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अमृता कुमारी पाण्डेय
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|-
| ३०. || अफगानी हमलेका हौआ (४-५-१९२१) || ४८
|-
| ३१. || गांधी—तब और अब (४-५-१९२१) || ६०
|-
| ३२. || भाषण : कपड़वंजकी सार्वजनिक सभामें (४-५-१९२१) || ६२
|-
| ३३. || भाषण : महिलाओंकी सभा, कठलालमें (४-५-१९२१) || ६३
|-
| ३४. || पारसियोंके प्रति मैं क्यों आशावान हूँ? (५-५-१९२१) || ६३
|-
| ३५. || एक पारसी बहनका पुरस्कार (५-५-१९२१) || ६५
|-
| ३६. || पत्र : देवचन्द पारेखको (५-५-१९२१) || ६६
|-
| ३७. || भाषण : महाराष्ट्र प्रान्तीय सम्मेलन, वसई में (७-५-१९२१) || ६६
|-
| ३८. || मालेगाँवका अपराध (८-५-१९२१) || ६९
|-
| ३९. || टिप्पणियाँ (८-५-१९२१) || ७२
|-
| ४०. || भाषण : मानपत्रके उत्तर में (१०-५-१९२१) || ८१
|-
| ४१. || टिप्पणियाँ (११-५-१९२१) || ८४
|-
| ४२. || हिन्दू-मुस्लिम एकता (११-५-१९२१) || ८८
|-
| ४३. || अकाल-सहायताके लिए कताई (११-५-१९२१) || ८९
|-
| ४४. || करघेका अधिक प्रयोग (११-५-१९२१) || ९०
|-
| ४५. || अली भाइयोंकी क्षमा-याचनाका मसविदा (१४-५-१९२१ अथवा उसके बाद) || ९२
|-
| ४६. || पेचीदा मामला (१५-५-१९२१) || ९३
|-
| ४७. || टिप्पणियाँ (१५-५-१९२१) || ९६
|-
| ४८. || भाषण : शिमलाकी सार्वजनिक सभामें (१५-५-१९२१) || ९९
|-
| ४९. || तार : सिलहट कांग्रेस कमेटीके मन्त्रीको (१७-५-१९२१) || १०१
|-
| ५०. || तार : चित्तरंजन दासको (१७-५-१९२१) || १०१
|-
| ५१. || टिप्पणियाँ (१८-५-१९२१) || १०२
|-
| ५२. || हमारे पड़ोसी (१८-५-१९२१) || १०६
|-
| ५३. || हिन्दुओ सावधान (१८-५-१९२१) || १०८
|-
| ५४. || इश्तिहार (१९-५-१९२१) || ११०
|-
| ५५. || एक परिपत्र (२०-५-१९२१) || ११०
|-
| ५६. || तार : जमनालाल बजाजको (२०-५-१९२१) || १११
|-
| ५७. || भाषण : रेलवे स्टेशनपर (२१-५-१९२१) || ११२
|-
| ५८. || भाषण : भुसावलमें (२१-५-१९२१) || ११२
|-
| ५९. || भाषण : संगमनेरकी सभायें (२२-५-१९२१) || ११४
|-
| ६०. || पाँच सौवीं मंजिल (२२-५-१९२१) || ११५
|-
| ६१. || टिप्पणियाँ (२२-५-१९२१) || ११७
|-
| ६२. || पत्र : न॰ चि॰ केलकरको (२३-५-१९२१) || १२२
|-
| ६३. || भाषण : बरसीमें (२४-५-१९२१) || १२३
|-
| ६४. || टिप्पणियाँ (२५-५-१९२१) || १२५
|-
| ६५. || बाजी लगानेकी लत (२५-५-१९२१) || १३१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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|-
| ६६. || शिमला-यात्रा (२५-५-१९२१) || १३२
|-
| ६७. || सीमा-प्रान्तके साथी (२५-५-१९२१) || १३६
|-
| ६८. || मध्य प्रान्तमें दमन (२५-५-१९२१) || १३८
|-
| ६९. || कराचीसे प्रतिवाद (२५-५-१९२१) || १३९
|-
| ७०. || नागरिकों द्वारा दिये गये अभिनन्दनपत्रका उत्तर (२६-५-१९२१) || १४२
|-
| ७१. || तार : महादेव देसाईको (२७-५-१९२१) || १४३
|-
| ७२. || बीजापुरके अभिनन्दनपत्रोंका उतर (२७-५-१९२१) || १४३
|-
| ७३. || पत्र : हसन इमामको (२७-५-१९२१ के बाद) || १४६
|-
| ७४. || सन्देश : गयाकी जनताके नाम (२९-५-१९२१) || १४६
|-
| ७५. || गुजरातके धनिक-वर्गसे (२९-५-१९२१) || १४७
|-
| ७६. || गुजरातसे बाहर रहनेवाले गुजरातियोंसे (२९-५-१९२१) || १४८
|-
| ७७. || टिप्पणियाँ (२९-५-१९२१) || १४९
|-
| ७८. || भाषण : बम्बईकी सार्वजनिक सभायें (२९-५-१९२१) || १५१
|-
| ७९. || टिप्पणियाँ (१-६-१९२१) || १५४
|-
| ८०. || कविवरकी चिन्ता (१-६-१९२१) || १६१
|-
| ८१. || खिलाफत और अहिंसा (१-६-१९२१) || १६४
|-
| ८२. || भाषण : गुजरात राजनीतिक परिषद्, भड़ौंचमें (१-६-१९२१) ||१६७
|-
| ८३. || भाषण : भड़ौंचमें अहिंसा-प्रस्तावपर (१-६-१९२१) || १७१
|-
| ८४. || प्रस्ताव (१-६-१९२१) || १७२
|-
| ८५. || भाषण : अन्त्यज परिषद्, वेजलपुरमें (१-६-१९२१) || १७३
|-
| ८६. || भाषण : भड़ौंचकी खिलाफत सभामें (२-६-१९२१) || १७४
|-
| ८७. || वाइसरायका भाषण (५-६-१९२१) || १७५
|-
| ८८. || गुजरातका निश्चय (५-६-१९२१) || १७६
|-
| ८९. || टिप्पणियाँ (५-६-१९२१) || १७७
|-
| ९०. || टिप्पणियाँ (८-६-१९२१) || १७८
|-
| ९१. || वाइसरायका भाषण: (८-६-१९२१) || १८८
|-
| ९२. || पत्र : नरमदलीय भाइयोंको (८-६-१९२१) || १९०
|-
| ९३. || गौओंको बचाओ! (८-६-१९२१) || १९४
|-
| ९४. || कताई बनाम बुनाई (८-६-१९२१) || १९६
|-
| ९५. || पत्र-लेखकोंसे (८-६-१९२१) || १९८
|-
| ९६. || हमारी कसौटी (९-६-१९२१) || १९८
|-
| ९७. || भाषण : सार्वजनिक सभा, बढवानमें (९-६-१९२१) || २००
|-
| ९८. || गुजरातका कर्त्तव्य (१२-६-१९२१) || २०२
|-
| ९९. || टिप्पणियाँ (१२-६-१९२१) || २०४
|-
| १००. || भाषण : अहमदाबादकी सार्वजनिक सभामें (१३-६-१९२१) || २१०
|-
| १०१. || पत्र : रणछोड़दास पटवारीको (१३-६-१९२१) || २१३
|-
| १०२. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (१३-६-१९२१) || २१४
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>१४०. टिप्पणियाँ (२९-६-१९२१)
उन्नीस
१४१. पत्र : लाला लाजपतरायको (३०-६-१९२१ के पूर्व )
१४२. भाषण : बोरीवलीकी सभायें (३०-६-१९२१)
१४३. भाषण : पारसियों की सभा में (३०-६-१९२१)
१४४. भाषण : बम्बईके व्यापारियोंकी सभा में (३०-६-१९२१)
१४५. भाषण : बम्बईकी सभा में (३०-६-१९२१)
१४६. एक महिलाको लिखे पत्रका अंश (३०-६-१९२१)
१४७. भाषण : बाँदराकी सभायें (१-७-१९२१)
१४८. 'नवजीवन' को तार (१-७-१९२१)
३११
३१४
३१५
३१८
३२२
३२३
३२४
३२४
३.२७
१४९. 'नवजीवन' को तार (१-७-१९२१)
३२७
१५०. विदेशी कपड़ेका बहिष्कार (२-७-१९२१)
३२८
१५१. भाषण : बम्बईकी सार्वजनिक सभामें (२-७-१९२१)
१५२. वैष्णवोंसे (३-७-१९२१)
३२९
३३१ -
१५३. विदेशी मालका बहिष्कार कैसे हो (४-७-१९२१)
३३३
१५४. पत्र : न० चि० केलकरको (४-७-१९२१)
३३४
१५५. पत्र : के० राजगोपालाचार्यको (५-७-१९२१)
१५६. टिप्पणियाँ (६-७-१९२१)
३३५
३३५
१५७. बम्बईकी सुन्दरता (६-७-१९२१)
३४२
१५८. अपील : मिल मालिकोंसे (६-७-१९२१)
३४४
१५९. तार : चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और एस० श्रीनिवास आयंगारको
(६-७-१९२१ या उसके पश्चात्)
३४६
१६०. पत्र : महादेव देसाईको (६-७-१९२१ या उसके पश्चात् )
३४६
१६१. कपड़े के व्यापारियोंको खुला पत्र ( ७-७-१९२१)
३४८
१६२. तार : गुलाम महबूबको (७-७-१९२१)
३५१
१६३. पत्र : ज० बो० पेटिटको (७-७-१९२१ के पश्चात् )
३५१
१६४. पत्र : वल्लभभाई पटेलको (८-७-१९२१)
३५२
१६५. तार : मोतीलाल नेहरूको (८-७-१९२१ या उसके पश्चात् )
३५२
१६६. पत्र : कुँवरजी मेहताको (९-७-१९२१)
३५३
१६७. शुभ घड़ी ( १०-७-१९२१)
३५३
१६८. पंच महायज्ञ (१०-७-१९२१)
३५६
१६९. टिप्पणियाँ (१०-७-१९२१)
३५७
१७०. भाषण : दवा-विक्रेताओंकी सभा, बम्बईमें (१०-७-१९२१)
३५९
१७१. तार : सी० विजयराघवाचार्यको (१०-७-१९२१ या उसके पश्चात् )
१७२. पत्र : मणिबेन पटेलको (११-७-१९२१)
३६०
३६१
१७३. पत्र : देवचन्द पारेखको (११-७-१९२१)
३६२
१७४. भाषण : बम्बईमें शराब-बन्दीपर (१२-७-१९२१)
३६२
३६६
१७५. टिप्पणियाँ (१३-७-१९२१)
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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2026-08-15T12:22:33Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
670207
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text/x-wiki
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| १४०. || टिप्पणियाँ (२९-६-१९२१) || ३११
|-
| १४१. || पत्र : लाला लाजपतरायको (३०-६-१९२१ के पूर्व) || ३१४
|-
| १४२. || भाषण : बोरीवलीकी सभायें (३०-६-१९२१) || ३१५
|-
| १४३. || भाषण : पारसियोंकी सभामें (३०-६-१९२१) || ३१८
|-
| १४४. || भाषण : बम्बईके व्यापारियोंकी सभामें (३०-६-१९२१) || ३२२
|-
| १४५. || भाषण : बम्बईकी सभामें (३०-६-१९२१) || ३२३
|-
| १४६. || एक महिलाको लिखे पत्रका अंश (३०-६-१९२१) || ३२४
|-
| १४७. || भाषण : बाँदराकी सभायें (१-७-१९२१) || ३२४
|-
| १४८. || 'नवजीवन' को तार (१-७-१९२१) || ३२७
|-
| १४९. || 'नवजीवन' को तार (१-७-१९२१) || ३२७
|-
| १५०. || विदेशी कपड़ेका बहिष्कार (२-७-१९२१) || ३२८
|-
| १५१. || भाषण : बम्बईकी सार्वजनिक सभामें (२-७-१९२१) || ३२९
|-
| १५२. || वैष्णवोंसे (३-७-१९२१) || ३३१
|-
| १५३. || विदेशी मालका बहिष्कार कैसे हो (४-७-१९२१) || ३३३
|-
| १५४. || पत्र : न॰ चि॰ केलकरको (४-७-१९२१) || ३३४
|-
| १५५. || पत्र : के॰ राजगोपालाचार्यको (५-७-१९२१) || ३३५
|-
| १५६. || टिप्पणियाँ (६-७-१९२१) || ३३५
|-
| १५७. || बम्बईकी सुन्दरता (६-७-१९२१) || ३४२
|-
| १५८. || अपील : मिल-मालिकोंसे (६-७-१९२१) || ३४४
|-
| १५९. || तार : चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और एस॰ श्रीनिवास आयंगारको (६-७-१९२१ या उसके पश्चात्) || ३४६
|-
| १६०. || पत्र : महादेव देसाईको (६-७-१९२१ या उसके पश्चात्) || ३४६
|-
| १६१. || कपड़ेके व्यापारियोंको खुला पत्र ( ७-७-१९२१) || ३४८
|-
| १६२. || तार : गुलाम महबूबको (७-७-१९२१) || ३५१
|-
| १६३. || पत्र : ज॰ बो॰ पेटिटको (७-७-१९२१ के पश्चात्) || ३५१
|-
| १६४. || पत्र : वल्लभभाई पटेलको (८-७-१९२१) || ३५२
|-
| १६५. || तार : मोतीलाल नेहरूको (८-७-१९२१ या उसके पश्चात्) || ३५२
|-
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|-
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|-
| १६८. || पंच महायज्ञ (१०-७-१९२१) || ३५६
|-
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|-
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|-
| १७३. || पत्र : देवचन्द पारेखको (११-७-१९२१) || ३६२
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| १४४. || भाषण : बम्बईके व्यापारियोंकी सभामें (३०-६-१९२१) || ३२२
|-
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| १४६. || एक महिलाको लिखे पत्रका अंश (३०-६-१९२१) || ३२४
|-
| १४७. || भाषण : बाँदराकी सभायें (१-७-१९२१) || ३२४
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| १४८. || 'नवजीवन' को तार (१-७-१९२१) || ३२७
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| १४९. || 'नवजीवन' को तार (१-७-१९२१) || ३२७
|-
| १५०. || विदेशी कपड़ेका बहिष्कार (२-७-१९२१) || ३२८
|-
| १५१. || भाषण : बम्बईकी सार्वजनिक सभामें (२-७-१९२१) || ३२९
|-
| १५२. || वैष्णवोंसे (३-७-१९२१) || ३३१
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| १५३. || विदेशी मालका बहिष्कार कैसे हो (४-७-१९२१) || ३३३
|-
| १५४. || पत्र : न॰ चि॰ केलकरको (४-७-१९२१) || ३३४
|-
| १५५. || पत्र : के॰ राजगोपालाचार्यको (५-७-१९२१) || ३३५
|-
| १५६. || टिप्पणियाँ (६-७-१९२१) || ३३५
|-
| १५७. || बम्बईकी सुन्दरता (६-७-१९२१) || ३४२
|-
| १५८. || अपील : मिल-मालिकोंसे (६-७-१९२१) || ३४४
|-
| १५९. || तार : चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और एस॰ श्रीनिवास आयंगारको (६-७-१९२१ या उसके पश्चात्) || ३४६
|-
| १६०. || पत्र : महादेव देसाईको (६-७-१९२१ या उसके पश्चात्) || ३४६
|-
| १६१. || कपड़ेके व्यापारियोंको खुला पत्र ( ७-७-१९२१) || ३४८
|-
| १६२. || तार : गुलाम महबूबको (७-७-१९२१) || ३५१
|-
| १६३. || पत्र : ज॰ बो॰ पेटिटको (७-७-१९२१ के पश्चात्) || ३५१
|-
| १६४. || पत्र : वल्लभभाई पटेलको (८-७-१९२१) || ३५२
|-
| १६५. || तार : मोतीलाल नेहरूको (८-७-१९२१ या उसके पश्चात्) || ३५२
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| १६६. || पत्र : कुँवरजी मेहताको (९-७-१९२१) || ३५३
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| १६७. || शुभ घड़ी (१०-७-१९२१) || ३५३
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| १६८. || पंच महायज्ञ (१०-७-१९२१) || ३५६
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१७६. रिसता हुआ घाव (१३-७-१९२१)
३७७
१७७. पत्र : भारतके अंग्रेजोंके नाम (१३-७-१९२१)
३७९
१७८. श्रद्धाका स्वरूप (१३-७-१९२१)
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१७९. पत्र लेखकोंसे (१३-७-१९२१)
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१८०. सन्देश : धारवाड़की जनताको (१४-७-१९२१ के पूर्व )
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१८१. पत्र : एक संवाददाताको (१४-७-१९२१)
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१८२. पत्र : मणिबेन पटेलको (१५-७-१९२१)
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१८५. स्वदेशी व्रत (१६-७-१९२१ के पूर्व )
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१८६. बहिष्कार के उपाय (१६-७-१९२१)
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१८७. सन्देश : अलीगढ़की जनताको (१६-७-१९२१)
१८८. भाषण : बम्बई में स्वदेशीपर (१६-७-१९२१)
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१८९. असहयोग समितिका प्रतिवेदन ( १७-७-१९२१)
१९०. जलायें किसलिए ? (१७-७-१९२१)
३९४
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१९१. व्यापारी क्या करें ? (१७-७-१९२१)
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१९५. भाषण : बम्बईकी मुसलमान महिलाओंके समक्ष (१९-७-१९२१)
१९६. भाषण : बम्बईमें शराब के ठेकेदारों के समक्ष (१९-७-१९२१)
१९७. पत्र : के० पी० जगासिया ब्रदर्सको (१९-७-१९२१ के बाद)
१९८. तार : बेलगाँवके धरनेदारोंको (२०-७-१९२१)
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१९९. भाषण : पूनाकी सार्वजनिक सभामें (२०-७-१९२१)
२००. भाषण : तिलक महाविद्यालयके उद्घाटनपर (२०-७-१९२१)
२०१. टिप्पणियाँ (२१-७-१९२१)
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४१८
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२०२. शिमलाकी छाया (२१-७-१९२१)
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२०३. स्त्रियों की स्थिति (२१-७-१९२१)
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२०४. पत्र लेखकोंसे (२१-७-१९२१)
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२०५. सभ्यताका उपहास (२१-७-१९२१)
२०६. त्याग और उत्पादन (२१-७-१९२१)
२०७. भाषण : बैंकके उद्घाटनपर (२१-७-१९२१)
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२०८. सन्देश : जनताको (२१-७-१९२१)
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२१२. टिप्पणियाँ (२४-७-१९२१)
४४०
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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| १७६. || रिसता हुआ घाव (१३-७-१९२१) || ३७७
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| १७७. || पत्र : भारतके अंग्रेजोंके नाम (१३-७-१९२१) || ३७९
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| १७६. || रिसता हुआ घाव (१३-७-१९२१) || ३७७
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| १८९. || असहयोग समितिका प्रतिवेदन (१७-७-१९२१) || ३९४
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| १९०. || जलायें किसलिए? (१७-७-१९२१) || ३९६
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| १७६. || रिसता हुआ घाव (१३-७-१९२१) || ३७७
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| १८८. || भाषण : बम्बईमें स्वदेशीपर (१६-७-१९२१) || ३९२
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| १८९. || असहयोग समितिका प्रतिवेदन (१७-७-१९२१) || ३९४
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| १९०. || जलायें किसलिए? (१७-७-१९२१) || ३९६
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| १९१. || व्यापारी क्या करें? (१७-७-१९२१) || ३९८
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२१३. भाषण : सान्ता क्रूज, बम्बई में (२४-७-१९२१)
२१४. भाषण : मारवाड़ी विद्यालयमें ( २६-७-१९२१)
२१५. भाषण : बम्बई में स्वदेशीपर (२६-७ - १९२१ )
२१६. तार : हकीम अजमल खाँको (२८-७-१९२१ के पूर्व )
२१७. टिप्पणियाँ (२८-७-१९२१)
२१८. उचित पश्चात्ताप और उससे शिक्षा (२८-७-१९२१)
२१९. हिन्दू-मुस्लिम एकता (२८-७-१९२१)
२२०. अहिंसा (२८-७-१९२१)
२२१. टिप्पणी (२८-७-१९२१)
४४२
४४४
४४५
४४७
४४७
४५३
४५५
४५८
४६१
२२२. तार : हैदराबाद के एक असहयोगीको (२९-७-१९२१)
२२३. अ० भा० कां० कमेटीकी बैठक में बहिष्कारपर बहस
४६१
(३०-७-१९२१ के पूर्व )
४६२
२२४. भाषण : बम्बई में स्वदेशीपर (३०-७-१९२१)
४६७
२२५. टिप्पणियाँ (३१-७-१९२१)
४७०
२२६. प्रस्ताव : चुनावके सम्बन्धमें (३१-७-१९२१)
४७१
२२७. भाषण : बम्बई में खादी-प्रदर्शनीके उद्घाटनपर (३१-७-१९२१)
४७२
२२८. भाषण : बम्बई में स्वदेशीपर ( ३१-७-१९२१)
४७४
२२९. भाषण : बम्बईकी सार्वजनिक सभामें (३१-७-१९२१)
४७५
२३०. पत्र : ज० बो० पेटिटको (जुलाई १९२१ के अन्तमें)
४७६
२३१. सन्देश : खेड़ा जिलेकी जनताको (१-८-१९२१ के पूर्व)
४७६
२३२. भाषण : बम्बई में स्वदेशीपर (१-८-१९२१)
४७७
२३३. पूजाका अधिकार (१-८-१९२१)
४७७
२३४. भाषण : चौपाटीकी सभा, बम्बई में (१-८-१९२१)
४७९
२३५. टिप्पणियाँ
(४-८-१९२१)
४८१
२३६. सविनय अवज्ञा (४-८-१९२१)
४८५
२३७. पत्र : महादेव देसाईको (५-८-१९२१)
४८८
२३८. भाषण : मुरादाबादकी सार्वजनिक सभामें (६-८-१९२१)
४८८
२४०. टिप्पणियाँ (७-८-१९२१)
२३९. नई प्रतिज्ञा (७-८-१९२१)
२४१. पत्र : महादेव देसाईको (७-८-१९२१)
४८९
४९१
४९५
२४२. भाषण : लखनऊमें (७-८-१९२१)
४९५
२४३. काठियावाड़ के राजा-महाराजाओंसे (८-८-१९२१)
४९६
२४४. सम्पादकके प्रश्नों के उत्तर (८-८-१९२१)
४९९
२४५. भाषण : कानपुर (९-८-१९२१)
५००
२४६. भेंट : 'आज' के प्रतिनिधिसे (९-८-१९२१)
५०१
२४७. पत्र: मणिलाल कोठारी और फूलचन्द शाहको (९-८-१९२१)
५०२
२४८. भाषण : इलाहाबाद की सभा में ( १०-८-१९२१)
५०२
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|-
| २१३. || भाषण : सान्ता क्रूज, बम्बईमें (२४-७-१९२१) || ४४२
|-
| २१४. || भाषण : मारवाड़ी विद्यालयमें (२६-७-१९२१) || ४४४
|-
| २१५. || भाषण : बम्बईमें स्वदेशीपर (२६-७-१९२१) || ४४५
|-
| २१६. || तार : हकीम अजमल खाँको (२८-७-१९२१ के पूर्व) || ४४७
|-
| २१७. || टिप्पणियाँ (२८-७-१९२१) || ४४७
|-
| २१८. || उचित पश्चात्ताप और उससे शिक्षा (२८-७-१९२१) || ४५३
|-
| २१९. || हिन्दू-मुस्लिम एकता (२८-७-१९२१) || ४५५
|-
| २२०. || अहिंसा (२८-७-१९२१) || ४५८
|-
| २२१. || टिप्पणी (२८-७-१९२१) || ४६१
|-
| २२२. || तार : हैदराबादके एक असहयोगीको (२९-७-१९२१) || ४६१
|-
| २२३. || अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी बैठकमें बहिष्कारपर बहस (३०-७-१९२१ के पूर्व) || ४६२
|-
| २२४. || भाषण : बम्बईमें स्वदेशीपर (३०-७-१९२१) || ४६७
|-
| २२५. || टिप्पणियाँ (३१-७-१९२१) || ४७०
|-
| २२६. || प्रस्ताव : चुनावके सम्बन्धमें (३१-७-१९२१) || ४७१
|-
| २२७. || भाषण : बम्बईमें खादी-प्रदर्शनीके उद्घाटनपर (३१-७-१९२१) || ४७२
|-
| २२८. || भाषण : बम्बईमें स्वदेशीपर (३१-७-१९२१) || ४७४
|-
| २२९. || भाषण : बम्बईकी सार्वजनिक सभामें (३१-७-१९२१) || ४७५
|-
| २३०. || पत्र : ज॰ बो॰ पेटिटको (जुलाई १९२१ के अन्तमें) || ४७६
|-
| २३१. || सन्देश : खेड़ा जिलेकी जनताको (१-८-१९२१ के पूर्व) || ४७६
|-
| २३२. || भाषण : बम्बईमें स्वदेशीपर (१-८-१९२१) || ४७७
|-
| २३३. || पूजाका अधिकार (१-८-१९२१) || ४७७
|-
| २३४. || भाषण : चौपाटीकी सभा, बम्बईमें (१-८-१९२१) || ४७९
|-
| २३५. || टिप्पणियाँ (४-८-१९२१) || ४८१
|-
| २३६. || सविनय अवज्ञा (४-८-१९२१) || ४८५
|-
| २३७. || पत्र : महादेव देसाईको (५-८-१९२१) || ४८८
|-
| २३८. || भाषण : मुरादाबादकी सार्वजनिक सभामें (६-८-१९२१) || ४८८
|-
| २४०. || टिप्पणियाँ (७-८-१९२१) || ४९१
|-
| २३९. || नई प्रतिज्ञा (७-८-१९२१) || ४८९
|-
| २४१. || पत्र : महादेव देसाईको (७-८-१९२१) || ४९५
|-
| २४२. || भाषण : लखनऊमें (७-८-१९२१) || ४९५
|-
| २४३. || काठियावाड़के राजा-महाराजाओंसे (८-८-१९२१) || ४९६
|-
| २४४. || सम्पादकके प्रश्नोंके उत्तर (८-८-१९२१) || ४९९
|-
| २४५. || भाषण : कानपुरमें (९-८-१९२१) || ५००
|-
| २४६. || भेंट : 'आज' के प्रतिनिधिसे (९-८-१९२१) || ५०१
|-
| २४७. || पत्र: मणिलाल कोठारी और फूलचन्द शाहको (९-८-१९२१) || ५०२
|-
| २४८. || भाषण : इलाहाबादकी सभामें (१०-८-१९२१) || ५०२
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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|-
| २४९. || टिप्पणियाँ (११-८-१९२१) || ५०५
|-
| २५०. || सफलताकी शर्तें (११-८-१९२१) || ५१३
|-
| २५१. || भारतीय महिलाओंसे (११-८-१९२१) || ५१५
|-
| २५२. || भाषण : गयामें (१२-८-१९२१) || ५१७
|-
| २५३. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्र्यूजको (१३-८-१९२१) || ५१९
|-
| २५४. || पत्र : महादेव देसाईको (१३-८-१९२१) || ५२०
|-
| २५५. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१३-८-१९२१) || ५२२
|-
| २५६. भाषण : बिहार शरीफकी सार्वजनिक सभामें (१३-८-१९२१) || ५२३
|-
| २५७. || मृत्युका भय (१४-८-१९२१) || ५२४
|-
| २५८. || स्वराज्यकी व्याख्या (१४-८-१९२१) || ५२६
|-
| २५९. || अस्पृश्यता और राष्ट्रीयता (१४-८-१९२१) || ५२८
|-
| २६०. || समझौता? (१४-८-१९२१) || ५३०
|-
| २६१. || टिप्पणियाँ (१४-८-१९२१) || ५३१
|-
| २६२. || पत्र : ओंकारनाथ पुरोहितको (१५-८-१९२१) || ५३४
|-
| २६३. || सन्देश : शिमला-पहाड़ियोंकी जनताके नाम (१५-८-१९२१) || ५३५
|-
| २६४. || पत्र : महादेव देसाईको (१७-८-१९२१ के पूर्व) || ५३५
|-
| २६५. || भाषण : कलकत्तेके मिर्जापुर पार्कमें (१७-८-१९२१) || ५३७
|-
| २६६. || पत्र : ख्वाजाको (१७-८-१९२१ के बाद) || ५३८
|-
| २६७. || संयुक्त-प्रान्तमें दमन (१८-८-१९२१) || ५३८
|-
| २६८. || टिप्पणियाँ (१८-८-१९२१) || ५३९
|-
| २६९. || मुसलमानोंकी बेचैनी (१८-८-१९२१) || ५४२
|-
| २७०. || द्वेषपूर्ण अभियोग ( १८-८-१९२१) || ५४५
|-
| २७१. || मेरी भूल (१८-८-१९२१) || ५४७
|-
| २७२. || पत्र : देवदास गांधीको (१८-८-१९२१) || ५५०
|-
| २७३. || 'हिन्दी नवजीवन' (१९-८-१९२१) || ५५१
|-
| २७४. || मारवाड़ी भाइयों और बहनोंसे (१९-८-१९२१) || ५५१
|-
|{{gap}}परिशिष्ट
|-
|{{gap|3em}} १. 'यंग इंडिया' के सम्पादकको पत्र || ५५३
|-
|{{gap|3em}} २. चरखा और अकाल-पीड़ितोंकी सहायता || ५५५
|-
|{{gap|3em}} ३. भेंट तथा क्षमा-प्रार्थना || ५५९
|-
|{{gap|3em}} ४. रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा असहयोगकी आलोचना || ५६२
|-
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|-
|{{gap}} सामग्रीके साधन-सूत्र || ५६९
|-
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|-
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|-
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|-
| २४९. टिप्पणियाँ (११-८-१९२१) || ५०५
|-
| २५०. सफलताकी शर्तें (११-८-१९२१) || ५१३
|-
| २५१. भारतीय महिलाओंसे (११-८-१९२१) || ५१५
|-
| २५२. भाषण : गयामें (१२-८-१९२१) || ५१७
|-
| २५३. पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्र्यूजको (१३-८-१९२१) || ५१९
|-
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|-
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|-
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|-
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|-
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|-
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|-
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|-
| २६१. टिप्पणियाँ (१४-८-१९२१) || ५३१
|-
| २६२. पत्र : ओंकारनाथ पुरोहितको (१५-८-१९२१) || ५३४
|-
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|-
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|-
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|-
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|-
| २७१. मेरी भूल (१८-८-१९२१) || ५४७
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|-
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|-
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|-
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|-
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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| १०३. || बहनोंसे (१४-६-१९२१) || २१४
|-
| १०४. || टिप्पणियाँ (१५-६-१९२१) || २१६
|-
| १०५. || असमका सबक (१५-६-१९२१) || २२७
|-
| १०६. || मजिस्ट्रेटकी धाँधली (१५-६-१९२१) || २३१
|-
| १०७. || फिर श्री पालके बारेमें (१५-६-१९२१) || २३३
|-
| १०८. || भाषण : घाटकोपर (१५-६-१९२१) || २३५
|-
| १०९. || पत्र : मणिबेन पटेलको (१६-६-१९२१) || २४०
|-
| ११०. || तार : चित्तरंजन दासको (१७-६-१९२१ या उसके पश्चात्) || २४१
|-
| १११. || भाषण: बम्बईमें असहयोगपर (१८-६-१९२१) || २४१
|-
| ११२. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचार्यको (१८-६-१९२१ को या उसके पश्चात्) || २४९
|-
| ११३. || भाषण : बम्बईमें स्वराज्यपर (१९-६-१९२१) || २५०
|-
| ११४. || तार : जितेन्द्रलाल बनर्जीको (१९-६-१९२१ को या उसके पश्चात्) || २५१
|-
| ११५. || समाचारपत्र-प्रतिनिधिके प्रश्नका उत्तर (२०-६-१९२१) || २५२
|-
| ११६. || पत्र : कुँवरजी आनन्दजीको (२१-६-१९२१) || २५२
|-
| ११७. || पत्र : मंगलदास पारेखको (२१-६-१९२१) || २५३
|-
| ११८. || टिप्पणियाँ (२२-६-१९२१) || २५३
|-
| ११९. || जुएका अभिशाप (२२-६-१९२१) || २५७
|-
| १२०. || तिलक स्मारक-कोष (२२-६-१९२१) || २५८
|-
| १२१. || युद्धोन्मुख डा॰ पॉलेन (२२-६-१९२१) || २६०
|-
| १२२. || हमारी खामियाँ (२२-६-१९२१) || २६३
|-
| १२३. || पत्र-लेखकोंसे (२२-६-१९२१) || २६८
|-
| १२४. || भाषण : बम्बईमें स्कूलके उद्घाटनपर (२२-६-१९२१) || २६९
|-
| १२५. || सन्देश : बम्बईमें आयोजित स्त्रियोंकी सभाको (२२-६-१९२१) || २७२
|-
| १२६. || पत्र : एस॰ आर॰ हिगनेलको (२४-६-१९२१) || २७३
|-
| १२७. || भाषण : शिक्षकोंके कर्त्तव्यपर (२५-६-१९२१) || २७३
|-
| १२८. || भाषण : बम्बईके स्वागत-समारोहमें (२६-६-१९२१ के पूर्व) || २७७
|-
| १२९. || गुजरातमें आत्मत्याग (२६-६-१९२१) || २७८
|-
| १३०. || माधुरी और पुष्पा (२६-६-१९२१) || २८०
|-
| १३१. || इन चार दिनोंमें हमारा कर्त्तव्य (२६-६-१९२१) || २८४
|-
| १३२. || काठियावाड़ियोंसे (२६-६-१९२१) || २८५
|-
| १३३. || भाषण : बम्बईकी सभामें (२६-६-१९२१) || २८६
|-
| १३४. || तार : मदनमोहन मालवीयको (२८-६-१९२१) || २९०
|-
| १३५. || टिप्पणियाँ (२९-६-१९२१) || २९०
|-
| १३६. || टर्कीका प्रश्न (२९-६-१९२१) || ३००
|-
| १३७. || कार्य-समिति और उसका काम (२९-६-१९२१) || ३०२
|-
| १३८. || चरखेका सन्देश (२९-६-१९२१) || ३०४
|-
| १३९. || चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र (२९-६-१९२१) || ३०६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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|-
| १०३. || बहनोंसे (१४-६-१९२१) || २१४
|-
| १०४. || टिप्पणियाँ (१५-६-१९२१) || २१६
|-
| १०५. || असमका सबक (१५-६-१९२१) || २२७
|-
| १०६. || मजिस्ट्रेटकी धाँधली (१५-६-१९२१) || २३१
|-
| १०७. || फिर श्री पालके बारेमें (१५-६-१९२१) || २३३
|-
| १०८. || भाषण : घाटकोपर (१५-६-१९२१) || २३५
|-
| १०९. || पत्र : मणिबेन पटेलको (१६-६-१९२१) || २४०
|-
| ११०. || तार : चित्तरंजन दासको (१७-६-१९२१ या उसके पश्चात्) || २४१
|-
| १११. || भाषण: बम्बईमें असहयोगपर (१८-६-१९२१) || २४१
|-
| ११२. || पत्र : सी॰ विजयराघवाचार्यको (१८-६-१९२१ को या उसके पश्चात्) || २४९
|-
| ११३. || भाषण : बम्बईमें स्वराज्यपर (१९-६-१९२१) || २५०
|-
| ११४. || तार : जितेन्द्रलाल बनर्जीको (१९-६-१९२१ को या उसके पश्चात्) || २५१
|-
| ११५. || समाचारपत्र-प्रतिनिधिके प्रश्नका उत्तर (२०-६-१९२१) || २५२
|-
| ११६. || पत्र : कुँवरजी आनन्दजीको (२१-६-१९२१) || २५२
|-
| ११७. || पत्र : मंगलदास पारेखको (२१-६-१९२१) || २५३
|-
| ११८. || टिप्पणियाँ (२२-६-१९२१) || २५३
|-
| ११९. || जुएका अभिशाप (२२-६-१९२१) || २५७
|-
| १२०. || तिलक स्मारक-कोष (२२-६-१९२१) || २५८
|-
| १२१. || युद्धोन्मुख डा॰ पॉलेन (२२-६-१९२१) || २६०
|-
| १२२. || हमारी खामियाँ (२२-६-१९२१) || २६३
|-
| १२३. || पत्र-लेखकोंसे (२२-६-१९२१) || २६८
|-
| १२४. || भाषण : बम्बईमें स्कूलके उद्घाटनपर (२२-६-१९२१) || २६९
|-
| १२५. || सन्देश : बम्बईमें आयोजित स्त्रियोंकी सभाको (२२-६-१९२१) || २७२
|-
| १२६. || पत्र : एस॰ आर॰ हिगनेलको (२४-६-१९२१) || २७३
|-
| १२७. || भाषण : शिक्षकोंके कर्त्तव्यपर (२५-६-१९२१) || २७३
|-
| १२८. || भाषण : बम्बईके स्वागत-समारोहमें (२६-६-१९२१ के पूर्व) || २७७
|-
| १२९. || गुजरातमें आत्मत्याग (२६-६-१९२१) || २७८
|-
| १३०. || माधुरी और पुष्पा (२६-६-१९२१) || २८०
|-
| १३१. || इन चार दिनोंमें हमारा कर्त्तव्य (२६-६-१९२१) || २८४
|-
| १३२. || काठियावाड़ियोंसे (२६-६-१९२१) || २८५
|-
| १३३. || भाषण : बम्बईकी सभामें (२६-६-१९२१) || २८६
|-
| १३४. || तार : मदनमोहन मालवीयको (२८-६-१९२१) || २९०
|-
| १३५. || टिप्पणियाँ (२९-६-१९२१) || २९०
|-
| १३६. || टर्कीका प्रश्न (२९-६-१९२१) || ३००
|-
| १३७. || कार्य-समिति और उसका काम (२९-६-१९२१) || ३०२
|-
| १३८. || चरखेका सन्देश (२९-६-१९२१) || ३०४
|-
| १३९. || चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र (२९-६-१९२१) || ३०६
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/११३
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>भाषण : मानपत्र के उत्तरमें
८३
मुझे यह जानकर खेद हुआ है कि प्रयागसे तिलक स्वराज्य कोषमें अभी काफी
चन्दा जमा नहीं हुआ है। यदि प्रयाग गरीब है तो मैं यह नहीं चाहता कि सब लोग
रुपये ही - रुपये दें। यदि प्रान्तका हरएक आदमी दो-दो पैसे भी दे तो इलाहाबादका
हिस्सा काफी हदतक पूरा हो जायेगा । प्रयाग तीर्थ-स्थान है जहाँ बहुतसे तीर्थ-यात्री
आते हैं। आप लोग उनकी सहायतार्थ सेवा समिति बनाइये और उनकी सहायता करने-
के बाद उनसे तिलक स्वराज्य-कोषके वास्ते चन्दा माँगिये। मुझे पूरा विश्वास है
कि यदि इस प्रकार मेहनत की जाये तो आप लोग सुगमतासे यदि अधिक नहीं तो
अपने हिस्सेकी रकम इकट्ठी कर ही लेंगे ।
फिर २० लाख चरखे चालू कराने हैं। मैं यह नहीं चाहता कि आप लोग
चरखोंको अपने घरोंमें रखकर इनकी सिर्फ पूजा करें; आप लोगोंको मौलाना मुहम्मद
अलीके शब्दों में उनसे वही काम लेना चाहिए जो अंग्रेजी सरकार मशीनगनोंसे लेती है ।
यदि २० लाख चरखे कमसे कम ४ घंटे रोज चलें तो मुझे विश्वास है कि थोड़े ही
समयमें किसी भी हिन्दुस्तानीको देशका बना कपड़ा पह्ननेमें लज्जा नहीं आयेगी ।
अपने हालके दौरेमें मौलाना शौकत अली और मैंने हिन्दू-मुस्लिम एकता की
आवश्यकता देशको बतलाई है और यदि इतनेपर भी देशने इस आवश्यकताको न
समझा हो तो चाहे कितना भी प्रचार किया जाये लोग इसको नहीं समझ सकेंगे ।
हम लोगोंने यह बात भी अच्छी तरह समझा दी है कि हमारा कार्यक्रम पूर्ण रूपसे
अहिंसक है । मुझे यह देखकर खेद हुआ है कि कुछ किसान लोग इस बातको भूल
जाते हैं और में इसकी निन्दा करता हूँ । आप लोगोंको पूरी तरह समझ लेना चाहिए
कि हमें अपने दुश्मनोंके प्रति भी सख्त भाषाका प्रयोग नहीं करना चाहिए। हिंसाका
सहारा लेनेके बदले आप लोगोंको कष्ट-सहन और आत्मत्यागकी भावना पैदा करनेके
लिए प्रस्तुत रहना चाहिए; और यदि आप लोगों में से कुछको जेलखाने भी भेज दिया
जाये तो क्रोधित होकर कोई जुलूस वगैरा नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि जब आप
लोग जेलखाने जानेको तैयार हो जायेंगे तभी स्वराज्यका मार्ग सुगम होगा । माले-
गाँवके निवासियोंने बहुत ही बुरा किया है और आप लोगोंको उससे सबक लेना चाहिए
ताकि फिर कभी वैसा न होने पावे । यदि मैं या मौलाना शौकत अली या मुहम्मद
अली या और कोई नेता गिरफ्तार किये और जेलखाने भेजे जायें तो भी आप लोगोंको
किसी थानेदारकी हत्या न करनी चाहिए चाहे वह हमारे कुछ आदमियोंको जानसे
भी मार दे। जब आप लोगोंमें इस प्रकारकी भावना आ जायेगी और आपके हृदयसे
जेलका, जो मेरे लेखे कार्यकर्ताका विश्रामस्थल है, भय निकल जायेगा तब स्वराज्य
बहुत समीप आ जायेगा ।
मुझे नहीं मालूम कि सरकार मौलाना मुहम्मद अलीको जेलमें बन्द करनेके
लिए इतनी उत्सुक क्यों है । मैं भी तो अक्षरशः वही कहता हूँ जो मौलाना कहते
हैं। मौलाना मुहम्मद अलीका अपराध यह बतलाया जाता है कि उन्होंने यह कहा
है कि यदि अफगान लोग भारतपर आक्रमण करेंगे तो वे उनके पास यह सन्देशा
भेजेंगे कि हिन्दुस्तानी लोग धन या जनसे ब्रिटिश सरकारकी सहायता नहीं करेंगे। मैं
उनके इस कथनका अक्षरश: समर्थन करता हूँ। मैं अपने हिन्दू भाइयोंसे कहता हूँ कि
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : मानपत्रके उत्तरमें|८३}}</noinclude>मुझे यह जानकर खेद हुआ है कि प्रयागसे तिलक स्वराज्य-कोषमें अभी काफी चन्दा जमा नहीं हुआ है। यदि प्रयाग गरीब है तो मैं यह नहीं चाहता कि सब लोग रुपये-ही-रुपये दें। यदि प्रान्तका हरएक आदमी दो-दो पैसे भी दे तो इलाहाबादका हिस्सा काफी हदतक पूरा हो जायेगा। प्रयाग तीर्थ-स्थान है जहाँ बहुतसे तीर्थ-यात्री आते हैं। आप लोग उनकी सहायतार्थ सेवा-समिति बनाइये और उनकी सहायता करनेके बाद उनसे तिलक स्वराज्य-कोषके वास्ते चन्दा माँगिये। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि इस प्रकार मेहनत की जाये तो आप लोग सुगमतासे यदि अधिक नहीं तो अपने हिस्सेकी रकम इकट्ठी कर ही लेंगे।
फिर २० लाख चरखे चालू कराने हैं। मैं यह नहीं चाहता कि आप लोग चरखोंको अपने घरोंमें रखकर इनकी सिर्फ पूजा करें; आप लोगोंको मौलाना मुहम्मद अलीके शब्दोंमें उनसे वही काम लेना चाहिए जो अंग्रेजी सरकार मशीनगनोंसे लेती है। यदि २० लाख चरखे कमसे-कम ४ घंटे रोज चलें तो मुझे विश्वास है कि थोड़े ही समयमें किसी भी हिन्दुस्तानीको देशका बना कपड़ा पह्ननेमें लज्जा नहीं आयेगी।
अपने हालके दौरेमें मौलाना शौकत अली और मैंने हिन्दू-मुस्लिम एकताकी आवश्यकता देशको बतलाई है और यदि इतनेपर भी देशने इस आवश्यकताको न समझा हो तो चाहे कितना भी प्रचार किया जाये लोग इसको नहीं समझ सकेंगे। हम लोगोंने यह बात भी अच्छी तरह समझा दी है कि हमारा कार्यक्रम पूर्ण रूपसे अहिंसक है। मुझे यह देखकर खेद हुआ है कि कुछ किसान लोग इस बातको भूल जाते हैं और मैं इसकी निन्दा करता हूँ। आप लोगोंको पूरी तरह समझ लेना चाहिए कि हमें अपने दुश्मनोंके प्रति भी सख्त भाषाका प्रयोग नहीं करना चाहिए। हिंसाका सहारा लेनेके बदले आप लोगोंको कष्ट-सहन और आत्मत्यागकी भावना पैदा करनेके लिए प्रस्तुत रहना चाहिए; और यदि आप लोगोंमें से कुछको जेलखाने भी भेज दिया जाये तो क्रोधित होकर कोई जुलूस वगैरा नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि जब आप लोग जेलखाने जानेको तैयार हो जायेंगे तभी स्वराज्यका मार्ग सुगम होगा। माले-गाँवके निवासियोंने बहुत ही बुरा किया है और आप लोगोंको उससे सबक लेना चाहिए ताकि फिर कभी वैसा न होने पावे। यदि मैं या मौलाना शौकत अली या मुहम्मद अली या और कोई नेता गिरफ्तार किये और जेलखाने भेजे जायें तो भी आप लोगोंको किसी थानेदारकी हत्या न करनी चाहिए चाहे वह हमारे कुछ आदमियोंको जानसे भी मार दे। जब आप लोगोंमें इस प्रकारकी भावना आ जायेगी और आपके हृदयसे जेलका, जो मेरे लेखे कार्यकर्त्ताका विश्रामस्थल है, भय निकल जायेगा तब स्वराज्य बहुत समीप आ जायेगा।
मुझे नहीं मालूम कि सरकार मौलाना मुहम्मद अलीको जेलमें बन्द करनेके लिए इतनी उत्सुक क्यों है। मैं भी तो अक्षरशः वही कहता हूँ जो मौलाना कहते हैं। मौलाना मुहम्मद अलीका अपराध यह बतलाया जाता है कि उन्होंने यह कहा है कि यदि अफगान लोग भारतपर आक्रमण करेंगे तो वे उनके पास यह सन्देशा भेजेंगे कि हिन्दुस्तानी लोग धन या जनसे ब्रिटिश सरकारकी सहायता नहीं करेंगे। मैं उनके इस कथनका अक्षरशः समर्थन करता हूँ। मैं अपने हिन्दू भाइयोंसे कहता हूँ कि<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>८४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
वे इस अफगानी हौएसे न डरें, क्योंकि कोई भी धर्म यह नहीं सिखाता कि उसके
अनुयायी कायर हों । मैं जानता हूँ कि पठान लोग बड़े शक्तिशाली हैं, परन्तु कोई
पठान मुझे गोमांस खाने या अपने धर्मके विरुद्ध काम करनेको बाध्य नहीं कर सकता ।
वर्तमान सरकारपर से हमारा विश्वास उठ गया है और जबतक कि खिलाफत
और पंजाबके विषयमें यह सरकार न्याय नहीं करेगी तबतक उसे हिन्दुस्तानियोंसे
अफगानिस्तान या और किसी शक्तिके मुकाबले सहायताकी आशा नहीं करनी चाहिए ।
जिस सरकारके विरुद्ध हमने आन्दोलन उठाया है वह जबतक अपनेको सुधार न ले
तबतक हम लोगों से सहायताकी आशा किस प्रकार कर सकती है । और जिन लोगोंने
हम लोगोंको पेटके बल रेंगाया है वे लोग कैसी ही कठिनाई क्यों न पड़े हमसे सह-
योगकी आशा नहीं कर सकते । परन्तु हम लोगोंको हर हालत में अहिंसक और शान्ति-
प्रिय रहना चाहिए । हम लोगोंको कितना भी भड़काया जाये, हमें किसीकी हत्या
नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हत्या करनेसे हम स्वराज्य पानेका अपना हक खो देंगे ।
-
अन्तमें, मुझे आपसे यह कहना है कि इस समय देशके हिन्दुओं और मुसलमानों
दोनोंका केवल एक धर्म है। - पंजाब और खिलाफत के मामलेमें न्याय हासिल करना
और देशको गुलामीसे बचाना। यदि आपको अपने देशकी सेवा करनी है तो आपको
कांग्रेस के नेतृत्वमें चलना चाहिए और उसके आदेशोंका पालन करना चाहिए, चाहे
वे हमारे महती उद्देश्यको देखते हुए कितने ही महत्त्वहीन क्यों न लगें ।
अन्तमें, भगवान् से मेरी यही प्रार्थना है कि वह हम लोगोंको कांग्रेसके नेतृत्वमें
चलनेकी शक्ति दे ।
आज, १२-५-१९२१
४१. टिप्पणियाँ
स्वामी गोविन्दानन्द
तो, स्वामी गोविन्दानन्दको पाँच सालका निर्वासन मिल ही गया। मजबूत आदमी
हैं वे ! पहले भी सजा काट चुके हैं और वह भी बिना अदालती कार्रवाईके । विभिन्न
जेलोंमें जो तकलीफें दी गई थीं उन सारे अनुभवोंको उन्होंने रिहाईके बाद कलमबन्द
भी किया है। इस बार मुकदमेका नाटक हुआ और आखिर सजा ठोक दी गई।
क्या इस तरह न्यायका नाटक करके निर्वासित करना कोई महत्त्व रखता है ? क्या इससे
अदालती कार्रवाईके आडम्बरका पर्दा ही फाश नहीं हुआ ? तरीका बदल गया मगर
भावना वही रही । असल बात है भावनाका बदलना । अच्छा वह है जो अच्छा करे । '
मैंने स्वामीजीका पूरा भाषण पढ़ा है । भाषा कुछ तीखी और चोट पहुँचानेवाली है,
लेकिन असाधारण तो कुछ भी नहीं है। हिंसाको बढ़ावा देनेवाली तो कोई भी बात
१. इस भाषणका मिलान अमृतबाजार पत्रिका, १३-५-१९२१ में प्रकाशित विवरणसे भी कर
लिया गया है ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" />{{Rh|८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>वे इस अफगानी हौएसे न डरें, क्योंकि कोई भी धर्म यह नहीं सिखाता कि उसके अनुयायी कायर हों। मैं जानता हूँ कि पठान लोग बड़े शक्तिशाली हैं, परन्तु कोई पठान मुझे गोमांस खाने या अपने धर्मके विरुद्ध काम करनेको बाध्य नहीं कर सकता। वर्तमान सरकारपर से हमारा विश्वास उठ गया है और जबतक कि खिलाफत और पंजाबके विषयमें यह सरकार न्याय नहीं करेगी तबतक उसे हिन्दुस्तानियोंसे अफगानिस्तान या और किसी शक्तिके मुकाबले सहायताकी आशा नहीं करनी चाहिए। जिस सरकारके विरुद्ध हमने आन्दोलन उठाया है वह जबतक अपनेको सुधार न ले तबतक हम लोगोंसे सहायताकी आशा किस प्रकार कर सकती है। और जिन लोगोंने हम लोगोंको पेटके बल रेंगाया है वे लोग कैसी ही कठिनाई क्यों न पड़े हमसे सहयोगकी आशा नहीं कर सकते। परन्तु हम लोगोंको हर हालतमें अहिंसक और शान्ति-प्रिय रहना चाहिए। हम लोगोंको कितना भी भड़काया जाये, हमें किसीकी हत्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हत्या करनेसे हम स्वराज्य पानेका अपना हक खो देंगे।
अन्तमें, मुझे आपसे यह कहना है कि इस समय देशके हिन्दुओं और मुसलमानों दोनोंका केवल एक धर्म है—पंजाब और खिलाफतके मामलेमें न्याय हासिल करना और देशको गुलामीसे बचाना। यदि आपको अपने देशकी सेवा करनी है तो आपको कांग्रेसके नेतृत्वमें चलना चाहिए और उसके आदेशोंका पालन करना चाहिए, चाहे वे हमारे महती उद्देश्यको देखते हुए कितने ही महत्त्वहीन क्यों न लगें।
अन्तमें, भगवान्से मेरी यही प्रार्थना है कि वह हम लोगोंको कांग्रेसके नेतृत्वमें चलनेकी शक्ति दे।<ref></ref>
{{Left|'''आज''', १२-५-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''४१. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''स्वामी गोविन्दानन्द'''}}
तो, स्वामी गोविन्दानन्दको पाँच सालका निर्वासन मिल ही गया। मजबूत आदमी हैं वे!
पहले भी सजा काट चुके हैं और वह भी बिना अदालती कार्रवाईके । विभिन्न
जेलोंमें जो तकलीफें दी गई थीं उन सारे अनुभवोंको उन्होंने रिहाईके बाद कलमबन्द
भी किया है। इस बार मुकदमेका नाटक हुआ और आखिर सजा ठोक दी गई।
क्या इस तरह न्यायका नाटक करके निर्वासित करना कोई महत्त्व रखता है ? क्या इससे
अदालती कार्रवाईके आडम्बरका पर्दा ही फाश नहीं हुआ ? तरीका बदल गया मगर
भावना वही रही । असल बात है भावनाका बदलना । अच्छा वह है जो अच्छा करे । '
मैंने स्वामीजीका पूरा भाषण पढ़ा है । भाषा कुछ तीखी और चोट पहुँचानेवाली है,
लेकिन असाधारण तो कुछ भी नहीं है। हिंसाको बढ़ावा देनेवाली तो कोई भी बात
१. इस भाषणका मिलान अमृतबाजार पत्रिका, १३-५-१९२१ में प्रकाशित विवरणसे भी कर
लिया गया है ।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>वे इस अफगानी हौएसे न डरें, क्योंकि कोई भी धर्म यह नहीं सिखाता कि उसके अनुयायी कायर हों। मैं जानता हूँ कि पठान लोग बड़े शक्तिशाली हैं, परन्तु कोई पठान मुझे गोमांस खाने या अपने धर्मके विरुद्ध काम करनेको बाध्य नहीं कर सकता। वर्तमान सरकारपर से हमारा विश्वास उठ गया है और जबतक कि खिलाफत और पंजाबके विषयमें यह सरकार न्याय नहीं करेगी तबतक उसे हिन्दुस्तानियोंसे अफगानिस्तान या और किसी शक्तिके मुकाबले सहायताकी आशा नहीं करनी चाहिए। जिस सरकारके विरुद्ध हमने आन्दोलन उठाया है वह जबतक अपनेको सुधार न ले तबतक हम लोगोंसे सहायताकी आशा किस प्रकार कर सकती है। और जिन लोगोंने हम लोगोंको पेटके बल रेंगाया है वे लोग कैसी ही कठिनाई क्यों न पड़े हमसे सहयोगकी आशा नहीं कर सकते। परन्तु हम लोगोंको हर हालतमें अहिंसक और शान्ति-प्रिय रहना चाहिए। हम लोगोंको कितना भी भड़काया जाये, हमें किसीकी हत्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हत्या करनेसे हम स्वराज्य पानेका अपना हक खो देंगे।
अन्तमें, मुझे आपसे यह कहना है कि इस समय देशके हिन्दुओं और मुसलमानों दोनोंका केवल एक धर्म है—पंजाब और खिलाफतके मामलेमें न्याय हासिल करना और देशको गुलामीसे बचाना। यदि आपको अपने देशकी सेवा करनी है तो आपको कांग्रेसके नेतृत्वमें चलना चाहिए और उसके आदेशोंका पालन करना चाहिए, चाहे वे हमारे महती उद्देश्यको देखते हुए कितने ही महत्त्वहीन क्यों न लगें।
अन्तमें, भगवान्से मेरी यही प्रार्थना है कि वह हम लोगोंको कांग्रेसके नेतृत्वमें चलनेकी शक्ति दे।<ref>इस भाषणका मिलान '''अमृतबाजार पत्रिका,''' १३-५-१९२१ में प्रकाशित विवरणसे भी कर लिया गया है।</ref>
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{{C|{{larger|'''४१. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''स्वामी गोविन्दानन्द'''}}
तो, स्वामी गोविन्दानन्दको पाँच सालका निर्वासन मिल ही गया। मजबूत आदमी हैं वे! पहले भी सजा काट चुके हैं और वह भी बिना अदालती कार्रवाईके। विभिन्न जेलोंमें जो तकलीफें दी गई थीं उन सारे अनुभवोंको उन्होंने रिहाईके बाद कलमबन्द भी किया है। इस बार मुकदमेका नाटक हुआ और आखिर सजा ठोक दी गई। क्या इस तरह न्यायका नाटक करके निर्वासित करना कोई महत्त्व रखता है? क्या इससे अदालती कार्रवाईके आडम्बरका पर्दा ही फाश नहीं हुआ? तरीका बदल गया मगर भावना वही रही। असल बात है भावनाका बदलना। 'अच्छा वह है जो अच्छा करे।' मैंने स्वामीजीका पूरा भाषण पढ़ा है। भाषा कुछ तीखी और चोट पहुँचानेवाली है, लेकिन असाधारण तो कुछ भी नहीं है। हिंसाको बढ़ावा देनेवाली तो कोई भी बात<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लिए अपने विश्वासको छिपा लूँ और उससे लाखोंका लाभ उठा लूँ तो उसमें क्या हानि है? परन्तु मुझे सारी दुनियाका साम्राज्य मिले तो भी मैं ऐसा नहीं कर सकता। बिलकुल इन्हीं कारणोंसे हम भारतके गरीब लोगों के लिए विदेशी कपड़ा काममें नहीं ले
सकते। और आखिर इस प्रकार छोड़े हुए कपड़ेको स्मरना और अन्य किसी विदेशी स्थानमें भेज देना त्यागके कार्यको सुविधाजनक बनाना ही है। परन्तु विदेशी कपड़ेको दूसरे देशोंमें भेजनेमें उतनी प्रबल नैतिक आपत्ति नहीं है जितनी प्रबल नैतिक आपत्ति उस कपड़ेको अपने देशमें ही काममें लेनेमें है।
{{c|'''विदेशी सूत'''}}
‘इंडियन सोशल रिफॉर्मर’ ने विदेशी सूतको स्वदेशीकी परिभाषामें से निकाल देनेपर आपत्ति की है। कुछ विनाश किये बिना और कहीं किसीको चोट पहुँचाये बिना, उठाये हुए कदमको वापस लेना, सुधार करना और शुद्धि करना असम्भव है। बुनकरोंका खयाल ऐसा नहीं है कि यदि वे विदेशी सूतका कपड़ा नहीं बुनेंगे तो उन्हें बेकार बैठना पड़ेगा। यदि हम सिर्फ फिलहाल कम बारीक कपड़ेसे सन्तोष करने की बात मान जायें तो वे बिना कठिनाईके देशी कारखानोंमें कते सूतका कपड़ा बुन सकते हैं और उसमें अपनी कलात्मक प्रतिभाका पूरा उपयोग कर सकते हैं। जब भारतीय बाजारमें विदेशी कपड़ा और विदेशी सूत नहीं मिलेंगे, तब भारतमें पुराने जमाने जैसे सुन्दर कपड़े फिर बनाये जा सकते हैं। भारतमें यह योग्यता है इसमें मुझे कोई बाधा दिखाई नहीं देती। सच्ची कला तो समाप्त हो गई है, और धनी लोगोंके घरोंमें कलात्मक वस्तुओंके नामपर दिखावटी वस्तुएँ आ घुसी है, क्योंकि अब सच्ची कलाके आश्रयदाता नहीं रहे हैं। मैं उस समयकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब सामान्य अवस्था आते ही धनी लोग अपने व्यवसाय- स्थानोंसे लगे हुए विशेष कातनेवालों और बुननेवालों के मकान बनवायेंगे और उन लोगोंका काम होगा अपने आश्रयदाताओंके लाभार्थ कलापूर्ण वस्त्र तैयार करना।
{{c|'''धरना देनेवाली स्त्रियाँ'''}}
एक पारसी बहन लिखती हैं, बम्बईमें धरना आरम्भ किया जायेगा तब मैं जो भी दल तैयार किया जाये उसमें सम्मिलित होनेके लिए बिलकुल तैयार हूँ और मुझे आशा है कि अन्य अनेक बहनें इसके लिए आगे आयेंगी। उनका यह मत है कि यदि स्त्रियाँ बड़ी संख्या में आगे आयें तो उनकी उपस्थितिसे हिंसापर प्रभावकारी रोक लग जायेगी। मैं उनकी बातका पूरी तरहसे समर्थन करता हूँ और आशा करता हूँ कि अन्य बहुत-सी बहनें बम्बईकी समितिको अपने नाम उम्मीदवारोंके रूपमें भेजेंगी।
{{c|'''करोंको अपवित्र करना'''}}
आगराके एक मित्रने मेरा ध्यान अजमेरके भारतीय प्रैस्बिटेरियन कब्रिस्तानमें ईसाइयोंकी कब्रोंके अपवित्र किये जाने के सम्बन्धमें समाचारपत्रोंको भेजे गये श्री डेविडके पत्रकी ओर आकृष्ट किया है। मुझे इस बातका अफसोस है कि वह पत्र मेरे देखनेमें नहीं आया है। श्री डेविडने यह ठीक ही कहा है कि कट्टरपन और धर्मान्धतासे भारतीय<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४८५
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2026-08-16T03:42:21Z
अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||उचित पश्चात्ताप और उससे शिक्षा|४५३}}</noinclude>राष्ट्र का सामंजस्यपूर्ण विकास रुक जायेगा और ये एकताके विकासके लिए घातक हैं। जैसा कि मैंने प्रायः कहा है, हिन्दू-मुस्लिम एकताका अर्थ है उन सभी लोगोंकी एकता जो विभिन्न धर्मों व पंथों के अनुयायी होने पर भी भारतको अपना देश मानते हैं। कब्रोंको अपवित्र करना विशेष रूपसे कायरतापूर्ण अपराध है। युद्ध के नियमों तकमें कब्रोंकी पवित्रता मानी जाती है। केवल पतित स्वभावका मनुष्य ही कब्रोंको अपवित्र करनेकी
दुष्टता करके प्रसन्न हो सकता है। परन्तु जब हम इस बातका खयाल करते है कि इस समय राष्ट्र अपने सभी विसंगत तत्त्वोंमें सामंजस्य स्थापित करनेका प्रयत्न कर रहा है तब ऐसा अपराध और भी दुष्टतापूर्ण हो जाता। हमारे संघर्षके प्रति सहानुभूति रखनेवाले बहुतसे लोग ईसाई है। श्री एन्ड्रयूज पक्के ईसाई हैं; भारतमें उनसे अधिक सच्चा कोई दूसरा कार्यकर्ता नहीं हो सकता। वे दीन-बन्धु कहे जाते हैं और यह ठीक ही है। मुझे आशा है कि अजमेरकी कांग्रेस कमेटी इस मामलेकी ओर ध्यान देगी और इन ईसाई देशभाइयोंकी सभी प्रकारसे सहायता करेगी।
{{left|[अंग्नेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २८-७-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१८. उचित पश्चात्ताप और उससे शिक्षा'''}}}}
मुझे अभी-अभी श्री याकूब हसनका निम्न करुण पत्र प्राप्त हुआ है:
:{{gap}}'''मैं अब अनुभव करता हूँ कि मैंने दुर्बलताके क्षणमें एक गम्भीर अविवेक-पूर्ण कार्य कर डाला है। जबसे मुझे अपनी भूलकी महत्ताका भान हुआ है तबसे मेरे हृदयमें ऐसी गहरी पीड़ा हो रही है कि उससे मैं पागल ही हुआ जा रहा हूँ। मुझे आपसे आन्दोलनके मुखियाके रूपमें क्षमा माँगनी चाहिए, और मैं बहुत ही नम्रतापूर्वक क्षमा माँग रहा हूँ। आप मुझे मेरे मार्गदर्शक और नेताके रूपमें जितना बुरा-भला कहा जाना चाहिए उतना बुरा-भला कहें और इस भूलकी जितनी कड़ी सजा दी जानी चाहिए उतनी कड़ी सजा दें; परन्तु मुझे आशा है कि आप भगवान्के नामपर मेरे इस पाप-कर्मके लिए मुझे क्षमा कर देंगे। मैं इससे पहले तक जिस पवित्र कार्यको अपने विवेकके अनुसार ईमानदारी और सचाईसे करनेका प्रयत्न करता रहा हूँ यदि उसे मेरे इस कार्यसे कोई क्षति पहुँची हो तो मैं उसका प्रायश्चित्त करूँगा और इस प्रकार उस क्षतिको पूरा करूँगा और ईश्वरके सम्मुख अपना मुख उज्ज्वल करूँगा।'''
इस पत्रमें सचाईकी झलक है; और इससे सभी आलोचना व्यर्थ हो जाती है। मैंने श्री याकूब हसनको यह लिख दिया है कि उनको क्षमा करना मेरा काम नहीं है। कौन जानता है, किसी संकटकी घड़ी में उनसे भी अधिक दुर्बल सिद्ध होऊँ? उनको केवल ईश्वर ही क्षमा कर सकता है, क्योंकि केवल वही हमें अच्छी तरह<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४८६
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2026-08-16T08:23:25Z
अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>जानता है। अनेक देशोंमें और अनेक जातियोंकी मार्फत ईश्वरने अपनी वाणीमें हमें यह आश्वासन दिया है, ‘जब मनुष्य मेरे सामने शुद्ध और विनम्र हृदयसे अपनी दुर्बलताको स्वीकार कर लेता है तब मैं उसे क्षमा कर देता हूँ।’ हम स्वयं दुर्बल है और इसलिए जिसने अपनी दुर्बलता स्वीकार कर ली है हमें ऐसे भाईपर पत्थर नहीं चलाना चाहिए।
परन्तु श्री याकूब हसनकी दुर्दशासे हम सभीको संकटके प्रति सचेत हो जाना चाहिए, क्योंकि यद्यपि विजय निकट दिखाई देने लगी है तथापि उसके पूर्व संघर्षका जो अन्तिम दौर आयेगा, और वह आयेगा अवश्य, उसको सहन न कर सकनेका भय होता है। हमें यह निश्चय कर लेना चाहिए कि यह सरकार वास्तवमें लोगोंके संकल्पके सामने झुकने से पहले हमें बार-बार अच्छी तरह परखेगी। हमें हजारोंकी संख्यामें भारतकी जेलोंको भरनेके लिए तैयार हो जाना चाहिए। उनके भीतर हैजा फैले तो
भी हम चिन्ता न करें, हमें ऐसी तैयारी रखनी चाहिए। परन्तु दासताके जिस पुराने नैतिक हैजेसे हम पीड़ित है उसकी तुलनामें वास्तविक हैजा एक साधारण बात है। यदि शेरवानीके अभियोगकी हास्यास्पद कार्रवाईकी खबर सही है तो उन्हें बिलकुल निर्दोष होनेके बावजूद सजा दी गई है। संयुक्त प्रान्तमें कोई-न-कोई रोज ही जेल जा रहा है। अभी आन्ध्रसे इस आशयका तार आया है कि गुन्टूरमें दो कार्यकर्ताओंको एक-एक वर्षकी सजा हो गई है। उनमें से एक बैरिस्टर है। इस तारको भेजनेवाले श्री वेंकटप्पैयाका कहना है कि अभी दमन बढ़नेकी आशंका है। आगे-पीछे यह तो होना ही था। यदि हम इस प्रहारका सामना दृढ़तासे करेंगे तो इस वर्ष स्वराज्य निश्चय ही मिल जायेगा।
परन्तु केवल दुर्बलताका ही भय नहीं है। भय यह भी है कि लोग उत्तेजित किये जानेपर और बदलेकी कार्रवाई करने में कहीं भड़क न जायें। लोगोंकी कष्ट-सहन करनेकी अयोग्यता या अनिच्छाकी अपेक्षा उनके पागल हो जानेका भय अधिक गम्भीर है। भारत-भरमें प्रत्येक कार्यकर्ताका यह कर्तव्य है कि वह हिंसाको रोकनेका प्रयत्न करे, भले ही इस प्रयत्नमें उसकी जान ही क्यों न चली जाये।
भारत भविष्यमें किये जानेवाले व्यापक दमनका जो सबसे अच्छा उत्तर दे सकता है वह यह कि बुद्धिमान अर्थशास्त्री हमारे सामने जिन आँकड़ोंको प्रस्तुत करें हम उनकी बिलकुल चिन्ता न करें और सभी प्रकारके विदेशी कपड़ेका त्याग कर दें। यदि हम कृतसंकल्प हो जायें तो हम अपने लिए आवश्यक पूरा कपड़ा तीन महीने में ही हाथसे सूत कातकर और उसे हाथसे बुनकर तैयार कर सकते हैं। क्या हममें स्वराज्य प्राप्त होने तक, खादीसे सन्तोष कर लेनेका संकल्प-बल है?
{{left|}}[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २८-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>जानता है। अनेक देशोंमें और अनेक जातियोंकी मार्फत ईश्वरने अपनी वाणीमें हमें यह आश्वासन दिया है, ‘जब मनुष्य मेरे सामने शुद्ध और विनम्र हृदयसे अपनी दुर्बलताको स्वीकार कर लेता है तब मैं उसे क्षमा कर देता हूँ।’ हम स्वयं दुर्बल है और इसलिए जिसने अपनी दुर्बलता स्वीकार कर ली है हमें ऐसे भाईपर पत्थर नहीं चलाना चाहिए।
परन्तु श्री याकूब हसनकी दुर्दशासे हम सभीको संकटके प्रति सचेत हो जाना चाहिए, क्योंकि यद्यपि विजय निकट दिखाई देने लगी है तथापि उसके पूर्व संघर्षका जो अन्तिम दौर आयेगा, और वह आयेगा अवश्य, उसको सहन न कर सकनेका भय होता है। हमें यह निश्चय कर लेना चाहिए कि यह सरकार वास्तवमें लोगोंके संकल्पके सामने झुकने से पहले हमें बार-बार अच्छी तरह परखेगी। हमें हजारोंकी संख्यामें भारतकी जेलोंको भरनेके लिए तैयार हो जाना चाहिए। उनके भीतर हैजा फैले तो
भी हम चिन्ता न करें, हमें ऐसी तैयारी रखनी चाहिए। परन्तु दासताके जिस पुराने नैतिक हैजेसे हम पीड़ित है उसकी तुलनामें वास्तविक हैजा एक साधारण बात है। यदि शेरवानीके अभियोगकी हास्यास्पद कार्रवाईकी खबर सही है तो उन्हें बिलकुल निर्दोष होनेके बावजूद सजा दी गई है। संयुक्त प्रान्तमें कोई-न-कोई रोज ही जेल जा रहा है। अभी आन्ध्रसे इस आशयका तार आया है कि गुन्टूरमें दो कार्यकर्ताओंको एक-एक वर्षकी सजा हो गई है। उनमें से एक बैरिस्टर है। इस तारको भेजनेवाले श्री वेंकटप्पैयाका कहना है कि अभी दमन बढ़नेकी आशंका है। आगे-पीछे यह तो होना ही था। यदि हम इस प्रहारका सामना दृढ़तासे करेंगे तो इस वर्ष स्वराज्य निश्चय ही मिल जायेगा।
परन्तु केवल दुर्बलताका ही भय नहीं है। भय यह भी है कि लोग उत्तेजित किये जानेपर और बदलेकी कार्रवाई करने में कहीं भड़क न जायें। लोगोंकी कष्ट-सहन करनेकी अयोग्यता या अनिच्छाकी अपेक्षा उनके पागल हो जानेका भय अधिक गम्भीर है। भारत-भरमें प्रत्येक कार्यकर्ताका यह कर्तव्य है कि वह हिंसाको रोकनेका प्रयत्न करे, भले ही इस प्रयत्नमें उसकी जान ही क्यों न चली जाये।
भारत भविष्यमें किये जानेवाले व्यापक दमनका जो सबसे अच्छा उत्तर दे सकता है वह यह कि बुद्धिमान अर्थशास्त्री हमारे सामने जिन आँकड़ोंको प्रस्तुत करें हम उनकी बिलकुल चिन्ता न करें और सभी प्रकारके विदेशी कपड़ेका त्याग कर दें। यदि हम कृतसंकल्प हो जायें तो हम अपने लिए आवश्यक पूरा कपड़ा तीन महीने में ही हाथसे सूत कातकर और उसे हाथसे बुनकर तैयार कर सकते हैं। क्या हममें स्वराज्य प्राप्त होने तक, खादीसे सन्तोष कर लेनेका संकल्प-बल है?
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २८-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४८७
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१९. हिन्दू-मुस्लिम एकता'''}}}}
यह बात अब सबको विदित है कि जबतक हिन्दुओं तथा मुसलमानोंमें एकता स्थापित नहीं हो जाती, देश तबतक कोई निश्चित प्रगति नहीं कर सकता। इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि जिस सीमेंटसे ये दोनों जुड़े हैं वह अभी नर्म और गीला है।
उनमें अभीतक पारस्परिक अविश्वास बना हुआ है। राष्ट्र के नेता इस बातको भली-भाँति मान गये हैं कि जबतक दोनों जातियाँ एक-दूसरीपर विश्वास करनेकी और मिलकर काम करनेकी आवश्यकता अनुभव नहीं करतीं तबतक भारत उन्नति नहीं कर सकता। यद्यपि जनसाधारणमें बहुत परिवर्तन हो गया है, परन्तु परिवर्तन अभीतक स्थायी नहीं है। अभीतक मुसलमान जनसाधारण स्वराज्यकी उतनी आवश्यकता नहीं मानते जितनी हिन्दू मानते हैं। सार्वजनिक सभाओंमें मुसलमान उतने नहीं आते जितने हिन्दू आते हैं। इसमें जबरदस्ती तो कुछ की नहीं जा सकती। मुसलमानोंमें राजनीतिक अभिरुचि जगानेके लिए जितने समयकी आवश्यकता है [शायद] अभी उतना समय नहीं बीता। केवल एक वर्ष पूर्व ही मुसलमान कांग्रेसके कार्यमें सामूहिक रूपसे कोई भाग ही नहीं लेते थे। वस्तुतः यह एक आश्चर्य की बात है कि अब देशमें हजारों मुसलमान कांग्रेसके सदस्य बन गये हैं। यह इतना कार्य ही भारी सफलताका सूचक है।
परन्तु अभी तो बहुत काम करना है और मुख्यतः हिन्दुओंको करना है। अबतक जहाँ-कहीं भी मुसलमान उदासीन दिखाई देते हों वहीं वे उन्हें शामिल होनेका निमन्त्रण दें। हिन्दुओंकी ओरसे बहुधा इस बातकी शिकायत सुनने में आती है कि मुसलमान न तो कांग्रेस-संगठनमें सम्मिलित होते हैं और न तिलक स्वराज्य-कोषमें चन्दा देते हैं। स्वाभाविक प्रश्न यह है कि क्या उन्हें शामिल होनेकी दावत दी जाती है? प्रत्येक जिलेमें हिन्दुओंको चाहिए कि वे अपने मुसलमान पड़ोसियोंको इस क्षेत्रमें लानेका
विशेष प्रयत्न करें। जबतक हम एक-दूसरेको हीन या श्रेष्ठ समझेंगे तबतक हम लोगोंमें सच्ची समानता कभी कायम नहीं हो सकती। बराबरीके लोगोंमें किसीको हीन माननेकी गुंजाइश नहीं रहती। जहाँ मुसलमानोंकी संख्या कम हो वहाँ उन्हें अपनी अल्प-संख्याका या अपने भीतर शिक्षाको कमीका खयाल नहीं करना चाहिए। शिक्षाकी कमी शिक्षा प्राप्त करके पूरी की जानी चाहिए। अल्पसंख्यामें होना कई बार एक वरदान होता है। बहुसंख्या प्रायः प्रगतिमें बाधक सिद्ध हुई है। अन्ततः मुख्य प्रभाव चरित्रका ही पड़ता है। किन्तु मैंने यह लेख यह बताने के लिए नहीं लिखा है कि मुसलमान अपनी कमियाँ कैसे पूरी कर सकते हैं या उन्हें भविष्यमें क्या करना चाहिए।
मेरा मुख्य उद्देश्य हमारे सामने इस समय जो प्रश्न उपस्थित है उसपर विचार करना है। बकरीद जल्दी ही आ रही है। इस अवसरपर हिन्दुओं और मुसलमानोंमें झगड़े कराने के जो प्रयत्न किये जायेंगे; उनको व्यर्थ करनेके लिए हमें क्या करना चाहिए? यद्यपि बिहारमें स्थिति बहुत-कुछ सुधर गई है; किन्तु फिर भी हम अभी उसकी ओरसे निश्चिन्त नहीं हो सकते। अति उत्साही और अधीर हिन्दू कुछ मामलोंमें<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२१९. हिन्दू-मुस्लिम एकता'''}}}}
यह बात अब सबको विदित है कि जबतक हिन्दुओं तथा मुसलमानोंमें एकता स्थापित नहीं हो जाती, देश तबतक कोई निश्चित प्रगति नहीं कर सकता। इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि जिस सीमेंटसे ये दोनों जुड़े हैं वह अभी नर्म और गीला है।
उनमें अभीतक पारस्परिक अविश्वास बना हुआ है। राष्ट्र के नेता इस बातको भली-भाँति मान गये हैं कि जबतक दोनों जातियाँ एक-दूसरीपर विश्वास करनेकी और मिलकर काम करनेकी आवश्यकता अनुभव नहीं करतीं तबतक भारत उन्नति नहीं कर सकता। यद्यपि जनसाधारणमें बहुत परिवर्तन हो गया है, परन्तु परिवर्तन अभीतक स्थायी नहीं है। अभीतक मुसलमान जनसाधारण स्वराज्यकी उतनी आवश्यकता नहीं मानते जितनी हिन्दू मानते हैं। सार्वजनिक सभाओंमें मुसलमान उतने नहीं आते जितने हिन्दू आते हैं। इसमें जबरदस्ती तो कुछ की नहीं जा सकती। मुसलमानोंमें राजनीतिक अभिरुचि जगानेके लिए जितने समयकी आवश्यकता है [शायद] अभी उतना समय नहीं बीता। केवल एक वर्ष पूर्व ही मुसलमान कांग्रेसके कार्यमें सामूहिक रूपसे कोई भाग ही नहीं लेते थे। वस्तुतः यह एक आश्चर्य की बात है कि अब देशमें हजारों मुसलमान कांग्रेसके सदस्य बन गये हैं। यह इतना कार्य ही भारी सफलताका सूचक है।
परन्तु अभी तो बहुत काम करना है और मुख्यतः हिन्दुओंको करना है। अबतक जहाँ-कहीं भी मुसलमान उदासीन दिखाई देते हों वहीं वे उन्हें शामिल होनेका निमन्त्रण दें। हिन्दुओंकी ओरसे बहुधा इस बातकी शिकायत सुनने में आती है कि मुसलमान न तो कांग्रेस-संगठनमें सम्मिलित होते हैं और न तिलक स्वराज्य-कोषमें चन्दा देते हैं। स्वाभाविक प्रश्न यह है कि क्या उन्हें शामिल होनेकी दावत दी जाती है? प्रत्येक जिलेमें हिन्दुओंको चाहिए कि वे अपने मुसलमान पड़ोसियोंको इस क्षेत्रमें लानेका
विशेष प्रयत्न करें। जबतक हम एक-दूसरेको हीन या श्रेष्ठ समझेंगे तबतक हम लोगोंमें सच्ची समानता कभी कायम नहीं हो सकती। बराबरीके लोगोंमें किसीको हीन माननेकी गुंजाइश नहीं रहती। जहाँ मुसलमानोंकी संख्या कम हो वहाँ उन्हें अपनी अल्प-संख्याका या अपने भीतर शिक्षाको कमीका खयाल नहीं करना चाहिए। शिक्षाकी कमी शिक्षा प्राप्त करके पूरी की जानी चाहिए। अल्पसंख्यामें होना कई बार एक वरदान होता है। बहुसंख्या प्रायः प्रगतिमें बाधक सिद्ध हुई है। अन्ततः मुख्य प्रभाव चरित्रका ही पड़ता है। किन्तु मैंने यह लेख यह बताने के लिए नहीं लिखा है कि मुसलमान अपनी कमियाँ कैसे पूरी कर सकते हैं या उन्हें भविष्यमें क्या करना चाहिए।
मेरा मुख्य उद्देश्य हमारे सामने इस समय जो प्रश्न उपस्थित है उसपर विचार करना है। बकरीद जल्दी ही आ रही है। इस अवसरपर हिन्दुओं और मुसलमानोंमें झगड़े कराने के जो प्रयत्न किये जायेंगे; उनको व्यर्थ करनेके लिए हमें क्या करना चाहिए? यद्यपि बिहारमें स्थिति बहुत-कुछ सुधर गई है; किन्तु फिर भी हम अभी उसकी ओरसे निश्चिन्त नहीं हो सकते। अति उत्साही और अधीर हिन्दू कुछ मामलोंमें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/२३
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शिखर तिवारी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अजय पोद्दार अनमोल" />{|width=100%
|+{{c|{{larger|'''विषय-सूची'''}}}}
|-
|{{gap}}भूमिका||पांच
|-
|{{gap}}आभार ||ग्यारह
|-
|{{gap}}पाठकोंको सूचना ||बारह</noinclude>भूमिका
आभार
पाठकोंको सूचना
विषय-सूची
१. पत्र : गंगूको (१५-६-१९२७ के पश्चात् )
२. हिन्दू-मुस्लिम एकता (१६-६-१९२७)
३. टिप्पणियाँ : सरदार खड़कसिंह; क्या मैंने आन्ध्रको त्याग दिया है ? ;
एक शुभ निश्चय (१६-६-१९२७)
४. रानीपरज जाँच समिति (१६-६-१९२७)
६. पत्र : डब्ल्यू० बी० स्टोवरको (१६-६-१९२७)
५. पत्र : सोंजा श्लेसिनको (१६-६-१९२७)
७. पत्र : डॉ० एम० एस० केलकरको (१६-६-१९२७)
८. पत्रः ए० ए० पॉलको (१६-६-१९२७)
९. पत्र : श्रीमती माणिकबाई बहादुरजीको (१६-६-१९२७)
१०. पत्र : ए० रंगस्वामी अय्यंगारको (१६-६-१९२७)
११. पत्र : आर० बी० ग्रेगको (१६-६-१९२७)
१२. पत्र : मिर्जा एम० इस्माइलको (१६-६-१९२७)
१३. पत्र : बा० शि० मुंजेको (१६-६-१९२७)
१४. पत्र : कुवलयानन्दको (१७-६-१९२७)
१५. पत्र : कान्ति गांधीको (१७-६-१९२७)
१६. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१८-६-१९२७)
१७. पत्र : मनोरमादेवीको (१८-६-१९२७)
१८. पत्र : फीरोजा पी० एस० तलयारखाँको (१८-६-१९२७)
१९. पत्र : सांगली इंडस्ट्रियल एंड एग्रिकल्चरल स्कूलके प्रिंसिपलको
(१८-६-१९२७)
२०. धर्मके नामपर झगड़ा (१९-६-१९२७)
२१. स्वदेशी बनाम विदेशी (१९-६-१९२७)
२२. पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको (१९-६-१९२७)
२३. पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-६-१९२७)
२४. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (१९-६-१९२७)
२५. पत्र : हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्यायको (१९-६-१९२७)
२६. पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१९-६-१९२७)
२७. पत्र : मथुरादासको (२०-६-१९२७)
पांच
ग्यारह
बारह
१
२
५
७
९
१०
१२
१३
१३
१४
१५
१६
१७
१८
२०
२२
२३
२३
२४
२५
२७
२९
३०
३१
३२
३२
३३
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४००
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४१७. पत्र: सी॰ रंगनाथ रावको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२७ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
जब मैं बंगलोरमें था, आपने सरकारी वर्कशाप में बना हुआ चरखा भेजा था। यदि मुझे ठीक याद है तो आप अच्छे तकुए भी बनाते थे। क्या आप कृपया अपने इंजीनियर फोरमैन से इस बात का पता लगायेंगे कि क्या कोई ऐसी मशीन है, जो बिलकुल सही तकुए बनाती हो और यह मशीन या कोई दूसरी मशीन क्या झुके हुए या टेढ़े-मेढ़े तकुओंको बिलकुल सही करके सीधा कर दे सकती है। आश्रम में हम यह काम मशीनके बिना ही कर रहे हैं। यह बड़ी कठिन प्रक्रिया है और सिर्फ थोड़ेसे लोग इसमें कुशलता प्राप्त कर सकते हैं और मरम्मत करनेवालेको यदि एक दिनमें बहुतसे तकुए ठीक करने हों, तो उसकी आँखोंपर बहुत जोर पड़ता है। इस मामले में आप जो भी सूचना मुझे दे सकें या मेरे लिये प्राप्त कर सकें उसे मैं बहुत कुछ मानूँगा।
मुझे पता नहीं कि आपके विभाग में चरखा कैसी प्रगति कर रहा है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्री सी॰ रंगनाथ राव साहब<br>
डायरेक्टर ऑफ इंडस्ट्रीज<br>
गवर्नमेंट वर्कशाप<br>
बंगलोर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३२३३) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७१
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बम्बई में|४३९}}</noinclude>है। इसके बाद उन्होंने श्री ललितसे स्वर्गीय लोकमान्यके सम्बन्ध में अपना गीत गानेकी प्रार्थना की।
सभामें भाषण देते हुए गांधीजीने कहा कि जिस कामके लिए हम यहाँ एकत्र हुए हैं वह पवित्र है। आज शामका हमारा कार्यक्रम काफी लम्बा है। [इसलिए] मैं आपका अधिक समय नहीं लूँगा।
श्री तिलक लम्बे भाषण देनेके लिए प्रसिद्ध नहीं थे। वे बहादुरीके कामोंके लिए प्रसिद्ध थे। देश उनकी वक्तृत्व शक्तिके कारण उनको प्यार नहीं करता था। उनके समकालीन कुछ ऐसे व्यक्तियोंके नाम लिये जा सकते हैं जो भाषण-सज्जाकी दृष्टिसे अधिक अच्छे वक्ता माने जाते थे। इसलिए में आप लोगोंके सम्मुख लम्बा भाषण देकर आपका अधिक समय लेनेकी जरूरत नहीं समझता। में आपका ध्यान उनके कुछ उन अत्यन्त विशिष्ट गुणोंकी ओर दिलाऊँगा जिनकी बदौलत वे जनताके आदर्श बन गये थे——वे गुण जिनकी ऐसे राष्ट्रके लिए उस समय बहुत जरूरत है, जो एक ही सालके भीतर स्वराज्य पानेका बहुत जोरदार प्रयत्न कर रहा हो। आप उनके गुणोंका अनुकरण करके और उन्हें अपने जीवन में गूँथकर दिवंगत नेताको स्मृतिमें सच्ची
श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। एक महान् गुण जो देशने लोकमान्यमें देखा वह था उनकी निडरता। उनमें यह गुण इतना साफ झलकता था कि कुछ लोग तो उन्हें अशिष्ट कहने लगे थे। हम जानते हैं कि वे नौकरशाहीकी कड़ी आलोचना करनेसे कभी नहीं चूके। इसलिए नौकरशाहीका क्रोध भड़क उठा और उनपर अंग्रेजोंके खिलाफ नफरत पैदा करनेका आरोप लगाया गया। किन्तु मैं जानता हूँ कि यदि श्री तिलक नौकरशाहीकी आलोचना करनेमें कुछ उठा नहीं रखते थे तो वे उसके सदस्योंकी प्रशंसा
करनेको भी, जब कभी वे मुनासिब समझते, तैयार रहते थे। मुझे याद है कि कल-कत्ताके पिछले अधिवेशनके अवसरपर जिसमें तिलक महाराज उपस्थित थे, उन्होंने एक हिन्दी सम्मेलनकी अध्यक्षता की। वे वहाँ कांग्रेस में छिड़े हुए गम्भीर वाद-विवादसे उठकर आये थे। परन्तु सम्मेलनके सामने उन्होंने बिना लिखा विद्वत्तापूर्ण धारावाहिक भाषण दिया। उन्होंने देशी भाषाओंकी सेवाओंके सम्बन्धमें अंग्रेजीके विद्वानोंकी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भविष्यके इतिहास-लेखक उनकी सेवाओंकी कद्र करेंगे। तथापि इसका यह अर्थ नहीं कि अंग्रेज देशी भाषाओंको लाभ पहुँचानके लिए भी भारत आये थे, परन्तु फिर भी, जिन अनेक अंग्रेजोंने भारतीयोंकी अपनी भाषाओंकी कद्र करने में मदद की उनके प्रति भारत ऋणी है और उसे न मानना अनुचित होगा।
उनका दूसरा महान् गुण, जिसकी देशको बहुत जरूरत थी, उनका आत्मबलिदान था। वे अपने देशकी सेवामें कभी पीछे नहीं रहे। इसके लिए उन्होंने कभी सौदा नहीं किया। उनके लिए आत्मत्याग हर्षका विषय था। गांधीजीने कहा कि मुझे उदाहरण देने की जरूरत नहीं है क्योंकि श्रोतृगण उनके बलिदानोंके उदाहरण मुझसे अच्छी तरह जानते हैं। तीसरा महान् गुण उनकी असीम सादगी था। श्री तिलकने<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६४८
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{c|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}
{{Multicol}}
{{outdent|अकाल, २०२}}
{{outdent|अकाल निवारण कोषकी पहली किस्त, २२६}}
{{outdent|अधिकारियों द्वारा कानूनकी अवज्ञामें वृद्धि, ३२४}}
{{outdent|“अनुग्रह” का एक कार्य, ४२८-३०}}
{{outdent|अन्यायपूर्ण कर, १९५}}
{{outdent|अपनी भाषाओंके माध्यमसे शिक्षण, ३५१}}
{{outdent|अपने विषयमें, ३२३, ३२५-२७}}
{{outdent|अब्दुला हाजी आदम (स्व॰ श्री॰), २१६}}
{{outdent|अभिनन्दनपत्र : डब्ल्यू हॉस्केनको, १०१}}
{{right|—श्रीमती बॉगलको, १७९}}
{{outdent|अभ्यावेदन : उपनिवेश मन्त्रीको, ६८}}
{{outdent|अवैध विनियम, २९७}}
{{outdent|आखिरकार, ८९}}
{{outdent|आरोग्यके सम्बन्धमें सामान्य ज्ञान [-१], ४२५-२७; [-२], ४३०-३२; [-३], ३३८-३९; [-४], ४४३-४५; [-५], ४४९-५१; [-६], ४५४-५६; [-७], ४६०-६३; [-८], ४६४-६७; [-९], ४६९-७२; [-१०], ४७६-८०; [-११], ४८९-९१; [-१२], ४९७-४९९; [-१३], ५०४-०७}}
{{outdent|आव्रजनका मामला, १६२}}
{{outdent|इंग्लैंडका सबसे बड़ा ग्राहक, ४३६-३७}}
{{outdent|‘इंडियन ओपिनियन’ के पाठकोंके नाम, ४१९-२०}}
{{outdent|उपनिवेशमें जन्मे भारतीयोंसे, ११९}}
{{outdent|एक अच्छा उद्देश्य, ८१}}
{{outdent|एक उदात्त जीवन गाथा, ३०४-०६}}
{{outdent|एक टिप्पणी, २१४}}
{{outdent|“ एक दुर्भाग्यपूर्ण मामला, २६३}}
{{outdent|एक महत्त्वपूर्ण निर्णय, १३९}}
{{outdent|एक लज्जाजनक कृत्य, १९९}}
{{outdent|एक संशोधन, ४४६-४७}}
{{outdent|एक सत्याग्रहीका सम्मान, ११०}}
{{outdent|एक सार्वजनिक उदाहरण, ४८५}}
{{outdent|एक क्षोभकारी मामला, १५३}}
{{outdent|एशियाई आचार-विचारपर हमला, १८८}}
{{outdent|एस्टकोर्टमें परवाना सम्बन्धी मुकदमा, ५०३}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|(लॉर्ड) ऍम्टहिलकी समिति, २६९, ४३७}}
{{outdent|(,,) ऍम्टहिल द्वारा हमारा पक्ष-पोषण, ४९२-९३}}
{{outdent|क्या फिर सत्याग्रह होगा ? ४३३}}
{{outdent|क्या सीरियाई एशियाई हैं ? ५०३}}
{{outdent|कांग्रेसमें हमारे सवालपर विचार ४५२-५३}}
{{outdent|काफी देरसे, ४३९}}
{{outdent|क्रूगर्स डॉर्पका बाजार, ११४}}
{{outdent|क्रूगर्स डॉर्पके आन्दोलनकारी, ९६}}
{{outdent|(श्री) कैलेनबैक, १३१}}
{{outdent|(,,) कैलेनबैकका स्वागत, १२९}}
{{outdent|खुश खबरी, २०४}}
{{outdent|खेदजनक उत्तर, १८३}}
{{outdent|गलतबयानी, २३८}}
{{outdent|(श्री) गांधी और भारतीय कांग्रेस, १५७}}
{{outdent|(,,) गांधी “नजर कैद”, ३५६-५९}}
{{outdent|गिरमिट प्रथा, ४३४-३५}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६५१
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बैंकके उद्घाटनपर|४३३}}</noinclude>
चाहिए। खादीका व्यवहार किये बिना भारतको वास्तविक गौरव मिलना और उसकी कलाका उत्थान होना असम्भव है। जब स्वराज्य मिल जाये तब भले ही हमारे धनी-मानी लोग बहुत बारीक सूत कतवाकर और उससे ढाकाकी मलमल-जैसा कपड़ा
बनवाकर पहनें। अभी तो उन्हें भी [मोटी] खादी पहनना ही शोभा देता है।
गुजरातके व्यापारी विदेशी कपड़ा तो निश्चय ही नहीं मँगवायेंगे; उनसे इतनी आशा रखना कुछ अधिक नहीं है। जहाँ विदेशी कपड़ा बिकता है ऐसे प्रत्येक शहरमें कांग्रेस के नेताओंको जाना चाहिए और विदेशी कपड़ेके व्यापारियोंसे निवेदन करना चाहिए कि वे विदेशी कपड़ेका व्यापार बन्द कर दें। इस प्रकार कांग्रेसके सदस्योंका यह मुख्य कर्त्तव्य है कि वे राष्ट्रके प्रत्येक अंगसे स्वदेशीका व्यवहार करवानेके काम में जुट जायें।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' २१-७-१९२१}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२०७. भाषण: बैंकके उद्घाटनपर'''<ref>१. गांधीजीने शामके चार बजे यूनियन बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेडके भवनका उद्घाटन किया। सेठ रतनसी धरमसी मोरारजीने सभाकी अध्यक्षता की।</ref>}}}}
{{right|बम्बई <br>
२१ जुलाई, १९२१}}
मैं बैंक-व्यवसाय और लेन-देनसे ताल्लुक रखनेवाली संस्थाओंसे सम्बन्धित नहीं हूँ। उसकी प्रबन्ध विषयक बातोंसे भी मैं बहुत ही कम परिचित हूँ; मित्रोंने मुझे यहाँ आनेको प्रेरित किया और मैं उनके प्रेमके कारण यहाँ आ पहुँचा हूँ। मैं यहाँ कभी-कभी मातृभूमि के लिए धन माँगने आया करता हूँ। विदेशी कपड़ा न पहननेके लिए आपको राजी करनेके सम्बन्धमें भी मैं आपसे कुछ निवेदन करना चाहता हूँ और आपसे यह भी कहना चाहता हूँ कि आप स्वदेशीको प्रोत्साहन दें, क्योंकि उसमें स्वराज्यकी कुंजी छिपी हुई है। हममें एक बड़े बैंकका कारोबार चलानेकी और अपने राष्ट्रीय कार्योंके दौरान करोड़ों रुपयोंकी व्यवस्था करनेकी योग्यता होनी चाहिए। हमारे देशमें अधिक बैंक नहीं हैं, इसका यह अर्थ नहीं कि हममें करोड़ों और अरबों रुपयोंका ठीकसे प्रबन्ध करनेकी क्षमता नहीं है। हमारे देशमें पिछले कई सौ वर्षोंसे बैंक-व्यवसाय होता आ रहा है। हमारे मारवाड़ी लोग जन्मजात बैंकर हैं और वे यदि भारतके अलावा किसी भी अन्य देशमें जन्मे होते तो कुछ करोड़ ही नहीं सैंकड़ों करोड़ रुपयोंका प्रबन्ध कर चुके होते। परन्तु चूंकि वे इस निर्धन देशमें जन्मे हैं इसलिए उनकी योग्यताका मूल्य कम आँका जाता है। एक लेखकने लिखा है कि हालके अधिकांश युद्ध आर्थिक कारणोंसे ही हुए हैं; किन्तु यह कहना भी अनुचित न होगा
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{{left|२०-२८}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४६६
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कि अमीर लोगों द्वारा पीड़ित मानवताका बड़ा हित-साधन किया जा सकता मुझे आशा है कि इस बैंकका संचालन ऊँचे नैतिक सिद्धान्तोंपर किया जायेगा। मैं इसकी सब प्रकारकी समृद्धिकी कामना करता हूँ। इन शब्दोंके साथ में इसका उद्घाटन करता हूँ।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २३-७-१९२१}}
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{{c|{{larger|'''२०८. सन्देश: जनताको'''}}}}
{{right|[२१ जुलाई, १९२१]<ref> साधन-सूत्र के अनुसार ‘सन्देश’ के पत्रक इसी तारीखको वितरित किये गये थे।</ref>}}
पहली अगस्तको विदेशी वस्त्रोंका त्याग करके और खद्दर पहनकर “लोकमान्य के” पवित्र नामका स्मरण कीजिए। बहिष्कार स्वराज्य-प्राप्ति तथा सार्वजनिक और खिलाफत सम्बन्धी अन्यायोंका निराकरण करानेकी अपरिहार्य शर्त है।
पहली अगस्तको लाखों पुरुषों और स्त्रियों-हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई तथा यहूदी——सभीको लाखोंकी संख्यामें लोकमान्यकी स्मृतिका सम्मान करनेके लिए एकत्रित होना चाहिए।
जो लोग खादी, या कमसे कम [स्वदेशी] मिलका बना कपड़ा नहीं पहनना चाहते, उन्हें शरीक होनेकी जरूरत नहीं है। विदेशी वस्त्र पहनकर आना स्वर्गीय लोकमान्यकी स्मृतिका अपमान करना है। विदेशी वस्त्र स्वयंसेवकों के हवाले कीजिये या प्रिन्सेस स्ट्रीटमें<ref>बम्बई में।</ref> स्थित अशोक बिल्डिंगमें खोले गये स्टोरमें भेज दीजिये। सबसे अच्छी बात तो यह होगी कि उन कपड़ोंकी होली जला दी जाये। किन्तु यदि आप चाहेंगे तो वे स्मरना या किसी अन्य देशको भेज दिये जायेंगे।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स,''' १९२१}}<noinclude>{{dhr|3em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४६७
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२०९. भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर'''<ref>यह सभा मांडवीमें जिला कांग्रेस कमेटीके तत्त्वावधानमें रातको ९ बजे हुई थी। सभामें गांधीजीके अलावा श्रीमती सरोजिनी नायडूने भी भाषण दिया था।</ref>}}}}
{{right|२१ जुलाई, १९२१}}
महात्मा गांधी जब बोलनेके लिए उठे तो उनके स्वागतमें जोरकी हर्षध्वनि हुई। उन्होंने कहा कि बहुत थोड़ा-सा ही अरसा बीतनेपर आज हम दुबारा इकट्ठे हुए हैं। पिछली बार तिलक स्वराज्य-कोषके लिए चन्दा करने के लिए मिले थे।उस अवसरपर सभामें कुछ स्त्रियाँ भी उपस्थित थीं। आज मुझे स्वदेशीके सम्बन्धमें कुछ कहना है। मैं निश्चित रूपसे नहीं कह सकता कि हम इस सालके अन्ततक विदेशी कपड़ेका पूर्ण बहिष्कार कर पायेंगे या नहीं। यदि आप सबने इस काममें मदद की तो सम्भव है कि हम शीघ्र ही अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकें। मैं गत सितम्बर माससे लोगोंते कहता आ रहा हूँ कि यदि भारतके लोगोंने राष्ट्रीय कार्यमें मदद की तो हम आगामी सितम्बरतक स्वराज्य पान में सफल हो जायेंगे। स्वदेशी आन्दोलन एक ऐसा आन्दोलन है जिसमें अमीर-गरीब दोनों ही खुशीसे भाग ले सकते हैं। यहाँ-तक कि सरकारी कर्मचारी भी निःसंकोच शुद्ध स्वदेशी वस्त्र पहन सकते हैं। मेरा विचार है कि यदि आप देशकी पुकारका अनुकूल उत्तर दे सकें तो मैं समझूँगा कि
मेरा उद्देश्य पूरा हो गया। में आप लोगोंसे साफ-साफ कह दूँ कि ३१ जुलाईके बाद मैं आपसे स्वदेशी के बारेमें कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि उससे पहले हर विदेशी चीजका पूर्ण बहिष्कार हो चुकेगा।
...आगे बोलते हुए गांधीजीने कहा, जब कोई व्यक्ति यह मानने लगता है कि असत्य बोलना बुरा है तभी वह समझ पाता है कि वह क्या कर रहा है। इसलिए मैं आप लोगोंसे कह रहा हूँ कि कुछ स्वदेशी और कुछ विदेशी वस्त्र पहनकर आप अपनेको धोखा न दें। सभी धर्मोके अनुसार यह मिथ्याचार कहा जायेगा। मैं गत ६ अप्रैलसे आपको बताता आ रहा हूँ कि जबतक हिन्दू यह नहीं समझ लेते कि मुसल-मानोंका साथ देकर ही वे खिलाफतकी गलतियां सुधरवा सकते हैं, और जबतक मुसलमान यह नहीं समझते कि हिन्दुओंका साथ देकर ही वे अपने उद्देश्यकी पूर्तिमें सफल हो सकते हैं तबतक आप स्वराज्यके लक्ष्यको प्राप्त करनेमें सफल नहीं हो सकते। कल मैं अपने भाई मौलाना और बहन नायड़के साथ पूनामें एक जगह से दूसरी जगह फिरता रहा और लोकमान्य तिलककी बरसी मनाने में मदद करता रहा। स्वर्गीय लोकमान्यकी खातिर मैंने वहाँ सुबह से लेकर राततक काम किया और जिन लोगोंके सामने भाषण दिया उन्हें विदेशों में बने सभी वस्त्रोंका बहिष्कार करनेके लिए समझाया।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४६८
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
...गांधीजीने अपना भाषण जारी रखते हुए कहा कि मिलोंमें तैयार किये गये कपड़े पहनने में आपको काफी सावधान रहना चाहिए। राष्ट्रीय दृष्टिकोणसे मशीनका बना कपड़ा वांछनीय नहीं है। वहीं पुरुष या स्त्रियाँ सुन्दर हैं जो अपना काम अपने लिए और देशके लिए सन्तोषजनक ढंगसे करते हैं। मेरे सामने जो स्त्रियाँ बैठी हुई हैं, उनसे में प्रार्थना करूँगा कि वे बिना किसी शंकाके खादी पहनें, क्योंकि जबतक वे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार नहीं करतीं, वे स्वराज्यका दावा नहीं कर सकतीं।
भाषण समाप्त करते हुए गांधीजीने कहा कि जो लोग विदेशों में तैयार किये गये वस्त्रका बहिष्कार करनेको राजी हैं वे उन कपड़ोंको या तो गरीबोंकी मददके लिए स्मरना भेज दें या भारतसे बाहर कहीं और भेज दें या पहली अगस्तको जलवा दें। जैसे बने वैसे विदेशी वस्त्रोंको पूरी तरह नष्ट कर देना चाहिए। अलबत्ता हर व्यक्ति अपने उन पुराने विदेशी वस्त्रोंको संजोकर रखना चाहेगा जो उसे उसके प्रिय मित्रों या सम्बन्धियोंने प्रेमोपहारके रूपमें दिये हैं, परन्तु देशकी पुकारको सुनकर इस तरहके वस्त्र भी नष्ट कर देने चाहिए; या कहीं और भेज देने चाहिए।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २२-७-१९२१}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१०. भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर'''<ref>मोरारजी गोकुलदास हॉलमें ‘ओ’ वार्ड कांग्रेस कमेटीके तत्त्वावधानमें गांधीजीने रातके ९ बजे यह भाषण दिया था।</ref>}}}}
{{right|२२ जुलाई, १९२१}}
जब महात्मा गांधी बोलनेके लिए उठे तब जोरको हर्षध्वनि हुई। उन्होंने कहा कि मैं शहरमें जगह-जगह स्त्री-पुरुषोंके सामने भाषण देता रहा हूँ और मैं समझता हूँ कि आपसे स्वदेशीके सम्बन्धमें कुछ नई बात कहना सम्भव न होगा। मेरे पास लख-
नऊसे एक सज्जन आये थे। उन्होंने मुझे बताया कि संयुक्त प्रान्तमें कुछ गड़बड़ी चल रही है। सरकारने एक व्यक्तिको मामूली अपराधके कारण एक बहुत अँधेरी कोठरी में बन्द कर दिया और वह व्यक्ति अभी कैदमें ही है। उक्त सज्जनने मुझसे प्रश्न किया कि ऐसी स्थिति में मनुष्यको क्या करना चाहिए। मैंने उन्हें सभी कष्ट धैर्यपूर्वक सहने-की सलाह दी। आप सबको अपने हृदयों में धैर्य नामक सद्गुण लाना चाहिए। मुझे पक्का पता नहीं कि उक्त सज्जनने जो बातें कहीं हैं वे सच हैं या नहीं, क्योंकि तीन दिनतक लगातार अँधेरी कोठरी में बन्द रहना बहुत ही कठिन है। निस्सन्देह ऐसी ही घटनाका अनुभव मुझे भी है, क्योंकि अभीतक हम पंजाब में विदेशियों<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
...गांधीजीने अपना भाषण जारी रखते हुए कहा कि मिलोंमें तैयार किये गये कपड़े पहनने में आपको काफी सावधान रहना चाहिए। राष्ट्रीय दृष्टिकोणसे मशीनका बना कपड़ा वांछनीय नहीं है। वहीं पुरुष या स्त्रियाँ सुन्दर हैं जो अपना काम अपने लिए और देशके लिए सन्तोषजनक ढंगसे करते हैं। मेरे सामने जो स्त्रियाँ बैठी हुई हैं, उनसे में प्रार्थना करूँगा कि वे बिना किसी शंकाके खादी पहनें, क्योंकि जबतक वे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार नहीं करतीं, वे स्वराज्यका दावा नहीं कर सकतीं।
भाषण समाप्त करते हुए गांधीजीने कहा कि जो लोग विदेशों में तैयार किये गये वस्त्रका बहिष्कार करनेको राजी हैं वे उन कपड़ोंको या तो गरीबोंकी मददके लिए स्मरना भेज दें या भारतसे बाहर कहीं और भेज दें या पहली अगस्तको जलवा दें। जैसे बने वैसे विदेशी वस्त्रोंको पूरी तरह नष्ट कर देना चाहिए। अलबत्ता हर व्यक्ति अपने उन पुराने विदेशी वस्त्रोंको संजोकर रखना चाहेगा जो उसे उसके प्रिय मित्रों या सम्बन्धियोंने प्रेमोपहारके रूपमें दिये हैं, परन्तु देशकी पुकारको सुनकर इस तरहके वस्त्र भी नष्ट कर देने चाहिए; या कहीं और भेज देने चाहिए।
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जब महात्मा गांधी बोलनेके लिए उठे तब जोरको हर्षध्वनि हुई। उन्होंने कहा कि मैं शहरमें जगह-जगह स्त्री-पुरुषोंके सामने भाषण देता रहा हूँ और मैं समझता हूँ कि आपसे स्वदेशीके सम्बन्धमें कुछ नई बात कहना सम्भव न होगा। मेरे पास लख-
नऊसे एक सज्जन आये थे। उन्होंने मुझे बताया कि संयुक्त प्रान्तमें कुछ गड़बड़ी चल रही है। सरकारने एक व्यक्तिको मामूली अपराधके कारण एक बहुत अँधेरी कोठरी में बन्द कर दिया और वह व्यक्ति अभी कैदमें ही है। उक्त सज्जनने मुझसे प्रश्न किया कि ऐसी स्थिति में मनुष्यको क्या करना चाहिए। मैंने उन्हें सभी कष्ट धैर्यपूर्वक सहने-की सलाह दी। आप सबको अपने हृदयों में धैर्य नामक सद्गुण लाना चाहिए। मुझे पक्का पता नहीं कि उक्त सज्जनने जो बातें कहीं हैं वे सच हैं या नहीं, क्योंकि तीन दिनतक लगातार अँधेरी कोठरी में बन्द रहना बहुत ही कठिन है। निस्सन्देह ऐसी ही घटनाका अनुभव मुझे भी है, क्योंकि अभीतक हम पंजाब में विदेशियों<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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अँजली चौधरी
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...गांधीजीने अपना भाषण जारी रखते हुए कहा कि मिलोंमें तैयार किये गये कपड़े पहनने में आपको काफी सावधान रहना चाहिए। राष्ट्रीय दृष्टिकोणसे मशीनका बना कपड़ा वांछनीय नहीं है। वहीं पुरुष या स्त्रियाँ सुन्दर हैं जो अपना काम अपने लिए और देशके लिए सन्तोषजनक ढंगसे करते हैं। मेरे सामने जो स्त्रियाँ बैठी हुई हैं, उनसे में प्रार्थना करूँगा कि वे बिना किसी शंकाके खादी पहनें, क्योंकि जबतक वे विदेशी वस्त्रका बहिष्कार नहीं करतीं, वे स्वराज्यका दावा नहीं कर सकतीं।
भाषण समाप्त करते हुए गांधीजीने कहा कि जो लोग विदेशों में तैयार किये गये वस्त्रका बहिष्कार करनेको राजी हैं वे उन कपड़ोंको या तो गरीबोंकी मददके लिए स्मरना भेज दें या भारतसे बाहर कहीं और भेज दें या पहली अगस्तको जलवा दें। जैसे बने वैसे विदेशी वस्त्रोंको पूरी तरह नष्ट कर देना चाहिए। अलबत्ता हर व्यक्ति अपने उन पुराने विदेशी वस्त्रोंको संजोकर रखना चाहेगा जो उसे उसके प्रिय मित्रों या सम्बन्धियोंने प्रेमोपहारके रूपमें दिये हैं, परन्तु देशकी पुकारको सुनकर इस तरहके वस्त्र भी नष्ट कर देने चाहिए; या कहीं और भेज देने चाहिए।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४६९
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर|४३७}}</noinclude>द्वारा भारतीयोंपर की गयी नृशंसताएँ भूल नहीं सके हैं। इसलिए मुझे जो कहानी सुनाई गई है, वह सच भी हो सकती है।
मैं आपसे फिर कहता हूँ कि यदि आप देशके प्रति अपना कर्तव्य नहीं समझते तो आपका आजादी माँगना मुनासिब नहीं है। आज में इस सभामें आपसे स्वदेशीके सम्बन्धमें कुछ कहूँगा। मुझे किसीने और भी कहानियाँ सुनाई हैं, मसलन यह कि सरकारने तीन व्यक्तियों को गिरफ्तार किया, उनमेंसे एक व्यक्ति कांग्रेसका मन्त्री है। उसने गिरफ्तार होनेपर सरकारसे माफी माँग लो और बाकी दोनोंने भी माफी माँगी है। उन तीनों आदमियोंने अब राष्ट्रीय कार्यों में भाग लेना त्याग दिया है और आन्दोलनसे अलग हो गये हैं। उन्हें ऐसे कार्योंके लिए शर्म आनी चाहिए। मैं
उपस्थित लोगोंसे अनुरोध करूँगा कि जहाँतक हो सके निर्भय रहें, क्योंकि जब आपका उद्देश्य श्लाघनीय है तो आपको सरकारकी परवाह क्यों करनी चाहिए? यदि आप कठिनाइयाँ और मुसीबतें झेलने को तैयार नहीं हैं तो आपको आन्दोलनमें
भाग लेना इसी समय छोड़ देना चाहिए। इसलिए मैं यहाँ इस सभा-भवनमें उपस्थित हर स्त्री-पुरुषसे अपील करता हूँ कि वह हर घड़ी देशकी खातिर दुःख सहने को तैयार रहे।
विदेशी कपड़ोंके लिए हमने एक ‘डिपो’ खोला है जहाँ आप बिना-किसी हिचकिचाहटके अपने कपड़े दे सकते हैं। यदि आप ३१ जुलाई तक विदेशी-वस्त्रका बहिष्कार करने में सफल नहीं होते तो आपको अपने साथियोंकी निगाहोंमें और सारे संसारके सामने बहुत शर्मिन्दा होना पड़ेगा।
गांधीजीने उनसे प्रश्न किया कि क्या आप लोगोंने पहली अगस्तके लिए कुछ तैयारियाँ की हैं। उन विदेशी वस्त्रोंको जमा करनेके लिए खोले गये डिपोमें अपने कपड़े भेजनेमें जरा भी शर्मकी बात नहीं है। कुछ बहनोंने, जब उनसे अपनी विदेशी साड़ियोंका बहिष्कार करने को कहा गया, उत्तर दिया कि वे ऐसा करनेको राजी नहीं हैं। हाँ, कुछ ऐसी भी स्त्रियाँ हैं जो खादीके कपड़े पहननेको सदैव तैयार रहती हैं। आज किसी भी महिलाके पास यदि विदेशी कपड़ा है तो वह सबका सब राष्ट्रकी पुकारपर त्याग दिया जाना चाहिए। सभामें उपस्थित स्त्री-पुरुष यदि अपने विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करनेको राजी नहीं हैं तो उन्हें स्वराज्य पानेका कोई अधिकार नहीं है।
मुझे आज इस सभा में जो कुछ कहना है वह में कई बार पहले भी कह चुका हूँ और अब मैं उन लोगोंसे, जो मेरी बात माननेको तैयार हैं, अपने हाथ उठानेको कहूँगा। परन्तु उनसे हाथ उठवानेके पहले में उन्हें बता दूँ कि तथाकथित स्वदेशी वस्त्र, जो मिलका तैयार किया हुआ है, हरगिज न अपनाया जाये, क्योंकि मैं आपको यही राय देता हूँ कि मशीनके बने सभी प्रकारके कपड़ोंका त्याग किया जाये। खादी-की सर्वोत्तम खासियत यह है कि वह हाथकी कती और हाथकी बुनी होती है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७०
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
गांधीजीने आगे कहा कि बेजवाड़ाकी खादीकी साड़ियाँ अब बड़ी संख्या में उपलब्ध नहीं हैं, परन्तु उनके अभावमें आप खादीकी साड़ियाँ बहुत आसानीसे पहन सकती हैं और पहली अगस्तको बहुतसी स्त्रियाँ खादीकी साड़ी पहने दिखाई देंगी। मैं आपसे फिर कहूँगा कि इस पोशाकको अपनाने में कोई शर्मकी बात तो है ही नहीं क्योंकि यह आपकी राष्ट्रीय पोशाक है। आपको अपने मनमें निराशाका पोषण नहीं करना चाहिए बल्कि भारतीय राष्ट्रवादका संग्राम लड़नेके लिए साहसी बनना चाहिए।
इसके बाद उन्होंने उन स्त्री-पुरुषोंसे हाथ उठानेको कहा जो पहली अगस्तको और उसके बाद अपनी पोशाक खादीकी ही रखनेको राजी हैं। इस अनुरोधपर भवनमें उपस्थित लगभग सभी लोगोंने अपने हाथ उठाये। कुछ स्त्रियोंको थोड़ी-बहुत अनिच्छासे हाथ उठाते देखा गया।
इसके बाद गांधीजीने उनसे विदेशों में बने कपड़ोंका बहिष्कार करनेका अनुरोध किया और कहा कि वे किसी शंका या अनुग्रहका खयाल किये बिना खादी पहनें और उनसे यह भी कहा कि आप लोग किसी भी प्रकारकी धमकी से विचलित न हों।...
अपना भाषण समाप्त करते हुए गांधीजीने कहा कि स्वदेशी आन्दोलनके सम्बन्धमें मुझे और कुछ नहीं कहना है, क्योंकि पिछले बहुत दिनोंसे मैं बराबर इसी विषयपर बोलता आया हूँ। मुझे अपने देशवासियोंपर बहुत विश्वास है और इसलिए मैं ईश्वरसे प्रार्थना करता हूँ कि जिस महत्त्वपूर्ण आन्दोलनका मैंने श्रीगणेश किया है उसका परिणाम अच्छा ही निकले। (हर्षध्वनि)
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २३-७-१९२१}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२११. भाषण: बम्बई में<ref>गांधीजीने एम्पायर थियेटर में पारसी राजकीय सभांके तत्त्वावधान में आयोजित एक सभामें भाषण दिया। उपस्थित लोगोंमें मार्माडयूक पिक्योल, मौलाना अली और सरोजिनी नायडू भी थे। श्रोतृवर्गमें काफी स्त्रियाँ खादी पहने हुए थीं, जिनमें दादाभाई नौरोजीकी पौत्री कुमारी पेरीन कैप्टेन भी थीं। जलसेमें
आनेके लिए जो टिकट रखे गये थे उनकी बिक्रीसे मिले धनको लोकमान्य तिलककी सर्वोत्तम जीवनीके निमित्त अलग रख दिया गया था।</ref>}}}}
{{right|२३ जुलाई, १९२१}}
महात्मा गांधीने सभाकी कार्रवाई शुरू करनेसे पहले कहा कि में श्री जयकरका<ref>मुकन्दराव रामराव जयकर (१८७३-१९५९ ); प्रसिद्ध वकील तथा बम्बई विधान परिषद्के सदस्य, पंजाबके उपद्रवोंको जाँचमें गांधीजीको सहायता की। १९३७-३९ में संघीय न्यायालय (फेडरल कोर्ट) के न्यायाधीश।</ref> एक पत्र पढ़कर सुना रहा हूँ; उन्हें बुखार आ गया है इसलिए उन्होंने सभामें शरीक होने और लोकमान्यको स्मृतिमें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करनेमें असमर्थता व्यक्त की<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७२
250
186104
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644418
2026-08-15T16:18:48Z
अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हमेशा स्वदेशी-व्रतका पालन किया। यदि उनके रहते खादी बनाई जाती तो वे उसे बिना हिचकिचाहटके पहनते। मैं तो विश्वास ही नहीं कर सकता कि साज-सज्जाकी अभिलाषा उन्हें छू भी सकती थी। आप लोगोंसे मेरी अपील है कि श्री तिलककी स्वदेशी भावनाका अनुकरण करें। परन्तु यह अनुकरण अनमने भावसे न करें। मैंने सुना है कि जिन स्त्रियोंने जूनमें अपने स्वदेशी प्रेमका इतना अच्छा परिचय दिया था वही अब अपनी विदेशी साड़ियोंको दे डालने में संकोच कर रही हैं। मैं उन गहनोंको नहीं भूल सकता जो एक पारसी बहनने पारसी सभामें मेरे पास भेजे थे। मैं चाहता हूँ कि स्त्रियाँ स्वदेशीका काम इसी भावनासे जारी रखें। यदि यह काम उन्हें कठिन लगता हो तो श्री तिलकका उदाहरण सामने रखें। अपने वस्त्रोंकी खाली अलमारियोंको देख-देखकर आँसू बहानेका समय नहीं है। मैं आशा करता हूँ कि बम्बईके नागरिक अपना समस्त विदेशी कपड़ा त्याग देंगे और खादी पहनकर पहली अगस्तका दिन मनायेंगे। इसके बाद उन्होंने श्रीमती सरोजिनी नायडूसे भाषण देनेके लिए कहा।
{{left|[अंग्रेजीसे],<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २४-७-१९२१}}
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{{c|{{larger|'''२१२. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''चोर और डाकुओंका भय'''}}
खेड़ा जिलेमें चोर और डाकुओंका भय हमेशा बना रहता है। इनका थोड़ा-बहुत डर तो दूसरी जगहों में भी है। स्वराज्य लेनेका अर्थ आत्मरक्षा करना भी है। दूसरे लोग हमारी रक्षा करें और हम स्वराज्यका उपभोग करें, ऐसा नहीं हो सकता। लोगोंमें आत्मरक्षाकी शक्ति होनी ही चाहिए। यह शक्ति दो प्रकारसे आती है। एक तो हम चोरों और डाकुओंको चोरी करने और माल लूटने दें; इसका अर्थ है हम कोई सम्पत्ति ही न रखें। दूसरे हम चोरों और डाकुओंको दण्ड दें। सभी लोग अपनी सम्पत्ति गँवानेके लिए अथवा कोई सम्पत्ति न रखने के लिए तैयार नहीं होते। इसीलिए वे चोरों और डाकुओंको दण्ड देकर रोकनेका उपाय करते हैं। कोई चौकीदार रखता है और कोई स्वयं ही उनसे लड़ाई करता है। चोरों और डाकुओंसे लोगोंकी रक्षा करना राजाका एक मुख्य कार्य होता है। लोग जब अपनी रक्षा आप करना सीख लेंगे तभी स्वराज्य होगा। इसलिए हममें यह शक्ति आनी चाहिए। यह काम कुछ कठिन नहीं है। गाँवों और शहरोंमें लोग अपने स्वयंसेवक तैयार कर सकते हैं और पहरा दे सकते हैं। हर गांवमें रोशनीका इन्तजाम होना चाहिए। यदि हम इतना ही कर लें तो भी चोरोंका भय बहुत कुछ दूर हो जायेगा।
किन्तु इस कामके साथ-साथ और इससे भी ज्यादा जोरसे तो सुधारका काम किया जाना चाहिए। चोरोंसे बचाव करना जितना जरूरी है उसकी अपेक्षा चोरोंको<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७३
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|४४१}}</noinclude>चोरीके धन्धेसे निकालना बहुत जरूरी है। चोरी करना और डाका डालना यह एक तरहका नैतिक रोग है। इस रोगको दूर करनेका उपाय हमारे पास अवश्य होना चाहिए। इन लोगोंको हमें राष्ट्रका अंग मानना चाहिए और इनको सुधारनेका प्रयत्न करना चाहिए। ये लोग मिलने-जुलनेसे, समझाने-बुझानेसे और पढ़ाने लिखानेसे हमारी बात नहीं समझेंगे, ऐसा माननेका कोई कारण नहीं है। उन्हें सुधारने में हमें धीरजसे काम लेना चाहिए और उनके प्रति प्रेमभाव रखना चाहिए। हमारे लिए इन दोनों कामोंको हाथमें लेना बहुत जरूरी है।
{{c|'''रेलोंमें चोरी'''}}
रेलोंमें चोरी होने और रेल-कर्मचारियों द्वारा रिश्वत लिये जानेकी इतनी खबरें आ रही हैं कि यदि ये सब शिकायतें सच्ची हों तो हमें लज्जित होना चाहिए। समस्त देशमें आत्मशुद्धिकी प्रवृत्ति चल रही है। ऐसे समय किसी जगहसे चोरीकी या रिश्वत लेनेकी शिकायत आती है तो दुःख हुए बिना नहीं रहता। रेलोंमें चोरी होती है, इसमें सरकारका हाथ तो अवश्य ही नहीं है। इसके लिए तो केवल हम ही जिम्मेदार हैं। मैंने तो यहाँतक सुना है कि अकालके दिनोंमें घास ले जानेके लिए डिब्बे चाहिए तो उसके लिए भी रेल कर्मचारियोंको रिश्वत देनी पड़ती है; यदि हम रेलसे कोई पार्सल भेजते हैं और उसमें से चीज निकालनेकी जरा भी गुंजाइश होती है तो पार्सल तोड़ दिया जाता है और माल चुरा लिया जाता है। अभी हालमें बम्बई में एक व्यापारी-
का खादीका पार्सल आया था; उसमें से खादी चुरा ली गई। यदि रेल-कर्मचारियोंको मेरी इस टिप्पणीको देखनेका अवसर मिले तो उनसे मेरा निवेदन है कि वे जनताका ध्यान रखें और यदि इस तनख्वाहसे पूरा न पड़ता हो तो कमाईका कोई दूसरा ईमानदारीका साधन खोजें। रेल कर्मचारी संघोंके संचालकोंको मेरी सलाह है कि वे रेल कर्मचारियोंसे अपने कर्त्तव्योंका पालन करानेका उतना ही प्रयत्न करें जितना प्रयत्न उनके अधिकारोंकी रक्षा करनेका करते हैं। यदि हमें स्वराज्य मिला और यह शिकायत दूर नहीं हुई तो हमारा शासन उतना ही मँहगा रहेगा जितना मँहगा आज है। स्वराज्यकी रक्षा तभी की जा सकती है जब सच्चे और देशभक्त अर्थात् लोगोंके हितमें अपना हित समझनेवाले लोग अधिक हों और लालची, स्वार्थी और बेईमान लोग कम हों। स्वराज्यका एक अर्थ है ‘अधिक लोगोंका राज्य’, और यदि ये अधिक लोग अन्यायी और स्वार्थी हों तो राज्यमें अन्धाधुन्धी ही होगी, यह स्पष्ट है। मैं इस आन्दोलनमें यह मानकर सम्मिलित हुआ हूँ कि इसमें अधिकतर लोग सच्चे और अच्छे हैं; किन्तु वे भीरु, लापरवाह और अज्ञानी हो गये हैं और अपनी शक्तिको नहीं पहचानते। ये लोग जब अपनी शक्तिको पहचान जायेंगे तो वे अपने सच्चे बल अर्थात् आत्म-बलको काममें लेंगे और सफल होंगे।
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'''नवजीवन,''' २४-७-१९२१}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७४
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१३. भाषण: सान्ता क्रूज, बम्बई में'''}}}}
{{right|२४ जुलाई, १९२१}}
{{left|भाइयो और बहनो,}}
मैं आज यहाँ बहुत बड़ा लालच लेकर आया हूँ। मुझसे कल भाई विठ्ठलदासने कहा था कि बम्बई में जितनी तेजीसे पैसा इकट्ठा हुआ था, उतनी तेजीसे विदेशी कपड़ा इकट्ठा करनेका काम नहीं चल रहा। यदि किसी जगहसे इस कामकी अच्छी शुरुआत हो सके तो बहुत उत्साहसे काम चलेगा; फिर और लोग भी अच्छा उत्साह दिखायेंगे। रुपया इकट्ठा करनेके सम्बन्धमें कामकी शुरुआत माटुंगासे की गई थी। परन्तु विदेशी कपड़ा इकट्ठा करनेके सम्बन्ध में आमन्त्रणकी भिक्षा माँगनेका काम मैंने सान्ता क्रूजसे शुरू किया है और यह आमन्त्रण मुझे भिक्षामें मिला है।
स्वदेशीके प्रचारका काम सितम्बर से आरम्भ हुआ है; फिर लोगोंको यह काम नया शुरू हुआ क्यों लगता है? कांग्रेसने स्वदेशी के प्रचारका प्रस्ताव सितम्बर में पास किया था। इसे खिलाफत समितिने तो पहले ही स्वीकार कर लिया है। मौलाना
मुहम्मद अलीके साथ मैं तभीसे स्वदेशीका प्रचार कर रहा हूँ। मैं जहाँ-जहाँ घूमा हूँ वहाँ-वहाँ मैंने इस सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये हैं। यदि हम खिलाफत के सम्बन्धमें कोई निर्णय करा सकेंगे तो हममें स्वराज्य लेनेकी शक्ति आ जायेगी। किन्तु
स्वदेशीको पूरी तरह स्वीकार किये बिना यह शक्ति नहीं आयेगी।
चरखा हर घरमें होना चाहिए। स्वदेशीके दो अंग हैं—— (१) विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और (२) उसके स्थानमें देशी कपड़ेका उत्पादन। यदि इस समय सारा कपड़ा मिल ही तैयार करें तो स्वराज्य नहीं मिल सकेगा। तो हम उसे कायम नहीं सकेंगे, ऐसी मेरी मान्यता है। जबतक भारतमें घर-घर चरखा न चलेगा तबतक स्वराज्य नहीं मिलेगा।
हमारे आन्दोलनके तीन मुख्य अंग हैं——स्वदेशी, हिन्दू-मुस्लिम एकता और शान्ति। इन तीनों कामोंमें से पहला अर्थात् स्वदेशी हिन्दू, मुसलमान और पारसी सभीके लिए है।
भारतमें ईस्ट इंडिया कम्पनी जब व्यापार करनेके लिए आई थी यदि हमने तब स्वदेशी कपड़ेका त्याग न किया होता और इंग्लैंडसे आनेवाली मलमल और छींटपर न ललचाये होते तो उसके बादका हमारे देशका इतिहास आज दूसरी तरह ही लिखा
गया होता। इस समय तो हम फिर स्वदेशीको ग्रहण करनेपर ही स्वराज्य ले सकते हैं। और यदि हम हिन्दुओं और मुसलमानोंमें ऐक्य न रख सकें अथवा देशकी शान्तिको भंग कर दें तो हम स्वराज्य भी खो देंगे। हमारी मनोरचना ही ऐसी हुई है कि हम हमेशा शान्तिकी कामना करते हैं। स्वराज्य मिलनेपर कोई किसीको हानि नहीं पहुँचायेगा, यही नहीं बल्कि स्वराज्य लेने और उसे कायम रखनेकी ये जरूरी शर्तें हैं।<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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मैं आज यहाँ बहुत बड़ा लालच लेकर आया हूँ। मुझसे कल भाई विठ्ठलदासने कहा था कि बम्बई में जितनी तेजीसे पैसा इकट्ठा हुआ था, उतनी तेजीसे विदेशी कपड़ा इकट्ठा करनेका काम नहीं चल रहा। यदि किसी जगहसे इस कामकी अच्छी शुरुआत हो सके तो बहुत उत्साहसे काम चलेगा; फिर और लोग भी अच्छा उत्साह दिखायेंगे। रुपया इकट्ठा करनेके सम्बन्धमें कामकी शुरुआत माटुंगासे की गई थी। परन्तु विदेशी कपड़ा इकट्ठा करनेके सम्बन्ध में आमन्त्रणकी भिक्षा माँगनेका काम मैंने सान्ता क्रूजसे शुरू किया है और यह आमन्त्रण मुझे भिक्षामें मिला है।
स्वदेशीके प्रचारका काम सितम्बर से आरम्भ हुआ है; फिर लोगोंको यह काम नया शुरू हुआ क्यों लगता है? कांग्रेसने स्वदेशी के प्रचारका प्रस्ताव सितम्बर में पास किया था। इसे खिलाफत समितिने तो पहले ही स्वीकार कर लिया है। मौलाना
मुहम्मद अलीके साथ मैं तभीसे स्वदेशीका प्रचार कर रहा हूँ। मैं जहाँ-जहाँ घूमा हूँ वहाँ-वहाँ मैंने इस सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये हैं। यदि हम खिलाफत के सम्बन्धमें कोई निर्णय करा सकेंगे तो हममें स्वराज्य लेनेकी शक्ति आ जायेगी। किन्तु
स्वदेशीको पूरी तरह स्वीकार किये बिना यह शक्ति नहीं आयेगी।
चरखा हर घरमें होना चाहिए। स्वदेशीके दो अंग हैं—— (१) विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और (२) उसके स्थानमें देशी कपड़ेका उत्पादन। यदि इस समय सारा कपड़ा मिल ही तैयार करें तो स्वराज्य नहीं मिल सकेगा। तो हम उसे कायम नहीं सकेंगे, ऐसी मेरी मान्यता है। जबतक भारतमें घर-घर चरखा न चलेगा तबतक स्वराज्य नहीं मिलेगा।
हमारे आन्दोलनके तीन मुख्य अंग हैं——स्वदेशी, हिन्दू-मुस्लिम एकता और शान्ति। इन तीनों कामोंमें से पहला अर्थात् स्वदेशी हिन्दू, मुसलमान और पारसी सभीके लिए है।
भारतमें ईस्ट इंडिया कम्पनी जब व्यापार करनेके लिए आई थी यदि हमने तब स्वदेशी कपड़ेका त्याग न किया होता और इंग्लैंडसे आनेवाली मलमल और छींटपर न ललचाये होते तो उसके बादका हमारे देशका इतिहास आज दूसरी तरह ही लिखा
गया होता। इस समय तो हम फिर स्वदेशीको ग्रहण करनेपर ही स्वराज्य ले सकते हैं। और यदि हम हिन्दुओं और मुसलमानोंमें ऐक्य न रख सकें अथवा देशकी शान्तिको भंग कर दें तो हम स्वराज्य भी खो देंगे। हमारी मनोरचना ही ऐसी हुई है कि हम हमेशा शान्तिकी कामना करते हैं। स्वराज्य मिलनेपर कोई किसीको हानि नहीं पहुँचायेगा, यही नहीं बल्कि स्वराज्य लेने और उसे कायम रखनेकी ये जरूरी शर्तें हैं।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७५
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: सान्ता क्रूज, बम्बई में|४४३}}</noinclude>
मेरे विचारसे अन्य राष्ट्र तलवारके जोरसे हिन्दुस्तानको जीतनेकी इच्छा करें तो यह भिन्न बात होगी। परन्तु इतना तो सच है कि हिन्दू और मुसलमानोंमें दिन-प्रति-दिन कटुता कम होती जाती है। इसलिए यह काम तो चल ही रहा है; इस सम्बन्धमें कोई नया कदम उठानेकी जरूरत नहीं है। अभी शान्ति-स्थापनाके सम्बन्धमें भी कोई कदम उठानेकी जरूरत नहीं है। इन दोनों कार्योंके सम्बन्धमें हमें कोई त्याग नहीं करना पड़ता। किन्तु स्वदेशी के सम्बन्धमें तो त्याग करना है। हमें अपने समाजके समस्त अंगोंको एक-सा रखना है। हम मोची, बढ़ई या लुहारके बिना अपना काम नहीं चला सकते। इनकी सेवाएँ आवश्यक हैं। यदि हम इन समस्त शक्तियोंका विकास नहीं करेंगे तो हमें स्वराज्य नहीं मिलेगा। स्वदेशी के कार्यक्रमको एक मनुष्य पूरा नहीं कर सकता। रुपया तो एक मनुष्य भी दे सकता है, परन्तु कांग्रेसके एक करोड़ सदस्य बनाने हों तो हमें एक करोड़ स्त्री-पुरुषोंकी जरूरत होगी। इसी प्रकार यदि भारतमें स्वदेशीका प्रचार करना है तो उसमें हर एक भारतीयको भाग लेना चाहिए। इस कार्य में तो ३० करोड़ लोगोंको आहुति देनी चाहिए। सब लोगोंको भली-भाँति समझकर स्वदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना चाहिए। यह बहिष्कार एक वर्ष पहले असम्भव था। परन्तु यदि हम निश्चय कर लें तो इस अगस्त में विदेशी कपड़ेका पूरा बहिष्कार किया जा सकता है। मैंने कहा है कि विदेशी कपड़ेके बहिष्कारके बाद एक महीने के भीतर स्वराज्य लिया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि यदि हम इस कार्यको पूरा कर दिखायें तो हम सरकारको अन्तिम चुनौती दे सकते हैं। कपड़ा तैयार करनेकी शक्ति हमारे भीतर मौजूद है, किन्तु हममें श्रद्धा नहीं है। यह बात भोजन जैसी ही है। घरमें चूल्हा हो तो भोजन बनाना आसान है। इसी तरह यदि घरका चरखा हो तो उससे काम भी जरूर लिया जायेगा और वह काम आसान भी हो जायेगा। चरखेकी रचना इतनी सादी है कि वह बड़ी आसानीसे बनाया जा सकता है। मैं मानता हूँ कि हम विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करनेके लिए तैयार हैं। चरखेमें जादू है; परन्तु वह जादू तभी काम करेगा जब भारतीयोंमें श्रद्धा हो। किन्तु मैं मानता हूँ कि भारतीयोंमें इतनी श्रद्धा आ गई है।
भारतके लोगोंको महीन कपड़ेका मोह हो गया है। अभी उनका यह मोह गया नहीं है। कठिन व्रत धारण करनेवाली भारतीय स्त्रियोंको भी खादीकी साड़ी पहनना भारी पड़ता है। जब स्त्री और पुरुष दोनों ही कहते हैं, ‘हम बारीक कपड़ा नहीं छोड़ सकते‘, तब मुझे उनपर दया आती है। यदि लोग मुझसे ऐसी बात कहेंगे तो मैं उनसे यही कहूँगा कि स्वराज्य नहीं मिलेगा; और यदि कोई स्वराज्य देने आयेगा तो मैं उससे ना कह दूँगा। मैं उस समय उससे पूछूंगा कि वह किन लोगोंको स्वराज्य दे रहा है? इन लोगोंको तो अजीर्ण हो गया है। हम क्षयग्रस्त हो गये हैं। हमारे मुखोंपर जो लाली है वह दिखावटी है। हमें अपने देशकी बनी चीजें अच्छी नहीं लगतीं और विदेशी चीजें अच्छी लगती हैं, यह कहाँकी बुद्धिमानी है। आपने आज जो कपड़ा दिया है वह कितना-सा है? मुझे तो वह कपड़ा चाहिए जो आपने अपने बक्सोंमें रख छोड़ा है। आप अपना धर्म समझकर विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करें। आपने संसारमें क्या सुख देखा है? जिस राजमें उलटा न्याय होता है क्या उसमें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७६
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>रहना हम सहन कर सकते हैं? हमें तो स्वदेशी व्रतधारी बनना चाहिए। स्वदेशी साधन और साध्य दोनों है। यदि आप विदेशी कपड़ेको त्याज्य समझते हों तो उसे मुझे दे दें। यह बहिष्कार ऐसा नहीं है कि आप बादमें विदेशी कपड़ा खरीद सकें। इसका कारण यह है कि स्वराज्य इस बहिष्कारपर ही निर्भर है। स्वराज्य मिलनेपर हम व्यवस्थापिका सभाओंमें, न्यायालयोंमें जा सकते हैं; किन्तु विदेशी कपड़ा तो तब भी नहीं पहना जा सकता। इसके विपरीत आचरण करना अपने मनको धोखा देनेके
समान है। यह कार्य करोड़ों लोगों द्वारा किया जाना चाहिए।
आप स्वदेशीके व्रतका पूर्ण पालन करें। आपके पास जितना विदेशी कपड़ा हो सबका सब निकालकर दे दें।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''गुजराती,''' ३१-७-१९२१}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१४. भाषण: मारवाड़ी विद्यालयमें'''<ref>गांधीजीने यह भाषण मारवाड़ी विद्यालय हॉलमें गिरगाँव कांग्रेस कमेटीके तत्वावधानमें हुई एक सार्वजनिक सभामें विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके सम्बन्धमें दिया था। इस सभा में सरोजिनी नायडू और मुहम्मद अलीने मी भाषण दिये थे। उस समय वर्षा होनेके बावजूद लोग बड़ी संख्या में उपस्थित हुए थे।</ref>}}}}
{{right|२६ जुलाई, १९२१}}
महात्मा गांधीने कहा कि पहली अगस्त आनेवाली है और आपको उससे पहले ही अपने देशके प्रति अपना कर्त्तव्य पूरा कर लेना है। आपके कर्त्तव्यका सबूत आपके अपने शरीर होंगे, आपके कर्त्तव्य पालनका तथा आपके त्यागका प्रमाण आपके शरीर-से ही मिल जायेगा। तब किसी से यह पूछनेकी जरूरत नहीं रहेगी कि क्या उसने अपना कर्त्तव्य पूरा किया है, क्योंकि उसका चिह्न प्रत्येक व्यक्ति प्रत्यक्ष देख सकेगा। कुछ लोग ऐसा खयाल करते हैं कि जो एक करोड़ रुपया चन्देमें आया है उसमें अपना हिस्सा देकर हम तो अपना कर्त्तव्य पहले ही पूरा कर चुके हैं। उनका ऐसा सोचना ठीक नहीं है। वह चन्दा तो तिलक स्मारक स्वराज्य-कोषके लिए है, और जबतक आपको स्वराज्य नहीं मिल जाता तबतक यह कहना ठीक न होगा कि आपने उस महान् दिवंगत नेताके प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन किया है। चन्दा इकट्ठा कर लेना ही काफी नहीं है, आपको स्वराज्य प्राप्त करना है। जब इस देशमें स्वदेशीका पूर्ण रूपसे प्रचलन हो जायेगा तब आप यह कह सकेंगे कि स्वराज्य मिल गया है। ऐसा कहने से मेरा यह मतलब नहीं है कि जिस दिन आप स्वदेशीको पूर्णतः अपना लेंगे उसी दिन स्वराज्य मिला हुआ समझें। जिस दिन आप पूर्ण स्वदेशी अपना लेंगे, उस दिनसे मैं
एक महीने का समय स्वराज्य पानके लिए माँगूँगा । स्वदेशी अपनाकर आप स्वराज्य-की नींव रखेंगे और एक महीने की अवधिमें ही स्वराज्य प्राप्त कर सकेंगे।<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>रहना हम सहन कर सकते हैं? हमें तो स्वदेशी व्रतधारी बनना चाहिए। स्वदेशी साधन और साध्य दोनों है। यदि आप विदेशी कपड़ेको त्याज्य समझते हों तो उसे मुझे दे दें। यह बहिष्कार ऐसा नहीं है कि आप बादमें विदेशी कपड़ा खरीद सकें। इसका कारण यह है कि स्वराज्य इस बहिष्कारपर ही निर्भर है। स्वराज्य मिलनेपर हम व्यवस्थापिका सभाओंमें, न्यायालयोंमें जा सकते हैं; किन्तु विदेशी कपड़ा तो तब भी नहीं पहना जा सकता। इसके विपरीत आचरण करना अपने मनको धोखा देनेके
समान है। यह कार्य करोड़ों लोगों द्वारा किया जाना चाहिए।
आप स्वदेशीके व्रतका पूर्ण पालन करें। आपके पास जितना विदेशी कपड़ा हो सबका सब निकालकर दे दें।
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महात्मा गांधीने कहा कि पहली अगस्त आनेवाली है और आपको उससे पहले ही अपने देशके प्रति अपना कर्त्तव्य पूरा कर लेना है। आपके कर्त्तव्यका सबूत आपके अपने शरीर होंगे, आपके कर्त्तव्य पालनका तथा आपके त्यागका प्रमाण आपके शरीर-से ही मिल जायेगा। तब किसी से यह पूछनेकी जरूरत नहीं रहेगी कि क्या उसने अपना कर्त्तव्य पूरा किया है, क्योंकि उसका चिह्न प्रत्येक व्यक्ति प्रत्यक्ष देख सकेगा। कुछ लोग ऐसा खयाल करते हैं कि जो एक करोड़ रुपया चन्देमें आया है उसमें अपना हिस्सा देकर हम तो अपना कर्त्तव्य पहले ही पूरा कर चुके हैं। उनका ऐसा सोचना ठीक नहीं है। वह चन्दा तो तिलक स्मारक स्वराज्य-कोषके लिए है, और जबतक आपको स्वराज्य नहीं मिल जाता तबतक यह कहना ठीक न होगा कि आपने उस महान् दिवंगत नेताके प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन किया है। चन्दा इकट्ठा कर लेना ही काफी नहीं है, आपको स्वराज्य प्राप्त करना है। जब इस देशमें स्वदेशीका पूर्ण रूपसे प्रचलन हो जायेगा तब आप यह कह सकेंगे कि स्वराज्य मिल गया है। ऐसा कहने से मेरा यह मतलब नहीं है कि जिस दिन आप स्वदेशीको पूर्णतः अपना लेंगे उसी दिन स्वराज्य मिला हुआ समझें। जिस दिन आप पूर्ण स्वदेशी अपना लेंगे, उस दिनसे मैं
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>रहना हम सहन कर सकते हैं? हमें तो स्वदेशी व्रतधारी बनना चाहिए। स्वदेशी साधन और साध्य दोनों है। यदि आप विदेशी कपड़ेको त्याज्य समझते हों तो उसे मुझे दे दें। यह बहिष्कार ऐसा नहीं है कि आप बादमें विदेशी कपड़ा खरीद सकें। इसका कारण यह है कि स्वराज्य इस बहिष्कारपर ही निर्भर है। स्वराज्य मिलनेपर हम व्यवस्थापिका सभाओंमें, न्यायालयोंमें जा सकते हैं; किन्तु विदेशी कपड़ा तो तब भी नहीं पहना जा सकता। इसके विपरीत आचरण करना अपने मनको धोखा देनेके
समान है। यह कार्य करोड़ों लोगों द्वारा किया जाना चाहिए।
आप स्वदेशीके व्रतका पूर्ण पालन करें। आपके पास जितना विदेशी कपड़ा हो सबका सब निकालकर दे दें।
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'''गुजराती,''' ३१-७-१९२१}}
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महात्मा गांधीने कहा कि पहली अगस्त आनेवाली है और आपको उससे पहले ही अपने देशके प्रति अपना कर्त्तव्य पूरा कर लेना है। आपके कर्त्तव्यका सबूत आपके अपने शरीर होंगे, आपके कर्त्तव्य पालनका तथा आपके त्यागका प्रमाण आपके शरीर-से ही मिल जायेगा। तब किसी से यह पूछनेकी जरूरत नहीं रहेगी कि क्या उसने अपना कर्त्तव्य पूरा किया है, क्योंकि उसका चिह्न प्रत्येक व्यक्ति प्रत्यक्ष देख सकेगा। कुछ लोग ऐसा खयाल करते हैं कि जो एक करोड़ रुपया चन्देमें आया है उसमें अपना हिस्सा देकर हम तो अपना कर्त्तव्य पहले ही पूरा कर चुके हैं। उनका ऐसा सोचना ठीक नहीं है। वह चन्दा तो तिलक स्मारक स्वराज्य-कोषके लिए है, और जबतक आपको स्वराज्य नहीं मिल जाता तबतक यह कहना ठीक न होगा कि आपने उस महान् दिवंगत नेताके प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन किया है। चन्दा इकट्ठा कर लेना ही काफी नहीं है, आपको स्वराज्य प्राप्त करना है। जब इस देशमें स्वदेशीका पूर्ण रूपसे प्रचलन हो जायेगा तब आप यह कह सकेंगे कि स्वराज्य मिल गया है। ऐसा कहने से मेरा यह मतलब नहीं है कि जिस दिन आप स्वदेशीको पूर्णतः अपना लेंगे उसी दिन स्वराज्य मिला हुआ समझें। जिस दिन आप पूर्ण स्वदेशी अपना लेंगे, उस दिनसे मैं
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर|४४५}}</noinclude>
लाला लाजपतरायने मुझे इत्मीनान दिलाया है कि केवल पंजाबमें ४० लाख चरखे हैं। आप तो सारे भारतमें २० लाख ही चलवाना चाहते हैं। वहाँ तो हर घरमें उतने चरखे हैं जितनी उस घरमें स्त्रियाँ हैं और यदि किसी पंजाबी स्त्रीसे यह पूछा जाये कि क्या आप सूत कात सकती हैं तो वह इसमें अपना अपमान मानेगी। औरतें सूत कातना पसन्द करती हैं, परन्तु इस देशमें पुरुष मैनचेस्टरकी धोतियाँ पहनते हैं इसलिए चरखेपर सूत कातनेकी प्रथा उठ जाने की जिम्मेवारी उन्होंकी है। अब चूंकि स्वदेशीको अपनाया जा रहा है, इसलिए चरखेका प्रचलन सारे देशमें हो गया है। देशमें काफी कपास है; कातनेवाले भी काफी हैं। कमी केवल इस बातकी है कि इन चीजोंका उपयोग करनेकी आपकी इच्छा नहीं होती। जिस तरह स्वराज्य पानेके लिए सब लोगोंका, चाहे वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, पारसी, ईसाई या यहूदी हों, एक राष्ट्रके रूपमें संगठित हो जाना जरूरी है उसी तरह यह बहुत जरूरी है कि स्वराज्य पानेके उद्देश्यसे आप लोग पूर्ण स्वदेशी अपनाएँ। सच्चा स्वदेशी वस्त्र भारत में काते गये सुतका बना हुआ ही माना जायेगा? उसमें विदेशी सूतका जरा
भी अंश नहीं होना चाहिए। जो साड़ियाँ विदेशी सूतसे बनी हुई हों, वे अवश्य त्याग दी जायें। कुछ स्त्री-पुरुष अपने सब कपड़े एकदम त्यागना पसन्द नहीं करेंगे; वे कुछको बचा रखना चाहते हैं। परन्तु यदि वे इस मार्गका अनुसरण करते हैं तो वे स्वराज्यकी योग्यता प्राप्त नहीं कर सकेंगे। विदेशी कपड़ा खरीदकर उन्होंने या तो अपने धनका अपव्यय किया है या अपने बहुतेरे देशवासियोंको भुखमरीकी हालत-में रखा है। उन्हें चाहिए कि वे उन कलुषित वस्त्रोंको तुरन्त फेंक दें। सफेद खद्दर न केवल पहली अगस्तको बल्कि उसके बाद भी पहनना चाहिए।
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'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २७-७-१९२१}}
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{{c|{{larger|'''२१५. भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर'''<ref>यह सार्वजनिक सभा भाषखला जिला कांग्रेस कमेटीके तत्त्वावधान में भाषखला उपनगर में हुई थी। गांधीजीने इसी सभा में अपना यह भाषण दिया था।
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{{right|२६ जुलाई, १९२१}}
महात्माजीने स्वदेशीपर व्याख्यान देते हुए कहा कि खादी पहनना अविलम्ब शुरू कर देना चाहिए और यह भी कहा कि खादीके द्वारा ही हमें निकट भविष्य में स्वराज्य-प्राप्तिका अनुष्ठान पूरा करना है यह समय आपके मौन बैठे रहनेका नहीं बल्कि हम सबके लिए जागरूक रहनेका और अपने देशको विदेशियोंके कब्जे से मुक्त करनेका है। लगभग ६० करोड़ रुपया प्रतिवर्ष हमारे देशके बाहर चला जाया करता है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७८
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
उन्होंने श्रोताओंसे पूछा कि उस रकमका कितना भाग हमारे देशवासियोंके हितमें खर्च किया जाता है? यदि दो आनेका विलायती कपड़ा खरीदा जाता है तो उसमें से सात पैसे विदेशी व्यापारियोंकी जेबोंमें चले जाते हैं। परन्तु यदि हम वो आनेकी खादी मोल लेते हैं तो एक या दो पैसे ही भारतीय व्यापारियोंकी जेबोंमें जाते हैं और बाकी पैसे हमारे कार्यकर्त्ताओंको मिलते हैं। जब ऐसी स्थिति है तो आप सबको पहली अगस्तको अपने वे सारे विदेशी कपड़े जला देने को तैयार रहना चाहिए, जिन्हें पहनना, फिर कहूँगा कि पाप ही है। हमें इस पापका प्रक्षालन, उन कपड़ोंको उस पवित्र-स्थानपर जलाकर जहाँ हमारे महान् नेता लोकमान्य तिलकका दाह-संस्कार किया गया था, करना चाहिए। यदि आपमेसे कुछ लोग उन्हें जला डालने को तैयार
नहीं हैं, तो वे उनको स्मरना भेज सकते हैं। यदि आप इस कामको पूरा नहीं कर सकते तो आप अपने दिवंगत नेता लोकमान्यके प्रति कर्तव्य से च्युत होंगे। पहली अगस्तको चौपाटीकी रेतपर में आप सबको अपने देशके प्रति अपना पवित्र कर्त्तव्य निभाते हुए देखनेकी आशा रखता हूँ।
इस सम्बन्ध में में भायखलाके बढ़ई भाइयोंको कुछ सलाह देना नहीं भूलूँगा। मैं यहाँ उनसे थैली लेने नहीं आया हूँ, वरन् उन्हें साफ-साफ यह बताने आया हूँ कि स्वदेशीकी सफलता उनके कर्त्तव्यका अंग है। उनका कर्त्तव्य है कि अच्छे और सस्ते चरखे, जितने भी बना सकें बनायें, जो हर भारतीय घरकी शोभा बनें। मैं अपने बढ़ई दोस्तोंके बारेमें यह अच्छी तरह जानता हूँ कि वे आकर्षक अलमारियाँ तथा लकड़ीको अन्य चीजें बनाने में कुशल हैं। परन्तु अब उन्हें ऐसी चीजें बनाने में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। गांधीजीने बढ़ई भाइयोंसे सानुरोध कहा कि आप लोग हजारोंकी संख्या में चरखे तैयार करें, क्योंकि वे स्वराज्यकी सीढ़ियाँ हैं। उन्हें मिल-जुलकर कलसे ही चरखे बनाना शुरू कर देना चाहिए। मुझे आशा है कि वे मेरी बातपर अमल करेंगे।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २८-७-१९२१}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७९
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{c|{{larger|'''२१६. तार: हकीम अजमल खाँको'''}}}}
{{right|[२८ जुलाई, १९२१ के पूर्व]<ref>लगता है कि यह तार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी २८-७-१९२१ को बम्बई में होनेवाली बैठकसे पहले भेजा गया था।</ref>}}
{{left|हकीमजी अजमल खाँ<br>
दिल्ली}}
बहुत खेद हुआ। अखिल भारतीय कमेटीकी बैठक २८को बम्बई में हो रही है। पहली अगस्त के बाद अलीगढ़ जा सकता हूँ। विदेशी कपड़ेका बहिष्कार संगठित कर रहा हूँ। यदि आप मुझे इसी महीने अलीगढ़ बुलाना चाहते हैं तो उस काममें रुकावट पड़ेगी। जवाब दीजिए।
अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ ७५७४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१७. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''सफेद टोपी'''}}
‘ब्रिटिश इंडिया स्टीम नैविगेशन कम्पनी’ का एक कर्मचारी खादी की टोपी पहनने-की गुस्ताखी करनेपर नौकरीसे निकाल दिया गया है। इस तरहकी कार्रवाई पहले ‘शॉ वैलेस ऐंड कम्पनी’ ने की थी। यह तो अपमान है और यह अपमान कितना बड़ा है इसे हमने अभी अनुभव नहीं किया है। हम इतने अधिक गिर गये हैं कि हमें अपनी इस गिरावटकी ह्द दिखाई नहीं देती। फिर भी राष्ट्रोंके लिए इस प्रकारके अपमान जान-बूझकर या रोषके आवेशमें किये गए प्रहारोंसे अधिक अप्रतिष्ठाजनक होते हैं। जमीनपर पेटके बल रेंगने और नाक रगड़नेसे शरीरको कोड़े लगाये जानेकी<ref>यह उल्लेख अप्रैल १९१९ में पंजाबमें मार्शल लॉके दिनों में दी गई सजाओंका है।</ref> अपेक्षा भले ही कम कष्ट होता हो, परन्तु इस बारेमें कोई सन्देह नहीं कि पेटके बल रेंगने और नाक रगड़नेसे कोड़े लगाये जानेकी अपेक्षा भारतका अधिक अपमान हुआ है। किसीको सलाम करनेमें क्या बुराई है? परन्तु फिर भी एक महाराजाकी गद्दी इसलिए खतरे में पड़ गई थी<ref>बड़ौदा-नरेश महाराजा सयाजीराव गायकवादकी, सन् १९११ के दिल्ली-दरबारमें किये गये आचरणके कारण।</ref> कि उन्होंने वाइसराय के सामने कायदेसे सलामी देने और सलीकेसे पीछे हटनेका खयाल नहीं रखा था। वह सलामी राजभक्तिकी सलामी थी, जो राजभक्ति कायम रखनेके लिए जबरदस्ती अपमानपूर्वक ली जाती थी। इसी तरह इन दोनों पेढ़ियोंने अपने इन गरीब क्लकोंको इसलिए नौकरीसे निकाल दिया है कि<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४८०
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>उनमें अपनी राष्ट्रीय पोशाक पहननेकी हिम्मत थी, जिसे आप चाहें तो उनकी श्रद्धाका प्रतीक भी कह सकते हैं। ये घमंडी पेढ़ियाँ यह सहन नहीं कर सकीं कि उनके क्लर्क ऐसी हिम्मत दिखायें। जिस समय भारतकी नारियाँ अपने नारीत्वको और भारतके पुरुष अपने पुरुषत्वको अनुभव करने लग जायेंगे, उसी समय भारत स्वतन्त्र हो जायेगा। तब दुनियाकी कोई ताकत उसे स्वतन्त्र होनेसे नहीं रोक सकती। इसलिए इन दोनों व्यक्तियोंको नौकरीसे निकाल दिये जानेका हमारे लिए बहुत बड़ा अर्थ होना चाहिए। और मुझे स्वीकार करना चाहिए कि इन पेढ़ियोंके अन्य कर्मचारियोंकी निष्क्रियतासे मुझे दुःखजनक निराशा हुई है। उन्हें कमसे-कम साधारण मजदूरोंका-सा साहस तो दिखाना ही था। भारत में एक पीड़ित भाईके लिए बड़ी भारी हड़ताल होनेके उदाहरण अनेक मिल सकते हैं। क्या इन पेढ़ियोंके क्लकोंके मनमें अपने भाईके लिए कोई दर्द नहीं है? क्या वे समूचे भारतसे अपने निकट सम्बन्धका दावा कर सकते हैं? यदि उनके किसी सगे भाईके साथ वैसा ही व्यवहार किया गया होता, जैसा कि इन दो बहादुर नौजवानोंके साथ किया गया, तो वे क्या करते? पर इन पेढ़ियोंके कर्मचारी अब भी अपनी गलती सुधार सकते हैं। वे विरोधस्वरूप अब भी खादीकी सफेद टोपियाँ पहन सकते हैं और अपने उन क्लर्क भाइयोंको उनके पदोंपर फिरसे नियुक्त करनेकी माँग कर सकते हैं।
मैं इन दोनों बड़ी पेढ़ियोंके मैनेजरोंको भी नम्रतापूर्वक सावधान करता हूँ। असहयोगी जातिवादसे बचे हुए हैं। वे अपनी पूरी ताकतसे एक दूषित प्रणालीसे लड़ रहे हैं। व्यक्तिश: अंग्रेजोंसे उनका कोई झगड़ा नहीं है। परन्तु यदि अंग्रेज इन पेढ़ियोंके मैनेजरोंकी तरह पक्षपात करेंगे तो जाति विस्फोटको रोकना मुश्किल होगा। यदि यूरोपीय व्यापारी इस मामलेको बहुत जरूरी मानकर इन पेढ़ियोंकी भयंकर गलतियोंको फौरन ठीक न करेंगे तो यूरोपीय पेढ़ियोंका बहिष्कार किये जानेका भय है।
{{c|'''क्षमा मँगवानेका प्रयत्न'''}}
‘‘इंडिपेंडेंट’ में प्रकाशित सर्वश्री जवाहरलाल नेहरू, जोजेफ और रंगा अय्यर तथा संयुक्त प्रान्तकी सरकारके बीच हुए पत्र-व्यवहारसे यह सिद्ध होता है कि मेरा वाइसरायके पास जाना और अली भाइयोंको अपने कुछ भाषणोंके लिए क्षमा माँगनेकी राय देना, राजनीतिक दृष्टिसे बहुत बड़ी भूल थी। अब यह अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है, जैसा कि मौलाना अब्दुल बारीने कहा है, कि जहाँ मेरे वाइसरायके पास जानेसे और
अली भाइयों द्वारा क्षमा-याचना करनेसे हुई हानि प्रत्यक्ष है, वहाँ इनसे कदाचित् कुछ लाभ हुआ है तो वह इतना अस्पष्ट है कि जनता उसे नहीं देख सकती। सौभाग्यसे मैं राजनीतिज्ञ नहीं हूँ। और संयुक्त प्रान्तकी सरकारने जवाहरलाल नेहरू तथा उनके
साथियोंको फँसाने के लिए अली भाइयोंकी क्षमा-याचनाका जो निन्दनीय उपयोग किया है, उसके पीछे छिपी भलाईको में देखता हूँ। सरकारने तो अली भाइयोंकी क्षमा-याचनाकी शब्दावलीका अनुकरण तक किया है। लोग प्रायः गलत जगहपर रखी हुई वस्तुको गन्दगी कहते हैं और यह ठीक ही है। ठीक इसी तरह जहाँ मैं यह मानता हूँ कि अली भाइयोंकी क्षमा-याचना ठीक जगहपर होनेके कारण एक सम्मानजनक बात<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>उनमें अपनी राष्ट्रीय पोशाक पहननेकी हिम्मत थी, जिसे आप चाहें तो उनकी श्रद्धाका प्रतीक भी कह सकते हैं। ये घमंडी पेढ़ियाँ यह सहन नहीं कर सकीं कि उनके क्लर्क ऐसी हिम्मत दिखायें। जिस समय भारतकी नारियाँ अपने नारीत्वको और भारतके पुरुष अपने पुरुषत्वको अनुभव करने लग जायेंगे, उसी समय भारत स्वतन्त्र हो जायेगा। तब दुनियाकी कोई ताकत उसे स्वतन्त्र होनेसे नहीं रोक सकती। इसलिए इन दोनों व्यक्तियोंको नौकरीसे निकाल दिये जानेका हमारे लिए बहुत बड़ा अर्थ होना चाहिए। और मुझे स्वीकार करना चाहिए कि इन पेढ़ियोंके अन्य कर्मचारियोंकी निष्क्रियतासे मुझे दुःखजनक निराशा हुई है। उन्हें कमसे-कम साधारण मजदूरोंका-सा साहस तो दिखाना ही था। भारत में एक पीड़ित भाईके लिए बड़ी भारी हड़ताल होनेके उदाहरण अनेक मिल सकते हैं। क्या इन पेढ़ियोंके क्लकोंके मनमें अपने भाईके लिए कोई दर्द नहीं है? क्या वे समूचे भारतसे अपने निकट सम्बन्धका दावा कर सकते हैं? यदि उनके किसी सगे भाईके साथ वैसा ही व्यवहार किया गया होता, जैसा कि इन दो बहादुर नौजवानोंके साथ किया गया, तो वे क्या करते? पर इन पेढ़ियोंके कर्मचारी अब भी अपनी गलती सुधार सकते हैं। वे विरोधस्वरूप अब भी खादीकी सफेद टोपियाँ पहन सकते हैं और अपने उन क्लर्क भाइयोंको उनके पदोंपर फिरसे नियुक्त करनेकी माँग कर सकते हैं।
मैं इन दोनों बड़ी पेढ़ियोंके मैनेजरोंको भी नम्रतापूर्वक सावधान करता हूँ। असहयोगी जातिवादसे बचे हुए हैं। वे अपनी पूरी ताकतसे एक दूषित प्रणालीसे लड़ रहे हैं। व्यक्तिश: अंग्रेजोंसे उनका कोई झगड़ा नहीं है। परन्तु यदि अंग्रेज इन पेढ़ियोंके मैनेजरोंकी तरह पक्षपात करेंगे तो जाति विस्फोटको रोकना मुश्किल होगा। यदि यूरोपीय व्यापारी इस मामलेको बहुत जरूरी मानकर इन पेढ़ियोंकी भयंकर गलतियोंको फौरन ठीक न करेंगे तो यूरोपीय पेढ़ियोंका बहिष्कार किये जानेका भय है।
{{c|'''क्षमा मँगवानेका प्रयत्न'''}}
‘इंडिपेंडेंट’ में प्रकाशित सर्वश्री जवाहरलाल नेहरू, जोजेफ और रंगा अय्यर तथा संयुक्त प्रान्तकी सरकारके बीच हुए पत्र-व्यवहारसे यह सिद्ध होता है कि मेरा वाइसरायके पास जाना और अली भाइयोंको अपने कुछ भाषणोंके लिए क्षमा माँगनेकी राय देना, राजनीतिक दृष्टिसे बहुत बड़ी भूल थी। अब यह अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है, जैसा कि मौलाना अब्दुल बारीने कहा है, कि जहाँ मेरे वाइसरायके पास जानेसे और
अली भाइयों द्वारा क्षमा-याचना करनेसे हुई हानि प्रत्यक्ष है, वहाँ इनसे कदाचित् कुछ लाभ हुआ है तो वह इतना अस्पष्ट है कि जनता उसे नहीं देख सकती। सौभाग्यसे मैं राजनीतिज्ञ नहीं हूँ। और संयुक्त प्रान्तकी सरकारने जवाहरलाल नेहरू तथा उनके
साथियोंको फँसाने के लिए अली भाइयोंकी क्षमा-याचनाका जो निन्दनीय उपयोग किया है, उसके पीछे छिपी भलाईको में देखता हूँ। सरकारने तो अली भाइयोंकी क्षमा-याचनाकी शब्दावलीका अनुकरण तक किया है। लोग प्रायः गलत जगहपर रखी हुई वस्तुको गन्दगी कहते हैं और यह ठीक ही है। ठीक इसी तरह जहाँ मैं यह मानता हूँ कि अली भाइयोंकी क्षमा-याचना ठीक जगहपर होनेके कारण एक सम्मानजनक बात<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|४४९}}</noinclude>थी, वहाँ गलत जगहपर होनेके कारण संयुक्त प्रान्तकी सरकार द्वारा अपेक्षित क्षमा-याचना असम्मानजनक बात होती। परन्तु उस सरकारका पाला जबरदस्त लोगोंसे पड़ा है। वे न तो झूठे उदाहरणोंसे धोखा खानेवाले हैं और न जेलकी धमकियोंसे डरनेवाले हैं। इसलिए सरकारके सामने यही मार्ग रह गया है कि वह इन तीनों जन-सेवकोंके विरुद्ध उनके भाषणों और लेखोंके आधारपर, जिन्हें जनता और वे स्वयं भूल चुकी है, अभियोग चलाकर अपनी अयोग्यता और असहनशीलताका अतिरिक्त प्रमाण दे। यदि वह ‘अपराधियों’ पर मुकदमा चलायेगी तो अशान्तिके मूल कारणको दूर करनेमें अपनी अयोग्यता सिद्ध करेगी और इससे उसकी समुचित विरोधी आलोचनाको सहन करनेकी अक्षमता भी प्रमाणित होगी। कानेको काना कहें तो उसे यह बात कड़ी लग सकती है; परन्तु सीधा-सादा सत्य जितनी अच्छी तरह समझमें आता है, उतनी अच्छी तरह कोई दूसरी चीज समझमें नहीं आ सकती। यदि कोई सरकार कठोर कार्य करती है तो कोमल शब्दोंमें उसका सच्चा वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिए इन पत्रोंके प्रकाशनसे स्वराज्यके उद्देश्यकी बहुत बड़ी सेवा हुई है। इससे वातावरण साफ हो गया है और इससे उन सभी लोगोंका मार्ग-निर्देशन होगा जिनकी स्थिति इन तीनों मित्रों जैसी है। कोई भी असहयोगी मुकदमेसे बचने के लिए न तो क्षमा माँग सकता है और न कोई आश्वासन दे सकता है। साथ ही, जब उसका ध्यान उसकी कही हुई ऐसी बातकी ओर आकर्षित किया जाये जो हिंसा भड़कानेवाली मानी जाती हो, तो उसे अपनी गलती तुरन्त सुधार लेनी चाहिए और अपने सिद्धान्तके प्रति ईमानदार रहना चाहिए। यदि सरकार असहयोगियोंसे ईमानदारीका बरताव करना चाहती हो और उन्हें
इसलिए जेलमें रखना चाहती हो कि वह असहयोग आन्दोलनको उसके अहिंसात्मक होने और बने रहने के बावजूद नापसन्द करती हो तो उसे उनपर सिर्फ धारा १२४ क के अन्तर्गत मुकदमा चलाना चाहिए। उस अवस्थामें हममें से हरएक अवश्य ही अपना अपराध स्वीकार कर लेगा क्योंकि एक तन्त्रके रूपमें सरकारके प्रति अपने मनमें असन्तोष रखना और फैलाना हमारा सिद्धान्त है। हम इस तन्त्रको समाप्त करने-पर तुले हैं; और मुझे बताया गया है कि ऐसा करना उक्त धाराकी दृष्टिसे राजद्रोह
है। यदि कानूनमें इस तन्त्रकी समाप्तिकी बात सोचनेकी अनुमति है तो हर असह-योगी वचनबद्ध देशभक्त है।
{{c|'''पत्रकारिताका दुरुपयोग'''}}
यह कुछ महत्त्वपूर्ण बात है कि ‘डिचर’ने जो-कुछ कहा है और जिसका उल्लेख इन स्तम्भों में किया जा चुका है उसके लिए ‘कैपिटल’ ने श्री गणेश दामोदर सावरकरसे क्षमा-याचना कर ली है। इसमें ‘डिचर’ ने जो आरोप लगाया था वह इतना गम्भीर था कि उससे अली भाई गम्भीर संकटमें पड़ गये थे। क्या किसी उत्तरदायी समाचारपत्र-का सम्पादक चुनौती दिये जानेपर इस तथ्यकी आड़ लेकर दोषमुक्त होनेका दावा कर
सकता है कि उसने अपने पत्र में केवल अफवाह ही प्रचारित की है? क्या वह किसी ऐसी अफवाहको जिसमें दी गई विगत लगभग तथ्योंके विवरण जैसी हो, विशद चर्चाका आधार बना सकता है? उदाहरणके लिए, ये सब अफवाहपर आधारित हैं पहले ऐसा<noinclude>{{left|२०-२९|1em}}</noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|४४९}}</noinclude>थी, वहाँ गलत जगहपर होनेके कारण संयुक्त प्रान्तकी सरकार द्वारा अपेक्षित क्षमा-याचना असम्मानजनक बात होती। परन्तु उस सरकारका पाला जबरदस्त लोगोंसे पड़ा है। वे न तो झूठे उदाहरणोंसे धोखा खानेवाले हैं और न जेलकी धमकियोंसे डरनेवाले हैं। इसलिए सरकारके सामने यही मार्ग रह गया है कि वह इन तीनों जन-सेवकोंके विरुद्ध उनके भाषणों और लेखोंके आधारपर, जिन्हें जनता और वे स्वयं भूल चुकी है, अभियोग चलाकर अपनी अयोग्यता और असहनशीलताका अतिरिक्त प्रमाण दे। यदि वह ‘अपराधियों’ पर मुकदमा चलायेगी तो अशान्तिके मूल कारणको दूर करनेमें अपनी अयोग्यता सिद्ध करेगी और इससे उसकी समुचित विरोधी आलोचनाको सहन करनेकी अक्षमता भी प्रमाणित होगी। कानेको काना कहें तो उसे यह बात कड़ी लग सकती है; परन्तु सीधा-सादा सत्य जितनी अच्छी तरह समझमें आता है, उतनी अच्छी तरह कोई दूसरी चीज समझमें नहीं आ सकती। यदि कोई सरकार कठोर कार्य करती है तो कोमल शब्दोंमें उसका सच्चा वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिए इन पत्रोंके प्रकाशनसे स्वराज्यके उद्देश्यकी बहुत बड़ी सेवा हुई है। इससे वातावरण साफ हो गया है और इससे उन सभी लोगोंका मार्ग-निर्देशन होगा जिनकी स्थिति इन तीनों मित्रों जैसी है। कोई भी असहयोगी मुकदमेसे बचने के लिए न तो क्षमा माँग सकता है और न कोई आश्वासन दे सकता है। साथ ही, जब उसका ध्यान उसकी कही हुई ऐसी बातकी ओर आकर्षित किया जाये जो हिंसा भड़कानेवाली मानी जाती हो, तो उसे अपनी गलती तुरन्त सुधार लेनी चाहिए और अपने सिद्धान्तके प्रति ईमानदार रहना चाहिए। यदि सरकार असहयोगियोंसे ईमानदारीका बरताव करना चाहती हो और उन्हें
इसलिए जेलमें रखना चाहती हो कि वह असहयोग आन्दोलनको उसके अहिंसात्मक होने और बने रहने के बावजूद नापसन्द करती हो तो उसे उनपर सिर्फ धारा १२४ क के अन्तर्गत मुकदमा चलाना चाहिए। उस अवस्थामें हममें से हरएक अवश्य ही अपना अपराध स्वीकार कर लेगा क्योंकि एक तन्त्रके रूपमें सरकारके प्रति अपने मनमें असन्तोष रखना और फैलाना हमारा सिद्धान्त है। हम इस तन्त्रको समाप्त करने-पर तुले हैं; और मुझे बताया गया है कि ऐसा करना उक्त धाराकी दृष्टिसे राजद्रोह
है। यदि कानूनमें इस तन्त्रकी समाप्तिकी बात सोचनेकी अनुमति है तो हर असह-योगी वचनबद्ध देशभक्त है।
{{c|'''पत्रकारिताका दुरुपयोग'''}}
यह कुछ महत्त्वपूर्ण बात है कि ‘डिचर’ने जो-कुछ कहा है और जिसका उल्लेख इन स्तम्भों में किया जा चुका है उसके लिए ‘कैपिटल’ ने श्री गणेश दामोदर सावरकरसे क्षमा-याचना कर ली है। इसमें ‘डिचर’ ने जो आरोप लगाया था वह इतना गम्भीर था कि उससे अली भाई गम्भीर संकटमें पड़ गये थे। क्या किसी उत्तरदायी समाचारपत्र-का सम्पादक चुनौती दिये जानेपर इस तथ्यकी आड़ लेकर दोषमुक्त होनेका दावा कर सकता है कि उसने अपने पत्र में केवल अफवाह ही प्रचारित की है? क्या वह किसी ऐसी अफवाहको जिसमें दी गई विगत लगभग तथ्योंके विवरण जैसी हो, विशद चर्चाका आधार बना सकता है? उदाहरणके लिए, ये सब अफवाहपर आधारित हैं पहले ऐसा<noinclude>{{left|२०-२९|1em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कहकर क्या मैं सम्राट्के विरुद्ध सभी प्रकारके आरोप लगा सकता हूँ? क्या मैं ऐसे आरोप लगानेके बाद उनसे ऐसे स्पष्ट निष्कर्ष निकाल सकता हूँ जिनसे महामहिम सम्राट्को बहुत अधिक क्षति पहुँचती हो? मैंने इस बातको इस प्रकार मोटे तौरपर केवल यही दिखानेके लिए रखा है कि मैं ब्रिटिश साम्राज्यके सर्वोच्च भद्र पुरुषकी प्रसिद्धिको कायरतापूर्वक कलुषित करनेके कारण अभद्र व्यवहार करनेका दोषी होऊँगा और कानूनके अनुसार सभ्य समाजसे तत्काल निकाला जा सकूँगा। इस मामले में इन हानिकर आरोपोंके शिकार संयोगसे दो सभ्य और वीर भारतीय हैं, और आरोपकर्त्ता एक यूरोपीय पत्रकार है, क्या इससे कुछ अन्तर पड़ जाता है? श्री गणेश सावरकरने अपने सम्मानपर लगाये गए इन दूषित आरोपोंपर क्षमा-याचना कर लेने मात्र से सन्तोष कर लिया है, यद्यपि वह क्षमा-याचना भी सच्चे मनसे की गई नहीं जान पड़ती है, और मुकदमा चलानेका अपना अधिकार उदारतापूर्वक छोड़ दिया है। ऐसा करके वे देशके लोगोंकी दृष्टिमें और भी ऊँचे उठ गये हैं। श्री सावरकरके वकीलोंको दिये गये उत्तरमें इस पूर्णतः अक्षम्य आचरणके सम्बन्धमें बहाना प्रस्तुत किया गया है। जब-तक सम्पादक अफवाहोंकी बारीकी से छानबीन न कर ले और उनके सचाईपर आधारित होनेका विश्वास न कर ले तबतक न्याय और ईमानदारीका थोड़ा-सा भी खयाल रखनेवाला समाचारपत्र अफवाहोंको प्रचारित नहीं कर सकता। मुझे आशा है कि अंग्रेजी और हिन्दी के समाचारपत्र इस बातपर गम्भीरतासे विचार करेंगे और ‘कैपिटल’ के सम्पादकको यह अनुभव करा देंगे कि उन्होंने एक सम्मानित पत्रकारके अयोग्य आचरण करनेका अपराध किया है।
{{c|'''विदेशी कपड़े क्यों जलाएँ?'''}}
आलोचकोंने विदेशी कपड़े जलाने के सम्बन्धमें मुझे बेहद झिड़कियाँ दी हैं। विदेशी कपड़े जलाने के विरुद्ध प्रस्तुत किये गये प्रत्येक तर्कपर विचार करनेके बाद मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि विदेशी कपड़ेसे छुटकारा पानेका सबसे अच्छा तरीका उसको नष्ट कर देना ही है। प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीने यह बात विदेशी कपड़ा देनेवाले व्यक्तियोंकी इच्छापर छोड़ दी है कि वे विदेशी कपड़ेको नष्ट कर दें या भारतसे बाहर स्मरना या कहीं अन्यत्र भेज दें। इसलिए यदि विदेशी कपड़े से छुटकारा पानेका एकमात्र तरीका उनको नष्ट करना ही बताया गया होता तो इस प्रश्नका जितना महत्त्व होता उसका उतना महत्त्व अब नहीं रहता। विदेशी कपड़े को नष्ट करनेका औचित्य इस बात-
पर निर्भर करता है कि किसी व्यक्तिका विदेशी कपड़ेको छोड़ देनेकी आवश्यकतामें कितना तीव्र विश्वास है। जिस प्रकार शराब न पीनेवाला मनुष्य अपने शराब के गोदामकी शराब अपने जरूरतमंद पड़ोसीको नहीं दे देता, उसी प्रकार यदि कोई स्वदेशीका भक्त उस शराब न पीनेवाले मनुष्य के समान ही बहुत उत्कट भावना रखता है तो वह अपने बक्स में रखे विदेशी कपड़े गरीबोंको नहीं देगा। मेरा विचार है कि भारतमें विदेशी कपड़े पहनना लगभग शराब पीनेके समान ही बुरा है। मैं इस बारेमें निश्चित कुछ नहीं कह सकता कि वह कुछ मानीमें शराब पीनेसे भी अधिक बुरा नहीं है। पिछले डेढ़ सौ वर्षोंसे भारत में विदेशी कपड़ा आ रहा है और उससे कताई के हमारे महान्<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४८३
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|४५१}}</noinclude>कुटीर उद्योगको हानि पहुँच रही है। जैसा कि श्री रमेशचन्द्र दत्तने<ref>१८४८-१९०९; भारतीय शासन-सेवाके सदस्य; '''इकनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया सिंस द एडवैन्ट ऑफ द ईस्ट इंडिया कम्पनी'''के लेखक; १८९९ में लखनऊ कांग्रेसके अध्यक्ष।</ref> अपनी भारतके कताई और बुनाई उद्योगोंके विचारपूर्ण और सुनियोजित विनाशके इतिहासका अध्ययन पुस्तकमें बताया है, जो बिहार भारतका अत्यन्त समृद्ध प्रान्त था, वह अब अपने बुनाई और कताईके समृद्ध उद्योगके आयोजित और क्रूरतापूर्ण विनाशके कारण निर्धन हो गया है। यदि हम यह अनुभव ही कर लें कि ईस्ट इंडिया कम्पनीने कितनी हानि पहुँचाई है और हमने कम्पनीके गुमाश्तोंके अत्याचारोंके सामने या अपने आगे रखे गये प्रलोभनोंके सामने झुककर कितना बड़ा पाप किया है तो हमारे सिर लज्जाके कारण नीचे हो जायेंगे। यदि हम स्वदेशी वस्तुओंका व्यवहार करते रहते तो हमारा महान् राष्ट्रीय उद्योग नष्ट ही न होता, हमारी स्त्रियोंको विवश होकर सार्वजनिक सड़कोंपर मजदूरी न करनी पड़ती और हमारे लाखों करोड़ों लोगोंको विवश होकर वर्ष में कुछ समय बेकार न बैठना पड़ता। मेरा यह विनम्र मत है कि जिस कपड़ेसे ऐसी दुःखजनक स्मृतियाँ जाग उठती हैं और जो हमारे लिए लज्जा और पतनका चिह्न है उसे नष्ट कर देना ही ठीक है। वह निश्चय ही गरीबोंको नहीं दिया जा सकता। जो वस्तु हमारे लिए दासताका चिह्न है उसे उनको देकर हम उनकी सहायता कर रहे हैं, ऐसा सोचनेकी अपेक्षा हमें उनकी भावनाओं और उनकी राष्ट्रीय शिक्षा-दीक्षा-का अधिक खयाल करना चाहिए। क्या भारत के गरीब लोगों में देशभक्तिकी भावना
नहीं होनी चाहिए? क्या उनमें हमारे ही समान आत्मगौरव और आत्मसम्मानकी भावनाएँ नहीं होनी चाहिए? मैं यह नहीं चाहता कि हममें से कोई तुच्छसे तुच्छ मनुष्य भी ऐसा हो जिसमें सच्ची देशभक्तिकी भावना न हो। हम उन्हें सड़ा-गला भोजन या ऐसा भोजन जिसे हम नहीं खाना चाहते, देते हुए भयसे सहमते हैं या हमें सहमना चाहिए; ठीक वैसे ही भावका अनुभव हमें उन्हें विदेशी कपड़ा देते समय भी करना चाहिए। एक क्षण विचार करें तो यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि हम जिन बारीक कपड़ोंको फेंक रहे हैं उनमें से ज्यादातर गरीबों के लिए बिलकुल बेकार हैं। वे पसीनेकी बदबूसे भरी हुई हमारी गन्दी टोपियोंको और हमारी छोड़ी हुई कीमती रेशमी साड़ियों और अत्यन्त बारीक मलमलका क्या उपयोग कर सकते हैं? जो लोग इन्हें पहनते थे वे इनसे प्रेम करते थे; उनके अतिरिक्त अन्य लोगोंके लिए इनका कोई मूल्य नहीं है। उनसे अकाल-पीड़ित लोगोंके शरीर नहीं ढँके जा सकते। इनमें उनके उपयोगकी वस्तुएँ तो वास्तवमें बहुत ही कम हैं। परन्तु जब में यह तर्क देता हूँ कि विदेशी कपड़ा नष्ट कर देना चाहिए तब मेरे इस तर्कका आधार यह नहीं होता कि जो कपड़ा फेंका गया है वह बेकार है। मेरा तर्क तो इससे भी अधिक गहरा जाता है क्योंकि वह उस एकमात्र भावनापर आधारित है जो हमारी श्रेष्ठतम भावनाको बल देती है और दे सकती है। एक अंग्रेजको जीर्ण-शीर्ण झंडेके प्रति किये गये अपमानपर क्यों रोष प्रकट करना चाहिए? परन्तु वह उसपर रोष प्रकट करता है, और वह यह ठीक ही सोचता है कि उसे ऐसा करना चाहिए। मैं एक क्षणके<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|४५१}}</noinclude>कुटीर उद्योगको हानि पहुँच रही है। जैसा कि श्री रमेशचन्द्र दत्तने<ref>१८४८-१९०९; भारतीय शासन-सेवाके सदस्य; '''इकनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया सिंस द एडवैन्ट ऑफ द ईस्ट इंडिया कम्पनी'''के लेखक; १८९९ में लखनऊ कांग्रेसके अध्यक्ष।</ref> अपनी भारतके कताई और बुनाई उद्योगोंके विचारपूर्ण और सुनियोजित विनाशके इतिहासका अध्ययन पुस्तकमें बताया है, जो बिहार भारतका अत्यन्त समृद्ध प्रान्त था, वह अब अपने बुनाई और कताईके समृद्ध उद्योगके आयोजित और क्रूरतापूर्ण विनाशके कारण निर्धन हो गया है। यदि हम यह अनुभव ही कर लें कि ईस्ट इंडिया कम्पनीने कितनी हानि पहुँचाई है और हमने कम्पनीके गुमाश्तोंके अत्याचारोंके सामने या अपने आगे रखे गये प्रलोभनोंके सामने झुककर कितना बड़ा पाप किया है तो हमारे सिर लज्जाके कारण नीचे हो जायेंगे। यदि हम स्वदेशी वस्तुओंका व्यवहार करते रहते तो हमारा महान् राष्ट्रीय उद्योग नष्ट ही न होता, हमारी स्त्रियोंको विवश होकर सार्वजनिक सड़कोंपर मजदूरी न करनी पड़ती और हमारे लाखों करोड़ों लोगोंको विवश होकर वर्ष में कुछ समय बेकार न बैठना पड़ता। मेरा यह विनम्र मत है कि जिस कपड़ेसे ऐसी दुःखजनक स्मृतियाँ जाग उठती हैं और जो हमारे लिए लज्जा और पतनका चिह्न है उसे नष्ट कर देना ही ठीक है। वह निश्चय ही गरीबोंको नहीं दिया जा सकता। जो वस्तु हमारे लिए दासताका चिह्न है उसे उनको देकर हम उनकी सहायता कर रहे हैं, ऐसा सोचनेकी अपेक्षा हमें उनकी भावनाओं और उनकी राष्ट्रीय शिक्षा-दीक्षा-का अधिक खयाल करना चाहिए। क्या भारत के गरीब लोगों में देशभक्तिकी भावना नहीं होनी चाहिए? क्या उनमें हमारे ही समान आत्मगौरव और आत्मसम्मानकी भावनाएँ नहीं होनी चाहिए? मैं यह नहीं चाहता कि हममें से कोई तुच्छसे तुच्छ मनुष्य भी ऐसा हो जिसमें सच्ची देशभक्तिकी भावना न हो। हम उन्हें सड़ा-गला भोजन या ऐसा भोजन जिसे हम नहीं खाना चाहते, देते हुए भयसे सहमते हैं या हमें सहमना चाहिए; ठीक वैसे ही भावका अनुभव हमें उन्हें विदेशी कपड़ा देते समय भी करना चाहिए। एक क्षण विचार करें तो यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि हम जिन बारीक कपड़ोंको फेंक रहे हैं उनमें से ज्यादातर गरीबों के लिए बिलकुल बेकार हैं। वे पसीनेकी बदबूसे भरी हुई हमारी गन्दी टोपियोंको और हमारी छोड़ी हुई कीमती रेशमी साड़ियों और अत्यन्त बारीक मलमलका क्या उपयोग कर सकते हैं? जो लोग इन्हें पहनते थे वे इनसे प्रेम करते थे; उनके अतिरिक्त अन्य लोगोंके लिए इनका कोई मूल्य नहीं है। उनसे अकाल-पीड़ित लोगोंके शरीर नहीं ढँके जा सकते। इनमें उनके उपयोगकी वस्तुएँ तो वास्तवमें बहुत ही कम हैं। परन्तु जब में यह तर्क देता हूँ कि विदेशी कपड़ा नष्ट कर देना चाहिए तब मेरे इस तर्कका आधार यह नहीं होता कि जो कपड़ा फेंका गया है वह बेकार है। मेरा तर्क तो इससे भी अधिक गहरा जाता है क्योंकि वह उस एकमात्र भावनापर आधारित है जो हमारी श्रेष्ठतम भावनाको बल देती है और दे सकती है। एक अंग्रेजको जीर्ण-शीर्ण झंडेके प्रति किये गये अपमानपर क्यों रोष प्रकट करना चाहिए? परन्तु वह उसपर रोष प्रकट करता है, और वह यह ठीक ही सोचता है कि उसे ऐसा करना चाहिए। मैं एक क्षणके<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>जोर-जबरदस्ती कर रहे हैं। वे शरारती लोगोंके षड्यन्त्रोंमें आसानीसे फँस जाते हैं और इन षड्यन्त्रोंके पीछे सदा सरकारका हाथ नहीं होता। गोरक्षा हिन्दुओंको अत्यन्त प्रिय है। इसलिए हम इस प्रश्नपर प्रायः उत्तेजनाके शिकार हो जाते हैं और इस प्रकार अनजाने अपने प्रिय उद्देश्यको हानि पहुँचानेके साधन बन जाते हैं। हमें यह मान लेना चाहिए कि हमारे मुसलमान भाइयोंने अपने हिन्दू भाइयोंकी खातिर गायकी जान बचाने के लिए बहुत उद्योग किया है। उसका मूल्य कम आँकना गम्भीर भूल होगी। हमारा अपनी बातपर जोर देना उनके समस्त उद्योगको व्यर्थ कर देना है। हमने पिछले कुछ सालों में गोवधको या तो बिना किसी आपत्तिके ही सहन किया है; या आपत्ति की है तो वह केवल प्रभावहीन और हिंसात्मक आपत्ति रही है। हमने अपनी ओरसे अपने देशमें रहनेवाले मुसलमान भाइयोंसे अपने सम्बन्ध प्रेमपूर्ण बनानेका कोई प्रयत्न नहीं किया है और इस बातकी पात्रता प्राप्त नहीं की है कि हमारे ये भाई इस बारे में अपने ऊपर स्वयं अंकुश लगा लें। हमने प्रायः अकारण ही यह मान लिया है कि यह कार्य असम्भव है।
किन्तु हम अब उनके इस संकट-कालमें सोच-समझकर उनकी सहायता करनेका विचारपूर्ण प्रयत्न कर रहे हैं। हमने यह कार्य अपनी इच्छासे किया है। इसके सत्-प्रभावको हमें सौदेबाजी करके नष्ट नहीं कर देना चाहिए। मित्रता कदापि सौदेकी वस्तु
नहीं हो सकती। वह तो एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें किसी भी बदलेका खयाल नहीं किया जाता। सेवा करना कर्त्तव्य है और कर्त्तव्य एक ऋण है। इस ऋणको चुकता न करना पाप है। यदि हम मुसलमानोंसे अपना मित्रभाव सिद्ध करना चाहते हैं तो हमारे ये भाई गायकी रक्षा करें चाहे न करें हमें उनकी सहायता करनी चाहिए। हमारे प्रति उनका जो व्यवहार है हम उसकी जिम्मेदारी उन्हींपर डालते हैं। हम उनसे यह कहने की धृष्टता नहीं करते कि हमारी सहायताके बदले में उन्हें क्या करना चाहिए। वह तो खरीदी हुई सहायता होगी। यदि मुसलमान इसको स्वीकार करनेसे इनकार कर दें तो हम इसके लिए उन्हें दोष नहीं दे सकते। इसलिए मुझे आशा है कि मुसलमान बकरीदपर चाहे कुछ भी करें, बिहारके वस्तुतः समस्त भारतके, हिन्दू पूरी सहिष्णुता दिखाने की आवश्यकताको अनुभव करेंगे। वे कौन-सा मार्ग पसन्द करते हैं, यह बात हमें उन्हींपर छोड़ देनी चाहिए। अमृतसरमें जो काम हकीम अजमल खाँने एक घंटे में कर दिया उसे हिन्दू वर्षों प्रयत्न करते तो भी नहीं कर सकते थे। पिछली बकरीदपर श्री छोटानी और श्री खत्रीने जिन गायोंकी रक्षा की उनकी रक्षा बम्बईके करोड़पति अपनी समस्त सम्पत्ति दे देते तो भी नहीं कर सकते थे। मुसलमानोंपर जितना अधिक दबाव डाला जायेगा, गोवध उतना ही अधिक होगा। हमें इस मामलेको उनकी सचाईकी भावना और कर्त्तव्य-बुद्धिपर छोड़ देना चाहिए। इस प्रकार हम गायकी बड़ी से बड़ी सेवा करेंगे।
गोरक्षाका उपाय मुसलमानोंको मारना या उनसे झगड़ा करना नहीं है। उसका उपाय यह है कि हिन्दू खिलाफतकी रक्षामें अपनी जान दे दें और गायका कोई उल्लेख न करें। गोरक्षा एक शुद्धिकी प्रक्रिया है। यह एक तपस्या है। हम जब स्वेच्छापूर्वक<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४८९
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||हिन्दू-मुस्लिम एकता|४५७}}</noinclude>कष्ट सहन करते हैं और किसी पुरस्कारकी अपेक्षा नहीं रखते, तब हमारी दुःखभरी पुकार ऊँची उठती है और ईश्वर उसे सुनता एवं उसका उत्तर देता है। धर्मका पथ यही है और यदि उसपर एक भी मनुष्य पूरे मनसे चलता है तो उसे उसका फल मिलता है। मैं तो यहाँतक कहता हूँ और मेरी इस बातका खण्डन नहीं किया जा सकता कि गायकी जान बचाने के लिए भी, अपने ही साथी, मनुष्यकी हत्या करना हिन्दू धर्म नहीं है। हिन्दू धर्म एक सच्चे हिन्दूको स्वधर्मकी खातिर अर्थात् गोरक्षाके निमित्त स्वयं कष्ट सहनेका आदेश देता है। क्या हिन्दू मुसलमानोंसे सौदा करने के बजाय उनकी खातिर और उनके धर्मकी खातिर मरनेके लिए तैयार हैं? यदि हिन्दू इस प्रश्नका उत्तर धर्म-भावसे देंगे तो वे सदाके लिए मुसलमानोंको अपना मित्र बना लेंगे और सदाके लिए गायकी रक्षा भी कर लेंगे। हमें इन मुसलमान भाइयोंके बड़ेसे-बड़े नेताओंसे भी कोई बड़ी आशा नहीं करनी चाहिए। वे हमारी थोड़ी सहायता करने के अलावा और क्या कर सकते हैं। जो लोग दीर्घकालसे गोवध करते आ रहे हैं और ऐसा करते हुए जिन्होंने हिन्दुओंके मनोभावोंका तनिक भी खयाल नहीं किया है, ये नेता उनके हृदयोंको एकाएक बदल देनेका जिम्मा नहीं ले सकते। परन्तु ईश्वर सर्वशक्तिमान् है; वह क्षणमें उनकी चित्तवृत्ति बदल सकता है और उसमें दया-भाव-का संचार कर सकता है। यदि प्रार्थनाके साथ-साथ कष्टसहन भी हो तो वह प्रार्थना हृदयकी प्रार्थना हो जाती है। ईश्वर केवल उसी प्रार्थनाको सुनता है। अब मैं अपने मुसलमान भाइयोंसे दो शब्द कहना चाहता हूँ। उन्हें अनुत्तरदायी या अज्ञानी किन्तु धर्मान्ध हिन्दुओंके कामोंसे चिढ़ नहीं जाना चाहिए। जो उत्तेजित किये जानेपर संयम रखता है, विजय उसीकी होती है। उन्हें यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जिन हिन्दुओंमें जरा भी दायित्वकी भावना है वे इस समय मुसलमानोंका साथ किसी लाभके भावसे प्रेरित होकर नहीं दे रहे हैं। उनका यह विश्वास है कि खिलाफत के बारेमें मुसलमानोंकी माँग न्यायोचित है, और इस अच्छे काममें मुसलमानोंकी सहायता करना भारतकी सेवा करना है, क्योंकि मुसलमान भी इसी भारत-भूमिसे पैदा हुए हैं और परस्पर भाई-भाई हैं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २८-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४९०
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२०. अहिंसा'''}}}}
मेरा विश्वास है कि हम अपने उद्देश्यके निकट पहुँच गये हैं, परन्तु जब विजय बहुत निकट दिखाई देती है तभी अधिकतम जोखम रहता है। किसीको जब भी कोई उल्लेखनीय विजय मिलती है उसे उससे पहले समस्त पूर्व प्रयत्नोंसे बड़ा एक अन्तिम प्रयत्न और करना पड़ता है। ईश्वर जो अन्तिम परीक्षा लेता है वह सदा कठिनतम होती है। शैतानका अन्तिम प्रलोभन सर्वाधिक मोहक प्रलोभन होता है। यदि हम स्वतन्त्र होना चाहते हैं तो हमें ईश्वरकी अन्तिम परीक्षामें उत्तीर्ण होना पड़ेगा और
शैतानके अन्तिम प्रलोभनको अमान्य करना पड़ेगा।
अहिंसा असहयोगका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और अभिन्न अंग है। यदि हम अहिंसक बने रहें तो हम अन्य सब बातोंको छोड़ देनेपर भी अपना स्वतन्त्रता संग्राम चलाते रह सकते हैं। परन्तु यदि हम अहिंसापर कायम नहीं रहेंगे तो हम बुरी तरह हारेंगे। हमें यह याद रखना चाहिए कि हिंसा तो वह आधारशिला है जिसपर सत्ताकी इमारत टिकी है। चूँकि हिंसा सरकारका अन्तिम सहारा है, और उसका अन्तिम आश्रय है, इसलिए उसने लोगोंके सभी प्रकार के हिसात्मक प्रयत्नोंको व्यर्थ करनेकी तैयारी कर ली है और इस प्रकार यदि हम हिंसा करें तो उसने अपने-आपको उससे पूर्ण सुरक्षित रखनेका प्रबन्ध कर लिया है। इसलिए हिंसाका आश्रय लेना अत्यन्त सक्रिय रूपसे सरकार के साथ सहयोग करना है। यदि हमने किसी भी प्रकारकी हिंसा की तो वह हमारी मूर्खता और दुर्बलताभरी नाराजीकी निशानी होगी। गम्भीरतम उत्तेजनाके बीच भी संयम बनाये रखना योद्धापनकी सबसे सच्ची निशानी है। युद्ध-कलामें सर्वथा नौसिखुआ मनुष्य भी यह जानता है कि उसे उन स्थानोंसे बचना चाहिए जहाँ शत्रु घात लगाये हों। क्योंकि खरे सैनिककी तो यह कसौटी ही है कि वह हर तरहकी उत्तेजनासे अपनेको बचाये रखनेकी सावधानी बरते।
अलीगढ़की घटना इस बातका उदाहरण है। यह बात बहुत साफ दिखाई देती है कि वहाँ पुलिसने लोगोंको उत्तेजनाका काफी कारण दिया था। हम यह बात बहुत पहले ही जान चुके हैं कि ऐसा करना उसका काम है। अलीगढ़ के लोग अपने लिए बिछाये गये जाल में फँसकर उत्तेजित हो गये और उन्होंने आगजनी की। अभीतक यह ठीक-ठीक मालूम नहीं हुआ है कि बिना वर्दीके सिपाहीको मारा किसने। यह साबित करनेकी जिम्मेदारी लोगोंकी है कि यह काम उन्होंने नहीं किया है।
हमें अपने प्रति कठोर होना चाहिए। यदि हम सीधे और तंग रास्तेसे जाना चाहते हैं (जो अवश्य ही सबसे छोटा रास्ता है), तो हमें अपने प्रति दयालु नहीं होना चाहिए। हम किसी भी दुर्घटनाका दोष बदमाशोंपर नहीं डाल सकते। उनके कामों के लिए हमें जिम्मेदार होना चाहिए। यदि यह असम्भव हो तो हमें कह देना चाहिए कि हम स्वराज्यके अयोग्य हैं। हमें उनपर भी नियन्त्रण रख सकना चाहिए<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४९१
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||अहिंसा|४५९}}</noinclude>और उनको भी अनुभव करना चाहिए कि जिस राष्ट्रीय और धार्मिक कार्यमें हम लोग लगे हैं उसमें उनका हस्तक्षेप न करना आवश्यक है। शुद्धीकरण के आन्दोलनमें पूरा देश ही ऊपर उठता है और उसमें दुष्ट और पतित लोग भी आ जाते हैं। यह हमारा
समझ-बूझकर किया गया दावा है, इसके सम्बन्धमें किसीको कोई भ्रम नहीं रहना चाहिए। यदि हमारा यह दावा सिर्फ जबानी दावा ही हो तो हम जिस तन्त्रको शैतानी तन्त्र कहकर बुरा बताते हैं उससे भी अधिक शैतानी तन्त्रकी स्थापना करने के दोषी सिद्ध होंगे।
इसलिए जब हम अहिंसात्मक असहयोगके मार्गपर चल रहे हैं तो हम नैतिक दृष्टिसे कर्त्तव्यबद्ध हो जाते हैं कि हम उसपर मन, वचन और कर्मसे आचरण करें। यदि हम इतने कमजोर या संदेहशील हैं कि अपने सिद्धान्तपर नहीं चल सकते तो हमें यह बात साफ-साफ स्वीकार कर लेनी चाहिए।
पाठकोंको इससे यह विचार न बना लेना चाहिए कि मुझे लगता है हम परीक्षा में खरे नहीं उतर रहे हैं। इसके विपरीत मेरा यह विश्वास है कि हमने लोगोंपर अपूर्व नियन्त्रण प्राप्त कर लिया है, और उन्होंने अहिंसाकी आवश्यकता इतनी पहले कभी नहीं समझी थी जितनी अब समझ ली है।
परन्तु जिस रास्तेको हमने सोच-समझकर चुना है उससे जरा-सा भी हटनेसे हमें जो उचित चेतावनी मिलती है उसको न समझना हमारे लिए अनुचित होगा।
मुझे सावधानी के तौरपर कुछ कहना भी आवश्यक मालूम होता है, क्योंकि सरकारकी ओरसे दी जानेवाली उत्तेजना बढ़ती जा रही है। ऐसा संयुक्त प्रान्तमें सबसे अधिक हो रहा है। श्री शेरवानीका सबेरे पाँच बजे गिरफ्तार किया जाना, उनपर शीघ्रतासे मुकदमा चलाया जाना, उनका अपराधी ठहराया जाना, उनको सजाका दिया जाना और उसी दिन वहाँसे अन्यत्र ले जाया जाना——ये सब बातें अन्यन्त विचारशील मनुष्यको भी चिढ़ा देनेके लिए काफी हैं। मुकदमेके ब्यौरेसे यह पता लगता है कि न्यायाधीशको कानूनका ज्ञान नहीं था और उनको इसकी अधिक परवाह भी नहीं थी। यदि उनके सामने सिर्फ वे ही सबूत थे जो समाचारपत्रोंमें प्रकाशित हुए हैं तो वे सजा देनेके लिए काफी नहीं थे। यह मालूम होता है कि उनको अपराधी ठहराने
और दण्ड देनेके बारेमें सब बातें पहले ही तय कर ली गई थीं। इस मामलेमें गवाही लेनेकी कार्रवाई एक बहुत बड़ा झूठ-मूठका दिखावा थी। हमारे यहाँ सर्वसाधारण कानूनके अधीन मुकदमोंके नाटककी तालीम चल रही है। प्रशासन के आदेश और अदालती अभियोगमें अन्तर ही कहाँ है? अदालती अभियोग तो और भी घातक होता है क्योंकि उसकी आलोचना करना अधिक कठिन होता है। ‘मुकदमा झूठा दिखावा था’, कहनेकी अपेक्षा ‘मुकदमा चलाया ही नहीं गया’, यह कहने में अन्यायकी अधिक प्रतीति होती है। दमनकारी कानून रद किये जा सकते हैं; परन्तु इससे यह निष्कर्ष तो नहीं निकलता कि दमन समाप्त हो जायेगा। स्वरूप बदल जानेपर भी वस्तु तो वही रहेगी। हम चाहते हैं कि वस्तु, आत्मा अथवा हृदय बदल जाये।
और यदि हम ऐसा परिवर्तन चाहते हैं तो हमें पहले अपने आपमें परिवर्तन करना चाहिए, अर्थात् हमारे ऊपर दमनका कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। जिस<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>प्रकार हम हिंसात्मक प्रतिकार नहीं कर सकते, उसी प्रकार हम दमन किये जानेपर कमजोर न हों, भले ही वह दमन कितना ही कठोर या कष्टकर क्यों न हो।
संयुक्त प्रान्तकी एक विश्वसनीय अफवाह है कि तीन या चार प्रसिद्ध कार्य-कर्त्ताओंने जेल-जीवनको बहुत अधिक कष्टप्रद पाया, अतः कुछ कामोंको न करनेका वचन दे दिया और जेलसे छूट गये। यदि यह बात सच है तो यह खेदजनक है। हमें चट्टानकी तरह दृढ़ होना चाहिए। हमें पीछे नहीं हटना चाहिए। भारतकी जेलोंमें हमें जो भी कष्ट उठाने पड़ें हममें उनको खुशीसे सहन करने की सामर्थ्य होनी चाहिए। हमें सरकारसे कोई आशा नहीं करनी चाहिए। हमें उससे यही आशा करनी चाहिए कि वह बुरासे-बुरा जितना कर सकती है करेगी, फिर चाहे वह कानूनके अनुसार हो, चाहे उसके खिलाफ। उसका एकमात्र उद्देश्य हमको झुकाना है, क्योंकि वह अपने
आपमें सुधार करना नहीं चाहती।
मैं सरकार के बारेमें कठोर मत नहीं दे रहा हूँ। धारवाड़ और अलीगढ़की घटनाएँ सरकार द्वारा शिष्टताका उल्लंघन किये जानेकी सबसे ताजी मिसालें हैं। यदि मैं विश्वास करूँ तो एक दूसरी अफवाह यह है कि संयुक्त प्रान्तकी एक जेलमें एक बहादुर मुसलमान कैदीको एक अँधेरी कोठरी में बन्द कर दिया गया और तीन दिन-तक तेज बदबू में रखा गया। जिस मनुष्यने मुझे सूचना दी उसने मुझसे पूछा कि जो व्यक्ति इस तेज बदबूको सहन न कर सके उसे क्या करना चाहिए। मैंने कठोरता से किन्तु विचारपूर्वक उत्तर दिया कि फिर भी उसे क्षमा नहीं माँगनी चाहिए, उसे अत्याचारीकी इच्छा के सामने झुक जानेकी अपेक्षा अपना सिर जेलकी दीवारोंसे मारकर फोड़ लेना चाहिए। यह मेरा कोई ऐसा मत नहीं है जिसे मैं व्यर्थ ही प्रकट कर रहा हूँ, बल्कि ये मेरे दक्षिण आफ्रिकाके दिलचस्प छुटपुट अनुभव हैं। दक्षिण आफ्रिका में जेलका जीवन सुख-सुविधापूर्ण नहीं था। बहुत-से कैदियोंको तनहाईकी सजा भुगतनी पड़ती थी। सैकड़ोंको सफाईका काम करना पड़ता था। अनेक लोगोंने उपवास किये। एक स्त्री जब जेलसे छोड़ी गई तब वह हड्डियोंका ढाँचा ही रह गई थी, क्योंकि जो कुछ भी वह खा सकती थी वह जेलके अधिकारी उसे देते नहीं थे। परन्तु वह स्वाभिमानिनी और दृढ़ थी। दक्षिण आफ्रिकामें जिन हजारों लोगोंने सजा भोगी, उनमें से शुरूमें एक या दो अपवादोंको छोड़कर मुझे ऐसे एक भी कैदीका उदाहरण याद नहीं आता जिसने जेलसे छूटनेके लिए किसी प्रकारकी कमजोरी दिखाकर माफी माँगी हो। पारसी रुस्तमजी, इमाम अब्दुल कादिर बावजीर, थम्बी नायडू और अन्य बहुतसे लोगोंने जिनके नाम मैं बता सकता हूँ, कभी पीछे पाँव नहीं हटाया। बल्कि वे बार-बार जेल गये। तपस्वियों के रक्तदान के बिना स्वतन्त्रताके मन्दिरका निर्माण नहीं हो सकता। अहिंसाकी पद्धति सबसे त्वरित, निश्चित और सर्वोत्तम है। हमें कांग्रेस के और खिलाफत के सम्मेलनोंमें की गई अपनी प्रतिज्ञाके प्रति सच्चे बने रहना चाहिए, और विजय बिलकुल पास है।
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'''यंग इंडिया,''' २८-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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संयुक्त प्रान्तकी एक विश्वसनीय अफवाह है कि तीन या चार प्रसिद्ध कार्य-कर्त्ताओंने जेल-जीवनको बहुत अधिक कष्टप्रद पाया, अतः कुछ कामोंको न करनेका वचन दे दिया और जेलसे छूट गये। यदि यह बात सच है तो यह खेदजनक है। हमें चट्टानकी तरह दृढ़ होना चाहिए। हमें पीछे नहीं हटना चाहिए। भारतकी जेलोंमें हमें जो भी कष्ट उठाने पड़ें हममें उनको खुशीसे सहन करने की सामर्थ्य होनी चाहिए। हमें सरकारसे कोई आशा नहीं करनी चाहिए। हमें उससे यही आशा करनी चाहिए कि वह बुरासे-बुरा जितना कर सकती है करेगी, फिर चाहे वह कानूनके अनुसार हो, चाहे उसके खिलाफ। उसका एकमात्र उद्देश्य हमको झुकाना है, क्योंकि वह अपने
आपमें सुधार करना नहीं चाहती।
मैं सरकार के बारेमें कठोर मत नहीं दे रहा हूँ। धारवाड़ और अलीगढ़की घटनाएँ सरकार द्वारा शिष्टताका उल्लंघन किये जानेकी सबसे ताजी मिसालें हैं। यदि मैं विश्वास करूँ तो एक दूसरी अफवाह यह है कि संयुक्त प्रान्तकी एक जेलमें एक बहादुर मुसलमान कैदीको एक अँधेरी कोठरी में बन्द कर दिया गया और तीन दिन-तक तेज बदबू में रखा गया। जिस मनुष्यने मुझे सूचना दी उसने मुझसे पूछा कि जो व्यक्ति इस तेज बदबूको सहन न कर सके उसे क्या करना चाहिए। मैंने कठोरता से किन्तु विचारपूर्वक उत्तर दिया कि फिर भी उसे क्षमा नहीं माँगनी चाहिए, उसे अत्याचारीकी इच्छा के सामने झुक जानेकी अपेक्षा अपना सिर जेलकी दीवारोंसे मारकर फोड़ लेना चाहिए। यह मेरा कोई ऐसा मत नहीं है जिसे मैं व्यर्थ ही प्रकट कर रहा हूँ, बल्कि ये मेरे दक्षिण आफ्रिकाके दिलचस्प छुटपुट अनुभव हैं। दक्षिण आफ्रिका में जेलका जीवन सुख-सुविधापूर्ण नहीं था। बहुत-से कैदियोंको तनहाईकी सजा भुगतनी पड़ती थी। सैकड़ोंको सफाईका काम करना पड़ता था। अनेक लोगोंने उपवास किये। एक स्त्री जब जेलसे छोड़ी गई तब वह हड्डियोंका ढाँचा ही रह गई थी, क्योंकि जो कुछ भी वह खा सकती थी वह जेलके अधिकारी उसे देते नहीं थे। परन्तु वह स्वाभिमानिनी और दृढ़ थी। दक्षिण आफ्रिकामें जिन हजारों लोगोंने सजा भोगी, उनमें से शुरूमें एक या दो अपवादोंको छोड़कर मुझे ऐसे एक भी कैदीका उदाहरण याद नहीं आता जिसने जेलसे छूटनेके लिए किसी प्रकारकी कमजोरी दिखाकर माफी माँगी हो। पारसी रुस्तमजी, इमाम अब्दुल कादिर बावजीर, थम्बी नायडू और अन्य बहुतसे लोगोंने जिनके नाम मैं बता सकता हूँ, कभी पीछे पाँव नहीं हटाया। बल्कि वे बार-बार जेल गये। तपस्वियों के रक्तदान के बिना स्वतन्त्रताके मन्दिरका निर्माण नहीं हो सकता। अहिंसाकी पद्धति सबसे त्वरित, निश्चित और सर्वोत्तम है। हमें कांग्रेस के और खिलाफत के सम्मेलनोंमें की गई अपनी प्रतिज्ञाके प्रति सच्चे बने रहना चाहिए, और विजय बिलकुल पास है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २८-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४९३
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२१. टिप्पणी'''}}}}
{{c|'''मऊमें झगड़ा'''}}
इन्दौर के पास मऊ एक बड़ी सरकारी छावनी है जहाँ हिन्दू और मुसलमान दोनों ही रहते हैं। कुछ दिन पहले अखबारोंमें इधर-उधर कहीं एक खबर छपी देखी थी कि वहाँ बोहरा और सुन्नी मुसलमानोंमें मारपीट हो गई है। कहा जाता है कि इसमें एक बोहरा मारा गया और कई लोग घायल हो गये। कहा जाता है कि बोहरा भाइयोंने स्वराज्य-कोषमें रुपया देनेसे इनकार किया था, इसी बातको लेकर वहाँ झगड़ा हो गया। कुछ भी हो, बोहरा और सुन्नी मुसलमानोंमें अनबन दिखाई देती है। गोधरामें
भी यह बात देखने में आई है। रतलाम में भी ऐसी ही घटना हुई है। बोहरा लोग भारत-भरमें कुल मिलाकर केवल तीन लाख हैं। जिनकी संख्या इतनी कम है ऐसे लोगोंको प्रश्रय देना बड़ी जातियोंका धर्म हैं। यदि बोहरा भाई खिलाफत या स्वराज्य आन्दोलनमें भाग न लें तो भी हमें उनको परेशान नहीं करना चाहिए। सम्भव है, कोई छोटी जाति डरके कारण अथवा परिणामका खयाल करके मैदानमें न भी आये। ऐसी स्थितिमें किसी बातके सम्बन्धमें उसपर जोर डालना उचित नहीं माना जा सकता। मुझे यह भी बताया गया है कि मऊमें हिन्दुओंने बोहरोंके विरोधियोंका पक्ष लिया था। मैं अनुभव करता हूँ कि जब एक धर्मके लोगोंमें कोई झगड़ा हो तो दूसरे धर्मके लोगोंको तटस्थ ही रहना चाहिए। उनका कर्त्तव्य है कि वे उन दोनोंको
समझाने और उनमें मेल करवानेका उद्योग करें। जैसे हिन्दू-हिन्दूकी लड़ाईमें मुसल-मानोंका किसी एक या दूसरे पक्षका साथ देना अनुचित है वैसे ही मुसलमान-मुसलमानके झगड़े में हिन्दुओंका पक्ष लेना भी अनुचित है। खिलाफत के हरेक कार्यकर्ताका कर्तव्य है कि वह जहाँ-कहीं भी झगड़ा होनेका डर हो, वहाँ उसे रोकनेका प्रयत्न करे।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' २८-७-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२२. तार: हैदराबादके एक असहयोगीको'''}}}}
{{right|२९ जुलाई, १९२१}}
असहयोगी गवाही नहीं दे सकते।
{{left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
बॉम्बे सीक्रेट एक्स्ट्रैक्ट्स, १९२१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४९४
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२३. अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीको बैठकमें बहिष्कारपर बहस}}}}
{{right|[३० जुलाई, १९२१ के पूर्व]<ref>अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी बैठक २८ से ३० जुलाईतक बम्बई में हुई थी।</ref>}}
'''गांधीजी''': जूनके महीने में जब हमने एक करोड़ रुपया इकट्ठा किया उस समय हममें जो उत्साह और स्फूर्ति थी वह अब कहाँ है? आज हम इस बातको लेकर सशंकित हैं कि कौन जाने हम विदेशी कपड़ेका बहिष्कार कर सकेंगे या नहीं। लेकिन हमारी दुर्बलता ही हमारे इस भयका कारण है। हम शान्तिसे विचार करें तो मालूम होगा कि बहिष्कारके बाद हमारे लिए कुछ और करनेको नहीं रह जायेगा। मैं जैसे-जैसे विचार करता हूँ वैसे-वैसे मुझे लगता है कि हमें सिपाहियोंको हथियार
छोड़ देनेकी तथा करदाताओंको कर न देनेकी सलाह देनेकी भी जरूरत नहीं रहेगी। हम यदि सम्पूर्ण रूपसे बहिष्कार कर सकें तो थोड़ेसे ही लोगोंको कानूनका सविनय भंग करके जेल जानेकी जरूरत होगी और थोड़ेसे लोगोंको ही आत्मत्याग करना
होगा। अतएव हमें गमगीन, हताश अथवा पस्त-हिम्मत नहीं होना चाहिए।
लोगोंने स्वदेशी और बहिष्कारसे सम्बन्धित कुछ-एक प्रश्न मुझसे पूछे हैं। मैं अब उनका उत्तर दूँगा।
'''प्रश्न: हम अगर आजसे नये विदेशी कपड़े न लेनेका व्रत लें और हमारे पास जो विदेशी कपड़े हैं उन्हें पहनकर फाड़ डालें तो इसमें क्या बुराई है?'''
उत्तर: मेरी समझमें नहीं आता कि जिस वस्तुको हमने एक बार कलुषित मान लिया हम उसे अपने पास सँजोकर कैसे रख सकते हैं? विदेशी कपड़ा पहनना अगर हमारे लिए अधर्म है तो फिर हम क्षण-भर के लिए भी कैसे उसे अपने पास रख सकते
हैं? किसीके घरमें प्रवेश करके अगर मैं जबरदस्ती उसका चूल्हा तोड़ डालूँ तो यह घोर पाप माना जायेगा। विदेशी कपड़े के व्यापारने हमारे गरीब वर्गका चूल्हा तोड़ डाला है, हमारे उद्योगको प्रायः समाप्त कर दिया है और अनेक लोगोंको भुखमरीकी स्थितिमें डाल दिया है। इस व्यापारके मोहमें हमने स्वयं अपने पेटपर लात मारी है; यह भी घोर पाप हुआ है। यदि कोई हमारे पाँवकी बेड़ियोंको तोड़ डाले तो क्या उसके टुकड़ोंको हम सँभालकर रखेंगे? मैं जानता हूँ कि जैसे दीर्घ कालतक पहनी गई बेड़ियोंसे गुलामको मोह हो जाता है उसी तरह हमारे मनमें भी विदेशी कपड़े के प्रति मोह पैदा हो गया है और इसीसे हमारे मनमें ऐसे प्रश्न उठते हैं।
'''हम स्वयं भले ही अपने विदेशी कपड़ोंका त्याग कर दें; किन्तु हम वे कपड़े अपने देश के गरीबों को और अर्ध-नग्नावस्था में घूमनेवाले बहनों और भाइयोंको क्यों न दे दें? उन्हें कपड़े देकर उनकी आत्माको क्यों न शीतल करें? हम ये कपड़े विदेशों-में——हिन्दसे बाहर——किसलिए भेजें?'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४९५
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी बैठक बहिष्कारपर बहस|४६३}}</noinclude>
हमारे घरमें अगर किसीने गोमांस फेंक दिया हो तो हम उसे निकाल फेकेंगे अथवा उसे किसी गरीबको दे देंगे? सम्भव है वह किसी गरीबके कामका हो; लेकिन जिस वस्तुको इस्तेमाल करने में हम पाप मानते हैं वह दूसरोंको कैसे दें? हम अपना सड़ा-गला भोजन किसी अन्यको खानेके लिए देंगे अथवा उसे नष्ट कर डालेंगे? समाजकी स्थिति आज इतनी विषम है कि कुछ लोग सड़े हुए भोजनसे भी पेट भरनेके लिए तैयार हैं। लेकिन उन्हें सड़ा हुआ भोजन देनेमें हमारी सज्जनता अथवा कुलीनता
निहित नहीं है, इतना तो आप कबूल करेंगे ही। हमने निश्चय किया है कि हम पहली अगस्तको खादी नहीं तो कमसे कम स्वदेशी कपड़ा पहनकर चौपाटीपर इकट्ठे होंगे। हमारी इच्छा है कि एक भी व्यक्ति खादी अथवा स्वदेशी वस्त्र पहने बिना चौपाटी-पर न आये। क्या आप यह चाहते हैं कि गरीब वहाँ न आयें? आपके उतारे हुए विदेशी वस्त्र पहनकर वे सभामें कैसे आ सकते हैं? हम बड़े जबरदस्त अन्नदानी हैं लेकिन अपनी दयामें हम विवेक खो बैठते हैं। हमारी उतारन गरीबोंका शृंगार क्यों होनी चाहिए? गरीबोंको दान दिया ही क्यों जाये? हम गरीबको स्वावलम्बी बनायें यही हमारा दान हो सकता है। हमारा आन्दोलन ही गरीबोंको अपने जैसा बनानेका है। अपने जैसेका अर्थ गरीबोंको धनवान बनाना नहीं परन्तु यह है कि वे नंगे-भूखे
न रहें। हमें जैसे श्वासोच्छ्वास लेनेका हक है वैसे ही पापीसे-पापी व्यक्तिको भी यह अधिकार है। ऐसा किसी भी शास्त्रमें नहीं लिखा कि उन्हें खाने-पीने अथवा पह्नने-ओढ़नेका हक नहीं है। भीख माँगनेका अधिकार किसे है? जो व्यक्ति साधु है, जिसने हमें ज्ञानका दान दिया है और देता है उसके अतिरिक्त किसी दूसरेको भिक्षा माँगनेका अधिकार नहीं है। हम भिक्षा देकर भूल करते हैं, पाप करते हैं। हमारे अनेक सदा-व्रत आलस्य और पापकी निशानी हैं, ऐसी मेरी मान्यता है। हिन्दुस्तानमें ऐसी स्थिति होनी चाहिए कि किसी भी व्यक्तिको हाथ पसारनेकी जरूरत ही न रहे। हमें अगर गरीबोंको स्वावलम्बी बनाना है तो उन्हें उद्यम सिखाना ही पड़ेगा। मेरे पास आज ही एक अंग्रेज इस विषयपर बातचीत करनेके लिए आया था। उसे मैं समझा रहा था कि क्या तुम किसी गरीबको अपना हैट या अपना सूट देना उचित समझोगे? इस समय आप जितने लोग यहाँ उपस्थित हैं आपके सिरोंपर मुझे ऐसी पगड़ी अथवा टोपी दिखाई नहीं देती जिसका गरीबके लिए कुछ उपयोग हो। बहनोंकी रंग-बिरंगी साड़ियों-का गरीब क्या करेंगे? उन्हें वे पहनेंगे ही नहीं। अगर हमने सोच-विचार किया होता तो हमारा पहरावा गरीबोंके पहावेसे कुछ मिलता-जुलता होता। काठियावाड़की अहीरिनोंको मैं जानता हूँ। वे आपकी दी हुई साड़ियोंको फेंक ही देंगी। क्या किसी भी गरीब स्त्रीको आपकी रेशमी साड़ीकी जरूरत है? क्या अकाल-ग्रस्त लोगोंको हम रेशमी साड़ियाँ भेजेंगे? क्या उनमें हम बुद्धिभेद उत्पन्न करेंगे? गीतामें बुद्धिभेद करनेकी मनाही की गई है। हम अपनी त्यक्त वस्तुएँ अगर गरीबों को देंगे तो उससे उनकी आत्मा शीतल होगी; ऐसा आप क्यों मानते हैं? जब वे यह समझ जायेंगे कि हमने उन्हें वे वस्तुएँ दी हैं जिन्हें काममें लाना हम पाप मानते हैं तो वे हमें बद्दुआ देंगे? अगर आपको अकाल पीड़ितोंसे सहानुभूति है तो आप उन्हें उन्हीं वस्तुओंमें से दें जो<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५१
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||तार : सी० विजयराघवाचार्यको|
३१९}}</noinclude>{{gap}}
मेरा कार्य भी अब थोड़ा-सा मुश्केल हो जायगा । परन्तु आप निश्चन्त रहें । भविष्य के लिये मेरा इशारा है ।
{{Right|मोहनदास गांधी}}
{{Left|बनारसीदास चतुर्वेदी<br>
हीराबाग<br>
गीरगांव मुंबई}}
जी० एन० २५७९ की फोटो नकलसे ।
{{C|'''१३२. तार : सी० विजयराघवाचार्यको '''<ref>१. जिस तारके उत्तर में यह भेजा गया था वह विजयराघवाचार्यने १९ अक्तूबरको भेजा था। तार इस तरह है: "नेहरूजीने जवाबी कार्रवाई करके लड़नेकी धमकी दी है। उनकी लड़ाई काल्पनिक विपक्षीसे होगी। मैं अलग होना या दल बनाने शुरू कर दूँगा । कृपया उनको तार दें। अपने सहज प्रेमके सन्देशपर आग्रह करें, अन्यथा लोग हमारे ऊँचे उद्देश्यपर अनावश्यक हँसेंगे ।...'</ref>}}
{{Right|[१९ अक्तूबर, १९२१]}}
{{Left|सी० विजयराघवाचार्य <br>
सेलम}}
नेहरूजी<ref>२. पण्डित मोतीलाल नेहरू, कांग्रेसके तत्कालीन महामन्त्री ।
"</ref> कार्यसमितिके<ref>३. इसी कार्यसमितिने उक्त प्रस्ताव द्वारा अ० भा० कांग्रेस कमेटीकी बैठक ४ नवम्बरको बुलाई थी।</ref> प्रस्तावकी उपेक्षा कैसे कर
सकते हैं ?
दुःख है
आप नाराज हैं। आप अलग होनेकी धमकी कैसे दे सकते हैं ? बैठक अवश्य होनी चाहिए। जैसा आपकी अन्तरात्मा कहे वैसा करें ।
गांधी
अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ७६४०) की फोटो नकलसे ।<noinclude>{{dhr|7em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८३
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पुण्यका सौदा|३५१}}</noinclude>पुरुष समझे जाते हैं, तब सिर्फ लाटरी प्रथाको ही अलग चुनकर उसकी आलोचना करना कठिन है। सट्टेका बाजार अगर जुआ खेलना नहीं तो और क्या है? और तो भी जुएके इस ज्वरसे कौन बचा हुआ है? सट्टेके बाजारमें हाथ मार कर जो अपनेको एक ही दिनमें धनी होते हुए पाते हैं, उनमेंसे हर एक आदमी जानता है कि उसके घर में लक्ष्मीके एकाएक आनेके मानी हैं कितनी ही विधवाओंके घरोंका सत्यानाश हो जाना। उन विधवाओंके रिश्तेदारोंने भी बेशक उसी तरहकी आशा की होगी, जैसी कि हमारे कल्पनाके चतुर सट्टेबाजने की होगी।
यह बात विचित्र भले ही जान पड़े, मगर दरअसल कपास, चावल और जूट पर ये सट्टे किये जाते हैं। लाटरीकी पद्धति भी जुए की उसी भावनाका मद्दा विस्तार है। इसमें कोई शक नहीं कि लाटरीको निरादरकी चीज मानना बहुत अच्छा
है, मगर उससे भी अच्छा यह होगा कि सबसे बुरे लक्षणका निदान करनेकी अपेक्षा लाटरी और सट्टा बाजारके भीतर छिपी भावनाको पहचान कर इस रोगकी जड़ ही काट दी जाये। इसलिए आशा ही की जा सकती है कि सबसे बुरे लक्षणके ही जरिए हम रोगकी जड़ तक पहुँच कर उसका समुचित इलाज कर सकेंगे।
मगर यह तो बहुत दूरकी ही आशा। एक आदमी भी लाटरीमें शामिल होनेका औचित्य यह कहकर साबित न करे कि मैंने यह रोग तो सर्वत्र फैला हुआ बताया है।
जब कि यह लाटरी किसी परोपकारी संस्थाके सम्बन्धमें हो तो सावधानीकी और भी अधिक जरूरत है। योग्यता पैदा किये बिना धनी होने की इच्छा करना बेशक बुरा है, मगर परोपकारके साथ जुएका सम्बन्ध जोड़ना तो निश्चित रूपसे
ही बुरा है। जो लोग लाटरीमें रुपये फेंकें, वे यह कभी न सोचें कि एक अनुचित आकांक्षाकी पूर्ति करनेकी आशा रखते हुए भी वे पुण्य कमायेंगे। हम दोनों काम एक ही साथ नहीं कर सकते कि परमात्माकी पूजा भी करें और अपने लिए अनुचित ढंगसे टके भी सीधे करें।
और गोआके अस्पतालोंके ईसाई संचालक, मनुष्योंकी बुरी प्रवृत्तिका अनुचित लाभ उठाकर धर्मको गढ़में क्यों डालते हैं? क्या वे समझते हैं कि लाखों आदमियोंको नैतिक दृष्टिसे बीमार बना कर, अस्पताल चलाने की कोशिश करके वे परमात्माको प्रसन्न करते हैं? क्या वे रामको देनेके लिए सोहनके घर डाका नहीं डालते? इने-गिने लोगोंको रोगमुक्त करनेसे क्या लाभ होगा अगर वे साथ ही उससे हजार गुना
अधिक आत्माओंको सन्ताप पहुँचाते हैं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' २४-५-१९२८}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८४
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३९५. नगरपालिकाके स्कूलोंमें कताई'''}}}}
जलगाँव खादी बोर्डके मंत्रीने मेरे पास वहाँकी नगरपालिकाकी शालाओंमें चरखा और तकलीपर कताईके बारेमें एक भली-भाँति तैयार की हुई रिपोर्ट आँकड़ों सहित भेजी है। यह रिपोर्ट १५ जून, १९२७ से १५ फरवरी, १९२८ तककी है। १४९ लड़कियाँ और १२६ लड़के तकली या चरखेपर कातते रहे हैं। रोजाना २५ से ५० मिनट तक तकली या चरखा चलानेका समय दिया गया है। कुल ४,४८,००० गज
सूत काता गया है। तकलीपर कताईकी रफ्तार अधिक से अधिक १२५ गज और चरखेपर ३२५ गज प्रति घंटा थी। यह काम तो प्रशंसाके योग्य है। जो बात जलगाँव नगरपालिका स्कूलोंमें सम्भव हो सकी है, वह सभी नगरपालिका स्कूलोंमें सम्भव है। यह सिद्ध किया जा सकता है कि अगर राष्ट्र चाहे तो पाठशालाओंमें पढ़नेवाले लड़के-लड़कियोंके जरिए ही अपनी जरूरतका सारा सूत कतवा सकता है, और साथ ही उन बच्चोंको स्वाभिमान और स्वावलम्बनका पाठ उनकी पढ़ाईके कालमें ही सिखा सकता है, जिसे कि कुछ लोग गलत ही गैरजिम्मेदारी और मजे उड़ानेका काल समझते हैं। मैंने यह भी गौर किया है कि केवल चरखा चलानेवाले लड़के अपनी रुई आप धुन लेते हैं। इसका अर्थ तो यह होता है कि तकली चलानेवाले रुई आप
नहीं धुनते। यह बात दिनोंदिन अधिकाधिक महसूस की जा रही है कि अच्छी कताईका रहस्य महज अच्छी धुनाई नहीं, बल्कि बिलकुल निर्दोष धुनाई है। यह तभी हो सकता है, जब सब अपनी-अपनी रुई स्वयं धुन लें। अगर इसे सीखनेकी सच्ची कोशिश की जाय तो यह आसानी से सीखी जा सकती है। मैं एक और सुझाव दे दूँ कि इस कते हुए सूतकी खादी बुनवानेमें बिलकुल वक्त न खोया जाये। इस
कामके लिए किसी होशियार लड़केको बुनना सिखलाया जाये या कोई शिक्षक बुननेकी कला सीख ले। इनमें से कोई भी बात न हो सके तो स्थानीय बुनकरोंको ऐसा सूत बुननेको राजी किया जाये।
{{left|[अंग्रेजी]<br>
'''यंग इंडिया,''' २४-५-१९२८।}}<noinclude></noinclude>
s7eyy4ymwc743vwcrtrbio7dp7fa6kz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८५
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३९६. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका पत्र मिला। श्री सेनगुप्तको मैंने जो पत्र<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref> लिखा है उसकी नकल
साथमें भेज रहा हूँ ।
सहपत्र - १
अंग्रेजी (एस० एन० १३६४० ) की फोटो - नकलसे ।
प्रिय मित्र,
३९७. पत्र : जे० एम० सेनगुप्तको
आपका,
२४ मई, १९२८
मेरे सुननेमें आया है कि आप कलकत्ताके आगामी कांग्रेस अधिवेशनके समय
एक भव्य प्रदर्शनीका आयोजन करने जा रहे हैं । परन्तु मुझे यह भी बताया गया
है कि यह प्रदर्शनी केवल पूरी तरह असली स्वदेशी तक ही सीमित नहीं होगी;
अपितु इसमें विदेशी और दूसरी किस्मकी सभी वस्तुएँ प्रदर्शित की जायेंगी। क्या यह
सच है ? मैं तो ऐसी आशा कर सकता था कि आप खादीको प्रदर्शनका केन्द्र बनायेंगे
और इसके इर्द-गिर्द उन वस्तुओंको प्रदर्शित करेंगे जो शुरूसे आखिर तक पूरी
तरह स्वदेशी होंगी और आप न केवल विदेशी वस्त्र और सभी विदेशी चीजोंको ही
प्रदर्शनीसे बाहर रखेंगे, अपितु देशी मिलोंके बने कपड़ेको भी बाहर रखेंगे। अहमदाबाद
अधिवेशनसे लेकर आज तक कांग्रेस प्रदर्शनियोंका इतिहास ऐसा ही रहा है। पिछले
साल मद्रासमें पहली बार इस परिपाटीसे अलग हटकर काम किया गया, जो दुःखद
था। मुझे आशा है कि कलकत्तामें यह भूल नहीं दुहराई जायेगी ।
श्रीयुत सेनगुप्त
कलकत्ता
अंग्रेजी (एस० एन० १३६०६) की माइक्रोफिल्मसे ।
१. देखिए अगला शीर्षक।
३६-२३
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
t2dmk1lw7hzxgnh8j43cwj7vtjbmpan
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३९६. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका पत्र मिला। श्री सेनगुप्तको मैंने जो पत्र<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref> लिखा है उसकी नकल
साथमें भेज रहा हूँ ।
{{right|आपका,}}
{{left|सहपत्र–१}}
अंग्रेजी (एस एन॰ १३६४०) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३९७. पत्र: जे॰ एम॰ सेनगुप्तको'''-}}}}
{{right|२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
मेरे सुननेमें आया है कि आप कलकत्ताके आगामी कांग्रेस अधिवेशनके समय
एक भव्य प्रदर्शनीका आयोजन करने जा रहे हैं । परन्तु मुझे यह भी बताया गया
है कि यह प्रदर्शनी केवल पूरी तरह असली स्वदेशी तक ही सीमित नहीं होगी;
अपितु इसमें विदेशी और दूसरी किस्मकी सभी वस्तुएँ प्रदर्शित की जायेंगी। क्या यह
सच है ? मैं तो ऐसी आशा कर सकता था कि आप खादीको प्रदर्शनका केन्द्र बनायेंगे
और इसके इर्द-गिर्द उन वस्तुओंको प्रदर्शित करेंगे जो शुरूसे आखिर तक पूरी
तरह स्वदेशी होंगी और आप न केवल विदेशी वस्त्र और सभी विदेशी चीजोंको ही
प्रदर्शनीसे बाहर रखेंगे, अपितु देशी मिलोंके बने कपड़ेको भी बाहर रखेंगे। अहमदाबाद
अधिवेशनसे लेकर आज तक कांग्रेस प्रदर्शनियोंका इतिहास ऐसा ही रहा है। पिछले
साल मद्रासमें पहली बार इस परिपाटीसे अलग हटकर काम किया गया, जो दुःखद
था। मुझे आशा है कि कलकत्तामें यह भूल नहीं दुहराई जायेगी ।
श्रीयुत सेनगुप्त
कलकत्ता
अंग्रेजी (एस० एन० १३६०६) की माइक्रोफिल्मसे ।
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३६-२३
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३९६. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका पत्र मिला। श्री सेनगुप्तको मैंने जो पत्र<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref> लिखा है उसकी नकल
साथमें भेज रहा हूँ ।
{{right|आपका,}}
{{left|सहपत्र–१}}
अंग्रेजी (एस एन॰ १३६४०) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३९७. पत्र: जे॰ एम॰ सेनगुप्तको'''-}}}}
{{right|२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
मेरे सुननेमें आया है कि आप कलकत्ताके आगामी कांग्रेस अधिवेशनके समय एक भव्य प्रदर्शनीका आयोजन करने जा रहे हैं। परन्तु मुझे यह भी बताया गया है कि यह प्रदर्शनी केवल पूरी तरह असली स्वदेशी तक ही सीमित नहीं होगी;
अपितु इसमें विदेशी और दूसरी किस्मकी सभी वस्तुएँ प्रदर्शित की जायेंगी। क्या यह सच है? मैं तो ऐसी आशा कर सकता था कि आप खादीको प्रदर्शनका केन्द्र बनायेंगे
और इसके इर्द-गिर्द उन वस्तुओंको प्रदर्शित करेंगे जो शुरूसे आखिर तक पूरी तरह स्वदेशी होंगी और आप न केवल विदेशी वस्त्र और सभी विदेशी चीजोंको ही प्रदर्शनीसे बाहर रखेंगे, अपितु देशी मिलोंके बने कपड़ेको भी बाहर रखेंगे। अहमदाबाद अधिवेशनसे लेकर आज तक कांग्रेस प्रदर्शनियोंका इतिहास ऐसा ही रहा है। पिछले साल मद्रासमें पहली बार इस परिपाटीसे अलग हटकर काम किया गया, जो दुःखद
था। मुझे आशा है कि कलकत्तामें यह भूल नहीं दुहराई जायेगी।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
मो॰ क॰ गांधी}}
{{left|श्रीयुत सेनगुप्त<br>
कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६०६) की माइक्रोफिल्मसे।
{{smallrefs}}
{{left|३६–२३}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८६
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|३९८. पत्र: मुहम्मद हबीबुल्लाको}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
मैं आपके उस पत्रके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ, जिसके साथ गुप्त रूपसे मेरी सूचनाके लिए श्रीयुत शास्त्रीके समुद्री-तार<ref>केपटाउनसे भेजे गये शास्त्रोंके समुद्री तारमें लिखा था: अपनी तार सं॰ २०२ दिनांक २४ अप्रैलके सिलसिले में मुझे ट्रान्सवालको पात्रा रद करनेके लिए बाध्य होना पड़ा है और मैं रियायत योजना के सम्बन्धमें गृह मन्त्री से भेंट करनेके लिए केपटाउन आ गया हूँ। गांधी और पैटिक डंकन १९१४ की जिस तरहकी योजनाका समर्थन करते हैं, उसी जैसी योजनाके लिए मैंने अनुरोध किया है। गृह विभाग, मेरे
तार सं॰ २१४ दिनांक २७ अप्रैलमें जिनकी सूचना दी गई है, ऐसे हाल ही के निर्णयों के बावजूद योजनाको
कार्यान्वित करनेके लिए उत्सुक है। ट्रान्सवालके भारतीय, विशेषकर गुजराती बड़े उत्तेजित हैं। परन्तु १९१४ को जैसी योजनासे शायद शान्त हो जायें। मन्त्रीने विचार करनेका वायदा किया है परन्तु मुझे शक है।
कृपया इसको एक प्रति गांधीको गुप्त रूपसे डाक द्वारा भेज दीजिएगा।</ref> की प्रति संलग्न है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सर मुहम्मद हबीबुल्ला<br>
वाइसरायकी कौंसिलके सदस्य<br>
शिमला}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ११९८७) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३९९. पत्र: टी॰ प्रकाशम्'''}}}}
{{right|२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय प्रकाशम्,}}
आपका पत्र मिला। श्री बैंकरने मुझे याद दिलाया है कि जिन दिनों में जुहूमें स्वास्थ्य लाभ कर रहा था, आपको मेरे कहनेपर पैसा दिया गया था। निस्सन्देह आपको यह पैसा खादीके कामके लिए मिला था। परन्तु निश्चय ही आपके ऐसा कहनेका अभिप्राय कहीं यह तो नहीं है कि चूंकि आपको यह पैसा खादीके कामके
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
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{{c|{{larger|'''३९८. पत्र: मुहम्मद हबीबुल्लाको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
मैं आपके उस पत्रके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ, जिसके साथ गुप्त रूपसे मेरी सूचनाके लिए श्रीयुत शास्त्रीके समुद्री-तार<ref>केपटाउनसे भेजे गये शास्त्रोंके समुद्री तारमें लिखा था: अपनी तार सं॰ २०२ दिनांक २४ अप्रैलके सिलसिले में मुझे ट्रान्सवालको पात्रा रद करनेके लिए बाध्य होना पड़ा है और मैं रियायत योजना के सम्बन्धमें गृह मन्त्री से भेंट करनेके लिए केपटाउन आ गया हूँ। गांधी और पैटिक डंकन १९१४ की जिस तरहकी योजनाका समर्थन करते हैं, उसी जैसी योजनाके लिए मैंने अनुरोध किया है। गृह विभाग, मेरे
तार सं॰ २१४ दिनांक २७ अप्रैलमें जिनकी सूचना दी गई है, ऐसे हाल ही के निर्णयों के बावजूद योजनाको
कार्यान्वित करनेके लिए उत्सुक है। ट्रान्सवालके भारतीय, विशेषकर गुजराती बड़े उत्तेजित हैं। परन्तु १९१४ को जैसी योजनासे शायद शान्त हो जायें। मन्त्रीने विचार करनेका वायदा किया है परन्तु मुझे शक है।
कृपया इसको एक प्रति गांधीको गुप्त रूपसे डाक द्वारा भेज दीजिएगा।</ref> की प्रति संलग्न है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
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वाइसरायकी कौंसिलके सदस्य<br>
शिमला}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ११९८७) की फोटो-नकलसे।
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आपका पत्र मिला। श्री बैंकरने मुझे याद दिलाया है कि जिन दिनों में जुहूमें स्वास्थ्य लाभ कर रहा था, आपको मेरे कहनेपर पैसा दिया गया था। निस्सन्देह आपको यह पैसा खादीके कामके लिए मिला था। परन्तु निश्चय ही आपके ऐसा कहनेका अभिप्राय कहीं यह तो नहीं है कि चूंकि आपको यह पैसा खादीके कामके
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८७
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||एक पत्र|३५५}}</noinclude>लिए मिला था, इसलिए आप निजी तौर पर इसके लिए जवाबदेह नहीं हैं। वास्तवमें पैसा आपको आपकी निजी जिम्मेदारी पर पेशगी दे दिया गया था। यदि आप मेरी
इस व्याख्याको सही नहीं मानते तो क्या आप पंच फैसला स्वीकार करेंगे? अ॰ भा॰ च॰ संघकी परिषद्को [इस मामले में] एक कर्त्तव्य निभाना है। इसलिए आप उसकी और मेरी कठिनाईको महसूस करेंगे।<ref>इस पत्रकी एक प्रति अ॰ भा॰ च॰ संघके सचिवको भेजी गई थी।</ref>
{{right|'''हृदयसे आपका,'''}}
{{left|श्रीयुत टी॰ प्रकाशम्<br>
"स्वराज्य"<br>
ब्रॉडवे, मद्रास जी॰ टी॰}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६०७) की माइक्रोफिल्मसे।
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{{c|{{larger|'''४००. एक पत्र'''<ref>जिस व्यक्तिको पत्र लिखा गया है उसका नाम नहीं दिया जा रहा है।</ref>}}}}
{{right|२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
अब आपको श्री रामनाथनका पत्र मिल गया होगा और मुझे विश्वास है कि आपने जो जमानतकी रकम जमा कराई है, उसे रोक रखनेके कारणोंके सम्बन्धमें यदि आपको सन्तोष न हो तो आप पंच-फैसलेको स्वीकार कर लेंगे।
{{right|'''हृदयसे आपका,'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६०८) की माइक्रोफिल्म से।
{{dhr|10em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८८
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४०१. पत्र: एस॰ रामनाथनको'''}}}}
{{right|२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय रामनाथन,}}
...के बारेमें आपका पत्र मिला। यह बिलकुल ठीक है। मैंने. .को पत्र<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref> लिखा है। उसकी नकल संलग्न है।
मैं आपको इस पत्रके साथ सम्बन्धित कागजात भेज रहा हूँ।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६०९) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४०२. पत्र: मेहरसिंह रेतको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। मैं समझता हूँ कि जबतक हमें स्वराज्य नहीं मिल जाता, तबतक हमें उस तरह की मुसीबतोंको, जिनमें आप पिसे जा रहे हैं, सहन करना ही होगा।<ref>मेहरसिंह रेत अमेरिकासे निर्वासित कर दिये गये थे। उनको अमेरिकी पत्नीको नागरिकता " हिन्दूसे विवाह कर लेनेके कारण" छिन गई थी।</ref>
{{right|हृदयसे आपका,<br>
मो॰ क॰ गांधी}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८०८) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८९
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2026-08-15T16:05:51Z
अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४०३. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२४ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
रामविनोद बहुत परेशान कर रहा है। उसने अभी संघ के प्रति अपना दायित्व नहीं निभाया है। क्या आप उसे समझा सकते हैं?
