, क्यों कर "जिसकी लाठी उसकी भैंस" की कहावत चरितार्थ होती थी और क्योंकर भारतवर्ष के उस प्रारब्ध परिवर्तन के जमाने में राजपूताने के क्षत्रिय नरेशों ने आपस के द्वेष से, दुर्व्यसनों से और इसी प्रकार के अनेक कारणों से आपस में लड़कर, अपने भाइयों का नाश करके देश के नाश करने का उद्योग किया। परमेश्वर की कृपा से उस<noinclude></noinclude> 3sgqsjte67mvk7vbj3p2g366xhsqsin पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११ 250 193474 663266 663226 2026-06-18T19:13:29Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663266 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(६)}} समय तक तक इनकी शक्ति का नाश नहीं हुआ था। यदि ये सब एक हो जाते, यदि सरहटे वीर भी इनके साथी हो जाते और इस तरह की संयुक्त शक्ति से काम लिया जाता तो हिंदुओं का पुराण प्रसिद्ध जमाना फिर भी एक बार आने की आशा हो सकती थी। परंतु इस संसार नाटक के सूत्रधार को यहाँ बात इष्ट नहीं थी। वह जानता था कि हिन्दू इस कार्य के अयोग्य हैं। बस इसीलिये उसने देश के दुर्भाग्यरूपी प्रलयपयोधरों का विनाश करके सचमुच ही सौभाग्य दिवाकर का उदय किया। यदि उसका अनुग्रह न होता तो न मालूम भारतवर्ष की आज दिन क्या दुर्दशा होती। किन्तु उसे अनेक शताब्दियों के असह्य संकट अनंतर इस देश को फिर सुख के दिन दिखलाना था इसलिए इस धर्मभूमि का शासन एक ऐसी जाति को दिया गया जो इस संसार में अपने सुन्याय के लिये विख्यात है। जो लोग उस समय के इतिहास पर दृष्टि दिये बिना भारतवर्ष के ब्रिटिश साम्राज्य पर दोष लगाते हैं वे इस पुस्तक को पढ़कर न्याय दृष्टि से उस जमाने की वर्तमान समय से तुलना करें तब उन्हें भली भाँति विदित हो जायगा कि उस युग की अपेक्षा अंग्रेजों का शासन हमारे लिये कितना सुखकर है। सर्वशक्तिमान् करुणा वरुणालय इस शासनको इस देश में चिरस्थायी करें और इससे राजा प्रजा का कल्याण हो। भगवान् करें श्रीमान् सम्राट् पंचम जार्जका कल्याण हो और उनके सुराज्य में राजा प्रजा सुखी रहें। "उम्मेदसिंह चरित्र" यद्यपि बूँदी राज्य के उद्धारक, हाड़ाक्षत्रियों के कुलकमल दिवाकर महाराज राजा उम्मेदसिंहजी का चरित्र है किन्तु केवल इसीसे मालूम हो जायगा कि मेरी इस उक्ति में कहाँतक सत्यता है। इनके पिता महाराव राजा बुधसिंहजी के बल विक्रमसे जब इस राज्य की वृद्धि हुई तो असाधारण और उनके हाथ से यदि राज्य निकल गया तो यहाँ तक कि एक जगह बैठकर दुःख के दिन बिताने के लिये गाँठकी एक झोंपड़ी भी न रही। उसी खोय हुए राज्य को घोर कष्ट उठाकर, वर्षों के अविश्रान्त परिश्रम से, समरभूमि में तलवार के हाथ दिखाते से, तीन चार युद्धों के अनन्तर इन्होंनें प्राप्त किया। राज्य पाकर इन्होंनें उसे बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित कर इसके भीतरी काँटों को निकाला। राज्य निष्कंटक होजाने के बाद पहले पुत्र को और उनका देहान्त होजाने पर पौत्र को राज्य देकर आप अलग होगये। अलग होकर भारत वर्ष के समस्त तीर्थों की अनेक बार यात्रा की।