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पृष्ठ:हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों का संक्षिप्त विवरण.pdf/२
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<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude> हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों
का
'''संक्षिप्त विवरण'''
पहला भाग
संपादक
श्यामसुंदरदास बी ए
भूतपूर्व निरीक्षक, हिंदी पुस्तकों की खोज, स्थायी सभासद और
मंत्री, काशी नागरीप्रचारिणी सभा, फेलो और
अध्यापक, काशी विश्वविद्यालय ।
काशी नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित
१९८०
५००] [मुख्य ५,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों का संक्षिप्त विवरण.pdf/३
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<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>मुद्रक--गणपति कृष्ण गुर्जर श्रीलक्ष्मीनारायण प्रेस, बनारस सिटी । १०४१-२४<noinclude></noinclude>
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सौरभ तिवारी 05
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[[Special:Contributions/Abybde|Abybde]] ([[User talk:Abybde|वार्ता]]) के संपादनों को हटाकर [[User:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/१
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/११५
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|८५}}</noinclude>उसमें नहीं है। असन्तोष उसमें है। लेकिन अगर असन्तोष व्यक्त करनेके लिए भी सजा दी जानी है तब तो स्वामी गोविन्दानन्दकी तरह मैं भी गुनहगार हूँ। मौजूदा शासन-तन्त्रसे जितना असन्तोष मुझे है उतना शायद ही किसी दूसरेको होगा, क्योंकि हुकूमतके तौर-तरीकोंसे मेरी तरह त्रस्त दूसरा शायद ही कोई मिलेगा। भारतमें राजनैतिक असन्तोष तो एक मानी हुई बात है और इसलिए [कहा गया था] कि अगर भाषणसे हिंसाको उत्तेजन न मिले तो पुलिस भाषणकर्त्तासे नहीं बोलेगी। लेकिन इस सरकारकी सबसे बुरी बात तो यह है कि इसकी कोई निश्चित और स्थिर नीति नहीं है। स्वर्गीय चैम्बरलेन साहब<ref>जोजेफ चैम्बरलेन (१८३६-१९१४); १८९५ से १९०३ तक उपनिवेश-मन्त्री।</ref> बड़े गर्वसे कहा करते थे कि अंग्रेज अफसरके मुँहसे निकली हुई बात पत्थरकी लकीर होती है। लेकिन हम अपने दुःखद अनुभवोंके बाद इस नतीजेपर पहुँचे हैं कि आज अंग्रेज सरकारकी बातका मोल फूटी कौड़ीके बराबर भी नहीं होता। सर विलियम विन्सेंटने कितनी शान और दिखावेके साथ यह आश्वासन दिया था कि जबतक असहयोगी हिंसाको नहीं भड़काते उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी। अच्छा ही हुआ कि भारतवासियोंने उनकी चिकनी-चुपड़ी बातोंपर भरोसा नहीं किया। इस आश्वासनका सिर्फ यही मतलब था कि जबतक असहयोग आन्दोलन महज प्रचार रहेगा, जबतक उसका खास असर न होगा तबतक असहयोगियोंके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जायेगा। अब चूँकि हम खाली जलसे-जुलूस और प्रदर्शनकी स्थितिसे बहुत आगे निकल आये हैं, इसलिए गिरफ्तारियों और सजाओंसे बचे रहनेकी कोई उम्मीद हमें नहीं करनी चाहिए; हमें तो बड़ेसे-बड़े कष्टोंके लिए तैयार रहना चाहिए। हमारा आन्दोलन ज्यों-ज्यों प्रभावशाली होता जायेगा त्यों-त्यों दमन भी उसी हिसाबसे बढ़ता जायेगा। जाहिर है कि पाँच सालके निर्वासनका दण्ड लोगोंके मनमें आतंक पैदा करनेकी गरजसे ही दिया गया है। मैं नहीं कह सकता कि भारतकी जिन्दगीमें वर्तमान पाँच सालोंका अरसा कितने युगोंके बराबर है। अगर भारतने जो कहा है उसे कर दिखाया तो अवधि पूरी होने के पहले ही अनुचित रूपसे जेलोंमें बन्द किये गए तमाम कैदियोंको रिहा करनेकी ताकत स्वयं देशके हाथमें आ जायेगी। लेकिन वह घड़ी दूर हो या करीब, हमारा कर्त्तव्य स्पष्ट है। किसी भी गिरफ्तारीका जवाब हमें गुस्सेसे नहीं देना है, जैसा कि मालेगाँवमें हुआ। हमें तो शान्त बने रहकर हिम्मत और पक्के इरादेके साथ अन्यायका मुकाबला करना है। अगर हम अपने धर्म और सिद्धान्तके प्रति सच्चे हैं तो हमें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके रचनात्मक कार्यक्रमपर ज्यादा जोरोंसे अमल करके उसे हर हालतमें पूरा करना चाहिए। हर गिरफ्तारीपर हमें थोथे या उत्तेजनात्मक प्रदर्शन नहीं करने चाहिए। शेखी बघारना हमारा काम नहीं। हमारा कर्त्तव्य है ठोस काम करते हुए जेल जाना।
{{C|'''मालेगाँवमें दुर्व्यवहार'''}}
मालेगाँवमें असहयोगियोंने जो अपराध किया, हम लोग उसकी गम्भीरताको कम करके दिखानेकी कोशिश करते हैं। वहाँके सब-इन्स्पेक्टरने उत्तेजित होनेका कितना ही<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/११६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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Ocr सुधार
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>८६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
बड़ा कारण क्यों न दिया हो, उससे असहयोगियोंकी प्रतिहिंसापूर्ण कार्रवाई उचित तो
नहीं ठहराई जा सकती। मैं इस मसलेपर कानूनी दृष्टिसे विचार नहीं करूँगा । मेरी
दृष्टि तो असहयोगीकी दृष्टि है और मुझे केवल उसीसे मतलब है । कोई कितना ही
क्यों न उकसाये, असहयोगी तो किसी भी सूरतमें बदला न लेने और जवाबी हमला
न करनेके अपने प्रणसे बँधा होता है । सरदार लछमनसिंह और सरदार दिलीपसिंह
और उनके साथियोंकी शानदार मिसाल हमारे सामने है । अगर हम सच्चे असहयोगी
हैं तो हमें अपने अन्दर उनकी तरह मरनेकी ताकत पैदा करनी होगी । अगर मालेगाँव-
के असहयोगी जवाबी हमला किये बगैर बहादुरीसे मर जाते तो मुझे खुशी होती और
मैं उनके बलिदानकी तारीफ करता । उनके ऐसे वीरतापूर्ण कृत्यसे भारतकी स्वतन्त्रता-
का दिन और नजदीक आ जाता। फिर असहयोगीकी दृष्टिसे हमें यह भी देखना
होगा कि उत्तेजित होनेका मौका पहले किसने दिया ? उन्होंने पुलिसको डराया या नहीं ?
जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ हममें से किसीकी गिरफ्तारीपर जिस तरहके
पागलपन भरे प्रदर्शन किये जाते हैं वे गिरफ्तारीसे बचनेकी हमारी भद्दी कोशिशका ही
इजहार करते हैं। अपने-आपको परखनेकी जो कसौटी हमने चुन ली है हमें उसीपर
कायम रहना चाहिए। तथ्योंकी अबतक की जानकारीके आधारपर मेरी तो अब भी
यही राय है कि असहयोगियोंने अहिंसात्मक असहयोगके नीति-नियमोंका बुरी तरह
उल्लंघन किया। खिलाफत या स्वराज्यमें दिलचस्पी रखनेवालोंसे मेरा यही कहना है कि
चाहे उनका प्यारेसे- प्यारा नेता ही क्यों न गिरफ्तार कर लिया जाये वे किसी भी
तरहका विरोध-प्रदर्शन न करें; इसे वे अपना धर्म ही बना लें । मेरी या मौलाना शौकत
अलीकी गिरफ्तारीपर अगर जनताने हड़तालें या विरोध सभाएँ कीं तो मैं इसे अपना
सम्मान नहीं समझँगा । हाँ, अगर हमारी गिरफ्तारीपर विदेशी कपड़ोंका पूरा बहिष्कार
करें, लोग ज्यादा उमंग और उत्साहसे चरखा चलाने लगें, तिलक स्वराज्य-कोष के
लिए खूब पैसा जमा करें और कांग्रेसके सदस्य बननेकी होड़ लग जाये तो मुझे जरूर
खुशी होगी और मैं उसकी तारीफ करूँगा । ऐसे समय में मैं यह उम्मीद करूँगा कि
सारे सरकारी स्कूल और कालेज खाली हो जायें और ज्यादासे ज्यादा वकील अपनी
वकालत छोड़ दें। खिलाफत और पंजाबके मामलेमें सरकारने जो अन्याय किया है उसे
मिटानेका तरीका अफसरोंकी हत्या और सरकारी इमारतोंको जलाना नहीं है । इससे
राष्ट्रका नैतिक अधःपतन होता है और साथ ही बेहद पस्ती भी फैलेगी। इसलिए
हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए और कभी एसा मौका नहीं आने देना चाहिए जिससे
लोग उत्तेजित हो उठें और अवांछित या अपराधपूर्ण कृत्योंकी ओर प्रेरित हों ।
नुक्ताचीनी
अकसर नौजवान लोग नेताओंके आचरणकी अकारण ही आलोचना करते हैं ।
इस तरहका जो ताजा उदाहरण मेरे देखनेमें आया है वह किसी हदतक उल्लेखनीय है ।
हालही में जब मैं सिन्धके दौरेपर गया था तो मुझे हैदराबादसे मीरपुर खासतक ले जानेके
लिए एक स्पेशल रेलगाड़ीका इन्तजाम करना पड़ा था । एक सज्जनको यह बरदाश्त
नहीं हुआ । उन्होंने नतीजा निकाल लिया कि नेतागण राष्ट्रीय धनका दुरुपयोग कर
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बड़ा कारण क्यों न दिया हो, उससे असहयोगियोंकी प्रतिहिंसापूर्ण कार्रवाई उचित तो नहीं ठहराई जा सकती। मैं इस मसलेपर कानूनी दृष्टिसे विचार नहीं करूँगा। मेरी दृष्टि तो असहयोगीकी दृष्टि है और मुझे केवल उसीसे मतलब है। कोई कितना ही क्यों न उकसाये, असहयोगी तो किसी भी सूरतमें बदला न लेने और जवाबी हमला न करनेके अपने प्रणसे बँधा होता है। सरदार लछमनसिंह और सरदार दिलीपसिंह और उनके साथियोंकी शानदार मिसाल हमारे सामने है। अगर हम सच्चे असहयोगी हैं तो हमें अपने अन्दर उनकी तरह मरनेकी ताकत पैदा करनी होगी। अगर मालेगाँवके असहयोगी जवाबी हमला किये बगैर बहादुरीसे मर जाते तो मुझे खुशी होती और मैं उनके बलिदानकी तारीफ करता। उनके ऐसे वीरतापूर्ण कृत्यसे भारतकी स्वतन्त्रताका दिन और नजदीक आ जाता। फिर असहयोगीकी दृष्टिसे हमें यह भी देखना होगा कि उत्तेजित होनेका मौका पहले किसने दिया? उन्होंने पुलिसको डराया या नहीं? जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ हममें से किसीकी गिरफ्तारीपर जिस तरहके पागलपन भरे प्रदर्शन किये जाते हैं वे गिरफ्तारीसे बचनेकी हमारी भद्दी कोशिशका ही इजहार करते हैं। अपने-आपको परखनेकी जो कसौटी हमने चुन ली है हमें उसीपर कायम रहना चाहिए। तथ्योंकी अबतक की जानकारीके आधारपर मेरी तो अब भी यही राय है कि असहयोगियोंने अहिंसात्मक असहयोगके नीति-नियमोंका बुरी तरह उल्लंघन किया। खिलाफत या स्वराज्यमें दिलचस्पी रखनेवालोंसे मेरा यही कहना है कि चाहे उनका प्यारेसे-प्यारा नेता ही क्यों न गिरफ्तार कर लिया जाये वे किसी भी तरहका विरोध-प्रदर्शन न करें; इसे वे अपना धर्म ही बना लें। मेरी या मौलाना शौकत अलीकी गिरफ्तारीपर अगर जनताने हड़तालें या विरोध सभाएँ कीं तो मैं इसे अपना सम्मान नहीं समझँगा। हाँ, अगर हमारी गिरफ्तारीपर विदेशी कपड़ोंका पूरा बहिष्कार करें, लोग ज्यादा उमंग और उत्साहसे चरखा चलाने लगें, तिलक स्वराज्य-कोषके लिए खूब पैसा जमा करें और कांग्रेसके सदस्य बननेकी होड़ लग जाये तो मुझे जरूर खुशी होगी और मैं उसकी तारीफ करूँगा। ऐसे समयमें मैं यह उम्मीद करूँगा कि सारे सरकारी स्कूल और कालेज खाली हो जायें और ज्यादासे-ज्यादा वकील अपनी वकालत छोड़ दें। खिलाफत और पंजाबके मामलेमें सरकारने जो अन्याय किया है उसे मिटानेका तरीका अफसरोंकी हत्या और सरकारी इमारतोंको जलाना नहीं है। इससे राष्ट्रका नैतिक अधःपतन होता है और साथ ही बेहद पस्ती भी फैलेगी। इसलिए हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए और कभी एसा मौका नहीं आने देना चाहिए जिससे लोग उत्तेजित हो उठें और अवांछित या अपराधपूर्ण कृत्योंकी ओर प्रेरित हों।
{{C|'''नुक्ताचीनी'''}}
अकसर नौजवान लोग नेताओंके आचरणकी अकारण ही आलोचना करते हैं। इस तरहका जो ताजा उदाहरण मेरे देखनेमें आया है वह किसी हदतक उल्लेखनीय है। हालही में जब मैं सिन्धके दौरेपर गया था तो मुझे हैदराबादसे मीरपुर खासतक ले जानेके लिए एक स्पेशल रेलगाड़ीका इन्तजाम करना पड़ा था। एक सज्जनको यह बरदाश्त नहीं हुआ। उन्होंने नतीजा निकाल लिया कि नेतागण राष्ट्रीय धनका दुरुपयोग कर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/११७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>टिप्पणियाँ
८७
रहे हैं। मैंने यह पूछनेकी जरूरत नहीं समझी कि स्पेशल रेलगाड़ीका इन्तजाम क्यों
करना पड़ा । पत्र - लेखकने सलाह दी है कि मुझे स्पेशल रेलगाड़ीका इस्तेमाल नहीं
करना चाहिए था और सिन्धके लिए एक दिन और देकर पैसेकी बचत करनी
चाहिए थी। अगर मेरे इस दोस्तने मामलेकी तहतक पहुँचने की कोशिश की होती
तो उन्हें मालूम हो जाता कि स्पेशल गाड़ी किये बगैर मुझे मीरपुर खास ले जाना
नामुमकिन था, दूसरे कार्यक्रमोंमें व्यवधान डाले बिना मैं सिन्धमें एक दिन और नहीं
रुक सकता था, मेरा मीरपुर खास जाना जरूरी था और मुझे वहाँ ले जानेमें जो
खर्च पड़ा वह तुलनात्मक दृष्टिसे बहुत ही कम था । सार्वजनिक कार्यकर्त्ताओंकी आलो-
चना जन-जागृतिका शुभ संकेत है । इसके कारण कार्यकर्त्ता जागरूक और सावधान
रहते हैं । कमखर्चीकी माँग करना चन्दा देनेवालों का हक है । आम जलसोंमें बेशक
बहुत ज्यादा फिजूलखर्ची की जाती है, तड़क-भड़क और कोरे दिखावे में भी बहुत पैसा
फूंका जाता है। अकसर बगैर सोचे-समझे ही खर्च किया जाता है। इसलिए सार्वजनिक
कार्यकर्त्ताओंके आचरण या सार्वजनिक कार्योंके लिए किये जानेवाले खर्चकी यदि निडरता-
पूर्वक आलोचना की जाती है तो उससे हमारा फायदा ही है । लेकिन इस तरहकी
आलोचना पूरी जानकारी हासिल करके और विचारपूर्ण ढंगसे ही की जानी चाहिए।
बेकारकी नुक्ताचीनीकी आदत छोड़ देनी चाहिए।
रेलकी यात्राके सवालपर यह तो मुझे कहना ही पड़ेगा कि नेताओंमें तीसरे
दर्जे की यात्रा से कतरानेकी आदत अब भी दिखाई देती है । मुझे अफसोस है कि तन्दु-
रुस्ती अच्छी न होने के कारण अब मैं तीसरे दर्जेमें यात्रा नहीं कर सकता, इसलिए
तीसरे दर्जेकी रेल यात्रासे होनेवाले अमूल्य अनुभवोंसे मैं वंचित हो गया हूँ । इस दर्जे में
यात्रा करनेसे देशवासियोंके विचारोंको जाननेका जितना बढ़िया मौका मिलता है
वैसा और किसी भी तरह नहीं मिल सकता । इस दर्जेमें यात्रा करके जो सेवा की
जा सकती है वह दूसरी किसी भी तरह नहीं की जा सकती । इसलिए मैं सभी कार्य-
कर्त्ताओंसे अनुरोध करता हूँ कि वे दूसरे दर्जेमें बहुत आवश्यक होनेपर ही यात्रा
करें। तीसरे दर्जेकी यात्रामें जो तकलीफ होती है उसे मुझसे ज्यादा शायद ही कोई
जानता होगा। ये तकलीफें कुछ तो रेलवेकी बेरहमीकी सीमातक पहुँची हुई बद-
इन्तजामी के कारण हैं और कुछ लोगोंकी बुरी आदतोंके कारण । हम दूसरेकी सुविधा-
असुविधाका कतई खयाल नहीं करते। तीसरे दर्जेमें यात्रा करनेवाले चौकस कार्यकर्त्ता
यात्रियोंकी और इन्तजाम दोनोंसे सम्बन्धित लापरवाहियोंको अच्छी तरह दूर करा सकते
हैं। इसमें तो शककी कोई गुंजाइश ही नहीं कि दूसरे दर्जेकी यात्रा आम लोगोंके बसके
बाहरकी बात है और आम लोगोंको जो सुविधा नहीं है उसका उपयोग राष्ट्रके सेवक
भी नहीं कर सकते ।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, ११-५-१९२१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
671155
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|८७}}</noinclude>रहे हैं। मैंने यह पूछनेकी जरूरत नहीं समझी कि स्पेशल रेलगाड़ीका इन्तजाम क्यों करना पड़ा। पत्र-लेखकने सलाह दी है कि मुझे स्पेशल रेलगाड़ीका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था और सिन्धके लिए एक दिन और देकर पैसेकी बचत करनी चाहिए थी। अगर मेरे इस दोस्तने मामलेकी तहतक पहुँचनेकी कोशिश की होती तो उन्हें मालूम हो जाता कि स्पेशल गाड़ी किये बगैर मुझे मीरपुर खास ले जाना नामुमकिन था, दूसरे कार्यक्रमोंमें व्यवधान डाले बिना मैं सिन्धमें एक दिन और नहीं रुक सकता था, मेरा मीरपुर खास जाना जरूरी था और मुझे वहाँ ले जानेमें जो खर्च पड़ा वह तुलनात्मक दृष्टिसे बहुत ही कम था। सार्वजनिक कार्यकर्त्ताओंकी आलोचना जन-जागृतिका शुभ संकेत है। इसके कारण कार्यकर्त्ता जागरूक और सावधान रहते हैं। कमखर्चीकी माँग करना चन्दा देनेवालों का हक है। आम जलसोंमें बेशक बहुत ज्यादा फिजूलखर्ची की जाती है, तड़क-भड़क और कोरे दिखावेमें भी बहुत पैसा फूँका जाता है। अकसर बगैर सोचे-समझे ही खर्च किया जाता है। इसलिए सार्वजनिक कार्यकर्त्ताओंके आचरण या सार्वजनिक कार्योंके लिए किये जानेवाले खर्चकी यदि निडरता-पूर्वक आलोचना की जाती है तो उससे हमारा फायदा ही है। लेकिन इस तरहकी आलोचना पूरी जानकारी हासिल करके और विचारपूर्ण ढंगसे ही की जानी चाहिए। बेकारकी नुक्ताचीनीकी आदत छोड़ देनी चाहिए।
रेलकी यात्राके सवालपर यह तो मुझे कहना ही पड़ेगा कि नेताओंमें तीसरे दर्जेकी यात्रासे कतरानेकी आदत अब भी दिखाई देती है। मुझे अफसोस है कि तन्दुरुस्ती अच्छी न होनेके कारण अब मैं तीसरे दर्जेमें यात्रा नहीं कर सकता, इसलिए तीसरे दर्जेकी रेल-यात्रासे होनेवाले अमूल्य अनुभवोंसे मैं वंचित हो गया हूँ। इस दर्जेमें यात्रा करनेसे देशवासियोंके विचारोंको जाननेका जितना बढ़िया मौका मिलता है वैसा और किसी भी तरह नहीं मिल सकता। इस दर्जेमें यात्रा करके जो सेवा की जा सकती है वह दूसरी किसी भी तरह नहीं की जा सकती। इसलिए मैं सभी कार्य-कर्त्ताओंसे अनुरोध करता हूँ कि वे दूसरे दर्जेमें बहुत आवश्यक होनेपर ही यात्रा करें। तीसरे दर्जेकी यात्रामें जो तकलीफ होती है उसे मुझसे ज्यादा शायद ही कोई जानता होगा। ये तकलीफें कुछ तो रेलवेकी बेरहमीकी सीमातक पहुँची हुई बदइन्तजामीके कारण हैं और कुछ लोगोंकी बुरी आदतोंके कारण। हम दूसरेकी सुविधा-असुविधाका कतई खयाल नहीं करते। तीसरे दर्जेमें यात्रा करनेवाले चौकस कार्यकर्त्ता यात्रियोंकी और इन्तजाम दोनोंसे सम्बन्धित लापरवाहियोंको अच्छी तरह दूर करा सकते हैं। इसमें तो शककी कोई गुंजाइश ही नहीं कि दूसरे दर्जेकी यात्रा आम लोगोंके बसके बाहरकी बात है और आम लोगोंको जो सुविधा नहीं है उसका उपयोग राष्ट्रके सेवक भी नहीं कर सकते ।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', ११-५-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/११८
250
159346
671160
508505
2026-08-17T05:09:45Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
671160
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{x-larger|'''४२. हिन्दू-मुस्लिम एकता'''}}}}
एकतामें बल है, यह कोरा किताबी जुमला नहीं बल्कि जिन्दगीका जीता-जागता नियम है; और हिन्दू-मुस्लिम एकताकी समस्या इसकी सबसे अच्छी मिसाल है। आपसी फूटसे तो हमारी बर्बादी ही है। जबतक हम हिन्दू और मुसलमान आपसमें एक-दूसरेका गला काटनेके लिए तैयार रहेंगे, तीसरी ताकत बड़ी आसानीसे भारतको गुलाम बनाये रखेगी। हिन्दू-मुस्लिम एकताका मतलब हिन्दुओं और मुसलमानोंकी आपसी एकतासे ही नहीं, इसका मतलब है हिन्दको अपना वतन समझनेवाले सभी लोगोंका आपसी मेल, फिर वे किसी भी धर्मको माननेवाले क्यों न हों।
मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि हममें अभीतक उस हदतक एकता नहीं हो पाई है जो शक्ति बन जाये। अभी तो यह एकता नन्हा-सा एक पौधा है, जो रोज बढ़ रहा है और जिसे खास तौरपर पूरी देखभालकी जरूरत है। नेलौरमें जब यह समस्या मेरे सामने स्पष्ट रूपमें आई तो यह बात बिलकुल साफ हो गई।<ref>देखिए खण्ड १९, पृष्ठ ५४५-५० ।</ref> वहाँ दोनों कौमोंके आपसी सम्बन्ध बहुत अच्छे नहीं थे। दो ही साल पहले, मेरे खयालसे एक जरा-सी बातपर दोनों आपसमें झगड़ पड़े। हमेशा वही बात लड़ाईकी जड़ बनती थी। मस्जिदके आगे बाजा बजाते हुए निकलनेके सवालको लेकर दंगा हुआ था। मेरी रायमें हर छोटीसी बातको गहरा मजहबी रंग देना वाजिब नहीं। इससे हमारी शोभा नहीं बढ़ती, बल्कि घटती है। इसलिए हिन्दुओंको मस्जिदके आगेसे बाजा बजाते हुए निकलनेकी बातपर अड़ना नहीं चाहिए। हम मन्दिरके आगे या दूसरे धर्म-स्थानोंके आगे भी बाजा बजाते हैं, ऐसे उदाहरण भी तर्कके रूपमें नहीं देने चाहिए। मस्जिदके आगेसे बाजा बजाते हुए निकलना हमारे लिए ऐसी कोई खास महत्त्वकी बात तो है नहीं। मस्जिदके आसपास चौबीस घंटे शान्ति बनाये रखनेकी मुसलमानोंकी भावनाका आदर किया जाना चाहिए। हिन्दूके लिए जो चीज अहमियत नहीं रखती वही मुसलमानके लिए अहम हो सकती है। और जो चीज अहमियत नहीं रखती, उसे माँगनेपर मुसलमानोंको दे देनेमें हिन्दुओंको एतराज नहीं होना चाहिए। जरा-जरा सी बातोंके लिए झगड़ना बेवकूफी है, यहाँ तक कि गुनाह है। जो एकता हम चाहते हैं वह तभी टिकेगी जब हम अपनी-अपनी जिदोंको तरह देना और आपसमें एक-दूसरेके साथ उदारताका बरताव करना सीखेंगे। हिन्दूके लिए गाय प्राणोंसे भी प्यारी है, इसलिए मुसलमानको इस मामलेमें अपने हिन्दू भाईको राजी-खुशी निबाह लेना चाहिए। नमाजके वक्त शान्ति मुसलमानको प्यारी है। हर हिन्दूको अपने मुसलमान भाईकी इस भावनाका हमेशा खयाल रखना चाहिए। भलमनसीका तो यही तकाजा है। मगर हिन्दुओंमें और मुसलमानोंमें भी ऐसे बुरे लोग हैं जो बिना बात झगड़नेपर आमादा रहते हैं। इसके लिए हमें हिन्दू-मुसलमानोंकी ऐसी मिली-जुली पंचायतें बना देनी चाहिए जिनकी ईमानदारीपर शककी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/११९
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||अकाल-सहायताके लिए कताई|८९}}</noinclude>कोई गुंजाइश न हो, और उन पंचायतोंके फैसलोंपर अमल करना दोनोंके लिए लाजिमी बना देना चाहिए। साथ ही हमें ऐसी पंचायतोंके फैसलोंके पक्षमें जनमत भी तैयार करना चाहिए ताकि उनको कोई चुनौती न दे सके।
मैं जानता हूँ कि पारस्परिक विश्वासकी अब भी कमी है, बहुत ज्यादा कमी है। बहुतसे हिन्दू मुसलमानोंकी ईमानदारीपर सन्देह करते हैं। स्वराज्यका मतलब वे मुसलमान राज समझते हैं और उन्हें अन्देशा है कि अंग्रेजोंके यहाँ न रहनेपर भारतके मुसलमान बाहरके मुस्लिम राज्योंकी मददसे यहाँ मुस्लिम सल्तनत कायम कर लेंगे। उधर मुसलमानोंको यह डर है कि तादादमें बहुत ज्यादा होनेके कारण हिन्दू उनका सफाया कर देंगे। इस तरहकी धारणाएँ दोनों ही कौमोंकी निर्बलता और कायरताकी सूचक है। शराफतका न सही, दोनोंके अमन-चैनके साथ रहनेकी अभिलाषाका तकाजा तो कमसे-कम है ही कि पारस्परिक विश्वास और सहिष्णुताकी नीतिको अपनाया जाये। दोनों धर्मोंमें से किसी भी धर्ममें ऐसी कोई बात नहीं जो दोनोंको मिलने न दे। जबरन धर्म-परिवर्तनके दिन अब लद चुके हैं। एक गायकी बात छोड़ दें तो हिन्दू मुसलमानोंसे किस बिनापर लड़ेंगे? और मुसलमान गायकी कुर्बानी करें ही, ऐसा तो उनके मजहबमें कहीं लिखा नहीं है। हकीकत यह है कि आजसे पहले पास आने, आपसी मतभेदोंको मिटाने और एक ही धरतीके बेटोंकी तरह आपसमें दोस्त बनकर रहनेकी हमने कभी कोशिश ही नहीं की थी। अब पहली बार हमें अपनी जिन्दगीमें यह मौका मिला है। खिलाफतका मसला अगले सौ बरसोंतक फिर कभी उठनेका नहीं। अगर हिन्दू मुसलमानोंके साथ पायदार दोस्तीका रिश्ता कायम करना चाहते हैं तो उन्हें इस्लामकी इज्जत रखनेके लिए अपने मुसलमान भाइयोंके साथ जानकी बाजी लगा देनी चाहिए।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', ११-५-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''४३. अकाल-सहायताके लिए कताई'''}}}}
अहमदाबादके पास मीरीमें अकाल पीड़ितोंके बीच कताईके सम्बन्धमें एक प्रयोग किया जा रहा है। उसके बारेमें श्रीमती जाईजी पेटिटने निम्नलिखित टिप्पणियाँ<ref>देखिए परिशिष्ट २ ।</ref> भेजी हैं। मैं उन्हें सहर्ष प्रकाशित कर रहा हूँ। प्रयोग एक अंग्रेज महिलाकी देख-रेखमें किया जा रहा है; वहाँ काम कितने सुव्यवस्थित ढंगसे किया जा रहा है, इसपर पाठकोंकी दृष्टि अवश्य जायेगी। व्यवस्था सभी तरहकी कठिनाइयोंको ध्यानमें रखकर की गई है। इस छोटेसे प्रयोगसे भी जाहिर होता है कि अकालमें राहत पहुँचानेके लिए चरखा कितना सशक्त उपकरण है। यदि कताईको ठीक तरहसे सुसंगठित किया जाये तो उससे आश्चर्यजनक परिणाम निकल सकते हैं।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', ११-५-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/१२०
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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{{C|{{larger|'''४४. करघेका अधिक प्रयोग'''}}}}
{{Left|सम्पादक<br>'यंग इंडिया'<br>महोदय,}}
जिन्हें देशकी भलाईका कुछ भी ध्यान है ऐसे सभी भारतीय एक स्वरसे यही कहते हैं कि भारतको अपने कपड़ेकी आवश्यकता खुद पूरी करनी चाहिए, अर्थात् भारतको न तो विदेशी कपड़ा खरीदना चाहिए और न विदेशी सूत। अब प्रश्न यह उठता है कि इस काममें शीघ्रसे-शीघ्र सफलता किस तरह प्राप्त की जा सकती है। कहा गया है कि यह काम चरखेसे सफल हो सकता है। पर हम लोगोंकी धारणा है कि इसके अतिरिक्त और भी तरीके हैं जिनके द्वारा यह काम और भी आसानी, शीघ्रता तथा ज्यादा अच्छी तरहसे सम्पन्न हो सकता है। लोग पूछ सकते हैं कि वे कौनसे तरीके हैं। हम लोग यहाँपर उन्हें ये तरीके बता देना उचित समझते हैं। (१) भारतमें करघोंकी संख्या बढ़ाना, (२) लोगोंमें इस बातका प्रचार करना कि भारतके बने सूतके मोटे और गाढ़े कपड़ोंपर ही सन्तोष करना चाहिए और भारतमें महीन विदेशी सूतसे बने कपड़ेका त्याग कर देना चाहिए। इसका थोड़ा स्पष्टीकरण कर देना जरूरी है। थोड़ी देरके लिए मान लीजिए कि देश सिर्फ मोटा कपड़ा पहननेके लिए तैयार है। ऐसी दशामें ध्यानमें रखनेकी सबसे बड़ी बात यह है कि यदि आज भारतमें चरखके प्रयोगके बिना कुल जितना सूत और धागा तैयार किया जाता है, यदि उस सबसे वस्त्र तैयार कर दिये जायें तो भारत वस्त्रोंकी अपनी लगभग सारी आवश्यकता पूरी कर सकता है। सचाई तो यह है कि इस देशसे प्रतिवर्ष १४,३०,००,००० पौंड सूत और धागा विदेश जाता है। बस इस सूतके कपड़े बुननेका प्रबन्ध कर दिया जाये तथा देशको मोटा कपड़ा पहननेका थोड़ा बहुत त्याग करनेके लिए तैयार कर लिया जाये तो कपड़ेकी समस्या थोड़े ही असेंमें हल हो सकती है। प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारे यहाँ जितने शक्ति चालित करघे और हथकरघे हैं वे इतने ज्यादा सूतका कपड़ा बुन सकेंगे? इसका उत्तर सिवा 'नहीं' के और कुछ नहीं हो सकता। ऐसी दशामें क्या करना चाहिए? स्पष्टतः यही उत्तर मिलेगा कि करघोंकी संख्या बढ़ाइये। इसमें भी हाथसे चलनेवाले करघे ही बढ़ाये जा सकते हैं, क्योंकि शक्तिसे चलनेवाले करघे इतनी आसानीसे एकदम नहीं बढ़ाये जा सकते। इसके लिए विदेशोंसे (बुनाईकी) मशीनें मँगानेकी आवश्यकता पड़ेगी। इसमें दो-तीन वर्ष<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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{{Left|सम्पादक<br>'यंग इंडिया'<br>महोदय,}}
:{{gap}}जिन्हें देशकी भलाईका कुछ भी ध्यान है ऐसे सभी भारतीय एक स्वरसे यही कहते हैं कि भारतको अपने कपड़ेकी आवश्यकता खुद पूरी करनी चाहिए, अर्थात् भारतको न तो विदेशी कपड़ा खरीदना चाहिए और न विदेशी सूत। अब प्रश्न यह उठता है कि इस काममें शीघ्रसे-शीघ्र सफलता किस तरह प्राप्त की जा सकती है। कहा गया है कि यह काम चरखेसे सफल हो सकता है। पर हम लोगोंकी धारणा है कि इसके अतिरिक्त और भी तरीके हैं जिनके द्वारा यह काम और भी आसानी, शीघ्रता तथा ज्यादा अच्छी तरहसे सम्पन्न हो सकता है। लोग पूछ सकते हैं कि वे कौनसे तरीके हैं। हम लोग यहाँपर उन्हें ये तरीके बता देना उचित समझते हैं। (१) भारतमें करघोंकी संख्या बढ़ाना, (२) लोगोंमें इस बातका प्रचार करना कि भारतके बने सूतके मोटे और गाढ़े कपड़ोंपर ही सन्तोष करना चाहिए और भारतमें महीन विदेशी सूतसे बने कपड़ेका त्याग कर देना चाहिए। इसका थोड़ा स्पष्टीकरण कर देना जरूरी है। थोड़ी देरके लिए मान लीजिए कि देश सिर्फ मोटा कपड़ा पहननेके लिए तैयार है। ऐसी दशामें ध्यानमें रखनेकी सबसे बड़ी बात यह है कि यदि आज भारतमें चरखके प्रयोगके बिना कुल जितना सूत और धागा तैयार किया जाता है, यदि उस सबसे वस्त्र तैयार कर दिये जायें तो भारत वस्त्रोंकी अपनी लगभग सारी आवश्यकता पूरी कर सकता है। सचाई तो यह है कि इस देशसे प्रतिवर्ष १४,३०,००,००० पौंड सूत और धागा विदेश जाता है। बस इस सूतके कपड़े बुननेका प्रबन्ध कर दिया जाये तथा देशको मोटा कपड़ा पहननेका थोड़ा बहुत त्याग करनेके लिए तैयार कर लिया जाये तो कपड़ेकी समस्या थोड़े ही असेंमें हल हो सकती है। प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारे यहाँ जितने शक्ति चालित करघे और हथकरघे हैं वे इतने ज्यादा सूतका कपड़ा बुन सकेंगे? इसका उत्तर सिवा 'नहीं' के और कुछ नहीं हो सकता। ऐसी दशामें क्या करना चाहिए? स्पष्टतः यही उत्तर मिलेगा कि करघोंकी संख्या बढ़ाइये। इसमें भी हाथसे चलनेवाले करघे ही बढ़ाये जा सकते हैं, क्योंकि शक्तिसे चलनेवाले करघे इतनी आसानीसे एकदम नहीं बढ़ाये जा सकते। इसके लिए विदेशोंसे (बुनाईकी) मशीनें मँगानेकी आवश्यकता पड़ेगी। इसमें दो-तीन वर्ष<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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:{{gap}}जिन्हें देशकी भलाईका कुछ भी ध्यान है ऐसे सभी भारतीय एक स्वरसे यही कहते हैं कि भारतको अपने कपड़ेकी आवश्यकता खुद पूरी करनी चाहिए, अर्थात् भारतको न तो विदेशी कपड़ा खरीदना चाहिए और न विदेशी सूत। अब प्रश्न यह उठता है कि इस काममें शीघ्रसे-शीघ्र सफलता किस तरह प्राप्त की जा सकती है। कहा गया है कि यह काम चरखेसे सफल हो सकता है। पर हम लोगोंकी धारणा है कि इसके अतिरिक्त और भी तरीके हैं जिनके द्वारा यह काम और भी आसानी, शीघ्रता तथा ज्यादा अच्छी तरहसे सम्पन्न हो सकता है। लोग पूछ सकते हैं कि वे कौनसे तरीके हैं। हम लोग यहाँपर उन्हें ये तरीके बता देना उचित समझते हैं। (१) भारतमें करघोंकी संख्या बढ़ाना, (२) लोगोंमें इस बातका प्रचार करना कि भारतके बने सूतके मोटे और गाढ़े कपड़ोंपर ही सन्तोष करना चाहिए और भारतमें महीन विदेशी सूतसे बने कपड़ेका त्याग कर देना चाहिए। इसका थोड़ा स्पष्टीकरण कर देना जरूरी है। थोड़ी देरके लिए मान लीजिए कि देश सिर्फ मोटा कपड़ा पहननेके लिए तैयार है। ऐसी दशामें ध्यानमें रखनेकी सबसे बड़ी बात यह है कि यदि आज भारतमें चरखके प्रयोगके बिना कुल जितना सूत और धागा तैयार किया जाता है, यदि उस सबसे वस्त्र तैयार कर दिये जायें तो भारत वस्त्रोंकी अपनी लगभग सारी आवश्यकता पूरी कर सकता है। सचाई तो यह है कि इस देशसे प्रतिवर्ष १४,३०,००,००० पौंड सूत और धागा विदेश जाता है। बस इस सूतके कपड़े बुननेका प्रबन्ध कर दिया जाये तथा देशको मोटा कपड़ा पहननेका थोड़ा बहुत त्याग करनेके लिए तैयार कर लिया जाये तो कपड़ेकी समस्या थोड़े ही असेंमें हल हो सकती है। प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारे यहाँ जितने शक्ति चालित करघे और हथकरघे हैं वे इतने ज्यादा सूतका कपड़ा बुन सकेंगे? इसका उत्तर सिवा 'नहीं' के और कुछ नहीं हो सकता। ऐसी दशामें क्या करना चाहिए? स्पष्टतः यही उत्तर मिलेगा कि करघोंकी संख्या बढ़ाइये। इसमें भी हाथसे चलनेवाले करघे ही बढ़ाये जा सकते हैं, क्योंकि शक्तिसे चलनेवाले करघे इतनी आसानीसे एकदम नहीं बढ़ाये जा सकते। इसके लिए विदेशोंसे (बुनाईकी) मशीनें मँगानेकी आवश्यकता पड़ेगी। इसमें दो-तीन वर्ष<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/१२१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>करघेका अधिक प्रयोग
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तो लग ही जायेंगे । और सो भी तब जब हम प्रतिकूल विनिमय दर और इस
प्रकारकी मशीनोंपर हालमें लगाये गये ऊँचे आयात करसे उत्पन्न कठिनाइयोंको
बिलकुल न देखें। हथकरघोंको बैठाना कठिन काम नहीं है । यहीं भारतमें स्थान-
स्थानपर ये बड़ी आसानीसे तैयार किये जा सकते हैं और इनमें खर्च भी
अधिक नहीं पड़ेगा। सांख्यकीय विभागके महा निदेशकन जो आँकड़े १९१९ में
प्रकाशित किये थे उनके आधारपर हिसाब लगाने से स्पष्ट हो जाता है कि वर्त
मान करघोंकी संख्या दूनी कर देनेसे ही हमारा काम चल सकता है। में यहाँ
उन आँकड़ोंको पेश करके आपके पाठकोंको उलझनमें नहीं डालना चाहता ।
मेरी सानुरोध प्रार्थना है कि इस पत्रके पाठक इस मामलेपर गौरसे विचार
करें और इसके महत्त्वको महसूस करते हुए अपनी सारी शक्ति इसे कार्यरूपमें
परिणत करनेकी दिशा में लगानेका प्रयत्न करें।
कलकत्ता,
१९ अप्रैल
आपका विश्वस्त,
एस० बी० मित्र
इस पत्रके लेखकने इस बातपर ध्यान नहीं दिया कि हाथकी कताईके साथ-
साथ हाथकी बुनाईका भी प्रचार होगा । यदि हाथका कता सूत करघोंपर नहीं बुना
जायेगा तो कपड़े की समस्या हल नहीं हो सकेगी। पर केवल हथकरघोंके प्रचारसे
यह प्रश्न हल नहीं हो सकता । हाथसे कपड़ा बुननेकी कला अभीतक खत्म नहीं
हुई है। इस समय हथकरघौंकी संख्या शक्ति-चालित करघोंकी संख्यासे अधिक है।
पर वे अधिकतर विदेशी सूतकी ही बुनाई करते हैं। मैं इस बातका हार्दिक समर्थन
करता हूँ कि हमें मोटे कपड़ेसे ही सन्तोष करना चाहिए और जुलाहोंको देशी सूतका
प्रयोग करनेके लिए ही प्रेरित किया जाना चाहिए । साथ-ही-साथ इस पत्रके लेखकको
" नेताओंसे " भी कहना चाहिए कि वे मिल मालिकोंसे इस बात के लिए अनुरोध करें
कि वे मिलके तैयार सूतको विदेशों में भेजनेकी बिलकुल चेष्टा न करें। पर यही कठिन
है, क्योंकि जो लाभ उन्हें सूत भेजनेसे होता है उसको छोड़ देना उनके लिए कठिन
है । विदेशी वस्त्रोंके पूर्ण बहिष्कारको सफल बनाना केवल मिल-मालिकों और पूंजी-
पतियोंके हाथमें है । यदि ये दोनों अपना कर्त्तव्य समझ लें और देशकी आवश्यकताकी
बात इनके दिमागमें बैठ जाये तो वे इसको अवश्य ही सफल बना सकते हैं । फिर भी
हाथकी कताईकी जरूरत तो बनी ही रहती है। विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार कर देनेसे ही
काम नहीं बन जायेगा। करोड़ों किसानोंके लिए कोई सहायक पेशा जुटाना भी नितान्त
आवश्यक है । पहलेकी भाँति इस समय भी उन्हें अपने अवकाशके समय कृषिके अतिरिक्त
किसी सहायक पेशेकी नितान्त आवश्यकता है । उन करोड़ों लोगों के लिए जो बिना
काम-धन्धेके भूखों मर रहे हैं, घर बैठे किसी ऐसे धन्धेकी आवश्यकता है, जिससे
उनका निर्वाह हो सके। ऐसा धन्धा हाथकी कताई ही है । इस पत्रके लेखकने जो बात
कही है वह काम तो चल ही रहा है। करघोंकी संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है;
जनताकी रुचि भी मोटे कपड़ेकी ओर बढ़ती जा रही है । पर दिन-दिन बढ़ती वर्तमान
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||करघेका अधिक प्रयोग|९१}}</noinclude>:'''तो लग ही जायेंगे। और सो भी तब जब हम प्रतिकूल विनिमय दर और इस प्रकारकी मशीनोंपर हालमें लगाये गये ऊँचे आयात करसे उत्पन्न कठिनाइयोंको बिलकुल न देखें। हथकरघोंको बैठाना कठिन काम नहीं है। यहीं भारतमें स्थान-स्थानपर ये बड़ी आसानीसे तैयार किये जा सकते हैं और इनमें खर्च भी अधिक नहीं पड़ेगा। सांख्यकीय विभागके महा निदेशकन जो आँकड़े १९१९ में प्रकाशित किये थे उनके आधारपर हिसाब लगानेसे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान करघोंकी संख्या दूनी कर देनेसे ही हमारा काम चल सकता है। मैं यहाँ उन आँकड़ोंको पेश करके आपके पाठकोंको उलझनमें नहीं डालना चाहता। मेरी सानुरोध प्रार्थना है कि इस पत्रके पाठक इस मामलेपर गौरसे विचार करें और इसके महत्त्वको महसूस करते हुए अपनी सारी शक्ति इसे कार्यरूपमें परिणत करनेकी दिशामें लगानेका प्रयत्न करें।'''
{{Left|'''कलकत्ता''',<br>'''१९ अप्रैल'''|1em}}
{{Right|'''आपका विश्वस्त,'''<br>एस॰ बी॰ मित्र}}
इस पत्रके लेखकने इस बातपर ध्यान नहीं दिया कि हाथकी कताईके साथ-साथ हाथकी बुनाईका भी प्रचार होगा। यदि हाथका कता सूत करघोंपर नहीं बुना जायेगा तो कपड़े की समस्या हल नहीं हो सकेगी। पर केवल हथकरघोंके प्रचारसे यह प्रश्न हल नहीं हो सकता। हाथसे कपड़ा बुननेकी कला अभीतक खत्म नहीं हुई है। इस समय हथकरघौंकी संख्या शक्ति-चालित करघोंकी संख्यासे अधिक है। पर वे अधिकतर विदेशी सूतकी ही बुनाई करते हैं। मैं इस बातका हार्दिक समर्थन करता हूँ कि हमें मोटे कपड़ेसे ही सन्तोष करना चाहिए और जुलाहोंको देशी सूतका प्रयोग करनेके लिए ही प्रेरित किया जाना चाहिए। साथ-ही-साथ इस पत्रके लेखकको "नेताओंसे" भी कहना चाहिए कि वे मिल-मालिकोंसे इस बातके लिए अनुरोध करें कि वे मिलके तैयार सूतको विदेशोंमें भेजनेकी बिलकुल चेष्टा न करें। पर यही कठिन है, क्योंकि जो लाभ उन्हें सूत भेजनेसे होता है उसको छोड़ देना उनके लिए कठिन है। विदेशी वस्त्रोंके पूर्ण बहिष्कारको सफल बनाना केवल मिल-मालिकों और पूँजी-पतियोंके हाथमें है। यदि ये दोनों अपना कर्त्तव्य समझ लें और देशकी आवश्यकताकी बात इनके दिमागमें बैठ जाये तो वे इसको अवश्य ही सफल बना सकते हैं। फिर भी हाथकी कताईकी जरूरत तो बनी ही रहती है। विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार कर देनेसे ही काम नहीं बन जायेगा। करोड़ों किसानोंके लिए कोई सहायक पेशा जुटाना भी नितान्त आवश्यक है। पहलेकी भाँति इस समय भी उन्हें अपने अवकाशके समय कृषिके अतिरिक्त किसी सहायक पेशेकी नितान्त आवश्यकता है। उन करोड़ों लोगोंके लिए जो बिना काम-धन्धेके भूखों मर रहे हैं, घर बैठे किसी ऐसे धन्धेकी आवश्यकता है, जिससे उनका निर्वाह हो सके। ऐसा धन्धा हाथकी कताई ही है। इस पत्रके लेखकने जो बात कही है वह काम तो चल ही रहा है। करघोंकी संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है; जनताकी रुचि भी मोटे कपड़ेकी ओर बढ़ती जा रही है। पर दिन-दिन बढ़ती वर्तमान<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||करघेका अधिक प्रयोग|९१}}</noinclude>:'''तो लग ही जायेंगे। और सो भी तब जब हम प्रतिकूल विनिमय दर और इस प्रकारकी मशीनोंपर हालमें लगाये गये ऊँचे आयात करसे उत्पन्न कठिनाइयोंको बिलकुल न देखें। हथकरघोंको बैठाना कठिन काम नहीं है। यहीं भारतमें स्थान-स्थानपर ये बड़ी आसानीसे तैयार किये जा सकते हैं और इनमें खर्च भी अधिक नहीं पड़ेगा। सांख्यकीय विभागके महा निदेशकन जो आँकड़े १९१९ में प्रकाशित किये थे उनके आधारपर हिसाब लगानेसे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान करघोंकी संख्या दूनी कर देनेसे ही हमारा काम चल सकता है। मैं यहाँ उन आँकड़ोंको पेश करके आपके पाठकोंको उलझनमें नहीं डालना चाहता। मेरी सानुरोध प्रार्थना है कि इस पत्रके पाठक इस मामलेपर गौरसे विचार करें और इसके महत्त्वको महसूस करते हुए अपनी सारी शक्ति इसे कार्यरूपमें परिणत करनेकी दिशामें लगानेका प्रयत्न करें।'''
{{Left|'''कलकत्ता''',<br>'''१९ अप्रैल'''|1em}}
{{Right|'''आपका विश्वस्त,'''<br>'''एस॰ बी॰ मित्र'''}}
इस पत्रके लेखकने इस बातपर ध्यान नहीं दिया कि हाथकी कताईके साथ-साथ हाथकी बुनाईका भी प्रचार होगा। यदि हाथका कता सूत करघोंपर नहीं बुना जायेगा तो कपड़े की समस्या हल नहीं हो सकेगी। पर केवल हथकरघोंके प्रचारसे यह प्रश्न हल नहीं हो सकता। हाथसे कपड़ा बुननेकी कला अभीतक खत्म नहीं हुई है। इस समय हथकरघौंकी संख्या शक्ति-चालित करघोंकी संख्यासे अधिक है। पर वे अधिकतर विदेशी सूतकी ही बुनाई करते हैं। मैं इस बातका हार्दिक समर्थन करता हूँ कि हमें मोटे कपड़ेसे ही सन्तोष करना चाहिए और जुलाहोंको देशी सूतका प्रयोग करनेके लिए ही प्रेरित किया जाना चाहिए। साथ-ही-साथ इस पत्रके लेखकको "नेताओंसे" भी कहना चाहिए कि वे मिल-मालिकोंसे इस बातके लिए अनुरोध करें कि वे मिलके तैयार सूतको विदेशोंमें भेजनेकी बिलकुल चेष्टा न करें। पर यही कठिन है, क्योंकि जो लाभ उन्हें सूत भेजनेसे होता है उसको छोड़ देना उनके लिए कठिन है। विदेशी वस्त्रोंके पूर्ण बहिष्कारको सफल बनाना केवल मिल-मालिकों और पूँजी-पतियोंके हाथमें है। यदि ये दोनों अपना कर्त्तव्य समझ लें और देशकी आवश्यकताकी बात इनके दिमागमें बैठ जाये तो वे इसको अवश्य ही सफल बना सकते हैं। फिर भी हाथकी कताईकी जरूरत तो बनी ही रहती है। विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार कर देनेसे ही काम नहीं बन जायेगा। करोड़ों किसानोंके लिए कोई सहायक पेशा जुटाना भी नितान्त आवश्यक है। पहलेकी भाँति इस समय भी उन्हें अपने अवकाशके समय कृषिके अतिरिक्त किसी सहायक पेशेकी नितान्त आवश्यकता है। उन करोड़ों लोगोंके लिए जो बिना काम-धन्धेके भूखों मर रहे हैं, घर बैठे किसी ऐसे धन्धेकी आवश्यकता है, जिससे उनका निर्वाह हो सके। ऐसा धन्धा हाथकी कताई ही है। इस पत्रके लेखकने जो बात कही है वह काम तो चल ही रहा है। करघोंकी संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है; जनताकी रुचि भी मोटे कपड़ेकी ओर बढ़ती जा रही है। पर दिन-दिन बढ़ती वर्तमान<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/१२२
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>९२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
-
दरिद्रताकी समस्याका हल केवल एक है- • स्थान-स्थानपर हाथकी कताई । मैं अपन
इस विश्वासको और भी जोरदार भाषामें इस प्रकार रखना चाहता हूँ कि भारतवर्ष
बिना चरखेके आत्मनिर्भर, निर्भीक तथा स्वावलम्बी नहीं हो सकता। मसूलीपट्टमके
श्री कृष्णरावने इसीलिए हाथकताई के कर्त्तव्य (धर्म) को सहज ही धार्मिक कृत्यके रूपमें
स्वीकार किया है । जनताने भी अपनी स्पष्ट सूझबूझ के सहारे इसी रूपमें इसे स्वीकार
किया है। डा० मित्र के विचारोंसे सहमति रखनेवाले सभी लोगोंसे मैं यही अनुरोध
करता हूँ कि वे जनताका ध्यान इस मूल तथ्यसे भटकने न दें । हाथकताईमें वे सभी
बातें आ जाती हैं जिनका पत्र लेखकने सुझाव दिया है, बल्कि उसमें कुछ और भी
विशेषताएँ हैं । समुद्रमें नदीके लाये हुए तत्त्व तो मौजूद रहते ही हैं ।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, ११-५-१९२१
४५. अली भाइयोंकी क्षमा-याचनाका मसविदा'
[ १४ मई, १९२१ अथवा उसके बाद ]
मित्रोंने हमारे कुछ भाषणोंकी ओर हमारा ध्यान दिलाया है जिनके सम्बन्धमें
उनकी राय है कि उनमें हिंसाको भड़कानेकी प्रवृत्ति नजर आती है। हम यह कह देना
चाहते हैं कि हमारा इरादा कभी हिंसा भड़कानेका नहीं रहा। हमने कभी सोचा भी
नहीं था कि हमारे भाषणोंके उन अंशोंसे जो अर्थ निकाला गया है उनका वैसा अर्थ
भी हो सकता है।' इसलिए हम हृदयसे अफसोस जाहिर करते हैं और इन भाषणोंके
कुछ अंशोंकी अनावश्यक उग्रताके लिए खेद व्यक्त करते हैं । हम सार्वजनिक रूपसे यह
भी आश्वासन देते हैं और उन सबसे, जो ऐसा वायदा चाहते हैं, वायदा करते हैं कि
जबतक असहयोग आन्दोलनसे हमारा सम्बन्ध है तबतक हम फिलहाल या भविष्य में
प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपसे न तो हिंसाकी वकालत करेंगे और न हिंसाके लिए
तैयार रहनेका वातावरण ही बनायेंगे । सचमुच हम इसे उस अहिंसात्मक असहयोगकी
भावनाके प्रतिकूल मानते हैं जिसके लिए हम वचनबद्ध हैं ।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, ३०-५-१९२१
१. गांधीजी जब १४ मईको शिमलामें वाइसरायसे मिले थे उस अवसरपर वाइसरायने अली बन्धुओंके
कुछ भाषणोंका उल्लेख करके उन्हें हिंसाको उभारनेवाला बताया था। चूँकि उनका वैसा अर्थ निकल सकता
था और चूँकि अली भाई असहयोगी होनेके नाते हिंसाका प्रचार करने की बात सोच भी नहीं सकते थे
इसलिए गांधीजीने उन्हें एक वक्तव्य निकालकर तदर्थं क्षमा माँगने की सलाह दी थी । वक्तव्य २९ मई,
१९२१ को प्रकाशित हुआ था । देखिए परिशिष्ट ३ ।
२. अली भाइयोंके वक्तव्यमें यह वाक्य भी जोड़ दिया गया था : " परन्तु हम मानते हैं कि हमारे
मित्रोंके तर्क और विवेचनमें वजन है । "
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दरिद्रताकी समस्याका हल केवल एक है—स्थान-स्थानपर हाथकी कताई। मैं अपन इस विश्वासको और भी जोरदार भाषामें इस प्रकार रखना चाहता हूँ कि भारतवर्ष बिना चरखेके आत्मनिर्भर, निर्भीक तथा स्वावलम्बी नहीं हो सकता। मसूलीपट्टमके श्री कृष्णरावने इसीलिए हाथकताईके कर्त्तव्य (धर्म) को सहज ही धार्मिक कृत्यके रूपमें स्वीकार किया है। जनताने भी अपनी स्पष्ट सूझबूझके सहारे इसी रूपमें इसे स्वीकार किया है। डा॰ मित्रके विचारोंसे सहमति रखनेवाले सभी लोगोंसे मैं यही अनुरोध करता हूँ कि वे जनताका ध्यान इस मूल तथ्यसे भटकने न दें। हाथकताईमें वे सभी बातें आ जाती हैं जिनका पत्र-लेखकने सुझाव दिया है, बल्कि उसमें कुछ और भी विशेषताएँ हैं। समुद्रमें नदीके लाये हुए तत्त्व तो मौजूद रहते ही हैं।
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मित्रोंने हमारे कुछ भाषणोंकी ओर हमारा ध्यान दिलाया है जिनके सम्बन्धमें उनकी राय है कि उनमें हिंसाको भड़कानेकी प्रवृत्ति नजर आती है। हम यह कह देना चाहते हैं कि हमारा इरादा कभी हिंसा भड़कानेका नहीं रहा। हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हमारे भाषणोंके उन अंशोंसे जो अर्थ निकाला गया है उनका वैसा अर्थ भी हो सकता है।<ref>अली भाइयोंके वक्तव्यमें यह वाक्य भी जोड़ दिया गया था : "परन्तु हम मानते हैं कि हमारे मित्रोंके तर्क और विवेचनमें वजन है।"</ref> इसलिए हम हृदयसे अफसोस जाहिर करते हैं और इन भाषणोंके कुछ अंशोंकी अनावश्यक उग्रताके लिए खेद व्यक्त करते हैं। हम सार्वजनिक रूपसे यह भी आश्वासन देते हैं और उन सबसे, जो ऐसा वायदा चाहते हैं, वायदा करते हैं कि जबतक असहयोग आन्दोलनसे हमारा सम्बन्ध है तबतक हम फिलहाल या भविष्यमें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपसे न तो हिंसाकी वकालत करेंगे और न हिंसाके लिए तैयार रहनेका वातावरण ही बनायेंगे। सचमुच हम इसे उस अहिंसात्मक असहयोगकी भावनाके प्रतिकूल मानते हैं जिसके लिए हम वचनबद्ध हैं।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>४६. पेचीदा मामला
एक भाई " स्वदेशी " उपनामसे तथा सरल भावसे कुछ प्रश्न पूछते हैं। उन्होंने
मेरी जानकारीके लिए अपना नाम भी दिया है। वे सुशिक्षित व्यक्ति हैं । उनके प्रश्न
समझने योग्य हैं । वे पूछते हैं :
प्र० : कांग्रेस में सर्वसम्मति से असहयोगका जो प्रस्ताव पास हुआ है उसमें अपना
योगदान देनेवाला प्रत्येक प्रतिनिधि क्या उस प्रस्तावके प्रत्येक मुद्देपर धीरे-धीरे नहीं
बल्कि तुरन्त ही अमल करनेके लिए नहीं बँधा हुआ है ?
उ० : निश्चय ही बँधा हुआ है।
प्र० : यदि वह ऐसा करनेके लिए बँधा हुआ है और ऐसा नहीं करता तो
क्या उक्त प्रतिनिधि असहयोगको एक खेल नहीं समझता ? ऐसे लोग क्या अपने-आपको
और दूसरोंको धोखा नहीं देते ?
उ० : अवश्य धोखा देते हैं, इतना ही नहीं बल्कि वे असहयोग के संघर्षको धक्का
पहुँचाते हैं । वे अपनी सिपहारीकी शर्तका पालन नहीं करते । जहाँ सिर्फ पाँच फुट
ऊँचे आदमी ही की भरती की जाती हो वहाँ चार फुटका आदमी काम नहीं आता,
उसी तरह असह्योगकी सेनामें रहकर जो उसकी शर्तोंका पालन नहीं करते वे असह-
योग कानूनका अविनय भंग करते हैं और गुनहगार बनते हैं ।
प्र० : यदि अधिकांश असहयोगी ऐसे ही हुए तो क्या इससे आपको निराशा
नहीं होगी ? इससे क्या आपका विचित्र आशावाद ढह नहीं जायेगा ?
उ० : अभी तो जनताकी कसौटी हो रही है । लेकिन यदि अधिकांश असह-
योगी तीस जूनके बाद भी वैसे ही बने रहे तो निस्सन्देह मुझे बहुत दुःख होगा । तथापि
इससे मेरा आशावाद ढह नहीं जायेगा। जबतक मैं स्वयं अपने बारेमें आशावान हूँ
तबतक मेरा आशावाद टूट नहीं सकता और सबको अपने समान समझनेवाला मैं
यही मानता हूँ कि जो मुझे सहज लगता और जो करने योग्य है उसे सब लोग अवश्य
करेंगे। धोखा देनेवाले अपने-आप निकल जायेंगे ।
प्र० : क्या ऐसे प्रतिनिधियोंका प्रगट रूपसे तिरस्कार करनेकी जरूरत नहीं है ?
उ० : यदि मैं जनरल डायरका तिरस्कार नहीं करता तो फिर मैं दुर्बल प्रति-
निधियोंका तिरस्कार कैसे कर सकता हूँ ? यह लड़ाई आत्मशुद्धिकी है और इसमें
किसी के तिरस्कारकी कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन ऐसे व्यक्तियोंका निस्सन्देह बहिष्कार
किया जाना चाहिए अर्थात् उन्हें प्रतिनिधि न चुना जाये, वे स्वयंसेवक और
पदाधिकारी भी न बन सकें। मैं मानता हूँ कि हमारा वातावरण दिन-प्रतिदिन साफ
होता जाता है। अब ऐसी समितियाँ बहुत कम रह गई हैं जहाँ वकालत न छोड़ने-
वाले वकील अभीतक ओहदोंपर हैं । सरकारी स्कूलोंमें पढ़नेवाले विद्यार्थी कदाचित् ही
स्वयंसेवक बनते हैं। सभी अपनी-अपनी मर्यादाको समझ गये जान पड़ते हैं ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''४६. पेचीदा मामला'''}}}}
एक भाई "स्वदेशी" उपनामसे तथा सरल भावसे कुछ प्रश्न पूछते हैं। उन्होंने मेरी जानकारीके लिए अपना नाम भी दिया है। वे सुशिक्षित व्यक्ति हैं। उनके प्रश्न समझने योग्य हैं। वे पूछते हैं :
प्र॰ : कांग्रेसमें सर्वसम्मतिसे असहयोगका जो प्रस्ताव पास हुआ है उसमें अपना योगदान देनेवाला प्रत्येक प्रतिनिधि क्या उस प्रस्तावके प्रत्येक मुद्देपर धीरे-धीरे नहीं बल्कि तुरन्त ही अमल करनेके लिए नहीं बँधा हुआ है?
उ॰ : निश्चय ही बँधा हुआ है।
प्र॰ : यदि वह ऐसा करनेके लिए बँधा हुआ है और ऐसा नहीं करता तो क्या उक्त प्रतिनिधि असहयोगको एक खेल नहीं समझता? ऐसे लोग क्या अपने-आपको और दूसरोंको धोखा नहीं देते?
उ॰ : अवश्य धोखा देते हैं, इतना ही नहीं बल्कि वे असहयोगके संघर्षको धक्का पहुँचाते हैं। वे अपनी सिपहारीकी शर्तका पालन नहीं करते। जहाँ सिर्फ पाँच फुट ऊँचे आदमी ही की भरती की जाती हो वहाँ चार फुटका आदमी काम नहीं आता, उसी तरह असह्योगकी सेनामें रहकर जो उसकी शर्तोंका पालन नहीं करते वे असहयोगके कानूनका अविनय भंग करते हैं और गुनहगार बनते हैं।
प्र॰ : यदि अधिकांश असहयोगी ऐसे ही हुए तो क्या इससे आपको निराशा नहीं होगी? इससे क्या आपका विचित्र आशावाद ढह नहीं जायेगा?
उ॰ : अभी तो जनताकी कसौटी हो रही है। लेकिन यदि अधिकांश असहयोगी तीस जूनके बाद भी वैसे ही बने रहे तो निस्सन्देह मुझे बहुत दुःख होगा। तथापि इससे मेरा आशावाद ढह नहीं जायेगा। जबतक मैं स्वयं अपने बारेमें आशावान हूँ तबतक मेरा आशावाद टूट नहीं सकता और सबको अपने समान समझनेवाला मैं यही मानता हूँ कि जो मुझे सहज लगता और जो करने योग्य है उसे सब लोग अवश्य करेंगे। धोखा देनेवाले अपने-आप निकल जायेंगे।
प्र॰ : क्या ऐसे प्रतिनिधियोंका प्रगट रूपसे तिरस्कार करनेकी जरूरत नहीं है?
उ॰ : यदि मैं जनरल डायरका तिरस्कार नहीं करता तो फिर मैं दुर्बल प्रतिनिधियोंका तिरस्कार कैसे कर सकता हूँ? यह लड़ाई आत्मशुद्धिकी है और इसमें किसीके तिरस्कारकी कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन ऐसे व्यक्तियोंका निस्सन्देह बहिष्कार किया जाना चाहिए अर्थात् उन्हें प्रतिनिधि न चुना जाये, वे स्वयंसेवक और पदाधिकारी भी न बन सकें। मैं मानता हूँ कि हमारा वातावरण दिन-प्रतिदिन साफ होता जाता है। अब ऐसी समितियाँ बहुत कम रह गई हैं जहाँ वकालत न छोड़ने-वाले वकील अभीतक ओहदोंपर हैं। सरकारी स्कूलोंमें पढ़नेवाले विद्यार्थी कदाचित् ही स्वयंसेवक बनते हैं। सभी अपनी-अपनी मर्यादाको समझ गये जान पड़ते हैं।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>९४
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
प्र० : जो न्याय प्रतिनिधियोंपर लागू होता है क्या वही आपके अनुयायियों
अथवा आपके सिद्धान्तोंके प्रशंसकोंपर लागू नहीं होता ?
उ० : मेरा तो कोई अनुयायी नहीं है; अथवा वही व्यक्ति मेरा अनुयायी है।
जो मेरे सिद्धान्तोंको पसन्द करता और उनके अनुसार चलता है। इसलिए अनुयायी
सिद्धान्तोंका अनुकरण नहीं करेगा, यह कहना ही अर्थहीन है। मेरे 'अनुयायी' को
प्रमाणपत्रकी जरूरत ही नहीं होती । सब उसे पहचान लेते हैं । जो सत्य नहीं बोलता,
सत्य आचरण नहीं करता, जो मन, वचन और कर्मसे दयाका पालन करनेके लिए
प्रयत्न नहीं करता, जो खादी नहीं पहनता और विदेशी कपड़ेका सर्वथा त्याग नहीं
करता, जो भंगीको अपने सगे भाईके समान नहीं मानता, जो परस्त्रीको अपनी माँ-बहन
नहीं मानता, जो धर्मकी खातिर, देशकी खातिर, सत्यकी खातिर मरनेके लिए तैयार
नहीं होता, जो अपनी तुच्छताको समझकर नम्रभावसे व्यवहार नहीं करता वह मेरा
'अनुयायी' नहीं है। सिद्धान्तोंके प्रशंसकपर भी मैं तो यही कानून लागू करूँगा । कथनी
और करनीमें भेद रखने और उसे सहन करनेकी हमें इतनी आदत पड़ गई है कि
यह एक रोग बन गया है। जो जैसा बोलते हैं वैसा करनेको तैयार नहीं होते,
अगर वे बोलना ही बन्द कर दें तो मैं जानता हूँ कि संसार बहुतसे वितण्डावादसे,
व्याख्यानोंसे और फसादोंसे बच जाये ।
"
प्र० : जो ऐसे ' परोपदेशे पांडित्यम्' में कुशल प्रतिनिधियों और प्रशंसकोंके समर्थन-
से स्वराज्य मिल जाये तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे ? अगर स्वीकार करेंगे तो
ऐसा स्वराज्य कबतक टिक सकेगा ?
उ० : स्वराज्यको स्वीकार करना मेरे अधिकारकी बात नहीं है। उसे तो जनता
स्वीकार करेगी । जनताके प्रतिनिधिके रूपमें मैं जानता हूँ कि ऐसे मिथ्याचारसे स्वराज्य
नहीं मिलता। और अगर मिल जाये तो टिकेगा अथवा नहीं, यह सवाल ही
नहीं उठता ।
हम सहज ही देख सकते हैं कि इस भाईने बहुत दुःखी होकर ये सारे प्रश्न
पूछे हैं। ऐसे ही प्रश्न अनेक सरल स्त्री-पुरुषोंके दिलोंमें उठा करते हैं। प्रत्येक असह-
योगीको अपने व्यवहारसे इन प्रश्नोंका समाधान करना चाहिए। स्वराज्य मिलने में
जो देर लग रही है उसका कारण हम लोग ही हैं ।
इस भाईने अपने पत्रकी प्रस्तावना में कुछ और भी शंकाएँ उठाई हैं। वे
विचार करने योग्य हैं इसलिए उन्हें मैं प्रश्नोत्तरके रूपमें प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
प्र० : आपके कुछ एक सिद्धान्तोंमें क्या मनुष्य-स्वभावके विरुद्ध विचित्र त्याग
करनेकी बात नहीं होती ?
उ० : असहयोग के एक भी सिद्धान्तमें ऐसे कठिन त्यागकी बात नहीं आती ।
असहयोग के अन्तर्गत त्याग सहल है और लोकस्वभावके विरुद्ध भी नहीं है, इसीसे
जनताने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया है, ऐसी मेरी मान्यता है । मुख्य सिद्धान्त तो
हिन्दू-मुस्लिम एकता, अशान्तिकी स्थितिमें भी शान्ति बनाये रखना, विदेशी वस्त्रका
सर्वथा त्याग, नित्य एक निश्चित समयतक चरखा चलाना, यथाशक्ति दान देना,
भंगीको भाई मानना, दारू तथा व्यभिचारका त्याग करना आदि हैं। इनमें में कहीं
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|९४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
प्र॰ : जो न्याय प्रतिनिधियोंपर लागू होता है क्या वही आपके अनुयायियों अथवा आपके सिद्धान्तोंके प्रशंसकोंपर लागू नहीं होता?
उ॰ : मेरा तो कोई अनुयायी नहीं है; अथवा वही व्यक्ति मेरा अनुयायी है जो मेरे सिद्धान्तोंको पसन्द करता और उनके अनुसार चलता है। इसलिए अनुयायी सिद्धान्तोंका अनुकरण नहीं करेगा, यह कहना ही अर्थहीन है। मेरे 'अनुयायी' को प्रमाणपत्रकी जरूरत ही नहीं होती। सब उसे पहचान लेते हैं। जो सत्य नहीं बोलता, सत्य आचरण नहीं करता, जो मन, वचन और कर्मसे दयाका पालन करनेके लिए प्रयत्न नहीं करता, जो खादी नहीं पहनता और विदेशी कपड़ेका सर्वथा त्याग नहीं करता, जो भंगीको अपने सगे भाईके समान नहीं मानता, जो परस्त्रीको अपनी माँ-बहन नहीं मानता, जो धर्मकी खातिर, देशकी खातिर, सत्यकी खातिर मरनेके लिए तैयार नहीं होता, जो अपनी तुच्छताको समझकर नम्रभावसे व्यवहार नहीं करता वह मेरा 'अनुयायी' नहीं है। सिद्धान्तोंके प्रशंसकपर भी मैं तो यही कानून लागू करूँगा। कथनी और करनीमें भेद रखने और उसे सहन करनेकी हमें इतनी आदत पड़ गई है कि यह एक रोग बन गया है। जो जैसा बोलते हैं वैसा करनेको तैयार नहीं होते, अगर वे बोलना ही बन्द कर दें तो मैं जानता हूँ कि संसार बहुतसे वितण्डावादसे, व्याख्यानोंसे और फसादोंसे बच जाये।
प्र॰ : जो ऐसे 'परोपदेशे पांडित्यम्' में कुशल प्रतिनिधियों और प्रशंसकोंके समर्थनसे स्वराज्य मिल जाये तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे? अगर स्वीकार करेंगे तो ऐसा स्वराज्य कबतक टिक सकेगा?
उ॰ : स्वराज्यको स्वीकार करना मेरे अधिकारकी बात नहीं है। उसे तो जनता स्वीकार करेगी। जनताके प्रतिनिधिके रूपमें मैं जानता हूँ कि ऐसे मिथ्याचारसे स्वराज्य नहीं मिलता। और अगर मिल जाये तो टिकेगा अथवा नहीं, यह सवाल ही नहीं उठता।
हम सहज ही देख सकते हैं कि इस भाईने बहुत दुःखी होकर ये सारे प्रश्न पूछे हैं। ऐसे ही प्रश्न अनेक सरल स्त्री-पुरुषोंके दिलोंमें उठा करते हैं। प्रत्येक असहयोगीको अपने व्यवहारसे इन प्रश्नोंका समाधान करना चाहिए। स्वराज्य मिलनेमें जो देर लग रही है उसका कारण हम लोग ही हैं।
इस भाईने अपने पत्रकी प्रस्तावनामें कुछ और भी शंकाएँ उठाई हैं। वे विचार करने योग्य हैं इसलिए उन्हें मैं प्रश्नोत्तरके रूपमें प्रस्तुत कर रहा हूँ।
प्र॰ : आपके कुछ-एक सिद्धान्तोंमें क्या मनुष्य-स्वभावके विरुद्ध विचित्र त्याग करनेकी बात नहीं होती?
उ॰ : असहयोगके एक भी सिद्धान्तमें ऐसे कठिन त्यागकी बात नहीं आती। असहयोगके अन्तर्गत त्याग सहल है और लोकस्वभावके विरुद्ध भी नहीं है, इसीसे जनताने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया है, ऐसी मेरी मान्यता है। मुख्य सिद्धान्त तो हिन्दू-मुस्लिम एकता, अशान्तिकी स्थितिमें भी शान्ति बनाये रखना, विदेशी वस्त्रका सर्वथा त्याग, नित्य एक निश्चित समयतक चरखा चलाना, यथाशक्ति दान देना, भंगीको भाई मानना, दारू तथा व्यभिचारका त्याग करना आदि हैं। इनमें मैं कहीं<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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उ॰ : मेरा तो कोई अनुयायी नहीं है; अथवा वही व्यक्ति मेरा अनुयायी है जो मेरे सिद्धान्तोंको पसन्द करता और उनके अनुसार चलता है। इसलिए अनुयायी सिद्धान्तोंका अनुकरण नहीं करेगा, यह कहना ही अर्थहीन है। मेरे 'अनुयायी' को प्रमाणपत्रकी जरूरत ही नहीं होती। सब उसे पहचान लेते हैं। जो सत्य नहीं बोलता, सत्य आचरण नहीं करता, जो मन, वचन और कर्मसे दयाका पालन करनेके लिए प्रयत्न नहीं करता, जो खादी नहीं पहनता और विदेशी कपड़ेका सर्वथा त्याग नहीं करता, जो भंगीको अपने सगे भाईके समान नहीं मानता, जो परस्त्रीको अपनी माँ-बहन नहीं मानता, जो धर्मकी खातिर, देशकी खातिर, सत्यकी खातिर मरनेके लिए तैयार नहीं होता, जो अपनी तुच्छताको समझकर नम्रभावसे व्यवहार नहीं करता वह मेरा 'अनुयायी' नहीं है। सिद्धान्तोंके प्रशंसकपर भी मैं तो यही कानून लागू करूँगा। कथनी और करनीमें भेद रखने और उसे सहन करनेकी हमें इतनी आदत पड़ गई है कि यह एक रोग बन गया है। जो जैसा बोलते हैं वैसा करनेको तैयार नहीं होते, अगर वे बोलना ही बन्द कर दें तो मैं जानता हूँ कि संसार बहुतसे वितण्डावादसे, व्याख्यानोंसे और फसादोंसे बच जाये।
प्र॰ : जो ऐसे 'परोपदेशे पांडित्यम्' में कुशल प्रतिनिधियों और प्रशंसकोंके समर्थनसे स्वराज्य मिल जाये तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे? अगर स्वीकार करेंगे तो ऐसा स्वराज्य कबतक टिक सकेगा?
उ॰ : स्वराज्यको स्वीकार करना मेरे अधिकारकी बात नहीं है। उसे तो जनता स्वीकार करेगी। जनताके प्रतिनिधिके रूपमें मैं जानता हूँ कि ऐसे मिथ्याचारसे स्वराज्य नहीं मिलता। और अगर मिल जाये तो टिकेगा अथवा नहीं, यह सवाल ही नहीं उठता।
हम सहज ही देख सकते हैं कि इस भाईने बहुत दुःखी होकर ये सारे प्रश्न पूछे हैं। ऐसे ही प्रश्न अनेक सरल स्त्री-पुरुषोंके दिलोंमें उठा करते हैं। प्रत्येक असहयोगीको अपने व्यवहारसे इन प्रश्नोंका समाधान करना चाहिए। स्वराज्य मिलनेमें जो देर लग रही है उसका कारण हम लोग ही हैं।
इस भाईने अपने पत्रकी प्रस्तावनामें कुछ और भी शंकाएँ उठाई हैं। वे विचार करने योग्य हैं इसलिए उन्हें मैं प्रश्नोत्तरके रूपमें प्रस्तुत कर रहा हूँ।
प्र॰ : आपके कुछ-एक सिद्धान्तोंमें क्या मनुष्य-स्वभावके विरुद्ध विचित्र त्याग करनेकी बात नहीं होती?
उ॰ : असहयोगके एक भी सिद्धान्तमें ऐसे कठिन त्यागकी बात नहीं आती। असहयोगके अन्तर्गत त्याग सहल है और लोकस्वभावके विरुद्ध भी नहीं है, इसीसे जनताने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया है, ऐसी मेरी मान्यता है। मुख्य सिद्धान्त तो हिन्दू-मुस्लिम एकता, अशान्तिकी स्थितिमें भी शान्ति बनाये रखना, विदेशी वस्त्रका सर्वथा त्याग, नित्य एक निश्चित समयतक चरखा चलाना, यथाशक्ति दान देना, भंगीको भाई मानना, दारू तथा व्यभिचारका त्याग करना आदि हैं। इनमें मैं कहीं<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/१२५
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>पेचीदा मामला
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भी संन्यास नहीं देखता । मैंने ऐसी कोई चीज नहीं माँगी है जो अन्य राष्ट्रोंकी
जनताने न की हो । शान्ति कदाचित् नई वस्तु जान पड़ेगी। लेकिन सिखोंने उसकी
मर्यादित साधना करके दिखा दी है। अधिक गहराईमें जानेपर दिखाई देगा कि
अंग्रेजोंने जब भी चाहा शान्तिका पालन किया है। मैंने तो यहाँतक कहा है कि
अगर हम शान्तिका नीतिके रूपमें
-- एक खास अवसरपर इस्तेमाल किया जानेवाला
हथियार समझकर -- पालन करेंगे तो भी हम विजय प्राप्त करेंगे। मेरी कल्पनामें शान्ति
सबलका -- • सच्चे क्षत्रियका - हथियार है। लेकिन हम उसे दुर्बलका हथियार मानें
तो भी शस्त्र बलको इस समय असम्भव मानकर हिन्दुस्तान यदि मरनेका ही मन्त्र
साधे और मारना छोड़ दे तो आज ही स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता है ।
-
प्र० : आप शासकके विरुद्ध असहयोग करवाते हैं तो फिर आप भंगियोंको विधान
परिषदोंमें जानेवाले सहकारियोंकी सेवा करनेसे और उनसे असहयोग करनके लिए
कहनेवाले लोगोंको क्यों रोकते हैं ?
उ० : हम शासकके विरुद्ध असहयोग नहीं करते, हमारा असहयोग शासकोंकी
नीतिके विरुद्ध है । हमारा असहयोग व्यक्तिगत नहीं है। हमने भंगी अथवा कुम्हारको
किसी भी अधिकारीकी सेवा करनेसे नहीं रोका है । वैसा करना मैं अभीष्ट भी नहीं
मानता । तो फिर हमारे ही जो भाई मतभेदके कारण विधान परिषदों आदिमें जाते हैं
भंगियों आदिको उनका काम करनेसे हम कैसे रोक सकते हैं? हम तो सभीको प्रेमके
द्वारा जीतनेकी उम्मीद रखते हैं । अगर प्रेमसे न हो तो हम किसीको जोर-जबरदस्तीसे
अपनी ओर नहीं लाना चाहते बल्कि हम उसकी बुद्धिको जाग्रत करके, उसे समझा-
बुझाकर अपने मतका प्रचार करना चाहते हैं । असहयोगका मूल तिरस्कार नहीं बल्कि
प्रेम है; असहयोगका मूल दुर्बलता नहीं अपितु अतुल बल है; असहयोगका मूल असत्य
नहीं बल्कि सत्य है; उसका मूल अन्ध-श्रद्धा न होकर ज्ञानमय श्रद्धा, विवेक और
बुद्धि आदि है, उसका मूल अधर्म नहीं बल्कि धर्म है, आत्मविश्वास है ।
-
प्र० : आप सिर्फ महात्मा हैं या महात्मा होने के साथ-साथ राजनीतिज्ञ भी हैं ?
उ० : मेरे विचारसे जो महात्मा है उसे राजनीतिज्ञ भी अवश्य होना चाहिए ।
राजनीतिज्ञ वह है जो राज्य • जनता -- की रक्षा व सेवा कर सके । कोई आत्मा
उसी हदतक 'महान्' है जिस हदतक वह जन-समाजकी दास बन चुकी है ।
[ गुजरातीसे ]
नवजीवन, १५-५-१९२१
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||पेचीदा मामला|९५}}</noinclude>भी संन्यास नहीं देखता। मैंने ऐसी कोई चीज नहीं माँगी है जो अन्य राष्ट्रोंकी जनताने न की हो। शान्ति कदाचित् नई वस्तु जान पड़ेगी। लेकिन सिखोंने उसकी मर्यादित साधना करके दिखा दी है। अधिक गहराईमें जानेपर दिखाई देगा कि अंग्रेजोंने जब भी चाहा शान्तिका पालन किया है। मैंने तो यहाँतक कहा है कि अगर हम शान्तिका नीतिके रूपमें—एक खास अवसरपर इस्तेमाल किया जानेवाला हथियार समझकर—पालन करेंगे तो भी हम विजय प्राप्त करेंगे। मेरी कल्पनामें शान्ति सबलका—सच्चे क्षत्रियका—हथियार है। लेकिन हम उसे दुर्बलका हथियार मानें तो भी शस्त्र-बलको इस समय असम्भव मानकर हिन्दुस्तान यदि मरनेका ही मन्त्र साधे और मारना छोड़ दे तो आज ही स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता है।
प्र॰ : आप शासकके विरुद्ध असहयोग करवाते हैं तो फिर आप भंगियोंको विधान परिषदोंमें जानेवाले सहकारियोंकी सेवा करनेसे और उनसे असहयोग करनके लिए कहनेवाले लोगोंको क्यों रोकते हैं?
उ॰ : हम शासकके विरुद्ध असहयोग नहीं करते, हमारा असहयोग शासकोंकी नीतिके विरुद्ध है। हमारा असहयोग व्यक्तिगत नहीं है। हमने भंगी अथवा कुम्हारको किसी भी अधिकारीकी सेवा करनेसे नहीं रोका है। वैसा करना मैं अभीष्ट भी नहीं मानता। तो फिर हमारे ही जो भाई मतभेदके कारण विधान परिषदों आदिमें जाते हैं भंगियों आदिको उनका काम करनेसे हम कैसे रोक सकते हैं? हम तो सभीको प्रेमके द्वारा जीतनेकी उम्मीद रखते हैं। अगर प्रेमसे न हो तो हम किसीको जोर-जबरदस्तीसे अपनी ओर नहीं लाना चाहते बल्कि हम उसकी बुद्धिको जाग्रत करके, उसे समझा-बुझाकर अपने मतका प्रचार करना चाहते हैं। असहयोगका मूल तिरस्कार नहीं बल्कि प्रेम है; असहयोगका मूल दुर्बलता नहीं अपितु अतुल बल है; असहयोगका मूल असत्य नहीं बल्कि सत्य है; उसका मूल अन्ध-श्रद्धा न होकर ज्ञानमय श्रद्धा, विवेक और बुद्धि आदि है, उसका मूल अधर्म नहीं बल्कि धर्म है, आत्मविश्वास है।
प्र॰ : आप सिर्फ महात्मा हैं या महात्मा होनेके साथ-साथ राजनीतिज्ञ भी हैं?
उ॰ : मेरे विचारसे जो महात्मा है उसे राजनीतिज्ञ भी अवश्य होना चाहिए। राजनीतिज्ञ वह है जो राज्य—जनता—की रक्षा व सेवा कर सके। कोई आत्मा उसी हदतक 'महान्' है जिस हदतक वह जन-समाजकी दास बन चुकी है।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', १५-५-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||पेचीदा मामला|९५}}</noinclude>भी संन्यास नहीं देखता। मैंने ऐसी कोई चीज नहीं माँगी है जो अन्य राष्ट्रोंकी जनताने न की हो। शान्ति कदाचित् नई वस्तु जान पड़ेगी। लेकिन सिखोंने उसकी मर्यादित साधना करके दिखा दी है। अधिक गहराईमें जानेपर दिखाई देगा कि अंग्रेजोंने जब भी चाहा शान्तिका पालन किया है। मैंने तो यहाँतक कहा है कि अगर हम शान्तिका नीतिके रूपमें—एक खास अवसरपर इस्तेमाल किया जानेवाला हथियार समझकर—पालन करेंगे तो भी हम विजय प्राप्त करेंगे। मेरी कल्पनामें शान्ति सबलका—सच्चे क्षत्रियका—हथियार है। लेकिन हम उसे दुर्बलका हथियार मानें तो भी शस्त्र-बलको इस समय असम्भव मानकर हिन्दुस्तान यदि मरनेका ही मन्त्र साधे और मारना छोड़ दे तो आज ही स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता है।
प्र॰ : आप शासकके विरुद्ध असहयोग करवाते हैं तो फिर आप भंगियोंको विधान परिषदोंमें जानेवाले सहकारियोंकी सेवा करनेसे और उनसे असहयोग करनके लिए कहनेवाले लोगोंको क्यों रोकते हैं?
उ॰ : हम शासकके विरुद्ध असहयोग नहीं करते, हमारा असहयोग शासकोंकी नीतिके विरुद्ध है। हमारा असहयोग व्यक्तिगत नहीं है। हमने भंगी अथवा कुम्हारको किसी भी अधिकारीकी सेवा करनेसे नहीं रोका है। वैसा करना मैं अभीष्ट भी नहीं मानता। तो फिर हमारे ही जो भाई मतभेदके कारण विधान परिषदों आदिमें जाते हैं भंगियों आदिको उनका काम करनेसे हम कैसे रोक सकते हैं? हम तो सभीको प्रेमके द्वारा जीतनेकी उम्मीद रखते हैं। अगर प्रेमसे न हो तो हम किसीको जोर-जबरदस्तीसे अपनी ओर नहीं लाना चाहते बल्कि हम उसकी बुद्धिको जाग्रत करके, उसे समझा-बुझाकर अपने मतका प्रचार करना चाहते हैं। असहयोगका मूल तिरस्कार नहीं बल्कि प्रेम है; असहयोगका मूल दुर्बलता नहीं अपितु अतुल बल है; असहयोगका मूल असत्य नहीं बल्कि सत्य है; उसका मूल अन्ध-श्रद्धा न होकर ज्ञानमय श्रद्धा, विवेक और बुद्धि आदि है, उसका मूल अधर्म नहीं बल्कि धर्म है, आत्मविश्वास है।
प्र॰ : आप सिर्फ महात्मा हैं या महात्मा होनेके साथ-साथ राजनीतिज्ञ भी हैं?
उ॰ : मेरे विचारसे जो महात्मा है उसे राजनीतिज्ञ भी अवश्य होना चाहिए। राजनीतिज्ञ वह है जो राज्य—जनता—की रक्षा व सेवा कर सके। कोई आत्मा उसी हदतक 'महान्' है जिस हदतक वह जन-समाजकी दास बन चुकी है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/१२६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>४७. टिप्पणियाँ
देशी राज्योंमें क्या किया जा सकता है ?
एक काठियावाड़ी भाई पूछते हैं कि देशी राज्योंमें रहनेवाले भाइयोंको क्या
करना चाहिए । जबसे काठियावाड़ में परिषद् हुई है तबसे यह सवाल बहुत ज्यादा
पूछा जाता है ।
देशी राज्यों में हमें ब्रिटिश साम्राज्य के सम्बन्धमें कुछ भी नहीं कहना चाहिए और
उन्हें विषम स्थितिमें नहीं डालना चाहिए । यह बात कहनेकी देशी राज्योंमें कोई जरूरत
नहीं कि कैसी राक्षसी सरकार है। लेकिन देशी राज्योंमें भी हम शराब छोड़ने और
छुड़वानेका आन्दोलन जरूर करें, वहाँ हम चरखेका प्रचार करें और सूत कातें, विदेशी
कपड़ेका बहिष्कार हम वहाँ भी करें, खादी जरूर पहनें, व्यभिचार और जुए आदिका
त्याग करें, कांग्रेसकी बहींमें अपना नाम दर्ज करवायें, तिलक स्वराज्य-कोषमें खूब चन्दा
दें। देशी राज्योंमें रहनेवाले सब लोग यदि चाहें तो इतना योगदान दे सकते हैं; और
यदि वे इतना करें तो यह स्वराज्यके लिए बहुत माना जायेगा । असहयोगको जिन्होंने
आत्मशुद्धिका यज्ञ माना है, उनके लिए तो कोई सवाल पूछनेको ही नहीं रह जाता ।
देशी राज्योंमें रहनेवाले अगर भंगीको भाई मानें तो इसमें देशी राज्योंके प्रति कोई
द्रोह नहीं होता ।
देशी राज्य कोई हिन्दुस्तान से बाहर नहीं है । हिन्दुस्तान के सब लोगोंके सामने
एक ही प्रश्न है । धर्मयुद्ध सबके सामने उपस्थित है। सबको सत्य, निर्भयता और
शान्तिका पाठ पढ़ना है। ब्रिटिश राज्यकी हृदमें, ब्रिटिश राज्यके विरुद्ध बोलना इष्ट हो
सकता है, लेकिन देशी राज्यों में हमें ऐसा करनेकी तनिक भी आवश्यकता नहीं है ।
टीका अनावश्यक है
लेकिन ब्रिटिश राज्यकी हृदमें भी क्या अब ब्रिटिश राज्यकी टीका करनेकी
जरूरत है? मुझे तो लगता है कि टीका मात्र छोड़ देनेमें ही हमारी सभ्यता है ।
जितनी टीका करनी पड़ती है सो मैं कर लेता हूँ । 'नवजीवन' के पाठकोंको मैं विश्वास
दिलाता हूँ कि जहाँ टीका करने की जरूरत जान पड़ती है वहाँ मैं टीका करनेसे नहीं
चूकता। लेकिन इस साम्राज्यका नाश अथवा सुधार हम टीका करके नहीं कर सकते ।
यह तो हम अपने कर्तव्यका पालन करके, स्वयं अपना सुधार करके ही कर सकेंगे।
हमें चरखा कातनेसे, कांग्रेस में नाम दर्ज करानेसे और तिलक स्वराज्य कोषके लिए
चन्दा इकट्ठा करने के कामसे तनिक भी अवकाश नहीं है । जब हम मुट्ठी भर काम
करनेवाले लोग अपना प्रत्येक क्षण उपर्युक्त कार्योंमें लगायेंगे तभी हम जून मासतक
किये जानेवाले कार्यको पूरा कर सकेंगे । तो फिर हम सरकारकी टीका करनेमें क्यों
अपना समय बरबाद करें ?
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{x-larger|'''४७. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''देशी राज्योंमें क्या किया जा सकता है?'''}}
एक काठियावाड़ी भाई पूछते हैं कि देशी राज्योंमें रहनेवाले भाइयोंको क्या करना चाहिए। जबसे काठियावाड़में परिषद् हुई है तबसे यह सवाल बहुत ज्यादा पूछा जाता है।
देशी राज्योंमें हमें ब्रिटिश साम्राज्यके सम्बन्धमें कुछ भी नहीं कहना चाहिए और उन्हें विषम स्थितिमें नहीं डालना चाहिए। यह बात कहनेकी देशी राज्योंमें कोई जरूरत नहीं कि कैसी राक्षसी सरकार है। लेकिन देशी राज्योंमें भी हम शराब छोड़ने और छुड़वानेका आन्दोलन जरूर करें, वहाँ हम चरखेका प्रचार करें और सूत कातें, विदेशी कपड़ेका बहिष्कार हम वहाँ भी करें, खादी जरूर पहनें, व्यभिचार और जुए आदिका त्याग करें, कांग्रेसकी बहींमें अपना नाम दर्ज करवायें, तिलक स्वराज्य-कोषमें खूब चन्दा दें। देशी राज्योंमें रहनेवाले सब लोग यदि चाहें तो इतना योगदान दे सकते हैं; और यदि वे इतना करें तो यह स्वराज्यके लिए बहुत माना जायेगा। असहयोगको जिन्होंने आत्मशुद्धिका यज्ञ माना है, उनके लिए तो कोई सवाल पूछनेको ही नहीं रह जाता। देशी राज्योंमें रहनेवाले अगर भंगीको भाई मानें तो इसमें देशी राज्योंके प्रति कोई द्रोह नहीं होता।
देशी राज्य कोई हिन्दुस्तानसे बाहर नहीं है। हिन्दुस्तान के सब लोगोंके सामने एक ही प्रश्न है। धर्मयुद्ध सबके सामने उपस्थित है। सबको सत्य, निर्भयता और शान्तिका पाठ पढ़ना है। ब्रिटिश राज्यकी हृदमें, ब्रिटिश राज्यके विरुद्ध बोलना इष्ट हो सकता है, लेकिन देशी राज्योंमें हमें ऐसा करनेकी तनिक भी आवश्यकता नहीं है।
{{C|'''टीका अनावश्यक है'''}}
लेकिन ब्रिटिश राज्यकी हृदमें भी क्या अब ब्रिटिश राज्यकी टीका करनेकी जरूरत है? मुझे तो लगता है कि टीका-मात्र छोड़ देनेमें ही हमारी सभ्यता है। जितनी टीका करनी पड़ती है सो मैं कर लेता हूँ। 'नवजीवन' के पाठकोंको मैं विश्वास दिलाता हूँ कि जहाँ टीका करनेकी जरूरत जान पड़ती है वहाँ मैं टीका करनेसे नहीं चूकता। लेकिन इस साम्राज्यका नाश अथवा सुधार हम टीका करके नहीं कर सकते। यह तो हम अपने कर्त्तव्यका पालन करके, स्वयं अपना सुधार करके ही कर सकेंगे। हमें चरखा कातनेसे, कांग्रेसमें नाम दर्ज करानेसे और तिलक स्वराज्य-कोषके लिए चन्दा इकट्ठा करनेके कामसे तनिक भी अवकाश नहीं है। जब हम मुट्ठी-भर काम करनेवाले लोग अपना प्रत्येक क्षण उपर्युक्त कार्योंमें लगायेंगे तभी हम जून मासतक किये जानेवाले कार्यको पूरा कर सकेंगे। तो फिर हम सरकारकी टीका करनेमें क्यों अपना समय बरबाद करें?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/१२७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>टिप्पणियाँ
९७
मुझे तो स्टेशनोंपर होनेवाली भीड़ और नारोंकी आवाजें भी असह्य जान पड़ती
हैं। नारों और भीड़से स्वराज्य मिलनेवाला नहीं है। इनका समय अब लद गया
है । जबतक लोगों में जागृति नहीं थी तबतक भले ही उसकी जरूरत महसूस होती
रही हो। अब तो लोगों में जितनी जागृति आनी चाहिए उतनी जागृति आ गई है ।
नायगराका जलप्रपात ही हमारे हाथ लग गया है। उसका उपयोग भी हम जान
गये हैं । इसलिए हमारा कार्य तो चुपचाप उसका उपयोग करना है ।
जैसे सरकारकी टीकाकी जरूरत नहीं है वैसे ही सरकारसे सहयोग करनेवालों की
भी टीका करने की जरूरत नहीं । हमारी सारी टीका हमारे कार्यों में समाहित है ।
यह जगत्का निजी अनुभव है कि आधी छटाँक-भर आचरणका जितना फल होता है
उतना मन-भर भाषणों अथवा लेखोंका नहीं होता । भाषण अनेक बार हमारे आचरणकी
खामियोंका दर्पण होता है। बहुत अधिक बोलनेवाला कदाचित् ही अपने कहेका पालन
करता है। वचनका पालन करनेवाला कंजूसकी भाँति तोले-तोलकर अपने मुखसे शब्द
निकालता है । और आज जब हम सरकार के सामने माँग पेश न करके स्वयं अपने से
करने लगे हैं तब हमें जो भी टीका करनी हो, जो भी शिकायत हो वह अपने
सम्बन्धमें ही होनी चाहिए ।
अशान्त असहयोगी
--
भावनगरकी जैन कन्या पाठशाला के सम्बन्धमें वहाँके एक सज्जन अपना नाम देते
हुए कुछ दुःखजनक बातें लिखते हैं । मेरे पास वह पत्र कुछ अर्सेसे पड़ा हुआ है
लेकिन निरन्तर यात्रापर रहनेके कारण में सब पत्रोंका जितनी जल्दी चाहता हूँ उतनी
जल्दी उत्तर नहीं दे पाता । यद्यपि इन सज्जनने अनुमति दी है तथापि मैं उनका नाम
प्रकाशित नहीं कर रहा हूँ क्योंकि मैं उन्हें भावनगर में अनुचित टीकाका पात्र नहीं
बनाना चाहता। मैं जानता हूँ कि हममें अभी परस्पर एक-दूसरेकी टीका --:
- चाहे वह
शुद्ध हृदयसे ही क्यों न की गई हो - सहन करनेकी शक्ति नहीं आई है । स्वराज्य-
वादी व्यक्तिमें तो विषैली टीका भी सहन करनेकी शक्ति आनी चाहिए। ये भाई
लिखते हैं कि छठी अप्रैलके पवित्र दिवसपर भी असहयोगियोंकी टोली वहाँकी कन्या-
पाठशालाको बन्द करवानेके लिए पहुँच गई। यदि एक भी व्यक्ति विनयपूर्वक समझानेके
लिए गया होता तो कुछ भी कहनेको न रहता लेकिन पत्र - लेखकके कथनानुसार तो
पूरी टोली वहाँ पहुँच गई। टोलीके मुखियाने बलपूर्वक उसे बन्द करनेके लिए कहा ।
प्रधान अध्यापकने कुछ दलीलें पेश कीं, जिनके उत्तरमें पत्थरोंकी वर्षा हुई। एक
कन्याका सिर फूट गया, दूसरीको थोड़ी चोट आई। इतनेमें सौभाग्यसे शान्तिके अर्थको
समझनेवाला एक असहयोगी आ गया । उसने पत्थरोंकी वर्षा तथा अत्याचारको रोका।
इस भाईको मैं बधाई देता हूँ। दूसरोंके सम्बन्धमें तो मैं क्या लिखूं ? यदि उपर्युक्त
हकीकत सही है तो उन्होंने छठी तारीखको बदनाम किया, अपनी प्रतिज्ञा भंग की
और अपना होश- हवास खो बैठे। बलात् पुण्य करवानेकी अनीतिसे छुटकारा चाहनेवाले
हम लोग दूसरोंपर जोर-जबरदस्ती कैसे कर सकते हैं ?