कृष्णदास क्या कर रहा है?
आपका स्वास्थ्य कैसा चल रहा है?
सस्नेह
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १५९२) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४०४. पत्र: एफ॰ एच॰ ब्राउनको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२५ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
मुझे आपका पत्र पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई। जब मैं दक्षिण आफ्रिकी शिष्टमण्डलके साथ लन्दन गया था; उस समयकी अपनी मुलाकातें मुझे अच्छी तरह याद है। जहाँतक "सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा" के अंग्रेजी संस्करणकी इजाजतका
सम्बन्ध है, पिछले साल न्यूयॉर्ककी मैकमिलन कम्पनीको इसकी इजाजत दे दी गई थी।
पुस्तकका दूसरा खण्ड अभी प्रकाशित नहीं होगा। इसे अभी कुछ वक्त लगेगा, क्योंकि मुझे मालूम नहीं है कि भारतीय अनुभवोंसे सम्बन्धित अध्याय कैसे चलेंगे। मैंने अभी उनकी कोई पक्की योजना नहीं बनाई है। इसलिए मैं नहीं कह
सकता कि मुझे और कितने अध्याय लिखने पड़ेंगे। यही कारण है कि दूसरे खण्डका प्रकाशन स्थगित कर दिया गया है।<noinclude></noinclude>
7fdugr2akhxr1v02237nidk1ipx437r
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९०
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>आपकी संवेदनाके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
मो॰ क॰ गांधी}}
{{left|श्री एफ॰ एच॰ ब्राउन<br>
डिलकुशा<br>
फोरेस्ट हिल, लन्दन, द॰ पू॰ २३}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३१७) की नकल तथा सी॰ डब्ल्यू॰ ४४४० से।
सौजन्य: एफ॰ एच॰ ब्राउन
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४०५. पत्र: जनकधारीप्रसादको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२५ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय जनकधारी बाबू,}}
आपका पत्र मिला। यदि हमें ईश्वरके निकटतम होकर रहना है तो ईश्वर और हमारे बीच कुछ दुराव नहीं होना चाहिए। पति और पत्नीका प्यार बाधा है, क्योंकि हम जिस रूपमें इस प्यारको समझते हैं यह अनिवार्यतः एकान्तिक और व्यक्तिगत है।
२. ईश्वरमें विश्वासके लिए तर्क नहीं दिया जा सकता। यह विश्वास मस्तिष्कसे नहीं हृदयसे उपजता है, और हृदयकी चीजें स्वतः प्रेरित और नैसर्गिक होती हैं। हमारी कमजोरी और हमारी सीमाओंको ही हममें उस परिपूर्ण और असीमके प्रति विश्वासका भाव जाग्रत करना चाहिए। और यदि हममें यह विश्वास हो तो हम अवश्य ही तरह-तरहकी कठिनाइयों और दुःखोंसे मुक्त रहेंगे।
३. आप ऐसा क्यों कहते हैं कि चूँकि आप प्रति माह रु॰ ५० लेते हैं इसलिए आप जन-हित सम्पादन नहीं कर रहे हैं। हर आदमी, जो चरखा संघकी सेवा करता है, निस्सन्देह राष्ट्रकी सेवा करता है। इस गरीब देशमें बिना भोजनके काम लेनेकी आशा करना मूर्खता होगी। चूँकि आप समृद्ध वकील नहीं हैं, इसलिए दूसरे लोग आपका आदर या आपसे स्नेह नहीं करते इसमें दुःख मनानेका कोई कारण नहीं है। परन्तु यदि आप सम्पत्ति और अनुकूल लोकमतके बिना भी प्रसन्न रह सकते हैं तो यह खासा बधाईका विषय है।
बाबू विन्देश्वरीप्रसादको आपका संरक्षण क्यों मांगना चाहिए? यदि उन्हें दृढ़ विश्वास है कि वकालत छोड़ देना ठीक रहेगा तो जैसे कि हमारे अन्य लाखों देशवासी कर रहे हैं उन्हें भी आये पेट खाने भरकी मजदूरी कमानेमें प्रसन्नताका<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९१
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: एच॰ एस॰ एल॰ पोलकको|३५९}}</noinclude>अनुभव करना चाहिए। यदि उन्हें वकालत छोड़ देनेका पश्चात्ताप हो तो वकालत फिरसे शुरू कर देनी चाहिए।
जहाँ तक आपके बच्चोंका सम्बन्ध है––आप उन्हें जो सच्ची शिक्षा दे सकते हैं वह यह है कि आप उनका इस तरह पालन-पोषण करें कि वे ईमानदार मजदूर बनें। उस शिक्षासे उन्हें और देशको लाभ होगा और आपके बच्चे आपपर बोझ
होनेके बजाय अपने लिये और देशके लिए वरदान सिद्ध होंगे।
मुझे आशा है कि आपकी पत्नी पूरी तरह ठीक हो गई होगी। मैं यह कह दूँ कि आश्रमके संविधानमें आमूल संशोधन हो रहा है और फिलहाल ऐसी इच्छा है कि कमसे कम एक साल तक कोई और आदमी न लिये जायें। इसलिए यदि आपकी पत्नीका अगले एक या दो महीनोंके दौरान आनेका विचार हो तो इससे पहले कि आप उन्हें भेजनेकी बात सोचें, कृपया मुझे लिख दीजिएगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
मो॰ क॰ गांधी}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ५१) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४०६. पत्र: एच॰ एस॰ एल॰ पोलकको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
२५ मई, १९२८}}
आपके पत्र मिले। मैंने महादेवको कहा था कि वे आपको समय-समयपर ठीक समाचार देते रहें और मगनलालकी मृत्युके बारेमें आपको पूरा विवरण दें। मेरे पास ज्यादा कुछ बोलकर लिखवानेका वक्त नहीं है। यह केवल इतना बतानेके लिए है कि मैं आपके तार और पत्रोंकी कितनी कद्र करता हूँ।
अब मैं मगनलालके कमरेमें रह रहा हूँ।
महादेवने आपको कारण अवश्य बताया होगा। मगनलाल कामपर कलकत्ता गया। उसके बाद वह गया के लिए रवाना हुआ। वहाँसे राधाको मिलने उस स्थान पर गया जहाँ राधा एक परिवारमें परदेकी कुप्रथा खत्म करनेके लिए गई हुई थी। रास्ते में उसे ठण्ड लग गई और निमोनिया हो गया और नौ दिनकी बीमारीके बाद कृपालु मित्रोंके बीच, जिन्होंने उसके लिए मानव द्वारा जो भी सम्भव था किया, शान्तिसे चल बसा।
{{left|श्री एच॰ एस॰ एल॰ पोलक<br>
४२, ४७ और ४८ डेन्स इन हाउस<br>
२६५ स्ट्रैण्ड, लन्दन, डब्ल्यू॰ सी॰ २}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३१६) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
ob1f40v83gtli2ze7awazd2pffs4qge
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९२
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४०७. पत्र: किशोरलाल मशरूवालाको'''}}}}
{{right|शुक्रवार, ज्येष्ठ सुदी ६, १९८४ [२५ मई, १९२८]}}
{{left|चि॰ किशोरलाल,}}
मैंने तुम्हारे दोनों पत्र ध्यानपूर्वक पढ़े हैं। ऐसा लगता है कि मैंने जिस प्रकार जो कहा था वह बिलकुल वैसा ही तुम्हारे
सामने नहीं रखा गया है।
जिन परिवर्तनोंका मैंने सुझाव दिया है उनमें कुछ नई बात भी है। हमने आश्रमवासीकी जो व्याख्या की है, उसमें कोई फेरफार नहीं किया है। उससे अभिप्राय तो इतना ही होगा कि जो आदर्श हमारे सामने हमेशा रहा है उसका अनुसरण
करनेका और भी अधिक प्रयत्न करें।
जबरदस्ती तो किसीसे न की है और न करनेकी इच्छा ही है। आज दो भाइयोंने अपनी रसोई अलग करनेकी इच्छा प्रकट की थी, उनपर दबाव डालनेसे मैंने इनकार कर दिया। इसलिए मुझे तो कहीं भी दबाव नहीं दिखाई देता। मीठा
आग्रह जरूर है। प्रत्येक वस्तु साफ-साफ समझाता रहता हूँ।
जो लोग आश्रममें आये हैं, उन्हें आश्रममें होनेवाले नैतिक विकास या परिवर्तनके अनुसार आचरण करना चाहिए। मेरा यही मत है। जो आये हैं उन्हें यह तो नहीं कहना चाहिए "हम तो अमुक नियमोंका पालन करेंगे और नये नियम बनाये जायेंगे तो उनपर अमल करना हमारे लिए वचनभंग करना होगा।" ऐसी स्थितिमें कोई भी संस्था नहीं चल सकती। स्थूल वस्तुओं जैसे वेतन अवधि आदिके विषय में
निश्चय हो सकता है। सामान्य तौरपर हमारे यहाँ तो नैतिक बन्धनके सिवा दूसरा कुछ अंकुश ही नहीं है।
यह सब होनेपर भी, ब्रह्मचर्यकी सबके साथ खूब चर्चा करनेपर ही, सबके द्वारा उसके पालनकी आवश्यकता स्वीकार करनेपर ही उससे सम्बन्धित नियमका पालन करनेका निश्चय किया गया था। इस नियमको पढ़कर सुनाते समय मैंने यह अवश्य कहा था कि जो इस नियमका पालन नहीं कर सकते या नहीं करना चाहते वे जा सकते हैं।
अभी संयुक्त रसोई ठीक चल रही है।
इस समय तुम्हें और कष्ट नहीं दूँगा। इतना भी अनिच्छापूर्वक लिखा है। सच तो यह है कि बीमार होते हुए दूर बैठे-बैठे तुम्हें यहाँ किये जा रहे परिवर्तनोंके विषयमें सोचनेका कष्ट ही नहीं उठाना चाहिए। ऐसा करना दोषपूर्ण भी है।
अब तबियत कैसी रहती है? इस बार सान्ताक्रूजमें नहीं रहूँगा। यहाँ आना चाहो तो आ सकते हो–– शरीर इस लायक तो है। इलाज तो यहाँ भी हो सकता<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९३
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: महादेव देसाईको|३६१}}</noinclude>है। जलवायु भी वहाँसे अच्छी है। किन्तु यदि आनेका निर्णय करो तो मैं चाहता कि वापस न जानेका विचार करके ही।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ११८०२) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४०८. तार: हरिलाल देसाईको'''}}}}
{{right|[२५ मई, १९२८ के पश्चात्]<ref>यह तार वल्लभभाई पटेल द्वारा हरिलाल देसाईके २५ मईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। इसका मसविदा गांधीजीने तैयार किया था।</ref>}}
पत्र मिला। बढ़ाये हुए अंशकी अदायगी जाँचसे पहले असम्भव। यदि स्वतन्त्र जाँच कराई जाये, जिसमें सबूत पेश करने और सरकारी गवाहोंसे जिरह करनेका अधिकार दिया जाये, जब्त की हुई जमीनें वापस दे दी जायें [और] सत्याग्रही कैदियोंको रिहा कर दिया जाये तो मूल लगानकी
अदायगी की जा सकती है। लोग पंच न्यायालयका निर्णय स्वीकार कर लेंगे। तार द्वारा उत्तर दीजिए: बारडोली वल्लभभाई।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १२७०५) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४०९. पत्र: महादेव देसाईको'''}}}}
{{right|२६ मई, १९२८}}
{{left|चि॰ महादेव,}}
हर बार तुम मुझे यह अच्छी भेंट भेज देते हो। जो बात स्वप्न में भी मेरे मनमें न थी, उसकी तुम सबने कैसे कल्पना कर ली? परसों मैंने जो कुछ कहा था वह किसी एककी जरासी भी टीका करनेके उद्देश्यसे नहीं कहा था। जो कुछ कहा था वह ८० व्यक्तियोंके लिए कहा था। जो संयुक्त रसोईमें शामिल नहीं हो सकते उनके लिए मेरे मनमें कोई आक्षेप या निन्दाकी बात न थी और न है। फिर उस सभामें इसकी चर्चा करनेकी बात ही क्या थी? इसलिए मेरे मनमें हिंसा नहीं थी। इतना कह देना ही काफी है। निन्दा तो मैंने सिर्फ उसी रात की थी। उस समय भी मुझे विरोधका तनिक भी दुख नहीं हुआ था। दुख तो सबकी ओछी वृत्ति देखकर
हुआ था। नरहरिकी निश्छलता तो बहुत ही अच्छी लगी; किन्तु उसकी और
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
rs7g772vysi0eem2115w7pbtahbz5u0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९४
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>बाकी सबकी बुद्धिका हरण हो जाना अच्छा नहीं लगा। यदि उनकी बुद्धि मैंने हर ली हो तो मैं कैसा निकम्मा व्यक्ति हूँ। ऐसी स्थितिमें मेरा क्या धर्म है यह सोचते-सोचते मैं जाग गया और तुरन्त निश्चिन्त हो गया। तुम्हें मालूम है कि पिछले नौ दिनोंमें मेरा वजन दो रतल बढ़ा है। तो मैं कितना निश्चिन्त रहा होऊँगा?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ११४४८) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४१०. पत्र: सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२६ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय चार्ली,}}
मुझे तुम्हारे पत्र नियमित रूपसे मिलते रहे हैं। मैंने महादेवको तुम्हें भी पत्र लिखनेके लिए कहा था। मुझे आशा है कि उसने वैसे ही किया होगा। उसे वल्लभभाईकी मददके लिए हफ्तेमें दो बार बारडोली जाना होता है। इसलिए वह आज यहाँ नहीं है।
मैं हमेशा तुम्हारे बारेमें सोचता रहता हूँ, परन्तु तुम्हें पत्र लिखनेका समय कभी नहीं मिलता। अलबत्ता, मुझे चिन्ता नहीं होती, क्योंकि मुझे मालूम है कि तुम मुझसे पत्रोंकी अपेक्षा नहीं रखते हो।
मेरा हृदय गुरुदेव के लिए उमड़ा पड़ता है।<ref>ऑक्सफोर्ड विद्यालय में हिबट भाषण देनेके लिए जाते हुए रास्तेमें कवि रवीन्द्रनाथ बीमार पड़ गये थे।</ref> मेरी कामना है और मुझे विश्वास है कि उनका स्वास्थ्य इस समुद्री यात्राको अच्छी तरह बर्दाश्त कर सकेगा और यूरोपमें वे अपने-आपको पूरा विश्राम देते रहेंगे तथा नई शक्ति लेकर वापस आयेंगे। मुझे यह भी आशा है कि तुम अपने थके शरीरको और इससे भी ज्यादा थके हुए मस्तिष्कको विश्राम दोगे। परन्तु मुझे लगता है तुम शायद वैसा नहीं कर सकोगे।
मैं आश्रमको सुधारनेमें और उसे उसके स्वीकृत आदर्शोंके अनुरूप बनानेपर ध्यान दे रहा हूँ। इसलिए हम लोग बड़े पैमाने पर संयुक्त रसोड़ा चला रहे हैं। ८० लोग एक साथ भोजन करने बैठते हैं, जहाँ वे अपने-आपको और अधिक सेवा कार्यके लिए उत्सर्ग करनेका प्रयत्न करते हैं। परन्तु समयकी कमीके कारण मैं और ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९५
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||प्राथमिक शिक्षा––३|३६३}}</noinclude>क्या महादेवने आपको बताया है कि मैं अब मगनलालके छोटेसे कमरेमें रहने लगा हूँ। इससे मुझे प्रसन्नता होती है और मैं मगनलालकी आत्माके सान्निध्यका अनुभव ज्यादा अच्छी तरह कर पाता हूँ।
सस्नेह,
{{right|'''मोहन'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३३९२) की फोटो-नकल से।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४११. पत्र: सेम्युअल आर॰ पेरीको'''}}}}
{{right|[२६ मई, १९२८ के पश्चात्]}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
२६ मईके आपके पत्रके लिए धन्यवाद। मुझे याद नहीं पड़ता कि "डज़ सिविलाइजेशन नीड रिलिजन"<ref>रेनहोल्डने बुकरकी लिखी पुस्तक।</ref> नामकी पुस्तक मुझे मिली है। मुझे इस बातसे हर्ष हुआ है कि सुदूर पश्चिममें मेरे इतने मित्र और सहानुभूति रखनेवाले लोग हैं।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सेम्युअल आर॰ पेरी}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४०४३) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४१२. प्राथमिक शिक्षा––३'''}}}}
विनय मन्दिर और महाविद्यालयमें हम शिक्षाका क्रम भली-भाँति बदल दें और शिक्षक मेरे द्वारा पेश किये गये दृष्टिकोणको हज्म कर चुके हों, तभी प्राथमिक शिक्षा यानी देहाती शिक्षाका सवाल हल होगा।
आज हम संख्या, लोकलाज या झूठी प्रतिष्ठाके लोभसे कुछ तबदीलियाँ करनेमें हिचकिचाते हैं। अगर न हिचकिचायें तो इन विनय-मन्दिरोंसे गाँवोंकी सेवा करनेवाला सुन्दर वर्ग पैदा हो और शहरोंके पापका कुछ प्रायश्चित्त हो।
इन मन्दिरोंमें विद्यार्थी अव्वल दर्जेके घुनिए, कतैये और जुलाहे बनें; पहले दर्जेकी कपासकी खेती जाननेवाले हों; उन्हें देहातके उपयोगकी बढ़ईगिरी आती हो, यानी उन्हें बढ़िया चरखा बनाना आता हो; गाड़ी, हल वगैरा बनाना न आता हो तो भी
{{dhr}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९६
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>उनकी मरम्मत करना आता हो; वे गाँवोंके लायक सीना-पिरोना जानते हों; उनके मोतीके दानों जैसे अक्षर हों; वे साधारण लिखनेकी कला जानते हों; उन्हें देशी अंक जबानी याद हों; वे 'रामायण', 'महाभारत' वगैरा पुराने साहित्य और उसके आध्यात्मिक और आधुनिक अर्थोके जानकार हों; देहाती खेल जानते हों; तन्दुरुस्ती के कानून जानते हों; उन्हें घरेलू चिकित्सा अच्छी तरह आती हो, यानी वे मामूली
बीमारियोंकी जाँच कर उनका इलाज जाननेवाले हों; वे गाँव के घूरे, तालाब और कुएँ वगैरा साफ करनेकी कला जाननेवाले हों; वगैरा-वगैरा। गरज यह कि इन विनय-मन्दिरोंमें इस तरहकी शिक्षा दी जाये, जिससे उनमें इतनी योग्यता आ जाये कि वे गाँवोंकी हर तरहसे सेवा करनेके लिए तैयार हो सकें। और इस तरहकी शिक्षा पर जो कुछ खर्च हो, वह प्राथमिक-शिक्षा के लिए ही किया गया है, ऐसा समझा जाये। हम गाँवोंमें सचमुच प्रवेश करने योग्य, ऐसा करने या कर सकनेपर ही होंगे।
यह शंका हो सकती है कि जहाँ हमने ऐसे परिवर्तन किये और ऐसा आदर्श साफ तौरपर जाहिर किया कि हमारे विनय-मन्दिर खाली हुए। ऐसा ही हो तो मैं सत्यके खातिर इस आपत्तिका स्वागत करनेको तैयार हो जाऊँगा। लेकिन जबतक विद्यापीठका देहाती शिक्षाका ध्येय कायम है, तबतक ऐसा न करना असत्य और द्रोह समझा जायेगा।
मगर मेरा विश्वास और अनुभव यह है कि अगर हम अपने उद्देश्योंके प्रति एकनिष्ठ रहें, तो जनता अन्तमें उन्हें पहचान लेती है और उन्हें प्रोत्साहन देती है। तथाकथित निष्फलताके कारण ढूँढनेपर हमें मालूम होगा कि ध्येयको माननेवाले बेवफा, कच्चे या ढीले थे। संशयात्माका तो सदा नाश ही होता है, और उसके नाशको न देखकर लोग उसके आदर्शकी कमी या निष्फलताको देखते हैं।
अगर हमारे विद्या-मन्दिरोंमें श्रद्धावान और त्यागी शिक्षक हों, तो मेरी पक्की राय है कि वे विद्यार्थियोंसे भर जायें। लोग सच्ची चीजको पहचान सकते हैं। बहुत बार ऐसा होनेमें देर होती देखी जाती है। पर वह निरा भ्रम होता है। यह निरपवाद नियम है कि सही रास्तेसे कमसे कम देर लगती है।
लोगोंकी कमजोरियोंको, उनकी भोगवृत्तिको उत्तेजन देनेवाली संस्था घड़ी-भरमें भर जाये तो इससे क्या? इससे कोई उसकी सफलता साबित नहीं होती।
मेरी दृष्टिको अपनानेका एक यह नतीजा तो हो सकता है कि जो विद्यार्थी सरकारी पाठशालाओंकी-सी शिक्षा पानेकी आशासे आये होंगे, जो सिर्फ शहरी जीवन बितानेकी योग्यता प्राप्त करनेकी उम्मीद रखकर आये होंगे, वे निराश होकर हमारे मन्दिर छोड़ देंगे। मगर ऐसा हो तो अच्छा ही है। हम और वे दोनों गलत स्थितिसे बच जायेंगे और एक-दूसरेकी शुद्ध सेवा करेंगे।
जिस विचारसे मैंने इस लेखमालाको शुरू किया था, उस विचारको जरा और आगे ले जाकर मैं इस मालाको बन्द करनेकी बात सोचता हूँ। और फिर इस बारेमें मेरे पास जो थोड़े-से सवाल हैं, उनकी चर्चा करनेकी आशा रखता हूँ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९७
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||प्राथमिक शिक्षा––३|३६५}}</noinclude>प्राथमिक-शिक्षाके पहले सालमें अक्षर-ज्ञान बिलकुल न सिखानेका विचार सही हो, तो उसका कुछ-न-कुछ अच्छा परिणाम विनय-मन्दिरों और महाविद्यालयोंमें भी आना चाहिए।
आजकल किताबी ज्ञानका प्रचार बहुत बढ़ गया है। नित नई पुस्तकें निकला ही करती हैं। जिसकी भाषा जरा भी मँजी हुई है, जिसने थोड़ा बहुत भी विचार किया है, वह अपने विचार प्रकट करनेको अधीर बन जाता है और यह समझता
हैं कि उन विचारोंको प्रकट करनेसे देशकी सेवा होती है। नतीजा यह होता है कि विद्यार्थियोंके दिमागपर और उनके माँ-बापकी जेबोंपर असह्य बोझ पड़ता है। विद्यार्थियोंकी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। उनके दिमाग तरह-तरह के तथ्योंके संग्रह-स्थान बन जाते हैं और इससे उनमें मौलिक विचारोंके लिए जगह नहीं रह जाती। और हकीकतें भी अपनी-अपनी जगहपर ठीक बैठ जानेके बजाय, जैसे एक आलसीके घरमें सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा रहता है, वैसे ही बेचारे इन विद्यार्थियोंके दिमाग में भी बिखरी पड़ी रहती हैं। इनका उपयोग न वे कर सकते हैं, न जनताको
उनसे लाभ होता है।
इसलिए मेरी रायमें तो आज जो बहुतेरी किताबें छपती हैं, उन्हें मैं विद्यार्थियोंके आगे हरगिज नहीं रखूँगा। लिखना-पढ़ना जाननेवाले विद्यार्थी भी बहुत-सी शिक्षा तो शिक्षकके मुँहसे ही पाते हैं। वे कमसे-कम पुस्तकें पढ़ें, मगर जो पढ़ें उसपर विचार करें और विचार करनेसे जो चीज अपनाने लायक लगे उसपर अमल करने लगें। ऐसा करनेसे विद्यार्थीका जीवन सरस, विचारमय, विवेकमय निश्छल, पवित्र और तेजस्वी होगा। ऐसी पढ़ाई गरीब जनताको शोभा देगी। ऐसी पढ़ाई विद्यार्थी और जनता दोनोंको फायदा पहुँचायेगी।
इसलिए विद्यापीठके सामने जो गूढ़ प्रश्न हैं, उसके हल होनेका दारोमदार मौजूदा शिक्षकोंकी विद्यापीठके ध्येयोंको पचानेकी और उनके अनुसार चलनेकी खूब कोशिश करनेकी शक्तिपर है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' २७-५-१९२८}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९८
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४१३. पत्र: कर्नाड सदाशिव रावको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२७ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय सदाशिव राव,}}
आशा है कि अब आप मलेरियाके बादके प्रभावोंसे पूरी तरह मुक्त होंगे। मैं आशा करता हूँ कि एक तरहसे सारे साल आश्रम में ही रहूँगा। परन्तु मुझे कभी पता नहीं होता कि आकस्मिक परिस्थितियोंके कारण कब बाहर जाना पड़े। इसलिए जब आपका अपनी लड़कियोंको यहाँ लानेका विचार हो, तो पहले से ही मेरी गतिविधियोंका पता लगा लें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत सदाशिव राव<br>
कोडाइबेल<br>
मंगलोर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३२२९) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४१४. पत्र: वाई॰ अंजप्पाको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२७ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। इस वक्त मैं आपको मात्र यही सुझाव दे सकता हूँ कि आपको अपनी कम्पनीके हिसाब-किताबका विवरण और सारा खद्दर जो आप तैयार कर रहे हैं, उसके नमूने तथा ऐसी अन्य सूचनायें जो आप वहाँसे भेज सकें, जिनसे अखिल भारतीय चरखा संघका विशेषज्ञ आपकी पेढ़ीकी हालतको जाँच सके, भेज देनी चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत वाई॰ अंजप्पा<br>
द्वारा यादगीर एण्ड कम्पनी<br>
टोबेको बाजार<br>
सिकन्दराबाद (दक्षिण)}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३२३०) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९९
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४१५. पत्र: सत्यानन्द बोसको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२७ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपने जो सुझाव दिया है वह नया नहीं है। इसपर कई दृष्टिकोणोंसे चर्चा हो चुकी है। परन्तु निजी तौर पर मैंने महसूस किया है कि अभी वह वक्त नहीं आया है कि हम अगुआ बन जायें। इस बीच कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा इस दिशा में अच्छा काम किया जा रहा है। सारे एशियाकी जागृति में योगदान देनेके रूपमें उनके कामका सबसे अधिक महत्व है। हम जैसे जो छोटे लोग हैं, उनके बारेमें, मैं
महसूस करता हूँ कि हमें केवल आन्तरिक शक्तियोंका विकास करके अपनी स्थिति सुदृढ़ करनी चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत सत्यानन्द बोस<br>
७८, धर्मतल्ला स्ट्रीट, कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३२३१) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४१६. पत्र: च॰ राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती
२७ मई, १९२८
प्रिय च० रा०,
मैंने आपकी पेंसिल से लिखी टिप्पणियाँ " बिना बिका माल" अभी-अभी पढ़ी है ।
खादी से सम्बन्धित विचार नितान्त परिचयात्मक हैं । हिन्दू-मुस्लिम एकताके बारेमें
विचार पूरी तरह असामयिक हैं और यदि उनके प्रति रोष नहीं भी प्रकट किया
गया तो उनका उलटा अर्थ लगाया जा सकता है। इसलिए फिलहाल आप उन्हें
तालेके अन्दर ही बन्द करके रखिएगा ।
अंग्रेजी (एस० एन० १३२३२) की फोटो- नकलसे ।
हृदयसे आपका,
बापू
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
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{{c|{{larger|'''४१५. पत्र: सत्यानन्द बोसको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२७ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपने जो सुझाव दिया है वह नया नहीं है। इसपर कई दृष्टिकोणोंसे चर्चा हो चुकी है। परन्तु निजी तौर पर मैंने महसूस किया है कि अभी वह वक्त नहीं आया है कि हम अगुआ बन जायें। इस बीच कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा इस दिशा में अच्छा काम किया जा रहा है। सारे एशियाकी जागृति में योगदान देनेके रूपमें उनके कामका सबसे अधिक महत्व है। हम जैसे जो छोटे लोग हैं, उनके बारेमें, मैं
महसूस करता हूँ कि हमें केवल आन्तरिक शक्तियोंका विकास करके अपनी स्थिति सुदृढ़ करनी चाहिए।
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७८, धर्मतल्ला स्ट्रीट, कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३२३१) की फोटो-नकलसे।
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साबरमती<br>
२७ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय च॰ रा॰,}}
मैंने आपकी पेंसिल से लिखी टिप्पणियाँ "बिना बिका माल" अभी-अभी पढ़ी है। खादी से सम्बन्धित विचार नितान्त परिचयात्मक हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकताके बारेमें विचार पूरी तरह असामयिक हैं और यदि उनके प्रति रोष नहीं भी प्रकट किया गया तो उनका उलटा अर्थ लगाया जा सकता है। इसलिए फिलहाल आप उन्हें तालेके अन्दर ही बन्द करके रखिएगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''बापू'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३२३२) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०१
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४१८. पत्र: गंगाप्रसादको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२७ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। मैंने आपकी पुस्तक पूरी पढ़ी। यद्यपि मैं यह कह सकता हूँ कि आपने इसपर बहुत मेहनत की है, लेकिन आपने मूल स्रोतोंकी प्रामाणिकता प्रस्तुत नहीं की है। परन्तु इस मामलेमें हमारे अधिकतर लेखक दोषी हैं। हम ऐसे
ही प्रमाणोंसे आसानीसे सन्तुष्ट हो जाते हैं, जिनसे हमारे पहलेसे ही बन चुके विचारों या सिद्धान्तोंको समर्थन मिलता हो।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत गंगाप्रसाद<br>
टिहरी}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३२३४) की माइक्रोफिल्मसे।
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{{c|{{larger|'''४१९. पत्रः भोजराज खुशीरामको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२७ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। यदि आपका हृदय सचमुच पवित्र है और आपको अपने पिताजीके प्रति और जिस लड़कीसे आपका विवाह हुआ है उसके प्रति सच्चा प्यार है तो आप अपनी पवित्रता और प्यारके बलसे सारा विरोध सहकर मिटा डालेंगे
और लड़कीको अपने विचारोंके अनुरूप बना लेंगे। और यदि यह केवल लड़की पसन्द न होनेका मामला है और प्रस्तावित ब्रह्मचर्य केवल सुविधाकी बात है, तो यह आपका स्पष्ट कर्त्तव्य है कि आप लड़कीको अपने मतानुकूल बना लें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत भोजराज खुशीराम<br>
मछली बाजार<br>
रोहड़ी (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३२३५) की माइक्रोफिल्मसे।
{{left|३६–२४}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०२
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४२०. पत्र: मणिबहन पटेलको'''}}}}
{{right|[२८ मई, १९२८]<ref>और</ref>}}
{{left|चि॰ मणि}}
मैंने तुम्हें मूर्ख माना है सो बिना विचारे नहीं, यह तुम सिद्ध कर रही हो। मीराबहन जो कहे वह मेरे लिये कभी वेदवाक्य नहीं हुआ। वह बहन निर्मल है...।<ref>साधन-सूत्रके अनुसार।</ref> तुम यहाँ होती तो तुमसे ही कहता। तुम नहीं थी इसलिए लक्ष्मीदास भाईसे कहा। परन्तु किसी दिन तो मूर्ख न रहकर तुम सयानी बनोगी, यह आशा रखता हूँ।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो: मणिबहेन पटेलने'''}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४२१. हरिलाल देसाईको लिखे पत्रका मसविदा'''<ref>मसविदा गांधीजीके स्वाक्षरोंमें है। महादेव देसाई इस पत्रको "दि स्टोरी ऑफ बारडोली" में
कुछ शाब्दिक परिवर्तनों सहित उद्धृत करते हुए कहते हैं कि यह पत्र वल्लभभाई पटेल द्वारा भेजा गया था।</ref>}}}}
{{right|[२८ मई, १९२८]}}
{{left|प्रिय,}}
अहमदाबादसे एक विशद तार<ref>देखिए "तार: हरिलाल देसाईको", २५-५-१९२८ के पश्चात्।</ref> आपको मेरी अनुमतिसे भेजा गया था। मैं उसकी नकल इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ, जो अपने आपमें स्पष्ट है। चूँकि सम्भवतः
हमारे काम और सेवाके तरीके परस्पर विरोधी हैं, मुमकिन है कि मेरी ऐसी माँग भी जिसे अपने सन्तोषका विचार करते हुए मैं अल्पतम मानता हूँ आपके विचारमें हदसे ज्यादा हो।
यदि बढ़े लगानकी अदायगी करनी ही है, तो किसी भी जाँचका क्या लाभ हो सकता है? यदि निर्णय लोगोंके प्रतिकूल हो और बढ़ाये हुए लगानकी अदायगी जल्दी न हो, तो इसकी वसूलीके लिए सरकारने पर्याप्त जमानत ले रखी है।
कृपया ध्यान रखिए कि विचारणीय प्रश्नोंके सम्बन्धमें दोनों पक्षोंकी सहमति आवश्यक होगी। ऐसा नहीं हो सकता कि इस सम्बन्धमें सरकार जो तय कर दे वही ठीक मान लिया जाये।
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{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०३
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||तार: दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसको|३७१}}</noinclude>जनताके किसी भी स्वाभिमानी एजेंट के लिए यह एक सम्मानका प्रश्न होगा कि वह कैदियों और जमीनोंके मुक्त किये जानेका आग्रह करे, विशेषकर उस हालत में जबकि उन कैदियोंको अवैध रूपसे दण्ड दिया गया है या उन जमीनोंकी कुर्की अवैध रूपसे की गई है।
अन्तमें यदि आप मजबूतीसे काम नहीं कर सकते और लोगोंमें कितनी शक्ति है, इस बातको मैं जैसा महसूस करता हूँ वैसा यदि आप नहीं कर पाते तो फिर आप कोई भी कार्यवाही न करें; इसी तरह आप हमारे उद्देश्यकी पूर्ति में सबसे ज्यादा सहायक होंगे। मैं सम्मानपूर्ण समझौतेके लिए कोई भी दरवाजा बन्द नहीं करना चाहता, किन्तु साथ ही सम्मानपूर्ण समझौतेके अभाव में या लोगोंको उस कठिनतम परीक्षायें डाले बिना जिसे वे पूरा कर सकते हैं, मुझे संघर्षको खत्म करनेकी जल्दी भी नहीं है। असम्मानपूर्ण समझौतेकी अपेक्षा मैं बहादुरीकी पराजयको ज्यादा पसन्द करूँगा।
सम्भवतः अब आप समझ गये होंगे कि मैं महाबलेश्वर या पूना दौड़े आनेके लिए उत्सुक नहीं हूँ। इसलिए जबतक आप यह न समझें कि मेरी उपस्थिति अनिवार्य है, कृपया मुझे मत बुला भेजिएगा।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १२७०५) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४२२. तार: दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसको'''<ref>यह तार द॰ आ॰ भा॰ कांग्रेस के दिनांक २८ मईके निम्न समुद्री तारके उत्तर में भेजा गया था:
अवैध प्रवेश करनेवालोंके सम्बन्ध में माननीय शास्त्रीजीको भेजा गया आपका तार स्पष्ट नहीं। क्या आपसे ट्रान्सवालमें उन सब प्रवेश करनेवालोंके लिए, जिनके पास १९१४ तक, जालसाजीसे प्राप्त किये गये पंजीकरण के प्रमाण पत्र थे, संरक्षण प्राप्त किया था? यदि सरकार निर्णय करनेसे पहले जाली दस्तावेज रखनेवालोंको कुछ रियायत देनेके लिए आगे आनेके लिए कहती है तो क्या कांग्रेसके लिए यह उचित है कि वह सरकारको १९१४ के समझौतेको भंग करनेवाली करार दे? कृपया तत्काल उत्तर दीजिए (एस॰ एन॰
११९८९)।</ref>}}}}
{{right|[२९ मई, १९२८ या उसके पश्चात्]}}
{{left|द॰ आ॰ भा॰ स॰<br>
जोहानिसबर्ग}}
समझौता पत्र-व्यवहारमें सम्मिलित है। पूरा मामला शास्त्रीजीके सामने रखने और उनका निर्देशन स्वीकार करनेकी आग्रहपूर्ण सलाह।
{{right|मो॰ क॰ गांधी}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ११९८९) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|3em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०४
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2026-08-16T11:53:57Z
अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४२३. पत्र: शंकरन्को'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मई, १९२८}}
{{left|प्रिय शंकरन्,}}
तुम्हारा विचार बिलकुल सही है। हमें बारडोलीके लोगोंके लिए विदेशी अथवा मिलके कपड़ोंके पार्सल हरगिज नहीं लेने चाहिए। और न ही उन्हें उसकी कोई इतनी जरूरत है। वे भूखे नहीं मर रहे हैं। उन्हें खिलाने या उन्हें कपड़ा देनेसे
खर्चेका कोई सम्बन्ध नहीं है। जो खर्चा किया जा रहा है वह अधिक संख्यामें स्वयंसेवकों का भार वहन करनेके लिए और व्यापक प्रचार चलाये रखनेके लिए हो रहा है।
{{right|हृदयसे तुम्हारा,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३३९६) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४२४. पत्र: च॰ राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मई, १९२८}}
{{left|प्रिय च॰ रा॰,}}
मैंने आपकी अभय आश्रम सम्बन्धी सराहना<ref>राजगोपालाचारीने एक लेखमें १९२७ के अन्तमें हुए दंगोंके सिलसिले में अभय आश्रम (कोमिल्ला) के
कार्यकर्ताओं के प्रयासोंकी सराहना की थी। देखिए "पत्र: च॰ राजगोपालाचारीको", २७-५-१९२८ भी।</ref> प्रकाशित न करनेके कारणोंपर आपसे बहस नहीं की है और मजदूरोंके सम्बन्धमें मेरा खयाल है, मैंने आपको अपने कारण बता दिये हैं। अभय आश्रमके सम्बन्धमें आपकी सराहना बिलकुल उपयुक्त है। परन्तु उन्हें लाभ पहुँचानेके बजाय उस सराहनासे सब तरहके ईर्ष्या-द्वेष बढ़नेकी सम्भावना थी और मुझे लगा कि यदि ईर्ष्या-द्वेषको न बढ़ाया जाये तो ज्यादा अच्छा है।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३३९७) की फोटो-नकलसे।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८
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|-
| २८. मेरा स्वास्थ्य (१६-२-१९२८)
|-
| २९. सिन्धमें बाढ़-सहायताका काम (१६-२-१९२८)
|-
|३०. चिट्ठी-पत्री (१६-२-१९२८)
|-
|३१. पत्र : च० राजगोपालाचारीको (१८-२-१९२८)
|-
|३२. पत्र : एम० एल्मर मॉडको (१८-२-१९२८)
|-
|३३. पत्र : एस्थर मेननको (१८-२-१९२८)
|-
|३४. पत्र: वायलेटको (१८-२-१९२८)
|-
|३५. हकीम अजमलखाँ स्मारक (१९-२-१९२८)
|-
|३६. बारडोलीके किसानोंसे (१९-२-१९२८)
|-
|३७. पत्र : सी० मुथुको (२१-२-१९२८)
|-
|३८. पत्र : एलिस मेकेकेलीको (२१-२-१९२८)
|-
|३९. पत्र : रोहिणी पूर्वयाको (२१-२-१९२८)
|-
|४०. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२१-२-१९२८)
|-
|४१. पत्र : नोरा एस० बेलीको (२२-२-१९२८)
|-
|४२. पत्र : देवी वेस्टको (२२-२-१९२८)
|-
|४३. पत्र : हेनरी नीलको (२२-२-१९२८)
|-
|४४. पत्र : एल० ले मन्सको (२२-२-१९२८)
|-
|४५. पत्र: प्र० च० घोषको (२-२-१९२८)
|-
|४६. लड़ना पड़े तो ईमानदारीसे लड़ें (२३-२-१९२८)
|-
|४७. पुरानी याद ताजा हो गई (२३-२-१९२८)
|-
|४८. हाथ करघा बनाम चरखा (२३-२-१९२८)
|-
|४९. तिलका ताड़ (२३-२-१९२८)
|-
|५०. पत्र : उर्मिला देवीको (२३-२-१९२८)
|-
|५१. पत्र : गौरीशंकर भार्गवको (२३-२-१९२८)
|-
|५२. पत्र : बी० डब्ल्यू० टकरको (२४-२-१९२८)
|-
|५३. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२५-२-१९२८)
|-
|५४. पत्र : वाई० भास्करको (२५-२-१९२८)
|-
|५५. पत्र : जी० रामचन्द्रनको (२५-२-१९२८)
|-
|५६. पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२५-२-१९२८)
|-
|५७. गायको कौन छुड़ायेगा ? (२६-२-१९२८)
|-
|५८. विद्यार्थियोंका सुन्दर सत्याग्रह ( २६-२-१९२८)
|-
|५९. पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (२६-२-१९२८)
|-
|६०. पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (२६-२-१९२८)
|-
|६१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२६-२-१९२८)
|-
|६२. पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२६-२-१९२८)
|-
|६३. पत्र : तुलसी मेहरको (२६-२-१९२८)
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|-
| २८. || मेरा स्वास्थ्य (१६-२-१९२८) ||
|-
| २९. || सिन्धमें बाढ़-सहायताका काम (१६-२-१९२८) ||
|-
|३०. || चिट्ठी-पत्री (१६-२-१९२८) ||
|-
|३१. || पत्र : च० राजगोपालाचारीको (१८-२-१९२८) ||
|-
|३२. || पत्र : एम० एल्मर मॉडको (१८-२-१९२८) ||
|-
|३३. || पत्र : एस्थर मेननको (१८-२-१९२८) ||
|-
|३४. || पत्र: वायलेटको (१८-२-१९२८) ||
|-
|३५. || हकीम अजमलखाँ स्मारक (१९-२-१९२८) ||
|-
|३६. || बारडोलीके किसानोंसे (१९-२-१९२८) ||
|-
|३७. || पत्र : सी० मुथुको (२१-२-१९२८) ||
|-
|३८. || पत्र : एलिस मेकेकेलीको (२१-२-१९२८) ||
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|३९. || पत्र : रोहिणी पूर्वयाको (२१-२-१९२८) ||
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|४५. || पत्र: प्र० च० घोषको (२-२-१९२८) ||
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|४६. || लड़ना पड़े तो ईमानदारीसे लड़ें (२३-२-१९२८) ||
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|४७. || पुरानी याद ताजा हो गई (२३-२-१९२८) ||
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|४८. || हाथ करघा बनाम चरखा (२३-२-१९२८) ||
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|४९. || तिलका ताड़ (२३-२-१९२८) ||
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|५०. || पत्र : उर्मिला देवीको (२३-२-१९२८) ||
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|५१. || पत्र : गौरीशंकर भार्गवको (२३-२-१९२८) ||
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|५२. || पत्र : बी० डब्ल्यू० टकरको (२४-२-१९२८) ||
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|५५. || पत्र : जी० रामचन्द्रनको (२५-२-१९२८) ||
|-
|५६. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२५-२-१९२८) ||
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|५७. || गायको कौन छुड़ायेगा ? (२६-२-१९२८) ||
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|५८. || विद्यार्थियोंका सुन्दर सत्याग्रह ( २६-२-१९२८) ||
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|५९. || पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (२६-२-१९२८) ||
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|६०. || पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (२६-२-१९२८) ||
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|६१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२६-२-१९२८) ||
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|६२. || पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२६-२-१९२८) ||
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आदेश यादव
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|२८. || मेरा स्वास्थ्य (१६-२-१९२८) || ३०
|-
|२९. || सिन्धमें बाढ़–सहायताका काम (१६-२-१९२८) || ३२{{smaller|}}
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|३०. || चिट्ठी–पत्री (१६-२-१९२८) || ३२
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|-
|३४. || पत्र: वायलेटको (१८-२-१९२८) || ३६
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|३५. || हकीम अजमलखाँ स्मारक (१९-२-१९२८) || ३७
|-
|३६. || बारडोलीके किसानोंसे (१९-२-१९२८) || ३८
|-
|३७. || पत्र : सी० मुथुको (२१-२-१९२८) ||
|-
|३८. || पत्र : एलिस मेकेकेलीको (२१-२-१९२८) ||
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|४७. || पुरानी याद ताजा हो गई (२३-२-१९२८) ||
|-
|४८. || हाथ करघा बनाम चरखा (२३-२-१९२८) ||
|-
|४९. || तिलका ताड़ (२३-२-१९२८) ||
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|५०. || पत्र : उर्मिला देवीको (२३-२-१९२८) ||
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|-
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|५५. || पत्र : जी० रामचन्द्रनको (२५-२-१९२८) ||
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|-
|५७. || गायको कौन छुड़ायेगा ? (२६-२-१९२८) ||
|-
|५८. || विद्यार्थियोंका सुन्दर सत्याग्रह ( २६-२-१९२८) ||
|-
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|२८. || मेरा स्वास्थ्य (१६-२-१९२८) || ३०
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|२९. || सिन्धमें बाढ़–सहायताका काम (१६-२-१९२८) || ३२{{smaller|}}
|-
|३०. || चिट्ठी–पत्री (१६-२-१९२८) || ३२
|-
|३१. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१८-२-१९२८) || ३३
|-
|३२. || पत्र : एम० एल्मर मॉडको (१८-२-१९२८) || ३४
|-
|३३. || पत्र : एस्थर मेननको (१८-२-१९२८) || ३४
|-
|३४. || पत्र: वायलेटको (१८-२-१९२८) || ३६
|-
|३५. || हकीम अजमलखाँ स्मारक (१९-२-१९२८) || ३७
|-
|३६. || बारडोलीके किसानोंसे (१९-२-१९२८) || ३८
|-
|३७. || पत्र : सी॰ मुथुको (२१-२-१९२८) || ३९
|-
|३८. || पत्र : एलिस मेकेकेलीको (२१-२-१९२८) || ४०
|-
|३९. || पत्र : रोहिणी पूवैयाको (२१-२-१९२८) || ४०
|-
|४०. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२१-२-१९२८) || ४१
|-
|४१. || पत्र : नोरा एस॰ बेलीको (२२-२-१९२८) || ४१
|-
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|-
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|-
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|-
|४५. || पत्र: प्र॰ च॰ घोषको (२-२-१९२८) || ४५
|-
|४६. || लड़ना पड़े तो ईमानदारीसे लड़ें (२३-२-१९२८) || ४६
|-
|४७. || पुरानी याद ताजा हो गई (२३-२-१९२८) || ४६
|-
|४८. || हाथ–करघा बनाम चरखा (२३-२-१९२८) || ४७
|-
|४९. || तिलका ताड़ (२३-२-१९२८) || ४९
|-
|५०. || पत्र : उर्मिला देवीको (२३-२-१९२८) || ५१
|-
|५१. || पत्र : गौरीशंकर भार्गवको (२३-२-१९२८) || ५२
|-
|५२. || पत्र : बी॰ डब्ल्यू॰ टकरको (२४-२-१९२८) || ५२
|-
|५३. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२५-२-१९२८) || ५४
|-
|५४. || पत्र : वाई॰ भास्करको (२५-२-१९२८) || ५५
|-
|५५. || पत्र : जी॰ रामचन्द्रनको (२५-२-१९२८) || ५५
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|५६. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२५-२-१९२८) || ५६
|-
|५७. || गायको कौन छुड़ायेगा? (२६-२-१९२८) || ५६
|-
|५८. || विद्यार्थियोंका सुन्दर सत्याग्रह (२६-२-१९२८) || ५८
|-
|५९. || पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (२६-२-१९२८) || ६०
|-
|६०. || पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (२६-२-१९२८) || ६१
|-
|६१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२६-२-१९२८) || ६२
|-
|६२. || पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२६-२-१९२८) ||६३
|-
|६३. || पत्र : तुलसी मेहरको (२६-२-१९२८) || ६४
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<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{c|पन्द्रह}}</noinclude>{|width=100%
|-
६४. पत्र : एल॰ डब्ल्यू॰ रिचको (२७-२-१९२८) || ६४
६५. पत्र : के॰ बालसुब्रह्मण्यमको (२७-२-१९२८) || ६६
६६. पत्र : के॰ नरसिंह आयंगारको (२७-२-१९२८) || ६७
६७. पत्र : प्रागजी देसाईको (२७-२-१९२८) || ६८
६८. पत्र : रामनारायण चौधरीको (२७-२-१९२८) || ६८
६९. पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२९-२-१९२८से पूर्व) || ६९
७०. पत्र : अब्बास तैयबजीको (२९-२-१९२८) || ७०
७१. पत्र : दुनीचन्दको (२९-२-१९२८) || ७०
७२. पत्र : बी॰ राजाराम पाण्डयनको (२९-२-१९२८) || ७१
७३. पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२९-२-१९२८) || ७२
७४. पत्र : पद्मराज जैनको (२९-२-१९२८) || ७३
७५. पत्र : देवचन्द पारेखको (२९-२-१९२८) || ७४
७६. पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२९-२-१९२८) || ७४
७७. वैदेशिक प्रचार (१-३-१९२८) || ७५
७८. अराजकता बनाम कुशासन (१-३-१९२८) || ७६
७९. टॉल्स्टॉय शताब्दी (१-३-१९२८) || ७९
८०. गोरक्षा सम्बन्धी साहित्यकी सूचि (१-३-१९२८) || ७९
८१. मेरठके समीप खादी (१-३-१९२८) || ८०
८२. पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (२-३-१९२८ या उसके पश्चात्) || ८१
८३. पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३-३-१९२८) || ८१
८५. गुजरातमें खादीकी फेरी (४-३-१९२८) || ८३
८६. काठियावाड़के ढ़ोर (४-२-१९२८) || ८४
८७. बारडोलीमें सत्याग्रह (४-३-१९२८) || ८४
८४. तार : जमनालाल बजाजको (३-३-१९२८) || ८५
८८. पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (४-३-१९२८) || ८६
८९. पत्र : प्रेम महाविद्यालय–न्यासके अध्यक्षको (५-३-१९२८) || ८६
९०. पत्र : ए॰ जे॰ साँडर्सको (५-३-१९२८) || ८८
९१. पत्र : वी॰ एस॰ भास्करनको ( ५-२-१९२८) || ८८
९२. पत्र : आर॰ नोरा ब्रॉकवेको (५-३-१९२८) || ८९
९३. पत्र : रोलेंड हेसको (५-३-१९२८) || ९०
९४. पत्र : डब्ल्यू॰ बी॰ स्टारको (५-३-१९२८) || ९०
९५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (६-३-१९२८) || ९१
९६. युद्धके विरुद्ध युद्ध (८-३-१९२८) || ९१
९७. प्रेम महाविद्यालय (८-३-१९२८) || ९३
९८. टिप्पणियाँ: परम निर्णायक; सफलता चाहनेवालोंके लिए;
(८-३-१९२८) || ९४
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आदेश यादव
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|-
||६४.|| पत्र : एल॰ डब्ल्यू॰ रिचको (२७-२-१९२८) || ६४
|-
||६५. || पत्र : के॰ बालसुब्रह्मण्यमको (२७-२-१९२८) || ६६
|-
||६६. || पत्र : के॰ नरसिंह आयंगारको (२७-२-१९२८) || ६७
|-
||६७. || पत्र : प्रागजी देसाईको (२७-२-१९२८) || ६८
|-
||६८. || पत्र : रामनारायण चौधरीको (२७-२-१९२८) || ६८
|-
||६९. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२९-२-१९२८से पूर्व) || ६९
|-
||७०. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (२९-२-१९२८) || ७०
|-
||७१. || पत्र : दुनीचन्दको (२९-२-१९२८) || ७०
|-
||७२. || पत्र : बी॰ राजाराम पाण्डयनको (२९-२-१९२८) || ७१
|-
||७३. ||पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२९-२-१९२८) || ७२
|-
||७४. || पत्र : पद्मराज जैनको (२९-२-१९२८) || ७३
|-
||७५. || पत्र : देवचन्द पारेखको (२९-२-१९२८) || ७४
|-
||७६. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२९-२-१९२८) || ७४
|-
||७७. || वैदेशिक प्रचार (१-३-१९२८) || ७५
|-
||७८. || अराजकता बनाम कुशासन (१-३-१९२८) || ७६
|-
||७९. || टॉल्स्टॉय शताब्दी (१-३-१९२८) || ७९
|-
||८०. || गोरक्षा सम्बन्धी साहित्यकी सूचि (१-३-१९२८) || ७९
|-
||८१. || मेरठके समीप खादी (१-३-१९२८) || ८०
|-
||८२. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (२-३-१९२८ या उसके पश्चात्) || ८१
|-
||८३. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३-३-१९२८) || ८१
|-
||८५. || गुजरातमें खादीकी फेरी (४-३-१९२८) || ८३
|-
||८६. || काठियावाड़के ढ़ोर (४-२-१९२८) || ८४
|-
||८७. || बारडोलीमें सत्याग्रह (४-३-१९२८) || ८४
|-
||८४. || तार : जमनालाल बजाजको (३-३-१९२८) || ८५
|-
||८८. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (४-३-१९२८) || ८६
|-
||८९. || पत्र : प्रेम महाविद्यालय–न्यासके अध्यक्षको (५-३-१९२८) || ८६
|-
||९०. || पत्र : ए॰ जे॰ साँडर्सको (५-३-१९२८) || ८८
|-
||९१. || पत्र : वी॰ एस॰ भास्करनको ( ५-२-१९२८) || ८८
|-
||९२. || पत्र : आर॰ नोरा ब्रॉकवेको (५-३-१९२८) || ८९
|-
||९३. || पत्र : रोलेंड हेसको (५-३-१९२८) || ९०
|-
||९४. || पत्र : डब्ल्यू॰ बी॰ स्टारको (५-३-१९२८) || ९०
|-
||९५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (६-३-१९२८) || ९१
|-
||९६. || युद्धके विरुद्ध युद्ध (८-३-१९२८) || ९१
|-
||९७. || प्रेम महाविद्यालय (८-३-१९२८) || ९३
|-
||९८. || टिप्पणियाँ: परम निर्णायक; सफलता चाहनेवालोंके लिए;
(८-३-१९२८) || ९४
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||६४.|| पत्र : एल॰ डब्ल्यू॰ रिचको (२७-२-१९२८) || ६४
|-
||६५. || पत्र : के॰ बालसुब्रह्मण्यमको (२७-२-१९२८) || ६६
|-
||६६. || पत्र : के॰ नरसिंह आयंगारको (२७-२-१९२८) || ६७
|-
||६७. || पत्र : प्रागजी देसाईको (२७-२-१९२८) || ६८
|-
||६८. || पत्र : रामनारायण चौधरीको (२७-२-१९२८) || ६८
|-
||६९. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२९-२-१९२८से पूर्व) || ६९
|-
||७०. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (२९-२-१९२८) || ७०
|-
||७१. || पत्र : दुनीचन्दको (२९-२-१९२८) || ७०
|-
||७२. || पत्र : बी॰ राजाराम पाण्डयनको (२९-२-१९२८) || ७१
|-
||७३. ||पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२९-२-१९२८) || ७२
|-
||७४. || पत्र : पद्मराज जैनको (२९-२-१९२८) || ७३
|-
||७५. || पत्र : देवचन्द पारेखको (२९-२-१९२८) || ७४
|-
||७६. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२९-२-१९२८) || ७४
|-
||७७. || वैदेशिक प्रचार (१-३-१९२८) || ७५
|-
||७८. || अराजकता बनाम कुशासन (१-३-१९२८) || ७६
|-
||७९. || टॉल्स्टॉय शताब्दी (१-३-१९२८) || ७९
|-
||८०. || गोरक्षा सम्बन्धी साहित्यकी सूचि (१-३-१९२८) || ७९
|-
||८१. || मेरठके समीप खादी (१-३-१९२८) || ८०
|-
||८२. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (२-३-१९२८ या उसके पश्चात्) || ८१
|-
||८३. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३-३-१९२८) || ८१
|-
||८४. || तार : जमनालाल बजाजको (३-३-१९२८) || ८३
|-
||८५. || गुजरातमें खादीकी फेरी (४-३-१९२८) || ८४
|-
||८६. || काठियावाड़के ढ़ोर (४-२-१९२८) || ८४
|-
||८७. || बारडोलीमें सत्याग्रह (४-३-१९२८) || ८५
|-
||८८. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (४-३-१९२८) || ८६
|-
||८९. || पत्र : प्रेम महाविद्यालय—न्यासके अध्यक्षको (५-३-१९२८) || ८६
|-
||९०. || पत्र : ए॰ जे॰ साँडर्सको (५-३-१९२८) || ८८
|-
||९१. || पत्र : वी॰ एस॰ भास्करनको (५-२-१९२८) || ८८
|-
||९२. || पत्र : आर॰ नोरा ब्रॉकवेको (५-३-१९२८) || ८९
|-
||९३. || पत्र : रोलेंड हेसको (५-३-१९२८) || ९०
|-
||९४. || पत्र : डब्ल्यू॰ बी॰ स्टारको (५-३-१९२८) || ९०
|-
||९५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (६-३-१९२८) || ९१
|-
||९६. || युद्धके विरुद्ध युद्ध (८-३-१९२८) || ९१
|-
||९७. || प्रेम महाविद्यालय (८-३-१९२८) || ९३
|-
||९८. || टिप्पणियाँ : परम निर्णायक; सफलता चाहनेवालोंके लिए; (८-३-१९२८) || ९४
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९९. श्रद्धांजलियाँ (८-३-१९२८) || ९६
|-
१००. बारडोली और सरकार (८-३-१९२८) || ९६
१०१. पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (८-३-१९२८) || ९९
१०२. पत्र : सर डेनियल एम० हेमिल्टनको (९-३-१९२८) || ९९
१०३. पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको (९-२-१९२८) || १००
१०४. पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (९-३-१९२८) || १०१
१०५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-३-१९२८) || १०१
१०६. पत्र : एडा एस० स्कडरको (१०-३-१९२८) || १०२
१०७. पत्र : दुनीचन्दको (१०-३-१९२८) || १०३
१०८. पत्र : भूपेन्द्र नारायण सेनको (१०-३-१९२८) || १०३
१०९. पत्र : वि० च० रायको (१०-३-१९२८) || १०४
११०. पत्र : ए० एस० मण्णाडि नायरको (१०-३-१९२८) || १०५
१११. पत्र : जॉन हेन्स होम्सको (१०-३-१९२८) || १०५
११२. पत्र : रामी गांधीको (१०-३-१९२८) || १०६
११३. टिप्पणियाँ : दिवंगत रमणभाई; लॉर्ड सिन्हा (११-३-१९२८) || ११३
११४. अन्त्यजोंकी हुण्डी कौन सकारेगा ? (११-३-१९२८) || १०८
११५. पत्र : जेन हॉवर्डको (१२-३-१९२८) || १०८
११६. पत्र : बी० डब्ल्यू० टकरको (१२-३-१९२८) || ११०
११७. पत्र : जे० बी० कृपलानीको (१२-३-१९२८) || १११
११८. पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (१२-३-१९२८) || ११२
११९. पत्र : अजमल जामिया कोषके खजांचीको (१३-३-१९२८) || ११३
१२०. हमारी मिलें क्या कर सकती हैं ? (१५-३-१९२८) || ११४
१२१. यह कैसे करें ? (१५-३-१९२८) || ११५
१२२. टिप्पणियाँ : अखिल भारतीय चरखा संघकी सदस्यता; बोधक आँकड़े (१५-३-१९२८) || ११६
१२३. फिर वही चर्चा (१५-३-१९२८) || ११७
१२४. पत्र : सर नीलरतन सरकारको (१६-३-१९२८) || ११९
१२५. पत्र : मधुसूदनदासको (१६-३-१९२८) || ११९
१२६. पत्र : अ० टे० गिडवानीको (१६-३-१९२८) || १२१
१२७. पत्र : वी० एस० भास्करन्को (१६-३-१९२८) || १२१
१२८. पत्र : शंकरको (१६-३-१९२८) || १२२
१२९. पत्र : वायलेटको (१७-३-१९२८) || १२२
१३०. पत्र : एन० डी० भोंसलेको (१७-३-१९२८) || १२३
१३१. तार : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-३-१९२८) || १२४
१३२. पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-३-१९२८) || १२४
१३३. बहिष्कारका शस्त्र ( १८-३-१९२८) || १२५
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||९९.|| श्रद्धांजलियाँ (८-३-१९२८) || ९६
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||१००.|| बारडोली और सरकार (८-३-१९२८) || ९६
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||१०१.|| पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (८-३-१९२८) || ९९
|-
||१०२.|| पत्र : सर डेनियल एम० हेमिल्टनको (९-३-१९२८) || ९९
|-
||१०३.|| पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको (९-२-१९२८) || १००
|-
||१०४.|| पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (९-३-१९२८) || १०१
|-
||१०५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-३-१९२८) || १०१
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|-
||१०७.|| पत्र : दुनीचन्दको (१०-३-१९२८) || १०३
|-
||१०८.|| पत्र : भूपेन्द्र नारायण सेनको (१०-३-१९२८) || १०३
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||१०९.|| पत्र : वि० च० रायको (१०-३-१९२८) || १०४
|-
||११०.|| पत्र : ए० एस० मण्णाडि नायरको (१०-३-१९२८) || १०५
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||१११.|| पत्र : जॉन हेन्स होम्सको (१०-३-१९२८) || १०५
|-
||११२.|| पत्र : रामी गांधीको (१०-३-१९२८) || १०६
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||११३.|| टिप्पणियाँ : दिवंगत रमणभाई; लॉर्ड सिन्हा (११-३-१९२८) || ११३
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||११४.|| अन्त्यजोंकी हुण्डी कौन सकारेगा ? (११-३-१९२८) || १०८
|-
||११५.|| पत्र : जेन हॉवर्डको (१२-३-१९२८) || १०८
|-
||११६.|| पत्र : बी० डब्ल्यू० टकरको (१२-३-१९२८) || ११०
|-
||११७.|| पत्र : जे० बी० कृपलानीको (१२-३-१९२८) || १११
|-
||११८.|| पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (१२-३-१९२८) || ११२
|-
||११९.|| पत्र : अजमल जामिया कोषके खजांचीको (१३-३-१९२८) || ११३
|-
||१२०.|| हमारी मिलें क्या कर सकती हैं ? (१५-३-१९२८) || ११४
|-
||१२१.|| यह कैसे करें ? (१५-३-१९२८) || ११५
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||१२२.|| टिप्पणियाँ : अखिल भारतीय चरखा संघकी सदस्यता; बोधक आँकड़े (१५-३-१९२८) || ११६
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||१२३.|| फिर वही चर्चा (१५-३-१९२८) || ११७
|-
||१२४.|| पत्र : सर नीलरतन सरकारको (१६-३-१९२८) || ११९
|-
||१२५.|| पत्र : मधुसूदनदासको (१६-३-१९२८) || ११९
|-
||१२६.|| पत्र : अ० टे० गिडवानीको (१६-३-१९२८) || १२१
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||१२७.|| पत्र : वी० एस० भास्करन्को (१६-३-१९२८) || १२१
|-
||१२८.|| पत्र : शंकरको (१६-३-१९२८) || १२२
|-
||१२९.|| पत्र : वायलेटको (१७-३-१९२८) || १२२
|-
||१३०.|| पत्र : एन० डी० भोंसलेको (१७-३-१९२८) || १२३
|-
||१३१.|| तार : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-३-१९२८) || १२४
|-
||१३२.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-३-१९२८) || १२४
|-
||१३३.|| बहिष्कारका शस्त्र ( १८-३-१९२८) || १२५
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||९९. || श्रद्धांजलियाँ (८-३-१९२८) || ९६
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||१००. || बारडोली और सरकार (८-३-१९२८) || ९६
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||१०१. || पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (८-३-१९२८) || ९९
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||१०२. || पत्र : सर डेनियल एम॰ हेमिल्टनको (९-३-१९२८) || ९९
|-
||१०३. || पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको (९-२-१९२८) || १००
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||१०४. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (९-३-१९२८) || १०१
|-
||१०५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-३-१९२८) || १०१
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|-
||१०८. || पत्र : भूपेन्द्र नारायण सेनको (१०-३-१९२८) || १०३
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|-
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||१११. || पत्र : जॉन हेन्स होम्सको (१०-३-१९२८) || १०५
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||११२. || पत्र : रामी गांधीको (१०-३-१९२८) || १०६
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||११३. || टिप्पणियाँ : दिवंगत रमणभाई; लॉर्ड सिन्हा (११-३-१९२८) || ११३
|-
||११४. || अन्त्यजोंकी हुण्डी कौन सकारेगा? (११-३-१९२८) || १०८
|-
||११५. || पत्र : जेन हॉवर्डको (१२-३-१९२८) || १०८
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||११६. || पत्र : बी॰ डब्ल्यू॰ टकरको (१२-३-१९२८) || ११०
|-
||११७. || पत्र : जे॰ बी॰ कृपलानीको (१२-३-१९२८) || १११
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||११८. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (१२-३-१९२८) || ११२
|-
||११९. || पत्र : अजमल जामिया कोषके खजांचीको (१३-३-१९२८) || ११३
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||१२०. || हमारी मिलें क्या कर सकती हैं? (१५-३-१९२८) || ११४
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||१२१. || यह कैसे करें? (१५-३-१९२८) || ११५
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||१२२. || टिप्पणियाँ : अखिल भारतीय चरखा संघकी सदस्यता; बोधक आँकड़े (१५-३-१९२८) || ११६
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||१२३. || फिर वही चर्चा (१५-३-१९२८) || ११७
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||१२४. || पत्र : सर नीलरतन सरकारको (१६-३-१९२८) || ११९
|-
||१२५. || पत्र : मधुसूदनदासको (१६-३-१९२८) || ११९
|-
||१२६. || पत्र : अ॰ टे॰ गिडवानीको (१६-३-१९२८) || १२१
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||१२८. || पत्र : शंकरको (१६-३-१९२८) || १२२
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||१३०. || पत्र : एन॰ डी॰ भोंसलेको (१७-३-१९२८) || १२३
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||१३१. || तार : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-३-१९२८) || १२४
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||१३२. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१७-३-१९२८) || १२४
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||१३३. || बहिष्कारका शस्त्र ( १८-३-१९२८) || १२५
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१३४. तार : ना० २० मलकानीको || १२५
१३५. पत्र : जाल खम्भाताको (१९-३-१९२८) || १२६
१३६. पत्र : बहरामजी खम्भाताको (१९-३-१९२८) || १२६
१३७. पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-३-१९२८) || १२७
१३८. पत्र : च० राजगोपालाचारीको (१९-३-१९२८) || १२७
१३९. पत्र : एम० आर० माधव वारियरको (२०-३-१९२८) || १२८
१४०. पत्र : ना० २० मलकानीको (२०-३-१९२८) || १२९
१४१. पत्र : सुरेश बाबूको (२०-३-१९२८) || १३०
१४२. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२०-३-१९२८) || १३१
१४३. सन्देश (२०-३-१९२८) || १३१
१४४. पत्र : मार्सेल केपीको (२०-३-१९२८) || १३२
१४५. पत्र: वि० च० रायको (२०-३-१९२८) || १३२
१४६. पत्र : जाकिर हुसेनको (२०-३-१९२८) || १३३
१४७. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२०-३-१९२८) || १३४
१४८. पत्र : राधा गांधीको (२०-३-१९२८) || १३४
१४९. भेंट : एलिस शैलेकसे (२०-३-१९२८) || १३५
१५०. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिसे (२०-३-१९२८) || १३९
१५१. पत्र : फेन्ज रोनाको (२१-३-१९२८) || १३९
१५२. पत्र : टी० डि० मन्जीयरलीको (२१-३-१९२८) || १४०
१५३. पत्र : जौजेफ ए० ब्रॉनको (२१-३-१९२८) || १४०
१५४. पत्र : पूंजाभाईको (२१-३-१९२८) || १४१
१५५. टिप्पणियाँ: चरखा एक प्रमाणित आवश्यकता; क्या यह सच हो
सकता हैं? ( २२-३-१९२८) || १४१
१५६. विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न (२२-३-१९२८) || १४४
१५७. मतभेद (२२-३-१९२८) || १४६
१५८. फीजी फीजीवालोंके लिए (२२-३-१९२८) || १४८
१५९. पत्र : पी० के० मैथ्यूको (२२-३-१९२८) || १४८
१६०. वृद्ध-विवाह बनाम बाल-विवाह ( २५-३-१९२८) || १४९
१६१. पत्र : रिचर्ड बी० ग्रेगको (२६-३-१९२८) || १५०
१६२. पत्र : के० एस० आचार्यको (२६-३-१९२८) || १५१
१६३. पत्र : एन० राम रावको (२६-३-१९२८) || १५२
१६४. पत्र : एच० एम० पेरीराको (२६-३-१९२८) || १५२
१६५. पत्र: पी० एस० किचूलको (२६-३-१९२८) || १५३
१६६. पत्र : च० राजगोपालाचारीको (२६-३-१९२८) || १५३
१६७. पत्र : प्रताप एस० पण्डितको (२६-३-१९२८) || १५४
१६८. पत्र : एम० पिगॉटको (२७-३-१९२८) || १५५
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||१३४.|| तार : ना० २० मलकानीको || १२५
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||१३५.|| पत्र : जाल खम्भाताको (१९-३-१९२८) || १२६
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||१३६.|| पत्र : बहरामजी खम्भाताको (१९-३-१९२८) || १२६
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||१३७.|| पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-३-१९२८) || १२७
|-
||१३८.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (१९-३-१९२८) || १२७
|-
||१३९.|| पत्र : एम० आर० माधव वारियरको (२०-३-१९२८) || १२८
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||१४०.|| पत्र : ना० २० मलकानीको (२०-३-१९२८) || १२९
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||१४१.|| पत्र : सुरेश बाबूको (२०-३-१९२८) || १३०
|-
||१४२.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२०-३-१९२८) || १३१
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||१४३.|| सन्देश (२०-३-१९२८) || १३१
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||१४४.|| पत्र : मार्सेल केपीको (२०-३-१९२८) || १३२
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||१४५.|| पत्र: वि० च० रायको (२०-३-१९२८) || १३२
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||१४६.|| पत्र : जाकिर हुसेनको (२०-३-१९२८) || १३३
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||१४७.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२०-३-१९२८) || १३४
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||१४८.|| पत्र : राधा गांधीको (२०-३-१९२८) || १३४
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||१४९.|| भेंट : एलिस शैलेकसे (२०-३-१९२८) || १३५
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||१५०.|| भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिसे (२०-३-१९२८) || १३९
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||१५१.|| पत्र : फेन्ज रोनाको (२१-३-१९२८) || १३९
|-
||१५२.|| पत्र : टी० डि० मन्जीयरलीको (२१-३-१९२८) || १४०
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||१५३.|| पत्र : जौजेफ ए० ब्रॉनको (२१-३-१९२८) || १४०
|-
||१५४.|| पत्र : पूंजाभाईको (२१-३-१९२८) || १४१
|-
||१५५.|| टिप्पणियाँ: चरखा एक प्रमाणित आवश्यकता; क्या यह सच हो
सकता हैं? ( २२-३-१९२८) || १४१
|-
||१५६.|| विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न (२२-३-१९२८) || १४४
|-
||१५७.|| मतभेद (२२-३-१९२८) || १४६
|-
||१५८.|| फीजी फीजीवालोंके लिए (२२-३-१९२८) || १४८
|-
||१५९.|| पत्र : पी० के० मैथ्यूको (२२-३-१९२८) || १४८
|-
||१६०.|| वृद्ध-विवाह बनाम बाल-विवाह ( २५-३-१९२८) || १४९
|-
||१६१.|| पत्र : रिचर्ड बी० ग्रेगको (२६-३-१९२८) || १५०
|-
||१६२.|| पत्र : के० एस० आचार्यको (२६-३-१९२८) || १५१
|-
||१६३.|| पत्र : एन० राम रावको (२६-३-१९२८) || १५२
|-
||१६४.|| पत्र : एच० एम० पेरीराको (२६-३-१९२८) || १५२
|-
||१६५.|| पत्र: पी० एस० किचूलको (२६-३-१९२८) || १५३
|-
||१६६.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (२६-३-१९२८) || १५३
|-
||१६७.|| पत्र : प्रताप एस० पण्डितको (२६-३-१९२८) || १५४
|-
||१६८.|| पत्र : एम० पिगॉटको (२७-३-१९२८) || १५५
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आदेश यादव
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|-
||१३४. || तार : ना॰ र॰ मलकानीको || १२५
|-
||१३५. || पत्र : जाल खम्भाताको (१९-३-१९२८) || १२६
|-
||१३६. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (१९-३-१९२८) || १२६
|-
||१३७. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-३-१९२८) || १२७
|-
||१३८. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१९-३-१९२८) || १२७
|-
||१३९. || पत्र : एम॰ आर॰ माधव वारियरको (२०-३-१९२८) || १२८
|-
||१४०. || पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (२०-३-१९२८) || १२९
|-
||१४१. || पत्र : सुरेश बाबूको (२०-३-१९२८) || १३०
|-
||१४२. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२०-३-१९२८) || १३१
|-
||१४३. || सन्देश (२०-३-१९२८) || १३१
|-
||१४४. || पत्र : मार्सेल केपीको (२०-३-१९२८) || १३२
|-
||१४५. || पत्र: वि॰ च॰ रायको (२०-३-१९२८) || १३२
|-
||१४६. || पत्र : जाकिर हुसेनको (२०-३-१९२८) || १३३
|-
||१४७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२०-३-१९२८) || १३४
|-
||१४८. || पत्र : राधा गांधीको (२०-३-१९२८) || १३४
|-
||१४९. || भेंट : एलिस शैलेकसे (२०-३-१९२८) || १३५
|-
||१५०. || भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिसे (२०-३-१९२८) || १३९
|-
||१५१. || पत्र : फेन्ज रोनाको (२१-३-१९२८) || १३९
|-
||१५२. || पत्र : टी॰ डि॰ मन्जीयरलीको (२१-३-१९२८) || १४०
|-
||१५३. || पत्र : जौजेफ ए॰ ब्रॉनको (२१-३-१९२८) || १४०
|-
||१५४. || पत्र : पूंजाभाईको (२१-३-१९२८) || १४१
|-
||१५५. || टिप्पणियाँ: चरखा एक प्रमाणित आवश्यकता; क्या यह सच हो सकता हैं? (२२-३-१९२८) || १४१
|-
||१५६. || विदेशी वस्त्र बहिष्कार : कुछ प्रश्न (२२-३-१९२८) || १४४
|-
||१५७. || मतभेद (२२-३-१९२८) || १४६
|-
||१५८. || फीजी फीजीवालोंके लिए (२२-३-१९२८) || १४८
|-
||१५९. || पत्र : पी॰ के॰ मैथ्यूको (२२-३-१९२८) || १४८
|-
||१६०. || वृद्ध–विवाह बनाम बाल–विवाह ( २५-३-१९२८) || १४९
|-
||१६१. || पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको (२६-३-१९२८) || १५०
|-
||१६२. || पत्र : के॰ एस॰ आचार्यको (२६-३-१९२८) || १५१
|-
||१६३. || पत्र : एन॰ राम रावको (२६-३-१९२८) || १५२
|-
||१६४. || पत्र : एच॰ एम॰ पेरीराको (२६-३-१९२८) || १५२
|-
||१६५. || पत्र: पी॰ एस॰ किचूलको (२६-३-१९२८) || १५३
|-
||१६६. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (२६-३-१९२८) || १५३
|-
||१६७. || पत्र : प्रताप एस॰ पण्डितको (२६-३-१९२८) || १५४
|-
||१६८. || पत्र : एम॰ पिगॉटको (२७-३-१९२८) || १५५
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आदेश यादव
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||१६९.|| मोतीलाल नेहरूको (२७-३-१९२८) || १५५
|-
||१७०.|| भाषण : हरिजनोंकी सभा में (२७-३-१९२८) || १५६
|-
||१७१.|| पत्र : टी० के० माधवनको (२८-३-१९२८) || १५८
|-
||१७२.|| पत्र : एस० देवनदास नारायणदासको (२८-३-१९२८) || १५८
|-
||१७३.|| पत्र : रामी गांधीको (२८-३-१९२८) || १५९
|-
||१७४.|| पत्र : एच० एन० वेनको (२८-३-१९२८) || १६०
|-
||१७५.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (२८-३-१९२८) || १६०
|-
||१७६.|| पत्र : अरुलमणि पिचमुथूको (२८-३-१९२८) || १६२
|-
||१७७.|| पत्र : सैम हिगिनबाँटमको (२८-३-१९२८) ||१६२
|-
||१७८.|| जाति विद्वेषकी जीत (२९-३-१९२८)|| १६३
|-
||१७९.|| आतंकवादका सिद्धान्त (२९-३-१९२८) ||१६३
|-
||१८०.|| राष्ट्रीय सप्ताह (२९-३-१९२८) ||१६४
|-
||१८१.|| टिप्पणियाँ : खास राष्ट्रीय सप्ताहके लिए; बंगालमें खादीके सिलसिले में दौरा; बहिष्कार और विद्यार्थी; मेकॉलेका सपना; संघर्ष के बीच शान्ति; (२९-३-१९२८) ||१६६
|-
||१८२.|| उपवासकी महिमा (२९-३-१९२८) ||१७०
|-
||१८३.|| दो संशोधन (२९-३-१९२८) ||१७१
|-
||१८४.|| पत्र: उर्मिला देवीको (३०-३-१९२८) ||१७१
|-
||१८५.|| पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके सचिवको (३०-३-१९२८) ||१७२
|-
||१८६.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (३०-३-१९२८) ||१७३
|-
||१८७.|| पत्र : ना० र० मलकानीको (३०-३-१९२८) ||१७३
|-
||१८८.|| पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (३०-३-१९२८) ||१७४
|-
||१८९.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (३०-३-१९२८) ||१७५
|-
||१९०.|| मोक्षदाता राम ||१७६
|-
||१९१.|| भाषण विद्यार्थियों और अध्यापकों की सभा में ( ३१-३-१९२८) ||१७८
|-
||१९२.|| पत्र : सुभाषचन्द्र बोसको (३१-३-१९२८) ||१७९
|-
||१९३.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (३१-३-१९२८) ||१८०
|-
||१९४.|| पत्र : राय हरेन्द्रनाथको (३१-३-१९२८) ||१८१
|-
||१९५.|| सत्याग्रहियों सावधान (१-४-१९२८) ||१८२
|-
||१९६.|| राष्ट्रीय सप्ताह (१-४-१९२८) ||१८३
|-
||१९७.|| टिप्पणियाँ : उड़ीसा की दुर्दशा; सस्ती खादी; (१-४-१९२८) ||१८४
|-
||१९८.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१-४-१९२८) ||१८५
|-
||१९९.|| पत्र: उत्तम भिक्खुको (१-४-१९२८) ||१८५
|-
||२००.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१-४-१९२८) ||१८६
|-
||२०१.|| पत्र : एच० एम० अहमदको (१-४-१९२८) ||१८७
|-
||२०२.|| पत्र : शुएब कुरैशीको (१-४-१९२८) ||१८७
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र:गंगाबहन वैद्यको|७}}</noinclude>देखता हूँ कि तुम्हारा वर्ग बढ़ रहा है। काकासाहबकी बात मुझे तो पसन्द आई। सच्ची सेवा करनेवाली बहनें आश्रममें तैयार नहीं होंगी, तो कहाँ होंगी?इसका जवाब तुम्हींको देना है। हम लोगोंका स्वास्थ्य इस लायक नहीं है,न हममें इतनी आत्मशक्ति या अक्षरज्ञान ही है। परन्तु हममें शुद्ध भक्ति हो, तो यह सब अपने आप आ जायेगा। भक्तिका अर्थ है श्रद्धा, ईश्वरके प्रति और अपने प्रति। यह श्रद्धा ही हमसे सारे त्याग कराती है। त्यागके लिए त्याग करना मुश्किल होता है, परन्तु सेवाके निमित्त त्याग आसान हो जाता है। कोई माता यों ही जान-बूझकर गीलेमें नहीं सोती, मगर अपने बच्चेको सूखेमें सुलाने के लिए खुश होकर गीलेमें सो रहती है।
मैं देख रहा हूँ कि इस वर्ष लम्बे समयतक में आश्रममें नहीं रह सकूंगा। इसका मुझे दुःख है, किन्तु हमें तो दुःखमें ही सुख मानना है। खादीके कामके लिए मुझे भ्रमण करना ही पड़ेगा। लाखों लोगोंको खादीका मन्त्र इसी तरह घूमकर ही दिया जा सकता है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी० एन० ३६३६) की फोटो नकलसे।
{{C|{{larger|'''७.पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|मौनवार, पौष वदी ६ [२४ जनवरी १९२७]|}}<ref>गंगाबहनकी साप्ताहिक चिट्ठीके उल्लेखसे लगता है कि यह पत्र १९२७ में लिखा गया होगा, क्योंकि गंगाबद्दन दिसम्बर, १९२६ में आश्रमकी महिलाओंकी प्रधान चुनी गईं थीं।<\ref>
{{Left|चि० गंगाबहन,}}
इस बार तुम्हारी साप्ताहिक चिट्ठी अभीतक नहीं मिली है।
तुम्हें अधीर तो होना ही नहीं चाहिए, लोभ भी नहीं करना चाहिए। बहुत काम करनेका लोभ कुछ भी नहीं करने देता। अतः थोड़ा किन्तु यथाशक्ति पूरा काम करनेकी वृत्ति रखनी चाहिए। यह इसलिए लिख रहा हूँ कि काकासाहब तुम सभी बहनोंको खूब प्रोत्साहित कर रहे हैं। उनका प्रोत्साहन देना मुझे अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि इस प्रोत्साहनके परिणामस्वरूप यदि हम फौरन कुछ करके दिखा सकें तो अच्छा होगा। किन्तु काम जल्दी तो तभी करके दिखाया जा सकता है जब हम पहले अपनी सामर्थ्यको आँककर, जितना हमारे बूतेका है, उतना ही काम अपने जिम्मे लें।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८७०२) से।}}<br>सौजन्य : गंगाबहन वैद्य|2em}}
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मैं देख रहा हूँ कि इस वर्ष लम्बे समयतक में आश्रममें नहीं रह सकूंगा। इसका मुझे दुःख है, किन्तु हमें तो दुःखमें ही सुख मानना है। खादीके कामके लिए मुझे भ्रमण करना ही पड़ेगा। लाखों लोगोंको खादीका मन्त्र इसी तरह घूमकर ही दिया जा सकता है।
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इस बार तुम्हारी साप्ताहिक चिट्ठी अभीतक नहीं मिली है।
तुम्हें अधीर तो होना ही नहीं चाहिए, लोभ भी नहीं करना चाहिए। बहुत काम करनेका लोभ कुछ भी नहीं करने देता। अतः थोड़ा किन्तु यथाशक्ति पूरा काम करनेकी वृत्ति रखनी चाहिए। यह इसलिए लिख रहा हूँ कि काकासाहब तुम सभी बहनोंको खूब प्रोत्साहित कर रहे हैं। उनका प्रोत्साहन देना मुझे अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि इस प्रोत्साहनके परिणामस्वरूप यदि हम फौरन कुछ करके दिखा सकें तो अच्छा होगा। किन्तु काम जल्दी तो तभी करके दिखाया जा सकता है जब हम पहले अपनी सामर्थ्यको आँककर, जितना हमारे बूतेका है, उतना ही काम अपने जिम्मे लें।
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रितु कुमारी साव
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मैं देख रहा हूँ कि इस वर्ष लम्बे समयतक में आश्रममें नहीं रह सकूंगा। इसका मुझे दुःख है, किन्तु हमें तो दुःखमें ही सुख मानना है। खादीके कामके लिए मुझे भ्रमण करना ही पड़ेगा। लाखों लोगोंको खादीका मन्त्र इसी तरह घूमकर ही दिया जा सकता है।
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इस बार तुम्हारी साप्ताहिक चिट्ठी अभीतक नहीं मिली है।
तुम्हें अधीर तो होना ही नहीं चाहिए, लोभ भी नहीं करना चाहिए। बहुत काम करनेका लोभ कुछ भी नहीं करने देता। अतः थोड़ा किन्तु यथाशक्ति पूरा काम करनेकी वृत्ति रखनी चाहिए। यह इसलिए लिख रहा हूँ कि काकासाहब तुम सभी बहनोंको खूब प्रोत्साहित कर रहे हैं। उनका प्रोत्साहन देना मुझे अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि इस प्रोत्साहनके परिणामस्वरूप यदि हम फौरन कुछ करके दिखा सकें तो अच्छा होगा। किन्तु काम जल्दी तो तभी करके दिखाया जा सकता है जब हम पहले अपनी सामर्थ्यको आँककर, जितना हमारे बूतेका है, उतना ही काम अपने जिम्मे लें।
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रितु कुमारी साव
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इस बार तुम्हारी साप्ताहिक चिट्ठी अभीतक नहीं मिली है।
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c||८.'''पत्र:मगनलाल गांधीको'''|}}
{{right|बेतिया}}<brमौनवार [ २४ जनवरी, १९२७]><ref>पत्रके वेतियासे लिखे जाने और रुखीकी बीमारीके उल्लेखसे लगता है कि पत्र इसी वर्ष लिखा गया होगा।</ref>
{{left|चि० मगनलाल,}}
बालकृष्णका पत्र इसके साथ भेज रहा हूँ। उसके उत्तरमें लिखा गया मेरा पत्र भी संलग्न है। पत्र उसके पतेपर भेज देना।
रुखीके बारेमें मैंने डाक्टरको लिखा है।
ऐसा लगता है कि हमें आश्रममें 'वाटरवर्क्स' का प्रबन्ध करना पड़ेगा। नदीमें काफी गहरी खुदाई करके पानीको ऊपर लाना पड़ेगा। किसी विशेषज्ञको बुलाकर तखमीना लगवाना। वल्लभभाईसे मिलना। [आश्रममें] इतनी अधिक बीमारी रहती है,उसका कारण पानी ही हो सकता है न? यदि हम बहुत अधिक सावधानी बरतकर ही स्वस्थ रह सकते हों तो वह भी तो ठीक नहीं है। इस सम्बन्धमें विचार करना। श्री और श्रीमती लॉरेंसके वहाँ पहुँचनेपर तुमने उनकी अच्छी तरह देखभाल की होगी। मेरे विशेष आग्रहपर ही वे लोग वहाँ पहुँचे थे। ऐसा लगता है कि सकलातवाला भी वहाँ पहुँचे थे। मैंने सुब्बैयासे मीराबहनका आखरी पत्र तुम्हें भेज देनेके लिए कह दिया था। पत्र तुम्हें मिल गया होगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|[पुनश्च:]}}
अब तुलसी मेहर वहाँ पहुँचेगा। फिलहाल तो वह मेरे साथ ही घूम रहा है।
{{left|गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८६९३) से।}}<br
सौजन्य: राधाबहन चौधरी><noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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{{left|चि० मगनलाल,}}
बालकृष्णका पत्र इसके साथ भेज रहा हूँ। उसके उत्तरमें लिखा गया मेरा पत्र भी संलग्न है। पत्र उसके पतेपर भेज देना।
रुखीके बारेमें मैंने डाक्टरको लिखा है।
ऐसा लगता है कि हमें आश्रममें 'वाटरवर्क्स' का प्रबन्ध करना पड़ेगा। नदीमें काफी गहरी खुदाई करके पानीको ऊपर लाना पड़ेगा। किसी विशेषज्ञको बुलाकर तखमीना लगवाना। वल्लभभाईसे मिलना। [आश्रममें] इतनी अधिक बीमारी रहती है,उसका कारण पानी ही हो सकता है न? यदि हम बहुत अधिक सावधानी बरतकर ही स्वस्थ रह सकते हों तो वह भी तो ठीक नहीं है। इस सम्बन्धमें विचार करना। श्री और श्रीमती लॉरेंसके वहाँ पहुँचनेपर तुमने उनकी अच्छी तरह देखभाल की होगी। मेरे विशेष आग्रहपर ही वे लोग वहाँ पहुँचे थे। ऐसा लगता है कि सकलातवाला भी वहाँ पहुँचे थे। मैंने सुब्बैयासे मीराबहनका आखरी पत्र तुम्हें भेज देनेके लिए कह दिया था। पत्र तुम्हें मिल गया होगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|[पुनश्च:]}}
अब तुलसी मेहर वहाँ पहुँचेगा। फिलहाल तो वह मेरे साथ ही घूम रहा है।
{{left|गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८६९३) से।}}<br
सौजन्य: राधाबहन चौधरी><noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c||८.'''पत्र:मगनलाल गांधीको'''|}}
{{right|बेतिया}}<br>मौनवार [ २४ जनवरी, १९२७]<ref>पत्रके वेतियासे लिखे जाने और रुखीकी बीमारीके उल्लेखसे लगता है कि पत्र इसी वर्ष लिखा गया होगा।</ref>}}
{{left|चि० मगनलाल,}}
बालकृष्णका पत्र इसके साथ भेज रहा हूँ। उसके उत्तरमें लिखा गया मेरा पत्र भी संलग्न है। पत्र उसके पतेपर भेज देना।
रुखीके बारेमें मैंने डाक्टरको लिखा है।
ऐसा लगता है कि हमें आश्रममें 'वाटरवर्क्स' का प्रबन्ध करना पड़ेगा। नदीमें काफी गहरी खुदाई करके पानीको ऊपर लाना पड़ेगा। किसी विशेषज्ञको बुलाकर तखमीना लगवाना। वल्लभभाईसे मिलना। [आश्रममें] इतनी अधिक बीमारी रहती है,उसका कारण पानी ही हो सकता है न? यदि हम बहुत अधिक सावधानी बरतकर ही स्वस्थ रह सकते हों तो वह भी तो ठीक नहीं है। इस सम्बन्धमें विचार करना। श्री और श्रीमती लॉरेंसके वहाँ पहुँचनेपर तुमने उनकी अच्छी तरह देखभाल की होगी। मेरे विशेष आग्रहपर ही वे लोग वहाँ पहुँचे थे। ऐसा लगता है कि सकलातवाला भी वहाँ पहुँचे थे। मैंने सुब्बैयासे मीराबहनका आखरी पत्र तुम्हें भेज देनेके लिए कह दिया था। पत्र तुम्हें मिल गया होगा।
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रितु कुमारी साव
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रुखीके बारेमें मैंने डाक्टरको लिखा है।
ऐसा लगता है कि हमें आश्रममें 'वाटरवर्क्स' का प्रबन्ध करना पड़ेगा। नदीमें काफी गहरी खुदाई करके पानीको ऊपर लाना पड़ेगा। किसी विशेषज्ञको बुलाकर तखमीना लगवाना। वल्लभभाईसे मिलना। [आश्रममें] इतनी अधिक बीमारी रहती है,उसका कारण पानी ही हो सकता है न? यदि हम बहुत अधिक सावधानी बरतकर ही स्वस्थ रह सकते हों तो वह भी तो ठीक नहीं है। इस सम्बन्धमें विचार करना। श्री और श्रीमती लॉरेंसके वहाँ पहुँचनेपर तुमने उनकी अच्छी तरह देखभाल की होगी। मेरे विशेष आग्रहपर ही वे लोग वहाँ पहुँचे थे। ऐसा लगता है कि सकलातवाला भी वहाँ पहुँचे थे। मैंने सुब्बैयासे मीराबहनका आखरी पत्र तुम्हें भेज देनेके लिए कह दिया था। पत्र तुम्हें मिल गया होगा।
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ऐसा लगता है कि हमें आश्रममें 'वाटरवर्क्स' का प्रबन्ध करना पड़ेगा। नदीमें काफी गहरी खुदाई करके पानीको ऊपर लाना पड़ेगा। किसी विशेषज्ञको बुलाकर तखमीना लगवाना। वल्लभभाईसे मिलना। [आश्रममें] इतनी अधिक बीमारी रहती है,उसका कारण पानी ही हो सकता है न? यदि हम बहुत अधिक सावधानी बरतकर ही स्वस्थ रह सकते हों तो वह भी तो ठीक नहीं है। इस सम्बन्धमें विचार करना। श्री और श्रीमती लॉरेंसके वहाँ पहुँचनेपर तुमने उनकी अच्छी तरह देखभाल की होगी। मेरे विशेष आग्रहपर ही वे लोग वहाँ पहुँचे थे। ऐसा लगता है कि सकलातवाला भी वहाँ पहुँचे थे। मैंने सुब्बैयासे मीराबहनका आखरी पत्र तुम्हें भेज देनेके लिए कह दिया था। पत्र तुम्हें मिल गया होगा।
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रितु कुमारी साव
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{{right|बेतिया<br> सोमवार, पौष कृष्ण ६ [२४ जनवरी, १९२७]}}
{{left|भाई घनश्यामदासजी }}
आपका पत्र मीला है।
रु० ८००० जमनालालजीको भेजे हैं। वह चर्खासंघके लिये समजता हुं। शुद्धिके बारेमें में खूब विचार कर रहा हूं। जिस ढंगसे आज शुद्धि की जाती है वह धार्मिक नहीं है। जो बलात्कारसे या अनजानपनमें विधर्मी हो जाते हैं उनकी शुद्धि क्या करनी थी? वे तो शुद्ध हि हैं? केवल हिंदु धर्मीकी उदारताका प्रश्न है। हमारा आंदोलन स्त्रीस्ती, इस्लामी शुद्धिके विरोधमें होना चाहिये। इसमें विचार परिवर्तनकी हि आवश्यकता है। यदि हम मानें कि शुद्धिकी प्रणाली दोषित है तो हम क्यों उसकी
नकल करें? हमपर आक्रमण हो जाय उसको दूर करनेके लिये शुद्ध इलाज ढूंढकर हमारे उसको ही उपयोगमें लाना चाहीये। शुद्धिके आदोलनसे हम गंदगीकी वृद्धि करते हैं, और हिंदुधर्मीओमें जो सुधारणा होनी चाहिये उसको रोकते है। आजकलके आंदोलनमें मैं विचारका अत्यंताभाव देख रहा हुं। जब आपको कुछ स्थिरता मीले तब इस बारेमें हम शांतिसे विचार कर सकते हैं। मैं यह नहीं चाहता कि मेरे हि कहनेसे एक भी कार्य रोक दीया जावे। उससे हमको फायदा नहि हो सकता है। जो मैं सोच रहा हुं वह स्वतंत्रतया यथार्थ है ऐसा प्रतीत हो जाय तब हि और उतना हि परिवर्तन होना उचित है। इसलीये में धैर्य और खामोशी धारण कर रहा हूं। मेरी सलाह है कि जब आपको धारासभाओंम से फुरसत मीले तब मेरे भ्रमणमें मेरे साथ चंद दिनोंके लीये हो जाय। फेरबरवारी पहली तारीखको में गोंदीया जाते हुए कलकत्तेमें हुंगा।
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नकल करें? हमपर आक्रमण हो जाय उसको दूर करनेके लिये शुद्ध इलाज ढूंढकर हमारे उसको ही उपयोगमें लाना चाहीये। शुद्धिके आदोलनसे हम गंदगीकी वृद्धि करते हैं, और हिंदुधर्मीओमें जो सुधारणा होनी चाहिये उसको रोकते है। आजकलके आंदोलनमें मैं विचारका अत्यंताभाव देख रहा हुं। जब आपको कुछ स्थिरता मीले तब इस बारेमें हम शांतिसे विचार कर सकते हैं। मैं यह नहीं चाहता कि मेरे हि कहनेसे एक भी कार्य रोक दीया जावे। उससे हमको फायदा नहि हो सकता है। जो मैं सोच रहा हुं वह स्वतंत्रतया यथार्थ है ऐसा प्रतीत हो जाय तब हि और उतना हि परिवर्तन होना उचित है। इसलीये में धैर्य और खामोशी धारण कर रहा हूं। मेरी सलाह है कि जब आपको धारासभाओंम से फुरसत मीले तब मेरे भ्रमणमें मेरे साथ चंद दिनोंके लीये हो जाय। फेरबरवारी पहली तारीखको में गोंदीया जाते हुए कलकत्तेमें हुंगा।
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नकल करें? हमपर आक्रमण हो जाय उसको दूर करनेके लिये शुद्ध इलाज ढूंढकर हमारे उसको ही उपयोगमें लाना चाहीये। शुद्धिके आदोलनसे हम गंदगीकी वृद्धि करते हैं, और हिंदुधर्मीओमें जो सुधारणा होनी चाहिये उसको रोकते है। आजकलके आंदोलनमें मैं विचारका अत्यंताभाव देख रहा हुं। जब आपको कुछ स्थिरता मीले तब इस बारेमें हम शांतिसे विचार कर सकते हैं। मैं यह नहीं चाहता कि मेरे हि कहनेसे एक भी कार्य रोक दीया जावे। उससे हमको फायदा नहि हो सकता है। जो मैं सोच रहा हुं वह स्वतंत्रतया यथार्थ है ऐसा प्रतीत हो जाय तब हि और उतना हि परिवर्तन होना उचित है। इसलीये में धैर्य और खामोशी धारण कर रहा हूं। मेरी सलाह है कि जब आपको धारासभाओंम से फुरसत मीले तब मेरे भ्रमणमें मेरे साथ चंद दिनोंके लीये हो जाय। फेरबरवारी पहली तारीखको में गोंदीया जाते हुए कलकत्तेमें हुंगा।
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रितु कुमारी साव
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रितु कुमारी साव
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आपका पत्र मीला है।
रु० ८००० जमनालालजीको भेजे हैं। वह चर्खासंघके लिये समजता हुं। शुद्धिके बारेमें में खूब विचार कर रहा हूं। जिस ढंगसे आज शुद्धि की जाती है वह धार्मिक नहीं है। जो बलात्कारसे या अनजानपनमें विधर्मी हो जाते हैं उनकी शुद्धि क्या करनी थी? वे तो शुद्ध हि हैं? केवल हिंदु धर्मीकी उदारताका प्रश्न है। हमारा आंदोलन स्त्रीस्ती, इस्लामी शुद्धिके विरोधमें होना चाहिये। इसमें विचार परिवर्तनकी हि आवश्यकता है। यदि हम मानें कि शुद्धिकी प्रणाली दोषित है तो हम क्यों उसकी
नकल करें? हमपर आक्रमण हो जाय उसको दूर करनेके लिये शुद्ध इलाज ढूंढकर हमारे उसको ही उपयोगमें लाना चाहीये। शुद्धिके आदोलनसे हम गंदगीकी वृद्धि करते हैं, और हिंदुधर्मीओमें जो सुधारणा होनी चाहिये उसको रोकते है। आजकलके आंदोलनमें मैं विचारका अत्यंताभाव देख रहा हुं। जब आपको कुछ स्थिरता मीले तब इस बारेमें हम शांतिसे विचार कर सकते हैं। मैं यह नहीं चाहता कि मेरे हि कहनेसे एक भी कार्य रोक दीया जावे। उससे हमको फायदा नहि हो सकता है। जो मैं सोच रहा हुं वह स्वतंत्रतया यथार्थ है ऐसा प्रतीत हो जाय तब हि और उतना हि परिवर्तन होना उचित है। इसलीये में धैर्य और खामोशी धारण कर रहा हूं। मेरी सलाह है कि जब आपको धारासभाओंम से फुरसत मीले तब मेरे भ्रमणमें मेरे साथ चंद दिनोंके लीये हो जाय। फेरबरवारी पहली तारीखको में गोंदीया जाते हुए कलकत्तेमें हुंगा।
{{Right|आपका,<br>larger'''मोहनदास'''}}
{{left|मूल (सी० डब्ल्यू० ६१४३) से। <br>सौजन्य: घनश्यामदास बिड़ला}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/४८
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|'''१०.प्रश्नोंके उत्तर'''}}
{{right|[२४ जनवरी, १९२७ के पश्चात्।}}<ref>२४ जनवरी, १९२७को विधानसभाका उद्घाटन करते समय वाइसराय द्वारा दिए गए भाषणके उल्लेखसे; वाइसरायने कहा था कि भारत सरकार भारतीय सेनाको टुकड़ियाँ चीन भेजनेको राजी हो गई है। देखिए "हमारी बेबसी, ३-२-१९२७ भी।<ref/>
प्रश्न: (१) '''भारतीय सेनाकी टुकड़ियाँ चीन भेजनेकी भारत सरकारको नीतिके बारेमें आपके क्या विचार हैं?'''
उत्तर: आम जनताकी राय जाननेवाले नेताओंसे सलाह लिये बिना सरकारका भारतीय सेनाको चीन भेज देना अनुचित और बहुत ही आपत्तिजनक काम है।
'''(२) एसेम्बली में वाइसरयाके हालमें दिये गये भाषणके सम्बन्धमें आपकी क्या राय है?'''
वह बेहद निराशाजनक था।
'''(३) आप संवैधानिक स्वायत्त शासनमें विश्वास करते हैं या स्वतन्त्र स्वराज्यमें?'''
मैं ऐसे स्वराज्यमें विश्वास करता हूँ, जिसमें यदि भारत चाहे तो कभी भी स्वाधीन हो सकता हो।
'''(४) बनारसके अपने हालके भाषणमें<ref>देखिए खण्ड ३२, ५४ ५३६।<ref/< स्वराज्यकी परिभाषा रामराज्य कहकर करनेमें आपका क्या उद्देश्य था?'''
मैंने स्वराज्यको, जैसा कि मैं बहुधा कहता हूँ रामराज्यके जैसा कहा, क्योंकि वह सत्य और अहिंसा, दूसरे शब्दोंमें विश्व धर्मपर आधारित एक नैतिक राज्यकी
सचित्र व्याख्या है।
'''(५) श्रद्धानन्द कोषके लिए १० लाख रुपये एकत्रित करनेकी आपकी अपीलसे मुसलमानोंके मनमें चिन्ता और सन्देह पैदा हो गया है।'''
जो लोग शुद्धि, तबलीग या धर्म-परिवर्तनमें विश्वास रखते हैं, वे ऐसे प्रचार-कार्यके लिए तबतक कोषकी अपील करनेका हक रखते हैं, जबतक उनका प्रचार
कार्य सच्चा और विशुद्ध है। कोषके लिए अपील करनेमें मेरे साथ देनेका प्रयोजन अस्पृश्यता निवारण कार्यतक सीमित था, और उन कारणोंसे जो अपीलपर 'यंग इंडिया'में लिखे अपने लेखमें<ref>देखिए खण्ड ३२, १४ ५१२-१३।<ref/<
मैंने व्यक्त किये हैं; कृपया उन्हें देखिए।
सैयद जहीरुल हक <br>बाढ़ (जिला पटना)
{{left|अंग्रेजी (एस० एन० ११८२६) की फोटो नकलसे।}}<noinclude></noinclude>
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प्रश्न: (१) '''भारतीय सेनाकी टुकड़ियाँ चीन भेजनेकी भारत सरकारको नीतिके बारेमें आपके क्या विचार हैं?'''
उत्तर: आम जनताकी राय जाननेवाले नेताओंसे सलाह लिये बिना सरकारका भारतीय सेनाको चीन भेज देना अनुचित और बहुत ही आपत्तिजनक काम है।
'''(२) एसेम्बली में वाइसरयाके हालमें दिये गये भाषणके सम्बन्धमें आपकी क्या राय है?'''
वह बेहद निराशाजनक था।
'''(३) आप संवैधानिक स्वायत्त शासनमें विश्वास करते हैं या स्वतन्त्र स्वराज्यमें?'''
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'''(४) बनारसके अपने हालके भाषणमें<ref>देखिए खण्ड ३२, ५४ ५३६।</ref> स्वराज्यकी परिभाषा रामराज्य कहकर करनेमें आपका क्या उद्देश्य था?'''
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'''(५) श्रद्धानन्द कोषके लिए १० लाख रुपये एकत्रित करनेकी आपकी अपीलसे मुसलमानोंके मनमें चिन्ता और सन्देह पैदा हो गया है।'''
जो लोग शुद्धि, तबलीग या धर्म-परिवर्तनमें विश्वास रखते हैं, वे ऐसे प्रचार-कार्यके लिए तबतक कोषकी अपील करनेका हक रखते हैं, जबतक उनका प्रचार
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प्रश्न: (१) '''भारतीय सेनाकी टुकड़ियाँ चीन भेजनेकी भारत सरकारको नीतिके बारेमें आपके क्या विचार हैं?'''
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'''(२) एसेम्बली में वाइसरयाके हालमें दिये गये भाषणके सम्बन्धमें आपकी क्या राय है?'''
वह बेहद निराशाजनक था।
'''(३) आप संवैधानिक स्वायत्त शासनमें विश्वास करते हैं या स्वतन्त्र स्वराज्यमें?'''
मैं ऐसे स्वराज्यमें विश्वास करता हूँ, जिसमें यदि भारत चाहे तो कभी भी स्वाधीन हो सकता हो।
'''(४) बनारसके अपने हालके भाषणमें<ref>देखिए खण्ड ३२, ५४ ५३६।</ref> स्वराज्यकी परिभाषा रामराज्य कहकर करनेमें आपका क्या उद्देश्य था?'''
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सचित्र व्याख्या है।
'''(५) श्रद्धानन्द कोषके लिए १० लाख रुपये एकत्रित करनेकी आपकी अपीलसे मुसलमानोंके मनमें चिन्ता और सन्देह पैदा हो गया है।'''
जो लोग शुद्धि, तबलीग या धर्म-परिवर्तनमें विश्वास रखते हैं, वे ऐसे प्रचार-कार्यके लिए तबतक कोषकी अपील करनेका हक रखते हैं, जबतक उनका प्रचार
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सैयद जहीरुल हक <br>बाढ़ (जिला पटना)
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प्रश्न: '''(१) भारतीय सेनाकी टुकड़ियाँ चीन भेजनेकी भारत सरकारको नीतिके बारेमें आपके क्या विचार हैं?'''
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'''(२) एसेम्बली में वाइसरयाके हालमें दिये गये भाषणके सम्बन्धमें आपकी क्या राय है?'''
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'''(३) आप संवैधानिक स्वायत्त शासनमें विश्वास करते हैं या स्वतन्त्र स्वराज्यमें?'''
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'''(४) बनारसके अपने हालके भाषणमें<ref>देखिए खण्ड ३२, ५४ ५३६।</ref> स्वराज्यकी परिभाषा रामराज्य कहकर करनेमें आपका क्या उद्देश्य था?'''
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सचित्र व्याख्या है।
'''(५) श्रद्धानन्द कोषके लिए १० लाख रुपये एकत्रित करनेकी आपकी अपीलसे मुसलमानोंके मनमें चिन्ता और सन्देह पैदा हो गया है।'''
जो लोग शुद्धि, तबलीग या धर्म-परिवर्तनमें विश्वास रखते हैं, वे ऐसे प्रचार-कार्यके लिए तबतक कोषकी अपील करनेका हक रखते हैं, जबतक उनका प्रचार
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger'''११.पत्र: मगनलाल गांधीको'''}}}}
{{right|मंगलवार [२५ जनवरी, १९२७]}}<ref>पत्रमें रुखीके ऑपरेशनके उल्लेखसे लगता है कि यह पत्र ३१-१-१९२७ के पत्रसे पहले और २४-१-१९२७ के पत्रके बाद लिखा गया था।</ref>
{{left|चि० मगनलाल,}}
तुम्हारे दो पत्र एक साथ मिले। चि० रुखीका ऑपरेशन हो जानेपर तार देना। क्या गोविन्दभाई आ गये हैं? हालमें उनका कोई पत्र नहीं आया है। ऐसा लगता है कि भाई प्रागजी नहीं आयेंगे। उनका मन फिर दक्षिण आफ्रिका जानेका है। यदि वे न आयें तो भी फिलहाल मैं कोई अन्य प्रबन्ध न करूँगा। यों, चर्मालय अथवा दुग्धालयके कार्यके लिए हमें किसीको नियुक्त करना पड़े, तो इसके लिए कार्य समितिकी अनुमति लेनेकी आवश्यकता नहीं है। फिर भी हर मामलेमें सबके साथ चर्चा कर लेना अच्छा ही है। नवीनको जिस विभागमें रखना उचित जान पड़े उसमें रखना। उसे प्रोत्साहित
करना आवश्यक है। बजटमें मंजूर रकमोंके खर्चके बारेमें कार्य समितिसे सलाह करनी होगी; लेकिन चर्मालय, दुग्धालय और 'लिफ्ट'के<ref>कुएँ से पानी निकालनेके लिए रामचन्द्रन् द्वारा बनाई गई विशेष रहट; देखिए खण्ड ३२, पृष्ठ (६०-६१)।</ref> मामले तखमीनेसे बाहरकी बात है और उनके लिए खर्चकी व्यवस्था भी अलग करनी होगी। इसलिए हमें इनपर आर्थिक दृष्टिसे नहीं, बल्कि आश्रमके आध्यात्मिक और सामाजिक लाभकी दृष्टिसे विचार करना चाहिए। ये सब संस्थाएँ आश्रमकी भूमिपर चलाई जायें इस आशयका प्रस्ताव पास हो ही गया है । जहाँतक मुझे याद है, शिवाभाई हरिभाईके वेतनकी बात तो तय हो गई थी। उन्हें ५० रुपयेतक देनेका निश्चय किया गया था; फिर भी उसपर मंजूरी दुबारा ले लें तो कोई हर्ज नहीं। रसोईघरोंकी बात मैं समझ गया। उनकी ओर जितना ध्यान दे सको उतना देना। मणिलाल वहाँ पहुँच जायेगा। उससे काम लेना। रतिलाल बहुत अव्यवस्थित-चित्त है। उसने परसों वहाँ जानेका हठ किया था, किन्तु वह अब फिर शान्त हो गया है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७७७२) से।|2em <br>सौजन्य: राधाबहन चौधरी}}<noinclude></noinclude>
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तुम्हारे दो पत्र एक साथ मिले। चि० रुखीका ऑपरेशन हो जानेपर तार देना। क्या गोविन्दभाई आ गये हैं? हालमें उनका कोई पत्र नहीं आया है। ऐसा लगता है कि भाई प्रागजी नहीं आयेंगे। उनका मन फिर दक्षिण आफ्रिका जानेका है। यदि वे न आयें तो भी फिलहाल मैं कोई अन्य प्रबन्ध न करूँगा। यों, चर्मालय अथवा दुग्धालयके कार्यके लिए हमें किसीको नियुक्त करना पड़े, तो इसके लिए कार्य समितिकी अनुमति लेनेकी आवश्यकता नहीं है। फिर भी हर मामलेमें सबके साथ चर्चा कर लेना अच्छा ही है। नवीनको जिस विभागमें रखना उचित जान पड़े उसमें रखना। उसे प्रोत्साहित
करना आवश्यक है। बजटमें मंजूर रकमोंके खर्चके बारेमें कार्य समितिसे सलाह करनी होगी; लेकिन चर्मालय, दुग्धालय और 'लिफ्ट'के<ref>कुएँ से पानी निकालनेके लिए रामचन्द्रन् द्वारा बनाई गई विशेष रहट; देखिए खण्ड ३२, पृष्ठ (६०-६१)।</ref> मामले तखमीनेसे बाहरकी बात है और उनके लिए खर्चकी व्यवस्था भी अलग करनी होगी। इसलिए हमें इनपर आर्थिक दृष्टिसे नहीं, बल्कि आश्रमके आध्यात्मिक और सामाजिक लाभकी दृष्टिसे विचार करना चाहिए। ये सब संस्थाएँ आश्रमकी भूमिपर चलाई जायें इस आशयका प्रस्ताव पास हो ही गया है । जहाँतक मुझे याद है, शिवाभाई हरिभाईके वेतनकी बात तो तय हो गई थी। उन्हें ५० रुपयेतक देनेका निश्चय किया गया था; फिर भी उसपर मंजूरी दुबारा ले लें तो कोई हर्ज नहीं। रसोईघरोंकी बात मैं समझ गया। उनकी ओर जितना ध्यान दे सको उतना देना। मणिलाल वहाँ पहुँच जायेगा। उससे काम लेना। रतिलाल बहुत अव्यवस्थित-चित्त है। उसने परसों वहाँ जानेका हठ किया था, किन्तु वह अब फिर शान्त हो गया है।
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{{right|मुजफ्फरपुर <br>२५ जनवरी, १९२७}}
फ्री प्रेसके प्रतिनिधि द्वारा भेंट किये जानेपर महात्मा गांधीने अमेरिका यात्राके लिए मिले निमन्त्रणोंके बारेमें अपनी राय व्यक्त की। महात्माजीने सीधे-सादे ढंगसे
कहा कि इन ललचानेवाले निमन्त्रणोंको स्वीकार करनेमें मुझे कुछ असमंजस हो रहा है। लेकिन मैं अभी अपने जीवनकार्यका वांछित लक्ष्य प्राप्त करनेमें सफल नहीं हो
पाया हूँ। जबतक मेरी उपलब्धियाँ एक निश्चित ठोस रूप धारण नहीं कर लेतीं तबतक में उन विदेशोंकी यात्रा नहीं करना चाहता जो सौजन्य पूर्वक मुझे आमन्त्रित कर रहे हैं। महात्माजीने आगे कहा कि भारतीयोंकी सेवाके लिए मुझे अमेरिकामें एक बड़ी थैली दी जानेवाली है; लेकिन मुझे लगता है कि उससे हमारी आत्म-निर्भरता और आत्मसम्मानको क्षति पहुँचेगी।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''हिन्दू,''' २९-१-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१३.भाषण: मुजफ्फरपुरके मिशन स्कूलमें'''}}}}
{{right|२५ जनवरी, १९२७}}
[नगरपालिका आयुर्वेदिक] औषधालय देखनेके बाद गांधीजी रामकृष्ण मिशन देखने गये और संन्यासियों तथा कार्यकर्त्ताओंने उनका स्वागत किया। उन्हें आश्रम और उससे संलग्न अस्पताल दिखलाया गया। इसके बाद वे भारतीय ईसाई लड़कियोंका मिशन स्कूल देखने गये। कई लड़कियाँ चरखा चलाती दिखलाई पड़ीं। वे सब नौसिखिया मालूम देती थीं। महात्माजीने देखरेख करनेवाली यूरोपीय महिलासे कहा कि छात्राओंसे चरखा सोखनेकी अपेक्षा करनेसे पहले आप खुद चरखा चलाना सीखें। सभा भवनमें मेजपोश विदेशी कपड़ेका था; और सभी लड़कियाँ तथा उनके शिक्षक विदेशी कपड़े पहने थे। इसपर महात्माजीने कहा कि कताईमें विश्वास करनेसे पहले आप लोगोंको खद्दरमें आस्था होनी चाहिए। अध्यक्ष द्वारा कुछ कहने का अनुरोध किये जाने पर महात्माजीने कहा कि मेरे पास आपके लिए खादीके अलावा दूसरा सन्देश नहीं| आप जिस धर्मको मानना चाहें, मानते रहें, लेकिन अगर गरीबोंके प्रति आपके मनमें प्यार नहीं है, तो आपकी प्रार्थना ईश्वर द्वारा सुनी जानेकी कोई सम्भावना नहीं है। भारतको विशिष्ट परिस्थितियोंमें गरीबोंके प्रति प्यारकी अभिव्यक्ति खादी पहननेके<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण: मुजफ्फरपुरके तिलक-मैदान में|१३}}</noinclude>'''अलावा और किसी ढंगसे ज्यादा अच्छी नहीं हो सकती। उन्होंने लड़कियोंसे खादी, केवल खादी ही पहननेका अनुरोध किया।'''
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''सर्चलाइट,''' ३०-१-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१४. भाषण: मुजफ्फरपुरके तिलक-मैदानमें'''}}}}
{{right|२५ जनवरी, १९२७}}
महात्माजीने सारे अभिनन्दनपत्रोंका एक साथ जवाब देते हुए सभी सार्वजनिक संस्थाओंको अभिनन्दनपत्र भेंट करनेके लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने सेवा समितिको
विशेष रूपसे इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि उसने सभामें अभिनन्दनपत्र न पढ़नेके लिए उनका अनुरोध स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि मैंने स्वयं उस अभिनन्दनपत्रको पढ़ लिया है और में उसका जवाब शुरूमें ही देना चाहता हूँ। उस अभिनन्दनपत्रमें मुझसे यह सवाल पूछा गया है कि क्या सभी मामलों में और सभी परिस्थितियोंमें हमें अहिंसात्मक रहना चाहिए? इसके जवाब में मेरा दृढ़तापूर्वक कहना है 'हाँ'। मनुष्यकी सच्ची वकतका तभी पता लगता है जब उसे कसौटीपर कसा जाता है। एक व्यक्ति अपनी भलाईके लिए सच बोल सकता है, लेकिन वह उसकी सत्यवादिताकी कसौटी नहीं है; एक व्यक्ति किसी जरूरतसे अहिंसात्मक रह सकता है, लेकिन अहिंसामें उसकी आस्थाकी वह कोई कसौटी नहीं है। बार-बार उत्तेजित किये जानेपर भी कोई व्यक्ति अहिंसात्मक रह सके, तभी समझना चाहिए कि उसकी अहिंसामें आस्थाकी सचाई और बलकी परीक्षा हुई। में वेदोंसे, 'गीता', 'कुरान' और 'बाइबिल' से अहिंसा के पक्ष में असंख्य तर्क प्रस्तुत कर सकता हूँ। किन्तु मेरे पास ऐसा करनेका समय
बिलकुल नहीं है। फिर भी मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि सभी धर्मोंका मूल उपदेश अहिंसा है।
भाषण जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि अभिनन्दनपत्रमें स्वामी श्रद्धानन्दकी हत्याका<ref>स्वामी श्रद्धानन्दकी हत्या २३ दिसम्बर, १९२६ को की गई थी।</ref> उल्लेख किया गया है। उस सिलसिले में प्रयुक्त की गई भाषा अनुचित है, लेकिन लेखकके हृदयके क्षोभ और दुःखका ध्यान रखते हुए मैं उस भाषाके प्रयोगके लिए उसे दोष नहीं दूंगा। में आपको बताना चाहता हूँ कि स्वामीजीकी हत्यापर मुझे
सेवा समितिके किसी भी सदस्यसे कुछ कम दुःख नहीं हुआ है। में तो यह कहना चाहूँगा कि मेरा दुःख उनके दुःखसे अधिक और ज्यादा तीव्र है। लेकिन फिर भी
१. यह भाषण नगरपालिका, जिलाबोर्ड, जिला कांग्रेस कमेटी और अन्य सार्वजनिक संस्थाओंकी ओरसे
भेंट किये गये अभिनन्दनपत्रों के उत्तरमें दिया गया था ।
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रितु कुमारी साव
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महात्माजीने सारे अभिनन्दनपत्रोंका एक साथ जवाब देते हुए सभी सार्वजनिक संस्थाओंको अभिनन्दनपत्र भेंट करनेके लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने सेवा समितिको
विशेष रूपसे इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि उसने सभामें अभिनन्दनपत्र न पढ़नेके लिए उनका अनुरोध स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि मैंने स्वयं उस अभिनन्दनपत्रको पढ़ लिया है और में उसका जवाब शुरूमें ही देना चाहता हूँ। उस अभिनन्दनपत्रमें मुझसे यह सवाल पूछा गया है कि क्या सभी मामलों में और सभी परिस्थितियोंमें हमें अहिंसात्मक रहना चाहिए? इसके जवाब में मेरा दृढ़तापूर्वक कहना है 'हाँ'। मनुष्यकी सच्ची वकतका तभी पता लगता है जब उसे कसौटीपर कसा जाता है। एक व्यक्ति अपनी भलाईके लिए सच बोल सकता है, लेकिन वह उसकी सत्यवादिताकी कसौटी नहीं है; एक व्यक्ति किसी जरूरतसे अहिंसात्मक रह सकता है, लेकिन अहिंसामें उसकी आस्थाकी वह कोई कसौटी नहीं है। बार-बार उत्तेजित किये जानेपर भी कोई व्यक्ति अहिंसात्मक रह सके, तभी समझना चाहिए कि उसकी अहिंसामें आस्थाकी सचाई और बलकी परीक्षा हुई। में वेदोंसे, 'गीता', 'कुरान' और 'बाइबिल' से अहिंसा के पक्ष में असंख्य तर्क प्रस्तुत कर सकता हूँ। किन्तु मेरे पास ऐसा करनेका समय
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भाषण जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि अभिनन्दनपत्रमें स्वामी श्रद्धानन्दकी हत्याका<ref>स्वामी श्रद्धानन्दकी हत्या २३ दिसम्बर, १९२६ को की गई थी।</ref> उल्लेख किया गया है। उस सिलसिले में प्रयुक्त की गई भाषा अनुचित है, लेकिन लेखकके हृदयके क्षोभ और दुःखका ध्यान रखते हुए मैं उस भाषाके प्रयोगके लिए उसे दोष नहीं दूंगा। में आपको बताना चाहता हूँ कि स्वामीजीकी हत्यापर मुझे
सेवा समितिके किसी भी सदस्यसे कुछ कम दुःख नहीं हुआ है। में तो यह कहना चाहूँगा कि मेरा दुःख उनके दुःखसे अधिक और ज्यादा तीव्र है। लेकिन फिर भी
१. यह भाषण नगरपालिका, जिलाबोर्ड, जिला कांग्रेस कमेटी और अन्य सार्वजनिक संस्थाओंकी ओरसे
भेंट किये गये अभिनन्दनपत्रों के उत्तरमें दिया गया था ।<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||१४सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''मैंने जो कुछ पहले कहा है मैं उन्हीं बातोंपर अडिग हूँ। उन्होंने कहा कि इस तरहके काम समूची हिन्दू जातिकी हत्या नहीं कर सकते। आपमें हताशाका भाव या हत्याके बदलेकी भावना जगना अविवेकपूर्ण और अनुचित है स्वामी श्रद्धानन्दकी हत्यासे कुछ सीखा जा सकता है। इससे आपको, हिन्दू-मुसलमानोंको यह शिक्षा मिलनी चाहिए कि अन्य लोगोंको भी अपने मनकी बात कहने और अपनी अंतरात्माके निर्देश माननेका उतना ही अधिकार है जितना कि खुद आपको है। इससे आपको यह शिक्षा भी लेनी चाहिए कि आप उनके अमूल्य रक्तसे अपने हृदय स्वच्छ कर लें। उनकी मृत्युपर शोक मनानेकी तो कोई बात ही नहीं है; आपको उनकी मृत्युपर गर्व होना चाहिए।'''
भाषण जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि कोई कारण नहीं कि कुछ लोग इस तरहकी मनोवृत्तिके हैं, इसलिए दूसरे भी पागल हो उठे। धर्मके संरक्षणके लिए हिंसाकी कोई जरूरत हो ही नहीं सकती। उन्होंने कहा कि जब भी आप ऐसा कोई काम करें, आपको ऐसा अनुभव होना चाहिए कि हम अपना पाँव धर्मके रास्तेसे बाहर रख रहे हैं। सच्चा धर्म अपने शत्रुओं तकसे मित्रताका नाता बनाना है। लेकिन ऐसी विनम्रता, ऐसी अहिंसा कायरता नहीं है। दूसरोंको मारनेके बजाय आपको खुद मरनेके लिए तैयार रहना चाहिए; किसी दूसरेका खून करनेके बजाय खुद अपना खून बहाने के लिए तैयार रहना चाहिए। जो व्यक्ति न्याय-धर्मके लिए प्राण देनेसे नहीं झिझकता है, वह अपराजेय है। सारा संसार भले ही हिंसाका समर्थन करनेको राजी हो जाये, तो भी अहिंसामें मेरी आस्था अविचल और अपरिवर्तनीय
रहेगी। में बराबर यह मानता रहूँगा कि अहिंसा सभी धर्मोका साररूप सत्य है और इस्लाम भी निश्चय ही इसका अपवाद नहीं है। में जितना भी जोर देकर कह सकता हूँ, उतने जोरसे आपसे कहना चाहूँगा कि अपने धर्ममें आपके विश्वासको इसी बातसे आँका जायेगा कि किस हदतक आप उसके लिए आत्म-बलिदान करने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि में हिन्दू-धर्मका उतना ही कट्टर अनुयायी हूँ, जितना कि आपमें से कोई है, लेकिन मैं कहता हूँ कि यदि आप अपने धर्मके प्रति सच्चे रहना चाहते हैं, तो आपको सत्य, अहिंसा और ब्रह्मचर्य का पालन करना तथा विश्वको कुल सम्पत्तिसे
विरतिका पाठ सीखना चाहिए। हिन्दू-धर्म कभी हिंसा या बेईमानीको स्वीकृति प्रदान नहीं करता। आप अपने कार्योंका औचित्य सिद्ध करनेके लिए अपने धर्मशास्त्रोंका
गलत अर्थ निकालते हैं। युधिष्ठिर भले ही एक बार झूठ बोले हों, लेकिन आपको याद रखना चाहिए कि उन्हें इस पापके लिए तुरन्त दुःख झेलना पड़ा था और बादमें
भी। यदि आप धर्मकी सेवा करना चाहते हैं, तो आपके पास सत्य और अहिंसाके सिवाय दूसरा कोई विकल्प नहीं है। आगे बोलते हुए उन्होंने नगरपालिका, जिला-बोर्ड, स्थानीय बोर्ड तथा कांग्रेस कमेटीको खद्दर कार्यकी तरफ ध्यान देनेके लिए धन्यवाद दिया। जो लोग देशको पुकार<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/५३
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण: मुजफ्फरपुरके तिलक मैदान में|१५}}</noinclude>पर स्कूलों-कालेजोंसे बाहर आ गये थे, और जिन्होंने अपनी अच्छी चलती हुई वकालतकी अच्छी आमदनीको छोड़ दिया था, उन्होंने उन लोगोंको, धन्यवाद दिया और कांग्रेस कमेटीको इन देशभक्त नौजवानोंकी चर्चा करनेके लिए विशेष रूपसे धन्यवाद दिया। कांग्रेस कमेटीके अभिनन्दनपत्र में राष्ट्रीय इतिहासके एक बहुत पुराने और अल्प कालकी चर्चा की गई है। वह काल बहुत ही भव्य था और उसकी स्मृति मेरे लिए कितनी
पुनीत है; किन्तु में कांग्रेसकी किसी अन्य गतिविधिके विषयमें कुछ नहीं कहना चाहूँगा। निश्चय ही वे महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन मेरे लिए देशकी वर्तमान परिस्थितियोंमें खद्दर-कार्य सबसे अधिक महत्त्वका कार्य है।
भाषण जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि यदि आप खद्दर- कार्यको ही सफल बना सकें तो [देखेंगे] केवल खद्दर ही आपकी अक्षुण्ण शक्तिका स्रोत है। स्वराज्य
आपके द्वारपर होगा। जबतक आप भारतके गरीब लोगों की हालतपर सहानुभूतिपूर्वक ध्यान देना नहीं सीख लेते हैं, तबतक आपको स्वराज्यकी माँग करनेका कोई हक नहीं है और जबतक आप उनसे सहानुभूतिका भाव नहीं रखने लगते, तबतक आप स्वराज्यके सच्चे पक्षपोषी भी नहीं हैं। जबतक देशमें एक भी गरीब ऐसा है जो भूखा रहता हो, तबतक भारतके स्वराज्यका मेरे लिए कोई अर्थ नहीं है। भूखोंको भोजन देना, प्यासोंको पानी देना हर प्राणीका धार्मिक कर्त्तव्य है और उन्होंने कहा कि जबतक हर व्यक्तिमें ऐसी उदात्त भावना नहीं भर जाती, धर्मराज्य नहीं मिल सकता। इस धर्मका आचरण आप कैसे कर सकते हैं? खद्दर, केवल खद्दर हीके द्वारा। मुझे और कोई दूसरा बेहतर उपाय किसीने नहीं सुझाया है और मेरा विश्वास है कि कोई दूसरा बेहतर तरीका है भी नहीं।
इसके बाद उन्होंने खद्दरका आर्थिक पहलू विस्तारसे समझाया और बिलकुल साफ करके बताया कि किस तरह खद्दरपर खर्च की गई प्रत्येक पाई गरीबोंकी जेबमें
जाती है। क्या आपको उन गरीब गाँववालोंकी इतनी भी मदद नहीं करनी चाहिए, जो आपको रोजमर्राकी रोटी मुहैया करते हैं? गरीब और जरूरतमंद लोगोंकी मदद
करना हर प्राणीका धार्मिक कर्तव्य है। क्या आप अपने इस कर्त्तव्यसे चूकेंगें? खादी भले ही खुरदरी हो, महँगी हो, फिर भी वह आपकी माँका दिया हुआ उपहार है।
क्या आपको वह अमूल्य उपहार उठाकर अलग फेंक देना चाहिए? आपको तो चाहिए कि आप विदेशी वस्त्रको खुरदरा और मंहगा समझें और खादीके टुकड़ोंको
बड़े आदरसे सिर-माथ रखें।
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१५. भाषण: मुजफ्फरपुरके विद्यार्थियों को सभामें'''}}}}<ref>यह सभा शामके ६ बजे टाउन हॉलमें हुई थी।</ref>
{{Right|२५ जनवरी, १९२७}}
गांधीजीने कहा कि मुझसे जब मुजफ्फरपुरमें विद्यार्थियोंकी एक सभामें भाषण देने को कहा गया तो मैं किसी भी अन्य प्रलोभनके बिना राजी हो गया; क्योंकि मुझे याद है कि जब में अपना चम्पारनका कार्य शुरू करने आया था तो पहले दिन मुजफ्फरपुर के विद्यार्थियोंने ही मुझे आश्रय दिया था। वह घटना, मैं भुला नहीं सकता। और यहाँके विद्यार्थियोंके समक्ष भाषण देनेका सुअवसर मैंने तत्काल यह सोचकर
स्वीकार कर लिया कि इस समय जब मुझे भारतके विद्यार्थी समुदायसे बहुत ज्यादा मददकी जरूरत है, यहाँके विद्यार्थी शायद मुझे मदद पहुँचायेंगे। उन्होंने कहा कि आप मुझे १९२० की याद दिला देते हैं। निश्चय ही वे बड़े शानदार दिन थे, निश्चय ही उन दिनों देशमें राष्ट्रीय चेतनाका जो प्रखर उभार दिखाई देता था वह अब दब गया है, लेकिन उस आन्दोलनका असर अब भी बाकी है। यदि आप उस जोशके उभारको बनाये नहीं रख सके हैं, तो केवल आप ही उसके लिए दोषी नहीं हैं। स्वाभाविक ही है कि मैं देशकी बदली हुई परिस्थितियों में आप लोगोंसे वही काम करनेको नहीं कहूँगा; पर मैंने तब स्वतंत्रता संघर्षका जो रास्ता सुझाया था, वही अब भी भारतीयों द्वारा अपनाने योग्य सर्वोत्तम रास्ता है। यदि आप उस रास्तेपर बहुत लम्बे समयतक नहीं चल सके, तो उसके लिए शर्मिन्दा होने की जरूरत नहीं है। मुझे इस बातपर आश्चर्य नहीं है कि आप आगे कूच करते हुए रुक क्यों गये, बल्कि देशकी हालत देखते हुए मुझे इस बातपर आश्चर्य होता है कि उन दिनों आप इतना आगे बढ़ ही कैसे सके थे। जो कार्यक्रम मैंने बताया था, यदि वह अमलमें लाया जा सकता तो सफलता मिलनेमें सन्देह ही नहीं था, लेकिन अब में तबतक उस कार्यक्रमके अनुसार काम करनेके लिए आपसे नहीं कहूँगा जबतक कि उसके लिए उपयुक्त अवसर नहीं आ जाता। लेकिन इस बीच मुझे आपसे एक काम करनेको कहना है और वह है खद्दरका काम। बड़े-छोटे, अमीर-गरीब, विद्वान-मूर्ख, विद्यार्थी या सरकारी कर्मचारी सभी लोग आसानीसे इस काममें जुटकर इसे सफल बना सकते हैं। विद्यार्थी समुदाय इस कामके लिए विशेष रूपसे उपयुक्त है। पंडित मालवीयने हिन्दू विश्वविद्यालयमें दृष्टांत प्रस्तुत करके आपका मार्गदर्शन कर दिया है। कल ही हिन्दू विश्वविद्यालयके विद्यार्थियोंने मुझे एक हजार रुपयेकी थैली भेंट की है। आपने जो थैली भेंट की है वह मुजफ्फरपुर के विद्यार्थियोंकी संख्याको देखते<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण:मुजफ्फरपुरके विद्यार्थियोंकी सभामें|१७}}</noinclude>हुए उससे बहुत कम है। मैं विद्यार्थियोंसे आशा रखता हूँ कि वे अपनी सारी आर्थिक और शारीरिक शक्तिसे खद्दर आन्दोलनकी सहायता करेंगे। मुझे आशा है कि मुजफ्फरपुरके विद्यार्थी देशके अन्य भागोंके विद्यार्थियोंसे पीछे नहीं रहेंगे। आप न सिर्फ आजके दिन ही धनसे सहायता करेंगे अपितु मुझे आशा है कि आप अपने जेब खर्चसे कुछ बचाते ही रहेंगे और नियमित रूपसे आन्दोलनकी सहायता करते रहेंगे। आप लोग प्रान्तीय खादी संगठन के मुख्यालयमें रह रहे है; इसलिए आपको खद्दरके कामके सभी पहलुओंको सीख लेना चाहिए और अपने अवकाशका समय भी इस काममें लगाना चाहिए। में तो आपसे कहूँगा कि आप प्रतिदिन कमसे कम आधा घंटा भी कातें। आप अपने लिये पैसा कमानेके लिए नहीं बल्कि गरीब और बेकार सूत ग्रामीणोंके लिए उदाहरण प्रस्तुत करनेके लिए सूत कातें। परन्तु यह सब कुछ आप तभी करें जब आपकी खादीमें श्रद्धा हो। वैसी श्रद्धा प्राप्त करनेके लिए आप मुझसे या अन्य किसी व्यक्तिसे खादीका अर्थशास्त्र समझ लें।
भाषण जारी रखते हुए गांधीजीने खद्दरके आर्थिक पहलूपर विस्तारसे प्रकाश डाला और कहा कि यदि आप मानव हैं तो आपमें अपने आसपासके मनुष्योंके प्रति
सहानुभूति अवश्य होनी चाहिए। यदि आपमें भाईचारेकी इतनी भी भावना नहीं है, तो आप स्वराज्य पानेकी आशा कैसे कर सकते हैं? भारतके सच्चे सपूत होनेके नाते आपका यह कर्त्तव्य है कि आप उन सब वस्तुओंको अस्वीकार कर दें जो प्रत्येक भारतीयको उपभोगके लिए सुलभ नहीं हो पातीं। पर मैं आपको ऐसा करनेके लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आप खादी खरीदें और इस तरह हजारों बेकार देशवासियों और महिलाओंको काम और भोजन दें। विद्यार्थियोंपर खादी पहननेका प्रतिबन्ध नहीं है। उन्होंने विस्तारसे बताया कि जब राजगोपालाचारीको मद्रासके एक सरकारी कालिजमें खद्दरपर बोलनेके लिए आमन्त्रित किया गया तब वे किस तरह प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों की सहायतासे उस कालिजमें खादी संघ चलानेमें सफल हुए। उन्होंने आशा प्रकट की कि मुजफ्फरपुरमें भी उस कालिजके दृष्टांतका अनुसरण किया जाएगा। खद्दरकी अर्थ-व्यवस्थाके सिद्धान्तको समझनेके लिए पुरस्कृत
निबन्धका<ref>अभिप्राथ वरदाचारी और पुणताम्बेकरके निबन्धके आधारपर प्रस्तुत पुस्तिकासे है; पुस्तकके संक्षिप्त
विवरणके लिए देखिए खण्ड ३२, पृष्ठ ५१४ ।</ref> पढ़ना आपके लिए लाभदायक होगा। मुझे आशा है कि पुस्तकको पढ़ चुकनके उपरान्त खादीमें आपकी आस्था हो जाएगी। उन्होंने कहा: खद्दर पहननेके विरोधमें केवल एक आपत्ति रह जाती है और वह है फैशन और आरामके प्रति मोह। मैं आपसे पूछता हूँ कि यदि आप देशके लिए इतना छोटा-सा त्याग भी नहीं कर सकते, तो स्वराज्य पानेकी आशा कैसे कर सकते हैं? उन्होंने विद्यार्थियोंसे उसी स्थानपर निष्ठापूर्वक यह प्रतिज्ञा करनेका आग्रह किया कि वे आजके बाद कभी सिवाय खादीके
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ऋतु मिश्रा
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<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{C|ग्यारह}}</noinclude>श्रीनिवास शास्त्रीसे उनका जो स्नेह-सम्बन्ध था, उसकी भी बहुत इज्जत करते थे। ये दोनों गांधीजीकी कुछ-एक नीतियोंके प्रखर आलोचक थे। कवि रवीन्द्रनाथ और उनके बीच मतभेदोंने कभी-कभी सार्वजनिक विवादका ऐसा रूप धारण कर लिया कि, जिससे ऐसा प्रतीत होता है, उन्हें बड़ा कष्ट हुआ। (देखिए खण्ड २१, पृ॰ २८७-९१ और खण्ड २८, पृ॰ ४४१-४७) इसलिए उन्हें सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको यह सूचना देते हुए बड़ी प्रसन्नता हुई कि "गुरुदेव मेरे साथ दो घंटे रहे। वह समय बड़ा आनन्ददायक रहा।...हम इस बार एक-दूसरेके और नजदीक आये और मैंने इसे ईश्वरकी बड़ी कृपा मानी।" (पृ॰ ४५९-६०)। श्रीनिवास शास्त्रीके साथ उनके मतभेद बने रहे, परन्तु गांधीजी उनके दृष्टिकोणका सम्मान करते थे। वास्तवमें कई सालों तक उनका अपना दृष्टिकोण भी यही था। "अच्छा होता कि आप जो लिखना चाहते थे, मुझे लिख ही देते।" उन्होंने शास्त्रीको लिखा "आपको मालूम है कि मैं आपकी रायको कितना महत्त्व देता हूँ। यदि मैं आपकी चिन्तन-पद्धतिको अपना सकता, तो मुझे बड़ी भारी राहत मिल जाती।" (पृ॰ ४६०)।
पिछले कई वर्षों में ग्राम्य भारतकी दुर्दशाके विषयमें गांधीजी की चिन्ता और गहरी हो गई थी और इस खण्ड में ग्राम-सुधारसे सम्बन्धित कई लेख हैं। उनमें से कुछ एक 'नवजीवन'के शिक्षा परिशिष्टके लिए लिखे गये थे। पंजाब में गुड़गाँवके डिप्टी कमीश्नर श्री ब्रेन द्वारा इस विषयपर लिखित पुस्तककी प्रशंसापूर्ण समीक्षा में उन्होंने लेखककी गृहीत स्थापनाओं और निर्णयोंका आलोचक-जैसी तटस्थतासे विश्लेषण किया और जहाँ उन्होंने उसके द्वारा अपनाए गए उपायोंकी सहृदयतापूर्वक टीका की
वहाँ उसके द्वारा प्रस्तुत अनेक व्यवहार्य सुझावोंका स्वागत भी किया।
जब कोई
अधिकारी सुधारक बनता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि उसका सरकारी ओहदा
उसके सुधारके रास्ते में सहायक नहीं होता, बल्कि रुकावट डालता है।" (पृ०१५३) ।
CC
गांधीजीने अस्पृश्यता निवारण के लिए जो आन्दोलन चलाया, उसे छोड़ दें तो
समाज सेवा के क्षेत्रमें उनकी दूसरी सबसे बड़ी सेवा यह थी कि स्त्रियोंके प्रति परम्परा-
गत में वह क्रान्तिकारी परिवर्तन ले आये। रेहाना तैयबजीके एक पत्रका उत्तर
देते हुए उन्होंने उनसे इस बातका समर्थन करनेका अनुरोध किया था कि स्त्रियोंको
उत्तराधिकार सम्बन्धी अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा : पुरुष नारी जातिपर
जो अत्याचार कर रहे हैं, उन्हें देखकर व्यग्र होनेके लिए मेरा लड़की होना
आवश्यक नहीं है .. स्त्रियोंके अधिकारके बारेमें में जरा भी झुकने को तैयार
नहीं हूँ।" ( पृ० ५) । परन्तु वर्तमान स्थितिके लिए उन्होंने स्त्रियोंको भी दोषी
ठहराया। उन्होंने कहा: बुराईकी जड़ कानूनों असमानताएँ नहीं अपितु 'पुरुषकी
सत्ता और कीर्तिके प्रति लोलुपता ही इसका मूल कारण है, और इसका इससे भी<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{C|ग्यारह}}</noinclude>श्रीनिवास शास्त्रीसे उनका जो स्नेह-सम्बन्ध था, उसकी भी बहुत इज्जत करते थे। ये दोनों गांधीजीकी कुछ-एक नीतियोंके प्रखर आलोचक थे। कवि रवीन्द्रनाथ और उनके बीच मतभेदोंने कभी-कभी सार्वजनिक विवादका ऐसा रूप धारण कर लिया कि, जिससे ऐसा प्रतीत होता है, उन्हें बड़ा कष्ट हुआ। (देखिए खण्ड २१, पृ॰ २८७-९१ और खण्ड २८, पृ॰ ४४१-४७) इसलिए उन्हें सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको यह सूचना देते हुए बड़ी प्रसन्नता हुई कि "गुरुदेव मेरे साथ दो घंटे रहे। वह समय बड़ा आनन्ददायक रहा।...हम इस बार एक-दूसरेके और नजदीक आये और मैंने इसे ईश्वरकी बड़ी कृपा मानी।" (पृ॰ ४५९-६०)। श्रीनिवास शास्त्रीके साथ उनके मतभेद बने रहे, परन्तु गांधीजी उनके दृष्टिकोणका सम्मान करते थे। वास्तवमें कई सालों तक उनका अपना दृष्टिकोण भी यही था। "अच्छा होता कि आप जो लिखना चाहते थे, मुझे लिख ही देते।" उन्होंने शास्त्रीको लिखा "आपको मालूम है कि मैं आपकी रायको कितना महत्त्व देता हूँ। यदि मैं आपकी चिन्तन-पद्धतिको अपना सकता, तो मुझे बड़ी भारी राहत मिल जाती।" (पृ॰ ४६०)।
पिछले कई वर्षों में ग्राम्य भारतकी दुर्दशाके विषयमें गांधीजी की चिन्ता और गहरी हो गई थी और इस खण्ड में ग्राम-सुधारसे सम्बन्धित कई लेख हैं। उनमें से कुछ एक 'नवजीवन'के शिक्षा परिशिष्टके लिए लिखे गये थे। पंजाब में गुड़गाँवके डिप्टी कमीश्नर श्री ब्रेन द्वारा इस विषयपर लिखित पुस्तककी प्रशंसापूर्ण समीक्षा में उन्होंने लेखककी गृहीत स्थापनाओं और निर्णयोंका आलोचक-जैसी तटस्थतासे विश्लेषण किया और जहाँ उन्होंने उसके द्वारा अपनाए गए उपायोंकी सहृदयतापूर्वक टीका की वहाँ उसके द्वारा प्रस्तुत अनेक व्यवहार्य सुझावोंका स्वागत भी किया। "जब कोई अधिकारी सुधारक बनता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि उसका सरकारी ओहदा उसके सुधारके रास्तेमें सहायक नहीं होता, बल्कि रुकावट डालता है।" (पृ॰ १५३)।
गांधीजीने अस्पृश्यता निवारणके लिए जो आन्दोलन चलाया, उसे छोड़ दें तो
समाज-सेवाके क्षेत्रमें उनकी दूसरी सबसे बड़ी सेवा यह थी कि स्त्रियोंके प्रति परम्परागत रुखमें वह क्रान्तिकारी परिवर्तन ले आये। रेहाना तैयबजीके एक पत्रका उत्तर देते हुए उन्होंने उनसे इस बातका समर्थन करनेका अनुरोध किया था कि स्त्रियोंको उत्तराधिकार-सम्बन्धी अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा : "पुरुष नारी जातिपर जो अत्याचार कर रहे हैं, उन्हें देखकर व्यग्र होनेके लिए मेरा लड़की होना आवश्यक नहीं है...स्त्रियोंके अधिकारके बारेमें मैं जरा भी झुकने को तैयार नहीं हूँ।" (पृ॰ ५)। परन्तु वर्तमान स्थितिके लिए उन्होंने स्त्रियोंको भी दोषी ठहराया। उन्होंने कहा : बुराईकी जड़ कानूनों असमानताएँ नहीं अपितु "पुरुषकी सत्ता और कीर्तिके प्रति लोलुपता ही इसका मूल कारण है, और इसका इससे भी<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{C|बारह}}</noinclude>बढ़कर कारण है स्त्री-पुरुषकी पारस्परिक विषय-वासना।" (पृ॰ ५)। किन्तु गांधीजी चाहते थे कि भारतकी स्त्रियाँ स्वतन्त्रताके लिए अपने संघर्षमें पश्चिमके तरीकोंकी नकल न करें बल्कि "भारतकी परिस्थिति और भारतीय स्वभावके अनुकूल उपायोंको काममें लाना चाहिए।" (पृ॰ ६)। महिलाएँ वीरतापूर्ण आचरण और आन्तरिक संयमके लिए आज भी सीता और द्रौपदी, सावित्री तथा दमयन्तीसे शक्ति और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकती हैं। इस तरह वे आदर्शको व्यवहारमें उतार सकेंगी और साथ ही भारतीय सभ्यताके उत्तम अंशकी रक्षा और दोषोंका निराकरण कर सकेंगी। वे चाहते थे कि महिलाएँ शुकके समान पवित्र हों। (पृ॰ २६४)। दिखावेके लिए की जानेवाली झूठी लज्जा छोड़ दें। एक-दूसरे संवाददाताको, जिसने उनसे यह सलाह माँगी थी कि ऊँच-नीचका भेद कैसे समाप्त किया जाये, गांधीजीने लिखा "...आचारसे बढ़कर और कोई प्रचार हो ही नहीं सकता। जो काम मनुष्य दूसरोंसे कराना चाहता है, उसे वह स्वयं करे। उसका यह सबसे बढ़कर असरदार प्रचार होगा।" (पृ॰ ८४)।
निरन्तर परिवर्तनशील समयकी अपूर्ण घटनाओंपर आधारित इतिहासका महत्त्व
गांधीजीके लिए 'महाभारत' जैसे काव्यकी अपेक्षा जो सनातन आन्तरिक अनुभव
पर आधारित है, कम है। जनकके उदाहरणमें हमारे लिए आज भी अर्थ है; वह "पुस्तक में वर्णित बैगन" नहीं है अपितु "अपने खेतमें होनेवाले सुन्दर
बैगनकी तरह" है जिसे तोड़कर खाया जा सकता है। (पृ॰ २३९)। सामूहिक प्रार्थनाको अनिवार्य बनानेकी आवश्यकतापर विद्यार्थियों को सलाह देते हुए गांधीजीने कहा : "स्वतः स्वीकार किए गए संयममें कोई जबरदस्ती नहीं होती।...जो अपनेको नियमोंसे बाँध लेता है, वह मुक्त हो जाता है।...अगर हम सिर ऊँचा करके चलनेवाले मनुष्य होना चाहते हैं और चौपाये नहीं बनना चाहते, तो हमें यह बात समझ लेनी चाहिए और अपने-आपको स्वेच्छासे अनुशासन और संयममें रखना चाहिए।" (पृ॰ ४२६)।
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ऋतु मिश्रा
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निरन्तर परिवर्तनशील समयकी अपूर्ण घटनाओंपर आधारित इतिहासका महत्त्व
गांधीजीके लिए 'महाभारत' जैसे काव्यकी अपेक्षा जो सनातन आन्तरिक अनुभव
पर आधारित है, कम है। जनकके उदाहरणमें हमारे लिए आज भी अर्थ है; वह "पुस्तक में वर्णित बैगन" नहीं है अपितु "अपने खेतमें होनेवाले सुन्दर
बैगनकी तरह" है जिसे तोड़कर खाया जा सकता है। (पृ॰ २३९)। सामूहिक प्रार्थनाको अनिवार्य बनानेकी आवश्यकतापर विद्यार्थियों को सलाह देते हुए गांधीजीने कहा : "स्वतः स्वीकार किए गए संयममें कोई जबरदस्ती नहीं होती।...जो अपनेको नियमोंसे बाँध लेता है, वह मुक्त हो जाता है।...अगर हम सिर ऊँचा करके चलनेवाले मनुष्य होना चाहते हैं और चौपाये नहीं बनना चाहते, तो हमें यह बात समझ लेनी चाहिए और अपने-आपको स्वेच्छासे अनुशासन और संयममें रखना चाहिए।" (पृ॰ ४२६)।<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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इस खण्डकी सामग्री के लिए हम साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास
और संग्रहालय (साबरमती आश्रम प्रिजर्वेशन एण्ड मेमोरियल ट्रस्ट); नवजीवन ट्रस्ट
और गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद ; गांधी स्मारक निधि व संग्रहालय,
नई दिल्ली; गृह विभाग, महाराष्ट्र सरकार, बम्बई; स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया;
नगरपालिका संग्रहालय, इलाहाबाद, नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय, नई दिल्ली;
श्री नारणदास गांधी, राजकोट श्री फूलचन्द शाह, सुरेन्द्रनगर; श्री हरिभाऊ उपाध्याय,
अजमेर, श्री ईश्वरलाल जोशी, बम्बई, श्री वालजी देसाई, पूना, श्री रमणीकलाल मोदी,
अहमदाबाद श्री डाह्याभाई एम पटेल, ढोल्का; श्री शान्तिकुमार मोरारजी, बम्बई;
श्री घनश्यामदास बिड़ला कलकत्ता, श्री बनारसीलाल बजाज, वाराणसी; श्रीमती लक्ष्मी-
बहन खरे, अहमदाबाद ; श्रीमती शारदाबहन शाह, वढवान; श्रीमती राधावन चौधरी,
कलकत्ता; श्रीमती मीराबहन, आस्ट्रिया; 'बापुना पत्रो', 'हिस्ट्री ऑफ द इंडियन नेशनल
कांग्रेस', 'लेटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री', 'पांचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद', 'ए बंच ऑफ
ओल्ड लैटर्स', 'बापू मैने क्या देखा क्या समझा ?', 'बापुनी प्रसादी', 'विट्ठलभाई पटेल :
लाइफ एण्ड टाइम्स', 'रिपोर्ट ऑफ द ४४ सेशन ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस',
'इंडिया इन १९२९-३०, पुस्तकोंके प्रकाशकों और 'अमृतबाजार पत्रिका', 'बॉम्बे
क्रॉनिकल', 'हिन्दी नवजीवन', 'हिन्दू', 'हिन्दुस्तान टाइम्स', 'लीडर', 'माडर्न रिव्यू,
'नवजीवन', 'प्रजावन्धु', 'सर्चलाइट', 'ट्रिब्यून' और 'यंग इंडिया' इन समाचारपत्रों
और पत्रिकाओंके आभारी हैं।
अनुसन्धान व सन्दर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी
पुस्तकालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स: पुस्तकालय, सूचना एवं प्रसारण
मन्त्रालयका अनुसन्धान और सन्दर्भ विभाग (रिसर्च एण्ड रिफरेंस डिवीजन) भारतीय
राष्ट्रीय अभिलेखागार और श्री प्यारेलाल नैय्यर, नई दिल्ली हमारे धन्यवादके पात्र
हैं। प्रलेखोंकी फोटो नकल तैयार करनेमें मदद देनेके लिए हम सूचना एवं प्रसारण
मन्त्रालय के फोटो विभाग, नई दिल्लीके आभारी हैं ।<noinclude></noinclude>
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इस खण्डकी सामग्री के लिए हम साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास
और संग्रहालय (साबरमती आश्रम प्रिजर्वेशन एण्ड मेमोरियल ट्रस्ट); नवजीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ ग्रन्थालय, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि व संग्रहालय, नई दिल्ली; गृह विभाग, महाराष्ट्र सरकार, बम्बई; स्वार्थमोर कालेज, फिलाडेल्फिया; नगरपालिका संग्रहालय, इलाहाबाद; नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय, नई दिल्ली; श्री नारणदास गांधी, राजकोट; श्री फूलचन्द शाह, सुरेन्द्रनगर; श्री हरिभाऊ उपाध्याय, अजमेर; श्री ईश्वरलाल जोशी, बम्बई; श्री वालजी देसाई, पूना; श्री रमणीकलाल मोदी, अहमदाबाद; श्री डाह्याभाई एम॰ पटेल, ढोल्का; श्री शान्तिकुमार मोरारजी, बम्बई; श्री घनश्यामदास बिड़ला, कलकत्ता; श्री बनारसीलाल बजाज, वाराणसी; श्रीमती लक्ष्मीबहन खरे, अहमदाबाद; श्रीमती शारदाबहन शाह, वढवान; श्रीमती राधाबहन चौधरी, कलकत्ता; श्रीमती मीराबहन, आस्ट्रिया; 'बापुना पत्रो', 'हिस्ट्री ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस', 'लैटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री', 'पाँचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद', 'ए बंच ऑफ ओल्ड लैटर्स', 'बापू मैंने क्या देखा क्या समझा?', 'बापुनी प्रसादी', 'विट्ठलभाई पटेल :
लाइफ एण्ड टाइम्स', 'रिपोर्ट ऑफ द ४४ सेशन ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस', 'इंडिया इन १९२९-३०', पुस्तकोंके प्रकाशकों और 'अमृतबाजार पत्रिका', 'बॉम्बे क्रॉनिकल', 'हिन्दी नवजीवन', 'हिन्दू', 'हिन्दुस्तान टाइम्स', 'लीडर', 'माडर्न रिव्यू', 'नवजीवन', 'प्रजाबन्धु', 'सर्चलाइट', 'ट्रिब्यून' और 'यंग इंडिया' इन समाचारपत्रों और पत्रिकाओंके आभारी हैं।
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पुस्तकालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स : पुस्तकालय, सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालयका अनुसन्धान और सन्दर्भ विभाग (रिसर्च एण्ड रिफरेंस डिवीजन) भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार और श्री प्यारेलाल नैय्यर, नई दिल्ली हमारे धन्यवादके पात्र हैं। प्रलेखोंकी फोटो-नकल तैयार करनेमें मदद देनेके लिए हम सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय के फोटो विभाग, नई दिल्लीके आभारी हैं।<noinclude></noinclude>
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{{C|{{x-larger|'''पाठकोंको सूचना'''}}}}
अंग्रेजी सामग्रीका अनुवाद करते हुए अनुवादको मूलके समीप रखनेका पूरा प्रयत्न किया गया है। छापेकी स्पष्ट भूलें सुधारनेके बाद अनुवाद किया गया है और मूलमें प्रयुक्त शब्दोंके संक्षिप्त रूप यथासम्भव पूरे करके दिए गए हैं। जिन
नामोंके उच्चारणमें संशय था उनको वैसा ही लिखा गया है जैसा गांधीजीने अपने
मूल लेखोंमें लिखा है।
मूल सामग्री के चौकोर कोष्ठकों में दी गई सामग्री सम्पादकीय है। गांधीजीने किसी लेख, भाषण आदिका जो अंश मूल रूपमें उद्धृत किया है, वह हाशिया छोड़कर गहरी स्याही में छापा गया है, लेकिन यदि कोई ऐसा अंश उन्होंने अनूदित करके दिया है तो उसका हिन्दी अनुवाद हाशिया छोड़कर साधारण टाइपमें छापा गया है। भाषणोंकी परोक्ष रिपोर्ट तथा वे अंश जो गांधीजीके कहे हुए नहीं हैं, बिना हाशिया छोड़े गहरी स्याही में छापे गये हैं। भाषणों और भेंटकी रिपोर्टोंके उन अंशोंमें जो गांधीजी नहीं है, कुछ परिवर्तन किया गया है और कहीं-कहीं कुछ जोड़ भी दिया गया है।
अंग्रेजी और गुजरातीसे अनुवाद करनेमें अनुवादको मूलके समीप रखनेका पूरा
प्रयत्न किया गया है, किन्तु साथ ही भाषाको सुपाठ्य बनानेका भी पूरा ध्यान रखा गया है।
शीर्षककी लेखन-तिथि जहाँ उपलब्ध है वहाँ दायें कोनेमें ऊपर दे दी गई है।
परन्तु जहाँ वह उपलब्ध नहीं है वहाँ उसकी पूर्ति अनुमानसे चौकोर कोष्ठकोंमें दी
गई है और आवश्यक होनेपर उसका कारण स्पष्ट कर दिया है। शीर्षकके अन्तमें
साधन-सूत्र के साथ दी गई तिथि प्रकाशनकी है। गांधीजीकी सम्पादकीय टिप्पणियाँ और लेख, जहाँ उनकी लेखन-तिथि उपलब्ध है अथवा जहाँ किसी दृढ़ आधारपर उसका अनुमान किया जा सका है, वहाँ लेखन तिथिके अनुसार, और जहाँ ऐसा सम्भव नहीं हुआ है, वहाँ उनकी प्रकाशन तिथिके अनुसार दिए गए हैं।
इस ग्रन्थमालाके खण्ड—१ के सन्दर्भ जून १९७० के संस्करणके हैं।
साधन-सूत्रोंमें 'एस॰ एन॰' संकेत साबरमती संग्रहालय, अहमदाबादमें मूल रूपमें
उपलब्ध सामग्रीका, 'जी॰ एन॰' गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्लीमें उपलब्ध कागज-पत्रोंका, और 'एम॰ एम॰ यू॰' गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय में उपलब्ध मोबाइल माइक्रोफिल्म यूनिटकी रीलोंका, और 'सी॰ डब्ल्यू॰' सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी) द्वारा संग्रहीत पत्रोंका सूचक है।
सामग्रीकी पृष्ठभूमि देनेके लिए मूलसे सम्बद्ध कुछ परिशिष्ट भी दिए गए हैं।
अन्तमें साधन-सूत्रकी सूची और खण्डसे सम्बन्धित कालकी तारीखवार घटनाएँ दी
गई हैं।<noinclude></noinclude>
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|-
| || || पृष्ठ
| || भूमिका || पाँच
|-
| || आभार || तेरह
|-
| || पाठकोंको सूचना || पंद्रह
|-
| १. || वक्तव्य : अहमदाबाद मजदूरोंके झगड़ेके सम्बन्धमें (१६-१०-१९२९) || १
|-
| २. || पत्र : महादेव देसाईको (१६-१०-१९२९) || २
|-
| ३. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१६-१०-१९२९) || ३
|-
| ४. || क्या यह ग्राम सुधार है? (१७-१०-१९२९) || ३
|-
| ५. || स्त्रियोंका स्थान (१७-१०-१९२९) || ४
|-
| ६. || मेरी चुप्पी (१७-१०-१९२९) || ७
|-
| ७. || भारतके अर्थशास्त्रका पाठ्यक्रम (१७-१०-१९२९) || ८
|-
| ८. || स्वयंसेवकका कर्त्तव्य (१७-१०-१९२९) || ९
|-
| ९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१७-१०-१९२९) || १०
|-
| १०. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१७-१०-१९२९) || ११
|-
| ११. || सन्देश : 'द इंडियन लेबर जर्नल'को (१८-१०-१९२९)|| १२
|-
| १२. || उस पत्रके बारेमें (६-३-१९३०) || १५
|-
| १३. || विद्यार्थी और चारित्र्य (६-३-१९३०) || १७
|-
| १४. || सरकारी कर्ज (६-३-१९३०) || १९
|-
| १५. || अशासन बनाम कुशासन (६-३-१९३०) || २१
|-
| १६. || अश्लील साहित्य (६-३-१९३०) || २२
|-
| १७. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (६-३-१९३०) || २३
|-
| १८. || पत्र : जयसुखलाल गांधीको (६-३-१९३०) || २३
|-
| १९. || पत्र : तहमीना खम्भाताको (६-३-१९३०) || २४
|-
| २०. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (६-३-१९३०) || २४
|-
| २१. || पत्र : पुंजाभाईको (६-३-१९३०) || २५
|-
| २२. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (७-३-१९३०) || २५
|-
| २३. || वक्तव्य : वल्लभभाई पटेलकी गिरफ्तारीपर (७-३-१९३०) || २६
|-
| २४. || तार : जॉन हेनीज होम्सको (७-३-१९३० या उसके पश्चात्) || २६
|-
| २५. || एक पुस्तककी प्रस्तावना (८-३-१९३०) || २७
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ऋतु मिश्रा
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|-
| || || पृष्ठ
|-
| || भूमिका || पाँच
|-
| || आभार || तेरह
|-
| || पाठकोंको सूचना || पंद्रह
|-
| १. || वक्तव्य : अहमदाबाद मजदूरोंके झगड़ेके सम्बन्धमें (१६-१०-१९२९) || १
|-
| २. || पत्र : महादेव देसाईको (१६-१०-१९२९) || २
|-
| ३. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१६-१०-१९२९) || ३
|-
| ४. || क्या यह ग्राम सुधार है? (१७-१०-१९२९) || ३
|-
| ५. || स्त्रियोंका स्थान (१७-१०-१९२९) || ४
|-
| ६. || मेरी चुप्पी (१७-१०-१९२९) || ७
|-
| ७. || भारतके अर्थशास्त्रका पाठ्यक्रम (१७-१०-१९२९) || ८
|-
| ८. || स्वयंसेवकका कर्त्तव्य (१७-१०-१९२९) || ९
|-
| ९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१७-१०-१९२९) || १०
|-
| १०. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१७-१०-१९२९) || ११
|-
| ११. || सन्देश : 'द इंडियन लेबर जर्नल'को (१८-१०-१९२९)|| १२
|-
| १२. || उस पत्रके बारेमें (६-३-१९३०) || १५
|-
| १३. || विद्यार्थी और चारित्र्य (६-३-१९३०) || १७
|-
| १४. || सरकारी कर्ज (६-३-१९३०) || १९
|-
| १५. || अशासन बनाम कुशासन (६-३-१९३०) || २१
|-
| १६. || अश्लील साहित्य (६-३-१९३०) || २२
|-
| १७. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (६-३-१९३०) || २३
|-
| १८. || पत्र : जयसुखलाल गांधीको (६-३-१९३०) || २३
|-
| १९. || पत्र : तहमीना खम्भाताको (६-३-१९३०) || २४
|-
| २०. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (६-३-१९३०) || २४
|-
| २१. || पत्र : पुंजाभाईको (६-३-१९३०) || २५
|-
| २२. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (७-३-१९३०) || २५
|-
| २३. || वक्तव्य : वल्लभभाई पटेलकी गिरफ्तारीपर (७-३-१९३०) || २६
|-
| २४. || तार : जॉन हेनीज होम्सको (७-३-१९३० या उसके पश्चात्) || २६
|-
| २५. || एक पुस्तककी प्रस्तावना (८-३-१९३०) || २७
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ऋतु मिश्रा
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|-
| || || पृष्ठ
|-
| || भूमिका || पाँच
|-
| || आभार || तेरह
|-
| || पाठकोंको सूचना || पंद्रह
|-
| १. || वक्तव्य : अहमदाबाद मजदूरोंके झगड़ेके सम्बन्धमें (१६-१०-१९२९) || १
|-
| २. || पत्र : महादेव देसाईको (१६-१०-१९२९) || २
|-
| ३. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१६-१०-१९२९) || ३
|-
| ४. || क्या यह ग्राम सुधार है? (१७-१०-१९२९) || ३
|-
| ५. || स्त्रियोंका स्थान (१७-१०-१९२९) || ४
|-
| ६. || मेरी चुप्पी (१७-१०-१९२९) || ७
|-
| ७. || भारतके अर्थशास्त्रका पाठ्यक्रम (१७-१०-१९२९) || ८
|-
| ८. || स्वयंसेवकका कर्त्तव्य (१७-१०-१९२९) || ९
|-
| ९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१७-१०-१९२९) || १०
|-
| १०. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१७-१०-१९२९) || ११
|-
| ११. || सन्देश : 'द इंडियन लेबर जर्नल'को (१८-१०-१९२९)|| १२
|-
| १२. || पत्र : बी॰ एस॰ गोपालरावको (१८-१०-१९२९) || १२
|-
| १३. || पत्र : सी॰ पी॰ दासको (१८-१०-१९२९) || १३
|-
| १४. || पत्र : पी॰ रंगनाथको (१८-१०-१९२९) || १४
|-
| १५. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१८-१०-१९२९) || १४
|-
| १६. || पत्र : ए॰ सुब्बैयाको (१८-१०-१९२९) || १५
|-
| १७. || पत्र : कटेश्वर प्रसाद पाण्डेको (१८-१०-१९२९) || १६
|-
| १८. || पत्र : मुहम्मद आदिल अब्बासीको (१८-१०-१९२९) || १६
|-
| १९. || पत्र : पी॰ जी॰ मैथ्यूको (१८-१०-१९२९) || १७
|-
| २०. || पत्र : ना॰ रा॰ मलकानीको (१८-१०-१९२९) || १७
|-
| २१. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१८-१०-१९२९) || १८
|-
| २२. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (१९-१०-१९२९) || १९
|-
| २३. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-१०-१९२९) || १९
|-
| २४. || पत्र : के॰ श्रीनिवासनको (१९-१०-१९२९) || २०
|-
| २५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-१०-१९२९) || २१
|-
| २६. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || २१
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ऋतु मिश्रा
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|-
| २७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २८. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २३
|-
| ३०. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २६
|-
| ३१. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २७
|-
| ३२. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २७
|-
| ३३. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २८
|-
| ३४. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २९
|-
| ३५. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २९
|-
| ३६. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१७-१०-१९२९) || ३०
|-
| ३७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९)|| ३०
|-
| ३८. || पत्र : बी॰ एस॰ गोपालरावको (१८-१०-१९२९) || ३१
|-
| ३९. || पत्र : सी॰ पी॰ दासको (१८-१०-१९२९) || ३२
|-
| ४०. || पत्र : पी॰ रंगनाथको (१८-१०-१९२९) || ३३
|-
| ४१. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१८-१०-१९२९) || ३३
|-
| ४२. || पत्र : ए॰ सुब्बैयाको (१८-१०-१९२९) || ३४
|-
| ४३. || पत्र : कटेश्वर प्रसाद पाण्डेको (१८-१०-१९२९) || ३५
|-
| ४४. || पत्र : मुहम्मद आदिल अब्बासीको (१८-१०-१९२९) || ३५
|-
| ४५. || पत्र : पी॰ जी॰ मैथ्यूको (१८-१०-१९२९) || ३६
|-
| ४६. || पत्र : ना॰ रा॰ मलकानीको (१८-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१८-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४८. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (१९-१०-१९२९) || ३८
|-
| ४९. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-१०-१९२९) || ३८
|-
| ५०. || पत्र : के॰ श्रीनिवासनको (१९-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५१. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५२. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४२
|-
| ५३. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४२
|-
| ५४. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४५
|-
| ५५. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४६
|-
| ५६. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४७
|-
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|-
| ५८. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४९
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
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|
|-
| २७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २८. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २९. || विचारोंकी अराजकता (२०-१०-१९२९) || २३
|-
| ३०. || पत्र : जे॰ पी॰ भणसालीको (२१-१०-१९२९) || २६
|-
| ३१. || पत्र : जमनालाल बजाजको (२१-१०-१९२९) || २७
|-
| ३२. || पत्र : महादेव देसाईको (२१-१०-१९२९) || २७
|-
| ३३. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२१-१०-१९२९) || २८
|-
| ३४. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२१-१०-१९२९) || २९
|-
| ३५. || पत्र : मूलचन्द अग्रवालको (२१-१०-१९२९) || २९
|-
| ३६. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (२१-१०-१९२९) || ३०
|-
| ३७. || पत्र : गिरिराजकिशोरको (२२-१०-१९२९)|| ३०
|-
| ३८. || पत्र : आर॰ थडानीको (२२-१०-१९२९) || ३१
|-
| ३९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२२-१०-१९२९) || ३२
|-
| ४०. || पत्र : पी॰ रंगनाथको (१८-१०-१९२९) || ३३
|-
| ४१. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१८-१०-१९२९) || ३३
|-
| ४२. || पत्र : ए॰ सुब्बैयाको (१८-१०-१९२९) || ३४
|-
| ४३. || पत्र : कटेश्वर प्रसाद पाण्डेको (१८-१०-१९२९) || ३५
|-
| ४४. || पत्र : मुहम्मद आदिल अब्बासीको (१८-१०-१९२९) || ३५
|-
| ४५. || पत्र : पी॰ जी॰ मैथ्यूको (१८-१०-१९२९) || ३६
|-
| ४६. || पत्र : ना॰ रा॰ मलकानीको (१८-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१८-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४८. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (१९-१०-१९२९) || ३८
|-
| ४९. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-१०-१९२९) || ३८
|-
| ५०. || पत्र : के॰ श्रीनिवासनको (१९-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५१. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५२. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४२
|-
| ५३. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४२
|-
| ५४. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४५
|-
| ५५. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४६
|-
| ५६. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४७
|-
| ५७. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४८
|-
| ५८. || पत्र : महादेव देसाईको (१९-१०-१९२९) || ४९
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| २७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २८. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २९. || विचारोंकी अराजकता (२०-१०-१९२९) || २३
|-
| ३०. || पत्र : जे॰ पी॰ भणसालीको (२१-१०-१९२९) || २६
|-
| ३१. || पत्र : जमनालाल बजाजको (२१-१०-१९२९) || २७
|-
| ३२. || पत्र : महादेव देसाईको (२१-१०-१९२९) || २७
|-
| ३३. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२१-१०-१९२९) || २८
|-
| ३४. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२१-१०-१९२९) || २९
|-
| ३५. || पत्र : मूलचन्द अग्रवालको (२१-१०-१९२९) || २९
|-
| ३६. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (२१-१०-१९२९) || ३०
|-
| ३७. || पत्र : गिरिराजकिशोरको (२२-१०-१९२९)|| ३०
|-
| ३८. || पत्र : आर॰ थडानीको (२२-१०-१९२९) || ३१
|-
| ३९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२२-१०-१९२९) || ३२
|-
| ४०. || पत्र : मोहनलाल भट्टको (२२-१०-१९२९) || ३३
|-
| ४१. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२२-१०-१९२९) || ३३
|-
| ४२. || पत्र : गुलजारीलाल नन्दाको (२३-१०-१९२९) || ३४
|-
| ४३. || पत्र : कन्नूमलको (२३-१०-१९२९) || ३५
|-
| ४४. || पत्र : हरचरणलाल वर्मनको (२३-१०-१९२९) || ३५
|-
| ४५. || पत्र : कोण्डा वेंकटप्पैयाको (२३-१०-१९२९) || ३६
|-
| ४६. || पत्र : सरकारी तार जाँच कार्यालय, कलकत्ताके अधीक्षकको (२३-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४७. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (२३-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४८. || पत्र : महादेव देसाईको (२३-१०-१९२९) || ३८
|-
| ४९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२३-१०-१९२९) || ३८
|-
| ५०. || पशुपालनका आर्थिक महत्त्व (२४-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५१. || निर्वाचित बोर्ड (२४-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५२. || लालाजीकी पुण्यतिथि (२४-१०-१९२९) || ४२
|-
| ५३. || संयुक्त प्रान्तका दौरा – ६ (२४-१०-१९२९) || ४२
|-
| ५४. || स्वयंसेवक या सरकार? (२४-१०-१९२९) || ४५
|-
| ५५. || पत्र : हेमन्त के॰ चटर्जीको (२४-१०-१९२९) || ४६
|-
| ५६. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२४-१०-१९२९) || ४७
|-
| ५७. || पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको (२५-१०-१९२९) || ४८
|-
| ५८. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२५-१०-१९२९) || ४९
|-
| ५९. || पत्र : माधवजी वी॰ ठक्करको (२६-१०-१९२९) || ५०
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{C|अठारह}}</noinclude>
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|
|-
| २७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २८. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २९. || विचारोंकी अराजकता (२०-१०-१९२९) || २३
|-
| ३०. || पत्र : जे॰ पी॰ भणसालीको (२१-१०-१९२९) || २६
|-
| ३१. || पत्र : जमनालाल बजाजको (२१-१०-१९२९) || २७
|-
| ३२. || पत्र : महादेव देसाईको (२१-१०-१९२९) || २७
|-
| ३३. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२१-१०-१९२९) || २८
|-
| ३४. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२१-१०-१९२९) || २९
|-
| ३५. || पत्र : मूलचन्द अग्रवालको (२१-१०-१९२९) || २९
|-
| ३६. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (२१-१०-१९२९) || ३०
|-
| ३७. || पत्र : गिरिराजकिशोरको (२२-१०-१९२९)|| ३०
|-
| ३८. || पत्र : आर॰ थडानीको (२२-१०-१९२९) || ३१
|-
| ३९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२२-१०-१९२९) || ३२
|-
| ४०. || पत्र : मोहनलाल भट्टको (२२-१०-१९२९) || ३३
|-
| ४१. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२२-१०-१९२९) || ३३
|-
| ४२. || पत्र : गुलजारीलाल नन्दाको (२३-१०-१९२९) || ३४
|-
| ४३. || पत्र : कन्नूमलको (२३-१०-१९२९) || ३५
|-
| ४४. || पत्र : हरचरणलाल वर्मनको (२३-१०-१९२९) || ३५
|-
| ४५. || पत्र : कोण्डा वेंकटप्पैयाको (२३-१०-१९२९) || ३६
|-
| ४६. || पत्र : सरकारी तार जाँच कार्यालय, कलकत्ताके अधीक्षकको (२३-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४७. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (२३-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४८. || पत्र : महादेव देसाईको (२३-१०-१९२९) || ३८
|-
| ४९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२३-१०-१९२९) || ३८
|-
| ५०. || पशुपालनका आर्थिक महत्त्व (२४-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५१. || निर्वाचित बोर्ड (२४-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५२. || लालाजीकी पुण्यतिथि (२४-१०-१९२९) || ४२
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| ५३. || संयुक्त प्रान्तका दौरा – ६ (२४-१०-१९२९) || ४२
|-
| ५४. || स्वयंसेवक या सरकार? (२४-१०-१९२९) || ४५
|-
| ५५. || पत्र : हेमन्त के॰ चटर्जीको (२४-१०-१९२९) || ४६
|-
| ५६. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२४-१०-१९२९) || ४७
|-
| ५७. || पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको (२५-१०-१९२९) || ४८
|-
| ५८. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२५-१०-१९२९) || ४९
|-
| ५९. || पत्र : माधवजी वी॰ ठक्करको (२६-१०-१९२९) || ५०
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ऋतु मिश्रा
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| २७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २२
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| २८. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-१०-१९२९) || २२
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| २९. || विचारोंकी अराजकता (२०-१०-१९२९) || २३
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| ३०. || पत्र : जे॰ पी॰ भणसालीको (२१-१०-१९२९) || २६
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|-
| ३६. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (२१-१०-१९२९) || ३०
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| ३८. || पत्र : आर॰ थडानीको (२२-१०-१९२९) || ३१
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| ३९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२२-१०-१९२९) || ३२
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| ४२. || पत्र : गुलजारीलाल नन्दाको (२३-१०-१९२९) || ३४
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|-
| ४६. || पत्र : सरकारी तार जाँच कार्यालय, कलकत्ताके अधीक्षकको (२३-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४७. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (२३-१०-१९२९) || ३७
|-
| ४८. || पत्र : महादेव देसाईको (२३-१०-१९२९) || ३८
|-
| ४९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२३-१०-१९२९) || ३८
|-
| ५०. || पशुपालनका आर्थिक महत्त्व (२४-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५१. || निर्वाचित बोर्ड (२४-१०-१९२९) || ३९
|-
| ५२. || लालाजीकी पुण्यतिथि (२४-१०-१९२९) || ४२
|-
| ५३. || संयुक्त प्रान्तका दौरा – ६ (२४-१०-१९२९) || ४२
|-
| ५४. || स्वयंसेवक या सरकार? (२४-१०-१९२९) || ४५
|-
| ५५. || पत्र : हेमन्त के॰ चटर्जीको (२४-१०-१९२९) || ४६
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ऋतु मिश्रा
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|-
| ६०. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २२
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| ६१. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-१०-१९२९) || २२
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| ६२. || विचारोंकी अराजकता (२०-१०-१९२९) || २३
|-
| ६३. || पत्र : जे॰ पी॰ भणसालीको (२१-१०-१९२९) || २६
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|-
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| २७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २८. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-१०-१९२९) || २२
|-
| २९. || विचारोंकी अराजकता (२०-१०-१९२९) || २३
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|-
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| ५२. || लालाजीकी पुण्यतिथि (२४-१०-१९२९) || ४२
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| ५३. || संयुक्त प्रान्तका दौरा – ६ (२४-१०-१९२९) || ४२
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| ५४. || स्वयंसेवक या सरकार? (२४-१०-१९२९) || ४५
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|-
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|-
| ६०. || पत्र : जमनादास गांधीको (२६-१०-१९२९) || ५१
|-
| ६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२६-१०-१९२९) || ५१
|-
| ६२. || आश्यर्चजनक परिणाम (२७-१०-१९२९) || ५२
|-
| ६३. || पत्र : फूलचन्द के॰ शाहको (२७-१०-१९२९) || ५८
|-
| ६४. || पत्र : रावजीभाई मणिभाई पटेलको (२७-१०-१९२९) || ५९
|-
| ६५. || मेरठ षड्यन्त्रके कैदियोंसे बातचीत (२७-१०-१९२९) || ६०
|-
| ६६. || भाषण : मेरठकी सार्वजनिक सभामें (२७-१०-१९२९) || ६२
|-
| ६७. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (२८-१०-१९२९) || ६३
|-
| ६८. || पत्र : रामनरेश त्रिपाठीको (२८-१०-१९२९) || ६४
|-
| ६९. || पत्र : कृष्णनको (२८-१०-१९२९) || ६५
|-
| ७०. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२८-१०-१९२९)|| ६६
|-
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|-
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|-
| ७३. || पत्र : मोहनलाल भट्टको (२२-१०-१९२९) || ६८
|-
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|-
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|-
| ७६. || पत्र : कन्नूमलको (२३-१०-१९२९) || ७१
|-
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|-
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|-
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|-
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|-
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|-
| ८३. || पशुपालनका आर्थिक महत्त्व (२४-१०-१९२९) || ७८
|-
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|-
| ८५. || लालाजीकी पुण्यतिथि (२४-१०-१९२९) || ८१
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|-
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|-
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ऋतु मिश्रा
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|-
| ६०. || पत्र : जमनादास गांधीको (२६-१०-१९२९) || ५१
|-
| ६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२६-१०-१९२९) || ५१
|-
| ६२. || आश्यर्चजनक परिणाम (२७-१०-१९२९) || ५२
|-
| ६३. || पत्र : फूलचन्द के॰ शाहको (२७-१०-१९२९) || ५८
|-
| ६४. || पत्र : रावजीभाई मणिभाई पटेलको (२७-१०-१९२९) || ५९
|-
| ६५. || मेरठ षड्यन्त्रके कैदियोंसे बातचीत (२७-१०-१९२९) || ६०
|-
| ६६. || भाषण : मेरठकी सार्वजनिक सभामें (२७-१०-१९२९) || ६२
|-
| ६७. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (२८-१०-१९२९) || ६३
|-
| ६८. || पत्र : रामनरेश त्रिपाठीको (२८-१०-१९२९) || ६४
|-
| ६९. || पत्र : कृष्णनको (२८-१०-१९२९) || ६५
|-
| ७०. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२८-१०-१९२९)|| ६६
|-
| ७१. || पत्र : महादेव देसाईको (२८-१०-१९२९) || ६६
|-
| ७२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२८-१०-१९२९) || ६७
|-
| ७३. || पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२८-१०-१९२९) || ६८
|-
| ७४. || भेंट : समाचारपत्रोंको (२८-१०-१९२९) || ६८
|-
| ७५. || भाषण : मेरठ कालेज, मेरठमें (२८-१०-१९२९) || ६९
|-
| ७६. || पत्र : सैयद रौस मसूदको (२९-१०-१९२९) || ७१
|-
| ७७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२९-१०-१९२९) || ७१
|-
| ७८. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२९-१०-१९२९) || ७२
|-
| ७९. || पत्र : बी॰ एल॰ रलियारामको (३०-१०-१९२९) || ७२
|-
| ८०. || पत्र : के॰ एस॰ सुब्रह्मण्यम् को (३०-१०-१९२९) || ७३
|-
| ८१. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३०-१०-१९२९) || ७४
|-
| ८२. || संयुक्त प्रान्तका दौरा – ७ (३१-१०-१९२९) || ७४
|-
| ८३. || अकालमें सहायताका साधन चरखा (३१-१०-१९२९) || ७८
|-
| ८४. || टिप्पणियाँ : अहिंसा बनाम कायरता; रक्षा कौन करे?; लम्पटताका विज्ञापन; एक भूल सुधार (३१-१०-१९२९) || ८०
|-
| ८५. || एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र (३१-१०-१९२९) || ८१
|-
| ८६. || भौतिक और नैतिक गन्दगी (३१-१०-१९२९) || ८१
|-
| ८७. || स्वयंसेवक या सरकार? (२४-१०-१९२९) || ८३
|-
| ८८. || पत्र : हेमन्त के॰ चटर्जीको (२४-१०-१९२९) || ८४
|-
| ८९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२४-१०-१९२९) || ८५
|-
| ९०. || पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको (२५-१०-१९२९) || ८६
|-
| ९१. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२५-१०-१९२९) || ८७
|-
| ९२. || पत्र : माधवजी वी॰ ठक्करको (२६-१०-१९२९) || ८८
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ऋतु मिश्रा
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|-
| ६०. || पत्र : जमनादास गांधीको (२६-१०-१९२९) || ५१
|-
| ६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२६-१०-१९२९) || ५१
|-
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|-
| ६३. || पत्र : फूलचन्द के॰ शाहको (२७-१०-१९२९) || ५८
|-
| ६४. || पत्र : रावजीभाई मणिभाई पटेलको (२७-१०-१९२९) || ५९
|-
| ६५. || मेरठ षड्यन्त्रके कैदियोंसे बातचीत (२७-१०-१९२९) || ६०
|-
| ६६. || भाषण : मेरठकी सार्वजनिक सभामें (२७-१०-१९२९) || ६२
|-
| ६७. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (२८-१०-१९२९) || ६३
|-
| ६८. || पत्र : रामनरेश त्रिपाठीको (२८-१०-१९२९) || ६४
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| ६९. || पत्र : कृष्णनको (२८-१०-१९२९) || ६५
|-
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| ७१. || पत्र : महादेव देसाईको (२८-१०-१९२९) || ६६
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| ७२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२८-१०-१९२९) || ६७
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| ७३. || पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२८-१०-१९२९) || ६८
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| ७४. || भेंट : समाचारपत्रोंको (२८-१०-१९२९) || ६८
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| ७५. || भाषण : मेरठ कालेज, मेरठमें (२८-१०-१९२९) || ६९
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| ७६. || पत्र : सैयद रौस मसूदको (२९-१०-१९२९) || ७१
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| ८३. || अकालमें सहायताका साधन चरखा (३१-१०-१९२९) || ७८
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| ८४. || टिप्पणियाँ : अहिंसा बनाम कायरता; रक्षा कौन करे?; लम्पटताका विज्ञापन; एक भूल सुधार (३१-१०-१९२९) || ८०
|-
| ८५. || एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र (३१-१०-१९२९) || ८१
|-
| ८६. || भौतिक और नैतिक गन्दगी (३१-१०-१९२९) || ८१
|-
| ८७. || स्वयंसेवक या सरकार? (२४-१०-१९२९) || ८३
|-
| ८८. || पत्र : हेमन्त के॰ चटर्जीको (२४-१०-१९२९) || ८४
|-
| ८९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२४-१०-१९२९) || ८५
|-
| ९०. || पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको (२५-१०-१९२९) || ८६
|-
| ९१. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२५-१०-१९२९) || ८७
|-
| ९२. || पत्र : माधवजी वी॰ ठक्करको (२६-१०-१९२९) || ८८
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| ६०. || पत्र : जमनादास गांधीको (२६-१०-१९२९) || ५१
|-
| ६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२६-१०-१९२९) || ५१
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| ६२. || आश्यर्चजनक परिणाम (२७-१०-१९२९) || ५२
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| ६३. || पत्र : फूलचन्द के॰ शाहको (२७-१०-१९२९) || ५८
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| ६४. || पत्र : रावजीभाई मणिभाई पटेलको (२७-१०-१९२९) || ५९
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| ६५. || मेरठ षड्यन्त्रके कैदियोंसे बातचीत (२७-१०-१९२९) || ६०
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| ६६. || भाषण : मेरठकी सार्वजनिक सभामें (२७-१०-१९२९) || ६२
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| ६७. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (२८-१०-१९२९) || ६३
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| ६८. || पत्र : रामनरेश त्रिपाठीको (२८-१०-१९२९) || ६४
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| ६९. || पत्र : कृष्णनको (२८-१०-१९२९) || ६५
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| ७०. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२८-१०-१९२९)|| ६६
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| ७१. || पत्र : महादेव देसाईको (२८-१०-१९२९) || ६६
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| ७२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२८-१०-१९२९) || ६७
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| ७३. || पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२८-१०-१९२९) || ६८
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| ७४. || भेंट : समाचारपत्रोंको (२८-१०-१९२९) || ६८
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| ७५. || भाषण : मेरठ कालेज, मेरठमें (२८-१०-१९२९) || ६९
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| ७६. || पत्र : सैयद रौस मसूदको (२९-१०-१९२९) || ७१
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| ७७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२९-१०-१९२९) || ७१
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| ७८. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२९-१०-१९२९) || ७२
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| ७९. || पत्र : बी॰ एल॰ रलियारामको (३०-१०-१९२९) || ७२
|-
| ८०. || पत्र : के॰ एस॰ सुब्रह्मण्यम् को (३०-१०-१९२९) || ७३
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| ८१. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३०-१०-१९२९) || ७४
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| ८२. || संयुक्त प्रान्तका दौरा – ७ (३१-१०-१९२९) || ७४
|-
| ८३. || अकालमें सहायताका साधन चरखा (३१-१०-१९२९) || ७८
|-
| ८४. || टिप्पणियाँ : अहिंसा बनाम कायरता; रक्षा कौन करे?; लम्पटताका विज्ञापन; एक भूल सुधार (३१-१०-१९२९) || ८०
|-
| ८५. || एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र (३१-१०-१९२९) || ८१
|-
| ८६. || भौतिक और नैतिक गन्दगी (३१-१०-१९२९) || ८१
|-
| ८७. || ऊँच-नीच (३१-१०-१९२९) || ८३
|-
| ८८. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || ८४
|-
| ८९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || ८५
|-
| ९०. || सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य (२-११-१९२९) || ८६
|-
| ९१. || भाषण : नागरिक अभिनन्दन समारोह, दिल्लीमें (२-११-१९२९) || ८७
|-
| ९२. || भाषण : सार्वजनिक सभा, दिल्लीमें (२-११-१९२९) || ८८
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| ६०. || पत्र : जमनादास गांधीको (२६-१०-१९२९) || ५१
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| ६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२६-१०-१९२९) || ५१
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| ६२. || आश्यर्चजनक परिणाम (२७-१०-१९२९) || ५२
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| ६४. || पत्र : रावजीभाई मणिभाई पटेलको (२७-१०-१९२९) || ५९
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| ७४. || भेंट : समाचारपत्रोंको (२८-१०-१९२९) || ६८
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| ८१. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३०-१०-१९२९) || ७४
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| ८३. || अकालमें सहायताका साधन चरखा (३१-१०-१९२९) || ७८
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| ८४. || टिप्पणियाँ : अहिंसा बनाम कायरता; रक्षा कौन करे?; लम्पटताका विज्ञापन; एक भूल सुधार (३१-१०-१९२९) || ८०
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| ८५. || एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र (३१-१०-१९२९) || ८१
|-
| ८६. || भौतिक और नैतिक गन्दगी (३१-१०-१९२९) || ८१
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| ८७. || ऊँच-नीच (३१-१०-१९२९) || ८३
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| ८८. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || ८४
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| ८९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || ८५
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| ९०. || सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य (२-११-१९२९) || ८६
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| ९१. || भाषण : नागरिक अभिनन्दन समारोह, दिल्लीमें (२-११-१९२९) || ८७
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| ९३. || शुष्क 'नवजीवन'? (३-११-१९२९) || ९०
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| ६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२६-१०-१९२९) || ५१
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| ६२. || आश्यर्चजनक परिणाम (२७-१०-१९२९) || ५२
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| ८३. || अकालमें सहायताका साधन चरखा (३१-१०-१९२९) || ७८
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| ८४. || टिप्पणियाँ : अहिंसा बनाम कायरता; रक्षा कौन करे?; लम्पटताका विज्ञापन; एक भूल सुधार (३१-१०-१९२९) || ८०
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| ८५. || एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र (३१-१०-१९२९) || ८१
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| ८६. || भौतिक और नैतिक गन्दगी (३१-१०-१९२९) || ८१
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| ८७. || ऊँच-नीच (३१-१०-१९२९) || ८३
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| ८८. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || ८४
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| ८९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || ८५
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| ९०. || सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य (२-११-१९२९) || ८६
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| ९१. || भाषण : नागरिक अभिनन्दन समारोह, दिल्लीमें (२-११-१९२९) || ८७
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| ९३. || शुष्क 'नवजीवन'? (३-११-१९२९) || ९०
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| ९४. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२६-१०-१९२९) || ९२
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| ९५. || आश्यर्चजनक परिणाम (२७-१०-१९२९) || ९३
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| ९९. || भाषण : मेरठकी सार्वजनिक सभामें (२७-१०-१९२९) || ९५
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| १००. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (२८-१०-१९२९) || ९६
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|-
| ११७. || टिप्पणियाँ : अहिंसा बनाम कायरता; रक्षा कौन करे?; लम्पटताका विज्ञापन; एक भूल सुधार (३१-१०-१९२९) || १०८
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| ११८. || एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र (३१-१०-१९२९) || १०८
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| ११९. || भौतिक और नैतिक गन्दगी (३१-१०-१९२९) || १०९
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| ९३. || शुष्क 'नवजीवन'? (३-११-१९२९) || ९०
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| ९४. || टिप्पणी : हर्षोन्मत्त ठक्कर बापा (३-११-१९२९) || ९२
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| ९५. || तार : 'डेली एक्सप्रेस'को (३-११-१९२९) || ९३
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| ९६. || पत्र : एस॰ शंकरको (३-११-१९२९) || ९३
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| ९७. || पत्र : एच॰ डब्ल्यू॰ बी॰ मोरेनोको (३-११-१९२९) || ९४
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| ९८. || पत्र : गोविन्द मिश्रको (३-११-१९२९) || ९५
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| ९९. || पत्र : सी॰ पी॰ मैथ्यूको (३-११-१९२९) || ९५
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| १००. || पत्र : बी॰ शिवा रावको (३-११-१९२९) || ९६
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| १०१. || पत्र : पापमा रुक्मिणीको (३-११-१९२९) || ९७
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| १०२. || पत्र : एस॰ महादेव जोशीको (३-११-१९२९) || ९७
|-
| १०३. || पत्र : ज्ञा॰ मो॰ सरकारको (३-११-१९२९)|| ९८
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| १०४. || पत्र : सी॰ हनुमन्त रावको (३-११-१९२९) || ९९
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| १०५. || पत्र : डा॰ गोपीचन्दको (३-११-१९२९) || ९९
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| १०६. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (३-११-१९२९) || १००
|-
| १०७. || पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (३-११-१९२९) || १०१
|-
| १०८. || भाषण : मेरठ कालेज, मेरठमें (२८-१०-१९२९) || १०२
|-
| १०९. || पत्र : सैयद रौस मसूदको (२९-१०-१९२९) || १०२
|-
| ११०. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२९-१०-१९२९) || १०३
|-
| १११. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२९-१०-१९२९) || १०४
|-
| ११२. || पत्र : बी॰ एल॰ रलियारामको (३०-१०-१९२९) || १०४
|-
| ११३. || पत्र : के॰ एस॰ सुब्रह्मण्यम् को (३०-१०-१९२९) || १०५
|-
| ११४. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३०-१०-१९२९) || १०५
|-
| ११५. || संयुक्त प्रान्तका दौरा – ७ (३१-१०-१९२९) || १०६
|-
| ११६. || अकालमें सहायताका साधन चरखा (३१-१०-१९२९) || १०७
|-
| ११७. || टिप्पणियाँ : अहिंसा बनाम कायरता; रक्षा कौन करे?; लम्पटताका विज्ञापन; एक भूल सुधार (३१-१०-१९२९) || १०८
|-
| ११८. || एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र (३१-१०-१९२९) || १०८
|-
| ११९. || भौतिक और नैतिक गन्दगी (३१-१०-१९२९) || १०९
|-
| १२०. || ऊँच-नीच (३१-१०-१९२९) || १०९
|-
| १२१. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || ११०
|-
| १२२. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || १११
|-
| १२३. || सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य (२-११-१९२९) || ११२
|-
| १२४. || भाषण : नागरिक अभिनन्दन समारोह, दिल्लीमें (२-११-१९२९) || ११५
|-
| १२५. || भाषण : सार्वजनिक सभा, दिल्लीमें (२-११-१९२९) || ११६
|-
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| ९३. || शुष्क 'नवजीवन'? (३-११-१९२९) || ९०
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| ९४. || टिप्पणी : हर्षोन्मत्त ठक्कर बापा (३-११-१९२९) || ९२
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| ९५. || तार : 'डेली एक्सप्रेस'को (३-११-१९२९) || ९३
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| ९६. || पत्र : एस॰ शंकरको (३-११-१९२९) || ९३
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| १००. || पत्र : बी॰ शिवा रावको (३-११-१९२९) || ९६
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| १०२. || पत्र : एस॰ महादेव जोशीको (३-११-१९२९) || ९७
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| १०३. || पत्र : ज्ञा॰ मो॰ सरकारको (३-११-१९२९)|| ९८
|-
| १०४. || पत्र : सी॰ हनुमन्त रावको (३-११-१९२९) || ९९
|-
| १०५. || पत्र : डा॰ गोपीचन्दको (३-११-१९२९) || ९९
|-
| १०६. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (३-११-१९२९) || १००
|-
| १०७. || पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (३-११-१९२९) || १०१
|-
| १०८. || भाषण : मेरठ कालेज, मेरठमें (२८-१०-१९२९) || १०२
|-
| १०९. || पत्र : सैयद रौस मसूदको (२९-१०-१९२९) || १०२
|-
| ११०. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२९-१०-१९२९) || १०३
|-
| १११. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२९-१०-१९२९) || १०४
|-
| ११२. || पत्र : बी॰ एल॰ रलियारामको (३०-१०-१९२९) || १०४
|-
| ११३. || पत्र : के॰ एस॰ सुब्रह्मण्यम् को (३०-१०-१९२९) || १०५
|-
| ११४. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३०-१०-१९२९) || १०५
|-
| ११५. || संयुक्त प्रान्तका दौरा – ७ (३१-१०-१९२९) || १०६
|-
| ११६. || अकालमें सहायताका साधन चरखा (३१-१०-१९२९) || १०७
|-
| ११७. || टिप्पणियाँ : अहिंसा बनाम कायरता; रक्षा कौन करे?; लम्पटताका विज्ञापन; एक भूल सुधार (३१-१०-१९२९) || १०८
|-
| ११८. || एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र (३१-१०-१९२९) || १०८
|-
| ११९. || भौतिक और नैतिक गन्दगी (३१-१०-१९२९) || १०९
|-
| १२०. || ऊँच-नीच (३१-१०-१९२९) || १०९
|-
| १२१. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || ११०
|-
| १२२. || पत्र : छगनलाल जोशीको (३१-१०-१९२९) || १११
|-
| १२३. || सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य (२-११-१९२९) || ११२
|-
| १२४. || भाषण : नागरिक अभिनन्दन समारोह, दिल्लीमें (२-११-१९२९) || ११५
|-
| १२५. || भाषण : सार्वजनिक सभा, दिल्लीमें (२-११-१९२९) || ११६
|-
| १२६. || भाषण : सार्वजनिक सभा, दिल्लीमें (२-११-१९२९) || ११९
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|-
| ९३. || शुष्क 'नवजीवन'? (३-११-१९२९) || ९०
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| ९४. || टिप्पणी : हर्षोन्मत्त ठक्कर बापा (३-११-१९२९) || ९२
|-
| ९५. || तार : 'डेली एक्सप्रेस'को (३-११-१९२९) || ९३
|-
| ९६. || पत्र : एस॰ शंकरको (३-११-१९२९) || ९३
|-
| ९७. || पत्र : एच॰ डब्ल्यू॰ बी॰ मोरेनोको (३-११-१९२९) || ९४
|-
| ९८. || पत्र : गोविन्द मिश्रको (३-११-१९२९) || ९५
|-
| ९९. || पत्र : सी॰ पी॰ मैथ्यूको (३-११-१९२९) || ९५
|-
| १००. || पत्र : बी॰ शिवा रावको (३-११-१९२९) || ९६
|-
| १०१. || पत्र : पापमा रुक्मिणीको (३-११-१९२९) || ९७
|-
| १०२. || पत्र : एस॰ महादेव जोशीको (३-११-१९२९) || ९७
|-
| १०३. || पत्र : ज्ञा॰ मो॰ सरकारको (३-११-१९२९)|| ९८
|-
| १०४. || पत्र : सी॰ हनुमन्त रावको (३-११-१९२९) || ९९
|-
| १०५. || पत्र : डा॰ गोपीचन्दको (३-११-१९२९) || ९९
|-
| १०६. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (३-११-१९२९) || १००
|-
| १०७. || पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (३-११-१९२९) || १०१
|-
| १०८. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (४-११-१९२९) || १०२
|-
| १०९. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (४-११-१९२९) || १०२
|-
| ११०. || पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (४-११-१९२९) || १०३
|-
| १११. || पत्र : पन्नालाल झवेरीको (४-११-१९२९) || १०४
|-
| ११२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (४-११-१९२९) || १०४
|-
| ११३. || पत्र : फूलचन्द के॰ शाहको (४-११-१९२९) || १०५
|-
| ११४. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (४-११-१९२९) || १०५
|-
| ११५. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (४-११-१९२९) || १०६
|-
| ११६. || भाषण : मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़में (४-११-१९२९) || १०७
|-
| ११७. || नारायण मोरेश्वर खरेको (५-११-१९२९) || १०८
|-
| ११८. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (५-११-१९२९) || १०८
|-
| ११९. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (६-११-१९२९) || १०९
|-
| १२०. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (६-११-१९२९) || १०९
|-
| १२१. || पत्र : रावजीभाई एम॰ पटेलको (६-११-१९२९) || ११०
|-
| १२२. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (६-११-१९२९) || १११
|-
| १२३. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — ८ (७-११-१९२९) || ११२
|-
| १२४. || नवयुवक क्या करें? (७-११-१९२९) || ११५
|-
| १२५. || खादी मताधिकार (७-११-१९२९) || ११६
|-
| १२६. || एक हो जाइए (७-११-१९२९) || ११९
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| १२७. || टिप्पणी : क्या यह सच है? (७-११-१९२९) || ११९
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| १२८. || टिप्पणी : हर्षोन्मत्त ठक्कर बापा (३-११-१९२९) || ९२
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| १२९. || तार : 'डेली एक्सप्रेस'को (३-११-१९२९) || ९३
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| ९६. || पत्र : एस॰ शंकरको (३-११-१९२९) || ९३
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| ९७. || पत्र : एच॰ डब्ल्यू॰ बी॰ मोरेनोको (३-११-१९२९) || ९४
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| ९८. || पत्र : गोविन्द मिश्रको (३-११-१९२९) || ९५
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| ९९. || पत्र : सी॰ पी॰ मैथ्यूको (३-११-१९२९) || ९५
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| १००. || पत्र : बी॰ शिवा रावको (३-११-१९२९) || ९६
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| १०१. || पत्र : पापमा रुक्मिणीको (३-११-१९२९) || ९७
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| १०२. || पत्र : एस॰ महादेव जोशीको (३-११-१९२९) || ९७
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| १०३. || पत्र : ज्ञा॰ मो॰ सरकारको (३-११-१९२९)|| ९८
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| १०४. || पत्र : सी॰ हनुमन्त रावको (३-११-१९२९) || ९९
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| १०५. || पत्र : डा॰ गोपीचन्दको (३-११-१९२९) || ९९
|-
| १०६. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (३-११-१९२९) || १००
|-
| १०७. || पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (३-११-१९२९) || १०१
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| १०८. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (४-११-१९२९) || १०२
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| १०९. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (४-११-१९२९) || १०२
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| ११०. || पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (४-११-१९२९) || १०३
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| १११. || पत्र : पन्नालाल झवेरीको (४-११-१९२९) || १०४
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| ११२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (४-११-१९२९) || १०४
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| ११४. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (४-११-१९२९) || १०५
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| ११५. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (४-११-१९२९) || १०६
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| ११६. || भाषण : मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़में (४-११-१९२९) || १०७
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| ११७. || नारायण मोरेश्वर खरेको (५-११-१९२९) || १०८
|-
| ११८. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (५-११-१९२९) || १०८
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| ११९. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (६-११-१९२९) || १०९
|-
| १२०. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (६-११-१९२९) || १०९
|-
| १२१. || पत्र : रावजीभाई एम॰ पटेलको (६-११-१९२९) || ११०
|-
| १२२. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (६-११-१९२९) || १११
|-
| १२३. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — ८ (७-११-१९२९) || ११२
|-
| १२४. || नवयुवक क्या करें? (७-११-१९२९) || ११५
|-
| १२५. || खादी मताधिकार (७-११-१९२९) || ११६
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| १२६. || एक हो जाइए (७-११-१९२९) || ११९
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| १२७. || टिप्पणी : क्या यह सच है? (७-११-१९२९) || ११९
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| १२८. || आत्मसंयमकी श्रेष्ठता (७-११-१९२९) || १२०
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| १२९. || राष्ट्रभाषा (७-११-१९२९) || १२१
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| १३०. || पत्र : मुहम्मद मुजीबको (७-११-१९२९) || १२२
|-
| १३१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (८-११-१९२९) || १२३
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| १३२. || पत्र : निधालाल निधीशको (८-११-१९२९) || १२४
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| १३३. || पत्र : मुहम्मद नसीमको (८-११-१९२९) || १२५
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| १३४. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (८-११-१९२९) || १२६
|-
| १३५. || पत्र : जमनालाल बजाजको (८-११-१९२९) || १२७
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| १३६. || पत्र : अल्बर्ट एम॰ टॉडको (८-११-१९२९) || १२७
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| १३७. || पत्र : गिरिराजकिशोरको (८-११-१९२९)|| १२८
|-
| १३८. || पत्र : पेन हेजलराटको (८-११-१९२९) || १२९
|-
| १३९. || पत्र : डा॰ गोपीचन्दको (३-११-१९२९) || १२९
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| १४०. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (३-११-१९२९) || १३०
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| १४१. || पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (३-११-१९२९) || १३०
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| १४२. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (४-११-१९२९) || १३१
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| १४३. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (४-११-१९२९) || १३१
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| १४४. || पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (४-११-१९२९) || १३२
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| १४७. || पत्र : फूलचन्द के॰ शाहको (४-११-१९२९) || १३३
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| १४८. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (४-११-१९२९) || १३४
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| १४९. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (४-११-१९२९) || १३५
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| १५०. || भाषण : मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़में (४-११-१९२९) || १३६
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| १५१. || नारायण मोरेश्वर खरेको (५-११-१९२९) || १३७
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| १५२. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (५-११-१९२९) || १३७
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| १५३. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (६-११-१९२९) || १३९
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| १५४. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (६-११-१९२९) || १४०
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| १५५. || पत्र : रावजीभाई एम॰ पटेलको (६-११-१९२९) || १४१
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| १५६. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (६-११-१९२९) || १४२
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| १५७. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — ८ (७-११-१९२९) || १४३
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| १५८. || नवयुवक क्या करें? (७-११-१९२९) || १४४
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| १५९. || खादी मताधिकार (७-११-१९२९) || १४५
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| १२७. || टिप्पणी : क्या यह सच है? (७-११-१९२९) || ११९
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| १२८. || आत्मसंयमकी श्रेष्ठता (७-११-१९२९) || १२०
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| १२९. || राष्ट्रभाषा (७-११-१९२९) || १२१
|-
| १३०. || पत्र : मुहम्मद मुजीबको (७-११-१९२९) || १२२
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| १३१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (८-११-१९२९) || १२३
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| १३२. || पत्र : निधालाल निधीशको (८-११-१९२९) || १२४
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| १३३. || पत्र : मुहम्मद नसीमको (८-११-१९२९) || १२५
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| १३४. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (८-११-१९२९) || १२६
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| १३७. || पत्र : गिरिराजकिशोरको (८-११-१९२९)|| १२८
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| १३८. || पत्र : पेन हेजलराटको (८-११-१९२९) || १२९
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| १३९. || पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (८-११-१९२९) || १२९
|-
| १४०. || पत्र : ए॰ ए॰ पालको (८-११-१९२९) || १३०
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| १४१. || पत्र : श्रीमती मोंक्रिफ स्मिथको (८-११-१९२९) || १३०
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| १४२. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (८-११-१९२९) || १३१
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| १४३. || पत्र : 'कैसर-ए-हिन्द'को (८-११-१९२९) || १३१
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| १४४. || पत्र : हिन्दुस्तानी सेवा दलके अवर सचिवको (८-११-१९२९) || १३२
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| १४५. || पत्र : के॰ सन्तानमको (८-११-१९२९) || १३२
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| १४६. || पत्र : ना॰ रा॰ मलकानीको (८-११-१९२९) || १३३
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| १४७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (८-११-१९२९) || १३३
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| १४८. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (८-११-१९२९) || १३४
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| १४९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (८-११-१९२९) || १३५
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| १५०. || पत्र : मथुरादास गांधीको (९-११-१९२९) || १३६
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| १५१. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (९-११-१९२९) || १३७
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| १५२. || बारडोलीकी भूल? (१०-११-१९२९) || १३७
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| १५३. || नवयुवक और खेती (१०-११-१९२९) || १३९
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| १५४. || टिप्पणियाँ : जापान का परिचय; इच्छा होते हुए भी अशक्त (१०-११-१९२९) || १४०
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| १५५. || सहयोगकी शर्तें (११-११-१९२९) || १४१
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| १५६. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (११-११-१९२९) || १४२
|-
| १५७. || पत्र : फूलचन्द के॰ शाहको (११-११-१९२९) || १४३
|-
| १५८. || पत्र : शारदाबहन शाहको (११-११-१९२९) || १४४
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| १६०. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (११-११-१९२९) || १४६
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| १६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (११-११-१९२९) || १४७
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| १२९. || राष्ट्रभाषा (७-११-१९२९) || १२१
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| १३०. || पत्र : मुहम्मद मुजीबको (७-११-१९२९) || १२२
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| १३१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (८-११-१९२९) || १२३
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| १३२. || पत्र : निधालाल निधीशको (८-११-१९२९) || १२४
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| १३३. || पत्र : मुहम्मद नसीमको (८-११-१९२९) || १२५
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| १३४. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (८-११-१९२९) || १२६
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| १३५. || पत्र : जमनालाल बजाजको (८-११-१९२९) || १२७
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| १३६. || पत्र : अल्बर्ट एम॰ टॉडको (८-११-१९२९) || १२७
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| १३७. || पत्र : गिरिराजकिशोरको (८-११-१९२९)|| १२८
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| १३८. || पत्र : पेन हेजलराटको (८-११-१९२९) || १२९
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| १३९. || पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (८-११-१९२९) || १२९
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| १४०. || पत्र : ए॰ ए॰ पालको (८-११-१९२९) || १३०
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| १४१. || पत्र : श्रीमती मोंक्रिफ स्मिथको (८-११-१९२९) || १३०
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| १४२. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (८-११-१९२९) || १३१
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| १४३. || पत्र : 'कैसर-ए-हिन्द'को (८-११-१९२९) || १३१
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| १४४. || पत्र : हिन्दुस्तानी सेवा दलके अवर सचिवको (८-११-१९२९) || १३२
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| १४५. || पत्र : के॰ सन्तानमको (८-११-१९२९) || १३२
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| १४६. || पत्र : ना॰ रा॰ मलकानीको (८-११-१९२९) || १३३
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| १४७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (८-११-१९२९) || १३३
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| १४८. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (८-११-१९२९) || १३४
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| १४९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (८-११-१९२९) || १३५
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| १५०. || पत्र : मथुरादास गांधीको (९-११-१९२९) || १३६
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| १५१. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (९-११-१९२९) || १३७
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| १५२. || बारडोलीकी भूल? (१०-११-१९२९) || १३७
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| १५३. || नवयुवक और खेती (१०-११-१९२९) || १३९
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| १५४. || टिप्पणियाँ : जापान का परिचय; इच्छा होते हुए भी अशक्त (१०-११-१९२९) || १४०
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| १५५. || सहयोगकी शर्तें (११-११-१९२९) || १४१
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| १५६. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (११-११-१९२९) || १४२
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| १५७. || पत्र : फूलचन्द के॰ शाहको (११-११-१९२९) || १४३
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| १६०. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (११-११-१९२९) || १४६
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| १६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (११-११-१९२९) || १४७
|-
| १६२. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (११-११-१९२९) || १४७
|-
| १६३. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१२-११-१९२९) || ११४८
|-
| १६४. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१३-११-१९२९) || १४८
|-
| १६५. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (१३-११-१९२९) || १५०
|-
| १६६. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (१३-११-१९२९) || १५०
|-
| १६७. || तार : विट्ठलभाई पटेलको (१३-११-१९२९ या उसके पश्चात्) || १५१
|-
| १६८. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-११-१९२९ या उसके पूर्व) || १५१
|-
| १६९. || संवेदना (१४-११-१९२९) || १५२
|-
| १७०. || ग्राम-सुधार (१४-११-१९२९)|| १५२
|-
| १७१. || मेरी स्थिति (१४-११-१९२९) || १६०
|-
| १७२. || राजाओंकी आय (१४-११-१९२९) || १६१
|-
| १७३. || संयुक्त प्रान्त का दौरा—९ (१४-११-१९२९) || १६२
|-
| १७४. || आदर्श मानपत्र (१४-११-१९२९) || १६७
|-
| १७५. || पत्र : शंकरलाल बैंकरको (८-११-१९२९) || १६८
|-
| १७६. || पत्र : 'कैसर-ए-हिन्द'को (८-११-१९२९) || १६९
|-
| १७७. || पत्र : हिन्दुस्तानी सेवा दलके अवर सचिवको (८-११-१९२९) || १६९
|-
| १७८. || पत्र : के॰ सन्तानमको (८-११-१९२९) || १७०
|-
| १७९. || पत्र : ना॰ रा॰ मलकानीको (८-११-१९२९) || १७१
|-
| १८०. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (८-११-१९२९) || १७१
|-
| १८१. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (८-११-१९२९) || १७२
|-
| १८२. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (८-११-१९२९) || १७३
|-
| १८३. || पत्र : मथुरादास गांधीको (९-११-१९२९) || १७३
|-
| १८४. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (९-११-१९२९) || १७४
|-
| १८५. || बारडोलीकी भूल? (१०-११-१९२९) || १७४
|-
| १८६. || नवयुवक और खेती (१०-११-१९२९) || १७५
|-
| १८७. || टिप्पणियाँ : जापान का परिचय; इच्छा होते हुए भी अशक्त (१०-११-१९२९) || १७६
|-
| १८८. || सहयोगकी शर्तें (११-११-१९२९) || १७६
|-
| १८९. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (११-११-१९२९) || १७७
|-
| १९०. || पत्र : फूलचन्द के॰ शाहको (११-११-१९२९) || १७८
|-
| १९१. || पत्र : शारदाबहन शाहको (११-११-१९२९) || १७९
|-
| १९२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (११-११-१९२९) || १७९
|-
| १९३. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (११-११-१९२९) || १८०
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ऋतु मिश्रा
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|-
| १६०. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (११-११-१९२९) || १४६
|-
| १६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (११-११-१९२९) || १४७
|-
| १६२. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (११-११-१९२९) || १४७
|-
| १६३. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१२-११-१९२९) || ११४८
|-
| १६४. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१३-११-१९२९) || १४८
|-
| १६५. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (१३-११-१९२९) || १५०
|-
| १६६. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (१३-११-१९२९) || १५०
|-
| १६७. || तार : विट्ठलभाई पटेलको (१३-११-१९२९ या उसके पश्चात्) || १५१
|-
| १६८. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-११-१९२९ या उसके पूर्व) || १५१
|-
| १६९. || संवेदना (१४-११-१९२९) || १५२
|-
| १७०. || ग्राम-सुधार (१४-११-१९२९)|| १५२
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| १७१. || मेरी स्थिति (१४-११-१९२९) || १६०
|-
| १७२. || राजाओंकी आय (१४-११-१९२९) || १६१
|-
| १७३. || संयुक्त प्रान्त का दौरा—९ (१४-११-१९२९) || १६२
|-
| १७४. || आदर्श मानपत्र (१४-११-१९२९) || १६७
|-
| १७५. || पत्र : जॉन एस॰ हॉलैंडको (१४-११-१९२९) || १६८
|-
| १७६. || पत्र : अली मुहम्मद ए॰ अलादीनको (१४-११-१९२९) || १६९
|-
| १७७. || पत्र : सी॰ डी॰ स्माइलीको (१४-११-१९२९) || १६९
|-
| १७८. || पत्र : अलवीको (१४-११-१९२९) || १७०
|-
| १७९. || पत्र : अ॰ भा॰ च॰ संघ मसूलीपट्टमके सचिवको (१४-११-१९२९) || १७१
|-
| १८०. || पत्र : ए॰ फेनर ब्रॉकवेको (१४-११-१९२९) || १७१
|-
| १८१. || पत्र : जे॰ सी॰ कुमारप्पाको (१४-११-१९२९) || १७२
|-
| १८२. || तार : सरोजिनी नायडूको (१४-११-१९२९) || १७३
|-
| १८३. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-११-१९२९) || १७३
|-
| १८४. || पत्र : जे॰ बी॰ पेनिंगटनको (१४-११-१९२९) || १७४
|-
| १८५. || पत्र : आनन्द टी॰ हिंगोराणीको (१४-११-१९२९) || १७४
|-
| १८६. || पत्र : दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसको (१४-११-१९२९) || १७५
|-
| १८७. || पत्र : नरगिस कैप्टेनको (१४-११-१९२९) || १७६
|-
| १८८. || पत्र : फिजी कांग्रेसके सचिवको (१४-११-१९२९) || १७६
|-
| १८९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१४-११-१९२९) || १७७
|-
| १९०. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (१४-११-१९२९) || १७८
|-
| १९१. || पत्र : जे॰ पी॰ भणसालीको (१५-११-१९२९) || १७९
|-
| १९२. || पत्र : सन्तोक गांधीको (१६-११-१९२९) || १७९
|-
| १९३. || राष्ट्रीय शिक्षाकी कीमत (१७-११-१९२९) || १८०
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ऋतु मिश्रा
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|-
| १६०. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (११-११-१९२९) || १४६
|-
| १६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (११-११-१९२९) || १४७
|-
| १६२. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (११-११-१९२९) || १४७
|-
| १६३. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१२-११-१९२९) || १४८
|-
| १६४. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१३-११-१९२९) || १४८
|-
| १६५. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (१३-११-१९२९) || १५०
|-
| १६६. || पत्र : ईश्वरलाल जोशीको (१३-११-१९२९) || १५०
|-
| १६७. || तार : विट्ठलभाई पटेलको (१३-११-१९२९ या उसके पश्चात्) || १५१
|-
| १६८. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-११-१९२९ या उसके पूर्व) || १५१
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| १६९. || संवेदना (१४-११-१९२९) || १५२
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| १७०. || ग्राम-सुधार (१४-११-१९२९)|| १५२
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| १७१. || मेरी स्थिति (१४-११-१९२९) || १६०
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| १७२. || राजाओंकी आय (१४-११-१९२९) || १६१
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| १७३. || संयुक्त प्रान्त का दौरा—९ (१४-११-१९२९) || १६२
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| १७४. || आदर्श मानपत्र (१४-११-१९२९) || १६७
|-
| १७५. || पत्र : जॉन एस॰ हॉलैंडको (१४-११-१९२९) || १६८
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| १७६. || पत्र : अली मुहम्मद ए॰ अलादीनको (१४-११-१९२९) || १६९
|-
| १७७. || पत्र : सी॰ डी॰ स्माइलीको (१४-११-१९२९) || १६९
|-
| १७८. || पत्र : अलवीको (१४-११-१९२९) || १७०
|-
| १७९. || पत्र : अ॰ भा॰ च॰ संघ मसूलीपट्टमके सचिवको (१४-११-१९२९) || १७१
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| १८०. || पत्र : ए॰ फेनर ब्रॉकवेको (१४-११-१९२९) || १७१
|-
| १८१. || पत्र : जे॰ सी॰ कुमारप्पाको (१४-११-१९२९) || १७२
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| १८२. || तार : सरोजिनी नायडूको (१४-११-१९२९) || १७३
|-
| १८३. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-११-१९२९) || १७३
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| १८४. || पत्र : जे॰ बी॰ पेनिंगटनको (१४-११-१९२९) || १७४
|-
| १८५. || पत्र : आनन्द टी॰ हिंगोराणीको (१४-११-१९२९) || १७४
|-
| १८६. || पत्र : दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसको (१४-११-१९२९) || १७५
|-
| १८७. || पत्र : नरगिस कैप्टेनको (१४-११-१९२९) || १७६
|-
| १८८. || पत्र : फिजी कांग्रेसके सचिवको (१४-११-१९२९) || १७६
|-
| १८९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१४-११-१९२९) || १७७
|-
| १९०. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (१४-११-१९२९) || १७८
|-
| १९१. || पत्र : जे॰ पी॰ भणसालीको (१५-११-१९२९) || १७९
|-
| १९२. || पत्र : सन्तोक गांधीको (१६-११-१९२९) || १७९
|-
| १९३. || राष्ट्रीय शिक्षाकी कीमत (१७-११-१९२९) || १८०
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| १९४. || उपले या खाद? (१७-११-१९२९) || १८१
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| १९५. || फिर वही प्रश्न (१७-११-१९२९) || १८२
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| १६२. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (११-११-१९२९) || १४७
