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पृष्ठ:हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों का संक्षिप्त विवरण.pdf/३
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2026-08-17T12:54:03Z
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<noinclude><pagequality level="3" user="Abybde" /></noinclude>मुद्रक - गणपति कृष्ण गुर्जर श्रीलक्ष्मीनारायण प्रेस, बनारस सिटी । १०४१-२४<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों का संक्षिप्त विवरण.pdf/४
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2026-08-17T14:00:26Z
Abybde
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Abybde" /></noinclude>प्रस्तावना
सन् १८६८ में भारत सरकार ने लाहोर
निवासी रामकृष्ण के प्रस्ताव को स्वीकृत
कर भारत के भिन्न भिन्न प्रांतों में हस्त-लिखित
संस्कृत पुस्तकों की खोज का काम आरम्भ करना
निश्चित किया और इस नियम के अनुसार अब
तक संस्कृत पुस्तकों की खोज का काम सरकार
की ओर से बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी,
बम्बई और मद्रास गवर्नमेंटों तथा अन्य संस्थाओं
और विद्वानों द्वारा निरंतर होता आ रहा है। इस
खोज का जो परिणाम आज तक हुआ है और
इससे भारतवर्ष की जिन जिन साहित्यिक तथा
ऐतिहासिक बातों का पता चला है, ये पंडित राधा-
कृष्ण की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता तथा मारत
सरकार की समुचित कार्यतत्परता और विद्या-
रसिकता के प्रत्यक्ष और ज्वलंत प्रमाण है। संस्कृत
पुस्तकों की साख-संबंधी डाक्टर कीलहार्न, वूलर,
पीटर्सन, भांडारकर और बर्मैल आदि की रिपोर्टो
के आधार पर डाक्टर आफ्रेक्ट ने तीन भागों में,
संस्कृत पुस्तकों व उनके कर्त्ताओं की एक वृहत्
सूची छापी है वो बड़े महत्व की है और जिसके
देखने से संस्कृत साहित्य के विस्तार तथा महत्व
का पूरा-पूरा परिचय मिलता है। इसका नाम
कैटेलोगस कैटेलोगराम है। ऐसे ही महस्व के अर्थों
में आफरेक्ट का ऑक्सफ़ोर्ड की बोडलियन लाइ-
ब्रेरी का सूचीपत्र, एगलिंग की इंडिया आफिस की
पुस्तकों का सूचीपत्र और बेबर का बर्लिन के राज
पुस्तकालय का सूचीपत्र है।
काशी नागरीप्रचारिणी सभा की सपना के
पहले ही पर्प ( सम् १८८३ ई०) में इस साम
का ध्यान इस महत्वपूर्ण विषय की मार भाकर्षित
हुआ समा ने इस शट को मही माँति समझ
किया और उसे इसका पूरा पूरा विश्वास हो गया
कि मारतवर्ष की, विशेष कर उत्तर भारत की,
बहुत सी साहित्यिक तथा ऐतिहासिक बातें बेटों
में लपेटरी, अँधेरी कोठरियों में बंद इति
हिंदी पुस्तकों में द्दिपी पड़ी है। यदि किसी को
कुछ पता भी हूँ अथवा किसी व्यक्ति के घर में
कुछ हस्तलिभित पुस्तकें सही भी है तो
थायोमिथ्या माहवश भगवा भनामा के कारण
म में तथा प्राप्त करने में बड़ी बड़ी
कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि
सम्पता की इस बीसवी शताब्दी में भी ऐसे बहुत
लिखित पुस्तकों का देन की बात या दूर रही।
6666666666666666666666666666666666666666666666666666666666666666666666666666<noinclude></noinclude>
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2026-08-17T16:52:50Z
Abybde
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Abybde" /></noinclude>प्रस्तावना
सन् १८६८ में भारत सरकार ने लाहोर
निवासी रामकृष्ण के प्रस्ताव को स्वीकृत
कर भारत के भिन्न भिन्न प्रांतों में हस्त-लिखित
संस्कृत पुस्तकों की खोज का काम आरम्भ करना
निश्चित किया और इस नियम के अनुसार अब
तक संस्कृत पुस्तकों की खोज का काम सरकार
की ओर से बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी,
बम्बई और मद्रास गवर्नमेंटों तथा अन्य संस्थाओं
और विद्वानों द्वारा निरंतर होता आ रहा है। इस
खोज का जो परिणाम आज तक हुआ है और
इससे भारतवर्ष की जिन जिन साहित्यिक तथा
ऐतिहासिक बातों का पता चला है, ये पंडित राधा-
कृष्ण की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता तथा मारत
सरकार की समुचित कार्यतत्परता और विद्या-
रसिकता के प्रत्यक्ष और ज्वलंत प्रमाण है। संस्कृत
पुस्तकों की साख-संबंधी डाक्टर कीलहार्न, वूलर,
पीटर्सन, भांडारकर और बर्मैल आदि की रिपोर्टो
के आधार पर डाक्टर आफ्रेक्ट ने तीन भागों में,
संस्कृत पुस्तकों व उनके कर्त्ताओं की एक वृहत्
सूची छापी है वो बड़े महत्व की है और जिसके
देखने से संस्कृत साहित्य के विस्तार तथा महत्व
का पूरा-पूरा परिचय मिलता है। इसका नाम
कैटेलोगस कैटेलोगराम है। ऐसे ही महस्व के अर्थों
में आफरेक्ट का ऑक्सफ़ोर्ड की बोडलियन लाइ-
ब्रेरी का सूचीपत्र, एगलिंग की इंडिया आफिस की
पुस्तकों का सूचीपत्र और बेबर का बर्लिन के राज्य
पुस्तकालय का सूचीपत्र है।
काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना के
पहले ही वर्ष ( सन १८९३ ई०) में इसके सभासदों
का ध्यान इस महत्वपूर्ण विषय की ओर आकर्षित
हुआ | सभा ने इस बात को भली-भाँती समझ
लिया और उसे इसका पूरा पूरा विश्वास हो गया
कि मारतवर्ष की, विशेष कर उत्तर भारत की,
बहुत सी साहित्यिक तथा ऐतिहासिक बातें बेटनों
में लपेटी, अँधेरी कोठरियों में बंद हस्तलिखित
हिंदी पुस्तकों में छिपी पड़ी है। यदि किसी को
कुछ पता भी हैं अथवा किसी व्यक्ति के घर में
कुछ हस्तलिखित पुस्तकें संगृहित भी है तो वे
या तो मिथ्या मोहवश अथवा अनामाप के कारण
इन छिपे हुए रत्नों को सर्वसाधारण के सम्मुख
उपस्थित कर अपनी देशभाषा के साहित्य को लाभ
पहूँचान और उसे सुरक्षित करने से परान्मुख हो
रहे हैं|<noinclude></noinclude>
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2026-08-17T16:54:25Z
Abybde
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Abybde" /></noinclude>प्रस्तावना
सन् १८६८ में भारत सरकार ने लाहोर
निवासी रामकृष्ण के प्रस्ताव को स्वीकृत
कर भारत के भिन्न भिन्न प्रांतों में हस्त-लिखित
संस्कृत पुस्तकों की खोज का काम आरम्भ करना
निश्चित किया और इस नियम के अनुसार अब
तक संस्कृत पुस्तकों की खोज का काम सरकार
की ओर से बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी,
बम्बई और मद्रास गवर्नमेंटों तथा अन्य संस्थाओं
और विद्वानों द्वारा निरंतर होता आ रहा है। इस
खोज का जो परिणाम आज तक हुआ है और
इससे भारतवर्ष की जिन जिन साहित्यिक तथा
ऐतिहासिक बातों का पता चला है, ये पंडित राधा-
कृष्ण की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता तथा मारत
सरकार की समुचित कार्यतत्परता और विद्या-
रसिकता के प्रत्यक्ष और ज्वलंत प्रमाण है। संस्कृत
पुस्तकों की साख-संबंधी डाक्टर कीलहार्न, वूलर,
पीटर्सन, भांडारकर और बर्मैल आदि की रिपोर्टो
के आधार पर डाक्टर आफ्रेक्ट ने तीन भागों में,
संस्कृत पुस्तकों व उनके कर्त्ताओं की एक वृहत्
सूची छापी है वो बड़े महत्व की है और जिसके
देखने से संस्कृत साहित्य के विस्तार तथा महत्व
का पूरा-पूरा परिचय मिलता है। इसका नाम
कैटेलोगस कैटेलोगराम है। ऐसे ही महस्व के अर्थों
में आफरेक्ट का ऑक्सफ़ोर्ड की बोडलियन लाइ-
ब्रेरी का सूचीपत्र, एगलिंग की इंडिया आफिस की
पुस्तकों का सूचीपत्र और बेबर का बर्लिन के राज्य
पुस्तकालय का सूचीपत्र है।
काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना के
पहले ही वर्ष ( सन १८९३ ई०) में इसके सभासदों
का ध्यान इस महत्वपूर्ण विषय की ओर आकर्षित
हुआ | सभा ने इस बात को भली-भाँती समझ
लिया और उसे इसका पूरा पूरा विश्वास हो गया
कि मारतवर्ष की, विशेष कर उत्तर भारत की,
बहुत सी साहित्यिक तथा ऐतिहासिक बातें बेटनों
में लपेटी, अँधेरी कोठरियों में बंद हस्तलिखित
हिंदी पुस्तकों में छिपी पड़ी है। यदि किसी को
कुछ पता भी हैं अथवा किसी व्यक्ति के घर में
कुछ हस्तलिखित पुस्तकें संगृहित भी है तो वे
या तो मिथ्या मोहवश अथवा अनामाप के कारण
इन छिपे हुए रत्नों को सर्वसाधारण के सम्मुख
उपस्थित कर अपनी देशभाषा के साहित्य को लाभ
पहूँचान और उसे सुरक्षित करने से परान्मुख हो
रहे हैं|<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३१९
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
Ocr सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>भाषण : बम्बईकी सभायें
२८९
अथवा बम्बई समितिको चला जायेगा । बम्बई समितिके कोषाध्यक्ष सर्वश्री तरसी और
मोतीवाला हैं । इन कोषाध्यक्षोंको इस रकममें से एक पाई भी खर्च करनेका अधिकार
नहीं है। समिति मन्त्री सर्वश्री उमर सोबानी, बैंकर और डा० वेलकर हैं और लोग
इनपर भरोसा कर सकते हैं कि ये एक पाई भी व्यर्थ खर्च नहीं करेंगे। आप लोग
मुझमें ही विश्वास करके भूल करते हैं, क्योंकि समस्त भारतमें एकत्र की गई राशियोंकी
देख-भाल करना मेरे लिए असम्भव है । कोषकी व्यवस्था अच्छे लोगोंके हाथों में देनेके
लिए मुझसे जो कुछ हो सकता था, मैंने कर दिया है। ऐसे लोगोंकी अब कमी नहीं
है; क्योंकि भारतका वातावरण काफी हदतक पवित्र हो गया है। मैं आपको यकीन
दिला सकता हूँ कि इस कोषकी व्यवस्था करनेवाले अधिकारियोंमें से एक भी अधिकारी
अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताके लिए इस पैसेका उपयोग नहीं करेगा। मुझे इन सबपर
पूरा-पूरा भरोसा है। मुझे बम्बई समितिके सदस्योंके नाम मालूम नहीं हैं, लेकिन में
कोषाध्यक्षों और मन्त्रियोंको जानता हूँ और उनपर पूर्णतया विश्वास किया जा
सकता है। मैंने आपसे अपना पैसा श्रीमती नायडूको देनेके लिए नहीं कहा, क्योंकि
वे हिसाबमें चुस्त नहीं हैं; वे आपको स्वराज्य-कोषमें चन्दा देनेके लिए न सिर्फ फुसला
सकती हैं बल्कि अपनी मीठी आवाजमें धमकी भी दे सकती हैं। (हँसी) इसलिए
आप अपना पैसा पूरे विश्वासके साथ दे सकते हैं। जहाँतक उस रकमके उपयोगका
सवाल है, वह नये स्कूल और कालेज स्थापित करने तथा चरखेका प्रचार करनेके लिए
खर्च की जायेगी । समितिका उद्देश्य सिर्फ व्याजपर ही गुजारा करना नहीं है। वह
तो सारी पूँजीको भारतके पुनरुद्धारके कार्य में खर्च करना चाहती है।
--
वैष्णवों और श्रावकोंको सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा, जबतक आप दलित-
वर्ग के लोगोंके साथ भाइयोंका-सा व्यवहार नहीं करते तबतक आपको स्वराज्य नहीं
मिलेगा। जबतक एक भी व्यक्ति दूसरे व्यक्तिके साथ उपेक्षा और घृणाका व्यवहार
करेगा तबतक आपको स्वराज्य नहीं मिल सकता, क्योंकि तबतक आप इसके योग्य
ही नहीं होंगे। मैं हिन्दुओं-- श्रावकों और वैष्णवों- - से अनुरोध करता हूँ कि वे
अपने बीचसे अस्पृश्यताको जड़मूलसे उखाड़ फेंकें। अस्पृश्यताकी भावना शैतानकी
भावना है। जिस तरह आप इस शैतानी सरकारसे छुटकारा पाना चाहते हैं उसी
तरह आपको अपने बीच प्रचलित इस शैतानी प्रथासे भी छुटकारा पाने के लिए तैयार
हो जाना चाहिए। आपके इन गरीब भाइयोंको कुऍसे पानी भरनेकी इजाजत नहीं है,
वे बीमार हों तो उनके लिए अस्पतालोंमें गुंजाइश नहीं है-
-- इस वस्तुस्थितिके बारेमें
आप क्या कह सकते हैं ? जबतक आपके मार्ग में इन गरीबोंको इस दलित अवस्थाम
रखनेवाली अस्पृश्यताकी नैतिक बाधा मौजूद है तबतक आप कैसे कह सकते हैं कि आप
स्वराज्यके काबिल हैं ।
[ अंग्रेजीसे ]
बॉम्बे क्रॉनिकल, २७-६-१९२१
२०-१९
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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671379
671377
2026-08-18T04:32:02Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
671379
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईकी सभामें|२८९}}</noinclude>'''अथवा बम्बई समितिको चला जायेगा। बम्बई समितिके कोषाध्यक्ष सर्वश्री तैरसी और मोतीवाला हैं। इन कोषाध्यक्षोंको इस रकममें से एक पाई भी खर्च करनेका अधिकार नहीं है। समितिके मन्त्री सर्वश्री उमर सोबानी, बैंकर और डा॰ वेलकर हैं और लोग इनपर भरोसा कर सकते हैं कि ये एक पाई भी व्यर्थ खर्च नहीं करेंगे। आप लोग मुझमें ही विश्वास करके भूल करते हैं, क्योंकि समस्त भारतमें एकत्र की गई राशियोंकी देख-भाल करना मेरे लिए असम्भव है। कोषकी व्यवस्था अच्छे लोगोंके हाथोंमें देनेके लिए मुझसे जो-कुछ हो सकता था, मैंने कर दिया है। ऐसे लोगोंकी अब कमी नहीं है; क्योंकि भारतका वातावरण काफी हदतक पवित्र हो गया है। मैं आपको यकीन दिला सकता हूँ कि इस कोषकी व्यवस्था करनेवाले अधिकारियोंमें से एक भी अधिकारी अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताके लिए इस पैसेका उपयोग नहीं करेगा। मुझे इन सबपर पूरा-पूरा भरोसा है। मुझे बम्बई समितिके सदस्योंके नाम मालूम नहीं हैं, लेकिन मैं कोषाध्यक्षों और मन्त्रियोंको जानता हूँ और उनपर पूर्णतया विश्वास किया जा सकता है। मैंने आपसे अपना पैसा श्रीमती नायडूको देनेके लिए नहीं कहा, क्योंकि वे हिसाबमें चुस्त नहीं हैं; वे आपको स्वराज्य-कोषमें चन्दा देनेके लिए न सिर्फ फुसला सकती हैं बल्कि अपनी मीठी आवाजमें धमकी भी दे सकती हैं। (हँसी) इसलिए आप अपना पैसा पूरे विश्वासके साथ दे सकते हैं। जहाँतक उस रकमके उपयोगका सवाल है, वह नये स्कूल और कालेज स्थापित करने तथा चरखेका प्रचार करनेके लिए खर्च की जायेगी। समितिका उद्देश्य सिर्फ व्याजपर ही गुजारा करना नहीं है। वह तो सारी पूँजीको भारतके पुनरुद्धारके कार्यमें खर्च करना चाहती है।'''
'''वैष्णवों और श्रावकोंको सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा, जबतक आप दलितवर्गके लोगोंके साथ भाइयोंका-सा व्यवहार नहीं करते तबतक आपको स्वराज्य नहीं मिलेगा। जबतक एक भी व्यक्ति दूसरे व्यक्तिके साथ उपेक्षा और घृणाका व्यवहार करेगा तबतक आपको स्वराज्य नहीं मिल सकता, क्योंकि तबतक आप इसके योग्य ही नहीं होंगे। मैं हिन्दुओं—श्रावकों और वैष्णवों—से अनुरोध करता हूँ कि वे अपने बीचसे अस्पृश्यताको जड़मूलसे उखाड़ फेंकें। अस्पृश्यताकी भावना शैतानकी भावना है। जिस तरह आप इस शैतानी सरकारसे छुटकारा पाना चाहते हैं उसी तरह आपको अपने बीच प्रचलित इस शैतानी प्रथासे भी छुटकारा पानेके लिए तैयार हो जाना चाहिए। आपके इन गरीब भाइयोंको कुऍसे पानी भरनेकी इजाजत नहीं है, वे बीमार हों तो उनके लिए अस्पतालोंमें गुंजाइश नहीं है—इस वस्तुस्थितिके बारेमें आप क्या कह सकते हैं? जबतक आपके मार्गमें इन गरीबोंको इस दलित अवस्थामें रखनेवाली अस्पृश्यताकी नैतिक बाधा मौजूद है तबतक आप कैसे कह सकते हैं कि आप स्वराज्यके काबिल हैं।'''
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २७-६-१९२१|1em}}<noinclude>{{Left|२०–१९}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३१३
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2026-08-17T14:34:00Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||माधुरी और पुष्पा|२८३}}</noinclude>"यह काँचकी तो ले लेता हूँ। लेकिन मैंने कहा था कि अगर तू दे तो भी मैं सोनेकी चूड़ी नहीं लूँगा। इसलिए यह तू मुझे मत दे। तूने तो, बहन, बहुत दिया है।"
"मैं तो आपको दे चुकी हूँ। मुझे यह नहीं चाहिए। मैंने आपको खुशीसे दी है; इसे आप रखें।"
माधुरीने मुझे पराजित कर दिया। मैंने अपना वचन भंग किया। उपर्युक्त चूड़ी मेरे हाथमें देकर, खाली हाथ और खाली कानवाली माधुरी मुझे तो और भी ज्यादा सुन्दर लगी। मैंने उसे अपने हृदयसे लगा लिया।
मैं हर्षसे पुलकित हो उठा, मैंने ईश्वरको धन्यवाद दिया।
इसके बाद माधुरी 'काम' में लग गई। उसने दूसरी लड़कियोंके हाथोंको खाली कराना शुरू कर दिया। उसमें उसे अतिशय सफलता मिली।
लेकिन क्या उसकी सफलता-असफलतापर ईश्वर उसका मूल्यांकन करनेवाला है? उसका वचन तो यह है कि "तू कर्म कर; फल तो मेरे ही हाथमें रहने दे।"
माधुरीने तो अपने 'कर्म' को भली-भाँति निभाया। संसारको दिखानेके लिए नहीं बल्कि अपने छोटेसे शरीरमें वास करनेवाली विशाल आत्माको प्रसन्न रखनेके लिए।
माधुरी और पुष्पाको खादी पहनने और चरखा चलानेकी सलाह दे और परिवारकी स्त्रियोंसे खादी और चरखेके सम्बन्धमें वचन ले, माधुरी और पुष्पाकी प्रशंसा करता हुआ मैं वहाँसे विदा हुआ।
ऐसे बच्चोंके निर्दोष यज्ञसे भी यदि हमें इसी वर्ष स्वराज्य नहीं मिलता तो हमारे तथाकथित बुजुर्गोंके पापका पुंज कितना विशाल होगा?
भगवन्! निर्दोष माधुरी और पुष्पा-जैसे बच्चोंको इस भूमिपर सदैव भेजते रहो। हम सब स्त्री-पुरुष ऐसे बच्चोंकी पवित्र आत्माको प्रणाम करें और उनसे कुछ सीखें।
माधुरी और अपने बीच हुए इस संवादको मैंने तीस घंटे बाद लिखा है और जहाँतक मुझे याद पड़ता है मैंने उसे अक्षरशः यहाँ प्रस्तुत किया है। भाषा भी बच्चोंकी होने के कारण मैंने उसे बिना किसी आडम्बरके लिखा है और मैं देख रहा था कि बच्चोंकी भाषा अत्यन्त शुद्ध थी।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', २६-६-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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671308
671307
2026-08-17T14:34:28Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||माधुरी और पुष्पा|२८३}}</noinclude>"यह काँचकी तो ले लेता हूँ। लेकिन मैंने कहा था कि अगर तू दे तो भी मैं सोनेकी चूड़ी नहीं लूँगा। इसलिए यह तू मुझे मत दे। तूने तो, बहन, बहुत दिया है।"
"मैं तो आपको दे चुकी हूँ। मुझे यह नहीं चाहिए। मैंने आपको खुशीसे दी है; इसे आप रखें।"
माधुरीने मुझे पराजित कर दिया। मैंने अपना वचन भंग किया। उपर्युक्त चूड़ी मेरे हाथमें देकर, खाली हाथ और खाली कानवाली माधुरी मुझे तो और भी ज्यादा सुन्दर लगी। मैंने उसे अपने हृदयसे लगा लिया।
मैं हर्षसे पुलकित हो उठा, मैंने ईश्वरको धन्यवाद दिया।
इसके बाद माधुरी 'काम' में लग गई। उसने दूसरी लड़कियोंके हाथोंको खाली कराना शुरू कर दिया। उसमें उसे अतिशय सफलता मिली।
लेकिन क्या उसकी सफलता-असफलतापर ईश्वर उसका मूल्यांकन करनेवाला है? उसका वचन तो यह है कि "तू कर्म कर; फल तो मेरे ही हाथमें रहने दे।"
माधुरीने तो अपने 'कर्म' को भली-भाँति निभाया। संसारको दिखानेके लिए नहीं बल्कि अपने छोटेसे शरीरमें वास करनेवाली विशाल आत्माको प्रसन्न रखनेके लिए।
माधुरी और पुष्पाको खादी पहनने और चरखा चलानेकी सलाह दे और परिवारकी स्त्रियोंसे खादी और चरखेके सम्बन्धमें वचन ले, माधुरी और पुष्पाकी प्रशंसा करता हुआ मैं वहाँसे विदा हुआ।
ऐसे बच्चोंके निर्दोष यज्ञसे भी यदि हमें इसी वर्ष स्वराज्य नहीं मिलता तो हमारे तथाकथित बुजुर्गोंके पापका पुंज कितना विशाल होगा?
भगवन्! निर्दोष माधुरी और पुष्पा-जैसे बच्चोंको इस भूमिपर सदैव भेजते रहो। हम सब स्त्री-पुरुष ऐसे बच्चोंकी पवित्र आत्माको प्रणाम करें और उनसे कुछ सीखें।
माधुरी और अपने बीच हुए इस संवादको मैंने तीस घंटे बाद लिखा है और जहाँतक मुझे याद पड़ता है मैंने उसे अक्षरशः यहाँ प्रस्तुत किया है। भाषा भी बच्चोंकी होने के कारण मैंने उसे बिना किसी आडम्बरके लिखा है और मैं देख रहा था कि बच्चोंकी भाषा अत्यन्त शुद्ध थी।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', २६-६-१९२१|1em}}
{{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३१४
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508745
2026-08-17T14:35:24Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
Ocr सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>१३१. इन चार दिनोंमें हमारा कर्त्तव्य
३० जून, बृहस्पतिवार समीप आ रहा है। 'नवजीवन' पाठकोंके हाथमें शनि-
वारको आयेगा । बृहस्पतिवारको गुजरातकी तथा हिन्दुस्तानकी प्रतिज्ञा पूरी होगी ।
१. लोकमान्य तिलक महाराजकी स्मृतिमें स्वराज्य के लिए गुजरातको दस लाख
रुपया इकट्ठा करना चाहिए ।
हैं ।
२. कांग्रेस में तीन लाख सदस्योंको भरती करना चाहिए।
३. एक लाख चरखोंका इन्तजाम करना चाहिए।
हम अगर निश्चय करें तो चार दिनमें बाकी बचे सारे कामको पूरा कर सकते
'नवजीवन' का प्रत्येक पाठक, चन्दा उगाहने के लिए किसीकी राह देखे बिना,
समीपके किसी निश्चित स्थानपर अपनी सामर्थ्य-भर पैसा दे और रसीद ले आये ।
प्रत्येक पाठक अपने साथीसे चन्दा देनेका आग्रह करे ।
प्रत्येक पाठकको, अगर उसकी आयु २१ वर्षकी हो चुकी हो और वह अभी-
तक कांग्रेसका सदस्य न बना हो तो, तनिक भी विलम्ब किये बिना सदस्य बन जाना
चाहिए तथा दूसरोंसे वैसा करनेके लिए कहना चाहिए।
प्रत्येक पाठक, अगर अभी तक चरखा न खरीदा हो तो, खरीद ले और कातना
सीख ले ।
ये चार दिन अमूल्य हैं, वे फिर नहीं आनेवाले, ऐसा समझकर प्रत्येक पाठक
जो समय बचे वह सारा समय सार्वजनिक कार्यमें ही दे ।
प्रत्येक पाठक राष्ट्रीय कार्यको अपना कार्य समझ उसे तेजी के साथ करे ।
कोई यह न समझ ले कि अब चार दिनोंमें क्या हो सकता है ?
चार दिनोंमें हजारों व्यक्ति जन्म लेंगे और हजारों मौतकी गोदमें सो जायेंगे ।
एक ही रात में रामचन्द्र जैसेका भविष्य बदल गया, एक ही दिनमें हरिश्चन्द्रने
सत्यकी खातिर फकीरी ली, एक ही दिनमें युधिष्ठिर राज्य हार गये। मनुष्य जीवन -
लोकजीवन - --में एक दिनका मूल्य कम नहीं होता तो फिर चार दिनोंका तो कहना
ही क्या ? यदि गुजरात अपने पराक्रमसे स्वराज्य - • धर्मराज्य - प्राप्त करना चाहता
हो तो गुजरातको इस प्रथम परीक्षामें पूरे अंक प्राप्त करने चाहिए।
[ गुजरातीसे ]
नवजीवन, २६-६-१९२१
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{x-larger|'''१३१. इन चार दिनोंमें हमारा कर्त्तव्य'''}}}}
३० जून, बृहस्पतिवार समीप आ रहा है। 'नवजीवन' पाठकोंके हाथमें शनिवारको आयेगा। बृहस्पतिवारको गुजरातकी तथा हिन्दुस्तानकी प्रतिज्ञा पूरी होगी।
१. लोकमान्य तिलक महाराजकी स्मृतिमें स्वराज्य के लिए गुजरातको दस लाख रुपया इकट्ठा करना चाहिए।
२. कांग्रेसमें तीन लाख सदस्योंको भरती करना चाहिए।
३. एक लाख चरखोंका इन्तजाम करना चाहिए।
हम अगर निश्चय करें तो चार दिनमें बाकी बचे सारे कामको पूरा कर सकते हैं।
'नवजीवन' का प्रत्येक पाठक, चन्दा उगाहनेके लिए किसीकी राह देखे बिना, समीपके किसी निश्चित स्थानपर अपनी सामर्थ्य-भर पैसा दे और रसीद ले आये।
प्रत्येक पाठक अपने साथीसे चन्दा देनेका आग्रह करे।
प्रत्येक पाठकको, अगर उसकी आयु २१ वर्षकी हो चुकी हो और वह अभीतक कांग्रेसका सदस्य न बना हो तो, तनिक भी विलम्ब किये बिना सदस्य बन जाना चाहिए तथा दूसरोंसे वैसा करनेके लिए कहना चाहिए।
प्रत्येक पाठक, अगर अभी तक चरखा न खरीदा हो तो, खरीद ले और कातना सीख ले।
ये चार दिन अमूल्य हैं, वे फिर नहीं आनेवाले, ऐसा समझकर प्रत्येक पाठक जो समय बचे वह सारा समय सार्वजनिक कार्यमें ही दे।
प्रत्येक पाठक राष्ट्रीय कार्यको अपना कार्य समझ उसे तेजीके साथ करे।
कोई यह न समझ ले कि अब चार दिनोंमें क्या हो सकता है?
चार दिनोंमें हजारों व्यक्ति जन्म लेंगे और हजारों मौतकी गोदमें सो जायेंगे।
एक ही रातमें रामचन्द्र-जैसेका भविष्य बदल गया, एक ही दिनमें हरिश्चन्द्रने सत्यकी खातिर फकीरी ली, एक ही दिनमें युधिष्ठिर राज्य हार गये। मनुष्य जीवन—लोकजीवन—में एक दिनका मूल्य कम नहीं होता तो फिर चार दिनोंका तो कहना ही क्या? यदि गुजरात अपने पराक्रमसे स्वराज्य—धर्मराज्य—प्राप्त करना चाहता हो तो गुजरातको इस प्रथम परीक्षामें पूरे अंक प्राप्त करने चाहिए।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', २६-६-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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३० जून, बृहस्पतिवार समीप आ रहा है। 'नवजीवन' पाठकोंके हाथमें शनिवारको आयेगा। बृहस्पतिवारको गुजरातकी तथा हिन्दुस्तानकी प्रतिज्ञा पूरी होगी।
१. लोकमान्य तिलक महाराजकी स्मृतिमें स्वराज्य के लिए गुजरातको दस लाख रुपया इकट्ठा करना चाहिए।
२. कांग्रेसमें तीन लाख सदस्योंको भरती करना चाहिए।
३. एक लाख चरखोंका इन्तजाम करना चाहिए।
हम अगर निश्चय करें तो चार दिनमें बाकी बचे सारे कामको पूरा कर सकते हैं।
'नवजीवन' का प्रत्येक पाठक, चन्दा उगाहनेके लिए किसीकी राह देखे बिना, समीपके किसी निश्चित स्थानपर अपनी सामर्थ्य-भर पैसा दे और रसीद ले आये।
प्रत्येक पाठक अपने साथीसे चन्दा देनेका आग्रह करे।
प्रत्येक पाठकको, अगर उसकी आयु २१ वर्षकी हो चुकी हो और वह अभीतक कांग्रेसका सदस्य न बना हो तो, तनिक भी विलम्ब किये बिना सदस्य बन जाना चाहिए तथा दूसरोंसे वैसा करनेके लिए कहना चाहिए।
प्रत्येक पाठक, अगर अभी तक चरखा न खरीदा हो तो, खरीद ले और कातना सीख ले।
ये चार दिन अमूल्य हैं, वे फिर नहीं आनेवाले, ऐसा समझकर प्रत्येक पाठक जो समय बचे वह सारा समय सार्वजनिक कार्यमें ही दे।
प्रत्येक पाठक राष्ट्रीय कार्यको अपना कार्य समझ उसे तेजीके साथ करे।
कोई यह न समझ ले कि अब चार दिनोंमें क्या हो सकता है?
चार दिनोंमें हजारों व्यक्ति जन्म लेंगे और हजारों मौतकी गोदमें सो जायेंगे।
एक ही रातमें रामचन्द्र-जैसेका भविष्य बदल गया, एक ही दिनमें हरिश्चन्द्रने सत्यकी खातिर फकीरी ली, एक ही दिनमें युधिष्ठिर राज्य हार गये। मनुष्य जीवन—लोकजीवन—में एक दिनका मूल्य कम नहीं होता तो फिर चार दिनोंका तो कहना ही क्या? यदि गुजरात अपने पराक्रमसे स्वराज्य—धर्मराज्य—प्राप्त करना चाहता हो तो गुजरातको इस प्रथम परीक्षामें पूरे अंक प्राप्त करने चाहिए।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>१३२. काठियावाड़ियों से
जैसे-जैसे जूनकी अन्तिम तारीख समीप आती जाती है वैसे-वैसे मेरी दृष्टि काठिया-
वाड़की ओर जा रही है। अभी तो मैं केवल काठियावाड़की पैसे-सम्बन्धी स्थिति के
बारेमें ही लिखना चाहता हूँ । अन्य विषयोंके सम्बन्ध में बाद में लिखनेकी उम्मीद
करता हूँ ।
स्वराज्यका कार्य समस्त भारतवर्षका कार्य है। इसमें देशी राज्योंका स्वार्थ भी
कोई कम नहीं है। देशी राज्याधिकारी जानते हैं कि स्वराज्य आन्दोलनसे उनका बल
बढ़ गया है। देशी राज्योंकी रैयत जानती है कि उसका बल बढ़ गया है ।
यह आन्दोलन राजा, सत्ता अथवा धनके नाश करनेका नहीं बल्कि इन सबको
स्वच्छ करनेका आन्दोलन है । जिस अंशतक पाखण्ड घटेगा उस हदतक स्वराज्यकी
नलीका पारा चढ़ेगा। यह प्रवृत्ति पाखण्ड, अत्याचार और अधर्मका नाश करनेवाली है ।
इस प्रकारकी इस प्रवृत्तिमें काठियावाड़ के राजा और प्रजा क्या योगदान देंगे ?
अभी तो कुछ नहीं दिया है। काठियावाड़ चाहे तो करोड़ रुपया होनेमें जो कमी रह
गई है उसे पूरा कर दे । काठियावाड़ के साहसी लोग व्यापारकी खातिर अनेक स्थानों-
पर फैल गये हैं । वे जहाँ हैं वहाँ पैसा दे रहे हैं। मेरी इच्छा है कि वे और भी
अधिक दें । तथापि उनका यह योगदान एक भारतीय के रूपमें है। लेकिन काठियावाड़ी
गुजरातीके रूपमें वे काठियावाड़से क्या भेजेंगे ? गुजरात के दस लाख चन्देमें क्या देंगे ?
अथवा हिम्मत करके क्या वे गुजरातके चन्देको दूना नहीं कर सकते ?
पोरबन्दर, राणावाव, कुतियाणा, बाँटवा, जेतपुर तथा धोराजीके मेमन अगर
चाहें तो अपने बीचमें से ही करोड़ रुपया इकट्ठा कर सकते हैं। जामनगरका एक
ही मेमन चाहे तो साठ लाखकी कमी पूरी कर सकता है।
काठियावाड़का एक ही राजा चरखेको धर्मको समझ ले तो सिर्फ उसके निमित
ही स्वराज्य कोषमें करोड़ रुपया दे सकता है ।
लेकिन मैं जानता हूँ कि मुझे ऐसी आशा नहीं रखनी चाहिए। राजाओंमें अथवा
मेमनोंमें ऐसी श्रद्धा नहीं उपजी है । इस बारका चन्दा सबकी श्रद्धाका माप दण्ड है ।
अपने रोग के उपचार के लिए हम कितना पैसा देते हैं ? हिन्दुस्तान के रोगको
अपना माननेवाले हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई अथवा यहूदी कितने हैं? कितने
राजा और रंक हैं ? हिन्दुस्तान के भयंकर क्षय रोगके लिए सब कितना देने को तैयार
हैं ? यह हम सबकी कसौटी हो रही है । तीस जूनतक प्रत्येक भारतवासीको उत्तर
देना है । प्रत्येक काठियावाड़ीको अपने कर्त्तव्यका पालन करना है ।
हिन्दुस्तानको क्षय हो गया है । जो लोग यह नहीं मानते और जो यह समझते
हैं कि चालू प्रवृत्तिसे इस क्षयका आंशिक रूपसे भी निवारण होनेवाला नहीं है, वे लोग
निःसन्देह इस कोष में दान न दें। लेकिन ऐसे अश्रद्धालु काठियावाड़ी मैंने कम ही
देखे हैं । इसलिए मुझे काठियावाड़से बड़ी आशा है ।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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{{C|{{larger|'''१३२. काठियावाड़ियोंसे'''}}}}
जैसे-जैसे जूनकी अन्तिम तारीख समीप आती जाती है वैसे-वैसे मेरी दृष्टि काठियावाड़की ओर जा रही है। अभी तो मैं केवल काठियावाड़की पैसे-सम्बन्धी स्थितिके बारेमें ही लिखना चाहता हूँ। अन्य विषयोंके सम्बन्धमें बाद में लिखनेकी उम्मीद करता हूँ।
स्वराज्यका कार्य समस्त भारतवर्षका कार्य है। इसमें देशी राज्योंका स्वार्थ भी कोई कम नहीं है। देशी राज्याधिकारी जानते हैं कि स्वराज्य आन्दोलनसे उनका बल बढ़ गया है। देशी राज्योंकी रैयत जानती है कि उसका बल बढ़ गया है।
यह आन्दोलन राजा, सत्ता अथवा धनके नाश करनेका नहीं बल्कि इन सबको स्वच्छ करनेका आन्दोलन है। जिस अंशतक पाखण्ड घटेगा उस हदतक स्वराज्यकी नलीका पारा चढ़ेगा। यह प्रवृत्ति पाखण्ड, अत्याचार और अधर्मका नाश करनेवाली है।
इस प्रकारकी इस प्रवृत्तिमें काठियावाड़के राजा और प्रजा क्या योगदान देंगे? अभी तो कुछ नहीं दिया है। काठियावाड़ चाहे तो करोड़ रुपया होनेमें जो कमी रह गई है उसे पूरा कर दे। काठियावाड़के साहसी लोग व्यापारकी खातिर अनेक स्थानोंपर फैल गये हैं। वे जहाँ हैं वहाँ पैसा दे रहे हैं। मेरी इच्छा है कि वे और भी अधिक दें। तथापि उनका यह योगदान एक भारतीयके रूपमें है। लेकिन काठियावाड़ी गुजरातीके रूपमें वे काठियावाड़से क्या भेजेंगे? गुजरातके दस लाख चन्देमें क्या देंगे? अथवा हिम्मत करके क्या वे गुजरातके चन्देको दूना नहीं कर सकते?
पोरबन्दर, राणावाव, कुतियाणा, बाँटवा, जेतपुर तथा धोराजीके मेमन अगर चाहें तो अपने बीचमें से ही करोड़ रुपया इकट्ठा कर सकते हैं। जामनगरका एक ही मेमन चाहे तो साठ लाखकी कमी पूरी कर सकता है।
काठियावाड़का एक ही राजा चरखेको धर्मको समझ ले तो सिर्फ उसके निमित ही स्वराज्य-कोषमें करोड़ रुपया दे सकता है।
लेकिन मैं जानता हूँ कि मुझे ऐसी आशा नहीं रखनी चाहिए। राजाओंमें अथवा मेमनोंमें ऐसी श्रद्धा नहीं उपजी है। इस बारका चन्दा सबकी श्रद्धाका माप-दण्ड है।
अपने रोगके उपचारके लिए हम कितना पैसा देते हैं? हिन्दुस्तानके रोगको अपना माननेवाले हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई अथवा यहूदी कितने हैं? कितने राजा और रंक हैं? हिन्दुस्तानके भयंकर क्षय रोगके लिए सब कितना देनेको तैयार हैं? यह हम सबकी कसौटी हो रही है। तीस जूनतक प्रत्येक भारतवासीको उत्तर देना है। प्रत्येक काठियावाड़ीको अपने कर्त्तव्यका पालन करना है।
हिन्दुस्तानको क्षय हो गया है। जो लोग यह नहीं मानते और जो यह समझते हैं कि चालू प्रवृत्तिसे इस क्षयका आंशिक रूपसे भी निवारण होनेवाला नहीं है, वे लोग निःसन्देह इस कोषमें दान न दें। लेकिन ऐसे अश्रद्धालु काठियावाड़ी मैंने कम ही देखे हैं। इसलिए मुझे काठियावाड़से बड़ी आशा है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३१६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>२८६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
बढवान और वीरमगाँव के लोगोंने मेरी उम्मीदोंको बढ़ा दिया है। झालावाड़
अपनी गरीबी और कंजूसी के लिए कुख्यात है, इसी झालावाड़ने मुझे आश्चर्यचकित कर
दिया है । अगर अकेला झालावाड़ ही २५,००० रुपयेसे अधिक दे सके तो हालार,
सोरठ और गोहिलवाड़ क्या देंगे ? भावनगर क्या देगा ? भावनगर तो इस समय
काठियावाड़का सबसे बड़ा बन्दरगाह है। उसका व्यापार सबसे बढ़ा चढ़ा है । वहाँकी
प्रजा अपेक्षाकृत सुखी है । उसका हिस्सा कहाँ है ?
--
--
हाँ, झालावाड़की बहनोंसे मुझे कुछ निराशा अवश्य हुई। मुझे बहनें बहुत
ज्यादा दिखाई दीं। लेकिन खेदकी बात है कि समस्त भारत के मेरे अनुभवोंमें बढवानकी
दो सभाओं में उपस्थित बहनोंने मुझे कमसे कम चन्दा दिया। क्या यह सम्भव है कि
इन बहनोंने स्वराज्य धर्मराज्य का नाम ही न सुना हो ? अथवा इसमें पुरुष वर्गका
दोष था ? उन्होंने इस धर्मकार्य के लिए बह्नोंको तनिक भी तैयार नहीं किया ? कुछ भी
हो, काठियावाड़की बहनोंसे मुझे तो बहुत आशा है। उन्हें चरखा पसन्द आया है ।
सैकड़ों गरीब बहनें उससे अपनी आजीविका अर्जित कर रही हैं और भारतमाताकी
सेवा कर रही हैं। क्या अमीर बहनें अपने आभूषण अथवा पैसा नहीं देंगी ?
काठियावाड़ी मुझे बिलकुल अपना मानते हैं । उस प्रेमकी अब कसौटी होनेवाली
है । यदि काठियावाड़का मेरे प्रति विशेष प्रेम होने के बावजूद मैं काठियावाड़को न
समझा सकूँ तो अन्य भारतवासियों को कैसे समझा सकता हूँ ? काठियावाड़ यदि मेरे
सन्देशको समझ गया हो तो मुझे उम्मीद है कि काठियावाड़ के चन्देकी रकम सबसे
अधिक होगी ।
ईश्वर हमारी यह आशा पूरी करे ।
[ गुजरातीसे ]
नवजीवन, २६-६-१९२१
१३३. भाषण : बम्बईको सभामें'
२६ जून, १९२१
महात्मा गांधीने कहा, मैं सान्ता क्रूजके लोगोंका बड़ा आभारी हूँ कि उन्होंने ३०,०००
रुपये से भी अधिक एकत्र किये; हालांकि आपको सिर्फ १५,००० रुपये ही एकत्र करने
थे। मुझे सान्ता क्रूजपर गर्व है, क्योंकि में पहले अक्सर यहाँ ठहरा करता था और
मुझे खुशी है कि सान्ता क्रूजके लोग मुझे अभी भूले नहीं हैं । बम्बई और शेष भारत के
लोगोंने मेरे प्रति जितना ज्यादा प्रेम और विश्वास दिखाया है, लोगोंके प्रति मेरा उत्तर-
दायित्व भी उतना ज्यादा बढ़ गया है, मेरे कन्धोंपर उतना ही बोझ आ पड़ा है।
१. इस सभाका आयोजन तिलक स्वराज्य कोषके निमित्त गांधीजीको एक थैली भेंट करनेके लिए
किया गया था ।
२. यह बात १९०१-२ की है, जब गांधीजी बम्बई में वकालत कर रहे थे ।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{rh|२८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बढवान और वीरमगाँवके लोगोंने मेरी उम्मीदोंको बढ़ा दिया है। झालावाड़ अपनी गरीबी और कंजूसीके लिए कुख्यात है, इसी झालावाड़ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया है। अगर अकेला झालावाड़ ही २५,००० रुपयेसे अधिक दे सके तो हालार, सोरठ और गोहिलवाड़ क्या देंगे? भावनगर क्या देगा? भावनगर तो इस समय काठियावाड़का सबसे बड़ा बन्दरगाह है। उसका व्यापार सबसे बढ़ा-चढ़ा है। वहाँकी प्रजा अपेक्षाकृत सुखी है। उसका हिस्सा कहाँ है?
हाँ, झालावाड़की बहनोंसे मुझे कुछ निराशा अवश्य हुई। मुझे बहनें बहुत ज्यादा दिखाई दीं। लेकिन खेदकी बात है कि समस्त भारतके मेरे अनुभवोंमें बढवानकी दो सभाओंमें उपस्थित बहनोंने मुझे कमसे-कम चन्दा दिया। क्या यह सम्भव है कि इन बहनोंने स्वराज्य—धर्मराज्य—का नाम ही न सुना हो? अथवा इसमें पुरुष-वर्गका दोष था? उन्होंने इस धर्मकार्यके लिए बहनोंकी तनिक भी तैयार नहीं किया? कुछ भी हो, काठियावाड़की बहनोंसे मुझे तो बहुत आशा है। उन्हें चरखा पसन्द आया है। सैकड़ों गरीब बहनें उससे अपनी आजीविका अर्जित कर रही हैं और भारतमाताकी सेवा कर रही हैं। क्या अमीर बहनें अपने आभूषण अथवा पैसा नहीं देंगी?
काठियावाड़ी मुझे बिलकुल अपना मानते हैं। उस प्रेमकी अब कसौटी होनेवाली है। यदि काठियावाड़का मेरे प्रति विशेष प्रेम होनेके बावजूद मैं काठियावाड़को न समझा सकूँ तो अन्य भारतवासियोंको कैसे समझा सकता हूँ? काठियावाड़ यदि मेरे सन्देशको समझ गया हो तो मुझे उम्मीद है कि काठियावाड़के चन्देकी रकम सबसे अधिक होगी।
ईश्वर हमारी यह आशा पूरी करे।
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'''महात्मा गांधीने कहा, मैं सान्ता क्रूजके लोगोंका बड़ा आभारी हूँ कि उन्होंने ३०,००० रुपये से भी अधिक एकत्र किये; हालाँकि आपको सिर्फ १५,००० रुपये ही एकत्र करने थे। मुझे सान्ता क्रूजपर गर्व है, क्योंकि मैं पहले अक्सर यहाँ ठहरा करता था<ref>यह बात १९०१-२ की है, जब गांधीजी बम्बईमें वकालत कर रहे थे।</ref> और
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{rh|२८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बढवान और वीरमगाँवके लोगोंने मेरी उम्मीदोंको बढ़ा दिया है। झालावाड़ अपनी गरीबी और कंजूसीके लिए कुख्यात है, इसी झालावाड़ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया है। अगर अकेला झालावाड़ ही २५,००० रुपयेसे अधिक दे सके तो हालार, सोरठ और गोहिलवाड़ क्या देंगे? भावनगर क्या देगा? भावनगर तो इस समय काठियावाड़का सबसे बड़ा बन्दरगाह है। उसका व्यापार सबसे बढ़ा-चढ़ा है। वहाँकी प्रजा अपेक्षाकृत सुखी है। उसका हिस्सा कहाँ है?
हाँ, झालावाड़की बहनोंसे मुझे कुछ निराशा अवश्य हुई। मुझे बहनें बहुत ज्यादा दिखाई दीं। लेकिन खेदकी बात है कि समस्त भारतके मेरे अनुभवोंमें बढवानकी दो सभाओंमें उपस्थित बहनोंने मुझे कमसे-कम चन्दा दिया। क्या यह सम्भव है कि इन बहनोंने स्वराज्य—धर्मराज्य—का नाम ही न सुना हो? अथवा इसमें पुरुष-वर्गका दोष था? उन्होंने इस धर्मकार्यके लिए बहनोंकी तनिक भी तैयार नहीं किया? कुछ भी हो, काठियावाड़की बहनोंसे मुझे तो बहुत आशा है। उन्हें चरखा पसन्द आया है। सैकड़ों गरीब बहनें उससे अपनी आजीविका अर्जित कर रही हैं और भारतमाताकी सेवा कर रही हैं। क्या अमीर बहनें अपने आभूषण अथवा पैसा नहीं देंगी?