उपर्युक्त समाचार देनेवाले भाई लिखते हैं कि पाठशालाके व्यवस्थापकोंने इस
उपद्रवके बावजूद पुलिसकी सहायता नहीं माँगी । इस खामोशीके लिए मैं व्यवस्थापकोंको
२०-७
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|९७}}</noinclude>मुझे तो स्टेशनोंपर होनेवाली भीड़ और नारोंकी आवाजें भी असह्य जान पड़ती हैं। नारों और भीड़से स्वराज्य मिलनेवाला नहीं है। इनका समय अब लद गया है। जबतक लोगोंमें जागृति नहीं थी तबतक भले ही उसकी जरूरत महसूस होती रही हो। अब तो लोगोंमें जितनी जागृति आनी चाहिए उतनी जागृति आ गई है। नायगराका जलप्रपात ही हमारे हाथ लग गया है। उसका उपयोग भी हम जान गये हैं। इसलिए हमारा कार्य तो चुपचाप उसका उपयोग करना है।
जैसे सरकारकी टीकाकी जरूरत नहीं है वैसे ही सरकारसे सहयोग करनेवालों की भी टीका करनेकी जरूरत नहीं। हमारी सारी टीका हमारे कार्योंमें समाहित है। यह जगत्का निजी अनुभव है कि आधी छटाँक-भर आचरणका जितना फल होता है उतना मन-भर भाषणों अथवा लेखोंका नहीं होता। भाषण अनेक बार हमारे आचरणकी खामियोंका दर्पण होता है। बहुत अधिक बोलनेवाला कदाचित् ही अपने कहेका पालन करता है। वचनका पालन करनेवाला कंजूसकी भाँति तोले-तोलकर अपने मुखसे शब्द निकालता है। और आज जब हम सरकारके सामने माँग पेश न करके स्वयं अपनेसे करने लगे हैं तब हमें जो भी टीका करनी हो, जो भी शिकायत हो वह अपने सम्बन्धमें ही होनी चाहिए।
{{C|'''अशान्त असहयोगी'''}}
भावनगरकी जैन कन्या-पाठशालाके सम्बन्धमें वहाँके एक सज्जन अपना नाम देते हुए कुछ दुःखजनक बातें लिखते हैं। मेरे पास वह पत्र कुछ अर्सेसे पड़ा हुआ है लेकिन निरन्तर यात्रापर रहनेके कारण मैं सब पत्रोंका जितनी जल्दी चाहता हूँ उतनी जल्दी उत्तर नहीं दे पाता। यद्यपि इन सज्जनने अनुमति दी है तथापि मैं उनका नाम प्रकाशित नहीं कर रहा हूँ क्योंकि मैं उन्हें भावनगरमें अनुचित टीकाका पात्र नहीं बनाना चाहता। मैं जानता हूँ कि हममें अभी परस्पर एक-दूसरेकी टीका—चाहे वह शुद्ध हृदयसे ही क्यों न की गई हो—सहन करनेकी शक्ति नहीं आई है। स्वराज्यवादी व्यक्तिमें तो विषैली टीका भी सहन करनेकी शक्ति आनी चाहिए। ये भाई लिखते हैं कि छठी अप्रैलके पवित्र दिवसपर भी असहयोगियोंकी टोली वहाँकी कन्या-पाठशालाको बन्द करवानेके लिए पहुँच गई। यदि एक भी व्यक्ति विनयपूर्वक समझानेके लिए गया होता तो कुछ भी कहनेको न रहता लेकिन पत्र-लेखकके कथनानुसार तो पूरी टोली वहाँ पहुँच गई। टोलीके मुखियाने बलपूर्वक उसे बन्द करनेके लिए कहा। प्रधान अध्यापकने कुछ दलीलें पेश कीं, जिनके उत्तरमें पत्थरोंकी वर्षा हुई। एक कन्याका सिर फूट गया, दूसरीको थोड़ी चोट आई। इतनेमें सौभाग्यसे शान्तिके अर्थको समझनेवाला एक असहयोगी आ गया। उसने पत्थरोंकी वर्षा तथा अत्याचारको रोका। इस भाईको मैं बधाई देता हूँ। दूसरोंके सम्बन्धमें तो मैं क्या लिखूँ? यदि उपर्युक्त हकीकत सही है तो उन्होंने छठी तारीखको बदनाम किया, अपनी प्रतिज्ञा भंग की और अपना होश-हवास खो बैठे। बलात् पुण्य करवानेकी अनीतिसे छुटकारा चाहनेवाले हम लोग दूसरोंपर जोर-जबरदस्ती कैसे कर सकते हैं?
उपर्युक्त समाचार देनेवाले भाई लिखते हैं कि पाठशालाके व्यवस्थापकोंने इस उपद्रवके बावजूद पुलिसकी सहायता नहीं माँगी। इस खामोशीके लिए मैं व्यवस्थापकोंको<noinclude>{{Left|२०—७|1em}}</noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|९७}}</noinclude>मुझे तो स्टेशनोंपर होनेवाली भीड़ और नारोंकी आवाजें भी असह्य जान पड़ती हैं। नारों और भीड़से स्वराज्य मिलनेवाला नहीं है। इनका समय अब लद गया है। जबतक लोगोंमें जागृति नहीं थी तबतक भले ही उसकी जरूरत महसूस होती रही हो। अब तो लोगोंमें जितनी जागृति आनी चाहिए उतनी जागृति आ गई है। नायगराका जलप्रपात ही हमारे हाथ लग गया है। उसका उपयोग भी हम जान गये हैं। इसलिए हमारा कार्य तो चुपचाप उसका उपयोग करना है।
जैसे सरकारकी टीकाकी जरूरत नहीं है वैसे ही सरकारसे सहयोग करनेवालों की भी टीका करनेकी जरूरत नहीं। हमारी सारी टीका हमारे कार्योंमें समाहित है। यह जगत्का निजी अनुभव है कि आधी छटाँक-भर आचरणका जितना फल होता है उतना मन-भर भाषणों अथवा लेखोंका नहीं होता। भाषण अनेक बार हमारे आचरणकी खामियोंका दर्पण होता है। बहुत अधिक बोलनेवाला कदाचित् ही अपने कहेका पालन करता है। वचनका पालन करनेवाला कंजूसकी भाँति तोले-तोलकर अपने मुखसे शब्द निकालता है। और आज जब हम सरकारके सामने माँग पेश न करके स्वयं अपनेसे करने लगे हैं तब हमें जो भी टीका करनी हो, जो भी शिकायत हो वह अपने सम्बन्धमें ही होनी चाहिए।
{{C|'''अशान्त असहयोगी'''}}
भावनगरकी जैन कन्या-पाठशालाके सम्बन्धमें वहाँके एक सज्जन अपना नाम देते हुए कुछ दुःखजनक बातें लिखते हैं। मेरे पास वह पत्र कुछ अर्सेसे पड़ा हुआ है लेकिन निरन्तर यात्रापर रहनेके कारण मैं सब पत्रोंका जितनी जल्दी चाहता हूँ उतनी जल्दी उत्तर नहीं दे पाता। यद्यपि इन सज्जनने अनुमति दी है तथापि मैं उनका नाम प्रकाशित नहीं कर रहा हूँ क्योंकि मैं उन्हें भावनगरमें अनुचित टीकाका पात्र नहीं बनाना चाहता। मैं जानता हूँ कि हममें अभी परस्पर एक-दूसरेकी टीका—चाहे वह शुद्ध हृदयसे ही क्यों न की गई हो—सहन करनेकी शक्ति नहीं आई है। स्वराज्यवादी व्यक्तिमें तो विषैली टीका भी सहन करनेकी शक्ति आनी चाहिए। ये भाई लिखते हैं कि छठी अप्रैलके पवित्र दिवसपर भी असहयोगियोंकी टोली वहाँकी कन्या-पाठशालाको बन्द करवानेके लिए पहुँच गई। यदि एक भी व्यक्ति विनयपूर्वक समझानेके लिए गया होता तो कुछ भी कहनेको न रहता लेकिन पत्र-लेखकके कथनानुसार तो पूरी टोली वहाँ पहुँच गई। टोलीके मुखियाने बलपूर्वक उसे बन्द करनेके लिए कहा। प्रधान अध्यापकने कुछ दलीलें पेश कीं, जिनके उत्तरमें पत्थरोंकी वर्षा हुई। एक कन्याका सिर फूट गया, दूसरीको थोड़ी चोट आई। इतनेमें सौभाग्यसे शान्तिके अर्थको समझनेवाला एक असहयोगी आ गया। उसने पत्थरोंकी वर्षा तथा अत्याचारको रोका। इस भाईको मैं बधाई देता हूँ। दूसरोंके सम्बन्धमें तो मैं क्या लिखूँ? यदि उपर्युक्त हकीकत सही है तो उन्होंने छठी तारीखको बदनाम किया, अपनी प्रतिज्ञा भंग की और अपना होश-हवास खो बैठे। बलात् पुण्य करवानेकी अनीतिसे छुटकारा चाहनेवाले हम लोग दूसरोंपर जोर-जबरदस्ती कैसे कर सकते हैं?
उपर्युक्त समाचार देनेवाले भाई लिखते हैं कि पाठशालाके व्यवस्थापकोंने इस उपद्रवके बावजूद पुलिसकी सहायता नहीं माँगी। इस खामोशीके लिए मैं व्यवस्थापकोंको<noinclude>{{Left|२०—७|3em}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/१२८
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|९८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बधाई देता हूँ। जो शान्तिको भंग करते हैं वे अन्य सब शर्तोंका पालन करनेके बावजूद सहयोगी माने जायेंगे और असहयोगीके तीरोंको सहन करते हुए भी शान्तिका पालन करनेवाले सहयोगीको मैं ऐसा असहयोगी मानता हूँ जो स्वयं नहीं जानता कि वह असहयोगी है।
{{C|'''"ईश्वर भी स्वराज्य भेंटमें नहीं दे सकता"'''}}
सत्याग्रह सप्ताहके समय मैंने जो सन्देश दिया था, यह वाक्य उस सन्देशमें से है। भाई रजबअली झीणाभाई लिखते हैं कि इस वाक्यमें निहित रहस्यको बहुत कम लोग समझेंगे और इससे आभास होता है कि मैंने ईश्वरकी शक्तिको भी सीमित कर दिया है तथा यह बात धार्मिक लोगोंके दुःखका कारण भी हो सकती है। मैं स्वयं अपनेको आस्तिक मानता हूँ; ईश्वर-तत्त्वको माननेवाला हूँ। मैंने तो एक स्पष्ट बातको अत्यन्त स्पष्ट शब्दोंमें लिखकर ईश्वरके कानूनको जनताके सम्मुख प्रस्तुत किया है। पापीको स्वर्ग देनेकी बात ईश्वरने अपने हाथमें रखी ही नहीं है। अगर यह कहें कि ईश्वरने कानून बनाकर मानो अपने हाथ ही धो लिए हैं तो अधिक उचित होगा। 'ईश्वर सर्वशक्तिमान् है, इसी कारण उसने अपवादरहित कानूनोंकी रचना की है।' स्वराज्य व्यक्ति और राष्ट्रके अस्तित्वका परिचायक है। जिस तरह उसीकी भूख शान्त होगी जो व्यक्ति खाना खायेगा, उसी तरह वही व्यक्ति स्वतन्त्र होगा जो अपनी पराधीनताको उतार फेंकेगा। हम शराब न छोड़ें, विदेशी कपड़ेका त्याग न करें और हिन्दू और मुसलमान लड़ते रहें तो क्या भगवान् स्वराज्य देगा? क्या वह दे सकता है? लेकिन यदि हम लोकमतके द्वारा विदेशी कपड़े और शराबका परित्याग करें तो क्या हमें स्वराज्य नहीं मिलेगा? ईश्वरीय विधानको भंग करनेके बावजूद कोई ईश्वरसे स्वर्ग-प्राप्तिकी आशा रख सकता है? कदापि नहीं रख सकता। इसीसे हम प्रार्थना करते हैं, सो भी स्वराज्यके लिए नहीं बल्कि स्वराज्यके लिए शक्ति प्राप्त करनेके लिए करते हैं। प्रार्थनाका अर्थ ही यह है कि अमुक वस्तु अथवा स्थितिको प्राप्त करनेकी अपनी तीव्र इच्छाको वाणी देना।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', १५-५-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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सत्याग्रह सप्ताहके समय मैंने जो सन्देश दिया था, यह वाक्य उस सन्देशमें से है। भाई रजबअली झीणाभाई लिखते हैं कि इस वाक्यमें निहित रहस्यको बहुत कम लोग समझेंगे और इससे आभास होता है कि मैंने ईश्वरकी शक्तिको भी सीमित कर दिया है तथा यह बात धार्मिक लोगोंके दुःखका कारण भी हो सकती है। मैं स्वयं अपनेको आस्तिक मानता हूँ; ईश्वर-तत्त्वको माननेवाला हूँ। मैंने तो एक स्पष्ट बातको अत्यन्त स्पष्ट शब्दोंमें लिखकर ईश्वरके कानूनको जनताके सम्मुख प्रस्तुत किया है। पापीको स्वर्ग देनेकी बात ईश्वरने अपने हाथमें रखी ही नहीं है। अगर यह कहें कि ईश्वरने कानून बनाकर मानो अपने हाथ ही धो लिए हैं तो अधिक उचित होगा। 'ईश्वर सर्वशक्तिमान् है, इसी कारण उसने अपवादरहित कानूनोंकी रचना की है।' स्वराज्य व्यक्ति और राष्ट्रके अस्तित्वका परिचायक है। जिस तरह उसीकी भूख शान्त होगी जो व्यक्ति खाना खायेगा, उसी तरह वही व्यक्ति स्वतन्त्र होगा जो अपनी पराधीनताको उतार फेंकेगा। हम शराब न छोड़ें, विदेशी कपड़ेका त्याग न करें और हिन्दू और मुसलमान लड़ते रहें तो क्या भगवान् स्वराज्य देगा? क्या वह दे सकता है? लेकिन यदि हम लोकमतके द्वारा विदेशी कपड़े और शराबका परित्याग करें तो क्या हमें स्वराज्य नहीं मिलेगा? ईश्वरीय विधानको भंग करनेके बावजूद कोई ईश्वरसे स्वर्ग-प्राप्तिकी आशा रख सकता है? कदापि नहीं रख सकता। इसीसे हम प्रार्थना करते हैं, सो भी स्वराज्यके लिए नहीं बल्कि स्वराज्यके लिए शक्ति प्राप्त करनेके लिए करते हैं। प्रार्थनाका अर्थ ही यह है कि अमुक वस्तु अथवा स्थितिको प्राप्त करनेकी अपनी तीव्र इच्छाको वाणी देना।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/१२९
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{x-larger|'''४८. भाषण : शिमलाको सार्वजनिक सभामें<ref>गांधीजीने ईदगाहके मैदानमें आयोजित एक सभामें भाषण दिया जिसमें लगभग पन्द्रह हजार लोग उपस्थित थे। उनसे प्रार्थना की गई कि वे शिमला आनेका उद्देश्य और वाइसरायके साथ हुई बातचीतका परिणाम बतायें। गांधीजीका यह भाषण '''आजके''' १६ मईके अंकमें और '''बॉम्बे क्रॉनिकल'''के १७ और १९ मईके अंकोंमें तथा '''नवजीवन'''के २९-५-१९२१ के अंकमें प्रकाशित हुआ था। यहाँ '''आज'''का विवरण '''बॉम्बे क्रॉनिकल''' और '''नवजीवन'''के विवरणोंसे मिला लिया गया है।</ref>}}
{{Right|१५ मई, १९२१}}
'''श्री गांधीने उत्तर<ref>इससे पूर्व दिये गये मानपत्रका उत्तर।</ref> देते हुए कहा :'''
यहाँ आनेके सम्बन्धमें मुझे यह कहना है कि पण्डित मदनमोहन मालवीयने मेरे पास एक तार भेजा था जिसमें उन्होंने लिखा था—'आप शिमला आयें। अगर आप न आयेंगे तो स्वास्थ्य खराब होते हुए भी मुझे आपको लिवानेके लिए आपके पास आना पड़ेगा।' तार पहुँचनेके बाद ही मुझे पण्डितजीकी चिट्ठी मिली जिसमें उन्होंने लिखा था कि अगर आप अपने असहयोगी दलकी सारी बात वाइसराय लॉर्ड रीडिंगके सामने रखनेके लिए उनसे मिलना चाहते हों तो आप उनसे मिल सकते हैं। मुझे अपनी बात किसी सरकारी अधिकारीके सम्मुख रखनेमें कोई बुराई नहीं दिखी।
इसलिए जब मैं शिमला पहुँचा तब मैंने वाइसरायको इस आशयकी एक चिट्ठी भेजी कि मैं आपसे मुलाकात करना चाहता हूँ। वाइसरायने मुलाकात करना तुरन्त मंजूर कर लिया और जब मैं उनसे मिला तब उन्होंने मेरी बातोंको काफी देरतक धैर्य और सौजन्यके साथ सुना। किन्तु मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी यह भेंट<ref>देखिए "शिमला-यात्रा", २५-५-१९२१।</ref> कितनी सफल या असफल हुई। मैंने वाइसरायको बतलाया कि हमारा दल क्या चाहता है और उन्होंने भी शासनकी कठिनाइयाँ ब्यौरेवार बताई। हमारी यह भेंट सफल भी कही जा सकती है और असफल भी।
...[मुझे] कहना यह है कि सब-कुछ इसपर निर्भर करता है कि कांग्रेस, सिख लीग और खिलाफत समितिके सम्मेलनमें गम्भीरतापूर्वक जो निश्चय किये गये हैं उनपर लोग किस हदतक अमल करते हैं।
इस समय तो मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि जबतक हमारा आन्दोलन शान्तिमय है और जबतक हममें आत्मत्यागका भाव मौजूद है और हम इन्हींके बलपर अपने देशके प्रति न्याय प्राप्त करना चाहते हैं, तबतक संसारमें कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो हमें इसी बरसके भीतर-भीतर स्वराज्य लेनेसे रोक सके। हम लोग संसारको यह दिखला देना चाहते हैं कि हमारा उद्देश्य न्याय प्राप्त करना है। हमारी समस्या<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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{{Right|१५ मई, १९२१}}
'''श्री गांधीने उत्तर<ref>इससे पूर्व दिये गये मानपत्रका उत्तर।</ref> देते हुए कहा :'''
यहाँ आनेके सम्बन्धमें मुझे यह कहना है कि पण्डित मदनमोहन मालवीयने मेरे पास एक तार भेजा था जिसमें उन्होंने लिखा था—'आप शिमला आयें। अगर आप न आयेंगे तो स्वास्थ्य खराब होते हुए भी मुझे आपको लिवानेके लिए आपके पास आना पड़ेगा।' तार पहुँचनेके बाद ही मुझे पण्डितजीकी चिट्ठी मिली जिसमें उन्होंने लिखा था कि अगर आप अपने असहयोगी दलकी सारी बात वाइसराय लॉर्ड रीडिंगके सामने रखनेके लिए उनसे मिलना चाहते हों तो आप उनसे मिल सकते हैं। मुझे अपनी बात किसी सरकारी अधिकारीके सम्मुख रखनेमें कोई बुराई नहीं दिखी।
इसलिए जब मैं शिमला पहुँचा तब मैंने वाइसरायको इस आशयकी एक चिट्ठी भेजी कि मैं आपसे मुलाकात करना चाहता हूँ। वाइसरायने मुलाकात करना तुरन्त मंजूर कर लिया और जब मैं उनसे मिला तब उन्होंने मेरी बातोंको काफी देरतक धैर्य और सौजन्यके साथ सुना। किन्तु मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी यह भेंट<ref>देखिए "शिमला-यात्रा", २५-५-१९२१।</ref> कितनी सफल या असफल हुई। मैंने वाइसरायको बतलाया कि हमारा दल क्या चाहता है और उन्होंने भी शासनकी कठिनाइयाँ ब्यौरेवार बताई। हमारी यह भेंट सफल भी कही जा सकती है और असफल भी।
...[मुझे] कहना यह है कि सब-कुछ इसपर निर्भर करता है कि कांग्रेस, सिख लीग और खिलाफत समितिके सम्मेलनमें गम्भीरतापूर्वक जो निश्चय किये गये हैं उनपर लोग किस हदतक अमल करते हैं।
इस समय तो मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि जबतक हमारा आन्दोलन शान्तिमय है और जबतक हममें आत्मत्यागका भाव मौजूद है और हम इन्हींके बलपर अपने देशके प्रति न्याय प्राप्त करना चाहते हैं, तबतक संसारमें कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो हमें इसी बरसके भीतर-भीतर स्वराज्य लेनेसे रोक सके। हम लोग संसारको यह दिखला देना चाहते हैं कि हमारा उद्देश्य न्याय प्राप्त करना है। हमारी समस्या<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/१३०
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>१००
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
केवल उसी हालत में सुलझ सकती है जब भारतके प्रति न्याय किया जाये, किसी दूसरे
उपायसे नहीं। मैं चाहता हूँ कि सब लोग उन लोगोंकी तरह बरताव करें जिन्होंने कि
ननकाना साहबमें अपने पवित्र उद्देश्यकी खातिर अपने प्राण न्यौछावर किये हैं, न
कि महन्त नारायणदासकी तरह जो दूसरोंकी जान लेनेपर तुला हुआ था। जब हममें
अहिंसा और आत्मत्यागकी भावना आ जायेगी तब आधुनिक अस्त्र-शस्त्र भी हमारी
स्वतन्त्रतामें बाधक नहीं हो सकेंगे ।
हमको बार-बार यह सुनाकर डराया जाता है कि अंग्रेजोंके चले जानेपर हमारे
देशपर अफगान लोग आक्रमण कर देंगे। किन्तु जबतक मैं जीवित हूँ तबतक मैं
इस देशके किसी भी भागपर किसी विदेशीका प्रभुत्व नहीं होने दूंगा । मेरा विश्वास
है कि प्रत्येक भारतीय मुसलमानका भी यही मत है । मेरा हिन्दुओंसे अनुरोध है कि
वे इस सम्बन्धमें मुसलमानोंके भावोंके बारेमें कोई सन्देह न करें। मैं चाहता हूँ कि
सब धर्मोके लोग मिलकर स्वतन्त्रता के संघर्ष में उनका साथ दें ।
उन्होंने सफलता के लिए आवश्यक तीन बुनियादी बातोंकी विस्तारसे चर्चा की
और कहा :
पहली बात यह है कि हम अपने दिलोंसे भय निकाल दें; हिन्दू, मुसलमानों और
पठानोंसे तथा मुसलमान हिन्दुओंसे भय न करें और एक-दूसरेपर अविश्वास न करें ।
अफगानोंका भय एक झूठा हौआ है । मैं अफगानोंके स्वभावको बहुत दिनोंसे जानता
हूँ । उनमें चाहे जितनी भी कमजोरियाँ हों किन्तु वे खुदासे डरनेवाले लोग हैं। मुझे
विश्वास है कि वे भारतपर हमला करनेकी बात कभी न सोचेंगे। दूसरी ओर मैं
स्वतन्त्रताकी लड़ाईमें मदद देनेके लिए अफगानोंको कभी न बुलाऊँगा । इसके विपरीत
यदि अफगानोंने हमपर हमला किया तो मैं उनके विरुद्ध भी दृढ़ता के साथ असहयोग
करूँगा और जीतेजी मातृभूमिकी एक अंगुल-भर जमीनपर कब्जा न होने दूंगा ।
मैं आपसे फिर कहता हूँ कि हिन्दुओं और मुसलमानोंके लिए अपने-अपने मनोंमें
से पारस्परिक अविश्वासको निकालना अत्यन्त आवश्यक । अब मैं दूसरी बुनियादी
बातपर आता हूँ। वह है हिन्दू-मुस्लिम एकता । हमने आपसमें जो समझौता किया है
वह कोई सौदेबाजीकी भावनासे प्रेरित होकर नहीं किया । हिन्दू मुसलमानोंके मामलेमें
इसलिए साथ देते हैं कि वे ऐसा करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं और जानते हैं कि
भलाईसे भलाई ही पैदा होती है। इसलिए उनका मुसलमानोंको गोवध बन्द करनेके
लिए विवश करना घातक होगा। इस सम्बन्धमें केवल वे ही दोषी नहीं हैं, फिर
गोरक्षाका प्रश्न जोर-जबरदस्तीसे कभी तय होनेवाला नहीं है। मुसलमानोंका मुक्त
हृदयसे विश्वास करने और उनको जी खोलकर सहयोग देनेसे अन्तमें हर चीज मिल
जायेगी । इस्लामका आधार भलमनसाहत है और यदि वह इसे छोड़ देगा तो वह
टिक नहीं सकता ।
तीसरी बुनियादी बात, जो सबसे महत्त्वपूर्ण भी है, अहिंसा है । इस सम्बन्धमें
मैं सिखोंसे सविनय अनुरोध करता हूँ कि वे लक्ष्मणसिंह और दलीपसिंहका अनुकरण
करें, जिन्होंने महन्त नारायणदाससे लड़ने में समर्थ होनेपर भी हिंसाका प्रयोग नहीं किया ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|१००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>केवल उसी हालतमें सुलझ सकती है जब भारतके प्रति न्याय किया जाये, किसी दूसरे उपायसे नहीं। मैं चाहता हूँ कि सब लोग उन लोगोंकी तरह बरताव करें जिन्होंने कि ननकाना साहबमें अपने पवित्र उद्देश्यकी खातिर अपने प्राण न्यौछावर किये हैं, न कि महन्त नारायणदासकी तरह जो दूसरोंकी जान लेनेपर तुला हुआ था। जब हममें अहिंसा और आत्मत्यागकी भावना आ जायेगी तब आधुनिक अस्त्र-शस्त्र भी हमारी स्वतन्त्रतामें बाधक नहीं हो सकेंगे।
हमको बार-बार यह सुनाकर डराया जाता है कि अंग्रेजोंके चले जानेपर हमारे देशपर अफगान लोग आक्रमण कर देंगे। किन्तु जबतक मैं जीवित हूँ तबतक मैं इस देशके किसी भी भागपर किसी विदेशीका प्रभुत्व नहीं होने दूँगा। मेरा विश्वास है कि प्रत्येक भारतीय मुसलमानका भी यही मत है। मेरा हिन्दुओंसे अनुरोध है कि वे इस सम्बन्धमें मुसलमानोंके भावोंके बारेमें कोई सन्देह न करें। मैं चाहता हूँ कि सब धर्मोके लोग मिलकर स्वतन्त्रताके संघर्षमें उनका साथ दें।
'''उन्होंने सफलताके लिए आवश्यक तीन बुनियादी बातोंकी विस्तारसे चर्चा की और कहा :'''
पहली बात यह है कि हम अपने दिलोंसे भय निकाल दें; हिन्दू, मुसलमानों और पठानोंसे तथा मुसलमान हिन्दुओंसे भय न करें और एक-दूसरेपर अविश्वास न करें। अफगानोंका भय एक झूठा हौआ है। मैं अफगानोंके स्वभावको बहुत दिनोंसे जानता हूँ। उनमें चाहे जितनी भी कमजोरियाँ हों किन्तु वे खुदासे डरनेवाले लोग हैं। मुझे विश्वास है कि वे भारतपर हमला करनेकी बात कभी न सोचेंगे। दूसरी ओर मैं स्वतन्त्रताकी लड़ाईमें मदद देनेके लिए अफगानोंको कभी न बुलाऊँगा। इसके विपरीत यदि अफगानोंने हमपर हमला किया तो मैं उनके विरुद्ध भी दृढ़ताके साथ असहयोग करूँगा और जीतेजी मातृभूमिकी एक अंगुल-भर जमीनपर कब्जा न होने दूँगा।
मैं आपसे फिर कहता हूँ कि हिन्दुओं और मुसलमानोंके लिए अपने-अपने मनोंमें से पारस्परिक अविश्वासको निकालना अत्यन्त आवश्यक है। अब मैं दूसरी बुनियादी बातपर आता हूँ। वह है हिन्दू-मुस्लिम एकता। हमने आपसमें जो समझौता किया है वह कोई सौदेबाजीकी भावनासे प्रेरित होकर नहीं किया। हिन्दू मुसलमानोंके मामलेमें इसलिए साथ देते हैं कि वे ऐसा करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं और जानते हैं कि भलाईसे भलाई ही पैदा होती है। इसलिए उनका मुसलमानोंको गोवध बन्द करनेके लिए विवश करना घातक होगा। इस सम्बन्धमें केवल वे ही दोषी नहीं हैं, फिर गोरक्षाका प्रश्न जोर-जबरदस्तीसे कभी तय होनेवाला नहीं है। मुसलमानोंका मुक्त हृदयसे विश्वास करने और उनको जी खोलकर सहयोग देनेसे अन्तमें हर चीज मिल जायेगी। इस्लामका आधार भलमनसाहत है और यदि वह इसे छोड़ देगा तो वह टिक नहीं सकता।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३११
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||माधुरी और पुष्पा|२८१}}</noinclude>यह कहकर मैंने माधुरीके नन्हेंसे हाथको अपने हाथमें ले लिया। उसकी चूड़ी मेरे हाथमें नाचने लगी। मैंने कहा :
"अब तो तुझे प्रायश्चित्त करना ही चाहिए। नन्हें बच्चे बिलकुल निर्दोष होते हैं, वे किसीको छलते नहीं। प्रायश्चित्त करना अर्थात् पाप धोना, मैल साफ करना। अब तो तुझे मैल अवश्य साफ करना चाहिए।"
"यह मैल अब कैसे धुल सकता है? सच तो यह है कि मैंने आपको छला है।"
"मैल साफ करनेका सहज उपाय है। तू यह तो समझ ही गई है कि तुझे असलमें गहने देने चाहिए थे इसीसे तूने कहा कि तूने मेरे साथ छल किया है। अब तो तू मुझे सारे गहने दे दे तो तेरा पाप धुल जायेगा।"
अभीतक तो माधुरीका मुख चमक रहा था, वह अब कुछ मलिन पड़ गया। मैं समझ गया और मैंने कहा :
"बच्चोंको गहनोंसे क्या लेना-देना? हम तो अपने कामके द्वारा ही शोभा पा सकते हैं? गहने तो खो भी जाते हैं। बेहतर तो यह है कि उन्हें अच्छे कामके लिए दे दें। तू तो बहुत समझदार लड़की जान पड़ती है। इसके अतिरिक्त तू अपने गुनाहको भी स्वीकार करती है। तुझे खुशी-खुशी सब गहने दे देने चाहिए। उनसे मैं गरीबोंको चरखे दूँगा। तेरे जैसे बच्चोंको पढ़ाऊँगा। तेरी जैसी अन्य लड़कियोंने भी अपने गहने दिये हैं।" मैं रुका।
माधुरीके कानोंमें छोटे माणिककी दो लौंगें थीं। हाथमें सोनेकी दो चूड़ियाँ और एक काँचकी चूड़ी थी। वह धीमे स्वरमें बोली :
"मैं यह काँचकी चूड़ी दूँ तो क्या ठीक होगा?"
इस बच्चेको क्या उत्तर दूँ? इसे अपने साथ ले जाकर इसे अपनी बेटी बना लूँ? लेकिन मेरी तो ऐसी कितनी ही बेटियाँ हैं। फिलहाल तो मैं केवल कृपण बनिया हूँ, लेना ही जानता हूँ; इसलिए मैंने कहा :
"तेरी काँचकी चूड़ीको भी मैं पैसेमें बदल दूँगा; लेकिन मुझे तो तेरे सारे गहने चाहिए। उन्हें देनेमें कौन-सी बड़ी बात है? एक तो तेरा पाप धुल जायेगा और मुझ जैसेका काम बन जायेगा। तेरे गहने स्वराज्य प्राप्त करनेमें हमारे काम आयेंगे। क्या मुझे सब गहने नहीं देगी?"
"मैं अपनी सोनेकी चूड़ियाँ तो कतई नहीं दूँगी। लेकिन क्या आप (लौंगोंकी और संकेत करते हुए) यह लेंगे?"
"यह तो तूने ठीक कहा। लेकिन अगर तू मुझे अपनी चूड़ियाँ भी दे दे तो कितना अच्छा हो?"
माधुरी कुछ मुरझा-सी गई। मैंने उसे चूमा और कहा—"अच्छा ठीक है, मुझे अपनी लौंगें ही दे दे।"
माधुरी दौड़ी गई। एक मिनट बाद वापस आई। लौंगें उतारनी शुरू कीं, इस बीच मैं बोला : "तूने माँसे अनुमति ले ली है?"
"हाँ, माँने अनुमति दे दी है।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३१२
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2026-08-17T09:47:10Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>________________
२८२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
लौंगें उतारकर मेरे हाथमें घर दीं, एक लौंग गिर गई, माधुरीने ध्यानपूर्वक उसे ढूंढ़कर मुझे दे दिया ।
लेकिन मेरा लोभ किसी तरह न जाता था । मेरी नजर चूड़ियोंसे हटती ही न थी। मैं अभीतक इस बच्चीका नाम नहीं जानता था । यह भी नहीं जानता था कि वह किसकी लड़की है। मैंने अब उसका नाम जान लिया और उसके लायक पिताको भी पहचान लिया और बोला :
" ओ माधुरी ! इस चूड़ीमें इतना क्या लोभ ? तेरी जैसी निर्दोष लड़कीको गहनोंसे क्या काम ? क्या तू अपनी चूड़ियाँ भी न देगी ? "
माधुरी पिघली । उसने अपने हाथसे ही चूड़ी उतारकर मेरे हाथमें धर दी । मुझे लगा कि मैं जीत गया ।
लेकिन जीत तो माधुरीकी ही हुई । इस बालिकाने मेरे मनको हर लिया। मुझे मन-ही-मन उसके माता-पितासे ईर्षा हुई। मैंने परमात्मासे प्रार्थना की कि " हर माता- पिताके ऐसे बच्चे हों। " स्वराज्य प्राप्ति के विषय में मेरा विश्वास और भी दृढ़ हो गया। मैंने माधुरीसे कहा :
“ तूने कमाल ही कर दिया। अब अगर तू दूसरी चूड़ी देगी भी तो नहीं लूंगा । लेकिन तूने इतना जो दिया है सो क्या खुश होकर ही दिया है ? तुझे वापस लेना हो तो ले ले । "
ऐसा कह मैंने गहने उसके आगे रख दिये ।
'यह तो मैंने आपको खुशी-खुशी दिये हैं । वे मुझे वापस नहीं चाहिए।" मेरा सवा सेर खून बढ़ गया ।
मैं बहनोंके दर्शन करनेके लिए दूसरी कोठरीमें गया । मेरे और माधुरीके संलापको दूसरे बच्चे भी सुन रहे थे ।
(२)
पुष्पाने, जो पड़ोसी की लड़की थी, अपनी चूड़ी उतारकर मेरे हाथमें रख दी। “ तूने माँसे आज्ञा ले ली है ? "
"हाँ जी, मुझे माँने आज्ञा दी इसीसे मैं यह चूड़ी दे रही हूँ ।"
'इन सब गहनोंको लेनेकी मेरी जो शर्त है, क्या तू उसे जानती है ? जो लड़- कियाँ मुझे गहने देंगी वे जबतक स्वराज्य नहीं मिल जाता तबतक अपने पितासे वैसे ही नये गहनोंकी माँग नहीं कर सकेंगी। उसी तरह के और गहने हों और अगर पहननेका मन करे तो पहन सकती हैं। लेकिन फिलहाल नये नहीं बनवाये जा सकते । " " मेरे पास ऐसी दूसरी चूड़ी है। मैं नई नहीं बनवाऊँगी। मैंने खुशीके साथ अपनी चूड़ी दी है । "
माधुरी देख रही थी। माँके साथ कुछ बात भी कर रही थी। उसने तो उप- युक्त काँचकी और सोनेकी चूड़ियाँ भी उतारकर मेरे हाथमें धर दीं !
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|२८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लौंगें उतारकर मेरे हाथमें धर दीं, एक लौंग गिर गई, माधुरीने ध्यानपूर्वक उसे ढूँढ़कर मुझे दे दिया।
लेकिन मेरा लोभ किसी तरह न जाता था। मेरी नजर चूड़ियोंसे हटती ही न थी। मैं अभीतक इस बच्चीका नाम नहीं जानता था। यह भी नहीं जानता था कि वह किसकी लड़की है। मैंने अब उसका नाम जान लिया और उसके लायक पिताको भी पहचान लिया और बोला :
"ओ माधुरी! इस चूड़ीमें इतना क्या लोभ? तेरी जैसी निर्दोष लड़कीको गहनोंसे क्या काम? क्या तू अपनी चूड़ियाँ भी न देगी?"
माधुरी पिघली। उसने अपने हाथसे ही चूड़ी उतारकर मेरे हाथमें धर दी। मुझे लगा कि मैं जीत गया।
लेकिन जीत तो माधुरीकी ही हुई। इस बालिकाने मेरे मनको हर लिया। मुझे मन-ही-मन उसके माता-पितासे ईर्षा हुई। मैंने परमात्मासे प्रार्थना की कि "हर माता-पिताके ऐसे बच्चे हों।" स्वराज्य प्राप्तिके विषयमें मेरा विश्वास और भी दृढ़ हो गया। मैंने माधुरीसे कहा :
"तूने कमाल ही कर दिया। अब अगर तू दूसरी चूड़ी देगी भी तो नहीं लूँगा। लेकिन तूने इतना जो दिया है सो क्या खुश होकर ही दिया है? तुझे वापस लेना हो तो ले ले।"
ऐसा कह मैंने गहने उसके आगे रख दिये।
"यह तो मैंने आपको खुशी-खुशी दिये हैं। वे मुझे वापस नहीं चाहिए।"
मेरा सवा सेर खून बढ़ गया।
मैं बहनोंके दर्शन करनेके लिए दूसरी कोठरीमें गया। मेरे और माधुरीके संलापको दूसरे बच्चे भी सुन रहे थे।
{{C|(२)}}
पुष्पाने, जो पड़ोसीकी लड़की थी, अपनी चूड़ी उतारकर मेरे हाथमें रख दी।
"तूने माँसे आज्ञा ले ली है?"
"हाँ जी, मुझे माँने आज्ञा दी इसीसे मैं यह चूड़ी दे रही हूँ।"
"इन सब गहनोंको लेनेकी मेरी जो शर्त है, क्या तू उसे जानती है? जो लड़कियाँ मुझे गहने देंगी वे जबतक स्वराज्य नहीं मिल जाता तबतक अपने पितासे वैसे ही नये गहनोंकी माँग नहीं कर सकेंगी। उसी तरहके और गहने हों और अगर पहननेका मन करे तो पहन सकती हैं। लेकिन फिलहाल नये नहीं बनवाये जा सकते।"
"मेरे पास ऐसी दूसरी चूड़ी है। मैं नई नहीं बनवाऊँगी। मैंने खुशीके साथ अपनी चूड़ी दी है।"
माधुरी देख रही थी। माँके साथ कुछ बात भी कर रही थी। उसने तो उपयुक्त काँचकी और सोनेकी चूड़ियाँ भी उतारकर मेरे हाथमें धर दीं!<noinclude></noinclude>
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शिखर तिवारी
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|-
| || भूमिका || पाँच
|-
| || आभार || ग्यारह
|-
| || पाठकोंको सूचना || बारह
|-
| १. || पत्र : गंगूको (१५-६-१९२७ के पश्चात्)|| १
|-
| २. || हिन्दू-मुस्लिम एकता (१६-६-१९२७) || २
|-
| ३. || टिप्पणियाँ: सरदार खड़कसिंह; क्या मैंने आन्ध्रको त्याग दिया है?; एक शुभ निश्चय (१६-६-१९२७) || ५
|-
| ४. || रानीपरज जाँच समिति (१६-६-१९२७) || ७
|-
| ५. || पत्र : सोंजा श्लेसिनको (१६-६-१९२७) || ९
|-
| ६. || पत्र : डब्ल्यू० बी० स्टोवरको (१६-६-१९२७) || १०
|-
| ८. || पत्र : डॉ० एम० एस० केलकरको (१६-६-१९२७) || ८
|-
| १०. || पत्रः ए० ए० पॉलको (१६-६-१९२७) || ९
|-
| ११. || पत्र : श्रीमती माणिकबाई बहादुरजीको (१६-६-१९२७) ||
|-
| १२. || पत्र : ए० रंगस्वामी अय्यंगारको (१६-६-१९२७) || ११
|-
| १३. || पत्र : आर० बी० ग्रेगको (१६-६-१९२७)|| १२
|-
| १४. || पत्र : मिर्जा एम० इस्माइलको (१६-६-१९२७) || १२
|-
| १५. || पत्र : बा० शि० मुंजेको (१६-६-१९२७) || १३
|-
| १६. ||पत्र : कुवलयानन्दको (१७-६-१९२७) || १४
|-
| १७. || पत्र : कान्ति गांधीको (१७-६-१९२७) || १४
|-
| १८. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१८-६-१९२७) || १५
|-
| १९. || पत्र : मनोरमादेवीको (१८-६-१९२७) || १६
|-
| २०. || पत्र : फीरोजा पी० एस० तलयारखाँको (१८-६-१९२७) || १६
|-
| २१. || पत्र : सांगली इंडस्ट्रियल एंड एग्रिकल्चरल स्कूलके प्रिंसिपलको (१८-६-१९२७) || १७
|-
| २२. || धर्मके नामपर झगड़ा (१९-६-१९२७) || १७
|-
| २३. || स्वदेशी बनाम विदेशी (१९-६-१९२७) || १८
|-
| २४. || पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको (१९-६-१९२७) || १९
|-
| २५. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-६-१९२७) || १९
|-
| २६. || पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (१९-६-१९२७) || २०
|-
| २७. || पत्र : हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्यायको (१९-६-१९२७) || २१
|-
| २८. ||पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१९-६-१९२७)|| २१
|-
| २९. || पत्र : मथुरादासको (२०-६-१९२७) || २२
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शिखर तिवारी
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|-
| || भूमिका || पाँच
|-
| || आभार || ग्यारह
|-
| || पाठकोंको सूचना || बारह
|-
| १. || पत्र : गंगूको (१५-६-१९२७ के पश्चात्)|| १
|-
| २. || हिन्दू-मुस्लिम एकता (१६-६-१९२७) || २
|-
| ३. || टिप्पणियाँ: सरदार खड़कसिंह; क्या मैंने आन्ध्रको त्याग दिया है?; एक शुभ निश्चय (१६-६-१९२७) || ५
|-
| ४. || रानीपरज जाँच समिति (१६-६-१९२७) || ७
|-
| ५. || पत्र : सोंजा श्लेसिनको (१६-६-१९२७) || ९
|-
| ६. || पत्र : डब्ल्यू० बी० स्टोवरको (१६-६-१९२७) || १०
|-
| ८. || पत्र : डॉ० एम० एस० केलकरको (१६-६-१९२७) || १२
|-
| १०. || पत्रः ए० ए० पॉलको (१६-६-१९२७) || १३
|-
| ११. || पत्र : श्रीमती माणिकबाई बहादुरजीको (१६-६-१९२७) || १३
|-
| १२. || पत्र : ए० रंगस्वामी अय्यंगारको (१६-६-१९२७) || १४
|-
| १३. || पत्र : आर० बी० ग्रेगको (१६-६-१९२७)|| १५
|-
| १४. || पत्र : मिर्जा एम० इस्माइलको (१६-६-१९२७) || १६
|-
| १५. || पत्र : बा० शि० मुंजेको (१६-६-१९२७) || १७
|-
| १६. ||पत्र : कुवलयानन्दको (१७-६-१९२७) || १८
|-
| १७. || पत्र : कान्ति गांधीको (१७-६-१९२७) || २०
|-
| १८. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१८-६-१९२७) || २२
|-
| १९. || पत्र : मनोरमादेवीको (१८-६-१९२७) || २३
|-
| २०. || पत्र : फीरोजा पी० एस० तलयारखाँको (१८-६-१९२७) || २३
|-
| २१. || पत्र : सांगली इंडस्ट्रियल एंड एग्रिकल्चरल स्कूलके प्रिंसिपलको (१८-६-१९२७) || २४
|-
| २२. || धर्मके नामपर झगड़ा (१९-६-१९२७) || २५
|-
| २३. || स्वदेशी बनाम विदेशी (१९-६-१९२७) || २७
|-
| २४. || पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको (१९-६-१९२७) || २९
|-
| २५. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (१९-६-१९२७) || ३०
|-
| २६. || पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (१९-६-१९२७) || ३१
|-
| २७. || पत्र : हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्यायको (१९-६-१९२७) || ३२
|-
| २८. ||पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१९-६-१९२७)|| ३२
|-
| २९. || पत्र : मथुरादासको (२०-६-१९२७) || ३३
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/२४
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|
|-
२८. पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२०-६-१९२७)
२९. पत्र : लक्ष्मीकान्तको (२०-६-१९२७)
३०. एक पत्र (२१-६-१९२७ के पूर्व )
३१. पत्र : अब्बास तैयबजीको (२१-६-१९२७)
३२. पत्र : देवेन्द्रनाथ मित्रको (२१-१-१९२७)
३३. पत्र : लाजपतरायको (२१-६-१९२७)
३४. पत्र विक्टर मोहन जोशीको (२१-६-१९२७)
३५. पत्र : डा० विधानचन्द्र रायको (२१-६-१९२७)
३६. पत्र : वालजी गो० देसाईको (२१-६-१९२७)
३७. पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२१-६-१९२७)
३८. पत्र : जयकृष्ण प्रभुदास भणसालीको (२१-६-१९२७)
३९. पत्र : सातवलेकरको (२१-६-१९२७)
४०. पत्र : देवी वेस्टको (२२-६-१९२७)
४१. पत्र : एच० हारकोर्टको (२२-६-१९२७)
४२. पत्र : गो० कृ० देवधरको (२२-६-१९२७)
४३. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२२-६-१९२७)
४४. लंकाशायर गुट (२३-६-१९२७)
४५. टिप्पणियाँ : आगामी दौरा; अश्लील विज्ञापन (२३-६-१९२७)
४६. तार : रामेश्वरदास पोद्दारको (२३-६-१९२७)
४७. पत्रः हेलेन हॉसडिंगको (२३-६-१९२७)
४८. पत्र : टी० डब्ल्यू० पेटावेलको (२३-६-१९२७)
४९. पत्र : हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्यायको (२४-६-१९२७)
५०. पत्र : पी० के० चार्लुको (२४-६-१९२७)
५१. पत्र: पी० राजगोपाल अय्यरको (२४-६-१९२७)
५२. पत्र : सरोजिनी नायडूको ( २५-६-१९२७)
५३. पत्र : शाह चमनलाल डूंगाजीको (२५-६-१९२७)
५४. पत्र : विलियम स्मिथको ( २५-६-१९२७)
५५. पत्र : के० केलप्पनको (२५-६-१९२७)
५६. 'नवजीवन' देवनागरीमें ( २६-६-१९२७)
५७. परोपकारी डॉक्टर (२६-६-१९२७)
५९. पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२६-६-१९२७)
५८. पत्र : एन० आर० मलकानीको (२६-६-१९२७)
६०. एक पत्र (२७-६-१९२७ के पूर्व )
६१. पत्र : तारा मोदीको (२७-६-१९२७)
६२. पत्र : डॉ० एम० एस० केलकरको (२८-६-१९२७)
६३. पत्र : श्रीमती ब्लेयरको (२८-६-१९२७)<noinclude></noinclude>
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|
|-
| २८. || पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२०-६-१९२७)|| ३४
|-
| २९. || पत्र : लक्ष्मीकान्तको (२०-६-१९२७) || ३५
|-
| ३०. || एक पत्र (२१-६-१९२७ के पूर्व) ||
|-
| ३१. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (२१-६-१९२७) ||
|-
| ३२. || पत्र : देवेन्द्रनाथ मित्रको (२१-१-१९२७) ||
|-
| ३३. || पत्र : लाजपतरायको (२१-६-१९२७) ||
|-
| ३४. || पत्र विक्टर मोहन जोशीको (२१-६-१९२७) ||
|-
| ३५. || पत्र : डा० विधानचन्द्र रायको (२१-६-१९२७)||
|-
| ३६. || पत्र : वालजी गो० देसाईको (२१-६-१९२७) ||
|-
| ३७. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२१-६-१९२७) ||
|-
| ३८. || पत्र : जयकृष्ण प्रभुदास भणसालीको (२१-६-१९२७) ||
|-
| ३९. || पत्र : सातवलेकरको (२१-६-१९२७) ||
|-
| ४०. || पत्र : देवी वेस्टको (२२-६-१९२७) ||
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| ४१. || पत्र : एच० हारकोर्टको (२२-६-१९२७) ||
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| ४२. || पत्र : गो० कृ० देवधरको (२२-६-१९२७) ||
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| ४३. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२२-६-१९२७) ||
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| ४४. || लंकाशायर गुट (२३-६-१९२७) ||
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| ४५. || टिप्पणियाँ : आगामी दौरा; अश्लील विज्ञापन (२३-६-१९२७) ||
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| ४६. || तार : रामेश्वरदास पोद्दारको (२३-६-१९२७) ||
|-
| ४७. || पत्रः हेलेन हॉसडिंगको (२३-६-१९२७) ||
|-
| ४८. || पत्र : टी० डब्ल्यू० पेटावेलको (२३-६-१९२७) ||
|-
| ४९. || पत्र : हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्यायको (२४-६-१९२७) ||
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| ५०. || पत्र : पी० के० चार्लुको (२४-६-१९२७) ||
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| ५१. || पत्र: पी० राजगोपाल अय्यरको (२४-६-१९२७) ||
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| ५२. || पत्र : सरोजिनी नायडूको ( २५-६-१९२७) ||
|-
| ५३. || पत्र : शाह चमनलाल डूंगाजीको (२५-६-१९२७) ||
|-
| ५४. || पत्र : विलियम स्मिथको ( २५-६-१९२७) ||
|-
| ५५. || पत्र : के० केलप्पनको (२५-६-१९२७) ||
|-
| ५६. || 'नवजीवन' देवनागरीमें ( २६-६-१९२७) ||
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| ५७. || परोपकारी डॉक्टर (२६-६-१९२७) ||
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| ५९. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२६-६-१९२७) ||
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| ५८. || पत्र : एन० आर० मलकानीको (२६-६-१९२७) ||
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| ६०. || एक पत्र (२७-६-१९२७ के पूर्व) ||
|-
| ६१. || पत्र : तारा मोदीको (२७-६-१९२७) ||
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| ६२. || पत्र : डॉ० एम० एस० केलकरको (२८-६-१९२७) ||
|-
| ६३. || पत्र : श्रीमती ब्लेयरको (२८-६-१९२७) ||<noinclude></noinclude>
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|
|-
| २८. || पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२०-६-१९२७)|| ३४
|-
| २९. || पत्र : लक्ष्मीकान्तको (२०-६-१९२७) || ३५
|-
| ३०. || एक पत्र (२१-६-१९२७ के पूर्व) || ३६
|-
| ३१. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (२१-६-१९२७) || ३७
|-
| ३२. || पत्र : देवेन्द्रनाथ मित्रको (२१-१-१९२७) || ३८
|-
| ३३. || पत्र : लाजपतरायको (२१-६-१९२७) || ३९
|-
| ३४. || पत्र विक्टर मोहन जोशीको (२१-६-१९२७) || ४०
|-
| ३५. || पत्र : डा० विधानचन्द्र रायको (२१-६-१९२७)|| ४०
|-
| ३६. || पत्र : वालजी गो० देसाईको (२१-६-१९२७) || ४१
|-
| ३७. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२१-६-१९२७) || ४२
|-
| ३८. || पत्र : जयकृष्ण प्रभुदास भणसालीको (२१-६-१९२७) || ४२
|-
| ३९. || पत्र : सातवलेकरको (२१-६-१९२७) || ४५
|-
| ४०. || पत्र : देवी वेस्टको (२२-६-१९२७) || ४५
|-
| ४१. || पत्र : एच० हारकोर्टको (२२-६-१९२७) || ४६
|-
| ४२. || पत्र : गो० कृ० देवधरको (२२-६-१९२७) ||४८
|-
| ४३. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२२-६-१९२७) || ४९
|-
| ४४. || लंकाशायर गुट (२३-६-१९२७) || ५०
|-
| ४५. || टिप्पणियाँ : आगामी दौरा; अश्लील विज्ञापन (२३-६-१९२७) || ५३
|-
| ४६. || तार : रामेश्वरदास पोद्दारको (२३-६-१९२७) || ५५
|-
| ४७. || पत्रः हेलेन हॉसडिंगको (२३-६-१९२७) || ५६
|-
| ४८. || पत्र : टी० डब्ल्यू० पेटावेलको (२३-६-१९२७) || ५६
|-
| ४९. || पत्र : हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्यायको (२४-६-१९२७) || ५९
|-
| ५०. || पत्र : पी० के० चार्लुको (२४-६-१९२७) || ६०
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| ५१. || पत्र: पी० राजगोपाल अय्यरको (२४-६-१९२७) || ६१
|-
| ५२. || पत्र : सरोजिनी नायडूको ( २५-६-१९२७) || ६२
|-
| ५३. || पत्र : शाह चमनलाल डूंगाजीको (२५-६-१९२७) || ६३
|-
| ५४. || पत्र : विलियम स्मिथको ( २५-६-१९२७) || ६४
|-
| ५५. || पत्र : के० केलप्पनको (२५-६-१९२७) || ६५
|-
| ५६. || 'नवजीवन' देवनागरीमें ( २६-६-१९२७) || ६६
|-
| ५७. || परोपकारी डॉक्टर (२६-६-१९२७) || ६७
|-
| ५९. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२६-६-१९२७) || ६८
|-
| ५८. || पत्र : एन० आर० मलकानीको (२६-६-१९२७) || ६८
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| ६०. || एक पत्र (२७-६-१९२७ के पूर्व) || ६९
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| ६१. || पत्र : तारा मोदीको (२७-६-१९२७) || ७०
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| ६२. || पत्र : डॉ० एम० एस० केलकरको (२८-६-१९२७) || ७१
|-
| ६३. || पत्र : श्रीमती ब्लेयरको (२८-६-१९२७) || ७२<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="4" user="सीमा1" />{{rh|५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>है। लेकिन अगर इस बात में सावधानी बरती जाये तो मैं समझता हूँ, अन्ततः भारतको भाषाके आधारपर गठित विभिन्न प्रान्तोंका एक स्वतन्त्र और स्वस्थ संघ ही बनाना पड़ेगा। छठा सवाल है:
::{{outdent|{{gap}}'''यहाँके अखबारों में छपे कई लेखोंमें ऐसा बताया गया है कि बहुत-सी बातोंपर आपका डॉ० ठाकुरसे<ref> रवीन्द्रनाथ ठाकुर।</ref> मतभेद हो गया है और अब आप उनकी
ओरसे बिलकुल विमुख हो गये हैं। क्या यह सच है? अगर सच है तो किन बातोंको लेकर यह मतभेद हुआ है?'''}}
बहुत-सी बातोंपर तो डॉ० ठाकुरसे मेरा मतभेद नहीं हुआ है। हाँ, कुछ बातोंमें हमारे बीच मतभेद जरूर है। आश्चर्य की बात तो तब होती, जब कोई मतभेद न होता। लेकिन उन मतभेदोंके कारण या और किसी कारणसे हमारे बीच तनिक भी मनमुटाव नहीं हुआ है। इसके विपरीत, हमारे सम्बन्ध सदासे अत्यन्त सौहार्दपूर्ण रहे हैं और आज भी हैं। सच तो यह है कि इन बौद्धिक मतभेदोंके कारण हमारी मैत्री और भी दृढ़ और सच्ची हो गई है। सातवाँ प्रश्न इस प्रकार है:
{{gap}}'''फिलहाल आप भारतमें क्या कर रहे हैं? क्या आपने राजनीतिक नेतृत्व और राजनीतिका त्याग कर दिया है?'''
इस समय तो मैं, जिसे सुअर्जित विश्राम कहा जा सकता है, उसी विश्रामका आनन्द ले रहा हूँ, और साथ ही अखिल भारतीय चरखा संघके कामको आगे बढ़ानेकी कोशिश कर रहा हूँ। इस समय अखिल भारतीय स्तरका यही एक कार्य है, जिसपर मैं ध्यान दे रहा हूँ। औपचारिक तौरपर तो मेरा राजनीतिक नेतृत्व उस वर्षकी समाप्ति के साथ-साथ खत्म हो गया, जिस वर्षके लिए मुझे कांग्रेसका अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन वास्तवमें वह मेरे जेल जानेके साथ ही समाप्त हो गया था। लेकिन, राजनीतिका जो अर्थ मैं लगाता हूँ, उसके अनुसार मैंने राजनीतिका त्याग नहीं किया है। मैं किसी और अर्थमें कभी राजनीतिज्ञ था भी नहीं। मेरी राजनीतिका सम्बन्ध आन्तरिक विकाससे है, किन्तु चूँकि उसका स्वरूप बहुत व्यापक है, इसलिए वह बाहरी जीवनपर भी बहुत असर डालती है। आठवाँ प्रश्न है:
::{{outdent|{{gap}}'''यहाँ मुझे रंगभेद बहुत फैला हुआ दिखाई देता है और कभी-कभी हमें अपने रंगके कारण बहुत मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। ऐसे प्रसंगोंपर आप मुझे क्या करनेकी सलाह देते हैं? क्या यह उचित होगा कि मैं पत्र लिखकर अपने देशके लोगों को यह सब बताऊँ? या जब-कभी मुझे यहाँ सार्वजनिक रूपसे बोलनेका निमन्त्रण मिले तब खुद अमेरिकी जनतासे ही यह सब कहना ठीक होगा?'''}}
मेरी सलाह इस प्रकार है: जब आप वहाँ गये हैं तो उस पूर्वग्रहको बर्दाश्त कीजिए; लेकिन अगर किसी भी प्रकारसे वह आपके आत्म-सम्मानको ठेस पहुँचाये तो आप प्राणपणसे उसका विरोध कीजिए। जो प्रतिकूल परिवेशमें रहकर भी अपना<noinclude>{{dhr|1em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५४
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|३२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>सम्बन्धित श्लोक मैंने उस लेखमें ही दे दिये हैं। अब नीचे उन लोगोंके लाभके लिए,
जो संस्कृत नहीं जानते, उन श्लोकोंका अंग्रेजी अनुवाद दे रहा हूँ । यह ‘भगवद्गीत’
के ‘साँग सेलेशियल’ नामसे एडविन आर्नाल्ड-कृत अनुवादसे लिया गया है।<ref>१. अंग्रेजी अनुवादका हिन्दी रूपान्तर यहाँ नहीं दिया जा रहा है। '''भगवद्गीताके''' मूल श्लोकोंके
लिए देखिए “ महान् प्रहरी ”, १३-१०-१९२१ ।</ref>
यहां कर्मसे तात्पर्य, निस्सन्देह, शारीरिक श्रमसे है, और यज्ञरूपमें किया गया
कर्म वही है जो समान लाभके लिए सभी लोगों द्वारा किया जाये। ऐसा कर्म, ऐसा
यज्ञ सिर्फ चरखा चलाना ही हो सकता है। मैं यह नहीं कहना चाहता कि ये श्लोक
रचते समय ‘गीता ’कारके मनमें चरखा ही रहा होगा। उन्होंने तो सिर्फ आचरणका
एक बुनियादी सिद्धान्त प्रस्तुत कर दिया। और भारतमें इन श्लोकोंका अध्ययन करते
हुए तथा भारतपर उन्हें लागू करते हुए तो मैं यही सोच सकता हूँ कि कताईका
काम ही वह शारीरिक श्रम है, जिसमें यज्ञकी गरिमा है। मैं तो इससे शुभतर या
बढ़कर राष्ट्रीय कर्मकी कोई कल्पना ही नहीं कर सकता कि जो काम करना हमारे
सभी गरीब भाइयोंके लिए अनिवार्य है, उस कामको सभी लोग प्रतिदिन ज्यादा नहीं
तो एक घंटा ही करें, और इस तरह उनके साथ और फलस्वरूप समस्त मानव-
जातिके साथ तादात्म्य स्थापित करें। मैं ईश्वरकी इससे बड़ी आराधनाकी कल्पना नहीं
कर सकता कि मैं गरीबोंके लिए उसी तरह काम करूँ जिस तरह वे स्वयं करते
हैं। चरखेका मतलब है दुनियाकी दौलतका अधिक न्यायोचित और समान बँटवारा।
{{C|'''बंगालका उत्साह'''}}
जिन लोगोंने कविवरका वह लेख नहीं पढ़ा है, उन्हें यह जानकर सन्तोषका
अनभव होगा कि वे चरखेके बिलकुल विरुद्ध हैं, ऐसी बात नहीं है। उन्हें इस बातकी
जरूरत नहीं दिखाई देती कि सभी लोग चरखा चलायें। लेकिन मुझे पूरा विश्वास
है कि जैसे-जैसे हम इस क्षेत्रमें आगे बढ़ते जायेंगे, भारतसे उसकी कष्टकर और
बढ़ती हुई गरीबीको दूर करनेके साधनके रूपमें चरखेकी कार्य-साधकता और महत्वमें
लोगोंका सन्देह समाप्त हो जायेगा । डा० प्रफुल्लचन्द्र रायने चरखेके महत्वको खुले
दिलसे स्वीकार किया है। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। और इससे भी बड़ी बात
चिट्ठियोंसे प्राप्त यह समाचार है कि देशबन्धु दास तथा उनकी पति-परायण पत्नी जहाँ
कहीं जाती हैं, लोग सामूहिक रूपसे विदेशी वस्त्रोंका त्याग करके चरखेको अपना
लेते हैं। यहाँ एक पत्रके अंशका अनुवाद दिया जा रहा है। यह पत्र एक बंगाली
भाईको उनके पिताने लिखा है, जो चाँदपुरके पास रहते हैं, जिसे गोरखोंके कारनामेने
भारत-भरमें प्रसिद्ध कर दिया है। चांदपुरके ही स्टेशनपर गोरखोंने उस भयंकर रात्रिमें
धावा किया था और असहाय कुलियोंको स्टेशनके अहातेसे निकाल बाहर किया था ।
उक्त पत्रका अंश इस प्रकार है :
'''कल समूह-गायन करता हुआ एक जुलूस निकला, हाथ-कते सूतकी प्रदर्शनी
'''हुई और नीरद पार्कमें एक भारी सार्वजनिक सभा हुई। . . . एक बहुत'''<noinclude>{{dhr|1em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५५
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ|
३२३}}</noinclude>:'''बड़ी होली जलाई गई, जिसमें टोपियों और कपड़ोंका इतना बड़ा ढेर जलाया गया कि मैं वर्णन नहीं कर सकता। पाल मार्केटका शाह साहूकार अपने विदेशी कपड़ोंका पूराका-पूरा स्टाक ही सभामें ले आया था, जिसे उसने आगको होम दिया। चरखेका प्रचार अबतक उतना अधिक नहीं हो पाया है, लेकिन मैं अब अच्छे परिणामोंकी आशा करता हूँ। मेरे परिवारमें तुम्हारी माँ, बहन और तीन भाई-सभी बहुत अच्छा सूत कात रहे हैं। ..'''
सारे बंगालमें जो कुछ हो रहा है, यह उसका एक नमूना-भर है। मुझे इसमें
तनिक भी सन्देह नहीं कि जब बंगालकी भावना जाग्रत हो उठेगी तब वह इस क्षेत्रमें
सबसे आगे होगा ।
{{C|'''उपाधियोंकी सूची'''}}
उपाधियोंकी सूची रोज-ब-रोज बढ़ती ही जा रही है। एक और जहाँ हम सर-
कारके लिए एक किस्मके खिताबोंको छोड़ रहे हैं तहाँ दूसरी तरहके खिताब, और सच्चे
खिताब, माँग रहे हैं। इस सम्मानके लिए अभी सबसे हाल ही में गंगाधरराव देशपाण्डे चुने
गये हैं। उनका नाम तथा जिन दूसरे बहुतसे लोगोंके बारेमें मैं सोच सकता हूँ उनके
नाम देखकर मुझे यकीन होता है कि अब हमारी विजयकी घड़ी निकट आ रही है।
बस, हमें सिर्फ बौछारके सामने स्थिर-भर रहना चाहिए। अगर हम सरकारके वारंट
आते ही बिना शोरगुल, बिना चीख-पुकार और बिना कोधके सरकारके हवाले हो जाया
करें तो हम निश्चित मान सकते हैं कि हम शीघ्र ही सफल होंगे। मेरे पास मित्रोंके ऐसे
पत्र लगातार आ रहे हैं जिनमें वे पूछते हैं कि अगर तमाम नेता लोग पकड़ लिये गये
तो फिर क्या होगा। उनका यह सवाल करना चाहे स्वराज्यके लिए उनकी अयोग्यता
न प्रकट करता हो, पर उसके प्रति उनका अविश्वास अवश्य प्रकट करता है । अगर
सभी नेता मर जायें तो क्या होगा? हमारी स्वराज्यकी योग्यता तभी सिद्ध होगी
जब हम मृत्यु अथवा कैदके कारण अपने नेताओंके हमारे पास न रहनेपर भी बराबर
काम करते रहें। नेताओंके जेल जानेकी स्मृतिसे निश्चय ही अनुशासित ढंगसे तथा
और अधिक कार्य करनेकी प्रेरणा मिलनी चाहिए। ऐसी अफवाह थी कि ५ तारीखको
में गिरफ्तार कर लिया जाऊँगा । ऐसा न होनेपर एक दूसरे मित्रको बड़ी निराशा
हुई, लेकिन उन्होंने स्वयं अपने और अपने कार्यके विषयमें बड़ा जबरदस्त विश्वास
प्रकट किया है। हमें तो बिना किसीके सहारेके अपने ही पाँवपर खड़ा होना चाहिए
ठीक उसी तरह जिस तरह हम बिना किसी बनावटी इमदादके अपनी साँस लेते
और छोड़ते हैं। अगर कर्नाटक वैसा ही देश है जैसी कि मेरी धारणा उसके विषयमें
है, तो गंगाधरराव देशपाण्डेकी गिरफ्तारी और उनके जेल जानेके परिणामस्वरूप वहाँ
विदेशी कपड़ोंका पूरा बहिष्कार होना चाहिए और बहुत ज्यादा खादी तैयार होने
लगती चाहिए। कर्नाटक तबतक सन्तुष्ट नहीं हो सकता जबतक कि वह खुद
अपने ही प्रयत्नोंके द्वारा अपने जेल गये हुए तथा आगे जो जेल जानेवाले हैं उन
देशभक्तोंको स्वतन्त्र न करा ले ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५६
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|३२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{c|'''अन्य नेता'''}}
{{Gap}}इस बातमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि बम्बई सरकार नेताओंको जेल भेजनेके
काममें बड़े ढंगके साथ लगी हुई है। सो इस तरह कि पीर तुराव अली शाह और
पीर मुजहिदको गिरफ्तार करके उसने दो ऐसे मुसलमानोंको गिरफ्तार किया है जिनके
अनुयायियोंकी संख्या बहुत बड़ी है और जिनके प्रभावका उपयोग साधारण लोगोंकी
हिसा-वृत्तिको रोकनेके लिए किया जाता था। कहनेकी जरूरत नहीं कि कर्नाटक में
श्रीयुत देशपाण्डेके अद्वितीय प्रभावका उपयोग भी शान्ति-रक्षाके लिए था। इसके बारेमें
कोई भी यही सोचेगा कि बम्बई सरकारको अब अपनी नरमीपर शायद शर्म आने
लगी और वह अबतककी कसर निकालनेकी कोशिश कर रही है। धारवाड़-निर्णय
और सिन्ध तथा कर्नाटककी गिरफ्तारियोंसे लगता है कि बम्बई सरकार लोगोंको हिंसा-
के लिए निमन्त्रण-सा दे रही है। लेकिन हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि इसका
मौका अब उसके हाथसे निकल गया है। मालूम होता है कि देश अब इस बातको
समझ गया है कि उसका हित किस बातमें है। और अब वह सरकारके हाथका
खिलौना न बन जायेगा। अगर हिन्दू और मुसलमान एक रहते हैं, जनता अहिंसाके
सिद्धान्तको सोच-समझकर बुद्धिपूर्वक अपना लेती है और स्वदेशीका काम तरतीबके
साथ होने लगता है तो फिर कोई भी ताकत हमको इसी साल स्वराज्य प्राप्त करनेसे
नहीं रोक सकती।
{{C|'''मजिस्ट्रेटकी क्षमा याचना'''}}
पाठकोंको याद होगा कि बुलन्दशहरके मजिस्ट्रेटने श्री त्यागीको थप्पड़ लगवाये
थे<ref>१. देखिए “ टिप्पणियाँ ", १३-१०-१९२१ का उप-शीर्षक “विपरीत दृश्य " ।</ref> हालाँकि उस समय उनके मुकदमेकी सुनवाई हो रही थी और इसलिए वे मजिस्ट्रेटके
संरक्षणमें थे । मजिस्ट्रेटने इसके लिए मुजरिमसे क्षमा याचना की। अब मुझे उसका
पाठ मिल गया है। वह इस प्रकार है:
:'''अदालतमें हाजिर मुजरिम,'''
:'''आजकी कार्रवाई आगे चलने से पहले कुछ कहना चाहता हूँ ।'''
:'''ऐसा मैं दो कारणोंसे कर रहा हूँ-एक तो इस कारणसे कि में तुम्हारे मामलेकी सुनवाई कर रहा हूँ और यह ठीक नहीं है कि तुम या कोई भी
'''ऐसा सन्देह करे कि तुम्हारी सुनवाई न्यायपूर्वक और उचित ढंगसे नहीं होगी। दूसरा कारण यह है कि सरकारका कोई भी अधिकारी यह नहीं चाहेगा कि कोई भी ऐसी घटना हो जिससे समाजके किसी भी हिस्सेको शिकायतका कोई उचित अवसर मिले — विशेषकर इसलिए कि बहुतसे सिद्धान्तहीन और मौकेका नाजायज फायदा उठानेवाले लोग ऐसी घटनाओंको नमक-मिर्च लगाकर पेश करनेको तैयार बैठे हैं ।'''
:'''पहली सुनवाईके समय में अधीर हो रहा था और तुम उद्धत थे। मैंने तुम्हें थप्पड़ लगवाकर गलती की और उसके लिए मुझे खेद है।'''<noinclude>{{dhr|1em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="सीमा1" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}}}
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{{c|११}}
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{{c|{{larger|(अप्रैल १९११—नवम्बर १९१३)}}}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="सीमा1" /></noinclude>{{dhr}}
{{c|{{xx-larger|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''}}<br>
{{dhr}}
{{larger|'''११'''}}}}
{{c|(अप्रैल १९११ – मार्च १९१३)}}
{{dhr|30em}}
[[चित्र:Emblem of India.svg|50px|फ़्रेमहीन|केंद्र]]
{{c|{{larger|'''प्रकाशन विभाग'''}}<br>'''सूचना और प्रसारण मन्त्रालय'''<br>'''भारत सरकार'''}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५२
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१०४. पत्र : मणिलाल गांधीको'''}}}}
{{Right|सोमवार [२१ फरवरी, १९२७]}}<ref>इस पत्रमें तथा अगले दो पत्रोंमें मणिलालके विवाहको तथा पण्डितजीको विवाहमें आनेका सन्देश
भेजे जानेकी चर्चासे लगता है कि ये सब पत्र एक ही तारीखको लिखे गये थे।>/ref>
{{Left|चि० मणिलाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मैं सुशीलासे कोई प्रतिज्ञा नहीं कराना चाहता। उसे में इतना जानता भी नहीं हूँ। लेकिन तुम्हें इस कुटुम्बको जान लेना चाहिए। यह बड़ा सुसंस्कारी कुटुम्ब है। सभी लोग खादी पहनते हैं। तुम्हारे लिये खादी पहनना मुश्किल है, यह बात मैंने मान ली है। सुशीला यदि देशी ढंगसे साड़ी आदि पहनती रही तो उसके लिए [खादी पह्नना] मुश्किल नहीं है। मामूली खर्च करके खादीकी अच्छी पोशाक बनवा ली जा सकती है। अब तो एडनबरा तकमें खादी पह्ननेवाले मिल जाते हैं।
मेरा प्रयत्न तुम्हें अथवा सुशीलाको संन्यासी बनानेका नहीं है। हाँ, तुम्हें मर्यादा-शील गृहस्थ अवश्य बनाना चाहता हूँ। यदि तुम्हें संन्यासी बनाना मेरा उद्दिष्ट होता तो तुम्हें विवाहकी झंझटमें क्यों डालता? तुम मर्यादामें रहकर विषय-सुखका सेवन करो, मैं इसका विरोधी नहीं हूँ इतना कहनेके बावजूद तुम स्वतन्त्र हो और अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करो। मैं तुमपर तनिक भी दबाव न डालूंगा।
जमनालालजी संन्यासी नहीं बन गये हैं; उन्होंने बहुतसे विषय भोगोंको जरूर त्याग दिया है। तुम्हारी आयु कम नहीं है। मैं तुम्हें बालक नहीं मानता।
में सभी बातोंमें तुमसे पूछ-पूछकर कदम उठा रहा हूँ विवाह-विधिके बारेमें भी तुम कोई परिवर्तन करना चाहो अथवा समारोहकी इच्छा करो तो मुझे अवश्य बताना। मैंने तो जो उचित लगा है सो तुम्हें सुझाया है और किया है। लेकिन मेरी इच्छा अपने धर्मका अनुसरण करते हुए जितनी हदतक तुम्हारे अनुकूल बन सकूँ उतनी हदतक अनुकूल बननेकी है। युवा स्त्री या पुरुषके जीवनमें विवाह एक महत्त्व-पूर्ण परिवर्तन है, यह मैं जानता हूँ। उसमें माता-पिताको बीचमें नहीं पड़ना चाहिए, यह भी मैं जानता हूँ। तुमपर किसी भी तरहका दबाव है, ऐसा न मानना। में इससे ज्यादा खुलकर और क्या लिखूं और इससे ज्यादा अभय दान क्या दूँ?
पण्डितजीको नानाभाईने बुलाया है, इसलिए वे तुम्हारे साथ आयेंगे। तुम दोनों ताप्ती घाटी के मार्ग से आकर मेरे साथ ही चल सकते हो। इस तरह समय भी बच
सकता है। लेकिन जैसा तुम दोनोंको ठीक लगे वैसा करना।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० १११९) से।<br>सौजन्य: सुशीलाबह्न गांधी|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१०४. पत्र : मणिलाल गांधीको'''}}}}
{{Right|सोमवार [२१ फरवरी, १९२७]<ref>इस पत्रमें तथा अगले दो पत्रोंमें मणिलालके विवाहको तथा पण्डितजीको विवाहमें आनेका सन्देश
भेजे जानेकी चर्चासे लगता है कि ये सब पत्र एक ही तारीखको लिखे गये थे।</ref>}}
{{Left|चि० मणिलाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मैं सुशीलासे कोई प्रतिज्ञा नहीं कराना चाहता। उसे में इतना जानता भी नहीं हूँ। लेकिन तुम्हें इस कुटुम्बको जान लेना चाहिए। यह बड़ा सुसंस्कारी कुटुम्ब है। सभी लोग खादी पहनते हैं। तुम्हारे लिये खादी पहनना मुश्किल है, यह बात मैंने मान ली है। सुशीला यदि देशी ढंगसे साड़ी आदि पहनती रही तो उसके लिए [खादी पह्नना] मुश्किल नहीं है। मामूली खर्च करके खादीकी अच्छी पोशाक बनवा ली जा सकती है। अब तो एडनबरा तकमें खादी पह्ननेवाले मिल जाते हैं।
मेरा प्रयत्न तुम्हें अथवा सुशीलाको संन्यासी बनानेका नहीं है। हाँ, तुम्हें मर्यादा-शील गृहस्थ अवश्य बनाना चाहता हूँ। यदि तुम्हें संन्यासी बनाना मेरा उद्दिष्ट होता तो तुम्हें विवाहकी झंझटमें क्यों डालता? तुम मर्यादामें रहकर विषय-सुखका सेवन करो, मैं इसका विरोधी नहीं हूँ इतना कहनेके बावजूद तुम स्वतन्त्र हो और अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करो। मैं तुमपर तनिक भी दबाव न डालूंगा।
जमनालालजी संन्यासी नहीं बन गये हैं; उन्होंने बहुतसे विषय भोगोंको जरूर त्याग दिया है। तुम्हारी आयु कम नहीं है। मैं तुम्हें बालक नहीं मानता।
में सभी बातोंमें तुमसे पूछ-पूछकर कदम उठा रहा हूँ विवाह-विधिके बारेमें भी तुम कोई परिवर्तन करना चाहो अथवा समारोहकी इच्छा करो तो मुझे अवश्य बताना। मैंने तो जो उचित लगा है सो तुम्हें सुझाया है और किया है। लेकिन मेरी इच्छा अपने धर्मका अनुसरण करते हुए जितनी हदतक तुम्हारे अनुकूल बन सकूँ उतनी हदतक अनुकूल बननेकी है। युवा स्त्री या पुरुषके जीवनमें विवाह एक महत्त्व-पूर्ण परिवर्तन है, यह मैं जानता हूँ। उसमें माता-पिताको बीचमें नहीं पड़ना चाहिए, यह भी मैं जानता हूँ। तुमपर किसी भी तरहका दबाव है, ऐसा न मानना। में इससे ज्यादा खुलकर और क्या लिखूं और इससे ज्यादा अभय दान क्या दूँ?
पण्डितजीको नानाभाईने बुलाया है, इसलिए वे तुम्हारे साथ आयेंगे। तुम दोनों ताप्ती घाटी के मार्ग से आकर मेरे साथ ही चल सकते हो। इस तरह समय भी बच
सकता है। लेकिन जैसा तुम दोनोंको ठीक लगे वैसा करना।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० १११९) से।<br>सौजन्य: सुशीलाबह्न गांधी|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/३१४
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<noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको''''}}</center>
{{right|[ लॉली ]}}
{{right|जुलाई १७, १९१२}}
माननीय गृहमन्त्री
प्रिटोरिया
महोदय,
प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र मिला। उसके लिए धन्यवाद ।
मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौते के अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने- पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें।
{{right|आपका}}
{{right|[ मो० क० गांधी ]}}
जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी ।
<center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''}}</center>
श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं • यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ? • वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप
१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)
२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।
३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="जुनैद जमान अंसारी" /></noinclude><center>{{x-larger|'''२३६. पत्र : गृह-मन्त्रीको'''}}</center>
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{{right|जुलाई १७, १९१२}}
माननीय गृहमन्त्री
प्रिटोरिया
महोदय,
प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकसे सम्बन्धित मेरे पत्रोंके जवाबमें आपका १६ तारीख- का पत्र मिला। उसके लिए धन्यवाद ।
मेरी समझमें आपके पत्रका अर्थ यह है कि समझौते के अनुसार अपेक्षित कोई सन्तोषजनक कानून बन जाने तक पिछले वर्षका अस्थायी समझौता कायम रहेगा। इसलिए मैं मान लेता हूँ कि उक्त सम्भावनाके आधारपर पिछले वर्षकी तरह ही इस वर्ष भी कुछ शिक्षित एशियाइयोंको प्रवेश दिया जायेगा। आपका पत्र मिलने- पर इस प्रान्तमें प्रवेश पानेके इच्छुक शिक्षित भारतीयोंके नाम सरकारके पास भेज दिये जायेंगे, ताकि उन्हें अनुमतिपत्र प्राप्त हो सकें।
{{right|आपका}}
{{right|[ मो० क० गांधी ]}}
जुलाई २०, १९१२ के 'इंडियन ओपिनियन' और टाइप की हुई दफ्तरी अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ५६६३) की फोटो नकलसे भी ।
<center>{{x-larger|'''२३७. नये मुल्लाके बारेमें कुछ और'''}}</center>
श्री कजिन्स अभी तक " बेधड़क बढ़ते ही जा रहे हैं।" उन्हें हमारी माताओं और बहनोंका अपमान करके ही सन्तोष नहीं • यद्यपि इससे अधिक बड़ी बात हो भी क्या सकती है ? • वह हमें हर बातमें छेड़ना चाहते हैं । उनका नया हुक्म यह है कि जो लोग भारतसे लौटें वे कागजात पेश करके अपनी शिनाख्त प्रमाणित तो करें ही, किन्तु केवल इतनेसे काम नहीं चलेगा; वे [ कजिन्स साहब ] अपने-आप
१. इसके जवाब में कार्यवाहक गृह सचिवने जुलाई १९ को लिखा: “मैं आज आपके नाम भेजे गये निम्नलिखित तारकी पुष्टि करता हूँ: । गत वर्षका अस्थायी समझौता कानून बन जाने तक कायम रहेगा। इसलिए इस साल छः शिक्षित भारतीयोंको पंजीयनका सवाल उठाये बिना प्रवेश दिया जायेगा...। उपर्युक्त तारके सम्बन्ध में उन छः शिक्षित भारतीयोंके नाम भेज देनेकी कृपा करें जिन्हें आप इस वर्षं प्रवेश दिलाना चाहते हैं ।" (एस० एन० ५६६७)
२. देखिए पाद-टिप्पणी १, पृष्ठ २६८ ।
३. देखिए "नया मुल्ला", पृष्ठ २७४-७६ ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२३
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<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>{{c|सत्रह|}}
{|width=100%
|-
|६७. || पत्र : नॉक्सको (१९-५-१९११) || ८०
|-
|६८. || एक अच्छा उद्देश्य (२०-५-१९११) || ८१
|-
|६९. || परवानोंकी कलंक-कथा (२०-५-१९११) || ८१
|-
|७०. || पत्र : गृह-मन्त्रीको (२०-५-१९११) || ८३
|-
|७१. || वक्तव्य : प्रस्तावित शिष्टमण्डलके लिए (२०-५-१९११के बाद) || ८४
|-
|७२. || सत्याग्रहियोंको सूचना ( २२-५-१९११) || ८५
|-
|७३. || भेंट : रायटरके प्रतिनिधिको (२३-५-१९११) || ८७
|-
|७४. || पत्र : एशियाई-पंजीयकको (२६-५-१९११) || ८७
|-
|७५. || सत्याग्रहियोंके लिए (२७-५-१९११) || ८८
|-
|७६. || आखिरकार ! (२७-५-१९११) || ८९
|-
|७७. || सत्याग्रहियोंसे (२७-५-१९११) || ९२
|-
|७८. || पत्र : हरिलाल गांधीको (२७-५-१९११) || ९२
|-
|७९. || पत्र : जी० ए० नटेसनको (३१-५-१९११) || ९४
|-
|८०. || पत्र : जी० ए० नटेसनको (२-६-१९११) || ९५
|-
|८१. || क्रूगर्सडॉर्पके आन्दोलनकारी (३-३-१९११) || ९६
|-
|८२. || सत्याग्रहसे क्या मिला ? (३-६-१९११) || ९७
|-
|८३. || संक्षिप्त रूप (६-६-१९११के बाद) || १००
|-
|८४. || पत्र : मगनलाल गांधीको (९-६-१९११के पूर्व ) || १००
|-
|८५. || अभिनन्दनपत्र : डब्ल्यू० हॉस्केनको (९-६-१९११) || १०१
|-
|८६. || घेरा (१०-६-१९११) || १०२
|-
|८७. || भाषण : डर्बनमें आयोजित सोराबजीकी विदाई-सभायें (१६-६-१९११) || १०३
|-
|८८. || राज्याभिषेक ( १७-६-१९११) || १०३
|-
|८९. || प्रीतिभोज (१७-६-१९११) || १०५
|-
|९०. || हॉस्केनका चित्र ( १७-६-१९११) || १०६
|-
|९१. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१७-६-१९११) || १०७
|-
|९२. || राज्याभिषेक (२४-६-१९११) || १०७
|-
|९३. || राज्याभिषेक (२४-६-१९११) || १०८
|-
|९४. || एक सत्याग्रहीका सम्मान (२४-६-१९११) || ११०
|-
|९५. || पोलकका कार्य (१-७-१९११) || १११
|-
|९६. || जोहानिसबर्गकी चिट्ठी (१-७-१९११) || १११
|-
|९७. || प्राणजीवन मेहताको लिखे पत्रका अंश (१-७-१९११के बाद) || ११२
|-
|९८. || पत्र : हरिलाल गांधीको ( ३-७-१९११)|| ११३
|-
|९९. || क्रूगर्सडॉर्पका बाजार (८-७-१९११) || ११४
|-
|१००. || भारतीय पत्नियां (८-७-१९११) || ११५
|-
|१०१. || जोहानिसबर्गकी चिट्ठी (८-७-१९११) || ११६
|-
|१०२. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१२-७-१९११) || ११८
|-
|१०३. || उपनिवेशमें जन्मे भारतीयोंसे (१५-७-१९११) || ११९
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|सत्रह|}}
{|width=100%
|-
|६७. || पत्र : नॉक्सको (१९-५-१९११) || ८०
|-
|६८. || एक अच्छा उद्देश्य (२०-५-१९११) || ८१
|-
|६९. || परवानोंकी कलंक-कथा (२०-५-१९११) || ८१
|-
|७०. || पत्र : गृह-मन्त्रीको (२०-५-१९११) || ८३
|-
|७१. || वक्तव्य : प्रस्तावित शिष्टमण्डलके लिए (२०-५-१९११के बाद) || ८४
|-
|७२. || सत्याग्रहियोंको सूचना ( २२-५-१९११) || ८५
|-
|७३. || भेंट : रायटरके प्रतिनिधिको (२३-५-१९११) || ८७
|-
|७४. || पत्र : एशियाई-पंजीयकको (२६-५-१९११) || ८७
|-
|७५. || सत्याग्रहियोंके लिए (२७-५-१९११) || ८८
|-
|७६. || आखिरकार ! (२७-५-१९११) || ८९
|-
|७७. || सत्याग्रहियोंसे (२७-५-१९११) || ९२
|-
|७८. || पत्र : हरिलाल गांधीको (२७-५-१९११) || ९२
|-
|७९. || पत्र : जी० ए० नटेसनको (३१-५-१९११) || ९४
|-
|८०. || पत्र : जी० ए० नटेसनको (२-६-१९११) || ९५
|-
|८१. || क्रूगर्सडॉर्पके आन्दोलनकारी (३-३-१९११) || ९६
|-
|८२. || सत्याग्रहसे क्या मिला ? (३-६-१९११) || ९७
|-
|८३. || संक्षिप्त रूप (६-६-१९११के बाद) || १००
|-
|८४. || पत्र : मगनलाल गांधीको (९-६-१९११के पूर्व ) || १००
|-
|८५. || अभिनन्दनपत्र : डब्ल्यू० हॉस्केनको (९-६-१९११) || १०१
|-
|८६. || घेरा (१०-६-१९११) || १०२
|-
|८७. || भाषण : डर्बनमें आयोजित सोराबजीकी विदाई-सभायें (१६-६-१९११) || १०३
|-
|८८. || राज्याभिषेक ( १७-६-१९११) || १०३
|-
|८९. || प्रीतिभोज (१७-६-१९११) || १०५
|-
|९०. || हॉस्केनका चित्र ( १७-६-१९११) || १०६
|-
|९१. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१७-६-१९११) || १०७
|-
|९२. || राज्याभिषेक (२४-६-१९११) || १०७
|-
|९३. || राज्याभिषेक (२४-६-१९११) || १०८
|-
|९४. || एक सत्याग्रहीका सम्मान (२४-६-१९११) || ११०
|-
|९५. || पोलकका कार्य (१-७-१९११) || १११
|-
|९६. || जोहानिसबर्गकी चिट्ठी (१-७-१९११) || १११
|-
|९७. || प्राणजीवन मेहताको लिखे पत्रका अंश (१-७-१९११के बाद) || ११२
|-
|९८. || पत्र : हरिलाल गांधीको ( ३-७-१९११)|| ११३
|-
|९९. || क्रूगर्सडॉर्पका बाजार (८-७-१९११) || ११४
|-
|१००. || भारतीय पत्नियां (८-७-१९११) || ११५
|-
|१०१. || जोहानिसबर्गकी चिट्ठी (८-७-१९११) || ११६
|-
|१०२. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१२-७-१९११) || ११८
|-
|१०३. || उपनिवेशमें जन्मे भारतीयोंसे (१५-७-१९११) || ११९
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|अठारह|}}
{|width=100%
|-
|१०४. || भारतकी दुर्दशा (१५-७-१९११) || १२०
|-
|१०५. || पत्र : मगनलाल गांधीको (१७-७-१९११) || १२२
|-
|१०६. || पत्र : हरिलाल गांधीको (२५-७-१९११) || १२४
|-
|१०७. || मणिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश ( २५-७-१९११के आसपास) || १२६
|-
|१०८. || मानपत्र : एच० कैलनबैकको (३१-७-१९११) || १२६
|-
|१०९. || पत्र : छगनलाल गांधीको (१-८-१९११) || १२७
|-
|११०. || श्री कैलनबैकका स्वागत (५-८-१९११) || १२९
|-
|१११. || श्री कैलनबैक (५-८-१९११) || १३१
|-
|११२. || क्षयरोग (५-८-१९११) || १३१
|-
|११३ || पत्र : एच० एल० पॉलको (७-८-१९११) || १३३
|-
|११४. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (७-८-१९११) || १३३
|-
|११५. || तूफान उमड़ रहा है (१२-८-१९११) || १३५
|-
|११६. || पत्र : गृह मन्त्रीको (१२-८-१९११) || १३६
|-
|११७. || पत्र: छगनलाल गांधीको (१३-८-१९११) || १३६
|-
|११८. || भारतीयों द्वारा श्री रिचका समर्थन (१९-८-१९११) || १३७
|-
|११९. || एक महत्वपूर्ण निर्णय (१९-८-१९११) || १३९
|-
|१२०. || शिक्षाका कलंक (१९-८-१९११ ) || १३९
|-
|१२१. || भारतीय माता-पिताओंके लिए (१९-८-१९११) || १४०
|-
|१२२. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (२०-८-१९११) || १४१
|-
|१२३. || पत्र : एशियाई पंजीयकको (२१-८-१९११) || १४२
|-
|१२४. || पत्र : छगनलाल और मगनलाल गांधीको (२३-८-१९११) || १४४
|-
|१२५. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (२५-८-१९११) || १४६
|-
|१२६. || पत्र : जमनादास गांधीको (२८-८-१९११) || १४८
|-
|१२७. || पत्र : छगनलाल गांधीको (२९-८-१९११) || १४९
|-
|१२८. || पत्र : मगनलाल गांधीको (९-९-१९११) || १५०
|-
|१२९. || जर्मिस्टनके भारतीय (२३-९-१९११) || १४२
|-
|१३०. || एक क्षोभकारी मामला (२३-९-१९११) || १५३
|-
|१३१. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (२४-९-१९११) || १५४
|-
|१३२. || छगनलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (२८-९-१९११से पूर्व ) || १५६
|-
|१३३. || श्री गांधी और भारतीय कांग्रेस (३०-९-१९११) || १५७
|-
|१३४. || एक पत्रका अंश (२-१०-१९११ के लगभग) || १५७
|-
|१३५. || सूखकर कांटा हो गये (७-१०-१९११) || १५८
|-
|१३६. || मूर्खराज और उनके भाई (७-१०-१९११) || १५९
|-
|१३७. || हरिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (७-१०-१९११ के आसपास) || १६०
|-
|१३८. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (१०-१०-१९११) || १६०
|-
|१३९. || आव्रजनका मामला (१४-१०-१९११) || १६२
|-
|१४०. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (२२ -८-१९११) || १६३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>{{c|उन्नीस|}}
{|width=100%
|-
|१४१. || भाषण : नव-वर्ष समारोहमें (२३-१०-१९११ ) || १६६
|-
|१४२. || पत्र : गो० कृ० गोखले को (२४-१०-१९११) || १६७
|-
|१४३. || श्री और श्रीमती पोलक (२८-१०-१९११) || १६८
|-
|१४४. || सत्याग्रहका एक नतीजा (२८-१०-१९११) || १६९
|-
|१४५. || सत्याग्रहकी जीत (२८-१०-१९११) || १७१
|-
|१४६. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (३०-१०-१९११) || १७३
|-
|१४७. || तीन पौंडी कर (११-११-१९११) || १७७
|-
|१४८. || देशमें अकाल (११-११-१९११) || १७८
|-
|१४९. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (११-११-१९११) || १७९
|-
|१५० || अभिनन्दनपत्र : श्रीमती वोगलको (१५-११-१९११) || १८०
|-
|१५१. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (१७-११-१९११) || १८१
|-
|१५२. || विश्वासघात (१८-११-१९११) || १८२
|-
|१५३. || पत्र : ए० एच० वेस्टको (२४-११-१९११) || १८३
|-
|१५४. || खेदजनक उत्तर (२५-११-१९११) || १८४
|-
|१५५. || पत्र: मणिलाल गांधीको (२७-११-१९११) || १८५
|-
|१५६. || एक पत्रका अंश (२७-११-१९११के बाद) || १८६
|-
|१५७. || पत्र : ए० एच० वेस्टको (२८-११-१९११) || १८७
|-
|१५८. || पत्र : रावजीभाई पटेलको (२९-११-१९११) || १८८
|-
|१५९. || एशियाई आचार-विचारपर हमला (२-११-१९११) || १८९
|-
|१६०. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (७-१२-१९११) || १९०
|-
|१६१. || पत्र : गो० कृ० गोखले को (८-१२-१९११ ) || १९१
|-
|१६२. || मिश्रित स्कूल और नैतिकता (९-१२-१९११) || १९२
|-
|१६३. || स्वदेशमें अकाल (९-१२-१९११) || १९३
|-
|१६४. || पत्र : छगनलाल गांधीको (९-१२-१९११) || १९४
|-
|१६५. || अन्यायपूर्ण कर (१६-१२-१९११) || १९५
|-
|१६६. || तार : गृह-मन्त्रीके निजी सचिवको (२१-१२-१९११) || १९७
|-
|१६७. || साम्राज्य-सरकारसे क्या अपेक्षा करें ? ( २३-१२-१९११) || १९७
|-
|१६८. || एक लज्जाजनक कृत्य (३०-१२-१९११) || १९९
|-
|१६९. || नया वर्ष (३०-१२-१९११) || २००
|-
|१७०. || अकाल (६-१-१९१२) || २०२
|-
|१७१. || श्री पोलक भारतीय राष्ट्रीय महासभा (६-१-१९१२) || २०३
|-
|१७२. || खुशखबरी (६-१-१९१२) || २०४
|-
|१७३. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१२-१-१९१२) || २०४
|-
|१७४. || जोहानिसबर्ग में चेचक (१३-१-१९१२) || २०५
|-
|१७५. || भेंट : ' इवनिंग क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिको (१५-१-१९१२) || २०६
|-
|१७६. || प्लेग (२०-१-१९१२) || १०९
|-
|१७७. || जोहानिसबर्गमें चेचक (२०-१-१९१२) || १०९
|}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|उन्नीस|}}
{|width=100%
|-
|१४१. || भाषण : नव-वर्ष समारोहमें (२३-१०-१९११ ) || १६६
|-
|१४२. || पत्र : गो० कृ० गोखले को (२४-१०-१९११) || १६७
|-
|१४३. || श्री और श्रीमती पोलक (२८-१०-१९११) || १६८
|-
|१४४. || सत्याग्रहका एक नतीजा (२८-१०-१९११) || १६९
|-
|१४५. || सत्याग्रहकी जीत (२८-१०-१९११) || १७१
|-
|१४६. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (३०-१०-१९११) || १७३
|-
|१४७. || तीन पौंडी कर (११-११-१९११) || १७७
|-
|१४८. || देशमें अकाल (११-११-१९११) || १७८
|-
|१४९. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (११-११-१९११) || १७९
|-
|१५० || अभिनन्दनपत्र : श्रीमती वोगलको (१५-११-१९११) || १८०
|-
|१५१. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (१७-११-१९११) || १८१
|-
|१५२. || विश्वासघात (१८-११-१९११) || १८२
|-
|१५३. || पत्र : ए० एच० वेस्टको (२४-११-१९११) || १८३
|-
|१५४. || खेदजनक उत्तर (२५-११-१९११) || १८४
|-
|१५५. || पत्र: मणिलाल गांधीको (२७-११-१९११) || १८५
|-
|१५६. || एक पत्रका अंश (२७-११-१९११के बाद) || १८६
|-
|१५७. || पत्र : ए० एच० वेस्टको (२८-११-१९११) || १८७
|-
|१५८. || पत्र : रावजीभाई पटेलको (२९-११-१९११) || १८८
|-
|१५९. || एशियाई आचार-विचारपर हमला (२-११-१९११) || १८९
|-
|१६०. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (७-१२-१९११) || १९०
|-
|१६१. || पत्र : गो० कृ० गोखले को (८-१२-१९११ ) || १९१
|-
|१६२. || मिश्रित स्कूल और नैतिकता (९-१२-१९११) || १९२
|-
|१६३. || स्वदेशमें अकाल (९-१२-१९११) || १९३
|-
|१६४. || पत्र : छगनलाल गांधीको (९-१२-१९११) || १९४
|-
|१६५. || अन्यायपूर्ण कर (१६-१२-१९११) || १९५
|-
|१६६. || तार : गृह-मन्त्रीके निजी सचिवको (२१-१२-१९११) || १९७
|-
|१६७. || साम्राज्य-सरकारसे क्या अपेक्षा करें ? ( २३-१२-१९११) || १९७
|-
|१६८. || एक लज्जाजनक कृत्य (३०-१२-१९११) || १९९
|-
|१६९. || नया वर्ष (३०-१२-१९११) || २००
|-
|१७०. || अकाल (६-१-१९१२) || २०२
|-
|१७१. || श्री पोलक भारतीय राष्ट्रीय महासभा (६-१-१९१२) || २०३
|-
|१७२. || खुशखबरी (६-१-१९१२) || २०४
|-
|१७३. || पत्र : गो० कृ० गोखलेको (१२-१-१९१२) || २०४
|-
|१७४. || जोहानिसबर्ग में चेचक (१३-१-१९१२) || २०५
|-
|१७५. || भेंट : ' इवनिंग क्रॉनिकल' के प्रतिनिधिको (१५-१-१९१२) || २०६
|-
|१७६. || प्लेग (२०-१-१९१२) || १०९
|-
|१७७. || जोहानिसबर्गमें चेचक (२०-१-१९१२) || १०९
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>{{c|बीस|}}
{|width=100%
|-
|१७८. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (२९-१-१९१२) || २१०
|-
|१७९. || तार : गृह-मन्त्रीके निजी सचिवको (३०-१-१९१२) || २१२
|-
|१८०. || तार : गृहमन्त्रीके निजी सचिवको (१-२-१९१२) || २१३
|-
|१८१. || एक टिप्पणी (२-२-१९१२ या उसके बाद ) || २१४
|-
|१८२. || नया प्रवासी विधेयक ( ३-२-१९१२) || २१४
|-
|१८३. || स्व० श्री अब्दुल्ला हाजी आदम ( ३-२-१९१२) || २१६
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|१८४. || नया प्रवासी विधेयक ( ३-२-१९१२) || २१७
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|१८५. || तार : ब्रिटिश भारतीय यूनियनको ( ३-२-१९१२) || २२०
|-
|१८६. || पत्र : रावजीभाई पटेलको (४-२-१९१२) || २२१
|-
|१८७ || प्रस्ताव : केप ब्रिटिश भारतीय यूनियनको सभामें (४-२-१९१२) || २२२
|-
|१८८. || तारः गृह-मन्त्रीको (६-२-१९१२)|| २२३
|-
|१८९. || तारः गृह-मन्त्रीके निजी सचिवको (७-२-१९१२) || २२४
|-
|१९०. || तार : गृह-मन्त्रीको (८-२-१९१२) || २२४
|-
|१९१. || प्रवासी विधेयक (१०-२-१९१२)|| २२५
|-
|१९२. || अकाल निवारण कोषकी पहली किस्त (१०-२-१९१२) || २२६
|-
|१९३. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (१५-२-१९१२) || २२७
|-
|१९४. || पत्र : आर० ग्रेगरोवस्कीको (१५-२-१९१२) || २२८
|-
|१९५. || तीन पौंडी कर (१७-२-१९१२) || २३१
|-
|१९६. || पत्र : चंचल बहन गांधीको (१८-२-१९१२) || २३३
|-
|१९७. || हरिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (१८-२-१९१२)|| २३४
|-
|१९८. || पत्र : आर० ग्रेगरोवस्कीको (२०-२-१९१२) || २३५
|-
|१९९. || तार : एशियाई पंजीयकको (२१-२ - १९१२से पूर्व ) || २३६
|-
|२००. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (२४-२-१९१२)|| २३७
|-
|२०१. || गलत बयानी (९-३-१९१२) || २३८
|-
|२०२. || श्रीमती जसातका मामला (९-३-१९१२) || २३९
|-
|२०३. || भाषण : विदाई सभामें (९-३-१९१२) || २४१
|-
|२०४. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (११-२-१९१२)|| २४१
|-
|२०५. || गिरमिटिया प्रथा-सम्बन्धी प्रस्ताव (१६-३-१९१२) || २४२
|-
|२०६. || श्री रत्नम् पत्तर (१६-३-१९१२) || २४३
|-
|२०७. || तार : गृह-मन्त्रीको (२०-३-१९१२) || २४४
|-
|२०८. || पत्र: छगनलाल गांधीको (२४-३-१९१२) || २४४
|-
|२०९. || सार्वजनिक पत्र : रतन जे० टाटाको (१-४-१९१२) || २४५
|-
|२१०. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (४-४-१९१२) || २५०
|-
|२११. || बस्तियाँ और रोग ( ६-४-१९१२) || २५१
|-
|२१२. || पत्र: मणिलाल गांधीको ( ६-४-१९१२) || २५२
|-
|२१३. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (११-४-१९१२)|| १५३
|-
|२१४. || पत्र: मणिलाल गांधीको ( १३-४-१९१२)|| १५४
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|१७८. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (२९-१-१९१२) || २१०
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|१७९. || तार : गृह-मन्त्रीके निजी सचिवको (३०-१-१९१२) || २१२
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|१८१. || एक टिप्पणी (२-२-१९१२ या उसके बाद ) || २१४
|-
|१८२. || नया प्रवासी विधेयक ( ३-२-१९१२) || २१४
|-
|१८३. || स्व० श्री अब्दुल्ला हाजी आदम ( ३-२-१९१२) || २१६
|-
|१८४. || नया प्रवासी विधेयक ( ३-२-१९१२) || २१७
|-
|१८५. || तार : ब्रिटिश भारतीय यूनियनको ( ३-२-१९१२) || २२०
|-
|१८६. || पत्र : रावजीभाई पटेलको (४-२-१९१२) || २२१
|-
|१८७. || प्रस्ताव : केप ब्रिटिश भारतीय यूनियनको सभामें (४-२-१९१२) || २२२
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|१८८. || तारः गृह-मन्त्रीको (६-२-१९१२)|| २२३
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|१८९. || तारः गृह-मन्त्रीके निजी सचिवको (७-२-१९१२) || २२४
|-
|१९०. || तार : गृह-मन्त्रीको (८-२-१९१२) || २२४
|-
|१९१. || प्रवासी विधेयक (१०-२-१९१२)|| २२५
|-
|१९२. || अकाल निवारण कोषकी पहली किस्त (१०-२-१९१२) || २२६
|-
|१९३. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (१५-२-१९१२) || २२७
|-
|१९४. || पत्र : आर० ग्रेगरोवस्कीको (१५-२-१९१२) || २२८
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|१९५. || तीन पौंडी कर (१७-२-१९१२) || २३१
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|१९६. || पत्र : चंचल बहन गांधीको (१८-२-१९१२) || २३३
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|१९७. || हरिलाल गांधीको लिखे पत्रका अंश (१८-२-१९१२)|| २३४
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|१९८. || पत्र : आर० ग्रेगरोवस्कीको (२०-२-१९१२) || २३५
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|१९९. || तार : एशियाई पंजीयकको (२१-२ - १९१२से पूर्व ) || २३६
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|२००. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (२४-२-१९१२)|| २३७
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|२०१. || गलत बयानी (९-३-१९१२) || २३८
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|२०२. || श्रीमती जसातका मामला (९-३-१९१२) || २३९
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|२०३. || भाषण : विदाई सभामें (९-३-१९१२) || २४१
|-
|२०४. || पत्र : डॉ० प्राणजीवन मेहताको (११-२-१९१२)|| २४१
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|२०५. || गिरमिटिया प्रथा-सम्बन्धी प्रस्ताव (१६-३-१९१२) || २४२
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|२०८. || पत्र: छगनलाल गांधीको (२४-३-१९१२) || २४४
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|२०९. || सार्वजनिक पत्र : रतन जे० टाटाको (१-४-१९१२) || २४५
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|२१०. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (४-४-१९१२) || २५०
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|२१२. || पत्र: मणिलाल गांधीको ( ६-४-१९१२) || २५२
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|-
|२१५. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२४-४-१९१२) || २५५
|-
|२१६. || पत्र : छगनलाल गांधीको (२४-४-१९१२) || २५६
|-
|२१७. || पत्र : ‘स्पोर्टिंग स्टार’ को (४-५-१९१२) || २५७
|-
|२१८. || पत्नी किसे कहा जाये? (११-५-१९१२) || २५८
|-
|२१९. || जोहानिसबर्गका स्कूल (१८-५-१९१२) || २५९
|-
|२२०. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (२२-५-१९१२) || २६०
|-
|२२१. || नेटालमें भारतीयोंकी शिक्षा (२५-५-१९१२) || २६१
|-
|२२२. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (३१-५-१९१२) || २६२
|-
|२२३. || “एक दुर्भाग्यपूर्ण मामला” (२-६-१९१२) || २६३
|-
|२२४. || गिरमिटिया भारतीयोंका स्वास्थ्य (२२-६-१९१२) || २६६
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|२२६. || तार : गृह-मन्त्रीको (२४-६-१९१२) || २६८
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|२२७. || तार : द० आ० त्रि० आ० समिति को (२६-६-१९१२) || २६९
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|२२८. || लॉर्ड ऐम्पहिलकी समिति (२९-६-१९१२) || २६९
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|-
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|२३५. || नेटालमें अधिवासके प्रमाणपत्रोंका सवाल (१३-७-१९१२) || २७७
|-
|२३६. || पत्र : गृह-मन्त्रीको (१७-७-१९१२) || २७८
|-
|२३७. || नये मुल्कके बारेमें कुछ और (२०-७-१९१२) || २७८
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|२३८. || डॉ० म्यूरिसका पत्र (२०-७-१९१२) || २७९
|-
|२३९. || डॉ० म्यूरिसका आरोप (२०-७-१९१२) || २८०
|-
|२४०. || पत्र : एशियाई पंजीयकको (२२-७-१९१२) || २८१
|-
|२४१. || पत्र : गृह-सचिवको (२२-७-१९१२) || २८२
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|-
|२४३. || समझौता चलता रहेगा (२७-७-१९१२) || २८३
|-
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|२४६. || पत्र : मनसुखको (२७-७-१९१२) || २८७
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|-
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|-
|२४९. || भाषण : वी० ए० चैटियारेके लिए जोहानिसबर्गमें आयोजित विदाई-सभामें (१-८-१९१२) || २८९
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|२५०. || जर्मिस्टनकी बस्ती (३-८-१९१२) || २९०<noinclude></noinclude>
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|२१५. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२४-४-१९१२) || २५५
|-
|२१६. || पत्र : छगनलाल गांधीको (२४-८-१९१२) || २५६
|-
|२१७. || पत्र : ‘स्पोर्टिंग स्टार’ को (४-५-१९१२) || २५७
|-
|२१८. || पत्नी किसे कहा जाये? (११-५-१९१२) || २५८
|-
|२१९. || जोहानिसबर्गका स्कूल (१८-५-१९१२) || २५९
|-
|२२०. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (२१-५-१९१२) || २६०
|-
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|२२२. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (३१-५-१९१२) || २६३
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|२२४. || गिरमिटिया भारतीयोंका स्वास्थ्य (२२-६-१९१२) || २६६
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|२२५. || श्रीमती वाॅगलका बाजार (२२-६-१९१२) || २६७
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|२३५. || नेटालमें अधिवासके प्रमाणपत्रोंका सवाल (१३-७-१९१२) || २७७
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|२३७. || नये मुल्लाके बारेमें कुछ और (२०-७-१९१२) || २७८
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|२३८. || डॉ० म्यूरिसनका पत्र (२०-७-१९१२) || २७९
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|२१५. || पत्र : मगनलाल गांधीको (२४-४-१९१२) || २५५
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|२१६. || पत्र : छगनलाल गांधीको (२४-८-१९१२) || २५६
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|२१७. || पत्र : ‘स्पोर्टिंग स्टार’ को (४-५-१९१२) || २५७
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|२१८. || पत्नी किसे कहा जाये? (११-५-१९१२) || २५८
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|२२०. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (२१-५-१९१२) || २६०
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|२२४. || गिरमिटिया भारतीयोंका स्वास्थ्य (२२-६-१९१२) || २६६
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|२२९. || भाषण : हाजियोंकी विदाई-सभामें (२९-६-१९१२) || २७०
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|२३१. || पत्र : ई० एफ० सी० लेनको (६-७-१९१२) || २७२
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|२३२. || डॉ० म्यूरिसनका आरोप (१३-७-१९१२) || २७३
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|२३३. || नया मुल्का (१३-७-१९१२) || २७४
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|२३४. || भारतीय दुभाषिये (१३-७-१९१२) || २७६
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|२३८. || डॉ० म्यूरिसनका पत्र (२०-७-१९१२) || २७९
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|२३९. || डॉ० म्यूरिसनका आरोप (२०-७-१९१२) || २८०
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१७. संघ संसद में प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) के सम्बन्धमें स्मट्सका भाषण
१८. अस्थायी समझौतेके सम्बन्धमें लॉर्ड सभामें लॉर्ड ऍम्टहिलका भाषण
१९. कस्बा कानून संशोधन अधिनियम (१९०८) के सम्बन्धमें साम्राज्य सरकारकी सेवामें
संघके मन्त्रियोंकी टिप्पणियाँ
२०. गांधीजीके नाम गोखलेका पत्र
२१. स्वर्ण-कानून और कस्वा अधिनियम (१९०८ ) के बारेमें भारत सरकारको पोलकका पत्र
२२. गोखलेके साथ हुई भेंटपर ग्लैडस्टनकी टिप्पणी
२३. बम्बई में गोखलेका भाषण
२४. सिलबर्न और एफ० सी० हॉलेंडरको गोखलेका उत्तर
२५. गांधीजीके नाम गृह सचिवका पत्र
सामग्री के साधन - सूत्र
तारीखवार जीवन-वृत्तान्त
पारिभाषिक शब्दावली
शीर्षक सांकेतिका
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२२.