|-
| १६३. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१२-११-१९२९) || ११४८
|-
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|-
| १६५. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (१३-११-१९२९) || १५०
|-
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|-
| १६७. || तार : विट्ठलभाई पटेलको (१३-११-१९२९ या उसके पश्चात्) || १५१
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| १६८. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-११-१९२९ या उसके पूर्व) || १५१
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| १६९. || संवेदना (१४-११-१९२९) || १५२
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| १७०. || ग्राम-सुधार (१४-११-१९२९)|| १५२
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| १७१. || मेरी स्थिति (१४-११-१९२९) || १६०
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| १७२. || राजाओंकी आय (१४-११-१९२९) || १६१
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| १७३. || संयुक्त प्रान्त का दौरा—९ (१४-११-१९२९) || १६२
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| १७४. || आदर्श मानपत्र (१४-११-१९२९) || १६७
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| १७५. || पत्र : जॉन एस॰ हॉलैंडको (१४-११-१९२९) || १६८
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| १७६. || पत्र : अली मुहम्मद ए॰ अलादीनको (१४-११-१९२९) || १६९
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| १७७. || पत्र : सी॰ डी॰ स्माइलीको (१४-११-१९२९) || १६९
|-
| १७८. || पत्र : अलवीको (१४-११-१९२९) || १७०
|-
| १७९. || पत्र : अ॰ भा॰ च॰ संघ मसूलीपट्टमके सचिवको (१४-११-१९२९) || १७१
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| १८०. || पत्र : ए॰ फेनर ब्रॉकवेको (१४-११-१९२९) || १७१
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| १८१. || पत्र : जे॰ सी॰ कुमारप्पाको (१४-११-१९२९) || १७२
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| १८२. || तार : सरोजिनी नायडूको (१४-११-१९२९) || १७३
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| १८३. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-११-१९२९) || १७३
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| १८५. || पत्र : आनन्द टी॰ हिंगोराणीको (१४-११-१९२९) || १७४
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| १८८. || पत्र : फिजी कांग्रेसके सचिवको (१४-११-१९२९) || १७६
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| १९१. || पत्र : जे॰ पी॰ भणसालीको (१५-११-१९२९) || १७९
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| १६०. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (११-११-१९२९) || १४६
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| १६१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (११-११-१९२९) || १४७
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| १६२. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (११-११-१९२९) || १४७
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| १६४. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१३-११-१९२९) || १४८
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| १६८. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-११-१९२९ या उसके पूर्व) || १५१
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| १६९. || संवेदना (१४-११-१९२९) || १५२
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| १७०. || ग्राम-सुधार (१४-११-१९२९)|| १५२
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| १७१. || मेरी स्थिति (१४-११-१९२९) || १६०
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| १७२. || राजाओंकी आय (१४-११-१९२९) || १६१
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| १७३. || संयुक्त प्रान्त का दौरा—९ (१४-११-१९२९) || १६२
|-
| १७४. || आदर्श मानपत्र (१४-११-१९२९) || १६७
|-
| १७५. || पत्र : जॉन एस॰ हॉलैंडको (१४-११-१९२९) || १६८
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| १७६. || पत्र : अली मुहम्मद ए॰ अलादीनको (१४-११-१९२९) || १६९
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| १९४. || उपले या खाद? (१७-११-१९२९) || १८१
|-
| १९५. || फिर वही प्रश्न (१७-११-१९२९) || १८२
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| १९६. || धर्म-संकट (१७-११-१९२९) || १८३
|-
| १९७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१७-११-१९२९) || १८५
|-
| १९८. || पत्र : राम विनोदको (१७-११-१९२९) || १८५
|-
| १९९. || पत्र : भोपालके नवाबको (१७-११-१९२९) || १८६
|-
| २००. || पत्र : बी॰ राम वर्माको (१७-११-१९२९) || १८७
|-
| २०१. || भाषण : इलाहाबाद विश्वविद्यालयमें (१७-११-१९२९) || १८७
|-
| २०२. || भाषण : अभिनन्दन समारोह, इलाहाबादमें (१७-११-१९२९) || १८९
|-
| २०३. || भाषण : सार्वजनिक सभा, इलाहाबादमें (१७-११-१९२९) || १९०
|-
| २०४. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१८-११-१९२९)|| १९२
|-
| २०५. || कांग्रेस कार्यसमितिके प्रस्तावका मसविदा (१८-११-१९२९) || १९२
|-
| २०६. || पत्र : बालजी देसाईको (१८-११-१९२९) || १९३
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| २०७. || संयुक्त प्रान्त का दौरा—९ (१४-११-१९२९) || १९३
|-
| २०८. || आदर्श मानपत्र (१४-११-१९२९) || १९४
|-
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|-
| २१०. || पत्र : अली मुहम्मद ए॰ अलादीनको (१४-११-१९२९) || १९५
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| २१९. || पत्र : आनन्द टी॰ हिंगोराणीको (१४-११-१९२९) || २००
|-
| २२०. || पत्र : दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसको (१४-११-१९२९) || २०१
|-
| २२१. || पत्र : नरगिस कैप्टेनको (१४-११-१९२९) || २०३
|-
| २२२. || पत्र : फिजी कांग्रेसके सचिवको (१४-११-१९२९) || २०६
|-
| २२३. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१४-११-१९२९) || २०८
|-
| २२४. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (१४-११-१९२९) || २०९
|-
| २२५. || पत्र : जे॰ पी॰ भणसालीको (१५-११-१९२९) || २०९
|-
| २२६. || पत्र : सन्तोक गांधीको (१६-११-१९२९) || २१३
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| १९४. || उपले या खाद? (१७-११-१९२९) || १८१
|-
| १९५. || फिर वही प्रश्न (१७-११-१९२९) || १८२
|-
| १९६. || धर्म-संकट (१७-११-१९२९) || १८३
|-
| १९७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१७-११-१९२९) || १८५
|-
| १९८. || पत्र : राम विनोदको (१७-११-१९२९) || १८५
|-
| १९९. || पत्र : भोपालके नवाबको (१७-११-१९२९) || १८६
|-
| २००. || पत्र : बी॰ राम वर्माको (१७-११-१९२९) || १८७
|-
| २०१. || भाषण : इलाहाबाद विश्वविद्यालयमें (१७-११-१९२९) || १८७
|-
| २०२. || भाषण : अभिनन्दन समारोह, इलाहाबादमें (१७-११-१९२९) || १८९
|-
| २०३. || भाषण : सार्वजनिक सभा, इलाहाबादमें (१७-११-१९२९) || १९०
|-
| २०४. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१८-११-१९२९)|| १९२
|-
| २०५. || कांग्रेस कार्यसमितिके प्रस्तावका मसविदा (१८-११-१९२९) || १९२
|-
| २०६. || पत्र : बालजी देसाईको (१८-११-१९२९) || १९३
|-
| २०७. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (१८-११-१९२९) || १९३
|-
| २०८. || पत्र : महादेव देसाईको (१८-११-१९२९) || १९४
|-
| २०९. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (१८-११-१९२९) || १९५
|-
| २१०. || पत्र : नन्दकिशोरीको (१८-११-१९२९) || १९५
|-
| २११. || पत्र : तोताराम सनाढ्यको (१८-११-१९२९) || १९६
|-
| २१२. || पत्र : चन्द त्यागीको (१८-११-१९२९) || १९६
|-
| २१३. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (१९-११-१९२९) || १९७
|-
| २१४. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-११-१९२९) || १९८
|-
| २१५. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१९-११-१९२९) || १९८
|-
| २१६. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-११-१९२९) || १९९
|-
| २१७. || पत्र : रामनारायण चौधरीको (१९-११-१९२९) || १९९
|-
| २१८. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२०-११-१९२९) || २००
|-
| २१९. || पत्र : मीराबहनको (२०-११-१९२९) || २००
|-
| २२०. || टिप्पणियाँ : फिजीमें भारतीय; इसे पापोंका प्रायश्चित नहीं समझा जा सकता; खादीके खरीदारो, होशियार (२१-११-१९२९) || २०१
|-
| २२१. || शुद्ध मतभेद (२१-११-१९२९) || २०३
|-
| २२२. || चरखेका गूढ़ार्थ (२१-११-१९२९) || २०६
|-
| २२३. || धर्मके नामपर (२१-११-१९२९) || २०८
|-
| २२४. || सचित्र खादी तालिका (२१-११-१९२९) || २०९
|-
| २२५. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — १० (२१-११-१९२९) || २०९
|-
| २२६. || कुछ प्रश्न (२१-११-१९२९) || २१३
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१७०
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{{c|{{larger|'''१४४. पत्र: हिन्दुस्तानी सेवा दलके अवर सचिवको'''}}}}
{{right|मुकाम हाथरस<br>
८ नवम्बर १९२९}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपकी पूछताछ के संदर्भ में मुझे इस बातका खेद है कि मेरे पास असम चाय
बागान के गिरमिटिया मजदूरोंके स्वदेशागमन सम्बन्धी नियम नहीं हैं; पर आप इन्हें
या तो पं॰ बनारसीदास चतुर्वेदी, ‘विशाल भारत’<ref>उस समय कलकत्तासे प्रकाशित होनेवाला हिन्दी मासिक।</ref> कलकत्तासे या सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी, पूनासे प्राप्त कर सकते हैं।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|अवर सचिव<br>
हिन्दुस्तानी सेवा दल<br>
हुबली}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५७५८) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|१४५. पत्र: के॰ सन्तानमको}}}}
{{right|मुकाम हाथरस<br>
८ नवम्बर, १९२९}}
{{left|प्रिय सन्तानम}}
इसके साथ में खादी प्रतिष्ठानके सतीश बाबूके उस पत्रकी एक प्रति<ref>सतीश बाबूने लिखा था: “लाहौर प्रदर्शनी समिति उदारतापूर्वक खादीके लिए (१) निःशुल्क दुकान (२) प्रदर्शनी मैदानके बीच ही विशेष झोंपड़ोंमें मुफ्त रहनेकी सुविधा देनेको राजी हो सकती है।”</ref> भेज रहा हूँ, जो उन्होंने मेरी पूछताछके जवाब में भेजा है। छगनलाल जोशी और सुब्रह्मण्यम आजकल आपके साथ हैं। आप जो उचित समझें, करलें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|सहपत्र: १<br>
पं॰ के॰ सन्तानम}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५७५९) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१७१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>{{c|{{larger|१४६. पत्र: ना॰ रा॰ मलकानीको}}}}
{{right|मुकाम हाथरस<br>
८ नवम्बर, १९२९}}
{{left|प्रिय मलकानी,}}
मुझे आश्चर्य है कि तुम्हें अपने पत्र लिखने की तारीख २८ तक मेरी ओरसे कोई सूचना नहीं मिली। फिर भी मैं आशा करता हूँ कि पत्र डाक में डालनेके बाद
तुम्हें मेरी चिट्ठी जरूर मिल गयी होगी। बहरहाल अब तुम्हें मेरे पत्रकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुमने जमशेदजीसे<ref>जमशेद, एन॰ आर॰ मेहता, कराचीके मेयर।<ref> अपना झगड़ा निपटा लिया है। आशा है अब काम<ref>सिन्धमें बाद सहायता कार्य</ref> बिना किसी रुकावटके चलेगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''बापू'''}}
{{left|श्रीयुत मलकानी<br>
तिलक कांग्रेस भवन<br>
हैदराबाद (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९७) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|१४७. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको}}}}
{{right|मुकाम हाथरस<br>
८ नवम्बर १९२९}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका पत्र मिला। आपने मुझे अपने राजमुन्द्री जानके बारेमें कुछ नहीं बताया पर मुझे डा॰ पट्टाभिसे पता चला कि आप वहाँ गये थे और यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई। उत्कलके बारेमें आप जो कुछ कह रहे हैं उसे मैं समझता हूँ। यदि समय मिला तो मैं कांग्रेस [अधिवेशन] के बाद उत्कल जाना चाहूँगा। चाहे मैं वहाँ जाऊँ या न जाऊँ, यदि वास्तवमे आवश्यकता है, अर्थात् परिस्थिति इसके योग्य है, तो उत्कलके लिए पैसा मिलनेमें किसी प्रकारकी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यह बहुत ही अच्छा होगा कि हमारे वर्धा में मिलनेसे पहले आप और शंकरलाल<ref>शंकरलाल बैंकर</ref><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>{{c|{{larger|१४६. पत्र: ना॰ रा॰ मलकानीको}}}}
{{right|मुकाम हाथरस<br>
८ नवम्बर, १९२९}}
{{left|प्रिय मलकानी,}}
मुझे आश्चर्य है कि तुम्हें अपने पत्र लिखने की तारीख २८ तक मेरी ओरसे कोई सूचना नहीं मिली। फिर भी मैं आशा करता हूँ कि पत्र डाक में डालनेके बाद
तुम्हें मेरी चिट्ठी जरूर मिल गयी होगी। बहरहाल अब तुम्हें मेरे पत्रकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुमने जमशेदजीसे<ref>जमशेद, एन॰ आर॰ मेहता, कराचीके मेयर।</ref> अपना झगड़ा निपटा लिया है। आशा है अब काम<ref>सिन्धमें बाद सहायता कार्य</ref> बिना किसी रुकावटके चलेगा।
{{right|हृदयसे आपका,<br>
'''बापू'''}}
{{left|श्रीयुत मलकानी<br>
तिलक कांग्रेस भवन<br>
हैदराबाद (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९७) की फोटो-नकलसे।
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{{c|{{larger|१४७. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको}}}}
{{right|मुकाम हाथरस<br>
८ नवम्बर १९२९}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका पत्र मिला। आपने मुझे अपने राजमुन्द्री जानके बारेमें कुछ नहीं बताया पर मुझे डा॰ पट्टाभिसे पता चला कि आप वहाँ गये थे और यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई। उत्कलके बारेमें आप जो कुछ कह रहे हैं उसे मैं समझता हूँ। यदि समय मिला तो मैं कांग्रेस [अधिवेशन] के बाद उत्कल जाना चाहूँगा। चाहे मैं वहाँ जाऊँ या न जाऊँ, यदि वास्तवमे आवश्यकता है, अर्थात् परिस्थिति इसके योग्य है, तो उत्कलके लिए पैसा मिलनेमें किसी प्रकारकी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यह बहुत ही अच्छा होगा कि हमारे वर्धा में मिलनेसे पहले आप और शंकरलाल<ref>शंकरलाल बैंकर</ref><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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८ नवम्बर, १९२९}}
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मुझे आश्चर्य है कि तुम्हें अपने पत्र लिखने की तारीख २८ तक मेरी ओरसे कोई सूचना नहीं मिली। फिर भी मैं आशा करता हूँ कि पत्र डाक में डालनेके बाद
तुम्हें मेरी चिट्ठी जरूर मिल गयी होगी। बहरहाल अब तुम्हें मेरे पत्रकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुमने जमशेदजीसे<ref>जमशेद, एन॰ आर॰ मेहता, कराचीके मेयर।</ref> अपना झगड़ा निपटा लिया है। आशा है अब काम<ref>सिन्धमें बाद सहायता कार्य</ref> बिना किसी रुकावटके चलेगा।
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तिलक कांग्रेस भवन<br>
हैदराबाद (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९७) की फोटो-नकलसे।
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आपका पत्र मिला। आपने मुझे अपने राजमुन्द्री जानके बारेमें कुछ नहीं बताया पर मुझे डा॰ पट्टाभिसे पता चला कि आप वहाँ गये थे और यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई। उत्कलके बारेमें आप जो कुछ कह रहे हैं उसे मैं समझता हूँ। यदि समय मिला तो मैं कांग्रेस [अधिवेशन] के बाद उत्कल जाना चाहूँगा। चाहे मैं वहाँ जाऊँ या न जाऊँ, यदि वास्तवमे आवश्यकता है, अर्थात् परिस्थिति इसके योग्य है, तो उत्कलके लिए पैसा मिलनेमें किसी प्रकारकी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यह बहुत ही अच्छा होगा कि हमारे वर्धा में मिलनेसे पहले आप और शंकरलाल<ref>शंकरलाल बैंकर</ref><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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मुझे आश्चर्य है कि तुम्हें अपने पत्र लिखने की तारीख २८ तक मेरी ओरसे कोई सूचना नहीं मिली। फिर भी मैं आशा करता हूँ कि पत्र डाक में डालनेके बाद
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{{left|श्रीयुत मलकानी<br>
तिलक कांग्रेस भवन<br>
हैदराबाद (सिन्ध)}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९७) की फोटो-नकलसे।
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{{c|{{larger|१४७. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको}}}}
{{right|मुकाम हाथरस<br>
८ नवम्बर १९२९}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका पत्र मिला। आपने मुझे अपने राजमुन्द्री जानके बारेमें कुछ नहीं बताया पर मुझे डा॰ पट्टाभिसे पता चला कि आप वहाँ गये थे और यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई। उत्कलके बारेमें आप जो कुछ कह रहे हैं उसे मैं समझता हूँ। यदि समय मिला तो मैं कांग्रेस [अधिवेशन] के बाद उत्कल जाना चाहूँगा। चाहे मैं वहाँ जाऊँ या न जाऊँ, यदि वास्तवमे आवश्यकता है, अर्थात् परिस्थिति इसके योग्य है, तो उत्कलके लिए पैसा मिलनेमें किसी प्रकारकी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यह बहुत ही अच्छा होगा कि हमारे वर्धा में मिलनेसे पहले आप और शंकरलाल<ref>शंकरलाल बैंकर</ref><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>वहाँ हो आयें। सुखेन्दुकी मृत्यु एक हत्या है।<ref>देखिए “पत्र जे॰ एम॰ सरकारको”, ३-११-१९२९ भी।</ref> संसारका इतिहास यह बताता है कि आप एकके प्रति हिंसक और दूसरेके प्रति अहिंसक नहीं हो सकते। यदि हम अपना [हिंसाका] रास्ता नहीं बदलते तो ज्यों-ज्यों हम हिंसा करते चलेंगे, त्यों-त्यों उसका बोझ हमारे सिरपर चढ़ता चला जायेगा। हमें अपने में विद्यमान इस हिंसाको खत्म करनेके लिए कोई तरीका खोजना पड़ेगा। निस्सन्देह ‘हिन्द स्वराज्य’<ref>देखिए खण्ड १०।</ref> में एक शब्द भी ऐसा नहीं है जिसकी उपयुक्तताकी पुष्टि न की जा सके। यदि मुझे उसे आज फिरसे लिखना पड़े तो हो सकता है कि मैं उसकी भाषा में बदलाव करूँ, लेकिन विचारोंमें कभी बदलाव नहीं कर सकता। आशा है कि आप सब और अधिक स्वस्थ होंगे। हेमप्रभा देवी कैसी हैं? मैं उन्हें चाहे लिखूँ या न लिखूँ उनको कभी-कभी मुझे अवश्य लिखते रहना चाहिए। किराये आदिके सम्बन्ध में प्रदर्शनी समितिसे अभी पत्र-व्यवहार चल रहा है। आपके पत्रोंके सम्बन्धित अंश मैं पं॰ सन्तानमको भेज रहा हूँ।<ref>देखिए “पत्र: के॰ सन्तानम्को”, ८-११-१९२९।</ref>
उत्कलके सम्बन्धमें गोविन्द बाबू द्वारा निरंजन बाबूपर लगाये गये आक्षेपोंको मैंने कोई महत्व नहीं दिया है। तथापि मैने उन्हें एक कड़ा पत्र<ref>३ नवम्बरको।</ref> लिखा है, जिसमें उनसे कहा है कि या तो अपने आक्षेपोंको सिद्ध करें या उनके लिए क्षमा माँगें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
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अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १६११) की फोटो-नकलसे।
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८ नवम्बर १९२९}}
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आज तुम्हें तार<ref>देखिए “तार: शान्तिकुमार मोरारजीको”, ८-११-१९२९।
</ref> किया है, मिला होगा। मैंने तो अभी-अभी अखबार में पढ़ा और जमनालालजीका तार मिला। इससे मैं काँप उठा। यह दुर्घटना कैसे घटी? अपने
स्वभावके अनुसार जमनालालजीने मुझपर यह जिम्मेदारी डाली है कि तुम्हें उनकी सलाह अथवा मददकी जरूरत हो तो मैं उसके बारेमें तुमसे पूछ लूँ, इसलिए तुमसे
पूछा तुम बहादुर हो इसलिए धीरज रखोगे ही। हम जानते हैं कि जिस रास्ते<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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उत्कलके सम्बन्धमें गोविन्द बाबू द्वारा निरंजन बाबूपर लगाये गये आक्षेपोंको मैंने कोई महत्व नहीं दिया है। तथापि मैने उन्हें एक कड़ा पत्र<ref>३ नवम्बरको।</ref> लिखा है, जिसमें उनसे कहा है कि या तो अपने आक्षेपोंको सिद्ध करें या उनके लिए क्षमा माँगें।
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आज तुम्हें तार<ref>देखिए “तार: शान्तिकुमार मोरारजीको”, ८-११-१९२९।
</ref> किया है, मिला होगा। मैंने तो अभी-अभी अखबार में पढ़ा और जमनालालजीका तार मिला। इससे मैं काँप उठा। यह दुर्घटना कैसे घटी? अपने
स्वभावके अनुसार जमनालालजीने मुझपर यह जिम्मेदारी डाली है कि तुम्हें उनकी सलाह अथवा मददकी जरूरत हो तो मैं उसके बारेमें तुमसे पूछ लूँ, इसलिए तुमसे पूछा तुम बहादुर हो इसलिए धीरज रखोगे ही। हम जानते हैं कि जिस रास्ते<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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उत्कलके सम्बन्धमें गोविन्द बाबू द्वारा निरंजन बाबूपर लगाये गये आक्षेपोंको मैंने कोई महत्व नहीं दिया है। तथापि मैने उन्हें एक कड़ा पत्र<ref>३ नवम्बरको।</ref> लिखा है, जिसमें उनसे कहा है कि या तो अपने आक्षेपोंको सिद्ध करें या उनके लिए क्षमा माँगें।
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अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १६११) की फोटो-नकलसे।
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{{c|{{larger|'''३३८. विद्यापीठका विकास'''}}}}
गुजरात विद्यापीठने क्या किया और वह क्या कर रहा है यह तो काकासाहब लिख रहे हैं। परन्तु एक बातका उत्तर वे नहीं दे सकते। कुछ लोग कहते हैं कि जबसे विद्यापीठकी बागडोर उनके हाथमें आई है तबसे वह बरबाद हो गया है यदि विद्यापीठ बरबाद हुआ है तो उसका कारण वे नहीं बल्कि मैं हूँ। क्योंकि लोगों में मेरे प्रति मोह कहिए या प्रेम बना हुआ है और वे अधिकतर मेरी सलाह मान लिया करते हैं; इस कारण विद्यापीठमें जो हेरफेर हुए हैं उनकी जिम्मेदारी मेरी है। मुझे यह बात नम्रतापूर्वक कह देनी या स्वीकार कर लेनी चाहिए कि सरकारी स्कूलोंका बहिष्कार करने तथा राष्ट्रीय शिक्षाकी योजना तैयार करनेमें मेरा खास हाथ रहा है। आचार्य गिडवानीको विद्यापीठमें लानेवाला मैं हूँ। उन्हें वहाँसे हटा लेनेवाला मैं हूँ। विद्यापीठके साथ शुरूसे ही काकासाहबका सम्बन्ध रहा है, किन्तु उन्हें बीचमें ही वहाँसे हटा लेनेवाला भी मैं ही हूँ। आचार्य गिड़वानीके कार्यकालमें विद्यापीठने विद्यार्थियोंको आकर्षित किया। विद्यापीठके लिए जमीन ली गई, मकान बने। यदि आचार्य गिड़वानी न होते तो शायद विद्यापीठ भी न होता। उन्होंने मुझे दो बार वचन दिया था कि मैं जब उन्हें बुलाऊँगा वे तभी पहुँच जायेंगे। मुझे भिवानीमें वल्लभभाईका तार मिला और मैंने आचार्य गिडवानीको विद्यापीठका कार्य भार सँभाल लेनेकी सूचना दी, जिसे उन्होंने तत्काल स्वीकार कर लिया और इस प्रकार थोड़े ही दिनोंमें हिन्दुस्तान में पहला असहयोगी विद्यालय आरम्भ हुआ। उनके गुजरात चले आनेसे सिन्ध और गुजरात में जो सन्धि हुई थी वह आज भी बनी हुई है। विद्यापीठमें मतभेद पैदा हो जानेके कारण मैंने आचार्य गिडवानीको वहाँसे हटा लिया। उनमें से किसीपर कोई लांछन नहीं था। मेरा विश्वास है कि आचार्य गिडवानी आज भी गुजरातके ही हैं। वे प्रेम महाविद्यालयमें गये क्योंकि गुजरातने उन्हें वहाँ भेजा था। वे आज कराचीमें हैं तो भी उनकी वही [प्रतिनिधिकी] स्थिति है। तीनों जगहोंपर राष्ट्रीय दृष्टिकोणको विकसित करनेकी आकांक्षा है। तीनों स्थानों
पर खादी-प्रचारका काम भी होता है।
आचार्य कृपलानीको तो काशी आश्रम, जो उन्हींकी कृति है, से कुछ समयके लिए माँग लिया गया था। मैं वचनवद्ध था, अतः तदनुसार उन्हें मुक्त कर देना पड़ा। उनके कार्यकालमें भी विद्यापीठकी अवनति नहीं हुई। वे विद्यार्थियोंके दिलोंको जीत सके थे या नहीं यह तो हम विद्यार्थियोंकी हड़तालके समय देख चुके हैं। सिन्धकी दूसरी भेंट आचार्य कृपलानी थे। किन्तु आज भी वे गुजरातके ही हैं। मेरे विचारसे तो उनके कार्यकालमें विद्यापीठ आगे ही बढ़ा है। सभीका आदर्श एक होते हुए भी प्रत्येक मनुष्यकी कृति स्वभावमें तो अन्तर होता ही है और इस प्रकार संस्था जिस व्यक्ति विशेषके हाथमें होती है उसीके अनुरूप उसका विकास होता है और वह विविध रंग धारण करती है। किन्तु यह विविधता इन्द्रधनुष के विविध रंगोंकी भाँति सुन्दर<noinclude>{{left|४२-२२}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३७६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३३८|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>होती है; ऐसा मुझे विद्यापीठके बारेमें लगा। एक आचार्यने किसी एक अंगको तो दूसरेने अन्य अंगको पुष्ट बनाया है। इसका फल अच्छा ही निकला है। अब पतवार काकासाहबके हाथमें है। वे विद्यापीठको गढ़ रहे हैं। विद्यापीठका पतन नहीं हुआ है, वह आगे बढ़ रहा है। जबतक पतवार काकासाहबके हाथमें है, उनके विषयमें यही कहा जा सकता है कि जिन्हें सन्देह हो वे विद्यापीठमें जाकर देख लें। जिस प्रकार तीनों आचार्य एक-दूसरेके पूरक हैं उसी प्रकार तीनोंका कार्यकाल एक-दूसरेका
पूरक है। तीनों एक ही वृक्षके फल हैं अतः तीनोंके कार्य में एकता छिपी ही हुई है। किसी आचार्यने पिछले कामको रद नहीं किया बल्कि कुल मिलाकर उसे आगे ही बढ़ाया है। विद्यापीठकी आजकी स्थिति यही सिद्ध करती है। विद्यापीठके आरम्भिक कालमें ही मैंने विद्यापीठको परखनेकी एक कसौटी बताई थी और वह बात आज भी लागू होती है। विद्यापीठको न तो उसके आलीशान भवनोंसे परखा जा सकता है और न विद्यार्थियोंके अंग्रेजी-ज्ञानसे। उसकी परख तो विद्यार्थियोंके देशप्रेमसे, पढ़े हुए विषयोंको गुजरातीके माध्यमसे दूसरोंको पढ़ा पानेकी उनकी सामर्थ्यसे, उनके हिन्दी के ज्ञानसे, उनके चरखा-शास्त्र के ज्ञानसे, उनके तथा शिक्षकोंके चारित्रिक बलकी वृद्धि और गांवोंके प्रति झुकावसे ही हो सकती है। इस कसौटीपर परखनेसे ज्ञात होता है कि विद्यापीठ आगे बढ़ा है। यह मेरा दृढ़ विश्वास है और जो लोग विद्यापीठका निरीक्षण करने जायें वे इस बातका विश्वास कर सकते हैं। जिस प्रकार वृक्षकी परीक्षा उसके फलोंको जांचनेसे होती है उसी प्रकार विद्यापीठको भी परखा जा सकता है। विद्यापीठ ऐसी संस्था नहीं है जो बहुत दूर हो और जिसके लिए परखनेवालेको मेरे या किसी अन्य के प्रमाणपत्रकी जरूरत हो और नीति कहती है कि जहाँ हम खुद किसीकी जाँच कर सकते हों और उसकी जाँच करना आवश्यक हो वहाँ उसकी परीक्षा स्वयं ही करनी चाहिए। जाँच करनेके बाद यदि ऐसा लगे
कि विद्यापीठकी उत्तरोत्तर उन्नति हुई है, उसकी सेवा करनेकी शक्ति बढ़ी है, तो लक्ष्मीदेवी उसके लिए घर ही चन्दा भिजवा देंगी।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' २९-१२-१९२९|1em}}<noinclude></noinclude>
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विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६
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शिखर तिवारी
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wikitext
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
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# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
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# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/~2026-44666-23|~2026-44666-23]] ([[सदस्य वार्ता:~2026-44666-23|वार्ता]]) ०१:४५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
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#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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सौरभ तिवारी 05
49
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__NOTOC__
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<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
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#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670221
2026-08-15T14:18:40Z
शिखर तिवारी
633
/* पुस्तक सूची */
670225
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
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<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:१८, १५ अगस्त २०२६ (UTC) पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
c01rc5ta9pb4e1dqccp6tn9mp7hme3y
670227
670225
2026-08-15T14:21:52Z
शिखर तिवारी
633
/* पुस्तक सूची */
670227
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670229
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2026-08-15T14:37:12Z
रितु कुमारी साव
6333
/* पुस्तक सूची */
670229
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670230
670229
2026-08-15T14:37:43Z
रितु कुमारी साव
6333
/* प्रतिभागी */
670230
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670231
670230
2026-08-15T14:41:16Z
रितु कुमारी साव
6333
/* पुस्तक सूची */
670231
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
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# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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2026-08-15T14:51:56Z
Sweta rani Gupta
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/* पुस्तक सूची */
670234
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
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<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
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#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670234
2026-08-15T17:14:36Z
Avantika Shaw
4732
/* पुस्तक सूची */
670270
wikitext
text/x-wiki
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670271
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2026-08-15T17:15:57Z
Avantika Shaw
4732
670271
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
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<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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2026-08-15T18:27:19Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* पुस्तक सूची */ +पुस्तक
670297
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
r9mko8qoazhv7zr7ekwbb7vobitg69f
670299
670297
2026-08-15T18:30:38Z
रेखा साव
5914
/* पुस्तक सूची */
670299
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670301
670299
2026-08-15T18:31:10Z
रेखा साव
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wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670302
670301
2026-08-15T18:33:58Z
आदेश यादव
3609
/* प्रतिभागी */ क्रम सुधार
670302
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०३:५४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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/* पुस्तक सूची */
670931
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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</div>
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</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670936
670931
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Sonu kumar 07
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/* पुस्तक सूची */
670936
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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</div>
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</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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670937
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Sonu kumar 07
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/* पुस्तक सूची */
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wikitext
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
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#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
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#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
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#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
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#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
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[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५८१
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<noinclude><pagequality level="1" user="Richmishra14" />{{rh||परिशिष्ट|५४३}}</noinclude>हमारे दृष्टिकोणसे वह सन्तोषजनक नहीं है। परन्तु सरकार इतना ही कर सकती
है और यह तो निश्चय ही नहीं कहा जा सकता कि उसकी कोई प्रतिक्रिया ही
नहीं हुई। इसलिए मेरा कहना यह है कि कलकत्ता प्रस्ताव पर कोई प्रतिक्रिया न
होने पर अपना वचन पूरा करनेका सवाल पैदा नहीं होता। अतः हर कीमत पर
अपना वचन पूरा करनेका विचार नैतिक दृष्टिसे न्यायोचित नहीं है, और राजनीतिक दृष्टिसे कार्यसाधक तो कदापि नहीं है|
मैं समझता हूँ कि मैंने अपनी स्थिति आपके आगे बिलकुल स्पष्ट कर दी है। मेरे यही विचार हैं और में यह महसूस करता हूँ कि हमारी तैयारीकी असली
कसौटी स्वाधीनता दिवसपर देशभरमें हुए उतने प्रदर्शन नहीं हैं जितने कि वे
परिणाम हैं जो हमें सदस्यों और स्वयंसेवकोंकी भर्ती, चन्दा इकट्ठा करने और
सबसे अधिक हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकताकी दिशामें प्राप्त हुए हैं। इसलिए मेरा यह विश्वास है कि देश अभी किसी भी तरहका सत्याग्रह आन्दोलन छेड़नेके लिए जरा भी तैयार नहीं है, और यदि आपने अभी या निकट भविष्य में इस तरहका आन्दोलन शुरू करनेका फैसला किया, तो उससे अपरिमित हानि होगी। अतः मैं आपसे और कार्यकारी समितिके सदस्योंसे गम्भीरतापूर्वक यह आग्रह करता हूँ कि ऐसा न किया जाये। मेरा यह विश्वास है कि यदि आप एक ऐसा प्रस्ताव पास करना ठीक समझें जिसमें कांग्रेस संगठनोंसे कहा जाये कि वे हिन्दू-मुस्लिम-सिख सहमतिकी और अन्य तैयारियाँ तेज कर दें, लेकिन फिलहाल सत्याग्रह आन्दोलन तबतक स्थगित रखा जाये जबतक कि आप सत्याग्रह आन्दोलन शुरू करनेको तैयार और बाध्य न हो जाएँ, तो वह वर्तमान परिस्थितिके लिए बहुत अधिक उपयुक्त होगा, और हमारे जो देशवासी लन्दनके गोलमेज सम्मेलनमें भाग लेनेकी बात सोच रहे हैं उन्हें एक मौका मिल जायेगा।
मेरी यह इच्छा है कि आप यह पत्र पं० जवाहरलाल और पं० मोतीलाल
नेहरूको भी दिखा दें। आशा है आपका स्वास्थ्य खूब अच्छा होगा।
सादर,
{{right|हृदयसे आपका,<br>एम० ए० अन्सारी}}
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>अन्सारीके कागजात}}
सौजन्य : जामिया मिलिया पुस्तकालय ओखला, दिल्ली<noinclude></noinclude>
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है और यह तो निश्चय ही नहीं कहा जा सकता कि उसकी कोई प्रतिक्रिया ही
नहीं हुई। इसलिए मेरा कहना यह है कि कलकत्ता प्रस्ताव पर कोई प्रतिक्रिया न
होने पर अपना वचन पूरा करनेका सवाल पैदा नहीं होता। अतः हर कीमत पर
अपना वचन पूरा करनेका विचार नैतिक दृष्टिसे न्यायोचित नहीं है, और राजनीतिक दृष्टिसे कार्यसाधक तो कदापि नहीं है|
मैं समझता हूँ कि मैंने अपनी स्थिति आपके आगे बिलकुल स्पष्ट कर दी है। मेरे यही विचार हैं और में यह महसूस करता हूँ कि हमारी तैयारीकी असली
कसौटी स्वाधीनता दिवसपर देशभरमें हुए उतने प्रदर्शन नहीं हैं जितने कि वे
परिणाम हैं जो हमें सदस्यों और स्वयंसेवकोंकी भर्ती, चन्दा इकट्ठा करने और
सबसे अधिक हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकताकी दिशामें प्राप्त हुए हैं। इसलिए मेरा यह विश्वास है कि देश अभी किसी भी तरहका सत्याग्रह आन्दोलन छेड़नेके लिए जरा भी तैयार नहीं है, और यदि आपने अभी या निकट भविष्य में इस तरहका आन्दोलन शुरू करनेका फैसला किया, तो उससे अपरिमित हानि होगी। अतः मैं आपसे और कार्यकारी समितिके सदस्योंसे गम्भीरतापूर्वक यह आग्रह करता हूँ कि ऐसा न किया जाये। मेरा यह विश्वास है कि यदि आप एक ऐसा प्रस्ताव पास करना ठीक समझें जिसमें कांग्रेस संगठनोंसे कहा जाये कि वे हिन्दू-मुस्लिम-सिख सहमतिकी और अन्य तैयारियाँ तेज कर दें, लेकिन फिलहाल सत्याग्रह आन्दोलन तबतक स्थगित रखा जाये जबतक कि आप सत्याग्रह आन्दोलन शुरू करनेको तैयार और बाध्य न हो जाएँ, तो वह वर्तमान परिस्थितिके लिए बहुत अधिक उपयुक्त होगा, और हमारे जो देशवासी लन्दनके गोलमेज सम्मेलनमें भाग लेनेकी बात सोच रहे हैं उन्हें एक मौका मिल जायेगा।
मेरी यह इच्छा है कि आप यह पत्र पं० जवाहरलाल और पं० मोतीलाल
नेहरूको भी दिखा दें। आशा है आपका स्वास्थ्य खूब अच्छा होगा।
सादर,
{{right|हृदयसे आपका,<br>एम० ए० अन्सारी}}
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सौजन्य : जामिया मिलिया पुस्तकालय ओखला, दिल्ली<noinclude></noinclude>
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है और यह तो निश्चय ही नहीं कहा जा सकता कि उसकी कोई प्रतिक्रिया ही
नहीं हुई। इसलिए मेरा कहना यह है कि कलकत्ता प्रस्ताव पर कोई प्रतिक्रिया न
होने पर अपना वचन पूरा करनेका सवाल पैदा नहीं होता। अतः हर कीमत पर
अपना वचन पूरा करनेका विचार नैतिक दृष्टिसे न्यायोचित नहीं है, और राजनीतिक दृष्टिसे कार्यसाधक तो कदापि नहीं है।
मैं समझता हूँ कि मैंने अपनी स्थिति आपके आगे बिलकुल स्पष्ट कर दी है। मेरे यही विचार हैं और में यह महसूस करता हूँ कि हमारी तैयारीकी असली
कसौटी स्वाधीनता दिवसपर देशभरमें हुए उतने प्रदर्शन नहीं हैं जितने कि वे
परिणाम हैं जो हमें सदस्यों और स्वयंसेवकोंकी भर्ती, चन्दा इकट्ठा करने और
सबसे अधिक हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकताकी दिशामें प्राप्त हुए हैं। इसलिए मेरा यह विश्वास है कि देश अभी किसी भी तरहका सत्याग्रह आन्दोलन छेड़नेके लिए जरा भी तैयार नहीं है, और यदि आपने अभी या निकट भविष्य में इस तरहका आन्दोलन शुरू करनेका फैसला किया, तो उससे अपरिमित हानि होगी। अतः मैं आपसे और कार्यकारी समितिके सदस्योंसे गम्भीरतापूर्वक यह आग्रह करता हूँ कि ऐसा न किया जाये। मेरा यह विश्वास है कि यदि आप एक ऐसा प्रस्ताव पास करना ठीक समझें जिसमें कांग्रेस संगठनोंसे कहा जाये कि वे हिन्दू-मुस्लिम-सिख सहमतिकी और अन्य तैयारियाँ तेज कर दें, लेकिन फिलहाल सत्याग्रह आन्दोलन तबतक स्थगित रखा जाये जबतक कि आप सत्याग्रह आन्दोलन शुरू करनेको तैयार और बाध्य न हो जाएँ, तो वह वर्तमान परिस्थितिके लिए बहुत अधिक उपयुक्त होगा, और हमारे जो देशवासी लन्दनके गोलमेज सम्मेलनमें भाग लेनेकी बात सोच रहे हैं उन्हें एक मौका मिल जायेगा।
मेरी यह इच्छा है कि आप यह पत्र पं० जवाहरलाल और पं० मोतीलाल
नेहरूको भी दिखा दें। आशा है आपका स्वास्थ्य खूब अच्छा होगा।
सादर,
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सौजन्य : जामिया मिलिया पुस्तकालय ओखला, दिल्ली<noinclude></noinclude>
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|-
|९०. || पत्र : प्रभावतीको (१७-३-१९३०) || ९४
|-
|९१. || पत्र : नारणदास गांधीको (१७-३-१९३०) || ९५
|-
|९२. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१७-३-१९३०) || ९६
|-
|९३. || पत्र : जयप्रकाश नारायणको (१७-३-१९३०) || ९६
|-
|९४. || भाषण : आनन्दमें (१७-३-१९३०) || ९७
|-
|९५. || स्वयंसेवकोंसे बातचीत (१७-३-१९३०) || १००
|-
|९६. || भाषण: सत्याग्रहियोंके समक्ष (१७-३-१९३० के पश्चात्) || १०१
|-
|९७. || महान् तत्त्वदर्शी (१८-३-१९३०) || १०२
|-
|९८. || पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१८-३-१९३०) || १०३
|-
|९९. || भाषण : बोरसदमें (१८-३-१९३०) || १०३
|-
|१००. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१९-३-१९३०) || १०७
|-
|१०१. || भाषण : रासमें (१९-३-१९३०) || १०७
|-
|१०२. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-३-१९३०) || ११०
|-
|१०३. || टिप्पणियाँ: नमक-कर; इसे कैसे तोड़ें; घटाया नहीं बढ़ाया है;<br>दीनबन्धु एन्ड्रयूज (२०-३-१९३०) || ११०
|-
|१०४. || विद्यार्थी क्या पसन्द करेंगे? (२०-३-१९३०) || ११३
|-
|१०५. || सरकारकी क्षुद्रता (२०-३-१९३०) || ११५
|-
|१०६. || यदि सच है तो अच्छा (२०-३-१९३०) || ११६
|-
|१०७. || स्वराज्य और रामराज्य (२०-३-१९३०) || ११७
|-
|१०८. || भाषण : कारेलीमें (२०-३-१९३०) || ११८
|-
|१०९. || पत्र : गंगादेवी सनाढ्यको (२०-३-१९३०) || ११८
|-
|११०. || पत्र : अब्दुलकादिर बावजीरको (२१-३-१९३०) || ११९
|-
|१११. || पत्र : कुसुम देसाईको (२१-३-१९३०) || ११९
|-
|११२. || भाषण : गजेरामें (२१-३-१९३०) || १२०
|-
|११३. || भाषण : अंखीमें (२१-३-१९३०) || १२१
|-
|११४. || सन्देश : महाराष्ट्रको (२२-३-१९३०) || १२२
|-
|११५. || भेंट : यूसुफ मेहरअलीको (२२-३-१९३०) || १२२
|-
|११६. || पत्र : मीराबहनको (२३-३-१९३० के पूर्व ) || १२४
|-
|११७. || पत्र : कुसुम देसाईको (२३-३-१९३०) || १२४
|-
|११८. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२३-३-१९३०) || १२५
|-
|११९. || भाषण : बुवामें (२३-३-१९३०) || १२५
|-
|१२०. || भाषण : समनीमें (२३-३-१९३०) || १२६
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||इक्कीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|१२१. || पत्र : महादेव देसाईको (२४-३-१९३०) || १२६
|-
|१२२. || पत्र : मीराबहनको (२५-३-१९३०) || १२७
|-
|१२३. || पत्र व्रजकृष्ण चांदीवालाको (२५-३-१९३०) || १२८
|-
|१२४. || भाषण: त्रालसाकी सार्वजनिक सभामें (२५-३-१९३०) || १२८
|-
|१२५. || पत्र : सुशीला गांधीको (२६-३-१९३०) || १२९
|-
|१२६. || भाषण : भड़ों में (२६-३-१९३०) || १३०
|-
|१२७. || भाषण अंकलेश्वरमें (२६-३-१९३०) || १३३
|-
|१२८. || पत्र : मीराबहनको (२६-३-१९३० के पश्चात्) || १३४
|-
|१२९. || खोदा पहाड़ निकली चुहिया (२७-३-१९३०) || १३५
|-
|१३०. || 'राजाका प्राप्य राजाको दो' (२७-३-१९३०) || १३६
|-
|१३१. || राजद्रोह धर्म है (२७-३-१९३०) || १३७
|-
|१३२. || स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा-पत्र (२७-३-१९३०) || १३९
|-
|१३३. || कुछ सुझाव (२७-३-१९३०) || १४०
|-
|१३४. || टिप्पणियाँ: खद्दरकी कमी मीराबाई प्रबन्धक नहीं ( २७-३-१९३०) || १४३
|-
|१३५. || तलवारका न्याय ( २७-३-१९३०) || १४४
|-
|१३६. || सन्देश: हिन्दुस्तानी सेवा दलको (२७-३-१९३०) || १४५
|-
|१३७. || भाषण: प्रार्थना सभा, सजोदमें (२७-३-१९३०) || १४५
|-
|१३८. || भाषण: सजोदमें ( २७-३-१९३०) || १४६
|-
|१३९. || भाषण : मांगरोलमें (२७-३-१९३०) || १४७
|-
|१४०. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (२८-३-१९३०) || १४८
|-
|१४१. || भाषण : रायमामें (२८-३-१९३०) || १४९
|-
|१४२. || भाषण: स्वयंसेवकोंके समक्ष (२८-३-१९३०) || १५०
|-
|१४३. || भाषण उमराठी में (२८-३-१९३०) || १५०
|-
|१४४. || भाषण: भटगाममे (२९-३-१९३०) || १५१
|-
|१४५. || बहिष्कारकी मर्यादा (३०-३-१९३०) || १५५
|-
|१४६. || मुखियों और मतादारोंके बारेमें (३०-३-१९३०) || १५८
|-
|१४७. || भाषण : ओलपाड ताल्लुके (३०-३-१९३० को या उसके पूर्व ) || १५९
|-
|१४८. || भाषण सांधियेरमें (३०-३-१९३०) ||१६०
|-
|१४९. || भाषण : देला में (३०-३-१९३०) || १६२
|-
|१५०. || पत्र: रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (३१-३-१९३०) || १६४
|-
|१५१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (३१-३-१९३०) || १६५
|-
|१५२. || भाषण छापरभाठा में (१-४-१९३०) || १६६
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||बाईस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|१५३. || भाषण : सूरतमें (१-४-१९३०) || १६७
|-
|१५४. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२-४-१९३०) || १७१
|-
|१५५. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२-४-१९३०) || १७१
|-
|१५६. ||भाषण : डिंडोलीमें (२-४-१९३०) || १७२
|-
|१५७. || टिप्पणियाँ: 'मुझे नहीं मिलेगा तो किसीको नहीं लेने दूंगा';<br>अतिरंजित कथन; सच्ची लगन; मोतीलालजी की दानशीलता<br>(३-४-१९३०) || १७३
|-
|१५८. || ६ अप्रैलको याद रखें (३-४-१९३०) || १७६
|-
|१५९. || मद्यपान निषेध (३-४-१९३०) || १७७
|-
|१६०. || पत्र : कपिलराय मेहताको (३-४-१९३०) || १७८
|-
|१६१. || भाषण : वाँझकी प्रार्थना सभा में (३-४-१९३०) || १७८
|-
|१६२. || भाषण : नवसारीमें (३-४-१९३०) || १७९
|-
|१६३. || भाषण : धामण (३-४-१९३०) || १८२
|-
|१६४. || पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (४-४-१९३०) || १८३
|-
|१६५. || भाषण : वेजलपुरमें (४-४-१९३०) || १८३
|-
|१६६. || वक्तव्य : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको (५-४-१९३०) || १८५
|-
|१६७. || एक सन्देश (५-४-१९३०) || १८६
|-
|१६८. || सन्देश : अमेरिकाको (५-४-१९३०) || १८६
|-
|१६९. || भाषण : दांडीमें (५-४-१९३०) || १८९
|-
|१७०. || पत्र : नारणदास गांधीको (६-४-१९३० के पूर्व) || १९१
|-
|१७१. || सूरत जिलेमें दिये भाषणोंके अंश (६-४-१९३० के पूर्व) || १९३
|-
|१७२. || बहनोंके प्रति (६-४-१९३०) || १९५
|-
|१७३. || अन्त्यजोंके लिए कुएँ (६-४-१९३०) || १९७
|-
|१७४. || टिप्पणियाँ: कुछ प्रश्न; निर्दयी पुरुषोंके प्रति (६-४-१९३०) || १९८
|-
|१७५. || स्वदेशी (६-४-१९३०) || १९९
|-
|१७६. || अहमदाबादके मिल-मालिकोंसे (६-४-१९३०) || २०२
|-
|१७७. || पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (६-४-१९३०) || २०४
|-
|१७८. || पत्र : लाला दुनीचन्दको (६-४-१९३०) || २०४
|-
|१७९. || भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको (६-४-१९३०) || २०५
|-
|१८०. || भाषण : दांडीमें (६-४-१९३०) || २०६
|-
|१८१. || पत्र : महादेव देसाईको (६-४-१९३०) || २०७
|-
|१८२. || पत्र : नारणदास गांधीको (६-४-१९३०) || २०८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||तेईस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|१८३. || पत्र : मीराबहनको (६-४-१९३०) || २०९
|-
|१८४. || पत्र : मीराबहनको (७-४-१९३० या उसके पूर्व) || २०९
|-
|१८५. || बर्बरतापूर्ण (७-४-१९३०) || २१०
|-
|१८६. || वक्तव्य : समाचार-पत्रोंको (७-४-१९३०) || २१२
|-
|१८७. || पत्र : महादेव देसाईको (७-४-१९३०) || २१३
|-
|१८८. || पत्र : प्रभावतीको (७-४-१९३०) || २१४
|-
|१८९. ||पत्र : नारणदास गांधीको (७-४-१९३०) || २१४
|-
|१९०. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (७-४-१९३०) || २१५
|-
|१९१. || सन्देश : स्वयंसेवकोंको, आटमें (७-४-१९३०) || २१५
|-
|१९२. || सन्देश : काठियावाड़के लोगोंके लिए (७-४-१९३०) || २१६
|-
|१९३. || सन्देश : गुजरातके नाम (७-४-१९३०) || २१६
|-
|१९४. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (७-४-१९३० या उसके पश्चात्) || २१७
|-
|१९५. || पत्र : मीराबहनको (८-४-१९३०) || २१७
|-
|१९६. || पत्र : अमीना तैयबजीको (८-४-१९३०) || २१८
|-
|१९७. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (८-४-१९३०) || २१८
|-
|१९८. || पत्र : महादेव देसाईको (८-४-१९३०) || २१९
|-
|१९९. || भाषण : आटमें (८-४-१९३०) || २१९
|-
|२००. || सन्देश : राष्ट्रके नाम (९-४-१९३०) || २२०
|-
|२०१. || पत्र : महादेव देसाईको (९-४-१९३०) || २२२
|-
|२०२. || भाषण : भीमराडमें (९-४-१९३०) || २२४
|-
|२०३. || भारतकी महिलाओंसे (१०-४-१९३०) || २२६
|-
|२०४. || टिप्पणियाँ : बधाई; एक दुष्टतापूर्ण आक्षेप (१०-४-१९३०) || २२८
|-
|२०५. || अनैतिक आधार (१०-४-१९३०) || २३०
|-
|२०६. || एक अंग्रेज भाईकी समस्या (१०-४-१९३०) || २३२
|-
|२०७. || कुछ शर्ते (१०-४-१९३०) || २३५
|-
|२०८. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१०-४-१९३०) || २३६
|-
|२०९. || सन्देश : बम्बईके नागरिकोंको (१०-४-१९३०) || २३६
|-
|२१०. || सन्देश : ब० प्र० कां० कमेटीको (१०-४-१९३०) || २३७
|-
|२११. || पत्र : मीराबहनको (१०-४-१९३०) || २३७
|-
|२१२. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (१०-४-१९३०) || २३८
|-
|२१३. || पत्र : नारणदास गांधीको (१०-४-१९३०) || २३८
|-
|२१४. ||पत्र : महादेव देसाईको (१०-४-१९३०) || २३९
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||चौबीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|२१५. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१०-४-१९३०) || २४०
|-
|२१६. || पत्र : लीलावतीको (१०-४-१९३०) || २४०
|-
|२१७. || पत्र : प्रभावतीको (१०-४-१९३०) || २४१
|-
|२१८. || पत्र : रुक्मिणी बजाजको (१०-४-१९३०) || २४१
|-
|२१९. || पत्र : जयसुखलाल गांधीको (१०-४-१९३०) || २४२
|-
|२२०. || पत्र : बनारसीलाल बजाजको (१०-४-१९३०) || २४२
|-
|२२१. || भाषण : स्वयंसेवकोंके समक्ष (१०-४-१९३०) || २४३
|-
|२२२. || भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको<br>(१०-४-१९३०) || २४३
|-
|२२३. || भेंट : ' हिन्दू 'के प्रतिनिधिको (१०-४-१९३०) || २४४
|-
|२२४. || भाषण : अबरामाकी सार्वजनिक सभामें (१०-४-१९३०) || २४५
|-
|२२५. || तार : एन० सी० केलकरको (११-४-१९३०) || २४७
|-
|२२६. ||पत्र : रेहाना तैयबजीको (११-४-१९३०) || २४७
|-
|२२७. || पत्र : महादेव देसाईको (११-४-१९३०) || २४८
|-
|२२८. || पत्र : नारणदास गांधीको (११-४-१९३०) || २४८
|-
|२२९. || पत्रः नारणदास गांधीको (११-४-१९३०) || २४९
|-
|२३०. || पत्र : महादेव देसाईको (११-४-१९३०) || २४९
|-
|२३१. || पत्र : शिवानन्दको (११-४-१९३०) || २५०
|-
|२३२. || पत्र : चिमनलालको (११-४-१९३०) || २५१
|-
|२३३. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (११-४-१९३०) || २५१
|-
|२३४. || पत्र : सीतलासहायको (११-४-१९३०) || २५२
|-
|२३५. || वक्तव्य : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडियाके लिए<br>(११-४-१९३०) || २५२
|-
|२३६. || सन्देश : हंसा मेहताके लिए (१२-४-१९३० के पूर्व) || २५३
|-
|२३७. || बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको लिखे पत्रका अंश<br>(१२-४-१९३० के पूर्व) || २५३
|-
|२३८. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१२-४-१९३०) || २५४
|-
|२३९. || पत्र : नानुभाई दवेको (१२-४-१९३०) || २५४
|-
|२४०. || गिरफ्तारियाँ और जंगली न्याय (१३-४-१९३०) || २५५
|-
|२४१. || मिल-मालिक और खादी (१३-४-१९३०) || २५६
|-
|२४२. || बहनोंसे (१३-४-१९३०) || २५७
|-
|२४३. || सन्देश : 'हिन्दू' के लिए (१३-४-१९३०) || २५९
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पच्चीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|२४४. || पत्र : महादेव देसाईको (१३-४-१९३०) || २५९
|-
|२४५. || भाषण : गुजरात महिला परिषद्, दांडीमें (१३-४-१९३०) || २६०
|-
|२४६. || भाषण : दांडीमें (१३-४-१९३०) || २६१
|-
|२४७. || पत्र : गुलाम रसूल कुरैशीको (१३-४-१९३०) || २६५
|-
|२४८. || पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको (१३-४-१९३०) || २६५
|-
|२४९. || पत्र : मीराबहनको (१४-४-१९३० या उसके पूर्व) || २६६
|-
|२५०. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१४-४-१९३०) || २६६
|-
|२५१. || अपील : भारतके नौजवानोंसे (१४-४-१९३०) || २६७
|-
|२५२. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१४-४-१९३०) || २६७
|-
|२५३. || पत्र : महादेव देसाईको (१४-४-१९३०) || २६८
|-
|२५४. || पत्र : कुसुम देसाईको (१४-४-१९३०) || २६८
|-
|२५५. || पत्र : मणिलाल वी० देसाईको (१४-४-१९३०) || २६९
|-
|२५६. || पत्र : महादेव देसाईको (१४-४-१९३०) || २६९
|-
|२५७. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१५-४-१९३०) || २७०
|-
|२५८. || पत्र : बम्बई प्रदेश कांग्रेस कमेटीके अध्यक्षको (१५-४-१९३०) || २७०
|-
|२५९. || पत्र : लक्ष्मीदास श्रीकान्तको (१५-४-१९३०) || २७१
|-
|२६०. || पत्र : महादेव देसाईको (१५-४-१९३०) || २७१
|-
|२६१. || भाषण : उंबेरमें (१५-४-१९३०) || २७२
|-
|२६२. || पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (१६-४-१९३०) || २७४
|-
|२६३. || अस्पृश्यता (१७-४-१९३०) || २७४
|-
|२६४. || राक्षसी कर (१७-४-१९३०) || २७६
|-
|२६५. || सिंहावलोकन (१७-४-१९३०) || २७८
|-
|२६६. || अध्यक्षका सम्मान (१७-४-१९३०) || २८१
|-
|२६७. || स्त्रियोंका विशेष कार्यक्षेत्र (१७-४-१९३०) || २८१
|-
|२६८. || 'सत्याग्रह-युद्ध' (१७-४-१९३०) || २८५
|-
|२६९. || कांग्रेस अध्यक्ष जेलमें (१७-४-१९३०) || २८६
|-
|२७०. || पत्र : नारणदास गांधीको (१७-४-१९३०) || २८६
|-
|२७१. || भेंट : फ्री प्रेस ऑफ इंडियाके प्रतिनिधिको (१७-४-१९३०) || २८७
|-
|२७२. || भाषण : वेजलपुर में स्वयंसेवकोंके समक्ष (१७-४-१९३०) || २८९
|-
|२७३. || पत्र : मीराबह्नको (१७-४-१९३०) || २९१
|-
|२७४. || पत्र : शौकत अलीको (१७-४-१९३०) || २९१
|-
|२७५. || स्वयंसेवकोंको सलाह (१७-४-१९३०) || २९३
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||छब्बीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|२७६. || तार : मोतीलाल नेहरूको (१८-४-१९३०) || २९३
|-
|२७७. || तार : एन॰ आर॰ मलकानीको (१८-४-१९३०) || २९४
|-
|२७८. || पत्र : रावजीभाई एन॰ पटेलको (१८-४-१९३०) || २९४
|-
|२७९. || पत्र : नारणदास गांधीको (१९-४-१९३०) || २९५
|-
|२८०. || पत्र : क॰ मा॰ मुन्शीको (१९-४-१९३०) || २९५
|-
|२८१. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१९-४-१९३०) || २९६
|-
|२८२. || भाषण : पटेलोंकी सभा, वेजलपुरमें (१९-४-१९३०) || २९६
|-
|२८३. || बारडोलीमें दिये गये भाषणके अंश (१९-४-१९३०) || २९८
|-
|२८४. || 'पब्लिक फिनांस एंड आवर पावर्टी' की प्रस्तावना (२०-४-१९३०) || २९९
|-
|२८५. || टिप्पणियाँ : सावधान; अहमदाबादके मिल मजदूर (२०-४-१९३०) || ३००
|-
|२८६. || सन्देश : धोलेरा और वीरमगाँव के लोगोंको (२०-४-१९३०) || ३०१
|-
|२८७. || कलकत्ता और कराची (२०-४-१९३०) || ३०१
|-
|२८८. || विदेशी वस्त्रोंके व्यापारी (२०-४-१९३०) || ३०२
|-
|२८९. || पत्र : नारणदास गांधीको (२०-४-१९३०) || ३०४
|-
|२९०. || पत्र : जमनादास गांधीको (२०-४-१९३०) || ३०५
|-
|२९१. || पत्र : क॰ मा॰ मुन्शीको (२०-४-१९३०) || ३०५
|-
|२९२. || पत्र : महादेव देसाईको (२०-४-१९३०) || ३०६
|-
|२९३. || भेंट : 'बॉम्बे क्रॉनिकल के प्रतिनिधिको (२०-४-१९३०) || ३०७
|-
|२९४. || विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंको सलाह (२०-४-१९३०) || ३०८
|-
|२९५. || काला शासन (२१-४-१९३०) || ३०९
|-
|२९६. || पत्र : मीराबहनको (२१-४-१९३०) || ३१२
|-
|२९७. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२१-४-१९३०) || ३१३
|-
|२९८. || पत्र : महादेव देसाईको (२१-४-१९३०) || ३१४
|-
|२९९. || भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिको (२१-४-१९३०) || ३१५
|-
|३००. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२२-४-१९३०) || ३१६
|-
|३०१. || पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२२-४-१९३०) || ३१६
|-
|३०२. || भाषण : पटेलोंके समक्ष, सूरतमें (२२-४-१९३०) || ३१७
|-
|३०३. || पत्र : नारणदास गांधीको (२२-४-१९३०) || ३१७
|-
|३०४. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (२३-४-१९३०) || ३१९
|-
|३०५. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (२३-४-१९३०) || ३१९
|-
|३०६. || पत्र : नारणदास गांधीको (२३-४-१९३०) || ३१८
|-
|३०७. || पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको (२३-४-१९३०) || ३१८
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||सत्ताईस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|३०८. || हिन्दू-मुस्लिम एकता (२४-४-१९३०) || ३२१
|-
|३०९. || जन-आन्दोलन (२४-४-१९३०) || ३२३
|-
|३१०. || खरा हिसाब रखनेकी जरूरत (२४-४-१९३०) || ३२५
|-
|३११. || शराबकी दुकानोंपर धरना (२४-४-१९३०) || ३२५
|-
|३१२. || धरना कैसे दें (२४-४-१९३०) || ३२७
|-
|३१३. || हमारी मिलें और विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार (२४-४-१९३०) || ३२८
|-
|३१४. || तकलीके द्वारा बहिष्कार (२४-४-१९३०) || ३३०
|-
|३१५. || विदेशी कपड़ोंके व्यापारी (२४-४-१९३०) || ३३२
|-
|३१६. || सलाम अथवा बेंत? (२४-४-१९३०) || ३३३
|-
|३१७. || भेंट : 'हिन्दू' के प्रतिनिधिको (२४-४-१९३०) || ३३४
|-
|३१८. || पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (२४-४-१९३०) || ३३५
|-
|३१९. || पत्र : मीराबहनको (२४-४-१९३० के बाद) || ३३५
|-
|३२०. || पत्र : डोरोथी डि' सूवाको (२५-४-१९३०) || ३३६
|-
|३२१. || पत्र : अब्बास तैयबजीको ( २५-४-१९३०) || ३३६
|-
|३२२. || पत्र : महादेव देसाईको (२५-४-१९३०) || ३३७
|-
|३२३. || पत्र : नारणदास गांधीको (२५-४-१९३०) || ३३८
|-
|३२४. || पत्र : जमनादास गांधीको (२५-४-१९३०) || ३३९
|-
|३२५. || भाषण : पन्नार में ( २५-४-१९३०) || ३४०
|-
|३२६. || पत्र : ए॰ सुब्बारावको (२६-४-१९३०) || ३४१
|-
|३२७. || पत्र : नारणदास गांधीको (२६-४-१९३०) || ३४१
|-
|३२८. || पत्र : नारणदास गांधीको (२६-४-१९३०) || ३४२
|-
|३२९. || पत्र : महालक्ष्मी एम० ठक्करको (२६-४-१९३०) || ३४२
|-
|३३०. || भाषण: अंभेटी में (२६-४-१९३०) || ३४३
|-
|३३१. || भाषण : बलसाड़में (२६-४-१९३०) || ३४३
|-
|३३२. || भाषण: छरवाड़ामें (२६-४-१९३०) || ३४६
|-
|३३३. || सन्देश : अमेरिकाको (२७-४-१९३० के पूर्व) || ३५०
|-
|३३४. || वाइसरायको लिखे पत्रका मसविदा (२७-४-१९३० अथवा<br>उसके पूर्व) || ३५३
|-
|३३५. || गुजरातकी महिलाओंसे अपीलका मसविदा (२७-४-१९३० के<br>आसपास) || ३५५
|-
|३३६. || विट्ठलभाई लल्लूभाईका श्राद्ध (२७-४-१९३०) || ३५६
|-
|३३७. || रासका उत्साह (२७-४-१९३०) || ३५७
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३४
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||अट्ठाईस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|३३८. || टिप्पणियाँ: हड़तालें; धरनेमें जोखिमें (२७-४-१९३०) || ३५८
|-
|३३९. || इमाम साहब (२७-४-१९३०) || ३५९
|-
|३४०. || बहिष्कार और खादी (२७-४-१९३०) || ३६०
|-
|३४१. || मेरी कसौटी (२७-४-१९३०) || ३६३
|-
|३४२. || पत्र : अमीना तैयबजीको (२७-४-१९३०) || ३६४
|-
|३४३. || आसफअलीको लिखे पत्रका अंश (२७-४-१९३०) || ३६४
|-
|३४४. || पत्र : लीलावती आसरको (२७-४-१९३०) || ३६५
|-
|३४५. || पत्र : रामेश्वरदास बिड़लाको (२८-४-१९३०) || ३६५
|-
|३४६. || पत्र : नरहरि परीखको (२८-४-१९३०) || ३६६
|-
|३४७. || भेंट : 'बॉम्बे क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिको (२८-४-१९३०) || ३६७
|-
|३४८. || पत्र : नरहरि परीखको (२९-४-१९३०) || ३६७
|-
|३४९. || भाषण : बिलीमोरामें (२९-४-१९३०) || ३६८
|-
|३५०. || छद्म सैनिक कानून (२९-४-१९३०) || ३६९
|-
|३५१. || पत्र : मीराबहनको (२९-४-१९३०) || ३७०
|-
|३५२. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२९-४-१९३०) || ३७०
|-
|३५३. || भेंट : 'लीडर' के प्रतिनिधिको (२९-४-१९३०) || ३७१
|-
|३५४. || वक्तव्य : नमककी क्यारी में विष मिलाये जानेके सम्बन्धमें<br>(३०-४-१९३०) || ३७१
|-
|३५५. || दिल्लीके पत्रकारोंको बधाइयाँ (३०-४-१९३०) || ३७२
|-
|३५६. || पत्र : नरहरि परीखको (३०-४-१९३०) || ३७२
|-
|३५७. || पत्र : नरहरि परीखको (३०-४-१९३०) || ३७३
|-
|३५८. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (३०-४-१९३०) || ३७३
|-
|३५९. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (३०-४-१९३०) || ३७४
|-
|३६०. || पत्र : वसुमती पण्डितको (३०-४-१९३०) || ३७४
|-
|३६१. || पत्र: मणिवहन पटेलको (अप्रैल १९३०) || ३७५
|-
|३६२. || स्वराज्यके कार्यकर्त्ताओंके लिए प्रतिज्ञा (अप्रैल १९३०) || ३७५
|-
|३६३. || पत्र : अमीना कुरैशीको (१-५-१९३० अथवा उसके पश्चात्) || ३७६
|-
|३६४. || महादेव देसाई और उनके उत्तराधिकारी (१-५-१९३०) || ३७६
|-
|३६५. || पत्र-लेखकोंसे (१-५-१९३०) || ३७८
|-
|३६६. || गुण्डा-राज (१-५-१९३०) || ३७९
|-
|३६७. || टिप्पणियाँ : अध्यक्षका इस्तीफा; सीमा-प्रान्त; वादा पूरा करनेकी<br>जरूरत; राष्ट्रीय स्त्री-सभा; समुद्र-पारसे (१-५-१९३०) || ३८२
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||उनतीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|३६८. || प्रश्नोत्तर (१-५-१९३०) || ३८५
|-
|३६९. || शराब और पारसी (१-५-१९३०) || ३८७
|-
|३७०. || 'अहिंसाकी विजय' (१-५-१९३० ) || ३८८
|-
|३७१. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (१-५-१९३०) || ३८९
|-
|३७२. || पत्र : नरहरि परीखको (१-५-१९३०) || ३८९
|-
|३७३. || ओलपाडमें दिये गये भाषणके अंश (१-५-१९३०) ||३९०
|-
|३७४. || भाषण : रांदेरमें (१-५-१९३०) || ३९२
|-
|३७५. || पत्र : सुशीला गांधीको (१-५-१९३० के पश्चात्) || ३९३
|-
|३७६. || पत्र : पुरुषोत्तम गांधीको (२-५-१९३०) || ३९३
|-
|३७७. || पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको (२-५-१९३०) || ३९४
|-
|३७८. || पत्र : राधा गांधीको (२-५-१९३०) || ३९४
|-
|३७९. || पत्र : कुसुम देसाईको (२-५-१९३०) || ३९४
|-
|३८०. || पत्र : जानकीदेवी बजाजको (२-५-१९३०) || ३९५
|-
|३८१. || पत्र : नरहरि परीखको (२-५-१९३०) || ३९५
|-
|३८२. || सन्देश : बम्बईकी साहू सभाके लिए (२-५-१९३०) || ३९६
|-
|३८३. || पत्र : जे॰ सी॰ कुमारप्पाको (३-५-१९३०) || ३९६
|-
|३८४. || पत्र : नारणदास गांधीको (३-५-१९३०) || ३९६
|-
|३८५. || वी॰ ए॰ सुन्दरम्को प्रमाणपत्र (३-५-१९३० के आसपास) || ३९७
|-
|३८६. || खेड़ावासियोंके प्रति (४-५-१९३०) || ३९८
|-
|३८७. || वकीलोंका धर्म (४-५-१९३०) || ४०१
|-
|३८८. || टिप्पणियाँ: शराबकी दुकानोंपर धरना; एक पारसी बालिकाकी भेंट<br>(४-५-१९३०) || ४०३
|-
|३८९. || मुद्रणालयोंपर छापा (४-५-१९३०) || ४०४
|-
|३९०. || खादीके विषयमें चेतावनी (४-५-१९३०) || ४०५
|-
|३९१. || काकासाहब (४-५-१९३०) || ४०६
|-
|३९२. || तार : मोतीलाल नेहरूको (४-५-१९३०) || ४०७
|-
|३९३. || पत्र : वाइसरायको (४-५-१९३०) || ४०८
|-
|३९४. || पत्र : डा॰ सैयद महमूदको (४-५-१९३०) || ४१२
|-
|३९५. || पत्र : पद्मावतीको (४-५-१९३०) || ४१३
|-
|३९६. || भेंट : जे॰ बी॰ कृपलानीको (४-५-१९३०) || ४१४
|-
|३९७. || भाषण : सूरतमें (४-५-१९३०) || ४१६
|-
|३९८. || अल्पसंख्यकोंकी समस्या (५-५-१९३० के पूर्व) || ४१७
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||तीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|३९९. || टिप्पणी : जे॰ बी॰ पेनिंगटन के पत्रपर (५-५-१९३० के पूर्व) || ४१८
|-
|४००. || पत्र : बम्बईकी सत्याग्रह- समितिको (५-५-१९३० के पूर्व) || ४१८
|-
|४०१. || मध्यरात्रिमें गिरफ्तारी (५-५-१९३०) || ४२०
|-
|४०२. || भेंट : 'डेली टेलीग्राफ 'के प्रतिनिधिको (५-५-१९३०) || ४२१
|-
|४०३. || पत्र : ई॰ ई॰ डॉयलको (१०-५-१९३०) || ४२२
|-
|४०४. || पत्र : मीराबहनको (१२-५-१९३०) || ४२३
|-
|४०५. || पत्र : नारणदास गांधीको (१२-५-१९३०) || ४२४
|-
|४०६. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१२-५-१९३०) || ४२६
|-
|४०७. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१२-५-१९३०) || ४२६
|-
|४०८. || पत्र : आश्रम के बालकोंको (१२-५-१९३०) || ४२७
|-
|४०९. || पत्र : बलभद्रको (१२-५-१९३० या उसके पश्चात्) || ४२८
|-
|४१०. || पत्र : कस्तूरबा गांधीको (१२-५-१९३० या उसके पश्चात्) || ४२८
|-
|४११. || आश्रमवासियोंको लिखे गये पत्रोंके अंश (१२-५-१९३० या<br>उसके पश्चात्) || ४२९
|-
|४१२. || पत्र : कुसुम देसाईको (१२-५-१९३० या उसके पश्चात्) || ४३०
|-
|४१३. || पत्र : रमाबहन जोशीको (१२-५-१९३० या उसके पश्चात्) || ४३०
|-
|४१४. || देवदास गांधीको लिखे पत्रका अंश (१३-५-१९३०) || ४३१
|-
|४१५. || पत्र : वाइसरायको (१८-५-१९३०) || ४३१
|-
|४१६. || पत्र : मीराबहनको (१८-५-१९३०) || ४३३
|-
|४१७. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१९-५-१९३०) || ४३४
|-
|४१८. || पत्र : मणिबहन पटेलको (१९-५-१९३०) || ४३५
|-
|४१९. || पत्र : नरहरि परीखको (२०-५-१९३०) || ४३५
|-
|४२०. || पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको (२०-५-१९३०) || ४३५
|-
|४२१. || पत्र : प्रभावतीको (२०-५-१९३०) || ४३६
|-
|४२२. || भेंट : 'डेली हैरॉल्ड' के प्रतिनिधिको (२०-५-१९३०) || ४३७
|-
|४२३. || पत्र : नारणदास गांधीको (१८-२१-५-१९३०) || ४३९
|-
|४२४. || पत्र : रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्सको (२२-५-१९३०) || ४४१
|-
|४२५. || पत्र : मीराबहनको (२५-५-१९३०) || ४४१
|-
|४२६. || पत्र : सरलादेवीको (२५-५-१९३०) || ४४३
|-
|४२७. || पत्र : चन्द्रशंकर शुक्लको (२५-५-१९३०) || ४४३
|-
|४२८. || पत्र : सुशीला गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४४
|-
|४२९. || पत्र : नारणदास गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४४
|}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||इकतीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|४३०. || पत्र : जानकीदेवी बजाजको (२६-५-१९३०) || ४४५
|-
|४३१. || पत्र : जमनाबहन गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४६
|-
|४३२. || पत्र : निर्मला गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४६
|-
|४३३. || पत्र : राधा गांधीको (२६-५-१९३०) || ४४७
|-
|४३४. || पत्र : मंत्री गिरिको (२६-५-१९३०) || ४४७
|-
|४३५. || पत्र : गंगाबहन झवेरीको (२६-५-१९३०) || ४४८
|-
|४३६. || पत्र : गोमती मशरूवालाको (२६-५-१९३०) || ४४८
|-
|४३७. || पत्र : मोतीबह्नको (२६-५-१९३०) || ४४९
|-
|४३८. || पत्र : डा॰ प्राणजीवनदास मेहताको (२६-५-१९३०) || ४४९
|-
|४३९. || पत्र : रतिलाल मेहताको (२६-५-१९३०) || ४५०
|-
|४४०. || पत्र : मणिबहन परीखको (२६-५-१९३०) || ४५०
|-
|४४१. || पत्र : मीठूबन पेटिटको (२६-५-१९३०) || ४५१
|-
|४४२. || पत्र : अमीना कुरैशीको (२६-५-१९३०) || ४५१
|-
|४४३. || पत्र : शान्ताको (२६-५-१९३०) || ४५२
|-
|४४४. || पत्र : सोनामणिको (२६-५-१९३०) || ४५२
|-
|४४५. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (२६-५-१९३०) || ४५३
|-
|४४६. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२६-५-१९३०) || ४५३
|-
|४४७. || पत्र : पी॰ जी॰ मैथ्यूको (२६-५-१९३०) || ४५४
|-
|४४८. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (२७-५-१९३०) || ४५४
|-
|४४९. || पत्र : मोहनलाल भट्टको (२७-५-१९३०) || ४५५
|-
|४५०. || पत्र : ई॰ ई॰ डायलको (३०-५-१९३०) || ४५५
|-
|४५१. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (४-६-१९३०) || ४५६
|-
|४५२. || पत्र : आर॰ वी॰ मार्टिनको (११-६-१९३०) || ४५७
|-
|४५३. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (१६-६-१९३० या उसके पूर्व) || ४५८
|-
|४५४. || पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१८-६-१९३०) || ४५९
|-
|४५५. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (१८-६-१९३०) || ४६०
|-
|४५६. || पत्र : मीराबहनको (२२-६-१९३०) || ४६०
|-
|४५७. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (२२-६-१९३०) || ४६१
|-
|४५८. || पत्र : नारणदास गांधीको (२२/२३-६-१९३०) || ४६२
|-
|४५९. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२३-६-१९३०) || ४६४
|-
|४६०. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (२४-६-१९३०) || ४६५
|-
|४६१. || पत्र: पैट्रिक क्विनको (२६-६-१९३०) || ४६५
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||बत्तीस|}}</noinclude>{|width=100%
|-
|४६२. || पत्र : प्रभावतीको (२७-६-१९३०) || ४६६
|-
|४६३. || पत्रः प्रभावतीको (२९-६-१९३०) || ४६६
|-
|४६४. || पत्र : रुक्मिणी बजाजको (२९-६-१९३०) || ४६७
|-
|४६५. || पत्र : कलावती त्रिवेदीको (२९-६-१९३०) || ४६७
|-
|४६६. || पत्र : बनारसीलाल बजाजको (२९-६-१९३०) || ४६७
|-
|४६७. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (३०-६-१९३०) || ४६८
|-
|४६८. || पत्र : मीराबहनको (३०-६-१९३०) || ४६८
|-
|४६९. || पत्र : पुरुषोत्तम गांधीको (३०-६-१९३०) || ४६९
|-
|४७०. || पत्र : लीलावती आसरको (३०-६-१९३०) || ४६९
|-
|४७१. || पत्र : मुन्नालालको (३०-६-१९३०) || ४७०
|-
|४७२. ||पत्र : सुशीला गांधीको (३०-६-१९३०) || ४७१
|-
|४७३. || पत्र : नारणदास गांधीको (३०-६-१९३०) || ४७१
|-
|४७४. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (३०-६-१९३०) || ४७४
|-
|४७५. || पत्र : कमला नेहरूको (३०-६-१९३०) || ४७४
|-
| || परिशिष्ट ||
|-
| || {{Gap}}१. नमक- अधिनियम के दाण्डिक खण्ड || ४७५
|-
| || {{Gap}}२. गांधीजी के साथ दाँडी-कूच करनेवाले लोगोंकी सूची || ४७७
|-
| || {{Gap}}३. अल्पसंख्यकोंके विषयमें जवाहरलाल नेहरूकी टिप्पणी || ४७८
|-
| || {{Gap}}४. 'डेली टेलीग्राफ' के विवरणसे उद्धरण || ४८१
|-
| || सामग्री के साधन-सूत्र || ४८३
|-
| || तारीखवार जीवन-वृत्तान्त || ४८५
|-
| || शीर्षक सांकेतिका || ४८९
|-
| || सांकेतिका || ४९३
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{Larger|{{c|'''१. ठक्कर बापाकी झोली'''}}}}
ठक्कर बापा द्वारा भेजे गये निम्नलिखित ब्योरेके<ref>इसमें जुगलकिशोर विइला द्वारा दान की गईं रकमसे अन्त्यजोंके लिए जो ४९ कुएँ खोदे गये थे उनका हवाला दिया गया था और पैसेको कमीके कारण जिन ३७ गाँवोंमें काम बन्द करना पड़ा था उनकी सूची दी गई थी।</ref> बारेमें मैं और क्या कहूँ? चाहे जैसा संकट हो, भले ही रणभेरी बज रही हो, फिर भी धनवान लोग इस कार्यके लिए और ऐसे बुजुर्ग सेवकके नामपर अपनी थैलियोंका मुँह अवश्य खोल देंगे। अब इस सम्बन्धमें मारवाड़के नहीं, गुजरातके जुगलकिशोर बिड़लाको मदद देनी चाहिए। इसमें गुजरातकी शोभा है।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''२. दो पत्र'''}}}}
एक नवयुवक लिखता है :<ref>पत्रका अनुवाद यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र लेखकने शिकायत की थी कि माता-पिता अपने बालकों को राष्ट्रीय भावनाओंको दबानेका प्रयास करते हैं। उसने अपने खादीधारी पिताका उल्लेख करते हुए लिखा था कि वे विदेशी थर्मस काममें लाते हैं।</ref>
सभी माता-पिता ऐसे नहीं होते। उदाहरणार्थ, एक माताने गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थी और सत्याग्रहके लिए उद्यत अपने पुत्रको नीचे लिखा पत्र भेजा है :<ref>पत्रका अनुवाद यहाँ नहीं दिया गया है। माताने आशीर्वाद देते हुए पुत्रको जेल जानेकी अनुमति दी थी।</ref>
यह माता धन्य है। अगर भारतमें ऐसी बहुत-सी माताएँ हों तो हमारी लड़ाईका अन्त बहुत अच्छा हो और यह लड़ाई शीघ्र ही समाप्त हो जाये। सौभाग्यसे ऐसी माताएँ और ऐसे पिताओंकी तादाद पर्याप्त रूपमें बढ़ती जा रही है। दो धनवान कुमारियोंके माता-पिताने भी अपनी पुत्रियोंको पूरा-पूरा प्रोत्साहन दिया है और उन्होंने उनकी संयत स्वतन्त्रतापर किसी प्रकारका अंकुश नहीं लगाया है। मैंने स्वतन्त्रताके लिए 'संयत' विशेषणका जान-बूझकर प्रयोग किया है, क्योंकि स्वतन्त्रता संयत और स्वेच्छाचारपूर्ण, दोनों ही प्रकारकी हो सकती है।
उक्त नवयुवकके साथ जैसा हुआ, उस तरह जहाँ पिता और शिक्षक शुभ इच्छाका विरोध करें वहाँ सोलह वर्षसे अधिक उम्र के बालिग पुत्र या पुत्रीको चाहिए कि वह उन दोनोंको विनयपूर्वक समझाये और न माननेपर उनकी आज्ञा या इच्छाकी<noinclude>{{Smallrefs}}
{{left|४३–१}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{rh|२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>सादर अवज्ञा करे। ऐसे समय यही प्रत्यक्ष धर्म है। इस पत्र में पिताका जिस रूप में वर्णन किया गया है, यदि वह सच हो, और पिता अपने-आपको पहचान गये हों तो उनसे मेरी विनती है कि ये खादीकी प्रतिष्ठा बढ़ायें, लड़केको आशीर्वाद दें, उसके यज्ञकार्यमें उसे प्रोत्साहित करें और स्वयं चाय तथा धर्मसको त्याग दें। चायकी कोई जरूरत नहीं है, और थर्मस जैसी चीज उनके गरीब घरकी शोभा नहीं बढ़ाती। जो विदेशी चीजें स्वास्थ्य आदिको बनाये रखने या ऐसे ही अन्य मामलोंमें जरूरी हैं, उनसे मुझे कोई द्वेष नहीं है। लेकिन कौन-सी चीज आवश्यक है, यह सदा एक विचारणीय प्रश्न है। खादी पहननेमें देशप्रेम और मर्यादाकी जो भावना विद्यमान है, उसे समझ लेना चाहिए। केवल खादी पहनने भरसे हर तरहकी मनमानी करनेका परवाना कदापि नहीं मिलता; यह तो अन्य अनावश्यक चीजोंके उपभोग पर अंकुश रखनेकी दिशा में पहला कदम और चिह्न है। यहां पानी या दूसरी किसी भी चीजको गरम बनाये रखनेका सस्ता और देशी उपाय बता दूं। गरम पानी वगैराको ठीक तरह से बन्द हो सकनेवाले बरतन में रखकर उसके चारों ओर अच्छी तरह गरम कम्बल या रुई लपेट दें और फिर उसे किसी डिब्बे या सन्दूकमें रख छोड़ें। इस तरह रखनेसे कोई भी चीज रखते समय जितनी गरम होगी, चौबीस घण्टे तक वह उतनी ही गरम बनी रहेगी।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' २-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''३. पत्र : लॉर्ड इर्विनको'''}}}}
{{right|सत्याग्रहाश्रम, साबरमती<br>२ मार्च, १९३०}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
इसके पहले कि मैं सविनय अवज्ञा शुरू करूँ, और शुरू करनेपर जिस जोखिमको उठानेके लिए मैं इतने सालोंसे हिचकिचाता रहा हूँ, उसे उठाऊँ, इस उम्मीदसे में आपको यह पत्र लिखने जा रहा हूँ कि अगर समझौतेका कोई रास्ता निकल सके तो उसके लिए कोशिश कर देखूं।
अहिंसामें मेरा वैयक्तिक विश्वास तो जाहिर ही है। जान-बूझकर में किसी भी प्राणीको चोट नहीं पहुँचा सकता, तो फिर किसी मनुष्यको—भले ही उसने मेरा या जिन्हें मैं अपना समझता हूँ उनका बड़ेसे बड़ा अहित ही क्यों न किया हो—चोट पहुँचाने की तो बात ही क्या? इसलिए यद्यपि अंग्रेजी सल्तनतको मैं एक अभिशाप मानता हूँ, लेकिन में यह कभी नहीं चाहता कि एक भी अंग्रेजको या भारतमें उपार्जित उसके एक भी उचित हितको किसी तरहका नुकसान पहुँचे।
गलतफहमी से बचने के लिए मैं अपनी बातको जरा और साफ किये देता हूँ। यह सच है कि मैं भारतमें अंग्रेजी राज्यको एक अभिशाप मानता हूँ, लेकिन इस<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पत्र : लॉर्ड इर्विनको|३}}</noinclude>कारण मैं यह तो कभी नहीं मानता कि सब-के-सब अंग्रेज दुनियाके दूसरे लोगोंके मुकाबले ज्यादा दुष्ट हैं। मुझे बहुतेरे अंग्रेजोंके साथ गहरी दोस्ती रखनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है; यही नहीं, बल्कि अंग्रेजी राज्यने हिन्दुस्तानको जो नुकसान पहुँचाया है उसके बारेमें बहुतेरी हकीकतें तो मुझे उन अनेक अंग्रेजोंकी लिखी चीजोंसे ही मालूम हुई हैं, जिन्होंने उस शासनके बारेमें कठोर सत्य निर्भीकतापूर्वक प्रकट किया है।
और मैं अंग्रेजी राज्यको अभिशाप रूप क्यों मानता हूँ?
इस कारणसे कि इस राज्यने क्रमिक शोषणको प्रणालीके द्वारा और अपने तन्त्र के तबाह कर डालनेवाले फौजी और दीवानी खर्चके द्वारा, जिसे कि यह देश कभी बरदाश्त नहीं कर सकता, इस भूमिके करोड़ों मूक मानवोंको दरिद्र बना दिया है। राजनैतिक दृष्टिसे इस राज्यने हमें लगभग गुलाम बनाकर रख छोड़ा है। इसने हमारी संस्कृति और सभ्यताकी बुनियादको हिला दिया है और लोगोंसे हथियार छीन लेनेकी सरकारी नीतिने तो हमारी आत्माको कुचल ही डाला है। अब तो बस यही शेष रह गया है कि हममें से किसीको कोई मामूली से मामूली हथियार भी न रखने देनेका कानून बना दिया जाये। आन्तरिक शक्तिसे रहित हम लोगोंपर इस नीतिका प्रभाव यह हुआ है कि हम लगभग कायरताजन्य असहायावस्थामें पहुँच गये हैं।
अपने दूसरे बहुत-से भाइयोंके साथ-साथ मैं भी यह आशा लगाये बैठा था कि प्रस्तावित गोलमेज परिषद्से ये सब शिकायतें शायद रफा हो जायें। लेकिन जब आपने साफ-साफ कह दिया कि आप कोई ऐसा आश्वासन नहीं देंगे कि आप या ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज्यकी किसी योजनाका समर्थन अनिवार्यतः करेंगे, तब मैंने महसूस किया कि गोलमेज परिषद् वह समाधान नहीं दे सकती जिसके लिए देशके प्रबुद्ध लोग ज्ञानपूर्वक और करोड़ों मूक मानव अनजाने मनसे तरस रहे हैं। यहाँ यह कहनेकी तो जरूरत ही नहीं होनी चाहिए कि इस मामलेमें पालियामेंटका आखिरी फैसला करनेका हक छीन लेनेका कोई सवाल नहीं था। ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं, जिनमें मन्त्रिमण्डलने इस आशासे कि पार्लियामेंटकी अनुमति तो मिलेगी ही, पहलेसे ही अपनी नीति निर्धारित कर ली थी।
इस तरह दिल्लीकी मुलाकातका<ref>यह मुलाकात २३ दिसम्बर, १९२९ को हुई थी; देखिए खण्ड ४२।</ref> कोई नतीजा न निकलनेके बाद मेरे और पण्डित मोतीलाल नेहरू के सामने १९२८ की<ref>देखिए खण्ड ३८, पृष्ठ २८५-७।</ref> कलकत्ता कांग्रेस द्वारा पास किये गये गम्भीर प्रस्तावपर अमल करानेके लिए कदम उठानेके अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं रह गया था।
पर आपकी घोषणामें जिस 'डोमीनियन स्टेटस' (औपनिवेशिक स्वराज्य) शब्दका जिक्र है, अगर वह शब्द अपने सच्चे अर्थ में प्रयुक्त किया गया होता तो पूर्ण स्वराज्यके प्रस्तावसे<ref>यह प्रस्ताव २३ दिसम्बर, १९२९ को लाहौर कांग्रेस द्वारा पास किया गया था; देखिए खण्ड ४२, १४ ३३३-३५।</ref> चौंकनेका कोई कारण ही न था। क्योंकि 'डोमीनियन स्टेटस' का अर्थ लगभग पूर्ण स्वाधीनता ही है, इस बातको क्या जिम्मेदार ब्रिटिश राजनीतिज्ञोंने<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८२
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दर्शन करनेको मिले और काका तथा नरहरिको भविष्य मार्गदर्शन मिले। इसके बावजूद तुम पकड़ लिये गये, यह ठीक ही हुआ। बाहर रहनेसे कुछ मिठाई तो मिलनेवाली थी नहीं और सम्भावना अत्यधिक कामकी वजहसे तुम्हारे बीमार पड़ जानेकी थी। तुम्हारे जेलसे लौटने तक कई हजार व्यक्ति अपने प्राणोंसे हाथ धो चुके होंगे। ईश्वरकी कैसी कृपा है कि कुछ चुने हुए लोग अनायास ही बच जायेंगे । जो लोग बलि हो जायेंगे और जो बचे रहेंगे वे सब समान रूपसे ही पुण्यको प्राप्त करेंगे। मरनेवाले लोग ही पुण्यवान सिद्ध होंगे अथवा अपेक्षतया अधिक पुण्यवान सिद्ध होंगे, ऐसा माननेका कोई कारण नहीं ।
मेरा खयाल है कि पेशावर और चटगांवमें हुई घटनाओंके बाद निर्दोष व्यक्तियोंके दो-चार कत्लेआम और होंगे। अथवा निर्दोष व्यक्तियोंको जान-बूझकर और दृढ़ताके साथ जेल में ठूंस दिया जायेगा। कराचीमें तो निर्दोष व्यक्ति ही मरे अथवा घायल हुए हैं। सच बात तो यह है कि सरकार खुद भी नहीं जानती कि उसकी स्थिति क्या है और यह क्या करना चाहती है। यह सब उसके लिए और संसारके लिए नई बात है ।
अब खूब आराम करना । लकड़ीकी तकली बना लेना और डटकर कातना । खादी तैयार हो रही है। दूसरे कैदियोंसे कतवाना ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ९८५८ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|{{larger|'''३२३. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|२५ अप्रैल १९३०}}
{{Left|चि० नारणदास,}}
आश्रमके लिए नमक प्रान्तीय समितिसे ले लेना। यदि यहाँ या अन्यत्र कहीं भी न मिल सके तो मुझे लिखना ।
नमकको बेचने के बारेमें इमाम साहबसे पूछना ।
सारजाबहनने अपनी बच्चीको कहाँ भेजा है ?
मैं खुशालभाईको लिखूंगा। उड़ीसा के लिए बहनोंने मुझसे तो कोई मांग नहीं की है। सोनामणि आदिको यदि अभी नहीं भेजा जा सकता तो उन्हें वहीं रहने दो और शिक्षा प्राप्त करने दो।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|[ पुनश्च : ]}}
भाई भणसाली काम मांगते हैं। रातकी पहरेदारी तो वे अवश्य चाहते हैं। उचित लगे तो उन्हें वह सौंप देना । कदाचित् सफाई भी करें।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०५ ) से ।
सौजन्य : नारणदास गांधी
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{C|{{larger|'''३२४. पत्र : जमनादास गांधीको'''}}}}
{{Right|२५ अप्रैल, १९३०}}
{{Left|चि० जमनादास,}}
तुम्हारा पत्र मिला । तार देनेकी जरूरत नहीं थी। सरकार किसी भी हालत में खुशालभाईको नहीं पकड़ेगी, ऐसी मेरी मान्यता है। उनके साथ यदि टुकड़ी हो तो यह अच्छी बात होगी। उन्हें इतनी बात जरूर सोच लेनी चाहिए कि सरकार सविनय अवज्ञा करनेके कारण कदाचित् उनकी पेंशन बन्द कर दे। यदि वह ऐसा करे तो मेरी दृष्टिसे यह ठीक ही होगा। वह जितना अन्याय करेगी, उसका परिणाम भी उतनी ही जल्दी सामने आ जायेगा। लेकिन यदि पेंशन रूपी इस विपत्तिका सामना करनेकी उनमें हिम्मत नहीं है तो उन्हें सविनय अवज्ञा करनेका विचार छोड़ देना चाहिए । इसमें मुझे तनिक भी सन्देह नहीं है कि फिलहाल तो सविनय अवज्ञा करना परमधर्म बन गया है। वे वीरमगांव न उतरें; बल्कि उन्हें अच्छा लगे तो लखतर अथवा उचित जान पड़े तो जहाँ छावनी हो यहाँ रहें; और बादमें वापस घर जायें। फिर प्रसंग उपस्थित होनेपर सविनय अवज्ञा करें और यदि कहीं पर गोली चलने की नौबत आ जाये तो गोलियोंकी बौछारको झेलें । तात्पर्य यह कि पूरी तैयारी होनी चाहिए। यदि देवभाभी सहमत हों तभी वे ऐसा करें। नहीं तो उनका आशीर्वाद हम सबके साथ है ही। हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है। जब तुम्हें आना हो तब आकर मिल जाना ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९३०८ ) से ।
सौजन्य : जमनादास गांधी
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३२५. भाषण: पन्नारमें'''}}}}<ref>१. भाषणके पूर्व गांधीजी ने महादेव देसाईसे प्राप्त पत्र पढ़कर सुनाया जिसमें श्री देसाईंने अपनी गिरपतारीका वर्णन करते हुए दिखा था कि उनके साथ गुजरातके उन नौजवान स्नातकों को भी गिरफ्तार कर दिया गया जो गैरकानूनी ढंगसे बनाये नमकको कारियोंके साथ चल रहे थे।</ref>
{{Right|२५ अप्रैल, १९३०}}
गांधीजी ने प्रामवासियोंसे कहा कि आपको जेल जानेके लिए तैयार रहना चाहिए लेकिन साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि हमारा संघर्ष अहिंसात्मक है। पुलिस भले ही आपको मारे-पीटे, लेकिन आपको उसके खिलाफ अंगुली भी नहीं उठानी चाहिए।
पण्डित मोतीलाल नेहरू और उनकी पत्नी देशसेवा करते-करते बूढ़े हो गये हैं, अब उन जैसे लोग भी इस संघर्ष में कूद पड़े हैं। फिर आप लोग ही पीछे क्यों रहें?
गांधीजी ने कानूनकी आड़में कुछ इलाकोंमें पुलिस द्वारा किये जुल्मका उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिसको कैदियोंके भी विरुद्ध शक्ति प्रयोग करनेका अधिकार नहीं है। उन्होंने पुलिसके अत्याचारोंकी निन्दा करते हुए कहा कि उसके इन कार नामों की कोई सफाई नहीं दी जा सकती। लेकिन इससे हमें संघर्षके अहिंसात्मक स्वरूपको कायम रखनमें कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए।
इसके उपरान्त गांधीजी ने ग्रामीण लोगोंसे सूत कातने तथा अपनी जरूरतका कपड़ा स्वयं तैयार करनेका अनुरोध किया और कहा कि कपड़ेके लिए आप गांवके बाहरके लोगोंपर आश्रित न रहें।
विद्यार्थियोंको उनका सन्देश यह था कि वे कमसे कम एक तोला सूत रोज कातें। उन्होंने कहा शराबबन्दी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शराब और विदेशी कपड़ोंके कारण देशके करोड़ों रुपये प्रतिवर्ष विदेश जा रहे हैं।
गांधीजी के यह पूछनेपर कि क्या इस गाँवके पटेलने अपना त्यागपत्र दे दिया है, एक खादीधारी ग्रामीण व्यक्तिने उठकर बताया कि उसने बहुत पहले त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने बच्चोंके माता-पिताओंसे अनुरोध करते हुए कहा कि आप अपने बच्चोंको सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलोंसे निकाल लें और राष्ट्रीय स्कूलकी स्थापना करें। ब्रिटिश शासनसे आपका कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। गाँवके मुखियाने बताया कि खजूरके ५०० पेड़ काट डाले गये हैं और सरकारी अधिकारियोंका सामा-जिक बहिष्कार करनेकी घोषणा की गई है।
यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन आपको विदेशी कपड़ेका जोरदार बहिष्कार भी करना चाहिए ।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २६-४-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३२५. भाषण: पन्नारमें'''<ref>१. भाषणके पूर्व गांधीजी ने महादेव देसाईसे प्राप्त पत्र पढ़कर सुनाया जिसमें श्री देसाईंने अपनी गिरपतारीका वर्णन करते हुए दिखा था कि उनके साथ गुजरातके उन नौजवान स्नातकों को भी गिरफ्तार कर दिया गया जो गैरकानूनी ढंगसे बनाये नमकको कारियोंके साथ चल रहे थे।</ref>}}}}
{{Right|२५ अप्रैल, १९३०}}
गांधीजी ने प्रामवासियोंसे कहा कि आपको जेल जानेके लिए तैयार रहना चाहिए लेकिन साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि हमारा संघर्ष अहिंसात्मक है। पुलिस भले ही आपको मारे-पीटे, लेकिन आपको उसके खिलाफ अंगुली भी नहीं उठानी चाहिए।
पण्डित मोतीलाल नेहरू और उनकी पत्नी देशसेवा करते-करते बूढ़े हो गये हैं, अब उन जैसे लोग भी इस संघर्ष में कूद पड़े हैं। फिर आप लोग ही पीछे क्यों रहें?
गांधीजी ने कानूनकी आड़में कुछ इलाकोंमें पुलिस द्वारा किये जुल्मका उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिसको कैदियोंके भी विरुद्ध शक्ति प्रयोग करनेका अधिकार नहीं है। उन्होंने पुलिसके अत्याचारोंकी निन्दा करते हुए कहा कि उसके इन कार नामों की कोई सफाई नहीं दी जा सकती। लेकिन इससे हमें संघर्षके अहिंसात्मक स्वरूपको कायम रखनमें कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए।
इसके उपरान्त गांधीजी ने ग्रामीण लोगोंसे सूत कातने तथा अपनी जरूरतका कपड़ा स्वयं तैयार करनेका अनुरोध किया और कहा कि कपड़ेके लिए आप गांवके बाहरके लोगोंपर आश्रित न रहें।
विद्यार्थियोंको उनका सन्देश यह था कि वे कमसे कम एक तोला सूत रोज कातें। उन्होंने कहा शराबबन्दी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शराब और विदेशी कपड़ोंके कारण देशके करोड़ों रुपये प्रतिवर्ष विदेश जा रहे हैं।
गांधीजी के यह पूछनेपर कि क्या इस गाँवके पटेलने अपना त्यागपत्र दे दिया है, एक खादीधारी ग्रामीण व्यक्तिने उठकर बताया कि उसने बहुत पहले त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने बच्चोंके माता-पिताओंसे अनुरोध करते हुए कहा कि आप अपने बच्चोंको सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलोंसे निकाल लें और राष्ट्रीय स्कूलकी स्थापना करें। ब्रिटिश शासनसे आपका कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। गाँवके मुखियाने बताया कि खजूरके ५०० पेड़ काट डाले गये हैं और सरकारी अधिकारियोंका सामा-जिक बहिष्कार करनेकी घोषणा की गई है।
यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन आपको विदेशी कपड़ेका जोरदार बहिष्कार भी करना चाहिए ।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २६-४-१९३०}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३२६. पत्र : ए० सुब्बारावको'''}}}}
{{Right|२६ अप्रैल, १९३०}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
तुम्हें सविनय अवज्ञा आन्दोलन में<ref>१. सुम्बाराव गांधीजीसे सलाह मागते हुए लिखा था कि ये सविनय अवज्ञा मान्दोलन में शामिल होना चाहते हैं लेकिन उनके वृद्ध माता-पिता उन्हें ऐसा करनेसे रोकते हैं।</ref> शामिल नहीं होना चाहिए अपितु अपने-आपको घुनाई और कताई तक ही सीमित रखना चाहिए।
{{Right|तुम्हारा,<br>
मो० क० गांधी}}
{{Left|श्रीयुत ए० सुब्बाराव<br>
राजावरम् आत्रेयपुरम्<br>
बरास्ता कोठपेटा<br>
पूर्व गोदावरी जिला}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९२८६) से।
सौजन्य ए० सुब्बाराव
{{C|{{larger|'''३२७. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|२६ अप्रैल, १९३०}}
{{Left|चि० नारणदास,}}
मेरे खयालसे मेरे गिरफ्तार होने में अभी आठ-दस दिनकी देर है ।
खुर्शीदबहन जिन्हें पसन्द करती हैं और जो उनके साथ-साथ रहेंगी, उन बहनोंके बारेमें मालूम होनेके बाद ही मैं अन्य बहनोंके सम्बन्धमें विचार करूँगा । खुर्शीदबनके साथ जितनी ज्यादा बहनें जायें उतना ही अच्छी है। यह बहन अत्यन्त पवित्र है। क्या सरोजिनीदेवी कुछ काम आ सकती है ?
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|[ पुनश्च : ]}}
मैंने अंजनादेवीको लिखा है कि उन्हें रामनारायणके साथ जाना चाहिए।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०६ ) से ।
सौजन्य : नारणदास गांधी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८६
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३२८. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|२६ अप्रैल, १९३०}}
{{Left|चि० नारणदास,}}
मौलवी सैयद रऊफ पाशा कोलम्बों में प्रोफेसर हैं। वे आश्रम देखने और कदाचित् कुछ दिनों रहनेके लिए वहाँ आ रहे हैं। उनकी खातिरदारी करना और इमाम साहब तथा मीराबहनसे उन्हें मिलाना ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१०७ ) से ।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{C|{{larger|'''३२९. पत्र : महालक्ष्मी एम० ठक्करको'''}}}}
{{Right|२६ अप्रैल, १९३०}}
{{Left|चि० महालक्ष्मी,}}
तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हें खुराक बदलनेकी बिलकुल जरूरत नहीं है। तुम्हें दूध और फलों पर ही रहना चाहिए। ताराबहनको मैंने ही यह लिखा था कि जहाँ तुम्हारे जानेकी बात है, वहाँ अगर फल न मिलें तो मुश्किल होगी। इसीसे मैने तुम्हें उसके साथ भेजने का विचार छोड़ दिया है। हां, मैं तुम्हें ऐसे स्थानपर अवश्य रखूंगा जहाँ तुम किसी अनुभवी और ऐसी बनके सम्पर्क में आ सको जो तुम्हें सिखा सके। बहुत करके आज रातको मैं वहाँ आ जाऊँगा । तब इस विषयपर और बात-चीत करेंगे। तुम तनिक भी घबराना नहीं ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ६७९६) की फोटो नकलसे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३३०. भाषण : अंभेटीमें'''}}}}
{{Right|२६ अप्रैल, १९३०}}
''''मृत्युका वरण करो देशकी सेवा करो', यही महात्माजी के सन्देशका सार था ।'''
'''उन्होंने कहा कि में विट्ठलदासकी वृद्ध माताजी से मिलने गया था-- अपनी समवेदना प्रकट करनेके लिए नहीं, बल्कि उन्हें अपने पुत्रको देश सेवाके लिए अर्पित कर देनेपर बधाई देनेके लिए हर माँको अपना बेटा देशसेवाके लिए भेंट कर देना चाहिए। विट्ठलदास मरे नहीं हैं, बल्कि वे तो देशकी स्मृतिमें अमर हो गये हैं। भारतको स्वतन्त्र करानेके लिए इस तरह बहुत-से लोगोंको मरना होगा।'''
'''जिस क्षण हम मृत्युके भयसे मुक्त हो जायेंगे, उसी क्षण स्वराज्य हमारे निकट आ जायेगा। सरकारने अत्याचारका सहारा लेना शुरू कर दिया है और हमें उसके खिलाफ लड़ते समय मृत्युके लिए तैयार रहना चाहिए।'''
'''आप सबसे मेरा यही अनुरोध है कि गाँवसे खजूरके सारे पेड़ोंको समाप्त करके और शराब पीनेकी आदतसे बिलकुल छुटकारा पाकर आप विठ्ठलदासके अधूरे कामको पूरा करें।'''
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''बाॅम्बे क्रॉनिकल,''' २८-४-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३३१. भाषण: बलसाड़में'''}}}}
{{Right|२६ अप्रैल, १९३०}}
मैं कुछ दिन पहले ही बलसाड़ आया था। उसके बाद यदि आपने कोई विशेष कार्य करके मुझे उसीको दिखाने बुलाया होता तो अच्छा होता। किन्तु वैसा कोई काम न तो आपने किया और न सरकारने ही किया है। रमणीकलाल मोदी दांडी-कूचमें मेरे साथी थे। सरकारने यहीं से उन्हें जेल भेजकर सम्मानित किया; आपने उसके उपलक्ष्यमें उत्सव मनानेके लिए मुझे बुलाया है। किन्तु इसमें मेरे लिए उत्सव-की क्या बात है ? मेरे साथीको सिर्फ एक वर्ष! इस बार तो हम सच्चा खेल खेल रहे हैं। जेल अब हमारे लिए जानी-पहचानी जगह बन गई है और जेलके कष्टोंको हम कष्ट नहीं मानते। अब तो हमारे यहाँ स्त्रियाँ और बच्चे भी जेल जानेकी माँग करते हैं; मानों वह कोई बहुत सुखदायी वस्तु हो। इस प्रकार हमारे मनसे जेलका भय निकल चुका है और लोगोंने यह समझ लिया है कि जेल जानेका मतलब स्वराज्य के आन्दोलनमें हाथ बँटाना है। यह सब मुझे अच्छा लगता है। किन्तु जेल
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
k14gkqhc7q54eolaqhdsfbgcrmhgrny
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८८
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>जानेके बारेमें मेरे लेखे कोई रस नहीं बचा है। यह सुनकर कि मेरे किसी साथीको बरस, दो बरस या पांच बरसकी जेल हो गई, मुझे उसमें कोई आनन्द नहीं आता । किन्तु जब में यह सुनता हूँ कि जयरामदास जैसे मेरे साथीको गोली लगी या ऐसे ही किसी निरपराध साथीकी खोपड़ी फूट गई तो इसमें मुझे अच्छा लगता है। सर-कारने अब अपने कृत्यों द्वारा यह घोषित कर दिया है कि हम तुम्हारी खोपड़ियाँ तोड़ देंगे किन्तु नमक कर नहीं उठायेंगे।" हम सरकारसे कहते हैं कि "तुम्हें जितनी चाहिए उतनी खोपड़ियाँ हम दान कर देंगे किन्तु कृपा करके नमक कर तो उठा ही लो। यदि रमणीकलालने यहाँ अपनी खोपड़ी दान कर दी होती और वलसाड़की धरती पर उनके खूनकी परत जम गई होती तो आपका मुझे बुलाना उचित होता । ऐसी बहादुरी न तो रमणीकलालने दिखाई और न सरकारने ऐसी बहादुरी आनन्द और दहेवाणमें दिखाई जा रही है। यहाँ स्वयंसेवकोंको रात में पीटा गया और पिटाई में पुलिसको मजा आये इसलिए बत्तियाँ मँगवाकर पीटा गया। यदि वहाँके लोग मुझे बुलायें तो मैं तुरन्त जाऊँ। यह अवसर वहाँ उत्सव मनाने लायक है। जब आपके यहाँ ऐसा अवसर आये तो मुझे अवश्य बुलायें। किन्तु ऐसा दिन आयेगा या नहीं यह तो बलसाड़के भाई-बहनोंके हाथमें है।
आपके यहाँ तो पटेल अब भी नौकरियोंसे चिपके हुए हैं। उनके इस्तीफोंकी घोषणामें मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है, इससे तो उलटे हमारी हँसी होती है। यदि इस सभा में कोई पटेल उपस्थित हों तो उनसे मैं प्रार्थना करता हूँ कि इसके बजाय वे अपने इस्तीफे वापस ले लें। यदि पटेल न आये हों तो कार्यकर्ता मेरी यह प्रार्थना उन तक पहुँचा दें। बलसाड़की नगरपालिका अवतक हरिजनोंके लिए कुँआ नहीं। बनवा सकी। यदि इस काम के लिए आपको कोई ठेकेदार न मिलता हो तो मुझे ठेका दे दें। बलसाड़के लोगोंको प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिए कि जबतक भंगियोंको पानी नहीं मिलेगा तबतक सभी लोग पानी लेना बन्द रखेंगे। एक दिनके लिए आप मुझे बलसाड़का शासन सौंप दें फिर मैं आपको दिखा दूंगा कि यह कैसे नहीं हो सकता। यदि आप इतना भी नहीं कर सकते तो बलसाड़को स्वराज्य नहीं दिला सकते। यह तो सभ्य शहर कहलाता है और आपके यहाँ ४५ हजार रुपयेकी ताड़ी बिकती है; तो फिर इसका अर्थ हुआ कि यह सभ्यताकी निशानी है। [यदि ऐसा है तो फिर मेरे-जैसे व्यक्तिको आदरपूर्वक यह निवेदन कर देना चाहिए कि जो स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अधीर है, जो नमक कर रद करवा देनेके लिए अधीर है और जो सरकारके जंगलीपनको बन्द करवा देनेके लिए अधीर हो उठा है, उसे ऐसे सभ्य शहरमें फिलहाल आपको नहीं बुलाना चाहिए था ।
आपने ताड़ी और शराब बन्द करनेके लिए क्या किया है ? कमसे कम स्थानीय बहनें तो सुधरी हुई हैं। मैंने ऊपर जिस सभ्यताका उल्लेख किया, उस दृष्टिसे नहीं । वे मधुर स्वरमें गीत गाती हैं। यदि वे अपने मधुर भजन शराब पीनेवालोंको सुनायें तो उनपर बहुत अच्छा असर पड़े। इस प्रकारसे बह्नोंने आज ओलपाड, जलालपुर और सूरत में अच्छा प्रभाव उत्पन्न किया है। ठेकेवालों को इस बातकी चिन्ता है कि
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३८९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||भाषण: बलसाड़में|३४५}}</noinclude>यदि उनका रोजगार नहीं चलेगा तो क्या होगा ? लोगोंको ठेकेवालों के पास जाकर कहना चाहिए कि यदि वे कोई दूसरा काम करना चाहें तो वह उन्हें सुझाया जाये । कल कराडीमे चार पारसी भाई मुझसे मिलने आये थे। वे कहने लगे कि " अब सिर्फ दो महीने बचे हैं, इतने दिन हमें शराबका धन्धा और कर लेने दें। कुछ देर विनोद कर लेनेके बाद मैने उनसे कहा, 'अब जबकि पूरे देशमें जागृतिकी लहर आई हुई है, तो क्या आपके धन्येकी खातिर में लोगोंसे शराब न छोड़नेकी प्रार्थना करूँ ? " उन्होंने कहा, "नहीं, ऐसा नहीं, किन्तु धरना क्यों दिया जाता है ?" " यदि धरना देनेसे लोग शर्मिन्दा होकर लौट जाते हों तो मैं वैसा क्यों न करूँ?" मैंने उनसे पूछा कि " क्या किसी महिला स्वयंसेविकाने आप पर या पीनेवालों पर जोर-जुल्म किया है?" उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा तो नहीं कहा जा सकता ।
सभी स्थानोंपर बहनें ही धरना देती हैं और इसका अच्छा परिणाम निकलता है यहाँ इतनी बहनें बैठी हैं यदि वे सब मिलकर इसके अनुसार काम करें तो ये २४ घंटोंके भीतर शरावके ठेके बन्द करवा सकती हैं। चाहे जितना बड़ा पियक्कड़ क्यों न हो किन्तु यह आप बहनोंकी प्रेमपूर्ण विनतीको कैसे ठुकरा सकता है? आप उनके पास जाकर दीन भावसे कहें, “भाइयों, आप ऐसा क्यों करते हैं? इस प्रकार विनती करनेसे केवल पीनेवाले ही नहीं, ठेकेके मालिक भी सुधर जायेंगे । लोग जोर-जबरदस्तीको बरदाश्त नहीं कर सकते, बल्कि यदि आप उन्हें प्रेमसे शराबोर कर दें तो इस प्रेमरसको चखकर उनका मद्यरस सूख जायेगा। श्रीमद्- भगवद्गीता में कहा गया है कि निराहार रहनेवाले मनुष्यके विषय मन्द पड़ जाते हैं किन्तु उनका रस नहीं जाता। वह रस तो ईश्वरकी कृपा होनेपर ही जाता है।<ref>१. अध्याय २-५९ ।</ref> आपका प्रेम प्रभुका प्रसाद है और मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि ऐसा करनेसे पीनेवाले का शराबके प्रति जो रस है वह काफूर हो जायेगा। यदि आप सचमुच कुछ करना चाहते हों तो आपके यहाँ ताड़ी या शराबके जितने ठेके या अड्डे हों उन्हें बन्द करवा दें और जितने खजूर हों उन्हें काटकर फेंक दें।
मुझे बताया गया है कि आपके शहरमें १०० तकलियाँ और ७ चरते हैं। किन्तु इनसे हम विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार नहीं कर पायेंगे। घर-घरमें तकली चलनी चाहिए। आप सबकी चरखोंकी मांगको पूरा करना मेरे लिए सम्भव नहीं । बलसाड़का कोई परोपकारी बढ़ई यदि चाहे तो यह उसके बसकी भी बात नहीं है। तकली आप खुद ही बना सकते हैं। यदि आपको अपने में छेद करना न आता हो तो बच्चोंकी टूटी हुई स्लेटके टुकड़े या ठीकरेको काममें लायें। यदि आप यह आशा करते हों कि मैं आपके लिए बम्बईसे खादी मँगवाऊँगा और पहनाऊँगा तो यह सम्भव नहीं है। बम्बई में खादीका भंडार तो कबका समाप्त हो चुका है। यदि आप खादी पहनना चाहते हों तो तकली चलायें।
आप नमक- कानून तोड़ते हैं; किन्तु सिर्फ इतनेसे स्वराज्य नहीं मिलेगा। इससे नमक-कानून तो उठ ही जायेगा, अतः इस बारे में कोई शंका न करें। किन्तु यदि
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३९०
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आप स्वराज्य स्थापित करना चाहते हों तो उसके लिए आपको प्राण देने पड़ेंगे। लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह चटगांवमें लोग मरे। इस तरह चार दिनमें मिलने- वाले स्वराज्यमें चार महीने तो लग ही जायेंगे। मैं नहीं कह सकता कि स्वराज्य कब मिलेगा। किन्तु निर्दोष कार्यकर्ताओंको रातमें पीटा जाता है, यह क्या है ? क्या यह गुण्डोंकी सरकार है ? अभी तो ऐसा ही लगता है। मुझे जो कुछ सुनने को मिला है उसे गुण्डागर्दी के सिवा और क्या कहा जा सकता है। मवाली तो अज्ञानी होते हैं इसलिए हमें उनकी गुण्डागर्दी सहनी पड़ती है, किन्तु इस गुण्डागर्दीको कैसे बर-दात किया जाये ? जितने भाई-बहन यहाँ इकट्ठे हुए हैं, यदि वे सिर्फ तमाशा देखने नहीं बल्कि कुछ करनेके विचारसे यहाँ एकत्रित हुए हों तो आपको यह निश्चय कर लेना चाहिए कि आप इस गुण्डागर्दीको बरदाश्त नहीं करेंगे और जितने भी कानून नीति विरुद्ध होंगे उन सबको सविनय तोड़कर आप इसका उत्तर देंगे। चटगाँवने जो रास्ता अपनाया है हम उस रास्तेको अपनाना नहीं चाहते। ज्यों-ज्यों हमारे कष्ट बढ़ते जायेंगे त्यों-त्यों हम अधिकाधिक कष्टोंको निमन्त्रित करते जायेंगे ।
आप सभी सभ्य हैं, अतः मने थोड़ेमें जो कहा, उसे विस्तारपूर्वक मनमें समझ लें और कृपा करके उस पर अमल करें। आपकी सीमासे रमणीकलाल जैसा साधू पुरुष पकड़ लिया गया है। यह तो ठीक है वह साधु है, तपश्चर्या करनेवाला है। ऐसे निर्मल व्यक्तिके जेल जानेसे स्वराज्य अवश्य कुछ पास खिसक आया है। अब आपको यह सिद्ध करना है कि आप रमणीकलाल, मोहनलाल पण्ड्या, ईश्वरलाल, नानूभाई और नीछाभाई जैसे कार्यकर्ताओंके योग्य हैं।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ४-५-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३३२. भाषण: छरवाड़ा में'''}}}}
{{Right|२६ अप्रैल, १९३०}}
लोगोंने मुझे महात्माके बजाय अब नमक चोरकी उपाधि प्रदान की है। मुझे उनकी यह बात अच्छी लगी है। किन्तु नमक-चोर बनना आसान नहीं है। महात्मा होना आसान है। खाने-पीने में थोड़ा ढोंग करे और लँगोटी लगा ले तो इस देशमें महात्माका पद आसानीसे मिल जाता है। यों तो अभी-अभी मैं आप लोगोंके साथ जाऊँगा और पासको खाड़ीसे थोड़ा-सा नमक लाऊँगा सरकारने इस नमक में बहुत-सारी मिट्टी मिला दी है। इसलिए हमें शुद्ध नमक नहीं मिलेगा किन्तु जैसा भी मिलेगा वैसा हम अभी ले आयेंगे। किन्तु किसी आदमीको चोर कब कहा जा सकता है ? किसीको चोर तो तभी कहा जा सकता है जब उसे चोरीके लिए दण्डित किया जाये। हम चोरी करें और कोई हमारे विषय में पूछताछ भी न करे तो यह
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||भाषण: छरवाड़ा में|३४७}}</noinclude>चोरी कैसी ? हम थोड़ी-सी मिट्टी उठा लायेंगे। सरकारी कानूनमें भले ही इसे चोरी कहा जाये किन्तु दुनिया इसे चोरी नहीं मानती और सरकार भी नहीं मानती । हम चोरी करें और उसके अपराधमें हमारा हाथ तोड़ दिया जाये तभी चोरी सफल और सच्ची हुई। आज हम नमक उठायेंगे लेकिन सम्भव कि मेरे या आपके किसीके भी हाथ टूटने का अवसर न आये ।
सच्ची चोरी तो तब होगी जब हम नमकके उन पहाड़ोंको लूटें। जब मैं ऊँटडी गया था तो मैंने दूरसे इन पहाड़ोंको देखा था और वे बहुत सुन्दर प्रतीत हुए थे । आज उन्हें पाससे देखा तो ये बहुत मैले और कुरूप मालूम हुए। लेकिन जैसे भी हों हम इन पहाड़ोंपर हाथ डालें । और हमारे हाथ या कलाइयों तोड़ दी जायें या हमें जेल में ठूंस दिया जाये तभी हम सच्चे नमक-चोर साबित होंगे।
किन्तु मैं तो कहता है कि केवल जेल जानेसे ही किसी व्यक्तिको नमक- चोरकी यह कीमती उपाधि नहीं दी जानी चाहिए। जेल जानेसे हमारी पसलियां तो नहीं टूट जायेंगी। अभी-अभी मेरे पास एक पत्र आया है कि खेड़ा जिलेमें कुछ लोगोंको मारा-पीटा गया है। मार खानेवाले ये सब आदरणीय जनसेवक थे। मारनेवाले सरकारी आदमी थे, किन्तु वे सब भी हमारे ही थे। मारनेमें मजा आये इसलिए उन लोगोंने बत्तियाँ भी बुझा दी थीं। इस समय ६-७ आदमी अस्पतालमें पड़े हैं। किसीके मरनेका डर नहीं है, किन्तु उनमें से यदि कोई मर जाये तो हम यह अवश्य कह सकते हैं कि वह हम नमक चोरोंका सच्चा सरदार था । आप आज मेरे साथ इस खाड़ी में से नमक लाने के लिए चलेंगे, किन्तु इतनेसे ही आपको नमक चोरकी उपाधि नहीं मिल सकती। हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि हम नमक- चोरीके उम्मीदवार हैं। जब हम सचमुच नमककी चोरी करेंगे तब तो देशमें कोई नमक-चोर रह ही नहीं जायेगा। उस समय सरकार कह देगी कि आप सभी नमक-कानूनको माननेसे इन्कार करते हैं, तो अब जाइये नमक के ये सारे पहाड़ आजसे आपकी सम्पत्ति हो गये। इस सम्पत्तिका मूल्य केवल सात करोड़ रुपये नहीं है, सात करोड़ तो कर के रूपमें हम सरकारको सीधे दे डालते हैं। लेकिन यह सारा कर वसूल करनेमें जो खर्च पड़ता है उसे भी जोड़ें तो इस तरह हम लगभग २० करोड़की सम्पत्ति के मालिक बनते हैं। इतनी बड़ी सम्पत्ति छोड़नेके लिए भला सरकार कैसे
राजी हो सकती है ? इस समय देशमें नमककी चोरीके हजारों ही नहीं लाखों उम्मीदवार हैं। सही, लेकिन क्या इसीलिए सरकार अपनी इतनी बड़ी आय छोड़ देगी? उसे छोड़ने के पहले यह जरूर ही दस-बीस आदमियोंको घायल करेगी। उन्हें मार तक डालेगी, लेकिन उसके बाद ऐसी अत्याचारी सरकारको फिर यह आय छोड़नेके सिवा कोई चारा नहीं रह जायेगा । वैसी स्थिति उत्पन्न होनेपर आपको यह अधिकार होगा कि आप मुझे नमक चोर कहें और मैं इस उपाधिको स्वीकार करूँ ।
इस समय तो मेरी अपेक्षा महादेव कहीं ज्यादा बड़ा नमक चोर साबित हुआ है। सरदारके जानेके बाद महादेवको एक पलका भी अवकाश नहीं मिला। पुलिस सुपरिटेंडेंट तो उन्हें गिरफ्तार करनेके लिए बहुत आतुर नहीं था। उसे लगता था
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गांधी
वाङमय
खण्ड चौवालीस
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તિથિપત્ર
10186
REFER
તો આ 10
(1)
ક્રા. સ.—
[S)-
ગાંધી સ્મારક સમ્રહાલય
39 MAY 1978
તારીખ
પિર. સં./ 0 [$
6 વાંચવા માટે મુક્ત કર્યા
આ પુસ્તક છેલ્લે દર્શાવેલી તારીખ પહેલાં અથવા તે જ દિવસે
પાછું આપી દેવુ એક એ. તે તારીખ પટ્ટા ને પુસ્તક વધુ આપવામાં
બાવરી
રાજના ૦૦૫ નો પે. લેખે અતિદેવ આપવું પડશે,
ત્વો ની વરખનાથ ન
બી પી વાળા
Portal
2.KADI
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अजीत कुमार तिवारी
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11 AUG 1972
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NOT TO
4
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શ્રી
4444.
જગદાવાદ-૧૦-
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अजीत कुमार तिवारी
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"BHy is cap de tian ula in dä
open why face, sh with see your
beloved. He is in everyone therefore
• say nothing better of anyone.
vent.
brag about thy riches or health
wuth, this case made of five
elements with play false to thee.
we day, Light up thy dark heart.
and do not move for thy purpose
wake up in this temple for then.
hast get the priceless treasure
thy and. Kabir.
says
let there.
he rejoicing for etre for dois voice
is heard initiie.
58:30
B43
साधी सहज समय मली
good man! natural meditation.
Carnicer, is hest. Ever since its manifesta-
देखिए परिशिष्ट ६ ।
SALON.
Geritage Portal<noinclude></noinclude>
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४४
(जुलाई-दिसम्बर १९३० )
प्रकाशन विभाग
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भारत सरकार
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भारत सरकार
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11 AUG 1972
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नवम्बर १९७१ (कार्तिक १८९३)
14
© नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद, १९७१
106.152
GANI HAD
12
DEC 1982
10186
साढ़े सात रुपये
कापीराइट
नवजीवन ट्रस्टकी सौजन्यपूर्ण अनुमतिसे
.
11 AUG 197
निदेशक, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली-१, द्वारा प्रकाशित
और शान्तिलाल हरजीवन शाह, नवजीवन प्रेस, अहमदाबाद- १४, द्वारा मुद्रित
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भूमिका
इस खण्ड में १ जुलाईसे १५ दिसम्बर १९३० तकके साढ़े पाँच महीने लिये
गये हैं, और इसमें मुख्यतः वे पत्र है जो गांधीजीने इस अवधि में यरवडा जेलसे
आश्रमके कार्यकर्त्ताओं तथा अन्य लोगोंको लिखे थे। इनसे पता चलता है कि गांधीजी
जेलमें बैठकर भी किस प्रकार अपने प्रेरक और शिक्षाप्रद पत्रों द्वारा साधारण
पुरुष और स्त्रियोंको सामान्य स्तरसे ऊपर उठाने और देशके सच्चे सेवक बनानेका
सतत प्रयत्न कर रहे थे। आश्रम में होनेवाली प्रार्थनाके समय पढ़े जानेके लिए उन्होंने
'मंगल प्रभात' शीर्षकसे जो कुछ लिखा उसमें ग्यारह व्रतोंका नैतिक महत्व समझाते
हुए उनका सम्बन्ध उस आध्यात्मिक उद्देश्यसे दर्शाया गया है जिनको ध्यान में
रखकर आश्रमकी स्थापना की गई थी। अपने व्यवहार द्वारा मीराबह्नको अक्सर
उन्होंने जो पीड़ा पहुंचाई थी उसके प्रायश्चित्तरूप गांधीजीने मीराबहन के लाभार्थ
'आश्रम - भजनावलि' में संकलित भजनों और गीतोंका अंग्रेजीमें अनुवाद भी किया।
मोहनको लिखे एक पत्रमें उन्होंने कहा, "तुम्हारी खातिर भजनोंका अनुवाद करते
हुए मैं स्वयं बहुत सुख पा रहा हूँ। क्या मैंने अपने प्रेमको अक्सर स्नेहकी कोमल
और मृदुल वर्षाकी अपेक्षा तूफानोंके रूपमें व्यक्त नहीं किया है ? इन तूफानोंकी
स्मृति अनन्य रूपसे तुम्हारे ही लिए किये जानेवाले अनुवादका सुख और बढ़ा देती
है" (पृष्ठ ५२) । दो घटनाओंको छोड़कर बन्दी जीवन के ये माह घटना विहीन ही
रहे। इनमें से एक घटना तो थी उनका मध्यस्थताका प्रयास, जो विफल हो गया,
और दूसरी घटना थी उनके अनशनको सम्भावना, जो टल गई।
कुछ उदारपन्थी नेताओं की मान्यता थी कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनसे देशको
हानि पहुँच रही है। इनमें से दो नेताओं, तेजबहादुर सप्रू और मु० रा० जयकरने
कांग्रेस और सरकार के बीच संधि-विराम कराने के उद्देश्यसे पहलकदमी की, ताकि
कांग्रेस गोलमेज सम्मेलन में भाग ले सके। गांधीजीने इसका जो उत्तर दिया वह
महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्नों पर भी 'मुखर चिन्तन' करने, बुनियादी सिद्धान्तों पर
आग्रह करने और तफसीलके मामले में समझौता करनेकी उनकी विशिष्टताओंसे युक्त
था। यद्यपि गांधीजी 'जेलको दीवारोंके उस पार होनेवाली घटनाओंके ऊपर कोई
निश्चित मत (पृष्ठ ४५) व्यक्त करनेको अनिच्छुक थे, लेकिन उन्होंने अपना यह
मत व्यक्त किया कि यदि भारतको स्वशासन देनेकी बात स्वीकार कर ली जाये
और गोलमेज सम्मेलनमें केवल संक्रमणकालीन पूर्वोपायोंकी तफसील पर ही विचार
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Juhi1986
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" /></noinclude>{{c|'''भूमिका'''}}
इस खण्डमें १ जुलाईसे १५ दिसम्बर, १९३० तकके साढ़े पाँच महीने लिये गये हैं, और इसमें मुख्यतः वे पत्र हैं जो गांधीजीने इस अवधि में यरवडा जेलसे आश्रमके कार्यकर्त्ताओं तथा अन्य लोगोंको लिखे थे। इनसे पता चलता है कि गांधीजी जेलमें बैठकर भी किस प्रकार अपने प्रेरक और शिक्षाप्रद पत्रों द्वारा साधारण पुरुष और स्त्रियोंको सामान्य स्तरसे ऊपर उठाने और देशके सच्चे सेवक बनानेका सतत प्रयत्न कर रहे थे। आश्रममें होनेवाली प्रार्थनाके समय पढ़े जानेके लिए उन्होंने 'मंगल प्रभात' शीर्षकसे जो कुछ लिखा उसमें ग्यारह व्रतोंका नैतिक महत्व समझाते हुए उनका सम्बन्ध उस आध्यात्मिक उद्देश्यसे दर्शाया गया है जिनको ध्यानमें
रखकर आश्रमकी स्थापना की गई थी। अपने व्यवहार द्वारा मीराबह्नको अक्सर उन्होंने जो पीड़ा पहुँचाई थी उसके प्रायश्चित्तरूप गांधीजीने मीराबहनके लाभार्थ 'आश्रम-भजनावलि' में संकलित भजनों और गीतोंका अंग्रेजीमें अनुवाद भी किया। मीराबहनको लिखे एक पत्रमें उन्होंने कहा, "तुम्हारी खातिर भजनोंका अनुवाद करते हुए मैं स्वयं बहुत सुख पा रहा हूँ। क्या मैंने अपने प्रेमको अक्सर स्नेहकी कोमल और मृदुल वर्षाकी अपेक्षा तूफानोंके रूपमें व्यक्त नहीं किया है? इन तूफानोंकी स्मृति अनन्य रूपसे तुम्हारे ही लिए किये जानेवाले अनुवादका सुख और बढ़ा देती है" (पृष्ठ ५२)। दो घटनाओंको छोड़कर बन्दी जीवन के ये माह घटना-विहीन ही रहे। इनमें से एक घटना तो थी उनका मध्यस्थताका प्रयास, जो विफल हो गया, और दूसरी घटना थी उनके अनशनकी सम्भावना, जो टल गई।
कुछ उदारपन्थी नेताओंकी मान्यता थी कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनसे देशको हानि पहुँच रही है। इनमें से दो नेताओं, तेजबहादुर सप्रू और मु रा० जयकरने कांग्रेस और सरकार के बीच संधि-विराम करानेके उद्देश्यसे पहलकदमी की, ताकि
कांग्रेस गोलमेज सम्मेलन में भाग ले सके। गांधीजीने इसका जो उत्तर दिया वह महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्नों पर भी 'मुखर चिन्तन' करने, बुनियादी सिद्धान्तों पर आग्रह करने और तफसीलके मामलेमें समझौता करनेकी उनकी विशिष्टताओंसे युक्त था। यद्यपि गांधीजी "जेलकी दीवारोंके उस पार होनेवाली घटनाओंके ऊपर कोई निश्चित मत" (पृष्ठ ४५) व्यक्त करनेको अनिच्छुक थे, लेकिन उन्होंने अपना यह मत व्यक्त किया कि यदि भारतको स्वशासन देनेकी बात स्वीकार कर ली जाये
और गोलमेज सम्मेलनमें केवल संक्रमणकालीन पूर्वोपायोंकी तफसील पर ही विचार<noinclude></noinclude>
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किया जाये तो कांग्रेस उसमें भाग ले सकती है। वाइसरायको लिखे गये अपने पत्र में
गांधीजीने जो ११ शर्ते रखी थीं उनकी कसौटी पर प्रत्येक स्वराज्य-योजनाको परलने
का अधिकार उन्होंने सुरक्षित रखा । सविनय अवज्ञा आन्दोलनको स्थगित करनेकी
उन्होंने न्यूनतम शर्तें भी स्पष्ट कर दीं जिनमें नमक- कानूनको दण्डात्मक धाराओंको
लागू न करने और सरकारी अध्यादेशोंको वापस लेनेकी मांग शामिल थी । अन्य
नेताओंको उनके द्वारा अपनायी गई स्थिति बहुत कड़ी अथवा बहुत कमजोर लग
सकती थी, इसलिए उन्होंने यह भी कह दिया कि यदि सम्मानजनक समझौता करनेका
समय आ गया हो तो मैं उसमें बाधक नहीं बनूंगा, और "इससे भी अधिक सस्त
स्थितिका समर्थन करनेमें मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं होगी बशर्ते कि वह लाहौर-
प्रस्तावकी शब्दावलीसे ज्यादा आगे न जाता हो" (पृष्ठ ४५) ।
१४ और १५ अगस्तको उदारपन्थी नेताओंसे, तथा मोतीलाल और जवाहरलाल
नेहरू, वल्लभभाई पटेल तथा अन्य कांग्रेस नेताओंसे (जिन्हें इसी उद्देश्यसे विशेष
रूपसे यरवडा लाया गया था) बात करनेके बाद गांधीजीने सरकारको सूचित
कर दिया कि कांग्रेसके नेताओंकी रायमें "अभी ऐसा कोई समझौता करनेका समय
नहीं आया है जो हमारे देशके लिए सम्मानजनक हो" (पृष्ठ ८२ ) । इस बातके
कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ते थे कि " अंग्रेज अधिकारी जगत यह मानने लगा हो
कि भारतके लिए क्या सर्वोत्तम है, इसके निर्णयका अधिकार भारतके स्त्री-पुरुषोंको
है" (पृष्ठ ८३) । तेजबहादुर सप्रू और जयकरने एक बार फिरसे प्रयत्न किया,
लेकिन समझौते की कोई सूरत नहीं बन सकी। इसपर गांधीजीने कहा, तथापि
शान्ति वार्ताकी प्रकट विफलता पर निराश होनेकी जरूरत नहीं है। हमारे
राष्ट्रने एक ऐसे अस्त्रका सहारा लिया है हमारे शासक जिसके अभ्यस्त नहीं है और
इसलिए जिसे समझने और जिसकी केंद्र करनेमें उन्हें समय लगेगा। हमारे कुछ
महीनोंके कष्ट सहनसे उनका हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है, इस बातपर हमें कोई
आश्चर्य नहीं है" (पृष्ठ १२१) ।
"
गांधीजीको अपने सह-बन्दियों और साथी कार्यकर्त्ताओंके कल्याणकी बहुत चिन्ता
रहती थी इसके कारण एक बार तो संकटकी स्थिति उत्पन्न होते-होते बची। गांधीजीने
अखबारोंमें पढ़ा था कि यरवडा जेल में कैदियोंके साथ बहुत खराब व्यवहार किया
जाता है। इसपर उन्होंने अधिकारियोंसे अनुमति माँगी कि उन्हें अन्य कैदियोंसे समय-
समय पर मिलने दिया जाये या उनके साथ ही रहने दिया जाये। गांधीजीने बदले में
ये विशेष सुविधाएँ भी छोड़ना स्वीकार किया जो उन्हें प्रदान की गई थीं। उन्होंने
यह संकेत किया कि यदि उनकी मांग नहीं मानी गई तो परिणाम गम्भीर होंगे।
"
'इस शरीरके अन्दर रहनेवाली आत्मा जो सेवा करनेके लिए उत्कण्ठित है, यदि उसके
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सात
लिए इस शरीरका उपयोग नहीं किया जा सकता तो मुझे उसके परिरक्षण में कोई
दिलचस्पी नहीं है" (पृष्ठ १५६) । उन्होंने जेलके मुख्य अधीक्षकको फिरसे पत्र लिखा
कि " अगर आगामी शनिवार की दोपहर तक मेरी इच्छा पूरी नहीं की गई तो मैं अपने
शरीरके परिरक्षण में सहयोग देना बन्द करना आरम्भ कर दूंगा" (पृष्ठ १८४) ।
सौभाग्यसे अधिकारियोंने उन्हें इस बातकी अनुमति दे दी कि वे जिन लोगोंसे " सेवा
की खातिर " मिलना चाहते थे उनसे समय-समय पर मिल सकते हैं, और इस प्रकार
संकट टल गया ।
मुलाकातियोंके बारेमें सरकारने जो पाबन्दियाँ लगा रखी थीं वे गांधीजीको
स्वीकार नहीं थी, और इसके फलस्वरूप उन्होंने अपने घनिष्ठतम रिश्तेदारों और
साथी कार्यकर्ताओं सहित सभीसे मिलना अस्वीकार कर दिया और " आत्मासे आत्मा
के मिलन" से ही सन्तोष करने लगे। उन्होंने मीराबहनको लिखा, "
इस सुखद सम्पर्क
को पृथ्वीकी कोई शक्ति नहीं रोक सकती" (पृष्ठ ३३) । राज-बन्दी होनेके कारण
गांधीजीको अन्य कैदियोंसे अलग रखा गया था और जेलमें उनके एकमात्र साथी
काकासाहब कालेलकर थे। काकासाकी रिहाईके बाद प्यारेलाल उनके साथ रखे
गये जिनके बारेमें गांधीजीने लिखा कि मेरे पास प्यारेलालका रहना वैसा ही है
जैसे " भेड़ियेके पास बकरी" का रहना (पृष्ठ ३६५) ।
बाहरी उथल-पुथलसे दूर, जेलके शान्तिपूर्ण एकान्त जीवन में गांधीजी अपने
समयका उपयोग खूब सूत कातने और आध्यात्मिक कार्यों में कर रहे थे। पिछले
अनेक वर्षो वह 'गीता' का अध्ययन-मनन करते आ रहे थे और अब 'गीता' पूरी
तरह उनके दिल-दिमाग पर छा चुकी थी। "मैं तो अपनी सारी कठिनाइयोंमें गीता
माताके पास दौड़ता हूँ और अबतक आश्वासन पाता आया हूँ" (पृष्ठ २७४) ।
इससे पहले १९२२-२३ में जब गांधीजी जेलमें थे तब उन्होंने अपना अधिकांश समय
पढ़ने में बिताया था। उनकी जेल -दैनन्दिनीमें उल्लिखित पुस्तक-सूचीसे पता चलता
हैं कि कितने विविध विषयोंका उन्होंने अध्ययन किया था (खण्ड २३, पृष्ठ १९१-
२०२) | किन्तु इस बार जब उनसे एक पत्र लेखकने सलाह माँगी कि कौन-सी किताब
पढ़नी चाहिए, गांधीजीने जवाब लिखा: “मेरे लिए 'गीता' और तुलसीदास ही
काफी हैं. ( पृष्ठ ३५) । अन्य पत्र लेखकोंको उन्होंने 'गीता' वारवार पढ़ने
की सलाह दी और कहा १२ अध्याय बारबार पढ़ना और उसपर विचार
करना (पृष्ठ ४) । अपने इस अध्ययनका निचोड़ गांधीजीने 'गीता' के गुजराती
अनुवाद 'अनासक्तियोग में प्रस्तुत किया जो ठीक उसी दिन प्रकाशित हुआ जिस
दिन दांडी-कूप आरम्भ हुआ। उनके मनमें यह विषय इतना रमा हुआ था कि एक
पत्र लेखकके सुझाव पर उन्होंने 'गीता' पर नई प्रवचन-माला लिखनी शुरू कर दी
"
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>आठ
(पृष्ठ २७३-४) । उन्होंने मीराबहनको लिखा :
उडेलना चाहता हूँ" (पृष्ठ २९५) ।
*
इन अध्यायोंमें में अपना हृदय
'गीता' में अनासक्तिका जो उपदेश किया गया है, उसपर से गांधीजीने हाथमें
लिये हुए काममें तल्लीन होनेका पाठ सीखा। उन्होंने महादेव देसाईको लिखा :
'जिसका सारा जीवन यज्ञरूप है और जो अनासक्त है, वह एक समयमें एक ही
काम करेगा" (पृष्ठ २९९) । " हमें जो काम दिया गया है उससे प्राप्त होनेवाला
सन्तोष ही सच्ची सिपहगरी या भक्ति या साधना है। " बिना मांगे जो सेवाका काम
हमारे हिस्से आ पड़े, उसमें डूब जाना ही सच्ची समाधि है (पृष्ठ १७) । नारणदास
गांधीको उन्होंने बताया कि यज्ञमय जीवन कलाकी पराकाष्ठा है, सच्चा रस उसीमें
है 'क्योंकि उसमें से उसके नित्य नये झरने प्रकट होते हैं। मनुष्य उन्हें पीकर
अघाता नहीं है, न वे झरने कभी सूखते हैं" (पृष्ठ २५८) । ऐसी सेवाके लिए
हमारे विचार और कार्यमें जाने-अनजाने रामनामकी संगत उसी प्रकार होनी चाहिए
जिस प्रकार गवैये गानमें तानपूरेकी संगत रहती है (पृष्ठ २९९) ।
गांधीजीने अनासक्तिकी शिक्षाको परवडाके अपने बन्दी - कालमें साकार करके
दिखा दिया। उन्होंने एक प्रबल जन आन्दोलनको जन्म दिया था और यह आन्दोलन
तीव्रसे तीव्रतर ही होता जा रहा था कि ५ मईको उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया ।
जेल पहुँचनेके बाद गांधीजी आन्दोलनकी दिशा या गतिके बारेमें सर्वथा उदासीन हो
गये और अपना सारा ध्यान कताई और पत्र-व्यवहार करनेपर लगा दिया। उन्हें
लगता था कि जेल से बाहर रहते हुए उन्होंने कताईकी कला और विज्ञानमें निपुणता
प्राप्त करनेकी तरफ ढिलाई बरती थी। कताईको वह "नित्यका महायज्ञ मानते
थे, दरिद्रनारायणकी सेवाके जरिये राष्ट्रीय पुनरुद्धारका चरम सामूहिक प्रयास मानते
थे (पृष्ठ २४० ) । "यदि दखिनारायण है और यदि सादी उसकी प्रसादी
है." तो अपनी ही शिक्षा पर मेरा खुदका अमल कितना शिथिल रहा है।
(पृष्ठ २९९ ) । अतः वह पूरे मनोयोगसे कताई और तत्सम्बन्धी प्रक्रियाओं पर
अधिकार प्राप्त करनेमें जुट गये और लगातार उसी विषयमें विचार करते रहते थे
(पृष्ठ ३३१) । मीराबहनके इस सुझाव पर कि वह 'अनासक्तियोग' का अंग्रेजीमें
अनुवाद कर दें, गांधीजीने उत्तर दिया कि वह इस कार्यके लिए अपनी कताई
नहीं छोड़ सकते क्योंकि मेरी दृष्टिमें कताई 'गीता' का " व्यावहारिक अनुवाद" है
(पृष्ठ २०) । मीराबहन, नारणदास तथा अन्य लोगोंको लिखे गये उनके पत्र कताई में
उनकी प्रगति और विभिन्न प्रकारके चरखोंके साथ उनके विफल या सफल प्रयोगोंके
विवरण भरे हुए हैं। मीराबहनको उन्होंने लिखा: 'चरखा, तकली और धुनकीने
तो मेरे ऊपर सम्मोहन कर दिया है" (पृष्ठ २९६) ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नौ
गांधीजी आश्रमकी समस्याओंमें गहरी दिलचस्पी लेते थे और नारणदासको
लिखे अपने प्रत्येक पत्रमें विस्तारसे अपने सुझाव रखते थे। प्रेमाबहन कंटकको पत्र
लिखकर उन्होंने स्पष्ट किया, "हिन्दुस्तानके प्रश्नोंको सुलझाने में मुझे जितना रस
आता है, उससे भी ज्यादा आश्रम-सम्बन्धी और उनमें भी बहनोंके प्रश्न सुलझाने में
आता है, क्योंकि उनमें बड़े प्रश्नोंको सुलझानेकी चाबी छिपी रहती है" (पृष्ठ ५३) ।
वर्षो से गांधीजी आश्रमकी स्त्रियोंको स्वतन्त्रता संग्राममें महत्वपूर्ण भूमिका निभानेके लिए
प्रशिक्षित कर रहे थे। अब उन्होंने स्त्रियोंको बाहर निकल कर गाँवोंमें जाने और
विदेशी वस्त्रोंकी दूकानों और मदिरालयों पर धरना देनेके लिए कहा। इन कार्यों में
स्त्रियोंको आने-जाने और काम करनेकी पूरी स्वतन्त्रता अपेक्षित थी और इसमें खतरे
भी कम नहीं थे किन्तु गांधीजीको उनमें पूरा विश्वास था और स्त्रियोंके आत्म-
विश्वासको सुदृढ़ करनेके लिए जो कुछ कर सकते थे, उन्होंने किया। आश्रमकी एक
बहनको उन्होंने लिखा: “मैं तो तुम सभी बहनोंको हर तरहसे परिपूर्ण देखना चाहता
मेरी सभी आशाएँ तुम बहनों पर निर्भर हैं। मुझे प्रायः ऐसा लगता
रहता है कि अहिंसाकी अन्तिम विजय स्त्रियोंके हाथों ही होगी" (पृष्ठ १३६-७ ) ।
गंगाबहन वैद्यको उन्होंने पत्र में लिखा " आत्मा तो दोनोंकी एक-सी है किन्तु पुरुष
आत्माको न पहचाने और स्त्री ही पहचाने तो स्त्री बलवती हो जाती है, जैसे सीता ।
आज भी संसारमें अनेक सीताएँ पड़ी हैं जो एक भी पुरुषकी मददकी जरूरत
नहीं रखतीं और फिर भी सुरक्षित हैं" (पृष्ठ ३०५)। नारणदास गांधीको उन्होंने
" स्त्री जाति इतनी दवाई गई है कि वे बेचारी स्वतन्त्र रूपसे विचार तक
नहीं कर सकतीं। इसीलिए उनके प्रति आश्रमको तो बहुत उदारता से काम लेना
है। उसमें अत्यधिक जोखिम है। वे सब [ जोखिम ] उनकी सेवाके लिए हम उठायें'
(पृष्ठ ९२) । और फिर, " बहनोंकी स्वतन्त्रताकी पूर्ण रूपसे रक्षा करनी है। चाहे
रास्ता चलते भूल जायें, ठोकर लगे, काँटा चुभे या गिर पड़ें" (पृष्ठ १४८) ।
नारणदास गांधीको एक अन्य पत्रमें उन्होंने लिखा: “बहनों के बारेमें हमने पूर्ण विश्वास
की नीति ग्रहण की है। हिन्दू स्त्रियोंका हिन्दू पुरुषों पर बहुत भारी कर्ज
है" (पृष्ठ २७२) । अपने एक सम्बन्धी और सादी कार्यकर्ता जयसुखलाल गांधीको,
जो अपनी पत्नीके रूढ़िवादी विचारोंके कारण उसके साथ शान्तिसे नहीं रह पाते
थे, गांधीजीने लिखा "हम स्वयं जिस स्वतन्त्रताका उपभोग करना चाहते हैं, वही
स्वतन्त्रता उसे भी है। उसपर क्रोध करनेसे उसकी सच्ची भावनाएँ दब जायेंगी ।
मैंने भी तो ऐसा किया है, अतः यह मैं अपने अनुभव के आधार पर लिख रहा हूँ
(पृष्ठ १७९) ।
लिखा :
"
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दस
गांधीजी गंगाबहन वैद्यके प्रशिक्षण में बहुत रुचि रखते थे। उनको एक पत्रमें
उन्होंने लिखा: “उदासी क्यों लगती है ? लगे तो उसे फौरन मेरी तरफ भेज ही
देना चाहिए।...
जिस तरह मुझमें बाप बननेकी शक्ति है, उस तरह मां बननेकी
भी है” (पृष्ठ १६३) । इस खण्ड में बहुतसे पत्र हैं जिनमें पिताकी कठोरता और
माताका वात्सल्य छलकता दिखाई पड़ता है । आश्रमके संगीत शिक्षक पंडित सरेको
एक पत्र लिखते हुए गांधीजीने स्वीकार किया : "पितृपदके लिए आवश्यक योग्यता -
उतना प्रेम, उतनी आत्मीयता, उतनी सजगता" मुझमें है या नहीं, इस बातकी में
अक्सर जाँच करता हूँ ( पृष्ठ १४० ) । मीराबहनको लिखे अनेक पत्रोंसे मीराबहन के
स्वास्थ्यके लिए उनकी चिन्ता प्रकट होती है और उनमें बराबर यह आग्रह किया
गया है कि मीराबहन आवश्यक सुविधाओं का लाभ उठायें और आराम करें। नैतिक
प्रश्नोंपर गांधीजीने बहुत दृढ़ स्थिति अपनाई लेकिन साथ ही व्यक्तियोंके प्रति उन्होंने
उदारताका रुख रखा और उनकी कमजोरियोंको सदा ध्यानमें रखा। प्रेमावहन कंटकके
बारेमें कहा जाता था कि वह आश्रमकी पाठशाला में बच्चोंको पीटती है। इसपर
गांधीजीने उन्हें लिखा :
गोलीके बिना काम हो सकता है
इस बातको सिद्ध करनेके लिए ही हमारा अर्थात् आश्रमका अस्तित्व है" (पृष्ठ
३४२-३ ) । उन्होंने प्रेमानको सलाह दी : "तू बच्चोंकी सभा कर । ... उन्हें
मारना और वे जैसा कहें, उसी तरह मारना जो मना करें, उन्हें मत मारना ।
...इस विषयकी चर्चा मेरे साथ करती रहना" (पृष्ठ ३७४) । नारणदास
गांधीके भतीजेने नारणदासके विरुद्ध जो आरोप लगाये थे उनके बारेमें नारणदासका
स्पष्टीकरण पढ़ने के बाद गांधीजीने लिखा मैंने तो केशुको लिखा है कि...
"
तुम्हारे विरुद्ध कोई बात मेरे मनमें नहीं आती।
जो शिकायतें मैंने लिखी हैं, उनकी बात करना।
"
सको तो करना (पृष्ठ ३६७) ।
अब तुम ही उसे बुलाकर
बादमें तुम उसे सन्तुष्ट कर
निश्चय ही यह जरूरी था कि लोग अपने-आपको सुधारें और दूसरोंको सुधारने
में मदद दें, लेकिन परिवर्तनकी आवश्यकताकी अनुभूति और फिर उस दिशा में प्रयत्न
भी व्यक्तिको ही करना था। अतः गांधीजीने यह सलाह दी कि हमारे गुणोंको
दूसरे देखें। हमें तो अपने दोषोंका ही दर्शन करना चाहिए (पृष्ठ २६६) । उन्होंने
यह भी कहा, " अहिंसाके मानी हैं कि हम अपने प्रति कृपण और दूसरोंके प्रति उदार
रहें।...
( पृष्ठ ९) । महालक्ष्मी ठक्करको लिखे एक पत्र में गांधीजीने विस्तार-
पूर्वक समझाया कि हमें अपनी कमजोरियोंके प्रति कठोर और दूसरोंकी कमजोरियों के
प्रति उदार दृष्टि रखनी चाहिए (पृष्ठ ३५८) । भूलका पता चलते ही उसे सुधार
लेनेका एक छोटा-सा किन्तु महत्त्वपूर्ण दृष्टान्त हमें उस पत्र में मिलता है जो उन्होंने
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ग्यारह
वालजी देसाईको लिखा था (पृष्ठ १६८ ) । इसमें गांधीजीने स्वीकार किया कि अंग्रेजी
कलेन्डरकी जगह गुजराती तिथिके ऊपर वह जो आग्रह पहले करते थे वह गलत था,
और फिर उन्होंने लिखा: “विदेशी मात्रसे हमें कोई द्वेष थोड़े ही है"। यही नहीं,
उन्हें इस मामले में अपने निर्णय पर स्वयं सन्देह था इसलिए उन्होंने वालजी देसाईकी
राय मांगी और पूछा कि उनके विचारसे क्या करना ठीक रहेगा ।
MORE
...:
जो चिन्तन कर्मके लिए उन्मुख न करे ऐसे चिन्तनको वह विचार-विलास मानते
ये और उसे " विषाक्त तत्त्व" मानते थे। अपरिग्रहके सिद्धान्तको वह वस्तु और
विचार - दोनों पर लागू मानते थे। उनके विचारसे "जैसे चीजोंका वैसे ही विचारों-
का भी अपरिग्रह " आवश्यक है (पृष्ठ १०४) । इसे वह 'गीता' के मुख्य सिद्धान्त,
अनासक्तिका स्वाभाविक निष्कर्ष मानते थे। उन्होंने मीराबहनको एक पत्रमें सलाह दी
" अच्छी खबर हो या बुरी उसे अपने ऊपरसे यों गुजर जाने दो जैसे बत्तखकी
पीठ परसे पानी फिसल जाता है। जब हम कोई खबर सुनें तो हमारा कर्तव्य मात्र
इतना पता चलाना है कि क्या कुछ करनेकी जरूरत है, और यदि हो तो हम
अपने आपको प्रकृतिके हाथका एक साधन मानकर उसे कर दें।
मस्तिष्कको मात्र सम्प्रेषणका साधन मानकर... उपयोग किया जाना चाहिए।
यहाँ जो भी चीज ग्रहण की जाये उसे या तो तत्काल कार्रवाईके लिए हृदयको
सम्प्रेषित कर देना चाहिए, या फिर सम्प्रेषण के लिए अनुपयुक्त मानकर उसी वक्त
रद कर देना चाहिए" (पृष्ठ ३७०-१) | प्रेमावहन कंटकको उन्होंने लिखा: “जो
निर्णय मैं करता हूँ उनके सभी कारण मुझे हमेशा याद नहीं रहते" (पृष्ठ ३२७) ।
तर्कमूलक अथवा असम्बद्ध चिन्तन मनुष्यके एक अंश विशेषका कार्य है जबकि कर्मको
उद्भावना हृदयसे होती है और वह हमारे समूचे व्यक्तित्वको प्रतिविम्बित करता है।
गांधीजीका झुकाव यद्यपि कठोर बाह्य कार्यकी ओर था, लेकिन वह अपने मस्तिष्ककी
क्रियाओंका भी बारीकीसे अध्ययन करते रहते थे। इसकी झलक उस
सुखद स्वप्न
के विवरण में मिलती है जिसमें उन्होंने मणिलालके लिए एक पाठ्यक्रम तैयार किया
था और जो रामदास और देवदासके लिए भी लाभप्रद होता; लेकिन इस स्वप्नका
विवरण देनेके बाद उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि स्वप्न में व्यक्त किये गये
मतके बजाय महादेव देसाईके मार्गनिर्देशन में पढ़ाई करना ज्यादा ठीक रहेगा।
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आश्रमके व्रतोंके विषय में गांधीजीने जो व्याख्यात्मक लेख लिखे वे उनके दीर्घ
अनुभवों पर आधारित थे और इनका उद्देश्य यह था कि आश्रम में उनका श्रवण करनेवाले
भी तदनुसार आचरण करते हुए वैसे ही अनुभव स्वयं भी प्राप्त करें। स्वदेशी व्रतके
सम्बन्धमें वह कुछ भी नहीं लिखना चाहते थे क्योंकि इस विषयकी चर्चा में राजनीतिक
प्रश्नोंका स्पर्श होना सम्भव था, जो कि वह नहीं चाहते थे। एक कैदीके नाते उनका
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बारह
एक आत्म-धारित व्रत यह था कि राजनीतिक प्रश्नोंकी चर्चा नहीं करेंगे (पृष्ठ १८६) ।
इन सभी प्रवचनोंमें विषयोंको बड़ी गहराईके साथ लेकिन बहुत ही सरल और स्पष्ट
ढंगसे समझाया गया है और ये अत्यन्त लोकप्रिय हो गये हैं। धर्मोकी समानता ( नवाँ
व्रत) और यज्ञ तथा विनम्रता (जिन्हें व्रतोंमें शामिल नहीं किया गया है) के ऊपर
गांधीजीके प्रवचन गांधीवादी नैतिकताके अध्येताओंके लिए विशेष दिलचस्पी रखते
हैं। " ईश्वरदत धर्म अगम्य है । सब अपनी-अपनी दृष्टिसे, जबतक वह दृष्टि
बनी है तबतक सच्चे हैं। पर झूठा होना भी असम्भव नहीं है ।
... इन सभी
धर्मोके मूल सिद्धान्त एक ही हैं। सभीमें सन्त स्त्री-पुरुष हो गये हैं, आज भी मौजूद
हैं" (पृष्ठ १६७) ।
"
सत्य और प्रेमका संवर्धन किया जा सकता है, किन्तु विनम्रताका आचरण
सोच-समझकर नहीं किया जा सकता। विनम्रताका आचरण करना ढोंग करनेके समान
है। किन्तु नम्रताको अनुभूति अहिंसाकी अपरिहार्य कसोटी है। सचमुच विनम्र व्यक्ति
जानता है कि वह कुछ नहीं के समान है। 'समुद्र में रहनेवाला विन्दु समुद्रकी महत्ता
का उपभोग करता है, परन्तु उसका उसे ज्ञान नहीं होता। समुद्रसे अलग होकर ज्यों
ही अपनेपनका दावा करने चला कि वह उसी क्षण सूखा ।
इसलिए सच्ची
नम्रता हमसे जीवमूर्तिकी सेवा के लिए सर्वार्पणकी आशा रखती है। जो सेवा
प्राप्त हो जाये वही करते-करते किसी दिन यह हमारे हाथ लग जायेगा। केवल
उसीको खोजने जानेसे यह अनुभव प्राप्त नहीं होता" (पृष्ठ २०४-५) । समुद्र और
बूंद "बहुत ही सुन्दर ढंगसे परस्पर निर्भर है। और यदि यह बात भौतिक जगतके
बारेमें सच है तो आध्यात्मिक जगतके मामले में कितनी सच न होगी" (पृष्ठ १३१) ।
अहिंसाकी भावना मनमें विकसित करनेके साथ विनम्रता अपने आप आती है और
एक स्थिति यह होती है जब 'मैं' को भूलकर व्यक्ति केवल शून्य बन जाता है।
'सत्य' ही गांधीजीके आश्रमका आधारभूत सिद्धान्त है, और आश्रमके अन्य
सव व्रतोंका अर्थ व्यापक रूपसे एक ही है- सत्य, " जिसका पालन विचार, वाणी
आचार में करें" (पृष्ठ ४१) । आश्रमका लक्ष्य सत्य और सत्याचरण पर आग्रह था।
सत्यको ही " मध्य-बिन्दु मानकर सारी रचना की गई है। उद्देश्य संसारमें बहुत नहीं
होते, होने भी नहीं चाहिए। जो बहुत दिखाई देता है वह सत्य पर आच्छादित
सोनेका ढक्कन है। उसके हट जाने पर एक ही वस्तु दिखाई देगी" (पृष्ठ २४५) ।
यह सत्य व्यक्तित्वहीन और अनिर्वचनीय है और इसे वाणोकी अपेक्षा कर्मके जरिये
ही समझा और व्यक्त किया जा सकता है, और सो भी आंशिक रूपसे ही।
गांधीजीने, विशेष रूपसे अपने ईसाई पत्र लेखकोंको, निर्गुण ब्रह्म अर्थात् शुद्ध
ज्ञानकी स्थितिकी संकल्पना समझानेका विशेष प्रयत्न किया, और साथ ही धर्मके
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द्वारा मोक्ष प्राप्त करनेकी अर्थात् आत्मानुशासन द्वारा मुक्ति प्राप्त करनेकी सापेक्षिक
धारणाको भी स्पष्ट किया। उन्होंने पी० जी० मैथ्यूको लिखा : 'मनुष्य तो एक
व्यक्ति होता है। ईश्वर उस अर्थमें व्यक्ति नहीं है। हम अपने तुच्छ पैमानोंसे
ईश्वरको नापनेकी कोशिश करते हैं, यही हमारी कठिनाइयोंका कारण है। यह तो
सभी पैमानोंसे परे है" (पृष्ठ १६९) ।
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व्रत लेना
जे० सी० कुमारप्पा तथा अन्य लोगों के साथ हुए अपने पत्र व्यवहारमें गांधीजीने
व्रतोंकी आवश्यकता पर बल दिया। नारणदास गांधीको उन्होंने लिखा: 'व्रतका अर्थ
है अटल निश्चय अड़चनोंको पार कर जानेके लिए ही तो व्रतकी आवश्यकता है।
शरीर रक्षाके लिए भी शराब न पीनेके दृष्टान्तका चमत्कारिक प्रभाव शराबकी
तमें कैसे हुए लोगों पर पड़े तो संसारका कितना लाभ है।..
निर्बलतासूचक नहीं, वरन बलका सूचक है। व्रतकी आवश्यकता के विषयमें हमारे
मनमें कभी शंका उठनी ही नहीं चाहिए" (पृष्ठ २१९-२० ) । व्रत लेनेका अर्थ पहले
ही से "संकटके क्षणोंमें ईश्वरसे हमें शक्ति प्रदान करने की प्रार्थनाके समान है
(पृष्ठ ३०८) । जे० सी० कुमारणाको लिखे एक अन्य पत्र में यही बात उन्होंने रोचक
ढंगसे समझाई है, हमें अपने अन्तरमें निवास करनेवाले दो तत्वोंसे निपटना है:
राम और रावण, अल्लाह और संतान, अहुरमज्द और ऑरिमान। पहला तत्व हमें
वास्तवमें मुक्त करने के लिए बांधता है, जबकि दूसरा अपने चंगुल में और अधिक
कसकर जकड़नेके लिए हमें मुक्त करता प्रतीत होता है। 'बाउ'
है जो हम रामसे करते हैं जिसे जबतक हम बँधे नहीं
निवाह नहीं सकते। हम सूरजसे ऊँ भले न हों लेकिन " कमसे कम
सच्चे और आस्थावान हो । व्रतबद्ध जीवन विवाहकी भांति है, वह एक परम
पवित्र संस्कार है व्रत धारण करना ईश्वरके साथ अविच्छेय विवाह सम्बन्ध स्थापित
करना है। आओ, हम उससे विवाह कर लें" (पृष्ठ २६२-३) । उत्तमोत्तम बननेकी
स्वतन्त्रता असीमित है, किन्तु आत्म-भोगकी प्रवृत्तिको प्रकृतिके नियमों जैसे अनुल्लंघनीय
व्रतों द्वारा नियंत्रित करना चाहिए। "ईश्वर स्वयं निश्चयकी, व्रतकी सम्पूर्ण मूर्ति है।
उसके नियमोंका एक अणु भी इधर-उधर हो जाये तो वह ईश्वर न रह जाये। सूर्य
महाव्रतधारी है। (पृष्ठ २२० ) । इससे देखा जा सकता है कि गांधीजीका
धर्म प्रकाशक धर्म था, सामान्य बुद्धि पर आधारित धर्म था। वह विज्ञानके विपरीत
नहीं, बल्कि स्वयं वैज्ञानिक धर्म था जो ज्यादासे ज्यादा लोगों में आनन्द और शान्तिका
प्रसार कर सकता है।
एक प्रतिज्ञा
" तब तक
सूरज के समान
जेलमें ही गांधीजीने मीराबहनकी खातिर 'आश्रम-भजनावलि' के भजनों और
गीतोंका अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। (हिन्दी खण्डमें 'आश्रम-भजनावलि' को परि-
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौदह
शिष्टमें ज्यों का त्यों दिया गया है। गांधीजी द्वारा किये गये अंग्रेजी अनुवादके लिए
अंग्रेजीका खण्ड ४४ देखा जा सकता है) । यह स्मरण रखना चाहिए कि 'भजनावलि'
में केवल संस्कृत, हिन्दी, गुजराती, मराठी और अन्य भारतीय भाषाओंसे ही अनुवाद
किये गये हैं, जबकि वास्तवमें आश्रमकी प्रार्थनाओंमें 'कुरान, ' 'बाइबिल, ' 'जंद
अवेस्ता' तथा अनेक विदेशी प्रार्थनाओंके भी अंश होते थे। खुले आकाशके नीचे
आयोजित होनेवाली गांधीजीकी प्रार्थना सभाएँ सचमुच सार्वदेशिक होती थीं और इनसे
" जाति, वर्ग और बँधे हुए विश्वासोंके बन्धनोंको" तोड़ने में सहायता मिलती थी (पृष्ठ
२१) । प्रार्थनाके दौरान गाये जानेवाले भजनोंमें 'राम' के स्थान पर 'होरमज्द'
अथवा 'वैष्णव' के स्थान पर 'क्रिश्चियन लगा देनेमें उन्हें कुछ भी गलत नहीं
लगता था (पृष्ठ १८९) । मीराबहनके लाभार्थ किये गये इन अनुवादोंके बारेमें
गांधीजीने लिखा : "सिवाय इसके कि यह प्रेमका काम है, उसमें और कोई गुण
नहीं है- साहित्यिक गुण तो है ही नहीं" (पृष्ठ ३६४) । भजनों और लोक-गीतोंके
जरिये प्रह्लाद, द्रौपदी और हरिश्चन्द्र आदिके चरित्र जन-मानसमें अमिट रूपसे बस
गये हैं। गांधीजीकी दृष्टिमें प्रह्लाद, द्रौपदी और हरिश्चन्द्र जिन चरमोत्कृष्ट अनुभवों
और अनुभूतियोंके प्रतीक हैं उन्हें इन चरित्रोंके माध्यमसे ही व्यक्त किया जा सकता
है, और किसी भी प्रकार नहीं। इसीलिए गांधीजीको इनसे सम्बन्धित गीत और भजन
प्रिय थे । “हरिश्चन्द्रकी कथा भले ही मनगढन्त हो, लेकिन उसमें सब आत्मार्थियों
(आत्माका कल्याण चाहनेवालों) का अनुभव भरा हुआ है, इसलिए उस कथाकी
कीमत किसी ऐतिहासिक कथासे अनन्त गुनी है और हम सबको उसे अपने मनमें
रखना चाहिए और उसपर गौर करना चाहिए" (पृष्ठ ११५) । ये भजन वास्तविकतासे
पलायनका पाठ नहीं पढ़ाते बल्कि पुरुषार्थको प्रेरित करते हैं। गांधीजीकी दृष्टिमें
पुरुषार्थका अर्थ था एक आदर्शकी संकल्पना करना और " यह चाहे कितना कठिन
क्यों न हो तो भी उसमें सफल होनेका जी-जान से प्रयत्न करना... आदर्शको
अपनी सुविधा अनुसार ढालनेमें असत्य है; हमारा पतन है" (पृष्ठ ८१) । भजनोंका
उपयोग और उनका अनुवाद इस बातका एक और उदाहरण है कि गांधीजी एक
विनम्र और परम्परानिष्ठ हिन्दू ये और उनका विश्वास था कि धर्म का उद्देश्य
मनुष्यको सद्विचार और पुरुषार्थके लिए प्रेरित करना है और मनुष्य धर्मसे शक्ति
प्राप्त करता है। केवल कर्मकाण्ड और विधि-विधानोंका उनकी दृष्टिमें कोई मूल्य नहीं
था। प्रार्थनाओं में सम्मिलित न होना किन्तु कहीं आग लगे तो उसे बुझाने में मदद
करना उनकी दृष्टिमें " सच्चा भजन" था और " कर्ममें अकर्मका उदाहरण
13 था
(पृष्ठ ३६१) ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>आभार
इस खण्डकी सामग्री के लिए हम निम्नलिखित संस्थाओं, व्यक्तियों, पुस्तकोंके
प्रकाशकों तथा पत्र-पत्रिकाओंके आभारी हैं:
संस्थाएँ : साबरमती आश्रम संरक्षक तथा स्मारक न्यास और संग्रहालय, नव-
जीवन ट्रस्ट और गुजरात विद्यापीठ ग्रंथालय, अहमदाबाद; गांधी स्मारक निधि व
संग्रहालय, नई दिल्ली तथा आफ्रिकन म्यूजियम, जोहानिसबर्ग।
व्यक्ति : श्रीमती मनुबहन मशरूवाला, श्री सुरेन्द्र मशरूवाला, अकोला श्रीमती
लक्ष्मीबहन खरे, श्री कपिलराय मेहता, श्रीमती शारदाबहन जी० चोखावाला, अहम-
दाबाद ; श्रीमती प्रेमाबहन कंटक, सासवड श्रीमती मीराबहन, गाडेन, आस्ट्रिया; श्री
भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया, सेवाग्राम, श्री ईश्वरलाल जोशी, श्री पी० डी० सरैया,
श्री शान्तिकुमार मोरारजी, श्रीमती प्रेमलीला ठाकरसी, बम्बई; श्रीमती गंगाबहन
वैद्य, बोचासण, वालजी गो० देसाई, पूना; श्री नारणदास गांधी, राजकोट; श्री
प्रकाशनारायण सप्रू श्री घनश्यामदास बिड़ला, कलकत्ता; श्री बनारसीलाल बजाज,
बनारस; श्रीमती राधाबहन चौधरी, श्री परशुराम मेहरोत्रा, श्री द० वा० कालेलकर,
नई दिल्ली; श्रीमती वसुमती पण्डित, सूरत; श्री वेणीलाल गांधी, नासिक, तथा प्रो०
जे० वी० गैलविन, किंगस्टन, कनाडा ।
पुस्तकें : 'बापूकी विराट वत्सलता', 'बापुना पत्रो-७ श्री छगनलाल जोशीने',
'बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहनने', 'बापुना पत्रो-४: मणिबहेन पटेलने ',
'बापुना पत्रो-९ श्री नारणदास गांधीने' भाग १, 'बापुनी प्रसादी', 'कन्या आश्रम
रजत जयन्ती स्मृतिग्रन्थ', 'महात्मा गांधी : सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ
द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, खण्ड ३, भाग ३, 'पाँचवे पुत्रको बापूके आशीर्वाद',
तथा ' गीताबोध' ।
पत्र-पत्रिकाएँ: 'बॉम्बे क्रॉनिकल' और 'हिन्दू' ।
अनुसन्धान और संदर्भ सम्बन्धी सुविधाओंके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी
पुस्तकालय, इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स पुस्तकालय, सूचना और प्रसारण मंत्रा-
लयका अनुसंधान और संदर्भ विभाग, नई दिल्ली, राष्ट्रीय अभिलेखागार (नेशनल
आर्काइव्ज ऑफ इंडिया), नई दिल्ली तथा श्री प्यारेलाल नैयर, नई दिल्ली, हमारे
धन्यवादके पात्र हैं। कागज पत्रोंकी फोटो नकल तैयार करनेमें सहायता देनेके लिए
हम सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्लीके फोटो-विभागके आभारी हैं।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पाठकोंको सूचना
हिन्दीकी जो सामग्री गांधीजीके स्वाक्षरोंमें मिली है उसे अविकल रूपमें दिया
गया है । किन्तु दूसरों द्वारा सम्पादित उनके भाषण अथवा लेख आदिमें हिज्जोंकी
स्पष्ट भूलोंको सुधारकर दिया गया है।
अंग्रेजी और गुजरातीसे अनुवाद करनेमें अनुवादको मूलके समीप रखनेका पूरा
प्रयत्न किया गया है, किन्तु साथ ही भाषा सुपाठ्य बनानेका भी पूरा ध्यान रखा
गया है। छापेकी स्पष्ट भूलें सुधारनेके बाद अनुवाद किया गया है। और मूलमें
प्रयुक्त शब्दोंके संक्षिप्त रूप यथासम्भव पूरे करके दिये गये हैं। नामोंको सामान्य
उच्चारणके अनुसार ही लिखनेकी नीतिका पालन किया गया है। जिन नामोंके
उच्चारणमें संशय था उनको वैसा ही लिखा गया है जैसा गांधीजीने अपने गुजराती
लेखोंमें लिखा है।
मूल सामग्रीके बीच चौकोर कोष्ठकोंमें दी गई सामग्री सम्पादकीय है। गांधीजी
ने किसी लेख, भाषण आदिका जो अंश मूल रूपमें उद्धृत किया है, वह हाशिया
छोड़कर गहरी स्याहीमें छापा गया है, लेकिन यदि कोई ऐसा अंश उन्होंने अनूदित
करके दिया है तो उसका हिन्दी अनुवाद हाशिया छोड़कर साधारण टाइपमें छापा
गया है। भाषणकी परोक्ष रिपोर्ट तथा वे शब्द जो गांधीजीके कहे हुए नहीं है,
बिना हाशिया छोड़े गहरी स्याहीमें छापे गये हैं। भाषणों और भेंटकी रिपोर्टके उन
अंशोंमें जो गांधीजीके नहीं हैं, कुछ परिवर्तन किया है और कहीं-कहीं कुछ छोड़
भी दिया गया है।
शीर्षककी लेखन-तिथि जहां उपलब्ध है वहाँ दायें कोनेमें ऊपर दे दी गई है।
परन्तु जहाँ यह उपलब्ध नहीं है वहाँ उसकी पूर्ति अनुमानसे चौकोर कोष्ठकोंमें की
गई है, और आवश्यक होनेपर उसका कारण स्पष्ट कर दिया गया है। जिन पत्रोंमें केवल
मास या वर्षका उल्लेख है उन्हें आवश्यकतानुसार मास या वर्षके अन्तमें रखा गया
है। शीर्षकके अन्त में साधन-सूत्रके साथ दी गई तिथि प्रकाशन की है। गांधीजीकी
सम्पादकीय टिप्पणियाँ और लेस, जहाँ उनकी लेखन-तिथि उपलब्ध है अथवा जहाँ
किसी दृढ़ आधार पर उसका अनुमान किया जा सका है, वहाँ लेखन तिथिके अनुसार
और जहाँ ऐसा सम्भव नहीं हुआ वहाँ उनकी प्रकाशन-तिथिके अनुसार दिये गये हैं।
साधन-सूत्रोंमें 'एस० एन० संकेत साबरमती संग्रहालय, अहमदाबादमें उपलब्ध
सामग्रीका, 'जी० एन० गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्लीमें उपलब्ध
कागज-पत्रोंका, 'एम० एम० यू०' गांधी स्मारक निधि और संग्रहालय, नई दिल्ली में
उपलब्ध मोबाइल माइक्रोफिल्म यूनिटकी रीलोंका, तथा 'सी० डब्ल्यू० सम्पूर्ण गांधी
वाङ्मय (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी) द्वारा संगृहीत पत्रोंका सूचक है।
सामग्रीकी पृष्ठभूमि देनेके लिए मूलसे सम्बद्ध कुछ परिशिष्ट भी दिये गये हैं।
अन्तमें साधन-सूत्रोंकी सूची और इस खण्डसे सम्बन्धित कालकी तारीखवार घटनाएँ
दी गई हैं।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विषय-सूची
10186
REFERENCE BOOK
OL 300
भूमिका
आभार
पाठकोंको
सूचना
१. पत्र : अमीना कुरेशीको (१-७-१९३०)
२. पत्र हेमप्रभा दासगुप्तको (१-७-१९३०)
३. पत्र : गंगाबहून झवेरीको ( ३-७-१९३०)
४. पत्र नानीबहन झवेरीको ( ३-७-१९३०)
५. पत्र : मनु गांधीको ( ३-७-१९३०)
६. पत्र वसुमती पण्डितको (३-७-१९३०)
७. पत्र लक्ष्मीबहन सरेको ( ५-७-१९३०)
८. पत्र मोतीबहून चोकसीको ( ५-७-१९३०)
९. पत्र : अमीना कुरेशीको (६-७-१९३०)
१०. पत्र: प्रेमावहून कंटकको (६-७-१९३० )
११. पत्र डाहीबहन पटेलको (६-७-१९३०)
१२. पत्र : महालक्ष्मी ठक्करको (६-७-१९३०)
१३. पत्र मीराबहनको (७-७-१९३०)
१४. पत्र नारणदास गांधीको (७-७-१९३०)
१५. पत्र भगवानजी पण्डयाको (७-७-१९३०)
१६. पत्र : आर० वी० मार्टिनको (८-७-१९३०)
१७. पत्र : कपिलराय मेहताको (८-७-१९३०)
१८. पत्र प्रभावतीको (८-७-१९३०)
१९. पत्र ईश्वरलाल जोशीको (८-७-१९३०)
२०. पत्र : गंगाबहन वैद्यको ( ८-७-१९३०)
२१. पत्र: शारदा सी० शाहको (९-७-१९३०)
२२. पत्र: विल्फ्रेड वेलॉकको (११-७-१९३०)
२३. पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (११-७-१९३० )
२४. पत्र कलावती त्रिवेदीको (११-७-१९३०)
२५. पत्र : कमलनयन बजाजको (१२-७-१९३०)
२६. पत्र वसुमती पण्डितको (१३-७-१९३०)
२७. पत्र प्रेमावहन कंटकको (१३-७-१९३०)
२८. पत्र मथुरादास पुरुषोत्तमको (१३-७-१९३०)
पृष्ठ
पाँच
पन्द्रह
सोलह
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१५
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१७
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१८
१८
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11 1972
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>BELEREMCE BOOK
अठारह
२९. पत्र : दुर्गा गिरिको (१३-७-१९३०)
३०. पत्र : मीराबहनको (१४-७-१९३०)
३१. पत्र : कुसुम देसाईको (१४-७-१९३०)
३२. पत्र: मणिबन पटेलको (१४-७-१९३०)
३३. पत्र : हरिप्रसादको (१४-७-१९३०)
३४. पत्र : नारणदास गांधीको (१३/१५-७-१९३० )
३५. पत्र प्रभावतीको (१५-७-१९३०)
३६. पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको (१५-७-१९३०)
४६. पत्र
४७ पत्र
३७. पत्र : एस० एस० एल० पोलकको (१६-७-१९३०)
३८. पत्र गोविन्द पटेलको (१७-७-१९३०)
३९. पत्र : मीराबहनको (१८-७-१९३०)
४०. पत्र रावजीभाई पटेलको (१८-७-१९३० )
४१. पत्र: नारणदास गांधीको (१८-७-१९३०)
४२. पत्र प्रभावतीको (१८-७-१९३०)
४३. पत्र : शिवाभाईको (१९-७-१९३०)
४४. पत्र : दूधीवन देसाईको (१९-७-१९३०)
४५. पत्र अमीना कुरेशीको (१९-७-१९३०)
गंगाबहन वैद्यको (१९-७-१९३०)
प्रेमावहन कंटकको (१९-७-१९३० )
४८. पत्र लालजी परमारको (१९-७-१९३० )
४९. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (१९-७-१९३०)
५०. पत्र : रमावहन जोशीको (१९-७-१९३०)
५१. पत्र : मीराबहनको (२००७-१९३०)
५२. पत्र पैट्रिक क्विनको (२०-७-१९३०)
५३. पत्र पैट्रिक विवनको (२०-७-१९३०)
५४. पत्र: रतिलाल शाहको (२०-७-१९३०)
५५. पत्र पुरुषोत्तम डी० सरैयाको (२०-७-१९३०)
५६. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२०-७-१९३० )
५७. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको (२१-७-१९३० )
५८. पत्र मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (२१-७-१९३०)
५९. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२१-७-१९३०)
६०. तार वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (२२-७-१९३०)
६१. पत्र जी० ए० नटेसनको (२२-७-१९३०)
६२. पत्र : नारणदास गांधीको (१८/२२-७-१९३०)
६३. ज्ञापिका मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूको (२३-७-१९३०)
६४. पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२३-७-१९३०)
१९
२०
२१
२२
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२३
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२५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>उन्नीस
६५. पत्र : हरिइच्छा देसाईको (२६-७-१९३०)
६६. पत्र बली और कुमीको (२६-७-१९३०)
६७. पत्र : रामी गांधीको ( २६-७-१९३०)
६८. पत्र : मनु गांधीको (२६-७-१९३०)
६९. पत्र भगवानजी पण्डयाको (२६-७-१९३० )
७०. पत्र : गंगाबहन झवेरीको (२७-७-१९३०)
७१. पत्र वसुमती पण्डितको (२७-७-१९३०)
७२. पत्र कलावती त्रिवेदीको (२७-७-१९३०)
७३. पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (२७-७-१९३०)
७४. पत्र जानकीदेवी बजाजको (२७-७-१९३०)
७५. मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रका अंश (२७-७-१९३०)
७६. पत्र : विठ्ठलदास जेराजाणीको (२७-७-१९३०)
७७. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२७-७-१९३०)
७८. पत्र मीराबह्नको ( २८-७-१९३०)
७९. पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२८-७-१९३०)
८०. पत्र प्रेमाबहन कंटकको (२८-७-१९३० )
८१. पत्र: गंगाबहन वैद्यको (२८-७-१९३०)
८२. पत्र प्रभावतीको (२८-७-१९३०)
८३. पत्र : रेहाना तैयबजीको (२८-७-१९३०)
८४. पत्र मणिबन पटेलको (२८-७-१९३०)
८५. पत्र शूरजी वल्लभदासको (२९-७-१९३०)
८६. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२९-७-१९३०)
८७. पत्र : नारणदास गांधीको (२८/३१-७-१९३०)
८८. टिप्पणी: मु० रा० जयकरको (२-८-१९३०)
८९. पत्र वसुमती पण्डितको (२-८-१९३०)
९०. पत्र : प्रेमावहन कंटकको (२-८-१९३०)
९१. पत्र : कमलनयन बजाजको (२-८-१९३०)
९२. पत्र: शारदा सी० शाहको ( ३-८-१९३०)
९३. पत्र : कुसुम देसाईको (३-८-१९३०)
९४. पत्र : भगवानजी पण्डयाको (३-८-१९३०)
९५. पत्र : मीराबहनको (४-८-१९३०)
९६. पत्र: गंगाबहन वैद्यको (४-८-१९३०)
९७. पत्र मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (४-८-१९३०)
९८. पत्र रुक्मिणी बजाजको (४-८-१९३०)
९९. पत्र व्रजकृष्ण चाँदीवालाको (४-८-१९३०)
१००. पत्र एक आश्रमवासीको (५-८-१९३० से पूर्व )
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बीस
१०१. पत्र नारणदास गांधीको (३/५-८-१९३०)
१०२. पत्र जे० सी० कुमारप्पाको (५-८-१९३०)
१०३. पत्र राधावन गांधीको (८-८-१९३०)
१०४. पत्र बलीबहन वोराको (८-८-१९३०)
१०५. पत्र मंत्री गिरिको (८-८-१९३० )
१०६. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको (८-८-१९३०)
१०७ पत्र रुक्मिणी बजाजको (८-८-१९३० )
१०८. पत्र: शारदा सी० शाहको (९-८-१९३०)
१०९. पत्र प्रभावतीको (९-८-१९३०)
११०. पत्र सत्यादेवी गिरिको (९-८-१९३० )
१११. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (९-८-१९३० )
११२. पत्र मीराबहनको (१०-८-१९२०)
११३. पत्र शिवाभाई पटेलको (१०-८-१९३०)
११४. पत्र हरिच्छा देसाईको (१०-८-१९३०)
११५. पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (१०-८-१९३०)
११६. पत्र: लक्ष्मीबहन खरेको ( ११-८-१९३०)
११७. पत्र वा० गो० देसाईको (११-८-१९३०)
११८. पत्र नारणदास गांधीको (१२-८-१९३०)
११९. पत्रः सप्रू और जयकरको (१५-८-१९३०)
१२०. पत्र : राधावन गांधीको (१८-८-१९३०)
१२१ पत्र प्रेमावहन कंटकको (१८-८-१९३०)
१२२. पत्र वसुमती पण्डितको (१८-८-१९३०)
१२३. पत्र रुक्मिणी बजाजको (१८-८-१९३० )
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८६
८६
१२४. पत्र कुँवरजी पारेखको (१८-८-१९३०)
८६
१२५. पत्र रेहाना तैयबजीको (१८-८-१९३०)
८७
१२६. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको (१८-८-१९३०)
८७
१२७. पत्र: मणिवहन पटेलको (१८-८-१९३०)
८८
१२८. पत्र प्रभावतीको ( १८-८-१९३०)
८८
१२९. पत्र : जयप्रकाश नारायणको (१८-८-१९३०)
८९
१३०. पत्र : मीराबहनको ( १८-८-१९३०)
८९
१३१. पत्र नारणदास गांधीको (१९-८-१९३० )
९०
१३२. पत्र रमावहन जोशीको (२१-८-१९३०)
९३
१३३. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (२१-८-१९३०)
९३
१३४. पत्र : नारायण मोरेश्वर सरेको (२१-८-१९३०)
१३५. पत्र : वसुमती पण्डितको (२१-८-१९३०)
९४
९४
१३६. पत्र मथुरादास पुरुषोत्तमको (२१-८-१९३०)
९५
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१३७. पत्र: मथुरादास पुरुषोत्तमको (२१-८-१९३० के पश्चात् )
१३८. पत्र : राधावन गांधीको (२२ -८-१९३० )
१३९. पत्र: मणिबहन पटेलको (२२ -८-१९३० )
१४०. पत्र : महावीर गिरिको ( २२ -८-१९३०)
१४१. पत्र : कुसुम देसाईको (२२-८-१९३०)
१४२. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२२-८-१९३०)
१४३. पत्र : कपिलराय मेहताको (२२-८-१९३०)
१४४. पत्र : सत्यादेवी गिरिको (२२-८-१९३०)
१४५. पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (२३-८-१९३०)
१४६. पत्र मीराबहनको (२४-८-१९३०)
१४७ पत्र प्रभावतीको (२४-८-१९३०)
१४८. पत्र : सुशीला गांधीको (२४-८-१९३०)
१४९. पत्र रसिक देसाईको (२४-८-१९३०)
१५०. पत्र : नारणदास गांधीको (२४ / २६-८-१९३०)
१५१. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको (२९-८-१९३०)
१५२. पत्र: महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (२९-८-१९३०)
१५३. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (२९-८-१९३०)
१५४. पत्र प्रभावतीको (२९-८-१९३०)
१५५. पत्र मंत्री गिरिको (२९-८-१९३० )
१५६. पत्र : गुलाम रसूल कुरेशीको (३०-८-१९३० )
१५७. पत्र: शारदा सी० शाहको (३१-८-१९३०)
१५८. पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको (३१-८-१९३०)
१५९. पत्र : मीराबहनको ( ३१-८-१९३० के लगभग)
१६०. पत्र अमृतलाल ठक्करको (१-९-१९३०)
१६१. पत्र मोतीबन चोकसीको (१-९-१९३०)
१६२. पत्र : गंगावहून झवेरीको (१-९-१९३०)
१६२. पत्र: प्रभावतीको (१-९-१९३० )
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११२
१६४. पत्र : दुर्गा गिरिको (१-९-१९३०)
११३
१६५. पत्र वा० गो० देसाईको (२-९-१९३०)
११३
१६६. पत्र: नारणदास गांधीको (२-९-१९३० )
११४
१६७. पत्र : वसुमती पण्डितको ( ३-९-१९३०)
११९
१६८. पत्रका अंश (३-९-१९३०)
११७
१६९. पत्र : सप्रू और जयकरको (५-९-१९३०)
११७
१७०. पत्र भगवानजी पण्डयाको (५-९-१९३०)
१२२
१७१. पत्र : पूँजाभाईको (५-९-१९३० )
१२२
१७२. पत्र : जयसुखलाल गांधीको (५-९-१९३०)
१२३
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१७३. पत्र: शारदा सी० शाहको ( ६-९-१९३०)
१७४. पत्र: प्रेमावहन कंटकको ( ६-९-१९३०)
१७५. पत्र : लीलावती आसरको ( ६-९-१९३०)
१७६. पत्र बेचरदास दोषीको ( ६-९-१९३०)
१७७. पत्र : कमलनयन बजाजको ( ६-९-१९३०)
१७८. पत्र : मीराबहनको (७-९-१९३०)
१७९. पत्र: मणिबहन पटेलको (७-९-१९३०)
१८०. पत्र : सुशीला गांधीको (७-९-१९३०)
१८१. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (७-९-१९३०)
१८२. पत्र : रेहाना तैयबजीको (७-९-१९३०)
१८३. पत्र : तारामती मथुरादास त्रिकमजीको (७-९-१९३०)
१८४. पत्र कलावती त्रिवेदीको (७-९-१९३०)
१८५. पत्र जे० सी० कुमारप्पाको (८-९-१९३०)
१८६. पत्र: पी० जी० मैथ्यूको ( ८-९-१९३०)
१८७. पत्र : मोतीबहन चोकसीको ( ८-९-१९३०)
१८८. पत्र: शान्तिकुमार मोरारजीको (८-९-१९३० )
१८९. पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (८-९-१९३०)
१९०. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको ( ८-९-१९३०)
१९१. पत्र : नारणदास गांधीको ( ५ / ९-९-१९३०)
१९२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (१०-९-१९३०)
१९३. पत्र : मोतीबहन चोकसीको (१०-९-१९३० के लगभग)
१९४. पत्र: रमावहन जोशीको (११-९-१९३०)
१९५. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको (११-९-१९३०)
१९६. पत्र: प्रेमावहून कंटकको (११-९-१९३०)
१९७ पत्र : निर्मला देसाईको (११-९-१९३०)
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१९८. पत्र : बलभद्रको (११-९-१९३०)
१३९
१९९. पत्र : लीलावती आसरको (११-९-१९३०)
१४०
२००. पत्र: नारायण मोरेश्वर खरेको (११-९-१९३०)
१४०
२०१. पत्र: गंगाबहन वैद्यको (११-९-१९३०)
१४१
२०२. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (११-९-१९३०)
१४१
२०३. पत्र : बनारसीलाल बजाजको (११-९-१९३०)
१४२
२०४. पत्र वसुमती पण्डितको (१२-९-१९३०)
२०५. पत्र: रुक्मिणी बजाजको (१२-९-१९३०)
२०६. पत्र : कुसुम देसाईको (१२-९-१९३०)
२०७. पत्र : माधवदासको (१२-९-१९३०)
२०८. पत्र: मणिवहन परीसको (१३-९-१९३०)
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२०९. पत्र प्रभावतीको (१३-९-१९३०)
१४५
२१०. पत्र : मीराबहनको (१४-९-१९३०)
२११. पत्र: मणिबन पटेलको (१४-९-१९३०)
२१२. छगनलाल जोशीको लिखे पत्रका अंश (१४-९-१९३०)
२१४. पत्र पैट्रिक क्विनको (१८-९-१९३०)
२१३. पत्रः नारणदास गांधीको (१४/१६-९-१९३०)
२१५. पत्र : गुलाम रसूल कुरेशीको (१८-९-१९३०)
२१६. पत्र: कमला नेवटियाको (१८-९-१९३०)
१४५
१४६
१४७
१४८
१५१
१५२
१५२
२१७. पत्र: रलियातवहन वृन्दावनलालको (१८-९-१९३०)
२१८. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (१८-९-१९३०)
२१९. पत्र: शारदा सी० शाहको (२०-९-१९३०)
२२०. पत्र : प्रेमावहन कंटकको (२०-९-१९३०)
२२१. पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको (२०-९-१९३०)
२२२. पत्र आर० वी० मार्टिनको (२१-९-१९३०)
२२३. पत्र : लीलावती आसरको (२१-९-१९३०)
२२४. पत्र : अमीना कुरेशीको (२१-९-१९३०)
२२५. पत्र : वसुमती पण्डितको (२१-९-१९३०)
२२६. पत्र प्रभावतीको (२१-९-१९३०)
१५३
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२२७. पत्र : कुसुम देसाईको (२१-९-१९३० )
१५९
२२८. पत्र भगवानजी पण्डयाको (२१-९-१९३०)
१५९
२२९. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (२१-९-१९३०)
१६०
२३०. पत्र : जानकीदेवी बजाजको (२१-९-१९३०)
१६०
२३१. पत्र : सत्यादेवी गिरिको (२१-९-१९३० )
१६१
२३२. पत्र जे० सी० कुमारप्पाको (२२-९-१९३०)
१६१
२३३. पत्र : मीराबहनको (२२-९-१९३० )
१६२
२३८. पत्र : गंगाबहन वैद्यको ( २२-९-१९३०)
२३४. पत्र गंगाबहन वैद्यको (२२-९-१९३०)
२३५. पत्र : कमलनयन बजाजको (२२-९-१९३०)
२३६. पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (२२-९-१९३०)
२३७. पत्र : अब्बासको ( २२-९-१९३०)
२३९. पत्र नारणदास गांधीको (२१ / २३-९-१९३०)
२४०. पत्र वा० गो० देसाईको ( २३-९-१९३०)
२४१. पत्र मोतीबहन चोकसीको (२३-९-१९३० )
२४२. पत्र पी० जी० मैथ्यूको (२६-९-१९३०)
२४३. पत्र कुसुम देसाईको (२६-९-१९३०)
२४४. पत्र: पन्नालालको (२७-९-१९३०)
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२४५. पत्र: युक्तिको (२७-९-१९३०)
२४६. पत्र: विनोद बालाको (२७-९-१९३०)
२४७ पत्र: मणिबन पटेलको (२७-९-१९३०)
२४८. पत्र : लीलावती आसरको (२७-९-१९३०)
२४९. पत्र: मणिबहन परीखको (२७-९-१९३० )
१७०
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२५०. पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको (२७-९-१९३०)
१७३
२५१. पत्र वसुमती पण्डितको (२७-९-१९३०)
१७३
२५२. पत्र : गंगाबहन झवेरी और नानीबहन झवेरीको (२७-९-१९३०)
१७४
२५३. पत्र: गंगाबहन वैद्यको (२७-९-१९३०)
१७४
२५४. पत्र : रेहाना तैयबजीको (२७-९-१९३० )
१७५
२५५. पत्र जयप्रकाश नारायणको (२७-९-१९३०)
२५६. पत्र: कलावती त्रिवेदीको (२७-९-१९३०)
२५७ पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (२७-९-१९३०)
२५८. पत्र : तुलसी मेहरको (२७-९-१९३०)
२५९. पत्र : मीराबहनको (२८-९-१९३०)
२६०. पत्र कसुम्बा गांधीको (२८-९-१९३०)
२६१. पत्र : जयसुखलाल गांधीको (२८-९-१९३० )
२६२. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको ( २८-९-१९३०)
२६३. पत्र : राधाबहन गांधीको (२८-९-१९३० )
२६४. पत्र : वेणीलाल गांधीको (२८-९-१९३० )
२६५. पत्र : बलभद्रको (२९-९-१९३०)
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२६६. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (२९-९-१९३०)
१८२
२६७, पत्र: पूँजाभाईको (२९-९-१९३०)
१८३
२६८, पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२९-९-१९३०)
१८३
२६९. पत्र आर० वी० मार्टिनको (३०-९-१९३०)
१८४
२७०. पत्र: नारणदास गांधीको (२५/३०-९-१९३०)
१८५
२७१. पत्र : आर० बी० मार्टिनको (२-१०-१९३०)
२७२. पत्र: शारदा सी० शाहको (२-१०-१९१०)
२७३. पत्र: प्रेमावहन कंटकको (२-१०-१९३०)
२७४. पत्र : रावजीभाई ना० पटेलको (२-१०-१९३०)
२७५. पत्र गंगाबहन वैद्यको (२-१०-१९३०)
२७६. पत्र बलवीर सिंहको (२/३-१०-१९३०)
२७७. पत्र आर० वी० मार्टिनको (३-१०-१९३० )
२७८. पत्र परशुराम मेहरोत्राको (३-१०-१९३०)
२७९, पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (४-१०-१९३०)
२८०. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (४-१०-१९३०)
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२८१. पत्र : मीराबहनको ( ५-१०-१९३० )
२८२. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (५-१०-१९३०)
२८३. पत्र: दूधीबहन देसाईको (५-१०-१९३०)
२८४. पत्र गोविन्द पटेलको (६-१०-१९३०)
२८५. पत्र प्रभावतीको (६-१०-१९३०)
२८६. पत्र: शान्ता शंकरभाई पटेलको (६-१०-१९३०)
२८७. पत्र : बलभद्रको (६-१०-१९३०)
२८८. पत्र भगवानजी पण्डयाको (६-१०-१९३०)
२८९. पत्र : नारणदास गांधीको (२ / ७-१०-१९३०)
२९०. पत्र: कुसुम देसाईको (७-१०-१९३०)
२९१. पत्र: शारदा सी० शाहको (१०-१०-१९३०)
२९२. पत्र हरिइच्छा देसाईको (१०-१०-१९३०)
२९३. पत्र कपिलराय मेहताको (१०-१०-१९३०)
२९४. पत्र: नारायण मोरेश्वर खरेको (११-१०-१९३०)
२९५. पत्र प्रभावतीको (११-१०-१९३०)
२९६. पत्र : मोतीबहन चोकसीको (११-१०-१९३० )
२९७. पत्र: महावीर गिरिको (११-१०-१९३०)
२९८. पत्र: विट्ठलदास जेराजाणीको (११-१०-१९३०)
२९९. पत्र: रमाबह्न जोशीको (१२-१०-१९३०)
३००. पत्र भगवानजी पण्डयाको (१२-१०-१९३०)
३०१. पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (१२-१०-१९३०)
३०२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (१२-१०-१९३०)
२०३. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको (१२-१०-१९३०)
३०४. पत्र वसुमती पण्डितको (१२-१०-१९३०)
३०५. पत्र गंगाबहन वैद्यको (१२-१०-१९३० )
३०६. पत्र प्रेमावहन कंटकको (१२-१०-१९३०)
३०७ पत्र: दुर्गा गिरिको (१२-१०-१९३०)
३०८. पत्र मीराबह्नको (१३-१०-१९३०)
३०९. पत्र : रामदास गांधीको (१३-१०-१९३०)
३१०. पत्र: नारणदास गांधीको ( ९ / १४-१०-१९३०)
३११. पत्र फेनर ब्रॉकवेको (१५-१०-१९३० )
३१२. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१५-१०-१९३०)
३१३. पत्र लीलावतीको (१६-१०-१९३०)
३१४. पत्र : भगवानजी पण्डयाको (१६-१०-१९३०)
३१५. पत्र नारणदास गांधीको (१६-१०-१९३०)
३१६. पत्र: सुशीला गांधीको (१७-१०-१९३० से पूर्व )
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३१७. पत्र पैट्रिक क्विनको (१७-१०-१९३०)
३१८. पत्र: शारदा सी० शाहको (१७-१०-१९३०)
३१९. पत्र: छगनलाल जोशीको (१७-१०-१९३०)
२२४
२२५
२२५
३२०. पत्र: रलियातबहन वृन्दावनलालको (१७-१०-१९३०)
२२६
३२१. पत्र : वसुमती पण्डितको (१७-१०-१९३०)
२२६
३२२. पत्र : कुसुम देसाईको (१७-१०-१९३०)
३२३. पत्र: रतिलाल सेठको (१७-१०-१९३०)
३२४. पत्र : पूँजाभाईको (१७-१०-१९३०)
३२५. पत्र : सुशीला गांधीको (१७-१०-१९३०)
३२६. पत्र : दुर्गा गिरिको (१७-१०-१९३०)
३२७. पत्र कलावती त्रिवेदीको (१७-१०-१९३०)
३२८. पत्र : राधाबहन गांधीको (१८-१०-१९३०)
२२७
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३२९. पत्र : प्रेमाबन कंटकको ( १८-१०-१९३०)
२३१
३३०. पत्र प्रभावतीको (१८-१०-१९३०)
२३१
३३१. पत्र: महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (१८-१०-१९३०)
२३२
३३२. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (१८-१०-१९३०)
२३२
३३३. पत्र : मीराबहनको (१९-१०-१९३०)
२३३
३३४. पत्र : रमाबहन जोशीको (१९-१०-१९३०)
२३४
३३५. पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-१०-१९३०)
३३६. पत्र : कसुम्बा गांधीको (१९-१०-१९३०)
३३७. पत्र : बनारसीदास चतुर्वेदीको (१९-१०-१९३०)
३३८. पत्र: बहरामजी खम्भाताको (२०-१०-१९३०)
२३५
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३३९. पत्र तहमीना पी० जोशीको (२०-१०-१९३०)
२३७
३४०. तार : मोतीलाल नेहरूको (२१-१०-१९३० या उससे पूर्व )
२३८
३४१. पत्र: नारणदास गांधीको (१६ / २१-१०-१९३०)
२३८
३४२. पत्र : शारदा सी० शाहको (२३-१०-१९३०)
२४२
३४३. पत्र : पुरुषोत्तम डी० सरैयाको (२३-१०-१९३०)
३४४. पत्र: पद्माको (२३-१०-१९३०)
३४५. पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२३-१०-१९३०)
३४६. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (२३-१०-१९३०)
३४७. पत्र : बलभद्रको (२४-१०-१९३०)
३४८. पत्र : भगवानजी पण्डयाको (२४-१०-१९३०)
३४९. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको (२४-१०-१९३०)
३५०. पत्र : राधाबहन गांधीको (२४-१०-१९३०)
३५१. पत्र : दुर्गा गिरिको (२४-१०-१९३०)
३५२. पत्र : नारायण देसाईको (२५-१०-१९३०)
Gandhi Heritage Portal
२४२
२४३
२४३
२४४
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२४५
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३५३. पत्र : मीराबहनको (२६-१०-१९३०)
३५४. पत्र महेन्द्र वा० देसाईको (२६-१०-१९३०)
३५५. पत्र: प्रेमावहन कंटकको (२६-१०-१९३०)
३५६. पत्र : गंगाबहन झवेरीको ( २६-१०-१९३०)
३५७. पत्र : कुंवरजी मेहताको (२६-१०-१९३०)
३५८. पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको (२६-१०-१९३०)
३५९. पत्र: कलावती त्रिवेदीको (२६-१०-१९३०)
३६०. पत्र : शान्ताको ( २६-१०-१९३०)
३६१. तार : जयशंकर त्रिवेदीको (२७-१०-१९३०)
३६२. पत्र वी० ए० सुन्दरम्को (२७-१०-१९३०)
३६३. पत्र: प्रभावतीको (२७-१०-१९३०)
२४७
२४८
२४९
२४९
२५०
२५०
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२५१
२५२
२५२
३६४. पत्र : भगवानजी अनूपचन्द मेहताको (२७-१०-१९३०)
२५३
२५३
३६५. पत्र : जयशंकर त्रिवेदीको (२७-१०-१९३०)
३६६. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (२७-१०-१९३०)
२५४
२५५
३६७. पत्र : तारामती मथुरादास त्रिकमजीको (२७-१०-१९३०)
३६८. पत्र : नारणदास गांधीको (२३ / २८-१०-१९३०)
३६९. पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको (२८-१०-१९३०)
३७०. पत्र घनश्यामदास बिड़लाको (२८-१०-१९३०)
३७१. पत्र प्रेमलीला ठाकरसीको (३०-१०-१९३०)
३७२. पत्र अपटन सिक्लेयरको (३०-१०-१९३०)
३७३. पत्र जे० सी० कुमारप्पाको (३१-१०-१९३०)
२५५
२५६
२५९
२६०
२६०
२६१
२६२
३७४. पत्र : वसुमती पण्डितको (३१-१०-१९३०)
२६३
३७५. पत्र प्रभावतीको (१-११-१९३०)
२६३
३७६. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१-११-१९३०)
२६४
३७७. पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (२-११-१९३०)
२६५
३७८. पत्र : राधाबहन गांधीको (२-११-१९३०)
२६५
३७९. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (२-११-१९३०)
२६६
३८०. पत्र हेमप्रभा दासगुप्तको (२-११-१९३०)
२६७
३८१. पत्र : रामचन्द्र त्रिवेदीको (२-११-१९३०)
२१७
३८२. पत्र : जयशंकर त्रिवेदीको (३-११-१९३०)
२६८
३८३. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (३-११-१९३०)
२६८
३८४. पत्र: पन्नालालको (३-११-१९३०)
२६९
३८५. पत्र : कुसुम देसाईको (३-११-१९३०)
२१९
३८६. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको (३-११-१९३०)
.२७०
३८७. पत्र जमनाको (३-११-१९३०)
२७०
३८८. पत्र शान्ता शंकरभाई पटेलको (३-११-१९३०)
२७१
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अट्ठाईस
३८९. पत्र: दुर्गा गिरिको (३-११-१९३०)
३९०. पत्र : नारणदास गांधीको (३०-१०/४-११-१९३०)
२७१
२७२
३९१. पत्र: बहरामजी सम्भाताको (४-११-१९३०)
३९२. पत्र : मीराबनको ( ६-११-१९३०)
३९३. पत्र : मीरावनको ( ७-११-१९३० )
३९४. पत्र: पद्माको (७-११-१९३०)
३९५. पत्र : सुशीला गांधीको ( ७-११-१९३०)
३९६. पत्र : भगवानजी पण्डयाको ( ७-११-१९३०)
३९७. पत्र : बलीबहन बोराको (७-११-१९३०)
२७४
२७५
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२७७
२७८
२७९
२८०
३९८. पत्र: कृष्णमैया देवीको (७-११-१९३०)
३९९. पत्र : तारामती मथुरादास त्रिकमजीको (७-११-१९३०)
४००. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको ( ८-११-१९३०)
४०१. पत्र: दूधीबहन वालजी देसाईको (८-११-१९३०)
४०२. पत्रः नानाभाई इच्छाराम मशरूवालाको ( ८-११-१९३०)
४०३. पत्र : तारा मशरूवालाको (८-११-१९३०)
२८०
२८१
२८१
२८२
२८२
२८३
४०४. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको (८-११-१९३०)
२८३
४०५. पत्र : ललिताको ( ८-११-१९३०)
२८४
४०६. पत्र: गोविन्द पटेलको (९-११-१९३०)
२८४
४०७. पत्र : जुगतराम ववेको ( ९-११-१९३०)
२८५
४०८. पत्र : रामचन्द्र खरेको (९-११-१९३०)
२८५
४०९. पत्र : कुंवरजी मेहताको (१०-११-१९३०)
२८६
४१०. पत्र प्रभावतीको (१०-११-१९३०)
२८६
४११. महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको लिले पत्रका अंश (१०-११-१९३०)
२८७
४१२. पत्र : बुलाखीदासको (१०-११-१९३०)
२८७
४१३. पत्र : अब्बासको (१०-११-१९३०)
२८८
४१४. पत्र : गंगावन वैद्यको (१०-११-१९३०)
२८८
४१५. पत्र: मनु गांधीको (१०-११-१९३०)
२८९
४१६. पत्र: रेहाना तैयबजीको (१०-११-१९३० )
४१७. पत्र : जयसुखलाल गांधीको (१०-११-१९३०)
४१८. पत्र: शान्ताको (१०-११-१९३०)
४१९. पत्र नारणदास गांधीको (११-११-१९३०)
४२०. पत्र : सुरेन्द्र मशरूवालाको (११-११-१९३०)
४२१. पत्र: बहरामजी खम्भाताको (११-११-१९३०)
४२२. पत्र हेमप्रभा दासगुप्तको (११-११-१९३०)
४२३. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (१२-११-१९३०)
४२४. पत्र : मीराबहनको (१३-११-१९३०)
Gandhi Heritage Portal
२८९
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२९३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>उनतीस
४२५. पत्र: शारदा सी० शाहको (१३-११-१९३०)
४२६. पत्र : वसुमती पण्डितको (१३-११-१९३० )
४२७. महादेव देसाईको लिखे पत्रका अंश (१३-११-१९३०)
४२८. पत्र: शिवाभाई पटेलको (१३-११-१९३०)
४२९. पत्र : गंगादेवी सनाढयको (१३-११-१९३०)
४३०. पत्र अब्बास तैयबजीको (१४-११-१९३०)
४३१. पत्र : कुसुम देसाईको (१४-११-१९३०)
४३२. पत्र : तहमीना पी० जोशीको (१४-११-१९३० )
४३३. पत्र: भगवानजी पण्डयाको (१४-११-१९३०)
४३४. पत्र: पद्माको (१४-११-१९३०)
४३५. पत्र : अब्दुल कादिर बावजीरको (१४-११-१९३०)
४३६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको (१४-११-१९३०)
४३७. पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको (१४-११-१९३०)
४३८. पत्र : गंगावहून झवेरीको (१५-११-१९३०)
४३९. पत्र: प्रेमावहन कंटकको (१५-११-१९३०)
४४०. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (१५-११-१९३०)
४४१. पत्र जे० सी० कुमारप्पाको (१६-११-१९३०)
४४२. पत्र : सुशीला गांधीको (१६-११-१९३० )
४४३. पत्र: शान्ता शंकरभाई पटेलको (१६-११-१९३०)
४४४. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (१६-११-१९३०)
४४५. पत्र : महावीर गिरिको (१६-११-१९३०)
४४६. पत्र : राधाबहन गांधीको (१६-११-१९३०)
४४७. पत्र: प्रभावतीको ( १६-११-१९३०)
२९७
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३२१
३२१
३२२
४५९. पत्र मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (२२-११-१९३०)
३२२
४६०. पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (२२-११-१९३०)
३२३
४४८. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (१६-११-१९३०)
४४९. पत्र रुक्मिणी बजाजको (१६-११-१९३०)
४५०. पत्र : जयप्रकाश नारायणको (१६-११-१९३०)
४५१. पत्र नारणदास गांधीको (१३/१७-११-१९३०)
४५२. पत्र : बबलभाई मेहताको (१८-११-१९३०)
४५३. पत्र : बी० जे० बी० गैलविनको (१८-११-१९३०)
४५४. पत्र: प्यारेलाल गोविलको (१९-११-१९३०)
४५५. पत्र पुरुषोत्तम गांधीको (२२-११-१९३० )
४५६. पत्र : कुसुम देसाईको (२२-११-१९३०)
४५७. पत्र शिवाभाई जी० पटेलको (२२-११-१९३०)
४५८. पत्र बलभद्रको (२२-११-१९३०)
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीस
४६१. पत्र : मथुरी खरेको (२२-११-१९३०)
४६२. पत्र : मीराबहनको (२३-११-१९३० )
४६३. पत्र प्रभावतीको (२४-११-१९३०)
४६४. पत्र : वसुमती पण्डितको (२४-११-१९३०)
४६५. पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२४-११-१९३०)
४६६. पत्र : हरिलाल देसाईको (२४-११-१९३०)
३२३
३२४
३२५
४६७. पत्र: प्रेमावहन कंटकको (२४-११-१९३०)
४६८. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (२४-११-१९३०)
४६९. पत्र : वनमाला परीसको ( २४-११-१९३०)
४७०. पत्र: अमीना कुरेशीको (२४-११-१९३० )
४७१. पत्र: मथुरादास पुरुषोत्तमको (२४-११-१९३०)
४७२. पत्र हेमप्रभा दासगुप्तको (२४-११-१९३०)
४७३ पत्र नारणदास गांधीको (२१/२५-११-१९३०)
४७४. पत्र रमायन जोशीको ( २५-११-१९३०)
४७५. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको ( २५-११-१९३०)
४७६. पत्र : मथुरी खरेको (२७-११-१९३०)
४७७. पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२७-११-१९३०)
४७८. पत्र : रामदास गांधीको (२८-११-१९३०)
४७९. पत्र प्रभावतीको (२८-११-१९३०)
४८०. पत्र वसुमती पण्डितको (२८-११-१९३०)
४८१. पत्र अब्दुल कादिर बावजीरको (२८-११-१९३०)
४८२. पत्र अमीना कुरेशीको (२८-११-१९३०)
४८३. पत्र हेमप्रभा दासगुप्तको ( २८-११-१९३०)
४८४. सत्याग्रही बन्दियोंका कर्त्तव्य (२९-११-१९३० से पूर्व )
४८५. पत्र: प्रेमाबन कंटकको (३०-११-१९३०)
४८६. पत्र: मूलचन्द अग्रवालको (३०-११-१९३०)
४८७. पत्र : मीरायनको (२९-११/-१२-१९३०)
४८८. पत्र : कुसुम देसाईको (२९-११/-१२-१९३०)
३२५
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३४४
३४६
४८९. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको (१-१२-१९३०)
४९०. पत्र : नारणदास गांधीको (२७-११/३-१२-१९३०)
४९१. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (३-१२-१९३०)
३४७
३४७
३५०
४९२. पत्र : मीराबहनको (४-१२-१९३०)
३५०
४९३. पत्र काशिनाथ त्रिवेदीको (४-१२-१९३० )
३५१
४९४. पत्र : रमावहन जोशीको (४-१२-१९३०)
३५२
४९५. पत्र : तारामती मथुरादास विकमजीको (४-१२-१९३०)
४९६. पत्र: कलावती त्रिवेदीको (४-१२-१९३०)
३५२
३५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>इकतीस
४९७. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको (५-१२-१९३०)
३५३
४९८. पत्र : मनु गांधीको (५-१२-१९३०)
३५४
४९९. पत्र प्रेमावहन कंटकको (५-१२-१९३०)
३५४
५००. पत्र : चंद त्यागीको (५-१२-१९३०)
३५५
५०१. पत्र कुसुम देसाईको (६-१२-१९३० )
३५६
५०२. पत्र : बुलाखीदासको ( ६-१२-१९३० )
५०३. पत्र: महेन्द्र देसाईको ( ६-१२-१९३०)
३५६
३५६
५०४. पत्र: भगवानजी पण्डयाको ( ६-१२-१९३०)
५०५. पत्र: शान्ता शंकरभाई पटेलको ( ६-१२-१९३०)
५०७ पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको ( ७-१२-१९३०)
५०८. पत्र: रेहाना तैयबजीको (७-१२-१९३०)
३५७
३५७
५०६. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको (७-१२-१९३०)
३५८
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३६१
३६१
३६२
३६२
५०९. पत्र : वसुमती पण्डितको ( ७-१२-१९३०)
५१०. पत्र: गंगाबहन वैद्यको ( ७-१२-१९३० )
५११. पत्र : सुशीला गांधीको (७-१२-१९३०)
५१२. पत्र: पद्माको (७-१२-१९३०)
५१३. पत्र : तोताराम सनाढयको ( ७-१२-१९३०)
५१४. पत्र : बबलभाई मेहताको (८-१२-१९३०)
५१५. पत्र : मीराबनको (८-१२-१९३०)
५१६. पत्र: नारणदास गांधीको ( ४ / ९-१२-१९३०)
५१७. पत्र: प्रभावतीको (९-१२-१९३०)
५१८. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको (११-१२-१९३०)
५१९. पत्र: कुसुम देसाईको (११-१२-१९३०)
५२०. पत्र ब्रजकृष्ण चांदीवालाको (१२-१२-१९३०)
५२१. पत्र मीराबह्नको (१३-१२-१९३०)
५२२. पत्र वसुमती पण्डितको (१३-१२-१९३० )
५२३. पत्र: निर्मला देसाईको (१३-१२-१९३० )
५२४. पत्र : रामचन्द्र त्रिवेदीको (१३-१२-१९३०)
३६३
३६३
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३६८
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३६९
३७०
३७०
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३७२
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५२५. पत्र: शारदा सी० शाहको (१४-१२-१९३०)
३७३
५२६. पत्र : प्रेमाबहुन कंटकको (१४-१२-१९३०)
३७४
५२७. पत्र: पद्माको (१४-१२-१९३०)
३७५
५२८. पत्र : वनमाला परीसको (१४-१२-१९३०)
३७५
५२९. पत्र: नानाभाई इच्छाराम मशरूवालाको (१४-१२-१९३०)
३७६
५३०. पत्र : कुंवरजी मेहताको (१४-१२-१९३०)
३७६
५३१. पत्र: मणिबन पटेलको (१४-१२-१९३०)
३७७
५३२. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको (१४-१२-१९३०)
३७७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बत्तीस
५३३. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको (१४-१२-१९३०)
५३४. पत्र: शान्ता त्रिवेदीको (१४-१२-१९३०)
३७८
३७९
५३५. पत्र : रामचन्द्र त्रिवेदीको (१४-१२-१९३० या उसके पश्चात् )
५३६. पत्र: प्रभावतीको (१५-१२-१९३०)
३७९
३८०
परिशिष्ट
१. (क) नेहरू-यकी टिप्पणी
३८१
(ख) जवाहरलाल नेहरूका पत्र
३८२
२. तेजबहादुर सप्रू और मु० रा० जयकरका पत्र
कांग्रेस नेताओंको
३८४
३. वाइसरायका पत्र सर तेजबहादुर सप्रुको
३८६
४. वाइसरायके साथ हुई बातचीतका सार-संक्षेप
३८८
५. नेहरू द्वयकी टिप्पणी
३९०
६. 'आश्रम भजनावलि '
३९४
सामग्री के साधन-सूत्र
तारीखवार जीवन-वृत्तान्त
शीर्षक सांकेतिका
सांकेतिका
४८३
४८४
४८५
४८८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>11 AUG 1972
१. पत्र : अमीना कुरैशीको
यरवडा मन्दिर'
मंगलवार [१ जुलाई, १९३०]
मैं तुझे रोज याद कर लेता हूँ। अब तो तुझे सूतिकागृहसे मुक्ति मिल गई
चि० अमीना,
होगी।
गुजराती (जी० एन० ६६७०) की फोटो नकलसे।
२. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
बापूकी दुआ
यरवडा मन्दिर
१ जुलाई, १९३०
प्रिय भगिनि,
अब तुमारी मानसिक स्थिति कैसी है? शरीर कैसा है ? सतीशबाबुको कब
मिली थी ? उनकी प्रकृति कैसी है? सोदपुरमें कौन कौन है ? क्या पढ़ती है ?
रोज क्या करती है ?
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः *
याद करो ।
बापुके आशीर्वाद
[ पुनश्च : ]
आश्रमके मार्फत लिखो ।
जी० एन० १६६७ की फोटो नकलसे ।
१. गांधीजीको ५ मई १९३० को गिरफ्तार किया गया था और परवडा सेंट्रल जेल, पूनामें रखा
गया था।
२. अमीना कुरैशीको ६ जुलाई, १९३० को लिखे पत्र में गांधीजीने अमीनाको बच्चा होनेका उल्लेख
किया है। अतः पद पत्र सम्भवतः उससे पहले मंगलवारको लिखा गया होगा ।
३. सतीशचन्द्र दासगुप्तको सत्याग्रह बुलेटिनोंके प्रकाशनके सम्बन्धमें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार
कर लिया गया था और उन्हें एक सालफी सख्त कैद हुई थी।
४. भगवद् गीता, १२, १७।
४४-१
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगाबहन झवेरी,
३. पत्र : गंगाबहन झवेरीको
यरवडा मन्दिर
३ जुलाई, १९३०
मई महीने में प्राप्त पत्र मुझे अभी हाल ही में दिये गये हैं। तुम्हारी शक्ति
और भक्तिपर मुझे विश्वास है। भगवान तुम्हें अवश्य सन्मति देगा। अपने स्वास्थ्यका
ध्यान रखना ।
बापूके आशीर्वाद
[ पुनश्च : ]
छोटूभाईसे मेरे वन्देमातरम् कहना।
गुजराती (जी० एन० ३१०१ ) की फोटो नकलसे ।
४. पत्र : नानीबहन झवेरीको
चि० नानीवहन ( झवेरी),
यरवडा मन्दिर
३ जुलाई, १९३०
तुम्हारा २७-५-१९३० का पत्र, एक महीने बाद, अभी हालमें ही मिला।
इसका नाम जेलखाना है। पत्र मिल गया, इसे भी अधिकारियोंका अनुग्रह कहना
चाहिए।
यदि तुम पचा सको तो अनाज अवश्य खाने लगो । किन्तु स्वादके लिए कभी
नहीं । तुम्हारा शरीर तो दूध और दहीसे ही पनपेगा। हर तरहकी चिन्ता करना
छोड़ देना। हम जिस श्लोकका रोज पाठ किया करते थे उसपर मनन करना ।
'अनासक्तियोग को बार-बार पढ़ना, उसपर विचार करना और अमल करना ।
गुजराती (जी० एन० ३१००) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. गांधीजी द्वारा भगवद्गीताका गुजराती अनुवाद; देखिए खण्ड ४१, पृष्ठ ९२-१६७ ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५. पत्र : मनु गांधीको '
चि० मनुड़ी,
यरवडा मन्दिर
३ जुलाई, १९३०
आखिर बलीबन तुझे फुसलाकर भगा ही ले गई। कोई बात नहीं। किन्तु
अब रानी बेटी बनना और काम करना। खूब कातना, पींजना और मुझे लिखना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५०२) की फोटो नकलसे सौजन्य : मनुबहन मशरूवाला
I
६. पत्र : वसुमती पण्डितको
यरवडा मन्दिर
३ जुलाई, १९३०
चि० वसुमती,
अब जबकि मैंने रामदास, देवदास आदिको 'तू' लिखना शुरू कर दिया है।
तो तुझे 'तुम' लिखनेमें मेरी कलम अटकेगी ही। अब मुझसे 'तुम' लिखा ही नहीं
जाता । अतः आजसे जो उपयुक्त सर्वनाम है वही लिखना शुरू करता हूँ। जबसे तू
मेरे सम्पर्क में आई है तभीसे मैंने तुझे बेटीके रूपमें अपने हृदयमें स्थान दिया है
और तूने उक्त पदको शोभान्वित भी किया है। इससे अधिक और क्या लिखूं ?
भविष्य में भी शोभान्वित करना। मैं जिन्हें अपनी लड़कियाँ मान बैठा हूँ यदि उनके
उपयुक्त पिता बन सकूं तभी बात बनेगी। इसे शिष्टताकी भाषा मत समझना। आज
इतना ही मैं ठीक ही हूँ। काकासाहब मेरे साथ ही हैं।
गुजराती (एस० एन० ९२७६) की फोटो नकलसे ।
१. हरिलाल गांधीकी कन्या ।
२. बलीबहन बोरा, मनु गांधीकी मौसी।
३. दत्तात्रेय बालकृष्ण काकर।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० लक्ष्मीबहन,
७. पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको
यरवडा मन्दिर
५ जुलाई, १९३०
तुम्हारा मई महीनेका लिखा पत्र मुझे जुलाईमें दिया गया। ऐसा ही होता
है। तुम जैसी गुजराती लिखती हो यदि मैं वैसी ही मराठी लिखने लगूं तो बात
बन जाये। मैं काकासाहब से सीख तो रहा हूँ ।
जितने भी बच्चे वसन्तकी उम्र के हैं वे सभी वसन्त हैं, इसमें तनिक भी सन्देह
नहीं है।
मुझे पत्र लिखती रहना ।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २८५ ) से सौजन्य : लक्ष्मीबहन खरे
८. पत्र : मोतीबहन चोकसीको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
५ जुलाई, १९३०
चि० मोतीबहन,
काफी दिन पहले लिखा तुम्हारा पत्र मुझे अभी-अभी मिला है। मैंने जो पत्र
तुम्हें लिखे थे वे मिले होंगे। १२वाँ अध्याय' बार-बार पढ़ना और उसपर विचार
करना । आशा है तुम्हें कोचीनसे बाल-बच्चोंके समाचार तो मिलते ही रहते होंगे।
मेघजीकी चिन्ता बिलकुल मत करना। ये तो शान्ति पा ही चुके हैं। मृत्युके समय
जिसके ओठों पर श्रद्धापूर्वक रामनाम रहा हो उसके विषयमें चिन्ता कैसी ?
गुजराती (जी० एन० ३७३७) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. भगवद्गीताका ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० अमीना,
९. पत्र : अमीना: कुरैशीको
यरवडा मन्दिर
६ जुलाई, १९३०
तेरा पत्र पढ़कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। बालकके जन्मका समाचार मिल
गया था। ख़ुदा उसे लम्बी उम्र दे और वह तेरे और कुरैशी जैसा बहादुर बने ।
क्या लड़कियाँ मुझे याद करती हैं ? उम्मीद है तेरी तबीयत अच्छी रहती होगी ।
गुजराती (जी० एन० ६६५६) की फोटो नकलसे।
१०. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
बापूकी दुआ
यरवडा मन्दिर
६ जुलाई, १९३०
चि० प्रेमा,
हुआ ।
तेरा १ जुलाईका पत्र मुझे दिया गया है। खुराकमें फल मिलते हैं, यह अच्छा
धुरन्धरको मैंने इसलिए लिया क्योंकि नियम-पालनमें मैंने उसे दृढ़ पाया। उसका
खरापन मुझे अच्छा लगा। यह बात अखबारमें नहीं छापी जा सकती ।
फूलों और पेड़ोंके साथ मेरी ओरसे बात करना। उनके भाई-बहन यहाँ भी
हैं। इससे हमें सन्तोष मानना चाहिए न ?
कुल मिलाकर तेरे दो ही पत्र मुझे मिले हैं। अंग्रेजी पत्र तो नहीं ही मिला।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७२) से सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२२४ की फोटो नकलसे भी ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११. पत्र : डाहीबहन पटेलको
चि० डाहीबहन ( रावजीभाई),
यरवडा मन्दिर
६ जुलाई, १९३०
तुम्हें मुझे लिखना चाहिए। तुम डाहीबहनोंकी मुझे प्रायः याद आती है।
आशा है अब तुम्हें हिस्टीरिया के दौरे बिल्कुल नहीं आते होंगे। तुम्हारे आसपास जो
बहनें हों उन सबको मेरे आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ९२०४ ) की फोटो नकलसे।
१२. पत्र : महालक्ष्मी ठक्करको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
६ जुलाई, १९३०
चि० महालक्ष्मी,
तुम्हारा पत्र मिला । सब बहनोंका काम अच्छी तरह चल रहा है, यह जानकर
मुझे खुशी होती है। रमावहनसे कहना कि उसका पत्र मिला है। इस बार मैं उसे
नहीं लिख रहा हूँ। जिन बहनोंको मैं नहीं लिखता वे यह न समझें कि मैं उन्हें
विसार बैठा हूँ। जितनी बहनों तक पत्र द्वारा पहुँचा जा सकता है उन तक पहुँचता
हूँ। लेकिन एकको लिखा सो सबको लिखा, ऐसा समझना चाहिए। बच्चोंके बारेमें मालूम
हुआ। उनके जानेसे मुझे दुःख हुआ है। माधवजीकी खबर मुझे मिलती रहती है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ६८२६) की फोटो नकलसे ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मीरा,
१३. पत्र : मीराबहनको
परवडा मन्दिर
७ जुलाई, १९३०
मुझे तुम्हारा पत्र ठीक हालत में और समयसे मिल गया। अब दोनों तरफके
पत्रोंके जल्दी पहुँचने में किसी कठिनाईकी सम्भावना नहीं है।
लन्दनसे तुम्हें अच्छा समाचार मिला, इसकी मुझे खुशी है। स्पष्टतः यह
आपरेशन पूरी तरह सफल रहा। पश्चिमने शल्य-चिकित्सा के क्षेत्रमें जो आविष्कार
किये हैं और उस दिशा में जो चहुँमुखी प्रगति की है उसका मैं हमेशा प्रशंसक रहा हूँ।
अपनी आहार सूचीमें तुमने मुझे यह नहीं बताया है कि तुम कितना घी ले
रही हो और सन्तरे लेती हो या नहीं। घी की तुम्हें आवश्यकता है और सन्तरोंकी
भी। मैं चाहूँगा कि तुम इन दो चीजोंको मत छोड़ो और न इनमें कमी करो।
अगर तुमने अभी तक रुई न भेजी हो तो तत्काल भेज दो। मैं तुम्हें बता
चुका हूँ कि १५ जुलाई अन्तिम दिन है।
मैं ठीक हूँ। ३७५ तार कातना आजकल मुझे कुछ भारी महसूस होता है।
मैं इसका कारण पता चलानेकी कोशिश कर रहा हूँ। ऐसी स्थितिमें तकलीका अभ्यास
काफी धीमा पड़ गया है।
मेरे पत्रोंके अंश प्रकाशित न होने की शिकायतें मुझे मिली हैं। इसलिए तुम
सामान्य बातोंवाले पत्रांश प्रकाशित करना फिरसे शुरू कर दो। मैंने इस विषय में
सुपरिटेंडेंटसे बात कर ली है। यदि लोगोंको मेरे पत्रोंका कोई भी अंश देखने को नहीं
मिला तो उन्हें बहुत असन्तोष होगा ।
मुलाकातों के बारेमें अभी तक कुछ तय नहीं हुआ है।'
उन सब लोगोंको मेरा प्यार कहना जिन्हें मैं पत्र नहीं लिखत लेकिन जिनकी
याद बराबर करता हूँ ।
से भी ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०० ) से । सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६३४
१. मीराबहनकी माताका आपरेशन हुआ था।
२. जबतक मुलाकातकी अनुमति अधिकार रूपमें न मिले, तबतक गांधीजीने परवडा जेलमें किसीसे
भी मिलने से इनकार कर दिया था, यहाँ तक कि मित्रों और सम्बन्धियोंसे भी; देखिए "पत्र : आर० वी०
मार्टिनको", ८-७-१९३० तथा खण्ड ४३, पृष्ठ ४५७-८ भी।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४. पत्र : नारणदास गांधीको
यरवडा मन्दिर
७ जुलाई, १९३०
चि० नारणदास,
भणसाली लीलाबहन के बारेमें क्या लिखता है? क्या वह आश्रमसे अलग हो
गई है ?
तुम्हारा २ जुलाईका पत्र इस बार तो फौरन मिल गया। रेवाशंकर भाईके
बारेमें तार मिल गया था। उन्हें मैंने सीधे ही जवाब दे दिया था।
रतिलाल अब शान्त होगा ।
मेरे पत्रोंमें से कुछ अंश तो जरूर छापे जा सकते हैं। जिस मर्यादाका पालन
किया जाना है, सो मैंने सुझा दिया है।
अमीना अब तो ठीक होगी। जब कभी जरूरत हो और जब जी चाहे मुझे
पत्र लिख सकते हो। बहुत करके तो वह फौरन मिल जायेगा ।
शम्भुको कहाँ चोटें आई थीं ?
१.
तुम्हारी ठीक परीक्षा हो रही है। बाबाका उपद्रव सहन किये बिना छुटकारा
कहाँ था । किन्तु वह बाबा है इसलिए नहीं। हमारे लिए तो राजा या बाबा दोनों
एकसे हैं। राजा भी ऐसा उपद्रव करे तो भी हम क्या ऐसा ही व्यवहार न करेंगे ?
हम जानते हों और हमारे पास समय हो तो ऐसे उपद्रव करनेवालोंका सहवास प्राप्त
करके उन्हें विवेकी बनना सिखायें उनके पास जाकर उनसे विनती करें। उनकी
परेशानी समझें। उनके रहन-सहनका पता लगायें। मैं जानता हूँ यह सब करना
कठिन है। रास्ता तो यही है। बाबा हमारा सगा भाई हो तो क्या करें ? जितना
हो सके उतना समय उसके लिए लगायेंगे और उसकी विनती ही करेंगे न ? दूसरे
इस या इस तरहके उपद्रवके ध्यानसे हम यथाशक्ति कमसे कम चीजें काममें लायें ।
दूधके बारेमें तो ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता। क्योंकि दुग्धालय चलानेके कामको
हमने कर्त्तव्य माना है और किया है, इसलिए उसको छोड़ा नहीं जा सकता। उसकी
रक्षाका हमें जो शोभा दे ऐसा उपाय ढूंढ़ना बाकी है। इतना मैंने चर्चा करनेकी
खातिर ही लिखा है। उसमें उपयोग करने लायक जो हो उसका उपयोग कर लेना ।
चोरोंका पकड़ा न जा सकना बाबाकी समस्यासे ज्यादा कठिन है। उसके लिए हम
अपने आसपास के गांवों में जायें, यही उपाय हमारे पास है। ये बाह्य उपचार हैं और
आवश्यक हैं। अन्तमें और फिर शुरूमें यह प्रार्थना तो है ही " जब लग गज बल
१. भणसालीकी विधवा साठी जो आश्रम में अपने तीन बच्चोंके साथ रहती थी।
२. बाबाने आश्रम दूधका नुकसान करना शुरू कर दिया था।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र भगवानजी पण्डयाको
अपनो बरत्यो नेक सरो नहीं काम, निर्बल होय बल राम पुकारचो आये आधे नाम ।
यह महान सत्य है और श्रद्धाके प्रमाणमें फल मिलता है ।
९
जो उपद्रव होते हैं उनके बारेमें मुझे जानकारी तो देते ही रहा करो। उससे
मेरी आध्यात्मिक कसरत हो जाती है। ऐसे संयोगोंमें मन क्या कहता है और क्या
कराता है इसका विचार कर पाता हूँ ।
4
प्रभुदासके चरखे सम्बन्धी प्रयोगके परिणाम लिखते रहना ।
'अनासक्तियोग' का उर्दूमें अनुवाद करना हो तो कर लें ।
ब्रह्मचर्य सम्बन्धी निबन्ध कहीं ठीक ही रखा है।
कहाँ है, यह तो प्यारेलाल
अथवा कुसुम कह सकते हैं। जहाँ कागज जमा करके रखे हुए हैं, वहीं मिलेगा।
[ पुनश्चः ]
बापूके आशीर्वाद
आज ४७ पत्र हैं, तुम्हारी सूचीके अनुसार कनुका और शारजाका पत्र नहीं
देखता ।
रुई न भेजी हो तो अब लौटती डाकसे भेज देना। आज बहुत जल्दी है,
इसलिए कुछ एक बातें रह गई हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
चि० भगवानजी,
१५. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
७ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । तुम परिताप न करो। प्रयत्नशील हो इसलिए अन्ततः
सब कुछ ठीक ही होगा। हमारा शरीर हमारे काबूमें है इसलिए हमें उसपर अंकुश
अवश्य रखना चाहिए और मनको नियन्त्रित करना चाहिए । जो मनुष्य दिखावा
करनेके लिए शरीर पर काबू रखता है और मनसे विषय सेवन करता है वह दम्भी
है, मिथ्याचारी है। जो मनुष्य शरीर पर काबू रखता है और मनको रोकनेका सतत
प्रयत्न करता है वह प्रयत्नशील साधक है। और जिसका मन और शरीर पर पूर्णतः
अधिकार है वह भगवान है। हम सब मध्यम वर्गके प्रयत्नशील साधक हैं, अथवा हों
तो पर्याप्त है। मनको कभी मलिन न रहने दें। मनमें मलिन विचार आयें तो उन्हें
हर सूरत निकाल देना चाहिए। जिस तरह शरीर पर रोज मैल चढ़ती है और
उसे हम रोज निकालते हैं, ऐसा ही मनके विषयमें भी समझना चाहिए। शंकरभाईके
पिता अथवा उनके जैसे अन्य लोगोंको हम अपने साथ रखें, ऐसा करते हुए हम
अपने धर्मका पालन ही करते हैं। अहिंसाके मानी हैं कि हम अपने प्रति कृपण और
दूसरोंके प्रति उदार रहें। यही सहिष्णुताका लक्षण है। जो लोग नियमादिका पालन
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
नहीं करते ये दयाके पात्र हैं; द्वेषके पात्र कदापि नहीं। हमने चाय आदि छोड़ दी
है, नियमका पालन करते हैं सो इसलिए कि ऐसा करना हमें अच्छा लगता है। यदि
कुछ लोग इनका पालन नहीं करते तो उससे हम क्यों विचलित हों ? हम आशा तो
यह करते हैं कि हमारे विनम्र और दृढ़ व्यवहारको देखकर शंकरभाईके पिता जैसे
लोगोंका दिल पिघल जाये और वे अपनी बुरी आदतोंको छोड़ दें।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२० ) से । सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
१६. पत्र : आर० वी० मार्टिनको
यरवडा सेंट्रल जेल
८ जुलाई, १९३०
प्रिय मेजर मार्टिन,
मुलाकातोंके सम्बन्धमें अपने पत्रके ही सन्दर्भमें मैं यहाँ परीक्षार्थ एक सूची
अपने इस कथनका अर्थ स्पष्ट करनेके लिए संलग्न कर रहा हूँ कि मैं श्रीमती गांधी
तथा अपने परिवारके अन्य सदस्योंसे तभी मुलाकात कर सकता हूँ जब मैं उन्हीं
शर्तोंपर उन लोगोंके साथ भी मुलाकात कर सकूँ जो मेरे लिए अपने सगे सम्ब
न्धियोंकी तरह हैं। इस सूचीमें उल्लिखित व्यक्ति ऐसे ही लोग हैं।
सरकार द्वारा प्रस्तावित विकल्प मेरे लिए अस्वीकार्य है और उसकी सीधी-
सादी वजह यह है कि मैं नहीं चाहता कि मेरी पत्नी और मेरे बच्चे जब मुझसे
मुलाकात करना चाहें तब उन्हें हर बार अनुमति प्राप्त करनेके लिए सरकारको अर्जी
देनेकी जिल्लत उठानी पड़े। मैं यह मानता हूँ कि सरकारके लिए यह जरूरी नहीं
है कि वह किसीको मुझसे मुलाकात करने दे। लेकिन यदि वह मुझे किसीसे मुलाकात
करनेकी अनुमति दे, और उसमें शालीनताका अभाव हो, जैसाकि मेरी रायमें मुलाकातों
के बारेमें इस समय है, तो मुझे ऐसी अनुमतिका लाभ उठानेसे इनकार है।
मैं जानता हूँ कि सरकारके पास और तमाम काम है, और सरकारकी दृष्टिमें
इस अपेक्षतया छोटेसे सवाल पर उसका समय बर्बाद करते हुए मुझे दुख होता है। मैं
उसकी दुबारा चर्चा सिर्फ इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मेरी आपसे इस विषय में बात
हुई थी, और इसलिए भी कि मैं चाहूँगा कि इसका इधर या उधर कोई फैसला कर
दिया जाये ।
यदि यह सूची स्वीकार कर ली जाती है तो मैं और नई सूची देनेका अधि-
कार अपने पास रखूंगा। मेरे लिए इस समय उन सभी लोगोंके नाम याद कर पाना
१. देखिए खण्ड ४३, ४४५७-८ को पाद-टिप्पणी ३ ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र आर० वी० मार्टिनको
११
सम्भव नहीं है जिनका मुझसे घनिष्ट सम्बन्ध है लेकिन जिनकी कोई राजनीतिक ख्याति
नहीं है। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि मैंने ऐसे [ कई] नामोंको जानबूझकर छोड़
दिया है। इनमें से बहुतसे १६ वर्षसे कम आयुके लड़के और लड़कियां हैं। मैंने अपने
सम्बन्धियोंके नाम छोड़ दिये हैं क्योंकि उन्हें तो पहले ही से अनुमति है और उन
लोगोंको भी छोड़ दिया है जो मेरी जानमें पहलेसे ही जेलमें हैं।
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
पत्र में उल्लिखित परीक्षणात्मक सूची ।
दामोदरदास और उनकी पत्नी
मणिबाई गलिआारा और उनके बच्चे
[ संलग्न ]
बेलाबाई आसर
रमाबाई जोशी
लक्ष्मीदास आसर
लक्ष्मीबहन बार
मोतीबहन चोकसी
मणि आसर
लीलावती आसर
अमीना कुरेशी
मथुरादास पुरुषोत्तम
मोतीबाई मथुरादास
जानकीबाई
लक्ष्मीबाई खरे
बालकृष्ण
हरिहर शर्मा
बेगम तैयबजी
रेहाना तैयबजी
मोतीबाई रणछोड़लाल
रमाबहून रणछोड़लाल
सरला देवी अम्बालाल
निर्मलाबाई
अम्बालाल साराभाई और लड़कियाँ
लड़के
अनसूयाबाई साराभाई
शंकरलाल बैंकर
विनोवा
गोपालराव
कमलाबहन पटेल
कमला हरिदास
वसुमतीबहन
कुसुम देसाई
जेठालाल गांधी
मगनभाई पटेल
हमीदा तैयबजी
प्यार अली
नूरबानू
कपिलराय
अब्दुल्लाभाई
महावीर
गोमतीबाई मशरूवाला
मैत्री
नौरोजी बहनें
दुर्गा
सम्भाता
कृष्णमैया देवी
तहमीना सम्भाता
रामभाऊ
छगनलाल जोशी
सरोजिनी देवी
मीठूबाई पेटिट
गंगावन (बड़ी)
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२
गंगाबहन झवेरी
मणिलाल झवेरी
गुलाबवन मणिलाल
रतिलाल मेहता
चम्पावहून मेहता
नानीबहन झवेरी
नानीबहन बुधाभाई
भणसाली
मैथ्यू
कुमारप्पा
चन्द्रशंकर शुक्ल
मणिबहन परीख
मणिबहन पटेल
नन्दाबहन कानूगा
शारदावहन मेहता
डाहीबहन पटेल
डाहीबहन सोमाभाई
ईश्वरलाल
टापू
शिवाभाई पटेल
रावजीभाई पटेल
शारजाबन
प्रेमाबाई
शारदा कोटक
हरजीवन कोटक
पार्वती
ललिता
लीलाबहन
शान्ताबाई
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
कृष्णकुमारी
कस्तूरवहन
पृथुराज
लक्ष्मी दादाभाई
लालजी
विठ्ठल
जेठालाल भाटिया
बबलभाई
केवलराम
निर्मला केवलराम
गोडसे
सोमाभाई
हसमुखराय
गिरिराज
मन्नालाल
जगन्नाथ
शम्भु
दिलखुश दीवानजी
नन्दलाल शाह
पूँजाभाई
बुधाभाई
करसनदास चितालिया
सूरजबहन मणिलाल
गंगाबहन रामजी
मोतीबहन रामजी
चेलीबहन शाह
शान्ताबहन
जानकीबाई बजाज और बच्चे
कमलनयन
नाथजी
कुँवरजी पटेल
सत्यवती
कान्तावन
केशवराव देशपांडे
रमीबाई कामदार
लेडी विठ्ठलदास
कमलाबाई
विठ्ठलदास जेराजाणी
छोटेलाल
कीकीबहन लालवानी
गिरधर
पंडित सुखलाल
बेवरदास
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>वी० सुन्दरम
एम्मा हारकर
पद्मजा नायडू
कृष्णाबाई सन्तानम
लक्ष्मी राजगोपालाचारी
डाह्याभाई पटेल
नर्मदा डाह्याभाई
शान्तिकुमार नरोत्तमदास
नरसिंहप्रसाद
मामा फड़के
हरिभाई फाटक
पत्र : कपिलराय मेहताको
महालक्ष्मी
निर्मला पण्ड्या
दुर्गाबहन देसाई
निर्मला देसाई
बलभद्र
दूदाभाई मोटजी
आनन्दी
इंदु पारेख
कान्तिलाल पारेख
अमृतलाल नानावटी
सामलभाई
चिमनलाल
रामचन्द्रन
जूठाभाई
पूँजाभाई जूनियर
मंगला
पुष्पा
१३
गुलाब बजाज
काकू
बापूभाई झेलत
मो० क० गांधी
अंग्रेजी (जी० एन० ३८५०) की फोटो नकलसे एस० एन० १९९७५ से भी ।
१७. पत्र : कपिलराय मेहताको
यरवडा मन्दिर
८ जुलाई, १९३०
चि० कपिलराय,
यह बीमारी फिर कहाँसे आ टपकी ? जल्दी ही चंगे हो जाना प्रत्येक विद्यार्थीका
कर्तव्य है। बीमार पड़ना गुनाह है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १९५९५ ) से सौजन्य: कपिलराय मेहता; जी० एन०
३९७३ की फोटो नकल से भी।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि प्रभावती,
१८. पत्र : प्रभावतीको
तेरी ओरसे कोई पत्र नहीं है; यह क्यों ? तू कैसी है ?
गुजराती (जी० एन० ३३८९) की फोटो नकलसे ।
१९. पत्र : ईश्वरलाल जोशीको
यरवडा मन्दिर
८ जुलाई, १९३०
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
८ जुलाई, १९३०
चि० ईश्वरलाल,
तेरी गाड़ी कैसी चल रही है ? तूने कितनी प्रगति की है ? तेरी अंग्रेजीकी
पढ़ाई चल रही है न ? क्या तेरी प्रगतिसे लक्ष्मीदासभाई सन्तुष्ट हैं ?
क्या इन्दु वहाँ है? वह क्या कर रही है? उससे पत्र लिखनेको कहना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ९३११) से सौजन्य : ईश्वरलाल जोशी
चि० गंगाबहन,
२०. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
८ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। काकू कैसा है ? रमीबाई क्या कर रही है ?
[गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७५२ से भी सौजन्य :
गंगाबहन वैद्य
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० शारदा (बबु )
२१. पत्र: शारदा सी० शाहको
यरबडा मन्दिर
मौनवार, ९ जुलाई, १९३०
यदि हम मन्दिरमें रहते हुए आनन्दपूर्वक हों तो इसमें कौन सी विचित्र बात है ?
किन्तु तुझे दमेका दौरा क्यों पड़ता है ? जो बच्चे या बड़े बीमार पड़ते हैं क्या वे
अपनी ही गलतीसे बीमार नहीं पड़ते ? यदि यह बात सच हो तो तुझे अपनी गलती
ढूंढ निकालनी चाहिए और उसे दुहराना नहीं चाहिए। अच्छी हो जानेके बाद यदि
तू भलीभाँति प्राणायाम, सूर्यस्नान, मालिश आदि और खान-पानके नियमों का पालन
करेगी तो दमा फिर दिखाई नहीं देगा।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९८८५ ) से । सौजन्य: शारदाबहन जी० चोखावाला
२२. पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको
यरवडा सेंट्रल जेल
११ जुलाई, १९३०
प्रिय मित्र,
आपके पत्रके लिए धन्यवाद । जेलकी कोठरी में बैठकर किसी बहसमें पड़ना मेरे
लिए उचित नहीं होगा। लेकिन आप विश्वास रखें कि मैं सहयोग करनेका एक भी
सच्चा मौका हाथसे नहीं जाने दूंगा। लेकिन मैं स्वीकार करता हूँ कि आज सत्तारूढ़
व्यक्तियोंके कितने ही कार्योंके पीछे में धोखाधड़ी, झूठ और पाशविक बलका जो जाल
फैला देखता हूँ उसके बीच सहयोगकी कोई सम्भावना मुझे दिखाई नहीं पड़ती ।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे सीक्रेट एक्सट्रैक्ट्स, ७५० (३४), पृष्ठ ११७
१. चिमनलाल और शकरी बहनकी पुत्री ।
२. ब्रिटिश संसद सदस्य ।
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० काशिनाथ,
२३. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
यरबडा मन्दिर
११ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । तुमने उसमें अपना हृदय उंडेलकर अच्छा किया। तुमने
जिस दोषका वर्णन किया उससे मैंने बहुत ही कम लोगोंको मुक्त देखा है। जिस
वातावरणमें हम रहते हैं, वह इतना हलका है कि उसके प्रभावसे अधिकांश नवयुवक
बच ही नहीं सकते । किन्तु अब भूतकालके बारेमें पश्चात्ताप न करके उचित रूपसे
वर्तमान पर ध्यान दो और ऐसा प्रयत्न करते हुए उसमें जरा-सी भी कमी न आने
दो ।
कलावतीको डाक्टरको अवश्य दिखाओ। चाहे तो यह महिला डाक्टर उसकी
जाँच करे। इसके लिए मेरी चिट्ठीकी जरूरत नहीं है। यहांसे ऐसी चिट्ठी भेजना
उचित भी नहीं है। यदि उसकी जरूरत जान ही पड़े तो नारणदासकी चिट्ठी ले
लेना ही काफी होगा। वह भली स्त्री है।
'गीताजी' के बारेमें तुमने जो लिखा है उसे मैं समझता हूँ। मैं कलकत्तेवाला
अनुवाद पढ़नेका प्रयत्न करूँगा। महावीरप्रसाद के लिए लिखा पत्र तो आज इसके
साथ भेज ही रहा हूँ। उसे देख लेना। उसे तुमने विनोवाको दिखाकर ठीक किया ।
गुजराती (जी० एन० ५२४७ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
चि० कलावती,
२४. पत्र : कलावती त्रिवेदीको
११ जुलाई, १९३०
तुमारा खत मिला ।
इच्छा एक हि रखनी
1
-
-सेवाकी । सेवाकार्य बहार मिले तो या आश्रम में
दोनों एक समजो चीज अपनी इच्छानुसार होनेसे हि आनंद मिले उसे सेवा नहि
कह सकते हैं। इसका अर्थ सेवा नहिं परंतु स्वेच्छाचार हुआ। हममें यह कभी न
हो। तुमारे दर्दकी बात काशीनाथने लिखी है। तुमारे कटीस्नानकी आवश्यकता है।
चित्त शुद्धिकी तो है हि मन निर्विकर रखनेकी चेष्टा करो।
जी० एन० ५२४६ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>119 AUG 1972
C
GAN
चि० कमलनयन,
२५. पत्र : कमलनयन बजाजको
10186
परवडा मन्दिर
१२ जुलाई, १९३०
तेरा पत्र मिला। फिलहाल तेरा कर्तव्य शरीरको बलिष्ठ बनाना है तेरी
खुराक ठीक है। कसरत बराबर करते रहना । यथाशक्ति खादीका कार्य करते रहना ।
मुझे पत्र लिखते रहना। कमला कैसी है? मदालसा क्या करती है ? जानकी बहनसे
पत्र लिखनेको कहना। पिताजीकी खुराक क्या है ? तू रोज कितना कातता है ?
क्या तुझे कुछ पढ़नेका समय मिलता है ?
[ पुनश्च : ]
काकासाहब आशीर्वाद भेजते हैं।
गुजराती (जी० एन० ३०४३) की फोटो नकलसे ।
चि० वसुमती,
२६. पत्र : वसुमती पण्डितको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१३ जुलाई, १९३०
तेरा पत्र मिला। कार्यका अर्थ क्या है ? क्या कातना, पींजना ये कार्य नहीं
हैं? शुद्ध हृदयसे किये गये सभी कार्योंका मूल्य एक जैसा ही होता है। हमें जो
काम दिया गया है उससे प्राप्त होनेवाला सन्तोष ही सच्ची सिपहगरी या भक्ति
या साधना है। हमें जो सेवा करनेका अवसर मिला है उसमें तन्मय हो जाना ही
सच्ची समाधि है । यह ठीक है कि इस स्थिति तक पहुँचने में समय लगता है । अतः
हम तो प्रयत्न करते ही रहें; उसका परिणाम ईश्वरके हाथमें है। हम दोनोंकी
तबीयत अच्छी है। इस सम्बन्धमें और अधिक समाचार तो मैं आश्रमके सामान्य
पत्र में दूंगा।
गुजराती (एस० एन० ९२८३ ) की फोटो नकलसे।
२. पद पक्ति हिन्दी में है।
४४-२
Gandh
મી
बापूके आशीर्वाद
10186
AUG 18
REFERENCE BOOK
NOT TO BE 100000
12 DEC 1982
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>BOOK.
