विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.7 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२८ 250 2470 663291 663264 2026-06-20T08:47:48Z Vanshiikaa 6602 663291 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२२२||बुदेनी}}</noinclude> '''बुर्जुआ'''–फरान्सीसी भाषा का शब्द, अर्थ नागरिक समुदाय। मार्क्सवादी सोशलिस्ट, खेतिहर समुदाय को छोड़कर, अन्य समुदायों के लिये, इस शब्द का प्रयोग करते हैं। अन्य समुदायों में पूँजीपति, सूदख़ोर, कारखानेदार, सौदागर, ज़मीदार और इन्हीं केसमान मोटी आमदनी, शिक्षा, सामाजिक स्थिति आदि रखनेवाले पेशेवर—वकील, डाक्टर, प्रोफेसर, तिजारत-पेशी लोग-अर्थात् जो लोक-संग्रह अथवा सामाजिक-विकास के लिये स्वयं श्रम नहीं करते और मजदूरों और साधनहीन श्रमजीवी समुदाय की कमाई पर पलते-पनपते हैं। बुर्जआ के विपरीत सर्वहारा है जिसके पास कोई ज़मीन-जायदाद, रुपयापैसा नहीं है, और जो अपने गाढे पसीने की कमाई से अपना और अपने आश्रितों का पेट भरता है। बुर्जुआ समुदाय के भी दो अंग हैं : अधिक सम्पन्न, जिनमें काखानेदार और धनिक लोग हैं, दूसरे छुटभय्ये, जिनमें कारीगर और दूकानदार आदि हैं, जिनका जीवन-माप एक मजदूर से अच्छा नहीं होता। मशीनों और कारखानों की बढ़ोतरी के साथ, तमाम उद्योगवादी देशों में, बुर्जुआ समुदाय की बन आई और वह पुरातन शासक सामन्तशाही और उसकी लुप्तप्राय आर्थिक व्यवस्था के स्थान पर सर्वेसर्वा बन बैठा। बुर्जुआई के विकास के साथ समाज में, आवश्यक रूप से, सामन्तशाही-दासता के विरुद्ध उदार विचारों का प्रसार हुआ। मार्क्सवाद के अनुसार इस बुर्जुआ सम्प्रदाय का भी समाज से लोप होगा और उसका स्थान समाजवादी मज़दूर वर्ग को मिलेगा। किन्तु बुर्जुआ सम्प्रदाय, अपने इस सम्भवनीय उत्तराधिकारी से कशमकश करते हुए, अपनी तथाकथित उदार विचारधारा को छोड़ बैठता और अपने अधिकार को अक्षुण्ण रखने के लिये अधिनायक-प्रणाली का पोषक बन बैठता है। ऐसी परिस्थिति में छोटे बुर्जुआ समुदाय के विचार बदलने लगते हैं और वह मज़दूर सम्प्रदाय का हामी होजाता है, बड़े बुर्जुआ, एक मुट्ठी भर सशक्त पूँजीपति की शकल में, रह जाते हैं और वह राष्ट्र के साधनों का नियन्त्रण करने लगते हैं। '''बुदेनी, मार्शल'''—आप सोवियत रूस के राष्ट्र रक्षा-विभाग के सहकारी अधिकारी (Deputy People's Commissar for Defence)<noinclude></noinclude> fo7wnoo2ufqdvczq3qamyyf13twsv6g पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२३१ 250 2474 663296 642927 2026-06-20T09:19:07Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 663296 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''ब्रैस्तलितास्क की सन्धि'''||'''२२५'''}}</noinclude>अत्यन्त समृद्धिशाली देश है। ताँबा, सोना, हीरा और रेडियम यहाँ की मुख्य उपज है । राष्ट्र-संघ के शासनादेश के अधीन बेलजियम, पिछले जर्मन-पूर्वीय–अफ्रीका के एक भाग, रुआन्दा उरन्दी, पर भी शासन करता है। बैसरेबिया-काला सागर क्षेत्र में एक प्रान्त ; क्षेत्रफल १७,१५० वर्गमील ; जनसंख्या २८,६७,००० , जिसमे ३,१५,००० यूक्रेनी; १६,०६,००० रूमानी, ३,५३,००० रूसी और शेष मे यहूदी, जर्मन, बलगारी, तातार आदि अल्पसख्यक जातियाँ हैं । १३६७ ई० से १८१२ तक बैसरेबिया मोल्दाविया का एक भाग रहा, जिस पर तुर्की का आधिपत्य था । १८१२ के रूस-तुर्कीयुद्ध मे रूस के हाथ आगया । १८५६ मे मोल्दाविया को दे दिया गया। १६१७ की रूसी क्रान्ति के बाद मोल्दाविया मे प्रजातंत्र कायम होगया । बीच के काल में यहाँ राजनीतिक उथल-पुथल रही और वर्तमान विश्वयुद्ध से लाभ उठाकर, जुलाई १६४० मे, सोवियत रूस ने इसके समीप के क्षेत्र को रूमानिया से लेकर, मोल्दावी सोवियत में मिला दिया। जब जर्मनी और रूमानिया ने रूस से युद्ध छेड़ा तब, जुलाई १६४१ मे, रूमानियनो ने बैसरेबिया और उसके साथ सोवियत मोल्दावी इलाके पर भी क़ब्ज़ा कर लिया । ब्रौस्तलितास्क की सन्धि—३ मार्च १६१८ को एक ओर जर्मनी, आस्ट्रिया, बलग़ारिया और तुर्की, दूसरी ओर रूस के बीच हुई संधि । रूस मे तब कम्युनिस्ट क्रान्ति का झमेला था, इसलिये वह किसीभी प्रकार शान्ति चाहताथा । जर्मनी ने इस स्थिति से मनमाना लाभ उठाया । रूस को रूसीपोलैण्ड, लिथुआनिया, लैटविया, एस्टोनिया और बाल्टिक सागर के अन्य द्वीपो पर से अपना प्रभुत्व त्यागकर जर्मनी तथा आस्ट्रिया का इन देशो पर प्रभुत्व स्वीकार करना पडा । साथ ही उसे फिनलैण्ड, जार्जिया तथा यूक्रेन की (जहाँ जर्मनी ने कठपुतली सरकार बना रखी थी) स्वाधीनता भी स्वीकार करनी पड़ी । रूस ने ६ अरब मार्क्स का सोना भी क्षतिपूर्ति में देना स्वीकार किया । इस प्रकार उसे ३४ प्रतिशत जनसख्या, ५४ प्रतिशत उद्योगधन्धो और ६० प्रतिशत अपनी कोयले की खदानों से हाथ धोना पडा। कालासागर और ख़ासकर बाल्टिक सागर से उसका सम्बन्ध टूट गया। जर्मनी को वरसाई की सन्धि से शिकायत है, किन्तु इस सन्धि की शतों<noinclude></noinclude> 2trmt6z4ejg6ldmryhg9uw5wwi7ray6 663297 663296 2026-06-20T09:20:17Z Vanshiikaa 6602 663297 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''ब्रैस्तलितास्क की सन्धि'''||'''२२५'''}}</noinclude>अत्यन्त समृद्धिशाली देश है। ताँबा, सोना, हीरा और रेडियम यहाँ की मुख्य उपज है । राष्ट्र-संघ के शासनादेश के अधीन बेलजियम, पिछले जर्मन-पूर्वीय–अफ्रीका के एक भाग, रुआन्दा उरन्दी, पर भी शासन करता है। '''बैसरेबिया'''-काला सागर क्षेत्र में एक प्रान्त ; क्षेत्रफल १७,१५० वर्गमील ; जनसंख्या २८,६७,००० , जिसमे ३,१५,००० यूक्रेनी; १६,०६,००० रूमानी, ३,५३,००० रूसी और शेष मे यहूदी, जर्मन, बलगारी, तातार आदि अल्पसख्यक जातियाँ हैं । १३६७ ई० से १८१२ तक बैसरेबिया मोल्दाविया का एक भाग रहा, जिस पर तुर्की का आधिपत्य था । १८१२ के रूस-तुर्कीयुद्ध मे रूस के हाथ आगया । १८५६ मे मोल्दाविया को दे दिया गया। १६१७ की रूसी क्रान्ति के बाद मोल्दाविया मे प्रजातंत्र कायम होगया । बीच के काल में यहाँ राजनीतिक उथल-पुथल रही और वर्तमान विश्वयुद्ध से लाभ उठाकर, जुलाई १६४० मे, सोवियत रूस ने इसके समीप के क्षेत्र को रूमानिया से लेकर, मोल्दावी सोवियत में मिला दिया। जब जर्मनी और रूमानिया ने रूस से युद्ध छेड़ा तब, जुलाई १६४१ मे, रूमानियनो ने बैसरेबिया और उसके साथ सोवियत मोल्दावी इलाके पर भी क़ब्ज़ा कर लिया । '''ब्रौस्तलितास्क''' की सन्धि—३ मार्च १६१८ को एक ओर जर्मनी, आस्ट्रिया, बलग़ारिया और तुर्की, दूसरी ओर रूस के बीच हुई संधि । रूस मे तब कम्युनिस्ट क्रान्ति का झमेला था, इसलिये वह किसीभी प्रकार शान्ति चाहताथा । जर्मनी ने इस स्थिति से मनमाना लाभ उठाया । रूस को रूसीपोलैण्ड, लिथुआनिया, लैटविया, एस्टोनिया और बाल्टिक सागर के अन्य द्वीपो पर से अपना प्रभुत्व त्यागकर जर्मनी तथा आस्ट्रिया का इन देशो पर प्रभुत्व स्वीकार करना पडा । साथ ही उसे फिनलैण्ड, जार्जिया तथा यूक्रेन की (जहाँ जर्मनी ने कठपुतली सरकार बना रखी थी) स्वाधीनता भी स्वीकार करनी पड़ी । रूस ने ६ अरब मार्क्स का सोना भी क्षतिपूर्ति में देना स्वीकार किया । इस प्रकार उसे ३४ प्रतिशत जनसख्या, ५४ प्रतिशत उद्योगधन्धो और ६० प्रतिशत अपनी कोयले की खदानों से हाथ धोना पडा। कालासागर और ख़ासकर बाल्टिक सागर से उसका सम्बन्ध टूट गया। जर्मनी को वरसाई की सन्धि से शिकायत है, किन्तु इस सन्धि की शतों<noinclude></noinclude> g2je93uoxpb77ohg54rwoaxexymn5ml 663299 663297 2026-06-20T09:20:52Z Vanshiikaa 6602 663299 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''ब्रैस्तलितास्क की सन्धि'''||'''२२५'''}}</noinclude>अत्यन्त समृद्धिशाली देश है। ताँबा, सोना, हीरा और रेडियम यहाँ की मुख्य उपज है । राष्ट्र-संघ के शासनादेश के अधीन बेलजियम, पिछले जर्मन-पूर्वीय–अफ्रीका के एक भाग, रुआन्दा उरन्दी, पर भी शासन करता है। '''बैसरेबिया'''-काला सागर क्षेत्र में एक प्रान्त ; क्षेत्रफल १७,१५० वर्गमील ; जनसंख्या २८,६७,००० , जिसमे ३,१५,००० यूक्रेनी; १६,०६,००० रूमानी, ३,५३,००० रूसी और शेष मे यहूदी, जर्मन, बलगारी, तातार आदि अल्पसख्यक जातियाँ हैं । १३६७ ई० से १८१२ तक बैसरेबिया मोल्दाविया का एक भाग रहा, जिस पर तुर्की का आधिपत्य था । १८१२ के रूस-तुर्कीयुद्ध मे रूस के हाथ आगया । १८५६ मे मोल्दाविया को दे दिया गया। १६१७ की रूसी क्रान्ति के बाद मोल्दाविया मे प्रजातंत्र कायम होगया । बीच के काल में यहाँ राजनीतिक उथल-पुथल रही और वर्तमान विश्वयुद्ध से लाभ उठाकर, जुलाई १६४० मे, सोवियत रूस ने इसके समीप के क्षेत्र को रूमानिया से लेकर, मोल्दावी सोवियत में मिला दिया। जब जर्मनी और रूमानिया ने रूस से युद्ध छेड़ा तब, जुलाई १६४१ मे, रूमानियनो ने बैसरेबिया और उसके साथ सोवियत मोल्दावी इलाके पर भी क़ब्ज़ा कर लिया । '''ब्रौस्तलितास्क की सन्धि'''—३ मार्च १६१८ को एक ओर जर्मनी, आस्ट्रिया, बलग़ारिया और तुर्की, दूसरी ओर रूस के बीच हुई संधि । रूस मे तब कम्युनिस्ट क्रान्ति का झमेला था, इसलिये वह किसीभी प्रकार शान्ति चाहताथा । जर्मनी ने इस स्थिति से मनमाना लाभ उठाया । रूस को रूसीपोलैण्ड, लिथुआनिया, लैटविया, एस्टोनिया और बाल्टिक सागर के अन्य द्वीपो पर से अपना प्रभुत्व त्यागकर जर्मनी तथा आस्ट्रिया का इन देशो पर प्रभुत्व स्वीकार करना पडा । साथ ही उसे फिनलैण्ड, जार्जिया तथा यूक्रेन की (जहाँ जर्मनी ने कठपुतली सरकार बना रखी थी) स्वाधीनता भी स्वीकार करनी पड़ी । रूस ने ६ अरब मार्क्स का सोना भी क्षतिपूर्ति में देना स्वीकार किया । इस प्रकार उसे ३४ प्रतिशत जनसख्या, ५४ प्रतिशत उद्योगधन्धो और ६० प्रतिशत अपनी कोयले की खदानों से हाथ धोना पडा। कालासागर और ख़ासकर बाल्टिक सागर से उसका सम्बन्ध टूट गया। जर्मनी को वरसाई की सन्धि से शिकायत है, किन्तु इस सन्धि की शतों<noinclude></noinclude> iz4y7bh03otqbfk6tji07z992m8olpv पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२३२ 250 2475 663312 573233 2026-06-20T10:04:22Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 663312 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''२२६'''||'''बोलिविया'''}}</noinclude>की क्रूरता ने उसका मुंह बन्द कर दिया था। पिछले युद्ध के बाद, ११ नवम्बर १६१८ की, अस्थायी सन्धि में यह सन्धि भी दुहराई गई और बरमाई की मन्धि मे पश्चिमी राष्ट्रों ने इस सन्धि का अन्त ही कर दिया । '''बोरबन'''- फ़ास का पूर्व राज-परिवार या वश । १८७१ मे, जब फ्रास मे प्रजातत्र की स्थापना हुई तब, इस वश का निष्कासन कर दिया गया । इस वश के लोगो को, प्रजातन्त्र-विधान के अनुसार, १८८६ से, .फ्रास में आने की आज्ञा नहीं है । किन्तु पेतॉ की विशी-सरकार ने, १६४१ मे, इस बन्दिश को उठा लिया है । उन्नीसवीं शताब्दि मे शुद्व बोरवन वश का नाश होगया, तब बोरबन-ओरलियन्स शाखा को फ्रास के राजसत्तावादी अपनाने लगे। '''बोल्शेविज्म'''–कम्युनिज्म का पर्यायवाची शब्द । १६०३ में जब रूसी समाजवादी प्रजातत्र-दल (सोशल-डिमोक्रेटिक पार्टी) मे क्रान्ति अथवा सुधारवाद की नीति के प्रश्न पर मतभेद हुआ तब, दल की काग्रेस मे, लेनिन के नेतृत्व मे, क्रान्तिवादियो की विजय हुई । ‘बहुमत’ शब्द को रूसी भाषा में ‘बोल्शिन्स्तवो’ कहा जाता है। अतः क्रान्तिवादियो (रेडिकल्स) को ‘बोल्शेविकी’ अर्थात् बहुमत के सदस्य कहा जाने लगा । नरमदली सुधारवादी सोशलिस्ट ‘मैन्शेविकी’ कहलाये । रूसी भाषा में ‘‘मैन्शिन्स्तवो’’ अल्पमत के अर्थ में आता है । पाश्चात्य देशो में वोल्शेविक शब्द प्रायः खिल्ली उडाने के अर्थ मे व्यवहृत होता है, किन्तु सोवियत रूस में यह एक आदरसूचक उपाधि मानी जाती है, और आज भी रूस का कम्युनिस्ट दल अपने को बोल्शेविक सोवियत संघ कहता है । '''बोलिविया'''-दक्षिण अमरीका का एक प्रजातत्र, ४,२०,००० वर्गमील लम्बा-चौडा, आबादी ३२,००,०००, जिसमे ५० प्रतिशत इडियन, २८ प्रति वर्णसकर और शेष गोरी जातियाँ हैं । धनी देश, किन्तु अविकसित । मुख्य व्यवसाय खनिज-उद्योग । चॉदी, सुरमे की डली तथा टीन बहुत निकलते हैं, टीन तो ससार की पैदावार का १५ प्रतिशत । समुद्र तक आवागमन का क्षेत्र प्राप्त करने के लिये बोलिविया और पैरागुए मे जुलाई १६३२ से जून १६३५ तक युद्व होता रहा । सयुक्त-राज्य अमरीका तथा पॉच दक्षिण अमरीकी प्रजातन्नो ने समझौता कराया । इस देश मे कहने को समाजवादी किन्तु वास्तव में<noinclude></noinclude> 6557mbzgrl7fizvamhzi7vjh6efo1ys पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२४७ 250 2491 663313 573249 2026-06-20T10:18:47Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 663313 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''भारत-सेवक समिति'''||'''२२७'''}}</noinclude> '''भारत-मंत्री'''–ब्रिटिश मंत्रि-मण्डल का एक सदस्य भारत-मंत्री कहलाता है । भारत का शासन-प्रबन्ध इसीके नियंत्रण में रहता है। भारत के शासन के लिये यह ब्रिटिश पार्लमेन्ट के प्रति उत्तरदायी है। भारत का गवर्नर-जनरल लन्दन मे रहनेवाले भारत-मंत्री के आदेशानुसार यहाँ का शासन-सूत्र चलाता है। आजकल मि० ऐमरी भारत-मन्त्री हैं। भारत-मन्त्री के कार्य में सहायता के लिये एक उसकी सलाहकारी समिति होती है । इसमें भारतीय सदस्य भी होते हैं । इस कमिटी मे ६ सदस्य तक नियुक्त किये जाते हैं। उनसे सलाह लेना अथवा उनकी सलाह के अनुकूल कार्य करना भारत-मत्री की इच्छा पर निर्भर है । प्रत्येक सलाहकार को ७,३५० पौड वार्षिक वेतन मिलता है। यदि सलाहकार भारत का स्थायी अधिवासी होता है तो उसे ६०० पौड सालाना अधिक भत्ता मिलता है । '''भारत-रक्षा-कानून'''-१ सितम्बर १६३६ को, योरप मे युद्ध छिड जाने के कारण, भारत में भी वाइसराय ने युद्ध-घोषणा करदी और ५ सितम्बर १६३६ को गवर्नर-जनरल ने, भारतीय-शासन-विधान की धारा ७२ के अन्तर्गत, भारतरक्षा-आर्डिनेस जारी किया। यह आर्डिनेस युद्ध-कालीन स्थिति में ब्रिटिश भारत की सार्वजनिक तथा उसकी हित-रक्षा और कुछ विशेष अपराधो के अपराधियो के मुकद्दमो के विषय में जारी किया गया। इसमे कुल १८ धाराएँ हैं। इस आर्डिनेस के अन्तर्गत भारत-सरकार ने भारत-रक्षा-नियम बनाये हैं । इस मे १३२ नियम हैं । वर्तमान समय में अधिकांश राजनीतिक अपराधियो की जेल-व्यवस्था और उनके मुक़द्दमे तथा नज़रबन्दी, एव बहुत से साधारण मामले भी, इन्ही नियमों के अनुसार होरहे हैं। नियम ३८, ३९, ४० तथा ४१ के अन्तर्गत राजनीतिक कार्यकर्ताओं को दण्ड दिया जा रहा है और धारा १२६ और १२६ के अन्तर्गत नज़रबन्द । केन्द्रिय व्यवस्थापक-सभा ने इन नियमो तथा आर्डिनेस को बाद में क़ानून का रूप दे दिया है । सन् १६४२ और १६४३ मे इसीके अन्तर्गत अनेक शासन-व्यवस्थायें की गई हैं । '''भारत-सेवक समिति (सर्वेन्टस्-ऑफ् इंडिया सोसाइटी)'''—सन् १६०५ में स्वर्गीय देशभक्त श्री गोपाल कृष्ण गोखले ने इस संस्था की स्थापना की थी। समिति का उद्देश ऐसे देश-सेवक उत्पन्न करना है, जो देश-सेवा में<noinclude></noinclude> 52vo713e9lawkjxh5qc15m2ypl7hx94 पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२४८ 250 2492 663322 573250 2026-06-20T10:59:57Z Vanshiikaa 6602 /* शोधित */ 663322 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Vanshiikaa" />{{rh|'''२४२'''||'''भारतीय ट्रेड यूनियन काग्रेस'''}}</noinclude>अपना जीवन अर्पण कर दे । यह सस्था सर्व वैध तथा शान्तिमय उपायों द्वारा भारत की हित-वृद्धि के प्रयत्न को अपना लक्ष्य मानती है । समिति का प्रधान कार्यालय पूना में है । बम्बई, मदरास, प्रयाग और नागपुर में इसकी शाखाएँ तथा कालीकट, मँगलोर, लखनऊ, लाहौर और कटक में इसकी, उप-शाखाएँ हैं । इसके प्रत्येक सदस्य को, प्रवेश के अनन्तर, अध्ययन-अभ्यास के लिये तीन वर्ष तक पूना में और दो साल तक अन्य स्थानो में अस्थायी रूप से रहना पड़ता है । प्रत्येक सदस्य को प्रतिज्ञा करनी पडती है कि देश ही का स्थान उसके हृदय में सदैव प्रथम रहेगा । यह सम्प्रदाय अथवा अन्य निम्न विचार का त्यागकर भारतवासी मात्र की सेवा वधुभाव से करेगा । स्वर्गीय श्री गोखले इस सस्था के प्रथम प्रधान हुए । उपरान्त महामानीय श्रीनिवास शास्त्री और उनके बाद श्री गोपालराव के० देवधर अध्यक्ष चुने गये । आजकल माननीय प० हृदयनाथ कुंजरू इसके अध्यक्ष हैं । पडित कुंजरू इस सस्था की एक ऐसी देन हैं, जिस पर देश समुचित रूप से गर्व कर सकता है । सहकारी-समितियो के आन्दोलन, दुर्भिक्ष और प्रकोप-पीडितों की सहायता, मजदूर-सगठन (आंशिक), ग्राम-सुधार (आंशिक), साक्षरता- प्रसार, दलित जातियों का उत्थान, आदि कार्यों में इसके सदस्य भाग लेते हैं । इस संस्था के ३० सदस्य हैं । इसके सदस्यों को ग्रेजुएट होना आवश्यक है, और उन्हें ७५ मासिक वृति मिलती है । इस सस्था के नियत्रण में ‘हितवाद’ ( अँगरेज़ी ), ‘ज्ञान-प्रकाश’ ( मराठी ) तथा ‘सर्वेन्ट आफ़् इंडिया’ पत्र प्रकाशित होते हैं, जो सस्था के उद्देरुयों के प्रचार में बडा योग देते है । समिति के सदस्य राजनीति से अलग-थलग रहते हैं । समिति की राजनीति आरम्भ-काल से ही नरम-दली रही है । '''भारतीय ट्रेड यूनियन काग्रेस'''-भारत में सबसे पहले श्री नारायण मेघजी लोखण्डे ने बम्बई में सन् १८६० में मजदूर-सघ की स्थापना की । उन्होंने ‘दीनबन्धु’ नामक एक समाचार-पत्र भी निकाला । अनेक वर्षों तक सघो मे मजदूर सदस्यों की सख्या में वृद्धि नहीं हुई । सन् १६१० में दूसरा मजदूर सघ कायम हुआ । सत् १८८१ में पहला भारतीय कारखाना-कानून बना था । सन् १८६१ में इसमें सशोघन किया गया । सन् १६११ मे, कारखाना-मजदूर कमी-<noinclude></noinclude> 78f2s0hg6tsdr7vwubddbmleymggipz पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६१ 250 82724 663304 663250 2026-06-20T09:35:44Z रोहित साव 1719 663304 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{Rh| <noinclude><div style="display: flex; gap: 20px; align-items: flex-start; justify-content: space-between; border-left: 1px solid transparent;"></noinclude> <div style="width: 48%; float: left; padding-right: 10px; border-right: 1px solid black; min-height: 600px;"> {{outdent|५६}}&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;'''अक्षरलिपि'''<br> {{outdent|युक्तिका समर्थन किसी तरह किया जा नहीं सकता, कि सन् ई० से पहलेकी ८वीं शताब्दीके बाद फिनिक (Phoenician) नामक बणिकोंसे भारतवासियोंने अक्षरज्ञान प्राप्त किया था।<br> {{gap}}सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें शाक्य बुद्धका अभ्युदय हुआ। उनके निर्वाण प्राप्त होनेसे कुछ ही पीछे उनके धर्मोपदेशकी रक्षा करनेके लिये उनके प्रधान-प्रधान शिष्यों ने इकट्ठा हो पहला बौद्धसङ्घ आह्वान किया। फ्रान्सीसी पण्डित फूको (Foucaux) और राजा राजेन्द्रलाल मित्र महाशयने ललितविस्तर-की समालोचनाके समय लिखा था, कि ललितविस्तरमें जो गाथा हैं, वह इसी समय (सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें) बनाई और संग्रह की गई थीं।* उन गाथाओंमें इस तरह वर्णन किया गया है— {{center|{{smaller|"सा गाथलेखलिखिते गुण अर्थयुक्ता<br>या कन्य ईदृश भवेन्मम तां वरयेथाः।" (ललितविस्तर १२ अ०)}}}} (शाक्यसिंहने कहा) जो कन्या गाथालेख लिखने और गाथाका अर्थ समझनेमें चतुर होगी, उससे मैं विवाह करूँगा।<br> {{gap}}कही हुई गाथासे क्या हम नहीं जान सकते, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले इस देशमें लिपिज्ञानकुशला महिलाओंका भी अभाव न था। यह बात सहज ही अनुमेय है, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले जहाँ कन्या लिखनेमें निपुण न होनेसे राजकुमारकी पत्नी बननेके योग्य न समझी जाती थी, उस देशके लिये अक्षर-लिपिकी चर्चा कितनी पुरानी है। ललितविस्तरकी गाथामें लिपिशाल† और लिपिशास्त्र‡ का उल्लेख}} <br><br> <hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;"> {{smaller|* Dr. Rajendralal Mitra's Lalita Vistara, Intro. p. 56.