<noinclude></noinclude> qyyis78ib39790x2kvjksgoi52ly2fs पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२ 250 193475 663268 663227 2026-06-19T10:41:40Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663268 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(७)}} इस समय भी बूँदी की रक्षा का अटल व्रत इन्होंने हृदय में बना रहा और इसका इन्होंने आजीवन निर्वाह किया। अवकाश पाकर इन्होंने इस नव प्राप्त राज्य को ऐसे सांचे में ढाल दिया जो अबतक प्रत्येक कार्य में देखा जाता है- जिसका पालन किया जाता है। और इनके पूर्वजों के बनाये कितने ही विशाल भवनों के सिवाय बूँदी राज्य में जो कुछ आजतक दिखलाई देता है केवल इन्हीं की बदौलत। बस ऐसे ही राजर्षि का इस पोथी में चरित्र- प्रातःस्मरणीय चरित्र है। इनके सद्गुणों के कारण यही श्री जी साहब कहलाते हैं। इसमें केवल महाराव राव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही चरित्र हो- सो नहीं। यह चार खण्डों में विभक्त है। प्रथम खण्ड में चौहान क्षत्रियों की हाडा शाखा के-बूँदी राज्य के संक्षिप्त इतिहास का दिग्दर्शन, दूसरे में चरित्र नायक के पिता महाराव राजा श्रीबुधसिंहजी का संक्षेप से जीवनचरित्र, तीसरे में उम्मेदसिंहजी की राज्य प्राप्ति से लेकर इनके वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करने तक का हाल और चौथे में उनके राज्य त्याग करने के अनंतर उनका शेष जीवनवृत्त और साथ ही महाराव राजा श्रीअजितसिंहजी तथा महाराव राजा श्रीविष्णुसिंहजी का चरित्र। केवल इतना ही क्यों- इसमें उस समय की और २ अनेक सामयिक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। इस ग्रंथ के लिखते समय मेरा विचार यह था कि इसमें महाराव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही चरित्र विस्तार से और आरंभ से लेकर महाराव राजा विष्णुसिंहजी तक का हाल संक्षेप से लिखा जाय। ऐसा करने के अनंतर महाराव राजा रामसिंहजी साहब बहादुर जी. सी. एस. आई., सी. आई. ई. का चरित्र लिखकर बूँदी का इतिहास समाप्त किया जाय। इस उद्देश्य से यह पोथी लिखी गई और राजर्षि रामसिंहजी का चरित्र लेखन अभीतक होनहार की गोद में है। किन्तु अब मेरा विचार बदल गया। इस पुस्तक के प्रथमखण्ड में इस राज्य का संक्षिप्त इतिहास लिखकर मेरा संतोष नहीं हुआ। इस कारण मैंने राव राजा रत्नसिंहजी, राव राजा शत्रुशल्यजी, राव राजा भावसिंहजी और राव राजा अनिरुद्ध सिंहजी का विस्तार से चरित्र लिखकर “पराक्रमी हाडाराव” के नाम से पोथी तैयार की है। और संकल्प यह है कि ठेठ से अबतक का इतिहास ही तैयार कर लिया जाय। इस कामना में सफलता होगी वा नहीं- सो भगवान जाने किन्तु “पराक्रमी हाडाराव” के<noinclude></noinclude> g7wit3dknewbggnfvcyh2tfxqr16srg 663269 663268 2026-06-19T10:42:38Z Skirti.codes 6559 663269 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(७)}} इस समय भी बूँदी की रक्षा का अटल व्रत इन्होंने हृदय में बना रहा और इसका इन्होंने आजीवन निर्वाह किया। अवकाश पाकर इन्होंने इस नव प्राप्त राज्य को ऐसे सांचे में ढाल दिया जो अबतक प्रत्येक कार्य में देखा जाता है- जिसका पालन किया जाता है। और इनके पूर्वजों के बनाये कितने ही विशाल भवनों के सिवाय बूँदी राज्य में जो कुछ आजतक दिखलाई देता है केवल इन्हीं की बदौलत। बस ऐसे ही राजर्षि का इस पोथी में चरित्र- प्रातःस्मरणीय चरित्र है। इनके सद्गुणों के कारण यही श्री जी साहब कहलाते