चि० प्रेमा,
२७. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरबडा मन्दिर
१३ जुलाई, १९३०
तेरा पत्र मिला। निर्मलाके पत्र में उसकी हिन्दीकी सुन्दर झलक दिखाई देती
है, तेरे पत्र में मराठीकी, जैसेकि 'बेत रहित कर्यो।" भाषामें होनेवाली ऐसी वृद्धि
मुझे अच्छी लगती है। कुछ अरसे बाद तो मैं मराठी अच्छी तरह समझ लेनेकी
आशा रखता हूँ। मैं रोज इसका अभ्यास करता हूँ ।
मैंने अंग्रेजी पत्र प्राप्त करनेकी उम्मीद अब छोड़ दी है।
कृष्णन नायरके बारेमें मुझे मालूम है ।
तेरे गुजराती अक्षर उत्तरोत्तर सुधर रहे हैं।
संवेदनशीलता कई बार कष्टप्रद सिद्ध होती है। लेकिन उसके बिना मनुष्य
पशुतुल्य है। उसे सही दिशा में ले जाना हमारा परम कर्तव्य है ।
कच्चे करेले खाकर तो देखने ही चाहिए।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६७३ ) से । सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२२५की फोटो नकलसे भी।
२८. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
परवडा मन्दिर
१३ जुलाई, १९३०
चि० मथुरादास,
तुम्हारे पत्र मिले। पिजाई सुधारने सम्बन्धी नियम तुमने मुझे लिख भेजे सो
अच्छा किया। 'नवजीवन' तो अब यहाँ कहाँ मिलनेवाला है? सप्तपदी की प्रतिज्ञाकी
प्रति मेरे पास नहीं है। यदि तुम उसकी नकल भेज दो तो मैं काकाके साथ बैठकर
उसे सुधारनेका प्रयत्न करूँगा ।
जहाँ तक अहिंसा सम्बन्धी प्रत्थका प्रश्न है, उसपर तो मैं फिलहाल आचरण
कर रहा हूँ। यदि मैं उसे अपने जीवनमें उतार सकूँ तो ग्रन्थका सच्चा अभ्यास तो
२. अर्थ है 'इरादा मुल्तवी रखा।
२. देखिए खण्ड ३०, पृष्ठ ९२-३ ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: दुर्गा गिरिको
१९
वही होगा । लिखा हुआ ग्रन्थ एक दिन जीर्ण हो जायेगा। किन्तु अपने जीवनमें उतारा
हुआ गुण सदा बढ़ता रहेगा। और फिर मैंने जब-तब इस सम्बन्धमें क्या कुछ कम
लिखा है ? अब और नया क्या लिखूं ? और कुछ सूझता भी तो नहीं है। फिर भी
जैसाकि तुम चाहते हो, कुछ अन्य लोग भी वही चाहते हैं। अतः यदि किसी दिन
अन्तप्रेरणा हुई तो शायद मैं भविष्य में कुछ लिखूं। मेघजीकी मृत्युका दुःख करना छोड़
देना । हमारे पास तो असंख्य मेघजी हैं।
गुजराती (जी० एन० ३७३९ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
२९. पत्र : दुर्गा गिरिको '
यरवडा मन्दिर
१३ जुलाई, १९३०
वि० दुर्गा,
तेरा पत्र अच्छा है । अक्षर भी अच्छे हैं। सिलाईमें तुम सब मेरी परीक्षा
लोगी या मुझे परीक्षा दोगी ? तुम सब तो वहाँ ब्योंतना भी सीखती हो। यहाँ यह
सब मुझे कौन सिखाये ? लेकिन देखूंगा। मेरी लाठियाँ (मुझसे) चढ़ती हैं या मैं ?
मैंने तेरे अक्षरोंकी तारीफ इस आशासे की है कि तू उन्हें और अच्छा बनायेगी ।
राधावनके अक्षरोंका नमूना तो तुम सब लड़कियोंके सामने है ही । लिखे हुए पत्रको
दुबारा पढ़ जानेसे बेध्यानमें रही भूल सुधारी जा सकती है। *
बापूकी विराट् वत्सलता
बापूके आशीर्वाद
१. दलबहादुर गिरिकी कन्या जो अपने भाइयों बहनों तथा विधवा माँ के साथ आश्रममें रह रही थी।
२. लड़कियों, जिनके कन्मोंका गांधीजी चलते समय सहारा लेते थे।
३. मूल पत्र गुजरातीमें था।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दुबारा नहीं पढ़ा
चि० मीरा,
३०. पत्र : मीराबहनको
१४ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। आश्रमकी डाक मुझे अब नियमित रूपसे मिलने की सम्भा
वना है।
अगर शरीर पर तुरन्त अच्छा प्रभाव पड़े तो मुझे तुम्हारे ठंडे जलसे स्नान
करनेमें कोई आपत्ति नहीं है। ठिठुरन नहीं लगनी चाहिए। भारतीय पद्धतिके अनुसार
ठंडे जलसे स्नानका पूरा लाभ तभी होता है जब जल डालते समय शरीरको जोर-
जोरसे रगड़ा जाये और स्नानके बाद शरीरको सूखे तौलिएसे तबतक खूब रगड़ना
चाहिए जबतक सभी अंग बिलकुल सूख न जायें। लेकिन कृपया बिना उबला पानी
मत इस्तेमाल करना । मेरी बात भिन्न है। मुझे वही पानी मिलता है जो छानकर एक
अलग मिट्टी के बर्तनमें रखा जाता है। सारे जेलमें छने हुए जलकी व्यवस्था है।
मेरा कब्ज लगभग दूर हो गया है। इसकी वजह यह है कि मैंने सुबह दहीकी
जगह फिर दूध लेना शुरू कर दिया है। यदि मुझे लगा कि दूधको गर्म करना या
गर्म पानी लेना जरूरी है तो में गर्म दूध या दोनों ही चीजें लेनेमें हिचकूंगा नहीं ।
लेकिन मैं आशा करता हूँ कि इसकी जरूरत नहीं होगी। मेरे लिए ताजा फल जरूरी
नहीं मालूम पड़ता। मेरा वजन घट नहीं रहा है। पिछले सप्ताह यह १०३ और
१०४ पौंडके बीच था। मैं इतने वजनको बुरा नहीं समझता। इस तरह तुम देखोगी
कि मेरे लिए चिन्ता करनेका कोई कारण नहीं है।
तुमने 'गीता' का अनुवाद करनेको कहा है। मैं करना भी चाहूँगा । लेकिन इस
समय मुझे जो थोड़ा-बहुत समय मिलता है वह 'भजनावलि के अनुवादमें लगता
है। इसे भी मैं तुम्हारे लिए ही कर रहा हूँ। मेरी रफ्तार बहुत धीमी है। इसलिए
मैं नहीं जानता कि यह कब तक खत्म होगा। 'गीता' का अनुवाद बड़ा काम है।
तुम मानोगी कि मुझे उसके लिए कातना स्थगित नहीं करना चाहिए। कारण, यदि
कहा जा सके तो सूत कातना 'गीता' का व्यावहारिक अनुवाद है। यदि मुझे यह
शान्ति काफी लम्बे अरसे तक मिल सकी तो में अनुवादका काम अवश्य उठाऊँगा ।
जिस प्रकारकी पूजाका तुमने जिक्र किया है वैसी पूजा हम आश्रममें नहीं कर
सकते। निःसन्देह मगन कुटीरके निकट यह छोटी-सी समाधि है। लेकिन चन्द लोगोंको
छोड़कर उसकी ओर कोई देखता तक नहीं उस प्रकारकी पूजामें आश्रमवासियोंकी
कोई जीवन्त आस्था नहीं है। अदृश्यकी पूजाके लिए बुद्धि तैयार है लेकिन हृदय
१. देखिए परिशिष्ट ६ ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र कुसुम देसाईको
२१
नहीं। तथापि हमें उस दिशामें धीरे-धीरे बढ़ना है। जैसाकि १२वें अध्यायमें बताया
गया है, इस मार्ग पर चलना कठिन जरूर है लेकिन असम्भव नहीं । आ जरूर
जायेगा। हर व्यक्ति अनजाने आश्रम प्रार्थनाका मूल्य समझ रहा है। बहुतोंके लिए
तो यह सान्त्वनाका एकमात्र स्रोत है। इस प्रार्थनामें शामिल होनेवाले लोग इसका
उपहास नहीं उड़ाते । वे जानबूझकर श्रद्धाहीन भी नहीं हैं। आत्मा तो चाहती है,
शरीर ही दुर्बल है वे सभी लोग प्रयत्नशील है। और ईमानदारीसे प्रयत्न करने-
वालेको कभी विफल होते नहीं सुना गया। तुम्हें याद रखना चाहिए कि हमारा
प्रयत्न कुछ नये ढंगका है। हमारे पास प्रार्थना के लिए कोई भव्य इमारत नहीं
है। हमारे पास केवल खुला मैदान है। लेकिन यह ठीक चीज है, विशेष रूपसे इस-
लिए कि हम करोड़ों क्षुधा पीड़ित लोगोंका प्रतिनिधित्व करते हैं। हमारे लिए आकाश
ही सर्वथा सन्तोषप्रद छत और चार दिशाएँ निस्सीम दीवारें हैं। लेकिन युगोंसे न
भी कहें तो पीढ़ियोंसे चली आ रही आदतोंसे मुक्त होनेमें हमें समय लगेगा। इसके
साथ ही यदि हमें जाति, वर्ग और बँधे हुए विश्वासोंके बन्धनोंको तोड़ना है तो हमारे
लिए एक बिलकुल वैसे ही खुले हुए प्रार्थना-गुहकी आवश्यकता है, जैसा कि हमारे
पास है। क्या मेरी बात स्पष्ट हो गई ?
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०१ ) से सौजन्य : मीराबह्न जी० एन० ९६३५
से भी।
चि० कुसुम (बड़ी),
३१. पत्र : कुसुम देसाईको
यरवडा मन्दिर
१४ जुलाई, १९३०
तेरा पत्र बहुत दिनों बाद मिला तू ठीक स्थान पर पहुँच गई है। अन्तमें
तो तुझे आश्रम पहुंचना ही है। अपना शरीर न बिगाड़ना। मुझे लिखती रहना ।
पीजन, चरखा और तकली पर पूरा काबू पाये बिना सिलाई पर न जाना। यह
आसान है । अनिवार्य भी नहीं जब तू कातनेकी क्रियामें सम्पूर्णता प्राप्त कर लेगी
तो मैं बहुत सन्तोष मानूंगा । पुराणी अभी बाहर है।
गुजराती (जी० एन० १८००) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मणि (पटेल),
३२. पत्र : मणिबहन पटेलको
परवडा मन्दिर
१४ जुलाई, १९३०
वाह! असली बापू' आ गये, तो नकली बापूको भूल गई क्या ? और अब
तो व्याख्यान देनेवाली हो गई, फिर क्या पूछना ? तेरा शारीरिक या मानसिक
स्वास्थ्य कैसा है ? मेरे पत्र तो मिल गये न ?
डाह्याभाई कैसे हैं ? यशोदाका अब क्या हाल है ? बिलकुल अच्छी हो गई
क्या ?
चि० मणिवन पटेल
डा० कानूगाका बंगला
बापूके आशीर्वाद
एलिस ब्रिज
अहमदाबाद
[ गुजरातीसे ]
बापुना पत्रो ४: मणिबहेन पटेलने
-
३३. पत्र : हरिप्रसादको
परवडा मन्दिर
१४ जुलाई, १९३०
चि० हरिप्रसाद,
तुम वापिस आ गये अच्छा हुआ। अब मुझे दिनचर्या बता दो और मानसिक
स्थिति भी लिखो ।
जी० एन० २५४९ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
१. वल्लभभाई पटेल, जो २६ जून, १९३० को जेसे छूटे थे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४. पत्र : नारणदास गांधीको
यरबडा मन्दिर
१३/१५ जुलाई, १९३०
चि० नारणदास,
इस वार सभी पत्र आते ही दे दिये गये थे; और आगेसे भी इसी तरह
मिलते रहनेकी सम्भावना है।
पिछली बार मैंने ४७ पत्र लिखकर
पर तुम्हारे पत्र में फेरफार नहीं कर सका।
अन्तिम घड़ीमें दो और लिख दिये थे,
क्योंकि मुख्य अधिकारी आ गया था,
इसलिए वे दोनों कागज यों ही खोंसकर लिफाफा उसे दे दिया ।
मेरी गति ४०० तार या गज भी नहीं हुई। होना सम्भव भी नहीं है। शरीरमें
इतनी ताकत नहीं, ऐसा मानता हूँ। मैं पहले पूरे दिनमें १६० तारके लगभग कातता
था। अब लगभग ३७५ तार कातता हूँ। पर ऐसा करनेके लिए औसतन कमसे कम
चार घंटे लग जाते हैं। जिस दिन सब कुछ ठीक चले उस दिन भी तीन घंटेसे
कम नहीं लगते। औसतन रोजके ४०० तार होते होंगे। गति १६० फी घंटा थी;
उसके बदले २०० तार तक चली गई है। किन्तु वह भी ऐसे दिन जब शरीरमें
काफी स्फूर्ति हो और माल आदि ठीकसे व्यवस्थित हों। पत्रमें इतना सुधार कर
देना । तकलीका काम अभी ढीला पड़ने दिया है। चरखेको चलाते ही शरीर अच्छा
खासा थक जाता है। चार घंटे लगातार बैठनेकी शक्ति तो बीमारीके बाद खो बैठा
हूँ, इसलिए यहाँ यह आदत डालना मुश्किल तो है ही। किन्तु अभी यही मेरी साधना
है इसलिए उसपर अड़ा हुआ हूँ । शरीरका ध्यान रखनेका प्रयत्न तो करता ही हूँ ।
वजन टिका हुआ है इसलिए कोई हानि नहीं दिखाई देती । बराबर सो लेता हूँ ।
तकलीको थोड़ा-सा समय तो देता ही हूँ। हाथसे अभी बिल्कुल बढ़िया तकली नहीं
बना सकता और ज्यादा समय न मिलनेके कारण उसका अभ्यास नहीं कर पाता ।
जितना ज्यादा सूत कात सकूं उतना अच्छा है, यह सोचकर इसी कामको प्रमुखता
दी है। सिलाईका काम तो ठीक चल रहा है। मशीन पर हाथ अच्छा बैठ गया
है। अभी उसका हिसाब-किताब तो मालूम नहीं हुआ। यहाँ कोई बतानेवाला भी
नहीं है। इस बारेमें ज्यादा बात मीराबहनको लिखे पत्र में देखोगे ।
काकासाहब का स्वास्थ्य अच्छा है। यहाँ आनेके बाद दो रतल वजन बढ़ा है।
रोज लगभग अढ़ाई घंटे चलते हैं । कामके सम्बन्धमें जितना चलना पड़े सो अलग।
खानेके लिए सारा दूध दहीके रूपमें ही लेते हैं। इससे वह सभी पच जाता है।
रोटीको सेंक लेते हैं। सामान्य तौर पर सब्जी बदल-बदल कर मिलती है। मूली,
१. यह पत्र कई दिनोंमें लिखा गया था। यहाँ इसे समाप्तिकी तिथिके अनुसार दिया गया है।
नारणदास गांधी और मीराबहनको लिखे ऐसे पत्रोंको आगे भी अन्तिम तिथिके अनुसार ही रखा गया है।
Gandhi
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
बैंगन कभी-कभी तुरई या गवारफली मिलती है। मूलीको उबालते नहीं है । १०
तोला मक्खन पच जाता है। अभी तो तकलीसे ही कातते हैं। हाल ही में सूरतसे
गाण्डीव चरखा आया है। उसपर आजसे कालना शुरू किया है। [ काका ] मुझे मराठी
सिखानेका काम तो कर ही रहे हैं। मेरे लिए फल भिगोने या धोनेका काम और
शामके बर्तन धोनेका काम भी वही करते हैं। उनसे दूसरी छोटी-छोटी सेवाएँ तो कई
लिया ही करता हूँ ।
हम दोनों में से किसीके बारेमें भी चिन्ता करनेका कोई कारण नहीं है।
भरवाड़ लोगोंका बन्दोबस्त हो गया सो ठीक हुआ।
आज तक वहाँसे रुई नहीं मिली। यह शनिवार की रातको लिख रहा हूँ । यदि यह
पत्र पहुँचने तक न भेजी हो तो फौरन डाकसे भेज देना। इस पत्रके जवाब में वापसी
डाकसे भी मिल जाये तो मानता हूँ कि कोई हानि नहीं होगी। मुझे उम्मीद तो है ही
कि मैने १५ तारीखको अन्तिम दिन बताया है इसलिए मंगलवार तक तो आ जायेगी ।
दिन बीतते जा रहे हैं इसलिए मुझमें धैर्य थोड़ा कम तो जरूर हो गया है।
शारजाका पत्र नहीं मिला। इस बार कनुका पत्र मिल गया है।
पूँजाभाईको सबर देना। वे कैसे रहते हैं ? कहाँ रहते हैं ? समय कैसे बिताते हैं ?
१४ जुलाई, १९३०
किसी लड़केके पत्र में प्रश्न है कि मैं कागजके टुकड़े क्यों इस्तेमाल करता हूँ ?
जवाब है, पहले तो कैदीको सभी चीजें कमसे कम इस्तेमाल करनी चाहिए इस
कारणसे तथा दूसरा जो अपरिग्रहके व्रतका पालन करता है वह सारी ही सम्पत्ति
का ट्रस्टी - रक्षक है। इसलिए मुझे तो यहाँकी सम्पत्ति भी कंजूसकी तरह इस्तेमाल
करनी चाहिए। तीसरे यह सम्पत्ति भी तो अपनी ही है न? किसके पैसेसे ली है ?
चौथा, इस गरीब देशमें ऐसी चीजोंको जितना कम इस्तेमाल किया जाये उतना अच्छा
है। पाँचवाँ ऐसे समय किसी भी चीजका ज्यादा उपयोग करनेसे जी दुखता है।
आज खबर मिली है कि दफ्तर में रेलकी रसीद आई है; इसलिए सम्भव है
रुई आ गई हो । अन्तमें [हर ] पत्र पर संख्या न लिख सकूं तो भी तुम अन्तिम
अंक तो देख ही लोगे न ?
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
अभी मंगलवार सुबहके ५-३० बजे हैं। पत्रोंको बन्द कर रहा हूँ। सब मिला
कर ५२ हैं। किसीको लिखना भूल गया होऊँ और उसे आशा हो तो उसका नाम
लिखना । बड़े कुटुम्बवाला किसे लिखे, किसे न लिखे। सुब्वैया कहाँ है।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइकोफिल्मसे ।
२. १५ जुलाई।
बापू
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५. पत्र : प्रभावतीको
चि० प्रभावती,
परवडा मन्दिर
१५ जुलाई, १९३०
आश्रमसे दो डाकें मिली हैं, उनमें तेरा पत्र नहीं है। तू तो नियमपूर्वक लिखने-
वाली है इसलिए पत्रके न आनेसे चिन्ता होती है। पिताजीकी तबीयत कैसी रहती
है ? जयप्रकाश क्या करता है? मैं अच्छी तरहसे हूँ ।
गुजराती (जी० एन० ३३९०) की फोटो नकलसे।
३६. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१५ जुलाई, १९३०
चिo व्रजकिसन,
आश्रमके मार्फत खत
तुमारी मानसिक और शारीरिक स्थितिका वर्णन दो।
लखा जा सकता है ? देवदासको मिलनेका होता है ? कृष्ण नायर कहाँ है ?
3
जी० एन० २३८२ की फोटो नकलसे।
बापुके आशीर्वाद
३७. पत्र: एच० एस० एल० पोलकको
यरवडा सेन्ट्रल जेल
१६ जुलाई, १९३०
प्रिय हेनरी,
तुम्हारा तार मुझे कल दिया गया था।
कैदीकी हैसियत से मैं जितने विस्तारसे लिखना चाहता हूँ, उतने विस्तारसे नहीं
लिख सकता। इसलिए मैं इतना ही कह सकता हूँ कि यदि तुम्हें भी परिस्थितियोंका
उतना ज्ञान होता जितना मुझे है तो तुम मुझसे गोलमेज सम्मेलन में जानेका आग्रह
१. देवदास गांधीको अप्रैल शुरू सविनय भवा करते हुए दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया था
और उन्हें सजा हो गई थी।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
न करते। मेरा यहाँ जाना बिलकुल व्यर्थ होगा। मुझे वाइसरायके वक्तव्यमें कोई
आशाजनक चीज नहीं दिखाई पड़ती। तथ्य यह है कि स्वराज्य तो हमें खुद लेना
है। वह दानके रूपमें नहीं आ सकता ।
मिली, सेलिक, लिऑन और जिनको हम जानते थे उन सबको मेरा प्यार
कहना। मॉट आजकल कहाँ है ? एण्ड्रयूजको मेरा प्यार कहना और कहना कि जेल
पहुँचने के तुरन्त बाद ही मुझे उसका तार मिला था।
[ अंग्रेजीसे ]
तुम्हारा,
भाई
महात्मा गांधी: सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,
खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ १८२
३८. पत्र : गोविन्द पटेलको
परवडा मन्दिर
१७ जुलाई, १९३०
चि० गोविन्द,
सुन्दर अक्षरोंमें लिखा तेरा पत्र पाकर मुझे प्रसन्नता हुई। अब भविष्यमें मुझे
पत्र लिखते रहना। मैं तो तेरी याद भूल ही गया था। बड़े कुटुम्बवालोंका शायद
यही हाल होता होगा ! जो मेरी नजरके सामनेसे हटा कि में उसे भूला ।
स्वास्थ्य में सुधार हुआ है, यह जानकर मुझे बहुत सन्तोष हुआ है तू अपना
काम जतनसे करता है, इस बारे में मेरे मनमें तनिक भी शंका नहीं है। ईश्वर तुझे
दीर्घायु करे और सच्चा सेवक बनाये ।
गुजराती (जी० एन० ३९४४ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मीरा,
३९. पत्र : मीराबहनको
[१८ जुलाई, १९३० ]
इस सुखसे अपने-आपको वंचित करते मुझे तकलीफ होती है, लेकिन इस सम्बन्ध
यदि मुझे उसका सुसंगत रूपसे पालन करना
कृपया चरखा आदि छोड़ जाओ, और मैं जो
तरह करनेकी कोशिश करूँगा । ऐसे ही अवसरों पर
ईश्वर तुम्हारे साथ रहे।
में मैंने जो स्थिति अख्तियार की है
है तो मुझे ऐसा करना ही चाहिए।
करना है उसे भरसक अच्छी
हम अपनी कसौटी करते हैं।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०२ ) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६३६
से भी ।
४०. पत्र : रावजीभाई पटेलको
परवडा मन्दिर
१८ जुलाई, १९३०
चि० रावजीभाई,
तुम्हारा पत्र मिला। जेल जानेकी तैयारी करना हमारा कर्तव्य है। जेल जानेकी
इच्छा करना मोह है। एक ही कामकी इच्छा की जा सकती है और वह है सेवा ।
जिस स्थिति में सेवा बन सकती हो, हमारे लिए यही स्थिति इष्ट है।
गुजराती (जी० एन० ८९८८) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
१. २४-७-१९३० के यंग इंडियाने प्रकाशित मीराबहनको एक टिप्पणीके अनुसार वह शुक्रवारको
चरखा लेकर गांधीजी से मिलने गई थीं। उस दिन तारीख १८ जुलाई थी। देखिए "पत्र मीराबहनको",
२०-७-१९३० भी।
२. यापूज लेटर्स टु मोरा, १४ १०१ में इस पत्रके साथ मीराबहनकी निम्नलिखित टिप्पणी भी
दी हुई है "मैंने बिहारके नमूनेपर एक चरखा तैयार किया था और उसे लेकर परवडा जेल गई थी
क्योंकि मैं जानती थी कि यदि मैं उसे जोड़नेका तरीका खुद समझाऊँगी नहीं तो बापूके लिए वैसा करना
मुलि होगा। लेकिन ऐसा सम्भव नहीं हुआ और बापूने मुझे सुपरिटेंडेंटके कमरे में यह पत्र भेजा। "
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० नारणदास,
४१. पत्र : नारणदास गांधीको
थरवडा मन्दिर
१८ जुलाई, १९३०
इस सप्ताहके प्रेमपत्रोंका पुलिंदा कल शामको मिला। और पत्रोंका जवाब तो
मौनवारको ही लिखूंगा। यह तो इसलिए लिख रहा हूँ कि पत्रोंको या तो कपड़े
लिफाफे में डाला करो या उसके चारों ओर मजबूत डोरी बाँधो
गिरनेकी हालत में थे। रुई १६ तारीखको मिली ।
चि० नारणदास गांधी
सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
बी० बी० [ ऐंड ] सी० आई० रेलवे
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्म से ।
४२. पत्र : प्रभावतीको
सब पत्र निकल कर
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१८ जुलाई, १९३०
चि० प्रभावती,
अनेक सप्ताह बाद मुझे तेरा पत्र मिला, निश्चिन्त हुआ ।
मेरी तबीयत अच्छी है। वजन १०३-४ तक रहता है।
मुनक्का, खजूर और खट्टा नीबू है मेरी चिन्ता न करना।
कातता हूँ। सीना भी सीख लिया है। काकासाहब साथ हैं।
तू जो लिखना चाहे सो लिखना ।
पिताजी गाँव-गाँव जाते हैं क्या ?
जयप्रकाशको आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ३३६५ ) की फोटो नकलसे।
भोजनमें दूध, दही,
मैं रोज ३७५ तार
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० शिवाभाई,
४३. पत्र : शिवाभाईको
यरवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। भगवानका यह निरपवाद वचन है कि जो जिसे भजता
है वह उसे प्राप्त होता है। हम निर्विकार और पूर्ण त्यागमय सेवाभाव पाने की कामना
करते हैं। इसलिए यदि यह भावना हमारे मनमें जाग्रत नहीं होती तो भगवानका वचन
मिथ्या हो जाता है; या फिर हमारी भावना ही सच्ची नहीं होगी। अतः हम तो
श्रद्धापूर्वक अपनी साधनामें तन्मय रहें।
गुजराती (एस० एन० ९४९९ ) की फोटो नकलसे ।
चि० दूधीबहन,
४४. पत्र : दूधीबहन देसाईको
बापूके आशीर्वाद
१९ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। अब तुम आश्रम पहुँच गई होगी। क्या तुम वालजीसे
मिलती हो ? उनकी तबीयत कैसी रहती है? अब जब मिलो तो उनसे कहना कि
मुझे उनकी बहुत याद आती है। अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखना ।
हरिइच्छा तथा अन्य लोग क्या कर रहे हैं ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४०४ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : वा० गो० देसाई
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० अमीना,
४५. पत्र : अमीना कुरेशीको
यरबडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०
तेरा पत्र मिला। अब्बा और कुरेशी जेलमें हैं तू भी वहां जाना चाहती है;
किन्तु तू आश्रममें है, अतः यही समझ कि तू भी इस लड़ाईमें शामिल है। खुदा हमें
जहाँ और जिस हालत में रखे हम उसीमें सन्तोष मानें, इसमें बहुत कुछ आ जाता है।
तुझे उर्दूकी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़नी चाहिए। गिरिराजजी तुझे सिखा सकेंगे। अन्वा
या कुरेशी, जिनसे भी तू मिले उनसे कहना कि मैं किसीको भूल नहीं सकता।
गुजराती (जी० एन० ६६५७ ) की फोटो नकलसे ।
चि० गंगाबहन (बड़ी),
४६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
बापूकी दुआ
परवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला काकूको ठीक अनुभव हो रहा है। रमीबाईको पत्र लिखना
और मुझे लिखनेको भी कहना। उसे और कामदार' को अक्सर याद करता हूँ।
शंकरलालसे तुमने ठीक ही कहा। अन्त्यज आयें तो हम उन्हें अवश्य लें।
फल लेनेमें कंजूसी करके स्वास्थ्य न बिगाड़ लेना ।
काकासाहब की खुराक तो तुमने देखी होगी। उसमें किसी तरहके फेरफारका
सुझाव देना हो तो लिखना उनका स्वास्थ्य तो अच्छा ही रहता है।
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७५३ से भी सौजन्य :
गंगाबहन वैद्य
१. रमीबाई पति ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/६९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रेमा,
४७. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०
तेरा विनोदपूर्ण और समाचारोंसे भरा हुआ पत्र मिला। ऐसे ही लिखती रहना ।
मुझे उम्मीद है मैं यहाँ बीमार नहीं ही होऊँगा। मुझे कुछ हो गया है, यह मानकर
कठिन समय में मेरी सहायता करनेवाली प्रेमा और वसुमतीको कहाँसे लाऊँगा ? मेरा
वजन कम हो जानेकी बातको गलत समझना। मेरी तबीयत निस्सन्देह अच्छी है ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६७४) से । सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२२६ की फोटो नकलसे भी ।
४८. पत्र : लालजी परमारको
यरवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०
चि० लालजी,
मैं और काकासाहब तेरा लम्बा पत्र पढ़कर प्रसन्न हुए। भविष्य में स्याहीसे
लिखना । खूब मेहनत करना । सत्य तथा अपनी मर्यादा कभी मत छोड़ना । तुझे खुद
तो सुबह ठीक चार बजे उठनेकी आदत बना लेनी चाहिए। इसका पूरा लाभ तू
भविष्य में समझ सकेगा ।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
मामासाहब से मुझे पत्र लिखनेको कहना।
गुजराती (जी० एन० ३२९४ ) की फोटो नकलसे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मथुरादास,
४९. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
परवडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०
हम दोनों तुम्हारा पारिभाषिक कोष पढ़ गये। मैं एक संशोधन सुझाना चाहता
हूँ। बैठक में पीजनको पालथीके दायीं ओर रखना ही काफी नहीं है। दायें पैरके
पंजेको वायें पैर के बीच तक ले लेना जरूरी है, नहीं तो पैर ताँत या मुठियासे
टकरायेगा। इस वारेमें विचार करना। यदि हो सका तो अन्य व्याख्याके सम्बन्धमें भी
विचार करूँगा। परिपूर्णता तक पहुँचनेका तुम्हारा उत्साह मुझे बहुत रुचता है।
गुजराती (जी० एन० ३७४० ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
५०. पत्र : रमाबहन जोशीको
चि० रमा,
यरबडा मन्दिर
१९ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। सुन्दर है। तुमने अपने ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी ली
है। लेकिन मैं जानता हूँ कि यह तुम्हारी शक्तिके बाहर नहीं है और हम वह
श्लोक भी तो जानते हैं जिसमें कहा गया है कि जो अनन्य भावसे भगवानका चिन्तन
करते हैं उनके कुशलक्षेमकी चिन्ता भी वही करता है। फिर हमें किस बातकी चिन्ता ?
वहाँ तुम्हें प्रार्थनाका समय बदलना पड़ा है, सो ठीक ही है। सब बहनोंको आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ५३२२ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
१. भगवद्गीता, ९, २२ ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दुबारा नहीं पढ़ा
५१. पत्र : मीराबहनको
२० जुलाई, १९३०
चि० मीरा,
तुमसे मिलनेसे इनकार करते हुए मुझे कष्ट हुआ था। लेकिन मैंने ठीक
किया था, इसका प्रमाण अगले दिन सुबह मिला सरकारने मेरा प्रस्ताव अस्वीकार
कर दिया है और इसलिए अब मुलाकातें नहीं हो सकतीं। अपने दृष्टिकोण पर
आग्रह करना मेरे लिए अशोभनीय होगा। उन्हें जैसाकि दुनिया भरमें अभी सी
साल पहले या उसके काफी बाद तक किया जाता था, कैदियोंको हर सुविधासे वंचित
करनेका अधिकार है। पत्रोंके आदान-प्रदानको अनुमति है, यही काफी है। लेकिन तुम
मानोगी कि यह भी अनिश्चित ही है। किसी भी क्षण वे पत्र-व्यवहार रोक सकते
हैं या ऐसी शर्तें लगा सकते हैं जो स्वीकार्य न हों। आत्म-त्यागसे हमारा तो लाभ ही
हो सकता है। इसलिए मुलाकातें बन्द होनेसे किसी प्रकारका क्षोभ होने की जरूरत
नहीं है। आत्माका आत्मासे मिलन हो, यह ज्यादा अच्छा है। इस सुखद सम्पर्कको
पृथ्वीकी कोई शक्ति नहीं रोक सकती ।
अब तुम जो उपहार छोड़ गई हो, उसकी बात इसमें छोटी-छोटी चीज़के
मामलेमें भी जो असाधारण सावधानी बरती गई है, वह मैंने देखी। मैने नये चरखेका
इस्तेमाल तुरन्त ही शुरू कर दिया था। इसलिए आज उसके इस्तेमालका दूसरा दिन
था। आज रविवार है; मौन आरम्भ कर चुका हूँ। यह प्रेम गहरा तो है, लेकिन
जितना बुद्धिमत्तापूर्ण होना चाहिए उतना नहीं हैं। तुम्हारे चरखेसे परिश्रम कम नहीं
हुआ है। जैसाकि मैंने मथुरादासको बताया, यह श्रम लगभग एक ही आसनमें
पाँच घंटे तक बैठने में है। यदि मैं घंटोंमें कमी करके उतना ही उत्पादन कर सकूँ
तो वह दूसरी बात होगी। यह चीज नये चरखेसे सम्भव नहीं लगती। नये चरखेको
चलाने में बायें हाथ पर मेहनत पड़ती है क्योंकि इसे चलाते समय हाथको दूर ले
जाना पड़ता है और उठाना भी पड़ता है। इसके विपरीत पेटी चरखेमें हाथ सम स्तर
पर रहता है और शरीरकी ओर आता है। इसके सिवा, जबतक मैं न चाहूँ तबतक
तुम्हें ऐसी चीजों पर अपना समय और कुशल कारीगरोंका समय नहीं लगाना चाहिए।
मुझे इतना सक्षम तो होने ही देना चाहिए कि मैं अपनी देखभाल कर सकूँ और
अपनी जरूरतें बता सकूं। तीसरे, पेटी चरसे पर मैं जितना वारीक सूत निकाल
सकता हूँ उतना इसपर अभी नहीं निकाल सका है। परिणाम है ५० अधिक पूनियोंका
इस्तेमाल -- यह राष्ट्रीय अपव्यय है। तथापि आलोचना बहुत हो चुकी । इतने प्रेममें
२. देखिए "पत्र मीराबदनको १८-७-१९३० ।
४४-३
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
पगी चीजको मैं यों ही नहीं छोड़नेवाला हूँ। इसलिए मैं इस चरखेका उपयोग जारी
रखूंगा और समय-समय पर तुम्हें सूचित करूँगा। तुम होल्डर और धुरीमें किस
तेलका प्रयोग करती हो? मालमें तुम कितने-कितने दिनमें राल लगाती हो ?
तकलियाँ चला कर मैंने देखी हैं। ये उतनी अच्छी नहीं हैं जितनी कि यहाँ
बनाई हुई मेरी तकली है। चकरियां बहुत बड़ी हैं और बांस पर अच्छी पालिश
नहीं है। तकलीके छड़की मोटाई और चकरीकी परिधिके बीच एक निश्चित अनुपात
दिखाई पड़ता है। यदि वजनकी कमी हो तो इसकी कमी चकरीको मोटा बनाकर
पूरी की जानी चाहिए। अगली बार जब तुम तकली बनाना तो इन बातोंको ध्यान में
रखना और अपनी राय मुझे लिखना ।
मेरे स्वास्थ्यके बारेमें बतानेको नया कुछ नहीं है। वजन स्थिर है।
दौरेमें अपने शरीरके साथ मनमानी मत करना ।
भजनोंके अनुवादमें में और अधिक समय लगा रहा हूँ। मैंने अब संस्कृत
श्लोकोंका अनुवाद सत्म कर दिया है और भजनोंका कर रहा हूँ।
हरिप्रसादको मेरा प्यार कहना।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०३ ) से सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६३७से भी ।
।
५२. पत्र: पैट्रिक क्विनको '
प्रिय श्री क्विन,
२० जुलाई, १९३०
संलग्न पोस्टकार्ड, आप देखेंगे, प्राप्ति-सूचना मात्र है। क्या आप इसे डाकमें
डलवा देंगे ? क्या आपने सेचक मँगवानेके लिए आर्डर दे दिया था ?
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
[ अंग्रेजीसे ]
महात्मा गांधी : सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,
खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ २८४
१. परसेंट्रल जेल सुपरिटेंडेंट
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५३. पत्र: पैट्रिक क्विनको
[२० जुलाई, १९३० ]
प्रिय श्री क्विन,
क्या आप कृपया २ पौंड खजूर और २ पौंड किशमिश मँगवा देंगे ?
[ अंग्रेजीसे]
हृदयसे आपका
मो० क० गांधी
महात्मा गांधी : सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,
खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २८५
भाईश्री ५ रतिलाल,
५४. पत्र : रतिलाल शाहको
२० जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। घटना दुःखद है किन्तु यह सिलसिला तो चलता ही रहता
है। मैं तो इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि हमने अकारण ही मृत्युको दुःखका विषय
मान लिया है। जिस प्रकार अन्य प्राकृतिक क्रियाएँ आवश्यक और लाभदायक हैं
वैसी ही यह क्रिया भी है। अतः आत्माके अस्तित्व या उसके गुणोंको स्वीकार न
करनेवालेके लिए भी मृत्युसे डरनेका कोई कारण नहीं है। और जो व्यक्ति आत्मा
और उसकी अमरतामें विश्वास रखता है, उसके बारेमें तो कहना ही क्या ? बहन
जबकने जिस देहका उपयोग पूरा हो चुका था उसका त्याग किया इसलिए हमें इसे
दुःखद बात नहीं माननी चाहिए।
पढ़ने और मनन करने लायक बहुत पुस्तकें दुनिया में मुझे नहीं मिली। मेरे
लिए 'गीता' और तुलसीदास ही काफी हैं और आधुनिक लेखकोंमें रायचन्द्रभाई के
लेख | किन्तु यदि कोई नई चीज पढ़नेकी इच्छा हो तो किशोरलालका 'जीवन-शोधन
देख जाना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ४६५८ ) से सौजन्य : नारणदास गांधी; जी० एन०
७१६४ की फोटो नकलसे से भी ।
7
१. सावन में इस पत्रको जिस क्रममें रखा गया है, उस परसे इसकी तिथि निर्धारित की गई है।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० काकू,
५५. पत्र : पुरुषोत्तम डी० सरैयाको
परवडा मन्दिर
२० जुलाई, १९३०
तूने कहीं पत्र न लिखनेकी प्रतिज्ञा तो नहीं ले ली ? या मेरे पत्रको प्रतीक्षा कर
रहा है। तू खूब बच निकला। किन्तु शायद भगवान तुझसे और भी अच्छा काम लेना
चाहता होगा। यदि हम तत्परायण रहें तो समझना चाहिए कि हमने अपना कर्त्तव्य
पूरा कर दिया। तू मुझे लिखेगा तो मुझे और काकासाहब दोनोंको प्रसन्नता होगी।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २८०५) से सौजन्य: पी० डी० सरैया
५६. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको
यरवडा मन्दिर
२० जुलाई, १९३०
भाई रामेश्वरदास,
हम दोनोंके नाम लिखा आपका पत्र मिला। आप यथाशक्ति सेवा करते जा
रहे हैं, बस इतना ही पर्याप्त है। उससे और अधिक शक्ति उत्पन्न होगी। यदि
रामनामको कण्ठसे हृदयमें उतार लें तो असन्तोष मिट जायेगा ।
बापू तथा काकाके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० २१७) की फोटो नकलसे।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रिय कुमारप्पा,
५७. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको
परवडा मन्दिर
२१ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हारे भाई जब लौटें तो उन्हें पहले विद्यापीठ आकर
सब कुछ खुद देख-समझ लेना चाहिए। उसके बाद वह निर्णय लेनेको स्वतन्त्र हैं,
लेकिन उससे पहले नहीं उनके बारेमें कराड़ीसे भेजा गया मेरा पत्र तुम्हें मिल गया
था कि नहीं ? जब वह आयें तो उनसे मेरा प्यार कहना और अपनी बहनको
पत्र लिखो तो उन्हें मेरी याद दिला देना ।
'थोडसो' शब्द 'दोड़सो' का तमिलमें विकृत रूप है।
हम दोनोंकी ओरसे प्यार सहित,
[ पुनश्च : ]
हाँ, तुम्हारी पुस्तक यथासमय मिल गई थी । धन्यवाद ।
अंग्रेजी (जी० एन० १००८७) की फोटो नकलसे ।
तुम्हारा,
बापू
५८. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
चि० मनु (त्रिवेदी),
यरवडा मन्दिर
२१ जुलाई, १९३०
मगनभाईने तेरे बारेमें पूरे समाचार दिये हैं, जिसे पढ़कर हम दोनोंको प्रसन्नता
हुई। भगवान तुझे स्वस्थ रखे और तेरे सेवाभाव में दिन-दिन वृद्धि करे। मैं यह बात
भूला नहीं हूँ कि तू मेरे लिए ताजे अंगूर लाया करता था। जब पिताजीको पत्र
लिखे तो उन्हें लिखना कि उनके बहुतसे मधुर संस्मरण मेरी स्मृतिमें हैं ।
गुजराती (जी० एन० ७७५८) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० भगिनी,
५९. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
तुमारे दो खत एक साथमें मिले है।
परवडा मन्दिर
२१ जुलाई, १९३०
कई भक्तोंकी परीक्षा वहीत कड़ी रहती है। तुमारी परीक्षा भगवान ऐसे हि
ले रहा है। परंतु साथ साथ सहन करनेका बल भी देता है यह उसकी कृपा है।
अब अरुण कैसे है? तारीणी और चारूकी प्रकृतिमें कुछ अच्छा मालुम होता है
क्या ? सोदपुर में कितने आदमी काम करते हैं। ईश्वरका इतना अनुग्रह है कि
क्षितिशवाय तुमारे साथ है और ईश्वरने उनको शरीर अच्छा दिया है मन दृढ़
बनाया है। दाक्तर रॉयका भी तो सहारा है हि। दोनोंको मेरे बंदेमातरम दे दो ।
antarraat arमें दूध इ० मिलता है ? सोने बैठनेका सुभिता है ? सब
हाल लिखो।
ईश्वर तुम्हें आरोग्य, शांति, और धैर्य देवे
जी० एन० १६६८ की फोटो नकलसे।
बापुके आशीर्वाद
६०. तार : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको '
तारके लिए
[ यरवडा सेंट्रल जेल
२२ जुलाई, १९३० ]
मैं
भरसक
कोशिश
करूँगा ।
धन्यवाद । आश्वस्त रहिए,
'प्रकाश' की प्रार्थना कर रहा हूँ । सप्रेम ।
[ अंग्रेजीसे |
बॉम्बे सीक्रेट एक्सट्रैक्ट्स, ७५० (५६), पृष्ठ २१
१. हेमप्रभा दासगुप्तका सबसे छोटा और एकमात्र जीवित बालक
२. सतीशचन्द्र दासगुप्तके छोटे भाई ।
३. श्रीनिवास शास्त्रीने गांधीजीको तार देकर अनुरोध किया था कि यह समू और जयकरके प्रस्तावों पर
सहानुभूतिके साथ विचार करें।
४. गांधीजीको भेजे गये उक्त तारके ठीक नीचे दी गई एक टिप्पणीके अनुसार इस तारके साथ
भेजे गये मेजर डॉ पत्रपर २२ जुलाई, १९३० तारीख थी; देखिए अगला शीर्षक भी
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६१. पत्र : जी० ए० नटेसनको
परवडा सेंट्रल जेल
२२ जुलाई, १९३०
प्रिय मित्र,
मुझे आपका पत्र और उसके साथ संलग्न कागजात दे दिये गये हैं। धन्यवाद ।
आप विश्वास रखें कि मैं भरसक जो हो सकेगा करूँगा। मुझे शास्त्रियरका एक तार
मिला था। मैं प्रकाशकी प्रार्थना कर रहा हूँ लेकिन इस अभेद्य अंधकारमें एक किरण
भी नहीं दिखाई पड़ती ।
श्रीयुत जी० ए० नटेसन
'इंडियन रिव्यू '
जॉर्ज टाउन
मद्रास
अंग्रेजी (जी० एन० २२३६) की फोटो नकलसे।
६२. पत्र : नारणदास गांधीको
हृदयसे आपका
मो० क० गांधी
१८ / २२ जुलाई, १९३०
चि० नारणदास,
तुम्हारा पुलिंदा कल मिला। इतने पत्र हलके लिफाफे में नहीं आ सकते। सारा
लिफाफा फट गया था। तुम या तो कपड़ेका लिफाफा इस्तेमाल करो या पत्र टिकटों
के लिहाज से चौड़ा हो तो भी चारों ओर डोरीसे अच्छी तरह बाँध दो ताकि पत्र
डोरीको तोड़े बिना निकले ही नहीं ।
रुई आखिर १६ तारीखको मिली। किन्तु कोई कठिनाई नहीं हुई।
प्रभुदास और मुन्नालालके पत्र में प्रार्थनाके शुष्क होनेका उल्लेख है। क्या
बालकृष्ण भजन नहीं गाता ? 'गीता' या किसी दूसरे विषयपर तुममें से कोई कुछ नहीं
कह सकता ? बालकृष्ण निश्चय करे तो कर सकता है। अनिवार्य हो तो सिर्फ संस्कृत
श्लोकोंका पाठ करके ही काम चलायें। किन्तु सम्भव हो तो और कुछ शुरू तो करना
ही चाहिए; या गुजरातीसे ही कुछ पढ़ा जाये। पहले प्रभुदास और मुन्नालाल के साथ
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
चर्चा करना, बालकृष्णसे बात करके जो ठीक लगे वह करना। मैं मानता हूँ कि
तुम्हारे पास इसका विचार करनेका तनिक भी समय नहीं है। ऐसा होते हुए भी
सुझाव दे देता हूँ। जो सम्भव हो वह करना ।
भरवाड़ लोगोंको अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
१९ जुलाई, १९३०
इस पत्रका अधिकांश हमारे सारे समाजके लिए होता है इसलिए इसकी बातें
अलग पत्रोंमें नहीं देता। ऐसी एक बात काकासाहब का आशीर्वाद है। सभी पत्रोंमें
वह है, ऐसा सभी लोग समझें। काकासाहब को सबका प्रणाम तो पहुँचता ही हैं
क्योंकि वे सब पत्र पढ़ते हैं और सब पत्रोंमें उनका नाम जरूर होता है। यह देख
कर कि हमारे समाजमें विनय है और उसका अनुभव करके हम दोनों आनन्दित
होते हैं।
दैनन्दिनीका विचार करने पर देखता हूँ कि मेरे लिए तो वह एक अमूल्य
वस्तु बन गई है। जो सत्यकी आराधना करता है उसके लिए वह चौकीदार सिद्ध
होती हैं, क्योंकि उसमें सत्य ही लिखना है। आलस किया हो तो उसका उल्लेख
किये बिना छुटकारा नहीं। काम कम किया हो तो यह लिखे बिना छुटकारा नहीं ।
इस तरह वह अनेक प्रकारसे सहायक बन गई है। इससे सब उसकी कीमत समझें,
यह आवश्यक है। नियमित रूपसे उसे लिखना शुरू करने पर हमें अपने-आप सूझता
है कि उसे किस तरह लिखें एक शर्त जरूर है कि हमें सच्चा बनना है। यदि
ऐसा न हो तो दैनन्दिनी लोटे सिक्केकी तरह हो जाती है। यदि उसमें सत्य ही लिखा
हो तो वह सोनेकी मुहरसे भी कीमती है।
६० नम्बरका पत्र श्रीमती जोलिंगर का है, उसे पढ़ लेना। उस बहनको क्या
परेशानी है, यह मालूम करना ।
तुम्हें पत्रोंकी सूची बनानी पड़ती है। देखता हूँ उसमें तकलीफ तो है ही ।
यदि उसमें बहुत समय लगता हो तो छोड़ देना। सिर्फ संख्या दे देना ही काफी है।
आसानीसे सूची बन सके तो बना देना ।
मुलाकातोंके लिए अभी तो मनाही ही करनी है। इसका कारण मीराबहनको
लिखे पत्र में देखोगे । यहाँ दुबारा नहीं लिखता । पत्र भी न लिख सकें तो कैसे चले ?
आत्म-सम्मानकी रक्षा करते हुए न लिख सकें तो यह भी छोड़ दें। भक्तिका पथ
कठिन है, पर हमारे सामने तो दुसरा मार्ग है ही नहीं।
पत्रोंकी संख्या बढ़ रही है, उसकी चिन्ता नहीं। जो लिखना चाहे उसे अपनी
इच्छानुसार लिखने देना । जेलके नियमोंकी मर्यादाका पालन हो, इतना ही काफी है।
राजनैतिक प्रश्नोंकी चर्चा न हो, मुझसे उस बारेमें कुछ न पूछें। सबको खबर देने में
न हानि है, न होगी ।
डा० हरिभाईको कहना कि उनको कई बार याद करता हूँ। डा० कानूगा
अब बिल्कुल ठीक हो गये होंगे ?
१. आश्रममे रहनेशली स्टिकरकी एक महिला ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/७९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
४१
२२ जुलाई, १९३०
सुबहकी प्रार्थनाके बाद
विश्वनाथ के पत्र में सुझाव है कि मुझे हर सप्ताह थोड़ासा प्रवचन प्रार्थनाके
समय पढ़ा जानेके लिए भेजना चाहिए। विचार करनेपर मुझे उसकी यह माँग उचित
लगी है। प्रार्थनाके समय थोड़ी और चेतनता डाल देनेमें यह मेरा योगदान मानना ।
दूसरे छः दिनोंके लिए भी पढ़ने लायक कुछ भेजा जा सकता हो तो भेजने की योजना
काका साथ बना रहा हूँ। यह तो इस सप्ताहके लिए है।'
हमारी संस्थाके मूलमें सत्यका आग्रह है इसलिए पहले सत्यको ही लेता हूँ ।
'सत्य' शब्द सत्से बना है। / सतु अर्थात् होना । सत्य अर्थात् अस्तित्व | सत्यके
सिवा दूसरी किसी चीजकी हस्ती ही नहीं । परमेश्वरका सच्चा नाम ही 'सत्'
अर्थात् 'सत्य' है। इसलिए ईश्वर 'सत्य' है, ऐसा कहनेके बदले 'सत्य' ही ईश्वर
यह कहना ज्यादा योग्य है। राजकर्त्ताकि बिना या सरदारके बिना हमारा काम
चलता नहीं, इसलिए ईश्वर नाम ज्यादा प्रचलित है और रहेगा। किन्तु विचार करके
देखें तो 'सत्' या 'सत्य' यही ठीक नाम है और यही पूर्ण अर्थका सूचक है।
और जहाँ सत्य है यहाँ ज्ञान, शुद्ध ज्ञान है ही। जहाँ सत्य नहीं, वहां शुद्ध ज्ञान
सम्भव नहीं। इसलिए ही ईश्वरके नामके साथ चित् अर्थात् ज्ञान शब्द जोड़ा है।
और जहाँ सच्चा ज्ञान है वहाँ आनन्द ही होगा। शोक हो ही नहीं सकता। और
सत्य शाश्वत है तो आनन्द भी शाश्वत होगा। इसीसे हम ईश्वरको सच्चिदानन्द
(सत्-चित्-आनन्द) के नामसे भी पहचानते हैं ।
हमारा अस्तित्व ही सत्यकी आराधनाके लिए है। हमारे प्रत्येक कामका वही
कारण हो, हमारे प्रत्येक साँस लेनेका यही कारण हो, ऐसा करना सीख लें, तो
दूसरे सभी नियम आसानीसे हमारे हाथ आ जायें और उनका पालन भी आसान
हो जाये । सत्यके बिना किसी भी नियमका शुद्ध पालन असम्भव' है । ।
सामान्य तौर पर सत्य अर्थात् सत्य बोलना इतना ही हम समझते हैं । किन्तु
हमने सत्य शब्दका विस्तृत अर्थ लिया है। सत्य वही है जिसका पालन विचार, वाणी
और आचारमें करें। इस सत्यको सम्पूर्ण रूपमें समझ लेनेवालेके लिए संसारमें और
कुछ जाननेके लिए नहीं रहता, क्योंकि हमने ऊपर देखा है कि ज्ञानमात्र उसमें समाया
हुआ है। उसमें जो नहीं समाता वह सत्य नहीं, ज्ञान नहीं, फिर उसमें सच्चा आनन्द
हो भी कहाँसे ? इस कसौटी पर परखना सीख लें तो हमें फौरन मालूम पड़ जायेगा
कि कौन-सी प्रवृत्ति ग्रहण करने योग्य है और कौन-सी त्याज्य क्या देखने योग्य
है, क्या नहीं ? क्या पढ़ने लायक है, क्या नहीं ?
किन्तु सत्य जो पारसमणि जैसा है, जो कामधेनु-जैसा है, वह कैसे मिले? उसका
जवाब भगवानने दिया है अभ्यास और वैराग्यसे सत्यकी ही लगन, यही अभ्यास
२. इन प्रवचनोंका अनुवाद गांधीजी द्वारा पुनः सम्पादित नवजीवन प्रकाशनको पुस्तिका मंगल-
प्रभातसे लिया गया है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
है। उसके बिना दूसरी सभी चीजोंके प्रति अतीव उदासीनता, यही वैराग्य है। ऐसा
होते हुए भी हम देखते हैं कि जो एकके लिए सत्य है यही दूसरेके लिए असत्य
है। उससे घबरानेका कोई कारण नहीं है। जहाँ शुद्ध प्रयत्न है यहाँ विभिन्न दिखाई
देनेवाले सभी सत्य एक ही वृक्षके अलग-अलग दिखनेवाले असंख्य पत्तोंके समान हैं।
ईश्वर भी क्या प्रत्येक मनुष्यको भिन्न नहीं दिखाई देता ? तो भी वह एक ही है,
यह हम जानते हैं । किन्तु सत्य ईश्वरका ही नाम है, इसलिए जिसे जो सत्य लगे
उसीके अनुसार वह व्यवहार करे तो उसमें दोष नहीं है। इतना ही नहीं, बल्कि
यही कर्तव्य है । फिर ऐसा करते हुए भूल हो तो वह भी सुधर ही जायेगी, क्योंकि
सत्यकी शोधके पीछे तपश्चर्या होगी। इसलिए स्वयं दुख सहन करना होगा उसके
लिए प्राण देने होंगे। इसलिए उसमें स्वार्थकी तो गन्ध भी न होगी। ऐसी निःस्वार्थ
शोध करते हुए आज तक कोई अन्त तक उलटे मार्ग पर नहीं गया। उलटे मार्ग गया कि
ठोकर लगी। इसलिए वह फिर सीधे मार्गकी ओर बढ़ जाता है। इसीलिए सत्यकी
आराधना ही भक्ति है। और भक्ति “सिरका सौदा है; वह तो हरिका मार्ग है और
उसमें कायरताका स्थान नहीं, उसमें हारने जैसी कोई बात ही नहीं। वह तो मरकर
जीनेका मन्त्र है।
किन्तु अब हम अहिंसा के किनारे आ पहुँचे हैं। इसका विचार अगले सप्ताह
करेंगे।
इस मौके पर हरिश्चन्द्र, प्रह्लाद, रामचन्द्र, इमाम हसन और हुसैन, ईसाई सन्तों
आदिके दृष्टान्तों पर विचार करना चाहिए। अगले सप्ताह तक सभी बच्चे-बूढ़े, स्त्री-
पुरुष उठते-बैठते, खाते-पीते खेलते और सभी काम करते इसे रटते रहें और
रटते रटते निर्दोष नींद ले पायें तो कितना अच्छा हो ।
यह सत्य रूपी ईश्वर मेरे लिए रत्न चिन्तामणि सिद्ध हुआ है। हम सबके
लिए ऐसा ही हो।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
पत्र ६६ हैं । यदि सभी पत्र देनेसे पहले नहीं पढ़ते तो अबसे पहले पढ़कर
देना। इनमें कई लोगोंके बारेमें सुझाव हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६३. ज्ञापिका : मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूको '
संवैधानिक प्रश्न
परवडा सेंट्रल जेल
२३ जुलाई, १९३०
१. जहाँतक इस प्रश्नका सम्बन्ध है, मेरी व्यक्तिगत स्थिति यह है कि यदि
गोलमेज सम्मेलनमें संक्रमणकालके दौरान पूर्ण स्व-शासनके सिलसिले में [अमुक हितोंकी
रक्षाके लिए] जो पूर्वोपाय आवश्यक हों, केवल उन्हीं पर विचार किया जाये, और
यदि कोई स्वतन्त्रताका प्रश्न उसमें उठाये तो उसपर भी विचार किया जाये, तो
मुझे सम्मेलन पर कोई आपत्ति नहीं है। सम्मेलनमें कांग्रेसके शामिल होनेकी बातका
समर्थन में तभी करूँगा जब सम्मेलनके गठनके बारेमें मुझे तसल्ली हो जायेगी ।
सविनय अवज्ञा और उसकी समाप्ति
२. यदि कांग्रेस गोलमेज सम्मेलनके बारेमें सन्तुष्ट हो जाती है तो स्वाभाविक
है कि सविनय अवज्ञा, अर्थात् केवल अवज्ञाके लिए कतिपय कानूनोंकी अवज्ञाका
आन्दोलन, खत्म करना होगा। लेकिन यदि सरकार स्वयं शराब और विदेशी कपड़े
पर निषेध नहीं लगवा सकती तो विदेशी कपड़े और शराबके खिलाफ शान्तिपूर्ण
धरना जारी रखा जायेगा। लेकिन जनता द्वारा नमक-निर्माण जारी रखना होगा
और नमक अधिनियमकी दण्डात्मक धाराएँ लागू नहीं की जानी चाहिए। नमकके
सरकारी या निजी भण्डारों पर धावे नहीं किये जायेंगे। यदि इस धाराको एक धारा
का रूप न दिया जाये लेकिन लिखित रूपमें उसे एक आपसी समझौतेकी तरह स्वीकार
कर लिया जाये तो भी मैं सहमत हो जाऊँगा ।
३ (क) सविनय अवज्ञा आन्दोलन समाप्त करनेके साथ ही उन सभी सत्या-
ग्रही कैदियों और अन्य राजनीतिक कैदियों या अभियुक्तोंको जो हिंसा करने या हिंसा
भड़काने के अपराधी नहीं है, छोड़नेका आदेश जारी किया जाये, और
(ख) नमक अधिनियम, प्रेस अधिनियम और राजस्व अधिनियम आदिके अन्त-
र्गत जब्त की गई सम्पत्तियाँ वापस कर दी जानी चाहिए, और
सुधारनेकी दृष्टिसे
१. सामान्य स्थिति स्थापित करने और " वर्तमान स्थितिको बातचीतके जरिये '
सर तेज बहादुर सभ और श्री मु० रा० जयकरने १३ जुलाईको वाइसरायको पत्र लिख कर परवडा जेल में
गांधीजीले और नैनी जेलमें मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरूते मुलाकात करनेकी अनुमति मांगी थी।
२३ और २४ जुलाईको उन्होंने गांधीजीसे भेंटकी। गांधीजीने उन्हें यह पत्र मोतीलाल और जवाहरलाल
नेहरूको देनेके लिए दिया था।
२ और ३. ये उप-शीर्षक एस० एन० १९९७६ में गांधीजीके साक्षरोंमें दिये हुए हैं।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
(ग) दण्डित सत्याग्रहियोंसे या प्रेस अधिनियम के अन्तर्गत लिये गये जुर्माने
और जमानतें वापस कर दी जायें।
(घ) ग्राम अधिकारियों सहित ऐसे सभी सरकारी अधिकारियोंको जिन्होंने सविनय
अवज्ञा आन्दोलन के दौरान स्वयं इस्तीफा दे दिया था या जिन्हें बर्खास्त कर दिया
था, और जो सरकारी नौकरीमें फिर आना चाहें, बहाल कर दिया जाना चाहिए।
टिप्पणी: पूर्वोक्त बात असहयोग आन्दोलनकी अवधि पर भी लागू होगी।
(ङ) वाइसराय द्वारा जारी किये गये अध्यादेश रद कर दिये जाने चाहिए।
मेरी यह राय बिलकुल अस्थायी है क्योंकि मेरी राय में किसी कैदीको उन
राजनीतिक गतिविधियोंके ऊपर राय देनेका कोई अधिकार नहीं है जिनके बारेमें
वह अन्य लोगोंके साथ सम्पर्क न रख पानेके कारण पूरी तरह कुछ नहीं जानता ।
इसलिए मुझे लगता है कि मेरी रायका उतना वजन नहीं माना जा सकता जितना
कि मेरी निगाहमें तब होता जब मैं आन्दोलन के सम्पर्क में रहता ।
श्री जयकर और डा० सप्रू इसे पण्डित मोतीलाल नेहरू, पण्डित जवाहरलाल
नेहरू, श्री वल्लभभाई पटेल तथा उन लोगोंको दिखा सकते हैं जिनके हाथमें आन्दो-
लनकी बागडोर है प्रेसमें कुछ नहीं छपना चाहिए।
इसे इस अवस्थामें वाइसरायको नहीं दिखाया जाना चाहिए।
उपरोक्त शर्तें स्वीकार कर ली जायें तो भी मैं सम्मेलन में तबतक भाग नहीं
लूंगा जबतक कि, जेलसे छूट जानेकी स्थिति में मुझमें आत्म-विश्वास नहीं पैदा हो
जाता, जोकि इस समय मेरे अन्दर नहीं है, और जबतक कि सम्मेलनमें बुलाये
जानेवाले भारतीयोंके बीच प्रारम्भिक बातचीत नहीं हो जाती और न्यूनतम मांगोंके
बारेमें ऐसा समझौता नहीं हो जाता जिस पर वे सभी आग्रहपूर्वक डटे रहेंगे।
मैं यह अधिकार अपने पास रखता हूँ कि अवसर आनेपर में प्रत्येक स्वराज्य-
योजनाको कसौटी पर रखकर देखूं कि वे उस उद्देश्यको पूरा करते हैं या नहीं जो
बाइसरायको लिखे गये मेरे पत्र में उल्लिखित ग्यारह सूत्रों का आधार है।'
[ अंग्रेजीसे ]
मो० क० गांधी
गांधी- सप्रू करेस्पांडेंस । सौजन्य : पी० एन० सप्रू एस० एन० १९९७६ से भी ।
१. इन धाराओंको “पत्र सम् और जपकरको ", १५-८-१९३० में शामिल कर लिया गया था।
२. देखिए ४२, १४४४७-५०
३. इस पत्रको मोतीलालजीके नाम लिखे गये एक पत्र (देखिए अगला शीर्षक ) के साथ समू और
जयकरको दे दिया गया था।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रिय मोतीलालजी,
६४. पत्र : मोतीलाल नेहरूको
परवडा मन्दिर
२३ जुलाई, १९३०
मेरी स्थिति मूलतः अटपटी है। जैसाकि मेरा स्वभाव है, मैं जेलकी दीवारोंके
उस पार होनेवाली घटनाओंके ऊपर कोई निश्चित मत नहीं दे सकता। इसलिए
मैंने अपने मित्रोंको जो दिया है वह उस चीजका एक अत्यन्त मोटा मसविदा है
जिससे मुझे व्यक्तिगत तौर पर सन्तोष होनेकी आशा है। आपको शायद पता न हो
कि मैं स्लोकोम्बको कोई चीज देना नहीं चाहता था और मेरी इच्छा थी कि वह
आपसे बात कर ले। लेकिन मैं उसकी अपीलको नहीं टाल सका और भेंट वार्ता को
आपसे मिलनेसे पूर्व ही छापनेकी अनुमति दे दी।
साथ ही यदि सम्मानजनक समझौते के लिए समय उपयुक्त हो तो मैं उसके
रास्तेमें बाधा भी नहीं बनना चाहता। मुझे इसमें गम्भीर शंका है। लेकिन अन्ततः
जवाहरलालका निर्णय ही अन्तिम होना चाहिए। आप और मैं तो उसे अपनी सलाह
ही दे सकते हैं। सर तेजबहादुर और श्री जयकरको दी गई अपनी ज्ञापिकामें मैंने
जो कुछ कहा है वह अन्तिम सीमा है जहाँ तक मैं जा सकता हूँ। लेकिन जवाहर
और वैसे आप भी ऐसा मान सकते हैं कि कांग्रेसकी अन्तर्भूत नीति अथवा जनताकी
वर्तमान मनोदशासे मेरी स्थितिकी संगति नहीं बैठती। इससे भी अधिक सख्त स्थितिका
समर्थन करनेमें मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं होगी बशर्ते कि वह लाहौर प्रस्तावकी
शब्दावलीसे ज्यादा आगे न जाता हो। इसलिए अगर मेरी शापिका आप दोनोंके
हृदयको ठीक न जैने तो आप उसको कोई महत्व न दें।
मैं जानता हूँ कि न आप और न जवाहरको ही ये ग्यारह सूत्र बहुत पसन्द
थे जो मैने वाइसरायको लिखे अपने पहले पत्र में स्पष्ट किये थे। मुझे पता नहीं
कि आपकी अब भी वही राय है या नहीं। खुद मेरा मन उनके बारेमें बिलकुल साफ
है। मेरे लिए वे स्वराज्यका सार है। मैं ऐसी किसी चीजसे अपना वास्ता नहीं रख
सकता जो राष्ट्रको यह शक्ति न दे कि वह उन्हें तुरन्त लागू कर सके। ज्ञापिकामें
मैंने उनमें से केवल तीन सूत्रोंका ही जिक्र किया है लेकिन शेष आठ मैंने छोड़े नहीं
हैं। लेकिन ये तीन सूत्र सविनय अवज्ञाके सन्दर्भमें स्पष्ट किये गये हैं। मैं ऐसे किसी
१. देखिए खण्ड ४३, पृ० ४३७८ ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
युद्ध-विराम में शामिल नहीं होऊँगा जो उस स्थितिको व्यर्थ करता हो जिसपर हम
आज पहुँचे हैं। "
हृदयसे आपका
मो० क० गांधी
[ अंग्रेजीसे ]
गांधी-सप्रू करेस्पांडेंस । सौजन्य : पी० एन० सप्रू एस० एन० १९९७६ से भी ।
चि० हरिइच्छा,
६५. पत्र : हरिइच्छा देसाईको
यरवडा मन्दिर
२६ जुलाई, १९३०
मुझे प्रायः तेरी याद आती है, किन्तु पत्र लिखनेकी प्रेरणा हरिभाईके पत्र में
तेरा उल्लेख देखकर मिली। तुम सब बहनें अपने स्वास्थ्यको तो ठीक रखती हो न ?
तू आजकल क्या कर रही है? यदि तू स्वीकृति दे और तेरी इच्छा हो तो मैं तुझे
आश्रम में खींच ले जाऊँ । यदि तेरी इच्छा हो तो प्रयत्न करना। मुझे पत्र लिखना ।
गुजराती (जी० एन० ७४६४) की फोटो नकलसे।
चि० वली, कुमी,
६६. पत्र : बली और कुमीको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२६ जुलाई, १९३०
तेरा पत्र मिला। कुमीको भी लिखना चाहिए। तूने मनुको ले जाकर ठीक
किया। तुम बहनोंके सन्तोषमें ही मेरा सन्तोष है। इन बालकोंके प्रति तुम्हारा प्रेम
देखकर तो कभी-कभी मेरी आंखोंमें खुशीके आंसू उमड़ आते हैं। मैं समय-समय पर
जो चेतावनी देता रहता हूँ, उसका कारण यह है कि तुम्हारा उक्त प्रेम केवल अन्धा
प्रेम ही न हो किन्तु तुम्हारे स्वभावको जानते हुए मुझे इतना करते भी संकोच
होता है। मैं तुम्हें कैसे दुःख दे सकता हूँ? क्या तुम दोनों बहनोंमें मेल है ?
२. इस पत्रके साथ तथा मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूके नाम लिखी शापिफाके साथ सर तेजबहादुर
और श्री मु० रा० जयकरने २७ और २८ जुलाईको मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूसे भेंट की थी।
उनके संयुक्त पत्र तथा जवाहरलाल नेहरूके पत्रके लिए देखिए परिशिष्ट १ (क) और १ (ख)।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र मनु गांधीको
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि तुलसीदास अच्छा हो गया ।
कुसुम तो अब बिलकुल ठीक हो गई होगी।
४७
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५०६०) की फोटो नकलसे सौजन्य : सुरेन्द्र मशरूवाला
६७. पत्र : रामी गांधीको
यरवडा मन्दिर
२६ जुलाई, १९३०
चि० रामी,
तेरा पत्र मिला। मुझे तेरे बारेमें बा ने लिखा था। कुसुम क्योंकर इतनी सस्त
बीमार पड़ गई ? कुँवरजीसे मुझे पत्र लिखनेको कहना। मैं उसे अलग से पत्र नहीं
लिख रहा हूँ। मुझे पत्र लिखती रहना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ५०६१) की फोटो नकलसे सौजन्य : सुरेन्द्र मशरूवाला
।
६८. पत्र: मनु गांधीको
यरवडा मन्दिर
२६ जुलाई, १९३०
चि० मनुड़ी,
तेरा पत्र मिला । यदि तू अपनी इच्छासे गई थी तो ठीक ही गई थी। मैं
तो सिर्फ यही चाहता हूँ कि तू खरी सेविका बने और तेरा शरीर दृढ़ बने । अब
भविष्य में स्याहीसे लिखता ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५०३) की फोटो नकलसे सौजन्य : मनुबह्न मशरूवाला
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० भगवानजी,
६९. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
२६ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। मणिबनके सम्बन्धमें तुमने जो किया वह उचित ही है।
एक बहन जो हमारे साथ रह रही हो और जिस तरह तटस्थभावसे उसे उसके दोषोंके
बारेमें बताकर हम निश्चिन्त हो जाते हैं वैसे ही हमें यहाँ भी करना चाहिए। तुम्हारा
शक उपवाससे दूर नहीं होगा, ऐसा तुम्हें उसे समझाना चाहिए। यदि उसने अपराध
नहीं किया तो उपवास किसलिए। और यदि किया हो तो उसका निवारण उपवास
नहीं है अपितु अपराधको स्वीकार करना और भविष्यमें कभी वैसा काम न करनेका
दृढ़ संकल्प करना ही हो सकता है। ऐसा करने पर भी यदि वह न माने तो फिर
जो हो सो होने दें। लेकिन मेरी ओरसे मणिबनसे कहना कि मेरी अनुमतिके बिना
उपवासकी मनाही है, अतः यदि उसने उपवास न छोड़ा हो तो अब छोड़ दे।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२१) से सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्ड्या
७०. पत्र : गंगाबहन झवेरीको
चि० गंगाबहन (झवेरी),
यरवडा मन्दिर
२७ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । आशा है तुम अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखती होगी ।
कानजीभाईका त्याग महान् है। उन्हें और उनके कुटुम्बियों तथा तुम्हारे साथ रहने-
वाली बहनोंको मेरा आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ३१०२ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० वसुमती,
७१. पत्र : वसुमती पण्डितको
यरबडा मन्दिर
२७ जुलाई, १९३०
तेरा पत्र मिला । तेरे साथ कितनी बहनें रहती है ? क्या उन्होंने प्रार्थना सीख
ली है? क्या तुझे 'अनासक्तियोग के अध्ययनका समय मिलता है ? क्या तेरा चित्त
शान्त है? मैं ठीक हूँ ।
गुजराती (एस० एन० ९२७७ ) की फोटो नकलसे।
७२. पत्र : कलावती त्रिवेदीको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
२७ जुलाई, १९३०
चि० कलावती,
तेरा पत्र मिला । तू गुजराती सीख रही है अतः यह पत्र गुजरातीमें लिख रहा
हूँ । यदि तू गुजरातीमें लिखनेको मना करेगी तो मैं भविष्य में हिन्दी में लिखूंगा । तुझे तो
हिन्दी में ही लिखना चाहिए। तू अपने अक्षर सुधारना। अब जबकि तू प्रभुभाईके चरखे
पर कातने लगी है तो इस काम में जी-जानसे जुट जाना । चरखेकी सफाई आदि
करना सीख लेना। जो कुछ भी करे उसे ध्यानसे और अच्छी तरह करना। ऐसा
करनेसे हृदय और बुद्धि दोनों विकसित होते हैं। शान्तानको किसी डाक्टरको
दिखाना ।
गुजराती (जी० एन० ५२४२ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
४४-४
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० काशिनाथ,
७३. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीकी
यरवडा मन्दिर
२७ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। अपने पिछले पत्रमें मैंने प्रार्थनाकी जो बात उठाई थी,
उससे तुम्हारे पत्रका आंशिक उत्तर तो तुम्हें मिल ही गया। मूर्तिपूजाके बारेमें जो
लोग अपने पास मूर्ति रखते हैं हम उन्हें वैसा करनेसे मना नहीं करते। किन्तु
सामूहिक प्रार्थनामें मूर्तिको स्थान नहीं दिया जा सकता ।
शान्ताबहनको डाक्टरको दिखानेकी बात मैंने सुझाई है। किन्तु यहाँ बैठे हुए
मैं भली-भांति मार्गदर्शन नहीं कर सकता ।
[ पुनश्च : ]
हिन्दी अनुवादको देखनेका मुझे समय ही नहीं मिल पाता ।
गुजराती (जी० एन० ५२४३) की फोटो नकलसे ।
७४. पत्र : जानकीदेवी बजाजको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२७ जुलाई, १९३०
चि० जानकी बहन,
तुम्हारा पत्र मिला। अब उत्साह क्यों न होगा ? अब तो तुम भाषण देती
हो, अखबारोंमें भी तुम्हारा नाम आता है। समय-समय पर जब जानकीबाई बजाजका
नाम अखबारोंमें देखता हूँ तो सोचता हूँ कि क्यों न जमनालाल और हम सभी
गिरफ्तार हों और जेलमें रहें। मुझे तो विश्वास था ही कि तुम्हारे दिखाई देनेवाले
अविश्वासके पीछे पूरा आत्मविश्वास था। ईश्वर उसमें वृद्धि करे। कमलनयनको
जल्दी नहीं करनी है। फिलहाल वह चाहे तो खादी उत्पादनके कार्य में ही लगा रहे ।
टुकड़ीके बाहर निकलने पर वह वालजीभाईको लिखे ।
गुजराती (जी० एन० २८८८ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/८९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७५. मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रका अंश
२७ जुलाई, १९३०
मुलाकात करनेके बारेमें तुम समझ गये हो न ? सरकारको मेरी सूची बड़ी
लगी है। अब ज्यादा झंझटमें नहीं पड़ेगा। पत्र-व्यवहारसे ही सन्तोष कर लें।
[ गुजरातीसे ]
बापुनी प्रसादी
भाई विठ्ठलदास,
७६. पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको
परवडा मन्दिर
२७ जुलाई, १९३०
अप्रैल, मई और जूनके आंकड़े मिले। इन आंकड़ोंको देखनेसे ज्ञात होता है।
कि अब भी पर्याप्त मात्रामें कोई सूत नहीं देता। इस बारे में तुम मुझे सविस्तार
लिखो ।
गुजराती (एस० एन० ९७७५ ) की फोटो नकलसे।
७७. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२७ जुलाई, १९३०
प्रिय भगिनि,
तुमारे दो पत्र मिले। उन्हें में प्रसादी सुरूप समझता हूं। तुमारा आत्मविश्वास
दिन प्रति दिन बढ़ता हुआ देख मुझे बड़ा आनंद होता है। ईश्वर उसमें वृद्धि करे ।
सतीशबाबुका तो क्या लिखु ? उनका विकास तो मैं कई दिनोंसे देखहि रहा था ।
खादी कार्यमें तुमारी श्रद्धा ऐसी है कि आवश्यक सहाय भगवान भेजता हि
रहेगा। जैसी जिसकी श्रद्धा ऐसा उसको होय ऐसा भगवद्-वचन है। वह मिथ्या नहि
हो सकता है।
चारुको भगवान शांति दें। अरूण कहां है ?
१. देखिए "पत्र आर० पी० मार्टिनको", ८-७-१९३० ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
सतीशबाबुको मेरे आशीर्वाद पहोंचा दो । चारू अरूणको और तारिणीको भी।
[ पुनश्च : ]
खादीके बारेमें सब कुछ लिख सकती है।
जी० एन० १६६९ की फोटो नकलसे ।
चि० मीरा,
७८. पत्र : मीराबहनको
बापुके आशीर्वाद
[ २८ जुलाई, १९३० ]
मुझे तुम्हारा पत्र मिला। मैं तुम्हारा ही चरखा चला रहा हूँ। अब उसमें कम
मेहनत पड़ती है। मालने किसी प्रकारकी कोई तकलीफ नहीं दी है। उस लिहाजसे
तुम्हारा चरखा कहीं ज्यादा अच्छा है। मुझे अभी भी अपेक्षित बारीकीका सूत निकालने-
में कठिनाई होती है। किसी भी हालतमें मैं उसे आसानीसे नहीं छोड़ेंगा। रफ्तार
अभी भी बहुत कम है। आज पहली बार मैंने ६५ मिनटमें १५४ तार निकाले ।
यह मेरे लिए उत्साहवर्धक था सफरी चरखेको बिना रुके चलाने पर मैं उससे प्रति
घंटे २०० तार निकालने लगा था।
तुम्हारी खातिर भजनोंका अनुवाद करनेमें में स्वयं बहुत आनन्द पा रहा हूँ।
क्या मैंने अपने प्रेमको अकसर स्नेहकी कोमल और मृदुल वर्षाकी अपेक्षा तूफानोंके
रूपमें व्यक्त नहीं किया है? इन तूफानोंकी स्मृति अनन्य रूपसे तुम्हारे लिए किये
जानेवाले अनुवादका सुख और बढ़ा देती है। लेकिन यह लम्बा काम है। आज
मैंने १०व भजन किया। श्लोकोंमें मुझे बहुत समय लगा। भजन में प्रतिदिन एकके
हिसाब से कर रहा हूँ। और अभी भी मुझे करीब १७० करने हैं। इसलिए अभी तो
मेरे 'गीता' पर पहुँचनेकी सम्भावना बहुत कम ही है।
तुम्हारे बुखारसे चिन्ता है। अभी भी तुम पर परिवर्तनोंका असर जल्दी होता
है। कृपया अपना ध्यान रखो और अगर तुम्हें जरा भी जरूरी लगे तो दूसरे दर्जेमें
सफर करनेमें हिचकिचाओ मत। मैं इस सप्ताहके पत्रकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०४ ) से । सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६३८
से भी ।
१. इस पत्र में उल्लिखित १०३ भजनका इसी तारीखको अनुवाद किया गया था; देखिए परिशिष्ट
लेकिन पत्रपर मीराबहनके स्वाक्षरोंमें “२७ जुलाई, १९३० के" तारीख दी हुई है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगाबहन (बड़ी),
७९. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
परवडा मन्दिर
मौनवार [ २८ जुलाई, १९३०
लगता है कि तुम अब पूर्णतया शान्तचित्त हो। यह बहुत अच्छा हुआ है।
सहज प्राप्त सेवामें पूर्ण सन्तोष मान लेने में ही आत्माका विकास है और वही उसे
पहचाननेका साधन है।
[ गुजराती से ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो ६ गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७५४ से भी सौजन्य :
गंगाबहन वैद्य
चि० प्रेमा,
८०. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
२८ जुलाई, १९३०
तुझे लिखने में मुझे कष्ट नहीं होता । तेरा निदान ठीक है। हिन्दुस्तानके प्रश्नोंको
सुलझाने में मुझे जितना रस आता है, उससे भी ज्यादा आश्रम-सम्बन्धी और उनमें
भी बहनोंके प्रश्न सुलझाने में आता है। क्योंकि उनमें बड़े प्रश्नोंको सुलझानेकी चाबी
छिपी रहती है। जैसा पिण्डमें वैसा ब्रह्माण्ड में ब्रह्माण्डको जानने जायें तो रास्ता
भूलेंगे, परन्तु पिण्ड तो हमारे हाथमें है ।
बाल-वर्ग व्यवस्थित ढंगसे चल रहा दीख पड़ता है।
शीला अब ठीक हो गई होगी।
मैंने जान-बूझकर करेले खानेकी सलाह दी है।
भावनाको सीधे मार्ग पर ले जाया सकता है। उसे सीधे मार्ग पर ले जाना
परमार्थ है। पुरुषार्थ शब्द एकांगी है। और कोई तटस्य शब्द जबान पर आता है ?
धुरन्धर अनासक्तियोग' का अनुवाद जरूर करें।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती ( सी० डब्ल्यू ० ६६७५ ) से सौजन्य : प्रेमावहन कंटक जी० एन०
१०२२७ की फोटो नकलसे भी ।
२. बापुना पत्रो६ गं० स्व० गंगावनने में दी गई तिथिके अनुसार ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगाबहन (बड़ी),
८१. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
यरवडा मन्दिर
२८ जुलाई, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारा कुटुम्ब तो बढ़ रहा लगता है। यह ठीक भी है।
हममें सेवाभाव होगा तबतक तो लोग आते ही रहेंगे।
नाथको खुजली कैसे हुई थी ?
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७५५ से भी । सौजन्य :
गंगाबहन वैद्य
८२. पत्र प्रभावतीको
यरवडा मन्दिर
२८ जुलाई, १९३०
चि० प्रभावती,
तेरा पत्र मिला । मृत्युंजय कहाँ रहता है ? क्या करता है ? माताजी के लिए
राजेन्द्रवावूका वियोग कष्टकर है ? विद्यावतीकी तबीयत कैसी रहती है ?
मैंने अपनी खुराकके बारेमें लिखा था; अभी तक वही ले रहा हूँ। वजन
१०३-४ के बीच रहता है। इसे खराब नहीं कहा जा सकता।
गुजराती (जी० एन० ३३९१ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
१. टा० राजेन्द्रप्रसादकी पत्नी ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० रेहाना,
८३. पत्र : रेहाना तैयबजीको
बिस्मिल्लाह
खुदा हाफिज
यरवदा मन्दिर
२८ जुलाई, १९३०
तेरा गुजराती में लिखा पत्र देखकर तो मैं खुशीसे पागल हो गया। अक्षर भी
अच्छे ही माने जायेंगे और भाषाके बारेमें तो कहना ही क्या। निर्दोष व्यक्तिकी
प्रार्थना भी सार्वजनिक कार्यके बराबर ही नहीं, उससे भी अधिक
अतः यदि तू शरीरसे काम न कर सके तो उससे क्या होता है ?
मत करना । वालिदकी तबीयत तुझे कैसी लगी? ये खुश तो हैं न?
अब कैसी है? तैयबजी परिवारने तो हद कर दी। अम्माजानसे
हँसमुख नम्र चेहरा रोज मेरी आँखोंमें घूमता रहता है।
मुझे फिर पत्र लिखना ।
यदि इस पत्रको पढ़ने में कठिनाई हो तो मुझे लिखना ।
गुजराती (एस० एन० ९६१८ ) की फोटो नकलसे।
चि० मणि (पटेल),
८४. पत्र : मणिबहन पटेलको
काम करती है।
इस बातका दुःख
श्रीमती लुकमानी
कहना कि उनका
बापूके आशीर्वाद
यरवदा मन्दिर
२८ जुलाई, १९३०
तेरे पत्रकी प्रसादी कई सप्ताह में मिली । तू काममें लगी है, अच्छा कर रही है और
तुझे वांछित कार्य मिल गया, यह तो जानता हूँ। फिर भी तेरे पत्रकी अपेक्षा रखता हूँ।
खूब जियो, खूब सेवा करो ।
चि० मणिबहन पटेल
श्रीराम मैन्शन
सैंडहर्स्ट रोड, बम्बई
[ गुजरातीसे ]
बाधुना पत्रो-४ : मणिबहेन पटेलने
१ व २. मूलमें ये शब्द उर्दूमें हैं।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८५. पत्र : शूरजी वल्लभदासको
भाईश्री शूरजी वल्लभदास,
परवडा मन्दिर
२९ जुलाई, १९३०
आपका अंग्रेजीमें लिखा पत्र तथा पुस्तक मिली। गुजराती पत्र अभी तक नहीं
मिला। प्रस्तावना यहाँसे लिखकर भेजनेकी अनुमति देनेका सुपरिटेंडेंटको तो अधिकार
ही नहीं है। सुपरिटेंडेंटको सरकारसे पूछना होगा और सरकार इसकी कदापि अनु-
मति नहीं देगी। यदि आपको सरकारसे पूछना उचित जान पड़े तो आप पूछ देखें ।
श्री शूरजी वल्लभदास
२२० २३०, शेख मेमन स्ट्रीट
बम्बई
गुजराती (जी० एन० ४०९४ ) की फोटो नकलसे ।
मोहनदासके आशीर्वाद
८६. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको
भाई घनश्यामदासजी,
परवडा मन्दिर
२९ जुलाई, १९३०
पत्र दे देते हैं। तो भी इंग्रेजीमें
अच्छा हि हुआ क्योंकि किसीको
आपका पत्र मीला है। अब तो करीब २ सब
लिखा वही अच्छा किया। पुने नहि आये वह तो
मिलनेका होता हि नहि है। जिस शरतसे मुलाकात करने देते हैं मुझे कबूल नह
है इसलिये एक हि मुलाकात आज तक हुई है। दूसरी होनेका संभव नहि है। मुझे
इसका कोई दुःख नहि है। वस्तुतः कैदीको कुछ हक तो है हि नहि । कैद एक प्रकार
का भावमृत्यु है और कैदका यहि अर्थ हो सकता है।
स्वप्नका बयान पढ़कर में खूब हसा यह स्वप्न प्रेमकी निशानी है। अपरिचित
लोगोंके लिये हमको स्वप्न नहीं आते हैं।
मेरा स्वास्थ्य अच्छा है। यहांका पानी हि ऐसा है जिससे कुछ बंधकोष सा
रहता है। परंतु उससे कोई उपाधि नहि है ।
जब तकली कोई-कोई बखत चलाते हैं तो नियमबद्ध क्यों न चलाई जाय ?
मैंने अनुभव किया है कि जो चीज हम अनियमित करते हैं उसीको यदि नियमबद्ध
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीकी
५७
कर दी जाय तो उसकी किम्मत सौगुनी तो अवश्य बढ़ जाती है। सारा जगत्
नियमके बशमें है। ऐसे अनुभवोंसे 'अव्यवस्थित चित्तानाम् प्रसादोपि भयंकर:' जैसे
वचनकी उत्पत्ति हुई है।
खादी प्रवृत्तिका बयान सुन कर हर्ष हुआ। आपके पुत्रको अब तो बिलकुल
आराम होगा ।
आपका स्वास्थ्य कैसा रहता है ? क्या खाते हैं ? मेरा खोराक दूध दही मनक्का,
खजूर और खट्टे लिंबु है। लिंबुका रस सोडाके साथ पी जाता हूं अथवा गरम पानी
और नमकके साथ ।
भाई मनमोहन गांधीसे कहना उनका पुस्तक
पुस्तक पढ़नेका समय बहोत कम रहता है। जितनी
कातने धुननेमें दे देता हूँ ।
मिल गया है और खत भी ।
शक्ति है
करीब सबकी सब
सी० डब्ल्यू० ६१८६ से सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला
८७. पत्र : नारणदास गांधीको
आपका,
मोहनदास
२८/३१ जुलाई, १९३०
चि० नारणदास,
तुम्हारा पत्र मिला। काकासाहब बताते हैं कि तुम जिस स्याहीसे लिखते हो
वह लिखे गये कागज परसे फूट निकलती है। इसलिए दोनों तरफ लिखनेसे वह पढ़ा
नहीं जाता। यह बात सच है। जब ऐसा हो तो कागजके एक ही ओर लिखना ठीक
होता है।
इस बार पत्र ठीक बँधे हुए थे। ये लिफाफे सँभाल कर रख रहा हूँ। जरूरत
होगी तो इनका उपयोग कर लूँगा । रुई मिल जानेके बारेमें लिख चुका हूँ। पीज
तो आज ही सका हूँ। बरसात के कारण बहुत नमी थी। चरखा चलाने में मेहनत
नहीं पड़ती; देर तक बैठनेमें पड़ती है। धीरे-धीरे कोई युक्ति निकल आयेगी ।
आसानीसे हार नहीं मानूंगा। इसमें विचारमें पड़ जाने की कोई बात नहीं। बाहर में
चार-पांच घंटे चरखा चलाने कहाँ बैठता था ?
केशुकी उँगली ठीक हो गई होगी। क्या बालकृष्णका स्वास्थ्य चौकीदारी करने
के लायक है ? शरीर पर बलात्कार न करे।
हम दोनोंकी तबीयत ठीक है। काकासाहब का वजन कमानीदार तराजू पर
१०९ हो गया है। कामकाजके सम्बन्धमें जितना चलना पड़ता है, उसे मिलाकर
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/९६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५८
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
रोज ८ मील जरूर चल लेते होंगे। कताईमें जो परिश्रम करते हैं सो अलग। खुराक
तो अभी वही है।
मैंने जिनको पत्र नहीं लिखा है, लेकिन जो इसकी आशा करते हैं ऐसे कोई
भाई-बहन हों तो उनके नाम लिखना । रमावहन ( रणछोड़भाईवाली) का पत्र आना
चाहिए था। उसे तो मेरा पत्र मिल ही गया होगा ।
अब अहिंसा के बारेमें ।
मंगल प्रभाव
इस लेखका आरम्भ मनोरंजक और दुखद है। कपड़े लिफाफेको किस तरह
बचायें और उसीको बार-बार किस तरह इस्तेमाल करें, इसका विचार हम दोनोंके
बीच हुआ था। सवाल यह था पूरे कवर पर कोरा कागज चिपकायें या जहाँ-जहाँ
लिखा हो वहीं कागजका टुकड़ा चिपकायें। यह संवाद निरर्थक था। उसमें प्रार्थनाके
बादके सुन्दर समयके १५ मिनट बेकार गये। परिणाम में हमारी मूर्खता सिद्ध हुई ।
इसमें सत्य, अहिंसा और विवेककी हानि हुई। सत्यको चोट लगी; क्योंकि इस संवाद-
के पीछे सत्यके शोधका उत्साह न था । अहिंसाका मुँह मलिन हुआ, क्योंकि जिसका
प्रत्येक क्षण वर्तमान दुखोंके दर्शन करनेमें और उनके उपायोंका ध्यान करनेमें जाना
चाहिए, उसने १५ मिनटका अमूल्य समय निरर्थक संवादमें गँवा दिया। विवेकका
पालन नहीं किया क्योंकि सारासारका विचार किया होता तो यह संवाद एक क्षण
भी न चल पाया होता। प्रजाके १५ मिनट चोरी करनेके बाद दोनोंने अपनी मूर्खता
को समझा और सावधान कर देनेके लिए प्रभुका आभार माना ।
यह प्रस्तावना मैंने जान-बूझकर दी है।
सत्यका, अहिंसाका मार्ग जितना सीवा है उतना ही संकरा है। दोधारी तलवार
पर चलने जैसा है। नट जिस डोरी पर एक नजर टिका कर चल सकता है, सत्य
और अहिंसाकी डोरी उससे भी सूक्ष्म है। जरा असावधान हुए नहीं कि नीचे गिरे ।
प्रतिक्षण साधना करनेसे ही उनके दर्शन हो सकते हैं।
किन्तु सत्यका सम्पूर्ण रूपसे दर्शन तो इस देहसे कर पाना सम्भव नहीं है।
उसकी कल्पनामात्र की जा सकती है। क्षणभंगुर देह द्वारा शाश्वत धर्मका साक्षात्कार
सम्भव नहीं। इसलिए अन्तमें श्रद्धाका उपयोग तो करना ही पड़ता है।
इसीलिए जिज्ञासुके हाथ अहिंसा लगी। मेरे मार्ग में जो मुसीबतें आयें उन्हें
सहन करूँ या उनके कारण थोड़ा-बहुत जो कुछ नाश करना ही पड़े उतना करता
जाऊँ और अपना मार्ग तय करूँ ? यह प्रश्न जिज्ञासुके सामने उपस्थित हुआ। जो
नाश करते हुए चलता है, उसका मार्ग तय नहीं होता; वह तो जहां है वहीं बना
रहता है; ऐसा उसने देखा। यदि संकट सहन करता है, तो वह आगे बढ़ता है।
पहले ही नाश-कर्मके समय उसने देखा कि वह जिस सत्यकी शोध कर रहा है वह
बाहर नहीं, अन्तरमें है इसलिए जैसे-जैसे वह किसी वस्तुका नाश करता है, वैसे-
वैसे पीछे हटता जा रहा है, सत्य उससे दूर होता जा रहा है।
हमारे यहाँ चोर उपद्रव करते हैं, उससे बचने के लिए हमने उन्हें दण्ड दिया।
उस समय वे वहाँसे तो जरूर भाग गये; लेकिन दूसरी जगह जाकर हमला कर
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
५९
इसलिए हम तो अँधेरी गलीमें भटक
क्योंकि उन्होंने तो चोरी करना कर्त्तव्य
दिया। दूसरी जगह भी तो हमारी ही है;
गये। चोरोंका उपद्रव बढ़ता ही जा रहा है;
मान लिया है। हमने देखा कि इससे तो अच्छा यह है कि चोरोंका उपद्रव सहन
करें। ऐसा करेंगे तो धीरे-धीरे चोरको भी समझ जायेंगे। इतना सहन करके हम
देख पाते हैं कि चोर हमसे जुदा नहीं है। हमारे तो सभी सम्बन्धी हैं। उन्हें दण्ड
नहीं दिया जा सकता। किन्तु उपद्रव सहन करते जायें, इतना ही काफी नहीं
है। उससे तो कायरता आती है। इसलिए हमने अपना दूसरा विशेष धर्म भी देखा।
चोर हमारे सगे-सम्बन्धी हों तो उनमें भी हमें यही भावना पैदा करनी चाहिए।
इसलिए हमें उन्हें अपनानेके लिए उपाय खोजनेकी पूरी तरह मेहनत करनी है। यह है
अहिंसाका मार्ग। इसमें उत्तरोत्तर दुख सहन करनेकी बात ही आती है। अटूट धीरज
सीखनेकी ही बात उठती है। और यदि वह हो तो अन्तमें चोर साहूकार बन जाता
है। हमें सत्यके और भी ज्यादा दर्शन होते हैं। ऐसा करते हुए हम जगतको अपना
मित्र बनाना सीखते हैं। ईश्वरकी, सत्यकी महिमा और ज्यादा महसूस करते हैं, संकट
सहन करते हुए भी शान्ति और सुखमें वृद्धि होती है। हममें साहस और हिम्मतके गुण
बढ़ते हैं। हम शाश्वत और अशाश्वतका भेद और अच्छी तरह समझ पाते हैं। हमें
कर्त्तव्य-अकर्त्तव्यका ज्ञान होता है। अभिमान दूर होता है, नम्रता बढ़ जाती है। परिग्रह
सहज ही कम हो जाता है। और देहमें भरे हुए दोष नित्य कम होते जाते हैं।
अहिंसाको जिस स्थूल रूपमें हम आज देखते हैं, अहिंसा वैसी स्थूल नहीं है।
किसीको न मारें, यह तो अहिंसा है ही; किन्तु कुविचार-मात्र हिसा है। उतावली हिंसा
है, मिथ्या भाषण हिंसा है, द्वेष हिंसा है, किसीके अहितकी कामना हिंसा है जिसकी
जरूरत जगतको है उसपर अधिकार कर लेना भी हिंसा है। किन्तु हम जो खाते
हैं, जगतको उसकी जरूरत है। जहां खड़े होते हैं वहाँ सैकड़ों सूक्ष्म जीव पड़े हैं
और उन्हें इससे कष्ट होता है। वह जगह उनकी है। तब फिर क्या आत्महत्या
कर लें ? उपाय यह नहीं है। देहके मोहका विचार पूरी तरह छोड़ दें तो अन्तमें
देह हमें छोड़ देगी। यह उस सत्यनारायणका जागृत स्वरूप है। यह दर्शन अर्धयंसे
नहीं हो सकता। देह हमारी नहीं, वह तो हमें मिली हुई धरोहर है, ऐसा समझ
कर उसका जो उपयोग कर सकें सो करते हुए अपना मार्ग तय करते जायें।
मुझे लिखना तो था सरल, पर लिख गया कठिन बात तो भी जिसने अहिंसा
के बारेमें जरा भी विचार किया होगा, उसे यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी
चाहिए।
इतना सब जान लें अहिंसाके बिना सत्यकी शोध असम्भव है अहिंसा और
सत्य एक दूसरेसे उसी तरह संलग्न हैं जैसे एक सिक्के के दो पहलू या कहो किसी
चिकनी फिरकीके दो पहलू उनमें सीधा किसे कहें और उलटा किसे कहें ? | तो
भी अहिंसाको साधन मानें और सत्यको साध्य । साधन अपने हाथकी बात है, इसीसे
अहिंसा परम धर्म हुआ। सत्य ईश्वर हुआ। साधनकी चिन्ता करते रहेंगे तो किसी
दिन साध्यके दर्शन तो होंगे ही। इतना निश्चय किया तो मानो जगको उस हदतक
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
जीत लिया। हमारे मार्गमें चाहे जो संकट आयें, बाह्य दृष्टिसे देखते हुए हमारी चाहे
जितनी हार होती दिखाई पड़े, तो भी हम विश्वास न छोड़ें और एक यही मन्त्र जपें
कि सत्य ही सब कुछ है; वही ईश्वर है, उसका साक्षात्कार करनेका एक ही मार्ग है,
एक ही साधन है और वह है अहिंसा में उसे कभी न छोड़ेंगा। जिस सत्य रूपी
ईश्वरके नाम यह प्रतिज्ञा की है, वही इसका पालन करनेका बल दे ।
[ पुनश्च : ]
५७ पत्र हैं।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती ( एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
८८. टिप्पणी : मु० रा० जयकरको '
२ अगस्त, १९३०
(१) श्री गांधीको ऐसी कोई संवैधानिक योजना स्वीकार्य नहीं होगी जिसमें
एक धारा ऐसी न हो जिसमें भारतको अपनी इच्छा पर साम्राज्यसे अलग होने का
अधिकार न दिया गया हो, और एक दूसरी धारा ऐसी न हो जिसमें भारतको उनके
ग्यारह सूत्रोंको कार्यान्वित करनेका अधिकार और शक्ति न दी गई हो।
(२) वाइसराय महोदयको श्री गांधीकी इस स्थिति से अवगत करा देना चाहिए
ताकि बाद में जब गोलमेज सम्मेलनमें श्री गांधीके इन विचारोंको आगे रखा जाये
तो वाइसराय ऐसा न मानें कि वह इन विचारोंसे सर्वथा अनभिज्ञ थे और उनके
लिए तैयार नहीं थे। वाइसरायको इस बात से भी अवगत करा देना चाहिए कि
गोलमेज सम्मेलनमें श्री गांधी उस धारा पर आग्रह करेंगे जिसमें भारतको इस बातका
अधिकार दिया गया हो कि विगतकालमें अंग्रेजोंको जो सम्पत्ति और रियायतें दी
गई थीं उनकी जांच वह एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण द्वारा करा सके।
[ अंग्रेजीसे ]
हिन्दू, ५-९-१९३०
१. ३१ जुलाई, तथा १ और २ अगस्तको मु० रा० जयकरने गांधीजीसे फिर भेंट की। इस अवसर पर
गांधीजीने उक्त टिप्पणी बोलकर लिखवाई थी, जिसके आधारपर वाइसरायसे आगे बातचीत होनी थी।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० वसुमती,
८९. पत्र : वसुमती पण्डितको
यरवडा मन्दिर
२ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र मिला। सिर्फ सेवाकी खातिर जहाँ सरदारी करना आवश्यक हो
वहाँ हमें सरदार बनकर भी काम चला लेना चाहिए। श्रद्धा भले ही कर्त्ताके कारण
उत्पन्न हुई हो किन्तु उस श्रद्धाको कार्य पर केन्द्रित कर देना चाहिए। तभी हम
निश्चिन्त हो सकेंगे। कर्ता क्षणभंगुर है, निमित्त मात्र है। कार्य शाश्वत है। अब
[ राजा] हरिश्चन्द्र कहाँ है ? किन्तु सत्य तो सदा रहा है, अब है और भविष्य में
भी रहेगा। हरिश्चन्द्रको जो अमरपद मिला वह सत्य कार्यके द्वारा मिला है। सत्य
तो हरिश्चन्द्रके पहले भी था । हरिश्चन्द्र तो निमित्त मात्र थे। अन्य दृष्टान्तोंकी
सहायतासे इस विचारको अपने मनमें जमा लोगी तो निराशारूपी डाइन निश्चय ही
भाग जायेगी।
गुजराती (एस० एन० ९२९८ ) की फोटो नकलसे।
चि० प्रेमा,
९०. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
२ अगस्त, १९३०
निर्दोष अर्थात् स्वप्नरहित नींदके लिए जाग्रत अवस्थामें हमारे आचार-विचार
निर्दोष होने चाहिए। निद्रावस्था जाग्रतावस्थाकी स्थितिको जाँचनेका दर्पण है। भावना
को गलत मार्गपर जानेसे रोकनेकी शक्ति हम सबमें होती ही है। यह उत्कृष्ट प्रयत्न
है। इस प्रयत्नमें पराजयके लिए कोई स्थान नहीं है।
कृष्णकुमारी कमलाबहूनसे किस बातमें अलग दिखाई देती है ?
यहाँ बादल तो पिछले डेढ़ महीनेसे छाये हुए हैं, लेकिन बरसात बहुत कम
होती है। लेकिन अहमदाबाद में सामान्यतया जितनी बारिश होती है उससे यहाँ बहुत
कम नहीं होती।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
कृष्ण नायरको मेरा आशीर्वाद देना और कहना कि कैदियोंको पत्र न लिखनेके
लिए मैं अधिकारियोंसे वचनबद्ध हूँ । उससे मुझे बड़ी आशाएँ हैं।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६७६ ) से सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२२८ की फोटो नकलसे भी ।
९१. पत्र : कमलनयन बजाजको
यरवडा मन्दिर
२ अगस्त, १९३०
चि० कमलनयन,
तेरा पत्र मिला । मेरे गुजराती अक्षर पढ़ सकेगा क्या? यदि नहीं पढ़ पायेगा
तो मैं हिन्दी में लिखूंगा। जिस प्रकार तूने इस बार मुझे पत्र लिखा, वैसे ही लिखते
रहना । जो कोई पिताजीसे मिलने जाये वह उनसे कहे कि वे अपना वजन बढ़ाकर
बाहर आयें।
तुझे साफ और सुन्दर अक्षर लिखने चाहिए। तुझे अपना स्वास्थ्य खूब अच्छी
तरह सुधार लेना चाहिए।
काकासाहब के आशीर्वाद ।
ओम कहाँ है ? मदालसासे पत्र लिखनेको कहना । कमला और रामेश्वरको पत्र
लिखनेके लिए कहना ।
[ पुनश्च : ]
राधाकिशन कहाँ है ? वह कैसा है ?
गुजराती (जी० एन० ३०४४) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>९२. पत्र : शारदा सी० शाहको
यरवडा मन्दिर
३ अगस्त, १९३०
चि० शारदा (बबु),
तेरे पत्र नियमित रूपसे मिलते रहते हैं। तू जो कुछ लिखे उसे दुहानेकी
आदत डाल लेनी चाहिए। पत्रको दुहराये बिना उसे पूरा हुआ कभी नहीं समझना
चाहिए। चिमनलालसे मुझे लिखनेको कहना। अब दमा तो नहीं उखड़ता न ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ९८८६ ) से । सौजन्य: शारदाबहन जी० चोखावाला
चि० कुसुम (देसाई),
९३. पत्र : कुसुम देसाईको
३ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र मिला। किसीके शुभ प्रयत्न आजतक व्यर्थ नहीं गये । इन्दुलालके'
बारेमें निश्चित समाचार तो पहले तू ही दे रही है। अच्छा हुआ।
सबके साथ तु अच्छी तरह पत्र-व्यवहार रख रही है। सुशीला (पंजाबन ) को
पत्र लिखती है? यदि उसका पता जानती हो तो उससे कहना कि वह मुझे लिखे ।
वह क्या कर रही है ?
सबको यथायोग्य |
गुजराती (जी० एन० १८०१ ) की फोटो नकलसे।
१. इन्दुलाल पाक्षिक
बापूके आशीर्वाद
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>९४. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
३ अगस्त, १९३०
चि० भगवानजी,
तुम्हारा पत्र मिला । मणिबन जबतक बाह्य नियमोंका पालन करती है तबतक
उसे छोड़नेके लिए नहीं कहा जा सकता। तुम व्यर्थ ही चिन्ता करते हो । -उसका
जो पतन हुआ हो उसमें तुम्हारा भी पूरा भाग था, यह जानकर धीरज धरो । पूरा
भाग इसलिए था क्योंकि तुमने सन्तानोत्पत्ति सम्बन्धका पूरी तरहसे त्याग नहीं किया
था। जबतक पुरुष स्त्रीके साथ विकारी सम्बन्ध रखता है तबतक यदि स्त्री किसी
अन्यके प्रति विकारवश हो तो वह क्षंतव्य माना जाना चाहिए, ठीक उसी तरह जिस
तरह स्त्री अपने पति के सम्बन्धमें सहन करती है।
जब वह सम्बन्ध खत्म हो जाये तब अगर स्त्री व्यभिचार करे तो पुरुषको
उसे अलग कर देना चाहिए और आवश्यक हो तो उसका भरण-पोषण करना चाहिए।
शान्त होता । भजन अच्छा है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२२ ) से सौजन्य भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
९५. पत्र : मीराबहनको
परवडा मन्दिर
४ अगस्त, १९३०
चि० मीरा,
मैं इस सप्ताह संक्षिप्त पत्र लिखना चाहता हूँ। इसका कोई विशेष कारण
नहीं है। तथ्य तो यह है कि सामान्य पत्र काफी लम्बा है।
मैं आशा करता हूँ कि सफरके दौरान तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक रहा है।
मुझे खुशी है कि तुम परशुरामसे मिली। पता नहीं उसे मेरा पत्र मिला था
कि नहीं।
तुम्हारा चरखा पहलेसे ज्यादा अच्छा काम कर रहा है। आज मैंने एक घंटे में
१६० से ज्यादा तार काते। मैंने धुनकीको नये ढंगसे लगाया है और इससे वह ज्यादा
अच्छा काम करती है। मैं दिनोंदिन महसूस करता हूँ कि कताईमें गति लानेके लिए
१. मीराबहन ने खादी कार्यके सिलसिले में व्यापक दौरा किया था।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
६५
लिए अच्छी पूनियाँ अत्यावश्यक हैं। यह आश्चर्यकी बात है कि हर तफसील पर
ध्यान देना कितना महत्त्वपूर्ण है ।
स्वास्थ्य ठीक चल रहा है।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०५ ) से । सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ८६३८से भी ।
चि० गंगाबहन (बड़ी),
९६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
यरवडा मन्दिर
४ अगस्त, १९३०
तुम्हारे अक्षर अच्छे होते जा रहे हैं। जिस तरह सूत अच्छा कातें तभी माना
जाता है कि हमने कताई की है, वैसा ही लिखाईके बारेमें भी है। चाहे एक ही
पंक्ति लिखें पर साफ लिखी हो। जहाँ हर सांस ईश्वर प्रीत्यर्थ लेना है, वहाँ तो
छोटेसे छोटा काम भी इस तरह करें कि वह शोभा बढ़ानेवाला हो ।
बहुत करके तो वह काकासाहब से मिल ही सकेगा, ऐसा मैंने बाल को लिखा है।
तुम्हारे भेजे हुए कपड़े मिल गये हैं।
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो ६: गं० स्व० गंगाबहेन ने सी० डब्ल्यू० ८७५६ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
९७. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
यरबडा मन्दिर
४ अगस्त, १९३०
चि० मनु,
तेरा पत्र हम दोनोंको अच्छा लगा तेरे काममें निश्चयात्मकता तो है ही,
इसलिए तू जो काम करेगा वही चमक उठेगा। जब शंकर छूटे तो कहना कि मैं
उसके विस्तृत पत्रकी प्रतीक्षामें हूँ ।
गुजराती (जी० एन० ७७५९ ) की फोटो नकलसे ।
४४-५
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१०४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० रुक्मिणी,
९८. पत्र : रुक्मिणी बजाजको
परवडा मन्दिर
४ अगस्त, १९३०
आश्रम पहुँच जानेके बाद तुझे क्या दो पंक्तियाँ लिखनेकी फुरसत भी नहीं
मिली? क्या तेरा चित्त शान्त है, क्या तू सन्तुष्ट और सुखी है? यदि तू इतना
लिख सके तो मुझे सन्तोष हो ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९३१२ ) से सौजन्य : बनारसीलाल बजाज
1
९९. पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको
यरवडा मन्दिर
४ अगस्त, १९३०
चिo व्रजकिसन,
तुमारे खतकी मैं राह देख रहा था -- • देवदास कृष्ण नेर इ० कैदीयोंको में
पत्र न लीखुं ऐसा संकेत हुआ है- • सब को मेरे आशीर्वाद कहो
चित प्रसन्नता कभी मत छोड़ो, जो कर्तव्य हाथमें आ जाये उसीको करो।
शरीरको अच्छा रखो और चिंता छोड़नेसे अच्छा रहेगा भी ।
जी० एन० २३८३ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
२. यह मूलमें अस्पष्ट है। सम्भवतः कृष्ण नायर है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१००. पत्र : एक आश्रमवासीको
[५ अगस्त, १९३० से पूर्व ]
२ जेल जानेकी तैयारी करना हमारा कर्त्तव्य है किन्तु जेल जानेकी इच्छा
करना मोह है। . जिसे अपने जिस काममें ढिलाई नजर आये उसे अपना वही
काम [ अधिक ] करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति यथाशक्ति कार्य न करे, तो वह चोर
माना जायेगा और हमने तो चोरी न करनेका व्रत लिया है। जो व्यक्ति काम तो
करता हो किन्तु उसे भली-भांति न करता हो तो वह भी चोर माना जायेगा। यदि
हमारी मनोवृत्ति शुद्ध होगी तो हम आखिरकार काम करने ही लगेंगे। प्रतिदिन प्रातः
और रातको सोते समय ईश्वरसे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे प्रभु! मेरा आलस्य
दूर करो, मेरी मनोवृत्तिको शुद्ध करो तथा मुझे अच्छा बननेकी शक्ति दो ।
गुजराती (एस० एन० १६८६५ ) से ।
१०१. पत्र : नारणदास गांधीको
यरवडा मन्दिर
३ / ५ अगस्त, १९३०
चि० नारणदास,
हाथमें इतनी तकलीफ होते हुए भी तुमने पत्र लिखा, इसकी जरूरत नहीं थी ।
जरूरी लगा था तो राधा आदि किसीसे लिखवा लेना था। तुम्हारा चरखा यश इस
स्थिति में भी चालू रह सका, यह प्रभुकी कृपा है। क्या करते हुए हाथ फिसल गया ?
अबतक तो बिलकुल ठीक हो गया होगा ।
हमारी रोटी कैसे बनती है, यह पकानेवालेसे लिखवा कर भेजना। खमीर कैसे
बनाया जाता है ? और कितने आटेमें कितना खमीर डालता है ? आटा कब गंधा
जाता है, गूंधनेके बाद कितनी देर रहने दिया जाता है, आदि सब जानकारी लिख
भेजना। जहाँ हम हैं वहीं रोटीकी भट्टी है। मैदेकी रोटी तो वे अच्छी बना लेते हैं ।
किन्तु हमारे जैसा खमीरदार आटा तैयार न कर पानेसे उनके आटेकी रोटी ठीक
फूलती नहीं है, इसलिए मुझसे पूछ रहे थे । इसे प्रकाशित करनेकी जरूरत नहीं है।
मीराबहनका पत्र देरसे पहुँचा, यह परवशताका सूचक है। जबतक बज पाये
तबतक इस बीनको बजाते रहना है। इसलिए पत्र बन्द कर दिये जायें तो इसमें
१. ५.८-१९३० की आश्रम पत्रिकासे ।
२ व ३. साधन-सूत्र में ये अंश छोड़ दिये गये है।
४. एक गुजराती कहावत
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१०६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
कोई आश्चर्य नहीं । आत्म-सम्मानकी रक्षा करते हुए जबतक लिख सकूंगा, लिखता
रहूँगा । बाकी कैदी पत्र में लिख ही क्या सकता है? कैदीको बाह्य अधिकार तो कोई
है ही नहीं। यह उसे तथा उसके सम्बन्धियोंको जान लेना चाहिए। किन्तु हम दोनों
तो मजे में ही हैं।
बहनका किस्सा दुःखद है। मुझे ऐसी घटनाओंसे अब आश्चर्य तो नहीं
ही होता। हमारे प्रयोगोंमें ऐसे जोखिम तो रहते ही है। • बहन आदिको लिखे
मेरे पत्र तो तुम देखोगे ही, इसलिए मुझे यहाँ और कुछ लिखनेकी जरूरत नहीं है।
हम ऐसे समय पूर्ण उदारतासे काम लें। छुपे पापका एकमात्र साक्षी तो ईश्वर है।
जिसका पाप प्रकट हो गया हो उसे हम कभी लज्जित न करें। हमें जो सूझे वह धर्म
उसे सुझाकर फिर ईश्वर पर छोड़ दें। तुमने . बहनको छुट्टी नहीं देकर
ठीक ही किया। मेरी आशा तो यह है कि
बहन और
आँखोंसे पर्दा हटेगा ।
'दोनोंकी
भाई अमीदासको अपनेमें विश्वास हो और प्रयोगकी जानकारी हो तो बीचमें
पड़नेकी आवश्यकता नहीं है। मुझे तो यही लगता है कि ७२ पौंड वजन बहुत
कम माना जायेगा । एक खजूर ही काफी नहीं है। लगता है कि दही अथवा दूध
साथमें लें तो कोई हानि नहीं। यह उन्हें पढ़ा देना। अनुभव न हो तो मेरी सलाह
मानें। ठण्ड लगे तो हठपूर्वक कपड़ा ओढ़ना न छोड़ें। ठण्ड न लगे तो खुले बदन
रहने में भी कोई हानि नहीं है। मुझे पत्र लिखनेके लिए कहना ।
दामोदरदास को रक्तस्राव होता रहे तो उसे पंचगनी जैसी जगह ले ही जाना
चाहिए। ठीक हो जाये तो सुविधानुसार लौट आये। मेरा अनुभव है कि ऐसा बीमार
साबरमतीकी जलवायुमें ठीक नहीं हो पाता। स्वास्थ्य एकदम बिगड़नेके बाद पंचगनी
आदि स्थानों पर जायें उससे अच्छा यह है कि शरीरमें शक्ति रहते अभी जायें और
फिर थोड़े समय में स्वस्थ होकर साबरमती लौट आयें।
गिरिराजके बारेमें उसको जो पत्र लिखा है उसमें पढ़ लेना ।
जमनालाल, किशोरलाल आदिको लिखना कि मैं दूसरे कैदियोंको न लिखूं, यह
बन्धन है। किशोरलालका पत्र मिल गया है। उसका भोजन सम्बन्धी प्रयोग सफल
हो जाये तो मुझे ईर्ष्या होगी। रमणीकलाल का मामला तो बहुत ही अच्छा रहा ।
उसे भी मैं नहीं लिख सकता। नरहरिको लिखना कि उसपर ईश्वरके चार हाथोंकी
छाया है, नहीं तो ऐसे सेवाकार्यका अवसर बार-बार क्यों मिलता रहता है।
मुझे बाँसका चरखा भेजनेसे किसी लाभकी सम्भावना नहीं दिखती। कताईके
काममें तो मैं मूर्ख और निरा विद्यार्थी ही हूँ। उसके प्रति भक्ति है, उद्यम है, सतर्क
हूँ तो भी गति नहीं बढ़ा पाता। इसमें चरखेका दोष क्यों निकालें ? मेरी मूर्खता
कहाँ है, यह में नहीं देख पाया हूँ। बाहर था तब मुझे बतानेकी हिम्मत किसीको
नहीं होती थी । १६० तार कत जाते थे इसलिए मैं सन्तोष करके बैठ जाता था।
१ से ५. नाम नहीं दिये गये है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१०७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: नारणदास गांधीको
६९
इस तरह गति बढ़ानेकी ओर जितना ध्यान देना चाहिए था उतना नहीं दिया ।
अपना यह दोष मुझे अब दिखाई देता है। किन्तु मूर्खके मस्तक पर सदा " देरी " की
पर्ची चिपकी होती है। अब यदि बाँसका चरखा भेजने को कहूँ तो यह " नौसिखएके
अनेक कलम" जैसा होगा। ऐसा नहीं करना है। अपना किया मैं आप भुगतूं
इसीमें छुटकारा है। मैं धीरे-धीरे देख रहा हूँ। जहाँ सुधार हो सके वहाँ सुधार
लेता हूँ। फिर शरीरमें ज्यादा ताकत आ जाये तो गति जरूर बढ़ा सकता हूँ ।
न बढ़े तो जैसे राम रसे वैसे रहेंगे । अन्तमें दोषके लिए जिम्मेदार तो उसे ही
बनाना है। मेरे यथाशक्ति प्रयत्न करनेके बाद वह मुझे दोष तो नहीं दे सकता ।
इस नियमका अपवाद तो है ही नहीं। और इस नियमका प्रथम और सम्पूर्ण रूपसे
पालन करनेवाला वह स्वयं है। इसलिए हम निर्भय रह सकते हैं। वह इतना महान
होते हुए भी स्वेच्छाचारी बने तो हम तो बिलकुल ही न उड़ जायेंगे ?
मंगल प्रभात
हमारे व्रतोंमें दूसरा व्रत ब्रह्मचयंका है। ठीक तरहसे देखें तो दूसरे सभी व्रत
सत्यके व्रतमें से ही उत्पन्न होते हैं और उसीके सहायक होते हैं। जिस मनुष्यने सत्य
का वरण किया है और उसीकी उपासना करता है वह दूसरी किसी वस्तुकी आरा-
धना करे तो व्यभिचारी ठहरेगा। फिर किसी विकारकी आराधना कैसे की जा सकती
है ? | जिसकी सभी प्रवृत्तियाँ सत्य दर्शनके उद्देश्यसे हैं वह सन्तानोत्पत्ति या गृहस्थीके
झंझटमें कैसे पढ़ सकता है? कोई भोगविलासी सत्यको पा सका है, इसका एक भी
उदाहरण हमारे पास नहीं है।
अथवा अहिंसा-पालनको लें तो उसका पूर्ण पालन ब्रह्मचर्यके बिना असम्भव
है। अहिंसा अर्थात् सर्वव्यापी प्रेम । जहाँ पुरुषने एक स्त्रीको या एक स्त्रीने एक
पुरुषको प्यार किया वहाँ उनके पास दूसरोंके लिए रहा क्या? इसका यही अर्थ
हुआ "हम दोनों पहले और दूसरे सब बादमें।" पतिव्रता स्त्री पुरुषके लिए और
पत्नीव्रती पुरुष स्त्रीके लिए सर्वस्व बलिदान करनेको तैयार होगा। इसलिए वे सर्व-
ब्यापी प्रेमका पालन कर ही नहीं सकते, यह स्पष्ट है। वे सारी सृष्टिको अपना
कुटुम्ब बना ही नहीं सकते, क्योंकि उनके पास अपना माना हुआ एक कुटुम्ब पहले
ही मौजूद है अथवा तैयार हो रहा है। उस कुटुम्बमें जितनी वृद्धि होगी उनके सर्वव्यापी
प्रेममें उतना ही विक्षेप होगा। हम देख सकते हैं कि ऐसा सारे संसारमें हो रहा है।
इसलिए अहिंसा व्रतका पालन करनेवाला विवाह नहीं कर सकता। विवाह के बाहरके
विकारोंका तो पूछना ही क्या ?
तब जिनका विवाह हो गया है उनका क्या हो ? क्या उन्हें सत्य किसी दिन
नहीं मिलेगा ? वे कभी सर्पिण न कर सकेंगे ? हमने उनके लिए रास्ता निकाला
ही है। विवाहित भी अविवाहित जैसे हो जायें। इस दिशामें मुझे इतनी सुन्दर और
किसी बातका अनुभव नहीं हुआ। इस स्थितिका आनन्द जिन्होंने लूटा है वे साक्षी
दे सकेंगे। आज तो कह सकते हैं कि यह प्रयोग सफल सिद्ध हुआ है। विवाहित
स्त्री-पुरुष एक दूसरेको भाई-बहन मानने लगें तो इस तरह सभी जंजालोंसे मुक्त हो
Gandhi
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१०८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
जायें। जगतमें सभी स्त्रियां बहनें हैं, माताएँ हैं और बेटियाँ हैं। यह विचार ही
मनुष्यको एकदम ऊँचा ले जानेवाला है और बन्धनसे मुक्त करनेवाला बन जाता है।
इसमें पति-पत्नी कुछ खो नहीं बैठते बल्कि अपनी पूँजीमें वृद्धि करते हैं, कुटुम्बमें वृद्धि
करते हैं। विकार रूपी मैल निकाल देनेसे प्रेम भी बढ़ता है। विकार चले जानेसे
एक-दूसरेकी सेवा ज्यादा अच्छी हो सकती है। आपसी क्लेशका अवसर कम हो जाता
है। जहाँ प्रेम स्वार्थी है, एकांगी है, वहां क्लेशका ज्यादा अवकाश रहता है।
ऊपरके प्रधान विचार पर मनन करने तथा उसे हृदयमें उतार लेनेके बाद
ब्रह्मचर्य से होनेवाले शारीरिक लाभ, वीर्य लाभ आदि बहुत गौण हो जाते हैं। जान-
बूझकर भोगविलासकी खातिर वीर्यहानि करने तथा शरीरको निचोड़नेको कैसी मूर्खता
माना जायेगा ? वीर्यका उपयोग दोनों की शारीरिक और मानसिक शक्तिको बढ़ानेके
लिए है। विषय-भोग में उपयोग करना उसका दुरुपयोग है। और उसके कारण अनेक
रोग जड़ पकड़ते हैं।
इस ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और कायासे करना चाहिए। व्रतमात्र के लिए
यही समझें। जो शरीरको काबू में रखता दिखाई देता है किन्तु मनसे विकारोंका पोषण
करता है वह मूक मिथ्याचारी है, ऐसा हमने 'गीता' में पढ़ा है।' सबने अनुभव भी
किया होगा। मनको विकारी रहने देनेमें और शरीरको दबाने के प्रयत्नमें नुकसान ही है।
जहाँ मन है वहाँ अन्ततः शरीर भी जबरदस्ती चला जाता है। यही एक भेद समझ
लेनेकी आवश्यकता है। मनको विकारवश होने देना एक बात है। मन अपने-आप
अनिच्छासे या जबरदस्ती विकारवश हो जाये या हुआ करे, यह अलग बात है। इन
विकारोंमें हम सहायक न हों तो अन्तमें जीत ही है। शरीर हाथमें रहता है किन्तु
मन नहीं रहता, ऐसा हम हर क्षण अनुभव करते हैं। इसलिए शरीरको तुरन्त काबू में
करके मनको नित्य काबू में रखनेका प्रयत्न करें तो इस तरह हमने कर्त्तव्य पालन कर
लिया। हम मनके वशमें हो जायें तो शरीर और मनका विरोध शुरू होगा और
मिथ्याचारका आरम्भ हो जायेगा। जबतक मनोविकारोंको दबाते ही रहेंगे तबतक मन
और शरीर दोनों साथ-साथ चल रहे हैं, ऐसा माना जायेगा ।
इस ब्रह्मचर्य व्रतका पालन बहुत कठिन, लगभग असम्भव माना गया है। उसके
कारण ढूंढ़ते हुए यह देखा गया है कि ब्रह्मचर्यका बहुत संकुचित अर्थ किया गया
है। जननेन्द्रिय-विकारका निरोध ही ब्रह्मचर्य का पालन माना गया है। मुझे लगता
है कि यह अधूरी और सदोष व्याख्या है। विषयमात्रका निरोध ही ब्रह्मचर्य है।
जो दूसरी इन्द्रियोंको यहाँ-वहां भटकने दे और एक ही को रोकनेका प्रयत्न
करे वह निष्फल प्रयत्न कर रहा है। इसमें क्या शक है ? कानसे विकारपूर्ण बातें
सुने, आँखसे विकार उत्पन्न करनेवाली वस्तु देखे, जीभसे विकारोत्तेजक वस्तुका स्वाद
ले, हाथसे उसका स्पर्श करे और ऐसा होते हुए भी जननेन्द्रियको वशमें रखनेका
इरादा रखे तो ऐसे व्यक्तिका प्रयत्न तो अग्निमें हाथ देने पर उसे न जलने देनेका
प्रयत्न करने जैसा ही हुआ। इसलिए जो जननेन्द्रियको रोकनेका निश्चय करे उसे
२. अध्याय ३६ ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१०९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको
७१
इन्द्रिय मात्र और उसके विकारोंको रोकनेका निश्चय पहले ही कर लेना चाहिए। मुझे
हमेशा ऐसा लगा है कि ब्रह्मचर्यकी संकुचित व्याख्यासे नुकसान हुआ है । मेरा तो दृढ़
मत है और अनुभव है कि यदि हम सभी इन्द्रियोंको एकसाथ वशमें करनेका अभ्यास
करें तो जननेन्द्रियको वशमें रखनेका प्रयत्न तत्काल सफल हो सकेगा। इसमें मुख्य
चीज स्वादेन्द्रिय है । और इसीलिए उसके संयमको हमने अलग स्थान दिया है। उसपर
बादमें विचार करेंगे।
ब्रह्मचर्यका मूल अर्थ सब याद रखें। ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्मकी - सत्यकी - शोधमें
चर्या अर्थात् तत्सम्बन्धी आचार । [ इस मूल अर्थमें से सर्वेन्द्रिय संयम यह विशेष अर्थ
निकलता है। मात्र जननेन्द्रिय जैसा अधूरा अर्थ तो हम भूल ही जायें।
[ पुनश्च : ]
४५ पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
१०२. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको
प्रिय कुमारप्पा,
१
मैंने तुम्हारा निबन्ध पढ़ा। बहुत अच्छा है ।
सप्रेम,
अंग्रेजी (जी० एन० १००८८) की फोटो नकलसे ।
१. यह उपलब्ध नहीं है।
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
५ अगस्त, १९३०
बापू
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० राधिका,
१०३. पत्र : राधाबहन गांधीको
यरवडा मन्दिर
८ अगस्त, १९३०
तेरा छापे-जैसे अक्षरोंमें लिखा पत्र मिला। काश मैं भी ऐसा लिख पाता !
तू यह मत मान बैठना कि मैंने सत्यकी जो व्याख्या की है, उसतक पहुँचा ही नहीं
जा सकता ।
रुक्मिणीकी मानसिक स्थितिके बारेमें तू यदि कुछ लिख सके तो लिखना ।
कविता तो मैं सर्वथा भूल ही गया हूँ । यदि तू ग्रे की 'एलिजी', 'होरेशियस '
और 'साम्स ऑफ डेविड' खूब ध्यानसे पढ़ जाये तो मैं बादमें अन्य नाम सुझाऊँगा ।
ये तीनों अलग-अलग ढंगकी हैं और उत्तम हैं। ये तेरी समझमें आने लायक भी हैं।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८६८३) से । सौजन्य : राधाबहन चौधरी
१०४. पत्र : बलीबहन वोराको
यरवडा मन्दिर
८ अगस्त, १९३०
चि० बली,
तुम दोनों बहनों और मनुड़ीके पत्र मिले। रामीको प्रसूतिसे छुटकारा मिलनेका
समाचार मिला। आशा है, शिशु दिन-दिन बढ़ रहा होगा। तुम दोनों बहनें उसकी
सेवामें डटी हुई हो, अतः रामीके बारेमें मुझे कोई चिन्ता नहीं है। जिनसे तुम्हें
स्नेह हो, उनकी सेवा करनेमें कोई तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकता।
यह जानकर मुझे बहुत सन्तोष होता है कि तुम दोनोंमें मेल है।
इस बार मैं मनुड़ीको नहीं लिख रहा हूँ, क्योंकि और बहुतसे पत्र लिखने हैं।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५०५९ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : सुरेन्द्र मशरूवाला
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०५. पत्र : मंत्री गिरिको
चि० मैत्री,
यरवडा मन्दिर
८ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र मिला। भूलें होती हैं, उसकी कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिए। तू
सावधानीसे मुझे पत्र लिखती रहना। यह बहुत अच्छा हुआ कि तेरा शरीर स्वस्थ
हो गया।
तेरी यह बात बिलकुल सच है कि जैसे भोजनमें मिताहार अच्छा होता है,
वैसा ही मानसिक आहारके बारेमें होना चाहिए। प्रभुभाई बड़े सुयोग्य व्यक्ति हैं,
तू उनसे सीखना ।
गुजराती (जी० एन० ६२१६) की फोटो नकलसे।
१०६. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
८ अगस्त, १९३०
चि० प्रेमा,
पिछले वर्षके रक्षाबन्धनकी याद मुझे अच्छी तरह है। तेरे राखी बांधने पर
सबको आश्चर्य हुआ था, यह भी याद है। इस राखीके पवित्र धागेसे तू बँध गई,
यह याद रखनेकी जरूरत नहीं है, क्योंकि यह बन्धन तो सदा बना हुआ है। इस
बार तेरे अधिकारका उपयोग काकासाहब करेंगे। लेकिन इस तरह यदि वे भी बंध
गये तो ? लेकिन जो कभीके बंध चुके हों उन्हें किस बातका भय ? इसलिए कोई
कठिनाई नहीं है; जो बाँधे उसकी स्थिति तो ठीक है, लेकिन जो बँधवाये उसका
क्या हाल होगा ?
तू पुस्तकालय संभालती है, यह मुझे अच्छा लगता है।
शीलाकी तबीयत अच्छी हो जानी चाहिए।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती ( सी० डब्ल्यू० ६६७७ ) से सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२२९ की फोटो नकलसे भी ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०७. पत्र : रुक्मिणी बजाजको
यरवडा मन्दिर
८ अगस्त, १९३०
चि० रुक्मिणी,
आखिर तेरा पत्र मिला तो सही जल्दीसे जल्दी अपना शरीर सँभाल लेनेकी
चेष्टा करना । अपनेको हलका रखना। जो काम तू कर सके वह करना; या अध्ययनमें
जुट जाना। यदि तू मुझे मुक्त मनसे, निःशंक होकर लिखे तो मुझे प्रसन्नता होगी।
अब डाक्टर क्या कहता है ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९३१३) से । सौजन्य: बनारसीलाल बजाज
१०८. पत्र : शारदा सी० शाहको
यरवदा मन्दिर
९ अगस्त, १९३०
चि० शारडा (बबु ),
तेरा सुन्दर पत्र मिला । यदि हम स्वप्नमें भजन गायें, ईश्वरको देखें या सन्त-
जनोंसे मिलें तो हमारे ये स्वप्न निर्दोष होंगे । यदि हम स्वप्न में स्वादका आनन्द
उठायें, किसीको धोखा दें, क्रोध करें या हमारे मनमें दूषित विचार उठें तो वे बुरे
स्वप्न होंगे।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९८८७) से । सौजन्य: शारदाबहन जी० चोखावाला
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०९. पत्र : प्रभावतीको
परवडा मन्दिर
चि० प्रभावती,
९ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र मिला। मेरे पत्र तुझे क्यों नहीं मिलते, यह बात मेरी समझमें नहीं
आती। किसी भी डाकमें में तुझे पत्र लिखना भूल गया होऊ, ऐसा मुझे याद नहीं
आता। लेकिन किसी समय तुझे पत्र न मिले, तो समझ लेना कि में पराधीन हूँ।
बहुत करके अब तो यहाँ से भी सब पत्र भेजे जाते हैं। मेरी चिन्ता न करना । तेरा
शरीर क्षीण नहीं होना चाहिए। शेष उत्तर मैंने पिछले पत्र में दे दिये हैं। पिताजीकी
क्या बात करें ? बिस्तर में पड़ गये हैं फिर भी उनमें सिंहका-सा उत्साह और साहस
है। तूने उनके घर जन्म लिया है; तू भी उनके इन गुणोंको अवश्य ग्रहण करेगी।
भगवान तुझे सिंहनी बनायेगा !
[ पुनश्च : ]
काकासाहब आनन्दसे हैं। तुझे आशीर्वाद भेजते हैं।
गुजराती (जी० एन० ३३६६ ) की फोटो नकलसे ।
चि० सत्य देवी,
११०. पत्र : सत्यादेवी गिरिको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
९ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र मिला। तूने पेड़ अच्छे निकाले हैं। अब तुझे चाहिए कि तू जिन्दा
पेड़ों को देखकर अपने चित्रोंसे उनकी तुलना करे, जिससे तेरा चित्र देखनेवालेको ऐसा
लगे, मानो वह असल पेड़ देख रहा हो अक्षरोंको ठीक-सा मोड़ देनेसे पहले सही
अक्षर निकालनेer पक्का अभ्यास कर लेना चाहिए। तुझे अच्छी बातें सीखनेका शौक
है। इसलिए कहता हूँ कि तू अपने हिज्जे अभीसे सही लिखना सीख ले। कातनेमें
आलस मत करना ।
बापूकी विराट् वत्सलता
१. दलबहादुर गिरिकी दूसरी कन्या ।
२. मूल पत्र गुजरातीमें था।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१११. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
प्रिय भगिनि
यरवडा मन्दिर
९ अगस्त, १९३०
तकली पर एक दिनमें
कातता है ? इतनी गति
सतीशबाबुकी दिनचर्या पढ़कर बड़ा आनंद होता है।
एक आदमी १००० गज नौकालता है तो एक घंटेका कितना
मैं तो नहि ला सकता हूँ। जो बहिन गिरफतार हुई उनके लड़कोंकी देखभाल कौन
करता है?
कृष्णदासका कुछ पता है?
तारीणीको मेरे आशीर्वाद दो
उसके तरफसे कुछ खत आते हैं।
अरूण कहां है ? चारू साथमें है क्या ? दोनोंको
आशीर्वाद ।
बापुके आशीर्वाद
जी० एन० १६७० की फोटो नकलसे।
चि० मीरा,
११२. पत्र : मीराबहनको
परवडा मन्दिर
१० अगस्त, १९३०
मुझे पटनासे भेजा तुम्हारा प्रेम पत्र मिला । तुम्हारे अनुभव मूल्यवान हैं। मैं
आशा करता हूँ कि पेचिशके लक्षण अब बिलकुल दूर हो गये हैं।
मैं नये चरखेको ही चला रहा हूँ। गति अभी भी वही है। लेकिन मैं इसे
छोड़नेवाला नहीं हूँ। यह एक अमूल्य निधि है।
भजनोंका अनुवाद कार्य घड़ीकी गतिके समान नियमित रूपसे चल रहा है,
लेकिन मैं उसे और अधिक समय नहीं दे पाया हूँ। इसलिए जैसाकि मैंने अपने
एक पत्रमें लिखा है, समय-सीमा वही है।
श्री हसन इमामको पत्र लिखना तो मेरी याद दिला देना और उन्हें बता
देना कि दस वर्ष पहलकी बातचीत उनको स्मरण है, यह जानकर मुझे बहुत आनन्द
हुआ।
मेरा वजन दो पौंड कम हुआ है, लेकिन चिन्ताकी कोई बात नहीं है। कब्ज
दूर ही नहीं होता, इस कारण दूधकी मात्रामें कमी करनी पड़ी। जितनी मात्रा लेता
था उतनी ही फिर लेने लगा तो वजन फिर बढ़ जायेगा। स्वास्थ्य खोनेकी अपेक्षा
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: शिवाभाई पटेलको
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वजन खोना ज्यादा अच्छा है। शक्ति वैसी ही बनी हुई है। यह समाचार प्रकाशनके
लिए नहीं है। मैंने सत्यकी खातिर यह सूचना तुम्हें दी है। मैं तुम्हें अपने
स्वास्थ्य के बारे में बतानेको वचनबद्ध हैं, और इसीलिए वजन कम होने की बात
छिपा नहीं सकता ।
भी ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सो० डब्ल्यू० ५४०६ ) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६४० से
११३. पत्र : शिवाभाई पटेलको
परवडा मन्दिर
१० अगस्त, १९३०
चि० शिवाभाई,
मुझे यह याद नहीं पड़ता कि तुम्हारा अलग से लिखा हुआ पत्र मुझे मिला था
या नहीं। क्या लिखा था उसमें ?
अपनी कमजोरीको दूर करनेका एक रास्ता तो यह है कि जिस दिन 'गीता' के
जिस अध्यायका पाठ हो, उस दिन उस अध्यायमें से जो भी श्लोक रुबे, कोई
भी काम करते हुए पूरे दिन उस श्लोकका निरन्तर पाठ करें। ऐसा करनेसे अन्य
हानिकर विचार दूर हो जाते हैं। यह उपाय मेरा आजमाया हुआ है। मैं जानता
हूँ कि रायचन्दभाई ऐसा ही किया करते थे। अन्य बहुतसे लोगोंका भी यही
अनुभव है।
गुजराती (एस० एन० ९५०० ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११४. पत्र : हरिइच्छा देसाईको
यरवडा मन्दिर
१० अगस्त, १९३०
चि० हरिइच्छा,
तेरा पत्र पढ़कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। तूने इतने खराब अक्षर क्यों लिखे
हैं? अक्षर बनानेके बारेमें रामदास स्वामीकी' छन्दोबद्ध कड़ियाँ हैं जिनका अनुवाद
मैंने आश्रमको भेजा है। हरिभाई उसकी नकल तुझे भेज देंगे।
कताई प्रतियोगितामें किसी बहनको जीतना चाहिए। तेरी तबीयत कैसे बिगड़
गई ? मैं तो तुझे खासी स्वस्थ मानता था। बुखारको भगाना। तेरी आंख कैसी
है ? यदि तुम सब तुरन्त आश्रम चली जाओ तो मुझे प्रसन्नता होगी। चन्दन, तारा
और वसन्त भी मुझे पत्र लिखें।
काकासाहब का आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ७४६५ ) की फोटो नकलसे ।
११५. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१० अगस्त, १९३०
चि० काशिनाथ,
-
तुम्हारा पत्र मिला। मैं समझता हूँ कि तुम्हें आश्रम नहीं छोड़ना पड़ेगा ।
किन्तु तुम यज्ञका महत्त्व और दैनन्दिनी रखनेकी आवश्यकता समझ नहीं सके। ऐसे
ही समयमें नियमन
अनुशासन -हमारे लिए कल्पद्रुम सिद्ध होता है। सभी लोग
सदा सब चीजोंकी एक-सी कीमत नहीं आँक सकते । इसलिए सहज रास्ता यह हुआ कि
जिस संस्थामें रहा जाये उसके नियमोंका आँख मूंदकर पालन किया जाये। भले ही
दैनन्दिनीमें एक ही बात प्रतिदिन क्यों न लिखनी पड़े। दैनन्दिनीकी यही महत्ता है,
बशर्ते कि उसमें लिखी गई बातें सत्य हों। जिसका जीवन सौर मण्डलकी भांति घूमता
है यदि वह पुरुष सचाईसे अपनी दैनन्दिनी लिख सके तो वह धन्य है। इसलिए तुम्हें
१. महाराष्ट्र १७वीं सदीके सन्त कवि
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र बा० गो० देसाईको
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मेरी यह सलाह है कि जो कुछ नारणदास कहे उसे श्रद्धापूर्वक करो। मुझे उसके
निर्णय पर पूरा विश्वास है ।
गुजराती (जी० एन० ५२४८ ) की फोटो नकलसे ।
११६. पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको
बापूके आशीर्वाद
चि० लक्ष्मीबहन (सरे),
यरवडा मन्दिर
११ अगस्त, १९३०
तुम्हारे पराक्रमकी बात छगनलालने मुझे लिखी है। ईश्वर तुम्हें अटूट बल दे
और तुम दीर्घायु हो ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २७५ ) से सौजन्य लक्ष्मीबहन खरे
११७. पत्र : वा० गो० देसाईको
यरवा मन्दिर
११ अगस्त, १९३०
भाईश्री ५ बालजी,
आपको लिखा हुआ यह पत्र पूरी टुकड़ीके लिए है।
छूटे और सब लोग कैसे हैं, लिखें। सबने [ जेलमें] क्या
कैसा रहता है? क्या शरीर कुछ और बना ?
[ पुनश्च : 1
जो मुझे पत्र लिखना चाहें वे लिखें।
आप लोगोंमें से कौन-कौन
किया ? आपका स्वास्थ्य
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४०५ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : वा० गो० देसाई
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० नारणदास,
११८. पत्र : नारणदास गांधीको
मंगल प्रभात, १२ अगस्त, १९३०
अस्वाद : (इस व्रतका ब्रह्मचर्यके साथ बहुत निकट सम्बन्ध है । मेरा यह अनुभव
है कि इस व्रत में सफल हो जायें तो ब्रह्मचर्य अर्थात् जननेन्द्रियसंयम बिलकुल आसान
हो जाये । किन्तु सामान्य तौर पर इसे व्रतोंमें अलग स्थान नहीं दिया जाता। स्वादको
बड़े-बड़े मुनि भी नहीं जीत सके, इसलिए इस व्रतको अलग स्थान नहीं मिला। यह
तो मेरा अनुमान मात्र है। ऐसा हो या न हो, हमने इस व्रतको अलग स्थान दिया
है और उसपर स्वतन्त्र रूपसे विचार कर लेना ठीक होगा।
अस्वाद अर्थात् स्वाद न लेना। स्वाद अर्थात् रस। जिस तरह औषधि लेते समय
हम यह स्वादिष्ट है या नहीं इसका विचार किये बिना, उसे शरीर के लिए जरूरी
मानकर आवश्यक मात्रामें खा लेते हैं, वैसा ही अन्नके बारेमें समझें । अन्न अर्थात्
खानेकी सभी वस्तुएँ; इसलिए उसमें दूध, फल भी शामिल हैं। जिस तरह दवा
[ आवश्यकतासे ] कम मात्रामें लेने पर असर नहीं करती अथवा थोड़ा असर करती है
और ज्यादा लेने पर हानि करती है, वैसा ही अन्नके बारेमें भी है। इसलिए कोई
चीज स्वाद लेनेके लिए खाना व्रतका भंग करना है। सुस्वादु लगनेवाली वस्तु अधिक लेना
इस व्रतका तो सहज भंग हुआ ही। इससे समझा जा सकता है कि किसी वस्तुका
स्वाद बढ़ानेके या बदलनेके लिए, अस्वाद दूर करनेके लिए नमक मिलाना व्रत भंग
है। किन्तु अमुक प्रमाणमें अन्नमें नमककी जरूरत है यह हम जानते हों और तब
फिर उसमें नमक डालें तो व्रत भंग नहीं होता । शरीरपोषणके लिए आवश्यकता न
होने पर भी मनको धोखा देनेके लिए आवश्यकता का आरोपण करके कोई वस्तु
लेना तो मिथ्याचार माना जायेगा ।
कि जो अनेक वस्तुएँ हम लेते हैं वे
त्याज्य हो जाती है। जिसके लिए इस
उसके विकारमात्र शान्त हो जाते हैं ।
इस तरह विचार करनेपर हम देखेंगे
शरीर रक्षा के लिए आवश्यक न होनेके कारण
तरह असंख्य वस्तुओंका त्याग आसान हो जाये
'एक हाँडीके लिए तेरह वस्तुएँ ! ' 'पेट बेगार कराता है ! 'पेट नाच नचाता
है!' इन सभी बचनोंमें बहुत सार है। इस विषय पर इतना कम ध्यान दिया गया
है कि व्रतकी दृष्टिसे खुराकको तय करना लगभग असम्भव हो गया है। फिर बचपनसे
ही मां-बाप झूठे लाड़-दुलारमें पड़ कर अनेक प्रकारकी स्वादिष्ट वस्तुएँ खिला-खिला कर
बच्चोंके शरीरको बिगाड़ डालते हैं और जीभको कुतिया बना डालते हैं; जिससे
समझदार बनने तक वे संसारमें शरीरकी दृष्टिसे रोगी और स्वादकी दृष्टिसे महा-
विकारी बन जाते हैं। इसका कटु परिणाम हम हर जगह पग-पगपर देखते हैं। लोग
अनेक प्रकारके खर्च में पड़ जाते हैं; उन्हें वैद्य और डाक्टरोंका इलाज करवाना पड़ता
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/११९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
८१
है और वे शरीर तथा इन्द्रियोंको वशमें रखनेके बदले उनके गुलाम बनकर अपंग-
जैसे हो जाते हैं। एक अनुभवी वैद्यका कहना है कि जगत् में उसने एक भी नीरोग
व्यक्ति नहीं देखा । जरा भी स्वाद लेनेकी आदत पड़ी तो शरीर भ्रष्ट हुआ; और
तभी शरीर के लिए उपवासकी आवश्यकता पैदा हुई।
किन्तु इन विचारोंसे घबरानेकी जरूरत नहीं है। अस्वाद-व्रतकी कठिनाईको
देखकर उसे छोड़ देना भी जरूरी नहीं है। व्रत लेनेका अर्थ व्रत लेते ही उसका
सम्पूर्ण रूपसे पालन करने लगना नहीं है। व्रत लें और ईमानदारीसे उसका सम्पूर्ण
पालन करनेका दृढ़ प्रयत्न मन, वचन और कर्मसे मृत्युपर्यन्त करें। अमुक व्रत कठिन
है, इसलिए उसकी जरा ढीली व्याख्या करके मनको धोला न दें। आदर्शको अपनी
सुविधाके अनुसार ढ़ालनेमें असत्य है; हमारा पतन है। आदर्शको स्वतन्त्र रूपसे जानें;
वह चाहे जितना कठिन क्यों न हो, तो भी उसमें सफल होनेका जी-जानसे प्रयत्न
करना ही परम अर्थ है - पुरुषार्थ है; 'पुरुष' शब्दका अर्थ केवल नर न करके
उसका मूल अर्थ लें। पुरमें अर्थात् जो शरीरमें है वह पुरुष । ऐसा अर्थ करने पर
पुरुषार्थ शब्दका उपयोग नर-नारी दोनोंके लिए हो सकता है। महाव्रतोंका तीनों काल
सम्पूर्ण रूपसे पालन करनेमें जो समर्थ है उसे इस जगतमें कुछ भी करनेकी जरूरत
नहीं। वह भगवान है, मुक्त है। हम तो क्षुद्र, मुमुक्षु, जिज्ञासु, सत्यके आग्रही, उसकी
शोध करनेवाले प्राणी है। इसलिए 'गीता' की भाषामें धीरे-धीरे किन्तु अतन्द्रित
रहकर प्रयत्न करते रहें। ऐसा करेंगे तो किसी दिन प्रभु प्रसादीके लायक बनेंगे और
तब हमारे रसमात्र यानी लालसाएँ जल जायेंगी ।
--
यदि हम अस्वाद-व्रतके महत्त्वको समझ गये हों तो हम उसके पालनके लिए
नया प्रयत्न करें। उसके लिए चौबीस घंटे खानेका ही विचार करनेकी आवश्यकता
नहीं रहती । सावधान और जागृत रहनेकी अवश्य ही बहुत आवश्यकता रहती है।
ऐसा करनेसे थोड़े समय में हमें अन्दाज लग जायेगा कि हम क्या चीज स्वादके यश
होकर और क्या शरीरका पोषण करनेके लिए खाते हैं। यह मालूम हो जाने पर
हम दृढ़तापूर्वक स्वाद कम ही करते जायें। इस दृष्टिसे विचार करते हुए अस्वाद-
वृत्तिसे की गई संयुक्त रसोई बहुत सहायक होती है। यहाँ हमें रोज यह विचार
नहीं करना पड़ता कि क्या खायेंगे या क्या बनायेंगे। किन्तु जो तैयार किया गया
हो और जो हमारे लिए त्याज्य न हो, उसे ईश्वरका अनुग्रह मानकर मनमें उसकी
आलोचना किये बिना, जितना शरीरके लिए आवश्यक हो उतना खाकर सन्तोषपूर्वक
उठ जायें। ऐसा करनेवाला सहज ही अस्वाद-यतका पालन करता है। संयुक्त रसोई
करनेवाले हमारा बोझ हलका करते हैं। वे हमारे व्रतके रक्षक बन जाते हैं। वे
स्वादके लिए कोई चीज न बनायें। केवल समाजके शरीरके पोषणके लिए ही खाना
तैयार करें। अच्छी तरह देखें तो आदर्श स्थितिमें अग्निका उपयोग कमसे कम या
बिलकुल न किया जाये। सूर्य रूपी महाग्निसे जो वस्तुएँ पकती है उन्हीं में से हमें खाने के
लिए चीजें प्राप्त करनी चाहिए। इस तरह विचार करें तो यह सिद्ध होता है कि
मनुष्य केवल फलाहारी प्राणी है, किन्तु यहाँ इतनी गहराईमें जानेकी जरूरत नहीं ।
यहाँ तो अस्वाद-व्रत क्या है, उसमें क्या कठिनाइयाँ हैं और क्या नहीं हैं तथा उसका
४४-६
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
ब्रह्मचर्य पालनके साथ कितना निकटका सम्बन्ध है, यही विचार करना था। इतना
मनमें उतारनेके बाद सभी यथाशक्ति इस व्रत में सफल होनेका शुभ प्रयत्न करें।
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्र- ९ : श्री नारणदास गांधीने; सी० डब्ल्यू० ८१२१ से भी ।
सौजन्य : नारणदास गांधी
११९. पत्र : सप्रू और जयकरको '
परवडा सेंट्रल जेल
१५ अगस्त, १९३०
प्रिय मित्रो,
ब्रिटिश सरकार और कांग्रेसके बीच शान्तिपूर्ण समझौता कराने की कोशिश करने-
का जो भार आपने उठाया है उसके लिए हम आपके हृदयसे कृतज्ञ हैं। आप दोनों
तथा वाइसराय महोदयके बीच हुए पत्र-व्यवहारको पढ़ने तथा आपके साथ लम्बी
बातचीत करने और आपस में विचार करनेके बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे
हैं कि अभी ऐसा कोई समझौता करनेका समय नहीं आया है जो हमारे देशके लिए
सम्मानजनक हो । हालांकि पिछले पांच महीनोंमें शानदार जन-जागृति हुई है और
विभिन्न धर्मो के सभी श्रेणी और वर्गोंके लोगोंने जबर्दस्त कष्टसहन किया है, तथापि
हमें लगता है कि उद्देश्यकी तात्कालिक प्राप्तिके लिए जितने व्यापक पैमाने पर और
जैसा अखण्डित कष्टसहन आवश्यक है उतना व्यापक या अखण्ड यह नहीं रहा है।
यह कहने की जरूरत नहीं है कि हम आपके या वाइसरायके इस विचारसे तनिक भी
सहमत नहीं है कि सविनय अवज्ञासे देशको हानि पहुंची है अथवा यह गलत वक्त
पर शुरू किया गया है या अवैधानिक है। इंग्लैडका इतिहास ऐसे रक्तरंजित विद्रोहों
के उदाहरणोंसे भरा पड़ा है जिनकी प्रशंसा अंग्रेजोंने मुक्त कंठसे की है और हमें भी
वैसा ही करना सिखाया गया है। इसलिए वाइसराय महोदय अथवा किसी भी प्रबुद्ध
अंग्रेजके लिए एक ऐसे विद्रोहकी भर्त्सना करना शोभाजनक नहीं है जिसका इरादा
तो शान्तिपूर्ण है ही, क्रियात्मक रूपमें भी जो बहुत बड़ी हदतक शान्तिपूर्ण रहा है।
लेकिन वर्तमान सविनय अवज्ञा अभियानकी सरकारी या गैर-सरकारी भर्त्सना विरुद्ध
हम कुछ नहीं कहना चाहते। हम ऐसा मानते है कि इस आन्दोलनको जो अद्भुत
जन-समर्थन प्राप्त हुआ है उससे इस आन्दोलनका औचित्य स्वयंसिद्ध है। यहाँ तो जो
१. १४ और १५ अगस्त,
जयकर तथा दूसरी ओर गांधीजी,
आदिके बीच बातचीत हुई थी
१९३० को परवडा जेल में एक ओर सर तेज बहादुर समू और मु० रा०
मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, डा० सैयद महमूद
बातयोतके बाद समू और जयकरको यह पत्र दिया गया था और उन्हें
अनुमति दी गई थी कि वे यह पत्र वाइसरायको भी दिखा सकते हैं। देखिए परिशिष्ट २
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र सप्रू और जयकरको
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मुद्दा है वह यह तथ्य है कि हमें आपके साथ कामना करते खुशी होती है कि यदि
किसी भी प्रकार सम्भव हो तो सविनय अवज्ञा आन्दोलनको समाप्त अथवा स्थगित
कर दिया जाये। हमारे लिए यह खुशीकी बात नहीं हो सकती कि हम देशके पुरुषों,
स्त्रियों और यहाँ तक कि बच्चोंको भी नाहक ही ऐसी स्थितिमें डालें जिसमें उन्हें
जेल जाना पड़े, तथा पुलिसकी लाठियां और इनसे भी खराब चीजें सहनी पड़ें। आप
विश्वास करें, और आपके जरिये हम वाइसराय महोदयसे भी विश्वास करनेकी आशा
रखते हैं, कि हम सम्मानपूर्ण शान्ति स्थापित करनेके लिए हर सम्भव उपाय पर
विचार करनेमें कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। लेकिन हम यह स्वीकार करते हैं कि अभी
तक हमें क्षितिज पर इसके कोई चिह्न नहीं दिखाई पड़ते। इस बातके कोई लक्षण
हमें नहीं दिखाई पड़ते कि अंग्रेज अधिकारी जगत यह मानने लगा हो कि भारतके लिए
क्या सर्वोत्तम है इसके निर्णयका अधिकार भारतके स्त्रियों और पुरुषोंको है। अधिकारियों
द्वारा नेकनीयतीके दावोंको, जो अक्सर सद्भावपूर्वक किये जाते हैं, हम अविश्वासकी
दृष्टिसे देखते हैं। अंग्रेज लोग एक लम्बे समयसे इस प्राचीन देशका जो शोषण करते
रहे हैं, उसके कारण अब उनकी आँखें यह देखनेमें असमर्थ हो गई हैं कि इस शोषणके
कारण इस देशकी कितनी नैतिक, आर्थिक और राजनीतिक पामाली हो चुकी है। वे
यह नहीं देखना चाहते कि उनके लिए जो चीज करनी सबसे अधिक जरूरी है वह
यह कि वे हमारी पीठपर से उतर जायें और सौ सालके ब्रिटिश आधिपत्यके दौरान
हमारे देशको हर दृष्टिसे हीन बनानेकी जो प्रक्रिया चलती रही है उससे उबरनेमें हमारी
मदद करके अपनी पिछली गलतियोंकी कुछ क्षतिपूर्ति करें। लेकिन हम जानते हैं कि
आप तथा हमारे कुछ विद्वान देशवासी ऐसा नहीं मानते। आप मानते हैं कि हृदय-
परिवर्तन हो चुका है, या कमसे कम इतना तो हो ही गया है जिससे प्रस्तावित
सम्मेलनमें भाग लेना उचित ठहरता है। अतः जिन सीमाओंके भीतर हमें काम करना
पड़ रहा है उनके बावजूद हम अपनी क्षमता-भर आपके साथ खुशी-खुशी सहयोग करेंगे ।
हमारी जो परिस्थितियाँ हैं उनको देखते हुए हम आपके मंत्रीपूर्ण प्रयत्नोंका
जो अधिक से अधिक प्रत्युत्तर दे सकते हैं, वह निम्नलिखित है ।
हमें लगता है कि प्रस्तावित सम्मेलनके सम्बन्धमें आपके पत्रका जो उत्तर
वाइसरायने दिया है उसकी भाषा इतनी अस्पष्ट है कि पिछले साल लाहौर में
निर्धारित राष्ट्रीय माँगको दृष्टिसे हम उसका मूल्य निश्चित नहीं कर सकते और न
ही हम आधिकारिक रूपसे तबतक कुछ कहने की स्थिति में हैं जबतक कि इस प्रश्नको
समुचित रूपसे गठित कार्य समितिको बैठकमें और यदि आवश्यक हो तो अखिल
भारतीय कांग्रेस कमेटीके सामने पेश नहीं किया जाता। लेकिन हम यह कह सकते हैं
कि हमारे लिए व्यक्तिगत रूपसे कोई हल तबतक संतोषजनक नहीं होगा जबतक कि
(क) उसमें स्पष्ट रूपसे भारतका यह अधिकार नहीं स्वीकार किया जाता कि वह
इच्छा होनेपर ब्रिटिश साम्राज्यसे अलग हो सकता है, (ख) वह भारतको ऐसी एक
पूर्णतः राष्ट्रीय सरकार नहीं प्रदान करता जो भारतकी जनताके प्रति उत्तरदायी हो
और जिसमें आर्थिक नियंत्रण और प्रतिरक्षा सेनाओंका नियंत्रण भी शामिल हो और
जिसमें वे ग्यारह मुद्दे भी शामिल हों जिन्हें गांधीजीने वाइसरायको लिखे अपने पत्र में
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
उठाया है, और (ग) यह भारतको यह अधिकार नहीं देता कि वह ऐसे सभी ब्रिटिश
दावों, रियायतों तथा ऐसी ही अन्य चीजोंको - जिनमें भारतका सार्वजनिक ऋण भी
शामिल है जिन्हें राष्ट्रीय सरकार अनुचित समझे या भारतकी जनताके हितोंके
विपरीत समझे, आवश्यक होनेपर एक स्वतंत्र न्यायाधिकरणके सामने रख सके
टिप्पणी : सत्ता हस्तांतरणके दौरान भारतके हितमें जो भी समंजन करना
आवश्यक हो जाये उसका निर्धारण भारतके निर्वाचित प्रतिनिधिगण करेंगे ।
(२) यदि पूर्वोक्त बातें ब्रिटिश सरकारको व्यवहार्य लगे और इस आशयकी
एक सन्तोषजनक घोषणा कर दी जाती है तो हम कार्य समितिको सविनय अवज्ञा,
अर्थात कतिपय कानूनोंकी अवज्ञाकी खातिर अवज्ञाका आन्दोलन समाप्त करनेकी सलाह
देंगे, लेकिन विदेशी वस्त्रों और शराबकी दुकानों पर शान्तिपूर्ण धरना तबतक जारी
रखा जायेगा जबतक सरकार स्वयं शराब और विदेशी वस्त्रों पर निषेध लागू नहीं
करती। जनता द्वारा नमकका निर्माण जारी रखा जायेगा और नमक अधिनियम की
दण्डात्मक धाराओंको लागू नहीं किया जाना चाहिए। सरकारी या
निजी नमक-
भण्डारों पर धावा नहीं किया जायेगा ।
(३) सविनय अवज्ञा समाप्त करनेके साथ ही (क) ऐसे सभी सत्याग्रही कैदी
और अन्य राजनीतिक कैदी जिन्हें सजा दी जा चुकी है या जिन पर मुकदमा चल
रहा है लेकिन जो हिंसा करने या हिंसा भड़कानेके अपराधी नहीं है, छोड़ दिये जायें,
(ख) नमक अधिनियम, प्रेस अधिनियम, राजस्व अधिनियम आदिके अधीन जब्त की
गई सम्पत्ति लौटा दी जानी चाहिए, (ग) सजा प्राप्त सत्याग्रहियोंसे, या प्रेस अधि-
नियमके अधीन किये गये जुर्माने और जमानतोंकी रकम वापस कर दी जानी चाहिए,
(घ) सविनय अवज्ञा आन्दोलनके दौरान जिन अधिकारियोंने, जिनमें ग्राम अधिकारी
भी शामिल हैं, इस्तीफा दे दिया हो अथवा जिन्हें बर्खास्त कर दिया गया हो, उनमें
से जो लोग फिरसे सरकारी नौकरीमें आना चाहें उन्हें बहाल कर दिया जाना चाहिए।
टिप्पणी: पूर्वोक्त उपधाराएँ असहयोग आन्दोलनकी अवधि पर भी लागू होती हैं ।
(ङ) वाइसराय द्वारा जारी किये गये सभी अध्यादेश रद कर दिये जायें।
(४) प्रस्तावित सम्मेलनमें किन्हें शामिल किया जायेगा, यह प्रश्न और उसमें
कांग्रेसके शामिल होनेका सवाल तभी तय किया जा सकता है जब पहले पूर्वोक्त
आरम्भिक बातें सन्तोषजनक रूपसे तय हो जायें।
[ अंग्रेजीसे ]
हिन्दू, ५-९-१९३०
हृदयसे आपके,
मो० क० गांधी
मोतीलाल नेहरू जयरामदाम दौलतराम
सरोजिनी नायडू सैयद महमूद
वल्लभभाई पटेल जवाहरलाल नेहरू
१. इस पत्रको छेकर सधू और जयकर २१ और २८ अगस्त के बीच शिमला में वाइसरायले मिले थे।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२०. पत्र : राधाबहन गांधीको
यरवडा मन्दिर
१८ अगस्त, १९३०
चि० राधिका,
तेरा पत्र मिला । तू कितना दूध पीती है और कौन-कौनसे फल लेती है ?
क्या तुझे कब्ज रहता है ? यदि तू पर्याप्त दूध पिये तो तुझे थकावट होगी ही नहीं ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८६८४ ) से सौजन्य : राधाबहन चौधरी
१२१. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
१८ अगस्त, १९३०
चि० प्रेमा,
तू अधीर मत होना । मनको जीतना सहल नहीं है। लेकिन प्रयत्नसे वह जीता
जा सकता है, ऐसी अटल श्रद्धा रखनी चाहिए।
करेलोंका शरीर पर कैसा असर हुआ ? उनका रस निकाल देनेकी कोई जरूरत
नहीं होती। उन्हें पीस कर अथवा कस करके ज्यों-का-त्यों नींबू और नमकके साथ
लिया जा सकता है।
प्रार्थनाकी आवश्यकताके बारेमें सारे जगतका अनुभव है। उसपर विश्वास रखें
तो मन लगता है ।
बहुत जल्दी है ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६७८ ) से सौजन्य : प्रेमावहन कंटक; जी० एन०
१०२३० की फोटो नकलसे भी ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० वसुमती,
१२२. पत्र : वसुमती पण्डितको
यरबडा मन्दिर
१८ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र मिला । हमें तो हर स्थितिमें शान्त रहना सीखना चाहिए। आज
तो मुझे पत्र लिखनेका बहुत कम समय मिला और आखिरी मिनटमें यह पत्र लिख
पाया हूँ।
गुजराती (एस० एन० ९२८५ ) की फोटो नकलसे।
चि० रुक्मिणी,
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१२३. पत्र : रुक्मिणी बजाजको
बापूके आशीर्वाद
१८ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र मिला। सबके पत्र कौन पढ़ता है ? जिन पत्रों पर यह लिखा हो
इस पत्रको अन्य कोई न पड़े", उन पत्रोंको कदापि नहीं पढ़ना चाहिए। अपना
स्वास्थ्य बहुत अच्छा कर लेना ।
गुजराती (जी० एन० ९०५१) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
१२४. पत्र : कुंवरजी पारेखको
१८ अगस्त, १९३०
चि० कुँवरजी,
तुम्हारा पत्र मिला । आखिर टोपीके बारेमें क्या हुआ, लिखना । मुझे पत्र
लिखते रहना ।
मेरी ओरसे भाई हीरजीको धन्यवाद पहुँचा देना ।
गुजराती (एस० एन० ९७१६) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२५. पत्र : रेहाना तैयबजीको
यरवडा मन्दिर
१८ अगस्त, १९३०
चि० रेहाना,
खुदा हाफिज',
तू अपने गुजराती पत्रोंमें तो कमाल कर रही है। मुझे पत्र लिखती रहना ।
श्रीमती लुकमानीकी वानर सेनाको तू भजन सिखाती है, यह तो बहुत ही अच्छा है।
तू जो कुछ भी करे, अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखते हुए करना।
चिट्ठी मेरे देखनेमें नहीं आये ।
बाबाजान किसकी लिखी शरीअतका तर्जुमा कर रहे हैं?
अन्य कुटुम्बी वहाँ हों उन सबको मेरा वन्देमातरम् ।
तेरा पत्र और खुली
अम्माजान और जो
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (एस० एन० ९६१९ ) की फोटो नकलसे ।
चि० रोहिणी,
१२६. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको
१८ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र पाकर प्रसन्नता हुई। मौका निकालकर हमीदाबनको गुजराती सिखा
देना । ईश्वर तुम सबको लम्बी उम्र दे और सच्ची सेविका बनाये ।
गुजराती (जी० एन० २६५१ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. ये शब्द उर्दूमें है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मणि (पटेल),
तेरा पत्र मिला।
मिले। ईश्वर तेरा भला
कहना ।
[ गुजरातीसे ]
१२७. पत्र: मणिबहन पटेलको
यरवडा मन्दिर
१८ अगस्त, १९३०
बापू मेरे साथ चार-पांच दिन रहकर गये । तेरे समाचार
ही करेगा। मुझे लिखती रहना। डाह्याभाईसे लिखनेको
बापुना पत्रो ४: मणिबहेन पटेलने
चि० प्रभावती,
१२८. पत्र : प्रभावतीको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१८ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र मिला। इस समय देशमें जो परिस्थितियां हैं उनको देखते हुए सूखे
मेवे अनावश्यक ही लेता रहूँ, ऐसी इच्छा नहीं होती। आज अधिक लिखनेका समय
नहीं है ।
गुजराती (जी० एन० ३४२७) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२९. पत्र : जयप्रकाश नारायणको
चि० जयप्रकाश,
यरबडा मन्दिर
१८ अगस्त, १९३०
तुमारा खत मीला। तुमारे शांतिके खबर सुनकर मुझको आनंद होता है।
आजकल तो जवाहरलाल मेरे साथ हि है। तुम दोनोंका शरीर अच्छा रहता होगा ।
मुझे लीखते रहो ।
जी० एन० ३४२८ की फोटो नकलसे ।
चि० मीरा,
१३०. पत्र : मीराबहनको
बापुके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१८ अगस्त, १९३०
इस बार मुझे पिछले सप्ताहसे भी ज्यादा संक्षेपमें लिखना होगा। इस समय
रातके दस बज रहे हैं- - जो मेरे लिए अत्यन्त असामान्य है। और यदि मुझे समय
की पाबन्दी रखनी है, जैसीकि मुझे रखनी चाहिए, तो यह अन्तिम रात है। लेकिन
ज्यादा कहनेको कुछ है भी नहीं।
कल मैंने फिर सफरी चरखेका इस्तेमाल किया। मेहनतमें फौरन कमी पड़ी
और उतने ही समय में ज्यादा उत्पादन हुआ हालांकि बहुत नहीं। लेकिन मैं
जानता हूँ कि मैं उसपर ज्यादा सूत निकाल सकूंगा। मैंने देखा कि जिस उद्देश्यसे
तुमने चरखा भेजा है यदि वह उससे पूरा नहीं होता तो उस चरखेका आग्रहपूर्वक
इस्तेमाल करते जाना प्रेमकी अनुचित अभिव्यक्ति होगी। इतना ही है कि मैं उसे
पूरी तरह परखे बगैर छोड़ना नहीं चाहता था। मेरा स्वास्थ्य बिलकुल ठीक है, लेकिन
वजन अभी भी कम है। लेकिन यह कुछ भी नहीं है। कब्ज काबूमें आते ही वजन
बढ़ जायेगा। मैं इस सप्ताह उसके बढ़नेकी आशा करता हूँ ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०८) से । सौजन्य : मीराबहून; जी० एन० ९६४२
से भी ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३१. पत्र : नारणदास गांधीको
दुबारा नहीं पढ़ा
परवडा मन्दिर
मंगल प्रभात, १९ अगस्त, १९३०
चि० नारणदास,
अब हम अस्तेय व्रत पर आते हैं।
गहराई में जायें तो हम देखेंगे कि सभी
व्रत सत्य और अहिंसा अथवा सत्यके गर्भ में समाहित हैं। यह बात इस प्रकार व्यक्तकी
जा सकती है
ब्रह्मचर्य
सत्य
सत्य
अहिंसा
अथवा
अस्वाद
अहिंसा
अस्तेय
अपरिग्रह
निर्भयता आदिको
जितना बढ़ा सकें उतना बढ़ायें।
या तो सत्यमें से अहिंसा निकलती है, ऐसा मानें, या सत्य-अहिंसाकी एक जोड़ी
मान लें। दोनों एक ही चीज हैं; फिर भी मेरा मन पहलेकी ओर झुकता है। और
आखिरी हालत तो जोड़ीसे -- द्वन्द्व से परे है। परम सत्य अकेला टिकता है। सत्य
साध्य है, अहिंसा साधन है। अहिंसा क्या है, यह हम जानते हैं; उसका पालन
मुश्किल है। सत्यका तो हम सिर्फ कुछ अंश ही जानते हैं; उसे पूरी तरह जानना
देहधारीके लिए कठिन है, जैसेकि अहिंसाका पूरा-पूरा पालन देहधारीके लिए कठिन है।
-
अस्तेयके मानी हैं चोरी न करना। कोई ऐसा नहीं कहेगा कि जो चोरी करता
है वह सत्यको जानता है या प्रेमधर्मका पालन करता है। फिर भी चोरी करनेका
थोड़ा-बहुत अपराध हम सब जाने-अनजाने करते ही हैं। बगैर इजाजतके किसीकी
कोई चीज लेना, यह तो चोरी है ही। लेकिन जिसे अपना माना है उसकी भी चोरी
इन्सान करता है जैसे कोई बाप अपने बच्चोंके न जानते हुए, उनको न जतानेके
इरावेसे, उनसे छुपकर कोई चीज खा लेता है । आश्रमका भण्डार हम सबका है, ऐसा
कह सकते हैं, परन्तु उसमें से कोई चुपचाप गुड़की एक डली भी ले ले तो वह चोर
है। एक बालक यदि दूसरेकी कलम ले लेता है तो वह चोरी करता है। दूसरा
आदमी जानता हो, तो भी उसकी इजाजतके बगैर उसकी कोई चीज लेना भी चोरी
है। फर्ला चीज किसीकी भी नहीं है, ऐसा मानकर उसे लेना भी चोरी है; यानी
रास्ते में पड़ी मिल जानेसे हम किसी वस्तुके मालिक नहीं हो जाते; उस प्रदेशका
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
९१
राजा या तन्त्र उसका मालिक है । आश्रमके नजदीक मिली हुई कोई भी चीज
आश्रमके मन्त्रीके सुपुर्द करनी चाहिए। अगर वह चीज आश्रमकी न हो तो मन्त्री
उसे पुलिसके हवाले कर दे । यहाँतक समझना तो प्रमाण में सहल ही है। लेकिन
अस्तेय इससे बहुत आगे जाता है। किसी चीजकी हमें जरूरत नहीं है; फिर भी
हम अगर, जिसके कब्जे में वह है, उससे उसकी इजाजत लेकर ही क्यों न हो, उसे
लें, तो यह चोरी है। जिसकी जरूरत न हो ऐसी कोई भी चीज हमें नहीं लेनी
चाहिए। ऐसी चोरी जगतमें ज्यादातर तो खानेकी चीजोंके बारेमें होती है। मुझे
अमुक फलकी आवश्यकता नहीं है, फिर भी मैं उसे खाता हूँ, या जितना खाना चाहिए
उससे ज्यादा खाता है, तो वह चोरी है। अपनी आवश्यकता वास्तव में कितनी है, यह
इन्सान सदा ही नहीं जान पाता है, और लगभग हम सभी जितनी चाहिए अपनी
हाजतें उससे ज्यादा बना डालते हैं। इससे हम अनजान में ही चोर बन बैठते हैं।
विचार करनेसे स्पष्ट हो जायेगा कि हम अपनी बहुतसी जरूरतें कम कर सकते हैं।
अस्तेयका व्रत पालनेवाला एकके बाद एक अपनी हाजतें कम करता जायेगा। इस
जगतमें बहुत लोगोंके अभावग्रस्त होनेका कारण अस्तेयका पालन न होना ही है।
ऊपर बताई गई सारी चोरियाँ बाहरी या शरीरकी चोरियाँ हुई। इससे भी
बारीक -- सूक्ष्म और आत्माको नीचे गिराने या रखनेवाली चोरी मानसिक, मनसे की
जानेवाली चोरी है। मनसे हम किसीकी चीज पानेकी इच्छा करें या उसपर बुरी
नजर डालें, यह चोरी है। बड़े हों या बच्चे हों, अच्छी चीज देखकर ललचाएँ तो
वह मनकी चोरी है। उपवास करनेवाला शरीरसे तो नहीं खाये, लेकिन दूसरेको
खाते देखकर मनसे स्वादका मजा ले, तो वह चोरी करता है और अपने उपवासका
भंग करता है। उपवास रखनेवाला जो आदमी उपवास छोड़ने पर क्या खायेगा इसका
विचार किया करता है, कहा जा सकता है कि वह अस्तेय और उपवासका भंग
करता है । अस्तेय व्रत पालनेवालेको भविष्य में पानेकी चीजके विचारोंके भँवरमें नहीं
पड़ना चाहिए। बहुत-सी चोरियोंके मूलमें ऐसी बद-दियानत पाई जायेगी। आज जो चीज
सिर्फ खयालमें ही है, उसे पानेके लिए कल हम भले-बुरे उपाय काममें लाना शुरू कर
देंगे । और जैसे वस्तुकी चोरी होती है, वैसे विचारकी चोरी भी होती है। अमुक
अच्छा विचार अपने मनमें न उठा हो, फिर भी खुद हमने ही सबसे पहले यह सोचा,
जो ऐसा अहंकारसे कहता है, वह विचारकी चोरी करता है। ऐसी चोरी बहुतसे
विद्वानोंने भी दुनियाकी तवारीखमें की है और आज भी चल रही है। खयाल कीजिए
कि मैंने आन्ध्रमें एक नई किस्मका चरखा देखा। वैसा चरखा मैं आश्रम में बनाऊँ
और फिर कहूँ कि यह मेरी खोज है, तो इसमें में साफ तौर पर दूसरेकी खोजकी
चोरी करता हूँ, झूठ तो बरतता ही हूँ।
इसलिए अस्तेय व्रतका पालन करनेवालेको बहुत नम्र, बहुत विचारशील, बहुत
सावधान और बहुत सादा रहना पड़ता है।
आज तो मैंने आश्रमकी डाक बहुत कामके बीचमें लिखी है। मोतीलालजी
आदि साथमें हैं। पिछला सप्ताह तो पूरा ही उनके साथ बातचीत में बीता समझो।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>९२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
सामान्य तौर पर अब भी उन्हें समय देना जरूरी है। इसलिए कल रातकी प्रार्थनाके
ठीक बाद ही पत्र लिखना शुरू कर सका और यह पत्र सुबहकी प्रार्थनाके बाद
लिखना शुरू किया । इसलिए आज कमसे कम पत्र लिख रहा हूँ और उनमें कमसे-
कम बातें लिख कर डाक निबटा रहा हूँ। बहनके बारेमें गंगाबहन और
भणसालीको लिखे पत्र देख लेना। जो ठीक लगे, सो दृढ़तापूर्वक कर डालना । ..
बहनका मन स्थिर और विकाररहित हो गया हो तो बाहर रहनेकी प्रतिज्ञा भंग
करनेकी बातको क्षमा किया जा सकता है। फिलहाल विचार करने पर तो मुझे ऐसा
ही लगता है। इस समय देखनेकी सबसे बड़ी चीज तो यह है कि विकारोंको जीतनेमें
उसकी मदद करें और दूसरी ओर उसकी स्वतन्त्रताकी रक्षा करें। स्त्री जाति इतनी
दबाई गई है कि वे बेचारी स्वतन्त्र रूपसे विचार तक नहीं कर सकती। इसीलिए
उनके प्रति आश्रमको तो बहुत उदारतासे काम लेना है। उसमें अत्यधिक जोखिम
है। वे सब [ जोखिम ] उनकी सेवाके लिए हम उठायें। तुम यथाशक्ति इस विचार
बहनका चेहरा मेरी आंखोंके सामने आता है तो उसमें
मुझे निर्दोषता और भय ही दिखाई देता है। अपने पतनका कारण वह खुद ही नहीं
है। यह दोष सुननेके बाद के चेहरे पर विकार में देख सकता हूँ
बहनके मुखपर मुझे वैसे चिह्न नहीं दिखते। उसके मुखपर तो भोलापन नजर आता
है। अज्ञान तो है ही । .' बहनकी तुलना कुछ-कुछ ऋष्यशृंगके साथ की जा
सकती है। सिर्फ यही बड़ा भेद है कि बहनने विकारका अनुभव किया था ।
उसे (ऋष्यशृंगको) तो उसका बिलकुल अनुभव नहीं हुआ था । किन्तु कविने उसका
चित्रण इस प्रकार किया है मानों वह स्पर्श मात्रकी बाट जोहते हुए ही बैठा हो ।
ऐसी स्थिति असंख्य निर्दोष स्त्री-पुरुषोंकी आज भी है। " संगका अवसर आने पर इच्छा
पनपती है", इसलिए हमें किसीकी निन्दा करनेका अधिकार नहीं है। केवल प्रेम
करना, स्वयं सावधान रहना ही हमारा स्पष्ट धर्म है। आज इतना ही काफी है।
बापूके आशीर्वाद
पर अमल करना । .
[ पुनश्च : ]
सब मिलाकर ३० पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
१ से ७. साधन-सूत्र में नाम नहीं दिये गये है।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० रमावन,
१३२. पत्र : रमाबहन जोशीको
मैंने
परवडा मन्दिर
२१ अगस्त, १९३०
बहुत दिनों बाद तुम्हारा पत्र मिला। मैं बाट तो जोह ही रहा था। धीरू
और विभुके बारेमें मैंने कभी कोई चिन्ता नहीं की। देखा है कि ऐसे शैतान
बच्चे अन्तमें जाकर बहुत शान्त हो जाते हैं। बच्चोंसे मिलने जानेके लोभका तुमने
संवरण किया, सो ठीक किया। तुम्हें जो बच्चे दिखाई दें उन्हें धीरू और विभुका
ही प्रतिरूप समझकर उन्हें स्नेह दो। इस तरह धीरू और विभुके प्रति तुम्हारा प्रेम
निर्मल हो जायेगा तथा वे अच्छे बनेंगे ।
सब बहनोंको मेरा आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ५३२३) की फोटो नकलसे ।
चि० मनु,
बापूके आशीर्वाद
१३३. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
परवडा मन्दिर
२१ अगस्त, १९३०
तूने अच्छा 'लम्बा' पत्र लिखा; किन्तु मैं उसे लम्बा नहीं मानता। मेरी
सलाह तो यह है कि जबतक काकासाहब वहाँ न पहुँचें तबतक तु वहाँ बैठकर तुझसे
जो सेवा बन पड़े सो करता रह। इसीमें तेरी साधना और परीक्षा है। जन सेवकको
धैर्य रखनेका पाठ भी सीख लेना चाहिए। यह सोचनेका काम नायकका है कि कार्य-
कर्ता अच्छी सेवा किस रूपमें कर सकता है। जो काम हमें सौंपा जाये यदि हम
उसे निष्ठापूर्वक करते हैं तो इसका यह मतलब है कि हमने अपने कर्तव्यका पालन
किया। यह तो सभी अपने अनुभवसे समझ सकते हैं कि कौन-सा कार्य हमारी सामर्थ्य-
के बाहर है। जहाँ मोह नहीं है वहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्यकी सीमा खोज
सकता है। काकासाहब के साथ विचार-विमर्श करनेके बाद मैंने उपर्युक्त सुझाव दिया
है। यदि इससे भी मानसिक शान्ति न मिले तो मुझे फिर लिखना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ७७६०) की फोटो नकलसे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाई पण्डितजी,
१३४. पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको
परवडा मन्दिर
२१ अगस्त, १९३०
₹
आपका पत्र पढ़कर हम दोनोंको प्रसन्नता हुई। ऐसा सुननेमें आया था कि
आप कुछ कमजोर हो गये हैं। आप कोई बीमारी नहीं लाये हैं, इसलिए धीरे-धीरे
आपका शरीर स्वस्थ हो जायेगा । आप अपने स्वास्थ्यकी ओर ध्यान दें। रामभाऊ '
और मथुरी मुझे जब-तब लिखते तो रहते हैं। एक-दो पत्रोंमें इस बातका उल्लेख
था कि लक्ष्मी ने बहुत बहादुरी और धीरज दिखाया है। बहादुरी तो उसके चेहरे से
ही झलकती है। प्रार्थनाके समय आपके कण्ठसे निकला हुआ स्वर तो मेरे कानों में
रोज ही गूंजता रहता है। हम भजन तो गा ही नहीं पाते इसलिए रामधुनसे ही
सन्तोष कर लेते हैं ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २३१ ) की फोटो नकलसे सौजन्य लक्ष्मीबाई सरे
चि० वसुमती,
१३५. पत्र : वसुमती पण्डितको
यरवडा मन्दिर
२१ अगस्त, १९३०
तेरा पत्र मिला। धीरे-धीरे अभ्यास कर लेने पर किसी भी व्यक्तिके हाथके
नीचे जन सेवा करनेसे हमें क्षोभ नहीं होता। हम ऐसा करना सीख जायें तभी यह
कहा जा सकता है कि हमें सच्ची सेवा करना आ गया। अहंभाव मिट जाने पर
हमें पराधीनताका अनुभव ही नहीं होगा। शून्यवत् होकर रहनेवाला किसी भी स्थिति में
शान्ति अनुभव करता है। ऐसी स्थिति एकदम नहीं आ जाती; किन्तु इसमें कोई
शंका नहीं कि प्रयत्न करने पर उक्त स्थितिको प्राप्त कर लेना सभीके लिए साध्य
है। तू किसी-न-किसी दिन इस स्थितिमें पहुँच जायेगी; इस सम्बन्ध में मुझे कोई
सन्देह नहीं है।
गुजराती (एस० एन० ९२८४ ) की फोटो नकलसे।
१ व २. ना० मो० खरेके पुत्र ( रामचन्द्र ) और पुत्री (माधुरी ) ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मथुरादास,
१३६. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
परवडा मन्दिर
२१ अगस्त, १९३०
तुम्हारा पत्र और पिंजाई सम्बन्धी प्रकरण मिला। तेल अभी तक नहीं मिला ।
क्या तुमने मिट्टी के तेलका प्रयोग करके देखा है ? उससे भी मच्छर भाग जाते हैं ।
जहाँ मच्छर बैठते हों वहाँ मिट्टीका तेल चुपड़ देनेसे मच्छर नहीं आते। बिनौलेके
तेलके बारेमें मुझे पता नहीं था। यहाँ तो हमें खुलेमें सोनेको मिलता है, अतः मच्छरों
का उपद्रव नहीं है।
पिजाई सम्बन्धी तुम्हारे सभी लेख मुझे पसन्द आये हैं। कुछ स्थानों पर भाषा में
अनावश्यक रूपसे दावेकी झलक आ गई है। मेरा अपना अनुभव है कि अच्छी तरह
पिजी हुई रुई होने पर भी इस बातका भरोसा नहीं दिलाया जा सकता कि सुत
समान ही निकलेगा । मैं बहुत ही सावधानीसे कातनेवाला हूँ किन्तु पिंजाईके भली-
भाँति किये जाने पर भी हमेशा सूत समान नहीं निकलता। एक समान सूत निकालना
भी एक कला है और यह अँगुलियोंके कौशल पर निर्भर है। जिनकी अँगुलियाँ जड़-
सी हो गई हैं, उन्हें एक समान सूत निकालने में अवश्य कठिनाई होगी। खराब पिंजी
हुई रुईसे मैंने कुशल कातनेवालोंको एक समान सूत निकालते हुए देखा है। किन्तु
यह कहकर मैं पिंजाईको कम महत्त्व नहीं देना चाहता। मेरा उद्देश्य इस बातको स्पष्ट
करना है कि अच्छी विजाईके कारण कातनेवालेकी सभी मुश्किलें हल नहीं हो जाती ।
जैसाकि मैंने कहा, कताईकी कलामें कपास चुननेसे लेकर पूनियाँ बनाने तककी सभी
क्रियाएँ आ जाती हैं और सभी पर कातनेवालेका अधिकार होना चाहिए। इनमें से
यदि एक भी क्रिया कच्ची होगी तो उस कमीको सावधानीसे कातकर कदापि पूरा
नहीं किया जा सकता। जिस बातके बारेमें हमें सोलह आने भरोसा न हो उसे हमें
विश्वासपूर्वक नहीं कहना चाहिए। तुम अपने लेखोंको छपवानेसे पहले लक्ष्मीदासको
दिखा लेना । इस कलाको जाननेवाला यदि कोई अन्य व्यक्ति हो तो उसे पढ़वा देना
अच्छा होगा। सम्भवतः शंकरलाल तुम्हारी मदद कर सकेगा। पुस्तक यथासम्भव
परिपूर्ण होनी चाहिए। मोतीबहन के पत्र फिर नहीं मिल रहे हैं। अब वह कैसी है?
गुजराती (जी० एन० ३७४२) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मथुरादास,
१३७. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
[२१ अगस्त, १९३० के पश्चात् |'
तुम्हारा पत्र मिला। पुस्तकके बारेमें तुमने काफी सतर्कता बरती है। मैं अब
तक अन्तिम अंश पढ़ नहीं पाया हूँ। चरखेके कारण मेरे पास अतिरिक्त समय बहुत
ही कम बचता है । और जो कुछ बचता भी है उसमें से अधिकांश समय पत्र लिखने में
चला जाता है। अपनी आंख खराब मत कर लेना। यदि आवश्यक हो तो डा०
हरिभाईको दिखाना। उन्हें इस विषयका अच्छा ज्ञान है। बिनौलेका तेल कार्यालयमें
आ गया है। मोतीबहनने मेरे पिछले पत्रका उत्तर अवतक नहीं दिया है।
सप्तपदीके बारेमें अगले पत्र में । २
...
गुजराती (जी० एन० ३७४३) की फोटो नकलसे ।
१३८. पत्र : राधाबहन गांधीको
यरवडा मन्दिर
२२ अगस्त, १९३०
चिo राधिका,
यह बात मुझसे सहन
मैं तेरे पत्रकी प्रतीक्षा करूँगा। केशु बीमार रहता है,
नहीं होती । तू ध्यानसे उसकी देख-भाल करना। फिरसे बुखार क्यों आया? वह
क्या खाता है? मुझे पूरे समाचार देना ।
[ पुनश्च ]
तेरा पत्र अभी-अभी मिला। मैं सब समझता हूँ ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८६८५ ) से । सौजन्य : राधाबहन चौधरी
१. बिनौलेके तेलका उल्लेख होनेसे ऐसा जान पड़ता है कि पद पत्र पिछले शीर्षकके बाद लिखा
गया होगा।
२. शेष अंश उपलब्ध नहीं है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३९. पत्र: मणिबहन पटेलको
यरवडा मन्दिर
२२ अगस्त, १९३०
चि० मणि (पटेल),
अपना अनुभव तूने ठीक-ठीक बताया है। तू बापूसे मिल गई, यह भी मालूम
हुआ । बापू मुझे तो [ तबसे | नहीं मिले। मुझे बराबर लिखती रहना । जब तू बम्बई में
पहुँचे तब पेरीनबहन और लीलावतीसे मिलना ।
मुझे पत्र लिखती रहना ।
| गुजरातीसे ]
बाबुना पत्रो - ४ : मणिबहेन पटेलने
१४०. पत्र : महावीर गिरिको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
२२ अगस्त, १९३०
चि० महावीर,
तेरा पत्र मिला। धनुर्धारीकी टुकड़ी तो देखने लायक होगी। जो काम हमारे
हिस्से में आये उसमें दक्षता प्राप्त करके हमें सन्तोष अनुभव करना चाहिए। यदि
तू अभ्यास करे तो तेरे अक्षर सुधर जायेंगे । जन्माष्टमीको तूने कौन-सी प्रतिज्ञा ली ?
दैनन्दिनी लिखने में आलस्य मत करना ।
गुजराती (जी० एन० ६२१७) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
४४-७
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४१. पत्र : कुसुम देसाईको
परवडा मन्दिर
२२ अगस्त, १९३०
चि० कुसुम (देसाई),
तेरा पत्र मिला । तेरे पत्रका उत्तर देनेमें में तनिक भी देर नहीं करता।
सुशीलासे जो सीखा जा सके, सीख लेना। परन्तु पढ़ने-लिखनेका समय मिलता है ?
डायरी लिखती है ? प्रार्थना जारी है ? मेरा स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
वहाँ कितनी बहनें काम करती है ? कपड़जकी क्या खबर है ?
गुजराती (जी० एन० १८०२ ) की फोटो नकलसे ।
१४२. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२२ अगस्त, १९३०
चि० प्रेमा,
तेरा पत्र मिला। श्रावणी पूर्णिमाके दिन तेरी राखी काकाने बांधी थी और
तेरी ओरसे प्रणाम भी किया था।
पण्डितजीका धैर्य और उनका त्याग तूने जैसा लिखा, वैसा ही है। उन्होंने
सहनशक्ति भी बहुत ऊँने दरजेकी दिखाई है।
अबसे आगे न तो तू दस बजे तक जागना, न दूसरेको जगाना। नो बजे हमें
विस्तर पर लेट ही जाना चाहिए।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६७९) से सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२३१ की फोटो नकलसे भी ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४३. पत्र : कपिलराय मेहताको
यरबडा मन्दिर
२२ अगस्त, १९३०
चि० कपिल,
तू चाहे तो विले पार्लेमें रह सकता है। यहाँ और कौन-कौन है ? अब्दुल्ला
सेठ क्या करते हैं? तू अपना स्वास्थ्य सुधारना। काकासाहब का स्वास्थ्य अच्छा है।
[ पुनश्च : ]
काकासाहब के आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ३९७४ ) की फोटो नकलसे ।
१४४. पत्र : सत्यादेवी गिरिको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
२२ अगस्त, १९३०
चि० सत्यदेवी,
मैं तेरे पत्र भूलचूक सुधारकर पढ़ें, इससे अच्छा तो यह है कि तू ही वहाँ
से अपनी भूलें सुधारकर पत्र लिखे। इससे दोहरा लाभ है। तुझे तेरी भूलें मालूम
हो जायें और मुझे कुछ सुधारना न पड़े है न अच्छी बात ?
माताजी से कहना, मुझे लिखें और बतायें कि आजकल क्या-क्या कर रही हैं।
बापूकी विराट् वत्सलता
बापूके आशीर्वाद
१. कृष्णमैया देवी।
२. मूल पत्र गुजरातीमें था।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० काशिनाथ,
१४५. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
परवडा मन्दिर
२३ अगस्त, १९३०
जो दवा दी है, उसे
कलावतीने यदि इस
कि वह अब नहीं जा
तुम्हारा पत्र मिला । शान्ता और कलावतीको डाक्टरने
आजमाने के बाद मुझे लिखना कि उसका क्या असर हुआ।
लड़ाईमें भाग लेनेकी प्रतिज्ञा ली हो, तो में समझता हूँ
सकेगी। तुम पिताजीको तो लिख ही चुके हो। अब तुम दोनोंकी अन्तरात्मा जो
कहे सो करना ।
गुजराती (जी० एन० ५२४९ ) की फोटो नकलसे ।
१४६. पत्र : मीराबहनको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२४ अगस्त, १९३०
चि० मीरा,
तुम्हारी मद्रास यात्रा के दौरान लिखा गया तुम्हारा प्रेम-पत्र मुझे मिला। मैं
आशा करता हूँ कि यह मेहनत तुम्हारे लिए बहुत ज्यादा साबित नहीं होगी। तुम्हारे
सभी विवरण मूल्यवान हैं। हाँ, नेहरूओंके यहां आने पर बहुत व्यस्तता रही। बड़ी
कठिनाईसे में ३७५ तार सूत कात सका, जिसे न करने पर में बहुत दुखी अनुभव
करूँगा। पेटी चरखा बहुत अच्छा काम दे रहा है और निस्सन्देह उसमें कम मेहनत
पड़ती है। तुमने जो पतली माल भेजी थी उसे उसपर लगा देनेके वादसे अब वह
और सन्तोषजनक रूपसे काम करती है। मोटी मालसे दिक्कत पैदा हो रही थी।
धुनकी बिलकुल ठीक काम कर रही है। उसमें मुझे कोई मेहनत नहीं पड़ती।
काकासाहब पूनियां बनाते हैं। उन्हें धुनाई अभी सीखनी है और वह जल्दी ही उसे
शुरू करनेवाले हैं। भजनोंका अनुवाद पहलेकी तरह ही नियमित रूपसे लेकिन धीरे-
धीरे चल रहा है और में इससे ज्यादा तेजीसे अनुवाद कर सकनेकी सम्भावना
निकट भविष्य में नहीं देखता। मैं अच्छा हूँ। वजन घटता-बढ़ता रहता है। मेरा जो
दो या तीन पौंड वजन कम हुआ लगता था उसमें से एक पौंड पिछले हफ्ते फिर
१. मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र सुशीला गांधीको
१०१
बढ़ गया। शक्तिमें कोई कमी नहीं हुई है । यहाँका पानी भारी है इसलिए कब्ज के
मामले में थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है।
सप्रेम,
[ पुनश्च : ]
तुम्हें जानकर खुशी होगी कि ताँत एक बार भी नहीं टूटा है।
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०९ ) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६४३ से भी ।
१४७. पत्र प्रभावतीको
यरवडा मन्दिर
२४ अगस्त, १९३०
चि० प्रभावती,
इस सप्ताह तेरा कोई पत्र नहीं आया। जयप्रकाशको और तुझे लिखे मेरे पत्र
मिले होंगे। पिछले दिनों मेरा वजन कम हो रहा था लेकिन अब दो पौंड बढ़
गया है। तू आजकल क्या करती है ? वल्लभभाईने बताया कि जयप्रकाशकी तबीयत
कुछ ढीली है। क्या यह बात सच है ?
गुजराती (जी० एन० ३३६७ ) की फोटो नकलसे।
१४८. पत्र : सुशीला गांधीको
चि० सुशीला ( मणिलाल ),
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
२४ अगस्त, १९३०
तू सूख गई है क्या? ऐसा मुझपर तरस खानेके कारण हुआ है या आलस्यवश ?
यदि तु मुझपर तरस खाती हो तो मुझे लिखना सीता कैसी है? वह बीमार
क्यों पड़ती रहती है? तू उसे फल खिलानेमें कंजूसी तो नहीं करती है न? तेरा
कान कैसा है ? तेरी तबीयत कैसी रहती है? तारा क्या करती है? नानाभाईका
स्वास्थ्य कैसा रहता है? अन्य प्रश्न तू स्वयं ही सोच लेना । मणिलाल हँसी करता
रहता है न ? वह जेलमें क्या पढ़ता है ?
गुजराती (जी० एन० ४७७०) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० रसिक (देसाई),
१४९. पत्र : रसिक देसाईको
यरवडा मन्दिर
२४ अगस्त, १९३०
क्या तूने मेरी लाज रखी ? तूने जो व्रत लिये थे, क्या उनका पालन किया था ?
मुझे पूरे समाचार देना । तूने अपना समय कैसे बिताया ? क्या तू आलस्य करता था ?
क्या बहुत बक बक करता था ? क्या तेरा शरीर स्वस्थ रहा? ये और इन जैसे
अन्य प्रश्नोंके उत्तर देना। तूने किन-किनको अपना मित्र बनाया ?
गुजराती (जी० एन० ६६१७ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१५०. पत्र : नारणदास गांधीको
यरवडा मन्दिर
२४ / २६ अगस्त, १९३०
चि० नारणदास,
--
इस बार डाक हमेशासे जल्दी मिली है। अर्थात् गुरुवारके बदले बुधवारको ।
पत्रोंमें सतीश बाबू
-कृष्णदासके गुरु सतीश मुखर्जी का पत्र है। उनका पता हाजरा
रोड, कलकत्ता है। नम्बर भूल गया हूँ। शायद सुरेन्द्रको मालूम होगा या पत्रोंमें कहीं
होगा। देवदासका स्वास्थ्य कैसा है? उससे कहना कि उसका यशोगान होता ही
रहता है। क्या रामदासकी तबीयत ठीक हो चुकी है? जो छूट गये हैं उनके नाम
तो मैंने मांगे हैं, साथ ही उन्होंने कितना काता-पींजा यह भी लिख भेजो तो अच्छा
हो। कपड़ेका लिफाफा न मिले तो बुक पोस्टकी तरह रस्सीसे कसकर बाँध भेजने में
कोई हानि नहीं है। केशुका स्वास्थ्य फिर बिगड़ गया मालूम होता है। उसका जल्दी
इलाज करवाना। गिरिराजकी बीमारी भी लम्बी चली है। जान पड़ता है, उसका
खून खराब हो गया है। सिंगरकी गाइड नहीं मिली। मिलने में बहुत कठिनाई हो तो
जाने देना । हसमुखरायके बारेमें समझ गया हूँ। ठीक लगे तभी उसे पत्र देना ।
जोलिंगको लिखा पत्र पढ़कर उसे देना। यहाँ इस बारेमें इससे ज्यादा नहीं लिखता ।
धनगोपालको तो तुमने पहुँच लिली होगी। जमनादासका स्वास्थ्य कैसा रहता है ?
उसे समय-समयपर मिलने देते हैं क्या ?
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
१०३
मंगल प्रभात, २६ अगस्त, १९३०
अपरिग्रहका सम्बन्ध अस्तेयसे है। जो असल में चुराया नहीं है उसे जरूरत न
होनेपर भी जमा करनेसे यह चोरीका माल सा बन जाता है। परिग्रहके मानी हैं
संचय यानी इकट्ठा करना। सत्यकी खोज करनेवाला, अहिंसा वरतनेवाला परिग्रह
नहीं कर सकता । परमात्मा परिग्रह नहीं करता। अपने लिए जरूरी चीज यह रोजके-
रोज पैदा करता है। इसलिए अगर हम उसपर भरोसा रखते हैं, तो हमें समझना
चाहिए कि हमारी जरूरतकी चीजें वह रोजाना देता है, देगा। औलियाओंका भक्तोंका
यही अनुभव है। रोजकी जरूरत जितना ही रोज पैदा करनेका ईश्वरीय नियम
हम नहीं जानते, या जानते हुए भी पालते नहीं। इसलिए जगत में असमानता और
उसमें से पैदा होनेवाले दुःख हम भुगतते हैं। अमीरके यहाँ जो उसको नहीं चाहिए,
ऐसी चीजें भरी पड़ी होती हैं; वे लापरवाहीसे खो जाती हैं, बिगड़ जाती है; जब
कि इन्हीं चीजोंकी कमी के कारण करोड़ों लोग भटकते हैं, भूखों मरते हैं, ठंडसे
ठिठुर जाते हैं। सब अगर अपनी जरूरतकी चीजोंका ही संग्रह करें, तो किसीको
तंगी महसूस न हो और सबको सन्तोष हो। आज तो दोनों (तंगी ) महसूस करते
हैं। करोड़पति अरवपति होना चाहता है; फिर भी उसको सन्तोष नहीं होता। गरीब
धनवान होना चाहता है। कंगालको भरपेट मिल जानेसे ही सन्तोष होता हो, ऐसा
नहीं देखा जाता। फिर भी उसे भरपेट पानेका हक है, और वह उतना पाये, यह
देखना समाजका फर्ज है। इसलिए उस (गरीब) के और अपने सन्तोषकी खातिर
अमीरको पहल करनी चाहिए। अगर वह अपना ज्यादा परिग्रह छोड़े तो गरीबको
अपनी जरूरत भर के लिए आसानीसे मिल जाये और दोनों पक्ष सन्तोषका सबक
सीखें । आत्यन्तिक आदर्श अपरिग्रह तो जो मन और कर्मसे दिगंबर है उसीका हो
सकता है। मतलब कि वह पंछीकी तरह बगैर घरके, बगैर कपड़े और बगैर
अन्नके चलता-फिरता रहेगा। अन्न तो उसे रोज चाहिए, जो भगवान देता रहेगा ।
इस अवधूत दशाको बिरला ही आदमी पहुँच सकेगा। हम मामूली दरजेके सत्याग्रही
जिज्ञासु (जानने की इच्छा रखनेवाले) लोग आदर्शको खयालमें रखकर जैसा बन पड़े,
हमेशा अपने परिग्रहकी जाँच करते रहें और उसे कम करते जायें। सही प्रगति,
सच्ची सभ्यताका लक्षण परिग्रह बढ़ाना नहीं है, बल्कि सोच-समझकर और अपनी
इच्छासे उसे कम करता है। ज्यों-ज्यों हम परिग्रह घटाते जाते हैं, त्यों-त्यों सच्चा
सुख और सच्चा सन्तोष बढ़ता जाता है, सेवाकी शक्ति बढ़ती जाती है। इस तरह
सोचनेपर और बरतनेपर हम देखेंगे कि आश्रम में हम बहुत-सा संग्रह ऐसा करते हैं,
जिसकी जरूरत साबित नहीं कर सकेंगे; और ऐसे बिना जरूरी परिग्रहसे पड़ोसीको
चोरी करनेके लालच में फँसाते हैं। अभ्याससे, आदत डालने से आदमी अपनी जरूरतें
घटा सकता है; और ज्यों-ज्यों उन्हें घटाता जाता है त्यों-त्यों वह सुखी, शान्त और
सब तरहसे तन्दुरुस्त होता जाता है। महज सत्यकी यानी आत्माकी नजरसे सोचने ]
पर शरीर भी परिग्रह है। भोगकी इच्छासे हमने शरीरका आवरण पैदा किया
है और उसे हम टिकाये रखते हैं। अगर भोगकी इच्छा बिलकुल कम हो जाये तो
10
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
शरीरकी आवश्यकता समाप्त हो जाये; यानी मनुष्यको नया शरीर लेने की जरूरत
न रहे। आत्मा सब जगह फैलनेवाली, सर्वव्यापी होनेसे शरीर रूपी पिंजरे में क्योंकर
कैद होगी? उस पिंजरेको बनाये रखनेके लिए बुरा काम क्यों करें? औरोंको क्यों
मारें ? इस तरह विचार करते हुए हम आखिरी त्याग तक पहुँच जाते हैं, और
जबतक शरीर है तबतक उसका उपयोग सिर्फ सेवाके लिए करना सीखते हैं; यहाँ
तक कि सेवा ही उसकी असली खुराक हो जाती है। वह खाता है, पीता है, लेटता
है, बैठता है, जागता है, सोता है; यह सब सेवाके लिए ही होता है। इसमें से पैदा
होनेवाला सुख सच्चा सुख है, और ऐसा करते-करते मनुष्य अन्तमें सत्यकी झांकी
करता है। हम सब अपने-अपने परिग्रहके बारेमें इसी निगाहसे सोचें।
इतना याद रखने लायक है कि जैसे चीजोंका, वैसे ही विचारोंका भी अपरिग्रह
होना चाहिए। जो आदमी अपने दिमागमें बेकारका ज्ञान भर रखता है वह परिग्रही
है। जो विचार हमें ईश्वरसे विमुख करते हैं, फेर लेते हैं या ईश्वरकी ओर नहीं
ले जाते, वे सब परिग्रहमें गिने जायेंगे और इसलिए छोड़ने लायक हैं। ज्ञानकी
ऐसी व्याख्या भगवानने 'गीता' के तेरहवें अध्यायमें दी है। वह इस मौके पर सोचने
लायक है। अमानित्व वगैराको गिना कर भगवानने कह दिया है कि उसके अलावा
जो कुछ है वह सब अज्ञान है। अगर यह सही वचन है और सही तो है ही
तो आज जो हम बहुत कुछ ज्ञानके नामसे जमा करते हैं वह अज्ञान ही है और उससे
लाभके बजाय नुकसान होता है; उससे सिर घूमता रहता है, और आखिर वह खाली
हो जाता है; उससे असन्तोष फैलता है और बुराइयां बढ़ती है।
---
इसमें से कोई जड़ताका अर्थ कभी न निकाले। हमारा हरएक पल और क्षण
प्रवृत्तिपूर्ण होना चाहिए। लेकिन वह प्रवृत्ति सात्विक हो, सत्यकी ओर ले जानेवाली
हो। जिसने सेवाधर्मको अपनाया है वह एक पलके लिए भी जड़ दशामें नहीं रह
सकता। यहाँ तो सार असारका विवेक सीखने की बात है। सेवापरायणको यह विवेक
आसानीसे हासिल होता है।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
काकासाहब का वजन एक पौंड फिर बढ़ गया है और उत्साह भी बढ़ा है।
मेरा जो वजन कम हुआ था उसमें एक पडकी वृद्धि हो गई है। तीन दिनसे दहीके
साथ उबली हुई सब्जी लेने लगा हूँ। आजके पत्र तुम्हारे भेजे हुए लिफाफे पर नया
कागज चिपका कर भेजे हैं, यह देखोगे ही। तुम यही वापस भेज सकते हो।
[ पुनश्च: ।
५३ पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
बापू
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४३
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2026-08-16T03:06:00Z
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बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ
670460
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५१. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
२९ अगस्त, १९३०
चि० प्रेमा,
तेरा पत्र मिला। कागजकी कतरनों पर लिखे पत्रोंको देखकर कोई हँसे नहीं,
न रोष ही करे। मुझे यही शोभा देता है। ऐसी कतरनों पर पत्र लिखते समय भी
मैं उसे जितना सुन्दर और दिलचस्प बना सकता हूँ, बनाता है।
तेरे शरीरमें रोग है, ऐसी शंकासे तू भयभीत क्यों होती है ? रोग हो तो
भी क्या ? और वह रोग गम्भीर हो तो भी क्या ? 'देह जावो अथवा राहो
पांडुरंगी दृढ भायो'। आश्रम में हमने कमसे कम इतना तो सीखा ही है। कुछ दिन
उपवास करनेसे तेरा शरीर स्वच्छ हो जायेगा। 'कूने बाथ', कटिस्नान और विशेष
रूपसे इन्द्रिय- घर्षण स्नान (फिक्शन सिट्ज बाथ) आवश्यक है। तुझे इनकी जानकारी
न हो तो कान्ता या राधासे पूछना। सम्भवतः उन्हें इसकी जानकारी है। कूनेकी
पुस्तक इनके विषय में पढ़ भी लेना स्त्रियोंको यदि कोई रोग हो तो मासिकधर्म के
बारेमें जानना जरूरी हो जाता है। मासिकधर्म तुझे ठीक आता है? नियमसे होता
है ? तकलीफ होती है? डाक्टरकी सलाह लेनेकी जरूरत हो तो लेना ।
अरविन्दवाबू की पुस्तक मैंने पढ़ी है। मैंने कितनी कम पुस्तकोंका अध्ययन किया
है, सो तो मैं ही जानता हूँ। मेरा धन्धा तो मुख्यतः प्रकृतिकी पुस्तकको पढ़नेका ही
रहा है और यह कभी खत्म हो ही नहीं सकता।
नींद तुझे पूरी लेनी ही चाहिए। ९ से ४ का नियम पालना चाहिए।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६८० ) से । सौजन्य: प्रेमाबहन कंटक जी० एन०
१०२३२ की फोटो नकलसे भी ।
१. मराठी सन्त नामदेवकी पंक्तियाँ, जिनका अर्थ है कि शरीर रहे अथवा नष्ट हो जाये, पाण्डुरन
(भगवान) के प्रति भक्ति बनी रहे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० महालक्ष्मी,
१५२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको
परवडा मन्दिर
२९ अगस्त, १९३०
किसी पत्रका उत्तर देना रह गया था क्या? मैं तुम सभी बहनोंको याद तो
कर ही लेता हूँ । यदि तुम लोग मेरे साथ कुछ महीने रही होतीं तो मुझे भी अच्छा
लगता। इसके बावजूद तुम दोनोंने इतनी दूर बैठे हुए भी स्वयंको इस तरह तैयार
कर लिया है कि यदि तुम मेरे पास ही रही होतीं तो मुझसे और अधिक क्या ले
पाती, यह मुझे नहीं सूझता। बच्चे अब भी फलादि पर रहते हैं और तुम भी फलों
पर रहने लगी हो, यह ठीक किया। डाहीबहनने मुझे क्यों नहीं लिखा ? सभी बहनोंको
आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ६७९७ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
१५३. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
परवडा मन्दिर
२९ अगस्त, १९३०
चि० मनु (त्रिवेदी),
गंगाबहन लिखती है कि तू बाहर निकलनेको अधीर है। यह तो मेरा पत्र
मिलनेके पहलेकी बात है। मुझे आशा है कि मेरे पत्रसे तेरा मन शान्त हुआ होगा ।
सिपाहीके मुँहसे 'क्यों निकल ही कैसे सकता है? उसे जो काम मिलता है, वह
मूक भावसे और प्रफुल्लित मनसे किये चला जाता है। काकासाहब की शर्त पूरी हो
लेने दो ।
अब क्या काकासाहब के छूटने में कोई बहुत देर है ? इसके बावजूद यदि
मनको शान्ति न मिले तो मुझे लिखना ।
गुजराती (जी० एन० ७७६१) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५४. पत्र : प्रभावतीको
यरवडा मन्दिर
२९ अगस्त, १९३०
चि० प्रभावती,
तेरा पत्र मिला । यदि कमलाबहन खुशी-खुशी तुझे अनुमति दे और बिहारमें
काम करनेकी सुविधा हो तो वहाँ जाना तेरा पहला धर्म है। जयप्रकाशकी तबीयत
तो अच्छी रहती है न? अपनी सेहतका ध्यान रखना । मृत्युंजयका पत्र मिला है।
मैं चंगा हूँ। खुराकमें अब खजूर और मुनक्के के स्थान पर हरी सब्जियां लेनी
शुरू की हैं। देखता हूँ, उसका क्या असर होता है? मेरी चिन्ता न करना ।
गुजराती (जी० एन० ३३६८ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
चि० मंत्री,
१५५. पत्र : मंत्री गिरिको
यरबडा मन्दिर
२९ अगस्त, १९३०
तू मुझे पत्र लिखती रहना। गंगाबह्नने तेरे बारेमें सन्तोष व्यक्त किया है,
जिससे मुझे आनन्द हुआ। तेरा शरीर तो स्वस्थ है न ?
गुजराती (जी० एन० ६२१८) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५६. पत्र : गुलाम रसूल कुरेशीको
चि० कुरेशी,
यरबडा मन्दिर
३० अगस्त, १९३०
तुम्हारा पत्र पढ़कर प्रसन्नता हुई। तुमने कुरान शरीफका अध्ययन करके ठीक
किया। 'मिस्टिक्स ऑफ इस्लाम' नामक पुस्तक खोजकर पढ़ डालना। मुझे जो
लिखना चाहो सो लिखना । दहीका सेवन करनेसे बहुत करके तुम ठीक हो जाओगे ।
आवश्यक व्यायाम करते रहना। तुम जब इमामसाहबसे मिलो तो कहना कि हम
दोनों उन्हें खूब याद करते हैं और प्रायः आपसी बातचीत में उनका नाम तो आता
ही रहता है। अमीनासे मुझे पत्र लिखनेको कहना। तुम दोनोंको हमारा आशीर्वाद
और दुआ ।
गुजराती (जी० एन० ६६५१ ) की फोटो नकलसे।
चि० शारदा,
१५७. पत्र : शारदा सी० शाहको
बापू
परवडा मन्दिर
३१ अगस्त, १९३०
तेरे पत्र सर्वथा नियमित रूपसे मिलते रहते हैं। ऐसे समय भी यदि मन आनन्द
मनाना चाहे तो शायद शारीरिक रूपसे उसका उपभोग करना उचित होगा। किन्तु
यदि मन ही ऐसा न करना चाहे और उस दिन कोई विशेष कार्य मनःपूर्वक किया
जाये तो निश्चय ही ज्यादा अच्छा होगा। ऐसे मामलोंमें बालकोंसे जबरदस्ती कुछ भी
नहीं कराया जा सकता। उद्योगमें आलस्य अनुभव होनेपर उसे निकालने की सतत
चेष्टा करनेसे यह चला जाता है। तुझे उद्योगकी आवश्यकता समझनी चाहिए।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९८८८ ) से । सौजन्य: शारदाबहन जी० चोखावाला
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५८. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको
यरवडा मन्दिर
३१ अगस्त, १९३०
चि० ब्रज कृष्ण,
तुमारा खत मिला। आलमोडा जानेका मौका मिल जाय तो अवश्य जाओ ।
अब मानसिक स्थिति कैसी रहती है ? कृष्ण नायर को मेरे आशीर्वाद भेजो। मुझे
खत लीखते रहो।
जी० एन० २३८४ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
१५९. पत्र : मीराबहनको
चि० मीरा,
[ ३१ अगस्त, १९३० के लगभग |
तुम्हारा पत्र हालांकि हिलती हुई रेलगाड़ीमें लिखा गया था लेकिन खूब साफ
था। अगर तुमने इस ओर मेरा ध्यान न दिलाया होता तो मुझे कोई फर्क नहीं
लगा होता ।
मैं समझता हूँ कि सफरी चरखेके ऊपर मेरी अच्छी पकड़ हो गई है और मैं
आगे और अधिक गतिसे काम कर सकनेकी आशा करता हूँ। उस पर कातनेसे में
आज भी एक घंटा बचा पा रहा हूँ और थकावट कम होती है। लेकिन तुम्हारी
मेहनत बेकार नहीं गई है। काकासाहब गाण्डीवका इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन
उससे उन्हें सन्तोष नहीं मिला है और यह एक इकाई अर्थात् १६० तार भी
हमेशा कभी नहीं निकाल पाते थे। तुम्हारे चरखे पर उन्हें दो घंटे में एक इकाई सूत
निकालने में कोई कठिनाई नहीं है। चरखेको कमसे कम इतना समय देनेका उन्होंने
व्रत लिया है।
१. सफरी चरखेके उल्लसे ऐसा लगता है कि यह पत्र १८ अगस्तके बाद किसी समय लिखा गया
था देखिए पत्र मीराबहनको, १८-८-१९३० । अपने ५ अक्टूबर के पत्र में गांधीजीने मीराबहनको लिखा
या कि एक भी ऐसा सप्ताह नहीं गुजरा है जब उन्होंने उनको (मीराबहनको ) पत्र न लिखा हो। चूँकि
२४ अगस्त और ७ सितम्बर के बीचकी तिथिका कोई पत्र उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस बातकी सम्भावना
है कि यह पत्र ३१ अगस्तको या उसके आसपास लिखा गया होगा।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
तुमने दूसरे दर्जेमें बदली करवा कर ठीक किया। जब तीसरे दर्जेमें चलना
असम्भव या लगभग असम्भव हो उस समय दूसरे दर्जे में सफर करनेमें कोई हर्ज
नहीं है और शर्मकी तो निश्चय ही कोई बात नहीं है।
मुझे खुशी है कि कुमारी पीटरसनके साथ तुमने ३६ घंटेका समय शान्तिपूर्वक
बिताया। क्या तुम्हारी बहन मद्रास ही में कहीं नहीं है ?
एण्ड्रयूज, रेजिनाल्ड तथा मेरी याद करनेवाले अन्य लोगोंको मेरा प्यार भेजना।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४०७) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६४१ से भी ।
भाई ठक्कर बापा,
१६०. पत्र : अमृतलाल ठक्करको
यरवडा मन्दिर
१ सितम्बर, १९३०
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि चूंकि आपने मेरा कभी कोई काम नहीं किया
है, अतः आपको मुझे पत्र लिखनेका अधिकार नहीं है। सच कहा जाये तो मेरा
काम नामकी कोई चीज ही कहाँ है ? हम सबको भगवानका काम यथाशक्ति यथामति
करना है और यह काम आप प्रतिक्षण कर रहे हैं। मैं और काका आपके
बारेमें प्रायः बातें करते हैं। यदि आपको कुछ लिखना आवश्यक जान पड़े तो अवश्य
लिखें। मैं आपसे यह नहीं कहता और न चाहता ही हूँ कि आप सिर्फ लिखनेकी खातिर
मुझे लिखें। मैं जानता हूँ कि आप प्रत्येक क्षणका हिसाब रखने और देनेके लिए
तैयार रहते हैं ।
[ गुजरातीसे ]
कन्या आश्रम रजत जयन्ती स्मृतिग्रंथ
बापू
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मोतीबहन,
१६१. पत्र : मोतीबहन चोकसीको
मौनवार [१ सितम्बर, १९३० ]
वा कह रही थी कि तुम उद्विग्न रहती हो। ऐसा क्यों है ? जो 'गीता' का
पाठ करता है वह कभी उद्विग्न नहीं हो सकता। जो प्रतिदिन ईश्वरका ध्यान करता
है, जो ईश्वरको अपने हृदयमें स्थित मानता है उसे उद्वेग कैसा ? उद्वेगको अपने मनसे
निकाल देना ।
गुजराती (जी० एन० ३७३६) की फोटो नकलसे।
१६२. पत्र : गंगाबहन झवेरीको
चि० गंगाबहन ( झवेरी),
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१ सितम्बर, १९३०
मुझे ऐसा याद पड़ता है कि तुमसे और नानीवनसे मुझे एक पत्रका उत्तर
पाना है। आज कोई विशेष बात लिखनेको नहीं है। किन्तु मैं तुम सब लोगोंको
रोज याद करता हूँ, इतना ही बतानेके लिए यह पत्र लिख रहा हूँ। मैं यह जानता
हूँ कि तुम सदा अपने कर्तव्यमें प्रवृत्त रहती हो। यही उचित भी है और इसीसे
उचित परिणाम निकलेगा । कर्त्तव्यके प्रति तन्मयता कल्पद्रुम है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ३१०१ ) की फोटो नकलसे।
१. मूल पत्रपर किसी अन्य व्यक्तिने "१-९-३० के आसपास " लिखा है। १ सितम्बरको
सोमवार था।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रभावती,
१६३. पत्र : प्रभावतीको
[१] सितम्बर, [ १९३०
तू लोभी है। मैं कितना ही लम्बा पत्र क्यों न लिखूं तो भी वह तुझे छोटा
ही लगेगा। मैं हर सप्ताह लगभग ५०-६० पत्र आश्रम भेजता हूँ और यह तभी सम्भव
हो सकता है जब मुझे चरखेसे फुरसत मिले। फिर रोज लिखनेको रहता भी क्या
है, इसीलिए संक्षिप्त पत्र लिखता हूँ लेकिन उसमें कह देने योग्य सब बातें होती
है। यदि एक-दो पत्र ही लिखनेको हों तो कुछ ज्यादा लिखा जा सकता है और
फिर सारे आश्रमकी दृष्टिसे जो पत्र लिखता हूँ वह तो लम्बा होता ही है। मीरा
बहन गुजराती नहीं समझती, इससे उसे कुछ लम्बा पत्र लिखता हूँ। बाकी पत्र तो
संक्षिप्त ही होते हैं। लो, इस तरह संक्षिप्त पत्र लिखनेका कारण बताते बताते ही
आधा पन्ना भर ही गया। शुक्रवारको मेरा और काका का वजन लिया गया था;
मेरा १०४ और उनका ११४ निकला; वजनमें यह वृद्धि अच्छी कही जा सकती
है। हम प्रार्थना नित्य नियमपूर्वक करते हैं। 'गीता'का पाठ भी होता ही है। मैंने
आजकल मुनक्का और खजूर लेना भी बन्द कर दिया है तथा इनके स्थान पर अब
मैं उबली सब्जियाँ लेता हूँ। मैं रोज आलू तथा कच्चे टमाटर और कोई हरी सब्जी,
जैसे गोभी आदि लेता हूँ। इससे कोई नुकसान नहीं हुआ। वजन बढ़ गया और
दस्त आने की शिकायत दूर हुई सरकारके साथ सलाह-मशविरा करनेके सम्बन्धमें
तूने सारी रिपोर्ट तो पढ़ी ही होंगी। उनमें कोई सार नहीं था। अपने भविष्यके
कार्यक्रमके बारेमें लिखना, जयप्रकाशका भी लिखना । तेरी सास अच्छी हो गई या
नहीं ? सेवा तो तू मनसे करती है न ?
गुजराती (जी० एन० ३३७०) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
१. मूल पत्र में तिथि मिट गई जान पड़ती है इसीलिए साधन-सूत्र में केवल सितम्बर लिखा हुआ है।
तथापि बापुना पत्रो-१०: श्री प्रभावतीबहेननेमें यही तारीख दी हुई है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० दुर्गा,
१६४. पत्र : दुर्गा गिरिको
क्या तू रूठ गई है ? तू पत्र
न्याय है? आश्रमका या पहाड़का ?
करती है ? तू रोज कितना कालती है ?
सवेरे उठती है? कितने अध्याय कण्ठ
बापूकी विराट् वत्सलता
भाईश्री ५ बालजी,
यरवडा मन्दिर
१ सितम्बर १९३०
भी न लिखे और रूठ भी जाये, यह कौनसा
या रूठनेका बहाना करके लिखनेका आलस
दूसरा क्या काम करती है ? नियमित रूपसे
किये है ?"