<br> † "शास्त्राणि यानि प्रचरन्ति च देवलोके<br>संख्या लिपिच गणनाऽपि च धातुतन्त्रः।<br>ये शिल्पयोगपृथु लौकिक अप्रमेया-<br>स्तेष्वेषु शिक्षितु पुरा बहुकल्पकोट्यः।<br>किन्तु जनस्य अनुवर्त्तनतां करोति<br>लिपिशालमागतु सुशिक्षितशिक्षणार्थं"॥ (ललितविस्तर १० अ०)<br> ‡ "लोकोत्तरेषु चतुःसत्यपथविधिज्ञो हेतुप्रतीत्यकुशली यथ सम्भवति।<br>यथ चानिरोधक्षयु संस्कृ तसोऽस्तिभावस्तस्मिन् विधिज्ञः किमथो लिपिशास्त्रमात्रे"॥<br>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;(ललितविस्तर १० अ०)}} </div> <div style="width: 48%; float: right; padding-left: 10px;"> {{outdent|होनेसे स्पष्ट मालूम होता है, कि उस पुराने समयमें भी लिपि सिखानेकी पाठशालाएं और नाना देशीय लिपिज्ञानके उपयुक्त लिपि-शास्त्र (Palaeography and Epigraphy) प्रचलित था।<br> {{center|{{smaller|ब्राह्मी आदि लिपियोंका उत्पत्ति-काल।}}}} {{gap}}इस समय यहाँ आलोच्य है, कि जिस प्राचीन कालकी बात चल रही है, उस समय भारतमें कैसे अक्षर प्रचलित थे।<br> {{gap}}पूर्वोक्त ललितविस्तरमें चौंसठ प्रकारकी लिपिका उल्लेख देख पड़ता है। यथा—<br> {{gap}}१ ब्राह्मी, २ खरोष्ठी, ३ पुष्करसारी, ४ अङ्ग, ५ वङ्ग, ६ मगध, ७ माङ्गल्य, ८ मनुष्य, ९ अङ्गुलीय, १० शकारि, ११ ब्रह्मवल्ली, १२ द्राविड़, १३ कनारी, १४ दक्षिण, १५ उग्र, १६ संख्या, १७ अनुलोम, १८ अवधनु, १९ दरद, २० खास्य, २१ चीन, २२ हूण, २३ मध्याक्षरविस्तर, २४ पुष्प, २५ देव, २६ नाग, २७ यक्ष, २८ गन्धर्व, २९ किन्नर, ३० महोरग, ३१ असुर, ३२ गरुड़, ३३ मृगचक्र, ३४ चक्र, ३५ वायुमरुत्, ३६ भौमदेव, ३७ अन्तरीक्षदेव, ३८ उत्तरकुरुद्वीप, ३९ अपरगौड़ादि, ४० पूर्वविदेह, ४१ उत्क्षेप, ४२ निक्षेप, ४३ विक्षेप, ४४ प्रक्षेप, ४५ सागर, ४६ वज्र, ४७ लेख-प्रतिलेख, ४८ अनुद्रुत, ४९ शास्त्रावर्त्त, ५० गणनावर्त्त, ५१ उत्क्षेपावर्त्त, ५२ विक्षेपावर्त्त, ५३ पादलिखित, ५४ द्विरुत्तरपदसन्धि, ५५ दशोत्तरपदसन्धि, ५६ अध्या-हारिणी, ५७ सर्वभूतसंग्रहणी, ५८ विद्यानुलोम, ५९ विमिश्रित, ६० ऋषितपस्तप्ता, ६१ धरणीप्रप्रेक्षण, ६२ सर्वौषधिनिष्यन्दा, ६३ सर्वसारसंग्रहणी और ६४ सर्वभूतरुतग्रहणी। (ललितविस्तर १० अ०)<br> {{gap}}जिस ललितविस्तरमें पूर्वोक्त लिपिमालाका नाम उद्धृत हुआ है, उसी ग्रंथका चू-फ-लन्ने सन् ६५ ई० के समय चीन-भाषामें अनुवाद किया था।\* ऐसे स्थलमें मूल ग्रंथके सब जगह फैलने और इसके बाद चीनदेश पहुँचनेमें अल्प समय न लगा होगा। पाश्चात्य और इस देशके राजा राजेन्द्रलाल मित्र-प्रमुख†}} <br><br> <hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;"> {{smaller|\* Beal's Romantic Legend of Sakya Buddha, Intro-duction.}} </div> <noinclude></div><div style="clear:both;"></div></noinclude><noinclude></noinclude> gjnv2bbg8q5di9a4as1i6srmnzh01fc पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२ 250 130143 663320 663072 2026-06-20T10:58:48Z Navishth 6636 663320 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|'''प्रथम संस्करण की भूमिका'''}}</noinclude> {{gap}}गत वर्ष मुझे हिंदी के विद्वानों के सम्मुख "साहित्यालोचन" उपस्थित करने का अवसर प्राप्त हुआ था। आज कोई चौदह मास के अनंतर मैं यह 'दूसरा ग्रंथ लेकर उपस्थित होता हूँ'। जिन कारणों के वशीभूत होकर मुझे पहले ग्रंथ की रचना का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, उन्हीं कारणों ने यह ग्रंथ उपस्थित करने में भी मुझे बाध्य किया है। भाषा-विज्ञान पर एक उत्तम ग्रंथ लिखने का भार मेरे परम मित्र स्वर्ग-वासी पंडित चंद्रधर जी गुलेरी ने अपने ऊपर लिया था। वे अभी इसे आरंभ भी न कर सके थे कि कराल-काल ने उन्हें अचानक कवलित कर लिया। मैंने बहुत चाहा कि कोई दूसरा विद्वान् गुलेरी जी का यह कार्य संपन्न करे; पर इस संबंध में मैंने जो कुछ उद्योग किया, वह सब निष्फल हुआ। कहीं से आशा या आश्वासन न मिला और न किसी प्रकार की यथेष्ट सहायता ही प्राप्त हुई। इधर काशी-विश्वविद्यालय के एम० ए० हिंदी क्लास के विद्यार्थियों की शांत किंतु दृढ़ पुकार बहुत दिनों तक उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखी जा सकती थी। अंत में मैंने गत सितंबर मास में सामग्री इकट्ठा करना आरंभ किया और मैं क्रमशः यह ग्रंथ लिखने तथा विद्यार्थियों को लिखे अंश पढ़ाने में लग गया। इस कार्य में अनेक बाधाएँ उपस्थित हुईं। स्वास्थ्य ने सबसे अधिक धोखा दिया। साथ ही विद्यार्थियों के अभाव की चिंता और उनके सम्मुख यथासमय उपयुक्त सामग्री उपस्थित करने में अपनी ढिलाई अथवा असमर्थता मुझे और भी व्यग्र करने लगी। दोनों ने मिलकर, जहाँ तक हो सका, बाधाएँ उपस्थित कीं और कम से कम इस पुस्तक के लिखने और प्रकाशित होने में तीन महीने का समय अधिक लगा दिया। इस अवस्था में भी पढ़ने और लिखने का काम करते रहने से आँखों ने भी असहयोग कर देने की सूचना उपस्थित कर दी और उनकी शक्ति क्षीण हो गई। परंतु फिर भी मेरे लिये यह कम आनंद और संतोष की बात नहीं है कि यह पुस्तक यथासमय लिखी गई और छप गई।<noinclude></noinclude> tqzjsjmr4b81z2km1utal7qfsa3kj84 663321 663320 2026-06-20T10:59:09Z Navishth 6636 663321 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|'''प्रथम संस्करण की भूमिका'''}}</noinclude>{{gap}}गत वर्ष मुझे हिंदी के विद्वानों के सम्मुख "साहित्यालोचन" उपस्थित करने का अवसर प्राप्त हुआ था। आज कोई चौदह मास के अनंतर मैं यह 'दूसरा ग्रंथ लेकर उपस्थित होता हूँ'। जिन कारणों के वशीभूत होकर मुझे पहले ग्रंथ की रचना का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, उन्हीं कारणों ने यह ग्रंथ उपस्थित करने में भी मुझे बाध्य किया है। भाषा-विज्ञान पर एक उत्तम ग्रंथ लिखने का भार मेरे परम मित्र स्वर्ग-वासी पंडित चंद्रधर जी गुलेरी ने अपने ऊपर लिया था। वे अभी इसे आरंभ भी न कर सके थे कि कराल-काल ने उन्हें अचानक कवलित कर लिया। मैंने बहुत चाहा कि कोई दूसरा विद्वान् गुलेरी जी का यह कार्य संपन्न करे; पर इस संबंध में मैंने जो कुछ उद्योग किया, वह सब निष्फल हुआ। कहीं से आशा या आश्वासन न मिला और न किसी प्रकार की यथेष्ट सहायता ही प्राप्त हुई। इधर काशी-विश्वविद्यालय के एम० ए० हिंदी क्लास के विद्यार्थियों की शांत किंतु दृढ़ पुकार बहुत दिनों तक उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखी जा सकती थी। अंत में मैंने गत सितंबर मास में सामग्री इकट्ठा करना आरंभ किया और मैं क्रमशः यह ग्रंथ लिखने तथा विद्यार्थियों को लिखे अंश पढ़ाने में लग गया। इस कार्य में अनेक बाधाएँ उपस्थित हुईं। स्वास्थ्य ने सबसे अधिक धोखा दिया। साथ ही विद्यार्थियों के अभाव की चिंता और उनके सम्मुख यथासमय उपयुक्त सामग्री उपस्थित करने में अपनी ढिलाई अथवा असमर्थता मुझे और भी व्यग्र करने लगी। दोनों ने मिलकर, जहाँ तक हो सका, बाधाएँ उपस्थित कीं और कम से कम इस पुस्तक के लिखने और प्रकाशित होने में तीन महीने का समय अधिक लगा दिया। इस अवस्था में भी पढ़ने और लिखने का काम करते रहने से आँखों ने भी असहयोग कर देने की सूचना उपस्थित कर दी और उनकी शक्ति क्षीण हो गई। परंतु फिर भी मेरे लिये यह कम आनंद और संतोष की बात नहीं है कि यह पुस्तक यथासमय लिखी गई और छप गई।<noinclude></noinclude> ijwvq8ggeu4yyi5g76h94hy46gwwzes पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/३ 250 130792 663316 662881 2026-06-20T10:52:01Z Navishth 6636 663316 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" /></noinclude>{{center|( २ )}} मैने इस पुस्तक के लिखने में अपने सम्मुख यह उद्देश्य रखा था कि भाषा-विज्ञान के मूल सिद्धांतों का दिग्दर्शन मात्र करा दिया जाय और भारतवर्ष को प्राचीन भाषाओं का आधुनिक आर्य-भायात्रों तथा विशेषकर हिंदी से जो कुछ संबंध है, वह दिखला दिया जाय । न मैंने किसी ऐसे ग्रंथ के लिखने का विचार ही किया था जो भाषा-वैज्ञानिकों के लिये श्रादर की वस्तु हो और न ऐसा करने की मुझमें सामर्थ्य ही थी। मैं चाहता था कि हिंदी भाषा में इस विज्ञान की दृद नींव रख दी जाय, जिसमें समय पाकर अन्य विद्वान उस पर सुंदर प्रासाद निर्मित करने का सफलतापूर्वक उद्योग कर सकें और उन्हें नींव खोदने तथा उसे भरकर दृढ़ करने की आवश्यकता न रहे । इस उद्देश्य में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, इसके विषय में मैं कुछ कह नहीं सकता और न इसका निश्चय करना मेरा काम ही है। यह दूसरों का काम है। पर मुझे श्राशा है कि मैं विद्वानों को असंतुष्ट करने का कारण न होऊँगा। जिस उद्देश्य से प्रेरित होकर मैंने इस अंथ का लिखना आरंभ किया था, उसके लिये सामग्री की प्रचुरता थी। पर मेरी कठिनता यही थी कि किस सामग्री का उपयोग करूँ, उसे किस रूप में संचित करूँ, और किसे छोड़ दूं। जैसा कि पहले कह चुका हूँ, मैं भाषा-विज्ञान की प्रारंभिक पुस्तक अथवा प्रवेशिका उपस्थित करना चाहता था और इसके लिये यह आवश्यक नहीं था कि मैं सूक्ष्म विषयों के विवेचन में दत्तचित्त होता। मैंने बॉप, मंहारकर, मैक्समूलर, प्रियर्सन, हार्नली, बीम्स, केलांग, उलनर, गुगो, देवतिया, हेमचंद्र, लक्ष्मीधर, ग्लूमफील्ड, स्वीट, लकोटे आदि विद्वानों को पुस्तकों तथा लेखों से अमूल्य सहायता पाई है और सामग्री ली है। अतएव मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद देता हूँ। यदि इन महानुभावों की कृतियां मुझे प्रास न होती, तो जो मैं लिख सका हूँ, वह भी उपस्थित करने में मैं सफल नहीं हो सकता था। मैने अनुमान किया था कि रेद-दो सौ पृष्ठों में इस ग्रंथ को समास कर गगा । पर व्या ज्यों मैं अपने कार्य में अग्रसर होता गया, त्या त्यों इसका प्राकार रदता गया, यहाँ तक कि यह अनुमान से दूने से भी अधिक<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 1nh2ztv8qa4q0ia3vs894so27kvvgzh 663323 663316 2026-06-20T11:00:16Z Navishth 6636 663323 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|( २ )}}</noinclude>{{gap}}मैने इस पुस्तक के लिखने में अपने सम्मुख यह उद्देश्य रखा था कि भाषा-विज्ञान के मूल सिद्धांतों का दिग्दर्शन मात्र करा दिया जाय और भारतवर्ष को प्राचीन भाषाओं का आधुनिक आर्य-भायात्रों तथा विशेषकर हिंदी से जो कुछ संबंध है, वह दिखला दिया जाय । न मैंने किसी ऐसे ग्रंथ के लिखने का विचार ही किया था जो भाषा-वैज्ञानिकों के लिये श्रादर की वस्तु हो और न ऐसा करने की मुझमें सामर्थ्य ही थी। मैं चाहता था कि हिंदी भाषा में इस विज्ञान की दृद नींव रख दी जाय, जिसमें समय पाकर अन्य विद्वान उस पर सुंदर प्रासाद निर्मित करने का सफलतापूर्वक उद्योग कर सकें और उन्हें नींव खोदने तथा उसे भरकर दृढ़ करने की आवश्यकता न रहे । इस उद्देश्य में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, इसके विषय में मैं कुछ कह नहीं सकता और न इसका निश्चय करना मेरा काम ही है। यह दूसरों का काम है। पर मुझे श्राशा है कि मैं विद्वानों को असंतुष्ट करने का कारण न होऊँगा। {{gap}}जिस उद्देश्य से प्रेरित होकर मैंने इस अंथ का लिखना आरंभ किया था, उसके लिये सामग्री की प्रचुरता थी। पर मेरी कठिनता यही थी कि किस सामग्री का उपयोग करूँ, उसे किस रूप में संचित करूँ, और किसे छोड़ दूं। जैसा कि पहले कह चुका हूँ, मैं भाषा-विज्ञान की प्रारंभिक पुस्तक अथवा प्रवेशिका उपस्थित करना चाहता था और इसके लिये यह आवश्यक नहीं था कि मैं सूक्ष्म विषयों के विवेचन में दत्तचित्त होता। मैंने बॉप, मंहारकर, मैक्समूलर, प्रियर्सन, हार्नली, बीम्स, केलांग, उलनर, गुगो, देवतिया, हेमचंद्र, लक्ष्मीधर, ग्लूमफील्ड, स्वीट, लकोटे आदि विद्वानों को पुस्तकों तथा लेखों से अमूल्य सहायता पाई है और सामग्री ली है। अतएव मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद देता हूँ। यदि इन महानुभावों की कृतियां मुझे प्रास न होती, तो जो मैं लिख सका हूँ, वह भी उपस्थित करने में मैं सफल नहीं हो सकता था। {{gap}}मैने अनुमान किया था कि रेद-दो सौ पृष्ठों में इस ग्रंथ को समास कर गगा । पर व्या ज्यों मैं अपने कार्य में अग्रसर होता गया, त्या त्यों इसका प्राकार रदता गया, यहाँ तक कि यह अनुमान से दूने से भी अधिक<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> otycq9ne9t8fnxm52wqzygk98b8xtit पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/४ 250 130793 663319 662888 2026-06-20T10:58:25Z Navishth 6636 663319 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|( ३ )}}</noinclude>पृष्ठों में समाप्त हुआ है। यही बात साहित्यालोचन के संबंध में भी हुई थी। अतएव मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि आरंभ में मैं यह ठीक ठीक अनुमान नहीं कर सकता था कि किस प्रकार के ग्रंथ के लिए कितने विस्तार की आवश्यकता होगी। अतएव भविष्य में यदि किसी और ग्रंथ के लिखने का मुझे आयोजन करना पड़ा तो अनुमान के इस दांव-पेंच से बचने की चेष्टा करूँगा। इस ग्रंथ में कई बातें कई बार कही गई हैं। यह बहुत कुछ जान-बूझकर किया गया है। भाषा-विज्ञान का विषय सरल नहीं है। वह बहुत उलझन डालनेवाला है। अतएव स्थान स्थान पर आवश्यकतानुसार बातों के दोहराने में मैंने संकोच नहीं किया है; क्योंकि मैं विषय को यथासंभव सरल बनाना चाहता था, जिसमें पढ़नेवालों का जी न ऊबे और उन्हें हृदयंगम करने में कठिनता न हो। यदि इस कारण से समालोचकों की दृष्टि में पुनरुक्ति-दोष आ गया हो, तो उसके लिये मुझे पश्चात्ताप नहीं है। जो बात जान-बूझकर किसी विशेष उद्देश्य से की जाय, उसके लिये पश्चात्ताप होना तो दूर रहा, कुछ आगा-पीछा भी होना अस्वाभाविक है। निदान यह ग्रंथ समाप्त हो गया और अब हिंदी के विद्वानों, विशेषकर भाषा-विज्ञान-वेत्ताओं की सेवा में उपस्थित है। यदि इस ग्रंथ से विश्वविद्यालयों की उच्च कक्षा के हिंदी पढ़नेवाले विद्यार्थियों का कुछ भी उपकार हो सका, तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूँगा और इस पुस्तक के प्रस्तुत करने में जो कुछ शारीरिक कष्ट मुझे उठाना पड़ा है, उसे भूल जाऊँगा। इस ग्रंथ के दसवें प्रकरण के संबंध में पंडित रामचंद्र शुक्ल ने कई आवश्यक परामर्श देने की कृपा की है। साथ ही बाबू धीरेंद्र वर्मा ने इसकी विषयानुक्रमणिका तैयार करने का कष्ट उठाया है। बाबू रामचंद्र वर्मा ने इस पुस्तक की तैयारी में जो उत्साह दिखाया है और मेरी सहायता की है, वह विशेष उल्लेख-योग्य है। इसलिए इन महाशयों को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ। श्रीरामनवमी } सं० १९८१ वि० } श्यामसुंदरदास<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> ljhe2st480crdngeydh05xq862afqa0 663325 663319 2026-06-20T11:01:16Z Navishth 6636 663325 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|( ३ )}}</noinclude>पृष्ठों में समाप्त हुआ है। यही बात साहित्यालोचन के संबंध में भी हुई थी। अतएव मुझे यह स्वीकार करना पड़ता है कि आरंभ में मैं यह ठीक ठीक अनुमान नहीं कर सकता था कि किस प्रकार के ग्रंथ के लिए कितने विस्तार की आवश्यकता होगी। अतएव भविष्य में यदि किसी और ग्रंथ के लिखने का मुझे आयोजन करना पड़ा तो अनुमान के इस दांव-पेंच से बचने की चेष्टा करूँगा। {{gap}}इस ग्रंथ में कई बातें कई बार कही गई हैं। यह बहुत कुछ जान-बूझकर किया गया है। भाषा-विज्ञान का विषय सरल नहीं है। वह बहुत उलझन डालनेवाला है। अतएव स्थान स्थान पर आवश्यकतानुसार बातों के दोहराने में मैंने संकोच नहीं किया है; क्योंकि मैं विषय को यथासंभव सरल बनाना चाहता था, जिसमें पढ़नेवालों का जी न ऊबे और उन्हें हृदयंगम करने में कठिनता न हो। यदि इस कारण से समालोचकों की दृष्टि में पुनरुक्ति-दोष आ गया हो, तो उसके लिये मुझे पश्चात्ताप नहीं है। जो बात जान-बूझकर किसी विशेष उद्देश्य से की जाय, उसके लिये पश्चात्ताप होना तो दूर रहा, कुछ आगा-पीछा भी होना अस्वाभाविक है। {{gap}}निदान यह ग्रंथ समाप्त हो गया और अब हिंदी के विद्वानों, विशेषकर भाषा-विज्ञान-वेत्ताओं की सेवा में उपस्थित है। यदि इस ग्रंथ से विश्वविद्यालयों की उच्च कक्षा के हिंदी पढ़नेवाले विद्यार्थियों का कुछ भी उपकार हो सका, तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूँगा और इस पुस्तक के प्रस्तुत करने में जो कुछ शारीरिक कष्ट मुझे उठाना पड़ा है, उसे भूल जाऊँगा। {{gap}}इस ग्रंथ के दसवें प्रकरण के संबंध में पंडित रामचंद्र शुक्ल ने कई आवश्यक परामर्श देने की कृपा की है। साथ ही बाबू धीरेंद्र वर्मा ने इसकी विषयानुक्रमणिका तैयार करने का कष्ट उठाया है। बाबू रामचंद्र वर्मा ने इस पुस्तक की तैयारी में जो उत्साह दिखाया है और मेरी सहायता की है, वह विशेष उल्लेख-योग्य है। इसलिए इन महाशयों को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ। श्रीरामनवमी } सं० १९८१ वि० } श्यामसुंदरदास<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> ji5otm9c2w03wj3skr7xuqmkl1wvrp3 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/५ 250 130794 663328 662887 2026-06-20T11:01:54Z Navishth 6636 663328 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|'''द्वितीय संस्करण की भूमिका'''}}</noinclude>{{gap}}भाषा-विज्ञान का पहला संस्करण सं० १९८१ में प्रकाशित हुआ था। जिन परिस्थितियों के वश में होकर मुझे यह पुस्तक तैयार करनी पड़ी थीं उनका उल्लेख उसकी भूमिका में, जो इस नवीन संस्करण में भी प्रकाशित की जाती है, कर दिया गया है। उनको ध्यान में रखकर पुस्तक जैसी बन पड़ी तैयार की गई, पर वह संतोषजनक न हुई। एक तो समय की संकीर्णता के कारण उस समय अधिक जाँच-पड़ताल न की जा सकी। दूसरे उस समय पर्याप्त सामग्री भी उपलब्ध न हो सकी। इस स्थिति में उसमें बहुत सी त्रुटियों का रह जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। पहले मेरा विचार एक नई पुस्तक लिखने का था और इस उद्देश्य से भाषा-रहस्य का पहला भाग प्रस्तुत किया गया था। पर अनेक विघ्न-बाधाओं के उपस्थित होने के कारण उसका दूसरा भाग अब तक न लिखा जा सका। इस अवस्था में भाषा-विज्ञान को ही नया रूप देने का निश्चय किया गया। इस नए रूप में अब यह प्रस्तुत है। {{gap}}इस संस्करण में सात प्रकरण हैं। पहले प्रकरण में शास्त्र की महत्ता, उसका विस्तार तथा अन्य शास्त्रों से उसका संबंध दिखाया गया है और संक्षेप में भाषा-विज्ञान के विकास का इतिहास दिया गया है। दूसरे प्रकरण में भाषा और भाषण के संबंध में विचार किया है। इसमें भाषा और भाषण का भेद तथा भाषा की उत्पत्ति का इतिहास दिया गया है। तीसरे प्रकरण में आकृतिमूलक तथा वंशानुक्रम से भाषाओं का वर्गीकरण किया गया है और किंचित् विस्तार से भारोपीय-वर्ग की भाषाओं का विवरण दिया गया है। यहाँ तक भाषा-विज्ञान की भूमिका समझनी चाहिए। भाषा-विज्ञान के मुख्य अंग तीन हैं—ध्वनि-विचार, रूप-विचार और अर्थ-विचार। इन्हीं तीन अंगों का चौथे, पाँचवें और छठे प्रकरणों में विवेचन किया गया है। अब तक भाषा-विज्ञान में रूप-विचार और अर्थ-विचार पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था पर अब ये अंग महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं और इन पर अधिकाधिक<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 3ql57lxpb9v0b4jf40e7yha9yj9kxc8 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/६ 250 130795 663330 662889 2026-06-20T11:03:43Z Navishth 6636 663330 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|( ५ )}}</noinclude>विचार किया जाता है। अर्थ-विचार का प्रकरण तो अभी तक आरंभिक अवस्था में है, पर अब भाषा-शास्त्रियों का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ है और दिनों दिन इस अंग का अध्ययन तथा विवेचन किया जाने लगा है। सातवें प्रकरण को उपसंहार स्वरूप मानना चाहिए। इसमें आर्यों के मूल निवास-स्थान, उनके विच्छेद तथा अनेक देशों में जाकर बस जाने का वर्णन है। भाषा-विज्ञान की सहायता से प्रागैतिहासिक काल का इतिहास किस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है, इसका दिग्दर्शन भी करा दिया गया है। आशा है कि इस पुस्तक से भाषा-विज्ञान का आरंभिक ज्ञान भली भाँति प्राप्त हो जायगा और इस शास्त्र के विशेष अध्ययन का मार्ग बहुत कुछ प्रशस्त हो जायगा। {{gap}}इस पुस्तक के पहले, दूसरे, तीसरे और सातवें प्रकरणों के प्रस्तुत करने में मेरे पुत्र गोपाललाल खन्ना ने मेरी सहायता की है, चौथा प्रकरण भाषा-रहस्य के आधार पर उसके इसी प्रकरण का संक्षिप्त रूप है और पाँचवें तथा छठे प्रकरणों के प्रस्तुत करने में पंडित पद्मनारायण आचार्य का सहयोग मुझे प्राप्त हुआ है। अनुक्रमणिका तैयार करने का श्रेय पंडित रमापति शुक्ल को है। ये सभी व्यक्ति आशीर्वाद तथा धन्यवाद के पात्र हैं। मुझे इस बात का अभिमान है कि मेरे कतिपय विद्यार्थी सदा मेरी सहायता को तैयार रहते हैं और प्रेमपूर्वक मेरे कार्यों में सहयोग देते हैं। {{gap}}इस पुस्तक की समाप्ति के साथ मेरी तीन पुस्तकों—हिंदी भाषा और साहित्य, साहित्यालोचन और भाषा-विज्ञान—के परिवर्धित और संशोधित संस्करणों की त्रिवेणी प्रस्तुत हो गई है। आशा है कि इस त्रिवेणी में अवगाहन कर विशेष कर हिंदी तथा साधारणतः अन्य आधुनिक भाषाओं के विद्यार्थी यथेष्ट फल प्राप्त कर सकेंगे। काशी } ज्येष्ठ शु० १०, १९९५ } '''श्यामसुंदरदास'''<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> nh1bcpf50xwkisupb37ubst74k7w9ub पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/७ 250 130796 663333 662890 2026-06-20T11:04:08Z Navishth 6636 663333 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|'''तृतीय संस्करण की भूमिका'''}}</noinclude>{{gap}}यह भाषा-विज्ञान का तीसरा संस्करण प्रकाशित हो रहा है। पहले दो संस्करणों में बहुत संशोधन किया गया था । इस संस्करण में एक प्रकरण बदा दिया गया है। इसमें लेखन कला तथा नागरी लिपि के विकास का इतिहास दिया गया है। यह लेख (स्वर्गीय) महामहोपाध्याय रायबहादुर डाक्टर गौरीशंकर हीराचंद शोमा लिखित प्राचीन-लिपि-माला नामक ग्रंथ के अाधार पर मेरे पुत्र गोगाजलाल खन्ना के उद्योग से लिखा गया है। यह अंध-रत्न अव अप्राप्य है। काशी } ३-४-४४ } श्यामसुंदरदास<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> obhdhuhc484llbs35j3939z5bbd7dil पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/८ 250 130797 663334 662892 2026-06-20T11:04:30Z Navishth 6636 663334 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|'''पारिभाषिक शब्द'''}}</noinclude>{{center|'''पारिभाषिक शब्द'''}} अनुपयोगी रूपों का विनाश—Extinction of useless forms.<br /> अपश्रुति—Ablaut, vowel-gradation.<br /> अमूर्तीकरण—Abstraction.<br /> अर्थ—Meaning, thing.<br /> अर्थ का मूर्तीकरण—Concretion of meaning.<br /> अर्थ-नियम—Semantic law.<br /> अर्थमात्र—Semanteme.<br /> अर्थ-अपकर्ष—Deterioration of meaning.<br /> अर्थ-विचार—Semantics.<br /> अर्थापदेश—Indirect expression.<br /> अर्थोत्कर्ष—Elevation of meaning.<br /> उद्योतन—Irradiation.<br /> उपमान—Analogy.<br /> एकोच्चरित समूह—Articulated group.<br /> कृत्प्रत्यय—Primary affixes.<br /> तद्धित प्रत्यय—Secondary affixes.<br /> ध्वनि-नियम—Phonetic law.<br /> ध्वनि-विचार—Phonology.<br /> नये लाभ—New acquisitions.<br /> प्रत्यय—Affix.<br /> पर-प्रत्यय—Suffix.<br /> पुरःप्रत्यय—Prefix.<br /> बुद्धि-नियम—Intellectual law.<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> ryyrhr84ypj6wmtkchlhd9btbe46deo 663335 663334 2026-06-20T11:04:48Z Navishth 6636 663335 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|'''पारिभाषिक शब्द'''}}</noinclude> अनुपयोगी रूपों का विनाश—Extinction of useless forms.<br /> अपश्रुति—Ablaut, vowel-gradation.<br /> अमूर्तीकरण—Abstraction.<br /> अर्थ—Meaning, thing.<br /> अर्थ का मूर्तीकरण—Concretion of meaning.<br /> अर्थ-नियम—Semantic law.<br /> अर्थमात्र—Semanteme.<br /> अर्थ-अपकर्ष—Deterioration of meaning.<br /> अर्थ-विचार—Semantics.<br /> अर्थापदेश—Indirect expression.<br /> अर्थोत्कर्ष—Elevation of meaning.<br /> उद्योतन—Irradiation.<br /> उपमान—Analogy.<br /> एकोच्चरित समूह—Articulated group.<br /> कृत्प्रत्यय—Primary affixes.<br /> तद्धित प्रत्यय—Secondary affixes.<br /> ध्वनि-नियम—Phonetic law.<br /> ध्वनि-विचार—Phonology.<br /> नये लाभ—New acquisitions.<br /> प्रत्यय—Affix.<br /> पर-प्रत्यय—Suffix.<br /> पुरःप्रत्यय—Prefix.<br /> बुद्धि-नियम—Intellectual law.<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> l65e2d18xhjnlch5qlkd2e3r8ad17ou पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/९ 250 130798 663336 662893 2026-06-20T11:05:11Z Navishth 6636 663336 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|( ८ )}}</noinclude>भाव—Feeling, emotion, action, becoming.<br /> भेदभाव का नियम—Law of differentiation.<br /> मिथ्या प्रतीति—False Perception.<br /> रूपमात्र—Morpheme.<br /> रूप-विचार—Morphology.<br /> रूप-साधक—Inflectional.<br /> वाक्य-विचार—Syntax.<br /> वाक्यांश—Phrase, word.<br /> विभक्तियों के भग्नावशेष—Survival of inflections.<br /> विशेष भाव का नियम—Law of specialisation.<br /> शब्द—Word.<br /> शब्द-साधक—Word-building or formative.<br /> शब्द-साधन—Accidence.<br /> संबंध—Relation, connection.<br /> संसर्ग—Association.<br /> सत्त्व—Existence, being.<br /> साधन शब्द—Form word.<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> lo93kl8947pcr73e9s5x7d0p2eqhxzl पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/१० 250 130799 663337 662895 2026-06-20T11:06:00Z Navishth 6636 663337 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|'''विषय-सूची'''}} {{center|'''पहला प्रकरण'''}} {{center|'''विषय-प्रवेश'''}}</noinclude> {{center|[ पृष्ठ १–१६ ]}} {{gap}}शास्त्र की परिभाषा—शास्त्र का महत्त्व—भाषा-विज्ञान का आरंभ—भारतवर्ष में भाषा-विज्ञान—भाषा-विज्ञान के ग्रंथ—भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन का प्रकार—भाषा-विज्ञान कला है या विज्ञान—भाषा-विज्ञान और व्याकरण—भाषा-विज्ञान और मनोविज्ञान—भाषा-विज्ञान और साहित्य—भाषा-विज्ञान और मानव-विज्ञान—भाषा-विज्ञान और अन्य शास्त्र—आधुनिक भाषा-विज्ञान का प्रारंभिक इतिहास—भाषा-विज्ञान की वर्तमान अवस्था । {{center|'''दूसरा प्रकरण'''}} {{center|'''भाषा और भाषण'''}} {{center|[ पृष्ठ २०–४१ ]}} {{gap}}भाषा के अंग—बोली, विभाषा और भाषा—राष्ट्रभाषा—भाषण का द्विविध आधार—भाषा परंपरागत संपत्ति है—भाषा अर्जित संपत्ति है—भाषा का विकास होता है—भाषा की उत्पत्ति—दिव्य उत्पत्ति—सांकेतिक उत्पत्ति—अनुकरणमूलकत्व वाद—मनोभावाभिव्यंजकतावाद—यो-हे-हो-वाद—डिंग-डोंग-वाद—विकासवाद का समन्वित रूप—अनुकरणात्मक शब्द—मनोभावाभिव्यंजक शब्द—प्रतीकात्मक शब्द—औपचारिक शब्द—भाषण का विकास—भाषा के प्रयोजन । {{center|'''तीसरा प्रकरण'''}} {{center|'''भाषाओं का वर्गीकरण'''}} {{center|[ पृष्ठ ४२–११४ ]}} {{gap}}वाक्य से भाषण का आरंभ—वाक्यों के चार भेद—( १ ) समास-प्रधान वाक्य—( २ ) व्यास-प्रधान वाक्य—( ३ ) प्रत्यय-प्रधान वाक्य—( ४ )<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 6ss7xvvvjpm3qao44kpcz936pglewen 663339 663337 2026-06-20T11:07:24Z Navishth 6636 663339 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|'''विषय-सूची'''}}</noinclude>{{center|'''पहला प्रकरण'''}} {{center|'''विषय-प्रवेश'''}} {{center|[ पृष्ठ १–१६ ]}} {{gap}}शास्त्र की परिभाषा—शास्त्र का महत्त्व—भाषा-विज्ञान का आरंभ—भारतवर्ष में भाषा-विज्ञान—भाषा-विज्ञान के ग्रंथ—भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन का प्रकार—भाषा-विज्ञान कला है या विज्ञान—भाषा-विज्ञान और व्याकरण—भाषा-विज्ञान और मनोविज्ञान—भाषा-विज्ञान और साहित्य—भाषा-विज्ञान और मानव-विज्ञान—भाषा-विज्ञान और अन्य शास्त्र—आधुनिक भाषा-विज्ञान का प्रारंभिक इतिहास—भाषा-विज्ञान की वर्तमान अवस्था । {{center|'''दूसरा प्रकरण'''}} {{center|'''भाषा और भाषण'''}} {{center|[ पृष्ठ २०–४१ ]}} {{gap}}भाषा के अंग—बोली, विभाषा और भाषा—राष्ट्रभाषा—भाषण का द्विविध आधार—भाषा परंपरागत संपत्ति है—भाषा अर्जित संपत्ति है—भाषा का विकास होता है—भाषा की उत्पत्ति—दिव्य उत्पत्ति—सांकेतिक उत्पत्ति—अनुकरणमूलकत्व वाद—मनोभावाभिव्यंजकतावाद—यो-हे-हो-वाद—डिंग-डोंग-वाद—विकासवाद का समन्वित रूप—अनुकरणात्मक शब्द—मनोभावाभिव्यंजक शब्द—प्रतीकात्मक शब्द—औपचारिक शब्द—भाषण का विकास—भाषा के प्रयोजन । {{center|'''तीसरा प्रकरण'''}} {{center|'''भाषाओं का वर्गीकरण'''}} {{center|[ पृष्ठ ४२–११४ ]}} {{gap}}वाक्य से भाषण का आरंभ—वाक्यों के चार भेद—( १ ) समास-प्रधान वाक्य—( २ ) व्यास-प्रधान वाक्य—( ३ ) प्रत्यय-प्रधान वाक्य—( ४ )<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> 1ll8ohnxsxfjq2eb4zoook82limi1fq पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/१४ 250 130803 663338 662896 2026-06-20T11:07:00Z Navishth 6636 663338 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|( ५ )}}</noinclude>{{center|'''सातवाँ प्रकरण'''}} {{center|'''भारतीय लिपियों का विकास'''}} {{center|[ पृष्ठ २८४–२९६ ]}} {{gap}}लेखन की उत्पत्ति—पौराणिक धारणा—विदेशी अनुसंधान—विदेशी मतों की परीक्षा—ब्राह्मी लिपि की सेमेटिक उत्पत्ति का खंडन—ब्राह्मी अक्षरों की स्वतंत्रता—भारत में लेखन का प्राचीन प्रचलन—प्राचीन ग्रंथ लिपिबद्ध न मिलने के कारण—लेखन की वेदकालीन उत्पत्ति—संख्या और अंक—बौद्ध काल के उल्लेख—परवर्ती प्रमाण—ब्राह्मी लिपि संबंधी निष्कर्ष—खरोष्ठी लिपि—देवनागरी तथा अन्य लिपियाँ । {{center|'''आठवाँ प्रकरण'''}} {{center|'''प्रागैतिहासिक खोज'''}} {{center|[ पृष्ठ २९७–३१२ ]}} {{gap}}भाषा और जाति—आर्यों का आदिम निवास-स्थान—आर्यों की पश्चिमी शाखा—आर्यों की दूसरी शाखा—आर्यों का विच्छेद—आर्यों की भाषाएँ—आदिम आर्यों की सभ्यता—गार्हस्थ्य और सामाजिक जीवन—वास—पेय पदार्थ—व्यवसाय और व्यापार—समय का विभाग—वंश—जाति आदि—दंड-विधान । {{center|'''परिशिष्ट'''}} {{center|'''हिंदी के स्वरों और व्यंजनों का भाषा-वैज्ञानिक वर्णन'''}} {{center|[ पृष्ठ ३१३–३२७ ]}} {{center|'''अनुक्रमणिका'''}} {{center|[ पृष्ठ ३२८–३४७ ]}}<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> aoh9jce3h1qiwh3rifnuotu3f2msbir पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/१६ 250 130805 663340 662898 2026-06-20T11:08:24Z Navishth 6636 663340 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|'''भाषा-विज्ञान'''}} {{center|——:o:——}}</noinclude>{{center|'''पहला प्रकरण'''}} {{center|'''विषय-प्रवेश'''}} {{gap}}भाषा-विज्ञान उस शास्त्र को कहते हैं जिसमें भाषामात्र के भिन्न भिन्न अंगों और स्वरूपों का विवेचन तथा निरूपण किया जाता है। {{gap}}मनुष्य किस प्रकार बोलता है, उसकी बोली का किस प्रकार विकास होता है, उसकी बोली और भाषा में कब, किस प्रकार और कैसे कैसे परिवर्तन होते हैं, किसी भाषा में दूसरी भाषाओं के शब्द आदि किन किन नियमों के अधीन होकर मिलते हैं, कैसे तथा क्यों समय पाकर किसी भाषा का रूप और का और हो जाता है तथा कैसे एक भाषा परिवर्तित या विकसित होकर पूर्णतया स्वतंत्र एक दूसरी भाषा का रूप धारण कर लेती है—इन विषयों तथा इनसे संबंध रखनेवाले और सब उप-विषयों का भाषा-विज्ञान में समावेश होता है। इसमें शब्दों की उत्पत्ति, रूप-विकास तथा वाक्यों की बनावट आदि सभी पर विचार किया जाता है। सारांश यह कि भाषा-विज्ञान की सहायता से हम किसी भाषा का वैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन, अध्ययन और अनुशीलन करना सीखते हैं, और जब<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> s32jujfpzs9wc5h17pnf42ghcj6uoja पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/१८ 250 130807 663341 662900 2026-06-20T11:09:01Z Navishth 6636 663341 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|विषय-प्रवेश {{Right|३}}}}</noinclude>देता है। जिस प्रकार शब्दों के भिन्न भिन्न रूपों और अर्थों पर यह शास्त्र विचार करता है, उसी प्रकार भाषा के उद्भव, विकास और ह्रास की भी मनोरम कहानी सुनाने के लिये यह उत्सुक रहता है। कोई भाषा क्यों बाँझ रहती है और कोई क्यों संतानवती होकर प्रजाहित पालन में तत्पर हो जाती है; आदि विषय किस सहृदय को अनुरंजित नहीं करते ? {{gap}}अन्यान्त्य अधिकांश आधुनिक विज्ञानों की भाँति भाषा-विज्ञान का, इस संस्कृत रूप में, आरंभ भी पाश्चात्य देशों में ही हुआ है। पहले भाषाओं का अध्ययन बिलकुल साधारण रूप में ठीक उसी रूप में जिसमें बालकों को आधुनिक विद्यालयों में शिक्षा दी जाती है, हुआ करता था। अध्ययन का यह रूप शुद्ध साहित्यिक था, अर्थात् इस प्रकार का अध्ययन किसी भाषा के केवल साहित्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए होता था। किसी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उस भाषा के व्याकरण का अध्ययन करना आवश्यक होता है। अतएव किसी भाषा के अध्ययन के अंतर्गत उस भाषा के व्याकरण का अध्ययन भी आपसे आप आ जाता है। अनेक विद्वान् ऐसे भी होते थे जिन्हें केवल एक ही भाषा के अध्ययन से संतोष नहीं होता था और जो भाषाओं के पूर्ण पंडित होकर उन सबके साहित्य और व्याकरणों का विवेचनात्मक अनुशीलन करते थे। जब यूरोपीय लोगों ने संस्कृत भाषा का अध्ययन आरंभ किया, तब उन्हें संस्कृत के व्याकरण में कुछ नये और विशिष्ट नियम मिले। संस्कृत भाषा के अनेक शब्दों और व्याकरण के अनेक नियमों ने उन लोगों का ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट किया कि संस्कृत का लैटिन तथा उसकी वंशज अनेक दूसरी भाषाओं के साथ कई बातों में साम्य है। इसके अतिरिक्त आरंभ में ऐसे विद्वानों ने यह भी देखा कि बहुत पास के दो चार प्रदेशों की भाषाओं की जिस प्रकार शब्दों और व्याकरण के नियमों आदि में बहुत अधिक समानता होती है, उसी प्रकार, पर उससे कुछ कम अंशों में, दूर दूर के प्रदेशों की<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> g0lbj6isk6buvrqxkknaggfs2hkq792 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२० 250 130809 663342 662901 2026-06-20T11:09:37Z Navishth 6636 663342 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|विषय-प्रवेश {{Right|५}}}}</noinclude>ध्यान भाषा-संबंधी ऐसे तत्त्वों की ओर न जाता जो साधारणतः स्वयं ही लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। {{gap}}भारतवर्ष में प्राचीन काल में ही शब्दों की व्युत्पत्ति और स्वरों के उच्चारण आदि पर विद्वानों का ध्यान गया था। ब्राह्मण-ग्रंथों तथा प्रातिशाख्यों में अनेक स्थानों पर इस प्रकार के विवेचन किए गए हैं। पीछे से यास्क ने अपने निरुक्त ग्रंथ में, जो वेदों के छह अंगों में से एक मुख्य अंग माना जाता है तथा जो वेदार्थ-ज्ञान का प्रधान साधन समझा जाता है, इस विषय का विस्तृत विवेचन किया है। वास्तव में यह निरुक्त भाषा-विज्ञान का ही दूसरा नाम था, और है। उन दिनों निरुक्त का बहुत व्यापक अर्थ लिया जाता था; आजकल की भाँति उसमें केवल 'यास्क-कृत निरुक्त' नामक ग्रंथ का ही अभिप्राय नहीं लिया जाता था। आजकल व्याकरण के अनेक ग्रंथ देखने में आते हैं; इसलिए 'व्याकरण' शब्द से किसी ग्रंथ-विशेष का बोध नहीं होता। उसी प्रकार निरुक्त-विषयक ग्रंथों की उतनी ही अधिकता थी, जितनी व्याकरण संबंधी ग्रंथों की है, और 'निरुक्त' शब्द किसी ग्रंथ-विशेष का परिचायक न होकर एक शास्त्र का बोधक होता था। ब्राह्मण आदि ग्रंथों में एक और प्राचीन शब्द मिलता है जो भाषा-विज्ञान का बोधक माना जा सकता है। यह शब्द है 'निर्वचन', जो निरुक्त शब्द का समानार्थक है। इसका साधारण अर्थ बोलना, उच्चारण करना, कहना, समझाना, व्याख्या करना, कहावत आदि है। निर्वचन का प्रचलित अर्थ है व्युत्पत्ति। निर्वचन के प्राचीन अर्थ का लोप हो गया है और अब साधारण अर्थ में ही उसका प्रयोग होता है। अतएव भाषा-विज्ञान के अर्थ में उसका प्रयोग करना समीचीन नहीं हो सकता। एक और पुराना शब्द 'शब्दशास्त्र' है जिससे आजकल व्याकरण का अर्थ लिया जाता है। यदि हम इसके अर्थ को समझें तो यह भी भली भाँति भाषा-विज्ञान का पर्याय हो सकता है; क्योंकि भाषा शब्दों से ही बनती है और 'भाषा-विज्ञान' 'भाषाशास्त्र' वास्तव में 'शब्द-विज्ञान' या 'शब्द-शास्त्र' ही है। पर यह 'शब्द-शास्त्र' पद एक<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> ir8uzxzn1sf7vkxthvsajcyzu736hjs पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२२ 250 130811 663343 662902 2026-06-20T11:10:33Z Navishth 6636 663343 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|विषय-प्रवेश {{Right|७}}}}</noinclude> नहीं रह जाती, तब मानो उनके प्राण निकल जाते हैं, केवल शरीर बचे रहते हैं। यद्यपि प्राकृतों के विकास को ध्यान में रखकर यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारतीय आर्य-भाषाएँ मृत नहीं हैं, उनमें निरंतर विकास हुआ है और वे आधुनिक देश-भाषाओं के रूप में वर्तमान हैं, परंतु संस्कृत इन्हीं आदिम बोल-चाल की भाषाओं की शाखा से सुधरकर बनी है और उसका रूप एक प्रकार से वैयाकरणों की कृपा से सर्वदा के लिये स्थिर हो गया है। कुछ भी हो, संस्कृत का अध्ययन इतने वैज्ञानिक और व्यवस्थित रूप से हुआ है कि संस्कृत व्याकरण आजकल के भाषा-वैज्ञानिकों के लिये भी आदर और आश्चर्य की वस्तु माना जाता है। {{gap}}विषय की दृष्टि से भाषा-विज्ञान के तीन अंग होते हैं—ध्वनि, रूप और अर्थ*। और इन्हीं तीनों अंगों के विवेचन की दृष्टि से ध्वनि-विचार, ध्वनि-शिक्षा, रूप-विचार, वाक्य-विचार, अर्थ-विचार और प्राचीन शोध भाषा-विज्ञान के प्रधान अंग हैं। ध्वनि-विचार अथवा ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत ध्वनि के परिवर्तनों का तात्त्विक विवेचन तथा ध्वनि-विकारों का इतिहास आदि सभी बातें आ जाती हैं। पर ध्वनि-शिक्षा का संबंध साक्षात् ध्वनियों के उच्चारण और विवेचन से रहता है। पुराने भाषा-शास्त्री ध्वनि का ऐतिहासिक तथा तात्त्विक विवेचन किया करते थे, पर आधुनिक वैज्ञानिक ध्वनि-शिक्षा की ओर अधिक ध्यान देते हैं। रूप-विचार, प्रकृति-प्रत्यय आदि भाषा का रूपात्मक विवेचन करता है। इसका प्रधान आधार व्याकरण है। वाक्य-विचार भी व्याकरण से संबंध रखता है, पर इसके ऐतिहासिक अध्ययन के लिये कई भाषाओं और साहित्यों का विशेष अभ्यास आवश्यक है। इसी से भाषा-विज्ञान का यह अंग अधिक उन्नत नहीं हो सका। अर्थ-विचार --- * पहले संस्करण में ध्वनि के स्थान पर नाद और अर्थ के स्थान पर भाव का प्रयोग हुआ था, पर अब हम ध्वनि और अर्थ का प्रयोग करेंगे।