काठियावाड़ी मुझे बिलकुल अपना मानते हैं। उस प्रेमकी अब कसौटी होनेवाली है। यदि काठियावाड़का मेरे प्रति विशेष प्रेम होनेके बावजूद मैं काठियावाड़को न समझा सकूँ तो अन्य भारतवासियोंको कैसे समझा सकता हूँ? काठियावाड़ यदि मेरे सन्देशको समझ गया हो तो मुझे उम्मीद है कि काठियावाड़के चन्देकी रकम सबसे अधिक होगी।
ईश्वर हमारी यह आशा पूरी करे।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन''', २६-६-१९२१|1em}}
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'''महात्मा गांधीने कहा, मैं सान्ता क्रूजके लोगोंका बड़ा आभारी हूँ कि उन्होंने ३०,००० रुपये से भी अधिक एकत्र किये; हालाँकि आपको सिर्फ १५,००० रुपये ही एकत्र करने थे। मुझे सान्ता क्रूजपर गर्व है, क्योंकि मैं पहले अक्सर यहाँ ठहरा करता था<ref>यह बात १९०१-२ की है, जब गांधीजी बम्बईमें वकालत कर रहे थे।</ref> और मुझे खुशी है कि सान्ता क्रूजके लोग मुझे अभी भूले नहीं हैं। बम्बई और शेष भारतके लोगोंने मेरे प्रति जितना ज्यादा प्रेम और विश्वास दिखाया है, लोगोंके प्रति मेरा उत्तरदायित्व भी उतना ज्यादा बढ़ गया है, मेरे कन्धोंपर उतना ही बोझ आ पड़ा है।'''<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३१७
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2026-08-18T04:12:22Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईकी सभामें|२८७}}</noinclude>'''क्या जाने वर्षके अन्ततक इस सबका क्या परिणाम होता है? आपके प्रयत्नोंका चाहे जो भी परिणाम निकले, मुझे विश्वास है कि आपके ये प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जायेंगे और आपको इससे बहुत ज्यादा लाभ होगा। तथापि मेरा अन्तर्तम मुझे इस बातका पूरा यकीन दिलाता है कि आपको इस वर्षके अन्ततक स्वराज्य मिल जायेगा। सान्ता क्रूजकी स्त्रियों और बच्चोंको यह नहीं समझना चाहिए कि सिर्फ उन्होंने ही इस महान् उद्देश्यके लिए बहुत काम किया है; आपको याद रखना चाहिए कि समस्त भारतके बच्चों और स्त्रियोंने भी यही किया है। समस्त भारतके पुरुषों, स्त्रियों और बच्चोंने तथा गरीब लोगोंने भी स्वराज्य-कोषमें अपना हिस्सा दिया है। मेरे ख्यालसे, गरीबोंने जो-कुछ दिया है उसकी तुलनामें, अमीर लोगोंने अपना पूरा हिस्सा नहीं दिया। तुलनात्मक दृष्टिसे, गरीबोंने अमीरोंसे ज्यादा दिया है और उन्होंने देशके प्रति अपने कर्त्तव्यको निभाया है। बोहरों, पारसियों और ईसाइयोंने भी ऐसा ही किया है। पारसी समाजके प्रति मेरे मनमें कोई शंका नहीं रही है। उनकी आबादी तथा उन्होंने जो दिया है उसको देखते हुए मैं कहूँगा कि उन्होंने अपने हिस्सेसे—इस देशके अन्य सभी समुदायोंके लोगोंसे—ज्यादा काम किया है। और आज इस समय भी मुझे विश्वास है कि अन्य लोगोंकी अपेक्षा पारसियोंसे अधिक पैसा मिलेगा। अगर मुझे आज नहीं मिला तो कल अवश्य मिलेगा। मुझे यकीन है कि पारसी हमारे साथ हैं, हमारे विरुद्ध नहीं; और वे अपने-आपको भारतके अन्य समुदायोंसे अलहदा नहीं रखेंगे।
हमें स्वराज्य अन्य लोग नहीं देंगे, इसे तो हमें स्वयं ही प्राप्त करना होगा। मैं अपने मित्रोंसे कहूँगा कि जबतक वे खिलाफतके प्रश्नका हल नहीं ढूँढ लेते और पंजाबमें किये गये अत्याचारोंके विरुद्ध न्याय प्राप्त नहीं कर लेते तबतक वे स्वराज्य प्राप्त नहीं कर सकते। ये दोनों बातें स्वराज्यसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इन्हें हमें अपने कार्यक्रममें सबसे प्रमुख स्थान देना है। हमारे शासक हमें और चाहे जो भी रियायतें दें, हम उनसे कभी सन्तुष्ट नहीं होंगे। ये दो चीजें हमारे समाज-तन्त्रमें जहरके समान हैं और हमें इस जहरको निकाल बाहर करना है। जबतक लोगोंको यह महसूस न हो जाये कि उन्हें स्वराज्य मिल गया है तबतक यह कैसे कहा जा सकता है कि उन्होंने उसे पा लिया है? जब आपमें से अमीर-गरीब, ऊँच-नीच सभी लोग अपने भीतर स्वराज्यका अनुभव करने लगेंगे तब निश्चय ही स्वराज्य मिल जायेगा। मैं अभी आपको स्वराज्यकी कोई परिभाषा नहीं दूँगा। लेकिन अगर अक्तूबर अथवा दिसम्बरके अन्ततक सारा भारत यह कहेगा कि उसे कुछ भी नहीं मिला है तो मैं भी उसके साथ यही कहूँगा। जिस चीजका एहसास अथवा अनुभव आप खुद नहीं कर सकते, जिसे आप खुद पहचान नहीं सकते उसका अनुभव या एहसास आपको मैं नहीं करवा सकता और न उसे पहचानना ही सिखा सकता हूँ। आप यह न सोचें कि चूँकि आप लोगोंने एक करोड़ रुपया इकट्ठा कर लिया है इसलिए स्वराज्य अब आपके हाथोंमें ही है। यह'''<noinclude></noinclude>
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2026-08-18T04:12:44Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||भाषण : बम्बईकी सभामें|२८७}}</noinclude>'''क्या जाने वर्षके अन्ततक इस सबका क्या परिणाम होता है? आपके प्रयत्नोंका चाहे जो भी परिणाम निकले, मुझे विश्वास है कि आपके ये प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जायेंगे और आपको इससे बहुत ज्यादा लाभ होगा। तथापि मेरा अन्तर्तम मुझे इस बातका पूरा यकीन दिलाता है कि आपको इस वर्षके अन्ततक स्वराज्य मिल जायेगा। सान्ता क्रूजकी स्त्रियों और बच्चोंको यह नहीं समझना चाहिए कि सिर्फ उन्होंने ही इस महान् उद्देश्यके लिए बहुत काम किया है; आपको याद रखना चाहिए कि समस्त भारतके बच्चों और स्त्रियोंने भी यही किया है। समस्त भारतके पुरुषों, स्त्रियों और बच्चोंने तथा गरीब लोगोंने भी स्वराज्य-कोषमें अपना हिस्सा दिया है। मेरे ख्यालसे, गरीबोंने जो-कुछ दिया है उसकी तुलनामें, अमीर लोगोंने अपना पूरा हिस्सा नहीं दिया। तुलनात्मक दृष्टिसे, गरीबोंने अमीरोंसे ज्यादा दिया है और उन्होंने देशके प्रति अपने कर्त्तव्यको निभाया है। बोहरों, पारसियों और ईसाइयोंने भी ऐसा ही किया है। पारसी समाजके प्रति मेरे मनमें कोई शंका नहीं रही है। उनकी आबादी तथा उन्होंने जो दिया है उसको देखते हुए मैं कहूँगा कि उन्होंने अपने हिस्सेसे—इस देशके अन्य सभी समुदायोंके लोगोंसे—ज्यादा काम किया है। और आज इस समय भी मुझे विश्वास है कि अन्य लोगोंकी अपेक्षा पारसियोंसे अधिक पैसा मिलेगा। अगर मुझे आज नहीं मिला तो कल अवश्य मिलेगा। मुझे यकीन है कि पारसी हमारे साथ हैं, हमारे विरुद्ध नहीं; और वे अपने-आपको भारतके अन्य समुदायोंसे अलहदा नहीं रखेंगे।'''
'''हमें स्वराज्य अन्य लोग नहीं देंगे, इसे तो हमें स्वयं ही प्राप्त करना होगा। मैं अपने मित्रोंसे कहूँगा कि जबतक वे खिलाफतके प्रश्नका हल नहीं ढूँढ लेते और पंजाबमें किये गये अत्याचारोंके विरुद्ध न्याय प्राप्त नहीं कर लेते तबतक वे स्वराज्य प्राप्त नहीं कर सकते। ये दोनों बातें स्वराज्यसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इन्हें हमें अपने कार्यक्रममें सबसे प्रमुख स्थान देना है। हमारे शासक हमें और चाहे जो भी रियायतें दें, हम उनसे कभी सन्तुष्ट नहीं होंगे। ये दो चीजें हमारे समाज-तन्त्रमें जहरके समान हैं और हमें इस जहरको निकाल बाहर करना है। जबतक लोगोंको यह महसूस न हो जाये कि उन्हें स्वराज्य मिल गया है तबतक यह कैसे कहा जा सकता है कि उन्होंने उसे पा लिया है? जब आपमें से अमीर-गरीब, ऊँच-नीच सभी लोग अपने भीतर स्वराज्यका अनुभव करने लगेंगे तब निश्चय ही स्वराज्य मिल जायेगा। मैं अभी आपको स्वराज्यकी कोई परिभाषा नहीं दूँगा। लेकिन अगर अक्तूबर अथवा दिसम्बरके अन्ततक सारा भारत यह कहेगा कि उसे कुछ भी नहीं मिला है तो मैं भी उसके साथ यही कहूँगा। जिस चीजका एहसास अथवा अनुभव आप खुद नहीं कर सकते, जिसे आप खुद पहचान नहीं सकते उसका अनुभव या एहसास आपको मैं नहीं करवा सकता और न उसे पहचानना ही सिखा सकता हूँ। आप यह न सोचें कि चूँकि आप लोगोंने एक करोड़ रुपया इकट्ठा कर लिया है इसलिए स्वराज्य अब आपके हाथोंमें ही है। यह'''<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>२८८
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
तो हमारे युद्धका साधन मात्र है और इस बातका सूचक है कि लोग इस वर्षके
अन्ततक स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं ।
मैं नहीं समझता कि सान्ता क्रूजके निवासियोंने जो कुछ दिया है, वह उनकी
शक्ति से बाहर था। जब मैंने एक करोड़ रुपया इकट्ठा करनेका कार्य हाथमें लिया था
तब मुझे बम्बईपर बहुत भरोसा था। मुझे विश्वास था कि अगर देशके अन्य भागोंके
लोग अपना कर्त्तव्य न भी निभा पायें तो बम्बईके लोग तो मुझे वह रकम दे ही
वेंगे। में नहीं समझता कि सान्ता क्रूजके स्त्रियों और बच्चोंने अपना उचित हिस्सा वे
दिया है। आपको इन चीजोंके बारेमें बनियेकी भावनासे नहीं सोचना चाहिए हालाँकि
मैं स्वयं बनिया हूँ । (हँसी) घरोंमें स्त्रियोंकी बहुत चलती है और वे बिना किसी
विघ्न-बाधाके जितना धन देना चाहें, दे सकती हैं। में आपसे पूछना चाहता हूँ कि
क्या आपने अपनी सारी सम्पत्तिका ढाई प्रतिशत दिया है, अगर आप चाहतीं तो
मुझे निश्चय ही साठ लाख बड़ी आसानीसे दे सकती थीं। अगले चार दिनोंमें आपको
इस घाटको पूरा करना है, आपको इन बातोंके सम्बन्धमें बनियेवाली भावनासे नहीं
सोचना चाहिए; आपको देशके प्रति अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिए। श्री जे०
के० मेहताने मुझे, स्पष्ट ही, अभिमानपूर्वक बताया कि सान्ता क्रूजमें चालीस चरखे
चलते हैं, जब कि में यहाँ चार सौ से भी ज्यादा स्त्रियोंको देख रहा हूँ और मुझे
आश्चर्य होता है कि ये सब भी चरखा क्यों नहीं चलातीं ।
इसके बाद श्री गांधी भारत-भूमिसे गरीबीको दूर करनेके लिए चरखेके इस्तेमाल-
के सम्बन्धमें कुछ विस्तारसे बोले । उन्होंने कहा कि गरीब और अमीर, दोनों ही
वर्गीकी स्त्रियोंको चरखा चलाना चाहिए और में उन स्त्रियोंका आशीर्वाद पाना चाहता
हूँ जो अपने हाथके कते सुतसे बुना खद्दर पहनती हैं। मुझे विश्वास है कि में जिस
उद्देश्यको अपने सामने रखकर चला हूँ, उस उद्देश्यको उनके आशीर्वाद से अवश्य पूरा
करूँगा । स्वराज्यके लिए, जिसे सब प्राप्त करना चाहते हैं, तीन महीने बहुत ज्यादा
हैं -- यह अवधि लम्बी है। हम समस्त भारतकी मनोवृत्तिको पूर्णतया परिवर्तित करके
स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं। आप लोगोंने जो कुछ किया उतनेसे ही सन्तुष्ट होकर
न बैठ जायें बल्कि मुझे और अधिक पैसा देनेके लिए आपसे जितना बन पड़े, कीजिए ।
बम्बईका यह कर्तव्य है कि वह मुझे ज्यादा धन दे, क्योंकि बम्बईके रास्ते ही सारे
भारतमें, प्रत्येक शहर और गाँवमें, विदेशी कपड़े पहुँचते हैं। में चाहता हूँ कि बम्बई
साठ लाख रुपयेकी इस कमीको पूरा करके अपने इस पापका प्रायश्चित्त करे। आप
जानते हैं कि जहाँ सत्य है वहाँ विजय है ।
सान्ता क्रूजके लोगोंकी इस शिकायत के बारेमें कि वे अपनी समितिको बम्बई प्रान्तीय
समितिके साथ मिलाना चाहते हैं, श्री गांधीने कहा कि अगर आप बम्बईके साथ
मिलना चाहते हैं तो आपको इससे कोई भी अलग नहीं रख सकता। अगर आप
ऐसा चाहते हैं तो आपने जो पैसा इकट्ठा किया है वह या तो महाराष्ट्र समितिको
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|२८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''तो हमारे युद्धका साधन-मात्र है और इस बातका सूचक है कि लोग इस वर्षके अन्ततक स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं।'''
'''मैं नहीं समझता कि सान्ता क्रूजके निवासियोंने जो-कुछ दिया है, वह उनकी शक्तिसे बाहर था। जब मैंने एक करोड़ रुपया इकट्ठा करनेका कार्य हाथमें लिया था तब मुझे बम्बईपर बहुत भरोसा था। मुझे विश्वास था कि अगर देशके अन्य भागोंके लोग अपना कर्त्तव्य न भी निभा पायें तो बम्बईके लोग तो मुझे वह रकम दे ही देंगे। मैं नहीं समझता कि सान्ता क्रूजके स्त्रियों और बच्चोंने अपना उचित हिस्सा वे दिया है। आपको इन चीजोंके बारेमें बनियेकी भावनासे नहीं सोचना चाहिए हालाँकि मैं स्वयं बनिया हूँ। (हँसी) घरोंमें स्त्रियोंकी बहुत चलती है और वे बिना-किसी विघ्न-बाधाके जितना धन देना चाहें, दे सकती हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या आपने अपनी सारी सम्पत्तिका ढाई प्रतिशत दिया है, अगर आप चाहतीं तो मुझे निश्चय ही साठ लाख बड़ी आसानीसे दे सकती थीं। अगले चार दिनोंमें आपको इस घाटेको पूरा करना है, आपको इन बातोंके सम्बन्धमें बनियेवाली भावनासे नहीं सोचना चाहिए; आपको देशके प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन करना चाहिए। श्री जे॰ के॰ मेहताने मुझे, स्पष्ट ही, अभिमानपूर्वक बताया कि सान्ता क्रूजमें चालीस चरखे चलते हैं, जब कि मैं यहाँ चार सौ से भी ज्यादा स्त्रियोंको देख रहा हूँ और मुझे आश्चर्य होता है कि ये सब भी चरखा क्यों नहीं चलातीं।'''
'''इसके बाद श्री गांधी भारत-भूमिसे गरीबीको दूर करनेके लिए चरखेके इस्तेमालके सम्बन्धमें कुछ विस्तारसे बोले। उन्होंने कहा कि गरीब और अमीर, दोनों ही वर्गोंकी स्त्रियोंको चरखा चलाना चाहिए और मैं उन स्त्रियोंका आशीर्वाद पाना चाहता हूँ जो अपने हाथके कते सुतसे बुना खद्दर पहनती हैं। मुझे विश्वास है कि मैं जिस उद्देश्यको अपने सामने रखकर चला हूँ, उस उद्देश्यको उनके आशीर्वाद से अवश्य पूरा करूँगा। स्वराज्यके लिए, जिसे सब प्राप्त करना चाहते हैं, तीन महीने बहुत ज्यादा हैं—यह अवधि लम्बी है। हम समस्त भारतकी मनोवृत्तिको पूर्णतया परिवर्तित करके स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं। आप लोगोंने जो-कुछ किया उतनेसे ही सन्तुष्ट होकर न बैठ जायें बल्कि मुझे और अधिक पैसा देनेके लिए आपसे जितना बन पड़े, कीजिए। बम्बईका यह कर्त्तव्य है कि वह मुझे ज्यादा धन दे, क्योंकि बम्बईके रास्ते ही सारे भारतमें, प्रत्येक शहर और गाँवमें, विदेशी कपड़े पहुँचते हैं। मैं चाहता हूँ कि बम्बई साठ लाख रुपयेकी इस कमीको पूरा करके अपने इस पापका प्रायश्चित्त करे। आप जानते हैं कि जहाँ सत्य है वहाँ विजय है।'''
'''सान्ता क्रूजके लोगोंकी इस शिकायतके बारेमें कि वे अपनी समितिको बम्बई प्रान्तीय समितिके साथ मिलाना चाहते हैं, श्री गांधीने कहा कि अगर आप बम्बईके साथ मिलना चाहते हैं तो आपको इससे कोई भी अलग नहीं रख सकता। अगर आप ऐसा चाहते हैं तो आपने जो पैसा इकट्ठा किया है वह या तो महाराष्ट्र समितिको'''<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१३४. तार : मदनमोहन मालवीयको'''}}}}
{{Right|बम्बई<br>२८ जून, १९२१}}
{{Left|पण्डित मदनमोहन मालवीय<br>शिमला}}
सरकारसे क्षमा<ref>देखिए "टिप्पणियाँ", १५-६-१९२१ और २९-६-१९२१।</ref>माँगनेका मंशा तो था ही नहीं। यदि होता तो मैं स्पष्टतः वैसा कहता। भेंटका (दोनों पक्षों द्वारा) स्वीकृत विवरण प्रकाशित करने या गोपनीयतासे मुझे बरी किये जानेके लिए मैंने पिछले सप्ताह वाइसरायको पत्र लिखा था।
{{Left|[अंग्रेजीसे]|1em}}
'''बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स''', १९२१
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१३५. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''अधिकारी तथा कर्मचारी'''}}
वाइसराय द्वारा अहमदिया जमातको दिये गये उत्तरसे यह स्पष्ट है कि वे नौकरशाहीके हाथमें खेल गये हैं। नौकरशाही बहुत चालाक, संगठित तथा पूर्णतः सिद्धान्तहीन होती है। उन्होंने अधिकारियों तथा कर्मचारियोंका जिस तरह बचाव किया है, उससे जातीय समानताके अर्थका पता चल जाता है। यूरोपीय लोग भारतीयोंपर निःशंक होकर जुल्म करते हैं और करते रहें, इसमें वाइसरायको कोई असमानता नजर नहीं आती। मुझे पंजाबके एक मजिस्ट्रेट द्वारा दिये गये एक विलक्षण फैसलेकी याद आ रही है। उसने एक आयरिश सैनिक द्वारा एक निरीह भारतीय महिलाके साथ छेड़खानी किये जाने के मामलेमें अपनी कल्पना-बुद्धिका सहारा लेकर कुछ ऐसे कारण खोज निकाले जिनसे अपराध अपेक्षाकृत कम लगने लगे और फिर उसने उसपर केवल पचास रुपया जुर्माना करके यह समझ लिया कि न्यायकी माँग पूरी हो गई।
परमश्रेष्ठ दैनिक पत्रोंको पढ़नेका कष्ट नहीं उठाते; वे यूरोपीयों द्वारा भारतीयोंको अपमानित किये जानेके समाचारोंसे भरे रहते हैं। वे इस तथ्यसे अनभिज्ञ मालूम होते हैं कि ब्रिटिश अधिकारी रेलमें अपने डिब्बेमें भारतीय न्यायाधीशों-तक की उपस्थिति गवारा नहीं करते। वाइसराय कहते हैं, "मुझे पूरा विश्वास है कि इस कथनमें जरा भी सत्यता नहीं है कि ब्रिटिश अधिकारी जिन भारतीयोंके सम्पर्कमें आते<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३२१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|२९१}}</noinclude>हैं, उन्हें जातीय बड़प्पन जताना चाहते हैं।" मैं लॉर्ड रीडिंगको यह बता देना चाहता हूँ कि उनका यह कथन औसत भारतीयके प्रतिदिनके अनुभवसे इतना भिन्न है कि इससे लोगोंके मनमें उनकी निर्णयबुद्धि तथा उनके उद्देश्यकी ईमानदारी-तक के प्रति सन्देह उत्पन्न हो जाना अवश्यम्भावी है। वे अपने कर्मचारियों तथा अधिकारियोंको आचरणके जो प्रमाणपत्र देंगे, उनमें भी लोगोंको यही लगेगा कि वे जान-बूझकर सत्यकी ओरसे आँखें फेर रहे हैं और न्याय नहीं करना चाहते। लोग इस बातमें शककी गुंजाइश भी नहीं मानेंगे और यही समझेंगे, जैसा कि मैं समझता हूँ, कि वाइसराय स्वेच्छासे अपनी आँखें बन्द नहीं किये हैं बल्कि उन्हें सिवा उन चीजोंके, जो नौकरशाही उन्हें दिखानेको तैयार है, और कोई चीज देखने ही नहीं दी जाती।
{{C|'''पाँच सौवीं मंजिलसे'''}}
तथ्य यह है कि किसी भी वाइसरायके लिए सत्यको देख पाना असम्भव है, क्योंकि सालमें सात महीने वह पहाड़की चोटियोंपर रहता है, और जब वह मैदानमें रहता है तब भी पूर्णतः अलग-सा रहता है। जरा बम्बईके एक ऐसे व्यापारीकी कल्पना कीजिए जो सबसे ऊपरवाली मंजिलसे व्यवसाय-संचालन करता है, और जो अपने क्लर्कों तथा सेल्समैनोंसे केवल लिफ्टों एवं फोनोंके जरिये उनसे सम्बन्ध रखता है। बम्बईके लोग इस स्थितिसे सन्तुष्ट नहीं हैं; हालाँकि वहाँ सबसे ऊपर और सबसे नीचेकी मंजिलोंके बीच कमसे-कम अनेक मंजिलोंकी ऐसी श्रृंखला तो है, जिनमें लोग रहते हैं। पर शिमलेमें जो एक बड़ा व्यापार-भवन है उसके तथा मैदानमें रहनेवाले कराहते हुए करोड़ों लोगोंके बीच तो ठोस निर्जीव चट्टान है; और उन अशक्त लोगोंका चीत्कार भी, जब वह मैदानसे उठकर पहाड़की चोटीतक पहुँचता है, तो शून्यमें विलीन हो जाता है। राजकुमार सिद्धार्थको दुनियासे इतना अलग रखा गया कि उन्हें मालूम ही नहीं हो पाया कि दुःख, अभाव तथा मृत्यु क्या चीजें हैं। वे एक ईमानदार नवयुवक थे। पर यदि एक घटना न घटी होती तो संसारको उनका नाम भी मालूम न होने पाता। वे अपनी जनतासे अधिक दूर नहीं रहते थे, और उनका जीवन भी
वैसा ही था जैसा उनके पिताकी प्रजाका। सिद्धार्थ जनतासे मुश्किलसे तीस फुटकी ऊँचाईपर रहते थे, जब कि वाइसराय साढ़े सात हजार फुटकी ऊँचाईपर<ref>तात्पर्य समुद्रकी सतहसे शिमलेकी ऊँचाईसे है।</ref> रहते हैं। फिर वाइसराय जनताकी आशाओं तथा आशंकाओंको नहीं समझ पाते इसमें उनका दोष नहीं है। उन्होंने यदि स्वेच्छासे अपनेको जनतासे विच्छिन्न रखा हो तो बात अलग है। जबतक वे शारीरिक एवं मानसिक रूपसे शिमला-वास करते रहेंगे तबतक उन्हें सत्यसे अनभिज्ञ रखा जायेगा जैसे कि सिद्धार्थको रखा गया था। पर एक घटना तो उनकी भी आँखोंके सामने उपस्थित है; जैसी उस सुप्रसिद्ध युवक राजकुमारके लिए थी जिसकी विश्व आज बुद्धके रूपमें पूजा करता है। वह घटना है असहयोग। और यदि लॉर्ड रीडिंगकी आँखें तथा कान खुले हैं तो वे शीघ्र ही सत्यको देख-सुन सकते हैं।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३२२
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|२९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{C|'''सावरकर बन्धु'''}}
'कैपिटल' के 'डिचर' ने इन बहादुर भाइयोंपर कीचड़ उछाला है। उनमें से एकपर उसने यह आरोप लगाया है कि उन्होंने कारावास-कालमें बेतारके तारका दुरुपयोग किया और शत्रुके साथ मिलकर षड्यन्त्र रचा। उसने सारी बातका ऐसे विस्तारके साथ वर्णन किया है मानो अधिकारियोंने उसे उस अंशको लिखनेके लिए विशेषरूप से प्रेरित किया हो। यदि आरोप सही है तो सरकारको चाहिए कि वह तथ्योंको प्रकाशित करे। वह जिस रूपमें पेश किया गया है उससे जान पड़ता है मानो आरोप सच्चा है और अवश्य ही इससे जनताकी निगाहमें दोनों बन्धुओंकी प्रतिष्ठाकी हानि हुई होगी। मैं समझता हूँ कि वे असहयोगी नहीं हैं। उनका दावा है कि वे बिलकुल निर्दोष हैं तथा उनके पास सम्बन्धित समाचारपत्रके विरुद्ध कारवाई करनेका स्पष्ट आधार भी है। बहरहाल जो भी हो, डा॰ सावरकरने मुझे सूचित किया है कि ऐसी सजाओंमें आम तौरसे जितने दिनोंकी माफी दी जाती है, अगर उन्हें भी गिना जाये तो उन दोनों भाइयोंमें से श्री गणेश सावरकर तो चौदह साल दो मासकी सजा भुगत चुके हैं; अतः कानूनन उन्हें रिहाईका अधिकार प्राप्त है। भारतीय दण्ड संहिताका खण्ड ५५ इस प्रकार है :
:{{gap}}'''ऐसे हर मामलेमें जिसमें आजीवन कालेपानीकी सजा दी जाती है, भारत सरकार अथवा उस स्थानकी सरकार जिसकी सीमामें उक्त दण्ड दिया गया हो, दोनोंमें से हर तरहके अभियुक्तकी सहमतिके बिना उसकी सजा घटाकर चौदह वर्ष कर सकती है।'''
इस धाराके अन्तर्गत यह स्पष्ट है कि श्री गणेश दामोदर सावरकरको दो मास पूर्व ही रिहा हो जाना चाहिए था। चूँकि दोनों भाई अंडमानसे हटा दिये गये हैं, अतः जिस खण्डको मैंने उद्धृत किया है वह उनके पक्षमें लागू किया जाना चाहिए, और उन्हें चौदह सालसे अधिक समयतक बन्दी नहीं रखा जाना चाहिए। सजामें से जितनी अवधि माफ की जा चुकी है उसे चौदह सालमें से घटना चाहिए। इस तरहका उदाहरण, जो एक स्नेही भाईकी लगन तथा परिश्रमके कारण प्रकाशमें आया है, अपने ढंगका अकेला नहीं है। संसारको यह कभी विदित ही नहीं हो पायेगा कि इस प्रकार कानूनके नामपर कितने गैरकानूनी काम किये गये हैं। मेरा मन यह स्वीकार करनेको नहीं होता कि श्री सावरकरको जान-बूझकर कैदमें रखा जा रहा है और इसके पीछे दुष्टताका भाव है। किन्तु पीड़ित व्यक्तिको तो इससे कोई सान्त्वना नहीं मिल सकती।
{{C|'''स्वतन्त्रताका प्रवेश-द्वार'''}}
अभीतक और तो और प्रगतिशील-वर्गोंमें भी ऐसे लोग हैं जो भारतकी स्वतन्त्रता-प्राप्तिके लिए जेल जानेकी उपयोगितापर सन्देह करते हैं। उनका खयाल है कि जेल चले जानेसे जनता वीर पुरुषोंकी सेवाओंसे वंचित हो जाती है। यह तो वैसा ही है जैसे यह कहना कि सबसे बहादुर सैनिकोंको कभी कोई जोखिम उठानी ही नहीं चाहिए।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|२९३}}</noinclude>क्योंकि इससे जिस उद्देश्यका वे पृष्ठपोषण करते हैं, उसका नेतृत्व करनेवालों के अभावका खतरा पैदा हो जायेगा। ऐसे संशयवादी यह भूल जाते हैं कि लोकमान्यकी महान् लोकप्रियता तथा प्रभावका कारण उनका जेल जाकर सजा भुगतना ही था। सूलीपर मृत्यु ईसाकी सबसे शानदार उपलब्धि थी। करबलाके मैदानमें इमाम हसनके बलिदानने इस्लामको विश्वमें एक शक्ति बना दिया। हरिश्चन्द्रको अनन्त दुःख उठानेके कारण स्मरण किया जाता है। भारत तबतक स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं कर सकता जबतक कि लाखों लोग भयका त्याग नहीं कर देते, और बिना किसी अपराधके स्वेच्छासे जेल जानेको तैयार नहीं हो जाते। यदि लाखों नहीं तैयार होते तो कमसे-कम हजारोंको तो स्वतन्त्रता पानेके लिए वास्तवमें जेल जाना ही चाहिए। असहयोगका ध्येय राष्ट्रके सच्चे शौर्यको जाग्रत करना है। यदि हमें स्वतन्त्र होना है तो मरते दमतक कष्टोंका मुकाबला करनेके लिए तैयार रहना चाहिए। जो अपनेको बचायेगा उसका अवश्य नाश होना है।
{{C|'''क्या हम अपनी सफाई दें?'''}}
यदि यह सत्य है कि इस सरकारकी इच्छाका न्यायोचित विरोध करनेके लिए हमें भारतकी जेलोंको भर देना चाहिए तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हम किसी ब्रिटिश कानूनी अदालतके समक्ष अपनी सफाई नहीं दे सकते; और वकील नियुक्त करनेका तो सवाल ही नहीं उठता। मैं जानता हूँ कि जटिल मुकदमे भी हो सकते हैं, जैसे सावरकर बन्धुओंका मुकदमा। यदि मुझे यह मालूम हो कि वे असहयोगी हैं, और असहयोगमें विश्वास करते हैं तो मुझे उन्हें यह सलाह देनेमें जरा भी हिचक न होगी कि चाहे उनका पक्ष पूरी तरहसे सही भी हो, फिर भी उन्हें जिन लोगोंने उनपर अत्याचार किया उनके विरुद्ध क्षतिपूर्तिके लिए कोई भी कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। यद्यपि ऐसे मुकदमोंमें सफाई न देनेका मुख्य कारण ब्रिटिश अदालतोंका बहिष्कार करनेसे सम्बन्धित प्रस्ताव ही होगा, तथापि कष्टसहनकी दृष्टिसे भी वह उतना ही आवश्यक है।
{{C|'''फिर अली बन्धुओंकी सफाईके बारेमें'''}}
शिमलामें वाइसराय महोदयसे मेरी भेंट तथा अली बन्धुओंकी सफाईने जितना समय नष्ट किया है, उतना किसी और चीजने नहीं। मेरे सामने जो बहुत-से पत्र हैं, उनमें से केवल एकके बारेमें मैं यहाँ जिक्र करना चाहता हूँ। एक सम्मानित मित्र,<ref>स्पष्टतः तात्पर्य पण्डित मदनमोहन मालवीयसे है; देखिए पिछला शीर्षक।</ref> जिन्हें ईमानदारी तथा सच्चे व्यवहारसे सम्बन्धित मेरी ख्यातिका बड़ा ख्याल है, लिखते हैं कि शिमलामें यह चर्चा हो रही है कि मैंने वाइसरायके साथ अन्याय किया है, उनपर लगभग वादाखिलाफीका आरोप लगाया है, और यह कहकर कि सफाई नहीं दी गई है, सम्भवतः मैं अनजाने ही सत्यसे डिग गया हूँ। मैं आज भी कहता हूँ कि सफाई सरकारको नहीं दी गई है। यदि ऐसी बात होती तो उसकी शब्दावलीमें ही इस बातको स्पष्ट कर देनेमें मैं कभी न हिचकता। उसे अस्पष्ट रखना मेरा उद्देश्य नहीं था।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३२४
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|२९४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>अली बन्धुओंकी नाक रखनेके लिए किसी बातको छिपानेकी कोई जरूरत नहीं थी। सबसे पहले मैं प्रत्येक व्यक्तिको, जिसमें परमश्रेष्ठ वाइसराय भी शामिल है, यह विश्वास दिला देना चाहता हूँ कि यदि मैं कभी सत्यसे बाल-भर भी डिग गया तो मैं उनसे तथा विश्वसे अवश्य क्षमा-याचना करूँगा। सत्यको मैं अपने प्रभावके मुकाबले, चाहे वह मेरे देशमें हो अथवा किसी और जगह, अधिक महत्त्व देता हूँ। मैंने लॉर्ड रीडिंगपर वादाखिलाफीका आरोप लगाया हो यह मुझे स्मरण नहीं है। तीव्र गतिसे होनेवाली बातचीत मानसिक चलचित्रके समान होती है। मस्तिष्क शब्द-रूपी चित्रोंको, जितनी तेजीसे वे आते हैं, ग्रहण करता जाता है, पर उसे वह पूरेका-पूरा अर्थात् ठीक उसी क्रममें स्मृतिमें नहीं रख पाता। हो सकता है कि विभिन्न मुलाकातोंकी हम दोनोंके मनपर अलग-अलग छाप पड़ी हो। मेरे मनपर जो छाप पड़ी उसे तो मैंने अधिकसे-अधिक सही रूपमें प्रस्तुत कर दिया है, और गोपनीयताका यथासम्भव उल्लंघन किये बिना किया है। पर यह मैं बिलकुल स्पष्ट देख रहा हूँ कि जनताके सामने चित्र बिलकुल धुँधला है। वह मुलाकातोंके पर्याप्त पूर्ण विवरणके बिना सन्तुष्ट नहीं हो सकती। मैं उसकी जिज्ञासा पूरी करनेके लिए उत्सुक हूँ। इस उद्देश्यसे मैंने परमश्रेष्ठ वाइसराय महोदयके साथ पत्रव्यवहार भी शुरू कर दिया है और उनसे कहा है कि या तो हम दोनोंकी सहमतिसे एक विवरण प्रकाशित किया जाये अथवा मुझे उसे गोपनीय रखनेके दायित्वसे मुक्त कर दिया जाये। जहाँतक मेरा सम्बन्ध है, मेरी कोई बात ऐसी नहीं है जिसे गोपनीय रखनेकी जरूरत हो। पर मैं यह स्वीकार करता हूँ कि बाइसरायकी स्थिति मुझ जैसे सार्वजनिक कार्यकर्त्तासे बहुत भिन्न है। मैं उन लोगोंसे, जो पूरी बात जाननेको उत्सुक हैं, थोड़ा सब्र रखनेको कहूँगा। इस बीच मुझसे जो एक गम्भीर भूल हुई दिखाई देती है, मैं उसे स्वीकार करना चाहता हूँ। जो विज्ञप्ति प्रकाशित की जानेवाली थी, मुझे कहना चाहिए था कि वह मुझे दिखा दी जाये। पर मैं पुनः शिमला जाकर अपनी यात्रामें और विघ्न नहीं डालना चाहता था, और मुझे इस बातका पूरा विश्वास था कि पूरी बात अच्छे ढंगसे तथा दोनों पक्षोंके लिए सम्मानजनक रूपसे सम्पन्न हो जायेगी। मुझे तो बिना किसी दुर्भावनाके भी गलतफहमियाँ और उससे भी बुरी बातें होनेका इतना सारा अनुभव था, इसलिए मुझे इस ओर ज्यादा चौकसी बरतनी चाहिए थी। पर वैसा न हो सका। फिर भी मुझे पूरा विश्वास है कि यद्यपि इस विवादके कारण काफी कटुता उत्पन्न हो गई है, तथापि अन्तमें यही सिद्ध होगा कि इससे देशका अनिष्ट होनेके बजाय भला ही हुआ है। इस बीच मैं नेक मौलाना अब्दुल बारीके इस कथनको स्वीकार करता हूँ कि असह्योगियोंके उत्साहमें गिरावट आनेकी शक्लमें जो हानि हुई है वह तो प्रत्यक्ष है, पर लाभ भविष्यके गर्भमें है। खैर, देखें आगे क्या होता है!
{{C|'''पारसियोंकी उदारता'''}}
प्रसिद्ध तिजोरी-निर्माता श्री गोदरेजने तिलक स्वराज्य-कोषके लिए तीन लाख रुपये देनेकी घोषणा करके चन्देकी अन्य सब राशियोंको फीका कर दिया है। सार्वजनिक कामोंके लिए दिये गये उनके चन्दे अभीतक गुप्त हुआ करते थे। पर इस बार<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३२५
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|२९५}}</noinclude>उन्होंने सार्वजनिक घोषणाकी आवश्यकताको समझा। मैं श्री गोदरेज तथा सम्पूर्ण पारसी समुदायको बधाई देता हूँ। मैं यह भी बता देना चाहता हूँ कि बम्बईमें चन्दा करनेके सप्ताह-भरमें एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब कि पारसियोंने चन्दे न दिये हों। पारसी महिलाएँ तथा पुरुष घर-घर जाकर भी चन्दा कर रहे हैं। वे धरना भी दे रहे हैं। समाचारपत्रोंमें भी सभी पारसी-समाचारपत्र आन्दोलनके विरोधी नहीं हैं। पर श्री गोदरेजकी उदारताके कारण पारसियोंको समस्त भारतमें सहज ही सर्वप्रथम स्थान
प्राप्त हो गया है। वैसे तो पारसी रुस्तमजीकी ५२,००० रुपयेकी राशि ही पारसियोंको सम्मानित स्थान दिलानेके लिए यथेष्ट थी किन्तु श्री गोदरेजने उन्हें सर्वप्रथम स्थान दिला दिया है।
{{C|'''खतरेकी सम्भावना'''}}
शराबकी दुकानोंपर धरना देना पारसियोंसे बहुत सम्बन्ध रखता है। हमें अपने पारसी देशवासियोंके प्रति बहुत सहिष्णुतासे काम लेना होगा। धरना देना हम बिलकुल तो बन्द नहीं कर सकते, पर हमें चाहिए कि हम शराबके व्यापारियोंसे मिलें, उनकी कठिनाइयोंको समझें, और अपनी कठिनाइयाँ उन्हें बतायें। श्री गोदरेजने अपने चन्देकी रकमको मद्यनिषेध तथा पददलित वर्गोंके उत्थान-सम्बन्धी कायोंके लिए निर्धारित कर दिया है। अतः हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि सभी पारसी अवश्य ही महान् मद्यनिषेध आन्दोलनके विरोधी हैं। यदि नरमदलीय मन्त्रिगण पूरे साहसके साथ नीलामम मिली सारी रकम लौटा नहीं देते, और शराबकी दुकानोंको बन्द नहीं कर देते तो इस समय मद्यनिषेध आन्दोलनके दौरान सबसे अधिक भय है हिंसाके विस्फोटका। मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूँ कि आन्दोलनको संयमित-नियन्त्रित किया जा सकता है, पर उसे रोका नहीं जा सकता। लोग शराबकी दुकानोंको बन्द करने तथा उसे दवाके दुकानदारों द्वारा दवाके रूपमें बेचे जानेके सिवा अन्य किसी भी रूपमें बेचे जानेको अपराध माननेपर तुले हुए हैं। यह ऐसा मामला है जिसमें जरा भी विलम्बकी गुंजाइश नहीं है।
{{C|'''आत्मशुद्धिकी प्रक्रिया'''}}
श्री अब्बास तैयबजीको सभी जानते हैं। जबसे उन्होंने कांग्रेस कमेटीकी पंजाब रिपोर्टपर<ref>तात्पर्य पंजाबमें हुए उपद्रवोंकी जाँचके लिए कांग्रेस द्वारा नियुक्त उप-समितिकी रिपोर्टसे है; देखिए खण्ड १७, पृष्ठ १२८-३२२।</ref> काम किया है तबसे वे देशकी कुछ-न-कुछ सेवा करते ही रहते हैं। पर असहयोगने उनके जीवनमें क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया है, जैसा कि अन्य बहुत-से लोगोंके जीवनमें भी किया है। श्री अब्बास बूढ़े होते हुए भी खेड़ामें रात-दिन काममें जुटे हुए हैं, ताकि बेजवाड़ा कार्यक्रमके अनुसार खेड़ाको जो-कुछ करना है, उसे वह पूरा कर दे। वे किसानों-जैसे कठोर जीवनके आदी नहीं है। फिर भी वे इस समय खेड़ाके सामान्य किसानोंके साथ, उन्हींकी मर्जी और सुविधाका खयाल रखते हुए, मिलने-जुलनेमें लगे हुए हैं। उनके साथ काम करनेवाले नवयुवक मित्र मुझे बतलाते हैं कि शक्ति और परिश्रममें वे उनमें से प्रत्येकको मात दे रहे हैं। मुझे विश्वास है कि पाठकगण<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३२६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|२९६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>उनके पत्रसे लिये गये निम्न अंशको अवश्य पसन्द करेंगे। यह पत्र उन्होंने मेरे उस पत्रके उत्तरमें लिखा है जिसमें मैंने उनके स्वास्थ्यके प्रति चिन्ता व्यक्त की थी। वे कहते हैं :
:{{gap}}'''मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको मेरे स्वास्थ्यके बारेमें जरा भी चिन्ता करनेकी जरूरत नहीं है। मैं कई वर्षोंसे इतना स्वस्थ कभी नहीं रहा हूँ। वास्तवमें बेजवाड़ामें मैंने जो खद्दर अपनाया, उससे मैं अपनेको अपनी उम्रसे बीस वर्ष कमका अनुभव कर रहा हूँ। मुझे कितना अच्छा अनुभव हो रहा है। हर जगह, यहाँतक कि गाँवकी औरतों द्वारा भी मेरा हार्दिक स्वागत किया जाता है। जिन-जिन स्थानोंमें मैं गया हूँ, उनमें से अधिकांशने अपने हिस्सेसे दूना या तिगुना दिया है। केवल आनन्द तथा नडियाद-जैसे बड़े शहर ही पीछे हैं। पर नडियाद, जहाँ मैं चार दिन बिता चुका हूँ, प्रगति कर रहा है, और मेरा खयाल है कि यदि वह अपने हिस्सेसे अधिक नहीं, तो कमसे-कम अपने हिस्सेका तो देगा ही। मैं आज कपड़वंज जा रहा हूँ किन्तु रात मैं नडियादमें ही बिताया करूँगा, नहीं तो मेरे नेक दोस्त ढीले पड़ जायेंगे।...'''
:{{gap}}'''हमारे कुछ कार्यकर्त्ताओंमें उमंग और उद्यमकी कमी है। मेरा खयाल है कि वे उस सम्मानित वर्गका प्रतिनिधित्व करते हैं, जिस वर्गमें मैं अब नहीं रहा। क्या शानदार अनुभव है यह। मुझे उस सामान्य लोक-वर्गसे, जिस वर्गका होना अब मैं सम्मानकी बात समझता हूँ, कितना अधिक प्यार तथा स्नेह मिला है। इस फकीरके वेशने ही सारे बंधनोंको तोड़ा है। और अब स्त्री तथा पुरुष मुझसे उसी तरह मिलते हैं जिस तरह मैं चाहता हूँ। कितना अच्छा होता, अगर वर्षों पहले ही यह मालूम हो जाता कि फेंटा, साया, अँगरखा, जूते तथा मोजे एक व्यक्तिको उसके गरीब भाइयोंसे अलग कर देते हैं। मुझे केवल अब यह अनुभव हुआ है कि उस प्रकारके वेशमें किसीके अन्दर इतना विश्वास उत्पन्न कर सकना कि वह अपनी बातें आपसे कह सके, क्यों असंभव था। अब मेरी समझमें आ रहा है कि मैंने जीवनमें कितना गँवाया है।...'''
:{{gap}}'''आन्दोलनने मेरी जीवन-धाराको कितना प्रभावित किया है, उसे मैं बहुत धुँधले रूपमें ही देख पा रहा हूँ। फिर भी मैं उसे देख रहा हूँ, और यही महत्त्व रखता है। देनेमें कितना आनन्द है, यह महसूस करना भी एक नया अनुभव है।'''
{{C|'''चरखेकी प्रशंसा'''}}
एक ईसाई महिला लिखती हैं :
:{{gap}}'''चरखके जरिये स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए मैं अपनी पूरी शक्तिसे काम करूँगी। यहाँसे रवाना होनेसे पहले-पहले मैंने अच्छे चरखे तैयार करा लिये।'''<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३२७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|२९७}}</noinclude>:'''तमिलमें हम चरखेको 'राट्टिनम' कहते हैं। गरीब औरतोंने मेरे पास आकर मुझसे चरखे माँगे और कातना सिखानेको कहा, ताकि वे अपनी जीविकाके लिए थोड़ा-बहुत कमा सकें। तब मुझे ईसाके शब्द स्मरण हो आये, "मैं नग्न था और तुमने मुझे वस्त्र नहीं दिया", "मैं भूखा था और तुमने मुझे खाना नहीं दिया।" मैं आशा करती हूँ कि परमेश्वर हश्रके दिन मुझसे ये कठोर शब्द न कहेंगे। भारत भूखा-नंगा है। भारतीय नारियाँ रोटीके लिए तड़पते हुए अपने बच्चोंके लिए भोजन प्राप्त करनेके निमित्त अपनी इज्जत तक बेचनेको मजबूर हुई हैं। चूँकि भारतकी अपनी ही सीमाओंमें यथेष्ट प्राकृतिक साधन मौजूद हैं, अतः उक्त स्थिति और भी दयनीय लगती है। भारत एक ऐसी स्त्रीके समान है जो सड़कके किनारे रुई, चावल तथा गेहूँके खेतोंके बीच नंगी-भूखी बैठी हुई है। भारतकी स्त्रियाँ बेकार क्यों बैठी हैं, जब कि दूसरे
देशवाले भारतकी ही उपजपर फल-फूल रहे हैं? इसलिए कि वे उस कामको छीन लेते हैं जो भारतीय स्त्रियोंको मिलना चाहिए। चरखा भारतवासियोंको काम देगा और मुट्ठी-भर दानेके लिए तड़पते हुए यहाँके नन्हें बच्चोंको भोजन देगा। चरखके संगीतके साथ स्त्रियाँ अपने सुन्दर गीत गायेंगी, पुराने जमानेकी कहानियाँ सुनायेंगी, और इस प्रकार सादे घरेलू जीवनकी सुन्दरता एवं सन्तुष्टि पुनः लौट आयेगी। यदि मेरे अन्दर कविकी प्रतिभा होती तो मैं चरखके, उसके सौन्दर्य तथा उसकी उपयोगिताके, उसकी काव्यात्मकता तथा उसके धार्मिक मूल्यके गीत लिखती और गाती; जरूरतके समय सहायताके लिए ईश्वरकी प्रशंसाके गीत गाती। मैं अपनी समस्त भारतीय बहनोंसे अपने घरोंसे भूख तथा अपमानरूपी भेड़ियेको दूर रखनेके लिए चरखा अपनानेको कहूँगी।... पर मुझमें वह प्रतिभा नहीं है। केवल मेरी आत्मा के अन्दर वह गीत ध्वनित हो रहा है। फिर मैं इसके सिवा और क्या कर सकती हूँ कि
चरखेको अपना गीत स्वयं गाने दूँ, और मैं स्वयं चरखा चलाऊँ और दूसरोंको भी वैसा ही करनेकी शिक्षा दूँ।'''
उक्त महिला कताईमें काफी निपुण हो गई हैं, और वे अपने साधनोंकी शक्ति और साधनोंको लड़कियोंके लिए एक स्कूल खोलनेमें लगानेवाली हैं। कताई इस स्कूलकी एक खास विशेषता होगी।
{{C|'''सच्ची भावना'''}}
गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीने कांग्रेस महासमितिके लिए अपने सदस्योंका चुनाव सम्पन्न कर लिया है। जिस क्रममें सदस्यगण चुने गये हैं, उसी क्रममें मैं उनके नाम यहाँ दे रहा हूँ : अब्बास तैयबजी, इमाम ए॰ के॰ बावजीर, एस॰ एफ॰ इदरस, अनसूयाबेन साराभाई, मो॰ क॰ गांधी, वल्लभभाई पटेल, महादेव देसाई, इन्दुलाल के॰ याज्ञिक, डा॰ दीक्षित, डा॰ चन्दूलाल देसाई, मोहनलाल पण्ड्या तथा वामनराव मुका-<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|२९७}}</noinclude>:'''तमिलमें हम चरखेको 'राट्टिनम' कहते हैं। गरीब औरतोंने मेरे पास आकर मुझसे चरखे माँगे और कातना सिखानेको कहा, ताकि वे अपनी जीविकाके लिए थोड़ा-बहुत कमा सकें। तब मुझे ईसाके शब्द स्मरण हो आये, "मैं नग्न था और तुमने मुझे वस्त्र नहीं दिया", "मैं भूखा था और तुमने मुझे खाना नहीं दिया।" मैं आशा करती हूँ कि परमेश्वर हश्रके दिन मुझसे ये कठोर शब्द न कहेंगे। भारत भूखा-नंगा है। भारतीय नारियाँ रोटीके लिए तड़पते हुए अपने बच्चोंके लिए भोजन प्राप्त करनेके निमित्त अपनी इज्जत तक बेचनेको मजबूर हुई हैं। चूँकि भारतकी अपनी ही सीमाओंमें यथेष्ट प्राकृतिक साधन मौजूद हैं, अतः उक्त स्थिति और भी दयनीय लगती है। भारत एक ऐसी स्त्रीके समान है जो सड़कके किनारे रुई, चावल तथा गेहूँके खेतोंके बीच नंगी-भूखी बैठी हुई है। भारतकी स्त्रियाँ बेकार क्यों बैठी हैं, जब कि दूसरे देशवाले भारतकी ही उपजपर फल-फूल रहे हैं? इसलिए कि वे उस कामको छीन लेते हैं जो भारतीय स्त्रियोंको मिलना चाहिए। चरखा भारतवासियोंको काम देगा और मुट्ठी-भर दानेके लिए तड़पते हुए यहाँके नन्हें बच्चोंको भोजन देगा। चरखके संगीतके साथ स्त्रियाँ अपने सुन्दर गीत गायेंगी, पुराने जमानेकी कहानियाँ सुनायेंगी, और इस प्रकार सादे घरेलू जीवनकी सुन्दरता एवं सन्तुष्टि पुनः लौट आयेगी। यदि मेरे अन्दर कविकी प्रतिभा होती तो मैं चरखके, उसके सौन्दर्य तथा उसकी उपयोगिताके, उसकी काव्यात्मकता तथा उसके धार्मिक मूल्यके गीत लिखती और गाती; जरूरतके समय सहायताके लिए ईश्वरकी प्रशंसाके गीत गाती। मैं अपनी समस्त भारतीय बहनोंसे अपने घरोंसे भूख तथा अपमानरूपी भेड़ियेको दूर रखनेके लिए चरखा अपनानेको कहूँगी।... पर मुझमें वह प्रतिभा नहीं है। केवल मेरी आत्मा के अन्दर वह गीत ध्वनित हो रहा है। फिर मैं इसके सिवा और क्या कर सकती हूँ कि
चरखेको अपना गीत स्वयं गाने दूँ, और मैं स्वयं चरखा चलाऊँ और दूसरोंको भी वैसा ही करनेकी शिक्षा दूँ।'''
उक्त महिला कताईमें काफी निपुण हो गई हैं, और वे अपने साधनोंकी शक्ति और साधनोंको लड़कियोंके लिए एक स्कूल खोलनेमें लगानेवाली हैं। कताई इस स्कूलकी एक खास विशेषता होगी।
{{C|'''सच्ची भावना'''}}
गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीने कांग्रेस महासमितिके लिए अपने सदस्योंका चुनाव सम्पन्न कर लिया है। जिस क्रममें सदस्यगण चुने गये हैं, उसी क्रममें मैं उनके नाम यहाँ दे रहा हूँ : अब्बास तैयबजी, इमाम ए॰ के॰ बावजीर, एस॰ एफ॰ इदरस, अनसूयाबेन साराभाई, मो॰ क॰ गांधी, वल्लभभाई पटेल, महादेव देसाई, इन्दुलाल के॰ याज्ञिक, डा॰ दीक्षित, डा॰ चन्दूलाल देसाई, मोहनलाल पण्ड्या तथा वामनराव मुका-<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|२९७}}</noinclude>:'''तमिलमें हम चरखेको 'राट्टिनम' कहते हैं। गरीब औरतोंने मेरे पास आकर मुझसे चरखे माँगे और कातना सिखानेको कहा, ताकि वे अपनी जीविकाके लिए थोड़ा-बहुत कमा सकें। तब मुझे ईसाके शब्द स्मरण हो आये, "मैं नग्न था और तुमने मुझे वस्त्र नहीं दिया", "मैं भूखा था और तुमने मुझे खाना नहीं दिया।" मैं आशा करती हूँ कि परमेश्वर हश्रके दिन मुझसे ये कठोर शब्द न कहेंगे। भारत भूखा-नंगा है। भारतीय नारियाँ रोटीके लिए तड़पते हुए अपने बच्चोंके लिए भोजन प्राप्त करनेके निमित्त अपनी इज्जत तक बेचनेको मजबूर हुई हैं। चूँकि भारतकी अपनी ही सीमाओंमें यथेष्ट प्राकृतिक साधन मौजूद हैं, अतः उक्त स्थिति और भी दयनीय लगती है। भारत एक ऐसी स्त्रीके समान है जो सड़कके किनारे रुई, चावल तथा गेहूँके खेतोंके बीच नंगी-भूखी बैठी हुई है। भारतकी स्त्रियाँ बेकार क्यों बैठी हैं, जब कि दूसरे देशवाले भारतकी ही उपजपर फल-फूल रहे हैं? इसलिए कि वे उस कामको छीन लेते हैं जो भारतीय स्त्रियोंको मिलना चाहिए। चरखा भारतवासियोंको काम देगा और मुट्ठी-भर दानेके लिए तड़पते हुए यहाँके नन्हें बच्चोंको भोजन देगा। चरखके संगीतके साथ स्त्रियाँ अपने सुन्दर गीत गायेंगी, पुराने जमानेकी कहानियाँ सुनायेंगी, और इस प्रकार सादे घरेलू जीवनकी सुन्दरता एवं सन्तुष्टि पुनः लौट आयेगी। यदि मेरे अन्दर कविकी प्रतिभा होती तो मैं चरखके, उसके सौन्दर्य तथा उसकी उपयोगिताके, उसकी काव्यात्मकता तथा उसके धार्मिक मूल्यके गीत लिखती और गाती; जरूरतके समय सहायताके लिए ईश्वरकी प्रशंसाके गीत गाती। मैं अपनी समस्त भारतीय बहनोंसे अपने घरोंसे भूख तथा अपमानरूपी भेड़ियेको दूर रखनेके लिए चरखा अपनानेको कहूँगी।... पर मुझमें वह प्रतिभा नहीं है। केवल मेरी आत्मा के अन्दर वह गीत ध्वनित हो रहा है। फिर मैं इसके सिवा और क्या कर सकती हूँ कि चरखेको अपना गीत स्वयं गाने दूँ, और मैं स्वयं चरखा चलाऊँ और दूसरोंको भी वैसा ही करनेकी शिक्षा दूँ।'''
उक्त महिला कताईमें काफी निपुण हो गई हैं, और वे अपने साधनोंकी शक्ति और साधनोंको लड़कियोंके लिए एक स्कूल खोलनेमें लगानेवाली हैं। कताई इस स्कूलकी एक खास विशेषता होगी।
{{C|'''सच्ची भावना'''}}
गुजरात प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीने कांग्रेस महासमितिके लिए अपने सदस्योंका चुनाव सम्पन्न कर लिया है। जिस क्रममें सदस्यगण चुने गये हैं, उसी क्रममें मैं उनके नाम यहाँ दे रहा हूँ : अब्बास तैयबजी, इमाम ए॰ के॰ बावजीर, एस॰ एफ॰ इदरस, अनसूयाबेन साराभाई, मो॰ क॰ गांधी, वल्लभभाई पटेल, महादेव देसाई, इन्दुलाल के॰ याज्ञिक, डा॰ दीक्षित, डा॰ चन्दूलाल देसाई, मोहनलाल पण्ड्या तथा वामनराव मुका-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३२८
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|२९८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दम। चुनाव स्वभावतः आनुपातिक प्रतिनिधित्वके आधारपर हुआ। नाम देकर पाठकोंको मैं कष्ट न देता यदि इस चुनावसे कुछ सीख न मिलती होती। पाठकगण यह देखेंगे कि तीन मुसलमान चुने गये हैं और वे सूचीमें सर्वप्रथम हैं, जिससे पता चलता है कि मतदाता उन्हें चुननेके लिए कृतसंकल्प थे। संख्याकी दृष्टिसे दोसे अधिक नहीं चुने जाने चाहिए थे, पर मतदाताओंने बुद्धिमानीसे सब मुसलमान उम्मीदवारोंको चुननेका निर्णय किया। उसके बाद वे कमसे-कम एक महिलाको अवश्य चुनना चाहते थे, अतः उनके बाद श्रीमती अनसूयाबेन आती हैं। लेकिन इस चुनावमें सबसे अधिक मार्केकी बात यह है कि जहाँ सब अच्छे कार्यकर्त्ता चुन लिये गये वहाँ बहुतसे उतने ही अच्छे और योग्य कार्यकर्त्ता चुपचाप अलग रह गये। वे चुनावमें खड़े नहीं हुए। आत्म-विलोपनकी इस भावनाकी, जिस किसीसे वह सम्बन्ध रखती हो, मैं तारीफ करता हूँ। कार्यकर्त्ताओंमें सम्मानके पदोंके लिए आपसमें कशमकश नहीं होनी चाहिए। सबका ध्येय सर्वाधिक योग्य कार्यकर्त्ता बनना होना चाहिए। पर सबका सम्मानके पदोंपर चुना जाना सम्भव नहीं है, खास तौरसे जब यदि उन पदोंके साथ भारी जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई हो। सबसे अच्छा तरीका यह है कि हर व्यक्ति चुनावसे अलग रहकर दूसरोंको चुने जाने दे। इसी तरह कटुता, अस्वस्थ प्रतिद्वन्द्विता तथा विद्वेषकी भावनासे बचना सम्भव है। चाहे कोई व्यक्ति कभी भी कोई पद न ग्रहण करे, फिर भी उसके लिए सबसे उत्तम सेवा कर सकना निश्चय ही सम्भव है। सच तो यह है कि सम्पूर्ण विश्वमें सबसे अच्छे कार्यकर्त्ता वही सिद्ध हुए है जो सामान्यतः सबसे अधिक चुप और शान्त रहते हैं।
{{C|'''मुस्लिम प्रतिनिधित्व'''}}
लखनऊ-समझौतेपर कार्य-समितिके परामर्शात्मक प्रस्तावके सम्बन्धमें बहुत लोगोंको शिकायत है। नये संविधानमें मुस्लिम प्रतिनिधित्वसे सम्बन्ध रखनेवाला एक खण्ड वह है जो अल्पसंख्यकोंके अधिकारोंके बारेमें है। चूँकि कार्य-समितिका ध्यान इस बातकी ओर आकृष्ट किया गया कि मुसलमान अपने प्रतिनिधित्वके बारेमें परेशान हो रहे हैं, और वे कांग्रेस द्वारा लखनऊ-समझौतेपर अमल चाहते है, अतः उस दिशामें निर्देश करना युक्तिसंगत समझा गया। इसमें सन्देह नहीं कि हम लोगोंके अन्दर फूट डालनेकी कोशिश की जा रही है। मुसलमानोंका आना शुरू ही हुआ है। इसलिए प्रत्येक हिन्दूका कर्त्तव्य है कि वह उनको कांग्रेसमें शामिल होनेके लिए हर तरहका उचित प्रोत्साहन दे। कांग्रेसको समस्त जातियों तथा धर्मोंका सामान्य मिलन-स्थल होना चाहिए। जहाँ अनुनय-विनयके बावजूद मुसलमान बिलकुल ही आगे नहीं आते, वहाँ उम्मीदवारोंके अभावके कारण स्थान खाली रखे जा सकते है, अथवा जबतक अनुकूल मुस्लिम उम्मीदवार नहीं मिल जाते, तबतक के लिए उन स्थानोंको दूसरों द्वारा भरा जा सकता है। कुछ मित्रोंका कहना है कि इस समय हमें किसी जाति विशेषके अधिकारोंके बारेमें नहीं बल्कि केवल कार्यक्षमताके बारेमें सोचना चाहिए। इसमें सन्देह नहीं कि कार्यक्षमता प्रशंसनीय चीज है, लेकिन यह भी हो सकता है कि हम उसके अन्धपुजारी बन जायें, जैसा कि हमारे अंग्रेज मित्र बन गये हैं। एकता कार्यक्षमतासे अधिक महत्त्वपूर्ण है, और हमारे लिए एकता ही कार्यक्षमता है। हाँ, एकताके नामपर हमें एक वस्तुका<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३२९
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2026-08-18T06:58:39Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टिप्पणियाँ|२९९}}</noinclude>त्याग नहीं करना चाहिए और वह है सिद्धान्त अथवा अन्तरात्माकी आवाज, अथवा सत्य सिद्धान्त अथवा अन्तरात्माकी आवाजका ही नाम सत्य है।
{{C|'''गो-रक्षा'''}}
हिन्दू-मुस्लिम एकताके सन्दर्भमें मैं एक बार पुनः गो-रक्षाकी चर्चा कर रहा हूँ। गो-रक्षाकी भावना जितनी अधिक मेरे हृदयमें है उससे ज्यादा किसी अन्य हिन्दूके हृदयमें नहीं, पर मैं उतावला नहीं होना चाहता। बलप्रयोग द्वारा हम मुसलमानोंसे गो-हत्या बन्द करानेमें कभी सफल नहीं हो सकते। उनके अन्दर गायके लिए उसी प्रकारकी तथा उतनी ही भावना नहीं हो सकती जितनी कि हम हिन्दुओंके अन्दर है। अगर हम ईमानदारीका व्यवहार करेंगे तभी तो ऐसी स्थिति आयेगी कि हमारे साथ ईमानदारीका व्यवहार करना उनके लिए जरूरी हो जायेगा। बिहारमें अब तूफान मचा हुआ है। मैं हिन्दू तथा मुसलमान दोनों नेताओंसे आग्रहपूर्वक विनय करता हूँ कि वे मौकेको हाथसे न जाने दें, और बुराईको आरम्भमें ही कुचल दें। साथ ही बिहारके हिन्दुओंको चाहिए कि वे निरामिषताके प्रश्नको गो-हत्या के साथ न मिलायें। दोनोंका स्थान अलग-अलग है। गो-रक्षा दो करोड़ हिन्दुओंका धार्मिक सिद्धान्त है, जब कि निरामिषता बहुत थोड़ेसे लोगोंतक सीमित है। उन थोड़ेसे लोगोंको अपना विचार दूसरोंपर नहीं लादने दिया जा सकता।
{{C|'''अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी'''}}
नव-निर्वाचित महासमिति, जिसके सदस्योंकी संख्या पहलेसे बड़ी है, की बैठक २२ जुलाईको लखनऊमें होनेवाली है। यह बैठक बहुत महत्त्वपूर्ण होगी। इसमें ऐसा कार्यक्रम तैयार करना है जिससे साल-भरके अन्दर स्वराज्यकी स्थापना तथा खिलाफत एवं पंजाब सम्बन्धी अन्यायोंका परिशोधन किया जा सके। उसे या तो एक नई कार्यसमितिका चुनाव करना होगा, अथवा पुरानी कार्य-समितिकी ही पुष्टि करनी होगी, यदि उसके सब सदस्य नई महासमितिके फिरसे सदस्य चुन लिये जाते हैं। उसे संभवतः कार्य-समितिके कुछ निर्णयोंपर पुनः विचार-विमर्श भी करना होगा। उसके अन्दर जो विचार-विमर्श होगा, उसीसे साल-भरके अन्दर स्वराज्य-प्राप्ति सम्बन्धी प्रश्नका बहुत-कुछ निपटारा होगा। अतः लोगोंके लिए ऐसी आशा करना स्वाभाविक है कि उस संस्थाके समक्ष जो प्रश्न उठाये जायेंगे उनपर विचार करनेके लिए पूरा सदन भरा होगा।
{{C|'''जूनके बाद'''}}
जान पड़ता है कि कुछ लोग इस खयालमें हैं कि ३० जूनके बाद बेजवाड़ा कार्यक्रमके सम्बन्धमें आगे कोई प्रयास करनेकी जरूरत नहीं है। यह भ्रांतिपूर्ण विचार है। यदि हमने एक करोड़ सदस्य बना लिये और बीस लाख चरखे चालू करवा लिये, तो फिर हमें उनमें और वृद्धि करनी चाहिए। न्यूनतम निश्चित राशि एकत्र करके हम तिलक स्वराज्य-कोषके लिए चन्दा करना बन्द कर सकते हैं, पर यदि हम उससे भी अधिक संग्रह करते हैं तो उसमें कोई हानि नहीं है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३३०
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३००|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>जैसी स्थिति है, उससे मालूम होता है कि बहुत-से प्रान्त ऐसे होंगे जो ३० जून तक अपने लिए निर्धारित रकमसे बहुत-कम एकत्र कर पायेंगे। अतः उनसे यह अवश्य उम्मीदकी जायेगी कि वे कमसे-कम कांग्रेस महासमितिकी बैठक आरम्भ होनेतक अपना संग्रह-कार्य जारी रखें।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २९-६-१९२१|1em}}
{{C|{{larger|'''१३६. टर्कीका प्रश्न'''}}}}
अगर हम अपने मुसलमान भाइयोंके सच्चे शुभेच्छु हैं तो यूरोपमें टर्की राष्ट्रको कुचलनेके लिए जो आन्दोलन चल रहा है, उसके खिलाफ हमें मुसलमान भाइयोंके प्रति सहानुभूति होनी चाहिए। यह बड़े खेदकी बात है कि ब्रिटिश सरकार लुके-छिपे या खुले आम आन्दोलनका नेतृत्व कर रही है। हिन्दुओंको इस्लामी एकताके आन्दोलनसे भयभीत नहीं होना चाहिए। वह भारत या हिन्दुओंके खिलाफ नहीं है और न उसे ऐसा होनेकी जरूरत है। मुसलमानोंको हर मुसलमान राज्यका शुभेच्छु होना चाहिए और यदि कोई मुसलमान देश अकारण मुसीबतमें पड़ जाये तो उसकी मदद भी करनी चाहिए। और जहाँतक हिन्दुओंका सवाल है, यदि वे मुसलमानोंके सच्चे दोस्त हैं तो उनकी भावनाओंसे सहानुभूति होनी चाहिए। अतः हमें चाहिए कि हम अपने उन मुसलमान भाइयोंकी मदद करें, जो यूरोपमें तुर्की साम्राज्यको नष्ट होनेसे बचानेके लिए कोशिश कर रहे हैं।
यदि मुसलमानोंको इस बातका थोड़ा भी संकेत मिला हो कि ब्रिटिश सरकार अंकाराकी तुर्की सरकारके खिलाफ यूनानियोंके साथ खुल्लमखुल्ला मिल सकती है, और वे इससे सशंकित हो उठे हों तो इससे हिन्दुओंको अपना सन्तुलन नहीं खोना चाहिए। यदि ब्रिटेन ऐसे पागलपनपर उतारू हो जाता है तो टर्कीके खिलाफ ब्रिटिश सरकारकी किसी भी ऐसी योजनामें भारत साथ नहीं दे सकता। ऐसा करना इस्लामके खिलाफ युद्ध छेड़नेके समान होगा।
इंग्लैंड अपना मार्ग चुननेको स्वतन्त्र है। हिन्दू और मुसलमान अब जाग गये हैं। वह अब उन्हें गुलाम बनाकर नहीं रख सकता। यदि भारतको साम्राज्यके दूसरे सदस्योंकी बराबरीका दर्जा पाना है तो उसके मतकी शक्ति किसी भी अन्य सदस्यसे कहीं ज्यादा होगी। स्वतन्त्र राष्ट्र-मण्डलमें जैसे हर सदस्यका यह कर्त्तव्य है कि जबतक और सदस्य कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्तोंका पालन कर रहे हैं तबतक वह उसमें शामिल
रहे। वैसे ही उसे यह अधिकार भी है कि यदि दूसरे सदस्य गलत रास्तेपर चलें तो वह उससे अलग हो जाये। यदि भारत किसी गलत बातके पक्षमें मत दे तो इंग्लैंडको अन्य सदस्योंकी तरह ही राष्ट्र-मण्डलसे अलग हो जानेका हक है। इस प्रकार जब भारतको अपना उचित पद प्राप्त हो जाये तब सन्तुलनका केन्द्र इंग्लैंडके बजाय भारत हो जायेगा। साम्राज्यके अन्तर्गत स्वराज्यसे मेरा यही मतलब है। किसी भी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३३१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||टर्कीका प्रश्न|३०१}}</noinclude>मसलेपर विचार-विमर्श करते समय पशु-बलके प्रयोगकी बात कभी भी मनमें नहीं लानी चाहिए। हमें सदा न्याय-बुद्धिका सहारा लेना चाहिए, न कि बलका।
इंग्लैंडकी तरह भारतको भी अपना रास्ता चुननेका हक है। आज हम साम्राज्यके अन्तर्गत स्वराज्यकी कोशिश इस उम्मीदसे कर रहे हैं कि इंग्लैंड अन्तमें सच्चा साबित होगा; और यदि ऐसा नहीं होता तो हम पूर्ण स्वतन्त्रताके लिए लड़ेंगे। किन्तु यदि यह निर्विवाद रूपसे सिद्ध हो जाये कि ब्रिटेन टर्कीको खत्म कर देना चाहता है, तो भारतके लिए एकमात्र विकल्प होगा पूर्ण स्वतन्त्रता। जहाँतक मुसलमानोंका सवाल है यदि टर्कीका अस्तित्व, जैसा वह आज है, खतरेमें पड़ जाये तो उनके लिए आगा-पीछा करनेकी गुंजाइश ही नहीं रह जाती। तब तो यदि उनसे बन पड़ेगा तो वे तलवार खींच लेंगे और बहादुर तुर्कोंके साथ लड़ते-लड़ते या तो मर मिटेंगे या जीतकर ही दम लेंगे। पर यदि वे भारत सरकारकी नीति के कारण ब्रिटिश सरकारके खिलाफ युद्धकी घोषणा नहीं कर सकते तो कमसे-कम ऐसी सरकारके प्रति जो अन्यायपूर्वक टर्कीसे युद्ध छेड़ देती है, वफादार होनेसे इनकार तो कर ही सकते हैं। हिन्दुओंका भी कर्त्तव्य उतना ही साफ है। यदि अभीतक हम मुसलमानोंसे डरते हैं और उनपर अविश्वास करते हैं तो हम ब्रिटेनका साथ ही देंगे और इस तरह अपने गुलामीके दिन और बढ़ायेंगे। और यदि हममें इतना साहस और धार्मिक बल है कि हम अपने मुसलमान देश-भाइयोंसे न डरें और यदि हममें इतनी बुद्धिमानी है कि हम उनपर विश्वास करें तो हमें चाहिए कि आजादी हासिल करनेके लिए हम सभी शान्तिपूर्ण और सच्चे तरीकोंसे मुसलमानोंका साथ दें। हिन्दू धर्मके बारेमें मेरी जो कल्पना है, उसके मुताबिक एक हिन्दूके लिए अहिंसात्मक असहयोगके सिवा और कोई रास्ता है ही नहीं। चाहे वह पूर्ण स्वतन्त्रताके लिए हो या साम्राज्यके अन्तर्गत स्वराज्यके लिए। यदि भारत अहिंसाके रहस्य और उसकी अजेय शक्तिको पहचान ले और उसे ग्रहण करे तो उसे आज ही उपनिवेशका दर्जा या पूरी आजादी मिल सकती है। जब वह अहिंसाके मन्त्रको सिद्ध कर लेगा तब वह असहयोगके हर कदमके लिए, जिसमें कर न देना भी शामिल है, तैयार हो जायेगा। आज भारत तैयार नहीं है। किन्तु यदि हम टर्कीके नाशके लिए या अपनी गुलामीके दिन और बढ़ानेके लिए रचे जानेवाले षड्यन्त्रोंको विफल करनेके लिए तैयार होना चाहते हैं तो हमें जल्दसे-जल्द प्रबुद्ध अहिंसाकी भावना पैदा करनी होगी। वह अहिंसा निर्बलकी नहीं, बलवानकी अहिंसा होगी जो मारनेके बजाय सत्यकी प्रतिष्ठाके लिए खुशी-खुशी मरनेको तैयार रहेगा।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २९-६-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३३२
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Neha Tanti" /></noinclude>
१३७. कार्य समिति और उसका काम
कार्य समिति के प्रस्तावोंकी कुछ आलोचना की गई है। कार्य समितिने असहयोगी
वकीलोंके अदालतोंमें जाने तथा असहयोगी प्रतिवादियोंके अदालतमें अपना बचाव करने-
को अनुचित करार देते हुए जो व्यवस्था दी है, उसपर बहुत आपत्ति की गई है, और
यहाँतक कहा गया है कि उसकी व्यवस्थाओंकी परवाह न की जाये। इसलिए यह
जानना आवश्यक हो जाता है कि कार्य समिति के क्या काम हैं और इसे समझने के
लिए हमें पहले कांग्रेसके संविधानको समझना होगा ।
कांग्रेसका ध्येय शान्तिपूर्ण तथा न्यायोचित तरीकोंसे स्वराज्य हासिल करना है ।
कांग्रेसका संचालन ऐसे ढंगसे होना चाहिए जिससे भारत अपने निर्दिष्ट लक्ष्यकी
ओर तेजीसे बढ़ सके । कांग्रेसका संविधान भी ऐसा बनाया गया है जिससे इस राष्ट्र-
की स्वशासनकी क्षमताकी पूरी कसौटी हो जाये और यह सिद्ध हो जाये कि उसमें
सचमुच यह क्षमता है । निस्सन्देह वह एक ऐसी ऐच्छिक सरकारकी स्थापना करता
है, जिसका एकमात्र बल जनमत तथा जनताका सद्भाव है । आज जिस प्रकार कांग्रेस
वर्तमान शासन प्रणालीका विरोध कर रही है और इसमें सन्देह नहीं कि यदि
जरूरत पड़ी तो उसे समाप्त कर देनेके लिए भी वह जुट जायेगी -- उससे जाहिर होता
है कि कांग्रेसका प्रभाव जितना ही बढ़ेगा सरकारका उतना ही कम होगा। जिस
दिन लोग कांग्रेस में पूरी तरह विश्वास करने लगेंगे और उसके निर्देशोंका स्वेच्छया पालन
करने लगेंगे उसी दिन पूर्ण स्वराज्य स्थापित हो जायेगा; क्योंकि तब सरकारको
कांग्रेसके माध्यमसे व्यक्त लोकमतका पालन करना ही होगा, अन्यथा वह स्वयं समाप्त
हो जायेगी । इसलिए कांग्रेसको देशकी सर्वाधिक संगठित, सबल और शुद्ध तथा सबसे