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२४.
२५.
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|२१. || स्वर्ण-कानून और कस्वा अधिनियम (१९०८ ) के बारेमें भारत सरकारको पोलकका पत्र || ५६२
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|२५. || गांधीजीके नाम गृह सचिवका पत्र || ५७९
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||| सामग्री के साधन - सूत्र || ५८१
|-
||| तारीखवार जीवन-वृत्तान्त || ५८२
|-
||| पारिभाषिक शब्दावली || ६०८
|-
||| शीर्षक सांकेतिका || ६१०
|-
||| सांकेतिका || ६१३
|-
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सीमा1
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="सीमा1" /></noinclude>{{c|छब्बीस|}}
{|width=100%
|-
|१७. || संघ संसद में प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयक (१९१२) के सम्बन्धमें स्मट्सका भाषण ||५५१
|-
|१८. || अस्थायी समझौतेके सम्बन्धमें लॉर्ड सभामें लॉर्ड ऍम्टहिलका भाषण || ५५५
|-
|१९.|| कस्बा कानून संशोधन अधिनियम (१९०८) के सम्बन्धमें साम्राज्य सरकारकी सेवामें संघके मन्त्रियोंकी टिप्पणियाँ || ५५९
|-
|२०. || गांधीजीके नाम गोखलेका पत्र || ५६१
|-
|२१. || स्वर्ण-कानून और कस्वा अधिनियम (१९०८ ) के बारेमें भारत सरकारको पोलकका पत्र || ५६२
|-
|२२. || गोखलेके साथ हुई भेंटपर ग्लैडस्टनकी टिप्पणी || ५६६
|-
|२३. || बम्बई में गोखलेका भाषण || ५६८
|-
|२४. || सिलबर्न और एफ० सी० हॉलेंडरको गोखलेका उत्तर || ५७७
|-
|२५. || गांधीजीके नाम गृह सचिवका पत्र || ५७९
|-
||| सामग्री के साधन - सूत्र || ५८१
|-
||| तारीखवार जीवन-वृत्तान्त || ५८२
|-
||| पारिभाषिक शब्दावली || ६०८
|-
||| शीर्षक सांकेतिका || ६१०
|-
||| सांकेतिका || ६१३
|-
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६५२
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AMAN KUMAR
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६१४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
{{outdent|अर्नेस्ट, श्रीमती, २७}}
{{outdent|अर्नेस्ट, सॉलोमन, ५७}}
{{outdent|अलबर्ट, ३६४, ३९७, ४०१, ४०२, {{gap|1em}} -का पन्द्रह दिनका उपवास, ३८१}}
{{outdent|अली, ३७१, ३८१, ३९०, ३९२}}
{{outdent|अली, हाजी वजीर, ५५ पा॰ टि॰, १४६}}
{{outdent|अलीगढ़में मुस्लिम विश्वविद्यालयकी स्थापनाके लिए चन्दा करनेका हमीदिया इस्लामिया सोसाइटी द्वारा प्रस्ताव, ८१}}
{{outdent|अलीभाई, ३७७}}
{{outdent|अली, जस्टिस अमीर, १११}}
{{outdent|अली, वलीमुहम्मद नाजर, ११०}}
{{outdent|अलीसन, डॉ॰}}
{{outdent|अलीसा, मूसा, ३७१}}
{{outdent|अलेकलैंडर, मॉरिस, ५, ३६, ३८, २२०, ३६४, ३७२, ४०९}}
{{outdent|अवाबाई, ३७८}}
{{outdent|अस्थायी समझौता; कर लेनेका गांधीजीको अधिकार, ४४, ८३; चीनियों द्वारा स्वीकृत, ५७; ज॰ बोथाकी स्वीकृति १५८; ब्रि॰ भा॰ संघ द्वारा स्वीकृत, ४६, ४७, ५७; यूरोपियन समितिके प्रयासोंकी बदौलत, १०१; सत्याग्रहकी शक्तिके कारण संभव, १९७; -(ते) की गोखले द्वारा स्वीकृति अनुचित और उसकी भारतमें टीका, ४६३-६४; -की शर्तोंको पूरा करनेकी संघ-संसदसे आशा, १९७; -के अन्तर्गत, अन्तःकरणके आधारपर आपत्ति करनेवाले वे लोग जो दस्तखत करना जानते हैं अंगुलियों और अंगूठोंकी छापसे मुक्त, ४८; ऑरेंज फ्री स्टेटमें अधिवासके अधिकारकी भारतीयों द्वारा माँग १ पा॰ टि॰; ऑरेंज फ्री स्टेटमें व्यापार या खेती करनेमें भारतीय असमर्थ, ३४१; उन लोगोंका पंजीयन नहीं जिनकी अर्जियाँ संघर्षके दौरान ट्रान्सवाल एशियाटिक पंजीयन अधिनियम और ट्रान्सवाल एशियाटिक पंजीयन संशोधक अधिनियमके द्वारा नामंजूर, ८६, ८८, ९२; केप और नेटाल निवासी भारतीयोंके अधिकारोंमें अप्रत्यक्ष रूपसे कमी, ६२; ट्रान्सवाल प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियमका संशोधन, ९०; ट्रान्सवालमें प्रतिवर्ष छः शिक्षित भारतीय प्रवासियोंको प्रवेश, ५१; दस शिक्षित भारतीयोंको ट्रान्सवालमें प्रवेशका}}
{{Multicol-break}}
: अधिकार ८७; नेटाल और केप निवासी भारतीयोंके लिए अधिक कड़ी शैक्षणिक परीक्षा, ६२; भारतीयोंके मौजूदा अधिकारोंका अपहरण नहीं, ४५, २०१; भारतीयोंको प्रवास सम्बन्धी कानूनी समानता, ५१, ८७, २०१; युद्ध पूर्व तीन वर्षसे अधिक कालके निवासियोंको पंजीयनका अधिकार, ८५; रंभाबाई सोढाको क्षमादान, ८७; शिक्षित भारतीय पंजीयनसे बरी, ४८; शिक्षित व्यक्तियोंसे अँगूठा निशानीकी अपेक्षा नहीं, ४७; शिक्षित सत्याग्रही पंजीयनके दायित्वसे मुक्त, ३८; सत्याग्रह मुल्तवी, ८७; सत्याग्रहियोंकी रिहाई, ४४, ५१, ८८, २०१; -के द्वारा उन शिक्षित भारतीयोंको स्थायी निवासियोंके रूपमें रहनेकी इजाजत जो ट्रान्सवालमें मौजूद हैं ८४-८५; -में शिक्षित भारतीयोंके अन्तर् प्रान्तीय प्रवासका समावेश, ३४१; -से नेटाल भारतीय कांग्रेसको सन्तोष, ६९
{{outdent|अस्वात, ३८१, ३८७ पा॰ टि॰}}
{{outdent|अहमद,}}
{{outdent|अहमद, इब्राहीम, ३९३}}
{{outdent|अहमद, उस्मान, ३६५}}
{{outdent|अहमद, सैयद, १५३-५४ पा॰ टि॰}}
{{gap|8em}}{{larger|'''आ'''}}
{{outdent|आँगलिया, मुहम्मद इब्राहीम, ३९२}}
{{outdent|आँगलिया, मुहम्मद कासिम, २०, ७२, ६८, ३६७, ३७३, ३७७, ३७९, ३८५, ३९३, ३९५}}
{{outdent|आकूजी, मूसा, ४०५}}
{{outdent|आगाखाँ, ३३६, ४१३; -का दक्षिण आफ्रिका आनेका निश्चय, ३०८, ३१६, ३३३; -का हिन्दू-मुसलमानोंको परस्पर निकट लानेका प्रयत्न, ३१५-१६}}
{{outdent|ऑटोमन क्रिकेट क्लब, २७०, ३९१}}
{{outdent|आत्मकथा, १ पा॰ टि॰, २ पा॰ टि॰, ११ पा॰ टि॰, १७ पा॰ टि॰, ३४ पा॰ टि॰, ३२३ पा॰ टि॰, ३४३ पा॰ टि॰, ४५२ पा॰ टि॰, ५०५ पा॰ टि॰}}
{{outdent|आदम, अब्दुल हाजी, ३९५}}
{{outdent|आदम, ईसप मूसा हाजी, ३६८, ३८४, ३८७}}
{{outdent|आदमजी, ११८}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४६६
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कि अमीर लोगों द्वारा पीड़ित मानवताका बड़ा हित-साधन किया जा सकता मुझे आशा है कि इस बैंकका संचालन ऊँचे नैतिक सिद्धान्तोंपर किया जायेगा। मैं इसकी सब प्रकारकी समृद्धिकी कामना करता हूँ। इन शब्दोंके साथ में इसका उद्घाटन करता हूँ।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २३-७-१९२१|1em}}
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{{c|{{larger|'''२०८. सन्देश: जनताको'''}}}}
{{right|[२१ जुलाई, १९२१]<ref> साधन-सूत्र के अनुसार ‘सन्देश’ के पत्रक इसी तारीखको वितरित किये गये थे।</ref>}}
पहली अगस्तको विदेशी वस्त्रोंका त्याग करके और खद्दर पहनकर “लोकमान्य के” पवित्र नामका स्मरण कीजिए। बहिष्कार स्वराज्य-प्राप्ति तथा सार्वजनिक और खिलाफत सम्बन्धी अन्यायोंका निराकरण करानेकी अपरिहार्य शर्त है।
पहली अगस्तको लाखों पुरुषों और स्त्रियों-हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई तथा यहूदी——सभीको लाखोंकी संख्यामें लोकमान्यकी स्मृतिका सम्मान करनेके लिए एकत्रित होना चाहिए।
जो लोग खादी, या कमसे कम [स्वदेशी] मिलका बना कपड़ा नहीं पहनना चाहते, उन्हें शरीक होनेकी जरूरत नहीं है। विदेशी वस्त्र पहनकर आना स्वर्गीय लोकमान्यकी स्मृतिका अपमान करना है। विदेशी वस्त्र स्वयंसेवकों के हवाले कीजिये या प्रिन्सेस स्ट्रीटमें<ref>बम्बई में।</ref> स्थित अशोक बिल्डिंगमें खोले गये स्टोरमें भेज दीजिये। सबसे अच्छी बात तो यह होगी कि उन कपड़ोंकी होली जला दी जाये। किन्तु यदि आप चाहेंगे तो वे स्मरना या किसी अन्य देशको भेज दिये जायेंगे।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स,''' १९२१|1em}}<noinclude>{{dhr|3em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७२
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हमेशा स्वदेशी-व्रतका पालन किया। यदि उनके रहते खादी बनाई जाती तो वे उसे बिना हिचकिचाहटके पहनते। मैं तो विश्वास ही नहीं कर सकता कि साज-सज्जाकी अभिलाषा उन्हें छू भी सकती थी। आप लोगोंसे मेरी अपील है कि श्री तिलककी स्वदेशी भावनाका अनुकरण करें। परन्तु यह अनुकरण अनमने भावसे न करें। मैंने सुना है कि जिन स्त्रियोंने जूनमें अपने स्वदेशी प्रेमका इतना अच्छा परिचय दिया था वही अब अपनी विदेशी साड़ियोंको दे डालने में संकोच कर रही हैं। मैं उन गहनोंको नहीं भूल सकता जो एक पारसी बहनने पारसी सभामें मेरे पास भेजे थे। मैं चाहता हूँ कि स्त्रियाँ स्वदेशीका काम इसी भावनासे जारी रखें। यदि यह काम उन्हें कठिन लगता हो तो श्री तिलकका उदाहरण सामने रखें। अपने वस्त्रोंकी खाली अलमारियोंको देख-देखकर आँसू बहानेका समय नहीं है। मैं आशा करता हूँ कि बम्बईके नागरिक अपना समस्त विदेशी कपड़ा त्याग देंगे और खादी पहनकर पहली अगस्तका दिन मनायेंगे। इसके बाद उन्होंने श्रीमती सरोजिनी नायडूसे भाषण देनेके लिए कहा।
{{left|[अंग्रेजीसे],<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २४-७-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१२. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''चोर और डाकुओंका भय'''}}
खेड़ा जिलेमें चोर और डाकुओंका भय हमेशा बना रहता है। इनका थोड़ा-बहुत डर तो दूसरी जगहों में भी है। स्वराज्य लेनेका अर्थ आत्मरक्षा करना भी है। दूसरे लोग हमारी रक्षा करें और हम स्वराज्यका उपभोग करें, ऐसा नहीं हो सकता। लोगोंमें आत्मरक्षाकी शक्ति होनी ही चाहिए। यह शक्ति दो प्रकारसे आती है। एक तो हम चोरों और डाकुओंको चोरी करने और माल लूटने दें; इसका अर्थ है हम कोई सम्पत्ति ही न रखें। दूसरे हम चोरों और डाकुओंको दण्ड दें। सभी लोग अपनी सम्पत्ति गँवानेके लिए अथवा कोई सम्पत्ति न रखने के लिए तैयार नहीं होते। इसीलिए वे चोरों और डाकुओंको दण्ड देकर रोकनेका उपाय करते हैं। कोई चौकीदार रखता है और कोई स्वयं ही उनसे लड़ाई करता है। चोरों और डाकुओंसे लोगोंकी रक्षा करना राजाका एक मुख्य कार्य होता है। लोग जब अपनी रक्षा आप करना सीख लेंगे तभी स्वराज्य होगा। इसलिए हममें यह शक्ति आनी चाहिए। यह काम कुछ कठिन नहीं है। गाँवों और शहरोंमें लोग अपने स्वयंसेवक तैयार कर सकते हैं और पहरा दे सकते हैं। हर गांवमें रोशनीका इन्तजाम होना चाहिए। यदि हम इतना ही कर लें तो भी चोरोंका भय बहुत कुछ दूर हो जायेगा।
किन्तु इस कामके साथ-साथ और इससे भी ज्यादा जोरसे तो सुधारका काम किया जाना चाहिए। चोरोंसे बचाव करना जितना जरूरी है उसकी अपेक्षा चोरोंको<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७३
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|४४१}}</noinclude>चोरीके धन्धेसे निकालना बहुत जरूरी है। चोरी करना और डाका डालना यह एक तरहका नैतिक रोग है। इस रोगको दूर करनेका उपाय हमारे पास अवश्य होना चाहिए। इन लोगोंको हमें राष्ट्रका अंग मानना चाहिए और इनको सुधारनेका प्रयत्न करना चाहिए। ये लोग मिलने-जुलनेसे, समझाने-बुझानेसे और पढ़ाने लिखानेसे हमारी बात नहीं समझेंगे, ऐसा माननेका कोई कारण नहीं है। उन्हें सुधारने में हमें धीरजसे काम लेना चाहिए और उनके प्रति प्रेमभाव रखना चाहिए। हमारे लिए इन दोनों कामोंको हाथमें लेना बहुत जरूरी है।
{{c|'''रेलोंमें चोरी'''}}
रेलोंमें चोरी होने और रेल-कर्मचारियों द्वारा रिश्वत लिये जानेकी इतनी खबरें आ रही हैं कि यदि ये सब शिकायतें सच्ची हों तो हमें लज्जित होना चाहिए। समस्त देशमें आत्मशुद्धिकी प्रवृत्ति चल रही है। ऐसे समय किसी जगहसे चोरीकी या रिश्वत लेनेकी शिकायत आती है तो दुःख हुए बिना नहीं रहता। रेलोंमें चोरी होती है, इसमें सरकारका हाथ तो अवश्य ही नहीं है। इसके लिए तो केवल हम ही जिम्मेदार हैं। मैंने तो यहाँतक सुना है कि अकालके दिनोंमें घास ले जानेके लिए डिब्बे चाहिए तो उसके लिए भी रेल कर्मचारियोंको रिश्वत देनी पड़ती है; यदि हम रेलसे कोई पार्सल भेजते हैं और उसमें से चीज निकालनेकी जरा भी गुंजाइश होती है तो पार्सल तोड़ दिया जाता है और माल चुरा लिया जाता है। अभी हालमें बम्बई में एक व्यापारी-
का खादीका पार्सल आया था; उसमें से खादी चुरा ली गई। यदि रेल-कर्मचारियोंको मेरी इस टिप्पणीको देखनेका अवसर मिले तो उनसे मेरा निवेदन है कि वे जनताका ध्यान रखें और यदि इस तनख्वाहसे पूरा न पड़ता हो तो कमाईका कोई दूसरा ईमानदारीका साधन खोजें। रेल कर्मचारी संघोंके संचालकोंको मेरी सलाह है कि वे रेल कर्मचारियोंसे अपने कर्त्तव्योंका पालन करानेका उतना ही प्रयत्न करें जितना प्रयत्न उनके अधिकारोंकी रक्षा करनेका करते हैं। यदि हमें स्वराज्य मिला और यह शिकायत दूर नहीं हुई तो हमारा शासन उतना ही मँहगा रहेगा जितना मँहगा आज है। स्वराज्यकी रक्षा तभी की जा सकती है जब सच्चे और देशभक्त अर्थात् लोगोंके हितमें अपना हित समझनेवाले लोग अधिक हों और लालची, स्वार्थी और बेईमान लोग कम हों। स्वराज्यका एक अर्थ है ‘अधिक लोगोंका राज्य’, और यदि ये अधिक लोग अन्यायी और स्वार्थी हों तो राज्यमें अन्धाधुन्धी ही होगी, यह स्पष्ट है। मैं इस आन्दोलनमें यह मानकर सम्मिलित हुआ हूँ कि इसमें अधिकतर लोग सच्चे और अच्छे हैं; किन्तु वे भीरु, लापरवाह और अज्ञानी हो गये हैं और अपनी शक्तिको नहीं पहचानते। ये लोग जब अपनी शक्तिको पहचान जायेंगे तो वे अपने सच्चे बल अर्थात् आत्म-बलको काममें लेंगे और सफल होंगे।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' २४-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७६
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अँजली चौधरी
2439
671110
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>रहना हम सहन कर सकते हैं? हमें तो स्वदेशी व्रतधारी बनना चाहिए। स्वदेशी साधन और साध्य दोनों है। यदि आप विदेशी कपड़ेको त्याज्य समझते हों तो उसे मुझे दे दें। यह बहिष्कार ऐसा नहीं है कि आप बादमें विदेशी कपड़ा खरीद सकें। इसका कारण यह है कि स्वराज्य इस बहिष्कारपर ही निर्भर है। स्वराज्य मिलनेपर हम व्यवस्थापिका सभाओंमें, न्यायालयोंमें जा सकते हैं; किन्तु विदेशी कपड़ा तो तब भी नहीं पहना जा सकता। इसके विपरीत आचरण करना अपने मनको धोखा देनेके
समान है। यह कार्य करोड़ों लोगों द्वारा किया जाना चाहिए।
आप स्वदेशीके व्रतका पूर्ण पालन करें। आपके पास जितना विदेशी कपड़ा हो सबका सब निकालकर दे दें।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''गुजराती,''' ३१-७-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१४. भाषण: मारवाड़ी विद्यालयमें'''<ref>गांधीजीने यह भाषण मारवाड़ी विद्यालय हॉलमें गिरगाँव कांग्रेस कमेटीके तत्वावधानमें हुई एक सार्वजनिक सभामें विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके सम्बन्धमें दिया था। इस सभा में सरोजिनी नायडू और मुहम्मद अलीने मी भाषण दिये थे। उस समय वर्षा होनेके बावजूद लोग बड़ी संख्या में उपस्थित हुए थे।</ref>}}}}
{{right|२६ जुलाई, १९२१}}
महात्मा गांधीने कहा कि पहली अगस्त आनेवाली है और आपको उससे पहले ही अपने देशके प्रति अपना कर्त्तव्य पूरा कर लेना है। आपके कर्त्तव्यका सबूत आपके अपने शरीर होंगे, आपके कर्त्तव्य पालनका तथा आपके त्यागका प्रमाण आपके शरीर-से ही मिल जायेगा। तब किसी से यह पूछनेकी जरूरत नहीं रहेगी कि क्या उसने अपना कर्त्तव्य पूरा किया है, क्योंकि उसका चिह्न प्रत्येक व्यक्ति प्रत्यक्ष देख सकेगा। कुछ लोग ऐसा खयाल करते हैं कि जो एक करोड़ रुपया चन्देमें आया है उसमें अपना हिस्सा देकर हम तो अपना कर्त्तव्य पहले ही पूरा कर चुके हैं। उनका ऐसा सोचना ठीक नहीं है। वह चन्दा तो तिलक स्मारक स्वराज्य-कोषके लिए है, और जबतक आपको स्वराज्य नहीं मिल जाता तबतक यह कहना ठीक न होगा कि आपने उस महान् दिवंगत नेताके प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन किया है। चन्दा इकट्ठा कर लेना ही काफी नहीं है, आपको स्वराज्य प्राप्त करना है। जब इस देशमें स्वदेशीका पूर्ण रूपसे प्रचलन हो जायेगा तब आप यह कह सकेंगे कि स्वराज्य मिल गया है। ऐसा कहने से मेरा यह मतलब नहीं है कि जिस दिन आप स्वदेशीको पूर्णतः अपना लेंगे उसी दिन स्वराज्य मिला हुआ समझें। जिस दिन आप पूर्ण स्वदेशी अपना लेंगे, उस दिनसे मैं
एक महीने का समय स्वराज्य पानके लिए माँगूँगा। स्वदेशी अपनाकर आप स्वराज्य-की नींव रखेंगे और एक महीने की अवधिमें ही स्वराज्य प्राप्त कर सकेंगे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७७
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर|४४५}}</noinclude>
लाला लाजपतरायने मुझे इत्मीनान दिलाया है कि केवल पंजाबमें ४० लाख चरखे हैं। आप तो सारे भारतमें २० लाख ही चलवाना चाहते हैं। वहाँ तो हर घरमें उतने चरखे हैं जितनी उस घरमें स्त्रियाँ हैं और यदि किसी पंजाबी स्त्रीसे यह पूछा जाये कि क्या आप सूत कात सकती हैं तो वह इसमें अपना अपमान मानेगी। औरतें सूत कातना पसन्द करती हैं, परन्तु इस देशमें पुरुष मैनचेस्टरकी धोतियाँ पहनते हैं इसलिए चरखेपर सूत कातनेकी प्रथा उठ जाने की जिम्मेवारी उन्होंकी है। अब चूंकि स्वदेशीको अपनाया जा रहा है, इसलिए चरखेका प्रचलन सारे देशमें हो गया है। देशमें काफी कपास है; कातनेवाले भी काफी हैं। कमी केवल इस बातकी है कि इन चीजोंका उपयोग करनेकी आपकी इच्छा नहीं होती। जिस तरह स्वराज्य पानेके लिए सब लोगोंका, चाहे वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, पारसी, ईसाई या यहूदी हों, एक राष्ट्रके रूपमें संगठित हो जाना जरूरी है उसी तरह यह बहुत जरूरी है कि स्वराज्य पानेके उद्देश्यसे आप लोग पूर्ण स्वदेशी अपनाएँ। सच्चा स्वदेशी वस्त्र भारत में काते गये सुतका बना हुआ ही माना जायेगा? उसमें विदेशी सूतका जरा
भी अंश नहीं होना चाहिए। जो साड़ियाँ विदेशी सूतसे बनी हुई हों, वे अवश्य त्याग दी जायें। कुछ स्त्री-पुरुष अपने सब कपड़े एकदम त्यागना पसन्द नहीं करेंगे; वे कुछको बचा रखना चाहते हैं। परन्तु यदि वे इस मार्गका अनुसरण करते हैं तो वे स्वराज्यकी योग्यता प्राप्त नहीं कर सकेंगे। विदेशी कपड़ा खरीदकर उन्होंने या तो अपने धनका अपव्यय किया है या अपने बहुतेरे देशवासियोंको भुखमरीकी हालत-में रखा है। उन्हें चाहिए कि वे उन कलुषित वस्त्रोंको तुरन्त फेंक दें। सफेद खद्दर न केवल पहली अगस्तको बल्कि उसके बाद भी पहनना चाहिए।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २७-७-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२१५. भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर'''<ref>यह सार्वजनिक सभा भाषखला जिला कांग्रेस कमेटीके तत्त्वावधान में भाषखला उपनगर में हुई थी। गांधीजीने इसी सभा में अपना यह भाषण दिया था।
</ref>}}}}
{{right|२६ जुलाई, १९२१}}
महात्माजीने स्वदेशीपर व्याख्यान देते हुए कहा कि खादी पहनना अविलम्ब शुरू कर देना चाहिए और यह भी कहा कि खादीके द्वारा ही हमें निकट भविष्य में स्वराज्य-प्राप्तिका अनुष्ठान पूरा करना है यह समय आपके मौन बैठे रहनेका नहीं बल्कि हम सबके लिए जागरूक रहनेका और अपने देशको विदेशियोंके कब्जे से मुक्त करनेका है। लगभग ६० करोड़ रुपया प्रतिवर्ष हमारे देशके बाहर चला जाया करता है।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७८
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671113
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2026-08-16T18:11:11Z
अँजली चौधरी
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671113
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
उन्होंने श्रोताओंसे पूछा कि उस रकमका कितना भाग हमारे देशवासियोंके हितमें खर्च किया जाता है? यदि दो आनेका विलायती कपड़ा खरीदा जाता है तो उसमें से सात पैसे विदेशी व्यापारियोंकी जेबोंमें चले जाते हैं। परन्तु यदि हम वो आनेकी खादी मोल लेते हैं तो एक या दो पैसे ही भारतीय व्यापारियोंकी जेबोंमें जाते हैं और बाकी पैसे हमारे कार्यकर्त्ताओंको मिलते हैं। जब ऐसी स्थिति है तो आप सबको पहली अगस्तको अपने वे सारे विदेशी कपड़े जला देने को तैयार रहना चाहिए, जिन्हें पहनना, फिर कहूँगा कि पाप ही है। हमें इस पापका प्रक्षालन, उन कपड़ोंको उस पवित्र-स्थानपर जलाकर जहाँ हमारे महान् नेता लोकमान्य तिलकका दाह-संस्कार किया गया था, करना चाहिए। यदि आपमेसे कुछ लोग उन्हें जला डालने को तैयार
नहीं हैं, तो वे उनको स्मरना भेज सकते हैं। यदि आप इस कामको पूरा नहीं कर सकते तो आप अपने दिवंगत नेता लोकमान्यके प्रति कर्तव्य से च्युत होंगे। पहली अगस्तको चौपाटीकी रेतपर में आप सबको अपने देशके प्रति अपना पवित्र कर्त्तव्य निभाते हुए देखनेकी आशा रखता हूँ।
इस सम्बन्ध में में भायखलाके बढ़ई भाइयोंको कुछ सलाह देना नहीं भूलूँगा। मैं यहाँ उनसे थैली लेने नहीं आया हूँ, वरन् उन्हें साफ-साफ यह बताने आया हूँ कि स्वदेशीकी सफलता उनके कर्त्तव्यका अंग है। उनका कर्त्तव्य है कि अच्छे और सस्ते चरखे, जितने भी बना सकें बनायें, जो हर भारतीय घरकी शोभा बनें। मैं अपने बढ़ई दोस्तोंके बारेमें यह अच्छी तरह जानता हूँ कि वे आकर्षक अलमारियाँ तथा लकड़ीको अन्य चीजें बनाने में कुशल हैं। परन्तु अब उन्हें ऐसी चीजें बनाने में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। गांधीजीने बढ़ई भाइयोंसे सानुरोध कहा कि आप लोग हजारोंकी संख्या में चरखे तैयार करें, क्योंकि वे स्वराज्यकी सीढ़ियाँ हैं। उन्हें मिल-जुलकर कलसे ही चरखे बनाना शुरू कर देना चाहिए। मुझे आशा है कि वे मेरी बातपर अमल करेंगे।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २८-७-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
ois2b6joxkdqdkd7wgm1gtpfe8pgvlz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५२
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१३३. तार : मोतीलाल नेहरूको'''}}}}
{{Right|अहमदाबाद<br>
१९ अक्तूबर, १९२१}}
मैं आपसे सहमत हूँ कि अध्यक्ष कार्यसमितिके प्रस्तावकी उपेक्षा नहीं कर सकता। कमेटीकी<ref>१. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ।</ref> बैठक निश्चयके अनुसार दिल्लीमें होनी चाहिए।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २२-१०-१९२१}}
{{C|{{larger|'''१३४. पत्र : जी० वी सुब्बारावको'''}}}}
{{Right|साबरमती<br>
१९ अक्तूबर, १९२१}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
इसमें सन्देह नहीं कि खेती करना, पुराने ढंगके बुनाईके पेशेकी अपेक्षा अधिक अच्छा है; किन्तु उसके लिए पूंजीगत अधिक व्यय, धैर्य और लगनकी जरूरत है तथा उसमें घरसे बाहर जाकर श्रम करना पड़ता है। इसलिए जो सरकारी नौकर दफ्तर में मेजोंपर काम करनेका अभ्यस्त होता है उसके लिए एकाएक खेतीका काम शुरू कर देना शायद व्यावहारिक नहीं। फिर सामान्यतः उसके साधन शायद इतने सीमित होते हैं कि मामूली पैमानेपर भी खेती शुरू करना उसके लिये असम्भव होगा ।
{{Right|आपका,<br>
'''मो० क० गांधी'''}}
अंग्रेजी पत्र ( जी० एन० ३६२२) की फोटो- नकलसे ।<noinclude>{{dhr|6em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
12kjw9laid0ern16z12dmjlf3inxg6m
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५३
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१३५. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|आश्रम<br>
बुधवार [१९ अक्तूबर, १९२१ को या उसके पश्चात् ]<ref> १. अन्तिम अनुच्छेद में किशोरलाल मशरूवालाके एकान्तमें एक झोंपड़ी में जाकर रहनेका उल्लेख है।
श्री मशरूवाला इस झोंपडीमें शुक्रवार, १४ अक्तूबर, १९२१ को रहनेके लिए गये थे ।</ref>}}
{{Left|भाई श्री ५ महादेव,}}
{{Gap}}तुम्हारा भेजा हुआ चेक तो मुझे रखना ही पड़ेगा । बादमें, जब तुम्हें जरूरत होगी
तब तुम्हें पैसा मुझसे माँगना पड़ेगा। ऐसा लगता है कि मोतीलालजीको परिवारके
लोगोंकी इन बीमारियोंसे छुटकारा कभी मिलेगा ही नहीं ।
स्वदेशीके विषयमें लोगोंको अपनी बात मैं जँचा नहीं पाता, इससे क्या मेरी
तपस्याकी कमी नहीं सूचित होती ? एक पूर्ण तपस्वी बोले बिना भी लोगोंको अपनी
भावनाओंसे प्रभावित करता है । कुछ लोग संकेतमात्रसे, तो कुछ बोलकर और कुछ
लिखकर ही अपनी बात समझा पाते हैं ? इस सबका क्या रहस्य है ? जो लोग खादी
केवल मेरी हाजिरीमें पहनते हैं वे मेरी तपस्याके कारण नहीं, मेरे प्रति अपने प्रेमके
कारण ही ऐसा करते हैं। भविष्यमें स्वतन्त्र हिन्दुस्तान अपना अनाज क्या विदेशोंसे
मँगायेगा ? यदि नहीं, तो कपड़ा भी नहीं मँगायेगा। क्या हम पानी और दवा भी विदेशसे
मंगायेंगे ? अलबत्ता, जब हमारे देशमें कपास पैदा होना बन्द हो जायेगा तब जरूर
हमारा धर्म बदल जायेगा । लेकिन तब तो हमें यह देश ही छोड़ देना पड़ेगा ।
यह तो तुमने सुन ही लिया होगा कि किशोरलालने एकान्तमें एक झोंपड़ी
बनवाई है और आजकल उसीमें रह रहे हैं ।
गुजराती पत्र (एस० एन० १०६०१) की फोटो - नकलसे ।
{{C|{{larger|'''१३६. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''गीता में चरखा'''}}
कविवर [ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ] ने 'मॉडर्न रिव्यू' में इस बात के खिलाफ अनेक
आपत्तियाँ उठाई थीं कि एक पुनीत कार्य मानकर सभीको चरखा चलाना चाहिए ।
पिछले अंकमें मैंने उनकी इन आपत्तियोंका उत्तर देनेकी कोशिश की है ।<ref>२. देखिए " महान् प्रहरी ", १३-१०-१९२१ ।</ref> मैंने पूरे
विनीत भावसे और इस इच्छाके वश ऐसा किया है कि कविवरको तथा उनके सदृश
मत रखनेवाले अन्य लोगोंको अपने मतसे सहमत कर सकूँ । पाठकोंके लिए यह जानना
रोचक होगा कि मेरी यह मान्यता बहुत अंशोंमें 'भगवद्गीता' पर आधारित है।<noinclude>{{dhr|}}
{{Smallrefs}}
२१-२१</noinclude>
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
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{{C|{{larger|'''१३५. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{Right|आश्रम<br>
बुधवार [१९ अक्तूबर, १९२१ को या उसके पश्चात् ]<ref> १. अन्तिम अनुच्छेद में किशोरलाल मशरूवालाके एकान्तमें एक झोंपड़ी में जाकर रहनेका उल्लेख है।
श्री मशरूवाला इस झोंपडीमें शुक्रवार, १४ अक्तूबर, १९२१ को रहनेके लिए गये थे ।</ref>}}
{{Left|भाई श्री ५ महादेव,}}
{{Gap}}तुम्हारा भेजा हुआ चेक तो मुझे रखना ही पड़ेगा । बादमें, जब तुम्हें जरूरत होगी
तब तुम्हें पैसा मुझसे माँगना पड़ेगा। ऐसा लगता है कि मोतीलालजीको परिवारके
लोगोंकी इन बीमारियोंसे छुटकारा कभी मिलेगा ही नहीं ।
स्वदेशीके विषयमें लोगोंको अपनी बात मैं जँचा नहीं पाता, इससे क्या मेरी
तपस्याकी कमी नहीं सूचित होती ? एक पूर्ण तपस्वी बोले बिना भी लोगोंको अपनी
भावनाओंसे प्रभावित करता है । कुछ लोग संकेतमात्रसे, तो कुछ बोलकर और कुछ
लिखकर ही अपनी बात समझा पाते हैं ? इस सबका क्या रहस्य है ? जो लोग खादी
केवल मेरी हाजिरीमें पहनते हैं वे मेरी तपस्याके कारण नहीं, मेरे प्रति अपने प्रेमके
कारण ही ऐसा करते हैं। भविष्यमें स्वतन्त्र हिन्दुस्तान अपना अनाज क्या विदेशोंसे
मँगायेगा ? यदि नहीं, तो कपड़ा भी नहीं मँगायेगा। क्या हम पानी और दवा भी विदेशसे
मंगायेंगे ? अलबत्ता, जब हमारे देशमें कपास पैदा होना बन्द हो जायेगा तब जरूर
हमारा धर्म बदल जायेगा । लेकिन तब तो हमें यह देश ही छोड़ देना पड़ेगा ।
यह तो तुमने सुन ही लिया होगा कि किशोरलालने एकान्तमें एक झोंपड़ी
बनवाई है और आजकल उसीमें रह रहे हैं ।
गुजराती पत्र (एस० एन० १०६०१) की फोटो - नकलसे ।
{{C|{{larger|'''१३६. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''गीता में चरखा'''}}
कविवर [ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ] ने 'मॉडर्न रिव्यू' में इस बात के खिलाफ अनेक
आपत्तियाँ उठाई थीं कि एक पुनीत कार्य मानकर सभीको चरखा चलाना चाहिए ।
पिछले अंकमें मैंने उनकी इन आपत्तियोंका उत्तर देनेकी कोशिश की है ।<ref>२. देखिए " महान् प्रहरी ", १३-१०-१९२१ ।</ref> मैंने पूरे
विनीत भावसे और इस इच्छाके वश ऐसा किया है कि कविवरको तथा उनके सदृश
मत रखनेवाले अन्य लोगोंको अपने मतसे सहमत कर सकूँ । पाठकोंके लिए यह जानना
रोचक होगा कि मेरी यह मान्यता बहुत अंशोंमें 'भगवद्गीता' पर आधारित है।
{{smaller|}}<noinclude>{{dhr|}}
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२१-२१</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''४२५. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मई, १९२८}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका दिलचस्प पत्र मिला। दुग्धाहारसे निश्चय ही आपको बहुत लाभ होगा। मुझे निश्चय है कि कटि-स्नानसे भी आपको लाभ होगा। यदि निखिल कटि-स्नान सहन नहीं कर सकता तो उसके पेटपर छ: इंच लम्बी और तीन इंच चौड़ी मिट्टीकी पट्टी बाँध कर देखिए। यदि कुछ समयके लिए निखिलको केवल दूध और साफ किये हुए पानी पर रखा जाये, और कब्ज हो तो नियमित रूपसे हर चौबीस घंटे बाद एनीमा दिया जाये तो शायद अच्छा रहेगा। जितना दूध वह आरामसे पी सके पी ले परन्तु उससे ज्यादा नहीं। यहाँ मैं एक रोगी के मामलेमें, जिसकी बीमारी काफी बिगड़ी हुई कही जा सकती है इस नुस्खेका प्रयोग कर रहा हूँ और इसमें काफी सफलता मिली है। इस इलाजके बारेमें आप किसी डाक्टर मित्रसे सलाह ले सकते हैं।
मुझे आशा है कि श्री बिड़लाके साथ आपको सफलता मिलेगी। मैं चाहता हूँ कि वे आपकी सहायता, आप उन्हें उनके व्यापारमें जो सहायता देंगे उसके बजाय इसी दृष्टिसे करें कि आपके खादी-प्रचारकी बात उन्हें ठीक मालूम होती है। आपका उनकी सहायता करना निस्सन्देह उचित है और आप जितनी सहायता उन्हें दे सकें जरूर दें। परन्तु यदि खादीको सफल होना है, तो वह केवल अपने गुणोंके आधार पर और खादी संस्थाओंकी व्यापारिक क्षमताके आधार पर ही सफल होगी।
क्या मैंने आपको श्री बिड़लाके एक पत्रमें से एक उद्धरण भेजा था या उसके बारेमें कुछ लिखा था? इस अंशमें श्री बिड़लाने आपके खादी-प्रेम और महान् आत्म-त्यागकी बड़ी प्रशंसा की है, किन्तु प्रतिष्ठानका गठन जिस तरह हुआ है
उसके या आपने अपनी खादी-प्रचारकी योजना उन्हें जैसी समझाई हो, उसके अनुसार आपकी प्रचार-योजनाके बारेमें वे आश्वस्त नहीं हैं। यह एक साल पहलेकी बात है। यह बात मैं आपसे, आपने अपने पत्रके निम्नलिखित वाक्यमें जो कहा है उसीपर जोर डालनेके लिए कह रहा हूँ। आपका वाक्य इस प्रकार है: "यदि उन्हें विश्वास हो जाये कि मैं यहाँ जो काम कर रहा हूँ वह उनके पूर्ण समर्थनके योग्य
है तो मुझे पूरी आशा है, कि जैसे वे हजारों खर्च करते हैं वैसे वह लाखों भी<noinclude></noinclude>
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{{c|{{larger|'''४२५. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३० मई, १९२८}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका दिलचस्प पत्र मिला। दुग्धाहारसे निश्चय ही आपको बहुत लाभ होगा। मुझे निश्चय है कि कटि-स्नानसे भी आपको लाभ होगा। यदि निखिल कटि-स्नान सहन नहीं कर सकता तो उसके पेटपर छ: इंच लम्बी और तीन इंच चौड़ी मिट्टीकी पट्टी बाँध कर देखिए। यदि कुछ समयके लिए निखिलको केवल दूध और साफ किये हुए पानी पर रखा जाये, और कब्ज हो तो नियमित रूपसे हर चौबीस घंटे बाद एनीमा दिया जाये तो शायद अच्छा रहेगा। जितना दूध वह आरामसे पी सके पी ले परन्तु उससे ज्यादा नहीं। यहाँ मैं एक रोगी के मामलेमें, जिसकी बीमारी काफी बिगड़ी हुई कही जा सकती है इस नुस्खेका प्रयोग कर रहा हूँ और इसमें काफी सफलता मिली है। इस इलाजके बारेमें आप किसी डाक्टर मित्रसे सलाह ले सकते हैं।
मुझे आशा है कि श्री बिड़लाके साथ आपको सफलता मिलेगी। मैं चाहता हूँ कि वे आपकी सहायता, आप उन्हें उनके व्यापारमें जो सहायता देंगे उसके बजाय इसी दृष्टिसे करें कि आपके खादी-प्रचारकी बात उन्हें ठीक मालूम होती है। आपका उनकी सहायता करना निस्सन्देह उचित है और आप जितनी सहायता उन्हें दे सकें जरूर दें। परन्तु यदि खादीको सफल होना है, तो वह केवल अपने गुणोंके आधार पर और खादी संस्थाओंकी व्यापारिक क्षमताके आधार पर ही सफल होगी।
क्या मैंने आपको श्री बिड़लाके एक पत्रमें से एक उद्धरण भेजा था या उसके बारेमें कुछ लिखा था? इस अंशमें श्री बिड़लाने आपके खादी-प्रेम और महान् आत्म-त्यागकी बड़ी प्रशंसा की है, किन्तु प्रतिष्ठानका गठन जिस तरह हुआ है
उसके या आपने अपनी खादी-प्रचारकी योजना उन्हें जैसी समझाई हो, उसके अनुसार आपकी प्रचार-योजनाके बारेमें वे आश्वस्त नहीं हैं। यह एक साल पहलेकी बात है। यह बात मैं आपसे, आपने अपने पत्रके निम्नलिखित वाक्यमें जो कहा है उसीपर जोर डालनेके लिए कह रहा हूँ। आपका वाक्य इस प्रकार है: "यदि उन्हें विश्वास हो जाये कि मैं यहाँ जो काम कर रहा हूँ वह उनके पूर्ण समर्थनके योग्य
है तो मुझे पूरी आशा है, कि जैसे वे हजारों खर्च करते हैं वैसे वह लाखों भी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०६
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३७४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>खर्च करेंगे।" वे ऐसे ही आदमी हैं। यदि उन्हें विश्वास हो जाये तो वह असीम सहायता कर सकते हैं।
सस्नेह,
{{right|'''बापू'''}}
{{left|श्रीयुत सतीशचन्द्र दासगुप्त<br>
खादी प्रतिष्ठान<br>
सोदपुर}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १५९३) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४२६. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|साबरमती<br>
बुधवार [३० मई, १९२८]<ref>ढाककी मुहरसे।</ref>}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तुम्हारा पत्र मिला। मुख्याध्यापिकासे गन्दगी के बारेमें शान्तिपूर्वक बात करना और उसे कैसे दूर किया जाये इसकी व्यवस्था करना। यहाँ सब काम ठीक चल रहा है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७५) की फोटो-नकल से।
सौजन्य: वसुमती पण्डित
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४२७. बारडोलीकी परीक्षा'''}}}}
उतावली में यह खयाल भले ही आ जाये कि इस समय बारडोलीमें सरकारकी परीक्षा हो रही है, मगर यह खयाल गलत होगा। सरकारको परीक्षा तो बीसों बार हुई है, और वह कच्ची निकली है। जब भी इसके शरीरके किसी मर्म-स्थलपर चोट पहुँचती है तभी इसकी नीति भय-प्रदर्शनकी रहती है। जब कभी इसकी प्रतिष्ठा या राजस्वको खतरा होता है, यह भले-बुरे सभी उपायोंसे दोनोंको बनाये रखनेका
प्रयत्न करती है। यह भय-प्रदर्शन करनेमें और उसे बेहयाईसे झूठ बोलकर छिपानेमें संकोच नहीं करती। इस ताजा खबरसे कि अब पठानोंको यह हुक्म देकर गाँवोंमें भेजा गया है कि वे ग्रामीणोंके घरोंको रातदिन घेरे रहें, न तो आश्चर्य होना चाहिए और न क्रोध ही आना चाहिए। ताज्जुब तो यह है कि उन्होंने बारडोलीमें अबतक
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
tqvy3qd08nhgiozvpkle56scfpnkjfj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०७
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||बारडोलीकी परीक्षा|३७५}}</noinclude>दाण्डिक पुलिस (प्युनिटिव पुलिस) को तैनात नहीं किया है और 'सैनिक शासन' घोषित नहीं किया है। हमें अबतक यह जान लेना चाहिए था कि 'दाण्डिक पुलिस' या
'सैनिक शासन' का क्या अर्थ होता है। यह तो स्पष्ट है कि भय प्रदर्शनके इस ताजा तरीकेसे सरकार लोगोंको किसी न किसी तरहकी हिंसाके लिए प्रेरित करना चाहती है––फिर चाहे वह हिंसा कितनी ही छोटी क्यों न हो––जिससे उसे सैनिक शासन घोषित करनेका बहाना मिल जाये।
क्या बारडोलीनिवासी इस अन्तिम परीक्षामें खरे निकलेंगे? वे अपने व्यवहारसे भारतीय जनताको चकित तो कर ही चुके हैं। अत्यन्त अधिक उत्तेजनाके बावजूद उन्होंने अबतक वीरोंके जैसा धैर्य दिखाया है। क्या वे उस बड़ीसे-बड़ी उत्तेजनाको
भी, जो उन्हें दी जा सके सहन कर सकेंगे? अगर वे सहनकर सके, तो फिर उन्होंने जग जीत लिया। जो लोग सम्मानको सबसे प्यारी वस्तु मानते हैं, उनके लिए जेल,
जब्ती, निर्वासन, मौत वगैरह सभी मामूली चीजें होनी चाहिए। अगर जुल्म असह्य हो जाये तो लोग बारडोलीकी भूमिको, जिसे वे अब तक अपना समझते रहे हैं, छोड़कर दूसरी जगह जा बसें। जिस घरमें प्लेग घुस जाये, उसे खाली कर देने में ही बुद्धिमानी है। अत्याचार एक तरहका प्लेग ही है और जब ऐसी आशंका हो कि इससे हमें क्रोध आ जायेगा या हम कमजोर पड़ जायेंगे तब ऐसे स्थानको छोड़ देनेमें ही बुद्धिमानी है। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जब कि वीर पुरुषोंने जुल्मके आगे सिर झुकानेकी अपेक्षा अपना देश छोड़ देना ही ज्यादा अच्छा समझा है।
खैर, मैं आशा करता हूँ कि ऐसा कदम उठानेकी जरूरत नहीं पड़ेगी। शुभेच्छु मित्रों द्वारा बीच-बचाव करनेकी खबरें सुननेमें आई हैं। बीच-बचाव करनेका उन्हें हक है, बीच-बचाव करना उनका कर्तव्य भी हो सकता है। मगर ये मित्र इस आन्दोलनका महत्व समझें। उन्हें जानना चाहिये कि वे निर्बल लोगोंकी ओरसे नहीं बोल रहे हैं और न किसी कमजोर चीजकी वकालत कर रहे हैं। बारडोलीवालोंके पक्षमें
न्याय है। वे दयाकी भीख नहीं माँगते, वे केवल न्याय माँगते हैं। वे नहीं चाहते कि कोई उनके दावेको सच्चा माने। वे तो केवल एक स्वतन्त्र, खुली और न्यायिक जाँच कराना चाहते हैं। और वे ऐसी अदालतके फैसलेको माननेके लिए तैयार हैं। इस जाँचको इनकार करनेके मानी हैं, न्याय करनेसे इनकार करना और सरकार अबतक यही करती आई है। लोगोंके हाथोंमें इसका इलाज यह है कि वे स्वयंकष्ट
उठायें। ऐसे मामलेमें, अधिकसे-अधिक और कमसे कम दोनोंका ही प्राय: एक ही अर्थ होता है। जो लोग कोई शिकायत दूर करानेके लिए आप ही कष्ट सहनेपर भरोसा रखते हैं, वे उस शिकायतको बढ़ाकर नहीं कहेंगे, इसलिए जो लोग इस आन्दोलनका रहस्य समझे बिना, बीच-बचाव करने जायेंगे, वे इसे नुकसान पहुँचायेंगे। उन्हें जानना चाहिए कि इस आन्दोलनको न तो सहज ही बन्द किया जा सकता
है और न उसकी प्रतिष्ठाको बट्टा लगने दिया जा सकता है।
जनताको भी सत्याग्रहियोंके प्रति कर्त्तव्यका पालन करना है। धनके लिए वल्लभभाईकी अपीलका लोगोंकी ओरसे ठीक उत्तर मिलना शुरू हो गया है। यह भी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०८
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३७६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>याद रखना चाहिए कि जबतक रुका जा सकता था तबतक उन्होंने अपील नहीं की। लोगोके जेल जानेके कारण अपील किये बिना काम चलना सम्भव नहीं रहा है। मुझे इसमें जरा भी सन्देह नहीं है कि आर्थिक सहायता तुरन्त और बड़ी उदारतासे मिलेगी। एक और चीज जो इतनी ही जरूरी है वह है प्रबुद्ध जनमतकी अभिव्यक्ति। प्रजा सारी हकीकत ध्यानसे सोचे समझे और तब सारे देशमें सार्वजनिक सभाएँ
की जायें। श्रीयुत जयरामदासका यह सुझाव मुझे पसन्द आया है कि आगामी १२ जून या कोई दूसरा उपयुक्त दिन बारडोली दिवस घोषित किया जाये और उस दिन सब जगह सभी दलोंके लोगोंकी सभाएँ करके बारडोली-पीड़ितोंकी सहायताके लिए प्रस्ताव पास किये जायें और चन्दा इकट्ठा किया जाये।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ३१-५-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४२८. दक्षिणमें अस्पृश्यता'''}}}}
धुर दक्षिणमें, अर्थात् केरलमें अस्पृश्यताका अत्यन्त निकृष्ट और भौंडा रूप दिखाई देता है; फिर भी दक्षिणके सुधारकोंने इस बुराईको दूर करनेके लिए अधिक, कमसे-कम पर्याप्त कार्य नहीं किया है। वे इस आन्दोलनके लिए उतना धन भी देना नहीं चाहते जितना आवश्यक है और जिसे वे दे सकते हैं। इसीलिए जब मैंने अपनी दक्षिणकी यात्रामें कालीकटमें वहाँके लोगोंसे रुपया इकट्ठा करना आरम्भ किया तो मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई कि बम्बईकी दक्षिण भारतीय बस्तीके लोगोंने यह विचार व्यक्त किया कि कालीकटमें जितना धन इकट्ठा किया गया है वे उससे बहुत अधिक रकम इकट्ठा कर देंगे और जब मैं बम्बईसे गुजरूँगा, वे वह रकम मुझे दे देंगे। जब मैं हालमें बम्बई गया था तब उनका एक शिष्टमण्डल इसी वादेको पक्का करनेके लिए मुझसे वहाँ मिला था और उसने मुझे विश्वास दिलाया था कि वे लोग उस वादेको भूले नहीं है, और रुपया इकट्ठा करनेके लिए 'अनुकूल समय' की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब शिष्ट-मण्डलके एक सदस्यने लिखा है:
'''छोटी-छोटी तनख्वाहें पानेवाले बहुत-से युवक अपना रुपया घुड़-दौड़ोंमें और शहरोंके दूसरे प्रलोभनोंमें खर्च करते रहते हैं। यदि हम उन्हें उनकी इन वर्तमान कुप्रवृत्तियोंसे विरत कर सकें तो उस रकमसे उनके और बम्बई शहरके लाभार्थ कुछ किये जानेकी आशा की जा सकती है।'''
मुझे आशा है कि दक्षिण भारतीय युवकोंमें यह सुधार आन्दोलन गहरी जड़ पकड़ेगा। मेरी सलाह है कि वे 'अनुकूल समय' की प्रतीक्षा न करें, क्योंकि कोई भी अच्छा काम करने या किसी भी अच्छे कामके लिए धन माँगने या धन देनेके लिए सभी समय उपयुक्त होते हैं। 'अस्पृश्य', अनुपगम्य' और 'अदर्शनीय' लोगोंके लिए किये जानेवाले कार्यसे अच्छा कार्य दूसरा नहीं हो सकता। यदि बम्बईमें रहनेवाले<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०९
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: शचीन्द्रनाथ मित्रको|३७७}}</noinclude>दक्षिणी युवक अपनी कुछ महँगी विलासिताओं, जैसे सिगरेट पीना, घुड़दौड़ोंमें जाना, नाचघरोंमें जाना आदि, को त्याग भर दें, तो उसीसे बहुत बड़ी राशि एकत्र हो जाये। सभी धर्मोमें यह विधान किया गया है कि लोग अपनी-अपनी आमदनियोंका एक हिस्सा धार्मिक कार्योंके लिए अलग निर्धारित करें। दुर्भाग्यसे आजकलके युवकोंने धर्मको अधिकतर तो तिलांजलि ही दे दी है। किन्तु यदि निरपवाद रूपसे सभीके द्वारा धार्मिक कार्योंके लिए अपनी-अपनी आमदनियोंका एक हिस्सा अलग किये जानेकी प्रथा पुनर्जीवित की जा सके तो अस्पृश्यता जैसे कार्योंके लिए 'अनुकूल समय' की प्रतीक्षा कभी न करनी पड़े।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया''' ३१-५-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४२९. पत्र: शचीन्द्रनाथ मित्रको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। अपने खयालसे तो मैंने जो सुझाव दिये हैं यदि उन्हें अपनाया जा सके, तो उनके जरिये मैंने आपके प्रश्नको सुलझा दिया है, क्योंकि विद्यार्थी, जब वे विद्याध्ययन कर रहे हों, खुद कताई करने और अपने प्रयोग और पहरावेके लिए खद्दर अपनानेसे ज्यादा या बेहतर कुछ और नहीं कर सकते। और यदि वे इतना भी नहीं कर सकते तो उनके द्वारा किसी ऐसे कामको कर सकनेकी आशा नहीं है, जिससे देशको कोई ठोस लाभ हो।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६१२) की माइक्रोफिल्म से।<noinclude></noinclude>
sspo4jbivmix9491h4rv5647bccfmg2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१०
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४३०. पत्र: जी॰ एन॰ कानिटकरको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय कानिटकर,}}
आपका पत्र मिला। मैं इस बातपर हैरान हूँ कि आपने जमनालालजीकी राय लिये बिना बैठककी तारीख निश्चित कर ली है और उसपर आप उनसे यह आशा करते हैं कि वह बैठकमें उपस्थित हों। निस्सन्देह उनके अध्यक्ष होनेके नाते आपके लिए इतना करना तो उपयुक्त ही था कि आप बैठककी तारीख और कार्य-सूचीके बारेमें पहले उनसे सलाह-मशविरा कर लेते और तब परिपत्र जारी करते। अब जमनालालजी कोई ऐसी दूसरी तारीख नियत करनेके लिए आपको तार भेज रहे हैं, जब वह निश्चय ही उपस्थित होंगे।
जहाँ तक औषधालयका सम्बन्ध है मैंने आपको जो कुछ कहा वह इतना ही था कि यदि संघ-कौंसिल शर्तो आदिको स्वीकार कर लेगी तो राष्ट्रीय शिक्षण मण्डलको आवास भूमि पट्टेपर देनेमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। और यह तभी हो सकता है जब कि स्वावलम्बन पाठशालाके सम्पत्ति सम्बन्धी सारे अधिकार और चरखा संघ बिना शर्त हस्तान्तरित कर दिये जायें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत जी॰ एन॰ कानिटकर<br>
३४१, सदाशिव पेठ<br>
पूना शहर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६१३) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४११
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४३१. पत्र: अ॰ टे॰ गिडवानीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३१ मई, १९२८}}
{{left|प्रिय गिडवानी,}}
मैं सोच ही रहा था कि मुझे आपका पत्र कब मिलेगा। इसलिए जब गिरधारीने मुझे आपका पत्र दिया तो मुझे प्रसन्नता हुई।
मैं तो इन व्यक्तिगत बातोंको भी जिन्हें आप मामूली कहते हैं उतना ही विचारणीय मानता हूँ जितना कि बारडोलीको; क्योंकि मैं सहयोगियोंके बारेमें सब कुछ जानना चाहता हूँ। मैं आपकी सब कुछ त्याग कर एकदम बारडोली चले आनेकी इच्छाको समझता हूँ। परन्तु अभी ऐसा करनेका अवसर नहीं आया है। जब वह वक्त आयेगा आप देखेंगे कि मैं रत्ती भर संकोच किये बिना आपको बुला भेजूँगा। और मैं जानता हूँ कि आप एक अच्छे सिपाहीकी तरह, बुलाये जानेपर तुरन्त आ जायेंगे। लेकिन अभी फिलहाल तो वल्लभभाईके पास काफी कार्यकर्त्ता हैं।
मुझे खुशी है कि आपकी सेहत अब काफी बेहतर है और मुझे मालूम है कि गंगाबहनने अपनी सारी उदासी झाड़ फेंकी है। परन्तु उससे कहिए कि उसे अपनी गुजराती भूल नहीं जाना चाहिए। और यदि वह आपके काममें अबतक हाथ नहीं बँटा रही है तो अब जरूर बँटाए। वह कन्या स्कूलोंमें जाकर उनका संगठन कर एवं उन्हें तकली वगैरह सिखा कर बहुत कुछ कर सकती है।
साम्प्रदायिक समस्या हमेशा और हर जगह ही हमारे साथ है। मुझे आशा है कि इससे निबटना आपकी ताकतसे बाहर नहीं होगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४४७५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
ahzqem9sa3t0aa60fhg6j8jz0302wmc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१२
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४३२. पत्र: इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया, अहमदाबाद के प्रबन्धकको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१ जून, १९२८}}
{{left|प्रबन्धक<br>
इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया<br>
अहमदाबाद<br>
प्रिय महोदय,}}
कृपया इस पत्रके साथ संलग्न हस्ताक्षरकी हुई रसीदके मुताबिक रु. ६५–१–८ की रकम पत्र वाहकको दे दें।
{{right|आपका विश्वस्त,}}
{{left|'''संलग्न:''' १ रसीद}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३४००) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४३३. पत्र: मथुरादास त्रिकमजीको'''}}}}
{{right|१ जून, १९२८}}
अच्छा हो यदि तुम मेरे पत्रकी आशा किये बिना मुझे पत्र लिखते रहो।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुनी प्रसादी'''}}<noinclude></noinclude>
tm0pjjgl35210whpg2q2ev2ylyog9q7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१३
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४३४. पत्र: विट्ठलभाई पटेलको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
बी॰ बी॰ सी॰ आई॰ रेलवे<br>
१ जून, १९२८}}
{{left|माईश्री विठ्ठलभाई,}}
आपका पत्र मिला। मुझे आपका वह पत्र अभी तक तो नहीं मिला है; किन्तु उसे मैंने समाचारपत्रोंमें पढ़ लिया था। उसका बहुत अच्छा असर होगा। हरिलाल देसाईके लिए क्या कहें और क्या करें? वल्लभभाईके लिखे हुए पत्रकी नकल भेजने के लिए महादेवने बारडोली पत्र लिखा है। हम तो अपना काम करते जायें। आप तो अपना हिस्सा पूरा अदा कर रहे हैं। कर्ता-हर्ता तो ईश्वर ही है न?
{{right|'''मोहनदासके वन्देमातरम्'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ १४४३६) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४३५. पत्र: केवलरामको'''}}}}
{{right|शनिवार, सुबह चार बजेसे पूर्व २ जून, १९२८}}
{{left|भाईश्री केवलराम,}}
तुम्हारा पत्र मिला। जवाब तो मैं जल्दी दे देता किन्तु समयके अभावके कारण आजतक ऐसा कर नहीं पाया। तुम्हारी तबीयत अबतक तो ठीक हो गई होगी। उसे बिलकुल ठीक करनेके लिए पूरा प्रयत्न करना चाहिए।
तुम्हारा स्वभाव जानते हुए मुझे तो यही भय है कि आश्रममें जो परिवर्तन हो चुके हैं या होनेवाले हैं उन्हें तुम सहन नहीं कर सकोगे।
स्त्री हो या पुरुष जवाबदारी लेनेपर दोनोंके लिए ब्रह्मचर्य आवश्यक है।
सभी धीरे-धीरे संयुक्त रसोई-घरमें शामिल होते जा रहे हैं। इस समय वहाँ ९० व्यक्ति भोजन करते हैं।
मजदूरोंको धीरे-धीरे कम किया जा रहा है, इससे सबके लिए शारीरिक श्रम बढ़ गया है।
भैंसका दूध और घी त्याग देनेकी बात चल रही है और आश्रममें प्राप्त होनेवाले गायके दूधसे निर्वाह करनेका विचार है।
यदि तुम लौटकर आओ तो तुम्हें बुनाईके कामके लिए तैयार रहना ही है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१४
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>नियमावली<ref>देखिए "सत्याग्रह आश्रम," १४-६-१९२८।</ref> लगभग तैयार हो गई है, तैयार होनेपर तुम्हें नकल भेजूँगा।
ब्रह्मचर्यके नियमके कारण भाई हरिहर और तारानाथ चले गये हैं।
तुम दोनों खूब गहरा विचार करना। विचार करनेके बाद आश्रमके नियमोंका पूरा पालन करते हुए यहाँ रहनेका निश्चय करोगे तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ११८०३) की माइक्रोफिल्मसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४३६. बारडोलीका महात्म्य'''}}}}
बारडोली सत्याग्रहका तेज दिन प्रतिदिन बढ़ता जाता है। मुझे अभी-अभी विट्ठलभाई पटेलका पत्र मिला है। उसको पढ़कर किसका हृदय प्रसन्नतासे न नाच उठेगा? मैंने इस पत्रका अनुवाद इसी अंकमें दिया है। किन्तु श्री विट्ठलभाई पटेलने
जिस आशाको लेकर यह पत्र लिखा है उसे फलवती करना बारडोलीके सत्याग्रहियोंके ही हाथमें है। विट्ठलभाईके पत्रके साथ ही सरकारी विज्ञप्ति प्रकाशित हुई है। उस विज्ञप्तिका आशय यह है कि सत्याग्रही असत्याग्रही हैं। वे भीरु हैं और भीरु होनेसे चोरी-छुपे लगान दे जाते हैं। विज्ञप्तिमें ऐसी दूसरी बातें भी हैं जो सत्याग्रहियोंके लिए विचार करने योग्य हैं। सरकारने अपनी आशाओंका किला लोगोंकी दुर्बलता पर बनाकर रखा है। जबकि सत्याग्रहियों और विट्ठलभाई जैसे उनके हितैषियोंकी आशाका हिमालय उनकी वीरता और दृढ़ता पर खड़ा हुआ है। किला मनुष्यकृत होता है इसलिए वह टूट जाता है। हिमालय ईश्वरकी प्रसादी होनेसे अटल रहता है। यदि वह टूटेगा तो प्रलय हो जायेगा। यह सच ही है कि मनुष्य अपनी बेड़ी स्वयं ही बनाता है; और वह स्वयं ही उसको तोड़ भी सकता है। इस बातको सिद्ध करनेके लिए ही बारडोलीमें यह यज्ञ चल रहा है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन''' ३-६-१९२८}}
{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३८२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>नियमावली<ref>देखिए "सत्याग्रह आश्रम," १४-६-१९२८।</ref> लगभग तैयार हो गई है, तैयार होनेपर तुम्हें नकल भेजूँगा।
ब्रह्मचर्यके नियमके कारण भाई हरिहर और तारानाथ चले गये हैं।
तुम दोनों खूब गहरा विचार करना। विचार करनेके बाद आश्रमके नियमोंका पूरा पालन करते हुए यहाँ रहनेका निश्चय करोगे तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ११८०३) की माइक्रोफिल्मसे।
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{{c|{{larger|'''४३६. बारडोलीका महात्म्य'''}}}}
बारडोली सत्याग्रहका तेज दिन प्रतिदिन बढ़ता जाता है। मुझे अभी-अभी विट्ठलभाई पटेलका पत्र मिला है। उसको पढ़कर किसका हृदय प्रसन्नतासे न नाच उठेगा? मैंने इस पत्रका अनुवाद इसी अंकमें दिया है। किन्तु श्री विट्ठलभाई पटेलने
जिस आशाको लेकर यह पत्र लिखा है उसे फलवती करना बारडोलीके सत्याग्रहियोंके ही हाथमें है। विट्ठलभाईके पत्रके साथ ही सरकारी विज्ञप्ति प्रकाशित हुई है। उस विज्ञप्तिका आशय यह है कि सत्याग्रही असत्याग्रही हैं। वे भीरु हैं और भीरु होनेसे चोरी-छुपे लगान दे जाते हैं। विज्ञप्तिमें ऐसी दूसरी बातें भी हैं जो सत्याग्रहियोंके लिए विचार करने योग्य हैं। सरकारने अपनी आशाओंका किला लोगोंकी दुर्बलता पर बनाकर रखा है। जबकि सत्याग्रहियों और विट्ठलभाई जैसे उनके हितैषियोंकी आशाका हिमालय उनकी वीरता और दृढ़ता पर खड़ा हुआ है। किला मनुष्यकृत होता है इसलिए वह टूट जाता है। हिमालय ईश्वरकी प्रसादी होनेसे अटल रहता है। यदि वह टूटेगा तो प्रलय हो जायेगा। यह सच ही है कि मनुष्य अपनी बेड़ी स्वयं ही बनाता है; और वह स्वयं ही उसको तोड़ भी सकता है। इस बातको सिद्ध करनेके लिए ही बारडोलीमें यह यज्ञ चल रहा है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन''' ३-६-१९२८}}
{{dhr|7em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१५
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४३७. शिक्षा-विषयक प्रश्न–१'''}}}}
प्राथमिक शिक्षापर तीन लेख<ref>देखिए "'प्राथमिक शिक्षा'-१", १३-५-१९२८;-२, २०-५-१९२८;-३, २७-५-१९२८।</ref> लिखनेके बाद, अब नीचेके प्रश्नोंके उत्तर देना सहज हो गया है।
प्रश्न––आपने एक बार लिखा था कि अंग्रेजीका भार हलका करें तो वह विद्यार्थी जीवनके कई वर्ष बचानेके बराबर होगा। राष्ट्रीय शिक्षणका अर्थ अगर राष्ट्रव्यापी शिक्षण करें तो आपके विचारानुसार इसका बोझा समाजपर कितना और कितने वर्षका होगा?
उत्तर––पहले तो यह समझाना होगा कि अंग्रेजीका भार हलका करनेके क्या मानी हैं। मेरा मतलब यह बिलकुल नहीं है कि विद्यार्थीको अंग्रेजीका ज्ञान बिलकुल ही न दिया जाये। किन्तु जिस तरह कि कोई फ्रांसीसी अंग्रेजी जानता हो, उसी तरह हम उसका ज्ञान पर-भाषाके रूपमें प्राप्त करें। अगर हम इसी हदतक अंग्रेजी जानें तो अंग्रेजीमें विचार करने, शुद्ध उच्चारणोंमें शुद्ध अंग्रेजी बोलने और शुद्ध अंग्रेजी लिखनेका बोझा न उठाना पड़े। मेरी मान्यता है कि इस बोझके कारण हर-एक विद्यार्थीका कमसे-कम ५ वर्षका समय तो नष्ट होता ही है। इतना ही नहीं, बल्कि उन पाँच वर्षमें होनेवाले परिश्रमसे उसकी विचार-शक्ति मारी जाती है, शरीर निर्बल हो जाता है, और वह किसी स्याहीसोखके समान केवल ऊपरी आकृतिकी नकल करनेवाला बन जाता है। अगर कोई आदमी पाँच वर्ष अपनी भाषाके जरिए ज्ञान लेनेमें खर्च करे तो कितना सीखेगा? कितना बचायेगा? अच्छेसे-अच्छे विचार अपनी भाषाके जरिये जल्दी जान लेगा और पर-भाषाके मुश्किल उच्चारण सीखनेके बोझके बच जायेगा।
प्रश्न––एक ओर बाल-शिक्षा दूसरी ओर महाविद्यालयकी शिक्षा; दोनों ही बहुत खर्चीली हैं। क्या सचमुच राष्ट्रीय शिक्षणमें ये दोनों समाहित की जा सकती हैं? अथवा कम खर्चमें उतनी ही ठोस शिक्षा देनेकी कोई योजना आपके पास है?
उत्तर––यह बतलानेका प्रयत्न मैंने पिछले तीन लेखोंमें किया है कि बालशिक्षा किस तरह सस्ती और स्वाश्रयी बनाई जा सकती है। अगर हम महाविद्यालयकी शिक्षाको, प्राथमिक-शिक्षाको मदद पहुँचानेवाला रूप दें तो वह शिक्षा भी सस्ती हो जाये, और विद्यार्थी भलीभाँति राष्ट्रके लिए पोषक प्रकारका ज्ञान पाने लगें। 'उतनी ही ठोस शिक्षा' का अर्थ अगर सरकारी शिक्षा जैसी शिक्षा ही हो तो यह अप्रस्तुत प्रश्न है; क्योंकि सरकारी शिक्षाको मैं ठोस गिनता ही नहीं हूँ। राष्ट्रीय महाविद्यालयकी या प्राथमिक शालाओंकी शिक्षा सरकारी शालाओंकी शिक्षासे भिन्न और कितनी बार नई और मौलिक प्रकारकी होगी। इसलिए वह स्वतन्त्र रूपसे ठोस है।
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{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१६
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३८४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>प्रश्न––पुरानी परम्पराके हिमायती विद्यार्थियोंमें गुरु-भक्ति उत्पन्न करनेकी कोशिश करते हैं। यह समझानेका प्रयत्न करते हैं कि हमें गुरुकी प्रसन्नतासे ही विद्या प्राप्त हो सकती है, अन्यथा नहीं। गुरुकी भक्ति, सेवा, शुश्रूषा न करें तो गुरु बुरा मानकर विद्या देनेसे जी चुराता है। जिससे वह ऐसी बेईमानी न करे, इसलिए उसकी खुशामद करनी चाहिए। क्या यही गुरुभक्तिकी मीमांसा है?
उत्तर––मैं गुरुभक्तिको योग्य मानता हूँ। किन्तु प्रत्येक शिक्षक गुरु नहीं होता। गुरु-शिष्यका सम्बन्ध आध्यात्मिक और स्वयं स्फुरित होता है; वह कृत्रिम नहीं होता, वह बाहरके दबावसे पैदा नहीं होता। ऐसे गुरु आज भी हिन्दुस्तानमें हैं। (यहाँ मैं मोक्षदायी गुरुका उल्लेख नहीं कर रहा हूँ, यह चेतावनी देनेकी जरूरत नहीं होनी चाहिए।) ऐसे गुरुकी खुशामद सम्भव ही नहीं है। ऐसे गुरुके प्रति आदर स्वाभाविक होता है। गुरुका प्रेम भी स्वाभाविक ही होता है। इसलिए एक देने और दूसरा लेनेको हमेशा तैयार ही रहता है। बाकी सामान्य ज्ञान तो हम हरएकके पाससे ले सकते हैं। किसी बढ़ईके साथ मेरा कोई सम्बन्ध न हो, तो भी उसके पाससे उसके दुर्गुण जानते हुए भी मैं बहुत कुछ ले सकता हूँ, जिस तरह दुकानदारसे सौदा खरीदते हैं, उसी तरह उससे मैं बढ़ईगिरीका ज्ञान खरीद लेता हूँ। हाँ, यहाँ
भी एक प्रकारकी श्रद्धा आवश्यक है। जिस बढ़ईसे मैं बढ़ईगिरीका ज्ञान लेना चाहता हूँ, उसके बढ़ईगिरीके ज्ञानमें मुझे श्रद्धा न हो तो मैं वह ज्ञान नहीं पा सकूँगा। गुरु-भक्ति अलग ही विषय है। जहाँ शिक्षाका उद्देश्य चरित्र गढ़ना ही हो, वहाँ गुरु-शिष्यका सम्बन्ध अत्यावश्यक है; और अगर वहाँ शुद्ध गुरु-भक्ति न हो तो चरित्र गढ़ा ही नहीं जा सकता।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन''' ३-६-१९२८}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१७
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४३८. पत्र: वल्लभभाई पटेलको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
३ जून, १९२८}}
{{left|भाईश्री वल्लभभाई,}}
इसके साथ गवर्नरको लिखे जवाबका मसविदा भेज रहा हूँ। संघर्ष अच्छा चल रहा है। चिरंजीवी होओ। मेरी जरूरत हो तो पत्र लिख देना या तार करना। तुम पकड़े जाओगे, यह अफवाह सुननेमें आती है। पकड़े गये तो कुछ आराम मिलेगा और न पकड़े गये तो हमने कभी हार न माननेकी सौगन्ध ली है न?