<noinclude>[[श्रेणी:भाषा-विज्ञान]]</noinclude> k7faesh8ivu08td6lel54phd4xl2dtt पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२४ 250 130813 663344 662903 2026-06-20T11:11:12Z Navishth 6636 663344 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|विषय-प्रवेश {{Right|९}}}}</noinclude>एक अन्वेषक ने पता लगाया कि अवेस्ता की भाषा में ग्रीष्म के लिये 'हमा' शब्द आया है। इससे स्पष्ट हो गया कि ये 'हमा' और 'समा' शब्द एक ही हैं। इसी प्रकार पिता शब्द का भी हाल है। तुलनात्मक अध्ययन में भाषा के अंत्यावयव वाक्य माने जाते हैं। अतएव तुलना वाक्यों की होनी चाहिए, शब्दों की नहीं। यह तुलना प्रवृत्ति-निवृत्ति, विधिनिषेध सूचक वाक्यों से होनी चाहिए। जहाँ ऐसे वाक्य न मिलें वहाँ सविभक्तिक शब्दों अर्थात् पदों द्वारा तुलना होनी चाहिए। प्रातिपदिक शब्दों द्वारा यह काम ठीक ठीक नहीं चल सकता। जब विभक्तियाँ और अर्थ दोनों एक हों तब शब्दों की समानता स्थिर की जा सकती है। अर्थ-साम्य और रूप-साम्य के निश्चित हो जाने पर ही कुछ परिणाम निकल सकता है। भाषा-शास्त्रियों ने तुलना के लिये पहले तीन प्रकार के शब्दों को लिया था—संख्यावाचक, संबंधवाचक (पिता, माता आदि) और गृहस्थीवाचक। तुलना के लिये संख्यावाचक शब्दों की उपयोगिता सर्वप्रधान है, क्योंकि उनमें परिवर्तन बहुत कम होता है। पहाड़ों की गिनती में अभी तक प्राचीन शब्द प्रचलित हैं। संबंधवाचक और गृहस्थीवाचक शब्द भी स्थायी हैं। इनके भी अंग स्थिर होते हैं। इनका भी लोप प्रायः कम होता है। तुलना तभी ठीक होगी जब ऐतिहासिक प्रक्रिया से शब्दों का परिवार निश्चित हो जाय। संख्यावाचक शब्दों के अतिरिक्त उत्तम और मध्यम पुरुष के सर्वनामों में भी यूरोपीय भाषाओं में बहुत साम्य है। वर्णसाम्य पर शब्दों की व्युत्पत्ति ढूँढ़ना या भिन्न भिन्न रूपों से भिन्न भिन्न मूलों अथवा एक मूल की कल्पना करना भ्रामक है। {{gap}}प्रश्‍न है कि भाषा-विज्ञान की गणना कला में की जाय या विज्ञान में। कला के अंतर्गत केवल मनुष्य की कृतियाँ ही आती हैं, जैसे चित्रकला, मूर्तिकला, काव्यकला आदि। विज्ञान उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर या प्रकृति की कृतियों की मीमांसा होती है, जैसे भौतिक-विज्ञान, वनस्पति-विज्ञान, जीव-विज्ञान, मनोविज्ञान आदि। भाषा-<noinclude></noinclude> esn1djwco5i8ef38pnv7l71w2sv1agh पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२५ 250 130814 663345 662904 2026-06-20T11:11:46Z Navishth 6636 663345 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|{{Left|८}} भाषा-विज्ञान}}</noinclude> के अंतर्गत ये दो बातें आती हैं—व्युत्पत्ति-विचार और भाषा के बौद्ध नियमों की मीमांसा। आज व्युत्पत्ति-विचार अथवा निर्वचन एक शास्त्र बन गया है। ऐतिहासिक और ध्वनि-परिवर्तन संबंधी विचारों ने उसे वैज्ञानिक रूप दे दिया है। भाषा के बौद्ध नियमों का अनुशीलन भी अब एक सुन्दर विषय बन गया है। किस प्रकार शब्द अर्थ को छोड़ता और अपनाता है और किस प्रकार अर्थ शब्द का त्याग और ग्रहण करता है तथा कैसे इन अर्थों का संकोच या विस्तार होता है—इन सब बातों का अब स्वतंत्र विवेचन होने लगा है। इसी विषय को कुछ लोग अर्थातिशय का नाम भी देते हैं। इस अर्थ-विचार अर्थात् व्युत्पत्ति-शास्त्र तथा अर्थातिशय के आधार पर भाषा द्वारा प्राचीन इतिहास और संस्कृति की कल्पना की जाती है। ऐसी भाषामूलक प्राचीन खोज भाषा-विज्ञान का एक बड़ा महत्त्वपूर्ण अंग हो गई है। इन सब अंगों का विशेषज्ञों द्वारा पृथक् पृथक् अध्ययन किया जाता है। पर शास्त्र के सामान्य परिचय के लिये इन सब का साधारण ज्ञान अनिवार्य है। • भाषा-विज्ञान के मुख्य प्रकरण, भाषा का इतिहास, भाषा-विज्ञान का इतिहास, भाषा का वर्गीकरण, ध्वनि-शिक्षा, ध्वनि-विचार, रूप-विचार, अर्थ-विचार, वाक्य-विचार और भाषा-मूलक प्राचीन शोध हैं। अंतिम और सबसे आवश्यक प्रकरण है किसी एक भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन। ये सब मिलकर भाषा-विज्ञान को पूर्ण बनाते हैं। किसी भाषा का अध्ययन दो प्रकार से होता है। एक ऐतिहासिक और दूसरा तुलनात्मक। तुलनात्मक अध्ययन भी अधिकांश में ऐतिहासिक अध्ययन पर ही निर्भर है। जब तक किसी शब्द के अनेक प्राचीन और नवीन रूप न प्राप्त हों तब तक उनकी परस्पर तुलना करके किसी निश्चित सिद्धांत पर पहुँचना कठिन है। उदाहरण के लिये हम वेद में “वर्ष” के लिये आए हुए समा, शरद्, हिम, हेमंत, वर्ष आदि शब्द पाते हैं। ये सब शब्द ऋतुवाचक हैं, पर यह पता नहीं चलता था कि ग्रीष्म ऋतु-वाची ‘समा’ शब्द कहाँ से आया ? अन्त में<noinclude></noinclude> 2og6cefaxhsr8d0xnqmuzpt3nto9kw2 पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२६ 250 130815 663346 662905 2026-06-20T11:14:44Z Navishth 6636 663346 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|विषय-प्रवेश {{Right|९}}}}</noinclude>एक अन्वेषक ने पता लगाया कि अवेस्ता की भाषा में ग्रीष्म के लिये 'हमा' शब्द आया है। इससे स्पष्ट हो गया कि ये 'हमा' और 'समा' शब्द एक ही हैं। इसी प्रकार पिता शब्द का भी हाल है। तुलनात्मक अध्ययन में भाषा के अंत्यावयव वाक्य माने जाते हैं। अतएव तुलना वाक्यों की होनी चाहिए, शब्दों की नहीं। यह तुलना प्रवृत्ति-निवृत्ति, विधिनिषेध सूचक वाक्यों से होनी चाहिए। जहाँ ऐसे वाक्य न मिलें वहाँ सविभक्तिक शब्दों अर्थात् पदों द्वारा तुलना होनी चाहिए। प्रातिपदिक शब्दों द्वारा यह काम ठीक ठीक नहीं चल सकता। जब विभक्तियाँ और अर्थ दोनों एक हों तब शब्दों की समानता स्थिर की जा सकती है। अर्थ-साम्य और रूप-साम्य के निश्चित हो जाने पर ही कुछ परिणाम निकल सकता है। भाषा-शास्त्रियों ने तुलना के लिये पहले तीन प्रकार के शब्दों को लिया था—संख्यावाचक, संबंधवाचक (पिता, माता आदि) और गृहस्थीवाचक। तुलना के लिये संख्यावाचक शब्दों की उपयोगिता सर्वप्रधान है, क्योंकि उनमें परिवर्तन बहुत कम होता है। पहाड़ों की गिनती में अभी तक प्राचीन शब्द प्रचलित हैं। संबंधवाचक और गृहस्थीवाचक शब्द भी स्थायी हैं। इनके भी अंग स्थिर होते हैं। इनका भी लोप प्रायः कम होता है। तुलना तभी ठीक होगी जब ऐतिहासिक प्रक्रिया से शब्दों का परिवार निश्चित हो जाय। संख्यावाचक शब्दों के अतिरिक्त उत्तम और मध्यम पुरुष के सर्वनामों में भी यूरोपीय भाषाओं में बहुत साम्य है। वर्णसाम्य पर शब्दों की व्युत्पत्ति ढूँढ़ना या भिन्न भिन्न रूपों से भिन्न भिन्न मूलों अथवा एक मूल की कल्पना करना भ्रामक है। {{gap}}प्रश्‍न है कि भाषा-विज्ञान की गणना कला में की जाय या विज्ञान में। कला के अंतर्गत केवल मनुष्य की कृतियाँ ही आती हैं, जैसे चित्रकला, मूर्तिकला, काव्यकला आदि। विज्ञान उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर या प्रकृति की कृतियों की मीमांसा होती है, जैसे भौतिक-विज्ञान, वनस्पति-विज्ञान, जीव-विज्ञान, मनोविज्ञान आदि। भाषा-<noinclude></noinclude> esn1djwco5i8ef38pnv7l71w2sv1agh पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२७ 250 130816 663347 662909 2026-06-20T11:15:12Z Navishth 6636 663347 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|{{Left|१०}} भाषा-विज्ञान}}</noinclude>विज्ञान विज्ञान है या कला, इस पर यूरोप के विद्वानों ने बहुत कुछ विचार किया है और अंत में यही सिद्धांत निकाला है कि यह विज्ञान है, कला नहीं है; क्योंकि भाषा भी वास्तव में एक ईश्वरदत्त शक्ति है, और उसका आरंभ तथा विकास आदि भी प्राकृतिक रूप में ही होता है; मनुष्य अपनी शक्ति से और जान-बूझकर कदाचित् ही उसमें कोई परिवर्तन कर सकता है। यदि इस संबंध में वह कुछ कर भी सकता है, तो एक तो वह प्रायः नहीं के बराबर होता है, और दूसरे जो कुछ हो भी सकता है, वह व्यक्तिगत प्रयत्न से नहीं वरन् सामूहिक या सामाजिक रूप से होता है, और जो काम सामूहिक या सामाजिक रूप से हो, वह प्रायः प्राकृतिक के समान ही माना जाता है। इसके अतिरिक्त भाषा-विज्ञान में विज्ञान के और भी लक्षण पाए जाते हैं। इन्हीं कारणों से इसकी गणना कला में नहीं, विज्ञान में होती है। {{gap}}हम कह चुके हैं कि भाषा-विज्ञान और व्याकरण का घनिष्ठ संबंध है। व्याकरण एक कला है और भाषा-विज्ञान एक विज्ञान। व्याकरण भाषा में साधुता और असाधुता का विचार करता है, और भाषाविज्ञान भाषा की वैज्ञानिक व्याख्या करता है। व्याकरण दो प्रकार का होता है—वर्णनात्मक और व्याख्यात्मक। वर्णनात्मक व्याकरण लक्ष्यों का व्यवस्थित रूप में वर्गीकरण करता है और सामान्य नियमों का निर्माण करता है। व्याख्यात्मक व्याकरण इसका भाष्य करता है। यह भाषामात्र की प्रवृत्तियों की व्याख्या करता है। इसके भी तीन अंग होते हैं—ऐतिहासिक, तुलनात्मक और सामान्य व्याकरण। ऐतिहासिक व्याकरण भाषा के कार्यों को समझाने के लिये उसी भाषा में या उसकी पूर्ववर्ती भाषा में उसके कारणों के ढूँढ़ने की चेष्टा करता है, तुलनात्मक व्याकरण उसके कार्यों की व्याख्या के लिये उस भाषा की समकालीन या उसकी पूर्वज सजातीय भाषाओं की तुलनात्मक परीक्षा करता है और सामान्य व्याकरण सभी भाषाओं के—भाषा-मात्र के—मौलिक सिद्धांतों तथा तत्त्वों की मीमांसा करता है। यद्यपि यह सत्य<noinclude></noinclude> 20hj4jzlmugvsm6x4czcas30eanvhuk पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२८ 250 130817 663348 662917 2026-06-20T11:15:45Z Navishth 6636 663348 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|विषय-प्रवेश {{Right|११}}}}</noinclude>है कि व्याख्यात्मक व्याकरण वर्णनात्मक व्याकरण के आधार पर ही काम करता है तथापि भाषा-विज्ञान ने व्याकरण की व्याख्या को अपने अंतर्गत कर लिया है, और उसका आधार भी वर्णनात्मक व्याकरण हो जाता है। {{gap}}व्याकरण एक काल की किसी भाषा विशेष से सम्बन्ध रखता है। भाषा-विज्ञान किसी भाषा की अतीत काल की आलोचना करता है, तथा अन्य भाषाओं से उसकी तुलना करता है। व्याकरण नियम उपनियम और अपवाद का सविस्तर विवेचन करता है, और भाषा-विज्ञान प्रत्येक शब्द का इतिहास प्रस्तुत करता है। व्याकरण भाषा-विज्ञान का एक सहायक मात्र है। व्याकरण वर्ण-प्रधान होने के कारण भाषा-विज्ञान और व्याकरण में एक और भेद हो जाता है। व्याकरण सिद्ध और निष्पन्न रूप को लेकर ही अपना काम करता है। भाषा में जैसे रूप मिलते हैं उन्हीं पर वह विचार करता है। प्राचीन रूप वर्तमान रूप को कैसे प्राप्त हुआ, इसके कारणों पर भाषा-विज्ञान विचार करता है। भाषा-विज्ञान व्याकरण का व्याकरण है। उसका विकसित रूप है। इसी गुण के कारण इसको तुलनात्मक व्याकरण अथवा ऐतिहासिक तुलनात्मक व्याकरण भी कहते हैं। {{gap}}इसके अतिरिक्त और भी ऐसे शास्त्र या विज्ञान हैं, जिनके साथ भाषा-विज्ञान का साधारण या घनिष्ठ सम्बन्ध है। भाषा की सृष्टि विचारों से होती है। पहले मन में किसी प्रकार का विचार उत्पन्न होता है और तब उस विचार के अनुकूल भाषा का सृजन होता है। भाषा वास्तव में विचाररूपी साध्य का साधन है। विचारों का सम्बन्ध मन या मस्तिष्क से है। इस प्रकार भाषा-विज्ञान का मनोविज्ञान के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित होता है। शब्दों के अर्थ आदि में जो परिवर्तन होते हैं उनके कारण और स्वरूप आदि के समझने के लिये भाषा-विज्ञान में मनोविज्ञान का आश्रय लिया जाता है।<noinclude></noinclude> h7icu7eykgn0noymjasi66viuc0vu4y पृष्ठ:भाषा-विज्ञान.pdf/२९ 250 130818 663349 662925 2026-06-20T11:16:28Z Navishth 6636 663349 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Navishth" />{{center|{{Left|१२}} भाषा-विज्ञान}}</noinclude>{{gap}}साहित्य से भी भाषा-विज्ञान का कम घनिष्ठ संबंध नहीं है। भाषा-विज्ञान संबंधी अधिकांश नियमों और सिद्धांतों की रचना साहित्य के ही सहारे होती है, क्योंकि भाषा और रूप-परिवर्तन का ज्ञान करानेवाली समस्त सामग्री साहित्य में रक्षित रहती है। यदि साहित्य इन सब बातों को रक्षित न रखे तो भाषा-विज्ञान का कार्य कठिन हो जाय। साहित्य संपन्न भाषाएँ साहित्य-द्वारा रक्षित होकर अमर हो सकती हैं। ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन तो तुलनात्मक भाषाओं का ही हो सकता है। जो बोलियाँ साहित्य-हीन हैं, जिनके अतीत का हमें कुछ भी ज्ञान नहीं, उनके इतिहास की चर्चा कैसे हो सकती है ? यदि हमारे पास हमारे देश का क्रमबद्ध प्राचीन साहित्य न हो तो हमारा भाषा-विज्ञान कुछ रह ही न जाय। भिन्न शब्दों और उनके रूपों में क्या और कैसे परिवर्तन हुए, इसका ज्ञान केवल साहित्य से ही हो सकता है। आजकल जो भाषा का अध्ययन इतना समृद्धिशाली हो रहा है वह संस्कृत के ही ज्ञान का फल है इसी की कृपा से शब्दों के रूप और अर्थ का इतिहास इतना सरल और रोचक हो गया है। {{gap}}भाषा-विज्ञान के ज्ञाता के लिये ऐसे साहित्य और भाषा का अध्ययन भी सुगम हो जाता है जो अत्यंत प्राचीन हो अथवा जिससे उसका कभी किसी प्रकार का संघर्ष न रहा हो। भाषा-विज्ञान के विद्यार्थी के लिये वे भाषाएँ सहज और सरल हो जाती हैं। हिन्दी-भाषा के विकास के जिज्ञासु को हिंदी की पूर्वज अपभ्रंश, प्राकृत, संस्कृत आदि भाषाओं के साहित्य से परिचय प्राप्त करना पड़ता है और वह एक भाषा की अपेक्षा अनेक भाषाओं का कोविद स्वयं हो जाता है तथा अनेक साहित्यों से उसका परिचय हो जाता है। {{gap}}एक और विज्ञान है जो भाषा-विज्ञान का प्रधान आधार है। वह मानव-विज्ञान है जिसमें इस विषय का विवेचन होता है कि मनुष्य ने अपनी प्राकृतिक या आरंभिक अवस्था से किस प्रकार उन्नति करके अपनी वर्तमान उन्नत और सभ्य अवस्था प्राप्त की है। मनुष्यों में<noinclude></noinclude> hte93glyk0ailo19yo2087vn6p72ixz पृष्ठ:साम्प्रदायिकता.pdf/८ 250 174919 663283 539701 2026-06-19T19:42:47Z Aniket1119 6685 /* शोधित */ 663283 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aniket1119" /></noinclude> साम्प्रदायिकता मात्र दो धर्मों के बीच विवाद, झगड़ों व हिंसा की घटनाओं का ही नाम नहीं है। यह दो धार्मिक समुदायों के विवादों तक सीमित नहीं बल्कि इसने एक विचारधारा का रूप धारण कर लिया है, अपनी एक तर्क-पद्धति विकसित कर ली है जिसके आधार पर यह समाज के विभिन्न पक्षों पर विचार करती है। समझ के स्तर पर साम्प्रदायिकता को एक विचारधारा के रूप में न देख पाना साम्प्रदायिकता को पूरे तौर पर न समझना है 'आखिरकार साम्प्रदायिकता सबसे पहले एक विचारधारा है, एक विश्वास प्रणाली है जिसके जरिए समाज, अर्थव्यवस्था और राजतंत्र को देखा जाता है। यह समाज और राजनीति को देखने का एक तरीका है।" साम्प्रदायिकता एक राजनीतिक दृष्टिकोण है जिसमें यह माना जाता है कि एक धार्मिक समुदाय के सभी लोगों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व धार्मिक हित एक जैसे होते हैं । साम्प्रदायिकता एक कदम आगे रखकर कहती है कि अलग-अलग समुदायों के हित न केवल अलग-अलग होते हैं, बल्कि एक-दूसरे के विपरीत भी होते हैं। इस तरह साम्प्रदायिकता एक नकारात्मक सोच पर टिकी होती है। यदि इस बात को समझा जाए तो इसका अर्थ निकलेगा कि जैसे भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी आदि विभिन्न धर्मो-सम्प्रदायों के लोग रहते हैं तो साम्प्रदायिकता की विचारधारा के तर्क के अनुसार सभी हिन्दुओं के हित एक जैसे हैं, सभी मुसलमानों के एक जैसे, सभी सिक्खों के एक जैसे व सभी ईसाइयों के एक जैसे । एक समुदाय के हित न केवल एक जैसे हैं बल्कि एक दूसरे के विपरीत हैं। हिन्दुओं के हितों की मुसलमानों, सिक्खों, ईसाइयों के हितों से टकराहट है। इसी तरह मुसलमानों व अन्य धर्मावलंबियों की अन्य धर्मों / समुदायों के साथ । इस धारणा के अनुसार तो भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई शान्तिपूर्ण तरीके से साथ-साथ रह ही नहीं सकते और साम्प्रदायिक झगड़े तो अवश्यंभावी हैं । यह धारणा न तो तर्क के आधार पर सही है और न ही तथ्यपरक है। यह बात बिल्कुल भी सही नहीं है कि एक धर्म के मानने वाले लोगों के हित एक समान होते हैं। जब तक समाज वर्गों में बंटा है, समाज में गरीब और<noinclude></noinclude> fqxv5avdndbl6z3li5efyi4xrmfda7z 663284 663283 2026-06-20T01:28:26Z सौरभ तिवारी 05 49 /* शोधित नहीं */ बिना सुधारे पृष्ठ की स्थिति ना बदलें। 663284 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude> साम्प्रदायिकता मात्र दो धर्मों के बीच विवाद, झगड़ों व हिंसा की घटनाओं का ही नाम नहीं है। यह दो धार्मिक समुदायों के विवादों तक सीमित नहीं बल्कि इसने एक विचारधारा का रूप धारण कर लिया है, अपनी एक तर्क-पद्धति विकसित कर ली है जिसके आधार पर यह समाज के विभिन्न पक्षों पर विचार करती है। समझ के स्तर पर साम्प्रदायिकता को एक विचारधारा के रूप में न देख पाना साम्प्रदायिकता को पूरे तौर पर न समझना है 'आखिरकार साम्प्रदायिकता सबसे पहले एक विचारधारा है, एक विश्वास प्रणाली है जिसके जरिए समाज, अर्थव्यवस्था और राजतंत्र को देखा जाता है। यह समाज और राजनीति को देखने का एक तरीका है।" साम्प्रदायिकता एक राजनीतिक दृष्टिकोण है जिसमें यह माना जाता है कि एक धार्मिक समुदाय के सभी लोगों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व धार्मिक हित एक जैसे होते हैं । साम्प्रदायिकता एक कदम आगे रखकर कहती है कि अलग-अलग समुदायों के हित न केवल अलग-अलग होते हैं, बल्कि एक-दूसरे के विपरीत भी होते हैं। इस तरह साम्प्रदायिकता एक नकारात्मक सोच पर टिकी होती है। यदि इस बात को समझा जाए तो इसका अर्थ निकलेगा कि जैसे भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी आदि विभिन्न धर्मो-सम्प्रदायों के लोग रहते हैं तो साम्प्रदायिकता की विचारधारा के तर्क के अनुसार सभी हिन्दुओं के हित एक जैसे हैं, सभी मुसलमानों के एक जैसे, सभी सिक्खों के एक जैसे व सभी ईसाइयों के एक जैसे । एक समुदाय के हित न केवल एक जैसे हैं बल्कि एक दूसरे के विपरीत हैं। हिन्दुओं के हितों की मुसलमानों, सिक्खों, ईसाइयों के हितों से टकराहट है। इसी तरह मुसलमानों व अन्य धर्मावलंबियों की अन्य धर्मों / समुदायों के साथ । इस धारणा के अनुसार तो भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई शान्तिपूर्ण तरीके से साथ-साथ रह ही नहीं सकते और साम्प्रदायिक झगड़े तो अवश्यंभावी हैं । यह धारणा न तो तर्क के आधार पर सही है और न ही तथ्यपरक है। यह बात बिल्कुल भी सही नहीं है कि एक धर्म के मानने वाले लोगों के हित एक समान होते हैं। जब तक समाज वर्गों में बंटा है, समाज में गरीब और<noinclude></noinclude> qmp7xy6ks4rtennf8tv9rjb0khg30mj 663286 663284 2026-06-20T06:33:03Z Aniket1119 6685 /* शोधित */ [[Special:Contributions/Aniket1119|Aniket1119]] ([[User talk:Aniket1119|वार्ता]]) द्वारा किए गए बदलाव [[Special:Diff/663283|663283]] को पूर्ववत किया 663286 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aniket1119" /></noinclude>साम्प्रदायिकता साम्प्रदायिकता मात्र दो धर्मों के बीच विवाद, झगड़ों व हिंसा की घटनाओं का ही नाम नहीं है। यह दो धार्मिक समुदायों के विवादों तक सीमित नहीं बल्कि इसने एक विचारधारा का रूप धारण कर लिया है, अपनी एक तर्क-पद्धति विकसित कर ली है जिसके आधार पर यह समाज के विभिन्न पक्षों पर विचार करती है। समझ के स्तर पर साम्प्रदायिकता को एक विचारधारा के रूप में न देख पाना साम्प्रदायिकता को पूरे तौर पर न समझना है 'आखिरकार साम्प्रदायिकता सबसे पहले एक विचारधारा है, एक विश्वास प्रणाली है जिसके जरिए समाज, अर्थव्यवस्था और राजतंत्र को देखा जाता है। यह समाज और राजनीति को देखने का एक तरीका