१६५. पत्र : वा० गो० देसाईको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। मसूड़ोंसे खून निकलता है तो दिनमें तीन-चार बार नमकके
पानीसे कुल्ले करने चाहिए। सुबहके वक्त बारीक पिसा हुआ अच्छा नमक मसूड़ों पर
रगड़ना चाहिए और लारको थूकना नहीं चाहिए। नमक के बदले तुम नारियलका
तेल भी इस्तेमाल कर सकते हो। लाल दवाके पानीसे कुल्ले करने चाहिए। यदि
इससे भी खून निकलना बन्द न हो तो मसूड़े डाक्टरको दिखाने चाहिए। कभी-कभी
बदहजमीसे भी ऐसा हो जाता है। कुछ थोड़ी-सी कच्ची हरी सब्जी भी खाना आय-
श्यक है।
तुम्हें ज्वार बाजरे की रोटियां मजबूर होकर खानी पड़ी थीं या अन्य कैदियोंका
साथ देनेके खयालसे तुमने खाई थीं ? हरे-भरे वृक्षके पास रहकर भी मैंने तुम्हें उसकी
छायाका अनादर करते देखा है। यदि मिल सके तो मैं किसने कितना काता, कितना
पीजा, इसका हिसाब देखना चाहूँगा ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४०६ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : या० गो० देसाई
१. मूल पत्र गुजराती में था।
४४-८
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० नारणदास,
१६६. पत्र : नारणदास गांधीको
[ २ सितम्बर, १९३०
आश्रमका बंडल गुरुवारको मिला। प्रवचन छपवायें तो एक-दो प्रतियाँ यहाँ
भी भेजना। पिछले प्रवचनकी नकल भी हो तो अच्छा है। आश्रम नियमावली भी
भेजना। सुरेन्द्र, माधवजी और माधवलालने अभी पत्र न लिखा हो तो मुझे लिखें।
दूसरे भी लिखें। कुसुमका हाथ ठीक हो गया होगा । श्रीमती जोलिंगर कुछ शान्त
हुई? उनको प्रसन्न करनेका प्रयत्न करना ।
स्वीडिशमें 'आत्मकथा' का अनुवाद करनेके लिए किसीको लिखने की बात याद
है । ११ पौंड ले लेना और जिस खातेमें ठीक समझो, डाल देना ।
रक्षाबन्धनका अच्छा उपयोग किया। लीलावतीका ध्यान रखना। दौरे आते
देवदासका वजन
जमनालालजी के
रहते हों तो आश्रम में आ जाये और मनको शान्त रखे ।
मालूम हो तो लिखना । वहाँ तो स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए।
सूतकी माला मिल सकेगी। मेरा चरखा अब तंग नहीं कर रहा है। गति बहुत नहीं
बढ़ी है, किन्तु ठीक है। यह चरखा यात्राके लिए है और उसके वास्ते पतली
मालकी जरूरत थी । माल बनानेकी सरल रीति किसीको मालूम हो तो लिख भेजें।
अब्बासने बताई थी। किन्तु मैं वह भूल गया हूँ। रुईका एक बंडल काममें आ चुका
है। दूसरेको देखते हुए पूनियाँ एक महीना तो चलेंगी। किन्तु काकासाहब से मिलने
तो कोई आयेगा ही । उसीके हाथ एक बंडल भेज देना । वल्लभभाईसे मिलनेके लिए
भी हर सप्ताह या पखवाड़े कोई आता है, उसके हाथ भी भेज सकते हो। यदि
ऐसा न हो सकता हो तो जिस तरह डाकसे भेजा था उसी तरह भेज देना । कुछ
जल्दी नहीं है। साथ ही चप्पलकी एड़ीकी मरम्मत करने लायक चमड़ेके टुकड़े भेजना
या उसका प्रबन्ध न हो सके और मेरी चप्पलकी जोड़ी मिल जाये तो वही भेज
देना । यात्रामें एक जोड़ी ज्यादा थी, कान्तिको मालूम होगा। आश्रममें भी एक थी,
कुसुमको मालूम होगा; या जिसको उसने सब कुछ सौंपा होगा उसे ।
अभय: इसकी गिनती गीताजी के सोलहवें अध्यायमें देवी सम्पतका जिक्र करते
हुए भगवानने प्रथम की है। यह इलोककी रचनाकी सुविधाकी खातिर है या अभयका
पहला स्थान होना चाहिए इसलिए है, इस बहसमें मैं नहीं उतरूँगा; ऐसा निर्णय
करनेकी मुझमें लियाकत भी नहीं है। मेरी राय में अभयको सहज ही पहला स्थान
मिला हो तो भी वह उसके लायक ही है। बिना अभयके दूसरी ऋद्धियां नहीं मिलेंगी।
१. बापुना पत्रो ९: श्री नारणदास गांचीने में दी गई तिथिके अनुसार।
२. " अयंसत्वसंशुद्धि" इत्यादि ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
११५
बिना अभयके सत्यकी खोज कैसे हो ? बिना अभयके अहिंसाका पालन कैसे हो ? /
'हरिनो मारग छे शूरानो, नहीं कायरनुं काम जोने' (हरिका मार्ग शूरका है,
उसमें कायरका काम नहीं ) । सत्य ही हरि, वही राम, वही नारायण, वही वासुदेव
है। कायर यानी डरा हुआ, बुजदिल, शूर यानी भयसे मुक्त, तलवार वगैरासे लैस
नहीं तलवार बहादुरकी निशानी नहीं है, डरकी निशानी है ।
अभयका मतलब है तमाम बाहरी भयोंसे मुक्ति मौतका डर, धन-दौलत लुट
जानेका डर, कुटुम्ब कबीलेके बारेमें डर, रोगका डर, हथियार चलने का डर, आबरूका
डर, किसीको बुरा लगानेका, चोट पहुँचानेका डर, इस तरह उरकी फेहरिस्त जितनी
बढ़ाना चाहें हम बढ़ा सकते हैं। एक सिर्फ मौतका भय जीता कि सब भयोंको जीत
लिया, ऐसा आम तौर पर कहा जाता है। लेकिन वह ठीक नहीं लगता। बहुत से
लोग मौतका डर छोड़ देते हैं, फिर भी वे तरह-तरह के दुःखोंसे भागते रहते हैं। कुछ
लोग खुद मरने को तैयार होते हैं, लेकिन सगे-सम्बन्धियोंका बिछोह बरदाश्त नहीं कर
सकते। कोई कंजूस यह सब छोड़ देगा, देह भी छोड़ देगा, लेकिन जमा किया हुआ
धन छोड़ते झिझकेगा। कोई आदमी अपनी मानी हुई इज्जत आवरू बनाये रखनेके
लिए बहुत कुछ स्याह-सफेद करनेको तैयार हो जायेगा और करेगा। कोई जगतकी
निन्दाके भयसे सीधी राह जानते हुए भी उसे पकड़ते हिचकिचायेगा । सत्यकी खोज
करनेवालेको इन सब भयोंको छोड़े बिना चारा नहीं। हरिश्चन्द्रकी तरह पामाल
होनेकी उसकी तैयारी होनी चाहिए। हरिश्चन्द्रकी कथा भले ही मनगढ़ंत हो, लेकिन
उसमें सब आत्मार्थियों (आत्माका कल्याण चाहनेवालों) का अनुभव भरा हुआ है;
इसलिए उस कथाकी कीमत किसी ऐतिहासिक कथासे अनन्तगुनी है और हम सबको
उसे अपने मनमें रखना चाहिए और उसपर गौर करना चाहिए।
अभय व्रतका पूरी तरह पालन करना लगभग नामुमकिन है। तमाम भयोंसे
मुक्ति तो वहीं पा सकता है जिसे आत्माके दर्शन हुए हों। अभय अमूर्च्छ दशाकी
आखिरी हद है । निश्चय करनेसे लगातार कोशिश करनेसे और आत्मामें श्रद्धा
बढ़ने से अभयकी मिकदार बढ़ सकती है। मैंने शुरूमें ही कहा कि हमें बाहरी भयोंसे
मुक्ति पानी है। अन्दर जो दुश्मन हैं उनसे तो डरकर ही चलना है। काम, क्रोध
वगैराका भय सच्चा भय है। उसे जीत लें तो बाहरी भयोंकी परेशानी अपने-आप
मिट जायेगी। तमाम भय देहको लेकर हैं। अगर देहकी ममता छूटे तो आसानीसे
अभय प्राप्त हो जाये। इस तरह सोचते हुए हम देखेंगे कि तमाम भय हमारी
सयाली पैदावार हैं। पैसेमें से, कुटुम्बमें से, शरीरमें से 'मेरापन निकाल दें, तो भय
कहाँ रहा ? " तेन त्यक्तेन भुंजीथाः "" ( उसे तजकर भोगो) – यह रामवाण वचन है ।
कुटुम्ब, पैसा, देह ज्योंके त्यों रहें; उनके बारेमें हमारी कल्पना बदलनी होगी। वे
'हमारे' नहीं हैं, 'मेरे' नहीं हैं। वे ईश्वरके हैं; 'मैं' भी उसीका है; इस जगत्
में 'मेरा' कहनेकी चीज कुछ है ही नहीं। फिर मुझे भय काहेका ? इसीलिए उपनि-
पदकारने कहा: “ उसे तजकर भोगो"। इसलिए हम उसके रखवाले बनें, वह उसकी
१. ईशोपनिषद, ५, ११
И
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
रखवाली के लिए जरूरी सामान और शक्ति हमें देगा । यों हम स्वामी मिटकर सेवक
बनें, शून्य जैसे (कुछ नहीं) होकर रहें, तो आसानी से तमाम भयोंको जीत लेंगे,
आसानीसे शान्ति पायेंगे और सत्यनारायणका दर्शन करेंगे।
काकासाहब ने चरखेके बारेमें स्पष्ट व्रत नहीं लिया था; अब लिया है। रोज
कमसे कम दो घंटे कातेंगे और उसमें भी कमसे कम १६० तार पिजाई भी शुरू
की है। उनका बहुत-सा समय तो शारीरिक प्रवृत्तियोंमें जाता है। उनकी शरीरकी शक्ति
बराबर बनी हुई है। मैंने चार दिनसे मुनक्का और खजूर छोड़ दिये हैं। उबली हुई
सब्जी और कच्चे टमाटर आदि लेता हूँ। इससे काम नहीं चलेगा तो फल लेना
शुरू करूँगा। यह परिवर्तन कब्ज कम करनेके लिए किया है। इससे सहज ही अर्थलाभ
होता हो, तो और भी अच्छा है। इसमें किसी तरहका आग्रह नहीं करूँगा ।
[ पुनश्च ]
५८ पत्र हैं।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८१२३) से । सौजन्य : नारणदास गांधी; बापुना पत्रो ९:
श्री नारणदास गांधीनसे भी ।
१६७. पत्र : वसुमती पण्डितको
परवडा मन्दिर
३ सितम्बर, १९३०
चि० वसुमती,
तेरे दोनों पत्र एक साथ मिले। सरभोण में तेरे साथ और कौन-कौन है ? सर्वथा
अभिमान रहित तो केवल एक ईश्वर है। हम सब अभिमानसे मुक्त होनेका रोज
प्रयत्न करते रहें।
'शूर संग्रामको देख भागे नहि
काम और क्रोध मद लोभसे जूझना ।
कल ही जब मैं इस भजनका अनुवाद कर रहा था, तो इसका अर्थ और अच्छी
तरह समझमें आया। हमारे लिए यही वास्तविक लड़ाई है। यदि हम जूझते रहें तो
आखिरकार हमारी जीत होगी ही ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५३१ ) की फोटो नकलसे सौजन्य वसुमती पण्डित
एस० एन० ९२८६ से भी ।
१. गांधीजी द्वारा किये गये कमीरके इस भजन अंग्रेजी अनुवादके लिए देखिए अंग्रेजीका खण्ड ४४ ॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६८. पत्रका अंश
३ सितम्बर १९३०
यदि आश्रमकी बहनें तूफानमें फँस जानेपर भी पार हो जायें तभी यह कहा
जा सकता है कि हमारा प्रयोग सफल हुआ। चोटें लगनी होंगी तो लगेंगी। ऊपर
चढ़ते हुए गिरनेका भय तो बना ही रहता है। हमारा निस्तार यह खतरा उठाने
पर ही होगा। हम जान-बूझ कर ऐसी जोखिम न उठायें, किन्तु यदि जोखिम सामने
आ जाये तो पीछे न हटें। पुरुषोंके बारेमें हमारे मनमें जितनी उदारता है, उतनी
ही स्त्रियोंके बारेमें रखें। हमारी लाज रखनेवाला तो गिरिधारी ही है न? और
जैसा हम गाते हैं उसीके अनुसार आचरण भी करें।
गुजराती (जी० एन० ६७९८) की फोटो नकलसे।
प्रिय मित्रो,
१६९. पत्र : सप्रू और जयकरको '
बापूके आशीर्वाद
५ सितम्बर, १९३०
वाइसराय द्वारा आपको लिखे गये २८-८-१९३० के पत्रको हमने बहुत ध्यान-
पूर्वक पढ़ा है। पत्र में जिन मुद्दोंका जिक्र नहीं है, उन मुद्दों पर वाइसरायके साथ
हुई आपकी बातचीतका विवरण भी आपने कृपापूर्वक हमें इसके साथ दे दिया है।
पण्डित मोतीलाल नेहरू, डा० सैयद महमूद और पण्डित जवाहरलाल नेहरू द्वारा
हस्ताक्षरित और आपके जरिये भेजी गई उनकी टिप्पणी भी हमने उतने ही ध्यानके
साथ पढ़ी है। इस टिप्पणीमें उक्त पत्र और बातचीत के सम्बन्धमें उनकी सुविचारित
राय दी हुई है।
२. सर तेज बहादुर सप्रु और श्री मु० रा० जपकरसे मिलने के बाद वाइसरायने २८ अगस्तको उन्हें
एक पत्र लिखा था, देखिए परिशिष्ट ३ इसके बाद समू और जयकरने नैनी जेल में ३० और ३१ अगस्तको
मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू और सैयद महमूदसे भेंट की और उन्हें बाराका पत्र तथा वाइसरायके
साथ अपनी बातचीतका विवरण भी दिखाया, देखिए परिशिष्ट ४। इसके बाद मोतीलाल और जवाहरलाल
नेहरू ने और जयकरको गांधीजीके नाम अपनी अन्तिम टिप्पणी दी, देखिए परिशिष्ट ५ इन
कागजातोंके साथ स और जयकरने ३, ४ और ५ सितम्बरको परवडा जेलमे गांधीजी तथा अन्य नेताओंसे
बातचीत की। गांधीजीकी हस्तलिपिमें इस पत्रका जो मसविदा एस० एन० १९२७ में प्राप्त है उसमें किसी
अन्य व्यक्तिकी हस्तलिपिमें कुछ परिवर्तन और परिवर्द्धन है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
-
हमने इन कागजातों का ध्यानपूर्वक अध्ययन करनेमें दो रातें गुजारी हैं और
इनसे उठनेवाले सभी मुद्दों पर आपके साथ दिल खोल कर पूरी तरह बातचीत करने
का लाभ भी हमें मिला। और जैसाकि हमने आपको बताया है, हम सब इस
निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सरकार और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके बीच-
बाहरी जगतके साथ सम्पर्क न रहनेके कारण हम जिस हद तक कांग्रेसकी तरफसे
बोल सकते हैं उस हद तक -- - ऐसी कोई बात नहीं है जिसपर दोनोंके दृष्टिकोण
मिल सकें। नैनी सेंट्रल जेल में बन्द विशिष्ट कैदियों द्वारा भेजी गई टिप्पणी में जो
मत व्यक्त किया गया है हम उसके साथ पूरी तरह सहमत हैं, लेकिन ये मित्र हमसे
अपेक्षा करते हैं कि आप दोनोंने देशभक्तिको भावनासे अपने समयका बलिदान कर
और काफी असुविधा उठाकर भी पिछले दो महीनों के दौरान जो शान्ति वार्ता जारी
रखी है, उसमें अन्ततः जिस स्थिति पर हम पहुँचे उसके बारेमें हम अपने ही शब्दों में
अपनी राय प्रकट करें। इसलिए हम यथासम्भव संक्षेपमें उन कठिनाइयोंकी चर्चा
करेंगे जो शान्ति स्थापित करनेके मार्गमें बाधक रही हैं।
हमने ऐसा माना है कि वाइसरायका दिनांक १६ जुलाई, १९३० के पत्रका
उद्देश्य, जहाँतक हो सके, पण्डित मोतीलाल नेहरू द्वारा २० तारीखको जार्ज स्लोकोम्ब-
को दी गई भेंटकी शर्तों और श्री स्लोकोम्ब द्वारा २५ जूनको पण्डित मोतीलाल नेहरू
को प्रस्तुत किये गये और उनके द्वारा स्वीकृत वक्तव्यकी शर्तोंको पूरा करनेका है।
वाइसरायने अपने १६ जुलाईके पत्रमें जिस भाषाका प्रयोग किया है उससे हम ऐसा
कोई अर्थ नहीं निकाल सके कि वह भेंटकी या वक्तव्यकी शर्तोंको पूरा करता है।
भेंट और वक्तव्यके सम्बन्धित अंश इस प्रकार हैं।
भेंट में कहा गया था: "गोलमेज सम्मेलन की शर्तों यदि निर्धारित नहीं की
जातीं और हमसे यह आशा की जाती हो कि हम औपनिवेशिक दर्जा पानेकी
अपनी माँगका औचित्य सिद्ध करनेके लिए लन्दन जायें, तो में अस्वीकार
कर दूंगा। लेकिन यदि यह बात स्पष्ट कर दी जाये कि सम्मेलनको बैठकम
भारतकी विशेष आवश्यकताओं और परिस्थितियों तथा हमारे पिछले सम्बन्धोंकी
दृष्टिसे आवश्यक हमारे पारस्परिक सम्बन्धोंके समायोजनका ध्यान रखते हुए
एक स्वतन्त्र भारतका संविधान बनाया जायेगा, तो में व्यक्तिगत तौरपर कांग्रेसको
सम्मेलन में शामिल होनेका निमन्त्रण स्वीकार करने की सलाह दूंगा। हमें अपने
घरमें मालिक होना चाहिए, लेकिन भारतमें ब्रिटिश प्रशासन द्वारा एक
जिम्मेदार भारतीय सरकारको सत्ता हस्तांतरित किये जानेकी अवधि भरके
लिए हम उचित शर्तोंको स्वीकार करनेके लिए तैयार हैं। सम्मेलन इसलिए
होना चाहिए कि हम ब्रिटिश जनताके साथ इन शर्तोंके सम्बन्धमें बराबरीके
दजॅपर उसी तरह बात कर सकें जैसेकि एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्रसे बातचीत
करता है।" "
१. मसविदेमें यह अनुच्छेद नहीं था।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र सप्रू और जयकरको
वक्तव्यमें निम्नलिखित बात कही गई थी
११९
"सरकार बानगी तौर पर यह आश्वासन देगी कि वह भारतकी विशेष
आवश्यकताओं और परिस्थितियों तथा ग्रेट ब्रिटेनके साथ उसके लम्बे सम्बन्धको
देखते हुए समायोजन और सत्ताके हस्तान्तरणकी जो शर्तें आवश्यक होंगी तथा
गोलमेज सम्मेलन जैसा तय करेगा, वैसी पारस्परिक समायोजना तथा सत्ता-
हस्तांतरणकी शर्तोंके साथ पूर्ण उत्तरदायी सरकारकी मांगका समर्थन करेगी।""
वाइसरायके पत्रका प्रासंगिक अंश निम्नलिखित है:
मेरी और मेरी सरकारकी --
---
• और मुझे कोई सन्देह नहीं कि सम्राट्की
सरकारकी भी यह हार्दिक इच्छा है कि जिन मामलोंमें भारतीय लोग अभी
स्वयं जिम्मेदारी उठानेकी स्थितिमें नहीं हैं, उन मामलोंके सम्बन्धमें विशेष
उपाय करनेके बाद भारतको जनताको यथासम्भव अधिक से अधिक मामलोंमें
उस हद तक स्वराज्य दिलानेके लिए हम अपने-अपने क्षेत्रमें मदद करें जिस
हद तक यह दिखाया जा सके कि वैसा करना उन विशेष उपायोंसे असंगत
नहीं होगा। वे मामले क्या है, और उनके लिए क्या पूर्वोपाय करना सर्वोत्तम
होगा, इस प्रश्नपर सम्मेलन विचार करेगा, लेकिन मैने कभी ऐसा नहीं माना
है कि दोनों पक्षोंके बीच परस्पर विश्वास होनेपर कोई समझौता हो सकना
असम्भव है।
हमें लगता है कि दोनों पक्षोंने जो स्थिति अपनाई है उसमें जबर्दस्त अन्तर
है। पण्डित मोतीलालजीकी जहाँ यह कल्पना है कि प्रस्तावित गोलमेज सम्मेलनमें
विचार-विमर्शके परिणाम स्वरूप भारत स्वतन्त्र हो जायेगा और उस स्वतन्त्र भारतका
दर्जा आज भारतको प्राप्त दर्जेसे भिन्न प्रकारका होगा, वहाँ वाइसरायका पत्र केवल
उनकी, उनकी सरकारकी और ब्रिटिश मन्त्रिमण्डलकी यह हार्दिक इच्छा मात्र व्यक्त
करता है कि जिन मामलोंमें भारतीय लोग अभी स्वयं जिम्मेदारी उठानेकी स्थिति में
नहीं हैं, उन मामलोंके सम्बन्धमें विशेष उपाय करनेके बाद वे भारतकी जनताको
यथासम्भव अधिक से अधिक मामलोंमें उस हद तक स्वराज्य दिलाने में मदद करना
चाहते हैं जिस हद तक यह दिखाया जा सके कि वैसा करना उन विशेष उपायोंसे
असंगत नहीं होगा। दूसरे शब्दोंमें, वाइसरायके पत्रसे यही सम्भावना प्रकट होती
है कि लैंसडाउन रिफॉर्म्सके नामसे विख्यात सुधारोंके साथ ही साथ कुछ और सुधार
भी लागू कर दिये जायेंगे ।
चूंकि हमें भय था कि हमारी व्याख्या सही है, अतः अपने १५-८-१९३० के
पत्र में, जिसपर पण्डित मोतीलाल नेहरू, डा० सैयद महमूद और पण्डित जवाहरलाल
नेहरूने भी हस्ताक्षर किये थे, हमने स्थिति निषेधात्मक रूपमें रखी थी और बताया
था कि क्या-क्या बातें हैं जो हमारी रायमें कांग्रेसको सन्तुष्ट नहीं करेंगी। जो पत्र
१ और २. मसविदेमें ये अनुच्छेद नहीं थे।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
अब आप वाइसराय महोदयसे लाये हैं उसमें वही बात दोहराई गई है जो उन्होंने
अपने पहले पत्र में कही थी, और हमें यह कहते हुए दुख होता है कि इस पत्र में वाइसराय
महोदयने हमारे पत्रको तिरस्कारपूर्वक विचारके योग्य भी नहीं माना है और उस
पत्रमें निहित सुझावोंके आधार पर समझौता वार्ता करनेको असम्भव बताया है।
आपने हमें यह बताकर इस प्रश्न पर और ज्यादा प्रकाश डाला है कि "यदि
श्री गांधी सरकारके सामने निश्चित रूपसे ऐसा सवाल रखेंगे" अर्थात् भारतकी इच्छा
पर साम्राज्यसे पृथक होनेके अधिकारका सवाल रखेंगे, तो वाइसराय कहेंगे कि हम इस
सवालको विचारणीय प्रश्न मानने को तैयार नहीं हैं। हम लोग, दूसरी ओर, ऐसा
मानते हैं कि भारतको जो भी संविधान मिलेगा उसमें यह अधिकार सबसे महत्त्वपूर्ण
होगा और यह ऐसा प्रश्न है जिसपर किसी बहसकी जरूरत नहीं होनी चाहिए। यदि
भारतको अब पूर्ण उत्तरदायी सरकार या पूर्ण स्वायत्त शासन, अथवा उस सरकारका
जो भी नाम रखा जाये, प्राप्त करना है तो यह बिल्कुल स्वैच्छिक आधार पर ही
हो सकता है, जिसमें प्रत्येक पक्षको अपनी इच्छा के अनुसार साझेदारी या सम्बन्ध
तोड़नेका अधिकार होगा। यदि भारतको आगेसे साम्राज्यका अंग नहीं रहना है बल्कि
राष्ट्र-मण्डलमें एक बराबरीका दर्जा रखनेवाले स्वतन्त्र सदस्यके रूपमें रहना है, तो
वैसी हालत में उसे इस सम्बन्धको आवश्यकता और हार्दिकताका अनुभव होना चाहिए।
इस सम्बन्धमें इससे भिन्न कोई स्थिति कदापि स्वीकार्य नहीं हो सकती। आप कृपा
करके देखेंगे कि हमने जिस भेंटका ऊपर जिक्र किया है उसमें यह स्थिति स्पष्ट
रूपसे जता दी गई है। इसलिए जबतक ब्रिटिश सरकार या ब्रिटिश जनता इस
स्थितिको असम्भव या अतर्कसंगत मानती है तबतक हमारी राय में कांग्रेसको स्वतन्त्रता
की लड़ाई जारी रखनी चाहिए।
नमक-करके विषयमें दिये गये हमारे अत्यन्त नरम प्रस्ताव के सम्बन्धमें वाइसराय
महोदयने जो रवैया अपनाया है उससे हमें सरकारकी मनोवृत्तिकी बड़ी दुखद झांकी
मिलती है। हमारे लिए यह बात दिनके प्रकाशके समान स्पष्ट है कि शिमलाकी
चकरानेवाली ऊँचाइयों पर बैठे हुए भारतके शासक मैदानोंमें रहनेवाले उन करोड़ों
क्षुधापीड़ित लोगोंकी कठिनाइयोंको न तो समझ सकते हैं, न उन्हें उनका अहसास
ही हो सकता है जिनके अनवरत श्रमके कारण ही उन चकरानेवाली ऊँचाइयों परसे
शासन करना सम्भव है ।
गरीब लोगोंके लिए जिस प्रकृति प्रदत्त वस्तुका महत्त्व हवा और पानीके समान
ही है, उस बीजपर एकाधिकार बनाये रखनेके लिए निर्दोष लोगों का खून बहाकर भी
यदि सरकारको उसकी घोर अनैतिकताका विश्वास नहीं हुआ है, तो वाइसराय द्वारा
सुझाया गया भारतीय नेताओंका कोई सम्मेलन वैसा विश्वास नहीं दिला सकता। यह
सुझाव देना कि एकाधिकारको रद करने की मांग करनेवालोंको उतने ही राजस्वका
कोई अन्य साधन बताना चाहिए, जलेपर नमक छिड़कनेके समान है। यह रवैया इस
वातका संकेत है कि यदि सरकारका वश चले तो मौजूदा पीस डालनेवाली खर्चीली
प्रणाली अनन्त काल तक जारी रहेगी। हम यह भी ध्यानमें लानेका साहस करते
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र सप्रू और जयकरको
१२१
हैं कि यहाँको सरकार ही नहीं बल्कि संसारभर की सरकारें ऐसे कानूनोंके उल्लंघनको
खुले तौर पर माफ करती हैं जो अलोकप्रिय हो गये हैं किन्तु जिन्हें प्राविधिक अथवा
अन्य किन्हीं कारणोंवश एकदम रद नहीं किया जा सकता।
अब हमें उन अन्य अनेक महत्वपूर्ण विषयोंकी चर्चा करनेकी जरूरत नहीं है
जिनके बारेमें हमने जनताकी स्थिति स्पष्ट की थी किन्तु जिनके बारेमें वाइसरायने
कोई अनुकूल उत्तर नहीं दिया है। हम आशा करते हैं कि हमने ऐसे पर्याप्त महत्त्व-
पूर्ण मामले यहाँ गिनाये हैं जिनके बारेमें इस समय ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस के
बीच ऐसे मतभेद हैं जिन्हें दूर नहीं किया जा सकता ।
तथापि शान्ति वार्ताको प्रकट विफलता पर निराश होनेकी जरूरत नहीं है।
कांग्रेस स्वतन्त्रताकी कड़ी लड़ाई लड़ रही है। हमारे राष्ट्रने एक ऐसे अस्त्रका सहारा
लिया है जिसके हमारे शासक अभ्यस्त नहीं हैं और इसलिए जिसे समझने और
जिसकी कद्र करने में उन्हें समय लगेगा। हमारे कुछ महीनोंके कष्ट सहनसे उनका
हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है, इस बात पर हमें कोई आश्चर्य नहीं है।
कांग्रेसकी इच्छा किसीके भी वह कोई भी क्यों न हो, वैध हितोंको हानि
पहुँचानेकी नहीं है। कांग्रेसका अंग्रेजों उनके अंग्रेज होनेके नाते कोई झगड़ा नहीं है,
लेकिन वह असह्य ब्रिटिश आधिपत्यका अपनी सम्पूर्ण नैतिक शक्तिसे विरोध करती
है और करेगी । अन्त तक अहिंसात्मक रहनेका विश्वास होनेके कारण हमें निश्चय
है कि हमारी राष्ट्रीय आकांक्षाएँ शीघ्र ही पूरी होंगी। यह बात हम सविनय अवज्ञाके
सम्बन्ध में शासक वर्ग द्वारा कटु और अक्सर अपमानजनक भाषा प्रयुक्त की जानेके
बावजूद कह रहे हैं।
अन्तमें, हम एक बार आपको फिर धन्यवाद देते हैं कि आपने शान्ति स्थापित
करनेके लिए इतनी तकलीफ उठाई है, लेकिन हमारी रायमें कांग्रेस संगठनके अधि-
कारियोंके साथ और आगे शान्तिवार्ता चलाने का अभी समय नहीं आया है । बन्दी
होनेके कारण हमारे सामने कुछ स्पष्ट कठिनाइयाँ हैं। हमारी राय, जैसाकि अनि-
वार्य है, दूसरोंसे सुनी बातों पर आधारित है और उसके गलत होनेका खतरा है।
कांग्रेस संगठनकी बागडोर जिनके हाथमें है वे स्वभावत: चाहने पर हममें से किसीसे
भी मिल सकते हैं। वैसी स्थितिमें, और जब सरकार स्वयं भी शान्तिकी उतनी ही
इच्छुक हो, तब उनके लिए हमसे मिलनेमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
मो० क० गांधी
सरोजिनी नायडू
वल्लभभाई पटेल
जयरामदास दौलतराम
[ अंग्रेजीसे ]
हिन्दू, ५-९-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७०. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
चि० भगवानजी,
५ सितम्बर, १९३०
" तो बहुत अधम
महिला प्रतीत होती
तुम्हारा धर्म स्पष्ट
तुम्हारा दुःखपूर्ण पत्र मिला।
है। लेकिन अब उसे दयासे जीता जा सके तो हम प्रयत्न करेंगे
है। तुम्हें उसका संग फिलहाल तो तुरन्त छोड़ देना चाहिए। तुम्हें न उससे सेवा
लेनी है न उसकी सेवा करनी है। मैंने उसे पत्र लिखा है। यह पत्र नारणदास उसे
पढ़नेको देगा। तुम [भी] उसे पढ़ जाना। जो पुरुष अथवा स्त्री किसी अन्य स्त्री
अथवा पुरुषके प्रति मनसे विकारवश हो सकते हैं उन्हें अपने पति अथवा पत्नीसे सेवा
लेने अथवा उसकी सेवा करनेका अधिकार नहीं रह जाता। तुम्हारा पति-पत्नीका
सम्बन्ध तो खत्म हो गया है और यदि यह सम्बन्ध हो भी तो विकारवश पति
अपनी पत्नीकी शुद्धभावसे कदापि सेवा नहीं कर सकता। इस बातको अनुभवसिद्ध
समझो। इसलिए फिलहाल तो तुम इस बातको ही अपने मनसे निकाल देना कि
नामका कोई प्राणी आश्रममें रहता है। इसीमें तुम्हारा श्रेय है।
लिए यदि यह स्थिति असह्य होगी तो वह चली जायेगी और यदि वह जाती है तो
भले ही चली जाये। यह सब तुम्हें समझ न आया हो तो फिर पूछना ।
'के
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२३) से सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
१७१. पत्र : पूँजाभाईको
परवडा मन्दिर
५ सितम्बर १९३०
चि० पूँजाभाई,
तुम्हारा पत्र मिला। स्वास्थ्य बिगड़ने पर हमें शर्मिन्दा तो होना ही चाहिए।
किन्तु प्रायः अनजाने ही हमें रोग आ घेरते हैं। यह मानकर हमें अपने मनको शान्त
रखना चाहिए। हम नम्र रहें और ईश्वरके प्रति अपनी श्रद्धाको बढ़ायें, यही बीमारीका
सदुपयोग है। तुम कौन-सी चिकित्सा करा रहे हो ? तुम्हारा चिकित्सक कौन है ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ४०१५) की फोटो नकलसे ।
२, २ और ३. यहाँ नाम छोड़ दिये गये हैं।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० जयसुखलाल,
१७२. पत्र : जयसुखलाल गांधीको
परवडा मन्दिर
५ सितम्बर, १९३०
नारणदासका कहना है कि मैंने तुम्हें पत्र नहीं लिखा। किन्तु जहाँतक मुझे
याद पड़ता है मैंने तो तुम्हें पत्र लिखा था। क्या तुम्हें यह याद पड़ता है कि मैंने
तुम्हारे किसी पत्रका उत्तर न दिया हो ? वहाँके समाचार देना। कसुंबा कैसी है ?
युक्ति वापस क्यों लौट आई ? यदि वह लिख सके तो मुझे लिखे । तुम्हारी तबीयत
कैसी रहती है ?
गुजराती (एम० एम० यू० / ३) की माइक्रोफिल्म से ।
चि० शारदा (बबु ),
१७३. पत्र : शारदा सी० शाहको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
६ सितम्बर, १९३०
तेरे पत्र तो सभी मिल जाते हैं। यह सच है कि मैं तुझे हर हफ्ते पत्र नहीं
लिखता । अस्तेय आदि व्रतोंके बारेमें में जो लिखता हूँ वह जरा अधकचरा होता
है, इसलिए यदि तुझे उसमें रस न आये तो यह बात मैं समझ सकता हूँ। भाषा
अधकचरी नहीं बल्कि विचार अधकचरे हैं और वे संक्षेपमें व्यक्त किये जाते हैं।
बड़ी बातको थोड़े में इसी प्रकार समझाया जा सकता है। अब तू यदि इन सब
बातोंको चिमनलाल या प्रेमावहनसे विस्तारपूर्वक समझकर फिर पढ़े तो तुझे उसमें
रस आयेगा । यदि तुझे समझनेकी इच्छा होगी तो तू भी अवश्य समझ सकेगी। आशा
है अब तुझे दमा नहीं उखड़ता होगा।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९८८९) से । सौजन्य : शारदाबहन जी० चोखावाला
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रेमा,
१७४. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
परवडा मन्दिर
६ सितम्बर, १९३०
तूने अब स्वास्थ्यकी चिन्ता छोड़ दी होगी। जमनादासने इस तरह सबसे
मिलने से क्यों इनकार कर दिया ? तुझे और कुछ मालूम हुआ हो तो लिखना ।
आश्रमके पुस्तकालय में हर भाषाकी कितनी पुस्तकें हैं, इसका किसीने हिसाब
लगाया है ? पुस्तकालयके लिए कितना समय देना पड़ता है ? चोरोंका उपद्रव कैसा
है ? बरसात अब तो नहीं होती होगी। यहाँ तो बहुत थोड़ी हुई है। आज ठीक
पानी बरस रहा है। जरूरत भी बहुत थी।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६८१ ) से । सौजन्य: प्रेमावहन कंटक; जी० एन०
१०२३३की फोटो नकलसे भी ।
१७५. पत्र : लीलावती आसरको
चि० लीलावती (आसर),
यरबडा मन्दिर
६ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला । नारणदास लिखता है कि तुझे दोरे बहुत आने लगे हैं। ऐसी
अवस्थामें आराम लेना जरूरी है। आश्रम में या जहाँ तुझे अच्छा लगे वहाँ कुछ दिन
रह आ । किन्तु यह सब खुद बहनकी अनुमति लेकर ही किया जा सकता है। तुझे
अपनी दैनन्दिनीमें सोलह आने सच बात लिखनी चाहिए। फिर भले ही उसे कोई
भी क्यों न पढ़े। हम जैसे हैं, दुनियाके सामने अपना वही रूप रखनेमें हमारा भला
है और इससे किसी तरह की मान-हानि भी नहीं होती ।
गुजराती (जी० एन० ९५६४ ) की फोटो नकलसे ।
•
बापूके आशीर्वाद
१. जमनादास गांधी, जो उस समय राजकोट जेल में थे।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाई बेचरदास,
१७६. पत्र : बेचरदास दोषीको
६ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। सच कहा जाये तो इसका उत्तर काकासाहब को देना
चाहिए था। किन्तु वे अधिक पत्र नहीं लिख सकते, इसलिए फिलहाल में ही लिख
रहा हूँ। यह मान लेना कि इसमें व्यक्त किये गये विचार हम दोनोंके हैं। व्युत्पत्तिकी
पद्धतिके बारेमें मैं कुछ नहीं लिखूंगा। यदि भविष्य में काकासाहब को कुछ लिखना
होगा तो लिखेंगे। उनसे बातचीत करनेके बाद मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारा प्रधान
कार्य आगमोंका अनुवाद करना ही है। श्री पूँजाभाईने जो पैसा दिया है वह इसी
कामके लिए दिया है, अतः हमारा कर्तव्य है कि उसपर यथासम्भव तेजीसे अमल
किया जाये। इस कार्यमें अपना समय देनेसे यदि व्युत्पत्तिका काम स्थगित करना पड़े
या उसमें शिथिलता आये तो चिन्ता नहीं करनी चाहिए या फिर बिना किसी अड़-
चनके यदि यह काम दूसरोंसे कराया जा सके तो करा लेना चाहिए। भक्तिप्रसादको
तुम्हारे पास इस खयालसे नहीं रखा गया था कि वह मूल काम करेगा बल्कि वह
तुम्हारे हाथ के नीचे रहकर मदद करेगा और यदि वह सावधानीसे काममें लगा रहेगा
तो उसमें निष्णात हो जायेगा ।
मेरे विचारसे तुम्हें अपनी आँखोंके इलाजके बारेमें एक सीमा निर्धारित कर लेनी
चाहिए। गुजरात में आसानीसे जो मदद मिल सके, तुम्हें उतनेमें ही सन्तोष कर लेना
चाहिए। डा० हरिभाई सके रोगोंके विशेषज्ञ है। यदि वे कुछ नहीं कर सकते
तो अन्य कोई कुछ नहीं कर सकेगा, यह मानकर तुम्हें सन्तोष कर लेना चाहिए।
गरीबीकी जिन्दगी बितानेके लिए ऐसी कोई सीमा होनी चाहिए। असंख्य गरीबोंको
क्या हरिभाई जैसा डाक्टर भी मिल पाता है? यह तो मेरा अपना व्यक्तिगत विचार
है और यह कहा जा सकता है कि काकासाहब भी इस विचारसे सहमत हो गये हैं।
किन्तु यह एक नाजुक मामला है। सभीको अपनी बुद्धि और इच्छानुसार सीमा निर्धारित
करनी चाहिए। ऐसे मामलोंमें एक व्यक्तिकी सीमा सवपर लागू नहीं हो सकती ।
[ पुनश्च : ]
बापू
काकासाहब सहमत " हो गये" हैं, इसमें " हो गये " का प्रयोग करनेका कारण
काकासाहब यह बताते हैं कि उन्होंने ही पहले तुमसे एक दो अन्य डाक्टरोंकी सलाह
लेनेको कहा था। किन्तु अब उन्हें मेरा विचार उचित जान पड़ता है।
गुजराती (जी० एन० १३४०) की फोटो नकलसे।
१. गुजराती कोशके लिए, जिसका सम्पादन उन दिनों गुजरात विद्यापीठमें हो रहा था।
२. जैन आगम ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कमलनयन,
१७७. पत्र : कमलनयन बजाजको
परवडा मन्दिर
६ सितम्बर, १९३०
तेरा खत मिला। अच्छा लिखा गया है। यदि वहीं काफी काम है तो अजमेर
जानेकी आवश्यकता मुझे प्रतीत नहीं होती है। अजमेर में ज्यादा जरूरत किसीकी है
तो जाना चाहिये सही यहांसे निश्चयपूर्वक अभिप्राय देना मुश्केल है। माताजी क्या
कहती है ? धार्मिक निर्णय तो टुकड़ीका सरदार हि दे सकता है। आजकल सुरेन्द्रजी
हैं उनसे पूछना ।
मराठीमें खत लिखना मेरे लिये प्रायः अब तक तो असंभवित है। पढनेका
मुझको समय भी कम मिलता है। जानकी बहनको कहो मुझे लिखे ।
का. सा. के आ.
पाँचवे पुत्रको बापूके आशीर्वाद
बापुके आशीर्वाद
१७८. पत्र : मीराबहन को
यरबडा मन्दिर
७ सितम्बर,
चि० मीरा,
१९३०
तिरुपुरसे लिखा तुम्हारा पत्र मिला। हमारी शान्ति वार्ताके विषय में अब तो
तुम सभी जानती हो ! मेरा जो वजन यहाँ कम हुआ था वह फिर पूरा हो गया
है। पिछले शुक्रवारको मेरा वजन १०४ पौंड था। मैंने मेवे लेना भी छोड़ दिया
है। नींबू लेता हूँ। मेवोंकी जगह सब्जियाँ लेता हूँ। शकरकन्द और कच्चा टमाटर
बराबर लेता हूँ। शकरकन्द भुने हुए होते हैं। कोई एक ही सब्जी उबली हुई होती
है- -- आम तौरसे यह बंदगोभी, लौकी या ऐसी ही कोई होती है। इस परिवर्तनसे
ही वजन फिर पहले जैसा हुआ है और अब कब्जकी मुझे कोई शिकायत नहीं है।
अगर अन्तमें यह परिवर्तन सफल सिद्ध हुआ तो खर्चा काफी घट जायेगा। हम
देखेंगे। मैंने फल न लेनेके बारेमें कोई सख्त नियम नहीं बनाया है। लेकिन इस समय
उसकी कमी खलती नहीं, और न लेनेसे स्वास्थ्य में लाभ ही हुआ है।
१. काकासाहब के आशीर्वाद ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र मीराबहनको
१२७
1
चरखे पर मेरा अभ्यास बढ़ता जा रहा है। अब थकावट बिल्कुल नहीं होती ।
मैं देखता हूँ कि यदि पूनी अच्छी हो, तो सूत निकालते समय अगर पूनीके सिरे पर
ध्यान रखा जाये, और जब सूतको शंकु पर लाया जा रहा हो उस समय तकुएकी
नोक पर ध्यान रखा जाये, और जब सूतको शंकु पर चढ़ाया जाये उस समय शंकु
पर ध्यान रखा जाये तो धागेको टूटनेसे बचाया जा सकता है। मैं आशा करता
हूँ कि शीघ्र ही मैं अपनी गति काफी बढ़ा लूंगा। अभी भी यह पहलेसे अच्छी है ।
लेकिन सुधारकी बहुत गुंजाइश है। जो हो, इस वक्त मैं अन्य अध्ययन कार्य छोड़
कर सारा ध्यान चरखे पर ही लगा रहा हूँ। काका अभी भी तुम्हारा ही चरखा
चला रहे हैं। उनकी गति धीमी है। धुनकी काफी ठीक है उसे संयोजित करनेमें
मुझे कोई कठिनाई नहीं होती। जबसे वह मेरे पास है तबसे उसकी ताँत केवल एक
बार टूटी है और सो भी तब जब काकाने उसपर काम करना शुरू किया। वह
धुनाईके काम में बिलकुल नये हैं लेकिन वह बहुत सावधान कामगर हैं। फिर मैंने
जहाँ देखा कि तांत घिस गई है यहाँ मैंने उसे जानबूझ कर काट भी दिया था।
काकाने तकुएसे सूत उतारते समय उसे फँसा कर रखनेकी एक नयी अड़ानी निकाली
है। यह अड़ानी पेटीमें जड़ी हैं। तकुएको उसमें चढ़ा देते हैं और सूतको बायें हाथकी
अँगुलियोंमें पकड़ा जाता है। नतीजा यह होता है कि सूत लपेटनी पर काफी कसा
हुआ चढ़ता है। समयकी भी बचत होती है। तुम्हारे चरखे पर बेशक सूत उतारते
समय तकुआ चमरखेमें ही लगा रहता है। अड़ानीकी जरूरत पेटीके लिए थी ।
मुझे आशा है कि तुमको कहीं कुछ आराम मिल गया होगा । बहुत तेजीसे
मत भागो ।
से भी ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४१०) से । सौजन्य: मीराबहन जी० एन० ९६४४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मणि (पटेल),
१७९. पत्र : मणिबहन पटेलको
यरबडा मन्दिर
७ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला । बापू तथा जयरामदास दो दिन और साथ रहकर चले गये ।
इतनेमें तेरा पत्र मिला। इसलिए बापूने भी पढ़ा। बापूको लिखा पत्र मैंने पढ़ा। माँ
सम्बन्धी वर्णन हृदयद्रावक है। अधिकतर प्राचीन माताएँ ऐसी ही होती थीं। इसलिए
तूने जो वर्णन किया है, उसपर आश्चर्य नहीं होता। हालांकि प्रेमका यह स्वरूप मोह-
जनित है फिर भी इतना उज्ज्वल है कि नित्य नया जैसा ही लगता है। पत्र लिखनेके
नियमको भंग न करना। यात्रामें (जेलमें) पहुँच जायें तो दूसरी बात है।
[ गुजरातीसे ]
बापुना पत्रो ४: मणिबहेन पटेलने
१८०. पत्र : सुशीला गांधीको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
७ सितम्बर, १९३०
चि० सुशीला,
बहुत दिन बाद तेरा पत्र मिला । 'उलटा चोर कोतवालको डाँटे' वाली बात
तू करती है। मेरा इससे पहला पत्र तो तुझे मिला ही होगा ? सीताकी बीमारी
बहुत लम्बी चली । वह इतनी बीमार कैसे हो गई, क्या तू यह भी नहीं समझ पा
रही है? सीताको अपनी आँखोंसे देखे बिना मेरी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो
रही है। किन्तु मैं यह सुझाव दूंगा कि यदि तू उसे बहुत-सी चीजोंके बजाय मुख्यतः
दूध, दही और फल दे, तो अच्छा हो। यदि टोस्ट दिये जायें तो थे 'ब्राउन ब्रेड' के
होने चाहिए। उसे दलिया देनेकी कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती। यदि तू चाहे
तो उसे 'कॉड लिवर आयल' [ मछलीका तेल ] देना। मैं तो यह तेल देनेकी बात
भी नहीं सोच सकता। किन्तु मेरे इस विचारको महत्त्वपूर्ण मत मानना । तेरा कान
कैसा है ? मुझे हर हफ्ते लिखती रहना। और स्याहीसे लिखना ।
गुजराती (जी० एन० ४७७१) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८१. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
चि० मनु (त्रिवेदी),
परवडा मन्दिर
७ सितम्बर, १९३०
तेरा चित्त शान्त नहीं हुआ क्या ? यदि अब भी तेरा समाधान न हुआ हो तो
मुझसे लगातार जूझता रह। मैं तुझसे बलात् पुण्य नहीं करवाना चाहता। इस संसारमें
आज तक कोई बलात् पुण्य कर भी नहीं सका है। और फिर तेरी तो इच्छा भी शुभ
है; इसलिए मैं तेरा दिल दुखाकर तुझे वहाँ विठाये नहीं रखना चाहता ।
गुजराती (जी० एन० ७७६२) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१८२. पत्र : रेहाना तैयबजीको
परवडा मन्दिर
७ सितम्बर, १९३०
चि० रेहाना,
अपने पत्रको छोटा मत
बाबाजान 'सीरत' का
तेरा पत्र मिला । मेरा छोटा-सा पत्र देखकर तू भी
करना। मेरे छोटा पत्र लिखनेका कारण तो तू जानती है।
अनुवाद किस भाषा में कर रहे है ? 'सीरत' और 'उस्वा-ए-सहाबा ' मैंने अपनी पहली
केंदके दौरान पड़े थे और उन्हें पढ़ने में मुझे बहुत आनन्द आया था। किन्तु बादमें
मेरी उर्दूमें जंग लग गया और अब कताईके कारण पढ़नेकी फुरसत नहीं मिलती।
तेरा स्वास्थ्य तो जब ईश्वरकी कृपा होगी, तभी सुधरेगा । "भगवानकी जब
जो मर्जी हो उसके लिए शोक करना वृथा है।" बाबाजानको भुर्रर और अम्माजान-
को वन्देमातरम् । तुझे तथा बहनोंको खुदा हाफिज ।
गुजराती (एस० एन० ९९२०) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. खुदा हाफिज उर्दू लिखा है।
४४-९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८३. पत्र : तारामती मथुरादास त्रिकमजीको
७ सितम्बर, १९३०
चि० मथुरादास जेल चला गया इससे तू घबराती तो नहीं है? अभी कहाँ
रह रही है? तेरा और दिलीपका स्वास्थ्य कैसा रहता है? मथुरादास क्या
लिखता है? उसे क्या कुछ असुविधा है ? तू समय कैसे बिताती है? सार्वजनिक
काममें कुछ भाग लेती है क्या ? कोई तुझसे मिलने आता है ? तू किसीसे मिलने
जाती है।
[ गुजरातीसे ]
बापुनी प्रसादी
१८४. पत्र : कलावती त्रिवेदीको
यरवडा मन्दिर
७ सितम्बर, १९३०
चि० कलावती,
तुम्हारा खत बहोत दिनोंसे मिला। सासकी सेवाके लिये जाना चाहिये हि
तो जाना। प्रायः यह खत भी वहीं मिलेगा। नियमोंका भली भांति पालन करना ।
खाने में भी बहोत मर्यादा रखना ।
जी० एन० ५२५० की फोटो नकलसे।
बापुके आशीर्वाद
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रिय कुमारप्पा,
१८५. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको
यरबडा मन्दिर
८ सितम्बर, १९३०
तुम्हारी भेजी पुस्तिका मुझे अभी तक नहीं मिली है। एक रोमांच सात्विक
होता है और एक राजसिक होता है। तुम्हारी लिखी रचनाएँ किस वर्गमें आती है ?
हम उन अमेरिकी महिलाके बारेमें और आगे सुननेकी अपेक्षा करते हैं। मुझे आशा
है कि आश्रमका जीवन उनके लिए बहुत कठिन सिद्ध नहीं होगा । अपने स्कूलमें चरखे
और तकलीका आरम्भ करानेके लिए श्रीमती अप्पास्वामीको हमारी संयुक्त बधाई।
सप्रेम,
अंग्रेजी (जी० एन० १००९०) की फोटो नकलसे ।
बापू
१८६. पत्र: पी० जी० मैथ्यूको
यरवडा मन्दिर
८ सितम्बर १९३०
प्रिय मैथ्यू
मानवकी वाणी सत्यका वर्णन करनेके लिए अपर्याप्त है। आत्मा अजन्मा और
अविनाशी है। [ बाहरी ] व्यक्तित्व नष्ट होता है, उसे नष्ट होना ही है। जिस प्रकार
सागरमें प्रत्येक बूंदका एक व्यक्तित्य है भी और नहीं भी है, उसी प्रकार व्यक्तिकी सत्ता
है भी और नहीं भी। ऐसा इसलिए नहीं कि सागरसे पृथक बूंदका कोई अस्तित्व
ही नहीं है। ऐसा इसलिए कि यदि बूँदका अस्तित्व नहीं है अर्थात् उसकी कोई
वैयक्तिक सत्ता नहीं है, तो सागरका भी कोई अस्तित्व नहीं है। ये बहुत ही सुन्दर
ढंगसे परस्पर निर्भर है। और यदि यह बात भौतिक जगतके बारेमें सच है तो
आध्यात्मिक जगतके मामले में कितनी सच न होगी।
सप्रेम,
अंग्रेजी (जी० एन० १५५४) की फोटो नकलसे ।
बापू
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मोती,
१८७. पत्र : मोतीबहन चोकसीको
यरबडा मन्दिर
८ सितम्बर, १९३०
तू आश्रम पहुँच गई, यह बहुत अच्छा हुआ। अब यदि तू शान्तिसे रह सके,
तो अच्छा हो। जब भट्टचसे तुझे कुछ नहीं मिलता तो तेरा खर्च कैसे चलता है ?
क्या नाजुकलालने कुछ बचाया है ?
लक्ष्मीसे मुझे पत्र लिखनेको कहना । जीवनदास कहाँ है और क्या कर रहा
है ? जेठालाल कहाँ है? मणिकी क्या खबर है? बम्बई में वह क्या करती है? क्या
गोकी बहन सेवा कार्यमें कुछ हाथ बँटाती है ? तेरा दैनिक कार्यक्रम क्या रहता है ?
वल्लभभाई कह रहे थे कि लक्ष्मीदासको बुखार आ गया था। बुखार कैसे आया ?
अब उन्होंने वल्लभभाईको मेरे पाससे हटा दिया है। उन्हें दो-तीन दिनके लिए ही
यहाँ रखा गया था । जेलमें तो ऐसा ही होता है।
गुजराती (एस० एन० १२१४७ ) की फोटो नकलसे।
१८८. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
८ सितम्बर, १९३०
चि० शान्तिकुमार,
तुम्हारा प्रणाम मुझ तक पहुँच गया है। मैं तुम्हारा रोज स्मरण करता हूँ।
घड़ी तो मेरे सामने ही पड़ी है न ? तुम मुझे पत्र लिख सकते हो। क्या तुम्हारी
कठिनाइयाँ दूर हुई ? मॉजी को प्रणाम । ईश्वर तुम्हारे मनको शान्ति दे ।
1
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ४७१९ ) की फोटो नकलसे सौजन्य: शान्तिकुमार
मोरारजी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० काशिनाथ,
१८९. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
परवडा मन्दिर
८ सितम्बर १९३०
किसी व्यक्तिको अपनी मानसिक स्थिति के बारेमें बहुत सोच-विचार नहीं करना
चाहिए। हमें अपने नियत कार्य में तन्मय रहना चाहिए और प्रफुल्लित रहना चाहिए।
जब हमारे मनमें विकारपूर्ण विचार आने लगें तो सद्विचारों द्वारा उनका निवारण
करके हमें शान्त रहना चाहिए। अपने निश्चयों पर दृढ़ रहनेसे आत्मविश्वास अपने-
आप आ जाता है ।
गुजराती (जी० एन० ५२५१ ) की फोटो नकलसे ।
१९०. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
८ सितम्बर, १९३०
वि० मथुरादास,
तुम्हारा पत्र मिला, किन्तु मोतीबहनका पत्र नजर नहीं आया।
,
उपाधियोंके बारेमें काकासाहब से बातचीत करनेके बाद हम दोनों इस निर्णय
पर पहुँचे हैं कि उनकी तीनसे अधिक श्रेणियों न रखी जायें तथा हर तरहके हुनर, कला
या साहित्य ज्ञानके लिए एक ही प्रकारकी उपाधि होनी चाहिए। फिलहाल 'विनीत',
'विशारद' और 'पण्डित' इस प्रकार विद्यापीठकी तीन उपाधियाँ हैं। जिसने किसी
विषय में सामान्य ज्ञान प्राप्त किया हो वह 'विनीत' (मेट्रिकुलेशन प्रवेश), जिसने उक्त
विषय में प्रवीणता प्राप्त कर ली हो अर्थात् जो दूसरोंको पढ़ा सके यह 'विशारद
( ग्रेजुएट) और जो इस विषय में शोध कर सके, शोध-प्रबन्ध और लेख लिख सके,
वह 'पण्डित'। इस बातको ध्यान में रखते हुए 'पण्डित' की उपाधि फिलहाल किसीको
न दी जाये। 'धनुविनीत', 'धनुविशारद' की उपाधि दी जा सकती है। यदि तुम
उपाधियाँ दो तो इस बातका ध्यान रखना कि उन्हें बहुत सस्ता मत बना देना ।
परीक्षक नियुक्त करके जो यथारीति उत्तीर्ण हों उन्हींको उपाधियाँ देना ।
गुजराती (जी० एन० ३७४४ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० नारणदास,
१९१. पत्र : नारणदास गांधीको
५/९ सितम्बर, १९३०
पत्रोंका पुलिंदा बुधवारको ही मिला। भगवानजी और मणिबनके पत्र पढ़ लेना ।
मणिबनका पत्र उसे तुम खुद पढ़ाना। दोनों पत्र पढ़नेसे सब समझ आ जायेगा और
तुम्हें और कुछ बतानेकी जरूरत नहीं रहेगी। ऐसे काम भी तुम्हींको करने पड़ेंगे,
इसका विचार नहीं किया था; पर मुझे सोच लेना चाहिए था। तुममें इन्हें भी पूरी
तरह संभाल लेनेकी शक्ति है, यह ईश्वरकी कृपा है। केशुका काम कठिन लगता
है । सँभलकर जैसे काम चले वैसे चलाना। नवीनके साथ क्यों नहीं बनी ? पहले तो
दोनोंकी बहुत ही बनती थी। विदेशसे आये हुए पत्र भेजने लायक हों तो भेज
सकते हो। बहुत महत्त्वपूर्ण हों तो नकल रख लेना, या नकल ही भेज देना । दूदा-
भाई लक्ष्मीको बुलाने का बहुत आग्रह करें और लक्ष्मी जाना चाहे तो रोकना नहीं।
वह अच्छी खासी हठी है; किन्तु अब उसका नया अनुभव हो तो देखना ।
८ सितम्बर, १९३०
पिजाईके लिए रुई मुश्किलसे २० तारीखतक चलेगी। यदि अभीतक न
भेजी हो तो अब फौरन भेज देना। चार पोंड भेज दो तो काफी है। दो जनोंके
लिए पूनियाँ बनती हैं; इसलिए काफी रुई लगती है। काकासाहब ने अभी तो शुरू
ही किया है, किन्तु समय बीतने पर ज्यादा कात पायेंगे यह सम्भव है। चप्पलके
बारेमें तो लिखा ही है।
मेरे वजन और भोजन सम्बन्धी
पत्र में देखोगे ही।
फेरफार आदिके बारेमें तो मीराबहनको लिखे
मंगल प्रभात, ९ सितम्बर, १९३०
ही गाया है कि 'आभडछेट अदकेरुं अंग
छठी अँगुलीके समान यह किसी कामका
या धर्मके बहाने धर्मके काममें रुकावट
अस्पृश्यता निवारण : यह व्रत भी अस्वाद-व्रतकी तरह नया है; और यह कुछ
विचित्र भी लगेगा। यह जितना विचित्र है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी है। अस्पृश्यता
यानी अछूतपन; और अखा भगतने ठीक
(अछूतपन तो [ शरीरका] एक व्यंग है;
नहीं है)। यह जहाँ-तहाँ धर्मके नामपर
डालता है और धर्मको बिगाड़ता है। अगर आत्मा एक ही है, ईश्वर एक ही है,
तो अछूत कोई नहीं। जैसे ढेड़, भंगी अछूत माने जाते हैं, लेकिन वे अछूत नहीं हैं;
वैसे ही मुरदा भी अछूत नहीं है, वह सम्मान और करुणाका पात्र है। मुरदेको
छूकर या तेल लगाकर या उसकी हजामत आदि करके अगर लोग नहाते हैं, तो
वह सिर्फ आरोग्य-तन्दुरुस्तीके खयालसे ही मुरदेको छूकर या तेल लगाकर अगर
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: नारणदास गांधीको
१३५
कोई नहाता नहीं है, तो उसे गन्दा भले ही कहा जाये, लेकिन वह पातकी नहीं है,
पापी नहीं है। यों तो माता बच्चेका मैला उठाकर जबतक न नहाये या हाथ-पैर
न धोये, तबतक अछूत गिनी जाये; लेकिन बच्चा प्यारसे या खेलता हुआ उसे छू ले
तो न उसे ( बच्चेको) छूत लगनेवाली है, और न इससे उसकी आत्मा ही मलिन होगी ।
लेकिन जो लोग नफरतके कारण भंगी, ढेड़, चमार वगैरा नामसे पहचाने जाते हैं, वे
तो जन्मसे अछूत माने जाते हैं। भले ही उनमें से किसीने बरसों तक शरीर पर सैकड़ों
साबुन मल डाले हों, भले ही वह किसी वैष्णव-जैसी पोशाक पहनता हो, माला-कण्ठी
पहनता हो, रोज गीतापाठ करता हो और लेखकका धन्धा करता हो, तो भी वह
अछूत माना जाता है। इस तरह जिसे धर्म माना जाता है या जो धर्मकी तरह
बरता जाता है, वह धर्म नहीं है, अधर्म है और उसको समाप्त किया जाना चाहिए।
अस्पृश्यता निवारणको व्रतका स्थान देकर हम यह प्रगट करते हैं कि अछूतपन हिन्दू
धर्मका अंग नहीं है; इतना ही नहीं, बल्कि वह हिन्दु धर्ममें बैठी हुई एक सड़न है, एक
अन्धविश्वास है, पाप है, और उसे मिटाना हरएक हिन्दूका धर्म है, उसका परम कर्तव्य
है। इसलिए जो उसे पाप मानता है वह उसका प्रायश्चित्त करे, और कुछ नहीं तो
प्रायश्चित्तके तौर पर ही समझदार हिन्दु अपना धर्म समझ कर हरएक अछूत माने
जानेवाले भाई या बहनको अपनाये प्रेमसे और सेवाभावसे उसे छुए, छूकर अपने-
को पावन हुआ माने, 'अछूतों' के दुख दूर करे; वे बरसोंसे कुचले गये हैं, इसलिए
उनमें अज्ञान वगैरा जो दोष आ गये हैं उन्हें धीरजसे दूर करनेमें उनकी मदद करे,
और ऐसा करनेके लिए दूसरे हिन्दुओंको समझाये, प्रेरणा दे। इस निगाह से अछूतपनको
देखने पर उसे दूर करनेमें जो सामाजिक या राजनीतिक नतीजे निहित हैं, उन्हें
व्रतधारी तुच्छ समझेगा। उक्त या वैसा नतीजा आये या न आये, फिर भी अछूत-
पन मिटानेके कामको जिसने अपना व्रत बना रखा है, वह धर्म समझ कर अछूत माने
जानेवाले लोगोंको अपनायेगा । सत्य वगैराका आचरण करते हुए हम सामाजिक
परिणामोंका विचार न करें। सत्यका आचरण उस व्रतधारीके लिए कोई तरकीब
नहीं है, वह तो उसकी देहके साथ जुड़ी हुई चीज है, उसका स्वभाव है; उसी तरह
अस्पृश्यता निवारण भी उस व्रतधारीके लिए तरकीब नहीं है, उसका स्वभाव है। इस
व्रतका महत्त्व समझनेके बाद हमें मालूम होगा कि यह अछूतपनकी सड़न सिर्फ छेड़-
भंगी माने जानेवालोंके बारेमें ही हिन्दू समाजमें पैठ गई है, ऐसा नहीं है। सड़नका
स्वभाव है कि वह पहले राईके दानेके बराबर दीखती है, बादमें पहाड़का रूप लेती है,
और अन्तमें जिस वस्तुमें दाखिल होती है उसका नाश कर देती है। अछूतपनका भी
ऐसा ही है। यह छुआछूत दूसरे धर्मवालोंके साथ बरती जाती है, दूसरे फिरकेवालोंके
साथ बरती जाती है, एक ही सम्प्रदायके भीतर भी बरती जाती है; यहाँ तक कि
कुछ लोग तो छुआछूतको पालते पालते इस पृथ्वी पर भाररूप हो गये हैं। वे अपनी
शुचिता सँभालने, खुदको ही सहलाने (अपने पर आंच न आने देने), अपने को बचाते
फिरने, नहाने धोने, खाने-पीनेसे फुरसत नहीं पाते, और ईश्वरको भूलकर ईश्वरके
नामसे खुदको पूजने लग जाते हैं। इसलिए अछूतपन मिटानेवाला आदमी सिर्फ ढेड़-
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
भंगीको अपनाकर सन्तोष न मानेगा; वह जबतक तमाम जीवोंको अपने में नहीं
देखता और अपनेको तमाम जीवोंमें नहीं होम देता, नहीं मिटा देता, तबतक शान्त
होगा ही नहीं । अछूतपन मिटाना यानी तमाम जगतके साथ दोस्ती रखना, उसका
सेवक बनना। यों अस्पृश्यता निवारण और अहिंसाकी जोड़ी बन जाती है और सच
मुच है भी ऐसा ही अहिंसाका अर्थ है तमाम जीवोंके प्रति पूरा प्रेम । अछूतपन
मिटाने का भी यही अर्थ है। तमाम जीवोंके साथका भेद मिटाना अछूतपन मिटाना
है। इस तरह अछूतपनको देखनेसे वह दोष थोड़ा-बहुत सारे जगतमें फैला हुआ है।
यहाँ हमने उसका हिन्दू धर्मकी सड़नके रूपमें विचार किया है, क्योंकि उसने हिन्दू
धर्म में धर्मका स्थान हथिया लिया है, और धर्मके बहाने लाखों या करोड़ोंकी हालत
गुलामों- जैसी कर डाली है।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
एक व्यक्ति कान्तु गजीवाला, खपाटिया नकला, सूरतमें रहता है। लगता है कि
[ दांडी- ] कूचके दौरान उसने मुझे ५ रुपये दिये थे। उसे मैंने अपने यहां से हाथका
कागज लेकर उसकी दैनन्दिनी बंधवाकर उसपर खादीकी जिल्द चढ़ाकर भेजने को कहा
था। पकड़े जानेके कारण ऐसा करा नहीं पाया। अब जिसे बाँधनेका काम आता हो
उससे सौ या उससे ज्यादा पन्नोंकी छोटी-सी वैनन्दिनी बनवाकर उसे भेज देना और
मुझे लिखना। उसे एक पोस्टकार्ड तो फौरन लिखकर डाल देना ।
[ पुनश्च : ]
५३ पत्र है।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्म से ।
१९२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको
चि० महालक्ष्मी,
बापू
यरवडा मन्दिर
१० सितम्बर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । ज्यों-ज्यों तुम्हारा काम बढ़ता जाता है त्यों-त्यों तुम्हारे
अक्षर भी सुधरते जाते हैं। तुम्हें अपने अक्षर और भी सुधारने चाहिए। सजावटके लिए
अक्षरोंमें घुडियाँ नहीं लगानी चाहिए। जैसे 'उ' की मात्रा ७' इसी तरह लगानी
चाहिए, न कि 2 इस तरह अक्षर जैसे छपते है, वैसे ही लिखनेका अभ्यास कर
लेनेसे लिखावट बहुत सुन्दर हो जायेगी। मैं तो तुम सभी बहनोंको हर तरहसे परिपूर्ण
देखना चाहता हूँ। मेरे इस कथनमें अतिशयोक्ति नहीं है कि मेरी सभी आशाएँ तुम
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: रमावहन जोशीको
१३७
बहनों पर निर्भर हैं। मुझे प्रायः ऐसा लगता रहता है कि अहिंसाकी अन्तिम विजय
स्त्रियोंके हाथों ही होगी।
गुजराती (जी० एन० ६७९९ ) की फोटो नकलसे ।
चि० मोतीबहन,
१९३. पत्र : मोतीबहन चोकसीको
बापूके आशीर्वाद
[१० सितम्बर, १९३० के लगभग ]
शान्तुको
आशा है अब तुमने दुःख मानना छोड़ दिया होगा। तुम्हारे दुःखकी औषधि
'गीताजी' है। प्रतिदिन गुजराती अनुवाद पढ़ना और बार-बार पढ़ना
हरिभाई डाक्टरको दिखाकर उसके दाँतका इलाज करवा लेना। प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा
पढ़ती रहना ।
गुजराती (जी० एन० ३७३८ ) की फोटो नकल से ।
चि० रमा (जोशी),
१९४. पत्र : रमाबहन जोशीको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
११ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा सुन्दर पत्र मिला। मैं देखता हूँ कि महालक्ष्मी तुम्हारा अनुकरण करती
है। इसके और तुम्हारे अक्षरोंमें कोई फर्क नहीं है। यह अच्छी बात है। लेकिन
इससे क्या तुम्हारी जिम्मेदारी बढ़ नहीं जाती ? तुम्हें हर चीजमें इसी कारण उन्नति
करनी चाहिए। ऐसा करनेकी शक्ति ईश्वरने तुम्हें प्रदान की है। तुम उन्नति करो,
यही मेरी प्रार्थना है। तुम्हें मेरा यही आशीर्वाद है। महालक्ष्मीके जिन गुणोंकी तुमने
चर्चा की है वह सचमुच उन गुणोंसे युक्त है, यह मैंने वर्धा में ही देख लिया था ।
गुजराती (जी० एन० ५३२४) की फोटो नकलसे ।
१. मूलमें यही तारीख दी गई है, किन्तु वह गांधीजीकी लिखावटमें नहीं है।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९५. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको
११ सितम्बर १९३०
चि० रोहिणी,
तेरा पत्र मिला। अपने पत्र में हमीदाबहन ने तेरे साहसकी बात लिखी है, जिसे
पढ़कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। कानजीभाईकी लड़की भला इतनी बहादुर क्यों न
हो । तेरी बहादुरीको बास पढ़कर मुझे उपनिषदकी एक कथा याद आ गई। उसमें
हमारी इन्द्रियोंकी तुलना घोड़ेसे की गई है। आत्माकी सारथीके रूपमें कल्पना की
गई है। जो इस घोड़े अर्थात् इन्द्रियोंको अपने वशमें रखता है उसे विजयी, और
घोड़ा जिसे घसीट ले जाये उसे पराजित कहा गया है। उस घोड़ेको जिस प्रकार
तू अपने साहसके बलपर रोक सकी है उसी प्रकार तू और अन्य बहनें अपनी इन्द्रियों
पर सवार रहें और उन्हें अपने यशमें रखें। यदि तुम लोग ऐसा कर सकी तो वह
हमारे लिए रामराज्य होगा। हमीदावनको यह पत्र पढ़ना और समझा देना। प्रभु
तेरा साहस बढ़ाये । हमीदा बहन को गुजराती सिखाना ।
गुजराती (जी० एन० २६५२ ) की फोटो नकलसे ।
१९६. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
बापूके आशीर्वाद
११ सितम्बर १९३०
चि० प्रेमा,
तेरा पत्र मिला। अब तबीयत अच्छी हो गई होगी। रातके नियमका पालन
करना ही चाहिए। तुझे दिनका कोई काम कम कर देना चाहिए अथवा अभी पढ़ना-
लिखना छोड़ देना चाहिए। पूरी नींद आनेसे उत्साह बढ़ेगा और यही काम थोड़े
समयमें हो सकेगा। ऐसा हो या न हो, ९ से ४ तक मनको शान्त रखकर
सोना ही चाहिए। इसपर तुरन्त अमल करना। तू बहस न करे तो अच्छा हो । बहस
करने योग्य बातों में खूब बहस करना, लेकिन इसमें नहीं ।
तूने कमलावन लुंडीसे मित्रता की या नहीं ?
धुरन्धरको बताना कि अध्यापक लिमयेने 'अनासक्तियोग' का अनुवाद किया है
और वह अनुवाद तुरन्त ही प्रकाशित भी होगा ।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र : बलभद्रको
'भीक' मराठीमें है, गुजरातीमें 'बीक'' [8]
१३९
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६८२ ) से । सौजन्य: प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२३४की फोटो नकलसे भी ।
१९७. पत्र : निर्मला देसाईको
परवडा मन्दिर
११ सितम्बर, १९३०
वि० निर्मला (बुआ),
तेरी कैद सच्ची है और हमारी झूठी। किन्तु अपनी कैदसे छूटना तेरे हाथमें
है। और हम जिस कैदमें हैं उससे छूटना किसके हाथमें है ? यदि हड्डी बढ़ गई है।
तो इसमें घबराने की कोई बात नहीं। सूर्योदयके समय तुझे केवल धूपस्नान लेना
चाहिए। धूपस्नानके समय शरीरके जिस भागकी हड्डी बढ़ गई है, उस भागको तो
खुला रखना ही चाहिए। यदि पूरा शरीर खुला रखा जाये तो अधिक लाभ होगा ।
यदि सादी खुराक ली जाये तो वह जल्दी पच जायेगी। बाकी तो हरिभाई जैसा
कहें वैसा करना ।
गुजराती (एस० एन० ९४५६) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१९८. पत्र : बलभद्रको
यरबडा मन्दिर
११ सितम्बर, १९३०
चि० बलभद्र (या बुद्धिचक्र),
नारणदासभाई तेरी बहुत प्रशंसा करते हैं। तूने तो जबर्दस्त पिंजाई की। यदि
तू इसी प्रकार नियमित रूपसे उद्यम करता रहे तो कितना अच्छा हो ! तू मुझे पत्र
क्यों नहीं लिखता ?
गुजराती (जी० एन० ९२१० ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. भीक' ( मराठी ) का अर्थ है भिक्षा और बीक' (गुजराती) का अर्थ है डर।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९९. पत्र : लीलावती आसरको
परवडा मन्दिर
११ सितम्बर, १९३०
चि० लीलावती (आसर),
तेरा पत्र मिला। फिलहाल थोड़ा आराम कर ले; अपना काम उसके बाद
शुरू करना । अपनी लिखावट बिगाड़ मत जरा राधाबहनकी लिखाई तो देख जरा-सी
कोशिश करके तू अपनी लिखावट सुधार सकती है। यदि तेरी लिखावट एक बार
सुधर जायेगी तो फिर तेजीसे लिखने पर भी बिगड़ेगी नहीं।
गुजराती (जी० एन० ९५६५ ) की फोटो नकलसे।
२००. पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको
बापूके आशीर्वाद
यरबडा मन्दिर
११ सितम्बर, १९३०
'चि०' पण्डितजी,
'पण्डितजी' के साथ 'चि०' अच्छा नहीं जान पड़ता। किन्तु 'चि०' शब्दका
प्रयोग तो मैं आजकल बहुत खुलकर करता हूँ। इस शब्दका प्रयोग करते हुए कभी-
कभी मुझे घबराहट भी होती है। पितृपदके लिए आवश्यक योग्यता - उतना प्रेम,
उतनी आत्मीयता, उतनी सजगता -- मुझमें है या नहीं, इस बातकी जब जांच करता
हूँ तो मैं कभी-कभी काँप उठता हूँ। किन्तु ईमानदारीसे में इतना कह सकता हूँ कि
अपने में इन सबका विकास करनेका में पूरा प्रयत्न करता है और इतनेसे सन्तोष
मानता हूँ। यह तो मैं जानता ही हूँ कि जब मैं किसीके लिए 'चि०' विशेषणका
प्रयोग करता हूँ तो उस हद तक मेरी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। ईश्वर इस उत्तर-
दायित्वको निभानेकी सामर्थ्यं दे तो अच्छा हो ।
प्रभात-फेरियोंसे काफी शक्ति उत्पन्न हो सकती है। उन्हें सुव्यवस्थित रूप
देनेमें तुम काफी सहयोग दे सकते हो। सहयोग देना।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २१२) की फोटो नकलसे सौजन्य : लक्ष्मीबाई खरे
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगाबहन ( बड़ी),
२०१. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
परवडा मन्दिर
११ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र क्यों नहीं आया ? तुम्हें हर सप्ताह पत्र लिखना ही चाहिए। जो
बहनें धरना देनेके लिए बाहर गई हुई हैं उन सबसे तुम्हारा पत्र-व्यवहार है न ? न
हो तो शुरू करना। याद रखना कि उनमें बहुतसी बहनोंके लिए तुम माँके समान
हो। तुम्हें लड़के-लड़कियोंकी कमी तो है ही नहीं; किन्तु वे सब जोखिमसे भरे काम में
जुटी हैं, यह तो हम जानते ही हैं। जोखिम भरा काम करना हमारा धर्म है। हम
जान-बूझकर ऐसा काम न उठायें, पर यदि सिर पर आ ही पड़े तो उसका स्वागत
करें और उसमें सफल होनेके लिए ईश्वरसे सहायता मांगें बाहर रहते हुए भी जो
अपने व्रतोंका पालन करेगी वह बहन ही जीती हुई मानी जायेगी ।
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो - ६: गं० स्व० गंगाबहेन ने सी० डब्ल्यू० ८७५७ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
२०२. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
चि० मनु ( त्रिवेदी),
यरवडा मन्दिर
११ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला। हम दोनोंने चैनकी साँस ली। यदि अपनी उम्र का कोई अन्य
व्यक्ति हमसे अधिक काम कर सके तो उससे हमें दुःखी होनेके बजाय प्रसन्न होना
चाहिए। "भगवानकी जब जो मर्जी हो, उसके लिए शोक करना वृथा है।" हमें जैसा
शरीर मिला होगा, हम वैसा ही काम कर सकेंगे। अधिक शारीरिक शक्ति होनेके
बावजूद जो व्यक्ति कामसे जी चुराता है और कम काम करता है उसे शर्मिन्दा होना
चाहिए। तेरे जैसेके लिए तो वैसा कोई कारण नहीं है।
गुजराती (जी० एन० ७७६३) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० बनारसी,
२०३. पत्र : बनारसीलाल बजाजको
यरवडा मन्दिर
११ सितम्बर, १९३०
तुमारा खत मीला है। पकड़े भी गये और छूट भी गये ? मुझे विश्वास है कि
अमारा कार्य धैर्यमय, सत्यमय और अहिंसामय हि रहेगा इसलिये
सी० डब्ल्यू० ९३०४ से । सौजन्य : बनारसीलाल बजाज
२०४. पत्र : वसुमती पण्डितको
मैं निश्चित हूं।
बापुके आशीर्वाद
यरबडा मन्दिर
१२ सितम्बर, १९३०
चि० वसुमती,
तेरा पत्र मिला । सरभोणके कामका विवरण मुझे लिख भेजना। तू कहाँ रहती
है ? क्या कोई पुरुष भी है या सारा कारोबार स्त्रियोंके ही हाथमें है ? वृद्धा मांजी
कहाँकी रहनेवाली हैं? उनकी उम्र क्या है ? वे क्या काम करती हैं ?
गुजराती (एस० एन० ९२८७) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० रुक्मिणी,
२०५. पत्र : रुक्मिणी बजाजको
यरवडा मन्दिर
१२ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला। मैं तेरे पत्रका इन्तजार ही कर रहा था। अब तेरा स्वास्थ्य
कैसा है ? क्या बीजापुर तुझे माफिक नहीं आया ? आशा है तू बनारसीके बारेमें
तनिक भी चिन्ता नहीं करती होगी। वह आगा-पीछा सोचकर चलनेवाला व्यक्ति है।
और आखिरकार तो ईश्वर ही हम सबकी रक्षा करता है ।
गुजराती (जी० एन० ९०५२) की फोटो नकलसे ।
चि० कुसुम (देसाई),
२०६. पत्र : कुसुम देसाईको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१२ सितम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला। मैं राह देख रहा था, प्यारेलालके समाचार मिलनेकी आशासे ।
प्यारेलाल यहाँ है, यह खबर भी मुझे तब मालूम हुई जब मैंने अनायास ही तेरा तार
जेलरके पास देखा । फिर छगनलाल (जोशी) के पत्रसे उसकी तबीयत खराब होनेका
समाचार मिला। यहां तो मुझे बताया गया है कि वह आनन्दसे है। अब तेरे पत्रसे
पता चलेगा।
नियत कर्म के बारेमें तू आलस्य न करना। श्रद्धा रखना। श्रद्धाका काम तो
वहीं होगा न, जहाँ बुद्धि काम न दे ? जो कार्य आलस्यके कारण या और किसी
कारणसे न हो उसके बारेमें मुझे लिखते हुए संकोच न करना। मुझे लिखनेसे भी
तू सुरक्षित रहेगी, क्योंकि मुझे लिखना पड़ेगा, यह बात ही तुझे नियमित बनाने में
सहायक सिद्ध होगी।
वा के विषय में मैं यहांसे क्या कर सकता हूँ ? तू ही मीठुवहनसे शिकायत कर ।
बा स्वतन्त्र रूपसे तो हरगिज कोई काम नहीं कर सकती । वह मीठुबनके नेतृत्वमें
वहाँ गई है इसलिए उसे उसके अधीन काम करना चाहिए।
गुजराती (जी० एन० १८०३) की फोटो-नफलसे।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०७. पत्र : माधवदासको
चि० माधवदास,
यरवडा मन्दिर
१२ सितम्बर १९३०
आश्रमसे मिले पत्रसे ज्ञात हुआ कि तुम रामदास आदिसे मिलने गये थे। ठीक
किया। तुम्हारा क्या हाल है ? कृष्णा कैसी है? क्या अब उसका शरीर स्वस्थ
हुआ ? क्या तुम दोनों वर्तमान आन्दोलनमें किसी प्रकार हाथ बँटा सकते हो ? तुम
कहाँ रहते हो ?
गुजराती ( एम० एम० यू० / २२ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
२०८. पत्र : मणिबहन परीखको
चि० मणिबहन (परीख),
बापूके आशीर्वाद
१३ सितम्बर, १९३०
नरहरिकी हड्डी कैसे बढ़ गई, यदि तुम्हें इसका पता हो तो मुझे लिखना ।
आशा है तुम्हारी तबीयत ठीक होगी। बच्चे कैसे हैं? क्या वे कुछ लिखते-पढ़ते हैं?
तुम्हारा दिन कैसे बीतता है? मुझे विस्तारपूर्वक पत्र लिखना । इस पत्र-व्यवहारको
सर्वथा अनिश्चित समझना, क्योंकि यह कभी भी बन्द हो सकता है। हालांकि
फिलहाल ऐसा कोई लक्षण नजर नहीं आता; किन्तु कैदी तो कैदी ही है। कैदीका
व्यक्तिगत कोई अधिकार नहीं होता।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
मोहनको पीलिया हो जानेका मतलब है उसकी खुराकमें लापरवाही होना ।
गुजराती (जी० एन० ५९६०) की फोटो- नकलसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रभावती,
२०९. पत्र प्रभावतीको
यरवडा मन्दिर
१३ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला। मैं तो एक भी डाक नहीं छोड़ता, लेकिन हो सकता है कि
यहींसे पत्र नियमपूर्वक न जाते हों। जयप्रकाश अब ठीक हो गया होगा। वहाँ कोई
अखबार क्यों नहीं आता ? आश्रममें बहुत सारे अखबार आते हैं, वे चाहें तो कुछ
अखवार तुझे भेज सकते हैं। तेरी सास अब ठीक हो गई होगी ।
मैं तुझे अपने वजनके बारेमें तो बता ही चुका है। हम दोनों आरामसे हैं।
तू वहाँ घूमने-फिरने जाती है अथवा नहीं ? नियमपूर्वक प्रार्थना भी करती है ? दिन
किस तरह बिताती है? वहाँकी आबादी कितनी है ? जयप्रकाश अब क्या करेगा ?
यह कुछ काम करेगा अथवा नहीं? और कोई चिन्ता करता है या नहीं ? यदि तू
मुझे सीधे पत्र लिखेगी तो बहुत करके वह मुझे मिल जायेगा । आजकल तो [ सभी
पत्र ] मिलते हैं। तुझे सीधे में अधिक पत्र नहीं लिख सकता ।
गुजराती (जी० एन० ३३६९ ) की फोटो नकलसे।
चि० मीरा,
२१०. पत्र : मीराबहन को
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१४ सितम्बर, १९३०
कोयम्बटूरसे लिखा तुम्हारा पत्र मेरे सामने है। यह विलक्षण बात है कि इतनी
जबर्दस्त भागदौड़ में भी तुम कुल मिलाकर इतनी स्वस्थ रह सकी। मैं समझता हूँ कि
यह मानसिक शान्तिका चिह्न है।
केशुने बाँसका चरखा भेजनेका प्रस्ताव अवश्य किया था। लेकिन मैंने नहीं भेजने
दिया। यह मेरी गलती है कि जब मेरे पास पर्याप्त अवसर था तब मैने उसके प्रयोग
की तफसीलों में निपुणता प्राप्त नहीं कर ली। अब मैं प्रायश्चित्त-स्वरूप गलती कर-
करके उसको चलाने में निपुणता प्राप्त कर रहा हूँ। मैं देखता हूँ कि माल और उसे
कम-ज्यादा करके ठीक तरहसे काममें लानेका चरखेकी गति और उसके बढ़िया चलनेसे
बहुत सम्बन्ध है । मेरा काम ठीक चल रहा है। मैं तनिक भी निराश नहीं हूँ ।
जो असाधारण थकान होती थी वह खत्म हो गई है। इसलिए चरखेके बारेमें चिन्ता
४४-१०
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
करनेकी कोई जरूरत नहीं है। काका तुम्हारा चरखा चलाते हैं। अभी भी वह प्रति
घंटे सूतके ८० तारसे अधिक नहीं निकाल पाते ।
श्रीमती ऐशरके गर्भपातका मुझे दुख है। यदि वे लोग एक पूर्ण विकसित और
स्वस्थ बच्चा चाहते हैं और श्रीमती ऐशरको एक मजबूत और स्वस्थ माँ होना है
तो मुख्य चीज यह है कि वे अपनी विषय-वासनापर तीन वर्षतक संयम रखें। इसके
लिए यदि जरूरत हो तो उन्हें अलग-अलग रहना चाहिए। अवश्य इस संयमके अलावा
उन्हें सादा भोजन करना और खुलेमें रहना चाहिए और हलकी कसरत खूब करनी
चाहिए। यदि श्रीमती ऐशर कूका कटि-स्नान और बैठकर स्नान दोनों करें, तो उन्हें
जबर्दस्त लाभ होगा। मुझे विश्वास है कि यदि वह यह स्नान तीन वर्षतक लें और
धीरजसे काम लें तो वह बिलकुल नई स्त्री बन जायेंगी। अगर तुम चाहो तो इसे तुम
श्रीमती ऐशरको भेज सकती हो।
मेरा टहलना अब भी सीमित ही है। लेकिन मैं काफी ठीक-ठाक हूँ। चरखा
चलाते और चरखेके बारेमें सोचते हुए समय जल्दी ही बीत जाता है। दिनके अन्तमें
में अच्छी नींद सोता हूँ जो मेरे लिए भोजनसे भी बढ़कर है। मैंने ६५ भजनका
अनुवाद समाप्त कर दिया है। लेकिन अभी भी बहुत दूरी तय करनी हैं। मुझे एकसे
ज्यादा करनेका अवसर कदाचित् ही मिलता है और प्रतिदिन एकसे कम करूँ, ऐसा अभी
तक हुआ नहीं है । अतः यद्यपि प्रगति सुस्थिर है, किन्तु निःसन्देह धीमी तो है ही ।
सप्रेम,
से भी ।
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४११ ) से । सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६४५
चि० मणि (पटेल),
२११. पत्र: मणिबहन पटेलको
T
यरवडा मन्दिर
१४ सितम्बर, १९३०
चूंकि तू मुझसे पत्रकी आशा रखती है, इसलिए यह लिख रहा हूँ तुझे यह कैसे
मिलेगा, यह तो दैव ही जाने तेरा पत्र बापूको पढ़नेके लिए जाने दिया गया था।
तुझे लिखनेकी छूट मिले तो लिखना। भले ही लाचारी क्यों न हो, अब तुझे शान्तिका
अवसर मिला है, उसका पूरा उपयोग करना। इसे भी मैं सेवा मानता हूँ। स्वास्थ्यको
सँभालना। कार्यक्रम ठीक बनाना। खाने-पीनेको क्या मिलता है, इत्यादि बातें लिखना ।
बापूके आशीर्वाद
[ गुजरातीसे ]
बापुना पत्रो ४: मणिबहेन पटेलने
१. मणिमदन उस समय सम्मकी आर्थर रोड जेल में थीं।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१२. छगनलाल जोशीको लिखे पत्रका अंश
[ १४ सितम्बर, ] १९३०
सूक्ष्म हिंसाकी गन्ध तो मुझे यहाँ बैठे हुए भी आती है। लोगोंने अहिंसाको
धर्मके रूपमें कम समझा है। वे उसे एक युक्तिके रूपमें आजमा रहे हैं। वैसे यह भी
एक बहुत बड़ा परिवर्तन है। किसी दिन इससे धर्म भी समझ जायेंगे। यदि हम उसे
मूर्तिमन्त कर सकें तो आसपासका वातावरण निर्बल होनेपर भी हम दुगुने जागृत हों,
दुगुनी तपश्चर्या करें।
बह्नोंके बारेमें तुमने जिस भयकी बात की है, उसे हम बहुत बड़ा नहीं मानते,
क्योंकि पुरुष वर्गके दोषोंको दरगुजर करनेकी हमें आदत पड़ी हुई है। बहनें बाहर
निकली है। यह अच्छा ही हुआ है। उस कसौटी पर जो सफल हुई, उसने व्रतोंका
पालन किया और अपना धर्म समझा, ऐसा हम कह सकेंगे। जो असफल हुई, वह
प्रयत्न करने पर भी गिरेगी तो बादमें फिर प्रयत्न करेगी और ऊँचा उठेगी। जो
मनमें विषयोंका सेवन करती है और मौका मिलने पर उसका पोषण करती है उसने
तो किसी दिन भी व्रत पालन नहीं किया था। उसमें दम्भ था, जो फूट निकला ।
यह भी अच्छा ही मानें।
इसलिए तुम निर्भय रहना। उनकी चिन्ता न करना । सब अपने-आपको सँभालें ।
ईश्वर सबका रखवाला है। थोड़े भी बचे रहेंगे तो भूले-भटकोंको सहारा मिलता
रहेगा। मेरा तो यही विश्वास है कि बहुत-से बच जायेंगे। आजकी खिचड़ी मुझे अच्छी
तो नहीं लगती, किन्तु वह अनिवार्य है।
जबतक मानपूर्वक लिख सकता हूँ तबतक पत्रोंके द्वारा प्रयत्न करता ही रहूँगा ।
फिर प्रार्थना भी मेरा प्रयत्न ही है; उसे तो कोई छीन नहीं सकता।
[ गुजरातीसे ]
बावुना पत्रो-७: श्री छगनलाल जोशीन
१. देखिए अगला शीर्षक वर्ष साधन-सूनके अनुसार दिया गया है।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० नारणदास,
२१३. पत्र : नारणदास गांधीको
परवडा मन्दिर
१४ / १६ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । बह्नोंके बारेमें तुम्हारा इशारा समझ गया हूँ। छगनलाल
जोशीका पत्र पढ़ लेना। बाहर काम करने गई हुई बहनोंके साथ तुम या गंगाबहन
पत्र-व्यवहार करते रहना । आवश्यकता लगे और समय मिले तो गंगाबहन किसी-
किसी जगह तो चक्कर भी लगा सकती है। कहीं गलती भी हो जायेगी, तो भी
हमें निर्भय रहना है। आवश्यकतानुसार सावधान भर रहें, दूसरोंको भी सावधान
करें और परिणाम ईश्वर पर छोड़ दें। जिस संयमकी हम आशा या इच्छा करते
हैं उसके मुकाबले में हमारी तपश्चर्या कितनी है? फिर भी हमें तो उसी मार्गपर
चलते रहना है। बहनोंकी स्वतन्त्रताकी पूर्ण रूपसे रक्षा करनी है। चाहे रास्ता चलते
भूल जायें, ठोकर लगे, काँटा चुभे, या गिर पड़ें। मैंने तो कागज नियमके अनुसार
मंगलवारको ही दिया था। किन्तु यहांके दफ्तर की गड़बड़के कारण या जानबूझकर
देरसे डाकमें भेजा गया होगा। मैंने शिकायत नहीं की। जब-जब डाक समयसे न
मिले, मुझे तो लिख ही देना अच्छा हुआ पूँजाभाई आ गये। क्या आश्रममें से किसी-
को सेवाके लिए नियुक्त किया है? कविश्री के स्मारकके लिए जो रकम रेवाशंकर-
भाईके पास है उसके बारेमें मणिभाईको लिख रहा हूँ। जोलिंगर बहनसे कहना
कि मैं उनके जयाबकी राह देख रहा हूँ। निःसंकोच लिखें। कमलावन लुंडीके
बारेमें तुमने ठीक किया है। फिलहाल वह न बोले, न लिखे, यही इष्ट है। मूक
सेवाकी तो कोई सीमा ही नहीं है। बलभद्रने तो पिंजाईमें खूब कमाल किया है।
इससे मालूम होता है कि हम किसीको मूर्ख न मानकर प्रोत्साहन देते रहें और उससे
आशा करते रहें तो उसका फल अच्छा ही निकलेगा ।
मेरी गाड़ी अभी तो चल रही है। हमेशाकी तरह दूध-दही ले रहा हूँ ।
मुनक्का और खजूर के बदले दिनमें सात या आठ टमाटर, चार या पांच भुने हुए
बड़े रतालू और कोई ६ चम्मच गोभीके या जो भी सब्जी बनी हो। इससे पाखाना
ठीक होता है। सुबहके ७-३० बजे एक खट्टे नींबूका रस गर्म पानी और नमकके
साथ लेता हूँ। दोपहरको एक नींबूका रस सोडाके साथ यह माफिक आ जाये
तो कब्जकी समस्या दूर हो और खर्च तो बहुत ही बच जाये। जो सब्जी यहाँ
बगीचेमें उगती है, उसीमें से लेता हूँ। किन्तु उसका खर्च गिनें तो रोज दो आनासे
ज्यादा नहीं होता होगा। जबकि खजूर और मुनक्केका खर्च कमसे कम ६ आने
१. राजचन्द्र ।
२. मणिभाई रेवाशंकर झवेरी।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: नारणदास गांधीको
१४९
होता होगा। जिन्हें कब्जकी शिकायत है वे इस खुराकको आजमाकर देखें। यह नहीं
कह सकते कि सभीको लाभ ही होगा। मुझपर भी यह असर बना ही रहेगा, इस
समय यह भी नहीं कह सकते। इस प्रयोगमें दूसरी खुराक निषिद्ध मानी जानी चाहिए।
सिर्फ भुने हुए रतालू ही खूब चबाकर खाने चाहिए। उसे दूध या दही में भिगोना
नहीं चाहिए। छिलका खा लेनेमें शायद कोई बुराई नहीं थोड़ा-सा तो खाता ही हूँ ।
पाचनशक्ति नाजुक है इसलिए सारा खाते हुए डरता हूँ। यदि नाजुक पाचनशक्ति-
वाला कोई व्यक्ति यह प्रयोग करना चाहे तो वह भी छिलकेको छोड़ दे मेरी चप्पल
मिल जाये तो सचमुच अच्छा हो। कुसुमको खबर होनी चाहिए। शायद उसने उन्हें
प्रेमावहनको सीपा हो। रुई अभी न भेजी हो तो आखिर डाकसे ही भेज देना छः
तार और आठ तारकी दोनों ही माल बहुत पतली मालूम हुई। चरखीसे खिसक जाती
हैं और उसे फिराये बिना खुद ही घूम जाती हैं। मुझे और न भेजना। मेरे पास
थोड़ी-सी तैयार पड़ी हैं और दूसरी जब चाहूँ तब बना ही सकता हूँ। कोई अच्छा
तरीका मालूम हो तो उससे कुछ समय बच जायेगा, इस विचारसे पूछा था ।
१५ सितम्बर, १९३०
अभी मौन छोड़ा है। रामदासने काकासाहब को जो पत्र लिखा था, सो उन्होंने
मुझे सुनाया। रामदासने लिखा है कि उसने मुझे पत्र लिखा था किन्तु वह पत्र मुझे
मिला नहीं रामदासने अपने स्वास्थ्य और अध्ययनके बारेमें विस्तारपूर्वक लिखा है। उससे
बहुत सन्तोष हुआ। उसके जेलमेंसे निकलनेके बाद पत्र लिख सकूंगा और वह भी
लिख सकेगा। उसके पत्र जबतक यह पत्र-व्यवहार निभेगा, तबतक मिलते रहेंगे।
अभी तुम्हें पत्र कपड़े अस्तरवाले लिफाफे में भेज रहा हूँ। अभी तो तुम्हारे भेजे हुए
लिफाफे हैं, उनका फिर वहाँ इस्तेमाल कर सको इस इरादेसे यहाँसे आकार न बदल
कर भेजता हूँ। नहीं तो मेरा काम तो उसे छोटा करके भी चल जाता ।
मंगल प्रभात, १६ सितम्बर, १९३०
या को सूरत में पुलिसने तंग किया -ऐसा समाचार देखा है। उसमें कुछ सत्य
है क्या ?
--
| शरीरश्रम सभी मनुष्योंके लिए अनिवार्य है, यह बात पहले-पहल टॉल्स्टॉयका
एक निबन्ध पढ़कर मेरे मनमें बैठी थी। यह बात इतनी साफ जाननेके पहले उसपर
अमल तो मैं रस्किनका 'अनटू दिस लास्ट' ('सर्वोदय') पढ़कर ही करने लगा था।
यहाँ 'शरीर-श्रम' अंग्रेजी शब्द 'ब्रेड लेबर' का तरजुमा है। 'ब्रेड लेवर' का शब्द
मुताबिक अनुवाद है रोटी (के लिए) मजदूरी रोटी के लिए हरएक मनुष्यको मजदूरी
करनी चाहिए, शरीरको (कमरको) झुकाना चाहिए, यह ईश्वरका कानून है।
यह मूल खोज टॉल्स्टॉयकी नहीं है, लेकिन उससे बहुत कम मशहूर रूसी लेखक
बन्दकी है। टॉल्स्टॉयने उसे रोशन किया और अपनाया। इसकी झांकी मेरी आंखें
'भगवद्गीता' के तीसरे अध्यायमें करती हैं। जो यज्ञ किये बिना खाता है, वह
चोरीका अन्न खाता है, ऐसा कठिन शाप यज्ञ नहीं करनेवालेको दिया गया है। यहाँ
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
यज्ञका अर्थ शरीर श्रम या रोटीके लिए की गई मजदूरी ही ठीक बैठता है। और
मेरी राय में वही मुमकिन है। जो भी हो, हमारे इस व्रतुका जन्म इस तरह हुआ है।
बुद्धि भी उस चीजकी ओर हमें ले जाती है। जो मजदूरी नहीं करता उसे
खानेका क्या हक है ? 'बाइबिल कहती है: “अपनी रोटी तू अपना पसीना बहाकर
कमा और खा । करोड़पति भी अगर अपने पलंगपर पड़ा रहे और जब उसके मुंहमें
कोई खाना डाले तब खाये, तो वह ज्यादा दिनों तक खा नहीं सकेगा, इसमें उसको मजा
भी नहीं आयेगा । इसलिए वह कसरत वगैरा करके भूख पैदा करता है और खाता
तो है अपने ही हाथ-मुँह हिलाकर अगर यों किसी-न-किसी रूपमें अंगोंकी कसरत
राय रंक सबको करनी ही पड़ती है, तो रोटी पैदा करनेके लिए ही सब क्यों कसरत
न करें? यह सवाल कुदरती तौर पर उठता है । किसानको हवाखोरी या कसरत
करनेके लिए कोई कहता नहीं है और दुनियाके ९० फीसदी से भी ज्यादा लोगोंका
निवाह सेतीपर होता है। बाकीके दस फीसदी लोग अगर इनकी नकल करें तो
जगतमें कितना सुख, कितनी शान्ति और कितनी तन्दुरुस्ती फैल जाये? और अगर
खेतीके साथ बुद्धि भी मिले तो खेती से सम्बन्ध रखनेवाली बहुतसी मुसीबतें आसानीसे
दूर हो जायेंगी। फिर अगर इस शरीर श्रमके निरपवाद कानूनको सब मानें, तो
ऊँच-नीच का भेद मिट जाये। आज तो जहाँ ऊँच-नीचकी बू भी नहीं थी वहाँ यानी
वर्ण-व्यवस्थामें भी वह घुस गई है। मालिक मजदूरका भेद एक आम बात हो गई
है और गरीब धनवानसे जलता है। अगर सब रोटीके लिए मजदूरी करें, तो ऊँच-
नीचका भेद न रहे; और फिर भी धनिक वर्ग रहेगा तो वह खुदको मालिक नहीं
बल्कि उस धनका रखवाला या ट्रस्टी मानेगा और उसका ज्यादातर उपयोग सिर्फ
लोगोंकी सेवाके लिए करेगा। जिसे अहिंसाका पालन करना है, सत्यकी भक्ति करनी
है, ब्रह्मचर्यको कुदरती बनाना है, उसके लिए तो शरीर श्रम रामबाण सा हो जाता है।
यह मेहनत सचमुच तो खेतीमें ही है। लेकिन सब खेती नहीं कर सकते, ऐसी आज
तो हालत है ही। इसलिए खेतीके आदर्शको खयालमें रखकर खेतीके एवज में आदमी
भले दूसरी मजदूरी करे- -जैसे कताई, बुनाई, बढ़ईगिरी, लुहारी वगैरा वगैरा। सबको
अपना भंगी स्वयं ही बनना चाहिए। जो खाता है यह मल त्याग तो करेगा ही ।
जो मल-त्याग करता है वहीं उसे जमीनमें गाड़ दे, यह उत्तम बात हो। अगर यह
नहीं ही हो सके तो प्रत्येक कुटुम्ब अपने यहाँ मल-मूत्रकी सफाई स्वयं करे। जिस
समाजमें भंगीका अलग पेशा माना गया है, वहाँ कोई बड़ा दोष पैठ गया है, ऐसा
मुझे तो बरसोंसे लगता रहा है। इस जरूरी और तन्दुरुस्ती बढ़ानेवाले (आरोग्य-
पोषक) कामको सबसे नीच काम पहले-पहल किसने माना, इसका इतिहास हमारे
पास नहीं है जिसने माना उसने हमपर उपकार तो नहीं ही किया। हम सब भंगी
हैं, यह भावना हमारे मनमें बचपन से ही जम जानी चाहिए और उसका सबसे
आसान तरीका यह है कि जो इसे समझ गये हैं वे शरीर-श्रमका आरम्भ पाखाना-
सफाईसे करें जो समझ-बूझकर, ज्ञानपूर्वक यह करेगा, यह उसी क्षणसे धर्मको निराले
ढंगसे और सही तरीकोंसे समझने लगेगा। बालक, बूढ़े और बीमारीसे जो लोग अपंग
हो गये हैं वे अगर मजदूरी न करें, तो उसे कोई अपवाद न समझे। बालक मां में
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र पैट्रिक क्विनको
१५१
समा जाता है। अगर कुदरतके कानूनका भंग न किया जाये, तो बूढ़े अपंग नहीं
बनेंगे और उन्हें बीमारी तो होगी ही क्यों ?
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
खुरदबहनसे कहना उसे पैसेकी जरूरत हो तो निःसंकोच आश्रमसे मांग ले ।
और कहीसे मँगायेगी तो मुझे दुख होगा, ऐसा कहना ।
५५ पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
प्रिय श्री विवन,
२१४. पत्र: पैट्रिक क्विनको
१८ सितम्बर, १९३०
आपने जो सन्देश भेजा था उसके अनुसार हम दोनों कल शाम आपकी प्रतीक्षा
करते रहे।
(१) कृपया कलका 'क्रॉनिकल' भेज दें।
(२) क्या आप उसे नियमित समयपर भिजवानेकी व्यवस्था नहीं कर सकेंगे ?
(३) कृपया आश्रमवाली डाक भी भिजवायें। वह कल आनेवाली थी।
(४) मैं आश्रमसे एक पार्सल पानेकी आशा कर रहा हूँ जिसमें सैंडिलें और
रुई होगी।
(५) किताबों और पत्रिकाओंका अन्य कोई पार्सल हो तो वह भी मुझे...'
'सीजर और क्राइस्ट' नामक पुस्तिका और मद्रासका 'हिन्दू' भी होना चाहिए।
[ अंग्रेजीसे ]
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
महात्मा गांधी : सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,
खण्ड ३, भाग ३, पृष्ठ २८७ ।
१. साधनसूत्रमें कुछ शब्द स्पष्ट नहीं है।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कुरेशी,
२१५. पत्र : गुलाम रसूल कुरेशीको
१८ सितम्बर १९३०
मुझे याद क्यों न करेगी।
मणिलाल इमामसाहब की
साहसका तो कोई पार
तुम्हारा पत्र मिला । तुम बम्बई हो आये, यह अच्छा किया। जब मैं यहाँ था
तो सुलताना मेरे पास आती ही नहीं थी, भला अब यह
फिर भी यदि वह मुझे देखेगी तो भाग ही जायेगी।
सेवामें है, इससे मुझे बहुत शान्ति मिलती है। अमीना
नहीं है, उसने स्वयंसेविकाओंमें अपना नाम लिखवा कर ठीक किया। किन्तु यदि
वह सचमुच जेल चली जाये तो यहां बच्चेकी देखभाल कैसे कर पायेगी ? इसलिए
वह अगर घर रहकर जो कुछ कर सके, सो करे, तो पर्याप्त होगा। मौका आने
पर यह जेल जानेको तैयार तो है ही ।
बापूकी दुआ और आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ६६५२) की फोटो नकलसे ।
२१६. पत्र : कमला नेवटियाको
परवडा मन्दिर
१८ सितम्बर १९३०
चि० कमला (रामेश्वरदास),
आखिरकार तेरा पत्र मिला। मेरे
आलस्य मत करना । तेरा स्वास्थ्य कैसा
पत्रका तकाजा तू ठीक समझ गई। अब
रहता है? मुझे लिखती रहना। मुझे पत्र
लिखनेकी वजहसे भी तू अपने आलस्यको भगा सकेगी। कराचीमें कीकीवहन, गंगा-
बहन' आदिसे मिली थी क्या ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ३०४२) की फोटो- नकलसे ।
१. जे० बी० कृपालानीकी बहन ।
२. ए० टी० गिडवानीकी पत्नी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रिय बहन,
२१७. पत्र : रलियातबहन वृन्दावनलालको
१८ सितम्बर, १९३०
मणि अपने पत्र में लिखती है कि तुम मुझे याद करती हो। क्यों न करोगी?
मैं तो प्रायः तुम्हारे बारेमें सोचता हूँ और तुम्हारे चेहरेको याद करके नरोत्तमदासकी
याद हो आती है; क्योंकि तुम्हारा चेहरा उनसे मिलता-जुलता है। प्रभु तुम्हें और
मांजी को मानसिक शान्ति दे।
श्रीमती गोकी बहन
बबई
गुजराती (एस० एन० ९८१०) की फोटो नकलसे ।
मोहनदासके जय श्रीकृष्ण
२१८. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको
भाई रामेश्वरदास (धुलीया),
१८ सितम्बर, १९३०
तुमारा पत्र मिला । सांपके उसते हुए बच गये तो ईश्वर अवश्य तुमारे पाससे
अधिक सेवा लेगा । उपचार क्या किया था ? सांप जहरी था ? ईश्वर तुमको शांति
देगा। राम नाम हमारे लिये कल्पद्रुम है ऐसा निश्चय जानो ।
जी० एन० १७५ की फोटो नकलसे।
बापुके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० शारदा (बबु),
२१९. पत्र: शारदा सी० शाहको
२० सितम्बर १९३०
तू तो बहुत सयानी हो गई लगती है। अबसे जबतक तेरे पत्र आते रहेंगे
तबतक मेरे पत्र भी तुझे मिलते ही रहेंगे। अब तो तू कोठारिन हो गई है न ?
तुझे अपना शरीर खूब मजबूत बना लेना चाहिए। पूजाभाई बड़े होने के बावजूद मुझे
अपने से बड़ा मानते हैं, यह कैसे होता है? यदि काका की अपेक्षा भतीजा उम्र में बढ़ा
हो तो भी भतीजेको काका ही आशीर्वाद देता है न ? क्या तू अब समझी ?
यदि आनन्दीको मेरे बिना अच्छा न लगता हो तो तुम सब मिलकर उसे
प्रसन्न रखना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९८९०) से सौजन्य: शारदावहन जी० चोखावाला
२२०. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
चि० प्रेमा,
तेरा लम्बा पत्र मिला।
२० सितम्बर १९३०
आना ।
तेरी तबीयत ठीक रहती है, इसलिए मुझे कोई सुझाव देनेकी जरूरत नहीं है।
पश्चिमकी उन दो बहनोंके सम्पर्क में तू आती है या नहीं ? न आती हो तो
अभी तो ईश्वरने तेरा समस्त जीवन मुझे सौंप दिया जान पड़ता है।' अन्त
तक ऐसा ही चलेगा।
सुशीला, जो मुझे अंग्रेजीमें शुभकामनाएँ भेजती है, किस प्रान्तकी है? नाम
तो गुजराती या मराठी- जैसा है। तमिल तो नहीं है। यदि वह तमिल हो तो उसे
माफ किया जा सकता है; नहीं तो शुभेच्छाएँ मातृभाषामें भेजे ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६८३) से । सौजन्य: प्रेमावहन कंटक जी० एन०
१०२३५ की फोटो नकलसे भी ।
१. गांधीजीके जन्म दिवसके उपलक्ष में प्रेमाबद्दन कटने अपना सारा जीवन उन्हें समर्पित कर दिया था।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२१. पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको
यरवडा मन्दिर
२० सितम्बर, १९३०
चि० लक्ष्मीबहन (खरे),
तुम्हारा धरनेके लिए जाना दूसरी बह्नों के लिए ढालरूप सिद्ध होगा। यह सब
नये अनुभव हैं। इनमें किसीको चोट भी लग सकती है; तो भी उससे हम पीछे न
हटें। तुममें अटूट बल है। इसका उपयोग करके तुम शोभा पाओ और आश्रमकी
शोभा भी बढ़ाओ ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २७६ ) से सौजन्य लक्ष्मीबहन खरे
२२२. पत्र : आर० वी० मार्टिनको
परवडा सेंट्रल जेल
२१ सितम्बर, १९३०
प्रिय मेजर मार्टिन,
अब मुझे अपनी दूसरी कठिनाई कह डालनी चाहिए। इस जेलमें तथाकथित
दुर्व्यवहारके आरोपोंके विषय में आपने मुझे जो बताया है, मैं उसके एक भी शब्द
पर अविश्वास नहीं करता। फिर भी, अखबारोंमें जो रिपोर्टें छपी है उन सभीको
मैं अपने दिमाग से निकाल नहीं सकता। लिखनेवालोंने हर चीजके बारेमें जानबूझ
कर झूठ नहीं कहा होगा। मुझे विश्वास है कि कुछ वक्तव्य तो सर्वथा अतिरंजित
हैं। मैं आशा करता हूँ कि अधिकांश बातें झूठ हैं और मैं ऐसा मानना चाहूँगा कि
सभी बातें झूठी हैं। लेकिन मेरा मन उद्विग्न है। कुछ ऐसी बातें हो सकती हैं जो
आप न जानते हों; कुछ ऐसी बातें भी होंगी जिन्हें आप एक दृष्टिकोण से देखते
हैं और सम्बन्धित कैदी दूसरे दृष्टिकोणसे ।
ऐसी स्थिति में मेरा कर्तव्य मुझे स्पष्ट प्रतीत होता है। अगर मुझे उन कैदियोंके
साथ रहनकी अनुमति नहीं दी जाती तो भी मैं यह अनुमति मांगना चाहूँगा कि
मुझ यदाकदा इनसे मिलने दिया जाये। मैं आपको बता चुका हूँ कि मैं कोई विशेष
सुविधाएँ नहीं चाहता। मुझे जो सुविधाएँ प्रदान की गई हैं वे मुझसे छीनी जा सकती
हैं। यदि मुझे सुविधाओंकी खातिर अलग रखा गया है तो उनका मेरे लिए कोई
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
महत्त्व नहीं है, जबकि अलग रखा जाना मेरे लिए बहुत महत्त्व रखता है। जिन
शारीरिक निर्योग्यताओंसे में पीड़ित है उन्हींसे पीड़ित अन्य कैदियोंको जो सुविधाएँ
नहीं दी जा सकतीं उनको मैं भी नहीं चाहता। मैं वर्गीकरण में विश्वास नहीं करता
क्योंकि वह मेरी रायमें अपमानजनक है। यदि मैं उन सुविधाओं का लाभ उठाता
हूँ जो मेरे ही जैसे अन्य कैदियोंको प्राप्त नहीं है, तो ऐसा मैं अपनी शारीरिक
आवश्यकताओं के कारण करता हूँ। किन्तु यदि मुझे अपने स्वास्थ्यको अपने उन
साथियोंकी सेवा करनेके सौभाग्यकी कीमत चुका कर खरीदना पड़े जिनमें से कइयोंको
मैं जानता हूँ और जिनमें से एकको भी मैं अपने से किसी प्रकार कम नहीं मानता,
तो मैं खुशीसे अपने स्वास्थ्यकी बलि चढ़ा दूंगा ।
मैं यह अलगाव तबतक सहन कर सका जबतक में ऐसा समझता रहा कि
सब ठीक-ठाक है। लेकिन इस जानकारीने कि तरुण रतिलाल अब नहीं रहा, और
प्यारेलाल, जो मेरे लिए पुत्रवत है, तकलीफमें है, तथा वृद्ध नरसिंहभाई मौत के
दरवाजे तक पहुँच गये थे, और अलवारोंमें छपनेवाली लगातार शिकायतोंने मुझे
अपने कर्तव्य के प्रति जागरुक कर दिया है, अर्थात् अब मुझे उनके साथ सम्पर्क
स्थापित करनेके लिए अपनी भरसक कोशिश करनी चाहिए।
मैं जानता हूँ कि मैंने जिस अनुमतिकी प्रार्थना की है उसे प्रदान करना आपके
या जेलोंके इन्स्पेक्टर जनरलके हाथमें नहीं है। अतः मैं आपसे प्रार्थना करूँगा कि
आप कृपया इस पत्रको सरकारके सामने पेश करके इसका उत्तर शीघ्र ही प्राप्त
करें। मैं इस बातसे अवगत हूँ कि एक बन्दीके नाते मुझे अपने शरीरकी व्यवस्था
करनेके मामलेमें कोई अधिकार नहीं है। लेकिन में यह भी जानता हूँ कि मेरे शरीर के
रख-रखाव में मेरे सहयोगकी भी आवश्यकता होती है। इस शरीर के अन्दर रहनेवाली
आत्मा जो सेवा करनेको उत्कंठित है, यदि उसके लिए इस शरीरका उपयोग नहीं
किया जा सकता तो मुझे उसके परिरक्षणमें कोई दिलचस्पी नहीं रह सकती। मैं मनुष्य
हूँ। बन्दी होकर भी मैं अपने अन्दरके इन्सानको अलग नहीं कर सकता।
मुझे यह आश्वासन देनेकी जरूरत नहीं है, लेकिन आवश्यक हुआ तो शायद आप
स्वयं यह आश्वासन दे सकेंगे कि अपने साथियोंके बीच मेरी उपस्थितिका उपयोग
अनुशासनका उल्लंघन करनेके लिए नहीं किया जायेगा, बल्कि इसके विपरीत उससे
अनुशासन और बढ़ने की ही सम्भावना है। एक सविनय अवज्ञाकारीकी नैतिक संहिता
उससे इस बातकी अपेक्षा करती है कि जेलके जो नियम आत्म सम्मानके विरुद्ध न
हों, उनको वह खुशीसे माने और उनका पालन करे।
अन्तमें मैं सरकारका ध्यान इस तथ्यकी ओर दिलाना चाहता हूँ कि १९२३ में
इसी जेलमें जब लगभग एक ऐसी ही घटना हुई थी तब मुझे दो कैदियोंसे मिलने
दिया गया था, और जिसका परिणाम यह हुआ कि एक बड़ी गम्भीर दुर्घटना होनेसे
१. एस० एन० १९९८० में प्राप्त मसविदेसे साधन यूपमें यह शब्द मिट गया है।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र अमीना कुरेशीको
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बच गई थी। पुलिसके वर्तमान इन्स्पेक्टर जनरल महोदय उस मामले के तथ्योंसे
अवगत हैं।
हृदयसे आपका
मो० क० गांधी
अंग्रेजी (जी० एन० ३८५२) की फोटो- नकलसे, बॉम्बे सीक्रेट ऐक्सट्रैक्ट्स ७५०
(५) / ए०, पृष्ठ २०७ से भी ।
२२३. पत्र : लीलावती आसरको
२१ सितम्बर, १९३०
चि० लीलावती,
तेरा पत्र मिला । यदि तू अधीर न हो तो अपने आदर्शो पर आचरण करनेकी
शक्ति आ ही जायेगी। जैसे एकबारगी बहुत खानेसे अजीर्ण हो जाता है उसी प्रकार
अपनी सामर्थ्यका अनुमान किये बिना किसी बात पर अमल करनेसे हम असफल
हो जाते हैं जिससे बादमें निराशा उत्पन्न होती है। यदि हम अपनी सामर्थ्यका अनु-
मान न कर सकें तो जिस पर हमारी आस्था हो, वह हमारी सामर्थ्यको ध्यानमें
रखकर जैसा करने को कहे, हम वैसा करें। गंगाबहन से दिल खोलकर अपनी बात
करना। वे जैसा कहें वैसा करेगी तो वही काफी होगा।
गुजराती (जी० एन० ९५६६) की फोटो नकलसे।
चि० अमीना,
२२४. पत्र : अमीना कुरेशीको
बापूके आशीर्वाद
२१ सितम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला मियाँ अब्दुल मजीदको मेरी तरफसे बहुत-बहुत प्यार । सुलताना
तो मुझे भला अपनेको छूने ही क्यों देगी ? तेरी तबीयत अब कैसी रहती है? खाने-
पीनेमें सावधानी बरतना ।
तेरी उर्दूकी पढ़ाई-लिखाई चल रही है न ?
बापूकी दुआ और आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ६६५८) की फोटो नकलसे ।
१. देखिए खण्ड २३, पृ४ १७०।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० वसुमती,
२२५. पत्र : वसुमती पण्डितको
परवडा मन्दिर
२१ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला। भगवानने हमें पंख तो दिये हैं किन्तु हम उन्हें काममें नहीं
लाते। यदि हम शरीरको भूल जायें तो भी पंख हैं ही न? जहाँ हमारा मन होता
है वहीं हम होते हैं। क्या कभी-कभी हमें ऐसा नहीं लगता कि हमारा शरीर एक
स्थान पर है और मन दूसरे स्थान पर ? सुर्वेका मन किस जगह होता है ? यह
कहना तो सहज है किन्तु उसपर आचरण करना कठिन है। किन्तु तूने पंखोंकी बात
लिखी थी इसलिए मैने यह ज्ञान उँडेला है। इसमें से जिस पर अमल कर सके उस
पर करना ।
गुजराती (एस० एन० ९२८८ ) की फोटो नकलसे।
२२६. पत्र : प्रभावतीको
बापूके आशीर्वाद
चि० प्रभावती,
परवडा मन्दिर
२१ सितम्बर, १९३०
तुझे मेरे पत्र नहीं मिलते, यह आश्चर्यजनक है। मैं नारणदासको लिखता हूँ।
मैंने तो एक भी सप्ताह खाली नहीं जाने दिया। मेरी तबीयत अच्छी है। मेरा वजन
१०३ है । मुनक्केके बदले घिया आदि हरी सब्जियां लेता हूँ। दूध-दही तो है ही ।
काकासाहब भी अच्छे हैं। इनका वजन प्रति सप्ताह लगभग एक सेर बढ़ जाता है।
कोई चिन्ता न करना । मृत्युंजय कैसा है ?
[ पुनश्च : ]
तू वहाँ घूमने जाती है ?
गुजराती (जी० एन० ३३७१ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कुसुम (देसाई),
२२७. पत्र : कुसुम देसाईको
२१ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला है। तू स्वयं बीमार पड़ी है, ऐसा सुनता हूँ। ऐसा क्यों ?
यदि वहाँ मच्छर हों तो तुझे निःसंकोच होकर मच्छरदानीका उपयोग करना चाहिए।
उसका प्रबन्ध न हो सके तो मिट्टीका तेल चुपड़ना। मैं इस तरह प्यारेलालको
अपने साथ रखने की मांग नहीं कर सकता। काका की मांग भी मैंने नहीं की थी।
अधिकारियोंने ही उन्हें भेज दिया था, लेकिन प्यारेलालसे मिलनेकी तजवीज कर
रहा हूँ। उसे दस्त लग रहे हैं, यह सुनते ही मैंने मिलने की मांग की है। अब उसे
आराम है। तुझे ध्यान रखना चाहिए कि यहां कौन-कौन कैदी हैं, इसका मुझे पता
नहीं चलता। तू यह समझ ले कि मैं पिंजड़े में हूँ । तुझे जब मालूम हुआ था, उसी
समय मुझको लिखना चाहिए था।
गुजराती (जी० एन० १८०४ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
चि० भगवानजी,
२२८. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
२१ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र पढ़ा। मणिबनके प्रति तुम्हारे मनमें जो रोष है उसे निकाल
दो। वह तुम्हारी पत्नी है, यह बात भूल जाओ। असंख्य बहनों में वह भी एक बहन
है, ऐसा समझो। उसके पास जो बच्चे हैं उन्हें भी बिसार दो। वे तुम्हारे नहीं
हैं, ऐसा समझो। तुम विकारवश हो सकते हो इसलिए वहनके रूपमें भी उससे तुम्हें
सेवाका अधिकार नहीं है; ऐसा जानो। और जिसे भुला दिया उसका स्मरण भी
नहीं करना चाहिए। इसलिए तुम किसी प्रकारकी चिन्ता करना भी छोड़ देना और
मनके बोझको उतार डालना। यह पत्र गंगाबहनको पढ़ाना जिससे वह इसपर अमल
करनेमें तुम्हारी मदद करेगी। गुड़का त्याग कर दो पर दूध पिया करो; यह मेरी
तुमको सलाह है। भले आधा सेर ही लिया जा सके।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२४) से सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मनु,
२२९. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
२१ सितम्बर, १९३०
तेरा मन शान्त हो गया यह जानकर हम दोनोंने चैनकी सांस ली। जो विद्यार्थी
सयाने हो चुके हैं वे जो कुछ समझ-बूझकर ग्रहण करेंगे वही फलप्रद होगा । तुझे
१००० तार सूत कातनेमें कितना समय लगा, वह कितने नम्बरका था और उसकी
मजबूती तथा समानता कितने प्रतिशत थी, लिखना ।
गुजराती (जी० एन० ७७६४) की फोटो नकलसे।
चि० जानकीबहन,
२३०. पत्र : जानकीदेवी बजाजको
बापूके आशीर्वाद
२१ सितम्बर, १९३०
तुम बहुत चंट मालूम होती हो। जैसे-तैसे पत्र लिखनेसे भी बच निकलना
चाहती हो? और यदि भाषण करते-करते हाकिम 'डिक्टेटर' बन जाओगी तो फिर
मुझ जैसेके तो बारह ही बज जायेंगे न ? मालूम होता है जमनालालने नासिकमें
अपना धन्धा ठीक जमा लिया है। यह तो मैं जानता ही था। उनके पंजेसे कोई
छूट ही नहीं सकता। मदू पहले तो पत्र लिखती थी, अब तुम्हारी तरह ही आलसी
हो गई है। ऐसी ही आलसी बनी रही तो तुम्हारे पाससे उसे हटा लेनेका हुक्म
जारी करना पड़ेगा। अब शरीर कैसा है ? ओम उपद्रव करती है या नहीं ?
बापूके आशीर्वाद
[ गुजरातीसे ]
पांचवे पुत्रको बापूके आशीर्वाद
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० सत्यदेवी,
२३१. पत्र : सत्यादेवी गिरिको
यरबडा मन्दिर
२१ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला । तुझे अपनी गुजराती किसीसे सुधरवा लेनी चाहिए। चित्र
[ बनाने ] का मुहावरा' [ जारी ] रखा है ? समय-समयपर उसमें सुधार नहीं दीखता ।
क्या धर्मकुमार ऊधम मचाता है ?"
बापूकी विराट् वत्सलता
प्रिय कुमारप्पा,
२३२. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको
बापूके आशीर्वाद
२२ सितम्बर, १९३०
मैं तुम्हारे हिसाबमें एक गलती दिखाना चाहता हूँ। अगर तुम जितना मैं कर
रहा हूँ उसी प्रमाणमें मेरा 'प्रति अभिनन्दन करना चाहते हो तब तो तुम्हें पता
चलाना चाहिए कि मैं प्रति सप्ताह कितने प्रेम-पत्र भेजता हूँ । अतः यदि प्रेमको
गणितकी पद्धतिसे नापना सम्भव हो, तब तो तुम्हारे पत्र उतने गुने ज्यादा लम्बे होने
चाहिए जितने कि मेरे सब पत्रोंका कुल जोड़ है। लेकिन ईश्वरका धन्यवाद है ! प्रेम
गणित और ज्यामिति दोनोंकी उपेक्षा करता है और उन्हें मिथ्या सिद्ध करता है।
हाँ, कमलाबहन वास्तवमें बहुत ठीक-ठाक हैं।
सप्रेम,
अंग्रेजी (जी० एन० १००९१ ) की फोटो नकलसे ।
बापू
१. अर्थात् अभ्यास ।
२. सत्यादेवी गिरिके छोटे भाई ।
३. मूल पत्र गुजरातीमें था।
४४-११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मीरा,
१
२३३. पत्र : मीराबहनको
यरवडा मन्दिर
२२ सितम्बर, १९३०
मुझे कलकत्तेसे लिखा तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हें विविध प्रकारके अनुभव हो
रहे हैं। सत्यान्वेषी लोग इन सभीका लाभ उठाते हैं। मैं आशा करता हूँ कि जो
थोड़ी-सी बीमारी तुम्हें हुई थी वह अल्पकालिक थी और तुम शीघ्र ही पुनः स्वस्थ
हो गई थीं। मुझे आशा है कि जो विश्राम तुम चाहती थीं वह तुम्हें मिला होगा।
मैं सफरी चरखेमें रोजाना कुछ मामूली सुधार करता जा रहा हूँ और अब वह मुझे
दिनोंदिन कम तकलीफ दे रहा है। जब किसीके पास एक पूर्ण यन्त्रकी जगह हाथोंके
कौशलकी मदद करनेवाला एक साधनमात्र हो, उस समय कितनी सारी बारीकियोंका
ध्यान रखना पड़ता है, यह बात आश्चर्यजनक है। लेकिन चरखेके प्रयोगमें जितनी
निपुणता हासिल होगी, कताईमें उतना ही आनन्द और कम थकान होगी। काका
अभी भी तुम्हारे चरखेको चलाने की कोशिश कर रहे हैं। पहले उन्होंने बहुत उपेक्षा
बरती थी और अब उसकी कसर उन्हें पूरी करनी है। जैसाकि उनका कहना है,
ठीक कातनेवाले तो वह यहीं बने हैं। इससे पहले वह कताई तो करते थे, लेकिन
कतैया नहीं थे। मेरा अभिप्राय क्या है सो तुम समझती हो। मेज बनानेके लिए
किसी व्यक्तिको आलमारी बनानेका ज्ञान होना जरूरी नहीं है। सब्जियाँ लेना जारी
है। न कोई नुकसान हुआ है और न ही कोई प्रत्यक्ष फायदा हुआ है। मैं इस प्रयोगकी
पूरी आजमाइश करना चाहता हूँ। डा० मेहताने कहला भेजा था कि शकरकन्दसे शायद
कब्जियत हो। इसलिए आज मैंने उन्हें नहीं लिया है। भोजनके साथ टमाटर और
एक हरी सब्जी रोजाना लेता हूँ।
तुम जहाँ कहीं भी हो, मित्रोंको मेरा प्यार कहना ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५४१२ ) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६४६ से भी ।
१. हावड़ा पहुँचनेपर मीराबहनको महिलाओंके उस जुलूस में शामिल होनेसे मना कर दिया गया था
जो उन्हें लेकर शहरमें घूमनेवाला था। इस निषेधाज्ञाके बावजूद यह जुलूसमें शामिल हुई और पुलिसने
उनपर लाठीचार्ज किया। मीराबदनको पुलिस थाने ले जाया गया और बादमें उन्हें छोड़ दिया गया।
औरतोंके साथ कठोर व्यवहार किये जानेके विरोध में विश्वविद्यालयके कुछ छात्रने पुलिसके विरुद्ध नारे लगाये,
इसपर उन्हें बुरी तरह पीटा गया। अगले दिन शहरमें हड़ताल हो गई। मीराबद्दनने अपनी आत्मकथा
द स्पिरिट्स पिलग्रिमेज, पृ४ ११५-७ में इन घटनाओंका काफी विस्तारसे उल्लेख किया है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगाबहन ( बड़ी),
२३४. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
२२ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र न मिले तो मुझे लगता है कि कुछ-न-कुछ हुआ है । उदासी
क्यों लगती है? लगे तो उसे फौरन मेरी तरफ भेज ही देना चाहिए। तुम उम्र में
चाहे जितनी बड़ी हो, तो भी मैं जबसे तुमसे मिला हूँ तबसे तुम्हें अपनी प्यारी
बेटीकी तरह मानता आया हूँ। जिस तरह मुझमें बाप बननेकी शक्ति है, उस तरह माँ
बनने की भी है। इसलिए तुम मुझे तुरन्त अपनी उदासी में भागीदार बनाकर निश्चिन्त
हो जाया करो।
काकासे मिलने की इच्छा हो, तो कभी डुबकी लगा जाओ ।
बहन में एक दोष तो है ही कि वह भगवानजीकी परीक्षा करने गई ।
ऐसा होते हुए भी जबतक वह आश्रममें रहनेकी और सुधरनेकी इच्छुक है, तबतक
उसे बना रहने दें। हमारे प्रयोग भयंकर तो है ही । ईश्वरपर श्रद्धा रखें तो इन
सबसे पार हो जायेंगे ।
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७५८ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
२३५. पत्र : कमलनयन बजाजको
यरवडा मन्दिर
२२ सितम्बर, १९३०
चि० कमलनयन,
तेरा पत्र मिला । तुझे साफ-साफ अक्षर लिखने चाहिए। अक्षर गढ़े हुए तो हैं,
किन्तु स्पष्ट नहीं हैं। अभीसे न सुधारे, तो बादमें नहीं सुधरेंगे। तू खुशीसे अजमेर
जा वहाँसे भी पत्र लिखते रहना । स्वास्थ्यको न बिगड़ने देना ।
[ गुजरातीसे]
पाँचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद
१. नाम यहाँ नहीं दिया गया है।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० पण्डितजी,
२३६. पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको
२२ सितम्बर, १९३०
कुछ प्रयत्न करके ही मैं तुम्हारे नामके आगे 'चि०' लगा पाता हूँ। मेरे
हृदयमें प्रेम तो वही है [ जो 'चिरंजीव ' से ध्वनित होता है] किन्तु शायद व्यवहारमें
उसे व्यक्त नहीं कर पाया हूँ। पिजाई तुरन्त सीख लेना और यदि हो सके तो
कताईके लिए कोई एक ही समय निश्चित कर लेना। खादीके प्रति प्रेमकी जो
कमी तुम्हें अपने आसपास नजर आती है वह हमारी ही कमजोरीका प्रतिविम्व है।
खादी आन्दोलनका मध्य- बिन्दु, केन्द्र, हम स्वयं है। जिस प्रकार सूर्यके कम तपनेसे
वातावरण में गर्मी कम हो जाती है उसी प्रकार यदि हम कम तपें' अर्थात् हम स्वयं
खादी के प्रति ढिलाई बरतें तो क्या बाहर ढिलाई नजर नहीं आयेगी ? किन्तु प्रेम
बाहरसे नहीं आता, वह तो अन्तरमें स्फुरित होना चाहिए। यदि हम उस प्रेमको
स्फुरित करनेके लिए परिश्रम करेंगे तो निश्चय ही उसका अच्छा परिणाम निकलेगा ।
रामभाऊ अल्मोड़ा गया, यह बहुत ही अच्छा हुआ।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २१३) की फोटो नकलसे सौजन्य
चि० अब्बास,
1
२३७. पत्र : अब्बासको
बापूके आशीर्वाद
लक्ष्मीबाई खरे
यरबडा मन्दिर
२२ सितम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला। मालके विषयमें तूने जो कुछ कहा है यह सब स्पष्ट तो है
किन्तु लगता है कि दुबारा पढ़ने पर ही उसे मैं पूरी तरह समझ पाऊँगा। मैंने यह
पत्र संभालकर रख लिया है। अपने जेलके अनुभव लिखना तूने क्या पढ़ा और
कितनी कताई पिजाई की; जेलके नियमोंका पालन किस तरह किया ? तेरा स्वास्थ्य
कैसा रहा? मथुरादासभाई ने पिजाईकी जो पद्धति चलाई है उसके बारेमें भी यदि
कुछ लिखना चाहे तो लिखना ।
गुजराती (जी० एन० ६३०३) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
१. ना० मो० खरेका पुत्र रामचन्द्र ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगाबहन (बड़ी),
२३८. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
यरबडा मन्दिर
मौनवार, २२ [सितम्बर, ] १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । जमाई [ भव बाधासे] छूट गया। हमने तो मौतको मित्र
मानना सीखा है। यदि संसारमें मौत न होती तो हम क्या करते ?
तुम जितने बच्चोंको आश्रममें लाना चाहो, ला सकती हो।
काकू
के बारेमें समझ गया। सबको अवसर मिल ही जायेगा।
[ गुजरातीसे]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेन ने सी० डब्ल्यू० ८७५० से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
२३९. पत्र : नारणदास गांधीको
२१ / २३ सितम्बर, १९३०
चि० नारणदास,
कमला गांधी आजकल कहाँ है ? बहुत दिनोंसे उसका पत्र नहीं आया, इसलिए
चिन्ता हो रही है। हरिदास कहाँ है? वह क्या कर रहा है? दो सप्ताहसे प्रभावती
के पत्रोंमें यह शिकायत आ रही है कि उसे मेरे पत्र नहीं मिले। यहाँसे तो मैंने
नियमित रूपसे लिखा है। उसने तुम्हें अपना ठीक पता दिया है न ? वह सीतल-
दिपारा है। हरिदासभाईको लिखा पत्र पढ़ लेनेसे उनके बारेमें जान जाओगे। वे
रखने लायक हैं। उनके कुटुम्बके लिए ६० से ६५ रुपये तक दे देना और उनके अपने
खर्चके लिए ४० रुपये तक कुल मिलाकर हर मास १०० रुपये होंगे। शिक्षणके बारेमें
मैंने जैसा लिखा, उसी तरह होना इष्ट है। मुझे लगता है कि जब आश्रम में रहेंगे,
तब उनका अपना खर्च कम ही होगा। अध्ययनके लिए बाहर जायें तो वहीं सर्व ४०
१. साधन-सूत्र में तारीख २२ सोमवार, १९३० दी गई है। १९३० में वाईस तारीखको
सोमवार सितम्बर और दिसम्बर में पड़ता है। अन्य पत्रोंको देखनेसे लगता है कि यह पत्र सितम्बर में ही
लिखा गया होगा; देखिए “पत्र : गंगाबद्दन वैद्यको", २२-९-१९३० और २७-९-१९३० तथा खण्ड ४५,
२२-१२-१९३०॥
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६६
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
तक हो जायेगा, ऐसा मैं समझता हूँ। ज्यादा स्पष्ट रूपसे बात करनेकी जरूरत हो
तो कर लेना। यह ठीक है न ? बालजीभाई तो यह सब जानते ही होंगे।
यदि गिरिराजका मन वहाँ शान्त न रहता हो तो मुझे लगता है उसके वर्धा
चले जाने में ही भलाई है। फिर भी जैसा तुम्हें ठीक लगे वही करना ।
नानीबहन (बुधाभाईवाली) को लिखा पत्र पढ़ लेना । बुधाभाईको लिखा पत्र भी
पढ़ लेना और यदि नानीबहन सहमत हो तो बुधाभाईकी इच्छानुसार व्यवस्था कर
देना । नानीबहन दुखी हो तो हस्तक्षेप न करना । मणिवहनको लिखा पत्र पढ़ लेना
और उसे भी पढ़वा देना। गंगाबहन भी पढ़ ले। जैनुको लिखा पत्र भी पढ़ लेना ।
इतना समझाने पर भी वह न समझे तो मेहमान मानकर उसकी गैरहाजिरी सहन
कर लेना । भगवानजीको लिखा पत्र भी पड़ना। मुझे लगता है कि उन्हें वही दवा
लेनी चाहिए जिसका मैंने सुझाव दिया है। बालकृष्णको विनोबाके पास भेजकर
बिलकुल ठीक किया है। दूसरोंको भेजने के लिए भी लिखा, यह ठीक किया।
प्रार्थनाका काम बालक-बालिकाओंने सँभाल लिया है, इससे तो मैं बहुत ही
खुश हुआ हूँ और फिर बत्तीकी जरूरत नहीं पड़ती। फिलहाल तो ['गीता' के ]
श्लोक कण्ठस्थ करनेका काम बन्द हो गया है। समय ही नहीं निकाल पाता । जेलमें
पड़े कैदीको ऐसा क्या काम हो सकता है, किन्तु है ऐसा ही। हर पलका हिसाब
है। कुछ क्षण बचाकर थोड़ा-बहुत पढ़ लेता हूँ। मिश्रित धरनेके बारेमें तुम्हारी राय
ठीक है। जोशीका पत्र पढ़ लेना । रुई मिली, चमड़ा मिला, काकासाहब की चप्पल
मिल गई। अपनीवाली की मरम्मत करा ली है, इसलिए मेरी गाड़ी तो अब दो-तीन
महीने तक चलनी ही चाहिए। तुम्हारा वर्षगाँठका नमस्कार पहुँच गया। ईश्वर
तुम्हारे आत्मबलमें वृद्धि करे और तुम दीर्घायु हो ।
मंगल प्रभात, २३ सितम्बर, १९३०
सर्वधर्म समभावः हमारे व्रतोंमें सहिष्णुताके नामसे परिचित व्रतको यह नया नाम
दिया गया है। सहिष्णुता अंग्रेजी शब्द 'टॉलरेशन' का अनुवाद है। मुझे यह पसन्द
नहीं था, पर उस समय दूसरा शब्द सूझता नहीं था। काकासाहब को भी यह नहीं
रुचा था। उन्होंने 'सर्वधर्म-आदर' शब्द सुझाया। मुझे वह भी नहीं जँचा। दूसरे
धर्मोको सहनेकी भावनामें उनमें न्यूनताका विचार आ जाता है। आदरमें कृपाकी
भावना झलकती है। अहिंसा हमें दूसरे धर्मो के प्रति समभाव सिखाती है। आदर और
सहिष्णुता अहिंसाकी दृष्टिसे पर्याप्त नहीं हैं। दूसरे धर्मोके प्रति समभाव रखनेके मूलमें
अपने धर्मकी अपूर्णताका स्वीकार भी आ ही जाता है। सत्यकी आराधना, अहिंसाकी
कसौटी यही सिखाती है। सम्पूर्ण सत्यको यदि हम देख पाये होते तो फिर सत्यके
आग्रहकी क्या बात थी? तब तो हम परमेश्वर हो गये होते; क्योंकि हमारी भावना
है कि सत्य ही परमेश्वर है। हम पूर्ण सत्यको पहचानते नहीं हैं, इसलिए उसका
आग्रह करते हैं। इसीसे पुरुषार्थकी गुंजाइश है। इसमें अपनी अपूर्णताकी स्वीकृति आ
गई। यदि हम अपूर्ण हैं तो हमारे द्वारा कल्पित धर्म भी अपूर्ण है; स्वतन्त्र धर्म तो
सम्पूर्ण है। हमने उसे देखा नहीं है, वैसे ही जैसे ईश्वरको नहीं देखा है। हमारा
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
१६७
माना हुआ धर्म अपूर्ण है और उसमें सदा परिवर्तन होते रहते हैं, होते रहेंगे। यह
होनेसे ही हम उत्तरोत्तर ऊपर उठ सकते हैं, सत्यकी ओर, ईश्वरकी ओर दिन-प्रति
दिन आगे बढ़ सकते हैं। जब हम मनुष्य-कल्पित सब धर्मोको अपूर्ण मान लेते हैं तो
फिर किसीको ऊँचा या नीचा माननेकी बात नहीं रह जाती। सभी सच्चे हैं, पर
सभी अपूर्ण हैं, इसलिए दोषपात्र हैं। समभाव होनेपर भी हम उनमें दोष देख सकते
हैं। हमें अपने में भी दोष देखना चाहिए। उस दोषके कारण उसका त्याग न करें;
बल्कि दोषको दूर करें। इस प्रकार समभाव रखनेसे दूसरे धर्मोक ग्राह्य अंशको अपने
धर्ममें लेते संकोच न होगा। इतना ही नहीं, बल्कि वैसा करना धर्म हो जायेगा ।
तब प्रश्न यह होता है कि बहुतसे धर्मोकी आवश्यकता क्या है ? हम जानते
हैं कि धर्म अनेक हैं। आत्मा एक है, पर मनुष्य देह अगणित हैं। देहकी असंख्यता
टाले नहीं टल सकती, तथापि आत्माकी एकताको हम पहचान सकते हैं। धर्मका
मूल एक है, जैसे वृक्षका पर उसके पत्ते असंख्य हैं।
सब धर्म ईश्वरदत्त हैं, पर वे मनुष्य-कल्पित होनेके कारण, मनुष्य द्वारा प्रचारित
होनेके कारण अपूर्ण हैं। ईश्वरदत्त धर्म अगम्य है। उसे भाषामें मनुष्य प्रकट करता
है, उसका अर्थ भी मनुष्य लगाता है। किसका अर्थ सच्चा माना जाये ? सब अपनी-
अपनी दृष्टिसे, जबतक वह दृष्टि बनी है तबतक सच्चे हैं। पर झूठा होना भी
असम्भव नहीं है। इसीलिए हमें सब धर्म के प्रति समभाव रखना चाहिए। इससे
अपने धर्मके प्रति उदासीनता नहीं आती, बल्कि स्वधर्म-विषयक प्रेम अन्धा न रहकर
ज्ञानमय हो जाता है, अधिक सात्विक, निर्मल बनता है। सब धर्मोके प्रति समभाव
आने पर ही हमारे दिव्यचक्षु खुल सकते हैं। धर्मान्धता और दिव्यदर्शनमें उत्तर-दक्षिण
जितना अन्तर है। धर्मज्ञान होने पर अन्तराय मिट जाते हैं और समभाव उत्पन्न
हो जाता है। इस समभाव के विकाससे हम अपने धर्मको अधिक पहचान सकते हैं।
यहाँ धर्म-अधर्मका भेद नहीं मिटता । यहाँ तो उन धर्मोकी बात है जिन्हें हम
निर्धारित धर्म के रूपमें जानते हैं। इन सभी धर्मोके मूल सिद्धान्त एक ही हैं। सभीमें
सन्त स्त्री-पुरुष हो गये हैं, आज भी मौजूद हैं। इसलिए धर्मोके प्रति समभाव में,
और धर्मियों मनुष्यों - के प्रति जिस समभावकी बात है उसमें कुछ अन्तर है।
मनुष्य मात्र के प्रति, दुष्ट और श्रेष्ठके प्रति, धर्मी और अधर्मीके प्रति समभावकी अपेक्षा
है, पर अधर्मके प्रति वह कदापि नहीं है।
--
इस विचार पर शायद और लिखना चाहिए। सहज ही समझ न आया हो
तो मुझसे पूछना ।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
यदि लेख ठीक समझमें न आया हो तो उसका अनुवाद करना ठीक नहीं ।
यहीसे करनेका प्रयत्न तो मैं करूँगा ही ।
आज ८६ पत्र है।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाईश्री वालजी,
२४०. पत्र : वा० गो० देसाईको
२३ सितम्बर, १९३०
तुम तो यह जानते ही होगे कि पहले मैं अपनी तिथि ही लिखा करता था,
किन्तु बादमें मैंने देखा कि यह तो दुराग्रह है। हिन्दुस्तानके बाहर तो [ अंग्रेजी ] तारीखका
ही प्रयोग किया जाता है, इस बातको जान लेने पर ही समस्या हल हो सकेगी।
मुझे ऐसा लगता है कि स्वराज्य मिल जाने पर भी हमें तारीखका प्रयोग करना
पड़ेगा। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई पंचांग नहीं है जिसे पूरा हिन्दुस्तान स्वीकार
करता हो । प्रत्येक प्रान्तमें लगभग अलग-अलग सम्वत्का प्रयोग किया जाता है ।
विदेशी मात्र से हमें कोई द्वेष थोड़े ही है। इसके सिवा और भी दलीलें हैं। फिलहाल
तो इतनी बातों पर विचार करके मुझे लिखना कि क्या करना उचित है। आजकल
तुम क्या कर रहे हो ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४०७ ) की फोटो नकलसे सौजन्य वा० गो० देसाई
२४१. पत्र : मोतीबहन चोकसीको
यरबडा मन्दिर
मंगलवार, २३ सितम्बर, १९३०
चि० मोतीबहन,
तुम्हारे विस्तृत पत्रका संक्षेपमें उत्तर दे रहा हूँ। बीती बातोंका विचार करनेके
बजाय हमें उन बातोंका विचार करना चाहिए जो हमारे सामने हैं। आश्रम में जितने
लोग रहते हैं उन सबको मेघजी समझकर उनपर प्रेमके मोती बरसाना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ३७४१ ) की फोटो नकलसे ।
२. मूल पत्रपर किसी अन्य व्यक्तिके हाथसे " २५-९-१९३० के आसपास लिखा हुआ है। इससे
पहले मंगलवार इसी तारीखको पड़ा था।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४२. पत्र : पी० जी० मैथ्यूको
२६ सितम्बर, १९३०
प्रिय मैथ्यू,
जिन चीजोंके बारेमें तुमने लिखा है उनका निर्णय अन्ततः श्रद्धासे होता है।
बुद्धि हमें कुछ दूर तक ही ले जा सकती है। मनुष्य तो एक व्यक्ति होता है,
ईश्वर उस अर्थ में व्यक्ति नहीं है। मनुष्यको सही और गलतका ज्ञान है इसीलिए
वह पाप करता है। हम अपने तुच्छ पैमानोंसे ईश्वरको नापने की कोशिश करते हैं,
यही हमारी कठिनाइयोंका कारण है। वह तो सभी पैमानोंसे परे है।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (जी० एन० १५५३) की फोटो - नकलसे ।
चि० कुसुम ( देसाई),
२४३. पत्र : कुसुम देसाईको
२६ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला । प्यारेलाल के बारेमें मैंने पिछले पत्र में लिखा है। अभी उससे
भेंट तो नहीं हुई, लेकिन अब उसके बारेमें समाचार मिल सकते है । भेंट तो अवश्य
होगी। साथ रहने की बात देवके अधीन है। जब मैं जेलसे बाहर निकलूंगा तब तो
वह मुझे मिलेगा ही और मेरे साथ रहेगा भी। परन्तु भविष्यकी कौन जानता है ?
काकासाहब नवम्बर के अन्त में छूटेंगे। इतने में तो प्यारेलालकी अवधि भी खत्म होनेको
आ जायेगी न? प्यारेलालने अन्ततः 'गीता' और 'रामायण' का आश्रय लिया और
मैं उसकी ओरसे चिन्तासे मुक्त हो गया। अभी तक उसे उनसे सन्तोष क्यों नहीं
मिलता था, यह बात मेरी समझ में नहीं आती।
तू स्वयं स्वीकार करती है कि मुझे लिखकर ही तू सुरक्षित रह सकती है।
तो मुझे पूरा ब्यौरा लिखा कर ।
मैंने पुरानी चप्पलें नहीं मांगीं। नई चप्पलोंके बारेमें तू भूल गई जान पड़ती
है। परन्तु अभी तो काम चलता है।
गुजराती (जी० एन० १८०५ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० पन्नालाल,
२४४. पत्र : पन्नालालको
परवडा मन्दिर
२७ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। तुम यह जानते हो न कि वर्षामें कुछ लोग तकलीपर
एक घंटेमें दो सौ तार निकाल सकते हैं। मैं तो यह पढ़कर हक्का-बक्का रह गया
था। इतनी गति किस प्रकार आ सकती है, यह वर्षा पत्र लिखकर जान लेना ।
वैसे छोटेलालने मुझे इसका पूरा विवरण लिख तो भेजा था।
निराशाको अपने पास मत फटकने देना । निराशामें नास्तिकता निहित है।
आस्तिकताका तात्पर्य है आशीर्वाद तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा रहता है?
गुजराती (जी० एन० ३१०५ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
२४५. पत्र : युक्तिको
यरवडा मन्दिर
२७ सितम्बर, १९३०
चि० युक्ति,
तू पेंसिल से क्यों लिखती है? जहाँतक हो सके बच्चोंको पेंसिलसे लिखना ही
नहीं चाहिए। अब मुझे लिखती रहना ।
गुजराती (एम० एम० यू० / ३) की माइक्रोफिल्मसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४६. पत्र: विनोद बालाको
२७ सितम्बर १९३०
चि० विनोद बाला,
तू यह क्यों मानती है कि तू मुझे पत्र नहीं लिखती, इसलिए मैं तुझे याद
नहीं करता होऊंगा और तुझे ऐसा भी नहीं मानना चाहिए कि जिन्हें मैं नहीं लिखता
उन्हें याद नहीं करता। ऐसे बहुत से लोगोंकी मुझे रोज याद आती है जिन्हें मैं
नहीं लिखता । तेरा पत्र बहुत सुन्दर है। लिखावटके बारेमें रामदास स्वामीकी एक
कविताका अनुवाद मैंने आश्रमको भेजा था । यदि तूने यह न देखा हो तो मँगवाकर
देख लेना। अब मुझे नियमित रूपसे लिखती रहना और बहुत अच्छी बिटिया बनना ।
बापूके आशीर्वाद
[ पुनश्च : ]
माँसे मेरे आशीर्वाद कहना। क्या अब उसका मन शान्त है ?
गुजराती (एम० एम० यू० । ३) की माइक्रोफिल्मसे ।
२४७. पत्र : मणिबहन पटेलको
परवडा मन्दिर
२७ सितम्बर, १९३०
चि० मणि (पटेल),
तूने मुझे हर हफ्ते पत्र लिखनेको तो कहा है परन्तु वह मिलेगा क्या? तू
लिख सकेगी या नहीं, इस बारेमें भी शंका है। देखना शरीरको सँभालना । प्रत्येक
क्षणका सदुपयोग करना और हिसाब रखना ।
[ गुजरातीसे ]
बापुना पत्रो-४ मणिबहेन पटेलने
:
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४८. पत्र : लीलावती आसरको
चि० लीलावती (आसर),
यरवडा मन्दिर
२७ सितम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला। मुझे तो यही उचित जान पड़ता है कि जबतक तेरा शरीर
स्वस्थ न हो जाये तबतक तुझे आश्रम में रहते हुए सेवा कार्य करना चाहिए। यदि
खुदेवन तुझे बुलायेंगी तो नारणदासभाई तुझे रोकेंगे नहीं। स्वयंसेविका को तो
जहाँ जो काम मिले उसीमें आनन्द आना चाहिए। तू अपनी इच्छासे या आलस्यके
कारण थोड़े ही आश्रममें पड़ी हुई है? और आश्रम यदि सेवा-स्थल नहीं तो फिर
क्या है ?
गुजराती (जी० एन० ९५६७ ) की फोटो नकलसे।
२४९. पत्र: मणिबहन परीखको
बापूके आशीर्वाद
चि० मणिवहन,
२७ सितम्बर, १९३०
ऐसा लगता है कि नरहरि और रमणीकलालको जेल ठीक फली है। मोहनको
बुखार कैसे आ गया ? तू उसके खाने-पीने पर निगाह रखती है क्या ?
गुजराती (जी० एन० ५९६१ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० पण्डितजी,
२५०. पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको
२७ सितम्बर १९३०
कदम-कदम चढ़ना ही मेरे लिए उचित होगा, अन्यथा गिर पड़ेगा। तिसपर यदि
मैं तुम्हें 'नारायण' लिखने और पुकारने लगूं और मोक्ष मिल जाये तो कैसा हो ?
तुम्हें भाषण देने पड़ते हैं, किन्तु यह भी एक अच्छा अनुभव है। सभी कार्य-
कर्ताओंको तरह-तरहके अनुभव हो रहे हैं और वे उनसे लाभान्वित हो रहे हैं। यदि
तुम्हें रामभाऊके बारेमें कोई समाचार मिले, तो मुझे लिखना। उन तीनोंके आश्रमसे
जानेके बाद मुझे कोई समाचार नहीं मिला है ।
गुजराती (सी० डबल्यू० २११ ) की फोटो नकलसे सौजन्य लक्ष्मीबाई खरे
२५१. पत्र : वसुमती पण्डितको
परवडा मन्दिर
२७ सितम्बर, १९३०
चि० वसुमती,
तेरा पत्र मिला। हम अकेले पड़ जायें, कोई हमें न पुकारे, कोई हमारी न
सुने और भले होनेके बावजूद लोग हमें गालियाँ दें, और इतने पर भी यदि हम
मुस्कराते रहें और प्रसन्न रहें तो इसीको सच्चा आनन्द कहा जा सकता है। संसार
भले ही हमारी निन्दा या स्तुति करे, किन्तु इन बातोंका स्पर्श तक हमें अपनी
आत्मासे नहीं होने देना चाहिए। यह स्थितप्रज्ञ सम्बन्धी उन श्लोकोंका अर्थ है जिनका
हम नित्य पाठ करते हैं। नित्य नियम और श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करनेसे किसी दिन
हम उसे आत्मसात् कर लेंगे।
गुजराती (एस० एन० ९२८९ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५२. पत्र : गंगाबहन झवेरी और नानीबहन झवेरीको
चि० गंगाबहन और नानीवहन,
२७ सितम्बर, १९३०
तुम दोनोंके पत्र मिले। मैं तुम दोनोंको हर हफ्ते तो याद करता ही हूँ, किन्तु
बादमें तुम्हें पत्र लिखनेका विचार छोड़ देता हूँ। एक प्रकारसे मैं तुम दोनोंकी एक
आदर्श जोड़ी मानता हूँ। तुम दोनों सास-बहू नहीं बल्कि सगी बहनोंसे भी बढ़-चढ़
कर हो। ऐसा वातावरण तैयार करनेमें पन्नालालका भी हाथ तो है ही । किन्तु
यदि तुम दोनों ऐसी न होतीं तो वह क्या कर पाता ? अभी तो हमें बहुत आगे
तीनों आगे बढ़ने योग्य भी हो ही
मिल गया था ।
बढ़ना है; और तुम
कि उनका तार मुझे
गुजराती (जी० एन० ३१०४) की फोटो नकलसे।
२५३. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
भाई पानाचन्दसे कहना
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२७ सितम्बर १९३०
चि० गंगाबहन (बड़ी),
तुमपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। प्रभु तुम्हें यह बोझ उठानेकी शक्ति दे।
अम्बालाल ने काकासाहब को लिखा है। काकासाहब मजे में हैं। कातते हैं,
पीजते हैं, नियमपूर्वक घूमने जाते हैं, नियमपूर्वक खाते हैं ।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
रमीबाई जो चाहती थी वह उसे मिल गया है। बहुत शोभा देता है।
[ गुजरातीसे ]
;
बापुना पत्रो ६: गं० स्व० गंगाबहेनने सी० डब्ल्यू० ८७५९ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
१. अम्बालाल चतुरभाई पटेल, जो उस समय काकासाहब कालेलकरके शिष्य थे।
२. रमीबाई गिरफ्तार हो गई थीं।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५४. पत्र : रेहाना तैयबजीको
२७ सितम्बर, १९३०
चि० रेहाना,
तेरा पत्र मिला । तेरा स्वास्थ्य पहलेसे कुछ अच्छा है यह जानकर प्रसन्नता
हुई। जब तू कमलादेवीको पत्र लिखे तो लिखना कि मैं उसे प्रायः याद करता हूँ।
बाबाजानसे कहना कि पूरी सीरत का अनुवाद अच्छा नहीं लगेगा, बल्कि यदि उसके
मुख्य-मुख्य अंशोंका अनुवाद दिया जायेगा तो अच्छी पुस्तक बन जायेगी। मौलाना
शिबलीने मुसलमानोंको ध्यानमें रखकर 'सीरत' लिखी है और यह उचित भी है,
किन्तु आम लोग ऐसी पुस्तकका अनुवाद नहीं पड़ेंगे। अमीर अली, मौलवी मुहम्मद
अली कादियानी, वाशिंगटन इविंग और कार्लाइल की पुस्तकें तो हमारे पास है। इसमें
यदि मौ० शिबलीकी पुस्तकका संक्षिप्त अनुवाद और जोड़ दिया जाये तो इससे [ हमारे
साहित्य में ] एक अच्छी पुस्तककी वृद्धि होगी रामदास लिखता है कि बाबाजान दिन-
दिन जवान होते जा रहे हैं, छः-छः घंटे लिखनेमें मेहनत करते हैं और उनकी स्मरण-
शक्ति बड़ी है। यदि ऐसा है तो उनकी दाढ़ी सफेद हो जानेसे क्या हुआ? और
तिसपर महादेवको फ्रेंच सिखाते हैं। उनसे किसे ईर्ष्या न होगी ? तुम दोनों माँ-बेटीने
खेड़ा जिलेमें खूब काम किया और वह हमीदा सूरत जिलेको गुंजाये हुए है।
खुदा हाफिज ।
[ पुनश्च : ]
क्या मेरी लिखावट पढ़ने में तुझे मुश्किल होती है ?
गुजराती (एस० एन० ९६२१) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० जयप्रकाश,
२५५. पत्र : जयप्रकाश नारायणको
यरवडा मन्दिर
२७ सितम्बर, १९३०
तुमारी शरी [र] प्रवृत्ति अच्छी नहि रहती ऐसा प्रभावती लिखती है। इतना
जान पानेके बाद शरीर क्यों बिलकुल दुरुस्त नहि बन सकता ? इस बारेमें प्रयत्न
करना आवश्यक है। अब क्या करते हो ।
जी० एन० ३३७४ की फोटो नकलसे ।
२५६. पत्र : कलावती त्रिवेदीको
बापुके आशीर्वाद
चि० कलावती,
२७ सितम्बर
परवडा मन्दिर
१९३०
तुमारा खत पाकर आनंद हुआ। ऐसे हि नियम पालनमें दृढ़ रहो। भले निदा
करना है वह करते रहें। ऐसे लोगों पर क्रोध भी मत करो परंतु प्रेम करो।
अक्षरमें सुधारके लिये काफी स्थान है। प्रयत्नसे अक्षर अच्छे बन सकेंगे।
जी० एन० ५२५२ की फोटो नकलसे।
बापुके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० काशिनाथ,
२५७. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
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परवडा मन्दिर
२७ सितम्बर १९३०
तुमारे दोनों पत्र मिले हैं। कलावतीकी प्रगती बहोत अच्छी हुई है । खद्दरके
बारेमें स्वावलम्बन पद्धति ग्रहणका निश्चय ठीक किया। स्वप्नदोषका निवारण अल्पा-
हार और शारीरिक और मानसिक उद्यम है जो शारीरिक कार्य किया जाय उसीमें
मनको रोक लेनेसे दोगुना लाभ होता है, कार्य ज्यादा अच्छा होता है, मनोविकार
ऐसे ही रुक जाते हैं।
जी० एन० ५२५३ की फोटो नकलसे ।
२५८. पत्र : तुलसी मेहरको
बापुके आशीर्वाद
चि० तुलसी मेहर,
यरबडा मन्दिर
२७ सितम्बर, १९३०
तुमारा खत ठीक मिला । तुमारा स्मरण बहोत करता हूं। मीराबहनने लिखा
था अब खत भी आया। अच्छा है।
जी० एन० ६५३८ की फोटो नकलसे।
बापुके आशीर्वाद
४४-१२
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५९. पत्र : मीराबहन को
२८ सितम्बर, १९३०
चि० मीरा,
तुम्हारा पत्र मिला ।
तुम्हें मुजफ्फरपुरमें पूरे चार दिनका भी आराम मिला नहीं या तुमने किया
नहीं। मैं तुम्हारी जगह होऊँ तो अगली बार इस प्रकारके वचनोंका पालन अवश्य
करूँ। विश्राम सेवाकी भावनासे क्यों नहीं किया जा सकता ? अवश्य ही इसका
सरलतासे दुरुपयोग किया जा सकता है और अक्सर किया जाता है। लेकिन यह
तो कोई वजह नहीं है कि ईमानदार लोग ईमानदारीसे अपनेको विश्राम क्यों न
दें ताकि वे और अधिक सेवा करनेके लिए अपनेको ठीक हालतमें रख सकें। कोई
व्यक्ति जब यह कहता है कि वह सेवा करनेमें अपने-आपको मिटाये दे रहा है, तो
मैं इसे और कुछ नहीं तो कमसे कम आत्म-प्रवंचना अवश्य समझता हूँ क्या ईश्वर
अनवरत और निष्काम भावसे की जानेवाली सेवाकी अपेक्षा ऐसी सेवाको ज्यादा
पसन्द करता है? शरीर तो मशीनकी भांति है जिसे पूरी सेवा लेनेके खयालसे अच्छी
हालत में रखनेकी जरूरत है। लेकिन सुरक्षित विश्राम स्थलसे बैठकर मुझे ज्यादा उपदेश
नहीं देना चाहिए। इतना ही है कि मुझे लगता है कि आवश्यक आराम लेने में मुझे
लज्जाका अनुभव नहीं हुआ है। मेरे निकटवर्ती लोगोंकी राय इससे भिन्न है, इसका
कारण यही है कि वे विश्रामके नियमोंसे अनभिज्ञ हैं। ठीक समय पर उचित विश्राम
लेना वैसा ही है जैसे कपड़े में पड़ी खोंचको समय रहते सिल देना ।
काका को तुम्हारा चरखा छोड़ना पड़ा। उसपर यह प्रति घंटे ७० तारसे अधिक
सूत नहीं निकाल पाते थे। अब वह पेटी चरखा इस्तेमाल करते हैं। कल तीसरा
दिन था और उन्होंने एक घंटे में ११९ तार सूत निकाला। वह और भी ज्यादा
अच्छे नतीजेकी उम्मीद करते हैं। मैं दिन-प्रतिदिन प्रगति कर रहा हूँ और उस
चरखे पर थकान क्या चीज है, मुझे पता ही नहीं चलता। वह बिल्कुल आसानी के
साथ चलता है। जब में आवश्यक मोटाईकी माल स्वयं बना लूंगा तब वह और भी
अच्छा चलेगा। धुनाई तो वास्तविक संगीतका आनन्द देती है। विट्ठलने लिखा था
कि हमें तांतमें पत्तियाँ रगड़ने के बजाय मोमबत्ती रगड़नी चाहिए। इस परिवर्तनसे
ताँत ज्यादा अच्छे परिणाम दे रहा है। मैं चाहूँगा कि जिन लोगोंको नये अनुभव
प्राप्त हों वे उनकी सूचना मुझे भी देते रहें। यहां जिन्हें आजमाना सम्भव होगा
उन्हें मैं निश्चय ही आजमाऊँगा। मैं कताई और धुनाई, दोनोंमें एक ऊँचा स्तर
प्राप्त करना चाहता हूँ कोई वजह नहीं है कि मैं १६० तार प्रति घंटे पर ही
क्यों ठहर जाऊँ। मुझे अब विश्वास है कि मैं और बेहतर कर सकता हूँ। मेरे लिए
तो यह ईश्वरका कार्य है। यदि वह चाहता है तो मुझे शक्ति और क्षमता देगा।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र : जयसुखलाल गांधीको
१७९
नारणदास मुझे बताता है कि
हमारा जन्तर तो उदारता ही है।
दूंगा। लेकिन मतभेदोंके बारेमें मुझे
पत्र में इस विषय में एक या दो पंक्तियां ही लिखी हैं। मेरा वजन १०३ और १०४
पोंडके बीच है और आहार लगभग वही है ।
तुम्हारी कुमारप्पासे पटरी नहीं बैठ रही है।
वह जैसा चाहता है मैं उसे वैसा ही करने
अवश्य ही कुछ पता नहीं है। ना० ने अपने
से भी ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४१३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६४७
२६०. पत्र : कसुम्बा गांधीको
चि० कसुम्बा,
परवडा मन्दिर
२८ सितम्बर १९३०
तुम चलाला पहुँच गई, यह बहुत ठीक किया। हमारी आपसमें जो बातचीत
हुई थी उसीके अनुसार चलना । छूतछातकी भावना अपने मनसे निकाल देना । उमिया
तो प्रसन्न है न? जयसुखलालके सभी कामों में रुचि लेना । तुममें मुझे दृढ़ताका गुण
नजर आया, जिससे मुझे प्रसन्नता हुई थी। मैं चाहता हूँ कि तुम अपने इस गुणका
उपयोग सेवा कार्यमें करो ।
गुजराती (एम० एम० पू० / ३) की माइक्रोफिल्मसे ।
चि० जयसुखलाल
२६१. पत्र : जयसुखलाल गांधीको
बापूके आशीर्वाद
२८ सितम्बर, १९३०
तुम्हारा विस्तृत पत्र मिला । तुमने पत्र लिखकर अच्छा किया। उमियाका पाँव
भारी है, इस बात की जानकारी मुझे तुम्हारे पत्रसे ही मिली। उसके दर्दका कारण
मैं अब समझा। शुरूमें वह जितनी खुश थी, अब भी वह उतनी ही खुश है न ?
अपने नियमोंका तत्परतापूर्वक पालन करते हुए भी तुम कसुम्बाका दिल मत दुखाना ।
हम स्वयं जिस स्वतन्त्रताका उपभोग करना चाहते हैं वही स्वतन्त्रता उसे भी है।
उसपर क्रोध करनेसे उसकी सच्ची भावनाएँ दब जायेंगी। मैंने भी तो ऐसा किया
है, अतः यह मैं अपने अनुभवके आधार पर लिख रहा हूँ। कसुम्बामें मुझे उच्च
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
कोटिके कुछ गुण दिखाई पड़े हैं। किन्तु यदि ये गुण न हों तो भी क्या है ? तुम्हारे
जीवनमें वह बाधक नहीं बनेगी और तुम उसके जीवनमें बाधक मत बनना । समय-
समय पर मुझे लिखते रहना ।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
तुमने पूँजीपतियोंके बारेमें जो कुछ लिखा है, वह सच है। किन्तु हम उन्हें
भी प्रेमसे ही जीतेंगे ।
गुजराती (एम० एम० यू० / ३) की माइक्रोफिल्मसे ।
२६२. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
२८ सितम्बर, १९३०
चि० प्रेमा,
तेरा पत्र मिला। चादर ओढ़ानेमें तू क्रम भूल जाती थी, यह कैसे याद न
रहे ? रोज एक ही भूल सहन करनेवाला पिता कितना अच्छा होगा ?
"
' आश्रम - भजनावलि में ८४वें भजनकी तीसरी पंक्ति यों है:
कमल म्याने
मोट बांधी।" इसका अर्थ तू समझती हो तो तू अथवा वालजीभाई अथवा तोता-
रामजी अथवा जो भी कोई जानता हो उससे समझकर भेज देना अथवा जो जानता
हो वही भेज दे।
कमलाके साथ तूने मित्रता कर ली है, यह अच्छा किया। इस बातका ध्यान
रखना कि वह उदास न हो। उस जोलिंगर नामकी बहनके साथ भी क्या तूने मित्रता
कर ली है ? न की हो तो कर लेना। आश्रमके नियमोंके बारेमें उसके मनमें कुछ
प्रश्न हैं। यदि वह उनको लेकर तुझसे बातचीत करे तो तू उससे बातचीत करना
और उसकी शंकाओंका समाधान करना ।
अब तबीयत कैसी है ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६८४ ) से । सौजन्य: प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२३६ की फोटो नकलसे भी ।
१. देखिए परिशिष्ट ६ ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२१९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६३. पत्र : राधाबहन गांधीको
२८ सितम्बर १९३०
चि० राधिका,
तुम सबके अलग-अलग लिखे पत्र मुझे मिल गये थे। फिलहाल तो ये लोग
तुम्हारे अलग-अलग लिखे गये पत्र भी मुझे दे देते हैं; किन्तु शर्तें तो यह है कि
सभी पत्र एक ही लिफाफे में भेजे जाने चाहिए।
तेरे पैरका मामला लम्बा चला। ऐसा लगता है कि तेरी शारीरिक निर्बलताका
भी इसमें कुछ हिस्सा है। नारणदासकी शिकायत है कि तुममें से कोई प्रार्थना आदि में
भाग नहीं लेता। क्या यह सच है? मुझे साफ-साफ लिखना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८६८६ ) से सौजन्य : राधावन चौधरी
२६४. पत्र : वेणीलाल गांधीको
२८ सितम्बर १९३०
चि० वेणीलाल गांधी,
तुम्हारा पत्र मिला तुम्हारी तबीयत जो दो सालसे खराब चली आ रही
है उसका इलाज वैद्यकी दवा नहीं बल्कि आबोहवा और खुराकमें रद्दोबदल और
अगर जरूरी हो तो उपवास है। इस तरहसे सैकड़ों लोगोंको आराम हुआ है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९१६ ) से सौजन्य : वेणीलाल गांधी
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६५. पत्र : बलभद्रको
यरवडा मन्दिर
२९ सितम्बर, १९३०
चि० बलभद्र,
तेरा पत्र मिला । तूने अच्छा लिखा है। किन्तु तू इससे भी अच्छा पत्र लिख
सकता है। तेरा वजन क्यों घटता जाता है ? तू चबा-चबाकर खाता है न ? तुझे
किसी तरह की पीड़ा तो नहीं रहती ? तू कितना दूध पीता है ? तेरा वजन बढ़ना
ही चाहिए। यह पत्र नारणदासभाई को पढ़वा देना और वे जैसा कहें वैसा करना ।
तू जो कुछ करे सो मुझे लिखना ।
गुजराती (जी० एन० ९२११ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
२६६. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको
परवडा मन्दिर
२९ सितम्बर १९३०
चि० महालक्ष्मी,
क्या एक ही पत्रका उत्तर देना बाकी था ? रोज तुम सब बहनोंको याद तो
करता ही हूँ। मेरे साथ भी यदि तुमने थोड़े महीने बिताये होते तो मुझे भी अच्छा
लगता । तथापि तुम दोनोंने दूर बैठे हुए भी इस तरहसे तरक्की की है कि यदि
मेरे पास ही होते तो भी मुझसे क्या [ विशेष ] ग्रहण करते सो मैं समझ नहीं
पाता। बच्चे आज भी फलों आदि पर रहते हैं और तुम भी फिरसे फलों पर आ
गई हो, यह ठीक किया। डाहीबहनने मुझे पत्र क्यों नहीं लिखा? सब बहनोंको
आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ६७९७ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६७. पत्र : पूँजाभाईको
चि० पूँजाभाई (छोटे, बड़ौदा),
२९ सितम्बर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हारी बीमारी बहुत लम्बी चली । शरीरका तो ऐसा
ही है। यह चूड़ीसे भी ज्यादा नाजुक है। अतः हमें उसकी देखभाल सेवा कार्यके
लिए ही करनी चाहिए तुरन्त चंगे हो जाओ। समय-समय पर मुझे लिखते रहना ।
गुजराती (जी० एन० ४०१६) की फोटो नकलसे ।
प्रिय भगिनी,
२६८. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
बापूके आशीर्वाद
२९ सितम्बर १९३०
तुमारे दो खतका उत्तर बाकी है। पहले तो सतीबाबुका प्रश्न । द्वितीय
अध्यायमें जो युद्धकी बात है उसका शब्दार्थ करे तो अवश्य भौतिक युद्ध है। परंतु
'गीता' का भाव हमको अंतरयुद्धकी ओर ले जाता है उसमें मेरे दिल में थोड़ा भी संदेह
नहि है। जब संदेह पैदा हो जायगा 'गीता' मेरे लिये धर्म ग्रंथ मिट जायगा ।
तुमारा शरीर अब अच्छा होगा। विनोबाको पूछकर संस्कृत सीखनेवाले लड़कों
को अवश्य वर्षा भेजो छोटेलाल अब तो जेल में गया। तारीणी कुछ भी अच्छा है
जानकर बहोत आनंद हुआ। तारीणी चारू अरूण इ० सबको मेरे आशीर्वाद भारत-
वर्षमें जैसे प्राचीन तपोवन थे ऐसे अब भी हो सकते हैं हमारी तपश्चर्या पर निर्भर
है। हां उसके रूपमें परिवर्तन हो सकता है। पूर्वजोंने जो किया उससे आगे बढ़नेका
हमारा धर्म है।
जी० एन० १६७१ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रिय मेजर मार्टिन,
२६९. पत्र : आर० वी० मार्टिनको
परवडा सेंट्रल जेल
३० सितम्बर १९३०
मैंने इसी २१ तारीखको आपको पत्र भेजकर अनुरोध किया था कि मुझे इस
जेल में बन्द सविनय अवज्ञावाले कैदियोंसे सम्पर्क स्थापित करने दिया जाये। मैंने
अपने सचिव और सह-कार्यकर्ता प्यारेलालसे मुलाकात करनेका अनुरोध इससे भी
पहले किया था। अब मैं यह आग्रह करना चाहता हूँ कि मुझे मेरी बातका जवाब
जल्दी दिया जाये। मैं जानता हूँ कि सरकार अत्यन्त व्यस्त है और एक बन्दीके
नाते मैं चाहता हूँ कि अपनी वजहसे उसे कोई तकलीफ न दूँ। लेकिन मैंने जो
अनुरोध किया है वह मेरे आत्माकी एक अनिवार्य मांग है। मैं अब अपनेको और
अधिक नहीं रोक सकता। अपने इन सह बन्दियोंसे मिलने न दिया जाना मेरे लिए
असह्य है। अतः अगर आगामी शनिवार की दोपहर तक मेरी इच्छा पूरी न की
गई तो मैं अपने शरीरके परिरक्षण में सहयोग देना बन्द करना आरम्भ कर दूंगा।
मेरे लिए इस समय यह बताना सम्भव नहीं है कि यह असहयोग में किस हद तक
करूँगा । उसका निश्चय दिन बीतने के साथ-साथ मेरी आन्तरिक प्रेरणा और साहस
तथा शक्ति द्वारा होगा। असहयोगका आरम्भ साधारण कैदियोंको दिये जानेवाले
भोजन, अर्थात् उसमें भी जो कुछ में धर्मपूर्वक ले सकता हूँ, उसके सिवा अन्य कोई
भोजन लेनेसे इनकार करनेके साथ होगा। मैं नमकके अलावा केवल पांच प्राकृतिक
खाद्य वस्तुएँ और ले सकता हूँ। इसलिए जहाँतक में देख सकता हूँ, मैं केवल
कांजी और बाजरी और जुवारी की चपाती ही ले सकता हूँ। मैं दाल या सब्जियाँ
नहीं ले सकता क्योंकि उनमें पाँचसे अधिक वस्तुएँ होती है। कांजी और चपाती में
अधिकारियोंकी जिम्मेदारी और उनकी इच्छा पर लूंगा। मुझे भरोसा नहीं है कि
इतने वर्षों तक इनका उपयोग न करनेके बाद मेरा पेट इन दो में से कोई भी चीज
हजम कर सकेगा। मैने आरम्भमें यह समझौता इसलिए किया है क्योंकि मैं अपने
यश-भर, अभी आरम्भमें, कमसे कम अटपटी स्थिति उत्पन्न करना चाहता हूँ। मैं चाहूँगा
कि सरकार इस पत्रको धमकी न माने बल्कि सौजन्य और लिहाजका द्योतक माने।
मेरी इच्छा यह नहीं है कि जिसे में मानव अधिकार मानता हूँ उस अधिकारको प्राप्त
करनेके लिए मुझे जो भी कदम उठाने पड़ें, उनकी सूचना सरकारको पहलेसे न हो ।
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
अंग्रेजी (जी० एन० ३८५३) की फोटो नकलसे; बॉम्बे सीक्रेट ऐन्सट्रैक्ट्स,
७५० (५) / ए० पुष्ठ २०७ से भी ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० नारणदास,
२७०. पत्र : नारणदास गांधीको
२५/३० सितम्बर, १९३०
आज तुम्हें ही पहले पत्र लिख रहा हूँ। पिछले सप्ताह समय कुछ कम था
इसलिए कुछ एक बातें संक्षेपमें लिख कर काम चलाना पड़ा था। राजगोपालाचारीके
आश्रममें कौन-कौन हैं, सुब्वैया कहाँ है, उसकी पत्नी कहाँ है, आदिके बारेमें मालूम
हो तो लिखना ।
पूँजाभाईको तो अब कष्ट सहन करते हुए शान्तिसे ही दिन बिताने हैं । जोलिंगर
बहन के साथ ज्यादा बातचीत कर सको तो करना। यह बहन अच्छी और समझदार
दिखाई देती है। किन्तु उसे हमारी सारी बातें समझने में समय लगता है। वह
चौकीदारी करना चाहे, तो वैसा करने देनेमें कोई दोष नहीं दिखाई देता। उसकी
दलील ठीक है। जितनी स्वतन्त्रतासे घूमने-फिरनेके लिए वह तत्पर है, हिन्दकी बहनें
शायद इतनी स्वतन्त्रता लेनेको तैयार न हों। फिर भी कोई उसके साथ रहना चाहे
तो बेशक रह सकता है। यह तो मैंने यहाँ बैठे-बैठे अपना विचार व्यक्त भर कर
दिया है। तुम जैसा उचित समझो वैसा कर लेना ।
केशु आदिको क्या लिखूं ? इस समय जो पत्र लिख रहा हूँ, सो पढ़कर उन्हें
दे देना। केशु ईमानदार नवयुवक है। समय आने पर अपना धर्म समझ जायेगा,
इसलिए उसे कुछ लिखनेका मन नहीं होता। तुम तो हिम्मतसे काम लेकर जो कहना
हो, कह देना । इस समय तो मैं लिख ही रहा हूँ ।
-
मेरी खुराक है तीन सेर दूध दो बार दहीके रूपमें, एक बार दूधके रूपमें ।
नौ टमाटर, छोटे-बड़े जैसे आये हों और परिमाणमें कुम्हड़ा या गोभी आदि सब्जी
उबाल कर । नमक डालनेकी जरूरत लगे ही तो ऊपरसे ले लेता हूँ। चार दिनसे
रतालू छोड़ दिये हैं, क्योंकि डा० जीवराज काकासाहबसे मिलने आये थे और
उन्होंने उन्हें बताया कि रतालू कब्ज करता है। मुझे बादमें एनीमा लेनेकी जरूरत
तो पड़ी ही थी । इसलिए रतालू छोड़कर देख रहा हूँ। [ शक्तिमें] कुछ फर्क नहीं
पड़ा है। शक्ति बनी रही तो फिर रतालू न लेनेका प्रयत्न जारी रखूंगा । यों मुझे
उसका खास नुकसान तो नहीं मालूम पड़ा । यहाँका पानी ही मेरे जैसे लोगोंके लिए
कब्ज करनेवाला जान पड़ता है, किन्तु चिन्ता करनेकी कोई बात नहीं है। आज
शामको वजन लिया जायेगा; वह भी लिख भेजूंगा। एनीमा मेरे लिए नई चीज
नहीं है। किन्तु यदि उसके बिना चल सकूँ तो उसे छोड़ना जरूर चाहता हूँ। ताजे
फल भी जबतक छोड़े रह सकूं, छोड़ना चाहता हूँ। यदि सब्जीसे एनीमा न छूटा या
किसी तरह की कमजोरी लगी तो खजूर और मुनक्का लेना शुरू करूँगा । कोई चिन्ता
न करे ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
चरखेका काम सुधरता जा रहा है। लगता है, गति बढ़ रही है । थकावट तो
मालूम नहीं होती। ज्यादा कात पानेका लोभ बेशक नहीं करूंगा। 'गीता' के इलोक
कण्ठस्थ करनेका काम फिलहाल बन्द है। इससे मनको दुःख होता है। किन्तु अवसर
देख रहा हूँ। पहले कताई करते समय याद करता था। देखता हूँ कि उससे कातनेमें
विघ्न पड़ता है। अच्छी तरह कताई करनेके लिए एकाग्रताकी आवश्यकता दिन प्रति-
दिन बढ़ती दिखाई दे रही है। कातने और कातनेकी कलामें बड़ा अन्तर है, यह
भी देखता हूँ। मुझे तो कलामें सिद्धहस्त होना है। यदि ऐसा इस जन्ममें न हो
सके तो न हो। मैं अपने प्रयत्नमें ढिलाई न करूँ तो मुझे उतनेसे भी सन्तोष
रहेगा। चरखा चलाते समय 'गीता' कण्ठस्थ करनेके लोभमें मैंने अपनी ढिलाई देखी।
'गीता' की शिक्षा इसके विरुद्ध है। चरखेकी साधनाके साथ-साथ 'गीता' कण्ठस्थ हो
तो ठीक है; किन्तु चरखेकी कीमत पर 'गीता' कण्ठस्थ करूँ तो यह 'गीता' का --
जिस तरह मैंने उसे समझा है। अनादर करनेके बराबर होगा। अमीदासको मना
लेना। मैं उसे लिख रहा हूँ। ऐसे व्यक्तिको हम आश्रम छोड़ देनेके लिए कहें भी कैसे ?
दो प्रवचन तो नहीं भेज सकूंगा। शायद इस बार सर्व धर्म समभाव ही चलेगा।
स्वदेशीको छोड़ देनेकी इच्छा होती है। राजनीतिसे सम्बन्धित विषयोंको न छेड़नेका
संकल्प है। ऐसा करनेसे उसके कुछ टूटनेका भय है। स्वदेशी पर केवल धार्मिक दृष्टि
रखकर लिखा जा सकता है। लिखें, तो भी कोई ऐसी बात उसमें आ सकती है
जिसका राजनीतिके साथ कुछ-न-कुछ सम्बन्ध जुड़ जाये। यदि लगा कि राजनीतिको
एक ओर रखकर लिख सकता हूँ तो लिखूंगा; देखता हूँ।
गिरिराजको वहां जबरदस्ती रखनेका कोई फायदा नहीं है। बालकृष्ण उसे
वर्धा बुला रहे हैं तो यहाँ जाने देनेमें तुम्हें क्या हानि दिखाई देती है ? यह आदमी
तो भला है किन्तु उसका दिमाग काम नहीं करता। सम्भव है कि बालकृष्णकी
संगतसे लाभ हो । विनोबाके पास दूसरा व्यक्ति भेजने के लिए तो तुमने लिखा ही
है; तो फिर गिरिराजको ही क्यों न भेज दो। यदि वह इससे खुश हुआ तो काम
करेगा ही। उसका त्याग करना मुझे ठीक नहीं लगता। किन्तु फिर मैं उसे लेकर
सिर खपा रहा हूँ, जिसे लेकर खपाना आवश्यक नहीं है;
ध्यान न देना । तुम्हें निर्णय करनेमें मदद हो, इसी विचारसे
मानना हो सकता है, मैं कोई बात समझ नहीं पाया होऊँ और मैंने ऐसी राय
बना डाली हो । मुझे तुम्हारे निर्णय पर इतना ज्यादा विश्वास है कि जब मेरी बुद्धि
किसी निर्णयका विरोध करती है तो मन यही कहता है कि यहाँ पर कुछ बातोंकी
मुझे जानकारी नहीं है। अब तुम्हारे प्रश्नोंका जवाब :
इसलिए इसपर बहुत
इतना लिखा है, ऐसा
१. आश्रम छोड़नेकी आज्ञा देनेकी जरूरत नहीं; किन्तु न रहे तो उसे आज्ञा
देकर रोकना नहीं चाहता।
२. आश्रमकी सम्मतिके बिना वर्धा जाना ठीक नहीं होगा ।
३. आश्रमकी आज्ञा उल्लंघन करके कुछ करे और वह आश्रमका विश्वास
खो बैठे तो आश्रम उसके बच्चोंका बोझ नहीं उठा सकता।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
१८७
४. कटु, विमुको आश्रममें न रख सकें तो उन्हें कहाँ भेजें, यह समझ में नहीं
आता। अभी गिरिराज उनकी देखरेखमें भाग न लेता हो और वह आश्रमकी सम्मतिसे
बाहर तब और यदि आश्रम बच्चोंकी देखभाल कर सकता हो, तो करे। किन्तु यदि
वे देखभाल करनेके लायक न रहे हों, तो गिरिराजसे यह बात कह देनी चाहिए।
५. नई व्यवस्था करनेमें गिरिराजको पैसेकी मदद तो देनी चाहिए, ऐसा मुझे
लगता है। कितनी रकम हो यह आश्रम ही तय करे। मुझे लगता है कि अब मैंने
तुम्हारे सभी प्रश्नोंका उत्तर दे दिया है। गिरिराजको लिखा पत्र पढ़ लेना ।
मेरे पास मणिबनके बारेमें निर्णय करने लायक तथ्य नहीं हैं। किन्तु जो
समझा हूँ उससे ऐसा लगता है कि वह अपने गाँव जाना चाहे तो जाने दें।
भगवानजीकी इच्छाका सवाल नहीं। मणिबहनकी इच्छाका सवाल है। रहे तो खुशी से
रहे। इतनी शर्त जरूर है कि भगवानजीको भूल जाये। उससे मिलनेकी इच्छा या
आशा न करे। जैसे दूसरी बहनें रहती हैं वैसे नियमोंका पालन करते हुए आश्रम में
रहे। वह खुशीसे ऐसा न करना चाहे तो उसे जाने देना चाहिए।
मीराबहन और कुमारप्पाके बारेमें समझ गया हूँ। तुम्हारा निर्णय ठीक लगता
है। मैं मीराबहनको लिख रहा हूँ।
आजकल भाई जेठालाल कहाँ हैं ? अपनी प्रदर्शनी में जो फल रखे गये उनके
बारेमें पढ़कर मुझे आश्चर्य और आनन्द हुआ है। मुझे तो अंगूर बोये जानेकी खबर
भी नहीं थी।
मेरी टूटी हुई चप्पलें भेजने की जरूरत नहीं। एक नई जोड़ी थी । कान्तिको
नहीं मालूम, तो ठीक है। मैंने जैसा लिखा है उस तरह अभी काम चल रहा है।
नई जोड़ी न मिले तो बादमें देखेंगे। वहाँ जो चप्पलें तैयार पड़ी हैं, उनमें से एक जोड़ी
क्यों नहीं चलेगी? जैसी काकासाहब के लिए भेजी है, वैसी मेरे लिए भी ठीक है ।
उस जैसी सजावट न हो तो ज्यादा अच्छा। प्यारेलालको घरके खर्चके लिए पैसे जरूर
भेज देना। इसके बारेमें और कुछ किया ही नहीं जा सकता। उसे तो पहले ही
पैसा मँगा लेना चाहिए था। वह उसने नहीं मँगाया। उसका मित्र या जो कुछ भी
कहो तो आश्रम ही है। गोकीवहनके बारेमें तुमने जो किया वह शोभा देता है ।
आश्रमसे तो नहीं भेज सकते थे। डा० मेहतासे मांग सकते थे। किन्तु तुमने ही
दिया, यह मुझे बहुत अच्छा लगा है। और उसे उसकी जरूरत तो होगी ही। रेंटिया-
बारस' की कताईका हिसाब देख लिया है। अच्छा है। लगता है, खुर्शेदबहन और
बहनोंको बुलाना चाहती है। उसकी माँग समझ लो और यदि किसी बहनको भेजा
जा सकता हो तो भेज देना। वहाँसे जा सकने योग्य कोई सयानी बहन बाकी ही
नहीं है, मुझे ऐसा लगता है।
१. भाद्र कृष्ण पक्षको द्वादशी; विक्रम सम्बत्के अनुसार इस दिन गांधीजीका जन्म दिन था।
Gandhi
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
२६ सितम्बर, १९३०
आज वजन लिया है। १०३ से थोड़ा ऊपर है। इसलिए सुधार माना जायेगा ।
काकासाहब का ११५ से थोड़ा कम है। इसलिए इस सप्ताह सुधार नहीं माना
जायेगा। इस तरह सेर आधा सेर कई बार कम हो भी जाता है।
बे० जी० की पत्रिका न भेजकर तुमने ठीक किया है। वह मुझे नहीं भेजी
जा सकती।
२७ सितम्बर, १९३०
लीलावती फिर खुदबनके पास जानेके लिए अधीर हो रही है। यदि खुर्शीद
बहन उसकी स्थिति जानते हुए भी बुलाये तो जाने देनेमें ही भलाई होगी। आश्रम में
रहकर व्याकुल रहे, उससे ज्यादा अच्छा है कि यहाँका अनुभव प्राप्त करके लौट
आये। जैसा ठीक हो वैसा करना। पूनियाँ आदि तोलने लायक काँटा सतीशबाबूने
तीन आने में बनाया था। वह या उसके जैसा दूसरा काँटा हो तो साथ भेज देना ।
मद्रासमें हिन्दी प्रचार करनेवाले अन्नाकी कोई खबर है क्या ?
२८ सितम्बर, १९३०
sterसाहब ने बाल को गोसेवा संघके लिए सूत दिया था। क्या वह मिला
है ? शंकरकी मारफत जो ८,५०० गज सूत भेजा था यह तुम्हें वहां मिलेगा या
अहमदाबादमें ? कुमारी अ० के बारेमें मीराबहनको मैंने लिखा है वह पढ़ लेना ।
मंगल प्रभात ३० सितम्बर, १९३०
जैसा मैंने पिछले सप्ताह लिखा था वैसे सर्वधर्म समभाव सम्बन्धी लेखका अंग्रेजी
अनुवाद कर डाला है। वह इसके साथ भेज रहा हूँ । यदि उसका अनुवाद वालजी
भाईने किया हो और वह छप चुका हो तो साथका अनुवाद वे देख लें। जिसे पढ़ना
हो वह पढ़कर अन्तमें मीराबहनको सौंप दे। यदि वालजीभाई का अनुवाद प्रकाशित न
हुआ हो तो मेरे अनुवादको देख लें और बादमें जो पसन्द आये उसे प्रकाशित कर
दें। तुम्हें सिर्फ गुजराती ही छापना है या अंग्रेजी अनुवाद भी ?
यह विषय इतना महत्वपूर्ण है कि यहाँ इसपर थोड़ा और लिख रहा हूँ ।
मंगल प्रभात ३० सितम्बर, १९३०
यह विषय इतने महत्वका है कि इसे यहाँ और विस्तारसे लिखना चाहता
हूँ अपना कुछ अनुभव लिख दूँ तो शायद समभावका अर्थ अधिक स्पष्ट हो जाये।
यहाँकी तरह फीनिक्समें भी नित्य प्रार्थना होती थी। वहाँ हिन्दू, मुसलमान और
ईसाई थे। स्व० सेठ रुस्तमजी या उनके लड़के प्रायः उपस्थित रहते ही थे। सेठ
रुस्तमजीको 'मने वहा वहालुं दादा रामजीनुं नाम' (मुझे रामनाम प्रिय है) बहुत
अच्छा लगता था। मुझे याद आ रहा है कि एक बार मगनलाल या काशी हम
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२२७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नारणदास गांधीको
पत्र
१८९
सबको गवा रहे थे। रुस्तमजी सेठ उल्लास में बोल उठे, "दादा रामजी" के बदले
दादा होरमज्द' गाओ न।" गवाने और गानेवालोंने इस सूचना पर तुरन्त इस
तरह अमल किया मानो वह बिलकुल स्वाभाविक हो। और इसके बादसे रुस्तमजी
जब उपस्थित होते तब तो अवश्य ही, और वे न होते तब भी कभी-कभी हम
लोग वह भजन 'दादा होरमज्द' कहकर गाते। स्वर्गीय दाऊद सेठका पुत्र हुसैन तो
आश्रममें कई बार रह जाता था। वह प्रार्थनामें उत्साहपूर्वक शामिल होता था। वह
खुद बहुत मधुर सुरमें 'आर्गन' के साथ 'है बहारे बाग दुनिया चन्द रोज' गाया
करता। उसने वह भजन हम सबको सिखा दिया था। वह कई बार प्रार्थनामें गाया
जाता था। हमारे यहाँकी 'आश्रम भजनावलि' में उसे स्थान मिला है; वह सत्य-प्रिय
हुसैनकी स्मृति है । उसकी अपेक्षा अधिक तत्परतासे सत्यका आचार करनेवाला नवयुवक
मैंने नहीं देखा। जोसेफ रायप्पन आश्रममें अक्सर आते-जाते थे। वे ईसाई थे। उन्हें
'वैष्णव जन' वाला भजन बहुत अच्छा लगता था। संगीतका उन्हें अच्छा ज्ञान था ।
उन्होंने 'वैष्णव जन' के स्थान पर 'क्रिश्चियन जन तो तेने कहिए' अलाप दिया। सबने
तुरन्त उनका साथ दिया। मैंने देखा कि जोसेफके आनन्दका पारावार न रहा ।
आत्म-सन्तोषके लिए जब में भिन्न-भिन्न धर्मपुस्तकें उलटता रहता था तब मैने
ईसाई, इस्लाम, जरतुश्त, यहूदी और हिन्दू, इतने धर्मोकी पुस्तकोंका अपने सन्तोषभरके
लिए परिचय कर लिया था। मैं कह सकता हूँ कि इस अध्ययनके समय सभी धर्मोक
प्रति मेरे मनमें समभाव था। मैं यह नहीं कहता कि उस समय मुझे इसकी प्रतीति
थी। उस समय समभाव शब्दका भी पूरा परिचय न रहा होगा; परन्तु उस समय
की अपनी स्मृतियाँ ताजी करता हूँ तो मुझे याद नहीं नहीं आता कि उन धर्मोक
सम्बन्धमें टीका-टिप्पणी करनेकी इच्छा तक हुई हो। वरन् उनके ग्रन्थोंको धर्मग्रन्थ
मानकर आदरपूर्वक पढ़ता और सबमें मूल नैतिक सिद्धान्त एक जैसे ही पाता था ।
कितनी ही बातें में नहीं समझ पाता था। यही बात हिन्दू धर्मग्रन्थोंके सम्बन्धमें भी
थी। आज भी कितनी ही बातें नहीं समझ पाता, पर अनुभवसे देखता हूँ कि जो बातें
हमारी समझ में नहीं आतीं, वे गलत ही हैं, यह माननेकी जल्दबाजी करना भूल है ।
कितनी ही बातें पहले समझमें नहीं आती थीं, वे आज दीपककी तरह दिखाई देती
हैं। समभावका अभ्यास करनेसे अनेक गुत्थियाँ अपने-आप सुलझ जाती हैं और जहाँ
दोष दिखाई ही दें, यहां उन्हें दरसानेमें भी नम्रता और विवेक होनेके कारण किसीको
दुःख नहीं होता।
एक कठिनाई शायद रह जाती है। पिछले लेखमें मैंने कहा है कि धर्म-धर्मका
भेद रहता है और धर्मके प्रति समभाव रखनेका अभ्यास करना यहाँ उद्देश्य नहीं है।
यदि ऐसा हो तो धर्माधर्मका निर्णय करनेमें ही क्या समभावकी श्रृंखला नहीं टूट
जाती ? यह प्रश्न उठ सकता है और यह भी सम्भव है कि ऐसा निर्णय करनेवाला
भूल कर बैठे। परन्तु हममें यदि वास्तविक अहिंसा मौजूद रहे तो हम वैरभावसे
बच जाते हैं; क्योंकि अधर्म देखते हुए भी उस अधर्मका आचरण करनेवालेके प्रति
तो प्रेमभाव ही होगा। इससे या तो वह हमारी दृष्टि स्वीकार कर लेगा अथवा
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
हमारी भूल हमें दिखायेगा या दोनों एक-दूसरेके मतभेदको सहन करेंगे। अन्तमें विपक्षी
अहिंसक न हुआ तो वह कठोरतासे काम लेगा। और फिर भी हम अहिसाके सच्चे
पुजारी होंगे तो इसमें सन्देह नहीं कि हमारी मृदुता उसकी कठोरताको अवश्य दूर
कर देगी। दूसरेको, उसकी भूलके लिए भी, हमें पीड़ा नहीं पहुँचानी है। हमें खुद
ही कष्ट सहना है। इस स्वर्ण नियमका पालन करनेवाला सभी संकटोंसे बच
जाता है।
जैसा मैंने इस पत्रके आरम्भ में लिखा है, स्वदेशी पर लिखनेका विचार तो छोड़
दिया है। अब फिर किस विषय पर लिखूं इसका विचार करना है।
[ पुनश्च : ]
आज ७० पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
२७१. पत्र : आर० वी० मार्टिनको
बापूके आशीर्वाद
२ अक्टूबर, १९३०
प्रिय मेजर मार्टिन,
श्री क्विन मेरे पिछले ३० तारीखके पत्रके बारेमें मुझसे बात करते रहे हैं।
अगर आपको यह अधिकार दे दिया जाये कि मैं अपने जिन मित्रोंसे सेवाके उद्देश्यसे
मिलना जरूरी समझैं उनसे समय-समय पर उस अहाते में, जहां मुझे रखा गया है,
मिलनेकी आप मुझे अनुमति दे सकें, तो मैं बिल्कुल सन्तुष्ट हो जाऊँगा । अवश्य
ही मैं उनके साथ राजनीतिक चर्चा नहीं करूँगा, न कोई राजनीतिक सन्देश भेजूँगा,
न ऐसी कोई बात कहूँगा जिसका उद्देश्य जेलके अनुशासनका भंग करना हो। जैसा
कि मैंने आपको आज सुबह बताया, इन मित्रोंसे मिलनेकी इच्छाके पीछे मेरा उद्देश्य
उनकी सेवा करना है और अगर आप विश्वास कर सकें, तो जैसाकि मैने १९२३ में
किया था, जहाँ भी सम्भव हो, जेल अधिकारियोंकी सहायता करना है।
अंग्रेजी (एस० एन० १९९८२ ) की फोटो नकलसे।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० शारदा (बबु ),
२७२. पत्र : शारदा सी० शाहको
यरबडा मन्दिर
२ अक्टूबर, १९३०
तेरा पत्र मिला। जैसे मिट्टीके टमाटरसे वास्तविक टमाटर अधिक सुन्दर
होते हैं, उसी तरह बिजलीके सम्भोंसे पेड़-पौधोंकी सुन्दरता अधिक होती है। कभी
मिट्टीके टमाटरोंसे किसीकी भूख मिटती सुनी है ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ९८९१ ) से । सौजन्य: शारदा जी० चोखावाला
२७३. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
२ अक्टूबर १९३०
चि० प्रेमा,
तू खड़ाऊँ रखना चाहे तो जरूर रख ले। लेकिन इन लकड़ीके टुकड़ोंका तू
क्या करेगी? उनसे तेरा कद दो इंच बढ़े तो भले ही उनका संग्रह कर मैं तो
इसे मूर्तिपूजा कहकर इसकी भर्त्सना करता हूँ। अपने पिताजीका चित्र में रखता
था । दक्षिण आफ्रिकामें अपने दफ्तर में, बैठकमें और सोनेके कमरे में मैंने उनके चित्र
टांग रखे थे। मैं सोनेकी जंजीर पहना करता था और उसमें लॉकेट भी हुआ करता
था। उसमें पिताजी और बड़े भाईका चित्र रहता था। आज मैंने इस सबको छोड़
दिया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि अब मैं उनकी कम पूजा करता हूँ। आज वे
मेरे हृदयमें पहलेसे भी ज्यादा अच्छी तरह प्रतिष्ठित हैं। उनके गुणोंका स्मरण करके
मैं निरन्तर उनका अनुकरण करनेका प्रयत्न करता हूँ और ऐसी भक्ति में असंख्य
देवताओंकी कर सकता हूँ। लेकिन यदि मैं उनके चित्रोंका संग्रह करने लगूं तो मेरे
पास जगह भी न रहे। और लोगोंकी खड़ाऊँ आदि रखने लगूं तो मुझे उसके लिए
जमीन लेनी पड़े। इसलिए एक अनुभवी व्यक्तिके रूपमें मैं तुझसे कहता हूँ कि यदि
मैं सच्चे मार्ग पर चलूँ तो तू मेरा अनुकरण कर ऐसा करना खड़ाऊँ रखनेकी
अपेक्षा हजार गुना अधिक श्रेष्ठ है, और यदि कोई उसे देखकर तेरा अनुसरण
करे तो वह और भी अच्छी बात है। लेकिन तेरे पास खड़ाऊँ देखकर उसका कोई
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
अन्धानुकरण करने लगे, तो वह खड्डे में ही गिरेगा न? इतना समझ ले और फिर
' यथेच्छसि तथा कुरु' ।
- - हटा
जो व्यक्ति कर्त्तव्य-कर्मको समझता है और उसपर आचरण करता है, उसकी
तृष्णा नष्ट हो जाती है। जिसकी तृष्णा नहीं मिटी, उसे कर्त्तव्य-कर्मका भान ही
नहीं हुआ है। तृष्णाका पर्वत तो इतना ऊँचा है कि उसे कोई लांच ही नहीं सकता ।
उसे धराशायी करनेके सिवा अन्य कोई चारा नहीं है। तृष्णाका त्याग करना अर्थात्
कर्तव्यका भान होना । मुझे मालूम हो कि मुझे काशी जाना है, वहाँ जानेके मार्गकी
भी मुझे जानकारी हो, तो फिर मुझे कौन-सी तृष्णा उस मार्गसे-- • कर्तव्यसे
सकती है? मेरी तृष्णा ही काशीके मार्ग पर जानेकी हो और वह पूरी हो जाये,
तो फिर बाकी क्या रह जाता है ? सहजप्राप्त सेवा तेरे पास है। उसे एकनिष्ठासे
तू करती रहे, तो उसमें तुझे पूर्ण सन्तोषकी अनुभूति होगी। सेवा करते हुए तुझे
जो संग मिले, जो पढ़नेको मिले, वह ग्राह्य है; उसके अलावा किसी अन्य वस्तुका
विचार तक भी नहीं करना चाहिए। मेरे विचारसे यह 'योगः कर्मसु कौशलम्' है।
यही समत्व और समाधि है।
लेकिन यह सब तुझे व्यर्थ लगे और तेरी इच्छा पठन-पाठनकी हो तो उसे
खुशीसे तृप्त करना। कामका बोझ हलका करना और आराम करना। यह कैसे हो,
तो नारणदाससे मिलकर ही तू इसपर विचार कर सकती है। नारणदास दूरदर्शी
है, धैर्यवान है और साधु-चरित है। वह तेरी जरूर मदद करेगा। तुझे और क्या
सान्त्वना दूँ? मेरे जैसे लोग तो केवल दिशा-निर्देश ही कर सकते हैं। वैसे तेरी
और हम सबकी शान्तिका सच्चा आधार तो अपने ऊपर ही निर्भर करता है।
सुशीलाके बारेमें तूने जो कहा है यह मैं समझ गया हूँ। अब तो वह मराठीमें
सन्देश भेजे। उसे मेरा आशीर्वाद ।
पण्डितजीका संगीत सुननेके बाद तेरे जैसी लड़कीको किसी अन्य व्यक्तिका
संगीत अच्छा नहीं लगता, यह में समझ सकता हूँ। लेकिन तू स्वयं ही भजन गायन
में सबसे आगे क्यों नहीं रहती ? यदि ऐसा करनेकी हिम्मत तुझमें हो तो उसके
लिए कहना । तू कहे तो मैं लिखूं। तुझे गाना आता तो है। लगभग रोज रातको
तू गाया करती थी, यह मैं भूला नहीं हूँ तेरे गलेकी गिल्टियाँ कैसी है? डा०
हरिभाईको दिखाई भी न ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६८५ ) से । सौजन्य: प्रेमावहन कंटक; जी० एन०
१०२३७ की फोटो नकलसे भी ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७४. पत्र : रावजीभाई ना० पटेलको
२ अक्टूबर
यरबडा मन्दिर
१९३०
चि० रावजीभाई,
जैसा कि डाक्टरने कहा है, तुम्हें पूरे एक महीने आराम कर ही लेना चाहिए।
सेवा कार्य तो हमारे सामने पड़ा ही हुआ है। तुम जितने मजबूत रहोगे उतनी अधिक
सेवा कर पाओगे । और फिर हमारे कार्यक्रमके अनुसार हम जहाँ भी होंगे वहाँ कुछ-
न-कुछ सेवा तो कर ही सकेंगे। मुझे लिखते रहना ।
गुजराती (जी० एन० ८९८९) की फोटो नकलसे।
चि० गंगाबहन (बड़ी),
२७५. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
तुम्हारा पत्र मिला ।
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२ अक्टूबर, १९३०
तुम्हें बेटी बननेकी योग्यता प्राप्त करनी है तो मुझे मां और बाप बननेके
लिए कितनी योग्यता प्राप्त करनी चाहिए ? माँ और बाप होनेका दावा करनेवाला मैं
यदि अपने प्रयत्नमें असावधान रहूँ तो तीनों लोकोंमें मेरे लिए तो कोई जगह भी
न रहे। इसलिए योग्य-अयोग्यके विवादमें क्यों पड़ें? बेटे-बेटी अयोग्य हों तो उसकी
जिम्मेदारी मां-बाप पर कम नहीं होती ।
तुम्हारी उदासीका कारण तो समझमें आता है। एक, दो, तीन- ये सब काम
मुझे करने हैं ऐसा कहने और सोचनेके बदले यह सोचो और कहो कि एक, दो,
तीन -
ये सब काम भगवान करता है और मैं उसका साधन है। ऐसा समझने
पर बोझ तो लगेगा ही नहीं बोझ तो भगवान उठाता है और उसके कन्धे इतने
विशाल है कि चाहे जितना बोझ लादें भगवानको उसका भार उतना भी नहीं लगता
जितना हमें रजकणका लगता है। इसलिए हम 'मैं' और 'मेरा' भूल जायें।
" मैं करता हूँ, मैं करता हूँ, यह हमारी अज्ञानता होगी। गाड़ीका भार जैसे कुत्ता
ढोता है।"" नरसिंह मेहताने इस पदमें अपना अनुभव बताया है। शकट अर्थात्
२. हुँ करूँ, हुँ कई एन अज्ञानता, शफटनो भार ज्यम श्वान ताणे ।
४४-१३
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
गाड़ी। गाड़ीके नीचे चलनेवाले कुत्तेके ऊपर यदि गाड़ीका भार होता है तो हम भी
अपने ऊपर रहनेवाले कामका भार मानें। किन्तु जो ईश्वरके निमित्त ही सेवा करता
है, वह ज्यादा बोझ तो कदापि नहीं उठाता । उसे उठानेकी जरूरत ही नहीं। उसपर
भार आ पड़ता है और वह भगवानका स्मरण करता हुआ आनन्दपूर्वक चलता जाता
है। 'मने चाकर राखोजी' तुम बहुत भावनासे गाती हो। इस भजनके अर्थका विचार
करना और हमने स्त्रियोंकी प्रार्थनामें जो दो श्लोक लिये हैं उनका विचार करना ।
जो भगवानके हो गये हैं उनके योगक्षेमका बोझ भगवान पर है। ऐसी भगवानकी
प्रतिज्ञा है । फिर हमें क्या परेशानी है। यह तो हुई ज्ञान वार्त्ता ।
दुःखी होकर भी तुम्हें और हमें कहाँ जाना है ? आश्रम-सम्बन्ध हिन्दू-विवाह
जैसा है; पल्ला बांधा है तो छोड़े नहीं छूटेगा ? दूसरे ढीले हैं या दृढ़, उसका खयाल
हम न करके यही विचार करें कि "मैं ढीला हूँ या दृढ़ " तो भी काफी है। नाथसे
जितना सहारा मिल सके, उतना तो लेना ही नारणदासके साथ बात करना और
हर सप्ताह मुझे तो मनकी बात लिखती ही रहना। थोड़े दिनकी छुट्टी लेकर
काकासाहब से मिलने आ जाओ, तो भी थोड़ा आश्वासन मिलेगा ।
इतना परिश्रम न करना कि थकान हो । सेवाभावसे किये जानेवाले काममें
प्रमाणका ध्यान रखना चाहिए। ध्यान तभी रख सकते हैं, जब हममें अनासक्तिकी
भावना आ गई हो। अनासक्तिका पर्याय ममत्वहीनता कहा जा सकता है। 'चादरके
अनुसार पैर फैलायें' वाली कहावतमें बहुत ज्ञान निहित है।
समय-समय पर इस पत्रको पढ़ती रहना, इसपर विचार करना और उदासी
छोड़ देना और हृदयमें 'चाकर राखो' की धुन दोहराती रहना ।
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो६ : गं० स्व० गंगाबहेन ने सी० डब्ल्यू० ८७६० से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाई बलवीर सिंह,
२७६. पत्र : बलवीर सिंहको
यरवडा मन्दिर
२ / ३१ अक्टूबर १९३०
तुमारा खत मिला। खादी भंडार काम काम हि है बहोत अच्छा है। कमसे कम
आध घंटा कातना यज्ञ है। दोनोंके बीच मुकाबला नहि हो सकता दोनों कर्तव्य है।
इसलिये जिस तरह खानेका समय निकालना हि पढता है ठीक उसी तरह यज्ञका
समय नीकालना । पुणीयां तो एक मासके लिये एक दिनमें बन सकती है । १० के
बदले २० या ३० का कातनेसे कम पुणीयां चाहीयेगी। इस बारेमें महावीर प्रसादजीसे
चर्चा करना। का० सा० आशीर्वाद भेजते हैं।
जी० एन० १०५३८ की फोटो नकलसे ।
२७७. पत्र : आर० वी० मार्टिनको
बापुके आशीर्वाद
परवडा सेंट्रल जेल
३ अक्टूबर १९३०
प्रिय मेजर मार्टिन,
हमारी बातचीतके सन्दर्भ में मुझे आपको यह बताना है कि 'मित्रों' से मेरा
अभिप्राय उन सविनय अवज्ञावाले कैदियोंसे है जिन्हें मैं जानता हूँ। मैं केवल उन्हींसे
मिलना चाहूंगा जिनके बीमार होनेकी सूचना हो या जिनके साथ दुर्व्यवहार किये
जानेकी शिकायत हो अथवा जिनके बारेमें दुर्व्यवहार किये जानेकी खबर हो। इस
अधिकारका भी मैं यथासम्भव अधिक से अधिक संयम के साथ प्रयोग करूँगा । यदि मेरा
अभिप्राय और अधिक स्पष्ट करनेकी आवश्यकता हो तो कृपया मुझे सूचित करें।
मैं कोई बात मनमें छिपा कर रखना नहीं चाहता।
जहाँतक अपने निश्चयके कार्यान्वयनको स्थगित रखनेका प्रश्न है, यदि मेरी
माँग समय रहते स्वीकार नहीं की जा सकती तो मुझे दुःख है कि मैं उसे मुल्तवी
नहीं कर सकता। लेकिन इसमें कोई तात्कालिक चिन्ता करनेकी जरूरत नहीं है
१. लिखावट अस्पष्ट है ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
क्योंकि आरम्भिक चरणोंमें में साधारण कैदियोंवाला वह भोजन तो खाता ही रहूँगा
जिसे मैं धर्मतः ले सकता हूँ।
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
अंग्रेजी (जी० एन० ३८५४ ) की फोटो नकलसे तथा एस० एन० १९९८३ से भी ।
२७८. पत्र : परशुराम मेहरोत्राको
यरवडा मन्दिर
३ अक्टूबर १९३०
चि० परसराम,
तुमारा खत मिला। जैसे शंकरलालजी कहें ऐसा करो। लोक भले उपहास
करे, तुमारे तो वही काम करते रहना। मील पुनी बेचनेवालोंको प्रेमसे मनाओ
धरणा मत दो। सत्य और अहिंसा हरगीज मत छोड़ो। ऐसा करने से बुद्धिबल अपने-
आप आयेगा। मुझे लिखते रहो।
सी० डब्ल्यू० ४९६५ से । सौजन्य : परशुराम मेहरोत्रा
२७९. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
बापुके आशीर्वाद
४ अक्टूबर, १९३०
चि० मथुरादास,
तुम्हारा पत्र मिला । बुनकरोंके बारेमें तुमने जो लिखा है वह सही है। सूतमें
माँड़ लगानेवाले अहमदाबादमें विशेष कारीगर होते हैं। अन्य स्थानोंमें भी ऐसे कारी-
गर देखनेमें आते हैं। क्या हम बुनकरोंकी माँड़वाले तानेके सूतकी माँगको पूरा नहीं
कर सकेंगे ? रामजीभाई आदिसे यदि तुम आनेको कहोगे तो वे तुम्हारी सहायताके
लिए आ जायेंगे। छगनभाई या सुरेन्द्र द्वारा सौंपा हुआ काम उन्हें करना है। फिर
भी यदि तुम्हें ऐसा लगता हो कि में उन्हें लिखूं तो मुझे पुनः सूचित करना। आखिर
मुझे मोतीबहनका पत्र नहीं ही मिला।
गुजराती (जी० एन० ३७४५ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८०. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको
भाई रामेश्वरदास (धुलीया),
४ अक्टूबर, १९३०
पत्र मिला। इतना शोक मत करो। राम नाम लेकर प्रसन्न चित्त रहना ।
दर्दका आवश्यक इलाज करनेके बाद सहना और जो कुछ सेवा कार्य हो सके करना ।
प्रातःकालमें न उठा जाय तो कोई चिंताका कारण नहि है ।
जी० एन० १७७ की फोटो नकलसे।
२८१. पत्र : मीराबहनको
बापुके आशीर्वाद
५ अक्टूबर,
यरवडा मन्दिर
१९३०
चि० मीरा,
मैंने 'टाइम्स इलस्ट्रेटेड
मैं मौन ग्रहण करनेके बाद यह पत्र लिख रहा हूँ।
वीकली' में प्रकाशित एक ग्रुप फोटोमें तुम्हारा चित्र देखा है। तुम चरखा चला रही
हो और स्वस्थ दिखाई पड़ रही हो। मैंने 'बॉम्बे क्रॉनिकल' में पढ़ा था कि तुम
महिलाओंके जुलूस में थीं और उनकी सभा में बोली थीं। तो अब तुम फिर मेरे
आवासके निकट हो और शायद यह पत्र तुम्हें आश्रम में मिलेगा ।
हाँ, एस० अय्यंगारकी बेटी बड़ी भली है लेकिन जब हम मैसूरसे चले थे तब भी
उसका व्यवहार कुछ वैसा ही था जैसा भावावेगोंमें बहनेवाले असंयत-चित्त व्यक्तियोंका
होता है। जब उसे चिट्ठी लिखना तो कृपया उसे मेरा प्यार कहना और कहना कि
मैं अक्सर उसकी याद करता हूँ। उसके पिताका मामला बहुत ही दुखद है। उनके
साथ भी वही बात है जो उनकी बेटीके साथ है। अपनी बहुतसी अजीब हरकतोंके
लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उनसे तुम मिली थीं ? मद्रासमें तुम कहाँ
ठहरी थीं ?
काकाको मेरा चरखा दे दिया गया है इसलिए पिछले हफ्ते मैंने सोचा था कि
मैं तुम्हारे वाले पर अपना कोटा पूरा कर लूंगा। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन उसे
चला नहीं पाया। तकुआ घूमता ही नहीं था। राल बेकार थी या क्या बात थी, मैं
कुछ समझ नहीं पाया। जो हो, वह चल नहीं रहा था। तब मुझे सूरतवाले गाण्डीवका
खयाल आया। मैंने उसे असाधारण रूपसे बढ़िया चीज पाया। पिछले दो दिनोंसे में
अपना सारा कोटा उसी पर पूरा करता रहा हूँ और सो भी काफी कम समय में..
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
और तनिक भी थकान महसूस किये बिना। इसने मुझे मोहित कर लिया है और
मैं चाहता हूँ कि तुम भी इसे आजमाओ। यह बुनियादी तौर पर गरीबोंका चरखा
है। इसका बनानेवाला कोई कुशल कारीगर नहीं है। लेकिन चरखेका प्रत्येक भाग
मुझे लगता है कि क्षुधा पीड़ितोंको ध्यान में रख कर बनाया गया । इसकी कीमत
१ रुपये है लेकिन मुझे विश्वास है कि इसे सिर्फ ८ आने में बनाया जा सकता है।
भारतमें जितने भी चरखे हैं, यह उन सबसे ज्यादा हलका है। इसकी ओर कमसे-
कम ध्यान देनेकी जरूरत है। जितने भी चरखे मैं जानता हूँ उनमें यह सबसे कम
स्थान घेरता है। एक छोटा बच्चा भी इसे चला सकता है। अगर चकरियाँ और
तकुए भंडारमें हों तो एक दिनमें हजारों ऐसे चरखे बनाये जा सकते हैं। इसकी
बनावट बहुत ही सादी है। इस पर बारीक सूत तो सहज ही निकलता है। पहली
बार मैंने जो सूत काता वह ३० नम्बरका था। और मेरा खयाल है कि रफ्तारके
मामलेमें यह चरखा किसी भी चरखेसे टक्कर ले सकता है। इसमें कुछ सुधारोंकी
गुंजाइश है जो इसकी लागतमें एक पाईका इजाफा हुए बगैर किये जा सकते हैं।
मैंने दो बनाये हैं और इससे लागत कम हुई है। मूल चरखेमें लकड़ीके चमरख हैं
जिनसे बड़ी आवाज होती है। मैंने उन्हें निकाल कर नारियलकी रस्सी लगा दी है
जो मैंने कूड़े में से निकाली है। मैंने तकुए पर लगे खनखनानेवाले शीशेके छड़को तोड़
कर उसकी जगह कुछ धागा लपेट दिया है ताकि तकुआ अपनी जगहसे न हिले । ऐसा
करनेसे अब चरखेमें कोई आवाज नहीं होती। यह राय इस चरखेके एक नये भक्तकी
है जिसने उसे पिछले चार दिन ही आजमाया है। इसलिए इस रायमें सुधारकी
आवश्यकता हो सकती है। लेकिन निस्सन्देह आस्थावान लोगोंको इस चरखेकी आज-
माइशका पूरा मौका देना चाहिए। मैं इस चरखेके आविष्कारकको पत्र लिख कर इसमें
कुछ सुधारोंका सुझाव दे रहा हूँ और केशुको भी लिख रहा हूँ कि वह इस चरखेको
जाँचे, आजमाये और यदि मेरा आरम्भिक प्रेक्षण तनिक भी ठीक हो, तो वह परमें
सुधार करे। इस चरलेके कुछ और भी गुण हैं जिनका वर्णन में नहीं करूँगा क्योंकि
अभी मुझे कई और पत्र लिखने है तुम्हारे चरखेका तकुआ किस कारण नहीं चल
रहा है, यह अगर सोचनेसे समझ में आये तो कृपया मुझे बताना ।
व्रजकिशोर बाबू तुम्हें कैसे मिले? क्या अब वह बेहतर है? क्या तुम प्रभावती
से मिली? वह काफी दुबली हो गई है और उसके अन्तिम पत्र में लिखा है कि उसे
तेज बुखार था।
और तुम्हारा स्वास्थ्य ? तुम आश्रम में अपनेको थका कर चूर मत कर देना ।
तुम कमलावन लुंडीसे मिली होगी। यह कहने की जरूरत नहीं कि तुम उसे मित्र
बिना लोगी। वह बहुत भली स्त्री मालूम पड़ती है।
हम दोनोंका स्वास्थ्य बहुत
सब्जियोंवाला प्रयोग सफल सिद्ध
खुशी है कि सूखे मेवे छोड़नेसे भी
बढ़िया है। मेरे वजनमें कुछ बढ़ोतरी ही हुई है।
हुआ दिखता है और मुझे यह जानकर बहुत ही
खर्चमें काफी कमी होती है। सब्जियोंमें मैं पिछले
दो दिनोंसे पालक ले रहा हूँ जिससे पेट अपने-आप साफ हुआ है। मैं कभी-कभी
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र दूधीबहन देसाईको
१९९
शकरकन्द खाता हूँ। मुझे आशा है कि अब तक तुम्हें मेरे सभी पत्र मिल गये होंगे ?
मैंने किसी सप्ताह नागा नहीं किया है।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५४१४ ) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६४८ से भी ।
२८२. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
५ अक्टूबर, १९३०
चि० मनु,
तुझे बुखार कैसे आ गया ? अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखनेके कारण तू तो इनाम
पाने योग्य है। अपने उद्योगसे ही तू अपना शरीर बना सका है और उसे बनाये
रखना भी तेरा ही काम है। जब काकासाहब छूटें तब तक तू एक प्रशिक्षित कार्य-
कर्ताके रूपमें तैयार हो जाना ।
गुजराती (जी० एन० ७७६५ ) की फोटो नकलसे।
चि० दूधीबहन,
२८३. पत्र : दूधीबहन देसाईको
बापूके आशीर्वाद
यरबडा मन्दिर
५ अक्टूबर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। तुम कक्षाओंको पढ़ाती हो, यह बात मुझे बहुत अच्छी
लगती है। अपनेको भूलकर उक्त कार्यमें खूब रस उत्पन्न करना। सभी बालकोंको
मनु समझकर अपना लेना। तुम्हारे पत्र लिखनेसे मेरा कार्य तनिक भी नहीं बढ़ता।
मुझे समय-समय पर लिखती रहना और यदि मुझसे कुछ पूछना चाहो, पूछना। अब
तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? कुल मिलाकर तुमपर उपवासका कैसा प्रभाव पड़ा जान
पड़ता है ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४५४ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : वा० गो० देसाई
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गोविन्द,
२८४. पत्र : गोविन्द पटेलको
परवडा मन्दिर
६ अक्टूबर, १९३०
तेरा सुन्दर अक्षरोंमें लिखा हुआ पत्र मिला । समय-समय पर अपनी गतिविधिके
बारेमें लिखते रहना। क्या तू कुछ पढ़ रहा है? अब तेरा वजन कितना है ?
गुजराती (जी० एन० ३९४५ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
२८५. पत्र : प्रभावतीको
परवडा मन्दिर
६ अक्टूबर, १९३०
चि० प्रभावती,
तेरे
तुझे मैंने सीधे ही एक पत्र भेजा है; उम्मीद है वह मिल गया होगा।
तारकी बाट जोह रहा हूँ तू बीमार क्यों पड़ जाती है? देखना, अपना स्वास्थ्य
खराब न करना। यदि वहाँ स्वास्थ्य नहीं सुधरता तो आश्रम चली जाना। तबीयत
की खातिर आश्रम जानेसे कोई इनकार नहीं करेगा। चूंकि तू पटनायें है, इसलिए
मुझे सबके समाचार दे सकती है। मैं आनन्दसे हूँ। काकासाहब का स्वास्थ्य अच्छा
होता जा रहा है।
गुजराती (जी० एन० ३३७५ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८६. पत्र : शान्ता शंकरभाई पटेलको
चि० शान्ता (पटेल),
यरवडा मन्दिर
६ अक्टूबर, १९३०
तेरा पत्र मिला। तूने ठीक विवरण दिया है किन्तु अबतक अपनी लिखावट
नहीं सुधारी है। यदि तू सुधारनेकी कोशिश करेगी तो लिखावट अवश्य सुधर जायेगी ।
यदि तू अपनी लिखावट अभी नहीं सुधारेगी तो वह मेरी जैसी खराब रह जायेगी। तू
यह समझती है न कि किसीको बुरी लिखावटमें पत्र लिखने में भी हिंसा दोष ही है।
गुजराती (जी० एन० ४०५४) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
२८७. पत्र : बलभद्रको
परवडा मन्दिर
६ अक्टूबर, १९३०
चि० बलभद्र,
तेरा पत्र मिला । यदि सचमुच ही मथुरादास भाई तुझे ले जानेको तैयार हों और
नारणदास भाई तुझे जानेकी अनुमति दे दें तो इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती।
तू अपनी लिखावट सुधारना और अपना वजन बढ़ाना।
गुजराती (जी० एन० ९२१२) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० भगवानजी,
२८८. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
६ अक्टूबर, १९३०
तुम्हारे पत्र पढ़ गया। तुम्हारे स्वभावमें वहमकी मात्रा अधिक है इसलिए
तुम्हारी राय सदोष हो सकती है। फिर भी तुम्हारा धर्म अपने ऊपर पूरी चौकसी
रखना है तुम्हारा धर्म यह है कि तुम्हें जो बुराई दीख पड़े उसके बारेमें नारणदास
को बता दो और फिर चुप रहो। तभी तुम आगे बढ़ सकोगे। जबतक आश्रममें
एक भी ऐसा व्यक्ति है जो सत्यादि व्रतोंका पुजारी है तबतक आश्रमको कदापि
स्वामीहीन न समझना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२५ ) से । सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्ड्या
चि० नारणदास,
२८९. पत्र : नारणदास गांधीको
२ / ७ अक्टूबर १९३०
आश्रमका पुलिंदा कल मिला। अधिकतर तो जिस दिन पहुँचता है उसी दिन
मुझे दे दिया जाता है।
हरिलाल देसाईको पत्र लिख रहा हूँ उसे पढ़ लेना। आज गिरिराजके बारेमें
कुछ लिखनेकी जरूरत नहीं । तुम्हें जैसा ठीक लगे वैसा करना। जैनूके बारेमें पढ़कर
खुशी हुई। भगवानजीको लिख रहा हूँ। उसके पत्रका मुझपर असर नहीं पड़ेगा।
उसका स्वभाव में जानता हूँ। मधुके पत्र से मुझे वह बहुत निर्दोष बालिका लगी है,
नवीन आदि धीरे-धीरे सादगी सीख लेंगे, ऐसा मानता हूँ। तुम्हारा विश्वास मुझे
अच्छा लगता है। विश्वास करनेवालेने इस संसारमें कभी कुछ खोया नहीं। अविश्वासी
कभी कुछ पाता नहीं और कई बार तो खो ही बैठता है, और शान्ति खोकर
अशान्ति मोल लेता है। मलेरियावालों से तीन बातोंका ध्यान रखनेको कहना। टट्टी
साफ हो, अपने-आप न आये, तो जुलाब लें या एनीमाका इस्तेमाल करें। बुखार
उतर जाने पर भी एक सप्ताह तक पांच ग्रेन कुनैन नींबूके रसमें घोल कर उसमें १०
या १५ ग्रेन सोडा डालनेके बाद सोडावाटरकी तरह पी जायें। उसमें उफान आता
है, और आना भी चाहिए। और बुखार उतरनेके बाद कमसे कम एक सप्ताह दूध
तथा मुनक्का या उबली हुई सब्जी पर रहें। जिन्हें बुखार नहीं है, पर मच्छर परे
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
२०३
शान करते हों, वे शरीरके खुले भाग पर मिट्टीका तेल मलकर सोयें। सबको अपना
पेट तो साफ रखना ही चाहिए। अमीदासके बारेमें चिन्ता तो जरूर होती है। मेरे
पत्रका कुछ असर हुआ हो और वह दूध लेने लगा हो तो अच्छा है।
पूंजाभाईको जैसा ठीक लगे वैसा करें और रहें। चन्द्रशंकर जिस उदासी वैद्यसे
उपचार करवाता है वह शायद जमनाके लिए भी ठीक रहेगा। चन्द्रशंकर उसकी बहुत
तारीफ करता है। पता लगाना। गंगाबहनको लिखा पत्र पढ़ लेना। उसे समय और
धीरज देना। वह काकासाहब को देखनेके बहाने भी पूना आ जाये तो तीन दिनके
लिए वायु परिवर्तन हो जायेगा। नाथजीसे आग्रह करते ही रहना। उनकी उपस्थिति
भी गंगाबहनके लिए शान्तिप्रद हो सकती है। महादेवकी माताजीसे कहना कि उन्होंने
आकर अच्छा किया है। अब जल्दी दिहेण वापस जानेका विचार न करें। हो सके
तो आश्रम में ही रहने लगे। छगनलालको लिखा पत्र पढ़ना । मुझे पत्र लिखने में कैसी
मर्यादाका पालन करना चाहिए, उससे यह मालूम होगा। जिसने उसका पालन न किया
हो उसका पत्र वहीं रोक लेना। खड़ग बहादुरके पत्रमें उसका उल्लंघन हुआ मानता हूँ ।
प्रेमावहन भी चिन्तित हो गई है। उसको लिखा पत्र पढ़ लेना । उसे सान्त्वना देना ।
कमलाबहन लुंडीका पत्र पढ़ना। उसके कई सुझाव अपनाये जानेके योग्य है।
४ अक्टूबर १९३०
छगनलाल जोशीको लिखा पत्र पढ़ना । उसमें जिन मर्यादाओंको सूचित किया
है सभी उनका पालन करें। उनका उल्लंघन करनेवालोंके पत्र वहीं रोक लेना ।
खड़ग बहादुरका पत्र ऐसा ही माना जायेगा। सभी पत्र तुम पढ़ो ऐसा बोझ में
तुमपर डालना नहीं चाहता। किन्तु नया व्यक्ति हो तो उसके पत्र एक नजर देख
जाओ। बहनोंके पत्र में तो आपत्तिके योग्य कुछ नहीं होता। इसलिए थोड़े ही देखने
लायक होंगे। मुझे कई बार यह विचार तो आता ही है कि यहाँ जो पत्र में भेजता
हूँ उन्हें छाँटने और सब लोगों तक भेजनेका काफी बोझ पड़ जाता होगा। उसे
कैसे कम किया जाये, यह समझ नहीं आता। न लिखना भी योग्य नहीं है; इसलिए
अनिवार्य समझकर यह बोझ लादता जाता हूँ ।
हरिलाल देसाईका पत्र पढ़ना ताकि उसमें लिखे सुझावोंका तुम्हें ध्यान रहे ।
गाण्डीय चरखा अभी चलाना शुरू किया है। मुझे वह अच्छा लगा है। उसपर
उसी गति से काल सका हूँ जितनी दूसरे पेटी चरखे पर है। गति और बढ़ानेकी आशा
करता हूँ। इसमें कई और सुधार सम्भव हैं, तब शायद यह और भी सम्पूर्ण बन
सके। उसके बारेमें ईश्वरलाल बीमावालाको जो लिखा है वह पढ़ना । मीराबहनके
पत्र में भी लिखना है उसे भी पढ़ लेना। मैं चाहता हूँ कि आश्रम में कोई उसे
चलाकर देखे। तुम खुद भी देख लेना। मैं ईश्वरलालको दो-तीन और चरखे भेजनेको
लिख रहा हूँ। मैंने बहुत से चरखे देखे है किन्तु सबमें अभी तो यही अभ्यास करने
लायक लगा है। और जैसे अनुभव होता जायेगा वैसे लिखूंगा ।
१. पिछले चार वाक्योंमें पुनरुक्ति अनजाने में हो गई लगती है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
रुई और सूतकी माला मिल गई है।
लगा है क्योंकि बल्लभभाईके लिए पूनियाँ
हूँ किन्तु उसकी जल्दी नहीं।
मंगल प्रभात, ७ अक्टूबर १९३०
रुईका आना तो खास तरहसे अच्छा
यहींसे जाती हैं। काँटेकी राह देख रहा
नम्रता: इसे व्रतोंमें पृथक स्थान नहीं है और हो भी नहीं सकता । अहिंसाका
यह एक अर्थ है, अथवा यों कहें कि यह उसके अन्तर्गत है; परन्तु नम्रता अभ्याससे
प्राप्त नहीं होती, वह स्वभावमें ही आ जानी चाहिए। जब आश्रमकी नियमावली
पहले पहल बनी तब मित्रोंके पास उसका मसविदा भेजा गया था। सर गुरुदास
बनर्जीने नम्रताको व्रतोंमें स्थान देनेका सुझाव दिया, तब भी उसे व्रतोंमें स्थान न
देनेका मैंने यही कारण बतलाया था जो यहाँ लिख रहा हूँ। यद्यपि व्रतोंमें उसे स्थान
नहीं है तथापि वह व्रतोंकी अपेक्षा शायद अधिक आवश्यक है; आवश्यक तो है ही ।
परन्तु नम्रता किसीको अभ्याससे प्राप्त होती नहीं देखी गई। सत्यका अभ्यास किया
जा सकता है, दयाका अभ्यास किया जा सकता है, परन्तु नम्रताके सम्बन्धमें कहना
चाहिए कि उसका अभ्यास करना दम्भका अभ्यास करना है। यहाँ नम्रतासे तात्पर्य
उस वस्तुसे नहीं है जो बड़े आदमियोंमें एक दूसरेके सम्मानार्थं सिलाई-पढ़ाई जाती
है। कोई बाहरसे दूसरेको साष्टांग नमस्कार करता हो, पर मनमें उसके सम्बन्धमें
तिरस्कार भरा हुआ हो तो यह नम्रता नहीं है, पाखण्ड है। कोई रामनाम जपता
रहे, माला फेरे, मुनि सरीखा बनकर समाजमें बैठे, पर भीतर स्वार्थ भरा हो, तो
वह नम्र नहीं है, पाखण्डी है। नम्र मनुष्य खुद नही जानता कि कब वह नम्र है।
सत्यादिका माप हम रख सकते हैं, पर नम्रताका नहीं। स्वाभाविक नम्रता छिपी
नहीं रहती, तथापि नम्र मनुष्य खुद उसे नहीं देख पाता। वशिष्ठ विश्वामित्रका
उदाहरण तो आश्रममें हम लोगोंने अनेक बार सुना और समझा है। हमारी नम्रता
शून्यता तक पहुँच जानी चाहिए। हम कुछ हैं, यह भूत मनमें घुसा कि नम्रता हवा
हो गई और हमारे सभी व्रत मिट्टीमें मिल गये। व्रत पालन करनेवाला यदि मनमें
अपने व्रत पालनका गर्व रखे तो व्रतोंका मूल्य खो देगा और समाजमें विषरूप हो
जायेगा। उसके व्रतका मूल्य न समाज ही करेगा, न वह खुद ही उसका फल
भोग सकेगा। नम्रताका अर्थ है अहंभावका आत्यन्तिक क्षय विचार करनेपर मालूम
हो सकता है कि इस संसारमें जीवमात्र एक रजकणकी अपेक्षा अधिक कुछ नहीं है।
शरीरके रूपमें हम लोग क्षणजीवी हैं। कालके अनन्त चक्रमें सौ वर्ष क्या है; परन्तु
यदि हम इस चक्करसे बाहर हो जायें, अर्थात् 'कुछ नहीं हो जायें तो हम सब-
कुछ हो जायें। कुछ होनेका अर्थ है ईश्वरसे- • परमात्मा से सत्यसे पृथक हो
जाना । कुछका मिट जाना परमात्मामें मिल जाना है। समुद्रमें रहनेवाला बिन्दु समुद्रकी
महत्ताका उपभोग करता है, परन्तु उसका उसे ज्ञान नहीं होता। समुद्रसे अलग होकर
ज्यों ही अपनेपनका दावा करने चला कि वह उसी क्षण सूखा। इस जीवनको पानीके
बुलबुलेकी उपमा दी गई है, इसमें मुझे जरा भी अतिशयोक्ति नहीं दिखाई देती ।
ऐसी नम्रता --
अभ्याससे कैसे आ सकती है? पर व्रतोंको सही रीतिसे
शून्यता
-
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
२०५
समझ लेनेपर नम्रता अपने-आप आने लगती है। सत्यका पालन करनेकी इच्छा रखने-
बाला अहंकारी कैसे हो सकता है? दूसरेके लिए प्राण न्यौछावर करनेवाला अपना
स्थान कहाँ घेरने जायेगा ? उसने तो जब प्राण न्यौछावर करनेका निश्चय किया, तभी
अपनी देहको फेंक दिया। क्या ऐसी नम्रता पुरुषार्थरहितता न कहलायेगी ? हिन्दू-
धर्म में ऐसा अर्थ अवश्य कर डाला गया है और इससे बहुत जगह आलस्यको, पाखण्ड
को स्थान मिल गया है। वास्तव में नम्रताका अर्थ तीव्रतम पुरुषार्थ है: परन्तु यह सब
परमार्थके लिए होना चाहिए। ईश्वर स्वयं चौबीसों घंटे एकसा काम करता रहता
है, अँगड़ाई लेने तकका अवकाश नहीं लेता, हम उसके हो जायें। उसमें मिल जायें तो
हमारा उद्योग भी उसके समान ही अतन्द्रित हो गया हो जाना चाहिए। समुद्रसे
अलग हो जानेवाले विन्दुके लिए हम आरामकी कल्पना कर सकते हैं; परन्तु समुद्रमें
रहनेवाले बिन्दुके लिए आराम कहाँ ? समुद्रको एक क्षणके लिए भी आराम कहाँ
मिलता है? ठीक यही बात हमारे सम्बन्धमें है। ईश्वररूपी समुद्रमें हम मिले और
हमारा आराम गया, आरामकी आवश्यकता भी जाती रही। यही सच्चा आराम है।
यह महा अशान्तिमें शान्ति है। इसलिए सच्ची नम्रता हमसे जीवमूर्तिकी सेवाके लिए
सर्पिणकी आशा रखती है। सबसे निवृत्त हो जानेपर हमारे पास न रविवार रह
जाता है, न शुक्रवार, न सोमवार इस अवस्थाका वर्णन करना कठिन है, परन्तु
वह अनुभवगम्य है। जिसने सर्वार्पिण किया है उसने इसका अनुभव किया है। हम
सब अनुभव कर सकते हैं। यह अनुभव करनेके उद्देश्यसे ही हम लोग आश्रम में एकत्र
हुए हैं।
सब व्रत, सब प्रवृत्तियाँ यह अनुभव करनेके लिए ही हैं। जो सेवा प्राप्त
हो जाये वही करते-करते किसी दिन यह हमारे हाथ लग जायेगा। केवल उसीको
खोजने जानेसे यह अनुभव प्राप्त नहीं होता ।
[ पुनश्च ]
आज ६१ पत्र हैं।
बापूके आशीर्वाद
खुदको आश्रमसे कोई लोग मिलने जायें। मणिवहनके बारेमें कुछ सबर
हो तो लिखना ।
गुजराती ( एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कुसुम (देसाई),
२९०. पत्र : कुसुम देसाईको
यरवडा मन्दिर
७ अक्टूबर, १९३०
पिछले सप्ताह में प्यारेलालसे मिल सका। मिलनेके लिए थोड़ा ही समय दिया
गया था। वह कमजोर तो जरूर हो गया है लेकिन अब ठीक । उसे दूध आदि
मिलता है। उसकी देख-भाल अच्छी होती है। अब मेरा खयाल है कि उससे फिर
मिल सकूंगा ।
गुजराती (जी० एन० १८०६) की फोटो नकलसे।
चि० शारदा (बबु ),
२९१. पत्र : शारदा सी० शाहको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१० अक्टूबर, १९३०
तेरा पत्र मिला कातना अच्छा नहीं लगता, इसका एक कारण तो यह है कि
तुझे अभी इस बातका पूरा भान नहीं हुआ कि उसके द्वारा करोड़ों लोगोंकी सेवा होती
है, अथवा यह कारण होना चाहिए कि इस सेवामें तुझे रसका ही अनुभव नहीं होता ।
ऐसा हो तो अपने विचारका शोधन कर लेना। दूसरा कारण यह हो सकता है कि
कातनेकी कला अभी तूने हस्तगत न की हो। सूत अच्छा निकले, तार टूटे नहीं, चरखा
बिना किसी तरहकी कटु आवाज करते हुए चलता रहे तो इस क्रियामें रसका अनुभव
हुए बिना नहीं रहता। किसी प्रदर्शनीमें किसी दिन तूने आन्ध्रकी बहनोंको कालते हुए
देखा है ? वे सचमुच कातती है। कातनेकी ऐसी क्रियामें किसे रस न आयेगा ?
'गीता' की भी यही बात है। उसका मूल्य तू समझे तो ही वह तुझे भायेगी ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १००२३) से । सौजन्य: शारदाबहन जी० चोखावाला
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० हरिइच्छा,
२९२. पत्र : हरिइच्छा - देसाईको
परवडा मन्दिर
१० अक्टूबर १९३०
तेरा पत्र मिला। चन्दनको धन्यवाद । तुझे भी प्रतियोगितामें अपना नाम देना
चाहिए। तुझे जो इनाम मिले, उसका उपयोग तू चाहे तो परोपकारके लिए करना ।
जिन लोगोंको प्रतियोगिता आदिके द्वारा प्रोत्साहनकी आवश्यकता नहीं है वे लोग दूसरोंके
लिए प्रतियोगितामें भाग लें। चन्दन, तारा और वसन्तको आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ७४६६) की फोटो नकलसे।
vिo कपिल,
२९३. पत्र : कपिलराय मेहताको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१० अक्टूबर, १९३०
तेरा पत्र विले पार्लेमें मिल गया है। पर निकट होनेके बावजूद किसीको घरमें
मिलनेवाली सुविधाओं या सगे-सम्बन्धियोंके प्रेमकी खातिर वहाँ नहीं जाना चाहिए,
किन्तु संगी-साथियोंका बोझ हलका करनेके खयालसे और उनकी इच्छासे तीमारदारीके
लिए पर जानेमें दोष नहीं हो सकता। यह व्यक्तिकी मानसिक स्थिति पर निर्भर
है। तुझे अपने स्वास्थ्यका ध्यान रखना चाहिए और उसे सुधार लेना चाहिए। तेरा
स्वास्थ्य इस जवानीमें नाजुक हो जाये, यह बात ठीक कैसे लग सकती है? सूर्य स्नान,
प्राणायाम, शवासन और अल्पाहार दमेमें बहुत सहायता पहुँचाते हैं ।
काकासाहब आनन्दसे हैं ।
उनके और बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ३९७५) की फोटो नकलसे ।
Shotos
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० पण्डितजी,
२९४. पत्र : नारायण मोरेश्वर खरेको
११ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। आशा है अब बुखार बिलकुल चला गया होगा। 'रामायण'
प्रवचनके द्वारा ग्रामवासियोंके सम्पर्क में आनेका तुम्हारा सुझाव मुझे पसन्द है। किन्तु
सम्पर्क में आनेको ही अपना उद्देश्य मत बना लेना। 'रामायण' तो इसी उद्देश्यसे
बाँचनी है कि लोगोंको उपदेश मिले और ऐसा करते हुए यदि उनके सम्पर्क में आनेका
अवसर मिले तो ठीक है। अर्थात् यह निश्चय करके तुम्हें 'रामायण' बाँचना आरम्भ
करना चाहिए कि तुम उसे बीचमें बन्द नहीं करोगे या फिर लोगोंके सम्पर्क में
आनेके लिए जैसे तुम अन्य बहुतसे काम करते हो वैसे ही बीच-बीचमें 'रामायण'
यांचोगे ? इन दोनोंके भेदको समझ लेना गोखलेके संस्मरण में शायद ही लिख
पाऊँ । चरखेकी लगन मुझे और कुछ करने ही नहीं देती।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २४० ) की फोटो नकलसे सौजन्य : लक्ष्मीबाई खरे ।
२९५. पत्र प्रभावतीको
यरवडा मन्दिर
११ अक्टूबर १९३०
चि० प्रभावती,
तेरा पत्र मिला। मैंने पटनाके पते पर जो पोस्टकार्ड भेजा था, लगता है वह
तुझे नहीं मिला क्योंकि उसमें मैंने तुझे एक तार भेजनेको कहा था; तार नहीं
मिला। अब तो पत्र परसे पता चलता है कि तेरी सासका देहान्त हो गया है और
तू तथा जयप्रकाश बहुत घबरा गये हो। जो मृत्यु छोटे, बड़े, सबके साथ लगी है,
उससे घबराना कैसा ? और फिर सासजी बीमार थीं। वे तो दुःखसे मुक्ति पा गई ।
अतएव पीछे रहनेवाले लोगोंका सन्ताप तो स्वार्थपूर्ण है। कर्तव्य तो अब यह है कि
तू जल्द ही स्वस्थ हो जा। अभी तो रोगसे मुक्त हो गई नहीं जान पड़ती। अब तू
मुझे सीधे पत्र लिख सकती है । आश्रमकी मारफत तो भेजती ही रहना। तुम सबको
भगवान धीरज दे। मेरी तबीयत अच्छी है। वजन १०४ है, यह अच्छा कहा जा
सकता है।
गुजराती (जी० एन० ३३७२) की फोटो नकलते ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२९६. पत्र : मोतीबहन चोकसीको
यरवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर, १९३०
चि० मोतीबहन,
बहुत इन्तजार करवानेके बाद आखिरकार तुमने पत्र लिखा। जितने बच्चोंको
तुम्हारी देखरेखमें रखा जाये उन सबकी तुम अपना ही मानकर चलना 'गीताजी के
कुछ अध्याय कण्ठस्थ कर लेनेसे तुम्हें अधिकाधिक शान्ति अनुभव होने लगेगी। एक-
एक श्लोक करके भी कण्ठस्थ कर सकती हो। लोकका अर्थ भली-भाँति समझ लेने
और उसका उच्चारण शुद्ध हो जानेके बाद उसे याद करना। विट्ठल, महावीर आदिको
यह सब आता है।
गुजराती (जी० एन० ३७४६ ) की फोटो नकलसे ।
२९७. पत्र : महावीर गिरिको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
११ अक्टूबर, १९३०
चि० महावीर,
तेरा पत्र मिला। सिद्धपुरमें तेरे साथ और कौन है?
मुझे पत्र तो लिखते ही रहना और छोटी-मोटी सभी खबरें
गुजराती (जी० एन० ६२१९ ) की फोटो नकलसे।
तू जहाँ भी रहे वहाँसे
देते रहना ।
बापूके आशीर्वाद
४४-१४
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२९८. पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको
परवडा मन्दिर
११ अक्टूबर, १९३०
भाई विठ्ठलदास,
तुम्हारे द्वारा भेजे गये आंकड़ोंके साथका पत्र भी मिला। मैं जानता हूँ कि
फिर खादी इकट्ठी हो गई है। हताश मत होना। मेरे विचारसे अभी ज्वार पूरी
तरह आया ही नहीं है। यदि हममें श्रद्धा होगी तो आयेगा अवश्य ।
गुजराती (एस० एन० ९७७४ ) की फोटो नकलसे।
२९९. पत्र : रमाबहन जोशीको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर, १९३०
चि० रमाबहन,
तुम्हारा पत्र मिला। इस बार तो बहुत दिनों बाद तुमने पत्र लिखा है।
लेकिन यह अपने आपमें पूर्ण पत्र है । बहनोंमें जो बल है उसे में ईश्वर प्रदत्त मानता
हूँ । अतएव उन्हें अपने काममें अवश्य सफलता मिलती है। हमीदाबन तुम्हारे साथ
है, यह तो बहुत अच्छा हुआ। बालिका होने पर भी उसका मुझपर समझदार और
साध्वी स्त्रीका-सा प्रभाव हुआ है। बा सचमुच बहुत दौड़-धूप कर रही है। मैं देख
रहा हूँ कि अब सारी बहनों पर ज्यादा जिम्मेदारी आयेगी। लेकिन हमें चाहिए कि
हम तो नौवें और दसवें अध्यायके पहले तीन इलोकोंका स्मरण करें और निश्चिन्त
रहें ।
गुजराती (जी० एन० ५३२५ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
२. भगवद्गीताके ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२४९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० भगवानजी,
३००. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
परवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर, १९३०
आश्रम सामान्य कोटिके मनुष्योंके लिए है। जैसा तुम समझते हो यदि गिरि-
राजजी उस स्थितिको प्राप्त हो गये है तो यह नहीं कहा जा सकता कि आश्रमने
उनका त्याग किया, बल्कि यह कहा जायेगा कि गिरिराजजी की महान आत्मा आश्रममें
समा नहीं सकती। नारणदासने जो निर्णय दिया है वह आध्यात्मिक है। आश्रम में
हम अमुक उद्देश्योंको लेकर चले हैं, उनको ध्यानमें रखते हुए व्यवहार करना आध्या-
त्मिक दृष्टिकोण है। मैं स्वयं मानता हूँ कि गिरिराज मोहमें पड़ गये हैं। हम जो
कार्य कर रहे हैं उससे यदि हमें आत्मदर्शन न हो तो मैं स्वयं कदापि वह कार्य न
करूँ और न किसीसे करनेके लिए कहूँ। यह सम्भव है कि भंगीके यहाँ ईश्वरका
वास हो और वेदान्तीके यहाँ नहीं। हमारा कर्म उच्च भावनाके अनुरूप होना चाहिए।
गिरिराज सज्जन है, विनम्र है, इसलिए भटककर वापस आ जायेंगे। यदि ये हमारे
मार्गको झूठा सिद्ध करेंगे, उनसे हम कुछ सीखेंगे तो भी इसका यश आश्रमको ही
जायेगा। तुम निश्चिन्त रहना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२६ ) से सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
चि० काशिनाथ,
३०१. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
परवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। मित्रोंके देहान्त पर व्यथित होनेका कोई कारण नहीं है।
बिना मौत कोई नहीं मरता, अकाल मृत्यु मिथ्या भ्रम है। एक दिन जीवित रहकर
मरनेवाले बालककी भी अकाल मृत्यु नहीं होती। उसकी मृत्युका अर्थ है कि उस
देहके कर्म पूरे हो गये हैं। मृत्युके कारण हमें जो दुःख होता है वह केवल अज्ञान
और स्वार्थवश होता है। आत्मा धर्मके प्रति अज्ञानके कारण, और चूंकि हम स्वयं
मरना नहीं चाहते, इस कारण मित्र आदिको मृत्युसे हम विचलित हो उठते हैं। हाँ,
विधवाओंके प्रति हमारा कर्त्तव्य है । यदि ये आना चाहें और नियमोंका पालन कर सकें
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
तो मेरे विचारमें उन्हें लेनेमें हमें कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए। किन्तु इसका उत्तर-
दायित्व नारणदास और गंगाबहन पर है इसलिए उनसे विचार-विमर्श कर लेना। यह
पत्र उन्हें पढ़वा देना ।
हालांकि कलावतीकी परिस्थिति विषम है, किन्तु उसकी ठीक परख हो जायेगी
और उसकी दृढ़ताकी भी परीक्षा हो जायेगी। मैं उसे पत्र लिख रहा हूँ। कुमारप्पाके
भाषणका हिन्दी अनुवाद मिल गया है। महावीरप्रसाद के उत्साहका क्या कहना !
'गीता' के तीसरे संस्करणकी तैयारी वह आजसे कर रहा है।
तुम्हारी मानसिक ग्लानि अब तो कट ही जानी चाहिए। यदि निराशाजनक
विचार और विकार आदि तुम्हारे मनमें उठें तो उन्हें लिख डालो और इस प्रकार
उन्हें दूर करनेका प्रयत्न करते रहो। उनके बारेमें सोच-विचार नहीं करना चाहिए।
उक्त विचार क्योंकर उठे, इसे लेकर तुम्हें अपने मनमें मंथन नहीं करना चाहिए,
बल्कि मनको सद्विचारोंमें लगाये रखना चाहिए और इसका उत्कृष्ट उपाय यह है
कि जो बाह्य काम किया जाये उसीमें मनको लीन रखा जाये। इस प्रकार मनके किसी
अन्य दिशामें भटकनेका अवकाश ही नहीं रहेगा ।
गुजराती (एस० एन० ५२५४ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
३०२. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको
चि० महालक्ष्मी,
परवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर १९३०
किन्तु यदि
तुम्हारा पत्र मिला। हमें चाहे जैसी आदत क्यों न पड़ गई हो,
वह हमें अरुचिकर लगने लगे तो फिर उसे छोड़ते देर नहीं लगती। तुम्हारे जैसी
दृढ़ निश्चयवाली स्त्रीके लिए तो ऐसा करना तनिक भी कठिन नहीं है। तुम अपनी
सुराक पर जमी हुई हो, यह अच्छा है। शराबकी दुकानों पर धरना आदि देनेके
मामलोंमें हम जब लोगोंको ढिलाई बरतते या उनकी श्रद्धाको डगमगाते देखें तो हमें
अधिक सजग हो जाना चाहिए तथा अपनी श्रद्धाको तेजपूर्ण बना लेना चाहिए।
आखिरकार इसका असर अवश्य होगा ।
गुजराती (जी० एन० ६८००) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० रोहिणी,
३०३. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको
परवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर १९३०
तेरा सुन्दर पत्र मिला। यदि हमीदा गुजराती सीख जायेगी तो उसका यश
तुझे ही मिलेगा न ? शराबकी दुकानों पर धरना देनेका काम कठिन है, इसीलिए
तो उक्त काम बहनोंको सौंपा गया है। यह कार्य करनेवालोंमें अति पवित्रता और
अति श्रद्धा होनी चाहिए, और ये दोनों गुण पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंमें विशेष मात्रा में
होते हैं।
गुजराती (जी० एन० २६५३) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
३०४. पत्र : वसुमती पण्डितको
परवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर १९३०
चि० वसुमती,
मुझे पत्र पढ़नेकी परेशानी से बचानेकी जरूरत नहीं है। पिताको अपने पुत्र-
पुत्रियोंके पत्र पाने की भूख तो बनी ही रहती है। दस या पन्द्रह दिन तक मैंने शाक-
भाजी और दूध-दही ही लिया; इसलिए मैंने मुनक्के और खजूर तक खाना छोड़
दिया था। आजसे मुनक्के और खजूर लेना शुरू कर दिया है और कुछ दिनों बाद
मैं फिर शाक-भाजी पर आ जाऊँगा। ऐसा करने से यह पता चल जायेगा कि मुझे
क्या माफिक आता है। यदि शाक-भाजीसे काम चल जायेगा तो बचत ही होगी।
किन्तु मैं किसी बातका आग्रह नहीं करूँगा। फिलहाल मेरा वजन १०४ पोंड है,
जोकि अच्छा ही माना जायेगा। तू कैसी है ?