{{right|'''बापू'''}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रों: सरदार वल्लभभाई पटेलने'''}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४३९. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|साबरमती<br>
मौनवार [४ जून, १९२८]<ref>डाककी मुहरसे।</ref>}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तुम्हारे पत्र नियमित रूपसे मिलते रहते हैं। मेरे पत्रकी पहुँच तो लिखा करो। मैं तो नियमित रूपसे नहीं लिख पाता हूँ। यह सुबह चार बजे लिख रहा हूँ। अभी घंटी बजना शुरू हुआ है। अब भी अक्षरोंमें सुधारकी गुंजाइश है। तुम्हारा एक
पत्र बह्नोंको पढ़कर सुनाया था। जहाँतक बन सके नौ बजेसे पहले सो जाना और चार बजे उठना। कसरत कर पाती हो? खटमलोंके लिए कोई दवा काममें लाना। पूरी सफाईके बारेमें कोई सुझाव हो तो लिखना। गुजराती लड़कियाँ कितनी हैं? इस समय रसोईमें ९० व्यक्ति जीमते हैं। अभी और शामिल होते जा रहे हैं। किन्तु यह सब तो दूसरे भी लिखते होंगे।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७६) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: वसुमती पण्डित
{{dhr|1em}}
{{smallrefs}}
{{left|३६–२५}}<noinclude></noinclude>
8r4lhg1yz0tdxnddwmoerzk7izvkxsc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१८
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४४० पत्र: वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको'''}}}}
{{right|साबरमती<br>
४ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र और भाई,}}
आप मुझे अपनी तरफकी घटनाओंकी जानकारी नियमित रूपसे दे रहे हैं। उनसे मुझे बड़ी मदद मिलती है।
मैं उन दो निर्णयोंपर इस सप्ताह बड़ी सावधानीके साथ 'यंग इंडिया' में एक लेख<ref>देखिए "दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय", ७-६-१९२८।</ref> लिख रहा हूँ। यदि हो सका तो मैं आपको उस लेखकी एक अग्रिम प्रति भेज दूँगा।
प्रागजीने मुझे एक लम्बा पत्र लिखा है। वह अच्छे व्यक्ति हैं। मैंने आपके समुद्री तार पर कार्यवाही की है और वहाँ अपने मित्रोंको समुद्री तार<ref>देखिए "तार: दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसको", २९-५-१९२८ या उसके पश्चात्।</ref> भेज दिया है कि उन्हें निर्देशनके लिए आपपर भरोसा रखना चाहिए।
आशा है कि आप ठीक होंगे।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ८८१५) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४४१. बारडोली दिवस'''}}}}
{{right|साबरमती<br>
५ जून, १९२८<ref>इस शीर्षक सम्बन्धी एक रिपोर्ट '''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ६-६-१९२८ में छपी थी। यह तिथि वहीसे ली गई है।</ref>}}
मैं आशा करता हूँ कि बारडोली दिवस, आगामी १२ जूनको सारे हिन्दुस्तान में उचित ढंगसे और उत्साहसे मनाया जायेगा। इसे मनानेका सबसे अच्छा तरीका यह है कि जहाँ-कहीं सम्भव हो काम बन्द रखा जाये और सारा दिन बारडोली पीड़ितोंकी और इस संघर्षके संचालनमें श्रीयुत वल्लभभाई पटेल तथा उनके कार्यकर्त्ताओंकी सहायताके लिए धन जमा करनेमें लगाया जाये; सार्वजनिक सभाएँ की जायें, जिनमें
और ज्यादा चन्दा जमा किया जाये और सत्याग्रहियोंकी मांगोंके समर्थनमें और सरकारके जुल्मोंके विरोधमें प्रस्ताव पास किये जायें। स्वयंसेवकोंकी माँग करनेकी आवश्यकता
नहीं है, क्योंकि श्रीयुत वल्लभभाईके पास उनके काम लायक काफी स्वयंसेवक हैं।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
s81oy9a38f7ultmlqimv214yq4vbltl
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५४८
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Lado Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|५१६|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
कांग्रेस, देखिए, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
कांग्रेसी, १५, ४६, ४७; -और स्वदेशी
मिलका कपड़ा, ३१९-२१
काठियावाड़ राजनैतिक परिषद, ७४, २४४
कानिटकर, जी० एन०, ३७८
कान्ति, ३४८
कापड़िया, २०८
कारीगर, -[ ] के स्वार्थ, २६६
कार्टराइट, ९५
कार्लाइल, ९५
कालिदास, १७६
कालेलकर, द० बा०, ६, १९१, ४२९, ४५०
किचलू, डा० पी० एस०
कुरुक्षेत्र, -शरीरमें, ४८०
कुरेशी, शुएब, १८७
कुलकर्णी, गोपालराव, ६
कुवलयानन्द, ४९६
कुसुम, ४५१
१५३, २५२
कूने, ३२३, ४४८, -की स्नान पद्धति, ५४
कृपलानी, जे० बी०, १२, ६२, ८०, ९४,
१११, १४१, २२१
कृष्ण, (भगवान), ३२४; और राम, १७६
कृष्णदास, ६२, १११, २२१, ३५७, ४७१,
४७३ पा० टि०
कृष्णप्रसाद, सर, ३९५
कृष्णया, उ० राजगोपाल, २४९
केपटाउन समझौता, १७
केपी, मार्सेल, १३२
केलप्पन, ३३
केली, एलिस मैके, ४०
केवलराम, ३८१
कैम्बेल, मेरी जे०, ३२५
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
कैलेनबँक, ६३
कोठारी, मणिलाल, ६, ७०, १०३, १६६,
२६७
कोलियर, जेरेमी, ९५
कोली, और यज्ञोपवीत, १४३-४४, १९८,
२११, ३४१
कोहू, हेंस, २५३
क्रिस्टोफर, अल्बर्ट, १७
क्रेना, एल०, ३१३
क्रेन्स, फ्लोरेन्स, के०, ४४६
क्लार्क, बॉयरन एन०, २९३ पा० टि०
क्वेकर्स, ४७१ पा० टि०
क्षितीश बाबू, ४९१
{{C|'''ख'''}}
खम्भाता, जाल, १२६, २०८, ३२२
खम्भाता, बहरामजी, १२६, २०८, ३२२
खादी ( खद्दर), ७, ९, ११, ३०, ३६,
३८, ४४, ५९, ६०, ६६, ६७, ८८,
९१, १०२, ११४, १४१, १५६, १५७,
१५९, १६१, १६४-६५, १७८, १८१,
१८३, १८४, १९९, २००, २०४-७,
२२३, २२४, २२५, २३७-३९, २४३,
२४४, २५३, २५८, २५९, २६३,
२७०, २७३, २८०, २८९, २९४,
३६६, ३६७, ३७३, ४०५, ४११,
४२५, ४६६; -आन्दोलन, ३३०,३९५;
- और अस्पृश्य, ३००-१; -और तरुण
बालक-बालिकाएँ, ११६; -और
महिलाएँ, २०५; -और मिलका कपड़ा,
३१९-२१; -और मिल-मालिक, ११४-
१५, १४५, १८०, २०२-३, २३०-३२,
२४२-४३; -और विदेशी कपडेका<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५५०
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6039
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|५१८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
गांधी स्मट्स समझौता, २४८, २८६, ३७१
पा० टि०; और शिक्षित भारतीय,
३९४-९५
बनाम शहर, ३३५, ३४७
गाइड टु हेल्थ, १४०
गायतोन्डे, वाई० आर०, २१०
गिडवानी, आ० टे०, ८७, ९३, ९४, १२१, ३७९
गिरधरदास, १७६
गिरधारी, ३७९
गिरधारीलाल, २६, २६३
गिरि, दलबहादुर, ४९३
ग्रामोंके शोषणकी निवासियोंको
क्षतिपूर्ति के लिए करनी चाहिए, ४७८
ग्रेग, रिचर्ड बी०, २५, १५०, २६२, २६८,
२८८, २८९, ३१३, ३२६, ३३१,
४१७, ४३५, ४९१; के चरखे और
खादी पर विचार, २२८-३०
घ
घोष, प्रफुल्लचन्द्र, ४५
च
चटर्जी, रामानन्द, ४४४
चट्टोपाध्याय, एच०, ८९
गिरि प्रवचन (सरमन ऑन दि माउन्ट), ४३ चतुर्वेदी, बनारसीदास, २९०
गिरिराज, १२२
गुजरात विद्यापीठ, और ग्रामसेवा, ४७८-
७९; -और देहाती शिक्षा, ३३५;
- का पुनर्गठन, ५-९; - के मुख्य उद्देश्य,
४२४-२५; - में शिक्षा पद्धति, ४१५
गुप्त, बाबू शिवप्रसाद, २२१
गुरु, और गोविन्द, ४०९-१०; -भक्ति
और चरित्र निर्माण, ३८४
गुरु गोविन्द, ४४३
गुरुकुल काँगड़ी, ४७६
गेट, सर एडवर्ड, ४६५
गेब्रियल, ब्रॉयन, ६३
गोकुलभाई, ४३८
गोखले, बबन १२३ पा० टि०
गोडमुने, अल्बर्ट, २२६
गोयनका, जयदयाल, ३१४
गोरक्षा, ११, ५९, ७९
ग्राम- पुनर्निर्माण, और कताई, ११५
ग्राम- पुननिर्माण सेवा, -और राष्ट्रीय
शिक्षाका पाठ्यक्रम, ३६४; -नगर
चन्दूलाल, डा०, ३३९
चमूपति, पण्डित, ३४१
चरखा, ८०, १४१, १४३, १४८, १९१,
२०२, २२५, २३१, २३९, २८५,
२९४, ३४३, ३६३, ३६८, ४२६,
४५२; -और गुजरात विद्यापीठ, ७;
-और मिल-मालिक, २३४; - और
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
ग्रामोंके शोषणकी
निवासियोंको
क्षतिपूर्ति के लिए करनी चाहिए, ४७८
ग्रेग, रिचर्ड बी०, २५, १५०, २६२, २६८,
२८८, २८९, ३१३, ३२६, ३३१,
४१७, ४३५, ४९१; के चरखे और
खादी पर विचार, २२८-३०
{{C|'''घ'''}}
घोष, प्रफुल्लचन्द्र, ४५
{{C|'''च'''}}
चटर्जी, रामानन्द, ४४४
चट्टोपाध्याय, एच०, ८९
गिरि प्रवचन (सरमन ऑन दि माउन्ट), ४३ चतुर्वेदी, बनारसीदास, २९०
गिरिराज, १२२
गुजरात विद्यापीठ, और ग्रामसेवा, ४७८-
७९; -और देहाती शिक्षा, ३३५;
- का पुनर्गठन, ५-९; - के मुख्य उद्देश्य,
४२४-२५; - में शिक्षा पद्धति, ४१५
गुप्त, बाबू शिवप्रसाद, २२१
गुरु, और गोविन्द, ४०९-१०; -भक्ति
और चरित्र निर्माण, ३८४
गुरु गोविन्द, ४४३
गुरुकुल काँगड़ी, ४७६
गेट, सर एडवर्ड, ४६५
गेब्रियल, ब्रॉयन, ६३
गोकुलभाई, ४३८
गोखले, बबन १२३ पा० टि०
गोडमुने, अल्बर्ट, २२६
गोयनका, जयदयाल, ३१४
गोरक्षा, ११, ५९, ७९
ग्राम- पुनर्निर्माण, और कताई, ११५
ग्राम- पुननिर्माण सेवा, -और राष्ट्रीय
शिक्षाका पाठ्यक्रम, ३६४; -नगर
चन्दूलाल, डा०, ३३९
चमूपति, पण्डित, ३४१
चरखा, ८०, १४१, १४३, १४८, १९१,
२०२, २२५, २३१, २३९, २८५,
२९४, ३४३, ३६३, ३६८, ४२६,
४५२; -और गुजरात विद्यापीठ, ७;
-और मिल-मालिक, २३४; - और
हाथ करघा, ४८; - विदेशी वस्त्रोंके
बहिष्कारमें समर्थ, १६५ - [ खे] पर
रिचर्ड बी० ग्रेगके विचार, २२८-३०
चरखा संघ, देखिए, अखिल भारतीय चरखा
संघ
चरित्र-निर्माण, और गुरुभक्ति, ३८४
चांदीवाला, ब्रजकृष्ण, १२१, ३१७
चिनाई, ३३४
चीन, पर विदेशी पूँजीका प्रभाव, १८
चैम्सफोर्ड, लॉर्ड, ४६५
चैरिंग्टन, बेन एम०, ४७४
चौधरी, राधाबहन, देखिए, गांधी राधा
चौधरी, रामनारायण, ६८<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|५२१}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
४३२, ४३६, ४३७, ४४४, ४५०,
४५४, ४५६, ४६१, ४६७, ४७६,
४८२, ४९१
देसाई, वा० गो०, ६, ७९, २३५, २८८, ३४९
देसाई, हरिप्रसाद ब्रजराय, ६
द्रोण, ८६, ४०७
द्रौपदी, १७६
द्वादशमन्त्र, ३१४
{{C|ध}}
धर्म, १७७, २४९, २९७, ४०८, ४१७; और
अधर्म, ३१४, ४१०; - और अहिंसा,
४४०; -और राष्ट्रीय शिक्षा, ३४७;
- का पूर्ण और अपूर्ण रूप, १४६;
- के नाम पर व्यभिचार और लूट,
३१४-१५ - जीवनकी छोटी से छोटी
बातों में दिखना चाहिए, ४७२
धर्म-परिवर्तन, और गुलाबकी उपमा
१४६-४७
धार्मिक शिक्षा, और शिक्षक, ४०६
धीरू, ११, ५६, ८७, १०१ पा० टि०
धीरेन, १७१, १७२, २९१
{{C|''' न '''}}
नगरवासी, -और ग्रामसेवा, ४७८-७९
नटराजन, के०, ४८७
नटेशन, १८९, ४७३
नडसन, एलिजाबेथ, २५०
नवजीवन, १२, ३७, ५१, १४९, २११,
३०२, ३१४, ४०३, ४१६, ४५६ ; -के
ट्रस्टी, ४५०
नादकर्णी, एस० डी०, ३२ पा० टि०, ९४
नायडू, डा० एम० ई०, १५३
नायडू, पद्मजा, २४८
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
नायडू, सरोजिनी, २४८, ३०५ पा० टि०
नायर, ए० एस० मण्णाडि, १०५
नायर, के० माधवन्, २५१
नारायण, २२०
नारायणदास, दीवान एम०, २०९
निखिल, ५४, ८१, १०२, २६४, २९९,
३३२, ३७३, ४०१, ४०४, ४१४,
४४७
निरंजनसिंह, ३२९
निष्कुलानन्दन, ४११
निष्क्रिय प्रतिरोध, -गलत नाम, ५२
नील, हेनरी, ४३
नीलकण्ठ बाबू, ४६६, ४८६
नेपोलियन, ९५
नेहरू, कमला, ६२, १३१, १८६, ४४८, ४५५
नेहरू, जवाहरलाल, २१, ६२, ७२, ८१,
८३, ८९, १३१, १३२, १४१, १८६,
२०७, २२२, २५२, २५८, २७५,
३१८ पा० टि०, ३२९, ४४८, ४५५,
नेहरू, मोतीलाल, २१, ७२, ८१, १५५,
२३४, २४२, २४३, २५८, ३१७,
३२९, ४४९, ४५५, ४६८
नैयर, प्यारेलाल, १२२, २२३, ३१९, ४५४
न्यास, ३०७
न्यू इंडिया, -को सन्देश, १९४
न्यूज शीट, ३१७
न्यूयार्क टाइम्स, १७
{{C|''' प '''}}
पट्टणी, प्रभाशंकर, ४५२
पट्टणी, लेडी रमाबाई, ४५
पटेल, गोवर्धनभाई आई०, ४८९
पटेल, मणिबहन, २४७, ३४८, ३७०, ३८९<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|५२२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
पटेल, वल्लभभाई, ३, ६, १० पा० टि०,
२४, ३२, ३८, ५१, ८५, ८६, ९६-
९८, १०७, १५७, १८२, २८०, ३०९,
३१६, ३२८, ३३४, ३३८, ३३९,
३४०, ३४८, ३६२, ३७० पा० टि०,
३७५, ३७९, ३८१, ३८५, ३८६,
३८७, ३९८, ४०७, ४१६, ४४१,
४४९, ४५०, ४५१, ४५९, ४६२,
४६४, ४८३, ४८६, ४८७
३९२, ३९८, ४५१, ४८८
पण्डित, प्रताप एस०, १५४
पण्डित, वसुमती, ३७४, ३८५, ३८९, ४०२,
४३६, ४५१, ४७६
पण्डित, सुखलालजी, ६
परमार, बेचर, ३८८, ४७७
परिवार नियोजन, देखिए सन्तति निग्रह
परिषद्, देखिए काठियावाड़ राजनैतिक
परिषद्
परीख, नरहरि, ६, २४, १७३, ३६१, ४२९
पर्दा, -बिहार में, ४९२-९३
पर्शतलाल, १७३
पश्चिम, और शोषण, ४
पाठ्यपुस्तकें; -और प्राथमिक शिक्षा, १७८- प्रजाबन्धु, १९५ पा० टि०
७९, ३३५-३६, ३६४-६५, ४०५-६
प्रताप, ६८
पाण्डयन, बी० राजाराम, ७१
पारनेकर, ५६
पारसी, ५०, १८३
पारेख, कुंवरजी, खेतसी २७३, २९८
पारेख, देवचन्द, ७४, २३५, २४४, २६०,
३२७, ३३३
पारेख, मूलचन्द, १०९
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पार्वती, ४९४
पॉल, ए० ए०, २१, १९३, २१७, २१८
पिगॉट, एम०, १५५
पिचमुथु, डा० अरुलमणि, १६२
पिल्ले, ४८६
पिल्लं, पी० तिरुकूटसुन्दरम् ३१२
पीटर्सन, एन० मेरी, ३२६
पुजारी, १५२, ३४४
पुणताम्बेकर, एस० वी०, १४ पा० टि०
पटेल, विट्ठलभाई, ३८१, ३८२, ३८७, पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, सर, २,
१२३
प्रतिज्ञा का पालन, ३८
प्रभावती, ४०३
प्राकृतिक चिकित्सा, २०६
प्रार्थना, १, ४५; -मन, वचन और कर्म
द्वारा, ३१५; -सामूहिक, ३२३, २४,
४७१
प्रिवी कौंसिल, १५५
१७३, २३४, २४३
पूँजाभाई, १४१, ३१३
पूवैया, रोहिणी, ४०
पृथक निर्वाचक मण्डल, -और स्थानों
[ सीटों ] का संरक्षण, ८२
पेटिट, जे० बी०, २८९
पेनिंगटन, जे० बी०, २१२, ३९९
पेरी, सैम्युअल आर०, ३६३
पेरीरा, एच० एम०, १५२
पोद्दार, रामेश्वरदास, १०, ४१, ४०२
पोलक, एच० एस० एल०, ६५, ३५९, ४६७
प्यारे, अली, १८
प्रकाशम्, टी०, २६९, ३५४<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५५५
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||सांकेतिक|५२३}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
'''फ'''
फड़के, मामा, ६
फेरियर, रेव० जॉन टॉड, ४६९
फ्रांसिस, ई० बी०, १९
''' ब '''
बच्चे, -[ चों ] की शिक्षा, ३३६
बजाज, जमनालाल, १०, १८, ८३,
११३,
बॉम्बे क्रॉनिकल, ३८६ पा० टि०
१२४, १३२, १३४, १६६,
२२१,
३४३,
२४२, २७८, २९१, ३३२,
३४९, ३७८, ४०२, ४३१, ४५०,
४५१, ४५६
बनर्जी, केदारनाथ, ४०४
बनर्जी, सुरेशचन्द्र, १३
बर्क, ९५
बर्केनहेड, लॉर्ड, ६२
बर्मा, की गांधीजीकी प्रस्तावित यात्रा,
१८५, २६७-८
बसु, कप्तान, १०५
बहिष्कार, ८, ५३, १५५, १६६, १८५;
- अंग्रेजी कपड़ेका बंगालमें, २५९;
-अंग्रेजी मालका, ६६, १३७, १६४;
- और खादी, २२२-२३; -और छात्र,
७१, १६७-६८; -और मिल-मालिक,
११४-१५, १३४, १४४-४६, १६५,
१८०, १८६, १९०, २०१-३, २३०-
३२, २३४, २५८-५९, २९२; -और
सुभाषचन्द्र बोस, १७९; के सम्बन्धमें
भ्रम,
१०१;
१८३; - बंगालमें,
-भारतीय मिलोंके कपड़ेका, २५८;
- विदेशी कपड़ेका, १०, १६, २०, ३०,
५०, ८३, १६१, १८३, २०१, २२२,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
२२३, २४३, ३१९-२१;
कमीशनका, ९ पा० टि०;
और अहिंसक, १२५
- साइमन
-हिंसक
बाघात रियासत; में कोलियोंका जनेऊ
पहननेका अधिकार, १४३-४४, १९८,
२११, ३४१
बाबू, १०
बारडोली दिवस, ३८६-८७, ४०८
बारडोली सत्याग्रह, २३ पा० टि०, ८५-
८६, ९६-९८, १२५, ३३४, ३८२;
- और पटेलों और तलाटियोंका त्यागपत्र,
४३२-३३; और स्वराज्यकी लड़ाई,
३८-३९; - के खिलाफ चार नीतियाँ,
४०६-८; -के खिलाफ डायरशाही,
१८२-८३; -के खिलाफ सरकारकी
डायरशाही और आतंकको नीति,
१६३, ३७४-७६; - गवर्नरका जाँच
बैठानेसे इन्कार, ४४०-४२ ; -पर
सरकारी लांछनोंका जवाब, ३३८-४०,
३९०-९२; - में पठानोंका व्यवहार,
४५७-६२; - में लगानकी खुली और
स्वतन्त्र जाँचकी माँग, ४६२-६५
बारदोलाई, एन० सी०, ४४६
बालकृष्ण, ३८९
बाल-विवाह, १०; -और ब्रह्मचर्य, ४८१ ;
-की बुराई, १४९
बाल- शिक्षा, -और महाविद्यालयकी शिक्षा,
३८३
बालि-वध, १७६
बाल्मीकि, १७६, १७<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|५२४|
सांकेतिका}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
बावजीर, अब्दुल कादिर, ६, ३३९, ४२९,
४३१, ४५४
बिंग, हैरॉल्ड, एफ०, २३
बिड़ला, घनश्यामदास, ११, १५, १७५,
२४३, २७४, २९२, ३३२, ३७३,
३८९, ४५२
बिड़ला, जुगलकिशोर, ४३०
बिड़ला, रामेश्वर, ३९८
बियरम, श्रीमती ई०, ३२३
बुकर, रेनहोल्डने, ३६३ पा० टि०
बुद्ध, (भगवान) १७०, ३२४
बुद्धि; -और शास्त्र, १४
बुनाई शास्त्र, ४२७
बुराई, ९३
बेंजामिन, ४६०
बेंटिक, लॉर्ड विलियम, १६८
बेली, नौरा एस०, ४१
बेली, रेव० ए० ए०, ४१ पा० टि०
बेसेंट, डा० एनी०, २४८, ३०५, पा० टि०
बैंकर, शंकरलाल, ६, १३०, १५६, १६६,
२२१, ३०७, ३४३, ४४६, ४५०,
४५६, ४९१
बोअर युद्ध, १७
बोल्ट्स, विलियम की गवाही जुलाहोंके
अपने अँगूठे काटनेके बारेमें, २५४-५७
बोस (जल-चिकित्सा विशेषज्ञ), ५४
बोस, सत्यानन्द, ३६७
बोस, सर जगदीशचन्द्र, २३६
बोस, सुभाषचन्द्र, १७९
बौद्धिक शिक्षा; और उद्योगकी शिक्षा, ४४३
---
ब्रजकिशोर प्रसाद, २७०, २७८, ४९३
ब्रह्मचर्य, १७७, १९५, २७३, २७९, ३६०,
३६९, ३८१-२, ४३०, ४३९, ४४१,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
४७९, ४८४; -आत्मबलका स्रोत,
४८०; -और जीवन-संगी, २८३;
- और स्वाद, ४२१; के भेद, १९६
ब्रह्मा, ९४, ४०९
ब्रॉउन, एफ० एच०, ३५७
ब्रॉउन, रनहम, २१
ब्रॉकवे, आर० नौरा, ८९
ब्रॉकवे, ए० फेनर, २१, २३, ८९
ब्रॉकवे, श्रीमती लीला, २२
ब्रॉन, श्रीमती जोजेफ ए०, १४०
ब्रिटिश शासन की फूट डालो और राज
करोकी नीति, ३४०; - में दशा, ४३,
४७; - से अराजकता अच्छी, ७६-७८;
- से हानियाँ, १३५, १३७
ब्लेयर, श्रीमती, २३९
{{C|''' भ '''}}
भक्ति, के नाम पर भोग, ३१४-१५
भक्ति बा, ३३९
भगवद्गीता, ५३, ५४, ११२, पा० टि०,
११७ पा० टि०, २२५, २६४ पा०
टि०, ३०३; - एक आध्यात्मिक शब्द-
कोष, १७८; -की शिक्षा, ८१
भगवानजी, ३२७, ३३३
भट्ट, गोकुलभाई, ६
भट्ट, नृसिंहप्रसाद, ६
भट्ट, मोहनलाल मगनलाल, ४५०
भवभूति, १७६
भारत, २९१
भारतवर्षका आर्थिक इतिहास, २५५
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, २०, २२, ४५,
४९, ५४, ८०, ८२, २३३, २५८,
२७५, ३५३, ४६८, -और खादीके<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५५७
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Lado Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|५२५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
बारेमें प्रस्ताव, ३१९-२१; -का १९१५
का अधिवेशन, १०८; -की अखिल
भारतीय कमेटी, १०; -की कार्य-
समिति, १०८, ३१८
भार्गव, गौरीशंकर, ५२
भावे, विनोबा, देखिए, विनोबा
भिक्खु, उत्तम, १८५
भीष्म, ८६, ४०७; का ब्रह्मचर्य, ४८०
भास्कर, वाई०, ५५
भास्करन्, वी० एस० ८८, १२१
भोजराज खुशीराम, ३६९
भोजा, भगत, ४४३
भोसले, एन० डी०, १२३
{{C|म}}
मंगलदास, सेठ, २२२, ४८९
मंजीयरली, टी० डि, १४०, ४००
मगनलाल गांधी स्मारक, ३४२
मजमूदार, ५४
मजमूदार, परीक्षितलाल, ६
मथुरादास त्रिकमजी, १२२, १२४, १९१,
३०३, ३८०, ४११, ४९५
मथुराप्रसाद, २६९
मदर इंडिया, ३, ४०, ३४४
मद्यनिषेध, ८२; -में सरकारी नीति
रुकावट, ३२५
मनरो, टॉमस, २५६
मनसुखलाल, २३५, २४४, ३२७
मनुस्मृति में प्रक्षेप, ३१
मरीचि, २६८
मलकानी, ना० रा० २, १३, ३२, १२५,
१२९, १७३, १९१, २१४, ३०३,
४११
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
मलकानी, श्रीमती ना० २०, १९२
मशरूवाला, किशोरलाल, ६, २२५, ३६०
मशीन, और बेरोजगारी, ४६८
-
महाभारत, ४७, ३०७, ३६४, ४१७, ४८० ;
- इतिहास नहीं है, २४९
महेन्द्र प्रताप, राजा, ९३
मॉड, एल्मर, ३४, ७९
माधव स्मृति, ९४
माधवन, एम० टी० के०, १५८
मानव-शक्ति, का कभी समाप्त न होने-
वाला भण्डार हमारे पास है, ११५
मार्सेलो, चार्ली यू०, २१३
मालवीय, मदनमोहन, १२, ७३, ४५५
मालिक और कर्मचारीके सम्बन्ध, २६५-६६;
- ऐसे होने चाहिए जैसे पिता और
पुत्रके, ३०६-८
मित्र, शचीन्द्रनाथ, ३२७, ३७७
मिलका कपड़ा, और बहिष्कार, २५८;
- कांग्रेस प्रदर्शनीसे बाहर रखें, ३५३,
४४८
मिल-मालिक, और खादी, ११४-१५, १४५,
१८०, २०१-३, ३१९-२१; -और
नकली खादीका उत्पादन, २०२, ३२१;
-और बहिष्कार, देखिए बहिष्कार,
मिशनरी, और अस्पृश्य, १९७ -और
गुलाबकी उपमा, १४६-४७
मिश्र, रामनन्दन, ४९३
मिश्र, श्रीमती रामनन्दन, ४९३
मीराबहन, ११, २७, २८, ३५, ४४ पा०
टि०, २८४, ३१६, ३१९, ३२८, ३४८,
३७०
मीरांबाई, ११२<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५५८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|५२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
मुखर्जी, धनगोपाल, ४०
मुखर्जी, सर आशुतोष, ३०५ पा० टि०
मुथु, डा० सी०, ३१, ३९, ५६, ६९, ७४,
२०६, ४९६
मुथुकृष्णा, ४८६
मुथुकृष्णा, श्रीमती लिली, ४८६
मुन्शी, क० मा०, ४४०, ४५८, ४६२,
४६५, ४८१, ४८३
मुराटोरी, एस०, ४१९
मुस्लिम, ३३, ३७, ४५ पा० टि०, ४७,
५०, ८२, १५३, १६४, १६५, १८३,
३४०
मुस्लिम लीग, ७२ पा० टि०
मुहम्मद अली, ३४३, ३४६
मुहम्मद, पैगम्बर, १७१, ३२४
मूर, आर्थर, ४१३
मूलचन्द भाई, २४४
मृत्यु की भविष्यवाणी, ४९-५०
मेघनाद, १९६
मेटॉफ, पेट, २६१
मेढ, ६८
मेनन, ३५, ४७४
मेनन, एस्थर, ३४, ४७३
मेयो, कुमारी, २१२, ४०२, ४६९; -की
'मदर इंडिया' पुस्तकके बारेमें और
चर्चा, ३-४; -को एन्ड्रयूजका उत्तर,
३४४
मेसर्स लिवर ब्रदर्स, ३०७, ३०८
मेहता, कल्याणजी, २९४
मेहता, छगनलाल, ११
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
मेहता, डा० सुमन्त, ३३९
मेहता, बालूभाई, ११५
मेहता, रायचन्द रावजीभाई, ३१३
मेहर, तुलसी, ६४, २७४
मैकडॉनल्ड, रैम्जे, १६३
मैकमिलन कम्पनी, २६४, ३५७
मैकाले, और अंग्रेजी शिक्षा, १६८
मैथ्यू, पी० के०, १४८
मैसेज ऑफ दुखोबर्स, २६१ पा० टि०
मोंटेस्क्यू, ९५
मोक्ष, ३८४; -और अहिंसा, ११८
मोदी, रमणीकलाल मगनलाल, ४२९
मोहनलाल, ४५६
{{C|य}}
यंग इंडिया, २, १२-१४, २९, ३४, ३५,
४०, ४२, ५१, ५३, ६७, ७३, ११३,
१४८, १५२, १६२, १७१, १८०,
१९०, १९८, २०७, २११, २१९,
२२८, २४३, २५३, २६१, २६२,
२७६, २७१, २८१, २९३, ३०३,
३१४, ३२५, ३२८, ३४४, ३४५,
३८६, ४०२, ४३७, ४४९, ४५६,
४५७ पा० टि०, ४६१, ४६६
यज्ञोपवीत, और अस्पृश्य, १४३-४४, १९८,
२११, ३४१; -और कोली, १४३-
४४, १९८, २११, ३४१ - देखिए
बाघात रियासत भी
यहूदी, ५०
युद्ध; -और ईसाई धर्म, ३२; -में भाग
लेना, ९१-९३, ११८
मेहता, डा० प्राणजीवन, ११ पा० टि०, युधिष्ठिर, ८६, ४०७
६९ पा० टि०, ७५
युवक, और सेवाका काम, १३९<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|५२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
रूपनारायण, ३९५
रूस में किसानोंके लिए स्कूल, १७
रूसी क्रान्ति, ७९
रेत, मेहरसिंह, ३५६
रेवाशंकर अनूपचन्द, २३५
रोनो, फ्रेंज, १३९
रोमाँ, रोला, २७, २८ पा० टि०, १२७,
१७४,
१५३, १५५, पा० टि०, १६०,
१७५, १८६, १८८, २०७, २१६,
२३४, २४०, २५३, २५९, २६७,
२७६, २८४
{{C|ल}}
रौलट ऐक्ट, २९
लक्ष्मी, ३४
लाइफ एंड लैटर्स, (मैकाले), १६८
लाजपतराय, १२, ४८, २२२, २२३, ३००,
३३०, ४६६
लाटरियाँ; -धर्मार्थ संस्थाएँ, ३५०-५१
लालजी, सेठ, २२२
लिबर्टी, ३, ४
लियोनिडस, २७
लीडर, १५
लीलाबहन, ३८९
ले मन्स, एल०, ४४
लेस्टर, म्यूरियल, ९९, १७४, २४०
लैन्सबरी, १६३
{{C|व}}
वर्णाश्रम धर्म, २१४; -और सत्याग्रह
आश्रम, ४२२; का आधार धन्धा,
४४२-४३
वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ यूथ फॉर पीस, १३९
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पा० टि०
वर्ल्ड यूथ पीस मूवमेंट, २२, ३४
वल्लभाचार्य, ४०९ पा० टि०
वाजपेयी, रामलाल बलराम, ४६९
वायलेट, ३६, १२२
वायु, १९५
वारियर, एम० आर० माधव, १२८
विजयराघवाचारियर, सी०, ३००, ४४९
विद गांधीजी इन सीलोन, ४१४ पा० टि०
विदेशी कपड़ा, देखिए बहिष्कार
विद्यार्थी; और कताई, ३७७; -और
खादी, १७९; -और धर्मोका ज्ञान,
४४२; - राष्ट्रीय आन्दोलन, १६, २९,
१६७-६८; - [ थियों की शारीरिक
-[
और मानसिक दुर्बलताके कारण, ४८१
विद्यार्थी परिषद, लंका, २५३
विनोबा, ४२९, ४३०
विन्ध्येश्वरी प्रसाद, ३५८, ४१२
विल्सन, एच०, एच०, २५६
विल्सन, सर लेस्ली, ३९६, ४६५
विवाह; -वृद्ध पुरुषोंका, ५६-५८, १४९-
५०; - सन्तति निग्रह, २८१-८३
विश्व मद्यनिषेध सम्मेलन महिला शाखा, ३२५
वकील; -[ ] और डाक्टरोंका फीस लेना, विश्वयुद्ध प्रथम, १७, २८,
१११, ३३४;
९०
-[तें]
वन्देमातरम्, ९३
- में गांधीजीका भाग लेना, ९१-९३,
११७-१८
वरदाचारी, एन० एस०, १४ पा० टि०, ४९१ विश्वास, सुरेन्द्रनाथ, ४४५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh|५३२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
अस्पृश्यता, ३१२; -और बारडोली
आन्दोलन, ३८; और हिन्दू-मुस्लिम
एकता, १५३; -का अर्थ, १३७;
-की ओर बढ़ने में सामाजिक बुराइयाँ
रुकावट, ४९३; के लिए मानसिक
क्रान्ति आवश्यक, ५०; और गुजरात
विद्यापीठ, ७
स्वराज्यवादी, ३७
स्वाधीनता, देखिए स्वराज्य
स्वावलम्बन पाठशाला, ३७८
स्वेच्छा स्वीकृत दारिद्र्य, का अर्थ, २९४-९६
नस्वेन्सका किरकान्स, ४००
{{C|ह}}
हंगमिंग, कु, १७-१८
हंटर, विलियम विल्सन, ४१७
हंटर कमेटी, १६३, १८२
हकीमजी, देखिए अजमल खाँ, हकीम
हनुमान की आराधना, १९५-९६
हबीबुल्ला, सर मुहम्मद, ६१, २८७, ३५४
हरचन्दराय विशनदास, ४७
हरिहर, ३८२
रेहन्द्रनाथ, राय, १८१
हाउस ऑफ कामन्स, ४५
हाथ कताई, और हाथ-बुनाई, १४ पाo
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
टि०; - देखिए कताई भी
हाथ करघा, और चरखा, ४८
हारकर, श्रीमती, २५
हारोलिकर, वी० बी०, ४७-४८
हॉवर्ड, जैन, १०९
हिंसा, कायरता से अच्छी है, ७७-७८
हिगिन बॉटम, श्रीमती सँम, २१७
हिगिनबॉटम, सैम, १६२
हिन्दी नवजीवन, ३१४
हिन्दी - हिन्दुस्तानी, की शिक्षा, गुजरात
विद्यापीठमें, ४२५
हिन्दू, ४४९
हिन्दू, ३७, ४५ पा० टि०, ४७, ५०,
१०९, १४३, १५३, १५६, १६४,
१६८, १८३, १९७, २४५, ३४०;
-और अलग-अलग निर्वाचक मण्डलों
पर कांग्रेस प्रस्ताव, ८२, -और
अस्पृश्य, ३२, २४६
हिन्दूधर्म, १०९, ४०९, ४२२, ४३९; -और
अवतार, १७६-७७; -और अस्पृश्यता,
७, ३२, २४६, २४७
हिन्दू महासभा, १९८
हिन्दू-मुस्लिम एकता, १९, ३७, ८२, २५२,
३६७, ४००; -और स्वराज्य, १५३,
३१२
हिन्दू-मुस्लिम मतभेद, ७८, ४१२
हिबर्ट, ३६२ पा० टि०
हुसैन, डॉ० जाकिर, ११३, १३२, ३४८
हेमिल्टन, सर डेनियल एम०, ९९, २५२,
४०१
हेरॉल्ड, ६४
हेस, रोलैंड, ९०
हैंड स्पिनिंग ऐसे, १४०
होज, रेव०, ९९
होम्स, जॉन हेन्स, १०५, २६०, २६४
होरेशियस, २७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१८
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|चौदह}}</noinclude>{|width=100%
|-
|२८. || मेरा स्वास्थ्य (१६-२-१९२८) || ३०
|-
|२९. || सिन्धमें बाढ़–सहायताका काम (१६-२-१९२८) || ३२
|-
|३०. || चिट्ठी–पत्री (१६-२-१९२८) || ३२
|-
|३१. || पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१८-२-१९२८) || ३३
|-
|३२. || पत्र : एम० एल्मर मॉडको (१८-२-१९२८) || ३४
|-
|३३. || पत्र : एस्थर मेननको (१८-२-१९२८) || ३४
|-
|३४. || पत्र: वायलेटको (१८-२-१९२८) || ३६
|-
|३५. || हकीम अजमलखाँ स्मारक (१९-२-१९२८) || ३७
|-
|३६. || बारडोलीके किसानोंसे (१९-२-१९२८) || ३८
|-
|३७. || पत्र : सी॰ मुथुको (२१-२-१९२८) || ३९
|-
|३८. || पत्र : एलिस मेकेकेलीको (२१-२-१९२८) || ४०
|-
|३९. || पत्र : रोहिणी पूवैयाको (२१-२-१९२८) || ४०
|-
|४०. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२१-२-१९२८) || ४१
|-
|४१. || पत्र : नोरा एस॰ बेलीको (२२-२-१९२८) || ४१
|-
|४२. || पत्र : देवी वेस्टको (२२-२-१९२८) || ४२
|-
|४३. || पत्र : हेनरी नीलको (२२-२-१९२८) || ४३
|-
|४४. || पत्र : एल॰ ले मन्सको (२२-२-१९२८) || ४४
|-
|४५. || पत्र: प्र॰ च॰ घोषको (२-२-१९२८) || ४५
|-
|४६. || लड़ना पड़े तो ईमानदारीसे लड़ें (२३-२-१९२८) || ४६
|-
|४७. || पुरानी याद ताजा हो गई (२३-२-१९२८) || ४६
|-
|४८. || हाथ–करघा बनाम चरखा (२३-२-१९२८) || ४७
|-
|४९. || तिलका ताड़ (२३-२-१९२८) || ४९
|-
|५०. || पत्र : उर्मिला देवीको (२३-२-१९२८) || ५१
|-
|५१. || पत्र : गौरीशंकर भार्गवको (२३-२-१९२८) || ५२
|-
|५२. || पत्र : बी॰ डब्ल्यू॰ टकरको (२४-२-१९२८) || ५२
|-
|५३. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२५-२-१९२८) || ५४
|-
|५४. || पत्र : वाई॰ भास्करको (२५-२-१९२८) || ५५
|-
|५५. || पत्र : जी॰ रामचन्द्रनको (२५-२-१९२८) || ५५
|-
|५६. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२५-२-१९२८) || ५६
|-
|५७. || गायको कौन छुड़ायेगा? (२६-२-१९२८) || ५६
|-
|५८. || विद्यार्थियोंका सुन्दर सत्याग्रह (२६-२-१९२८) || ५८
|-
|५९. || पत्र : विल्फ्रेड वेलॉकको (२६-२-१९२८) || ६०
|-
|६०. || पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (२६-२-१९२८) || ६१
|-
|६१. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२६-२-१९२८) || ६२
|-
|६२. || पत्र : मणिलाल और सुशीला गांधीको (२६-२-१९२८) ||६३
|-
|६३. || पत्र : तुलसी मेहरको (२६-२-१९२८) || ६४
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१९
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|पन्द्रह}}</noinclude>{|width=100%
|-
|६४. || पत्र : एल॰ डब्ल्यू॰ रिचको (२७-२-१९२८) || ६४
|-
|६५. || पत्र : के॰ बालसुब्रह्मण्यमको (२७-२-१९२८) || ६६
|-
|६६. || पत्र : के॰ नरसिंह आयंगारको (२७-२-१९२८) || ६७
|-
|६७. || पत्र : प्रागजी देसाईको (२७-२-१९२८) || ६८
|-
|६८. || पत्र : रामनारायण चौधरीको (२७-२-१९२८) || ६८
|-
|६९. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२९-२-१९२८से पूर्व) || ६९
|-
|७०. || पत्र : अब्बास तैयबजीको (२९-२-१९२८) || ७०
|-
|७१. || पत्र : दुनीचन्दको (२९-२-१९२८) || ७०
|-
|७२. || पत्र : बी॰ राजाराम पाण्डयनको (२९-२-१९२८) || ७१
|-
|७३. ||पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२९-२-१९२८) || ७२
|-
|७४. || पत्र : पद्मराज जैनको (२९-२-१९२८) || ७३
|-
|७५. || पत्र : देवचन्द पारेखको (२९-२-१९२८) || ७४
|-
|७६. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (२९-२-१९२८) || ७४
|-
|७७. || वैदेशिक प्रचार (१-३-१९२८) || ७५
|-
|७८. || अराजकता बनाम कुशासन (१-३-१९२८) || ७६
|-
|७९. || टॉल्स्टॉय शताब्दी (१-३-१९२८) || ७९
|-
|८०. || गोरक्षा सम्बन्धी साहित्यकी सूचि (१-३-१९२८) || ७९
|-
|८१. || मेरठके समीप खादी (१-३-१९२८) || ८०
|-
|८२. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (२-३-१९२८ या उसके पश्चात्) || ८१
|-
|८३. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३-३-१९२८) || ८१
|-
|८४. || तार : जमनालाल बजाजको (३-३-१९२८) || ८३
|-
|८५. || गुजरातमें खादीकी फेरी (४-३-१९२८) || ८४
|-
|८६. || काठियावाड़के ढ़ोर (४-२-१९२८) || ८४
|-
|८७. || बारडोलीमें सत्याग्रह (४-३-१९२८) || ८५
|-
|८८. || पत्र : रेवाशंकर झवेरीको (४-३-१९२८) || ८६
|-
|८९. || पत्र : प्रेम महाविद्यालय—न्यासके अध्यक्षको (५-३-१९२८) || ८६
|-
|९०. || पत्र : ए॰ जे॰ साँडर्सको (५-३-१९२८) || ८८
|-
|९१. || पत्र : वी॰ एस॰ भास्करनको (५-२-१९२८) || ८८
|-
|९२. || पत्र : आर॰ नोरा ब्रॉकवेको (५-३-१९२८) || ८९
|-
|९३. || पत्र : रोलेंड हेसको (५-३-१९२८) || ९०
|-
|९४. || पत्र : डब्ल्यू॰ बी॰ स्टारको (५-३-१९२८) || ९०
|-
|९५. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (६-३-१९२८) || ९१
|-
|९६. || युद्धके विरुद्ध युद्ध (८-३-१९२८) || ९१
|-
|९७. || प्रेम महाविद्यालय (८-३-१९२८) || ९३
|-
|९८. || टिप्पणियाँ : परम निर्णायक; सफलता चाहनेवालोंके लिए; (८-३-१९२८) || ९४
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/२२
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|अठारह}}</noinclude>{|width=100%
|-
||१६९.|| मोतीलाल नेहरूको (२७-३-१९२८) || १५५
|-
||१७०.|| भाषण : हरिजनोंकी सभा में (२७-३-१९२८) || १५६
|-
||१७१.|| पत्र : टी॰ के॰ माधवनको (२८-३-१९२८) || १५८
|-
||१७२.|| पत्र : एस॰ देवनदास नारायणदासको (२८-३-१९२८) || १५८
|-
||१७३.|| पत्र : रामी गांधीको (२८-३-१९२८) || १५९
|-
||१७४.|| पत्र : एच॰ एन॰ वेनको (२८-३-१९२८) || १६०
|-
||१७५.|| पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (२८-३-१९२८) || १६०
|-
||१७६.|| पत्र : अरुलमणि पिचमुथूको (२८-३-१९२८) || १६२
|-
||१७७.|| पत्र : सैम हिगिनबाँटमको (२८-३-१९२८) ||१६२
|-
||१७८.|| जाति विद्वेषकी जीत (२९-३-१९२८)|| १६३
|-
||१७९.|| आतंकवादका सिद्धान्त (२९-३-१९२८) ||१६३
|-
||१८०.|| राष्ट्रीय सप्ताह (२९-३-१९२८) ||१६४
|-
||१८१.|| टिप्पणियाँ : खास राष्ट्रीय सप्ताहके लिए; बंगालमें खादीके सिलसिले में दौरा; बहिष्कार और विद्यार्थी; मेकॉलेका सपना; संघर्ष के बीच शान्ति; (२९-३-१९२८) ||१६६
|-
||१८२.|| उपवासकी महिमा (२९-३-१९२८) ||१७०
|-
||१८३.|| दो संशोधन (२९-३-१९२८) ||१७१
|-
||१८४.|| पत्र: उर्मिला देवीको (३०-३-१९२८) ||१७१
|-
||१८५.|| पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके सचिवको (३०-३-१९२८) ||१७२
|-
||१८६.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (३०-३-१९२८) ||१७३
|-
||१८७.|| पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (३०-३-१९२८) ||१७३
|-
||१८८.|| पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (३०-३-१९२८) ||१७४
|-
||१८९.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (३०-३-१९२८) ||१७५
|-
||१९०.|| मोक्षदाता राम ||१७६
|-
||१९१.|| भाषण विद्यार्थियों और अध्यापकों की सभा में (३१-३-१९२८) ||१७८
|-
||१९२.|| पत्र : सुभाषचन्द्र बोसको (३१-३-१९२८) ||१७९
|-
||१९३.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (३१-३-१९२८) ||१८०
|-
||१९४.|| पत्र : राय हरेन्द्रनाथको (३१-३-१९२८) ||१८१
|-
||१९५.|| सत्याग्रहियों सावधान (१-४-१९२८) ||१८२
|-
||१९६.|| राष्ट्रीय सप्ताह (१-४-१९२८) ||१८३
|-
||१९७.|| टिप्पणियाँ : उड़ीसा की दुर्दशा; सस्ती खादी; (१-४-१९२८) ||१८४
|-
||१९८.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१-४-१९२८) ||१८५
|-
||१९९.|| पत्र: उत्तम भिक्खुको (१-४-१९२८) ||१८५
|-
||२००.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१-४-१९२८) ||१८६
|-
||२०१.|| पत्र : एच॰ एम॰ अहमदको (१-४-१९२८) ||१८७
|-
||२०२.|| पत्र : शुएब कुरैशीको (१-४-१९२८) ||१८७
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|-
||१६९.|| मोतीलाल नेहरूको (२७-३-१९२८) || १५५
|-
||१७०.|| भाषण : हरिजनोंकी सभा में (२७-३-१९२८) || १५६
|-
||१७१.|| पत्र : टी॰ के॰ माधवनको (२८-३-१९२८) || १५८
|-
||१७२.|| पत्र : एस॰ देवनदास नारायणदासको (२८-३-१९२८) || १५८
|-
||१७३.|| पत्र : रामी गांधीको (२८-३-१९२८) || १५९
|-
||१७४.|| पत्र : एच॰ एन॰ वेनको (२८-३-१९२८) || १६०
|-
||१७५.|| पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (२८-३-१९२८) || १६०
|-
||१७६.|| पत्र : अरुलमणि पिचमुथूको (२८-३-१९२८) || १६२
|-
||१७७.|| पत्र : सैम हिगिनबाँटमको (२८-३-१९२८) ||१६२
|-
||१७८.|| जाति विद्वेषकी जीत (२९-३-१९२८)|| १६३
|-
||१७९.|| आतंकवादका सिद्धान्त (२९-३-१९२८) ||१६३
|-
||१८०.|| राष्ट्रीय सप्ताह (२९-३-१९२८) ||१६४
|-
||१८१.|| टिप्पणियाँ : खास राष्ट्रीय सप्ताहके लिए; बंगालमें खादीके सिलसिलेमें दौरा; बहिष्कार और विद्यार्थी; मेकॉलेका सपना; संघर्षके बीच शान्ति; (२९-३-१९२८) ||१६६
|-
||१८२.|| उपवासकी महिमा (२९-३-१९२८) ||१७०
|-
||१८३.|| दो संशोधन (२९-३-१९२८) ||१७१
|-
||१८४.|| पत्र: उर्मिला देवीको (३०-३-१९२८) ||१७१
|-
||१८५.|| पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके सचिवको (३०-३-१९२८) ||१७२
|-
||१८६.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (३०-३-१९२८) ||१७३
|-
||१८७.|| पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (३०-३-१९२८) ||१७३
|-
||१८८.|| पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (३०-३-१९२८) ||१७४
|-
||१८९.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (३०-३-१९२८) ||१७५
|-
||१९०.|| मोक्षदाता राम ||१७६
|-
||१९१.|| भाषण विद्यार्थियों और अध्यापकों की सभा में (३१-३-१९२८) ||१७८
|-
||१९२.|| पत्र : सुभाषचन्द्र बोसको (३१-३-१९२८) ||१७९
|-
||१९३.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (३१-३-१९२८) ||१८०
|-
||१९४.|| पत्र : राय हरेन्द्रनाथको (३१-३-१९२८) ||१८१
|-
||१९५.|| सत्याग्रहियों सावधान (१-४-१९२८) ||१८२
|-
||१९६.|| राष्ट्रीय सप्ताह (१-४-१९२८) ||१८३
|-
||१९७.|| टिप्पणियाँ : उड़ीसा की दुर्दशा; सस्ती खादी; (१-४-१९२८) ||१८४
|-
||१९८.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१-४-१९२८) ||१८५
|-
||१९९.|| पत्र: उत्तम भिक्खुको (१-४-१९२८) ||१८५
|-
||२००.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१-४-१९२८) ||१८६
|-
||२०१.|| पत्र : एच॰ एम॰ अहमदको (१-४-१९२८) ||१८७
|-
||२०२.|| पत्र : शुएब कुरैशीको (१-४-१९२८) ||१८७
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२०३. पत्र : सदाशिवम्को (१-४-१९२८) १८८
२०४. पत्र : सी० एफ० एण्ड्रयूजको (१-४-१९२८) १८८
२०५. पत्र : रामजीदास जैनीको (१-४-१९२८) १८९
२०६. पत्र : रेमिंगटन टाइपराइटर कम्पनीको (१-४-१९२८) १९०
२०७. पत्र : सत्यानन्दको ( ३-४-१९२८) १९०
२०८. पत्र : रामी गांधीको (३-४-१९२८) १९१
२०९. पत्र : ना० र० मलकानीको (४-४-१९२८) १९१
२१०. पत्र : ए० ए० पॉलको (४-४-१९२८) १९३
२११. पत्र : बी० शिवा रावको (४-४-१९२८) १९४
२१२. सन्देश : 'न्यू इंडिया'को (४-४-१९२८) १९४
२१३. भाषण : आश्रमकी प्रार्थना सभा में (४-४-१९२८) १९५
२१४. अछूतोंको याद रखो (५-४-१९२८) १९७
२१५. बाघात रियासत और जनेऊ (५-४-१९२८) १९८
२१६. अ० भा० च० संघकी वार्षिक रिपोर्ट (५-४-१९२८) १९९
२१७. श्री शास्त्रीका आत्म-त्याग (५-४-१९२८) २००
२१८. बहिष्कार पर एक मिल-मालिक (५-४-१९२८) २०१
२१९. टिप्पणियाँ : आफ्रिकावासी और हिन्दुस्तानी ; स्त्रियाँ और गहने;
कर्वे जयन्ती (५-४-१९२८) २०३
२२०. पत्र : डा० सी० मुथुको (५-४-१९२८) २०६
२२१. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (५-४-१९२८) २०७
२२२. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-४-१९२८) २०७
२२३. पत्र : बहरामजी खम्भाताको ( ६-४-१९२८) २०८
२२४. पत्र : डा० और श्रीमती स्टेंडेनथको ( ६-४-१९२८) २०८
२२५. पत्र : सरदारनी एम० एम० सिंहको ( ६-४-१९२८) २०९
२२६. पत्र : एम० दीवान नारायणदासको (६-४-१९२८) २०९
२२७. वाई० आर० गायतोंडेको ( ६-४-१९२८) २१०
२२८. पत्र : गंगारामको ( ६-४-१९२८) २११
२२९. पत्र : एस० राधाकृष्णनको ( ६-४-१९२८) २११
२३०. पत्र : जे० बी० पेनिंगटनको ( ६-४-१९२८) २१२
२३१. पत्र : जी० रामचन्द्रनको ( ६-४-१९२८) २१३
२३२. पत्र : चार्ली यू० मॉर्सेलोको ( ६-४-१९२८) २१३
२३३. पत्र : ना० र० मलकानीको (७-४-१९२८) २१४
२३४. पत्र : आई० पी० दुराईरत्नम्को (७-४-१९२८) २१५
२३५. पत्र : रेहाना तैयबजीको (७-४-१९२८) २१५
२३६. पत्र : मु० अ० अन्सारीको (७-४-१९२८) २१६
|-
२३७. पत्र : श्रीमती सेम हिगिनबाँटमको (७-४-१९२८) २१७
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||२०३.|| पत्र : सदाशिवम्को (१-४-१९२८) ||१८८
||२०४.|| पत्र : सी० एफ० एण्ड्रयूजको (१-४-१९२८) ||१८८
||२०५.|| पत्र : रामजीदास जैनीको (१-४-१९२८) ||१८९
||२०६.|| पत्र : रेमिंगटन टाइपराइटर कम्पनीको (१-४-१९२८) ||१९०
||२०७.|| पत्र : सत्यानन्दको ( ३-४-१९२८) ||१९०
||२०८.|| पत्र : रामी गांधीको (३-४-१९२८) ||१९१
||२०९.|| पत्र : ना० र० मलकानीको (४-४-१९२८) ||१९१
||२१०.|| पत्र : ए० ए० पॉलको (४-४-१९२८) ||१९३
||२११.|| पत्र : बी० शिवा रावको (४-४-१९२८) ||१९४
||२१२.|| सन्देश : 'न्यू इंडिया'को (४-४-१९२८) ||१९४
||२१३.|| भाषण : आश्रमकी प्रार्थना सभा में (४-४-१९२८) ||१९५
||२१४.|| अछूतोंको याद रखो (५-४-१९२८) ||१९७
||२१५.|| बाघात रियासत और जनेऊ (५-४-१९२८) ||१९८
||२१६.|| अ० भा० च० संघकी वार्षिक रिपोर्ट (५-४-१९२८) ||१९९
||२१७.|| श्री शास्त्रीका आत्म-त्याग (५-४-१९२८) ||२००
||२१८.|| बहिष्कार पर एक मिल-मालिक (५-४-१९२८) ||२०१
||२१९.|| टिप्पणियाँ : आफ्रिकावासी और हिन्दुस्तानी ; स्त्रियाँ और गहने;
कर्वे जयन्ती (५-४-१९२८) ||२०३
||२२०.|| पत्र : डा० सी० मुथुको (५-४-१९२८) ||२०६
||२२१.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (५-४-१९२८) ||२०७
||२२२.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-४-१९२८) ||२०७
||२२३.|| पत्र : बहरामजी खम्भाताको ( ६-४-१९२८) ||२०८
||२२४.|| पत्र : डा० और श्रीमती स्टेंडेनथको ( ६-४-१९२८) ||२०८
||२२५.|| पत्र : सरदारनी एम० एम० सिंहको ( ६-४-१९२८) ||२०९
||२२६.|| पत्र : एम० दीवान नारायणदासको (६-४-१९२८) ||२०९
||२२७.|| वाई० आर० गायतोंडेको ( ६-४-१९२८) ||२१०
||२२८.|| पत्र : गंगारामको ( ६-४-१९२८) ||२११
||२२९.|| पत्र : एस० राधाकृष्णनको ( ६-४-१९२८) ||२११
||२३०.|| पत्र : जे० बी० पेनिंगटनको ( ६-४-१९२८) ||२१२
||२३१.|| पत्र : जी० रामचन्द्रनको ( ६-४-१९२८) ||२१३
||२३२.|| पत्र : चार्ली यू० मॉर्सेलोको ( ६-४-१९२८) ||२१३
||२३३.|| पत्र : ना० र० मलकानीको (७-४-१९२८) ||२१४
||२३४.|| पत्र : आई० पी० दुराईरत्नम्को (७-४-१९२८) ||२१५
||२३५.|| पत्र : रेहाना तैयबजीको (७-४-१९२८) ||२१५
||२३६.|| पत्र : मु० अ० अन्सारीको (७-४-१९२८) ||२१६
|-
||२३७.|| पत्र : श्रीमती सेम हिगिनबाँटमको (७-४-१९२८) ||२१७
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||२०३.|| पत्र : सदाशिवम्को (१-४-१९२८) ||१८८
|-
||२०४.|| पत्र : सी० एफ० एण्ड्रयूजको (१-४-१९२८) ||१८८
|-
||२०५.|| पत्र : रामजीदास जैनीको (१-४-१९२८) ||१८९
|-
||२०६.|| पत्र : रेमिंगटन टाइपराइटर कम्पनीको (१-४-१९२८) ||१९०
|-
||२०७.|| पत्र : सत्यानन्दको ( ३-४-१९२८) ||१९०
|-
||२०८.|| पत्र : रामी गांधीको (३-४-१९२८) ||१९१
|-
||२०९.|| पत्र : ना० र० मलकानीको (४-४-१९२८) ||१९१
|-
||२१०.|| पत्र : ए० ए० पॉलको (४-४-१९२८) ||१९३
|-
||२११.|| पत्र : बी० शिवा रावको (४-४-१९२८) ||१९४
|-
||२१२.|| सन्देश : 'न्यू इंडिया'को (४-४-१९२८) ||१९४
|-
||२१३.|| भाषण : आश्रमकी प्रार्थना सभा में (४-४-१९२८) ||१९५
|-
||२१४.|| अछूतोंको याद रखो (५-४-१९२८) ||१९७
|-
||२१५.|| बाघात रियासत और जनेऊ (५-४-१९२८) ||१९८
|-
||२१६.|| अ० भा० च० संघकी वार्षिक रिपोर्ट (५-४-१९२८) ||१९९
|-
||२१७.|| श्री शास्त्रीका आत्म-त्याग (५-४-१९२८) ||२००
|-
||२१८.|| बहिष्कार पर एक मिल-मालिक (५-४-१९२८) ||२०१
|-
||२१९.|| टिप्पणियाँ : आफ्रिकावासी और हिन्दुस्तानी ; स्त्रियाँ और गहने;
कर्वे जयन्ती (५-४-१९२८) ||२०३
|-
||२२०.|| पत्र : डा० सी० मुथुको (५-४-१९२८) ||२०६
|-
||२२१.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (५-४-१९२८) ||२०७
|-
||२२२.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-४-१९२८) ||२०७
|-
||२२३.|| पत्र : बहरामजी खम्भाताको ( ६-४-१९२८) ||२०८
|-
||२२४.|| पत्र : डा० और श्रीमती स्टेंडेनथको ( ६-४-१९२८) ||२०८
|-
||२२५.|| पत्र : सरदारनी एम० एम० सिंहको ( ६-४-१९२८) ||२०९
|-
||२२६.|| पत्र : एम० दीवान नारायणदासको (६-४-१९२८) ||२०९
|-
||२२७.|| वाई० आर० गायतोंडेको ( ६-४-१९२८) ||२१०
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||२२८.|| पत्र : गंगारामको ( ६-४-१९२८) ||२११
|-
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||२३०.|| पत्र : जे० बी० पेनिंगटनको ( ६-४-१९२८) ||२१२
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||२३१.|| पत्र : जी० रामचन्द्रनको ( ६-४-१९२८) ||२१३
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|-
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||२०३.|| पत्र : सदाशिवम्को (१-४-१९२८) ||१८८
|-
||२०४.|| पत्र : सी॰ एफ॰ एण्ड्रयूजको (१-४-१९२८) ||१८८
|-
||२०५.|| पत्र : रामजीदास जैनीको (१-४-१९२८) ||१८९
|-
||२०६.|| पत्र : रेमिंगटन टाइपराइटर कम्पनीको (१-४-१९२८) ||१९०
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||२०७.|| पत्र : सत्यानन्दको ( ३-४-१९२८) ||१९०
|-
||२०८.|| पत्र : रामी गांधीको (३-४-१९२८) ||१९१
|-
||२०९.|| पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (४-४-१९२८) ||१९१
|-
||२१०.|| पत्र : ए॰ ए॰ पॉलको (४-४-१९२८) ||१९३
|-
||२११.|| पत्र : बी॰ शिवा रावको (४-४-१९२८) ||१९४
|-
||२१२.|| सन्देश : 'न्यू इंडिया'को (४-४-१९२८) ||१९४
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||२१३.|| भाषण : आश्रमकी प्रार्थना सभा में (४-४-१९२८) ||१९५
|-
||२१४.|| अछूतोंको याद रखो (५-४-१९२८) ||१९७
|-
||२१५.|| बाघात रियासत और जनेऊ (५-४-१९२८) ||१९८
|-
||२१६.|| अ॰ भा॰ च॰ संघकी वार्षिक रिपोर्ट (५-४-१९२८) ||१९९
|-
||२१७.|| श्री शास्त्रीका आत्म–त्याग (५-४-१९२८) ||२००
|-
||२१८.|| बहिष्कार पर एक मिल–मालिक (५-४-१९२८) ||२०१
|-
||२१९.|| टिप्पणियाँ : आफ्रिकावासी और हिन्दुस्तानी; स्त्रियाँ और गहने; कर्वे जयन्ती (५-४-१९२८) ||२०३
|-
||२२०.|| पत्र : डा॰ सी॰ मुथुको (५-४-१९२८) ||२०६
|-
||२२१.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (५-४-१९२८) ||२०७
|-
||२२२.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-४-१९२८) ||२०७
|-
||२२३.|| पत्र : बहरामजी खम्भाताको (६-४-१९२८) ||२०८
|-
||२२४.|| पत्र : डा॰ और श्रीमती स्टेंडेनथको (६-४-१९२८) ||२०८
|-
||२२५.|| पत्र : सरदारनी एम॰ एम॰ सिंहको (६-४-१९२८) ||२०९
|-
||२२६.|| पत्र : एम॰ दीवान नारायणदासको (६-४-१९२८) ||२०९
|-
||२२७.|| वाई॰ आर॰ गायतोंडेको ( ६-४-१९२८) ||२१०
|-
||२२८.|| पत्र : गंगारामको ( ६-४-१९२८) ||२११
|-
||२२९.|| पत्र : एस॰ राधाकृष्णनको (६-४-१९२८) ||२११
|-
||२३०.|| पत्र : जे॰ बी॰ पेनिंगटनको (६-४-१९२८) ||२१२
|-
||२३१.|| पत्र : जी॰ रामचन्द्रनको (६-४-१९२८) ||२१३
|-
||२३२.|| पत्र : चार्ली यू॰ मॉर्सेलोको (६-४-१९२८) ||२१३
|-
||२३३.|| पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (७-४-१९२८) ||२१४
|-
||२३४.|| पत्र : आई॰ पी॰ दुराईरत्नम्को (७-४-१९२८) ||२१५
|-
||२३५.|| पत्र : रेहाना तैयबजीको (७-४-१९२८) ||२१५
|-
||२३६.|| पत्र : मु॰ अ॰ अन्सारीको (७-४-१९२८) ||२१६
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२३८. पत्र : ए० ए० पॉलको (७-४-१९२८) २१७
२३९. सन्देश : 'न्यूज शीट' को (७-४-१९२८) २१८
२४०. पत्र : जोजेफको (७-४-१९२८) २१८
२४१. पत्र : एस० गणेशनको (७-४-१९२८) २१९
२४२. पत्र : एलिस शैलेकको (७-४-१९२८) २१९
२४३. पत्र : एस० ए० वेजको (८-४-१९२८) २२०
२४४. पत्र : नारायणको (८-४-१९२८) २२०
२४५. पत्र : जे० बी० कृपलानीको (८-४-१९२८) २२१
२४६. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (८-४-१९२८) २२२
२४७. पत्र : शंकरनको (८-४-१९२८) २२३
२४८. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१०-४-१९२८ से पूर्व) २२४
२४९. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१०-४-१९२८) २२५
२५०. पत्र : अल्बर्ट गोडमुनेको (११-४-१९२८) २२६
२५१. पत्र : च० राजगोपालचारीको (११-४-१९२८) २२६
२५२. पत्र : आर० आर० एथनको (११-४-१९२८) २२७
२५३. पत्र : सदाशिव रावको (११-४-१९२८) २२७
२५४. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (११-४-१९२८) २२८
२५५. एक समयानुकूल किताब (१२-४-१९२८) २२८
२५६. खादीका स्थान ( १२-४-१९२८) २३०
२५७. टिप्पणियाँ: वचन भंग, माजोरका मानवीय कताई यन्त्र (१२-४-१९२८) २३२
२५८. दक्षिण आफ्रिकी भारतीय (१२-४-१९२८) २३३
२५९. पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१२-४-१९२८) २३४
२६०. पत्र : देवचन्द पारेखको (१२-४-१९२८) २३५
२६१. भाषण: खादी विद्यालयके विद्यार्थियोंके समक्ष (१३-४-१९२८ से पूर्व) २३५
२६२. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१३-४-१९२८) २३८
२६३. पत्र : ए० एलिंग्सको (१३-४-१९२८) २३८
२६४. श्रीमती ब्लेयरको (१३-४-१९२८) २३९
२६५. पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (१३-४-१९२८) २४०
२६७. पत्र : रामनाथनको (१३-४-१९२८) २४०
२६८. एक पत्र (१३-४-१९२८) २४१
२६६. पत्र : टी० नागेश रावको (१३-४-१९२८) २४२
२६९. पत्र : मु० अ० अन्सारीको (१४-४-१९२८) २४२
२७०. पत्र : विट्ठलभाई जेराजाणीको (१४-४-१९२८) २४३
२७१- पत्र : देवचन्द पारेखको (१४-४-१९२८) २४४
२७२. दलितोंकी सेवा (१५-४-१९२८) २४५
२७३. पत्र: मणिबहन पटेलको (१५-४-१९२८) २४७<noinclude></noinclude>
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||२३८.|| पत्र : ए० ए० पॉलको (७-४-१९२८) ||२१७
||२३९.|| सन्देश : 'न्यूज शीट' को (७-४-१९२८) ||२१८
||२४०.|| पत्र : जोजेफको (७-४-१९२८) ||२१८
||२४१.|| पत्र : एस० गणेशनको (७-४-१९२८) ||२१९
||२४२.|| पत्र : एलिस शैलेकको (७-४-१९२८) ||२१९
||२४३.|| पत्र : एस० ए० वेजको (८-४-१९२८) ||२२०
||२४४.|| पत्र : नारायणको (८-४-१९२८) ||२२०
||२४५.|| पत्र : जे० बी० कृपलानीको (८-४-१९२८) ||२२१
||२४६.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (८-४-१९२८) ||२२२
||२४७.|| पत्र : शंकरनको (८-४-१९२८) ||२२३
||२४८. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१०-४-१९२८ से पूर्व) ||२२४
||२४९.|| पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१०-४-१९२८) ||२२५
||२५०.|| पत्र : अल्बर्ट गोडमुनेको (११-४-१९२८) ||२२६
||२५१.|| पत्र : च० राजगोपालचारीको (११-४-१९२८) ||२२६
||२५२.|| पत्र : आर० आर० एथनको (११-४-१९२८) ||२२७
||२५३.|| पत्र : सदाशिव रावको (११-४-१९२८) ||२२७
||२५४.|| पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (११-४-१९२८) ||२२८
||२५५.|| एक समयानुकूल किताब (१२-४-१९२८) ||२२८
||२५६.|| खादीका स्थान ( १२-४-१९२८) ||२३०
||२५७.|| टिप्पणियाँ: वचन भंग, माजोरका मानवीय कताई यन्त्र (१२-४-१९२८) ||२३२
||२५८.|| दक्षिण आफ्रिकी भारतीय (१२-४-१९२८) ||२३३
||२५९.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१२-४-१९२८) ||२३४
||२६०.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (१२-४-१९२८) ||२३५
||२६१.|| भाषण: खादी विद्यालयके विद्यार्थियोंके समक्ष (१३-४-१९२८ से पूर्व) ||२३५
||२६२.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१३-४-१९२८) ||२३८
||२६३.|| पत्र : ए० एलिंग्सको (१३-४-१९२८) ||२३८
||२६४.|| श्रीमती ब्लेयरको (१३-४-१९२८) ||२३९
||२६५.|| पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (१३-४-१९२८) ||२४०
||२६७.|| पत्र : रामनाथनको (१३-४-१९२८) ||२४०
||२६८.|| एक पत्र (१३-४-१९२८) ||२४१
||२६६.|| पत्र : टी० नागेश रावको (१३-४-१९२८) ||२४२
||२६९.|| पत्र : मु० अ० अन्सारीको (१४-४-१९२८) ||२४२
||२७०.|| पत्र : विट्ठलभाई जेराजाणीको (१४-४-१९२८) ||२४३
||२७१.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (१४-४-१९२८) ||२४४
||२७२.|| दलितोंकी सेवा (१५-४-१९२८) ||२४५
||२७३.|| पत्र: मणिबहन पटेलको (१५-४-१९२८) ||२४७<noinclude></noinclude>
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||२३८.|| पत्र : ए० ए० पॉलको (७-४-१९२८) ||२१७
|-
||२३९.|| सन्देश : 'न्यूज शीट' को (७-४-१९२८) ||२१८
|-
||२४०.|| पत्र : जोजेफको (७-४-१९२८) ||२१८
|-
||२४१.|| पत्र : एस० गणेशनको (७-४-१९२८) ||२१९
|-
||२४२.|| पत्र : एलिस शैलेकको (७-४-१९२८) ||२१९
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||२४८.|| पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१०-४-१९२८ से पूर्व) ||२२४
|-
||२४९.|| पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१०-४-१९२८) ||२२५
|-
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|-
||२५१.|| पत्र : च० राजगोपालचारीको (११-४-१९२८) ||२२६
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||२५२.|| पत्र : आर० आर० एथनको (११-४-१९२८) ||२२७
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|-
||२५५.|| एक समयानुकूल किताब (१२-४-१९२८) ||२२८
|-
||२५६.|| खादीका स्थान ( १२-४-१९२८) ||२३०
|-
||२५७.|| टिप्पणियाँ: वचन भंग, माजोरका मानवीय कताई यन्त्र (१२-४-१९२८) ||२३२
|-
||२५८.|| दक्षिण आफ्रिकी भारतीय (१२-४-१९२८) ||२३३
|-
||२५९.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१२-४-१९२८) ||२३४
|-
||२६०.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (१२-४-१९२८) ||२३५
|-
||२६१.|| भाषण: खादी विद्यालयके विद्यार्थियोंके समक्ष (१३-४-१९२८ से पूर्व) ||२३५
|-
||२६२.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१३-४-१९२८) ||२३८
|-
||२६३.|| पत्र : ए० एलिंग्सको (१३-४-१९२८) ||२३८
|-
||२६४.|| श्रीमती ब्लेयरको (१३-४-१९२८) ||२३९
|-
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|-
||२६७.|| पत्र : रामनाथनको (१३-४-१९२८) ||२४०
|-
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|-
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|-
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|-
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||२३८.|| पत्र : ए॰ ए॰ पॉलको (७-४-१९२८) ||२१७
|-
||२३९.|| सन्देश : 'न्यूज शीट' को (७-४-१९२८) ||२१८
|-
||२४०.|| पत्र : जोजेफको (७-४-१९२८) ||२१८
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|-
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||२५३.|| पत्र : सदाशिव रावको (११-४-१९२८) ||२२७
|-
||२५४.|| पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (११-४-१९२८) ||२२८
|-
||२५५.|| एक समयानुकूल किताब (१२-४-१९२८) ||२२८
|-
||२५६.|| खादीका स्थान (१२-४-१९२८) ||२३०
|-
||२५७.|| टिप्पणियाँ: वचन भंग, माजोरका मानवीय कताई यन्त्र (१२-४-१९२८) ||२३२
|-
||२५८.|| दक्षिण आफ्रिकी भारतीय (१२-४-१९२८) ||२३३
|-
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|-
||२६०.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (१२-४-१९२८) ||२३५
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||२७४.|| पत्र : सरोजिनी नायडूको (१६-४-१९२८) ||२४८
||२७५.|| पत्र : एनी बेसेंटको (१६-४-१९२८) ||२४८
||२७६.|| पत्र : उ० राजगोपाल कृष्णैयाको (१६-४-१९२८) ||२४९
||२७७.|| तार : राजेन्द्रप्रसादको (१६-४-१९२८ या उसके पश्चात) ||२४९
||२७८.|| तार : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (१७-४-१९२८) ||२५०
||२७९.|| पत्र : के० माधवन नायरको (१७-४-१९२८) ||२५१
||२८०.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१७-४-१९२८) ||२५२
||२८१.|| पत्र : डेनियल हेमिल्टनको (१७-४-१९२८) ||२५२
||२८२.|| पत्र : हेंस कोहूको (१७-४-१९२८) ||२५३
||२८३.|| सन्देश : लंकाकी विद्यार्थी परिषदको (१८-४-१९२८) ||२५३
||२८४.|| गलत पदचिह्नों पर (१९-४-१९२८) ||२५४
||२८५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-४-१९२८) ||२५८
||२८६.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२०-४-१९२८) ||२५८
||२८७.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (२०-४-१९२८) ||२६०
||२८८.|| पत्र : जॉन हेन्स होम्सको (२०-४-१९२८) ||२६०
||२८९.|| पत्र : पेट मेटॉफको (२०-४-१९२८) ||२६१
||२९०.|| पत्र : एस० गणेशनको (२१-४-१९२८) ||२६२
||२९१.|| पत्र : शंकरनको (२१-४-१९२८) ||२६३
||२९२.|| पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (२१-४-१९२८) ||२६४
||२९३.|| तार : डबलडे डोरन कं०को (२१-४-१९२८) ||२६४
||२९४.|| पत्र : जूलिया इजब्रूकरको (२२-४-१९२८ से पूर्व) ||२६५
||२९५.|| दफ्तरके बाबूका नाम कारीगर (२२-४-१९२८) ||२६२
||२९६.|| पत्र : एलिजाबेथ नडसनको (२२-४-१९२८) ||२६६
||२९७.|| पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (२२-४-१९२८) ||२६७
||२९८.|| पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको (२२-४-१९२८) ||२६९
||२९९.|| तार : मथुराप्रसादको (२३-४-१९२८ से पूर्व) ||२६९
||३००.|| पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (२३-४-१९२८) ||२६९
||३०१.|| तार : ब्रजकिशार प्रसादको (२३-४-१९२८) ||२७०
||३०२.|| तार : देवदास गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७१
||२०३.|| तार : राधा गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७१
||३०४.|| तार : खुशालचन्द गांधीको ( २३-४-१९२८) ||२७१
||३०५.|| तार : छगनलाल गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७२
||३०६.|| तार : जमनादास गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७२
||३०७.|| पत्र : श्रीनाथ सिंहको (२३-४-१९२८) ||२७३
||३०८.|| पत्र : कुँवरजी खेतसी पारेखको (२३-४-१९२८) ||२७३
||३०९.|| पत्र : सन्तोक गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७४<noinclude></noinclude>
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||२७४.|| पत्र : सरोजिनी नायडूको (१६-४-१९२८) ||२४८
|-
||२७५.|| पत्र : एनी बेसेंटको (१६-४-१९२८) ||२४८
|-
||२७६.|| पत्र : उ० राजगोपाल कृष्णैयाको (१६-४-१९२८) ||२४९
|-
||२७७.|| तार : राजेन्द्रप्रसादको (१६-४-१९२८ या उसके पश्चात) ||२४९
|-
||२७८.|| तार : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (१७-४-१९२८) ||२५०
|-
||२७९.|| पत्र : के० माधवन नायरको (१७-४-१९२८) ||२५१
|-
||२८०.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१७-४-१९२८) ||२५२
|-
||२८१.|| पत्र : डेनियल हेमिल्टनको (१७-४-१९२८) ||२५२
|-
||२८२.|| पत्र : हेंस कोहूको (१७-४-१९२८) ||२५३
|-
||२८३.|| सन्देश : लंकाकी विद्यार्थी परिषदको (१८-४-१९२८) ||२५३
|-
||२८४.|| गलत पदचिह्नों पर (१९-४-१९२८) ||२५४
|-
||२८५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-४-१९२८) ||२५८
|-
||२८६.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२०-४-१९२८) ||२५८
|-
||२८७.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (२०-४-१९२८) ||२६०
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||२८८.|| पत्र : जॉन हेन्स होम्सको (२०-४-१९२८) ||२६०
|-
||२८९.|| पत्र : पेट मेटॉफको (२०-४-१९२८) ||२६१
|-
||२९०.|| पत्र : एस० गणेशनको (२१-४-१९२८) ||२६२
|-
||२९१.|| पत्र : शंकरनको (२१-४-१९२८) ||२६३
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||२९२.|| पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (२१-४-१९२८) ||२६४
|-
||२९३.|| तार : डबलडे डोरन कं०को (२१-४-१९२८) ||२६४
|-
||२९४.|| पत्र : जूलिया इजब्रूकरको (२२-४-१९२८ से पूर्व) ||२६५
|-
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||२९६.|| पत्र : एलिजाबेथ नडसनको (२२-४-१९२८) ||२६६
|-
||२९७.|| पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (२२-४-१९२८) ||२६७
|-
||२९८.|| पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको (२२-४-१९२८) ||२६९
|-
||२९९.|| तार : मथुराप्रसादको (२३-४-१९२८ से पूर्व) ||२६९
|-
||३००.|| पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (२३-४-१९२८) ||२६९
|-
||३०१.|| तार : ब्रजकिशार प्रसादको (२३-४-१९२८) ||२७०
|-
||३०२.|| तार : देवदास गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७१
|-
||२०३.|| तार : राधा गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७१
|-
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||२७४.|| पत्र : सरोजिनी नायडूको (१६-४-१९२८) ||२४८
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||२७५.|| पत्र : एनी बेसेंटको (१६-४-१९२८) ||२४८
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||२७९.|| पत्र : के॰ माधवन नायरको (१७-४-१९२८) ||२५१
|-
||२८०.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१७-४-१९२८) ||२५२
|-
||२८१.|| पत्र : डेनियल हेमिल्टनको (१७-४-१९२८) ||२५२
|-
||२८२.|| पत्र : हेंस कोहूको (१७-४-१९२८) ||२५३
|-
||२८३.|| सन्देश : लंकाकी विद्यार्थी परिषदको (१८-४-१९२८) ||२५३
|-
||२८४.|| गलत पदचिह्नों पर (१९-४-१९२८) ||२५४
|-
||२८५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-४-१९२८) ||२५८
|-
||२८६.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (२०-४-१९२८) ||२५८
|-
||२८७.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (२०-४-१९२८) ||२६०
|-
||२८८.|| पत्र : जॉन हेन्स होम्सको (२०-४-१९२८) ||२६०
|-
||२८९.|| पत्र : पेट मेटॉफको (२०-४-१९२८) ||२६१
|-
||२९०.|| पत्र : एस॰ गणेशनको (२१-४-१९२८) ||२६२
|-
||२९१.|| पत्र : शंकरनको (२१-४-१९२८) ||२६३
|-
||२९२.|| पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (२१-४-१९२८) ||२६४
|-
||२९३.|| तार : डबलडे डोरन कं॰को (२१-४-१९२८) ||२६४
|-
||२९४.|| पत्र : जूलिया इजब्रूकरको (२२-४-१९२८ से पूर्व) ||२६५
|-
||२९५.|| दफ्तरके बाबूका नाम कारीगर (२२-४-१९२८) ||२६२
|-
||२९६.|| पत्र : एलिजाबेथ नडसनको (२२-४-१९२८) ||२६६
|-
||२९७.|| पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२२-४-१९२८) ||२६७
|-
||२९८.|| पत्र : अखिल भारतीय चरखा संघके मन्त्रीको (२२-४-१९२८) ||२६९
|-
||२९९.|| तार : मथुराप्रसादको (२३-४-१९२८ से पूर्व) ||२६९
|-
||३००.|| पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (२३-४-१९२८) ||२६९
|-
||३०१.|| तार : ब्रजकिशार प्रसादको (२३-४-१९२८) ||२७०
|-
||३०२.|| तार : देवदास गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७१
|-
||२०३.|| तार : राधा गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७१
|-
||३०४.|| तार : खुशालचन्द गांधीको ( २३-४-१९२८) ||२७१
|-
||३०५.|| तार : छगनलाल गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७२
|-
||३०६.|| तार : जमनादास गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७२
|-
||३०७.|| पत्र : श्रीनाथ सिंहको (२३-४-१९२८) ||२७३
|-
||३०८.|| पत्र : कुँवरजी खेतसी पारेखको (२३-४-१९२८) ||२७३
|-
||३०९.|| पत्र : सन्तोक गांधीको (२३-४-१९२८) ||२७४
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३१०. पत्र : तुलसी मेहरको (२३-४-१९२८के पश्चात) २७४
३११. तार : दक्षिण आफ्रिकी भारतीयको (२४-४-१९२८) २७५
३१२. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२४-४-१९२८) २७५
३१३. पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२४-४-१९२८) २७६
३१४. तार : सतीशचन्द्र दासगुप्तको ( २५-४-१९२८) २७७
३१५. तार : देवदास गांधीको (२५-४-१९२८) २७७
३१६. तार : च० राजगोपालाचारीको (२५-४-१९२८) २७८
३१७. मेरा सबसे अच्छा सहयोगी चला गया (२६-४-१९२८) २७८
३१८. धर्मसंकट (२६-४-१९२८) २८१
३१९. यूरोपीय मित्रोंसे (२६-४-१९२८) २८३
३२०. चार महीनेका काम (२६-४-१९२८) २८५
३२१. तार : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (२६-४-१९२८) २८६
३२२. पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२६-४-१९२८) २८७
३२३. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (२६-४-१९२७) २८७
३२४. पत्र : एस० गणेशनको (२६-४-१९२८) २८८
३२५. पत्र : लॉर्ड इर्विनको (२६-४-१९२८) २८९
३२६. पत्र : जे० बी० पेटिटको (२६-४-१९२८) २८९
३२७. पत्र : जुगलकिशोरको (२७-४-१९२८) २९०
३२८. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२७-४-१९२८) २९२
३२९. पत्र : फेड्रिक और फ्रान्सिस्का स्टेंडनथको (२७-४-१९२८) २९२
३३०. एक सन्देश (२७-४-१९२८) २९३
३३१. पत्र : कल्याणजी मेहताको (२८-४-१९२८) २९४
३३२. स्वेच्छा- स्वीकृत दारिद्र्यका अर्थ (२९-४-१९२८) २९४
३३३. आश्रमके प्राण (२९-४-१९२८) २९६
३३४. पत्र : कुँवरजी खेतसी पारेखको (२९-४-१९२८) २९८
३३५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२९-४-१९२८) २९९
३३६. पत्र : सी० विजयराघवाचारियरको (२९-४-१९२८) ३००
३३७. पत्र : लाजपतरायको (२९-४-१९२८) ३००
३३८. पत्र : रविशंकर महाराजको (३०-४-१९२८) ३०२
३३९. पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-४-१९२८) ३०२
३४०. पत्र : ना० २० मलकानीको (१-५-१९२८) ३०३
३४१. पत्र : एस० रामनाथनको (१-५-१९२८) ३०३
३४२. पत्र : वि० च० रायको (१-५-१९२८) ३०५
३४३. भाषण : अहमदाबादमें, बालभवनके उद्घाटनपर (१-५-१९२८) ३०६
३४४. पत्र : अब्बास तैयबजीको (२-५-१९२८) ३०९
३४५. नियम पालनकी आवश्यकता ( ३-५-१९२८) ३०९<noinclude></noinclude>
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||३१०.|| पत्र : तुलसी मेहरको (२३-४-१९२८के पश्चात) ||२७४
||३११.|| तार : दक्षिण आफ्रिकी भारतीयको (२४-४-१९२८) ||२७५
||३१२.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२४-४-१९२८) ||२७५
||३१३.|| पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२४-४-१९२८) ||२७६
||३१४.|| तार : सतीशचन्द्र दासगुप्तको ( २५-४-१९२८) ||२७७
||३१५.|| तार : देवदास गांधीको (२५-४-१९२८) ||२७७
||३१६.|| तार : च० राजगोपालाचारीको (२५-४-१९२८) ||२७८
||३१७.|| मेरा सबसे अच्छा सहयोगी चला गया (२६-४-१९२८) ||२७८
||३१८.|| धर्मसंकट (२६-४-१९२८) ||२८१
||३१९.|| यूरोपीय मित्रोंसे (२६-४-१९२८) ||२८३
||३२०.|| चार महीनेका काम (२६-४-१९२८) ||२८५
||३२१.|| तार : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (२६-४-१९२८) ||२८६
||३२२.|| पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२६-४-१९२८) ||२८७
||३२३.|| पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (२६-४-१९२७) ||२८७
||३२४.|| पत्र : एस० गणेशनको (२६-४-१९२८) ||२८८
||३२५.|| पत्र : लॉर्ड इर्विनको (२६-४-१९२८) ||२८९
||३२६.|| पत्र : जे० बी० पेटिटको (२६-४-१९२८) ||२८९
||३२७.|| पत्र : जुगलकिशोरको (२७-४-१९२८) ||२९०
||३२८.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२७-४-१९२८) ||२९२
||३२९.|| पत्र : फेड्रिक और फ्रान्सिस्का स्टेंडनथको (२७-४-१९२८) ||२९२
||३३०.|| एक सन्देश (२७-४-१९२८) ||२९३
||३३१.|| पत्र : कल्याणजी मेहताको (२८-४-१९२८) ||२९४
||३३२.|| स्वेच्छा- स्वीकृत दारिद्र्यका अर्थ (२९-४-१९२८) ||२९४
||३३३.|| आश्रमके प्राण (२९-४-१९२८) ||२९६
||३३४.|| पत्र : कुँवरजी खेतसी पारेखको (२९-४-१९२८) ||२९८
||३३५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२९-४-१९२८) ||२९९
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||३३८.|| पत्र : रविशंकर महाराजको (३०-४-१९२८) ||३०२
||३३९.|| पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-४-१९२८) ||३०२
||३४०.|| पत्र : ना० २० मलकानीको (१-५-१९२८) ||३०३
||३४१.|| पत्र : एस० रामनाथनको (१-५-१९२८) ||३०३
||३४२.|| पत्र : वि० च० रायको (१-५-१९२८) ||३०५
||३४३.|| भाषण : अहमदाबादमें, बालभवनके उद्घाटनपर (१-५-१९२८) ||३०६
||३४४.|| पत्र : अब्बास तैयबजीको (२-५-१९२८) ||३०९
||३४५.|| नियम पालनकी आवश्यकता ( ३-५-१९२८) ||३०९
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||३१०.|| पत्र : तुलसी मेहरको (२३-४-१९२८के पश्चात) ||२७४
|-
||३११.|| तार : दक्षिण आफ्रिकी भारतीयको (२४-४-१९२८) ||२७५
|-
||३१२.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२४-४-१९२८) ||२७५
|-
||३१३.|| पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२४-४-१९२८) ||२७६
|-
||३१४.|| तार : सतीशचन्द्र दासगुप्तको ( २५-४-१९२८) ||२७७
|-
||३१५.|| तार : देवदास गांधीको (२५-४-१९२८) ||२७७
|-
||३१६.|| तार : च० राजगोपालाचारीको (२५-४-१९२८) ||२७८
|-
||३१७.|| मेरा सबसे अच्छा सहयोगी चला गया (२६-४-१९२८) ||२७८
|-
||३१८.|| धर्मसंकट (२६-४-१९२८) ||२८१
|-
||३१९.|| यूरोपीय मित्रोंसे (२६-४-१९२८) ||२८३
|-
||३२०.|| चार महीनेका काम (२६-४-१९२८) ||२८५
|-
||३२१.|| तार : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (२६-४-१९२८) ||२८६
|-
||३२२.|| पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२६-४-१९२८) ||२८७
|-
||३२३.|| पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको (२६-४-१९२७) ||२८७
|-
||३२४.|| पत्र : एस० गणेशनको (२६-४-१९२८) ||२८८
|-
||३२५.|| पत्र : लॉर्ड इर्विनको (२६-४-१९२८) ||२८९
|-
||३२६.|| पत्र : जे० बी० पेटिटको (२६-४-१९२८) ||२८९
|-
||३२७.|| पत्र : जुगलकिशोरको (२७-४-१९२८) ||२९०
|-
||३२८.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२७-४-१९२८) ||२९२
|-
||३२९.|| पत्र : फेड्रिक और फ्रान्सिस्का स्टेंडनथको (२७-४-१९२८) ||२९२
|-
||३३०.|| एक सन्देश (२७-४-१९२८) ||२९३
|-
||३३१.|| पत्र : कल्याणजी मेहताको (२८-४-१९२८) ||२९४
|-
||३३२.|| स्वेच्छा- स्वीकृत दारिद्र्यका अर्थ (२९-४-१९२८) ||२९४
|-
||३३३.|| आश्रमके प्राण (२९-४-१९२८) ||२९६
|-
||३३४.|| पत्र : कुँवरजी खेतसी पारेखको (२९-४-१९२८) ||२९८
|-
||३३५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२९-४-१९२८) ||२९९
|-
||३३६.|| पत्र : सी० विजयराघवाचारियरको (२९-४-१९२८) ||३००
|-
||३३७.|| पत्र : लाजपतरायको (२९-४-१९२८) ||३००
|-
||३३८.|| पत्र : रविशंकर महाराजको (३०-४-१९२८) ||३०२
|-
||३३९.|| पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-४-१९२८) ||३०२
|-
||३४०.|| पत्र : ना० २० मलकानीको (१-५-१९२८) ||३०३
|-
||३४१.|| पत्र : एस० रामनाथनको (१-५-१९२८) ||३०३
|-
||३४२.|| पत्र : वि० च० रायको (१-५-१९२८) ||३०५
|-
||३४३.|| भाषण : अहमदाबादमें, बालभवनके उद्घाटनपर (१-५-१९२८) ||३०६
|-
||३४४.|| पत्र : अब्बास तैयबजीको (२-५-१९२८) ||३०९
|-
||३४५.|| नियम पालनकी आवश्यकता ( ३-५-१९२८) ||३०९
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||३१०.|| पत्र : तुलसी मेहरको (२३-४-१९२८के पश्चात) ||२७४
|-
||३११.|| तार : दक्षिण आफ्रिकी भारतीयको (२४-४-१९२८) ||२७५
|-
||३१२.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (२४-४-१९२८) ||२७५
|-
||३१३.|| पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२४-४-१९२८) ||२७६
|-
||३१४.|| तार : सतीशचन्द्र दासगुप्तको ( २५-४-१९२८) ||२७७
|-
||३१५.|| तार : देवदास गांधीको (२५-४-१९२८) ||२७७
|-
||३१६.|| तार : च॰ राजगोपालाचारीको (२५-४-१९२८) ||२७८
|-
||३१७.|| मेरा सबसे अच्छा सहयोगी चला गया (२६-४-१९२८) ||२७८
|-
||३१८.|| धर्मसंकट (२६-४-१९२८) ||२८१
|-
||३१९.|| यूरोपीय मित्रोंसे (२६-४-१९२८) ||२८३
|-
||३२०.|| चार महीनेका काम (२६-४-१९२८) ||२८५
|-
||३२१.|| तार : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (२६-४-१९२८) ||२८६
|-
||३२२.|| पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२६-४-१९२८) ||२८७
|-
||३२३.|| पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२६-४-१९२७) ||२८७
|-
||३२४.|| पत्र : एस॰ गणेशनको (२६-४-१९२८) ||२८८
|-
||३२५.|| पत्र : लॉर्ड इर्विनको (२६-४-१९२८) ||२८९
|-
||३२६.|| पत्र : जे॰ बी॰ पेटिटको (२६-४-१९२८) ||२८९
|-
||३२७.|| पत्र : जुगलकिशोरको (२७-४-१९२८) ||२९०
|-
||३२८.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२७-४-१९२८) ||२९२
|-
||३२९.|| पत्र : फेड्रिक और फ्रान्सिस्का स्टेंडनथको (२७-४-१९२८) ||२९२
|-
||३३०.|| एक सन्देश (२७-४-१९२८) ||२९३
|-
||३३१.|| पत्र : कल्याणजी मेहताको (२८-४-१९२८) ||२९४
|-
||३३२.|| स्वेच्छा–स्वीकृत दारिद्र्यका अर्थ (२९-४-१९२८) ||२९४
|-
||३३३.|| आश्रमके प्राण (२९-४-१९२८) ||२९६
|-
||३३४.|| पत्र : कुँवरजी खेतसी पारेखको (२९-४-१९२८) ||२९८
|-
||३३५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२९-४-१९२८) ||२९९
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||३३६.|| पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (२९-४-१९२८) ||३००
|-
||३३७.|| पत्र : लाजपतरायको (२९-४-१९२८) ||३००
|-
||३३८.|| पत्र : रविशंकर महाराजको (३०-४-१९२८) ||३०२
|-
||३३९.|| पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-४-१९२८) ||३०२
|-
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|-
||३४१.|| पत्र : एस॰ रामनाथनको (१-५-१९२८) ||३०३
|-
||३४२.|| पत्र : वि॰ च॰ रायको (१-५-१९२८) ||३०५
|-
||३४३.|| भाषण : अहमदाबादमें, बालभवनके उद्घाटनपर (१-५-१९२८) ||३०६
|-
||३४४.|| पत्र : अब्बास तैयबजीको (२-५-१९२८) ||३०९
|-
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३४६. धन्यवाद (३-५-१९२८) ३११
३४७. पत्र : वीरूमल हेमराजको (४-५-१९२८) ३११
३४८. पत्र : पी० तिरुकूटसुन्दरम् पिल्लैको (४-५-१९२८) ३१२
३४९. पत्र : एल० क्रेनाको (४-५-१९२८) ३१३
३५०. पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (४-५-१९२८) ३१३
३५१. भक्तिके नामपर भोग (६-५-१९२८) ३१४
३५२. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (७-५-१९२८) ३१६
३५३. पत्र : मीरा बहनको (७-५-१९२८) ३१६
३५४. पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको (७-५-१९२८) ३१७
३५५. पत्र : मोतीलाल नेहरूको (८-५-१९२८) ३१७
३५६. पत्र : मीरा बहनको (९-५-१९२८) ३१९
३५७. मिलोंका कपड़ा बनाम खादी ( १०-५-१९२८) ३१९
३५८. मिल मालिकोंका लोभ ( १०-५-१९२८) ३२१
३५९. सभ्यताकी विनाशकारी गति ( १०-५-१९२८) ३२२
३६०. पत्र : बहरामजी खम्भाताको (१०-५-१९२८) ३२२
३६१. पत्र : ई० बियरमको (१०-५-१९२८) ३२३
३६२. पत्र : मेरी जे० कैम्बेलको (११-५-१९२८) ३२५
३६३. पत्र : एस० गणेशनको (११-५-१९२८) ३२५
३६४. पत्र : एन० मेरी पीटर्सनको (११-५-१९२८) ३२६
३६५. पत्र : शचीन्द्र नाथ मित्रको (११-५-१९२८) ३२७
३६६. पत्र : देवचन्द पारेखको (११-५-१९२८) ३२७
३६७. पत्र : मीरा बहनको (११-५-१९२८) ३२८
३६८. पत्र : टी० बी० केशवरावको (१२-५-१९२८) ३२८
३६९. पत्र : निरंजन सिंहको (१२-५-१९२८) ३२९
३७०. पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१२-५-१९२८) ३२९
३७१. पत्र : शंकरनको (१२-५-१९२८) ३३०
३७२. पत्र : लाजपतरायको (१२-५-१९२८) ३३०
३७३. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१२-५-१९२८) ३३१
३७४. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१२-५-१९२८) ३३२
३७५. पत्र : भगवानजीको (१२-५-१९२८) ३३३
३७६. तपका उद्यापन (१३-५-१९२८) ३३३
३७७. बारडोलीका यज्ञ (१३-५-१९२८) ३३४
३७८. प्राथमिक शिक्षा — १ (१३-५-१९२८) ३३५
३७९. पत्र: पी० वी० कर्मचन्दानीको (१३-५-१९२८) ३३६
३८०. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (१३-५-१९२८) ३३७
३८१. पत्र : लॉर्ड इर्विनको (१६-५-१९२८) ३३७<noinclude></noinclude>
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||३४६.|| धन्यवाद (३-५-१९२८) ||३११
||३४७.|| पत्र : वीरूमल हेमराजको (४-५-१९२८) ||३११
||३४८.|| पत्र : पी० तिरुकूटसुन्दरम् पिल्लैको (४-५-१९२८) ||३१२
||३४९.|| पत्र : एल० क्रेनाको (४-५-१९२८) ||३१३
||३५०.|| पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (४-५-१९२८) ||३१३
||३५१.|| भक्तिके नामपर भोग (६-५-१९२८) ||३१४
||३५२.|| पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (७-५-१९२८) ||३१६
||३५३.|| पत्र : मीरा बहनको (७-५-१९२८) ||३१६
||३५४.|| पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको (७-५-१९२८) ||३१७
||३५५.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (८-५-१९२८) ||३१७
||३५६.|| पत्र : मीरा बहनको (९-५-१९२८) ||३१९
||३५७.|| मिलोंका कपड़ा बनाम खादी ( १०-५-१९२८) ||३१९
||३५८.|| मिल मालिकोंका लोभ ( १०-५-१९२८) ||३२१
||३५९.|| सभ्यताकी विनाशकारी गति ( १०-५-१९२८) ||३२२
||३६०.|| पत्र : बहरामजी खम्भाताको (१०-५-१९२८) ||३२२
||३६१.|| पत्र : ई० बियरमको (१०-५-१९२८) ||३२३
||३६२.|| पत्र : मेरी जे० कैम्बेलको (११-५-१९२८) ||३२५
||३६३.|| पत्र : एस० गणेशनको (११-५-१९२८) ||३२५
||३६४.|| पत्र : एन० मेरी पीटर्सनको (११-५-१९२८) ||३२६
||३६५.|| पत्र : शचीन्द्र नाथ मित्रको (११-५-१९२८) ||३२७
||३६६.|| पत्र : देवचन्द पारेखको (११-५-१९२८) ||३२७
||३६७.|| पत्र : मीरा बहनको (११-५-१९२८) ||३२८
||३६८.|| पत्र : टी० बी० केशवरावको (१२-५-१९२८) ||३२८
||३६९.|| पत्र : निरंजन सिंहको (१२-५-१९२८) ||३२९
||३७०.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१२-५-१९२८) ||३२९
||३७१.|| पत्र : शंकरनको (१२-५-१९२८) ||३३०
||३७२.|| पत्र : लाजपतरायको (१२-५-१९२८) ||३३०
||३७३.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१२-५-१९२८) ||३३१
||३७४.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१२-५-१९२८) ||३३२
||३७५.|| पत्र : भगवानजीको (१२-५-१९२८) ||३३३
||३७६.|| तपका उद्यापन (१३-५-१९२८) ||३३३
||३७७.|| बारडोलीका यज्ञ (१३-५-१९२८) ||३३४
||३७८.|| प्राथमिक शिक्षा — १ (१३-५-१९२८) ||३३५
||३७९.|| पत्र: पी० वी० कर्मचन्दानीको (१३-५-१९२८) ||३३६
||३८०.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (१३-५-१९२८) ||३३७
||३८१.|| पत्र : लॉर्ड इर्विनको (१६-५-१९२८) ||३३७<noinclude></noinclude>
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||३४६.|| धन्यवाद (३-५-१९२८) ||३११
|-
||३४७.|| पत्र : वीरूमल हेमराजको (४-५-१९२८) ||३११
|-
||३४८.|| पत्र : पी० तिरुकूटसुन्दरम् पिल्लैको (४-५-१९२८) ||३१२
|-
||३४९.|| पत्र : एल० क्रेनाको (४-५-१९२८) ||३१३
|-
||३५०.|| पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (४-५-१९२८) ||३१३
|-
||३५१.|| भक्तिके नामपर भोग (६-५-१९२८) ||३१४
|-
||३५२.|| पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (७-५-१९२८) ||३१६
|-
||३५३.|| पत्र : मीरा बहनको (७-५-१९२८) ||३१६
|-
||३५४.|| पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको (७-५-१९२८) ||३१७
|-
||३५५.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (८-५-१९२८) ||३१७
|-
||३५६.|| पत्र : मीरा बहनको (९-५-१९२८) ||३१९
|-
||३५७.|| मिलोंका कपड़ा बनाम खादी ( १०-५-१९२८) ||३१९
|-
||३५८.|| मिल मालिकोंका लोभ ( १०-५-१९२८) ||३२१
|-
||३५९.|| सभ्यताकी विनाशकारी गति ( १०-५-१९२८) ||३२२
|-
||३६०.|| पत्र : बहरामजी खम्भाताको (१०-५-१९२८) ||३२२
|-
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|-
||३७१.|| पत्र : शंकरनको (१२-५-१९२८) ||३३०
|-
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|-
||३७३.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१२-५-१९२८) ||३३१
|-
||३७४.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१२-५-१९२८) ||३३२
|-
||३७५.|| पत्र : भगवानजीको (१२-५-१९२८) ||३३३
|-
||३७६.|| तपका उद्यापन (१३-५-१९२८) ||३३३
|-
||३७७.|| बारडोलीका यज्ञ (१३-५-१९२८) ||३३४
|-
||३७८.|| प्राथमिक शिक्षा — १ (१३-५-१९२८) ||३३५
|-
||३७९.|| पत्र: पी० वी० कर्मचन्दानीको (१३-५-१९२८) ||३३६
|-
||३८०.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (१३-५-१९२८) ||३३७
|-
||३८१.|| पत्र : लॉर्ड इर्विनको (१६-५-१९२८) ||३३७
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||३४६.|| धन्यवाद (३-५-१९२८) ||३११
|-
||३४७.|| पत्र : वीरूमल हेमराजको (४-५-१९२८) ||३११
|-
||३४८.|| पत्र : पी॰ तिरुकूटसुन्दरम् पिल्लैको (४-५-१९२८) ||३१२
|-
||३४९.|| पत्र : एल॰ क्रेनाको (४-५-१९२८) ||३१३
|-
||३५०.|| पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (४-५-१९२८) ||३१३
|-
||३५१.|| भक्तिके नामपर भोग (६-५-१९२८) ||३१४
|-
||३५२.|| पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (७-५-१९२८) ||३१६
|-
||३५३.|| पत्र : मीरा बहनको (७-५-१९२८) ||३१६
|-
||३५४.|| पत्र : ब्रजकृष्ण चांदीवालाको (७-५-१९२८) ||३१७
|-
||३५५.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (८-५-१९२८) ||३१७
|-
||३५६.|| पत्र : मीरा बहनको (९-५-१९२८) ||३१९
|-
||३५७.|| मिलोंका कपड़ा बनाम खादी (१०-५-१९२८) ||३१९
|-
||३५८.|| मिल मालिकोंका लोभ (१०-५-१९२८) ||३२१
|-
||३५९.|| सभ्यताकी विनाशकारी गति (१०-५-१९२८) ||३२२
|-
||३६०.|| पत्र : बहरामजी खम्भाताको (१०-५-१९२८) ||३२२
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||३६१.|| पत्र : ई॰ बियरमको (१०-५-१९२८) ||३२३
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|-
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|-
||३६७.|| पत्र : मीरा बहनको (११-५-१९२८) ||३२८
|-
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||३६९.|| पत्र : निरंजन सिंहको (१२-५-१९२८) ||३२९
|-
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||३७१.|| पत्र : शंकरनको (१२-५-१९२८) ||३३०
|-
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|-
||३७५.|| पत्र : भगवानजीको (१२-५-१९२८) ||३३३
|-
||३७६.|| तपका उद्यापन (१३-५-१९२८) ||३३३
|-
||३७७.|| बारडोलीका यज्ञ (१३-५-१९२८) ||३३४
|-
||३७८.|| प्राथमिक शिक्षा — १ (१३-५-१९२८) ||३३५
|-
||३७९.|| पत्र: पी॰ वी॰ कर्मचन्दानीको (१३-५-१९२८) ||३३६
|-
||३८०.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (१३-५-१९२८) ||३३७
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३८२. पत्र : सवाल तो यह है (१७-५-१९२८) ३३८