बड़ी संस्था बनना चाहिए। अतः उसकी नीति ऐसी होनी चाहिए जिसे लोग प्रसन्नता-
से स्वीकार कर लें ।
कांग्रेसका अधिवेशन सालमें केवल एक बार होता है, जिसमें वह अपनी नीतियाँ
निर्धारित करती है। कांग्रेस महासमिति उसके प्रस्तावोंमें समाहित उन नीतियोंको
कार्यान्वित करती है । इसलिए कांग्रेसकी महासमितिको भी उतने ही अधिकारके साथ
कांग्रेसके प्रस्तावोंकी व्याख्या और सभी नये सवालोंपर विचार करना चाहिए जितने
अधिकारसे स्वयं कांग्रेस कर सकती है। उसके सदस्यगण विभिन्न प्रस्तावों एवं उनके
अर्थोपर जितनी चाहें उतनी बहस कर सकते हैं, पर कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त के मामलों-
को छोड़कर बाकी सब बातोंमें उन्हें बहुमतसे स्वीकृत प्रस्तावोंको मानकर ईमानदारी के
साथ कार्यान्वित भी करना चाहिए। किसी बातपर महासमितिमें बहस हो चुकने के
बाद फिर उसपर महासमितिके बाहर बहस नहीं हो सकती । महासमिति अपना काम
तेजी और ठीक ढंगसे कर सके, इसके लिए कांग्रेस के संविधानमें एक कार्य समितिकी
व्यवस्था की गई है। इस कार्य समितिकी बैठक बराबर होनी चाहिए और महासमिति
द्वारा सौंपे गये सभी कार्योंको उसे पूरा करना चाहिए। जब महासमितिकी बैठक नहीं
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१३७. कार्य-समिति और उसका काम'''}}}}
कार्य-समितिके प्रस्तावोंकी कुछ आलोचना की गई है। कार्य-समितिने असहयोगी वकीलोंके अदालतोंमें जाने तथा असहयोगी प्रतिवादियोंके अदालतमें अपना बचाव करनेको अनुचित करार देते हुए जो व्यवस्था दी है, उसपर बहुत आपत्ति की गई है, और यहाँतक कहा गया है कि उसकी व्यवस्थाओंकी परवाह न की जाये। इसलिए यह जानना आवश्यक हो जाता है कि कार्य-समितिके क्या काम हैं और इसे समझनेके लिए हमें पहले कांग्रेसके संविधानको समझना होगा।
कांग्रेसका ध्येय शान्तिपूर्ण तथा न्यायोचित तरीकोंसे स्वराज्य हासिल करना है। कांग्रेसका संचालन ऐसे ढंगसे होना चाहिए जिससे भारत अपने निर्दिष्ट लक्ष्यकी ओर तेजीसे बढ़ सके। कांग्रेसका संविधान भी ऐसा बनाया गया है जिससे इस राष्ट्रकी स्वशासनकी क्षमताकी पूरी कसौटी हो जाये और यह सिद्ध हो जाये कि उसमें सचमुच यह क्षमता है। निस्सन्देह वह एक ऐसी ऐच्छिक सरकारकी स्थापना करता है, जिसका एकमात्र बल जनमत तथा जनताका सद्भाव है। आज जिस प्रकार कांग्रेस वर्तमान शासन-प्रणालीका विरोध कर रही है—और इसमें सन्देह नहीं कि यदि जरूरत पड़ी तो उसे समाप्त कर देनेके लिए भी वह जुट जायेगी—उससे जाहिर होता है कि कांग्रेसका प्रभाव जितना ही बढ़ेगा सरकारका उतना ही कम होगा। जिस दिन लोग कांग्रेसमें पूरी तरह विश्वास करने लगेंगे और उसके निर्देशोंका स्वेच्छया पालन करने लगेंगे उसी दिन पूर्ण स्वराज्य स्थापित हो जायेगा; क्योंकि तब सरकारको कांग्रेसके माध्यमसे व्यक्त लोकमतका पालन करना ही होगा, अन्यथा वह स्वयं समाप्त हो जायेगी। इसलिए कांग्रेसको देशकी सर्वाधिक संगठित, सबल और शुद्ध तथा सबसे बड़ी संस्था बनना चाहिए। अतः उसकी नीति ऐसी होनी चाहिए जिसे लोग प्रसन्नतासे स्वीकार कर लें।
कांग्रेसका अधिवेशन सालमें केवल एक बार होता है, जिसमें वह अपनी नीतियाँ निर्धारित करती है। कांग्रेस महासमिति उसके प्रस्तावोंमें समाहित उन नीतियोंको कार्यान्वित करती है। इसलिए कांग्रेसकी महासमितिको भी उतने ही अधिकारके साथ कांग्रेसके प्रस्तावोंकी व्याख्या और सभी नये सवालोंपर विचार करना चाहिए जितने अधिकारसे स्वयं कांग्रेस कर सकती है। उसके सदस्यगण विभिन्न प्रस्तावों एवं उनके अर्थोपर जितनी चाहें उतनी बहस कर सकते हैं, पर कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तके मामलोंको छोड़कर बाकी सब बातोंमें उन्हें बहुमतसे स्वीकृत प्रस्तावोंको मानकर ईमानदारीके साथ कार्यान्वित भी करना चाहिए। किसी बातपर महासमितिमें बहस हो चुकनेके बाद फिर उसपर महासमितिके बाहर बहस नहीं हो सकती। महासमिति अपना काम तेजी और ठीक ढंगसे कर सके, इसके लिए कांग्रेसके संविधानमें एक कार्य-समितिकी व्यवस्था की गई है। इस कार्य-समितिकी बैठक बराबर होनी चाहिए और महासमिति द्वारा सौंपे गये सभी कार्योंको उसे पूरा करना चाहिए। जब महासमितिकी बैठक नहीं<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||कार्य-समिति और उसका काम|३०३}}</noinclude>हो रही हो तब कार्य-समितिसे महासमितिके सारे काम करनेकी अपेक्षा की जाती है। समितिको जनमतके बारेमें पूरी जानकारी रखनी चाहिए, उसे सही दिशा देनी चाहिए और उसकी व्याख्या भी करनी चाहिए। उसे सभी मातहत संगठनोंको काम करनेकी स्थितिमें रखना चाहिए, देश-भरमें संगठनके लिए धन जुटानेकी कोशिश करनी चाहिए, उसका उचित वितरण करना चाहिए और जब-कभी बहुत महत्त्वके मामलोंपर निर्णय लेना हो तब निर्देशके लिए महासमितिकी बैठक बुलानी चाहिए। कांग्रेसके लिए कार्य-समितिका वही महत्त्व है जो संसदके लिए मन्त्रिमण्डलका। यदि हमें इसी वर्ष संवैधानिक सरकारकी स्थापना करनी है तो कार्य-समितिके सभी निर्णय ऐसे होने चाहिए जिनका आदर सब लोग करें। अतः यह जरूरी है कि उसके सदस्य ऐसे हों जिन्हें महासमितिके सदस्य तथा पूरा राष्ट्र सम्मानकी दृष्टिसे देखता हो। उसे जल्दबाजीमें किसी बातपर निर्णय नहीं करना चाहिए और उसके सदस्योंको एक-से विचारका होना चाहिए। उसके अन्दर दो नीतियाँ या दो दल नहीं हो सकते। चूँकि कांग्रेस पूरे देशका प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए उसके अन्दर सभी विचारों, सभी दलोंके लोग हो सकते हैं। पर कार्य-समितिमें ऐसे लोग ही होने चाहिए जो कांग्रेसके बहुसंख्यक दल व उसकी नीतियोंका प्रतिनिधित्व करते हों। उसके निर्णय अधिकतर सर्वसम्मत होने चाहिए। जब कोई सदस्य अन्य सदस्योंके साथ मिलकर नहीं चल पाता तो वह अलग हो सकता है, पर उसे कार्य-समितिकी कार्रवाइयोंकी अखबारोंमें चर्चा करके उसके कामोंमें बाधा डालने या उन्हें प्रभावित करनेकी कोशिश नहीं करनी चाहिए। अतः यद्यपि कांग्रेसवालों को कार्य-समितिके निर्णयोंको कार्यान्वित करना ही चाहिए, तथापि ऐसा नहीं है कि यह संगठन किसीके प्रति जवाबदेह है ही नहीं। कांग्रेस महासमिति अविश्वासका प्रस्ताव पास करके उसे बरखास्त कर सकती है। महासमिति उसके निर्णयोंपर फिरसे विचार कर सकती है और यदि गम्भीर कारण उपस्थित हों तो उन्हें रद्द भी कर सकती है। मेरे खयालसे जबतक कार्य-समितिका जनतापर काफी प्रभाव नहीं होता तबतक साल-भरके अन्दर स्वराज्य-प्राप्तिका लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इसलिए हममें से हर व्यक्तिको चाहिए कि वह कांग्रेसके सभी प्रस्तावोंको पूरी तरहसे कार्यान्वित करके उसे एक ऐसी संस्था बना दे जिसकी इच्छाका कोई अनादर ही न कर सके। जो काम सरकार अन्तमें बल-प्रयोग द्वारा करती है, कांग्रेस उसी कामको प्रेम द्वारा करनेकी उम्मीद रखती है। सरकारने जनताके हृदयमें भय पैदा करके अपनेको ऐसा-कुछ बना लिया है कि कोई उसकी इच्छाका अनादर नहीं कर सकता, पर कांग्रेसको ऐसा रास्ता अख्तियार करके लोगोंको अपनी शक्तिका एहसास कराना है
जिससे इसके सिद्धान्तों और नीतियोंको सभी अपनी मर्जीसे स्वीकार कर लें। इस तरह जनताके समक्ष जो भी कार्यक्रम रखा जाना है, उससे सम्बन्धित हर मामलेमें अहिंसाका पालन करना जरूरी है। लेकिन हर संगठन जनताके सहयोगपर ही सफल होनेकी आशा रखता है। कांग्रेसके निर्णयोंके प्रति वफादारी नागपुर कांग्रेसमें एक सालके अन्दर स्वराज्य प्राप्त करनेके हमारे संकल्पकी सफलताकी अनिवार्य शर्त है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २९-६-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३३४
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१३८. चरखेका सन्देश'''}}}}
'इंडियन सोशल रिफॉर्मर' ने चरखेकी प्रशंसामें किसी पत्र-लेखककी एक टिप्पणी प्रकाशित की है। उसने अपनी टिप्पणीमें यह कामना की है कि आन्दोलनका संगठन ऐसे ढंगसे किया जाये कि कताई करनेवाले उससे उकता न जायें। श्री अमृतलाल ठक्करने ('सवेंट ऑफ इंडिया' में प्रकाशित) अपनी एक उपयोगी टिप्पणीमें काठियावाड़में चल रहे अपने परीक्षणके बारेमें लिखा है। उन्होंने लिखा है कि किसान स्त्रियोंने चरखे अपना लिये हैं। इससे उनको उकताहट कभी नहीं होगी क्योंकि यह उनकी अपनी जीविकाका साधन है, और पहले वे इसकी आदी भी थीं। इसका चलन बन्द इसलिए हो गया था कि उनके काते हुए सूतकी कोई माँग ही नहीं रह गई थी। शहरी लोग यदि चरखेको एक फैशन या खब्तकी तरह अपनायें तो हो सकता है कि वे आगे चलकर उससे उकता जायें। चरखेके प्रति आस्था उन्हीं लोगोंकी रहेगी जो आज देशके लिए इस सबसे अधिक उपयोगी कार्यके लिए अपने अवकाशके कुछ घंटे लगाना अपना कर्त्तव्य मानते हों। कताई करनेवालों का तीसरा वर्ग स्कूली बच्चोंका है। राष्ट्रीय स्कूलोंमें चरखा चालू करनेके परीक्षणसे मुझे बड़े अच्छे परिणामोंकी आशा है। यदि राष्ट्रीय स्कूलोंमें चरखे चालू करनेका काम वैज्ञानिक ढंगसे ऐसे अध्यापकों द्वारा शुरू किया जाये जो चरखेको भारतके साढ़े सात लाख गाँवोंमें शिक्षा पहुँचानेका सबसे कारगर साधन मानते हों, तो फिर इससे उकताहट पैदा होनेका कोई खतरा नहीं रह जायेगा; और इतना ही नहीं उसके सहारे राष्ट्र नये-नये कर लगाये बिना और राजस्वके अनैतिक तरीके इस्तेमाल किये बिना ही जन-शिक्षाका खर्च जुटानेकी समस्या भी हल कर लेगा।
'इंडियन सोशल रिफॉर्मर' के पत्र-लेखकने सुझाया है कि चरखेपर बढ़िया किस्मका सूत तैयार करनेकी कोशिश की जानी चाहिए। मैं उनको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि यह काम शुरू भी हो गया है, लेकिन ढाकाकी मलमलकी तरहका बढ़िया निखार (फिनिश) या उससे कुछ कम महीन किस्मका सूत कातनेमें अभी कुछ समय तो लग ही जायेगा। हाथ-कताई अभी पिछले सितम्बरमें ही शुरू हुई थी और भारतको उसकी उपयोगितापर दिसम्बरमें ही विश्वास होने लगा था। यदि इसे ध्यानमें रखा जाये तो इसने अभीतक जितनी प्रगति की है वह बहुत काफी मानी जानी चाहिए।
पत्र-लेखकने शिकायत की है कि हाथकते सूतकी बुनाई उतनी ही तेजीसे नहीं हो पाती। एक हदतक यह सही है। लेकिन इसका इलाज सिर्फ यह नहीं है कि करघोंकी संख्या बढ़ा दी जाये। इससे कहीं ज्यादा जरूरत इस बातकी है कि मौजूदा बुनकरोंको हाथका कता सूत इस्तेमाल करनेके लिए प्रेरित किया जाये। बुनाईका काम कताईकी अपेक्षा अधिक पेचीदा किस्मका है। कताईकी भाँति, बुनाई केवल एक अनुपूरक उद्योग नहीं है, वह अपने-आपमें जीविकाका एक सम्पूर्ण साधन है। इसीलिए वह कभी बन्द नहीं हुआ था। "भारतमें इतने काफी बुनकर और करघे मौजूद<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३३५
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||चरखेका सन्देश|३०५}}</noinclude>हैं कि वे विदेशोंसे मँगाये जानेवाले सारे वस्त्रोंकी कमी स्वयं पूरी कर सकते हैं।" हमें यह समझ लेना चाहिए कि मद्रास, महाराष्ट्र और बंगालमें हमारे हजारों करघे जापान और मैनचेस्टरसे आनेवाले महीन सूतसे कपड़ा बुननेमें लगे हुए हैं। हमें उनका उपयोग हाथका कता सूत बुननेके लिए ही करना चाहिए। और इस कामके लिए राष्ट्रको बेकारको आडम्बरपूर्ण और महीन, मात्र दिखावेकी मलमलकी ओर अपनी आसक्तिको छोड़ना ही पड़ेगा। मुझे तो ऐसी मलमलकी बुनाईमें कोई कला नहीं दिखाई देती जो शरीरको ढकनेकी बजाय उसे और उघाड़ देती है। कलाके सम्बन्धमें हमें अपने विचार बदलने चाहिए। यदि सामान्य परिस्थितिमें महीन वस्त्रोंकी बुनाई वांछनीय मानी जाये, तो भी आजकी परिस्थिति सामान्य नहीं है। हम आज स्वतन्त्र और आत्म-निर्भर बननेका भगीरथ प्रयत्न कर रहे हैं, इसलिए हमें हाथके कते सूतका बुना वस्त्र पहननेमें ही सन्तोष मानना चाहिए। हमें एक ओर तो फैशन-परस्त लोगोंको मोटे वस्त्रपर सन्तोष करनेके लिए कहना चाहिए और दूसरी ओर कताई करनेवालों को ज्यादा महीन और एकसा सूत कातना सिखाना चाहिए।
पत्र-लेखकने कहा है कि मिल-मालिकोंको मिलोंमें तैयार वस्त्रोंके दाम घटाने चाहिए। जिन्हें स्वदेशीसे प्रेम है, जब वे लोग खद्दर पहनना अपना कर्त्तव्य मानने लगेंगे, जब देशमें जरूरतके मुताबिक चरखे चलने लगेंगे और बुनकर लोग हाथका कता सूत इस्तेमाल करने लगेंगे, तब मिल-मालिक कीमतें घटानेपर विवश हो जायेंगे। जिन लोगोंका उद्देश्य अधिकसे-अधिक मुनाफा लेते चले जाना ही हो उनसे देशभक्तिकी अपील करना करीब-करीब बेमतलब लगता है।
पत्र-लेखकने कुछ अन्य असंगतियोंका जिक्र किया है—जैसे कि सार्वजनिक समारोहोंमें खद्दर और अन्य अवसरोंपर फैशनेबल अंग्रेजी सूट पहनना, और खद्दरधारियों द्वारा सबसे कीमती किस्मके सिगार पीना। ये सभी बातें नये फैशनके चल निकलने पर धीरे-धीरे समाप्त हो जायेंगी। मेरा तो कहना यह है कि जैसे-जैसे विदेशी वस्त्रोंका पूर्ण बहिष्कार करनेमें हम समर्थ होते जायेंगे, वैसे-वैसे वर्तमान असंगतियोंको भी अवश्यमेव त्यागते जायेंगे और देशकी विशाल जनताके हृदयमें बद्धमूल सादगी और स्वदेशीके आदर्शके अनुरूप अपने राष्ट्रीय जीवनको एक नये साँचेमें ढालते जायेंगे। तब हम संसारकी कमजोर जातियोंके शोषणपर आधारित साम्राज्यवादके शिकंजेमें नहीं फँसेंगे और हम नौसेना तथा वायु-सेनाओं द्वारा अभिरक्षित इस भड़कीली भौतिकवादी सभ्यताको स्वीकार करनेपर विवश नहीं होंगे जिसने जनताका शान्तिसे रहना हराम कर रखा है। इसके विपरीत हम उस समय साम्राज्यको परिष्कृत करके एक राष्ट्रमण्डलका रूप दे देंगे जिसमें सभी राष्ट्र यदि चाहें तो संसारकी उन्नतिमें अपना सर्वोत्तम योगदान करनेके लिए और निरे भौतिक बलके बदले वास्तवमें कष्टसहन द्वारा संसारके कमजोर राष्ट्रों या जातियोंको अभय देनेके लिए सम्मिलित और सक्रिय हो सकते हैं। असहयोगका उद्देश्य विचार-जगत्में इसी प्रकारकी एक क्रान्ति लाना है। परन्तु ऐसी काया-पलट चरखेकी पूर्ण सफलताके बाद ही सम्भव है। भारत संसारको ऐसा सन्देश देने योग्य तभी बन सकता है जब वह सभी प्रलोभनोंको अपने वशमें<noinclude>{{Left|२०-२०|1em}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३३६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>कर ले और इस प्रकार विदेशी आक्रमणोंके लिए दुर्भेद्य बन जाये और अपनी दो बड़ी-बड़ी आवश्यकताओं—खाद्य और वस्त्र—के मामलेमें आत्मनिर्भर बन जाये।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २९-६-१९२१|1em}}
{{Dhr|}}
{{C|{{larger|'''१३९. चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र'''}}}}
:{{gap}}'''श्री गांधी तथा असहयोग आन्दोलनसे सम्बन्धित अन्य लोगोंके नाम पत्र:'''
:'''सज्जनो,'''
:{{gap}}'''क्या आपने कभी इस बातपर तनिक भी विचार किया है कि आपका असहयोग आन्दोलन भारतको किधर लिये जा रहा है? यदि अनुमति हो तो असमके बारेमें मैं कुछ कहूँ। आप जिन बुराइयोंको दूर करनेकी कोशिश कर रहे हैं, उन्हें दूर करने या दुरुस्त करनेका उपाय असहयोग नहीं वरन् कानून है। सबसे पहले कानून और फिर अनिवार्य शिक्षा। असमके जो चाय-बागान यूरोपीयोंके नियन्त्रणमें हैं, उन सभीमें काम करनेवाले कुलियोंकी यूरोपीय अधिकारी बहुत अच्छी तरह देखभाल करते हैं। पर मुझे खेदके साथ कहना पड़ता है कि आपके ही देशवासियोंमें इन बागानोंके कुलियोंसे नाजायज तरीकेसे पैसे ऐंठनेकी नामुनासिब प्रवृत्ति बहुत अधिक फैली हुई है। चाय-बागानोंमें काम करनेवालों को काफी अच्छी मजदूरी मिलती है। मेरे बागानमें काम करनेवाले पुरुषोंको औसतन १० रुपये ३ आने ८ पाई, स्त्रियोंको ६ रुपये १२ आने ८ पाई तथा बच्चोंको ४ रुपये १५ आने ९पाई मिलते हैं। (सितम्बर १९२० को सरकारी रिपोर्ट)। इसके अलावा असमके सभी चाय-बागानोंके कुलियोंको ईंधन तथा दवाई मुफ्त दी जाती है; उनका मुफ्त इलाज किया जाता है; मुफ्त रिहायशका इन्तजाम है; मवेशियोंको चरानेके लिए चरागाहकी मुफ्त व्यवस्था है; खेतीके लिए मुफ्त जमीन दी जाती है; अकाल पड़नेपर चावल बाजार-भावसे काफी कममें दिया जाता है। आप यह तो मानेंगे ही कि किसीके आगे थाली परोसकर रखी जा सकती है, लेकिन उसके मुँहमें जबरदस्ती कौर तो नहीं डाला जा सकता। उसी तरह आप किसी कुलीको कामपर तो लगा सकते हैं, लेकिन उसे काम करनेके लिए मजबूर नहीं कर सकते; और कोई चाहे दुनियाके किसी भी धन्धेमें लगा हो, काम करना तो उसके लिए जरूरी ही है। चाय-बागानों में नफरीपर भी काम कराया जाता है; और जिन दिनों ज्यादा काम रहता है उन दिनों पुरुष आसानीसे एक दिनमें ८ से १० आने तक और स्त्री ४ से ६ आने तक कमा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५३८
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
:'''वाला सस्ता कपड़ा त्याग दिया है और वे मँहगे विदेशी वस्त्रोंके पीछे पागल हैं। आभूषणोंके मामलेमें ब्राह्मण घरोंकी स्त्रियाँ सबसे आगे रहती हैं और उनमें भी श्री वैष्णव घरानोंकी स्त्रियाँ। पुरुष तो सादगीका अच्छा जीवन अपना रहे है, पर हमारी महिलाएँ फिजूलखर्च बनती जा रही हैं। मन्दिरों में ईश्वराधनाके लिए जाते समय भी उनको सादगीका पहनावा अपनानेकी बात नहीं सूझती। वे कीमतीसे-कीमती जवाहरात और ज्यादासे-ज्यादा कीमती जरी इत्यादि पहन-कर मन्दिरोंमें जाना चाहती हैं। मैं ऐसी कई ईमानदार महिलाओंको जानता हूँ जो सिर्फ इसीलिए मन्दिर नहीं जाती कि उनके पास कीमती वस्त्र और आभूषण नहीं हैं।'''
मेरे ये वैष्णव मित्र जो-जो कहते हैं उस सबकी सचाईपर विश्वास करनेका मेरा मन नहीं होता। ये सज्जन असहयोगी है और वकील है। मैं उनके इस कथनपर अविश्वास करना चाहता हूँ कि तड़क-भड़क और दिखावेके मामले में तमिल बहनें अन्य सभी प्रदेशोंकी महिलाओंसे आगे हैं। फिर भी उनके पत्रसे तमिल बहनोंको अपने बारेमें कुछ सोचनेकी प्रेरणा तो मिलनी चाहिए।उनको फिरसे अपनी पहलेकी सादगी अपनानी चाहिए। ईश्वर श निश्चय ही उन स्त्रियोंसे कहीं ज्यादा प्रसन्न होगा जो अपने हृदयकी शुचिताके प्रतीकस्वरूप बिलकुल साफ धुली खादी पहनती हैं। हमारे मन्दिर शान-शौकत और दिखावेके लिए नहीं हैं; वे तो आराधकोंकी मनःस्थितिके अनुकूल विनम्रता और सादगीकी अभिव्यक्तिके लिए है। मद्रास अहातेकी महिलाओंमें इस बुराईके खिलाफ निरन्तर प्रचार होता रहना चाहिए।
{{c|'''मध्य प्रान्तमें खादी-टोपी'''}}
मध्य प्रान्तमें सरकारी कर्मचारियों द्वारा खादीकी टोपियाँ पहनना अधिकृत रूपसे गैरकानूनी माना जाने लगा है। मध्य प्रान्त परिषद्ने सार्वजनिक रूपसे इस निर्णयका समर्थन क दिया है।मध्य प्रान्त सरकार द्वारा निर्धारित यह नियम परले दर्जेकी गुलाम मनोवृत्तिका सूचक है और खतरनाक है। यदि खादीकी टोपी असहयोग दलकी निशानी है, तो फिर खादीका इस्तेमाल भी गैर-कानूनी माना जा सकता है और इसके लिए सजा दी जा सकती है। और इस तरह तो सरकारी शब्द-कोषमें स्वदेशीको भी जुर्म माना जा सकता है। विदेशी वस्त्र आजसे दो सदी पहले भारतपर जबरन लादे गये थे। और अब भारतको फिरसे स्वदेशी अपनानेसे रोकने में जबरदस्ती की जा रही है। आम जनताकी रायका खयाल रखनेवाली किसी भी नेकनीयत सरकारको सरकारी कर्मचारियों द्वारा खादीके इस्तेमालको बढ़ावा देना चाहिए था। मैं यह नहीं मानता कि खादीकी टोपी असहयोगकी निशानी है। मैं ऐसे कई लोगोंको जानता हूँ जो असहयोगको ठीक नहीं समझते पर उन्होंने सुविधा और स्वदेशीकी निशानीके तौरपर खादीको टोपीको अपना लिया है। कांग्रेसने अभीतक सरकारी कर्मचारियोंसे नौकरियाँ छोड़नेके लिए नहीं कहा है, लेकिन मैं उनसे इतनी उम्मीद जरूर करता हूँ कि वे अपनी पसन्दका पहनावा बरकरार रखनेकी हिम्मत दिखायेंगे और इस तरह<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५०७
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बम्बईकी सार्वजनिक सभामें|४७५}}</noinclude>हमारे भीतर और बाहरकी सारी अपवित्रता दूर करे। ईश्वर करे भारतको ऐसी शक्ति प्राप्त हो कि वह अगले ३० सितम्बरतक विदेशी वस्त्रोंके पूर्ण बहिष्कारको सफल बना सके और इस प्रकार अपने पवित्र निश्चयको पूरा कर सके।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १-८-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२९. भाषण: बम्बईकी सार्वजनिक सभामें'''<ref>मोतीशाहके मंदिर, परेलको सभामें।</ref>}}}}
{{right|३१ जुलाई, १९२१}}
'''अपने भाषणके दौरान महात्मा गांधीन कहा: चरखा आपकी तलवार है। इसी शस्त्रसे आपको स्वराज्यका युद्ध लड़कर अपने देशके लिए विजय प्राप्त करनी चाहिए। चरखा ही एक ऐसा शस्त्र है जिससे आप अपने धर्मको रक्षा कर सकते हैं। इसलिए आपका कर्तव्य है कि आप देशमें खद्दरके उपयोगको आम बना दें। आपकी मुक्ति केवल स्वदेशीमें है, इसलिए यह आपका कर्तव्य हो जाता है कि आप विदेशी वस्त्रोंका उपयोग सदैवके लिए छोड़ दें। जो विदेशी वस्त्र आप इस समय पहनते हैं, वे आपको विदेशियोंके साथ जकड़ रखनेवाले बन्धन हैं। यदि आप चाहते हैं कि देश हमेशाके लिए मुक्त हो जाये तो आपको विदेशी वस्त्रोंका उपयोग छोड़ना ही होगा। यह प्रत्येक भारतीयका निश्चित कर्तव्य है कि वह अपने उन भाइयोंके बारेमें सोचे जो भुखमरीके किनारेपर खड़े हुए हैं। इसका कारण यह है कि लोग स्वदेशी वस्त्रोंका उपयोग करना छोड़कर विदेशी वस्त्रोंके आदी हो गये हैं। अब चूँकि आप समझ गये हैं कि हमारे गरीब देशवासी किस हालतमें हैं, तो क्या आप उन्हें हमेशाके लिए इसी हालतमें रहने देंगे? मुझे आशा है कि आप ऐसा नहीं करेंगे। मुझे जरा भी सन्देह नहीं कि जिन लोगोंने अभीतक विदेशी वस्त्रोंका उपयोग नहीं छोड़ा है वे तुरन्त उसे छोड़ देंगे। जो बहनें यहाँपर उपस्थित हैं, मैं उनसे भी अपील करूँगा कि वे देशकी खातिर महीन विदेशी वस्त्रोंका परित्याग करके खद्दर पहने। पूर्ण रूपसे स्वदेशीका उपयोग करके ही आप देशको गुलामीकी उन जंजीरोंसे छुड़ाने की आशा कर सकते है जिनमें वह इस समय जकड़ा हुआ है। क्योंकि सच्ची स्वदेशीका अर्थ है सच्चा स्वराज्य। आपको अपने देशको खातिर स्वराज्य तो प्राप्त करना ही है। मैं आप लोगोंसे अपील करता हूँ कि आप इस संकट-कालमें देशके प्रति अपना कर्तव्य निभायें और हमेशाके लिए स्वराज्य प्राप्त कर लें।'''
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,'''१-८-१९२१|1em}}<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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अँजली चौधरी
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'''अपने भाषणके दौरान महात्मा गांधीन कहा: चरखा आपकी तलवार है। इसी शस्त्रसे आपको स्वराज्यका युद्ध लड़कर अपने देशके लिए विजय प्राप्त करनी चाहिए। चरखा ही एक ऐसा शस्त्र है जिससे आप अपने धर्मको रक्षा कर सकते हैं। इसलिए आपका कर्तव्य है कि आप देशमें खद्दरके उपयोगको आम बना दें। आपकी मुक्ति केवल स्वदेशीमें है, इसलिए यह आपका कर्तव्य हो जाता है कि आप विदेशी वस्त्रोंका उपयोग सदैवके लिए छोड़ दें। जो विदेशी वस्त्र आप इस समय पहनते हैं, वे आपको विदेशियोंके साथ जकड़ रखनेवाले बन्धन हैं। यदि आप चाहते हैं कि देश हमेशाके लिए मुक्त हो जाये तो आपको विदेशी वस्त्रोंका उपयोग छोड़ना ही होगा। यह प्रत्येक भारतीयका निश्चित कर्तव्य है कि वह अपने उन भाइयोंके बारेमें सोचे जो भुखमरीके किनारेपर खड़े हुए हैं। इसका कारण यह है कि लोग स्वदेशी वस्त्रोंका उपयोग करना छोड़कर विदेशी वस्त्रोंके आदी हो गये हैं। अब चूँकि आप समझ गये हैं कि हमारे गरीब देशवासी किस हालतमें हैं, तो क्या आप उन्हें हमेशाके लिए इसी हालतमें रहने देंगे? मुझे आशा है कि आप ऐसा नहीं करेंगे। मुझे जरा भी सन्देह नहीं कि जिन लोगोंने अभीतक विदेशी वस्त्रोंका उपयोग नहीं छोड़ा है वे तुरन्त उसे छोड़ देंगे। जो बहनें यहाँपर उपस्थित हैं, मैं उनसे भी अपील करूँगा कि वे देशकी खातिर महीन विदेशी वस्त्रोंका परित्याग करके खद्दर पहने। पूर्ण रूपसे स्वदेशीका उपयोग करके ही आप देशको गुलामीकी उन जंजीरोंसे छुड़ाने की आशा कर सकते है जिनमें वह इस समय जकड़ा हुआ है। क्योंकि सच्ची स्वदेशीका अर्थ है सच्चा स्वराज्य। आपको अपने देशको खातिर स्वराज्य तो प्राप्त करना ही है। मैं आप लोगोंसे अपील करता हूँ कि आप इस संकट-कालमें देशके प्रति अपना कर्तव्य निभायें और हमेशाके लिए स्वराज्य प्राप्त कर लें।'''
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३०. पत्र: ज॰ बो॰ पेटिटको'''}}}}
{{right|[जुलाई १९२१ के अन्तमें]}}
{{left|प्रिय श्री पेटिट,}}
१८ तारीखके पत्रके लिए धन्यवाद स्वीकार करें। मेरा खयाल था कि रुक्का २,००० का था। मैं याददाश्तसे लिख रहा हूँ। कृपया २,००० में से ५०० रुपये भेज दीजिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी पत्र (जी॰ एन॰ ८२३१) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२३१. सन्देश: खेड़ा जिलेको जनताको'''}}}}
{{right|[१ अगस्त, १९२१ के पूर्व]}}
{{left|खेड़ाके भाइयो और बहनो,}}
मैंने आप लोगोंसे सदा बहुत आशाएँ रखी है, और अब आपने अपने हृदयोंमें भाई अब्बास तैयबजीको स्थान दिया है। इससे मेरी ये आशाएँ और बढ़ गई हैं। आपने तिलक स्वराज्य-कोषमें अपेक्षासे अधिक रकम दी। अब भारतकी यह दूसरी प्रतिज्ञा अधिक कठिन है, किन्तु वह आपके लिए कठिन नहीं हो सकती। किसानोंको विदेशी कपड़ेका मोह नहीं हो सकता। किसान लोग महीन कपड़े पहनने में संकोच करेंगे। चरखा खेड़ाके सारे भयको दूर करनेवाली प्रधान वस्तु है। हमने चरखेके
प्रभावको समझ लिया है। अब हमें सर्वथा उसीका आश्रय ले लेना चाहिए। ऐसा करने-वाले लोगोंको विदेशी कपड़ेका पूर्ण बहिष्कार करना ही चाहिए। इस कार्यको आरम्भ करनेके लिए जितना पुनीत दिवस लोकमान्य तिलककी संवत्सरीका दिन हो सकता है उतना कोई दूसरा नहीं। उस दिन आप विदेशी कपड़ेकी होली जलाकर अपना मैल धो डालें और फिर आपको कितना ही कम कपड़ा क्यों न मिले, उसीसे काम चलायें एवं
खेड़ामें ही अपनी जरूरतके लायक खादी तैयार करनेका दृढ़ संकल्प कर लें। मेरी कामना है, प्रभु इस कार्य में आपकी सहायता करे।
{{right|'''मोहनदास करमचन्द गांधी'''}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''गुजराती,''' ७-८-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५०९
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२३२. भाषण: बम्बईमें स्वदेशीपर'''}}}}
{{right|१ अगस्त, १९२१}}
'''महात्मा गांधीने कहा: आप लोग इतनी बड़ी संख्यामें यहाँ भाषण सुनने नहीं बल्कि लोकमान्य तिलककी पूजा करने आये हैं। आप यहाँपर तिलक महाराजको श्रद्धांजलि चढ़ाने आये हैं। मेरा सन्देश तो अखबारोंमें छप जायेगा, आप उसे वहाँ पढ़ सकते हैं। ऐसे लोगोंको जो एक वर्षके भीतर ही स्वराज्य प्राप्त करने के लिए कृत-निश्चय है, यहाँ इतनी बड़ी संख्यामें देखकर मेरा हृदय फूला नहीं समा रहा है। हमें इसी वर्ष स्वराज्य प्राप्त करने के लिए अधिकसे-अधिक काम करना है। इसीके लिए हमने ३० जूनसे पहले सभी प्रकारके विदेशी कपड़ोंका बहिष्कार करनेकी शपथ ली है। यह देखना हमारा कर्तव्य है कि हमने अपनी शपथको निष्ठापूर्वक निभाया है कि नहीं। मैं इससे अधिक और कुछ नहीं कहना चाहता क्योंकि ज्वार आ गया है और तेजीके साथ आगे बढ़ता चला आ रहा है। जिस धैर्य के साथ आप डटे हुए हैं उससे मालूम पड़ता है कि आप अहिंसक और असहयोगी हैं। मुझे आशा है कि हिन्दू मुसलमान, पारसी, सिख, ईसाई और यहूदी सभी ली हुई शपथको निभायेंगे।तिलकने आप लोगोंको सिखाया है कि स्वराज्य आपका जन्मसिद्ध अधिकार है, इसलिए केवल स्वतन्त्रता प्राप्त करके ही आप अपने देशके प्रति अपना कर्तव्य निभा सकेंगे। मेरी आप
लोगोंसे अपील है कि आप चुपचाप यहाँसे घर जायें और स्वदेशी-व्रतका न केवल इस समय बल्कि सदैव पालन करते रहें। मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप स्वराज्य प्राप्त करनेपर भी स्वदेशीको न छोड़ें।'''
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' २-८-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२३३. पूजाका अधिकार'''}}}}
जिसपर हमारा अधिकार न हो यदि हम ऐसा कार्य करें तो वह फलीभूत नहीं होता। धोबी हजामत करने बैठे तो खून निकाल दे। वकील इलाज करने लगे तो बंटा ढार हो जाये। अगर धूर्त मन्दिर जाये तो उसे देवीका प्रसाद अवश्य मिल जायेगा किन्तु भक्ति-भावनासे विहीन प्रार्थनाको प्रभु स्वीकार नहीं करता।
उसी तरह अगर हम अधिकार बिना तिलक महाराजकी पूजा करेंगे तो वह कदापि स्वीकृत नहीं होगी। जिसे हिन्दुस्तान अच्छा ही नहीं लगता, जो हिन्दुस्तानकी आबोहवासे अकुलाता है, जिसे हिन्दुस्तानके रीति-रिवाज जंगली लगते हैं, हिन्दुस्तानी
ढंगके भोजनको देखकर जो मुँह बिचकाता है, हिन्दुस्तानकी पोशाक जिसे काटनेको<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५१०
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४७८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दौड़ती है वह तिलक महाराजकी पूजा क्या करेगा? ऐसी पूजाको क्या तिलक महाराजकी आत्मा स्वीकार करेगी? जो व्यक्ति देवताको भक्तिपूर्वक ‘पत्रंपुष्पंफलंतोयम्’ चढ़ाता है उसपर देवता प्रसन्न होते हैं। और भक्तिका अर्थ है भावपूर्वक अनुकरण।
पुजारीकी परीक्षाको घड़ी आ पहुँची है। आज लोकमान्यकी पुण्यतिथि हम किस तरह मनायेंगे? क्या हम इसी वर्ष स्वराज्य प्राप्त करनेका दृढ़ निश्चय करेंगे? क्या हम विदेशी कपड़ेके शृंगारको उतार फेंकेंगे?
जो अपना कर्त्तव्य नहीं जानता, उसे अधिकार नहीं मिलता। जो अपना कर्तव्य अदा नहीं करता वह मुक्ति-पत्र कैसे माँग सकता है? जिस तरह स्वराज्य जन्मसिद्ध अधिकार है उसी तरह स्वदेशी भी जन्मजात कर्त्तव्य है। स्वदेशी बिना स्वराज्य नहीं होता।स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है——यह ‘तिलक गीता’ का पूर्वार्द्ध है; स्वदेशी हमारा जन्मजात कर्तव्य है——यह उत्तरार्द्ध है।
इसलिए लोकमान्यकी पुण्य-तिथि अगर हम अच्छी तरहसे मनाना चाहते हों तो वह स्वदेशी व्रतको धारण करके ही मना सकते हैं। विदेशी कपड़ेका पूर्णतया त्याग किये बिना स्वदेशी-मन्त्रका जाप नहीं हो सकता। विदेशी कपड़ा मैल है। इस मैलको निकाले बिना हम स्वच्छ नहीं हो सकते और स्वच्छ हुए बिना स्वराज्य-मन्दिरमें प्रवेश करनेका हमें अधिकार नहीं है। जैसा कि मौलाना मुहम्मद अलीने कहा है, शान्तिसे स्वराज्य प्राप्त करनेका अर्थ स्वच्छन्दता नहीं है। हम कुछ भी त्याग न करें और केवल शान्ति-पाठ ही करते रहें तो यह मात्र मन्दता अथवा आलस्य कहलायेगा। त्याग और उद्यमविहीन शान्ति तो मृत्यु है। शव-जैसी शान्तिसे क्या लाभ है? ऐसी शान्तिका क्या उपयोग हो सकता है? कायर व्यक्ति भय देखकर घरमें छिपकर बैठ जाता है। ऐसीशान्तिसे घरका नाश ही हो जाता है। हमने जिस शान्तिकी प्रतिज्ञा ली है वह वीरताकी सूचक है। विदेशी कपड़ोंका त्याग करनेकी भी अगर हममें शक्ति नहीं है, बहादुरी नहीं है, इच्छा नहीं है तो हमारी यह शान्ति केवल दम्भ है। दम्भ तो एक नाटक है। नाटक में बहाये गये आँसुओंसे क्या ज्ञानोपलब्धि होती है?
इसलिए जो व्यक्ति तिलक महाराजकी पूजाका इच्छुक है, उसे तो सम्पूर्ण स्वदेशी-व्रत लेना ही पड़ेगा। स्वदेशी वस्त्र धारण किये बिना यदि कोई लोकमान्यका स्मरण करता भी है तो उसका फल तोतेकी तरह रटी हुई ‘भागवत' जितना होगा।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १-८-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५३९
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|५०७}}</noinclude>अपने आचरणकी स्वतन्त्रताको बरकरार रखेंगे, चाहे फिर इसमें उनकी नौकरियोंपर भी क्यों न बन आये। यदि सभी सरकारी कर्मचारी मिलकर यह काम करें तो वे देखेंगे कि सरकार उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। यह मुमकिन हो या न हो, पर मुझे उनसे इतनी उम्मीद जरूर है कि व्यक्तिगत रूपसे कुछ ऐसे सरकारी कर्म-चारी अवश्य निकल आयेंगे जो खादीकी टोपी पहननेसे नहीं हिचकिचायेंगे।
{{c|'''ग्वालियरमें अन्धकार'''}}
ग्वालियर स्टेशनसे गुजरते हुए, मुझे यह देखकर ताज्जुब हुआ कि लोग हमारे डिब्बेके पास आनेमें भय खाते थे। प्लेटफार्मपर स्वदेशीका नाम-निशानतक नहीं था। दूसरे स्टेशनोंकी तरह एकने भी आकर हमें अपनी विदेशी टोपी नहीं सौंपी। इसके कारणका मुझे जल्द ही पता चल गया। उस राज्यमें असहयोग आन्दोलनपर करीब-करीब प्रतिबन्ध ही लगा दिया गया है।खादीकी टोपी पहनना और घरमें चरखा रखना अगर जुर्म नहीं तो नापसन्द तो किया ही जाता है। यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि महाराजाके विचार भी इतने प्रतिक्रियावादी होंगे।महाराजाके साथ मेरी पूरी सहानुभूति है। वैसे सरकारका विषैला प्रभाव रजवाड़ोंमें ही सबसे ज्यादा दिखाई पड़ता है, क्योंकि रजवाड़ोंके पास कोई भी ठोस किस्मका सुधार करनेकी शक्ति ही नहीं है और उनको अक्सर ही उनकी प्रजाकी स्वतन्त्रता सीमित करनेका साधन बनने-पर विवश किया जाता है। इतना ही नहीं, प्रभुता सम्पन्न सत्ताके संरक्षणने शेष भारत-की भाँति उनको भी पुंसत्वहीन और अनुत्तरदायी बना दिया है। इसलिए जब भी कोई राजा मनमानी और दमन करनेपर तुल जाता है, तो अपने राज्यमें जुल्म ढानेकी उसकी शक्ति वाइसरायसे भी कहीं ज्यादा होती है। सरकारको वर्तमान व्यवस्थामें यह एक बहुत ही बड़ी बुराई है। फिर भी, आशा है कि ग्वालियर स्टेशनपर मुझे जो खबर दी गई उसमें काफी नमक-मिर्च लगाया गया होगा और जितना मुझे बतलाया गया है राज्यमें दमनका रूप उतना नृशंस नहीं होगा।
{{c|'''लाहौरका अनुकरण कीजिये'''}}
लाहौर नगरपालिकामें असहयोगियोंका बहुमत है। उसने प्रस्ताव स्वीकार किया है कि वहाँके सभी कोचवान और ऐसे ही अन्य कर्मचारी खादीकी टोपियां पहनेंगे और नगरपालिकाके सभी विभाग खादीका यथासम्भव अधिकतम उपयोग करेंगे। कहा जाता
है कि अमृतसरके वकीलोंने अपनी पोशाकके लिए खादीको अपना लिया है। आशा है कि अन्य नगरपालिकाएँ लाहौरका अनुकरण करेंगी और देश-भरके वकील अमृतसरके वकीलोंके मार्गपर चलेंगे। देश और स्वदेशीकी खातिर वे कमसे-कम इतना तो कर ही सकते हैं।
{{c|'''श्रमिकोंका योगदान'''}}
जनताको इसका कोई अन्दाज नहीं है कि श्रमिकोंने तिलक स्वराज्य-कोषके लिए चन्दा देने में कहाँतक हाथ बँटाया है।अहमदाबादके २१ हजार मिल-मजदूरोंने इस कोषमें करीब ५४,००० रुपये दिये हैं। यह चन्दा उन्होंने निर्धारित दर, अर्थात्<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४०
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५०८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>अपनी माह्वारी मजदूरीके दसवें भागके हिसाबसे दिया था। सात हजार मजदूर सदस्य बन चुके हैं। इसी तरह बम्बईके मजदूरोंने भी बिना माँगे चन्दा भेजा है। हालाँकि उन्होंने अहमदाबादके मजदूरोंकी तरह किसी निश्चित हिसाबसे और उतना ज्यादा नहीं दिया है। मजदूरोंका यह योगदान बतलाता है कि हवाका रुख किस तरफ है। मजदूर जितने ही अधिक संगठित होते जायेंगे और अपने हितके साथ-साथ देशके हितोंका भी खयाल करते जायेंगे, उतना ही अपनी मेहनतसे तैयार होनेवाली चीजोंकी कीमतें निर्धारित करानेके लिए उनका संघर्ष तीव्रतर होता जायेगा। तब फिर मिल-मालिकों द्वारा मजदूरों और उपभोक्ताओंके हितोंकी परवाह किये बिना अपने भागीदारोंका लाभांश बढ़ानेकी गरजसे बेहिसाब कीमतें वसूल करनेका सवाल ही नहीं रहेगा। एक ऐसा वक्त जरूर आयेगा——और वह जितनी जल्दी आये उतना अच्छा होगा——जब भागीदारोंके लाभांश, मजदूरोंकी मजूरी और उपभोक्ताओं द्वारा अदा की जानेवाली कीमतोंके बीच समुचित सामंजस्य स्थापित हो जायेगा।
{{c|'''अनुशासनहीनता'''}}
मैंने दुबारा जो दौरा शुरू किया है उसका तजुर्बा पहलेके मुकाबले अच्छा नहीं रहा है। मैंने तो सोचा था कि मैं अनुशासनके बारेमें इतना लिख और बोल चुका हूँ और चूँकि हम अनुशासनके एक दौरसे गुजर ही चुके हैं, इसलिए अब इस दौरे में मुझे काफी अनुशासित और सन्तुलित किस्मके प्रदर्शन देखनेको मिलेंगे। लेकिन मुझे यह देखकर ताज्जुब ही हुआ कि स्टेशनोंपर लोगोंका हुजूम ठेला-ठेली और शोर-गुल करते हुए मिलता है। आगरा और टूँडलामें भीड़ उत्तेजित थी और लोग किसीकी बात सुननेको तैयार नहीं थे। टूँडलामें तो भीड़के कारण स्टेशनसे बाहर निकलना तक कठिन हो गया था। जाहिर है कि उनसे जो भी कुछ कहा जा रहा था वह उनको सुनाई नहीं देता था। उनसे कोई चुप रहनेको कहता तो वे जोर-जोरसे चीखने लगते थे। और मुझे जैसे-तैसे जब भोजन-कक्षमें पहुँचाया गया तो भीड़ वहाँ भी घिर आई। अन्दर झाँकनेके लिए उत्सुक लोगोंने दरवाजेके काँच तोड़-फोड़ डाले। लोग तबतक सन्तुष्ट नहीं हुए जबतक मैं उन्हें लेकर स्टेशनसे बाहर नहीं निकल आया। लेकिन मेरे भाषणके बाद काफी फर्क पड़ा। लोग हिदायतोंपर कान देने लगे। शोर-गुल भी पहलेसे कम हो गया। फिर लोग मेरे डिब्बेकी ओर बेतहाशा नहीं भागे और हम लोगोंको गुजरनेके लिए रास्ता भी दे दिया। मैं टूँडलासे कई बार गुजर चुका हूँ, पर मैंने पहले कभी इतनी भीड़ वहाँ नहीं देखी थी। पूछताछ करनेपर मुझे पता चला कि इस बार आसपासके गाँवोंके लोग सिर्फ दर्शनोंके लिए सिमट आये थे। यह ‘दर्शन’ तो एक परेशानी बन गई है, और इसमें काफी कीमती समय बेकार चला जाता है। इससे मुझे सचमुच बड़ी परेशानी होती है और यात्राके दौरान अपने लेखन-कार्य के लिए मुझे जिस शान्तिकी जरूरत है वह भी नहीं मिल पाती। इस सारी कठिनाईकी जड़में यही बात है कि हम पहलेसे कोई योजना नहीं बनाते और हम अच्छी तरहसे संगठित भी नहीं हैं। कार्यकर्ताओंको या तो इन प्रदर्शनोंको सर्वथा व्यवस्थित ढंगसे संगठित करना चाहिए या फिर इनका विचार ही त्याग देना चाहिए। गनीमत समझिए कि<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५३७
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२४९. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''बम्बई में होली'''}}
विदेशी कपड़ोंकी होली जलानेके बारेमें अगर किसीको कोई शक रह भी गया था, तो परेलमें श्री सोबानीके अहातेमें जलाई गई होलीको अपनी आँखोंसे देखनेवाले सभी लोगोंका वह शक दूर हो गया होगा। हजारों दर्शकोंने वह प्रेरणादायक दृश्य देखा था। जैसे ही आगकी लपटें ऊँची उठ-उठकर कपड़ोंके अम्बारको अपने आगोश-में भरने लगी, उपस्थित दर्शकोंकी हर्ष-ध्वनिसे आकाश गूंज उठा। लगता था जैसे हमारी जंजीरें टूक-टूक हो रही हों। सभीके चेहरोंपर स्वतन्त्रताकी आभा दमक उठी। यह शानदार काम बड़े शानदार ढंगसे सम्पन्न हुआ। मुझे पूरा भरोसा है कि लोगोंके दिमागोंपर किसी भी और चीजकी इतनी गहरी छाप न पड़ी जितनी स्वदेशीकी पड़ी है। होलीमें जलाये जानेवाले कपड़े फटे-पुराने भी नहीं थे; उनमें बढ़ियासे-बढ़िया किस्मकी साड़ियाँ, कमीजें और जाकिटें थीं। मैं जानता हूँ कि कुछ माताओंने अपनी बेटियोंकी शादीके लिए सहेजकर रखे गये रेशमी वस्त्र भी जलानेके लिए दे दिये थे। इतने कीमती कपड़ोंको जला देना काफी महत्त्व रखता है। लपटोंमें झोंके गये कपड़ोंकी तादाद किसी कद्र डेढ़ लाखसे कम नहीं थी। उनमें ऐसे-ऐसे कपड़े भी शामिल थे जिनमें से एक-एककी कीमत कई सौ रुपये बैठती। मुझे पूरा यकीन है कि यह सब देशके भलेके लिए ही हुआ। ऐसी चीजें गरीबोंको बाँटना पाप होता। जरा सोचिये इन बेशकीमती कपड़ोंमें गरीब लोग कैसे लगते। अधिक न कहा जाये तो भी इतना तो कहना ही पड़ेगा कि वह दृश्य बड़ा ही बेतुका और अभिरुचिहीन लगता। सच तो यह है कि जलाये गये अधिकतर कपड़े ऐसे थे जो गरीबोंकी जिन्दगीके साथ जरा भी मेल नहीं खाते। मध्यम-वर्गके लोगोंके पहनावेमें इतनी बड़ी तब्दीली आ गई है कि गरीबोंको वे कपड़े देना बिलकुल उचित न होता। वह तो ऐसा ही होता जैसे इस्तेमालशुदा कीमती दाँतका ब्रश किसी गरीबको देना। इसलिए मुझे आशा है कि ऐसे होली-काण्ड होते रहेंगे और वे भारतके एक छोरसे दूसरे छोरतक फैल जायेंगे और वे तबतक बन्द नहीं होंगे जबतक कि एक-एक विदेशी कपड़ा भस्म नहीं कर दिया जाता या देशसे बाहर नहीं भेज दिया जाता।
{{c|'''तमिल नारियाँ'''}}
तिरुपतिसे एक मित्र लिखते हैं:
'''मद्रासमें हमारे आन्दोलनको सफलताके मार्गमें सबसे बड़ी बाधा है मद्रासकी नारी। उनमें से कुछ तो बड़ी ही प्रतिक्रियावादी हैं और ऊँचे ब्राह्मण घरानोंकी स्त्रियोंमें से बहुत-सी ऐसी हैं जिन्हें पाश्चात्य बुराइयोंकी आदत हो गई है। वे दिनमें तीन बारसे कम काफी नहीं पीतीं; इससे और ज्यादा बार पीना ‘फैशन’
मानती हैं। भूषामें भी उनका यही हाल है। उन्होंने घरेलू तौरपर तैयार होने-'''<noinclude></noinclude>
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विदेशी कपड़ोंकी होली जलानेके बारेमें अगर किसीको कोई शक रह भी गया था, तो परेलमें श्री सोबानीके अहातेमें जलाई गई होलीको अपनी आँखोंसे देखनेवाले सभी लोगोंका वह शक दूर हो गया होगा। हजारों दर्शकोंने वह प्रेरणादायक दृश्य देखा था। जैसे ही आगकी लपटें ऊँची उठ-उठकर कपड़ोंके अम्बारको अपने आगोश-में भरने लगी, उपस्थित दर्शकोंकी हर्ष-ध्वनिसे आकाश गूंज उठा। लगता था जैसे हमारी जंजीरें टूक-टूक हो रही हों। सभीके चेहरोंपर स्वतन्त्रताकी आभा दमक उठी। यह शानदार काम बड़े शानदार ढंगसे सम्पन्न हुआ। मुझे पूरा भरोसा है कि लोगोंके दिमागोंपर किसी भी और चीजकी इतनी गहरी छाप न पड़ी जितनी स्वदेशीकी पड़ी है। होलीमें जलाये जानेवाले कपड़े फटे-पुराने भी नहीं थे; उनमें बढ़ियासे-बढ़िया किस्मकी साड़ियाँ, कमीजें और जाकिटें थीं। मैं जानता हूँ कि कुछ माताओंने अपनी बेटियोंकी शादीके लिए सहेजकर रखे गये रेशमी वस्त्र भी जलानेके लिए दे दिये थे। इतने कीमती कपड़ोंको जला देना काफी महत्त्व रखता है। लपटोंमें झोंके गये कपड़ोंकी तादाद किसी कद्र डेढ़ लाखसे कम नहीं थी। उनमें ऐसे-ऐसे कपड़े भी शामिल थे जिनमें से एक-एककी कीमत कई सौ रुपये बैठती। मुझे पूरा यकीन है कि यह सब देशके भलेके लिए ही हुआ। ऐसी चीजें गरीबोंको बाँटना पाप होता। जरा सोचिये इन बेशकीमती कपड़ोंमें गरीब लोग कैसे लगते। अधिक न कहा जाये तो भी इतना तो कहना ही पड़ेगा कि वह दृश्य बड़ा ही बेतुका और अभिरुचिहीन लगता। सच तो यह है कि जलाये गये अधिकतर कपड़े ऐसे थे जो गरीबोंकी जिन्दगीके साथ जरा भी मेल नहीं खाते। मध्यम-वर्गके लोगोंके पहनावेमें इतनी बड़ी तब्दीली आ गई है कि गरीबोंको वे कपड़े देना बिलकुल उचित न होता। वह तो ऐसा ही होता जैसे इस्तेमालशुदा कीमती दाँतका ब्रश किसी गरीबको देना। इसलिए मुझे आशा है कि ऐसे होली-काण्ड होते रहेंगे और वे भारतके एक छोरसे दूसरे छोरतक फैल जायेंगे और वे तबतक बन्द नहीं होंगे जबतक कि एक-एक विदेशी कपड़ा भस्म नहीं कर दिया जाता या देशसे बाहर नहीं भेज दिया जाता।
{{c|'''तमिल नारियाँ'''}}
तिरुपतिसे एक मित्र लिखते हैं:
'''मद्रासमें हमारे आन्दोलनको सफलताके मार्गमें सबसे बड़ी बाधा है मद्रासकी नारी। उनमें से कुछ तो बड़ी ही प्रतिक्रियावादी हैं और ऊँचे ब्राह्मण घरानोंकी स्त्रियोंमें से बहुत-सी ऐसी हैं जिन्हें पाश्चात्य बुराइयोंकी आदत हो गई है। वे दिनमें तीन बारसे कम काफी नहीं पीतीं; इससे और ज्यादा बार पीना ‘फैशन’ मानती हैं। भूषामें भी उनका यही हाल है। उन्होंने घरेलू तौरपर तैयार होने-'''<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५०४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''हैं तो वे खिलाफतको पवित्र अग्निमें अपनी बलि दे दें, किन्तु वे सौदेबाजीको भावनासे ऐसा न करें। वे मुसलमान भाइयोंसे गोवध न करनेका आग्रह भी न करें।'''
'''स्वदेशीके प्रश्नपर आते हुए उन्होंने कहा: स्वदेशीकी वकालत करनेका अर्थ है प्रतिवर्ष ६० करोड़ रुपयेकी बचत, भुखमरीसे पीड़ित अपने देशवासियोंके लिए भोजन तथा अपनी स्त्रियोंकी पवित्रताकी रक्षा। किन्तु इन सबसे बढ़कर इसका उद्देश्य है सविनय अवज्ञाके लिए तैयारी करना। यदि आप स्वदेशीके मुद्देको सितम्बरतक सफल बना देते हैं तो मैं समझूँगा कि आप सरकारको अन्तिम चेतावनी देनेके लिए पर्याप्त समर्थ हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त इसका अर्थ दुनियाको यह बतला देना भी होगा कि भारतने अपनी शक्तिको संगठित कर लिया है। मैं चाहता हूँ कि आप अपने विदेशी वस्त्रोंको जला दें। यदि आप स्मरनाकी सहायता करना चाहते हैं तो आप अपने उतारे कपड़े न भेजकर, वहाँ नकद या नये कपड़े भेजें। किन्तु यदि आप अपने काममें लाये हुए कपड़े ही भेजना चाहते हैं तो भी मैं आपत्ति नहीं करूँगा। किन्तु आपको तो अपने सभी विदेशी वस्त्रोंका त्याग करना ही होगा। आप अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके
निर्णयानुसार काम करें और करघे तथा चरखेको अपनायें। अर्थात् आपको उन कपड़ोंपर निर्भर रहना चाहिए जो आपके अपने जिलेमें तैयार होते हों। दूसरे स्थानोंसे कपड़ेका आयात नहीं करना चाहिए, चाहे आपको अर्धनग्न ही क्यों न रहना पड़े। इससे आपपर स्वदेशी वस्त्रोंका नाम लेकर विदेशी वस्त्र थोपनका खतरा मिट जायेगा।'''
'''भाषणको समाप्त करते हुए उन्होंने कहा: अब मैं यहाँ एकत्र विदेशी वस्त्रोंके ढेरमें आग लगाने जा रहा हूँ। इसमें किसीके भी प्रति दुर्भावनाकी कोई बात मेरे मनमें नहीं है। प्रेम, हिंसा और शान्ति मेरा धर्म है। अन्तमें मैं आशा करता हूँ कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ इस दिशामें अधिक कार्य करेंगी इसलिए मैं उनसे अपील करता हूँ कि वे इस कार्य में हाथ बटाएँ।'''<ref>अपने भाषणके बाद गांधीजीने विदेशी वस्त्रोंके विशाल ढेरकी होली जलाई।</ref>
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''लीडर,''' १२-८-१९२१|1em}}<noinclude>{{dhr|10em}}
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'''स्वदेशीके प्रश्नपर आते हुए उन्होंने कहा: स्वदेशीकी वकालत करनेका अर्थ है प्रतिवर्ष ६० करोड़ रुपयेकी बचत, भुखमरीसे पीड़ित अपने देशवासियोंके लिए भोजन तथा अपनी स्त्रियोंकी पवित्रताकी रक्षा। किन्तु इन सबसे बढ़कर इसका उद्देश्य है सविनय अवज्ञाके लिए तैयारी करना। यदि आप स्वदेशीके मुद्देको सितम्बरतक सफल बना देते हैं तो मैं समझूँगा कि आप सरकारको अन्तिम चेतावनी देनेके लिए पर्याप्त समर्थ हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त इसका अर्थ दुनियाको यह बतला देना भी होगा कि भारतने अपनी शक्तिको संगठित कर लिया है। मैं चाहता हूँ कि आप अपने विदेशी वस्त्रोंको जला दें। यदि आप स्मरनाकी सहायता करना चाहते हैं तो आप अपने उतारे कपड़े न भेजकर, वहाँ नकद या नये कपड़े भेजें। किन्तु यदि आप अपने काममें लाये हुए कपड़े ही भेजना चाहते हैं तो भी मैं आपत्ति नहीं करूँगा। किन्तु आपको तो अपने सभी विदेशी वस्त्रोंका त्याग करना ही होगा। आप अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके निर्णयानुसार काम करें और करघे तथा चरखेको अपनायें। अर्थात् आपको उन कपड़ोंपर निर्भर रहना चाहिए जो आपके अपने जिलेमें तैयार होते हों। दूसरे स्थानोंसे कपड़ेका आयात नहीं करना चाहिए, चाहे आपको अर्धनग्न ही क्यों न रहना पड़े। इससे आपपर स्वदेशी वस्त्रोंका नाम लेकर विदेशी वस्त्र थोपनका खतरा मिट जायेगा।'''
'''भाषणको समाप्त करते हुए उन्होंने कहा: अब मैं यहाँ एकत्र विदेशी वस्त्रोंके ढेरमें आग लगाने जा रहा हूँ। इसमें किसीके भी प्रति दुर्भावनाकी कोई बात मेरे मनमें नहीं है। प्रेम, हिंसा और शान्ति मेरा धर्म है। अन्तमें मैं आशा करता हूँ कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ इस दिशामें अधिक कार्य करेंगी इसलिए मैं उनसे अपील करता हूँ कि वे इस कार्य में हाथ बटाएँ।'''<ref>अपने भाषणके बाद गांधीजीने विदेशी वस्त्रोंके विशाल ढेरकी होली जलाई।</ref>
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<noinclude><pagequality level="1" user="आँचल तिवारी" />{{rh||भाषण: इलाहाबादकी सभामें|५०३}}</noinclude>'''आप अहिंसा और असहयोगके अर्थको भली-भाँति नहीं समझ सके हैं। असहयोगका अर्थ निष्क्रिय बैठे रहना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी शक्तिको संगठित करना, क्योंकि असहयोगके लिए महान शक्तिको आवश्यकता है। मैं ब्रिटिश झंडे यूनियन जैक के सामने, जिसके सामने फौजी कानूनके दिनोंमें पंजाबके बालकोंको अपना सिर झुकाना पड़ता था, तबतक सिर नहीं झुकाऊँगा जबतक सरकार अपने पिछले अत्याचारोंके लिए पश्चात्ताप प्रकट करके क्षमा नहीं माँगती।
आगे बोलते हुए गांधीजीने संयुक्त प्रान्तकी स्थितिका उल्लेख किया और कहा: छोटे-छोटे बालक जेल भेजे जा रहे हैं और तिसपर भी यह घोषित किया जा रहा है कि संयुक्त प्रान्तमें कहीं कोई दमन नहीं हो रहा है। संयुक्त प्रान्तकी सरकार पंजाब
सरकारसे कहीं अधिक चालाक है। उसने बड़े-बड़े नेताओंको नहीं छुआ; क्योंकि उसे डर था कि उनको गिरफ्तारीसे प्रान्तमें अशान्ति फैल जायेगी, किन्तु वह छोटे बालकों-को कालकोठरीमें बन्द करनेकी सजा दे रही है। यह दमनका भयानक तरीका है। दमनकी प्रणालीमें लोगोंको भयभीत करना तथा उन्हें नैतिक रूपसे गिरा देना भी आता है। किसानोंपर भी इसी प्रकारका दबाव डाला जा रहा है। उन्हें अमन-सभाका सदस्य बनने तथा असहयोग आन्दोलनसे अलग रहनेको मजबूर किया जा रहा है। इसके लिए मैं उच्च अधिकारियोंको दोषी ठहरानेको तैयार नहीं, क्योंकि गवर्नर और उनके सहकारी यह बात जानते हैं या नहीं, इसका मुझे अभीतक निश्चय नहीं है। मैं तो अब भी महमूदाबादके राजा और श्री चिन्तामणि<ref></ref> तथा अन्य लोगोंका सम्मान
करता हूँ। किन्तु उनके हाथ भी पापसे पंकिल हो गए है। भले ही उन्होंने वे पाप
जान-बूझकर या स्वेच्छासे न किये हों। अब वे सरकारी सदस्य बन गये हैं, इसलिए उनके
दिमाग बदल गए हैं। उन्होंने घोषित किया है कि स्वयं असहयोगी ही अपने विरोधियों-
के खिलाफ हिंसाका प्रयोग कर रहे हैं। मैं इस आरोपसे एकदम इनकार नहीं करता
और इसीलिए मैंने अलीगढ़ तथा मालेगाँवकी घटनाओंपर पश्चात्ताप व्यक्त किया है
और हिंसक कार्योंकी निन्दा की है। फिर भी मेरा विचार है कि कुल मिलाकर
असहयोगका कार्य शान्तिपूर्ण ढंगसे हो रहा है।
श्री गांधीने आगे कहा : मैं चाहता हूँ कि शान्तिकी यह भावना प्रगति करे।
सरकार आप लोगोंको जेलमें डाले या गोलीसे मारे तब भी आपको सरकारी अधि-
कारियोंको बुरा-भला नहीं कहना चाहिए और न उनका सामाजिक रूपसे बहिष्कार
ही करना चाहिए। जब आप अपने ऊपर इतना नियन्त्रण प्राप्त कर लेंगे तब
समझिए कि स्वराज्य आपका है और तभी पंजाब और खिलाफतके सम्बन्धमें आप
न्याय प्राप्त कर सकेंगे। किन्तु ऐसा तबतक सम्भव नहीं जबतक कि हिन्दू और
मुसलमान एक नहीं हो जाते। बकरीद आ रही है। यदि हिन्दू गायको बचाना चाहते
१. सर चिराचुरी पशेश्वर चिन्तामणि (१८८०-१९४१); प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक तथा राजनीतिज्ञा इलाहाबादके प्रसिद्ध दैनिक '''लीडरके सम्पादक ।<noinclude></noinclude>
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'''आगे बोलते हुए गांधीजीने संयुक्त प्रान्तकी स्थितिका उल्लेख किया और कहा: छोटे-छोटे बालक जेल भेजे जा रहे हैं और तिसपर भी यह घोषित किया जा रहा है कि संयुक्त प्रान्तमें कहीं कोई दमन नहीं हो रहा है। संयुक्त प्रान्तकी सरकार पंजाब
सरकारसे कहीं अधिक चालाक है। उसने बड़े-बड़े नेताओंको नहीं छुआ; क्योंकि उसे डर था कि उनको गिरफ्तारीसे प्रान्तमें अशान्ति फैल जायेगी, किन्तु वह छोटे बालकों-को कालकोठरीमें बन्द करनेकी सजा दे रही है। यह दमनका भयानक तरीका है। दमनकी प्रणालीमें लोगोंको भयभीत करना तथा उन्हें नैतिक रूपसे गिरा देना भी आता है। किसानोंपर भी इसी प्रकारका दबाव डाला जा रहा है। उन्हें अमन-सभाका सदस्य बनने तथा असहयोग आन्दोलनसे अलग रहनेको मजबूर किया जा रहा है। इसके लिए मैं उच्च अधिकारियोंको दोषी ठहरानेको तैयार नहीं, क्योंकि गवर्नर और उनके सहकारी यह बात जानते हैं या नहीं, इसका मुझे अभीतक निश्चय नहीं है। मैं तो अब भी महमूदाबादके राजा और श्री चिन्तामणि<ref>सर चिराचुरी पशेश्वर चिन्तामणि (१८८०-१९४१); प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक तथा राजनीतिज्ञा इलाहाबादके प्रसिद्ध दैनिक '''लीडर'''के सम्पादक।</ref> तथा अन्य लोगोंका सम्मान करता हूँ। किन्तु उनके हाथ भी पापसे पंकिल हो गए है। भले ही उन्होंने वे पाप जान-बूझकर या स्वेच्छासे न किये हों। अब वे सरकारी सदस्य बन गये हैं, इसलिए उनके दिमाग बदल गए हैं। उन्होंने घोषित किया है कि स्वयं असहयोगी ही अपने विरोधियों-के खिलाफ हिंसाका प्रयोग कर रहे हैं। मैं इस आरोपसे एकदम इनकार नहीं करता और इसीलिए मैंने अलीगढ़ तथा मालेगाँवकी घटनाओंपर पश्चात्ताप व्यक्त किया है और हिंसक कार्योंकी निन्दा की है। फिर भी मेरा विचार है कि कुल मिलाकर असहयोगका कार्य शान्तिपूर्ण ढंगसे हो रहा है।'''
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: इलाहाबादकी सभामें|५०३}}</noinclude>'''आप अहिंसा और असहयोगके अर्थको भली-भाँति नहीं समझ सके हैं। असहयोगका अर्थ निष्क्रिय बैठे रहना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी शक्तिको संगठित करना, क्योंकि असहयोगके लिए महान शक्तिको आवश्यकता है। मैं ब्रिटिश झंडे यूनियन जैक के सामने, जिसके सामने फौजी कानूनके दिनोंमें पंजाबके बालकोंको अपना सिर झुकाना पड़ता था, तबतक सिर नहीं झुकाऊँगा जबतक सरकार अपने पिछले अत्याचारोंके लिए पश्चात्ताप प्रकट करके क्षमा नहीं माँगती।'''
'''आगे बोलते हुए गांधीजीने संयुक्त प्रान्तकी स्थितिका उल्लेख किया और कहा: छोटे-छोटे बालक जेल भेजे जा रहे हैं और तिसपर भी यह घोषित किया जा रहा है कि संयुक्त प्रान्तमें कहीं कोई दमन नहीं हो रहा है। संयुक्त प्रान्तकी सरकार पंजाब सरकारसे कहीं अधिक चालाक है। उसने बड़े-बड़े नेताओंको नहीं छुआ; क्योंकि उसे डर था कि उनको गिरफ्तारीसे प्रान्तमें अशान्ति फैल जायेगी, किन्तु वह छोटे बालकों-को कालकोठरीमें बन्द करनेकी सजा दे रही है। यह दमनका भयानक तरीका है। दमनकी प्रणालीमें लोगोंको भयभीत करना तथा उन्हें नैतिक रूपसे गिरा देना भी आता है। किसानोंपर भी इसी प्रकारका दबाव डाला जा रहा है। उन्हें अमन-सभाका सदस्य बनने तथा असहयोग आन्दोलनसे अलग रहनेको मजबूर किया जा रहा है। इसके लिए मैं उच्च अधिकारियोंको दोषी ठहरानेको तैयार नहीं, क्योंकि गवर्नर और उनके सहकारी यह बात जानते हैं या नहीं, इसका मुझे अभीतक निश्चय नहीं है। मैं तो अब भी महमूदाबादके राजा और श्री चिन्तामणि<ref>सर चिराचुरी पशेश्वर चिन्तामणि (१८८०-१९४१); प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक तथा राजनीतिज्ञा इलाहाबादके प्रसिद्ध दैनिक '''लीडर'''के सम्पादक।</ref> तथा अन्य लोगोंका सम्मान करता हूँ। किन्तु उनके हाथ भी पापसे पंकिल हो गए है। भले ही उन्होंने वे पाप जान-बूझकर या स्वेच्छासे न किये हों। अब वे सरकारी सदस्य बन गये हैं, इसलिए उनके दिमाग बदल गए हैं। उन्होंने घोषित किया है कि स्वयं असहयोगी ही अपने विरोधियों-के खिलाफ हिंसाका प्रयोग कर रहे हैं। मैं इस आरोपसे एकदम इनकार नहीं करता और इसीलिए मैंने अलीगढ़ तथा मालेगाँवकी घटनाओंपर पश्चात्ताप व्यक्त किया है और हिंसक कार्योंकी निन्दा की है। फिर भी मेरा विचार है कि कुल मिलाकर असहयोगका कार्य शान्तिपूर्ण ढंगसे हो रहा है।'''
'''श्री गांधीने आगे कहा: मैं चाहता हूँ कि शान्तिकी यह भावना प्रगति करे। सरकार आप लोगोंको जेलमें डाले या गोलीसे मारे तब भी आपको सरकारी अधि-कारियोंको बुरा-भला नहीं कहना चाहिए और न उनका सामाजिक रूपसे बहिष्कार ही करना चाहिए। जब आप अपने ऊपर इतना नियन्त्रण प्राप्त कर लेंगे तब समझिए कि स्वराज्य आपका है और तभी पंजाब और खिलाफतके सम्बन्धमें आप न्याय प्राप्त कर सकेंगे। किन्तु ऐसा तबतक सम्भव नहीं जबतक कि हिन्दू और मुसलमान एक नहीं हो जाते। बकरीद आ रही है। यदि हिन्दू गायको बचाना चाहते'''<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५७
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ|
३२५}}</noinclude>:'''{{gap}}अब मैं तुम्हें बता दूं कि अगर अदालतके प्रति तुम्हारा व्यवहार आदर-पूर्ण रहेगा तो मैं भी तुम्हारे साथ शिष्टतापूर्ण व्यवहार करूंगा। अगर तुम ठीक व्यवहार नहीं करोगे तो मैं उचित तरीकेसे उसका निराकरण करनेकी कोशिश करूँगा। जो भी हो, तुम्हारे मामलेको धैर्यपूर्वक, उचित सुनवाई की जायेगी; और ठीक अवसर आनेपर तुमको अगर कोई संगत बात कहनी होगी तो उसे कहनेका तुम्हें पूरा मौका दिया जायेगा।'''
:'''{{gap}}यहाँ में इतना और बता दूं कि तुमपर जो अभियोग है, उस अभियोगसे इस अदालतमें या किसी अन्य अदालतमें यदि तुम निर्दोष साबित हुए तो तुम्हारे समाजके लोग इस जिलेमें जो अच्छा काम कर रहे हैं, उसका खयाल रखते हुए मैं मलाबार-सहायता कोषमें ५० रुपये दूंगा ।
{{Right|'''डब्ल्यू० ई० जे० डॉन्स'''}}
{{Gap}}मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि जैसे सर माइकेल ओ'डायरको कौंसिलकी शानमें
गुस्ताखी करने के लिए क्षमा माँगनेपर मजबूर किया गया था, वैसे ही उक्त मजिस्ट्रेट
पर भी दबाव डालकर क्षमा याचना कराई गई है। इस क्षमा याचनाकी शब्दावलीमें
हार्दिकता या भावनाका अभाव था क्योंकि मजिस्ट्रेटने उसी दिनकी सुनवाईके दौरान
अभियुक्तके बयानके एक हिस्सेको, जो उसे पसन्द नहीं था, कार्रवाईके विवरणसे
निकालकर उनकी धैर्यपूर्ण सुनवाई करनेका अपना वचन तोड़ दिया। उसने जो अभि-
युक्तके दोषमुक्त सिद्ध होने की शर्तपर वफादार लोगोंका खयाल करके मलाबार सहायता
कोषमें ५० रुपये देने की बात कही, उससे सिद्ध होता है कि वह सही रास्तेपर आ ही
नहीं सकता। उस दानका उद्देश्य उस अपराधको धोना था जो मजिस्ट्रेटने किया था ।
वफादार लोगोंका अभियुक्तके दोषी अथवा निर्दोष सिद्ध होनेसे क्या सम्बन्ध हो सकता
था ? फिर उस दानके पीछे अभियुक्तके निर्दोष होनेकी शर्त लगानेकी क्या जरूरत थी ?