हैं। इसमें केवल महाराव राव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही चरित्र हो- सो नहीं। यह चार खण्डों में विभक्त है। प्रथम खण्ड में चौहान क्षत्रियों की हाडा शाखा के-बूँदी राज्य के संक्षिप्त इतिहास का दिग्दर्शन, दूसरे में चरित्र नायक के पिता महाराव राजा श्रीबुधसिंहजी का संक्षेप से जीवनचरित्र, तीसरे में उम्मेदसिंहजी की राज्य प्राप्ति से लेकर इनके वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करने तक का हाल और चौथे में उनके राज्य त्याग करने के अनंतर उनका शेष जीवनवृत्त और साथ ही महाराव राजा श्रीअजितसिंहजी तथा महाराव राजा श्रीविष्णुसिंहजी का चरित्र। केवल इतना ही क्यों- इसमें उस समय की और २ अनेक सामयिक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। इस ग्रंथ के लिखते समय मेरा विचार यह था कि इसमें महाराव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही चरित्र विस्तार से और आरंभ से लेकर महाराव राजा विष्णुसिंहजी तक का हाल संक्षेप से लिखा जाय। ऐसा करने के अनंतर महाराव राजा रामसिंहजी साहब बहादुर जी. सी. एस. आई., सी. आई. ई. का चरित्र लिखकर बूँदी का इतिहास समाप्त किया जाय। इस उद्देश्य से यह पोथी लिखी गई और राजर्षि रामसिंहजी का चरित्र लेखन अभीतक होनहार की गोद में है। किन्तु अब मेरा विचार बदल गया। इस पुस्तक के प्रथमखण्ड में इस राज्य का संक्षिप्त इतिहास लिखकर मेरा संतोष नहीं हुआ। इस कारण मैंने राव राजा रत्नसिंहजी, राव राजा शत्रुशल्यजी, राव राजा भावसिंहजी और राव राजा अनिरुद्ध सिंहजी का विस्तार से चरित्र लिखकर “पराक्रमी हाडाराव” के नाम से पोथी तैयार की है। और संकल्प यह है कि ठेठ से अबतक का इतिहास ही तैयार कर लिया जाय। इस कामना में सफलता होगी वा नहीं- सो भगवान जानै किन्तु “पराक्रमी हाडाराव” के<noinclude></noinclude> 1zjimu0suu1rfgkjqenjnzwjnaq43gk पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३ 250 193476 663270 663228 2026-06-19T11:18:02Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663270 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(८)}} प्रकाशित होने से इन दोनों पुस्तकों को मिलाकर पढ़ने में राव राजा रत्नसिंहजी से लेकर महा राव राजा विष्णुसिंहजी तक का पूरा हाल मिल जायगा। प्रथम खंड को संक्षिप्त—परम संक्षिप्त करने से उसमें कितनी ही त्रुटियाँ रहीं होगी सो राम जानै परंतु पृष्ठ १३ में राव सूर्यमल्लजी का तीर से शेर मारना चित्तोड में लिखा गया है किन्तु उन्होंने मारा अपनी ससुराल में था। पृष्ठ २० में राव राजा रत्नसिंहजी का मारा जाना लिखा गया है किन्तु यह मारे नहीं गये मृत्यु से परलोक वासी हुए थे। पृष्ठ २२ में राव राजा शत्रुशल्यजी का तलवार से काम आना लिखागया है किन्तु यह तलवार से नहीं गोली लगने से वीर गति को प्राप्त हुए थे। पृष्ठ ५७ में बूढलुहारी पर जयपुर की नानक पंथी सेना की चढाई लिख दी गई किन्तु जयपुर में सेना दादू पंथियों की है। पृष्ठ २०५ में श्री जी साहब के पौत्र रामसिंहजी लिखेगये हैं किन्तु उनके यह परपोते थे। और पृष्ठ २२१ में विष्णुसिंहजी का शिरपर माला फेेरना छपगया किन्तु माला नहीं यह भाला फेरा करते थे। इसतरह की त्रुटियों के सिवाय मेरे ही दृष्टिदोष से