है।" साम्प्रदायिकता एक राजनीतिक दृष्टिकोण है जिसमें यह माना जाता है कि एक धार्मिक समुदाय के सभी लोगों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व धार्मिक हित एक जैसे होते हैं । साम्प्रदायिकता एक कदम आगे रखकर कहती है कि अलग-अलग समुदायों के हित न केवल अलग-अलग होते हैं, बल्कि एक-दूसरे के विपरीत भी होते हैं। इस तरह साम्प्रदायिकता एक नकारात्मक सोच पर टिकी होती है। यदि इस बात को समझा जाए तो इसका अर्थ निकलेगा कि जैसे भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी आदि विभिन्न धर्मो-सम्प्रदायों के लोग रहते हैं तो साम्प्रदायिकता की विचारधारा के तर्क के अनुसार सभी हिन्दुओं के हित एक जैसे हैं, सभी मुसलमानों के एक जैसे, सभी सिक्खों के एक जैसे व सभी ईसाइयों के एक जैसे । एक समुदाय के हित न केवल एक जैसे हैं बल्कि एक दूसरे के विपरीत हैं। हिन्दुओं के हितों की मुसलमानों, सिक्खों, ईसाइयों के हितों से टकराहट है। इसी तरह मुसलमानों व अन्य धर्मावलंबियों की अन्य धर्मों / समुदायों के साथ | इस धारणा के अनुसार तो भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई शान्तिपूर्ण तरीके से साथ-साथ रह ही नहीं सकते और साम्प्रदायिक झगड़े तो अवश्यंभावी हैं । यह धारणा न तो तर्क के आधार पर सही है और न ही तथ्यपरक है। यह बात बिल्कुल भी सही नहीं है कि एक धर्म के मानने वाले लोगों के हित एक समान होते हैं। जब तक समाज वर्गों में बंटा है, समाज में गरीब और साम्प्रदायिकता / 9<noinclude></noinclude> 8ncea3a5pcqazct8wlxyv0s6v7klpat पृष्ठ:साम्प्रदायिकता.pdf/९ 250 174920 663285 539702 2026-06-20T06:28:07Z Aniket1119 6685 /* शोधित */ 663285 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Aniket1119" /></noinclude>अमीर हैं तब तक एक धर्म के लोगों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक हित एक समान हो ही नहीं सकते बल्कि एक ही धर्म के मानने वाले गरीब और अमीर के सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक हित परस्पर विरोधी होते हैं और दूसरी तरफ अलग-अलग धर्मों को मानने वाले अमीरों के हित एक जैसे होते हैं और गरीबों के हित एक जैसे होते हैं । उदाहरण के लिए एक मजदूर हिन्दू या मुसलमान अपने ही धर्म के पूंजीपति के कारखाने में काम करते हैं उनके आर्थिक हित एक जैसे कैसे हो सकते हैं जहां पूंजीपति हमेशा अपने लाभ को बढ़ाने के लिए मजदूर की मेहनत का शोषण करने की नई-नई योजनाएं बनाता रहता है । इसके विपरीत पूंजीपति हिन्दू और पूंजीपति मुसलमान के हित एक जैसे होते हैं । गरीब हिन्दू व गरीब मुसलमान के जीवन जीने के ढंग में, रहन-सहन, शिक्षा - स्वास्थ्य, कार्य-स्थितियों में समानता होती है जबकि अमीर हिन्दू या मुसलमान की जीवन शैली, रहन-सहन, ठाठ-बाट ऐश-विलास में समानता होती है। साम्प्रदायिक शक्तियां और साम्प्रदायिकता की विचारधारा, गरीबों में एकता न होने पाए, इसलिए उनमें वर्गीय- एकता को कमजोर करने के लिए व दरार पैदा करने के लिए यह सवाल उठाते रहे हैं। यदि गरीब लोगों (जो कि इसलिए गरीब हैं क्योंकि उनकी मेहनत का फल कोई और यानी अमीर खा रहा है) को इस बात का अहसास हो जाए और उनमें एकता स्थापित हो जाए तो फिर पूंजीपति हिन्दू व मुसलमान गरीब हिन्दू व मुसलमान को लूट नहीं सकेंगे। अपने इस ठाठ - ऐश्वर्य को जारी रखने के लिए 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत साम्प्रदायिकता की यह घिनौनी चाल उनके बहुत काम आती है । साम्प्रदायिकता हमेशा इस बात पर जोर देती है कि दो धर्मों के लोग इक्ट्ठा नहीं रह सकते। इसी बात को आधार बनाकर 'द्वि-राष्ट्र' का सिद्धान्त गढ़ा गया और हिन्दुस्तान के दो टुकड़े हुए— भारत और पाकिस्तान बने, लेकिन यह सिद्धांत कितनी झूठ और कृत्रिमता पर खड़ा था । यह तब साबित हुआ जब पाकिस्तान के भी दो टुकड़े हो गए और धर्म के आधार बनने वाले राष्ट्र और 'एक धर्म एक देश' की अवधारणा का थोथापन उजागर हो गया । साम्प्रदायिकता की दृष्टि धारण किए हुए लोगों की यह बात तथ्यपरक भी नहीं है कि विभिन्न धर्मों के लोग शांति के साथ एक जगह नहीं रह सकते। भारत में ही विभिन्न धर्मों के लोग हजारों सालों तक शांतिपूर्ण ढंग से रहते आए हैं। विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे से इतने घुल-मिल गए हैं कि यह अनुमान लगाना कठिन है कि कौन सा विश्वास या रिवाज किस धर्म का है । विभिन्न धर्मों के लोगों ने खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा व आचार-विचार में एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा है। आधुनिक चिन्तक व समाज सुधारक<noinclude></noinclude> 4l7ky4hhlc6ii5u4lh75bghwczxnj3u पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३५ 250 193468 663298 663224 2026-06-20T09:20:23Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663298 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र}}</noinclude>उम्मेदसिंह चरित्र जीरे जो राजा पचास साठ वा इससे अधिक वर्ष राज्य करता है वह अपने पुत्र पौत्र के राज्य के समय को छीन लेता है । विचारपूर्वक देखने पर इग्लैंड के और भारतवर्ष के मुसलमान राजाओं के राजत्वकाल की तुलना से यह बात प्रमाणित होती है और इसीलिये सर्वशास्त्रनिष्णात राजकार्यधुरंधर बूँदी राज्य के भूतपूर्व अमात्य श्रीपण्डित गंगासहायजी ने अपने ग्रंथ "वंशप्रकारा" में अभिकुल की उत्पत्ति का समय कलियुग के हजार वर्ष बीतने पर माना है और मेरी समझ में बहुत ही ठीक माना है । अब रहा कर्नल टाड साहब का अग्निकुल को तक्षकवंशीय बतलाने का विचार । यह भी मेरी समझ में ठीक नहीं है क्योंकि प्रथम तो जब उनका समय विचार ठीक नहीं तब यह भी अटकल मिथ्या होना चाहिये और दूसरे उन्होंने अग्निकुल की आबू पहाड़ पर उत्पत्ति का वर्णन लिखते हुए जो राय दी है वह भी उनके इस लेख को काटती है । थोड़ासा आगे चलने पर मालूम हो जायगा । इन बातों से सिद्ध है कि चाहुवान वंश की उत्पत्ति को आज दिन चार हजार वर्ष से ऊपर हुए । खैर । कुछ भी हो परंतु जिस समय भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के धाम पधार जाने के अनंतर दैत्यों और बौद्धों का अत्याचार बढ़ा, जिस समय बाणासुर के पुत्र धूम्रकेतु और यंत्रकेतन को आदि लेकर अनेक असुर ब्राह्मण के यज्ञों का नाश करके प्रजा को सताने लगे तब महर्षि वशिष्ठजी ने आबू पहाड़ पर अभिकुल की उत्पत्ति के लिये यज्ञ किया । भविष्यपुराण में लिखा है :— {{blockcenter| दूषयिष्यति यवनाः सहस्राब्दे गते कलेः । तदा रक्षां करिष्यन्ति याज्ञिकाः क्षत्रियर्षभाः ॥ }} अर्थात् कलि के हजार वर्ष बीतने पर यवन (बौद्ध) पृथ्वी को दूषित करेंगे तब यज्ञ से उत्पन्न होनेवाले क्षत्रिय उसकी रक्षा करेंगे । इसके साथ जो कथा लिखी है वह अभिकुल के चारों क्षत्रियवंशों की उत्पत्ति से मिलती हुई है । अवश्य ही आजकल के पढ़े लिखे लोग ऐसी कथाओं को कल्पित बतलाते हैं और टाड साहब ने भी इस बात को कल्पित माना है परंतु आश्चर्य यह है कि चंद्रमा में खाई पहाड़ और मंगलग्रह में मनुष्यों की वस्ती की अटकल ऐसे लोगों के विचार से सही और प्राचीन कथायें उनके विचार से कल्पित हैं । खैर इस पक्ष-<noinclude></noinclude> icalfjtrwns1lgy43j7a343h9h3rksp पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४ 250 193477 663271 663229 2026-06-19T12:01:38Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663271 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(९)}} पूज्य बुद्धि है। मैंने उनकी प्रशंसा के समय प्रशंसा और निन्दा के समय निन्दा की है। इसपर भी यदि किसी को आपत्ति मालूम हो तो मैं उनसे क्षमा मांगताहूँ। परमेश्वर की कृपा से ब्रिटिश राज्य की छत्र छाया में सब रजवाड़ों का परस्पर का वैमनस्य जाकर स्नेह की वृद्धि होरही है। अवश्य ही उन लोगों का यह कार्य देश दृष्टि के विचार से और नातेदारी के खयाल से अनुचित था और इसी कारण समय पडने पर उनके लिये- उनकी शक्ति के दुरुपयोग को देखकर कुछ लिखना पडा किन्तु “संतुष्टाश्च महीपतेः” के सिद्धान्त से उनका कार्य अनुचित भी नहीं कहा जासकता। इसी लक्ष्य से जब टाड साहब ने इन्द्रगढवालों का वध करनेपर अथवा महाराणा अडसीजी के मारे जाने पर महाराव राजा उम्मेदसिंहजी की और अनुक्रम से अजितसिंहजी की निन्दा की है तब ऐसे अवसर पर भारतवर्ष में अंगरेजी साम्राज्य के संस्थापक लार्ड क्लाइव और वेरन हेस्टिंग्स के वर्ताव की याद दिलानी पडी है और वह भी इसलिये पडी है कि दुनिया भर के इतिहास में शायद ऐसा कोई भी राज्य का संस्थापक नहीं निकल सकता जिसके चरित्र में इस प्रकार का धब्बा न हो किन्तु जिनका लक्ष्य राज्य संस्थापन है उन्हें समय आपडने पर ऐसे कार्य करने पड़ते हैं। इतना लिखने से पाठक यह न समझ लैं कि मैं इन बातों का अनुमोदक हूँ। जो कार्य भला सो भला और बुरा सो बुरा ही है। इस पुस्तक की रचना बूँदी के सुप्रसिद्ध इतिहास “वंश भास्कर” के रचयिता कवि शिरोमणि सूर्यमल्लजी के उक्त ग्रंथ के आधार पर, सर्व शास्त्र निष्णात, राजकार्य धुरंधर, बूँदी के भूतपूर्व अमात्य पंडित गंगासहायजी के बनाये “वंशप्रकाश” को आगे रखकर राजपूताने के जगत् प्रसिद्ध इतिहास लेखक महामान्य टाड साहब कृत “एनल्स ऐंड एंटीक्विटीज् आफ राजस्थान” का मिलान करके की गई है। इसमें समय २ पर मथुरानिवासी बाबू हरिचरणसिंह चौहान कृत “बूँदी राजचरितावली” का भी आश्रय लिया गया है और कहीं २ जनश्रुति का भी आधार है। इन सबही के लिए मेरा हार्दिक धन्यवाद है। विभक्ति प्रत्यय को मैं सर्व नाम के शामिल और संज्ञा से अलग लिखना पसन्द करताहूँ। इस पुस्तक में भी जहाँ तक बन सका इस तरह का उपयोग किया गया है।<noinclude></noinclude> 79kqk7ohcts8q5tdfnfvfa5dts0oas2 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५ 250 193478 663272 663230 2026-06-19T12:16:09Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663272 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(१०)}} यह पोथी संवत् १९६३ में तैयार हुई थी और प्रकाशित होने का सौभाग्य इसे अब प्राप्त हुआ है। इतना विलम्ब होने का कुछ भी कारण हो उसे यहाँ लिखने की आवश्यकता नहीं। हां! “श्रीवेङ्कटेश्वर” यंत्रालय के स्वामी सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी को भी मैं धन्यवाद देताहूँ जिन्होंने मुझ जैसे अकिंचन की पोथियां प्रकाशित करने का अनुग्रह किया है। मेरी पूर्व प्रकाशित और पुस्तकों की तरह इसे छापने, प्रकाशित करने और दुबारा छापने का अधिकार भी उन्हीं को है। इतिहास अथवा जीवनचरित्र लिखने में यह मेरा तीसरा उद्योग है। इस से पहले श्रीमती महारानी विक्टोरिया का चरित्र और काबुल के अमीर अवदुुर्रहमानखाँ का चरित्र- यों दो पुस्तकें प्रकाशित होचुकी हैं। इसके अतिरिक्त दो पुस्तकें अभी अमुद्रित हैं सो समय पड़नै पर छपैं ही गी। अब रहा आगे लिखने का कार्य सो उसका आधार पाठकों के- समालोचकों के अनुग्रह पर है। यदि समय मिला, यदि सामग्री मिली और साथ ही यदि उत्साह बढ़ाया गया तो शरीर आरोग्य रहने पर फिर भी उद्योग करना मनुष्य का कर्तव्य है। परमेश्वर ऐसी ही कृपा करै। इस भूमिका को समाप्त करते पूर्व उन हिन्दी रसिकों को भी मैं धन्यवाद देता हूँ जो “अंगीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति” के अनुसार मेरी पुस्तकों का आदर करते हैं और जिन समालोचकों की नीर क्षीर को अलग कर देनेवाली बुद्धि है वे भी धन्यवाद के भागी हैं। {{left| बूँदी राजपुताना माघ कृष्ण ७ सं० १९६९ वि० }} {{right| हिन्दी का एक लघु सेवक- लज्जाराम शर्म्मा. }} [अलंकरण]<noinclude></noinclude> m6iy5w7lc6fcbt3vjaabt2x3hs2p55h 663273 663272 2026-06-19T12:30:14Z Skirti.codes 6559 663273 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(१०)}} यह पोथी संवत् १९६३ में तैयार हुई थी और प्रकाशित होने का सौभाग्य इसे अब प्राप्त हुआ है। इतना विलम्ब होने का कुछ भी कारण हो उसे यहाँ लिखने की आवश्यकता नहीं। हां! “श्रीवेङ्कटेश्वर” यंत्रालय के स्वामी सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी को भी मैं धन्यवाद देताहूँ जिन्होंने मुझ जैसे अकिंचन की पोथियां प्रकाशित करने का अनुग्रह किया है। मेरी पूर्व प्रकाशित और पुस्तकों की तरह इसे छापने, प्रकाशित करने और दुबारा छापने का अधिकार भी उन्हीं को है। इतिहास अथवा जीवनचरित्र लिखने में यह मेरा तीसरा उद्योग है। इस से पहले श्रीमती महारानी विक्टोरिया का चरित्र और काबुल के अमीर अबदुुर्रहमानखाँ का चरित्र- यों दो पुस्तकें प्रकाशित होचुकी हैं। इसके अतिरिक्त दो पुस्तकें अभी अमुद्रित हैं सो समय पड़नै पर छपैं ही गी। अब रहा आगे लिखने का कार्य सो उसका आधार पाठकों के- समालोचकों के अनुग्रह पर है। यदि समय मिला, यदि सामग्री मिली और साथ ही यदि उत्साह बढ़ाया गया तो शरीर आरोग्य रहने पर फिर भी उद्योग करना मनुष्य का कर्तव्य है। परमेश्वर ऐसी ही कृपा करै। इस भूमिका को समाप्त करते पूर्व उन हिन्दी रसिकों को भी मैं धन्यवाद देता हूँ जो “अंगीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति” के अनुसार मेरी पुस्तकों का आदर करते हैं और जिन समालोचकों की नीर क्षीर को अलग कर देनेवाली बुद्धि है वे भी धन्यवाद के भागी हैं। {{left| बूँदी राजपुताना माघ कृष्ण ७ सं० १९६९ वि० }} {{right| हिन्दी का एक लघु सेवक- लज्जाराम शर्म्मा. }} [अलंकरण]<noinclude></noinclude> q0ug34496l7ux7b3iu4xfli8u71o9s4 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६ 250 193479 663274 663231 2026-06-19T15:42:43Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663274 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|महता लज्जाराम शर्मा रचित पुस्तकें।}} (१) श्रीमती महारानी विक्टोरिया का चरित्र १।) (२) काबुल के अमीर अबदुर्रहमानखां का चरित्र ।।।) (३) उम्मेद सिंह चरित्र (४) बीरबल विनोद १।) (५) धूर्तरसिकलाल ।) (६) स्वतंत्र रमा और परतंत्र लक्ष्मी ।-) (७) हिन्दू गृहस्थ ।।=) (८) आदर्श दम्पती ।।=) (९) सुशीला विधवा ।।=) (१०) बिगड़ेका सुधार ।-) (११) विपत्ति की कसौटी (छपरही है) (१२) पराक्रमी हाड़ाराव (तैयार है) (१३) विचित्र स्त्रीचरित्र ।।) (१४) भारत की कारीगरी ।) {{blockcenter| पुस्तक मिलने का ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम् प्रेस- बम्बई। }}<noinclude></noinclude> gresqhqyjf04i86jtwml9glci44qnhx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८ 250 193480 663275 663240 2026-06-19T16:04:29Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663275 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र की|}}</noinclude>{{blockcenter|श्रीहरिः।}} {{blockcenter|{{xxx-larger|'''उम्मेदसिंहचरित्र की-'''}}}} {{blockcenter|{{larger|विषयानुक्रमणिका।}}} {| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | १ | १ | वंशपरिचय । | |- | | | चौहानों और हाडाओं की उत्पत्ति। | १ |- | | | अग्निकुल चारों क्षत्रियों की उत्पत्ति। | {{ditto}} |- | | | अजमेर का किला बनानेवाले अजयपालजी | ४ |- | | | जाहिर पीर गोगाजी | {{ditto}} |- | | | अचलेश्वर के आगे अपना मस्तक काटकर चढानेवाले | {{ditto}} |- | | | रमणेशजी | {{ditto}} |- | | | शाकंभरी का सांग्भर में मंदिर बनवानेवाले महानंदजी | {{ditto}} |- | | | चितोड का किला बनानेवाले चित्रांगजी। | {{ditto}} |- | | | बीसल सागर तालाब अजमेर में बनानेवाले वीसलदेवजी | {{ditto}} |- | | | आना सागर तालाब अजमेर में बनानेवाले आनाजी | {{ditto}} |- | | | भारतवर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट् पृथ्वीराजजी | {{ditto}} |- | | | शरणागत वत्सल हम्मीरजी | {{ditto}} |- | | | हाडा वंश के मूल पुरुष अस्थिपालजी | ५ |- | | | पृथ्वीराजजी के शूर सामन्त हम्मीरजी और गम्भीरजी | ७ |- | | | मांडलगढ बसानेवाले मंडनजी | {{ditto}} |- | | | बूंदी राज्य स्थापन करनेवाले देवसिंहजी | {{ditto}} |- | १ | २ | बूंदी राज्य का संस्थापन । | |- | | | देवसिंहजी ने बादशाह को घोड़ा न दिया | ८ |- | | | बाँदू के नले में बूंदी ३०० घरों की बस्ती थी | {{ditto}} |- | | | देवसिंहजी ने मीनों से बूंदी छीन ली..... | {{ditto}} |- | | | कोटा बसा...... | {{ditto}} |}<noinclude></noinclude> n5qm5ojfp8l63iek2ipclhyqkdcn7kp 663276 663275 2026-06-19T16:05:51Z Skirti.codes 6559 663276 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र की|}}</noinclude>{{blockcenter|श्रीहरिः।}} {{blockcenter|{{xxx-larger|'''उम्मेदसिंहचरित्र की-'''}}}} {{blockcenter|{{larger|विषयानुक्रमणिका।}}}} {| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | १ | १ | वंशपरिचय । | |- | | | चौहानों और हाडाओं की उत्पत्ति। | १ |- | | | अग्निकुल चारों क्षत्रियों की उत्पत्ति। | {{ditto}} |- | | | अजमेर का किला बनानेवाले अजयपालजी | ४ |- | | | जाहिर पीर गोगाजी | {{ditto}} |- | | | अचलेश्वर के आगे अपना मस्तक काटकर चढानेवाले | {{ditto}} |- | | | रमणेशजी | {{ditto}} |- | | | शाकंभरी का सांग्भर में मंदिर बनवानेवाले महानंदजी | {{ditto}} |- | | | चितोड का किला बनानेवाले चित्रांगजी। | {{ditto}} |- | | | बीसल सागर तालाब अजमेर में बनानेवाले वीसलदेवजी | {{ditto}} |- | | | आना सागर तालाब अजमेर में बनानेवाले आनाजी | {{ditto}} |- | | | भारतवर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट् पृथ्वीराजजी | {{ditto}} |- | | | शरणागत वत्सल हम्मीरजी | {{ditto}} |- | | | हाडा वंश के मूल पुरुष अस्थिपालजी | ५ |- | | | पृथ्वीराजजी के शूर सामन्त हम्मीरजी और गम्भीरजी | ७ |- | | | मांडलगढ बसानेवाले मंडनजी | {{ditto}} |- | | | बूंदी राज्य स्थापन करनेवाले देवसिंहजी | {{ditto}} |- | १ | २ | बूंदी राज्य का संस्थापन । | |- | | | देवसिंहजी ने बादशाह को घोड़ा न दिया | ८ |- | | | बाँदू के नले में बूंदी ३०० घरों की बस्ती थी | {{ditto}} |- | | | देवसिंहजी ने मीनों से बूंदी छीन ली..... | {{ditto}} |- | | | कोटा बसा...... | {{ditto}} |}<noinclude></noinclude> f1hlkdog9uynum1wm0bk3l05g6g5pds 663293 663276 2026-06-20T09:06:31Z Skirti.codes 6559 /* प्रमाणित */ 663293 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Skirti.codes" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र की|}}</noinclude>{{blockcenter|श्रीहरिः।}} {{blockcenter|{{xxx-larger|'''उम्मेदसिंहचरित्र की-'''}}}} {{blockcenter|{{larger|विषयानुक्रमणिका।