मजिस्ट्रेटने जो अभियुक्तको थप्पड़ लगवाये, उससे एक बहुत गम्भीर सवाल उठ खड़ा
होता है। क्या ऐसा कोई व्यक्ति किसी सभ्य सरकारमें एक दिन भी मजिस्ट्रेटके पद-
पर आसीन रह सकता था ? उदाहरणके लिए, क्या इंग्लैंड के मुख्य न्यायाधीश महोदय,
जिस कैदीके मामलेकी सुनवाई हो रही हो, उसे थप्पड़ लगवाने के बाद अपने पदपर
आसीन रह सकते ? अगर भारत सरकार बिलकुल नियम-विधान रहित और सर्वथा
गैरजिम्मेदार सरकार नहीं होती तो मजिस्ट्रेटको तुरन्त मुअत्तिल करके उसपर एक
जरायमपेशा आदमीकी तरह मुकदमा चलाया जाता । एक न्यायाधीश द्वारा किसी
अभियुक्तके मुकदमेकी सुनवाईके दौरान उस अभियुक्तको पिटवाना कोई मामूली बात
नहीं है और उसे यों ही टाला नहीं जा सकता ।
सहयोग करते जानेमें भी धीरजकी कोई हद होती है। क्या सम्बन्धित भारतीय
मन्त्रियोंकी आत्मा, मजिस्ट्रेटने राष्ट्रके प्रति जो अपराध किया है उसके लिए उन्हें
धिक्कार नहीं देती ? या वे ऐसा मानते हैं कि चूंकि मजिस्ट्रेट उनके विभागमें नहीं
है, इसलिए उनपर उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है ?
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
53s5xouoa2ucxgom1gqaow51covpfcp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५८
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|३२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{gap}}असहयोगीका कर्तव्य सीधा-सादा है। सरकारी अधिकारियों द्वारा कानून और
नैतिकताको भंग करनेके ऐसे एक-एक मामलेसे हमें अपने काममें और भी संकल्पके साथ
जुट जानेकी प्रेरणा मिलनी चाहिए। जिस प्रणालीके अन्तर्गत ऐसा बर्बरतापूर्ण आचरण
सम्भव है, वह प्रणाली जबतक जड़मूलसे नष्ट नहीं हो जाती तबतक हम सन्तुष्ट नहीं
हो सकते ।
{{C|'''अभियुक्तका बयान'''}}
अपने मामलेकी दूसरी सुनवाईसे दो दिन पूर्व श्री त्यागीने मजिस्ट्रेटको निम्न-
लिखित बयान भेजा :
:'''वन्देमातरम्,'''
:'''बुलन्दशहरके जिला मजिस्ट्रेटके न्यायालयों ।'''
:'''भारतीय दण्ड संहिताके खण्ड १२४ और १५३के अधीन अभियुक्त'''
{{C|'''महावीर त्यागीकी ओरसे'''}}
:'''{{gap}}मैं, महावीर त्यागी, एक निर्दोष अभियुक्त, निम्नलिखित बयान देनेपर मजबूर हो गया हूँ। इस बयान में मैं कहना चाहता हूँ कि उक्त मजिस्ट्रेटन अपने अत्याचार और अयोग्यताका परिचय देते हुए इसी ३ तारीखको खुली अदालतमें मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया जो मेरे आत्म-सम्मान, धर्म और राष्ट्रीयताको चोट पहुँचानेवाला था। उसने मुझे "सावधान" मुद्रामें खड़े रहने को मजबूर किया और मुझे धमकी दी कि तुम्हें पुलिससे ठोकरें लगवाऊँगा और सचमुच मुझे थप्पड़ लगवाये भी । मजिस्ट्रेटका यह कार्य सर्वथा गैर-कानूनी और बर्बरतापूर्ण था। इसलिए अपने राष्ट्रीय, धार्मिक और व्यक्तिगत सम्मान तथा स्वाभिमानको रक्षा करनेके लिए मैंने, विरोधके तौरपर, मौनव्रत धारण करनेका निश्चय किया है, और तय किया है कि जिस अदालतने सारे कानून-कायदे ताकपर रख दिये हैं उसमें में अपना मुँह नहीं खोलूंगा।'''
:'''{{gap}}(टिप्पणी -- यहाँ बयानमें से अदालतने अभियुक्तकी इच्छाके खिलाफ निम्नलिखित शब्द निकाल दिये और उसपर हस्ताक्षर और तारीख दिलवा दी : "जैसी कि पंजाबमें मेरी बहनोंको बेहुरमती की गई और वह बेहुरमती इन्साफके लिए दरबार-ए-इलाहीमें पेश है", वैसे ही) में अपनी बेहुरमतीको भी, जो उन बहनोंकी बेहुरमतीके मुकाबले कुछ नहीं है, दरबार-ए-इलाहीके इन्साफपर छोड़ता हूँ। यह सम्भव है कि मेरे साथ जो दुर्व्यवहार किया गया, उसका उद्देश्य जनताको भड़काना रहा हो, लेकिन मैं अपने अनुभवसे यही कहूँगा कि अब भारतकी जनता काफी समझदार हो गई है। वह हर अत्याचार बरदाश्त कर सकती है,लेकिन महात्मा (गांधी) ने उसके लिए जो अहिंसात्मक कार्यक्रम निर्धारित कर दिया है, उससे वह एक पग भी पीछे नहीं हटेगी।'''
:'''अपने देशकी आजादीके लिए ईश्वरसे प्रार्थना करता हुआ-'''
{{Right|'''मैं हूं,'''<br>
'''मौनव्रती'''<br>
'''महावीर त्यागी'''}}
{{Left|'''बुलन्दशहर जेल,'''<br>
'''४ अक्तूबर, १९२१'''}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५९
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ|
३२७}}</noinclude>{{gap}}यह बड़ा साहसपूर्ण और निर्भीक बयान है, और अगर इसमें कही गई बातें
श्री त्यागीकी अपनी ही भावनाएँ व्यक्त करती हैं तो जिस समय उनको थप्पड़ लगाये
गये थे उस समय के उनके आचरणमें साहसका अभाव देखनेवालोंको अपना विचार
बदलनेकी जरूरत है। मामला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे कैदियोंकी
शारीरिक सुरक्षाका सवाल जुड़ा हुआ है। इसलिए इससे उठनेवाले सवालपर कुछ
विस्तारपूर्वक विचार करना जरूरी है।
मेरे विचारसे तो "मुंह बन्द रखने" और "मौनव्रती " का खिताब लेनेसे कोई
फायदा नहीं है। जिस दिन कैदीको पीटा गया, उस दिन उसका स्पष्ट कर्त्तव्य था
कि वह स्वेच्छासे अदालतमें रहने से इनकार कर देता । उसे तत्काल उसी स्थानपर उस
तथाकथित जज द्वारा अपने मुकदमेकी सुनवाईकी कार्रवाईमें शरीक होनेसे इनकार कर
देना चाहिए था । उसे इतना तो करना ही चाहिए था कि वह वहाँ बैठ जाता और
इस तरह जाहिर कर देता कि वह उस न्यायालयके अधिकार क्षेत्रको स्वीकार नहीं
करता । इस सबका मतलब शायद यह होता कि उसे और मारा जाता, और सजा तो
ज्यादा दी ही जाती। लेकिन बलवानके अस्त्रके रूपमें अहिंसाके प्रयोगका मर्म ही यह
कि अत्याचारके निवारणके लिए खुशी-खुशी कष्ट उठाया जाये और शारीरिक चोट
सहनेके लिए तैयार रहा जाये । सामान्यतया इस आन्दोलनमें वारंट आनेपर अदालत में
हाजिर होनेकी अपेक्षा की जाती है या उसकी छूट दी गई है क्योंकि इसमें वैसे
आचरणकी पूर्वकल्पना नहीं की गई थी जैसा कि बुलन्दशहरके मजिस्ट्रेटने किया ।
लेकिन मजिस्ट्रेटके इस असामान्य आचरणका तकाजा है कि उसके निराकरण के लिए
असामान्य उपाय भी अपनाया जाये ।
बयानमें अहिंसापर जोर दिया गया है, और यह ठीक ही किया गया है।
लेकिन कोई मुझे गलत न समझे । अहिंसाकी प्रतिज्ञा हमपर यह बन्धन नहीं डालती कि
कोई हमारा अपमान करे और हम उसमें सहयोग करें। इसलिए अहिंसाकी प्रतिज्ञा
हमसे यह अपेक्षा नहीं रखती कि हम अधिकारियोंका आदेश मिलते ही चुपचाप पेटके
बल रेंगने लगें, या नाकसे लकीरें खींचें, या ब्रिटिश झंडेको सलामी देने जायें या ऐसा
कुछ करें जो हमारे लिए अपमानजनक हो। इसके विपरीत, हमने जिस धर्म और
सिद्धान्तको अपनाया है, उसका तकाजा यह है कि भले ही हमें गोलीसे उड़ा दिया
जाये, किन्तु हम ऐसा कोई काम नहीं करें। तो उदाहरण के तौर पर कह सकते हैं
कि जब जलियाँवाला बागमें लोगोंपर गोलियाँ चलने लगीं तो उस समय वहाँसे भाग
खड़े होना या कि पीठ दिखाना उनका कर्तव्य नहीं था । अगर उनतक अहिंसाका
सन्देश पहुँचा होता तो उनसे अपेक्षा यही की जाती कि जब उनपर गोलियाँ चलने
लगीं, उस समय वे सीना खोलकर आगे बढ़ते और इस विश्वास के साथ अपने प्राण
उत्सर्ग कर देते कि उनका यह प्राणोत्सर्ग उनके देशको मुक्ति दिलायेगा । जो अहिंसाका
व्रती है वह अत्याचारीकी शक्तिपर हँसता है और उसके वारका जवाब न देकर
तथा अपने स्थानपर डटा रहकर उसे निष्प्रभ बना देता है। हम लोग जनरल
डायरके हाथोंमें खिलौने बन गये, क्योंकि हमने वैसा ही आचरण किया जैसे आचरणकी
वे आशा रखते थे। वे चाहते थे कि उनकी गोलियोंकी बौछारसे डरकर हम भाग<noinclude></noinclude>
ohk3p62leanine0igwjxqtxv5hubmnx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४८२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४५०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>इस बात का विचार रहा है कि आघात पहुँचाने वाले के साथ हम कैसा व्यवहार करें
जिससे उसको आघात न पहुँचे बल्कि हम कुछ-न-कुछ उसका भला ही करें। असहयोग
का मूल दया में निहित है, रोष में नहीं। कदाचित् हम स्वयं भूलते हों यह सोचकर
हम अपने विरोधी पर रोष नहीं करते। उससे हम स्वयं दूर भागते हैं।
इस तरह भागने का परिणाम अवश्य गंभीर होता है। इसलिए जिन व्यक्तियों
अथवा जिस संस्था से हम असहयोग करते हैं उस संस्था को चलाने वाले व्यक्तियों को
आघात तो अवश्य पहुँचता है लेकिन दयाधर्म का अर्थ यह नहीं है कि आघात कभी
किया ही न जाये। कविश्री से मैंने ऐसा दयाधर्म नहीं सीखा है। हमारे अपने सत्कार्य से,
कर्तव्य-पालन से दूसरों को दुःख होता हो तो उसे सहकर भी सत्कार्य करने में ही सच्चा
दयाधर्म है।
मैं अनेक बार कह चुका हूँ कि मैंने बहुत सारे व्यक्तियों के जीवन से बहुत-कुछ
ग्रहण किया है। लेकिन सबसे अधिक अगर मैंने किसी के जीवन से ग्रहण किया है तो
वह कविश्री के जीवन से ही किया है। दयाधर्म भी मैंने उनके जीवन से सीखा है। ऐसा
एक भी कार्य नहीं हो सकता जिससे किसी को भी आघात न पहुँचता हो लेकिन यह
आघात दया से प्रेरित होना चाहिए।
इस आघात की दो शर्तें हैं :
(१) हम अमुक कार्य तभी कर सकते हैं जब हमें अपने प्रतिपक्षी व्यक्ति से
अधिक आघात पहुँचता हो।
(२) हमारा हेतु अत्यन्त शुभ होना चाहिए, उसमें अपने विरोधी का कल्याण
भी हमारे मन में होना चाहिए।
मान लीजिये कि मेरा लड़का शराब पीता है, बीड़ी पीता है, व्यभिचारी है। वह
मुझसे पैसा मांगता है। आज तक तो उसने माँगा और मैंने दिया क्योंकि मैं एक अंधा
बाप था। मैंने रायचंदभाई के प्रसंग से सीखा कि मुझे स्वयं तो शराब-बीड़ी आदि नहीं ही
पीनी चाहिए, व्यभिचार नहीं करना चाहिए लेकिन दूसरों को भी उसमें से उबार लेना
चाहिए। इसलिए मेरा धर्म है कि मैं अपने लड़के को पैसा न दूं, उसके हाथ में शराब का
प्याला देखूं तो उसे छीन लूँ। मुझे मालूम हो कि वह अमुक संदूक में शराब रखता
है तो मुझे वह संदूक जला डालना चाहिए; बोतल देखूं तो मुझे उसे फोड़ डालना
चाहिए। ऐसा करने से लड़के को तो जरूर आघात पहुँचेगा और वह मुझे क्रूर बाप
मानेगा। दयाधर्म को समझने वाला बाप, पुत्र को आघात पहुँचेगा, यह सोचकर नहीं डरता,
पुत्र के श्राप से वह घबराता नहीं है। इस अवसर पर दयाधर्म,
परोपकार-धर्म ही यह
बताता है कि उसके हाथ में से शराब की बोतल छीन लेनी चाहिए। बलप्रयोग के द्वारा
मैं भले ही उससे बोतल न छीनूं लेकिन मुझे अगर मालूम हो कि घर में अमुक स्थान
पर वह बोतल रखता है तो वहाँ से बोतल लेकर मैं उसे फोड़ अवश्य डालूंगा।
रायचंदभाई ने दयाधर्म का बहुत ही सुन्दर मापदंड प्रस्तुत किया है। उनका
कहना है कि हम सामान्य मामलों में किसी को व्यर्थ नाराज न करें, दयाधर्म का नाम लेकर
दूसरों को छोटी-छोटी बात में टोकने न बैठ जायें, दयाधर्म के इस सामान्य नियम को अगर<noinclude>{{dhr|2}}
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४५०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>इस बात का विचार रहा है कि आघात पहुँचाने वाले के साथ हम कैसा व्यवहार करें
जिससे उसको आघात न पहुँचे बल्कि हम कुछ-न-कुछ उसका भला ही करें। असहयोग
का मूल दया में निहित है, रोष में नहीं। कदाचित् हम स्वयं भूलते हों यह सोचकर
हम अपने विरोधी पर रोष नहीं करते। उससे हम स्वयं दूर भागते हैं।
इस तरह भागने का परिणाम अवश्य गंभीर होता है। इसलिए जिन व्यक्तियों
अथवा जिस संस्था से हम असहयोग करते हैं उस संस्था को चलाने वाले व्यक्तियों को
आघात तो अवश्य पहुँचता है लेकिन दयाधर्म का अर्थ यह नहीं है कि आघात कभी
किया ही न जाये। कविश्री से मैंने ऐसा दयाधर्म नहीं सीखा है। हमारे अपने सत्कार्य से,
कर्तव्य-पालन से दूसरों को दुःख होता हो तो उसे सहकर भी सत्कार्य करने में ही सच्चा
दयाधर्म है।
मैं अनेक बार कह चुका हूँ कि मैंने बहुत सारे व्यक्तियों के जीवन से बहुत-कुछ
ग्रहण किया है। लेकिन सबसे अधिक अगर मैंने किसी के जीवन से ग्रहण किया है तो
वह कविश्री के जीवन से ही किया है। दयाधर्म भी मैंने उनके जीवन से सीखा है। ऐसा
एक भी कार्य नहीं हो सकता जिससे किसी को भी आघात न पहुँचता हो लेकिन यह
आघात दया से प्रेरित होना चाहिए।
इस आघात की दो शर्तें हैं :
(१) हम अमुक कार्य तभी कर सकते हैं जब हमें अपने प्रतिपक्षी व्यक्ति से
अधिक आघात पहुँचता हो।
(२) हमारा हेतु अत्यन्त शुभ होना चाहिए, उसमें अपने विरोधी का कल्याण
भी हमारे मन में होना चाहिए।
मान लीजिये कि मेरा लड़का शराब पीता है, बीड़ी पीता है, व्यभिचारी है। वह
मुझसे पैसा मांगता है। आज तक तो उसने माँगा और मैंने दिया क्योंकि मैं एक अंधा
बाप था। मैंने रायचंदभाई<ref>१. गुजरातकी आम जनता श्रीमद् राजचन्द्रको इसी तरह पुकारती है ।</ref> के प्रसंग से सीखा कि मुझे स्वयं तो शराब-बीड़ी आदि नहीं ही
पीनी चाहिए, व्यभिचार नहीं करना चाहिए लेकिन दूसरों को भी उसमें से उबार लेना
चाहिए। इसलिए मेरा धर्म है कि मैं अपने लड़के को पैसा न दूं, उसके हाथ में शराब का
प्याला देखूं तो उसे छीन लूँ। मुझे मालूम हो कि वह अमुक संदूक में शराब रखता
है तो मुझे वह संदूक जला डालना चाहिए; बोतल देखूं तो मुझे उसे फोड़ डालना
चाहिए। ऐसा करने से लड़के को तो जरूर आघात पहुँचेगा और वह मुझे क्रूर बाप
मानेगा। दयाधर्म को समझने वाला बाप, पुत्र को आघात पहुँचेगा, यह सोचकर नहीं डरता,
पुत्र के श्राप से वह घबराता नहीं है। इस अवसर पर दयाधर्म,
परोपकार-धर्म ही यह
बताता है कि उसके हाथ में से शराब की बोतल छीन लेनी चाहिए। बलप्रयोग के द्वारा
मैं भले ही उससे बोतल न छीनूं लेकिन मुझे अगर मालूम हो कि घर में अमुक स्थान
पर वह बोतल रखता है तो वहाँ से बोतल लेकर मैं उसे फोड़ अवश्य डालूंगा।
रायचंदभाई ने दयाधर्म का बहुत ही सुन्दर मापदंड प्रस्तुत किया है। उनका
कहना है कि हम सामान्य मामलों में किसी को व्यर्थ नाराज न करें, दयाधर्म का नाम लेकर
दूसरों को छोटी-छोटी बात में टोकने न बैठ जायें, दयाधर्म के इस सामान्य नियम को अगर<noinclude>{{dhr|2}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||भाषण : राजचन्द्र जयन्ती के अवसरपर, अहमदाबाद में|४५१}}</noinclude>हम समझ लें तो ऐसी अनेक बातें, जो हमारी समझमें पूरी तरह नहीं आती हम लोक-
लज्जावश ही करने लग जायें। खादी किसलिए पहनी जायें यह बात मुझे समझमें
न आये और मुझे झीनी मलमल अच्छी लगती हो तो भी जिस समाजमें मैं रहता
हूँ वहाँ सब खादी पहनते हैं और खादी पहनने में कुछ बुरा नहीं है, कोई अधर्मं
नहीं है ऐसा समझकर मैं वही करूँगा जो उस समाजमें होता है । यह सरल नियम
मुझे रायचन्दभाईने ही सिखाया ।
बम्बई में हम एक बार दयाधर्मकी चर्चा कर रहे थे । चमड़ेका उपयोग करना
चाहिए अथवा नहीं, इसका विचार हो रहा था । हम दोनोंने अन्तमें स्वीकार किया कि
चमड़े के बिना तो नहीं चल सकता । खेती जैसे उद्योग तो चलने ही चाहिए; लेकिन अगर
कुछ नहीं तो चमड़ा माथेपर तो कदापि नहीं पहनना चाहिए। मैं तो स्वभावसे ही
जरा मजाक-पसन्द ठहरा। मैंने पूछा कि आपकी सिरकी टोपीमें क्या है ? वे स्वयं तो
आत्मचिन्तनमें लीन रहनेवाले थे । स्वयं क्या पहनते हैं, क्या ओढ़ते हैं इसका विचार
करने नहीं बैठते थे । टोपीमें चमड़ा लगा हुआ है, यह उन्होंने देखा नहीं था । लेकिन
जैसे ही मैंने उन्हें बताया वैसे ही उन्होंने टोपीमें से चमड़ा तोड़कर फेंक दिया। मुझे
ऐसा नहीं लगता, मेरी दलील इतनी सशक्त थी कि वह तुरन्त उनके मनमें उतर गई,
उन्होंने तो दलील ही नहीं की। उन्होंने यही सोचा होगा कि इसका हेतु अच्छा है,
मेरे प्रति पूज्यभाव रखता है, उसके साथ बहस किसलिए करूँ ? उन्होंने तो तुरन्त
चमड़ेको उतार फेंका और मैं समझता हूँ कि बादमें उन्होंने कभी चमड़ा नहीं पहना ।
लेकिन अगर कोई मुझसे आज आकर यह बात कहे कि उसने उन्हें बादमें भी चमड़े-
की टोपी पहनते हुए देखा है तो भी मुझे उससे आघात नहीं पहुँचेगा। अगर मैं फिर
उनके पास पहुँचूँ तो वे उसे फिर उतार फेंकेंगे। वह इसीलिए रह गया होगा कि
उसकी ओर उनका ध्यान ही नहीं था ।
इसीमें महापुरुषका महत्व है। इससे यह पता चलता है कि उनमें मिथ्याभिमान
नहीं होता । वे बालकसे भी सीख लेने को तैयार रहते हैं। बड़े लोग छोटी बातों में
मतभेद नहीं रखते हैं। छोटी-छोटी बातोंमें जो दयाधर्मका बहाना करके मतभेद रखता है,
और आत्माकी आवाजकी बात करता है उससे मैं कहता हूँ कि उसे आत्माकी आवाज
सुनाई नहीं पड़ती या फिर पशुकी तरह उसकी आत्मा सुप्त है। अधिकतर मनुष्योंकी
आत्मा सुप्तावस्थामें ही रहती है। मनुष्यमें और पशुमें इतना ही भेद है कि मनुष्यकी
आत्मा सम्पूर्ण रूपसे जाग्रत हो सकती है। अगर हम निन्यानवे अवसरोंपर दुनियाके
साथ चलते हों तो सौवें अवसरपर उससे कह सकते हैं कि वह सही नहीं है । जन्मके
साथ ही जो दुनियाके साथ वैर बाँध लेता है वह प्रेम कैसे कर सकता है ?
अधिकांश अवसरोंपर तो हमें ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए मानो हम जड़
हों । शुद्ध जड़ और चैतन्यमें भेद नहीं के बराबर है । सारा जगत जड़ रूपमें ही दिखाई
देता है, आत्मा तो कभी-कभी ही चमकती है। अलौकिक पुरुषका व्यवहार ऐसा ही
होता है और मैंने देखा है कि ऐसा ही व्यवहार रायचन्दभाईका था ।
वे अगर आज जीवित होते तो इस समय जो प्रवृत्ति चल रही है उसको उन्होंने
जरूर आशीर्वाद दिया होता। इस वस्तुमें धर्म है। जिसकी आत्मामें दयाधर्म वास<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४८४
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2026-08-18T05:31:11Z
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करता है वह इसमें पड़े बिना रह ही नहीं सकता। इसमें से राजनैतिक, आर्थिक आदि
विषयों के परिणाम तो सुन्दर आयेंगे ही, लेकिन सबसे सुन्दर परिणाम तो यह होगा कि
इस प्रवृत्ति से बहुत सारे लोगों का उद्धार हो जायेगा, बहुत सारे मोक्ष के योग्य बन
जायेंगे। अगर साल के अन्त में हमें ऐसा अनुभव न हो तो मेरे लिए जीना दूभर हो
जायेगा।
वे बहुत बार कहा करते थे कि अगर कोई मुझे चारों ओर से बरछी भोंके तो मैं
उसे सह सकता हूँ, लेकिन जगत में जो झूठ, पाखंड और अत्याचार चल रहा है, धर्म के
नाम पर जो अधर्म किया जा रहा है उसकी बरछी सहन नहीं होती। अत्याचारों पर
उन्हें रोष आता था और मैंने उन्हें अनेक बार क्रोधित होते हुए देखा है। उनके लिए
सारा जगत् उनका सगा था। अपने भाई अथवा बहन को मरते देख हमें जो क्लेश होता
है उतना ही क्लेश उन्हें जगत में दुःख और मृत्यु को देखकर होता था। अगर कोई कहता
कि लोग अपने पाप के कारण दुःख पा रहे हैं, तो वे कहते : लेकिन उन्हें पाप करना
क्यों पड़ा ? जब पुण्य को सरल मार्ग नहीं मिलता और बड़ी-बड़ी खाइयों और पर्वतों को
लाँघना पड़ता है तब उसे हम कलिकाल कहते हैं। उस समय जगत में पुण्य बहुत नहीं
दिखाई देता, स्थान-स्थान पर पाप ही दिखाई देता है। पुण्य के नाम पर पाप चल पड़ता
है। वैसी स्थिति में अगर हम दयाधर्म का पालन करना चाहें तो हमारी आत्मा क्लेश से
विकल होनी ही चाहिए। हमें ऐसा लगेगा कि ऐसी स्थिति में जीवित रहने की अपेक्षा
तो देह जर्जरित हो जाये अथवा उसका अवसान हो जाये, यही ज्यादा अच्छा है।
रायचंदभाई का इतनी कम उम्र में देहावसान हो गया, इसका कारण भी मुझे
यही लगता है। यह सच है कि वे बीमार थे, लेकिन जगत के ताप का जो कष्ट उन्हें
था वह उनके लिए असह्य था। अगर उन्हें केवल शारीरिक कष्ट ही होता तो वे जरूर
उस पर विजय पा लेते। लेकिन उन्हें लगा कि ऐसे विषम काल में आत्मदर्शन कैसे हो
सकता है ? यह उनके दयाधर्म का सूचक है।
दयाधर्म की परिसीमा खटमल को न मारने में नहीं है। यह सच है कि खटमल को
नहीं मारना चाहिए, लेकिन खटमलों की उत्पत्ति को भी रोकना चाहिए। खटमलों को
मारने में जितनी क्रूरता है उससे कहीं अधिक क्रूरता उनको उत्पन्न होने देने में है।
हम सब खटमलों को पैदा करते हैं, श्रावक भी ऐसा ही करते हैं और मैं वैष्णव
भी ऐसा करता हूँ। हम शौचादि के नियमों से परिचित ही नहीं हैं। परिग्रह को बढ़ाते
समय हम कोई विचार नहीं करते और अनावश्यक वस्तुओं के परिग्रह से खटमल नहीं
होंगे तो और क्या होगा ?
खटमल, मच्छर आदि क्षुद्र जन्तुओं को न मारने में दयाधर्म है। लेकिन इससे बढ़कर
दयाधर्म तो यह है कि हम मनुष्य की हत्या न करें। मनुष्य को मारें अथवा खटमल को -
यह प्रश्न उपस्थित होने पर हम क्या करेंगे ? मनुष्य को मारकर मच्छर को उबारने का
प्रसंग आना भी सम्भव है। मैं तो इन दोनों तरह के प्रसंगों से छुटकारा पाने का मार्ग
बताता हूँ और वह है दयाधर्म।
कविश्री का कहना था कि "जैन-धर्म अगर श्रावकों के हाथ में न गया होता तो
इसके तत्त्वों को देखकर जगत चकित हो उठता। बनिये तो जैन-धर्म के तत्त्वों को बदनाम<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४८५
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||भाषण : राजचन्द्र जयन्ती के अवसरपर, अहमदाबादमे|४५३}}</noinclude>कर रहे हैं। वे तो चींटियोंको 'चून' डालते हैं । आलू उनके मुँहमें चला जाये तो उन्हें
दुःख होता है । ऐसी छोटी-छोटी बातोंमें वे धर्मका पालन करते हैं। उनकी यह सावधानी
उन्हें मुबारक हो लेकिन जो यह मानते हैं कि इनमें ही जैन-धर्मकी परिसीमा है,
वे लोग धर्मकी निम्न से निम्नतर श्रेणी में आते हैं । इतना सा धर्म तो पतितका धर्म है, यह
पुण्यवान्का धर्म नहीं है ।" इसलिए अनेक श्रावक कहते हैं कि राजचन्द्रको धर्मका
भान न था, वे दम्भी थे, अहंकारी थे। मैं स्वयं तो यह जानता हूँ कि उनमें दम्भ अथवा
अहंकारका नाम भी न था ।
यद्यपि खटमल आदि जन्तुओंको नष्ट नहीं करना चाहिए तथापि उनको न मारने
तक ही दयाधर्म सीमित नहीं है । उन्हें न मारना धर्मकी पहली सीढ़ी-भर है । किसी
समय लोगों में ऐसी मान्यता रही होगी कि मनुष्यको बचानेकी खातिर किसी भी जन्तुकी
हत्या करना पाप नहीं है; उस समय कोई साधु खड़ा हुआ होगा और उसने जन्तुओं-
की रक्षापर अधिक जोर दिया होगा । इस साधुने कहा होगा कि 'मूर्ख ! इस
क्षणभंगुर देहकी खातिर जन्तुओंका नाश न कर। बल्कि तेरे मनमें इस बातकी आतु-
रता होनी चाहिए कि यह देह कल नष्ट होता हो तो आज ही नष्ट हो जाये । "
और इससे अहिंसाका जन्म हुआ होगा । लेकिन जो खटमलको तो नहीं मारता परन्तु
अपनी स्त्री और पुत्रपर हाथ उठाता है वह व्यक्ति न तो जैन है, न हिन्दू है और न
वैष्णव ही है; वह तो शून्य है । हम कविश्री के जन्मोत्सव के मंगल अवसरपर दयाधर्मके
संकुचित अर्थको छोड़ उसके व्यापक अर्थको ग्रहण करें। एक भी जीवको दुःख देना,
उसे दुश्मन मानना, पाप है। जो यह चाहते हैं कि जनरल डायरको फाँसी दी जाये,
सर माइकेल ओ'डायरको सुलगती हुई भट्टीमें झोंक दिया जाये • वह श्रावक नहीं है,
वैष्णव भी नहीं, और न हिन्दू ही । वह कुछ भी नहीं है । अहिंसाका रहस्य यही है कि
क्रोधका शमन करें, आत्माकी मलिनताको दूर करें । जनरल डायरकी परीक्षा लेनेवाला
मैं कौन हूँ? मैं जानता हूँ कि मैं रोषसे भरा हुआ हूँ। मैं मन-ही-मन कितने ही लोगों-
की हत्या करता होऊँगा, तब तो जनरल डायरका विचार करनेवाला मैं कौन ? इसलिए
मैंने निश्चय किया है कि अगर कोई मुझे तलवारसे मारे तो भी मुझे उसको नहीं
मारना है । यह दयाधर्म है; यही असहयोग आन्दोलनका रहस्य है ।
लेकिन जब मैं बोलता हूँ तब मैं दयाधर्म शब्दका प्रयोग नहीं करता । आज
रायचन्दभाईकी जयन्ती होने के कारण मैं दयाधर्मकी बात करता हूँ। मैं जानता हूँ कि
इस आन्दोलनका परिणाम तो यही है और यह परिणाम होगा तो लोग अपने-आप
ही इस बातको जान लेंगे ।
सर्पको मारनेमें पाप है लेकिन उसकी अपेक्षा मनुष्य शरीरधारी सर्प अथवा
बाघको मारनेमें अधिक पाप है। पशु-बाघको तो हम भयवश होकर मारते हैं, क्रोध से
प्रेरित होकर नहीं । यदि वास्तवमें कोई धर्मराज है और वह हमारे पाप-पुण्यका निर्णय
करता है तो वह बाघको मारनेवाले व्यक्तिपर दया खाकर कदाचित् उसे माफ कर
देगा। क्योंकि उसमें तो उस व्यक्तिने अपने पशुधर्मका ही पालन किया, एक पशु
दूसरे पशुको मार डाला। लेकिन मनुष्यकी हत्या करनेमें तो क्रोधका भाव होता
है, अभिमान होता है, दम्भ होता है । धर्मराज कहेगा : 'अरे मूर्ख ! तूने अमुक<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४८६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="सूरज साव" />{{rh|४५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मनुष्यकी हत्या की, तो उसके पीछे तो जाने कितनी खटपट, कितना पाखण्ड रहा होगा ।"
श्रावकोंसे और दूसरे सब लोगोंसे मैं कहता हूँ कि जीवदयाका अर्थ केवल कीड़े-
मकौड़े आदि सूक्ष्म जन्तुओंको न मारना ही नहीं है । यह सच है कि उन्हें नहीं मारना
चाहिए लेकिन मनुष्य योनिके किसी भी जीवको धोखा नहीं देना चाहिए। तिसपर
भी अधिकांश व्यापारी इसके सिवा और क्या करते हैं ? यदि कोई श्रावक मुझे अपनी
बहियाँ दिखाये तो मैं उसे बता दूंगा कि वह श्रावक नहीं है। जिस कपड़ेका हम
व्यापार करते हैं वह कैसे तैयार होता है ? उसके उत्पादनमें कहीं कोई पापकर्म तो
नहीं है; उसको जो माँड़ी दी जाती है उसमें चरबी तो नहीं होती, इन बातोंपर
व्यापारियोंको विचार करना चाहिए। दुगुना दाम लेना उन्हें ह्राम होना चाहिए। यह
श्रावकों का धर्म नहीं है । अपनी मजदूरी के खयालसे चीजोंके दाममें वे एक पैसा अथवा
दो पैसे चढ़ाएँ, यह तो ठीक है, लेकिन इतनी सब खटपट किसलिए ? इतना पाखण्ड
क्यों ? ब्याज तो इतना अधिक लिया जाता है कि देनेवाला बिलकुल मर जाता है ।
जहाँ जाता हूँ वहाँ श्रावक और वैष्णव दोनों ही प्रकारके बनियोंके खिलाफ शिकायतें
मिलती हैं। अनेक गोरे मुझपर व्यंग कसते हैं कि आपके लोग ही कितना ज्यादा ब्याज
लेते हैं ।
हमें नीच बनिया न रहकर शुद्ध क्षत्रिय बन जाना चाहिए। वैश्य-धर्म अर्थात्
मजूरी बिलकुल नहीं, हल नहीं, शौर्य नहीं, विवेक नहीं सो बात नहीं । सच्चा
वैश्य तो अपनी उदारतामें शौर्य -- क्षत्रियत्वका प्रदर्शन करता है, व्यापारमें विवेक
बरततां है; वह शराब नहीं बेचेगा, मछली नहीं बेचेगा, सिर्फ शुद्ध खादी ही बेचेगा
और वह विवेकका विकास करके ब्राह्मण-धर्मका भी पालन करेगा। अन्य सब लोग
हमारे लिए मजदूरी करें और हम पड़े-पड़े खाते रहें तो हम पतित बनते हैं । यज्ञके
रूपमें भी हमें प्रतिदिन थोड़ी-बहुत मजदूरी कर लेनी चाहिए ।
बनियेका मुख्य धर्म तो व्यापार ही रहे लेकिन उसमें अन्य धर्मोका समावेश भी
अवश्य होना चाहिए। अपनी स्त्रीकी रक्षाके लिए अगर मुझे काबुली अथवा पठान
रखना पड़े तो उसकी अपेक्षा मुझे-मेरे हिन्दू होने के बावजूद-
अपनी स्त्रीसे तलाक
ले लेना चाहिए । लेकिन आज अधिकांश बनिये क्या करते हैं ? उन्होंने सिपाही, भैया-
लोग और पठान रख छोड़े हैं । वे भले ही इन्हें भी रखें इस बातसे मुझे कोई ईर्षा
नहीं, लेकिन अगर आपमें अपनी स्त्री और बच्चोंकी रक्षा करनेकी ताकत नहीं है, तो
आप जाकर कुटिया में बैठ जायें और वहाँ रहकर अपने धर्मको सुशोभित करें। उस
हालत में, दुखियोंकी रक्षाके लिए दौड़नेके धर्मसे बनिया मुक्त हो जायेगा; जब जहाँ
ऐसे दुःखी दिखाई देंगे वहाँ क्षत्रिय उनकी रक्षा करनेके लिए पहुँच जायेंगे ।
रायचन्दभाईके जीवनसे मुझे सबसे बड़ी बात यह दिखाई दी कि बनियेको बनिया
ही बने रहना चाहिए। आज तो बनिये, बनिये नहीं रहे । सच्चा बनिया बननेके लिए
बड़ा पण्डित बनने अथवा बड़ी-बड़ी पोथियाँ पढ़ने की जरूरत नहीं है । जो मलिन न
हो, यम-नियमका पालन करनेवाला हो, असत्य और अधर्मसे दूर रहनेवाला हो, जिसके
हृदयको काम-वासना छू तक न गई हो, जिसके हृदयमें दयाधर्मका वास हो वह<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>मनुष्यकी हत्या की, तो उसके पीछे तो जाने कितनी खटपट, कितना पाखण्ड रहा होगा ।"
श्रावकोंसे और दूसरे सब लोगोंसे मैं कहता हूँ कि जीवदयाका अर्थ केवल कीड़े-
मकौड़े आदि सूक्ष्म जन्तुओंको न मारना ही नहीं है । यह सच है कि उन्हें नहीं मारना
चाहिए लेकिन मनुष्य योनिके किसी भी जीवको धोखा नहीं देना चाहिए। तिसपर
भी अधिकांश व्यापारी इसके सिवा और क्या करते हैं ? यदि कोई श्रावक मुझे अपनी
बहियाँ दिखाये तो मैं उसे बता दूंगा कि वह श्रावक नहीं है। जिस कपड़ेका हम
व्यापार करते हैं वह कैसे तैयार होता है ? उसके उत्पादनमें कहीं कोई पापकर्म तो
नहीं है; उसको जो माँड़ी दी जाती है उसमें चरबी तो नहीं होती, इन बातोंपर
व्यापारियोंको विचार करना चाहिए। दुगुना दाम लेना उन्हें ह्राम होना चाहिए। यह
श्रावकों का धर्म नहीं है । अपनी मजदूरी के खयालसे चीजोंके दाममें वे एक पैसा अथवा
दो पैसे चढ़ाएँ, यह तो ठीक है, लेकिन इतनी सब खटपट किसलिए ? इतना पाखण्ड
क्यों ? ब्याज तो इतना अधिक लिया जाता है कि देनेवाला बिलकुल मर जाता है ।
जहाँ जाता हूँ वहाँ श्रावक और वैष्णव दोनों ही प्रकारके बनियोंके खिलाफ शिकायतें
मिलती हैं। अनेक गोरे मुझपर व्यंग कसते हैं कि आपके लोग ही कितना ज्यादा ब्याज
लेते हैं ।
हमें नीच बनिया न रहकर शुद्ध क्षत्रिय बन जाना चाहिए। वैश्य-धर्म अर्थात्
मजूरी बिलकुल नहीं, हल नहीं, शौर्य नहीं, विवेक नहीं सो बात नहीं । सच्चा
वैश्य तो अपनी उदारतामें शौर्य -- क्षत्रियत्वका प्रदर्शन करता है, व्यापारमें विवेक
बरततां है; वह शराब नहीं बेचेगा, मछली नहीं बेचेगा, सिर्फ शुद्ध खादी ही बेचेगा
और वह विवेकका विकास करके ब्राह्मण-धर्मका भी पालन करेगा। अन्य सब लोग
हमारे लिए मजदूरी करें और हम पड़े-पड़े खाते रहें तो हम पतित बनते हैं । यज्ञके
रूपमें भी हमें प्रतिदिन थोड़ी-बहुत मजदूरी कर लेनी चाहिए ।
बनियेका मुख्य धर्म तो व्यापार ही रहे लेकिन उसमें अन्य धर्मोका समावेश भी
अवश्य होना चाहिए। अपनी स्त्रीकी रक्षाके लिए अगर मुझे काबुली अथवा पठान
रखना पड़े तो उसकी अपेक्षा मुझे-मेरे हिन्दू होने के बावजूद-
अपनी स्त्रीसे तलाक
ले लेना चाहिए । लेकिन आज अधिकांश बनिये क्या करते हैं ? उन्होंने सिपाही, भैया-
लोग और पठान रख छोड़े हैं । वे भले ही इन्हें भी रखें इस बातसे मुझे कोई ईर्षा
नहीं, लेकिन अगर आपमें अपनी स्त्री और बच्चोंकी रक्षा करनेकी ताकत नहीं है, तो
आप जाकर कुटिया में बैठ जायें और वहाँ रहकर अपने धर्मको सुशोभित करें। उस
हालत में, दुखियोंकी रक्षाके लिए दौड़नेके धर्मसे बनिया मुक्त हो जायेगा; जब जहाँ
ऐसे दुःखी दिखाई देंगे वहाँ क्षत्रिय उनकी रक्षा करनेके लिए पहुँच जायेंगे ।
रायचन्दभाईके जीवनसे मुझे सबसे बड़ी बात यह दिखाई दी कि बनियेको बनिया
ही बने रहना चाहिए। आज तो बनिये, बनिये नहीं रहे । सच्चा बनिया बननेके लिए
बड़ा पण्डित बनने अथवा बड़ी-बड़ी पोथियाँ पढ़ने की जरूरत नहीं है । जो मलिन न
हो, यम-नियमका पालन करनेवाला हो, असत्य और अधर्मसे दूर रहनेवाला हो, जिसके
हृदयको काम-वासना छू तक न गई हो, जिसके हृदयमें दयाधर्मका वास हो वह<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४८७
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||सन्देश : बम्बईकी सार्वजनिक सभाके लिए|४५५}}</noinclude>"केवली "<ref>१. जिसे विशुद्ध ज्ञान प्राप्त हो गया है ।</ref> बन सकेगा, उसके लिए केवल ज्ञान अप्राप्य नहीं होगा । इसलिए मैं आपसे
यह नहीं कहता कि आप संस्कृत पढ़ें, या भगवती सूत्रका पाठ करें। आप पढ़ें अथवा
न पढ़ें- इस विषय में मैं तटस्थ हूँ ।
वढवाणमें जब जयन्ती मनाई गई थी तब " राजचन्द्र- पुस्तकालय " खोलने का निश्चय
किया गया था । पुस्तकालयकी इमारत बनवानेकी बात भी हुई थी । उसके सम्बन्धमें
मैंने बहुत ज्यादा उत्साह प्रकट नहीं किया था। मैंने कहा था इमारत हो लेकिन अगर
उसमें आत्मा न हो तो इमारत तो केवल ईंटकी बनी हुई है । आज तीन वर्षके बाद
हमारा वह संकल्प सफल हो रहा है । सब अनुकूल संयोग इकट्ठे हो गये हैं । उसके
लिए हमें मुनि जिनविजयजी जैसे योग्य पुरुषकी सेवाएँ प्राप्त हुई हैं। पुरातत्व
मन्दिरका पुस्तकालय भी उसीमें जोड़ दिया गया है। जो कोई वहाँ जानेकी तकलीफ
उठायेगा उसे मुक्तभावसे उसका लाभ मिलेगा ।
आपने जो कुछ सुना है उसे अपने साथ ले जाना और अपने जीवनमें उतारना ।
जितना आपको टीका योग्य जान पड़े उतना तुरन्त त्याग देना लेकिन जो लेने योग्य
जान पड़ा हो, कर्णप्रिय लगा हो, हृदयको अच्छा लगा हो उसका तो आज ही से
अमल करना शुरू कर देना ।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' २४-११-१९२१}}
{{C|{{larger|'''१८८. सन्देश : बम्बईकी सार्वजनिक सभाके लिए'''}}}}
{{Right|१७ नवम्बर, १९२१ के पूर्व}}
मुझे दुःख है कि मैं स्वयं इस बार बम्बई में एक दिनके लिए भी नहीं आ
सकता।<ref>२.लेकिन बादमें उन्हें आनेके लिए राजी कर लिया गया था । देखिए “भाषण: बम्बईको सार्व-
जनिक सभामें", १७-११-१९२१ ।</ref>
लेकिन मैं यहाँ जिस कार्यमें रुका हुआ हूँ वह कार्य बम्बई में किये जानेवाले
सुन्दर कार्यसे भी अधिक महत्वका है, ऐसा जानकर आप मुझे क्षमा करेंगे, इस बातकी
मुझे पूरी-पूरी उम्मीद है ।
अगर आप बम्बईको सुशोभित करना चाहते हैं तो :
१. राजकुमारके स्वागतार्थं होनेवाले किसी भी समारोहमें एक बच्चातक न जाये ।
२. तमाशोंको मुफ्त में देखनेका आयोजन किया गया हो तो भी उसमें छोटे-बड़े कोई
न जायें; तमाशा देखनेके लिए और बहुत सारे दिन पड़े हुए हैं ।
३. कोई स्त्री या पुरुष १७ तारीखको बिना किसी कामके घरसे बाहर निकले ही
नहीं ।<noinclude>{{dhr|2em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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सदस्य वार्ता:Avantika Shaw
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667473
2026-08-18T11:44:52Z
Avantika Shaw
4732
/* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ उत्तर
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wikitext
text/x-wiki
{{संवाद}}
== स्वागत ==
{{स्वागत}}
--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १८:४३, २ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:०२, ७ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:१८, २९ मार्च २०२५ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा सांत्वना पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:२२, १० जनवरी २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:०९, २९ जनवरी २०२६ (UTC)
== गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन ==
@[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_षष्ठ_भाग.djvu/१२७&curid=45922&diff=667454&oldid=664893 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १०:३४, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
:मुझे आप कोई शोधित पुस्तक का लिंक दे [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५४, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
:ताकि हम उसके रूल देख ले आप ने जो भेजा है उससे उतना समझ नहीं अर्ह [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५६, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
::@[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]]जी, मैंने उसी पुस्तक के पृष्ठ की कड़ी आपको दी है जिस पुस्तक पर आप शोधन कार्य कर रही हैं। आप उस पृष्ठ के [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_षष्ठ_भाग.djvu/१२७&action=edit स्रोत सम्पादित करें] कड़ी पर जाकर साँचे के सही उपयोग को देख सकती हैं। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १४:११, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
:::सर में नया page ले सकती हु जो मैने लिया था वो बहुत डिफिकल्ट है उस समय दूसरा समूर्ण गांधी वाङ्मयं नहीं था इसलिए मुझे अभी दूसरा बुक लेना है। [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ११:४४, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४९६
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आपके अपने इस्तेमालके लिए हैं। आप जो खादी पहनने जा रहे हैं उसमें से थोड़ी खादी आप गरीबोंको क्यों नहीं दे देते? पुण्य कोई सहल वस्तु नहीं है।
'''अपने पास पड़े विदेशी कपड़ेको हम विदेशोंको भेज सकते हैं, फिर उनकी होली किसलिए करें? इस कपड़े को तैयार करनेमें मानव-जातिने जो श्रम किया है उसे नाहक ही पानीमें क्यों फेंकें?'''
मैं तो विदेशके प्रति भी सभ्य व्यवहार करनेवाला व्यक्ति हूँ। हम क्यों न मिलका कपड़ा खरीदकर उन लोगोंको भेजें? मैं इतना तो मानता हूँ कि इस कपड़ेको यहाँ [गरीब लोगोंको] दे देनेमें जितना दोष है उतना स्मरना भेजनेमें नहीं है। कुछ-एक वस्तुएँ अमुक स्थानपर ही पापमय होती हैं, सदा और सब स्थानोंपर पापमय नहीं होतीं। विदेशी कपड़ेपर भी यही बात लागू होती है। यूरोपके देशोंके लिए अथवा जो देश अधिकतर विदेशी कपड़ेपर निर्भर करते हैं और जहाँ कपास पैदा ही नहीं होती उनके लिए विदेशी कपड़ा पापमय नहीं होता। यूरोप में बने किन्तु हमारे देशमें आये हुए कपड़ेको हम वापस यूरोप भेज सकते हैं। इस सम्बन्धमें मुसलमान भाइयोंसे मेरा बहस करना उपयोगी नहीं हो सकता इसलिए मैं झुक गया और मैंने विदेशी कपड़े के स्मरना भेजे जानेकी छूट दे दी, लेकिन हमारा प्रथम कर्त्तव्य तो उसकी होली करना ही है।
अब प्रश्न यह है कि जिस वस्तुपर मनुष्य जातिने परिश्रम किया है उसको कैसे नष्ट किया जा सकता है? लेकिन जगत् में ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसपर परिश्रम किया गया हो और फिर जिसका नाश न हुआ हो? मेरी पगड़ी सुन्दर बँधी हुई है——और मेरे भाई तो पगड़ी बाँधनेका धन्धा करते हैं——लेकिन अगर मेरी पगड़ी में प्लेगके कीटाणु भर जायें तो चूँकि यह पगड़ी मेरे भाईने बाँधी है इसलिए क्या मुझे उसको नष्ट नहीं करना चाहिए? मेरा फर्ज तो उसे नष्ट करना ही है। मनुष्य-देहको
हम संसार-सागरको पार करनेकी नौका मानते हैं। ईश्वरने ऐसी महत्त्वपूर्ण वस्तुओं के नाशकी भी व्यवस्था की है। वह तो अनेक वस्तुओंका नाश करता है। क्या हम उसकी अपेक्षा अधिक समझदार हैं? अपनी गढ़ी हुई वस्तुओंको नष्ट करनेका हमें अधिकार है।
'''जिन कपड़ोंको हमने स्वदेशी समझ लिया है और जिनके बारेमें हमें यह समझाया गया है कि वे स्वदेशी हैं, उनका त्याग करनेकी हमसे किसलिए अपेक्षा की जाती है? स्वदेशीका अर्थ आजतक एक ही था, अब दूसरा अर्थ किया जाता है, और थोड़े समय बाद क्या कुछ और ही अर्थ नहीं किया जायेगा? तो क्या हर बार हमें अपने वस्त्र निकालकर देते रहना चाहिए?'''
हमें अगर कोई चिरायता समझकर संखिया देगा तो क्या हम उसे खा लेंगे? यह प्रश्न पूछने योग्य ही नहीं है। मुझे अगर कोई पारा चढ़ा हुआ पैसा देता है और उसे अगर मैं अठन्नी के रूपमें बाजारमें चलाने जाता हूँ तो क्या पुलिस मुझे नहीं पकड़ेगी? जो वस्तु हमें खोटी लगे उसको हमें उसी क्षण त्याग देना चाहिए। वैसे मैंने १९१९ में स्वदेशीकी जो व्याख्या की थी उसकी वही व्याख्या आज भी है। जिस दिन मैंने यह<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी बैठक बहिष्कारपर बहस|४६५}}</noinclude>व्याख्या की थी उस दिन मेरे तनपर खद्दर भी नहीं था। जिसका कोई अस्तित्व ही न था उसे मैं हिन्दुस्तानके आगे किस तरह पेश कर सकता था? आज तो सूत और खादीका ढेर लगा है । और अब तो हमें सिर्फ आत्मविश्वासकी जरूरत है। स्वदेशी-की व्याख्याका रूपान्तर तो हमने अपनी सुविधानुसार किया है। मनुष्य हर तरहकी गुलामीसे छूट सकता है लेकिन उसे अपने साथियोंका गुलाम तो बनना ही पड़ता है। मुझे भी उस समय भाई उमर सोबानी और भाई शंकरलाल बैंकरके कथनको मान्यता
प्रदान करनी पड़ी और मैंने उनकी खातिर एक नये व्रतकी <ref>देखिए खण्ड १५, पृष्ठ २०२-४।</ref> सृष्टि की जिसके अनुसार यहाँकी रुईसे यहाँकी मिलमें कते सूतके बुने हुए कपड़ेका प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन बात इतनेपर ही रुकी नहीं। बहन रामीबाई कामदारको इसमें भी मुश्किल दिखाई दी, इसलिए मैंने फिर तीसरे व्रतकी रचना की। लेकिन खरी स्वदेशी तो एक ही है। मैं आज सबसे यही व्रत लेनेके लिए कह रहा हूँ।
'''कपड़ोंकी होली जलानेसे क्या अहिंसा-व्रत भंग नहीं होता?'''
मैल धोने में हिंसा नहीं होती। जिससे आत्माका पतन होता है वह पाप है। कुछ-एक मामलोंमें हिंसा अनिवार्य है। शास्त्रोंका कहना है कि श्वासोच्छ्वासमें हिंसा है। इसके अतिरिक्त वनस्पतिमें भी प्राण हैं और हम वनस्पति खाते हैं; लेकिन उसे खानेमें हिंसा है, ऐसा हम नहीं मानते। सूक्ष्मदर्शक यन्त्रसे देखें तो पता चलेगा कि पानीमें भी कीटाणु भरे हुए होते हैं। दूधमें भी कीटाणु बिलबिलाते हुए दिखाई देत हैं, तिसपर भी हम पानी पीनेमें दोष नहीं देखते और दूध तो बहुत पुष्टिकारक खुराक मानी गई है। मैं इस समय आपके सम्मुख जो बोल रहा हूँ उसमें भी कुछ हदतक हिंसा निहित है। लेकिन ऐसी हिंसा अनिवार्य है और उसमें हम पाप नहीं मानते। जहाँ एक कौरसे निबाह हो सके वहाँ अगर हम दो खाते हैं तो वह पाप है।‘गीता’ में कहा गया है, अगर हम अल्पाहारी नहीं बनते तो हम चोर हैं। तिसपर भी हम भारी भोज देते हैं; पग-पगपर ‘गीता’ के वचनोंको भंग करते हैं। अतएव ऐसा प्रश्न कैसे पूछा जा सकता है?
'''अश्रद्धा होते हुए भी लज्जा, भय आदि कारणोंसे कोई अपने विदेशी कपड़ों में से थोड़े-बहुत कपड़े निकालकर दे दे और बादमें वैसे ही विदेशी कपड़े खरीद ले तो उससे देशको लाभके बदले हानि ही होगी। इसलिए विदेशी कपड़े क्यों इकट्ठ
किये जायें? विदेशी कपड़ों में निहित गुलामीके बारेमें लोगोंको बताकर ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ क्यों न कहें?'''
हम किसीपर अश्रद्धा अथवा अविश्वास कैसे रख सकते हैं? हम दूसरोंको पाखण्डी क्यों मानें? हम यह कैसे मानें कि किसीने अपने मनमें मैल रखकर हमें कपड़े दिये हैं? तथापि व्यक्ति किसी भी वृत्तिसे सत्कार्य क्यों न करे, उससे लाभ ही होता है। अगर कोई व्यक्ति डरके मारे सच बोलता है तो उतनेसे भी उसके झूठ बोलनेपर जगत् की जो हानि होती वह न होगी।अशुभ भावसे यदि कोई व्यक्ति अच्छा कार्य करेगा तो इससे स्वयं उसीकी हानि होगी, उसे उस कार्यका पुण्यफल<noinclude>{{smallrefs}}
{{left|२०-३०}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४६६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>नहीं मिलेगा; लेकिन जगत्को उसके कार्य में निहित अच्छाईका लाभ अवश्य मिलेगा। भयवश विदेशी कपड़ा देनेवाले और स्वदेशी पहननेवाले को स्वदेशी-व्रत पालन करनेका पुण्यफल भले ही न मिले लेकिन उसके स्वदेशी पहननेसे देशके कारीगरको रोजी मिलेगी और उसके कार्यसे इतना हित तो होगा ही। लेकिन हमें तो यही मानना चाहिए कि हर किसीने जो-कुछ दिया है सो शुद्ध निष्ठासे दिया है।
‘यथेच्छसि तथा कुरु<ref>भगवद्गीता, १८-६३।</ref> इस वाक्यका प्रयोग भी भूलसे भरा हुआ जान पड़ता है। श्रीकृष्णने यह वाक्य कब कहा? अर्जुनको पूरी तरह अपने वशमें कर लेनेके बाद ही। उन्होंने अर्जुनको उसके कर्त्तव्य के बारेमें बताया, खूब अनुनय-विनय की और अन्तमें कहा कि “जो तेरी इच्छा हो सो कर”। हमें भी लोगोंको समझाना चाहिए, उनके आत्म-सम्मानकी भावनाको जगाना चाहिए और अगर तब भी वे न मानें तो हम उनसे कहें कि आपकी जो इच्छा हो सो करें।
हमें किसीको मारनेकी इच्छा नहीं करनी चाहिए। बल्कि खुद मरनेके लिए तैयार होना चाहिए। हम इसके लिए भी तैयार नहीं तो कमसे-कम हमें विदेशी कपड़े-का बहिष्कार तो करना ही चाहिए। कुछ किये बिना शान्त बैठे रहनेमें धर्म नहीं है। मैं अगस्तकी पहली तारीखतक ऐसी सभाओंमें जाऊँगा। लेकिन बादमें तो जाना भी बन्द कर दूँगा। ३१ अगस्ततक में स्वदेशीकी बात करूँगा और बादमें वह भी छोड़ दूँगा। मैं तो व्यावहारिक बनिया हूँ। जबतक मुझे यह लगेगा कि इन तिलोंमें तेल है तबतक मैं उन्हें पेरूँगा, लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दूँगा। मुझे और बहुत-सा दूसरा व्यापार करना है।
'''प्रतिदिन ८-१० आने कमानेवाले लोग किस तरह विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करेंगे, १०० से १५० रुपये वेतन पानेवाले विदेशी कपड़े निकाल बाहर कर नये स्वदेशी अथवा खादी के वस्त्र कैसे बनवा सकते हैं? वे क्या कर्ज लें? क्या भिक्षा माँगे? अथवा अबसे विदेशी कपड़ा न लेनेका व्रत लेकर सन्तोष मानें?'''