३८३. दलित वर्ग और बाघात रियासत (१७-५-१९२८) ३४१
३८४. मगनलाल गांधी स्मारक (१७-५-१९२८) ३४२
३८५. हैदराबाद राज्यमें खादी (१७-५-१९२८) ३४३
३८६. भारतके सम्बन्धमें सत्य : कुमारी मेयोको उत्तर (१७-५-१९२८) ३४४
३८७. पत्र : अजमल जामिया कोषके कोषाध्यक्षको (१८-५-१९२८) ३४५
३८८. तार : महमूद अलीको (१९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ३४६
३८९. प्राथमिक शिक्षा — २ (२०-५-१९२८) ३४६
३९०. पत्र: मणिबहन पटेलको (२१-५-१९२८) ३४८
३९१. जाकिर हुसैनको (२३-५-१९२८) ३४८
३९२. दक्षिण आफ्रिकी सत्याग्रहका इतिहास ( २४-५-१९२८) ३४९
३९३. एन्ड्रयूजकी श्रद्धांजलि (२४-५-१९२८) ३५०
३९४. पुण्यका सौदा (२४-५-१९२८) ३५०
३९५. नगरपालिकाके स्कूलोंमें खादी (२४-५-१९२८) ३५२
३९६. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२४-५-१९२८) ३५३
३९७. पत्र : जे० एम० सेनगुप्तको (२४-५-१९२८) ३५३
३९८. पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२४-५-१९२८) ३५४
३९९. पत्र : टी० प्रकाशम्को (२४-५-१९२८) ३५४
४००. एक पत्र (२४-५-१९२८) ३५५
४०१. पत्र : एस० रामनाथनको (२४-५-१९२८) ३५६
४०२. पत्र : मेहर सिंह रेतको (२४-५-१९२८) ३५६
४०३. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२४-५-१९२८) ३५७
४०४. पत्र : एफ० एच० ब्राउनको ( २५-५-१९२८) ३५७
४०५. पत्र : जनकधारी प्रसादको (२५-५-१९२८) ३५८
४०६. पत्र : हेनरी और मिली पोलकको (२५-५-१९२८) ३५९
४०७. पत्र : किशोरलाल मशरूवालाको (२५-५-१९२८) ३६०
४०८. तार : हरिलाल देसाईको (२५-५-१९२५ के पश्चात्) ३६१
४०९. पत्र : महादेव देसाईको (२६-५-१९२८) ३६१
४१०. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूज को (२६-५-१९२८) ३६२
४११. पत्र : सेम्युअल आर० पेरीको (२६-५-१९२८के पश्चात्) ३६३
४१२. प्राथमिक शिक्षा — ३ (२७-५-१९२८) ३६३
४१३. पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२७-५-१९२८) ३६६
४१४. पत्र : वाई० अंजप्पाको (२७-५-१९२८) ३६६
४१५. पत्र : सत्यानन्द बोसको (२७-५-१९२८) ३६७
४१६. पत्र : च० राजगोपालाचारीको (२७-५-१९२८) ३६७
४१७. पत्र : सी० रंगनाथ रावको (२७-५-१९२८) ३६८<noinclude></noinclude>
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||३८२.|| पत्र : सवाल तो यह है (१७-५-१९२८) ||३३८
||३८३.|| दलित वर्ग और बाघात रियासत (१७-५-१९२८) ||३४१
||३८४.|| मगनलाल गांधी स्मारक (१७-५-१९२८) ||३४२
||३८५.|| हैदराबाद राज्यमें खादी (१७-५-१९२८) ||३४३
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||३८८.|| तार : महमूद अलीको (१९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ||३४६
||३८९.|| प्राथमिक शिक्षा — २ (२०-५-१९२८) ||३४६
||३९०.|| पत्र: मणिबहन पटेलको (२१-५-१९२८) ||३४८
||३९१.|| जाकिर हुसैनको (२३-५-१९२८) ||३४८
||३९२.|| दक्षिण आफ्रिकी सत्याग्रहका इतिहास (२४-५-१९२८) ||३४९
||३९३.|| एन्ड्रयूजकी श्रद्धांजलि (२४-५-१९२८) ||३५०
||३९४.|| पुण्यका सौदा (२४-५-१९२८) ||३५०
||३९५.|| नगरपालिकाके स्कूलोंमें खादी (२४-५-१९२८) ||३५२
||३९६.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२४-५-१९२८) ||३५३
||३९७.|| पत्र : जे० एम० सेनगुप्तको (२४-५-१९२८) ||३५३
||३९८.|| पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२४-५-१९२८) ||३५४
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||४००.|| एक पत्र (२४-५-१९२८) ||३५५
||४०१.|| पत्र : एस० रामनाथनको (२४-५-१९२८) ||३५६
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||४११.|| पत्र : सेम्युअल आर० पेरीको (२६-५-१९२८के पश्चात्) ||३६३
||४१२.|| प्राथमिक शिक्षा — ३ (२७-५-१९२८) ||३६३
||४१३.|| पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२७-५-१९२८) ||३६६
||४१४.|| पत्र : वाई० अंजप्पाको (२७-५-१९२८) ||३६६
||४१५.|| पत्र : सत्यानन्द बोसको (२७-५-१९२८) ||३६७
||४१६.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (२७-५-१९२८) ||३६७
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||३८२.|| पत्र : सवाल तो यह है (१७-५-१९२८) ||३३८
|-
||३८३.|| दलित वर्ग और बाघात रियासत (१७-५-१९२८) ||३४१
|-
||३८४.|| मगनलाल गांधी स्मारक (१७-५-१९२८) ||३४२
|-
||३८५.|| हैदराबाद राज्यमें खादी (१७-५-१९२८) ||३४३
|-
||३८६.|| भारतके सम्बन्धमें सत्य : कुमारी मेयोको उत्तर (१७-५-१९२८) ||३४४
|-
||३८७.|| पत्र : अजमल जामिया कोषके कोषाध्यक्षको (१८-५-१९२८) ||३४५
|-
||३८८.|| तार : महमूद अलीको (१९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ||३४६
|-
||३८९.|| प्राथमिक शिक्षा — २ (२०-५-१९२८) ||३४६
|-
||३९०.|| पत्र: मणिबहन पटेलको (२१-५-१९२८) ||३४८
|-
||३९१.|| जाकिर हुसैनको (२३-५-१९२८) ||३४८
|-
||३९२.|| दक्षिण आफ्रिकी सत्याग्रहका इतिहास (२४-५-१९२८) ||३४९
|-
||३९३.|| एन्ड्रयूजकी श्रद्धांजलि (२४-५-१९२८) ||३५०
|-
||३९४.|| पुण्यका सौदा (२४-५-१९२८) ||३५०
|-
||३९५.|| नगरपालिकाके स्कूलोंमें खादी (२४-५-१९२८) ||३५२
|-
||३९६.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२४-५-१९२८) ||३५३
|-
||३९७.|| पत्र : जे० एम० सेनगुप्तको (२४-५-१९२८) ||३५३
|-
||३९८.|| पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२४-५-१९२८) ||३५४
|-
||३९९.|| पत्र : टी० प्रकाशम्को (२४-५-१९२८) ||३५४
|-
||४००.|| एक पत्र (२४-५-१९२८) ||३५५
|-
||४०१.|| पत्र : एस० रामनाथनको (२४-५-१९२८) ||३५६
|-
||४०२.|| पत्र : मेहर सिंह रेतको (२४-५-१९२८) ||३५६
|-
||४०३.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२४-५-१९२८) ||३५७
|-
||४०४.|| पत्र : एफ० एच० ब्राउनको ( २५-५-१९२८) ||३५७
|-
||४०५.|| पत्र : जनकधारी प्रसादको (२५-५-१९२८) ||३५८
|-
||४०६.|| पत्र : हेनरी और मिली पोलकको (२५-५-१९२८) ||३५९
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||४०७.|| पत्र : किशोरलाल मशरूवालाको (२५-५-१९२८) ||३६०
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||४०८.|| तार : हरिलाल देसाईको (२५-५-१९२५ के पश्चात्) ||३६१
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||४०९.|| पत्र : महादेव देसाईको (२६-५-१९२८) ||३६१
|-
||४१०.|| पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूज को (२६-५-१९२८) ||३६२
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||४११.|| पत्र : सेम्युअल आर० पेरीको (२६-५-१९२८के पश्चात्) ||३६३
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||४१२.|| प्राथमिक शिक्षा — ३ (२७-५-१९२८) ||३६३
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||४१३.|| पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२७-५-१९२८) ||३६६
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आदेश यादव
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|-
||३८२.|| पत्र : सवाल तो यह है (१७-५-१९२८) ||३३८
|-
||३८३.|| दलित वर्ग और बाघात रियासत (१७-५-१९२८) ||३४१
|-
||३८४.|| मगनलाल गांधी स्मारक (१७-५-१९२८) ||३४२
|-
||३८५.|| हैदराबाद राज्यमें खादी (१७-५-१९२८) ||३४३
|-
||३८६.|| भारतके सम्बन्धमें सत्य : कुमारी मेयोको उत्तर (१७-५-१९२८) ||३४४
|-
||३८७.|| पत्र : अजमल जामिया कोषके कोषाध्यक्षको (१८-५-१९२८) ||३४५
|-
||३८८.|| तार : महमूद अलीको (१९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ||३४६
|-
||३८९.|| प्राथमिक शिक्षा — २ (२०-५-१९२८) ||३४६
|-
||३९०.|| पत्र: मणिबहन पटेलको (२१-५-१९२८) ||३४८
|-
||३९१.|| जाकिर हुसैनको (२३-५-१९२८) ||३४८
|-
||३९२.|| दक्षिण आफ्रिकी सत्याग्रहका इतिहास (२४-५-१९२८) ||३४९
|-
||३९३.|| एन्ड्रयूजकी श्रद्धांजलि (२४-५-१९२८) ||३५०
|-
||३९४.|| पुण्यका सौदा (२४-५-१९२८) ||३५०
|-
||३९५.|| नगरपालिकाके स्कूलोंमें खादी (२४-५-१९२८) ||३५२
|-
||३९६.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२४-५-१९२८) ||३५३
|-
||३९७.|| पत्र : जे॰ एम॰ सेनगुप्तको (२४-५-१९२८) ||३५३
|-
||३९८.|| पत्र : मुहम्मद हबीबुल्लाको (२४-५-१९२८) ||३५४
|-
||३९९.|| पत्र : टी॰ प्रकाशम्को (२४-५-१९२८) ||३५४
|-
||४००.|| एक पत्र (२४-५-१९२८) ||३५५
|-
||४०१.|| पत्र : एस॰ रामनाथनको (२४-५-१९२८) ||३५६
|-
||४०२.|| पत्र : मेहर सिंह रेतको (२४-५-१९२८) ||३५६
|-
||४०३.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२४-५-१९२८) ||३५७
|-
||४०४.|| पत्र : एफ॰ एच॰ ब्राउनको ( २५-५-१९२८) ||३५७
|-
||४०५.|| पत्र : जनकधारी प्रसादको (२५-५-१९२८) ||३५८
|-
||४०६.|| पत्र : हेनरी और मिली पोलकको (२५-५-१९२८) ||३५९
|-
||४०७.|| पत्र : किशोरलाल मशरूवालाको (२५-५-१९२८) ||३६०
|-
||४०८.|| तार : हरिलाल देसाईको (२५-५-१९२५ के पश्चात्) ||३६१
|-
||४०९.|| पत्र : महादेव देसाईको (२६-५-१९२८) ||३६१
|-
||४१०.|| पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूज को (२६-५-१९२८) ||३६२
|-
||४११.|| पत्र : सेम्युअल आर॰ पेरीको (२६-५-१९२८के पश्चात्) ||३६३
|-
||४१२.|| प्राथमिक शिक्षा — ३ (२७-५-१९२८) ||३६३
|-
||४१३.|| पत्र : कर्नाड सदाशिव रावको (२७-५-१९२८) ||३६६
|-
||४१४.|| पत्र : वाई॰ अंजप्पाको (२७-५-१९२८) ||३६६
|-
||४१५.|| पत्र : सत्यानन्द बोसको (२७-५-१९२८) ||३६७
|-
||४१६.|| पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (२७-५-१९२८) ||३६७
|-
||४१७.|| पत्र : सी॰ रंगनाथ रावको (२७-५-१९२८) ||३६८
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४१८. पत्र : गंगा प्रसादको (२७-५-१९२८) ३६९
४१९. पत्र: भोजराज खुशीरामको (२७-५-१९२८) ३६९
४२०. पत्र: मणिबन पटेलको (२८-५-१९२८) ३७०
४२१. हरिलाल देसाईको लिखे पत्रका मसविदा (२८-५-१९२८) ३७०
४२२. तार : दक्षिण आफ्रिका भारतीय कांग्रेसको (२९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ३७१
४२३. पत्र : शंकरनको (३०-५-१९२८) ३७२
४२४. पत्र : च० राजगोपालाचारीको (३०-५-१९२८) ३७२
४२५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (३०-५-१९२८) ३७३
४२६. पत्र : वसुमती पण्डितको (३०-५-१९२८) ३७४
४२७. बारडोलीकी परीक्षा (३१-५-१९२८) ३७४
४२८. दक्षिण में अस्पृश्यता (३१-५-१९२८) ३७६
४२९. पत्र : शचीन्द्रनाथ मित्रको (३१-५-१९२८) ३७७
४३०. पत्र : जी० एन० कानिटकरको (३१-५-१९२८) ३७८
४३१. पत्र : अ० टे० गिडवानीको (३१-५-१९२८) ३७९
४३२. पत्र : इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया, अहमदाबादके प्रबन्धकको (१-६-१९२८) ३८०
४३३. पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१-६-१९२८) ३८०
४३४. पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (१-६-१९२८) ३८१
४३५. पत्र : केवलरामको (२-६-१९२८) ३८१
४३६. बारडोलीका माहात्म्य ( ३-६-१९२८) ३८२
४३७. शिक्षा-विषयक प्रश्न- १ ( ३-६-१९२८) ३८३
४३८. पत्र : वल्लभभाई पटेलको (३-६-१९२८) ३८४
४३९. पत्र : वसुमती पण्डितको (४-६-१९२८) ३८५
४४०. पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (४-६-१९२८) ३८६
४४१. बारडोली दिवस (५-६-१९२८) ३८६
४४२. पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-६-१९२८) ३८७
४४३. पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (६-६-१९२८) ३८७
४४८. दोनों पहलू (७-६-१९२८) ३९३
४४४. पत्र : बेचर परमारको (६-६-१९२८) ३९४
४४५. पत्र : वसुमती पण्डितको (६-६-१९२८) ३९५
४४६. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (६-६-१९२८) ३८८
४४७. पत्र : चीमनलाल वोराको (६-६-१९२८) ३८९
४४९. नौ नकदन तेरह उधार (७-६-१९२८) ३८९
४५०. दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय (७-६-१९२८) ३९०
४५१. पत्र : कृष्णप्रसादको (७-६-१९२८) ३९०<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{c|पच्चीस}}</noinclude>
||४१८.|| पत्र : गंगा प्रसादको (२७-५-१९२८) ||३६९
|`४१९.|| पत्र: भोजराज खुशीरामको (२७-५-१९२८) ||३६९
||४२०.|| पत्र: मणिबन पटेलको (२८-५-१९२८) ||३७०
||४२१.|| हरिलाल देसाईको लिखे पत्रका मसविदा (२८-५-१९२८) ||३७०
||४२२.|| तार : दक्षिण आफ्रिका भारतीय कांग्रेसको (२९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ||३७१
||४२३.|| पत्र : शंकरनको (३०-५-१९२८) ||३७२
||४२४.|| पत्र : च० राजगोपालाचारीको (३०-५-१९२८) ||३७२
||४२५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (३०-५-१९२८) ||३७३
||४२६.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (३०-५-१९२८) ||३७४
||४२७.|| बारडोलीकी परीक्षा (३१-५-१९२८) ||३७४
||४२८.|| दक्षिण में अस्पृश्यता (३१-५-१९२८) ||३७६
||४२९.|| पत्र : शचीन्द्रनाथ मित्रको (३१-५-१९२८) ||३७७
||४३०.|| पत्र : जी० एन० कानिटकरको (३१-५-१९२८) ||३७८
||४३१.|| पत्र : अ० टे० गिडवानीको (३१-५-१९२८) ||३७९
||४३२.|| पत्र : इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया, अहमदाबादके प्रबन्धकको (१-६-१९२८) ||३८०
||४३३.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१-६-१९२८) ||३८०
||४३४.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (१-६-१९२८) ||३८१
||४३५.|| पत्र : केवलरामको (२-६-१९२८) ||३८१
||४३६.|| बारडोलीका माहात्म्य ( ३-६-१९२८) ||३८२
||४३७.|| शिक्षा-विषयक प्रश्न- १ (३-६-१९२८) ||३८३
||४३८.|| पत्र : वल्लभभाई पटेलको (३-६-१९२८) ||३८४
||४३९.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (४-६-१९२८) ||३८५
||४४०.|| पत्र : वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (४-६-१९२८) ||३८६
||४४१.|| बारडोली दिवस (५-६-१९२८) ||३८६
||४४२.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-६-१९२८) ||३८७
||४४३.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (६-६-१९२८) ||३८७
||४४८.|| दोनों पहलू (७-६-१९२८) ||३९३
||४४४.|| पत्र : बेचर परमारको (६-६-१९२८) ||३९४
||४४५.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (६-६-१९२८) ||३९५
||४४६.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (६-६-१९२८) ||३८८
||४४७.|| पत्र : चीमनलाल वोराको (६-६-१९२८) ||३८९
||४४९.|| नौ नकदन तेरह उधार (७-६-१९२८) ||३८९
||४५०.|| दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय (७-६-१९२८) ||३९०
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|-
||४१८.|| पत्र : गंगा प्रसादको (२७-५-१९२८) ||३६९
|-
||४१९.|| पत्र: भोजराज खुशीरामको (२७-५-१९२८) ||३६९
|-
||४२०.|| पत्र: मणिबन पटेलको (२८-५-१९२८) ||३७०
|-
||४२१.|| हरिलाल देसाईको लिखे पत्रका मसविदा (२८-५-१९२८) ||३७०
|-
||४२२.|| तार : दक्षिण आफ्रिका भारतीय कांग्रेसको (२९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ||३७१
|-
||४२३.|| पत्र : शंकरनको (३०-५-१९२८) ||३७२
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|-
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|-
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|-
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|-
||४२९.|| पत्र : शचीन्द्रनाथ मित्रको (३१-५-१९२८) ||३७७
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||४३७.|| शिक्षा-विषयक प्रश्न- १ (३-६-१९२८) ||३८३
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||४३८.|| पत्र : वल्लभभाई पटेलको (३-६-१९२८) ||३८४
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|-
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|-
||४४१.|| बारडोली दिवस (५-६-१९२८) ||३८६
|-
||४४२.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-६-१९२८) ||३८७
|-
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|-
||४४८.|| दोनों पहलू (७-६-१९२८) ||३९३
|-
||४४४.|| पत्र : बेचर परमारको (६-६-१९२८) ||३९४
|-
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|-
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|-
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|-
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|-
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|-
||४५१.|| पत्र : कृष्णप्रसादको (७-६-१९२८) ||३९०
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|-
||४१८.|| पत्र : गंगा प्रसादको (२७-५-१९२८) ||३६९
|-
||४१९.|| पत्र: भोजराज खुशीरामको (२७-५-१९२८) ||३६९
|-
||४२०.|| पत्र: मणिबन पटेलको (२८-५-१९२८) ||३७०
|-
||४२१.|| हरिलाल देसाईको लिखे पत्रका मसविदा (२८-५-१९२८) ||३७०
|-
||४२२.|| तार : दक्षिण आफ्रिका भारतीय कांग्रेसको (२९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ||३७१
|-
||४२३.|| पत्र : शंकरनको (३०-५-१९२८) ||३७२
|-
||४२४.|| पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (३०-५-१९२८) ||३७२
|-
||४२५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (३०-५-१९२८) ||३७३
|-
||४२६.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (३०-५-१९२८) ||३७४
|-
||४२७.|| बारडोलीकी परीक्षा (३१-५-१९२८) ||३७४
|-
||४२८.|| दक्षिण में अस्पृश्यता (३१-५-१९२८) ||३७६
|-
||४२९.|| पत्र : शचीन्द्रनाथ मित्रको (३१-५-१९२८) ||३७७
|-
||४३०.|| पत्र : जी॰ एन॰ कानिटकरको (३१-५-१९२८) ||३७८
|-
||४३१.|| पत्र : अ॰ टे॰ गिडवानीको (३१-५-१९२८) ||३७९
|-
||४३२.|| पत्र : इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया, अहमदाबादके प्रबन्धकको (१-६-१९२८) ||३८०
|-
||४३३.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१-६-१९२८) ||३८०
|-
||४३४.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (१-६-१९२८) ||३८१
|-
||४३५.|| पत्र : केवलरामको (२-६-१९२८) ||३८१
|-
||४३६.|| बारडोलीका माहात्म्य ( ३-६-१९२८) ||३८२
|-
||४३७.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — १ (३-६-१९२८) ||३८३
|-
||४३८.|| पत्र : वल्लभभाई पटेलको (३-६-१९२८) ||३८४
|-
||४३९.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (४-६-१९२८) ||३८५
|-
||४४०.|| पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (४-६-१९२८) ||३८६
|-
||४४१.|| बारडोली दिवस (५-६-१९२८) ||३८६
|-
||४४२.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-६-१९२८) ||३८७
|-
||४४३.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (६-६-१९२८) ||३८७
|-
||४४८.|| दोनों पहलू (७-६-१९२८) ||३९३
|-
||४४४.|| पत्र : बेचर परमारको (६-६-१९२८) ||३९४
|-
||४४५.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (६-६-१९२८) ||३९५
|-
||४४६.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (६-६-१९२८) ||३८८
|-
||४४७.|| पत्र : चीमनलाल वोराको (६-६-१९२८) ||३८९
|-
||४४९.|| नौ नकदन तेरह उधार (७-६-१९२८) ||३८९
|-
||४५०.|| दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय (७-६-१९२८) ||३९०
|-
||४५१.|| पत्र : कृष्णप्रसादको (७-६-१९२८) ||३९०
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|पच्चीस}}</noinclude>{|width=100%
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||४१८.|| पत्र : गंगा प्रसादको (२७-५-१९२८) ||३६९
|-
||४१९.|| पत्र: भोजराज खुशीरामको (२७-५-१९२८) ||३६९
|-
||४२०.|| पत्र: मणिबन पटेलको (२८-५-१९२८) ||३७०
|-
||४२१.|| हरिलाल देसाईको लिखे पत्रका मसविदा (२८-५-१९२८) ||३७०
|-
||४२२.|| तार : दक्षिण आफ्रिका भारतीय कांग्रेसको (२९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ||३७१
|-
||४२३.|| पत्र : शंकरनको (३०-५-१९२८) ||३७२
|-
||४२४.|| पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (३०-५-१९२८) ||३७२
|-
||४२५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (३०-५-१९२८) ||३७३
|-
||४२६.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (३०-५-१९२८) ||३७४
|-
||४२७.|| बारडोलीकी परीक्षा (३१-५-१९२८) ||३७४
|-
||४२८.|| दक्षिण में अस्पृश्यता (३१-५-१९२८) ||३७६
|-
||४२९.|| पत्र : शचीन्द्रनाथ मित्रको (३१-५-१९२८) ||३७७
|-
||४३०.|| पत्र : जी॰ एन॰ कानिटकरको (३१-५-१९२८) ||३७८
|-
||४३१.|| पत्र : अ॰ टे॰ गिडवानीको (३१-५-१९२८) ||३७९
|-
||४३२.|| पत्र : इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया, अहमदाबादके प्रबन्धकको (१-६-१९२८) ||३८०
|-
||४३३.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१-६-१९२८) ||३८०
|-
||४३४.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (१-६-१९२८) ||३८१
|-
||४३५.|| पत्र : केवलरामको (२-६-१९२८) ||३८१
|-
||४३६.|| बारडोलीका माहात्म्य ( ३-६-१९२८) ||३८२
|-
||४३७.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — १ (३-६-१९२८) ||३८३
|-
||४३८.|| पत्र : वल्लभभाई पटेलको (३-६-१९२८) ||३८४
|-
||४३९.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (४-६-१९२८) ||३८५
|-
||४४०.|| पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (४-६-१९२८) ||३८६
|-
||४४१.|| बारडोली दिवस (५-६-१९२८) ||३८६
|-
||४४२.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-६-१९२८) ||३८७
|-
||४४३.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (६-६-१९२८) ||३८७
|-
||४४४.|| पत्र : बेचर परमारको (६-६-१९२८) ||३८८
|-
||४४५.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (६-६-१९२८) || ३८९
|-
||४४६.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (६-६-१९२८) ||३८९
|-
||४४७.|| पत्र : चीमनलाल वोराको (६-६-१९२८) ||३९०
|-
||४४८.|| दोनों पहलू (७-६-१९२८) ||३९०
|-
||४४९.|| नौ नकदन तेरह उधार (७-६-१९२८) ||३९३
|-
||४५०.|| दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय (७-६-१९२८) ||३९४
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|-
||४१८.|| पत्र : गंगा प्रसादको (२७-५-१९२८) ||३६९
|-
||४१९.|| पत्र: भोजराज खुशीरामको (२७-५-१९२८) ||३६९
|-
||४२०.|| पत्र: मणिबन पटेलको (२८-५-१९२८) ||३७०
|-
||४२१.|| हरिलाल देसाईको लिखे पत्रका मसविदा (२८-५-१९२८) ||३७०
|-
||४२२.|| तार : दक्षिण आफ्रिका भारतीय कांग्रेसको (२९-५-१९२८ या उसके पश्चात्) ||३७१
|-
||४२३.|| पत्र : शंकरनको (३०-५-१९२८) ||३७२
|-
||४२४.|| पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (३०-५-१९२८) ||३७२
|-
||४२५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (३०-५-१९२८) ||३७३
|-
||४२६.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (३०-५-१९२८) ||३७४
|-
||४२७.|| बारडोलीकी परीक्षा (३१-५-१९२८) ||३७४
|-
||४२८.|| दक्षिणमें अस्पृश्यता (३१-५-१९२८) ||३७६
|-
||४२९.|| पत्र : शचीन्द्रनाथ मित्रको (३१-५-१९२८) ||३७७
|-
||४३०.|| पत्र : जी॰ एन॰ कानिटकरको (३१-५-१९२८) ||३७८
|-
||४३१.|| पत्र : अ॰ टे॰ गिडवानीको (३१-५-१९२८) ||३७९
|-
||४३२.|| पत्र : इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया, अहमदाबादके प्रबन्धकको (१-६-१९२८) ||३८०
|-
||४३३.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१-६-१९२८) ||३८०
|-
||४३४.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (१-६-१९२८) ||३८१
|-
||४३५.|| पत्र : केवलरामको (२-६-१९२८) ||३८१
|-
||४३६.|| बारडोलीका माहात्म्य ( ३-६-१९२८) ||३८२
|-
||४३७.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — १ (३-६-१९२८) ||३८३
|-
||४३८.|| पत्र : वल्लभभाई पटेलको (३-६-१९२८) ||३८४
|-
||४३९.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (४-६-१९२८) ||३८५
|-
||४४०.|| पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (४-६-१९२८) ||३८६
|-
||४४१.|| बारडोली दिवस (५-६-१९२८) ||३८६
|-
||४४२.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (५-६-१९२८) ||३८७
|-
||४४३.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (६-६-१९२८) ||३८७
|-
||४४४.|| पत्र : बेचर परमारको (६-६-१९२८) ||३८८
|-
||४४५.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (६-६-१९२८) || ३८९
|-
||४४६.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (६-६-१९२८) ||३८९
|-
||४४७.|| पत्र : चीमनलाल वोराको (६-६-१९२८) ||३९०
|-
||४४८.|| दोनों पहलू (७-६-१९२८) ||३९०
|-
||४४९.|| नौ नकदन तेरह उधार (७-६-१९२८) ||३९३
|-
||४५०.|| दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय (७-६-१९२८) ||३९४
|-
||४५१.|| पत्र : कृष्णप्रसादको (७-६-१९२८) ||३९५
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३०
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४५२. लेस्ली विलसनको लिखे गये पत्रका मसविदा (७-६-१९२८) ३९६
४५३. पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (७-६-१९२८) ३९८
४५४. पत्र : महादेव देसाईको (७-६-१९२८के पश्चात्) ३९८
४५५. पत्र : जे० बी० पेनिंग्टनको (८-६-१९२८) ३९९
४५६. पत्र : स्वेन्सका किरकान्सको (८-६-१९२८) ४००
४५७. पत्र : श्रीमती टी० मंजीयरलीको (८-६-१९२८) ४००
४५८. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (८-६-१९२८) ४०१
४५९. पत्र : श्रीमती रचेल एम० रटरको (८-६-१९२८) ४०१
४६०. पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (८-६-१९२८) ४०२
४६१. पत्र : वसुमती पण्डितको (९-६-१९२८) ४०२
४६२. पत्र : तैयब अलीको (९-६-१९२८) ४०३
४६३. पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (९-६-१९२८) ४०४
४६४. पत्र : केदारनाथ बनर्जीको (९-६-१९२८ के पश्चात्) ४०४
४६५. शिक्षा–विषयक प्रश्न — २ (१०-६-१९२८) ४०५
४६६. बारडोली यज्ञ (१०-६-१९२८) ४०६
४६७. बारडोली दिवस (१०-६-१९२८) ४०८
४६८. गोविन्द बड़े या गुरु? (१०-६-१९२८) ४०९
४६९. संयमकी आवश्यकता किसे? ( १०-६-१९२८) ४१०
४७०. पत्र : ना० २० मलकानीको (१०-६-१९२८) ४११
४७१. पत्र : जनकधारी प्रसादको (१०-६-१९२८) ४१२
४७२. पत्र : आर्थर मूरको (१०-६-१९२८) ४१३
४७३. पत्र : सदानन्दको (१०-६-१९२८) ४१४
४७४. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-६-१९२८) ४१४
४७५. भाषण : गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष (११-६-१९२८) ४१५
४७६. पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको (११-६-१९२८) ४१८
४७७. पत्र : एस० मुराटोरीको (१३-६-१९२८) ४१९
४७८. सत्याग्रह आश्रम ४१९
४७९. बारडोलीकी बलि (१४-६-१९२८) ४३२
४८०. बारडोलीका मामला क्या है? (१४-६-१९२८) ४३३
४८१. अ० भा० च० संघकी सदस्यता (१४-६-१९२८) ४३४
४८२. पत्र : रामदेवको (१५-६-१९२८) ४३४
४८३. पत्र : रिचर्ड बी० ग्रेगको (१५-६-१९२८) ४३५
४८४. पत्र : वसुमती पण्डितको (१५-६-१९२८) ४३६
४८५. पत्र : एस० रामनाथनको (१६-६-१९२८) ४३६
४८६. पत्र : जी० रामचन्द्रनको (१६-६-१९२८) ४३७
४८७. छुट्टियों में खादी सेवा (१७-६-१९२८) ४३८<noinclude></noinclude>
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||४५२.|| लेस्ली विलसनको लिखे गये पत्रका मसविदा (७-६-१९२८) ||३९६
||४५३.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (७-६-१९२८) ||३९८
||४५४.|| पत्र : महादेव देसाईको (७-६-१९२८के पश्चात्) ||३९८
||४५५.|| पत्र : जे० बी० पेनिंग्टनको (८-६-१९२८) ||३९९
||४५६.|| पत्र : स्वेन्सका किरकान्सको (८-६-१९२८) ||४००
||४५७.|| पत्र : श्रीमती टी० मंजीयरलीको (८-६-१९२८) ||४००
||४५८.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (८-६-१९२८) ||४०१
||४५९.|| पत्र : श्रीमती रचेल एम० रटरको (८-६-१९२८) |`४०१
||४६०.|| पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (८-६-१९२८) ||४०२
||४६१.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (९-६-१९२८) ||४०२
||४६२.|| पत्र : तैयब अलीको (९-६-१९२८) ||४०३
||४६३.|| पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (९-६-१९२८) ||४०४
||४६४.|| पत्र : केदारनाथ बनर्जीको (९-६-१९२८ के पश्चात्) ||४०४
||४६५.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — २ (१०-६-१९२८) ||४०५
||४६६.|| बारडोली यज्ञ (१०-६-१९२८) ||४०६
||४६७.|| बारडोली दिवस (१०-६-१९२८) ||४०८
||४६८.|| गोविन्द बड़े या गुरु? (१०-६-१९२८) ||४०९
||४६९.|| संयमकी आवश्यकता किसे? ( १०-६-१९२८) ||४१०
||४७०.|| पत्र : ना० २० मलकानीको (१०-६-१९२८) ||४११
||४७१.|| पत्र : जनकधारी प्रसादको (१०-६-१९२८) ||४१२
||४७२.|| पत्र : आर्थर मूरको (१०-६-१९२८) ||४१३
||४७३.|| पत्र : सदानन्दको (१०-६-१९२८) ||४१४
||४७४.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-६-१९२८) ||४१४
||४७५.|| भाषण : गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष (११-६-१९२८) ||४१५
||४७६.|| पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको (११-६-१९२८) ||४१८
||४७७.|| पत्र : एस० मुराटोरीको (१३-६-१९२८) ||४१९
||४७८.|| सत्याग्रह आश्रम ||४१९
||४७९.|| बारडोलीकी बलि (१४-६-१९२८) ||४३२
||४८०.|| बारडोलीका मामला क्या है? (१४-६-१९२८) ||४३३
||४८१.|| अ० भा० च० संघकी सदस्यता (१४-६-१९२८) ||४३४
||४८२.|| पत्र : रामदेवको (१५-६-१९२८) ||४३४
||४८३.|| पत्र : रिचर्ड बी० ग्रेगको (१५-६-१९२८) ||४३५
||४८४.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (१५-६-१९२८) ||४३६
||४८५.|| पत्र : एस० रामनाथनको (१६-६-१९२८) ||४३६
||४८६.|| पत्र : जी० रामचन्द्रनको (१६-६-१९२८) ||४३७
||४८७.|| छुट्टियों में खादी सेवा (१७-६-१९२८) ||४३८<noinclude></noinclude>
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||४५२.|| लेस्ली विलसनको लिखे गये पत्रका मसविदा (७-६-१९२८) ||३९६
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||४५३.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (७-६-१९२८) ||३९८
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||४५४.|| पत्र : महादेव देसाईको (७-६-१९२८के पश्चात्) ||३९८
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||४५५.|| पत्र : जे० बी० पेनिंग्टनको (८-६-१९२८) ||३९९
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||४६०.|| पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (८-६-१९२८) ||४०२
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||४६४.|| पत्र : केदारनाथ बनर्जीको (९-६-१९२८ के पश्चात्) ||४०४
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||४६५.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — २ (१०-६-१९२८) ||४०५
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||४६६.|| बारडोली यज्ञ (१०-६-१९२८) ||४०६
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||४६७.|| बारडोली दिवस (१०-६-१९२८) ||४०८
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||४६८.|| गोविन्द बड़े या गुरु? (१०-६-१९२८) ||४०९
|-
||४६९.|| संयमकी आवश्यकता किसे? ( १०-६-१९२८) ||४१०
|-
||४७०.|| पत्र : ना० २० मलकानीको (१०-६-१९२८) ||४११
|-
||४७१.|| पत्र : जनकधारी प्रसादको (१०-६-१९२८) ||४१२
|-
||४७२.|| पत्र : आर्थर मूरको (१०-६-१९२८) ||४१३
|-
||४७३.|| पत्र : सदानन्दको (१०-६-१९२८) ||४१४
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||४७४.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-६-१९२८) ||४१४
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||४७५.|| भाषण : गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष (११-६-१९२८) ||४१५
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||४७६.|| पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको (११-६-१९२८) ||४१८
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||४७७.|| पत्र : एस० मुराटोरीको (१३-६-१९२८) ||४१९
|-
||४७८.|| सत्याग्रह आश्रम ||४१९
|-
||४७९.|| बारडोलीकी बलि (१४-६-१९२८) ||४३२
|-
||४८०.|| बारडोलीका मामला क्या है? (१४-६-१९२८) ||४३३
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||४८१.|| अ० भा० च० संघकी सदस्यता (१४-६-१९२८) ||४३४
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||४८२.|| पत्र : रामदेवको (१५-६-१९२८) ||४३४
|-
||४८३.|| पत्र : रिचर्ड बी० ग्रेगको (१५-६-१९२८) ||४३५
|-
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|-
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||४५२.|| लेस्ली विलसनको लिखे गये पत्रका मसविदा (७-६-१९२८) ||३९६
|-
||४५३.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (७-६-१९२८) ||३९८
|-
||४५४.|| पत्र : महादेव देसाईको (७-६-१९२८के पश्चात्) ||३९८
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||४६३.|| पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (९-६-१९२८) ||४०४
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||४६४.|| पत्र : केदारनाथ बनर्जीको (९-६-१९२८ के पश्चात्) ||४०४
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||४६५.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — २ (१०-६-१९२८) ||४०५
|-
||४६६.|| बारडोली यज्ञ (१०-६-१९२८) ||४०६
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||४६७.|| बारडोली दिवस (१०-६-१९२८) ||४०८
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||४६८.|| गोविन्द बड़े या गुरु? (१०-६-१९२८) ||४०९
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||४६९.|| संयमकी आवश्यकता किसे? ( १०-६-१९२८) ||४१०
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||४७०.|| पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (१०-६-१९२८) ||४११
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||४७१.|| पत्र : जनकधारी प्रसादको (१०-६-१९२८) ||४१२
|-
||४७२.|| पत्र : आर्थर मूरको (१०-६-१९२८) ||४१३
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||४७३.|| पत्र : सदानन्दको (१०-६-१९२८) ||४१४
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||४७४.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-६-१९२८) ||४१४
|-
||४७५.|| भाषण : गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष (११-६-१९२८) ||४१५
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||४७६.|| पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको (११-६-१९२८) ||४१८
|-
||४७७.|| पत्र : एस॰ मुराटोरीको (१३-६-१९२८) ||४१९
|-
||४७८.|| सत्याग्रह आश्रम ||४१९
|-
||४७९.|| बारडोलीकी बलि (१४-६-१९२८) ||४३२
|-
||४८०.|| बारडोलीका मामला क्या है? (१४-६-१९२८) ||४३३
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||४८१.|| अ॰ भा॰ च॰ संघकी सदस्यता (१४-६-१९२८) ||४३४
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||४८२.|| पत्र : रामदेवको (१५-६-१९२८) ||४३४
|-
||४८३.|| पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको (१५-६-१९२८) ||४३५
|-
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|छब्बीस}}</noinclude>{|width=100%
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||४५२.|| लेस्ली विलसनको लिखे गये पत्रका मसविदा (७-६-१९२८) ||३९६
|-
||४५३.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (७-६-१९२८) ||३९८
|-
||४५४.|| पत्र : महादेव देसाईको (७-६-१९२८के पश्चात्) ||३९८
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||४५५.|| पत्र : जे॰ बी॰ पेनिंग्टनको (८-६-१९२८) ||३९९
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||४५६.|| पत्र : स्वेन्सका किरकान्सको (८-६-१९२८) ||४००
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||४५७.|| पत्र : श्रीमती टी॰ मंजीयरलीको (८-६-१९२८) ||४००
|-
||४५८.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (८-६-१९२८) ||४०१
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||४५९.|| पत्र : श्रीमती रचेल एम॰ रटरको (८-६-१९२८) ||४०१
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||४६०.|| पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (८-६-१९२८) ||४०२
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||४६१.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (९-६-१९२८) ||४०२
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||४६२.|| पत्र : तैयब अलीको (९-६-१९२८) ||४०३
|-
||४६३.|| पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (९-६-१९२८) ||४०४
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||४६४.|| पत्र : केदारनाथ बनर्जीको (९-६-१९२८ के पश्चात्) ||४०४
|-
||४६५.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — २ (१०-६-१९२८) ||४०५
|-
||४६६.|| बारडोली यज्ञ (१०-६-१९२८) ||४०६
|-
||४६७.|| बारडोली दिवस (१०-६-१९२८) ||४०८
|-
||४६८.|| गोविन्द बड़े या गुरु? (१०-६-१९२८) ||४०९
|-
||४६९.|| संयमकी आवश्यकता किसे? ( १०-६-१९२८) ||४१०
|-
||४७०.|| पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको (१०-६-१९२८) ||४११
|-
||४७१.|| पत्र : जनकधारी प्रसादको (१०-६-१९२८) ||४१२
|-
||४७२.|| पत्र : आर्थर मूरको (१०-६-१९२८) ||४१३
|-
||४७३.|| पत्र : सदानन्दको (१०-६-१९२८) ||४१४
|-
||४७४.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१०-६-१९२८) ||४१४
|-
||४७५.|| भाषण : गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष (११-६-१९२८) ||४१५
|-
||४७६.|| पत्र: प्रेमलीला ठाकरसीको (११-६-१९२८) ||४१८
|-
||४७७.|| पत्र : एस॰ मुराटोरीको (१३-६-१९२८) ||४१९
|-
||४७८.|| सत्याग्रह आश्रम ||४१९
|-
||४७९.|| बारडोलीकी बलि (१४-६-१९२८) ||४३२
|-
||४८०.|| बारडोलीका मामला क्या है? (१४-६-१९२८) ||४३३
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||४८१.|| अ॰ भा॰ च॰ संघकी सदस्यता (१४-६-१९२८) ||४३४
|-
||४८२.|| पत्र : रामदेवको (१५-६-१९२८) ||४३४
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||४८३.|| पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको (१५-६-१९२८) ||४३५
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||४८४.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (१५-६-१९२८) ||४३६
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४८८. टिप्पणियाँ : लुटेरे पत्रकार; सत्यादि बातोंके बारेमें (१७-६-१९२८) ४३८
४८९. गवर्नर और बारडोली (१७-६-१९२८) ४४०
४९०. शिक्षा–विषयक प्रश्न — ३ (१७-६-१९२८) ४४२
४९१. पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१७-६-१९२८) ४४४
४९२. पत्र : सुरेन्द्रनाथ विश्वासको (१७-६-१९२८) ४४५
४९३. पत्र : फ्लोरेंस के० क्रेव्सको (१७-६-१९२८) ४४६
४९४. पत्र : एन० सी० बारदोलाईको (१७-६-१९२८) ४४६
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४९८. पत्र : च० राजगोपालाचारीको (१७-६-१९२८) ४५०
४९९. पत्र : वसुमती पण्डितको (१७-६-१९२८) ४५१
५००. पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (१७-६-१९२८) ४५१
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५०९. बारडोलीका घपला (२१-६-१९२८) ४६२
५१०. टिप्पणियाँ: स्वर्गीय गोपबन्धु बाबू; युवकोंके लिए लज्जास्पद; एक प्रशस्ति (२१-६-१९२८) ४६६
५११. पत्र : जे० एम० सेनगुप्तको (२१-६-१९२८) ४६८
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||४८८.|| टिप्पणियाँ : लुटेरे पत्रकार; सत्यादि बातोंके बारेमें (१७-६-१९२८) ४३८
||४८९.|| गवर्नर और बारडोली (१७-६-१९२८) ४४०
||४९०.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — ३ (१७-६-१९२८) ४४२
||४९१.|| पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१७-६-१९२८) ४४४
||४९२.|| पत्र : सुरेन्द्रनाथ विश्वासको (१७-६-१९२८) ४४५
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||५०९.|| बारडोलीका घपला (२१-६-१९२८) ४६२
||५१०.|| टिप्पणियाँ: स्वर्गीय गोपबन्धु बाबू; युवकोंके लिए लज्जास्पद; एक प्रशस्ति (२१-६-१९२८) ४६६
||५११.|| पत्र : जे० एम० सेनगुप्तको (२१-६-१९२८) ४६८
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||४८८.|| टिप्पणियाँ : लुटेरे पत्रकार; सत्यादि बातोंके बारेमें (१७-६-१९२८) ||४३८
||४८९.|| गवर्नर और बारडोली (१७-६-१९२८) ||४४०
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||५१०.|| टिप्पणियाँ: स्वर्गीय गोपबन्धु बाबू; युवकोंके लिए लज्जास्पद; एक प्रशस्ति (२१-६-१९२८) ||४६६
||५११.|| पत्र : जे० एम० सेनगुप्तको (२१-६-१९२८) ||४६८
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||४८८.|| टिप्पणियाँ : लुटेरे पत्रकार; सत्यादि बातोंके बारेमें (१७-६-१९२८) ||४३८
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||४८९.|| गवर्नर और बारडोली (१७-६-१९२८) ||४४०
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||४९०.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — ३ (१७-६-१९२८) ||४४२
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||४८८.|| टिप्पणियाँ : लुटेरे पत्रकार; सत्यादि बातोंके बारेमें (१७-६-१९२८) ||४३८
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||४८९.|| गवर्नर और बारडोली (१७-६-१९२८) ||४४०
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||४९०.|| शिक्षा–विषयक प्रश्न — ३ (१७-६-१९२८) ||४४२
|-
||४९१.|| पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१७-६-१९२८) ||४४४
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||५०९.|| बारडोलीका घपला (२१-६-१९२८) ||४६२
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||५१०.|| टिप्पणियाँ: स्वर्गीय गोपबन्धु बाबू; युवकोंके लिए लज्जास्पद; एक प्रशस्ति (२१-६-१९२८) ||४६६
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||५११.|| पत्र : जे॰ एम॰ सेनगुप्तको (२१-६-१९२८) ||४६८
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||४८८.|| टिप्पणियाँ : लुटेरे पत्रकार; सत्यादि बातोंके बारेमें (१७-६-१९२८) ||४३८
|-
||४८९.|| गवर्नर और बारडोली (१७-६-१९२८) ||४४०
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||४९०.|| शिक्षा विषयक प्रश्न — ३ (१७-६-१९२८) ||४४२
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||४९१.|| पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१७-६-१९२८) ||४४४
|-
||४९२.|| पत्र : सुरेन्द्रनाथ विश्वासको (१७-६-१९२८) ||४४५
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||४९३.|| पत्र : फ्लोरेंस के॰ क्रेब्सको (१७-६-१९२८) ||४४६
|-
||४९४.|| पत्र : एन॰ सी॰ बारदोलाईको (१७-६-१९२८) ||४४६
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||४९५.|| पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१७-६-१९२८) ||४४७
|-
||४९६.|| पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१७-६-१९२८) ||४४८
|-
||४९७.|| पत्र : सी॰ विजयराघवाचारियरको (१७-६-१९२८) ||४४९
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||४९८.|| पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (१७-६-१९२८) ||४५०
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||४९९.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (१७-६-१९२८) ||४५१
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||५००.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (१७-६-१९२८) ||४५१
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||५०१.|| पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (१८-६-१९२८) ||४५२
|-
||५०२.|| पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१८-६-१९२८) ||४५२
|-
||५०३.|| पत्र: मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको (१९-६-१९२८) ||४५३
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||५०४.|| पत्र : प्यारेलाल नैयरको (१९-६-१९२८) ||४५४
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||५०५.|| पत्र : मोतीलाल नेहरूको (१९-६-१९२८) ||४५५
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||५०६.|| पत्र : के॰ एस॰ सुब्रह्मण्यम्को (१९-६-१९२८) ||४५५
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||५०७.|| पत्र : शंकरन्को (२०-६-१९२८) ||४५६
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||५०८.|| मुल्जिम न्यायाधीश बन बैठा (२१-६-१९२८) ||४५७
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||५०९.|| बारडोलीका घपला (२१-६-१९२८) ||४६२
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||५१०.|| टिप्पणियाँ: स्वर्गीय गोपबन्धु बाबू; युवकोंके लिए लज्जास्पद; एक प्रशस्ति (२१-६-१९२८) ||४६६
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||५११.|| पत्र : जे॰ एम॰ सेनगुप्तको (२१-६-१९२८) ||४६८
|-
||५१२.|| पत्र : ईथल एंगसको (२२-६-१९२८) ||४६९
|-
||५१३.|| पत्र : रामलाल बलराम वाजपेयीको (२२-६-१९२८) ||४६९
|-
||५१४.|| पत्र : के॰ श्रीनिवासनको (२२-६-१९२८) ||४७०
|-
||५१५.|| पत्र : देवी वेस्टको (२२-६-१९२८) ||४७१
|-
||५१६.|| पत्र : होरेस जी॰ अलेक्जेंडरको (२२-६-१९२८) ||४७१
|-
||५१७.|| पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको (२२-६-१९२८) ||४७३
|-
||५१८.|| पत्र : एस्थर मेननको (२२-६-१९२८) ||४७३
|-
||५१९.|| पत्र : बेन एम॰ चेरिंग्टनको (२२-६-१९२८) ||४७४
|-
||५२०.|| पत्र : वसुमती पण्डितको (२३-६-१९२८) ||४७६
|-
||५२१.|| पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (२३-६-१९२८) ||४७६
|-
||५२२.|| पत्र : बेचर परमारको (२३-६-१९२८) ||४७७
|}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१४८
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१०१. भाषण: शोलापुरमें'''<ref>शोलापुर शहरके कुछ लोगोंने गांधीजीके नाम एक खुला पत्र लिखकर उनसे कई प्रश्न किये थे; गांधीजीने अपने भाषण में इन प्रश्नों और उनमें गर्भित आलोचनाओंका उत्तर दिया था ।</ref>}}}}
{{right|२० फरवरी, १९२७}}
यदि लोग मुझसे करोड़ रुपयेकी खादी लें और फिर उसे समुद्र में फेंक दें तो उससे मुझे क्या मतलब? मुझसे तो वे एक करोड़की खादी खरीदते हैं और इस तरह गरीबोंके घरोंमें एक करोड़ रुपये पहुँच जाते हैं। हमारे लिये इतना ही पर्याप्त है। परन्तु हकीकत यह है कि खादी पहननेवाले सभी लोग पाखण्डी नहीं हैं, वे बेचारे तो मेरे पास आकर स्पष्ट शब्दों में यह कह देते हैं कि हमें खादी अच्छी तो लगती है; परन्तु उसे हम हमेशा नहीं पहन सकते। आप ऐसा कुछ कीजिए कि हममें हमेशा खादी पहननेकी शक्ति आ जाये। तो क्या मैं उन लोगोंसे यह कहूँ कि आप लोग खादी पहनना त्याग दें। मेरा कर्त्तव्य तो सम्पूर्ण धर्म समझा देना है। परन्तु सामान्य लोग उसका जितना पालन कर सकें उतना करें। में तो व्यापारी ठहरा। मैं तो दरिद्रनारायणका स्वयं नियुक्त एक गुमाश्ता हूँ, उसका आढ़तिया हूँ। मेरे पास जो प्रमाणपत्र है वह मेरी सेवाका है। यदि आप मेरी बात मानने को तैयार हों तो मैं आपको बताना चाहता हूँ कि गत वर्ष चरखा संघ द्वारा गरीब लोगोंके घरोंमें नौ लाख रुपये वितरित हुए। हमने १,५०० गाँवोंमें खादीका सन्देश पहुँचाया और आज इस संस्थाके द्वारा जितना ग्राम-संगठन कार्य हो रहा है उतना अन्य किसी भी संस्थाके
द्वारा नहीं हो रहा है।
प्रत्येक मनुष्य सदोष है, अपूर्ण है। सम्पूर्ण तो केवल ईश्वर ही है। प्रत्येक व्यक्ति में अपूर्णता है । मुझमें तो हजारों अपूर्णताएँ भरी हुई हैं, आप उन्हें दरगुजर
कर दीजिए और मुझमें जो थोड़ेसे भी गुण हैं उन्हें ग्रहण कीजिए। यदि आप लोग मेरे दोषोंको त्याग कर मेरी सेवा-शक्तिका उपयोग न करेंगे तो आपके बारेमें इस युगका इतिहासकार क्या कहेगा? वह यही कहेगा कि इस जमानेमें खुदाका एक बन्दा हुआ; उसे ठीक दिखाई तो नहीं देता था लेकिन वह जन्मा था सेवा करनेके लिए। उसके हाथों बहुत सेवाकार्य हुआ परन्तु उस कालकी जनताने उसकी आँखका दोष देखकर उसके हाथकी सेवा लेनेसे इनकार कर दिया था।
आप हमारे खादी-कार्यके बीचमें शुद्धि और संगठनको क्यों लाते हैं? फिर भी मैंने इस सम्बन्धमें अपने विचार छिपाये नहीं हैं। में इसके बारेमें नासिकमें अपने विचार विस्तारपूर्वक व्यक्त कर चुका हूँ।<ref>देखिए " भाषण: नासिकमें ", १६-२-१९२७ ।</ref> आज जो शुद्धि और तबलीग चलाई जा रही है, उसे समझना मेरी सामर्थ्य के बाहर है। में एक धर्म त्यागकर दूसरे धर्मको अंगीकार करनेकी प्रवृत्तिको समझ ही नहीं पाता हूँ। परन्तु यह तो मेरा निजी विचार<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१४९
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण:शोलापुरमें|१११}}</noinclude>है। मेरे कहने से कोई भी व्यक्ति न तबलीग बन्द करनेको तैयार है और न शुद्धि रोकनेको तैयार है। मुझे तो अपना फर्ज अदा करना है, अपनी शुद्धि करनी है यदि मैं ऐसा करता हूँ तो आसपासके सब लोग अपनी शुद्धि कर लेंगे। हिन्दू-धर्मकी रक्षाका एकमात्र साधन तपश्चर्या है, ऐसा हमारे शास्त्र पुकार-पुकार कर कहते हैं। आप संगठन चाहे जितना क्यों न करें परन्तु वह शुभ सद्वृत्तिका संगठन होना चाहिए, न कि दुर्वृत्तिका।
यह आरोप कि में मुसलमानोंका पक्षपात करता हूँ और हिन्दुओंके दोष ही देखा करता हूँ, यदि सही भी हो तो मुझे दुःख न होगा। परन्तु मुसलमान तो यह मानते ही नहीं हैं कि में उनके साथ पक्षपात करता हूँ -- यदि वे यह स्वीकार करते हों तो मेरा काम बन जाये। में तो मुसलमानोंके साथ उचित न्याय ही करता हूँ, परन्तु न्याय करते हुए यदि में उन्हें वाजिबसे अधिक भी दूं तो उसमें धर्मंकी हानि कैसे हो सकती है? किसीको मुझसे कुछ पावना हो और में उसे निर्धारित पावनेकी रकमसे चार कौड़ी अधिक दे दूं तो ईश्वर मुझसे जवाब तलब नहीं करेगा। हाँ, यदि उसे उसकी रकमसे कम दूंगा तो ईश्वर मुझसे जरूर पूछेगा। इसलिए यदि मुझसे मुसलमानोंके साथ अथवा अन्य किसीके साथ पक्षपात हो गया हो, तो बुरा मत मानिए। आपको तो इसपर गर्व करना चाहिए कि हिन्दुओंमें एक पागल गांधी ऐसा था जो मुसलमानोंको उनकी वाजिब लेनदारीसे अधिक देता था। श्रीकृष्ण पाँच गाँवोंको छोड़कर पाण्डवोंसे उनका सब कुछ दिलवा देनेके लिए तैयार थे। न्यायका मार्ग ही यही है कि जितना बन सके देते जाइए। वीरका प्रथम लक्षण है क्षमा। युधिष्ठिरने कहा है कि क्षमाका अर्थ है न्यायकी अपेक्षा अधिक देना। यह भी वीरका एक लक्षण है। दया और क्षमासे हिन्दू-धर्म परिपूर्ण है, तो आप लोगोंके लिए यह दुःखका विषय न होकर सुखका विषय होना चाहिए कि आपके समाजमें एक हिन्दू ऐसा भी हो गया है, जिसने हिन्दू धर्मके महान् सिद्धान्तोंका अपने जीवनमें यथाशक्ति पालन किया है और जिसने दूसरोंको जितना हो सका उतना दे डाला है।
म तो जबतक आपके सामने खरा हिसाब पेश कर सकता हूँ उस समयतक आपसे माँगता ही रहूँगा। जबतक आपको मेरे प्रति प्रेम है और मुझमें विश्वास है
तबतक आप लोग मेरे कार्यक्रम में विश्वास रखकर मेरी धनसे सहायता करते जाइये। परन्तु यदि मेरे द्वारा की जानेवाली सेवाका मूल्य आपके नजदीक कुछ न हो तो मेरा नाम भी आप भूल जायें। मुझे नामका अभिमान नहीं है, मुझमें असाधारण शक्ति नहीं है। मैं तो एक बिन्दुमात्र हूँ, मुझमें तो एक सामान्य मनुष्यकी शक्ति है। यदि आप मुझे 'महात्मा' कहे बिना नहीं रह सकते तो 'महात्मा' भले ही कहते रहिए; परन्तु [याद रखिए] मेरा यह महात्मापन आपकी ही शक्तिका प्रतिबिम्ब है आज मेरा मौनवार है तो भी मैं लोगोंको अपना 'दर्शन' करने ही दूं-ऐसा मुझसे कहा गया। इससे मुझे दुःख हुआ। में किसीको दर्शन देना नहीं चाहता। में किस मुंहसे दर्शन दूं? में दर्शन देने योग्य हूँ ही नहीं। मुझे न तो 'दर्शन' शब्द अच्छा लगता है और न 'महात्मा' शब्द ही। दर्शन करना हो तो खादीका दर्शन कीजिए, खादीकी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५०
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||११२सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>शक्तिका दर्शन कीजिए, मैं तो मिट्टीका पुतला हूँ-- सब दोषोंसे भरा हुआ। जिस प्रकार आपको भोजनकी और जल पीने और सोनेकी आवश्यकता होती है उसी प्रकार मुझे भी। जिस प्रकार आपमें दोष और विकार है उसी प्रकार मुझमें भी हैं। तो फिर मेरे दर्शनमें क्या रखा है? दर्शन ईश्वरका कीजिए, निरंजन निराकार परमात्माका कीजिए। उसका दर्शन तो हर स्थलपर हमेशा हुआ ही करता है। उस निराकारका दर्शन मन्दिरमें और शौचालय में भी किया जा सकता है। अपना हृदय उसीके दर्शनसे भरिये। मेरे दर्शनसे क्या लाभ होगा?
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन, '''६-३-१९२७|2em}}
{{c|{{larger|'''१०२.पत्र: च० राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{right|[२१ फरवरी, १९२७ से पूर्व]}}<ref>यह पत्र फ्री प्रेस द्वारा मद्राससे इसी तारीखको प्रसारित किया गया था।</ref>
जल्दीका काम शैतानका। मुझे वहुतसी जगहें जैसे-तैसे निबटा देनेके बजाय थोड़े स्थानों में जाकर वहाँ पूरी तरह कार्य सम्पन्न करने देना ज्यादा ठीक रहेगा। आपको
यह ध्यान में रखना होगा कि मुझे वर्ष-भर लगातार सफर करना पड़ता है। मेरी कार्य-क्षमता और शक्ति सीमित है। इसलिए मुझे तीन बारके भोजनके लिए ४५-
४५ मिनट, स्नानादिके लिए ४५ मिनट, सबेरे-शाम शान्त वातावरणमें सैरके लिए ४५-४५ मिनट अवश्य चाहिए। मुझे रातके ९ बजे अवश्य सो जाना चाहिए। फिर पत्र-व्यवहार और सम्पादन कार्यके लिए तीन घंटे और दिनके समय सोनेके लिए आधे घंटेका समय अवश्य मिलना चाहिए। यदि आप मुझे इतना समय दे सकें तो मुझे लगता है मैं न केवल सफरकी थकानको ही बर्दाश्त कर लूंगा, बल्कि अनिश्चित समयतक अपना कार्यक्रम जारी रख सकूंगा और मेरे स्वास्थ्यमें भी सुधार होगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल, '''२२-२-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
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जल्दीका काम शैतानका। मुझे वहुतसी जगहें जैसे-तैसे निबटा देनेके बजाय थोड़े स्थानों में जाकर वहाँ पूरी तरह कार्य सम्पन्न करने देना ज्यादा ठीक रहेगा। आपको
यह ध्यान में रखना होगा कि मुझे वर्ष-भर लगातार सफर करना पड़ता है। मेरी कार्य-क्षमता और शक्ति सीमित है। इसलिए मुझे तीन बारके भोजनके लिए ४५-
४५ मिनट, स्नानादिके लिए ४५ मिनट, सबेरे-शाम शान्त वातावरणमें सैरके लिए ४५-४५ मिनट अवश्य चाहिए। मुझे रातके ९ बजे अवश्य सो जाना चाहिए। फिर पत्र-व्यवहार और सम्पादन कार्यके लिए तीन घंटे और दिनके समय सोनेके लिए आधे घंटेका समय अवश्य मिलना चाहिए। यदि आप मुझे इतना समय दे सकें तो मुझे लगता है मैं न केवल सफरकी थकानको ही बर्दाश्त कर लूंगा, बल्कि अनिश्चित समयतक अपना कार्यक्रम जारी रख सकूंगा और मेरे स्वास्थ्यमें भी सुधार होगा।
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१०३. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
दुबारा नहीं पढ़ा
{{Right|शोलापुर<br>२१ फरवरी, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
दिल्लीसे लिखा तुम्हारा पत्र मिला। तुमने गुरुकुलोंके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, उसपर मैंने ध्यान दिया है। मुझे रामचन्द्रका पत्र अभी नहीं मिला है। तुम्हारे गुरुकुल जानेका मुझे बिलकुल दुःख नहीं है। गुरुकुलोंको चलानेका प्रयत्न बड़े शुद्ध हृदयसे किया जा रहा है। मैं चाहता हूँ कि तुम इन मामलोंपर रामदेवजी और अन्य लोगोंसे बातचीत करो। जब तुम उनसे प्रेमपूर्वक बात करोगी, तो तुम्हारी बातका उनपर असर पड़ सकेगा। हमें लोगोंको उन्हींके पैमानेसे नापना चाहिए और यह देखना चाहिए कि वे उसपर किस हृदतक पूरे उतरते हैं। तुम्हें इस चेतावनीकी जरूरत नहीं है; लेकिन यह देखकर कि तुमने अपने लिए एक कठोर मापदण्ड बना
लिया है और तुम अजनबी वातावरणमें हो, मुझे यह चिन्ता रहती है कि तुम्हारा सन्तुलन रत्ती भर भी न बिगड़े।
आज मुझपर कामका इतना अधिक भार है कि मैं इससे ज्यादा नहीं लिख सकता।
{{Left|सस्नेह,|2em}}
{{Right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}}
{{Left|[पुनश्च:]}}
सतीश बाबूके सबसे बड़े बेटेका देहावसान हो गया है उन्हें खादी-प्रतिष्ठान, सोदपुर, कलकत्ताके पतेपर पत्र लिखना।
२६ बेलगाँव
५ Brand
६-७ अकोला (मणिलालका विवाह)
८ नम्बई
९-१४ आश्रम
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५२०६ ) से। <br>सौजन्य: मीराबहन|2em}}
३३-८<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१०३. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
दुबारा नहीं पढ़ा
{{Right|शोलापुर<br>२१ फरवरी, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
दिल्लीसे लिखा तुम्हारा पत्र मिला। तुमने गुरुकुलोंके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, उसपर मैंने ध्यान दिया है। मुझे रामचन्द्रका पत्र अभी नहीं मिला है। तुम्हारे गुरुकुल जानेका मुझे बिलकुल दुःख नहीं है। गुरुकुलोंको चलानेका प्रयत्न बड़े शुद्ध हृदयसे किया जा रहा है। मैं चाहता हूँ कि तुम इन मामलोंपर रामदेवजी और अन्य लोगोंसे बातचीत करो। जब तुम उनसे प्रेमपूर्वक बात करोगी, तो तुम्हारी बातका उनपर असर पड़ सकेगा। हमें लोगोंको उन्हींके पैमानेसे नापना चाहिए और यह देखना चाहिए कि वे उसपर किस हृदतक पूरे उतरते हैं। तुम्हें इस चेतावनीकी जरूरत नहीं है; लेकिन यह देखकर कि तुमने अपने लिए एक कठोर मापदण्ड बना
लिया है और तुम अजनबी वातावरणमें हो, मुझे यह चिन्ता रहती है कि तुम्हारा सन्तुलन रत्ती भर भी न बिगड़े।
आज मुझपर कामका इतना अधिक भार है कि मैं इससे ज्यादा नहीं लिख सकता।
{{Left|सस्नेह,|2em}}
{{Right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}}
{{Left|[पुनश्च:]}}
सतीश बाबूके सबसे बड़े बेटेका देहावसान हो गया है उन्हें खादी-प्रतिष्ठान, सोदपुर, कलकत्ताके पतेपर पत्र लिखना।
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
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दुबारा नहीं पढ़ा
{{Right|शोलापुर<br>२१ फरवरी, १९२७}}
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दिल्लीसे लिखा तुम्हारा पत्र मिला। तुमने गुरुकुलोंके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, उसपर मैंने ध्यान दिया है। मुझे रामचन्द्रका पत्र अभी नहीं मिला है। तुम्हारे गुरुकुल जानेका मुझे बिलकुल दुःख नहीं है। गुरुकुलोंको चलानेका प्रयत्न बड़े शुद्ध हृदयसे किया जा रहा है। मैं चाहता हूँ कि तुम इन मामलोंपर रामदेवजी और अन्य लोगोंसे बातचीत करो। जब तुम उनसे प्रेमपूर्वक बात करोगी, तो तुम्हारी बातका उनपर असर पड़ सकेगा। हमें लोगोंको उन्हींके पैमानेसे नापना चाहिए और यह देखना चाहिए कि वे उसपर किस हृदतक पूरे उतरते हैं। तुम्हें इस चेतावनीकी जरूरत नहीं है; लेकिन यह देखकर कि तुमने अपने लिए एक कठोर मापदण्ड बना
लिया है और तुम अजनबी वातावरणमें हो, मुझे यह चिन्ता रहती है कि तुम्हारा सन्तुलन रत्ती भर भी न बिगड़े।
आज मुझपर कामका इतना अधिक भार है कि मैं इससे ज्यादा नहीं लिख सकता।
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{{Left|[पुनश्च:]}}
सतीश बाबूके सबसे बड़े बेटेका देहावसान हो गया है उन्हें खादी-प्रतिष्ठान, सोदपुर, कलकत्ताके पतेपर पत्र लिखना।
२६ बेलगाँव
५ बेलगांव
६-७ अकोला (मणिलालका विवाह)
८ नम्बई
९-१४ आश्रम
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१०५. पत्र: नानाभाई इ० मशरूवालाको'''}}}}
{{Right|सोमवार [२१ फरवरी, १९२७]}}<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref>
{{Left|भाई नानाभाई,}}
आपका पत्र मिला। विवाह [दिनको] १०-३० बजे भले ही हो। शामका समय तो मेरे लिये तनिक भी सुविधाजनक न होगा।
आप मणिलालको कपड़े किसलिए देंगे? वह जो कपड़े पह्नकर आयेगा क्या वे काफी नहीं हैं? फिर भी में आपका जी नहीं दुःखाना चाहता।
चि० सुशीलासे कहना कि उसे पत्र लिखनेकी आदत तो डालनी ही चाहिए। वह लिखने बैठेगी तो लिखनेकी बहुत सारी बातें सूझ जायेंगी।
मैंने पण्डितजीको आनेके लिए लिख दिया है।
बिस्कुट वहाँसे भेजनेकी जरूरत नहीं। रास्तेमें बहुत स्थानोंसे मिल गये हैं।
वहाँ पहुँचनेपर भले ही विजयलक्ष्मी मेरा डिब्बा भरकर दे दे।
क्या उसका विचार अब भी मणिलालको कुछ दिन अपने साथ रखनेका है? यदि वह चाहे तो मणिलालको थोड़े दिन पहले भेज दूंगा। अथवा मणिलाल विवाहके बाद कुछ दिन वहाँ रह लेगा। यात्राका कार्यक्रम तो आपके पास है ही।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२१) से।<br>सौजन्य: सुशीलाबह्न गांधी|2em}}
{{C|{{larger|'''१०६. पत्र: मगनलाल गांधीको'''}}}}
{{Right|सोमवार [२१ फरवरी, १९२७]}}
{{Left|चि० मगनलाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला।
परसरामसे अभी जो काम लिया जा सके सो लेना।
पण्डितजीसे कहना कि उन्हें तैयार रहना है। समय और पैसा बचाने के लिए वे ५ तारीखकी सुबह साबरमतीसे रवाना हों और ताप्ती घाटीवाली गाड़ीसे मुझे जलगाँवमें आ मिलें। मणिलाल भी इसी गाड़ीसे आ सकता है। लेकिन यदि दोनोंको बम्बई होकर आना हो तो वे वैसा कर सकते हैं। क्या-क्या सामग्री तैयार रखनी<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१०५. पत्र: नानाभाई इ० मशरूवालाको'''}}}}
{{Right|सोमवार [२१ फरवरी, १९२७]<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref>}}
{{Left|भाई नानाभाई,}}
आपका पत्र मिला। विवाह [दिनको] १०-३० बजे भले ही हो। शामका समय तो मेरे लिये तनिक भी सुविधाजनक न होगा।
आप मणिलालको कपड़े किसलिए देंगे? वह जो कपड़े पह्नकर आयेगा क्या वे काफी नहीं हैं? फिर भी में आपका जी नहीं दुःखाना चाहता।
चि० सुशीलासे कहना कि उसे पत्र लिखनेकी आदत तो डालनी ही चाहिए। वह लिखने बैठेगी तो लिखनेकी बहुत सारी बातें सूझ जायेंगी।
मैंने पण्डितजीको आनेके लिए लिख दिया है।
बिस्कुट वहाँसे भेजनेकी जरूरत नहीं। रास्तेमें बहुत स्थानोंसे मिल गये हैं।
वहाँ पहुँचनेपर भले ही विजयलक्ष्मी मेरा डिब्बा भरकर दे दे।
क्या उसका विचार अब भी मणिलालको कुछ दिन अपने साथ रखनेका है? यदि वह चाहे तो मणिलालको थोड़े दिन पहले भेज दूंगा। अथवा मणिलाल विवाहके बाद कुछ दिन वहाँ रह लेगा। यात्राका कार्यक्रम तो आपके पास है ही।
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{{C|{{larger|'''१०६. पत्र: मगनलाल गांधीको'''}}}}
{{Right|सोमवार [२१ फरवरी, १९२७]}}
{{Left|चि० मगनलाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला।
परसरामसे अभी जो काम लिया जा सके सो लेना।
पण्डितजीसे कहना कि उन्हें तैयार रहना है। समय और पैसा बचाने के लिए वे ५ तारीखकी सुबह साबरमतीसे रवाना हों और ताप्ती घाटीवाली गाड़ीसे मुझे जलगाँवमें आ मिलें। मणिलाल भी इसी गाड़ीसे आ सकता है। लेकिन यदि दोनोंको बम्बई होकर आना हो तो वे वैसा कर सकते हैं। क्या-क्या सामग्री तैयार रखनी<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
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आपका पत्र मिला। विवाह [दिनको] १०-३० बजे भले ही हो। शामका समय तो मेरे लिये तनिक भी सुविधाजनक न होगा।
आप मणिलालको कपड़े किसलिए देंगे? वह जो कपड़े पह्नकर आयेगा क्या वे काफी नहीं हैं? फिर भी में आपका जी नहीं दुःखाना चाहता।
चि० सुशीलासे कहना कि उसे पत्र लिखनेकी आदत तो डालनी ही चाहिए। वह लिखने बैठेगी तो लिखनेकी बहुत सारी बातें सूझ जायेंगी।
मैंने पण्डितजीको आनेके लिए लिख दिया है।
बिस्कुट वहाँसे भेजनेकी जरूरत नहीं। रास्तेमें बहुत स्थानोंसे मिल गये हैं।
वहाँ पहुँचनेपर भले ही विजयलक्ष्मी मेरा डिब्बा भरकर दे दे।
क्या उसका विचार अब भी मणिलालको कुछ दिन अपने साथ रखनेका है? यदि वह चाहे तो मणिलालको थोड़े दिन पहले भेज दूंगा। अथवा मणिलाल विवाहके बाद कुछ दिन वहाँ रह लेगा। यात्राका कार्यक्रम तो आपके पास है ही।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२१) से।<br>सौजन्य: सुशीलाबह्न गांधी|2em}}
{{C|{{larger|'''१०६. पत्र: मगनलाल गांधीको'''}}}}
{{Right|सोमवार [२१ फरवरी, १९२७]}}
{{Left|चि० मगनलाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला।
परसरामसे अभी जो काम लिया जा सके सो लेना।
पण्डितजीसे कहना कि उन्हें तैयार रहना है। समय और पैसा बचाने के लिए वे ५ तारीखकी सुबह साबरमतीसे रवाना हों और ताप्ती घाटीवाली गाड़ीसे मुझे जलगाँवमें आ मिलें। मणिलाल भी इसी गाड़ीसे आ सकता है। लेकिन यदि दोनोंको बम्बई होकर आना हो तो वे वैसा कर सकते हैं। क्या-क्या सामग्री तैयार रखनी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५४
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|११६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>चाहिए यह पण्डितजी नानाभाईको लिख दें। विवाह विधि रविवारको सुबह साढ़े दस बजे सम्पन्न की जायेगी
मुझे यह भ्रम रहा कि गणेशका अंग्रेजी नाम जॉन है। और चूँकि मैं गणेश नाम भूल गया था इसलिए मैंने जॉन लिख दिया। अब में गणेश नामसे नया पत्र लिख रहा हूँ। उसे यह दे देना। और यदि उसका स्वभाव ऐसा हो कि वह इस विनोदको और अपने नामके विस्मरणको सहन कर सके तो उसे जॉनके नामवाला पत्र भी दे देना। अन्यथा उसे फाड़ देना।
रुखीके बारेमें अब मुझे चिन्ता करनेकी कोई जरूरत नहीं है।
मुझे लगता है कि जो लोग संयुक्त रसोईसे अलग होना चाहें वे अलग भले ही हो जायें; लेकिन वह बन्द नहीं की जानी चाहिए। वैयक्तिक रसोई और संयुक्त रसोई, दोनों साथ-साथ चलनी चाहिए।
चर्मालय और 'लिफ्ट'में कमसे कम जितना पैसा लगाना होगा उतना तो हम अवश्य लगायेंगे। चर्मालयके लिए गोरक्षा-निधिका उपयोग करना है। मुझे याद है कि इस सम्बन्धमें वर्षामें एक प्रस्ताव पास किया गया था। यदि न किया गया हो तो ११ तारीखकी बैठकमें करेंगे। जिसमें नुकसान होने की भी कोई सम्भावना नहीं है, वह काम तो हमें करना ही है।
हम 'लिफ्ट'के लिए भी आवश्यक धन जुटा ही लेंगे। लेकिन में जब ९ तारीख को वहाँ पहुँचूँगा तब इसका कोई हल ढूंढ लूंगा।
मीराबाईका पैसा तो नियमपूर्वक आता ही है। उस सारे धनका उपयोग अब आश्रमके निमित्त करना है। उसकी एक वर्षकी अवधि पूरी हो गई; इसलिए अब उसका उपयोग करनेमें कोई आपत्ति नहीं है। सिर्फ इतना याद रखना कि हिसाब की अथवा किसी अन्य प्रकारकी असावधानीसे नुकसान न हो।
क्या अब तुममें इतनी क्षमता आ गई है कि लोग जितने 'लिफ्ट' मँगवायें उतने भेज सकते हो और उन्हें वहाँ इस तरह लगा भी दे सकते हो कि वे काम देने लगें। मैंने इसके विषयमें जानबूझकर ही कुछ नहीं छापा है। यदि छापना ही हो तो मुझे लिखना ताकि मैं आगामी अंकके लिए लेख लिख सकूं। क्या कुछ कहा जा सकता है, सो बताना। लिफ्ट चलानेके लिए तुम्हारे पास लोग तैयार हैं? प्रत्येकके पास कमसे कम कितना तगड़ा पशु हो, यह भी लिखना चाहिए न? क्या बूढ़ी भैंसका उपयोग नहीं किया जा सकता? क्या स्वस्थ और सधा हुआ बैल काममें नहीं लाया जा सकता? हमारे अनुमानमें कहीं भूल नहीं होनी चाहिए। मुझे भय है कि प्रत्येक स्थानपर हमें पर्याप्त समयतक अपना प्रशिक्षित आदमी रखना पड़ेगा। लेकिन यदि इन सब बातोंपर तुमने विचार कर लिया हो तो इतना बहुत है।
यही बात चमड़े के कामके बारेमें भी है। चमड़े के कामके बारेमें मुझे पत्रिका भेजना। मैं उसे देखकर प्रकाशित करूँगा।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/५४
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१५. भाषण: मुजफ्फरपुरके विद्यार्थियों को सभामें'''<ref>यह सभा शामके ६ बजे टाउन हॉलमें हुई थी।</ref>}}}}
{{Right|२५ जनवरी, १९२७}}
गांधीजीने कहा कि मुझसे जब मुजफ्फरपुरमें विद्यार्थियोंकी एक सभामें भाषण देने को कहा गया तो मैं किसी भी अन्य प्रलोभनके बिना राजी हो गया; क्योंकि मुझे याद है कि जब में अपना चम्पारनका कार्य शुरू करने आया था तो पहले दिन मुजफ्फरपुर के विद्यार्थियोंने ही मुझे आश्रय दिया था। वह घटना, मैं भुला नहीं सकता। और यहाँके विद्यार्थियोंके समक्ष भाषण देनेका सुअवसर मैंने तत्काल यह सोचकर
स्वीकार कर लिया कि इस समय जब मुझे भारतके विद्यार्थी समुदायसे बहुत ज्यादा मददकी जरूरत है, यहाँके विद्यार्थी शायद मुझे मदद पहुँचायेंगे। उन्होंने कहा कि आप मुझे १९२० की याद दिला देते हैं। निश्चय ही वे बड़े शानदार दिन थे, निश्चय ही उन दिनों देशमें राष्ट्रीय चेतनाका जो प्रखर उभार दिखाई देता था वह अब दब गया है, लेकिन उस आन्दोलनका असर अब भी बाकी है। यदि आप उस जोशके उभारको बनाये नहीं रख सके हैं, तो केवल आप ही उसके लिए दोषी नहीं हैं। स्वाभाविक ही है कि मैं देशकी बदली हुई परिस्थितियों में आप लोगोंसे वही काम करनेको नहीं कहूँगा; पर मैंने तब स्वतंत्रता संघर्षका जो रास्ता सुझाया था, वही अब भी भारतीयों द्वारा अपनाने योग्य सर्वोत्तम रास्ता है। यदि आप उस रास्तेपर बहुत लम्बे समयतक नहीं चल सके, तो उसके लिए शर्मिन्दा होने की जरूरत नहीं है। मुझे इस बातपर आश्चर्य नहीं है कि आप आगे कूच करते हुए रुक क्यों गये, बल्कि देशकी हालत देखते हुए मुझे इस बातपर आश्चर्य होता है कि उन दिनों आप इतना आगे बढ़ ही कैसे सके थे। जो कार्यक्रम मैंने बताया था, यदि वह अमलमें लाया जा सकता तो सफलता मिलनेमें सन्देह ही नहीं था, लेकिन अब में तबतक उस कार्यक्रमके अनुसार काम करनेके लिए आपसे नहीं कहूँगा जबतक कि उसके लिए उपयुक्त अवसर नहीं आ जाता। लेकिन इस बीच मुझे आपसे एक काम करनेको कहना है और वह है खद्दरका काम। बड़े-छोटे, अमीर-गरीब, विद्वान-मूर्ख, विद्यार्थी या सरकारी कर्मचारी सभी लोग आसानीसे इस काममें जुटकर इसे सफल बना सकते हैं। विद्यार्थी समुदाय इस कामके लिए विशेष रूपसे उपयुक्त है। पंडित मालवीयने हिन्दू विश्वविद्यालयमें दृष्टांत प्रस्तुत करके आपका मार्गदर्शन कर दिया है। कल ही हिन्दू विश्वविद्यालयके विद्यार्थियोंने मुझे एक हजार रुपयेकी थैली भेंट की है। आपने जो थैली भेंट की है वह मुजफ्फरपुर के विद्यार्थियोंकी संख्याको देखते<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६५१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{c|{{larger|'''सांकेतिका'''}}}}
{{Multicol}}
{{outdent|[ईश्वर], २८१, ५९७; -के नामपर देवदासी प्रथा, ५७४-५; -गुणातीत, १७३; - दरिद्रनारायण के रूपमें, ४२५-६; - पूर्णतः सत्स्वरूप, ९७; -महाजीवके रूपमें, ९८; - में आस्थाकी आवश्यकता, ४३२}}
{{outdent|ईसाई, १०९, १६५, २१६, २५९, २८१, ३३०, ३६६, ३६८, ४११, ४४०, ४५१, ४९४, ५०२, ५४९, ५५५; - [ इयों ] के प्रति गांधीजी नरम क्यों हैं, ५८२}}
{{outdent|ईसाई धर्म, २८२-३, ५४९; -और पाश्चात्य तौर-तरीके, १७४; -को यूरोपीय रंगमें रँग देना, २८१-२; - ही एकमात्र सत्य नहीं है, २८३}}
{{outdent|ईसाई मिशनरी, ८२; -और धर्म-परिवर्तन, १३०; -और बाइबिल, ११; - [रियों ] को सलाह, १७४, २८०-३}}
{{outdent|ईसा मसीह, ११, २५९, २८१-३, ४६८; - अगर शिकागो आयें, ५८}}
{{outdent|उत्तम, भिक्खु, १९७}}
{{outdent|उत्तमचन्द, २१०, ४०९}}
{{outdent|उद्योग; -को संरक्षण, २४३}}
{{outdent|उद्योगवाद, ३६७}}
{{outdent|उपवास; -आत्म-दण्डके रूपमें, ४२-३; -आत्मशुद्धिके लिए, ४२४; - प्रायश्चित्त-के रूपमें, २-३}}
{{outdent|उर्दू, १८०; - देवनागरी लिपिमें, ६६}}
{{outdent|उर्मिलादेवी, १२८}}
{{outdent|एकता; - अनेकतामें, ३४३}}
{{outdent|एडगर, लिलियन, १२४}}
{{outdent|एडीसन, ३४५-६}}
{{outdent|एन्डर्सन, ५०१}}
{{multicol-break}}
{{outdent|एन्ड्रयूज, सी० एफ०, ३१, १०, ११४, १८५, १९४, २८२, २९०, ३२६, ३३८, ३४१, ३६३, ३७४, ३७६, ४३६, ४५४, ४५५-६, ४७२, ४७९}}
{{outdent|एलोपैथी, बनाम आयुर्वेद, २१२}}
{{outdent|एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया, ९३ पा० टि०, ४५५ पा० टि०, ४५७ पा० टि०}}
{{outdent|एस्क्विथ, ३९}}
{{outdent|औदार्य, १}}
{{outdent|कताई, ६१, ७२, ९१, १०१, १२४, १६६, १९०, १९४, २१७, २२५, २५६, ३०२, ३३२, ३४९, ३५१, ३५९, ३६६, ३८३, ३९८, ४६०, ४६४, ४७६, ५२७, ५३३; - ऊनकी, २६५, ३५३-४; -का महत्त्व, ४७१; - के बारेमें सुझाव, १२४-५; -पर निबन्ध, १०८; - बेरोजगारीको दूर करनेके लिए, १०९; - मैसूर में, २३९, ४५०; -यज्ञ, १०३-४; -यज्ञ सेवा है, ३५५, ४०६, ४११, ४३३-४, ४९६-७; -स्कूलोंमें, ४०७-८; देखिए चरखा भी}}
{{outdent|कबीर, ३९१}}
{{outdent|करेंट थॉट, ३७६}}
{{outdent|कर्त्तव्य, ६९, ७४; - और अधिकार, ४४७; - का पालन, ३८४, ३८८; -जब आत्म-हत्या करनी ही हो, ४७८; -मजदूरों-का, २०२; -यज्ञका, ४४४}}
{{outdent|कला; - सच्ची और क्षणजीवी, ३४८-९}}
{{outdent|कलानी, टी० डब्ल्यू०, ४०३}}
{{outdent|कविवर, देखिए ठाकुर, रवीन्द्रनाथ}}
{{outdent|कांग्रेस, देखिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस}}
{{outdent|काकी, देखिए कालेलकर, श्रीमती द० बा०}}
{{outdent|काकोरी; -के निकट सशस्त्र डकैती, ५७१ पा० टि०}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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Avantika Shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|काजी, ए० आई०, १९५, ३७५}}
{{outdent|काटजू, कैलाशनाथ, ४७०}}
{{outdent|कानिटकर, २७७}}
{{outdent|कान्तिलाल, २८९, २९३, २९८}}
{{outdent|काफी पीना, ५२५}}
{{outdent|कायरता; -अहिंसा नहीं है, ५५९}}
{{outdent|कारन्त, के० एस०, २०८-९}}
{{outdent|काले, प्रोफेसर, २९५}}
{{outdent|कालेलकर, द० बा०, ७३, ७४, ११२, १५७, १५८, १५९, २१०, २३८, २७३, ३०७, ३०८, ३२०, ३२५, ३३०, ३३७, ३७५, ४१४, ४१६, ४८६, ५७७; -का संन्यास ले लेना, ३६४-६}}
{{outdent|कालेलकर, बाल, ७४, ३६४, ४७४}}
{{outdent|कालेलकर, श्रीमती द० बा०, ७३, ३६५}}
{{outdent|काशीबहन, ५६८}}
{{outdent|किर्कनेस, विलियम, ३०२}}
{{outdent|किशोरलाल, ७४, २६२}}
{{outdent|कीकी बहन, १५५}}
{{outdent|कुंटे, गंगाबाई, ३५२}}
{{outdent|कुरान, ९७, १६६, १८१, १८४, २१६, ३९०, ३९१, ४२८, ४९६; - खुदाका कलाम, ५९७-८}}
{{outdent|कुलन्दाई, डी०, ५०७, ५१०, ५११, ५१२, ५१५-६}}
{{outdent|कुवलयानन्द, १८, ७७, २४६, ४१९}}
{{outdent|केलकर, डॉ० एम० एस०, १२, १९, ७१, २१०}}
{{outdent|केलप्पन, ६५}}
{{outdent|केलॉग, डॉ०, की आहार सम्बन्धी पुस्तक, १५-६}}
{{outdent|केशवदास, ४१०}}
{{outdent|केशू, ७०, ११९}}
{{outdent|कैप्टेन, नरगिस, १९८, २६९}}
{{outdent|कृपलानी, जे० बी०, १४८, १५४, २०४}}
{{outdent|कृष्ण (भगवान्), ३६, १८१, ३९७, ४१०-१}}
{{multicol-break}}
{{outdent|कृष्णदास, ५६, १२४, २२०, २९५, ३५७, ३५९, ३७८, ४२२, ४५६, ४९८}}
{{outdent|कृष्णा (हठीसिंह), २२१}}
{{outdent|कोजलगी, एस० वी०, २३४, २७१}}
{{outdent|कोठारी, छोटालाल, ३३१}}
{{outdent|कोठारी, डॉ० ए० पी०, ३५२}}
{{outdent|कोठारी, मणिलाल, २८८}}
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{{outdent|क्षितीश बाबू, २१३, ३२४}}
{{C|(ख)}}
{{outdent|खड़कसिंह, सरदार, ५}}
{{outdent|खरे, ना० मो०, ५७८}}
{{outdent|खाँ, हकीम अजमल, ३३४}}
{{outdent|खादी (खद्दर), ६, १५, ३३, ३७, ४०, ५५, ५९, ७४, ७८, ८०, ८८, १०७, १०९, ११०-१, ११४, १२४-५, १२८, १३४-५, १४४, १४९-५०, १५८, १६५, १६८, १८३, १८८, १९१-२, २००, २०२, २१३, २२५, २३३-४, २३९, २५६, २६७, २६९, २७१, २८६, २९५, २९९, ३०७, ३१९, ३२३, ३३८, ३५१, ३५९, ३९९-४००, ४१९, ४२६, ४३३, ४४६, ४४८, ४५०-१, ४५८, ४६०, ४६२-४, ४७०-१, ४७६, ४८०-३, ४८८, ४९४, ५२१, ५२६-७, ५३४, ५३६, ५३९, ५४६, ५५६, ५९८; - अपने भाइयोंको गरीबीसे बचाने के लिए, ५८३; - और अस्पृश्यता, ५६१; - और फैशनपरस्तोंका पहनावा, ८५; -और महिलाएँ, ५३९-४०; - और मिल उद्योग, ५१-२; - और व्यवसायी, ५३७; -और स्वदेशी, २७-८; - का उपयोग कैसे किया जाये, ५७६; - का महत्त्व, ९३, १४५-७, १६७-८, २१७, ३६६, ४८८-९२, ५२१-२; -का राजनीतिक महत्त्व, ८४-५}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|-की चूड़ियाँ, ४२; -की भावना, ५६४; - कोष, २५४-५, २६७, ५३४-५, ५४८; - कोष में चन्दा देनेपर मद्रास सरकारका प्रतिबन्ध, १३३-५; - गांधीके लिए नहीं, १०७-८; -द्वारा गरीबोंसे सम्बन्ध, ५९९; - नकली, मिलोंकी बनी, ३५३; -प्रदर्शनी, बंगलोर में, ८४-६, ९४, १०६-७, ११९, १४५-८, १६३, १७४, ४३३; -पहनना, सरकारी कर्मचारियोंको, १३४; - बेरोजगारोंकी आजीविकाका साधन, ५७६; -मिलोंकी, २७६; - सेवकके गुण, १३४; - सेवाका प्रतीक, २५९}}
{{outdent|खान, एम० एफ०, ३७९}}
{{outdent|खिलाफत, २; -कोष, २५४}}
{{outdent|खुर्शीद, २४६}}
{{outdent|गंगाबहन, ७३, २१०, ४१६}}
{{outdent|गंगाराम, सर, २२७, २५०}}
{{outdent|गंगू, १, ७३, ११२, १६९, २०३, ४१२}}
{{outdent|गणेशन्, एस०, ३७६-७, ४२२}}
{{outdent|गन, डॉ० जॉन, ३०२}}
{{outdent|गनी, एम० अब्दुल, ३५५}}
{{outdent|गरीबी, ४८९-९१; -भारतमें, २५८, ३८१, ४६२, ४९०-१, ५२१-२, ५४०, ५५२}}
{{outdent|गांधी, कस्तुरबा, ११९, १४२, ३७५, ४१६, ४३५, ५३६ पा० टि०}}
{{outdent|गांधी, कान्ति, २०, २११}}
{{outdent|गांधी, काशी, ४१५}}
{{outdent|गांधी, जेठालाल, २१५}}
{{outdent|गांधी, देवदास, ४६, २९१, ३७५, ३८२, ४७७}}
{{outdent|गांधी, मगनलाल, १, १५, ११९, २३५, ३०४, ३८८, ४१४, ४१८, ४५५, ४७८}}
{{multicol-break}}
{{outdent|गांधी, मणिलाल, ९, ३४, ४५, ११८-९, १९५, ३७६, ३८१, ४४३}}
{{outdent|गांधी, मोहनदास करमचन्द का तमिलनाडके दौरेका कार्यक्रम, ४३६; -का लेख मिस मेयोकी पुस्तक मदर इंडिया-पर, ५८४-९४; -की गुजरात बाढ़-सहायता कार्यके लिए चन्देकी अपील, ३०४-५, ३३०-१}}
{{outdent|गांधी, रामदास, ३५, ४६, २५३, २९१, ३२४, ३६१, ३८२, ३८९, ४१४}}
{{outdent|गांधी शिक्षणमाला, २७७}}
{{outdent|गांधी, सुशीला, ३४, ४५ पा० टि०, ११८, ११९, ३८१, ४४३}}
{{outdent|गांधी, हरिलाल, २०-१}}
{{outdent|गाँव; - [व] की सेवा आवश्यक, १६७-८, ४६३; -में गरीबी, ४८९-९१; - में सरकारी योजना, मवेशियोंकी दशामें सुधार के लिए, ३०३-४}}
{{outdent|गाइड टु हेल्थ, ४०६}}
{{outdent|गिरिराजकिशोर, १२१}}
{{outdent|गीतांजलि, १८०}}
{{outdent|गुजरात में बाढ़, देखिए बाढ़}}
{{outdent|गुलजार मुहम्मद अकील, ३२१, ४७२}}
{{outdent|गुलाबबाई, ४४२}}
{{outdent|गोखले, गोपाल कृष्ण, ८१, ८६ पा० टि०, ८८, २४४, ४९५}}
{{outdent|गोखले, लक्ष्मीबाई, ३५२}}
{{outdent|गोपालाचार, बी०, ४०७}}
{{outdent|गोरक्षा, ८०, १४०, १९१, ३६६, ३६८, ५३७; -और पिंजरापोल, १७५-८; -और मुसलमान, ६३, १३१, २२७, ३६७; -और हिन्दू धर्म, २४९; -कानून द्वारा, १३०-२, २२७; -सरकारी प्रयत्न द्वारा, ४५१}}
{{outdent|गोरख, ३४}}
{{outdent|ग्रन्थ साहब, १८४}}
{{outdent|ग्रेग, आर० बी०, १५, २९७}}
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{{outdent|-की चूड़ियाँ, ४२; -की भावना, ५६४; - कोष, २५४-५, २६७, ५३४-५, ५४८; - कोष में चन्दा देनेपर मद्रास सरकारका प्रतिबन्ध, १३३-५; - गांधीके लिए नहीं, १०७-८; -द्वारा गरीबोंसे सम्बन्ध, ५९९; - नकली, मिलोंकी बनी, ३५३; -प्रदर्शनी, बंगलोर में, ८४-६, ९४, १०६-७, ११९, १४५-८, १६३, १७४, ४३३; -पहनना, सरकारी कर्मचारियोंको, १३४; - बेरोजगारोंकी आजीविकाका साधन, ५७६; -मिलोंकी, २७६; - सेवकके गुण, १३४; - सेवाका प्रतीक, २५९}}
{{outdent|खान, एम० एफ०, ३७९}}
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{{outdent|गोरक्षा, ८०, १४०, १९१, ३६६, ३६८, ५३७; -और पिंजरापोल, १७५-८; -और मुसलमान, ६३, १३१, २२७, ३६७; -और हिन्दू धर्म, २४९; -कानून द्वारा, १३०-२, २२७; -सरकारी प्रयत्न द्वारा, ४५१}}
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घ
घरे, अन्नपूर्णाबाई, ३५५
घोष, प्रफुल्लचन्द्र, १०९
चन्दावरकर, २०१
चन्दूलाल, ३९३
च
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
चन्दूलाल, डॉ०, २३८, ३०५, ३९३
चन्द्रशंकर, ४१६
चक्रवर्ती, के० टी०, २४४
चटर्जी, जोगेन्द्र, ३५२
चट्टोपाध्याय, हरीन्द्रनाथ, ३२, ५९, ९१
चतुर्वेदी, बनारसीदास, ७६
चरखा, ५४, ६१, ८९-९०, १०१, ११०-१,
१७४, १९०,
१३५, १५८, १६६,
२००, २१७, २२५, २२८, २३९,
२५८-९, २८७, ३५०, ३९८, ४००,
४०६, ४२६, ४६०, ४६२, ४६७,
४९६, ५२१, ५२७, ५३३, ५३५,
५५३, ५६८, ५९८-९, ६०० -एक
यज्ञ, १०३-४, ३५५, ३७०, ४४५;
-और अहिंसा, ५४५; - गरीबीसे
लड़नेके लिए, ५२०-३; - महायज्ञ,
९९ - मैसूर रियासत में, ४५०;
- [खे] का महत्त्व, १०, ४८८-१२,
५८३; -का विज्ञान, ५६९; -का
संगीत, २४०
चाँद, (विजयलक्ष्मी पंडितकी पहली पुत्री),
९४
चाय पीना, ५२५
चालु, पी० के०, ६०
चिकित्सा पद्धति; -आयुर्वेदिक और एलो-
पेथी, २११-२; के रूपमें प्राकृतिक
चिकित्सा, देखिए प्राकृतिक चिकित्सा
चित्तरंजन सेवा सदन के लिए धनकी
अपील, ८३
चीन द्वारा अपनी स्वतन्त्रताके लिए
लड़ाई, ३०१