}}}} {| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | १ | १ | वंशपरिचय । | |- | | | चौहानों और हाडाओं की उत्पत्ति। | १ |- | | | अग्निकुल चारों क्षत्रियों की उत्पत्ति। | {{ditto}} |- | | | अजमेर का किला बनानेवाले अजयपालजी | ४ |- | | | जाहिर पीर गोगाजी | {{ditto}} |- | | | अचलेश्वर के आगे अपना मस्तक काटकर चढानेवाले | {{ditto}} |- | | | रमणेशजी | {{ditto}} |- | | | शाकंभरी का सांग्भर में मंदिर बनवानेवाले महानंदजी | {{ditto}} |- | | | चितोड का किला बनानेवाले चित्रांगजी। | {{ditto}} |- | | | बीसल सागर तालाब अजमेर में बनानेवाले वीसलदेवजी | {{ditto}} |- | | | आना सागर तालाब अजमेर में बनानेवाले आनाजी | {{ditto}} |- | | | भारतवर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट् पृथ्वीराजजी | {{ditto}} |- | | | शरणागत वत्सल हम्मीरजी | {{ditto}} |- | | | हाडा वंश के मूल पुरुष अस्थिपालजी | ५ |- | | | पृथ्वीराजजी के शूर सामन्त हम्मीरजी और गम्भीरजी | ७ |- | | | मांडलगढ बसानेवाले मंडनजी | {{ditto}} |- | | | बूंदी राज्य 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रानाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले भांडाजी | ११ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | समरकंद (श्यामजी) | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया | १२ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | नारायणदासजी की बहादुरी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने मांडू के बादशाह का<br> इक्का मारा | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अफीम न मिलने से सांप की जोड़ी | १३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अपना घात करनेवाले रानाजी को सात आदमियों सहित<br> मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये | १४ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | माता के स्तनों से दूध की धारा | १५ |- | १ | ३ | बूँदी राज्य की उन्नति | |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सुरतानजी के अत्यांचार | १६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सुरजनजी को गद्दी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटा और रणथंभोर में सुरजनजी का अधिकार | 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सके „ ``` अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले भांडाजी ११ ``` „ „ समरकंद (श्यामजी) „ „ „ नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया १२ „ „ नारायणदासजी की बहादुरी „ „ „ मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने मांडू के बादशाह का ``` इक्का मारा „ ``` „ „ अफीम न मिलने से सांप की जोड़ी १३ „ „ बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई „ „ „ अपना घात करनेवाले रानाजी को सात आदमियों सहित ``` मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये १४ ``` „ „ माता के स्तनों से दूध की धारा १५ १ ३ बूँदी राज्य की उन्नति „ „ सुरतानजी के अत्यांचार १६ „ „ सुरजनजी को गद्दी „ „ „ कोटा और रणथंभोर में सुरजनजी का अधिकार „ „ „ जलेेवदार के वेश में बादशाह अकबर „ „ „ बादशाह से सात वा दश शर्तें लिखवाकर और सात परगने ``` लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया „ ``` „ „ गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसमेत बावन ``` परगने पाये १७ ``` „ „ सुरजनजी को काशीवास „ „ „ राजमन्दिर आदि बनाये गये „<noinclude></noinclude> jidhrcnoeba6t0emz1o1d1wdg2i2emo 663279 663278 2026-06-19T16:35:13Z Skirti.codes 6559 663279 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र की|}}</noinclude>{| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय | ! पृष्ठ | | ---------------------------------------------------------- | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | बूँदी के चार राजाओं का वानप्रस्थ आश्रम | | ९ | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | गणगौरि छीन लेगया | | {{ditto}} | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | गणगौरि और रानी को शेरगढ़ के राजा से हामाजी छीनलाये<br> | | जब संग्राम में कोई मारनेवाला न मिला तब हालूजी ने शिर<br> | | काट कर भद्रकाली को चढ़ा दिया | | १० | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | श्वसुर ने दामाद रानाजी की मारा | | {{ditto}} | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | रानाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके | | {{ditto}} | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले भांडाजी | | ११ | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | समरकंद (श्यामजी) | | {{ditto}} | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया | | १२ | | - | | {{ditto}} 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परगने<br> | | लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया | | {{ditto}} | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसमेत बावन<br> | | परगने पाये | | १७ | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | सुरजनजी को काशीवास | | {{ditto}} | | - | | {{ditto}} | | {{ditto}} | | राजमन्दिर आदि बनाये गये | | {{ditto}} | | } |<noinclude></noinclude> 66th3go3qq73vtgqs81ii9pkg22ktb0 663280 663279 2026-06-19T16:39:41Z Skirti.codes 6559 663280 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र की|}}</noinclude>{| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बूँदी के चार राजाओं का वानप्रस्थ आश्रम | ९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | गणगौरि छीन लेगया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | गणगौरि और रानी को शेरगढ़ के राजा से हामाजी छीनलाये<br> जब संग्राम में कोई मारनेवाला न मिला तब हालूजी ने शिर<br> काट कर भद्रकाली को चढ़ा दिया | १० |- | {{ditto}} | {{ditto}} | श्वसुर ने दामाद रानाजी की मारा | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | रानाजी मिट्टी की बूँदी को भी न जीत सके | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अकाल में अन्न संग्रह कर प्रजा के प्राण बचानेवाले भांडाजी | ११ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | समरकंद (श्यामजी) | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | नारायणदासजी ने समरकंद का शिर काट लिया | १२ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | नारायणदासजी की बहादुरी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | मेवाड़ की सहायता में नारायणदासजी ने मांडू के बादशाह का<br> इक्का मारा | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अफीम न मिलने से सांप की जोड़ी | १३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह बाबर को जीतकर नारायणदासजी ने दीवानपदवी पाई | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अपना घात करनेवाले रानाजी को सात आदमियों सहित<br> मारकर सूर्यमल्लजी मारे गये | १४ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | माता के स्तनों से दूध की धारा | १५ |- | १ | ३ | बूँदी राज्य की उन्नति | |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सुरतानजी के अत्यांचार | १६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सुरजनजी को गद्दी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटा और रणथंभोर में सुरजनजी का अधिकार | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जलेवदार के वेश में बादशाह अकबर | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह से सात वा दश शर्तें लिखवाकर और सात परगने<br> लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसमेत बावन<br> परगने पाये | १७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सुरजनजी को काशीवास | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | राजमन्दिर आदि बनाये गये | {{ditto}} |}<noinclude></noinclude> 6m6htlznco0scv18ggetujlyn6j5hia 663292 663280 2026-06-20T09:06:18Z Skirti.codes 6559 /* प्रमाणित */ 663292 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Skirti.codes" />{{rh|(२)|उम्मेदसिंह चरित्र की|}}</noinclude>{| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बूँदी के चार राजाओं का वानप्रस्थ आश्रम | ९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | गणगौरि छीन लेगया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | गणगौरि और रानी को शेरगढ़ के राजा से हामाजी छीनलाये<br> जब संग्राम में कोई मारनेवाला न 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| सुरतानजी के अत्यांचार | १६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सुरजनजी को गद्दी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटा और रणथंभोर में सुरजनजी का अधिकार | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जलेवदार के वेश में बादशाह अकबर | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह से सात वा दश शर्तें लिखवाकर और सात परगने<br> लेकर सुरजनजी ने रणथंभौर दिया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | गोंडवाने का विजय कर सुरजनजी ने काशीसमेत बावन<br> परगने पाये | १७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सुरजनजी को काशीवास | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | राजमन्दिर आदि बनाये गये | {{ditto}} |}<noinclude></noinclude> 4xrwtdyh1lgpiqarv9yxpv4p9fa59ys पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२०२ 250 193486 663294 663035 2026-06-20T09:10:18Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663294 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|'''यात्रा का दिग्दर्शन ।''' {{right|('''१७१''')}}}} स्नात बतरसी गिरनार की पुण्य भूमि में जाकर कृत कृत्य हुए । इन्होंने अपना जन्न सफल समझा । जीवन भर में कभी पाप न करने से इनके पुण्यपुंज की वृद्धि हुई । वहां पांडव छत्री में गुप्त वन चढाकर इन्होंने अपस्मृति कुंड किया और तत्र जूनागढ से चलकर माघ कृष्ण ३० को गोमती में जा स्नान किया । उस समय आज कल की तरह रेल नहीं थी और सड़कें भी नहीं थीं, तथापि केवल दो मास में इन्होंने इतनी बडी यात्रा कर ली । वहांसे ज्योतिर्लिंग के दर्शन करके रामहङापुर होतेहुए माघशुक्ला ७ को नौका द्वारा '''द्वारका पहुँचे !'''खोद्वार में स्नान किया, भगवान के दर्शन किये और चार दिन तक उस : वित्र भूमि में निवास करके नाव द्वारा वहांसे प्रयाण कर गोपीतलाई में स्नान्द किया । बस यहीं '''कावाजातिके''' डाकुओं से इनकी, जिसका वर्णन चौथे अध्याय में टाउ साहब के आधार पर किया गया है, मुठभेड हुई। केवल मुठभेड ही क्यों हुई कावापति नगमणि की आज्ञा से सैकडों काबों इनकी '''मुट्ठीभर सेना''' को चारों ओर से इसतरह घेर लिया जिस तरह बालक सूर्यको बादल ढांक लेते हैं अथवा जैसे अभिमन्यु को कौरवोंने घर लिया था। वे लोग ऊँचे २ पहाड़ों पर चढकर इनपर बाणों की वर्षा करने लगे, इनपर पर्वत के बडे २ पत्थर लुढका २ कर मारने लगे और गोलियों के ओलों से इनके शरीर चटाचट घायल करने लगे । अतिवृद्ध होनेपर भी यह बहादुर थे, और शत्रु सेना में घिरजाने पर भी यह हाडा थे । कायाओं ने इनसे बहुतेरा कहा कि " अपने बूढ़े प्राणों को वृथा क्यों खोते हो, अपने पास का माल मता देकर भाग जावो ।" परंतु वीर हाडा, अनेक लडाइयों में विजय पाने वाले, जयपुर का पेट फाडकर बूँदी निकाल लेने वाले उम्मेदसिंहजी प्राणजाने तक भी प्रणभंग करने वाले थोडे ही थे । चारों ओर से घिरजाने पर और शत्रु के हाथ में पजाने पर हिम्मत टूटने के बदले इनका दूना साहस बढा । इन्होंने अण वर्षा के बीच में, बाणों से, गोलियोंसे शरीर छिद २ कर चकनाचूर हो गोली ऐसी मारी जिससे कावापति गमणि का शरीर छिदगया । गोली उसे भेदकर दो और काबाओं को मारती हुई. कल गई । नागमणि का चाचा इनके साथ के सरदार खैराडा के हाथ से मारा- आने पर भी तककर एक ही<noinclude></noinclude> f8ea9ksm99bkdo6ztxb3hex53j78s86 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२०३ 250 193487 663295 663036 2026-06-20T09:10:57Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663295 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>₹ १७२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | गया । वस इनके मारे जाते ही पहाडी लंगूरों की तरह लुटेरे काबा बेकाबू होकर भागगये इन्होंने जिन को मारा उनके शिर काट २ कर साथ लेलिये । इनका एक सिलहदार अमरा, इनका एक घोडा और इनका प्रधान खुशहालचंद्र सो- नानी मारा गया । इनके सिवाय पांच सात आदमी घायल हुए । बस यह बेट होकर रामहडापुर आगये । वहां के राजा ने जब इनसे बहुत बिनती की तब . इन्होंने कात्राओं के कटे शिर उन्हें लौटादिये । इसतरह उस बार की लडाई अवश्य ही समाप्त होगई, परंतु आगे बढने पर फिर कात्राओं ने इनका मार्ग रोकलिया । उस समय थोडी सी लडाई में दो आदमी इधरके और एक उधरका घायल होने बाद नगमणि जो पहले घायल होकर साग गया था पकडा गया । पकडे जाते ही वह श्रीजी साहब के पैरों में पड गया । उसने हाथ जोडकर कहा :- "महाराज, हमारे पुरखे इस जगह गांडीव धनुष त्राले अर्जुन को भी लूट चुके हैं । किन्तु मैं आपकी शरण आया हूँ । 1 " (श्रीजी साहब ने उसे १०० ) और वस्त्र देकर उसका सत्कार किया क्योंकि लुटेरा होने पर भी वह बहादुर था । उससे लिखवा लिया कि अब से कोई भी कात्रा किसी भी यात्रीको न सतावैगा । बस वहां चलकर नयानगर ( जामनगर ) के जाडेचा : यादव यशकरण जी राजा से मिलते हुए संवत् १८३२ की चैत्र शुक्ला १ को बूँदी आपहुँचे । कुछ दिन बडोदिये में विश्राम कर के रामनवमी के दिन केदारेश्वर के निकट अपने निवास स्थान में प्रवेश किया। यहां पधारने के अनंतर आपने बाग कुंड और महल बनाने के लिये अपने पास से हजारों रुपया खर्च करडाला । कात्राओं के विजय का जो वर्णन संक्षेप से टाड साहब ने किया है वही कुछ विस्तार से "वंशभास्कर " में लिखा हुआ है । दोनों पाठकों के सामने हैं केवल अंतर दोनों में इतना ही है कि टाड साहब ने यह बात विष्णुसिंहजी के ही विराजने से पहले लिखी है और "वंशभास्कर" तथा "वंशप्रकाश" नामक ग्रं- थों में बाद | मेरी समझ में यह घटना वाद की ही है और टाड साहब ने -<noinclude></noinclude> 2euoldtfgcn0wg02anqvd1jfsfqwf8r विषयसूची:अर्ध कथानक.pdf 252 193514 663287 2026-06-20T07:30:36Z VishnudevButla 6641 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663287 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=अर्ध कथानक |Language=hi |Volume= |Author=बनारसीदास |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=हिंदी प्रेस रत्नाकर प्राइवेट लिमिटेड |Address=बंबई |Year=1957 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} j6e97xmbpqedf4zu0my0rlxy1qg4fq0 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२० 250 193515 663288 2026-06-20T08:41:50Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663288 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>|- | १ | ३ | दूदा लक्कडखां | १८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सूरत के बादशाह को मारकर अहमदनगर की बेगम को जीतने-<br> पर भोजजी ने बादशाह से चार शर्तें लिखवाई | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सूरत के बादशाह की पगडी का हीरा भोजजी ने अकबर को न दिया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह की बेगम मरने पर भोजजी ने मोंछें न मुंडवाई | १९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुरहानपुर विजयी रत्नजी का अधिकार | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटेमें माधवसिंहजी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाही डेरों को गोवध न करने का रत्नजी ने बादशाह<br> जहाँगीर से प्रण करवाया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | हरिसिंहजी ने शाहजादे खुर्रम से चिलमें भरवाईं | २० |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कुंवर गोपीनाथजी की मृत्यु | २१ |- | १ | ४ | पराक्रम की परिसीमा। | |- | {{ditto}} | {{ditto}} | रावराजा शत्रुशल्य जी को गद्दी। | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह शाहजहाँ के लिये अनेक युद्ध जीतकर शत्रुशल्यजी ने<br> दिल्ली का राज्य बढ़ाया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | शाहजादा दारा के लिये लड़कर धौलपुर में बड़ी बहादुरी के<br> साथ शत्रुशल्यजी मारे गये | २२ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | शत्रुशल्यजी ने बावन युद्धों में विजय पाया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | रावराजा भावसिंहजी को गद्दी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | औरंगाबाद की सूबेदारी | २३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | हिन्दूधर्म की रक्षा के लिये औरंगजेब से न डरे | २४ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | मंदिरों की रक्षा | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | भगवान के विमानों को बादशाह की सेनासे भावसिंहजी ने बचाया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | भावसिंहजी की बहनका बादशाह की सेनासे युद्ध | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अनिरुद्धसिंहजी को गद्दी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | दक्षिण के युद्ध में विजय | २५ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह की बेगम को छुड़ाया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | काबुल में विजयकर वहां ही अनिरुद्धसिंहजी का देहान्त | {{ditto}}<noinclude></noinclude> jssunmefbswqtu2unq545ygqe1124iz 663289 663288 2026-06-20T08:44:18Z Skirti.codes 6559 663289 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{| class="wikitable" |- | १ | ३ | दूदा लक्कडखां | १८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सूरत के बादशाह को मारकर अहमदनगर की बेगम को जीतने-<br> पर भोजजी ने बादशाह से चार शर्तें लिखवाई | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सूरत के बादशाह की पगडी का हीरा भोजजी ने अकबर को न दिया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह की बेगम मरने पर भोजजी ने मोंछें न मुंडवाई | १९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुरहानपुर विजयी रत्नजी का अधिकार 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{{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी का जन्म, विवाह ... | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी ग्यारहवर्ष की उमर में काबुल गये | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | आमेरनरेश ने इन की वीरता देख अपनी कन्या विवाह दी ... | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाही दर्बार में इन्हों ने एक मुगल मार डाला | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | औरंगजेब का अंतिम पश्चाताप | २७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जाजव के मैदान में बुधसिंहजी का पराक्रम | २८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटे से शत्रुता का बीजारोपण | २९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | महारावराजा की पदवी और चौवन परगने मिले... | {{ditto}} |- | २ | {{ditto}} | कोटा और दतिया के राजा तथा शाहजादा मारेगये ... | {{ditto}} |- | {{ditto}} | २ | पिताका पतन । | ३० |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी बाममार्गी होगये ... | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | भाई जोधसिंहजी गणगौरि समेत तालाब में डूबगये ... | ३१ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह ने बूंदी कोटानरेश को देदी ... | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी को फिर बूंदी मिलगई ... | ३२ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजीने बादशाह के प्राण बचाये... | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटे के महारावजी का बूंदी में अधिकार | ३३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी ने फिर बूंदी लेली | {{ditto}} |- | २ | ३ | आमेर से शत्रुता<br>“आमेर