ऐसे गरीब व्यक्ति भी विदेशी कपड़े रूपी मैलको निकालेंगे ही, बादमें भले खादीकी भीख माँगे, मित्रोंसे उधार माँगे अथवा मजूरी करें; और इस बीच लंगोटी-भर कपड़ेसे निर्वाह करें। दृढ़ संकल्प हमें अनेक कठिनाइयोंसे उबार लेगा। संकल्प एक तरहकी ईश्वर-प्रार्थना है और यह अवश्य फलीभूत होता है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' ११-९-१९२१|1em}}<noinclude>{{dhr|6em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२४. भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर’'''<ref>गांधीजीने यह भाषण एक्सेल्सियर थियेटर में पारसी राजकीय सभाके तत्वावधानमें आयोजित पारसियोंकी एक भारी सभामें दिया था।</ref>}}}}
{{right|३० जुलाई, १९२१}}
'''श्री गांधीने कहा कि ३० जूनको भारतीयोंने अपने देशके प्रति अपना कर्त्तव्य पूरा किया है और उन्हें इसका गर्व होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने समझ लिया है कि वे किसी कामको सरकारी मदद या संरक्षणके बिना कर सकते हैं। धनाभावक सम्बन्धमें हमारा भय अब दूर हो गया है और अब भी मुझे बिना माँगे ही पारसी, मुसलमान और हिन्दू मित्र तिलक स्वराज्य-कोषके लिए धन भेजते जा रहे हैं। इससे जाहिर होता है कि भारतीय अपनी मातृभूमिके प्रति अपना कर्त्तव्य पहचान रहे हैं। मुझे विश्वास है कि यदि इकट्ठा किया गया यह धन ठीकसे खर्च किया जायेगा तो एक करोड़ रुपया तो क्या चार करोड़ भी इकट्ठा हो जायेगा। परन्तु में साल पूरा होनेसे पहले ही स्वराज्य चाहता हूँ। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें और रुपया इकट्ठा नहीं करना होगा। परन्तु मनुष्यकी चेती कब होती है? होती तो ईश्वरकी चेती ही हैं। इसलिए सम्भव है मेरी इच्छाएँ पूरी न हों। यदि सभी भारतीय——पुरुष और स्त्री——अपने देशके प्रति अपना कर्तव्य पूरा करें तो सफलता मिले बिना नहीं रह सकती। अब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने निर्णय किया है कि हमें अपनी शक्ति अधिकसे-अधिक खादी तैयार करनेमें लगानी चाहिए। स्वदेशीके बिना हमें स्वराज्य नहीं मिल सकता। जो कपड़ा इस देशमें तैयार किया जाता है उसे पहनना भारतीय पसन्द नहीं करते। वे तो सिर्फ वही कपड़ा पसन्द करते हैं जो इंग्लैंड, फ्रांस या जापानसे आता है। क्योंकि उनका खयाल है कि देशमें बना कपड़ा इतना सुन्दर और कलात्मक नहीं होता जितना कि उसे होना चाहिए। यदि वे ऐसा सोच सकते हैं तो स्वराज्य कैसे प्राप्त कर सकते हैं? अन्न और वस्त्र भारतके वो फेफड़े हैं और यदि वे रोगी हुए तो देश अधिक दिनतक जिन्दा नहीं रहेगा। इस देशमें कितने ही करोड़ लोग किसी भी दिन भरपेट भोजन नहीं पाते। यदि आप उनके बारेमें सोचें तो आपको मालूम हो जायेगा कि भूखों मरते उन भारतीयोंके लिए अन्न मुहैया करना आपका कर्त्तव्य है। यदि आप इस देशका इतिहास पढ़ें तो आपको विदित होगा कि जबसे भारतने कातना-बुनना छोड़कर विदेशी कपड़ा अपनाया तबसे भारत गरीबी भोग रहा है। और जबतक आप लोग इन बातोंका हल नहीं निकालेंगे तबतक आपके कष्ट बने रहेंगे। अगर करोड़पती पारसी लोग अपनी सारीकी-सारी दौलत इस देशके निर्धन व्यक्तियोंको दे डालें तो भी उनका संकट दूर न होगा। क्या हमें इन करोड़ों'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''लोगोंको सदावर्तके सहारे रखना है? या वे उन्हें स्वावलम्बी बनाना चाहते हैं? इन लोगों को तो अपने ही प्रयाससे, अपने ही उद्योगसे अपनी जीविका कमानी चाहिए और अपने लिए वस्त्र प्राप्त करना चाहिए। उन्हें अपनी जरूरतें पूरी करनेके लिए दूसरोंके आश्रित रहना कदापि नहीं सिखाना चाहिए। इस देशमें गरीबोंको काम देनेका एक ही मार्ग है और वह है भारतीयोंका खद्दर पहनने लगना। कुछ लोग शायद मुझसे यह प्रश्न करें कि ये सब गरीब लोग अहमदाबाद और बम्बई-जैसे शहरों में जहाँ मजदूरोंकी इतनी कमी है क्यों नहीं आ जाते। मैं नहीं समझता कि भारतके गरीब अपने घर छोड़कर मिलोंमें काम करनेके लिए शहरोंमें जा बसेंगे। मान लीजिए कि वे ऐसा करते भी हैं तो परिणाम क्या होगा? उस हालत में भारतको भूखे रहना होगा, क्योंकि तब हल कौन चलायेगा और आपके लिए गेहूँ तथा अन्य खाद्यान्न कौन पैदा करेगा। तब भारत एक जंगल जैसा हो जायेगा और जनता भूखों मरने लगेगी। इसलिए सारी आबादीका शहरोंमें बसना सम्भव नहीं है। जबतक इस देशमें एक भी व्यक्तिको भूखा रहना पड़ता है तबतक भारतीयोंका कर्त्तव्य है कि मितव्ययितासे काम लें और व्यर्थका ऐश-आराम त्याग दें। इसीलिए मैं अपने मित्रोंसे कहा करता हूँ कि वे चाहे जैसे भी सुधार प्राप्त कर लें, कौंसिलोंमें चाहे जैसे भी प्रस्ताव क्यों न पास करा लें जबतक वे इस देशसे गरीबी नहीं दूर कर सकते तबतक उनके सारे प्रयत्न व्यर्थ जायेंगे। मैं अपने पारसी मित्रोंसे अपील करूँगा कि वे भारतकी सच्ची स्थितिका ज्ञान प्राप्त करके उस रोगको पहचानें जिससे देश पीड़ित है और तब स्वदेशी अपना-कर उसे दूर करनेका प्रयत्न करें। पारसी सारे देशको दिखा दें कि वे चाहे जितने ऐशोआराम में क्यों न डूबे हों, कीमती चीजों और कपड़ोंको इस्तेमाल करना वे चाहे जितना क्यों न पसन्द करते हों, किन्तु एक बार इस देशकी गम्भीर स्थितिको पहचान लेनेके पश्चात् वे मातृभूमिके प्रति अपना कर्तव्य निभाने को तैयार हैं। वे केवल अन्य जातियोंके साथ कतारमें खड़े न होकर अन्य पिछड़ी जातियोंको स्वराज्यके लक्ष्यकी ओर ले जानेमें अगुआ होंगे। कमसे-कम मुझे तो इस बातका पूरा विश्वास है कि जो जाति देशके अनेक मामलों में अगुआ रही है वह इस बार भी देशमें अग्रणी बनेगी और पीछे नहीं रहेगी। सभी विभिन्न जातियोंको साथ लेकर चले बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता और भारत एक भी जातिको पीछे नहीं छोड़ सकता। पारसी लोग जो अनेकों मामलोंमें प्रमुख हिस्सा लेते रहे हैं, इस मामलेमें भी लेंगे, इसके बारेमें मुझे जरा भी सन्देह नहीं है। पारसियोंको यह नहीं कहना चाहिए कि चूँकि उनके पास अभी ३० सितम्बरतक दो महीने का समय है इसलिए वे इस बीच कुछ न त्यागकर अन्तिम दिन ही सब चीजें त्यागेंगे। आगामी सोमवारको<ref>इस दिन, पहली अगस्तको बहिष्कार आन्दोलन प्रारम्भ होना था।</ref> पारसी समाजकी परीक्षा होने जा रही है और मैं जानता हूँ कि वे खरे उतरेंगे, क्योंकि मैं अपने पारसी दोस्तों-'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर|४६९}}</noinclude>'''को अच्छी तरह जानता हूँ। मैं जिस समाजके साथ इतने वर्ष रह चुका हूँ उसे कैसे नहीं जानूँगा? जिन स्त्री-पुरुषोंने तिलक स्वराज्य-कोषके लिए इतना धन दिया हैं, जिन महिलाओंने अपने जेवर त्याग दिये हैं, उन्हें अब पहली अगस्तको अपने कर्तव्यमें नहीं चूकना चाहिए। इस तारीखसे उन सबको अपने विदेशी वस्त्र छोड़ देने चाहिए। जिसे पहनना वे पाप समझते हैं उसे एक क्षण भी अपने पास नहीं रखना चाहिए। उन्हें यह अवश्य जान लेना चाहिए कि इन विदेशी वस्त्रोंको पहनकर वे अपने करोड़ों देशभाइयोंको भूखा रख रहे हैं। वे विदेशी वस्त्र नष्ट कर दिये जाने चाहिए और अपने पास कतई नहीं रखने चाहिए, क्योंकि वे पापसे रंगे हुए हैं। उनकी दृष्टिमें जिसे पहनना पापपूर्ण है वह गरीबोंके लिए भी पहनना पापपूर्ण है और इसलिए मैं उनके कपड़ोंको गरीबोंको दे दिये जानेके पक्षमें नहीं हूँ। परन्तु यदि वे चाहें तो उन कपड़ोंको भारतसे बाहर स्मरना भेजा जा सकता है।'''
'''मैं आप लोगोंसे खादी पहननेको कहता हूँ; गरीब लोगोंको मिलोंका बना कपड़ा पहनने दीजिए। जो कुछ हाथका बना है वह अधिक कलात्मक, अधिक सुन्दर और कुल मिलाकर मशीनकी बनी चीजसे बेहतर है। मशीनपर जो कुछ बनाया जाता है वह गरीबोंके लिए है। अमीर लोगोंको अपना सूत स्वयं कातना और उसे अपने बुनकरोंके पास भेजना चाहिए, ताकि वे उनकी पसन्दका कपड़ा तैयार कर दें। पहले, जब विदेशी कपड़ा पहनना शुरू नहीं हुआ था, ऐसा ही होता था। हम देशमें प्रचलित सभी प्रकारकी कलात्मक कारीगरीको भूल गये हैं और मिलोंमें तैयार की गई विदेशी चीजोंका प्रयोग करने लगे हैं, केवल इसलिए कि वे फ्रांस या इंग्लैंडसे आती हैं। क्या आप अपनेमें किसी प्रकारको मौलिकता नहीं ला सकते? हर चीजके लिए विदेशोंका मुँह ताकना क्या अच्छी बात है? क्या आप लोग अपनी सब कारीगरी भूल बैठे हैं और अपनी जरूरतोंको पूरा करने के लिए विदेशोंके मुहताज बन गये हैं? मैं उनसे अपील करता हूँ कि अपनी विदेशी चीजें त्याग दें और अपने देशके लिए कुछ त्याग करें। जो-कुछ आप करेंगे वह वास्तव में आपका त्याग कहा जायेगा, आप तो केवल देशसेवा कर रहे हैं। मुझे खुशी है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके सभी सदस्य जिनकी संख्या लगभग ३०० है, शुद्ध श्वेत खादी पहनकर बम्बई आये हैं। मुझे अक्सर याद आ जाया करता है कि इसके बारेमें श्री पिक्यॉलने क्या कहा था। उन्होंने कहा था कि यदि आप अपनेको किसी नये रंगमें रंगना चाहते हैं तो पहले आपको अपनी सारी गन्दगी धोकर उजले बनना होगा——आपको कोई अन्य रंगीन कपड़ा अपनानेसे पहले शुद्ध सफेद खादी धारण करनी चाहिए। खादीमें पवित्रता है, शुद्धता है और सौन्दर्य है और उसे पहननेवालों को कोई असुविधा भी नहीं होती। वह हमारी भारतीय राष्ट्रीयताका ध्वज है और अब उसे अवश्य पहनने लगना चाहिए। इसके बाद गांधीजीने लोगोंसे कहा कि आप लोगोंके बीच जो शपथ प्रचारित की गई है, उसपर खूब सोच-विचार कीजिए और उसपर अपने हस्ताक्षर कीजिए। ऐसा खूब अच्छी तरह विचार'''<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|४७०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''करनेके बाद ही कीजियेगा। क्योंकि मैं आप लोगोंको लज्जित करके आपसे हस्ताक्षर कराना नहीं चाहता। यह पूर्णतः ऐच्छिक हो; इसमें किसी तरहका भी दबाव नहीं होना चाहिए।'''
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' ३१-७-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२५. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''श्वेत वस्त्र-सज्जित हिन्दुस्तान'''}}
तिलक जयन्तीके दिन ‘क्रॉनिकल’ के सम्पादक श्री पिक्थॉल <ref>मार्माडयूक पिक्थॉल।</ref> खादीकी पोशाक और खादीकी टोपी पहने सभामें आये, यह देख मैं चकित रह गया और उनके छोटे परन्तु शुद्ध विचारोंसे युक्त भाषणको सुन मुझे और भी अधिक खुशी हुई। उन्होंने कहा: “यह संघर्ष आत्मशुद्धिका संघर्ष है। थोड़े समय के लिए अगर हिन्दुस्तान सिर्फ श्वेत वस्त्र पहने तो इससे वह कुछ खोयेगा नहीं। एक बार श्वेत वस्त्र धारण कर अपने उद्देश्यको प्राप्त करने के बाद भले ही हिन्दुस्तान रंग-बिरंगे कपड़े पहने।” हम सफेद खादी पहनते हैं क्योंकि रँगनेका हमारे पास समय ही नहीं है। इसके अतिरिक्त रंग विदेशी होनेके कारण हममें से बहुतों को पसन्द नहीं आते।श्री पिक्थॉलको खादीकी शुभ्रतामें हमारे संघर्षकी उज्ज्वलता दिखाई दी; यह विचार मुझे बहुत सुन्दर लगा। और यह सच भी है। अभी तो हम जो रंग जहाँसे भी आये उसे ही सुन्दर मान लेते हैं। हकीकतमें यह मैल है। जो रंग समय देखकर और उसके उद्गम स्रोतकी जाँच करने के बाद वस्त्रमें दिया जाता है उसीमें कला और सौन्दर्य होता है। बालक द्वारा कागजपर तूलिका फेरनेमें और चित्रकार द्वारा अपनी तूलिकासे रेखाएँ खींचकर चित्रको आत्मा प्रदान करनेमें कितना अन्तर होता है? अभी तो रंगोंके प्रति हमारा मोह बालक द्वारा तूलिका फेरनेसे पड़े धब्बोंके मोहके समान है। जबतक हिन्दुस्तानके लोग अधिकतर श्वेत वस्त्र धारण नहीं करते तबतक चित्रकारका जन्म नहीं होगा और हमारे बाजारोंमें चित्र दिखाई नहीं देंगे। जिस तरह चित्रपटके अभाव में बेलबूटे नहीं बनते उसी तरह जबतक हम शुद्ध सफेद खादीकी शुरुआत नहीं करते तबतक आँख और मनको जो भा सके ऐसे सुन्दर डिजाइनवाली खादी भी तैयार नहीं हो सकती। आजके रंग तो धुली-पुती कब्र के समान हैं।हिन्दुस्तानकी कलाका विकास चाहनेवाले व्यक्तियोंको विदेशसे आये हुए कपड़े कचरेको हटाकर शुभ्र भूमिका तैयार करनी ही होगी।आँगनमें रंग पूरनेसे पहले जैसे हम आँगन साफ करते हैं वैसे ही हमें हिन्दुस्तानके आँगनमें पड़े विदेशी कपड़ेके कचरेको तुरन्त निकाल देना चाहिए।
{{c|'''पारसी भाई और बहनें'''}}
एक पारसी बहन राष्ट्रीय आन्दोलनमें खूब भाग लेने लगे हैं। भाई गोद-रेजने तो तिजोरी बनानेके अपने धन्धेको सिर्फ देशके लिए ही चलानेका निश्चय कर<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५०३
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||प्रस्ताव: चुनावके सम्बन्ध में|४७१}}</noinclude>लिया जान पड़ता है। पारसी नौजवान शराबकी दुकानोंपर धरना देनेके लिए निकल पड़े हैं। पारसी सज्जन खादी पहनने लगे हैं। भारतके पितामहकी पौत्री बहन पेरीनने सिरसे पैरतक मोटी खादीकी पोशाक धारण की है। पारसी बहनोंने अपने जवाहरात तिलक स्वराज्य-कोषमें दे दिये हैं। पारसी राजकीय सभाने एम्पायर थियेटरमें तिलक जयन्ती मनाई है। अब बम्बईकी एक पारसी बहनने शराबकी दुकानपर धरना देनेकी इच्छा प्रकट की है और अन्य बहनोंसे भी वैसा करनेके लिए कहा है। उस बहनका कहना है कि अगर अन्य बहनें भी इस कार्यमें शामिल हो जायें तो इस समय धरना देनेसे हिंसाका जो भय बना रहता है वह बहुत अंशोंमें दूर हो जायेगा। और अभी हाल ही में हमपर जो यह आरोप लगाया गया है कि धरना देनेवालों में अवांछनीय व्यक्ति भी आ जाते हैं उस आरोप से भी हम मुक्त हो जायेंगे। इस बह्नको मैं बधाई देता हूँ।
{{left|[गुजराती से]
'''नवजीवन,''' ३१-७-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२२६. प्रस्ताव: चुनावके सम्बन्धमें'''<ref>मणिभवन, लैबर्नम रोड, बम्बई में कांग्रेस कार्य-समितिकी बैठक सुबह साढ़े आठ बजे हुई। गांधीजी द्वारा पेश किये गये इस प्रस्तावका मौलाना मुहम्मद अलोने अनुमोदन किया। प्रस्ताव बहुमतसे पास हो गया।</ref>}}}}
{{right|[बम्बई<br>
३१ जुलाई, १९२१]}}
'''महात्मा गांधीने निम्नलिखित प्रस्ताव पेश किया:'''
१७. पिछले महीने बंगाल और मद्रासमें हुए अखिल भारती कांग्रेस कमेटी के चुनावोंसे सम्बन्धित संवैधानिक प्रश्नोंपर किसी पूर्वग्रहके बिना और उनके गुण-दोषोंपर नजर डाले बगैर, और इस तथ्यको देखते हुए कि समस्त भारतमें नये चुनाव अगले नवम्बर में या उससे पहले अवश्य होंगे और इस बातको भी ध्यानमें रखते हुए कि समस्त भारतके कांग्रेस-संगठनोंके सामने इस समय एक व्यस्त और भारी कार्यक्रम प्रस्तुत है, यह समिति देश-हितके खयालसे इन चुनावोंमें किसी प्रकारका हस्तक्षेप करना या खलल पहुँचाना ठीक नहीं समझती है और बंगाल तथा मद्रासके उन लोगोंको, जिनके दिलोंमें क्षोभ है, सलाह देती है कि वे अपने-अपने प्रान्तोंमें प्रान्तीय संगठनोंको अपना सहयोग दें जिससे कार्यक्रम सुचारु रूपसे चलाया जा सके और वह सफल हो।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स, १९२१'''}}<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५०४
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२७. भाषण: बम्बई में खादी-प्रदर्शनीके उद्घाटनपर'''<ref>गांधीजीने रामबाग, सी॰ पी॰ टैंकमें राष्ट्रीय स्त्री-सभा द्वारा आयोजित प्रदर्शनीका उद्घाटन किया था।</ref>}}}}
{{right|३१ जुलाई, १९२१}}
'''महात्मा गांधीने प्रदर्शनीके उद्घाटनकी घोषणा करते हुए कहा कि मैं अध्यक्षा तथा अतिया बेगमका कृतज्ञ हूँ जिन्होंने इसके लिए इतना परिश्रम किया। अतिया बेगमने इसे सफल बनाने के लिए रात-दिन काम किया है। मैं जानता हूँ कि उनके साथ और भी कार्यकर्ता थे। मैं उनकी भी प्रशंसा करता हूँ। किन्तु इस पूरी प्रदर्शनीके कामको गति प्रदान करनेवाली शक्ति अतिया बेगम ही थीं। मुझे इस बातकी प्रसन्नता हहै कि इस देशमें इस प्रकारकी महिलाएँ हैं जिनमें संगठनकी इतनी महान् क्षमता है। इस सम्बन्धमें अध्यक्षा तथा उनकी बहनने जो-कुछ किया है उसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। मुझे इससे और भी अधिक प्रसन्नता होती है कि संगठन करने वाली बहन मुसलमान हैं।'''
'''यह दुर्भाग्यकी बात है कि इतने समय बाद लोगोंको खद्दरसे बहुत-सी चीजें तैयार होने की बात बताई जा रही है। मुझे आशा है कि लोग इस प्रदर्शनीका लाभ उठायेंगे। खद्दरकी परिभाषा करते हुए उन्होंने बताया कि देशमें ही विशुद्ध रूपसे हाथकते सूतका हाथबुना कपड़ा खादी है। मुझे इस बातसे हर्ष होता है कि यह देश महीनसे-महीन वस्त्र बनाने में समर्थ है, विशेषकर बेजवाड़ा और गंजाम जिलोंमें ऐसा कपड़ा बनाया जाता है। इस सभा में मौजूद बहनों में से बहुत-सी बहने मद्रास अहातेके उन भागों में बनी साड़ियाँ अवश्यमेव पहने हुए होंगी। उन्हें इस बातपर गर्व होना चाहिए कि यह देश ऐसी महीन साड़ियाँ तैयार करने में समर्थ है। किन्तु जिस व्यक्ति-को इस काम अर्थात् इस प्रकारके महीन वस्त्रके उत्पादनका प्रमुख श्रेय है वह भी यहाँ मौजूद है। किन्तु उसने अपने प्रान्त में खद्दरको लोकप्रिय बनाया और वहाँ उसके उत्पादनको प्रोत्साहन दिया, इसके लिए उसे अपराधी माना गया है। मैं यह नहीं कहता कि वह खादीका लोगों में प्रचार कर रहा था, केवल इसीलिए उसे जेल भेजा गया।'''
'''किन्तु जहाँतक मैं जानता हूँ उसका इसके अतिरिक्त और कोई अपराध नहीं था कि उसने लोगोंके बीच खादीका बहुत प्रचार किया। सरकार अब उस जैसे लोगों से डरती है। इसलिए वह कुछ-न-कुछ स्याह-सफेद करके ऐसे लोगों को जेल भेजने-
की कोशिश कर रही है।'''
'''इसलिए यह हमारा कर्तव्य है कि हम आन्ध्र केसरी तथा कांग्रेस व स्वदेशीके जबरदस्त कार्यकर्त्ता वेंकटप्पैयाके समान सफेद खादी पहनकर जेल जायें। सरकार यह'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५०५
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बम्बई में खादी-प्रदर्शनीके उद्घाटनपर|४७३}}</noinclude>समझ गई है कि लोगोंने ३० सितम्बरके पूर्व जो-कुछ करनेके लिए कहा है उसे वे अवश्य करेंगे, इसलिए वह दमनका सहारा ले रही है। हमने अपना कार्य आरम्भ करते ही वाइसरायको चेतावनी दे दी थी। मैं श्री शेरवानी तथा आन्ध्र-निवासी श्री वेंकटप्पैयाको उस साहसके लिए बधाई देता हूँ जो उन्होंने देशके प्रति अपना कर्तव्य पालन करनेके लिए जेल जाकर दिखाया है। लोगोंको ऐसे दमनसे भयभीत नहीं होना चाहिए; जबतक वे अपना कर्तव्य-पालन कर रहे हैं तबतक उन्हें इस दुनियामें डरने-का कोई कारण नहीं। मैं आप लोगोंसे अपील करता हूँ कि आप अपनी व्यक्तिगत सुविधा तथा विलासिताको छोड़कर खादी पहनें। जब मैं पुरी गया था तब मैंने देखा कि लोग भूखों मर रहे हैं। हमारे देशमें ऐसे तीन करोड़ लोग हैं। जब हमारे किसान अपने खाली समय में चरखा कातते थे, तब वे अपनी आयमें अभिवृद्धि कर लेते थे, इस प्रकार वे भुखमरीको अपने पास नहीं फटकने देते थे। किन्तु अब लोग मैनचेस्टरके वस्त्र पहननेके आदी हो गये हैं, किसानोंका वह पेशा मारा गया है और वे भूखों मर रहे हैं। जगन्नाथके मन्दिरमें स्वयं भगवान्की प्रतिमा विदेशी वस्त्रोंसे सजाई गई थी, इसलिए मैंने पुजारीसे पूछा कि क्या वह विदेशी वस्त्र पहनाकर स्वयं भगवान्को ही शर्मिन्दा नहीं कर रहा है?
लोग शिकायत कर रहे हैं कि मेरे मित्र विठ्ठलदास जेराजाणी तथा नारणदास पुरुषोत्तमने खादीकी कीमतें बढ़ा दी हैं। मेरा निवेदन है कि इस कामपर होनेवाले खर्चको पूरा करने के लिए ही वे ऐसा कर रहे हैं; उनका उद्देश्य इस व्यापारसे किसी प्रकारका लाभ उठाना नहीं है। कुछ लोगोंकी शिकायत है कि बुनकर खादी बुननेकी अधिक मजदूरी माँग रहे हैं। आप ही बतायें कि इसमें उनका क्या अपराध है। क्या कभी यह शिकायत भी की गई है कि वकीलों तथा डाक्टरोंने अपनी फीस बढ़ा दी है? उनमें से कुछ तो १,००० रु० प्रतिदिनके हिसाब से फीस लेते हैं, इसलिए यदि बुनकर कुछ आने और माँगते हैं तो इसमें क्या हानि है? क्या उन्हें अपने परिवार-का पालन-पोषण नहीं करना है? कुछ आने और प्राप्त कर लेनेपर वे अपने परिवार-की उन जरूरतोंको पूरा करेंगे जिन्हें वे बहुत दिनोंसे पूरा करने में असमर्थ थे। लोगों को इसके लिए शिकायत क्यों होनी चाहिए? यदि बुनकर खादीकी कीमत जितनी उन्होंने
बढ़ाई है उससे भी अधिक बढ़ा दें तो भी लोगों को कोई आपत्ति नहीं उठानी चाहिए।
मैं चाहता हूँ कि इस देशका प्रत्येक घर सूत कातनेकी तथा प्रत्येक गली कपड़ा बुननेकी मिल बन जाये ताकि इस देशका पुनरुत्थान हो। यदि हमारी महिलाएँ अपने उस खाली समयको जिसे वे अब सिनेमा जाने आदिमें बर्बाद करती हैं, कपड़ा बुननेमें लगायें तो जहाँतक वस्त्रका प्रश्न है, भारत आत्मनिर्भर बन सकता है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १-८-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५०६
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२२८. भाषण: बम्बई में स्वदेशीपर '''<ref>बम्बईके परेल नामक स्थानमें एलफिन्स्टन मिल्सके समीप विदेशी कपड़ोंकी होली जलाकर स्वदेशी आन्दोलन शुरू करनेके लिए एक ऐतिहासिक सभा हुई थी। गांधीजीके जिस भाषणकी छपी हुई प्रतियाँ सभामें पहलेसे बांटी गई थीं उसीका यह अंग्रेजी अनुवाद समाचारपत्रों में छपा था।</ref>}}}}
{{right|३१ जुलाई, १९२१}}
मैं इस दिनको बम्बईके लिए एक पवित्र दिन मानता हूँ। आज हम अपने शरीरोंसे गन्दगी हटा रहे हैं। हम विदेशी वस्त्रको, जो हमारी गुलामीका चिह्न है, त्यागकर अपना शुद्धीकरण कर रहे हैं। आज हम स्वतन्त्रताके (स्वराज्य) मन्दिरमें प्रवेश पानेकी योग्यता प्राप्त कर रहे हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि बहिष्कृत वस्त्रोंको नष्ट करना क्रोध और द्वेष-भावनाका सूचक है। वह द्वेष-भावका सूचक है या नहीं यह तो इसपर निर्भर करता है कि हम किस भावनासे इन कपड़ोंको जला रहे हैं।
हम अंग्रेजों, अमेरिकियों, जापानियों या फ्रांसीसियोंके प्रति दुर्भावना क्यों रखें? वे हमारे यहाँ अपना कपड़ा तबतक पाटते रहेंगे जबतक हम उसे खरीदना पसन्द करेंगे। इसलिए यदि हमें क्रोध आये तो हमें अपना क्रोध अपने ही ऊपर उतारना चाहिए।
जब हम विदेशी सुन्दर चीजोंसे लुब्ध होना बन्द कर देंगे तब हम विदेशी राष्ट्रोंके प्रति दुर्भाव रखना भी छोड़ देंगे।
मैं देखता हूँ कि टर्कीमें हो रही घटनाएँ हमारे देशके मुसलमानोंको सन्ताप पहुँचा रही हैं। वे खिलाफत के सम्बन्धमें किये गये अन्यायसे अधीर हो उठे हैं। मैं उनसे विनयपूर्वक कहना चाहता हूँ कि खिलाफतकी मदद करनेका सबसे छोटा और सीधा तरीका स्वदेशी है। क्योंकि स्वदेशीको अपनाकर हम भारतको शक्तिशाली बनाते हैं। और भारतकी ताकत बढ़ानेका अर्थ है खिलाफतकी रक्षा करनेकी हमारी ताकतका बढ़ जाना।
परन्तु आज हमारे दिलोंमें सबसे पहला खयाल यही होना चाहिए कि कल लोकमान्यकी बरसी मनानेके लिए हम अपनेको शुद्ध करें। जबतक हम स्वदेशीकी शपथ नहीं लेते, तबतक हम अपनेको शुद्ध नहीं कर सकते। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि जिन लोगोंने अपने कपड़े बाँटनेके लिए या बाहर भेजनेके लिए दे दिये हैं, वे इस बातका दृढ़ निश्चय करेंगे कि भविष्यमें कभी विदेशी वस्त्र नहीं पहनेंगे। मुझे विश्वास है कि लोकमान्यकी स्मृतिको अमर बनानेका सबसे अच्छा तरीका स्वराज्यकी प्राप्ति
है। और स्वदेशीके बिना स्वराज्य असम्भव है। और स्वदेशीका श्रीगणेश तभी हुआ माना जायेगा जब विदेशी वस्त्रोंका पूर्ण और स्थायी रूपसे बहिष्कार हो। इसलिए मैं होली जलानेकी इस रस्मको एक पुनीत यज्ञ मानता हूँ। और यह पवित्र रस्म मेरे द्वारा सम्पन्न होने जा रही है इसलिए मैं अपने-आपको सौभाग्यशाली मानता हूँ। ईश्वर<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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अँजली चौधरी
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{{right|३१ जुलाई, १९२१}}
मैं इस दिनको बम्बईके लिए एक पवित्र दिन मानता हूँ। आज हम अपने शरीरोंसे गन्दगी हटा रहे हैं। हम विदेशी वस्त्रको, जो हमारी गुलामीका चिह्न है, त्यागकर अपना शुद्धीकरण कर रहे हैं। आज हम स्वतन्त्रताके (स्वराज्य) मन्दिरमें प्रवेश पानेकी योग्यता प्राप्त कर रहे हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि बहिष्कृत वस्त्रोंको नष्ट करना क्रोध और द्वेष-भावनाका सूचक है। वह द्वेष-भावका सूचक है या नहीं यह तो इसपर निर्भर करता है कि हम किस भावनासे इन कपड़ोंको जला रहे हैं।
हम अंग्रेजों, अमेरिकियों, जापानियों या फ्रांसीसियोंके प्रति दुर्भावना क्यों रखें? वे हमारे यहाँ अपना कपड़ा तबतक पाटते रहेंगे जबतक हम उसे खरीदना पसन्द करेंगे। इसलिए यदि हमें क्रोध आये तो हमें अपना क्रोध अपने ही ऊपर उतारना चाहिए।
जब हम विदेशी सुन्दर चीजोंसे लुब्ध होना बन्द कर देंगे तब हम विदेशी राष्ट्रोंके प्रति दुर्भाव रखना भी छोड़ देंगे।
मैं देखता हूँ कि टर्कीमें हो रही घटनाएँ हमारे देशके मुसलमानोंको सन्ताप पहुँचा रही हैं। वे खिलाफत के सम्बन्धमें किये गये अन्यायसे अधीर हो उठे हैं। मैं उनसे विनयपूर्वक कहना चाहता हूँ कि खिलाफतकी मदद करनेका सबसे छोटा और सीधा तरीका स्वदेशी है। क्योंकि स्वदेशीको अपनाकर हम भारतको शक्तिशाली बनाते हैं। और भारतकी ताकत बढ़ानेका अर्थ है खिलाफतकी रक्षा करनेकी हमारी ताकतका बढ़ जाना।
परन्तु आज हमारे दिलोंमें सबसे पहला खयाल यही होना चाहिए कि कल लोकमान्यकी बरसी मनानेके लिए हम अपनेको शुद्ध करें। जबतक हम स्वदेशीकी शपथ नहीं लेते, तबतक हम अपनेको शुद्ध नहीं कर सकते। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि जिन लोगोंने अपने कपड़े बाँटनेके लिए या बाहर भेजनेके लिए दे दिये हैं, वे इस बातका दृढ़ निश्चय करेंगे कि भविष्यमें कभी विदेशी वस्त्र नहीं पहनेंगे। मुझे विश्वास है कि लोकमान्यकी स्मृतिको अमर बनानेका सबसे अच्छा तरीका स्वराज्यकी प्राप्ति है। और स्वदेशीके बिना स्वराज्य असम्भव है। और स्वदेशीका श्रीगणेश तभी हुआ माना जायेगा जब विदेशी वस्त्रोंका पूर्ण और स्थायी रूपसे बहिष्कार हो। इसलिए मैं होली जलानेकी इस रस्मको एक पुनीत यज्ञ मानता हूँ। और यह पवित्र रस्म मेरे द्वारा सम्पन्न होने जा रही है इसलिए मैं अपने-आपको सौभाग्यशाली मानता हूँ। ईश्वर<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१९
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: विट्ठलभाई पटेलको|३८७}}</noinclude>देशके सब भागोंसे स्वयंसेवक भेजे जानेके प्रस्ताव आये हैं। और अगर अधिककी जरूरत हुई तो मुझे इसमें जरा भी शक नहीं है कि सारे देशमें स्वयंसेवक तैयार बैठे हैं। महाराष्ट्र, सिन्ध और दूसरे प्रान्तोंसे मित्रोंने मुझे सन्देश भेजे हैं कि वल्लभभाई इस बातका भरोसा रख सकते हैं कि उन्हें लगभग अनगिनत स्वयंसेवक मिल सकते हैं। इन शब्दोंमें जो आशावादिता व्यक्त हुई है, मुमकिन है, वह बहुत ज्यादा हो
किन्तु उसमें उचित कमी करनेके बाद भी यह तो बेशक कहा जा सकता है कि अगर जरूरत पड़ी और माँग हुई तो पुरुष और स्त्रियां यथेष्ट संख्यामें सामने आयेंगे।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ७-६-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४४२. पत्र: शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{right|मंगलवार [५ जून, १९२८]<ref>डाककी मुहरसे।</ref>}}
{{left|चि॰ शान्तिकुमार,}}
इसके साथ सुमन्तका पत्र है। अब क्या करूँ यह समझ नहीं आता। देखता कि इस आरोपका उत्तर जरूर देना चाहिए। यदि तुम कहो तो उसे यहाँ बुला लूँ। किन्तु अच्छा तो यह होगा कि उसने विवेकको बिलकुल छोड़ न दिया हो तो तुम्हीं उसके साथ उसके पत्रके विषयमें बात करो।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७०५) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: शान्तिकुमार मोरारजी
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४४३. पत्र: विट्ठलभाई पटेलको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
बुधवार, ज्येष्ठ वदी ३, [६ जून, १९२८]<ref>साधन सूत्रमें ज्येष्ठ वदी ४ है पर बुधवार ज्येष्ठ वदी ३ को ही था।</ref>}}
{{left|भाईश्री विट्ठलभाई,}}
स्वामीका पत्र मुझे मिल गया है। मुझे लगता है कि जो समिति नियुक्त की जायेगी यदि उसका निर्णय किसानोंके विरुद्ध जाता है तो उसके अनुसार उनको जो धन देना पड़ सकता है, उसे आज ही बैंकमें रखनेको शर्तको हम कबूल नहीं कर सकते। मैं देखता हूँ कि समितिके प्रति वल्लभभाई और किसानोंको अविश्वास है। अभी तो किसान इस बातपर लड़ रहे हैं कि लगानमें अनुचित वृद्धि की गई है। किन्तु जिस समितिके निर्णयसे बँधना उन्होंने स्वीकार किया है उसका निर्णय
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२०
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३८८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मयं}}</noinclude>उनके विरुद्ध जाये तो भी वह पैसा न भरेंगे या वल्लभभाई उनकी सहायता नहीं करेंगे, ऐसा मान बैठनेके लिए सरकारके पास कोई कारण नहीं है। अत: अपने स्वाभिमानकी खातिर भी हम पैसा बैंकमें रखनेकी शर्तको कबूल नहीं कर सकते। लोगोंका पूरा इकरारनामा सार्वजनिक रूपसे होगा। वल्लभभाईका इकरारनामा भी सार्वजनिक रूपसे होगा। बढ़ी हुई रकमको छोड़कर लगान अर्थात् पाँच लाख तो लोग भर ही देंगे। बाकीकी रकमको वसूल करना तो सरकारके लिए बहुत आसान काम होना चाहिए। किसी भी रीतिसे बढ़ी हुई रकमको पहले वसूल करनेकी बातमें मुझे
बदनीयतीकी गन्ध आती है। नाममात्र के लिए किसी समितिको नियुक्त कर दिया जाये तो उससे हमें सन्तोष नहीं होगा। फिर यह समिति निष्पक्ष और खुली होनी चाहिए। लोगोंके इतना साहस दिखानेके बाद हमें ढीला पड़नेका कोई अधिकार नहीं है। अन्तमें यदि लोगोंको हारना ही पड़ा तो हारेंगे, किन्तु हमें तो उनके हारनेमें योग नहीं देना चाहिए।
आप महाबलेश्वर कब और किसके निमन्त्रण पर जायें, इसका विचार आप मुझसे ज्यादा अच्छी तरह कर सकते हैं। अभी तो ऐसा नहीं लगता कि स्वामीके पत्र में से कोई बात रह गई हो।
{{right|बापू}}
{{left|[गुजरातीसे]}}
महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी
सौजन्य: नारायण देसाई
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४४४. पत्र: बेचर परमारको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
बुधवार, ज्येष्ठ वदी ३, [६ जून, १९२८]<ref>वर्ण-व्यवस्थाके उल्लेखसे लगता है कि यह पत्र १९२८ में ही लिखा होगा। देखिए "पत्र: बेचर परमारको", २३-६-१९२८ तथा पिछले शीर्षककी पाद टिप्पणी।</ref>}}
{{left|भाईश्री ५ बेचर,}}
तुम्हारा पत्र मिला। उसका एक जवाब तो यह है कि जो धन्धा नीतिके विरुद्ध हो वह सदा ही त्याज्य है। दूसरा यह है कि वर्णं सिर्फ चार हैं और उनमें अनीति नहीं है। और इसलिए अपने वर्ण में रहते हुए, माता-पिताने जो अनीति ग्रहण की हो उसे छोड़ दें, ताकि उसी वर्णमें रहकर दूसरा काम किया जा सके।
{{right|मोहनदासके आशीर्वाद}}
गुजराती पत्र (जी॰ एन॰ ५५७२) की फोटो-नकलसे।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२१
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४४५. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
बुधवार, ज्येष्ठ वदी [३, ६ जून, १९२८]<ref>डाककी मुहरसे। साधन सूत्रमें ज्येष्ठ वदी ४ है पर बुधवार ज्येष्ठ वदी ३ को था।</ref>}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तुम्हारे पत्र मिलते रहते हैं। इस समय तक मेरा पत्र भी मिल गया होगा। गंगाबहन और मणिबन बम्बई गई हैं। संयुक्त रसोईमें अब ९० से भी ज्यादा व्यक्ति जीमते हैं। लीलाबहन भी १५ दिनके लिए आई है। भाई चमनलाल भी
वहीं भोजन करते हैं। काम तो अच्छा चल रहा है। बालकृष्ण आजकल यहीं है। छगनलाल और प्रभुदास कल आ गये हैं। भैंसका दूध और मुख्य रूपसे भैंसका घी आता है, इसलिए घीका त्याग करनेकी बात आश्रममें हो रही है। वहाँ पाखानोंकी कठिनाई दूर करनेका कोई आसान तरीका सोचकर बताना चाहिए। अन्ततः मिट्टीका उपयोग तो होना ही चाहिए।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ५७८) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: वसुमती पण्डित
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४४६. पत्र: घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}}
{{right|६ जून, १९२८}}
{{left|भाईश्री घनश्यामदासजी,}}
आपका पत्र मीला है। आसनोंसे फायदा है ऐसा मैं भी मानता हूं। आसनोंकी पसंदगी में ज्ञानकी आवश्यकता है ऐसा मैंने देखा है।
अगस्ट मासमें मैं आश्रममें ही हूंगा ऐसा अब तो लगता है। अवश्य आइये।
{{right|आपका,<br>
{{larger|मोहनदास}}}}
{{left|श्रीयुत घनश्यामदास बिड़ला<br>
बिड़ला पार्क<br>
बालीगंज, कलकत्ता}}
सी॰ डब्ल्यू॰ ६१५९ से।
सौजन्य: घनश्यामदास बिड़ला
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२२
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४४७. पत्र: चीमनलाल वोराको'''}}}}
{{right|ज्येष्ठ कृष्ण ३ [६ जून, १९२८]<ref>डाककी मुहरसे।</ref>}}
{{left|भाई चीमनलालजी,}}
आपका पत्र मीला। पांच वस्तुका मतलब पांच ही है। दवामें भी दो पदार्थ आ जाय तो दो गीना जाय। नमक अलग पदार्थ में नहिं है। आजका मेरा खोराक बकरीका दूध, भाजी, घेउं, लींबु, बादाम है। हलंगी अलग गीनी जाती है। क्वीनीनके साथ कुछ और चीज भी लाई जाय तो दो वस्तु हो जायगी इ॰।
मेरा विश्वास है की जहां तक मनुष्य प्रयत्नको स्थान है यहां तक आयु बढ़ाना घटाना संभव है। आखरमें करनेवाला ईश्वर ही है परन्तु किसीको अपना निमित्त बना लेता है।
{{right|आपका,<br>
'''मोहनदास गांधी'''}}
{{left|श्री चीमनलाल गुलाबचंद वोरा<br>
श्रीमाली मोहल्ला<br>
रतलाम}}
जी॰ एन॰ ६३०० की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४४८. दोनों पहलू'''}}}}
अभी उस दिन ही मुझे उत्तरी खण्डके कमिश्नरके जिस पत्र की आलोचना करनेका दुःखद काम करना पड़ा था, बारडोली सत्याग्रह पर बम्बई सरकारकी विज्ञप्ति भी उसी पत्रकी श्रेणीकी है। इस विज्ञप्तिका आरम्भ इस अपमानजनक कथनको दुहराकर किया गया है कि श्रीयुत वल्लभभाई और उनके दूसरे साथी बाहरके लोग हैं। यहाँ उन्हें 'बाहरी' कहनेके बजाय बारडोलीमें न रहनेवाला कहा गया है। इसके बाद विज्ञप्तिमें बहुत बेहयाईसे इस तथ्यका उल्लेख किया गया है कि जब उनकी जब्ती करनेकी कोशिशें बेकार गई, तब सरकारने 'संगठित रूपसे भैंसें या दूसरी चल सम्पत्तिको जब्त करना शुरू किया।' श्रीयुत वल्लभभाईके प्रचार विभागने यह दिखा दिया है कि भैंसें जब्त करनेके क्या मानी होते हैं। इसके बाद विज्ञप्तिमें बड़े गर्व से कहा गया है कि जब्तीके काममें तथा जब्त किये गये मवेशियोंकी देखभालमें मामलतदारों और महालकारियोंकी मददके लिए चालीस पठान बुलाये गये हैं। प्रचार
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२३
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2026-08-18T04:45:09Z
अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||दोनों पहलू|३९१}}</noinclude>विभागने यह भी बता दिया है कि पठानोंको लानेके क्या मानी हुए हैं। वैसे तो प्रचार विभागकी मददके बिना भी हम इसके अर्थका सहज ही अनुमान लगा सकते थे। पठानोंको चाहे सरकार नौकर रखे या सामान्य लोग मगर सब जानते हैं कि ये दोस्त किसलिए रखे जाते हैं। बहरहाल कोई पठानोंको यहाँ लानेका कहीं यही सर्वमान्य अर्थ न लगा ले, इसलिए विज्ञप्ति कहती है, "इन पठानोंपर निराधार आरोप लगाये गये हैं। सरकारको विश्वास है कि उनका बरताव हर तरहसे आदर्श रहा है।" इस कैफियत पर किसे हँसी न आयेगी। जैसा कि सरकारका दावा है, अगर पठानोंको बेठियोंकी<ref>बेगारमें काम करनेवाले मजदूर।</ref> जगहपर बुलाया गया है, क्योंकि उन्हें जाति-च्युत करनेकी धमकी दी गई 'बताई जाती' है, तो फिर यह सवाल पूछना युक्ति-संगत है कि दूसरी जगहोंसे वेठियोंको बुलाने या किन्हीं दूसरे कुछ नम्र लोगोंको लानेके बदले ये पठान ही क्यों चुने गये हैं? सरकार तो इस बातकी हँसी उड़ाती है और उसे अविश्वसनीय बताती है कि "एक जिम्मेवार सरकारी अधिकारीकी नजरके नीचे पाँच-पाँच पठानोंके पाँच दल, नब्बे हजार मनुष्योंकी बस्तीको आतंकित कर सकते हैं।" फिर भी हिन्दुस्तानके लोगोंको अनुभव है कि अधिकारका बल पाकर एक भी पठान सारे गाँवमें क्या कर सकता है। निस्सन्देह यह हमारे लिये एक अपमानकी बात है कि पठान या ऐसे ही कोई दूसरे आदमी बहुसंख्यक समुदायोंको आतंकित कर सकते हैं, मगर दुर्भाग्यसे इस आतंकित और भयाक्रान्त हिन्दुस्तान में यह रोजमर्राकी बात है। और अगर बारडोलीकी हमारी इस लड़ाईसे और कुछ भी नहीं हुआ, लोगोंने केवल आदमियों और अफसरोंका डर छोड़कर पठानोंको मित्र बना लिया तो भी मैं समझूँगा कि बारडोलीकी लड़ाई अच्छी तरह लड़ी गई है।
मगर विज्ञप्तिमें केवल चल सम्पत्तिकी जब्तीके बारेमें जो जोर जबरदस्तीके तरीके अपनाये जा रहे हैं उन्हें ही गिनाकर सन्तोष नहीं किया गया है। उसमें जमीनकी जब्तीका भी जिक्र किया गया है। सरकारको यह कबूल करते हुए भी शर्म नहीं आई कि "विज्ञप्ति निकलनेके समय तक १४०० एकड़ जब्त की गई जमीन बेच दी गई है और अगर उसका बकाया लगान जल्दी ही न चुकाया गया तो वक्त आने पर ऐसी ५००० एकड़ जमीन और बेच दी जायेगी।" और फिर बिलकुल नाहक उसमें ये शब्द और जोड़े गये हैं कि "इस तरह बेची हुई जमीन फिर कभी नहीं लौटाई जायेगी।" विज्ञप्तिमें और भी कई दूसरी बातें हैं जिनपर टीका की जा सकती है, मगर मैं जब्त करता हूँ।
विज्ञप्तिमें उन लोगोंके लिए कुछ अपमानजनक रियायतोंकी घोषणा की गई है, जो १९ तारीखके पहले अपना कर भर देंगे। स्वाभिमानी पुरुषोंके लिए इसका एक ही जवाब सम्भव है, और वैसा जवाब देना बारडोलीके लोगोंका काम है। जब उन्होंने यह लड़ाई छेड़ी तब वे इसके नतीजे जानते थे। मुझे इसमें जरा भी शक नहीं है कि वे लड़ाईके अन्तिम अंकमें भी वैसी ही वीरता और धीरता दिखलायेंगे, जैसी कि उन्होंने शुरूमें दिखाई थी।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२४
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|३९२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>एक ओर सरकार की यह विज्ञप्ति है, दूसरी ओर श्रीयुत विट्ठलभाई पटेलने मेरे पास एक खत भेजकर १,०००) रु॰की अच्छी खासी रकम, जबतक सत्याग्रह चलता रहे, तबतक मासिक सहायताके रूपमें देते रहनेकी घोषणाकी है। एसेम्बलीके अध्यक्षके रूपमें अपने उज्ज्वल कार्य-कालमें श्रीयुत विट्ठलभाई पटेलने जनताके अधिकारोंकी रक्षाकी है। पद पानेसे उनको थोड़ा भी मद नहीं हुआ है, और ना ही उन्होंने देशकी इज्जतको बट्टा लगाया है। उन्होंने बिलकुल निष्पक्षतासे काम लिया है। और साथ ही जब कभी उन्हें अपने पदपर रहते हुए अवसर मिला है, प्रजाका प्रतिनिधि बनकर काम करनेमें उन्हें न तो झिझक हुई है, और न डर ही लगा है। विदेशी शासकोंने यह गुलामीकी परम्परा स्थापित कर दी है कि जो लोग सरकारसे तनख्वाह पाते हैं, उन्हें
किसी भी हालत में सरकारके विरुद्ध लड़ाईमें प्रजाके पक्षके प्रति सहानुभूति प्रकट नहीं करनी चाहिए। यहाँ तक कि सरकार अपने ही बनाये नियमोंके भी विरुद्ध चले, तब भी। श्रीयुत विट्ठलभाई पटेलने इस गुलामीकी बुरी परम्पराको तोड़ दिया है। और वे इस परम्पराको इसलिए तोड़ सके हैं कि उन्होंने अपना पद न तो सम्मानके लिए और ना ही इससे मिलनेवाले वेतन के लिए स्वीकार किया है, बल्कि, जैसा कि वे अपने पत्र में लिखते हैं, निर्वाचकोंकी ओरसे न्यासके रूपमें स्वीकार किया है। यह भी याद रखना चाहिए कि एसेम्बलीका अध्यक्ष बादशाहका सांविधिक नौकर नहीं है।
वह तो प्रजाका प्रतिनिधि है और राजनीतिक वाद-विवादोंमें सक्रिय रूपसे शामिल हुए बिना, उसे प्रजाके प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करनेका पूरा अधिकार है। अध्यक्ष चुन लिये जानेके बाद विट्ठलभाई किसी दल विशेषके आदमी न रहे, मगर उन सभी संयुक्त दलोंके प्रतिनिधि तो अवश्य ही हैं, जिन्होंने उनको अपना अध्यक्ष चुना है। इसलिए उन्होंने प्रजाके पक्षमें जो बहादुरीका काम किया है उसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूँ। अगर विदेशी सरकारकी बनाई विधान सभाओं में जाना किसी तरह भी उचित कहा जा सकता है तो उनमें जानेवालों और पद स्वीकार करनेवालोंके लिए
श्रीयुत विट्ठलभाईने रास्ता दिखा दिया है कि वे शालीनता और निर्भयतासे कैसे काम कर सकते हैं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ७-६-१९२८}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२५
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४४९. नौ नकद न तेरह उधार'''}}}}
अ॰ भा॰ चरखा-संघके मन्त्री लिखते हैं:
{{outdent|'''संघकी प्रान्तीय शाखाओंकी कुल उधार-बिक्री रु॰ १,५४,४८८–१३–८१/२ तक पहुँची है यानी इन शाखाओंमें कुल जितनी पूँजी लगी है, उसका १५ प्रतिशत तो उधार में लगा हुआ है। और यह भी उधार-बिक्रीकी रोकके लिए कौंसिल के प्रस्तावके बावजूद। इसका मुख्य कारण हमारे कार्यकर्त्ताओंका भय है। उन्हें डर है कि अगर उधार-बिक्री बिलकुल रोक दी जाये तो बिक्री कम हो जायेगी। यह भय निराधार है। तमिलनाडने उधारकी बिक्री बिलकुल बन्द कर दी है, मगर तो भी हिन्दुस्तानभर की सभी खादी दुकानोंमें सबसे ज्यादा बिक्री यहींकी है। आप हमारी विभिन्न शाखाओं और जनताको समझा दीजिए कि पिछले अनुभवसे यह प्रकट होता है कि उधार बिक्रीसे खादीके काममें नुकसान होता है, क्योंकि ग्राहक उधार चुकाने में देर करते हैं और हमारी पूँजी जो पहले ही बहुत ज्यादा नहीं, बन्द पड़ी रहती है।'''}}
ऊपरके पत्र में दी गई चेतावनीका मैं पूरी तरह समर्थन करता हूँ। जबतक खादीका हमारा यह राष्ट्रीय उद्योग अपनी शैशवावस्थामें है, और इसलिए जबतक उसे जनताकी प्रेमपूर्ण शुश्रूषा और संरक्षणकी जरूरत है, तबतक तो खादी भण्डारोंमें उधार-बिक्री होनी ही नहीं चाहिए। हमें केवल देशभक्त जनता ही के समर्थनका भरोसा रखना चाहिए और अगर हम नकद बिक्री न कर सकें तो हम नकद दाम देनेकी अनिच्छाका यह अर्थ लगा सकते हैं कि जनता खादीको संरक्षण नहीं देना चाहती। किन्तु अपनी अनेकानेक यात्राओंमें मेरा तो यही अनुभव रहा है कि जब लोगोंको खादीकी जरूरत होती है तब वे इसके लिए खुशीसे नकद दाम दे देते हैं, जब कि अपने दूसरे सौदेके लिए उधार करते हैं। जो लोग खादी चाहते हैं, वे उसके लिए नकद दाम दें। यह तो कमसे-कम संरक्षण है जिसकी कि खादी हकदार है। बिक्री भण्डारोंके व्यवस्थापकोंको यह भय बिलकुल नहीं होना चाहिए कि उधार बिक्री बन्द कर देनेसे खादी नहीं बिकेगी। खादीकी नकद बिक्री कर सकनेके लिए
उन्हें पास-पड़ोसमें प्रचार कर सकनेकी अपनी योग्यतापर ही भरोसा रखना चाहिए। और केन्द्रीय कार्यालय आदेशके विरुद्ध तो उन्हें उधार बिक्री किसी हालतमें करनी ही नहीं चाहिए। अनुशासनका तकाजा है कि अगर उन्हें उधार दिये बिना खादी भण्डारोंको चलानेकी अपनी योग्यताका विश्वास न हो तो वे प्रधान कार्यालयको इसकी सूचना दें और कामसे छुट्टी पानेके लिए कहें। प्रधान कार्यालयसे यह आशा की जानी चाहिए कि उसे यह मालूम है कि खादीको कमसे कम समयमें व्यावहारिक रूप किस तरह दिया जा सकता है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ७-६-१९२८}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२६
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<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४५०. दक्षिण आफ्रिकाके भारतीय'''}}}}
दक्षिण आफ्रिकी सर्वोच्च न्यायालयके ट्रान्सवाल प्रान्तीय विभागने अभी हालमें दो बहुत ही महत्वपूर्ण मामलोंमें निर्णय दिया है। इनमें से एक मामला सुरेन्द्र बापूभाई मेढ बनाम प्रवासी अपील बोर्डका था। यह यद्यपि स्वतः महत्वपूर्ण है, किन्तु इसका प्रभाव भारतीयोंके थोड़ेसे उन विशेष मामलोंपर ही पड़ता है, जिनको शिक्षित भारतीयोंकी हैसियत से स्मट्स-गांधी समझौतेके अन्तर्गत छूट मिली थी। संघ सरकारका कहना था कि ये छूटें पूरी नहीं थीं। मुझे इसकी इससे अधिक विस्तृत चर्चा करनेकी आवश्यकता नहीं है। अब न्यायालय इस निर्णयपर पहुँचा है कि अपीलकर्त्ताओं द्वारा प्रस्तुत दृष्टिसे ये छूटें पूरी थी।
दूसरा मामला दया पुरुषोत्तम बनाम प्रवासी अपील बोर्डका था। भारतीय प्रवासियोंके लिए इसके परिणाम बहुत दूरगामी हैं। इस मामलेके फैसलेमें कहा गया है कि १९२७ के अधिनियम ३७ का खण्ड ५ पीछेकी तिथिसे लागू नहीं होता। इस कारण जाली तौरपर लिये गये प्रमाणपत्र प्रवासी बोर्ड अथवा प्रवास अधिकारीकी मर्जीके मुताबिक रद नहीं किये जा सकते। यदि यह फैसला कायम रहता है तो वे लोग, जिनके पास ऐसे प्रमाणपत्र हैं, मूलतः दोषी होनेपर भी अप्रभावित रहेंगे। यह प्रवासियोंकी बहुत बड़ी जीत है। मेरी यह इच्छा कदापि नहीं है कि किसी भी तरहकी जालसाजीका समर्थन किया जाये। किन्तु इन प्रवासियोंका मामला मामूली जालसाजीका मामला नहीं है। कई मामलोंमें, कमसे कम १९१४ तक एशियाई दफ्तर एक रिश्वतखोर महकमा था; इस कारण वैध-प्रवेशकर्त्ताओंके लिए एशियाई दफ्तरके अधिकारियोंकी लोभवृत्तिकी तृप्तिके लिए टेढ़े तरीके अख्तियार किये बिना प्रवेश पाना लगभग असम्भव था। जहाँ सरकारी अधिकारी जालसाजीमें शामिल हों वहाँ सरकारका असहाय पीड़ितोंको दण्ड देना उचित नहीं है।
दक्षिण आफ्रिकी प्रवासियोंसे प्राप्त तारोंसे मुझे पता चला है कि सरकार इन दोनों फैसलोंके खिलाफ अपील कर रही है। मैं संघ सरकारसे नम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि वह भारतीयोंको इन दोनों अपीलोंसे प्राप्त लाभोंसे वंचित न करे।
ऐसा करना उसकी समझौतेकी वृत्ति और सद्भावकी नई भावनाके अधिक अनुरूप होगा। पहली अपीलके फैसलेसे सिर्फ थोड़ेसे ही व्यक्तियोंका बचाव होता है। उनके मामलोंमें जालसाजीका कोई सवाल ही नहीं है। दूसरी अपीलके फैसलेसे इस समय संघमें मौजूद काफी लोगोंका बचाव होता है। यदि संघ सरकारने जितने भारतीयोंकी मौजूदगी मानी है, वह उससे कुछ ज्यादा भारतीयोंको खपा लेगी तो इससे उसपर कोई गम्भीर संकट नहीं आ जायेगा। संघ सरकारको यह याद रखना चाहिए कि ये अपीलें खास तौरसे गरीब भारतीयोंके लिए तो बहुत ही खर्चीली पड़ी हैं। एक सुगठित शक्तिशाली सरकारके लिए मुकदमा जीते हुए नागरिकोंको अपील अदालतोंमें घसीटना और उन्हें थका-थका कर उनसे घुटने टिकवाना या उनकी उससे भी खराब<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: कृष्णप्रसादको|३९५}}</noinclude>हालत करना मुनासिब नहीं है। दैत्य जैसी शक्ति प्राप्त कर लेना तो ठीक है; किन्तु उसका उपयोग बौनोंके विरुद्ध करना निस्सन्देह बुरा है।
यदि प्रवासी इन अपीलोंमें अपनी जीतपर कोई ज्यादा उम्मीदें न बाँचेंगे तो अच्छा होगा। उन्हें शास्त्री जैसे महान् मित्र और परामर्शदाता मिले हैं। वे अपना मामला उनके सामने पूरे जोरसे रखें; किन्तु उसके बाद वे जो परामर्श दें उसके
अनुसार कार्य करें। वे उनकी ओरसे संघ सरकार पर उनका जितना प्रभाव है उस समस्त प्रभावका उपयोग करेंगे। मैं प्रवासियोंके समुद्री तारोंका स्वागत करता उनका मुझपर जो विश्वास है, मैं उसकी मी कद्र करता हूँ। किन्तु मैं सन् १९२०में इतनी दूर और बदली हुई स्थितियोंमें रहता हुआ सहायता करनेकी अपनी सामर्थ्यको बहुत ही सीमित पाता हूँ। इसलिए उनकी शक्ति पारस्परिक एकता, नरम रुख और
उस व्यक्तिमें आस्था रखनेपर निर्भर करती है, जो वहाँ भारत सरकारका एजेंट जनरल ही नहीं है, बल्कि उनका सच्चा और सशक्त मित्र और मार्गदर्शक भी है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ७-६-१९२८}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४५१. पत्र: कृष्णप्रसादको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
बाबू रूपनारायणसे यह सुनकर कि आप खादी आन्दोलन में अत्यधिक दिलचस्पी ले रहे हैं और आपने स्वयं भी कातना शुरू कर दिया है, मुझे प्रसन्नता हुई। मैसूर राज्य द्वारा खादी आन्दोलन किस प्रकार चलाया जा रहा है, इस और मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि यदि इस आन्दोलनको भली प्रकार चलाया जाये तो निजामकी रियासतके गरीब किसानोंके लिए यह एक वरदान सिद्ध होगा।
बाबू रूपनारायणने बताया है कि मैं आपके और आपके बड़े बेटेके सूतका नमूना पानेकी आशा रख सकता हूँ। मैं नमूनोंको पानेकी बाट जोह रहा हूँ। यदि आप मुझे अनुमति देंगे तो ये नमूने हमारे संग्रहालय में रखे जायेंगे, जिसमें प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा काते गये सुतके नमूने इकट्ठे किये जाते हैं।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|परमश्रेष्ठ महाराजा सर कृष्ण प्रसाद<br>
यामिनस्सल्तनत<br>
सिटी पैलेस, हैदराबाद, दक्षिण}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६१४) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२८
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४५२. लेस्ली विल्सनको लिखे गये पत्रका मसविदा'''}}}}
{{right|[७ जून, १९२८]<ref>यह अगले शोर्षकोके साथ संलग्न था।</ref>}}
मेरे इस माहकी ४ तारीखके पत्रका उत्तर तत्काल देनेके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ।
आपके पत्रसे यह जाहिर है कि हम विरोधी दिशाओंमें काम कर रहे हैं। मेरी समझमें नहीं आता कि चूँकि मेरा जनतामें महत्वपूर्ण पद है इसलिए समान महत्वपूर्ण पदवाले दूसरे व्यक्तिको ऐसा एक मैत्रीपूर्ण पत्र क्यों न लिखूँ, जिसमें उसका ध्यान उस बातपर आकृष्ट किया गया हो, जिसे मैं उसके अधिकारियों द्वारा कानून या सरकारी कर्त्तव्यका गम्भीर उल्लंघन समझता हूँ। मैं जो बयान देता हूँ, उनके बारेमें
अपने पदके कारण मेरी जो स्थिति बन गयी है उसे ध्यान में रखते हुए मैं प्रमाण नहीं दे सकता, इस तथ्यका यह अभिप्राय नहीं कि मेरे पास ऐसे बयानोंका कोई आधार नहीं है या कि मैं जन-हितको ध्यान में रखते हुए एक साथी अधिकारीको वे बयान गोपनीय रूपमें भी न दूँ।
यदि आप मेरे ४ तारीखके पत्रको फिरसे पढ़ें तो उससे आपको पता चलेगा कि मैंने यह नहीं कहा है कि मेरे पास प्रमाण नहीं हैं। इसके विपरीत मैंने तो आपको मुझे जो जानकारी मिली है उसके स्रोत बताये हैं। यदि आप उन बयानोंको प्रमाणित करवाना चाहते हैं तो क्या अब यह आपपर ही निर्भर नहीं है कि आप इसका एकमात्र सम्भव तरीका अपनायें अर्थात् जाँच-समिति नियुक्त करें? अन्यथा,
आप मुझे बताइये कि मैंने आपको जो बयान दिये हैं, वे सही हैं या गलत; इसके बारेमें आप और किस तरह सन्तुष्ट हो सकते हैं?
आपके पत्रके तीसरे अनुच्छेदके सम्बन्धमें मैं यह कहूँगा कि मेरा आपपर विश्वास न करनेका कोई प्रश्न नहीं है। मैंने आपके पत्रका हवाला यह दिखाने के लिए दिया था कि जिस वक्त आपने मुझे वह पत्र लिखा था उस वक्त आपने कोई जाँच नहीं करवाई थी। स्पष्ट ही आप ऐसा सोचते मालूम होते हैं कि कमिश्नरका पत्र आपत्तिजनक नहीं है, परन्तु मेरी रायमें तो यह पत्र अत्यन्त अपमानजनक है और यह सारे कानूनकी अवज्ञा चाहे न करता हो किन्तु यह सारी व्यवस्था और भद्रताकी अवज्ञा जरूर करता है और सब तरहके शासकीय उत्तरदायित्वसे रहित है। और पिछली १७ तारीखके आपके पत्रके अन्तिम अनुच्छेदसे, जो कि स्पष्ट है, पता चलता है कि उस वक्त जब आपने उसे लिखा था आपने मेरे द्वारा लगाये गये आरोपोंकी कोई जाँच नहीं की थी।
जहाँ तक आपके पत्रके चौथे अनुच्छेदका सम्बन्ध है, मैं आपको विश्वास दिला दूँ कि मेरा पत्र किसी भी तरह शीघ्रतामें नहीं लिखा गया था। मैंने यह बयान पूर्ण उत्तरदायित्वकी भावनाके साथ सोच-विचार कर दिया था।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२९
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||लेस्ली विल्सनको लिखे गये पत्रका मसविदा|३९७}}</noinclude>अन्तमें मैं आपसे ये दो प्रश्न पूछता हूँ:
क्या आप उत्तरी खण्डके अधिकारीके पत्रपर जिसकी ओर मैंने आपका ध्यान आकृष्ट किया था कोई विचार करना चाहते हैं या नहीं?