गुजराती (एस० एन० ९२९०) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगाबहन,
३०५. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
यरवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । मणिबनके जानेसे जो विचार आये हों वे और दूसरे
विचार भी मुझे जरूर लिखना तुम्हारा पिछला पत्र ठीक था। हम जैसे हों, संसार
भले हमें वैसा देखे और जिसपर हमें विश्वास हो उसे तो हम अपनी इच्छासे
बतायें। कोई भी अपनी शुभेच्छाके अनुसार एकाएक आचरण नहीं कर सकता। किन्तु
प्रयत्न तो सभी कर सकते हैं। वह तुम रोज करती ही हो इसलिए अन्ततोगत्वा
अच्छा ही होगा।
[ गुजराती से ]
बापूके आशीर्वाद
बाबुना पत्रो ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७६१ से भी ।
सौजन्य : गंगावहून वैद्य
३०६. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
परवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर १९३०
चि० प्रेमा,
दोनों अर्थ अच्छे हैं। नाथजीका अर्थ अधिक अधिकृत हो सकता है।
तू शान्त हो गई है, यह हमारा सौभाग्य है ।
सरोजिनी देवीके हृदयमें प्रवेश करना। उसे सहानुभूति और प्रेमकी जरूरत
है। ऐसे कामोंके लिए थोड़ा समय निकालना। अभी तो तुझे बड़ी जिम्मेदारीके काम
करने हैं।
अब तेरी स्वास्थ्य सम्बन्धी चिन्ता दूर हो गई क्या ? शरीर बिलकुल चंगा
लगता है ? क्या खुराक लेती है ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६८६ ) से सौजन्य : प्रेमावहून कंटक; जी० एन०
१०२३८ की फोटो नकलसे भी ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० दुर्गा,
।
३०७. पत्र : दुर्गा गिरिको
परवडा मन्दिर
१२ अक्टूबर, १९३०
तेरा पत्र मिला में हरगिज देरमें जवाब नहीं देता। बल्कि तु लिखती नहीं,
इसीलिए मानती है कि मेरा पत्र देरमें पहुँचा। तेरे पत्रके अन्तमें लिखे हुए अक्षर
सत्यादेवीके ही हों, तो वे तेरे जैसे तो हैं ही। अतएव अब कुछ ही दिनोंमें उसे
तुझसे आगे बढ़ जाना चाहिए।'
बापूकी विराट् वत्सलता
बापूके आशीर्वाद
३०८. पत्र : मीराबहनको
[१३ अक्टूबर १९३०
चि० मीरा,
आशा है तुम्हें वे पत्र मिल गये होंगे जो रास्ता भटक गये थे। मुझे विश्वास
है कि उन्हें बीच में रोका नहीं गया होगा, परन्तु एक स्थानसे दूसरे स्थान पर भेजने में
देर हुई होगी।
तुम जर्जर स्थितिमें लौटी हो, अतः स्पष्ट है कि जिसे तुम मेरी 'झिड़की'
कहती हो, वह बिलकुल उचित थी सबसे बुरी बात तो यह हुई कि तुम एक
बुरी दुर्घटनाकी शिकार बनीं। अब अपना वचन पूरा करके पूरा आराम लो। यह
जानकर मुझे बड़ी राहत मिली कि तुम सरदारसे मिलती रही थीं। इससे जाहिर
होता था कि तुम्हारी तबीयत सफर करने लायक थी।
मैं अभी तक गाण्डीव चरखे पर ही काम कर रहा हूँ और उसमें मुझे जिस
आनन्दका अनुभव होता है यह न केवल बराबर बना हुआ है, बल्कि कुछ बढ़ा ही
है। अब में वैज्ञानिक ढंगसे कात रहा हूँ, यानी सूतका तार निकलनेके रास्तेके नीचे
गज भरका कपड़ा रखता हूँ। मैं एक मिनटमें ८ धागे निकाल सकता हूँ और एक
१. मूल पत्र गुजरातीमें था ।
२. पुनध में जिस १००३
तारीखको हुआ था देखिए परिशिष्ट ६
पड़ी हुई है।
भजनका उल्लेख किया गया है उसका अंग्रेजी अनुवाद इसी
बैसे पत्रपर मीराबहनकी लिखावट १२-१०-१९३० तारीख
Gandhi Heritage
Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२५४
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बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
धागा कमसे कम दो फुटका होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि फी घंटे २४० तार
या ३०० गज सूत कतता है। अलबत्ता, एक घंटे में इतना तो हो नहीं पाता। लेकिन
इसका कारण गाण्डीवकी कोई खराबी नहीं है। कम सूत निकलनेका कारण तो तारका
टूटना और उसके फलस्वरूप समयका बरबाद होना है। लेकिन जबसे ध्यान लगानेका
तरीका अख्तियार किया है, तार बहुत कम टूटते हैं। इसलिए मेरी गति बहुधा २००
गज की घंटे तक पहुँच जाती है, जो मेरे लिए बहुत अच्छी है। गाण्डीवके बारेमें
मेरे विचार अभी प्रकाशित न करना। मैं उन लोगोंकी रिपोर्ट चाहता हूँ, जो आश्रममें
प्रयोग करें। सबसे अधिक तो मुझे तुम्हारी रिपोर्ट चाहिए, बशर्ते कि तुम्हारे पास इसका
प्रयोग करनेके लिए अवकाश हो और रुचि हो। मैं जानता हूँ कि मेरी तरह तुम
सबके पास ये प्रयोग करनेके लिए समय नहीं है। इसलिए उतना ही करना जितना
सम्भव हो और तभी करना जब तुम इसे जरूरी समझो। मेरे पास और कोई काम
नहीं है, इसलिए बहुत सम्भव है कि मैं किसी ऐसी चीजके गुणोंका अधिक बखान
कर देता होऊ, जिसकी मैंने पहले उपेक्षा की हो, जैसीकि मैंने की है, लेकिन जिससे
अब अपेक्षतया ज्यादा सन्तोष मिल रहा हो।
पिछले दो दिन में फिर किशमिश और खजूर लेने लगा हूँ, सिर्फ यह देखनेके
लिए कि मुझे जो जुकाम हो गया है उसका सम्बन्ध तरकारियोंसे तो नहीं है ।
संयोगसे हो या और कोई बात हो, मगर आज यह लगभग मिट गया है। बहरहाल,
तबीयत बिलकुल अच्छी है। वजन १०४ पौंड है।
सप्रेम,
[ पुनश्च : ]
बापू
आज मैंने १०० वा भजन पूरा कर लिया है। हिन्दुस्तानी भजनोंमें केवल दो का
अनुवाद करना बाकी रहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस कामको मैंने लगभग
आधा पूरा कर लिया है।
से भी।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४१५) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६४९
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२५५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>11 AUG 1972
चि० रामदास,
३०९. पत्र : रामदास गांधीको
यरवडा मन्दिर
१३ अक्टूबर १९३०
जबतक तू बाहर है तबतक हर सप्ताह तेरा पत्र मुझे मिलना चाहिए। तेरा
स्वास्थ्य कैसा है ? खाना ठीक-ठीक पच जाता है? क्या अभी तक दवा चल रही
है ? तू किस काममें लगा हुआ है? नीमू कैसी है? सुमित्रा कैसी है? खादी-
सरंजाम कार्यालयके बारेमें क्या हुआ ? सच्ची परीक्षा तो अब होगी । किन्तु इसमें
कोई नई बात नहीं है।
गुजराती (जी० एन० ६८६० ) की फोटो नकलसे ।
चि० नारणदास,
३१०. पत्र : नारणदास गांधीको
बापूके आशीर्वाद
९/१४ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा भेजा पुलिन्दा कल रातको मेरे हाथ आया। तुम्हें डाक देरसे क्यों मिली
इसके बारेमें पता तो लगाऊँगा ही, किन्तु ऐसा तो होता ही रहेगा; इसलिए निश्चित
दिन डाक न मिले तो चिन्ता न करना। वहाँसे भेजी जानेवाली डाक नियमपूर्वक भेजते
रहना ।
आज हम दोनोंका वजन लिया गया। हर गुरुवारको लिया जाता है। काका
साहबका ११५-१६ के बीच है; इसलिए थोड़ा सुधार है। मेरा १०४ हो गया है।
चार दिनसे एनीमा बन्द है। चौलाईका साग खाता हूँ। उसका अच्छा असर हुआ
है । रतालू हमेशा के लिए बन्द नहीं किये हैं। सप्ताह में दो-तीन बार लेनेका इरादा
है और बाकी दिन कुम्हड़ा या ऐसी ही कोई दूसरी सब्जी । टमाटर तो अबतक
चल ही रहे हैं। फलकी अभीतक जरूरत मालूम नहीं हुई। वजन बना रहे तो
जिस तरह चल रहा है उसी तरह चलाते रहनेका इरादा है। यह सब स्वास्थ्यका
ध्यान रखते हुए ही करूँगा, सबके लिए इतना आश्वासन काफी होना चाहिए।
तुम्हारा पत्र लम्बा नहीं लगता। तुम्हारा बोझ न बढ़े, यह जरूर चाहता हूँ ।
मेरी डाक देखना और बांटना तथा मुझे पत्र लिखना । दूसरोंकी भेजना, यह एक काम
ज्यादा मानता हूँ। ज्यादा इसलिए कि ठीक तरहसे देखें तो मुझे यहाँसे कोई राय
व्यक्त नहीं करनी चाहिए। पत्र लिख-लिखा सकते हैं; यह एक संयोग ही है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२५६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१८
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
राधाका लम्बा जवाब मिला है। उसमें
की चोरी आदिके बारेमें लिखा
है। यह देखकर और जानकर केशु व्याकुल हुआ, यह लिखा है। यह क्या है ? * को
पत्र लिख रहा है; उसे पढ़ना ।
गिरिराजके बारेमें तुमने जो निर्णय किया है उसके बारेमें मुझे कुछ नहीं कहना ।
मैं इस निर्णयको ठीक ही मानता हूँ पूरी हकीकत तो तुमको ही मालूम है। बच्चोंका
क्या हुआ, यह सब बादमें मालूम होगा। अमीदासके लिए क्या कहें? उसकी बहादुरी
के लिए तो मनमें सम्मान उपजता ही है। दूधकी प्रतिज्ञाके लिए में जिस हद तक
जिम्मेदार हूँ, उस हद तक मुझे दुःख होगा। उसके पिता आ गये हैं इसलिए
धीरज है। उसकी सेवा किये बिना हमारा छुटकारा नहीं । रक्षा करनेवाला तो
ईश्वर ही है।
मणिबनके सर्वकी जिम्मेदारी तो भगवानजी पर ही होगी न ? मैं प्यारेलालसे
मिला हूँ। उसका स्वास्थ्य बिगड़ा नहीं है। कुछ कमजोर है। ऐसा लगता है कि
आगे भी मिलते रहेंगे। अभी उसे दूध रोटी मिलती है।
चितालियाका पत्र दिखाई नहीं दिया। मददको रकम मुझे जवानी याद नहीं।
मेरा खयाल है कि रकमको दर्ज तो कराया था। उसका कागज फाइलमें होनेकी
सम्भावना है। शिवाभाई और छगनलालको मालूम होना चाहिए। शायद रावजीभाई
को भी मालूम हो । चितालिया स्वयं भी बता सकेगा। क्या १५०० रुपये मकानके
लिए मँगाये हैं ? मालूम करके यदि योग्य लगे तो भेज देना । मुझे फिर लिखनेकी
जरूरत हो तो लिखना । उसे पत्र लिखा है; सो पढ़ लेना ।
१३ अक्टूबर १९३०
नया कानून देखा है। तुम्हारे लिए भी विचार करनेकी जरूरत तो है ही ।
किन्तु मैं यहाँसे कुछ कहना नहीं चाहता। वहाँ जो नेता हो उसीके साथ सलाह
करके जो ठीक लगे वह करते जाओ। मुझे इसमें कुछ नया नहीं लगता। ऐसा
सोचा ही था।
मंगल प्रभात १४ अक्टूबर १९३०
व्रतकी आवश्यकता: व्रतके महत्त्वके सम्बन्धमें में जहाँ-तहाँ इस लेखमालामें
लिख ही चुका होऊँगा; परन्तु व्रत जीवनके गठन के लिए कितने आवश्यक है, यहाँ
इसपर विचार करना मुझे उचित प्रतीत होता है। स्वदेशीके सिवा दूसरे सभी व्रतोंके
सम्बन्धमें लिख चुकने के बाद अब उन यतोंकी आवश्यकता पर विचार करेंगे। ऐसा
एक सम्प्रदाय है और वह प्रबल है जो कहता है कि अमुक नियमोंका पालन
करना उचित है, पर उनके सम्बन्धमें व्रत लेनेकी आवश्यकता नहीं; इतना ही नहीं,
बल्कि ऐसा करना सनकी निर्बलता सूचित करता है और हानिकारक भी हो सकता है।
इसके सिवा व्रत लेनेके बाद यह नियम अड़चन उत्पन्न करनेवाला या पापरूप मालूम
१ और २. नाम नहीं दिये गये हैं।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२५७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
"
२१९
हो तो भी उसे पकड़ रखना पड़े, यह तो असह्य है।" ये कहते हैं, "उदाहरणके
लिए, शराब न पीना अच्छा है, इसलिए नहीं पीनी चाहिए, पर कभी पी ली गई
तो क्या हुआ? दवाके रूपमें तो उसे पीना ही चाहिए। इसलिए उसे न पीनेका
व्रत तो गलेमें फंदा डालने के समान है। और जो बात शराबके बारेमें है वही बात
दूसरी चीजोंके बारेमें है। झूठ भी भलाई के लिए क्यों न बोला जाये ? मुझे इन
दलीलोंमें तत्व नहीं दिखाई देता । व्रतका अर्थ है अटल निश्चय अड़चनोंको पार
कर जानेके लिए ही तो व्रतकी आवश्यकता है। असुविधा सहन करनेपर भी जो
भंग न हो वही अटल निश्चय कहा जा सकता है। समस्त संसारका अनुभव इस
बात की गवाही दे रहा है कि ऐसे निश्चयके बिना मनुष्य उत्तरोत्तर ऊपर उठ नहीं
सकता। जो पापरूप हो, उसका निश्चय व्रत नहीं कहलाता। वह राक्षसी वृत्ति है।
और कोई विशेष निश्चय जो पहले पुण्यरूप प्रतीत हुआ हो और अन्तमें पापरूप
सिद्ध हो तो उसे त्याग करनेसे धर्म अवश्य प्राप्त होता है; पर ऐसी वस्तु के लिए
कोई व्रत नहीं लेता, न लेना चाहिए। जो सर्वमान्य धर्म माना गया है, पर जिसके
आचरणकी हमें आदत नहीं पड़ी उसके सम्बन्धमें व्रत होना चाहिए। ऊपरके दृष्टान्तमें
तो पापका आभासमात्र सम्भव है । सत्य कहनेसे किसीकी हानि हो जायेगी तो ? "
सत्यवादी ऐसा विचार करने नहीं बैठता। उसे खुद ऐसा विश्वास रखना चाहिए कि
सत्यसे इस संसारमें किसीकी हानि नहीं होती और हो भी नहीं सकती। मद्यपानके
विषयमें भी यही बात है। या तो इस व्रत में दबाके लिए अपवाद रहने देना चाहिए
या व्रतके पीछे शरीरके लिए जोखिम उठानेका भी निश्चय रहना चहिए। दवा
तौर पर भी शराब न पीनेसे शरीर न रहे तो क्या हुआ ? शराब पीनेसे शरीर
रहेगा ही, इसका पट्टा कौन लिख सकता है ? और उस समय शरीर बच गया,
पर किसी दूसरे समय किसी दूसरे कारणसे वह न रहा, तो उसकी जवाबदेही किसके
सिर होगी ? इसके विपरीत, शरीर रक्षाके लिए भी शराब न पीनेके दृष्टान्तका
चमत्कारिक प्रभाव शराबकी लतमें फँसे हुए लोगों पर पड़े तो संसारका कितना लाभ
है ? शरीर जाये या रहे, मुझे तो धर्मका पालन करना ही है। - ऐसा भव्य निश्चय
करनेवाले ही किसी समय ईश्वरकी झांकी कर सकते हैं।
व्रत लेना निर्बलतासूचक नहीं, वरन् बलका सूचक है। अमुक बातका करना
उचित है तो फिर वह करनी ही चाहिए, इसका नाम व्रत है और इसमें वल है। फिर
इसे व्रत न कहकर किसी दूसरे नामसे पुकारें तो उसमें हर्ज नहीं है; परन्तु जहाँ
तक हो सकेगा करूँगा " ऐसा कहनेवाला अपनी कमजोरी या अभिमानका परिचय
देता है, भले ही उसे खुद यह नम्रता कहे। इसमें नम्रताकी गन्ध तक नहीं है।
"जहाँ तक हो सकेगा यह शुभ निश्चयमें जहरके समान है। मैंने तो अपने और
बहुतोंके जीवन में देखा है कि जहाँ तक हो सकेगा, वहाँ तक करनेके मानी पहली
ही अड़चनके सामने गिर पड़ना । " सत्यका पालन जहाँ तक हो सकेगा करूँगा, इस
arrer कोई अर्थ ही नहीं है। व्यापारमें यथासम्भव अमुक तारीखको अमुक रकम
चुका दी जायेगी, इस तरहकी चिट्ठी, चेक या इंडीके रूपमें स्वीकार नहीं की जाती।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२५८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२०
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
उसी तरह जहाँ तक हो सकेगा, वहाँ तक सत्य-पालन करनेवालेकी हुंडी भगवानकी
दुकानमें नहीं भुनाई जा सकती।
ईश्वर स्वयं निश्चयकी, व्रतकी सम्पूर्ण मूर्ति है। उसके नियमोंका एक अणु भी
इधर-उधर हो जाये तो यह ईश्वर न रह जाये। सूर्य महाव्रतधारी है, उससे संसारका
काल-निर्माण होता है और शुद्ध पंचांगोंकी रचना की जा सकती है। उसने अपनी
ऐसी सास सिद्ध की है कि वह सदा उदय हुआ है, सदा उदय होता रहेगा, और
इसीसे हम लोग अपनेको सुरक्षित पाते हैं। व्यापार मात्र एक पक्की प्रतिज्ञाके आधार
पर चलते हैं। व्यापारी एक-दूसरेके प्रति वादेसे बंधे न हों तो व्यापार चले ही नहीं।
इस प्रकार व्रत एक सर्वव्यापक वस्तु दिखाई देती है। तो फिर जहाँ हमारे अपने
जीवन के गठनका प्रश्न उपस्थित हो, ईश्वर दर्शन करनेका प्रश्न हो, वहाँ व्रतके बिना
कैसे काम चल सकता है ? इसलिए व्रतकी आवश्यकता के विषयमें हमारे मनमें कभी
शंका उठनी ही नहीं चाहिए।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
गाण्डीव और मेरी खुराकके बारेमें खबर मीराबहनके पत्र में है।
आज ६३ पत्र है ।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
३११. पत्र : फेनर ब्रॉकवेको
यरवडा सेंट्रल जेल
१५ अक्टूबर १९३०
प्रिय मित्र,
लन्दनसे जन्म-दिवसकी बधाइयोंवाला तार भेजनेवालोंमें में आपका नाम देखता
हैं। चूंकि मैं मन्त्री महोदयका पता नहीं जानता, इसलिए मैं आपको तथा आपके
जरिये अन्य मित्रोंको धन्यवाद देता हूँ।
मैं आशा करता हूँ कि मद्रासके निकट आप जिस दुःखद दुर्घटना' में पड़ गये
थे उसका आपपर अब कोई दुष्प्रभाव शेष नहीं रह गया है।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे सीक्रेट ऐन्सट्रैक्ट्स, ७५० (३४), भाग १, पृष्ठ २७९
२. फेनर
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
१९२७ के अन्तमें एक कार दुर्घटना में पड़ गये थे। देखिए खण्ड ३६, १४ २२-२
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२५९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१२. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको
भाई घनश्यामदासजी,
आपका खत मिला है। मिराबहनने भी थोड़ा लिखा था ।
परवडा मन्दिर
१५ अक्टूबर १९३०
दोषमुक्त तो इस जगत् में कोई नहि है। मुक्ति पानेकी कोशीष करना हम
सबका कर्तव्य है और वही पुरुषार्थ है। जब तक निजी प्रयत्नके हम साक्षी बन सके
निराशाको कोई स्थान नहि है दुन्यवी व्यापारमें जितनी साहसकी आवश्यकता है
उससे कोटीगुना साहसकी आवश्यकता आध्यात्मिक व्यापारमें है । आत्मश्रद्धाको कभी न
छोड़ी जाय। श्रद्धाके नजदीक सब कुछ शक्य है।
मुझे भी विश्वास है कि पू० मालवीजी कभी बीमार नहि होंगे। मेरा तो
विश्वास है कि जेलसे उनको सच्चा आराम और सच्ची शांति मिलेंगे ।' दोनोंकी उनके
लिये बरसोंसे बड़ी आवश्यकता थी। भगवान् ने ऐसे हि अब दोनों दे दीये हैं।
अबके पत्र में शरीरके हाल दे दो।
खादी ज्यादा हो जानेसे डरोगे नहि ऐसी आशा करता हूं। गोशालाका प्रयोग
कुछ करते हो क्या ?
आपका,
सी० डब्ल्यू० ६१८७ से सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला
३१३. पत्र : लीलावतीको
मोहनदास
१६ अक्टूबर, १९३०
चि० लीलावती,
प्रसन्नता हुई । तुझे तीन
कि उम्र के लिहाजसे तू
नहीं लेना चाहिए। यदि
तेरा पत्र मिला । तु शान्त है, यह जानकर मुझे
दिनका उपवास क्यों करना पड़ा था ? यह मत भूल जाना
अभी बच्ची है। बच्चोंको दुनिया-भरका बोझ अपने सिर
सच कहा जाये तो हम सभी बालक हैं। वृद्ध तो एकमात्र भगवान् है सबका भार
२. मदनमोहन माबो दूसरी बार २७ अगस्तको गिरफ्तार किया गया था जबकि वह कांग्रेस
कार्यसमितिको बैठक हिस्सा के रहे थे। उन्हें ६ महीनेकी मामूली कैद हुई थी।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
वह उठाता है तो फिर हमें किस बातकी चिन्ता ? हम सब तो बस उसकी गुलामी
करते रहें।
गुजराती (जी० एन० ९३१७ ) की फोटो नकलसे ।
चि० भगवानजी,
३१४. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
बापूके आशीर्वाद
१६ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारा हेतु तो निर्मल है ही, लेकिन हेतुकी निर्मलता
मात्रसे सन्तोष नहीं करना चाहिए। ज्ञानकी आवश्यकता इसलिए स्वीकार की गई है
ताकि मनुष्यसे शुभ हेतुके होते हुए भी भूल न होने पाये। इतना भी निश्चित जानो कि
जिस हृदतक तुम शुद्ध बनोगे उस हदतक आश्रम भी अधिकाधिक शुद्ध होता चला
जायेगा। आश्रमकी शुद्धि आश्रमवासीकी शुद्धिसे भिन्न वस्तु नहीं है। आध्यात्मिक
समस्याओंको सुलझाने में मदद करनेके लिए आश्रम में नारणदाससे बढ़कर हो, ऐसा
तो और कोई व्यक्ति नहीं है। तोताराम जी भी मदद कर सकते हैं।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२७ ) से सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
३१५. पत्र : नारणदास गांधीको
गुरुवार रात [ १६ अक्टूबर, १९३०
चि० नारणदास,
तुम्हारी डाक मिल गई है। यह पत्र खास करके अमीदासके बारेमें ही लिख
रहा है; इसलिए तुरन्त भेजा जा सकेगा। अमीदास कच्चा अंडा लेगा ? दोषपूर्ण
और निर्दोष दो प्रकारके अंडे मिलते हैं। दोषयुक्त वह है जिसमें अन्तमें बच्चा पैदा
हो सके । निर्दोष वह है जिसमें जीव पैदा होता ही नहीं। मुर्गी ऐसा अंडा मुर्गेका
साथ किये बिना देती है। यह बात प्रसिद्ध है। भाई पारनेरकर जानता होगा। बाजार में
ऐसे अंडे मिल सकते हैं। मुख्यतः यूरोपीय लोग ऐसे अंडे तैयार करते हैं। मीरजके
पास एक फार्म है। इस विषयमें किया गया पत्र व्यवहार हमारे दफ्तर में है। उसे
१. बापुनापत्रो९ श्री नारणदास गांधीनेके अनुसार ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र : सुशीला गांधीको
२२३
ढूँढनकी जरूरत नहीं। अहमदाबादके कई पारसी ऐसे अंडोंके बारेमें बता सकते हैं।
मैं स्वयं मानता हूँ कि ऐसे अंडे दूधकी अपेक्षा दोष कम है। दूधकी तरह इसे हम
किसीकी खुराकमें से नहीं छीनते ।
यदि अमीदास 'हाँ' करे तो फौरन मँगा लेना । उपचार इस प्रकार है। जैसे-
का तैसा कच्चा अंडा फोड़कर उसका रस आठ औंस पानीमें मिलाकर शीशी में भर
कर रखो। हर घंटे एक-एक औंस पानी दो एकदम ताकत आयेगी। दूधकी जरूरत
पूरी करेगा। कह सकते हैं कि मनु इसी चीजसे बची। यह अंडा 'कॉड लिवर आयल'
से तो सोगुना अच्छा है। अमीदासको समझाना कि इस सलाहमें कुछ भी दोष होगा
तो वह मैं अपने सिर उठानेको तैयार हूँ। इस बातका मैने प्रचार नहीं किया क्योंकि
जहाँ भोगका पहाड़ बढ़ता जा रहा हो, बिना संकोच अनेक दवाएं ली जा रही हों,
वहाँ इसे भी कैसे उसीमें जोड़ दें। अमीदासका किस्सा बिल्कुल न्यारा है। पारनेरकर
अब अच्छा होगा ।
[ पुनश्च : ]
इसका जवाब जल्दी दे सकते हो।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे; बापुना पत्रो - ९ :
श्री नारणदास गांधीने से भी ।
३१६. पत्र : सुशीला गांधीको
चि० सुशीला,
[१७ अक्टूबर, १९३० से पूर्व ]
मानता हूँ ।
इस बार तेरा ब्यौरेवार पत्र मिला । यदि सीताको पर्याप्त फल दिये जायें तो
साग-भाजी देनेकी बिलकुल जरूरत नहीं है। फिलहाल ताजा दूध, फल और जो सट्टा
न हो ऐसा दही में उसके लिए पर्याप्त
यदि उसके दाँत मजबूत हों तो वह भले ही कुछ कड़े बिस्कुट या 'खाखरी'
[ अच्छी तरह सिकी हुई, कड़ी पतली रोटी] चबाये । उसे अच्छी तरह चबाने की
आदत डालनी चाहिए। माधवजीके दोनों बच्चे इसी खुराकपर पले हैं। उनकी देह
कुन्दन जैसी है तूने अपने कान किसी डाक्टरको दिखाये या नहीं? मणिलाल किसीको
दिखानेको कहता था न ? एक बार यदि किसी जाने-माने डॉक्टरको दिखाकर तकलीफ
को समझ ले तो चिन्ता मिट जाये। मुझे नियमित रूपसे पत्र लिखती रहना। अपनी
१. हरिलाल गांधीको लड़की।
1
२. पत्र में हेलीका नाम (अभिप्राय भारती नामकी बालिकाले है) भूल जानेके उल्लेख ऐसा
लगता है कि यह १७-१०-१९३० को सुशीला गांधीको लिले गये पत्रसे पहले लिखा गया होगा ।
Gandhi
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
उस सहेलीका नाम तो भूल गया जो तेरे बिवाहके मौकेपर मुझसे बहुत हिल-मिल
गई थी।
सभीसे मेरे आशीर्वाद कहना ।
गुजराती (जी० एन० ४७८१ ) की फोटो नकलसे ।
३१७. पत्र: पैट्रिक क्विनको
बापूके आशीर्वाद
१७ अक्टूबर १९३०
प्रिय श्री विन
साथका पत्र एक मित्र के बारेमें है जोकि आश्रम में मृत्यु शय्यापर पड़े हैं। यदि
आवश्यक हो तो क्या आप मेजर मार्टिनसे बात करके इस पत्रको तुरन्त डाकसे
भिजवा देंगे। तब यह शायद कल सुबह तक वहाँ पहुँच जायेगा, और कौन जाने
एक व्यक्तिकी प्राण-रक्षाका साधन ही सिद्ध हो !
क्या आपने 'सोशल रिफॉर्मर सरदार वल्लभभाईको भेज दिया है? साथका
पत्र, जोकि हम दोनोंके एक बीमार मित्रके बारेमें है, उनके देखनेके लिए है। और
क्या आपने उनकी पुत्रीका पत्र उनको दे दिया है ?
यदि आपने खजूर मँगानेका आदेश कल दे दिया हो, तो अभी तक वे मुझे
दिये नहीं गये हैं।
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
टिप्पणी: आश्रमके लोग पिछले दो हफ्तोंसे शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें
डाक दो-तीन दिन देरसे मिलती है।
[ अंग्रेजीसे ]
महात्मा गांधी : सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया,
खण्ड ३, भाग २, पृष्ठ २८८
१. अभिप्राय अमीदाससे है; देखिए पत्र नारणदास गांधीको १६-१०-१९३० ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२६३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० शारदा,
३१८. पत्र : शारदा सी० शाहको
परवडा मन्दिर
१७ अक्टूबर १९३०
तेरा पत्र मिला। किन्तु तू बीमार क्यों पड़ गई ? खाने-पीने में कोई भूल हुई
थी क्या ? दमाको तो तुझे समाप्त ही कर डालना चाहिए ताकि फिर उसका नाम
लेनेकी भी जरूरत न रहे। तू निश्चय कर ले तो सफलता अवश्य मिलेगी। सूर्य स्नान
करती है ? छाती में मालिश करती है? पेट साफ रखती है ? प्रातःकालकी प्रार्थना
के बाद कुछ भी खानेके पहले धीरे-धीरे गहरा श्वास लेना चाहिए। ऐसा करनेसे
फेफड़े निर्मल हो जाते हैं। फेफड़ोंको साफ करनेके लिए उनमें प्राण वायुका सिंचन
करना चाहिए। यह क्या है सो चिमनलालसे समझ लेना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९८९२) से सौजन्य: शारदाबहन जी० चोखावाला
३१९. पत्र छगनलाल जोशीको
चि० छगनलाल (जोशी),
यरवडा मन्दिर
१७ अक्टूबर १९३०
तुम्हारे दो पत्र मिले। यह पत्र तो तुम्हें शायद ही मिले। जेलके बाहर
परिवर्तित स्थितिको चिन्ता लेकर जेलमें मत जाना। हमारी चिन्ता ईश्वर करता है,
यह हम 'गीता' से सीखते हैं। और फिर यह याद रखो कि जब कोई व्यक्ति अपने
विचारको आचारमें उतारनेकी बाट ही जोह रहा हो उस समय उसके विचारकी शक्ति
आचारकी अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ जाती है। इसलिए जो लोग काम करनेको तत्पर
रहते हैं उनके विचार भी अवश्य फलित होते हैं। इसलिए यदि तुम्हें [ जेल जाकर ]
आराम मिले और जेलसे बाहरके लोगों की परीक्षा हो तो तुम्हें इसकी चिन्ता नहीं
करनी चाहिए।
गुजराती (जी० एन० ५४९५ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
४४-१५
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रिय बहन,
३२०. पत्र : रलियातबहन वृन्दावनलालको
यरवडा मन्दिर
१७ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पत्र पाकर मुझे बहुत खुशी हुई। मृत्युमार्ग तो राजमार्ग है और इच्छा
या अनिच्छापूर्वक हम सबको उसे रौंदना ही है तथा असंख्य बटोहियोंके बावजूद वह
सूनाका सूना ही बना रहेगा। अतः वह परमशान्तिका मार्ग भी है जो उसपर जाते
डरता है, यही धैर्य नहीं रख पाता है और जो निडर रहता है वह शान्तिके साथ
सुख उठाता है।
श्रीमती गोकी बहन
गुजराती (एस० एन० ९८११) की फोटो नकलसे ।
मोहनदासके जय श्रीकृष्ण
३२१. पत्र : वसुमती पण्डितको
चि० वसुमती,
परवडा मन्दिर
१७ अक्टूबर १९३०
तेरा पत्र मिला। मैंने डाहीबनके विरुद्ध किसी बातपर विश्वास ही नहीं किया।
डाहीबहनकी आंखों या उसके व्यवहारमें मुझे मलिनता नामकी कोई चीज दिखाई
ही नहीं पड़ी। मैं समझता हूँ डाहीबहनने वह स्थान न छोड़कर ठीक ही किया है।
रावजीभाईका पत्र मुझे मिला था।
अब बहनोंके लिए भारी जिम्मेवारी उठानेका समय आ पहुँचा जान पड़ता है।
भगवान इसमें उनकी सहायता करेगा।
गुजराती (एस० एन० ९२९१ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२६५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कुसुम (देसाई),
३२२. पत्र : कुसुम देसाईको
परवडा मन्दिर
१७ अक्टूबर, १९३०
तेरा पत्र मिला तेरे पत्रकी राह देखूंगा। आजकल तो नियमित रूपसे लिखती
रहना । निराश न होना । प्यारेलालसे फिर मिला था। अभी फिर मिलूंगा। अब कोई
दिक्कत नहीं है। सेवाश्रम के अस्पताल भी कब्जे में ले लिये जानेकी खबर अखबारोंमें है।
गुजराती (जी० एन० १८०७) की फोटो नकलसे ।
३२३. पत्र : रतिलाल सेठको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१७ अक्टूबर, १९३०
भाई रतिलाल,
तुम्हारा पत्र मिला। मुझे वल्कल भेज देना। इससे
आकासे ऐसा वस्त्र भेजा था। मैं समझता हूँ कि किसीके
दे दिया था।
पहले भी किसी भाईने
माँगने पर वह मैंने उसे
आशा है, तुम्हारी व्यापार सम्बन्धी सभी अड़चनें दूर हो गई होंगी। नरभेराम
और अन्य स्नेही जनोंको वन्देमातरम् ।
गुजराती (जी० एन० ७१६५) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२६६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२४, पत्र : पूंजाभाईको
यरबडा मन्दिर
चि० पूँजाभाई,
१७ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। मुझे विश्वास है कि तुम [ जेलके ] बहार ज्यादा दिन नहीं
रह पाओगे । जब तुम फिर जेल जाओ तो बीमार न होनेकी कोशिश करना। यदि
बीमारीका कारण तुम्हारी समझमें आ गया हो तो उसे दूर करना ।
गुजराती (जी० एन० ४०१७) की फोटो नकलसे।
चि० सुशीला,
३२५. पत्र : सुशीला गांधीको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१७ अक्टूबर, १९३०
तेरा पत्र मिला । भारतीसे मुझे माफी तो माँगनी ही चाहिए। भारती यह
कह सकती है कि इतनी गहरी दोस्ती कर लेनेके बाद जो नाम ही भूल जाये वह
कैसा मित्र है। किन्तु में सठिया गया है, यह मानकर क्या वह मुझे माफ नहीं कर
देगी ? यदि वह लिखना चाहे तो मुझे लिखे । व्यक्तिगत रूपसे मैं तो यही मानता
हूँ कि सामान्यतः तेरे कानका इलाज स्वस्थ शरीर ही है। यदि तू भी ऐसा ही
मानती हो तो तेरे लिए कटिस्नान और सूर्यस्नान लेना अच्छा होगा। तुझे अच्छी
तरह कसरत भी करनी चाहिए। तड़के ही तुझे घूमनेके लिए निकल जाना चाहिए।
ताराका सिरका कष्ट कैसा है ? नानाभाईकी लिखावट देखकर मुझे प्रसन्नता हुई।
तारा उन दोनोंको मेरे आशीर्वाद लिख दे ।
[ पुनश्च: ]
बापूके आशीर्वाद
क्या मणिलालका ४० पौंड वजन कम हो गया है? ऐसा नहीं हो सकता।
कहीं कोई भूल है। फिरसे जांचना ।
गुजराती (जी० एन० ४७७३) की फोटो नकलसे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२६७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२६. पत्र : दुर्गा गिरिको
यरवडा मन्दिर
१७ अक्टूबर, १९३०
वि० दुर्गा,
तेरे पत्रसे मुझे अभी सन्तोष नहीं हो रहा है। रोजका कार्यक्रम लिखना ।
नियमित रूपसे लिखने लगेगी, तो नया विशेषण मिलेगा। इस बार अक्षर अच्छे
लिखे हैं। तेरे पत्रके नीचे मंत्रीके अक्षर देखकर खुश हुआ हूँ। उसके विस्तृत पत्रकी
राह देखूंगा' ।
बाकी विराट् वत्सलता
३२७. पत्र : कलावती त्रिवेदीको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१७ अक्टूबर, १९३०
चि० कलावती,
बहोत दिनोंके बाद तुम्हारा खत मिला। हमें ऐसी आदत रखनी चाहिये जि[स] से
अच्छा बुरा न लगे। कर्तव्यके कारण कहीं भी रहना पड़े अच्छा हि मानना जिसको
सेवा हि करनी है उसको अच्छा क्या बुरा क्या ? लोक चर्चासे डरना नहि। अपने
निश्चय पर कायम रहेना धर्म पालन वही स्त्री करती है जो फांसी पर भी अपने
निश्चयको न तोड़े। मुझको लिखा करो।
जी० एन० ५२५६ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
१. मूल पत्र गुजराती में था।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२६८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० राधिका,
३२८. पत्र : राधाबहन गांधीको
परवडा मन्दिर
१८ अक्टूबर १९३०
तेरा पत्र मिला। पिछले पत्रमें मैंने अविवेककी कोई बात नहीं देखी। उसमें
तूने अपना दुखड़ा रोया है। ऐसा करनेका तुझे अधिकार है।
नम्रताका पाठ सीखा नहीं जा सकता। किन्तु अहिंसाका विकास करनेके
प्रयत्नमें नम्रता अपने आप आ जाती है। नम्रता अहिंसाका एक बड़ा लक्षण है। हम
अहिंसाका पाठ पढ़ते हैं और नम्रता स्वतः आ जाती है। नम्रताका बाह्याचार सीखा
जा सकता है, यह हम राजपरिवारोंमें देखते ही हैं; किन्तु वह वास्तविक नम्रता
नहीं है। वह एक प्रकारकी सभ्यता है। मैंने जिस नम्रताकी बात कही है, उसमें तो
अहं पूरी तरह मिट जाना चाहिए और हमें एकदम शून्य हो जाना चाहिए। यह
वस्तु क्या सीखने-सिखानेकी है? किन्तु जिसे शरीरकी क्षणिकताका कुछ भान हो
गया है और आत्माका कुछ ज्ञान हो गया है वह तुरन्त नम्र हो जाता है। मैं तुझे
खिझाऊँ और तू गरीब गायकी तरह आंखें नीची किये चुपचाप सुनती रहे तेरे मनमें
बिलकुल भी रोष उत्पन्न न हो यह कैसी नम्रता है? सच्ची नम्रता तो तभी
आती है जब व्यक्तिमें सच्चा स्वाभिमान होता है। यह बात तू न समझी हो तो
बार-बार पूछना। मैं समझाते हुए थकूंगा नहीं तू बिलकुल ठीक तो हो गई है न ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८६८७) से सौजन्य : राधाबहन चौधरी
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२६९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रेमा,
३२९. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
१८ अक्टूबर, १९३०
तेरा पत्र मिला। अपने बम्बईके अनुभव लिखना डाक्टरको गला नहीं दिखाती,
यह ठीक नहीं है। रोगको शुरू होते ही दबा देना चाहिए। समय पर लगाया हुआ
एक टांका आगे नौ टांकोंको बचाता है, यह कहावत बिलकुल सच्ची है।
मूर्तिपूजाके मैं दो अर्थ करता हूँ। एकमें मनुष्य मूर्तिका ध्यान करके उसमें
आरोपित गुणोंमें लीन होता है। यह इष्ट पूजा है। दूसरेमें गुणोंका विचार न करके
वह मूर्तिको ही मूल वस्तु मानता है। यह बुतपरस्ती हानिकारक है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६८७) से । सौजन्य: प्रेमावहन कंटक; जी० एन०
१०२३९ की फोटो नकलसे भी ।
३३०. पत्र : प्रभावतीको
यरवडा मन्दिर
१८ अक्टूबर १९३०
चि० प्रभावती,
तेरा तार मिला तो जरूर, लेकिन बहुत देरसे। क्या तुझे भी मेरा पत्र देरसे
मिला था? अब तुम दोनों शान्त हो गये होगे। तेरे तारसे लगता है कि आजकल
तेरी सेहत ठीक रहती है। कमजोरी दूर होनी चाहिए। घूमने जाती है क्या ?
जयप्रकाश क्या करेगा ?
है |
मेरी तबीयत अच्छी है। अब मैंने फिरसे खजूर और मुनक्का लेना शुरू किया
गुजराती (जी० एन० ३३७३ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२७०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० महालक्ष्मी,
३३१. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको
परवडा मन्दिर
१८ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। दूसरे पत्रोंमें तुम्हारे बुखारकी खबर पढ़ी। बुखार क्यों
आया? मुझे आशा है कि वहाँ कोई बीमार नहीं पड़ेगा। सच्चे कामका समय तो
अब आता दिख रहा है। जिस समय हम ज्यादासे ज्यादा काम कर रहे हों, उस
समय भी हमारे मनमें किसी किस्मकी अशान्ति नहीं होनी चाहिए। कर्ता और भर्ता
तो ईश्वर है, हम तो उसके हाथमें केवल साधन रूप हैं। यह बात मनमें उतर जाये
तो अशान्ति हो ही नहीं ।
गुजराती (जी० एन० ६८०१ ) की फोटो नकलसे।
३३२. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१८ अक्टूबर, १९३०
प्रिय भगिनि
ईश्वर तुमारी सब तरहसे परीक्षा कर रहा है। और अबतक तुम उत्तीर्ण हुई
है। तारिणीने तो अपना कर्त्तव्य पालन करते हुए देह छोडा उसका खेद हम क्यों
करे ? क्योंकि तारिणीका देह हमको काम देता था उस स्वार्थसे हम भले दुःख
माने । परमार्थं दृष्टिसे तारिणीका देहांत हि इष्ट था। ऐसा दुर्बल देह उसके आत्माको
कष्टदायी था। अब वह कार्यपरायण आत्मा दूसरा देह धारण करके अधिक सेवा
करेगा ऐसा हम निश्चय पूर्वक माने ।
सतीशबाबुका अनुवाद' मिल गया है। उसे समझने के लिये भी बंगलाका ज्ञान
ताजा करनेको दिल चाहता है। परंतु चर्खाका ध्यान मुझे रोकता है। श्रेयो हि
ज्ञानमभ्यासात्' के लिये १० वा श्लोक' की
उसमें से अर्थ स्पष्ट हो
१. शाब्द अनासक्तियोग का; देखिए पत्र
२. भगवद्गीता अध्याय १२, १२
३. भगवद्गीता अध्याय १२ ।
टिप्पणी देखो
हेमप्रभा दासगुप्तको ", १४-१२-१९३० ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र : मीराबहनको
२३३
जायगा । उसके बाद भी यदि शंका रहे तो मुझे फिर लिखो। चारू और अरुण कैसे
हैं। सब भाई बहनोंको मेरे आशीर्वाद दे दो ।
जी० एन० १६७२ की फोटो नकलसे ।
३३३. पत्र : मीराबहनको
बापुके आशीर्वाद
चि० मीरा,
परवडा मन्दिर
१९ अक्टूबर १९३०
बम्बईसे भेजा तुम्हारा पत्र मिला।
मुझे यह जानकर खुशी हुई कि तुम्हारी तबीयत पहलेसे अच्छी है। तुमने जिस
मनःस्थितिका वर्णन किया है, वह हरगिज नहीं होने देनी चाहिए। अगर तुम अनासक्त
होकर काम करो, तो किसी भी वातके लिए तुम भागदौड़ न करोगी और न अपने
मन पर किसी बातका भार पढ़ने दोगी। किसी सुपुर्द किये हुए काम या हाथमें
उठाये हुए काममें अपना सारा हृदय लगा देनेके बाद आदमी उसका परिणाम ईश्वर
पर छोड़ सकता है। तब कोई भागदौड़ और कोई चिन्ता नहीं रह सकती। राजा
जनककी कथा तुम्हें मालूम है। वे कर्त्तव्यकी साक्षात् मूर्ति थे। उनकी राजधानी जल
रही थी । यह उन्हें मालूम था लेकिन किसीने उन्हें इसकी खबर दी। उनका उत्तर
यह था
" मेरी राजधानी जल कर राख हो जाये या बच जाये, इसकी मुझे क्या
चिन्ता।" उन्होंने उसे बचानेकी जितनी कोशिश हो सकती थी, कर ली थी। घटनास्थल
पर उनके जाने और वहाँ अतिरिक्त हलचलका वातावरण पैदा करनेसे आग बुझाने
वालोंका और दूसरोंका ध्यान बँट जाता और इससे स्थिति और खराब ही होती।
वह तो भगवानके प्रतिनिधि मात्र थे। उस हैसियतसे उन्होंने अपना भाग अदा कर
दिया था और इसलिए वे दायित्वसे 'मुक्त' और निश्चिन्त थे। इसी तरह अगर
हम भरसक अपना कर्तव्य कर चुके हों, तो हमारा काम बने या बिगड़े, हम भी
शान्त और निश्चिन्त हो सकते हैं, और हमें होना ही चाहिए ।
गाण्डीवसे मुझे अब भी सुख और सन्तोष मिल रहा है। अभीतक कोई चीज
टूटी नहीं है। जहाँ पहले मुझे पांच घंटे लगते थे, वहाँ अब में अपना काम आसानीसे
तीन घंटे के भीतर ही समाप्त कर लेता हूँ। तकलीके सिवाय तीसरे पहरको अब कोई
काम नहीं रहता । अतः दूसरे कामके लिए वक्त खाली है। अगर गाण्डीवसे तुम्हें
उतना ही सन्तोष मिलता हो जितना मुझे मिलता है, तो यात्रामें उसे साथ ले जा
सकती हो। मेरे पास जो नमूना है, उसकी लागत एक रुपया है। इसमें तकुआ और
चरखेके चौखटेको खोखला करके उसमें बनाई गई एक पेटी शामिल है और चौखटेके
एक बाजूमें तकुआ रखनेका अत्यन्त सादा उपाय भी शामिल है। कीमत और
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२७२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
सादगी में इस चरखेकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। लकड़ीके चमरखों तथा रद्दी
शीशेके सिलेंडरोंको मैंने निकाल दिया है। मेरे खयालमें मैंने तुम्हें यह बात बताई
भी थी। इससे चरखा बिना कोई कर्णकटु आवाज किये चलता है।
सप्रेम,
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४१६ ) से सौजन्य : मीराबहन
चि० रमावहन,
३३४. पत्र : रमाबहन जोशीको
बापू
परवडा मन्दिर
१९ अक्टूबर, १९३०
[ छगनलालके गिरफ्तार होनेसे ] तुम घबरा तो नहीं गई ? छगनलालको अब
कुछ शान्ति मिलेगी तथा लोगोंकी परीक्षा होगी। सब बहनोंकी परीक्षाका समय भी
अब निकट आ रहा है मेरा विश्वास बढ़ता जाता है। अब हमें चाहिए कि हम
और भी दृढ़ बनें, जागरूक रहें तथा हमारे हृदय सदा आनन्दसे सराबोर रहें।
अब मुझे तुम और भी ज्यादा नियमपूर्वक पत्र लिखना । ईश्वर हमारा कल्याण
करेगा ।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
धीरू और विमुके बारेमें कोई विशेष समाचार हो तो देना। केवलराम कहाँ
है ? निर्मला कहाँ है? उनसे कहो कि वे मुझे पत्र लिखें।
गुजराती (जी० एन० ५३२६) की फोटो नकलसे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२७३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० रेहाना,
३३५. पत्र : रेहाना तैयबजीको
यरवडा मन्दिर
१९ अक्टूबर १९३०
तू तो बड़ी चालाक लड़की मालूम होती है। मुझे दो-चार पत्र गुजराती में
लिखनेके बाद अब बेचारी मुझे उर्दूमें पत्र भेजती है। पर वह प्रेम किस कामका जो
बदला मांगे ? लेकिन ठीक है, में बदला दे रहा हूँ। तेरे अक्षर इतने साफ और
अलग-अलग लिखे गये हैं और शब्द ऐसे सरल चुने हैं कि मुझे पढ़ने में कोई कठिनाई
नहीं हुई। अवसे तुझे अपने पत्रका आधा हिस्सा उर्दूमें लिखने की छूट है। उससे
मुझे लाभ ही होगा ; कारण, उर्दू पढ़नेका मेरा भूला हुआ अभ्यास ताजा हो जायेगा ।
और तुम सब मिलकर मेरी हँसी न करो तो मैं भी कभी-कभी उर्दूमें लिखूंगा।
लेकिन यदि मैं ऐसा करूँ, तब तो तू पूरा बदला मिल गया मानेगी न ?
--
तेरे पेटमें जितनी चालाकी है उतनी ही ईर्ष्या भी भरी दीखती है। और ईर्ष्या
भी किसकी ? -बाबाजानकी ? किन्तु कोई चिन्ता नहीं। वे अब दिन-प्रतिदिन जवान
होते जा रहे हैं। इसलिए तेरी खबर लेंगे ही। तेरे पत्रके एक-दो शब्द नहीं पढ़
सका पत्र सुरक्षित रख लिया है, फिर पढ़ेगा और उन शब्दोंको समभूंगा, कमसे कम
प्रयत्न तो करूँगा ही । पत्र पूरा भर गया है। इसलिए तेरे लिए अब तीसरा विशेषण
नहीं दे सकता। उसे फिर देखूंगा।
खुदा हाफिज ।
गुजराती (एस० एन० ९६२२ ) की फोटो नकलसे।
चि० कसुम्बा,
३३६. पत्र : कसुम्बा गांधीको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१९ अक्टूबर, १९३०
मैं देखता हूँ कि तुम्हारी और जयसुखलालकी अभी भी ठीक बन नहीं रही
है। तुम्हें मैं ज्यादा पहचानने लगा हूँ। इसलिए तुम्हें दोषी माननेका मन नहीं होता ।
तुम दोनोंके स्वभाव अलग-अलग हैं; वे एक-दूसरेसे मिल नहीं सकते। ऐसी स्थितिमें
यही ठीक है कि तुम दोनों अलग-अलग रहो । ईश्वरने तुम्हें सन्तान तो पर्याप्त दी
ही है। पुत्र नहीं है किन्तु उसका कोई दुख नहीं होना चाहिए। हम पुत्र और पुत्रीके
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२७४
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2026-08-16T03:42:56Z
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
बीच कोई भेद नहीं करते। पुत्रियाँ पुत्र जैसी ही हैं। और फिर सब होशियार हैं।
इसलिए अपने मनमें पूरा सन्तोष रखना। खर्च जयसुखलाल देगा ही। दूर रहकर
एक-दूसरेके लिए निष्ठा रखना। मनमें खेद बिलकुल न करना। दोनोंमें से कोई भी
गलत रास्ते पर नहीं है। जब ऐसा समय आये कि तुम जयसुखलालके साथ उसके
जीवनमें घुलमिल सको, तब उसके साथ जरूर रह सकोगी। लड़कियोंको आश्रममें
जाकर रहनेके लिए प्रेरित करना; इससे तो उनका भी जीवन सुधरेगा ।
[ पुनश्च : ]
मुझे पत्र विस्तारसे लिखना ।
गुजराती (एम० एम० यू० / ३) की माइक्रोफिल्मसे ।
भाई बनारसीदास,
३३७. पत्र : बनारसीदास चतुर्वेदीको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१९ अक्टूबर १९३०
तुमारी धर्म पत्नीके देहांतकी खबर भाई काशीनाथने दी है। तुमारे शीरसे'
यह बड़ी आपत्ती आई है। मृत्युसे तो हमने डरको छोड़ हि दिया है। दुःख स्वार्थका
है । मैं समझा हूं तुमारे छोटे बाल-बच्चे हैं परंतु इससे भी दुःख क्यों आवे ? ऐसी
घटनाएं जगतमें बनती हि रहती हैं। हमारी परीक्षाका ये सब घटनाएं काल है ।
हमने परिश्रम करके जो ज्ञान पाया है वह हृदयगत हुआ है या नहि उसकी कसौटी
भी ऐसे मौके पर हो सकती है। ईश्वर तुमको शांति बक्शे ।
जी० एन० २५२५ की फोटो नकलसे ।
मोहनदासके बं० मा०
१. अर्थात्, सर पर
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२७५
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2026-08-16T03:43:13Z
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670605
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाईथी खम्भाता,
३३८. पत्र : बहरामजी खम्भाताको
यरवडा मन्दिर
२० अक्टूबर, १९३०
तुम्हारा पत्र पढ़कर प्रसन्न हुआ। मेरी तबीयत ठीक रहती है। तुम कैसे हो ?
मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपनी शक्तिका उपयोग सत्कार्यमें ही करोगे ।
क्या अभी पूनामें ही रहनेवाले हो ?
तुम दोनोंको,
गुजराती (जी० एन० ६५९६ ) की फोटो नकलसे ।
प्रिय बहन,
३३९. पत्र : तहमीना पी० जोशीको '
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२० अक्टूबर, १९३०
तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई। हमने जो बातें की थी उनकी मुझे
अच्छी तरह याद है। कभी-कभी अखबारोंमें तुम्हारा नाम देखकर मुझे खुशी होती
है।' आश्चर्य तो मैं तब करता जब जितना काम तुम करती हो उतना काम न
करती। हमारी पहली भेंटमें ही मैंने तुम्हारी क्षमता समझ ली थी।
मुझे बराबर पत्र लिखती रहना ।
भाई गोदरेजका स्वास्थ्य कैसा है? उनके [ कृषि ] फार्मका काम कैसा चल
रहा है? उनसे मेरा वन्देमातरम् कहना ।
गुजराती (एस० एन० ११४ ) की फोटो नकलसे ।
१. अर्देशिर गोदरेजकी छोटी बहन
बापूके आशीर्वाद
अदेशिर गोदरेजने मद्यपान निषेध और अस्पृश्यता निवारण
कार्यके लिए २० १,००,००० का दान दिया था, जिसके फलस्वरूप उनको सरकारी ठेकेसे हाथ धोना पड़ा।
२. तहमीना जोशी मपान निषेध और अस्पृश्यता निवारणके ऊपर सभाओं में व्याख्यान दिया करती
थीं जिनकी खबर अखबारों में छपा करती थी।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४०. तार : मोतीलाल नेहरूको
यरवडा सेंट्रल जेल, पूना
[२१ अक्टूबर १९३० या उससे पूर्व ]
पण्डितजी नेहरू
मसूरी
आपके स्वास्थ्यकी
असवारी रिपोर्ट चित्तोत्पादक है। कृपया तारसे पूरा
हाल दें सुझाव है कि रोजाना बुलेटिन जारी की जाये। सप्रेम ।
[ अंग्रेजीसे ]
गांधी
बॉम्बे सीक्रेट एक्सट्रैक्ट्स, (३४) ७५०, भाग १, पृष्ठ २६९
चि० नारणदास,
३४१. पत्र : नारणदास गांधीको
तुम्हारा पत्र मिला।
लीजिएरे काल कोणे दीठी ती
१९ / २१ अक्टूबर १९३०
यहाँसे देर-सबेर होती ही रहेगी। 'आजनो लहावो
-- आजका आनन्द लूटो कल किसने देखा है, यहाँ तो
यही लागू होता है। बारडोली कारखानेवाले लोग नहीं पकड़े गये तो कारखानेका
? अखबार में तो उसके भी जब्त होनेकी खबर है।
क्या हुआ
आश्रम मलेरिया से मुक्त रहा है, यह आश्चर्यजनक लगता था अन्ततक तो
नहीं रह सका। मैं मानता हूँ कि वह मुक्त रहने लायक बन सकता है। इस मौसम में
पेट खाली और साफ रखना चाहिए। स्टार्च और भारी पदार्थों का जैसेकि दालका
त्याग करना चाहिए। जो बचे हुए हैं वे सावधान हो जायें तो स्वस्थ रहेंगे। कुँएका
पानी साफ करना चाहिए परमँगनेट या क्लोरीन डाल कर नदीके पानीमें भी
डाल देना चाहिए, ऐसा मानता हूँ। इसलिए जिस वर्तनमें नदीका पानी भरा हो,
-
१. इस तारको मेजर आर० बी० मार्टिनले बम्बई सरकारके गृह-सचिव जी० एफ० एस० कॉलिन्सके
पास २१ अक्टूबर १९३० को निम्नलिखित टिप्पणीके साथ अग्रेषित किया था:
"गांधी संलग्न तार मोतीलाल नेहरूको भेजना चाहते हैं क्या आप कृपया मुझे सूचित करेंगे कि
इसे भेजने में कोई आपत्ति तो नहीं है?"
२. बारडोलीके इस कारखाने में लक्ष्मीदास मसरकी देखरेखमें चरखे आदि बनाये जाते थे।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२७७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
२३९
उसमें कुछ बूंदें डालें जिससे उसका रंग हलका गुलाबी हो जाये। कुछ समय रहने
देनेसे रंग बैठ जाता है। इसके बारेमें डाक्टरसे और मालूम कर लेना चाहिए।
अमीदासके बारेमें पत्र अलग लिख रहा हूँ । सम्भव है कि वह कल डाकसे भेज
दिया जायेगा। मिलनेका समय लिखना ।
जमनालालजीको खबर देना कि मैं कोई मांग नहीं करता। काकासाहब के
लिए भी नहीं की। जमनालालजी या और जो कोई आये, अपने प्रयत्नसे आये;
अथवा सरकारी कृपाके बल पर प्यारेलाल मुझे कभी-कभार मिल सके, इतना बन्दो-
बस्त करा पाया हूँ। साथी मांगने में स्वार्थको गन्ध है इसलिए नहीं मांगता। मांगता
तो हूँ सबके साथ रहना। पर ऐसा दिन कहाँसे मिले ? मथुरादासने भी यही माँग
की है, ऐसा काकासाहब से मुलाकात करनेवालेने कहा है। गिरिराजके बारेमें लिख
चुका हूँ। तुम्हारे निर्णयमें दोष नहीं दिखाई दिया।
राजाजीको लिखना कि प्रसिद्धि पा जानेवालोंको में कम ही लिखता हूँ इसलिए
उन्हें भी नहीं लिखता रोज याद करता हूँ। लक्ष्मी और सुब्वैयाकी पत्नीकी खबर
दें । [ राजाजी ] कैसा स्वास्थ्य लेकर लौटे हैं ?
१९ अक्टूबर, १९३०
तुम्हारी पत्रों की सूची में प्रभावतीका नाम देखता हूँ। उसका पत्र हाथ नहीं
लगा। यहाँ तो नहीं रोका गया होगा। या तो वह वहीं रह गया। ऐसा हर सप्ताह
होता है इससे इस बार भी उसका नाम लिखा गया होगा। यदि ऐसा हो तो ठीक
है। उसने अपने स्वास्थ्य के बारेमें तार दिया है; ठीक लगता है ।
वर्धा तकलीका प्रयोग बहुत नियमपूर्वक चल रहा है। इसका वर्णन तुमने
शायद बालकृष्णके पत्रमें देखा होगा । भाऊकी गति आधे घंटे १३२ तार है, जो
आश्चर्यजनक है। इतनी गतिसे कैसे कात पाते हैं, इसकी ब्यौरेवार जानकारी प्राप्त
करके छापनी चाहिए। गाण्डीवके बारेमें मेरा सन्तोष कायम है। शायद बढ़ा ही है ।
इस सम्बन्धमें मीराबहन और ईश्वरलाल बीमावालाको लिखे पत्र पढ़ लेना। उसने
मुझे भी एक नया चरखा भेजनेको लिखा है। उसकी तथा जो चरखे आश्रम में आयें
उनकी कीमत चुका देना । चरखेकी परीक्षा करके बादमें परिणाम भेजना। काका-
साहब को जो सूत वहाँ मिले उसका अंक मजबूती और समानताका प्रमाण लिखना ।
बारडोली मोड़िया के बारेमें मैंने मगनभाईके पत्र में लिखा है वह पढ़ना । मेरा
अनुभव तो यह है कि वह हर तरह आश्रम तथा दूसरे सभी मोढ़ियोंसे ज्यादा
बढ़िया । यदि यह बात ठीक हो, तो अपने सभी चरखोंमें ऐसा ही मोढ़िया लगाना
चाहिए। यदि मैंने परीक्षा में भूल की हो तो उसे सुधारना ठीक है। जो आश्रमका
मोड़िया लगानेका आग्रह करते हैं या जिन्होंने बारडोलीवालेको इस्तेमाल करके देखा
हो वे मुझे लिखें। मेरा विश्वास है कि गतिकी दृष्टिसे भी अन्तमें बारहोलीका
मोढ़िया ही बढ़िया ठहरता है। मुझे सुविधा मिली तो गाण्डीव पर भी यह मोढ़िया
चढ़ा कर देखूंगा ।
१. देखिए "पत्र नारणदास गांधीको १६-१०-१९३० ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
अमीदासके बारेमें तुम्हें शुक्रवारको' ही पत्र लिखा था। वह मिला होगा। इसे
डाक में डालने से पहले ही शायद जवाब भी मिल जाये । वह पत्र न मिला हो तो
मुझे तार भेज देना, ताकि उसकी दलील फिर लिख भेजूंगा ।
२० अक्टूबर १९३०
कान्ताको लिखा मेरा पत्र पढ़ना । उसे अब थोड़े समय के लिए बाहर जानेकी
इच्छा हुई लगती है। तुम इसपर विचार करना। मुझे यहाँ बैठे हुए लगता है कि
जहाँ भी जाना हो थोड़े समय के लिए जरूर हो आये । वह सच बोलती है और
बहादुर भी है। और अपना ध्यान रख सके, ऐसी भी है। दिये हुए वचनका पालन
करनेवाली भी है। यह तो मेरा अनुभव है। तुम्हें जैसा ठीक लगे वैसा करना ।
उसके मनकी बात मालूम करना ।
मंगल प्रभात, दीवाली
२१ अक्टूबर १९३०
तुम सब मित्रोंको मेरा यथायोग्य आशीर्वाद तथा वन्देमातरम् । आनेवाले वर्षमें
हम सब और ज्यादा सेवापरायण बनें और उसके लिए ज्यादा योग्य और जागृत बनें ।
यज्ञ: हम 'यज्ञ' शब्दका व्यवहार वारम्वार करते हैं। हमने नित्यका महायज्ञ
भी रचा है। इसलिए यज्ञ' शब्दका विचार कर लेना जरूरी है। इस लोकम या
परलोकमें कुछ भी बदला लिये या चाहे बिना, परमार्थके लिए किये हुए किसी भी
कर्मको यज्ञ कहेंगे। कर्म कायिक हो या मानसिक, चाहे वाचिक, उसका विशालसे-
विशाल अर्थ लेना चाहिए। 'परमार्थके लिए' का मतलब केवल मनुष्य वर्ग नहीं, बल्कि
जीवनमात्र लेना चाहिए और अहिंसाकी दृष्टिसे भी मनुष्य जातिकी सेवाके लिए भी,
दूसरे जीवोंकी बलि देना या उनका नाश करना यशकी गिनतीमें नहीं आ सकता ।
वेदादिमें अश्व, गाय इत्यादिकी बलि देनेकी जो बात आती है, उसे हमने गलत
माना है। वहाँ पशु-हिंसाका अर्थ लें तो ऐसे होम सत्य और अहिंसाकी तराजू पर
ठीक नहीं उतर सकते इतनेसे हमने सन्तोष मान लिया है जो वचन धर्मके नामसे
प्रसिद्ध हैं उनका ऐतिहासिक अर्थ करनेमें हम नहीं फँसते और वैसे अर्थोके अन्वेषणकी
अपनी अयोग्यता हम स्वीकार करते हैं। उस योग्यताकी प्राप्तिका प्रयत्न भी हम
नहीं करते, क्योंकि ऐतिहासिक अर्थसे जीव- हिंसा संगत भी ठहरे तो भी अहिंसाको
सर्वोपरि धर्म माननेके कारण हमारे लिए अर्थको न रुचनेवाला आचार त्याज्य है ।
उक्त व्याख्याके अनुसार विचारने पर हम देख सकते हैं कि जिस कर्मसे अधिक-
से-अधिक जीवोंका, अधिकसे अधिक क्षेत्रमें कल्याण हो और जो कर्म अधिकसे-अधिक
मनुष्य अधिक से अधिक सरलतासे कर सकें और जिसमें अधिक से अधिक सेवा होती
हो, वह महायज्ञ है या अच्छा यज्ञ है। अतः किसीकी भी सेवाके निमित्त अन्य किसीका
अकल्याण चाहना या करना यश कार्य नहीं है और यज्ञके अलावा किया हुआ कार्य
बन्धनरूप है, यह हमें 'भगवद्गीता' बताती है, और अनुभव भी यही सिखाता है।
१. स्पष्ट ही गांधीजी भूलले 'बृहस्पति की जगह 'शुक' लिख गये; देखिए "पत्रः नारदास
गांधीको ", १६-१०-१९३० ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: नारणदास गांधीको
२४१
ऐसे यज्ञके बिना यह जग क्षण-भर भी नहीं टिक सकता, इसीलिए गीताकारने
ज्ञानकी कुछ झलक दूसरे अध्यायमें दिखाकर तीसरे अध्यायमें उसकी प्राप्तिके साधनमें
प्रवेश कराया है और साफ शब्दोंमें कहा है कि हम यज्ञको जन्मसे ही साथ लाये
हैं । यहाँतक कि हमें यह शरीर केवल परमार्थके लिए मिला है और इसलिए यज्ञ
किये बिना जो खाता है, वह चोरीका खाता है, ऐसी सख्त बात गीताकारने कह
डाली। जो शुद्ध जीवन बिताना चाहता है, उसके सब काम यज्ञरूप होते हैं। हमारे
यज्ञ सहित जन्मनेका मतलब है कि हम जन्मसे ही ऋणी या देनदार हैं। इसलिए हम
जगत्के सदाके गुलाम हैं। और जैसे स्वामी गुलामको सेवाके बदले में खाना, कपड़ा
आदि देता है वैसे ही जगत्का स्वामी हमसे काम लेनेके लिए जो अन्न-वस्त्रादि देता
है वह हमें कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। यह नहीं समझना चाहिए कि जो
हमें मिलता है उतनेके हम हकदार हैं; और न मिलने पर मालिकको दोष भी न दें ।
यह देह उसकी है; वह चाहे इसे रखे, या न रखे। यह स्थिति दुःखद नहीं है, न
दयनीय है। यदि हम अपना स्थान समझ लें तो यह स्वाभाविक है और इसलिए
सुखद और चाहने योग्य है। ऐसे परम सुखके अनुभवके लिए अचल श्रद्धा तो अवश्य
चाहिए। अपने लिए कोई चिन्ता न करना, सब परमेश्वरको सौंप देना, ऐसा आदेश
मैने तो सब धर्मो में पाया है।
पर इस वचनसे किसीको घबराना नहीं चाहिए। मनको स्वच्छ रखकर सेवाका
आरम्भ करनेवालेको उसकी आवश्यकता दिन-प्रतिदिन स्पष्ट होती जाती है और वैसे
ही उसकी श्रद्धा बढ़ती जाती है। जो स्वार्थ छोड़ने को तैयार ही नहीं है, अपनी
जन्मकी स्थितिको पहचानने को ही तैयार नहीं है, उसके लिए तो सेवाके सब मार्ग
मुश्किल हैं। उसकी सेवामें तो स्वार्थकी गन्ध आती ही रहेगी। पर ऐसे स्वार्थी जगत्-
में कम ही मिलेंगे। कुछ-न-कुछ निस्वार्थ सेवा हम सब जाने-अनजाने करते ही रहते
हैं। इसी चीजको विचारपूर्वक करनेपर हमारी पारमार्थिक सेवाकी वृत्ति उत्तरोत्तर
बढ़ती रहेगी। उसमें हमारा सच्चा सुख है और जगत्का कल्याण है।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
आज ५८ पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
४४-१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४२. पत्र : शारदा सी० शाहको
चि० शारदा,
यरबडा मन्दिर
२३ अक्टूबर, १९३०
किसीसे कुछ सीखनेको ईर्ष्या नहीं कहा जा सकता। इसे ईर्ष्या कौन कहता
है ? अब दमाको पास न फटकने देना। तेरी लिखावट खराब नहीं है। धीरे-धीरे
और सुधर जायेगी । शकरीवहन कहाँ है? उससे कहना या उसे लिखना कि वह
मुझे पत्र दे ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९८९३) से । सौजन्य: शारदाबहन जी० चोखावाला
चि० काकू,
३४३. पत्र : पुरुषोत्तम डी० सरैयाको
२३ अक्टूबर १९३०
तेरी लिखावट तो बहुत अच्छी है। लेकिन चिट्ठी तो कोरी ही कही जायेगी।
बम्बई में क्या काम मिल गया, यह भी तूने नहीं लिखा। कहां रहता है ? काका
साहबका आशीर्वाद ।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
तू प्रार्थना तो करता है? 'गीता' अच्छी तरह समझ में आती है ?
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २८०६ ) से । सौजन्य: पुरुषोत्तम डी० सरैया
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० पद्मा',
३४४. पत्र: पद्माको
२३ अक्टूबर, १९३०
तू मुझे दोष लगाती मालूम होती है ! पत्र तू नहीं लिखती और मुझसे पानेकी
आशा रखती है? गलेमें जो गाँठ है वह क्या है? इसका निश्चय तुरन्त हो जाना
चाहिए। उसे गंगाबहनको दिखाया था ? क्या प्रभुभाईवाला चरखा तू रोज चलाती
है ? चलाये तो अच्छा। इतने ज्यादा तार यदि तू रोज काते तो कितनी बढ़िया
बात हो। शीला कैसी है? तू क्या पढ़ती है ? क्या खाती है?
जाती है ? संयुक्त प्रान्तमें क्या काम किया? वहाँ किस-किससे
गुजराती (जी० एन० ६११३) की फोटो नकलसे ।
चि० गंगाबहन (बड़ी),
३४५. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
बराबर ९ बजे सो
मिली थी ?
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२३ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। एक अनुभवी डाक्टरका मत है कि बुढ़ापेमें जोड़ोंके दर्द से
बचनेके लिए सोडा लेना चाहिए। तुम तो जानती होगी कि मैं रोज किसी-न-किसी
बहाने २० ग्रेन सोडा ले लेता हूँ। प्लास्टरसे फायदा हो सकता है। रोगकी जड़
तो अन्दर है। यह पीड़ा यह चेतावनी देती है कि तुम फल लेनेमें कंजूसी न करो,
मुख्यतः तुम दूध और फल ही लो। घुटनोंको सूर्य किरणोंका प्रकाश दे सको, तो
अच्छा है। सुबहके आठ बजेका समय अच्छा है।
काकूने कौनसा काम शुरू किया है, यह उसने नहीं लिखा।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ८७६२ ) से सौजन्य गंगाबहन वैद्य बापुना पत्रो
-६: गं० स्व० गंगाबहेनने से भी ।
१. सीतासहाय की पुत्री ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रिय भगिनी,
३४६. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
यरवडा मन्दिर
२३ अक्टूबर १९३०
तुमारा खत मिला। सतीशबाबु तारिणीके वियोगका खेद क्यों करे? जिस
मकान पर तारिणी गया है यहां तो हम सब जानेवाले है हि ? स्वार्थके वश भी
हम खेद न करें। प्रतिष्ठान न तारिणी चलाता था न तुम चलाती है। भगवान
चलाता है। हम सब निमित्त मात्र है और ऐसे हि रहें तो हमें क्या कब हमको
भगवान एक कामसे उठाकर दूसरे काममें रखता है।
जी० एन० १६७३ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
३४७. पत्र : बलभद्रको
यरवडा मन्दिर
२४ अक्टूबर १९३०
चि० बलभद्र,
इस बारका तेरा पत्र अच्छा कहा जा सकता है। वजन अब क्यों नहीं बढ़ेगा ?
अगर तू कसरत करे, मनको प्रफुल्लित रखे, और भोजन अच्छी तरह चबा कर खाये
तो वजन अवश्य बढ़ेगा। इस प्रयत्नमें कभी हारना नहीं घूमने जाता हो तो थोड़ा
दौड़ना, और दौड़ते समय मुंह बिलकुल बन्द रखना और श्वास नाकसे लेना ।
गुजराती (जी० एन० ९२१३) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० भगवानजी,
३४८. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
२४ अक्टूबर, १९३०
तुम्हें यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जिस व्यक्तिका मन व्यव
स्थित नहीं है वह दूसरोंके गुणदोषकी विवेचना नहीं कर सकता। गिरिराजको मैं तो
अच्छी तरह जानता हूँ। उनमें भावनाएँ उत्तम हैं लेकिन उन भावनाओं तक पहुँच
सकनेकी शक्ति उनमें बहुत कम है। किन्तु वे प्रयत्नशील हैं इसलिए में उनके प्रति
आशावान हूँ। आश्रमका ध्येय सत्य और उसके अनुरूप आचारका आग्रह है । इसीको
मध्यविन्दु मानकर सारी रचना की गई है। उद्देश्य संसारमें बहुत नहीं होते, होने
भी नहीं चाहिए। जो बहुत दिखाई देता है वह सत्य पर आच्छादित सोनेका ढक्कन
है।" उसके हट जाने पर एक ही वस्तु दिखाई देगी।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२८ ) से सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
चि० मथुरादास,
३४९. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
२४ अक्टूबर, १९३०
तुम्हें मैं पिछले सप्ताह ही लिखना चाहता था, किन्तु लिखना रह गया।
तुम्हारी हस्तलिखित पुस्तक में पूरी पढ़ गया है; बहुत अच्छी लगी। मैंने देखा कि
उसमें धुनकीके प्रति तुम्हारा प्रेम छलक रहा है। उसपर मैं मुग्ध हो गया, इसलिए
उसे आलोचककी दृष्टिसे नहीं पढ़ सका। अब तो वह छपे हुए रूपमें मिलेगी ही,
तब आलोचनाकी दृष्टिसे पढ़कर यदि मुझे तुम्हें कोई सूचनाएँ देनी होंगी तो दूंगा ।
[ धुनकीकी डोरी पर ] मोमबत्ती चिसनेके बाद भी तुम हरे पत्ते घिसनेको कहते हो ।
किन्तु विट्ठल लिखता है कि फिर कुछ करनेकी जरूरत नहीं है। ऐसा क्यों ?
गुजराती (जी० एन० ३७४७) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. ईशोपनिषद, ५, १५%
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० राधिका,
३५०. पत्र : राधाबहन गांधीको
परवडा मन्दिर
२४ अक्टूबर १९३०
तेरा पत्र मिला । रुखीको लिखना कि मुझे लिखे। काशीमें बनारसी क्या करेगा ?
काशीकी जलवायु तो बहुत अच्छी मानी जाती है इसलिए हलीको वह जगह माफिक
आनी चाहिए। नवीनका पत्र आया है; वह उसमें अपनी निर्दोषताकी घोषणा करता
है। तू उससे मिलना और शान्तिसे बात करना तुझे जो मालूम है और जिसके
सच होनेका तुझे विश्वास है ऐसा सब उसे दृढ़तापूर्वक बताना। नवीन अपनी निर्दोषता
सिद्ध कर दे और ऐसा प्रगट हो कि तूने या केशुने उसे दोषी माननेमें भूल की है
तो यह बहुत अच्छी बात होगी। इस बातकी खोज तटस्थ भावसे करना। बात ऐसी
नहीं है जिसे छोड़ दिया जाये; साथ ही उसे लेकर उद्विग्न भी मत होना तेरी
लिखावट मेरे लिए चित्र जैसी सुन्दर है। इस बार तेरा हाशिया थोड़ा टेढ़ा हो गया
है। ऐसी सुन्दर लिखावटमें यह दोष आँखोंको उसी तरह खटकता है जिस प्रकार
दूधमें धूलका काला कण ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८६८८ ) से । सौजन्य : राधाबहन चौधरी
३५१-
पत्र : दुर्गा गिरिको
यरवडा मन्दिर
२४ अक्टूबर १९३०
चि० दुर्गा,
"
'अब और क्या लिखूं ?" ऐसा तू क्यों लिखती है? एक हफ्ते में तो बहुतेरी
घटनाएँ घट जाती हैं। उनका वर्णन करनेकी शक्ति आनी चाहिए। तेरी उमरकी
लड़कीके मनमें तो सैकड़ों विचार उठते रहते हैं। उन विचारोंकी बात भी लिखी
जा सकती है। हां, एक शर्त है- लिखनेका उत्साह चाहिए, उसमें मन तल्लीन
होना चाहिए। अगर तू डायरी रखती हो, और उसमें सब कुछ लिखती हो, तो
उसमें से भी लिखनेके लिए विषय मिल सकते हैं।'
बापूकी विराट् वत्सलता
१. मूल पत्र गुजरातीमें था।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२८५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री नारायणराव,
३५२. पत्र : नारायण देसाईको
यरवडा मन्दिर
२५ अक्टूबर १९३०
या 'बावलो " कहूँ ? लकीरें तो तूने बहुत अच्छी खींची मालूम होती हैं।
लेकिन लकीरें खींचनेके बजाय अब तू चित्र-जैसे सुन्दर अक्षर लिखना सीख । महादेव
आ गये हैं इसलिए अब तो खूब मजा आ रहा होगा। उन्हें जल्दी वापस मत भेज
देना ।
गुजराती (एस० एन० ९४७४ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
३५३. पत्र : मीराबहनको
चि० मीरा,
परवडा मन्दिर
२६ अक्टूबर, १९३०
तुम्हारा पत्र और बिहारी चरखेको चलानेके बारेमें विस्तृत निर्देश मिल गये ।
तुम्हारे बताये अनुसार मैंने सब बातें कीं, बस यह नहीं समझ आया कि माल कहाँ
चढ़ाई जाये। मुझे मालूम नहीं कि वह चरखेके चौखटेके नजदीक चढ़ाई जाये या दूर ।
फिर भी मैं एक और प्रयत्न करके देखूंगा कि वह चलता भी है या नहीं। कमसे-
कम उसे चलना तो चाहिए। इधर गाण्डीव बराबर सन्तोष दे रहा है। अभी तक
तो इसने कोई तकलीफ दी नहीं है। मैंने तुम्हें बताया या नहीं कि इसमें हर रोज
काम करनेके बाद तकुएको निकालने की जरूरत नहीं होती। काम करनेके बाद इसे
दीवार पर टांग दिया जाता है। इस प्रकार इसमें रोज सुबह जाँच-पड़तालकी
जरूरत नहीं रहती जैसीकि दूसरे सब चरलोंमें होती है और जितना ही अधिक मैं
इसपर काम करता हूँ उतनी ही मेरी यह धारणा दृढ़ होती जाती है कि इसमें किसी
भी परखेके बराबर उत्पादन करनेकी क्षमता है। मेरे पास अब तराजू आ गया है।
मै २४ तथा उससे ज्यादा अंकका सूत कातता हूँ और मेरी अधिकतम गति २००
तार हैं। पेटी चरसेके मुकाबले यह गति काफी ज्यादा है। मुझे बस एक बारकी याद
है जब मैंने पेटी चरखे पर इतनी गतिसे काता था। बहरहाल में जानता हूँ कि
१. छोटे बच्चोंके लिए गुजरातीका प्रचलित सम्बोधन।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
जबतक मुझसे ज्यादा कुशल कतैये अपना मत देकर इसकी पुष्टि नहीं करते तबतक
मेरी रायका कोई मूल्य नहीं है।
मुझे खुशी है कि तुम अभी तो दौरे पर नहीं जा रही हो। तुम्हें अपना शरीर
फिरसे स्वस्थ बना लेना चाहिए। हम दोनोंकी तबीयत अच्छी रहती है। पिछले
गुरुवारको मेरा वजन १०५ था और काका का ११७। मैने तरकारियां काफी कम
कर दी हैं और खजूर फिर लेने लगा हूँ। अभी और फेरबदल होंगे।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४१७) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६५१
से भी।
३५४. पत्र: महेन्द्र वा० देसाईको
परवडा मन्दिर
२६ अक्टूबर, १९३०
श्री मानसिंह',
तुझे 'देसाई' कहूँ या 'चि० मनु', इसका निर्णय करके मुझे सुन्दर लिखावटमें
लिख भेजना। अध्यक्ष और मन्त्री अब भी ऊधम करते हैं या उनमें पदाधिकारी बनने
पर कुछ गम्भीरता आ गई है ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४०८ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : वा० गो० देसाई
१. गांधीजी द्वारा अपने मित्र वा० गो० देसाईके पुत्रका दिया गया प्यारका नाम
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रेमा,
३५५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
२६ अक्टूबर १९३०
नासिकसे लिखा हुआ तेरा पत्र मिला । धुरन्धरके अनुवादके बारे मैंने जो
लिखा था वह याद है न ? उसने अनुवाद किया सो ठीक किया, लेकिन चूंकि अब
लिमयेने भी उसका अनुवाद कर दिया है, इसलिए हमें इसपर विचार करना चाहिए
कि धुरन्धरके अनुवादको प्रकाशित करवाया जाये या नहीं। आराम करनेसे तबीयत
अच्छी रहती है, यह इस बातका परिचायक है कि तू कामका बोझ सिर पर उठाये
फिरती है। काम करने पर भी उसका भार महसूस न हो, यह अनासक्तिका गुण है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६८८ ) से सौजन्य : प्रेमावहन कंटक; जी० एन०
१०२४० की फोटो नकलसे भी ।
३५६. पत्र : गंगाबहन झवेरीको
चि० गंगाबहन ( झवेरी),
परवडा मन्दिर
२६ अक्टूबर, १९३०
तुम्हारा यह पत्र तो कुछ हफ्तोंके बाद मिला है। लगता है, नानीबहन तुम्हारे
साथ नहीं है। तुम बीमार क्यों पड़ीं? भूल न लगे, तब उपवास करना चाहिए।
कमजोरी मालूम हो तो भी ऐसी कमजोरीको झूठी कमजोरी समझना चाहिए।
पूरा उपवास न सधे तो अंगूर, संतरा आदि ताजे फल लें लेकिन और कुछ नहीं,
और एनीमासे पेट साफ रखें। तबीयत बिगड़ने नहीं देनी चाहिए। पानी उबाला
हुआ ही पिया जाये तो अच्छा मुझे पत्र लिखती रहना। अभी स्त्रियोंके करनेका
बहुत सारा काम बाकी है। तुम्हारे साथ दूसरी स्त्री कार्यकर्ता कौन है ? भाई
पानाचन्दको मेरे आशीर्वाद ।
[ पुनश्च : ]
हम दोनोंकी तबीयत ठीक है।
गुजराती (जी० एन० ३१०६) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाई कुंवरजी,
३५७. पत्र : कुँवरजी मेहताको
परवडा मन्दिर
२६ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । यदि अभीतक सरकारके प्रिय मेहमान नहीं हुए हो तो
यह पत्र तुम्हें मिल जायेगा। लक्ष्मीदासके चले जाने पर अब क्या व्यवस्था की जा
रही है, सो लिखना मन्दिरवासियों से मिलो, तब उन्हें मेरा आशीर्वाद कहना ।
इतने वर्षोंके कामके बाद लोगों में आवश्यक साधन अपने बल पर निर्माण कर लेनेकी
शक्ति तो आ ही जानी चाहिए।
गुजराती (जी० एन० २६८७ ) की फोटो नकलसे ।
३५८. पत्र : लक्ष्मीबहन खरेको
बापूके आशीर्वाद
यरवदा मन्दिर
२६ अक्टूबर १९३०
चि० लक्ष्मीबहन,
पत्र तो पण्डितजीका मिला है, पर उन्हें लिखनेके बदले तुम्हें लिख रहा हूँ।
जो बीमार पड़ जाये उसे लिखनेकी इच्छा तो रहती ही है। सेवा करते हुए कोई
बीमार क्यों पड़े ? पर कितना ही ध्यान रखा जाये, फिर भी बीमारी कई बार चोरकी
तरह छिपे-छिपे आ जाती है। आशा है, अब चोरको भगा दिया होगा। स्वास्थ्यको
बिगड़ने मत देना । क्या मथुरी कुछ कमजोर रह गई है? कई बच्चे चेचकके बाद ज्यादा
ताकतवर हो जाते हैं। मणिलालका ऐसा ही हुआ था। मुझे ब्यौरेवार पत्र लिखना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० २७७ ) से सौजन्य : लक्ष्मीबहन खरे
1
१. अभिप्राय कैदियोंसे है।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कलावती,
३५९. पत्र : कलावती त्रिवेदीको
२६ अक्टूबर १९३०
तुमारे खतमें से काशीनाथ कुछ २ फिके भेजते हैं। उसमें से देखता हूं तुम बहोत
जगभराहटमें रहती है। जो अनासक्तियोगकी साधना करते हैं उसके लिये गंभराहट
जैसी कोई चीज नहि है। जिसने सब ईश्वरार्पण किया उसके पास गंभराहटका मौका
हि कहां है ? जीजी के पीसने के परिश्रमसे कुछ हानि होनेका संभव नहीं है।
जी० एन० ५२५५ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
३६०. पत्र : शान्ताको
२६ अक्टूबर, १९३०
चि० शान्ता,
काशीनाथ लिखते हैं मेरा पत्रकी तुम प्रतीक्षा कर रही है। कोई पत्र लिखनेका
बाकी है ऐसा मेरे मनमें तो न था । तुमारा शरीर अच्छा है और कामों में समय
व्यतीत कर रही है सुनकर आनंद हुआ। आश्रम में से प्रत्यक्ष क्या लेना का है वह
तो सब जानते हैं परन्तु जो सत्यकी आराधना करते हैं उनको जो अप्रत्यक्ष मिलता
है वह प्रत्यक्षसे बहोत अधिक है। इसे तुम ग्रहण कर सके ऐसा मैं चाहता हूँ ।
जी० एन० ५२५७ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
१. सम्भवतः कलावती त्रिवेदीकी सास
२. काशिनाथ त्रिवेदीकी छोटी बहन, जो उस समय आश्रम में रह रही थी।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रोफेसर त्रिवेदी
३६१. तार : जयशंकर त्रिवेदीको
पूना
[ २७ अक्टूबर, १९३०
विद्यापीठ
अहमदाबाद
मनुकी बीमारीके बारेमें सुनकर हम दोनों चिन्तित हैं। हालतकी सूचना
तारसे दें। हम उसके स्वस्थ होनेकी प्रार्थना करते हैं।
अंग्रेजी (जी० एन० १०००) की फोटो नकलसे ।
३६२. पत्र : वी० ए० सुन्दरम्को
गांधी
प्रिय सुन्दरम्
यरबडा मन्दिर
२७ अक्टूबर १९३०
तुम अपनेको आराम दे रहे हो, यह जानकर खुशी हुई। आशा है सावित्री*
और बच्चे ठीक हैं। पुस्तक और कागजके लिए कृपया प्रोफेसर
राधाकृष्णन् को मेरा
धन्यवाद कहना ।
तुम सबको प्यार सहित,
अंग्रेजी (जी० एन० ३१८६) की फोटो नकलसे।
बापू
१. टाकी मुहरसे; देखिए " पत्र जयशंकर त्रिवेदीको २७-१०-१९३० भी।
२. सुन्दरम्की पत्नी
३. डॉ० सर्वेपल्ली राधाकृष्णन् ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रभावती,
३६३. पत्र : प्रभावतीको
२७ अक्टूबर, १९३०
तू बहुत घबरा गई है। लेकिन घबरानेका कोई कारण नहीं। यदि घरका
सारा कामकाज तेरे सिर पर आ पड़ा है तो उसे उठानेके लिए तु समर्थ है। यदि
जवाबदेही तेरी है तो तुझे अधिकार भी होना चाहिए। घरकी व्यवस्था जैसी तुझे
अच्छी लगे, तू वैसी कर सकती है। जयप्रकाश तो उसमें तेरी सहायता करेगा ही ।
ससुर के साथ सगी लड़की के समान मुक्तभावसे सब बातें करना। उन्हें पहले-पहल
कदाचित् थोड़ा संकोच होगा, लेकिन बादमें तू देखेगी कि वे भी मुक्तभावसे तुझसे
बात करेंगे और तेरा मार्ग सरल करेंगे। घरमें नौकर-चाकर तो हैं ही अपने स्वास्थ्य
का ध्यान रखते हुए सब व्यवस्था करना। अपनी सामर्थ्य के बाहर काम न करना ।
पढ़ने, घूमने और शान्तिपूर्वक मनन करनेका समय बचा लेना; इस तरह एक आदर्श
गृहस्थी बनाना । यदि तुझे समस्त अधिकार नहीं मिलते तभी यह विचारणीय बात
होगी । लेकिन अभी तो मेरा मन इस बातको स्वीकार ही नहीं करता कि तुझे
अधिकार नहीं मिलेगा। तू आत्मविश्वास रखना, दृढ़ बनना। ईश्वर तुझे उबार लेगा
और तेरा पथ-प्रदर्शन करेगा। तु कदापि शोकाकुल न होना। मुझे ज्यादा बार पत्र
लिखनेका मन हो तो लिखना । सीधे भी लिख सकती है। मिलना होगा तो अवश्य
मिलेंगे। भगवान तेरी रक्षा करें।
गुजराती (जी० एन० ३३७६) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
३६४. पत्र : भगवानजी अनूपचन्द मेहताको
भाईश्री भगवानजी,
परवडा मन्दिर
२७ अक्टूबर, १९३०
आपका पत्र मिला। भाई रेवाशंकरकी खबर पढ़कर दुःख हुआ। उनकी सादगी
जैसी आप लिखते हैं, सचमुच वैसी ही थी। उनकी आत्माको भगवान् शान्ति देंगे ही।
सुदर्शनके सम्बन्धमें इसके साथ देवचन्दभाई के नाम पत्र तो लिख रहा हूँ; किन्तु
जहाँ हूँ वहाँसे इस मामलेमें में अधिक क्या कर सकता हूँ?
भाई नरभेरामके बारेमें आपने जो लिखा है उसे सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ ।
afreenीय सिद्ध हुए हैं, यह माननेमें मेरे जीको बहुत चोट पहुँचेगी। मेरी
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
सलाह यह है कि उनसे पंचकी मार्फत फैसला करा लेनेके लिए कहा जाये। वे न
मानें तो आप नुकसान सह लें। मामलेको न्यायालय में न ले जाया जाये, ऐसी मेरी
सलाह है। जो प्रतिष्ठा बैंक ऑफ इंग्लैंडकी लन्दनमें या कहो कि दुनियामें है, वही
करसनजी मूलचन्दकी हमारी छोटी-सी दुनियामें, राजकोटमें है। अपने-अपने क्षेत्रमें
दोनोंकी प्रतिष्ठा समान है। मैं तो यही चाहूँगा कि यह प्रतिष्ठा पुनः स्थापित हो ।
जापको लड़ना नहीं चाहिए; पैसा तो आज है और कल नहीं है।
गुजराती (जी० एन० ५८१३) की फोटो नकलसे।
मोहनदासका वन्देमातरम्
३६५. पत्र : जयशंकर त्रिवेदीको
यरवडा मन्दिर
२७ अक्टूबर १९३०
भाई त्रिवेदी,
तुम पति-पत्नी, दोनोंको, रिश्तेदारोंको और मित्रोंको पुनः मनुके विषयमें चिन्ता
में पड़ना पड़ा है। हम दोनोंने आज तार तो भेजा है।" तुम्हें मिल गया या नहीं,
यह तो कल ही मालूम हो सकेगा। मैं जानता हूँ कि तुममें भरपूर धैर्य है, इसलिए
आश्वासन तो क्या दूँ ? ऐसी बीमारियाँ हमारे लिए परीक्षा रूप हैं। ऐसा नहीं है कि
जो लोग ईश्वरमें आस्था रखते हैं उन्हें ऐसा कोई पट्टा लिख दिया गया है कि
सदा सुखका अनुभव करते रहो। किन्तु काकासाहब और मैं, दोनों ही यह मानते हैं
कि मनु सुरक्षित है। हम मानते हैं कि ईश्वर उससे उसकी इसी देहके द्वारा काम
लेना चाहता है। जबतक बीमारी गम्भीर है तबतक प्रतिदिन खबर देते रहना ।
मेरा खयाल है कि खबर प्रतिदिन मिलती रहे ऐसी व्यवस्था हो सकेगी।
गुजराती (जी० एन० ९९९ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
२. देखिए "तार जयशंकर त्रिवेदीको ", २७-१०-१९३०
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६६. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
यरवडा मन्दिर
२७ अक्टूबर १९३०
चि० मनु,
तू फिर बीमार पड़ गया ! किन्तु तेरे ऊपर भगवानकी कृपा है। तेरा मनोबल
उत्तम है इसलिए हम दोनों यह आशा रखते हैं कि यह पत्र वहाँ पहुँचेगा तबतक
तो तू संकटसे मुक्त हो चुका होगा। स्थिति कितनी भी विषम हो, उसमें सदा शान्त
रहनेका पाठ तो तूने सीखा ही है। पूरा आराम लेकर शरीरको बिलकुल नीरोग
बना लेना ।
गुजराती (जी० एन० ७७६६) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
३६७. पत्र : तारामती मथुरादास त्रिकमजीको
२७ अक्टूबर, [ १९३० ]
तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर बहुत प्रसन्न हुआ। दिलीप तो अब बहुत बड़ा
लगता होगा। देवलाली में मिलनेके बाद तो मैंने उसे फिर देखा ही नहीं। कभी-
कभी मित्रोंसे मिलने-जुलने से मनको धीरज मिलता रहेगा । प्यारेलाल भी इसी जेलमें
है। किन्तु उसे मेरे साथ नहीं रखा गया। हाँ, कभी-कभी उससे मिल जरूर लेता
हूँ। पढ़नेका शौक न हो, तो मैं सलाह दूंगा कि तुम्हें कुछ पढ़ना चाहिए नवजीवन
कार्यालय द्वारा प्रकाशित की गई बहुत-सी पुस्तकें पढ़ने लायक है; और तुम उन्हें
आसानीसे समझ भी सकती हो।
[ गुजरातीसे ]
बापुनी प्रसादी
१. साधन-सूनके अनुसार १९३० में तारामतीके पति जब जेलमें बीमार पड़े तब उन्होंने गांधीणीको
पत्र लिखना आरम्भ किया।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० नारणदास,
३६८. पत्र : नारणदास गांधीको
२३/२८ अक्टूबर १९३०
तुम्हारा पुलिंदा (कल) बुधवार को दो भागों में मिला। दो भाग यहीं अधिकारियोंने
किये थे। यहांसे जो पत्र २१ को भेजे थे, वे कब और कैसे मिले, यह लिखना ।
मेरी डाका तुम्हें बोझ नहीं लगता, मेरे लिए इतना ही काफी है। जबतक सुविधा
मिलती है, तबतक नियमानुसार लिखता ही रहूँगा । अमीदासकी खबर मिले तो
लिखते रहा करो। मेरी अंडों सम्बन्धी रायके लिए कुछ कहना चाहो तो लिखना ।
प्यारेलालको नासिक नहीं भेजा जायेगा, इतना मैं निश्चित रूपसे जानता हूँ। दो-एक
दिनमें फिर मिल पाऊँगा । चितालिया के बारेमें मालूम करने पर यदि रकम देना ठीक
हो, तो दे देना। उसे परेशानी मत भोगने देना। तुमने छगनलाल जोशीसे पूछा था ?
शायद उसने कुछ लिखकर रखा हो। वह तो तुम्हारा पड़ोसी ही है न ? वह वहाँ
कैसा रहता है, यह भी लिखना। फिलहाल मीराबहन का कहीं बाहर आने जानेका
विचार नहीं है, यह मुझे अच्छा लगा। देवदासका एक भी छोटा-बड़ा पत्र मुझे नहीं
मिला। [ उसने पत्र ] जेलसे सीधा भेजा था या और किसी तरीकेसे ? सबर मिलने
पर खोज करूँगा । जीवराम भाईको मुझे लिखनेके लिए कहना ।
चन्द्रकान्ताने लिखा है कि कुमारप्पाका पत्र साथ है, किन्तु उक्त पत्र नहीं मिला।
उसके बदले रेवरेंड होम्सका है। उसके ऊपर कुमारप्पाकी मार्फत लिखा है। उसीसे कान्ताने
कुमारप्पाका नाम लिख दिया ऐसा काकासाहब का अनुमान है। मणिलालने पढ़ने के
बारेमें मेरी सलाह मांगी है। इसीका विचार करते-करते में सो गया होऊँगा । तब जो
स्वप्न आया तो लिख रहा हूँ, और पढ़नेके बारेमें यही मेरी सलाह भी है। [ मैने देखा, ]
मणिलाल मेरे पास खड़ा है। देवदास बच्चा है और मेरी गोदीमें बैठा है और ऊँघ रहा
है। मणिलाल कहता है कि मेरा बहुत समय बिना पढ़े निकल गया; किन्तु अब पढ़नेका
शौक होता है। इसलिए मुझे बताइए । मैं पश्चात्ताप करता हूँ कि बच्चोंकी शिक्षाके
लिए ज्यादा नहीं कर सका और फिर [ स्वप्नमें ही ] मणिलालको मैंने यह लिखकर
दिया : " गोखलेका अंक गणित पूरा कर लो। समय मिले तो बीजगणित और ज्यामिति भी ।
हिन्दुस्तानका इतिहास और भूगोल विस्तृत रूपसे और दुनियाका सामान्य रूपसे जान लो ।
टॉल्स्टॉय की 'किंगडम ऑफ हेवेन इज विदिन यू', संस्कृतमें भण्डारकर [ की किताब ] और
'गीता', गुजराती में 'नवजीवन माला' कि० भाई' की 'जीवनशोधन' और तुलसीकृत
'रामायण' | अंकगणित आदि सीखने के लिए गुजराती पुस्तकें पढ़ना । पुस्तकें मगनभाईसे
मँगा लो।" इतना लिख चुका तो आँख खुल गई। अभी थोड़ा-सा और भी था, किन्तु
मुझे याद नहीं आ रहा है। अर्थात् सुबह ३-३० बजे आंख खुली तब भी भूल गया
२. किशोरलाल घ० मशरूवाला ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
२५७
था । स्वप्नमें जो लिखा सो मुझे ठीक लगा है। ऊपर लिलेमें जो दिलचस्प लगे
और जितना हो सके, उतना मणिलाल करे। या उसे पढ़नेका रस लगानेवाला महादेव
है, इसलिए जैसा महादेव बताये वैसा करे। स्वप्नमें सूझी हुई वस्तुओंका मुझे कोई
आग्रह नहीं है, और इसके अलावा मुझे स्वयं यहाँसे मणिलालके लिए कुछ सूझता
भी नहीं। मैं रामदासको भी यही सलाह दूंगा। स्वप्नोंको मैं किसी प्रकारका महत्त्व
नहीं देता । मणिलालका प्रश्न मेरे सामने था। देवदासके पत्रकी बात मनमें थी ही।
अतः पेटमें कुछ गड़बड़ी हुई होगी और उसके कारण ऐसा मीठा स्वप्न आया हो
तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं। ब्रजकृष्णको लिखना कि मुझे ऐसा संकेत दिया गया
है कि जहाँतक हो सके मैं कैदियोंको न लिखूं, इसलिए नहीं लिखता । किन्तु रोज
उसे याद करता हूँ। वह स्वास्थ्य का खूब ध्यान रखे। हर क्षणका सदुपयोग करे
और उसका हिसाब रखे। इसीको पत्र समझे। वह तो पत्र लिखा ही करे।
मंगल प्रभात, २८ अक्टूबर, १९३०
यज्ञके विषय में पिछले सप्ताह लिख कर भी अभी मेरा मन भरा नहीं है ।
जिस चीजको जन्म के साथ लेकर हमने इस संसार में प्रवेश किया है उसके बारेमें कुछ
अधिक विचार करना व्यर्थ न होगा। यज्ञ नित्य-कर्त्तव्य है, चौबीसों घंटे आचरणमें
लानेकी वस्तु है, इस विचारसे और यज्ञका अर्थ सेवा समझकर 'परोपकाराय सतां
विभूतयः वचन कहा गया है। निष्काम सेवा परोपकार नहीं है, बल्कि अपने निजके
ऊपर उपकार है। जैसे कर्ज चुकाना परोपकार नहीं, बल्कि अपनी सेवा है, अपने
ऊपर उपकार है, अपने ऊपरसे भार उतारना है, अपने धर्मकी रक्षा करना है। फिर
किसी सन्तकी ही पूँजी 'परोपकारार्थ' मा अधिक सुन्दर भाषामें कहिए तो 'सेवार्थ '
हो सो बात नहीं है, बल्कि मनुष्य मात्रकी पूंजी सेवार्थ है। और यह होने पर सारे
जीवनमें भोगका खात्मा हो जाता है, जीवन त्यागमय हो जाता है। मनुष्य त्याग
करके ही भोग करता है। पशु और मनुष्यके जीवनमें यह भेद है। जीवनका यह
अर्थ जीवनको शुष्क बना देता है, इससे कलाका नाश हो जाता है, गृहस्थ जीवनका
नाश हो जाता है, अनेक लोग यह आरोप लगाकर उक्त विचारको सदोष समझते
हैं। पर मेरे खयालमें ऐसा कहना त्यागका अनर्थ करना है। त्यागके मानी संसारसे
भाग कर जंगलमें जा बसना नहीं है, बल्कि जीवनकी प्रवृत्तिमात्रमें त्यागका संचार
करना है। एक गृहस्थका जीवन त्यागमय और भोगमय दोनों हो सकता है। मोचीका
जूते सीना, किसानका खेती करना, व्यापारीका व्यापार करना और नाईका हजामत
बनाना त्याग भावनासे हो सकता है या उसमें भोगकी लालसा हो सकती है। जो
यज्ञार्थ व्यापार करता है, वह करोड़ोंके व्यापारमें भी लोक-सेवाका ही खयाल रखेगा,
किसीको धोखा नहीं देगा, सट्टेबाजीकी जोखिम नहीं उठायेगा, करोड़ोंकी सम्पत्ति रखते
हुए भी सादगी से रहेगा, करोड़ों कमाते हुए भी किसीकी हानि नहीं करेगा। किसीकी
हानि पहुँचानेके बजाय स्वयं करोड़ोंकी हानि भी उठा लेगा । कोई इस खयालसे न
इसे कि ऐसा व्यापारी मेरी कल्पनायें ही बसता है । संसारके सौभाग्यसे ऐसे व्यापारी
४४-१७
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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
पश्चिम और पूर्व दोनोंमें हैं। हों चाहे अंगुलियों पर ही गिनने भरको, पर एक भी
जीवित उदाहरण रहने पर उसे फिर कल्पनाकी वस्तु नहीं कह सकते। ऐसे एक
लोकोपकारी दर्जी' को आपने बढ़वाणमें देखा ही है। ऐसे एक नाईको मैं जानता हूँ
और ऐसे ही एक बुनकर को हम लोगों में से कौन नहीं जानता। देखने ढूंढ़नेपर हम
सब धन्धों में केवल यज्ञार्थ अपना धन्धा करने और तदर्थ जीवन बितानेवाले आदमी
पा सकते हैं। यह अवश्य है कि ऐसे याज्ञिक अपने धन्धेसे अपनी आजीविका प्राप्त
करते हैं। पर वे अपना धन्धा आजीविकाके निमित्त नहीं करते, आजीविका उनके
लिए उस धन्धेका गौण फल है। मोतीलाल पहले भी दर्जीका धन्धा करता था और
ज्ञान होनेके बाद भी दर्जी बना रहा। भावना बदल जानेसे उसका धन्धा यज्ञरूप बन
गया, उसमें पवित्रता आ गई और पेशेमें दूसरेके सुखका विचार दाखिल हो गया।
उसी समय उसके जीवनमें कलाका प्रवेश हो गया।
यज्ञमय जीवन कलाकी पराकाष्ठा है, सच्चा रस उसीमें है, क्योंकि उसमें से रसके
नित्य नये झरने प्रकट होते हैं। मनुष्य उन्हें पीकर अघाता नहीं है, न वे झरने कभी
सूखते हैं। यज्ञ यदि भाररूप जान पड़े तो यश नहीं है, जो असरे वह त्याग नहीं
है । भोगका अन्त नाश है, त्यागका अन्त अमरता । रस स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, रस तो
हमारी वृत्तिमें मौजूद है। एकको नाटकके पदोंमें मजा आता है, अन्यको आकाशमें
नित्य नये-नये प्रकट होनेवाले दृश्योंमें | रस परिशीलनका विषय है। जो चीज रसके
रूपमें बचपन से सिखाई जाती है, जिसे रसके नामसे जनतामें प्रवेश कराया जाता है,
वह रस माना जाता है। हम ऐसे उदाहरण पा सकते हैं जिनमें किसी जातिको
रसमय लगनेवाली चीज दूसरी जातिको रसहीन लगती है।
यश करनेवाले अनेक सेवक मानते हैं कि हम निष्काम भावसे सेवा करते हैं,
अतः लोगोंसे आवश्यकता भरको, और अनावश्यक भी, लेनेका हमें परवाना मिल गया
है। जहाँ किसी सेवकके मनमें यह विचार आया कि उसकी सेवकाई गई, सरदारी
आई। सेवामें अपनी सुविधाके विचारकी गुंजाइश ही नहीं होती है। सेवककी सुविधा
स्वामी अर्थात् ईश्वर देखनेवाला है; देनी होगी तो वह देगा। यह खयाल रखते
हुए सेवकको चाहिए कि जो कुछ आ जाये उस सबको ही न अपना बैठे। आवश्यकता
भर ही ले, बाकीका त्याग करे। अपनी सुविधाकी रक्षा न होने पर भी शान्त
रहे, रोष न करे, मनमें भी खिन्नता न लाये। याज्ञिकका पुरस्कार, सेवककी मजदूरी,
यज्ञ-सेवा ही है । उसीमें उसका सन्तोष है।
सेवा कार्यमें बेगार भी नहीं काटी जाती। उसे अन्तके लिए नहीं छोड़ा जाता ।
अपना काम तो सँवारे; लेकिन पराया काम बिना पैसेके करना है, इस खयालसे
जैसा तैसा या जब चाहे तब करनेमें भी हर्ज न समझनेवाला यज्ञका ककहरा भी नहीं
जानता। सेवामें तो सोलहों श्रृंगार करने पड़ते हैं, अपनी सारी कला उसमें खर्च
१. मोतीलाल नामक दर्जी, देखिए खण्ड १४, पृष्ठ ४९, पाद-टिप्पणी २ ।
२. शायद कबीरसे आशय है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२९७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र
प्रेमलीला ठाकरसीको
२५९
कर देनी पड़ती है। पहले यह फिर अपनी सेवा । मतलब यह है कि शुद्ध यज्ञ
करनेवालेके लिए अपना कुछ नहीं है। उसने सब कृष्णार्पण कर दिया है।
[ पुनश्च : ]
•
बापूके आशीर्वाद
आश्रम में सबसे अच्छी तरह तकली चलानेवाला व्यक्ति यह लिख भेजे कि वह
तकलीसे किस तरह कातता है, तकलीकी गति किस तरह बढ़ाता है, एक बारमें
कितना लम्बा तार खींचता है, आदि। मैं एक घंटेमें ४४ फेरेसे ज्यादा नहीं कात पाता,
यह बुरा लगता है। प्रो० त्रिवेदीने कांटा भेज दिया है। इसलिए तुम न भेजना ।
७२ पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
३६९. पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको
बापू
परवडा मन्दिर
२८ अक्टूबर १९३०
प्रिय बहन,
हाथसे
मेरे पास धुननेके लिए जितनी रुई थी वह अब समाप्त हो रही है। अभी तक
आश्रमसे मँगवाता था। इस बार तुम्हें कष्ट दे रहा हूँ। इसमें लालच यह है कि
तुम अपने पास ऐसी रुई न रखती हो तो रखने लगो । यह रुई हाथसे ओटी हुई
होनी चाहिए। जिनिंग प्रेसकी गांठकी रुई धुननी मुश्किल होती है और
उसका सूत अच्छा नहीं निकलता। यदि तुम ऐसी रुईका संग्रह अपने पास नहीं रखती
हो तो आश्रमसे अथवा विठ्ठलदास जेराजाणीके पाससे मँगा सकती हो। शायद स्थानीय
खादी कार्यालय में भी हो। तुम यह सब करनेका कष्ट करो, इसीलिए तो तुमसे
अनुरोध कर रहा हूँ ।
तुम्हारी सिलाईकी मशीनका उपयोग में और काकासाहब बराबर कर रहे हैं।
मोहनदासके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४८१४) की फोटो नकलसे सौजन्य : प्रेमलीला ठाकरसी
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२९८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाई घनश्यामदास,
३७०. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको
२८ अक्टूबर १९३०
आपकी आध्यात्मिक अशांति मुझको एक तरह अच्छी लगती है। इसीमें से सच्ची
शांति पैदा होगी। खादीका कार्य भले भाई महावीरप्रसाद हि करते रहें, और आप
उसकी फिकर न करें। परंतु मेरा विश्वास है कि कुछ एक पारमार्थिक काममें केवल
पैसे हि नहि परंतु दिल भी लगानेसे कुछ शांति मिलेगी। धंदेकी देखभाल करनेमें
ज्यादा समय जायगा [ यह ] में समज सकता हूं। सारा समय उसीकी चितामें रहनेसे न
धंदा अच्छा बनता है न उससे मनको शांति मिल सकती है। यज्ञके बारेमें इसी
सप्ताहमें जो कुछ मैंने लिख भेजा है ध्यानसे पढ़ें कैसा भी हो, मेरा विश्वास है
कि आपका प्रयत्न इतना दृढ़ है और आपका दिल ऐसा साफ प्रतीत होता है कि
आपको शांति अवश्य मिलेगी और सच्चा रास्ता भी दिखाई पड़ेगा।
आपका,
[ पुनश्च : ]
मोहनदास
जिस बहनको मैं मसुरीमें मिला था वह कहां है, कैसे है ? उनको मेरे आशीर्वाद ।
सी० डब्ल्यू ० ६१८८ से सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला
३७१. पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको
यरवडा मन्दिर
३० अक्टूबर, १९३०
प्रिय बहन,
तुमने तो मुझे रुई वापसी डाकसे ही भेज दी। रुई बहुत बढ़िया है। मैं
वजन लिखना भूल गया था। तुमने ठीक अनुमान लगाया। खतम होने लगेगी तब
मैं जरूर फिर कष्ट दूंगा। हाथसे ओटी हुई रुईका संग्रह करनेके लिए तुम्हें ललचाने में
मेरा अभिप्राय मात्र संग्रहका ही नहीं था, यह तो तुमने समझ ही लिया होगा। मैंने
ऐसा माना है कि तुम्हारी 'कुटी' में चरखा तो चलता ही है। लेकिन यदि तुम
पूनियाँ बाहरसे लेती हो अथवा गांठकी रुईका उपयोग करती हो तो मुझे हाथकी
ओटी हुई रूई भेजनेके इस प्रसंगके फलस्वरूप तुम भी इसी रुईका संग्रह और
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/२९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र अपटन सिक्लेयरको
२६१
उपयोग करने लगोगी। रेटिया बारसके दिन मुझे एक कलईके डिब्बेमें और तीन कांचकी
शीशियों में किशमिश आदि सूखा मेवा मिला अवश्य था, किन्तु मुझसे ऐसा कहा गया
था कि वह सुन्दरमूने भेजा है। तुमने भी मेवा भेजा था, इस बातका पता मुझे
तुम्हारे पत्रसे ही चला, अन्यथा में पहुँच जरूर लिखता । अब यह मेवा यही है या
कोई और, सो मैं नहीं जानना । तुमने जो मेवा भेजा था, यदि उसका विवरण भेज
दो तो मैं पता लगाऊँगा ।
लेडी विठ्ठलदास ठाकरसी
" पर्णकुटी'
यरवडा हिल
मोहनदासके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४८१५ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : प्रेमलीला ठाकरसी
३७२. पत्र : अपटन सिंक्लेयरको
परवडा सेंट्रल जेल
३० अक्टूबर, १९३०
प्रिय मित्र,
मैंने आपकी ' मैमनआर्ट" बड़ी दिलचस्पी और 'मेन्टल रेडियो " कौतूहलके साथ
पढ़ी। पहली पुस्तकसे मुझे सोचनेका बहुत मसाला मिला, लेकिन दूसरीवाली मुझे नहीं
रुची । मेरे विचारसे भारतमें कोई व्यक्ति टेलिपैथीकी सम्भावनायें सन्देह नहीं करेगा,
लेकिन उसके भौतिक उपयोगकी बुद्धिमत्ता पर अधिकांश लोग शंका करेंगे ।
अब मैं आपके कृपापूर्ण प्रस्तावका लाभ उठाऊँगा और आपसे अनुरोध करूँगा
कि आप अपनी अन्य पुस्तकें या वे पुस्तकें मुझे भेजें जो आपकी रायमें मुझे पढ़नी
चाहिए ।
श्री अपटन सिंक्लेयर
हृदयसे आपका,
मो० क० गांधी
स्टेशना पी०, पासाडेना
कैलिफोनिया
अंग्रेजी (जी० एन० २५५२) की फोटो नकलसे ।
१ और २. सिंक्केयर लिखित पुस्तकें, जो क्रमशः १९२५ और १९३० में प्रकाशित हुई थीं।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३७३. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको
३१ अक्टूबर १९३०
प्रिय कुमारप्पा,
मुझे खुशी है कि 'वाउज' के प्रश्न पर तुमने अपने विचार खुल कर प्रकट
किये हैं।
मुझे लगता है कि तुमने मेरा अर्थ गलत समझा है। इसमें तुम्हारा कोई दोष
नहीं है। तुम्हारे सामने मूल लेख नहीं है। मैंने अनुवाद नहीं देखा है। 'बाउ' शब्द
भी 'व्रत शब्दका उपयुक्त पर्याय नहीं है। लेकिन मेरे लिए सबसे अच्छा यही होगा
कि मैं अपना आशय स्पष्ट कर दूँ, और फिर अगर तुम मेरे विचारसे सहमत हो
तो बिलकुल सटीक शब्द ढूंढनेका जिम्मा तुम पर छोड़ दूं। अगर तुम असहमत हो,
तो जबतक हम इस विषयको विचार-विमर्श करके सुलझा न लें, तबतक तुम्हें इस
पर पत्र-व्यवहार जारी रखना चाहिए।
'वाउ' के अर्थ तुम वह शपथ लगाते प्रतीत होते हो जो सभामें उपस्थित लोगोंको
दिलाई जाती है। यह अच्छी चीज भी हो सकती है और नहीं भी हो सकती । मेरे
मनमें जिस 'वाउ' का विचार है वह अपनेसे की गई प्रतिज्ञा है। हमें अपने अन्तरमें
निवास करनेवाले दो तत्वोंसे निपटना है राम और रावण, अल्लाह और शैतान,
अहुरमज्द और ऑरिमान। पहला तत्व हमें वास्तवमें मुक्त करनेके लिए बाँधता है,
जबकि दूसरा तत्व हमें अपने चंगुलमें और अधिक कस कर जकड़नेके लिए हमें
मुक्त करता प्रतीत होता है। 'बाउ' अमुक चीज करने या न करनेकी एक प्रतिज्ञा
है जो हम रामसे करते हैं। यह अमुक चीज यदि अच्छी तो हम उसे करना तो
चाहते हैं किन्तु जबतक हम बँधे नहीं तबतक हममें उसे करनेकी शक्ति नहीं
आती, और यदि खराब है तो उससे बचना चाहते हुए भी हम जबतक उसी प्रकार
बँधे नहीं तबतक उससे बचनेकी हममें शक्ति नहीं आती। मैं इस बन्धनको विकासकी
एक अनिवार्य शर्त मानता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि हम सूर्यसे भी ऊँचे हैं।
तब क्या हमारे लिए यह और अधिक आवश्यक नहीं है कि हम यदि ज्यादा नहीं
तो कमसे कम सूरजके समान सच्चे और आस्थावान हों? अगर व्यापारके मामले में
आगा-पीछा करनेवाला व्यक्ति बेकार है तो आध्यात्मिक मामलोंमें वह इसके सिवा
और कुछ कैसे हो सकता है, क्योंकि इसमें तो परिणाम कहीं अधिक गुरुतर होते
हैं? अगर तुम ऐसा मानते हो कि मुझे हर कीमत पर सही बोलना और सही काम
करना चाहिए तो तुम मेरी सारी स्थितिको स्वीकार करते हो, और उसी प्रकार यदि
तुम यह स्वीकार करते हो कि मुझे अपने प्राणोंकी जोखिम उठा कर भी अपनी पत्नी
या मित्रके प्रति बफादार रहना चाहिए तो भी तुम मेरी स्थितिका समर्थन करते
हो। तुम आसानीसे ऐसे बहुतसे दृष्टान्त ढूंढ़ सकते हो। मेरी दृष्टिमें ईसा मसीह मुख्य
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र प्रभावतीको
२६३
रूपसे एक अडिग निश्चयी, अर्थात् व्रती व्यक्ति थे। उनकी हाँ के मतलब थे हमेशा के
लिए हाँ। व्रतबद्ध जीवन विवाहकी भाँति है, वह एक परम पवित्र संस्कार हैं। व्रत
धारण करना ईश्वरके साथ अविच्छेय विवाह सम्बन्ध स्थापित करना है। आओ, हम
उससे विवाह कर लें। किं बहुना विशेषु ।
सप्रेम,
अंग्रेजी (जी० एन० १००८१ ) की फोटो नकलसे ।
चि० वसुमती,
३७४. पत्र : वसुमती पण्डितको
बापू
परवडा मन्दिर
३१ अक्टूबर १९३०
मैं सोचता था कि तेरा पत्र क्यों नहीं आया। सरभोणसे हारकर या थककर
तो नहीं आई? ऐसा हो तो भी कोई बात नहीं। प्रकृतिका अतिक्रमण कौन कर सकता
है ? प्रकृति जहाँ तक जाने दे, यहाँ तक जानेका प्रयत्न करना हमारा धर्म है। शेष
तो ईश्वरके हाथमें है। हमारी अन्तरात्मा यदि यह गवाही दे कि हमने आलस्य नहीं
किया है तो बस, हमारा कर्त्तव्य पूरा हुआ। यह तो मैं मानता हूँ कि तू मुझे
लिखेगी कि अब तेरा क्या करनेका विचार है।
गुजराती (एस० एन० ९२९२ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
३७५. पत्र प्रभावतीको
चि० प्रभावती,
परवडा मन्दिर
१ नवम्बर, १९३०
आश्रमकी मारफत और सीधे लिखे तेरे दोनों पत्र मुझे मिले। तुझे इतना नहीं
घबराना चाहिए। जो कष्ट तुझपर आ पड़ा है उसे सहन कर यदि तेरा स्वास्थ्य
नहीं सुधरता, तो तुझे आश्रम चले जाना चाहिए। स्वास्थ्य ठीक होने पर ही घरका
काम-काज संभालना । कमजोर शरीरके साथ घरमें रहकर भी तू क्या कर सकेगी।
तुझे दौरे क्यों पढ़ते हैं, यह बात तो मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ। जान पड़ता
है, तू बहुत सोचती रहती है। विचार करना छोड़ दे। ईश्वर पर भरोसा रख ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
उसे जो करना होगा, करेगा। हम तो उसके हाथमें खिलौने हैं। फिलहाल तू मुझे
रोज एक पोस्टकार्ड लिखना, यह मुझे अवश्य यहीं मिलेगा। मैंने जयप्रकाशको पत्र
लिखा है। यदि वह तुझे अपना पत्र पढ़ाये और तेरी सलाह मांगे तो जैसी तुझे ठीक
लगे वैसी सलाह देना । चिन्तामात्र छोड़ देना। मुझे जो लिखना हो सो निर्द्वन्द्र होकर
लिखना मेरा पोस्टकार्ड क्यों नहीं मिला, इसके बारेमें कुछ नहीं कहा जा सकता ।
आशा करता हूँ कि तुझे यह पत्र तुरन्त मिलेगा ।
गुजराती (जी० एन० ३३७७) की फोटो नकलसे।
३७६. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको
भाई घनश्यामदासजी,
बापूके आशीर्वाद
यरबडा मन्दिर
१ नवम्बर, १९३०
यह खत भाई जयप्रकाश नारायणके लिये है। यह बिहारके प्रतिष्ठित कुलके
हैं और बिहारके बड़े सेवक व्रजकिशोर बाबुके दामात है। अब तक तो पं० जवाहर
लालके साथ कांग्रेसके दफतर में थे। अमेरिकामें सात वर्ष तक अभ्यास किया है। अब
माताका देहांत होने के कारण कुछ धनोपार्जन करनेकी आवश्यकता उनको प्रतीत हुई
है। उनकी हाजत रु० ३०० माहवार है। मेरा अभिप्राय है कि भाई जयप्रकाश
गुणवान नवयूवक है। यदि संभव है तो उनको कहीं भी रख लो और जो हाजत
है इतना माहवार दे दो। भाई जयप्रकाश हि के पाससे उनका और इतिहास सुनोगे ।"
बाबु ब्रजकिशोरकी लड़की को तो मैं खूब जानता हूं। आश्रममें काफी रह चुकी है।
ऐसी कर्त्तव्यशील और दृढ़ लड़की मैंने बहौत कम देखी है।
सी० डब्ल्यू० ६१८९ से सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला
आपका,
मोहनदास
२. इस पत्रके साथ जयप्रकाश नारायणका पत्र संलग्न था।
२. प्रभावती, जयप्रकाशकी पत्नी ।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० काशिनाथ,
३७७. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
यरवडा मन्दिर
२ नवम्बर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। शान्ता स्नान-चिकित्सा कर रही हो तो उसका परिणाम
सूचित करना । कुनेकी पुस्तककी दो प्रतियां हमारे पास थीं। मेरा खयाल है कि
उसका गुजराती अनुवाद भी हुआ है। कलावतीको घरके जीवनका काफी अनुभव
मिल गया है, और अब यह स्वेच्छासे वापस आ रही है, यह भी ठीक है।
रुक्मिणीकी आत्महत्या अत्यन्त करुणाजनक है। पतिका नाम-धाम मिल सके तो
जाननेका प्रयत्न करना । मुझे लगता है, इस आत्महत्या के पीछे और भी कारण होना
चाहिए। किसीने इस घटनाकी और ज्यादा जांच की है ? स्त्री समाजमें इसकी चर्चा
नहीं हुई ? जगह गोधराके आसपास की है, इसलिए सम्भव है मामा जानते हों। यदि
खबर सच हो तो घटना ऐसी है कि उसकी अच्छी तरह छानबीन होनी चाहिए।
अवकाश मिले तो जाँच करना और परिणाम सूचित करना। मूल पत्र लिखनेवाला
कौन है ? काशीका समाचारपत्र भेजने की जरूरत नहीं है। किन्तु उसमें क्या लिखा
हैं, यह क्या समझमें नहीं आता ?
गुजराती (जी० एन० ५२५८ ) की फोटो नकलसे।
३७८. पत्र : राधाबहन गांधीको
बापूके आशीर्वाद
२ नवम्बर, १९३०
चि० राधिका,
तेरा पत्र मिला । मेरा पत्र बार-बार पढ़ना और जो चीज समझ में न आये
उसे पूछती रहना। कोई मुझे लात मारकर सलाम कराना चाहे और मैं उसकी लात
सह लूँ, क्रोध न करूँ, लात मारनेवालेका भला चाहें, उसे कुछ कहूँ तक नहीं, किन्तु
फिर भी सलाम न करूँ, तो अपने इस आचरणसे में स्वाभिमानको भी रक्षा करता
हूँ और नम्रताकी भी। मुझे लात मारकर उसने मुझे अपने पांवोंके पास बिठानेकी
कोशिश की। मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया, स्वप्नमें भी उसका अकल्याण नहीं चाहा,
किन्तु मैं उसके पाँवोंके पास नहीं बैठा। मैं मानता हूँ कि इस तरह में स्वाभिमान
और नम्रता दोनोंकी रक्षा करता हूँ। यह घटना जिस समय घटी उस समय मुझे यह
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
भान नहीं था कि में नम्रताका आचरण कर रहा हूँ या क्या कर रहा हूँ। यह तो
मैं घटनाके घट चुकनेके बाद अब उसका विश्लेषण कर रहा हूँ। इस एक उदाहरणसे
तुम अन्य अनेक उदाहरणोंकी कल्पना कर सकती हो। तुम उन्हें अपने जीवनके अनु-
भवोंसे भी निकाल सकती हो। और उन्हें दूसरोंके जीवनमें देखनेके बजाय यदि अपने
ही जीवनमें देखनेकी आदत डाली जाये और यह कला हस्तगत हो जाये तो बहुत
अच्छा हो। हाँ, जब ऐसे उदाहरण ढूंढ़े जायें तब अपने गुणोंके उदाहरण ढूँढनेकी
झंझटमें नहीं पड़ना चाहिए। उन्हें देखनेका काम दूसरे लोग करेंगे। हमें तो अपने
दोषोंका ही दर्शन करना चाहिए।
[ पुनश्च : ]
अपने दोषोंका दर्शन भी नम्रताका ही एक रूप है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८६८९) से । सौजन्य : राधाबहन चौधरी
चि० महालक्ष्मी,
३७९. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको
यरवडा मन्दिर
२ नवम्बर, १९३०
तुम [ अपने कार्यसे ] अपनी और उस कार्यकी भी शोभा वृद्धि कर रही हो।
बीमारीको तो अपने पास भी न फटकने देना। अब रमाबहन आ गई होंगी। बच्चे
आ गये हों और लिखना सीख चुके हों, तो उनसे मुझे पत्र लिखनेको कहना। रमावहून
मुझे लिखें कि बम्बई में उन्होंने क्या देखा। बच्चे कैसा स्वास्थ्य लेकर लौटे हैं ? सब
भाई-बहनोंको आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ६८०२ ) की फोटो - नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३०५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८०. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
२ नवम्बर १९३०
प्रिय भगिनी,
तुमारा खत पाकर बहोत आनंद हुआ। मृत्युको भी जो ईश्वरकी कृपा समझते
हैं उनको लाभ हि होता है। इसी लाभ तुम उठा रही है। तुमारी प्रगतिका कुछ
अंत हि नहि है। एक पुरूष करेगा उससे ज्यादा आज तुम कर रही है। और मैं
स्त्रीओसे यही आशा करता हूँ। ईश्वरके कामोंमें स्त्रीशक्ति पुरुषसे कम तो है हि
नहि, अहिंसा इ० में वह बड़ जाती है। तारिणीके श्राद्धका वर्णन भी बोधप्रद है ।
सतीशबाबुको छुटनेका समय कब है ? अरुण और चारू अच्छे होंगे। आश्रमवासि
सबको मेरे आशीर्वाद
जी० एन० १६७४ की फोटो नकलसे ।
३८१. पत्र : रामचन्द्र त्रिवेदीको
बापुके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
२ नवम्बर, १९३०
चि० रामचंद्र,
तुमारा खत देखकर मुझे आनंद हुआ। तुमारी उम्मरके लड़के बहोत अच्छा सूत
कातते हैं, गीता पाठ करते हैं, रामायण समजते हैं। तुम क्या पढ़ता है ? घंटे में
कितना कातता है, सूतका आंक क्या है ?
जी० एन० ५२५९ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
१. काशिनाथ त्रिवेदीका सात वर्षीय भाई, जो उस समय आश्रममें रह रहा था।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाई त्रिवेदी,
३८२. पत्र : जयशंकर त्रिवेदीको
३ नवम्बर १९३०
हमारे नाम भेजा हुआ आपका पत्र मिला । तार तो मिला ही था । निश्चिन्त
हुआ। मनु तो एक बड़े संकटसे बच गया। हम इससे यह अनुमान कर सकते हैं कि
उसके भाग्य में कोई बड़ा पराक्रम करना होना चाहिए। अभी तो उसमें ऐसे ही गुण दिल
रहे हैं। ऐसा लगता है कि डाक्टरोंकी राय लेकर * अलमोड़ा या ऐसी किसी
दूसरी जगह जाने लायक पाया जाये तो अच्छा हो। रेवाशंकरभाईके धीरूको इससे
बहुत लाभ हुआ था। उसे मनुसे भी ज्यादा गम्भीर हड्डीका रोग था। प्रभुदासको भी
इससे लाभ हुआ है। पसलियोंमें अभी कुछ बाकी रह गया मालूम होता है। वह
जड़मूलसे चला जाये तो हम लोग एक हद तक निश्चिन्त हो सकेंगे।
गुजराती (जी० एन० ७७६७) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
चि० मनु,
३८३. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
परवडा मन्दिर
३ नवम्बर १९३०
तेरे बारेमें पिताजीका तार आया था, जिससे हम दोनों बहुत प्रसन्न हुए। अब
काम फिर करने लगनेमें उतावली न करना। कुछ शक्ति आ जानेके बाद अगर तू
अल्मोड़ा जैसी किसी जगह रह आये तो बहुत अच्छा हो। पूरी शक्ति आनेके बाद
लिखना कि ऐसी गम्भीर बीमारी तुझे क्यों हुई ?
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
यह लिख चुकनेके बाद तेरा पत्र मिला। हम दोनों उसे पढ़कर बहुत प्रसन्न
हुए। पूना जानेके बारेमें चर्चा होनेके बाद ही काकासाहब ने तुझे पत्र लिखा था ।
पूना जरूर जाना। लेकिन तूने देखा ही होगा कि मैं दूर तक की सोच रहा हूँ।
ईश्वर तेरी रक्षा करे ।
गुजराती (जी० एन० ७७६८) की फोटो नकलसे ।
१. साधन-सूत्र यह एक पंक्ति छूटी हुई है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८४. पत्र : पन्नालालको
परवडा मन्दिर
चि० पन्नालाल,
३ नवम्बर, १९३०
तुम्हारा प्रश्न अच्छा है। ऐसा ही प्रश्न पहले आन्ध्र प्रदेशके विषयमें भी उठा
था । अन्तमें निर्णय यह हुआ था कि हमें तो गुजरातमें गुजरातके ही लिए जरूरी
खादी पैदा करनेका प्रयत्न करना चाहिए। पंजाबके लिए भी यही सिद्धान्त लागू पड़ता
है। खादी के मूलमें ही स्थानिक उत्पादनका सिद्धान्त निहित है। प्रत्येक प्रान्तको, प्रत्येक
जिलेको, और सच पूछो तो प्रत्येक गाँवको अपनी जरूरतकी खादी खुद पैदा कर
लेनी चाहिए। ऐसा हो तो सस्ते और महँगेका सवाल ही नहीं रह जाता। जो लोग
[ खादीका ] अर्थशास्त्र समझ गये हैं वे यदि अपनी जरूरतका सूत नहीं कालते तो
खादी मिलके कपड़ेसे महँगी पड़ेगी। किन्तु तब भी यदि वे गरीबोंके हितमें खादी
पहनते रहते हैं तो अन्तमें उन्हें भी सादी ही सस्ती पड़ेगी। स्वदेशीकी मेरी व्याख्या पर
विचार करना। आज जो कठिनाइयाँ आ रही हैं उनसे निपटनेका हमारे लिए तो
एक ही रास्ता है सिद्धान्तका निश्चय करके फिर उसका वृढ़तापूर्वक अनुसरण करना ।
तथापि खानगी व्यापारी तो पंजाब आदिसे खादी मँगायेंगे ही। उन्हें हम नहीं रोकेंगे।
इसका औचित्य समझमें न आये तो फिर पूछना।
गुजराती (जी० एन० ३१०७) की फोटो नकलसे।
चि० कुसुम (देसाई),
३८५. पत्र : कुसुम देसाईको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
३ नवम्बर, १९३०
सुशीलाको लिखना कि मैं प्यारेलालसे शनिवारको मिला था। अब उसकी
तबीयत पूरी तरहसे ठीक हो गई है। उसका वजन पहले जैसा हो गया है। भोजन में
वह डेढ़ सेर दूध और आधा सेर रोटी लेता है । इच्छा होने पर साग-सब्जी भी
लेता है।
पत्र सम्बन्धी तेरी अनियमितताके बारेमें तुझे क्या लिखूं ?
गुजराती (जी० एन० १८०८) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३०८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रमा,
३८६. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
३ नवम्बर, १९३०
पीलियाके लक्षण हों और खट्टी डकारें आती हों, तो मेरा खयाल है कि
तुझे कमसे कम सात दिनका उपवास करना चाहिए। इस बीच सोडा या नमक डाल-
कर कमसे कम चार सेर पानी रोज पीना चाहिए। फिर ताजे फलके रससे उपवास
तोड़ना चाहिए। आखिरमें छाछ चावल जरूर लेना । उपवासके दिनोंमें एनिमा अवश्य
लेना चाहिए और कटिस्नान करना चाहिए। सात दिनके उपवासमें तुझे खाट नहीं
पकड़नी पड़ेगी। थोड़ा बहुत काम भी किया जा सकता है। उपवाससे तुझे कतई
कोई नुकसान नहीं होगा।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६८९) की फोटो नकलसे। सौजन्य: प्रेमाबहन कंटक
३८७. पत्र : जमनाको
यरवडा मन्दिर
३ नवम्बर, १९३०
चि० जमना,
बम्बई जाकर ठीक किया। वहाँ स्वास्थ्य ठीक रहे तो लौटनेकी जल्दी मत
करना। कल्याणदास, धरमदास, प्रेमकुँवर और जिन दूसरे भाइयों या बहनोंसे में मिला
था किन्तु जिनके नाम में भूल गया हूँ उन सबको मेरा आशीर्वाद कहना। कल्याण-
दास और धरमदास आजकल क्या करते हैं ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५४५ ) की फोटो नकलसे। सौजन्य: नारणदास गांधी
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३०९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८८. पत्र : शान्ता शंकरभाई पटेलको
चि० शान्ता ( शंकरभाई),
यरवदा मन्दिर
३ नवम्बर, १९३०
पत्र लिखते समय तू अशान्त थी। अपने छोटे-से पत्र में तूने तीन बार लिखा
है कि "कुछ सूझता नहीं।" अपनी लिखनेकी नोटबुकमें तू लिखनेका अभ्यास करने
बैठी है, ऐसा मानकर यदि सावधानीसे धीरे-धीरे लिखे तो लिखावट जरूर अच्छी
आयेगी। जिसे सारे दिन काम करना होता है उसे तो लिखनेका विषय आसानीसे
सूझना चाहिए। मिलनेकी इच्छा होना स्वाभाविक है। ईश्वर मिलायेगा तब मिलेंगे ।
जबतक वह मिलनेकी घड़ी नहीं लाता तबतक हम धीरज रखेंगे ।
गुजराती (जी० एन० ४०५५ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
३८९. पत्र : दुर्गा गिरिको
चि० दुर्गा,
यरवडा मन्दिर
३ नवम्बर, १९३०
इस बारके तेरे पत्रको में अच्छा मानता हूँ। भाषाकी भूलें जरूर हैं, पर उसमें
कोई हर्ज नहीं लिखे हुए पत्रोंको दुबारा पढ़नेकी आदत डालनी चाहिए। इससे कुछ
भूलें सुधारी जा सकती हैं। दतीन प्रार्थनासे पहले हो तो अधिक अच्छा रहे। सिलाईमें
क्या सीख रही है ? चरखे और तकली पर एक घंटे में कितना और किस अंकका
सूत कात लेती है ? लिखना । अगर गति निकाली न हो, तो निकाल कर लिखना ।
अंक निकालना जानती है न? बिछौनेमें लेटते समय रामनाम लेती है, सो बहुत ही
अच्छी आदत है।"
बापूकी विराट् वत्सलता
बापूके आशीर्वाद
२. मूल पत्र गुजराती में था।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३१०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३९०. पत्र : नारणदास गांधीको
३० अक्टूबर / ४ नवम्बर १९३०
चि० नारणदास,
तुम्हारा पुलिन्दा आज मिला। चप्पलके लिए भेजा गया चमड़ा तल्लेके लायक
नहीं था। अभी तो मुश्किलसे एक महीना हुआ है, उतनेमें वह घिस गया है। तल्ले
और एड़ीके लिए सख्त चमड़े की जरूरत होती है। वह जानवरके किसी खास भागका
होता है और भैंसकी खालसे बनता है। ऐसा टुकड़ा मिले तो भेज देना । अथवा जिस
नम्बरकी चप्पल काकासाहब के लिए भेजी है उस नम्बरकी या उससे एक नम्बर
ज्यादा हो तो भी भेजनेसे काम चलेगा।
कोटा न भेजने के बारेमें तो मैं शायद लिख ही चुका हूँ। नहीं, तो इससे
मालूम हो जायेगा। भाई त्रिवेदी काँटा दे गये हैं ।
तुम्हारा तरीका में जानता हूँ। जबतक महादेव बाहर हैं, तबतक तुम अपने
तरीके के मुताबिक अन्तिम निर्णयका बोझ नहीं उठाओगे; और वह ठीक है। केशुका
बहुत लम्बा पत्र आया है। यह बहुत दुखी लगता है। तुम्हारी बहुत शिकायत की
है। उसका मुझपर कुछ असर नहीं हुआ। किन्तु तुम उसे एक ओर ले जाकर सब
पूछ लेना। उसकी प्रकृति उतावली करनेकी है, मैं यह जानता हूँ। किन्तु यह निर्मल-
हृदय नवयुवक है। उसे सेवा करनेका बहुत उत्साह है। किन्तु उसे बहुत जानने और
मौलिक काम करनेका लोभ है। मेरी परीक्षामें भूल हो सकती है, किन्तु तुम उसे
बुलाकर सब बात सुनना और जो छाप तुमपर पड़े वह मुझे लिखना । वह खर्चीला
है, यह मैं जानता हूँ, किन्तु खर्चीला होते हुए भी उसमें सादगी है, ऐसा मेरा अनुभव
है । पर उसका आरोप कायम है और गम्भीर है।
कान्ता और सुमंगलके बारेमें हमें निर्भय रहना है। वे निकटके सम्बन्धी हैं।
ये सगे चचेरे भाई-बहन हैं और एक साथ पले हैं। यह होते हुए भी मुझे जरा
शक हुआ था, वह मैंने दोनोंसे कहा था किन्तु मुझे लगा कि दोनों बिलकुल निर्मल
हैं। सुमंगल कान्ताका शिक्षक था और कान्ताको उसपर भारी विश्वास है। अन्तमें
भाई-बहन के सम्बन्धमें भी वहम करके हम कहाँ जायेंगे? बह्नोंके बारेमें हमने पूर्ण
विश्वासकी नीति ग्रहण की है। ऐसा करते हुए हाथ जले तो उसे भी सहन करेंगे।
हम जोखिम उठाये बिना स्त्रियोंके प्रति अपने धर्मका पालन नहीं कर सकते। हिन्दू
स्त्रियोंका हिन्दू पुरुषों पर बहुत भारी कर्ज है।
२. नाम नहीं दिया गया है।
Gandhi
Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३११
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
२७३
३१ अक्टूबर १९३०
ऊपरका लिख चुकने पर नी का घंटा बजा, इसलिए कलम रख दी। जहाँ
तक हो सके, नौ बजेके बाद काम न करनेका निश्चय किया है।
अमीदासके बारेमें तुम्हारा पत्र मिला था। अब मुझे सन्तोष है। उसका आग्रह
उसे फल देगा। मैं जो जानता था वह उसे बताना मुझे अपना धर्म लगा। भाई
चितालिया की मांगके बारेमें मुझे ही निर्णय करना हो, तो १५०० रुपये तो भेज देना ।
मेरे कथनमें भूतकालका उल्लेख था, भविष्यका नहीं। उस कथन के कारण यह रकम
नहीं मांगी जा सकती, ऐसा मैं मानता हूँ। किन्तु मेरे पास निर्णय करने लायक
पूरे साधन नहीं हैं। भाई करसनदास पर मुझे विश्वास है, और उन्होंने रकम मांगी
है इसलिए दे देना ही धर्म मानता हूँ किन्तु इसके बाद जरूरत लगे तो वे जमना-
लालजी अथवा भाई किशोरलालकी सम्मति से लें। लगता है यही ठीक होगा। भाई
करसनदासको रकम के साथ इस पत्रकी एक नकल करके भेज देना। यह ठीक है या
नहीं, इसके बारेमें भाई करसनदास अपनी राय लिखें।
१ नवम्बर १९२०
इसके साथ प्रभावती, जयप्रकाश और उनके बारेमें घनश्यामदासको लिखा पत्र
है । तीनों एक लिफाफेमें फौरन भेज देना। ये दोनों जयप्रकाशकी माँके देहान्तके
कारण इस समय महादुःसमें पड़े हैं। क्या आश्रममें कातनेवाले बिगड़े सूतकी तौल
करते है ? न तोलते हों तो रोज तौलना चाहिए। यदि कोई रोज ऐसा करता हो
तो कितना सूत खराब होता है यह लिखना कातनेवाले औसतन घंटेमें ज्यादासे ज्यादा
कितनी गतिसे कात पाते हैं ? एक बार तैयारी करलेके बाद अच्छी गतिसे कातना
एक बात है, और यदि कोई पूरे वर्षका हिसाब रखता हो तो उसकी कितनी गति
होती है, यह दूसरी बात है। ठीक तरहसे देखें तो इसमें माल टूटने दुसरी लगाने,
साफ करने आदिमें जो समय गया हो, वह भी गिनना चाहिए। यह गिनें तो सही
हिसाब किया गया माना जायेगा ।
मंगल प्रभात, ४ नवम्बर, १९३०
आश्रम में जिन व्रतों का पालन किया जाता है उनके बारेमें यज्ञके अर्थ और व्रतकी
आवश्यकता के बारेमें हम विचार कर चुके हैं। अब जिस पुस्तकका हम हर सप्ताह
नित्य थोड़ा-थोड़ा करके पारायण और मनन करते हैं, जिसे अपने लिए हमने आध्या
त्मिक दीप-स्तम्भरूप बना रखा है, उसे मैंने जैसा समझा है, उसपर अपने विचार
देनेकी इच्छा है। यह खयाल पहले एक पत्र पाकर हुआ था। लेकिन गत सप्ताह
भाई गोविन्दजी पत्रने मुझे इसके लिए तैयार कर दिया। यह लिखते हैं कि वह
'अनासक्तियोग' पढ़ते हैं; लेकिन समझने में बहुत कठिनाई पड़ती है। सबकी समझमें
आने योग्य भाषामें अर्थ करनेका प्रयत्न करते हुए भी शब्दशः अनुवाद देनेमें समझनेकी
कठिनाई तो अवश्य रहेगी। जहाँ विषय ही कठिन हो, वहाँ सरल भाषा क्या कर सकती
४४-१८
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
है ? इसलिए अब विषयको ही सरल रीतिसे रखनेका प्रयत्न करना चाहता हूँ। जिस
वस्तुका हम उठते-बैठते उपयोग करना चाहते हैं, जिसकी सहायतासे अपनी सारी
आन्तरिक उलझनें सुलझानेका प्रयत्न करते हैं, उस ग्रन्थको जितनी रीतियोंसे, जैसे
भी समझा जा सके वैसे समझने और बारम्बार उसका मनन करनेसे अन्तमें हम
तन्मय हो सकते हैं। मैं तो अपनी सारी कठिनाइयोंमें गीता माताके पास दौड़ता हूँ
और अबतक आश्वासन पाता आया हूँ। दूसरोंको भी, जो उसमें से आश्वासन पानेके
इच्छुक हैं, शायद, जिस रीतिसे में उसे रोज-रोज समझता जाता हूँ, वह रीति जानकर
कुछ अधिक मदद मिले। उस रीतिको जानकर उनको कुछ नया प्रकाश पाना भी
असम्भव नहीं है।
आज तो बारहवें अध्यायका सार देना चाहता हूँ। यह भक्तियोग है। विवाहके
अवसर पर दम्पतीको पांच यशोंमें इसे भी एक यज्ञ रूपसे कंठ करके मनन करनेको हम
कहते हैं। बिना भक्तिके ज्ञान तथा कर्म शुष्क हैं और उनके बन्धन रूप हो जानेकी ।
सम्भावना है। इसलिए भक्तिभावसे 'गीता' का यह मनन आरम्भ करना चाहिए।'
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
६२ पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
३९१. पत्र : बहरामजी खम्भाताको
यरवडा मन्दिर
४ नवम्बर १९३०
भाई खम्भाता,
तुम्हारे दोनों पत्र और जीवन-चरखा मिला। तुम्हारे नाम पूनाके पते पर मैंने
जो पत्र लिखा था वह तुम्हें मिला या नहीं, यह तुम्हारे पत्रसे स्पष्ट नहीं होता ।
जीवन-चरखा तो मैं अन्ततः तुम्हें वापस करनेके लिए ही सुरक्षित रखूंगा; उसे
आजमाने के बाद अपना अनुभव भी तुम्हें बताऊँगा। तुम दोनों अपना स्वास्थ्य सँभालना;
१. गांधीजीने व्रतक सम्बन्धमें आश्रमवासियोंको कुछ पत्र लिखे थे, और उसी प्रकार उन्होंने गीत के
बारेमें भी लिखे थे; जिन्हें आश्रमकी प्रार्थना सभा में पढ़ कर सुनाया जाता था; देखिए पृष्ठ ४१ बादमे
गीताबोध नामसे इनका संकलन प्रकाशित किया गया था। अंग्रेजीमें इसका अनुवाद डिस्कोर्सेस ऑन
द गीताके नामसे प्रकाशित हुआ था। इन प्रवचनोंकि पाठके लिए देखिए खण्ड ४९, "गीता पत्रावलि,
२१-२-१९३२ ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३१३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र मीराबहनको
२७५
तुम्हारा मन तो निर्मल है ही काकासाहब प्रसन्न हैं। वे २८ तारीखतक तो जरूर
ही रिहा हो जायेंगे ।
गुजराती (जी० एन० ६५९७ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
३९२. पत्र : मीराबहनको
यरवडा मन्दिर
चि० मीरा,
६ नवम्बर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। मेरे खयालमें जो गाण्डीव मुझे मिला है उसमें कोई खास
बात नहीं है। उसने जितना कष्ट तुम्हें दिया था, उतना ही काका को दिया। मैंने
खरावीका पता लगा लिया, उसे दूर कर दिया और उसके बाद उसने मुझे एक
बार भी तंग नहीं किया। दूसरी माल जितनी पतली हो सके उतनी पतली होनी
चाहिए। मैं तो नारणदासने आश्रमसे जो भेजी है उसका उपयोग कर रहा हूँ। मेरा
खयाल है, वह छह धागोंकी है। घूमते हुए चकके लिए मालकी गाँठ बाहरकी ओरसे
बाँधनी चाहिए। दोनोंमें से कोई भी बहुत कसी हुई नहीं होनी चाहिए। चक्रको विना
झटकेके घूमना चाहिए झटकेका कारण यह हो सकता है कि चक्रोंमें लोहे के छल्लोंको
मजबूतीसे न जमाया गया हो या धुरियाँ सीधी न हों या वे सीधी लाइनमें न हों।
मेरी दृष्टिमें तो इसका सौन्दर्य इसके निर्विघ्न चलने में तथा कम बिगड़ने में है। लेकिन
जैसाकि मैंने पिछले पत्र में बताया है, तुम्हें चरखेके लिए अपना ध्यान दूसरी चीजोंसे
हटाने की जरूरत नहीं है। मेरे खयालसे अधिकांश वस्तुओंकी तरह चरखोंके बारेमें
भी यह सही है कि जो चरखा एकके अनुकूल हो यह जरूरी नहीं कि वह और
सबके भी अनुकूल हो। विशेषज्ञोंको अलग-अलग किस्मके चरखोंके मूल्योंका समंजन
करना पड़ता है। हम कार्यकर्त्ताओंको तो उस चरलेसे सन्तोष होना चाहिए, जिस पर
कमसे कम कष्ट उठाकर अधिकसे-अधिक काम हो सके। अगर मुझे आवश्यक यन्त्र-
शिक्षा मिली होती या इस कलामें मेरी प्रतिभा होती, तो मुझे धुनाई और कताईमें
और धुनकियों, चरखों और तकलियोंकी परख करनेमें पारंगत बनने में बड़ी खुशी
होती। मगर मुझे तो यही समझना चाहिए कि यह महत्वाकांक्षा मेरे लिए निषिद्ध
है, यद्यपि में खोज नहीं छोड़ेगा। यहाँ खोज मेरे लिए स्वयमं है।
लम्बा हो या छोटा, मुझे आशा है कि कमसे कम एक भजन [ का अनुवाद ] तो
रोज कर लूंगा। मराठी भजन मैंने काका की सहायता से पूरे किये। बंगाली भजन भी
शुरू कर दिये थे। परन्तु काकासे यह जानकर कि उन सबका अनुवाद स्वयं कविवरने
किया है या उनकी निगरानी में हुआ है, मैंने उन्हें छोड़ दिया, क्योंकि मुझे लगा कि तब
तो प्रयत्न करना भी अधर्म कार्य होगा। इसलिए अब केवल ४२ भजन ही और रह
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३१४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७६
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
गये हैं। मराठी भजन बहुत छोटे होने के कारण कभी-कभी हर रात तीन भी कर
लेता था । ४२ दिन बीतनेसे पहले-पहले खत्म कर लेनेकी आशा रखता हूँ।
तुम्हारे पत्रमें गाण्डीवके सम्बन्धमें एक प्रश्नका उत्तर मुझे अभी भी देना बाकी
है। मैं चरखेके चक्र भागको लगभग ३ इंच ऊँची लकड़ीकी छड़में चढ़ा कर उसे दो
कीलोंसे जड़ देता हूँ । ये कीलें आसानीसे निकाली और लगाई जा सकती हैं। इस
तरह यह सिरेसे नीचे की ओर आड़ी स्थितिमें होता है। इसे किसी पेटीके ऊपर इस
प्रकार भी चढ़ाया जा सकता है कि यह समतल स्थितिमें रहे। काकाने तो उसे एक
कुर्सीकी बेंतवाले तलेमें बाँध दिया और एक कुर्सी पर बैठे-बैठे उसे चलाया । मुझे
खुशी है कि तुमने अलेक्जेंडर से भेंट की। उन्होंने मुझे उसके फौरन बाद चिट्ठी लिखी ।
यह पत्र यहाँ प्राप्त होनेके १० दिन बाद मुझे दिया गया था। उनसे मुझे पता चला
कि तुमसे उनकी मुलाकात बिलकुल संयोगवश ही हो गई थी। जब तुम उन्हें पत्र
लिखो तो उन्हें मेरा प्यार भेज देना और लिख देना कि मुझे उनका पत्र मिल गया
है। मुझे उन्हें अलग से पत्र लिखनेकी कोशिश नहीं करनी चाहिए। आजके लिए
इतना काफी है।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५४१८) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६५३ से भी ।
३९३. पत्र : मीराबहनको
परवडा मन्दिर
७ नवम्बर, १९३०
चि० मीरा,
तुम्हारा पत्र मिला। मुझे खुशी है कि तुम फिर पूर्णतः स्वस्थ महसूस कर
रही हो। यह न समझना कि गाण्डीव चरला तुम्हें आजमाना ही है। मुझे मालूम
है कि तुम्हें बहुत-से काम करने पड़ते हैं और बढ़िया चलनेवाला चरखा होने पर
शायद तुम अपना कताई यश बिना किसी झंझटके पूरा कर सकोगी।
एन्ड्रयूजसे मेरा प्यार कहना। मैं उन्हें एक औपचारिक पत्र लिख सकता हूँ ।
परन्तु में उन्हें मात्र एक औपचारिक पत्र नहीं लिखना चाहता। इससे तो यही अच्छा
होगा कि मेरा मौन ही उनसे बात करे। हृदयके प्रवाहके लिए अकसर कलम बाधक
नहीं तो अनावश्यक जरूर होती है।
महादेवको बहुत परिश्रम नहीं करना चाहिए। मैंने इस बारे में उसे सख्त पत्र
लिखा है। मगर जब कभी वह अपने स्वास्थ्य के बारेमें लापरवाही करे, तब उसे
डाँट दिया करो। मेरा जुकाम बिलकुल मिट गया था और इसीलिए मैंने पिछले
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३१५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: पद्माको
२७७
सप्ताह जब तुम्हें पत्र लिखा, तब मुझे उसका खयाल तक नहीं आया। हाँ, आजकल
तो खजूर और तरकारियाँ मिलाकर लेता हूँ, तरकारियाँ बहुत कम मात्रामें सर्दी
न हुई होती तो तरकारियोंसे मेरा काम मजेसे चल रहा था। इस सप्ताह में मैं तुम्हें
इससे ज्यादा वक्त नहीं दे सकता ।
सप्रेम,
[ पुनश्च : ]
से भी ।
आशा है भजन में अनुमानसे भी जल्दी पूरे कर लूँगा ।
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४१९) से । सौजन्य: मीराबहन जी० एन० ९६५२
३९४. पत्र: पद्माको
परवडा मन्दिर
चि० पद्मा,
७ नवम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला । गाँठ मिटनी ही चाहिए। उसके विषयमें लापरवाही मत
करना। यदि गंगाबहन साथ न होती, तो तेरे बाहर जाने से मुझे चिन्ता तो अवश्य
होती। पर वे साथ हैं इस लिए मैं निश्चिन्त हूँ। मुझे नियमित रूपसे लिखती रहना ।
अक्षर बड़े और सुडौल होने चाहिए।
गुजराती (जी० एन० ६११४ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० सुशीला,
३९५. पत्र : सुशीला गांधीको
यरबडा मन्दिर
७ नवम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला। मणिलालने ४० पौंड वजन खोया है, लेकिन उसने मुझसे
अपने अध्ययनके सम्बन्धमें सलाह मांगी है जिससे लगता है कि उसकी शक्ति सुरक्षित
रह गई है। फीनिक्सके बारेमें प्रागजी जो चाहते हैं, वह मुझे उचित मालूम होता
है किन्तु तू और मणिलाल मिलकर जो निर्णय करोगे वही ठीक होगा। मेरे पास
निर्णय करनेके लिए आवश्यक पूरे तथ्य भी कहाँ है? इसके सिवा सामान्य अनुभव
यह है कि जिसे अन्तमें कार्यका उत्तरदायित्व उठाना होगा, वही उसके बारेमें सन्तोष-
कारक निर्णय कर सकता है। भारतीकी लिखावट बुरी हो तब भी उसे लिखना तो
चाहिए। मित्रको लिखनेमें लज्जा किस बातकी ? कृष्णकान्तसे तो माफी ही मांगनी
चाहिए। उसका चेहरा में बिलकुल भूल गया हूँ। और नाम तुझसे सुन रहा हैं
याकि तेरे पत्र में लिखा हुआ देख रहा हूँ। कृष्णकान्तको ढेर सारा आशीर्वाद भेजूं
तब तो वह माफ करेगा न ? उससे पूछना तब भी माफी न दे तो मेरी ओरसे
वकालत करना। क्या सीता अब उतनी ही स्वस्थ हो गई कही जा सकती है, जितनी
वह दक्षिण आफ्रिकामें थी? उसे खानेके लिए फल देती हो न ? प्रागजीको मेरा
आशीर्वाद देना और [मेरी ओरसे ] कहना कि सेवा सहज कर्तव्यके पालनमें ही है।
गोमतीके साथ कौन है ? उन्हें खानेको क्या मिलता है? उनके जितने समाचार तेरे
पास हों, मुझे देना ।
गुजराती (जी० एन० ४७७४ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३९६. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
यरबडा मन्दिर
७ नवम्बर, १९३०
चि० भगवानजी,
तुम्हारा पत्र मिला। तुम जैसे-जैसे दूसरोंके कार्यों में रुचि लेना बन्द करोगे और
अपने कर्तव्यमें लीन होगे वैसे-वैसे तुम्हें सत्यके अधिक दर्शन होंगे। बहुत ज्यादा सोच-
विचारमें पड़ना भी अच्छा नहीं है। मनुष्यको एक हदतक ही सोचना चाहिए; उसके
बाद श्रद्धाका आश्रय लेना चाहिए। जिस तरह ज्यादा खुराकसे अपच हो जाती है
और शरीर बिगड़ जाता है उसी तरह मनको भी ज्यादा खुराकसे अपच हो जाती
है और यह खराब हो जाता है। जिस तरह शरीरको शान्तिकी जरूरत है उसी तरह
मनको भी है। इसीसे रामनाम आदि मन्त्रोंके निरन्तर उच्चारणका विधान किया
गया है। इससे मन तुरन्त शान्त हो जाता है। अब अर्थ लें पर और अपर अर्थात्
अव्यक्त और व्यक्त, निराकार और साकार इसका 'गीता' में बार-बार निरूपण
किया गया है। हम उसका संक्षिप्त अर्थ ईश्वर अथवा ब्रह्म करते हैं अथवा सत्य
भी करते हैं । स्वतन्त्र सत्य तो पर है और किसी व्यक्ति द्वारा देखा गया सत्य,
मर्यादित अपर है। जो मनुष्य इस ईश्वरकी झांकी कर लेता है उसकी सारी समस्याएँ,
समस्त शंकाएँ और कमोंके अच्छे बुरे फलका भोग भी नष्ट हो जाता है। दूसरे
अध्यायके " रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्या निवर्तते " का भी यही अर्थ है जो मनुष्य सहज
प्राप्त कर्त्तव्यमें तन्मय रहता है वह पर के दर्शन करता है। इसीलिए उसकी
समस्त उलझनें नष्ट हो ही जानी चाहिए। जिसे यह अनुभव नहीं होता [ उसके
लिए कह सकते हैं कि ] वह कर्त्तव्यमें तन्मय नहीं हुआ। मैंने इसे इस ढंगसे प्रस्तुत
करनेका प्रयत्न किया है जिससे यह सब अच्छी तरह तुम्हारी
फिर भी यदि समझमें न आया हो तो पूछना।
समझमें आ जाये ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३२९ ) से । सौजन्य : भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
१. साधन-सूत्र में अपर दिया गया है जो स्पष्टतः भूल है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३९७. पत्र : बलीबहन वोराको
यरवडा मन्दिर
७ नवम्बर, १९३०
चि० बली,
तेरा पत्र बहुत दिनके बाद मिला । मनको अपनी इच्छाके अनुसार और जैसा
बा को अच्छा लगे वैसा रखना। मैं तो तुम बह्नोंका जी बिलकुल नहीं दुखाना चाहता
और यहाँ बैठे हुए तो कैसे चाह सकता हूँ ? बच्चोंके प्रति तुम दोनोंका प्रेम तो मैं
समझता ही हूँ। कान्तिकी चिन्ता मत करना। वह बहादुर लड़का है और फिर
ईश्वर जैसा हम सबका स्वामी तो बैठा ही है। वह सबकी रक्षा करता है। जब भी
उससे मिलनेकी सुविधा हो, मिलती रहना, और मिलनेके बाद समाचार मुझे लिखना ।
वैसे, उसके समाचार मुझे दूसरोंसे तो मिलते ही रहते हैं ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ५०५८ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : सुरेन्द्र मशरूवाला
३९८. पत्र : कृष्णमैया देवीको
यरवडा मन्दिर
७ नवम्बर, १९३०
चि० कृष्णमैया,
तुम्हारे किसी भी पत्रका जवाब मैंने न दिया हो,
आता। किसी प्रश्नका उत्तर बाकी रह गया हो तो मुझसे
गुजराती (जी० एन० ६२२०) की फोटो नकलसे ।
ऐसा तो मुझे याद नहीं
दुबारा पूछना |
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३९९. पत्र : तारामती मथुरादास त्रिकमजीको
७ नवम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। रोटीके सिवाय मथुरादास और क्या
लेता है ? दूध, फल आदि लेता है क्या ? बाहरसे कुछ भोजन मँगाता है या जो कुछ
जेल में मिलता है वहीं लेता है? वहाँ घूमने-फिरने लायक जगह है? घूम-फिर सकता
है ? उसके पास कोई साथी है? यह सब मालूम करके मुझे लिखना । प्यारेलाल
मजे में है। शंकरने भी मुझे पत्र लिखा था जब आये, तब उससे कह देना कि मैंने
उसे जवाब दिया था। दिलीप काफी कसरत कर पाता है क्या? तुमने खुद घूमना
जारी रखा है? छोड़ दिया है, तो शुरू कर देना चाहिए। कुछ पढ़ना प्रारम्भ किया
हो, तो मुझे यह भी लिखना कि क्या पढ़ रही हो ।
[ गुजरातीसे ]
बापुनी प्रसादी
४००. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
परवडा मन्दिर
८ नवम्बर, १९३०
चि० मनु,
पिताजीका अन्तिम पत्र मुझे मिल गया है। उन्हें अलगसे नहीं लिखता । अब
तो तू शीघ्र ही पहले जैसा स्वस्थ हो जायेगा। यह भी हो सकता है कि तेरे शरीरमें
पहले जो जहर था वह भी इस बीमारी में निकल गया हो। मेरा खयाल है, अब
तो तुम सब पुनामें होगे। इसलिए यह पत्र तुम लोगोंके पास थोड़ा घूम-फिरकर
पहुँचेगा ।
गुजराती (जी० एन० ७७६९ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० दूधीबहन,
४०१. पत्र : दूधीबहन वालजी देसाईको
परवडा मन्दिर
८ नवम्बर, १९३०
यहाँ हालमें तुम्हारा कोई पत्र नहीं मिला। वालजी फिर मन्दिरमें जा पहुँचे
हैं इसलिए यह लिख रहा हूँ। घबड़ाती तो नहीं हो ? वालजी जैसे सरल हृदय और
निर्दोष व्यक्तियोंके बलिदानसे ही हम सच्चा स्वराज्य प्राप्त कर सकेंगे। इसलिए
वालजीके इस बलिदान पर हमें प्रसन्न ही होना चाहिए, किसी प्रकारका दुःख
कदापि नहीं । प्रभु सबकी रक्षा करनेवाला है। अपना सारा हाल लिखना ।
देसाई
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४०९ ) की फोटो नकलसे सौजन्य वालजी गोविन्दजी
४०२. पत्र : नानाभाई इच्छाराम मशरूवालाको
यरवडा मन्दिर
८ नवम्बर १९३०
भाई नानाभाई,
ताराके पत्रके नीचे तुम्हारे लिखे शब्द पढ़े। तुम जितना करते हो, वह पर्याप्त
है। तीन फुट ऊँचा मनुष्य अपना हाथ वहाँ तक पहुँचाना चाहे जहाँ छः फुट ऊँचे
मनुष्यका हाथ पहुँचता है और ऐसा न कर सकने पर दुखी हो, तो वह मानो जग-
कर्ताकी निन्दा करता है। जो यथाशक्ति भक्तिपूर्वक अपना कर्तव्य करता है वह
अपना ऋण पूरी तरह चुकाता है। मेरा विश्वास है कि तुम ऐसा ही कर रहे हो ।
हाँ, यह बात जरूर सोचने-विचारने लायक है कि तुम्हारा शरीर इतना निर्बल क्यों
है। लेकिन ऐसा मालूम होता है कि तुम सब भाइयोंके शरीर जन्मसे ही निर्बल
हैं। इसके कारणोंको जाननेका प्रयत्न करना चाहिए और यदि ऐसा मालूम हो कि
अपने लिए तो इसका कोई इलाज सम्भव नहीं है तो जिनकी रक्षाका भार हमपर
है उनके सम्बन्धमें तो उन कारणोंको दूर करनेकी कोशिश करनी ही चाहिए।
गुजराती (जी० एन० ४७७६) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०३. पत्र : तारा मशरूवालाको
चि० तारा (अकोलावाली),
यरवडा मन्दिर
८ नवम्बर १९३०
तेरा पत्र ( कितने महीनों बाद ?) मिला। तेरे माथेमें चोट लगनेके बाद तुझे
जो दर्द रहा करता था, उसके बारेमें तू कुछ नहीं लिखती। अपनी डायरीसे किसी
एक दिनका विवरण भेजना। सीताको खेल-खेल में बहुत कुछ संस्कृत सिखाई जा सकती
है । झंडा ऊँचा रहे हमारा वह जरूर गाये, किन्तु उसी तरह वह 'गीता' से कोई
सरल-सा श्लोक भी गुनगुना सकती है।
या को मेरा आशीर्वाद कहना ।
गुजराती (जी० एन० ४७७५ ) की फोटो नकलसे ।
चि० रोहिणी,
बापूके आशीर्वाद
४०४. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको
यरवडा मन्दिर
८ नवम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला, उसके पहले ही समाचारपत्र में कानजीभाईके पकड़े जानेकी
खबर पढ़कर में तुझे लिख चुका था। तुम सब कितने भाग्यशाली हो। पिताजीको
कितने दिनकी सजा हुई है? उनकी उम्र क्या है? अकेली तू ही रह गई है, ऐसा
नहीं है। यह कुछ कम बहादुरी नहीं थी कि तूने घोड़ेको कैद कर लिया था। उस
समय ईश्वरने तुझे ऐसी प्रेरणा दी और उसके लिए आवश्यक बल दिया। तुझे
भविष्य में भी ऐसी ही सफलताएँ मिलती रहें।
गुजराती (जी० एन० २६५४ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० ललिता,
४०५. पत्र : ललिताको
परवडा मन्दिर
८ नवम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला । तू गंगाबहन के साथ गई सो ठीक ही किया। अब काम अच्छी
तरह करना और बहादुर बनना तेरी उम्रको देखते हुए तेरी लिखावट खराब कही
जायेगी और तेरी भाषा भी ठीक नहीं है। प्रयत्न करके लिखावट और भाषा दोनोंको
सुधारना। इसमें ज्यादा समयकी नहीं, केवल लगनकी जरूरत है। धीरे-धीरे बहुत
प्रगति की जा सकती है।
गुजराती (जी० एन० ९२१८ ) की फोटो - नकलसे ।
चि० गोविन्द,
४०६. पत्र : गोविन्द पटेलको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
९ नवम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला । आँखें कमजोर हों तो न पढ़ना ही ठीक है। 'गीता' के कितने
अध्याय मुखाग्र हैं ? सम्पूर्ण 'गीता' मुखाग्र हो गई हो तो चलते-फिरते चिन्तनके
लिए पर्याप्त सामग्री सुलभ हो जाती है। फिर कुछ पढ़नेकी जरूरत नहीं रहती ।
हां, जो कुछ कण्ठ किया जाये उसे अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।
तेरा काता हुआ सूत मजबूत तो होता है न ? इकसार होता है ? पूनियाँ
कौन बनाता है ?
गुजराती (जी० एन० ३९४३) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०७. पत्र : जुगतराम दवेको
यरवडा मन्दिर
९ नवम्बर, १९३०
भाई जुगतराम,
तुम्हारे पत्र में वे सारे समाचार हैं जो दिये जाने चाहिए। अभी तक तो सब
ठीक चल रहा है। हमारी परीक्षा हर तरहसे और बहुत सुन्दर हो रही है। जब
तक बाहर हो, नियमित रूपसे लिखते रहना हमारा हरएक कार्य यथारीति चल
रहा है, इसे में बहुत कुशलता सूचक मानता हूँ ।
गुजराती (जी० एन० २६८६ ) की फोटो नकलसे।
४०८. पत्र : रामचन्द्र खरेको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
९ नवम्बर, १९३०
चि० रामभाऊ,
तुम्हारा पत्र मिला । पत्र सुन्दर है। अक्षर भी सुन्दर हैं। लाइन खींच कर
अच्छा ही किया। तुम्हारे पत्रका जवाब देना बाकी रह गया हो, ऐसा याद नहीं
आता ।
ठंड बढ़ने के साथ-साथ वजन भी बढ़ रहा है, यह तो बहुत अच्छी बात है।
ठीक-ठीक कसरत करोगे, तो ठंडसे हारनेके बजाय तुम ही उसे हरा दोगे ।
क्या लक्ष्मीबहन को समय-समय पर पत्र लिखते रहते हो ? भजनोंको याद करना
तो अच्छा ही है। तुम्हें तो पण्डितजीकी गद्दी सँभालनी है और उसकी शोभा बढ़ानी
है और शोभा तो तुम तभी बढ़ा सकते हो जब तुम उनसे आगे बढ़ जाओ। तुम्हें
जो अवसर इस आयुमें मिला है, वह पण्डितजीको कहाँ मिला था ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २८६ ) से सौजन्य : लक्ष्मीबहन सरे
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०९. पत्र : कुँवरजी मेहताको
यरबडा मन्दिर
१० नवम्बर, १९३०
भाई कुंवरजी,
तुम्हारा उत्साहपूर्ण पत्र मिला। यह जानकर बहुत आनन्द हुआ कि तुम्हारा
शरीर स्वस्थ हो गया है। सेवाका सच्चा अवसर उपस्थित होने पर जिन लोगोंको
उसमें रस मिलता है और जो उसमें कूद पड़ते हैं उनका स्वास्थ्य मैंने अकसर सुधरते
देखा है।
प्रागजीको लिखना कि उनका देशान्तर प्रवास भी एक प्रकारकी सेवा ही है।
जिस समय विधाताको उनकी जरूरत यहाँ होगी उस समय वह उन्हें यहाँ पहुँचा देगा ।
गुजराती (जी० एन० २६८८ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
४१०. पत्र : प्रभावतीको
यरवडा मन्दिर
१० नवम्बर १९३०
चि० प्रभावती,
तेरा पत्र मिला । तुझे मेरा विस्तारपूर्वक लिखा पत्र मिल गया होगा । तेरे
लिए गुजराती अखबारका प्रबन्ध कर रहा हूँ तूने मुझे इस सम्बन्धमें पहले भी
लिखा था, लेकिन मैं बिलकुल भूल गया । कितना लापरवाह हूँ तू जल्दी अच्छी हो
जा, यही मेरी इच्छा है। मैंने जयप्रकाशको पत्र लिखा है, उससे उसे शान्ति मिली
होगी । तू मुझे जब भी लिखना चाहे तब अलगसे पत्र लिख सकती है।
गुजराती (जी० एन० ३३७८) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४११. महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको लिखे पत्रका अंश
यरबडा मन्दिर
१० नवम्बर १९३०
पीछे नहीं रहेगा । हमें तो दोनों स्थितियाँ स्वीकार्य हैं। निर्भय हो गये,
तो फिर किस बातकी चिन्ता ? सब बहनोंको आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ६८०३) की फोटो नकलसे।
४१२. पत्र : बुलाखीदासको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१० नवम्बर, १९३०
भाई बुलसीदास,
तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हारे और तुम्हारी पत्नीके जैसे बलिदानोंसे ही शराब-
खोरी जैसी जघन्य बुराईका नाश होगा। आशा है कि अब तुम्हारी पत्नीकी तबीयत
बिलकुल ठीक होगी। उसे मेरी बधाई और आशीर्वाद देना ।
गुजराती (जी० एन० ३१३८) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१.
पत्र किसे लिखा गया, यह ज्ञात नहीं हो पाया। तथापि, जी० एन० रजिस्टर में इसे महालक्ष्मी
माधवजी ठक्करको लिखे पत्रोंके साथ रखा गया है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१३. पत्र : अब्बासको
यरवडा मन्दिर
चि० अब्बास,
१० नवम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला। हमें सूतका अंक निकालनेकी एक बहुत सरल रीति मिल गई
है - इकन्नी-भर वजनमें जितने तार आयें, उतना उस सूतका अंक माना जाये । और
तूने जो कुछ लिखा है सो मैंने समझ लिया ।
स्वास्थ्य अच्छा रहता होगा।
गुजराती (जी० एन० ६३०४) की फोटो नकलसे ।
चि० गंगाबहन,
४१४. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
बापूकी दुआ
१० नवम्बर, १९३०
तुम्हारा लम्बा पत्र मिला। किन्तु मेरे लिए वह लम्बा नहीं है। मेरे कारण
हिज्जोंकी कोई अड़चन नहीं मानना । मुझे तो तुम्हारा अर्थ समझना है, और वह मैं
समझ लेता हूँ ।
तुमने बहुत बड़ी जिम्मेदारी उठाई है, किन्तु ईश्वर तुम्हारा रक्षक है। आज
तक उसने तुम्हारे कामको शोभायमान किया है, आगे भी करेगा ।
लीलाबहनको मैं लिख रहा हूँ। लीलाबहन स्वयं हिम्मत छोड़ दे तो कोई क्या
करेगा ? बहनोंकी समस्याको हमें सुलझाना ही है। अच्छी तरह देखें तो वह सुलझ
रही है। उनकी बहुत भारी परीक्षा हो रही है। सारी दुनियाकी नजरें हिन्दुस्तानकी
बहनोंकी तरफ हैं। मुझे ब्यौरेवार पत्र लिखती रहा करो। स्वयं लिखनेका समय न
मिले तो किसी और को लिखनेके लिए कह देना। तुम्हें एक बहनको मन्त्री नियुक्त
करना चाहिए।
काकासाहब का पत्र अभी नहीं मिला ।
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
तापत्र - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७६१ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३२७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१५. पत्र : मनु गांधीको
१० नवम्बर १९३०
चि० मनुड़ी,
तेरा पत्र अच्छा है। लिखावट भी ठीक है। अभी और सुधारना । तू तो घंटे में
मुझसे ज्यादा कातती है। ३०६ तार काटती है या ३०६ गज। दोनोंमें फर्क है, यह
तो जानती है न? तार होता है ४ फुटका, और गज ३ ही फुटका किस चरखे
पर और कितने अंकका सूत कातती है? मैं कब रिहा होऊँगा, इसका मुझे या
किसीको भी कोई पता नहीं है। सरकारको भी नहीं है। लेकिन हमें उससे क्या
मतलब ? रिहा हों या न हों इससे क्या आता-जाता है ? तूने चित्र मांगा है।
जेलमें चित्र कैसे ? जेलमें ऐसी चीजें नहीं मिल सकतीं। लेकिन यदि कोई चित्र
हाथ आया तो उसे तेरे लिए सुरक्षित रखूंगा ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५०५ ) की फोटो नकलसे। सौजन्य : मनुबन
मशरूवाला
४१६. पत्र : रेहाना तैयबजीको
बेटी रेहाना,
ख़ुदा हाफिज
१० नवम्बर १९३०
तुम्हारा खत मिला, बहुत खुश हुआ। '
आजके लिए इतनी उर्दू काफी है न ? तू मुझे दूसरा पाठ सिखा चुकी है;
उसके बाद भी यदि मैं चन्द शब्द उर्दूमें न लिखूं और तू मुझे मूर्ख शिष्य मानकर
मेरा त्याग कर दे तो मेरा क्या हाल होगा ? इतनी सावधानी और सफाईसे उर्दू
लिखने में तुझे देर न लगती हो और ज्यादा मेहनत भी न होती हो तो उर्दूमें लिखती
रहना। इस तरह मुझे उर्दूका कुछ अभ्यास अनायास ही हो जायेगा। मेरी बुरी
लिखावट और उससे भी बुरी वर्तनी पर तुम सब लोगोंको जितना हँसना हो उतना
हँसनेकी छूट है। लेकिन मुझे जड़ समझकर सिखाना मत छोड़ देना ।
१. आरम्भकी ये तीन पंक्ति उर्दूमें है। शेष पत्र गुजराती में है।
४४-१९
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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
लेकिन यह तो मैं कहूँगा कि तेरी धूर्तताकी हद नहीं है। पता नहीं कहाँसे
सीखी? मैंने तो नहीं सिखाई। उर्दूमें लिखनेकी छूट दी तो बेचारी आगे बढ़कर
मुझसे ही उर्दू लिखवाने लगी। लेकिन तुझे अपनी गोद ली बेटी माना है तो अब
मेरा छुटकारा भी कैसे हो सकता है! अम्माजानको मेरा 'वन्देमातरम्' कहना;
बाबाजानको मेरी ओरसे गले भेंटना और उनकी दाढ़ी खूब खींचना ।
श्रीमती रेहानाबहन
गुजराती (एस० एन० ९६२३) की फोटो नकलसे।
चि० जयसुखलाल,
४१७. पत्र : जयसुखलाल गांधीको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१० नवम्बर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। शरीर ठीक रहे, तो मैं तुमसे दूध पीनेका आग्रह नहीं
करूँगा । ऐसा न करना कि शरीर बिलकुल ही सूख जाये, तब लेनेकी सोचो।
अभी कुछ दिन मुझे पत्र नियमित रूपसे लिखते रहो । चलालाके बारेमें शंकर-
लालसे परामर्श करके जो ठीक मालूम हो, सो करना। रावजीभाई तथा जीवनलालका
स्वास्थ्य कैसा रहता है? दोनोंको मेरा आशीर्वाद पहुँचाना।
गुजराती (एम० एम० यू० / ३) की माइक्रोफिल्मसे ।
बापूके आशीर्वाद
४१८. पत्र : शान्ताको
यरवडा मन्दिर
१० नवम्बर १९३०
चि० शांता,
तुमारा खत मिला। काशीनाथ लिखते हैं तुमको फिर बुखार आ गया। यह
कैसे ? सब बातमें सावधानीके साथ रहना आवश्यक है। गंगा बहनके साथ भले गई।
यदि वहांका जलवायु अनुकूल न रहे तो वापिस आ जाना ।
जी० एन० ५२६० की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३२९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० नारणदास,
४१९. पत्र : नारणदास गांधीको
[११ नवम्बर, १९३० ]
इस बार भी तुम्हारा पुलिंदा दो हिस्सोंमें मिला। पहले अंग्रेजी पत्र और उसके
बाद अन्य पत्र दूसरे दिन पहले भी ऐसा ही हुआ था। पुलिंदा खोलकर और अपनी
इच्छानुसार वे थोड़ी-बहुत जांच करके देते हैं। देखना तो जरूरी है ही। जल्दी दे
पायें इसलिए भी कई बार दो भागों में देखकर देते हैं।
केशुने फिर लम्बा पत्र लिखा है। उसके कथनमें मुझे बहुत सार लगता है।
उसने काफी गहरी जांच की है। छुपा रहा है, मुझपर यह छाप पड़ी है।
केशु और.. . को लिखे पत्र पढ़कर देना। केशुके बारेमें उससे पूछ रहा हूँ। मैं
मानता हूँ कि उसकी अनियमितता आदि सहन करने योग्य है। वह सच्चा है, इसलिए
दम्भ नहीं करना चाहता। जो उसकी इच्छा या शक्तिसे बाहर है, उसे करनेसे इनकार
करता है। किन्तु उसमें सेवाभाव तो है ही। उसका हृदय साफ है इसलिए उसके
छोटे-छोटे दोष सहन करना धर्म ही है, ऐसा लगता है। फिर अब वहाँ महादेव है ।
वह महादेवके निर्णयको माननेके लिए कह रहा है। महादेव क्या कहता है, यह मालूम
करो। यदि महादेव इसको हल नहीं कर सका, तब अन्तमें मैं तो करूँगा ही ।
हरिइच्छाके बारेमें तुमने जो लिखा है वह ठीक है। वहाँ शादीको न रोका जा सके
तो निभा लेना । मुझे शक हुआ था इसलिए ही मैंने हरिलालसे पत्रमें यह पूछा था ।
तकलीकी गति के बारेमें बालकृष्ण के पत्र में ज्यादा हकीकत थी। क्या उसे तुमने
देखा था? वहाँ अभी गति बढ़ रही है। मैं इस गतिको बहुत महत्वपूर्ण खोज मानता
हूँ। मुझे याद है कि चार वर्ष पहले एक घंटे में सौ तार कातना अच्छी गति मानी
जाती थी। अब १६० तार कात पाना विनोबा द्वारा 'पास' किये जानेका माप है ।
गंगाबहनने बहुत साहस दिखाया है। किन्तु ईश्वर उसके कामको निभाता और शोभाय-
मान करता आया है। अच्छा हुआ कुसुम गई। तुम्हारी सेवामें अब खास कौन व्यक्ति
रहेगा ? तुमपर बोझ तो बहुत पड़ेगा। काम करनेवाले इतने लोगोंके जानेसे काम कम
होनेके बजाय बढ़ने की ही सम्भावना है। कान्ताकी जगह कौन लेगा? जानेवाली
बहनोंकी अन्तिम सूची भेजना।
तुम्हारी खुराक मुझे अच्छी लगी है। इसलिए यदि हजम हो जाये तो लगभग
आदर्श मिश्रण है। मूंगफलीकी मात्रा न बढ़ने देना। मूंगफली और
दिन न लेना । दूधकी मात्रा अब कम नहीं होने देना। कमसे कम
हो ही । इतना दूध सत्त्वपोषक पदार्थ देता है, ऐसी डाक्टर मुत्तुकी
१. गांधीजीने पत्र स्पष्टतः १२ से पहले लिखना शुरू किया होगा।
२ और ३. नाम नहीं दिये गये है।
खोपरा एक ही
आधा पौंड तो
राय है। कम-
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२९२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
जोरी लगे तो दूध या दहीकी मात्रा बढ़ाना। भणसालीको लिखा पत्र पढ़ना । अब भी
वह आश्रममें आना चाहे तो जैसा तुम्हें ठीक लगे वैसा करना । भणसालीके साथ दृढ़
रहोगे तो वह ज्यादा तकलीफ नहीं देगा। लीलाबहनको लिखा पत्र भी पढ़ लेना ।
मैथ्यूके वहममें मुझे कुछ सार नहीं लगता। मेरा जवाब पड़ लेना। पारनेरकरको
आराम करना चाहिए। और शायद उसके लिए वायु परिवर्तन भी आवश्यक है। उसे
अपना स्वास्थ्य सुधार लेना चाहिए।
अब मुझे तल्लेके लिए मजबूत चमड़ा या नया जूतेका जोड़ा मिल जाना चाहिए।
कितने ही लोग " जूते" के लायक होने पर भी जब उसे पाते हैं तो दुखी होकर
लेते हैं। मैं उसके लायक तो कबका बन गया हूँ और अब तो प्राप्त करनेके लिए
अधीर हो रहा हूँ।
काशी और कृष्णदासकी पुस्तकें जब कोई आये तभी भेजना। मुझे जल्दी नहीं है। '
मंगल प्रभात, ११ नवम्बर, १९३०
देवदाससे कहना कि उसका पत्र मुझे अभी नहीं मिला। उसने भेजा किस तरह
था ? उसमें क्या था ? चाहे तो फिर पत्र लिखे। तारीख आदि बता सके तो ज्यादा
जांच कर सकता हूँ ।
सोमाभाई आदि जो लोग जेलमें हैं क्या कोई उनसे मिलने जाता है? इतने
सारे लोगों से मिलना मुश्किल है, यह मैं जानता हूँ। तो भी जिनसे मिलना किसीके
लिए सम्भव न दिखे, ऐसे लोगोंको चुन लेना चाहिए। और उनसे मुलाकात करनेका
कुछ प्रबन्ध हो सके तो अच्छा।
प्रभावतीको गुजरातीके अखबार बिलकुल नहीं मिलते। हमारे पास 'मुंबई समा-
चार' आदि आते रहते हैं। उसमें से एक-दो उसे भेजे जाने चाहिए। उसने दो-एक
बार मुझे लिखा भी, किन्तु में लिखना भूल गया था।... का अलग पत्र मुझे कल
मिला। उसे मुझे पत्र लिखना था, पर लिख सकूँ इससे पहले उसका पश्चात्तापका
पत्र मिल गया । इसलिए मैंने अब जो उत्तर दिया है वह बिलकुल ही अलग हो
गया है। उसके पत्रकी मुझपर यह छाप पड़ी है कि वह अभी बहुत छिपा रहा है।
मेरा पत्र पढ़ोगे तो मालूम होगा। दुखपूर्ण कथा ही है।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
सुरेन्द्र मशरूवालाको लिखा पत्र पढ़ना। उसे बुलाकर कहना कि वह आश्रम में
आना चाहे तो मजेसे आये और रहे।
८२ पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
१. इसके बाद गांधीजीने गीताके बारेमें लिखा था। गीता-सम्बन्धी पत्रांशके पाठके लिए देखिए
खण्ड ४९, "गीता-पत्रावलि", अध्याय १ ।
२. नाम नहीं दिया गया है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३३१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२०. पत्र : सुरेन्द्र मशरूवालाको
यरवडा मन्दिर
११ नवम्बर १९३०
चि० सुरेन्द्र ( विद्यापीठवाले),
तेरा पत्र मिला । तुझे चिन्ता करनेका कारण नहीं है। तुझे जो रोग है वह
आजकल बहुत देखनेमें आता है। जायफल लेना हो तो उसका केवल चुटकी भर चूर्ण
ही लेना। किन्तु सच्चा उपाय तो मानसिक है। मन और शरीरको सदा काममें
लगाये रखो। एकान्तका सेवन मत करो। खुराक सादी और हमेशा निश्चित समय
पर लो। शरीरको सह्य हो तो ठंडे पानीसे स्नान करो। आश्रममें अच्छा लगे तो
आश्रम में रहो या वर्धा चले जाओ। वर्षामें रहना शायद ज्यादा कठिन होगा। आश्रम
जाना पसन्द करो तो नारणदास तुझे बुला लेंगे। चिन्ता बिलकुल न करना। मैं तुझे
जरूर लिखता रहूँगा। तू मुझे निःसंकोच लिखते रहना। विशेष अगले पत्र में ।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
काकासाहब बाहर आयें तब उनसे पूछकर जो ठीक लगे सो करना ।
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५०६) की फोटो नकलसे सौजन्य : मनुबहन मशरूवाला
I
४२१. पत्र : बहरामजी खम्भाताको
यरवडा मन्दिर
११ नवम्बर, १९३०
भाईश्री खम्भाता,
तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हारा जीवन-चरखा मैंने चलाकर देखा। ठीक चलता
है किन्तु फिलहाल मैं गाण्डीवकी परीक्षा कर रहा हूँ। जीवन-चरखा काकासाहब
चलाते हैं। उन्हें वह सुविधाजनक मालूम हुआ है जबकि गाण्डीव उन्हें अनुकूल नहीं
आया था। मैं तो गाण्डीवके सादेपन और सस्तेपन पर मोहित हूँ। परन्तु अभी मैं
कोई अन्तिम निर्णय नहीं दे सकता। दूधका प्रयोग बम्बई में क्यों नहीं हो सकता ?
उसमें डरनेकी कोई बात नहीं है। दूधकी तुलना में सम्भवतः दही ज्यादा अनुकूल
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३३२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२९४
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
आयेगा । यदि स्वादका सवाल न हो तो दूधका प्रयोग तुरन्त करने लायक है। उससे
नुकसान नहीं हो सकता और उससे पर्याप्त पोषण मिलता है।
तुम दोनोंको,
भाई बहरामजी खम्भाता
२७५, हार्नबी रोड
फोर्ट, बम्बई
गुजराती (जी० एन० ६५९८ ) की फोटो नकलसे ।
४२२. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
बापूके आशीर्वाद
प्रिय भगिनी,
परवडा मन्दिर
११ नवम्बर १९३०
प्रतिष्ठानमें गीतापाठ साबरमतीके माफक हि चलता है क्या ? यदि ऐसा हि
है तो अब इरादा कीया है कि चौदा दिनके बदले में सात दिनमें परायण समाप्त
करना। इस बारेमें तुमारी और सतीशबाबुकी क्या राय है लीखीयो । यदि वहां स्वतन्त्र
दिनका पाठ होता है तो इस खतका कुछ स्थाल करनेकी आवश्यकता नहि है ।
जी० एन० १६७५ की फोटो नकलसे ।
४२३. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको
I
बापुके आशीर्वाद
परवडा सेंट्रल जेल
१२ नवम्बर, १९३०
प्रिय चार्ली,
तुम्हें लिख कर यह
पाकर मुझे कितनी
तुम जहाँ कहीं भी
हालांकि मैंने मीराको अभी उसी दिन पत्र लिखकर तुम्हें अपना प्रेम भेजा
था और उसे बताया था कि मुझे तुम्हें पत्र नहीं लिखना चाहिए क्योंकि मैं जो कुछ
लिखना चाहता था वह सब लिख नहीं सकता था, लेकिन में
बताने से अपने-आपको रोक नहीं सकता कि सीधे तुम्हारा पत्र
प्रसन्नता हुई है। मैं तुम्हारी याद रोज और अकसर करता हूँ।
रहोगे, अच्छे कार्य ही करोगे, और ऐसा तुम इसलिए करते हो क्योंकि दैवी संकेत
तुम्हें जहाँ जानेको कहता है तुम वहाँ होते ही हो ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३३३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र मीराबह्नको
२९५
मुझे तुम्हारी दोनोंमें से एक भी पुस्तक अभी तक नहीं मिली है। एक स्थानीय
पत्रमें 'टाइम्स' में छपी समीक्षा मैंने पढ़ी है।
मुझे यह जानकर दुख हुआ कि गुरुदेवकी तबीयत अमेरिकामें ठीक नहीं रही
और वह वापस लौट रहे हैं। आश्चर्यकी बात तो यह है कि इस आयुमें भी वह
इतना श्रम सह लेते हैं। कृपया उनको और ग्रेग दम्पतिको मेरा प्रेमाभिवादन देना ।
सप्रेम,
[ पुनश्च : ]
मोहन
काका मुझे साथीके रूपमें दिये गये हैं। वह तुम्हें अपना प्रेमाभिवादन भेजते
हैं। हम दोनों ठीक हैं।
श्री सी० एफ० एन्ड्रयूज
द्वारा फेल्प्स स्टोक्स फण्ड
१०१, पार्क एवेन्यू
न्यूयॉर्क सिटी
यू० एस० ए०
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ९३१८) की फोटो नकलसे सौजन्य : आफ्रिकाना म्यूजियम,
जोहानिसबर्ग
४२४. पत्र : मीराबहनको
यरबडा मन्दिर
१३ नवम्बर, १९३०
चि० मीरा,
तुम्हारा पत्र मिला। 'गीता' के अध्यायों पर मैं जो कुछ लिख रहा हूँ, उसके
अनुवादकी व्यवस्था बिलकुल ठीक है। मैं इस सम्मिलित प्रयासके फलकी प्रतीक्षा करूंगा ।
उन अध्यायोंमें मैं अपना हृदय उँडेलना चाहता हूँ। इसका अर्थ होगा तुम्हारे लिए
अतिरिक्त काम, और वह तुम्हारा बहुत-सा समय ले लेगा। परन्तु मैं जानता हूँ कि
उसमें तुम्हें थकान महसूस नहीं होगी, क्योंकि उस कार्यसे तुम्हें प्रेम है।
यह लो, इस बार तुम्हारे पास भेजनेको एन्ड्रयूजका पत्र भी है। मुझे फौरन
लिखे बिना उनसे रहा नहीं गया। अन्तमें मैंने उन्हें कुछ पंक्तियाँ लिखकर भेज
ही दीं। जबतक केशु गाण्डीव पर पूरा काबू न पा ले और चरखेको चालू हालत में
तुम्हें न दे दे, तबतक तुम गाण्डीव पर बिलकुल समय न लगाना । मुझे तो वह
नये-नये आनन्द देता ही रहता है। गतिचक्रकी मूल मालको आखिर छोड़ना ही
पड़ा, क्योंकि उसे कसनेके लिए मैं उसे और ज्यादा नहीं काट सकता था। वह
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३३४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२९६
।
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
काफी मजबूत और मोटी होनी चाहिए। हाथकती मालोंमें उतनी मोटी मेरे पास
कोई थी नहीं। तुम तो जानती हो, मैंने इन छोटी-छोटी चीजोंको बनाना न सीखकर
कितनी बुरी गफलत की है और में इस बात पर तुला हुआ था कि माल हाथकी
ही बनी हुई होनी चाहिए। पहली कोशिशमें मुझे पूरे दो घंटे लगाने पड़े। वह
सफल हुई और इसीलिए हुई कि छोटी-सी ही माल बनानी थी। दूसरी कोशिश में
तो मुझे मुश्किलसे आधा घंटा लगा होगा। आकस्मिक आवश्यकता के लिए मुझे दूसरी
भी बना लेनी पड़ी। और यह आवश्यकता भी तुरन्त ही पैदा हो गई, क्योंकि जिन
मूल धागोंसे मैंने माल बनाई थी वे कमजोर थे। अब मैंने जरूरी मजबूती लानेके
लिए कितने ही धागोंमें जल्दी से बल डालनेकी एक तरकीब सोच ली है। इसलिए
मेरे तीसरे प्रयत्न में और भी कम समय लगेगा। और इस बीचमें हाथ कती मजबूत
डोरियोंके छोटे-छोटे टुकड़े जमा कर रहा हूँ। इन्हें में जहां जरूरत हो वहाँ दो
चीजोंको साथ afs कर रखने आदि काममें ले सकता हूँ। इन सब बातों में मुझे
आनन्द और आराम मिलता है, क्योंकि इनसे चरखे पर अधिक दक्षता प्राप्त होती
है। गाण्डीवकी अविश्वसनीय सादगीके कारण यह सब बड़े आराम से सम्भव हो गया
है। लेकिन जवतक मेरी रायकी परिपुष्टि किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा नहीं होती जो
चरखेकी रचनाके बारेमें मुझसे अधिक जानता हो तबतक में अपनी रायको अन्तिम
और प्रामाणिक नहीं मानूंगा। लेकिन मैं तुम्हें यह चेतावनी दे दूं कि इस विस्तृत
विवरणको तुम गाण्डीवमें जुट जानेके लिए दी गई कोई प्रेरणा मत समझना। मुझे
मालूम है कि यदि मैं बाहर होता तो में इस चीज पर इतना सब समय, विचार तथा
ध्यान नहीं दे सकता था। अन्य आवश्यक कार्योंकी उपेक्षा करके इसे करना तो
अवांछनीय भी होता । यह विवरण मैने तुम्हें अपने आनन्दमें हिस्सेदार बनानेके खयालसे
दिया है। चरखा, तकली और धुनकीने तो मेरे ऊपर सम्मोहन कर दिया है। मुझे उनसे
थकान ही महसूस नहीं होती। रोज लगता है कि काश इन्हें देनेको मेरे पास और
अधिक समय होता । मैं चाहता हूँ कि इन तीनों पर और अधिक उत्पादन हो सके।
लेकिन मैं बड़ा फूहड़, मूर्ख और सुस्त हूँ। मैं ज्यादा उत्पादन नहीं कर पाता, इसका
कारण न जाने क्यों मुझे लगता है कि बुढ़ापेकी जड़ता नहीं है। शायद मुझमें वह
कुशलता ही नहीं है। फिर भी मुझे यही जानकर सन्तोष होता है कि इस हालत में
ईश्वर मेरी इस छोटी-सी भेंटको ही उत्तम समझकर स्वीकार कर लेगा। अगर तुम
जाड़े में ठंडे पानी से स्नान बरदाश्त कर सको, तो इससे अधिक स्फूर्तिदायक और कुछ
नहीं है। हाँ, प्रकृतिके विरुद्ध कोशिश न करना। अगर नहानेके बाद फौरन गर्मी
महसूस न हो, तो तुम फिर गर्म पानीसे ही नहाने लग जाना। उस प्रतिक्रिया
लिए शर्त यह है कि खाली हाथोंसे जोरके साथ मालिश की जाये। मुझे १९१४ में
लन्दन में प्लूरिसीके उस कमबख्त दौरेके बाद ही ठंडे जलसे स्नान करना दुखके साथ
छोड़ना पड़ा था। तुम्हारी खुराक बिलकुल अच्छी है। घी अधिक लेनेकी जरूरत
हो सकती है। अनुभवने बता दिया है कि तुम्हें शक्ति, गर्मी और वजन कायम
रखनेके लिए काफी मात्रामें पीकी आवश्यकता है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र शारदा सी० शाहको
२९७
गंगा देवी थोड़ा-बहुत टहल सकती हैं। उन्हें नपे-तुले कदम चलने चाहिए और
शुरू में एक बारमें कुछ ही मिनट घूमना चाहिए। तबीयत फिर से खराब होने के
हर खतरे से बचना चाहिए। कटि-स्नान लेने पर उनकी पेशाबकी तकलीफ दूर हो
जायेगी। यदि पानी ठंडा हो तो ठंडक कम करनेके लिए थोड़ा गर्म पानी मिलाया
जा सकता है। यह कटि-स्नान बिल्कुल अचूक उपाय है।
ये चाचा, जिन्होंने शादी की है, क्या जरा अधेड़से नहीं है, और बहुत विद्वान
होकर भी हिज्जोंकी गलतियाँ करने में तो तुमसे भी होड़ लगाते है ?
तो अपनी जन्मतिथिके अनुसार तो तुम कुछ माहकी बच्ची ही हो !! इस
प्रकार तुम्हें तो अभी बहुतसे वसन्त देखने हैं।
से भी ।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४२० ) से । सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६५४
४२५. पत्र : शारदा सी० शाहको
परवडा मन्दिर
१३ नवम्बर, १९३०
चि० शारदा,
-
अंकके इतने
निकालना ।
तेरा पत्र मिला। सूर्य स्नान और तेलकी मालिश जारी रखना। तकली पर
तो तार टूटना ही नहीं चाहिए। चरले पर कुछ टूटन निकलती है इस बातका
कोई अर्थ नहीं होता। किन्तु यदि तूने ऐसा लिखा होता कि अमुक
तारोंमें इतनी टूटन निकलती है तो बात अर्थपूर्ण होती। इसका हिसाब
एक दूसरी बात भी बताता हूँ। यह देखो कि आधा घंटे में तूने कितने तार खींचे
और उस अवधि में वे कितनी बार टूटे। यह तो तेरी समझमें आता है न कि इसमें
और टूटनके वजनमें फर्क है। यदि तु यह बात समझ गई हो तो मुझे लिखना कि
वह फर्क क्या है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ९८९४ ) से । सौजन्य: शारदाबहन जी० चोखावाला
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० वसुमती,
४२६. पत्र : वसुमती पण्डितको
१३ नवम्बर १९३०
तेरा सूखा-सा पत्र मिला। यह कैसी बात है कि हम इतने महान परिवर्तनसे
गुजर रहे हैं और तुझे कुछ लिखनेको न सूझे। हाँ, यह हो सकता है कि इस महान्
परिवर्तन के प्रभाव में मन स्तब्ध हो जाये और बुद्धि विमूढ़। फिर तो स्वाभाविक है
कि लिखनेकी कोई बात न सूझे। ऐसे समय मन केवल काममें निमग्न हो जाता
है; दूसरी कोई बात उसे नहीं सूझती। तेरी ऐसी भव्य स्थिति हो तब तो मुझे कुछ
कहना नहीं है। तब तो मैं तेरा इतना लिखना भी काफी मानूँगा कि
कुशल है । वसुमती'
गुजराती (एस० एन० ९२९३ ) की फोटो नकलसे।
H
बापू, सब
बापूके आशीर्वाद
४२७. महादेव देसाईको लिखे पत्रका अंश'
१३ नवम्बर १९३०
चरखे और फ्रेंचके विषयमें तुमने जो लिखा है, उसमें भी सिद्धान्त दृष्टिसे
त्रुटि पाता हूँ। जो समय चरखेको सर्वार्पिण कर दिया है, उसे दूसरे काममें नहीं
लगाया जा सकता। कोई बात करने आ जाये, तो शिष्टताके विचारसे बात कर
सकते हैं; पर इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बातोंके बजाय कुछ
सीखा ही जाये तो उसमें क्या बुराई है। बातसे तो जब चाहे छुट्टी पाई जा सकती है।
बात करनेवाला भी बहुत देर तक बैठ कर बातें नहीं करेगा। पर कोई सिखाना
स्वीकार करने पर पूरा समय देने को मजबूर हो जाता है। यह सब तब लागू समझना
चाहिए जब हम चरखेको यज्ञरूपमें चलाते हों। अपने विषयमें मैं इस सत्यका प्रत्यक्ष
अनुभव करता हूँ। चरखा चलाते समय जब अन्य विचारोंमें उलझता हूँ तब गति
पर, नम्बर पर, समानता पर उसका असर पड़ता है। कल्पना करो कि रोमा रोल
या बीथोवन पियानो पर बैठे हैं। उसपर के ऐसे तन्मय हो जाते हैं कि बात नहीं
कर सकते, न मनमें अन्य विचार कर सकते हैं। कला और कलाकार पृथक नहीं
१. पत्र किसे लिखा गया था, साधन-सूत्र में पक्ष स्पष्ट नहीं है। किन्तु १३/१७-११-१९३० को नारणदास
गांधीको लिखे पत्र में गांधीजीने पचार्थ कताईका उल्लेख किया है और इस सम्बन्धमें महादेव देसाईको लिखे
पत्रको पढ़नेके लिए कहा है। सम्भवतः यह वही पत्र है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महादेव देसाईको लिखे पत्रका अंश
२९९
होते । यदि यह बात पियानोके लिए सत्य हो तो फिर चरखा यज्ञके लिए कितना
अधिक सत्य होना चाहिए ? यह अलग बात है कि ऐसा करना आज सम्भव नहीं
है। अपने विचार-क्षेत्रको बावन तोला पाव रती शुद्ध रख सकें तो तदनुसार
आचरण किसी दिन हो ही जायेगा। यह न समझो कि इसमें जो कुछ हुआ है,
उसकी आलोचना है। मैं खुद बहुत अधूरा हूँ, मुझे आलोचना करनेका हक भी कहाँ
है ? जितना जानता हूँ उसपर में खुद कहाँ पूरी तरह चलता हूँ ? चलता होता तो
कबका चरखा सात लाख गांवोंमें गूंज जाता। आज भी जो जानता हूँ उसके अनुसार
सौ फीसदी चल सकूँ तो मेरे यहाँ बैठे रहने पर भी चरखा हवाकी तरह फैल जाये ।
पर यदि मालवीयजी भागवत पुराणकी चर्चासे थकें तो मैं चरखा संगीतकी बातोंसे
थकूं। चरखापुराण तो कैसे कहूँ? पुराण तो भविष्य की पीढ़ी रचेगी, बशर्ते कि हम
कुछ रचने लायक कर जायें। आज तक तो हम इसका टूटा-फूटा संगीत रचते रहे
है । अन्तमें उसमें से कैसा सुर निकलता है यह हमारी तपश्चर्या और हमारे समर्पण
पर निर्भर रहेगा।
अब मैं पिछले पत्रमें कही बातको आगे बढ़ाऊँगा ।
मुझे आदर्श तो यह लगता है कि यज्ञके समय मौन रखा जाये। उस समय
जो विचार करें वह चरखे, या कहो खादी-सम्बन्धी अथवा रामनामका करें। रामनाम
को विस्तृत अर्थ में लेना चाहिए। वास्तवमें रामनाम तो जाने-अनजाने हमेशा मनमें
होना ही चाहिए, जैसे संगीतमें तानपुरा । पर हाथ जो काम कर रहे हों, हम उसमें लीन
न हों तो रामनामका इच्छापूर्वक जाप करना चाहिए। चरखा चलाते हुए हम बातें
करें, कुछ सुनें या और कोई काम करें तो यह क्रिया यज्ञ तो नहीं होगी। यदि
यह यज्ञ कर्तव्य है तो उतने समयके लिए उसमें लीन हो जाना चाहिए। जिसका
सारा जीवन यज्ञरूप है और जो अनासक्त है, वह एक समय में एक ही काम करेगा ।
इतना जानते हुए भी (अल्पाधिक प्रमाणमें) में ही पहला पापी ठहरता हूँ; क्योंकि कह
सकते हैं कि मैंने किसी दिन चुपचाप एकान्तमें बैठकर अर्थात मौन रहकर नहीं काता ।
मौनवार के दिन काते-काते डाक सुनता या किसीकी कोई बात सुननी होती तो वह
सुनता। यह कुटेव यहाँ भी नहीं गई। इसलिए कोई ताज्जुब नहीं कि कातनेमें बहुत
नियमित होते हुए भी मेरी गति ठीक नहीं है और अब जाकर घंटेमें मुश्किलसे २००
तार तक पहुँचा हूँ और भी अनेक दोष अपनेमें पाता हूँ, जैसे तार टूटना, माल
बनाना न जानना, चमरलका अल्पज्ञान, रुईकी किस्म न पहचानना, समानता वगैरा
पूरी तरहसे न निकाल सकना, तारकी परख न कर सकना इत्यादि । क्या यह सब किसी
याज्ञिकको शोभा देता है? फिर खादीकी गति धीमी रह गई तो इसमें क्या आश्चर्य
है? यदि दरिद्रनारायण है, और उसके होनेमें कोई शक नहीं है, और यदि उसकी
प्रसादी खादी है, और यह कहनेवाला, जाननेवाला जो कुछ कहो वह मैं हूँ, फिर भी
मेरा अमल कितना ढीला-ढाला है? इसलिए इस विषयमें किसी औरको दोषी ठहराने
का जी नहीं होता। मैं तो सिर्फ तुम्हें अपने दोषका दुःखका और उसमेंसे उत्पन्न
२. सामन में छूटा हुआ है। इसके बादका अंश सम्भवतः इससे अगले पत्र में से लिया गया है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३३८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३००
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
होनेवाले खयालका और ज्ञानका दर्शन कराना चाहता हूँ । यद्यपि काका के साथ यदा
कदा ऐसी बातें हुई हैं, तथापि इतनी स्पष्टतासे यह पहले-पहल तुमसे ही कह रहा हूँ ।
और यह स्पष्टता भी आई तुम्हारे उस फ्रेंचको चरखेके साथ जोड़नेके कारण । तुमने
जो किया उसमें मैं तुम्हारा तनिक भी दोष नहीं पाता। मैं देख रहा हूँ कि चरखेका
कैसा कच्चा ' मन्त्रा' हूँ मैं। मन्त्रको तो जाना, पर उसकी पूरी विधि आचारमें
नहीं उतारी, इसलिए मन्त्र अपनी पूरी शक्ति नहीं प्रकट कर सका। चरखेकी भाँति
ही इस बातको सारे जीवन पर घटाकर देखो तो कल्पनामें तो तुम्हें जीवनकी
अद्भुत शान्तिका अनुभव होगा और सफलताका भी। 'योगः कर्मसु कौशलम् " का तात्पर्य
यह है, इस बातको ध्यानमें रखकर जितना हो उतना ही करनेको हाथमें लें और
सन्तोष मानें। मेरा दृढ़ विश्वास है कि इससे हम अपनेको और समाजको अधिकसे
अधिक बढ़ाने में अपना कर्त्तव्य करते हैं। जबतक इसका पूरा-पूरा अमल न हो ले,
तबतक तो यह कोरा पाण्डित्य ही कहा जायेगा। दिन-दिन इस दिशामें बढ़ तो रहा हूँ।
बाहर निकलने पर क्या होगा, वह भगवान जानें। तुम इसमें से बन सके तो इतना तो
अमल में ला सकते हो कि यज्ञके निमित्त जितने तार तय कर लो उतने तो शास्त्रीय
रीतिसे कातो। और फिर तो चाहे जिस दिशामें हिन्दुस्तानकी सम्पत्ति बढ़ानेके इरादे से
कातते रहो। अभी लिखते जानेकी इच्छा होती है। पर अब बस करता हूँ ।
[ गुजरातीसे ]
गीता-बोध
चि० शिवाभाई,
४२८. पत्र : शिवाभाई पटेलको
१३ नवम्बर, १९३०
तुम जेलसे छूट चुके हो, इसका पता तो तुम्हारे पोस्टकार्डसे ही लगा। प्यारेलाल
तो भूल ही गया था। खुजली कैसे हो गई? यह तो ऐसी बीमारी है जो तुरन्त अच्छी
हो सकती है। खानेमें परहेजका पालन तो करते होगे। जेल-मन्दिरमें तुम कितने दिन
रहे और तुम्हें क्या अनुभव हुए सो लिखना ।
गुजराती (एस० एन० ९५०१ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. भगवद्गीता २, ५०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगादेवी,
४२९. पत्र : गंगादेवी सनाढ्यको
परवडा मन्दिर
१३ नवम्बर १९३०
बहोत दिनोंसे मैंने नहि लिखा है और में न लिखु तो तुमने न लिखनेका व्रत
लिया लगता है। घूमनेके बारेमें और जो दर्द होता है इस बारेमें मैंने विस्तारसे मीरा-
बहनको लिखा है वे समजावेगी। मुझको निःसंकोच जो लिखना है लिखो। तोतारामजी
कैसे हैं
जी० एन० २५४३ की फोटो नकलसे ।
४३०. पत्र : अब्बास तैयबजीको
बापुके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१४ नवम्बर, १९३०
ओ सफेद दाढ़ीवाला नौजवान, तीन हफ्तेका मेहमान, भुर्ररर !
जो है तो बच्ची पर दिखाना चाहती है बड़ी, ऐसी उस लड़कीको यदि में
गुजराती में लिखता हूँ; तो जो है तो बूढ़ा, पर रोज-रोज जवान बन रहा है उस
पिताको भी मातृभाषामें ही क्यों न लिखूं ? पश्चिमके लोग तार पर बातचीत करते
हैं और अब तो तारके जरिये तसवीरें भी भेजी जाती हैं। मेरे पास तो पूर्वकी विद्या
है। सो मैं [ तारकी सहायताके बिना ही | मुक्त हास्यसे भरपूर एक ऐसा चेहरा देख
रहा हूँ जिसके सफेद दाढ़ी है लेकिन फिर भी जिसपर तरुणाई खेल रही है और वह
उस रिपोर्टरसे कह रहा है कि "मैं तीन हफ्ते में फिर अपने उसी विश्राम घरमें पहुँचने
वाला हूँ।" उसके चेहरेकी यह तसवीर तो मेरी जेबमें ही पड़ी हुई है। मेरे जेब नहीं
है, इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है। बूढ़ेने खूब कमाल किया। और तिसपर खूबी यह
कि सारा कुटुम्ब ही ऐसा है! ख़ुदा उसे सलामत रखे ! ख़ुदा हाफिज ।
बापूका भुर्ररर
गुजराती (एस० एन० ९५७३ ) की फोटो नकलसे।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कुसुम (बड़ी),
४३१. पत्र : कुसुम देसाईको
यरवडा मन्दिर
१४ नवम्बर १९३०
तुझे क्या कहूँ ? लिखने बैठी तब तो तू काफी खबर दे सकी। अब तू अपने
किये हुए निश्चयका पालन करना। यदि तू चाहे तो मेरे पास अपना रोना भी रो
सकती है। हमें तो दुःखमें सुख मानना है। यही 'गीता' का सार है, यों भी कहा
जा सकता है। लेकिन मैं तुझे कोई उपदेश नहीं देना चाहता ।
मँगवानी पड़ी हैं। कपड़े कोई नहीं चाहिए। यहाँका
कूपके लिए जो कम्बल साथ लिया था वह तो है ही।
तेरा स्वास्थ्य तो अब अच्छा है न ? काकासाहब २८
चप्पलें तो अन्ततः मुझे
कम्बल इस्तेमाल करता हूँ।
खादी तो बहुत आ गई है।
तारीख तक छूटेंगे ।
गुजराती (जी० एन० १८०९ ) की फोटो नकलसे।
४३२. पत्र : तहमीना पी० जोशीको
बापूके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
१४ नवम्बर १९३०
प्रिय बहन,
तुम्हारा पत्र मिला है। मैं बोर नहीं हुआ हूँ और न होऊँगा। तुम्हारा जब मन
हो तब मुझे पत्र लिखो। अपने पत्र में दादाभाई [नौरोजी ] का उल्लेख करके तुमने
अच्छा किया। वह मेरे लिए पिता-तुल्य थे। जब मैं इंग्लैंड पहुँचा, उस समय वही
एक बुजुर्ग व्यक्ति थे जिनके नाम मेरे पास चिट्ठी थी। उन्होंने मुझे अपनी देखभालमें
ले लिया और फिर मुझे कभी नहीं छोड़ा।
दक्षिण आफ्रिकाके हमारे आरम्भिक दिनोंमें उन्होंने ही हमारा नेतृत्व किया
था। लगभग हर पखवाड़े मुझे उनका एक पत्र मिलता था। आज मैं उनके आशीर्वादों
का सुफल प्राप्त कर रहा हूँ ।
गुजराती (एस० एन० ११५ ) की फोटो नकलसे।
मोहनदासके आशीर्वाद
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० भगवानजी,
४३३. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
१४ नवम्बर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। सच्ची प्रगति [ देखने में] धीमी लगती है लेकिन वस्तुतः
वह हमें शीघ्रातिशीघ्र गन्तव्य स्थान पर पहुँचाती है। जैसे-जैसे मनुष्य परिणामके
प्रति मोह रखे बिना सहज प्राप्त सेवा कर्ममें लीन होता जाता है वैसे-वैसे वैराग्य
उसके लिए सहज होता जाता है और उस समय इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना भी
उसके लिए नितान्त सहल हो जाता है ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३३० ) से सोजन्य भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
४३४. पत्र: पद्माको
परवडा मन्दिर
१४ नवम्बर १९३०
चि० पद्मा,
कितनी लापरवाह लड़की है तू ? मक्खोकी टांग जैसे टेढ़े-मेढ़े अक्षर लिखकर
तू अभीसे अपनी लिखावट खराब क्यों कर रही है? और वहाँ क्या स्याही नहीं
है ? तू अपनी तबीयत के बारेमें कुछ भी नहीं लिखती । तेरी बात सच है कि वहाँकी
बहनोंके त्यागको देखते हुए हमारे त्याग नगण्य है। बस अब तू वहाँ रहकर वैसी ही
त्यागकी भावनाका विकास करना और खूब सेवा करना ।
गुजराती (जी० एन० ६११५ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३५. पत्र : अब्दुल कादिर बावजीरको
भाई इमामसाहब,
यरवढा मन्दिर
१४ नवम्बर, १९३०
जबतक यह पत्र आपके पास पहुँचेगा तबतक आप रिहा हो चुके होंगे। मुझे
अभी हाल ही में आपके बीमार पड़नेकी खबर मिली थी; आशा है, अब आप बिलकुल
ठीक हो गये होंगे। अब आप फिर कब सरकारके मेहमान बनेंगे, यह देखना है ।
आपकी जेलकी प्रवृत्तिके बारेमें मैंने सुना तो है लेकिन वह सब मैं आपके मुखसे सुनना
चाहूँगा। अमीना अब शान्त हो गई है क्या ? कुरेशीसे मिले थे ?
बापूकी दुआ और वन्देमातरम्
गुजराती (जी० एन० ६६४६ ) की फोटो नकलसे।
४३६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
१४ नवम्बर, १९३०
चि० गंगाबहन,
काकासाहब को लिखा तुम्हारा पत्र देरसे मिला। बात उसे पढ़ने पर ज्यादा
समझमें आई। तुम्हें तो यश मिलता ही है। किन्तु खूब धीरजसे काम लेना । बहुत
जोखिम उठाया है। किन्तु हम जो तीन नये श्लोक' गाते हैं, उन्हींका रटन करना ।
जो भगवानका ही नाम रटता है और उसके लिए ही काम करता है, उसकी
सफलताका भार भगवान उठाते हैं। उसका पथप्रदर्शन भी वही करते हैं। फिर हम
क्यों चिन्ता करें ?
पद्माको बुखार आ गया लगता है। उसे कहीं कोई सूजन भी है। क्या बात है,
यह तुम न समझ पाओ तो हरिभाईको दिखा देना। और यदि तुम्हारी ही समझमें
आ जाये तो जो इलाज ठीक लगे, निर्भय हो कर करना। भगवान ही मार्गदर्शक है,
यह समझकर जिस अवसर पर जैसा ठीक लगे वह करके पीछे एकदम निश्चिन्त हो
जायें। शक्तिसे बाहर बोझ न उठाना ।
पुरुषोंने स्त्रियोंके साथ अन्याय किया है और अब भी करते हैं। किन्तु इसका
उपाय अन्ततः स्त्रियोंके हाथमें ही है। स्त्री स्वयं अपने-आपको अबला मानना छोड़
दे तो आज ही स्वतन्त्र बन सकती है। जिसके शरीरमें बल है वहीं बलवान नहीं
१. अभिप्राय कदाचित् द्रौपदीकी प्रार्थनासे है ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३४३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: गंगाबहन वैद्यको
३०५
है। रावण जैसा राक्षस अर्थात् शरीरमें बलवान पुरुष भी निर्बल लगनेवाली सीताके
सामने अपंग जैसा था। तुम्हें याद है न ? सीताको वरदान था कि उसके ऊपर कोई
भी कुदृष्टि करे तो भस्म हो जायेगा। रावण यह जानता था, इसीलिए सीताको
उठा कर ले गया किन्तु उसका मलिन स्पर्श नहीं कर सका। उसके लिए तो वह
सीतासे विनय ही करता था। वह सीताको धमकाता भी था कि वह डर जाये ।
पर जबतक सीता डरे नहीं या द्रवित न हो तबतक रावण शरीरसे बलवान होते हुए
भी बकरी जैसा था। सीता शरीरमें कुछ भी बल न होते हुए भी सिंहनी जैसी थी।
हम इस वरदानका अर्थ जान लें वरदान कल्पना है। जिस स्त्रीमें अडिग
पवित्रता है, उसे सीता जैसा ही वरदान है उसपर कुदृष्टि डालनेवाला भस्म हो
जायेगा। अब तक पुरुष स्त्रियोंको दुःख देते आ सके हैं, इसका कारण यही है कि
वह उनकी तरह विकारवश हो गई है। दोनों लालचमें फँसे, इसलिए सुध-बुध खो
बैठे, आत्माको भूल गये; इसलिए फिर तो शरीर ही बाकी रहा। उसमें तो पुरुष
बलवान है ही। इसलिए स्त्री उसके अधीन हो गई और उसे ऐसा ही सोचनेकी आदत
पड़ गई कि वह अपंग है, अबला है और हमेशा पुरुषकी शरण लेने लायक है।
आत्मा तो दोनोंकी एक-सी है। किन्तु पुरुष आत्माको न पहचाने और स्त्री
ही पहचाने तो स्त्री बलवती हो जाती है, जैसे सीता; और पुरुष हो गया रावणकी
तरह। यह रामके ही युगमें शक्य था, सो भी मत मानना। आज भी संसार में अनेक
सीताएँ पड़ी हैं जो एक भी पुरुषकी मददकी जरूरत नहीं रखतीं और फिर भी
सुरक्षित हैं। जानकी मैया एक ऐसी स्त्री हैं। उन्हें तुमने देखा होगा। मैं बम्बई
जाता हूँ तब हर बार मुझे मिल जाती हैं। उस बेचारीमें बुद्धिबल ज्यादा नहीं है,
किन्तु आत्मबल तो अपार है। वे जवानीमें रूपवती रही होंगी। भरी जवानीमें
उन्होंने कठिन सेवा हाथमें ली। ऐसी दूसरी भारतीय स्त्रियां भी मेरे सामने हैं,
अंग्रेज स्त्रियाँ भी हैं, और ये सब उदाहरण अल्प आत्मशक्तिवाली स्त्रियोंके हैं। जिसमें
आत्मा पूर्ण रूपसे विकसित है, वह जगदम्बा होनेके लायक है। जो इच्छा करे उसके
लिए आज भी सतयुग है। इसलिए तुम्हारा काम स्त्रियोंको बलवान बनाना है।
पुरुषसे इंसाफ पानेकी यह सही रीति है। मेरे जैसे व्यक्ति मार्ग-दर्शन करें, पुरुषको
अपने धर्मका भान करायें। किन्तु स्त्री-सेवा करनेकी मेरी शक्ति सीमित ही है ।
स्त्रीकी पूरी तरह सेवा तो स्त्री ही करेगी। ऐसी एक नहीं, अनेक स्त्रियाँ आश्रम
में तैयार करना मेरी एक बहुत बड़ी अभिलाषा है। यह अवसर इस समय सहज
ही हाथ आ गया है।
यह बात समझ में न आई हो, तो फिर पूछना ।
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७६४ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
४४-२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३७. पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको
यरवडा मन्दिर
१४ नवम्बर १९३०
प्रिय बहन,
रुईकी पहुँच और आपके पत्रके उत्तर देते हुए मैंने जो
गये होंगे। कृपया डेढ़ सेर रुई और भेज दीजिए। आशा है
होंगी।
पत्र लिखे थे, वे मिल
सब बहनें आनन्दपूर्वक
मोहनदासके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४८१६) की फोटो नकलसे सौजन्य: प्रेमलीला ठाकरसी
४३८. पत्र : गंगाबहन झवेरीको
यरवडा मन्दिर
१५ नवम्बर १९३०
चि० गंगाबहन ( झवेरी),
बीमार हो । फलोंमें यदि
और यदि पानीमें डुबोये
रहेगा। जबतक पेचिशका
छिलके निकाल कर अथवा
तुम्हारा पत्र मिला। जान पड़ता है कि तुम सचमुच
नारंगी, मुसम्बी, ताजा अंगूर खानेको मिले तो काफी है।
हुए काले सूखे अंगूर तथा मुनक्का ले सको तो वह भी ठीक
असर दिखाई दे तबतक अत्यन्त सावधानीके साथ उनके
उनका रस निकालकर लेना चाहिए। जब पेट खराब हो, तब चाहे कितनी ही कम-
जोरी क्यों न हो, थोड़ा बहुत उपवास करनेसे अवश्य लाभ होता है।
गुजराती (जी० एन० ३१०८) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रेमा,
४३९. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
१५ नवम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला। डाक्टरसे मिली यह तो अच्छा ही किया। लेकिन मैं अपने
उपचारपर ही कायम हूँ चाहे तो डाक्टरका इलाज बादमें करना। लेकिन कमसे-कम
सात दिनका उपवास तो कर ही डालना। हमें उपवाससे नहीं डरना चाहिए। सात
दिनके उपवास में तू अपने अधिकांश कार्योंको पूरा कर सकेगी। अपने जीवन में जब
पहली बार मैंने लम्बा उपवास किया था उस समय मैंने एक दिन भी आराम नहीं
किया था और मुझे कोई दिक्कत भी नहीं हुई थी। वह उपवास सात दिनका था ।
शरीरमें उस समय थोड़ी बहुत चर्बी थी। जिस व्यक्तिकें शरीरमें ज्यादा चर्बी नहीं
होती, उसे ही उपवास में विवश हो बिस्तर पर पड़े रहना पड़ता है। दो दिन बाद
तो तुझे पहले से ज्यादा शक्ति मालूम होगी। दो दिन झूठी भूल लगेगी जरूर;
फिर तो भूल भी नहीं लगती। और अन्त में रक्तके शुद्ध होनेपर भूख लगती है।
उस बीच एनिमा लेकर पेट अवश्य साफ रखना चाहिए। एनिमा लेनेके बाद
अर्थसर्वांगासन करनेसे पानी ऊपरकी अंतड़ियों तक पहुँचता है। लेकिन यदि तुझे इस
आसनकी जानकारी न हो तो आसन न करना। उपवासके दिनोंमें पानी में सोडा और
नमक डालकर खूब पीना चाहिए। हर आठ औंस पानीमें पांच ग्रेन नमक, दस ग्रेन
सोडा मिलाकर ऐसे आठ प्याले तक आसानीसे पिये जा सकते हैं। धूपमें बैठना ।
मेरी इच्छा है कि तू निःशंक होकर उपवास करना। डाक्टरसे कहना चाहो तो
भले कहना । शायद वे भी यह इलाज पसन्द करें। अब तो बहुतसे डाक्टर उपवासके
चमत्कारको मानने लगे हैं।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६९०) से सौजन्य : प्रेमावहन कंटक; जी० एन०
१०२४१ की फोटो नकलसे भी ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० हेमप्रभा,
४४०. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
यरवडा मन्दिर
१५ नवम्बर, १९३०
अच्छा 'प्रिय भगिनि,' छोड देता हूँ कैसे भी लिखता था में कोशीष तो पितादि
बननेकी करता हूं। तुमारे प्रेम और विश्वासका मैं पात्र बनुं ऐसी प्रार्थना ईश्वरसे
प्रतिदिन करता हूँ। तुमारे ऐसी बहनोंका खयाल कर मैं जानता हूं कि इस आत्म शुद्धि
पक्ष में भगवानका हाथ है हि । तुमारी हिंदी भाषा ऐसी सरल है मुझको समजनेमें कोई
कष्ट नहीं है। सच्ची बात यह है हृदयके भावोंके लिये भाषा क्या कर सकती है।
हृदयके भाव ऐसी हि प्रगट हो जाते हैं। किरनदास अब छुटा है, उसे अपनाइये ।
उसका खत मेरे पास आया है। तुमसे मिलनेका तो मैंने लिखा हि है।
गीताके बारेमें मेरा खत मिला होगा ।
जी० एन० १६७६ की फोटो नकलसे ।
प्रिय कुमारण्या
४४१. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको
वापुके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१६ नवम्बर १९३०
यदि कोई व्यक्ति कोई कार्य करने या न करनेका अपरिवर्तनीय निर्णय करता
है, तो मेरे लिए इसका अर्थ व्रत है । अत्यन्त शक्तिशाली व्यक्तियोंको भी कभी-कभी
दुर्बल होते सुना गया है। हमारी शक्तिको चूर्ण कर देनेका भी ईश्वरका अपना एक
तरीका है। इसीलिए व्रतोंकी, अर्थात् संकटके क्षणोंमें ईश्वरसे हमें शक्ति प्रदान करनेकी
प्रार्थना करनेकी आवश्यकता है। लेकिन मुझे तुमसे बहस नहीं करनी चाहिए। मुझे
लगता है कि हम दोनोंका तात्पर्य एक ही है, लेकिन हम उसे भिन्न-भिन्न ढंगसे व्यक्त
करते हैं- कहें कि तुम स्पेनी भाषामें और में इतालवी भाषामें ?
सप्रेम,
अंग्रेजी (जी० एन० १००८२) की फोटो नकलसे ।
बापू
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४२. पत्र : सुशीला गांधीको
परवडा मन्दिर
१६ नवम्बर १९३०
चि० सुशीला,
मुझे अभी-अभी मणिलालका लिखा पहला पत्र मिला है। उसमें उसने लिखा
है कि उसकी तबीयत बहुत अच्छी है। उसका वजन ४० पौंड नहीं, बल्कि २२ पौंड
कम हुआ है। यह भी ज्यादा है। लेकिन वह खूब प्रसन्न दीख पड़ता है। विद्याभ्यास
भी खूब कर रहा है। ईश्वरने उसे हर तरहकी परिस्थितियोंको निभा ले जानेकी शक्ति
दी है। और चूंकि वह सरल हृदय व्यक्ति है इसलिए भगवान हमेशा उसकी रक्षा
करता है। तुम्हें तो कदाचित यह सब मालूम ही होगा फिर भी इन गुणोंकी जितनी
ज्यादा चर्चा होगी, तुम्हें तो उतनी ही खुशी होगी। मुझे नियमित रूपसे लिखती रहना ।
भारतीको अक्षर लिखनेके लिए प्रेरित करना ।
गुजराती (जी० एन० ४७७७) की फोटो नकलसे ।
४४३. पत्र : शान्ता शंकरभाई पटेलको
चि० शान्ता ( शंकरभाई),
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१६ नवम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला। यह सच है कि तू योजनाएँ बहुत बनाती है; लेकिन तू
अभी इतनी बूढ़ी नहीं हो गई है कि इनमें से अनेक योजनाओंको समयपर कार्यान्वित
न कर सके। फिर भी फिलहाल हमने जिस कामको हाथमें लिया है उसमें तल्लीन
होना। चित्रकला है, संगीत है, संस्कृत है: विवाह करने [ की इच्छा ] वालेके लिए
यह विवाह के समान है और कन्याओंके लिए यह कौमार्यत्रत है। मुझे इसी तरहसे
लम्बे पत्र लिखती रहना और उल्टे-सीधे जितने भी विचार मनमें उठें, उन्हें निःसंकोच
होकर मेरे आगे प्रस्तुत करती रहना ।
--
गुजराती (जी० एन० ४०५६) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३४८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४४. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
यरवडा मन्दिर
१६ नवम्बर, १९३०
चि० मनु,
तेरा पत्र मिला । जबतक तुझे बुखार आता है और डाक्टर तुझे बिस्तर छोड़नेसे
मना करता है तबतक तुझे हाथसे पत्र लिखनेकी कोई जरूरत नहीं है। तेरी देखभाल
के लिए जो व्यक्ति तेरे पास हो उसे दो शब्द लिखनेके लिए कह देना ही काफी
होगा । पत्र पढ़कर तो हम दोनोंको आनन्द आया । अल्मोड़ा जानेके सम्बन्धमें जल्द-
बाजी करनेकी जरूरत नहीं है। मेरा आग्रह तो नहीं है, केवल सुझाव-भर है। इस
बारेमें विचार तो डाक्टर ही कर सकते हैं ।
गुजराती (जी० एन० ७७७०) की फोटो नकलसे ।
चि० महावीर,
४४५. पत्र : महावीर गिरिको
बापूके आशीर्वाद
१६ नवम्बर १९३०
बहुत दिनों बाद तुम्हारा पत्र आया । काकासाहब तुम्हारे पत्र अवश्य पढ़ते
हैं। तुम मुझे जो पत्र लिखते हो उन्हें काकासाहब को लिखा हुआ ही समझो। मेरे
पत्र में उनके लिए अलगसे कुछ नहीं लिखा जा सकता। लेकिन अब तो उनके छूटने में
दो सप्ताह भी नहीं बच रहे हैं। तुम्हारे अनुभव अच्छे हैं। तुम जब यह कहते हो
कि अधिकांश तो सीखनेवालेकी मेहनतपर निर्भर करता है तो ठीक ही कहते हो ।
शिक्षक तो केवल इतना ही कर सकता है कि जहाँ भूल दिखाई दे वहाँ बता दे ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ६२२१ ) की फोटो नकलसे ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३४९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० राधिका,
४४६. पत्र : राधाबहन गांधीको
१६ नवम्बर १९१०
तेरा पत्र मिला। एक अच्छी पुस्तक भी सद्गुरुका काम दे सकती है। सच्चा
सद्गुरु तो भगवान है। उसे जब हम अपने हृदयमें प्रतिष्ठित करते हैं, तब समझो
कि सद्गुरु मिल गये ।
हरिइच्छाकी सगाईकी बात सुनी थी। विवाहका समाचार तो स्वयं उसने ही
दिया। कहाँ हुआ, किसके साथ हुआ ? हरिइच्छा यदि अभी यहाँ हो तो उससे कहना
कि मुझे पत्र लिखे। इसमें लज्जाकी क्या बात है ? बरकी आयु कितनी है, क्या करता
है, आदि समाचार यदि तुझे मालूम न हों तो जानकर मुझे लिखना । रुखीकी अच्छी
परीक्षा ली जा रही है। क्या अब तू बिलकुल ठीक हो गई है ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९३१५ ) से सौजन्य : राधाबहन चौधरी
४४७. पत्र : प्रभावतीको
१६ नवम्बर १९३०
चि० प्रभावती,
तेरा दुःखपूर्ण पत्र मिला। रोज दौरे पड़ना सचमुच असहनीय है। तुझे बहाँसे
हर हालत में निकल आना चाहिए और आश्रम आकर यह सिलसिला खत्म करना
चाहिए। यह रोग दवासे दूर नहीं होता। यह तो वायु-परिवर्तन और अनुकूल संगतिसे
जाता है।
गुजराती (जी० एन० ३३७९ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३५०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४८. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको
चि० महालक्ष्मी,
परवडा मन्दिर
१६ नवम्बर १९३०
तुम्हारे पत्र काफी नपे-तुले होते हैं। उनसे मुझे बहुत कुछ सीखनेको मिलता
है । वचन देकर बदल जानेवाली बहनोंसे निराश न होना, क्रोध भी न करना । अनेक
वर्षोंकी बुरी आदतें एक क्षणमें दूर नहीं हो सकतीं। लेकिन रस्सीके रोज घिसने से
पत्थर पर भी निशान पड़ जाते हैं; विश्वास रखो कि उसी तरह पाषाणसम कठोर
हृदय भी प्रेमरूपी रस्सीके घर्षणसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। मैंने चन्द्रको
पत्र लिखा है। यदि उसने बिना किसीकी मददके अपने आप ही वह सब लिखा
हैं तो पत्र सचमुच बहुत अच्छा है। बहनोंको मेरा आशीर्वाद ।
गुजराती (जी० एन० ६८०४ ) की फोटो- नकलसे ।
४४९. पत्र : रुक्मिणी बजाजको
बापूके आशीर्वाद
चि० रुक्मिणी,
यरवडा मन्दिर
१६ नवम्बर १९३०
एक लम्बे असके बाद तेरा पत्र मिला तेरी तबीयत अच्छी हो गई है, यह
जानकर खुशी हुई। अन्य सब लोग भी ठीक हो गये होंगे। बनारसीलाल वहाँ क्या
करेगा ? काशीकी आबोहवा कैसी लगती है? वहाँ लीमडीके नागरदास गांधी रहते
हैं, तू यह जानती है न ? इनकी पत्नी आश्रममें आकर रही थी और फिर वहाँ
आनन्दशंकरभाई भी तो हैं। इन सबसे न मिली हो, तो अवसर मिलते ही इन सबके
पास हो आना । बनारसीलालसे कहना कि यह मुझे पत्र लिखे ।
गुजराती (जी० एन० ९०५४) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. आनन्दशंकर बापूभाई भुव
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३५१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० जयप्रकाश,
४५०. पत्र : जयप्रकाश नारायणको
मेरा खत तुमको मिला होगा। प्रभावतीको नित्य वाई
बात है। वाई मिटाने का इलाज हवाका फेरफार और अनुकूल
है प्रभावतीको आश्रम ले जाओ अथवा भेज दो। अच्छी होनेसे
जी० एन० ३३८० की फोटो नकलसे ।
४५१. पत्र : नारणदास गांधीको
यरवडा मन्दिर
१६ नवम्बर १९३०
होती है यह असह्य
संग है । मेरा आग्रह
वापिस आ जावे ।
बापुके आशीर्वाद
सुबहके ४-३० बजे
१३/१७ नवम्बर, १९३०
चि० नारणदास,
तुम्हारा पुलिंदा कल बुधवार शामके ४-३० बजे मुझे भेजा गया ।
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भक्त 'आरम्भ नहीं करेगा," अर्थात् उसने किसी भी व्यवसायकी योजना
नहीं की होगी। जो व्यापार करता हो वह आज कपड़ेका व्यापार करे और कल
लकड़ीका व्यापार करने का भी प्रयत्न करे या कपड़े व्यापारमें आज एक दुकान है
तो कल पाँच खोल बैठे, इसीका नाम आरम्भ है। भक्त उस झंझटमें नहीं पड़ेगा ।
यही नियम सेवा कार्यमें भी लागू होता है। आज खादी द्वारा करे और कल गाय
द्वारा, परसों खेती द्वारा और चौथे दिन डाक्टर बनकर, इस तरह सेवक भी नहीं
भटकेगा। उसके हिस्से में जो कुछ आयेगा, उसीको अच्छी तरह पूरा करेगा। जहाँ
'मैं' समाप्त हो गया, वहाँ 'मुझे' क्या करना है ? 'सूतरने तांतणे मने हरजीये
बाँधी जैम ताणे तेम तेमनी रे मने लागी कटारी प्रेमनी ।' भक्तके सब काम
भगवान आरम्भ करता है। उसके सभी कार्य स्वाभाविक ढंगसे होते हैं; इसलिए
यह 'सन्तुष्टो येनकेनचित्' रहता है। सब काम त्याग देनेका भी यही अर्थ है।
आरम्भ करनेका अर्थ प्रवृत्ति या कार्य नहीं है किन्तु उसे करनेका विचार, योजना
बनाना आदिका त्याग करना है; इसीका अर्थ आरम्भ न करना है। स्याली घोड़े
दौड़ानेकी आदत हो तो उसे छोड़ देना चाहिए। " इदमय मया लब्धमिमं प्राप्स्ये
मनोरथम् । इस तरह आरम्भ, त्यागसे उलटा है। मुझे लगता है कि इसमें तुम्हारा
२. देखिए खण्ड ४९, “गीतान्यत्रावदि, २१-२-१९३२ ।
२. भगवद्गीता, १६, १३ ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३५२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
पूरा प्रश्न आ जाता है। कुछ बाकी रह गया हो तो पूछ लेना। यह भाग, जो
विवेचन चल रहा था, उसीके साथ रखना ।
यदि चप्पल भेज दी है और उसके साथ तल्लेके लिए चमड़ा न भेजा हो तो
प्राप्त करके किसी आनेवाले के साथ भेज देना अथवा सस्ता पड़े तो डाकसे भेजना
ताकि जो चप्पल टूट गई है वह भी थोड़ी-बहुत पहनी जा सके।
संकल्प फलें । अन्तमें उसे ऐसे मनोरथोंको
सेवा कार्य लादता ही रहेगा। उनको
जमनालालको लिखना कि उसके शुभ
मनमें लाना ही नहीं है। ईश्वर तो उसपर
ढूंढ़ने या उनका संकल्प करनेकी जरूरत नहीं रहेगी। फिलहाल तो ये संकल्प ठीक
हैं। उन्हींसे भक्ति रस पूरा मिलेगा। जबतक बरसात न हो तबतक कुँआ, नदी, नाला
आदिसे प्रयत्नपूर्वक सिचाई करनी ही होती है। ऊपरसे बादल बरस पड़े और घर
बैठे ही गंगा वह उठे तब इनकी क्या आवश्यकता ? यह जो काम नासिकमें कर
सका है उसे दूसरे किसी व्यक्तिकी शक्तिसे बाहर मानता हूँ। फिर भी सभी लोग
प्रयत्न करें तो अच्छा ही है। मुझे तो प्रयत्नसे ही सन्तोष मानना पड़ता है। दूसरों
का माप भी मैंने अपनेसे ही लगाया है। कहने और लिखनेको तो और भी बहुत
कुछ है, पर वह सब तो मिलने पर इतना उसके लिए है।
.के बारेमें लिख चुका हूँ। उसने जो कुछ स्वीकार किया है उससे हममें से
किसीको सन्तोष नहीं हुआ, यह ठीक है। उसके मनमें मैलकी परतें जमी हैं। मैंने
तो उसे सख्त भाषामें लिखा ही है। तुम सबने उसके सामने असन्तोष व्यक्त किया
ही होगा। जबतक उसकी सफाईकी दलीलसे हम सन्तुष्ट न हों, तबतक उससे सार्व-
जनिक सेवा नहीं ली जा सकती। वह स्वयं यज्ञ करता रहे। इस बारेमें तुम्हें जैसा
ठीक लगे वैसा करते रहना । उसपर क्रोध न करें। प्रेमसे जितना कर सकें उतना
करें। किसी विशेष अवसर पर प्रेम क्या करनेको कहता है इसका विचार तो वही
कर सकता है जो पासमें मौजूद हो। दूर बैठा हुआ व्यक्ति हुक्म नहीं दे सकता ।
४-४५ बजे, १५ नवम्वर १९३०
मणिलालसे कहना कि उसका जो पत्र इस बार मिला है वही एक पत्र मिला
है। उससे पहले नहीं मिला। उसने लिखा था सो किस तरह और किसकी मारफत ?