नरेश से बुधसिंहजी की शत्रुता के कारण” | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी के साले आमेर नरेश जयसिंहजी का बूंदी लेने का लोभ | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी का रानी कछवाहीजी से विरोध | ३४ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | पांचों लास में बुधसिंहजी से आमेर की सेना का संग्राम | ३६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बूंदी की गद्दी आमेर के जयसिंहजी ने दलेल सिंहजी को देदी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी को हारकर बेंगू जाना पड़ा | ३७ |- | {{ditto}} | ४ | बूंदी छूट गई | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | छः वर्ष में छः बादशाह | {{ditto}} |}<noinclude></noinclude> sv56csi9ebudnhcax1vvvyf1x9pdy6v 663301 663300 2026-06-20T09:23:37Z Skirti.codes 6559 663301 proofread-page text/x-wiki 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| {{ditto}} | बुधसिंहजी बाममार्गी होगये ... | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | भाई जोधसिंहजी गणगौरि समेत तालाब में डूबगये ... | ३१ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बादशाह ने बूंदी कोटानरेश को देदी ... | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी को फिर बूंदी मिलगई ... | ३२ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजीने बादशाह के प्राण बचाये... | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटे के महारावजी का बूंदी में अधिकार | ३३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी ने फिर बूंदी लेली | {{ditto}} |- | २ | ३ | आमेर से शत्रुता<br>“आमेर नरेश से बुधसिंहजी की शत्रुता के कारण” | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी के साले आमेर नरेश जयसिंहजी का बूंदी लेने का लोभ | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी का रानी कछवाहीजी से विरोध | ३४ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | पांचों लास में बुधसिंहजी से आमेर की सेना का संग्राम | ३६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बूंदी की गद्दी आमेर के जयसिंहजी ने दलेल सिंहजी को देदी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी को हारकर बेंगू जाना पड़ा | ३७ |- | {{ditto}} | ४ | बूंदी छूट गई | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | छः वर्ष में छः बादशाह | {{ditto}} |}<noinclude></noinclude> 10k7c125afjlqyi01aj1hqx4tw3cupf पृष्ठ:अर्ध कथानक.pdf/२ 250 193518 663302 2026-06-20T09:29:09Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663302 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter| वीर सेवा मन्दिर दिल्ली कम मन्या काल न मर २६२ ज}<noinclude></noinclude> gldgxoagvwvi8cc9vvywhueaogtak20 663303 663302 2026-06-20T09:30:12Z VishnudevButla 6641 663303 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude> वीर सेवा मन्दिर दिल्ली कम मन्या काल न मर २६२ ज<noinclude></noinclude> d3a6n3tyoy4ai4d278s8705s5j1enep पृष्ठ:अर्ध कथानक.pdf/३ 250 193519 663305 2026-06-20T09:36:56Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663305 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{left|संशोधित साहित्यमाला}} {{right|द्वितीय पुष्प}} {{blockcenter|कविवर बनारसीदासविरचित}} {{blockcenter|{{x-larger|अर्ध कथानक}} सम्पादक नाथूराम प्रेमी }} {{blockcenter| {{x-smaller|{{blockcenter|सोल एजेण्ट}}}} हिन्दी - अन्य - रत्नाकर ( प्राइवेट) लिमिटेड, बम्बई}}<noinclude></noinclude> 9upyruv6d6oye2ozkx47jh7vn1kab9b पृष्ठ:अर्ध कथानक.pdf/४ 250 193520 663306 2026-06-20T09:39:14Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663306 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{left|प्रकाशक--- यशोधर मोदी, विद्याधर मोदी संशोधित साहित्यमाला ठाकुरद्वार - २.}} {{blockcenter| प्रथम संस्करण, १९४३ द्वितीय संशोधित सत्करण अक्टूबर १९५७ मूल्य तीन रुपया}} {{right|मुद्रक-- रघुनाथ दिपाजी देसाई, न्यू भारत प्रिंटिंग प्रेस, ६, वाकी, गिरगांव, बम्बई-४.}}<noinclude></noinclude> 885nmjaoxbzjydhv06slvd0cq1dbghe पृष्ठ:अर्ध कथानक.pdf/५ 250 193521 663307 2026-06-20T09:40:11Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663307 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter| जो अपनी स्वर्गीय जननी के ही समान निष्कपट और साधु-चरित था, जिसने शानकी विविध शाखाओंका विशाल अध्ययन और मनन किया था. जो शीघ्र ही भारती माताके चरणों में अनेक भेंट चढ़ाने मनसूबे बाँध रहा था, परन्तु जिसे देवने अकालमें ही उठा लिया, अपने उसी एकमात्र पुत्र {{larger|स्व० हेमचन्द्रको}}}}<noinclude></noinclude> 93p9mtqnctoakl1ilnst03biy292xxp पृष्ठ:अर्ध कथानक.pdf/६ 250 193522 663308 2026-06-20T09:40:57Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663308 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter|{{x-larger|मुद्रण-कथा}}}} सन् १९०५ म जब मैंने स्वर्गीय गुरुची (पं० पाली पालीवाल) की आशा और अनुरोधसे बना सोविज्ञानका सम्पादन संशोधन किया और उसके प्रारभने कविवर बनारसीदासजीका विस्तृत परिचय लिखा, तब उसकी बड़ी प्रशा हुई और स्व० आचार्य महावीरप्रसादवी द्विवेदी वैसे विद्वानोंने उसकी लम्बी लम्बी समालोचनाएँ लिखी कविवरका उक्त परिचय एक तरहसे इस 'अर्थ कथानक का ही गयानुवाद था। उसे पढ़कर और उसके बीच बीच में 'अर्थ भयानक' के जो पथ उद्धृत किये गये थे, उनपर मुग्ध होकर कई मित्रोंने अनुरोध किया कि यह मूल ग्रन्थ भी ज्योंका त्यों प्रकाशित हो जाना चाहिए, अनुवादकी अपेक्षा मूलका मूल्य बहुत अधिक है। मुझे भी यह बात ठीक थी और मैंने उसी समय इसके प्रकाशित करनेका निश्चय कर लिया; परन्तु वह निश्चय कार्यरूपमे अव ३८ वर्षके बाद परिणत हो रहा है और पाठक यह जानकर तो और भी आश्चर्य करेगे कि इसकी प्रेस-कापी मैंने अपने सहयोगी देवरीनिवासी पं० शिवसहाय चतुर्वेदी सन् १९१२-१३ के लगभग तैयार करा दी थी, फिर भी यह ३० वर्ष तक प्रेमें न जा सकी। गत वर्ष अप्रैल में इसी तरह बरसोंसे पटे हुए जैन साहित्य और इतिहास के कामसे निश्टा ही था और लगे हाथ इस पुस्तकसे भी निवट लेनेकी सोच ही रहा था कि अचानक सा० १० मईको मुझपर ऐसा पात हुआ जिसकी कभी कल्पना भी न की थी। मेरे एकमात्र सुयोग्य और विद्वान् पुत्र हेमचन्द्रका देहान्त हो गया और उसके साथ ही मेरे सारे सकल्प और सारी आशायें धूल मिल गई। इस पुस्तकके छानेकी चर्चा करनेपर स्व० हेमचन्द्रने चालीस ही कहा था कि "दादा यों तो तुम्हे कमी अवकाश मिलनेका नहीं, इसे प्रकाशित करनेका एक ही उपाय है और वह यह कि मूल पुस्तकको आँख बन्द करके प्रेस में दे दिया जाए। ऐसा करनेसे यह कभी न कभी पूरी हो ही जाएगी। " वाग चार महीने बाद शोक और उद्वेग कुछ कम हुआ, तब अपने प्रिय पुत्रकी उक्त सूचना अनुसार पूर्वोच्च प्रेस-कापी प्रेस में दे दी गई और<noinclude></noinclude> jxvz3d82lubzo2jsl9dkhcusx1cgjbd पृष्ठ:अर्ध कथानक.pdf/७ 250 193523 663309 2026-06-20T09:43:50Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663309 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>उसके चार फार्म २०-२५ दिनमें छप भी गये। उसके बाद शब्दकोश, परिशिष्ट आदि तैयार किये जाने लगे और उनके भी दो फार्म फरवरीके प्रारंभ तक छप गये। परन्तु अचानक उसी समय लगभग चार महिनेके लिए मुझे बम्बई छोड़नी पड़ी और इतने समय के लिए फिर यह काम बता पा रहा। यद्यपि मानसिक उद्वेग अनुल्लाह और शरीरकी शिथिलता के कारण पुस्तकका [सम्पादन] [असा] में चाहता था येसा न हो सका। परन्तु सन्तोष यही है कि पुस्तक किसी न किसी प्रकार पूरी हो गई और इतने लम्बे के समय के बाद भी मेरी एक इच्छा पूरी हो गई। घुटिक लिए विद्वान पाठक मेरा वर्तमान अवस्थाका खयाल करके क्षमा कर ही देंगे। पुस्तक अन्तमे शब्दकोश, नामसूची आदिके जो १२ परिधि जोड़े गये हैं ठीक ठीक मर्म समझने के लिए आवश्यक है। इन परिशिष्टोम न० ६७८ प्रायः यही है जो बनारस भूमिकामे दिये गये थे और इतिहास मुशी देवीप्रसादजीने मेरे अनुरोधसे लिख दिया थे। अर्थ अपने अव मित्र प्रो दलाली ना मे हूँ जिन्होंने कथानककी भाषा पर विचार करके पुस्तककी उपयोगिताको बढ़ा दिया है। तीन प्रतियोंके आधार इस पुसकका सम्पादन सशोधन किया गया है। अरब के पनावती मन्दिरकी प्रति जो वि० ० १८४९ को लिखी हुई है। यह प्रति अन्य प्रतियोकी अपेक्षा शुद्ध है और प्रेसकापी इसीपर तैयार कराई थी। जनमन्दिर धरमपुरा देहलीकी प्रति जो पाढ वदी ७० १९०२ की हुई है। सवाडा, देहली मन्दिरको प्रति लिखनेका समय नही दिया है और यह बहुत ही अशुद्ध है। इसमें मिलाकर ६६२ प ही है, ३९२, पिछली दोनो प्रतियों देवी ५५९-६६,६२२, २३, ६६५ और ६७१ नम्बरके १३ पद्म नहीं है। जिसके लिए मैं उनका अतिशय कृतश हूँ। की कृपासे प्राप्त हुई थीं {{left|१५ जून १९४३}} {{right|- नाथूराम प्रेमी}}<noinclude></noinclude> qqhdzze5n2vfk865pk9yto3hxgqeyo2 पृष्ठ:अर्ध कथानक.pdf/८ 250 193524 663310 2026-06-20T09:45:32Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663310 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{x-larger|{{blockcenter|द्वितीय संस्करण}}}} पहली बार जिन तीन हस्तलिखित प्रतियोंके आधारसे अर्थ-कथानकके मूल- पाठका संशोधन किया गया था, उनके सिवाय अबकी बार नीचे लिखी दो प्रतियों का उपयोग और भी किया गया है- ड-एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ताके प्रत्यसादकी ७१७६ नम्बरकी, विना लेखनतिथिकी प्रति को बाबू छोटेलालजी जैनकी कृपासे प्राप्त हुई है। ई- स्वाद्वादविद्यालय बनारसकी स० १९४८ की लिखी हुई प्रति । लेखक, अमीचन्द आवक | यह प्रति पं० केलासचन्द्रजी शास्त्रीने भेजने की कृपा की है। पहली बार जो २३ पृष्ठों की भूमिका थी यह सबकी सब फिरसे लिखी गई है। और अन उसकी ० सं० ९४ हो गई है। इसी तरह अन्तके परिशिष्ट ४० की जगह अब ७६ पृष्ठ हो गये हैं और उनमे बहुतसे नये तथ्य प्रकाशमे साये गये है 'शब्दकोश' पहले पयोके क्रमसे था, अबकी बार वह वर्णानुक्रमसे कर दिया गया है और उसका सशोधन शब्दशास्त्र के सुप्रसिद्ध विद्वान् डा० वासुदेव गरणजी अग्रवालसे करा लिया है। उन्हीं की सूचना अनुसार नाटक समयसारक- तथा बनारसीविलासी समस्त रचनाओंका परिचय भी दे दिया है। माननीय डा० मोतीचन्दजीका में अतिशय कृतश हूँ कि उन्होंने इस मध्य- कालीन असफल व्यापारी और सफल साहित्यिकके सबे और रोचक आत्म- aftaपर अपना वक्त लिख देनेकी कृपा की है। मेरे कृपालु मित्र प० बनारसीदासजी चतुर्वेदीने अपने 'हिन्दी प्रथम आत्म- चरित लेखको कुछ संशोधित और परिवर्तित कर दिया है और डा० ही जैनने 'आत्मकथाकी भाषा मे द्वितीय संस्करणकी विशेषता का अंश और बो दिया है।<noinclude></noinclude> jmis3tc00yyirz3y29kjg2thxe1kx1l पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२ 250 193525 663311 2026-06-20T09:47:17Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663311 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|विषयानुक्रमणिका ।}} {{right|(५)}} {{blockcenter|उम्मेदसिंहचरित्र की-}} {| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | २ | ४ | देश में अराजकता फैली हुई थी | ३७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बुधसिंहजी का स्वर्गवास | ३८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उम्मेदसिंहजी का जन्म | {{ditto}} |- | ३ | | बूंदी का उद्धार | ३९ |- | {{ditto}} | १ | जन्म से तेरह वर्ष | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बालवय के कष्ट | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अकबर की बाल्यावस्था की घटनाओं से मेल | ४० |- | {{ditto}} | {{ditto}} | माता का स्नेह, राज्याभिषेक | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उम्मेदसिंहजी को मंत्रदीक्षा देने का वल्लभ संप्रदायवालों ने डर से निषेध कर दिया | ४२ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | रामानुज संप्रदाय | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उम्मेदसिंहजी की शिक्षा दीक्षा और भगवद्भक्ति | ४३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उनका आचरण और स्वभाव | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | भाई भाई में कलह, वेगूं से निकाले गये | ४४ |- | {{ditto}} | २ | कार्य का आरंभ- पहली जीत । | ४५ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | पहला विवाह | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उन्हें मारने के लिये दलेलसिंहजी ने हाथी भेजा | ४६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुर नरेश जयसिंहजी का देहान्त | ४७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उम्मेदसिंहजी ने पाटन और गैंडोली पर अपना अधिकार कर लिया | ४८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटा नरेश दुर्जनशल्यजी ने उम्मेदसिंहजी की सहायता की | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | युद्ध क्षेत्र में पहली बार उम्मेदसिंहजी, बूंदी विजय | ४९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटेवालों का लोभ | ५१ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उम्मेदसिंहजी ने बूंदी छोड़ दी और जोधपुर गये | ५२ |- | {{ditto}} | ३ | माता का देहान्त । | ५३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटे पर जयपुर की चढ़ाई, कोटा लूटा | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | माता का वियोग | ५५ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | दूसरा विवाह | ५६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | विमाता कछवाहीजी से मेल | ५७ |}<noinclude></noinclude> aibxeu5ub1v2kc41jrdj0zkt27ja5y0 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३ 250 193526 663314 2026-06-20T10:30:00Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663314 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|विषयानुक्रमणिका की—}} {{right|'''(६)'''}} {{blockcenter|उम्मेदसिंहचरित्र की-}} {| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | ३ | ४ | बूंदी में उम्मेदसिंहजी | ५७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | मीना जाति का उम्मेदसिंहजी पर प्रेम | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बूढ लुहारी का संग्राम | ५८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | वीचडी के मैदान में उम्मेदसिंहजी ने बूंदी की सेनासे विजय पाया | ५९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बूंदीमें सोलह दिन उम्मेदसिंहजी का राज्य | ६० |- | {{ditto}} | {{ditto}} | दलेल सिंहजी ने उम्मेद सिंहजी के डर से जयपुर नरेश को<br> बूंदी के लिये फारिगखती लिख दी | ६२ |- | {{ditto}} | ५ | लोमहर्षण संग्राम, बूंदी छूटगई । | ६३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुर नरेश की बूंदी पर चढ़ाई | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुरवालों से लड़ने के लिये उम्मेदसिंहजी की तैयारी | ६५ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अमर पुरे के संग्राम में उम्मेदसिंहजी की बहादुरी | ६६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उनके घोड़े की टांग टूट गई | ६७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उमरावों ने रणभूमि से चले जाने के लिये<br> उम्मेदसिंहजी को शपथ दिलवाया | ६८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | पैदल चलकर उम्मेद सिंहजी इन्द्रगढ गये | ६९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | युद्ध में पराक्रम करने पर उम्मेद सिंहजी की प्रशंसा | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | देवसिंहजी ने घोडा न देकर कटु वचन कहे | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उम्मेदसिंहजी मधुकर गढ चले गये | {{ditto}} |- | {{ditto}} | ६ | हारने पर भी न हारे । | ७१ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुर के लिये यह लड़ाई बड़ी भारी पड़ी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुर ने कोटे को मिलाया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | दो सो रुपया दैनिक लेकर कोटे ने<br> उम्मेदसिंहजी को न दिया | ७२ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | रानाजी ने उम्मेदसिंहजी के लिये घोड़ा भेजा | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | तीसरा विवाह | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | भोग विलास में रत न हुए | ७३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटेवालों ने उम्मेदसिंहजी को लड़ने से रोका | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | टाड साहब कहते हैं कि कोटे की सहायता से<br> उम्मेदसिंहजी ने बूंदी ली तो सही परंतु<br> जयपुरवालों ने फिर बूंदी छीन ली | ७४ |}<noinclude></noinclude> 01g67c1pbpktp3vds5r0lx58jsnal2v 663315 663314 2026-06-20T10:31:02Z Skirti.codes 6559 663315 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{left|(६)}} {{blockcenter|उम्मेदसिंहचरित्र की-}} {| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | ३ | ४ | बूंदी में उम्मेदसिंहजी | ५७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | मीना जाति का उम्मेदसिंहजी पर प्रेम | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बूढ लुहारी का संग्राम | ५८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | वीचडी के मैदान में उम्मेदसिंहजी ने बूंदी की सेनासे विजय पाया | ५९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बूंदीमें सोलह दिन उम्मेदसिंहजी का राज्य | ६० |- | {{ditto}} | {{ditto}} | दलेल सिंहजी ने उम्मेद सिंहजी के डर से जयपुर नरेश को<br> बूंदी के लिये फारिगखती लिख दी | ६२ |- | {{ditto}} | ५ | लोमहर्षण संग्राम, बूंदी छूटगई । | ६३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुर नरेश की बूंदी पर चढ़ाई | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुरवालों से लड़ने के लिये उम्मेदसिंहजी की तैयारी | ६५ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | अमर पुरे के संग्राम में उम्मेदसिंहजी की बहादुरी | ६६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उनके घोड़े की टांग टूट गई | ६७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उमरावों ने रणभूमि से चले जाने के लिये<br> उम्मेदसिंहजी को शपथ दिलवाया | ६८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | पैदल चलकर उम्मेद सिंहजी इन्द्रगढ गये | ६९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | युद्ध में पराक्रम करने पर उम्मेद सिंहजी की प्रशंसा | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | देवसिंहजी ने घोडा न देकर कटु वचन कहे | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | उम्मेदसिंहजी मधुकर गढ चले गये | {{ditto}} |- | {{ditto}} | ६ | हारने पर भी न हारे । | ७१ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुर के लिये यह लड़ाई बड़ी भारी पड़ी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुर ने कोटे को मिलाया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | दो