क्या आप उन आरोपोंकी जाँच कराना चाहेंगे जिनकी ओर मैंने आपका ध्यान आकृष्ट किया है?
जिन बयानोंपर मुझे यकीन है और यदि जाँच-समितिकी नियुक्ति की जाये तो जिनकी पुष्टिमें काफी प्रमाण दिये जा सकते हैं, निम्नलिखित हैं:—
१. कुर्कीके बहुतसे मामलोंमें पंचनामे तैयार नहीं किये गये, रसीदें नहीं दी गई और कुर्क की गई सम्पत्तिका कोई हिसाब-किताब नहीं दिया गया।
२. मालिकोंको पहचाने बिना ही भैंसोंकी कुर्की कर ली गई।
३. सिविल प्रोसीजर कोड (दीवानी प्रक्रिया संहिता) के अधीन कुर्कीसे मुक्त रखी गई सम्पत्ति भी कुर्क कर ली गई है।
४. कुर्की रातके वक्त की गई।
५. बाड़ोंको तोड़कर और दरवाजोंको उखाड़कर घरोंमें जबरदस्ती प्रवेश किया गया।
६. दुधारू पशुओंको यातना पहुँचाई गई और उन्हें बहुत ही मामूली कीमत पर बेच दिया गया। रु॰ १२०० की भैंसे रु॰ २१६ पर बेच दी गई।
७. एक पठान चोरी करता हुआ पकड़ा गया।
८. पठानोंने महिलाओंसे छेड़छाड़ की और उनके सामने भद्दी हरकतें कीं।
९. पठानोंने लोगोंकी भावनाओंको और भी कई तरहसे ठेस पहुँचाई।
१०. कलक्टर या जिला अधीक्षक द्वारा मनमानी विज्ञप्तियाँ जारी की गई।
११. सत्याग्रहियोंके मुकदमोंकी कार्यवाही अनियमित ढंगसे चलाई गई।
मुझे जो बहुतसे दृष्टान्त बताये गये थे मैंने उनमेंसे कुछ एक ही यहाँ दिये हैं।
मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यद्यपि मेरे पत्र बिलकुल मैत्रीपूर्ण हैं और इसलिए गोपनीय होने चाहिए, तो भी यदि आप समझते हों कि हमारा पत्र-व्यवहार प्रकाशित कर दिया जाये तो मेरी ओरसे इस बारेमें किसी तरहकी भी
कोई आपत्ति नहीं है।
{{left|परमश्रेष्ठ सर लेस्ली विल्सन<br>
बम्बईके राज्यपाल}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ११४४७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३०
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४५३. पत्र: विट्ठलभाई पटेलको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
७ जून, १९२८}}
{{left|भाईश्री विट्ठलभाई,}}
गवर्नरको भेजे जानेवाले जवाबका मसविदा इसके साथ है। उसमें कुछ फेरफार करनेकी जरूरत हो तो जरूर कर लेना। स्वामीने जो तैयार किया हो वह सब भेजने की जरूरत नहीं देखता। उसमें से कई बातें ली हैं। यह तो बहुत चाहता हूँ
कि सारा पत्र-व्यवहार प्रकाशित हो जाये। किन्तु यह किस प्रकार हो? गवर्नर अपने प्रत्येक पत्रके साथ अपने आपको अधिकाधिक बांधते प्रतीत होते हैं।
{{right|{{larger|मोहनदासके वन्देमातरम्}}}}
गुजराती (एस॰ एन॰ १४४४१) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४५४. पत्र: महादेव देसाईको'''}}}}
{{right|[७ जून, १९२८ के पश्चात्]<ref>गवर्नरको भेजे जानेवाले उत्तरके मसविदेके उल्लेखसे स्पष्ट है कि यह पत्र ७ जूनके बाद लिखा
गया होगा।</ref>}}
{{left|चि॰ महादेव,}}
तुम्हारा तार मिला। मुझे जितना ठीक लगा उतना भाग मैंने ले लिया है। नम्रताका अभाव है, शेष भाग छोड़नेका यह तो सबसे छोटा कारण है। मुझे तो इस लेखकी शैली बिलकुल पसन्द नहीं आई। तुम जब जाओगे तो तुम्हारे सामने उसका विश्लेषण करूँगा। जिस दोषके कारण स्वामीका लेख रद्द किया था, लगभग वही दोष इस लेखमें भी है। इस लेखके विषयमें तुम्हारी कोई अलग धारणा या
आशा हो तो वह मैं नहीं जानता इसलिए यदि मेरे अनुमानमें कुछ भूल हो तो वह हमें सहन करनी पड़ेगी।
रामेश्वर बिड़लाका पत्र देखकर वल्लभभाई प्रसन्न होंगे।
विट्ठलभाईको लिखा गया गवर्नरका पत्र भेज रहा हूँ और उसके साथ जवाब का मसविदा भी।
{{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३१
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2026-08-18T09:03:12Z
अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: जे॰ बी॰ पेनिग्टनको|३९९}}</noinclude>{{left|[पुनश्चः]}}
तुम्हारे जितने पत्र मुझे फाड़ने लायक लगे, उन्हें मैंने फाड़ दिया है। तुम सब-कुछ यहीं देख लोगे।
गुजराती (एस॰ एन॰ ११४४७) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४५५ पत्र: जे॰ बी॰ पेनिंग्टनको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
८ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। मैं जानता हूँ कि हम दोनोंमें चाहे कितने ही मतभेद हों, यदि मैं कभी इंग्लैंड आ सका तो निश्चय ही आप मेरा हृदयसे स्वागत करेंगे। एक मित्रने मुझे लिखा है कि यदि सर जॉन साइमन मुझसे मिलनेकी इच्छा प्रकट करें तो मैं उसे न ठुकराऊँ, क्योंकि वे एक साफ दिलके ईमानदार अंग्रेज हैं, वे कभी कड़ा रुख नहीं अपनाते और वे मेरे मनकी बात जान सकेंगे। यदि उन्होंने ऐसी इच्छा की होती तो मैं आश्रममें निश्चय ही उनका प्रसन्नतासे स्वागत करता। यों मैं [भेंट करनेको] इच्छुक नहीं हूँ; क्योंकि मैं अभी तक आयोगमें हूँ। इस कारण मैं उनसे भेंट करनेकी आवश्यकता नहीं समझता। फिर आप पश्चिमी भारतका भूगोल जानते हैं। अहमदाबाद एक तरफ कोनेमें है, अतः मुझे सर जॉन साइमन जैसे व्यक्तिके निश्चित मार्गसे हटकर मुझ जैसे व्यक्तिसे, जो उनके कार्य में किसी प्रकारकी सहायता नहीं कर सकता, मिलने आनेकी आशा नहीं करनी चाहिए।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|जे॰ बी॰ पेनिंग्टन}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३२५) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३२
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४५६. पत्र: स्वेन्सका किरकान्सको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
८ जून, १९२८}}
{{left|महाशय,}}
आपके ८ फरवरीके पत्रके सन्दर्भ में मेरा कहना है कि आप
'आत्मकथा' (स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरीमेंट्स विद ट्रुथ) के पहले खण्डका असंक्षिप्त स्वीडिश अनुवाद छाप सकते हैं।
जो भी पैसा आप मुझे देंगे, वह मेरे सार्वजनिक कार्योको चलानेमें खर्च होगा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५०३४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४५७. पत्र: टी॰ डि मंजीयरलीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
८ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय बहन,}}
आपका पत्र और पत्रिकाएँ मिलीं; धन्यवाद!
मैं आपकी बातपर विश्वास करता हूँ और आपको, यदि आप इसे ऐसा मान लें तो एक बहुत ही छोटा लेख भेज रहा हूँ।
"बावजूद इसके कि यदि कोई मुझसे मेरे इस विश्वासका कारण पूछे तो मैं उसे कारण बता नहीं सकूँगा, हिन्दू-मुस्लिम एकतामें मेरा विश्वास अटल है।"
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३२४) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३३
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अनुश्री साव
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४५८. पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
८ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
आपका पत्र मिला। हमारा रास्ता साफ है। यदि खादी प्रदर्शनीको मद्रास प्रदर्शनी<ref>मद्रास प्रदर्शनोपर गांधीजीके विचारोंके लिए देखिए, खण्ड ३५, पृष्ठ ४५५-५६।</ref> की नकल मात्र ही होना है तो कांग्रेस के अवसर पर खादी प्रदर्शनी नहीं की जानी चाहिए। श्री सेनगुप्तकी ओरसे अभी तक मुझे कोई खबर नहीं मिली है।
मैं निखिलसे सम्बन्धित डाक्टरी रायको जाननेके लिए बहुत उत्सुक हूँ। उसे कटि-स्नान, पूरा आराम और दूधका सेवन करना चाहिए।
सर डेनियल हेमिल्टन के पत्रका एक अंश आपको भेज रहा हूँ। क्या आप सुन्दरवनमें [उनकी] जायदाद<ref>१६ मईके अपने पत्रमें सर डेनियलने लिखा था: बंगालके सुन्दरवनमें अपनी जायदादमें में हस्तकला और पुस्तक ज्ञानको भी अनिवार्य बनाना चाहता हूँ। मैं बालकोंको कताई, बुनाई, बढ़ईगिरी और खेती के सुधरे ढँग सिखाना चाहता हूँ।</ref>के बारेमें कुछ जानते हैं? और यदि आप उसके
बारेमें कुछ जानते हैं तो लिखे, वहाँके लोगोंकी क्या दशा है तथा जायदादमें कितने लोग बसते हैं।
सस्नेह,
{{right|बापू}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८९१६) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४५९. पत्र: श्रीमती रचेल एम॰ रटरको'''<ref>एक अंग्रेज पादरी बहन जो गांधीजीसे १९२४में उनके जूहूमें स्वास्थ्य लाभ करते समय मिली थीं।</ref>}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
८ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय बहन,}}
आपके पत्रके लिए धन्यवाद। कुमारी मेयोके बारेमें आपका जो कुछ कहना है वह ठीक ही है। ऐसे लोग भी हैं जो कुछ करने या कहनेसे कभी नहीं रुकते, फिर चाहे वह असत्य ही क्यों न हो।
{{smallrefs}}
{{left|३६–२६}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३४
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४०२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>आपके पत्रके कुमारी मेयोसे सम्बन्धित अंशको मैं 'यंग इंडिया'<ref>देखिए '''यंग इंडिया,''' २८-६-१९२८ में प्रकाशित लेख "एन इम्पटिनेंस"।</ref> में उद्धृत कर
रहा हूँ। आपका नाम उसमें नहीं दे रहा हूँ।
श्री एन्ड्रयूज आजकल कोलम्बोमें हैं और कविकी सेवा कर रहे हैं, जिन्हें अचानक बीमार पड़ जानेसे यूरोप जाते हुए बीचमें रुकना पड़ा।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीमती रचेल एम॰ रटर<br>
आयरसन लेन<br>
विन्केन्टन<br>
समरसेट, इंग्लैंड}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४३२३) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४६०. पत्र: रामेश्वरदास पोद्दारको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
८ जून, १९२८}}
{{left|भाई रामेश्वरदास,}}
तुम्हारा पत्र जमनालालजीने मुझे भेज दिया है। मैं तुम्हें क्या लिखूँ? तुम धीरज न छोड़ो, स्वस्थ रहो और शक्तिसे अधिक कोई भी काम करनेकी इच्छा न करो। शंकरराव देव जैसे साधु पुरुष वहाँ हैं, उनसे पूछकर चलो; या वर्घामें रहो
तो जैसा जाजूजी<ref>श्रीकृष्णदास जाजू।</ref> कहें वैसा करो।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ १९५) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४६१. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|९ जून, १९२८}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तुम्हारे पत्र मिलते रहते हैं। यदि पाखानेका दूसरा कोई प्रबन्ध न हो सके और एनिमा लेनेमें मुश्किल हो तो कमोड रख लो और उसे अपने हाथसे ही साफ कर लिया करो। विलायती कमोड लेनेके बदले, वहींसे ले लेना ज्यादा आसान होगा।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३५
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अनुश्री साव
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||पत्र: तैयब अलीको|४०३}}</noinclude>देहरादूनके बहुत से घरोंमें कमोड इस्तेमाल करनेका रिवाज है। जो भी सुधार प्रेम-पूर्वक हो सके वह करवाना।
चि॰ कमलाने तुम्हारा सन्दूक नहीं खोला। तुम्हारा सन्दूक गंगाबहनने किसी कामसे खोला था। उसी समय उसमें थाली है या नहीं यह देखनेके लिए प्रभावती से कहा था। सन्दूक खोलनेका काम गंगाबहनने प्रभावतीको सौंपा था। इसमें दुःख
माननेका मुझे कोई कारण नहीं दिखाई देता। कमलाने सन्दूक खोलकर नहीं देखा। उसने यही कहा है और प्रभावतीसे तसदीक करा लेनेको कहा है। मेरा भी विचार प्रभावतीसे पूछ लेनेका है। किन्तु मुझे नहीं लगता कि कमलाने कोई बात छिपाई है। तुम्हारे सन्तोषके लिए प्रभावतीसे भी पूछूँगा।
यहाँका काम जमता जा रहा है। इस समय सवेरेके तीन बजे हैं।
{{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
{{left|[पुनश्चः] हिन्दी खूब सुधार लो।}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७७) की फोटो-नकलसे।
सौजन्य: वसुमती पण्डित
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४६२. पत्र: तैयब अलीको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
साबरमती<br>
९ जून, १९२८}}
{{left|भाईश्री तैयब अली,}}
आपका पत्र मिला। अपनी टेकपर कायम रहनेके लिए आपने नौकरी छोड़ दी, इसके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ।
'नवजीवन' में खादीपर समय-समयपर लिखा ही जाता है, किन्तु एक-एक कामको लेकर अलगसे लिखें यह योग्य नहीं लगता।
सम्बन्धियोंकी निन्दा सहन करें। इस समय आपने कौन-सा धन्धा तलाश किया है?
{{right|{{larger|मोहनदास गांधीके वन्देमातरम्}}}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ७७५८) से।
सौजन्य: लालचन्द जयचन्द वोरा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१५८
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|'''१३५. पत्र : जाल खभ्भाताको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१९ मार्च, १९२८}}
{{left|चि॰ जाल,}}
तुम्हारा स्वास्थ्य अच्छा न होनेकी खबर पढ़कर दुख हुआ है। ईश्वरके हुक्मके बिना एक पत्ता भी नहीं गिरता, यह सोचकर ईश्वर पर भरोसा रखते हुए उसीका ध्यान करो और धीरज रखो। उसकी मरजी होगी तो ठीक हो जाओगे।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
:गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ५०१३) से।
:सौजन्य : तहमीना खम्माता
{{c|'''१३६. पत्र : बहरामजी खम्भाताको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
१९ मार्च, १९२८}}
{{left|भाईश्री खम्भाता,}}
तुम्हारा पत्र आज ही मिला। बेटेके लिए मेरा आशीर्वाद तो है ही। लेकिन घबराहटमें यूरोप जानेकी मुझे कोई जरूरत दिखाई नहीं देती। हम ईश्वर पर ही सब कुछ छोड़ दें। वहाँ कोई अच्छा डाक्टर जोखम लेनेको तैयार हो तो ऑपरेशन कराने में कोई हानि नहीं है। छोटे देशमुखको तुमने दिखाया है? चि॰ जालसे कहना कि हिम्मत न हारे। मुझे भी समाचार लिखते रहना। तुम्हारा स्वास्थ्य अब कैसा चल रहा है?
यदि वहाँ कोई डाक्टर हिम्मत न करे और तुम्हें शान्ति न मिले तो यूरोप अवश्य चले जाना। मेरे पत्रको मनाहीका हुक्म मत समझना। हम जल्दबाजी में कुछ न करें और यह देह क्षणभंगुर है इसलिए इसके प्रति ज्यादा मोह नहीं रखना चाहिए, मैं तो इतना ही समझाना चाहता हूँ।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
:गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ५०१२) से।
:सौजन्य : तहमीना खम्भाता<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३२
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{c|अठाईस}}</noinclude>
५२३. शिक्षा विषयक प्रश्न — ४ (२४-६-१९२८) ४७८
५२४. विनाशकाले (२४-६-१९२८) ४८१
५२५. पशु-सुधार (२४-६-१९२८) ४८४
५२६. शब्दकोष (२४-६-१९२८) ४८४
५२७. पत्र : सदानन्दको (२४-६-१९२८) ४८५
५२८. पत्र : लिली मुथु कृष्णाको (२४-६-१९२८) ४८६
५२९. पत्र : नीलकण्ठ बाबूको (२४-६-१९२८) ४८६
५३०. पत्र : के० नटराजन्को (२४-६-१९२८) ४८७
५३१. पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (२५-६-१९२८) ४८८
५३२. पत्र : रामनाथको (२७-६-१९२८) ४८९
५३३. पत्र : गोवर्धनभाई आई० पटेलको (२७-६-१९२८) ४८९
५३४. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२७-६-१९२८) ४९०
५३५. पत्र : रिचर्ड बी० ग्रेगको (२७-६-१९२८) ४९१
५३६. एक संशोधन (२८-६-१९२८) ४९२
५३७. पर्दा दूर हुआ समझो (२८-६-१९२८) ४९२
५३८. पत्र : पार्वतीको (३०-६-१९२८) ४९४
५३९. पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (३०-६-१९२८) ४९५
५४०. पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-६-१९२८) ४९५
५४१. पत्र : कुवलयानन्दको ४९६
परिशिष्ट
१. विदेशोंमे प्रचार ४९७
२. वी० ए० श्री निवास शास्त्रीका समुद्रीतार ५००
३. बारडोलीका मामला क्या है? ५०२
सामग्री के साधन-सूत्र ५०५
तारीखवार जीवन-वृत्तान्त ५०६
शीर्षक सांकेतिका
सांकेतिका<noinclude></noinclude>
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671425
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आदेश यादव
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{c|अठाईस}}</noinclude>
|५२३.|| शिक्षा विषयक प्रश्न — ४ (२४-६-१९२८) ||४७८
|५२४.|| विनाशकाले (२४-६-१९२८) ||४८१
|५२५.|| पशु-सुधार (२४-६-१९२८) ||४८४
|५२६.|| शब्दकोष (२४-६-१९२८) ||४८४
|५२७.|| पत्र : सदानन्दको (२४-६-१९२८) ||४८५
|५२८.|| पत्र : लिली मुथु कृष्णाको (२४-६-१९२८) ||४८६
|५२९.|| पत्र : नीलकण्ठ बाबूको (२४-६-१९२८) ||४८६
|५३०.|| पत्र : के० नटराजन्को (२४-६-१९२८) ||४८७
|५३१.|| पत्र : विट्ठलभाई पटेलको (२५-६-१९२८) ||४८८
|५३२.|| पत्र : रामनाथको (२७-६-१९२८) ||४८९
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|५३६.|| एक संशोधन (२८-६-१९२८) ||४९२
|५३७.|| पर्दा दूर हुआ समझो (२८-६-१९२८) ||४९२
|५३८.|| पत्र : पार्वतीको (३०-६-१९२८) ||४९४
|५३९.|| पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (३०-६-१९२८) ||४९५
|५४०.|| पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-६-१९२८) ||४९५
|५४१.|| पत्र : कुवलयानन्दको ||४९६
| ||परिशिष्ट
| ||१. विदेशोंमे प्रचार ||४९७
| ||२. वी० ए० श्री निवास शास्त्रीका समुद्रीतार ||५००
| ||३. बारडोलीका मामला क्या है? ||५०२
| ||सामग्री के साधन-सूत्र ||५०५
| ||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त ||५०६
| ||शीर्षक सांकेतिका
| ||सांकेतिका
|}<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{c|अठाईस}}</noinclude>{|width=100%
|-
|५२३.|| शिक्षा विषयक प्रश्न — ४ (२४-६-१९२८) ||४७८
|-
|५२४.|| विनाशकाले (२४-६-१९२८) ||४८१
|-
|५२५.|| पशु-सुधार (२४-६-१९२८) ||४८४
|-
|५२६.|| शब्दकोष (२४-६-१९२८) ||४८४
|-
|५२७.|| पत्र : सदानन्दको (२४-६-१९२८) ||४८५
|-
|५२८.|| पत्र : लिली मुथु कृष्णाको (२४-६-१९२८) ||४८६
|-
|५२९.|| पत्र : नीलकण्ठ बाबूको (२४-६-१९२८) ||४८६
|-
|५३०.|| पत्र : के० नटराजन्को (२४-६-१९२८) ||४८७
|-
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|-
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|-
|५३३.|| पत्र : गोवर्धनभाई आई० पटेलको (२७-६-१९२८) ||४८९
|-
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|-
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|५३६.|| एक संशोधन (२८-६-१९२८) ||४९२
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|-
|५३८.|| पत्र : पार्वतीको (३०-६-१९२८) ||४९४
|-
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|-
|५४०.|| पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-६-१९२८) ||४९५
|-
|५४१.|| पत्र : कुवलयानन्दको ||४९६
|-
| ||परिशिष्ट
|-
| ||१. विदेशोंमे प्रचार ||४९७
|-
| ||२. वी० ए० श्री निवास शास्त्रीका समुद्रीतार ||५००
|-
| ||३. बारडोलीका मामला क्या है? ||५०२
|-
| ||सामग्री के साधन-सूत्र ||५०५
|-
| ||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त ||५०६
|-
| ||शीर्षक सांकेतिका
|-
| ||सांकेतिका
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{c|अठाईस}}</noinclude>{|width=100%
|-
|५२३. || शिक्षा विषयक प्रश्न — ४ (२४-६-१९२८) || ४७८
|-
|५२४. || विनाशकाले (२४-६-१९२८) || ४८१
|-
|५२५. || पशु–सुधार (२४-६-१९२८) || ४८४
|-
|५२६. || शब्दकोष (२४-६-१९२८) || ४८४
|-
|५२७. || पत्र : सदानन्दको (२४-६-१९२८) || ४८५
|-
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|-
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|-
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|-
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|५४०. || पत्र : ताराबहन जसवानीको (३०-६-१९२८) || ४९५
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|-
| || परिशिष्ट
|-
| || १. विदेशोंमे प्रचार || ४९७
|-
| || २. वी॰ ए॰ श्री निवास शास्त्रीका समुद्रीतार || ५००
|-
| || ३. बारडोलीका मामला क्या है? || ५०२
|-
| || सामग्री के साधन–सूत्र || ५०५
|-
| || तारीखवार जीवन–वृत्तान्त || ५०६
|-
| || शीर्षक–सांकेतिका
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|११६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>चाहिए यह पण्डितजी नानाभाईको लिख दें। विवाह विधि रविवारको सुबह साढ़े दस बजे सम्पन्न की जायेगी
मुझे यह भ्रम रहा कि गणेशका अंग्रेजी नाम जॉन है। और चूँकि मैं गणेश नाम भूल गया था इसलिए मैंने जॉन लिख दिया। अब में गणेश नामसे नया पत्र लिख रहा हूँ। उसे यह दे देना। और यदि उसका स्वभाव ऐसा हो कि वह इस विनोदको और अपने नामके विस्मरणको सहन कर सके तो उसे जॉनके नामवाला पत्र भी दे देना। अन्यथा उसे फाड़ देना।
रुखीके बारेमें अब मुझे चिन्ता करनेकी कोई जरूरत नहीं है।
मुझे लगता है कि जो लोग संयुक्त रसोईसे अलग होना चाहें वे अलग भले ही हो जायें; लेकिन वह बन्द नहीं की जानी चाहिए। वैयक्तिक रसोई और संयुक्त रसोई, दोनों साथ-साथ चलनी चाहिए।
चर्मालय और 'लिफ्ट'में कमसे कम जितना पैसा लगाना होगा उतना तो हम अवश्य लगायेंगे। चर्मालयके लिए गोरक्षा-निधिका उपयोग करना है। मुझे याद है कि इस सम्बन्धमें वर्षामें एक प्रस्ताव पास किया गया था। यदि न किया गया हो तो ११ तारीखकी बैठकमें करेंगे। जिसमें नुकसान होने की भी कोई सम्भावना नहीं है, वह काम तो हमें करना ही है।
हम 'लिफ्ट'के लिए भी आवश्यक धन जुटा ही लेंगे। लेकिन में जब ९ तारीख को वहाँ पहुँचूँगा तब इसका कोई हल ढूंढ लूंगा।
मीराबाईका पैसा तो नियमपूर्वक आता ही है। उस सारे धनका उपयोग अब आश्रमके निमित्त करना है। उसकी एक वर्षकी अवधि पूरी हो गई; इसलिए अब उसका उपयोग करनेमें कोई आपत्ति नहीं है। सिर्फ इतना याद रखना कि हिसाब की अथवा किसी अन्य प्रकारकी असावधानीसे नुकसान न हो।
क्या अब तुममें इतनी क्षमता आ गई है कि लोग जितने 'लिफ्ट' मँगवायें उतने भेज सकते हो और उन्हें वहाँ इस तरह लगा भी दे सकते हो कि वे काम देने लगें। मैंने इसके विषयमें जानबूझकर ही कुछ नहीं छापा है। यदि छापना ही हो तो मुझे लिखना ताकि मैं आगामी अंकके लिए लेख लिख सकूं। क्या कुछ कहा जा सकता है, सो बताना। लिफ्ट चलानेके लिए तुम्हारे पास लोग तैयार हैं? प्रत्येकके पास कमसे कम कितना तगड़ा पशु हो, यह भी लिखना चाहिए न? क्या बूढ़ी भैंसका उपयोग नहीं किया जा सकता? क्या स्वस्थ और सधा हुआ बैल काममें नहीं लाया जा सकता? हमारे अनुमानमें कहीं भूल नहीं होनी चाहिए। मुझे भय है कि प्रत्येक स्थानपर हमें पर्याप्त समयतक अपना प्रशिक्षित आदमी रखना पड़ेगा। लेकिन यदि इन सब बातोंपर तुमने विचार कर लिया हो तो इतना बहुत है।
यही बात चमड़े के कामके बारेमें भी है। चमड़े के कामके बारेमें मुझे पत्रिका भेजना। मैं उसे देखकर प्रकाशित करूँगा।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५५
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र : आश्रमवासियोंको|११७}}</noinclude>{{left|[पुनश्च:]}}
साथका पत्र विशेष रूपसे आश्रमके लिए है।
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ७७६२) से।<br>सौजन्य : राधाबहन चौधरी|2em}}
{{C|{{larger|'''१०७. पत्र : आश्रमवासियोंको'''}}}}
{{Right|मौनवार, २१ फरवरी, १९२७}}
मुझे जो पत्र प्राप्त होते हैं उनसे में देखता हूँ कि प्रार्थनामें उपस्थिति कम और अनियमित होती है और सूत कातनेमें भी ढिलाई आती जा रही है।
प्रार्थना और कताई ये दोनों हमारे ज्योति स्तम्भ हैं। यदि हम इनपर अपनी दृष्टि न रखें तो न हम आश्रमको शोभान्वित कर सकते हैं और न अपने-आपको। दोनोंमें से किसी भी कामको हम पहलेसे ही न करनेका निश्चय करें और न करें, यह एक बात है और करनेकी प्रतिज्ञा करके फिर न करें, यह दूसरी बात है। जिसे ये दोनों काम पसन्द न हों वह आश्रम में कुछ भी नहीं सीख सकता, ऐसा मेरा मत है; क्योंकि हम दोनों को ही आवश्यक धार्मिक कार्य मानते हैं। जिन्हें ये दोनों पसन्द
हैं फिर भी जो शिथिलता दिखाते हैं वे दूसरी सभी बातों में भी शिथिल ही रहेंगे । यदि हम सत्यका आग्रह करना सीखना चाहते हैं और उससे उद्भूत शक्तिका अनुभव करना चाहते हैं तो हमें उपर्युक्त दोनों कार्योंमें कभी चूकना नहीं चाहिए। दोनोंमें श्रद्धाकी जरूरत है। दोनों कार्योंकी उपयुक्तता हम एक निश्चित सीमातक
अपनी बुद्धिसे सिद्ध कर सकते हैं। लेकिन अन्ततः तो श्रद्धा ही हमें सन्तोष प्रदान करेगी। ऐसी बातें मनमें उठ सकती हैं कि प्रार्थनामें आनेसे मुझे तो कोई लाभ नहीं होता, उसमें मेरा ध्यान केन्द्रित नहीं होता और आलस्य आता है। इनका समाधान बुद्धिसे नहीं होता वह तो श्रद्धासे ही होता है। 'गीता' जब निष्काम कर्मका पाठ सिखाती है तब वह श्रद्धाका ही पाठ सिखाती है। कर्म निष्फल नहीं जाता। सत्यकी पराजय देखते हुए भी यही मानें कि अन्तमें सत्यकी जय होती है और निष्काम भावसे सत्यका ही सेवन करें। यह शक्ति श्रद्धासे ही आती है। यही बात प्रार्थना और चरखेके सम्बन्धमें भी सत्य है। इतना कातनेसे देशको अथवा मुझे क्या लाभ होगा? इसका हिसाव लगाने का अधिकार मुझे नहीं है। हमें श्रद्धापूर्वक ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए कि कातनेसे भले ही फिलहाल कोई लाभ होता दिखाई न दे; लेकिन उसमें लाभ अवश्य है। मुख्य बात यह है कि हमें मृत्युपर्यंत अपने निश्चयपर दृढ़ रहनेका स्वभाव बना लेना है। और मुझे लगता है कि यह कार्य इन दो सार्वजनिक प्रवृत्तियोंके द्वारा किया जा सकता है। यदि हम इनमें ही शिथिल रहेंगे तो सत्यके आग्रही कब बनेंगे?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५६
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|११८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इससे में बालक और वृद्ध सब लोगोंसे प्रार्थना करता हूँ कि वे इन दोनों कार्योंमें कभी न चूकें।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ८०५३) से।<br>सौजन्य: रावजीभाई नाथाभाई पटेल}}
{{C|{{larger|'''१०८. पत्र: आश्रमकी बहनोंको'''}}}}
{{Right|शोलापुर<br>सोमवार, माघ बदी ५ [२१ फरवरी, १९२७]}}
{{Left|बहनो,|2em}}
तुम्हारा पत्र मिला।
देखता हूँ कि तुम्हारा पिंजाई आदिका काम ठीक चल रहा है। इसी तरह नियमित रूपसे चलता रहेगा तो तुम सब थोड़े समयमें बहुत प्रगति कर लोगी। नियमित रूपसे किये गये कामका असर नियमपूर्वक ली गई खूराककी तरह होता है। वह आत्माका पोषण करता है। एक साथ ही ज्यादा मात्रामें ली हुई खुराक जैसे शरीरको बिगाड़ देती है, वैसे ही एक साथ अधिक काम करनेसे आत्माको तकलीफ होती है।
आज हम शोलापुरमें हैं। यह बड़ा शहर है। यहाँ पाँच मिलें हैं। उनमें सबसे बड़ी मिल मोरारजी गोकलदासकी है। उनके पोते शान्तिकुमार उम्र में तो अभी नवयुवक हैं, परन्तु उनकी आत्मा महान है। वे खुद खादीप्रेमी हैं और खादी ही पहनते हैं। यह कोई उनका सबसे बड़ा गुण है, में यह नहीं कहना चाहता। उनमें दया है, उदारता है, नम्रता है, ईश्वरपरायणता है, सत्य है। यथा नाम तथा गुण हैं। शान्तिकी मूर्ति हैं। करोड़पतिके यहाँ ऐसा रत्न है, यह देखकर मुझे बहुत आनन्द होता है। उनकी धर्मपत्नी के साथ तो मेरा परिचय थोड़ा ही था। कल भोजन करते समय उन्हें पास बिठलाकर उनसे जी भरकर बातें कीं और अपने पतिकी तरह सेवाकार्य में लग जाने को कहा। तुम सबकी मिसाल उनके सामने पेश की, क्या यह मैंने ठीक किया? ऐसा उदाहरण देनेमें कुछ अभिमान हो तो? तुम सब सेवाभावसे भरी हो, यह कहा जा सकता है या नहीं, यह तो तुम जानो। मेरे मुँहसे तो निकल ही गया। उसे सच्चा साबित करना तुम्हारे हाथमें है।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (जी० एन० ३६४०) की फोटो नकलसे।|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५७
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१०९. पत्र : जमनालाल बजाजको'''}}}}
{{Right|[२१ फरवरी, १९२७]<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref>}}
{{Left|चि० जमनालाल}}
तुम्हारा पत्र मिला। भाई घनश्यामदासके दोनों पत्र वापस भेजता हूँ। उनकी बातपर मुझे विश्वास है, इसलिए ऐसी आशंकाका कोई कारण नहीं है कि वे पुनर्विवाह करेंगे।
मैं चाहता हूँ कि तुम २५-२६ को बेलगाँव में रहो और ११ तारीखको आश्रममें। दोनों ही जगह तुम्हारे लिए बहुत काम है। आश्रममें ९ से १३ तारीखतक रहना सम्भव हो तो अवश्य रहना चाहिए। बादमें घनश्यामदास गुरुकुलके दीक्षांत समारोहमें मेरे साथ रहना चाहते हैं, उस समय भी यदि तुम साथ रहना चाहो तो रह सकते
हो। यह सब ज्यादातर तो तुम्हें जो दूसरे काम हैं उनकी सुविधा-असुविधा देखकर ही तय हो सकता है।
कमला क्या करती है? उसके बारेमें मुझे चिन्ता होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि तुम भी चिन्ता करने लगो। लेकिन यदि उसकी पढ़ाईका कुछ प्रबन्ध हो सके, तो कदाचित उसका चित्त स्थिर हो जाये। वह चाहे तो जी भर कर अंग्रेजी सीखे।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (जी० एन० २८८२) की फोटो-नकलसे।}}
{{C|{{larger|'''११०. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको'''}}
{{Right|शोलापुर<br>सोमवार [२१ फरवरी, १९२७]<ref>गांधीजी इस तारीखको शोलापुरमें थे।</ref>}}
{{Left|भाई घनश्यामदास,|2em}}
आपके दो पत्र मीले हैं। आपके वचनपर मेरा विश्वास है इसलीये आपके पुनर्विवाह करनेका मुझे कोई डर नहीं है। एसेंबलीके बारेमें भी आपपर मेरा विश्वास है। परंतु वहांका वायु ऐसा है कि सम्पूर्णतया स्वतंत्र रहना कठिन है।
संगठनके बारेमें मेरा विचार वही है जो मैंने बताये हैं। जो केसकी हकीकत आपने भेजी है उसका इलाज संगठन तो है हि नहि। उसका इलाज या तो तपश्चर्या<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१०९. पत्र : जमनालाल बजाजको'''}}}}
{{Right|[२१ फरवरी, १९२७]<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref>}}
{{Left|चि० जमनालाल}}
तुम्हारा पत्र मिला। भाई घनश्यामदासके दोनों पत्र वापस भेजता हूँ। उनकी बातपर मुझे विश्वास है, इसलिए ऐसी आशंकाका कोई कारण नहीं है कि वे पुनर्विवाह करेंगे।
मैं चाहता हूँ कि तुम २५-२६ को बेलगाँव में रहो और ११ तारीखको आश्रममें। दोनों ही जगह तुम्हारे लिए बहुत काम है। आश्रममें ९ से १३ तारीखतक रहना सम्भव हो तो अवश्य रहना चाहिए। बादमें घनश्यामदास गुरुकुलके दीक्षांत समारोहमें मेरे साथ रहना चाहते हैं, उस समय भी यदि तुम साथ रहना चाहो तो रह सकते
हो। यह सब ज्यादातर तो तुम्हें जो दूसरे काम हैं उनकी सुविधा-असुविधा देखकर ही तय हो सकता है।
कमला क्या करती है? उसके बारेमें मुझे चिन्ता होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि तुम भी चिन्ता करने लगो। लेकिन यदि उसकी पढ़ाईका कुछ प्रबन्ध हो सके, तो कदाचित उसका चित्त स्थिर हो जाये। वह चाहे तो जी भर कर अंग्रेजी सीखे।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (जी० एन० २८८२) की फोटो-नकलसे।}}
{{C|{{larger|'''११०. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको'''}}}}
{{Right|शोलापुर<br>सोमवार [२१ फरवरी, १९२७]<ref>गांधीजी इस तारीखको शोलापुरमें थे।</ref>}}
{{Left|भाई घनश्यामदास,|2em}}
आपके दो पत्र मीले हैं। आपके वचनपर मेरा विश्वास है इसलीये आपके पुनर्विवाह करनेका मुझे कोई डर नहीं है। एसेंबलीके बारेमें भी आपपर मेरा विश्वास है। परंतु वहांका वायु ऐसा है कि सम्पूर्णतया स्वतंत्र रहना कठिन है।
संगठनके बारेमें मेरा विचार वही है जो मैंने बताये हैं। जो केसकी हकीकत आपने भेजी है उसका इलाज संगठन तो है हि नहि। उसका इलाज या तो तपश्चर्या<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५९
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''११२. पत्र: पुरुषोत्तमदास ठाकुरदासको'''}}}}
{{Right|दौरेपर<br>गुलबर्गा<br>२२ फरवरी, १९२७}}
{{Left|प्रिय सर पुरुषोत्तमदास}}
ऐसा लगता है कि आपको अंग्रेजी में लिखे पत्रसे ज्यादा सुविधा होती है, अतः मैं यह पत्र अंग्रेजीमें लिख रहा हूँ।
हालांकि मैंने स्वयं अभीतक मुद्रा-सम्बन्धी मामलोंपर<ref>हिल्टन यंग आयोगका सुझाव रुपयेकी दर १ शिलिंग ६ पेंस सम्बन्धमें तय करना था इसके संबंधमें दी गई अपनी असहमति-सूचक टिप्पणीमें सर पुरुषोत्तमदासने रुपयेकी दर १ शिलिंग ४ स्वर्णपर तय करनेका सुझाव दिया था। </ref> कुछ नहीं लिखा है फिर भी मैंने जैसा कि शायद आप जानते ही होंगे, निरन्तर यात्रा करते रहने के बावजूद इस आन्दोलनके साथ जितना सम्पर्क रखा जा सकता था बनाये रखा है।
मैं इस प्रश्नका सावधानीसे अध्ययन करता रहा हूँ और विशेषज्ञों, खास तौरपर सर्वश्री मदान और वाडियाके साथ बराबर पत्र-व्यवहार भी करता रहा हूँ। श्री वाडियाने मुझे एक विधेयकका<ref>स्वर्ण मुद्रा मानक तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया सम्बन्धी विधेयक जो विधान सभामें २५ जनवरी,
१९२७ को पेश किया गया था।</ref> मसविदा भी भेजा है, जिसे में समझता हूँ कि उन्होंने विधान परिषद के सदस्योंमें भी प्रचारित किया है। क्या आप मुझे यह बताने की कृपा करेंगे कि आप इस विधेयकका समर्थन करते हैं या नहीं?
यदि शुद्ध स्वर्ण मानक स्थापित कर दिया जाये, स्वतन्त्र टकसालें खोली जायें और एक रिजर्व बैंककी स्थापना हो जाये, तब क्या अनुपातका प्रश्न ही सर्वथा दूर नहीं हो जायेगा? क्या सब मामले अपने आप नहीं सुलझ जायेंगे? और यदि १ : १५ का अनुपात तय कर दिया जाता है और स्वर्ण मुद्रा टकसालों और रिजर्व बैंक सम्बन्धी मामले एक बार को समाप्त कर दिये जाते हैं या आयोगके सुझावोंके अनुसार तय कर दिये जाते हैं, तो क्या वह वर्तमान दशासे और भी बुरा न होगा {{right|हृदयसे आपका,<br>'''मो० क० गांधी'''}}
{{Left|सर पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास<br>बम्बई}}
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ७८२५) से।<br>सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६०
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''११३. पत्र : बी० एफ० मदानको'''}}}}
{{Right|गुलबर्गा<br>२२ फरवरी, १९२७}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
आपका हालका पत्र मिला। धन्यवाद। संलग्न पत्रके बारेमें आपका क्या कहना है, जवाब देते समय इसे वापस भेजने की कृपा करें।
आपने श्री शराफके बारेमें जो लिखा है, उसका में ध्यान रखूंगा।
क्या आपको नहीं लगता कि श्री वाडियाके इस कथनमें काफी बल है कि मुद्रा अनुपातका सवाल मानकके चिरस्थायी प्रश्नसे अलग करके नहीं देखना चाहिए। या क्या आप यह मानते हैं कि रुपयेका संविधिगत मूल्य स्वर्णके रूपमें ही है इसलिए यदि संतोषजनक ढंगसे अनुपातकी दर निश्चित हो जाये और आयोगकी अन्य सिफारिशें<ref>स्वर्ण मुद्रा मानक तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया विधेयकमें निहित सिफारिशें।</ref>या तो छोड़ दी जायें या उन्हें उनके वर्तमान रूपमें लागू कर दिया जाये, तो इतनेसे ही हमें पूरी तरह सन्तोष मान लेना चाहिए। दूसरे शब्दोंमें यदि आपको इन सबमें से चुनाव करना हो तो आप क्या करेंगे?
अनुपातको १ : १५ पर तय करके बाकी सभी बातें जैसीकी-तैसी रहने दी जायें;
या अनुपात १ : ५० का तय कर दिया जाये और आयोग द्वारा उल्लिखित रिजर्व बैंकके साथ स्वर्ण मुद्रा मानक स्थापित किया जाये;
या शुद्ध स्वर्ण मानक स्थापित कर दिया जाये, टकसालें पुनः खोल दी जायें; उनमें सोनेकी मुहरें बिना रोक-टोक बनें और प्रो० वाडियाके सुझावके अनुसार एक ऐसे केन्द्रीय बैंककी स्थापना कर दी जाये, जिससे अनुपातपर किसी संविधिक कार्य-वाहीका प्रभाव न पड़ सके।
क्या आपने सर्वश्री वाडिया और जोशीके विधेयकका मसविदा देखा है?
{{Left|अंग्रेजी (एस० एन० १२९००) की माइक्रोफिल्मसे।|2em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६१
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2026-08-17T16:52:34Z
रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''११४. पत्र : अमृतलाल वि० ठक्करको'''}}}}
{{Right|गुलबर्गा<br>माघ वदी ६ [२२ फरवरी, १९२७]<ref>१९२७ में इस तारीखको गांधीजी गुलबर्गामें थे।</ref>
ढेढ़ों और भीलोंके पुरोहित,
आप जरूर आयें; ढेढ़ों और भंगियोंको अवश्य लायें। जुगतरामको अथवा जिसे समाचार देना ठीक हो उसे लिखें, ताकि वह समुचित व्यवस्था कर सके। रोटियाँ साथ बाँध लायें, ओढ़नेके लिए कुछ साथ रहे, भूमिको शय्या बना सकें तथा एक लोटा और रस्सी रखें तो उन्हें किसी किस्मकी पूर्व सूचना देनेकी जरूरत नहीं है।
हम अभी-अभी शोलापुरसे चलकर ट्रेनसे गुलबर्गा पहुँचे हैं और मुझे अभी पत्र लिखनेका अवकाश मिल गया है; सो मैं उसमें से कुछ समय चुराकर आपके साथ
यह थोड़ा-सा विनोद कर रहा हूँ और थोड़ा काम भी कर रहा हूँ।
ढेढ़ादिके पुरोहित ठक्कर बापाकी जय हो!
{{Right|'''बापू जो चाहो सो'''}}
{{Left|[पुनश्च:]}}
महात्मा" से तो "बापू" ही भला है।
{{Left|गुजराती (जी० एन० २७११) की फोटो- नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''११५. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}}}
{{Right|मंगलवार [२२ फरवरी, १९२७]<ref>गांधीजीके दौरे के कार्यक्रमके आधारपर।</ref>
{{Left|चि० व्रजकिशन,}}
तुमारा खत मीला है। जमशेदपुरमें काम करनेकी योग्यताके बारेमें मैं निश्चय नहि कर सकता हूं। अंग्रेजी भाषाका तुमारा ज्ञानका मुझे कोई अनुभव नहिं है। यदि
तुमको इस कार्यके लीये आत्मविश्वास है तो जमशेदपुर जाकर देख लेना और पीछे अंतीम निर्णय करना। आश्रममें तो जब आना है तब आ सकते हो। कार्य तो बहोत है। हां, जिधर उधर घूमनेके लीये तैयार होना चाहिये और चर्खा शास्त्रका अच्छा अनुभव ले लेना चाहीये। तुमारी अंग्रेजी पढ़ाई कहां तककी है?
{{Right|'''बापुके आशीर्वाद'''}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''११४. पत्र : अमृतलाल वि० ठक्करको'''}}}}
{{Right|गुलबर्गा<br>माघ वदी ६ [२२ फरवरी, १९२७]<ref>१९२७ में इस तारीखको गांधीजी गुलबर्गामें थे।</ref>}}
ढेढ़ों और भीलोंके पुरोहित,
आप जरूर आयें; ढेढ़ों और भंगियोंको अवश्य लायें। जुगतरामको अथवा जिसे समाचार देना ठीक हो उसे लिखें, ताकि वह समुचित व्यवस्था कर सके। रोटियाँ साथ बाँध लायें, ओढ़नेके लिए कुछ साथ रहे, भूमिको शय्या बना सकें तथा एक लोटा और रस्सी रखें तो उन्हें किसी किस्मकी पूर्व सूचना देनेकी जरूरत नहीं है।
हम अभी-अभी शोलापुरसे चलकर ट्रेनसे गुलबर्गा पहुँचे हैं और मुझे अभी पत्र लिखनेका अवकाश मिल गया है; सो मैं उसमें से कुछ समय चुराकर आपके साथ
यह थोड़ा-सा विनोद कर रहा हूँ और थोड़ा काम भी कर रहा हूँ।
ढेढ़ादिके पुरोहित ठक्कर बापाकी जय हो!
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तुमको इस कार्यके लीये आत्मविश्वास है तो जमशेदपुर जाकर देख लेना और पीछे अंतीम निर्णय करना। आश्रममें तो जब आना है तब आ सकते हो। कार्य तो बहोत है। हां, जिधर उधर घूमनेके लीये तैयार होना चाहिये और चर्खा शास्त्रका अच्छा अनुभव ले लेना चाहीये। तुमारी अंग्रेजी पढ़ाई कहां तककी है?
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
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आप जरूर आयें; ढेढ़ों और भंगियोंको अवश्य लायें। जुगतरामको अथवा जिसे समाचार देना ठीक हो उसे लिखें, ताकि वह समुचित व्यवस्था कर सके। रोटियाँ साथ बाँध लायें, ओढ़नेके लिए कुछ साथ रहे, भूमिको शय्या बना सकें तथा एक लोटा और रस्सी रखें तो उन्हें किसी किस्मकी पूर्व सूचना देनेकी जरूरत नहीं है।
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यह थोड़ा-सा विनोद कर रहा हूँ और थोड़ा काम भी कर रहा हूँ।
ढेढ़ादिके पुरोहित ठक्कर बापाकी जय हो!
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महात्मा" से तो "बापू" ही भला है।
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तुमारा खत मीला है। जमशेदपुरमें काम करनेकी योग्यताके बारेमें मैं निश्चय नहि कर सकता हूं। अंग्रेजी भाषाका तुमारा ज्ञानका मुझे कोई अनुभव नहिं है। यदि
तुमको इस कार्यके लीये आत्मविश्वास है तो जमशेदपुर जाकर देख लेना और पीछे अंतीम निर्णय करना। आश्रममें तो जब आना है तब आ सकते हो। कार्य तो बहोत है। हां, जिधर उधर घूमनेके लीये तैयार होना चाहिये और चर्खा शास्त्रका अच्छा अनुभव ले लेना चाहीये। तुमारी अंग्रेजी पढ़ाई कहां तककी है?