पक्की खबर मिले तो जाँच कहें। जिस तरह वह मेरे पत्रकी इच्छा करता है उसी
तरह मुझे भी लिखने की इच्छा होती है; तो भी अपनी इच्छाको दबाना पड़ता है।
अधिकारियोंका यह सामान्य संकेत है कि मैं कैदियोंको पत्र न लिखूं, अतः उसका पालन
करता हूँ। औरोंको लिखनेकी पूरी-पूरी छूट है इसलिए किसी कोरे सन्तोषके लिए
बेकारके झगड़े में नहीं पड़ता। एक भी पत्र न लिखने दें तो भी जहाँ कैद भोगनेकी
बात हमने मान ली है वहाँ ऐसी बातोंके बारेमें झगड़ा नहीं किया जा सकता। फिर
मैने सन्देश तो भेजा ही था। उसे जितनी छूट मिले, उसके अनुसार वह तो लिखे
ही उसके अध्ययनके बारेमें में लिख चुका हूँ और वह उसे मिल गया होगा। आज-
१. नाम नहीं दिया गया है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३५३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
३१५
कल वह जो पढ़ रहा है, सो ठीक है। किन्तु मैंने जो क्रम लिख भेजा है, वह अधिक
नियमानुसार और पूर्ण लगता है। इसलिए उसमें मन लग सके तो उसी तरह पढ़े।
सुशीलाने उसका वजन ४० पौंड कम होनेकी बात लिखी थी। यह तो भूल ही थी
न? या किसी समय वजन इतना कम हो गया था ? अब कुछ बढ़ रहा है या जो
कमी हुई थी वह बनी हुई है? शक्ति कितनी है ? फीनिक्स के बारेमें वह जो विचार
करता है, सो ठीक है। मणिलाल उनको ऐसा लिख दे यदि कि पत्र में घाटा ही
चलता रहे तो उसे बन्द कर दिया जाये। अनुमति मिलने पर मैं भी लिखूंगा ।
प्रागजीने मुझे पत्र लिखा है। मुख्य अधिकारी बाहर गया हुआ है। उसके आनेके
बाद जवाबके बारेमें फैसला होगा। इस बीच तुम इस तरहका पत्र लिख सकते हो
कि प्रागजी जो अधिकार मांगते हैं, मैं मानता हूँ कि वे सब उन्हें मिलने चाहिए।
देवदासके लिखे हुए पत्रके बारेमें तुम्हारे जवाब की राह देख रहा हूँ।
कताईके बारेमें मीराबहनको लिखे पत्र में देख लेना। उसे कल लिखूंगा । उससे
भी ज्यादा महत्वकी बात महादेवके पत्र में है। मैं चाहता हूँ उसे सब समझ लें ।
यज्ञार्थ कातना और आमदनी बढ़ानेके ध्यानसे कातनेमें श्रम करना, ये दो अलग
चीजें हैं। यज्ञमें किया अत्यन्त आवश्यक होते हुए भी गौण है। मजदूरीमें क्रिया ही
सब कुछ है। और कुछ हो न हो तो भी क्रिया रूपमें उसका फल मिलता है। यज्ञमें
याज्ञिकका फलके साथ कोई सम्बन्ध नहीं; इसलिए फल अनन्त है। अर्थात् उसका
मनोवांछित फल मिलता है। यज्ञ सम्बन्धी ऐसी क्रियाके साथ तादात्म्य होना चाहिए।
यदि ऐसा करें तो उसका शास्त्र समझमें आ जाता है। इसलिए याज्ञिकमें पवित्रता
आदि होनी चाहिए। यज्ञ करते समय उसमें एकाग्रता होनी चाहिए। उस समय मनमें
दूसरा विचार तक न आये। ऐसे याज्ञिकको चरखेका जानने लायक सारा शास्त्र
सीख लेना चाहिए और नित्य तद्विषयक नया ज्ञान प्राप्त करते रहना चाहिए।
असावधानी या साधनों के अभाव के कारण या किसी और कारणसे ऐसे याज्ञिकसे
कोई भूल हो जाये तो उसे सुधारनेकी उसमें शक्ति होनी चाहिए। और चरखा शब्द
तो यहाँ सिर्फ एक संज्ञा है; उससे तो रुईसे सम्बन्धित सभी क्रियाओंका ज्ञान सूचित
होता है। यह काम बहुत बड़ा लगने पर भी बड़ा नहीं है और है भी । जिसने
इसकी आवश्यकताको समझ लिया हैं, उसके लिए वह बड़ा या कठिन नहीं है। क्योंकि
वह रोज धीरे-धीरे इस दिशामें प्रगति करता रहेगा और अपने इस कामके ज्ञानमें
वृद्धि करता रहेगा और अपनी पवित्रतामें भी वृद्धि करता रहेगा । क्योंकि याज्ञिक
सत्यका पुजारी होता है इसलिए इतना समझमें आनेके बाद अपने-आप बिना किसी
कष्टके उसके ज्ञानमें और काममें वृद्धि होती रहेगी। और यदि कष्ट होगा भी तो
वह उसे कष्ट न समझकर ईश्वरकी प्रसादी समझेगा। इसलिए मैंने अपने पिछले
पत्र में जो पद्धति बताई है, मुझे लगता है कि हम सबको उसे अपना लेना चाहिए
और यज्ञका सूक्ष्म और सही स्वरूप समझ लेना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ, इसके
लिए में स्वयं कितनी हद तक दोषी हूँ, इसका दर्शन तो मैने महादेवके पत्रमें कराया
ही है।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१६
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
५ बजे, १६ नवम्बर, १९३०
'गीता' के पारायणका समय ठीक आधा कर देनेके बारेमें काकासाहब के सुझावके
विषय में तुम्हें पिछली बार लिखना भूल ही गया। विनोबाका पत्र पढ़ा हो तो
उसमें देखा ही होगा। उसे पढ़ लो, यह बात लिखना याद नहीं रहा। काकासाहब का
सुझाव है कि यदि पारायण सप्ताह में करें तो वह परम्परा ज्यादा अनुकूल ही होगी ।
जो बीचमें शामिल होगा, उसको कितना पाठ हो चुका है, इसका हिसाब लगानेकी
जरूरत ही न होगी। निश्चित दिनोंमें निश्चित पाठ ही हुआ करेगा। पन्द्रह दिनका
समय रखनेसे हर सप्ताह में दिनका पाठ बदल जायेगा। यह सही है कि सप्ताह में
पढ़नेसे समय दुगुना लगेगा। पूरी 'गीता' का पारायण एक ही समय करें तो सवासे
डेढ़ घंटा लग जाता है। डेढ़ घंटे के हिसाबसे १४ दिनोंमें लगभग ६३ मिनट लगेंगे।
सात दिनोंमें करनेसे १३ मिनट लगेंगे। जिन्हें इसके पाठ में रस है वे ६३ मिनट
ज्यादा देनेमें बुरा नहीं मानेंगे जिन्हें रस नहीं उनके लिए तो आजकलके ६३
मिनट भी बोझ ही है। यह काकासाहब के तर्कके समर्थन में है। मुझे उनका सुझाय
और तर्क दोनों पसन्द आये हैं। तुम स्वतन्त्र रूपसे विचार करना और तुम्हें ठीक
लगे तो सबको बता कर इस पर चर्चा करना। महादेव वहाँ हो तो उसके साथ भी
बात करना। जो अपनी इच्छासे सोच समझ कर यह पारायण करते हैं उन्हें तो
पहले पूछ लेना। उनकी मर्जी न हो तो आगे चर्चा करने की जरूरत ही नहीं । यदि
वे इस सुझाबको पसन्द करें तो सब लोगोंके सामने रखना। सात दिवसके पारायणके
लिए तालिका भी बनाई है। उसे अभी यहाँ नहीं लिखता । यदि और लोग सहमत
हुए तो भेज दूंगा। अभी तो भेजने की जरूरत नहीं है क्योंकि दो सप्ताहके अन्दर-
अन्दर काकासाहब यहां पहुँच जायेंगे और वही समझायेंगे। इतना और कहूँगा कि
जिन्हें आज भी 'गीता'-पारायण अच्छा न लगता हो वे यदि पारायणके समय उठकर
चला जाना चाहें तो शायद उन्हें आज्ञा दे देना ज्यादा ठीक होगा। आखिरकार
पारायण तो होगा ही। इसलिए प्रार्थनाके मूल भागमें मेहमानों वगैराको छोड़कर
बाकी सभी लोग उपस्थित होंगे। वमें साबरमतीकी तरह ही पारायण किया जाता
है और प्रतिष्ठानोंमें भी बहुत कुछ वैसा ही किया जाता है। इसलिए यहाँ ऐसा
परिवर्तन करना कहाँ तक अनुकूल है, हम यह भी देख लेंगे। इसीलिए मैंने पिछली
वार विनोबा और हेमप्रभादेवीको लिखा है। जैसे-जैसे हम पारायणका महत्व समझते
जायेंगे, वैसे-वैसे हम 'गीता' को अपने आचारको सही स्थान पर रखनेका दीप-स्तम्भ
मानते जायेंगे। उसका पारायण कम दिनोंमें करनेके विचारको बुरा नहीं मानेंगे।
बहुत कुछ तो पारायण करानेवाले पर निर्भर रहेगा ही। यदि वह पारायणमें जान
लगा देगा तो 'गीता' रसमय बने बिना न रहेगी। जिस अध्यायका पारायण किया
हो, दिनभर मनमें उसीका ध्यान करें तो उस दिशामें नया अर्थ मालूम होगा और
जो अर्थ जानते हैं वह भी दृढ़ होगा। महावाक्योंके अर्थ अनन्त हैं। 'गीता' एक
महावाक्य ही है।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: बबलभाई मेहताको
३१७
दोपहरको
चप्पल आज मिल गई है। तो भी तल्लेके लिए मजबूत चमड़ा जब हाथ में
आये भेज देना। तब पुरानी भी कुछ महीने पहनी जा सकती है।
सोमवार सुबह १७ नवम्बर, १९३०
यदि डाक मंगलवारको रवाना होनी हो तो मेरे ११ बजे तक दे देने पर
ही वैसा हो पाता है। इसलिए उस दिन प्रवचन लिखूं, तो जल्दी-जल्दी लिखना पड़ता
है। इसलिए सोमवार को लिख डालूं तो सब काम ठीक निवट जाता है और काका
साहब भी उसे धैर्यपूर्वक पढ़ पाते हैं।
बापूके आशीर्वाद
[ पुनश्च : ]
सोमवार दोपहर, १७ नवम्बर १९३०
चप्पल एक दिन पहन कर भी देखी है। बिलकुल ठीक बैठी है। लेडी
विट्ठलदास मुझे रुई पहुँचा देती हैं, इसलिए तुमसे नहीं मॅगाता। यदि वे भेजनेको
कहें तो भेज देना ।
भेजने लायक और न भेजने लायक पत्रोंके भेदका ध्यान रखना। जिस सार्व-
जनिक कामकी खबर समाचारपत्रोंमें नहीं दी जा सकती, वह मुझे भी न दी जाये,
यह नियम ठीक है ।
६० पत्र हैं।
गुजराती ( एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
४५२. पत्र : बबलभाई मेहताको
भाई बबलभाई,
1016
परवडा मन्दिर
१८ नवम्बर १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। काकासाहब छूटने पर तुम्हारा पथ-प्रदर्शन करेंगे। तुम
मुझे लिखते रहा करो। यदि अभी तक तुमने तकली पर पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं
किया है तो कर लेना । चरले अथवा तकली पर तुम्हारी गति कितनी है ? तुम
कितने घंटे पीज सकते हो ? कितने अंकका सूत तैयार करते हो, आदि-आदि लिखना ।
बापूके आशीर्वाद
२. इसके बाद गांधीजीने गीता के बारेमें लिखा था उस पत्रांशके पाठके लिए देखिए खण्ड ४९,
"गीता पत्रावलि "- अध्याय २ ।
२. साधन-सूत्र में १८ नवम्बर" है, किंतु सोमवार १७ तारीखको था।
0186
Gandhi Heltage<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३५६
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[ पुनश्च : ]
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
काकासाहबने तुम्हारा पत्र पढ़ा है। उनका आशीर्वाद ।
गुजराती (एस० एन० ९४५४ ) की फोटो नकलसे।
४५३. पत्र : बी० जे० बी० गैलविनको
प्रिय मेजर गैलविन,
परवडा सेंट्रल जेल
१८ नवम्बर १९३०
(१) साथमें यह सामान्य डाक संलग्न है जो मैं मंगलवारको भेजता हूँ। क्या
आप उसे आज भिजवानेका आदेश देनेकी कृपा करेंगे ?
(२) मेरे लिए वहाँ एक चरखा होगा। क्या मैं उसे पा सकता हूँ ?
हृदयसे आपका
मो० क० गांधी
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ४५०४ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : प्रोफेसर बी० जे०
बी० गैलविन
४५४. पत्र : प्यारेलाल गोविलको '
यरबडा सेंट्रल जेल
१९ नवम्बर १९३०
प्रिय मित्र,
आपका पिछले माहकी २८ तारीखका लिखा मर्मस्पर्शी पत्र मुझे दिया गया
है। मेरा मन आपके दुखसे दुखी है और यदि इस पत्रसे आपको कुछ सान्त्वना मिले
तो मुझे खुशी होगी।
२. यह पत्र प्यारेलाल गोविल, सम-जम, मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश द्वारा २८ अक्टूबर १९३० को
लिखे पत्रके उत्तर में था। श्री गोविलके माता-पिताका देहान्त १५-२० वर्ष पहले हो चुका था और उनकी
एकमात्र बहनका देहान्त यह पत्र लिखने १६ पूर्व हुआ था। उनकी एकमात्र सन्तान, २४ वर्षीया
पुत्रीकी मृत्यु एक बच्चेका जन्म होनेके बाद हो गई। अपनी पुत्री की मृत्युकी परिस्थितियोंका विवरण देते
हुए उन्होंने अपने पत्र में लिखा था कि उनकी लड़कीको जहरबाद हो गया था जिसका निदान समय रहते
नहीं हो सका। उन्होंने अपनी बेटीकी मृत्युके लिए अपने-आपको "भयंकर चूफ" करनेका दोषी माना
था। उन्होंने आगे लिखा था "यदि
नितिके अनुसार घटित होती है तब दबाकी
तो उससे फरियाद करने की जरूरत नहीं है।
निम्नलिखित शंका उत्पन्न होती है
भाग्यकी रचना की है और हर चीज पूर्व-निर्धारित
याचना करनेसे कोई फायदा नहीं है। यदि ईश्वर अशक्त है
२. इस घोर लापरवाहीका पाप धोनेके लिए मुझे क्या प्रायश्चित करना चाहिए ?
२. उसकी लड़कीको ) आत्माको शान्ति कैसे प्रदान की जाये ?
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३५७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: प्यारेलाल गोविलको
३१९
मेरी राय में आपका कोई दोष नहीं है। लेडी डाक्टर बुलानेके बाद आपने उस
पर विश्वास करके ठीक ही किया। में डाक्टरों और हकीमोंको बार-बार बदलनेमें
विश्वास नहीं रखता। जिन्हें हम बुलायें उन पर हमें यह विश्वास करना ही चाहिए
कि सहायताकी जरूरत होने पर या रोग-विषयक अपने निदानके बारेमें शंकालु होने
पर वे हमें वैसा बता देंगे। कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि किसी व्यक्ति पर यह
विश्वास करना गलत सिद्ध हो। लेकिन ये तो जीवनके ऐसे खतरे हैं जिन्हें हमें
हमेशा उठाना ही होगा। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि आप जिसे अपनी लापरवाही
समझते हैं, उसको लेकर मनमें परेशान नहीं होंगे। इतनी बात तो आप स्वयं जानते
हैं कि आपने जानबूझ कर किसी चीजकी उपेक्षा नहीं की। इससे अधिक कोई मनुष्य
कुछ नहीं कर सकता ।
और अब आपके प्रश्नों के उत्तर ये रहे:
(१) किसी प्रायश्चित्तकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि मेरी राय में आपकी
तरफसे कोई लापरवाही नहीं हुई थी।
(२) कोई व्यक्ति किसी दूसरेकी आत्माको शान्ति नहीं दे सकता। उसकी
शान्ति स्वतः उसके भीतरसे ही आयेगी ।
(३) यह कहना असम्भव है कि अगर अन्य कोई सहायता प्राप्त हो जाती
तो क्या होता । योग्यतम विशेषज्ञोंकी सहायताके बावजूद राजाओंको भी तो मरना
ही होता है।
(४) एक अवश्यम्भावी घटनाके ऊपर बहुत ज्यादा शोक या बतंगड़ नहीं होना
चाहिए। जिसका जन्म हुआ है ऐसे प्रत्येक जीवकी मृत्यु निश्चित है न ऐसा ही
मानना चाहिए कि यह बहुत बड़ा संकट है। मृत्यु वास्तवमें मुक्ति है।
(५) शरीर छोड़नेके बाद आत्मा क्या करती है, यह हर मामले में एक
अनुमानकी बात है, किन्तु इतना निश्चित है कि शरीरके साथ आत्माका नाश नहीं
होता। इसके आगे हमें ईश्वर या प्रकृतिके नियमों में भरोसा करना चाहिए।
३. सही और सामयिक सहायता दी जाती तो क्या उसे बचाया नहीं जा सकता था ?
४. या ईश्वरप्रारयकी दिशा बदलने में अशक्त है? यदि ऐसा है तो प्रार्थना करनेका अथवा दवा
देनेका या डाक्टरी सहायता मांगनेका भवा उस दिशा में कोई प्रयत्न करनेका कोई लाभ नहीं है।
५. क्या शरीर छोड़नेके बाद आत्मा कुछ समय तक इधर-उधर भटकती है?
६. मैं यह कैसे जान सकता हूँ कि क्या उसने कहीं और जन्म के लिया है?
७. मुझे प्रतिक्षण पद विचार सताता है कि मैंने बहुत लापरवाहीले काम लिया, हालाकि मैं सौगन्ध
उठा सकता हूँ कि मुझे पता ही नहीं था कि मैं कोई गलती कर रहा हूँ, अन्यथा में गलतिया करता ही
नहीं। मुझे पता नहीं कि मेरी बुद्धि और विवेक कहाँ गये थे। अब मैं और कुछ नहीं चाहता,
केवल यह जानना चाहता हूँ कि क्या मैं उसकी आत्माको शान्ति पाने और स्वर्गमें रहने में किसी प्रकारकी
सहायता कर सकता हूँ यदि हाँ तो मुझे क्या करना चाहिए ?
कृपापूर्वक मृतात्माको अपना आशीर्वाद दें। "
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३५८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
(६) जन्मसे पूर्व और मृत्युके बादकी स्थितियाँ अदृश्य हैं, जैसा कि 'गीता' में
कहा गया है, और अनुभवसे इसकी पुष्टि होती है; लेकिन हम अपनी वर्तमान
स्थिति ऐसा freei निकाल सकते हैं कि मृत्यु के बादकी स्थिति कमसे कम वर्तमान
स्थितिका ही दूसरा, यद्यपि कुछ परिवर्तित रूप होती होगी ।
(७) जो नहीं रहे उनके सभी अच्छे गुणोंको स्वयं अपने जीवनमें अपना कर
हम अपने मृत आत्मीयजनोंकी निश्चय ही सहायता कर सकते हैं। क्योंकि यदि उन्हें
यहाँ जो कुछ होता है उसका पता होता है तो उन्हें इस बात से सान्त्वना मिलेगी
कि उनके अन्दर जो अच्छाइयां थीं उनको अपना कर हम उनकी स्मृतिकी रक्षा कर
रहे हैं।
[ पुनश्च : ]
हृदयसे आपका
मो० क० गांधी
चूकसे एक प्रश्न रह ही गया। ईश्वर तो कभी अशक्त है ही नहीं। लेकिन
उसके नियम अपरिवर्तनीय हैं। हम उन्हें नहीं जानते। हम यह भी नहीं जानते कि
अमुक समय उसकी क्या इच्छा है। इसलिए हम एक मर्यादाके अन्दर ऐसे उपाय
अपनाते हैं जो हमें ठीक लगते हैं। प्रार्थना अपने अन्तरमें स्थित ईश्वरकी होती है।
प्रार्थनासे भगवानकी इच्छाको नहीं बदला जा सकता, लेकिन उसके जरिये हमें उसकी
इच्छाका ज्ञान हो जाता है, और यही सबसे बड़ी चीज है।
मो० क० गांधी
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९३०५ ) से । सौजन्य : द० वा० कालेलकर; हरिजन,
१५-२-१९४८ से भी ।
चि० पुरुषोत्तम,
४५५. पत्र : पुरुषोत्तम गांधीको
२२ नवम्बर, १९३०
वहाँके कुशल समाचार और प्रवृत्तिकी सूचना देनेका बोझ नारणदास पर नहीं
पड़े, इसलिए तुम्हें चाहिए कि तुम मुझे पत्र लिखो। उसमें जमनादासकी खबर भी
देना । गुरुजनोंको मेरा दण्डवत् प्रणाम कहना। उन दोनोंकी
है और उनके आशीर्वादकी कामना करता हूँ क्या तुम अब
तुम अपने [ किसी भी ] एक दिनका कार्यक्रम लिखना ।
मुझे रोज याद आती
स्वस्थ हो गये हो ?
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ९०० ) की फोटो नकलसे सौजन्य : नारणदास गांधी
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३५९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कुसुम (बड़ी),
४५६. पत्र : कुसुम देसाईको
-
यरबडा मन्दिर
२२ नवम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला । ['गीता' के ] लोक हमारी प्रार्थना के अंग हैं, इसलिए उन्हें
याद कर लेना चाहिए- -यदि तुझमें ऐसी श्रद्धा उत्पन्न हो जाये तो तू प्रयत्नपूर्वक
उनमें तल्लीन हो सकेगी। यदि न हो सके तो उससे निराश न होना। जो लोग
श्लोकोंका पाठ करते हैं वे सब तल्लीन नहीं होते। लेकिन श्रद्धापूर्वक इनका पाठ
करनेसे किसी-न-किसी दिन तल्लीनता अवश्य आ जाती है। इसके अतिरिक्त श्लोकोंके
अर्थमें गम्भीर रहस्य भरा हुआ है। यदि तू उनका मनन करेगी तो भी तू उनमें
तल्लीन हो सकेगी।
गुजराती (जी० एन० १८१०) की फोटो नकलसे ।
चि० शिवाभाई,
४५७. पत्र : शिवाभाई जी० पटेलको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
२२ नवम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला है। मेरी स्मरण शक्ति तुम्हारे समान ही खराब है लेकिन
जो कुछ भी मैं कण्ठस्थ कर पाया हूँ और अवसर मिलने पर अभी भी जो कुछ
कण्ठस्थ करता हूँ, उसका तरीका यह रहा है, और यह उत्तम है, इस बारेमें मुझे
तनिक भी सन्देह नहीं है हम जो पंक्तियाँ कण्ठस्थ करना चाहते हैं उन्हें पहले
अच्छी तरह से समझ लें, उनके पूर्वापर सम्बन्धको अर्थात् सन्दर्भको जान लें। इतना
सब हो जानेके बाद तो कविकी उन पंक्तियोंको जिनके अर्थ और पूर्वापर सम्बन्धको
तुमने हृदयंगम किया है, बार-बार पढ़नेकी बात ही रह जाती है। तब वे सहज ही
याद हो जाती हैं। 'गीता' के बारहवें अध्यायके विषयमें तुम ऐसा ही करना । उसमें
अर्जुन पूछता है, " जो इस तरह आराधना करता है और जो अव्यक्तकी साधना
करता है, उन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है ? " तुम पहले इसके उत्तर पर अच्छी तरहसे
मनन करना और बादमें श्लोकोंको कण्ठस्थ करना। ऐसा करनेसे आनन्द आता है,
व्यर्थका परिश्रम नहीं करना पड़ता, और हृदयमें श्रद्धा होनेके कारण श्लोक कण्ठस्थ
करते समय अर्थ भी हृदयमें रिस जाता है।
गुजराती (एस० एन० ९५०२) की फोटो नकलसे ।
४४-२१
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३६०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० बलभद्र,
४५८. पत्र : बलभद्रको
यरवडा मन्दिर
२२ नवम्बर, १९३०
तुमने इस बार निस्सन्देह बहुत अच्छा पत्र लिखा है। तथापि अभी तुम्हारी
लिखावट तुम्हारी उम्र को देखते हुए खराब है। उसे धैर्यपूर्वक सुधारना । नारणदास
भाईका चरखा तुम्हें अच्छा लगता है, क्योंकि वह प्रतिष्ठित है और उसकी अच्छी
तरहसे देखभाल की जाती है। तुम राबके साथ दूध लेते हो, यह अच्छा करते हो।
चावलके स्थान पर चपाती लेते हो, यह भी अच्छी बात है। तुम यदि अपनी सामर्थ्या-
नुसार काम करते रहोगे तो तुम्हारा स्वास्थ्य अवश्य अच्छा हो जायेगा और वजन
भी बढ़ेगा। रावजीभाई ले जायें तो जाऊँगा, नहीं ले जायें तो यहीं रहूँगा - यदि
तुम इस भावनासे काम करोगे तो यह अनासक्त भावसे की गई.' सेवा होगी।
सेवकको तो जहाँ रहे वहीं सेवा करनी चाहिए।
गुजराती (जी० एन० ९२१४ ) की फोटो नकल से ।
चि० मनु,
बापूके आशीर्वाद
४५९. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
यरवडा मन्दिर
२२ नवम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला । अब तो काकासाहब थोड़े ही दिनोंमें तुझसे मिलेंगे। अपने
बुखार और दर्दको अपनी दृढ़ इच्छाशक्तिके द्वारा दूर करना। तुझे इस बातका गर्व
है कि काकासाहब और तेरा जन्मदिवस एक ही दिन पड़ता है, सो यह बात समझमें
आती है। और जिसके प्रति हम गर्वका अनुभव करते हैं उसके गुणोंका अनुकरण
करनेका प्रयत्न भी करते हैं। सो तू कर रहा है। ईश्वर तुझे दीर्घायु बनाये ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ७७७१ ) की फोटो नकलसे ।
१. मूलमें यहाँ एक शब्द पढ़ने में नहीं आता।
Gandhi, Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३६१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६०. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
यरवडा मन्दिर
२२ नवम्बर, १९३०
चि० काशिनाथ,
यदि माताजी आश्रमके निकट रहेंगी तो तुम उनके बारेमें निश्चिन्त हो जाओगे
और सेवा भी कर सकोगे।
यह जरूरी नहीं है कि किसी व्यक्तिका किसी-न-किसीके साथ विवाह होना
ही चाहिए। लेकिन यदि कोई हिन्दू स्त्री अच्छे और उचित कारणोंकी वजहसे किसी
मुसलमानके साथ विवाह करनेकी इच्छा रखती है तो वह पाप करती है, हमें ऐसा
नहीं मानना चाहिए। अस्पृश्यके बारेमें तो कहने की कोई जरूरत ही नहीं है। अस्पृश्य
कोई अहिन्दू नहीं है । विवाहका वर्णके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। स्त्री-पुरुषकी
वासनाको मर्यादित करनेके लिए विवाह एक सर्वसामान्य धार्मिक व्यवस्था है। इस
बातको ध्यान में रखकर पसन्दगीका क्षेत्र हमेशा सीमित होना चाहिए। इसमें मुझे
लगता है तुम्हारे समस्त प्रश्नोंका उत्तर आ जाता है।
गुजराती (जी० एन० ५२६१ ) की फोटो - नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
४६१. पत्र : मथुरी खरेको
२२ नवम्बर १९३०
चि० मथुरी,
तुम्हें कातना अच्छा नहीं लगता, इसके दो कारण हैं। एक यह कि यह गरीबों
की खातिर है, इसका तुम्हें अन्दाज नहीं है; और तुम यह भी नहीं जानती कि
भूखे मरनेवाले कितने गरीब होते हैं। दूसरा कारण यह कि तुम्हें अच्छी तरह कातना
नहीं आता। यदि कोई गरीबोंके बारेमें जान ले, और उनपर दया करना अपना धर्म
समझ ले, तो कताईमें सहज ही रस आने लगे। फिर उनके लिए कातना है इसलिए
अच्छे से अच्छा और ज्यादासे ज्यादा कातना चाहिए, ऐसा तो तुम्हें लगेगा ही ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० २५७) से सौजन्य : लक्ष्मीबहन सरे
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३६२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६२. पत्र : मीराबह्नको
२३ नवम्बर, १९३०
चि० मीरा,
फिर बुखार आ गया, यह बुरी बात हुई। लेकिन मेरे विचारसे इसकी चिन्ता
करना बेकार है। तुम्हारे शरीरमें जरूर जहर है वह जरा-सा बहाना मिलते ही
शरीरमें गड़बड़ी पैदा कर देता है। भविष्यमें जहाँ कारणका पता लग सके लगाकर
उससे बचनेकी कोशिश करो। अगर आरामकी ही जरूरत हो और आश्रम में न ले
सको, तो जहाँ तुम्हारे सवालसे आराम मिल सके वहाँ जाकर ले लो। तुम बीजापुर
भी जा सकती हो। यहाँ छगनलाल है या ऐसी ही किसी और शान्त जगह चली
जाओ। एक सप्ताहका आराम भी तुम्हें बिलकुल दुरुस्त कर देगा।
तुम्हें यह जानकर खुशी होगी कि मैंने बिहारी चरखेको चला लिया है। मैंने
तुम्हारी हिदायतों पर अमल किया और वह चलने लगा। चमरखों पर ध्यान देनेकी
जरूरत थी। मैंने सूराखोंको बड़ा कर दिया है। मैं उस पर सूत नहीं कात रहा
हूँ क्योंकि मैं गाण्डीव पर परीक्षण कर रहा हूँ। उससे अभी और अच्छे परिणामोंकी
आशा है। मैंने जो परिवर्तन किये हैं उनकी सूचना केशुको पत्र लिख कर दे रहा हूँ।
तुमसे में बिहारी चरखके बारेमें बात करूँगा तुमने जो परिवर्तन किये हैं उनसे
चरखेकी उपयोगिता बढ़ी हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। चौखटेकी मूल लम्बाई ही आदर्श
लम्बाई है। 'सुबरे हुए' चरसेके चौखटकी लम्बाई सूतको बाहर खींचनेके लिहाज-
से ज्यादा है और अपनी तरफ खींचनेके लिहाजसे बहुत कम है। मूल चमरखोंमें
परिवर्तनकी गुंजाइश है। मैं गाण्डीवमें जूटकी होरके चमरखोंसे प्रयोग कर रहा
हूँ और ये बहुत अच्छा काम दे रहे हैं। इस डोरीवाले चमरलेमें तकुआ डोरकी
मोटी और चिकनी उन्नतोदर सतह पर घूमता है। इसलिए वह न्यूनतम घर्षणके
साथ घूमता है। बिहारवाले चमरखोंमें तकुआ इंच चौड़ी समतल सतह पर
मन्थर गति से घूमता है। इसलिए उसमें घर्षण होता है जिसे बचाया जा सकता है।
जूटकी डोरके चमरले निस्सन्देह ज्यादा टिकाऊ होते हैं, जल्दी बनाये जा सकते हैं
और उसमें तेल ज्यादा ठहरता है। जूटकी डोरी सर्वत्र सुलभ है। कूड़ेमें मिल सकती
है। ये कुछ बातें हैं जिन्हें तुम ध्यानमें रख लो और जहाँ फुर्सत हो वहाँ इनको
अमल में लाओ। एक और खुशखबरी । तुम जो तकलियाँ यहाँ छोड़ गई थी उनमें
से एकको पिछले तीन दिनसे आजमा रहा हूँ। इससे मुझे उस तकलीसे भी ज्यादा
सन्तोष मिल रहा है जो मैने बनाई थी और जिस पर में कात रहा था। मेरी
तकलीका मुँह भद्दा बना है। तुम्हारी तकलीका कहीं ज्यादा अच्छा है। 'गीता' के
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३६३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र वसुमती पण्डितको
३२५
पहले अध्यायके अपने सारका अनुवाद मैने आज पढ़ा। मुझे उसमें तुम्हारा हाथ दिखाई
देता है। भावार्थकी काफी रक्षा हुई है।
सप्रेम,
बापू
से भी ।
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४२१ ) से सौजन्य : मीराबहून; जी० एन० ९६५५
चि० प्रभावती,
४६३. पत्र : प्रभावतीको
२४ नवम्बर, १९३०
तेरे पत्र मुझे मिलते रहते हैं। मैंने तुझे जो पत्र लिखा है, वह अवश्य मिला
होगा। चूंकि तूने पटनाका पता दिया था इसलिए मैंने यह पत्र पटना भेजा था ।
मैंने जयप्रकाशको तार दिया था कि वह तुझे आश्रम भेज दे। उसने उत्तरमें कहा
है कि यदि तेरी तबीयत नहीं सुधरी तो वह ऐसा ही करेगा। आजकल तू क्या
करती है, यह जानने के लिए मैं उत्सुक हूँ। भगवान तुझे शान्ति और आरोग्य
प्रदान करे। मुझे तो पत्र लिखती रहना । हिम्मत न छोड़ना ।
गुजराती (जी० एन० ३३८१ ) की फोटो नकलसे।
चि० वसुमती,
४६४. पत्र : वसुमती पण्डितको
बापूके आशीर्वाद
२४ नवम्बर १९३०
अपने पत्र में तू हस्ताक्षर करना ही भूल गई है। सरभोणके बारेमें तूने जो
कहा सो मैं समझ गया हूँ। नाथ, नारणदास, महादेवके साथ सलाह-मशविरा करके
तूने सरभोणको छोड़ा है, यह ठीक ही है। तब मुझे ब्यौरेवार बतलानेकी जरूरत भी
नहीं है।
मुझे तेरा कब्ज हटता नहीं दिखता। मुझे पत्र लिखती रहना ।
गुजराती (एस० एन० ९२७८) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगाबहन,
४६५. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
२४ नवम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिल गया है। जहाँ हम अपने अभिमानके कारण नहीं, परन्तु
ईश्वरकी प्रेरणासे जाते हैं यहाँ पहुँच कर ऐसा ही लगता है कि हम एक भी क्षण
जल्दी नहीं पहुंचे। और यदि एक पल भी देरसे पहुंचे होते तो वह विलम्ब या
गलत माना जाता । काम बहुत बड़ा है, किन्तु ईश्वर पार उतारनेवाला है।
बहनोंकी प्रार्थनाका ध्यान करना। कौन जानता है कि उसका एक-एक श्लोक
ऐसे समय के लिए ही खोजा गया हो। द्रौपदीकी प्रार्थनाकी कीमत आज स्पष्ट हो
जानी चाहिए।
का विरोध तो कोई नहीं करता न ? सबको उसके बारेमें मालूम है न ?
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने सी० डब्ल्यू० ८७६५ से भी । सौजन्य :
गंगाबहन बेच
४६६. पत्र : हरिलाल देसाईको
चि० हरिलाल (देसाई),
२४ नवम्बर १९३०
तुम्हारा खरा पत्र मिला। विवाहके बारेमें तुमने जो कहा है, सो समझा ।
बरके कोई सन्तान है क्या? उसकी मां जीवित है ? हरिइच्छा ससुराल गई ? तुमने
चर्मालयका काम छोड़ दिया, यह तो सचमुच अनर्थ हुआ। इसमें में हमारे समाजकी
सामान्य दुर्बलताका अनुभव करता हूँ। जिन कारणोंवश तुमने उसे छोड़ा, वे तो उस
समय भी तुम्हारे सामने थे, जिस समय तुमने इस कामको अपने हाथमें लिया था ।
कल ही में १२७ वें भजनका अनुवाद कर रहा था; उसमें यह कहा गया है
कार्य आरम्भ करनेसे पूर्व अच्छी तरह सोच-विचार करो। किसीकी प्रतिस्पर्धा में
किसी कामको हाथमें मत लो और यदि लो तो उसे पूरा करके रहो ।
एक बार टेक छूट जानेसे बाजी हाथसे जाती रहती है। माताके प्रति अपन
धर्मको भी तुमने ठीक तरहसे नहीं समझा। मान लो कि माता मद्यपान करनेवालोंके
१. नाम यहाँ नहीं दिया गया है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३६५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र प्रेमावहन कंटकको
३२७
समाजकी है; उसका बच्चा मद्यपानको खराव समझ उसका त्याग करता है। माता
शराब न छोड़नेके लिए बालकको फुसलाती है; यदि वह नहीं मानता तो आत्महत्या
करनेकी धमकी देती है तो क्या पुत्रका यह धर्म है कि जिसे उसने धर्म माना, उसका
त्याग कर दे ? दशरथको मरने दिया, फिर भी उनके वचनका पालन करनेके लिए
राम वनको चल दिये। कैकेयीने भरतसे राज्य अपनानेके लिए अनुनय-विनय की; लेकिन
भरतने गद्दी नहीं ली। सामान्य दृष्टिसे देखा जाये तो कैकेयीने क्या कोई गलत काम
किया था? बहूत रानियोंमें वह एक रानी थी और फिर उसे पतिका वचन भी
प्राप्त था। अपने लड़के के लिए उसने गद्दी माँगी तो उसमें क्या पाप किया ? लेकिन
भारतको यह पापरूप जान पड़ा और उसने अपनी माताका त्याग किया।
यह बात मैंने तुम्हें उलाहना देनेके लिए नहीं लिखी है। मैं तुम्हारे ऊपर रुष्ट
होऊ, ऐसी बात नहीं। यह बात तो इस विचारसे लिखी है कि तुम्हें धर्मका बोध
कराना मेरा धर्म है।
गुजराती (जी० एन० ६६२५ ) की फोटो नकलसे ।
४६७. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
बापूके आशीर्वाद
चि० प्रेमा
परवडा मन्दिर
२४ नवम्बर १९३०
तेरा ब्यौरेवार पत्र मिला। खुश हुआ। जो निर्णय में करता हूँ उनके सभी
कारण मुझे हमेशा याद नहीं रहते। तू सच्ची सैनिक सिद्ध हुई है। आश्रम में रहने से
सिपारी नहीं होती, ऐसा यदि तू मानती हो तो यह तेरी भूल है। लड़ाईमें सव
आगे ही रहें, ऐसा नहीं होता। बहुत से सिपाही रोक कर रखे जाते हैं ताकि समय
पड़ने पर उनसे काम लिया जा सके। और फिर केन्द्र-स्थान पर बहुत जिम्मेदार
व्यक्तियोंकी जरूरत होती है। खतरा उठाने के भयका त्याग तो करना ही चाहिए;
और खतरा सामने उपस्थित हो जाये तो वीरताके साथ उसका सामना करना चाहिए।
लेकिन जो व्यक्ति बिना किसी कारण खतरा मोल लेता है वह सिपाही नहीं, मूर्ख
है नारणदासको में सच्चा सिपाही मानता हूँ। कौन जानता है कि तुझे किस तरहके
खतरोंका सामना करना पड़े। सच्ची सिपहगरी ईश्वर जैसा रखे, वैसा रहने में है।
इसमें अनासक्ति है। इसे सामान्य भाषामें कहें तो इसका अर्थ यह हुआ कि जिस
सेनापतिके अधीन हम विचारपूर्वक और स्वेच्छापूर्वक गये हों वह जैसा कहे हमें वैसा
करना चाहिए। यह पाठ तूने अच्छी तरह सीख लिया है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३६६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
[ आश्रमके बच्चोंने] अपने पत्र में धर्मकुमारके बारेमें शिकायत की है कि वह
गन्दा रहता है। लगता है, धीरूको इसकी जानकारी है। जांच करना ।
गीता पारायणके बारेमें तेरी जो राय है उसे में समझता हूँ। काकासाहब के
साथ तू जी भर कर लड़ना। लेकिन ऐसा लगता है कि तेरे विरोधके मूलमें तो
प्रार्थनाके प्रति ही तेरी अरुचि या अथवा है तेरा बस चले तो तु धुनके साथ ही
प्रार्थना समाप्त कर दे। मेरी सलाह है कि तु प्रार्थनाकी सारी विधि पर श्रद्धा रख ।
हो सके तो अर्थ पर ध्यान रख वैसा न कर सके तो ये शब्द संस्कारी हैं, उन्हें
सुनने में भी लाभ है, ऐसी श्रद्धा रखकर विनयपूर्वक सुन। इससे यह मत समझना कि
मैं तुझे सात दिनके पारायणके लिए राजी करना चाहता हूँ। जिस प्रार्थनाके पीछे
कुछ लोगोंकी अनन्य श्रद्धासे की हुई १५ वर्षकी तपश्चर्या है, उसमें कुछ तो [सार ]
है ही, यह बात तेरे गले उतारनेके लिए मैंने यह सब लिखा है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ६६९१ ) से । सौजन्य : प्रेमावहन कंटक; जी० एन०
१०२४३ की फोटो नकलसे भी ।
४६८. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको
चि० महालक्ष्मी,
२४ नवम्बर १९३०
माधवजी लिखते हैं कि तुम्हें बराबर बच्चोंकी चिन्ता बनी रहती है। यह
क्यों? हम जिन श्लोकोंका पाठ करते हैं उनका स्मरण करना और चिन्ता छोड़
देना। बच्चोंकी देखभाल करनेवाला प्रभु है। मैंने कलकत्ता पत्र लिखा है। हमें
चाहिए कि हम यथासम्भव बड़ोंसे अनुरोध करें और फिर उनके प्रति विश्वास- भाव
रखते हुए ईश्वरका आश्रय लें।
गुजराती (जी० एन० ६८०५ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० वनमाला,
४६९. पत्र : वनमाला परीखको
यरवडा मन्दिर
२४ नवम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। लेखन कलाके विषयमें मैने रामदास स्वामीको कविताका जो
अनुवाद भेजा था, तुमने क्या वह सुना था ? यदि तुम्हें न
जान लेना और उसके अनुसार लिखनेका प्रयत्न करना।
ही आकर तुम सबको आशीर्वाद देंगे।
गुजराती (जी० एन० ५७५५ ) की फोटो नकलसे।
मालूम हो तो प्रेमाबहनसे
काकासाहब तो अब स्वयं
४७०. पत्र : अमीना कुरेशीको
बापूके आशीर्वाद
२४ नवम्बर, १९३०
चि० अमीना,
बहुत दिनोंके बाद तेरा पत्र मिला । कुरेशीके फिरसे जेल जाने की खबर मिली
है। ऐसा ही होना भी चाहिए। धंधुकामें तुम सब लोगोंका स्वास्थ्य अच्छा रहा
अथवा नहीं? वहीं सर्दी ज्यादा है या कम ? वहाँ कुछ घूमना-फिरना होता है क्या ?
बापूकी दुआ और आशीर्वाद
[ पुनश्च : ]
अपने ससुरजीसे मेरा सलाम कहना ।
गुजराती ( जी० एन० ६६६८ ) की फोटो नकलसे ।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७१. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
२४ नवम्बर १९३०
वि० मथुरादास,
प्रश्न यह है
विठ्ठल कहता है कि मोमबत्ती लगानेके बाद पत्तीकी जरूरत
नहीं रह जाती। तुम कहते हो कि जरूरत होती है। यदि होती है तो किसलिए ?
विट्ठलको अपनी भूल सुधारनी चाहिए। हमारे लिए मोमबत्ती ही ठीक है, उससे रुई
साथ नहीं चिपकती ।
गुजराती (जी० एन० ३७४८ ) की फोटो नकलसे ।
चि० हेमप्रभा
४७२. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
बापूके आशीर्वाद
२४ नवम्बर १९३०
तुमरा खत मिला है।' सतीश बाबुका प्रवचन उत्तम है। उनकी मनोदशाका सूचक
यह प्रवचन है। सोदपुरमें आश्रमवासी बनकर रहना चाहें उनको आश्रमके नियमोंका
भल भांति पालन करना हि चाहिये । यदि ऐसे न मिले तो वेतनदारोंसे सोदपुर भले
चले या ग्रंथ हो जाय। इसमें हमारी परीक्षा है। वेतनदारोंके मार्फत चलाना कहाँ
तक उचित होगा यह अलग बात है ? ऐसा समय न आये ऐसी हम आशा करें।
आश्रमका चलाना न चलाना ईश्वराधीन है।
जी० एन० १६७७ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
१. हेमप्रभा दासगुप्त अपने पत्र सोपुर आश्रम
की नाके प्रति सन्देह प्रकट किया
था। सतीशचन्द्र दासगुप्तकी अनुपस्थिति में वह आश्रमको चलाने की कोशिश कर रही थी। आश्रमवासियों के
प्रयत्न नाकाकी होनेपर उन्होंने वैतनिक कार्यकर्ताओं की नियुक्तिको सम्भावना व्यक्त की थी तथा सतीशचन्द्र
दासगुप्तके पत्र में से उद्धरण भी संलग्न किये थे जिसमें उन्होंने तारिणीको गुरुयुके विषयपर अपने उद्गार
और विचार व्यक्त किये थे (एस० एन० १६७५८- एम० )
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३६९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७३. पत्र : नारणदास गांधीको
रात, २१/२५ नवम्बर १९३०
चि० नारणदास,
तुम्हारा पत्र गुरुवार ( २० तारीख) को सवेरे मिला। बन्द पत्र तो भेजो ही मत ।
खोलकर ही भेजा करो। लिखनेवाला मना करे तो न पड़ो; इतना ही काफी है।
किन्तु उसमें भी यही शर्त होनी चाहिए कि जिस बातकी मनाही है ऐसी कोई बात
न लिखी जाये। इसलिए कोई निजी पत्र हो ही तो उसका सम्बन्ध लेखकके निजी
जीवनसे ही होना चाहिए तुम आजकल जिस पद्धतिसे काम ले रहे हो उसे जारी
रखना । हरिइच्छाकी शादी में नाजायज छूट ली गई, यह दुखकी बात तो है ही। किन्तु
तुमने धैर्यपूर्वक उसे सहन कर लिया और जितनी हो सकी उतनी मदद की, यह
ठीक किया। कई बार ऐसे नियमोंके भंग होने में ही कर्तव्यका पालन निहित होता
है। तुमने जो रुख अपनाया वह अहिंसात्मक था। सिद्धान्तका अपवाद नहीं होता ।
सिद्धान्तको मूर्तिमन्त करनेके लिए जिन नियमों या उपनियमोंको बनाया जाता है, यदि
उनसे सिद्धान्त शिथिल पड़ता हो तो उनका त्याग किया जा सकता है। हरिइच्छाका
विवाह भी ऐसा एक प्रसंग था ।
मैं तो आजकल कताई आदिकी साधना कर रहा हूँ। इसलिए अनेक विचार
आते रहते हैं। यह हमारा यज्ञ है इसलिए उसमें बहुत सावधानी, नियमितता, उत्साह,
सच्चाई और कुशलता होनी चाहिए। कई लोगोंको उसके बारेमें थोड़ा बहुत भी
सामान्य ज्ञान नहीं है, सो अब होना चाहिए यानी हरएक को अपने सूतका अंक,
समानता आदि निकालना आना चाहिए; और यह सब दर्ज करके रखना चाहिए ।
रोज कितना समय लगाया इसका भी हिसाब होना चाहिए। आदत डाल लें तो इस
काममें बहुत कम समय लगता है। सबको गति बढ़ानेकी चिन्ता भी करनी चाहिए
और फिर भी सूत अच्छा कतना चाहिए। कताईके लिए चरखा तैयार करनेकी विधि
भी सबको मालूम होनी चाहिए। इसलिए सबको माल, मोड़ियेकी रस्सी, चमरल
आदि तैयार करना आना चाहिए। अलग-अलग तरहके चरखोंका ज्ञान होना चाहिए ।
इस सबपर विचार करने और अमल में लानेका बोझ तुमपर नहीं होना चाहिए। मेरे
पास तो एक ही धन्धा है और तुम्हारे सिर रोज नई जिम्मेदारी और प्रश्न इसलिए
मैं जो कुछ भी लिखूँ उसको मनपर बोझरूप नहीं लेना है। इसमें से जितना सहज ही
पचाया जा सके और अमल में लाया जा सके उसे कर-कराकर बाकी को भूल जाना ।
फिर इस बातको दूसरे लोग भी सोचें-विचारें जिसे जितनी दिलचस्पी, जितनी जान-
कारी हो, उसी प्रमाणमें वह करे इस सम्बन्धमें मुझे जो अनुभव हुए हैं उनका कुछ
अंश लक्ष्मीदासको लिखे पत्र में होगा। उसे पढ़ लेना ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
शनिवार सुबह
तुम्हारी सेवाका वर्णन बड़ा रोचक है। तुम यह श्रम करते हुए बीमार मत
पड़ जाना । अनासक्ति तुममें अच्छी खासी है। इसलिए बीमार पड़नेकी सम्भावना कम
है। प्रीत्यर्थ सेवा करनेवाले के कामको कृष्ण न निभायें, यह कैसे हो सकता है? वजन
कम होना तो शुभ चिह्न ही है। आश्रम में फल तो अच्छे आये हैं। मैथ्यूने अपनी
छूट छाटका वर्णन तो भेजा नहीं छूट लेता है बस इतना ही लिखा है किस प्रकारकी
लेता है, यह तुम्हें मालूम हो तो लिखना। मैथ्यू अच्छा व्यक्ति है इसलिए उसे अपने
यहाँ रहने दें। मैं तो यह भी मानता हूँ कि वह किसी दिन ठिकाने आ जायेगा ।
ज्यादा काम हो तो एक-दो सतरें लिख भेजनेसे भी काम चलेगा। मुझे कुछ
खास लिखना ही हो तो छोटे-छोटे टुकड़ों पर लिख डालना आसान होगा। मुझे यहाँ
तुम्हारी तरह काम नहीं है, फिर भी मैं यहीं करता हूँ, यह तुमने देखा है न ?
जिस कामके लिए जो समय नियुक्त किया है, उस समय वह काम छोड़ कर पत्र
नहीं लिखना । खाने पीने, सोने, शौच, चरखा आदि कामोंसे बचा हुआ साराका
सारा समय मंगलवारका दिन छोड़कर, पत्रोंमें ही जाता है। तुम अपने कामको ठीक
तरहसे व्यवस्थित कर सकते हो, यह जानता हूँ, तब भी इतना लिखनेका जी हो
आता है। यह अनासक्ति पानेका एक उपाय भी है। खूब काम करते हुए भी
अनासक्तको थकावटका अनुभव नहीं होता। अंग्रेजीमें एक बहुत अच्छा विचार है-
जिसे बहुत काम रहता है, उसके पास और कामोंके लिए भी सदा अवकाश रहता
है। मतलब यह है कि ऐसा मनुष्य काम करते हुए भी हमेशा खाली बैठे हुए व्यक्ति
जैसा निश्चिन्त दिखाई देता है और फिर कोई उससे निराश नहीं होता।
तुम धीरू और विमुको ले सके यह तो बहुत अच्छा हुआ। ये बच्चे स्वयं भी
आश्रम में आनेके इच्छुक थे, यह भी अच्छा हुआ है। अब धीरू कैसा व्यवहार करता है,
यह लिखना ।
अमीदासका प्रयोग देखने लायक है। यहाँ बैठे-बैठे उसके कुछ दोष दिखाई देते
हैं। वह कुछ काम-काज न कर सके और पड़ा ही रहे तो फल पर शरीर जरूर
निभा सकेगा। किन्तु यह प्रयोग सफल नहीं माना जायेगा। जिस खुराकसे शरीरमें
सामान्य सेवा कार्य करनेकी शक्ति रहती है, वही खुराक अच्छी मानी जायेगी। ऐसी
शक्ति प्राप्त करनेके लिए शरीर में बादाम जैसे स्नायु मजबूत करनेवाले पदार्थको पचाने की
शक्ति होनी चाहिए। अभी तक तो मुझे यही अनुभव है कि हाजमा कमजोर हो
जानेके बाद बादाम आदि हजम नहीं होते जबकि व्यक्ति दूधसे वे ही तत्व प्राप्त कर
सकता है और उन्हें हजम कर सकता है तो भी अमीदासको यह लिखने या प्रका
रान्तरसे भी कहनेकी मेरी इच्छा नहीं होती। उसकी गहरी श्रद्धासे उसे आवश्यक ज्ञान
मिलनेकी सम्भावना है। भूल होगी तो सुधार लेगा और अपने प्रयोगसे दूध या ऐसी
वनस्पतियाँ खोज निकालेगा जिनसे ऐसे तत्व प्राप्त हो सकें, हम यही आशा करें।
का किस्सा करुणाजनक है। मुझे उसके चेहरेमें कुछ अरुचिकर लगता
था । किन्तु वह अच्छा ही है, यह सोचकर मनसे विचार निकाल दिया था; ऐसा
१. नाम नहीं दिया गया है।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र : नारणदास गांधीको
३३३
करना ठीक भी था। जब कभी वह गिरता था तभी सँभलनेका प्रयत्न करता था
और हो सकता है, अब प्रयत्नमें सफल हो गया हो। ऐसा हुआ होगा तो चेहरा भी
बदल जाना सम्भव है। सुकरातके बारेमें कहते हैं कि उसका चेहरा तो अन्त तक
साधु-पुरुष जैसा नहीं लगता था । इसलिए हम भूलोंसे भरे प्राणियोंके लिए तो एक ही
मार्ग है। जबतक किसीके बारेमें कोई बुरी बात निश्चित रूपसे मालूम न हो सके
तबतक उसे अच्छा ही मान कर चलें।
चन्द्रकान्ताके पिताका नाम लिखना और माँ का भी, जिससे मैं उनके नाम
पचियाँ लिख सकूं। तुमने उन्हें ठीक ही लिखा है। उन्हें उसकी (कान्ताकी) चिन्ता
छोड़ ही देनी चाहिए। कान्ताकी मी आश्रम न आये, तो अच्छा ही है। गंगाबहनको
शायद परेशान करेगी।
पूँजाभाईका बेहोश होना भी ईश्वरकी दया है। इससे लगता है कि उन्हें उतनी
देर आराम मिल जाता है। चम्पाको प्रसबके लिए अमीनावाले अस्पतालमें भेजें तो
अच्छा है । वहाँ उसे सब तरहकी सुविधा मिलेगी और देखभाल भी ठीक होगी।
और किसीको कष्ट न होगा। आश्रमसे जो बहन जा सके, वह समय-समय पर जाये
या उसके साथ रहे। यदि ऐसा हो सकता हो तो चम्पाको सूचना देना। वह मान
जाये तो उसे आराम रहेगा।
सोमवार सुबह २४ नवम्बर, १९३०
रतुभाईका भेजा हुआ वल्कल मिल गया है और शायद मैंने उन्हें लिख भी
दिया है। आजतक मैंने उसे ओढ़नेके लिए इस्तेमाल किया है, पर वह मुलायम नहीं
पढ़ा। धोया जा सकता है या नहीं, सो नहीं मालूम। किन्तु सस्त ही बना हुआ
है इसलिए बिछीनेकी तरह ज्यादा अच्छा रहेगा, यह सोचकर आजसे बिछाया है।
इस समय उसीपर बैठा हूँ।
विनोबा लिखते हैं कि दो कलियां भेजी हैं। पता लगाया। अभी तक तो
यहाँ आई नहीं लगतीं। वहाँ तो नहीं आईं ? आई हों तो भेज देना ।'
इस अध्यायको मैंने 'गीता' समझनेकी कुंजी कहा है। एक वाक्यमें उसका सार
यह जान पड़ता है कि जीवन सेवाके लिए है, भोगके लिए नहीं है। अतः हमें
जीवनको यज्ञमय बना डालना उचित है। पर इतना जान लेने भरसे वैसा हो जाना
सम्भव नहीं हो जाता। जानकर आचरण करने पर हम उत्तरोत्तर शुद्ध होते जायेंगे।
पर सच्ची सेवा क्या है, यह जाननेके लिए इन्द्रियदमन आवश्यक है। इस प्रकार उत्तरोत्तर
हम सत्यरूपी परमात्माके निकट होते जाते हैं। युग-युगमें हमें सत्यको अधिक झाँकी
होती है। स्वार्थ दृष्टिसे होनेवाला सेवा कार्य यज्ञ नहीं रह जाता। अतः अनासक्तिकी
बड़ी आवश्यकता है। इतना जानने पर हमें इधर-उधरके वाद-विवादमें नहीं उलझना
पड़ता । भगवानने अर्जुनको क्या सचमुच ही स्वजनोंको मारने की शिक्षा दी ? क्या
१. इसके बाद गांधीजीने गीताके बारेमें लिखा था उस पत्रांशके पाठके लिए देखिए खण्ड ४९,
“गीता पत्रावलि " - अध्याय ३ ।
Gandhi
Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
उसमें धर्म था ? ऐसे प्रश्न आते रहते हैं। अनासक्ति आने पर यों ही हमारे
हाथमें किसीको मारनेको छुरी हो तो वह भी छूट जाती है। पर अनासक्तिका ढोंग
करनेसे वह नहीं आती। हमारे प्रयत्न पर वह आज आ सकती है, अथवा सम्भव
है, हजारों वर्ष तक प्रयत्न करते रहने पर भी न आये। इसकी भी फिक्र छोड़
देनी चाहिए। प्रयत्नमें ही सफलता है। यह हमें सूक्ष्मतासे जांचते रहना चाहिए कि
प्रयत्न वास्तव में हो रहा है या नहीं। इसमें आत्माको धोखा नहीं देना चाहिए और
इतना ध्यान रखना तो सभी के लिए सम्भव है।
इन प्रकरणों के
छापने का इरादा
मुझे यह नाम
इस तरह तीसरा अध्याय में दो भागोंमें समाप्त कर सका हूँ। इस समय मेरे
पास लगभग पन्द्रह मिनट हैं। उतनी देर में इस पत्रको पूरा करना है।
लिए तुमने जो नाम लिखा है वह लम्बा है। प्रकरण अलग-अलग
लगता है। काकाने संक्षिप्त नाम 'गीताबोध' का सुझाव दिया है।
पसन्द आया है। इस प्रयत्नके पीछे भावना यह है कि 'गीता' पढ़ते हुए उसे जैसे मैंने
समझा है, उसी तरह समझने के इच्छुक दूसरे लोगोंके लिए यह काम सरल हो जाये ।
ऐसा हो सकेगा या नहीं, यह तो ईश्वर जानता है। मेरा यही प्रयत्न है। इसलिए
'गीताबोध नाम ठीक बैठता है। इन प्रकरणोंका अंग्रेजीमें अनुवाद करनेकी
आवश्यकताके बारेमें मुझे शंका है। किन्तु इसका निर्णय वहीं हो सकता है। सप्ताहके
पारायणके बारेमें ज्यादा बात तो अब काकासाहब ही कर लेंगे। जो सबको न रुचे
वह हमें नहीं ही करना है।
बापूके आशीर्वाद
मंगलवार, सुबहके आठ बजेके बाद
दूधाभाई जेलमें हैं। कौन-सी जेलमें, यह मालूम करना। साबरमती जेल हो
तो कोई उनसे जाकर मिले। सोमाभाई कहाँ काम करने गये हैं? जयरामदासको मैंने
लिखा था कि में ताजे फल नहीं लेता। उसका कारण था। सरकारी लाठी-विभागका
ऐसा वक्तव्य था कि मैंने लाठी चलाये जानेके विरोधमें ताजे फल छोड़े नहीं है और
मैं आजकल भी उन्हें लेता हूँ। मैं क्या लेता हूँ, वह तुम्हें बता ही चुका हूँ। फिर
भी आज तकका इतिहास यहाँ लिख रहा हूँ ताकि अगर तुम्हें कुछ उत्तर देनेका
अवसर मिले तो तुम अधिकारपूर्वक दे सको बहुत हद तक तो ताजा फल मैने
नमक यात्रामें ही छोड़ा था। यहाँ आकर शुरू किया। लेकिन पुलिस द्वारा लाठी
चलानेकी बात सुनकर छोड़ दिया। यहाँ तीन-चार दिन ही लिया था, जब लाठी
चलनेकी खबरें सुनीं। जब जयरामदास मिला तब यह स्थिति थी। बादमें कब्ज दूर
करनेके लिए और खर्च कम करनेके इरादेसे जो सूखा मेवा अर्थात खजूर, मुनक्का
और किशमिश लेता था वह छोड़कर सब्जी लेना शुरू किया। कई दिन तो दोनों
चीजें लीं। फिर ऐसा लगा कि सिर्फ सब्जीसे नहीं निभेगा । इसलिए फिर सब्जी और
खजूर, मुनक्का लेना शुरू किया। सब्जीमें कच्चा पपीता मिलने लगा। उसमें कई
१. कदाचित् गृह विभाग ।
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Sonu kumar 07
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/* शोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३३४|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
उसमें धर्म था ? ऐसे प्रश्न आते रहते हैं। अनासक्ति आने पर यों ही हमारे
हाथमें किसीको मारनेको छुरी हो तो वह भी छूट जाती है। पर अनासक्तिका ढोंग
करनेसे वह नहीं आती। हमारे प्रयत्न पर वह आज आ सकती है, अथवा सम्भव
है, हजारों वर्ष तक प्रयत्न करते रहने पर भी न आये। इसकी भी फिक्र छोड़
देनी चाहिए। प्रयत्नमें ही सफलता है। यह हमें सूक्ष्मतासे जांचते रहना चाहिए कि
प्रयत्न वास्तव में हो रहा है या नहीं। इसमें आत्माको धोखा नहीं देना चाहिए और
इतना ध्यान रखना तो सभी के लिए सम्भव है।
{{Gap}}इस तरह तीसरा अध्याय में दो भागोंमें समाप्त कर सका हूँ। इस समय मेरे
पास लगभग पन्द्रह मिनट हैं। उतनी देर में इस पत्रको पूरा करना है।
लिए तुमने जो नाम लिखा है वह लम्बा है। प्रकरण अलग-अलग
लगता है। काकाने संक्षिप्त नाम 'गीताबोध' का सुझाव दिया है।
पसन्द आया है। इस प्रयत्नके पीछे भावना यह है कि 'गीता' पढ़ते हुए उसे जैसे मैंने
समझा है, उसी तरह समझने के इच्छुक दूसरे लोगोंके लिए यह काम सरल हो जाये ।
ऐसा हो सकेगा या नहीं, यह तो ईश्वर जानता है। मेरा यही प्रयत्न है। इसलिए
'गीताबोध नाम ठीक बैठता है। इन प्रकरणोंका अंग्रेजीमें अनुवाद करनेकी
आवश्यकताके बारेमें मुझे शंका है। किन्तु इसका निर्णय वहीं हो सकता है। सप्ताहके
पारायणके बारेमें ज्यादा बात तो अब काकासाहब ही कर लेंगे। जो सबको न रुचे
वह हमें नहीं ही करना है।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Rh|||मंगलवार, सुबहके आठ बजेके बाद}}
{{Gap}}दूधाभाई जेलमें हैं। कौन-सी जेलमें, यह मालूम करना। साबरमती जेल हो
तो कोई उनसे जाकर मिले। सोमाभाई कहाँ काम करने गये हैं? जयरामदासको मैंने
लिखा था कि में ताजे फल नहीं लेता। उसका कारण था। सरकारी लाठी-विभागका
ऐसा वक्तव्य था कि मैंने लाठी चलाये जानेके विरोधमें ताजे फल छोड़े नहीं है और
मैं आजकल भी उन्हें लेता हूँ। मैं क्या लेता हूँ, वह तुम्हें बता ही चुका हूँ। फिर
भी आज तकका इतिहास यहाँ लिख रहा हूँ ताकि अगर तुम्हें कुछ उत्तर देनेका
अवसर मिले तो तुम अधिकारपूर्वक दे सको बहुत हद तक तो ताजा फल मैने
नमक यात्रामें ही छोड़ा था। यहाँ आकर शुरू किया। लेकिन पुलिस द्वारा लाठी
चलानेकी बात सुनकर छोड़ दिया। यहाँ तीन-चार दिन ही लिया था, जब लाठी
चलनेकी खबरें सुनीं। जब जयरामदास मिला तब यह स्थिति थी। बादमें कब्ज दूर
करनेके लिए और खर्च कम करनेके इरादेसे जो सूखा मेवा अर्थात खजूर, मुनक्का
और किशमिश लेता था वह छोड़कर सब्जी लेना शुरू किया। कई दिन तो दोनों
चीजें लीं। फिर ऐसा लगा कि सिर्फ सब्जीसे नहीं निभेगा । इसलिए फिर सब्जी और
खजूर, मुनक्का लेना शुरू किया। सब्जीमें कच्चा पपीता मिलने लगा। उसमें कई
१. कदाचित् गृह विभाग ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र: रमाबहन जोशीको
३३५
बार पका हुआ आये तो उसे भी लेता हूँ। ऐसा जयरामदासके समय तो हुआ ही
नहीं । यहाँके बगीचेसे पका हुआ पपीता कोई दसेक बार लिया होगा। खट्टा नींबू
तो रोज लेता ही हूँ । जयरामदासने उसका उल्लेख किया है। इसलिए जयरामदासकी
सारी बातें सच हैं और सरकारी बात लगभग झूठ है। पपीता तो अभी-अभी मिलने
लगा है। उसे लेनेका अर्थ है में ताजे फल खा रहा हूँ, ऐसा कोई कह ही नहीं
सकता । शायद किसी भी अधिकारीको इसकी जानकारी तक नहीं है। क्योंकि पपीता
तो कच्ची सब्जी के साथ आता है, बाजारसे कभी नहीं। वर्तमान स्थिति यही है ।
काकासाहब २९ को छूटेंगे इसलिए ज्यादा स्पष्टीकरण तो वे करेंगे ही। मेरा विचार
है कि सरकारी अधिकारीने सूखे और ताजेका भेद नहीं किया या सम्भव है कोई
फलकी टोकरी लाया हो और उसे मैंने ले लिया हो और काकासाहब को दे दिया
हो तो विभागने शायद ऐसा भी मान लिया हो कि मैंने ही खाया होगा । ईश्वर
जाने इसे क्यों छापा गया है। यदि कोई चर्चा न हो तो तुम्हें जान-बूझ कर कुछ
लिखनेकी जरूरत नहीं है।
[ पुनश्च : ]
आज ६४ पत्र हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
४७४. पत्र : रमाबहन जोशीको
बापू
चि० रमावहन,
यरवडा मन्दिर
२५ नवम्बर १९३०
कितने हफ्तों बाद आज मुझे तुम्हारा पत्र मिला। छगनलालको जो आराम
मिला है, उम्मीद है वह उसका समुचित उपयोग करेगा। विमलाने अब अपने बाल
कटवा लिये हैं, यह ठीक ही हुआ। हर वस्तुका एक निश्चित समय होता है। उसने
पहले नहीं कटवाये, इसमें पश्चात्ताप करनेकी कोई बात नहीं है। बाल कटवानेका
विचार इतना नया है कि यदि वह किसी माताके गले नहीं उतरता तो इसमें आश्चर्यकी
कोई बात नहीं। बेहतर यही है कि मेरी बात ठीक तरहसे समझ आनेपर ही उसपर
अमल किया जाये। उसका प्रभाव स्थायी होगा। और मेरा धर्म यह है कि जबतक
मैं अपनी बात तुम्हें अच्छी तरहसे नहीं समझा देता, तबतक धीरज रखूं।
गुजराती (जी० एन० ५३२७) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||पत्र: रमाबहन जोशीको|
३३५}}
बार पका हुआ आये तो उसे भी लेता हूँ। ऐसा जयरामदासके समय तो हुआ ही
नहीं । यहाँके बगीचेसे पका हुआ पपीता कोई दसेक बार लिया होगा। खट्टा नींबू
तो रोज लेता ही हूँ । जयरामदासने उसका उल्लेख किया है। इसलिए जयरामदासकी
सारी बातें सच हैं और सरकारी बात लगभग झूठ है। पपीता तो अभी-अभी मिलने
लगा है। उसे लेनेका अर्थ है में ताजे फल खा रहा हूँ, ऐसा कोई कह ही नहीं
सकता । शायद किसी भी अधिकारीको इसकी जानकारी तक नहीं है। क्योंकि पपीता
तो कच्ची सब्जी के साथ आता है, बाजारसे कभी नहीं। वर्तमान स्थिति यही है ।
काकासाहब २९ को छूटेंगे इसलिए ज्यादा स्पष्टीकरण तो वे करेंगे ही। मेरा विचार
है कि सरकारी अधिकारीने सूखे और ताजेका भेद नहीं किया या सम्भव है कोई
फलकी टोकरी लाया हो और उसे मैंने ले लिया हो और काकासाहब को दे दिया
हो तो विभागने शायद ऐसा भी मान लिया हो कि मैंने ही खाया होगा । ईश्वर
जाने इसे क्यों छापा गया है। यदि कोई चर्चा न हो तो तुम्हें जान-बूझ कर कुछ
लिखनेकी जरूरत नहीं है।
{{Rh|||बापू}}
[ पुनश्च : ]
आज ६४ पत्र हैं।
{{Gap}}गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की माइक्रोफिल्मसे ।
{{C|'''४७४. पत्र : रमाबहन जोशीको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||२५ नवम्बर १९३०}}
चि० रमावहन,
{{Gap}}कितने हफ्तों बाद आज मुझे तुम्हारा पत्र मिला। छगनलालको जो आराम
मिला है, उम्मीद है वह उसका समुचित उपयोग करेगा। विमलाने अब अपने बाल
कटवा लिये हैं, यह ठीक ही हुआ। हर वस्तुका एक निश्चित समय होता है। उसने
पहले नहीं कटवाये, इसमें पश्चात्ताप करनेकी कोई बात नहीं है। बाल कटवानेका
विचार इतना नया है कि यदि वह किसी माताके गले नहीं उतरता तो इसमें आश्चर्यकी
कोई बात नहीं। बेहतर यही है कि मेरी बात ठीक तरहसे समझ आनेपर ही उसपर
अमल किया जाये। उसका प्रभाव स्थायी होगा। और मेरा धर्म यह है कि जबतक
मैं अपनी बात तुम्हें अच्छी तरहसे नहीं समझा देता, तबतक धीरज रखूं।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी० एन० ५३२७) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० काशिनाथ,
४७५. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
२५ नवम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । यदि माताजी आयें ही नहीं और कलावती भी उनकी
सेवामें न रहे, तब तो मुझे केवल एक ही मार्ग दिखाई देता है और वह यह कि
या तो तुम्हें उनके पास चले जाना चाहिए अथवा उनकी सेवाके लिए किसी नौकरकी
व्यवस्था कर देनी चाहिए। इन दोनोंमेंसे तुम्हारा क्या कर्तव्य है, यह तो केवल तुम्हारा
हृदय ही तुम्हें बता सकता है। इसमें किसी तीसरे व्यक्तिकी राय नहीं ली जा सकती ।
और यदि कोई इसपर राय दे भी तो वह अनुचित होगा। यह प्रश्न इतना नाजुक
है कि तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति इसका समाधान नहीं कर सकता ।
जिस महिलाने आत्महत्या की थी, उसके बारेमें कुछ और जानकारी मिली ?
गुजराती (जी० एन० ५२६२ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
चि० मथुरी,
४७६. पत्र : मथुरी खरेको
२७ नवम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । प्रेमावहन छड़ीसे मारती है, तो क्या तुमने खुद उससे
शिकायत की है? में तो तुम्हारी और चन्दनकी वकालत करूँगा ही ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० २५८ ) से सौजन्य लक्ष्मीबहन खरे
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४७५. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको'''}}
{{Rh|||२५ नवम्बर, १९३०}}
चि० काशिनाथ,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला । यदि माताजी आयें ही नहीं और कलावती भी उनकी
सेवामें न रहे, तब तो मुझे केवल एक ही मार्ग दिखाई देता है और वह यह कि
या तो तुम्हें उनके पास चले जाना चाहिए अथवा उनकी सेवाके लिए किसी नौकरकी
व्यवस्था कर देनी चाहिए। इन दोनोंमेंसे तुम्हारा क्या कर्तव्य है, यह तो केवल तुम्हारा
हृदय ही तुम्हें बता सकता है। इसमें किसी तीसरे व्यक्तिकी राय नहीं ली जा सकती ।
और यदि कोई इसपर राय दे भी तो वह अनुचित होगा। यह प्रश्न इतना नाजुक
है कि तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति इसका समाधान नहीं कर सकता ।
जिस महिलाने आत्महत्या की थी, उसके बारेमें कुछ और जानकारी मिली ?
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ५२६२ ) की फोटो नकलसे।
{{C|'''४७६. पत्र : मथुरी खरेको'''}}
{{Rh|||२७ नवम्बर, १९३०}}
चि० मथुरी,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला । प्रेमावहन छड़ीसे मारती है, तो क्या तुमने खुद उससे
शिकायत की है? में तो तुम्हारी और चन्दनकी वकालत करूँगा ही ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० २५८ ) से सौजन्य लक्ष्मीबहन खरे<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० गंगाबहन,
४७७. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
२७ नवम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र और रिपोर्ट मिली। रिपोर्ट अच्छी है। तुम जिन गांवों में गई
वहाँ गाय नहीं देखी। ऐसी स्थिति लगभग पूरे खेड़ा जिलेकी है। स्वार्थके कारण
किसीको गाय रखना अच्छा ही नहीं लगता। इसीलिए तो हमने गो-सेवाका काम
उठाया है।
तुम्हारे भोजनका क्या प्रबन्ध है ?
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७६६ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
४७८. पत्र : रामदास गांधीको
२८ नवम्बर १९३०
चि० रामदास,
तुम्हारा पत्र मिला। दांत निकलते समय अनेक बच्चोंको कष्ट होता है, इसमें
आश्चर्यकी कोई बात नहीं। लेकिन जुकाम दूर होना चाहिए। उसे धूपमें घूमाना
चाहिए, माथा ढका रहना चाहिए। इससे चमड़ी खूब सिकेगी, कठोर होगी और
सर्दी दूर हो जायेगी; ऐसी मेरी मान्यता है ।
पैसोंका हिसाब-किताब रखनेका काम आदत पड़ जानेके बाद भार रूप नहीं
लगता और इसकी कीमत तो अनुभवके बाद ही जानी जा सकती है। शान्त अथवा
अशान्त जीवनसे इसमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। और फिर कुछ चीजें ऐसी होती
हैं जो भले ही कितना अशान्त वातावरण क्यों न हो हमें अवश्य करनी चाहिए।
हमें वैसा करनेकी आदत डालनी चाहिए। मुझे हर सप्ताह पत्र लिखा करना ।
गुजराती (जी० एन० ६८५९ ) की फोटो नकलसे ।
४४-२२
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७९. पत्र : प्रभावतीको
२८ नवम्बर, १९३०
चि० प्रभावती,
आरासे लिखा तेरा पत्र मिला। मैंने तो कल तुझे सीताबदियाराके पते पर
पत्र भेजा है। उम्मीद है कि तुझे यह भी मिल जायेगा। यदि स्वास्थ्य वहाँ सुधर
सकता है तो मुझे कुछ नहीं कहना है। लेकिन शरीरके बिलकुल टूट जानेके बाद तु
आश्रम में जाये यह कोई समझदारीकी बात नहीं है जब स्वास्थ्य सुधर सकता है,
ऐसी हालत में यदि तू अभी आश्रम जाती है तो यह ठीक होगा। वहाँ तू शान्तिके
साथ विचार कर सकती है और तुझे अपने कर्तव्यका भान भी हो सकता है। तुझे
इतना जानना चाहिए कि तू पराधीन नहीं है। परतन्त्र अथवा स्वतन्त्र होना तो
प्रत्येकके अपने हाथ में है। इतना समझ ले तो जग जीत लिया ।
- सच पूछो तो कैदमें
मैं अच्छा हूँ। काकासाहब कल सबेरे रिहा होनेवाले हैं।
जानेवाले हैं। वे जेलमें ही स्वतन्त्र हैं।
श्रीमती प्रभावती देवी
मार्फत बाबू हरसू दयालजी
राजस्व अधिकारी
आरा, बिहार
गुजराती (जी० एन० ३३८२) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४७९. पत्र : प्रभावतीको'''}}
{{Rh|||२८ नवम्बर, १९३०}}
चि० प्रभावती,
आरासे लिखा तेरा पत्र मिला। मैंने तो कल तुझे सीताबदियाराके पते पर
पत्र भेजा है। उम्मीद है कि तुझे यह भी मिल जायेगा। यदि स्वास्थ्य वहाँ सुधर
सकता है तो मुझे कुछ नहीं कहना है। लेकिन शरीरके बिलकुल टूट जानेके बाद तु
आश्रम में जाये यह कोई समझदारीकी बात नहीं है जब स्वास्थ्य सुधर सकता है,
ऐसी हालत में यदि तू अभी आश्रम जाती है तो यह ठीक होगा। वहाँ तू शान्तिके
साथ विचार कर सकती है और तुझे अपने कर्तव्यका भान भी हो सकता है। तुझे
इतना जानना चाहिए कि तू पराधीन नहीं है। परतन्त्र अथवा स्वतन्त्र होना तो
प्रत्येकके अपने हाथ में है। इतना समझ ले तो जग जीत लिया ।
मैं अच्छा हूँ। काकासाहब कल सबेरे रिहा होनेवाले हैं।- सच पूछो तो कैदमें
जानेवाले हैं। वे जेलमें ही स्वतन्त्र हैं।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
श्रीमती प्रभावती देवी
मार्फत बाबू हरसू दयालजी
राजस्व अधिकारी
आरा, बिहार
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ३३८२) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० वसुमती,
४८०. पत्रः वसुमती पण्डितको
२८ नवम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला । मनमें हमेशा यह विचार बना रहता है कि वहाँकी भाग-
दौड़में तेरा स्वास्थ्य कैसा रहेगा ? जानता हूँ कि मुझे चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
सब ईश्वराधीन है। मुझे ये सब बातें लिखी जा सकती है जो अखबारोंमें प्रकाशित
करने योग्य हों। और जो अखबारोंमें भेजने लायक बात न हो, वह बात मुझे नहीं
लिखी जा सकती। वर्तमान गतिविधियोंकी सूचना देते समय तू नियमको पालन
करना। अपने बारेमें तो तू जो चाहे सो लिख सकती है। मेरी गाड़ी ठीक चल
रही है।
गुजराती (एस० एन० ९२९४) की फोटो नकलसे।
भाई इमामसाहब,
बापूके आशीर्वाद
४८१. पत्र अब्दुल कादिर बावजीरको
२८ नवम्बर १९३०
आपका पत्र मिला; सुन्दर है। मैं तो जैसे-जैसे धर्मका विचार करता है,
वैसे-वैसे उसके मूलमें मुझे सत्य और अहिंसा के ही दर्शन होते हैं। शुरूमें ही रहीमका
नाम आता है। इस नाममें भी अहिंसा ही व्याप्त है न ? हमें इस वस्तुका उपयोग
करना नहीं आता इसीसे हम इसका तिरस्कार करते हैं। यदि हम उसका उपयोग
करना सीखें तो बादमें यह कभी न छूटे ।
पेशावमें अभी तक मधुका जाना सराव बात है। यदि आपसे निभ सके अर्थात्
अपनी जीभको वशमें रखा जा सके तो आपको केवल कच्चे दूध पर ही रहना
चाहिए। उसमें कुछ भी नहीं डालना चाहिए। यह सम्पूर्ण खुराक है। और उससे
शक्कर आनी भी बन्द हो जाती है। आपको फलादि भी नहीं लेने चाहिए। वस्तुतः
दूधके अलावा अन्य कुछ भी नहीं लेना चाहिए, दही अवश्य लिया जा सकता है।
हो सके तो आप देशके लिए इतना अवश्य कीजियेगा ।
गुजराती (जी० एन० ६६४७ ) की फोटो नकलसे ।
बापूकी दुआ
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० अमीना,
४८२. पत्र : अमीना कुरेशीको
२८ नवम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला। इमामसाहब लिखते हैं कि तू जेल जानेके लिए अधीर हो
रही है, लेकिन यह ठीक नहीं है। जब खुदाकी मरजी तुझे वहाँ भेजनेकी होगी तो
समय अपने-आप उपस्थित हो जायेगा । तू तैयार है, इतना ही पर्याप्त है। इस
बीच बच्चोंको सँभाल, अपने स्वास्थ्यको ठीक रख और घर बैठे-बैठे जो सेवा हो
सके, सो कर। यह आन्दोलन ही कुछ ऐसा है कि घर बैठे रहकर भी सेवा हो
सकती है। तेरा भय दूर हो गया, इतना ही काफी है।
[ पुनदच ]
बापूकी दुआ और आशीर्वाद
उर्दूका क्या हुआ ?
गुजराती (जी० एन० ६६५९ ) की फोटो नकलसे।
४८३. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
परवडा मन्दिर
२८ नवम्बर, १९३०
चिरंजी हेमप्रभा,
तुमारा खत मिला। मेरे विचारोंका कम प्रचारके कारण बंगला में हिंसाका
वायु है यह ठीक नहि लगता। यह वायु हमेशा ज्यादा रहा है इसलिये मेरे विचारों
का प्रचार कम हो सका है। परंतु हम सच्चे रहेंगे तो बंगालका वायुका भी परि-
वर्तन अवश्य होगा । इसका अर्थ यह नहि है कि तुमने जो विचार किया है उसे
छोड़ दो। यथाशक्ति प्रचार अवश्य करो उसमें से ज्यादा परिणामकी शीघ्र आशा
मत रखो।
आश्रमवासी भाई बहनोंको आशीर्वाद ।
बापुके आशीर्वाद
जी० एन० १६७८ की फोटो नकलसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४८४. सत्याग्रही बन्दियोंका कर्त्तव्य'
[२९ नवम्बर, १९३० से पूर्व ]
जब हम कैद होनेका प्रयत्न करते हैं तो उसके साथ ही हमारी सविनय अवज्ञा
परिपूर्ण हो जाती है। यदि हम जेलके वैध अनुशासनकी अवहेलना करेंगे तो अवज्ञा
सविनय नहीं रह जायेगी। इसलिए हमें जेलमें नारे लगाना या झगड़ा खड़ा करना
नहीं चाहिए। नियमानुसार यदि हमसे काम करने को कहा जाये तो हम काम करनेसे
इनकार नहीं कर सकते, बल्कि जितना काम हम कर सकें उतना काम करनेके लिए
हमें उत्सुक रहना चाहिए, और सो भी जितनी अच्छी तरह हो सके उतनी अच्छी
तरह करें। यह अच्छी चीज होगी कि "साधारण कैदी" भी स्वेच्छासे कुछ उपयोगी
काम करें, जिसके पीछे यह मंशा होना जरूरी नहीं है कि उससे उनकी कदकी अवधि
में कुछ माफी मिल जायेगी। साधारण कैद भोगनेवाले कैदियोंने महज मशक्कतका
काम करनेका प्रस्ताव करके तनावपूर्ण स्थितियोंको सामान्य बनाने में बड़ी मदद की है।
हम जितना कुछ भी काम करते हैं उससे राष्ट्रीय सम्पत्ति में वृद्धि ही होती है।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, १-१-१९३१
२. बॉम्बे कॉनिक सम्वाददाताले बात करते हुए ६० वा० कालेलकरने के इस कथनको
उद्धृत किया था। २९ नवम्बर १९३० को जेलले रिहा होनेसे पूर्व गांधीजी के साथ हुई अपनी चर्चाओं के
आधारपर उन्होंने कहा वह (गांधीजी ) अपनी मौजूदा हालत में अपनेको राजनीतिक संघर्षका मार्ग-दर्शन
करनेके योग्य नहीं समझते क्योंकि वह फर्मक्षेत्रसे दूर हैं। सत्याग्रहीको जेलने पहुँचने के बाद ऐसा समझना
चाहिए कि बाहरी दुनिया के लिए वह मर गया है। किन्तु एक कैदीके नाते वह (गांधीजी) भावी सत्याग्रही
कैदियोंके लिए आधिकारिक निर्देश दे सकते हैं। परवडा जेल में उनके साथ रहनेके दौरान मैंने उनके
साथ जेलजीवन विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की और कुछ उपयोगी निर्देश प्राप्त किये। मैं उनके उन
विचारोंको की लड़ाई लड़नेवाले कार्यकर्ताओंको बताऊँ, इसमें उन्हें कोई आपति नहीं थी। ऐसा
मुझे याद आता है मैं उन बातोंको उसी प्रकार नीचे लिखता हूँ।
सत्याग्रहको यह बात समझनी चाहिए कि अदालत द्वारा अपराधी करार दिये जाते ही उसका विरोधभाव
या भवभाव समाप्त हो जाता है। उसका उद्देश्य जेलके अनुशासनको समाप्त करना नहीं है। युद्ध में पकड़
लिये जानेपर सिपाही अपने शख रख देता है और आत्म समर्पण कर देता है। एक सच्चे "सैनिक कैदी " के
शब्दोंपर शत्रु
सदैव भरोसा कर सकता है। अपने वचन के बलपर यदि युद्धबन्दीको थोड़ी-बहुत स्वतन्त्रता
प्रदान की जाती है तो वह भाग निकलनेकी या धोखा देनेकी कोशिश नहीं करेगा। हमें सत्याग्रही कैदियों के
नाते कि अन्दर आदर्श कैदी बनने की कोशिश करनी चाहिए। जबतक जेके नियम मानवताके साधारण
नियमों और आत्मसम्मानके विरुद्ध न हों तबतक हमें जेल अनुशासन सम्बन्धी नियमोंका पालन करनेके
लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। मैंने अक्सर कुछ युवक सत्याग्रहियोंको जेल्के अनुशासनको स्वीकार करने के
विरुद्ध बहस करते सुना है वे कहते हैं 'हम जेल इसलिए आये है क्योंकि हम सरकारके कानूनोंकी
अ] करना चाहते थे। आप इमसे जेलके अन्दर नियमोंका पालन करने को कैसे कहते है ? हमने केवल
साकी शपथ की है, लेकिन हम जेलोंमें भी सरकारको अवज्ञा अवश्य करेंगे।"
Gandhi
Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रेमा,
४८५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
यरवडा मन्दिर
रात्रि ३० नवम्बर, १९३०
तेरा पत्र पढ़कर बहुत खुश हुआ। आज तो तेरा उपवास छूटे हुए दो दिन
हो गये हैं। जबतक यह पत्र तेरे हाथमें पहुंचेगा तबतक तो उपवासको तू भूल चुकी
होगी और नये जीवनका आनन्द ले रही होगी। यदि तू ऐसा महसूस न करती हो
तो मैं उपवासको अधूरा मानूंगा। इसके बारेमें तूने मुझे ब्यौरेवार पत्र अवश्य लिखा
ही होगा। तेरे अनुभवसे दूसरोंको मदद मिलनी चाहिए। उपवास छोड़नेके बाद किन
बातोंकी सावधानी रखनी चाहिए, यह तो तू जानती है। उपवासके बाद बहुत भूख
लगती है, परन्तु उस प्रमाणमें कभी पेट नहीं भरना चाहिए। दूध-दही धीरे-धीरे
बढ़ाते जाना चाहिए। अंट-शंट चीजें नहीं खानी चाहिए। रसयुक्त फलोंका सेवन
करना चाहिए। मुझे उम्मीद है, तू उसमें कंजूसीसे काम नहीं लेती होगी। शरीर
नीरोग हो जाना चाहिए। उपवासके दिनोंमें तू ठीक तरहसे काम करती रही, यह
बात सुनकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मैंने अनेक व्यक्तियोंको ऐसा करते हुए
देखा है और मेरा अपना अनुभव भी यही है। जिन लोगोंको कोई रोग होता है,
ये लोग तो उपवासके दिनोंमें ज्यादा शक्ति महसूस करते हैं। उनके चेहरे पर ज्यादा
रौनक आ जाती है।
बच्चोंका हिसाब तूने ठीक-ठीक भेजा। कृष्णविजय सबसे तेज मालूम होता
है। दूधीबहनकी अनुपस्थितिमें उनके वर्ग ले सके, ऐसा कोई नहीं है? यह तो मैं
समझता हूँ कि अभी इस सम्बन्धमें निश्चित रूपसे कुछ कहा नहीं जा सकता। जब
बहुत सारी बहनें आश्रमसे बाहर हों तब क्या हो सकता है? फिर भी किसीको
यह काम सौंपा जा सकता हो, तो उसे कहने में संकोच न रखना।
धुरन्धर छूट गया होगा। उससे कहना कि उसके साथ हुआ वार्तालाप मुझे
याद है। उसकी डायरीकी भी मुझे याद है। उससे कहना कि वह मुझे पत्र लिखे।
अपना अनुभव भी बताये। भविष्यका कार्यक्रम भी लिखे ।
तेरे विरुद्ध मथुरीकी शिकायत है तू बच्चोंको मारती है। कभी-कभी लकड़ीसे
भी काम लेती है। ऐसा हो तो यह आदत दूर करना। बच्चोंको हरगिज नहीं मारना
चाहिए। क्रॉसबीने 'टॉल्सटॉय ऐज टीचर' (टॉल्स्टॉय शिक्षकके रूपमें) नामक पुस्तक लिखी
है। बहुत करके हमारे संग्रहमें है। देख लेना। अब तो यह बात सिद्ध हो चुकी है
कि मारनेसे बच्चे सुधरते नहीं। लेकिन मैं जानता हूँ कि जिन लोगोंको मारकर
पढ़ानेकी आदत पड़ गई हो, उन्हें इसको छोड़ने में कठिनाई होती है। लेकिन यह तो
बन्दूकधारी सिपाही के अनुभव जैसा हुआ। वह तो यही मानेगा कि गोली के बिना दुनियामें
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४८५. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}
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{{Rh|||रात्रि ३० नवम्बर, १९३०}}
चि० प्रेमा,
{{Gap}}तेरा पत्र पढ़कर बहुत खुश हुआ। आज तो तेरा उपवास छूटे हुए दो दिन
हो गये हैं। जबतक यह पत्र तेरे हाथमें पहुंचेगा तबतक तो उपवासको तू भूल चुकी
होगी और नये जीवनका आनन्द ले रही होगी। यदि तू ऐसा महसूस न करती हो
तो मैं उपवासको अधूरा मानूंगा। इसके बारेमें तूने मुझे ब्यौरेवार पत्र अवश्य लिखा
ही होगा। तेरे अनुभवसे दूसरोंको मदद मिलनी चाहिए। उपवास छोड़नेके बाद किन
बातोंकी सावधानी रखनी चाहिए, यह तो तू जानती है। उपवासके बाद बहुत भूख
लगती है, परन्तु उस प्रमाणमें कभी पेट नहीं भरना चाहिए। दूध-दही धीरे-धीरे
बढ़ाते जाना चाहिए। अंट-शंट चीजें नहीं खानी चाहिए। रसयुक्त फलोंका सेवन
करना चाहिए। मुझे उम्मीद है, तू उसमें कंजूसीसे काम नहीं लेती होगी। शरीर
नीरोग हो जाना चाहिए। उपवासके दिनोंमें तू ठीक तरहसे काम करती रही, यह
बात सुनकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मैंने अनेक व्यक्तियोंको ऐसा करते हुए
देखा है और मेरा अपना अनुभव भी यही है। जिन लोगोंको कोई रोग होता है,
ये लोग तो उपवासके दिनोंमें ज्यादा शक्ति महसूस करते हैं। उनके चेहरे पर ज्यादा
रौनक आ जाती है।
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है। दूधीबहनकी अनुपस्थितिमें उनके वर्ग ले सके, ऐसा कोई नहीं है? यह तो मैं
समझता हूँ कि अभी इस सम्बन्धमें निश्चित रूपसे कुछ कहा नहीं जा सकता। जब
बहुत सारी बहनें आश्रमसे बाहर हों तब क्या हो सकता है? फिर भी किसीको
यह काम सौंपा जा सकता हो, तो उसे कहने में संकोच न रखना।
{{Gap}}धुरन्धर छूट गया होगा। उससे कहना कि उसके साथ हुआ वार्तालाप मुझे
याद है। उसकी डायरीकी भी मुझे याद है। उससे कहना कि वह मुझे पत्र लिखे।
अपना अनुभव भी बताये। भविष्यका कार्यक्रम भी लिखे ।
{{Gap}}तेरे विरुद्ध मथुरीकी शिकायत है तू बच्चोंको मारती है। कभी-कभी लकड़ीसे
भी काम लेती है। ऐसा हो तो यह आदत दूर करना। बच्चोंको हरगिज नहीं मारना
चाहिए। क्रॉसबीने 'टॉल्सटॉय ऐज टीचर' (टॉल्स्टॉय शिक्षकके रूपमें) नामक पुस्तक लिखी
है। बहुत करके हमारे संग्रहमें है। देख लेना। अब तो यह बात सिद्ध हो चुकी है
कि मारनेसे बच्चे सुधरते नहीं। लेकिन मैं जानता हूँ कि जिन लोगोंको मारकर
पढ़ानेकी आदत पड़ गई हो, उन्हें इसको छोड़ने में कठिनाई होती है। लेकिन यह तो
बन्दूकधारी सिपाही के अनुभव जैसा हुआ। वह तो यही मानेगा कि गोली के बिना दुनियामें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र मूलचन्द अग्रवालको
३४३
कोई काम नहीं हो सकता। हो सकता है- - इस बातको सिद्ध करनेके लिए ही हमारा
अर्थात् आश्रमका अस्तित्व है। यही बात बच्चों पर भी लागू होती है। अभी इससे
ज्यादा नहीं लिखूंगा । तेरा उत्तर आने पर जरूरत हुई तो और लिखूंगा ।
मैं आशा करता हूँ कि उपवासके दिनोंमें तूने खूब नींद ली होगी। और अब
तू नियमपूर्वक जल्दी सोती होगी। पूरी नींद लेनी चाहिए। मनुष्यको भोजनकी अपेक्षा
नींदकी अधिक आवश्यकता होती है। भोजनको लेकर किया गया उपवास लाभदायक
है। लेकिन नींदके सम्बन्धमें किया गया उपवास शरीरको क्षीण बनाता है। उससे
सिर चकराने लगता है और मनुष्य अस्वस्थ हो जाता है। इसलिए नींदके बारेमें
लापरवाह न रहना। यदि तू रातको ९ बजेसे सुबह ४ बजे तक गहरी नींद सोये,
तो मैं शिकायत नहीं करूँगा।
मैंने अपने प्रयोगके बारेमें मीराके पत्र में लिखा है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६९१) से सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२४४ की फोटो नकलसे भी ।
भाई मूलचन्दजी,
४८६. पत्र : मूलचन्द अग्रवालको
३० नवम्बर, १९३०
आपका पत्र मिला । दृढ़तापूर्वक चार बजे उठ ही जाना चाहीये। उस समय
शीच न आये तो कुछ परवा नहि में साफ करके प्रार्थना करना मुं साफ करनेके
बाद एक कटोरा ठंडा पानी पी लेना । प्रार्थनाके बाद घूमने के लिए चला जाता ।
जोरोंसे चलता। इससे शौचकी हाजत होगी। शर्दीके बदले में गर्मी लगेगी फिर भी
शौच न आये तो परवा नहि। घूमनेके बाद दिल चाहे ऐसे काम में लग जाना ।
शौचकी हाजत होवे तब जाना। ऐसा थोड़े दिन करनेसे अच्छा हो जायगा ।
आपका,
मोहन
जी० एन० ७६८ की फोटो नकलसे ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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Sonu kumar 07
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||'''पत्र मूलचन्द अग्रवालको'''|
३४३}}
कोई काम नहीं हो सकता। हो सकता है- - इस बातको सिद्ध करनेके लिए ही हमारा
अर्थात् आश्रमका अस्तित्व है। यही बात बच्चों पर भी लागू होती है। अभी इससे
ज्यादा नहीं लिखूंगा । तेरा उत्तर आने पर जरूरत हुई तो और लिखूंगा ।
{{Gap}}मैं आशा करता हूँ कि उपवासके दिनोंमें तूने खूब नींद ली होगी। और अब
तू नियमपूर्वक जल्दी सोती होगी। पूरी नींद लेनी चाहिए। मनुष्यको भोजनकी अपेक्षा
नींदकी अधिक आवश्यकता होती है। भोजनको लेकर किया गया उपवास लाभदायक
है। लेकिन नींदके सम्बन्धमें किया गया उपवास शरीरको क्षीण बनाता है। उससे
सिर चकराने लगता है और मनुष्य अस्वस्थ हो जाता है। इसलिए नींदके बारेमें
लापरवाह न रहना। यदि तू रातको ९ बजेसे सुबह ४ बजे तक गहरी नींद सोये,
तो मैं शिकायत नहीं करूँगा।
{{Gap}}मैंने अपने प्रयोगके बारेमें मीराके पत्र में लिखा है।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६९१) से सौजन्य : प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२४४ की फोटो नकलसे भी ।
{{C|'''४८६. पत्र : मूलचन्द अग्रवालको'''}}
{{Rh|||३० नवम्बर, १९३०}}
भाई मूलचन्दजी,
आपका पत्र मिला । दृढ़तापूर्वक चार बजे उठ ही जाना चाहीये। उस समय
शीच न आये तो कुछ परवा नहि में साफ करके प्रार्थना करना मुं साफ करनेके
बाद एक कटोरा ठंडा पानी पी लेना । प्रार्थनाके बाद घूमने के लिए चला जाता ।
जोरोंसे चलता। इससे शौचकी हाजत होगी। शर्दीके बदले में गर्मी लगेगी फिर भी
शौच न आये तो परवा नहि। घूमनेके बाद दिल चाहे ऐसे काम में लग जाना ।
शौचकी हाजत होवे तब जाना। ऐसा थोड़े दिन करनेसे अच्छा हो जायगा ।
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{{Rh|||मोहन}}
जी० एन० ७६८ की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मीरा,
४८७. पत्र : मीराबहनको
२९ नवम्बर / १ दिसम्बर, १९३०
यह २९-११-१९३० को प्रातःकालीन प्रार्थनाके बादका समय है। काफी ठंड
है। लेकिन में प्रार्थनाके बाद और ५-३० बजेके बिगुल पर सैरको निकलनेसे पहले कुछ
लिखनेका काम करता हूँ।
मुझे प्रसन्नता है कि जब तुमने पत्र लिखा तब तुम्हारी तबीयत पहले से अच्छी
थी। स्वास्थ्य-रक्षाके मामलेकी तरह हर बातमें दरअसल हम बार-बार भूलें करके
और उनसे लाभ उठाकर सीख सकते हैं। यह तुम्हें चेतावनी देनेके बजाय अपनी
भूल स्वीकार करनेकी भूमिका है। गत गुरुवारको मुझे अचानक
सख्त पेटका दर्द
हो गया। मैं उसे टाल सकता था, मगर बेवकूफी में टाला नहीं। जैसाकि तुम्हें मालूम
है, कुछ दिनोंसे में दही पर रह रहा हूँ। वह खासा माफिक आया था, हालांकि
टट्टी तो एनीमासे ही होती थी। लेकिन, जैसा तुमने देखा, वजन बढ़ रहा था और
अन्यथा भी मेरा स्वास्थ्य ठीक था। इसलिए मैने दही जारी रखा और वह भी
उसका गाढ़ा हिस्सा। इससे एनीमाके बावजूद कब्ज बढ़ गया। यह कमसे कम दही
बन्द कर देनेके लिए, या जो इससे भी बेहतर होता, एक दिनके लिए भोजनमात्र
छोड़ देनेके लिए काफी चेतावनी थी। ऐसा मैंने नहीं किया और दिन-भर कष्ट
पाया। मैंने जो कुछ खाया था उसे खुद ही उल्टी करके निकाल दिया, तो कुछ ही
घंटोंमें दर्द मिट गया। दूसरे दिन द्राक्षके पानीके सिवाय कुछ नहीं लिया और बिलकुल
ठीक हो गया, हालांकि वजन ३ पौंड घट गया। मेरा सदा यही हाल होता है।
स्पष्ट है कि ९५ से ऊपर मेरे वजनका कोई ठिकाना नहीं और बहुत करके वह
जहरीले मासे बनता है। मैंने यह भी निश्चय कर लिया कि हो सके तो कब्ज से पिण्ड
छुड़ा लूं। इसलिए मैंने वही अब भी बन्द कर रखा है। (लो बिगुल हो रहा है
और फिलहाल लिखना बन्द करता हूँ।) शामके ८ बजे फिर लिख रहा हूँ। और
आजकल उबली हुई पत्तियाँ, टमाटर और खजूर या द्राक्ष लेता हूँ। दस्त अपने-आप
हो जाता है, शक्ति बनी हुई है और वजनमें और कमी नहीं हुई है।
कल मैने
शकरकन्द और आज १२ बादाम भी लिये। इस परिवर्तन पर किसीको चौंकनेकी
जरूरत नहीं। अगर मुझे बराबर कमजोरी महसूस हुई या वजन घटता रहा, तो
फिर फौरन दूध लेने लगूंगा और दुग्धोपवासके कारण तबीयत और भी अच्छी हो
जायेगी। इसके विपरीत यदि परिवर्तन माफिक आ गया तो और भी हर्षका कारण
होगा । इसलिए तुम सब इस परिवर्तन पर खुशी मनाना। अगर यह चल गया तो
ठीक है न चला तो भी ठीक ही है। मैं कोई जोखिम नहीं उठाऊँगा ।
तो काका चले गये और जाते समय रो दिये। हम एक-दूसरेके बहुत निकट
आ गये थे। उनके जानेके दो घंटे के भीतर ही मेरे पास प्यारेलालको भेज दिया
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४८७. पत्र : मीराबहनको'''}}
{{Rh|||२९ नवम्बर / १ दिसम्बर, १९३०}}
चि० मीरा,
{{Gap}}यह २९-११-१९३० को प्रातःकालीन प्रार्थनाके बादका समय है। काफी ठंड
है। लेकिन में प्रार्थनाके बाद और ५-३० बजेके बिगुल पर सैरको निकलनेसे पहले कुछ
लिखनेका काम करता हूँ।
मुझे प्रसन्नता है कि जब तुमने पत्र लिखा तब तुम्हारी तबीयत पहले से अच्छी
थी। स्वास्थ्य-रक्षाके मामलेकी तरह हर बातमें दरअसल हम बार-बार भूलें करके
और उनसे लाभ उठाकर सीख सकते हैं। यह तुम्हें चेतावनी देनेके बजाय अपनी
भूल स्वीकार करनेकी भूमिका है। गत गुरुवारको मुझे अचानक
सख्त पेटका दर्द
हो गया। मैं उसे टाल सकता था, मगर बेवकूफी में टाला नहीं। जैसाकि तुम्हें मालूम
है, कुछ दिनोंसे में दही पर रह रहा हूँ। वह खासा माफिक आया था, हालांकि
टट्टी तो एनीमासे ही होती थी। लेकिन, जैसा तुमने देखा, वजन बढ़ रहा था और
अन्यथा भी मेरा स्वास्थ्य ठीक था। इसलिए मैने दही जारी रखा और वह भी
उसका गाढ़ा हिस्सा। इससे एनीमाके बावजूद कब्ज बढ़ गया। यह कमसे कम दही
बन्द कर देनेके लिए, या जो इससे भी बेहतर होता, एक दिनके लिए भोजनमात्र
छोड़ देनेके लिए काफी चेतावनी थी। ऐसा मैंने नहीं किया और दिन-भर कष्ट
पाया। मैंने जो कुछ खाया था उसे खुद ही उल्टी करके निकाल दिया, तो कुछ ही
घंटोंमें दर्द मिट गया। दूसरे दिन द्राक्षके पानीके सिवाय कुछ नहीं लिया और बिलकुल
ठीक हो गया, हालांकि वजन ३ पौंड घट गया। मेरा सदा यही हाल होता है।
स्पष्ट है कि ९५ से ऊपर मेरे वजनका कोई ठिकाना नहीं और बहुत करके वह
जहरीले मासे बनता है। मैंने यह भी निश्चय कर लिया कि हो सके तो कब्ज से पिण्ड
छुड़ा लूं। इसलिए मैंने वही अब भी बन्द कर रखा है। (लो बिगुल हो रहा है
और फिलहाल लिखना बन्द करता हूँ।) शामके ८ बजे फिर लिख रहा हूँ। और
आजकल उबली हुई पत्तियाँ, टमाटर और खजूर या द्राक्ष लेता हूँ। दस्त अपने-आप
हो जाता है, शक्ति बनी हुई है और वजनमें और कमी नहीं हुई है।
कल मैने
शकरकन्द और आज १२ बादाम भी लिये। इस परिवर्तन पर किसीको चौंकनेकी
जरूरत नहीं। अगर मुझे बराबर कमजोरी महसूस हुई या वजन घटता रहा, तो
फिर फौरन दूध लेने लगूंगा और दुग्धोपवासके कारण तबीयत और भी अच्छी हो
जायेगी। इसके विपरीत यदि परिवर्तन माफिक आ गया तो और भी हर्षका कारण
होगा । इसलिए तुम सब इस परिवर्तन पर खुशी मनाना। अगर यह चल गया तो
ठीक है न चला तो भी ठीक ही है। मैं कोई जोखिम नहीं उठाऊँगा ।
तो काका चले गये और जाते समय रो दिये। हम एक-दूसरेके बहुत निकट
आ गये थे। उनके जानेके दो घंटे के भीतर ही मेरे पास प्यारेलालको भेज दिया<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र मीराबह्नको
३४५
गया और कुदरती तौर पर उसने मुझे अपने संरक्षण में ले लिया है। मैंने उसे तुम्हारे
चरखे पर बैठाया। उसने ८३ तार काते। उसे जैसा मैंने ठीक करके रखा था वह
लगभग वैसा ही चलता रहा। अब हमने चमरसमें कुछ सुधार कर लिये हैं। मैं
इधर यह पत्र लिख रहा हूँ, और उधर प्यारेलाल ऐसे ही एक सुधारमें लगा हुआ
है । जाने क्यों मैं केवल चरखेके बारेमें और चरखा जिन चीजोंका प्रतीक है उन्हीं
तमाम बातोंको सोचने में लगा रहता हूँ। गाण्डीवमें भी बहुत सुधार हो रहा है।
सुधरे हुए चरखेको कल आजमानेकी आशा रखता हूँ। उसमें खिसकाया जा सके
एक ऐसा चक्र और विचावके लिए स्प्रिंग लगाई जायेगी। अगर वह अच्छी तरह
चला, तो सूत जरूर ज्यादा निकलेगा। तकली पर धीरे-धीरे मेरा काबू होता जा
रहा है। तुम्हारी तकली पर मेरी गति ८७ तार की घंटे तक पहुँच गई है। परन्तु
विनोबा कहते हैं कि मुझे पहले लोहेकी तकलीको आजमाना चाहिए। उन्होंने मुझे
दो तकलिया भेजी हैं और में उनमें से एक तकली पर काम करनेकी कोशिश कर
रहा हूँ। जिस परिणामकी आशा रखी जाती है, वह अभी मुझे मिला नहीं है। लेकिन
दिन-दिन मेरा विश्वास बढ़ता जा रहा है और मुझे आशा है कि मैं तकली पर की
घंटे जल्दी ही १०० तार निकालने लगूंगा । (क्योंकि रातके ९ बज गये थे इसलिए
मुझे यहाँ पर लिखना बन्द करना पड़ा। इतवारको सुबह ४-३० बजे प्रार्थनाके
पश्चात् फिर लिख रहा हूँ।) कुमारप्पाके मतभेदोंको में समझता हूँ। यदि महादेव
चला गया है तो अब काका आ गये हैं। मतभेदोंको दूर करने में वह शायद मदद
कर सकें। स्वर्ण नियम तो यह है कि यदि बातें किसीकी इच्छाके प्रतिकूल हों तो
भी खीझना नहीं चाहिए और जहाँ किसी सिद्धान्त पर आंच न आती हो तथा किसी
संगठनमें सारी जिम्मेदारी अपने ही ऊपर न हो, वहाँ यदि प्रतिरोध व्यर्थ हो या
गलत समझे जानेकी सम्भावना हो तो आग्रह छोड़कर मान जाना चाहिए। उदारताका
गुण तो केवल तब काममें आता है जब कोई विभिन्न विचारों तथा आचरणवाले
पक्तियोंके सम्पर्क में आता है। हमें अपने प्रति कठोर एवं निष्ठुर तथा दूसरोंके प्रति
उदार और मृदु बनना चाहिए। अन्तमें हम देखते है कि हम अपने प्रति न तो कठोर
हैं और न दूसरोंके प्रति मृदु ही तथ्य यह है कि जितनी जल्दी हम दूसरोंके दोष
देख सकते हैं उतनी जल्दी हम अपने दोष नहीं देखते। इसीलिए कठोर सत्य यह है
कि दूसरोंके दोष देखने और उन्हें सुधारने की कोशिश करने के बजाय हमें अपने ही
बड़े दोष देखने चाहिए और उन्हें सुधारना चाहिए। या बन्संके शब्दों में (उक्ति
बन्संकी ही है न ? ) काश जैसा हमें दूसरे देखते हैं हम अपनेको वैसा ही देखें।
व्यवहारमें तो मैंने पाया है कि सबसे अच्छा तो यह है कि हम स्वयं अपने मनको
टटोलें तथा मित्रों द्वारा की गई अपनी आलोचनाकी सच्चाईको मान लें एवं जब वे
अपने दोष तथा बुराईको स्वीकार न करें तब पहले-पहल तो उनका कहा ही ठीक
मानें। बस आज सुबहके लिए काफी उपदेश दे चुका तुम्हारी आत्मा जैसा कहे
तुम वैसा ही करो।
सप्रेम,
7
बापू
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||पत्र मीराबह्नको|
३४५}}
गया और कुदरती तौर पर उसने मुझे अपने संरक्षण में ले लिया है। मैंने उसे तुम्हारे
चरखे पर बैठाया। उसने ८३ तार काते। उसे जैसा मैंने ठीक करके रखा था वह
लगभग वैसा ही चलता रहा। अब हमने चमरसमें कुछ सुधार कर लिये हैं। मैं
इधर यह पत्र लिख रहा हूँ, और उधर प्यारेलाल ऐसे ही एक सुधारमें लगा हुआ
है । जाने क्यों मैं केवल चरखेके बारेमें और चरखा जिन चीजोंका प्रतीक है उन्हीं
तमाम बातोंको सोचने में लगा रहता हूँ। गाण्डीवमें भी बहुत सुधार हो रहा है।
सुधरे हुए चरखेको कल आजमानेकी आशा रखता हूँ। उसमें खिसकाया जा सके
एक ऐसा चक्र और विचावके लिए स्प्रिंग लगाई जायेगी। अगर वह अच्छी तरह
चला, तो सूत जरूर ज्यादा निकलेगा। तकली पर धीरे-धीरे मेरा काबू होता जा
रहा है। तुम्हारी तकली पर मेरी गति ८७ तार की घंटे तक पहुँच गई है। परन्तु
विनोबा कहते हैं कि मुझे पहले लोहेकी तकलीको आजमाना चाहिए। उन्होंने मुझे
दो तकलिया भेजी हैं और में उनमें से एक तकली पर काम करनेकी कोशिश कर
रहा हूँ। जिस परिणामकी आशा रखी जाती है, वह अभी मुझे मिला नहीं है। लेकिन
दिन-दिन मेरा विश्वास बढ़ता जा रहा है और मुझे आशा है कि मैं तकली पर की
घंटे जल्दी ही १०० तार निकालने लगूंगा । (क्योंकि रातके ९ बज गये थे इसलिए
मुझे यहाँ पर लिखना बन्द करना पड़ा। इतवारको सुबह ४-३० बजे प्रार्थनाके
पश्चात् फिर लिख रहा हूँ।) कुमारप्पाके मतभेदोंको में समझता हूँ। यदि महादेव
चला गया है तो अब काका आ गये हैं। मतभेदोंको दूर करने में वह शायद मदद
कर सकें। स्वर्ण नियम तो यह है कि यदि बातें किसीकी इच्छाके प्रतिकूल हों तो
भी खीझना नहीं चाहिए और जहाँ किसी सिद्धान्त पर आंच न आती हो तथा किसी
संगठनमें सारी जिम्मेदारी अपने ही ऊपर न हो, वहाँ यदि प्रतिरोध व्यर्थ हो या
गलत समझे जानेकी सम्भावना हो तो आग्रह छोड़कर मान जाना चाहिए। उदारताका
गुण तो केवल तब काममें आता है जब कोई विभिन्न विचारों तथा आचरणवाले
पक्तियोंके सम्पर्क में आता है। हमें अपने प्रति कठोर एवं निष्ठुर तथा दूसरोंके प्रति
उदार और मृदु बनना चाहिए। अन्तमें हम देखते है कि हम अपने प्रति न तो कठोर
हैं और न दूसरोंके प्रति मृदु ही तथ्य यह है कि जितनी जल्दी हम दूसरोंके दोष
देख सकते हैं उतनी जल्दी हम अपने दोष नहीं देखते। इसीलिए कठोर सत्य यह है
कि दूसरोंके दोष देखने और उन्हें सुधारने की कोशिश करने के बजाय हमें अपने ही
बड़े दोष देखने चाहिए और उन्हें सुधारना चाहिए। या बन्संके शब्दों में (उक्ति
बन्संकी ही है न ? ) काश जैसा हमें दूसरे देखते हैं हम अपनेको वैसा ही देखें।
व्यवहारमें तो मैंने पाया है कि सबसे अच्छा तो यह है कि हम स्वयं अपने मनको
टटोलें तथा मित्रों द्वारा की गई अपनी आलोचनाकी सच्चाईको मान लें एवं जब वे
अपने दोष तथा बुराईको स्वीकार न करें तब पहले-पहल तो उनका कहा ही ठीक
मानें। बस आज सुबहके लिए काफी उपदेश दे चुका तुम्हारी आत्मा जैसा कहे
तुम वैसा ही करो।
सप्रेम,
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४६
[ पुनश्च : ]
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
रात्रि ८४५ बजे, १-१२ -३०
प्यारेलालने बिहारी चरखेपर अच्छी शुरुआत की थी। परन्तु उसमें सफलता
नहीं मिली। मैंने दूसरा गाण्डीव ठीक कर दिया और वह बिना किसी बाधाके मजेसे
चलने लगा। सुपरिटेंडेंटकी मेहरबानीसे मैंने गाण्डीवमें अपने सुधार करवा लिये है।
आशा है वह अच्छी तरह काम देगा। मैंने उसे अभी १-१२-१९३० को रातके पौने
नौ बजे चलाकर देख लिया है। भोजनका प्रयोग जारी है।
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४२२ ) से । सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६५६
से भी ।
चि० कुसुम (देसाई),
४८८. पत्र : कुसुम बेसाईको
परवडा मन्दिर
२९ नवम्बर / १ दिसम्बर, १९३०
तेरे हर सप्ताह लिखनेकी प्रतिज्ञा करने पर भी इस हफ्ते कोई पत्र नहीं आया ।
इसे मैं एक गम्भीर भूल मानता हूँ। एक बार ली हुई प्रतिज्ञाको भंग करने जैसी
भयंकर बात और कोई नहीं हो सकती। हमारी यह बुरी आदत इतनी सामान्य बन
गई है कि आम तौर पर हमें उसकी भयंकरताका पता नहीं चलता। परन्तु यह एक
भयंकर भूल है, इतना निश्चित जान और सावधान हो जा । तेरे पास लिखनेको
कुछ न हो, तब तु छोटेलाल की तरह कोरे कागज पर हस्ताक्षर कर दिया कर ।
लेकिन माता-पिता के आगे बच्चोंको कुछ कहना ही न हो, यह सम्भव नहीं ।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
१ दिसम्बर, १९३०
काकासाहब की जगह २९ तारीखको प्यारेलाल आ गया।
गुजराती (जी० एन० १८११ ) की फोटो नकलसे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४८९. पत्र : मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको
चि० मनु ( त्रिवेदी),
१ दिसम्बर, १९३०
जैसा कि प्यारेलाल तुम्हारे बारेमें बताते हैं, उसपर से अनुमान होता है कि
अब तुम सशक्त हो गये हो। उम्मीद है, तुमने काकासाहब के साथ जी भरकर बातें
की होंगी। फिरसे बीमार न पड़ना काम करने में अधीरता न दिखलाना। जिनका
हेतु शुभ है, जो हमेशा सेवा करनेकी इच्छा रखते हैं, उनके
गुजराती (जी० एन० ७७७२ ) की फोटो नकलसे ।
४९०. पत्र : नारणदास गांधीको
अकर्म में भी कर्म है।
बापूके आशीर्वाद
२७ नवम्बर / ३ दिसम्बर, १९३०
गुरुवार सुबह
चि० नारणदास,
इस बार तुम्हारा पुलिंदा मुझे कल शामको ही दे दिया गया था। 'व्रतविचार'
नामक पुस्तक मिल गई है।
चि० कुसुम यदि अपने निश्चय पर दृढ़ हो तो मुझे उसकी बात पसन्द है ।
जब स्वराज्य प्राप्ति के बाद ही शादी करनी है तब अभीसे क्यों बन्धन डाल लें।
उस समय जो विचार होगा उसके अनुसार चलना ही ठीक है। इसलिए देवचन्दभाई
और जमनालालजी दोनोंको मेरा यह विचार बताना। कुसुमके विचार तुम अच्छी
तरह जान लेना। कहीं मन ही मन और बात हो और यह केवल बहाना न हो।
उसे जो करना हो, उसके लिए वह पूर्णतया स्वतन्त्र है। मैं तो इन दोनों नवयुवकोंके
बारेमें भी यही कहूँगा कि यदि वे स्वराज्य तक राह देखने को तैयार हैं तो आजसे
ही किस लिए बँध जाना चाहते हैं या क्यों किसी लड़कीको आजसे बांधना चाहते
हैं? यह शूरवीर या भक्तका लक्षण नहीं है, और यदि कुसुम वीर बालिका है और
उसकी शादी करनी ही हो तो वह वीरका ही वरण करे। घनश्यामदासको पत्र
लिखूंगा ।
मणिलाल क्यों दूध लेनेसे इनकार करता है? ऐसा होने पर भी उसमें ताकत
ठीक बनी रहती हो तो मुझे कोई आग्रह नहीं। किन्तु हठपूर्वक दूध न ले, ऐसा भी
नहीं होना चाहिए। वजन कम ही हो रहा हो तो दूध लेना चाहिए। देवदास पत्र
क्यों नहीं लिखता ?
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
शुक्रवार सुबह
अमीदासके बारेमें जबसे सुना है तबसे उस पर मुग्ध हो गया हूँ। यह तो
पूरी तरह जीत गया है। उसकी टेक तो प्रौढ़ ऋषि-मुनियों जैसी थी। मैं तो मानता
हूँ कि उसके आश्रम में रहनेसे आश्रम पवित्र ही हुआ। टेकके लिए हँसते-हँसते जान
देना हम सब अमीदाससे सीखें। दूधादिके त्यागका व्रत उसने मेरा जीवन देखकर
लिया हो तो उसमें उसने कुछ जल्दबाजी की। मुझे लगता है कि जबतक मैं स्वयं
इस व्रतका सफल रीतिसे पालन न कर सकूँ, तबतक उसका अनुकरण नहीं किया
जाना चाहिए। फिर भी ऐसा व्रत लेने पर अमीदास उसे भंग नहीं कर सकता यह
दीपक जैसा स्पष्ट है। सोच-समझ कर लिया गया व्रत देहके लिए हानिकर होते
हुए भी नहीं तोड़ा जा सकता। आत्माके लिए हानिकर व्रत तो लिया ही नहीं जा
सकता और यदि लिया हो तो उसे त्याग देना ही धर्म है। जैसे कि कोई 'झूठ
बोलूंगा, ' ऐसा व्रत नहीं ले सकता। वह आत्माके विरुद्ध है। सत्य बोलेंगे, यह देह-
विरुद्ध हो सकता है, इससे देह जायेगी, देश जायेगा, ऐसा भी लगे तो भी उसका
पालन करना ही ठीक है। उसके पिताको पत्र लिख रहा हूँ। पढ़कर उसे भेज देना ।
शनिवार सुबह
सोराबजीको लिखना कि बीमेकी किस्त चुकाना हमारी शक्तिसे बाहर है।
उन्हें जैसे हो वैसे भरकर उसकी पहुँच भेज देनी चाहिए। इस बारेमें जालभाईको
भी पत्र लिखना । नानीबहनके बारेमें बुधाभाईने जो निश्चय लिखा हो उसे लिखकर
रख लेना । नानीबहनको खबर देना और जबतक पैसा मिलता है, वसूल करते रहना ।
.' के पत्र से मुझे सन्तोष नहीं हुआ। उसे जवाब लिखा है वह पढ़ लेना। जबतक
उसपर शक रहता है तबतक वह संघर्ष में भाग न ले। आश्रमसे संघर्षमें भाग लेने
वही जाये जो हमारी नजरमें शुद्ध है।
यज्ञके विषयमें खूब सावधान रहना। यही कोशिश करना कि दोष कम हो ।
सभी सूतकी मजबूती और अंक निकालना सीख लें और रोज ऐसा करें। कस मालूम
करनेकी कोई मोटी रीति तो सहज ही निश्चित की जा सकती है। सभी उसके
अनुसार कस निकालें। हरएक का सूत अलग बुना जाये तो ज्यादा मालूम होगा।
सीतलासहाय आ गया, यह तो बहुत अच्छा हुआ है। किन्तु में किस तरह
बच सका ? शिवाभाईका पत्र काकासाहब को पढ़ा कर भेजना। उसे प्रकाशित किया
जा सकता हो, ऐसी बात हो तो यह मुझे लिख भेजने में कोई हानि नहीं है। इतना
ही नहीं, भेज देनेसे फायदा भी होगा। अन्तमें इसकी जिम्मेदारी काकासाहब पर
छोड़ देना ।
कैसे पड़ा, यह समझ
का किस्सा हृदयद्रावक है। ऐसे सम्बन्ध में
नहीं आता ।.. .को पत्र लिख रहा हूँ। वह पढ़कर भेज देना।
१, २, ३ र ४. नाम नहीं दिये गये हैं।
-Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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Sonu kumar 07
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/* शोधित */
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३४८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Rh|||शुक्रवार सुबह}}
{{Gap}}अमीदासके बारेमें जबसे सुना है तबसे उस पर मुग्ध हो गया हूँ। यह तो
पूरी तरह जीत गया है। उसकी टेक तो प्रौढ़ ऋषि-मुनियों जैसी थी। मैं तो मानता
हूँ कि उसके आश्रम में रहनेसे आश्रम पवित्र ही हुआ। टेकके लिए हँसते-हँसते जान
देना हम सब अमीदाससे सीखें। दूधादिके त्यागका व्रत उसने मेरा जीवन देखकर
लिया हो तो उसमें उसने कुछ जल्दबाजी की। मुझे लगता है कि जबतक मैं स्वयं
इस व्रतका सफल रीतिसे पालन न कर सकूँ, तबतक उसका अनुकरण नहीं किया
जाना चाहिए। फिर भी ऐसा व्रत लेने पर अमीदास उसे भंग नहीं कर सकता यह
दीपक जैसा स्पष्ट है। सोच-समझ कर लिया गया व्रत देहके लिए हानिकर होते
हुए भी नहीं तोड़ा जा सकता। आत्माके लिए हानिकर व्रत तो लिया ही नहीं जा
सकता और यदि लिया हो तो उसे त्याग देना ही धर्म है। जैसे कि कोई 'झूठ
बोलूंगा, ' ऐसा व्रत नहीं ले सकता। वह आत्माके विरुद्ध है। सत्य बोलेंगे, यह देह-
विरुद्ध हो सकता है, इससे देह जायेगी, देश जायेगा, ऐसा भी लगे तो भी उसका
पालन करना ही ठीक है। उसके पिताको पत्र लिख रहा हूँ। पढ़कर उसे भेज देना ।
{{Rh|||शनिवार सुबह}}
{{Gap}}सोराबजीको लिखना कि बीमेकी किस्त चुकाना हमारी शक्तिसे बाहर है।
उन्हें जैसे हो वैसे भरकर उसकी पहुँच भेज देनी चाहिए। इस बारेमें जालभाईको
भी पत्र लिखना । नानीबहनके बारेमें बुधाभाईने जो निश्चय लिखा हो उसे लिखकर
रख लेना । नानीबहनको खबर देना और जबतक पैसा मिलता है, वसूल करते रहना ।
.' के पत्र से मुझे सन्तोष नहीं हुआ। उसे जवाब लिखा है वह पढ़ लेना। जबतक
उसपर शक रहता है तबतक वह संघर्ष में भाग न ले। आश्रमसे संघर्षमें भाग लेने
वही जाये जो हमारी नजरमें शुद्ध है।
{{Gap}}यज्ञके विषयमें खूब सावधान रहना। यही कोशिश करना कि दोष कम हो ।
सभी सूतकी मजबूती और अंक निकालना सीख लें और रोज ऐसा करें। कस मालूम
करनेकी कोई मोटी रीति तो सहज ही निश्चित की जा सकती है। सभी उसके
अनुसार कस निकालें। हरएक का सूत अलग बुना जाये तो ज्यादा मालूम होगा।
{{Gap}}सीतलासहाय आ गया, यह तो बहुत अच्छा हुआ है। किन्तु में किस तरह
बच सका ? शिवाभाईका पत्र काकासाहब को पढ़ा कर भेजना। उसे प्रकाशित किया
जा सकता हो, ऐसी बात हो तो यह मुझे लिख भेजने में कोई हानि नहीं है। इतना
ही नहीं, भेज देनेसे फायदा भी होगा। अन्तमें इसकी जिम्मेदारी काकासाहब पर
छोड़ देना ।
{{Gap}}...का किस्सा हृदयद्रावक है। ऐसे सम्बन्ध में
नहीं आता ।.. .को पत्र लिख रहा हूँ। वह पढ़कर भेज देना।
१, २, ३ र ४. नाम नहीं दिये गये हैं।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>जाये ।
पत्र नारणदास गांधीको
३४९
रविवार रात
यह पत्र लिख दिया है। बहुत महत्वपूर्ण बन गया है। मैं चाहता हूँ उसे पहुँच
विनोबाकी तकलियाँ मिल गई हैं।
समाचार है, पढ़ लेना। काका के जानेके
प्रवचन के लिए पहले पन्नेका पिछला भाग
मेरे स्वास्थ्यके बारेमें मीराबह्नके पत्र में
फौरन बाद प्यारेलालको भेज दिया है।
पढ़ना ।
२ दिसम्बर, १९३०
महादेव से कहना जेल में भी उसे समय मिले और अनुमति मिले तो लिखा
करे। बाकी अगले सप्ताह '
बापूके आशीर्वाद
-
तीसरा, चौथा, और पाँचवाँ अध्याय, तीनों एक-साथ मनन करने योग्य हैं। उनमें
से अनासक्तियोग क्या है, इसका अनुमान हो जाता है। इस अनासक्ति - निष्कामता
से मिलने का उपाय उनमें थोड़े-बहुत अंशमें बतलाया गया है। इन तीनों अध्यायोंको
यथार्थ रूपमें समझ लेनेपर आगे के अध्यायमें कम कठिनाई पड़ेगी। आगेके अध्याय हमें
अनासक्ति प्राप्तिके साधनकी अनेक रीतियां बतलाते हैं। हमें इस दृष्टिसे 'गीता' का
अध्ययन करना चाहिए, इससे अपनी नित्य पैदा होनेवाली समस्याओंको हम 'गीता'
द्वारा बिना परिश्रम के हल कर सकेंगे। यह नित्यके अभ्याससे सम्भव होनेवाली वस्तु
है। सबको आजमा देखनी चाहिए। क्रोध आया कि तुरन्त उससे सम्बन्धित दलोकका
स्मरण करके उसे शान्त करना चाहिए। किसीसे द्वेष हो, अधीरता हो, आहारपणा
आये, किसी कामको करने या न करनेका संकट आये, तो ऐसे सब प्रश्नोंका निपटारा,
श्रद्धा हो और नित्य मनन हो, तो गीता-मातासे कराया जा सकता है। इसके लिए
नित्यका यह पारायण है और तदर्थ यह प्रयत्न है।
अभी ५-३० का बिगुल हुआ है।
[ पुनदच: ]
५२ पत्र है।
गुजराती (एम० एम० यू० /१) की माइक्रोफिल्मसे ।
बापूके आशीर्वाद
१. इसके बाद गांधीजीने गीता के बारेमें लिखा था उस पत्रके पाठके लिए देखिए खण्ड ४९,
"गीता पत्रावलि ", अध्याय ४।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाई घनश्यामदास,
४९१. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको
३ दिसम्बर १९३०
जमनालाल के तरफ से संदेशा मिला है कि आपके कोई मित्र या भागीदारने
सट्टा किया और उसमें काफी नुकसान हुआ। संदेशामें यह भी है कि उससे आपको
दुःख हुआ है। सट्टा करनेके साथ हि नुकसान तो रहा हि है। उसमें दुःख कैसे ।
इस नुकसानका सीधा अर्थ किया जावे तो सुख भी मिल सकता है। आप और
मित्रवर्ग ऐसी प्रतिज्ञा क्यों न करे कि अवसे सट्टा बिलकुल नहीं किया जायगा। सट्टासे
मिला हुआ धन नीतिकी कमाई कभी नहि हो सकती । पू० मालवीजीके स्वास्थ्यके
हाल लिखें।
सी० डब्ल्यू० ६१९० से सीजन्य : घनश्यामदास बिड़ला
४९२. पत्र : मीराबहनको
आपका,
मोहन
४ दिसम्बर, १९३०
चि० मीरा,
आश्रमकी डाक कल शामको मिली। उसमें तुम्हारा अशान्तिप्रद पत्र भी है।
उससे चिन्ता तो नहीं होती, परन्तु विचारके लिए सामग्री मिलती है। इस स्वास्थ्यके
बिगड़ने का क्या कारण है ? बहरहाल, तुम्हें पूरा आराम अवश्य लेना ही चाहिए तुम्हें
मन और शरीर दोनोंको विश्राम देना चाहिए। इसलिए धीरे चलो। 'गीता' का छठा
अध्याय पढ़ लो । योग धीरे-धीरे करना चाहिए। जो काम हम कर रहे हैं वह योग
ही है। मुझे रोज एक कार्ड डाल दिया करो।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४२३ ) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६५७
से भी ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० काशिनाथ,
४९३. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
यरवडा मन्दिर
४ दिसम्बर, १९३०
तुम्हारे दोनों पत्र मिले। माताजी वगैरा आ गये हैं, यह अच्छा हुआ। यदि
तुम नारणदासकी सम्मतिसे माताजीको अपने साथ खिलाते हो तो इसमें मुझे कोई
आपत्ति नहीं है। फिर भी इसमें दोष तो है ही । तुम्हें माताजीको बता देना चाहिए
कि तुम दोनोंका जीवन कौटुम्बिक जीवनसे भिन्न है। बेशक, इसका आर्थिक पहलू
भी है, जो कठिन है। लेकिन यहाँ तो मैंने आदर्शकी बात की है। हम हमेशा अपने
आदर्श तक नहीं पहुँच सकते और कई बार तो आदर्शके ठीक पालनकी खातिर ही
हमें उसके पालनमें कुछ सीमा निर्धारित करनी पड़ती है। इसलिए मैंने जो यह सब
लिखा है, उसपर से यह मत समझना कि तुम्हें अब सम्मिलित रसोईमें भोजन के लिए
जाना चाहिए। जहाँतक पिताजीके साथ तुम्हारे सम्बन्धका प्रश्न है तुम्हें कड़ाईसे
काम लेना चाहिए तुम्हें उनसे स्पष्ट शब्दोंमें कह देना चाहिए कि वे तुम्हारे द्वारा
नोकरी करने और उसके द्वारा पैसा जमा करनेकी आशा छोड़ दें। इसीमें उनकी
सेवा है। जबतक उन्हें तनिक भी आशा बनी रहेगी, तबतक ये प्रयत्न करते रहेंगे ।
जब आशा छोड़ देंगे तब इसके लिए प्रयत्न करना भी छोड़ देंगे। यह मानव-स्वभाव
है। जब आशा बिलकुल नष्ट हो जाती है तब निराशा हृदयको एक तरहका आश्वासन
देती है। यहाँ अनेक ऐसे कैदी हैं जिन्हें उम्र कैदकी सजा मिली है, उन्हें छूटनेकी
कोई आशा नहीं है। इससे वे आनन्दमग्न रहते हैं। मेरे जैसे अनिश्चित स्थितिवाले
लोग दुःखी होते होंगे। आज छूटेंगे कि कल -- आशा-निराशाके सागरमें इस प्रकार
डूबते-उतराते होंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि पिताजीके साथ तुम्हारे सम्बन्धमें जो
दुःखका भाव है, यह तुम्हारे अपने मनकी उपज है। यदि तुम्हें अपने कर्त्तव्यका भान
हो गया हो तो तुम्हें पिताजीकी बातोंका तनिक भी विचार नहीं करना चाहिए।
पिताजीका कर्ज चुकाने और उन्हें राहत देनेके लिए मित्रवर्गसे उधार लेनेकी नीति
कदापि सराहनीय नहीं है। मित्रोंसे ऐसा व्यक्तिगत लाभ न उठाने में ही भलाई है। यहाँ
फिर मैंने कोरे आदर्शकी बातकी है। यदि महावीरप्रसाद आदिके साथ तुम्हारा निकटका
सम्बन्ध हो और पैसा उधार लेनेकी आवश्यकता हो तो कदाचित लेना ही उचित
होगा। इन समस्त समस्याओं का समाधान तुम अनासक्ति रूपी रामबाण उपायसे करना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ५२६३) की फोटो नकलसे।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० रमावहन,
४९४. पत्र : रमाबहन जोशीको
४ दिसम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । सुन्दर है। धीरूकी दृढ़ता आश्चर्यजनक है। उसके तूफानी
स्वभावमें उसकी दृढ़ताकी छाप है। हम यही आशा करें कि आश्रमके कई बालक
सेवा कार्यमें हम सबसे आगे बढ़ जायेंगे। यदि हमारा अन्तःकरण शुद्ध है और रोज
और भी शुद्ध होता जायेगा, तो परिणाम यही होगा ।
काठियावाड़ के वर्णनसे मुझे आश्चर्य नहीं होता। इस सुस्तीसे यह जाहिर होता
है कि अभी हमें काफी मार्ग तय करना है। इसीमें हमारी साधना निहित है।
इसलिए चिन्ता करनेकी कोई बात नहीं ।
[ गुजरातीसे ]
बापुना पत्रो-७: श्री छगनलाल जोशीन
बापूके आशीर्वाद
४९५. पत्र : तारामती मथुरादास त्रिकमजीको
४ दिसम्बर, १९३०
मैं जो समाचार चाहता था, वे सब मुझे मिल गये हैं। मथुरादास अपने समयका
इतना सुन्दर उपयोग करे, इसपर मुझे कुछ आश्चर्य नहीं होता। यह अनुभव उसके
लिए लाभदायक है। वियोग तुम्हारी कसौटी है। दिलीप और ज्योत्स्नाका स्वास्थ्य
अच्छा है यह पढ़कर सन्तोष हुआ। इस समय प्यारेलाल मेरे साथ है। हम दोनों
ठीक हैं। मुझे पत्र लिखती रहना ।
[ गुजरातीसे ]
बापुनी प्रसादी
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कलावती,
४९६. पत्र : कलावती त्रिवेदीको
यरवडा मन्दिर
४ दिसम्बर, १९३०
तुमारे खत मिले। अक्षर सुधारना चाहिये। सावधानीसे लिखनेसे अच्छे हो सकते
हैं। माताजी इ० आ गये अच्छा हुआ खेड़ामें जाओ तो खूब सावधानीसे रहो
और सेवामें तन्मय बन जाना। गंगाबहनकी आशाका पालन करना ।
[ पुनश्च : ]
बापुके आशीर्वाद
मीलकी पुणीके बारेमें में समजा । अबी कुछ कहने की आवश्यकता नहि है ।
जी० एन० ५२६४ की फोटो नकलसे ।
चि० रोहिणी,
४९७. पत्र : रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको
बापु
५ दिसम्बर, १९३०
तुमने जो लिखा है सो ठीक है। सरकार जितना चाहे उतना सामान ले जा
सकती है और उसे कौड़ीके भाव बेच सकती है। सच बात तो यही है कि अन्यायी
शासन के अन्तर्गत सत्य पर चलनेवाले लोगोंके पास सम्पत्ति रह ही नहीं सकती ।
यदि रहे भी तो समझ लो कि जब यह चाहे तब उस सम्पत्तिको छीन ले सकती
है । हमारे इस आन्दोलनका आधार तो धनपर है ही नहीं ।
गुजराती (जी० एन० २६५५ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
१. कलावती त्रिवेदीकी सास ।
४४-२३
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० मनुड़ी
४९८. पत्र : मनु गांधीको
परवडा मन्दिर
५ दिसम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला । यदि तू लाठी चलाना सीख रही है तब तो मुझे भी तुझसे
इसकी शिक्षा ग्रहण करनी ही पड़ेगी। एक शब्दके अक्षर अलग-अलग नहीं होने
चाहिए। यदि पंक्ति में अन्तिम शब्दको पूरा करनेकी जगह नहीं रह जाती तो उस
स्थानको रिक्त ही छोड़ देना चाहिए। मूल शब्द 'नवडाई' नहीं 'नबलाई ' है ।
ह्रस्व उ
इस तरह लिखा जाना चाहिए । [ भी जिस तरह लिखा है ]
उस तरह नहीं । अभी तो तुझे अक्षर शुद्ध करनेकी ओर ध्यान देना चाहिए, शाब्दिक
सौन्दर्य पर नहीं। शाब्दिक सौन्दर्य तो अक्षर शुद्ध होनेसे स्वयमेव आ जायेगा ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५०७ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : मनुबहन मशरूवाला
४९९. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
चि० प्रेमा,
परवडा मन्दिर
५ दिसम्बर १९३०
अपने उपवास और उस बीच तूने जो उत्साह दिखाया उसके लिए तुझे बधाई
चाहिए ? खुराकके बारेमें तो लिख ही चुका हूँ। अभी तुझे कच्ची सब्जियां नहीं खानी
चाहिए। दाल तो कतई न खाना दूध, दही, खाखरी, उबली सब्जियाँ अथवा फल,
जैसे पपीता, मोसम्मी आदि मिलें तो कच्ची सब्जियोंकी जरूरत नहीं रहती। कमसे कम
मुझे तो दवाकी जरूरत महसूस नहीं होती। और फिर मेरी हमेशासे यह वृत्ति रही
है कि जबतक मुझे यह मालूम न हो कि अमुक दवामें कौन-कौन-सी
मैं उस दवाको नहीं लेता । उपवासको दवाका काम देना चाहिए।
रखने की जरूरत है तो सही देखना, नींद पूरी लेना ।
बच्चोंकी पढ़ाईंका कुछ-न-कुछ इन्तजाम जरूर करना ।
चीजें हैं तबतक
सूर्यस्नान जारी
धुरका पत्र मुझे बहुत अच्छा लगा। उसका सारा काम मुझे बहुत निश्चित
और साफ मालूम हुआ है।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र चंद त्यागीको
सुशीलाको वर्षगाँठके उपलक्ष्य में मेरा आशीर्वाद कहना ।
३५५
राजकोट जाने पर तू जमनादाससे मिली होगी। मनुसे मिली थी ? पुरुषोत्तमकी
तबीयत कैसी है ?
जमनादासकी पाठशालामें कुछ होता है या नहीं ? राजकोटमें आन्दोलन के सिल-
सिले में कुछ हलचल दिखाई दी या नहीं ? इन सब खबरोंकी मैं तुझसे आशा रखता हूँ ।
धर्मकुमारकी बुरी आदतोंका बराबर ध्यान रखना दुर्गाको समझाना | दुर्गा
ध्यान दे तो बहुत काम कर सकती है।
[ पुनश्च : ]
बापूके आशीर्वाद
'भजनावलि' में १३९ वें भजनकी दूसरी पंक्ति में 'निजनामग्राही प्रयोग है।
इसका अर्थ नारणदाससे या किसी गुजराती जाननेवाले व्यक्तिसे समझकर भेजना।
तू ही समझती हो, तो और क्या चाहिए ?
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६९३) से । सीजन्य प्रेमावहन कंटक; जी० एन०
१०२४५ की फोटो नकलसे भी।
भाई त्यागीजी,
५००. पत्र : चंद त्यागीको
५ दिसम्बर १९३०
तुमारा खत पा कर मुझको बहोत आनंद हुआ। यदि नियम पालनसे भी
अशक्ति न हटे तो दूध लेना। उसके पहले पका हुआ अन्न ला कर देख लेना । हठ
नहि करना । गुरुकुलके हाल सुन कर मुझे खेद होता है। अभयजी जानते है क्या ?
रामदेवजीने क्या उत्तर दिया था ? बलदेव सुधारी काम भले सीखे। उसे लिखो चरखा,
करा, तकली इ० बनानेका सीख लेवे वृ० गु० ' में आजकल कौन मुख्य अध्यापक
है ? प्रेमराजजीसे कहो मुझे सब हाल लिखे। वहां क्या चल रहा है ?
भारतीय पाठशाला
फरुखाबाद
[ पुनश्च ]
बापुके आशीर्वाद
मुझे कभी पता नहि था कि तुमारे उर्दू हरफ छपे हुए जैसे है। बहोत ह
अच्छे है।
जी० एन० ३२६६ की फोटो नकलसे ।
२. वृन्दायन गुरुकुल |
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० कुसुम (देसाई),
५०१. पत्र : कुसुम देसाईको
यरवडा मन्दिर
६ दिसम्बर, १९३०
तेरे पत्रके तीन पन्ने थे। बीचका पन्ना इन लोगोंने खो दिया मालूम होता
है। मुझे नहीं मिला । तुझे याद हो तो फिर लिखना । प्यारेलालकी तबीयत बहुत
ही अच्छी हो गई है। उसका वजन १२२ पौंड है। उसे भोजनमें डेढ़ सेर दूध, आध
सेर रोटी और शाक-सब्जी आदि मिलते हैं।
आजकल तो हम दोनों चरखेके पीछे पागल हो गये हैं।
गुजराती (जी० एन० १८१२ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
५०२. पत्र : बुलाखीदासको
६ दिसम्बर, १९३०
भाई बुलसीदास,
ईश्वर तो निस्सन्देह हजारों ढंगसे हमारी परीक्षा लेगा । उससे निराश न
होना। आप दोनों अन्तिम क्षण तक अपने कर्त्तव्यका पालन करना ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी० एन० ३१३९ ) की फोटो नकलसे ।
५०३. पत्र: महेन्द्र देसाईको
६ दिसम्बर, १९३०
चि० मनु ( मानसिंह),
है ?
तेरा पत्र मिला तेरी लिखावट सुन्दर होनी चाहिए। रोज कितना सूत कातता
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७४११) की फोटो नकलसे सौजन्य : वा० गो० देसाई
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० भगवानजी,
५०४. पत्र : भगवानजी पण्डयाको
६ दिसम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । अभ्यासका अर्थ तुमने ठीक किया है; उसी तरह चित्तवृत्ति
निरोधका भी ध्यान, उपासना, अर्थात् श्रद्धापूर्वक स्वधर्मका पालन करना - अप्रत्यक्ष
रूपसे ऐसा अर्थ किया जा सकता है। मेरे विचारानुसार यहाँ ध्यानका संकुचित अर्थ
किया गया है। ध्यान अर्थात् पूजापाठके समय हम जो चुपचाप बैठते हैं यह इससे
मनुष्य में ईश्वरके प्रति आत्म-समर्पणकी भावना आती है और उससे निष्काम वृत्ति
पैदा होती है। आत्मशुद्धिके बिना समाज सेवा नहीं होती और समाज-सेवा करते-
करते ही आत्मशुद्धि होती है। अत: तुम्हारे मनमें जो प्रश्न उठते हैं वे तो ठीक
है, लेकिन तुम्हें उनके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। प्रश्नोंका [ अपने-आप ] समाधान
मिल जाये तो ठीक है न हो तो मनमें ऐसी श्रद्धा रखनी चाहिए कि सेवा करते-
करते समाधान मिल जायेगा ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३३४ ) से सौजन्य भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
चि० शान्ता,
५०५. पत्र : शान्ता शंकरभाई पटेलको
यरवडा मन्दिर
६ दिसम्बर, १९३०
तू शंकरभाईसे मिल आई, यह ठीक किया। कमलाके संयमकी बात सुनकर
मुझे खुशी होती है। तू यदि अपने नामके अनुरूप धैर्य रखकर पत्र लिखे, तो तेरे
अक्षर सुधर जायें। जिन लोगोंसे एक जून भी भूखा नहीं रहा जा सकता उन्हें धीरे-
धीरे आदत डालनी चाहिए और फिर जो ब्रह्मचर्य का पालन करनेकी इच्छा रखते
हैं, उन्हें तो विशेष रूपसे ऐसा करना चाहिए। अभी फिलहाल ही प्रेमाबहनने सात
दिनका उपवास रखा था, क्या तू यह जानती है ? और उपवासके दौरान वह अपने
रोजमर्राके काम, यथा कपड़े धोना, पानी भरना आदि भी करती रही है। और
एक तु है कि एक जून भोजन न खाने पर तेरे हाथ कांपने लगे। यह मानसिक
समझी ?
स्थिति है, शारीरिक नहीं
गुजराती (जी० एन० ३९९०) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५०६. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको
चि० महालक्ष्मी,
परवडा मन्दिर
७ दिसम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । तुमने जो लिखा है, वह ठीक है। किसी भी व्यक्तिको
किसी भी कारणसे अपना काम नहीं छोड़ना चाहिए, आदर्श इसीको कहते हैं। सभी
इस आदर्शको प्राप्त नहीं कर सकते, इसपर हमें दुःखी भी नहीं होना चाहिए, उनकी
आलोचना भी नहीं करनी चाहिए। हमें चाहिए कि हम अपने दोषोंके प्रति सजग
रहें तथा औरोंके दोषोंके प्रति उदार रहें। यह कोरी भलमनसाहत ही नहीं है, यह
तो एक सिद्धान्तकी बात है। हमें जिनके दोष दिलाई देते हैं यह उन्हें दूर करनेके
कितने प्रयत्न कर रहा है, यह हमें दिखाई नहीं देता । वस्तुतः महत्वकी बात तो
प्रयत्न करना है। हममें यदि अमुक दोष नहीं है, तो इसका कारण प्रयत्न न होकर
स्वभाव भी हो सकता है। हम जो जन्मसे ही मांस नहीं खाते सो हमारे मांस त्याग-
का कोई महत्व नहीं लेकिन जो व्यक्ति नित्य मांस खानेवाला है, यदि वह उसका
त्याग करता है और कभी-कभी खा भी लेता है तो भी उसके इस त्यागका बहुत
महत्व माना जा सकता है। इसलिए बेहतर यही है कि हम अपने व्रतका यथाशक्ति
सम्पूर्ण रूपसे पालन करें। दूसरा व्यक्ति जितना भी करे उतनेसे सन्तोष मानें। तुम्हें
ठीक अनुभव मिल रहा है। मुझे पक्का विश्वास है कि तुम परीक्षामें अवश्य सफल
होगी। तुम्हारी खुराक बिलकुल ठीक है।
1
गुजराती (जी० एन० ६८०६) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि. मथुरादास,
५०७. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
यरवडा मन्दिर
७ दिसम्बर, १९३०
मैं आज तक तुम्हारे लेखोंको मुग्ध भावसे पढ़ता-भर रहा हूँ। वह मुग्ध-भाव
तो अब भी है, लेकिन अब मैं तुम्हारे लेखोंको एक विद्यार्थीके रूपमें और टीकाकारकी
हैसियतसे पढ़ने लगा हूँ। मैं देखता हूँ कि तुम्हारी पुस्तक स्वयंशिक्षक नहीं है। उसे
पढ़कर मनुष्य पींजना नहीं सीख सकता। जिन्हें थोड़ा-बहुत पीजना आता है, वे लोग
भी तुम्हारे सुझाये हुए सुधारों पर अमल नहीं कर सकते । पुस्तक अपने-आपमें सुन्दर
बन पड़ी है, लेकिन एक शिक्षक के रूपमें वह अधूरी है। जहाँ तक मैं तुम्हारी पुस्तकको
समझ पाया हूँ, तुमने मुझे जो पद्धति बताई थी उसे रद करके अब तुमने नई पद्धति
को अपनाया है। मेरी यह धारणा थी कि मैं उसे पहले ही अपना चुका हूँ, लेकिन
तुम्हारी पुस्तकको दुबारा पढ़ने पर देखता हूँ कि मैंने कोई नई बात नहीं की है।
अब मेरी तुम्हें यह सलाह है कि तुम मुझे एक ऐसा पाठ लिख भेजो, मानो तुम
मुझे सिखा रहे हो। तुम्हारी पुस्तकमें जितना कुछ दिया हुआ है उसे फिरसे लिखनेकी
जरूरत नहीं है। मुझे एक समय में ताँत पर कितनी रुई रखनी चाहिए और उसे
कितने झटकोंमें पीज लेना चाहिए? कितनी रुईसे पीजना आरम्भ करना चाहिए ?
गड्डी रोज क्यों बनाई जानी चाहिए? और वह कच्ची रुईकी क्यों होनी चाहिए ?
उसे भी क्या अन्ततः प्रतिदिन पीज डालना होगा ? तांतको खींचते समय क्या धुनकी
भी झुकती है ? तुम्हारे कहने का तात्पर्य यही है न कि तुम्हारा बायाँ हाथ उतना ही
ऊपर-नीचे होना चाहिए जितनी धुनकी होती हो तथा उसको आगे-पीछे ले जानेका
झुलानेका काम -- - मुठिया करती है। यदि इस झंझट में पड़नेका तुम्हारे पास समय न
हो तो इस पत्र की ओर कोई ध्यान न देना। तुम्हारा काम तो वहाँ जो लोग सीख
रहे हैं उनकी जांच करना और उनमें सुधार करना है। मैं तो मात्र एक दर्शकके
समान हूँ और मैं जानता हूँ कि अभी मुझे तुम्हारा ध्यान इस ओर आकर्षित करनेका
कोई अधिकार नहीं है। इस पत्रके दो उद्देश्य हैं- एक तो दोष बताना और दूसरा
उससे कुछ सीखना । तुम दूसरे उद्देश्यको गौण समझना। मैंने उपर्युक्त प्रश्नोंको विट्ठलके
आगे भी रखा है। उसे भी चाहिए कि वह मेरे इन प्रश्नोंका उत्तर दें, इससे वह
कुछ सीखेगा भी।
गुजराती (जी० एन० ३७४९ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बेटी रेहाना,
५०८. पत्र : रेहाना तैयबजीको
७ दिसम्बर, १९३०
अब तो एककी जगह दो उस्ताद हो गये। एक उस्ताद छोटी-सी लड़की और
दूसरी उस्ताद एक सफेद दाढ़ी। अब शागिर्दका खात्मा ही समझो। देखें, क्या होता
है। इतना सबक काफी है न ? क्यों में उर्दूमें तरक्की कर रहा हूँ न ? और फिर
अब तो प्यारेलाल इस बातका साक्षी है। और उसे तो उर्दू अच्छी तरह आती है।
लेकिन मैं इसके लिए उसका ज्यादा समय नहीं लेना चाहूँगा, क्योंकि अब यह सम्पूर्ण
रूपसे परखेमें खो गया है। इसलिए मेरे हिज्जेको तू सुधारना। चूंकि तबीयत अच्छी
नहीं है, इसलिए तुझे मुझको ज्यादा समय नहीं देना चाहिए। मैं तो बेकार हूँ इसलिए
मैं तेरे पत्रको धीरे-धीरे पढ़ लिया करूंगा । अम्माजान वालिदके साथ पक्षपात करती
हैं। वालिदके अक्षर उनके समान ही बूढ़े हैं और तेरे अक्षर तेरे समान युवा
हैं। खैर, अक्षर जैसे हैं वैसे रहने दो। [सम्भव है ] किसी व्यक्तिकी भले ही
सफेद दाढ़ी हो लेकिन मन जवान हो और हजारों नखरे करता हो, किसीको फ्रेंच
सिखाता हो, अनुवाद करता हो और अनेक योजनाएँ बनाता हो; तथा [सम्भव है ]
कोई जवान होने पर भी मनसे बूढ़ा हो। तू ठीक ऐसी ही है, सो तो नहीं कहता
लेकिन तेरी नाककी बीमारीके दूर होने पर तु बुढ़िया नहीं रह जायेगी । चीर-फाड़की
खबरसे मुझे भय नहीं हुआ; इससे मैं नहीं डरता। लेकिन तेरे बारेमें खबर सुननेको
लालायित अवश्य रहता हूँ। डाह्याभाईको मेरा आशीर्वाद अथवा वन्देमातरम्, यह
जो चाहे सो देना। उसके बारेमें सुनकर मुझे खुशी हुई।
खुदा हाफिज । *
गुजराती (एस० एन० ९६२४ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
१. प्रथम पांच पंक्तियां उर्दू लिपिमें लिखी गई है। शेष पत्र गुजराती में है।
२. ये शब्द उर्दू में है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० वसुमती,
५०९. पत्र : वसुमती पण्डितको
७ दिसम्बर, १९३०
तेरे दोनों पत्र मिले हैं। तू अभी तक तो पकड़ी नहीं गई है। लेकिन यदि पकड़ी
जाये तो अच्छा ही है। इस विषयमें तटस्थ रहना सब कुछ धीरजके साथ करना ।
देखता हूँ, वहां तो तुझे अच्छा अनुभव मिल रहा है। अब मेरे पास प्यारेलाल है ।
गुजराती (एस० एन० ९२९५ ) की फोटो नकलसे ।
५१०. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
७ दिसम्बर, १९३०
चि० गंगाबहन (बड़ी),
तुम्हारा पत्र मिला। आग बुझानेके लिए प्रार्थना छोड़ी, इसका अर्थ है प्रार्थना
की। यह कर्ममें अकर्मका उदाहरण है। तुमने प्रार्थनाके हेतुको निभाया। फिर आग
बुझानेके लिए भागते हुए भी मनमें रामनामका जप हो ही सकता है।
और आखिरकार जिसका जीवन सेवामय है और जिसने अहंकारको मनसे
निकाल दिया है, वह प्रार्थनामय ही है। ऐसा बननेके लिए ही सुबह-शाम प्रार्थना
करते हैं । किन्तु आग आदि जैसी घटना होनेपर प्रार्थना छोड़ी भी जा सकती है।
ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं।
तुम्हारे पत्र में जिस जहरका वर्णन है, वहां तुम अमृत उँडेल दो। हिंसाका
अहिंसासे, असत्यका सत्यसे, कामका संयमसे, क्रोधका अक्रोधसे और लोभका उदारतासे
ही सामना किया जा सकता है।
[ गुजरातीसे ]
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो - ६: गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७६७ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० सुशीला,
५११. पत्र : सुशीला गांधीको
यरवडा मन्दिर
७ दिसम्बर, १९३०
'स्टुअर्ट' नामके में दो-तीन व्यक्तियोंको जानता हूँ। एक मजिस्ट्रेट था जो बादमें
जुलू विद्रोहके समय सैनिक अधिकारी बन गया था। एक अन्य स्टुअर्ट वकालत
किया करता था। पहले के साथ तो मेरे सम्बन्ध काफी घनिष्ठ हो गये थे। क्या यही
व्यक्ति वहाँ है? क्या तू भी मणिलालके स्थान पर जाना चाहती है? सीताको उर्फ
धैर्यालाको अथवा उसका और कोई नाम रखा हो, क्या साथ ले जाना चाहती है
अथवा पीछे छोड़ जाना चाहती है ?
यहाँ कितनी बहनें काम करती है ?
तुम सबको
गुजराती (जी० एन० ४७७८) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
५१२. पत्र: पद्माको
७ दिसम्बर, १९३०
चि० पद्मा,
तेरा पत्र मिला। गुजराती तेरी मातृभाषा नहीं है, इसलिए लिखावट क्यों
खराब होनी चाहिए? लिखावटका भाषाके साथ क्या सम्बन्ध है? अच्छा तो तू
देवनागरी लिपिमें मुझे पत्र लिख और उसमें अपनी सुघड़ताका परिचय दे । अक्षर
तो चित्रके समान हैं। जिसे चित्रकला आती है वह चाहे जिस भाषा में अक्षर चित्रित
कर सकता है।
यदि कोई व्यक्ति हमसे ऐसे भोजनको खानेका आग्रह करता है जो हमने कभी
न खाया हो और यदि हम विनम्रतापूर्वक उसे खाने से इनकार कर दें, तो वह अन्ततः
हमारी बातको मान जायेगा ।
यदि हमसे कोई अंग्रेज अधिकारी मिलने आये तो हमें उसके साथ अभद्र
व्यवहार नहीं करना चाहिए।
गुजराती (जी० एन० ६११६) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भाई तोतारामजी,
५१३. पत्र : तोताराम सनाढ्यको
यरवडा मन्दिर
७ दिसम्बर १९३०
मट्टी रखकर
सरके लिये मट्टीका प्रयोग किया जाय। धूपमें काम करनेके समय मट्टीकी टोपी
सरपे रख सकते हैं। कुचमें ' मैंने बहोत दफा ऐसा किया था। दुवाल
सरपे बांधनेसे टोपी बन जाती है और रक्षा होती है। गंगा देवीका शरीर अब कैसे
है ? धीरू अच्छी तरह रहता है? तोफान करता है ?
पंडित तोतारामजी
हरिजन आश्रम
साबरमती जंकशन
बी० बी० ऐंड सी० आई० रेलवे
जी० एन० २५४० की फोटो नकल से ।
भाई बबलभाई,
५१४. पत्र : बबलभाई मेहताको
बापुके आशीर्वाद
परवडा मन्दिर
८ दिसम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला। जेलमें चाहे जिस व्यक्तिके साथ भोजन किया जा सकता
है। इस पर कोई प्रायश्चित्त आवश्यक नहीं होता । प्रायश्चित्त स्वच्छता अथवा
अस्वच्छताको लेकर नहीं किया जाता। वह तो बिरादरीके बाहरके किसी व्यक्तिके
हाथका खाना खाने पर किया जाता है। जो लोग ऐसे बन्धनोंको नहीं मानते वे
प्रायश्चित्त करते ही नहीं हैं। अन्य बातोंके सम्बन्धमें काकासाहब तुम्हारा पथ-निर्देश
करेंगे।
गुजराती (एस० एन० ९४५५ ) की फोटो नकलसे।
१. दाण्डी- मूल
२. तात्पर्य शायद 'टावेल' अर्थात् तौलियासे है।
३ और ४. मूल पत्रमें ये शब्द अंग्रेजी लिपिमें है।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५१५. पत्र : मीराबहनको
८ दिसम्बर, १९३०
चि० मीरा,
मैंने तुम्हारा पत्र आसिरके लिए जान-बूझकर इस आशासे रख लिया है कि
मैंने तुम्हें गुरुवारको जो पोस्टकार्ड लिखा था और जो तुमको, आशा है, समय पर
मिल गया होगा, उसका जवाब मुझे सोमवारके पहले या सोमवारको मिल जायेगा ।
उसमें मैंने तुम्हारे स्वास्थ्यका हाल पूछा था । यह कब्जका बना रहना चिन्ताकी बात
है। मुझे उम्मीद है कि जब यह पत्र तुम्हारे पास पहुंचेगा, तबतक कब्जके दौरेका
सारा असर मिट जायेगा। मैंने तो थोड़े दिनके लिए प्रोटीनवाली खुराक छोड़कर
ही कजसे अपना पिण्ड छुड़ा लिया। अब मैं बादामके जरिये प्रोटीन ले रहा हूँ ।
अगर फिर दूध न शुरू करना पड़े, तो मुझे बड़ी खुशी होगी। अभी थोड़ी कमजोरी
मालूम होनेके सिवाय परिणाम सुन्दर रहा। बादाम में बड़ी सावधानीके साथ ले
रहा हूँ और में केवल हरी तरकारियों और एक आउन्स बादाम पर शक्ति कायम
नहीं रख सकता। मैं एक आउन्स पिछले दो दिनसे ही लेने लगा हूँ। मुझे कोई
अन्न लेना पड़ेगा। अभी मैंने निश्चय नहीं किया है कि क्या हूं। बाजरा या ज्वार
जिसकी भी रोटी जेलमें बनती हो उसीको आजमाना चाहता हूँ। अगर वह अनुकूल
आ जाये तो मेरी समस्या सन्तोषप्रद रूपमें हल हो सकती है। लेकिन जल्दबाजी
नहीं की जायेगी और दुराग्रह तो होगा ही नहीं । ज्योंही मुझे जरूरत महसूस होगी,
फिर दूध लेने लगूंगा ।
अगले दस दिनों में 'भजनावलि' का अनुवाद पूरा कर लूंगा। इससे मुझे बढ़ा
आनन्द मिला है। अपने कामसे मुझे सन्तोष नहीं है। इसके सिवाय कि यह प्रेमका
काम है, उसमें और कोई गुण नहीं है: साहित्यिक गुण तो है ही नहीं। लेकिन
इससे तुम्हें भजनोंका अर्थ जानने में सहायता मिलेगी, और यही मेरा उद्देश्य था ।
और जब यह काम पूरा हो जायेगा, तो आशा रखता हूँ कि दूसरा शुरू कर दूंगा;
अर्थात् गुजराती 'गीता' की भूमिकाका अनुवाद । मेरा विचार श्लोकोंका अनुवाद
करनेका नहीं है। परन्तु में मौजूदा अनुवादोंमें से एकको पढ़ जाऊँगा और जहाँ वह
मेरे अनुवादसे भिन्न होगा वहाँ उसे लिख लूंगा, और हाशियेकी तमाम टिप्पणियोंका
अनुवाद कर दूंगा। इससे मेरा काम सरल हो जायेगा और बहुत-सा परिश्रम बच
जायेगा । यह काका को भी पढ़ा देना। उन्हें इस प्रस्तावमें दिलचस्पी होगी ।
गाण्डीवमें आशासे कहीं अधिक सुधार हो गये हैं। अब वह हलका चलता है।
पहले जो खिचाव नहीं था वह भी आ गया है। लेकिन मैं सुधारोंका वर्णन करके
तुम्हें थकाऊँगा नहीं। उनका वर्णन केशुके पत्र में कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
३६५
गतिमें अब दूसरा कोई चरखा इससे बढ़ नहीं सकता। लेकिन अभी उसकी परीक्षा
होती है। मैं जानता हूँ कि मेरे आश्वासनसे अधिक सूत पैदा नहीं होगा ।
तुम्हें अपनेको खूब आराम तो देना ही चाहिए। और मानसिक तनाव रहते
हुए काम नहीं करना चाहिए। वह चरखेके लिए तो अच्छा है, परन्तु इन्सानोंके
लिए अच्छा नहीं है।
सप्रेम,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४२४) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६५८
से भी ।
५१६. पत्र नारणदास गांधीको
गुरुवार सुबह, ४/९ दिसम्बर १९३०
चि० नारणदास,
तुम्हारा पत्र कल शामको मिला। [ अधिकारी] बड़े ध्यानसे पत्रोंका पुलिंदा
देते हैं। रवाना भी तत्परतासे करते हैं। लगता है [ इस बार ] रवाना करनेमें एक
दिनकी देरी हुई।
डाक्टरको दीवालीमें आना है अर्थात् नौ महीने बाद या ईसाई दीवालीके बाद ?
यदि हिन्दु दीवाली में आनेकी बात हो, तब तो इस अरसेमें कई रंग बदल जायेंगे ।
महालक्ष्मी और माधवजीको प्रतिज्ञाका बहुत सूक्ष्म ध्यान है। इसलिए उन दोनों
को एक अक्षरके टूटनेसे भी दुख होगा; होना भी चाहिए। किन्तु यदि सभी अपनी
प्रतिज्ञाका यथाशक्ति अर्थ समझकर उसका पालन करें तो भी काफी है और लगता
है कि अधिकांश तो कर ही रहे हैं। तुम चेताते रहा करो।
गिरिराजका तुम्हें जैसा ठीक लगे वैसा करना। भार तुम्हें ही उठाना है;
इसलिए तुम्हारा निर्णय ही सही मानूंगा। कृष्ण तो जबरदस्त है ही उसका स्वास्थ्य
अच्छा रहेगा तो मुझे लगता है कि वह बहुत सेवा कर सकेगा ।
पुरुषोत्तमके बारेमें भी यही मानता हूँ। यह पत्र लिखता रहे।
प्यारेलालका स्वास्थ्य सुधर रहा । मेरे पास न बिगड़े तो अच्छा। प्यारेलाल
का मेरे पास होना ऐसा है जैसे भेड़ियेके पास बकरी । भेड़ियेके पास बकरी बाँध
दो और बादमें रोज अच्छी-अच्छी खुराक उसको दो तो भी वह रोज सुसती ही
जायेगी । प्यारेलालका भी कुछ ऐसा ही था। अब न हो तो अच्छा है। ऐसा होने में
में पूरी तरह अपना दोष मानता हूँ। देखें अब ईश्वर क्या करना चाहता है। उसे
जो कुछ खुराक चाहिए वही उसे मिलती है। अभी दूध, दही, रोटी, सब्जी और
पपीता लेता है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
पारनेरकर इतना अव्यवस्थित काम करेगा यह मैंने नहीं सोचा था। वह शुद्ध
हेतुसे सेवा करनेवाला है। किन्तु लगता है कि काम कम ही संभाल सकता है।
तुमने दृढ़ होकर हिसाब ठीक कराया यह तो अच्छा ही हुआ है। अब ठीक तरहसे
आराम करके शरीरको स्वस्थ बना डाले तो अच्छा है। बीडजके व्यापार में घाटा है,
क्या ऐसा मानना होगा ? इन सभी प्रवृत्तियों में जिन्हें कम करना या खत्म करना
हो उन्हें तदनुसार सँभाल लो। अनासक्त होकर काम करनेवालेको अपने कामका
अन्दाज फौरन हो जाता है। उसे लोभ तो करना ही नहीं चाहिए। अपनी शक्ति-
से बढ़कर काम तो उठाना ही नहीं चाहिए। ठीक तरहसे देखें तो उसे काम लेनेकी
जरूरत ही नहीं होती। काम स्वयं उसके पास आ जाता है और वह उसे पूरी तरह
करनेका प्रयत्न करता है । संसारको ऐसा व्यक्ति निकम्मा जैसा लगता है। क्योंकि
उसके चेहरे पर कभी ग्लानि नहीं होती, वह कभी अपने कामके बोझका ढिढोरा नहीं
पीटता स्वयं अपने कामका बोझ कभी नहीं उठाता और सब कुछ नटवर पर लाद
कर जैसे वह नचाये वैसे नाचता है।
जेठालालने कामका हाल लिख भेजनेको कहा था लेकिन उसने अभी तक नहीं
भेजा। कमलाबहन लुंडीकी बात समझ गया हूँ। विवाह ऐसी ही चीज है। उसकी
उत्पत्ति ही विषयमें रागमें है। विवाहको धार्मिक क्रिया कहते हैं; क्योंकि वह
विषयको काबू में रखने की विधि है इसीलिए उसकी रचना हुई। लेकिन यह बात
भुला दी गई है, इसलिए अब बहुत लोगोंके लिए विवाह केवल भोगका साधन ही
बन गया है। गंगाबहन और नानीवनको लिखूँगा ।
तुम्हारा भोजन सम्बन्धी प्रयोग देख रहा हूँ। मुझे ब्यौरा लिखते रहा करो ।
मूंगफली की मात्रा कम करनेमें ही लाभ है। दूध, दही मिले तो लो; न लो, तो भी
काम चलेगा। सभी चीजें एक ही बार न खानेकी सलाह जो आजकल शोधक देते हैं,
उसमें कुछ तथ्य जरूर है। पूरी खुराकका रस एक ही तरह और एक ही बार हजम
नहीं होता, इसलिए बहुत मिश्रण करनेसे भी हाजमा बिगड़ता है। दयाका वर्णन
बहुत सन्तोषदायक माना जायेगा। छपे हुए अध्याय भेजनेको तुमने लिखा है। उसका
अर्थ यह भी हो सकता है कि अब भेज रहे हो। वे अभी मुझे नहीं मिले हैं।
शुक्रवार सुबह
अपने स्वास्थ्य और खुराकके बारेमें पूरी जानकारी मैंने काकासाहब को लिले
पत्र में दी है। इसलिए यहाँ दुबारा नहीं लिखता केशुको बुलाकर उसकी शिकायत
सुन लोगे, ऐसा मैंने मान लिया था, इसलिए पत्र में नहीं लिखा था। किन्तु अब भी
मुझे यह याद है। उसका सार दे रहा हूँ ।
१. तुम उसपर अकारण क्रोध करते हो।
२. एक बार वह तुम्हें बताने लगा तो भी तुमने बात नहीं सुनी, सबके सब
सुन सकें इतनी ऊँची आवाजमें फटकारा और उसे बोलने ही नहीं दिया।
३. तुम कुसुम, नवीन और धीरूके प्रति खूब पक्षपात करते हो। उनके विरुद्ध
शिकायत हो तो उसे सुनते भी नहीं हो ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र नारणदास गांधीको
४. केशुके पाससे बिना किसी कारणके ही कारखानेका काम ले लिया है।
५. दामोदरदासने तुम्हारे पक्षपातसे तंग आकर ही आश्रम छोड़ा।
३६७
मैंने तो केशुको लिखा है कि जिस तरह मैं मगनलाल पर मुग्ध था और
उसके विरुद्ध कोई बात मेरे मनमें नहीं आती थी वैसा ही तुम्हारे बारेमें भी है।
इसलिए जिस बातका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव न हो तुम्हारे बारेमें वैसी बात माननेके
लिए तैयार नहीं हूँ। तब भी उसे तुम्हारे पास जाकर सब कुछ साफ-साफ कह देनेकी
सलाह दी थी। जवाब में उसने इतना ही लिखा कि मेरे पत्रसे उसे सन्तोष नहीं
हुआ। बाद में महादेव के साथ चर्चा करने की बात थी, इसलिए मैं चुप रहा। अब
तुम ही उसे बुलाकर जो शिकायतें मैने लिखी हैं उनकी बात करना। मैंने समझने में
भूल की हो तो वह बतायेगा और सुधार देगा। मैंने कुछ छोड़ दिया हो तो बह
पूरी बातें बताये। बादमें तुम उसे सन्तुष्ट कर सको तो करना। किसी भी काम में
लगे रहने के लिए तो मैंने लिखा ही है। काकासाहब के साथ भी उसके बारेमें बात
की है। केशुको भी उनसे मिलनेके लिए लिखा है। यह खाली बैठा रहे, यह तो
निःसन्देह अच्छी बात नहीं है।
हरिलाल देसाई नौकरी करना चाहता हो और तुम्हें ठीक लगे तो उसे रख
लेना । वह व्यवस्थित नहीं है; तो भी निर्मल हृदय नवयुवक है। और मैं मानता
हूँ कि अपने यहाँ रखने लायक है। ' ने मुझे लम्बा पत्र लिखा था क्या वह
तुमने देखा है? जबतक वह कोई आंखों देखी पक्की बात न लिख सके तबतक
मुझपर कुछ असर नहीं पड़ेगा।.. * को मैं अति निर्मल हृदया बालिका मानता
हूँ ।...' भी निर्मल और साफ बात करनेवाला है, ऐसी छाप मुझपर पड़ी है। [दांडी-]
कूचमें भी मुझे इसका मधुर अनुभव हुआ था। काशी विद्यापीठमें भी उसकी सुवास
थी। ::
उसका पथ-प्रदर्शन कर रहा है और उसे उसे ले जाना चाहता है यह
सच है, किन्तु उसमें मैंने केवल भाई और शिक्षकका ही भाव देखा है।
मौनवार दोपहर
चप्पलके तल्लेके लिए चमड़ा जल्दी प्राप्त करना। नई चप्पलका तल्ला भी नाजुक
ही दिखाई देता है। उसमें घिसनेके निशान आजसे ही दिखाई दे रहे हैं। मेरे स्वास्थ्य
और खुराकके बारेमें मीराबहनके पत्र में और कुछ काकासाहब के पत्र में है। इसलिए
यहाँ कुछ नहीं लिखता ।
अब छोटी बातोंको ज्यादा ध्यानसे देख पाता हूँ। इसलिए तुम्हारे पुलिदेमें
आनेवाले पत्रोंके अक्षरकी ओर ध्यान चला ही जाता है। अपने खराब अक्षर सुधारने
का प्रयत्न करता हूँ, यह तो तुम मेरे प्रत्येक पत्र में देखते ही होगे । खराब अक्षरोंमें
अविवेक तो है ही और अविवेकमात्र हिंसा है। किन्तु खराब अक्षर प्रत्यक्ष हिंसा
भी है। जिससे हमारे पड़ोसीको या किसी औरको बिना कारण कष्ट हो, वह हिंसा
ही है। सराय अक्षर पढ़नेवालेको कितना कष्ट होता है, कितनी असुविधा होती है
इसका मुझे दोहरा अनुभव है। एक तो मुझे खराब अक्षरवाले पत्र पढ़ने पड़ते हैं, यह
१, २, ३ और ४. नाम नहीं दिये गये हैं।
Gandhi
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
अनुभव है। दूसरा, मेरे-खराब अक्षर पढ़नेवालेको होनेवाले कष्टका अनुभव। यह लिखने-
का उद्देश्य यही है कि आश्रम में रहनेवाला हर व्यक्ति स्त्री, पुरुष, बालक, बालिका
खूब सुन्दर अक्षर लिखनेका ध्यान रखे। इसके लिए समय नहीं सिर्फ विचार करने-
भरकी जरूरत है, दूसरे व्यक्तिके प्रति प्रेमकी जरूरत है। सब इन नियमोंका पालन
करें :
१. शब्द खुले लिखें।
२. बनावटका त्याग करें।
३. अधूरे अक्षर न लिखें।
४. एक अक्षरको दूसरे में न मिलायें ।
५. जहाँ तक हो सके कोई भी मुझे पेंसिलसे न लिखे।
इतने नियमोंका पालन करते हुए अक्षर लिखें तो जरूर अच्छे होंगे। जल्दबाजी में
आसक्ति है। जल्दीमें कोई न लिखे। धीरजसे जितना लिखा जा सके उतना लिखकर
सन्तोष करे ।
[ पुनश्च :]
बापूके आशीर्वाद
आज ८३ पत्र हैं। किन्तु ३६वीं क्र० सं० वाला पत्र छूट गया लगता है;
इसलिए ठीक तरहसे देखें तो ८० ही है । ८१व पत्र स्वर्गीय सेठ मंगलदासके भाईके
लिए है। वह उन्हें तुरन्त पहुँचा देना ।
प्रवचन सम्बन्धी पत्रों पर भी अंक हैं।
गुजराती (एम० एम० यू० / १ ) की फोटो नकलसे ।
चि० प्रभावती,
५१७. पत्र प्रभावतीको
परवडा मन्दिर
९ दिसम्बर, १९३०
बहुत दिनोंसे तेरा कोई पत्र नहीं आया। मैं चिन्तित तो अवश्य हैं, लेकिन
मान लेता हूँ कि वहाँ सब ठीक है। ईश्वर तेरा रक्षक है।
गुजराती (जी० एन० ३३८३ ) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
२. इसके बाद लिये गये गीता सम्बन्धी पत्रके पाठके लिए देखिए खण्ड ४९, “गीता पत्रावलि, "
अध्याय ५ ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रिय कुमारप्पा,
५१८. पत्र : जे० सी० कुमारप्पाको
११ दिसम्बर १९३०
कमलाबनके बारेमें तुमने जो लिखा है उसे मैंने ध्यानमें भर लिया है। ईश्वर
करे वह सच्चे अर्थोंमें उन्नति करे !! "यह पत्र-व्यवहार बन्द होनेकी जरुरत नहीं
है। यदि तुम मुझसे और आगे जिरह करोगे तो मैं इसे खुशीके साथ जारी रखूंगा ।
मैंने देखा है कि कई चीजें समय बीतनेके साथ और इस बीच अनजाने ही हम जो
देखते रहते हैं उससे स्पष्ट हो जाती हैं।
सप्रेम,
अंग्रेजी (जी० एन० १००८३) की फोटो नकलसे ।
चि० कुसुम (बड़ी),
५१९. पत्र : कुसुम देसाईको
बापू
११ दिसम्बर १९३०
तेरा पत्र मिला। मुझे अपने स्वास्थ्यमें कोई खराबी नहीं दिखती। परिवर्तनसे
उसमें सुधार ही दिखाई देता है। जरा भी चिन्ता न करना ।
प्यारेलालका समय इन कामोंमें बँटा हुआ है :
३७५ तार चरखेपर कातना और १०० तार तकलीपर; जितनी चाहिए
उतनी पूनियाँ बनाना अभी तो इन तीन कामोंसे ही मुश्किलसे फुरसत मिल पाती
है। तकली दो घंटे ले लेती है। मैं भी लगभग यही करता हूँ। तकलीके १०० तारके
साथ चरखेके २७५ तार रखें तो काम चल सकता है। दोनोंके मिलाकर ३७५
तार ।
लड़कियोंके बारेमें तू जो लिखती है सो ठीक है। मुझे और अधिक स्पष्टता-
से लिखना ।
गुजराती (जी० एन० १८१३) की फोटो - नकलसे ।
४४-२४
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० व्रज किसन,
५२०. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको
यरवडा मन्दिर
१२ दिसम्बर १९३०
तुमारा खत मिला। मैंने लीले फल छोड़ दिये बहारके दुःखकी कथा पढ़कर।
अब साथ में प्यारेलाल है। खाना पीना यज्ञादि सब कर्म हैं। नहि करने योग्य विकर्म
है। अकर्म कर्मका अभाव । जो मनुष्य अनासक्तिपूर्वक कर्म करता है वह अकर्म हुआ ।
विकर्म अनासक्तिपूर्वक हो हि नहि सकता। जो कुछ शंका उठे उसके बारेमें अवश्य
पूछो। स्वास्थ्य अच्छा करके बहार निकलो हम दोनों अच्छे हैं।
जी० एन० २३८५ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
५२१. पत्र : मीराबहनको
चि० मीरा,
१३ दिसम्बर १९३०
तुम्हारा पोस्टकार्ड यथासमय प्राप्त हुआ था । तुम्हारी तरफसे और कोई खबर
न मिलने का अर्थ में यह मान रहा हूँ कि तुम अब पूर्णतः स्वस्थ हो । प्रत्येक बीमारी-
के बाद तुम शीघ्र ही ठीक हो जाती हो, क्योंकि उसमें जो चिकित्सा होती है वह
प्राकृतिक होती है, किन्तु यदि शरीरको पूरा आराम न दिया जाये और मनको तनावसे
मुक्त न किया जाये तो बीमारी अपने पीछे कमजोरीकी विरासत छोड़ जाती है।
मेरी समझमें मन पर नियन्त्रण करना सबसे कठिन चीज है। इसका सर्वोत्तम उपाय
है 'गीता' का पालन किया जाये। मनको जितनी बार आघात लगता है, समझो
उतनी बार 'गीता' के इस पालनमें व्याघात हुआ। अच्छी खबर हो या बुरी खबर
हो, उसे अपने ऊपरसे यों गुज़र जाने दो जैसे बत्तखकी पीठ परसे पानी फिसल जाता
है। जब हम कोई सवर सुनें तो हमारा कर्तव्य मात्र इतना पता चलाना है कि
क्या कुछ करनेकी जरूरत है, और यदि हो तो हम अपने-आपको प्रकृतिके हाथका
एक साधन मानकर अपने कार्यके परिणामसे प्रभावित हुए बिना और तटस्थ भावसे
उसे कर दें। किसी भी परिणामके पीछे एकसे अधिक साधनोंका उपयोग होता है
इसलिए इस बातको ध्यान में रखते हुए वैसी तटस्थता या निष्काम भावका होना एक
१. यह मूलमें अस्पष्ट है तात्पये शायद रसीले, अर्थात् ताजे फलोंसे हैं।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पत्र
मीराबहनको
३७१
यह
वैज्ञानिक आवश्यकता प्रतीत होता है। यह कहनेका साहस कौन करेगा कि "
कार्य मैंने किया है ? " मैं जानता हूँ कि तुम्हें यह सब पता है। तथापि मैं इस सत्य-
को तुम्हारे मनमें बिठा देना चाहता हूँ ताकि वह बुद्धिसे छनकर हृदयमें उतर जाये ।
जबतक यह सत्य केवल बुद्धिमें रहेगा तबतक यह उसके ऊपर एक व्यर्थ भार-जैसा
बना रहेगा। बुद्धि द्वारा ग्रहण किया हुआ कोई भी सत्य तुरन्त हृदयको सम्प्रेषित
कर दिया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो सत्य निष्फल रह जाता
है और तब वह हमारे मन में विषैले पदार्थको भाँति फैल जाता है। जो चीज मनको
fare करती है वह सम्पूर्ण शरीरको विषाक्त कर देती है। अतः मस्तिष्कको मात्र
सम्प्रेषणका साधन मान कर उसका केवल उसी रूपमें उपयोग किया जाना चाहिए ।
वहाँ जो भी चीज ग्रहण की जाये उसे या तो तत्काल कार्रवाईके लिए हृदयको
सम्प्रेषित कर देना चाहिए या फिर सम्प्रेषणके लिए अनुपयुक्त मानकर उसी वक्त
रद कर देना चाहिए। शरीरको होनेवाले प्रत्येक रोग और मानसिक थकानका कारण
भी मस्तिष्क द्वारा अपने इस कार्यको सुचारु रूपसे सम्पादित न करना ही है। यदि
मस्तिष्क सिर्फ अपना कार्य करता रहे तो दिमागी थकान हो ही नहीं। इसलिए जब
हम बीमार पड़ते हैं तो उसका कारण आहारकी गड़बड़ी मात्र ही नहीं होता बल्कि
मस्तिष्क द्वारा अपने कार्यको सुचारु रूपसे न करनेके कारण हो रही गड़बड़ी भी
होता है। गीताकारने स्पष्ट ही इस बातको देख लिया था और स्पष्टसे स्पष्ट शब्दोंमें
इसका सर्वोत्तम उपाय संसारको बताया है। इसलिए जब कभी तुम्हारे दिमाग में कोई
बोझ हो तो तुम्हें 'गीता' की इसी मुख्य शिक्षापर ध्यान लगाना चाहिए और बोझ
को निकाल फेंकना चाहिए। हमें आशा करनी चाहिए कि यह भयंकर कब्ज फिर
कभी नहीं होगा।
जहाँतक कुमारप्पाका प्रश्न है, यदि तुम्हारे मनमें पर्याप्त प्रेम और सद्भावना
है तो तुम्हें जो भी आलोचनाएं प्राप्त हों उन्हें उसके पास भेज दो और परिणामकी
चिन्ता मत करो। उसको आलोचनाओंकी जानकारी दे देना उसके प्रति तुम्हारा कर्तव्य
है। अपने सन्देश भेजने के लिए अब तुम काका का भी उपयोग कर सकती हो।
मेरा दुग्ध-विहीन आहारका प्रयोग चल रहा है और अभीतक कोई खराब
परिणाम नहीं है। वजनमें ३ पौंडकी और कमी हुई है लेकिन शरीरमें शक्ति बनी
हुई है। वजनमें कमी होनेका एक कारण यह है कि मैं जितना अनाज और बादाम
लेता हूँ उनकी मात्रा बढ़ाने के मामले में अत्यन्त सावधानी बरत रहा हूँ। दोनों समय
अर्थात ११ बजे और ५ बजे बादाम तीन तोले और बाजरा तथा जुवारी भाखरी
लगभग २ तोले लेता हूँ। शीघ्र ही मेरा वजन बढ़ सकता है। किसी भी सूरत में,
पेटकी दशा असाधारण रूपसे अच्छी है। मैं तुमसे बिल्कुल सहमत हूँ कि एनीमाकी
आदत बुरी चीज है और सम्भव हो तो इसे छोड़ देना चाहिए। दूध छोड़नेके बाद
इसे छोड़ना सम्भव हो गया है, जैसाकि तुम्हें याद होगा, वर्धा जानेपर जब मैंने
दूध छोड़ दिया था तब एनीमा छोड़ना सम्भव हो गया था। सच तो यह है कि यदि
मैंने गोपालरावकी सलाह माननेमें जल्दबाजी करनेकी मूर्खता न की होती और उस
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३७२
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
समय जो आहार चुना था वही लेता रहता तो आज भी मैं उसीपर पनप रहा
होता। वर्तमान आहार वर्षावाले आहारका थोड़ा सुधरा रूप है।
जब कभी बीमार पड़ो तो साप्ताहिक पत्र- दिवसकी प्रतीक्षा किये बिना मुझे
पत्र लिखने में हिचकना नहीं ।
सप्रेम,
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ९२८३) की फोटो नकलसे सौजन्य : मीराबहन
चि० वसुमती,
५२२. पत्र : वसुमती पण्डितको
बापू
१३ दिसम्बर १९३०
तेरे सब पत्र मुझे एक-साथ मिले हैं। बहनें पकड़ी गई यह अच्छा हुआ ।
चूंकि सर्वसाधारणको लिखे पत्र में मैं अपने वारेमें सब कुछ लिखता हूँ, इसलिए व्यक्तिगत
पत्रोंमें कुछ नहीं कहता। मेरी तबीयत अच्छी है। इस समय मैंने दूध छोड़ दिया है
तथा ज्वार-बाजराकी रोटी, साग और तीन तोला बादाम लेता हूँ। इनके अतिरिक्त
नींबू और कभी-कभी खजूर भी लेता हूँ। इससे मुझे एनीमा नहीं लेना पड़ता। अब
देखना यह है कि ऐसा हमेशा कर पाता हूँ या नहीं। वजन कम हो गया है, लेकिन
इसकी कोई चिन्ता नहीं।
गुजराती (एस० एन० ९२९६) की फोटो नकलसे।
बापूके आशीर्वाद
५२३. पत्र: निर्मला देसाईको
१३ दिसम्बर, १९३०
चि० निर्मला,
तेरा पत्र मिला । तेरे किसी पत्रका उत्तर देना रह गया हो, ऐसा मुझे याद
तो नहीं पड़ता । बा वापस क्यों गई? वहाँ उन्हें अच्छा नहीं लगा ? अथवा वे
थोड़े दिनोंके लिए ही आई थीं ? तेरा पैर अब कैसा है ?
गुजराती (जी० एन० ९४५७ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४११
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० रामचन्द्र,
५२४. पत्र : रामचन्द्र त्रिवेदीको
१३ दिसम्बर, १९३०
तुम्हारा खत मिला । तुमारे शाहिसे खत लिखना और अक्षर शुद्ध बनाना ।
आश्रममें सब आ गए अच्छा हुआ। जीजीसे कहो शांतिसे रहे और छुआछूत छोड़
देवे छुआछुतमें धर्म कभी नहीं हो सकता ।
जी० एन० ५२६५ की फोटो नकलसे।
५२५. पत्र : शारदा सी० शाहको
बापुके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१४ दिसम्बर, १९३०
चि० शारदा,
तेरे पत्रका जवाब लिखना रह गया हो ऐसा तो मुझे नहीं लगता । हाँ, उता-
वलीमें रह गया हो तो आश्चर्य नहीं । तुझे यह श्वासका कष्ट होता ही रहता है।
तू इसे भगा क्यों नहीं पाती ? तेरे खाने-पीनेमें कुछ बदपरहेजी होती होगी। या
फिर तू क्रोधमें आ जाती होगी। मनुष्य उत्तेजित हो जाये तो उसे दमाका दौरा पड़
जाता है।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ९८९५) से । सौजन्य: शारदाबहन जी० चोखावाला
१. रामचन्द्र त्रिवेदीकी माता, जो उस समय आश्रममें रह रही थीं।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चि० प्रेमा,
५२६. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको
१४ दिसम्बर, १९३०
तेरा पत्र मिला। बच्चोंकी सजाके बारेमें भी समझा। तेरी दलील पुरानी है।
यह 'दूषित चक्र' है। तुझे मार पड़ी इससे तू सुधरी; इसलिए दूसरोंको सुधारनेके
लिए तू उन्हें मारती है। बच्चे भी बड़े होनेपर यही सीखेंगे। बिलकुल इसी दलीलसे
लोग हिंसाको ठीक मानते हैं। इस झूठे अनुभवके उस पार जाना हमारा काम है।
उसके लिए धीरज चाहिए, यह मैं स्वीकार करता हूँ। यह धीरज पैदा करने और
उसे विकसित करनेके लिए हम इकट्ठे हुए हैं। बच्चोंको पढ़ाना या अनुशासन सिखाना
ही हमारा ध्येय नहीं है। उन्हें चरित्रवान बनाना हमारा ध्येय है और उसीके लिए
पढ़ाई, अनुशासन वगैरा है। उन्हें चरित्रवान बनाने में अनुशासन टूटे, पढ़ाई बिगड़े तो
भले ही टूटे और बिगड़े। लेकिन तेरी दलीलको मैं समझता हूँ। यह भी समझता
हूँ कि तेरे मारनेमें द्वेष नहीं है; फिर भी तेरे मारनेमें रोष और अधीरता तो है
ही में एक सुझाव तेरे सामने रखता हूँ। तू बच्चोंकी सभा कर। जो बच्चे कहें
कि 'हम शैतानी करें या आज्ञा भंग करें तो हमें मारिए और इस तरहसे मारिए',
उन्हें मारना और वे जैसे कहें उसी तरह मारना । जो मना करें, उन्हें मत मारना ।
ऐसा करते-करते तू देखेगी कि मारनेकी जरूरत नहीं रहेगी।
साथ करती रहना। अधीर बनकर या निराश होकर इसे
तेरी बुद्धी मेरी बातको स्वीकार न करे, तबतक तू अपने ही
हूँ कि तू सत्यकी पुजारी है, इसलिए अन्तमें तुझे सत्य जरूर मिलेगा ।
तेरी खुराक ठीक मालूम होती है।
इस विषयकी चर्चा मेरे
छोड़ मत देना। जबतक
मार्गसे चलना । मैं जानता
तूने राजकोटका वर्णन नहीं भेजा ।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६९४ ) से । सौजन्य: प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२४६ की फोटो नकलसे भी ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५२७. पत्र: पद्माको
१४ दिसम्बर १९३०
चि० पद्मा,
तेरा पत्र मिला। इस बारकी लिखावट ठीक है। अभी और सुधारना तेरी
वह गिलटी कोई गम्भीर रोग नहीं है यह जानकर मन प्रसन्न हुआ, लेकिन अपनी
तबीयत सँभालना अपनी डायरीमें तू सब कुछ लिखती है, यह अच्छी बात है।
सरोजिनीदेवी को कितने दिनोंकी सजा हुई है ?
गुजराती (जी० एन० ६११७) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
५२८. पत्र वनमाला परीखको
१४ दिसम्बर १९३०
चि० वनमाला,
चूंकि तूने मेरे लिए एक बहुत बड़ी कतरन रखी है इसलिए मैंने उसे सँभालकर
रख लिया है। धीरू गाली दे तो उसे स्नेहपूर्वक रोकना । प्रेमावहनसे भी कहना ।
गुजराती (जी० एन० ५७५६) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५२९. पत्र : नानाभाई इच्छाराम मशरूवालाको
भाई नानाभाई (अकोला),
यरवडा मन्दिर
१४ दिसम्बर, १९३०
तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हें दामाद सचमुच अच्छा मिला है। वह विश्राम-मन्दिर
में जाकर बैठ गया है। अब सुशीला जायेगी और फिर तारा। सुरेन्द्र भी इसकी
उम्मीद लगाये बैठा है, यह अच्छा ही है। यही सच्चा धर्म है। आजतक हम धर्मके
नामपर सुखोपभोग कर रहे थे। यदि ताराको परेशानी न हो, तो उसे सूर्यस्नान
लेना चाहिए। इससे तुम्हें भी बहुत फायदा होगा। इसके साथ-साथ विधिपूर्वक कटि-
स्नान भी लो तथा खुराक सादी रखो ।
गुजराती (जी० एन० ४७७९ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
५३०. पत्र : कुँवरजी मेहताको
१४ दिसम्बर, १९३०
भाई कुंवरजी,
आपका समाचारोंसे भरपूर पत्र मिला । जुगतरामसे भी पत्र लिखनेको कहना।
हम तो जेलके बाहर अथवा भीतर सलामत ही हैं। हमारी डोर ईश्वरके हाथमें है।
वह जैसा नचायेगा, वैसा नाचेंगे ।
कानजीभाईका त्याग महान है। उनमें हिम्मत त्यागसे भी कहीं अधिक बढ़-
चढ़कर है। उन्हें मेरी बधाई देना ।
नेपोलियन को लिखा है ।
गुजराती (जी० एन० २६८९ ) की फोटो नकलसे।
१. आशय छोटाभाई कल्याणजी मेहतासे है।
बापूके आशीर्वाद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५३१. पत्र : मणिबहन पटेलको
यरबडा मन्दिर
१४ दिसम्बर, १९३०
चि० मणि (सरदारीजी),
अब तू बाहर आ गई है, इसलिए तुझसे ब्यौरेवार पत्रकी आशा करता हूँ ।
अपने अनुभव लिखना तेरा स्वास्थ्य कैसा है ?
[ गुजरातीसे ]
बाबुना पत्रो-४ : मणिबहेन पटेलने
५३२. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको
बापूके आशीर्वाद
यरवडा मन्दिर
१४ दिसम्बर, १९३०
चि० काशिनाथ,
तुम्हारा पत्र मिला। कलावतीको मैंने उत्तर लिख दिया है। माताजीका जो
उपचार किया जा रहा है, वह उचित ही जान पड़ता है। इसमें सन्देह नहीं कि
अनेक रोग कब्जके कारण ही होते हैं। मैंने अपने कब्जको दूर करनेके लिए अभी
जो प्रयोग किये हैं उनसे मुझे लाभ हुआ है। तुम्हारी जानकारीके लिए मैं उन्हें
यहाँ दे रहा हूँ। मैंने तो सिर्फ उबली हुई सब्जियाँ तथा कच्चे और उबले हुए
टमाटर ही लिये हैं। इससे कब्ज दूर हो गया। तब मैंने पीसे हुए बादाम लेने शुरू
किये; उनकी मात्रा मैंने धीरे-धीरे बढ़ाकर तीन तोला कर दी और अब ज्वार-बाजरा
की थोड़ी रोटी लेता हूँ। इससे में अपने शरीरमें शक्तिका अनुभव करता हूँ। अभी
तो निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कह सकता। यदि दो-तीन महीने ऐसी ही स्थिति
बनी रहे तो कुछ कहा जा सकता है। इसपर सावधानीसे ही अमल किया जाना
चाहिए। सन्तोक और राधाको कुनेकी पुस्तकमें दिये गये दोनों स्नानोंकी जानकारी
है । मेरा खयाल है कि ये दोनों स्नान कलावतीके लिए बहुत अच्छे सिद्ध होंगे।
'मुखचर्या विज्ञान' नामक पुस्तक हमारे यहाँ नहीं है।
डा० सरजूप्रसादजी को मेरी ओरसे बधाई देना। वे जो कार्य कर रहे हैं उसमें
मैं उनकी सफलताकी कामना करता हूँ ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३७८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
अनाजके सस्ता होनेके लिए मैं आशीर्वादका भागी कैसे बन सकता हूँ? किसान
लोग मुझे शाप भी तो दे सकते हैं न? अनाजके सस्ता होनेके अनेक कारण हैं। मैंने
अपने पत्रोंमें जो कारण प्रस्तुत किये हैं, नारणदासकी सम्मति से उनके उद्धरण देने में
मुझे कोई हर्ज दिखाई नहीं देता ।
प्यारेलाल आनन्दपूर्वक है। उसके पास दो 'रामायण' है। इसलिए अभी उसे
किसी अन्य पुस्तककी जरूरत नहीं। यहाँ आनेपर उसका पढ़ना-लिखना कुछ कम
तो हो ही गया है।
गुजराती (जी० एन० ५२६६) की फोटो नकलसे।
५३३. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
बापूके आशीर्वाद
यरबडा मन्दिर
१४ दिसम्बर १९३०
चि० हेमप्रभा,
तुमारा खत आया । अनासक्तियोगकी बंगला प्रति १००० बिक गई वह शुभ
चिह्न है। जाड़ाके दिनोंमें ९-१० बजेके सूर्यमें जितना अंग खुला रखकर रह सके
इतना अच्छा है। जाड़ाके दिनोंमें औषध रूपसे थोडी कच्ची प्याज रोटीके साथ लेनेसे
भी अच्छा रहता है । प्याजमें दोष है ऐसे गुण भी काफी है। प्रधानदोष दुर्गंधीका
है। अल्प मात्रा लेनेसे दुर्गंधी प्रतीत नहि रहती है।
जी० एन० १६७९ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५३४. पत्र : शान्ता त्रिवेदीको
१४ दिसम्बर, १९३०
चि० शांता,
तुमारा खत मिला। जीजीकी सेवा भी एक प्रकारकी देश सेवा है। यह सेवा
विगतमोह होनी चाहिए अर्थात् दूसरी कोई सेवा कर सके ऐसी
सेवाको आवश्यकता है और सेवामें हमारी कुछ निजी स्वार्थ नहि है ।
जी० एन० ५२६८ की फोटो नकलसे ।
चि० रामचंद्र,
५३५. पत्र : रामचन्द्र त्रिवेदीको
नह है और जीजीको
बापुके आशीर्वाद
रविवार [ १४ दिसम्बर, १९३० या उसके पश्चात् ]
तुमने दस्तखत नहि दिये हैं परंतु तुमारा हि खत है। तुमने अच्छे अशर
लिखनेका ठीक प्रयत्न किया है। ऐसे हि करते रहो। जीजीसे कहो धर्म पालनमें
पिताजीकी प्रसन्नता अप्रसन्नताका प्रश्न रहता हि नहि। अंतमें धर्म पालनसे सब प्रसन्न
हो जाते हैं। मीरा बाईका दृष्टान्त हमारे सामने हि है। छुआछुतको जीजी यदि पाप
समझती है और समझना चाहिए तो उसे छोड़ दें।
जी० एन० ५२९१ की फोटो नकलसे ।
बापुके आशीर्वाद
१. पत्रकी सामग्रीसे लगता है कि यह पत्र १३ दिसम्बर, १९३० को रामचन्द्र त्रिवेदीको लिखे पत्रके
पश्चात् लिखा गया था। इसके बाद रविवार १४ दिसम्बरको था।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५३६. पत्र : प्रभावतीको
१५ दिसम्बर, १९३०
चि० प्रभावती,
आश्रम पहुँच गई होगी।
जायेंगे। लेकिन आज और
नहीं गई है तो अविलम्ब
जयप्रकाशके पत्रके अनुसार तो शायद तू अबतक
अब ऐसा बन्दोबस्त हुआ है कि तेरे पत्र मुझे तुरन्त दिये
कल मुझे कोई पत्र नहीं मिला । यदि तू अबतक आश्रम
चली जाना । वहाँसे भी फिलहाल मुझे रोज पत्र लिखा करना । तुझे जो दौरे पड़ते
हैं, वे बन्द होने चाहिए; आश्रममें आनेपर वे अवश्य बन्द हो जायेंगे। फलादि
जिन वस्तुओंकी जरूरत हो, उन्हें मँगवाने में संकोच न करना । जाते ही एकदम काममें
न लग जाना। तूने आश्रमकी बहुत सेवा की है, इसलिए पूरा आराम लेना । मनमें
किसी तरह की चिन्ता मत करना। ईश्वरको जो करना होगा, सो करेगा। 'प्रेमल
ज्योति भजनका चिन्तन करना ।
गुजराती (जी० एन० ३३८४ ) की फोटो नकलसे ।
बापूके आशीर्वाद
२. न्यूमैनको "लीड, काडली लाइट" का नरसिंहराव दिवेतिया द्वारा किया गया गुजराती अनुवाद |
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परिशिष्ट १ (क)
नेहरू द्वयकी टिप्पणी
सेंट्रल जेल
नैनी, इलाहाबाद
२८ जुलाई, १९३०
सर तेजबहादुर सप्रू और श्री जयकरसे हमारी एक लम्बी बातचीत हुई।
उन्होंने उन विभिन्न घटनाओंका जिक्र किया जिनके फलस्वरूप उन्होंने गांधीजी और
हमारे साथ जेलमें मुलाकात करनेका निश्चय किया ताकि यदि सम्भव हो तो भारतकी
जनता और ब्रिटिश सरकारके बीच चल रहे वर्तमान संघर्षको समाप्त या स्थगित
किया जा सके। शान्तिकी उनकी हार्दिक कामनाकी हम कद्र करते हैं और हम
खुशीसे उन सभी तरीकोंपर विचार करेंगे जिनसे कि शान्ति स्थापित हो सके, बशर्ते
कि यह शान्ति भारतकी उस जनताके लिए, जिसने राष्ट्रीय लड़ाईमें पहले ही इतना
ज्यादा बलिदान किया है और जो हमारे देशकी आजादी चाहती है, सम्मानजनक
हो । कांग्रेस के प्रतिनिधिकी हैसियतसे हमें कांग्रेसके प्रस्तावोंमें कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन
करनेका अधिकार नहीं है, लेकिन कांग्रेसने जो बुनियादी स्थिति अपनाई है, यदि उसे
स्वीकार कर लिया जाये तो अमुक परिस्थितियोंमें हम तफसीलके मामले में मामूली
हेर-फेर की सिफारिश करनेको राजी हो सकते हैं। लेकिन हमारे सामने एक आरम्भिक
कठिनाई है। हम दोनों ही जेलमें हैं और पिछले कुछ समयसे बाहरी दुनियासे तथा
राष्ट्रीय आन्दोलनसे हमारा सम्पर्क बिलकुल छूटा हुआ है। हममें से एक व्यक्तिको
लगभग तीन महीनेतक कोई दैनिक अखबार दिया ही नहीं गया। गांधीजी भी कई
महीने से जेल में हैं। वस्तुतः मूल कार्य समितिके हमारे लगभग सभी सहयोगी जेलमें
हैं और खुद कार्य समितिको ही एक अवैध संगठन घोषित कर दिया गया है। राष्ट्रीय
कांग्रेस संगठन में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ही सबसे बड़ी सत्ता है जिसके निर्णय
केवल कांग्रेसके पूर्ण अधिवेशनमें ही बदले जा सकते हैं। उस अ० भा० कांग्रेस कमेटीके
३६० सदस्योंमें से ७५ प्रतिशत सदस्य जेलमें हैं। राष्ट्रीय आन्दोलनसे हमारा सम्पर्क
बिलकुल छूटा हुआ है, और ऐसी स्थितिमें हम अपने सहयोगियोंके साथ, विशेष रूपसे
गांधीजी के साथ पूरी तरह विचार-विमर्श किये बिना कोई निश्चित कदम उठानेकी
जिम्मेदारी नहीं ले सकते। जहाँतक गोलमेज सम्मेलनका सवाल है, जबतक सभी
महत्वपूर्ण विषयोंपर पहले ही से समझौता नहीं हो जाता, तबतक उससे हमें किसी
१. देखिए "पत्र मोतीलाल नेहरूको, २३-७-१९३० ।
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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
लाभकी आशा नहीं लगती। इस प्रकारके समझौतेको हम अत्यन्त महत्वपूर्ण मानते
हैं। समझौता निश्चित ढंगका होना चाहिए और उसमें किसी प्रकारकी गलतफहमी
होने या गलत अर्थ करनेकी गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। सर तेजबहादुर सप्रू और
श्री जयकरने यह बात बिलकुल स्पष्ट कर दी है और लॉर्ड इविनने भी उनको
लिखे अपने प्रकाशित पत्रमें कह दिया है कि वे दोनों अपनी ही ओर से यह बात-
चीत कर रहे हैं और वे वाइसराय या वाइसरायकी सरकारकी तरफसे कोई वादा
नहीं कर सकते। फिर भी यह सम्भव है कि वे कांग्रेस और सरकार के बीच इस
प्रकारके समझौतेका रास्ता निकालने में सफल हों। चूंकि हम गांधीजी और अन्य सह-
योगियोंसे परामर्श किये बिना युद्ध विरामके लिए कोई निश्चित शर्त नहीं सुझा सकते,
इसलिए हम सर तेजबहादुर सप्रू और श्री जयकरके सुझावोंपर और गांधीजी द्वारा
२३ जुलाईकी टिप्पणीमें, जो हमें दिखाई गई है, दिये गये सुझावोंपर यहाँ चर्चा
नहीं करेंगे। हम गांधीजीकी टिप्पणीके मुद्दा संख्या २ और ३ पर सामान्य रूपसे
सहमत हो सकते हैं, लेकिन हम इन मुद्दोंकी, और विशेष रूपसे उनके मुद्दा संख्या
१ की तफसीलों पर उनके (गांधीजीके) और अन्य लोगोंके साथ चर्चा करनेके बाद
ही अन्तमें अपने सुझाव दे सकते हैं। हम चाहेंगे कि हमारी इस टिप्पणीको गोपनीय
माना जाये और इसे केवल उन्हीं लोगोंको दिखाया जाये जो गांधीजीकी २३-७-१९३०
की टिप्पणी देखें।
[ अंग्रेजीसे ]
हिन्दू, ५-९-१९३०
परिशिष्ट १ (ख)
जवाहरलाल नेहरूका पत्र १
सेंट्रल जेल
नैनी
२८ जुलाई, १९३०
प्रिय बापूजी,
एक लम्बे अन्तरालके बाद आपको फिरसे चिट्ठी लिखते हुए मुझे बहुत खुशी
हो रही है, भले ही यह एक जेलसे दूसरे जेलको ही भेजी जा रही है। मैं विस्तारसे
लिखना चाहूँगा, लेकिन मुझे भय है कि मैं इस समय वैसा कर नहीं सकता। इसलिए
मैं केवल विचाराधीन मसलेकी ही चर्चा करूँगा। डा० सप्रू और श्री जयकर कल आये
थे और उन्होंने पिताजी तथा मेरे साथ लम्बी बातचीत की। आज वे लोग फिर
आ रहे हैं। चूंकि उन्होंने हमें सारे तथ्योंसे अवगत करा दिया है और आपकी
टिप्पणी तथा पत्र भी हमें दिखा दिया है, इसलिए हमें लगा कि बिना दूसरी मुला-
१. देखिए " पत्र : मोतीलाल नेहरूको, २३-७-१९३० ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
३८३
कातका इन्तजार किये हुए हम दोनों इस मसलेपर चर्चा करके कोई निर्णय ले
सकते हैं। बेशक, अगर दूसरी मुलाकात में कोई नई चीज सामने आती है तो हम
अपनी पूर्व निर्धारित रायमें यथोचित परिवर्तन करने को तैयार हैं। फिलहाल हम जिन
निष्कर्षोपर पहुँचे हैं वे उस टिप्पणी में दिये हुए हैं जो हम सर तेजबहादुर सप्रू
और श्री जयकरको दे रहे हैं। यह टिप्पणी कुल मिला कर संक्षिप्त ही है लेकिन
मुझे आशा है कि इससे आपको पता चल जायेगा कि हम किस प्रकार सोच रहे
हैं। मैं यह भी कह दूं कि हमारा क्या रुख होना चाहिए, इसके बारेमें मेरे और
पिताजी के बीच पूरी सहमति है। मैं स्वीकार करता हूँ कि संवैधानिक प्रश्नसे सम्ब
न्धित आपका मुद्दा (१) मुझे कायल नहीं कर सका है और पिताजीको भी वह
पसन्द नहीं आया। मैं नहीं देख पाता कि हमारी स्थिति या हमारी प्रतिज्ञाओं या
वर्तमान वास्तविकताओंके साथ इसका मेल किस प्रकार बैठ सकता है। पिताजी और
मैं आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि हम "ऐसे किसी युद्ध विरामका समर्थन
नहीं कर सकते जो हमारी उस स्थितिको व्यर्थ कर दे जिसपर कि हम आज पहुँचे
हैं।" यही कारण है कि किसी अन्तिम निर्णयपर पहुँचनेसे पहले पूरी तरह विचार
करना अत्यावश्यक है। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि प्रतिपक्षीकी ओरसे कोई उल्लेख-
नीय अगला कदम अभी तक नहीं उठाया गया है, और मुझे बहुत भय है कि कहीं
हम कोई गलत या कमजोर कदम न उठा बैठें। मैं अपनी बात कहने में संयमसे काम
ले रहा हूँ। मुझे तो लड़ाई लड़ने में मजा आता है। उससे मुझे लगता है कि हाँ,
मैं जिन्दा हूँ। भारतमें पिछले चार महीनोंमें जो घटनाएँ हुई हैं उनसे मेरा दिल
खुश हुआ है, और भारतके मर्दों, औरतों और बच्चों पर मुझे और ज्यादा गर्व होने
लगा है। लेकिन मैं जानता हूँ कि ज्यादातर लोग लड़ाकू किस्मके नहीं हैं और शान्ति
पसन्द करते हैं, इसीलिए मैं अपने-आपको दबानेकी और शान्तिपूर्ण दृष्टिकोणसे काम
लेनेकी जबर्दस्त कोशिश करता है। आपने अपने जादू भरे स्पर्शसे जो एक नवीन
भारतकी रचना कर दी है, उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। भविष्य क्या
लायेगा सो मैं नहीं जानता, लेकिन अतीतने जीवनको जीने लायक बना दिया है,
और हमारे नीरस अस्तित्वने अपने अन्दर एक अद्भुत गरिमा और महानता पैदा
कर ली है। यहाँ नैनी जेलमें बैठे हुए मैंने शस्त्र के रूपमें अहिंसाकी विलक्षण प्रभाव-
कारिता पर विचार किया है और अहिंसामें मेरी आस्था और विश्वास पहलेसे कहीं
ज्यादा बड़े हैं। देशने अहिंसाके सिद्धान्तमें अपने विश्वासका जो प्रदर्शन किया है,
आशा है उससे आप असन्तुष्ट नहीं हैं। इक्का-दुक्का चूकोंको छोड़कर देशने अहिंसाका
जिस दृढ़ताके साथ पालन किया है वह आश्चर्यजनक है। मैंने तो इतनी आशा नहीं
की थी। मुझे भय है कि आपके ग्यारह सूत्रोंपर मुझे अभी भी आपत्ति है। ऐसी
बात नहीं कि मैं उनमें से किसी एकसे भी असहमत हूँ। वस्तुतः वे अत्यन्त महत्वपूर्ण
हैं। फिर भी मुझे ऐसा नहीं लगता कि वे स्वतन्त्रताका स्थान ले सकते हैं। लेकिन
आपकी इस बातसे में अवश्य ही सहमत हूँ कि हमें " ऐसी किसी चीज से कोई सरो-
कार नहीं रखना चाहिए जो देशको उन्हें (११ सूत्रोंको) तत्काल लागू करनेकी
शक्ति न प्रदान करता हो।" पिताजीने आठ दिन हुए एक सुई लगवाई थी, और
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
तबसे ही वह अस्वस्थ हैं। वह बहुत कमजोर हो गये हैं। कल शामकी लम्बी बात-
चीतने उन्हें बिलकुल थका दिया है।
जवाहरलाल
कृपया मेरे बारेमें चिन्ता न करें। यह तकलीफ तो अपने-आप ठीक हो जायेगी
और मैं दो-तीन दिनमें उससे मुक्त हो जाऊँगा ।
सप्रेम,
[ पुनश्च : ]
मोतीलाल नेहरू
हमारी सर तेजबहादुर सप्रु और श्री जयकरसे दुबारा बातचीत हुई है। उनके
सुझावपर हमने अपनी टिप्पणी में कुछ परिवर्तन किये हैं, लेकिन उनसे कोई महत्व-
पूर्ण अन्तर नहीं पड़ता। हमारी स्थिति बिलकुल स्पष्ट है, और उसके बारेमें मुझे
कोई सन्देह नहीं है। मुझे आशा है आप उसे पसन्द करेंगे।
[ अंग्रेजीसे ]
हिन्दू, ५-९-१९३०
परिशिष्ट २
तेजबहादुर सप्रू और मु० रा० जयकरका पत्र कांग्रेस नेताओंको
विंटर रोड, मलाबार हिल
बम्बई
१६ अगस्त, १९३०
प्रिय मित्रो,
हमने पूना और इलाहाबादमें आप लोगोंसे कई बार भेंट की, और इन सभी
अवसरोंपर आपने जिस सौजन्यता और धीरजके साथ हमारी बातें सुनी उसके लिए
हम आप सबको धन्यवाद देते हैं। इन लम्बी वार्ताओंके कारण आपको हमने जो
असुविधा पहुँचाई उसका हमें खेद है। हमें इस बातका विशेष दुख है कि पंडित
मोतीलाल नेहरूको पूना आनेका कष्ट उठाना पड़ा, विशेषकर उस समय जबकि उनकी
तबीयत इतनी खराब थी।
हम औपचारिक रूपसे उस पत्र की प्राप्ति भी स्वीकार करते हैं जो आपने हमें
दिया था और जिसमें आपने उन शर्तोंका उल्लेख किया है जिनके आधारपर आप
कांग्रेस सविनय अवज्ञा आन्दोलनको स्थागित करने और गोलमेज सम्मेलनमें भाग
लेनेकी सिफारिश करनेको तैयार हैं।
१. देखिए "पत्रः समू और जयकरको १५-८-१९३०
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
जैसा कि हम आपको बता चुके हैं, हमने मध्यस्थता करनेका काम
३८५
(१) कांग्रेसके तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष, पंडित मोतीलाल नेहरूने २० जून,
१९३० को श्री स्लोकोम्बको दी गई भेंटमें जो शर्ते रखी थीं उनके आधारपर और
विशेष रूप से
(२) उस वक्तव्यकी शर्तों के आधारपर हाथमें लिया था जिन्हें श्री स्लोकोम्बने
१५ जून, १९३० को बम्बईमें पंडित मोतीलाल नेहरूको दिया था और जिसे उन्होंने
(पंडित मोतीलाल नेहरूने) स्वीकार किया था और माना था कि हम उन शर्तों के
आधारपर वाइसराय से अनौपचारिक वार्ता आरम्भ कर सकते हैं।
श्री लोकोम्बने दोनों दस्तावेज हमें दे दिये और उसके बाद हमने बाइसराय महोदयसे
अनुमति मांगी कि समझौते की सम्भावनाएँ खोजने के खयाल से वह हमें महात्मा गांधी,
पंडित मोतीलाल नेहरू और पंडित जवाहरलाल नेहरूसे मुलाकात करनेकी अनुमति
प्रदान करें। ऊपर जिस दूसरे दस्तावेजका जिक्र किया गया है उसकी एक प्रति आपने
हमसे ले ली है।
अब हम देखते हैं कि आपने हमें इसी १४ तारीखको जो पत्र दिया है उसमें
उल्लिखित शर्तें ऐसी हैं कि उस पत्रको, जैसा कि हमारे बीच सहमति हुई थी, वाइस-
राय महोदय के सामने उनके विचारार्थं पेश किया जाना चाहिए और उनके निर्णयकी
हमें प्रतीक्षा करनी होगी ।
हमने आपकी इस इच्छाको ध्यान में रख लिया है कि इन शान्ति वार्ताओ
सम्बन्धित सारे महत्वपूर्ण दस्तावेजोंको, जिनमें आपका हमारे नाम लिखा उपर्युक्त
पत्र भी शामिल है, प्रकाशित कर दिया जाये। वाइसराय महोदय द्वारा आपके पत्र
पर विचार कर चुकनेके बाद हम उन्हें प्रकाशित कर देंगे।
पत्र समाप्त करनेसे पूर्व आपसे हम यह कहने की इजाजत चाहेंगे कि जैसाकि
हमने आपसे कहा था, हमारे पास ऐसा माननेके कारण थे कि सविनय अवज्ञा आन्दो-
लनको वास्तव में स्थगित करनेके साथ ही सामान्य स्थिति काफी सुधर जायेंगी, अहिंसक
राजनीतिक कैदी रिहा कर दिये जायेंगे, चटगांव और लाहौरके षड्यन्त्रके मामलोंसे
सम्बन्धित अध्यादेशोंको छोड़ कर शेष सभी अध्यादेश वापस ले लिये जायेंगे, और
गोलमेज सम्मेलनमें कांग्रेसको अन्य किसी भी राजनीतिक पार्टीके मुकाबले ज्यादा बढ़ा
प्रतिनिधित्व मिलेगा। यह कहने की जरूरत नहीं कि हमने इस बातपर भी जोर दिया
था कि हमारी रायमें अपनी भेंट' में पंडित मोतीलाल नेहरूने जो रुख अख्तियार किया
था और पंडित मोतीलालको सहमतिसे श्री स्लोकोम्ब द्वारा हमारे पास भेजे गये वक्तव्यमें
तथा वाइसराय महोदय द्वारा हमें लिखे गये पत्र में तत्वतः कोई अन्तर नहीं है।
[ अंग्रेजीसे ]
गांधी-सप्रू करेस्पांडेन्स । सौजन्य: प्रकाशनारायण समू
४४-२५
हृदयसे आपके,
ते० ब० सप्रू
मु० रा० जयकर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट ३
वाइसरायका पत्र सर तेजबहादुर सप्रूको
प्रिय सर तेजबहादुर,
वाइसरीगल लॉज
शिमला
२८ अगस्त, १९३०
कांग्रेसके जो नेता इस समय जेल में हैं, उनके साथ श्री जयकर और आपने
सूचना देने तथा उनके
उसके उत्तरकी प्रतियां
१५ अगस्तके संयुक्त पत्र
भेजनेके लिए मैं आपको
जो बातचीतकी उनके परिणामोंकी
और आप लोगों द्वारा दिये गये
धन्यवाद देता हूँ। मैं आपको और श्री जयकरको बताना चाहता हूँ कि भारतमें फिरसे
सामान्य स्थिति स्थापित करने में मदद देनेके लिए लोक-कल्याणके इस आत्मधारित
काममें आपने जिस भावनाके साथ प्रयत्न किया है उसकी में बहुत कद्र करता हूँ।
आपने जिन परिस्थितियोंमें इस कामको हाथमें लिया उसकी यहाँ चर्चा करना उपयुक्त
होगा। मैंने अपने १६ जुलाईके पत्र में आपको विश्वास दिलाया था कि मेरी, मेरी
सरकारकी, और मुझे कोई शक नहीं था कि सम्राट्की सरकारकी भी, यह हार्दिक
इच्छा है कि भारतके लोगोंको अपने मामलोंकी व्यवस्था स्वयं करनेका ज्यादासे ज्यादा
अधिकार प्राप्त करने में मदद देनेके लिए हम जो कुछ कर सकते हों, करें, और केवल
उन्हीं विषयोंके बारेमें हम अलगसे व्यवस्था करें जिनकी जिम्मेदारी सँभालने की स्थिति में
वे अभी नहीं है। सम्मेलनका एक यह भी काम होगा कि वह सभी उपलब्ध सामग्री के
आधारपर इस बातकी जाँच करे कि ये विषय क्या हैं, और इनके बारेमें क्या
व्यवस्था की जाये। इससे पूर्व ९ जुलाईको विधान सभाके सामने अपने भाषण में मैने
दो अन्य मुद्दोंको भी स्पष्ट कर दिया था। पहला यह है कि सम्मेलनमें भाग लेने-
बाले सभी लोगोंको इस बातका पूरा अधिकार होगा कि वे सम्पूर्ण संवैधानिक समस्या-
की उसके पूरे परिप्रेक्ष्यमें जांच करें। दूसरे, सम्मेलन आपसी सहमतिसे जो भी सम-
झौता करेगा, सम्राट्की सरकार बादमें उसी समझौते के आधारपर अपने प्रस्ताव
संसदके सामने पेश करेगी। जैसा कि आप मानेंगे, मुझे भय है कि आपने जो काम
स्वेच्छासे अपने ऊपर लिया है उसमें कांग्रेसके नेताओं द्वारा आपको लिखे गये पत्रसे
मदद नहीं मिलती। पत्रमें जो सामान्य लहजा अख्तियार किया गया दिखता है, और
उसमें जो बातें कही गई हैं, साथ ही जिस तरह पत्रमें कांग्रेसकी नीतिके फलस्वरूप
देशको होनेवाली गम्भीर हानि, विशेष रूपसे आर्थिक क्षेत्रमें होनेवाली हानि, को
स्वीकार करनेसे साफ इनकार किया गया है, उसे देखते मुझे नहीं लगता कि उस
१. देखिए पत्र : सप्रू और जयकरको ", ५-९-१९३० ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
३८७
पत्र में दिये गये सुझावोंपर मेरा विस्तारपूर्वक चर्चा करना जरा भी उपयोगी होगा;
और मैं स्पष्ट रूपसे कहना चाहूँगा कि उस पत्र में निहित प्रस्तावोंके आधारपर कोई
चर्चा करना में असम्भव मानता हूँ। मुझे आशा है कि यदि आप कांग्रेस के नेताओंसे
फिर मिलना चाहते हों तो यह बात आप उन्हें साफ तौर पर बता देंगे।
आपने उन्हें १६ अगस्तको उत्तर देते हुए जो पत्र लिखा है, उसके अन्तिम अनुच्छेद के
बारेमें में एक बात और कहना चाहूँगा। जब हमने इन मामलों पर बातचीत की
थी उस समय मैंने कहा था कि यदि सविनय अवज्ञा आन्दोलन वास्तवमें बन्द कर
दिया जाता है तो में लाहौर षड्यन्त्र केस और चटगाँव षड्यन्त्र केससे सम्बन्धित
अध्यादेशोंको छोड़ शेष सारे अध्यादेश वापस ले लूंगा क्योंकि तब उनकी आवश्यकता
ही नहीं रह जायेगी। लेकिन मैंने यह बात स्पष्ट कर देनेकी सावधानी बरती थी
कि मैं ऐसा कोई आश्वासन नहीं दे सकता कि सविनय अवज्ञा आन्दोलन समाप्त
होनेके बाद स्थानीय सरकारें आन्दोलन से सम्बन्धित अपराधोंके सिलसिले में उन सजा-
प्राप्त या नजरबन्द कैदियोंको रिहा कर देंगी जिनके विरुद्ध हिंसात्मक कार्रवाई करनेका
आरोप नहीं है। मैं चाहूँगा कि इस मामले में उदार नीति वरती जाये, लेकिन में
ज्यादासे ज्यादा यह वादा कर सकता हूँ कि स्थानीय सरकारोंसे अनुरोध करूँ कि वे
प्रत्येक व्यक्ति मामलेवर उसके गुणोंके आधारपर सहानुभूतिपूर्वक विचार करें।
कांग्रेस यदि सविनय अवज्ञा आन्दोलन बन्द कर दे और उसके बाद यदि वह
सम्मेलन में भाग लेना चाहे तो सम्मेलन में कांग्रेस के प्रतिनिधित्व के सवालका आपने
जो उल्लेख किया है उसके बारेमें मेरी स्मृतिके अनुसार आपने यह स्पष्ट किया था
कि कांग्रेसकी मांग यह नहीं है कि उसे सम्मेलन में बहुसंख्याके अर्थमें अन्य दलोंकी
अपेक्षा प्रातिनिधिक प्रधानता दी जाये, और मैंने यह विचार व्यक्त किया था कि
सम्राट्को सरकारसे यह सिफारिश करने में मुझे कोई कठिनाई नहीं दिखाई पड़ती कि
कांग्रेसको समुचित प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाना चाहिए। मैंने यह भी कहा था कि
यदि सूरत वैसी बनी तो मैं कांग्रेस पार्टीके नेताओं द्वारा ऐसे लोगोंके नामकी एक
सूत्री मांगने को तैयार रहूंगा जिन्हें वे उपयुक्त प्रतिनिधि मानते हैं। मुझे लगता है
कि आप और श्री जयकर चाहेंगे कि मैं आपको अपनी और अपनी सरकारकी
स्थितिसे स्पष्ट रूपसे अवगत करा दूं क्योंकि यह शायद उचित होगा कि हमारे पत्र-
व्यवहारको शीघ्र ही प्रकाशित कर दिया जाये ताकि जनताको पता चल जाये कि
वे क्या परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण आपके प्रयत्नोंका वैसा वांछित परिणाम नहीं
निकल सका जिसकी कि आप आशा करते थे, और जो निकलना भी चाहिए था।
हृदयसे आपका
इविन
[ अंग्रेजीसे ]
हिन्दू, ५-९-१९३०
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट ४
वाइसरायके साथ हुई बातचीतका सार-संक्षेप
(क) संवैधानिक प्रश्नपर स्थिति वही होगी जोकि वाइसरायने २८ अगस्तको
हमें लिखे गये अपने पत्रके अनुच्छेद २ में उल्लिखित चार मूलभूत मुद्दोंमें बताई है।
(ख) इस सवालपर, कि क्या श्री गांधीको गोलमेज सम्मेलन में भारत द्वारा
जब भी इच्छा हो तब साम्राज्यसे अलग होने के अधिकारका सवाल उठानेकी अनुमति
दी जायेगी, स्थिति इस प्रकार थी " जैसा कि वाइसरायने हमें भेजे गये अपने पूर्वोक्त
पत्र में कहा है, सम्मेलन एक स्वतन्त्र सम्मेलन होगा। अतः कोई भी व्यक्ति जो सवाल
चाहे उठा सकता है। लेकिन वाइसरायकी राय थी कि श्री गांधी द्वारा इस सवालको
अभी उठाना बिलकुल बुद्धिमानी की बात नहीं होगी । लेकिन यदि वह भारत सरकार के
सामने यह सवाल उठायेंगे तो वाइसराय कह देंगे कि सरकार इस सवालको विचार-
णीय सवाल मानने को तैयार नहीं है। अगर इसके बावजूद श्री गांधी इस सवालको
उठाना चाहें तो सरकार भारत-मन्त्रीको सूचित कर देगी कि श्री गांधी गोलमेज
सम्मेलनमें यह सवाल उठानेका इरादा रखते हैं। "
(ग) जहाँतक अमुक वित्तीय जिम्मेदारियोंके बारेमें भारतके दायित्वका सवाल
उठाने के और उनकी एक स्वतन्त्र अधिकरण द्वारा जांच करानेके अधिकारका सवाल है,
स्थिति यह थी कि वाइसराय किसी भी ऐसे प्रस्तावपर विचार करने को तैयार नहीं थे
जिसके तहत भारत सारे ऋणोंकी देनदारीको मानने से इनकार करता हो, लेकिन
गोलमेज सम्मेलन में कोई भी व्यक्ति भारतके वित्तीय दायित्वका सवाल उठाने और
उसकी जाँचकी मांग करनेको स्वतन्त्र होगा ।
(घ) जहाँतक नमक अधिनियम के खिलाफ राहत देनेका सवाल है, वाइसरायकी
स्थिति यह थी कि (१) यदि साइमन कमीशनकी सिफारिश मंजूर कर ली गई तो
नमक-करका प्रान्तीयकरण कर दिया जानेवाला है, और (२) पहले ही राजस्वमें बहुत
कमी हो गई है और इसलिए सरकार राजस्वके इस साधनको छोड़ना नहीं चाहेगी;
लेकिन यदि विधान सभाको यह अधिनियम रद करने के लिए राजी कर लिया गया,
और अगर कोई ऐसा प्रस्ताव रखा गया जिससे कि उक्त अधिनियमको रद करनेसे
होनेवाला घाटा पूरा किया जा सके तो वाइसराय और उनकी सरकार इस प्रन
पर उसके गुणावगुणकी दृष्टिसे विचार करेंगे। लेकिन जबतक नमक अधिनियम
कानूनके रूपमें जारी है aere वाइसरायके लिए उस अधिनियमके खुल्लमखुल्ला
उल्लंघनको माफ करना सम्भव नहीं है। सद्भावना और शान्ति स्थापित हो जाने के
बाद यदि भारतीय नेतागण गरीब वर्गोको आर्थिक राहत देने के तरीकोंके बारेमें बाइसराय
२. यह बातचीत २१ और २८ अगस्तको शिमला में सर तेजबहादुर सप्रु और श्री मु० रा० जयकर
तथा बाइसरायके बीच हुई थी देखिए पृष्ठ ११७ की पाद-टिप्पणी ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
३८९
चाहेंगे तो वाइसराय खुशीके साथ
और उनकी सरकारके साथ बातचीत करना
भारतीय नेताओंका एक छोटा-सा सम्मेलन बुलायेंगे ।
(ङ) धरनोंके बारेमें स्थिति यह थी कि यदि धरनेके कारण किसी वर्गके
लोगोंको किसी प्रकारकी उलझन या परेशानी होती है या धरना देनेके अलावा लोगों
को सताया भी जाता है या धमकी दी जाती है या बल-प्रयोग किया जाता है तो
बाइसराय सरकारका यह अधिकार मानते हैं कि कानूनके अनुसार जो कदम उठाये
जा सकते हैं, वे उठाये जायें, अथवा यदि कोई आपत्कालीन स्थिति उत्पन्न हो जाये
तो उसका सामना करनेके लिए जो भी कानूनी अधिकार जरूरी हों वे अधिकार
प्राप्त किये जायें। ऊपरकी शर्तोंके तहत, जब शान्ति स्थापित हो जायेगी तब धरनोंके
खिलाफ जारी किया गया अध्यादेश वापस ले लिया जायेगा ।
(च) उन अफसरों के बारेमें जिन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान इस्तीफा
दे दिया था या जिन्हें निकाल दिया गया था, स्थिति यह है कि वह मुख्यतः स्थानीय
सरकारोंके विवेकाधिकारकी बात है। स्थानीय सरकारोंसे अपेक्षा की जायेगी कि जिन
लोगोंने भावावेशमें आकर या जोश में बिना विचारे अपने पदोंसे त्यागपत्र दे दिया
था उन्हें ये फिर नौकरी में बहाल कर लें, बशर्ते कि स्थान रिक्त हों, और बातें
कि उनको बहाल करने के लिए राजनिष्ठ कर्मचारियोंको निकालने की जरूरत न पड़े।
(छ) जहाँतक प्रेस अध्यादेशके अन्तर्गत जब्त किये गये छापेखानोंको वापस
करनेका सवाल है, इसमें कोई कठिनाई नहीं होगी।
(ज) जहाँतक राजस्व कानून के अन्तर्गत किये गये जुर्मानों और जब्त की गई
सम्पत्तिको वापस करने का सवाल है, उसकी और बारीक व्याख्या करने की जरूरत
है। राजस्व कानूनके अन्तर्गत जब्त की गई या बेची गई सम्पतिमें तीसरे पक्ष के हित
भी निहित हो सकते हैं। जहाँ तक जुर्माने वापस करनेकी बात है, इसमें कठिनाइयाँ
हैं। संक्षेपमें, वाइसराय महोदय केवल इतना ही कह सकते थे कि स्थानीय सरकारें
न्यायपूर्वक अपने विवेकाधिकारका प्रयोग करेंगी और सभी परिस्थितियों पर विचार
करेंगी और जो कुछ कर सकती हैं करेंगी ।
(स) जहाँ तक कैदियोंकी रिहाईका सवाल है, वाइसराय महोदयने हमें लिखे
गये अपने २८ जुलाईके पत्र में अपने विचार पहले ही बता दिये हैं।
[ अंग्रेजीसे ]
हिन्दू, ५-९-१९३०
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट ५
नेहरू द्वयको टिप्पणी'
नैनी सेंट्रल जेल
३१ अगस्त, १९३०
हम लोगोंकी श्री मु० रा० जयकर और सर तेजबहादुर सप्रुके साथ कल
तथा आज आगे और मुलाकातें हुई और लम्बी बातचीत हुई। उन्होंने हमें वाइसराय
द्वारा उनको लिखे गये २३ अगस्तके पत्रकी एक नकल दी है। इस पत्र में यह बात
स्पष्ट रूपसे कही गई है कि सर तेजबहादुर सप्रू और श्री जयकरके नाम लिखे
हमारे १५ अगस्तके संयुक्त पत्रमें जो सुझाव दिये गये हैं, उनके आधार पर किसी
प्रकारकी बातचीतको वाइसराय महोदय असम्भव मानते हैं, और इन परिस्थितियों में
उन्होंने यह निष्कर्ष ठीक ही निकाला है कि उनके प्रयत्न विफल मनोरथ हुए हैं।
यह संयुक्त पत्र, जैसा कि आप जानते हैं, पत्र पर हस्ताक्षर करनेवालों द्वारा पूरी
तरह विचार-विमर्श करनेके बाद लिखा गया था और हस्ताक्षरकर्ता अपनी व्यक्तिगत
हैसियतमें ज्यादासे ज्यादा जिस हद तक जानेको तैयार थे, वह इसमें बताया गया
था । हमने उस पत्र में कहा था कि कोई समझीता तबतक सन्तोषजनक नहीं होगा
जबतक कि वह कुछ महत्वपूर्ण शर्तोंको पूरा न करता हो, और जबतक उस
आशयकी एक सन्तोषजनक घोषणा ब्रिटिश सरकार नहीं कर देती। यदि ऐसी घोषणा
कर दी जाये तो हम कार्य समितिसे सविनय अवज्ञा आन्दोलन समाप्त करनेकी सिफारिश
करनेको तैयार हैं, बशर्ते कि उसके साथ ही भारत सरकार हमारे पत्र में उल्लिखित
अमुक कदम उठाये ।
इन आरम्भिक मुद्दों पर सन्तोषजनक समझौता हो जानेके बाद ही प्रस्तावित
लन्दन सम्मेलनके गठनका सयाल और उसमें कांग्रेसके प्रतिनिधित्वके सवालको तय
किया जा सकता था। लॉर्ड इविन अपने पत्र में इन प्रस्तावोंके आधार पर बातचीत
तकको असम्भव बताते हैं। ऐसी स्थितिमें हमारे बीच बातचीतका कोई समान आधार
नहीं है, और न हो सकता है। पत्रमें जो कुछ बातें कही गई है उनके अलावा भी
पत्रकी ध्वनि, और भारतमें ब्रिटिश सरकारकी हालकी कार्रवाइयाँ इस बातकी सूचक
हैं कि सरकारके मनमें शान्तिकी कोई इच्छा नहीं है। कार्य समितिने दिल्ली में अपनी
बैठक बुलाने की घोषणा की थी, लेकिन इसके फौरन बाद ही सरकार द्वारा दिल्ली
प्रान्त में कांग्रेस कार्य समितिको एक अवैध संगठन घोषित कर देने, और बादमें उसके
अधिकांश सदस्योंको गिरफ्तार कर लेनेके अर्थ इसके सिया दूसरे नहीं हो सकते कि
उसकी शान्तिकी इच्छा नहीं है। हमें इन या अन्य गिरफ्तारियोंके खिलाफ या
सरकारकी अन्य कार्रवाइयोंके खिलाफ कोई शिकायत नहीं है, हालांकि इनमें से कुछ
१. देखिए पृष्ठ १२७ की पाद-टिप्पणी।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४२९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
३९१
कार्रवाइयोंको हम 'असभ्यतापूर्ण' और 'वर्वरतापूर्ण' समझते हैं। हम उनका स्वागत
करते हैं। लेकिन हमें लगता है कि हमारा यह कहना उचित ही है कि एक तरफ
तो शान्तिकी इच्छा करना, और दूसरी ओर एक ऐसे संगठन पर आक्रमण करना
जो शान्ति दे सकता है और जिसके साथ सरकार समझौतेकी बातचीत भी करना
चाहती है, ये दो ऐसी बातें हैं जिनका मेल नहीं बैठता। समस्त भारतमें कार्य समितिके
गैर-कानूनी करार दिये जाने और उसकी बैठकको रोकने के अर्थ ही हैं कि जो भी
परिणाम हों, लेकिन राष्ट्रीय संघर्ष जारी ही रहेगा और शान्तिकी कोई सम्भावना
नहीं होगी, क्योंकि जिन लोगोंको भारतकी जनताका प्रतिनिधित्व करनेका कुछ
अधिकार है, वे भारतकी ब्रिटिश जेलोंमें बन्द होंगे ।
लॉर्ड इर्विन के पत्र तथा ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई कार्रवाईसे साफ हो
जाता है कि सर तेजबहादुर सप्रु और श्री जयकरके प्रयत्न निष्फल हो गये हैं।
वस्तुतः उनका पत्र और हमें जो कैफियतें दी गई थीं, वे हमें कुछ दृष्टियोंसे पहलेकी
स्थिति से भी पीछे ले जाते हैं। हमारी स्थिति और लॉर्ड इविनकी स्थिति के बीच जो
गहरा अन्तर है, उसे देखते तफसीलमें जानेकी जरूरत ही नहीं है; लेकिन हम आपको
उनके पत्रकी कुछ बातें बताना चाहेंगे। उनके पत्रका प्रथम अंश तो विधान सभामें
दिये गये उनके भाषण और १६ जुलाईको श्री जयकर और सर तेजबहादुर सप्रुको
लिये गये उनके पत्रकी भाषा-शैलीकी पुनरावृत्ति ही । जैसाकि हमने अपने संयुक्त
पत्रमें कहा था, उसकी यह भाषा और शैली इतनी अस्पष्ट है कि हम उसका मूल्यांकन
नहीं कर सकते। उसके कुछ भी अर्थ निकाले जा सकते हैं। अपने संयुक्त पत्र में
हमने स्पष्ट कर दिया है कि एक पूर्णतः राष्ट्रीय सरकार, जोकि भारतकी जनता के
प्रति उत्तरदायी हो और जिसे सशस्त्र सेना और आर्थिक मामलों पर पूरा नियन्त्रण
प्राप्त हो, भारतकी तात्कालिक मांगके रूपमें स्वीकार की जानी चाहिए। इसमें आम
तौर पर जिन्हें पूर्वोपाय कहा जाता है उनका, अथवा किसी विलम्बका कोई प्रश्न
नहीं पैदा होता। सत्ताके हस्तान्तरणके लिए कुछ मामलों में समंजनकी आवश्यकता
जरूर होगी, और इसके बारेमें हमारा कहना है कि इसका निर्धारण भारतके निर्वाचित
प्रतिनिधियों द्वारा किया जायेगा ।
जहाँ तक भारत द्वारा जब मर्जी हो तब ब्रिटिश साम्राज्यसे अलग हो जाने के
अधिकारका और ब्रिटेनके दावों और ब्रिटेनको प्राप्त रियायतोंके मामलेको एक
स्वतन्त्र अधिकरणको सौंपनेके उसके अधिकारका सवाल है, हमें केवल यह बताया जाता
है कि सम्मेलन एक स्वतन्त्र सम्मेलन होगा और उसमें कोई भी मुद्दा उठाया जा
सकता है। इसे तो पिछली स्थितिसे कुछ आगे बढ़ना नहीं कहा जायेगा। तथापि हमें
आगे यह भी बताया गया है कि यदि भारत में ब्रिटिश सरकारको यह सम्भावना
लगी कि भारत द्वारा साम्राज्यसे अलग होनेका सवाल उसके सामने उठाया ही जायेगा
तो लॉर्ड इविन कह देंगे कि यह सवाल कोई खुला सवाल नहीं है। उनके अनुसार
भारतकी ब्रिटिश सरकार तो केवल इतना ही कर सकती है कि वह इस सवालको
सम्मेलनमें उठाके हमारे इरादेकी सूचना भारत-मन्त्रीको दे दे।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३०
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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
जहाँ तक दूसरे प्रस्तावका सवाल है, हमें बताया गया है कि लॉर्ड इविन कुछ
वैयक्तिक आर्थिक लेन-देनके मामलोंकी छानबीनकी बातपर ही विचार कर सकते
हैं। व्यक्तिगत मामलोंमें ऐसी छानबीन अवश्य की जा सकती है, लेकिन इस छानबीनकी
परिधिको फैलाना होगा ताकि उसमें ब्रिटेन के सारे दावे भी आ जायें, जिनमें भारतका
तथाकथित सार्वजनिक ऋण भी शामिल है। हम इन दोनों प्रश्नोंको अत्यन्त महत्वपूर्ण
मानते हैं और हमारी दृष्टिमें इसपर हमारे संयुक्त पत्र में पहले ही सहमति हो जाना
अत्यावश्यक है।
कैदियोंकी रिहाईके बारेमें लॉर्ड इविनने जो कुछ कहा है उसका दायरा अत्यन्त
सीमित और असन्तोषजनक है। वह हमें यह आश्वासन देने में असमर्थ हैं कि सविनय
अवज्ञा आन्दोलनके सिलसिले में गिरफ्तार सभी अहिंसक कैदी रिहा कर दिये जायेंगे ।
वह केवल इतना करना चाहते हैं कि इस मामलेको स्थानीय सरकारोंके हाथमें छोड़
दें हम ऐसे मामले में स्थानीय सरकारों या स्थानीय अधिकारियोंकी उदारता या
सहानुभूतिपर भरोसा नहीं करना चाहते। लेकिन इसके सिवा लॉर्ड इविनके पत्र में
अन्य अहिंसक कैदियोंका कोई जिक्र नहीं है। ऐसे कांग्रेसजन और अन्य लोग बहुत
बड़ी संख्या में हैं जिन्हें सविनय अवज्ञा आन्दोलनसे पहले राजनीतिक अपराधोंके कारण
जेल में डाल दिया गया था। इस सिलसिले में हम मेरठवाले मामलेके कैदियोंका उल्लेख
करना चाहेंगे जो डेढ़ साल से जेल में हैं और जिनपर अभी मुकदमा चलना शुरू भी
नहीं हुआ है। हमने अपने संयुक्त पत्रमें स्पष्ट कर दिया है कि इन सभी व्यक्तियोंको
रिहा कर दिया जाना चाहिए।
बंगाल और लाहौर केस अध्यादेशोंके सम्बन्धमें लॉर्ड इविनने कहा है कि इन्हें
छोड़कर अन्य सभी अध्यादेश वापस ले लिये जायेंगे। हमें लगता है कि इन्हें भी
वापस ले लिया जाना चाहिए। हमने यदि उन राजनीतिक कैदियोंकी रिहाई की मांग
नहीं की है जो हिंसात्मक कार्योंके दोषी हैं, तो उसका कारण यह नहीं है कि हम
उनकी रिहाईका स्वागत नहीं करेंगे बल्कि इस कारण कि हमें लगा कि चूंकि हमारा
आन्दोलन पूरी तरह अहिंसात्मक है अतः हम मामलेको उलझायेंगे नहीं। लेकिन हम
कमसे कम जो कर सकते हैं वह यह है कि हम आग्रह करें कि हमारे अपने इन
देशभाइयोंके ऊपर साधारण अदालतमें मुकदमा चलाया जाये, किसी ऐसे अध्यादेश के
अन्तर्गत संगठित एक असाधारण अदालतमें नहीं जो उन्हें अपील करनेके अधिकारसे
और किसी अभियुक्तको जो साधारण अधिकार प्राप्त होते हैं, उनसे वंचित करता हो ।
खुली अदालत में तथाकथित मुकदमेके दौरान क्रूरतापूर्वक मारने-पीटने तककी
जो विस्मयकारी घटनाएँ हुई हैं, उनको देखते यह अत्यावश्यक है कि अदालत में
मुकदमा चलाने की साधारण प्रक्रियाका अनुगमन किया जाये। हम समझते हैं कि कुछ
अभियुक्त अपने साथ किये जानेवाले व्यवहारके विरोध में काफी अर्सेसे भूख-हड़ताल
कर रहे हैं और अब मौतके दरवाजे पर पहुँच गये हैं। हम समझते हैं कि बंगाल-
अध्यादेशका स्थान अब बंगाल विधान परिषद के एक अधिनियमने ले लिया है। हम इस
अध्यादेशको और उसपरसे पास किये गये किसी भी अधिनियमको अत्यन्त आपत्तिजनक
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३१
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३९३
मानते हैं, और इस तथ्यसे बात कुछ सुधर नहीं जाती कि बंगालकी वर्तमान विधान-
परिषद जैसी गैर-प्रातिनिधिक संस्थाने यह अधिनियम पास किया है।
जहाँ तक विदेशी वस्त्रों और शराबकी दुकानों पर धरना देनेका सवाल है,
हमें बताया गया है कि लॉर्ड इविन धरनेके विरुद्ध जारी किया गया अध्यादेश वापस
लेनेको तैयार हैं, लेकिन वह यह भी कहते हैं कि यदि उन्होंने जरूरी समझा तो
धरनोंका मुकाबला करनेके लिए वह नये कानून बनायेंगे। दूसरे शब्दोंमें, वह हमें
सूचित करते हैं कि वह जब भी जरूरी समझेंगे, इस अध्यादेशको फिरसे जारी करेंगे
या शिमला में बैठकर इसी प्रकारकी कोई दूसरी चीज करेंगे। हमारे संयुक्त पत्र में
नमक -अधिनियम तथा अन्य चीजोंके बारेमें जो कुछ कहा गया था उसके सम्बन्धमें
भी उनका जवाब बिलकुल असन्तोषजनक है। आप नमकके जाने-माने विशेषज्ञ हैं,
अतः हमें यहाँ उसके विषय में विस्तारसे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। हम इतना
ही कहेंगे कि इन विषयों पर हमने पहले जो स्थिति अपनाई है, उसमें परिवर्तन
करनेका हमें कोई कारण नहीं दिखता ।
इस प्रकार हमारे संयुक्त पत्रमें जो मुख्य प्रस्ताव थे उन सभीको, तथा बहुतसे
छोटे-मोटे प्रस्तावोंको लॉर्ड इविनने स्वीकार करनेसे इनकार कर दिया है। उनके
और हमारे दृष्टिकोण में बहुत अन्तर है, बल्कि यह अन्तर बुनियादी है। हमें आशा
है कि आप इस टिप्पणीको श्रीमती सरोजिनी नायडू, श्री वल्लभभाई पटेल, और
श्री जयरामदास दौलतरामको दिखा देंगे और उनसे परामर्श करके श्री जयकर तथा
सर तेजबहादुर सप्रूको अपना उत्तर देंगे। हमें लगता है कि पत्र-व्यवहारके प्रकाशनमें
और अधिक विलम्ब नहीं किया जाना चाहिए, और हमारा जनताको अँधेरेमें
रखना उचित नहीं है। इनके प्रकाशन के प्रश्नके अतिरिक्त, हम सर तेजबहादुर सप्रू
और श्री जयकरसे अनुरोध कर रहे हैं कि ये सारे पत्र-व्यवहार तथा सभी प्रासंगिक
कागज-पत्रोंको भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके कार्यवाहक अध्यक्ष श्री खलीकुज्जमाके पास
भेज दें। कार्य समिति अभी काम कर रही है, इसलिए हमें लगता है कि उसे
तत्काल सूचना भेजे बिना हमें कोई कदम नहीं उठाना चाहिए।
मोतीलाल
सैयद महमूद
जवाहरलाल
[ अंग्रेजीसे ]
हिन्दू, ५-९-१९३०
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट ६
आश्रम भजनावलि १
१
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरद् आत्म-तत्त्वम्
सत्-चित्-सुखं परमहंस-गति
तुरीयम् ।
यत् स्वप्न जागर सुषुप्तम् अवैति नित्यम्
तद् ब्रह्म निष्कलम् अहं न च भूत-संघः ॥
२
प्रातर् भजामि मनसो वचसाम् अगम्यम्
वाचो विभान्ति निखिला यद् अनुग्रहेण ।
यन् 'नेति नेति' वचनैर् निगमा अवोचुस्
तं देव-देवम् अजम् अच्युतम् आहुर् अस्यम् ॥
३
प्रातर् नमामि तमसः परम् अर्क-वर्णम्
पूर्ण सनातन-पदं पुरुषोत्तमाख्यम् ।
यस्मिन् इदं जगद् अशेषम् अशेष-मूर्ती
रज्ज्वा भुजंगम इव प्रतिभासितं वै ।।
२०-१२-१९३०
७-५-१९३०
८-५-१९३०
१. आश्रम भजनावलि गांधीजी के आश्रमोंमें होनेवाली सुबह-शामको प्रार्थनाओं और प्रधानतः विविध
भारतीय भाषाओंके भजनसंग्रह है। ये भजन अधिकांशतः सुप्रसिद्ध संत-कवियोंके हैं, किन्तु कुछ ऐसे
भी है जिनके रचयिताओंका ठीक पता नहीं है किन्तु जो भजनानन्दी गायकों के गीत-साहित्यका अंग हो
गये है और इस भजनावलिमें इसीलिए स्थान पा गये है। सन् १९३० में जब गांधीजी परवडा जेल में थे,
उन्होंने मीरायहनके उपयोगके लिए इनमें से अधिकांश प्रार्थनाओं और भजनोंका अंग्रेजी अनुवाद किया था।
अनुवाद कार्य ६ मई, १९३० को आरम्भ हुआ और १५ दिसम्बर को पूरा हुआ था। अंग्रेजी अनुवादके
लिए पाठक इस ग्रन्थावलीका ४४ देखें तो हम उस अंग्रेजी अनुवादमें गृहीत क्रमके अनुसार
मूल श्लोक आदि और अमन ही दे रहे हैं और जहां कहीं गांधीजीने अपने अंग्रेजी अनुवादमें मूल भाव
या विचारको स्पष्ट करनेके लिए कुछ जोड़ा है या कोई टिप्पणी दी है उसे भी दे रहे हैं। प्रत्येक श्लोक
और भजनके अन्त में रही हुई तारीख सूचित करती है कि उसका अंग्रेजी अनुवाद गांधीजीने किस दिन
किया था। हिन्दी पाठकों के सूचनायें यहां इतना और कहना जरूरी लगता है कि नवजीवन प्रकाशन मन्दिर
द्वारा प्रकाशित
आश्रम भजनावलि में संस्कृत स्टोफका गांधीजीके निकट सहयोगी किशोरलाल
मशरूवाला कृत हिन्दी अनुवाद प्राप्त है जिसे गांधीजीका स्वीकार किया हुआ माना जा सकता है और
उसमें अन्त में भजनों में आये हुए कठिन शब्दोंका कोष भी दिया गया है।
२. गांधीजी की टिप्पणी: "प्रथम श्लोकफा अनुवाद २०-१२-१९३० को दोबारा किया गया।"
गांधीजीने पहले इसका अनुवाद ६ मईको किया, दोबारा २० नवम्बरको और फिर अन्तमें २०-१२-१९३० को
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४३३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
४
समुद्र-वसने ! देवि ! पर्वत स्तन मण्डले !।
विष्णु-पत्नि ! नमस्तुभ्यम्; पाद-स्पर्श क्षमस्व मे ।।
५.