एक बड़ी भारी गलती छपगई। वह यह कि पृष्ठ ४८ से पृष्ठ ९५ तक के ३५ पृष्ठों में संवत् १८०१ से संवत् १८०७ तक की घटनाओं का उल्लेख है परंतु वहाँ भूल से १८०० के बदले १९०० मुद्रित हो गया। इनके अतिरिक्त छापे की भूल से भैंसरोड़ गढका मैसरोड़गढ, उपकार की जगह उपारक, मंथरा के बदले मंथर, होलकर का होलका- इत्यादि छपगया सो जुदा। इस पुस्तक में कई जगह उदयपुर, कोटा, जयपुर और जोधपुर के उस समय के नरेशोंपर, इन्द्रगढ के महाराजा देवसिंहजीपर, राजनीति निपुण जालिम सिंहजी पर और ऐसे ही औरों पर कटाक्ष करता पड़ा है परंतु यह कटाक्ष वास्तव में कटाक्ष नहीं। न्याय दृष्टि से किया गया है। इसका कारण मैं ऊपर लिखचुका हूँ। मैं फिर भी मानताहूँ कि यदि उस समय के नरेश आपसमें लड़मरने की जगह, अपने भाइयों का, नातेदारों का और जाति भाइयों का विनाश करने के बदले मिलकर चलते तो भारतवर्ष की ऐसी दुर्दशा न होती। परंतु उन लोगों ने अपनी राजनीति का- अपनी शक्ति का उपयोग उस व्यक्ति पर किया जिसका राज्य छूट गया था, घर वार छूट गया था और जिसे विपत्ति सागर में पड़कर जंगल में झडबेेरी के फलों पर कालक्षेप करना पडा था। टाड साहब से बढ़कर इसकी गवाही क्या हो? नहीं तो मेरी उन नरेशों पर परम<noinclude></noinclude> 0mo2vx2dlzsisu6gvgxvhz9uwbv3c4o सदस्य वार्ता:ReetiSingh14 3 193506 663261 663159 2026-06-18T12:37:00Z ReetiSingh14 6618 /* आपके द्वारा शोधित पृष्ठ */ उत्तर 663261 wikitext text/x-wiki {{स्वागत}} —[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०८:११, १८ जून २०२६ (UTC) == आपके द्वारा शोधित पृष्ठ == @[[सदस्य:ReetiSingh14|ReetiSingh14]]जी, आपके द्वारा शोधित किए जा रहे पृष्ठों में त्रुटियाँ छूट जा रही हैं। कृपया उन त्रुटियों को अच्छी तरह से सुधारे बगैर पृष्ठ को शोधित चिह्नित (पृष्ठ का रंग बदलना) ना करें। आप पृष्ठों के रंग बदले बगैर अपना संपादन कार्य जारी रख सकते हैं। धन्यवाद।—[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०८:११, १८ जून २०२६ (UTC) :<blockquote>नमस्ते [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]]<nowiki> जी , संदेश के लिए धन्यवाद! मैं डिजिटल आर्काइविंग और प्रूफरीडिंग की बारीकियां सीख रही हूँ, इसलिए आपकी यह प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत मददगार है। आगे से मैं यह सुनिश्चित करूंगी कि पृष्ठ पूरी तरह से त्रुटि-मुक्त होने पर ही उसे शोधित चिह्नित करूँ। सहयोग के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। ~~~~</nowiki></blockquote> :[[सदस्य:ReetiSingh14|ReetiSingh14]] ([[सदस्य वार्ता:ReetiSingh14|वार्ता]]) १२:३७, १८ जून २०२६ (UTC) ay5yc3wg1jqsxbzuy8gksll37i6uqpn पृष्ठ वार्ता:रामचरितमानस.pdf/२७८ 251 193511 663267 2026-06-19T02:29:56Z ~2026-35541-91 6681 /* सियाराम मय सब जग जानी करहुं प्रणाम जोरी जुग पानी */ नया अनुभाग 663267 wikitext text/x-wiki == सियाराम मय सब जग जानी करहुं प्रणाम जोरी जुग पानी == जयश्रीराम [[विशेष:योगदान/&#126;2026-35541-91|&#126;2026-35541-91]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-35541-91|वार्ता]]) ०२:२९, १९ जून २०२६ (UTC) qmz0yxmkr618bh9j3yu6eeewlbw7d7q