सो रुपया दैनिक लेकर कोटे ने<br> उम्मेदसिंहजी को न दिया | ७२ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | रानाजी ने उम्मेदसिंहजी के लिये घोड़ा भेजा | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | तीसरा विवाह | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | भोग विलास में रत न हुए | ७३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कोटेवालों ने 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ईश्वरीसिंहजी का गिराव | ७७ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | कामदार की लड़की पर ईश्वरीसिंहजी आसक्त हो गये | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | होलकर से उम्मेद सिंहजी मिले | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | होलकर ने उम्मेद सिंहजी को बूंदी देदेने का जयपुर पर जोर डाला | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | होलकर ने जयपुर पर चढ़ाई की | ७८ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुर होलकर का भयानक संग्राम | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुर हार गया | ७९ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयपुरवालों को उम्मेदसिंहजी के तांई लाचारी से बूंदी देनी पड़ी,<br> जयपुर से बूंदी का झगड़ा मिट गया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | टाड साहब के मत से माता कछवाहीजी ने होलकर के राखी<br> बांधकर जयपुर पर चढ़ाया | ८० |- | {{ditto}} | {{ditto}} | टाड साहब के मत का बूंदी के इतिहास से मिलान और उस<br> पर इस चरित्र लेखक की राय | ८१ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | सदा के लिये उम्मेदसिंहजी ने बूंदी प्राप्त की | ८२ |- | {{ditto}} | ८ | उम्मेदसिंहजी का बूंदी में राज्याभिषेक । | ८३ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | ईश्वरीसिंहजी ने गैंडोली के परगनेके लिये लालच किया | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | बूंदी में उम्मेद सिंहजी को होलकर ने राज तिलक किया | ८५ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | मेहमानों की पहरावनी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | जयश्रीकृष्ण के बदले "जयश्रीरंगनाथजी की" | ८६ |- | {{ditto}} | {{ditto}} | भूमिवालों को खोजकर उन की भूमि लौटा दी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | शत्रुओं की दीहुई भूमि भी बहाल रक्खी | {{ditto}} |- | {{ditto}} | {{ditto}} | दलेलसिंहजी का देहान्त | {{ditto}} |}<noinclude></noinclude> ega313xua54tsk0pwfcoga4fwm6r10r विषयसूची:दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf 252 193528 663318 2026-06-20T10:56:00Z VishnudevButla 6641 "" के साथ नया पृष्ठ बनाया 663318 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ। |Language=hi |Volume= |Author=नाथूराम प्रेमी |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=श्रीजैनग्रन्थरलाकर |Address=बम्बई |Year=1911 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=X |Pages=<pagelist 1to852 /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 3jcvsn05byqyl6kk9nik9e0vz2shgeg पृष्ठ:दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf/१ 250 193529 663324 2026-06-20T11:00:38Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663324 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter| ॥ श्री वीतरागाय नमः ॥ {{x-larger|दिगम्बर जैन ग्रन्थकर्त्ता}} और उनके ग्रन्थ | [ जैनहितैषीसे-उद्धृत ] {{larger|श्रीजैन ग्रन्थरत्नाकर कार्यालय बम्बई द्वारा}} कर्नाटक प्रेस में छपकर प्रकाशित । ———————————————————— श्री वीर नि० सं० २४३७ ईसवी सन् १९११}} {{left|प्रथमावृत्ति ]}} {{right|[ मू० तीन आना}}<noinclude></noinclude> mvvey4xxo1v5jymcbuxkhcd3l32b457 पृष्ठ:दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf/२ 250 193530 663326 2026-06-20T11:01:18Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663326 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude><noinclude></noinclude> 70hck57wf9eoj9vbuqtnxpwfei1vdh0 पृष्ठ:दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf/३ 250 193531 663327 2026-06-20T11:01:46Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663327 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter|{{x-larger|प्रस्तावना ।}}}} जैनधर्मका संस्कृत प्राकृत तथा भाषाका साहित्य कितना बड़ा यह बतलाने के लिये अभीतक कोई ऐसी पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई थी जिससे सर्वसाधारणको लाभ पहुंच सके और साहित्यकी दृष्टिसे इसकी बहुत आवश्यकता थी, इसलिये मैने यह उद्योग किया है। यद्यपि इस कार्य सम्पादन करनेके लिये जितनी योग्यता चाहिये उसका एक अंश भी मुझमें नहीं है, और ऐसे महत्कार्य के लिये जितने साहित्य तथा समयकी आवश्यकता है, वह भी मेरे पास नहीं है, तो भी अपने समाजकी किसी भी सस्थाकी ओरसे इस विषय में प्र- यत्न होते न देखकर बल्कि इस विषयसे अरुचि देखकर मै अपने उत्साहको रोक नहीं सका और विवश होकर मैंने इस कार्यमें हाथ डाल दिया । मुझमें जितनी शक्ति थी, उसके अनुसार इसके सम्पादन करनेमें मैने कुछ भी उठा नहीं रक्खा है, तो भी इसमें भूलें बहुत हुई होंगी, क्योंकि इसका अधिक भाग दूसरोंकी रिपोर्टों तथा सूचियोंपर से लिखा गया है—स्वयं ग्रन्थ देखकर तथा उनकी प्रशस्तियां पढ़कर ही नहीं । और यह अपूर्ण भी है। खोज करनेसे इनके सिवाय और भी सैकड़ों ग्रन्थकर्त्ताओंका तथा उनके ग्रन्थोंका पता लग सकता है । परन्तु “निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते" अर्थात् जिस देशमें वृक्ष नहीं होते है, वहां एरंड भी वृक्षका काम देता है । इस न्यायसे हमको आशा है कि हमारी यह अनेक त्रुटि- पूर्ण सूची भी समाजकी दृष्टिमें उपकारी जॅचेगी । और समाजके नेताओं को एक विश्वस्त तथा विशाल सूची तयार करानेके लिये उत्साहित करेगी । }<noinclude></noinclude> 60qw9lq1tgo4tqinrqy024nu2mt93w1 पृष्ठ:दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf/४ 250 193532 663329 2026-06-20T11:02:39Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663329 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter|२}} संस्कृत ग्रन्थकर्ताओं की सूची तयार करने में हमको विशेष करके निम्नलिखित पुस्तक तथा रिपोर्टोंसे सहायता मिली है:-- १. मि० भगवानदास कल्याणजी नामके एक सज्जन डाक्टर पिटर्सनकी ओरसे ग्रन्थसंग्रह करनेवाले एक प्रधान कर्मचारी थे । आपने अनेक रिपोर्टों तथा प्राचीन भंडारोंका निरीक्षण करके दिगम्बर जैनग्रन्थ- कर्त्ताओंकी एक सूची तयार की थी और उसकी एक नकल उन्होंने मान्यवर पंडित पन्नालालजी वाकलीवालको कृपाकरके प्रदान की थी, उस सूचीपरसे । २. वम्बई सरस्वतीभंडार में एक पोथी है, जिसे आष्टा (भोपाल)- के किसी सज्जनने दी थी। उक्त पोयीमें किसी विद्वानकी संग्रह की हुई एक पट्टावली है, जिसमें थोडेसे आचार्योंके नाम तथा उनके ग्रन्थोंकी सूची दी है. उस पट्टावलीपरसे । २. दानवीर शेठ माणिकचन्द हीराचन्दजीने ईडरके सरस्वतीभंडा- रके कई सौ ग्रन्थोंकी प्रशस्तियोंका जो एक संग्रह कराया है, उसपरसे। ४. श्रीवर्धमान जैनग्रन्थालय जयपुरकी ओरसे जो जयपुरके ८ भंडारोंकी सूची हुई है, उसकी नकलपरसे । १. जैनबोधककी पुरानी फाइलोंमें छपी हुई श्रवणबेलगुल तथा मूडविद्री आदिके भंडारोंकी सूचीपरसे । १ महासभाकी ओरसे दिगम्बर जैन ग्रन्थोंकी एक सूची तयार होना चाहिये, जिसमें अन्यका नाम, उसकी श्लोकसंख्या, आचार्यका नाम, बननेका समय, जिस भढारमें यह प्रन्थ हो उसका ठिकाना, आदि सब बातें हो । श्वेताम्बर जैन- कान्फरेंसकी ओरसे श्वेताम्बर भन्योंकी "जैनप्रन्यावली" नामकी एक ऐसी ही विस्तृत सूची २५० पृष्ठकी छपी है।<noinclude></noinclude> p8zzq9gysdca0qt296um9xstmb7x62u पृष्ठ:दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf/५ 250 193533 663331 2026-06-20T11:03:43Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663331 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude>{{blockcenter|३ }} ६. डेक्कन कालेज लायब्रेरी पूनामें जो जैनग्रन्थोंका बड़ा भारी संग्रह है, उसके सूचीपत्र परसे । ७. बम्बई सरस्वतीभंडारके ग्रन्थों परसे । इसीप्रकार भाषाग्रन्थकारोंकी सूची तयार करनेमें जयपुर सरस्वती- सदनके सम्पादक बाबा दुलीचन्दजीकी छपाई हुई 'जैन शास्त्रनाममाला भाषा' की, लाहौर के बाबू ज्ञानचन्द्रजीके छपाई हुई 'नाममाला' की और जयपुरकी वर्धमानग्रंथालयसम्पादित 'सूची' की सहायता ली है । हमारा विश्वास है कि, यदि प्रयत्न किया जायगा, तो भाषा ग्रन्थोंका इस सूचीके सिवाय और भी पता लगेगा। क्योंकि सत्रहवीं सदी के पहलेकी पुरानी हिन्दीमें जैनकवियोंने सैकड़ों रासा और चरित्र लिखे है । परन्तु इसमें एक दोके सिवाय उनका नाम भी नहीं आया है । युक्तप्रान्त तथा बुन्देलखंड के कवि भी इसमें बहुत थोड़े जान पड़ते है । इस लिये हम अपने पाठकोंसे ऐसे ग्रन्थोंकी खोज में रहने और उनकी सूचना देनेके लिये प्रार्थना करते है । शेष ग्रन्थकारों तथा उनके ग्रंथोंका पता लगनेपर हम इस सूचीका एक परिशिष्ट भाग फिर प्रकाशित कर देंगे। हमारा यह भी विचार है कि, संस्कृत प्राकृत और हिंदीके समान कानड़ी, तामिल, द्राविड़ और मराठीके दिगम्बर जैनग्रंथकर्ताओंकी भी एक सूची प्रकाशित करें । प्रयत्न हो रहा है, यदि सफलता हुई, तो पाठकों को वह भी शीघ्र भेंट की जायगी । एवमस्तु । {{right|सरस्वती सेवक ----- नाथूराम प्रेमी.}}<noinclude></noinclude> fwer3hq9317inye2tx7pidx7th6h8t1 पृष्ठ:दिगम्बर जैन ग्रन्थ कर्ता और उनके ग्रन्थ।.pdf/६ 250 193534 663332 2026-06-20T11:04:05Z VishnudevButla 6641 /* शोधित */ 663332 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="VishnudevButla" /></noinclude><noinclude></noinclude> 70hck57wf9eoj9vbuqtnxpwfei1vdh0 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५ 250 193535 663350 2026-06-20T11:24:42Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663350 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{center|विषयानुक्रमणिका । <span style="float:right;">(८)</span>}} {| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | ३ | ९ | कोटेवालों का प्रपंच । | ८७ |- | „ | „ | जोधपुर नरेश का अपने भाई से कलह, उम्मेदसिंहजी सहायता के लिये गये … | „ |- | „ | „ | मारवाड़ की सेना में घुसकर अकेले उम्मेदसिंहजी ने अपने शरर्णागत के घातक को मारा | ८८ |- | „ | „ | उम्मेदसिंहजी ने बूंदी के कांटे निकाल राजभक्तों को प्रसन्न किया | ८९ |- | „ | „ | कोटेवालों ने दलेलसिंहजी के बेटे कृष्णसिंह जी को बहकाया | „ |- | „ | „ | कोटेवालों ने रानाजी को और पेशवा के मंत्री को बहकाया | ९० |- | „ | „ | बूंदी में श्रावणी तीज का नया उत्सव आरंभ हुआ | ९१ |- | „ | „ | उम्मेदसिंहजी की दक्षिणयात्रा, होलकर से मिले | „ |- | „ | „ | बूंदी के कामदार का प्रजा पर अत्याचार | ९२ |- | „ | „ | उम्मेद सिंहजी की आज्ञा से भजनेरी के जागरिदार ने आकर कामदार कैद कर लिया, कोटेवालों ने कामदार को सहायता दी | „ |- | „ | „ | सतारा के राजा से उम्मेदसिंहजी मिले | ९३ |- | „ | „ | कोटेवालों ने उदयपुरवालों को बहकाया | „ |- | „ | „ | कोटेवालों की बहकावट से दलेल सिंह जी के पुत्रने बूंदी पर चढ़ाई की | „ |- | „ | „ | कोटेवालों ने कृष्ण सिंह जी को सहायता न दी तब वह भाग गये | ९४ |- | ३ | „ | उम्मेदसिंहजी का बूंदी आगमन | „ |- | „ | १० | होलकर जयपुर का संग्राम, जयपुर का रनवास | „ |- | „ | „ | रानाजी ने उम्मेद सिंह जी के लिये राज तिलक का दस्तूर भेजा | „ |- | „ | „ | होलकर की जयपुर पर चढ़ाई | ९५ |- | „ | „ | जयपुर नरेश का उम्मेदसिंहजी के नाम पत्र | „ |- | „ | „ | अपनी लड़की पर आसक्त हो जाने का जयपुर के कामदार ने ईश्वरीसिंहजी से बदला लिया | ९६ |- | „ | „ | ईश्वरीसिंहजी जहर खाकर मरगये | ९७ |- | „ | „ | पराये कफन से उनका दाह हुआ | ९८ |- | „ | „ | ईश्वरी सिंहजी के कुकर्मों की कथा | „ |}<noinclude></noinclude> gnrhj59r8ryunwwlmognws252o202gn 663355 663350 2026-06-20T11:54:33Z Skirti.codes 6559 663355 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{| style="width:100%;" | style="width:15%; text-align:left;" | '''(८)''' | style="width:70%; text-align:center;" | '''उम्मेदसिंहचरित्र की—''' | style="width:15%;" | |} {| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | ३ | ९ | कोटेवालों का प्रपंच । | ८७ |- | „ | „ | जोधपुर नरेश का अपने भाई से कलह, उम्मेदसिंहजी सहायता के लिये गये … | „ |- | „ | „ | मारवाड़ की सेना में घुसकर अकेले उम्मेदसिंहजी ने अपने शरर्णागत के घातक को मारा | ८८ |- | „ | „ | उम्मेदसिंहजी ने बूंदी के कांटे निकाल राजभक्तों को प्रसन्न किया | ८९ |- | „ | „ | कोटेवालों ने दलेलसिंहजी के बेटे कृष्णसिंह जी को बहकाया | „ |- | „ | „ | कोटेवालों ने रानाजी को और पेशवा के मंत्री को बहकाया | ९० |- | „ | „ | बूंदी में श्रावणी तीज का नया उत्सव आरंभ हुआ | ९१ |- | „ | „ | उम्मेदसिंहजी की दक्षिणयात्रा, होलकर से मिले | „ |- | „ | „ | बूंदी के कामदार का प्रजा पर अत्याचार | ९२ |- | „ | „ | उम्मेद सिंहजी की आज्ञा से भजनेरी के जागरिदार ने आकर कामदार कैद कर लिया, कोटेवालों ने कामदार को सहायता दी | „ |- | „ | „ | सतारा के राजा से उम्मेदसिंहजी मिले | ९३ |- | „ | „ | कोटेवालों ने उदयपुरवालों को बहकाया | „ |- | „ | „ | कोटेवालों की बहकावट से दलेल सिंह जी के पुत्रने बूंदी पर चढ़ाई की | „ |- | „ | „ | कोटेवालों ने कृष्ण सिंह जी को सहायता न दी तब वह भाग गये | ९४ |- | ३ | „ | उम्मेदसिंहजी का बूंदी आगमन | „ |- | „ | १० | होलकर जयपुर का संग्राम, जयपुर का रनवास | „ |- | „ | „ | रानाजी ने उम्मेद सिंह जी के लिये राज तिलक का दस्तूर भेजा | „ |- | „ | „ | होलकर की जयपुर पर चढ़ाई | ९५ |- | „ | „ | जयपुर नरेश का उम्मेदसिंहजी के नाम पत्र | „ |- | „ | „ | अपनी लड़की पर आसक्त हो जाने का जयपुर के कामदार ने ईश्वरीसिंहजी से बदला लिया | ९६ |- | „ | „ | ईश्वरीसिंहजी जहर खाकर मरगये | ९७ |- | „ | „ | पराये कफन से उनका दाह हुआ | ९८ |- | „ | „ | ईश्वरी सिंहजी के कुकर्मों की कथा | „ |}<noinclude></noinclude> nf7x4z03a25a13y589f54vyj7r8kbsv पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२६ 250 193536 663351 2026-06-20T11:44:36Z Skirti.codes 6559 /* शोधित */ 663351 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{center|विषयानुक्रमणिका । <span style="float:right;">(९)</span>}} {| class="wikitable" ! खंड ! अध्याय ! विषय ! पृष्ठ |- | ३ | १० | होलकर के पुत्रने जयपुर की रानियों पर मन चलाया | ९९ |- | „ | „ | उम्मेद सिंह जी ने जयपुर के जनाने की इज्जत बचाई | „ |- | „ | „ | माधवसिंहजी को जयपुर की गद्दी | „ |- | „ | „ | टाड साहब के मतसे उम्मेद सिंह जी को बूंदी दिलाने में होलकर का स्वार्थ | १०१ |- | „ | „ | पाटन के तीन हिस्से | „ |- | „ | ११ | भाई की बंहकावट, देवसिंहजी का बध | १०२ |- | „ | „ | महाराज कुमार अजितसिंह जी का जन्म | „ |- | „ | „ | उम्मेदसिंह जी ने भाई दीपसिंह जी का विवाह किया | १०३ |- | „ | „ | कोटेवालों की बंहकावट से दीपसिंह जी कोटे चले गये | „ |- | „ | „ | इन्द्रगढवाले देवसिंह जी ने दीपसिंहजी को राज्य का लालच दिलाकर जयपुर भेजा | „ |- | „ | „ | उम्मेद सिंह जी को भाई रूठ जानेका खेद, उन्हें बुलाने का उद्योग | १०४ |- | „ | „ | बूंदी के महल में श्रीरंगनाथजी की स्थापना | १०५ |- | „ | „ | महाराज कुमार बहादुर सिंह जी का जन्म | „ |- | „ | „ | कलकत्ते की काल कोठरी में अंगरेज कैद, झांसी में अंगरेजों का विजय | „ |- | „ | „ | देवसिंह जी की चिट्ठी पकड़ी गई | १०६ |- | „ | „ | उम्मेद सिंह जी ने यह चिट्ठी होलकर आदि को दिखलाई तब उन्होंने देव सिंह जी को मार डालने की सलाह दी... | „ |- | „ | „ | करवर में उम्मेद सिंह जी ने देवसिंह जी को मारकर उन के पुत्र को कैद किया | १०७ |- | „ | „ | इन्द्रगढ़ खातोली आदि में उम्मेद सिंह जी ने अपना अधिकार कर किले बनवाकर देव सिंह जी के भाई को इन्द्रगढ़ देदिया | „ |- | „ | „ | टाड साहब का देव सिंहजी के मारने पर उम्मेद सिंह जी को कलंकित मानना, देव सिंहजी के अपराधों पर दृष्टि देकर टाड साहब के मतका खंडन | १०८ |}<noinclude></noinclude> fe0lgp787a9tf8tuawmgr8wjxfq7sb0 663352 663351 2026-06-20T11:49:04Z Skirti.codes 6559 663352 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{center|विषयानुक्रमणिका । <span style="float:right;">(९)</span>}} {{center|उम्मेदसिंहचरित्र की—}} {| style="width:100%; text-align:center;" | style="width:10%;" | '''खंड''' | style="width:10%;" | '''अध्याय''' | style="width:65%;" | '''विषय''' | style="width:15%;" | '''पृष्ठ''' |} {| class="wikitable" |- | ३ | १० | होलकर के पुत्रने जयपुर की रानियों पर मन चलाया | ९९ |- | „ | „ | उम्मेद सिंह जी ने जयपुर के जनाने की इज्जत बचाई | „ |- | „ | „ | माधवसिंहजी को जयपुर की गद्दी | „ |- | „ | „ | टाड साहब के मतसे उम्मेद सिंह जी को बूंदी दिलाने में होलकर का स्वार्थ | १०१ |- | „ | „ | पाटन के तीन हिस्से | „ |- | „ | ११ | भाई की बंहकावट, देवसिंहजी का बध | १०२ |- | „ | „ | महाराज कुमार अजितसिंह जी का जन्म | „ |- | „ | „ | उम्मेदसिंह जी ने भाई दीपसिंह जी का विवाह किया | १०३ |- | „ | „ | कोटेवालों की बंहकावट से दीपसिंह जी कोटे चले गये | „ |- | „ | „ | इन्द्रगढवाले देवसिंह जी ने दीपसिंहजी को राज्य का लालच दिलाकर जयपुर भेजा | „ |- | „ | „ | उम्मेद सिंह जी को भाई रूठ जानेका खेद, उन्हें बुलाने का उद्योग | १०४ |- | „ | „ | बूंदी के महल में श्रीरंगनाथजी की स्थापना | १०५ |- | „ | „ | महाराज कुमार बहादुर सिंह जी का जन्म | „ |- | „ | „ | कलकत्ते की काल कोठरी में अंगरेज कैद, झांसी में अंगरेजों का विजय | „ |- | „ | „ | देवसिंह जी की चिट्ठी 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भाई की बंहकावट, देवसिंहजी का बध | १०२ |- | „ | „ | महाराज कुमार अजितसिंह जी का जन्म | „ |- | „ | „ | उम्मेदसिंह जी ने भाई दीपसिंह जी का विवाह किया | १०३ |- | „ | „ | कोटेवालों की बंहकावट से दीपसिंह जी कोटे चले गये | „ |- | „ | „ | इन्द्रगढवाले देवसिंह जी ने दीपसिंहजी को राज्य का लालच दिलाकर जयपुर भेजा | „ |- | „ | „ | उम्मेद सिंह जी को भाई रूठ जानेका खेद, उन्हें बुलाने का उद्योग | १०४ |- | „ | „ | बूंदी के महल में श्रीरंगनाथजी की स्थापना | १०५ |- | „ | „ | महाराज कुमार बहादुर सिंह जी का जन्म | „ |- | „ | „ | कलकत्ते की काल कोठरी में अंगरेज कैद, झांसी में अंगरेजों का विजय | „ |- | „ | „ | देवसिंह जी की चिट्ठी पकड़ी गई | १०६ |- | „ | „ | उम्मेद सिंह जी ने यह चिट्ठी होलकर आदि को दिखलाई तब उन्होंने देव सिंह जी को मार डालने की सलाह दी... | „ |- | „ | „ | करवर में उम्मेद सिंह जी ने देवसिंह जी को मारकर उन के पुत्र को कैद किया | १०७ |- | „ | „ | इन्द्रगढ़ खातोली आदि में उम्मेद सिंह जी ने अपना अधिकार कर किले बनवाकर देव सिंह जी के भाई को इन्द्रगढ़ देदिया | „ |- | „ | „ | टाड साहब का देव सिंहजी 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