चुंगी निकाय ( टैरिफ बोर्ड ) ; की रिपोर्ट,
५०-१
चेखव, एंटन, ३४७
चेट्टियर, टी० आदिनारायण, ८९
चेट्टी, आर० के० षन्मुगम, ३३५
चेट्टी, चेंगिया, २५४
चैतन्य, ३६४
चोकसी, नाजुकलाल नन्दलाल, ७५, १६०,
२३८
छोटालालजी, ४०
छ
छोटूराम, ४६ पा० टि०
ज
जगमोहन, डाह्याभाई, ७९
जनक, २१३
जन्मभूमि, ६७ पा० टि०
जमनादास, ४१३
जमनाप्रसाद, २२४
जमनाबहन, ११९, १९८, २६९-७०
जयन्ती, ३६०
जयरामदास दौलतराम, १२३, २४३
जलबाला [ पोत ]; -का जलावतरण, ३०२
जलियाँवाला बाग; -में जनरल डायरका
कृत्य, और उनका लकवेसे पीड़ित
होना, २४५
जॉन, सेंट, २८०
जादू, ७१
जादू टोना; -से दूर ही रहना चाहिए, १२
जापान; की भौतिक प्रगति, १०
जामिनी बाबू, ४७०
जिन्ना, १४ पा० टि०, २२१
जीव; - मात्र में सादृश्य, १३८; -संसारके,
और मनुष्य, १३९
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{{outdent|ठक्कर, रणछोड़लाल, अमृतलाल, २६५ पा० टि०}}
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{{outdent|तथाचारी, १०६}}
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{{outdent|तुलसीदास, १७३, ३६०, ५३१, ५९४}}
{{outdent|तैयबजी, अब्बास, ३७}}
{{outdent|तैयबजी, रेहाना, ३०, ३८, १६०, २४३}}
{{outdent|त्रिदेव, ३७०}}
{{outdent|त्रिपाठी, गोवर्धनराम माधवराम, ४१६}}
{{outdent|त्रिवेदी, प्रोफेसर, ५७०}}
{{c|थ}}
{{outdent|थडानी, एन० वी०, ६८, १४८, १५४, २०६, २४१ पा० टि०, २४३}}
{{c|द}}
{{outdent|दक्षिण आफ्रिका, ३८, १६२, २००, २८२-८३; -के भारतीय अधिवासी, ३३८-९, ४७३-४}}
{{outdent|दयानन्द, ३६४, ४७५}}
{{outdent|दरिद्रनारायण - और चरखा, ५२०-३, ५५३; -का अर्थ, १९१-२}}
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{{outdent|दलित वर्ग; और पिछड़े वर्ग में अन्तर ३९७, देखिए अस्पृश्य भी}}
{{outdent|दयालजीभाई, शिवजी, ३५२}}
{{outdent|दास, गोपबन्धु, २३}}
{{outdent|दास, चि० रं०, ८८, १०८, १२८, २१६, २३१, ४२५; के बारेमें भाषण, ५४०-४}}
{{outdent|दुध, ३४५}}
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शिखर तिवारी
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|
|-
|६४. || पत्र : जामिनीभूषण मित्रको (२८-६-१९२७) || ७२
|-
|६५. || पत्र : द० वा० कालेलकरको (२८-६-१९२७) || ७३
|-
|६६. || पत्र : सुरेन्द्रको (२८-६-१९२७) || ७४
|-
|६७. || पत्र : नाजुकलाल नन्दलाल चोकसीको (२८-६-१९२७) || ७५
|-
|६८. || पत्र : राजकिशोरी मेहरोत्राको (२८-६-१९२७) || ७६
|-
|६९. || पत्र : बनारसीदास चतुर्वेदीको (२८-६-१९२७) || ७६
|-
|७०. || पत्र : कुवलयानन्दको (२९-६-१९२७) || ७७
|-
|७१. || पत्र : अलवीको (२९-६-१९२७) || ७८
|-
|७२. || पत्र: जगमोहन डाह्याभाईको (२९-६-१९२७) || ७९
|-
|७३. || पत्र: फूलचन्द शाहको (२९-६-१९२७) || ८०
|-
|७४. || हमारा कलंक (३०-६-१९२७) || ८०
|-
|७५. || चित्तरंजन सेवा सदन (३०-६-१९२७) || ८३
|-
|७६. || बंगलोर खादी-प्रदर्शनी (३०-६-१९२७) || ८४
|-
|७७. || टिप्पणी: उनकी स्मृतिके प्रति न्याय करनेके लिए (३०-६-१९२७) || ८६
|-
|७८. || काशी विद्यापीठ (३०-६-१९२७) || ८८
|-
|७९. || सन्देश : 'फॉरवर्ड' को (३०-६-१९२७) || ८८
|-
|८०. || पत्र : पी० आर० सुब्रह्मण्य शास्त्रीको (३०-६-१९२७) || ८९
|-
|८१. || पत्र : टी० आदिनारायण चेट्टियारको (१-७-१९२७) || ८९
|-
|८२. || पत्र: सरोजिनी नायडूको (१-७-१९२७) || ९०
|-
|९२. || पत्र: विलियम स्मिथको (३-७-१९२७) || ९१
|-
|८३. || पत्र: हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्यायको (१-७-१९२७) || ९२
|-
|८४. || पत्र: जे० डब्ल्यू० पेटावेलको (१-७-१९२७) || ९२
|-
|८५. || पत्र: बी० एफ० भरूचाको (२-७-१९२७ के पूर्व) || ९३
|-
|८६. || सन्देश: दक्षिण भारतके लोगोंको (२-७-१९२७) || ९४
|-
|८७. || पत्र: मोतीलाल नेहरूको (२-७-१९२७) || ९५
|-
|८८. || पत्र: वसुमती पण्डितको (२-७-१९२७) || ९५
|-
|८९. || पत्र: सन्तोजी महाराजको (२-७-१९२७) || १००
|-
|९०. || निष्कलंक मजदूरी (३-७-१९२७) || १०१
|-
|९१. || एक विद्यार्थीकी परेशानी (३-७-१९२७) || १०६
|-
|९३. || भाषण: बंगलोरकी खादी-प्रदर्शनीके उद्घाटनके अवसरपर
(३-७-१९२७) || १०६
|-
|९४. || पत्र: मीराबहनको (४-७-१९२७) || ११२
|-
|९५. || पत्र: मीराबहनको (४-७-१९२७) || ११३
|-
|९६. || पत्र: आश्रमकी बहनोंको (४-७-१९२७) || ११४
|-
|९७. || पत्र: जे० बी० पेटिटको (५-७-१९२७) || ११४
|-
|९८. || पत्र: जोशीको (५-७-१९२७) || ११६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/२६
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शिखर तिवारी
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|
|-
९९. पत्र : के० एस० नटराजन्को (५-७-१९२७) ११६
१००. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको ( ५-७-१९२७) ११७
१०१. पत्र: मणिलाल और सुशीला गांधीको (५-७-१९२७) ११८
१०२. पत्र : मीराबहनको (६-७-१९२७) १२०
१०३. पत्र : ए० फेनर ब्रॉकवेको (६-७-१९२७) १२०
१०४. पत्र : गिरिराजकिशोरको (६-७-१९२७) १२१
१०५. पत्र : जयरामदास दौलतरामको (६-७-१९२७) १२३
१०६. पत्र : लिलियन एडगरको (६-७-१९२७) १२४
१०७. पत्र : हिन्दी साहित्य सम्मेलनके मन्त्रीको (६-७-१९२७) १२६
१०८. एक पत्र (७-७-१९२७ के पूर्व) १२७
१०९. टिप्पणियाँ: दार्जिलिंग में देशबन्धु-दिवस; आदि कर्नाटक (७-७-१९२७) १२८
११०. मैसूरमें गोरक्षा (७-७-१९२७) १३०
१११. राजनीतिक संगठन क्या है? (७-७-१९२७) १३३
११२. पिंजरापोलोंके समक्ष उपस्थित काम (७-७-१९२७ ) १३५
११३. युगों पुरानी समस्या (७-७-१९२७) १३७
११४. पत्र : बी० एफ० भरूचाको (७-७-१९२७ के पश्चात्) १४०
११५. भाषण : आदि कर्नाटक विद्यार्थियों के समक्ष (८-७-१९२७ के पूर्व) १४३
११६. पत्र : मीराबहनको (८-७-१९२७ ) १४४
११७. भाषण: बंगलोर खादी-प्रदर्शनी के समापन के अवसरपर (८-७-१९२७) १४५
११८. पत्र : मीराबहनको (९-७-१९२७) १४७
११९. पत्र : एन० आर० मलकानीको (९-७-१९२७) १४८
१२०. भाषण : एमेच्योर ड्रमैटिक एसोसिएशन, मैसूरमें (९-७-१९२७) १४९
१२१. दो तुलाएँ (१०-७-१९२७) १५०
१२२. एक पत्र (१०-७-१९२७) १५२
१२३. पत्र : जे० बी० कृपलानीको (१०-७-१९२७) १५४
१२४. भाषण : अखिल कर्नाटक हिन्दी सम्मेलन, बंगलोर में (१०-७-१९२७) १५५
१२५. पत्र : मीराबहनको (१०-७-१९२७) १५६
१२६. पत्र : मीराबहनको (११-७-१९२७) १५७
१२७. पत्र : गोपालरावको (११-७-१९२७) १५७
१२८. पत्र : नाजुकलाल न० चौकसीको (११-७-१९२७) १६०
१२९. पत्र : रेहाना तैयबजीको (१२-७-१९२७) १६०
१३०. पत्र : जे० डब्ल्यू० पेटावेलको (१२-७-१९२७) १६२
१३१. पत्र : आश्रमकी बहनोंको (१२-७-१९२७) १६३
१३२. भाषण : मैसूरके विद्यार्थियोंके समक्ष, बंगलोर में ( १२-७-१९२७) १६४
१३३. भाषण: इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइन्समें (१२-७-१९२७) १६६
१३४. सन्देश: 'सर्चलाइट' को (१३-७-१९२७) १६८<noinclude></noinclude>
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शिखर तिवारी
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|
|-
|९९. || पत्र: के० एस० नटराजन्को (५-७-१९२७) || ११६
|-
|१००. || पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको (५-७-१९२७) || ११७
|-
|१०१. || पत्र: मणिलाल और सुशीला गांधीको (५-७-१९२७) || ११८
|-
|१०२. || पत्र: मीराबहनको (६-७-१९२७) || १२०
|-
|१०३. || पत्र: ए० फेनर ब्रॉकवेको (६-७-१९२७) || १२०
|-
|१०४. || पत्र: गिरिराजकिशोरको (६-७-१९२७) || १२१
|-
|१०५. || पत्र: जयरामदास दौलतरामको (६-७-१९२७) || १२३
|-
|१०६. || पत्र: लिलियन एडगरको (६-७-१९२७) || १२४
|-
|१०७. || पत्र: हिन्दी साहित्य सम्मेलनके मन्त्रीको (६-७-१९२७) || १२६
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|१०८. || एक पत्र (७-७-१९२७ के पूर्व) || १२७
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|१०९. || टिप्पणियाँ: दार्जिलिंग में देशबन्धु-दिवस; आदि कर्नाटक (७-७-१९२७) || १२८
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|११०. || मैसूरमें गोरक्षा (७-७-१९२७) || १३०
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|१११. || राजनीतिक संगठन क्या है? (७-७-१९२७) || १३३
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|११२. || पिंजरापोलोंके समक्ष उपस्थित काम (७-७-१९२७) || १३५
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|११३. || युगों पुरानी समस्या (७-७-१९२७) || १३७
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|११४. || पत्र: बी० एफ० भरूचाको (७-७-१९२७ के पश्चात्) || १४०
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|११५. || भाषण: आदि कर्नाटक विद्यार्थियों के समक्ष (८-७-१९२७ के पूर्व) || १४३
|-
|११६. || पत्र: मीराबहनको (८-७-१९२७) || १४४
|-
|११७. || भाषण: बंगलोर खादी-प्रदर्शनी के समापन के अवसरपर (८-७-१९२७) || १४५
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|११८. || पत्र: मीराबहनको (९-७-१९२७) || १४७
|-
|११९. || पत्र: एन० आर० मलकानीको (९-७-१९२७) || १४८
|-
|१२०. || भाषण: एमेच्योर ड्रमैटिक एसोसिएशन, मैसूरमें (९-७-१९२७) || १४९
|-
|१२१. || दो तुलाएँ (१०-७-१९२७) || १५०
|-
|१२२. || एक पत्र (१०-७-१९२७) || १५२
|-
|१२३. || पत्र: जे० बी० कृपलानीको (१०-७-१९२७) || १५४
|-
|१२४. || भाषण: अखिल कर्नाटक हिन्दी सम्मेलन, बंगलोर में (१०-७-१९२७) || १५५
|-
|१२५. || पत्र: मीराबहनको (१०-७-१९२७) || १५६
|-
|१२६. || पत्र: मीराबहनको (११-७-१९२७) || १५७
|-
|१२७. || पत्र: गोपालरावको (११-७-१९२७) || १५७
|-
|१२८. || पत्र: नाजुकलाल न० चौकसीको (११-७-१९२७) || १६०
|-
|१२९. || पत्र: रेहाना तैयबजीको (१२-७-१९२७) || १६०
|-
|१३०. || पत्र: जे० डब्ल्यू० पेटावेलको (१२-७-१९२७) || १६२
|-
|१३१. || पत्र: आश्रमकी बहनोंको (१२-७-१९२७) || १६३
|-
|१३२. || भाषण: मैसूरके विद्यार्थियोंके समक्ष, बंगलोर में (१२-७-१९२७) || १६४
|-
|१३३. || भाषण: इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइन्समें (१२-७-१९२७) || १६६
|-
|१३४. || सन्देश: 'सर्चलाइट' को (१३-७-१९२७) || १६८<noinclude></noinclude>
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शिखर तिवारी
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|
|-
|९९. || पत्र: के० एस० नटराजन्को (५-७-१९२७) || ११६
|-
|१००. || पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको (५-७-१९२७) || ११७
|-
|१०१. || पत्र: मणिलाल और सुशीला गांधीको (५-७-१९२७) || ११८
|-
|१०२. || पत्र: मीराबहनको (६-७-१९२७) || १२०
|-
|१०३. || पत्र: ए० फेनर ब्रॉकवेको (६-७-१९२७) || १२०
|-
|१०४. || पत्र: गिरिराजकिशोरको (६-७-१९२७) || १२१
|-
|१०५. || पत्र: जयरामदास दौलतरामको (६-७-१९२७) || १२३
|-
|१०६. || पत्र: लिलियन एडगरको (६-७-१९२७) || १२४
|-
|१०७. || पत्र: हिन्दी साहित्य सम्मेलनके मन्त्रीको (६-७-१९२७) || १२६
|-
|१०८. || एक पत्र (७-७-१९२७ के पूर्व) || १२७
|-
|१०९. || टिप्पणियाँ: दार्जिलिंग में देशबन्धु-दिवस; आदि कर्नाटक (७-७-१९२७) || १२८
|-
|११०. || मैसूरमें गोरक्षा (७-७-१९२७) || १३०
|-
|१११. || राजनीतिक संगठन क्या है? (७-७-१९२७) || १३३
|-
|११२. || पिंजरापोलोंके समक्ष उपस्थित काम (७-७-१९२७) || १३५
|-
|११३. || युगों पुरानी समस्या (७-७-१९२७) || १३७
|-
|११४. || पत्र: बी० एफ० भरूचाको (७-७-१९२७ के पश्चात्) || १४०
|-
|११५. || भाषण: आदि कर्नाटक विद्यार्थियों के समक्ष (८-७-१९२७ के पूर्व) || १४३
|-
|११६. || पत्र: मीराबहनको (८-७-१९२७) || १४४
|-
|११७. || भाषण: बंगलोर खादी-प्रदर्शनी के समापन के अवसरपर (८-७-१९२७) || १४५
|-
|११८. || पत्र: मीराबहनको (९-७-१९२७) || १४७
|-
|११९. || पत्र: एन० आर० मलकानीको (९-७-१९२७) || १४८
|-
|१२०. || भाषण: एमेच्योर ड्रमैटिक एसोसिएशन, मैसूरमें (९-७-१९२७) || १४९
|-
|१२१. || दो तुलाएँ (१०-७-१९२७) || १५०
|-
|१२२. || एक पत्र (१०-७-१९२७) || १५२
|-
|१२३. || पत्र: जे० बी० कृपलानीको (१०-७-१९२७) || १५४
|-
|१२४. || भाषण: अखिल कर्नाटक हिन्दी सम्मेलन, बंगलोर में (१०-७-१९२७) || १५५
|-
|१२५. || पत्र: मीराबहनको (१०-७-१९२७) || १५६
|-
|१२६. || पत्र: मीराबहनको (११-७-१९२७) || १५७
|-
|१२७. || पत्र: गोपालरावको (११-७-१९२७) || १५७
|-
|१२८. || पत्र: नाजुकलाल न० चौकसीको (११-७-१९२७) || १६०
|-
|१२९. || पत्र: रेहाना तैयबजीको (१२-७-१९२७) || १६०
|-
|१३०. || पत्र: जे० डब्ल्यू० पेटावेलको (१२-७-१९२७) || १६२
|-
|१३१. || पत्र: आश्रमकी बहनोंको (१२-७-१९२७) || १६३
|-
|१३२. || भाषण: मैसूरके विद्यार्थियोंके समक्ष, बंगलोर में (१२-७-१९२७) || १६४
|-
|१३३. || भाषण: इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइन्समें (१२-७-१९२७) || १६६
|-
|१३४. || सन्देश: 'सर्चलाइट' को (१३-७-१९२७) || १६८<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| २२७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| २२८. || पत्र : मोहनलाल के॰ मेहताको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| १९६. || धर्म-संकट (१७-११-१९२९) || १८३
|-
| १९७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१७-११-१९२९) || १८५
|-
| १९८. || पत्र : राम विनोदको (१७-११-१९२९) || १८५
|-
| १९९. || पत्र : भोपालके नवाबको (१७-११-१९२९) || १८६
|-
| २००. || पत्र : बी॰ राम वर्माको (१७-११-१९२९) || १८७
|-
| २०१. || भाषण : इलाहाबाद विश्वविद्यालयमें (१७-११-१९२९) || १८७
|-
| २०२. || भाषण : अभिनन्दन समारोह, इलाहाबादमें (१७-११-१९२९) || १८९
|-
| २०३. || भाषण : सार्वजनिक सभा, इलाहाबादमें (१७-११-१९२९) || १९०
|-
| २०४. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१८-११-१९२९)|| १९२
|-
| २०५. || कांग्रेस कार्यसमितिके प्रस्तावका मसविदा (१८-११-१९२९) || १९२
|-
| २०६. || पत्र : बालजी देसाईको (१८-११-१९२९) || १९३
|-
| २०७. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (१८-११-१९२९) || १९३
|-
| २०८. || पत्र : महादेव देसाईको (१८-११-१९२९) || १९४
|-
| २०९. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (१८-११-१९२९) || १९५
|-
| २१०. || पत्र : नन्दकिशोरीको (१८-११-१९२९) || १९५
|-
| २११. || पत्र : तोताराम सनाढ्यको (१८-११-१९२९) || १९६
|-
| २१२. || पत्र : चन्द त्यागीको (१८-११-१९२९) || १९६
|-
| २१३. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (१९-११-१९२९) || १९७
|-
| २१४. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-११-१९२९) || १९८
|-
| २१५. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१९-११-१९२९) || १९८
|-
| २१६. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-११-१९२९) || १९९
|-
| २१७. || पत्र : रामनारायण चौधरीको (१९-११-१९२९) || १९९
|-
| २१८. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२०-११-१९२९) || २००
|-
| २१९. || पत्र : मीराबहनको (२०-११-१९२९) || २००
|-
| २२०. || टिप्पणियाँ : फिजीमें भारतीय; इसे पापोंका प्रायश्चित नहीं समझा जा सकता; खादीके खरीदारो, होशियार (२१-११-१९२९) || २०१
|-
| २२१. || शुद्ध मतभेद (२१-११-१९२९) || २०३
|-
| २२२. || चरखेका गूढ़ार्थ (२१-११-१९२९) || २०६
|-
| २२३. || धर्मके नामपर (२१-११-१९२९) || २०८
|-
| २२४. || सचित्र खादी तालिका (२१-११-१९२९) || २०९
|-
| २२५. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — १० (२१-११-१९२९) || २०९
|-
| २२६. || कुछ प्रश्न (२१-११-१९२९) || २१३
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| २२७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| २२८. || पत्र : मोहनलाल के॰ मेहताको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| २२९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२२-११-१९२९) || २१७
|-
| २३०. || पत्र : मीराबहनको (२२-११-१९२९) || २१७
|-
| २३१. || तार : रुचीराम साहनीको (२३-११-१९२९) || २१८
|-
| २३२. || पत्र : भोपालके नवाबको (१७-११-१९२९) || २१८
|-
| २३३. || पत्र : बी॰ राम वर्माको (१७-११-१९२९) || २२०
|-
| २३४. || भाषण : इलाहाबाद विश्वविद्यालयमें (१७-११-१९२९) || २२१
|-
| २३५. || भाषण : अभिनन्दन समारोह, इलाहाबादमें (१७-११-१९२९) || २२१
|-
| २३६. || भाषण : सार्वजनिक सभा, इलाहाबादमें (१७-११-१९२९) || २२५
|-
| २३७. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१८-११-१९२९)|| २२६
|-
| २३८. || कांग्रेस कार्यसमितिके प्रस्तावका मसविदा (१८-११-१९२९) || २२६
|-
| २३९. || पत्र : बालजी देसाईको (१८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४०. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (१८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४१. || पत्र : महादेव देसाईको (१८-११-१९२९) || २३२
|-
| २४२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (१८-११-१९२९) || २३३
|-
| २४३. || पत्र : नन्दकिशोरीको (१८-११-१९२९) || २३४
|-
| २४४. || पत्र : तोताराम सनाढ्यको (१८-११-१९२९) || २३५
|-
| २४५. || पत्र : चन्द त्यागीको (१८-११-१९२९) || २३६
|-
| २४६. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (१९-११-१९२९) || २३७
|-
| २४७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-११-१९२९) || २३८
|-
| २४८. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१९-११-१९२९) || २४३
|-
| २४९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-११-१९२९) || २४४
|-
| २५०. || पत्र : रामनारायण चौधरीको (१९-११-१९२९) || २४५
|-
| २५१. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२०-११-१९२९) || २४६
|-
| २५२. || पत्र : मीराबहनको (२०-११-१९२९) || २४६
|-
| २५३. || टिप्पणियाँ : फिजीमें भारतीय; इसे पापोंका प्रायश्चित नहीं समझा जा सकता; खादीके खरीदारो, होशियार (२१-११-१९२९) || २४७
|-
| २५४. || शुद्ध मतभेद (२१-११-१९२९) || २४८
|-
| २५५. || चरखेका गूढ़ार्थ (२१-११-१९२९) || २५०
|-
| २५६. || धर्मके नामपर (२१-११-१९२९) || २५१
|-
| २५७. || सचित्र खादी तालिका (२१-११-१९२९) || २५२
|-
| २५८. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — १० (२१-११-१९२९) || २५३
|-
| २५९. || कुछ प्रश्न (२१-११-१९२९) || २५४
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|
|-
| २२७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| २२८. || पत्र : मोहनलाल के॰ मेहताको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| २२९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२२-११-१९२९) || २१७
|-
| २३०. || पत्र : मीराबहनको (२२-११-१९२९) || २१७
|-
| २३१. || तार : रुचीराम साहनीको (२३-११-१९२९) || २१८
|-
| २३२. || बालक बनो (२४-११-१९२९) || २१८
|-
| २३३. || टिप्पणी : गुजरातका धर्म (२४-११-१९२९) || २२०
|-
| २३४. || पत्र : प्रभावतीको (२४-११-१९२९) || २२१
|-
| २३५. || न्यासका घोषणा-पत्र (२६-११-१९२९) || २२१
|-
| २३६. || पत्र : मीराबहनको (२६-११-१९२९) || २२५
|-
| २३७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२६-११-१९२९)|| २२६
|-
| २३८. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — ११ (२८-११-१९२९) || २२६
|-
| २३९. || टिप्पणियाँ : कांग्रेस कमेटियो, सावधान; लालाजी स्मारक (२८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४०. || संयुक्त प्रान्तके दौरेके सम्बन्धमें कुछ विचार (२८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४१. || पत्र : महादेव देसाईको (१८-११-१९२९) || २३२
|-
| २४२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (१८-११-१९२९) || २३३
|-
| २४३. || पत्र : नन्दकिशोरीको (१८-११-१९२९) || २३४
|-
| २४४. || पत्र : तोताराम सनाढ्यको (१८-११-१९२९) || २३५
|-
| २४५. || पत्र : चन्द त्यागीको (१८-११-१९२९) || २३६
|-
| २४६. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (१९-११-१९२९) || २३७
|-
| २४७. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-११-१९२९) || २३८
|-
| २४८. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१९-११-१९२९) || २४३
|-
| २४९. || पत्र : छगनलाल जोशीको (१९-११-१९२९) || २४४
|-
| २५०. || पत्र : रामनारायण चौधरीको (१९-११-१९२९) || २४५
|-
| २५१. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२०-११-१९२९) || २४६
|-
| २५२. || पत्र : मीराबहनको (२०-११-१९२९) || २४६
|-
| २५३. || टिप्पणियाँ : फिजीमें भारतीय; इसे पापोंका प्रायश्चित नहीं समझा जा सकता; खादीके खरीदारो, होशियार (२१-११-१९२९) || २४७
|-
| २५४. || शुद्ध मतभेद (२१-११-१९२९) || २४८
|-
| २५५. || चरखेका गूढ़ार्थ (२१-११-१९२९) || २५०
|-
| २५६. || धर्मके नामपर (२१-११-१९२९) || २५१
|-
| २५७. || सचित्र खादी तालिका (२१-११-१९२९) || २५२
|-
| २५८. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — १० (२१-११-१९२९) || २५३
|-
| २५९. || कुछ प्रश्न (२१-११-१९२९) || २५४
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| २२७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| २२८. || पत्र : मोहनलाल के॰ मेहताको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| २२९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२२-११-१९२९) || २१७
|-
| २३०. || पत्र : मीराबहनको (२२-११-१९२९) || २१७
|-
| २३१. || तार : रुचीराम साहनीको (२३-११-१९२९) || २१८
|-
| २३२. || बालक बनो (२४-११-१९२९) || २१८
|-
| २३३. || टिप्पणी : गुजरातका धर्म (२४-११-१९२९) || २२०
|-
| २३४. || पत्र : प्रभावतीको (२४-११-१९२९) || २२१
|-
| २३५. || न्यासका घोषणा-पत्र (२६-११-१९२९) || २२१
|-
| २३६. || पत्र : मीराबहनको (२६-११-१९२९) || २२५
|-
| २३७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२६-११-१९२९)|| २२६
|-
| २३८. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — ११ (२८-११-१९२९) || २२६
|-
| २३९. || टिप्पणियाँ : कांग्रेस कमेटियो, सावधान; लालाजी स्मारक (२८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४०. || संयुक्त प्रान्तके दौरेके सम्बन्धमें कुछ विचार (२८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४१. || लोकवित्त और हमारी दरिद्रता (२८-११-१९२९) || २३२
|-
| २४२. || अछूतोंके लिए मन्दिर (२८-११-१९२९) || २३३
|-
| २४३. || देशी राज्य (२८-११-१९२९) || २३४
|-
| २४४. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३०-११-१९२९) || २३५
|-
| २४५. || डाकिनीकी आखिरी साँस (१-१२-१९२९) || २३६
|-
| २४६. || नवजीवन ट्रस्ट (१-१२-१९२९) || २३७
|-
| २४७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२-१२-१९२९) || २३८
|-
| २४८. || पत्र : मीराबहनको (२-१२-१९२९) || २४३
|-
| २४९. || पुर्जी : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (२-१२-१९२९) || २४४
|-
| २५०. || पत्र : एम॰ जे॰ को (२-१२-१९२९) || २४५
|-
| २५१. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (२-१२-१९२९) || २४६
|-
| २५२. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (३-१२-१९२९) || २४६
|-
| २५३. || भाषण : प्रार्थना-सभा, साबरमती आश्रममें (४-१२-१९२९) || २४७
|-
| २५४. || हमारे भाईबन्द — पेड़ (५-१२-१९२९) || २४८
|-
| २५५. || जमींदार और ताल्लुकेदार (५-१२-१९२९) || २५०
|-
| २५६. || खादी और ईमानदारी (५-१२-१९२९) || २५१
|-
| २५७. || बारडोलीकी कहानी (५-१२-१९२९) || २५२
|-
| २५८. || हमारा भ्रम (५-१२-१९२९) || २५३
|-
| २५९. || तार : सरोजिनी नायडूको (६-१२-१९२९ से पूर्व) || २५४
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ऋतु मिश्रा
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| २६०. || तार : मोतीलाल नेहरूको (६-१२-१९२९) || २५४
|-
| २६१. || पत्र : हरदत्त शर्माको (७-१२-१९२९) || २५५
|-
| २६२. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२२-११-१९२९) || २५५
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| २६३. || पत्र : मीराबहनको (२२-११-१९२९) || २५६
|-
| २६४. || तार : रुचीराम साहनीको (२३-११-१९२९) || २५७
|-
| २६५. || बालक बनो (२४-११-१९२९) || २५७
|-
| २३३. || टिप्पणी : गुजरातका धर्म (२४-११-१९२९) || २२०
|-
| २३४. || पत्र : प्रभावतीको (२४-११-१९२९) || २२१
|-
| २३५. || न्यासका घोषणा-पत्र (२६-११-१९२९) || २२१
|-
| २३६. || पत्र : मीराबहनको (२६-११-१९२९) || २२५
|-
| २३७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२६-११-१९२९)|| २२६
|-
| २३८. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — ११ (२८-११-१९२९) || २२६
|-
| २३९. || टिप्पणियाँ : कांग्रेस कमेटियो, सावधान; लालाजी स्मारक (२८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४०. || संयुक्त प्रान्तके दौरेके सम्बन्धमें कुछ विचार (२८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४१. || लोकवित्त और हमारी दरिद्रता (२८-११-१९२९) || २३२
|-
| २४२. || अछूतोंके लिए मन्दिर (२८-११-१९२९) || २३३
|-
| २४३. || देशी राज्य (२८-११-१९२९) || २३४
|-
| २४४. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३०-११-१९२९) || २३५
|-
| २४५. || डाकिनीकी आखिरी साँस (१-१२-१९२९) || २३६
|-
| २४६. || नवजीवन ट्रस्ट (१-१२-१९२९) || २३७
|-
| २४७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२-१२-१९२९) || २३८
|-
| २४८. || पत्र : मीराबहनको (२-१२-१९२९) || २४३
|-
| २४९. || पुर्जी : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (२-१२-१९२९) || २४४
|-
| २५०. || पत्र : एम॰ जे॰ को (२-१२-१९२९) || २४५
|-
| २५१. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (२-१२-१९२९) || २४६
|-
| २५२. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (३-१२-१९२९) || २४६
|-
| २५३. || भाषण : प्रार्थना-सभा, साबरमती आश्रममें (४-१२-१९२९) || २४७
|-
| २५४. || हमारे भाईबन्द — पेड़ (५-१२-१९२९) || २४८
|-
| २५५. || जमींदार और ताल्लुकेदार (५-१२-१९२९) || २५०
|-
| २५६. || खादी और ईमानदारी (५-१२-१९२९) || २५१
|-
| २५७. || बारडोलीकी कहानी (५-१२-१९२९) || २५२
|-
| २५८. || हमारा भ्रम (५-१२-१९२९) || २५३
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| २५९. || तार : सरोजिनी नायडूको (६-१२-१९२९ से पूर्व) || २५४
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| २२७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| २२८. || पत्र : मोहनलाल के॰ मेहताको (२१-११-१९२९) || २१६
|-
| २२९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२२-११-१९२९) || २१७
|-
| २३०. || पत्र : मीराबहनको (२२-११-१९२९) || २१७
|-
| २३१. || तार : रुचीराम साहनीको (२३-११-१९२९) || २१८
|-
| २३२. || बालक बनो (२४-११-१९२९) || २१८
|-
| २३३. || टिप्पणी : गुजरातका धर्म (२४-११-१९२९) || २२०
|-
| २३४. || पत्र : प्रभावतीको (२४-११-१९२९) || २२१
|-
| २३५. || न्यासका घोषणा-पत्र (२६-११-१९२९) || २२१
|-
| २३६. || पत्र : मीराबहनको (२६-११-१९२९) || २२५
|-
| २३७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२६-११-१९२९)|| २२६
|-
| २३८. || संयुक्त प्रान्तका दौरा — ११ (२८-११-१९२९) || २२६
|-
| २३९. || टिप्पणियाँ : कांग्रेस कमेटियो, सावधान; लालाजी स्मारक (२८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४०. || संयुक्त प्रान्तके दौरेके सम्बन्धमें कुछ विचार (२८-११-१९२९) || २३०
|-
| २४१. || लोकवित्त और हमारी दरिद्रता (२८-११-१९२९) || २३२
|-
| २४२. || अछूतोंके लिए मन्दिर (२८-११-१९२९) || २३३
|-
| २४३. || देशी राज्य (२८-११-१९२९) || २३४
|-
| २४४. || पत्र : मोतीलाल नेहरूको (३०-११-१९२९) || २३५
|-
| २४५. || डाकिनीकी आखिरी साँस (१-१२-१९२९) || २३६
|-
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|-
| २४७. || पत्र : छगनलाल जोशीको (२-१२-१९२९) || २३८
|-
| २४८. || पत्र : मीराबहनको (२-१२-१९२९) || २४३
|-
| २४९. || पुर्जी : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (२-१२-१९२९) || २४४
|-
| २५०. || पत्र : एम॰ जे॰ को (२-१२-१९२९) || २४५
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| २५१. || पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको (२-१२-१९२९) || २४६
|-
| २५२. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (३-१२-१९२९) || २४६
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| २५४. || हमारे भाईबन्द — पेड़ (५-१२-१९२९) || २४८
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| २५५. || जमींदार और ताल्लुकेदार (५-१२-१९२९) || २५०
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| २५६. || खादी और ईमानदारी (५-१२-१९२९) || २५१
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| २५७. || बारडोलीकी कहानी (५-१२-१९२९) || २५२
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| २५८. || हमारा भ्रम (५-१२-१९२९) || २५३
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| २६०. || तार : मोतीलाल नेहरूको (६-१२-१९२९) || २५४
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| २६१. || पत्र : हरदत्त शर्माको (७-१२-१९२९) || २५५
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| २६२. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२२-११-१९२९) || २५५
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| २६५. || बालक बनो (२४-११-१९२९) || २५७
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| २६६. || टिप्पणी : गुजरातका धर्म (२४-११-१९२९) || २५८
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| २६७. || पत्र : प्रभावतीको (२४-११-१९२९) || २५९
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| २६८. || न्यासका घोषणा-पत्र (२६-११-१९२९) || २६२
|-
| २६९. || पत्र : मीराबहनको (२६-११-१९२९) || २६२
|-
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|-
| २७२. || टिप्पणियाँ : कांग्रेस कमेटियो, सावधान; लालाजी स्मारक (२८-११-१९२९) || २६४
|-
| २७३. || संयुक्त प्रान्तके दौरेके सम्बन्धमें कुछ विचार (२८-११-१९२९) || २६६
|-
| २७४. || लोकवित्त और हमारी दरिद्रता (२८-११-१९२९) || २६६
|-
| २७५. || अछूतोंके लिए मन्दिर (२८-११-१९२९) || २६७
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| २७६. || देशी राज्य (२८-११-१९२९) || २६८
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|-
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| २६०. || तार : मोतीलाल नेहरूको (६-१२-१९२९) || २५४
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|-
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|-
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|-
| २६७. || कुछ महत्त्वके प्रश्न (८-१२-१९२९) || २५९
|-
| २६८. || पत्र : मथुरादास पु॰ गांधीको (८-१२-१९२९) || २६२
|-
| २६९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (८-१२-१९२९) || २६२
|-
| २७०. || पत्र : वी॰ ए॰ सुन्दरम् को (९-१२-१९२९)|| २६३
|-
| २७१. || तार : विट्ठलभाई पटेलको (९-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || २६३
|-
| २७२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (९-१२-१९२९) || २६४
|-
| २७३. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (९-१२-१९२९) || २६६
|-
| २७४. || पत्र : डाह्याभाई म॰ पटेलको (१०-१२-१९२९) || २६६
|-
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|-
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|-
| २७७. || टिप्पणियाँ : अछूतोद्धार आन्दोलन; लालाजी स्मारक; दिल्लीके हिन्दू कालेजका चन्दा (१२-१२-१९२९) || २६८
|-
| २७८. || संयुक्त प्रान्त राष्ट्र-सेवा संघ (१२-१२-१९२९) || २७०
|-
| २७९. || तीसरे दर्जेका डिब्बा (१२-१२-१९२९ और १९-१-१९३०) || २७१
|-
| २८०. || एक महत्त्वपूर्ण फैसला (१२-१२-१९२९) || २७२
|-
| २८१. || धर्मक्षेत्रमें अधर्म (१२-१२-१९२९) || २७४
|-
| २८२. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१२-१२-१९२९) || २७५
|-
| २८३. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (१३-१२-१९२९) || २७६
|-
| २८४. || पत्र : मथुरादास पु॰ गांधीको (१३-१२-१९२९) || २७६
|-
| २८५. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१३-१२-१९२९) || २७७
|-
| २८६. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (१४-१२-१९२९) || २७८
|-
| २८७. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१४-१२-१९२९) || २७९
|-
| २८८. || पत्र : रघुनाथको (१४-१२-१९२९ के पश्चात्) || २८०
|-
| २८९. || विद्यापीठकी भिक्षा (१५-१२-१९२९) || २८०
|-
| २९०. || किंकर्त्तव्यविमूढ़ पति (१५-१२-१९२९) || २८१
|-
| २९१. || टिप्पणियाँ : सत्ताके सामने सत्य पानी भरता; खादीका सूचीपत्र (१५-१२-१९२९) || २८३
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|-
| २९२. || मिल मजदूरोंकी माँग (१५-१२-१९२९) || २८५
|-
| २९३. || स्त्रियोंकी दुरावस्था (१५-१२-१९२९) || २८८
|-
| २९४. || झूठी खबर (१५-१२-१९२९) || २८९
|-
| २९५. || पत्र : छगनलाल जोशीको (७-१२-१९२९) || २५६
|-
| २९६. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (७-१२-१९२९) || २५७
|-
| २९७. || अपील : अहमदाबादके मजदूरोंसे (७-१२-१९२९) || २५७
|-
| २९८. || टिप्पणी : गुजरात विद्यापीठ (८-१२-१९२९) || २५८
|-
| २९९. || कुछ महत्त्वके प्रश्न (८-१२-१९२९) || २५९
|-
| २६८. || पत्र : मथुरादास पु॰ गांधीको (८-१२-१९२९) || २६२
|-
| २६९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (८-१२-१९२९) || २६२
|-
| २७०. || पत्र : वी॰ ए॰ सुन्दरम् को (९-१२-१९२९)|| २६३
|-
| २७१. || तार : विट्ठलभाई पटेलको (९-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || २६३
|-
| २७२. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (९-१२-१९२९) || २६४
|-
| २७३. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (९-१२-१९२९) || २६६
|-
| २७४. || पत्र : डाह्याभाई म॰ पटेलको (१०-१२-१९२९) || २६६
|-
| २७५. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१०-१२-१९२९) || २६७
|-
| २७६. || पत्र : प्रभावतीको (११-१२-१९२९) || २६८
|-
| २७७. || टिप्पणियाँ : अछूतोद्धार आन्दोलन; लालाजी स्मारक; दिल्लीके हिन्दू कालेजका चन्दा (१२-१२-१९२९) || २६८
|-
| २७८. || संयुक्त प्रान्त राष्ट्र-सेवा संघ (१२-१२-१९२९) || २७०
|-
| २७९. || तीसरे दर्जेका डिब्बा (१२-१२-१९२९ और १९-१-१९३०) || २७१
|-
| २८०. || एक महत्त्वपूर्ण फैसला (१२-१२-१९२९) || २७२
|-
| २८१. || धर्मक्षेत्रमें अधर्म (१२-१२-१९२९) || २७४
|-
| २८२. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१२-१२-१९२९) || २७५
|-
| २८३. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (१३-१२-१९२९) || २७६
|-
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|-
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|-
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|-
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|-
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|-
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|-
| २९०. || किंकर्त्तव्यविमूढ़ पति (१५-१२-१९२९) || २८१
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| २९२. || मिल मजदूरोंकी माँग (१५-१२-१९२९) || २८५
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| २९३. || स्त्रियोंकी दुरावस्था (१५-१२-१९२९) || २८८
|-
| २९४. || झूठी खबर (१५-१२-१९२९) || २८९
|-
| २९५. || पत्र : छगनलाल जोशीको (७-१२-१९२९) || २८९
|-
| २९६. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (७-१२-१९२९) || २९०
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|-
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|-
| २९९. || कुछ महत्त्वके प्रश्न (८-१२-१९२९) || २९३
|-
| ३००. || पत्र : मथुरादास पु॰ गांधीको (८-१२-१९२९) || २९५
|-
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|-
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|-
| ३०७. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१०-१२-१९२९) || ३०३
|-
| ३०८. || पत्र : प्रभावतीको (११-१२-१९२९) || ३०४
|-
| ३०९. || टिप्पणियाँ : अछूतोद्धार आन्दोलन; लालाजी स्मारक; दिल्लीके हिन्दू कालेजका चन्दा (१२-१२-१९२९) || ३०५
|-
| ३१०. || संयुक्त प्रान्त राष्ट्र-सेवा संघ (१२-१२-१९२९) || ३०६
|-
| ३११. || तीसरे दर्जेका डिब्बा (१२-१२-१९२९ और १९-१-१९३०) || ३०७
|-
| ३१२. || एक महत्त्वपूर्ण फैसला (१२-१२-१९२९) || ३०७
|-
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| २९३. || स्त्रियोंकी दुरावस्था (१५-१२-१९२९) || २८८
|-
| २९४. || झूठी खबर (१५-१२-१९२९) || २८९
|-
| २९५. || महीन खादी पहननेवालोंसे (१५-१२-१९२९) || २८९
|-
| २९६. || देहातकी बीमारियाँ (१५-१२-१९२९) || २९०
|-
| २९७. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१५-१२-१९२९) || २९२
|-
| २९८. || पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१६-१२-१९२९) || २९३
|-
| २९९. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (१६-१२-१९२९) || २९३
|-
| ३००. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१६-१२-१९२९) || २९५
|-
| ३०१. || पत्र : म को (१६-१२-१९२९) || २९६
|-
| ३०२. || पत्र : म को (१६-१२-१९२९) || २९६
|-
| ३०३. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१७-१२-१९२९) || २९६
|-
| ३०४. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१८-१२-१९२९) || २९७
|-
| ३०५. || पत्र : रमणीकलाल और सुशीला गांधीको (१८-१२-१९२९) || २९८
|-
| ३०६. || सैनिकीकरणका कार्यक्रम (१९-१२-१९२९) || २९९
|-
| ३०७. || पूँजीपतियोंका कर्त्तव्य (१९-१२-१९२९) || ३०३
|-
| ३०८. || कांग्रेस किसकी? (१९-१२-१९२९) || ३०४
|-
| ३०९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१९-१२-१९२९) || ३०५
|-
| ३१०. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (२०-१२-१९२९) || ३०६
|-
| ३११. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२०-१२-१९२९) || ३०७
|-
| ३१२. || एक महत्त्वपूर्ण फैसला (१२-१२-१९२९) || ३०७
|-
| ३१३. || धर्मक्षेत्रमें अधर्म (१२-१२-१९२९) || ३०८
|-
| ३१४. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१२-१२-१९२९) || ३०९
|-
| ३१५. || पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको (१३-१२-१९२९) || ३०९
|-
| ३१६. || पत्र : मथुरादास पु॰ गांधीको (१३-१२-१९२९) || ३०९
|-
| ३१७. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१३-१२-१९२९) || ३१०
|-
| ३१८. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (१४-१२-१९२९) || ३१०
|-
| ३१९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१४-१२-१९२९) || ३१०
|-
| ३२०. || पत्र : रघुनाथको (१४-१२-१९२९ के पश्चात्) || ३११
|-
| ३२१. || विद्यापीठकी भिक्षा (१५-१२-१९२९) || ३११
|-
| ३२२. || किंकर्त्तव्यविमूढ़ पति (१५-१२-१९२९) || ३१२
|-
| ३२३. || टिप्पणियाँ : सत्ताके सामने सत्य पानी भरता; खादीका सूचीपत्र (१५-१२-१९२९) || ३१३
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| २९२. || मिल मजदूरोंकी माँग (१५-१२-१९२९) || २८५
|-
| २९३. || स्त्रियोंकी दुरावस्था (१५-१२-१९२९) || २८८
|-
| २९४. || झूठी खबर (१५-१२-१९२९) || २८९
|-
| २९५. || महीन खादी पहननेवालोंसे (१५-१२-१९२९) || २८९
|-
| २९६. || देहातकी बीमारियाँ (१५-१२-१९२९) || २९०
|-
| २९७. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१५-१२-१९२९) || २९२
|-
| २९८. || पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१६-१२-१९२९) || २९३
|-
| २९९. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (१६-१२-१९२९) || २९३
|-
| ३००. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१६-१२-१९२९) || २९५
|-
| ३०१. || पत्र : म को (१६-१२-१९२९) || २९६
|-
| ३०२. || पत्र : म को (१६-१२-१९२९) || २९६
|-
| ३०३. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१७-१२-१९२९) || २९६
|-
| ३०४. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१८-१२-१९२९) || २९७
|-
| ३०५. || पत्र : रमणीकलाल और सुशीला गांधीको (१८-१२-१९२९) || २९८
|-
| ३०६. || सैनिकीकरणका कार्यक्रम (१९-१२-१९२९) || २९९
|-
| ३०७. || पूँजीपतियोंका कर्त्तव्य (१९-१२-१९२९) || ३०३
|-
| ३०८. || कांग्रेस किसकी? (१९-१२-१९२९) || ३०४
|-
| ३०९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१९-१२-१९२९) || ३०५
|-
| ३१०. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (२०-१२-१९२९) || ३०६
|-
| ३११. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२०-१२-१९२९) || ३०७
|-
| ३१२. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२०-१२-१९२९) || ३०७
|-
| ३१३. || तार : वाइसरायके निजी सचिवको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३०८
|-
| ३१४. || तार : विट्ठलभाई पटेलको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३०९
|-
| ३१५. || तार : वल्लभभाई पटेलको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३०९
|-
| ३१६. || तार : लक्ष्मीनारायण गाड़ोदियाको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३०९
|-
| ३१७. || तार : द॰ बा॰ कालेलकरको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३१०
|-
| ३१८. || तार : मणिकलाल कोठारीको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३१०
|-
| ३१९. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (२१-१२-१९२९) || ३१०
|-
| ३२०. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (२१-१२-१९२९) || ३११
|-
| ३२१. || पत्र : नारणदास गांधीको (२१-१२-१९२९) || ३११
|-
| ३२२. || किसानोंके लिए क्या करना चाहिए? (२२-१२-१९२९) || ३१२
|-
| ३२३. || स्त्रियाँ और गहने (२२-१२-१९२९) || ३१३
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३
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ऋतु मिश्रा
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|-
| ३२४. || टिप्पणियाँ : स्वर्गीय जयकृष्ण इन्द्रजी; मजदूर और मालिक; हज्जाम या नाई (२२-१२-१९२९) || ३१६
|-
| २९३. || स्त्रियोंकी दुरावस्था (१५-१२-१९२९) || २८८
|-
| २९४. || झूठी खबर (१५-१२-१९२९) || २८९
|-
| २९५. || महीन खादी पहननेवालोंसे (१५-१२-१९२९) || २८९
|-
| २९६. || देहातकी बीमारियाँ (१५-१२-१९२९) || २९०
|-
| २९७. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१५-१२-१९२९) || २९२
|-
| २९८. || पत्र : रामानन्द चटर्जीको (१६-१२-१९२९) || २९३
|-
| २९९. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (१६-१२-१९२९) || २९३
|-
| ३००. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१६-१२-१९२९) || २९५
|-
| ३०१. || पत्र : म को (१६-१२-१९२९) || २९६
|-
| ३०२. || पत्र : म को (१६-१२-१९२९) || २९६
|-
| ३०३. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१७-१२-१९२९) || २९६
|-
| ३०४. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१८-१२-१९२९) || २९७
|-
| ३०५. || पत्र : रमणीकलाल और सुशीला गांधीको (१८-१२-१९२९) || २९८
|-
| ३०६. || सैनिकीकरणका कार्यक्रम (१९-१२-१९२९) || २९९
|-
| ३०७. || पूँजीपतियोंका कर्त्तव्य (१९-१२-१९२९) || ३०३
|-
| ३०८. || कांग्रेस किसकी? (१९-१२-१९२९) || ३०४
|-
| ३०९. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१९-१२-१९२९) || ३०५
|-
| ३१०. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (२०-१२-१९२९) || ३०६
|-
| ३११. || पत्र : प्रेमाबहन कंटकको (२०-१२-१९२९) || ३०७
|-
| ३१२. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२०-१२-१९२९) || ३०७
|-
| ३१३. || तार : वाइसरायके निजी सचिवको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३०८
|-
| ३१४. || तार : विट्ठलभाई पटेलको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३०९
|-
| ३१५. || तार : वल्लभभाई पटेलको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३०९
|-
| ३१६. || तार : लक्ष्मीनारायण गाड़ोदियाको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३०९
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| ३१७. || तार : द॰ बा॰ कालेलकरको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३१०
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| ३१९. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (२१-१२-१९२९) || ३१०
|-
| ३२०. || पत्र : शिवाभाई पटेलको (२१-१२-१९२९) || ३११
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| ३२२. || किसानोंके लिए क्या करना चाहिए? (२२-१२-१९२९) || ३१२
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| ३२३. || स्त्रियाँ और गहने (२२-१२-१९२९) || ३१३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||पत्र: रमणीकलाल मोदीको|१३५}}</noinclude>पिताजी गये हैं, उसी रास्ते हम सबको जाना ही है तो फिर शोक किस बातका?
माताजी तो ज्ञानी हैं, संयमी है; इसलिए उन्हें हर्ष-शोक न होना चाहिए।
पिताजीकी गद्दीको सुशोभित करना। अपने सभी कार्यों में खूब धीरजसे काम लेना। मैं चाहता हूँ कि मुझे इधर बराबर लिखते रहो।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७१६) की फोटो नकलसे।
सौजन्य: शान्तिकुमार मोरारजी
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१४९ पत्र: रमणीकलाल मोदीको'''}}}}
{{right|हाथरस<br>
८ नवम्बर १९२९}}
{{left|चि॰ रमणीकलाल,}}
तुम्हारी तरफसे आज कोई पत्र नहीं मिला। इसके साथ बैंकके लिए एक पत्र भेज रहा हूँ। यदि जरूरत पड़े तो उसका उपयोग कर लेना।
आज वा और देवदास स्त्रियोंकी समामें शाहबाद गये हैं। अन्य लोग पहले से एटा चले गये हैं।
तुम अपना स्वास्थ्य अच्छा बनाये रखना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च]}}
छगनलाल हमारा साथ छोड़कर आज पंजाबकी ओर रवाना हो गया है।
गुजराती (जी॰ एन॰ ४१४८) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१७४
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Sanjana Chowdhury
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{{c|{{larger|१५०. पत्र: मथुरादास पु॰ गांधीको}}}}
{{right|एटा<br>
९ नवम्बर १९२९}}
{{left|चि॰ मथुरादास<ref>साबरमती आश्रमके कुशल कतैये तथा खादी-कार्यकर्ता।</ref>}}
कराची जाते हुए तुमने जो पत्र लिखा था वह मिल गया था। जीवनदासके निधनसे क्या तुम्हारी जिम्मेदारी बढ़ गई है? जीवनदास अपनी विधवा पत्नीके लिए क्या कोई व्यवस्था कर गया है अथवा विधवा पत्नी अपनी गुजर-बसर करनेमें स्वयं समर्थ है? मेरा विचार तो यह है कि प्रत्येक पत्नी परायण पतिको जैसे ही मोका मिले अपनी पत्नीको स्वावलम्बी बननेका ढंग सिखा देना चाहिए। पत्नीके लिए पैसा छोड़ जानेको तो मैं गौण कर्तव्य मानता हूँ। अपनी पत्नीको अपनेपर निर्भर रखनेवाले व्यक्तिके लिए एकमात्र उपाय यही है कि वह पत्नीके लिए पैसा छोड़ जाये। किन्तु सच बात तो यह है कि जैसे कोई पत्नी अपने पतिके लिए पैसा नहीं छोड़ जाती और यदि छोड़ जाती है तो पति शरमाता है, ठीक यही बात पत्नीपर भी लागू होनी चाहिए। उनकी सन्तानके बारेमें भी मेरा यही विचार है। यह बात तुमने ‘नवजीवन’ के मेरे लेखमें भी देखी होगी। यदि विधवा वहन निर्धन हो तो ऐसी स्थिति में तुम्हारा कर्तव्य यह नहीं कि तुम उसका आजीवन भरण-पोषण करते रहो बल्कि उसे दृढ़तापूर्वक स्वावलम्बी बनाना है।
चरखेकी कक्षाकी प्रगति धीमी है। क्योंकि इस कामको कलाके रूपमें देखनेवाले तथा उसमें रस लेनेवाले व्यक्ति बहुत ही कम है। और इन दो कमियोंके कारण हमारे पास शिक्षकोंकी श्रृंखला भी नहीं है। अत: तुम देखोगे कि ऐसा एक भी शिक्षक नहीं है जो शुरूसे आजतक इसी काम में लगा रहा हो। तुमने इस रहस्यको समझ लिया है। अतः मैं आशा करता हूँ कि तुम इसी काममें लगे रहोगे और उसे आगे बढ़ाओगे।
आशा है तुम दोनों स्वस्थ होगे।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३७३३) की फोटो-नकलसे।<noinclude>{{dhr|4em}}
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९ नवम्बर १९२९}}
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जबतक तुम आश्रम में थे तबतक मुझे अकारण पत्र लिखनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। किन्तु अब लिखना आवश्यक हो गया है। तुम्हें किसी प्रकारकी कठिनाई हो तो मुझे लिखना।
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गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९२८०) से।
सौजन्य: ईश्वरलाल जोशी
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एक पत्र लेखक लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र-लेखकने किसीके द्वारा कही गई उस बातका उल्लेख किया या जिसके अनुसार यदि महात्माजीने फरवरी १९२२ में चौरी-चौरा काण्डके कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित न कर दिया होता तो भारत कबका स्वतन्त्र हो गया होता।</ref>
मनुष्य अपनी पीठकी भाँति ही अपने दोष भी स्वयं नहीं देख सकता। अतएव
बुद्धिमानोंने यह सलाह दी है कि अन्य लोगोंको हममें जो दोष दिखाई दें और वे
हमारा ध्यान उनकी ओर आकर्षित करायें तो हम सदा उन्हें समझने के लिए तैयार रहें; अवीरतावश या गुस्से में आ कर अपने दोष बतानेवालेका अनादर न करें। मैं इस बातको जानता हूँ और इसी कारण अपने दोष बतानेवालोंका में सदासे स्वागत करता रहा हूँ। लेकिन मेरे सामने एक विकट समस्या सदा रही है एक ही बात
सब लोगोंको दोष नहीं जान पड़ती। कई जिसे गुण मानते हैं उसीको दूसरे दोष
समझते हैं। ऐसी संकटमय अवस्थामें मुझ-जैसा व्यक्ति क्या करे? ऐसी अवस्था में टीकाकारको बातपर निष्पक्षतापूर्वक विचार करनेपर भी अगर वह हमारे गले न उतरे तो अन्तरात्मा जो कुछ कहे वही करना चाहिए। बारडोली के सम्बन्धमें मेरी ठीक यही स्थिति है। आज तक तो मैं यही मानता रहा हूँ कि बारडोलीकी लड़ाईको स्थगित करके, मैंने देश और जगतकी सेवा ही की है। मुझे विश्वास है कि इतिहास उसे भोरता नहीं मानेगा बल्कि पूर्ण सत्याग्रहके रूपमें उसका परिचय देगा। मैं तो
उसका परिणाम भी अच्छा ही देख रहा हूँ। अगर दुराग्रहपूर्वक मैं उस आन्दोलनको
चलता रहता तो देश व्यर्थ में हो कुचल दिया जाता। आन्दोलनको स्थगित कर देने से<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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९ नवम्बर १९२९}}
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एक पत्र लेखक लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र-लेखकने किसीके द्वारा कही गई उस बातका उल्लेख किया या जिसके अनुसार यदि महात्माजीने फरवरी १९२२ में चौरी-चौरा काण्डके कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित न कर दिया होता तो भारत कबका स्वतन्त्र हो गया होता।</ref>
मनुष्य अपनी पीठकी भाँति ही अपने दोष भी स्वयं नहीं देख सकता। अतएव
बुद्धिमानोंने यह सलाह दी है कि अन्य लोगोंको हममें जो दोष दिखाई दें और वे
हमारा ध्यान उनकी ओर आकर्षित करायें तो हम सदा उन्हें समझने के लिए तैयार रहें; अवीरतावश या गुस्से में आ कर अपने दोष बतानेवालेका अनादर न करें। मैं इस बातको जानता हूँ और इसी कारण अपने दोष बतानेवालोंका में सदासे स्वागत करता रहा हूँ। लेकिन मेरे सामने एक विकट समस्या सदा रही है एक ही बात
सब लोगोंको दोष नहीं जान पड़ती। कई जिसे गुण मानते हैं उसीको दूसरे दोष
समझते हैं। ऐसी संकटमय अवस्थामें मुझ-जैसा व्यक्ति क्या करे? ऐसी अवस्था में टीकाकारको बातपर निष्पक्षतापूर्वक विचार करनेपर भी अगर वह हमारे गले न उतरे तो अन्तरात्मा जो कुछ कहे वही करना चाहिए। बारडोली के सम्बन्धमें मेरी ठीक यही स्थिति है। आज तक तो मैं यही मानता रहा हूँ कि बारडोलीकी लड़ाईको स्थगित करके, मैंने देश और जगतकी सेवा ही की है। मुझे विश्वास है कि इतिहास उसे भोरता नहीं मानेगा बल्कि पूर्ण सत्याग्रहके रूपमें उसका परिचय देगा। मैं तो
उसका परिणाम भी अच्छा ही देख रहा हूँ। अगर दुराग्रहपूर्वक मैं उस आन्दोलनको चलाता रहता तो देश व्यर्थ में ही कुचल दिया जाता। आन्दोलनको स्थगित कर देने से<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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९ नवम्बर १९२९}}
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जबतक तुम आश्रम में थे तबतक मुझे अकारण पत्र लिखनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। किन्तु अब लिखना आवश्यक हो गया है। तुम्हें किसी प्रकारकी कठिनाई हो तो मुझे लिखना।
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मनुष्य अपनी पीठकी भाँति ही अपने दोष भी स्वयं नहीं देख सकता। अतएव
बुद्धिमानोंने यह सलाह दी है कि अन्य लोगोंको हममें जो दोष दिखाई दें और वे
हमारा ध्यान उनकी ओर आकर्षित करायें तो हम सदा उन्हें समझने के लिए तैयार रहें; अवीरतावश या गुस्से में आ कर अपने दोष बतानेवालेका अनादर न करें। मैं इस बातको जानता हूँ और इसी कारण अपने दोष बतानेवालोंका में सदासे स्वागत करता रहा हूँ। लेकिन मेरे सामने एक विकट समस्या सदा रही है एक ही बात
सब लोगोंको दोष नहीं जान पड़ती। कई जिसे गुण मानते हैं उसीको दूसरे दोष
समझते हैं। ऐसी संकटमय अवस्थामें मुझ-जैसा व्यक्ति क्या करे? ऐसी अवस्था में टीकाकारको बातपर निष्पक्षतापूर्वक विचार करनेपर भी अगर वह हमारे गले न उतरे तो अन्तरात्मा जो कुछ कहे वही करना चाहिए। बारडोली के सम्बन्धमें मेरी ठीक यही स्थिति है। आज तक तो मैं यही मानता रहा हूँ कि बारडोलीकी लड़ाईको स्थगित करके, मैंने देश और जगतकी सेवा ही की है। मुझे विश्वास है कि इतिहास उसे भोरता नहीं मानेगा बल्कि पूर्ण सत्याग्रहके रूपमें उसका परिचय देगा। मैं तो उसका परिणाम भी अच्छा ही देख रहा हूँ। अगर दुराग्रहपूर्वक मैं उस आन्दोलनको चलाता रहता तो देश व्यर्थ में ही कुचल दिया जाता। आन्दोलनको स्थगित कर देने से<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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Sanjana Chowdhury
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{{left|चि॰ ईश्वरलाल,}}
जबतक तुम आश्रम में थे तबतक मुझे अकारण पत्र लिखनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। किन्तु अब लिखना आवश्यक हो गया है। तुम्हें किसी प्रकारकी कठिनाई हो तो मुझे लिखना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९२८०) से।
सौजन्य: ईश्वरलाल जोशी
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१५२. बारडोलीकी भूल?'''}}}}
एक पत्र लेखक लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र-लेखकने किसीके द्वारा कही गई उस बातका उल्लेख किया या जिसके अनुसार यदि महात्माजीने फरवरी १९२२ में चौरी-चौरा काण्डके कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित न कर दिया होता तो भारत कबका स्वतन्त्र हो गया होता।</ref>
मनुष्य अपनी पीठकी भाँति ही अपने दोष भी स्वयं नहीं देख सकता। अतएव बुद्धिमानोंने यह सलाह दी है कि अन्य लोगोंको हममें जो दोष दिखाई दें और वे हमारा ध्यान उनकी ओर आकर्षित करायें तो हम सदा उन्हें समझने के लिए तैयार रहें; अवीरतावश या गुस्से में आ कर अपने दोष बतानेवालेका अनादर न करें। मैं इस बातको जानता हूँ और इसी कारण अपने दोष बतानेवालोंका में सदासे स्वागत करता रहा हूँ। लेकिन मेरे सामने एक विकट समस्या सदा रही है एक ही बात सब लोगोंको दोष नहीं जान पड़ती। कई जिसे गुण मानते हैं उसीको दूसरे दोष समझते हैं। ऐसी संकटमय अवस्थामें मुझ-जैसा व्यक्ति क्या करे? ऐसी अवस्था में टीकाकारको बातपर निष्पक्षतापूर्वक विचार करनेपर भी अगर वह हमारे गले न उतरे तो अन्तरात्मा जो कुछ कहे वही करना चाहिए। बारडोली के सम्बन्धमें मेरी ठीक यही स्थिति है। आज तक तो मैं यही मानता रहा हूँ कि बारडोलीकी लड़ाईको स्थगित करके, मैंने देश और जगतकी सेवा ही की है। मुझे विश्वास है कि इतिहास उसे भोरता नहीं मानेगा बल्कि पूर्ण सत्याग्रहके रूपमें उसका परिचय देगा। मैं तो उसका परिणाम भी अच्छा ही देख रहा हूँ। अगर दुराग्रहपूर्वक मैं उस आन्दोलनको चलाता रहता तो देश व्यर्थ में ही कुचल दिया जाता। आन्दोलनको स्थगित कर देने से<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>देश धीमी गति से ही सही लेकिन आगे बढ़ा है, उसमें विवेक-शक्तिका विकास हुआ है और उसके फलस्वरूप जो जागृति आई वह स्थायी बनों है।
बम्बईके गवर्नर या अन्य अफसरोंने जो भी मत व्यक्त किया था, वह असंगत था। “मालिकको ढक्कन में दीख पड़ता है, पड़ोसीको आसमानमें भी नहीं सूझता।”<ref>गुजराती कहावत जिसका तात्पर्य है कि किसी समस्याका इल सम्बन्धित व्यक्तिको ही सूझ सकता है न कि किसी अन्यको।</ref> युद्धका मेरे समान संचालक अथवा उसमें भाग लेनेवाले दूसरे साथी ही उसकी सच्ची परीक्षा कर सकते हैं। जो सेनापति दूसरोंकी टीकासे प्रभावित होकर अपने विश्वासको खो बैठता है, वह अपने पद से हटा देने लायक है। सेनापतिमें अपने निश्चयोंको तोलनेकी शक्ति होनी चाहिए। जो काम करनेकी उसमें शक्ति न हो, ऐसे काम में उसे हाथ
ही नहीं डालना चाहिए।
अपने निर्णयका इतना समर्थन करनेके बाद मैं यह कबूल करने को तैयार हूँ कि सम्भवतः वणिक कुलमें जन्म लेनेके कारण मुझे अपनी कायरताका भान न होता हो। अगर इसे दोष माना जाये तो यह अनिवार्य है। लेकिन इसे निभाना या इस दोषके कारण मेरी सेवाको नामंजूर करना तो जनताकी मर्जीपर निर्भर है। जनता सेवा चाहे और पूर्णता भी चाहे तो ये दोनों बातें कैसे हो सकती हैं? फिर भी मुझे इतना तो कह ही देना चाहिए कि जानते हुए तो अबतक मने किसी भी लड़ाई में पीठ नहीं दिखाई है। १९२०-२१ में जो लड़ाई शुरू हुई थी, वह तो अभी खत्म ही नहीं हुई है। मैंने पराजय स्वीकार नहीं की है। मैं इसी जन्म में स्वराज्य पाने या उसके लिए जूझते हुए मरनेकी आशा लगाये बैठा हूँ। और सत्याग्रहमें हार नामकी कोई वस्तु ही नहीं है। सत्याग्रही एक बार अपना मार्ग निश्चित कर लेने पर फिर पीछे पैर नहीं हटाता। और यदि हटाता है तो वह सत्याग्रही नहीं है।
अगर भविष्य में फिरसे चौरी-चौराके समान कोई काण्ड हो जाये तो मैं क्या करूँगा, इसपर विचार करने की यहाँ आवश्यकता नहीं है। क्योंकि अभीसे इस प्रकारके निर्णय करने की शक्ति मुझमें नहीं है। मेरी इच्छा तो यह है कि जब फिरसे जूझनेका समय आये तब चौरी-चौराके समान काण्डोंको काबू में रखनेके लिए पहलेसे ही मैं व्यूह-रचना कर लूँ। ऐसी व्यूह रचना हो सकेगी या नहीं सो में नहीं जानता। मनुष्य इच्छा करे, उसके लिए प्रयत्न करे, किन्तु उसकी इच्छा पूरी करना तो ईश्वरका ही काम है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १०-११-१९२९|1em}}<noinclude>{{dhr|5em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१७७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१५३. नवयुवक और खेती'''}}}}
खेती करके स्वावलम्बी बननेकी इच्छा रखनेवाले आधुनिक शिक्षाप्राप्त एक साथी लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref>
मैं खुद अपनेको दिलसे किसान मानता हूँ। जब अदालत में बयान देते हुए मैंने अपना धन्धा किसान और बुनकर बताया था तो इसपर कुछ लोग हँसे थे। अपनी शक्तिका विचार करते हुए मैं आज भी अपनेको किसान कहलानेका बिलकुल अधिकारी नहीं मानता; पर मेरी देहमें किसानका खून है इस विषय में मुझे थोड़ा भी सन्देह नहीं है। किसानके जीवनपर मैं मुग्ध हूँ। उसके स्वाभाविक गुणोंका मैं पूजारी हूँ। मौतके सम्बन्धमें उसकी लापरवाही देखकर मुझे ईर्ष्या होती है। उसका गठा हुआ बलिष्ठ शरीर देखकर मुझे अपने कमजोर शरीरपर तरस आता है। मैंने यह प्रत्यक्ष अनुभव किया है कि किसानमें जो सामान्य व्यावहारिक ज्ञान होता है, वह पाठशालामें कभी नहीं मिलता। कुदाली फावड़ा उठाते, कचरा साफ करते और पाखानोंकी सफाई करते मुझे शर्म नहीं आती। बल्कि मुझे ये सब काम करनेमें आनन्द आता है, यानी मैं जानता हूँ कि अगर शरीर मेरा साथ दे और जिसे मैं सेवा कार्य मान बैठा हूँ वह मुझसे छूट जाये या मैं उसे छोड़ दूँ तो आजसे ही जमीन जोतने लगूँ। लेकिन यह तो मेरे नसीब में नहीं था। अतएव साथियोंको खेतीका काम करनेकी प्रेरणा देकर और स्वयं खेतोंपर रहकर ही मैने सन्तोष किया है।
लेकिन खेतीकी महिमासे अवगत होने के कारण जब किसी सुशिक्षितको खेती करते देखता हूँ तो मुझे हर्ष होता है। साथ ही किसानोंके निकट सम्पर्क में आने और खेती प्रयोग सीधे मेरी निगरानीमें होनेके कारण में उसकी विडम्बनाओंसे भी परिचित हूँ। इस हर्ष और विडम्बनाकी झाँकी दिखानेकी इच्छासे मैंने अपने सहयोगीके पत्रका उक्त अंश उद्धृत किया है।
द्रव्य और शारीरिक स्वास्थ्यके अभाव में खेती हो ही नहीं सकती। करोड़पति लाखों बीघे जमीन लेकर उससे द्रव्य पैदा करते हैं। वे खेती नहीं, व्यापार करते हैं। उनकी सफलता तो मजदूरों द्वारा कारखाने चलानेवालोंकी सफलताके समान है। लेकिन जिनके पास परिमित द्रव्य है और जो उसे खेतीमें लगाना चाहते हैं उनमें स्वयं मेहनत करनेकी इच्छा और शक्ति जरूर होनी चाहिए। जितनी सावधानी और जागरूकता की आवश्यकता किसानको होती है उतनी और किसी धन्धेमें नहीं होती।
किसान अगर चाहे तो यत्किंचित् प्रयत्नसे योगी बन सकता है। इसीसे तो ‘उत्तम खेती मध्यम बान, निखिद नौकरी भीख निदान’ वाली कहावत कही जाती है। अतएव अधिक से-अधिक जितने नवयुवक खेती करने लगें उतना ही अच्छा है, इसमें मुझे तनिक भी शंका नहीं। लेकिन मैं जानता हूँ कि यह मार्ग कठिन है और इसी कारण मैंने<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/१७८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|१४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इस बारे में कुछ विशेष नहीं लिखा है। सभीसे यह उत्तम धन्धा अपनानेको नहीं कहा जा सकता। खेती करनेके इच्छुक व्यक्तिको पहले तो चुपचाप किसी किसानके पास रहकर मजदूरी करनी चाहिए। वह पहले हल चलाना, साधारण किसानकी तरह
जमीन और फसलको पहचानना तथा गोल और चौकोर गड्ढों को अच्छी तरह खोदना
सीखे। फिर उसे खेती विषयक पश्चिमी साहित्य पढ़कर आवश्यक ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए। खेतीका रसायनशास्त्र बिलकुल जुदा है। उसे जान लेनेसे हम अपनी खेती में कई आवश्यक सुधार कर सकते हैं। अतएव खेती में सफलता पाने की इच्छा रखनेवाले नौजवान में अगर अटूट धैर्य न हो तो वह इस झमेले में कभी न पड़े। प्रयोग करनेवालेको अपने में आत्मविश्वास भी बढ़ाना चाहिए। आरम्भिक असफलतासे वह हिम्मत कभी न हारे। क्योंकि विफलता ही सफलताकी जननी है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १०-११-१९२९|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१५४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''जापानका परिचय'''}}
जापानमें रहनेवाले एक भारतीयके पत्रका नीचे लिखा अंश<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र-लेखकने जापानियोंकी कुछ विशेषताओं और दोषोंका वर्णन किया था।</ref>पठनीय है:
यह अन्य स्वदेशाभिमानका एक नमूना है। वस्तुतः जापान ऐसा है या नहीं, इसका निर्णय करनेकी हमें आवश्यकता नहीं। हाँ, हमारे स्वदेशाभिमानको ज्ञानमय,
सत्यमय और दयापूर्ण होना चाहिए।
{{c|'''इच्छा होते हुए भी अशक्त'''}}
एक दुःखी भाई लिखते हैं:<ref>पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। खादी पहननेवाले उक्त पत्र-लेखकने अपना अपराध स्वीकार करते हुए गांधीजीसे कोई ऐसा उपाय सुझानेका अनुरोध किया था, जिससे वह व्यभिचारके अधम मार्गको छोड़ सके।</ref>
इन भाईकी विडम्बनाका अनुभव बहुतोंको है और प्राचीन कालसे ऐसा ही होता आया है। अर्जुनने भी भगवानसे यही प्रश्न पूछा था जिसके उत्तरमें इन्द्रिय-दमनका उपाय बताया गया है। आत्माको आत्मा द्वारा यशमें करनेको कहा गया है तथा प्रयत्न और वैराग्यकी बात भी कही गई है। इसके अतिरिक्त भक्तिमार्गका उपदेश भी दिया गया है। असंख्य मनुष्योंने भक्ति द्वारा ही आत्मशुद्धि प्राप्त की है। इन भाईको अपनी कमजोरीका पूरा-पूरा भान है, अतएव इनका रोग असाध्य नहीं कहा जा सकता। इन्हें और इन जैसे लोगोंको इन्द्रिय-दमन करना, मनको वशमें करनेके लिए पूरा समय काममें बिताना और ऐसा प्रयत्न करते हुए रामनाम अथवा ईश्वरका<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||सहयोगकी शर्तें|१४१}}</noinclude>जो भी विशेषण उन्हें प्रिय हो, उसका जप करना चाहिए और इस बातका विश्वास रखना चाहिए कि आखिरकार उनका प्रयत्न अवश्य सफल होगा। ऐसे भी बहुत-से लोग पाये जाते हैं, जो हिम्मत हार कर प्रयत्न करना छोड़ देते हैं, किन्तु फिर भी अपने पापोंकी चर्चा हर किसीसे करके, अनेक तरहके उपाय जानकर, तथा उपायोंपर अमल करनेकी अपनी असमर्थता जता कर पाप करनेका परवाना प्राप्त कर लेते हैं। प्रयत्नकी शिथिलता के कारण ये भाई ऐसी भूल न करें। उन्हें विश्वास रखना चाहिए कि भगवान दुखियोंकी पुकार अवश्य सुनता है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १०-११-१९२९|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१५५. सहयोगकी शर्तें'''<ref>इस लेखके पहले दो अनुच्छेदों को यहाँ नहीं दिया जा रहा है, क्योंकि उनमें उन्हीं बातोंको दुहराया गया है जिनमे “टिप्पणियों", ७-११-१९२९ के उपशीर्षक ‘क्या यह सच है’ में पहले ही कहा जा चुका है।</ref>}}}}
पाठकोंको मेरी यह सलाह है कि वे नेताओंकी बातचीत और उनके कामकाज में अधिक दिलचस्पी न लें। और न उनकी बातोंको जाननेके लिए बहुत अधीर हों। क्योंकि सरकार द्वारा वचन देने और कानूनकी किताब में ‘औपनिवेशिक स्वराज्य’ के दर्ज हो जानेपर भी अगर, जनता उसके योग्य नहीं होगी तो उसे इन बातोंसे
कोई लाभ नहीं होगा। स्वर्णभस्म में चाहे जितनी शक्ति हो लेकिन सेवन करनेवालेमें
अगर उसे पचानेकी ताकत न हो तो उसके लिए वह भस्म निरर्थक ही ठहरेगी। ठीक यही स्थिति ‘औपनिवेशिक स्वराज्य’, आजादी, स्वराज्य अथवा स्वतन्त्रताकी है। नाम भिन्न-भिन्न होनेसे कोई अन्तर नहीं पड़ता। इसे पाने और बनाये रखनेकी ताकत जैसे-जैसे हममें आती जायेगी वैसे-वैसे और उस हदतक, हमें स्वराज्य मिला
माना जायेगा। इस दृष्टिसे तो परिषद् वगैराकी कोई आवश्यकता ही नहीं रहती। परिषद् वगैरा होने की दशामें उससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रतिपक्षी हमारी शक्तिको कुछ अंशोंमें स्वीकार करने को तैयार है। मान लीजिए कि परिषद्हो नेवाली है और उसमें कांग्रेसके प्रतिनिधि भी हैं, तथापि अगर उस समय जनतामें बलकी कमी होगी तो उसका असर परिषद्पर पड़े बिना नहीं रहेगा। अतएव जिन्हें परिषद् में भाग नहीं लेना है, उन्हें तो जनबलको दृढ़ करनेवाले रचनात्मक कामों में ही जुटे रहना चाहिए। अभी तो हमें यहीं पता नहीं है कि वाइसरायकी घोषणाका
ठीक-ठीक अर्थ क्या है। मान लीजिए कि नेताओंके वक्तव्यका अर्थ ही ठीक है, मान लीजिए कि उन्होंने जो शर्तें रखी हैं वे मान ली गई हैं, तो भी जो काम आज हम कर रहे हैं, उनमें ढिलाई नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दोंमें, विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार, खादीका उत्पादन, शराब-बन्दी, हिन्दू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता निवारण<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३३९. भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटोकी विषय समितिमें'''<ref>गांधीजी पहले हिन्दी और फिर अंग्रेजीमें बोले।</ref>}}}}
{{right|लाहौर<br>
२९ दिसम्बर १९२९}}
सभापतिने मुझे आशा दी है कि जो संशोधन पेश किये गये हैं उनपर मैं
आपसे कुछ कहूँ। श्री केलकरने मुझे याद दिलाई कि मैंने अपने प्रथम भाषण में कहा था कि मैं प्रस्तावपर दोबारा नहीं बोलना चाहता। उनका कहना कुछ हदतक सही है। वैसे मैंने कहा यह था कि चूँकि मैं यह नहीं चाहता कि मेरी किसी अपीलका मतदान के समय आपपर कोई प्रभाव पड़े, इसलिए मैं चुप रहना पसन्द करूँगा। मैं चाहता था कि आप अपने मनसे मेरा निजी लिहाज छोड़कर प्रस्तावके गुणदोषपर विचार कर अपनी धारणाके अनुसार इसपर अपना मत दें। परन्तु यदि आप मेरी बात सुनना चाहते हैं कि में संशोधनों और बहुसपर अपना दृष्टिकोण आपके सामने रखूँ तो यह माँग करना आपका अधिकार है और उसे मानना मेरा कर्तव्य है।
'''आवाजें आने लगीं: महात्माजी कृपा करके बोलिए।'''
मैं बोलूँगा। पहले मैं इस बात के लिए क्षमा माँग लूँ कि कल जब बहस चल रही थी, मैं थोड़ी देर के लिए सभासे अनुपस्थित रहा। मैं सिर्फ हाजत रफा करने गया था। प्रस्तावपर जो भाषण हुए उनको मैंने बड़ी सावधानी और ध्यानसे सुना है।
मैं पहले आपको एक चेतावनी दे रहा हूँ। जो प्रस्ताव आपके सामने रखा गया है, वह कार्यसमिति द्वारा प्रस्तावित है। प्रस्तायोंके संशोधनोंपर विचार करते समय आपको इस बातके प्रति सावधान रहना चाहिए कि कार्यसमिति आपने नियुक्त की है और कार्यसमिति के सदस्य आपके सेवक है। आपको अपने सेवकोंपर विश्वास होना चाहिए कि प्रश्नके सभी पहलुओंको ध्यान में रखनेके बाद जबतक वे इसे बिलकुल ही जरूरी नहीं समझते वे कोई भी प्रस्ताव आप पर नहीं थोपेंगे। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि जबतक आपको यह पूरा निश्चय न हो जाये कि कार्यसमिति गलती कर रही है और संशोधनपर जोर देना ही आपका कर्तव्य है, तबतक आप
किसी संशोधनका आग्रह न करें।
यह भी एक नियम है जो सभी सुसंचालित और उत्तरदायी संगठनोंमें बरता
जाता है।
‘वर्तमान परिस्थितियोंमें‘ शब्दोंके कारण कई एक वक्ताओंको त्रुटियोंका कुछ शक हुआ है, मैं उनका उल्लेख नहीं करूँगा। मैं इस बातसे बिलकुल सहमत हूँ कि समझौते के सभी दरवाजे सदाके लिए बन्द रहेंगे, यह सोचना सही नहीं होगा। किसी-न-किसी वक्त गोलमेज परिषद या चौकोर मेज परिषद जरूर होगी। बहुतसे लोग कहते हैं कि यदि हमने एक बार स्वतन्त्रताको अपना उद्देश्य घोषित कर दिया<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तो फिर किसी परिषदकी गुंजाइश नहीं रहेगी। अगर आप हिंसाको ही अपना सिद्धान्त मान लें तो भी शान्ति परिषद तो होगी ही। प्रश्न सिर्फ यह है कि परिषद में चर्चा किस बातपर की जायेगी? मैं आपसे कह सकता हूँ कि अब चूँकि कांग्रेस स्वतन्त्रताकी घोषणा कर रही है, किसी भी कांग्रेसीके लिए यह उपयुक्त नहीं होगा कि वह औपनिवेशिक स्वराज्य पर विचार-विमर्श करनेके लिए किसी भी परिषद में जाये। कांग्रेसी सिर्फ स्वतन्त्रताकी चर्चा करनेके लिए किसी परिषदमें जा सकते हैं।
शिकायत की गई है कि सबकी सहमतिसे प्राप्त जो वक्तव्य समाचारपत्रों में
प्रकाशित हो चुका है उसमें हमने वह बातचीत जाहिर नहीं की है जो वाइसराय, नेहरूजी, मेरे और दूसरे नेताओंके बीच हुई थी। जितना कुछ आपको जानना आवश्यक था और जो-कुछ जाननेका आपको अधिकार था वह सब बता दिया गया है। नेहरूजी आपके इतके रूपमें वाइसरायसे मिलने गये और उनपर विश्वास किया जाना चाहिए। वाइसरायके साथ हुई बातचीत के बारेमें जो कुछ प्रकाशित हुआ है उसे ध्यान में रखते हुए ‘वर्तमान परिस्थितियोंमें’ ये शब्द बिलकुल समझ में आ सकते हैं।
पण्डित मालवीय और श्री केलकरने निर्णयको स्थगित करनेकी वकालत की है। मुझे उनके प्रति बड़ा आदर और स्नेह है। उन्होंने सर्वदलीय परिषदको फिरसे सक्रिय करनेकी वकालत की है। सर्वदलीय परिषदको लेकर मेरे मनमें कोई खेद नहीं है। उसने बहुत महत्त्वपूर्ण काम किया है। उसने कांग्रेसी और दूसरे दलोंके नेताओंको नजदीक कर दिया। उससे उन्हें एक दूसरेको समझने में मदद मिली है, उनके बीच सहयोगकी भावना आई है। उदारवादी और दूसरे दोस्त उसके कारण हमारे ज्यादा नजदीक आये हैं। इसलिए सर्वदलीय परिषद द्वारा किये गये इस बहुत उपयोगी कामका मुझे
पूरा एहसास है।
पण्डित मालवीय और उन जैसे अन्य मित्रोंको मेरा जवाब यह है कि हम
कांग्रेसजनोंको अपना कर्त्तव्य पालन करना है। हमें अपना कार्यक्रम बनाना है। हम जो आश्वासन चाहते थे, उसका वाइसराय द्वारा न दिया जाना और दूसरी शर्तोंका पूरा न करना हमारे कर्तव्य-पथको स्पष्ट कर देता है।
कलकत्तामें मैने दो सालका वक्त दिये जानेकी वकालत की थी। अगर इतना वक्त दिया गया होता तो मुझे खुशी होती। इससे हमें तैयारीके लिए अधिक समय मिल जाता। परन्तु अपने उन नवयुवकोंकी, जो प्रगतिकी और तीव्र करना चाहते थे, आकांक्षाएँ पूरी करनेके विचारसे, मैं दो सालके बजाय एक सालके लिए राजी हो गया। मुझे अपनी प्रतिज्ञापर अटल रहना होगा। मेरा विश्वास है कि अगर राष्ट्र एक बार कोई निश्चय कर ले, तो चाहे कुछ भी परिणाम क्यों न हों, फिर उसे उसपर दृढ़ रहना चाहिए। अन्यथा यह हमें गिरानेवाली एक बात होगी। इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप स्वतन्त्रताके लिए घोषणा कर दें और अपना दृढ़ निश्चय कायम रखें। हममें ऐसे लोग भी हैं, जिनका विश्वास है कि अभी हम स्वतन्त्रताकी घोषणा करने योग्य समर्थ नहीं हुए हैं। यदि आपकी यही राय है और यदि आप सोचते हैं कि स्वतन्त्रताकी घोषणा करना गलत कदम है तो ऐसा कहने में संकोच मत कीजिएगा। यह अनुरोध किया जा रहा है कि जबतक विभिन्न सम्प्रदायोंमें परस्पर एकता स्थापित<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३७९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: अ॰ भा॰ का॰ कमेटीकी विषय समितिमें|३४१}}</noinclude>न हो जाये, स्वतन्त्रताके लिए घोषणा स्थगित कर देनी चाहिए। मैं इस दृष्टिकोणसे सहमत नहीं हूँ। राष्ट्र, एक बार कोई दृढ़ निश्चय कर लें तो उन्हें उसे चाहे मुट्ठीभर लोगोंका समर्थन मिले या लाखों लोगोंका, अपने दृढ़ निश्चयोंपर अडिग रहना चाहिए। निस्सन्देह हमें अपने ज्यादासे-ज्यादा देशवासियोंका समर्थन पानेकी कोशिश तो करनी ही है।
अब मैं बहिष्कारोंका जिक्र करूँगा। मुझसे पूछा गया है कि अदालतों और
स्कूलोंका बहिष्कार शामिल क्यों नहीं किया गया है। मैं आपको साफ तौरपर कह दूँ कि मैं तीनों बहिष्कारोंमें से किसी एकको भी छोड़ देनेके पक्षमें कदापि नहीं हूँ। वास्तवमें मैं पाँच प्रकारका बहिष्कार चाहता हूँ। परन्तु यह दूसरी बात है। मैं निश्चय ही तीन बहिष्कारोंके पक्षमें हूँ। यह मेरा विचार है। परन्तु क्या हम इसके लिए तैयार हैं? राष्ट्रके एक सदस्यके नाते मुझे राष्ट्रके साथ अवश्य कदम मिलाकर चलना है। यह अनुभव किया जा रहा है कि वकीलों और विद्यार्थियोंके आह्वानका अभी वक्त नहीं आया है, इसलिए मैंने सिर्फ कौंसिलों और स्थानीय संस्थाओंका बहिष्कार शामिल किया है। यदि आप समझते हैं कि वैसा आह्वान करनेका वक्त आ गया है और उस आह्वानका मन्तव्य पूरा हो जायेगा तो जरूर कीजिए।
कौंसिल-बहिष्कार की चर्चा में अध्यक्ष पटेलके बहादुरीके कारनामोंकी याद दिलाई गई है। अध्यक्ष पटेलकी जो उपलब्धियां हैं उनके लिए पटेलकी श्लाघामें मैं किसीसे पीछे नहीं रहता। मैं मानता हूँ कि उन्होंने भारत और भारतीयोंकी इज्जत और मानको बढ़ाया है, परन्तु अध्यक्ष पटेल, या विधानसभा या विधान परिषदके प्रस्ताव, कोई भी हमें स्वतन्त्रता नहीं दिला सकते। वे हमें औपनिवेशिक स्वराज्य भी नहीं दिला सकते। परिषदोंका बहिष्कार स्वीकार करनेमें कार्यसमिति एकमत थी।
जहाँतक स्थानीय संस्थाओं और नगरपालिकाओंका सम्बन्ध है, मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि उन्हें मैंने अपने मूल मसविदेमें शामिल नहीं किया था, परन्तु मैं इसमें विश्वास नहीं करता कि स्थानीय संस्थाएँ राष्ट्रीय कार्यका कोई हित कर सकती हैं। पण्डित जवाहरलाल जो इलाहाबाद नगरपालिकाके अध्यक्ष थे, बाबू राजेन्द्रप्रसाद जो पटना नगरपालिकाके अध्यक्ष थे और सरदार वल्लभभाई पटेल जो अहमदाबाद नगरपालिकाके अध्यक्ष थे――उनके अनुभव मेरे विचारको पुष्ट करते हैं। मेरे कोई निजी अनुभव नहीं हैं। बहरहाल में आपको बता सकता हूँ कि यदि सरदार पटेल
अहमदाबाद नगरपालिकाका अध्यक्षपद नहीं छोड़ते तो बारडोली आन्दोलन नामकी कोई चीज न होती। मैंने ऐसी स्थानीय संस्थाएँ कदाचित् ही देखी हैं जिन्होंने लोगोंके हित में वृद्धि की हो। मैं चाहता हूँ कि ग्रामीण लोगोंको प्रोत्साहन दिया जाये। हम स्वतन्त्रताकी माँग करते हैं; परन्तु हम छोटे-छोटे लाभ छोड़नेके लिए भी तैयार नहीं हैं। छोटे लाभ छोड़ने के लिए तो हमें तैयार रहना ही चाहिए। हमें केवल उन्हीं लाभोंको अपनाये रखना चाहिए जो हमें अपने ध्येयतक पहुँचने में सहायता दें। परन्तु ये तो मेरे निजी विचार हैं। निर्णय आप लोगोंपर निर्भर है।<ref>अगला अनुच्छेद-'''ट्रिव्यून'''से लिया गया है।</ref><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: अ॰ भा॰ का॰ कमेटीकी विषय समितिमें|३४१}}</noinclude>न हो जाये, स्वतन्त्रताके लिए घोषणा स्थगित कर देनी चाहिए। मैं इस दृष्टिकोणसे सहमत नहीं हूँ। राष्ट्र, एक बार कोई दृढ़ निश्चय कर लें तो उन्हें उसे चाहे मुट्ठीभर लोगोंका समर्थन मिले या लाखों लोगोंका, अपने दृढ़ निश्चयोंपर अडिग रहना चाहिए। निस्सन्देह हमें अपने ज्यादासे-ज्यादा देशवासियोंका समर्थन पानेकी कोशिश तो करनी ही है।
अब मैं बहिष्कारोंका जिक्र करूँगा। मुझसे पूछा गया है कि अदालतों और
स्कूलोंका बहिष्कार शामिल क्यों नहीं किया गया है। मैं आपको साफ तौरपर कह दूँ कि मैं तीनों बहिष्कारोंमें से किसी एकको भी छोड़ देनेके पक्षमें कदापि नहीं हूँ। वास्तवमें मैं पाँच प्रकारका बहिष्कार चाहता हूँ। परन्तु यह दूसरी बात है। मैं निश्चय ही तीन बहिष्कारोंके पक्षमें हूँ। यह मेरा विचार है। परन्तु क्या हम इसके लिए तैयार हैं? राष्ट्रके एक सदस्यके नाते मुझे राष्ट्रके साथ अवश्य कदम मिलाकर चलना है। यह अनुभव किया जा रहा है कि वकीलों और विद्यार्थियोंके आह्वानका अभी वक्त नहीं आया है, इसलिए मैंने सिर्फ कौंसिलों और स्थानीय संस्थाओंका बहिष्कार शामिल किया है। यदि आप समझते हैं कि वैसा आह्वान करनेका वक्त आ गया है और उस आह्वानका मन्तव्य पूरा हो जायेगा तो जरूर कीजिए।
कौंसिल-बहिष्कार की चर्चा में अध्यक्ष पटेलके बहादुरीके कारनामोंकी याद दिलाई गई है। अध्यक्ष पटेलकी जो उपलब्धियां हैं उनके लिए पटेलकी श्लाघामें मैं किसीसे पीछे नहीं रहता। मैं मानता हूँ कि उन्होंने भारत और भारतीयोंकी इज्जत और मानको बढ़ाया है, परन्तु अध्यक्ष पटेल, या विधानसभा या विधान परिषदके प्रस्ताव, कोई भी हमें स्वतन्त्रता नहीं दिला सकते। वे हमें औपनिवेशिक स्वराज्य भी नहीं दिला सकते। परिषदोंका बहिष्कार स्वीकार करनेमें कार्यसमिति एकमत थी।
जहाँतक स्थानीय संस्थाओं और नगरपालिकाओंका सम्बन्ध है, मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि उन्हें मैंने अपने मूल मसविदेमें शामिल नहीं किया था, परन्तु मैं इसमें विश्वास नहीं करता कि स्थानीय संस्थाएँ राष्ट्रीय कार्यका कोई हित कर सकती हैं। पण्डित जवाहरलाल जो इलाहाबाद नगरपालिकाके अध्यक्ष थे, बाबू राजेन्द्रप्रसाद जो पटना नगरपालिकाके अध्यक्ष थे और सरदार वल्लभभाई पटेल जो अहमदाबाद नगरपालिकाके अध्यक्ष थे――उनके अनुभव मेरे विचारको पुष्ट करते हैं। मेरे कोई निजी अनुभव नहीं हैं। बहरहाल में आपको बता सकता हूँ कि यदि सरदार पटेल अहमदाबाद नगरपालिकाका अध्यक्षपद नहीं छोड़ते तो बारडोली आन्दोलन नामकी कोई चीज न होती। मैंने ऐसी स्थानीय संस्थाएँ कदाचित् ही देखी हैं जिन्होंने लोगोंके हित में वृद्धि की हो। मैं चाहता हूँ कि ग्रामीण लोगोंको प्रोत्साहन दिया जाये। हम स्वतन्त्रताकी माँग करते हैं; परन्तु हम छोटे-छोटे लाभ छोड़नेके लिए भी तैयार नहीं हैं। छोटे लाभ छोड़ने के लिए तो हमें तैयार रहना ही चाहिए। हमें केवल उन्हीं लाभोंको अपनाये रखना चाहिए जो हमें अपने ध्येयतक पहुँचने में सहायता दें। परन्तु ये तो मेरे निजी विचार हैं। निर्णय आप लोगोंपर निर्भर है।<ref>अगला अनुच्छेद-'''ट्रिव्यून'''से लिया गया है।</ref><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३८०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