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६२
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
मुसाफरी की तारीख<refयहाँ नहीं दी रही हैं। इनके लिए देखिए "पत्र : मीराबहनको ", २१-२-१९२७।<</ref>
{{Left|[पुनश्च:]|2em}}
ता० १७ की रातकी सुरतसे हरद्वारकी ट्रेन लुंगा। दिल्लीमें ठहरना तो नहि है।
हरद्वार जाते हुए दिल्ली बीचमें तो है हि । गुरुकुलमें तीन दिन ठहरना है।
{{Left|मूल (जी० एन० २३५४) की फोटो नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''११६. भाषण : गुलबर्गामें'''}}}}
{{Right|२२ फरवरी, १९२७}}
जब मेरे पास लोग विलायती टोपी और विलायती वस्त्र पहने हुए आते हैं तब मेरे हृदयमें आग लग जाती है उस वक्त मेरे मनमें यह सवाल उठता है कि इस युवककी समझ में यह बात क्यों नहीं आती कि विदेशी टोपीको खरीदनेके लिए वह जो डेढ़ रुपये खर्च करता है वे गोया पानी में जाते हैं। इसके विपरीत, खादीकी टोपीके लिए दिये गये पाँच आने हिन्दुस्तानके गरीबोंके घरोंमें पहुँचते हैं। जो व्यक्ति अपने देशके गरीब लोगोंका खयाल छोड़कर दुनियाके गरीबों को खोजने जाता है, वह पागल है। खुदा, उसे खुदाकी जगह लेनेके दुरभिमानका दोषी कहेगा। खुदा कहेगा कि पहले अपने मुल्कके नंगे भूखोंकी ओर देख बादमें दुनियाका खयाल कर। दुनियाके लोगोंका खयाल करनेवाला तो में बैठा हूँ। तू अपने पड़ोसीका ही विचार क्यों नहीं करता? जो व्यक्ति गरीबों के लिए कुछ भी नहीं करता वह अगर हिन्दू हो और गायत्रीका जाप करता हो तो उसका गायत्रीका जाप और यदि मुसलमान हो और दिनमें पाँच बार नमाज पढ़ता हो या सिजदा करते-करते अपना माथा घिस डालता हो, तो उसका नमाज पढ़ना या सिजदा करना व्यर्थ है। क्या आपको मालूम है कि मद्रासमें हजारों हिन्दू स्त्रियोंको और बिहार-बंगालमें हजारों मुसलमान स्त्रियोंको अधपेट खाकर रहने और लज्जाका जीवन व्यतीत करनेसे बचानेवाली वस्तु खादी है? परन्तु आपको भला उसकी खबर क्यों होगी? आप लोग तो शेर बनकर एक दूसरेकी गर्दन काटनेमें व्यस्त थे। यह अज्ञान है, जंगलीपन है। में आपके सामने अपने दिलकी आग उगलने आया हूँ।
इस मामलेसे तो मैंने अपने हाथ खींच लिये हैं। इसका कारण यह है कि मैं अपनी बात किसे सुनाऊँ? खुदा ही एक सुननेवाला रह गया है, उसीको सुनाता हूँ। मैं उससे यही प्रार्थना करता रहता हूँ कि तू हिन्दुस्तानको जैसे भी हो इस आफतसे बचा। लेकिन आज इतने मुसलमान यहाँ बैठे हुए हैं। और में उनका खैरख्वाह
और एक खुदापरस्त सत्याग्रही हूँ तो फिर में उन्हें अपने दिलकी आवाज क्यों न सुनाऊँ? मैं मन्दिरमें गया तो वहाँ सुना कि मूर्ति तोड़ डाली गई है और नन्दीको<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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मुसाफरी की तारीख<refयहाँ नहीं दी रही हैं। इनके लिए देखिए "पत्र : मीराबहनको ", २१-२-१९२७।</ref>
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जब मेरे पास लोग विलायती टोपी और विलायती वस्त्र पहने हुए आते हैं तब मेरे हृदयमें आग लग जाती है उस वक्त मेरे मनमें यह सवाल उठता है कि इस युवककी समझ में यह बात क्यों नहीं आती कि विदेशी टोपीको खरीदनेके लिए वह जो डेढ़ रुपये खर्च करता है वे गोया पानी में जाते हैं। इसके विपरीत, खादीकी टोपीके लिए दिये गये पाँच आने हिन्दुस्तानके गरीबोंके घरोंमें पहुँचते हैं। जो व्यक्ति अपने देशके गरीब लोगोंका खयाल छोड़कर दुनियाके गरीबों को खोजने जाता है, वह पागल है। खुदा, उसे खुदाकी जगह लेनेके दुरभिमानका दोषी कहेगा। खुदा कहेगा कि पहले अपने मुल्कके नंगे भूखोंकी ओर देख बादमें दुनियाका खयाल कर। दुनियाके लोगोंका खयाल करनेवाला तो में बैठा हूँ। तू अपने पड़ोसीका ही विचार क्यों नहीं करता? जो व्यक्ति गरीबों के लिए कुछ भी नहीं करता वह अगर हिन्दू हो और गायत्रीका जाप करता हो तो उसका गायत्रीका जाप और यदि मुसलमान हो और दिनमें पाँच बार नमाज पढ़ता हो या सिजदा करते-करते अपना माथा घिस डालता हो, तो उसका नमाज पढ़ना या सिजदा करना व्यर्थ है। क्या आपको मालूम है कि मद्रासमें हजारों हिन्दू स्त्रियोंको और बिहार-बंगालमें हजारों मुसलमान स्त्रियोंको अधपेट खाकर रहने और लज्जाका जीवन व्यतीत करनेसे बचानेवाली वस्तु खादी है? परन्तु आपको भला उसकी खबर क्यों होगी? आप लोग तो शेर बनकर एक दूसरेकी गर्दन काटनेमें व्यस्त थे। यह अज्ञान है, जंगलीपन है। में आपके सामने अपने दिलकी आग उगलने आया हूँ।
इस मामलेसे तो मैंने अपने हाथ खींच लिये हैं। इसका कारण यह है कि मैं अपनी बात किसे सुनाऊँ? खुदा ही एक सुननेवाला रह गया है, उसीको सुनाता हूँ। मैं उससे यही प्रार्थना करता रहता हूँ कि तू हिन्दुस्तानको जैसे भी हो इस आफतसे बचा। लेकिन आज इतने मुसलमान यहाँ बैठे हुए हैं। और में उनका खैरख्वाह
और एक खुदापरस्त सत्याग्रही हूँ तो फिर में उन्हें अपने दिलकी आवाज क्यों न सुनाऊँ? मैं मन्दिरमें गया तो वहाँ सुना कि मूर्ति तोड़ डाली गई है और नन्दीको<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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जब मेरे पास लोग विलायती टोपी और विलायती वस्त्र पहने हुए आते हैं तब मेरे हृदयमें आग लग जाती है उस वक्त मेरे मनमें यह सवाल उठता है कि इस युवककी समझ में यह बात क्यों नहीं आती कि विदेशी टोपीको खरीदनेके लिए वह जो डेढ़ रुपये खर्च करता है वे गोया पानी में जाते हैं। इसके विपरीत, खादीकी टोपीके लिए दिये गये पाँच आने हिन्दुस्तानके गरीबोंके घरोंमें पहुँचते हैं। जो व्यक्ति अपने देशके गरीब लोगोंका खयाल छोड़कर दुनियाके गरीबों को खोजने जाता है, वह पागल है। खुदा, उसे खुदाकी जगह लेनेके दुरभिमानका दोषी कहेगा। खुदा कहेगा कि पहले अपने मुल्कके नंगे भूखोंकी ओर देख बादमें दुनियाका खयाल कर। दुनियाके लोगोंका खयाल करनेवाला तो में बैठा हूँ। तू अपने पड़ोसीका ही विचार क्यों नहीं करता? जो व्यक्ति गरीबों के लिए कुछ भी नहीं करता वह अगर हिन्दू हो और गायत्रीका जाप करता हो तो उसका गायत्रीका जाप और यदि मुसलमान हो और दिनमें पाँच बार नमाज पढ़ता हो या सिजदा करते-करते अपना माथा घिस डालता हो, तो उसका नमाज पढ़ना या सिजदा करना व्यर्थ है। क्या आपको मालूम है कि मद्रासमें हजारों हिन्दू स्त्रियोंको और बिहार-बंगालमें हजारों मुसलमान स्त्रियोंको अधपेट खाकर रहने और लज्जाका जीवन व्यतीत करनेसे बचानेवाली वस्तु खादी है? परन्तु आपको भला उसकी खबर क्यों होगी? आप लोग तो शेर बनकर एक दूसरेकी गर्दन काटनेमें व्यस्त थे। यह अज्ञान है, जंगलीपन है। में आपके सामने अपने दिलकी आग उगलने आया हूँ।
इस मामलेसे तो मैंने अपने हाथ खींच लिये हैं। इसका कारण यह है कि मैं अपनी बात किसे सुनाऊँ? खुदा ही एक सुननेवाला रह गया है, उसीको सुनाता हूँ। मैं उससे यही प्रार्थना करता रहता हूँ कि तू हिन्दुस्तानको जैसे भी हो इस आफतसे बचा। लेकिन आज इतने मुसलमान यहाँ बैठे हुए हैं। और में उनका खैरख्वाह
और एक खुदापरस्त सत्याग्रही हूँ तो फिर में उन्हें अपने दिलकी आवाज क्यों न सुनाऊँ? मैं मन्दिरमें गया तो वहाँ सुना कि मूर्ति तोड़ डाली गई है और नन्दीको<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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जब मेरे पास लोग विलायती टोपी और विलायती वस्त्र पहने हुए आते हैं तब मेरे हृदयमें आग लग जाती है उस वक्त मेरे मनमें यह सवाल उठता है कि इस युवककी समझ में यह बात क्यों नहीं आती कि विदेशी टोपीको खरीदनेके लिए वह जो डेढ़ रुपये खर्च करता है वे गोया पानी में जाते हैं। इसके विपरीत, खादीकी टोपीके लिए दिये गये पाँच आने हिन्दुस्तानके गरीबोंके घरोंमें पहुँचते हैं। जो व्यक्ति अपने देशके गरीब लोगोंका खयाल छोड़कर दुनियाके गरीबों को खोजने जाता है, वह पागल है। खुदा, उसे खुदाकी जगह लेनेके दुरभिमानका दोषी कहेगा। खुदा कहेगा कि पहले अपने मुल्कके नंगे भूखोंकी ओर देख बादमें दुनियाका खयाल कर। दुनियाके लोगोंका खयाल करनेवाला तो में बैठा हूँ। तू अपने पड़ोसीका ही विचार क्यों नहीं करता? जो व्यक्ति गरीबों के लिए कुछ भी नहीं करता वह अगर हिन्दू हो और गायत्रीका जाप करता हो तो उसका गायत्रीका जाप और यदि मुसलमान हो और दिनमें पाँच बार नमाज पढ़ता हो या सिजदा करते-करते अपना माथा घिस डालता हो, तो उसका नमाज पढ़ना या सिजदा करना व्यर्थ है। क्या आपको मालूम है कि मद्रासमें हजारों हिन्दू स्त्रियोंको और बिहार-बंगालमें हजारों मुसलमान स्त्रियोंको अधपेट खाकर रहने और लज्जाका जीवन व्यतीत करनेसे बचानेवाली वस्तु खादी है? परन्तु आपको भला उसकी खबर क्यों होगी? आप लोग तो शेर बनकर एक दूसरेकी गर्दन काटनेमें व्यस्त थे। यह अज्ञान है, जंगलीपन है। में आपके सामने अपने दिलकी आग उगलने आया हूँ।
इस मामलेसे तो मैंने अपने हाथ खींच लिये हैं। इसका कारण यह है कि मैं अपनी बात किसे सुनाऊँ? खुदा ही एक सुननेवाला रह गया है, उसीको सुनाता हूँ। मैं उससे यही प्रार्थना करता रहता हूँ कि तू हिन्दुस्तानको जैसे भी हो इस आफतसे बचा। लेकिन आज इतने मुसलमान यहाँ बैठे हुए हैं। और में उनका खैरख्वाह
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६३
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण : गुलबर्गामें|१२५}}</noinclude>खण्ड-खण्ड कर दिया गया है। में तो मूर्तिपूजक हूँ और साथ ही खुदाको सब जगह हाजिर नाजिर जाननेवाला आदमी हूँ। इसलिए मैं तो उसे हर जगह सिर झुकाता
हूँ। खुदा किसी एक ही स्थानमें बँधा नहीं पड़ा है। मैंने यरवदा जेलमें मौलाना शिबलीका लिखा हुआ मुहम्मद साहबका जीवनचरित्र पढ़ा, अलकलाम' भी पढ़ डाला और देखा वेदान्तमें तथा 'अलकलाम' में वही एक बात कही गई है। 'सीरत ' को पढ़ा, 'उस्वाए-सहाबा' को पढ़ा। इन सब ग्रन्थोंको पढ़ चुकने के पश्चात् में आप लोगोंसे कहता हूँ कि आपको मूर्ति नहीं तोड़नी चाहिए थी। मूर्तिको तोड़कर मुसलमान खुदाके गुनहगार बने हैं।
इस प्रकारके झगड़ों को देखते-देखते मैं थक गया हूँ एक मैं ही ऐसा व्यक्ति था जो इस प्रकारके झगड़ोंको मिटानेके लिए अपनी सारी जिन्दगी खर्च कर डालनेको तैयार था। परन्तु मेरी कोशिशें बेकार गईं, इसलिए मैंने सब्र कर लिया और इस समस्याका पूरा बोझ खुदाके ऊपर छोड़कर बैठ गया। इस सम्बन्धमें मुझे इस्लामकी तवारीखका एक किस्सा याद आ रहा है। पैगम्बर साहबकी वफातके बाद जब औलियाओंने लोगोंको सत्ताके लिए झगड़ते देखा तब वे बोले कि हम इस झगड़ेमें नहीं पड़ सकते। उनमें से कई मिस्र, बहुतसे ईरान और कितने ही तुर्किस्तान चले गये। कितने ही गुफाओंमें जाकर बैठ गये, ठीक वैसे ही जैसे हमारे अनेक ऋषि हिमालयकी कन्दराओंमें जा बैठते थे। इन्हीं औलियाओंने इस्लामको जीवित रखा है। मुझे लगता है कि मैं भी किसी कन्दरामें जाकर बैठ जाऊँ और अपना जीवन भगवानके भजनमें बिता दूं। परन्तु जब हिन्दू-मुस्लिम इतिहास लिखा जायेगा तब, मेरा विश्वास है, मेरे बारेमें यह लिखा जायेगा कि एक खुदाका बन्दा था जो पहाड़ जैसी बड़ी-बड़ी भूलें तो कर डालता था परन्तु तोबा करना भी जानता था। आज मैं यद्यपि इस सवालसे वास्ता तोड़कर अलग बैठ गया हूँ; फिर भी आप लोगोंसे इतना तो कहने आया ही हूँ कि आप लोग अपनी-अपनी कौमके भूखे लोगोंका तो विचार कीजिए। हिन्दू कार्यकर्त्ता सैकड़ों-हजारों मुसलमान स्त्रियोंकी मदद कर रहे हैं। वहाँ हिन्दू-मुसलमानके झगड़ेके बारेमें सोचनेकी किसीको फुरसत ही नहीं है। जो व्यक्ति भूखसे व्याकुल हो वह झगड़ा कैसे करेगा? ६० वर्षकी एक मुसलमान स्त्रीसे जब यह पूछा गया कि इतने सुतका एक आना पाकर क्या तू निहाल हो जायेगी, तब वह बोली कि में तो इतना ही जानती हूँ कि इस दुनियामें ख़ुदा जरूर है, क्योंकि यह एक आना देकर वह मेरे मुँहमें रोटी डालनेका प्रबन्ध तो करता है। इसीलिए मैं आप लोगोंसे कहता हूँ कि आपको लड़ना हो तो लड़ते रहिए, परन्तु जब आपके बीच मुझ जैसा कोई व्यक्ति आ पहुँचे तब अपना झगड़ा भूल जाइये, आपसी दुश्मनी और अदावतको भूलकर मेरा कुछ-न-कुछ काम जरूर कीजिए।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन, '''६-३-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''११७. पत्र : के० राजगोपालाचारीको'''}}}}
{{Right|दौरेपर<br>२३ फरवरी, १९२७}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। मंसूखीके दस्तावेजकी साफ प्रति ठीकसे हस्ताक्षर करके में इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ।
{{Right|हृदयसे आपका,<br>'''मो० क० गांधी'''}}
सहपत्र : १<br>श्रीयुत के० राजगोपालाचारी<br>खद्दर स्टोर<br>गांधी स्ट्रीट
<br>तिरुपति<br>(जिला चित्तूर)
{{Left|अंग्रेजी (जी० एन० ५६७०) की फोटो नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''११८. भाषण : पंढरपुरमें'''<ref>महादेव देसाईंकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से।</ref>}}}}
{{Right|[२३ फरवरी, १९२७]<ref>गांधीजी इस तारीख को पंढरपुरमें थे। देखिए “पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको”, २१-२-१९२७।
</ref>
पंढरपुरके मंदिरके अधिकारियोंको किसी प्रकार यह खबर लग गई थी कि गांधीजी वहाँ किसी यूरोपीय मित्रके साथ आ रहे हैं और वे इस सोचमें पड़े थे कि अगर वे
बनारसको तरह यहाँ भी उस यूरोपीय मित्रको साथ लेकर मन्दिरमें प्रवेश करना चाहेंगे, तो हम क्या करेंगे। मण्डलीमें किसी यूरोपीय को न देखकर जरूर ही उनके दिलका बोझ उतर गया होगा। मगर गांधीजीने अपने भाषण में इस बातकी चर्चा खास तौरपर की। उन्होंने कहा:
मुझे खेद है कि आज मेरे साथ न तो वह बौद्ध बहन है जो बनारसमें थी और न वह अछूत लड़की ही, जिसे मैंने गोद लिया है। मगर आप लोग विश्वास रखें कि अगर वे मेरे साथ होतीं, तो में उनके बिना अकेला मन्दिरमें न जाता। अगर में उन्हें<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
6333
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आपका पत्र मिला। मंसूखीके दस्तावेजकी साफ प्रति ठीकसे हस्ताक्षर करके में इस पत्रके साथ भेज रहा हूँ।
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सहपत्र : १<br>श्रीयुत के० राजगोपालाचारी<br>खद्दर स्टोर<br>गांधी स्ट्रीट
<br>तिरुपति<br>(जिला चित्तूर)
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पंढरपुरके मंदिरके अधिकारियोंको किसी प्रकार यह खबर लग गई थी कि गांधीजी वहाँ किसी यूरोपीय मित्रके साथ आ रहे हैं और वे इस सोचमें पड़े थे कि अगर वे
बनारसको तरह यहाँ भी उस यूरोपीय मित्रको साथ लेकर मन्दिरमें प्रवेश करना चाहेंगे, तो हम क्या करेंगे। मण्डलीमें किसी यूरोपीय को न देखकर जरूर ही उनके दिलका बोझ उतर गया होगा। मगर गांधीजीने अपने भाषण में इस बातकी चर्चा खास तौरपर की। उन्होंने कहा:
मुझे खेद है कि आज मेरे साथ न तो वह बौद्ध बहन है जो बनारसमें थी और न वह अछूत लड़की ही, जिसे मैंने गोद लिया है। मगर आप लोग विश्वास रखें कि अगर वे मेरे साथ होतीं, तो में उनके बिना अकेला मन्दिरमें न जाता। अगर में उन्हें<noinclude></noinclude>
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2026-08-18T04:42:54Z
रितु कुमारी साव
6333
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||सम्मानजनक समझौता|१२७}}</noinclude>बाहर छोड़ देता तो उससे मुझे स्वयं विठोबाको अपमानित करनेका पाप लगता। यदि कोई नास्तिक भी हमारे मन्दिरमें प्रवेश करे तो उसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रभु अपनी चिन्ता आप कर सकते हैं। दुनियामें ऐसा कौन है जो मूर्तिमें व्याप्त भगवान्का अपमान कर सके? मेरे साथ जो यूरोपीय महिला थीं, वे बौद्ध धर्मावलम्बिनी हैं और इसलिए वे तो हिन्दू हैं। अगर उन्हें मन्दिरमें आनेका अधिकार नहीं है तो और किसे हो सकता है? मैं कितने ही तीर्थ स्थानोंमें गया हूँ, और वहाँ मुझे पाखण्ड और विषय- लोलुपता देखकर दुःख हुआ है। कुछ मन्दिरोंके
पुजारी शराबी और भ्रष्ट हैं। हमें पहले उनका सुधार करना जरूरी है। अगर आज जैसी ही स्थिति बनी रही, अगर हमने कुछ काम न किया और आवश्यक तपश्चर्या और आत्मशुद्धि न की तो मैं कहता हूँ कि २२ करोड़ हिन्दू भी हिन्दू-धर्मको जीवित नहीं रख सकेंगे। हिमालयके निष्कलंक धवल होनेका कारण निर्मल महिमा
सम्पन्न अगणित ऋषि-मुनियोंका उसकी गुहाओंमें तपश्चर्या करते हुए अपने प्राण-समर्पण करना ही है। आज केवल ऐसी ही तपश्चर्या हमें और हमारे धर्मको नष्ट होनेसे बचा
सकती है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १०-३-१९२७}}
{{C|{{larger|'''११९. सम्मानजनक समझौता'''}}}}
दोनों पक्षोंके लिए सम्मानजनक समझौता करानेपर सर मुहम्मद हबीबुल्लाह और उनके साथी बधाईके पात्र हैं। यह हमारी कल्पनाका सर्वोत्तम समझौता तो नहीं है; फिर भी आजकी इन स्थितियोंमें यह यथासम्भव सर्वोत्तम समझौता अवश्य है। मुझे इसम शक है कि कोई दूसरा शिष्टमण्डल इससे अधिक सफलता प्राप्त कर सकता कालों और गोरोंको अलग-अलग क्षेत्रों में रखनेके जिस विधेयकके कारण वहाँ संघर्ष हुआ था और जिस विधेयकके सम्बन्धमें यह परिषद बुलाई गई थी वह विधेयक अब रद हो गया है। परम माननीय श्री श्रीनिवास शास्त्री शिष्टमण्डलके दक्षिण आफ्रिकाको रवाना होनेपर हमें अन्य सदस्योंसे अधिक पत्र लिखते थे और उन्होंने हमें तभी चेतावनी दे दी थी कि परिषदसे बहुत अधिक परिणाम की आशा नहीं रखी जा सकती। मगर अब परिषदके समाप्त हो जानेपर उन्होंने परिषदमें किये गये प्रयत्नोंके परिणाम पर संतोष व्यक्त किया है।
मगर सभी समझौतोंकी तरह इस समझौतेमें भी खतरेकी कुछ बातें तो हैं ही। एक ओर तो वर्गक्षेत्र विधेयक वापस ले लिया जाता है, दूसरी ओर दक्षिण आफ्रिकी
भारतीयोंके प्रत्यावर्तनकी नीतिको उनके पुनः प्रवासकी नीतिमें बदलकर वही स्थिति कायम कर दी जाती है। अगर " पुनः प्रवास" नाम अधिक गौरवास्पद है, तो इसमें खतरे भी अधिक हैं। प्रत्यावर्तन तो केवल हिन्दुस्तानतक ही सीमित हो सकता है,<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||सम्मानजनक समझौता|१२७}}</noinclude>बाहर छोड़ देता तो उससे मुझे स्वयं विठोबाको अपमानित करनेका पाप लगता। यदि कोई नास्तिक भी हमारे मन्दिरमें प्रवेश करे तो उसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रभु अपनी चिन्ता आप कर सकते हैं। दुनियामें ऐसा कौन है जो मूर्तिमें व्याप्त भगवान्का अपमान कर सके? मेरे साथ जो यूरोपीय महिला थीं, वे बौद्ध धर्मावलम्बिनी हैं और इसलिए वे तो हिन्दू हैं। अगर उन्हें मन्दिरमें आनेका अधिकार नहीं है तो और किसे हो सकता है? मैं कितने ही तीर्थ स्थानोंमें गया हूँ, और वहाँ मुझे पाखण्ड और विषय- लोलुपता देखकर दुःख हुआ है। कुछ मन्दिरोंके
पुजारी शराबी और भ्रष्ट हैं। हमें पहले उनका सुधार करना जरूरी है। अगर आज जैसी ही स्थिति बनी रही, अगर हमने कुछ काम न किया और आवश्यक तपश्चर्या और आत्मशुद्धि न की तो मैं कहता हूँ कि २२ करोड़ हिन्दू भी हिन्दू-धर्मको जीवित नहीं रख सकेंगे। हिमालयके निष्कलंक धवल होनेका कारण निर्मल महिमा
सम्पन्न अगणित ऋषि-मुनियोंका उसकी गुहाओंमें तपश्चर्या करते हुए अपने प्राण-समर्पण करना ही है। आज केवल ऐसी ही तपश्चर्या हमें और हमारे धर्मको नष्ट होनेसे बचा
सकती है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १०-३-१९२७|2em}}
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दोनों पक्षोंके लिए सम्मानजनक समझौता करानेपर सर मुहम्मद हबीबुल्लाह और उनके साथी बधाईके पात्र हैं। यह हमारी कल्पनाका सर्वोत्तम समझौता तो नहीं है; फिर भी आजकी इन स्थितियोंमें यह यथासम्भव सर्वोत्तम समझौता अवश्य है। मुझे इसम शक है कि कोई दूसरा शिष्टमण्डल इससे अधिक सफलता प्राप्त कर सकता कालों और गोरोंको अलग-अलग क्षेत्रों में रखनेके जिस विधेयकके कारण वहाँ संघर्ष हुआ था और जिस विधेयकके सम्बन्धमें यह परिषद बुलाई गई थी वह विधेयक अब रद हो गया है। परम माननीय श्री श्रीनिवास शास्त्री शिष्टमण्डलके दक्षिण आफ्रिकाको रवाना होनेपर हमें अन्य सदस्योंसे अधिक पत्र लिखते थे और उन्होंने हमें तभी चेतावनी दे दी थी कि परिषदसे बहुत अधिक परिणाम की आशा नहीं रखी जा सकती। मगर अब परिषदके समाप्त हो जानेपर उन्होंने परिषदमें किये गये प्रयत्नोंके परिणाम पर संतोष व्यक्त किया है।
मगर सभी समझौतोंकी तरह इस समझौतेमें भी खतरेकी कुछ बातें तो हैं ही। एक ओर तो वर्गक्षेत्र विधेयक वापस ले लिया जाता है, दूसरी ओर दक्षिण आफ्रिकी
भारतीयोंके प्रत्यावर्तनकी नीतिको उनके पुनः प्रवासकी नीतिमें बदलकर वही स्थिति कायम कर दी जाती है। अगर " पुनः प्रवास" नाम अधिक गौरवास्पद है, तो इसमें खतरे भी अधिक हैं। प्रत्यावर्तन तो केवल हिन्दुस्तानतक ही सीमित हो सकता है,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६६
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|१२८}}</noinclude>मगर 'पुनः प्रवास' तो किसी भी देशमें कराया जा सकता है। इसका अभिप्राय समझौते के इस वाक्यसे स्पष्ट होता है, -" इसलिए दक्षिण आफ्रिकी संघकी सरकार, उन्हें हिन्दुस्तान लौटाने या दूसरे देशोंमें, जहाँ यूरोपीय पाश्चात्य रहन-सहनकी जरूरत नहीं है, पुनः प्रवासित कर देने में सहायता देनेकी योजना बनायेगी।" मैं 'पुनः प्रवास में सहायता देनेकी बातको खतरनाक समझता हूँ, क्योंकि हम नहीं जानते कि उन गरीब अबोध लोगोंकी, जो किसी अनजाने देशमें बिलकुल परदेशी बनकर पहुँचेंगे, क्या दशा होगी। केवल फीजी और ब्रिटिश गियाना ही ऐसे देश हैं जो उन्हें लेनेके लिए
राजी होंगे। किन्तु वे दोनों ही हिन्दुस्तानमें बदनाम हैं। प्रवासियोंको दुनियामें किसी दूसरी जगह सहायता देकर भेजनेका समर्थन करना निस्सन्देह हानिकर है।
इस सहायता प्राप्त पुनः प्रवासके विषय में अच्छी बात यही है कि जहाँ समझौतेसे पहले स्वदेश लौटे हुए लोग वहाँकी नागरिकतासे वंचित हो जाते थे, वहाँ अब वे
तबतक वहाँके नागरिक बने रहेंगे जबतक कि उन्हें दक्षिण आफ्रिकासे बाहर इतने दिन न हो जायें, जिससे ऐसा लगने लगे कि उनका फिर दक्षिण आफ्रिका वापस आनेका इरादा नहीं है। यह दूसरा सवाल है कि कितने लोग प्राप्त वित्तीय सहायताको लौटाने की या अपने परिवारोंके साथ वहाँ फिर वापस लौटनेकी आशा कर सकेंगे। उनके इस हकको जब्त न किये जानेकी धाराका हेतु उनको निश्चित ठोस अधिकार देनेका उतना नहीं है जितना उनके राष्ट्रीय स्वाभिमानको चोट न पहुँचानेका।
दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंके सवालपर गोलमेज परिषद्के निश्चयका जो संक्षिप्त विवरण संलग्न किया गया है वह भी एक अद्भुत दस्तावेज है। इसके हर अनुच्छेदसे विरोधी हितों और भावोंकी संगति बिठानेका भगीरथ प्रयत्न झलकता है। परिश्रमी पाठकको आशाप्रद अनुच्छेद ढूंढ निकालने में कोई कठिनाई नहीं होगी। इसलिए में उस अनुच्छेदका उल्लेख मात्र करूँगा जो भयानक खतरोंसे भरा है। संघ सरकार " सार्वजनिक स्वास्थ्य कानूनके अन्तर्गत डर्बनमें और उसके आसपास स्वच्छता
और गृह निर्माणकी स्थितियोंकी विशेष रूपसे जांच करेगी; इसमें प्रतिबन्धक शर्तोंके अन्तर्गत नगरपालिकाकी जमीनोंकी बिक्रीको मर्यादित करनेका सवाल भी शामिल है। मुझे इस अनुच्छेदका उद्देश्य नहीं मालूम मगर मेरे शक्की दिमागमें यही घूम रहा है कि समिति नियुक्त करनेकी और जमीनोंकी बिक्री मर्यादित करने की बातके परिणाम भयानक ही होंगे। मेरे शकका आधार मेरा पुराना कटु अनुभव है जिसमें मैंने देखा है कि सबल पक्ष समझौतेका उचित या अनुचित रीतिसे ऐसा अर्थ लगाता है जो निर्बल पक्षके लिए हानिकर होता है। डर्बन निगमको अभीसे ऐसे अधिकार दे दिये गये हैं जिनका प्रयोग उसने हिन्दुस्तानी नागरिकोंका दमन करनेमें किया है। जहाँ तक मैं जानता हूँ कोई समिति ऐसी बातें प्रकाशमें नहीं ला सकती जो सरकारको या निगमको मालूम न हों। भारतीय सलाहकार समितिकी नियुक्ति केवल दिखावा ही है। स्वास्थ्य समिति भावनाओं को उभारनेवाला प्रतिवेदन तैयार कर सकती है, और में जानता हूँ कि एक पुरानी समितिने ऐसा किया भी था इससे भारतीयोंपर नगरपालिकाकी जमीनें खरीदनेके मामलेमें पाबन्दी लगाई जा सकती है और उससे<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१६७
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||सम्मानजनक समझौता|१२९}}</noinclude>डर्बनके रहनेवाले भारतीयोंपर प्रतिबन्ध लग सकते हैं। में उस अनुच्छेदको भी पसन्द नहीं करता जिसका अर्थ यह प्रतीत होता है कि प्रान्तीय सरकारें केन्द्रीय सरकारसे पूछे बिना किसी भी प्रवासी हिन्दुस्तानीके विरुद्ध कोई भी कार्रवाई कर सकती हैं।
मगर मेरे बतलाये हुए इन खतरोंके रहते हुए भी यह समझौता स्वीकार करने लायक है, इसलिए नहीं कि समझौतेसे वस्तुतः कुछ हासिल हुआ है, बल्कि इसलिए कि इससे दक्षिण आफ्रिकामें हिन्दुस्तानियोंके प्रति निर्दयतापूर्ण दुश्मनी और नितान्त सामाजिक बहिष्कारका जो भी वातावरण था वह एकदम बदल गया है और उसकी जगह अब गोरोंमें उनके प्रति उदारतापूर्ण सहिष्णुता आ गई है और वे उन्हें सामाजिक समारोहोंमें सम्मिलित करने लगे हैं। श्री एन्ड्रयूजने मेरे पास इस बातके प्रशंसासूचक विवरण भेजे हैं कि किस प्रकार शिष्टमण्डलके हिन्दुस्तानी सदस्योंका सरकार और लोगोंने हार्दिक स्वागत किया है, किस प्रकार हिन्दुस्तानियोंको केपटाउन के बड़ेसे-बड़े शानदार होटलमें बिना किसी बाधा या विरोधके आने दिया गया है, और दक्षिण आफ्रिकाके झुण्डके-झुण्ड गोरे किस प्रकार उनके पास हिन्दुस्तानियोंके प्रश्न और हिन्दुस्तानी शिष्टमण्डलके विषयमें पूछताछ करने आ रहे हैं। अगर दोस्ती और मिलन-सारीका यह वातावरण कायम रखा जा सके और उसे बढ़ावा दिया जाये तो इस समझौतेको दक्षिण आफ्रिकावासी हिन्दुस्तानियोंकी स्वतन्त्रताके भव्य मन्दिरकी पक्की नींव बनाया जा सकता है। मगर इस समझौते की सफलता बहुत कुछ उस व्यक्ति पर निर्भर है जिसे भारत सरकार वाणिज्य दूत या आयुक्त बनाकर अपना प्रतिनिधित्व करनेके लिए चुनेगी। वह आदमी अत्यन्त प्रतिष्ठित, योग्य, चरित्रवान और मेरी समझमें, कोई हिन्दुस्तानी होना चाहिए। उसका हिन्दुस्तानी होना भर यूरोपीय लोगों पर असर करेगा और इससे उनके दिलोंमें वहाँके हिन्दुस्तानियोंकी इज्जत बढ़ेगी। हिन्दुस्तानियोंके दिलोंतक उसकी जैसी पहुँच होगी, वैसी किसी अंग्रेजकी, शायद श्री एन्ड्रयूजकी भी नहीं हो सकती। और अगर इस पदके लिए ऐसा व्यक्ति चुना जा सके जिसे संघ सरकारकी ओरसे भी वैसी ही इज्जत मिल सके तो भारतीयोंके भविष्यके विषयमें कुछ भय नहीं रह जाता। मेरी नम्र सम्मतिमें ऐसे व्यक्ति श्री श्रीनिवास शास्त्री हैं। मैं समझौतेके इस जल्दबाजी में लिखे गये विवेचन को यह लिखे बिना समाप्त नहीं कर सकता कि मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस सुपरिणामका कारण मुख्यतः उस ईश्वर भक्त और आत्मत्यागी अंग्रेज चार्ली एन्ड्रयूजका सतत और विनम्र उद्योग ही है।
{{Left|[अंग्रेजी से]<br>'''यंग इंडिया''' २४-२-१९२७}}
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रितु कुमारी साव
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मगर मेरे बतलाये हुए इन खतरोंके रहते हुए भी यह समझौता स्वीकार करने लायक है, इसलिए नहीं कि समझौतेसे वस्तुतः कुछ हासिल हुआ है, बल्कि इसलिए कि इससे दक्षिण आफ्रिकामें हिन्दुस्तानियोंके प्रति निर्दयतापूर्ण दुश्मनी और नितान्त सामाजिक बहिष्कारका जो भी वातावरण था वह एकदम बदल गया है और उसकी जगह अब गोरोंमें उनके प्रति उदारतापूर्ण सहिष्णुता आ गई है और वे उन्हें सामाजिक समारोहोंमें सम्मिलित करने लगे हैं। श्री एन्ड्रयूजने मेरे पास इस बातके प्रशंसासूचक विवरण भेजे हैं कि किस प्रकार शिष्टमण्डलके हिन्दुस्तानी सदस्योंका सरकार और लोगोंने हार्दिक स्वागत किया है, किस प्रकार हिन्दुस्तानियोंको केपटाउन के बड़ेसे-बड़े शानदार होटलमें बिना किसी बाधा या विरोधके आने दिया गया है, और दक्षिण आफ्रिकाके झुण्डके-झुण्ड गोरे किस प्रकार उनके पास हिन्दुस्तानियोंके प्रश्न और हिन्दुस्तानी शिष्टमण्डलके विषयमें पूछताछ करने आ रहे हैं। अगर दोस्ती और मिलन-सारीका यह वातावरण कायम रखा जा सके और उसे बढ़ावा दिया जाये तो इस समझौतेको दक्षिण आफ्रिकावासी हिन्दुस्तानियोंकी स्वतन्त्रताके भव्य मन्दिरकी पक्की नींव बनाया जा सकता है। मगर इस समझौते की सफलता बहुत कुछ उस व्यक्ति पर निर्भर है जिसे भारत सरकार वाणिज्य दूत या आयुक्त बनाकर अपना प्रतिनिधित्व करनेके लिए चुनेगी। वह आदमी अत्यन्त प्रतिष्ठित, योग्य, चरित्रवान और मेरी समझमें, कोई हिन्दुस्तानी होना चाहिए। उसका हिन्दुस्तानी होना भर यूरोपीय लोगों पर असर करेगा और इससे उनके दिलोंमें वहाँके हिन्दुस्तानियोंकी इज्जत बढ़ेगी। हिन्दुस्तानियोंके दिलोंतक उसकी जैसी पहुँच होगी, वैसी किसी अंग्रेजकी, शायद श्री एन्ड्रयूजकी भी नहीं हो सकती। और अगर इस पदके लिए ऐसा व्यक्ति चुना जा सके जिसे संघ सरकारकी ओरसे भी वैसी ही इज्जत मिल सके तो भारतीयोंके भविष्यके विषयमें कुछ भय नहीं रह जाता। मेरी नम्र सम्मतिमें ऐसे व्यक्ति श्री श्रीनिवास शास्त्री हैं। मैं समझौतेके इस जल्दबाजी में लिखे गये विवेचन को यह लिखे बिना समाप्त नहीं कर सकता कि मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस सुपरिणामका कारण मुख्यतः उस ईश्वर भक्त और आत्मत्यागी अंग्रेज चार्ली एन्ड्रयूजका सतत और विनम्र उद्योग ही है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१२०. टिप्पणियाँ'''<br>एक सीधी-सादी सलाह}}}}
मैंने अपने दौरेमें देखा है कि कुछ सभाओंमें मेहमानके आने और मानपत्र पढ़ना शुरू होनेके बाद स्वयंसेवक तुरन्त ही बिना सोचे-समझे कागजात, जैसे मानपत्रों आदिकी प्रतियाँ वगैरा बाँटना शुरू कर देते हैं। वे यह नहीं समझते कि इससे कोलाहलपूर्ण और अशान्त सभाओंमें नये सिरेसे गड़बड़ी होने लगती है। अगर पर्चे
बाँटने ही हों तो सभाओंकी कार्रवाई शुरू होनेसे पहले ही बाँट दिये जाने चाहिए। लोग यह भी नहीं समझते कि अगर पर्चे बांटे जाते हों, तो फिर जो कोई भी माँगे उसे वे दिये जाने चाहिए। पर्चोकी हजारों नकलें न छपाई जायें तो बड़ी-बड़ी सभाओंमें ऐसा सम्भव नहीं है। मेरी रायमें यह सार्वजनिक पैसेको बिलकुल बरबाद करना होगा। जो कुछ निहायत जरूरी बातें होंगी, उन्हें स्थानीय अखबार छापेंगे ही और जनताको अपने अखबारोंमें छपे विवरणोंसे ही सन्तोष करना चाहिए। अगर उन पचके बिना सभाओं की कार्रवाई ठीक-ठीक समझी न जा सके, तो उन्हें बेचनेमें कुछ हर्ज नहीं है। उस हालतमें पक्षपातका सवाल ही नहीं हो सकता। इसलिए जो लोग
पर्चे लेना चाहते हों, वे उन्हें नाम मात्रका मूल्य देकर ले सकते हैं और उस पैसेसे छपाईका खर्च और सभाओंके प्रबन्धका भी कुछ खर्च, वह थोड़ा ही क्यों न हो, निकल सकता है।
{{C|'''राष्ट्र के निधि-रक्षक'''}}
थोड़ा ही पूर्व विचार कर लें तो बहुतसी मुसीबतें कम हो सकती हैं और बहुत-सा समय और धन बचाया जा सकता है। अक्सर इन सभाओंमें में सार्वजनिक धन पानीकी तरह बहाया जाता देखता हूँ। सभी सभाओंके प्रबन्धक, खासकर खादी-सम्बन्धी सभाओंके प्रबन्धक, यह बात हृदयंगम कर लें कि हमारा देश दुनियामें सबसे गरीब देश है, अगर अन्य किसी कारणसे नहीं तो केवल इसी कारण कि उसकी प्रति व्यक्ति आमदनी तीन पैसे रोजसे भी कम है। यहाँ लाखों आदमी अधभूखे रहते हैं। इसलिए संयोजक समझ लें कि राष्ट्रके रक्षकके नाते उनका यह कर्त्तव्य है कि वे सार्वजनिक धनका उपयोग कंजूसीसे करें और बिना सोचे और बिना जरूरत एक पाई भी खर्च न करें। यह भी समझ लें कि इकट्ठा किया गया प्रत्येक पैसा भूखों मरनेवालोंके लिए है और उस पैसेकी कीमत प्रायः किसी विधवाकी एक दिनकी कमाईके बराबर होती है। इसलिए उन्हें बिना जरूरत एक पैसा भी खर्च नहीं करना चाहिए। मसलन वे कागजी सजावटमें रुपया लगाते हैं, किन्तु यह जमाना सजावटका नहीं है। इसलिए वे सिवा उस सजावटके जो लोगोंको आकर्षित करनेके लिए बिलकुल जरूरी हो, अन्य कोई सजावट न करें और जितना पैसा बचा सकें, उतना बचायें। इस दशामें ऐसी कितनी ही कलात्मक चीजोंकी बात सोची जा सकती है, जिनमें एक पैसा भी न<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१२०. टिप्पणियाँ'''}}{{c|'''एक सीधी-सादी सलाह'''}}
मैंने अपने दौरेमें देखा है कि कुछ सभाओंमें मेहमानके आने और मानपत्र पढ़ना शुरू होनेके बाद स्वयंसेवक तुरन्त ही बिना सोचे-समझे कागजात, जैसे मानपत्रों आदिकी प्रतियाँ वगैरा बाँटना शुरू कर देते हैं। वे यह नहीं समझते कि इससे कोलाहलपूर्ण और अशान्त सभाओंमें नये सिरेसे गड़बड़ी होने लगती है। अगर पर्चे
बाँटने ही हों तो सभाओंकी कार्रवाई शुरू होनेसे पहले ही बाँट दिये जाने चाहिए। लोग यह भी नहीं समझते कि अगर पर्चे बांटे जाते हों, तो फिर जो कोई भी माँगे उसे वे दिये जाने चाहिए। पर्चोकी हजारों नकलें न छपाई जायें तो बड़ी-बड़ी सभाओंमें ऐसा सम्भव नहीं है। मेरी रायमें यह सार्वजनिक पैसेको बिलकुल बरबाद करना होगा। जो कुछ निहायत जरूरी बातें होंगी, उन्हें स्थानीय अखबार छापेंगे ही और जनताको अपने अखबारोंमें छपे विवरणोंसे ही सन्तोष करना चाहिए। अगर उन पचके बिना सभाओं की कार्रवाई ठीक-ठीक समझी न जा सके, तो उन्हें बेचनेमें कुछ हर्ज नहीं है। उस हालतमें पक्षपातका सवाल ही नहीं हो सकता। इसलिए जो लोग
पर्चे लेना चाहते हों, वे उन्हें नाम मात्रका मूल्य देकर ले सकते हैं और उस पैसेसे छपाईका खर्च और सभाओंके प्रबन्धका भी कुछ खर्च, वह थोड़ा ही क्यों न हो, निकल सकता है।
{{C|'''राष्ट्र के निधि-रक्षक'''}}
थोड़ा ही पूर्व विचार कर लें तो बहुतसी मुसीबतें कम हो सकती हैं और बहुत-सा समय और धन बचाया जा सकता है। अक्सर इन सभाओंमें में सार्वजनिक धन पानीकी तरह बहाया जाता देखता हूँ। सभी सभाओंके प्रबन्धक, खासकर खादी-सम्बन्धी सभाओंके प्रबन्धक, यह बात हृदयंगम कर लें कि हमारा देश दुनियामें सबसे गरीब देश है, अगर अन्य किसी कारणसे नहीं तो केवल इसी कारण कि उसकी प्रति व्यक्ति आमदनी तीन पैसे रोजसे भी कम है। यहाँ लाखों आदमी अधभूखे रहते हैं। इसलिए संयोजक समझ लें कि राष्ट्रके रक्षकके नाते उनका यह कर्त्तव्य है कि वे सार्वजनिक धनका उपयोग कंजूसीसे करें और बिना सोचे और बिना जरूरत एक पाई भी खर्च न करें। यह भी समझ लें कि इकट्ठा किया गया प्रत्येक पैसा भूखों मरनेवालोंके लिए है और उस पैसेकी कीमत प्रायः किसी विधवाकी एक दिनकी कमाईके बराबर होती है। इसलिए उन्हें बिना जरूरत एक पैसा भी खर्च नहीं करना चाहिए। मसलन वे कागजी सजावटमें रुपया लगाते हैं, किन्तु यह जमाना सजावटका नहीं है। इसलिए वे सिवा उस सजावटके जो लोगोंको आकर्षित करनेके लिए बिलकुल जरूरी हो, अन्य कोई सजावट न करें और जितना पैसा बचा सकें, उतना बचायें। इस दशामें ऐसी कितनी ही कलात्मक चीजोंकी बात सोची जा सकती है, जिनमें एक पैसा भी न<noinclude></noinclude>
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बाँटने ही हों तो सभाओंकी कार्रवाई शुरू होनेसे पहले ही बाँट दिये जाने चाहिए। लोग यह भी नहीं समझते कि अगर पर्चे बांटे जाते हों, तो फिर जो कोई भी माँगे उसे वे दिये जाने चाहिए। पर्चोकी हजारों नकलें न छपाई जायें तो बड़ी-बड़ी सभाओंमें ऐसा सम्भव नहीं है। मेरी रायमें यह सार्वजनिक पैसेको बिलकुल बरबाद करना होगा। जो कुछ निहायत जरूरी बातें होंगी, उन्हें स्थानीय अखबार छापेंगे ही और जनताको अपने अखबारोंमें छपे विवरणोंसे ही सन्तोष करना चाहिए। अगर उन पचके बिना सभाओं की कार्रवाई ठीक-ठीक समझी न जा सके, तो उन्हें बेचनेमें कुछ हर्ज नहीं है। उस हालतमें पक्षपातका सवाल ही नहीं हो सकता। इसलिए जो लोग
पर्चे लेना चाहते हों, वे उन्हें नाम मात्रका मूल्य देकर ले सकते हैं और उस पैसेसे छपाईका खर्च और सभाओंके प्रबन्धका भी कुछ खर्च, वह थोड़ा ही क्यों न हो, निकल सकता है।
{{C|'''राष्ट्र के निधि-रक्षक'''}}
थोड़ा ही पूर्व विचार कर लें तो बहुतसी मुसीबतें कम हो सकती हैं और बहुत-सा समय और धन बचाया जा सकता है। अक्सर इन सभाओंमें में सार्वजनिक धन पानीकी तरह बहाया जाता देखता हूँ। सभी सभाओंके प्रबन्धक, खासकर खादी-सम्बन्धी सभाओंके प्रबन्धक, यह बात हृदयंगम कर लें कि हमारा देश दुनियामें सबसे गरीब देश है, अगर अन्य किसी कारणसे नहीं तो केवल इसी कारण कि उसकी प्रति व्यक्ति आमदनी तीन पैसे रोजसे भी कम है। यहाँ लाखों आदमी अधभूखे रहते हैं। इसलिए संयोजक समझ लें कि राष्ट्रके रक्षकके नाते उनका यह कर्त्तव्य है कि वे सार्वजनिक धनका उपयोग कंजूसीसे करें और बिना सोचे और बिना जरूरत एक पाई भी खर्च न करें। यह भी समझ लें कि इकट्ठा किया गया प्रत्येक पैसा भूखों मरनेवालोंके लिए है और उस पैसेकी कीमत प्रायः किसी विधवाकी एक दिनकी कमाईके बराबर होती है। इसलिए उन्हें बिना जरूरत एक पैसा भी खर्च नहीं करना चाहिए। मसलन वे कागजी सजावटमें रुपया लगाते हैं, किन्तु यह जमाना सजावटका नहीं है। इसलिए वे सिवा उस सजावटके जो लोगोंको आकर्षित करनेके लिए बिलकुल जरूरी हो, अन्य कोई सजावट न करें और जितना पैसा बचा सकें, उतना बचायें। इस दशामें ऐसी कितनी ही कलात्मक चीजोंकी बात सोची जा सकती है, जिनमें एक पैसा भी न<noinclude></noinclude>
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बाँटने ही हों तो सभाओंकी कार्रवाई शुरू होनेसे पहले ही बाँट दिये जाने चाहिए। लोग यह भी नहीं समझते कि अगर पर्चे बांटे जाते हों, तो फिर जो कोई भी माँगे उसे वे दिये जाने चाहिए। पर्चोकी हजारों नकलें न छपाई जायें तो बड़ी-बड़ी सभाओंमें ऐसा सम्भव नहीं है। मेरी रायमें यह सार्वजनिक पैसेको बिलकुल बरबाद करना होगा। जो कुछ निहायत जरूरी बातें होंगी, उन्हें स्थानीय अखबार छापेंगे ही और जनताको अपने अखबारोंमें छपे विवरणोंसे ही सन्तोष करना चाहिए। अगर उन पचके बिना सभाओं की कार्रवाई ठीक-ठीक समझी न जा सके, तो उन्हें बेचनेमें कुछ हर्ज नहीं है। उस हालतमें पक्षपातका सवाल ही नहीं हो सकता। इसलिए जो लोग
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{{C|'''राष्ट्र के निधि-रक्षक'''}}
थोड़ा ही पूर्व विचार कर लें तो बहुतसी मुसीबतें कम हो सकती हैं और बहुत-सा समय और धन बचाया जा सकता है। अक्सर इन सभाओंमें में सार्वजनिक धन पानीकी तरह बहाया जाता देखता हूँ। सभी सभाओंके प्रबन्धक, खासकर खादी-सम्बन्धी सभाओंके प्रबन्धक, यह बात हृदयंगम कर लें कि हमारा देश दुनियामें सबसे गरीब देश है, अगर अन्य किसी कारणसे नहीं तो केवल इसी कारण कि उसकी प्रति व्यक्ति आमदनी तीन पैसे रोजसे भी कम है। यहाँ लाखों आदमी अधभूखे रहते हैं। इसलिए संयोजक समझ लें कि राष्ट्रके रक्षकके नाते उनका यह कर्त्तव्य है कि वे सार्वजनिक धनका उपयोग कंजूसीसे करें और बिना सोचे और बिना जरूरत एक पाई भी खर्च न करें। यह भी समझ लें कि इकट्ठा किया गया प्रत्येक पैसा भूखों मरनेवालोंके लिए है और उस पैसेकी कीमत प्रायः किसी विधवाकी एक दिनकी कमाईके बराबर होती है। इसलिए उन्हें बिना जरूरत एक पैसा भी खर्च नहीं करना चाहिए। मसलन वे कागजी सजावटमें रुपया लगाते हैं, किन्तु यह जमाना सजावटका नहीं है। इसलिए वे सिवा उस सजावटके जो लोगोंको आकर्षित करनेके लिए बिलकुल जरूरी हो, अन्य कोई सजावट न करें और जितना पैसा बचा सकें, उतना बचायें। इस दशामें ऐसी कितनी ही कलात्मक चीजोंकी बात सोची जा सकती है, जिनमें एक पैसा भी न<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१३१}}</noinclude>लगे या बहुत कम खर्च हो। इस तरह बेकार खादीके झंडे और पताकाएँ बनवाई जा सकती हैं। अब हम खादीके साथ खादीके कपड़ोंकी सिलाईकी विस्तृत व्यवस्था भी कर रहे हैं। दर्जीकी दुकानमें हमेशा ही खादीकी बहुत-सी बेकार कतरनें पड़ी रहती हैं। वह उन्हें फेंक देता है। इन बेकार कतरनोंका इस्तेमाल झंडियाँ और पताकाएँ बनानेके लिए किया जा सकता है कागजकी झंडियां और पताकाएँ तो दूसरे ही दिन फेंक दी जाती हैं। मगर ये तो भविष्यमें काममें लानेके लिए भी रखी जा सकती हैं।
{{C|'''मानपत्र हाथ से लिखें '''}}
फूलोंकी मालाएँ बिलकुल छोड़ी जा सकती हैं और सूतकी मालाएँ भेंट की जा सकती हैं। किन्तु सूतमें गाँठें लगाकर उसे खराब नहीं किया जाना चाहिए। उसे जैसा का तैसा ही दे देना चाहिए, जिससे बादमें उसका उपयोग कपड़ा बुननेमें या इसी तरह के किसी दूसरे काममें किया जा सके। मानपत्रोंको न छपाकर भी पैसा बचाया जा सकता है। संयोजकोंमेंसे जो सबसे सुन्दर अक्षर लिखते हों, वे हाथके बने कागजपर मानपत्र लिख दें और वह कागज खद्दरपर सफाईसे चिपकाया जा सकता है। अगर कोई छोटा लड़का या लड़की भी सूतसे खद्दरपर ही काढ़ दे तो और भी अच्छा। कढ़ाईके लिए सूत भी हाथकता होना चाहिए। ऐसी चीज कलात्मक और कीमती भी होगी। छपरा नगरपालिकाके अध्यक्ष बाबू महेन्द्रप्रसादने नगरपालिकाकी ओरसे मुझे जो मानपत्र भेंट किया था, उसे उनकी लड़की रमाने खद्दरपर बड़े अनूठे ढंगसे काढ़कर दिया था। मैंने यह कल्पना उसीसे ली है। इसमें नगरपालिकाको कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ा और मेरे पास एक ऐसी कलात्मक वस्तु हो गई जो गुजरात राष्ट्रीय विद्यालयमें अध्यापक मलकानी द्वारा बनाए संग्रहालयकी शोभा बढ़ायेगी।
{{C|'''चाँदीकी मंजूषाएँ न दें'''}}
[मानपत्रोंको] कीमती मंजूषाओं [में रखकर] देनेकी जरूरत नहीं है, क्योंकि ये मंजूषाएँ मेरे लिये किसी कामकी नहीं हैं। फिर उन्हें रखनेके लिए मेरे पास जगह
भी नहीं है। मैं कुछ दिनोंसे उपहारमें मिली सभी कीमती मंजूषाओंको नीलाम कर देता हूँ और उनकी बिक्रीसे मिले धनको अखिल भारतीय देशबन्धु स्मारक कोषको दे देता हूँ। यद्यपि मुझे ऐसी नीलामी में बहुधा मंजूषाओंकी असली कीमत से अधिक पैसा मिल जाता है; तो भी अधिक दाम पानेके लिए ही इनका दिया जाना उचित नहीं होगा। अगर मानपत्र मंजूषामें रखकर ही देना हो, तो संयोजकोंके लिए अच्छी पद्धति यह होगी कि वे कोई सस्ती, सुन्दर ओर स्थानीय वस्तु ढूंढकर उसकी मंजूषा बनवायें।
{{C|सैर-सपाटा नहीं}}
गंगाधररावने बहुत ठीक ही कहा है कि मेरा यह दौरा सैर-सपाटेका दौरा नहीं है; बल्कि एक कामकाजी दौरा है और मैं आशा करता हूँ कि मैं इसमें अपने दरिद्रनारायणके लाभार्थं काफी ठोस कार्य कर लूंगा इसलिए हरएक समारोह उसीके<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७०
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रितु कुमारी साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१३२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>अनुरूप होना चाहिए। मैंने देखा है कि कामकी जरूरतके लिहाजसे जितने आदमी साथ होने चाहिए, उससे अधिक स्थानिक आदमी मेरे साथ चल देते हैं और कारें किराये पर लेने में उचित मितव्ययताका खयाल नहीं करते। खर्चकी हरएक मदपर पहलेसे सावधानीसे विचार कर लिया जाना चाहिए। जबतक हम ऐसा नहीं करते, भूखों मरनेवाले लाखों लोगोंके लिए हम कोई योग्य आर्थिक संस्था स्थापित नहीं कर सकते और छोटे पैमानेपर ही सही, हम भी उसी फिजूलखर्चीके दोषके भागी होंगे, जिसके लिए हम सरकारको उचित रूपसे दोषी ठहराते हैं। जहाँ कहीं सम्भव हो, किटसन लालटेनें नहीं लाई जानी चाहिए। मैं खाने-पीनेपर भी बहुत रुपया खर्च होता देखता हूँ। जो मेरे साथ घूमते हैं वे खातिर करवानेके लिए नहीं घूमते। स्वच्छ स्थान और स्वच्छ भोजनकी व्यवस्था हो, इतना ही काफी है। सचमुच कई बार मेरे मनमें आया है कि मैं और मेरे साथी अपना भोजन अपने साथ लेकर चलें और इस मामलेमें श्री भरूचाके अच्छे दृष्टान्तका अनुकरण करें, जो अपना भोजन अपने साथ ले जाने पर हमेशा जोर देते हैं। हम खाने-पीने में बहुत, बल्कि जरूरतसे अधिक, समय और रुपया खर्च करते हैं। मुझे लोगोंको कलकत्ते, बम्बईसे फलोंकी पार्सले मँगाते देखकर कष्ट होता है। यह बिलकुल व्यर्थका खर्च है। वेशक कुछ फल तो मेरे आहारका आवश्यक अंग हैं और वे जब हमें अपने यहाँ न मिल सकें तो बाहरसे मँगाने ही पड़ते हैं। मगर मुझे विश्वास है कि फलोंपर जितना पैसा खर्च किया जाता है, उसका कमसे-कम तीन चौथाई तो जरूर बचाया जा सकता है। मगर कुछ अति उत्साही मित्र कहते हैं, जो लोग आपसे प्रेम करते हैं, वे यदि कुछ ऐसी सेवा करके अपना प्रेम प्रकट करना चाहें तो क्यों न करें? वे दूसरी तरह पैसा खर्च नहीं करेंगे और आपकी निजी सेवामें जितना खर्च करते हैं, उतना यों ही देंगे भी नहीं। इसलिए आप उन्हें अपनी सेवामें खर्च करनेका सुख उठाने दें। बेशक, यह दलील कानोंको तो अच्छी
लगती है, मगर कायल कतई नहीं करती।
{{c|सेवामें परिवर्तन}}
जो लोग मुझसे प्रेम करते हैं, वे अगर मेरे सिद्धान्तसे भी प्रेम नहीं कर सकते तो उनका प्रेम अन्धा है और वह बहुत कीमती नहीं है। मैं नहीं समझता कि किसीका
उद्देश्य केवल मित्रोंका मनोविनोद करना हो सकता है मित्रताका अर्थ प्रेमभरी पारस्परिक सेवा है। कभी-कभी बहुत अधिक खातिर करके मित्रोंको प्रलोभनमें फँसाना
तो अवश्य ही अहितकर होता है। अगर मेरे कोई मित्र ऐसे हैं जो मेरे सुखोपभोग के लिए तो रुपया पानीकी तरह बहाना चाहते हैं मगर जिस उद्देश्यको में प्यार करता हूँ, उसके लिए कुछ भी खर्च करना नहीं चाहते, तो उस सुखोपभोगसे बचना मेरा स्पष्ट कर्त्तव्य है। मित्रोंको अगर मित्रता निभानी है, तो उन्हें पहले मेरी
जिन्दगीकी जरूरी चीजें जुटानी होंगी। वे उसके बाद ही मुझे सुखोपभोगकी चीजें भेजनेकी बात सोच सकते हैं, और खद्दरका काम मेरी जिन्दगीकी सबसे बड़ी जरूरी
चीज है। वह मेरे लिए खानेसे भी ज्यादा जरूरी है स्वागत समितियाँ इस चीजको ध्यानमें रखें।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७१
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१३३}}</noinclude>{{c|मालाओंकी नीलामी}}
ये पिछले अनुच्छेद अहमदनगर पहुँचने के पहले जहाँ-जहाँ मैं रुका वहाँ-वहाँ लिखे गये अथवा बोलकर लिखाये गये थे। वहाँ एक बड़ी जबर्दस्त सभा हुई थी जिसमें मुझे कई मानपत्र दिये गये थे। नगरपालिकाका मानपत्र चांदीके एक सुन्दर गोलाकार डिब्बेमें रखकर दिया गया था। हर संस्थाके प्रतिनिधि फूलोंकी कीमती मालाएँ भी लाये थे। श्रीयुत फिरोदियाने थैली देते हुए उसमें छोटी रकम होनेके लिए क्षमा माँगते हुए यह बतलाया कि अहमदनगर अकालग्रस्त प्रदेश है। इसलिए जब मैंने उसका उत्तर दिया तो मैं महलोंके समान कोठियों, खर्चीले प्रबन्ध और अकालकी बातकी विसंगतिका उल्लेख किये बिना न रह सका। मैंने लोगोंसे कहा कि जो अहमदनगरकी दशा है वही सारे हिन्दुस्तानकी है। क्या सारा भारत अकाल-ग्रस्त नहीं
है? मगर इससे कुछ लोगोंका धन जमा करना तो नहीं रुका है। हम नगरनिवासी अकालग्रस्त गाँववालोंका ही शोषण करके जीते हैं। खद्दर आन्दोलनका अर्थ है इस
बुराईका थोड़ा बहुत इलाज करना और उन लाखों लोगोंका थोड़ा-सा कर्ज चुकाना जिनका हम आज शोषण कर रहे हैं। इसलिए मैंने कहा कि इस सचाईको माननेसे कि अहमदनगर अकाल-ग्रस्त प्रदेश है, वहाँके धनियोंके लिए कम चन्दा देना नहीं, और भी अधिक चन्दा देना, दुगुना, लाजिमी हो जाता है। मैंने यह भी कहा कि उपहारके रूपमें ऐसी सुन्दर पेटियाँ और कीमती मालाएँ लेना मेरे लिये शोभनीय नहीं होगा। मैंने यह भी कहा कि मैं पौधोंको मनुष्यके समान ही प्राणवान् मानता हूँ; इस कारण मैं एक भी फूलका यों ही तोड़ा जाना पसन्द नहीं करता। मगर अहमदनगर जैसे स्थान में मेरी नापसन्दगी इस बातको याद करके और भी बढ़ जाती है कि मैं उन्हीं अकाल-ग्रस्तोंका स्वयंभू प्रतिनिधि हूँ, जिनका जिक्र श्रीयुत फिरोदियाने किया है। गैरजरूरी कामोंमें एक रुपया खर्च करनेका अर्थ है, १६ भूखी स्त्रियोंकी रोजी मारना। इसलिए मैंने सुझाया कि चाँदीकी पेटी और फूल नीलाम कर दिये जायें और मेरी बातका अगर कुछ भी असर पड़े तो खरीदार लोग इनका बाजार दाम न दें, बल्कि इससे जो भावना सम्बद्ध है उसको ध्यान में रखकर दाम दें। स्वभावतः ही नीलामका काम नगरपालिकाके अध्यक्ष खानबहादुर दोराब सेठको दिया गया। पेटी नगरके दानी सेठ मगनीरामको १००१ रु० में बेची गई और मालाएँ और गुलदस्ते उन्हीं योग्य प्रबन्धकों द्वारा विभिन्न लोगोंको ५०२ रुपये में बेचे गये। मेरी अपीलका असर केवल सभामें ही नहीं पड़ा बल्कि मुझे लगा कि वहाँके नागरिकोंने मेरे भाषणका भाव समझ लिया है क्योंकि १७०० रु० रुपयेकी थैली, जिसके लिए श्रीयुत फिरोदियाने माफी माँगी थी, बढ़ा कर करीब ६००० रुपयेकी कर दी गई। इसके अलावा सभामें खादी भी धड़ाधड़ बिकी। भविष्य के लिए प्रबन्धक इससे चेत जायें। मैं उन्हें सावधान करता हूँ कि उन्हें मालाएँ या कीमती पेटियाँ देने की जरूरत नहीं है। अगर वे देंगे तो मैं समक्षूंगा कि वे नीलाम करनेके लिए हैं और इसलिए हैं कि गरीबोंके कोषमें उनका हिस्सा नीलामी द्वारा काफी बड़ा हो जाये।
१. देखिए 'भाषण : अहमदनगर में ", १८-२-१९२७ ।<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१३३}}</noinclude>{{c|मालाओंकी नीलामी}}
ये पिछले अनुच्छेद अहमदनगर पहुँचने के पहले जहाँ-जहाँ मैं रुका वहाँ-वहाँ लिखे गये अथवा बोलकर लिखाये गये थे। वहाँ एक बड़ी जबर्दस्त सभा हुई थी जिसमें मुझे कई मानपत्र दिये गये थे। नगरपालिकाका मानपत्र चांदीके एक सुन्दर गोलाकार डिब्बेमें रखकर दिया गया था। हर संस्थाके प्रतिनिधि फूलोंकी कीमती मालाएँ भी लाये थे। श्रीयुत फिरोदियाने थैली देते हुए उसमें छोटी रकम होनेके लिए क्षमा माँगते हुए यह बतलाया कि अहमदनगर अकालग्रस्त प्रदेश है। इसलिए जब मैंने उसका उत्तर दिया तो मैं महलोंके समान कोठियों, खर्चीले प्रबन्ध और अकालकी बातकी विसंगतिका उल्लेख किये बिना न रह सका। मैंने लोगोंसे कहा कि जो अहमदनगरकी दशा है वही सारे हिन्दुस्तानकी है। क्या सारा भारत अकाल-ग्रस्त नहीं
है? मगर इससे कुछ लोगोंका धन जमा करना तो नहीं रुका है। हम नगरनिवासी अकालग्रस्त गाँववालोंका ही शोषण करके जीते हैं। खद्दर आन्दोलनका अर्थ है इस
बुराईका थोड़ा बहुत इलाज करना और उन लाखों लोगोंका थोड़ा-सा कर्ज चुकाना जिनका हम आज शोषण कर रहे हैं। इसलिए मैंने कहा कि इस सचाईको माननेसे कि अहमदनगर अकाल-ग्रस्त प्रदेश है, वहाँके धनियोंके लिए कम चन्दा देना नहीं, और भी अधिक चन्दा देना, दुगुना, लाजिमी हो जाता है। मैंने यह भी कहा कि उपहारके रूपमें ऐसी सुन्दर पेटियाँ और कीमती मालाएँ लेना मेरे लिये शोभनीय नहीं होगा। मैंने यह भी कहा कि मैं पौधोंको मनुष्यके समान ही प्राणवान् मानता हूँ; इस कारण मैं एक भी फूलका यों ही तोड़ा जाना पसन्द नहीं करता। मगर अहमदनगर जैसे स्थान में मेरी नापसन्दगी इस बातको याद करके और भी बढ़ जाती है कि मैं उन्हीं अकाल-ग्रस्तोंका स्वयंभू प्रतिनिधि हूँ, जिनका जिक्र श्रीयुत फिरोदियाने किया है। गैरजरूरी कामोंमें एक रुपया खर्च करनेका अर्थ है, १६ भूखी स्त्रियोंकी रोजी मारना। इसलिए मैंने सुझाया कि चाँदीकी पेटी और फूल नीलाम कर दिये जायें और मेरी बातका अगर कुछ भी असर पड़े तो खरीदार लोग इनका बाजार दाम न दें, बल्कि इससे जो भावना सम्बद्ध है उसको ध्यान में रखकर दाम दें। स्वभावतः ही नीलामका काम नगरपालिकाके अध्यक्ष खानबहादुर दोराब सेठको दिया गया। पेटी नगरके दानी सेठ मगनीरामको १००१ रु० में बेची गई और मालाएँ और गुलदस्ते उन्हीं योग्य प्रबन्धकों द्वारा विभिन्न लोगोंको ५०२ रुपये में बेचे गये। मेरी अपीलका असर केवल सभामें ही नहीं पड़ा बल्कि मुझे लगा कि वहाँके नागरिकोंने मेरे भाषणका भाव समझ लिया है क्योंकि १७०० रु० रुपयेकी थैली, जिसके लिए श्रीयुत फिरोदियाने माफी माँगी थी, बढ़ा कर करीब ६००० रुपयेकी कर दी गई। इसके अलावा सभामें खादी भी धड़ाधड़ बिकी। भविष्य के लिए प्रबन्धक इससे चेत जायें। मैं उन्हें सावधान करता हूँ कि उन्हें मालाएँ या कीमती पेटियाँ देने की जरूरत नहीं है। अगर वे देंगे तो मैं समक्षूंगा कि वे नीलाम करनेके लिए हैं और इसलिए हैं कि गरीबोंके कोषमें उनका हिस्सा नीलामी द्वारा काफी बड़ा हो जाये।
१. देखिए 'भाषण : अहमदनगर में ", १८-२-१९२७ ।<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>{{c|तिलक स्वराज्य कोष}}
महाराष्ट्रके दौरेमें एक दो सभाओंमें मुझसे यह प्रश्न पूछा गया कि तिलक स्वराज्य कोषमें जो एक करोड़ रुपया इकट्ठा किया गया था उसका क्या हुआ?<ref>देखिए " भाषण: पाचोरामें, तिलक स्वराज्य कोषपर", ८-२-१९२७।</ref> प्रश्नकर्त्ताओंने इस कोषमें चाहे एक पाई भी न दी हो, फिर भी उन्हें यह प्रश्न पूछनेका पूरा अधिकार था। सार्वजनिक कोष सार्वजनिक सम्पत्ति हो जाता है, इस-लिए जनतामेंसे हरएक मनुष्यको ऐसे कोषोंकी व्यवस्थाका पूरा-पूरा ब्यौरा पूछनेका हक हो जाता है। इसी कारण मैंने इस प्रश्नका उत्तर बहुत विस्तारसे दिया। यद्यपि इस प्रश्नका उत्तर इन पृष्ठोंमें पहले दिया जा चुका है, फिर भी मेरे उत्तरका सार यहाँ दोहराना ठीक होगा।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने इस कोषका हिसाब नियमित रुपसे प्रकाशित किया है। जाँचे हुए हिसावकी प्रतियाँ कांग्रेसके मन्त्रियों और कोषाध्यक्षोंसे किसी भी
समय मँगाई जा सकती हैं। इसमें पाई-पाईका हिसाब दिया गया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिन लोगोंको यह कोष सौंपा गया था, उनमेंसे कुछ लोग इस न्यासके प्रति सच्चे नहीं रहे; किन्तु इसका अर्थ इतना ही है कि मनुष्योंकी बनाई हुई सब संस्थाओंकी तरह कांग्रेस भी अपूर्ण संस्था है और उसमें सब तरहके लोग शामिल हैं। मुझे संसारकी किसी भी ऐसी संस्थाका नाम मालूम नहीं है जिसमें बेईमान कार्यकर्त्ता न हों। कांग्रेस इसका अपवाद नहीं है; किन्तु मैं यह कह सकता हूँ कि जितना नुकसान एक सावधान व्यापारी उठाता है, उससे ज्यादा नुकसान हमने नहीं उठाया है। जो थोड़ा-सा नुकसान हुआ है उसका कारण लापरवाही नहीं है, बल्कि वह सावधानीसे देखरेख करने और हिसाब जाँचते रहनेपर भी हो गया है। इसके अतिरिक्त यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि कांग्रेसके पण्डित जवाहरलाल
नेहरू जैसे मन्त्री और सेठ जमनालाल बजाज जैसे कोषाध्यक्ष रहे हैं, जो किसी लालचमें पड़कर भ्रष्ट नहीं हो सकते। इसके अतिरिक्त संचित रुपयेका ७५ प्रतिशत उन्हीं स्थानोंपर वहींके ऐसे स्थानीय प्रतिनिधियोंके नियन्त्रणमें रहा है, जिन्होंने इस रुपये को इकट्ठा करनेमें सहायता दी थी और जिनपर लोगोंने विश्वास करके रुपया दिया था। आखिरी बात यह है कि सबसे बड़ी रकमें ज्यादातर खास कामोंके लिए निश्चित कर दी गई थीं और उनके खर्चपर रुपया देनेवालोंका नियन्त्रण था। बेशक इसकी शर्त यह थी कि यह निश्चित किया हुआ रुपया असहयोगके कार्यक्रमके अन्तर्गत आनेवाले कामोंपर खर्च किया जायेगा और कांग्रेसके प्रतिनिधि उसके हिसाबकी जाँच कर सकेंगे। जहाँतक मेरा सम्बन्ध है, मुझे इस कोषके इकट्ठा करनेपर बिलकुल अफसोस नहीं है और इसके खर्चके नियन्त्रणके बारेमें मेरा मन बिलकुल साफ है। मनुष्यके लिए जहाँतक सम्भव है वहाँतक जालसाजी, बद-इन्तजामी या गबनसे बचने की पूरी सावधानी रखी गई थी। इस कोषने बहुत बड़ा राष्ट्रीय कार्य पूरा करनेमें मदद की है। इतनी विशाल संस्था, जो एकदम खड़ी हो गई, इस बहुत बड़े राष्ट्रीय<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७३
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र: नारणदास गांधीको|१३५}}</noinclude>कोषके बिना, जिसमें अमीर और गरीब सबने अच्छी रकमें दी हैं, खड़ी नहीं हो सकती थी।
{{C|अखिल भारतीय गोरक्षा संघ}}
मन्त्रीके नीचे लिखे अनुसार और सूत मिला है?{{ref>साधन-सूत्रसे।</ref>
संख्या ५, ६, ८ और १० के सदस्योंने अपना जोड़ बढ़ाकर क्रमशः २४,००२, २४,०००, २२,००० और १४,९४० कर दिया है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २४-२-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१२१. पत्र: नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|[२५ फरवरी, १९२७ से पूर्व]<ref>आँकड़े यहाँ नहीं दिए जा रहे हैं, ये आँकड़े ११ से १७ तकके सदस्योंसे सम्बन्धित थे।</ref>}}
{{Left|[चि०] नारणदास,}}
तुम्हारा दूसरा पत्र अभी-अभी मिला।
भण्डारके बारेमें आज मैंने तुम्हें बेलगाँव पहुँचनेका तार दिया है। तुम तो २५ तारीख तक ही पहुँचोगे । मैं २६ को पहुँचूँगा।
पाँच तलावडीमें चरखोंकी आवश्यकताको पूरा करनेके बारेमें अपनी राय देना। यदि उस विभागको अमरेली [कार्यालय] की मार्फत चलाया जाये तो निश्चय ही सुविधा होगी। कोटक भण्डारसे सम्बन्धित आँकड़े क्यों नहीं भेजे गये? ये आँकड़े पिछली बार भी नहीं भेजे गये थे।
{{Right|बापू}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ७७११) से।<br>सौजन्य : नारणदास गांधी}} nhi<noinclude></noinclude>
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रितु कुमारी साव
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text/x-wiki
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{{C|अखिल भारतीय गोरक्षा संघ}}
मन्त्रीके नीचे लिखे अनुसार और सूत मिला है?{{ref>साधन-सूत्रसे।</ref>
संख्या ५, ६, ८ और १० के सदस्योंने अपना जोड़ बढ़ाकर क्रमशः २४,००२, २४,०००, २२,००० और १४,९४० कर दिया है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २४-२-१९२७|2em}}
{{C|{{larger|'''१२१. पत्र: नारणदास गांधीको'''}}}}
{{Right|[२५ फरवरी, १९२७ से पूर्व]<ref>आँकड़े यहाँ नहीं दिए जा रहे हैं, ये आँकड़े ११ से १७ तकके सदस्योंसे सम्बन्धित थे।</ref>}}
{{Left|[चि०] नारणदास,}}
तुम्हारा दूसरा पत्र अभी-अभी मिला।
भण्डारके बारेमें आज मैंने तुम्हें बेलगाँव पहुँचनेका तार दिया है। तुम तो २५ तारीख तक ही पहुँचोगे । मैं २६ को पहुँचूँगा।
पाँच तलावडीमें चरखोंकी आवश्यकताको पूरा करनेके बारेमें अपनी राय देना। यदि उस विभागको अमरेली [कार्यालय] की मार्फत चलाया जाये तो निश्चय ही सुविधा होगी। कोटक भण्डारसे सम्बन्धित आँकड़े क्यों नहीं भेजे गये? ये आँकड़े पिछली बार भी नहीं भेजे गये थे।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/२६९
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>
{{c|'''२२२. पत्र : आश्रमके बच्चोंको'''}}
{{Right|४ अप्रैल, १९२७}}
{{Left|बालको और बालिकाओ,}}
देखो, सत्याग्रह सप्ताहको शोभान्वित करना। जिसे 'गीता' में रस नहीं आता,
जिसे चरखेका गान अच्छा नहीं लगता वह जीवनको जानता ही नहीं है। हमें तो
रसका स्वामी होना चाहिए और जो वस्तु हमारे लिए कल्याणकारी हो उसीमें से
आनन्द प्राप्त करना आना चाहिए। इसी में सच्ची कला है । बाह्य रसोंके अधीन
होना गुलामीका परिचायक है । अन्तरसे रस उत्पन्न करनेमें ही सच्चा आनन्द है ।
यदि हम तुम्हें यह ज्ञान नहीं दे सकते तो हम सब शिक्षक नहीं, घास छीलनेवाले
हुए। तुम्हें निकम्मे शिष्य तो कैसे कहा जा सकता है ?