९-५-१९३०
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माऽच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
३९५
१०-५-१९३०
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ! |
६
!
निविडनं कुरु मे देव !
शुभ-कार्येषु सर्वदा ।।
११-५-१९३०
गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर् विष्णुर्, गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म
तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
१२-५-१९३०
८
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर् ध्यान- गम्यम्
वन्दे विष्णुं भय-भय-हरं सर्वलोकैकनाथम् ।।
१३-५-१९३०
९
कर-चरण कृतं वाक् कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं या मानस वाऽपराधम् ।
विहितम् अविहितं वा सर्वम् एतत् क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे ! श्रीमहादेव शम्भो ! ॥
१४-५-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३९६
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
१०.
न त्वहं कामये राज्यम् न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
कामये दुःख तप्तानाम् प्राणिनाम् आर्ति-नाशनम् ।।
१५-५-१९३०
११
स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्ताम्
न्याय्येन मार्गेण महीं महीनाः ।
गो-ब्राह्मणेभ्यः शुभम् अस्तु नित्यम्;
लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ॥
१२
नमस् ते सते ते जगत्-कारणाय
नमस् ते चिते सर्व-लोकाश्रयाय ।
नमोऽद्वैत तत्त्वाय मुक्ति प्रदाय
नमो ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय ।।
१३
त्वम् एकं शरण्यं त्वम् एकं वरेण्यम्
त्वम् एकं जगत्-पालक स्व-प्रकाशम् ।
त्वम् एकं जगत्-कर्तृमातृ-प्रहर्तुं
त्वम् एकं परं निश्चलं निर्विकल्पम् ।।
१६-५-१९३०
१७-५-१९३०
१८-५-१९३०
१४
भयानां भयं भीषणं भीषणानाम्
गतिः प्राणिनां पावनं पावनानाम् ।
महोच्चैः पदानां नियन्तु त्वम् एकम्
परेषां परं रक्षणं रक्षणानाम् ॥
१९-५-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
१५
वयं त्वां स्मरामो वयं त्वां भजामो
वयं त्वां जगत् साक्षि-रूपं नमामः ।
सद् एकं निधानं निरालंबम् ईशम्
भवाम्भोधि-पोतं शरण्यं व्रजामः ॥
१६
२०-५-१९३०
विपदो नैव विपदः संपदो नैव संपदः ;
विपद् विस्मरणं विष्णोः संपन् नारायण-स्मृतिः ।।
१७
२१-५-१९३०
विष्णुर् या त्रिपुरान्तको भवतु वा ब्रह्मा सुरेन्द्रोऽथवा
भानुर् वा शश-लक्षणोऽथ भगवान् बुद्धोऽथ सिद्धोऽथवा ।
राग-द्वेष-विपाति- मोह-रहितः सत्त्वानुकंपयतो
यः सर्वेः सह संस्कृतो गुणगणैस् तस्मै नमः सर्वदा ।।
१८
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत् त्वं पूषन् ! अपावृणु सत्य धर्माय दृष्टये ॥
[ ईश, १५ ]
२२-५-१९३०
१९
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणम् एनो
भूयिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ॥
[ ईश, १८]
२०
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यम् एतः
तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयो वृणीते ।
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥
[ कठ, १. २. २]
२३-५-१९३०
२४-५-१९३०
२५-५-१९३०
३९७
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सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
२१
सर्वे वेदा यत्पदम् आमनन्ति
तपांसि सर्वाणि न यद् वदन्ति ।
यद् इच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत् ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॐ इत्येतत् ।।
[कठ, १.२.१५]
२२
न तत्र सूर्यो भाति, न चन्द्र-तारकम्
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयम् अग्निः ?
तम् एव भान्तम् अनुभाति सर्वम्
तस्य भासा सर्वम् इदं विभाति ।।
२३
[ कठ, २.५. १५ ]
तपःश्रद्धे ये
धुपवसन्त्यरण्ये
शान्ता विद्वांसो भैक्षचयाँ चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति
२६-५-१९३०
२७-५-१९३०
यत्रामृतः स पुरुषो
व्ययात्मा ।।
[ मुंडक १.२.११]
२८-५-१९३०
२४
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथम् एव तु ।
बुद्धि तु सारथि विद्धि मनः प्रग्रहम् एव च ।।
इन्द्रियाणि हयान् आहुर् विषयांस् तेषु गोचरान् ।
आरमेन्द्रियमनोयुक्तम् भोक्ते त्याहुर् मनीषिण: ।
२५
[ कठ, १. ३. ३-४ ]
२९-५-१९३०
विज्ञानसारथिर् यस् तु मनः प्रग्रहवान् नरः ।
सोऽध्वनः पारम् आप्नोति तद्
विष्णोः परमं पदम् ।।
[ कठ, १.३.९]
३०-५-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
२६
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस् तत् कवयो वदन्ति ॥
[ कठ, १. ३. १४ ]
३९९
२७
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूप
एकस् तथा
रूपं रूपं
प्रतिरूपो बभूव ।
सर्व भूतान्तरात्मा
प्रतिरूपो वहिश् च ॥
[कठ, २५.९]
वायुर्
यसैको
रूपं रूपं
२८
भुवनं प्रविष्टो
प्रतिरूपो बभूव ।
एकस् तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश् च ॥
२९
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्
एकस्
न लिप्यते चाक्षुर् बाह्यदोषः ।
सर्वभूतान्तरात्मा
तथा
न लिप्यते लोकदुःखेन बाहाः ॥
३०
एको वशी
सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तम् आत्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्
तेषां सुखं शादयतं; नेतरेषाम् ।।
३१-५-१९३०
१-६-१९३०
२-६-१९३०
३-६-१९३०
४-६-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४००
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
३१
नित्योऽनित्यानां चेतनश् चेतनानाम्
एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तम् आत्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्
तेषां शान्तिः शाश्वतो; नेतरेषाम् ॥
[ कठ, २. ५. १०-१३]
परीक्ष्य
लोकान्
३२
कर्मचितान्
ब्राह्मणो निर्वेदम् आयान् 'नास्त्यकृतः कृतेन '।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुम् एवाभिगच्छत्
समित्पाणिः
श्रोत्रियं
ब्रह्म-निष्ठम् ॥
[ मुंडक, १.३. ११, १२]
३३
६-६-१९३०
तस्मै स विद्वान् उपसन्नाय सम्यक्
प्रशान्त-चित्ताय
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यम्
शमान्विताय ।
प्रोवाच तो ततो
ब्रह्मविद्याम् ।।
[ मुंडक, १.२.१]
७-६-१९३०
३४
प्रणव धनुः शरोह्यात्मा, ब्रह्म तत् लक्ष्यम् उच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यम् शरवत् तन्मयो भवेत् ।।
[ मुंडक, २. २.४]
३५
८-६-१९३०
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥
[ मुंडक, २. २.८]
९-६-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४-२६
परिशिष्ट
३६
ब्रह्मैवेदम् अमृतं पुरस्ताद् ब्रह्म
पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश् चोत्तरेण ।
अथश् चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मवेदम्
विश्वम्
इर्द
वरिष्ठम् ।।
[ मुंडक, २.२.११]
३७
सत्येन लभ्यस् तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो
यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ।।
३८
सत्यम् एव जयते, नानृतम्
सत्येन पन्था
विततो देवयानः ।
येनाक्रमन्ति ऋषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ।।
[ मुंडक, ३. १.५, ६]
नायम् आत्मा
न
मेघया
३९
प्रवचनेन लभ्यो
न बहुना श्रुतेन ।
यम् एवैष वृणुते तेन लभ्यस्
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।।
१०-६-१९३०
११-६-१९३०
१२-६-१९३०
१३-६-१९३०
नायम्
४०
आत्मा बलहीनेन लभ्यो
न च प्रमादात् तपसो वायलिंगात् ।
एतैर् उपायर् यतते यस्तु विद्वांस्
तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ।।
[ मुंडक, ३. २.३, ४]
१३-६-१९३०
४०१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०२
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
४१
सम्प्राप्यैनम् ऋषयो ज्ञान-तृप्ताः
कृतात्मानो वीतरागाः
प्रशान्ताः ।
ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य
धीरा
युक्तात्मानः सर्वम् एवाविशन्ति ।।
४२
वेदान्त - विज्ञान-सुनिश्चितार्थाः
संन्यास-योगाद् यतयः शुद्ध-सत्वाः ।
ते
ब्रह्म-लोकेषु
परामृताः
परान्तकाले
परिमुच्यन्ति
सर्वे ॥
[ मुंडक, ३.२.५, ६]
यथा
नद्यः
४३
स्यन्दमानाः समुद्रे
अस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्त:
परात्परं पुरुषम् उपैति दिव्यम् ॥
१४-६-१९३०
१५-६-१९३०
૪૪
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद, ब्रह्मैव भवति ।
नास्याब्रह्मवित् कुले भवति ।
तरति शोकं, तरति पाप्मानम्
गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ।।
[ मुंडक, ३. २. ८, ९]
४५
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन ।।
एतं हि वाव न तपति 'किम् अहं साधु नाकरवम् ।
किम्
अहं
१६-६-१९३०
१७-६-१९३०
पापम्
अकरवम्' इति ॥
[ तैत्तिरीय, २. ९]
१८-६-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
४६
युवा स्यात् साधु युवाध्यायकः आशिष्ठोद्ररिष्ठो बलिष्ठः ।
तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् ।।
[ तैत्तिरीय, २. ८ ]
४०३
४७
१९-६-१९३०
अनृतदर्शी । सभा: समाजांश्चागन्ता ।
अजनवादशीलः । रहः शीलः । गुरोरुदाचारेष्वकर्ता स्वैरिकर्माणि । स्त्रीषु यावदर्थ-
संभाषी । मृदुः । शान्तः । हीमान् । दृधृतिः । अग्लास्तुः । अक्रोधनः । अनसूयः । सायं-
प्रातरुवकुम्भमात् । अरण्यादेधानाहृत्याथो निदध्यात् ।।
२०-६-१९३०
४८
बलं वाव विज्ञानाद् भूयः; अपि ह शतं विज्ञानवताम् एको
बलवान् आकम्पयते । स यदा बली भवति अथोत्थाता
भवति, उत्तिष्ठन् परिचरिता भवति, परिचरन् उपसत्ता
भवति, उपसीदन् द्रष्टा भवति श्रोता भवति, मन्ता
भवति, योद्धा भवति, कर्ता भवति, विज्ञाता भवति ॥
[ छान्दोग्य, ७ ८ १ |
४९
मधुवाता ऋतायते । मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर् नः
सन्त्वोषधीः । मधु नक्तम् उतोषसः । मधुमत् पार्थिवं
रजः । मधु चीर् अस्तु नः पिता । मधुमान् नो वनस्पतिः ।
मधुमान् अस्तु सूर्य माध्वीर् गावो भवन्तु नः ।।
[ बृहदारण्यक, ६. ३.६ ]
।
२१-६-१९३०
५०
न जातु कामात् न भयात् न लोभात्
धर्मं त्यजेत् जीवितस्यापि हेतोः ।
धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये
जीवो नित्यो हेतुर् अस्य त्वनित्यः ।।
२२-६-१९३०
२३-६-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०४
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
५१
यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति ।
[ छान्दोग्य, १. १. १०]
५२
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तर्वैर्
वेदैः सांग-पदक्रमोपनिषदैर् गायन्ति यं सामगाः ।
ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥
५३
विद्या मन्दिरकी प्रार्थना
२४-६-१९३०
२५-६-१९३०
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतम्
अस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
५४
[ तैत्तिरीय, २ ( शान्ति पाठ ) ]
२६-६-१९३०
ॐ असतो मा सद् गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर् माऽमृतं गमय ।
५५
[वृहदारण्यक, ३,२८]
२७-६-१९३०
योऽन्तः प्रविश्य मम वाचम् इमां प्रसुप्ताम्
संजीवयत्यखिल-शक्ति-धरः स्वधाम्ना ।
हस्त-चरण-श्रवण त्वगादीन्
अन्यांश्च
प्राणान् नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ।।
२८-६-१९३०
५६
स्त्रीवर्गकी प्रार्थना
गोविन्द ! द्वारिकावासिन् ! कृष्ण !
नाथ ! हे
गोपीजनप्रिय ! |
कौरवः परिभूतां माम् कि न जानासि केशव ।।
रमानाथ! व्रजनाथार्तिनाशन !।
कौरवार्णव-मग्नां माम् उद्धरस्व जनार्दन ॥
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
कृष्ण ! कृष्ण ! महायोगिन् ! विश्वात्मन् ! विश्वभावन
४४५
1
प्रपन्नां
पाहि
गोविन्द !
"
कुरुमध्ये ऽवसीदतीम् ।।
२९-६-१९३०
५७
धर्मं चरत, माध्यमंम् सत्यं वदत, नानुतम् ।
दीर्घ पश्यत मा ह्रस्वम्; परं पश्यत, माऽपरम् ।।
५८
अहिंसा सत्यम् अस्तेयम् शौचम् इन्द्रिय-निग्रहः ।
एतं सामासिकं धर्मम् चातुर्वण्र्येऽब्रवीन् मनुः ।।
३०-६-१९३०
१-७-१९३०
५९
अहिंसा सत्यम् अस्तेयम् अकाम-क्रोध-लोभता ।
भूत-प्रिय-हितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिकः ।।
२-७-१९३०
३-७-१९३०
६०
विद्यद्भिः सेवितः सद्भिर् नित्यम् अद्वेष-रागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस् तं निबोधत ॥
६१
श्रूयतां धर्म-सर्वस्वम्, श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।।
दलोकार्थेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।
परोपकारः
पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
६२
आदित्य-चन्द्रावनिलोऽनलश्च
योर् भूमिर् आपो हृदयं यमश्च ।
अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये
धर्मोऽपि जानाति नरस्य वृत्तम् ।।
४-७-१९३०
५-७-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
६३
द्वादश-पंजरिकास्तोत्रसे
मूढ ! जहीहि धनागम तृष्णाम् कुरु सद्बुद्धि मनसि
वितृष्णाम् ।
यल्लभसे निज कर्मोपात्तम् वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ।।
६४
६-७-१९३०
अर्थम् अनर्थं भावय नित्यम् नास्ति ततः सुख-लेशः सत्यम् ।
पुत्राद् अपि धन-भाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ।।
७-७-१९३०
६५
काम क्रोध लोभं मोहम् त्यक्त्वाऽऽत्मानं भावय कोऽहम् ।
आत्म-ज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरक-निगूढाः ।।
६६
८-७-१९३०
त्वयि मयि चान्यत्रको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि सर्व-सहिष्णुः ।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानम् सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ।।
६७
९-७-१९३०
नलिनी-दल-गत सलिलं तरलम् तद्वज्-जीवितम् अतिशय-
चपलम् ।
विद्धि व्याध्यभिमान प्रस्तम् लोकं शोक हतं च समस्तम् ।।
६८
१०-७-१९३०
पाण्डव गीतासे
पाण्डव : प्रह्लाद-नारद-पराशर- पुण्डरीक-
व्यासाम्बरीष शुक- शौनक भीष्म-दाभ्यान् ।
रुक्मांगदार्जुन वसिष्ठ-विभीषणादीन्
पुण्यान् इमान् परमभागवतान् स्मरामि ।।
११-७-१९३०
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६९
कुन्ती : स्वकर्म-फल- निर्दिष्टां यां यां योनि व्रजाम्यहम् ।
तस्यां तस्यां हृषीकेश ! त्वयि भक्तिर् दृढाऽस्तु मे ।।
७०
द्रोण ये ये हताश् चक्रधरेण राजन् !
त्रैलोक्यनाथेन
जनार्दनेन ।
ते ते गता विष्णुपुरीं
प्रयाताः
क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः ॥
१२-७-१९३०
१३-७-१९३०
७१
गान्धारी : त्वम् एव माता च पिता त्वम् एव
त्वम् एव बंधुश्च सखा त्वम् एव ।
त्वम् एव विद्या द्रविणं त्वम् एव
त्वम् एव सर्व मम देवदेव ! ॥
१४-७-१९३०
७२
विराट: नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।।
प्रह्लाद :
नाथ !
योनिसहस्रेषु येषु येषु व्रजाम्यहम् ।
तेषु तेष्वचलाभक्तिर् अच्युतास्तु सदा त्वयि ।।
या प्रीतिर् अविवेकानां विषयेष्वनपायिनी ।
त्वाम् अनुस्मरतः सा मे हृदयान् मापसर्पतु ॥
भरद्वाज :
लाभस् तेषां जयस् तेषां कुतस् तेषां पराजयः ।
येषाम् इन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥
मार्कण्डेय :
सा हानिस् तन् महच्छिद्रं सा चान्ध-जड मूढता ।
यन्मुहूर्त क्षणं वापि वासुदेवं न चितयेत् ॥
४०७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०८
शौनक :
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
भोजनाच्छादने चिन्तां वृथा कुर्वन्ति वैष्णवाः ।
योऽसौ विश्वम्भरो देवः स भक्तान् किम् उपेक्षते ।।
सनत्कुमार:
आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।
सर्व देव-नमस्कारः केशवं प्रति
७३
गच्छति ।।
१५-७-१९३०
मुकुन्दमालासे
श्रीवल्लभेति वरदेति
दयापरेति
भक्त प्रियेति
भव लुण्ठन- कोविदेति ।
नाथेति नाग-शयनेति जगन्निवासे-
त्यालापिनं प्रतिदिनं कुरु मां मुकुन्द ।।
१५-७-१९३०
मुकुन्द
७४
! मूर्ध्ना प्रणिपत्य याचे
भवन्तम् एकान्तम् इयन्तम् अर्थम् ।
अविस्मृतिस् त्वच्चरणारविन्दे
भवे भवे मेऽस्तु भवत्प्रसादात् ।।
नास्था धर्मे न वसु-निचये नैव कामोपभोगे
यद् भाव्यं तद् भवतु भगवन् पूर्व-कर्मानुरूपम् ।
एतत् प्राप्यं मम बहु-मतं जन्म-जन्मान्तरेऽपि
स्वतपादाम्भोरुह युग-गता निश्चला भक्तिर् अस्तु ।।
दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो
नरके वा नरकान्तक ! प्रकामम् ।
| अवधीरित शारदारविन्दी
चरणी ते मरणेऽपि
चिन्तयामि ॥
भव जलधि-गतानां द्वन्द्व वाताहतानाम्
सुत दुहितृ-फल- प्राण-भारावृतानाम् ।
विषम-विषय-तोये मज्जताम् अपल्वानाम्
भवति शरणम् एको विष्णु-पोतो नराणाम् ।।
१६-७-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
७५
भव- जलधिम् अगाधं दुस्तरं निस्तरेयम्
कथम् अहम् इति चेतो मा स्म गाः कातरत्वम् ।
सरसिज दृशि देवे तावकी भक्तिर् एका
नरक - भिदि-निषण्णा
तारयिष्यत्यवश्यम् ।।
बढेनाञ्जलिना नतेन शिरसा गात्रैः सरोमोद्गमैः
कण्ठेन स्वर- गद्गदेन नयनेनोद्गीर्ण- बाप्पाम्बुना ।
नित्यं त्वच्चरणारविन्द-युगल-ध्यानामृतास्वादिनाम्
अस्माकं सरसीरुहाक्ष! सततं संपयतां जीवितम् ।।
स्थिति मदीये
मुकुन्द पदारविन्द धाग्नि ।
मदन !
परिहर
मनसि
हर-नयन-कृशानुना
शोऽसि
स्मरसि न
चक्र-पराक्रमं मुरारे : ।।
इदं
शरीरं
शत- सन्धि जर्जर
पतत्यवश्यं
परिणाम-पेशलम् ।
क्लिव्यसि
मूढ! दुर्मते !
निरामयं
कृष्ण रसायनं
पिच ॥
१७-७-१९३०
७६
नमामि
करोमि
वदामि
नारायण-नाम निर्मलम्
स्मरामि
नारायण-पाद-पङ्कजम्
नारायण-पूजनं सदा ।
नारायण तत्वम् अव्ययम् ।।
अनन्त !
वैकुण्ठ !
मुकुन्द !
कृष्ण !
गोविन्द !
दामोदर !
माधवेति ।
वक्तुं
समर्थोऽपि
न ववित कश्चिद्
अहो !
जनानां
व्यसनाभिमुख्यम् ।।
१८-७-१९२०
४०९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१०
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
७७
भजन
(सोरठा)
जेहि सुमिरत सिधि होइ,
गण-नायक करिवर वदन ।
बुद्धि- रासि सुभ-गुण-सदन ।।
होइ वाचाल,
करो
अनुग्रह सोइ,
मूक
जासु
कृपासु
पंगु चढ़े गिरिवर गहन ।
दयालु,
द्रवी सकल कलि-मल दहन ।।
१९-७-१९३०
[ राग टोडी.
-
७८
- द्रुत एक ताल (चार ताल ) ]
दीन को दयालु दानि दूसरो न कोऊ ।
जासों दीनता कहीं, ह्रीं देखों दीनसोऊ ॥ १ ॥
सुर नर मुनि असुर नाग साहिब तो घनेरे
तोलों, जौलों रावरे न नेकु नयन फेरे ॥ २ ॥
त्रिभुवन तिहुँ काल विदित वदति वेद चारी
आदि अंत मध्य राम! साहिबी तिहारी ॥ ३ ॥
तोहि माँगि माँगनो न माँगनो कहायो !
सुनि सुभाउ सील सुजस जाचन जन आयो ॥ ४ ॥
पाहन, पसु, विटप, विहेंग अपने कर लीन्हें।
महाराज दसरथके ! रंक राय
तू गरीब को निवाज, ह्रीं गरीब
बारक कहिये कृपालु ! 'तुलसिदास'
कीन्हें ॥। ५ ।।
तेरो ।
मेरो ॥६॥
२०-७-१९३०
७९
( राग देस
- ताल दादरा )
तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी ।
ह्रीं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज हारी ||१||
नाथ तू अनाथको, अनाथ कौन मोसो ?
मो समान आरत नहि, आरत-हरतोसो ||२||
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
ब्रह्म तू हीं जीव, तू ठाकुर, हौं बेरो
तात, मात, गुरु, सखा तू, सब विधि हितु मेरो || ३ ||
तोहि मोहि नाते अनेक मानिय जो भाव ।
ज्यों त्यों तुलसी कृपालु चरन सरन
पावे ॥४॥
४११
८०
(राग हिंडोल-
-
-तीन ताल)
कबहुँक हीं रहनि रहौंगो ।
२१-७-१९३०
जया लाभ
हींगो ||
श्री रघुनाथ कृपालु कृपा तें संत सुभाव
संतोष सदा, काहू सों कछु न चहाँगो ।
परहित-निरत निरंतर मन क्रम बचन नेम निवहाँगो ।।
परुष बचन अति दुसह सवन सुनि तेहि पावक न दहाँगो ।
विगत मान, सम सीतल मन पर गुन, अवगुन न कहींगो ।।
परिहरि देह जनित चिंता, दुख सुख समबुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि, अविचल हरिभक्ति लहौंगो ।।
८१
( राग सोहनी- पंजाबी ठेका वि० तीन ताल )
ऐसी मूढ़ता या मनकी ।
२२-७-१९३०
परिहरि रामभक्ति-सुरसरिता आस करत ओस-कनकी ।।
धूम-समूह निरखि चातक ज्यों तृषित जानि मति धनकी
नहि त सीतलता, न वारि, पुनि हानि होति लोचनकी ॥
ज्यों गच कांच विलोकि स्येन जड़ छाँह आपने तनकी ।
टूटत अति आतुर अहारबस, छति बिसारि आननकी ।।
कह लो कहीं कुचाल कृपानिधि, जानत हो गति जनकी ।
तुलसिदास प्रभु ! हरहु दुसह दुख करहु लाज निजपनकी ।।
२३-७-१९३०
८२
( राग परज- तीन ताल)
यह विनती रघुवीर गुसांई ।
और आस बिस्वास भरोसो, हरु जियकी जड़ताई ।।
वहीं न सुगति, सुमति, संपति कछु, रिधिसिधि विपुल बड़ाई ।
हेतु-रहित अनुराग रामपद बढ़ें अनुदिन अधिकाई ॥
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१२
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
कुटिल करम लै जाइ मोहि जहाँ जहँ अपनी बरिआई ।
तहँ तहँ जनि छिन छोह छोड़िये कमठ-अण्डकी नाई ॥
या जगमें जहँ लगि या तनुकी, प्रीति प्रतीति सगाई ।
ते सब तुलसिदास प्रभु ही सो होहि सिमिटि इक ठाई ॥
२४-७-१९३०
८३
( राग खमाज तीन ताल)
-
साधव! मोह-पास क्यों टूट ?
बाहर कोटि उपाय करिय अभ्यन्तर ग्रन्थि न छूटै ॥
घृतपूरन कराह अन्तरगत ससि प्रतिविम्व दिखावे ।
ईंधन अगन
लगाय कल्पसत औटत नास न पावै ॥
तरु कोटर महँ बस विहंग तरु काटे मरे न जैसे ।
साधन करिय विचार-हीन मन सुद्ध होइ नहि तैसे ||
अंतर मलिन विषय मन अति, तन पावन करिय पारे ।
मरइ न उरग अनेक जतन वल्मीक विविध विधि मारे ।
तुलसिदास हरि गुरु-करुना विनु, विमल विवेक न होई ।
बिनु विवेक संसार- घोर निधि पार न पायें कोई ।।
२५-७-१९३०
८४
( राग कौशिया
त
तीन ताल )
श्रीरघुबीर दीन हितकारी ।।
आइ बसे बहु चोरा ॥
मानहि नहि विनय निहोरा ।।
मद, क्रोध, बोध-रिपु, मारा ।।
मरदहं मोहि जानि अनाथा ।।
मैं केहि कहीं विपति अति भारी
मम हृदै भवन प्रभु तोरा
अति कठिन करहिं बरजोरा
तम, मोह, लोभ, अहंकारा
अति करहिं उपद्रव नाथा ।
मैं एक अमित बटपारा कोउ सुनै न मोर पुकारा ।।
भागेउ नहि नाथ, उवारा रघुनायक! करहु सँभारा ॥
कह तुलसिदास सुनु रामा। लूटहि तस्कर तय धामा ।
चिन्ता यह मोहि अपारा। अपजस नहि होई तुम्हारा ॥
२६-७-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
८५
( राग आसावरी या टोडी तीन ताल)
ऐसो को उदार जग माहीं ।
बिनु सेवा जो वे दीन पर राम सरिस कोड नाही ।।
जो गति योग विराग जतन करि नहि पावत मुनि ग्यानी ।
सो गति देत गीध सबरी कहें, प्रभु न बहुत जिय जानी ।।
जो संपति दस सीस अरपि करि रावन सिव पहें लीन्ही ।
सो संपदा विभीषन कहें अति सकुच सहित हरि दीन्ही ॥
तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चासि मन मेरो ।
तौ भजु राम काम सब पूरन करहि कृपानिधि तेरो ।।
२७-७-१९३०
८६
(राग खमाज तीन ताल)
जाके प्रिय न राम वैदेही ।
सो छोड़िये कोटि बेरी सम, जद्यपि परम सनेही ।।
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषण बन्धु, भरत महतारी ।
बलि गुरु राज्यो, कंत व्रजवनितनि, भये मुद-मंगलकारी ।।
नाते नेह रामके मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं ।
अंजन कहा आंति जेहि फूटै, बहुत कहाँ कहाँ ह्रीं ॥
तुलसी सो सब भांति परमहित पूज्य प्रान ते प्यारो ।
जासों होय सनेह रामपद, एतो मतो हमारो ॥
२८-७-१९३०
४१३
८७
( राग आसावरी तीन ताल)
कौन जतन विनति करिये।
निज आचरन विचारि हारि हिय मानि जाति हरिये ||१||
जेहि साधन हरि बहु जानि जन, सो हठ परिहरिये
जाते विपति जाल निसिदिन दुख, तेहि पथ अनुसरिये ||२||
जानत हूँ मन वचन करम परहित कीन्हें तरिये ।
सो विपरीत देखि परसुल विमुकारन ही जरिये ||३||
सुति पुरान सबको मत यह सतसंग सुदृढ़ धरिये ।
निज अभिमान मोह इरषा बस तिन्हहिं न आदरिये ॥४॥
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१४
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
संतत सोइ प्रिय मोहि सदा जाते भवनिधि परिये
कहो अब नाथ, कौन बल ते संसार-सोग हरिये ॥५॥
जब कब निजु करुना सुभाउते, द्रवहु तो निस्तरिये
तुलसिदास विस्वास आन नहि कत पचि पचि मरिये ॥६॥
८८
( राग खमाज तीन ताल)
जानत प्रीत-रीत रघुराई ।
२९-७-१९३०
नाते सब हाते करि राखत, राम सनेह सगाई ॥१॥
नेह निवाहि देह तजि दशरथकी रति अचल-चलाई।
ऐसें हु पितु तें अधिक गीध पर ममता गुन गरुआई ||२||
तिय बिरही सुग्रीव सखा लखि प्रानप्रिया बिसराई ।
रन पर्यो बंधु विभीषन ही को सोच हृदय अधिकाई ॥३॥
घर, गुरुगृह, प्रियसदन सासुरे, भई जब जह पहुनाई ।
तव तह कहि सबरीके फलनकी रुचि माधुरी न पाई ॥४॥
सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिरनाई ।
केवट मीत कहे सुख मानत बानर बंधु बड़ाई ||५||
तुलसी राम सनेह सील लखि जो न भगति उर आई।
त तोहि जनमि जाय जननी जड़ तनु-तरुनता गँवाई ||६||
८९
(राग पीलू - तीन ताल)
रघुवर ! तुमको मेरी लाज ।
सदा सदा में सरन तिहारी, तुम बड़े
पतित- उधारन बिरुद तिहारो स्रवनन
ह्रीं तो पतित पुरातन कहिये, पार उतारो
अघ- खंडन, दुख भंजन जनके यही तिहारो
तुलसिदास पर किरपा करिये भक्ति दान देहू
९०
गरीबनिवाज ।।
सुनी
अवाज ।।
जहाज ।।
काज ॥
आज ||
[ राग विभास- द्रुत चीताल (एक ताल) ]
जागिये रघुनाथ कुँवर ! पंछी बन बोले ॥ध्रु०॥
चंद्र- किरन शीतल भई, चकई पिय मिलन गई,
त्रिविध मंद चलत पवन पल्लव द्रुम डोले ॥१॥
प्रात भानु प्रकट भयो,
भृंग करत गुंज-गान
रजनीको तिमिर गयो
कमलन दल खोले ॥२॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ब्रह्मादिक धरत ध्यान, सुर
जागनकी बेर भई
परिशिष्ट
नर मुनि करत गान,
नयन पलक खोले ॥३॥
तुलसिदास अति अनंद निरखिके मुखारविंद ।
दीननको
देत
दान
भूषण
९१
बहुमोले
॥४॥
२०-७-१९३०
( राग ललित-तीन ताल)
मेरो मन हरिजू ! हठ न वर्ज ।
निसदिन नाथ देऊ सिख बहु विधि करत सुभाव निजै ॥
ज्यों जुवति अनुभवति प्रसव अति दारुन दुख उपजै ।
है अनुकूल बिसारि सुल सठ पुनि खल पतिहि भजे ॥
लोलुप भ्रमर गृह-पशु ज्यों जहँ तहँ सिर पदगान बजे ।
तदपि अधम विचरत तेहि मारग, कबहुँ न मूढ़ लजै ।।
हौं हार्यो करि जतन विविध विधि अति प्रबल अर्ज ।
तुलसिदास बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजे ।।
३१-७-१९३०
९२
( राग खमाज - तीन ताल )
कुटुंब तजि शरण राम ! तेरी आयो,
तजि गढ़ लंक, महल औ' मंदिर,
नाम सुनत उठि
धायो ॥ ध्रु०॥
भरी सभा में रावण बैठघो चरण प्रहार चलायो ।
मूरख अंध कह्यो नहिं माने बार बार समझायो || १ ||
आवत ही लंका-पति कीनो, हरि हँस कंठ लगायो ।
जन्म जन्मके मिटे पराभव राम दरस जब पायो || २ |
हे रघुनाथ ! अनाथके बंधु ! दीन जान अपनायो ।
तुलसिदास रघुवरकी शरणा भक्ति अभय पद पायो ॥३॥
१-८-१९३०
९३
( राग भैरवी -
- तीन ताल)
भज मन राम चरण सुखदाई ॥ध्रु०॥
जिहि चरननसे निकसी सुर-सरी संकर-जटा समाई।
जटासंकरी नाम पर्यो है, त्रिभुवन तारन आई ॥१॥
४१५
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
मिटाई ।
धाई || ४ ||
जिन चरननकी चरन-पादुका भरत रह्यो लव लाई ।
सोई चरन केवट धोय लीने तब हरि नाव चलाई ! ॥२॥
सोई चरन संतन जन सेवत सदा रहत सुखदाई ।
सोई चरन गौतम ऋषि - नारी परसि परम पद पाई ॥३॥
दंडक वन प्रभु पावन कीन्हो ऋषियन त्रास
सोई प्रभु त्रिलोकके स्वामी कनक मुगा सँग
कपि सुग्रीव बंधु-भय-व्याकुल तिन जय छत्र
रिपुको अनुज विभीषण निसिचर परसत लंका पाई ॥५॥
सिव-सनकादिक अरु ब्रह्मादिक शेष सहस मुख गाई ।
तुलसिदास मारुत सुतकी प्रभु निज मुख करत बड़ाई ।। ६ ।।
धराई ।
९४
( राग गौड़ सारंग तीन ताल)
अब लौं नसानी, अब न नर्सहीं ।
रामकृपा भवनिसा सिरानी, जागे फिरि न
पायो नाम
चारु चितामनि डर कर तें न
स्याम रूप सुचि रुचिर कसोटी चित कंचनहि
परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन निज यस है न
मन मधुपछि प्रन करि, तुलसी रघुपति-पद-कमल
२-८-१९३०
उसैहौं ।
खर्सहीं ।
कसैहौं ।
हँसेहीं ।
बसैहीं ॥
३-८-१९३०
९५
-
( राग पूर्वी तीन ताल)
मन पछिते है अवसर बीते ।
दुर्लभ देह पाई हरिपद भजु, करम, वचन अरु होतें ॥१॥
सहस-बहु दस वदन आदि नृप, बचे न काल वली सें ।
हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते ॥२॥
सुत वनितादि जानि स्वारथ रत न करु नेह सब ही तें ।
अंतहुँ तोहि तजेंगे, पामर ! तू न त
अब ही तें ॥३॥
अब नाथहि अनुरागु जागु जड़, त्यागु दुरासा जीतें ।
बुझे न काम-अगिनि तुलसी कहुँ, विषय-भोग बहु धीतें ||४||
४-८-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
९६
( राग खमाज तीन ताल)
-
माधव ! मो समान जग माहीं ।
सब विधि हीन मलीन दीन अति लीन विषय कोड
तुम सम हेतु रहित,
मैं दुख सोक विकल, कृपालु, केहि कारन दया न
नाहिन कछु अवगुन तुम्हार, अपराध मोर में
ग्यान भवन तनु दियहु नाथ सोउ पाय न मैं प्रभु
बेनु करील, श्रीखंड वसंतहि दूषन मृषा
सार रहित हतभाग्य सुरभि पल्लव सो कहें कह
सब प्रकार में कठिन, मृदुल हरि, दृढ़ विचार जिय
तुलसिदास प्रभु मोह संखला छुटिहि तुम्हारे
कृपालु, आरत-हित, ईसहि
कलि
९७
( राग कल्याण - तीन ताल)
नाम कामतरु रामको ।
दलनिहार दारिद दुकाल दुख
दोष घोर धन धामको ॥ ध्रु०॥
नाहीं ॥
त्यागी ।
लागी ।।
माना।
जाना ।
लगावै ।
पायें ।।
मोरे ।
छोरे ।।
नाम
लेत दाहिनो होत
मन
वाम
विधाता
बामको ।
कहत
उलटे
भलो
लोक
मुनीस महेस महातम
सू
परलोक तासु
जाके बल ललित ललामको।
तुलसी जग जानियत नाम ते
नामको
४१७
10186
सोच न
कूच मुकामको ||
५-८-१९३०
४४-२७
जय
राम
९८
रमा-रमनं
समनं ।
पाहि
जनं ॥
भव-ताप भयाकुल
अवधेस, सुरेस, रमेस, विभो ।
सरनागत मांगत पाहि प्रभो ।।
दस-सीस विनासन बीस भुजा ।
कृत दूरी महा-महि भूरि-रुजा ।।
11 AUG 1972
मेहाबाद- 13.
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
रहे।
सर-पावक-तेज प्रचंड
४१८
रजनी-पर-वृन्द-पतंग
महि-मंडल-मंडन
मद-मोह-महाममता-रजनी ।
तमपुंज
दहे ॥
चारतरं ।
घृत-सायक चाप निषंग-वरं ।।
दिवाकर तेज अनी ॥
मनजात किरात निपात किये।
मृग लोभ कुभोग सरे न हिये ॥
इति नाथ अनाथन्हि पाहि हरे ।
विषयायन पॉवर भूलि परे ॥
बहु रोग वियोगन्हि लोग हये ।
भवद् अंधि-निरादर के फल ये ॥
भव-सिन्धु अगाध परे नर तें ।
पद-पंकज-प्रेम न
जे करते !
अति दीन मलीन दुखी नित हो ।
अवलंब
प्रीति नहीं ॥
जिन्हके पद पंकज
भवंत-कथा जिन्हके ।
प्रिय संत अनंत सदा तिन्हके ।।
नहि राग न लोभ न मान मदा ।
तिन्हके सम वैभव वा विपदा ।।
एहि ते तय सेवक होत मुदा ।
करि प्रेम
मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ।।
निरंतर नेम लिये ।
पद पंकज सेवित सुद्ध हिये ॥
हो ।
सम मानि निरादर आदर
सव संत सुखी
विचरंति मही ॥
मुनि-मानस -पंकज-भृंग
भजे ।
रघुवीर
महा-रन-धीर
अजे ।।
गुनसील
तव नाम जपामि नमामि हरी ।
भव-रोग-महा-मद-मान-अरी ।।
कृपा- परमायतनं ।
प्रनमामि
निरंतर
श्रीरमनं ॥
रघुनंद !
निकंदय
इंद्रधनं ।
महिपाल ! विलोकय दीनजनं ॥
६-८-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
९९
तुलसी-बोध-मौक्तिक
परहित सरिस धरम नहिं भाई ।
पर पीड़ा सम नहि अधमाई ॥
सुमति कुमति
सबके उर बसहीं ।
नाथ
पुरान
जहाँ
सुमति
निगम अस कहहीं ॥
तहें संपति नाना ।
जहाँ कुमति तहँ विपति निदाना ।।
धन्य सो भूप
नीति जो करई ।
धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई ॥
धन्य परी सोइ जब
सतसंगा ।
धन्य
जन्म
हरिभक्ति
अभंगा ॥
साधु
चरित
सुभ सरिस
कपासू ।
गुनमय फल जासू ॥
निरस विसद
जो सहि दुख
परछिद्र दुरावा ।
वंदनीय जेहि जग जस
जेहिके
जेहि पर
पावा ।।
सत्य सनेहू ।
सो तेहि मिलत न कछु सन्देहू ||
परहित बस जिनके मन माँहीं ।
तिन्ह कहें जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥
रघुकुल रीति
सदा
चलि आई।
प्राण जाय बरु वचन न जाई ॥
नहि असत्य
सम
पातक-पुंजा ।
गिरि सम होई कि कोटिक गुंजा ॥
सत्य मूल सब
सुकृत सुहाये ।
वेद-पुरान विहित
मुनि गाये ॥
तुम
समान
मोसम दीन न दीन-हित
अस विचारि रघु वंश मणि
विषम
हरहु
रघुवीर ।
भव-पीर ॥
७-८-१९३०
४१९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२०
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
१००
( राग कल्याण - तीन ताल)
चरन कमल बन्दों हरि राई ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे अंधेको सब कछु दरसाई ।।
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलें; रंक चलें सिर छत्र धराई ॥
सूरदास स्वामी करुणामय बार-बार बन्द तेहि पाई ॥
८-८-१९३०
१०१
(राग जयतिथी - तीन ताल)
जैसे राखहु वैसे हि रहीं।
जानत दुःख सुख सब जनके तुम ।
मुखतें कहा कहीं ॥
कबहुँक भोजन लहीं कृपानिधि,
कबहूँ भूख सहीं।
कबहुँक चढ़ तुरंग महा-गज,
कबहुँक भार वहीं ॥
कमल नयन घनश्याम
मनोहर,
अनुचर भयो रहीं।
सूरदास
प्रभु
भक्त कृपानिधि,
तुम्हरे चरन गहीं ।
९-८-१९३०
१०२
( राग आसा ताल दादरा )
दीनन दुख हरन देव सन्तन हितकारी ॥ ध्रु० ॥
अजामील गीध व्याध, इनमें कहो कौन साथ
पंछीको पद पढ़ात, गणिका -सी तारी ॥ १ ॥
ध्रुवके सिर छत्र देत प्रह्लादको उबार लेत ॥
भक्त हेत बांध्यो सेत, लंक-पुरी जारी
संकुल देत रीझ जात, सागपातसों
॥ २ ॥
अघात ।
गिनत नहि जूठे फल, खाटे मीठे खारी ॥ ३ ॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४५९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
गजको जब ग्राह ग्रस्यो, दुःशासन चीर बस्यो ।
सभा बीच कृष्ण कृष्ण द्रौपदी पुकारी ॥ ४ ॥
इतने हरि आय गये, बसनन
आरूढ़ भये ।
सूरदास द्वारे ठाड़ो आंधरो भिखारी ॥५॥
४२१
१०-८-१९३०
१०३
( राग भैरवी पंजाबी ठेका, तीन ताल)
सुने री मैंने निर्बलके बल राम ।
पिछली सास भएँ संतनकी आड़े सँवारे काम ॥ ध्रु० ॥
जबलग गज वल अपनो वरस्यो नेक सरो नहि काम |
निर्बल है बल राम पुकार्यों आये आधे नाम ।।
द्रुपद-सुता निर्बल भरता दिन गहलाये निज धाम ।
दुःशासनको भूजा थकित भई बसन रूप भये श्याम ।।
अप-बल, तप-बल और बाहुबल चौथा है बल दाम ।
सूर किशोर कृपासे सब थल हारेको हरिनाम ॥
११-८-१९३०
१०४
( राग खमाज - तीन ताल)
हम भक्तनके, भक्त हमारे ।
सुन अर्जुन, परतिज्ञा मेरी, यह व्रत टरत न टारे ।
भक्ते काज लाज हिय धरिके, पाईं पयादे धाऊँ ।
जाँ जहाँ भीर पर भक्तन पै तहँ तहँ जाई छुड़ाऊँ ।
जो मम भक्तसों बैर करत है, सो निज बैरी मेरो ।
देखि विचारि भक्त हितकारन हांकत हौं रथ तेरो ॥
जीते जीत भक्त अपने की हारे हार विचारों ।
सूरदास सुनि भक्त बिरोधी चक्र सुदर्शन जारौं ।
( राग काफी
अबकी टेक हमारी
जैसी लाज राखी
-
१०५
ताल दीपचंदी )
लाज राखो गिरिधारी ॥ ध्रु० ॥
अर्जुनकी भारत युद्ध मँझारी ।
सारथि होके रथको हाँको चक्र सुदर्शन धारी ॥
भक्तनकी टेक न टारी ॥ १ ॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२२
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
जैसी लाज राखी द्रौपदीकी होन न दीनि उधारी ।
खंचत संचत दोउ भुज थाके दुःशासन पचिहारी ॥
चीर बढ़ायो मुरारी ॥ २ ॥
सूरदासकी लाज राखो, अब को है रखवारी ?
राधे राधे श्रीवर प्यारो श्रीवृषभान- दुलारी ।
शरण तक आयो तुम्हारी ॥ ३ ॥
१०६
( राग केदार-तीन ताल)
मो सम कौन कुटिल खल कामी ।
जिन
तनु दियो ताहि बिसरायो ऐसो निमकहरामी ॥ ध्रु० ॥
भरि भरि उदर विषयको धाव
जैसे सूकर ग्रामी ।
हरिजन छाँड़ हरी-विमुखनकी
निसि-दिन करत गुलामी ॥ १ ॥
पापी कौन बड़ों है मोतें,
सब पतितनमें नामी।
सूर पतितको ठौर कहाँ है,
सुनिये श्रीपति स्वामी ॥ २ ॥
१२-८-१९३०
१०७
(राग सिंध काफी तीन ताल)
प्रभु ! मोरे अवगुण चित न
सम-दरशी है नाम तिहारो,
धरो ।
चाहे तो पार करो ॥
एक नदिया एक नार कहावत मैलो ही नीर भरो।
जय मिलकरके एक वरन भये सुरसरि नाम पर्यो ।
इक लोहा पूजामें राखत, इक घर बधिक पर्यो ।
पारस गुण अवगुण नहि चितवत, कंचन करत खरो ।।
यह माया भ्रम जाल कहावत सूरदास सगरो ।
अबकी बेर मोहिं पार उतारो, नहि, प्रन जात टरो ॥
१३-८-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
१०८
( राग गौरी- तीन ताल)
अँखियाँ हरि दरसनकी प्यासी ।
देख्यो चाहत कमलनको
निसिदिन रहत उदासी ॥ १ ॥
आये ऊधो फिरि गये आंगन
डारि गये गर फांसी ॥ २ ॥
केसरि-तिलक मोतिनकी माला
वृन्दावनको
काहूके मनकी कोऊ न जानत
लोगन के मन
बासी ॥ ३ ॥
हाँसी ॥ ४ ॥
सूरदास प्रभु ! तुमरे दरस विन
लेहीं
करवत
कासी ।। ५ ।।
१४-८-१९३०
१०९
( राग भीमपलासी - तीन ताल)
सबसे ऊँची प्रेम सगाई ।
लगाई ।।
नाई ॥ १ ॥
दुर्योधनको मेवा त्यागो साग विदुर घर पाई ॥ ध्रु० ॥
जूठे फल सबरीके साये बहुविधि प्रेम
प्रेमके बस नृप सेवा कीन्हीं आप बने हरि
राजसुयज्ञ युधिष्ठिर कीनो तामें जूठ
प्रेमके बस अर्जुन रथ हाँक्यो भूल गये
ऐसी प्रीति बड़ी वृन्दावन गोपिन नाच
सूर क्रूर इस लायक नाहीं कहँ लगि करौं
उठाई ॥
ठकुराई ॥
२ ॥
नचाई ॥
बड़ाई ॥
३ ॥
१५-८-१९३०
११०
( राग-जोगी- तीन ताल)
अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल ।
क्रोधको पहिरि बोलना
काम
कंठ विषयकी माल ||
महा मोहके नूपुर बाजत
निन्दा सब्द
रसाल ।
भरम भर्यो मन भयो पलायज
चलत कुसंगति
चाल ॥
४२३
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
तृस्ना नाद करत घट भीतर
नाना विधि दै
मायाको कटि फेटा बाँध्यो
लोभ तिलक दै
कोटिक कला काछि दिखराई
जल-थल सुधि नहि काल ।
सूरदासकी सबै अविद्या
दूर करो
ताल ।
भाल ||
नंदलाल ||
१६-८-१९३०
१११
( राग खमाज विलंबित तीन ताल; पंजाबी ठेका)
अब तो प्रगट भई जग जानी।
वा मोहनसों प्रीति निरन्तर
नाहिं रहेगी छानी ॥ ध्रु० ॥
कहा कहीं सुन्दर मूरत इन
नयन माँझ समानी ।
निकसत नाहि बहुत
पचिहारी
रोम रोम
उझानी ॥ १ ॥
अब
कैसे
निर्वार
जात है,
मिले दूध
ज्यों पानी।
सूरदास प्रभु अन्तर्यामी
ग्वालिन मनकी जानी ॥ २ ॥
१७-८-१९३०
११२
( राग भैरवी तीन ताल)
लज्जा मोरी राखो श्याम हरी !
कीनी कठिन दुःशासन मोसे गहि केशों पकरी ॥ ध्रु० ॥
आगे सभा दुष्ट दुर्योधन चाहत नग्न करी ।
पाँचों पांडव सव यल हारे तिनसों कछु न सरी ॥
भीष्म द्रोण विदुर भये विस्मय तिन सब मौन
अब नहि मात पिता सुत बांधव, एक टेक तुम्ही ॥
१ ॥
धरी ।
२ ॥
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
वसन प्रवाह किये करुणा-निधि, सेना हार परी।
सूर श्याम जब सिंह-शरण लइ स्थालोंको काहि डरी ।। ३ ।।
१८-८-१९३०
११३
(राग कानड़ा मत्त ताल )
दे पूतना विष रे अमृत पायो;
जो कछु दैयत सों फल पैयत नाहक वेदन गायो ॥ध्रु०॥
शतयज्ञ राजा बलि कीनो बांध पताल पठायो
लक्ष गऊ राजा नृगदीनी गिरगिट रूप करायो
रंक जन्मके मित्र सुदामा कंचन धाम बनायो
सूरदास तेरी
लीला वेद नेति कहि गायो
अद्भुत
॥१॥
॥२॥
११४
( राग बागेश्री ताल केरवा )
१९-८-१९३०
अबके नाथ ! मोहि उधारि ।
मग नहीं भव-अम्बु-निधिमें कृपासिंधु
मुरारि ।।
तिरंग ।
अनंग ।।
नीर अति गंभीर माया लोभ लहर
लिये जात अगाध जलमें गहे ग्राह
मीन इन्द्रिय अतिहिं काटति मोट अप सिर भार ।
पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिवार ।।
काम क्रोध समेत तुस्ना पवन अति झकझोर ।
नाहि चितवन देत तिय सुत नाम नौका ओर ।।
क्यो बीच बिहाल बिह्वल सुनो करुना-मूल
श्याम ! भुज गहि काढ़ि लीजै सूर व्रजके कूल ।
११५
( राग काफी तीन ताल)
२०-८-१९३०
करि अभिमान विषय रस राज्यो स्याम सरन नहि आयो ।
रे मन ! मूरख जनम गँवायो ।
यह संसार फूल सेमरको
सुन्दर देखि
चाखन लाग्यो रुई गई उड़ि हाथ कछु नहि
कहा भयो अबके मन सोचे, पहिले नाहि
भुलायो ।
आयो ।
कमायो ।
कहत सूर भगवंत भजन बिनु सिर धुनि धुनि पछितायो ।
२१-८-१९३०
४२५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
११६
( राग भूपाली - तीन ताल)
मोहि अबकी बेर उबारो॥ टेक ॥
नाथनके नाथ सुवामी
नाथ
तुम
करमहीन,
दाता नाम तिहारो ॥
जनमको अंधो,
मोतें कौन नकारो ?
तिहारो
तीन लोकके तुम प्रति पालक, में तो दास
तारी जाति कुजाति प्रभुजी, मोपर किरपा धारो ॥ २ ॥
पतितन में इक नायक कहिये, नीचनमें सरदारों
कोटि पापी इक पासँग मेरे, अजामिल कौन बिचारो ।। ३ ।।
धरम नाम सुनि मेरो, नरक कियो हठ तारो
मोको ठौर नहीं अब कोऊ, अपनो बिरद सम्हारो ॥ ४ ॥
छुद्र पतित तुम तारे रमापति, अब न करो जिय गारो
सूरदास साचो तब माने, जो मम निस्तारो ॥ ५ ॥
२२-८-१९१०
११७
( राग दरबारी कानड़ा तीन ताल)
घूंघटका पट खोल रे ! तोको पीव मिलेंगे ।
घट घट में वह साँई रमता कटुक वचन मत बोल रे ।।
धन-जोवनको गरव न कीजें झूठा पचरंग चोल रे ।
सुन महलमें दियना बारिले आसनसों मत डोल रे ।।
जाग जुगुतसों रंग-महलमें पिय पायो अनमोल रे ।
कहैं कबीर आनन्द भयो है, बाजत अनहद ढोल रे ।।
११८
( राग धनाश्री, भजन केरवाकी धुन में)
साधो
सहज समाध भली ।
गुरु प्रताप जा दिनसे जागी,
२३-८-१९३०
दिन दिन अधिक चली ॥ १ ॥
जहें जहँ डोलोसे सो परिकरमा,
जब
जो कछु करौं सो सेवा ।
सोवों तब करों दंडवत,
पूज
और न देवा ।। २ ।।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
कहीं सो नाम, सुनौं सो सुमिरन
सायें पिय सो पूजा ।
गिरह उजाड़ एक सम लेखौं
भाव मिटाव दूजा ।। ३ ।।
आँख न मूंदों, कान न धों
तनिक कष्ट नहि धारों
खुले नैन पहिचानों हँसि हँसि
सुन्दर रूप निहारी ॥ ४ ॥
सबद निरन्तरसे मन लागा,
मलिन वासना त्यागी ।
बैठत कबहुँ न छूटै
ऊठत
ऐसी तारी लागी ।। ५ ।।
कह कबीर यह उनमुनि रहनी,
सो परगट करि
गाई ।
दुख सुखसे कोई परे परमपद,
तेहि
पद
रहा
समाई ॥६॥
२४-८-१९३०
११९
( राग कालिंगड़ा - तीन ताल)
मन मस्त हुआ तब क्यों बोले ॥ टेक ॥
हीरा पायो गाँठ गठियायो ।
बार बार वो क्यों खोले ? ॥ १ ॥
हलकी थी जब चढ़ी तराजू ।
तोले ? ॥ २ ॥
पूरी भई तब क्यों
मतवारी ।
सुरत कलारी भई
मदवा पी गई विन सोले ।। ३ ।।
हंसा पाये मान सरोवर ।
ताल तलैया
क्यों डोले ? ॥ ४ ॥
तेरा साहिब है घट माँही
बाहर नैना
क्यों खोले ? ॥५॥
कहे कबीर सुनो
भाई साधो ।
साहिब मिल गये तिल ओले ॥ ६ ॥
२५-८-१९३०
४२७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
१२०
(राग विद्रावनी सारंग तीन ताल (जलद) अथवा धुमाली)
-
रहना नहि देस बिराना है ॥ ध्रु० ॥
यह संसार कागदकी पुड़िया, बूंद पड़े धुल जाना है ।।
मरि जाना है ।
बरि जाना है ।
यह संसार काँटेकी बाड़ी, उलझ उलझ
यह संसार झाड़ औ' झखिर, आग लगे
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरु नाम ठिकाना है ।
२६-८-१९३०
१२१
-
( राग कालिंगड़ा तीन ताल)
मन लागो मेरो यार फकीरीमें ।
जो सुख पावो राम भजनमें
सो सुख नाहि अमीरी ॥ १ ॥
भला बुरा सबका सुनि लीजे
कर गुजरात गरीबीमें ॥ २ ॥
प्रेमनगर में रहनि हमारी
भलि बनि आई सबूरीमें ॥ ३ ॥
हाथमें कूंडी, बगलमें सोटा
चारों दिसि जागीरी ॥ ४ ॥
आखिर यह तन खाक मिलेगा
कहा फिरत मगरूरीमें ? ॥ ५ ॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो
साहिब मिले सबूरी ॥ ६ ॥
१२२
( राग भीमपलासी - तीन ताल)
समझ बूझ दिल खोज पियारे, आशक होकर सोना क्या
जिन नैनोंसे नींद गँवाई, तकिया लेफ बिछौना
रूखा सूखा रामका टुकड़ा, चिकना और सलोना
कहत कमाल प्रेमके मारग, सीस दिया फिर रोना
१. गांधीजी द्वारा अनुवादमें इसे कबीरका माना गया है।
?
॥ ध्रु० ॥
क्या ?
॥ १ ॥
क्या ?
॥ २ ॥
क्या ?
।। ३ ।।
२७-८-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
१२३
(राग केदार तीन ताल)
-
तू तो राम सुमर जग लड़वा दे ।। ० ॥
कोरा कागज काली स्याही लिखत पढ़त वाको पढ़वा दे ॥ १ ॥
हाथी चलत है अपनी गतमो, कुतर भुक्त वाको भुकदा दे ।। २ ।। -
कहत कबीर सुनो भाई साधू नरक पचत बाको पचवा दे ।। ३ ।।
२८-८-१९३०
१२४
(राग भैरवी ताल रूपक)
-
मत कर मोह तू, हरि भजनको मान रे ।
नयन दिये दरसन करनेको, श्रवण दिये सुन ज्ञान रे ॥
वदन दिया हरिगुण गानेको, हाथ दिये कर दान रे ।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, कंचन निपजत खान रे ।।
२८-८-१९३०
१२५
( राग हमीर तीन ताल)
गुरु बिन कौन बतावे बाट ? बड़ा विकट यमघाट ॥ध्रु०॥
भ्रांतिकी पहाड़ी नदिया बिचमों अहंकारकी लाट ॥ १॥
काम क्रोध दो पर्यंत ठाड़ लोभ शोर संघात ॥२॥
मद मत्सरका मेह बरसत ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो
माया पवन बहे दाट ||३||
क्यों तरना यह घाट ||४||
२९-८-१९३०
१२६
४२९
( राग बिहाग तीन ताल )
नहीं छोडूं रे बाबा रामनाम,
प्रह्लाद
मेरो और पढ़नसों नहीं काम ॥ध्रु० ॥
पठाये पढ़न शाल,
संग सखा बहु लिय बाल |
मोको कहा पढ़ावत आलजाल
मेरी पटिया पे लिख देउ श्रीगोपाल ॥१॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४६८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३०
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
यह षंडामरके कह्यो जाय,
तू
भोको
प्रह्लाद बुलाये वेग धाय ।
राम कहनकी छोड़ बान,
तुझे तुरत छुड़ाऊँ कहो मान ॥२॥
कहा सतावो बारबार,
प्रभु जल थल नभ कीन्हे पहार
एक राम न छोडूं गुरुहि गार
मोको घाल जार चाहे मार डार ||३||
काढ़ खड्ग कोप्यो रिसाय,
कहें राखनहारो मोहि बताय ।
प्रभु खंभसे निकसे विस्तार,
हरिणाकुश छेद्यो नख विदार ||४||
भक्तहेत नरसिंह
श्री
परम पुरुष देवाधिदेव,
कहे कबीर कोऊ लख न पार,
भेल ।
प्रह्लाद उबारे अनेक बार ||५||
१२७
( राग भैरवी - तीन ताल)
झीनी
झीनी विनी
चदरिया ॥ ध्रु०॥
काहे
कै
ताना, काहे के भरनी
कौन
तारसे बिनी चदरिया |
इंगला पिंगला ताना भरनी
आठ
सुषमन तारसे बिनी चदरिया ||
कैवल दस चरखा डोलै
पाँच तत्त, गुन तिनी चदरिया ||
साँईको सीयत मास दस लागे
ठोक ठोकके बिनी चदरिया |
चादर सुर नर मुनि ओढ़ी
ओठीके मैली कीनी चदरिया |
जतनसे ओढ़ी
सो
दास
कबीर
ज्योंकी त्यों धरि दीनी चदरिया |
३०-८-१९३०
३१-८-१९३०
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परिशिष्ट
१२८
( राग पीलू- दीपचंदी)
तन धनकी कौन बड़ाई
देखत नैनोंमें मिट्टी मिलाई ॥ ध्रु० ॥
अपने खातर महल बनाया ।
आपहि जा कर जंगल सोया ।। १ ।।
हाड जले जैसे लकड़ीकी मोली
बाल जले जैसे घासको पोली ॥ २ ॥
कहत कबीर सुन मेरे गुनियां
आप मुवे पिछे हुब गई दुनिया ॥ ३ ॥
१२९
( राग खमाज धुमाली)
भजो रे भैया राम गोविन्द हरी
साधन कछु नहि लागत
१-९-१९३०
॥ध्रु०॥
जप
तप
खरचत
नहि
गठरी
॥१॥
संतत
संपत
सुख के
कारण
जासे
भूल
परी
॥२॥
कहत
कबीर
जा मुख राम नह
वो
मुख धूल भरी
॥३॥
२-९-१९३०
१३०
सोना
( राग आसावरी - दीपचंदी)
मन! तोहे केहि विध कर समझाऊँ ॥ध्रु०॥
होय
तो सुहाग मंगाऊँ, बंकनाल रस लाऊँ ।
ग्यान शब्दकी फूंक चलाऊँ, पानी कर पिघलाऊँ ॥१॥
घोड़ा होय तो लगाम लगाऊँ, ऊपर जीन कसाऊँ ।
होय सवार तेरे पर बैठूं, चाबुक देके चलाऊँ ||२|
हाथी होय तो जंजीर गढ़ाऊँ, चारों पैर बँधाऊँ ।
होय महावत तेरे पर बैठूं अंकुश लेके चलाऊँ ॥३॥
लोहा होय तो एरण मँगाऊँ, ऊपर ध्रुवन धुवाऊँ ।
धूवनकी घनघोर मचाऊँ, जंतर तार सिंचाऊँ ॥४॥
ग्यानी होय तो ज्ञान सिखाऊं, सत्यकी राह
कहत कबीर सुनो भाई साधू, अमरापुर पहुँचाऊँ ॥५॥
चलाऊँ ।
३-९-१९३०
४३१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
१३१
=
( राग तिलक कामोद तीन ताल)
पायो सतनाम गरे के हरवा ।
सांकर खटोलना रहनि हमारी,
दुवरे दुबरे पांच कहरवा ॥
ताला कुंची हमें गुरु दीनी
जब चाहीं तब खोलीं किवरया ।।
प्रेम प्रीतीकी चुनरि हमारी
जब चाहीं तब नाचौं सहरवा ॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो ।
बहर न ऐवं एही नगरवा ॥
४-९-१९३०
१३२
( राग मालकोंस झपताल)
शूर संग्रामको देख भागे नहीं,
देख भाग सोई शूर नाहीं ॥
काम क्रोध, मद, लोभसे जूझना
मंडा घमसान तहँ खेत माहीं ।
शील ओ' शौच, संतोष साही भये,
नाम समसेर त खूब बाजे ।।
कहै कबीर कोइ जूझि है शूरमा,
कायरी भीड़ तहँ तुरत भाजे ।।
१३३
( राग आसावरी
-
दीपचन्दी)
ठाकुर तुम शरणाई आया।
उत्तरि गयो मेरे मनका संशा
जवते दरशन पाया ॥ ध्रु० ॥
अनबोलत मेरी विरथा जानी
दुख
अपना नाम जपाया ।
नाठे सुख सहजि समाये
अनंद अनंद गुण गाया ।। १ ।।
५-९-१९३०
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४७१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४-२८
परिशिष्ट
बाँह पकरि कढ़ि लीने असुने
गृह अंध कूपते माया ।
कछु
नानक गुरु बन्धन काटे
बिछुरत आनि मिलाया ।। २ ।।
६-९०१९३०
१३४
( राग मल्हार-तीन ताल )
साधो मनका मान त्यागो ।
काम को संगत दुर्जनकी, ताते अनिस भागो ॥ ध्रु० ॥
सुख दुख दोनों सम करि जाने, और मान अपमाना ।
हर्ष शोक ते रहे अतीता, तिन जग तत्व पिछाना ।। १ ।।
अस्तुति निन्दा दोऊ त्यागे, खोजें पद निरवाना |
जन नानक यह खेल कठिन है, कोऊ गुरु-मुख जाना ।। २ ।।
१३५
( राग शंकरा - ताल तेवरा)
विसर गई सब तात पराई ।
जब ले साध संगत मोहिं पाई ॥ ध्रु० ॥
ना को बैरी नाहि विगाना,
सकल संगि हमको बनि आई ।। १ ।।
जो प्रभु कीन्हो सो भल मान्यो,
एक सुमति साधुन तें पाई ॥ २ ॥
सब मह रम रहिया प्रभु एके,
पेखि पेखि नानक बिगसाई ।। ३ ।।
७-९-१९३०
८-९-१९३०
श्रवण
१३६
( राग दुर्गा-ताल कहरवा )
रे मन ! रामसो कर प्रीत ॥ ध्रु० ॥
गोविन्द-गुण सुनो
अरु गाउ रसना गीत ।। १ ।।
कर साधु-संगत सुमिर माधो
होय पतित
काल व्याल ज्यों पर्यो डोल
मुख
पसारे
पुनीत ।। २ ।।
मीत ।। ३ ।।
४३३
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४७२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
आजकल पुनि तीहि ग्रसिह
समझ राखो चीत ॥ ४ ॥
कहे नानक राम भज लें
जात
अवसर बीत ।। ५ ।।
१३७
९-९-१९३०
( राग शंकरा - तीन ताल)
काहे रे बन खोजन जाई ।
सर्व-निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई ॥ ध्रु० ॥
पुष्प मध्य ज्यों वास बसत है, मुकुर माहि जस छाई ।
तैसे ही हरि बसें निरंतर, घट ही खोजो
बाहर भीतर एकै जानो, यह गुरु ज्ञान
जन नानक बिन आपा चीन्हे, मिर्ट न भ्रमकी
भाई ।। १ ।।
बताई।
काई ।। २ ।।
१०-९-१९३०
१३८
(राग कौशिया • विलंबित, तीन ताल)
सुमरन कर ले मेरे मना ।
तेरि बिति जाति उमर, हरिनाम बिना ॥ ध्रु० ॥
कूप नीर विनु, धेनु छीर बिनु, धरती मेह बिना ।
जैसे तरुवर फल बिन होना, तैसे प्राणी हरिनाम बिना |
देह नैन बिन रेन चन्द विन, मन्दिर दीप विना ।
जैसे पंडित वेद बिहीना, तैसे प्राणी हरिनाम बिना ||
काम क्रोध मद लोभ निहारो छाँड़ दे अब संतजना ।
कहे नानकशा, सुन भगवंता या जगमें नहि कोई अपना ।
११-९-१९३०
१३९
(राग बिहाग तीन ताल )
नाम जपन क्यों छोड़ दिया ?
क्रोध न छोड़ा, झूठ न छोड़ा,
सत्यवचन क्यों छोड़ दिया ? ।। ६० ।।
झूठे जगमें दिल ललचा कर
असल वतन क्यों छोड़ दिया ?
कौड़ीको तो खूब सम्हाला
लाल रतन क्यों छोड़ दिया ? ॥ १ ॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४७३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
जिहि सुमिरनते अति सुख पावे
सो सुमिरन क्यों छोड़ दिया ?
खालस इक भगवान भरोसे
तन, मन, धन क्यों छोड़ दिया ? ॥ २ ॥
१४०
-
( राग मुलतानी तीन ताल)
१२-९-१९३०
मनकी मन ही
माँहि
ना हरि भजे
रही ।
न तीरथ सेवे
चोटी काल
दारा, मीत, पूत, रथ,
धन-जन-पूर्न
और सकल मिथ्या यह
भजना राम
फिरत फिरत बहुते जुग
मानस देह
गही ॥ ध्रु० ॥
संपति,
मही ।
जानो
सही ।। १ ।।
हान्यो
लही ।
नानक कहत मिलतकी बिरियाँ
सुमिरत कहा नहीं ? ॥ २ ॥
१३९-१९३०
१४१
( राग तिलक कामोद तीन ताल)
=>
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो । टेक ॥
वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु,
जनम
किरपा कर अपनायो ।। १ ।।
जनमकी पूँजी पाई,
जगमें सभी खोवायो ॥ २ ॥
खरचं न खुट, बाको चोर न लूट,
दिन दिन बढ़त सवायो ॥ ३ ॥
सतकी नाव, खेवटिया सतगुरु,
भवसागर तर आयो ॥ ४ ॥
मीरांके प्रभु गिरिधर नागर
हरख हरख जस गायो ॥ ५ ॥
१४-९-१९३०
४३५
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४७४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
१४२
( राग देस या पूर्वी तीन ताल)
नहि ऐसो जन्म बारंबार ।
क्या जानूं कछु पुन्य प्रकटे मानुसा अवतार ॥ ध्रु० ॥
बढ़त पल पल, पटत छिन छिन, चलत न लागे बार।
बिर के ज्यों पात टूटे, लागे नहि पुनि डार ।। १ ।।
भवसागर अति जोर कहिये विषम ओखी धार ।
सुरतका नर बांधे बेड़ा बेगि उतरे पार || २ ||
साधु संता ते महंता चलत करत पुकार।
दासि मीरां लाल गिरिधर जीवना दिन पार ।। ३ ।।
१५-९-१९३०
१४३१
(राग तोड़ी - ताल तेरा )
मन रे परसि हरिके चरण
सुभग शीतल कॅवल कोमल विविध ज्वाला
हरण ।
सरण ।
धरण ।।
जिण चरण प्रह्लाद परसे इन्द्र पदवी धरण ।।
जिण चरण ध्रुव अटल कीन्हें राखि अपनी
जिण चरण ब्रह्मांड भेट्यो नखसिखों सीरी
जिण चरण प्रभु परसि लीने तरी गोतम
जिण चरण कालीनाग नाथ्यो गोपी लीला
जिण चरण गोवर्धन धार्यो गर्यो मघवा
दासि मीरा लाल गिरधर अगम तारण
१४४
(राग झिझोटी ताल दादरा )
धरण ।
करण ॥
हरण |
तरण ।।
१६-९-१९३०
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई ।
दूसरा न कोई साधो सकल लोक जोई ॥ध्रु० ॥
भाई छोड़ा, बंधु छोड़ा, छोड़या सगा सोई ।
साधु संग बैठ बैठ लोक-लाज खोई ॥ १ ॥
भगत देस राजी हुई, जगत देख रोई,
असुवन जल सीच सींच प्रेम बेलि बोई ॥ २ ॥
दधिमथ पूत कोड़ि लियो, डार दई छोई ।
राणा विषको प्यालो भेज्यो, पीय मगन होई || ३ ||
१. डॉ० भुवनेश्वर मिश्र माधव कृत ग्रन्थ मीराकी प्रेम साधना, पृष्ठ २५८ से
उद्धृत ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
अब तो बात फैल पड़ी, जाणे सब कोई ।
मीरां एम लगण लागी, होनी होय सो होई ।। ४ ।
१४५
१७-९-१९३०
४३७
(राग माँड ताल दादरा )
माई मैंने गोविन्द लीनो मोल गोविन्द लीनो मोल ॥ ध्रु० ॥
1
कोई कहे सस्ता, कोई कहे महेंगा, लीनो तराजू तोल ॥ १ ॥
कोई कहे घरमें कोई कहे बनमें, राधाके संग खिलोल ॥ २ ॥
मीरांके
गिरधर नागर, आवत प्रेमके डोल ॥३॥
१४६
प्रभु
(राग झिझोटी - समाज - ताल घुमाली)
मेरे राणाजी, मैं गोविन्द गुण गाना ॥ ध्रु० ॥
राजा रूठे नगरी रक्खे अपनी मैं हर रूठया कहाँ जाना ? ॥ १ ॥
राणे भेज्या जहर पियाला में अमृत कह पी जाना ॥ २ ॥
डबिया में काला नाग भेजा, में शालग्राम कर जाना ॥ ३ ॥
प्रेम दीवानी, मैं साँवलिया वर
मीरांबाई
१४७
(राग मालकंस तीन ताल)
पाना ।। ४ ।।
मोरी लागी लटक गुरु चरननकी ॥ ध्रु० ॥
चरन बिना मुझे कछु नहीं भावे,
झूठ माया सब सपननकी ।। १ ।।
भवसागर सय सूख गया है,
फिकर नहीं मुझे तरननकी ।। २ ।।
मीरां कहे प्रभु गिरिधर नागर !
उलट भई मोरे नयननकी ॥ ३ ॥
१४८
(राग अडाणा ताल तेवरा )
हरि ! तुम हरो जनकी भीर ॥ टेक ॥
द्रौपदीकी लाज राखी,
तुम बढ़ायो चीर ।। १ ।।
भक्त कारन रूप नरहरि
धन्यो आप शरीर ।। २ ।।
हरिनकश्यप मार लीन्हो
धन्यो नाहिन धीर ।। ३ ।।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३८
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
बुड़ते गजराज
कियो
राख्यो,
बाहर नीर ।। ४ ।।
दासि मीरां लाल गिरधर,
दुख जहाँ तहाँ पीर ।। ५ ।।
१४९
( राग मांडताल घुमाली अथवा तेवरा )
म्होंने चाकर राखो जी !
गिरिधारी लला ! चाकर राखो जी ॥ टेक ॥।
चाकर रहयूँ, बाग लगा, नित उठ दरसन पासूं ।
वृन्दावनकी कुंज गलिनमें, गोविन्द-लीला गायूँ ।। १ ।।
चाकरीमें दरसन पाऊँ, सुमिरन पाऊँ खरची ।
भाव-भगति जागीरी पाऊँ, तीनों बात सरसी ।। २ ।।।
मोर मुकट, पीताम्बर सोहे, गल बैजंती माला ।
वृन्दावनमें धेनु चरावे, मोहन मुरलीवाला ॥ ३ ॥
ऊँचे ऊँचे महल बनाऊँ, बिच बिच राखूं बारी ।
साँवरिया दरसन पाऊँ, पहिर कुसुम्बी सारी ॥ ४ ॥
जोगी आया जोग करनकूं, तप करने संन्यासी ।
हरी भजन साधू आये, वृन्दावनके वासी ॥ ५ ॥
मीरांके प्रभु गहिर गंभीरा, हृदे रहो जी धीरा ।
आधी रात प्रभु दरसन दीन्हों, जमुनाजीके तीरा ।। ६ ।।
१७-९-१९३०
१५०
(राग कौशिया
-
तीन ताल)
निंदक बाबा बीर हमारा
बिन ही कौड़ी बहे विचारा ।।
कोटी कर्मके कल्मय कार्ट
काज सँवारे बिनही साटें ।
आपन डूबे और को तारे
ऐसा प्रीतम पार उतारै ।।
जुग जुग जीवी निंदक मोरा
रामदेव ! तुम करो निहौरा ॥
निंदक मेरा पर उपकारी
दात निंदा करे हमारी ॥
१८-९-१९३०
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४७७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
१५१
( राग बागेश्री - तीन ताल)
अजहुँ न निकसे
प्राण कठोर ! ॥ टेक ॥
दरसन बिना बहुत दिन बीते,
सुन्दर प्रीतम मोर ।। १ ।।
चारि पहर चारों जुग बीते,
रैनि गँवाई भोर ॥ २ ॥
अवधि गई अजहूँ नहि आये,
कतहुँ रहे चितचोर ! ।। ३ ।।
कबहूँ नैन निरखि नहि देखे,
मारग चितवत चोर ।। ४ ।।
दाबू ऐसे आतुर विरहिणी,
जैसे
चंद चकोर ।। ५ ।।
१५२
प्रभुजी !
( राग कौशिया तीन ताल)
तुम चंदन, हम पानी ।
जाकी अंग अँग बास समानी ॥ ध्रु० ॥
प्रभुजी, तुम घन बन, हम मोरा ।
जैसे चितवत चंद चकोरा ।। १ ।।
प्रभुजी, तुम दीपक, हम बाती ।
जाकी जोति
प्रभुजी, तुम
जैसे सोनहि
प्रभुजी, तुम
ऐसी भक्ति
बरै दिन राती ।। २ ।।
मोती, हम धागा ।
मिलत सुहागा ॥। ३ ।।
स्वामी, हम दासा ।
करे रैदासा ।। ४ ।।
१९-९-१९३०
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४३९
१५३
(राग भैरवी तीन ताल)
नरहरि ! चंचल है मति मेरी, कैसे भगति करूँ मैं तेरी ? ॥
तू मोहिं देखें, ह्रीं तोहि देखूं, प्रीति परस्पर होई ।
तू मोहि देखे, तोहि न देखूं, यह मति सब बुधि खोई ।।
सब घट अंतर रमसि निरंतर में देखन नहिं जाना ।
गुन सब तोर मोर सब औगुन कृत उपकार न माना ।।
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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
मैं ते तोरि मोरि असमझि सों कैसे करि निस्तारा ?
कह
देवास
कृष्ण करुणामय जे जे जगत अधारा ! ॥
१५४
२१-९-१९३०
( राग आसा-पहाड़ी, गजल
क्यों सोया ग्रफ़लतका मारा, जाग रे
या जागे कोई जोगी भोगी, या जागे
धुन )
नर जाग रे ।
कोई चोर रे ।
या जागे कोई संत पियारा, लगी रामसों डोर रे ।।
ऐसी जागन जाग पियारे! जैसी ध्रुव प्रह्लाद रे ।
ध्रुवको दीनी अटल पदवी, प्रह्लादको राज रे ।
मन है मुसाफ़िर, तनुका सरा बिच, तू कीता अनुराग रे ।
रैन बसेरा कर ले डेरा, उठ चलना परभात रे ।।
साधु-संगत सतगुरुकी सेवा, पावे अचल सुहाग रें |
नितानन्द भज राम, गुमानी! जागत पूरन भाग रे ।।
२२-९-१९३०
१५५
( राग बिभास तीन ताल)
अकल कला खेलत नर ज्ञानी !
जैसे हि नाव हिरे फिरे दसों दिश,
ध्रुव तारे पर रहत निशानी ॥ ध्रु० ॥
चलन वलन अवनी पर वाकी
मनकी सुरत अकाश ठहरानी ॥
तत्त्व समास भयो है स्वतंतर
जैसे हिम होत है पानी । अकल० ॥ १ ॥
छुपी आदि अन्त नहिं पायो
आइ न सकत जहाँ मन बानी ||
ता घर स्थिती भई है जिनकी
कहि न जात ऐसी अकथ कहानी ।। अकल० ॥ २ ॥
अजब खेल अद्भुत अनुपम है
जाकू
है
पहिचान पुरानी ॥
गगनहि गेव भया नर बोले
एहि अखा जानत कोई ज्ञानी ।। अकल० ।। ३ ।
२३-९-१९३०
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१५६
जाग जीव सुमरण कर हरिको, भोर भयो है भाई रे
सतगुरु ज्ञान विचार कहते है, चेतो राम दुहाई रे ।।
ना कोई तेरो सजन सनेही, ना कोई बेन न भाई रे
जम की मार पड़े जब रोवे तब तो कौन सहाई रे ।।
मातपिता कुल लोग लुगाई स्वारथ मिले सगाई रे
सुमरण बिना संग नहि कोई जीव अकेलो जाई रे ।।
अथमोचन भवहरण मुरारी चरण सरण बड आई रे
सहजराम भज रामसनेही दुख मेटन सुखदाई रे ।।
१५७
( राग भैरव तीन ताल)
-
नंद-भवनको भूखन माई
यशोदाको लाल, वीर हलधरको,
२४-९-१९३०
राधारमन परम सुखदायी ॥ ध्रु० ।।
संतनको सर्वस,
महिमा वेद-पुरानन गाई ।
शिवको
धन,
इन्द्रको
इन्द्र, देव देवनको,
ब्रह्मको ब्रह्म, अधिक अधिकाई ॥। १ ।।
कालको
काल, ईश ईशनको,
नन्ददासको
जीवन गिरिधर,
२५-९-१९३०
अति हि अतुल तोल्यो नहीं जाई ।
गोकुल - गामको कुँवर कन्हाई ।। २ ।।
१५८
(राग बहार- ताल विलंबित तीन ताल)
=
अब हौं कासों बैर करौं ?
कहत पुकारत प्रभु निज मुखते ।
20
'घट घट हीं बिहरी" ॥ ध्रु० ॥
आपु समान सर्व जग लेखौं ।
भक्तन अधिक डरीं ॥
श्रीहरिदास कृपाते हरिकी
नित निर्भय विचरों ।। १ ।।
२६-९-१९३०
४४१
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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
१५९
( राग देसताल तेवरा )
कोई वन्दो, कोई निन्दो, कोई कैसे कहो रे ।
रघुनाथ साथ प्रीत बांधी, होय तैसे होय रे ॥ ध्रु० ।।
कमल म्याने मोट बांधी, नीर था भरपूर रे ।
रामचन्द्रने कूर्म होकर राख लीनी पीठ रे ॥ १ ॥
चंद्र सूर्य जिमि ज्योत, स्तंभ बिनु आकाश रे ।
जल ऊपर पाषाण तारे, क्यों न तारे दास रे ? ॥ २ ॥
जपत शिव, सनकादि मुनिजन नारदादि संत रे ।
जन्म जन्मके स्वामी रघुपति दास जनि जसवंत रे ।। ३ ।।
१६०
( राग भैरवी तीन ताल)
संत परम हितकारी, जगत मांही ॥ ध्रु० ॥
२७-९-१९३०
प्रभुपद प्रगट करावत प्रीति, भरम मिटावत भारी ॥ १ ॥
परम कृपालु सकल जीवन पर, हरि सम सब दुखहारी ॥ २ ॥
विगुणातीत फिरत तन त्यागी, रीत जगतसे न्यारी
ब्रह्मानन्द संतनकी सोबत, मिलत है प्रगट मुरारी || ४ ||
१६१
( राग कालिंगड़ा तीन ताल)
।। ३ ।।
२८-९-१९३०
प्राणि! तू हरिसों डर रे तू क्यों रहा निडर रे ? ॥ ध्रु० ॥
ग्राफ़िल मत रह चेत सवेरा मनमें राख फ़िकर रे
जो कुछ करे बैग ही कर ले, सिर पर काल जबर रे ।। १ ।।
काले गोरे तन पर भूला, तन जायेगा जर रे
यमके दूत पकड़ करे पीसें काढ़ें बहुत कसर रे ।। २ ।।
हरि भज हरि भज हरि भज प्रानी, हरिको भजन तू कर रे
व्रजकिशोर प्रभु-पद नौका चढ़, भवसागरको तर रे ।। ३ ।।
१६२
( राग भैरवी तीन ताल )
-
विश्व विधाता,
हे सुख-शान्ति निकेतन हे !
हे जग त्राता,
प्रेमके सिन्धो,
दीनके
बन्धो,
२९-९-१९३०
दु:ख-दरिद्र विनाशन हे ! ॥ ध्रु० ॥
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
नित्य, अखंड, अनंत, अनादि,
पूरण ब्रह्म सनातन है !
जग आश्रय, जग-पति, जग-वंदन,
अनुपम, अलख निरंजन हे !
प्राणसखा,
त्रिभुवन प्रतिपालक,
जीवनके अवलंबन हे !
॥ १ ॥
१६३
( राग मालकंस झपताल )
३०-९-१९३०
धर्ममणि मीन, मर्यादमणि रामचंद्र
रसिकमणि कृष्ण और तेजमणि नरहरि ।।
॥ ध्रु० ॥
कण्ठमणि कमठ, बल- विपुलमणि वाराह
छलनमणि वामन, देह विक्रमधरि
।। १ ।।
गिरिनमणि कनकगिरि, उदधिनमणि क्षीरनिधि,
सरनमणि मानसर, नदिनमणि सुरसरी
।। २ ।।
खगनमणि गरुड, द्रुमनमणि कल्पतरु
कपिनमणि हनुमान, पुरिनमणि अवधपुरी
।। ३ ।।
सुभटमणि परशुधर कांतमणि चक्रवर
॥ ४ ॥
॥५ ॥
१-१०-१९३०
शक्तिमणि पार्वती, जान शंकरवरी
भक्तमणि प्रह्लाद, प्रेममणि राधिके
मणिनकी माल गुहि कंठ कान्हार धरी
१६४
( राग बिहाग तीन ताल)
बिसर न जाजो मेरे मीत, यह वर मांगू में नीत ॥ ध्रु० ॥
मैं मतिमंद कछू नहिं जानूं, नहि कछु तुम सँग हीत ।
बाँह गहेकी लाज है तुमको, तुम सँग मेरी जीत ॥ १ ॥
तुम रीझो ऐसो गुण नाहीं, अवगुणकी हूँ भीत ।
अवगुण जानि विसारोगे जीवन, होऊँगी मैं बहुत फजीत ॥ २ ॥
मेरे दृढ़ भरोसो जियमें, तजिहों न मोहन प्रीत ।
जन अवगुण प्रभु मानत नाहीं, यह पूरबकी रीत ।। ३ ।।
दीनबन्धु अति मृदुल सुभाऊ, गाऊँ निसिदिन गीत ।
प्रेमसली समजूं नहिं ऊँडी, एक भरोसो चीत ॥ ४ ॥
२-१०-१९३०
४४३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४४
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
( राग भैरवी
१६५
-
तीन ताल)
हो रसिया, मैं तो शरण तिहारी,
नहिं साधन बल वचन चातुरी,
एक भरोसो चरणे गिरिधारी ॥ ध्रु० ॥
कदुइ तुंबरिया मैं तो नीच भूमिकी,
गुण-सागर पिया तुम हि संवारी ॥ १ ॥
मैं अति दीन बालक तुम सरन,
नाथ न दीजे अनाथ बिसारी ! ॥ २ ॥
निज जन जानि सँभालोगे प्रीतम,
दरसन
प्रेम सखी नित जाऊँ बलिहारी ।। ३ ।।
१६६
( राग सारंग तीन ताल)
देना प्रान पियारे !
नन्दलाला मेरे नैनोंके तारे ॥ ध्रु० ॥
दीनानाथ दयाल सकल गुण,
नवकिशोर सुन्दर मुखवारे ।। १ ।।
मनमोहन मन रुकत न रोक्यो,
दरशनकी चित चाह हमारे ।। २ ।।
रसिक खुशाल मिलनकी आशा,
निशिदिन सुमरन ध्यान लगारे ।। ३ ।।
१६७
( राग बिहाग तीन ताल)
चेतन ! अब मोहिं दर्शन दीजे ।
तुम दर्शन शिव सुख पामीजे,
३-१०-१९३०
४-१०-१९३०
तुम दर्शन भव छीजे ॥ ध्रु० ॥
तुम कारन तप संयम किरिया, कहो कहाँ लौं कीजे ?
तुम दर्शन बिनु सब या झूठी, अंतर चित न भीजे ॥ १ ॥
क्रिया मूढमति कहे जन कोई, ज्ञान औरको प्यारो,
मिलत भाव रस दोउ न भाखे तू दोनोंते न्यारो ॥ २ ॥
सबमें है और सबमें नाहीं, पूरन रूप अकेलो,
आप स्वभावे वे किम रमतो ? तू गुरु अरु तु चेलो ।। ३ ।।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
अकल अलस प्रभु ! तू सब रूपी, तू अपनी गति जाने,
अगम रूप आगम अनुसारे, सेवक सुजस बखान || ४ ||
५-१०-१९३०
१६८
( राग धनाश्री
-तीन ताल)
अब हम अमर भये न मरेंगे।
।। अब० ।। १ ।।
।। अब० ।। २ ।।
या कारन मिथ्यात दियो तज, क्योंकर देह धरेंगे ?
राग दोष जग बंध करत है, इनको नाश करेंगे
मर्यो अनंत काल ते प्रानी, सो हम काल हरेंगे
देह विनाशी हूँ अविनाशी, अपनी गति करेंगे ।
नासी नासी हम थिरवासी, चोखे है निखरेंगे ।
मन्यो अनंत बार बिन समज्यो, अब सुख दुःख बिसरेंगे।
आनन्दघन निपट निकट अक्षर दो, नहीं सुमरे सो मरेंगे । ॥ अव० ॥ ४ ॥
१६९
(राग केदार तीन ताल)
-
।। अव० ।। ३ ।।
६-१०-१९३०
राम कहो, रहमान कहो कोऊ, कान्ह कहो, महादेव री
पारसनाथ कहो, कोऊ ब्रह्मा, सकल ब्रह्म स्वयमेव री ॥ ध्रु० ॥
भाजन-भेद कहावत नाना, एक मृत्तिका रूप री
तैसे खंड कल्पनारोपित, आप अखंड सरूप री ॥ १ ॥
निजपद रमे राम सो कहिये, रहिम करे रहिमान री
कर्पे करम कान्ह सो कहिये, महादेव निर्वाण री ॥ २ ॥
परसे रूप पारस सो कहिये, ब्रह्म चिन्हे सो ब्रह्म री
इह विधि साधो आप आनन्वधन, चेतनमय निकर्म री ॥ ३ ॥
७-१०-१९३०
१७०
(राग छाया कालिंगडा - तीन ताल)
बंधन काट मुरारी, हमरे बंधन काट मुरारी
ग्राह गजराज लर्ड जल भीतर ले गयो अंबु मंझारी
गजकी टेर सुनी यदुनन्दन, तजी गरुड-असवारी
पांचाली प्रभु कारण मोटे, पग धायो गिरिधारी ।
पट शठ खंचत निकसत नाहीं, सकल सभा पचिहारी
चरण स्पर्श परमपद पायो, गौतम ऋषिकी नारी
गणिका शवरी इन गति पाई, बैठ विमान सिधारी
॥ ध्रु० ॥
॥ १ ॥
॥ २ ॥
113 11
४४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
सुन सुन सुयश सदा भक्तनको मुख सो भजो इक बारी
विधिचंद दरशनको प्यासो, लीजिये सुरत हमारी
१७१
(राग तिलंग तीन ताल )
मैं तो बिरद भरोसे बहुनामी ।
सेवा सुमिरन कछुवे न जानूं,
सुनियो परमगुरु स्वामी ॥ ध्रु० ॥
गज अरु गीध तारि है गणिका,
कुटिल अजामिल कामी ।। १ ।।
यही साख श्रवणे सुनि आयो,
चरण-शरण सुखधामी ॥ २ ॥
तारो के मारो,
प्रेमानन्द
समरथ
अन्तरयामी ॥ ३ ॥
॥। ४ ॥
८-१०-१९३०
९-१०-१९३०
१७२
( राग गजल )
अगर है शौक़ मिलनेका, तो हरदम लौ लगाता जा ।
जलाकर खुदनुमाईको, भसम तन पर लगाता जा ।।
पकड़कर इश्ककी झाडू, सफ़ा कर हिज्र-ए दिलको ।
दुईकी धूलको लेकर, मुसल्ले पर उड़ाता जा ।।
मुसल्ला छोड़, तसबी तोड़, किताबें डाल पानीमें ।
पकड़ दस्त तू फ़रिश्तोंका, गुलाम उनका कहाता जा ।।
न मर भूखा न रख रोजा, न जा मस्जिद, न कर सिजदा ।
वजूका तोड़ दे कूजा, शरावे-शौक़ पीता जा ॥
हमेशा खा, हमेशा पी, न ग्रफ़लतसे रहो इकदम ।
नशेमें सैर कर अपनी खुदीको तू जलाता जा ।।
न हो मुल्ला, न हो बम्मन, दुईकी छोड़कर पूजा ।
हुक्म है शाह कलंदरका, 'अनलहक' तू कहाता जा ।।
कहे मंसूर मस्ताना, हक़ मैंने दिलमें पहचाना।
वही मस्तोंका मयखाना, उसीके बीच आता जा ।।
१०-१०-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>है बहारे बाग़
परिशिष्ट
१७३
( राग ग़जल )
दुनिया चंद रोज ।
देख लो इसका तमाशा चंद रोज |
ऐ मुसाफ़िर! कूचका सामान कर ।
इस जहाँ में है बसेरा बंद रोज ।
पूछा लुकमाँसे, जिया तू कितने रोज ?
बाद
दस्ते हसरत मलके बोला 'चंद रोज ' ।।
कुत्रमें बोली कज़ा ।
मदफ़न
अब यहाँपे सोते रहना चंद रोज़ ॥
'फिर तुम कहाँ औ' में कहा, ऐ दोस्तो !
क्यों
साथ है मेरा तुम्हारा चंद रोज |
हो दिले बेजुर्मको ।
सताते
जालिमो, है ये जमाना चंद रोज ।
याद कर तू ऐ नजीर क़बरोंके रोज़ ।
जिन्दगीका है भरोसा चंद रोज़ ॥
११-१०-१९३०
१७४
( राग ग़ज़ल, सिंध काफी )
बस, अब मेरे दिलमें बसा एक तु है।
मेरे दिलका अब दिलरुबा एक तू है ॥
फक्त तेरे कदमोंसे अय मेरे खालिक ।
लगा अब मेरा ध्यान शामो सुबू है ।।
मेरा दिल तो तुझसे हि पाता है तसकी ।
बसी मरजमें प्रेमके तेरी बू है ॥
समझते हैं यूँ मुझको अकसर दिवाना ।
तेरा जिक्र विरदे ज़बाँ कूबकू है ॥
नहीं मुझको दुनयवी खुशबूसे उलफत ।
तेरा प्रेम ही अब मेरा मुझको
रँगूँ प्रेमसे तेरे दिलका ये
जिसे ज्ञानसे अब किया कुछ
न पाला पड़े नपसे शैसे
तेरे दासकी अब यही आरजू
बू है ।
घोला ।
रफू है ॥
मुझको ।
है ॥
१२-१०-१९३०
४४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४८
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
१७५
(राग ग़ज़ल, भैरवी)
अजब तेरा क़ानून देखा,
जहाँ दिल दिया फिर वहीं तुझको
खुदाया !
पाया ॥
न यां देखा जाता है मंदिर ओ मसजिद ।
फ़क़्त यह कि तालिब सिदक दिलसे आया ।।
जो तुझपे फ़िदा हुआ एक बारी ।
उसे प्रेमका तूने जलवा दिखाया ||
तेरी पाक सीरतका आशिक हुआ जो ।
वहीं रेंग रंगा फिर जो तूने
है गुमराह, जिस दिलमें बाक़ी
मिला तुझसे जिसने खुदीको
हुआ तेरे विश्वासीको तेरा
गदाको दुरे बेवहा
रंगाया ॥
खुदी है।
गंवाया ।।
दरसन ।
हाथ
आया ।
१३-१०-१९१०
१७६
( राग अड़ाणा ताल झुमरा )
नैया मेरी तनकसी, दोझी पाथर भार
चहुँ दिसि अति भरे उठत, केवट है मतवार ॥ ध्रु० ॥
केवट है मतवार, नाव मँझधारहि आनी ।
आंधी उठी प्रचंड तेहूँ पर बरसत पानी ! ॥ १ ॥
कह गिरधर कविराय, नाथ हो तुमहि सेवैया ।
उठे दयाको डाँड घाट पर आवे नैया ॥ २ ॥
१४-१०-१९३०
१७७
( राग आसावरी
-तीन ताल)
कर ले सिंगार, चतुर अलबेली
साजनके घर जाना होगा ॥ ध्रु० ॥
मिट्टी ओढवन, मिट्टी बिछावन,
मिट्टी से मिल जाना होगा ॥ १ ॥
नहा ले, धो ले, सीस गुंधा ले,
फिर वहांसे नहि आना होगा । कर ॥ २ ॥
१४-१०-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
१७८
[ गुजराती ]
( राग खमाज ताल घुमाली)
वैष्णव जन तो तेने कहीए, जे पीड पराई जाणे रे;
परदुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आगे रे. ध्रु०
सकळ लोकमा सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे;
वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे.
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे;
जिल्हा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे.
मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ वैराग्य जेना मनमां रे;
रामनामनुं ताळी लागी, सकळ तीरथ तेना तनमां रे.
लोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे;
भणे नरसंयो तेनुं दरसन करतां, कुछ एकोतेर ताय रे.
१
२
३
१५-१०-१९३०
४४-२९
१७९
मराठी भजन
(राग जोगीमांड- ताल कव्वाली)
जे का रंजले गांजले, त्यांसि म्हणे जो आपुले ।
तोचि साधु ओळखावा, देव तेथेचि जाणावा ।।
मृदु सबाह्य नवनीत, तैसें सज्जनायें चित्त ।
ज्यासि आपंगिता नाहीं, त्यासि घरी जो हृदयीं ॥
दिया करणें जे पुत्रासी, तेचि दासा आणि दासी ।
तुका म्हणे सांगों किलो, तोचि भगवंताची मूर्ति ।
१८०
(राग पूर्वी अगर विभास - ताल कवाली)
देव जवळी अंतरी भेटी नाहीं जन्म बेरी ।
मूर्ति त्रैलोक्य संचली, दृष्टि विश्वाची चुकली ।
भाग्यें आले संतजन झालें देवाचें दर्शन ।
रामदासी योग झाला, देहीं देव प्रगटला ॥
४४९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४५०
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
१८१
(राग पूर्वी तीन ताल )
भरलें ।
आलें ।
तें मन निष्ठुर कां केलें, जें पूर्ण दयेनें
गजेन्द्राचे हाकेसरिसें घाउनियां
प्रह्लादाच्या भावार्थासी, स्तंभी गुरगुरलें ॥
पांचाळीच्या करुणा-वचनें कळवळुनी आलें ।
एका जनार्दनीं पूर्ण कृपेनें निशिदिनि पदीं रमलें ।
१५-१०-१९३०
१८२
(राग केदार ताल केरवा अगर धुमाळी)
पापाची वासना नको दाबू डोळा,
त्याहुनी अंधळा बराच
निदेचें श्रवण नको माझे कानी,
मी ।
बधिर करोनि ठेवीं देवा ।
अपवित्र वाणी नको माझ्या मुखा,
त्याजहूनि मुका बराच मी ।
नको मज कधीं परस्त्रीसंगति,
जनांतूनि माती उठतां भली ।
तुका म्हणे मज अवध्याचा कंटाला,
तूं एक गोपाळा आवडसी ।।
१६-१०-१९३०
१८३
( राग खमाज तीन ताल )
स्मरतां नित्य हरि, मग ती माया काय करी ?
श्रवणें मननें अद्वय वचनें, पळतो काळ दूरी।
करुणाकर वर-दायक हरि जो, ठेवित हात शिरीं ।
तोचि निरंतर उद्धव चरणी, अमृत पान करी ॥
१७-१०-१९३०
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१८४
( राग धनाश्री- तीन ताल )
संतपदाची ०
संत-पदाची जोड, दे रे हरि !
संत समागमें आत्म-सुखाचा सुन्दर उगवे मोड |
सुफलित करुनी पूर्ण मनोरथ पुरविसि जीविचे फोड ।
अमृत म्हणे रे हरि-भक्तांचा शेवट करिसी गोड ।।
१७-१०-१९३०
भाव
१८५
(राग झिझोटी ताल घुमाळी)
धरा रे, अपुलासा देव करा रे ।।
कोणी काय म्हणों या साठी, बळकट प्रेम असावें गांठी ।
निंदा-स्तुति वर लावुनि काठी, मी तूं हरा रे अपुलासा ०
सकाम साधन सर्वहि सांडा, निष्कामे मुळ भजनी भांडा ।
नाना कुतर्क वृत्तिसि दवडा, आलि जरा रे--
• अपुलासा०
दुर्लभ नरदेहाची प्राप्ति, पुन्हां न मिळे हा कल्पांतीं ।
ऐसा विवेक आणुनि चित्तीं, गुरुसि वरा रे अपुलासा ०
केसरिनाथ गुरुचे पायीं, सृष्टी आजि बुडाली पाही ।
शिवदिन निश्चय दुसरा नाही, भक्त सखा रे अपुलासा ०
१८-१०-१९३०
१८६
(राग समाज
•तीन ताळ)
अशाश्वत संग्रह कोण करी ?
कोण करी घर सोपे माडया,
झोंपडि हेचि बरी ।
चिरगुट चिंध्या जोडुनि
गोधडी हेचि
नित्य नवें जें देइल
भक्षू तेचि
अमृत म्हणे मज भिक्षा
कंथा
बरी ।
माधव
परी ।
डोहळे
येति अशा लहरी ॥
१९-१०-१९३०
४५१
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सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
१८७
(राग झिझोटी - ताल दादरा )
हरि भजनावीण काळ घालवू नको रे ।।
दोरिच्या सापा भिउनी भवा, भेटि नाहि जिवा शिवा ।
अंतरीचा ज्ञान-दिवा, मालवू नको रे ॥
विवेकाची ठरेल ओल, ऐसे बोलावे की बोल ।
आपुलें मतें उगिच चिखल, कालवू नको रे ।
संत संगतीनें उमज, आणुनि मनीं पुरतें समज ।
अनुभवावीण मान हालवू नको रे ॥
सोहिरा म्हणे ज्ञान ज्योति, तेथें कैचि दिवस राती ।
तयाविणें नेत्रपाती, हालवू नको रे ॥
१८८
२०-१०-१९३०
पवित्र तें कुळ पावन तो देश जेथें हरिचे दास जन्म घेती ।
कर्मधर्म त्यांचे जाला नारायण त्याचेनि पावन तिन्ही लोक ।
वर्ण अभिमानें कोण जाले पावन ? ऐसें या सांगून मजपाशीं
अंत्यजादि योनि तरल्या हरिभजनें तयांची पुराणें भाट झाली ।
वैश्य तुळावार गोरा तो कुंभार धागा हा चांभार रोहिदास
कबीर मोमीन लतिफ मुसलमान सेना न्हावी आणि विष्णुदास ।
कान्होपात्र खोदु पिंजारी तो दादू भजनी अभेदु हरिचे पायी ।
चोखा मेळा का जातीचा महार त्यासी सर्वेश्वर ऐक्य करी
नामयाची जनी कोण तिचा भाव ? जेवी पंढरीराव तियेसवें
मैराळ जनक कोण कुळ त्याचें ? महिमान तयाचे काय सांगो ?
यातायातिधर्म नाहीं विष्णुदासा निर्णय हा ऐसा वेदशास्त्री ।
तुका म्हणे तुम्हीं विचारावे ग्रंथ
तारिले पतित नेणों किती ।
१८९
( राग छाया समाज - ताल घुमाली)
२१-१०-१९३०
नियम पाळावे, जरि म्हणशिल योगी व्हावें ॥ ध्रु० ॥
रसनेचा जो अंकित झाला, समूळ निद्रेला जो विकला,
तो नर योगाभ्यासा मुकला, असें समजावें जरि०
रात्री निद्रा परिमित ध्यावी भोजनांत ही मिति असावी,
शब्द-वल्गना बहु न करावी, साधक जीवेंजरि०
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यापरि सकलाहार-विहारी, नियमित व्हायें मनि अवधारी,
निज-रूपोन्मुख होउनी अंतरी, चित्त मग धावें जरि०
विषयापासुनि वळतां वृत्ति, येइल सहजचि आत्म्यावरती,
जैसा निश्चळ दीप निवाती, समाधि पावे जरि०
बुद्धि-ग्राह्य अतीन्द्रिय सुख तें वर्णाया श्रुति अक्षम त्यातें,
मग तें कैसें कृष्णसुतातें बोलतां यायें जरि०
जेथें
१९०
जातों तेथें तूं माझा सांगाती
चालविसी हाती धरूनियां ।
बालों वाटे आम्हीं तुझाचि आधार
चालविसी भार सर्वे माझा ।
बोलों जातां वरळ करिसी तें नीट
नेली लाज घीट केलों देवा ।
जन मज झाले लोकपाळ
सोईरे सकळ प्राणसखे ।
अवधे
तुका
म्हणे आतां खेळतों कौतुकें
झाले तुझें सुख अंतहां ॥
४५३
१९१
(राग भैरवी
-ताल कवाली)
न
कळतां काय करावा उपाय
जेणें राहे भाव तुझ्या पायी ?
येउनियां बास करिसी हृदयीं
ऐसें
घडे
कई कासयानें ?
साच भावें तुझें चितन मानसी
राहे हैं करिसी गा देवा ?
लटिकें हैं माझें करूनियां दूरी
साच तूं अंतरी येउनी राहें।
तुका म्हणे मज राखावें पतिता
आपुलिया सत्ता
पांडुरंगा ||
२२-१०-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४५४
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
१९२
मुक्ति पांग नाही विष्णूचिया दासां
संसार ते कैसा न देखती ।
वैसला गोविंद जडोनियां चित्ती
आदि तेचि अंती अवसानी ।
भोग नारायणा देऊनी निराळी
ओवियां मंगळी तोचि गाती ।
बळ बुद्धि त्यांची उपकारासाठी
अमृत तें पोटीं सांठविलें ।
दयावंत तरी देवाच सारिखीं
आपुली पारकी नोळखती ।
तुका म्हणे त्यांचा जीव तोचि देव
वैकुंठ तो ठाव वसती ते ।।
१९३
काय वाणूं आतां न पुरे हे वाणी
थोरीय
मस्तक चरणी ठेवीतसें ।
सांडिली आपुली परिसें
नेणें शिवों कैसें लोखंडासी ।
जगाच्या कल्याणा संतांच्या विभूति
देह
कष्टविती उपकारें ।
भूतांची दया हैं
भांडवल संतां
आपुली
ममता
नाहीं देहीं ।
तुका म्हणे सुख
पराचिया
सुखें
२३-१०-१९३०
अमृत हें मुखें स्रवतसे ॥
१९४
नाहीं संतपण मिळत ते हाटी
हिंडतां कपाटी रानी
नये मोल देतां धनाचिया राशी
वनीं ।
नाहीं तें आकाशी पाताळी तें ।
तुका म्हणे मिळे जीवाचीये साटों
नाही तरी गोष्टी बोलों नये ।
२४-१०-१९३०
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१९५
भक्त ऐसे जागा जे देहीं उदास
गेले आशापाश निवास्नी ।
विषय तो त्यांचा झाला नारायण
नावडे धन जन मातापिता ।
निर्वाणी गोविंद असे मागेंपुढे
कांहींच सांकडे पडों नेदी ।
तुका म्हणे सत्य कर्मा व्हावें साह्य
घातलिया भय नर्का जाणें ।
१९६
वेद अनंत बोलिला, अर्थ इतुकाचि साधिला ।
विठोबासी शरण जावें, निजनिष्ठे नाम गायें।
सकळ शास्त्रांचा विचार, अंती इतुकाचि निर्धार ।
अठरा पुराणी सिद्धांत, तुका म्हणे हाचि हेत ।।
१९७
आणीक दुसरें मज नाहीं आतां
नेमिलें या
चित्तापासुनियां ।
पांडुरंग ध्यानी,
पांडुरंग
मनी,
जागृती
स्वपनी
पांडुरंग ।
पडिलें वळण इंद्रियां सकळां
भाव तो निराळा नाहीं दुजा ।
तुका म्हणे नेत्रीं केली ओळखण
तटस्थ तें ध्यान विटेवरी ॥
१९८
न
मिळो खावया न वाढो संतान,
ऐसी
माझी
परि हा नारायण कृपा करो ।
वाचा मज उपदेशी
आणीक लोकांसी
हेंचि सांगे ।
२५-१०-१९३०
४५५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४५६
विटंयो
परि
तुका
म्हणे
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
शरीर,
होत कां विपत्ती
राहो चित्तीं नारायण ।
नाशिवंत हे सकळ
आठवे
गोपाळ तेंचि हित ॥
२६-१०-१९३०
१९९
महारासी शिवे,
कोपे ब्राह्मण तो नव्हे ।
नावळे चांडाळ,
तया प्रायश्चित्त काही, देहत्याग करितां नाहीं ।
ज्याचा संग चित्ती तुका म्हणे तो त्या याती ॥
त्याचा अंतरी विटाळ |
२००
देह
चरण
बदनी
तुझें
(राग बडहंस ताल घुमाली)
जावो अथवा राहो
पांडुरंगी दृढ़ भावो ।
न सोडीं सर्वथा
आण
तुझी पंढरिनाथा ।
मंगल नाम
हृदय
अखंडित
प्रेम ।
नामा
म्हणे केशवराजा
केला पण चालवि माझा ॥
२०१
पुण्य पर उपकार, पाप ते पर पीडा,
आणिक नाहीं जोडा दुजा यासी ।
सत्य तोचि धर्म, असत्य तें कर्म,
आणिक हें धर्म नाहीं दुजें ।
गति तेचि मुखी नामाचें स्मरण,
अधोगति जाण विन्मुखता ।
संतांचा संग तोचि
नर्क तो उदास
स्वर्गवास,
अनर्गळ |
तुका म्हणे उघडें आहे हित घात,
जया जें उचित करा तैसें ॥
२७-१०-१९३०
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(राग भैरवी
शेवटची विनवणी
२०२
-
ताल कवाली)
संतजनीं
परिसावी ।
तुम्हांसी ।
विसर तो न पडावा माझा देवा
आतां फार बोलों काई अव पायां विदीत ।
तुका म्हणे पडिलों पायी करा छाया कृपेची ॥
२०३
हेची दान देगा देवा, तुझा विसर न व्हावा ।
गुण गाईन आवडी, हेचि माझी सर्व जोडी ।
नलगे मुक्ति धन संपदा, संत-संग देई सदा ।
तुका म्हणे गर्भवासीं सुखें घालावें आम्हांसी ॥
२०४
बंगाली भजन
२८-१०-१९३०
( राग भैरवी - ताल दादरा या राग आसावरी द्रुत एक ताल )
अन्तर मम विकसित करो अन्तरतर हे !
-
निर्मल करो, उज्ज्वल करो, सुन्दर करो हे अन्तर०
जाग्रत करो, उद्यत करो, निर्भय करो है,
मंगल करो, निरलस निःसंशय करो हे - अन्तर०
युक्त करो हे सबार संगे, मुक्त करो हे बंध,
संचार करो सकल कर्मे शान्त तोमार छंद - अन्तर०
चरण-पये मम चित्त निष्पंदित करो है.
नंदित करो, नंदित करो, नंदित करो है - अन्तर०
२०५
वहे
निरन्तर अनंत
आनन्दधारा
बाजे असीम नभ माझे अनादि रव
जागे अगण्य
एकक अखण्ड
रवि चन्द्र तारा बहे ०
ब्रह्माण्ड
राज्ये
परम एक सेइ राज-राजेन्द्र राजे
विस्मित निमेष हृत विश्व चरणे विनत
लक्ष शत भक्त-चित वाक्यहारा - - वहे०
२९-१०-१९३०
४५७
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सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
२०६
( राग अडाणा -- ताल झपताल)
तुमि बंधु, तुमि नाथ,
निशिदिन
तुमि आमार;
तुमि सुख, तुमि शान्ति,
तुमि हे अमृत पाथार. ध्रु०
तुम तो आनन्दलोक,
जुडाओ प्राण नाशो शोक;
तापहरण तोमार चरण,
असीम शरण दीनजनार. तुमि ०
[ ३०-१०-१९३० ]
२०७
एकटि नमस्कारे प्रभु! एकटि नमस्कारे
संसारे ।
तोमार ए
रसेर भारे
सकल देह लुटिये प
घन श्रावण मेघेर मत
एकटि नमस्कारे प्रभु!
समस्त मन पडिया था
नाना सुरेर आकुल धारा
एकटि नमस्कारे प्रभु!
समस्त गान समाप्त हो
नम्र नत
एकटि नमस्कारे
तब भवनद्वारे ।
मिलिये दिये आत्म-हारा
एकटि नमस्कारे
नीरव पारावारे ।
हंस जेसन मानस यात्री, तेमनि सारा दिवस-रात्री
एकटि नमस्कारे प्रभु! एकटि नमस्कारे
समस्त प्राण उडे चलुक् महा-मरण पारे ।
२०८
गुजराती भजन
( राग खमाज -- ताल घुमाली)
[ ३०-१०-१९३० ]
भूतळ भक्ति पदारथ मोटु, ब्रह्म लोकमां नाहि रे;
पुण्य करी अमरापुरी पाम्या, अन्ते चोराशी मांही रे. ध्रु०
हरिना जन तो मुक्ति न मागे, मागे जन्मो जनम अवतार रे
नित सेवा, नित कीर्तन ओच्छव, नीरखवा नन्दकुमार रे १
१. साधन-सूत्र में कोई तिथि नहीं दी गई है। लेकिन इसका और इसके वाइवाले भनका अनुवाद
सम्भवत: इसी तारीखको हुआ था।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
भरतखंड भूतळमां जनमी, जेणे गोविन्दना गुण गाया रे,
धन धन रे एनां मातपिताने, सफळ करी एणे काया रे.
धन वृन्दावन, धन ए लीला, धन ए व्रजनां वासी रे;
अष्ट महासिद्धि आगणिये रे कभी मुक्ति के एमनी दासी रे.
ए रसनो स्वाद शंकर जाणे के जाणे शुकजोगी रे;
कईएक जाणे व्रजनी रे गोपी, भणे नरसैयो भोगी रे.
२
३
४
३१-१०-१९३०
२०९
( राग खमाज - ताल घुमाली)
१
नारायणनुं नाम ज लेतां वारे तेने तजीए रे;
मनसा वाचा कर्मणा करीने लक्ष्मीवरने भजीए रे. ध्रु०
कुळने तजीए, कुटुम्बने तजीए, तजीए मा ने बाप रे;
भगिनी सुत दाराने तजीए, जेम तज कंचुकी साप रे.
प्रथम पिता प्रह्लाद तजियो, नव तजियुं हरिनुं नाम रे ;
भरत शत्रुध्ने ती जनेता, नव तजिया श्रीराम रे.
ऋषि पत्नीए श्रीहरि काजे, तजिया निज भरणार रे ;
तेमा तेनुं कईये न गयुं, पामी पदारथ चार
व्रज वनिता विठ्ठलने काजे, सर्व तजीने
भणे नरसंयो वृन्दावनमां, मोहन साथै
रे.
२
३
चाली रे;
महाली रे.
ढें
१-११-१९३०
मांडता झपताल)
२१०
( राग आसा
समरने
श्रीहरि मेल ममता परी,
जोने विचारीने मूळ तारु;
तुं अल्या कोण ने कोने वलगी रह्यो ?
वगर समज्ये कहे मारु मारु.
देहतारी नथी, जो तुं जुगते करी,
राखतां नव रहे निश्चे जाये;
देहसंबंध तज्ये अवनवा बहु थशे
पुत्र कलन परिवार बहाये.
घन तणुं ध्यान तुं अहोनिश आदरे,
तारे अंतराय मोटी;
पासे छे पियु अल्या, तेने नव परखियो,
ए
ज
१
२
हाथथी बाजी गई, थयो रे खोटी. ३
४५९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
भरनिद्रा भय संधी घेर्यो घणो,
संतना शब्द सुणी कोन जागे ?
न जागतां नरसैंयो लाज छे अति घणी,
जनमो-जनम तारी खांत भागे,
४
२-११-१९३०
२११
(राग आसा-मांड - ताल झपताल )
अखिल ब्रह्मांडमा एक तु श्रीहरि
जूजवे रूपे अनंत भासे;
तेजमा तत्व तुं,
शून्यमा शब्द थई वेद वासे.
देहमां देव सुं
पवन तुं, पाणी तुं,
भूमि तुं, भूधरा,
वृक्ष थई फूली रह्यो आकाशे;
विविध रचना करी अनेक रस लेवाने,
१
शिव थकी जीव थयो ए ज आशे. २
वेद तो एम वदे, श्रुति स्मृति साख दे -
कनक कुण्डल विषे भेद न्होये;
घट घडिया पछी नामरूप जूजवां
अंते
तो हेमनुं हेम
वृक्षमां बीज तुं बीजमां वृक्ष तुं,
होये. ३
जोउं पटंतरी ए ज पासे;
भणे नरसंयो ए मन तणी शोधना
प्रीत करें प्रेमची प्रगट बाशे ४
३-११-१९३०
२१२
( राग आसा-मांड - ताल झपताल )
ज्यां लगी आतमा-तत्त्व चीन्यो नहि
त्यां लगी साधना सर्व जूठी,
मानुषा-देह तारो एम एळे गयो
मावठानी जेम वृष्टि वूठी. १
शुं थयुं स्नान पूजा ने सेवा थकी,
शुं पयुं घेर रही दान दीधे ?
शुं थयुं धरी जटा भस्म लेपन कर्ये,
शुं धर्यु बाळ लोचन कीधे ? २
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४९९
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शुं पयुं तप ने तीरथ कीधा थकी,
शुं पयुं माळ ग्रही नाम लीधे ?
शुं थयुं तिलक ने तुळसी धार्या थकी,
शुं थयुं गंगजल पान कीधे ?
शुं थयुं वेद
व्याकरण वाणी वये,
शुं थयुं राग ने रंग जाण्ये ?
शुं थयुं खट दरशन सेव्या थकी
शुं थयुं वरणना भेद आण्ये ?
ए छे परपंच सह पेट भरवा तणा,
आतमाराम परिब्रह्म न जोयो;
भणे नरसंयो
के
रत्न-चितामणि जन्म खोयो.
तत्व-दर्शन बिना
३
४
५
४-११-१९३०
४६१
२१३
( राग आसा मांड - ताल झपताल)
जे गमे जगतगुरु देव जगदीशने
ते तणो खरखरो फोक करवो;
आपणो चितव्यो अर्थ काई नव सरे,
कगरे एक उद्वेग धरवो.
हुँ करूँ, हुं करूं, ए ज अज्ञानता
शकटनो भार जेम श्वान ताणे;
सृष्टि मंडाण छे सर्व एणी पेरे
जोगी जोगेश्वरा कोईक जाणे.
नीपजे नरथी तो कोई ना रहे दुखी
शत्रु मारीने सौ मित्र राखे;
राय ने रंक कोई दृष्टे आवे नहि,
भवन पर भवन पर छत्र दाखे.
ऋतु लता पत्र फळ फूल आपे यथा,
मानवी मूर्ख मन व्यर्थ शोने;
जेहना भाग्यमा जे समे जे लख्युं
तेहने ते समे तेज पहोंचे.
ग्रन्थ गरबड करी बात न करी खरी
जेहने जे गमे तेने पूजे,
मन कर्म वचनथी आप मानी लहे
१
२
३.
४
सत्य छे ए ज मन एम सूझे. ५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
सुख संसारी मिथ्या करी मानजो
कृष्ण विना बीजुं सर्व काचुं
जुगल कर जोडी करी नरसंयो एम कहे,
जन्म प्रतिजन्म हरिने ज जाचुं.
२१४
( राग आसा मांड ताल झपताल )
जागीने जोउं तो जगत दीसे नहि,
चित्त
ऊंघमा अटपटा भोग
६
५-११-१९३०
भासे;
चैतन्य विलास तद्रूप छे,
ब्रह्म लटकां करे ब्रह्म पासे.
पंच महाभूत परिब्रह्म विषे ऊपज्यां
अणु अणु मांही रह्यो रे वळगी;
फूल ने फळ ते तो वृक्षनां जाणवां,
थड थकी डाळ ते नहि रे अळगी.
वेद तो एम वदे, श्रुति स्मृति साख दे -
घाट घडिया
कनक कुण्डल विषे भेद न्होंये;
पछी नामरूप जूजवा
अंते तो हेमनुं हेम होये.
जीव ने शिव तो आप इच्छाए थया
रची परपंच चौद लोक कीधा;
भणे नरसंयो ए, 'तेज तुं, ' 'ते जतुं
एने समर्याथी कई संत सीध्या.
२१५
( राग आसा मांड - ताल झपताल)
ध्यान धर हरि तणुं अल्पमति आळसु
जे थकी जन्मनां दुःख जाये,
अवर धंधो कर्मे अरथ कांई नवसरे
?
२
३
४
६-११-१९३०
माया देखाड़ीने मृत्यु बहाये ॥ १ ॥
सकल कल्याण श्रीकृष्णना चरणमां
शरण आवे सुख पार व्हाये,
अवर वेपार तुं मेल मिध्या करी
कृष्णानुं नाम तुं राख मोंये
॥ २ ॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५०१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
पटक माया परी, अटक चरणे हरि
बटक मावात सुणतां ज साची,
आशनुं भवन आकाश सुधि रच्धुं
मूढ़ ! ए मूळची भीत काची।
सरस गुण हरि तणा जे जनो अनुसर्या
ते तथा सुजश तो जगत बोले
नरसैयो रंकनी प्रीत प्रभुशुं घणी
अवर वेपार नहि भजन तोले
॥३॥
॥ ४ ॥
४६३
७-११-१९३०
जूनुं तो
२१६
( राग आसा मांड तीन ताल)
थयुं रे देवळ जूनुं तो थयुं,
मारो हंसलो नानो ने देवळ जूनुं तो थयुं. ध्रु०
आ रे काया रे हंसा, डोलवाने लागी रे,
पडी गया दांत, मांयली रेखूं तो रहयुं. मारो०
तारे ने मारे हंसा, प्रीत्युं बंधाणी रे,
ऊडी गयो हंस, पांजर पड़ी रे रयू. मारो०
बाई मीरां कहे छे प्रभु गिरिधरना गुण,
प्रेमनो प्यालो समने पाउं ने पीउं. मारो०
८-११-१९३०
जल
२१७
( राग कालिंगड़ा - ताल दीपचंदी)
नहीं रे विसाएं हरि, अंतरमाथी नहीं रे ०
जमुनाना पाणी रे जाता
ध्रु०
शिर पर मटकी घरी.
१
आवतां ने
जातां मारग बच्चे
अमूलख वस्तु
जडी.
२
आवतां ने जातां वृन्दा रे वनमां
चरण तमारे
पीळां पीताम्बर जरकशी
पडी.
३
जामा
कैंसर आड
करी
मोर
मुगट
ने काने रे कुंडल
मुख पर मोरली धरी.
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
बाई मीरां कहे प्रभु गिरिधरना गुण
विठ्ठलवरने
वरी.
६
९-११-१९३०
२१८
(राग झिंझोटी तीन ताल)
-
बोल मा, बोल मा, बोल मा, रे
राधा-कृष्ण विना बीजुं बोल मा. भु०
शेलडीनो स्वाद तजीने
कडवो लीमडो घोळ मा रे.
साकर
१
चांदा सूरजनुं तेज तजीने
आगिया संगाते प्रीत जोड मा रे.
२
हीरा माणेक झवेर तजीने
कथीर संगाते मणि तोळ मा रे.
३
मीरां कहे प्रभु गिरिधर नागर
शरीर आप्यु
समतोलमां
रे.
४
१०-११-१९३०
२१९
मुखडानी
( राग काफी - ताल द्रुत - दीपचंदी)
माया लागी रे,
मोहन प्यारा !
मुख में जोयुं तारं, सर्व जग थयुं खाएं,
मन मारुं रहभुं न्याएं रे, मोहन ०
संसारीनुं सुख एवं झांझवानां नीर जेवुं,
तेने तुच्छ करी फरीए रे, मोहन ०
मीरांबाई बलिहारी, आशा मने एक तारी,
हवे हूं तो बडभागी है,
२२०
( राग आसावरी -- तीन ताल)
मोहन०
प्र०
११-११-१९३०
वैष्णव नथी
थियो तु रे, शीद गुमानमां घूमे
हरिजन नथी थयो तु रे. टेक
हरिजन जोई हैहुं नव हरखे, द्रवे न हरिगुण गातां,
काम धाम चटकी नथी पटकी, क्रोधे लोचन रातां.
१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४-३०
परिशिष्ट
तुज संगे कोई वैष्णव थाये, तो तुं वैष्णव साचो,
तारा संगनो रंग न लागे, तांहां लगी तुं काचो.
परदुःख देखी हृदे न दाझे, परनिंदा नथी डरतो,
बहाल नथी विठ्ठलसुं सानुं, हठे न हूँ हूँ करतो.
परोपकारे प्रीत न तुजने, स्वारय छूटयो छे नहीं,
कहेणी तेवी रहेणी न मळे, कांहां लख्युं एम कहेनी.
२
३
४
भजवानी रुचि नथी मन निश्चे, नथी हरिनो विश्वास,
जगत तणी आशा हे जांहां लगी, जगत गुरुं, तुं दास. ५
करेश तो, साची वस्तु जडशे,
मान पण, साधुं कहेवुं पडशे.
मन तणो गुरु मन
दया दुःख के सुख
६
१२-११-१९३०
(राग हिंडोल
२२१
--
-ताल तेवरा)
हरि, जेवो तेवो हूँ दास समारो
२
करुणासिंधु, ग्रहो कर मारो. टेक
सांकडाना साथी शामक्रिया, छो बगडचाना बेली,
शरण पडचो खल अमित कुकरमी, तदपि न मूको ठेली. १
निज जन शूठानी जाती लज्जा, राखो छो श्रीरणछोड,
शून्य भाग्यने सफळ करो छो, पूरो वरद बळ कोड.
अवळनुं सवळ करो सुन्दर-बर, ज्यारे जन जाय हारी,
अयोग्य योग्य, पतित करो पावन, प्रभु दुःख दुष्कृतहारी. ३
विनति विना रक्षक निज जनना, दोष तथा गुण मानो,
स्मरण करता संकट टाळो, गणो न मोटो नानो.
विकळ पराधीन पीडा प्रजाळो, अंतरनुं दुःख जाणो,
आरत-बन्धु सहिष्णु अभयकर, अवगुण उर नव आणो.
सर्वेश्वर सर्वात्मा स्वतंत्र, दया प्रीतम गिरिधारी,
श्रीजी मारे, मोटी छे ओष तमारी.
शरणागत वत्सल
४
५
६
१३-११-१९३०
२२२
(राग बिलावल
झपताल)
महाकष्ट पाभ्या विना कृष्ण कोने मला ?
चारे जुगना जुओ साधु शोधी
बहाल वैष्णव विषे विरलाने होय बहु
पीड नाराज भक्ति विरोधी
॥ ध्रु० ॥
४६५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
ध्रुवजी, प्रह्लादजी, भीष्म, बलि, विभीषण
विदुर, कुन्ती कुंवर सहित दुखियां
वसुदेव देवकी, नंदजी, पशुपति
सकळ ब्रजभक्त दुःखी भक्त मुखिया
नळ दमयन्ती, हरिश्चंद्र तारामती,
रुक्मांगद अंबरीषादि कष्टी
नरसिंह महतो ने जयदेव मीरा जनी
प्रथम पीडा पछी सुखनी वृष्टि
व्यास आधि व्याथि तुलसी मथवादिक
शिव कपाली विद्या विश्व निन्दे,
जग जननी जानकी दुःख दुस्तर स
पाप वण ताप, जेने जगत वंदे
संचित क्रियमाण प्रारम्भ जेने नथी
तेने भय ताप आवी नडे छे,
अकल गत ईश हेतु न समज्युं पड़े
प्रबल इच्छा सरव ते पड़े छे
छे कथन मात्र पाप ने पुण्य थे ।
नवव्यं नंदकुंवरनं जगत नाचे
दया प्रीतम रुचि बिना पत्र हाले नहि
पण न भागे भ्रमण मनकाचे
॥१॥
॥२॥
113 11
।। ४ ।।
॥५॥
१४-११-१९३०
२२३
( राग धीरानी काफ़ी )
भटकता भवमां रे, गया काल कोटी वही
हृद थई हावा रे, राखो हरि हाथ नही
आव्यो शरण त्रितापनी दाइयो, शीतल कीजे श्याम
॥ टेक ॥
करगरी कहूं, कृष्ण कृपानिधि ! राखो चरणे सुखधाम
करुणा कटाक्षे रे, फिल्मियकोष वही
जो मारा कृत सामुं तमे जोशो, तो ठरशे बराबरी
रत्न गुंजा क्यम होय समतोल, हुं तो रंक ने तमे हरि
माटे मन मोटु रे, करो मुने रंक नही
आशाभर्यो आव्यो अविनाशी, समर्थ लही तम पास
धर्मधरिधर तम द्वारे थी, हूं क्यम जाऊँ निराश ?
।। १।।
॥२॥
निजनो करी लोरे, ना तो मुने कहेशो नहि ॥ ३ ॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
अरज सांभळो अनाथ जननी, श्रवणे श्री रणछोड
एकवार सन्मुख जुओ शामळा, पहोंचे मारा मनना कोड
हसीने बोलावे रे, 'दया तुं मारो' कही
॥ ४ ॥
१५-११-१९३०
२२४
( राग छाया समाज --
-तीन ताल)
हरिनो मारग छे शूरानो नहि कायरतुं काम जोते;
परथम पहेलु मस्तक मूकी, वळती लेवु नाम जोने. ध्रु०
सुत वित दारा शीश समरपे, ते पामे रस पीवा जोने;
सिंधु मध्ये मोती लेवा मांही पडघा मरजीवा जोने. ॥ १ ॥
मरण आगमे ते भरे मूठी, दिलनी दुग्धा वामे जोने;
तीरे ऊभा जुए तमासो, ते कोटी नव पाने जोने ॥ २ ॥
प्रेमपंथ पावकनी ज्वाळा, भाळी पाछा भागे जोने;
मांही पडया ते महासुख माणे, देखनारा दाझे जोने ॥ ३ ॥
माथा साठे मोधी वस्तु, सांपडवी नहि सहेल जोने;
महापद पाम्या ते मरजीवा, मूकी मननो मेल जोने. ॥ ४ ॥
माता पूरा प्रेमी परसे जोने;
लीला ते रजनीनंद नरखे जोने. ॥५ ॥
राम-अमलमां राता
प्रीतमना
स्वामीनी
२२५
१६-११-१९३०
४६७
( राग सारंग ताल दीपचंदी)
जननी जीवो रे गोपीचंदनी, पुत्रने प्रेर्यो वैराग जी;
उपदेश आप्यो एणी पेरे, लाग्यो संसारीडो आग जी. ॥ध्रु० ॥
धन्य धन्य माता ध्रुव तणी, कह्यां कठण वचन जी
राजसाज सुख परहरी, वेगे चालिया वन जी. ।। १ ।।
ऊठी न शके रे ऊंटियों, बहु बोलाव्यो बाजंद जी;
तेने रे देखी त्रास ऊपन्यो, लोधी फकीरी छोडो फंद जी ॥ २ ॥
भलो रे त्याग भरथरी तणो, तजी सोळसें नार जी;
मंदिर शहला मेली करी, आसन कीथलां बहार जी. ।। ३ ।।
ए वैराग्यवन्तने जाउं वारणे, बीजा गया रे अनेक जी
भला रे भूडा अवनी उपरे, गणतां नावे छेक जी ॥ ४ ॥
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६८
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
क्यों गये कुळ रावण तणुं, सगरसुत साठ हजार जी;
न रह्यं ते नाणुं राजा नंदनुं, सर्व सुपंन-वेवार जी ।। ५ ।।
छत्रपति चाली गया, राज मूकी राजन जी;
देव दानव मुनि मानवी, सर्वे जाणो सुपन जी ।। ६ ।।
समजी मूको तो सारं घणुं, जरूर मुकावशे जम जी;
निष्कृळांनन्द कहे नहि मटे, साधुं कहुं खाई सम जी ॥ ७ ॥
१७-११-१९३०
२२६
( राग सारंग ताल दीपचंदी)
त्याग न टके रे वैराग विना, करीए कोटि उपाय जी;
अंतर अंडी इच्छा रहे, ते केम करीने सजाय जी ? ॥ ध्रु० ॥
वेष लीधो वैरागनो, देश रही गयो दूर जी;
उपर वेष अच्छो बन्यो, मांही मोह भरपूर जी ॥ १ ॥
काम क्रोध लोभ मोहनुं ज्यां लगी मूळ न जाय जी;
संग प्रसंगे पांगरे, जोग भोगनो थाय जी. ॥ २ ॥
उष्ण रते अवनी विषे, बीज नव दीसे
धन बरसे वन पांगरे, इंद्रिय विषय
बहार जी;
आकार जी ॥ ३ ॥
चमक देखीने लोह चळे, इंद्रिय विषय संजोग जी;
अणभेटये रे अभाव छे, भेट भोगवशे भोग जी. ।। ४ ।।
उपर तजे ने अन्तर भजे, एम न सरे अरब जी;
वणस्यो रे वर्णाश्रम थकी, अंते करशे अनरथ जी ॥ ५ ॥
भ्रष्ट थयो जोग-भोगथी, जेम बगडधुं दूध जी;
गयुं घृत मही माखण थकी, आपे थयुं रे अशुद्ध जी ॥ ६ ॥
पळमां जोगी ने भोगी पळमां, पळमां गृही ने त्यागी जी;
निष्कुलानन्द ए नरतो, वणसमज्यो
वैराग जी. ।। ७ ।।
१८-११-१९३०
२२७
जंगल वसायुं रे जोगीए, तजी तनडानी आस जी
वात न गमे आ विश्वनी, आठे पहोर उदास जी ॥ ध्रु० ॥
सेज पलंग पर पोढता, मंदिर झरखा मांय जी
तेने नदि तृण साथरो, रहेता तस्तळ छाय जी
शाल दुशाला ओढता, झीणा जरकशी जाम जी
।। १ ।।
तेणे रे राखी कथा गोदड़ी, सहे शिर शीतथामजी ॥ २ ॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
भावतां भोजन जमता, अनेक विधिनां अन्न जी
तेरे मागण लाग्या टुकडा, भिक्षा भवन भवन जी
हाजी कद्देतां हजाएं उठतां, चालतां लश्कर लाव जी
ते तर चाल्यारे एकला, नहि पेंजार पावजी
॥ ३ ॥
॥ ४ ॥
रहो तो राजा रसाई करूं, जमता जाओ जोगीराजजी
खीर नीपजानुं क्षणुं एकमां, ते तो भिक्षाने काजजी ॥ ५ ॥
आहार कारण उभो रहे, एकनी करी आश जी
ते जोगी नहि, भोगी जाणवो, अंते थाय विनाशजी ॥ ६ ॥
राजसाज सुख परहरि, जे जन लेशे जोग जी
ते धनदारामां नहि घसे, रोग सम जागे भोगजी
धन्य ते त्याग वैरागने, तजी तनडानी आश जी
कुछ रे तजी निष्कुळ थया, तेनुं कुळ अविनाशजी
116 11
116 11
१९-११-१९३०
४६९
२२८
( राग सारंग दीपचंदी ताल)
जडभरतनी जातना, जोगी जे जगमाय जी
इन्द्रिय मननी उपरे रहे शत्रु सदाय जी
विकल न थाये विषयमां, रहे पर्वतप्राय जी
धरमधीरज मूके नहि, मरे मस्तक जाय जी
आठ पहोरमां एक घड़ी, नय माते निज देह जी
तेना सुख सारं शुं करे उपाय तर ऐह जी
हरि इच्छाए हरे फरे, करे जीवनो उद्धार जी
जेने मळे ऐवा जोगिया, पामे ते भव पार जी
एवा जोगीने आवी मळे, जाण्ये अजाये जन जी
निष्कुळानंद कहे ए नरने, पलमां करे पावनजी
॥ ध्रुव ॥
॥ १ ॥
॥ २ ॥
।। ३ ।।
॥ ४ ॥
२०-११-१९३०
२२९
(राग आसा - ताल झपताल )
धीर धुरन्धरा शूर साचा खरा
मरणनो भय ते तो मंन
फरे
नाणे,
खवं निखर्व दळ एक सामां
तरणने तुल्य
तेने ज जाणे. ॥ १ ॥
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
मोहनुं सेन महा विकट लडवा समे
मरे पण मोरचो नहि ज त्यागे,
कवि गुणी पंडित बुद्धे बहु आगळा
ए दळ देखता सर्व भागे.
काम ने क्रोध मद लोभ दळमां मुखी
लड़वा तणो नव लाग लागे,
जोगिया जंगम तपी त्यागी घणा
मोरचे गये
।। २ ।।
धर्मद्वार मागे. ॥ ३ ॥
एवा ए सेनशुं अडीलम आखडे
मुक्त आन्नद मोह-फोज मार्या पछी
गुरुमुखी जोगिया जुक्ति जाणे,
अखंड सुख अटळ पद राज माणे ॥ ४॥
२३०
(गरवी)
( शीख सामुजी दे छे रे ए डाळ)
मर
टेक न मेले रे ते मरद खरा जग मांहि
त्रिविध तापेरे, कदी अंतर डोले नाहि
निधड़क करते रे, दृढ़ धीरज मन धारी
काळ कर्मनी रे, शंका देवे विसारी
मोडुं बहे रे, निदने करी एक दिन
जगमुख सारु रे, केंदी कायर मन नय कर
अंतर पाडी रे, समजीने सवळी आंटी
माथु जातां रे मेले नहि ते नर माटी
कोईनी शंका रे, केदी मनमा नव धारे
ब्रह्मानन्दना रे, बहालाने पल न विसारे
२३१
(गरबी- ढाळ : सगपण हरिनुं साधुं )
रे शिर साठे नटवरने
वरीए,
२१-११-१९३०
॥ १ ॥
113 11
॥ ३ ॥
॥ ४ ॥
॥५॥
२२-११-१९३०
रे पार्छु ते पगलु नव भरीए ॥ध्रु० ॥
रे अन्तरदृष्टि करी खोळधुं रे उहापण झाझुं नव
होळ
ए हरि सारु माथु घोळधुं ॥ १ ॥
रे समज्या विना नव नीसरीए, रे रण मध्ये जईने नव डरीए;
त्यां मुख पाणी राखी मरीए ॥२॥
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
रे प्रथम चडे शूरो थईने, रे भागे पाछो रणमा जईने;
ते शुं जीये भुंडं मुख लईने. ॥ ३ ॥
रे पहेलु ज मनमां त्रेवडीए, रे होडे होडे जुढे नव चडीए;
रे जो चडीए तो कटका थई पडीए. ॥ ४ ॥
रे रंग सहित हरिने रटीए रे हाक वाग्ये पाछा नव हठीए
ब्रह्मानन्द कहे त्यां मरी मटीए ॥५॥
२३-११-१९३०
४७१
२३२
( राग छाया समाज-तीन ताल)
सद्गुरु शरण विना अज्ञान तिमिर टळशे नहि रे,
जन्म मरण देनाएं बीज खरं बळशे नहि रे ॥ ध्रु० ॥
प्रेमामृत-बच-पान विना, साचा खोटाना भान विना,
गांठ हृदयनी ज्ञान विना गळ नहि रे ॥ १ ॥
शास्त्र पुराण सदा संभारे, तन मन इंद्रिय तत्पर वारे,
वगर विचारे बळमां सुख रळशे नहि रे ॥ २ ॥
तत्त्व नयी मारा तारामां, सूझ समज नरता सारामां,
सेवक सुत दारामां दिन वळशे नहि रे ।। ३ ।
केशव हरिनी करता सेवा परमानन्द बतावे तेवा,
शोध विना सज्जन एवा मळशे नहि रे ॥ ४ ॥
२४-११-१९३०
२३३
( राग छाया समाज -तीन ताल)
मारी नाइ तमारे हाथ हरि संभाळजो रे,
मुजने पोतानो जाणीने प्रभुपद पाळो रे ॥ध्रु०॥
पथ्यापथ्य नथी समजातुं दुःख सदैव रहे ऊभरातुं,
मने हसे शुं थातुं नाथ निहाळजो रे ॥ १ ॥
अनादि आप वैध छो साचा, कोई उपाय विषे नहि काचा,
दिवस रह्या छे टांचा वेळा वाळजो रे. ॥ २ ॥
विश्वेश्वर शुं हजी विसारो, बाजी हाथ छतों को हारो ?
महा मुंझारो मारो नटयर, टाळजो रे ॥ ३॥
केशव हरि मारुं शुं थाशे, घाण वळचो शुं गढ घेराशे ?
लाज तमारी जाशे, भूधर भाळजो रे ॥ ४ ॥
२५-११-२९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
२३४
।। १ ।।
( राग बागेश्री ताल धमार अथवा तेवरा )
दीनानाथ दयाळ नटवर ! हाथ मारो मूको मा
हाथ मारो मूकशो मा हाथ मारो मूकशो मा ॥ ध्रु० ॥
आ महा भवसागरे, भगवान हूं पडघो छु;
चौद लोक निवास चपला-कान्त ! आ तक चूकशो मा.
ओष ईश्वर आपनी साधन विषे समजुं नहीं हूं;
प्राणपालक! पोत जोई, शंख आखर फूंकशो मा.
मात तात समां सहोदर, जे कहुं ते आप मारे,
हे कृपामृतना सरोवर ! दास सारु सूकशो मा.
शरण केशवलाल छे, चरण हे हरि राम तारुं;
अखिलनायक ! आ समय, खाटे मरो पण खूटशो मा.
॥ २ ॥
।। ३ ।।
॥ ४ ॥
२७-१०-१९३०
२३५
( राग कालिंगड़ा
-
तीन ताल)
॥ ध्रु० ॥
॥ १ ॥
॥ २ ॥
भक्ति वडे वश थाय रमापति, भक्ति बडे यश थाय
जो ईश्वर थाय नहीं तो, जन्ममरण नहि जाय
भक्ति परम सुखनुं शुभ साधन, सफल करे छे काय,
भक्ति बडे भगवान सदावश, निगमागम पण गाय
बळियाना बळरूप दयाधन, निर्बल थई बंधाय
संकट सेवक पर आवे तो, त्यां धरणी घर धाय
भक्ताधीन दयानिधि भूधर, भक्ति विना न पमाय,
भक्ति विना व्रत जप तप आदिक, अकळ अनेक उपाय ।। ३ ।।
धन यौवन बलबुद्धि चतुरता, निर्वळ ते समुदाय,
रंग रूप कुळ जाति विशेषे न करे कोई सहाय
अजामील नारदमुनि शबरी, क्या गणिका गजराय
केशव हरिनी भक्ति तथा गुण, एक मुखे न गवाय
॥ ४ ॥
॥५॥
२७-११-१९३०
२३६
( राग काफी ताल दीपचंदी)
-
कोई सहाय नथी, बिना हरि कोई सहाय नथी. ॥ ध्रु० ॥
बंधा मालमतुं बालक, ममतामां मनथी;
सुतो केम धरीने धीरज, धाम धरा धनथी ?
112 11
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भज भूधरने भाळ
अवर तणी सेवा शा
काळ कराळ तणो भय
परिशिष्ट
करीने, शम-दम साधनथी;
माटे, अरर! करे अमथी ?
भारे, जो मन मांही मयी;
॥२॥
।।३।।
करणे ते थई शकशे केशव, आ उत्तम तनथी.
२८-११-१९३०
२३७
( राग धनाश्री तीन ताल)
रामबाण वाग्यां होय ते जाणे (२)
ठरी बेठा
ठेकाणे,
॥ ध्रु० ।।
वेद-वचन परमाणे ॥ १ ॥
बहाला पधार्या ते ठामे,
भुवने वाग्यां प्रह्लादने वाग्यां
गर्भवासमा शुकदेवजीने वाग्यां
मोरध्वज राजानां मन हरी लेवा
काशीए जईने करवत मेलाव्यां पुत्र- पत्नी बेउ ताणे. ॥ २ ॥
बाई मीरां उपर क्रोध करीने, राणो खडग लई ताणे,
शेरना प्याला गिरधरलाले, अमृत कर्या एवे टाणे ॥ ३ ।।
नरसिंह महेतानी इंडी सिकारी, खेप करी खरे टाणे,
अनेक भक्तोने एणे उगार्या, धनो भगत उर आणे ॥४॥
२३८
( धीरा भगतनी काफी)
जेने राम राखे रे तेने कुण मारी शके ?
प्रभु
२९-११-१९३०
पखे.
॥ ध्रु० ॥
अवर नहि देखूं रे, बीजो कोई
चाहे अमीरने भीख मगाये, ने रंकने करे राय,
थळने थानक जळ चलावे, जळ धानक यह थाय;
तरणानो तो मेरु रे, मेरुनुं तरणं करी दाखवे ।। १ ।।
नीभाडाथी वळतो राख्यां मांजारीन बाळ,
टिटोडीनां ईडा उगायी एवा छो राजन रखवाल
अन्त वेळा आवो रे, प्रभु तमे तेनी तके ॥ २ ॥
वाण ताणीने ऊभो पारथी, सींचाणो करे तकाय,
पारधीने पगे सर्प उसियो, सींचाणा शिर मही घाव;
वाज पडचो हेठो रे, पंखी
गज कातरणी लईने बैठा दरजी तो
ऊडी गयां सुखे ॥ ३ ॥
दीनदयाळ,
पटे तेने करे बराबर, सीनी ले संभाळ;
धणी तो धीरानो रे, हरि तो मारो हीडे हके ॥४॥
[ १-१२-१९३० ]
४७३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७४
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
२३९
( धीरा भगतनी काफी)
तरणा ओथे डुंगर रे, डुंगर कोई देखे नहीं;
अजाजूथ मांहे रे, समरथ गाजे सही.
सिंह अजामां करें गर्जना, कस्तूरी मृग राजन,
तलनी ओथे जेम तेल रहधुं छे, काष्ठमां हुताशन;
॥ ध्रु० ॥
दधि ओथे घृत ज रे, वस्तु एम छुपी रही. ॥ १ ॥
कोने कहुं ने कोण सांभळशे, अगम खेल अपार,
अगम केरी गम नहीं रे, वाणी न पहोंचे विस्तार;
एक देश एवो रे, बुद्धि थाकी रहे तहीं ॥ २ ॥
मन पवननी गति न पहोंचे, छे अविनाशी अखंड,
रह्यो सचराचर भर्यो ब्रह्म पूरण, तेणे रच्यां ब्रह्मांड;
ठाम नहीं को टालो रे, एक अणुमात्र कहीं ॥ ३ ॥
सदगुरुजीए कृपा करी त्यारे, आप थया रे प्रकाश,
शांशां दोडी साधन साधे, पोते
दास धीरो कहे छे रे, ज्यां
पोतानी पास;
जाउं त्यां तुही तुम्ही ॥ ४ ॥
१-१२-१९३०
२४०
खबरदार मनसुवाजी, खांडानी धारे चडवु छे;
हिम्मत हथियार बांधी रे, सत्यनी लडाईए लडवु छे ॥ टेक ॥
एक उमराव ने बार पटावत, एक एक नीचे श्रीस श्रीस
एक धणी ने एक धणियाणी, एम विगते सातसे ने बीस
सो सरदारे गढ धेर्यो रे, तेने जीती पार पडबुं छे ।। १ ।।
पांच प्यादल तारी पूठे फरे छे, ने बळी काम ने क्रोध
लोभ मोह माया ने ममता एवा जुलमी जोरावर जोध
अति बलिष्ठ स्वारी रे, ते साधे आखड छे ।। २ ।।
प्रेम-पलाण करी, ज्ञान घोडे चडी, सद्गुरुशब्द लगाम
शील संतोष ने क्षमा सडगधरी भजन भजके राम,
धर्म ढाल झाली रे, निर्भे निशाने बडवु छे ।। ३ ।।
सुरत नुरत ने इड़ा पिंगला सुखमणा गंगास्नान कीजे
मन पवनयी गगनमंडल चडी, धीरा सुधारस पीजे
राज धणुं रीझे रे, भजन वडे भडवु छे ॥४॥
२-१२-१९३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
२४१
दुनिया तो दिवानी रे, ब्रह्मांड पाखंड पूजे
कर्ता बसे पाले रे, मूरख ने नव सूझे टेक०
जीव नहि तेने शिव कही माने, पूजे काष्ठ पाषाण
चैतन्य पुरुषने पूछे रे मूळे, एवी अंधी जग अजाण,
अरकने अजवाळे रे, पारसमणि नव सूझे
पथ्थरतुं नाव नीरमां मूको, सो वार पटको शीश
कोटि उपाये तो नहि तेतो, बूडे यसा वीश
-
- दुनिया ०
मां तेल क्याथी रे, धातुनी धेनु केम दुझे -- दुनिया०
अंतर मेल भर्यो अति पूरण, तितनिर्मळ जळमां नहाय
सापडलीने दरमां पेठा पछे, सफडो काप्ये धुं थाय ?
घायल अति घायल रे, जाणे कोई ज्ञानी हृदे
दूर नथी नाथ छे नजीक, निरंजन प्रकट पिङमां तुं पेल
दिल सुधरी दिदार तारो आपे रुदियामां देख,
• दुनिया ०
धीरिधर धणी धीरानोरे, जगतमा जाहेर सूझे दुनिया०
-
२४२
३-१२-१९३०
॥ १ ॥
॥२॥
निश्चे करो रामनुं नाम, नथी जोगी थईने जावु
नथी करवां भगवां काय, नथी भेगु करीने खातुं टेक०
गमे तो तमे भगवां करजो, गमे तो उजळां राखो
नयी दूभवो सामा जीवने, सुख सामानुं ताको
एक बाजये सौ संसारी, बीजे जोगी लाबो
कया जोगीने राम मया ? एवो तो एक बताओ
महतो, मीरां ने प्रह्लाद, सेनो नापिक नाती
धनो, पीपो, रोहिदाम, कुबो, गोते कुंभारनी जाती
बोडाणो जाते रजपूत, गंगाबाई के नारी
दास थईने जो रह्यां तो घर आव्या गिरिधारी
रंका का सजन कसाई, भज्या सतने दहाड़ो
क्या जोगीने राम मळवा ? एवो तो एक बतायो
नयी राम विभूति चोळये, नथी कंधे शिर झोळचे
नयी नारी तजी वन जाता, ज्यां लगी आप न खोळे ॥ ६ ॥
जंगलमां मंगल करी जावो, मंगल जंगल जे ने
।। ३ ।।
॥ ४ ॥
॥ ५ ॥
कडवं मीठु मठु कडवु, रामजी वश छे तेने
॥७॥
४७५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७६
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
पय ओये जेम घृत रह्य छे, तल ओये जेम तेल
कहे नरभो रघुवर छे सथळे, एवो ऐतो खेल
116 11
४-१२-१९३०
२४३
( राग प्रभात ताल दीपचंदी)
हरिजन होय तेणे हेत घणुं राखवं,
निज नाम ग्राही निर्मान रहे;
त्रिविधना ताप ते जाप जरणा करी,
परहरी पाप रामनाम लेबुं हरि०
सीने सरस कहेयुं, पोताने नरस धर्बु,
आप आधीन थई दान देवु
मन करम वचने करी निज धर्म आदरी,
दाता भोक्ता हरि एम रहे. हरि०
अडग नव डोलवु अधिक नव बोलवु
सोलवी गूज ते पात्र खोळी;
दीनवचन दाखवु, गंभीर मतुं राख,
विवेकीने वात नव करवी पहोळी. हरि०
अनंत नाम उच्चारखु, तरबुं ने तावु,
रासवी भक्ति ते रांक दावे;
भक्त भोजो कहे गुरु परतापथी,
त्रिविधना ताप त्यां निकट नावे. हरि०
२४४
५-१२-१९३०
भक्ति शूरवीरनी साची रे, लोधा पछी केम मेले पाछी ॥ ध्रु० ॥
मन तणो निश्चय मोरचो करीने, वधिया विश्वासी
काम क्रोध मद लोभ तने जणे गळे दीधी फांसी
॥ १ ॥
शब्दना गोळा ज्यारे छूटवा लाग्या ने मामलों रह्यो सी मची;
कायर हता ते तो कंपना लाग्या, ए तो निश्चे गया नासी
साचा हता ते सन्मुख रह्या, नेहरि संगाये रह्या रात्री;
पांच पचीसने अळगा मेल्या, पछी ब्रह्म रह्यो भासी
करमना पासला कापी नाख्या, भाई ओळख्या अविनाशी
अष्टसिद्धिनी इच्छा न करे, एनी मुक्ति थाय दासी
॥ २ ॥
॥ ३ ॥
॥ ४ ॥
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
तन मन धन जेणे तुच्छ करी जाण्यां अहर्निश रह्या उदासी;
भोजो भगत कहे भक्त थया, ए तो वैकुंठना वासी
11.4 11
६-१२-१९३०
२४५
( राग धीरा भगतनी काफी)
गुरुजी तमे कहो छोरे, ब्रह्म तारी पासे वस्यो;
मने नव दीसे रे, क्या रसे ए रस्यो ? ॥ टेक ॥
मायुं ब्रह्म के ब्रह्म माथु ब्रह्म आंखमां के आंख ब्रह्म,
नाकमा ए वसियो के मुखमां, ए विषे धाय मने भ्रमः
संशय निवारो रे भ्रममाथी जाउं खस्यो ।। १ ।।
हाथमा के पगमा गुरु, हृदय छातीमांय,
पगमां होय तो पळु नहि बहेलो ब्रह्म बेठो क्यांय;
वदो गुरु मोटा रे, शिष्य ज्यारे कसणी कस्यो. ॥ २ ॥
गुरुजी कहे छे, तमे शिष्य सांभळो, आमळो काढी आज,
एके अवयवे नव बहालो बिराजे, पाणी पहेली बांधु पाज;
बुक होये ध्याने रे, नथी ए तो जसोतस्यो. ।। ३ ।।
जेटला ध्याने घसीने जाओ, तेटलो पासे एह,
रूपरंग विनानो तद्रूप थाशे, ज्यारे ध्याननो चडशे मेह;
बापु सह रूपे रे, जोशो जगदीश जशो. ॥ ४ ॥
७-१२-१९३०
४७७
२४६
(राग खमाज ताल धुमाळी)
जीभलडी रे, तने हरिगुण गातां आवडुं आळस क्यांची रे ?
लवरी करतां नवराई न मळे, बोली ऊठे मुलमांची रे.
परनिंदा करवाने पूरी शूरी सटरस खावा रे;
झघडो करवा झूझे बहेली, कायर हरिगुण गावा रे.
अंतकाल कोई काम न आये, वहाला बेरीनी टोळी रे;
वजन धारीने सर्वस्य लेशे, रहेशो आंखो चोळी रे.
तल मंगावो ने तुलसी मंगावो, रामनाम संभळावो रे;
प्रथम तो मस्तक नहि नमतुं, पछी शुं नाम सुणावो रे ?
घर लाग्या पछी कूप खोदावे, आग ए केम होलवाशे रे ?
चोरो तो धन ही गया, पछी दीपकथी शुं थाशे रे ?
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
मायाधेनमां ऊंधी रहे छे, जागीने जो तुं तपासी रे;
अंत समे रोवाने बेठो, पड़ी काळनी फांसी रे.
हरिगुण गातां दाम न बेसे, एके वाळ न खरशे रे;
सहेज पंथनो पार न आये, भजन थकी भव तर रे..
८-१२-१९३०
२४७
भगवत भजजो, रामनाम रणुंकार
आ तन होडी, सत धर्म हृदामां धार
भवसागर तो भर्यो भयंकर तृष्णानीर अपार
काय वेडी छे कादवनी, आडाझुड अहंकार
सद्गुरु संगे, तरी उतरो भवयार
नरदेह तो दुर्लभ देवने, ते पाम्यो तुं पिंड
सत्संग करजो, साधु पुरुषनो, लेजो लाभ अखंड
पछे पस्ताशो, बखत जाय आवार
कीट ब्रह्मादिक सकळ देहने जमरायनो त्रास
क्षणभंग काया जाणजो, निश्चे एक काळनो ग्रास
अपनी बाजी, तेमां शुं करवो अहंकार ?
केक जन्म तो मनुष्य जातमां धर्मो देह अपार
मद माया ने मोहजाळनो धर्मो सिर पर भार
प्रभु नव जाण्या, तेथी अंते थयो छे सुवार
कहे गवरी तु सद्गुरु केरो राख विश्वास
भजन करो दृढ़ भावथी, तो मळे सुख अविनाश
मान कहधुं मार, नहि तो खाशे जमनो मार
- टेक
- भग०
भग०
----- भग०
-भग०
भग
२४८
९-१२-१९३०
( राग खमाज ताल धुमाळी)
संतकृपाथी छूटे माया, काया निर्मळ याय जोने;
श्वासोश्वासे स्मरण करता, पांचे पातक जाय जोने.
केसरी केरे नादे नासे, कोटी कुंजर जूथ जोने;
हिमत होय तो पोते पामे, सघळी बाते सूथ जोने.
अग्निने उधेई न लागे, महामणिने मेल जोने;
अपार सिंधु महाजल ऊंडा, मरमीने मन सहेल जोने.
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट
बाजीगरनी बाजी से तो, जंबूरो सौ जाणे जोने;
हरिनी माया बहु बळवंती,
सन्त सेवतां सुकृत बाधे,
सन्त नजरमा नाणे जोने.
सहेजे सीझे काज जोने;
प्रीतमना स्वामीने भजतां आये अखंड राज जोने.
१०-१२-१९३०
२४९
मार्यो रे;
संहार्यो रे. ।। १ ।।
आप्यो रे;
थाप्यो रे. ॥ २ ॥
पीधां रे;
हरिने भजतां हजी कोईनी लाज जती नथी जाणी रे,
जेनी सुरता शामळिया साथ, वदे वेदवाणी रे. टेक
वहाले उगार्यो प्रह्लाद, हरणार्कस
विभीषणने आप्यु राज्य, रावण
वहाले नरसिंह महेताने हार हाथोहाथ
ध्रुवने आप्युं अविचळ राज, पोतानो करी
वहाले मीरां ते बाईना शेर हळाहळ
पंचाळीनां पूर्या नीर, पांडव काम
आवो हरि भजवानो लहावो, भजन कोई
कर जोड़ी कहे प्रेमलदास, भक्तोनां दुःख
कीधा रे ॥३॥
करशे रे,
हरशे रे ॥। ४ ॥
११-१२-१९३०
२५०
अनुभव एवो रे अंतर जेने उये थयो ।
कृत टळघां तेनां रे, तेने तेनो आत्मा लह्यो
आतमदरशी तेने कहीए, आवरण नहि लगार
टेक०
सर्वातीत ने सर्वनो साक्षी खट विश्वमा निरधार
तेथी पर पोते रे, एकएकी आय रह्यो ।
अनु०
ए बात कोई विरला जाणे, कोटिकमा कोई एक
नाम विनानी वस्तु निरसे, ए अनुभवीनो विवेक
मुक्त पद माटे रे, द्वैत भाव तेनो गयो ।
अनु०
अद्वैतपदनी इच्छा नहीं, अणइच्छाये पाय
यथारथपद ने कहीए, जैम उपजे तेम जाय
प्रौढ़ प्रन्हानो रे संसार जाये बह्यो ।
अनु०
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरीया तुरीयातीत पद तेह
स्थूल सूक्ष्मने कारण कहीए, महा कारणथी पर जेह
परावर जे परखे रे, जेने नेति नेति वेदे को
अनु०
४७९
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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
हंस- हितारय जे जन कहिए, ते जन सत्यस्वरूप
ते जननी जावु बलिहारी, जे सद्गुरुनुं रूप
निरांत नाम नित्य रे, अनामी नामे भर्यो ।
२५१
दिलमां दीवो करो, रे दीवो करो,
कूटा काम क्रोधने परहरो रे दिलमां दिवो करो.
अनु०
१२-१२-१९३०
दया दिवेल प्रेम परणायुं लायो, मांही सुरतानी दिवेट बनावो;
महीं ब्रह्म अग्निने चेतावो रे.
दिलमां०
साचा दिलनो दीयो ज्यारे याशे, त्यारे अंधारं मटी जाशे;
पछी ब्रह्मलोक तो ओळखाशे रे.
दिलमां०
दीवो अणभे प्रगटे एवो, टाळे तिमिरना जेवो;
एने नेणे तो नीरखीने लेबो रे.
दिलमां०
दास रणछोड घर संभाळयुं, जडी कूंची ने पडताळु
थयुं भीमंडळमां अजवाळु रे.
दिलमां०
१३-१२-१९३०
२५२
(डाळ - ओधवजीनो संदेशो)
अपूर्व अवसर एवो क्यारे
आवशे,
क्यारे थईशुं बाह्यांतर निर्गंथ
जो ? ॥ ध्रु० ॥
सर्व
संबंधनुं
बंधन तीक्षण
छेदीने,
विचरीशुं कव
महत्पुरुषने पंथ
जो ?
॥ १ ॥
सर्व भावथी औदासीन्य वृत्ति करी,
मात्र देह ते संयमहेतु
अन्य
होय जो;
कारणे अन्य कशुं कल्पे नहि,
देह पण किंचित् मूर्छा नव जोय जो.
दर्शन मोह व्यतीत थई ऊपज्यो यो जो
देह भिन्न केवळ चैतन्यनुं ज्ञान जो;
तेथी प्रक्षीण चारित्रमोह विलोकीए,
यतें एवं शुद्ध स्वरूपनुं ध्यान जो
॥ २ ।।
॥ ३ ॥
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५१९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४-३१
परिशिष्ट
त्रण
संक्षिप्त
योगनी
आत्म-स्थिरता
मुख्यपणे तो वर्त देह पर्यंत जो;
घोर परिषहके उपसर्ग भये करी
आनी शके नहि ते स्थिरतानो अंत जो.
संयमना हेतुथी योग - प्रवर्तना,
स्वरूपलक्षे जिन आज्ञा आधीन जो;
ते पण क्षण क्षण घटती जाती स्थितिमां
अंते थायें निज स्वरूपमा लीन जो.
पंच विषयमा राग-द्वेष-विरहितता,
पंच प्रमादे न मळे मननो क्षोभ जो;
द्रव्य, क्षेत्र ने काम भाव प्रतिबंध यण
विचर उदयाधीन पण बीतलोभ जो.
क्रोध प्रत्ये तो वर्ते क्रोध-स्वभावता,
मान प्रत्ये तो दीनपणानुं
माया प्रत्ये माया
लोभ प्रत्ये नहि लोभ
बहु उपसर्ग कर्ता प्रत्ये
वंदे चक्री तथापि न
देह जाय पण माया
मान जो;
साक्षी - भावनी,
समान जो.
पण क्रोध नहि,
मळे मान जो;
थाय न रोममां,
लोभ नहि छो प्रवद्ध सिद्धि निदान जो.
शत्रु मित्र प्रत्ये वर्त समदर्शिता,
मान अमाने वर्ते ते
ज
जीवित के मरणे नहि
भय मोक्षे पण वर्ते शुद्ध
मोह स्वयंभू-रमण समुद्र
॥ ४ ॥
।। ५ ।।
॥६॥
॥७ ॥
॥ ८ ॥
स्वभाव जो;
न्यूनाधिकता,
स्वभाव जो.
॥ ९ ॥
तरी करी,
स्थिति त्यां ज्यां क्षीण-मोह-गुण-स्थान जो;
अंत समय त्यां स्वरूप वीतराग थई,
प्रगटायुं निज केवलज्ञान निधान जो. ।। १० ।।
वेदनीयादि चार कर्म वर्ते जहां,
बळी सींदरीवत् आकृतिमात्र जो;
ते देहायुष आधीन जेनी स्थिति छे,
आयुष पूर्णे मटीए दैहिक पात्र
जो. ।। ११ ।।
४८१
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४८२
पूर्ण
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
एक परमाणु- मात्रनी मळे न स्पर्शता,
कलंक- रहित अडोल स्वरूप जो;
शुद्ध निरंतर चैतन्यमूर्ति अनन्यमय,
अगुरुलघु अमूर्त सहजपदरूप जो. ।। १२ ।।
पूर्व प्रयोगादि कारणना योगथी,
ऊर्ध्वं गमन सिद्धालय प्राप्त सुस्थित जो;
सादि अनंत अनंत समाधि मुसमां,
अनंत दर्शन ज्ञान अनंत सहित जो. ।। १३ ।।
जें
पद श्री सर्वज्ञे दीयुं ज्ञानमां,
कही शक्या नहि पणते श्री भगवान जो;
तेह स्वरूपने अन्य वाणी ते शुं कहे ?
अनुभव - गोचर मात्र रहे ते ज्ञान जो ॥ १४ ॥
एह परम-पद-प्राप्तिनुं कर्तुं ध्यान में,
गंजा वगरनो हाल मनोरथ रूप जो;
तोपण निश्चय राजचन्द्र मनने रह्यो,
प्रभु आज्ञाए थाशुं ते ज स्वरूप जो ।। १५ ।।
१४-१२-१९३०
२५३
-
( सीख सासुजी दे छे रे ए डाळ)
मारां नयणांनी आळस रे, न नीरख्या हरिने जरी;
एक मटकुं न मांड्धुं रे, न ठरियां झांखी करी. ॥ १ ॥
शोक मोहना अग्नि रे, तपे तेमां तप्त थयां
नथी देवनां दर्शन रे, कीधां तेमां रक्त रह्यां ॥२॥
प्रभु सघळे बिराजे रे,
नथी अणु पण खाली रे,
सृजनमां सभर भर्या
चराचर मांही भटया ॥ ३ ॥
१५-१२-१९३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सामग्री के साधन - सूत्र
गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली: गांधी साहित्य और गांधीजीसे सम्बन्धित
कागजपत्रका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय देखिए खण्ड १, पृ० ३५९ ( प्रथम
संस्करण १५ अगस्त, १९५८) तथा पृ० ३५५ (द्वितीय संशोधित संस्करण जून, १९७० ) ।
साबरमती संग्रहालय पुस्तकालय तथा संग्रहालय; जिसमें गांधीजीके दक्षिण
आफ्रिकी काल तथा १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात रखे हैं;
देखिए खण्ड १, पृ० ३६० (प्रथम संस्करण १५ अगस्त, १९५२) तथा पृ० ३५५
(द्वितीय संशोधित संस्करण जून, १९७० ) ।
'बॉम्बे क्रॉनिकल' बम्बईसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक |
'हिन्दू' : मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ।
बॉम्बे सीक्रेट ऍक्सट्रैक्ट्स, १९३० ।
'कन्या आश्रम रजत जयन्ती स्मृतिग्रन्थ प्रकाशक : भील सेवा मंडल, दोहाद,
गुजरात |
'गीताबोध' (गुजराती) : मो० क० गांधी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदा
बाद, १९३० ।
'पांचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद स० काका कालेलकर, सस्ता साहित्य मंडल,
नई दिल्ली, १९५३ ।
'बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने' (गुजराती) स० काका कालेलकर,
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६० ।
'बापुना पत्रो-७ श्री छगनलाल जोशीने (गुजराती) स० छगनलाल जोशी,
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६२ ।
'बापुना पत्रो ९ श्री नारणदास गांधीने' (गुजराती) स० नारणदास गांधी,
नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६४ ।
'बापुना पत्रो-४ मणिबहेन पटेलने' (गुजराती) स० मणिवन पटेल, नव-
जीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७ ।
'बापुनी प्रसादी' (गुजराती) : मथुरादास त्रिकमजी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर,
अहमदाबाद, १९५७ ।
8
'वापूको विराट् वत्सलता काशिनाथ त्रिवेदी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर,
अहमदाबाद, १९६४ ।
'महात्मा गांधी सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन
इंडिया', खण्ड ३, भाग ३ ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>10186
तारीखवार जीवन-वृत्तान्त
(१ जुलाई, १९३० - १५ दिसम्बर १९३० तक)
१ जुलाई : गांधीजी यरवदा जेलमें।
८ जुलाई : गांधीजीने अपने रिश्तेदारोंसे तबतक मिलनेसे इन्कार कर दिया जबतक
कि सगे-सम्बन्धियों जितने ही प्रिय अन्य लोगोंको भी गांधीजीसे मिलनेको इजाजत
न दे दी जाये।
२३ जुलाई : मु० रा० जयकर और तेजबहादुर ससे भेंटकी तथा उनकी मार्फत
मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरूको एक पत्र भिजवाया।
३१ जुलाई- २ अगस्त: मु० रा० जयकरसे बातचीत की।
१४ और १५ अगस्त : मु० रा० जयकर, तेजबहादुर सप्रूने यरवडा जेलमें गांधीजी
तथा दूसरे कांग्रेसी नेताओं - मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई
पटेल, डा० सैयद महमूद, जयरामदास दौलतराम और सरोजिनी नायडू -
साथ बातचीत की।
के
३० और ३१ अगस्त : मु० रा० जयकर, तेज बहादुर सप्रूने नैनी जेल में मोतीलाल
नेहरू, जवाहरलाल नेहरू तथा डा० सैयद महमूदसे भेंट की ।
३ - ५ सितम्बर : तेजबहादुर सप्रू और मु० रा० जयकरने यरवडा जेलमें गांधीजी
तथा दूसरे कांग्रेसी नेताओंके साथ बातचीत की तथा कांग्रेसी नेताओं द्वारा
हस्ताक्षरित और गांधीजी द्वारा तैयार किया गया एक संयुक्त वक्तव्य प्राप्त
किया।
१२ सितम्बर : गांधीजीकी अनुपस्थितिमें लंदन में गोलमेज सम्मेलन आरम्भ हुआ ।
गांधीजीने 'गीता' पर प्रवचन-माला लिखनी आरम्भ की।
6.6
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शीर्षक सांकेतिका
ज्ञापिका मोतीलाल और जवाहरलाल
नेहरूको, ४३-४
टिप्पणी: मु० रा० जयकरको ६०
तार: जयशंकर त्रिवेदीको २५२ -मोती-
लाल नेहरूको २३८; बी० एस०
श्रीनिवास शास्त्रीको, ३८
पत्र अपटन सिंक्लेयरको २६१:
अब्दुल
• कादिर बावजीरको ३०४, ३३९,
-अब्बासको १६४, २८८; -अब्बास
तैयबजीको ३०१ - अमीना कुरेशीको,
१, ५, ३०, १५७, ३२९, ३४० अम्-
तलाल ठक्करको ११० आर० पी०
मार्टिनको १०-१३, १५५-५७, १८४,
१९०, १९५-९६ - ईश्वरलाल जोशी-
को, १४ -एक आश्रमवासीको ६७
-एच० एस० एल० पोलकको, २५-२६३
-कपिलराय मेहताको, १३, ९९, २०७
-कमलनयन बजाजको १७, ६२, १२६.
१६३ कमला नेवटियाको १५२
-कलावती त्रिवेदीको १६, ४९, १३०.
१७६, २२९, २५१, ३५३ कसुम्बा
गांवको १७९, २३५-३६; काशिनाथ
त्रिवेदीको १६, ५०, ७८-७९, १००,
१३३, १७७, २११-१२, २६५, ३२३,
३३६, ३५१, ३७७-७८ -कुँवरजी
पारेखको, ८६ कुँवरजी मेहताको,
२५०, २८६, ३७६; –कुसुम बेसाईको
२१, ६३, ९८, १४३, १५९, १६९.
२०६, २२७, २६९. ३०२, ३२१,
३४६, ३५६, ३६९ - कृष्णमैया देवीको,
२८०, गंगादेवी सनाको ३०१
- गंगाबहन झवेरीको २, ४८, १११,
२४९, ३०६ - गंगाबहन झवेरी और
नानीबहन झवेरीको १७४ -गंगा-
बहन वैद्यको १४, ३०, ५३, ५४,
६५, १४१, १३, १६५, १७४, १९३-
९४, २१४, २४३, २८८, ३०४-५,
३२६, ३३७, ३६१६ गुलाम रसूल
कुरेशीको १०८, १५२; गोविन्द
पटेलको २६, २००, २८४ - घनश्याम-
दास बिड़लाको ५६-५७, २२१, २६०,
२६४, ३५०; -चन्द त्यागीको,
३५५ छगनलाल जोशीको २२५
- जमनाको; २७०; -जयप्रकाश
नारायणको ८९, १७६, ३१३ -जय-
शंकर त्रिवेदीको २५४, २६८: जय-
सुखलाल गांधीको १२३, १७९-८०,
२९० - जानकीदेवी बजाजको, ५०,
१६० जी० ए० नटेसनको २९
- जुगतराम दबेको, २८५: जे० सी०
कुमारप्पाको, ३७, ७१, १३१, १६१,
२६२-६३, ३०८, ३६९ - डाहीबहन
पटेलको, ६) हमीना पी० जोशीको,
२३७, ३०२ -तारा मशरूवालाको
२८३, तारामती मथुरादास विक्रमजी
को, १३०, २५५, २८१, ३५२ -तुलसी
मेहरको १७७ तोताराम सनाढ्य
को, ३६३ दुर्गा गिरिको १९,
११३, २१५. २२९, २४६, २७१
-दूधीबहन देसाईको २९, १९९, २८२
-नानाभाई इच्छाराम मशरूवालाको,
२८२, ३७६ - नानीबहन झवेरीको
२ - नारणदास गांधीको, ८-९, २३-
२४, २८, ३९-४२, ५७-६०, ६७-७१,
८०-८२, ९०-९२, १०२ ४, ११४-१६,
१३४-३६, १४८.५१, १६५ ६७, १८५-
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४८६
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
९०, २०२५, २१७-२०, २२२-२३,
२३८-४१, २५६-५९, २७२-७४, २९१-
९२, ३१३-१७, ३३१-३५, ३४७-४९,
३६५-६८ - नारायण देसाईको २४७;
-नारायण मोरेश्वर खरेको, ९४, १४०,
१६४, १७३, २०८ -निर्मला देसाईको,
१३९, ३७२ - पद्माको २७७, ३०३,
३४३, ३६२, ३७५ - पन्नालालको,
१७०, २६९ - परशुराम मेहरोत्राको,
१९६ - पी० जी० मॅथ्यूको, १३१.
१६९ पुरुषोत्तम गांधीको ३२०
- पुरुषोत्तम डी० सरैयाको, ३६, २४२;
-पूँजा भाईको १२२, १८३, २२८
-पैट्रिक क्विनको, ३४, ३५, १५१,
२२४; - प्यारेलाल गोविलको ३१८-
२० - प्रभावतीको, १४, २५, २८,
५४, ७५, ८८, १०१, १०७, ११२.
१४५, १५८, २००, २०८, २३१,
२५३, २६३-६४, २८६, ३११, ३२५,
३३८, ३६८, ३८०, - प्रेमलीला
ठाकरसीको २५९, २६०-६१, ३०६
प्रेमावहन कंटको, ५, १८. ३१.
५३, ६१-६२, ७३, ८५, ९८, १०५.
१२४, १३८-३९, १५४, १८०, १९१-
९२, २१४, २२१, २४९, २७०, ३०७,
३२७-२८, ३४२-४३, ३५४-५५, २७४
-फेनर ब्रॉकवेको, २२०; वनारसीदास
चतुर्वेदीको २३६; -बनारसीलाल
बजाजको, १४२ -चबलभाई मेहताको,
३१७-१८, ३६३ बलभद्रको १३९,
१८२, २०१, २४४, ३२२ बलवीर
सिंहको १९५ - बहरामजी सम्माताको
२३७, २७४-७५, २९३-९४ बली
और कुमीको, ४६-४७ बलीबहन
वोराको ७२ २८० बी० जे० बी०
गैलविनको ३१८ -बुलालीदासको,
२८७, ३५६ - कृष्ण चांदीवालाको,
२५. ६६, १०९, ३७० - बेचरदास
दोषीको १२५ -भगवानजी अनूपचन्द
मेहताको २५३-५४; -भगवानजी
पण्डयाको ९-१०, ४८, ६४, १२२.
३५८
१५९, २०२, २११, २२२ २४५,
२७९, ३०३, ३५७ - मणिबहन पटेलको,
२२, ५५, ८२, ९७, १२८, १४६,
१७१, ३७७ - मणिवहन परीक्षको,
१४४, १७२ - मथुरादास पुरुषोत्तमको,
१८-१९, ३२, ९५,९६, १३३, १९६,
२४५, ३३०, ३५९: -मथुरी खरेको,
३२३, ३३६ - मनु गांधीको, ३, ४७,
२८९, ३५४ - महालक्ष्मी माधवजी
ठक्करको ६, १०६, १३६-३७, १८२,
२१२, २३२, २६६, ३१२, ३२८,
- महावीर गिरिको ९७ २०९,
३१० महेन्द्र वा० देसाईको २४८,
३५६ - माधवदासको, १४४ - मान-
शंकर जयशंकर त्रिवेदीको, ३७, ६५,
९३, १०६, १२९, १४१. १६०,
१९९, २५५. २६८, २८१, ३१०,
३२२, ३४७; -मीराबहनको, ७, २००
२१, २७, ३३-३४, ५२, ६४-६५,
७६-७७, ८९, १०० १. १०९-१०,
१२६-२७, १४५-४६, १६२, १७८-
७९, १९७ ९९, २१५-१६, २३३-३४,
२४७-४८, २७५-७६, २७६-७७, २९५-
९७, ३२४-२५, ३४४-४६, ३५०,
३६४-६५, ३७०-७२; -मूलचन्द
अग्रवालको, ३४३ - मंत्री गिरिको
७३, १०७ - मोतीबहन चोकसीको,
४, १११, १३२, १३७, १६८, २०१
-मोतीलाल नेहरूको, ४५-४६; -युक्ति-
को, १७० - रतिलाल शाहको ३५
- रतिलाल सेठको, २२७ - रमावहन
जोशीको ३२, ९३, १३७, २१०,
२३४, ३३५, ३५२ -रलियातवन
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शीर्षक सांकेतिका
वृन्दावनलालको, १५३, २२६, रसिक
देसाईको १०२ - राधाबहन गांधीको,
७२,८५,९६, १८१, २२०, २४६,
२६५-६६, ३११ - रामचन्द्र खरेको,
२८५ - रामचन्द्र त्रिवेदीको २६७,
३७३, ३७९; - रामदास गांधीको,
२१७, ३३७ -रामी गांधीको, ४७;
- रामेश्वरदास पोद्दारको, ३६, १५३,
१९७ - रावजीभाई पटेलको, २७,
१९३;
-रुक्मिणी बजाजको, ६६,
७४, ८६, १४३, ३१२ - रेहाना
तैयबजीको ५५ ८७, १२९, १७५,
२३५, २८९-९०, ३६० - रोहिणी
कन्हैयालाल देसाईको ८७, १३८,
२१३, २८३, ३५३ - लक्ष्मीबहन
सरेको, ४, ७९. १५५, २५०;
-ललिताको, २८४; -लालजी परमार-
को, ३१; - लीलावतीको २२१-२
- लीलावती आसरको, १२४, १४०,
१५७, १७२; वनमाला परीखको,
३२९, ३७५; -वसुमती पण्डितको
३, १७, ४९, ६१, ८६, ९४, ११६,
१४२, १५८, १७३, २१३, २२६,
२६३, २९८, ३२५, ३३९, ३६१,
३७२ - या० गो० देसाईको ७९,
११३, १६८; - विठ्ठलदास जेराजाणीको,
५१, २१० -विनोद बालाको, १७१;
- विल्फ्रेड वेलॉकको, १५ बी० ए०
३५७;
४८७
सुन्दरको २५२; -वेणीलाल गांधीको,
१८१ - शान्ताको २५१, २९०;
-शान्ता त्रिवेदीको, ३७९ -ज्ञान्ता
शंकरभाई पटेलको, २०१, २७१, ३०९,
- शान्तिकुमार मोरारजीको,
१३२, शारदा सी० शाहको १५, ६३,
७४, १०८, १२३, १५४, १९१, २०६,
२२५, २४२, २९७, ३७३ - शिवाभाई
को, २९ - शिवाभाई जी० पटेलको,
७७, ३००, ३२१; -शूरजी वल्लभदास
को, ५६ -सत्यादेवी गिरिको ७५,
९९ १६१: सप्रू और जयकरको
८२-८४, ११७-२१; -सी० एफ०
एन्ड्रयूजको २९४-९५; - सुरेन्द्र मशरू-
वालाको २९३ -सुशीला गांधीको,
१०१ १२८, २२३-२४, २२८, २७८,
३०९, ३६२ -हरिइच्छा देसाईको
४६, ७८, २०७, हरिप्रसादको २२
-हरिलाल देसाईको ३२६-२७;
-हेमप्रभा दासगुप्तको, १, ३८, ५१-५२,
७६, १८३, २३२-३३, २४४, २६७,
२९४, ३०८, ३३०, ३४०, ३७८
पत्रका अंश, ११७ - छगनलाल जोशीको
लिखे, १४७; -मथुरादास त्रिकमजीको
लिखे, ५१ - महादेव देसाईको लिखे,
२९८-३००; -महालक्ष्मी माधवजी
ठक्करको लिखे, २८७
सत्याग्रही बन्दियोंका कर्त्तव्य, ३४१
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
np3ylmp4xsm7cg97alkmnkmfu2d6d7o
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२६
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670863
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अंग्रेज, १२१, ३०५
अकर्म, ३७०
अखा भगत, १३४
सांकेतिका
अ
अग्रवाल, मूलचन्द, ३४३
अनटू बिस लास्ट ( सर्वोदय), १४९
अनासक्ति, १९४, २४९, ३३२, ३४९,
३५१, ३६६ -पानेका उपाय, ३३२
अनासक्तियोग, २, ९, ५३, १३८, २३२
पा० टि०, ३६४, ३७८
अन्त्यज, ३०
अन्ना, १८८
अपरिग्रह, ९०, १०३-४
अप्पास्वामी, श्रीमती, १३१
अब्दुल्ला सेठ, ११, ९९
अब्बास १६४, २८८
अभयजी, ३५५
अमीदास, ६८, १८६, २०३, २१८, २२२,
२३९, २४०, २५६, २७३, ३३२, ३४८
अमीर अली, १७५
अय्यंगार, एस० १९७
अरविन्द बाबू, देखिए घोष, अरविन्द
अरुण, ३८,५२, ७६, १८३, २३३, २६७
अर्जुन, ३२२, ३३३
अलेक्जेंडर, २७६
अव्यक्त, ३२१
असहयोग, ४४, ८४; - अपने शरीरसे, १८४
अस्तेय, ९१-२, १०३-४
अस्पृश्य, १३४, १३५, ३२३
अस्पृश्यता, २३७ पा० टि०, ३७९; और
धर्म, ३७३
- और हिन्दू धर्म, १३५
- निवारण, १३४-५
अस्वाद, ९० और ब्रह्मचर्य, ८०-२
अहिंसा, ९, १८, ४२, ५८-६०, ९०-२,
१२१, १३७, १६६, १९६, २०४,
२३०, २४०, २६७, ३३१, ३३९,
३४१ पा० टि०, ३६१; और अस्पू-
श्यता निवारणका एक अर्थ, १३६०
-और शरीर श्रम, १५० और सत्य,
५८-६०; का पूर्ण पालन ब्रह्मचर्यके
बिना असम्भव, ६९; - धर्मके रूपमें,
१४७
अहुरमज्द २६२ देखिए होरमज्द भी,
आगम, १२५
आ
आत्मकथा का स्वीडिशमें अनुवाद, ११४
आत्मशुद्धि, ३०८, ३५७
आत्मा, १३१, १३८
आनन्द, १४
आनन्दी, १३, १५४
आश्रम - भजनावलि, २०, १८०, ३५५ का
अनुवाद, ३६४
आसक्ति, जल्दबाजीमें, ३६८
आसर, मणि, ११
आसर, लक्ष्मीदास, ११, ९५, १३२
आसर, लीलावती, ११, ११४, १२४, १४०,
१५७, १७२, १८८, २२१
आसर, वेलाभाई, ११
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
57f12n0ogpduly7779o5ie37svpl7u2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>इ
सांकेतिका
४८९
ऐ
इमाम हसन, ७६
इमाम साहब, देखिए बावजीर इमाम
अब्दुल कादिर
इविंग, वाशिंग्टन, १७५
इविन, लॉर्ड, ४४, ६० पा० टि०, ८२,
८३, ८४ पा० टि०, ११७-२०
इस्लाम, १८९
ऐशर, श्रीमती, १४६
ओ
ओम, ६२
औ
औपनिवेशिक दर्जा, ११८
क
कंटक, प्रेमावहन, ५, १८, ३१, ५३, ६१,
७३, ८५, ९८, १०५, १२३, १२४,
ई
ईश्वर, ४१, ४२,
१०४,
११०, ११५.
१३८, १४९, १५४,
१८०,
१९१,
१२९, १४१, १६६. १६९, १७०,
१७८, १९३, २०४, २०५,
२१४, २३१, २४९,
२७०, ३०७,
२१८,
३२७, ३२९,
३३६, ३५३, ३५७,
२२०, २२१, २२५, २३२,
२३३,
३७४, ३७५
२४१, २४४, २५१, २५४
२६३,
२६७, २७९, २८०, २८२,
२८८.
३०९,
२९६, ३००, ३०४, ३०८,
३१३, ३१४, ३२०, ३२२, ३२७,
३३३, ३३५, ३३९, ३४०, ३५६,
३६५, ३७६, ३८०; सत्य-रूपी, ४२,
५९, ३३३ - ही सच्चा सद्गुरु, ३११
ईश्वरलाल १२
ईसाई धर्म, १८९
उ
उत्तरदायी सरकार, स्वतंत्र भारतके लिए,
११९, १२०
उपनिषद्, ११५, १३८
उपवास, ८१, ३०७, ३४३, ३५३
उस्वा-ए-सहावा, १२९
कताई, १७, २०, २१, २४, ४९, ५७,
६४, ६८, ७५, १०२, ११३, ११६,
१८७,
२३९,
१२९, १६२, १६४, १८६,
१९५ २०३, २०६, २१५,
२५९, २७३, २७५, २९१, २९९,
३२४, ३५६, आश्रम, ३३२ - यज्ञ,
२७६, २९८-३००, ३३१, ३४८
कटु, १८७
कनु, ९, २४
कपिलराय, ११
कवीर, ११६ पा० टि०, २५८ पा० टि०
कमला १७, १८०; देखिए पटेल, कमला
शंकरभाई भी
कमलाबहन, ६१, १०७, १६१, १७५, ३६९
कमला हरिदास, ११
करसनजी मूलचन्द, २५४
ए
एन्ड्रयूज, सी० एफ०, २६, ११०, २७६,
कर्तव्य, देखिए धर्म
२९४, २९५
४४-३२
कर्म, ३७०
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
afk08rprrri67hti6c0j0dg2wvn8449
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४९०
कलावती, देखिए त्रिवेदी, कलावती
कल्याणदास, २७०
कस्तूरबहन, १२
काकू, १३, १६५, २४३
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
कादियानी, मौलवी मुहम्मद अली, १७५
कानजीभाई, ४८, १३८, २८३, ३७६
कानूगा, डा०, ४०
कुमारप्पा, जे० सी०, १२, ३७, ७१, १३१,
१६१, १७९, १८७, २१२, २५६,
२६२, ३०८, ३४५, ३६९
कुमी, देखिए वोरा, कुमीबहन
कुरेशी, अमीना, १, ५, ११, ३०, १०८,
१५२, १५७, ३०४, ३२९, ३४०
कुरेशी, गुलाम रसूल, १०८, १५२
कान्तावन, १२, १०५, २४०, २५६, २७२, कुरेशी, शुएब ३०४, ३२९
२९१, ३३३
कामदार, ३०
कामदार, रमीबाई, १२, १४, ३०
कार्लाइल, १७५
कॉलिन्स, जी० एफ० एस० २३८
कालेलकर, द० वा०, ३, ४, १७, १८,
२३, २८, ३०, ३१, ३६, ४०, ४१,
५७, ६२, ७३, ७८, ९३, ९८, १००,
१०४, १०६, १०९,
कुरान, १०८
कुसुम, ४७, ३४७; देखिए देसाई, कुसुम भी
कूने, डा०, १०५, २६५, ३७७
कृपालानी, जे० बी०, १५२ पा० टि०
कृष्ण, भगवान, ११७, ३३२, ३३३, ३६६
कृष्णकान्त, २७८
कृष्णकुमारी, १२, ६१
कृष्णदास, ७६ १०२, २९२, ३०८
कृष्णमैया देवी, ११, १९, २८०
कृष्णविजय, ३४२
११०, ११२,
११४, ११६, १२५,
१२७, १३३,
१३४, १४६, १४९,
१५८, १५९,
कृष्णा, १४४
१६२, १६३, १६६,
१६९,
१७४,
केवलराम, १२, २३४
१७८, १८५, १८७, १८८,
१९४,
कोटक, शारदा, १२
२०७,
कोटक, हरजीवन, १२
२५४,
१९७, १९९, २००, २०३,
२१७, २३९, २४२, २४८,
२५६, २५९, २६८ २७२, २७५,
२८८, २९३, २९५, २९९, ३०२,
३०४, ३१०, ३१६-१८, ३२२, ३२८,
३२९, ३३४, ३३५, ३३८, ३४१ पा०
टि०, ३४४, ३४५, ३४७, ३४८,
३६३, ३६४, ३६६, ३६७, ३७१
कालेलकर, बाल, ६५, १८८
किंगडम ऑफ हेवेन इज विदिन यू २५६
कीकीबहन, १५२
कोठारी, जीवरामभाई, २५६
क्रॉसबी, ३४२
क्विन, पैट्रिक, ३५, १५१, १९०, २२४
ख
खम्भाता, तहमीना, ११
सम्भाता, बहरामजी, ११, २३७, २७४, २९३
खरे, ना० मो०, ९४, ९८, १४०, १६४,
१७३, १९२, २०८, २५०, २८५
खरे, मथुरी, ९४, २५०, ३२३, ३३६, ३४२
सरे, रामचन्द्र, देखिए खरे, रामभाऊ
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
q78iihbseumul8bb4k80y02jv5o5m5b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सांकेतिका
खरे, रामभाऊ ११, ९४, १६४, १७३, २८५
खरे, लक्ष्मीबहन, ४, ११, ७९, ९४, १५५,
२५०, २८५
खादी (सदर), १७, ५०, ५१, १६४,
१७७, २१७, २२१, २६९, २९९
खुराक, १३४, १४६, १५८, १७७, १८५,
२१६, २२३, २४३, २९३, २००,
३२२, ३४२, ३५३, ३५५, ३६५.
३६६, ३७३, ३७६; और दूध, ३३९;
-और फल, ३३२; जेल, ३३४-५
-में प्रयोग, १४९, १६२, २३८-९,
२४८, २७७, २९३-४, ३०६, ३४४,
३४६, ३६४, ३६६, ३७१-२, ३७७
सुदवन, १२४, १५१, १७२, १८८, २०५
ग
गंगावहून, देखिए झवेरी, गंगावन
गंगावहून रामजी, १२
गजीवाला कान्तु १३६
गलिआारा, मणिबाई, ११
गांधी, उमिया, १७९
गांधी, कमला, १६५
गांधी, कसुम्बा, १२३, १७९, २३५
गांधी, कस्तूरबा १०, ४७, १११, १४३,
१४९, २१०
गांधी, कान्ति, ११४, १८७, २८०
गांधी, काशी, २९२
गांधी, कुसुम, ३६६: देखिए कुसुम भी
गांधी, केशु, ५७, ९६, १०२, १३४, १४५,
१८५, १९८, २१८, २४६, २७२,
२९१, २९५, ३६४, ३६६, ३६७
गांधी, छगनलाल, ३२४
गांधी, जमनादास, १०२, १२४, ३२०, ३५५
४९१
गांधी, जयसुखलाल, १२३, १७९, २३५,
२९०
गांधी, जेठालाल, ११
गांधी, देवदास, ३, २५,६६, १०२, ११४,
२५६, २९२, ३१५, ३४७
गांधी, नारणदास, ८, १६, २३, २८, ३९,
५७, ६७, ७९, ८०, ९०, १०२,
११४, १२२-४, १३४, १३९, १४८,
१५८, १६५, १७२, १८१, १८२,
१८५, १९४, २०१, २०२, २११,
२१२, २१७, २२२, २३८, २५६,
२७२, २७५, २९१, ३१३, ३२०,
३२२, ३२५, ३२७, ३३१, ३४७,
३५१, ३५५, ३६५, ३७८
गांधी, नीमू २१७
गांधी, पुरुषोत्तम, ३२०, ३५५, ३६५
गांधी, प्रभुदास, ९, ३९, ४९, २६८
गांधी, मगनलाल, ३६७
गांधी, मणिलाल, १०१, २२३, २२७,
२५०, २५६, २७८, ३०९, ३१४,
३४७, ३६२
गांधी, मनमोहन, ५७
गांधी, मनु, ३, ४६, ४७, ७२, १९९,
२२३, २८९, ३५४, ३५५
गांधी, मोहनदास करमचन्द, ११७ पा० टि० ;
-की ते० ब० समू और मु० रा०
जयकरसे भेंट, ८२ पा० टि० ने
सप्रू और जयकरको मोतीलाल नेहरू
और जवाहरलालको देनेके लिए एक
ज्ञापिका दी, ४३ पा० टि०
गांधी, राधाबहन, १९, ६७ ७२ ८५,
९६,१०५, १४०, १८१, २१८, २३०,
२४६, २६५, ३११, ३७७
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४९२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
गांधी, रामदास, ३, १०२, १४८, १४९,
१७५, २१७, २५७, ३३७
गांधी, रामी, ४७, ७२
गांधी, वेणीलाल, १८१
गांधी, सन्तोक, ३७७
गांधी, सुशीला, १०१ १२८, २२३, २२७,
२७८, ३०९, ३१५, ३५५, ३६२,
३७६
गांधी, हरिलाल, ३ पा० टि०
गोकी बहन, १३२, १५३, १८७, २२६
गोखले, गोपालकृष्ण, २०८, २५६
गोडसे, १२
गोदरेज, अर्देशिर २३७
गोपालराव ११, ३७१
गोमती, २७८
गोविन्दजी, २७३
गोविल, प्यारेलाल, ३१८
ज्ञान, १०४, २२२, २७४ और सत्य, ४१
ग्रे, थामस, ७२
गाण्डीव चरखा, १०९, २०३, २१५, २१६,
२२०, २३३, २३९, २४७,
२९३, २९६, ३२४, ३४६, ३६४.
गिडवानी, ए० टी०, १५२ पा० दि०
२७५,
ग्रेग दम्पति २९५
घ
घोष, अरविन्द, १०५
गिडवानी, गंगाबहन, १५२
गिरधर, १२
च
गिरि, दलबहादुर, १९
गिरि, दुर्गा, १९
गिरि, धर्मकुमार १६१, ३२८, ३५५
गिरि, महावीर, ११, ९७ २०९, ३१०
गिरि, मैत्री, ११, ७३, १०७, २२८
गिरि, सत्यादेवी, ७५, ९९, १६१, ३०७
गिरिराज, १२, ३०, ६८, १०२, १८६,
१८७, २०२, २११, २१८, २३९,
२४५, ३६५
गीताबोध, २७४ पा० टि०, ३३४
गुजरात विद्यापीठ, १२५ -द्वारा उपाधियोंका
वितरण, १३३
गुजराती गीता देखिए अनासक्तियोग
गुरुदेव, देखिए ठाकुर, रवीन्द्रनाथ
गुलाबबहन मणिलाल, १२
गैलविन, बी० जे० बी०, ३१८
गो-सेवा, ३३७
चतुर्वेदी, बनारसीदास, २३६
चन्दन, ७८, २०७, ३३६
चन्द्र, ३१२
चन्द्रकान्ता, २५६, ३३३
चन्द्रशंकर, २०३
चम्पा, ३३३
चरखा, ९, २१, २३, २७, ३३, ४९,
५२, ५७, ६४, ६८, ७६, ८९, १००,
११४, १२७, १३१, १४५, १६२,
१७८, १९७, १९८, २०६, २३२,
२४३, २७१, २८९, २९७-९, ३१७,
३२२, ३३१, ३५५, ३६९
चांदीवाला, ब्रजकृष्ण, २५, ६६, १०९,
२५७, ३७०
चारु, ३८, ५१, ७६, १८३, २३३, २६७
चितालिया करसनदास, १२, २१८, २५६,
२७३
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिमनलाल, देखिए शाह, चिमनलाल
चोकसी, नाजुकलाल, १३२
सांकेतिका
चोकसी, मोतीबहन, ४, ११,९६, १११,
१३२, १३७, १६८, २०९
छोटूभाई, २
छ
छोटेलाल, १२, १७०, १८३
जगन्नाथ, १२
जनक, राजा, २३३
जबक, ३५
जमना, २७०
ज
जयकर, मु० रा० ३८ पा० टि०, ४३
पा० टि०, ४४, ४५,४६, ६०,
८४ पा० टि०, ११७
८२,
जयप्रकाश नारायण, २५, २८, ८९, १०१,
१०७, ११२, १४५, १७६, २०८,
२३१, २५३, २६४, २७३, २८६,
२१३, ३२५, ३८०
जयरामदास दौलतराम, ८४, १२१, १२८,
३३४, ३३५
जरतुश्त धर्म, १८९
जानकीबाई, ११
जानकीमैया, ३०५
जालभाई, ३४८
जीवन बरला २७४
जीवनदास, १३२
जीवनलाल, २९०
जीवनशोधन, ३५, २५६
जीवरामभाई, देखिए कोठारी, जीवरामभाई-
जुगतराम, ३७६
जुलू विद्रोह, ३६२
जूठाभाई, १३
जेठालाल, १३२, १८७, ३६६
४९३
जेराजाणी, विठ्ठलदास, ५१, २१० २५९
जैनू, १६६, २०२
जोलिंगर, श्रीमती, ४०, १०२, ११४, १४८,
१८०, १८५
जोशी, ईश्वरलाल, १४
जोशी, छगनलाल, ११, ७९, १४३, १४७,
१४८, १६६, १९६, २०३, २१८,
२२५, २३४, २५६, ३३५
जोशी, तहमीना पी०, २३७, ३०२
जोशी, रमावहन, ११, ३२, ९३, १३७,
२१०, २३४, ३३५, ३५२
ज्योत्स्ना ३५२
श
झबेरी, गंगावन, २, १२, ४८, १११,
१७४, २४९, ३०६, ३६६
झवेरी, नानीबहन, २, १२, १११, १७४,
२४९, ३६६
झवेरी, मणिभाई रेवाशंकर, १४८
झवेरी, मणिलाल, १२
झवेरी, रेवाशंकर १४८, २५३, २६८
(द) टाइम्स, २९५
ट
टाइम्स इलस्ट्रेटेड वीकली, १९७
टापू, १२
टॉल्स्टॉय ऐज टीचर, ३४२
ठक्कर, अमृतलाल, ११०
ठक्कर, माधवजी, ६, ११४, २२३
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५३२
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४९४
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
ठक्कर, महालक्ष्मी माधवजी, ६, १३६,
१३७, १८२, २१२, २३२, २६६,
२८७, ३१२, ३२८, ३५८, ३६५
ठाकरसी, प्रेमलीला, २५९, २६०, ३०६
ठाकुर, रवीन्द्रनाथ, २७५, २९५
ड
डायल, मेजर, ३८ पा० टि०
डाहीबहन, १०६, १८२
डाहीबहन सोमाभाई, १२
डिस्कोर्सेस ऑन द गीता, २७४ पा० टि०
त
तपश्चर्या, १४६, १४८, २९९
तारा, २०७; देखिए मशरूवाला, तारा भी
तारामती मथुरादास विकमजी, १३०, २५५,
२८१, ३५२
तारिणी, ३८, ५२, ७६, १८३, २३२,
२४४, २६७, ३३०
तुलसी मेहर, १७७
तुलसीदास, ३५, ४७, २५६
तैयबजी, अब्बास, ११४, ३०१
तैयबजी, अमीना, ८
तैयबजी, बेगम, ११
तैयबजी, रेहाना, ११, ५५, ८७, १२९,
१७५, २३५, २८९, ३६०
तैयबजी, हमीदा, ११
२६५, २९०, ३२३, ३३६, ३५१,
३७७
त्रिवेदी, जयशंकर, २५२, २५४,२६८
त्रिवेदी, प्रो०, २५९, २७२
त्रिवेदी, मानशंकर जयशंकर, ३७, ६५,
९३, १०६, १२९, १४१, १६०, १९९,
२५५, २६, २८१, ३१०, ३२२, ३४७
त्रिवेदी, रामचन्द्र, २६७, ३७३, ३७९
दवे, जुगतराम, २८५
दशरथ, ३२७
दाऊद सेठ, १८९
द
दामोदरदास, ११, ६८, ३६७
दासगुप्त, क्षितीशचन्द्र, ३८
दासगुप्त, सतीशचन्द्र, १, ३८, ५१, ५२,
७६, १८३, १८८, २३२, २४४, २६७,
२९४, ३३०
दासगुप्त, हेमप्रभा, १, ३८, ५१, ७६,
१८३, २३२, २४४, २६७, २९४,
३०८, ३१६, ३३०, ३४०, ३७८
दिलखुश दीवानजी १२
दिलीप, १३०, २८१, ३५१
दूदाभाई, १३४
दूदाभाई मोटजी, १२
देशपांडे, केशवराव, १२
देसाई, कुसुम, ९, ११, २१, ६३, ९८, ११४,
१४३, १४९, १५९, १६९, २०६,
२२७, २६९, २९१, ३०२, ३२१,
३४६, ३५६, ३६९; देखिए कुसुम भी
देसाई, डा० हरिभाई, ४०, ४६, ७८, ९६,
तोताराम, देखिए सनाघ, तोताराम
त्रिवेदी, कलावती, १६, ४९, १००,
१३०,
१७६, २१२, २२८, २५१,
२६५,
३३६, ३५३, ३७७
त्रिवेदी, काशिनाथ, १६, ५०, ७८,
१००,
१३३, १७७, २११, २३६,
२५१,
देसाई, दुर्गाबहन, १३
१२५, १३७, १३९, १९२, ३०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सांकेतिका
देसाई, दूधीबहन, २९, १९९, २८२, ३४२
देसाई, नारायण, २४७
देसाई, निर्मला, १३, १३९, ३७२
देसाई, प्रागजी २७८, २८६, ३१५
देसाई, महादेव, १७५, २०३, २४७, २५७,
२७२, २७६, २९१, २९८, ३१५-६,
३२५, ३४५, १४९, ३६७
देसाई, महेन्द्र वा०, २४८, ३५६
देसाई, रसिक, १०२
देसाई, रोहिणी कन्हैयालाल, ८७, १३८,
२१३, २८३, ३५३
देसाई, बा० गो० २९, ५०, ७९, ११३,
१६६, १६८, १८०, १८८, २४८
पा० टि०, २८२
२९१, ३११, ३२६, ३३१
४९५
न
नटेसन, जी० ए०, ३९
नमक अधिनियम, ४३, ८४
नमक कर १२०
नम्रता, २०४५ का पाठ सीखा नहीं
जा सकता, २३०
नय्यर, प्यारेलाल, ९, १४३, १५९, १६९,
१८४, १८७, २०६, २१८, २२७,
२३९, २५६, २६९, २८१, ३००,
३४६, ३४७, ३५२,
३६५, ३६९, ३७८
नय्यर, सुशीला २६८
नरभेराम, २२७
नरसिंहप्रसाद, १३
देसाई, हरिइच्छा, २९, ४६, ७८, २०७, नरसिंहभाई, १५६
देसाई, हरिलाल, २०२-२, ३२६, ३६७
दोषी, बेचरदास, १२५
द्रौपदी, ३२६
धनगोपाल, १०२
धनुर्धारी, ९७
धरमदास, २७०
ध
धर्म, १८९, २२८, ३३१, ३३६, ३५१,
३५७, ३७६; और अस्पृश्यता, ३७३;
-और शरीर श्रम, १५० - की समानता,
१६६-७, १८९
धर्मकुमार, देखिए गिरि, धर्मकुमार
धीरू, ९३, २३४, २६८, १२८, ३३२, ३५२,
३६३, ३६६, ३७५
धुरन्धर, ५, ५३, १२८, २४९, ३४२, ३५४
ध्रुव, आनन्दशंकर, ३१२
नरोत्तमदास, १५३
नर्मदा डाह्याभाई, १३
नवजीवन, १८
नवजीवन कार्यालय, २५५
नवजीवनमाला, २५६
३५६, ३६०,
नवीन, १३४, २०२, २४६, ३६६
नाथ, ५४, १९४, ३२५
नाथजी, १२, ५४, २०३, २१४, ३२५
नामदेव, १०५ पा० टि०
नानाभाई, देखिए मशरूवाला, नानाभाई
इच्छाराम
नानावटी, अमृतलाल, १३
नानीवहन, देखिए झवेरी नानीवन
नानीबहन बुधाभाई, १२, १६६, ३४८
नायडू, पद्मजा, १३
नायडू, सरोजिनी ८४, १२१, २१४, ३७५
नायर, कृष्ण, १८, २५, ६२, ६६, १०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४९६
निर्भयता, ९०, ११५
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
निर्मला, १८, २३४; देखिए पण्डया, निर्मला
भी
निर्मला केवलराम, १२
निर्मलाबाई, ११
नूरबानू, ११
नेवटिया, कमला, १५२
नेहरू, जवाहरलाल, ४३-४, ४६ पा० टि०,
८२ पा० टि०, ८४, ८९, १००,
११७, ११९, २६४
नेहरू, मोतीलाल, ४३-४, ४६ पा० टि०,
८२, पा० टि०,
११७-९, २३९
प
८४,९१, १००,
पटेल, अम्बालाल चतुरभाई, १७४
पटेल, कमला शंकरभाई, ११, ३५७ देखिए
कमला भी
पटेल, कुँवरजी, १२
पटेल, गोविन्द, २६, २००, २८४
पटेल, डाहीवहन, ६, १२, २२६
पटेल, डाह्याभाई, १३, २२. ८८, ३६०
पटेल, मगनभाई, ११
पटेल, मणिबहन, १२, २२, ५५, ८८,
९७, १२८, १४६, १७१
पटेल, रावजीभाई, १२, २७, १९३, २१८,
२२६, ३२२
पटेल, वल्लभभाई, २२ पा० टि०, ४४,
८२ पा० दि०, ८४, १०१. ११४,
१२१, १३२, २०४, २२४
पटेल, शान्ता शंकरभाई, २०१, ३०९, ३५७
देखिए शान्ता भी
पटेल, शिवाभाई, १२, २९, ७७, २१८,
३००, ३२१, ३४८
पण्डया, निर्मला, १३; देखिए निर्मला भी
पण्डया, भगवानजी, ९, ४८, ६४, १२२,
१३४, १५९, १६३, १६६, १८७,
२०२, २११, २१८, २२२, २४५,
२७९, ३०३, ३५७
पण्ड्या, मणिबहन, ४८, ६४, १३४, १५९,
१८७, २१८
पण्डित, वसुमती ३, ११, १७, ३१, ४९,
८६, ९४, ११६, १४२, १५८, १७३,
२१३, २२६, २६३, २९८, ३२५,
३३९, ३६१, ३७२
पण्डितजी देखिए खरे, ना० मो०
पद्मा, २४३, २७७, ३०२, ३०४, ३६२, ३७५
पन्नालाल, १७०, १७४, २६९
परमार, लालजी, ३१
परमार्थ, ५३
परीख, नरहरि, ६८, १४४, १७२
परीख, मणिवहन, १२, १४४, १७२
परीख, वनमाला, ३२९, ३७५
पानाचन्द, १७४, २४९
पारनेरकर, २२२, २९२, ३६६
पारेख, इन्दु, १३
पारेख, कान्तिलाल, १३
पारेख, कुंवरजी, ४७, ८६
पारेख, देवचन्द, २५३, ३४७
पीटरसन, कुमारी, ११०
पुराणी, २१
पुरुषार्थ, ५३, ८१
पुष्पा, १३
पुंजाभाई, १२, २४, १२२, १२५, १४८,
१८३, १८५, २०३ ३३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सांकेतिका
४९७
पंजाभाई, जूनियर, १३
पेटिट मीटूबहन, ११, १४३
पोद्दार, रामेश्वरदास, ३६, १५३, १९७
पोलक, एच० एस० एल०, २५
पोलक, मिली, २६
पोलक, लिऑन, २६
पोलक, सेलिक, २६
प्यार अली, ११
प्यारेलाल, देखिए नय्यर, प्यारेलाल
प्रभावती, १४, २५, २८, ५४, ७५, ८८,
१०१, १०७, ११२, १५८, १६५.
१७६, १९८, २०० २०८, २३१,
२३९, २५३, २६३, २६४, २७३,
२८६, २९२, ३११, ३१३, ३२५,
३३८, ३६८, ३८०
प्रभुभाई, ७३, २४३
प्रह्लाद, ४२
प्रागजी, देखिए देसाई, प्रागजी
प्रायश्चित ३१८ पा० टि०, ३१९, ३६३
प्रार्थना ५५ ३२६, ३२८, ३६१
-अपने
अन्तरमें स्थित ईश्वरकी ३२० की
आवश्यकता, ८५
पृथुराज, १२
प्रेम, ३, १२
प्रेमकुँवर, २७०
प्रेमराजजी ३५५
प्रेमाबाई, १२
प्रेस अधिनियम ४३, ८४
फड़के, मामा, १३
फ
फाटक, हरिभाई, १३
ब
बजाज, कमलनयन, १२, १७, ५०, ६२,
१२६. १६३
बजाज, गुलाब, १३
बजाज, जमनालाल, ५०, ६८, ११४, १६०,
२३९, २७३, ३१४, ३४७, ३५०
बजाज, जानकीदेवी, १२, १७, ५०, १२६,
१६०
बजाज, बनारसीलाल, १४२, २४६, ३१२
बजाज, राधाकिशन, ६२
बजाज, रुक्मिणी, ६६, ७२, ७४, ८६,
१४३, २४६, २६५, ३१२
बनर्जी, सर गुरुदास, २०४
बर्न्स, ३४५
बलदेव, ३५५
बलभद्र, १३, १३९, १४८, १८२, २०१,
२४४, ३२२
बलवीरसिंह, १९५
बली, देखिए वोरा, बलीबहन
बाइबिल, १५०
बाबलो, २४७
वार, लक्ष्मीबहन, ११
बालकृष्ण, ११, ३९, ५७.
बावजीर, इमाम अब्दुल कादिर, १०८,
१५२, ३०४, ३३९, ३४०
बिड़ला, घनश्यामदास, ५६, २६० २६४,
२७३, ३४७, ३५०
बिहारी चरखा, २४७, ३२४, ३४६
बीथोवन, २९८
बुधाभाई, १२, १६६. ३४८
बुलाखीदास, २८७, ३५६
फीनिक्स आश्रम, २७८
बे० जी०, १८८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४९८
बेचरदास, १२
बैंक ऑफ इंग्लैंड, २५४
बैंकर, शंकरलाल, ११, ९५
ब्रजकिशोर बाबू, १९८, २६४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ४३, ४५,८२,
११८-२१ का संगठन, १२१; की
अखिल भारतीय कमेटी, ८३३ की
कार्यसमिति, २२१
ब्रह्म, ७१, २७९
ब्रह्मचर्य, ९, ९०, ३५७;
और अहिंसा,
भावे, बालकृष्ण, १६६, १८६, २३९, २९१
भावे, विनोबा, ११, १६, १६६, १८३,
६९; और इन्द्रियोंका संयम, ७०-१
-और शरीर श्रम, १५०
-और स्वादका
संयम, ८०-२ का
पालन
मन,
वचन और कायासे, ७०
१८६, २९१, ३१६, ३३२, ३४९
म
ब्रॉकवे, फेनर, २२०
भ
भक्त, और व्यवसायकी योजना, ३१३
भक्ति, ४०, ४२, २७४, ३१४
भक्तिप्रसाद, १२५
भगवद्गीता, १ पा० टि०, २, ४ पा० टि०,
१६, २०, ३५, ३९, ५२, ७०, ७७,
८१, १०४, १११, ११२, ११४, १३५,
१३७, १४९, १६६, १६९, १८३,
१८६, २०९, २१० पा० टि०, २१२,
२२५, २३२ पा० टि०, २४०-२,
२५६, २६७, २७४, २७९, २८४,
२९५, ३०२, ३०८, ३२१, ३२४,
३२८, ३३४, ३४९, ३५०, ३७०;
-का पारायण, ३१६
भणसाली, जयकृष्ण, ८, १२, ९२, २९२
भण्डारकर, २५६
भाऊ, २३९
भागवत पुराण, २९९
भाटिया, जेठालाल, १२
भारती, २२८, २७८, ३०९
मंगलदास, सेठ, ३६८
मंगला, १३
मगनभाई, ३७, २३९, २५६
मगनलाल, १८८
मजीद, मियाँ अब्दुल, १५७
मणि, १५३
मणिबन, २०५, २१४
मथुरादास त्रिकमजी, ५१, १३०, २३९,
२८१, ३५२
मथुरादास पुरुषोत्तम, ११, १८, ३२, ३३,
९५, ९६, १३३, १६४, १९६, २०१,
२४५, ३३०, ३५९
मदालसा, १७, ६२
मधु, २०२
मन्नालाल, १२
मनुड़ी, देखिए गांधी, मनु
मशरूवाला, किशोरलाल, ३५, ६८, २५६,
२७३
मशरूवाला, गोमतीबाई, ११
मशरूवाला, तारा, १०१, २२८, २८२,
२८३, ३७६; देखिए तारा भी
मशरूवाला, नानाभाई इच्छाराम, १०१,
२२८, २८२, ३७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मशरूवाला, सुरेन्द्र, २९३, ३७६
सांकेतिका
महमूद, डा० सैयद, ८२ पा० टि०, ८४,
११७, ११९
महालक्ष्मी, १३
महावीर प्रसाद, १६, १९५, २१२, २६०,
३५१
मॉड, २६
माधवदास, १४४
माधवलाल, ११४
मार्टिन, आर० वी०, १०, १५५, १८४,
१९०, १९५, २२४, २३८ पा० टि०
मालवीय, मदनमोहन, २२१, २९९, ३५०
मिस्टिक्स ऑफ इस्लाम, १०८
मीराबहन ७, २०, २३ पा० टि०, २७,
३३, ४०, ५२, ६४, ६७, ७६, ८९,
१००, १०९, ११२, १२६, १३४,
१४५, १७८, १८७, १८८,
मृत्युंजय, ५४, १०७, १५८
४९९
मृत्यु, १६४, २०८, २२६, २६७, ३२०
मेघजी, २९, १६८
मेन्टल रेडियो, २६१
मेहता, कपिलराय १३, ९९, २०७
मेहता, कुंवरजी, २५०, २८६, ३७६
मेहता, चम्पावन, १२
मेहता, छोटाभाई कल्याणजी, ३७६
मेहता, डा० जीवराज, १६२, १८५, १८७
मेहता, नरसिंह, १९३
मेहता, बबलभाई, १२, ३१७, ३६३
मेहता, भगवानजी अनूपचन्द, २५३
मेहता, रतिलाल, ८, १२
मेहता, राजचन्द्र रावजीभाई, ३५, ७७, १४८
मेहता, शारदाबहन, १२
मेहरोत्रा, परशुराम, ६४, १९६
मैथ्यू, पी० जी०, १३१, १६९, २९२, ३३२
मैमनआर्ट, २६१
१९७,
मैथ्यू, १२
२०३, २१५, २२०, २२१,
२३३,
२३९, २४७, २५६, २७५,
२७६,
३२४,
२९४, २९५, ३०१, ३१५,
३४३, ३४४, ३४९, ३५०, ३६४,
३६७, ३७० - निषेधाज्ञाके बावजूद
कलकत्तामें महिलाओंके जलूसमें शामिल
हुई, १६२
मीराबाई, ३७९
मुंबई समाचार, २९२
मुंशी, लीलावती, ९७
मुखर्जी, सतीश, १०२
मुत्तु, डा०, २९१
मुन्नालाल, ३९
मुसलमान, १८८, ३२३
मूर्तिपूजा, ५०, २३१
मोक्ष, १७३
मोतीबहन रामजी, १२
मोतीबाई मथुरादास, ११, १३३, १९६
मोतीबाई रणछोड़लाल, ११
मोतीलाल (बढ़वाणका दर्जी), २५८
मोदी, रमणीकलाल, ६८, १७२
मोरारजी, शान्तिकुमार, १३२
मोहन, १७२
य
यज्ञ, २४०-१, २५७, २६०; -आत्मशुद्धिके
लिए, ३०८; और कताई, २९९,
३१५, ३३१, ३४८ का अर्थ, २७३
यशोदा, २२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५००
याज्ञिक, इन्दुलाल, ६३
युक्ति, १७०
सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
रायपन्न, जोसेफ, १८९
रावण २६२, २०५
योग, १९२, ३००, ३५० और अनासक्ति, राष्ट्रीय मांग, ८३
३४९
र
रुखी (रुक्मिणी), देखिए बजाज,
रुस्तमजी, सेठ, १८८
रुक्मिणी
रणछोड़भाई, ५८
रतिलाल, १५६
रतिलाल सेठ, २२७
रतुभाई, ३३३
रमावहन, ६, २६६, देखिए जोशी, रमावहन
भी
रमावहन रणछोड़लाल, ११,५८
रमीबाई, देखिए कामदार, रमीबाई
रस्किन, १४९
रहीम, भगवान, ३३९
राजगोपालाचारी, १०, १८५, २३९
राजस्व अधिनियम, ४३, ८४,
राजेन्द्र प्रसाद ५४
राधाकृष्णन्, डा० सर्वपल्ली २५२
राम, भगवान, ९, ४२, १८८, २६२, ३२७
रामचन्द्रन, १३
रामजीभाई, १९६
रामदास स्वामी, ७९, १७१, ३२९
रामदेवजी ३५५
रामनाम, ४, ३६, १५३, १९७, २७१,
२७९, २९९, ३६१
राभाऊ, देखिए खरे, रामभाऊ
रामराज्य १३८
रामायण, १६९, २०८, २५६, २६७, ३७८
राय, डा० प्रफुल्लचन्द्र, ३८
रायचन्द भाई, देखिए मेहता, राजचन्द्र
रावजीभाई
ऋष्यशृंग, ९२
रेनॉल्डस, रेजिनॉल्ड, ११०
रोमा रोला, २९८
ल
लक्ष्मी, १३२, १३४
लक्ष्मी दादाभाई, १२
लक्ष्मीदास, १४, २५०, ३३१
लक्ष्मी राजगोपालाचारी, १३
ललिता, १२, २८४
लालजी १२
लालवानी, कीकीवन, १२
लिमये, प्रो० १३८, २४९
लीलाबहन, ८, १२
लीलावती, देखिए आसर, लीलावती
लुंडी, कमलाबहन, १३८, १४८, १९८,
३६६
लुकमानी, श्रीमती, ५५,८७
थ
वर्णाश्रम, और विवाह, ३२३
वसिष्ठ, २०४
बसन्त ७८, २०७
बाइसराय, देखिए इर्विन, लॉर्ड
विकर्म, ३७०
विठ्ठल, १२, १७८, २०९, २४५, ३३०,
३५९
विठ्ठलदास लेडी, १२, ३१७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सांकेतिका
विदेशी वस्त्र का निषेध, ८४ के खिलाफ करीबहन, २४२
धरना, ४३
विद्यावती, ५४
विनोदबाला, १७१
विनोबा, देखिए भावे, विनोबा
विमला, ३३५
विमु, १८७, २३४, ३३२
विवाह, एक धार्मिक क्रिया, ३६६
और
विश्वनाथ, ४१
वर्णाश्रम, ३२३ का प्रयोजन, ३२३
विश्वामित्र, २०४
वीमावाला, ईश्वरलाल, २०३, २३९
वेद, २४०
वेलॉक, विल्फ्रेड, १५
वैद्य, गंगाबहन, ११, १४, ३०, ५४, ६५,
९२, १०६, १०७, १४१, १४८, १५७,
१५९, १६३, १६५, १७४,
२०३, २१४, २४३, २७७,
१९३,
२८४,
२८८, २९०, २९१, ३०४,
३२६,
३३७, ३५३, ३६१
वैयक्तिक सत्ता, १३१
वोरा, कुमीबहन, ४६
बोरा, बलीबहन, ३, ४६, ७२, २८०
व्रत, ३४८; का अर्थ, २६२; की आव-
श्यकता २१८-९, ३०८; जो आत्माके
लिए हानिकर न हो, ३४८
व्रतविचार, ३४७
शम्भु, ८, १२
शरीरश्रम १४९-५०
शर्मा, हरिहर, ११
-५०१
11 AUG 1972
शान्ता, १२, ४९, ५०, १००, २५१, २६५,
२९०, ३७९ देखिए पटेल, शान्ता
शंकरभाई भी
शान्तिकुमार नरोत्तमदास, १३
शान्तू, १३७
शारजाबहन, ९, १२, २४
शास्त्री, वी० एस० श्रीनिवास, ३८, ३९
शाह, चिमनलाल, १३, ६३, १२३, २२५
शाह, चेलीबहन, १२
शाह, नन्दलाल, १२
शाह, पूँजाभाई, १५४; देखिए पूँजाभाई भी
शाह, रतिलाल, ३५
शाह, शारदा सी०, १५, ६३, ७४, १०८,
१२३, १५४, १९१, २०६, २२५,
२४२, २९७, ३७३
शिक्षा, बच्चोंकी, ३७४
शिवली, मौलाना, १७५
शीला, ५३, ७३,
शुक्ल, चन्द्रशंकर, १२
शूरजी वल्लभदास, ५६
शेलत, बापूभाई, १३
श्रद्धा, १६९ - प्रार्थनाएँ, ३२८
शंकर, ६५, १८८
शंकरभाई, १०
श
शंकरलाल, ३०, १९६, २९०
स
सच्चिदानन्द के रूपमें ईश्वर, ४१
सट्टा, और व्यापार, ३५०
सत्य, ६१, ६९, ९०-१, ११५, १६२,
१६६, १८९, १९६, २१९, २४०,
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सम्पूर्ण गांधी वाड्मय
२४५, २५१, २७९, ३३९, ३६१,
३७१, ३७४, और अहिंसा, ५८-६०;
-और शरीर-श्रम, १५० ;
अभ्यास किया जा सकता है, २०४
-का
- का अर्थ, ४१-२ - रूपी परमात्मा,
३३३
सत्यनारायण, ११६
सत्यवती, १२
सत्याग्रह बुलेटिन, १ पा० टि०
सत्याग्रही, ४४, ८४
सीता ( धैर्यबाला ), १०२, १२८, २७८,
२८३, ३६२
सीताबदियारा ३३८
सुकरात, ३३३
सुखलाल, पंडित, १२
सुदर्शन, २५३
सुन्दरम् वी० ए०, १३, २५२, २६१
सुन्दरम् सावित्री, २५२
सुब्वैया, २४, १८५, २३९
सुमंगल, २७२
सत्याग्रही कैदी, और जेलका अनुशासन, सुमित्रा, २१७
३४१
सनाढ्य, गंगादेवी, २९७, ३०१, ३६३
सनाढ्य, तोताराम, १८०, २२२, ३०१,
३६३
सन्तानम, कृष्णाबाई, १३
सप्रू, तेजबहादुर, ३८ पा० टि०, ४३ पा०
टि०, ४४, ४६ पा० टि०, ८२, ८४
पा० टि०, ११७
सुरेन्द्र, १०२, ११४, १२६, १९६
सुलताना, १५२, १५७
सुशीला, ६३, ९८, १५४, १९२
सूरजबहन मणिलाल, १२
सेवा, २४१, २५८, ३१३, ३३२, ३३३,
३५३, ३६१, ३७९; - अनासक्त भावसे,
३०३, ३२२; और आत्माका विकास,
५३,
के लिए विश्राम आवश्यक,
१७८ - सामाजिक, ३५७
समाधि, १९२
सरजूप्रसादजी, डा०, ३७७
सोमाभाई, १२, २९२
सरैया, पुरुषोत्तम डी०, ३६, २४२
सोराबजी, ३४८
सविनय अवज्ञा, ४४, १२१, ३४१
अभि-
सोशल रिफॉर्मर, २२४
यान, ८२; की समाप्ति,
४२-३,
स्टुअर्ट, ३६२
૮૪
सामलभाई, १३
साराभाई, अनसूयाबाई, ११
साराभाई अम्बालाल, ११
सिक्लेयर, अपटन, २६१
सीजर और क्राइस्क, १५१
सीतलासहाय, २४३ पा० टि०, ३४८
सीता, ३०५
स्त्री, के साथ पुरुषका दुव्यर्वहार ३०५;
- हिन्दू, ३२३
स्थितप्रज्ञ, १७३
(ब) स्पिरिट्स पिलग्रिमेज, १९६२ पा० टि०
स्लोकोम्ब, जॉर्ज, ११८
स्वदेशी, १८६, २१८, २६९
स्वराज्य, २६, ४४; की प्राप्ति केवल
बलिदानोंसे ही सम्भव, २८२
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ह
हमीदाबहन, ८७, १३८, १७५, २१०, २१३
हरिदास १६५
हरिप्रसाद, २२, ३४
हिन्दू, १५१
हिन्दू, १३५, १८८, २६२
हिन्दू धर्म, १८९, २०५ और अस्पृश्यता,
१३५
हरिभाई, डा०, देखिए देसाई, डा० हरिभाई हिन्दू-धर्मग्रन्थ, १८९
हरिलाल, २९१
हरिश्चन्द्र, ४२, ६१, ११५
हसन, इमाम, ४२
हसमुख राय, १२, १०२
हारकर, एम्मा १३
हीरजी, ८६
हुसैन, १८९
हुसैन, इमाम, ४२
होम्स, रेवरेण्ड, २५७
होरमज्द १८९ देखिए अहुरमज्द भी
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भाभी
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