हम असहयोग केवल क्रमशः कर सकते हैं। कृपया प्रस्ताव में परिवर्तन न करें क्योंकि यह एक पूर्ण प्रस्ताव है। परन्तु गोल-मोल तरीकेसे बात मत कीजिए। यदि आपको मेरे प्रस्तावपर विश्वास नहीं तो मतदान द्वारा इसे गिरा दीजिए या इसमें संशोधन कर दीजिए। मैंने अदालतोंका बहिष्कार शामिल नहीं किया क्योंकि उसकी प्रतिक्रिया सम्बन्ध में मुझे निश्चित रूपसे पता नहीं था।
अब मैं इस प्रस्तावकी भूमिका अर्थात् दिल्ली घोषणापत्रके समर्थन और वाइसरायकी तारीफके बारेमें उठाई गई आपत्तियोंकी बातपर आता हूँ। वह भूमिका अत्यन्त आवश्यक थीं। नेताओंने औपनिवेशिक स्वराज्य पानेकी गारंटीके लिए किसी भी बातचीत के लिए अपने-आपको तैयार रखकर कलकत्ता प्रस्तावके आज्ञानुसार ही काम किया है। जहाँतक वाइसरायकी तारीफका सम्बन्ध है, पण्डित मोतीलालजी, और मैं दोनों ऐसा महसूस करते हैं कि वाइसराय एक सच्चे व्यक्ति हैं, जो हृदयसे शान्ति बनाये रखना चाहते हैं। मैं समझता हूँ कि मैं वाइसरायके बारेमें इतना कह सकता हूँ। वाइसरायके साथ सम्पर्क में आनेके परिणामस्वरूप मेरी ऐसी धारणा बनी है। यही नेहरूजीका भी विचार है।
स्वतन्त्रता अहिंसा द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती――इस तरहकी जो शंकाएँ
व्यक्त की गई हैं, अब मैं उनपर चर्चा करूँगा। मैं इस विचारसे सहमत नहीं हूँ। यदि आप मुझसे सहमत नहीं हैं और यदि आप यह महसूस ही करते हैं कि हमें हिंसाकी बात अपने ध्यानसे एकदम नहीं निकाल देनी चाहिए तो वैसा कहिए और सिद्धान्तको बदल दीजिए। मेरे लिहाजसे अपने हाथ मत रोकिए। आपका जैसा दृढ़ विश्वास हो वैसा कीजिए। खैर, मैं आपको अपनी धारणा बता दूँ। वह यह है कि यदि राष्ट्र अहिंसाके कार्यक्रमको पूरी ईमानदारीसे निभा दे तो अपने ध्येयकी प्राप्तिके बारेमें कोई शककी गुंजाइश नहीं है। यदि हम सरकारी खजानेको करोंकी अदायगी करके अपने पैसोंसे न भरें, यदि हमारे सिपाही सेवा करनेसे इनकार कर दें और फौजसे बाहर आ जायें, यदि हमारे वकील अदालतोंका बहिष्कार कर दें, यदि हमारे विद्यार्थी स्कूलोंका बहिष्कार कर दें, तो शककी गुंजाइश ही कहाँ रह जाती है? हिंसाकी आवश्यकता ही कहाँ है? हमारे राष्ट्रके तीस करोड़ लोगोंके लिए हिंसाकी कोई आवश्यकता नहीं है। आपके द्वारा इस अहिंसाके सिद्धान्तकी इतने बरसों तक परीक्षा की जा चुकनेके बाद तो अहिंसाकी अमोघता और शक्तिपर मैं आपसे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता। दस साल बीत चुकनेपर भी जब आप इसकी शक्तिके बारेमें आश्वस्त नहीं हैं, तो मैं इसके प्रतिवादमें क्या कह सकता हूँ? पिछले दस सालोंकी कार्य विधिका पुनर्वेक्षण कीजिए। राष्ट्रीय जागृति, राष्ट्रीयताका आग्रह, विचार-स्वातन्त्र्य और लोगोंने जो मेल-जोल और काम करके दिखाया है उसपर नजर डालिए। क्या ये अहिंसाके सिद्धान्तके कार्यान्वित होनेके परिणाम नहीं है? परन्तु यदि आप मुझसे सहमत नहीं हैं तो अहिंसा-सिद्धान्तके विरोध में मत देनेमें संकोच मत कीजिए। ऐसा मत कीजिए कि आपके मनमें एक बात हो और आप कहें कुछ दूसरी स्पष्टवादी और उत्साही बनिए और अपनी धारणाओंके अनुसार मत दीजिए।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३८१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें|३४३}}</noinclude>
उसके बाद महात्मा गांधी हिन्दी भाषणमें कही बातोंका प्रत्याख्यान करते हुए अंग्रेजीमें बोले। उन्होंने इस बातपर बल दिया कि उनका मालवीयजी, श्री केलकर और दूसरे दोस्तोंके प्रति जो मान और स्नेह है उसके कारण वह उस पथसे जो उन्हें ऐसा लगा है कि राष्ट्रके हितमें है, सम्भवतः विचलित नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि मुझे मालूम है कि सर्वदलीय परिषदके निर्णयको पीछे सब दलोंकी सहमति प्राप्त है, परन्तु तत्काल औपनिवेशिक स्वराज्य न मिलनेपर भी उस सर्वसम्मतिपर कायम रहना बहुत महँगा पड़ेगा। यदि लोगोंने इस सर्वसम्मतिका स्थाल नहीं किया है तो यह सिर्फ दुबारा एक-दूसरे के नजदीक आनेके लिए किया गया और अब औपनिवेशिक स्वराज्य के मंचपर नहीं, स्वतन्त्रताके मंच पर। मैं जानता हूँ कि यहाँ, इंग्लंडमें और दूसरी जगह उनकी बड़ी भर्त्सना की जायेगी; परन्तु राष्ट्र के हितमें उन्हें यह खतरा मोल लेना ही पड़ेगा।
जहाँतक प्रस्तावके संविधान सभाओंके बहिष्कारसे सम्बन्धित भागका सम्बन्ध
था महात्मा गांधीने घोषणा की कि मेरी अब भी केवल त्रिविध बहिष्कारमें नहीं, अपितु पंचविध बहिष्कारमें, जिसे मैंने मूल रूप में प्रस्तुत किया था, आस्था है। परन्तु मैं वहाँतक चल सकता हूँ जहाँतक राष्ट्र मेरा साथ दे। इसमें सिद्धान्तकी कोई बात नहीं है और जब मैंने देखा कि अत्यन्त श्रद्धेय साथी और मित्र मुझसे सहमत नहीं है; मैंने ईमानदारीसे उनका निर्णय स्वीकार कर लिया और संविधान सभाओं में प्रवेश कार्यक्रम जहाँतक बन पड़ा उनका साथ दिया। परन्तु जब मुझे उन साथियोंने उनको जो अनुभव हुआ है वह बताया और कहा कि जो कुछ उनसे हमें मिल चुका है उससे ज्यादा उनके द्वारा और कुछ प्राप्त नहीं किया जा सकता, तो मुझे प्रसन्नता हुई और मैंने विधानसभाओंके बहिष्कारका विचार उनके सामने रखा। अदालतों और स्कूलोंके बहिष्कारके बारेमें में वही बात नहीं कह सकता। परन्तु जब ऐसा वक्त आयेगा तो मैं प्रसन्नतासे वह बात भी विचार के लिए प्रस्तुत करूँगा। परन्तु इस वक्त जहाँतक मैं देशकी विचारधाराको समझ सका हूँ, इन दो बहिष्कारोंके लिए अभी उपयुक्त वातावरण नहीं है।
जहाँतक स्थानीय संस्थाओंके बहिष्कारका सम्बन्ध है, इसे कार्यसमितिने अपने एक सदस्यके सुझावपर स्वीकार किया था। इस सदनको यह निर्णय करना है कि इनका बहिष्कार किया जाये या नहीं। परन्तु मेरा विचार है कि इन संस्थाओंके द्वारा आजादी नहीं मिल सकती और इन संस्थाओंका जो सरकारकी ही ईजाद की हुई हैं और जिन्हें अभी किसी सीमातक ही सही, सरकारसे मदद की अपेक्षा रहती है, जितना कम मुँह ताका जाये उतना ही अच्छा है।
बीमा-कम्पनियों और बैंकों आदिके बहिष्कार के बारेमें बहुत-कुछ कहा जा चुका है। जहाँतक मेरा सम्बन्ध है, मैं उस सारे कार्यकलापको जिससे सरकारका सम्बन्ध है, छोड़ देनेका प्रयत्न अवश्य ही करूँगा; लेकिन असहयोग के मेरे जैसे सूत्रधार के लिए<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३८२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>भी यह कर सकता असम्भव रहा है, इसे स्वीकार करते हुए उन्हें लज्जा तो आती है परन्तु यही बात सही है।<ref>आगेका अंश '''ट्रिव्यून'''से लिया गया है।</ref>
जहाँतक प्रस्तावकी भूमिकाका सम्बन्ध है महात्मा गांधीने इस बात पर बल
दिया कि अहिंसा-धर्म में सामान्य शालीनता तो अनिवार्य रूपसे निहित ही है।
यदि कोई अंग्रेज भारतका हित चाहता है और यह सदन उसके प्रति शालीनता नहीं दिखाता तो वह इस सदन के अनुरूप बात नहीं होगी। मैं अंग्रेजोंको हानि पहुँचाकर स्वतन्त्रताका प्रतिपादन नहीं करना चाहता। यह अंग्रेजों के हितमें है कि वे भारतसे चले जायें; परन्तु मैं नहीं चाहता कि उन्हें एक भी गोली चलाकर भगाया जाये।
आगे बोलते हुए महात्मा गांधीने इस बातको साफ करते हुए कहा कि मेरे
पास अंग्रेजोंको भारतसे विदा करनेसे ज्यादा प्रभावपूर्ण तरीके हैं। वे ये हैं कि उन्हें सलाम करना और महसूल देना बन्द कर दिया जाये। जिस क्षण लोग ऐसा करने लगेंगे उसी वक्त अंग्रेजोंको गुलामोंके मालिक होनेकी हैसियत समाप्त हो जायेगी। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि वाइसरायकी उनपर और पण्डित मोतीलालपर यही छाप पड़ी है कि वे ईमानदार आदमी हैं।
अन्तमें गांधीजीने उस संशोधनके बारेमें अपना अभिप्राय प्रकट किया जिसके अनुसार पूर्ण स्वतन्त्रताका केवल शान्तिपूर्ण उपायोंसे ही नहीं अपितु सभी सम्भव उपायों द्वारा प्राप्त किया जाना जरूरी था। उन्होंने कहा कि राष्ट्रने असहयोग आन्दोलन द्वारा भयको बहुत हदतक त्याग दिया है। यदि आपमें यह विश्वास नहीं है कि अहिंसा और सत्यसे न केवल औपनिवेशिक स्वराज्य, जो अब सदाके लिए अतीतकी वस्तु बन गया है, बल्कि स्वतन्त्रता तक प्राप्त हो सकती है, तो आपको इस [संशोधन] का समर्थन करना चाहिए।
{{right|[अंग्रेजीसे]<br>
'''अमृत बाजार पत्रिका,''' ३१-१२-१९२९<br>
'''ट्रिब्यून,''' ३१-१२-१९२९}}<noinclude>{{dhr|9em}}
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जहाँतक प्रस्तावकी भूमिकाका सम्बन्ध है महात्मा गांधीने इस बात पर बल
दिया कि अहिंसा-धर्म में सामान्य शालीनता तो अनिवार्य रूपसे निहित ही है।
यदि कोई अंग्रेज भारतका हित चाहता है और यह सदन उसके प्रति शालीनता नहीं दिखाता तो वह इस सदन के अनुरूप बात नहीं होगी। मैं अंग्रेजोंको हानि पहुँचाकर स्वतन्त्रताका प्रतिपादन नहीं करना चाहता। यह अंग्रेजों के हितमें है कि वे भारतसे चले जायें; परन्तु मैं नहीं चाहता कि उन्हें एक भी गोली चलाकर भगाया जाये।
आगे बोलते हुए महात्मा गांधीने इस बातको साफ करते हुए कहा कि मेरे
पास अंग्रेजोंको भारतसे विदा करनेसे ज्यादा प्रभावपूर्ण तरीके हैं। वे ये हैं कि उन्हें सलाम करना और महसूल देना बन्द कर दिया जाये। जिस क्षण लोग ऐसा करने लगेंगे उसी वक्त अंग्रेजोंको गुलामोंके मालिक होनेकी हैसियत समाप्त हो जायेगी। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि वाइसरायकी उनपर और पण्डित मोतीलालपर यही छाप पड़ी है कि वे ईमानदार आदमी हैं।
अन्तमें गांधीजीने उस संशोधनके बारेमें अपना अभिप्राय प्रकट किया जिसके अनुसार पूर्ण स्वतन्त्रताका केवल शान्तिपूर्ण उपायोंसे ही नहीं अपितु सभी सम्भव उपायों द्वारा प्राप्त किया जाना जरूरी था। उन्होंने कहा कि राष्ट्रने असहयोग आन्दोलन द्वारा भयको बहुत हदतक त्याग दिया है। यदि आपमें यह विश्वास नहीं है कि अहिंसा और सत्यसे न केवल औपनिवेशिक स्वराज्य, जो अब सदाके लिए अतीतकी वस्तु बन गया है, बल्कि स्वतन्त्रता तक प्राप्त हो सकती है, तो आपको इस [संशोधन] का समर्थन करना चाहिए।
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'''अमृत बाजार पत्रिका,''' ३१-१२-१९२९<br>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४०. पत्र: आश्रमकी बहनोंको'''}}}}
{{right|लाहौर<br>
मौनवार, ३० दिसम्बर, १९२९}}
{{left|बहनो,}}
आज मौनवारको तुम्हारी याद आ रही है और यह बतानेके लिए ही यह पत्र लिख रहा हूँ। वहाँ ५ तारीखको पहुँचनेकी आशा रखता हूँ। ठण्ड काफी पड़ रही है। इस समय चारों तरफसे आवाज आ रही है। मैं सभामें बैठा हूँ इसलिए अधिक लिखनेकी कोशिश नहीं करूँगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३७१४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३४१. पत्र: रमणीकलाल मोदीको'''}}}}
{{right|लाहौर<br>
३० दिसम्बर, १९२९}}
{{left|चि॰ रमणीकलाल,}}
आज मेरा मौनवार होनेके बावजूद जवाहरलाल मुझे विषय समितिमें घसीट लाये हैं। वहीं बैठा हुआ मैं पत्र लिख रहा हूँ। कुछ खास लिखनेको नहीं है किन्तु मौनवारको मैं जहाँ होता हूँ, वहाँ तुम सबकी याद तो आती है। इसलिए इतना भर लिखे दे रहा हूँ।
ऐसा लगता है कि हम यहाँसे शायद ३ तारीखको रवाना हो सकेंगे। ऐसी
स्थिति आ खड़ी हुई है कि मैं छूट ही नहीं सकता।
अच्छी-खासी ठंड पड़ रही है और सब उसे महसूस कर रहे हैं।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च:]}}
आशा है डा॰ मेहतासे सबका परिचय हो गया होगा। उनकी अच्छी तरह देखभाल होती होगी।
गुजराती (जी॰ एन॰ ४१७०) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३८४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४२. भाषण: अ॰ भा॰ का॰ कमेटीकी विषय समितिमें―१'''<ref>गांधीजीने हिन्दीमें भाषण दिया जो उपलब्ध नहीं है।</ref>}}}}
{{right|३० दिसम्बर १९२९}}
प्रस्तावपर बोलने से पहले मैं सभापतिकी इजाजतसे एक बातका जिक्र करूँगा। श्री हरिसर्वोत्तम रावने कौंसिल बहिष्कार संशोधन पर मुझसे अपील की थी कि इस विषय पर [सदस्योंकी] भावनाओंको ध्यान में रखते हुए मुझे कौंसिल बहिष्कारकी बात [प्रस्ताव में से] निकाल देनी चाहिए, अन्यथा आपसमें झगड़ा बढ़ेगा। अब इस बातको ध्यान में रखते हुए कि संशोधन एक ही अधिक मतसे गिरा<ref>११६ मत पक्षमें और ११७ विपक्षमें आये।</ref> है श्री राजाने मुझसे मुख्य प्रस्तावकी<ref>नृ॰ चि॰ केलकर द्वारा प्रस्तुत किया गया। ११३ मत पक्ष में और ११४ विपक्षमें आनेसे गिर गया। संशोधन राष्ट्रीय संघर्षको शान्तिमय उपायोंसे सुलझानेकी दिशा में वाइसराय द्वारा की गई सेवाओं की प्रशंसाका जिक्र प्रस्तावमें से निकाल देनेकी बात थी।</ref> भूमिका निकाल देनेके लिए अपील की है।
श्री हरिसर्वोत्तम राव मुझे याद दिलाते हैं कि मैंने इलाहाबादमें अपने हाथ किस तरह रोके लिये थे और इसलिए अब भी मुझे वैसा ही करना चाहिए। मैं आपको बता दूँ कि यदि यह मेरे हाथमें हो और साथ ही ऐसा करनेका कोई महत्त्व हो, और यदि मैं समझें कि इसमें देशका हित है, तो मैं कौंसिल बहिष्कारका अपना प्रस्ताव एक बार नहीं सौ बार वापस ले लूँगा। मैंने मुख्य प्रस्ताव आपके सामने अपनी ओरसे नहीं, बल्कि कार्यसमितिकी ओरसे रखा है। अगर यह बात केवल मुझपर ही छोड़ दी जाती तो मैंने आपके सामने त्रिसूत्री वहिष्कार रखा होता। उस संशोधनको
जो एक ही मतपर गिर गया है, स्वीकार कर लेनेके लिए मुझसे जो अपील की गई है उसके सम्बन्धमें मैं आपको याद दिला दूँ कि हम लोकतान्त्रिक संविधानके अन्तर्गत काम करनेका दावा करते हैं। आज एक मतका मतलब यह हुआ है कि संशोधन गिर गया है। परन्तु एक अधिक मत दूसरी ओर होता तो इसका मतलब होता कि संशोधन बरकरार है। आपको ध्यान इस बातपर देना है कि क्या संशोधनके गिर जानेसे देशको हानि होगी।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे कानिकल,''' ३१-१२-१९२९|1em}}<noinclude>{{dhr|5em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३८५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३४३. भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें―२'''}}}}
{{right|३० दिसम्बर, १९२९}}
:{{gap}}'''यह कांग्रेस विदेशी वस्त्र बहिष्कार समिति, छुआछूत विरोधी समिति और मद्य-निषेध समितिको सुपुर्द किये हुए काम पूरी शक्तिसे कार्यान्वित करनेके लिए उन्हें बधाई देती है परन्तु खेदपूर्वक विचार प्रकट करती है कि राष्ट्रकी ओरसे इस दिशामें उतना प्रोत्साहन नहीं मिला जितना पानेकी आशा करनेका कांग्रेसको अधिकार था। इन समितियों और अखिल भारतीय चरखा संघसे जो अनुभव हुआ उससे यह पता चलता है कि विशेष तरहके कामोंके लिए बनाई गई ऐसी स्वायत्त संस्थाओं द्वारा काफी प्रभावशाली काम सम्भव है। इसलिए यह कांग्रेस पूर्वोक्त समितियोंको स्थायी घोषित करती है। वे समितियाँ सर्वथा स्वायत्त होंगी और उन्हें अपनी संख्या में वृद्धि करने और अपने-अपने संविधान बनाने और चन्दा उगाहनेके अधिकार होंगे बशर्ते कि वे कांग्रेसकी सामान्य नोतिका अनुसरण करें और यदि कभी कांग्रेसको ऐसा लगे कि इनमें से कोई भी संस्था राष्ट्रहितके विरोध में काम कर रही हैं तो कांग्रेस उससे सम्बन्ध विच्छेद करनेका अधिकार अपने पास रखती है।'''<ref>पण्डित जवाहरलाल नेहरूने विषय समितिके सामने यह प्रस्ताव महात्माजीकी ओरसे रखा।</ref>
:'''इसके बाद महात्माजीने कहा:'''
आपके सामने जो प्रस्ताव पेश किया गया है उसके बारेमें कई प्रश्न पूछे गये हैं। यह पूछा गया है: “क्या यह साम्राज्यके भीतर साम्राज्य बनानेका इरादा है?” मेरा उत्तर है ‘हाँ’। वे भी कहते हैं――‘इम्पीरियम इन इम्पीरियो’।<ref>लेटिन उक्ति जिसका अर्थ है-साम्राज्य के भीतर साम्राज्य।</ref> मैं इन प्रस्तावित समितियोंको औपनिवेशिक स्वराज्य देना चाहता हूँ। आपने अखिल भारतीय चरखा संघको औपनिवेशिक स्वराज्य दे दिया है और परिणाम यह है कि १५०० गाँवोंमें वे काम कर रहे हैं और जो भी काम किया जाता है उसका श्रेय कांग्रेसको मिलता है। यदि कभी अखिल भारतीय चरखा संघकी प्रवृत्ति कांग्रेस विरोधी हो जाये तो आपने अपना नाम इस्तेमाल करने की जो आज्ञा उसे दे रखी है, सो आप वापस ले सकते हैं। आज कांग्रेस खादीके पक्षमें है। लेकिन हममें ऐसा विचार रखनेवाले लोग हैं जो खादीके विरोधी हैं और उसके विरुद्ध काम करते हैं। फिर हममें से कुछ लोग यह विचार भी रखते हैं कि केवल खादी तैयार करनेसे ही विदेशी वस्त्रका पूर्ण बहिष्कार नहीं हो सकेगा और कांग्रेसके कार्यक्रम में मिलका कपड़ा भी शामिल कर दिया जाना चाहिए। अखिल भारतीय चरखा संघका विश्वास है कि हमें खादीसे स्वराज्य मिल जायेगा। यदि कल कांग्रेसका विश्वास खादी परसे उठ जाये और<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४३. भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें―२'''}}}}
{{right|३० दिसम्बर, १९२९}}
:{{gap}}'''यह कांग्रेस विदेशी वस्त्र बहिष्कार समिति, छुआछूत विरोधी समिति और मद्य-निषेध समितिको सुपुर्द किये हुए काम पूरी शक्तिसे कार्यान्वित करनेके लिए उन्हें बधाई देती है परन्तु खेदपूर्वक विचार प्रकट करती है कि राष्ट्रकी ओरसे इस दिशामें उतना प्रोत्साहन नहीं मिला जितना पानेकी आशा करनेका कांग्रेसको अधिकार था। इन समितियों और अखिल भारतीय चरखा संघसे जो अनुभव हुआ उससे यह पता चलता है कि विशेष तरहके कामोंके लिए बनाई गई ऐसी स्वायत्त संस्थाओं द्वारा काफी प्रभावशाली काम सम्भव है। इसलिए यह कांग्रेस पूर्वोक्त समितियोंको स्थायी घोषित करती है। वे समितियाँ सर्वथा स्वायत्त होंगी और उन्हें अपनी संख्या में वृद्धि करने और अपने-अपने संविधान बनाने और चन्दा उगाहनेके अधिकार होंगे बशर्ते कि वे कांग्रेसकी सामान्य नोतिका अनुसरण करें और यदि कभी कांग्रेसको ऐसा लगे कि इनमें से कोई भी संस्था राष्ट्रहितके विरोध में काम कर रही हैं तो कांग्रेस उससे सम्बन्ध विच्छेद करनेका अधिकार अपने पास रखती है।'''<ref>पण्डित जवाहरलाल नेहरूने विषय समितिके सामने यह प्रस्ताव महात्माजीकी ओरसे रखा।</ref>
:'''इसके बाद महात्माजीने कहा:'''
आपके सामने जो प्रस्ताव पेश किया गया है उसके बारेमें कई प्रश्न पूछे गये हैं। यह पूछा गया है: “क्या यह साम्राज्यके भीतर साम्राज्य बनानेका इरादा है?” मेरा उत्तर है ‘हाँ’। वे भी कहते हैं――‘इम्पीरियम इन इम्पीरियो’।<ref>लेटिन उक्ति जिसका अर्थ है-साम्राज्य के भीतर साम्राज्य।</ref> मैं इन प्रस्तावित समितियोंको औपनिवेशिक स्वराज्य देना चाहता हूँ। आपने अखिल भारतीय चरखा संघको औपनिवेशिक स्वराज्य दे दिया है और परिणाम यह है कि १५०० गाँवोंमें वे काम कर रहे हैं और जो भी काम किया जाता है उसका श्रेय कांग्रेसको मिलता है। यदि कभी अखिल भारतीय चरखा संघकी प्रवृत्ति कांग्रेस विरोधी हो जाये तो आपने अपना नाम इस्तेमाल करने की जो आज्ञा उसे दे रखी है, सो आप वापस ले सकते हैं। आज कांग्रेस खादीके पक्षमें है। लेकिन हममें ऐसा विचार रखनेवाले लोग हैं जो खादीके विरोधी हैं और उसके विरुद्ध काम करते हैं। फिर हममें से कुछ लोग यह विचार भी रखते हैं कि केवल खादी तैयार करनेसे ही विदेशी वस्त्रका पूर्ण बहिष्कार नहीं हो सकेगा और कांग्रेसके कार्यक्रम में मिलका कपड़ा भी शामिल कर दिया जाना चाहिए। अखिल भारतीय चरखा संघका विश्वास है कि हमें खादीसे स्वराज्य मिल जायेगा। यदि कल कांग्रेसका विश्वास खादी परसे उठ जाये और<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३८६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कांग्रेसके खयालमें चरखा संघकी नीति कांग्रेस नीतिकी विरोधी हो जाये तो उस संस्थाको अपने से अलग कर देनेके लिए कांग्रेसको महासभामें एक प्रस्ताव-भर पारित करना पड़ेगा।
फिर यह पूछा जाता है कि चरखा संघ इस बीच कांग्रेसके नामका प्रयोग
करके जो प्रतिष्ठा, अधिकार और बल प्राप्त कर चुकेगा, उसका क्या होगा। यह खतरा तो इसमें जरूर है परन्तु आपको खतरा मोल लेने के लिए तैयार रहना ही चाहिए। आपमें इतना आत्मविश्वास होना चाहिए कि जबतक कांग्रेस सच्ची पद्धति पर रहकर काम करती रहती है, वही सर्वोच्च संस्था रहेगी और कोई भी अधीनस्थ संस्था उसका अधिकार या मान नहीं छीन सकती। इतिहासमें ऐसे दृष्टान्त है जहाँ अनुचित रीतिसे अधिकार हथिया लिये गये हैं। परन्तु आपको इतना खतरा मोल लेनेके लिए तैयार रहना चाहिए। इस मामलेमें कोई अनिवार्यता नहीं है। यह काम करवानेका एक तरीका है। जिनकी किसी एक कामको करने में विशेष रुचि है कांग्रेस उनसे कहती है――‘आगे बढ़ो और हमारे नामपर और हमारे अनुमोदनसे अच्छा काम करो।’ इसके परिणामस्वरूप अच्छा काम होता है और इससे कांग्रेसकी प्रतिष्ठा और अधिकार बढ़ता है। इस सम्बन्धमें मुझे चिरला-पेरला उदाहरणकी याद हो आई है। डुग्गिराला गोपाल कृष्णैयाने जब चिरला-पेरला सत्याग्रह<ref>देखिए खण्ड २१, पृष्ठ १६-१८।</ref> शुरू किया, मुझसे सलाह ली। मैंने उनसे और जब में चिरला-पेरला गया तो यहाँ लोगोंसे भी कहा कि वे आन्दोलनके लिए कांग्रेसके नाम और अधिकारका प्रयोग किसी भी हालत में न करें। यह आन्दोलन वे अपने ही बलबूतेपर करें। यदि वे सफल हो गये तो श्रेय कांग्रेसको मिलेगा। यदि वे असफल हुए तो अपमानका भाजन उन्हें बनना पड़ेगा।
यहाँ मैं आपके सामने जो प्रस्ताव रख रहा हूँ वह इससे विपरीत है। इस
प्रस्तावके अन्तर्गत जो काम किया जायेगा उसका श्रेय कांग्रेसको मिलेगा; परन्तु कांग्रेस उसके लिए पैसा नहीं देगी। वह इस दिशामें खुद कोई प्रयत्न भी नहीं करेगी। आप चाहें तो आज विदेशी वस्त्र-बहिष्कार समिति, मद्य-निषेध समिति और छुआछूत विरोधी समितिको भी बन्द कर दे सकते हैं। मैं पिछले दो बरसोंसे अस्पृश्यता निवारण संबंधी काम जमनालालजीके मारफत करनेकी कोशिश कर रहा हूँ।
कई बरसोंतक इस दिशामें कुछ ज्यादा काम नहीं किया जा सका। इसी दौरान कलकत्ता कांग्रेसने<ref>१९२८ में।</ref> प्रस्ताव पास किया और उसके द्वारा अस्पृश्यतानिवारण समितिकी नियुक्ति की गई और वह काम जमनालालजीको सुपुर्द कर दिया गया। उन्होंने कुछ सफलता प्राप्त करके दिखाई और उसका श्रेय कांग्रेसको मिला। सामाजिक कार्यकी पूरी जिम्मेदारी लेना कांग्रेसका मुख्य कार्य नहीं है। किन्तु साथ ही इसे सामाजिक कार्यको बढ़ावा तो देना ही चाहिए। कांग्रेस एक राजनीतिक संस्था है और उसमें बहुधा मतभेद होना जरूरी है। मेरा अनुरोध है कि हम दूरंदेशी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३८७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीको विषय समितिमें-२|३४९}}</noinclude>से काम लें, ये समितियाँ बनायें तथा उन्हें अपने ही बनाये संगठनों द्वारा और अपने ही द्वारा इकट्ठे किये हुए पैसोंसे अच्छा काम करने दें।
मैं आपका सेवक हूँ। मैं आपकी सेवा करनेके लिए बाध्य हूँ मैं आपसे स्पष्ट बात कह देना चाहता हूँ। तथ्योंकी उपेक्षा करनेसे क्या लाभ है? इन सब कामों के लिए कांग्रेसको जितना पैसा चाहिए वह सारा पैसा कांग्रेसके नामपर इकट्ठा कर पाना आसान नहीं है। कांग्रेसकी ओरसे ही मैं आपसे यह बात कह सकता हूँ। अपनी लम्बी यात्राओंके दौरानके अपने अनुभवसे मेरा ध्यान बहुत-सी चीजोंपर गया है और मैने बहुत-सी चीजें देखी हैं। आन्ध्र और संयुक्त प्रान्तमें मुझसे कांग्रेस कोषके बारेमें कई प्रश्न पूछे गये। मुझसे पूछा गया――तिलक स्वराज्य कोषका क्या हुआ? उसे किसने खर्च किया? आप लोगोंने इसे कैसे खर्च किया? इसका हिसाब कहाँ है? फिर वे यह भी कहते हैं हम पैसा आपको आपके नामपर दे देंगे। हम आपको
पैसा दे देंगे परन्तु कांग्रेसको नहीं देंगे। मैं उनसे कहता हूँ, कि आप किसी भी नामसे मुझे पैसा दे दें। मैं आपको हर पाईका हिसाब दूँगा। अब मैं आपसे कहता हूँ कि मुझे यह पैसा उन उद्देश्योंकी पूर्ति के लिए खर्च करने दीजिए जिनका कांग्रेस आज अनुमोदन करती है। परन्तु बदले में मैं आपसे यही कहता हूँ कि इन समितियोंको औपनिवेशिक स्वराज्य दे दीजिए। जहाँतक कांग्रेसका सम्बन्ध है, हमें धनके लिए की गई हमारी अपीलोंपर जो प्रतिक्रिया होती है उसे जान लेना चाहिए। हमने आमदनीपर एक प्रतिशत कर लगाया। हमें मालूम है कि कितने थोड़े लोगोंने वह कर दिया। हमारे लिये यह शर्मकी बात है। ये समितियाँ आपसे कोई पैसा नहीं
चाहती आदमी नहीं माँगती। केवल आपके नामपर काम करनेकी अनुमति माँगती हैं। परन्तु आप लोग जिन्हें न पैसा मिलता है और न आदमी, यह कहते हैं:“नहीं अधिकार हमारा जरूर होना चाहिए।” मैं आपको बता दूँ कि आपको यह अधिकार बिलकुल नहीं है। यदि आपको यह अधिकार होता तो इन समितियोंको आप वह औपनिवेशिक स्वराज्य नहीं दे रहे होते जिसे देनेकी मैं आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ। यह बात सही है। इन समितियोंको औपनिवेशिक स्वराज्य दीजिए या मत दीजिए, परन्तु कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। मैं विदेशी सरकारसे कहता हूँ कि स्वतन्त्रता मेरा अधिकार है। परन्तु मैं आपसे कहता हूँ, आपसे प्रार्थना करता हूँ, आपसे याचना करता हूँ कि इन समितियोंको औपनिवेशिक स्वराज्य या स्वतन्त्रता दीजिए, फिर भी अब आपको जैसा सही लगे वैसा कीजिए।
परन्तु मुख्य प्रस्तावके सम्बन्धमें मेरी आपसे एक अपील है। आपने दो दिन
मुझसे अपनी ताकत आजमाई है। आपको उस प्रस्तावपर कांग्रेसके खुले अधिवेशन में भी ऐसा करनेका हक है। मैं आपका सामना करने और आपसे लड़नेके लिए तैयार हूँ। परन्तु कृपया दूसरे प्रस्तावों में आप बाधा न डालिए। यह दिखा दीजिए कि आप समयकी कीमत जानते हैं। कृपया व्यवहारकुशल बनिए। आप व्यवहारकुशल बननेको भी तैयार नहीं होते। आप एक प्रस्तावपर दो दिन लगाते हैं। आप कार्यसमितिको समय नहीं देते। और फिर प्रस्तावकी प्रतियाँ आपको न देनेपर आप उसकी खबर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३८८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लेते हैं। क्या यह ठीक है? क्या यह व्यवहार्य है? मैंने अभी हाल में समाचारपत्रों में पढ़ा कि करोड़ों रुपयोंके प्रबन्धसे सम्बन्धित बैंक ऑफ इंग्लैंड की बैठक साढ़े तेरह मिनटमें समाप्त हो गई। हमें उनसे कुछ सीखना चाहिए। मैं आपसे अपील करता हूँ कि आपको जैसा अच्छा लगे वैसा निश्चय कर लीजिए, परन्तु व्यवहारकुशल बनिए और भाषण कम दीजिए। सूचना प्राप्त करनेके लिए प्रश्न पूछिए। परन्तु बहुत समय न कीजिए, क्योंकि यह समयका अपव्यय होगा।
'''डा॰ रहीमको उत्तर देते हुए महात्माजोने कहा कि इन समितियोंका प्रस्ताव कामके विशेष ज्ञान के सिद्धान्तपर किया गया था। डा॰ हार्डिकर कांग्रेस के नामपर परन्तु स्वायत्त संविधान के अन्तर्गत हिन्दुस्तानी सेवादल द्वारा जो काम कर रहे थे, महात्माजोने उसका दृष्टान्त दिया। भाषण जारी रखते हुए महात्माजीने कहा:'''
यदि कांग्रेस सब कुछ अपने हाथमें रखना चाहती है, तो कोई काम नहीं होगा और कोई प्रगति नहीं होगी। कुछ एक लोग ऐसे होते हैं, जिनकी केवल एक किस्मके काममें रुचि होती है और जो विशेष उद्देश्योंके लिए अपना समय और शक्ति लगानेको तैयार रहते हैं। जो उद्देश्य कांग्रेसकी नजर में है और जिनसे उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है, उनकी पूर्तिमें इन लोगोंको जुटा देना चाहिए।
'''श्री रामनारायणसिंहको उत्तर देते हुए गांधीजीने कहा कि यह सही है कि किन्हीं मामलों में खद्दरका प्रचार लोगोंमें केवल आर्थिक अपीलके आधारपर करना पडा। खद्दरके आर्थिक और राजनीतिक दोनों पहलू हैं। राजपूतानामें और कुछ अन्य राज्यों में खादीकी बातपर शासक भड़क उठे। तब उनके सामने खद्दरका आर्थिक पहलू पेश किया गया। गांधीजीने कहा-'''
मैं उस दिन एक मुख्य न्यायाधीशके पास गया और उनसे बद्दरके लिए रुपया माँगा। उन्होंने कहा यह एक राजनीतिक बात है। मैंने कहा इसके राजनीतिक पहलू हो सकते हैं, परन्तु आपको इससे कोई वास्ता नहीं। यह लोकहितकी बात है।
'''श्री अणेको उत्तर देते हुए गांधीजीने कहा कि एक बार समिति बन जानेपर कांग्रेसको उसके कर्मचारी वर्गके बारेमें बोलनेका कोई हक नहीं होगा।'''<ref>इसकेबाद प्रस्ताव मतदानके लिए पेश किया और यह भारी बहुमतसे गिर गया।</ref>
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'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १-१-१९३०}}<noinclude>{{dhr|6em}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लेते हैं। क्या यह ठीक है? क्या यह व्यवहार्य है? मैंने अभी हाल में समाचारपत्रों में पढ़ा कि करोड़ों रुपयोंके प्रबन्धसे सम्बन्धित बैंक ऑफ इंग्लैंड की बैठक साढ़े तेरह मिनटमें समाप्त हो गई। हमें उनसे कुछ सीखना चाहिए। मैं आपसे अपील करता हूँ कि आपको जैसा अच्छा लगे वैसा निश्चय कर लीजिए, परन्तु व्यवहारकुशल बनिए और भाषण कम दीजिए। सूचना प्राप्त करनेके लिए प्रश्न पूछिए। परन्तु बहुत समय न कीजिए, क्योंकि यह समयका अपव्यय होगा।
'''डा॰ रहीमको उत्तर देते हुए महात्माजोने कहा कि इन समितियोंका प्रस्ताव कामके विशेष ज्ञान के सिद्धान्तपर किया गया था। डा॰ हार्डिकर कांग्रेस के नामपर परन्तु स्वायत्त संविधान के अन्तर्गत हिन्दुस्तानी सेवादल द्वारा जो काम कर रहे थे, महात्माजोने उसका दृष्टान्त दिया। भाषण जारी रखते हुए महात्माजीने कहा:'''
यदि कांग्रेस सब कुछ अपने हाथमें रखना चाहती है, तो कोई काम नहीं होगा और कोई प्रगति नहीं होगी। कुछ एक लोग ऐसे होते हैं, जिनकी केवल एक किस्मके काममें रुचि होती है और जो विशेष उद्देश्योंके लिए अपना समय और शक्ति लगानेको तैयार रहते हैं। जो उद्देश्य कांग्रेसकी नजर में है और जिनसे उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है, उनकी पूर्तिमें इन लोगोंको जुटा देना चाहिए।
'''श्री रामनारायणसिंहको उत्तर देते हुए गांधीजीने कहा कि यह सही है कि किन्हीं मामलों में खद्दरका प्रचार लोगोंमें केवल आर्थिक अपीलके आधारपर करना पडा। खद्दरके आर्थिक और राजनीतिक दोनों पहलू हैं। राजपूतानामें और कुछ अन्य राज्यों में खादीकी बातपर शासक भड़क उठे। तब उनके सामने खद्दरका आर्थिक पहलू पेश किया गया। गांधीजीने कहा-'''
मैं उस दिन एक मुख्य न्यायाधीशके पास गया और उनसे बद्दरके लिए रुपया माँगा। उन्होंने कहा यह एक राजनीतिक बात है। मैंने कहा इसके राजनीतिक पहलू हो सकते हैं, परन्तु आपको इससे कोई वास्ता नहीं। यह लोकहितकी बात है।
'''श्री अणेको उत्तर देते हुए गांधीजीने कहा कि एक बार समिति बन जानेपर कांग्रेसको उसके कर्मचारी वर्गके बारेमें बोलनेका कोई हक नहीं होगा।'''<ref>इसकेबाद प्रस्ताव मतदानके लिए पेश किया और यह भारी बहुमतसे गिर गया।</ref>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''३४४. भाषण: अ॰ भा॰ का॰ कमेटीकी विषय समितिमें-३'''<ref>प्रस्ताव रखनेके बाद गांधीजी अ॰ भा॰ का॰ कमेटीके प्रतिनिधियोंकी संख्या में कमी करनेके बारेमें बोले। मूल पाठके लिए देखिए, प्रस्ताव संख्या-४, पृष्ठ ३३०।</ref>}}}}
{{right|३० दिसम्बर, १९२९}}
मुझे मालूम है कि आपने अभी मेरा पेश किया हुआ एक प्रस्ताव गिरा दिया है और शायद आप यह प्रस्ताव भी गिरा दें। परन्तु चूँकि आप कुछ प्रस्ताव गिरा देना चाहते हैं, कार्यसमिति और मैं अपना काम नहीं रोक सकते। कार्यसमिति के सदस्य आपके सेवक है। उनके काम पर आप कुछ भी निर्णय क्यों न दें, उन्हें अपना काम करना ही चाहिए। चूँकि ऐसा प्रतीत होता है कि कार्यसमिति में आपका विश्वास नहीं रह गया है, मेरे विचारमें आपको अपनी एक अलग कार्यसमिति चुन लेनी चाहिए। नागपुर कांग्रेस<ref>१९२० में।</ref> के दिनोंसे मैं कांग्रेस संविधान में यह महत्त्वपूर्ण परिवर्तन लानेका अनुरोध कर रहा हूँ। मेरा यह विश्वास दृढ़ हो गया है कि कांग्रेसके सदस्य इतने ज्यादा है कि इसका काम शान्तिसे, तत्परतासे और सुव्यवस्थित ढंगसे नहीं चल सकता। मेरा यह भी विश्वास है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके ३५० सदस्य होना बहुत ज्यादा है। मैं यह अपना कर्तव्य समझता हूँ कि आपके कामके लिए कार्यक्रम आपके सामने रखूँ। और इसपर निर्णय लेना आपपर निर्भर करता है। आपको पूरी तरह से यह एहसास होना चाहिए कि आपका क्या काम है। मैं जोर देकर आपसे कहना चाहूँगा कि यदि आप आज यह प्रस्ताव पारित नहीं करते तो यह आपको कल और कल नहीं तो परसों पास करना ही पड़ेगा। यदि आप चाहें तो एक और कार्यसमिति चुन लें। परन्तु जबतक यह कार्यसमिति है आपको ऐसा करना चाहिए कि जो भी कुछ यह सामने रखे पास कर दिया जाये। मुझे यकीन हो गया है कि आजकल कांग्रेसमें जो निर्देशक विभाग है वह अलग कर दिया जाना चाहिए। इससे बहुत ज्यादा पैसे और शक्तिका अपव्यय हो रहा है। इस प्रस्तावका उद्देश्य है कि कांग्रेसकी शक्ति केन्द्रित की जाये। यदि आपकी विधानसभा में इतने ज्यादा सदस्य नहीं है तो आपको यह बात क्योंकर उचित समझनी चाहिए कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीमें इतने ज्यादा सदस्य हों? आप राष्ट्रीय संसदकी बात करते हैं, तो आपको यह एहसास होना चाहिए कि आपकी राष्ट्रीय संसदका आकार कितना होना चाहिए। यदि कांग्रेस सारे देशमें दूर-दूर तक फैलना चाहती है तो उसे अपने कार्यक्रमपर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। आप सविनय अवज्ञा चाहते हैं। परन्तु इतनी भारी-भरकम किसी राष्ट्रीय संस्थासे सविनय अवज्ञाके कार्यान्वित किये जानेकी आप कभी आशा ही नहीं कर सकते। मैं सविनय अवज्ञाके लिए जीवित हूँ और यदि आवश्यकता हुई तो मैं अलगसे सविनय अवज्ञा जारी रखूँगा। जैसी अनुशासनहीनता<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३९०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आज विद्यमान है, उसमें आप सविनय अवज्ञाकी बात कभी सोच भी नहीं सकते। मैं प्रस्ताव पर और ज्यादा नहीं बोलना चाहता। अब आपको जैसा अच्छा लगे वैसा निर्णय करें।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बोम्बे क्रॉनिकल,''' १-१-१९३०|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''३४५. भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौर में―१'''}}}}
{{right|३१ दिसम्बर, १९२९}}
:'''श्री मो॰ क॰ गांधीने...निम्नलिखित प्रस्ताव पेश किया:'''
:{{gap}}'''यह कांग्रेस वाइसरायको गाड़ी पर बम फेंके जानके नृशंस हिंसात्मक आचरण पर दुःख प्रकट करती है और अपना यह विश्वास फिर दोहराती है कि ऐसा आचरण कांग्रेस सिद्धान्तके ही खिलाफ नहीं है, बल्कि इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय हितको भी हानि पहुँचती है। यह कांग्रेस वाइसराय, लेडी इर्विन और गरीब नौकरों सहित उनके बलको सौभाग्य से और बाल-बाल बच जाने पर बधाई देती है।'''
:'''हिन्दुस्तानी में बोलनेके बाद श्री गांधीने भाषण जारी रखते हुए कहा:'''
{{left|सभापति महोदय और मित्रो,}}
मैंने जो-कुछ कहा उसका सार अंग्रेजीमें देनेके लिए मुझसे कहा गया है। मेरी रायमें यदि कांग्रेसके सामने जो काम है उससे सम्बन्धित प्रस्ताव एक मतसे पारित कर दिये जायें तो यह शुभारम्भ होगा। आपके सामने आनेमें मैंने इस मामलेमें अपनी जिम्मेदारीको पूरी तरहसे समझा है और मेरा निश्चित विश्वास है कि यदि कांग्रेस इस प्रस्तावको लिपिबद्ध नहीं करती तो अपना स्पष्ट कर्त्तव्य निभाने में चूक जायेगी। आपको इसका कारण प्रस्तावमें ही निर्दिष्ट मिलेगा। जबतक कांग्रेसका सिद्धान्त जैसेका-तैसा रहता है अर्थात् हम चाहे जिस तरीकेसे नहीं अपितु शान्तिमय और न्यायसंगत तरीके से स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं तबतक इस शर्तको भंग करनेवाली
भारतमें घटनेवाली हरएक घटना पर ध्यान देना हमारा परम कर्त्तव्य है।शायद आपसे यह कहा जाये और मैं कह सकता हूँ कि कहा जायेगा कि जब वे लोग जो कांग्रेस संगठन के नहीं है और किसी भी रूप में अथवा किसी भी प्रकारसे उससे सम्बन्धित नहीं है, ऐसे काम करते हैं जो हमारे सिद्धान्तके विपरीत हों, तब हम किसी भी तरह और किसी भी अर्थमें उत्तरदायी नहीं हैं। जो इस तरह सोचते हैं उनसे, मैं विनम्रतापूर्वक कहता हूँ कि उनके कन्धोंपर जो बड़ा भारी उत्तरदायित्व है, उसका उन्हें जरा भी ज्ञान नहीं है और कांग्रेसकी जो महती-प्रतिष्ठा है, उन्हें उसका भी कोई ज्ञान नहीं है। या तो हम यह मानें कि हम हिन्दुस्तानके तीस करोड़ लोगों का<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३९१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौरमें―१|३५३}}</noinclude>या तो प्रतिनिधित्व करते हैं या यह मानें कि नहीं करते। यदि हम उनका
प्रतिनिधित्व करनेका दावा करते हैं――कांग्रेसका एक विनम्र कार्यकर्ता होनेके कारण मैं तो निश्चित रूपसे करता हूँ, और मुझे आशा है आप भी करते हैं――तब यह हमारा कर्तव्य हो जाता है कि हिन्दुस्तानमें पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति जो कुछ करे उसके लिए हम अपनेको उत्तरदायी समझें। मुझे इससे रत्ती-भर भी सरोकार नहीं कि वह आदमी विवेकशील है या खुफिया विभागसे सम्बन्धित है। मुझे आशा है कि आप खुफिया विभागके भारतीयोंको भी अपना सम्बन्धी मानते होंगे। हम अपने आचरणसे हर भारतीयको अपने सिद्धान्तके अनुरूप बना लेनेकी और उसकी सेवाओंका अपने ध्येयकी प्राप्तिके लिए उपयोग करनेकी आशा करते हैं। इतना ही नहीं बल्कि प्रस्तावमें कहा गया है, और मुझे आशा है कि आप भी ऐसा विश्वास करते हैं कि इस तरहके आचरणसे राष्ट्रहितको बड़ी हानि होती है।
कांग्रेस के इतिहासकी विभिन्न युगान्तकारी घटनाओंकी ओर आपका ध्यान
आकृष्ट करके मैं आपका वक्त नहीं लेना चाहता; उनसे आपको संतोषप्रद रूपसे यह मालूम हो जायेगा कि बम फेंककर किया गया हर हिंसात्मक आचरण भारतको मँहगा पड़ा है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि जो सुधार हासिल किये गये हैं, वे बम फेंककर किये गये हिंसात्मक आचरणके बिना या बिना हिंसा नहीं हासिल किये जा सकते थे; किन्तु मैं आपको यह बता देना चाहता हूँ कि इनमें से हरएक सुधारकी जितनी कीमत चुकाई जा सकती थी हमें उनसे कहीं ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी है मानो हमने सिर्फ खिलोनोंपर लाखों दे डाले हैं।
कांग्रेस प्रस्तावमें वाइसराय, लेडी इर्विन और गरीब नौकरों समेत उनके दलको भी बधाई दी गई है। मेरी विनम्र रायमें प्रस्तावके पहले भागमें जो-कुछ कहा गया है, वाइसराय, लेडी इविन और उनके दलको बधाई देना उसका सहज परिणाम है। सामान्य शिष्टाचार बरतनेसे हमारा कुछ नहीं घटता है। सिर्फ इतनी ही बात नहीं है, जो अंग्रेज भारतमें रहना चाहते हैं वे चाहे अधिकारी वर्गके हों या न हों उनकी हमें देखभाल करनी है और हम लोगोंको तो, जो इस अहिंसा धर्मका दम भरते हैं, उनकी जीवन रक्षाके लिए अपने आपको उनका न्यासी समझना चाहिए और यदि हम यह बात भूल गये तो हम अपने सिद्धान्तका तात्पर्य न समझ पानेके
अपराधी होंगे। हमारे ऊपर सेनाका जबर्दस्त बोझ है। यह बोझ भारतके ७,००,००० गाँवों में रहनेवाले लाखों भूखसे पीड़ित लोगोको पीसे डाल रहा है। वास्तवमें सेनाके इस बोझकी आवश्यकता सीमा सुरक्षाके लिए नहीं है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यह बोझ इसी कारण है कि इंग्लैंडसे आये हुए कुछ एक हजार अंग्रेज तीस करोड़ लोगोंपर शासन करते रहना चाहते है। यदि हम इस सैनिक बोझसे किसी समय छुटकारा पा जायें तो यह अत्यन्त आवश्यक हो जायेगा कि जिन्हें हम अपना शत्रु भी मानते हों, उनके जीवन भी हमारे निकट एक पवित्र धरोहर हों। मेरी नम्र रायमें भारतकी राजनैतिक मुक्तिके लिए अहिंसा धर्मका स्पष्टतम तात्पर्य यही है और यदि आप मुझसे सहमत हों तो आपकी ओरसे यह मामला शिष्टताका ही नहीं, बल्कि कर्त्तव्यका है कि हम वाइसराय, लेडी इर्विन और नौकरों<noinclude>{{left|४२-२३}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौरमें―१|३५३}}</noinclude>या तो प्रतिनिधित्व करते हैं या यह मानें कि नहीं करते। यदि हम उनका
प्रतिनिधित्व करनेका दावा करते हैं――कांग्रेसका एक विनम्र कार्यकर्ता होनेके कारण मैं तो निश्चित रूपसे करता हूँ, और मुझे आशा है आप भी करते हैं――तब यह हमारा कर्तव्य हो जाता है कि हिन्दुस्तानमें पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति जो कुछ करे उसके लिए हम अपनेको उत्तरदायी समझें। मुझे इससे रत्ती-भर भी सरोकार नहीं कि वह आदमी विवेकशील है या खुफिया विभागसे सम्बन्धित है। मुझे आशा है कि आप खुफिया विभागके भारतीयोंको भी अपना सम्बन्धी मानते होंगे। हम अपने आचरणसे हर भारतीयको अपने सिद्धान्तके अनुरूप बना लेनेकी और उसकी सेवाओंका अपने ध्येयकी प्राप्तिके लिए उपयोग करनेकी आशा करते हैं। इतना ही नहीं बल्कि प्रस्तावमें कहा गया है, और मुझे आशा है कि आप भी ऐसा विश्वास करते हैं कि इस तरहके आचरणसे राष्ट्रहितको बड़ी हानि होती है।
कांग्रेस के इतिहासकी विभिन्न युगान्तकारी घटनाओंकी ओर आपका ध्यान
आकृष्ट करके मैं आपका वक्त नहीं लेना चाहता; उनसे आपको संतोषप्रद रूपसे यह मालूम हो जायेगा कि बम फेंककर किया गया हर हिंसात्मक आचरण भारतको मँहगा पड़ा है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि जो सुधार हासिल किये गये हैं, वे बम फेंककर किये गये हिंसात्मक आचरणके बिना या बिना हिंसा नहीं हासिल किये जा सकते थे; किन्तु मैं आपको यह बता देना चाहता हूँ कि इनमें से हरएक सुधारकी जितनी कीमत चुकाई जा सकती थी हमें उनसे कहीं ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी है मानो हमने सिर्फ खिलोनोंपर लाखों दे डाले हैं।
कांग्रेस प्रस्तावमें वाइसराय, लेडी इर्विन और गरीब नौकरों समेत उनके दलको भी बधाई दी गई है। मेरी विनम्र रायमें प्रस्तावके पहले भागमें जो-कुछ कहा गया है, वाइसराय, लेडी इविन और उनके दलको बधाई देना उसका सहज परिणाम है। सामान्य शिष्टाचार बरतनेसे हमारा कुछ नहीं घटता है। सिर्फ इतनी ही बात नहीं है, जो अंग्रेज भारतमें रहना चाहते हैं वे चाहे अधिकारी वर्गके हों या न हों उनकी हमें देखभाल करनी है और हम लोगोंको तो, जो इस अहिंसा धर्मका दम भरते हैं, उनकी जीवन रक्षाके लिए अपने आपको उनका न्यासी समझना चाहिए और यदि हम यह बात भूल गये तो हम अपने सिद्धान्तका तात्पर्य न समझ पानेके अपराधी होंगे। हमारे ऊपर सेनाका जबर्दस्त बोझ है। यह बोझ भारतके ७,००,००० गाँवों में रहनेवाले लाखों भूखसे पीड़ित लोगोको पीसे डाल रहा है। वास्तवमें सेनाके इस बोझकी आवश्यकता सीमा सुरक्षाके लिए नहीं है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यह बोझ इसी कारण है कि इंग्लैंडसे आये हुए कुछ एक हजार अंग्रेज तीस करोड़ लोगोंपर शासन करते रहना चाहते है। यदि हम इस सैनिक बोझसे किसी समय छुटकारा पा जायें तो यह अत्यन्त आवश्यक हो जायेगा कि जिन्हें हम अपना शत्रु भी मानते हों, उनके जीवन भी हमारे निकट एक पवित्र धरोहर हों। मेरी नम्र रायमें भारतकी राजनैतिक मुक्तिके लिए अहिंसा धर्मका स्पष्टतम तात्पर्य यही है और यदि आप मुझसे सहमत हों तो आपकी ओरसे यह मामला शिष्टताका ही नहीं, बल्कि कर्त्तव्यका है कि हम वाइसराय, लेडी इर्विन और नौकरों<noinclude>{{left|४२-२३}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३९२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>संहित उनके दलको बधाई दें। यदि आप ऐसा करेंगे तो आप भी बधाई के पात्र होंगे। मुझे उम्मीद है कि इस प्रस्ताव के विरोध में जो कुछ कहा जाये यह सब सुन चुकने के बाद आप इसे सर्वसम्मति और पूरे हृदयसे पास कर देंगे।<ref>इसके बाद प्रस्तावपर बहस हुई जिसमें डा॰ अन्सारी, स्वामी गोविन्दानन्द, पुरुषोत्तमदास टण्डन और दूसरे लोग बोले। बहसका जवाब गांधीजीने हिन्दीमें दिया।</ref>
भाइयो और बहनो,
मैं जानता हूँ कि पिछली बार इस प्रस्तावपर मैंने काफी कहा है――और मैं अब कुछ भी न बोलूँ तो अच्छा रहेगा। लेकिन जब किसीको एकाध खास बातमें बहुत विश्वास रहता है तो उसे उसके पक्षमें बोलनेकी लगन रहती है; और यह इसलिए ताकि जो चीज वह समझाना चाहता है, उसे समझा सके। इसी लगनके कारण मैं यहाँ खड़ा हो गया हूँ।
आपकी यह कांग्रेस एक बड़ा काम उठानेवाली है। यह उम्मीद है। आप बड़ी उम्मीदसे यहाँ इकट्ठे हुए हैं। और यह यह है कि इस कांग्रेस में हम यह अंगीकार करते हैं कि स्वराज्यका अर्थ स्वतन्त्र हिन्दुस्तान है। मेरे लेखे हिन्दुस्तानी स्वतन्त्र तब हो सकते हैं, जब जो कौमें हिन्दुस्तानमें रहती हैं वे उनकी स्वतन्त्रताको कायम रखें। अगर यह बात, जो मैं आपसे कह रहा हूँ, सही है, तो आज हमारा क्या धर्म हो जाता है? किसी भी अंग्रेज, छोटेसे एक लड़के, एक अदना अंग्रेजसे हम यह कह सकते हैं कि जितने भी लोग स्वतन्त्र हिन्दुस्तान में हैं उनकी हिफाजतकी जिम्मेदारी हिन्दुस्तानपर है। इसमें पशोपेशकी कोई बात ही नहीं है। आज आप पूरे जोश में आकर यह बात भले ही न समझें, मगर मैं इतना चाहता हूँ कि आप भी इसे समझ लें।
बहुतसे भाइयोंने इस प्रस्तावकी मुखालफत की। स्वामी गोविन्दानन्द और डाक्टर आलम तो यहाँतक कहते हैं कि रेजोल्यूशन (प्रस्ताव) की जरूरत नहीं है। लेकिन मैं यह कहता हूँ कि फिर यह नॉनवॉयलेन्स (अहिंसा) नहीं है; और डाक्टर आलमने यह दावा किया कि वह नॉनवॉयलेन्स (अहिंसा) मानते हैं। काम कोई भी करे, मैं यह कहता हूँ कि हमको यह कहना चाहिए कि हमने यह किया है। लेकिन अभी थोड़े दिनोंमें हवा बदल गई है। एक काम जो अभी वाॅयलेन्स (हिंसा) का हुआ उसके लिए कहा जाता है कि हमें उसपर कुछ कहने की जरूरत नहीं है। हम अपना काम करते हैं वह अपना करें। मैं कहता हूँ कि यह हिन्दुस्तानको आजाद करनेका तरीका नहीं है। आप साथ ही यह कहते हैं कि कांग्रेस हिन्दुस्तानकी सबसे बड़ी संस्था है। अगर ऐसा है तो जो काम होगा कांग्रेस [उसपर] अपनी राय जाहिर कर देगी।
अगर आप रेजोल्यूशन (प्रस्ताव) को फेंक देना चाहते हैं तो फेंक दें। कांग्रेसके क्रीड (सिद्धान्त) को भी फेंक देना चाहते हैं तो फेंक दें। लेकिन अगर कांग्रेसका क्रीड (सिद्धान्त) रहता है तो आप इस रेजोल्यूशन (प्रस्ताव) को पास करनेके अलावा कोई काम नहीं कर सकते। एक बात और कही गई है, जिसको सुनकर मुझे तकलीफ हुई है। वह यह कि अगर कांग्रेस इस रेजोल्यूशन (प्रस्ताव) को ले लेगी तो नौजवानों<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३९३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौर में―१|३५५}}</noinclude>को नहीं पहचानता हूँ, ऐसा नहीं है। मैं हजारों नौजवानोंसे मिला हूँ.... यूरोपमें भी हजारोंसे मिला हूँ। किसीने किसी बात में मेरा विरोध नहीं किया। यहां भी वे हमारे पास आ जाते हैं, तो मुझे इस बातका डर नहीं है कि एक भी नौजवान, [यदि मैं] सच्ची बात कहूँ या कांग्रेसकी ओरसे एक बात कहूँ तो वह मुझसे हट जायेगा। लेकिन मान भी लें कि नौजवानोंको इसमें रंज होता है। [ये] रंग भी होंगे तो भी जो हिन्दुस्तानके हितके लिए, धर्मके लिए है वह हम करते रहेंगे। ईश्वर ताकत दे कि हम और अच्छी बात करें। अगर मैं अपने कर्त्तव्यको छोड़ देता हूँ, इसलिए कि लोग मुझको छोड़ देंगे, तो मैं समझूँगा कि मैं कांग्रेसका सेवक होनेके
लायक नहीं हूँ। अगर कांग्रेसको आप मानते हैं, तो आपका यह काम है कि जो बात आप सत्य मानते हैं उसको करें। आप लोग यह मानते हैं कि स्वराज्य होना चाहिए। आप बड़ा काम उठाना चाहते हैं, राष्ट्रवादी बनना चाहते हैं। मैं बड़े अदबसे अपने उन मित्रोंसे यह कहूँगा कि उसके लिए आपमें शक्ति नहीं है। जो चीज आपमें नहीं है, उसको आप छिपाना चाहते हैं। हममें शक्ति है या नहीं है; परन्तु हम स्वराज्य चाहते हैं। हम छोटे मुँह बड़ी बात करनेका इरादा करते हैं, तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि अगर आप नये प्रोग्राम (कार्यक्रम) पर चलना चाहते हैं तो आप दिलको साफ करके चलें।
आपसे मैं कहना चाहता हूँ कि आपको इस प्रस्तावसे डरपोकपनकी बू आती है, बूका अर्थ बदबू है। आप देखें, इसमें अंग्रेजोंकी खुशामदकी क्या बात है? इसमें खुशामदकी तो कोई बात नहीं है। कांग्रेसने तो खुशामद करना छोड़ दिया है। स्वराज्यकी बात एक तरफ और खुशामदकी बात दूसरी तरफ, यह जहनियत निकाल दीजिए। जो आदमी कर्तव्यको भूल जाता है, वह डरपोक होता है। जो ईश्वरको छोड़कर किसीसे नहीं डरता वह बम फेंकनेवालेसे क्यों डरे? जो हमारा कर्तव्य है, जो क्रीड (सिद्धान्त) है, मैं उसको मानता हूँ। जो लोग कांग्रेसके क्रीड (सिद्धान्त) के माफिक नहीं हैं और उसका इजहार करते हैं, तो जो शख्स ऐसा काम करता है कांग्रेस उसे जरूर कहेगी कि यह क्या काम है, कैसा काम है। अगर वह आदमी गुस्से में भी आ जाये तो भी यह करना होगा। जब-जब ऐसा मौका आया है, लोग गुस्से हुए हैं। नौजवानोंने समझ लिया है कि विचार यह है। बस मेरा कहना यह है कि आप लोग समझें कि आप प्रतिनिधि बनकर आये हैं। आप लोग प्रतिज्ञा करके आये हैं, आप ईश्वरको मानते हैं, सत्याग्रहको मानते हैं, कांग्रेसको मानते हैं तो यह समझ लें कि कांग्रेसको या किसको मानते हैं। ईश्वरको मानते हैं तो ईश्वरको दरम्यान रखकर जो ठीक हो वह करें। अगर ठीक नहीं तो रेजोल्यूशन (प्रस्ताव) को फेंक दें।<ref>इसके बाद प्रस्तावपर मत लिया गया और यह पारित घोषित कर दिया गया।</ref>
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''अखिल भारतीय कांग्रेसके ४४वें अधिवेशनकी रिपोर्ट'''|1em}}<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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लायक नहीं हूँ। अगर कांग्रेसको आप मानते हैं, तो आपका यह काम है कि जो बात आप सत्य मानते हैं उसको करें। आप लोग यह मानते हैं कि स्वराज्य होना चाहिए। आप बड़ा काम उठाना चाहते हैं, राष्ट्रवादी बनना चाहते हैं। मैं बड़े अदबसे अपने उन मित्रोंसे यह कहूँगा कि उसके लिए आपमें शक्ति नहीं है। जो चीज आपमें नहीं है, उसको आप छिपाना चाहते हैं। हममें शक्ति है या नहीं है; परन्तु हम स्वराज्य चाहते हैं। हम छोटे मुँह बड़ी बात करनेका इरादा करते हैं, तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि अगर आप नये प्रोग्राम (कार्यक्रम) पर चलना चाहते हैं तो आप दिलको साफ करके चलें।
आपसे मैं कहना चाहता हूँ कि आपको इस प्रस्तावसे डरपोकपनकी बू आती है, बूका अर्थ बदबू है। आप देखें, इसमें अंग्रेजोंकी खुशामदकी क्या बात है? इसमें खुशामदकी तो कोई बात नहीं है। कांग्रेसने तो खुशामद करना छोड़ दिया है। स्वराज्यकी बात एक तरफ और खुशामदकी बात दूसरी तरफ, यह जहनियत निकाल दीजिए। जो आदमी कर्तव्यको भूल जाता है, वह डरपोक होता है। जो ईश्वरको छोड़कर किसीसे नहीं डरता वह बम फेंकनेवालेसे क्यों डरे? जो हमारा कर्तव्य है, जो क्रीड (सिद्धान्त) है, मैं उसको मानता हूँ। जो लोग कांग्रेसके क्रीड (सिद्धान्त) के माफिक नहीं हैं और उसका इजहार करते हैं, तो जो शख्स ऐसा काम करता है कांग्रेस उसे जरूर कहेगी कि यह क्या काम है, कैसा काम है। अगर वह आदमी गुस्से में भी आ जाये तो भी यह करना होगा। जब-जब ऐसा मौका आया है, लोग गुस्से हुए हैं। नौजवानोंने समझ लिया है कि विचार यह है। बस मेरा कहना यह है कि आप लोग समझें कि आप प्रतिनिधि बनकर आये हैं। आप लोग प्रतिज्ञा करके आये हैं, आप ईश्वरको मानते हैं, सत्याग्रहको मानते हैं, कांग्रेसको मानते हैं तो यह समझ लें कि कांग्रेसको या किसको मानते हैं। ईश्वरको मानते हैं तो ईश्वरको दरम्यान रखकर जो ठीक हो वह करें। अगर ठीक नहीं तो रेजोल्यूशन (प्रस्ताव) को फेंक दें।<ref>इसके बाद प्रस्तावपर मत लिया गया और यह पारित घोषित कर दिया गया।</ref>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३४६. भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौर में―२'''}}}}
{{right|३१ दिसम्बर, १९२९}}
'''श्री मो॰ क॰ गांधीने अपना दूसरा प्रस्ताव पेश किया जो इस प्रकार है:'''
'''यह कांग्रेस औपनिवेशिक स्वराज्यसे सम्बन्धित ३१ अक्तूबरको की गई वाइसराय की घोषणापर कांग्रेसियों समेत सभी दलों के नेताओं द्वारा हस्ताक्षरित घोषणा के सम्बन्ध में कार्यसमिति द्वारा उठाये गये कदमका समर्थन और स्वराज्यके लिए किये जा रहे राष्ट्रीय आन्दोलन के सम्बन्धमें वाइसराय द्वारा समझौते के लिए किये गये प्रयत्नोंकी सराहना करती है। तथापि तबसे जो कुछ हुआ है तथा मो॰ क॰ गांधी, पण्डित मोतीलाल नेहरू और अन्य नेताओं तथा वाइसरायकी भेंटसे जो परिणाम निकले हैं उन्हें देखते हुए कांग्रेसका यह विचार है कि वर्तमान परिस्थितियोंमें प्रस्तावित गोलमेज परिषद में कांग्रेसके प्रतिनिधित्वसे कोई लाभ नहीं होनेवाला है। इसलिए यह कांग्रेस पिछले साल अपने कलकत्तेके अधिवेशनमें
पास हुए प्रस्तावको ध्यान में रखते हुए यह घोषणा करती है कि कांग्रेस संविधान के अनुच्छेद एकमें आये ‘स्वराज्य’ शब्दका अर्थ पूर्ण स्वराज्य होगा; वह यह भी घोषित करती है कि नेहरू समितिको रिपोर्टकी समूची योजना रद हो गई है और वह यह आशा करती है कि अबसे आगे सभी कांग्रेसी अपना पूरा ध्यान भारतके लिए पूर्ण स्वराज्य हासिल करनेपर लगायेंगे। स्वराज्य आन्दोलन चलानेके लिए प्रारम्भिक कदम के रूपमें तथा कांग्रेसको नीतिको बदले हुए उद्देश्यके यथासम्भव अनुरूप बनानेके लिए यह कांग्रेस केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान सभाओं तथा सरकार द्वारा गठित समितियोंका पूर्ण बहिष्कार करती है और कांग्रेसियों, तथा अन्य लोगोंसे, जो राष्ट्रीय आन्दोलनमें भाग ले रहे हैं भविष्य में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपमें चुनावोंमें भाग न लेनेका आग्रह करती है तथा कांग्रेस के वर्तमान सदस्योंको विधान सभाओं और समितियोंसे त्यागपत्र देनेका आदेश देती है। यह कांग्रेस राष्ट्रसे कांग्रेसके रचनात्मक कार्यक्रमपर चलने की जोरदार अपील करती है और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीको जब भी वह उचित समझे तथा जैसे भी वह आवश्यक समझे वैसे बचावोंके साथ सविनय अवज्ञाका कार्यक्रम, जिसमें कुछ चुने हुए या अन्य इलाकोंमें कर न देनेकी बात शामिल है, करनेका अधिकार देती है।'''<ref>इसके बाद महात्मा गांधी हिन्दुस्तानीमें बोले।</ref>
{{left|सभापति महोदय, भाइयो और बहनो,}}<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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'''श्री मो॰ क॰ गांधीने अपना दूसरा प्रस्ताव पेश किया जो इस प्रकार है:'''
'''यह कांग्रेस औपनिवेशिक स्वराज्यसे सम्बन्धित ३१ अक्तूबरको की गई वाइसराय की घोषणापर कांग्रेसियों समेत सभी दलों के नेताओं द्वारा हस्ताक्षरित घोषणा के सम्बन्ध में कार्यसमिति द्वारा उठाये गये कदमका समर्थन और स्वराज्यके लिए किये जा रहे राष्ट्रीय आन्दोलन के सम्बन्धमें वाइसराय द्वारा समझौते के लिए किये गये प्रयत्नोंकी सराहना करती है। तथापि तबसे जो कुछ हुआ है तथा मो॰ क॰ गांधी, पण्डित मोतीलाल नेहरू और अन्य नेताओं तथा वाइसरायकी भेंटसे जो परिणाम निकले हैं उन्हें देखते हुए कांग्रेसका यह विचार है कि वर्तमान परिस्थितियोंमें प्रस्तावित गोलमेज परिषद में कांग्रेसके प्रतिनिधित्वसे कोई लाभ नहीं होनेवाला है। इसलिए यह कांग्रेस पिछले साल अपने कलकत्तेके अधिवेशनमें पास हुए प्रस्तावको ध्यान में रखते हुए यह घोषणा करती है कि कांग्रेस संविधान के अनुच्छेद एकमें आये ‘स्वराज्य’ शब्दका अर्थ पूर्ण स्वराज्य होगा; वह यह भी घोषित करती है कि नेहरू समितिको रिपोर्टकी समूची योजना रद हो गई है और वह यह आशा करती है कि अबसे आगे सभी कांग्रेसी अपना पूरा ध्यान भारतके लिए पूर्ण स्वराज्य हासिल करनेपर लगायेंगे। स्वराज्य आन्दोलन चलानेके लिए प्रारम्भिक कदम के रूपमें तथा कांग्रेसको नीतिको बदले हुए उद्देश्यके यथासम्भव अनुरूप बनानेके लिए यह कांग्रेस केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान सभाओं तथा सरकार द्वारा गठित समितियोंका पूर्ण बहिष्कार करती है और कांग्रेसियों, तथा अन्य लोगोंसे, जो राष्ट्रीय आन्दोलनमें भाग ले रहे हैं भविष्य में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपमें चुनावोंमें भाग न लेनेका आग्रह करती है तथा कांग्रेस के वर्तमान सदस्योंको विधान सभाओं और समितियोंसे त्यागपत्र देनेका आदेश देती है। यह कांग्रेस राष्ट्रसे कांग्रेसके रचनात्मक कार्यक्रमपर चलने की जोरदार अपील करती है और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीको जब भी वह उचित समझे तथा जैसे भी वह आवश्यक समझे वैसे बचावोंके साथ सविनय अवज्ञाका कार्यक्रम, जिसमें कुछ चुने हुए या अन्य इलाकोंमें कर न देनेकी बात शामिल है, करनेका अधिकार देती है।'''<ref>इसके बाद महात्मा गांधी हिन्दुस्तानीमें बोले।</ref>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{c|{{x-larger|'''सामग्रीके साधन-सूत्र'''}}}}</noinclude>गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली : गांधी साहित्य और तत्सम्बन्धित कागजातोंका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय; देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३५५ (जून १९७० का संस्करण)।
नेहरू स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली।
साबरमती संग्रहालय: पुस्तकालय तथा आलेख संग्रहालय: जिसमें गांधीजीके दक्षिण आफिको काल तथा १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात रखे हैं; देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३५५ (जून १९७० का संस्करण)।
'अमृतबाजार पत्रिका': कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी समाचारपत्र, सर्वप्रथम
यह १८६८ में बंगाली साप्ताहिकके रूपमें प्रकाशित हुआ था; १८९१ में दैनिक
बन गया।
'ट्रिब्यून': अम्बालासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'नवजीवन': (१९१९-१९३१) गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक (कभी-कभी सप्ताहमें दो बार प्रकाशित)। ७ सितम्बर, १९१९ में पहली बार प्रकाशित हुआ था। 'नवजीवन अने सत्य' नामसे यह (१९१५ से १९१९ तक) प्रकाशित होता रहा। १९ अगस्त, १९२१से हिन्दी में भी प्रकाशित होने लगा।
'प्रजाबन्धु': अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक।
'बॉम्बे क्रॉनिकल': बम्बईसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'माडर्न रिव्यू': कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी मासिक।
'यंग इंडिया': (१९१८-१९३१) जमनादास द्वारकादास द्वारा बम्बईमें स्थापित
अंग्रेजी साप्ताहिक, ७ मई १९१९में गांधीजीकी देखरेखमें सप्ताह में दो बार प्रकाशित होने लगा था; ८ अक्तूबर १९१९से गांधीजीके सम्पादनमें यह अहमदाबादसे साप्ताहिकके रूपमें निकलने लगा।
'लीडर': इलाहाबादसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'शिक्षण अने साहित्य': मासिक प्रकाशन, नवजीवनके पूरकके रूपमें ७ जुलाई,
१९२९ से आरम्भ, डी० बी० कालेलकर द्वारा सम्पादित।
' सर्चलाइट': पटनासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दी नवजीवन': हिन्दी साप्ताहिक, गांधीजी द्वारा अहमदाबाद से प्रकाशित;
देखिए 'नवजीवन' भी।
'हिन्दुस्तान टाइम्स': नई दिल्लीसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दू': मद्राससे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी फाइल: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके रेकार्ड्स।
चौवालीसवीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लाहौरकी रिपोर्ट।<noinclude></noinclude>
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नेहरू स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली।
साबरमती संग्रहालय: पुस्तकालय तथा आलेख संग्रहालय: जिसमें गांधीजीके दक्षिण आफिको काल तथा १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात रखे हैं; देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३५५ (जून १९७० का संस्करण)।
'अमृतबाजार पत्रिका': कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी समाचारपत्र, सर्वप्रथम
यह १८६८ में बंगाली साप्ताहिकके रूपमें प्रकाशित हुआ था; १८९१ में दैनिक
बन गया।
'ट्रिब्यून': अम्बालासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'नवजीवन': (१९१९-१९३१) गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक (कभी-कभी सप्ताहमें दो बार प्रकाशित)। ७ सितम्बर, १९१९ में पहली बार प्रकाशित हुआ था। 'नवजीवन अने सत्य' नामसे यह (१९१५ से १९१९ तक) प्रकाशित होता रहा। १९ अगस्त, १९२१से हिन्दी में भी प्रकाशित होने लगा।
'प्रजाबन्धु': अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक।
'बॉम्बे क्रॉनिकल': बम्बईसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'माडर्न रिव्यू': कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी मासिक।
'यंग इंडिया': (१९१८-१९३१) जमनादास द्वारकादास द्वारा बम्बईमें स्थापित
अंग्रेजी साप्ताहिक, ७ मई १९१९में गांधीजीकी देखरेखमें सप्ताह में दो बार प्रकाशित होने लगा था; ८ अक्तूबर १९१९से गांधीजीके सम्पादनमें यह अहमदाबादसे साप्ताहिकके रूपमें निकलने लगा।
'लीडर': इलाहाबादसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'शिक्षण अने साहित्य': मासिक प्रकाशन, नवजीवनके पूरकके रूपमें ७ जुलाई,
१९२९ से आरम्भ, डी० बी० कालेलकर द्वारा सम्पादित।
' सर्चलाइट': पटनासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दी नवजीवन': हिन्दी साप्ताहिक, गांधीजी द्वारा अहमदाबाद से प्रकाशित;
देखिए 'नवजीवन' भी।
'हिन्दुस्तान टाइम्स': नई दिल्लीसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दू': मद्राससे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
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गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली : गांधी साहित्य और तत्सम्बन्धित कागजातोंका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय; देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३५५ (जून १९७० का संस्करण)।
नेहरू स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली।
साबरमती संग्रहालय: पुस्तकालय तथा आलेख संग्रहालय: जिसमें गांधीजीके दक्षिण आफिको काल तथा १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात रखे हैं; देखिए खण्ड १, पृष्ठ ३५५ (जून १९७० का संस्करण)।
'अमृतबाजार पत्रिका': कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी समाचारपत्र, सर्वप्रथम
यह १८६८ में बंगाली साप्ताहिकके रूपमें प्रकाशित हुआ था; १८९१ में दैनिक
बन गया।
'ट्रिब्यून': अम्बालासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'नवजीवन': (१९१९-१९३१) गांधीजी द्वारा सम्पादित और अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक (कभी-कभी सप्ताहमें दो बार प्रकाशित)। ७ सितम्बर, १९१९ में पहली बार प्रकाशित हुआ था। 'नवजीवन अने सत्य' नामसे यह (१९१५ से १९१९ तक) प्रकाशित होता रहा। १९ अगस्त, १९२१से हिन्दी में भी प्रकाशित होने लगा।
'प्रजाबन्धु': अहमदाबादसे प्रकाशित गुजराती साप्ताहिक।
'बॉम्बे क्रॉनिकल': बम्बईसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'माडर्न रिव्यू': कलकत्तासे प्रकाशित अंग्रेजी मासिक।
'यंग इंडिया': (१९१८-१९३१) जमनादास द्वारकादास द्वारा बम्बईमें स्थापित
अंग्रेजी साप्ताहिक, ७ मई १९१९में गांधीजीकी देखरेखमें सप्ताह में दो बार प्रकाशित होने लगा था; ८ अक्तूबर १९१९से गांधीजीके सम्पादनमें यह अहमदाबादसे साप्ताहिकके रूपमें निकलने लगा।
'लीडर': इलाहाबादसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'शिक्षण अने साहित्य': मासिक प्रकाशन, नवजीवनके पूरकके रूपमें ७ जुलाई,
१९२९ से आरम्भ, डी० बी० कालेलकर द्वारा सम्पादित।
' सर्चलाइट': पटनासे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दी नवजीवन': हिन्दी साप्ताहिक, गांधीजी द्वारा अहमदाबाद से प्रकाशित;
देखिए 'नवजीवन' भी।
'हिन्दुस्तान टाइम्स': नई दिल्लीसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
'हिन्दू': मद्राससे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी फाइल: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके रेकार्ड्स।
चौवालीसवीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लाहौरकी रिपोर्ट।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh||सामग्रीके साधन-सूत्र|५४५}}</noinclude>बॉम्बे सीक्रेट एन्स्ट्रैक्ट्स १९३०: बम्बई सरकारके दफतरी कागजात।
'इंडिया इन-१९२९-३०': भारत सरकार, केन्द्रीय प्रकाशन शाखा, कलकत्ता, १९३१।
'ए बंच ऑफ ओल्ड लैटर्स': जवाहरलाल नेहरू, एशिया पब्लिशिंग हाउस, बम्बई १९५८।
'गांधीजीके संस्मरण': शान्तिकुमार, काशोनाथ त्रिवेदी द्वारा अनूदिन; सर्वसेवा संघ वाराणसी, १९६४।
'पाँचवे पुत्रको बापूके आशीर्वाद' (हिन्दी): डी० बी० कालेलकर, जमनालाल
बजाज ट्रस्ट, वर्षा, १९५३।
'बापुना पत्रो --: ६ गं० स्व० गंगाबहेनने' (गुजराती): काका साहेब कालेलकर द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९६०में प्रकाशित।
बापुना पत्रो--: १० श्री प्रभावतीबहेनने' (गुजराती): काकासाहेब कालेलकर
द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९६६में प्रकाशित।
'बापुना पत्रो--:५ कु० प्रेमावहेन कंटकने' (गुजराती): काकासाहेब कालेलकर
द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९६०में प्रकाशित।
'बापुना पत्रो:- ४ मणिबहेन पटेलने' (गुजराती): मणिबहन पटेल द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९५७ में प्रकाशनत।
'बापुना पत्रो--: ७ श्री छगनलाल जोशीने' (गुजराती): श्री छगनलाल जोशी
द्वारा सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद १९६२में प्रकाशित।
'बापुना पत्रो--: ९ श्री नारणदास गांधीने' (गुजराती): श्री नारणदास गांधी
द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९६४ में प्रकाशित।
'बापुनी प्रसादी': (गुजराती) : मथुरादास त्रिकमजी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर,अहमदाबादसे १९४८में प्रकाशित।
'बापू: मैंने क्या देखा, क्या समझा' (हिन्दी): रामनारायण चौधरी, नवजीवन
प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद १९५४में प्रकाशित।
'लैटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री': टी० एन० जगदीशन, द्वारा सम्पादित तथा
एशिया पब्लिशिंग हाउस बम्बईसे १९६३में प्रकाशित।
'विट्ठलभाई पटेल: लाइफ ऐंड टाइम्स': द्वितीय पुस्तक: आर० ए० मोरारकर, लक्ष्मी नारायण प्रेस, ३६४, ठाकुर द्वार, बम्बई।
'हिस्ट्री ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस': खण्ड १, डा० पट्टामिसीतारमैया, पद्मा पब्लिकेशन्स लिमिटेड बम्बई, १९४६।<noinclude>{{Dhr|7em}}
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बॉम्बे सीक्रेट एन्स्ट्रैक्ट्स १९३०: बम्बई सरकारके दफतरी कागजात।
'इंडिया इन-१९२९-३०': भारत सरकार, केन्द्रीय प्रकाशन शाखा, कलकत्ता, १९३१।
'ए बंच ऑफ ओल्ड लैटर्स': जवाहरलाल नेहरू, एशिया पब्लिशिंग हाउस, बम्बई १९५८।
'गांधीजीके संस्मरण': शान्तिकुमार, काशोनाथ त्रिवेदी द्वारा अनूदिन; सर्वसेवा संघ वाराणसी, १९६४।
'पाँचवे पुत्रको बापूके आशीर्वाद' (हिन्दी): डी० बी० कालेलकर, जमनालाल
बजाज ट्रस्ट, वर्षा, १९५३।
'बापुना पत्रो --: ६ गं० स्व० गंगाबहेनने' (गुजराती): काका साहेब कालेलकर द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९६०में प्रकाशित।
बापुना पत्रो--: १० श्री प्रभावतीबहेनने' (गुजराती): काकासाहेब कालेलकर
द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९६६में प्रकाशित।
'बापुना पत्रो--:५ कु० प्रेमावहेन कंटकने' (गुजराती): काकासाहेब कालेलकर
द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९६०में प्रकाशित।
'बापुना पत्रो:- ४ मणिबहेन पटेलने' (गुजराती): मणिबहन पटेल द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९५७ में प्रकाशनत।
'बापुना पत्रो--: ७ श्री छगनलाल जोशीने' (गुजराती): श्री छगनलाल जोशी
द्वारा सम्पादित, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद १९६२में प्रकाशित।
'बापुना पत्रो--: ९ श्री नारणदास गांधीने' (गुजराती): श्री नारणदास गांधी
द्वारा सम्पादित तथा नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबादसे १९६४ में प्रकाशित।
'बापुनी प्रसादी': (गुजराती): मथुरादास त्रिकमजी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर,अहमदाबादसे १९४८में प्रकाशित।
'बापू: मैंने क्या देखा, क्या समझा' (हिन्दी): रामनारायण चौधरी, नवजीवन
प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद १९५४में प्रकाशित।
'लैटर्स ऑफ श्रीनिवास शास्त्री': टी० एन० जगदीशन, द्वारा सम्पादित तथा
एशिया पब्लिशिंग हाउस बम्बईसे १९६३में प्रकाशित।
'विट्ठलभाई पटेल: लाइफ ऐंड टाइम्स': द्वितीय पुस्तक: आर० ए० मोरारकर, लक्ष्मी नारायण प्रेस, ३६४, ठाकुर द्वार, बम्बई।
'हिस्ट्री ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस': खण्ड १, डा० पट्टामिसीतारमैया, पद्मा पब्लिकेशन्स लिमिटेड बम्बई, १९४६।<noinclude>{{Dhr|7em}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{c|{{x-larger|'''तारीखवार जीवन-वृत्तान्त'''}}}}</noinclude>{{rh||(१६ अक्टूबर, १९२९ से २८ फरवरी, १९३०)|}}
१६ अक्टूबर: गांधीजीने संयुक्त प्रान्तका दौरा जारी रखा जिसमें उन्होंने लाला
लाजपतराय स्मारक, संयुक्त प्रान्त राष्ट्रीय सेवा और खादीके लिए पैसा
इकट्ठा किया। देहरादून में श्रद्धानन्द अबला आश्रमका शिलान्यास किया।
विद्यार्थियों, महिलाओं और अस्पृश्योंकी सभाओं में भाषण दिया।
१७ अक्टूबर: मसूरी जाते हुए कन्या गुरुकुलकी लड़कियों द्वारा संस्कृतमें लिखा
मानपत्र स्वीकार किया; बा और मीराबहनके साथ कलाईकी प्रतियोगतामें भाग
लिया; राजपुर में केशवदेव शास्त्रीके चित्रका अनावरण किया और उनकी स्मृतिमें वृक्षारोपण किया।
१८ अक्टूबर: मसूरी में नगरपालिकाके यूरोपीय पार्षदोंके समक्ष भाषण दिया।
१९ से २३ अक्टूबर तक: मसूरीमें।
२४ अक्टूबर: मसूरी में आम सभामें भाषण दिया; अन्त्यजोंसे अनुरोध किया कि वे चेतें और यह देखें कि उन्हें मसूरीके हिन्दू मन्दिरमें प्रवेश करने दिया जाए।
२५ अक्टूबर: सहारनपुरमें।
२६ अक्टूबर: मुजफ्फरनगरमें।
२७ अक्टूबर: मेरठमें। "मेरठ षड्यन्त्र" के कैदियोंसे मिले। आम सभामें भाषण दिया।
२८ अक्टूबर: आचार्य कृपलानीके आश्रम में गये; मेरठ कालेजमें भाषण दिया।
२९, ३० अक्टूबर: असौदामें।
३१ अक्टूबर: मेरठमें।
वाइसरायने भारतकी राजनीतिक समस्याको हल करनेके लिए गोलमेज परिषद्की घोषणा की, जिसका गठन साइमन कमीशन द्वारा अपनी रिपोर्ट दिए जानेके बाद किया जाना था।
१ नवम्बर: गांधीजी दिल्ली पहुँचे; नेतागण वल्लभभाई पटेलके भवन में संयुक्त
वक्तव्यका मसविदा तैयार करनेके लिए इकट्ठे हुए; गांधीजीने इस बातपर जोर दिया कि वाइसरायके प्रस्तावको, शर्तें पूरी न किए जानेपर, स्वीकार
न किया जाये।
२ नवम्बर: वाइसरायके गोलमेज परिषद् सम्बन्धी प्रस्तावके उत्तरमें प्रमुख नेताओंके सम्मेलनने दिल्लीमें सर्वसम्मतिसे वक्तव्य जारी किया।<noinclude></noinclude>
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{{outdent|१६ अक्टूबर: गांधीजीने संयुक्त प्रान्तका दौरा जारी रखा जिसमें उन्होंने लाला लाजपतराय स्मारक, संयुक्त प्रान्त राष्ट्रीय सेवा और खादीके लिए पैसा इकट्ठा किया। देहरादून में श्रद्धानन्द अबला आश्रमका शिलान्यास किया। विद्यार्थियों, महिलाओं और अस्पृश्योंकी सभाओं में भाषण दिया।}}
{{outdent|१७ अक्टूबर: मसूरी जाते हुए कन्या गुरुकुलकी लड़कियों द्वारा संस्कृतमें लिखा मानपत्र स्वीकार किया; बा और मीराबहनके साथ कलाईकी प्रतियोगतामें भाग लिया; राजपुर में केशवदेव शास्त्रीके चित्रका अनावरण किया और उनकी स्मृतिमें वृक्षारोपण किया।}}
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{{outdent|३१ अक्टूबर: मेरठमें।<br>वाइसरायने भारतकी राजनीतिक समस्याको हल करनेके लिए गोलमेज परिषद्की घोषणा की, जिसका गठन साइमन कमीशन द्वारा अपनी रिपोर्ट दिए जानेके बाद किया जाना था।}}
{{outdent|१ नवम्बर: गांधीजी दिल्ली पहुँचे; नेतागण वल्लभभाई पटेलके भवन में संयुक्त वक्तव्यका मसविदा तैयार करनेके लिए इकट्ठे हुए; गांधीजीने इस बातपर जोर दिया कि वाइसरायके प्रस्तावको, शर्तें पूरी न किए जानेपर, स्वीकार न किया जाये।}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>खुद ही कबूल नहीं किया है? लेकिन मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि ब्रिटिश सरकारकी कभी यह नीयत ही नहीं थी कि भारतवर्षको निकट भविष्यमें 'डोमीनियन स्टेटस' दे दिया जाये।
लेकिन ये सब तो बीती बातें हैं। आपकी घोषणाके बाद तो ऐसी अनेक घटनाएँ घट चुकी हैं, जिनसे ब्रिटिश राजनीतिका रुख साफ जाहिर हो जाता है।
यह बात दिनके उजालेकी तरह साफ नजर आ रही है कि जिम्मेदार ब्रिटिश राजनीतिज्ञोंके मनमें ब्रिटेनकी नीतिमें कोई ऐसा परिवर्तन करनेका इरादा नहीं है जिससे भारतके साथ इंग्लैंडके व्यापारको जरा भी नुकसान पहुँचनेकी सम्भावना हो या जिसके कारण भारतके साथ इंग्लैंडके आर्थिक लेन-देनके औचित्य-अनौचित्यकी निष्पक्षतापूर्वक और गहरी छानबीन करना आवश्यक हो जाये । किन्तु यदि हिन्दुस्तानके शोषणकी प्रक्रियाको समाप्त करनेके लिए कुछ नहीं किया जाता तब तो भारत उत्तरोत्तर अधिकाधिक तेजीसे चूसा ही जाता रहेगा। आर्थिक मामलोंसे सम्बन्धित सदस्य महोदय कहते हैं कि १/६ अनुपात तो एक निश्चित तथ्य है। इस तरह कलमके एक ही इशारेसे भारतके करोड़ों रुपये बाहर खिचे चले जाते हैं और जब इस और ऐसे ही दूसरे बहुतेरे निश्चित तथ्योंको मिटानेके लिए विनयपूर्ण ढंगकी सीधी कार्रवाईकी जा रही है तो आप भी धनवानों और जमींदारों वगैरहसे यह अनुरोध किये बिना नहीं रह सकते कि वे देश में उस अमन-कानूनकी रक्षाके नामपर इस प्रयत्नको कुचलनेमें आपकी मदद करें जिसके भारसे दबकर भारतका सत्यानाश हो रहा है।
यदि जनताके नामपर काम करनेवाले लोग स्वतन्त्रताकी लालसाके पीछे जो उद्देश्य है उसे सभी सम्बन्धित लोगोंके सामने नहीं रखते तो इस बातका पूरा खतरा है कि हमें मिलनेवाली स्वतन्त्रता एक ऐसे बोझसे दबी हुई स्वतन्त्रता होगी जिसके कारण वह उन करोड़ों मूक और मेहनतकश इन्सानोंके लिए किसी लायक नहीं रह जायेगी जिनके लिए स्वतन्त्रता माँगी जा रही है और जिनके लिए इसे लेना योग्य है। इसीलिए इधर कुछ दिनोंसे मैं लोगोंको स्वतन्त्रताका सच्चा मतलब समझाता रहा हूँ।
अब इससे सम्बन्धित कुछ खास बातें आपके सामने पेश करनेका साहस करता हूँ।
जिस मालगुजारीसे सरकारको इतनी अधिक आमदनी होती है, उसीके भारसे रैयतका दम निकला जा रहा है। स्वतन्त्र भारतको इस नीतिमें बहुत-कुछ हेर-फेर करना होगा। जिस स्थायी बन्दोबस्तकी तारीफके पुल बाँधे जाते हैं, उससे सिर्फ मुट्ठी भर धनवान जमींदारोंको ही फायदा पहुँचता है, रैयतको नहीं। रैयत तो अब भी पहले की ही तरह असहाय हैं। वे ऐसे काश्तकार-भर हैं जिन्हें जमींदार जब चाहे बेदखल कर सकते हैं। इसलिए लगानमें तो काफी कमी करनी ही है, साथ ही पूरी राजस्व व्यवस्थामें ऐसा परिवर्तन करना है जिससे उसका मुख्य उद्देश्य रैयतकी भलाई करना बन जाये। लेकिन ब्रिटिश सरकारकी नीति तो रैयतको चूसकर निष्प्राण बना देनेकी प्रतीत होती है। यहाँतक कि उसके जीवनके लिए आवश्यक नमक-जैसी चीजपर भी इस तरह कर लगाया जाता है कि उसका सबसे अधिक भार उन्हींपर पड़ता है—भले ही उसका कारण यही क्यों न हो कि यह कर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४३
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Vineet Kumar Tiwari 29
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पत्र : लॉर्ड इर्विनको|५}}</noinclude>लगाते हुए निष्ठुरतापूर्ण निष्पक्षता बरती गई है। नमक ही एक ऐसी चीज है, जिसे गरीब लोग व्यक्तिके रूपमें और समूहके रूपमें भी धनवानोंके मुकाबले अधिक खाते हैं। इस बातका विचार करनेसे तो यह कर गरीबोंके लिए और अधिक भार-रूप जान पड़ता है। शराब और दूसरी नशीली चीजोंसे होनेवाली आमदनीका जरिया भी ये गरीब ही हैं। ये चीजें लोगोंकी तन्दुरुस्ती और नैतिकता दोनोंकी जड़ें खोखली करनेवाली हैं। इसका बचाव व्यक्तिगत स्वातन्त्र्यके बहाने, जो कि झूठा बहाना है, किया जाता है; लेकिन वास्तवमें इससे जो आमदनी होती है, उसीके लिए इसे कायम रखा जा रहा है। सन् १९१९ में जो सुधार जारी किये गये, उनके अनुसार इन मदोंकी आमदनी चतुराईके साथ नामधारी निर्वाचित मन्त्रियोंके जिम्मे कर दी गई, जिससे सब तरह्की नशीली चीजोंका व्यवहार बन्द करनेसे होनेवाला नुकसान उन्हींको सहना पड़े और इस तरह देश-हितके काम करना उनके लिए शुरूमें ही नामुमकिन हो जाये। अगर कोई अभागा मन्त्री इस आमदनीसे हाथ धोना चाहे भी तो वह ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि उस हालत में वह शिक्षा विभागका खर्च पूरा नहीं कर सकेगा और मौजूदा हालत में शराबके अलावा आमदनीका कोई दूसरा जरिया खड़ा करना उसके लिए मुमकिन नहीं है। और यदि करोंका यह भार गरीबोंको ऊपरसे पीस रहा है तो उधर प्रमुख सहायक उद्योग, अर्थात् हाथ-कताईके विनाशने उनकी उपार्जनकी क्षमताको खत्म कर दिया है। हिन्दुस्तानकी तबाहीका यह दर्द-भरा किस्सा अधूरा ही रह जायेगा, यदि उसके नाम जो कर्जा लिया गया है, उसका जिक्र इस सिलसिले में न किया जाये। इन कके बारेमें हालमें अखबारोंमें काफी चर्चा हो चुकी है। स्वतन्त्र भारतका यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि वह इस तरहके तमाम कर्जोंकी पूरी-पूरी जाँच एक निष्पक्ष अधिकरण द्वारा कराये और इस जाँचके फलस्वरूप जो कर्ज अन्यायपूर्ण और अनुचित ठहरे, उसे देनेसे इनकार करे।
यह जाहिर है कि मौजूदा विदेशी सरकार दुनियामें सबसे ज्यादा खर्चीली है और इसे बनाये रखनेकी गरज से ही ये सारे अन्याय किये जा रहे हैं। आप अपने वेतनको ही ले लीजिए। वह माहवार २१,००० रुपयेसे भी ज्यादा है। इसके सिवा उसमें भत्ता और दूसरे सीधे टेढ़े आमदनीके जरिये हैं ही। इंग्लैंडके प्रधान मन्त्रीको सालाना ५,००० पौंड, यानी, मौजूदा विनिमय दरके हिसाबसे माहवार ५,४००
रुपयेसे कुछ अधिक मिलता है। जिस देशमें हरएक आदमीकी औसत रोजाना आमदनी दो आनेसे भी कम है, उसमें आपको रोजाना ७०० रुपयेसे भी अधिक मिलते हैं। उधर इंग्लैंडके बाशिन्दोंकी औसत दैनिक आय लगभग दो रुपये है और वहाँके प्रधान मन्त्रीको रोजाना सिर्फ १८० रुपये ही मिलते हैं। इस तरह आप अपनी तनख्वाहके रूपमें ५,००० से भी अधिक भारतीयोंकी औसत कमाईका हिस्सा ले लेते हैं; उधर इंग्लैंडके प्रधान मन्त्री सिर्फ ९० अंग्रेजोंकी कमाई ही लेते हैं। मैं आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि आप इस आश्चर्यजनक विषमता पर ध्यानपूर्वक थोड़ा विचार कर देखें। एक कठोर लेकिन सच्ची हकीकतको ठीकसे समझानेके लिए मुझे आपका व्यक्तिगत उदाहरण पेश करना पड़ा है; नहीं तो निजी तौरपर मेरे दिलमें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४४
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Vineet Kumar Tiwari 29
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आपके लिए इतनी इज्जत है कि मैं ऐसी कोई बात आपके बारेमें नहीं कहना चाहूँगा जिससे आपके दिलको ठेस पहुँचे। मैं जानता हूँ कि आपको जो तनख्वाह मिलती है उसकी जरूरत आपको नहीं है। मुमकिन है कि आप अपनी सारी की सारी तनख्वाह दानमें दे डालते हों। पर जिस प्रणालीने ऐसी खर्चीली व्यवस्था बना रखी है, उसे तुरन्त तिलांजलि देना ही उचित है। जो दलील आपकी तनख्वाहके लिए ठीक है वही सारे तन्त्रपर लागू होती है।
मतलब यह कि जब राज्य-प्रबन्धके खर्चमें बहुत ज्यादा कमी कर दी जायेगी, तभी राज्यकी आमदनी में बहुत-कुछ कमी की जा सकेगी और यह तभी हो सकता है जब कि राज-काजकी सारी नीति ही बदल दी जाये। इस तरहका परिवर्तन बिना स्वतन्त्रताके नहीं हो सकता। मेरी रायमें इन्हीं भावोंसे प्रेरित होकर २६ जनवरीको लाखों ग्रामवासी स्वातन्त्र्य दिवस मनानेके लिए की गई सभाओंमें बिना किसीके कहे-सुने सहज ही शामिल हुए थे। उनके लिए तो स्वाधीनताका मतलब उक्त कुचल डालनेवाले बोझोंसे छुटकारा पाना है।
इंग्लैंड जिस तरह इस देशको लूट रहा है, सारा हिन्दुस्तान उसका एक स्वरसे विरोध कर रहा है, तो भी मैं देखता हूँ कि इंग्लैंडका कोई भी बड़ा राजनैतिक दल इस लूटको बन्द करनेके लिए तैयार नहीं है।
लेकिन यदि भारतको एक राष्ट्रके रूपमें जीवित रहना है, यदि इस देशकी जनताको भूखों रखकर तिल-तिलकर मारनेकी प्रक्रिया बन्द करनी है तो कोई-न-कोई इलाज जल्दी ही ढूंढ़ निकालना होगा। आपके द्वारा प्रस्तावित परिषद् वह इलाज नहीं है। दलीलोंसे वास्तविकताकी प्रतीति करानेका अब कोई सवाल ही नहीं रहा है। अब तो सवाल दो पक्षोंकी ताकतोंकी आजमाइशका है। इंग्लैंडको इस वास्तविकताकी प्रतीति हो या न हो, वह तो अपनी सारी ताकत लगाकर भारतके साथके व्यापारको और भारतमें कायम अपने स्वार्थीको बनाये रखना चाहेगा ही। सो इस यमपाशसे छुटकारा पानेके लिए जितनी ताकत जरूरी है उतनी ताकत इकट्ठा करना अब भारतके लिए लाजिमी हो गया है।
इसमें तो किसी भी पक्षको शक नहीं है कि हिन्दुस्तानमें जो हिंसक दल है, आज चाहे वह जितना असंगठित और उपेक्षणीय हो, फिर भी दिनों-दिन उसका बल बढ़ता जा रहा है और वह प्रभावशाली बन रहा है। उस दलका और मेरा ध्येय तो एक ही है। पर मुझे यकीन है कि हिन्दुस्तानके करोड़ों मूक लोगोंको जिस आजादीकी जरूरत है, वह इसके दिलाये नहीं मिल सकती। इसके अलावा, मेरा यह विश्वास दिनों-दिन बढ़ता ही जाता है कि शुद्ध अहिंसाके सिवा और किसी भी तरीकेसे ब्रिटिश सरकारकी इस संगठित हिंसाके प्रवाहको रोका नहीं जा सकता। बहुतेरे लोगोंका यह खयाल है कि अहिंसा कोई सक्रिय शक्ति नहीं है। लेकिन अपने अनुभवसे, जो निस्सन्देह बहुत सीमित है, मैं यह जानता हूँ कि अहिंसा एक जबरदस्त सक्रिय शक्ति है। ब्रिटिश सल्तनतको संगठित हिंसा-शक्ति और देशके हिंसक दलकी बढ़ती हुई असंगठित हिंसा-शक्तिके मुकाबले में इस जबरदस्त अहिंसक शक्तिको खड़ा<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पत्र : लॉर्ड इर्विनको|७}}</noinclude>करनेका मेरा इरादा है। अगर मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा तो इन दोनों हिंसक शक्तियोंको खुलकर खेलनेका मौका मिल जायेगा। अहिंसाको मैंने जिस रूपमें जाना है, उस रूपमें उसकी कार्य-साधक शक्तिमें समस्त सन्देहोंसे परे अविचल श्रद्धा रखते हुए भी यदि मैं और अधिक प्रतीक्षा करता हूँ तो वह पापपूर्ण कृत्य होगा।
यह अहिंसक शक्ति सविनय अवज्ञा द्वारा व्यक्त होगी। फिलहाल तो सिर्फ सत्याग्रह आश्रमके लोगों द्वारा ही इसकी शुरुआत होगी, लेकिन बादमें तो जो भी लोग इस आन्दोलनकी स्पष्ट मर्यादाओंको जानते हुए इसमें शरीक होना चाहेंगे, सब शरीक हो सकेंगे।
मैं जानता हूँ कि अहिंसात्मक संघर्ष शुरू करके मैं पागलोंका-सा साहस कर रहा हूँ, वैसी ही जोखिम उठा रहा हूँ। लेकिन जोखिम उठाये बिना, और अकसर भारीसे-भारी जोखिम उठाये बिना, सत्यकी कभी जीत नहीं हुई है। जो राष्ट्र किसी ऐसे राष्ट्रका जाने या अनजाने शोषण करता रहा है जो जनसंख्याकी दृष्टिसे उससे बड़ा है, जो उससे अधिक प्राचीन और उसके जैसा ही सभ्य संस्कृत है, उस राष्ट्रके लोगोंका हृदय परिवर्तन करनेके लिए चाहे जितनी जोखिम क्यों न उठानी पड़े, कम ही है।
'हृदय-परिवर्तन' शब्दका प्रयोग मैं जान-बूझकर कर रहा हूँ, क्योंकि मैं अपने मनमें यही महान् आकांक्षा लेकर चल रहा हूँ कि अहिंसाके द्वारा अंग्रेजोंका हृदय-परिवर्तन करके भारतके साथ उन्होंने जो अन्याय किया है, उसे देखनेकी सामर्थ्य उन्हें दे सकूँ। मैं आपके देशभाइयोंका बुरा नहीं चाहता। अपने देशभाइयोंकी तरह ही मैं उनकी भी सेवा करना चाहता हूँ। मैं मानता हूँ कि मैंने हमेशा उनकी सेवा ही की है। सन् १९१९ तक मैंने आँखें बन्द करके उनकी सेवा की। लेकिन जब मेरी आँखें खुलीं और मैंने असहयोगकी आवाज बुलन्द की तब भी मेरा मकसद उनकी सेवा करना ही था। जिस हथियारका मैंने अपने प्रियसे-प्रिय सम्बन्धीके खिलाफ नम्रतासे, पर कामयाबीके साथ इस्तेमाल किया है, वही हथियार मैंने सरकारके खिलाफ भी उठाया। अगर यह बात सच है कि मैं भारतीयोंके समान अंग्रेजोंको भी चाहता हूँ तो यह बात ज्यादा देरतक छिपी नहीं रहेगी। बरसोंतक मेरी परीक्षा लेनेके बाद जैसे मेरे कुनबेवालोंने मेरे प्रेमके दावेको कबूल किया, वैसे ही अंग्रेज भी किसी दिन कबूल करेंगे। मुझे उम्मीद है कि इस लड़ाईमें आम जनता मेरा साथ देगी और अगर उसने साथ दिया तो—सिवा उस हालतके कि अंग्रेज लोग समय रहते ही समझ जायें—उसके कष्ट सहनसे कठोरसे-कठोर लोगोंके भी हृदय पसीज जायेंगे।
सविनय अवज्ञाके द्वारा हम ऐसी ही बुराइयोंका विरोध करेंगे जिनके कुछ उदाहरण मैंने ऊपर दिये हैं। ब्रिटेनसे अपने सम्बन्ध तोड़ डालनेकी हमारी इस इच्छाका कारण ऊपर गिनाई गई ये बुराइयाँ ही हैं। इनके मिटते ही रास्ता साफ हो जायेगा और फिर सुलहके लिए दरवाजे खुल जायेंगे। भारतके साथ अंग्रेजोंके व्यापारमें से यदि लोभका पाप धुल जाये तो हमारी आजादीको कबूल करनेमें अंग्रेजोंको कोई कठिनाई न होगी। अतएव मैं आपको इन बुराइयोंको तत्काल दूर करने और इस प्रकार एक सच्ची परिषद्के आयोजनका मार्ग प्रशस्त करनेके लिए आमन्त्रित<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करता हूँ। इस परिस्थितिमें जो परिषद् होगी उसमें शामिल होनेवाले पक्षोंमें कोई छोटा या बड़ा नहीं होगा, बल्कि वे बराबरीके पक्ष होंगे और उनका उद्देश्य स्वेच्छा-जनित सहयोगके द्वारा केवल मानव-समाजका कल्याण करना और पारस्परिक सहायता तथा दोनोंके लिए समान रूपसे लाभदायक व्यापारकी शर्तें तय करना होगा। बदनसीबीसे देशमें आज जो साम्प्रदायिक झगड़े फैले हुए हैं उन्हें आपने बेवजह जरूरतसे ज्यादा महत्त्व दिया है। यह तो ठीक है कि किसी भी सरकारकी योजना तैयार करने में इनका खयाल रखना जरूरी होगा, लेकिन जो सवाल साम्प्रदायिक झगड़ोंसे परे हैं और जिनके कारण सब कौमोंको समान रूपसे हानि उठानी पड़ती है, उन सवालोंका इन झगड़ोंसे कोई सरोकार ही नहीं है। लेकिन अगर ऊपर लिखी बुराइयोंको दूर करनेका कोई इलाज आप नहीं ढूँढ़ निकालेंगे और मेरे इस पत्रका आपपर कोई असर न होगा तो इस महीनेकी ग्यारहवीं तारीखको<ref>गांधीजीने १२ मार्चको कूच आरम्भ किया था।</ref> मैं अपने आश्रमके जितने साथियोंको ले जा सकूंगा, उतने साथियोंके साथ नमक-सम्बन्धी कानूनको तोड़नेके लिए कदम बढ़ाऊँगा। गरीबोंके दृष्टिकोणसे यह कानून मुझे सबसे ज्यादा अन्यायपूर्ण मालूम होता है। आजादीकी यह लड़ाई खासकर देशके गरीबसे गरीब लोगोंके लिए है। अत: यह लड़ाई इस अन्यायके विरोधसे ही शुरू की जायेगी। आश्चर्य तो यह है कि हम इतने सालोंतक इस क्रूरतापूर्ण एकाधिकारको स्वीकार करके चलते रहे। मैं जानता हूँ कि मुझे गिरफ्तार करके मेरी योजनाको निष्फल बना देना आपके हाथमें हैं, परन्तु मुझे उम्मीद है कि मेरे बाद लाखों आदमी अनुशासित ढंगसे इस कामको अपने सिर उठा लेंगे और नमक-कानूनको, एक ऐसे कानूनको तोड़नेके लिए दिया जानेवाला सारा दण्ड खुशी-खुशी भोगेंगे जो विधान-पुस्तकको विरूपित कर रहा है और इसलिए जो कभी बनाया ही नहीं जाना चाहिए था।
मैं आपको अनावश्यक रूपसे या कमसे कम मेरे लिए जहाँतक सम्भव है वहाँ तक किसी धर्मसंकटकी स्थितिमें नहीं डालना चाहता। अगर आप सोचते हों कि मेरे पत्रमें कोई सार है और अगर आप इन मामलोंपर मुझसे बातचीत करना योग्य समझते हों तथा यदि इस उद्देश्यसे आप यह चाहते हों कि मैं इस पत्रको प्रकाशित न करूँ तो आप पत्र मिलते ही इस आशयका तार भेजकर मुझे सूचित करें।<ref>वाइसरायने उत्तर में इस बात के लिए केवल दुःख-भर प्रकट किया था कि गांधीजी "एक ऐसा रास्ता अख्तियार करनेकी सोच रहे हैं जिससे स्पष्टतः कानून भंग होगा और सार्वजनिक शान्ति खतरे में पड़ जायेगी।"</ref> फिर मैं इसका प्रकाशन सहर्ष रोक रखूंगा। लेकिन एक कृपा अवश्य कीजिएगा। वह यह कि अगर आप इस पत्रके सारसे सहमत न हो सकें तो मैंने अपने लिए जो रास्ता तय कर लिया है, उससे मुझे विमुख न करें।
इस पत्रको किसी भी तरहसे धमकी न समझें। इसे लिखना तो एक सविनय प्रतिरोधीका सीधा-सादा और पवित्र कर्त्तव्य था, जिसे उसे पूरा करना ही था। इसलिए मैं इसे विशेष रूपसे एक ऐसे नौजवान अंग्रेज मित्रके हाथ भेज रहा हूँ जो<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : साबरमती आश्रममें|९}}</noinclude>भारतीय पक्षके औचित्यमें विश्वास रखते हैं और जिनकी अहिंसामें पूरी श्रद्धा है और जिन्हें, ऐसा लगता है मानों, ईश्वरने इसी कामके लिए मेरे पास भेजा।<ref>यह पत्र वाहक रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्स थे। '''टु लिव इन मनकाइंड''' में इस प्रसंगका उल्लेख करते हुए वे कहते हैं : "गांधीजी ने आग्रह किया कि मैं पत्रको पहले ध्यानपूर्वक पढ़ लूँ और तभी इसे वाइसरायके पास ले जाऊँ। वे नहीं चाहते थे कि इस पत्रके मजमूनसे पूरी तरह सहमत हुए बिना मैं इसमें अपनेको शामिल करूँ। दरअसल इस पत्रको लेकर मुझे इसलिए भेजा गया था कि यह चीज इस बातका प्रतीक समझी जाये कि यह संघर्ष केवल भारतीयों और अंग्रेजोंके बीचका ही संघर्ष नहीं था।. . . " देखिए "उस पत्रके बारेमें", ६-३-१९३० भी।</ref>
{{right|आपका सच्चा मित्र,}}
{{right|'''मो॰ क॰ गांधी'''|1em}}
{{left|परमश्रेष्ठ लॉर्ड इविन<br>वाइसराय हाउस<br>नई दिल्ली-३}}
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १२-३-१९३० तथा एस॰ एन॰ १६६२४ से भी।|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{Larger|{{c|'''४. भाषण : साबरमती आश्रम में<ref>बनारसीलाल बजाज तथा मगनलाल गांधीकी पुत्री रुक्मिणी गांधी (रुखी) के विवाह के अवसरपर।'''</ref>}}}}
{{right|२ मार्च, १९३०}}
जब कभी आश्रमकी मारफत कोई विवाह सम्पन्न होता है तो मैं आशीर्वादके साथ दो शब्द भी कह देता हूँ। श्री शंकरलाल और उमियाके विवाह के अवसर पर मैंने जो आशा व्यक्त की थी, मैं फिर वैसी ही आशा व्यक्त करना चाहता हूँ।
भाई बनारसी, तुमसे मुझे बहुत कुछ आशा रखनेका अधिकार है। तुम्हारी नम्रता और धर्मभावना आदिको देखकर मुझे बहुत आनन्द हुआ है। मुझे आशा है कि तुम यथाशक्ति देशके कार्य में लगे रहोगे तथा इसके लिए रुक्मिणीको भी प्रेरित करोगे। सप्तपदीकी प्रतिज्ञाके अर्थको भलीभाँति हृदयंगम करके उसका पालन करनेका प्रयत्न करो। प्रतिज्ञामें कहा गया है कि हम एक-दूसरेके मित्र बनेंगे; किन्तु मित्रता तो तभी मानी जायेगी जब तुम एक-दूसरेके दोषोंको दूर करोगे। इस संसारमें जो राग-द्वष दिखाई पड़ते हैं उसका कारण एक-दूसरेके दोष देखना है। जब लोग विषय-भोगकी ही बात सोचते हैं तभी राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ कि पति-पत्नी के बीच विषय-भोगका सम्बन्ध न होकर सच्ची मित्रताका सम्बन्ध रहे। मैं जानता हूँ कि इसका पालन करना कठिन है, किन्तु प्रयत्न करनेवालेके लिए यह तनिक भी कठिन नहीं है। प्रतिज्ञा लेते हुए वधू कहती है कि तुम मेरे मित्र हो, देवता हो। इस बार<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>प्रतिज्ञाके उक्त शब्दोंको हटा देनेकी मेरी इच्छा हुई थी किन्तु मैंने उन्हें यह मानकर बना रहने दिया कि ऐसा करनेसे कोई भ्रम पैदा न हो जाये। फिर भी मैं भविष्य में गुरु और देवता शब्दोंको हटा देना चाहता हूँ। इसका कारण यह है कि पति स्वयंको देवता और गुरु माने, यह ठीक नहीं है। दूसरेकी सेवा करनेवाला तो सहज ही उसके लिए देवता और गुरु बन जाता है। फिर भी ऐसा नहीं है कि आज जो प्रतिज्ञा की जा रही है, वह झूठ है। रुक्मिणीने अच्छी तरह समझ-बूझकर तुम्हें गुरु और देवता माना है। अतः तुम उसके लायक बनो। उसे फूलकी तरह सँभालकर रखना। प्रान्त भेदके कारण उत्पन्न होनेवाली बातोंको सहन करना। मारवाड़ और गुजरातमें जो सम्बन्ध स्थापित हुआ है वह पुष्पित और पल्लवित हो। अन्य लोगोंके लिए तुम्हारा सम्बन्ध आदर्श रूप हो।
रुखी, बनारसीको मैंने नहीं बल्कि मगनलालने पसन्द किया था। मैंने तो सिर्फ उसका उत्तराधिकारी होनेकी योग्यता पानेका प्रयत्न किया है। मगनलालने तुझसे जो आशा की थी, तू उसे पूरी करना। यह तो तू जानती है कि उसका पूरा जीवन सेवामय था। उसका यह संस्कार मुझमें भी आ जाये, इस विचारसे मैं उसके आसन पर बैठ गया हूँ। मेरे अपने विचार तो तू जानती ही है। तू उन विचारोंका अनुसरण करे, यही नहीं, तुझे अपने पिता और पितामहका नाम रोशन करना चाहिए। मेरी महत्त्वाकांक्षा तो यह है कि तेरी सास आदिको तुझमें स्वार्थका नाम निशान तक नजर न आये तथा तेरे हाथों ऐसा कोई काम न हो जिससे मुझे, खुशालभाई, देव-भाभी या सन्तोकको शर्मिन्दा होना पड़े। तेरे किसी भी कामपर यदि कोई लांछन आया तो वह दुःखकी बात होगी। विषय-भोग में भी संयम रखना श्रेयस्कर होगा। संयमके लिए ही विषय भोग करना। स्वभाववश हमें कुछ बातें करनी पड़ती हैं, जैसे प्रार्थनाके समय संगीत। यह एक प्रकारका भोग है; क्योंकि मधुरता तो भोग है। किन्तु यह भोग त्यागके लिए है। इसी प्रकार विवाह भी भोग है, किन्तु इसके
बावजूद हमें यह समझ लेना चाहिए कि उसका उद्देश्य संयम है। विषय-भोगको स्वीकार करनेका हेतु उससे छुटकारा पाना है। तू तो दक्षिण आफिकासे ही यह शिक्षा लेती आ रही है। इसलिए सदा सेवा करती रहना और ऐसे काम करना जिनसे बनारसीको आश्रमकी गुजराती कन्याके साथ विवाह करनेका पश्चात्ताप न हो। यदि उसमें गुरु-देवता बननेकी योग्यता न भी हो तो तू ऐसी आदर्श स्त्री बनना
जिससे तेरे द्वारा उसमें ऐसी योग्यता आ जाये। तुम दोनों दीर्घायु होओ, यह मेरा हार्दिक आशीर्वाद है।
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९२९६) की नकलसे।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''५. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}}
{{right|सोमवार, ३.४५ प्रातःकाल<br>[३ मार्च, १९३०]<ref>तिथिका निर्धारण पत्र लॉर्ड इविनको २-३-१९३० से किया गया है। यह पत्र वाइसरायको रेजिनाइड रेनॉल्ड्स द्वारा भिजवाया गया था।</ref>}}
{{left|चि॰ ब्रजकृष्ण,}}
तुमारे सतकी मैं राह देख रहा था। छगनलाल और काशीवहनसे तो सुना कि तुमारा बुखार चला गया और राजी हुआ।
दूधमें घी लेनेसे हजम हो जाय तो अवश्य ले लो। दूध थोड़ा लेनेसे और रोटीमें लेनेसे काम चले तो भी अच्छा है। वैद्योंका अनुभव यह बताता है कि जो दूधसे बंधकोष्ट होता है उसका फल छोड़कर और चीजोंसे भी ऐसा हि होगा। परंतु उसकी कोई दरकार नहि है। जिससे अच्छा हो जाय ऐसा करो।
अब रही बात दिल्लीकी। मा और भाईको तारसे रोको कहो कि तुमारा अब तो जेल में जानेका नहि है। और अब तुमारे कामोंमें दखल भी न दें तो भी यदि तुमारे पास आवे तो दृढ़ रहो, विनयसे कह दो अब तुमारे पर ऐसा दबाव डालने की आशा छोड़ दें। उनके दुःखकी बरदास करो। ऐसा एक वखत भी होगा तो ये शांत हो जायंगे।
महादेव दिल्ही नहि गया है। रेनल्ड्स खत लेकर गया है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
जी॰ एन॰ २३७५ की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''६. पत्र : मनमोहनदास गांधीको'''}}}}
{{right|३ मार्च, १९३०}}
{{left|भाईश्री मनमोहनदास,}}
आपकी भेजी हुई दोनों पुस्तकें मिलीं। आप देखते ही हैं कि नमक-सम्बन्धी पुस्तकका उपयोग हो रहा है। यदि आपको इतनी जानकारी और हो तो उसे प्राप्त कर मुझे भेजिएगा कि नमक कर उगाने में कितना खर्च होता है? कोई कहता है ८ प्रतिशत, कोई २० प्रतिशत अन्य करोंको उगाहने में होनेवाले खर्चके साथ इस खर्चकी तुलना भी कीजिएगा।<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आपके पास नमकपर यदि अन्तिम एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट (शासकीय विवरण) हो तो भेजें, यदि आपके पास उसकी एक ही प्रति हो तो मैं उसे वापस भेज दूँगा।
अब आपकी कपासके बारेमें लिखी पुस्तकके सम्बन्धमें। मैं इसे पढ़ रहा हूँ। आप लिखते हैं कि प्राचीन कालमें बुनाई और कताई सम्भवतः सहायक धन्धे नहीं अपितु स्वतन्त्र धन्धे रहे होंगे। बुनाई और कताई दो स्वतन्त्र क्रियाएँ हैं। बुनाई (मुख्यतः) स्वतन्त्र धन्धा था और आज भी है। कताई हमेशासे (मुख्यतः) सहायक धन्धा रहा है, यह बात हम आज भी हजारों दृष्टान्तोंसे सिद्ध कर सकते हैं। १९१९ में पुनरु-द्धार आन्दोलनके आरम्भके समय भी ऐसे दृष्टान्त मौजूद थे। यह भेद महत्त्वपूर्ण है। इसलिए आप समझ ही लेंगे कि यह जो भूल बन पड़ी है वह गम्भीर है। अनुभव-ज्ञानके अभावमें ऐसी भूलें होती ही रहेंगी; ऐसी भूलें उन लेखकोंसे भी हुई हैं जिन्होंने आपसे अधिक अध्ययन किया है, जो आपसे अधिक गहरेमें उतरे हैं। लेकिन विनम्र अभ्यासीके लिए अपने बचाव में यह दलील देना व्यर्थ है। आप मुगल-कालके बारेमें लिखते हुए कहते हैं, "मुस्लिम साम्राज्यमें इतनी मार-काट हुआ करती थी कि धन्धे आदि चल नहीं सकते थे।" आपकी इस मान्यतामें दो दोष हैं। यह मार-काट कभी व्यापक नहीं होती थी। अकबरसे पूर्व किसी मुसलमान बादशाहने कभी गाँवोंमें प्रवेश नहीं किया था। सारी मार-काट शहरोंमें हुआ करती थी। इसके अतिरिक्त शहरोंमें होनेवाली मार-काटका असर भी कारीगर-वर्ग पर कम ही होता था । इस अन्धेरपूर्ण राज्यमें भी हम आज कारीगरोंको काम करते हुए देखते। प्राचीन कालमें शासनतन्त्र केवल राजनयिकोंके वर्गको ही स्पर्श करता था। यह तो आजके युगकी ही विशेषता है कि सरकारोंको समस्त जनताको अपने अधिकारमें ले लेनेका लोभ होता जा रहा है और इस बातमें अंग्रेजी राज्यने अधिकसे-अधिक निपुणता प्राप्त की है। उसकी यही निपुणता हमें नेस्तनाबूद किये दे रही है, क्योंकि उस राज्यका अस्तित्व परोपकारके लिए नहीं है।
फुरसत मिलनेपर सवेरेके समय मैं यह पत्र लिख रहा हूँ; क्योंकि मैं आपसे महत्त्वपूर्ण योगदानकी आशा रखता हूँ।
{{right|'''मोहनदासके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ६) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{Larger|{{c|'''७. पत्र : रेहाना तैयबजीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रहाश्रम, साबरमती<br>५ मार्च, १९३०}}
{{left|प्रिय रेहाना,}}
यह पत्र तो बोलकर ही लिखाना होगा। अन्यथा तुम्हें पत्र लिख नहीं सकता। तुम्हें किसी भी चीजका इस्तेमाल करने या न करनेकी तो पूरी छूट है ही, लेकिन मैं समझता हूँ, पिताजी और माताजी ने जो स्थिति अपनाई है उसके खिलाफ भी कुछ नहीं कहा जा सकता। गृहस्थीके सूत्रधार तो वही लोग हैं । तुम नम्रतापूर्वक कुछ सुझाव तो दे सकती हो, लेकिन तुम्हें उनकी इच्छाओंका बुरा नहीं मानना चाहिए। इनसे अच्छे माता-पिताकी तो कोई भी आशा नहीं कर सकता। इतना ही काफी है कि जहाँतक तुमसे बनता है, तुम पाश्चात्य सुखोपादानोंका प्रयोग नहीं करती। अपने प्रति कठोर और अपने आसपासके लोगोंके प्रति उदार रहकर तुम उन्हें जितना प्रभावित कर सकती हो, उतना और किसी तरीकेसे नहीं कर सकती।
{{right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ९६१५) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{Larger|{{c|'''८. टिप्पणियाँ : साबरमती आश्रमकी प्रार्थना सभामें'''}}}}
{{right|५ मार्च, १९३०}}
१२ तारीखको प्रातःकाल आन्दोलन आरम्भ हो जायेगा। अतः मेरे साथ भाग लेनेवाले सभी लोगोंको पाँच दिनमें तैयार हो जाना पड़ेगा। भोजन-पानीकी चिन्ता आपको नहीं करनी चाहिए। ईश्वरपर भरोसा रखनेसे हमें सब कुछ मिल जायेगा।
'''एक नवयुवकने पूछा कि हमें किस ओर कूच करना है। चलते-चलते मुस्कराते हुए उसके प्रश्नका उत्तर देते हुए गांधीजी ने कहा :'''
हम लोग पेथापुरकी तरफ पैदल कूच करेंगे। हमारे साथ एक घोड़ा रहेगा और यदि मेरी तबीयत ठीक न हुई तो मैं उसका उपयोग करूँगा। श्री अब्बास तैयबजी तथा पचास लोगोंकी टुकड़ीके साथ मैं कूच करूँगा। प्रत्येक व्यक्तिको अपने साथ 'गीता' की एक प्रति रखनी चाहिए। यदि जरूरत पड़ी तो हम जेलमें भी सविनय कानून-भंग करेंगे। सिर्फ पुरुष ही हमारे साथ जायेंगे। स्त्रियाँ तथा बच्चे आश्रममें ही रहेंगे।
'''किसीके यह सुझानेपर कि हमें चार-पाँच स्त्रियोंको अपने साथ रखना चाहिए, गांधीजी ने कहा :'''<noinclude></noinclude>
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यह पत्र तो बोलकर ही लिखाना होगा। अन्यथा तुम्हें पत्र लिख नहीं सकता।
तुम्हें किसी भी चीजका इस्तेमाल करने या न करनेकी तो पूरी छूट है ही, लेकिन मैं समझता हूँ, पिताजी और माताजी ने जो स्थिति अपनाई है उसके खिलाफ भी कुछ नहीं कहा जा सकता। गृहस्थीके सूत्रधार तो वही लोग हैं । तुम नम्रतापूर्वक कुछ सुझाव तो दे सकती हो, लेकिन तुम्हें उनकी इच्छाओंका बुरा नहीं मानना चाहिए। इनसे अच्छे माता-पिताकी तो कोई भी आशा नहीं कर सकता। इतना ही काफी है कि जहाँतक तुमसे बनता है, तुम पाश्चात्य सुखोपादानोंका प्रयोग नहीं करती। अपने प्रति कठोर और अपने आसपासके लोगोंके प्रति उदार रहकर तुम उन्हें जितना प्रभावित कर सकती हो, उतना और किसी तरीकेसे नहीं कर सकती।
{{right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ९६१५) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{Larger|{{c|'''८. टिप्पणियाँ : साबरमती आश्रमकी प्रार्थना सभामें'''}}}}
{{right|५ मार्च, १९३०}}
१२ तारीखको प्रातःकाल आन्दोलन आरम्भ हो जायेगा। अतः मेरे साथ भाग लेनेवाले सभी लोगोंको पाँच दिनमें तैयार हो जाना पड़ेगा। भोजन-पानीकी चिन्ता आपको नहीं करनी चाहिए। ईश्वरपर भरोसा रखनेसे हमें सब कुछ मिल जायेगा।
'''एक नवयुवकने पूछा कि हमें किस ओर कूच करना है। चलते-चलते मुस्कराते हुए उसके प्रश्नका उत्तर देते हुए गांधीजी ने कहा :'''
हम लोग पेथापुरकी तरफ पैदल कूच करेंगे। हमारे साथ एक घोड़ा रहेगा और यदि मेरी तबीयत ठीक न हुई तो मैं उसका उपयोग करूँगा। श्री अब्बास तैयबजी तथा पचास लोगोंकी टुकड़ीके साथ मैं कूच करूँगा। प्रत्येक व्यक्तिको अपने साथ 'गीता' की एक प्रति रखनी चाहिए। यदि जरूरत पड़ी तो हम जेलमें भी सविनय कानून-भंग करेंगे। सिर्फ पुरुष ही हमारे साथ जायेंगे। स्त्रियाँ तथा बच्चे आश्रममें ही रहेंगे।
'''किसीके यह सुझानेपर कि हमें चार-पाँच स्त्रियोंको अपने साथ रखना चाहिए, गांधीजी ने कहा :'''<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
स्त्रियोंको सत्याग्रह करनेका पूरा अवसर मिलेगा। जैसे हिन्दू गायको नहीं मारते उसी प्रकार अंग्रेज लोग जहाँतक सम्भव होता है स्त्रियोंपर हमला नहीं करते यदि हिन्दू लड़ाईमें जाते हुए अपने साथ गायको ले जायें तो उसे कायरता माना जायेगा। इसी प्रकार यदि हम स्त्रियोंको साथ ले जायें तो यह कायरता मानी जायेगी। भविष्यमें होनेवाले आन्दोलनमें तो बच्चे भी मारे जायेंगे, यह जानते हुए भी यदि हम बच्चोंको साथ रखेंगे तो यह मूर्खता ही होगी।
मैं चाहता हूँ कि यह आन्दोलन एकाध मासमें समाप्त हो जाये, किन्तु यह तो बहुत दिनोंतक चलेगा।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''गुजराती,''' ९-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''९. पत्र : विट्ठलदास जेराजाणीको'''}}}}
{{right|५/६<ref>यह पत्र ५ तारीखको लिखवाया गया था और गांधीजी ने इसपर ६ को हस्ताक्षर किये थे।</ref> मार्च, १९३०}}
{{left|भाईश्री जेराजाणी,}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हें भाई शंकरलाल जहाँ जानेके लिए कहें वहाँ चले जाना। ऐसे कामके लिए मेरी अनुमति प्राप्त करनेकी कोई जरूरत नहीं। जब मुझे तुम्हारी जरूरत महसूस होगी तब तुम जहाँ भी होगे वहाँसे तुम्हें बुला लूंगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९७६९) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr}}
{{larger|{{c|'''१०. नमक- कानूनके दण्ड-विषयक खण्ड'''}}}}
बम्बई नमक-कानून और भारतीय नमक-कानूनसे शब्दशः अथवा संक्षिप्त रूपमें उद्घृत निम्नलिखित खण्डोंको<ref>देखिए परिशिष्ट १।</ref> देखनेसे स्पष्ट हो जायेगा कि उन्हें लागू करनेका क्या मंशा रहा है। बम्बई कानून १८८२ के भारतीय कानूनकी ही परिष्कृत आवृत्ति है। बम्बई कानूनके अधिकांश दण्ड-विषयक खण्डोंसे प्रकट होता है कि मूलको और भी सख्त रूप दे दिया गया है। जाहिर है कि इस कानूनके प्रयोगके अनुभवसे यह परिवर्तन आवश्यक जान पड़ा। केन्द्रीय कानूनसे केवल एक खण्ड लिया गया है। पाठक-गण उस विचित्र खण्डको लक्षित किये बिना न रहेंगे जिसमें कहा गया है कि अगर नमक-कर वसूल करनेवाले अधिकारी 'कायरता' से काम लेते पाये जायेंगे तो उनका यह आचरण जुर्म माना जायेगा और इसके लिए तीन साल तककी सजा दी जा<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
g934kbm5rs4x5kigo6roexchkdb3yyb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||उस पत्रके बारेमें|१५}}</noinclude>सकती है। 'कायरता' शब्दकी कोई परिभाषा नहीं की गई है। लेकिन समझदार पाठकोंको यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि एक ऐसे कानूनके प्रयोगके सन्दर्भ में, जिसकी चपेटमें करोड़ों आदमी, स्त्री-पुरुष, बूढ़े-जवान, शारीरिक दृष्टिसे अक्षम और सक्षम सभी आ जाते हैं, इस शब्दका क्या अर्थ हो सकता है।
{{left|[अंग्रेजीसे],<br>'''यंग इंडिया,''' ६-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''११. सरकारी कर्जका विश्लेषण'''}}}}
श्रीयुत हरिदास मजुमदारने सरकारी कर्जके विषयमें एक लेख लिखा है। नीचे उसका सार दे रहा हूँ<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है।</ref> जिससे पाठक समझ सकते हैं कि यह कर्ज क्या चीज है।
{{left|[अंग्रेजीसे],<br>'''यंग इंडिया,''' ६-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१२. उस पत्रके बारेमें'''}}}}
जैसा कि अखबारोंका अनुमान था, वाइसराय साहबके नाम मेरा पत्र २ मार्चको रवाना हो गया। अखबारवालोंने पत्रकी बातोंके सम्बन्धमें कई अटकलें लगाई हैं, मगर उनमें से अधिकांश गलत हैं। मैं चाहता हूँ कि संवाददाता और समाचार भेजने-वाली एजेंसियाँ समाचारोंको केवल पैसा कमाने का जरिया बनानेके बजाय लोक-हितका खयाल रखा करें। अगर पत्रमें सर्व-साधारणके कामकी कोई बात होती तो अवश्य ही पण्डित जवाहरलाल नेहरूने उसे जाहिर किया होता। लेकिन उसे छापनेसे पहले दिल्लीसे उसके जवाबकी राह देख लेना मुनासिब समझा गया। मैं लड़ाई करनेको तुला नहीं बैठा हूँ। अगर हो सके तो उसे टालनेके लिए मैं कोई बात उठा नहीं रख रहा हूँ। लेकिन जिस घड़ी मुझे मालूम हो जायेगा कि अब किसी सम्माननीय समझौतेकी गुंजाइश नहीं रह गई है, उसी घड़ी मैं लड़ाई छेड़ देनेके लिए तैयार हूँ। समाचारोंको अप्रत्यक्ष स्रोतोंसे और प्रायः उलटे-सीधे साधनोंसे बटोरकर उन्हें समयसे पहले छापना पत्रकारोंका काम नहीं होना चाहिए। मैं जानता हूँ कि दुनिया-भरमें सबसे बड़ा माना जानेवाला पत्र अपनी इस बात के लिए मगरूर है कि वह छिपे तौर पर ऐसे समाचार भी प्राप्त कर सकता है, जिसे दूसरी एजेंसियाँ प्राप्त नहीं कर सकतीं। जिन समाचारोंको लोग कुछ समयके लिए लोकहितकी दृष्टिसे गुप्त रखना चाहते हैं, उन्हें छापकर वह पत्र अभिमानसे फूल उठता है। लेकिन अंग्रेज जनता<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>'टाइम्स' के इस व्यवहारको इसलिए सह लेती है कि उसके संचालकोंमें धनवान और प्रभावशाली लोग हैं। हमने अपने शासकोंके इस व्यवहारकी बिना विचारे, आँख मूंद कर नकल की है, और यह नकल सिर्फ समाचारोंके छापने तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि अधिक महत्त्वकी कई बातोंमें भी हम उनके अन्धे नकलची बन गये हैं। मैं जानता हूँ कि मेरी यह आवाज अरण्यरोदन-सी है, हालांकि मैं यह बात अधिकार-पूर्वक कहता हूँ, क्योंकि अगर चार साप्ताहिकोंको<ref>'''इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया, नवजीवन, और हिन्दी नवजीवन।'''</ref> सफलतापूर्वक चलाना पत्रकारिताका व्यावहारिक अनुभव माना जा सकता है तो मुझे इस कलाका लगातार २० सालसे ज्यादाका निजी अनुभव है। खैर, चाहे जो हो, शीघ्र ही जो लड़ाई छिड़नेवाली है, उसमें अन्य बातोंके साथ हर चीज में अंग्रेजोंकी इस अन्धी नकल पर हमला करना भी शामिल है। आशा है, इसके कारण कोई मुझे अंग्रेज-विरोधी वृत्तिका दोषी नहीं ठहरायेगा। सच तो यह है कि मुझे अपने विवेकपर गर्व है। मैंने धन्यवादपूर्वक अंग्रेजोंसे उनके कई गुण सीखे हैं। समयकी पाबन्दी, वाक्-संयम, सार्वजनिक स्वास्थ्य-सफाई और सुघड़ता, स्वतन्त्र विचार, स्वतन्त्र निर्णय और दूसरी कई बातें मैंने अंग्रेजोंके सम्पर्क में रहकर सीखी हैं। इनके लिए मैं उनका आभारी हूँ। लेकिन चूंकि मुझमें शुरूसे ही गुलामीकी मनोवृत्तिका नामोनिशान नहीं रहा है और न मेरे दिलमें कभी यह विचार ही आया कि किसी अधिकारी या अन्य अंग्रेजकी दोस्तीका लाभ उठाकर अपना भौतिक स्वार्थ साधूं, इसलिए मुझे अंग्रेजोंसे पूरी तरह अनासक्त रहकर उन्हें पहचानने, उनका अध्ययन करनेका विरल सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अतएव जब कि यह लड़ाई शुरू होनेवाली है, मैं अपने सहयोगी पत्रकारोंको सावधान कर देना चाहता हूँ कि वे समाचार छापने या पानेके लिए अंग्रेजी तरीकोंकी नकल न करें। मेरे महात्मा बननेसे बहुत पहले और जब हिन्दुस्तानके सार्वजनिक जीवनमें मेरा कोई महत्त्वका स्थान नहीं था उस समय मैंने जो मौलिक तरीका इस बारे में अख्तियार किया था, मेरे सहयोगी उसका अध्ययन करके देखें। निःसन्देह मामला बड़ा टेढ़ा था, लेकिन अन्य क्षेत्रोंकी भाँति ही मैंने पत्रकारिताके क्षेत्रमें भी यह अनुभव किया कि शुद्ध प्रामाणिकता और सच्चा व्यवहार सर्वोत्तम नीति है। छोटे रास्तेसे निकलनेकी कोशिशमें, हम जितनी दूरी बचाना चाहते हैं, उससे कमसे-कम दुगुनी दूरी ज्यादा तय करनी पड़ जाती है; क्योंकि उस राहसे लौटना तो पड़ता ही है। मैं ये सारी बातें अपने साथी पत्रकारोंको उपदेश देनेके लिए नहीं कह रहा हूँ, बल्कि इस गरजसे कह रहा हूँ कि आगामी लड़ाईमें उनका शुद्ध सहयोग मेरे लिए बहुत उपयोगी होगा—फिर चाहे वे मेरे राजनीतिक लड़ाईके तरीकोंको पसन्द करें या उनकी मुखालफत करें। जो जोखिम मैं उठा रहा हूँ, मेहरबानी करके वे उसे ज्यादा न बढ़ायें। मैं उम्मीद करता हूँ कि वे एक नियमका पालन करेंगे और वह यह कि जबतक मेरे नजदीकी और किसी अधिकारी व्यक्तिसे समाचारोंकी जांच न करा लें, वे कोई भी समाचार अपने पत्र में न छापें।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५५
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||विद्यार्थी और चारित्र्य|१७}}</noinclude>
इस लम्बी भूमिकाके बाद मैं पाठकोंसे यह कह दूं कि वाइसराय साहबके निजी सचिव तक हाथों-हाथ पहुँचानेके लिए यह पत्र एक खास पत्रवाहकके साथ भेजा गया था। ये पत्रवाहक एक नौजवान अंग्रेज मित्र श्री रेजिनाल्ड रेनॉल्ड्स हैं। कुछ महीने पहले ये हिन्दुस्तान आये हैं और उन्होंने हिन्दुस्तानके पक्षको सम्पूर्णतया अपना पक्ष बना लिया है। मेरे लिए तो यह पत्र भेजना एक धार्मिक कार्य था, जैसी कि यह सारी लड़ाई है। और एक अंग्रेज मित्रको मैंने अपना पत्रवाहक इसलिए चुना कि मैं अपने ऊपर एक और अंकुश लगा लेना चाहता था ताकि मुझसे एक भी अंग्रेजको तकलीफ पहुँचानेका कोई काम इरादतन न हो सके। अगर मुझे अपनी बातका थोड़ा भी खयाल है तो अनजाने होनेवाली भूलपर भी इस पसन्द के कारण अपने-आप अंकुश बना रहेगा। मुझे यह देखकर भी खुशी होती है कि मुझे एक ऐसे काममें, जिसमें मेरी सारी कोशिशोंके बावजूद अंग्रेजोंकी जान जानेका खतरा मौजूद है, एक
संस्कारवान्, बहुविद् और निष्ठावान अंग्रेजका निःस्वार्थ सहयोग बिना माँगे ही मिल गया है।
जहाँतक खुद पत्रकी बात है, जब वह पाठकोंके सामने जायेगा तो वे देखेंगे कि वह कोई अन्तिम चेतावनी नहीं है, बल्कि अपनेको अंग्रेजोंका मित्र माननेवाले व्यक्तिका लिखा एक मैत्रीपूर्ण पत्र है, हालाँकि उसमें जो कुछ कहा गया है सो बिल-कुल दो टूक कहा गया है। लेकिन अभी कुछ दिन पाठक धीरजसे उसकी प्रतीक्षा करें।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ६-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१३. विद्यार्थी और चारित्र्य'''}}}}
पंजाबके एक अवकाश प्राप्त स्कूल इन्स्पेक्टर लिखते हैं :<ref>पत्रका अनुवाद यहाँ नहीं दिया जा रहा है। पत्र लेखकने विद्यार्थियों में बढ़ती हुई हिंसा और घृणाकी वृत्ति तथा अनुशासनहीनता के सम्बन्धमें गांधीजी की सलाह माँगी थी।</ref>
इन नारोंके बारेमें तो मैं 'यंग इंडिया' के अभी हालके ही एक अंकमें विस्तार-पूर्वक लिख चुका हूँ।<ref>देखिए खण्ड ४२, पृष्ठ ५१०-१२।</ref> मैं पूरी तरह मानता हूँ कि 'डाउन विद द यूनियन जैक' (ब्रिटिश झण्डा मुर्दाबाद) के नारेमें हिंसाकी गंध है। इसी तरहके और भी आपत्तिजनक नारे आजकल चल पड़े हैं। अहिंसाको कार्य-साधक नीति माननेवालों को भी उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। इससे कोई लाभ नहीं, उलटे नुकसान हो सकता है। संयमी नौजवान ऐसे नारे नहीं लगा सकते। सत्याग्रह्के तो ये विरुद्ध हैं ही। अब हम इन पत्र-लेखकके दूसरे प्रश्नपर विचार करेंगे। स्पष्ट है कि वे इस बातको भूल गये कि अधिकारियोंने जैसा बोया है, वैसा ही वे आज काट भी रहे हैं। हमारे विद्यार्थियोंमें आज जो भी चारित्रिक दोष पाये जाते हैं, उन सबके लिए मौजूदा<noinclude>{{Smallrefs}}
{{dhr}}
{{left|४३–२}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५६
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>शिक्षा-प्रणाली ही जिम्मेदार है । मेरी सलाह या सहायता अब काम नहीं दे सकती। अब तो शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियोंके पक्षको अपना बनाकर उनका नेतृत्व करते हुए उन्हें विजय दिलाना ही इसका उपाय है। विद्यार्थी अपने देशका दर्दनाक इतिहास जानते हैं। दूसरे देशोंने किस तरह स्वतन्त्रता प्राप्त की है, यह भी वे जानते हैं। अब उन्हें अपने देशकी आजादीके लिए काम करनेसे रोकना मुमकिन नहीं। अगर उन्हें अपने ध्येयकी प्राप्तिके लिए ठीक रास्तेसे नहीं ले जाया गया तो ठीक लोगोंके परामर्शके अभावमें उनकी अपरिपक्व बुद्धि जो मार्ग उन्हें सुझायेगी, वे उसी मार्ग पर चलेंगे। चाहे जो हो, मैं तो उन्हें अपना मार्ग बता चुका हूँ। अगर नौजवानोंके इस उत्साहका कारण मैं ही हूँ, तो मेरे लिए यह हर्षकी बात है। मैं उस उत्साहको सही दिशा देनेकी भी कोशिश कर रहा हूँ। अगर वे मेरी कोशिशोंके बावजूद गलत रास्तेपर चलते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी मेरे सिर नहीं डाली जा सकती।
अमृतसरके बम-काण्डसे मुझसे ज्यादा दुःख और किसको हो सकता है? उसमें एक सर्वथा निर्दोष युवक प्रतापसिंहकी जान गई, जिसे मारना निश्चय ही बम फेंकने-वालेका उद्देश्य नहीं था। हमारे विद्यार्थियोंमें जिस चारित्र्यकी कमीका जिक्र शिक्षा विभागके उक्त अवकाश प्राप्त निरीक्षकने किया है, ऐसे हिंसात्मक कार्य निश्चय ही उसीके कारण होते हैं। लेकिन यहाँ चारित्र्य शब्दका प्रयोग करना शायद बहुत उचित न हो। मतलब उस तत्त्वसे है जो चरित्रको स्थिरता और दृढ़ता प्रदान करता है। अगर बम फेंकनेवालेका इरादा सचमुच ही खालसा कॉलेजके आचार्यको मारनेका था, तो यह हममें फैले हुए एक भयंकर और गम्भीर रोगका सूचक है। आज शिक्षकों और विद्यार्थियोंके बीच सजीव सम्बन्ध नहीं हैं। सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओंके शिक्षक स्वभावतः यह महसूस करते हैं कि सरकारके प्रति वफादारीका इजहार करना और दूसरोंको वफादार बननेकी सीख देना उनका कर्त्तव्य है—भले ही उनमें सच्ची वफादारी हो या न हो। पर विद्यार्थियोंमें सरकारके प्रति वफादारीके भाव नहीं रह गये हैं। वे अधीर हो उठे हैं और इसी अधीरताके कारण अब वे आत्मसंयम खो बैठे हैं। यही वजह है कि वे अपनी शक्ति ऐसे कार्योंमें लगाते हैं जिनका औचित्य सन्दिग्ध है। लेकिन इन सब घटनाओंके कारण मैं यह नहीं महसूस करता कि मुझे अपनी लड़ाई बन्द कर देनी चाहिए; उलटे मुझे तो यही एक मार्ग साफ-साफ दिखाई पड़ रहा है कि इन दोनों पक्षोंकी हिंसाके दावानलसे जूझते हुए मैं या तो उसपर विजय प्राप्त करूँ या फिर स्वयं उसमें जलकर खाक हो जाऊँ।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ६-३-१९३०|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१४. सरकारी कर्ज'''}}}}
सरकारी कर्जपर कांग्रेस द्वारा पास किये गये प्रस्तावके परिणामस्वरूप अब इस विषयपर काफी महत्त्वपूर्ण साहित्य सामने आ रहा है। 'बॉम्बे क्रॉनिकल' इस विषयपर 'पॉलिटिक्स' द्वारा लिखी तथ्यपूर्ण लेख-माला प्रकाशित करके एक बहुत बड़ी सेवा कर रहा है। वित्तीय समस्याएँ बराबर एक नीरस विषय हुआ करती हैं। इस विषयको समझने के लिए काफी एकाग्रचित्त होने और कुछ पूर्व अध्ययनकी भी आवश्यकता होती है। यह तो हमारे विद्वान् अर्थशास्त्रियोंका काम है कि वे इन समस्याओंको ऐसे रोचक ढंगसे सामने रखें जिससे लोग इन्हें समझ सकें। 'पॉलिटिक्स' द्वारा लिखी लेख-माला इसी दिशामें एक प्रयास है। मगर मैं निश्चयपूर्वक ऐसा नहीं कह सकता कि उसके विषयके निरूपणको और भी सरल नहीं बनाया जा सकता—भले ही उसके लिए कुछ और भी विस्तारसे क्यों न लिखना पड़े। उस लेख-मालासे मैं पाठकोंके विचारार्थं दो चीजें यहाँ दे रहा हूँ। तमाम उपलब्ध आँकड़ोंपर विचार करनेके बाद 'पॉलिटिक्स' निष्कर्ष रूपमें कहता है :
{{outdent|{{gap}}{{gap}}'''सभी प्रकारकी सरकारी संस्थाओं द्वारा अलग-अलग उद्देश्योंसे और अलग-अलग रूपोंमें लिया गया कुल सरकारी कर्ज इस समय १२ अरब रुपये से कुछ ही कम होगा। यह भारतमें प्रति वर्ष उत्पादित तमाम वस्तुगत सम्पदाका आधा है। और उस सम्पदासे देशके प्रत्येक मनुष्यको मुश्किलसे दिनमें केवल एक वक्त मोटे झोटे किस्मका खाना दिया जा सकता है–सो भी तब जब कि हम मानव जीवनकी अन्य सभी आवश्यकताओंको अलग रख दें।'''}}
यदि यह कथन सच हो तो भारतके खिलाफ किये गये एक घोर अपराधकी साक्षी भरता है। इससे प्रकट होता है कि इन कर्जोंको अधिकांशतः ऐसी मदों में लगाया जाता जिनका उत्पादनसे कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि ये कर्ज सही ढंगके होते तो हमारी सम्पत्तिमें इतनी वृद्धि तो अवश्य हुई होती जिससे हममें से प्रत्येकको खानेके लिए बहुत काफी मिल जाता। कुल कर्जका हवाला दे देनेके बाद 'पॉलिटिक्स' इन दायित्वोंके नैतिक औचित्यपर विचार करते हुए अन्तमें अपना मत इन शब्दों में व्यक्त करता है :
{{outdent|{{gap}}{{gap}}'''लेकिन यहाँ इस बातका उल्लेख फिर करना होगा कि अभी तक ये कर्ज सरकारने भारतको जनताकी राय जाननेकी चिन्ता किये बिना लिये हैं। भारतको जनताको १९१९-२० के सुधार अधिनियमके अधीन भी कर्ज लेने-न-लेने और उसके भुगतानका दायित्व अपने सिर लेने-न-लेनके बारेमें मत देनेका अधिकार नहीं दिया गया है। अतएव हमारी राजनीतिक परिपक्वताकी स्वीकृतिके साथ—चाहे वह स्वीकृति औपनिवेशिक स्वराज्यके ही रूपमें क्यों न हो—लगाई गई ऐसी कोई भी शर्त विधान और अन्तरात्मा दोनों ही'''}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
{{outdent|{{gap}}'''धरातलोंपर अस्वीकार्य होनी चाहिए जो भारतकी जनतापर भविष्यमें सदाके लिए एक ऐसा बोझ डाल देगी जिसे अपने सिर डालनेकी उसने न पहले स्वीकृति दी थी और न बादमें उस फार्रवाईकी पुष्टि ही की थी। बेशक, किसी भी व्यासीको ग्यासको समाप्त करते समय अपनी व्यवस्थाका पूरा हिसाब-किताब देनेका अधिकार है ताकि बादमें वे लोग, जिनके हमें न्याय चलाया जाता था और जिन्होंने अब न्यासको सम्पत्ति स्वयं संभाल ली है, उस न्यासीपर कोई दावा या जवाबी दावा न करें। मगर इसका मतलब यह नहीं कि न्यासी न्यासको भंग करते समय व्यासकी जायदादपर जो भी दावे करे उन सबको ये लोग, जिनके हकमें न्यास चलाया जाता था, बिना किसी छान-बीन के स्वीकार करके अपने सिर ओढ़ लें।'''}}
कांग्रेसके प्रस्तावका<ref>देखिए खण्ड ४२।</ref> भी कुल मतलब इतना ही है। हां, उसमें एक यह सुझाव भी जरूर रखा गया है कि इन सौदोंकी जाँच-पड़ताल करनेके लिए कोई ऐसी समिति नियुक्त की जाये जिसके सम्बन्धमें किसीको कोई आपत्ति या शंका न हो। मगर उनमें अपनी इच्छा थोपनेकी शक्ति है, जब कि हमने अबतक उस इच्छाका विरोध करनेकी शक्तिका विकास अपने अन्दर नहीं किया है। तभी तो सर मैलकम हेली, उनके द्वारा जो कुछ कहनेकी खबर छपी है, वह सब कह सके। ये संयुक्त प्रान्तकी विधान परिषद् में बोल रहे थे। अपने अभिभाषण के दौरान उन्होंने कहा :
{{outdent|{{gap}}{{gap}}'''सबसे पहले तो सविनय अवज्ञा आन्दोलनको विफल बनानेके लिए हर बंध उपायसे काम लिया जायेगा, और यदि ये बंध उपाय पर्याप्त नहीं सिद्ध होंगे तो हम कानून में ऐसी धाराएँ जुड़वानेका प्रयत्न करेंगे जिनसे हमारा उद्देश्य पूरा हो सके।'''}}
मानों इतना काफी नहीं था, उन्होंने जोश में भरकर कहा :
{{outdent|{{gap}}{{gap}}'''मुझे यह भी लग सकता है कि यदि सरकारको इस अवसरपर उस दानवी रूपका भी कुछ परिचय देना पड़ा जिसके बारेमें मुझसे इतनी शिकायतें की गई हैं तो वह बिलकुल गलत ही न होगा।'''}}
मुझे विश्वास है कि सत्याग्रहियोंने खूब सोच-समझ लिया है कि अपने इस दमके लिए उन्हें कहाँतक कुरबानी देनी पड़ सकती है। और शासक लोग अपने उस प्रशंसनीय रूपका परिचय दें, यह तो भारत के लिए कोई नई बात नहीं होगी। मैं आशा करता हूँ कि इस आन्दोलनको ऐसा रूप दिया जायेगा जिससे क्रोधका यह उबाल अपने-आप उफन उमड़कर चुक जाये। प्रतिकारमें हाथ न उठाने के नियमका यह अनिवार्य परिणाम है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ६-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/५९
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१५. अशासन बनाम कुशासन'''}}}}
स्पष्ट है कि यह पत्र<ref>इसका अनुवाद यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इस पत्रमें जे॰ बी॰ पेनिंगटनने २८ नवम्बर, १९२९ से २३ जनवरी, १९३० तकके '''यंग इंडियाके''' अंकोंमें प्रकाशित जे॰ सी॰ कुमारप्पाकी "सरकारी वित्त व्यवस्था और हमारी गरीबी" शीर्षक लेख-मालाकी आलोचना की थी। जे॰ बी॰ पेनिंगटनने ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित शान्तिसे भारतको हुए कतिपय लाभोंका उल्लेख किया था और भारतकी स्वतन्त्रताके सम्बन्धमें कुछ आशंकाएँ व्यक्त की थीं।</ref> प्रकाशनार्थं लिखा गया है। इस उम्र में भी श्री पेनिंगटन जितना परिश्रम करते हैं और जिस चीजमें उनका विश्वास है उसका समर्थन वे जितनी उत्कटतासे करते हैं उसके लिए वे सदैव प्रशंसाके पात्र रहेंगे। प्रोफेसर कुमारप्पा अपना बचाव करनेमें आप ही काफी समर्थ हैं—उनकी ओरसे किसी और-को कुछ कहने की जरूरत नहीं है। वे आजकल एक गाँवमें हैं, इसलिए उनसे सम्पर्क स्थापित करना जरा कठिन है। लेकिन श्री पेनिंगटन द्वारा बताये तथ्योंका उनके पास कोई उत्तर हो या न हो, मैं जो कुछ कहने जा रहा हूँ, वह तो अपने अनुभवसे कह ही सकता हूँ। श्री पेनिंगटन जैसे लोग जो 'तथ्य' पेश कर सकते हैं, उनमें से अधिकांश भले ही सच्चे हों, लेकिन उनसे राष्ट्रवादी चिन्तकोंके निष्कर्षोंमें कोई अन्तर नहीं पड़ता, और न उन तथ्योंके आधारपर ऐसे निष्कर्ष ही निकालना तर्कसंगत लगता है जो निष्कर्ष श्री पेनिंगटन-जैसे लोग निकालते हैं। एक कोयलके कूकनेसे बसन्त नहीं आ जाता। उसी तरह देशके किसी उपजाऊ और समृद्ध हिस्सेमें चन्द एकड़ जमीनके लिए दी गई ऊँची कीमतोंसे एक महादेशकी सामान्य खुशहाली भी साबित नहीं होती। जहाँ-तहाँ देखी जानेवाली समृद्धिके इक्के-दुक्के तथ्योंके मुकाबले एक गम्भीर और कठोर तथ्य यह है कि भारत देशके रूपमें सामान्य रूपसे दरिद्र है। इस दरिद्रताको भारतके गाँवोंमें जानेका कष्ट उठानेवाला कोई भी आदमी अपनी आँखोंसे देख सकता है। ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित शान्तिके पीछे कोई कल्याणकर उद्देश्य नहीं है। भारतके लिए तो उसका महत्त्व उतना ही है जितना कि गुलामोंके लिए उस जागीरका हो सकता है, जिसका मालिक उनको आपसमें लड़ने नहीं देता, अपनी जागीरकी बाहरी दुश्मनोंसे रक्षा करता है और गुलामोंसे उतनी नियमितता के साथ काम करवा लेता है जितनी नियमितताके साथ काम करनेसे वह जागीर उस मालिककी स्वार्थ-सिद्धिके साधनके रूपमें टिकी रहे। इस काल्पनिक जागीरमें रहनेवाले गुलामोंमें जब अपनी स्थिति के बारेमें जागरूकता आयेगी तो वे और कोई उपाय न रहनेपर गुलामीके बजाय अराजकताको कहीं अधिक पसन्द करेंगे। इसी प्रकार अगर मेरे सामने और कोई चारा न होगा तो मैं वर्तमान शासन तथा इसकी दी हुई जिस शान्तिका इतना ढिढोरा पीटा जाता है, उसके बजाय अराजकताको ज्यादा पसन्द करूँगा। बेशक, कुशासनसे अशासन बेहतर है। और जहाँतक<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|२२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>उन मित्रोंकी बात है जो मुझे 'सम्मानकी दृष्टिसे देखते रहनेको अत्यन्त उत्सुक हैं, मैं तो यही कह सकता हूँ कि मैं उनके इस स्नेहकी बराबर कद्र करूँगा, किन्तु यदि उसे मैं अपनी आत्माके आदेशका पालन करते हुए कायम नहीं रख सकता तो मैं उस स्नेहके बिना ही अच्छा हूँ। आत्माको खोकर यदि मैं सारी दुनियाका भी स्नेह-सम्मान अर्जित कर पाता हूँ तो वह स्नेह-सम्मान किस कामका?
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' ६-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१६. अश्लील साहित्य'''}}}}
कोई देश और कोई भाषा अश्लील साहित्यसे मुक्त नहीं है। जबतक स्वार्थी और व्यभिचारी लोग दुनियामें रहेंगे, तबतक अश्लील साहित्य प्रकाशित करनेवाले और पढ़नेवाले भी रहेंगे। लेकिन जब ऐसे साहित्यका प्रचार प्रतिष्ठित माने जानेवाले अलवारोंके द्वारा होता है, और उसका प्रचार कलाके नामसे या सेवाके नामसे किया जाता है, तब वह भयंकर स्वरूप धारण कर लेता है। इस प्रकारका कुछ अश्लील साहित्य मुझे मारवाड़ी समाजने भेजा है और प्रतिष्ठित मारवाड़ी लोगोंकी ओरसे प्रकाशित एक यक्तव्यकी प्रति भी मुझे भेजी गई है। इस वक्तव्यमें मारवाड़ी समाजको जाग्रत किया गया है और बताया गया है कि ऐसे साहित्यका, जो कलाके नामपर केवल धन कमानेके लिए प्रकाशित होता है, समाजको बहिष्कार करना चाहिए। जिस पत्रको विशेषतया ध्यानमें रखकर यह वक्तव्य प्रकट किया गया है, यह 'चांद' नामक मासिकका "मारवाड़ी अंक" है। मैं उसे पूरा न तो पढ़ सकता हूँ और न पढ़नेकी इच्छा ही है लेकिन जो कुछ मैं पढ़ पाया हूँ, वह इतना गंदा और इतना वीभत्स है कि कोई भी मनुष्य, जिसके मनमें विवेक है या समाजके हितका जरा भी खयाल है, कभी ऐसी बातें नहीं छापेगा। सुधारके नामसे ऐसी चीजोंको छापना अनावश्यक और हानिकारक है। 'चांद के समान गंदे गीत गानेवाले लोग अखबार नहीं पढ़ा करते। पढ़नेवाले दो प्रकारके ही हो सकते हैं। एक पढ़े-लिखे कामुक लोग, जो अपनी वासनाको किसी-न-किसी प्रकार तृप्त करना चाहते हैं; दूसरे निर्दोष-बुद्धि, जो आजतक व्यभिचारमें नहीं फँसे हैं, परन्तु जिनकी बुद्धि परिपक्व भी नहीं है, जो लालचमें पड़कर विकारके वशमें हो सकते हैं। ऐसे लोगोंके लिए गंदा साहित्य घातक है। यही सब लोगोंका अनुभव भी है। मुझे उम्मीद है कि प्रतिष्ठित मारवाड़ी सज्जनोंके वक्तव्यका असर 'चांद' के संपादक इत्यादि पर होगा, वे अपने इस अंकको वापस ले लेंगे और दुबारा ऐसा गंदा साहित्य प्रकट न करनेकी कृपा करेंगे। इससे भी बढ़कर कर्तव्य तो इस बारेमें मारवाड़ी समाज और सर्व साधारण
समाजका है। वह ऐसा गंदा साहित्य न कभी खरीदे और न पढ़े ही हिन्दी पत्रोंके संपादकोंके सिरपर दोहरा बोझ है; क्योंकि हिन्दीको हम राष्ट्रभाषा बनाना चाहते हैं और इसलिए इस भाषाकी रक्षा करनेका विशेष धर्म उन्हें प्राप्त होता है। मेरे<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पत्र : जयसुखलाल गांधीको|२३}}</noinclude>जैसा राष्ट्रभाषाका पुजारी राष्ट्रभाषामें उत्कृष्ट विचारोंको प्रकट करनेवाली पुस्तकोंकी ही प्रतीक्षा करेगा। इसलिए यदि सम्भव हो तो हिन्दी साहित्य सम्मेलनको एक भाषा समिति नियुक्त करनी चाहिए, जिसका धर्म प्रत्येक नई पुस्तककी भाषा, विचार आदिकी दृष्टिसे परीक्षा करना हो। इस परीक्षामें जो पुस्तकें सर्वोत्तम मानी जायें और जो गंदी ठहरें, समिति उनकी एक फेहरिस्त तैयार करे और अच्छी पुस्तकोंका प्रचार तथा गंदी पुस्तकोंका बहिष्कार करनेके लिए जनताको प्रेरित करे। ऐसी समिति तभी सफल हो सकती है, जब उसके सदस्य साहित्य-ज्ञान और साहित्य सेवाके लिए ही अपने-आपको अर्पित कर दें।
'''हिन्दी नवजीवन,''' ६-३-१९३०
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१७. तार : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|अहमदाबाद<br>६ मार्च, १९३०}}
{{left|जवाहरलाल नेहरू<br>इलाहाबाद}}
{{left|पत्र<ref>देखिए "पत्र: लॉर्ड इर्विनको" २-३-१९३०।</ref> प्रकाशनार्थं प्रेसको दे दिया है। बारह तारीखकी सुबह साठ लोगोंके साथ कूच आरम्भ कर रहा हूँ।}}
{{right|'''गांधी'''|1em}}
{{left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
ए॰ आई॰ सी॰ सी॰ फाइल सं॰ १७८, १९३०
सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''१८. पत्र : जयसुखलाल गांधीको'''}}}}
{{right|साबरमती आश्रम<br>६ मार्च, १९३०}}
{{left|चि॰ जयसुखलाल,}}
तुम्हारा पत्र मिला। अभी तुम्हें वहाँसे हटाना मुझे ठीक नहीं लगता। १२ तारीखको आश्रम के अधिकांश पुरुषोंके साथ कूच करूँगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰–३) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''१९. पत्र : तहमीना खम्भाताको'''}}}}
{{right|६ मार्च, १९३०}}
{{left|प्रिय बहन,}}
यदि भाई खम्भाता तुरन्त ही इस संघर्षमें शामिल हो जायेंगे तो इससे तुम्हारी भावनाओंको ठेस पहुँचेगी, यह बात में अच्छी तरहसे समझता हूँ। अभी तो मैं तुमसे सहमत हूँ। अन्ततक यही हो, ऐसा तो तुम नहीं चाहती ना? जहाँतक बने वहाँतक शरीरकी रक्षा करना हमारा धर्म है। लेकिन जब शरीरका त्याग करके ही धर्मकी रक्षाका प्रसंग सामने आ जाये तब शरीरका त्याग करना ही धर्म बन जाता है। इसलिए मुझे इस बातका पूरा यकीन है कि जब ऐसा समय आयेगा, उस समय तुम दोनों बलिदान देनेके लिए अवश्य तैयार मिलोगे। इतना याद रखना, जो ईश्वरके नाम पर लड़ते हैं उन्हें सारे दुःख सहन करने लायक शक्ति भी ईश्वर दे ही देता है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ७५४४) की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''२०. पत्र : बहरामजी खम्भाताको'''}}}}
{{right|६ मार्च, १९३०}}
{{left|भाईश्री सम्भाता,}}
तुम्हारा पत्र मिला। तुम आश्रममें कभी नहीं रहे, फिर भी मैंने तुम्हें आश्रमवासीकी अपेक्षा अधिक माना है। तुम 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' नियमपूर्वक पढ़ते हो, यह बात तथा तुम्हारा व्यवहार मुझसे छिपा नहीं है। तुम लड़ाईमें शामिल होनेके नितान्त योग्य हो। लेकिन तुम अभी उतावली न करो। तहमीना बहनकी भावनाकी कद्र करो। उसके कहने में थोड़ा वजन भी है। आज तुम शरीरके प्रति लापरवाही दिखाते हो; [इस तरह] यह जेलमें कबतक टिका रह सकेगा, इसे विश्वासपूर्वक कौन कह सकता है? इसलिए नम्रताका रुख अख्तियार करना ही बेहतर है। अतएव मेरी तुमको यह सलाह है: तुम किसी कठिन समयके लिए अपने-आपको [गिरफ्तारीसे] बचाये रखो। बम्बई में ही यदि कोई ऐसा प्रसंग उपस्थित हो तो खुशीके साथ उसमें कूद पड़ना। उस समय तहमीना बहन भी इनकार नहीं करेगी, बल्कि तुम्हें प्रोत्साहित करेगी, ऐसी मेरी मान्यता है। इतना ही नहीं, यदि आवश्यकता जान पड़ी तो खुद भी उसमें शामिल हो जायेगी। और मैं यह मानता हूँ कि इस अन्तिम लड़ाई में बहनों को भी अन्ततः शामिल होना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त जब बम्बई में अशान्तिका<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|२५}}</noinclude>वातावरण होगा उस समय तुम्हारा धर्म शान्ति बनाये रखनेके कार्य में जुट जानेका होगा; इसलिए बेहतर यही है कि फिलहाल तुम 'रिज़र्व' में रहो। कुछ-एक लोगों को तो रहना ही पड़ेगा।
इस सबके बावजूद तुमने मुझे जो पत्र लिख भेजा सो ठीक ही किया।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ७५४५) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''२१. पत्र : पुंजाभाईको'''}}}}
{{right|साबरमती आश्रम<br>६ मार्च, १९३०}}
{{left|भाईश्री पुंजाभाई,}}
तुम्हारा पत्र मिला।
१२ तारीखको कूच करना है। यदि तुम इस कूचमें शामिल ही होना चाहते हो तो कूच आरम्भ होनेसे पहले मुझसे मिल लेना ठीक होगा।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ४०१०) की फोटो-नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''२२. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|७ मार्च, १९३०}}
{{left|प्रिय जवाहरलाल,}}
सीतला सहायसे बात करनेके बाद मैंने उनको वहाँ भेजनेका निर्णय किया है। उन्हींको तय करने दो कि वे वहाँ क्या कुछ कर सकते हैं। तुम क्या कुछ होता है, उस पर नजर रखना। फिर यदि तुम दोनों तय करो कि उनको लौट आना चाहिए तो वे वापस आ सकते हैं। उनकी पत्नी और बच्चे यहीं रहेंगे और वे स्वयं अपने निर्वाहके लायक आश्रमसे ले सकते हैं। बाकी बातें वे स्वयं ही तुमको बतलायेंगे।
{{right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}}
{{left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
गांधी-नेहरू कागजात, १९३०।
सौजन्य : नेहरू स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''२३. वक्तव्य : वल्लभभाई पटेलकी गिरफ्तारीपर'''}}}}
{{right|७ मार्च, १९३०}}
सरदार वल्लभभाई पकड़े गये और उन्हें सजा हो गई, यह एक शुभ शकुन है। यह देखना है कि इस शुभ शकुनका हम किस प्रकार उपयोग करते हैं। लड़ाई छिड़ गई है; और अब हमें उसे अन्ततक लड़ना है। सरदारकी गिरफ्तारी तथा उन्हें दी गई सजाके विरोधमें हमें आम हड़ताल करनी चाहिए। मैं प्रार्थना करता हूँ कि मिल-मालिक मिल बन्द कर दें, विद्यार्थी अपनी पाठशालाओंमें न जायें तथा सभी दुकानदार अपनी दुकानें बन्द रखें। मुझे गुजरातसे अहिंसाका पालन करनेकी बात कहनेकी जरूरत नहीं है। हमारी लड़ाई आदिसे अन्ततक अहिंसक है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''गुजराती,''' ९-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''२४. तार : जॉन हेनीज होम्सको'''}}}}
{{right|[७ मार्च, १९३० या उसके पश्चात्]<ref>यह अमेरिकासे ६ मार्च, १९३० को भेजे गये और आश्रम में उसके अगले दिन प्राप्त तारके उत्तर में भेजा गया था। उक्त तारमें गांधीजी को सूचित किया गया था कि शैलेन्द्रनाथ घोष नामक एक व्यक्ति अपनेको कांग्रेस और गांधीजी का प्रतिनिधि बताकर वहाँ भारतीय स्वातन्त्र्य-संघर्ष की गलत तस्वीर पेश कर रहा है। उसका कहना है कि भारत सैनिक शक्तिके बलपर स्वतन्त्रता प्राप्त करनेको कटिबद्ध है और इस उद्देश्यसे लाखों राष्ट्रवादियोंको शस्त्र-सज्जित कर रहा है। यह जानकारी देनेके बाद होम्सने कहा था कि इससे गांधीजी के अहिंसात्मक तरीकोंमें विश्वास रखनेवाले उन अमेरिकियोंपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है जो भारत के अहिंसात्मक स्वातन्त्र्य संग्रामके प्रति सहानुभूति रखते हैं। अन्तमें उन्होंने गांधीजी से इस स्थितिका निराकरण करने को कहा था।</ref>}}
{{left|अमेरिकामें मेरा प्रतिनिधित्व करनेका अधिकार किसीको नहीं दिया गया है। यह आन्दोलन सर्वथा शान्तिमय है। कांग्रेसका अहिंसाका सिद्धान्त ज्यों-का-त्यों है। इस आन्दोलनमें सर्वसाधारण के शरीक हो जानेपर स्थिति क्या होगी, यह कहना कठिन है, लेकिन हजारों लोग उत्तेजनाके गम्भीरसे-गम्भीर कारण होनेपर शान्ति बनाये रखनेको कृतसंकल्प हैं। सैनिक प्रतिरोधकी तो कोई दबी जुबान भी बात नहीं करता। कोई भी राष्ट्रवादियोंको शस्त्र सज्जित नहीं कर रहा है। बहुत ही कठोर नियन्त्रणोंके अधीन सविनय अवज्ञा १२ तारीखको शुरू की जा रही है।}}
{{right|'''गांधी'''}}
अंग्रेज (एस॰ एन॰ १६६३७) की फोटो नकलसे।<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
na63wy1cyoxvatz4muoehxjsg1stkfm
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''२५. एक पुस्तककी<ref>पुस्तकके नामका पता नहीं चलता।</ref> प्रस्तावना'''}}}}
{{right|साबरमती<br>८ मार्च, १९३०}}
रचनात्मक उपायोंसे भारतकी अमूल्य सम्पत्ति गायोंकी रक्षा करनेमें जिन लोगोंकी दिलचस्पी हो उन्हें इन पृष्ठोंमें लिखी सुन्दर सामग्रीसे विचारका काफी मसाला मिलेगा।
{{right|मो॰ क॰ गांधी}}
अंग्रेजी (सी॰ डब्ल्यू॰ ९३२७) की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''२६. 'द्रौपदीना चीर' की प्रस्तावना'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम, साबरमती<br>८-३-१९३०}}
जो लोग ऐतिहासिक दृष्टिकोणसे खादीके विषयको समझना चाहते हैं या यह जाननेके इच्छुक हैं कि कताई धार्मिक कर्त्तव्य क्यों है, उनके लिए भाई वालजी देसाई द्वारा लिखित ये प्रकरण अत्यन्त रोचक सिद्ध होंगे।
{{right|'''मोहनदास करमचन्द गांधी'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९२७३) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य : वालजी गो॰ देसाई<noinclude>{{Dhr|13em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
ioanv70hsfui5g1dm7nwn5dxxqffl3s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''२७. 'राजकथा' की प्रस्तावना'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम, साबरमती<br>८-३-१९३०}}
राजा और प्रजाके कर्त्तव्यको जानना आज एक प्रस्तुत विषय है। राजाका कर्त्तव्य क्या है, अच्छा राजा कौन है और बुरा कौन, प्राचीन कालमें राजा कैसे राजगद्दी पर बैठता था और कैसे उसे राजगद्दीसे उतारा जाता था, आदि बातोंकी जानकारी हमें वालजी देसाईके इस लेख संग्रहसे मिलती है।
{{right|'''मोहनदास करमचन्द गांधी'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ९२७२) की फोटो नकलसे।
सौजन्य : वालजी गो॰ देसाई
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''२८. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}}
{{right|शनिवार [८ मार्च, १९३०]<ref>तिथि ऐट द फीट ऑफ बापूसे ली गई है।</ref>}}
{{left|चि॰ व्रजकृष्ण,}}
यदि तुमारेमें शक्ति है तो यह धर्म है।
माताजी से कह दो इस वखत जान बुझकर जेलमें नहिं जाना है।
कोई घर पर आकर पकड़ जायगा तो जाना हि होगा।
माताजी को शांतिसे दिल्ली जाना चाहीये।
यदि नहि जायगी तो भी तुमारे तो विजापुर जाना हि होगा।
ऐसा कहकर तुम बिजापुर चले जाओ । माताजी कुछ भी करे प्राण त्याग भी करे लेकिन धर्म नहि छुट सकता है और इस मौकेपर भीरु बनना अधर्म है। तुमारा कर्तव्य शरीरको अच्छा करके कर्तव्यमें डटे रहनेका है। माताजी यहां रहेगी तो उनकी रक्षा करेंगे, सेवा करेंगे। भाई साहब तो समझ गये हैं ऐसा मुझसे कहा था; इसलीये मैं मानता हूं कि माता भी मान जायगी। कैसा भी हो, तुमारा मार्ग बिलकुल साफ है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च :]}}
जानेके पहले मुझे एक मिनिटके लीये मीलो।
जी॰ एन॰ २३७६ की फोटो नकलसे।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''२९. भाषण : अहमदाबादमें'''}}}}
{{right|८ मार्च, १९३०}}
मैं यह जानता हूँ कि मेरी आवाज आप सब लोगों तक नहीं पहुँच सकेगी। पहली बात तो यह कि मेरी आवाजमें पहले जितनी ताकत थी उतनी आज तो बची भी नहीं है; फिर लोगोंके इतने बड़े समुदाय तक किसी व्यक्तिकी आवाज पहुँच भी नहीं सकती। जो भाई-बहन मेरी [जितनी] आवाज सुन सकें, वे उससे ही सन्तोष मान लें। जो लोग मेरी आवाज न सुन सकें यदि वे शान्त रहें और बादमें अपने पासवाले व्यक्तिसे भाषणका आशय सुन-समझ लें तो [शान्तिके कारण] अधिक लोग मेरी बात सुन सकेंगे।
मुझे आपको कोई नई बात नहीं बतानी है। अहमदाबादके नागरिकों तथा पूरे हिन्दुस्तान से मुझे जो कुछ कहना था वह मैं कह चुका हूँ। अब तो वह समय सामने है जब मेरी और आपकी अन्तिम परीक्षा होने जा रही है। इस मामलेमें सरकारने मेरे और आपके रास्तेको सहज बना दिया है। मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि सरदार वल्लभभाईकी जेलयात्राका समय आ पहुँचा है। मैं समझता हूँ कि सरदार वल्लभभाईने गुजरातकी और विशेष रूपसे इस शहरकी मेरी अपेक्षा सैकड़ों गुनी अधिक सेवा की है। अतः वे मुझसे पहले ही जेलमें जा विराजे तो इसमें आश्चर्यकी कोई बात नहीं है। यह उनका और आपका सौभाग्य है; किन्तु उन्होंने पहले जेल जाकर मुझे विषम परिस्थितिमें डाल दिया है। मुझे किसी-न-किसी तरह गिरफ्तार होना है। सरकारने अनुचित रूपसे नमकपर कब्जा कर रखा है। मुझे उससे यह कब्जा छीनना है। मुझे नमक-कानून रद करवाना है। मैं इसे पूर्ण स्वराज्यकी दिशामें एक या पहला कदम मानता हूँ। इस आन्दोलनमें सरदार वल्लभभाई हमारे साथ नहीं रह सकेंगे। हिन्दुस्तान के लोग अब बेचैन हो उठे हैं और स्वतन्त्रता प्राप्त किये बिना उन्हें चैन नहीं मिल सकता। मेरी आवाज किसी-न-किसी तरह सरकार तक तो पहुँच ही जायेगी। गुजरातमें पूरी तरह शान्ति बनी रहनी चाहिए। वल्लभभाईने सत्याग्रहके दौरान बारडोलीमें जो पूर्ण शान्ति बनाये रखी उनकी उस सेवाके पुरस्कार-स्वरूप सरकारने उन्हें यह जेलकी सजा दी है।
सरदार वल्लभभाई- जैसे स्वतन्त्र और स्वाधीनता-प्रेमी व्यक्तिका सरकार और किसी प्रकार सम्मान नहीं कर सकती, यह तो हम बरसोंसे जानते थे। हम सब अपने काममें इस प्रकारसे जुट जायें कि हम वर्षोंसे जिस [आजादी] का नाम जपते रहे हैं, उसे प्राप्त कर लें। २६ तारीखको हमने जो प्रतिज्ञा की थी, उसका पालन करनेके लिए हमें सविनय अवज्ञा करनी चाहिए। हालांकि वल्लभभाईने नमक-कानून नहीं तोड़ा था, किन्तु सरकारने उन्हें गिरफ्तार करके मेरा दाहिना हाथ तोड़ दिया है। यदि एक वल्लभभाईको पकड़कर जेलमें बन्द कर दिया गया है तो अहमदाबादके<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बहन-भाइयो, आप वल्लभभाईके प्रतिनिधिके रूपमें उनका काम अपने हाथ में ले लें। यदि आपको वल्लभभाईसे प्रेम हो और आप बलिदान देनेके लिए तत्पर होकर आये हों तो तैयार हो जायें। यदि आप उनके त्यागका अनुकरण करनेको तैयार हों तो हम सरकारको और दुनियाको यह दिखा सकेंगे कि शुभ मनोरथ किस खूबीसे सफल होते हैं। ईश्वरसे मेरी प्रार्थना है कि वह हमें इस कार्यके लिए त्याग करनेकी शक्ति दे।
आश्रमके लोगोंकी टुकड़ीके साथ बुधवारको प्रातःकाल कूच करने के अपने निश्चय पर मैं आज भी दृढ़ हूँ। आशा है यहाँ आये हुए सभी लोग अपने कर्त्तव्यका पालन करेंगे। सरदार वल्लभभाईने सन्देश भिजवाया है कि गांधीके गिरफ्तार कर लिये जानेपर क्या करना होगा, यह वे अपने भड़ौचके भाषण में बता चुके हैं। उन्होंने जेलमें पहुँचकर अपने इन शब्दों पर मुहर लगा दी है और सरकार भी तदनुसार
हम सबकी कद्र करेगी। मैं यहाँ आपसे कोई प्रस्ताव पास करनेको नहीं कहूँगा। यहाँ आनेके पहले मैंने आप क्या [प्रतिज्ञा] करेंगे सो निश्चित कर रखा है और मैं आशा करता हूँ कि आप उसपर अमल करेंगे।
{{outdent|{{gap}}{{gap}}हम अहमदाबादके नागरिक—स्त्रीपु—रुष निश्चय करते हैं कि सरदार वल्लभभाई पटेलने जिस मार्गको अपनाया है हम सब लोग उसी मार्ग पर चलेंगे या पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करेंगे। पूर्ण स्वराज्य प्राप्त किये बिना न तो हम शान्तिसे बैठेंगे और न सरकारको शान्तिसे बैठने देंगे। हमारा विश्वास है कि हिन्दुस्तानको शान्ति और सत्यके द्वारा ही स्वाधीनता मिलेगी।}}
आज १५ वर्षसे मैं जिस प्रकारकी बात देशके लोगों और विशेषकर अहमदाबादके नागरिकोंसे कहता आ रहा हूँ तथा स्थानीय मजदूरोंकी हड़तालके समय उनसे जो दृढ़ प्रतिज्ञा करवाई गई थी वैसी ही दृढ़ प्रतिज्ञा यहाँ उपस्थित हजारों भाई-बहन करें और उसके पक्षमें अपने हाथ उठायें। यदि आप उस प्रतिज्ञाका पालन कर सकें तभी हाथ उठायें।<ref>इसपर हजारों हाथ उठाये गये।</ref>
आपने जो शान्तिपूर्वक आम हड़ताल की उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। मुझे आशा है कि अहमदाबादके छात्र-छात्राएँ सरदार वल्लभभाई तथा हिन्दुस्तानके प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन करेंगे।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''प्रजाबन्धु,''' १०-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|8em}}
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>३०
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
बहन-भाइयो, आप वल्लभभाईके प्रतिनिधिके रूपमें उनका काम अपने हाथ में ले लें ।
यदि आपको वल्लभभाईसे प्रेम हो और आप बलिदान देनेके लिए तत्पर होकर आये
हों तो तैयार हो जायें। यदि आप उनके त्यागका अनुकरण करनेको तैयार हों तो
हम सरकारको और दुनियाको यह दिखा सकेंगे कि शुभ मनोरथ किस खूबीसे सफल
होते हैं । ईश्वरसे मेरी प्रार्थना है कि वह हमें इस कार्यके लिए त्याग करनेकी शक्ति
दे ।
आश्रमके लोगोंकी टुकड़ीके साथ बुधवारको प्रातःकाल कूच करने के अपने निश्चय
पर मैं आज भी दृढ़ हूँ । आशा है यहाँ आये हुए सभी लोग अपने कर्त्तव्यका पालन
करेंगे। सरदार वल्लभभाईने सन्देश भिजवाया है कि गांधीके गिरफ्तार कर लिये
जानेपर क्या करना होगा, यह वे अपने भड़ौचके भाषण में बता चुके हैं। उन्होंने
जेलमें पहुँचकर अपने इन शब्दों पर मुहर लगा दी है और सरकार भी तदनुसार
हम सबकी कद्र करेगी। मैं यहाँ आपसे कोई प्रस्ताव पास करनेको नहीं कहूँगा ।
यहाँ आनेके पहले मैंने आप क्या [ प्रतिज्ञा ] करेंगे सो निश्चित कर रखा है और मैं
आशा करता हूँ कि आप उसपर अमल करेंगे ।
हम अहमदाबादके नागरिक - - स्त्री-पुरुष - निश्चय करते हैं कि सरदार
वल्लभभाई पटेलने जिस मार्गको अपनाया है हम सब लोग उसी मार्ग पर
चलेंगे या पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करेंगे । पूर्ण स्वराज्य प्राप्त किये बिना न तो
हम शान्तिसे बैठेंगे और न सरकारको शान्तिसे बैठने देंगे। हमारा विश्वास
है कि हिन्दुस्तानको शान्ति और सत्यके द्वारा ही स्वाधीनता मिलेगी ।
आज १५ वर्षसे मैं जिस प्रकारकी बात देशके लोगों और विशेषकर अहमदा-
बादके नागरिकोंसे कहता आ रहा हूँ तथा स्थानीय मजदूरोंकी हड़तालके समय उनसे
जो दृढ़ प्रतिज्ञा करवाई गई थी वैसी ही दृढ़ प्रतिज्ञा यहाँ उपस्थित हजारों भाई-बहन
करें और उसके पक्षमें अपने हाथ उठायें। यदि आप उस प्रतिज्ञाका पालन कर सकें
तभी हाथ उठायें । '
आपने जो शान्तिपूर्वक आम हड़ताल की उसके लिए मैं आपको बधाई देता
हूँ । मुझे आशा है कि अहमदाबादके छात्र-छात्राएँ सरदार वल्लभभाई तथा हिन्दुस्तानके
प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन करेंगे ।
[ गुजरातीसे ]
प्रजाबन्धु, १०-३-१९३०
१. इसपर हजारों हाथ उठाये गये ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude>{{Dhr|8em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३९२
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कि यह जबतक है तबतक सच्ची खबर तो देता है; लेकिन वह बेचारा क्या करता । लोग धोलेरासे नमककी लारी भरकर ला रहे थे और महादेव छलांग लगाकर उस पर बैठ गया। इस तरह महादेव गिरफ्तार हो गया तथापि में महादेवको भी चोर नहीं कहूँगा। मैंने महादेवको लिखा है कि वह जेल गया सो ठीक हुआ, किन्तु उसका धर्म तो मरनेका था। आश्रम में कुछ लोगोंके हाथ टूटे और सिर फूटे यह बहुत अच्छा हुआ। जेल में क्या दुःख है? और फिर 'अ' वर्ग में भी आये तब तो फिर साहब क्या पूछे ? आश्रम में जितना मिलता है, उससे ज्यादा अच्छा खाने और पीनेको मिलेगा, एक आदमी खाना बना देगा, खाना पका देगा दूसरा पानी भर देगा, तीसरा धोती धो देगा। ये क्या कैदीके लक्षण हैं? महादेव और जयरामदास जैसे व्यक्तियोंके तो सिर रंग जायें, गरम-गरम खूनसे उनके कपड़े रच जायें तब कहीं दुनियाके किसी कोनेसे दयाका सोता फूटे बिना नहीं रहेगा। दुनियामें ईश्वर कहीं तो है ही। ऐसे व्यक्तियोंके सिरसे जब रक्तकी धारा बहेगी तब नमकका कर तो जायेगा ही, उसके साथ और भी कुछ समुद्र में बह जायेगा । तब हमारे बहुतसारे पाप मिट्टी में उसी प्रकार विलीन हो जायेंगे, जिस प्रकार कि आज नमकके ढेर मिट्टी से ढक दिये गये हैं।
मुझे नमक चोर तो उसी समय कहना जब हम धरासणाकी नमककी जमीन पर कब्जा कर लें इस तरह इस या उस कोनेसे सेर-दो सेर नमक ले आनेका कोई अर्थ नहीं है। यह देखकर तो सरकार अपने मनमें कहती होगी कि यह लड़कोंकी तरह खेल जैसा क्या करते हो। सच्चा खेल खेलना हो तो आओ और धरासणा या भायन्दरा या खारगोडाकी उन जमीनों पर कब्जा करो जहाँ नमक बनाया जाता है। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इस समय हम लड़कोंका ही खेल खेल रहे हैं। लेकिन किसी दिन यह खेल ही रंग लायेगा। वह दिन आये तब आप छरवाड़ा और धरा सणाके भाई और बहनें सब हमारे साथ आना । किन्तु अभी नहीं। धरासणापर हमारी चढ़ाईका यह वर्णन जब लिखा जायेगा तब इस जमीनके आसपास रहनेवाले आप लोग अपने विषय में क्या लिखवाना चाहेंगे ? वे उस समय भाग गये थे ऐसा लिखायेंगे या ऐसा कि ' वे उस अवसरपर छाती खोलकर खड़े रहे थे ? जिन्होंने सत्याग्रहियों को बत्ती बुझाकर मारा-पीटा उनपर हम क्रोध न करें, उन्हें गालियाँ भी न दें। हमें तो एक भिन्न मार्गपर चलना है। हमारी एक कहावत है --'अँगुली पकड़ने दी तो कलाई पकड़ ली' यह लोग हमारी अँगुली पकड़ें तो तुम उँगली ही क्यों कलाई भी पकड़ लो; कलाई पकड़ेंगे तो हम कहेंगे कि पूरी
यह गह लो और बांह पकड़नेपर हम उन्हें अपनी गर्दन देनेके लिए तैयार हो जायेंगे। उन्होंने हमारे स्वयंसेवकोंको मारना पीटना आरम्भ किया है। तो अब हम ऐसा सीधा खेल खेलेंगे कि ये सारी-मारपीट हमारे सिर आ जाये ।
किन्तु हम जो भी करें वह शुद्ध और निर्दोष होना चाहिए। पेशावरमें जो कुछ हुआ यह मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा। ऐसे आदमियोंके हाथमें यदि राज्यसत्ता आ गई तो क्या वे भी इसी तरह राज्य नहीं चलायेंगे ? क्या वे भी गरीबोंके सिर
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९
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अविनाश कुमार सिंह
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अविनाश कुमार सिंह" /></noinclude>१. पत्र : अमीना कुरैशीको
यरवडा मन्दिर१
मंगलवार [१ जुलाई, १९३०]२
मैं तुझे रोज याद कर लेता हूँ। अब तो तुझे सूतिकागृहसे मुक्ति मिल गई
चि० अमीना,
होगी।
गुजराती (जी० एन० ६६७०) की फोटो नकलसे।
२. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको
बापूकी दुआ
यरवडा मन्दिर
१ जुलाई, १९३०
प्रिय भगिनि,
अब तुमारी मानसिक स्थिति कैसी है? शरीर कैसा है ? सतीशबाबुको कब
मिली थी ? उनकी प्रकृति कैसी है? सोदपुरमें कौन कौन है ? क्या पढ़ती है ?
रोज क्या करती है ?
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः *
याद करो ।
बापुके आशीर्वाद
[ पुनश्च : ]
आश्रमके मार्फत लिखो ।
जी० एन० १६६७ की फोटो नकलसे ।
१. गांधीजीको ५ मई १९३० को गिरफ्तार किया गया था और परवडा सेंट्रल जेल, पूनामें रखा
गया था।
२. अमीना कुरैशीको ६ जुलाई, १९३० को लिखे पत्र में गांधीजीने अमीनाको बच्चा होनेका उल्लेख
किया है। अतः पद पत्र सम्भवतः उससे पहले मंगलवारको लिखा गया होगा ।
३. सतीशचन्द्र दासगुप्तको सत्याग्रह बुलेटिनोंके प्रकाशनके सम्बन्धमें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार
कर लिया गया था और उन्हें एक सालफी सख्त कैद हुई थी।
४. भगवद् गीता, १२, १७।
४४-१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१६६
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१७९. पत्र: मणिबहन पटेलको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मणि (पटेल),}}
तेरा पत्र मिला। बापू तथा जयरामदास दो दिन और साथ रहकर चले गये। इतनेमें तेरा पत्र मिला। इसलिए बापूने भी पढ़ा। बापूको लिखा पत्र मैंने पढ़ा। माँ सम्बन्धी वर्णन हृदयद्रावक है। अधिकतर प्राचीन माताएँ ऐसी ही होती थीं। इसलिए तूने जो वर्णन किया है, उसपर आश्चर्य नहीं होता। हालांकि प्रेमका यह स्वरूप मोह-जनित है फिर भी इतना उज्ज्वल है कि नित्य नया जैसा ही लगता है। पत्र लिखनेके
नियमको भंग न करना। यात्रामें (जेलमें) पहुँच जायें तो दूसरी बात है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो– ४: मणिबहेन पटेलने'''}}
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{{c|{{larger|'''१८०. पत्र: सुशीला गांधीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ सुशीला,}}
बहुत दिन बाद तेरा पत्र मिला। 'उलटा चोर कोतवालको डाँटे' वाली बात तू करती है। मेरा इससे पहला पत्र तो तुझे मिला ही होगा? सीताकी बीमारी बहुत लम्बी चली। वह इतनी बीमार कैसे हो गई, क्या तू यह भी नहीं समझ पा
रही है? सीताको अपनी आँखोंसे देखे बिना मेरी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही है। किन्तु मैं यह सुझाव दूँगा कि यदि तू उसे बहुत-सी चीजोंके बजाय मुख्यतः दूध, दही और फल दे, तो अच्छा हो। यदि टोस्ट दिये जायें तो थे 'ब्राउन ब्रेड' के होने चाहिए। उसे दलिया देनेकी कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती। यदि तू चाहे तो उसे 'कॉड-लिवर आयल' [मछलीका तेल] देना। मैं तो यह तेल देनेकी बात भी नहीं सोच सकता। किन्तु मेरे इस विचारको महत्त्वपूर्ण मत मानना। तेरा कान कैसा है? मुझे हर हफ्ते लिखती रहना। और स्याहीसे लिखना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ४७७१) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{larger|'''१७९. पत्र: मणिबहन पटेलको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मणि (पटेल),}}
तेरा पत्र मिला। बापू तथा जयरामदास दो दिन और साथ रहकर चले गये। इतनेमें तेरा पत्र मिला। इसलिए बापूने भी पढ़ा। बापूको लिखा पत्र मैंने पढ़ा। माँ सम्बन्धी वर्णन हृदयद्रावक है। अधिकतर प्राचीन माताएँ ऐसी ही होती थीं। इसलिए तूने जो वर्णन किया है, उसपर आश्चर्य नहीं होता। हालांकि प्रेमका यह स्वरूप मोह-जनित है फिर भी इतना उज्ज्वल है कि नित्य नया जैसा ही लगता है। पत्र लिखनेके
नियमको भंग न करना। यात्रामें (जेलमें) पहुँच जायें तो दूसरी बात है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो– ४: मणिबहेन पटेलने'''}}
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{{c|{{larger|'''१८०. पत्र: सुशीला गांधीको'''}}}}
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७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ सुशीला,}}
बहुत दिन बाद तेरा पत्र मिला। 'उलटा चोर कोतवालको डाँटे' वाली बात तू करती है। मेरा इससे पहला पत्र तो तुझे मिला ही होगा? सीताकी बीमारी बहुत लम्बी चली। वह इतनी बीमार कैसे हो गई, क्या तू यह भी नहीं समझ पा
रही है? सीताको अपनी आँखोंसे देखे बिना मेरी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही है। किन्तु मैं यह सुझाव दूँगा कि यदि तू उसे बहुत-सी चीजोंके बजाय मुख्यतः दूध, दही और फल दे, तो अच्छा हो। यदि टोस्ट दिये जायें तो थे 'ब्राउन ब्रेड' के होने चाहिए। उसे दलिया देनेकी कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती। यदि तू चाहे तो उसे 'कॉड-लिवर आयल' [मछलीका तेल] देना। मैं तो यह तेल देनेकी बात भी नहीं सोच सकता। किन्तु मेरे इस विचारको महत्त्वपूर्ण मत मानना। तेरा कान कैसा है? मुझे हर हफ्ते लिखती रहना। और स्याहीसे लिखना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ४७७१) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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रेखा साव
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text/x-wiki
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७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मणि (पटेल),}}
तेरा पत्र मिला। बापू तथा जयरामदास दो दिन और साथ रहकर चले गये। इतनेमें तेरा पत्र मिला। इसलिए बापूने भी पढ़ा। बापूको लिखा पत्र मैंने पढ़ा। माँ सम्बन्धी वर्णन हृदयद्रावक है। अधिकतर प्राचीन माताएँ ऐसी ही होती थीं। इसलिए तूने जो वर्णन किया है, उसपर आश्चर्य नहीं होता। हालांकि प्रेमका यह स्वरूप मोह-जनित है फिर भी इतना उज्ज्वल है कि नित्य नया जैसा ही लगता है। पत्र लिखनेके
नियमको भंग न करना। यात्रामें (जेलमें) पहुँच जायें तो दूसरी बात है।
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'''बापुना पत्रो– ४: मणिबहेन पटेलने'''}}
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७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ सुशीला,}}
बहुत दिन बाद तेरा पत्र मिला। 'उलटा चोर कोतवालको डाँटे' वाली बात तू करती है। मेरा इससे पहला पत्र तो तुझे मिला ही होगा? सीताकी बीमारी बहुत लम्बी चली। वह इतनी बीमार कैसे हो गई, क्या तू यह भी नहीं समझ पा
रही है? सीताको अपनी आँखोंसे देखे बिना मेरी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही है। किन्तु मैं यह सुझाव दूँगा कि यदि तू उसे बहुत-सी चीजोंके बजाय मुख्यतः दूध, दही और फल दे, तो अच्छा हो। यदि टोस्ट दिये जायें तो थे 'ब्राउन ब्रेड' के होने चाहिए। उसे दलिया देनेकी कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती। यदि तू चाहे तो उसे 'कॉड-लिवर आयल' [मछलीका तेल] देना। मैं तो यह तेल देनेकी बात भी नहीं सोच सकता। किन्तु मेरे इस विचारको महत्त्वपूर्ण मत मानना। तेरा कान कैसा है? मुझे हर हफ्ते लिखती रहना। और स्याहीसे लिखना।
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गुजराती (जी॰ एन॰ ४७७१) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८१. पत्र: मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मनु (त्रिवेदी),}}
तेरा चित्त शान्त नहीं हुआ क्या? यदि अब भी तेरा समाधान न हुआ हो तो मुझसे लगातार जूझता रह। मैं तुझसे बलात् पुण्य नहीं करवाना चाहता। इस संसारमें आज तक कोई बलात् पुण्य कर भी नहीं सका है। और फिर तेरी तो इच्छा भी शुभ है; इसलिए मैं तेरा दिल दुखाकर तुझे वहाँ बिठाये नहीं रखना चाहता।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ७७६२) की फोटो-नकलसे।
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{{c|{{larger|'''१८२. पत्र: रेहाना तैयबजीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ रेहाना,}}
तेरा पत्र मिला। मेरा छोटा-सा पत्र देखकर तू भी अपने पत्रको छोटा मत करना। मेरे छोटा पत्र लिखनेका कारण तो तू जानती है। बाबाजान 'सीरत' का अनुवाद किस भाषा में कर रहे है? 'सीरत' और 'उस्वा-ए-सहाबा ' मैंने अपनी पहली कैदके दौरान पड़े थे और उन्हें पढ़ने में मुझे बहुत आनन्द आया था। किन्तु बादमें मेरी उर्दूमें जंग लग गया और अब कताईके कारण पढ़नेकी फुरसत नहीं मिलती।
तेरा स्वास्थ्य तो जब ईश्वरकी कृपा होगी, तभी सुधरेगा। "भगवानकी जब जो मर्जी हो उसके लिए शोक करना वृथा है।" बाबाजानको भुर्रर और अम्माजानको वन्देमातरम्। तुझे तथा बहनोंको खुदा हाफिज<ref>'खुदा हाफिज' उर्दू लिखा है।</ref>।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९९२०) की फोटो-नकलसे।
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{{left|४४–९}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१६८
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८३. पत्र: तारामती मथुरादास त्रिकमजीको'''}}}}
{{right|७ सितम्बर, १९३०}}
चि॰ मथुरादास जेल चला गया इससे तू घबराती तो नहीं है? अभी कहाँ रह रही है? तेरा और दिलीपका स्वास्थ्य कैसा रहता है? मथुरादास क्या लिखता है? उसे क्या-कुछ असुविधा है? तू समय कैसे बिताती है? सार्वजनिक काममें कुछ भाग लेती है क्या? कोई तुझसे मिलने आता है? तू किसीसे मिलने जाती है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुनी प्रसादी'''}}
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{{c|{{larger|'''१८४. पत्र: कलावती त्रिवेदीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
७ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ कलावती,}}
तुम्हारा खत बहोत दिनोंसे मिला। सासकी सेवाके लिये जाना चाहिये हि तो जाना। प्रायः यह खत भी वहीं मिलेगा। नियमोंका भली भांति पालन करना। खाने में भी बहोत मर्यादा रखना।
{{right|बापुके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ ५२५० की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१६९
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८५. पत्र: जे॰ सी॰ कुमारप्पाको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|प्रिय कुमारप्पा,}}
तुम्हारी भेजी पुस्तिका मुझे अभी तक नहीं मिली है। एक रोमांच सात्विक होता है और एक राजसिक होता है। तुम्हारी लिखी रचनाएँ किस वर्गमें आती है? हम उन अमेरिकी महिलाके बारेमें और आगे सुननेकी अपेक्षा करते हैं। मुझे आशा है कि आश्रमका जीवन उनके लिए बहुत कठिन सिद्ध नहीं होगा। अपने स्कूलमें चरखे और तकलीका आरम्भ करानेके लिए श्रीमती अप्पास्वामीको हमारी संयुक्त बधाई।
सप्रेम,
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १००९०) की फोटो-नकलसे।
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{{c|{{larger|'''१८६. पत्र: पी॰ जी॰ मैथ्यूको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
८ सितम्बर १९३०}}
{{left|प्रिय मैथ्यू}}
मानवकी वाणी सत्यका वर्णन करनेके लिए अपर्याप्त है। आत्मा अजन्मा और अविनाशी है। [बाहरी] व्यक्तित्व नष्ट होता है, उसे नष्ट होना ही है। जिस प्रकार सागरमें प्रत्येक बूँदका एक व्यक्तित्य है भी और नहीं भी है, उसी प्रकार व्यक्तिकी सत्ता है भी और नहीं भी। ऐसा इसलिए नहीं कि सागरसे पृथक बूँदका कोई अस्तित्व ही नहीं है। ऐसा इसलिए कि यदि बूँदका अस्तित्व नहीं है अर्थात् उसकी कोई वैयक्तिक सत्ता नहीं है, तो सागरका भी कोई अस्तित्व नहीं है। ये बहुत ही सुन्दर ढंगसे परस्पर निर्भर है। और यदि यह बात भौतिक जगतके फोटो-नकलसे है तो आध्यात्मिक जगतके मामले में कितनी सच न होगी।
सप्रेम,
{{right|'''बापू'''}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १५५४) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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