मैं आनन्दमें हूँ ।
{{Left|[गुजरातीसे]}}
:महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरीसे ।
:सौजन्य : नारायण देसाई
{{C|{{larger|'''२२३. पत्र : हेमप्रभादेवी दासगुप्तको'''}}}}
{{Right|मौनवार [४ अप्रैल, १९२७]<ref>१. गंगाधरराव मैसूर राज्य १० तारीखसे पहले गये थे।</ref>}}
{{Left|प्रिय भगिनी,}}
आपका कोई खत आजकल नहि है । यदि शक्ति है तो लिखियो । ऐसे खतोंसे
मुझको कुछ तकलीफ नहि होत है, लाभ होता है ।
मुझे आराम है। यहां बा, महादेव, देवदास, कृष्णदास इ० हैं । राजाजी और
गंगाधरराव भी हैं। शांत जगह है ।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
मूल (जी० एन० १६६२) की फोटो- नकल से ।<noinclude>{{dhr|5em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६५६
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Avantika Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|६२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|दास, मधुसूदन, २८, ११०}}
{{outdent|दास, राधासुन्दर, २७६}}
{{outdent|दासगुप्त, कमला, २८४, ४२१}}
{{outdent|दासगुप्त, सतीशचन्द्र, २२, ७२-३, १०९, ११७, २१३, २९५, ३२३, ३२८, ३५१, ३५९, ४२१, ४७०}}
{{outdent|दास्ताने, वी० वी०, २८६, २९५}}
{{outdent|दिलीपसिंह, न्यायमूर्ति, १५२, ४७२}}
{{outdent|दीक्षा; - कौन ले, ४४२-३}}
{{outdent|दीवान - मैसूरके, १२९, १३२, १८७, २८१}}
{{outdent|दुग्ध व्यवसाय, २४, ३८, १७५, ४५१; - एक ग्रामोद्योग, ६४-५; -और पिंजरापोल, १३५-७}}
{{outdent|दुर्गा, ३९७}}
{{outdent|दुर्योधन, ४१०}}
{{outdent|देव, नानासाहेब, २३८}}
{{outdent|देवचन्द माई, ८०}}
{{outdent|देवता; और राक्षस, ४९}}
{{outdent|देवदासी प्रथा, ५४६, ५५६, ५६५, ५९६; -ईश्वरका अपमान, ५७४-५}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३३
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| ३२४. || टिप्पणियाँ : स्वर्गीय जयकृष्ण इन्द्रजी; मजदूर और मालिक; हज्जाम या नाई (२२-१२-१९२९) || ३१६
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| ३२५. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२३-१२-१९२९) || ३१९
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| ३२६. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२३-१२-१९२९) || ३१९
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| ३२७. || भाषण : सर्वेन्ट्स ऑफ पीपल सोसाइटी, लाहौरमें (२४-१२-१९२९) || ३२०
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| ३२८. || भाषण : अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलनमें (२४-१२-१९२९) || ३२२
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| ३२९. || टिप्पणियाँ : दोषपूर्ण निर्णय; गांधीजीके साथ सात माह (२६-१२-१९२९) || ३२३
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| ३३०. || निश्चित परामर्श (२६-१२-१९२९) || ३२४
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| ३३१. || यह क्रूर प्रथा (२६-१२-१९२९) || ३२६
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| ३३२. || गोवा-निवासी (२६-१२-१९२९) || ३२७
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| ३३३. || राष्ट्रभाषा (२६-१२-१९२९) || ३२८
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| ३३४. || लाहौर कांग्रेसके प्रस्तावोंका मसविदा — २ (२६-१२-१९२९) || ३२९
|-
| ३३५. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२६-१२-१९२९) || ३३१
|-
| ३३६. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — १ (२७-१२-१९२९) || ३३३
|-
| ३३७. || सिख नेताओंसे बातचीत (२७-१२-१९२९) || ३३६
|-
| ३३८. || विद्यापीठका विकास (२९-१२-१९२९) || ३३७
|-
| ३३९. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — २ (२९-१२-१९२९) || ३३९
|-
| ३४०. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (३०-१२-१९२९) || ३४५
|-
| ३४१. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (१९-१२-१९२९) || ३४५
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| ३४२. || पत्र : शान्तिकुमार मोरारजीको (२०-१२-१९२९) || ३४६
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|-
| ३४४. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२०-१२-१९२९) || ३५१
|-
| ३४५. || तार : वाइसरायके निजी सचिवको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३५२
|-
| ३४६. || तार : विट्ठलभाई पटेलको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३५६
|-
| ३४७. || तार : वल्लभभाई पटेलको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३६८
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| ३४८. || तार : लक्ष्मीनारायण गाड़ोदियाको (२०-१२-१९२९ या उसके पश्चात्) || ३६९
|-
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| ३२४. || टिप्पणियाँ : स्वर्गीय जयकृष्ण इन्द्रजी; मजदूर और मालिक; हज्जाम या नाई (२२-१२-१९२९) || ३१६
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| ३२५. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (२३-१२-१९२९) || ३१९
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| ३२६. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (२३-१२-१९२९) || ३१९
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| ३२७. || भाषण : सर्वेन्ट्स ऑफ पीपल सोसाइटी, लाहौरमें (२४-१२-१९२९) || ३२०
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| ३२८. || भाषण : अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलनमें (२४-१२-१९२९) || ३२२
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| ३२९. || टिप्पणियाँ : दोषपूर्ण निर्णय; गांधीजीके साथ सात माह (२६-१२-१९२९) || ३२३
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| ३३०. || निश्चित परामर्श (२६-१२-१९२९) || ३२४
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| ३२४. || टिप्पणियाँ : स्वर्गीय जयकृष्ण इन्द्रजी; मजदूर और मालिक; हज्जाम या नाई (२२-१२-१९२९) || ३१६
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| ३५०. || भेंट : पत्र-प्रतिनिधियोंसे (१-१-१९३०) || ३७१
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| ३२९. || टिप्पणियाँ : दोषपूर्ण निर्णय; गांधीजीके साथ सात माह (२६-१२-१९२९) || ३२३
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| ३३०. || निश्चित परामर्श (२६-१२-१९२९) || ३२४
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| ३३१. || यह क्रूर प्रथा (२६-१२-१९२९) || ३२६
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| ३३२. || गोवा-निवासी (२६-१२-१९२९) || ३२७
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| ३५०. || भेंट : पत्र-प्रतिनिधियोंसे (१-१-१९३०) || ३७१
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| ३५१. || बमकी उपासना (२-१-१९३०) || ३७२
|-
| ३५२. || कांग्रेसमें हिन्दी (२-१-१९३०) || ३७५
|-
| ३५३. || पत्र : मणिबहन पटेलको (२-१-१९३०) || ३७६
|-
| ३५४. || नवयुवक न्यायाधीश (५-१-१९३०) || ३७७
|-
| ३५५. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (७-१-१९३०) || ३७८
|-
| ३५६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (८-१-१९३०) || ३७९
|-
| ३५७. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (८-१-१९३०) || ३८०
|-
| ३५८. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (८-१-१९३०) || ३८१
|-
| ३५९. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (९-१-१९३० से पूर्व) || ३८१
|-
| ३६०. || वक्तव्य : 'न्यूयार्क वर्ल्ड'को (९-१-१९३० से पूर्व) || ३८२
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| ३६१. || टिप्पणियाँ : स्वर्गीय मजहर-उल-हक; मद्यनिषेध अभियान (९-१-१९३०) || ३८४
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| ३६२. || कांग्रेस (९-१-१९३०) || ३८५
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| ३६३. || सिख नेताओंसे बातचीत (२७-१२-१९२९) || ३९१
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|-
| ३६६. || पत्र : आश्रमकी बहनोंको (३०-१२-१९२९) || ३९३
|-
| ३६७. || पत्र : रमणीकलाल मोदीको (३०-१२-१९२९) || ३९४
|-
| ३६८. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — १ (३०-१२-१९२९) || ३९५
|-
| ३६९. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — २ (३०-१२-१९२९) || ३९७
|-
| ३७०. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — ३ (३०-१२-१९२९) || ३९८
|-
| ३७१. || भाषण : कांग्रेस अधिवेशन, लाहौरमें — १ (३१-१२-१९२९) || ३९८
|-
| ३७२. || भाषण : कांग्रेस अधिवेशन, लाहौरमें — २ (३१-१२-१९२९) || ३९९
|-
| ३७३. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — १ (१-१-१९३०) || ४०२
|-
| ३७४. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — २ (१-१-१९३०) || ४०३
|-
| ३७५. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — ३ (१-१-१९३०) || ४०४
|-
| ३७६. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — ३ (१-१-१९३०) || ४०५
|-
| ३७७. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — ३ (१-१-१९३०) || ४०५
|-
| ३७८. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — ३ (१-१-१९३०) || ४०६
|-
| ३७९. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — ३ (१-१-१९३०) || ४०६
|-
| ३८०. || भाषण : अ॰ भा॰ कां॰ कमेटीकी विषय समितिमें — ३ (१-१-१९३०) || ४०७
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ऋतु मिश्रा
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|-
| ३५०. || भेंट : पत्र-प्रतिनिधियोंसे (१-१-१९३०) || ३७१
|-
| ३५१. || बमकी उपासना (२-१-१९३०) || ३७२
|-
| ३५२. || कांग्रेसमें हिन्दी (२-१-१९३०) || ३७५
|-
| ३५३. || पत्र : मणिबहन पटेलको (२-१-१९३०) || ३७६
|-
| ३५४. || नवयुवक न्यायाधीश (५-१-१९३०) || ३७७
|-
| ३५५. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (७-१-१९३०) || ३७८
|-
| ३५६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (८-१-१९३०) || ३७९
|-
| ३५७. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (८-१-१९३०) || ३८०
|-
| ३५८. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (८-१-१९३०) || ३८१
|-
| ३५९. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (९-१-१९३० से पूर्व) || ३८१
|-
| ३६०. || वक्तव्य : 'न्यूयार्क वर्ल्ड'को (९-१-१९३० से पूर्व) || ३८२
|-
| ३६१. || टिप्पणियाँ : स्वर्गीय मजहर-उल-हक; मद्यनिषेध अभियान (९-१-१९३०) || ३८४
|-
| ३६२. || कांग्रेस (९-१-१९३०) || ३८५
|-
| ३६३. || सदाबहार पेनिंगटन (९-१-१९३०) || ३९१
|-
| ३६४. || जवाहरलाल नेहरू (९-१-१९३०) || ३९१
|-
| ३६५. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (९-१-१९३०) || ३९३
|-
| ३६६. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (९-१-१९३०) || ३९३
|-
| ३६७. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१०-१-१९३०) || ३९४
|-
| ३६८. || २६ जनवरीकी घोषणाका मसविदा (१०-१-१९३०) || ३९५
|-
| ३६९. || पत्र : डॉ॰ सैयद महमूदको (१०-१-१९३०) || ३९७
|-
| ३७०. || एक पत्र (१०-१-१९३०) || ३९८
|-
| ३७१. || पत्र : दुनीचन्दको (११-१-१९३०) || ३९८
|-
| ३७२. || भाषण : गुजरात विद्यापीठके दीक्षान्त समारोहमें (११-१-१९३०) || ३९९
|-
| ३७३. || कुएँ और तालाब (१२-१-१९३०) || ४०२
|-
| ३७४. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१२-१-१९३०) || ४०३
|-
| ३७५. || पत्र : बी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (१२-१-१९३०) || ४०४
|-
| ३७६. || पत्र : रामी पारेखको (१२-१-१९३०) || ४०५
|-
| ३७७. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (१२-१-१९३०) || ४०५
|-
| ३७८. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१२-१-१९३०) || ४०६
|-
| ३७९. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (१३-१-१९३०) || ४०६
|-
| ३८०. || भाषण : अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा-परिषद्, अहमदाबादमें (१३-१-१९३०) || ४०७
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ऋतु मिश्रा
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|-
| ३८१. || स्वतन्त्रता दिवस (१६-१-१९३०) || ४११
|-
| ३५१. || बमकी उपासना (२-१-१९३०) || ३७२
|-
| ३५२. || कांग्रेसमें हिन्दी (२-१-१९३०) || ३७५
|-
| ३५३. || पत्र : मणिबहन पटेलको (२-१-१९३०) || ३७६
|-
| ३५४. || नवयुवक न्यायाधीश (५-१-१९३०) || ३७७
|-
| ३५५. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (७-१-१९३०) || ३७८
|-
| ३५६. || पत्र : वसुमती पण्डितको (८-१-१९३०) || ३७९
|-
| ३५७. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (८-१-१९३०) || ३८०
|-
| ३५८. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (८-१-१९३०) || ३८१
|-
| ३५९. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (९-१-१९३० से पूर्व) || ३८१
|-
| ३६०. || वक्तव्य : 'न्यूयार्क वर्ल्ड'को (९-१-१९३० से पूर्व) || ३८२
|-
| ३६१. || टिप्पणियाँ : स्वर्गीय मजहर-उल-हक; मद्यनिषेध अभियान (९-१-१९३०) || ३८४
|-
| ३६२. || कांग्रेस (९-१-१९३०) || ३८५
|-
| ३६३. || सदाबहार पेनिंगटन (९-१-१९३०) || ३९१
|-
| ३६४. || जवाहरलाल नेहरू (९-१-१९३०) || ३९१
|-
| ३६५. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (९-१-१९३०) || ३९३
|-
| ३६६. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (९-१-१९३०) || ३९३
|-
| ३६७. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१०-१-१९३०) || ३९४
|-
| ३६८. || २६ जनवरीकी घोषणाका मसविदा (१०-१-१९३०) || ३९५
|-
| ३६९. || पत्र : डॉ॰ सैयद महमूदको (१०-१-१९३०) || ३९७
|-
| ३७०. || एक पत्र (१०-१-१९३०) || ३९८
|-
| ३७१. || पत्र : दुनीचन्दको (११-१-१९३०) || ३९८
|-
| ३७२. || भाषण : गुजरात विद्यापीठके दीक्षान्त समारोहमें (११-१-१९३०) || ३९९
|-
| ३७३. || कुएँ और तालाब (१२-१-१९३०) || ४०२
|-
| ३७४. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१२-१-१९३०) || ४०३
|-
| ३७५. || पत्र : बी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (१२-१-१९३०) || ४०४
|-
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|-
| ३७७. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (१२-१-१९३०) || ४०५
|-
| ३७८. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१२-१-१९३०) || ४०६
|-
| ३७९. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (१३-१-१९३०) || ४०६
|-
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| ३८१. || स्वतन्त्रता दिवस (१६-१-१९३०) || ४११
|-
| ३८२. || बमकी उपासना (२-१-१९३०) || ४१३
|-
| ३८३. || कांग्रेसमें हिन्दी (२-१-१९३०) || ४१६
|-
| ३८४. || पत्र : मणिबहन पटेलको (२-१-१९३०) || ४१८
|-
| ३८५. || नवयुवक न्यायाधीश (५-१-१९३०) || ४१८
|-
| ३८६. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (७-१-१९३०) || ४१९
|-
| ३८७. || पत्र : वसुमती पण्डितको (८-१-१९३०) || ४१९
|-
| ३८८. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (८-१-१९३०) || ४२०
|-
| ३८९. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (८-१-१९३०) || ४२४
|-
| ३९०. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (९-१-१९३० से पूर्व) || ४२६
|-
| ३९१. || वक्तव्य : 'न्यूयार्क वर्ल्ड'को (९-१-१९३० से पूर्व) || ४२७
|-
| ३९२. || टिप्पणियाँ : स्वर्गीय मजहर-उल-हक; मद्यनिषेध अभियान (९-१-१९३०) || ४२७
|-
| ३९३. || कांग्रेस (९-१-१९३०) || ४२८
|-
| ३९४. || सदाबहार पेनिंगटन (९-१-१९३०) || ४२८
|-
| ३९५. || जवाहरलाल नेहरू (९-१-१९३०) || ४२९
|-
| ३९६. || पत्र : बहरामजी खम्भाताको (९-१-१९३०) || ४२९
|-
| ३९७. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (९-१-१९३०) || ४३०
|-
| ३९८. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१०-१-१९३०) || ४३०
|-
| ३९९. || २६ जनवरीकी घोषणाका मसविदा (१०-१-१९३०) || ४३१
|-
| ४००. || पत्र : डॉ॰ सैयद महमूदको (१०-१-१९३०) || ४३१
|-
| ४०१. || एक पत्र (१०-१-१९३०) || ४३२
|-
| ४०२. || पत्र : दुनीचन्दको (११-१-१९३०) || ४३५
|-
| ४०३. || भाषण : गुजरात विद्यापीठके दीक्षान्त समारोहमें (११-१-१९३०) || ४३८
|-
| ४०४. || कुएँ और तालाब (१२-१-१९३०) || ४४०
|-
| ४०५. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (१२-१-१९३०) || ४४३
|-
| ४०६. || पत्र : बी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (१२-१-१९३०) || ४४३
|-
| ४०७. || पत्र : रामी पारेखको (१२-१-१९३०) || ४४४
|-
| ४०८. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (१२-१-१९३०) || ४४४
|-
| ४०९. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१२-१-१९३०) || ४४४
|-
| ४१०. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (१३-१-१९३०) || ४४५
|-
| ४११. || भाषण : अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा-परिषद्, अहमदाबादमें (१३-१-१९३०) || ४४६
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| ३८१. || स्वतन्त्रता दिवस (१६-१-१९३०) || ४११
|-
| ३८२. || आगामी कांग्रेस (१६-१-१९३०) || ४१३
|-
| ३८३. || प्रस्तुत प्रश्न (१६-१-१९३०) || ४१६
|-
| ३८४. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (१६-१-१९३०) || ४१८
|-
| ३८५. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (१६-१-१९३०) || ४१८
|-
| ३८६. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१६-१-१९३०) || ४१९
|-
| ३८७. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (१७-१-१९३०) || ४१९
|-
| ३८८. || भाषण : छात्रालयमें रहनेवाले छात्रोंके सम्मेलन, साबरमतीमें (१७-१-१९३०) || ४२०
|-
| ३८९. || भाषण : साबरमती आश्रमकी प्रार्थना सभामें (१७-१-१९३० या उससे पूर्व) || ४२४
|-
| ३९०. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१८-१-१९३०) || ४२६
|-
| ३९१. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१८-१-१९३०) || ४२७
|-
| ३९२. || पत्र : बनारसीदास चतुर्वेदीको (१९-१-१९३०) || ४२७
|-
| ३९३. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२०-१-१९३०) || ४२८
|-
| ३९४. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (२०-१-१९३०) || ४२८
|-
| ३९५. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२०-१-१९३०) || ४२९
|-
| ३९६. || पत्र : शारदाबहन शाहको (२१-१-१९३०) || ४२९
|-
| ३९७. || पत्र : देवचन्द पारेखको (२१-१-१९३०) || ४३०
|-
| ३९८. || पत्र : कुँवरजी पारेखको (२२-१-१९३०) || ४३०
|-
| ३९९. || पत्र : हरिइच्छा देसाईको (२२-१-१९३०) || ४३१
|-
| ४००. || पत्र : बनारसीदास बजाजको (२२-१-१९३०) || ४३१
|-
| ४०१. || भेंट : 'डेली एक्सप्रेस'के प्रतिनिधिसे (२२-१-१९३०) || ४३२
|-
| ४०२. || भारतीय आलोचकोंसे (२३-१-१९३०) || ४३५
|-
| ४०३. || अंग्रेज मित्रोंसे (२३-१-१९३०) || ४३८
|-
| ४०४. || २६ को यह याद रखिए (२३-१-१९३०) || ४४०
|-
| ४०५. || क्या अहिंसा छोड़ दी? (२३-१-१९३०) || ४४३
|-
| ४०६. || पत्र : डॉ॰ रोमरको (२३-१-१९३०) || ४४३
|-
| ४०७. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२३-१-१९३०) || ४४४
|-
| ४०८. || तार : नलिनीजरंजन सरकारको (२४-१-१९३० या उससे पूर्व) || ४४४
|-
| ४०९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२४-१-१९३०) || ४४४
|-
| ४१०. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (२४-१-१९३०) || ४४५
|-
| ४११. || नवजीवन कार्यालय (२६-१-१९३०) || ४४६
|-
| ४१२. || पत्र : एम॰ आर॰ जयकरको (२८-१-१९३०) || ४४६
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ऋतु मिश्रा
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<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{C|तीस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
| ४१३. || 'कलाकृतियां प्रस्तावना (२९-१-१९३०) || ४४७
|-
| ४१४. || पर्दाफाश हो गया (२९-१-१९३०) || ४४७
|-
| ४१५. || आचरणकी कठिनाई (३०-१-१९३०) || ४१६
|-
| ३८४. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (१६-१-१९३०) || ४१८
|-
| ३८५. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (१६-१-१९३०) || ४१८
|-
| ३८६. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (१६-१-१९३०) || ४१९
|-
| ३८७. || तार : जवाहरलाल नेहरूको (१७-१-१९३०) || ४१९
|-
| ३८८. || भाषण : छात्रालयमें रहनेवाले छात्रोंके सम्मेलन, साबरमतीमें (१७-१-१९३०) || ४२०
|-
| ३८९. || भाषण : साबरमती आश्रमकी प्रार्थना सभामें (१७-१-१९३० या उससे पूर्व) || ४२४
|-
| ३९०. || पत्र : वसुमती पण्डितको (१८-१-१९३०) || ४२६
|-
| ३९१. || पत्र : मथुरादास त्रिकमजीको (१८-१-१९३०) || ४२७
|-
| ३९२. || पत्र : बनारसीदास चतुर्वेदीको (१९-१-१९३०) || ४२७
|-
| ३९३. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (२०-१-१९३०) || ४२८
|-
| ३९४. || पत्र : हरिभाऊ उपाध्यायको (२०-१-१९३०) || ४२८
|-
| ३९५. || पत्र : गंगाबहन वैद्यको (२०-१-१९३०) || ४२९
|-
| ३९६. || पत्र : शारदाबहन शाहको (२१-१-१९३०) || ४२९
|-
| ३९७. || पत्र : देवचन्द पारेखको (२१-१-१९३०) || ४३०
|-
| ३९८. || पत्र : कुँवरजी पारेखको (२२-१-१९३०) || ४३०
|-
| ३९९. || पत्र : हरिइच्छा देसाईको (२२-१-१९३०) || ४३१
|-
| ४००. || पत्र : बनारसीदास बजाजको (२२-१-१९३०) || ४३१
|-
| ४०१. || भेंट : 'डेली एक्सप्रेस'के प्रतिनिधिसे (२२-१-१९३०) || ४३२
|-
| ४०२. || भारतीय आलोचकोंसे (२३-१-१९३०) || ४३५
|-
| ४०३. || अंग्रेज मित्रोंसे (२३-१-१९३०) || ४३८
|-
| ४०४. || २६ को यह याद रखिए (२३-१-१९३०) || ४४०
|-
| ४०५. || क्या अहिंसा छोड़ दी? (२३-१-१९३०) || ४४३
|-
| ४०६. || पत्र : डॉ॰ रोमरको (२३-१-१९३०) || ४४३
|-
| ४०७. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२३-१-१९३०) || ४४४
|-
| ४०८. || तार : नलिनीजरंजन सरकारको (२४-१-१९३० या उससे पूर्व) || ४४४
|-
| ४०९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२४-१-१९३०) || ४४४
|-
| ४१०. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (२४-१-१९३०) || ४४५
|-
| ४११. || नवजीवन कार्यालय (२६-१-१९३०) || ४४६
|-
| ४१२. || पत्र : एम॰ आर॰ जयकरको (२८-१-१९३०) || ४४६
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ऋतु मिश्रा
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|-
| ४१३. || 'कथाकुसुमांजलि'की प्रस्तावना (२९-१-१९३०) || ४४७
|-
| ४१४. || पर्दाफाश हो गया (२९-१-१९३०) || ४४७
|-
| ४१५. || आचरणकी कठिनाई (३०-१-१९३०) || ४१६
|-
| ४१६. || टिप्पणियाँ : बंगालके देशभक्त; चौवालीस आदमी मरे; स्थानीय बोर्ड (३०-१-१९३०) || ४५३
|-
| ४१७. || राक्षसी विवाह (३०-१-१९३०) || ४५४
|-
| ४१८. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (१-२-१९३०) || ४५५
|-
| ४१९. || तार : वसुमती पण्डितको (१-२-१९३०) || ४५५
|-
| ४२०. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१-२-१९३०) || ४५६
|-
| ४२१. || टिप्पणियाँ : खाखरेची-सत्याग्रह; बाल-विवाह; मृत्यु-भोज; बारीकी (२-२-१९३०) || ४५६
|-
| ४२२. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२-२-१९३०) || ४५९
|-
| ४२३. || पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (२-२-१९३०) || ४६०
|-
| ४२४. || पत्र : डा॰ मु॰ अ॰ अन्सारीको (२-२-१९३०) || ४६१
|-
| ४२५. || पत्र : पुरुषोत्तमदास ठाकुरदासको (२-२-१९३०) || ४६१
|-
| ४२६. || पत्र : महादेव देसाईको (३-२-१९३०) || ४६३
|-
| ४२७. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (४-२-१९३०) || ४२९
|-
| ४२८. || पत्र : सी॰ वाई॰ चिन्ताममिको (४-२-१९३०) || ४६४
|-
| ४२९. || तथ्य यह है (६-२-१९३०) || ४६५
|-
| ४३०. || स्वाधीनताके गर्भमें (६-२-१९३०) || ४६७
|-
| ४३१. || टिप्पणियाँ : पूर्णाहुति; बारडोली और कवि ठाकुर (६-२-१९३०) || ४७०
|-
| ४००. || पत्र : बनारसीदास बजाजको (२२-१-१९३०) || ४३१
|-
| ४०१. || भेंट : 'डेली एक्सप्रेस'के प्रतिनिधिसे (२२-१-१९३०) || ४३२
|-
| ४०२. || भारतीय आलोचकोंसे (२३-१-१९३०) || ४३५
|-
| ४०३. || अंग्रेज मित्रोंसे (२३-१-१९३०) || ४३८
|-
| ४०४. || २६ को यह याद रखिए (२३-१-१९३०) || ४४०
|-
| ४०५. || क्या अहिंसा छोड़ दी? (२३-१-१९३०) || ४४३
|-
| ४०६. || पत्र : डॉ॰ रोमरको (२३-१-१९३०) || ४४३
|-
| ४०७. || पत्र : रामेश्वरदास पोद्दारको (२३-१-१९३०) || ४४४
|-
| ४०८. || तार : नलिनीजरंजन सरकारको (२४-१-१९३० या उससे पूर्व) || ४४४
|-
| ४०९. || पत्र : वसुमती पण्डितको (२४-१-१९३०) || ४४४
|-
| ४१०. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (२४-१-१९३०) || ४४५
|-
| ४११. || नवजीवन कार्यालय (२६-१-१९३०) || ४४६
|-
| ४१२. || पत्र : एम॰ आर॰ जयकरको (२८-१-१९३०) || ४४६
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| ४१३. || 'कथाकुसुमांजलि'की प्रस्तावना (२९-१-१९३०) || ४४७
|-
| ४१४. || पर्दाफाश हो गया (२९-१-१९३०) || ४४७
|-
| ४१५. || आचरणकी कठिनाई (३०-१-१९३०) || ४१६
|-
| ४१६. || टिप्पणियाँ : बंगालके देशभक्त; चौवालीस आदमी मरे; स्थानीय बोर्ड (३०-१-१९३०) || ४५३
|-
| ४१७. || राक्षसी विवाह (३०-१-१९३०) || ४५४
|-
| ४१८. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (१-२-१९३०) || ४५५
|-
| ४१९. || तार : वसुमती पण्डितको (१-२-१९३०) || ४५५
|-
| ४२०. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१-२-१९३०) || ४५६
|-
| ४२१. || टिप्पणियाँ : खाखरेची-सत्याग्रह; बाल-विवाह; मृत्यु-भोज; बारीकी (२-२-१९३०) || ४५६
|-
| ४२२. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२-२-१९३०) || ४५९
|-
| ४२३. || पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (२-२-१९३०) || ४६०
|-
| ४२४. || पत्र : डा॰ मु॰ अ॰ अन्सारीको (२-२-१९३०) || ४६१
|-
| ४२५. || पत्र : पुरुषोत्तमदास ठाकुरदासको (२-२-१९३०) || ४६१
|-
| ४२६. || पत्र : महादेव देसाईको (३-२-१९३०) || ४६३
|-
| ४२७. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (४-२-१९३०) || ४२९
|-
| ४२८. || पत्र : सी॰ वाई॰ चिन्ताममिको (४-२-१९३०) || ४६४
|-
| ४२९. || तथ्य यह है (६-२-१९३०) || ४६५
|-
| ४३०. || स्वाधीनताके गर्भमें (६-२-१९३०) || ४६७
|-
| ४३१. || टिप्पणियाँ : पूर्णाहुति; बारडोली और कवि ठाकुर (६-२-१९३०) || ४७०
|-
| ४३२. || पूर्ण स्वराज्य क्यों? (६-२-१९३०) || ४७१
|-
| ४३३. || विचारोंकी उलझन (६-२-१९३०) || ४७२
|-
| ४३४. || खादी प्रदर्शक (६-२-१९३०) || ४७४
|-
| ४३५. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — १ (६-२-१९३०) || ४७४
|-
| ४३६. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (६-२-१९३०) || ४७५
|-
| ४३७. || पत्र : लीलावती कोडीदासको (६-२-१९३०) || ४७६
|-
| ४३८. || टिप्पणियाँ : हमारी लापरवाही; विदेशोंमें खादी (९-२-१९३०) || ४७६
|-
| ४३९. || गांधी शिक्षण (९-२-१९३०) || ४७८
|-
| ४४०. || दो तकुओंवाला चरखा (९-२-१९३०) || ४७८
|-
| ४४१. || देहातकी गलियाँ और सड़कें (९-२-१९३०) || ४७९
|-
| ४४२. || पत्र : पुरुषोत्तमदास ठाकुरदासको (९-२-१९३०) || ४८१
|-
| ४४३. || पत्र : आर॰ वी॰ मोटवानीको (९-२-१९३०) || ४८२
|-
| ४४४. || पत्र : छोटूभाई पटेलको (१०-२-१९३०) || ४८२
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| ४४५. || पत्र : कुँवरजी पारेखको (१२-२-१९३०) || ४८३
|-
| ४४६. || एक वकीलकी दुविधा (१३-२-१९३०) || ४८३
|-
| ४४७. || 'वकीलोंका कर्तव्य' (१३-२-१९३०) || ४८५
|-
| ४४८. || मेरी असंगतियाँ (१३-२-१९३०) || ४८५
|-
| ४४९. || चेचकका इलाज (१३-२-१९३०) || ४८७
|-
| ४५०. || टिप्पणियाँ : आश्चर्यजनक अज्ञान; नये मन्दिर खुले; रेलगाड़ियोंमें भीड़भाड़; पाँच कूट प्रश्न (१३-२-१९३०) || ४८८
|-
| ४५१. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — २ (१३-२-१९३०) || ४९१
|-
| ४२०. || पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको (१-२-१९३०) || ४५६
|-
| ४२१. || टिप्पणियाँ : खाखरेची-सत्याग्रह; बाल-विवाह; मृत्यु-भोज; बारीकी (२-२-१९३०) || ४५६
|-
| ४२२. || पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको (२-२-१९३०) || ४५९
|-
| ४२३. || पत्र : वी॰ एस॰ श्रीनिवास शास्त्रीको (२-२-१९३०) || ४६०
|-
| ४२४. || पत्र : डा॰ मु॰ अ॰ अन्सारीको (२-२-१९३०) || ४६१
|-
| ४२५. || पत्र : पुरुषोत्तमदास ठाकुरदासको (२-२-१९३०) || ४६१
|-
| ४२६. || पत्र : महादेव देसाईको (३-२-१९३०) || ४६३
|-
| ४२७. || पत्र : रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको (४-२-१९३०) || ४२९
|-
| ४२८. || पत्र : सी॰ वाई॰ चिन्ताममिको (४-२-१९३०) || ४६४
|-
| ४२९. || तथ्य यह है (६-२-१९३०) || ४६५
|-
| ४३०. || स्वाधीनताके गर्भमें (६-२-१९३०) || ४६७
|-
| ४३१. || टिप्पणियाँ : पूर्णाहुति; बारडोली और कवि ठाकुर (६-२-१९३०) || ४७०
|-
| ४३२. || पूर्ण स्वराज्य क्यों? (६-२-१९३०) || ४७१
|-
| ४३३. || विचारोंकी उलझन (६-२-१९३०) || ४७२
|-
| ४३४. || खादी प्रदर्शक (६-२-१९३०) || ४७४
|-
| ४३५. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — १ (६-२-१९३०) || ४७४
|-
| ४३६. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (६-२-१९३०) || ४७५
|-
| ४३७. || पत्र : लीलावती कोडीदासको (६-२-१९३०) || ४७६
|-
| ४३८. || टिप्पणियाँ : हमारी लापरवाही; विदेशोंमें खादी (९-२-१९३०) || ४७६
|-
| ४३९. || गांधी शिक्षण (९-२-१९३०) || ४७८
|-
| ४४०. || दो तकुओंवाला चरखा (९-२-१९३०) || ४७८
|-
| ४४१. || देहातकी गलियाँ और सड़कें (९-२-१९३०) || ४७९
|-
| ४४२. || पत्र : पुरुषोत्तमदास ठाकुरदासको (९-२-१९३०) || ४८१
|-
| ४४३. || पत्र : आर॰ वी॰ मोटवानीको (९-२-१९३०) || ४८२
|-
| ४४४. || पत्र : छोटूभाई पटेलको (१०-२-१९३०) || ४८२
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| ४४५. || पत्र : कुँवरजी पारेखको (१२-२-१९३०) || ४८३
|-
| ४४६. || एक वकीलकी दुविधा (१३-२-१९३०) || ४८३
|-
| ४४७. || 'वकीलोंका कर्तव्य' (१३-२-१९३०) || ४८५
|-
| ४४८. || मेरी असंगतियाँ (१३-२-१९३०) || ४८५
|-
| ४४९. || चेचकका इलाज (१३-२-१९३०) || ४८७
|-
| ४५०. || टिप्पणियाँ : आश्चर्यजनक अज्ञान; नये मन्दिर खुले; रेलगाड़ियोंमें भीड़भाड़; पाँच कूट प्रश्न (१३-२-१९३०) || ४८८
|-
| ४५१. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — २ (१३-२-१९३०) || ४९१
|-
| ४५२. || पत्र : कस्तूरबहन भट्टको (१४-२-१९३०) || ४९३
|-
| ४५३. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (१५-२-१९३०) || ४९३
|-
| ४५४. || भाषण : साबरमतीकी प्रार्थना सभामें (१५-२-१९३०) || ४९४
|-
| ४५५. || पत्र : डा॰ मु॰ अ॰ अन्सारीको (१६-२-१९३०) || ४९५
|-
| ४५६. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१८-२-१९३०) || ४९६
|-
| ४५७. || पत्र : उदित मिश्रको (१९-२-१९३०) || ४९७
|-
| ४५८. || 'अमोघ अस्त्र' (२०-२-१९३०) || ४९८
|-
| ४५९. || कुछ सवाल (२०-२-१९३०) || ५००
|-
| ४६०. || लुटेरी सरकार (२०-२-१९३०) || ५०४
|-
| ४६१. || तथ्य यह है (६-२-१९३०) || ५०५
|-
| ४६२. || स्वाधीनताके गर्भमें (६-२-१९३०) || ५०८
|-
| ४६३. || टिप्पणियाँ : पूर्णाहुति; बारडोली और कवि ठाकुर (६-२-१९३०) || ५०९
|-
| ४६४. || पूर्ण स्वराज्य क्यों? (६-२-१९३०) || ५१०
|-
| ४६५. || विचारोंकी उलझन (६-२-१९३०) || ५१०
|-
| ४६६. || खादी प्रदर्शक (६-२-१९३०) || ५१३
|-
| ४६७. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — १ (६-२-१९३०) || ५१३
|-
| ४६८. || पत्र : जवाहरलाल नेहरूको (६-२-१९३०) || ५१४
|-
| ४६९. || पत्र : लीलावती कोडीदासको (६-२-१९३०) || ५१४
|-
| ४७०. || टिप्पणियाँ : हमारी लापरवाही; विदेशोंमें खादी (९-२-१९३०) || ५१५
|-
| ४७१. || गांधी शिक्षण (९-२-१९३०) || ५१५
|-
| ४७२. || दो तकुओंवाला चरखा (९-२-१९३०) || ५१६
|-
| ४७३. || देहातकी गलियाँ और सड़कें (९-२-१९३०) || ५१६
|-
| ४७४. || पत्र : पुरुषोत्तमदास ठाकुरदासको (९-२-१९३०) || ५१९
|-
| ४७५. || पत्र : आर॰ वी॰ मोटवानीको (९-२-१९३०) || ५१९
|-
| ४७६. || पत्र : छोटूभाई पटेलको (१०-२-१९३०) || ५२२
|-
| ४७७. || पत्र : छोटूभाई पटेलको (१०-२-१९३०) || ५२३
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| ४४५. || पत्र : कुँवरजी पारेखको (१२-२-१९३०) || ४८३
|-
| ४४६. || एक वकीलकी दुविधा (१३-२-१९३०) || ४८३
|-
| ४४७. || 'वकीलोंका कर्तव्य' (१३-२-१९३०) || ४८५
|-
| ४४८. || मेरी असंगतियाँ (१३-२-१९३०) || ४८५
|-
| ४४९. || चेचकका इलाज (१३-२-१९३०) || ४८७
|-
| ४५०. || टिप्पणियाँ : आश्चर्यजनक अज्ञान; नये मन्दिर खुले; रेलगाड़ियोंमें भीड़भाड़; पाँच कूट प्रश्न (१३-२-१९३०) || ४८८
|-
| ४५१. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — २ (१३-२-१९३०) || ४९१
|-
| ४५२. || पत्र : कस्तूरबहन भट्टको (१४-२-१९३०) || ४९३
|-
| ४५३. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (१५-२-१९३०) || ४९३
|-
| ४५४. || भाषण : साबरमतीकी प्रार्थना सभामें (१५-२-१९३०) || ४९४
|-
| ४५५. || पत्र : डा॰ मु॰ अ॰ अन्सारीको (१६-२-१९३०) || ४९५
|-
| ४५६. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१८-२-१९३०) || ४९६
|-
| ४५७. || पत्र : उदित मिश्रको (१९-२-१९३०) || ४९७
|-
| ४५८. || 'अमोघ अस्त्र' (२०-२-१९३०) || ४९८
|-
| ४५९. || कुछ सवाल (२०-२-१९३०) || ५००
|-
| ४६०. || लुटेरी सरकार (२०-२-१९३०) || ५०४
|-
| ४६१. || टिप्पणियाँ : 'नहीं छोड़ेंगे'; शुद्धि नहीं हो सकती (२०-२-१९३०) || ५०५
|-
| ४६२. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — ३ (२०-२-१९३०) || ५०८
|-
| ४६३. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (२०-२-१९३०) || ५०९
|-
| ४६४. || पत्र : तुलसी मेहरको (२२-२-१९३०) || ५१०
|-
| ४६५. || सत्याग्रहकी नियमावली (२३-२-१९३०) || ५१०
|-
| ४६६. || पत्र-लेखकोंसे (२३-२-१९३०) || ५१३
|-
| ४६७. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (२३-२-१९३०) || ५१३
|-
| ४६८. || पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (२३-२-१९३०) || ५१४
|-
| ४६९. || पत्र : जवाहरलालको (२४-२-१९३०) || ५१४
|-
| ४७०. || पत्र : जयसुखलाल गांधीको (२५-२-१९३०) || ५१५
|-
| ४७१. || पत्र : मीठूबहन पेटिटको को (२६-२-१९३०) || ५१५
|-
| ४७२. || पत्र : हरिइच्छा देसाईको (२६-२-१९३०) || ५१६
|-
| ४७३. || जब मैं गिरफ्तार हो जाऊँ (२७-२-१९३०) || ५१६
|-
| ४७४. || नमक और कैंसर (२७-२-१९३०) || ५१९
|-
| ४७५. || नमक-कर (२७-२-१९३०) || ५१९
|-
| ४७६. || टिप्पणियाँ; राष्ट्रीय झण्डा; धूम्रपान (२७-२-१९३०) || ५२२
|-
| ४७७. || नमक निकालनेका इतिहास (२७-२-१९३०) || ५२३
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| ४७८. || झूठी आशाएँ (२७-२-१९३०) || ५२४
|-
| ४७९. || खादी-मताधिकार (२७-२-१९३०) || ५२६
|-
| ४८०. || हानिकारक ताड़ का पेड़ (२७-२-१९३०) || ५२७
|-
| ४८१. || दिवालियेपनकी सीमा (२७-२-१९३०) || ५२८
|-
| ४८२. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — ४ (२७-२-१९३०) || ५२८
|-
| ४८३. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (२७-२-१९३०) || ५२९
|-
| ४८४. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२८-२-१९३०) || ५३०
|-
| ४५२. || पत्र : कस्तूरबहन भट्टको (१४-२-१९३०) || ४९३
|-
| ४५३. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (१५-२-१९३०) || ४९३
|-
| ४५४. || भाषण : साबरमतीकी प्रार्थना सभामें (१५-२-१९३०) || ४९४
|-
| ४५५. || पत्र : डा॰ मु॰ अ॰ अन्सारीको (१६-२-१९३०) || ४९५
|-
| ४५६. || पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१८-२-१९३०) || ४९६
|-
| ४५७. || पत्र : उदित मिश्रको (१९-२-१९३०) || ४९७
|-
| ४५८. || 'अमोघ अस्त्र' (२०-२-१९३०) || ४९८
|-
| ४५९. || कुछ सवाल (२०-२-१९३०) || ५००
|-
| ४६०. || लुटेरी सरकार (२०-२-१९३०) || ५०४
|-
| ४६१. || टिप्पणियाँ : 'नहीं छोड़ेंगे'; शुद्धि नहीं हो सकती (२०-२-१९३०) || ५०५
|-
| ४६२. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — ३ (२०-२-१९३०) || ५०८
|-
| ४६३. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (२०-२-१९३०) || ५०९
|-
| ४६४. || पत्र : तुलसी मेहरको (२२-२-१९३०) || ५१०
|-
| ४६५. || सत्याग्रहकी नियमावली (२३-२-१९३०) || ५१०
|-
| ४६६. || पत्र-लेखकोंसे (२३-२-१९३०) || ५१३
|-
| ४६७. || पत्र : रेहाना तैयबजीको (२३-२-१९३०) || ५१३
|-
| ४६८. || पत्र : म्यूरियल लेस्टरको (२३-२-१९३०) || ५१४
|-
| ४६९. || पत्र : जवाहरलालको (२४-२-१९३०) || ५१४
|-
| ४७०. || पत्र : जयसुखलाल गांधीको (२५-२-१९३०) || ५१५
|-
| ४७१. || पत्र : मीठूबहन पेटिटको को (२६-२-१९३०) || ५१५
|-
| ४७२. || पत्र : हरिइच्छा देसाईको (२६-२-१९३०) || ५१६
|-
| ४७३. || जब मैं गिरफ्तार हो जाऊँ (२७-२-१९३०) || ५१६
|-
| ४७४. || नमक और कैंसर (२७-२-१९३०) || ५१९
|-
| ४७५. || नमक-कर (२७-२-१९३०) || ५१९
|-
| ४७६. || टिप्पणियाँ; राष्ट्रीय झण्डा; धूम्रपान (२७-२-१९३०) || ५२२
|-
| ४७७. || नमक निकालनेका इतिहास (२७-२-१९३०) || ५२३
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|-
| ४७८. || झूठी आशाएँ (२७-२-१९३०) || ५२४
|-
| ४७९. || खादी-मताधिकार (२७-२-१९३०) || ५२६
|-
| ४८०. || हानिकारक ताड़ का पेड़ (२७-२-१९३०) || ५२७
|-
| ४८१. || दिवालियेपनकी सीमा (२७-२-१९३०) || ५२८
|-
| ४८२. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — ४ (२७-२-१९३०) || ५२८
|-
| ४८३. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (२७-२-१९३०) || ५२९
|-
| ४८४. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२८-२-१९३०) || ५३०
| || '''परिशिष्ट''' ||
|-
| || :१. पत्र : वाइसरायका वक्तव्य (३१-१०-१९२९) || ५३१
|-
| || :२. पत्र : जवाहरलाल नेहरूका गांधीजीको (४-११-१९२९) || ५३५
|-
| || :३. पत्र : वल्लभभाई पटेलका गांधीजीको (११-११-१९२९) || ५३७
|-
| || :४. डॉ॰ अन्सारीका पत्र (१३-२-१९३०) || ५३९
|-
| || सामग्रीके साधन-सूत्र || ५४४
|-
| || तारीख़वार जीवन-वृत्तान्त || ५४६
|-
| || शीर्षक-सांकेतिका || ५५१
|-
| || सांकेतिका || ५५६
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ऋतु मिश्रा
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|
|-
| ४७८. || झूठी आशाएँ (२७-२-१९३०) || ५२४
|-
| ४७९. || खादी-मताधिकार (२७-२-१९३०) || ५२६
|-
| ४८०. || हानिकारक ताड़ का पेड़ (२७-२-१९३०) || ५२७
|-
| ४८१. || दिवालियेपनकी सीमा (२७-२-१९३०) || ५२८
|-
| ४८२. || वर्णधर्म और श्रमधर्म — ४ (२७-२-१९३०) || ५२८
|-
| ४८३. || पत्र : नौतमलाल भगवानजीको (२७-२-१९३०) || ५२९
|-
| ४८४. || पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको (२८-२-१९३०) || ५३०
|-
| || '''परिशिष्ट''' ||
|-
| || {{gap}}१. पत्र : वाइसरायका वक्तव्य (३१-१०-१९२९) || ५३१
|-
| || {{gap}}२. पत्र : जवाहरलाल नेहरूका गांधीजीको (४-११-१९२९) || ५३५
|-
| || {{gap}}३. पत्र : वल्लभभाई पटेलका गांधीजीको (११-११-१९२९) || ५३७
|-
| || {{gap}}४. डॉ॰ अन्सारीका पत्र (१३-२-१९३०) || ५३९
|-
| || सामग्रीके साधन-सूत्र || ५४४
|-
| || तारीख़वार जीवन-वृत्तान्त || ५४६
|-
| || शीर्षक-सांकेतिका || ५५१
|-
| || सांकेतिका || ५५६
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ऋतु मिश्रा
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| ४७८. || झूठी आशाएँ (२७-२-१९३०) || ५२४
|-
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|-
| ४८०. || हानिकारक ताड़ का पेड़ (२७-२-१९३०) || ५२७
|-
| ४८१. || दिवालियेपनकी सीमा (२७-२-१९३०) || ५२८
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|-
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|-
| || '''परिशिष्ट''' ||
|-
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ऋतु मिश्रा
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{{c|{{x-larger|'''१. वक्तव्य : अहमदाबाद मजदूरोंके झगड़ेके सम्बन्ध में'''<ref>अहमदाबादके मिल मजदूर संघ तथा मिल-मालिक संघके आपसी झगड़े को निबटानेके लिए मंगलदास गिरधरदास तथा गांधीजीको पंच चुना गया था और कृ० मो० झवेरीने सरपंचके रूपमें काम किया था। पंच निर्णयपर गांधीजीकी टिप्पणियोंके लिए देखिए “एक महत्वपूर्ण फैसला”, १२-१२-१९२९।</ref>}}}}
{{right|देहरादून}}
{{right|१६ अक्टूबर, १९२९}}
सेठश्री मंगलदासने सरपंचके सामने पेश किये जानेवाले वक्तव्यकी नकल सुझावोंके लिए मेरे पास भेजी है । उक्त वक्तव्य मैंने पढ़ लिया है ।
मुझे लगता है कि उसमें कही गई बहुत-सी बातें अप्रासंगिक हैं।
मेरी समझमें तो १९२३ में हुए समझौते के अनुसार वेतनमें जो कटौती की गई थी वह भविष्य में भी हमेशा लागू होगी, इस बातका आग्रह छोड़ दिया गया था । इसके अतिरिक्त प्रस्तुत वक्तव्यमें भी सेठ मंगलदास इस बातका आग्रह नहीं करते कि १९२३ में की गई कटौतीके बाद मजदूरोंकी ओरसे उसे रद करनेकी माँग की ही नहीं जा सकती। इसलिए हालाँकि उन्होंने इस सम्बन्धमें बहुत-कुछ लिखा है किन्तु मेरे लिए उसका उत्तर देना अनावश्यक है । उन्होंने पंचके रूपमें १९२३ में कोई निर्णय नहीं दिया था, इतना तो स्पष्ट है । इसलिए १९२३ में जो कुछ हुआ उसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता बल्कि यदि किसीको दोष दिया जा सकता है तो वह मिल मालिक संघ है ।
यदि सच कहा जाये तो मेरे विचारमें सरपंचको एक ही मुद्देपर अपना निर्णय देना है। अनाज आदिके मौजूदा भावोंको देखते हुए मजदूरोंको जो वेतन आज मिलता है वह उनके खर्चकी अपेक्षा कम है या नहीं। और यदि कम है तो इस कमीको पूरा करने लायक वेतन वृद्धि कर ही दी जानी चाहिए।
इस मुद्दे के बारेमें मजदूर पक्षकी ओरसे जो साक्ष्य दिया गया है उससे स्पष्टतः यह सिद्ध हो जाता है कि मजदूरोंकी कुल आमदनी उनके आवश्यक मासिक खर्चकी अपेक्षा कहीं कम है । सेठ मंगलदासके वक्तव्य में मुझे मजदूरोंके इस कथनका कोई खण्डन नहीं मिलता। इसलिए मैंने अपने निर्णय में<ref>देखिए खण्ड ४१, पृष्ठ ४०४-९।</ref> जो कुछ कहा है उससे अधिक और कुछ कहने को नहीं रह जाता। किन्तु एक बातकी ओर मैं सरपंचका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। वेतनमें कटौती मजदूरोंके लिए जिन्दगी और मौतका प्रश्न है । मिलोंके लिए कटौती करना और उसे बनाये रखनेका उद्देश्य नफेमें आई हुई कमीको भरना और नफेको बढ़ाना था और है । मेरा तात्पर्य यह है कि जबतक मिलोंको कुछ भी नफा हो रहा है तबतक मजदूरोंके गुजर-बसरके लायक वेतनमें कमी की ही नहीं जा सकती। कटौतीके पहले मिलनेवाला गुजारेके लायक वेतन वास्तवमें गुजारेके
४२-१<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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सेठश्री मंगलदासने सरपंचके सामने पेश किये जानेवाले वक्तव्यकी नकल सुझावोंके लिए मेरे पास भेजी है। उक्त वक्तव्य मैंने पढ़ लिया है।
मुझे लगता है कि उसमें कही गई बहुत-सी बातें अप्रासंगिक हैं।
मेरी समझमें तो १९२३ में हुए समझौते के अनुसार वेतनमें जो कटौती की गई थी वह भविष्य में भी हमेशा लागू होगी, इस बातका आग्रह छोड़ दिया गया था। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत वक्तव्यमें भी सेठ मंगलदास इस बातका आग्रह नहीं करते कि १९२३ में की गई कटौतीके बाद मजदूरोंकी ओरसे उसे रद करनेकी माँग की ही नहीं जा सकती। इसलिए हालाँकि उन्होंने इस सम्बन्धमें बहुत-कुछ लिखा है किन्तु मेरे लिए उसका उत्तर देना अनावश्यक ह । उन्होंने पंचके रूपमें १९२३ में कोई निर्णय नहीं दिया था, इतना तो स्पष्ट है। इसलिए १९२३ में जो कुछ हुआ उसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता बल्कि यदि किसीको दोष दिया जा सकता है तो वह मिल मालिक संघ है।
यदि सच कहा जाये तो मेरे विचारमें सरपंचको एक ही मुद्देपर अपना निर्णय देना है। अनाज आदिके मौजूदा भावोंको देखते हुए मजदूरोंको जो वेतन आज मिलता है वह उनके खर्चकी अपेक्षा कम है या नहीं। और यदि कम है तो इस कमीको पूरा करने लायक वेतन वृद्धि कर ही दी जानी चाहिए।
इस मुद्दे के बारेमें मजदूर पक्षकी ओरसे जो साक्ष्य दिया गया है उससे स्पष्टतः यह सिद्ध हो जाता है कि मजदूरोंकी कुल आमदनी उनके आवश्यक मासिक खर्चकी अपेक्षा कहीं कम है। सेठ मंगलदासके वक्तव्य में मुझे मजदूरोंके इस कथनका कोई खण्डन नहीं मिलता। इसलिए मैंने अपने निर्णय में<ref>देखिए खण्ड ४१, पृष्ठ ४०४-९।</ref> जो कुछ कहा है उससे अधिक और कुछ कहने को नहीं रह जाता। किन्तु एक बातकी ओर मैं सरपंचका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। वेतनमें कटौती मजदूरोंके लिए जिन्दगी और मौतका प्रश्न है। मिलोंके लिए कटौती करना और उसे बनाये रखनेका उद्देश्य नफेमें आई हुई कमीको भरना और नफेको बढ़ाना था और है। मेरा तात्पर्य यह है कि जबतक मिलोंको कुछ भी नफा हो रहा है तबतक मजदूरोंके गुजर-बसरके लायक वेतनमें कमी की ही नहीं जा सकती। कटौतीके पहले मिलनेवाला गुजारेके लायक वेतन वास्तवमें गुजारेके<noinclude>{{smallrefs}}
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ऋतु मिश्रा
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<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
लायक था ही नहीं। यह सच है कि १९२३ की अपेक्षा आजकल अनाजका भाव उतरा हुआ है। किन्तु दुःख और आश्चर्यकी बात तो यह है कि आज अनाजके भाव उतर जानेके बावजूद मजदूरोंका खर्च उनके वेतनकी अपेक्षा अधिक है, यह बात पंचके सामने पेश किये गये साक्ष्यसे सिद्ध हो जाती है। मजदूरों द्वारा पेश किये गये आँकड़ोंका समर्थन दो प्रकारसे होता है। मजदूरोंको मिलनेवाले वेतनमें से वार्षिक बचतका हिसाब लगाने तथा सरकारकी ओरसे दो बार की गई जाँचके फलस्वरूप जो आँकड़े निकले थे उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि मजदूरोंकी ओरसे खर्चके बारेमें जो आँकड़े पेश किये गये थे, सरकारी रिपोर्ट भी उनका समर्थन करती है।
मुझे लगता है कि मजदूरोंकी आजकी स्थितिको मिल-मालिक या सेठ मंगलदास समझ नहीं सके हैं। मैं चाहता हूँ कि सरपंच इस स्थितिको समझ लें।
यदि सरपंच मुझसे अन्य कोई खास बात न जानना चाहते हों तो मेरी ओरसे और कुछ कहने को नहीं बचता।
गुजराती (एस॰ एन॰ १४९७९) की माइक्रोफिल्म से।
{{c|{{x-larger|'''२. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{right|१६ अक्टूबर, १९२९}}
चि॰ महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला । आजकल तो मैं लिख ही नहीं पाता हूँ। काकी'-सम्बन्धी लेख मुझे आज ही मिला है । लेख अच्छा है । कहनेवाले तो कहते ही रहेंगे।
'गीताजी' के जो प्रूफ गोरखपुर भेजे गये थे। वे अभीतक वापस नहीं मिले। अब जब आयें तभी ठीक है। इन प्रूफोंको मसूरी में देखनेका मुझे अच्छा मौका मिल सकेगा।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस० एन० ११४५७) की फोटो - नकलसे ।
१. दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकरको पत्नी; देखिए नवजीवन, १३-१०-१९२९ में प्रकाशित " एक सतीका अवसान " शीर्षक लेख ।
२. देखिए " शुष्क- नवजीवन ”, ३-११-१९२९ ।
३. १७ से २४ अक्टूबर, १९२९ तक गांधीजी मसूरी में थे।<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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लायक था ही नहीं। यह सच है कि १९२३ की अपेक्षा आजकल अनाजका भाव उतरा हुआ है। किन्तु दुःख और आश्चर्यकी बात तो यह है कि आज अनाजके भाव उतर जानेके बावजूद मजदूरोंका खर्च उनके वेतनकी अपेक्षा अधिक है, यह बात पंचके सामने पेश किये गये साक्ष्यसे सिद्ध हो जाती है। मजदूरों द्वारा पेश किये गये आँकड़ोंका समर्थन दो प्रकारसे होता है। मजदूरोंको मिलनेवाले वेतनमें से वार्षिक बचतका हिसाब लगाने तथा सरकारकी ओरसे दो बार की गई जाँचके फलस्वरूप जो आँकड़े निकले थे उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि मजदूरोंकी ओरसे खर्चके बारेमें जो आँकड़े पेश किये गये थे, सरकारी रिपोर्ट भी उनका समर्थन करती है।
मुझे लगता है कि मजदूरोंकी आजकी स्थितिको मिल-मालिक या सेठ मंगलदास समझ नहीं सके हैं। मैं चाहता हूँ कि सरपंच इस स्थितिको समझ लें।
यदि सरपंच मुझसे अन्य कोई खास बात न जानना चाहते हों तो मेरी ओरसे और कुछ कहने को नहीं बचता।
गुजराती (एस॰ एन॰ १४९७९) की माइक्रोफिल्म से।
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चि॰ महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला । आजकल तो मैं लिख ही नहीं पाता हूँ। काकी<ref>दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकरको पत्नी; देखिए नवजीवन, १३-१०-१९२९ में प्रकाशित "एक सतीका अवसान" शीर्षक लेख।</ref>-सम्बन्धी लेख मुझे आज ही मिला है। लेख अच्छा है। कहनेवाले तो कहते ही रहेंगे।<ref>देखिए "शुष्क- नवजीवन", ३-११-१९२९।</ref>
'गीताजी' के जो प्रूफ गोरखपुर भेजे गये थे। वे अभीतक वापस नहीं मिले। अब जब आयें तभी ठीक है। इन प्रूफोंको मसूरीमें<ref>१७ से २४ अक्टूबर, १९२९ तक गांधीजी मसूरी में थे।</ref> देखनेका मुझे अच्छा मौका मिल सकेगा।
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ऋतु मिश्रा
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text/x-wiki
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{{c|{{x-larger|३. पत्र : छगनलाल जोशीको}}}}
देहरादून
१६ अक्टूबर, १९२९
चि० छगनलाल,
चुकी है। उससे
तुम्हारा पत्र नहीं मिला, हालांकि आश्रमसे लिखा जमनालालजीका पत्र मिल गया है । इसका मतलब यह हुआ कि आश्रमको डाक यहाँ पहुँच मुझे उमियाकी सगाईका समाचार मिला है । वे दोनों सुखी हों। शंकरलालका पत्र उमिया तक पहुँचानेके लिए भेज रहा हूँ । उक्त
दे देना ।
[ पुनश्च : ]
यह पत्र दुबारा नहीं पढ़ा है ।
गुजराती (जी० एन० ५४६० ) की फोटो- नकलसे ।
४. क्या यह ग्राम सुधार है ?
इसके साथ चि० पत्र पढ़कर उसे
बापूके आशीर्वाद
पंजाबके गुड़गाँव जिलेमें श्री एफ० एल० ब्रेनने ग्रामीणोंकी बेहतरीके लिए जो काम किया, उसकी कुछ समय पहले समाचारपत्रोंमें काफी चर्चा की गई थी। वह जिला श्री ब्रेनकी देखरेखमें था । समाचारपत्रोंकी इन चर्चाओंसे मेरा ध्यान उस ओर आकृष्ट हुआ और मुझे लगा कि श्री ब्रेनने जो हवाला दिया है, यदि वह गुड़गाँव में हुई प्रगतिका सही हवाला है, तो उनके कामका बारीकीसे अध्ययन और अनुकरण करना उपयुक्त होगा। इसलिए मैंने लालाजीकी समिति से अनुरोध किया कि वह मौकेपर निरीक्षण करके इस बातकी जाँच करे कि वास्तवमें कैसा काम हुआ है । समितिके एक स्नातक सदस्य लाला देशराजको इस काम में लगाया गया था । उन्होंने अपनी जाँचकी एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है । उसे मैं कुछ अंशोंको छोड़ते हुए बाकी ज्यों-की-त्यों प्रकाशित कर रहा हूँ। रिपोर्टको ध्यानसे पढ़ना लाभदायक होगा । श्री ब्रेनने वाइसरायसे तथा पंजाबके राज्यपालसे भी अपने कामके सम्बन्ध में सावधानीसे प्रयुक्त शब्दों में लिखे प्रमाण-पत्र हासिल कर लिये हैं। लेकिन मैं लाला देशराजके विचारोंका पूर्वानुमान
१. आश्रमवासी जयसुखलाल गांधीकी पुत्री ।
२. लोक सेवक समिति ( सर्वेन्टस ऑफ पीपल सोसाइटी ) । ३. यहाँ नहीं दी जा रही है।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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ऋतु मिश्रा
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सुधार
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{{right|१६ अक्टूबर, १९२९}}
चि० छगनलाल,
तुम्हारा पत्र नहीं मिला, हालांकि आश्रमसे लिखा जमनालालजीका पत्र मिल गया है। इसका मतलब यह हुआ कि आश्रमको डाक यहाँ पहुँच मुझे उमियाकी सगाईका समाचार मिला है। वे दोनों सुखी हों। शंकरलालका पत्र उमिया तक पहुँचानेके लिए भेज रहा हूँ। उक्त पत्र पढ़कर उसे दे देना।
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[ पुनश्च : ]
यह पत्र दुबारा नहीं पढ़ा है ।
गुजराती (जी० एन० ५४६० ) की फोटो- नकलसे ।
४. क्या यह ग्राम सुधार है ?
इसके साथ चि० पत्र पढ़कर उसे
पंजाबके गुड़गाँव जिलेमें श्री एफ० एल० ब्रेनने ग्रामीणोंकी बेहतरीके लिए जो काम किया, उसकी कुछ समय पहले समाचारपत्रोंमें काफी चर्चा की गई थी। वह जिला श्री ब्रेनकी देखरेखमें था । समाचारपत्रोंकी इन चर्चाओंसे मेरा ध्यान उस ओर आकृष्ट हुआ और मुझे लगा कि श्री ब्रेनने जो हवाला दिया है, यदि वह गुड़गाँव में हुई प्रगतिका सही हवाला है, तो उनके कामका बारीकीसे अध्ययन और अनुकरण करना उपयुक्त होगा। इसलिए मैंने लालाजीकी समिति से अनुरोध किया कि वह मौकेपर निरीक्षण करके इस बातकी जाँच करे कि वास्तवमें कैसा काम हुआ है । समितिके एक स्नातक सदस्य लाला देशराजको इस काम में लगाया गया था । उन्होंने अपनी जाँचकी एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है । उसे मैं कुछ अंशोंको छोड़ते हुए बाकी ज्यों-की-त्यों प्रकाशित कर रहा हूँ। रिपोर्टको ध्यानसे पढ़ना लाभदायक होगा । श्री ब्रेनने वाइसरायसे तथा पंजाबके राज्यपालसे भी अपने कामके सम्बन्ध में सावधानीसे प्रयुक्त शब्दों में लिखे प्रमाण-पत्र हासिल कर लिये हैं। लेकिन मैं लाला देशराजके विचारोंका पूर्वानुमान
१. आश्रमवासी जयसुखलाल गांधीकी पुत्री ।
२. लोक सेवक समिति ( सर्वेन्टस ऑफ पीपल सोसाइटी ) । ३. यहाँ नहीं दी जा रही है।<noinclude></noinclude>
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विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
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</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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671366
671365
2026-08-18T01:46:59Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* प्रतिभागी */
671366
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
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<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
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'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
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# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५८५
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Richmishra14
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|५४७}}</noinclude>
::गांधीजीने टाउन हालमें भाषण दिया; कांग्रेस कमेटी और मजदूर सभा द्वारा दिए गए मानपत्र और नागरिकों द्वारा भेंट की गई थैली प्राप्त की।
{{outdent|३ नवम्बर: खुजमें पड़ाव डाला।}}
{{outdent|४ नवम्बर: अलीगढ़ पहुँचे; रातको अलोगढ़ विश्व विद्यालयमें विद्यार्थियोंके समक्ष भाषण दिया और हिन्दू-मुस्लिम एकतापर बोले।}}
{{outdent|५ नवम्बर: अलोगढ़में; तोसरे पहर महिलाओंको सभा और आम सभामें भाषण दिया।}}
{{outdent|'हाउस ऑफ लाईस' में वाइसरायकी घोषणापर चर्चा हुई, ज्यादातर सदस्योंने वक्तव्यके औचित्य पर सन्देह प्रकट किया।}}
{{outdent|६ नवम्बर: गांधीजी मथुरा पहुँचे।}}
{{outdent|७ नवम्बर: वृन्दावनमें। 'हाउस ऑफ कामन्स' में वाइसरायकी घोषणापर बहस की गई।}}
{{outdent|८ नवम्बर: गांधीजी हाथरस पहुँचे।}}
{{outdent|९ नवम्बर: एटा जिलेमें।}}
{{outdent|१० नवम्बर: बदायूँ जिलेमें।}}
{{outdent|११ नवम्बर: शहाजहांपुर जिलेमें; दलित वर्गोंके लिए खोला गया अमेरिकी मेथोडिस्ट मिशन गर्ल्स स्कूल देखा।}}
{{outdent|१२ नवम्बर: पीलीभीत जिलेमें।}}
{{outdent|१३ नवम्बर: सीतापुर जिलेमें; रायबरेली जाते हुए लखनऊ गये।}}
{{outdent|१४ नवम्बर: रायबरेली जिलेमें। फेनर ब्रॉकवेको लिखा कि ब्रिटिश सरकारसे बिना शर्त कुछ निश्चित गारन्टी लेना जरूरी है।}}
{{outdent|१५ नवम्बर: इलाहाबाद पहुँचे।}}
{{outdent|१६ नवम्बर: इलाहाबादमें; सुबह डा० हिगिन बॉटमका प्रायोगिक फार्म और कृषि संस्थान, श्रीमती हिगिन बॉटम द्वारा अपाहिजोंके बच्चोंके लिए बनाया गया आश्रम, उनके द्वारा चलाया गया अपाहिज आश्रम; इविंग क्रिश्चियन कालेज, कास्टवेट गर्ल्स स्कूल, कायस्थ पाठशाला और इलाहाबादके इर्द-गिर्दके गांव देखे।}}
{{outdent|१७ नवम्बर: लाला लाजपतरायकी प्रथम बरसी।}}
गांधीजीने इलाहाबाद विश्वविद्यालयके विद्यार्थियों और स्टाफकी सभामें, नगरपालिका सभा तथा महिलाओंकी सभामें जहाँ उन्हें इन्दिरा नेहरूने रु० ८,००० से ज्यादाका चेक भेंट किया, भाषण दिया। उन्होंने एक प्रार्थना
सभामें भी भाषण दिया, जिसकी अध्यक्षता मोतीलाल नेहरूने की।
{{outdent|१८ नवम्बर: इलाहाबादमें प्रतिनिधि राजनीतिक नेताओंके सम्मेलनने प्रस्ताव स्वीकार किया कि दिल्ली घोषणा पत्रका अनुमोदन किया जाये और आशा प्रकट की}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५८६
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Richmishra14
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|५४८|'''सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय'''|}}</noinclude>
::कि ब्रिटिश सरकार इसे पूरी तरह स्वीकार कर लेगी। आधी रातके बाद कांग्रेस कार्यसमितिने एक मतसे प्रस्ताव पास किया कि ब्रिटिश सरकारके उत्तरकी
प्रतीक्षा की जाए।
{{outdent|१९ नवम्बर: गांधीजी मिर्जापुर और चुनार गये।}}
{{outdent|२० नवम्बर: फतेहपुर जिलेमें।}}
{{outdent|२१ नवम्बर: बांदा जिलेमें; कुलपहाड़के लिए रवाना हो गए।}}
{{outdent|२२ नवम्बर: हमीरपुर जिलेमें।}}
{{outdent|२३ नवम्बर: झांसी और जलाओं जिलोंमें।}}
{{outdent|२४ नवम्बर: इटावामें; संयुक्त प्रान्तकी यात्रा समाप्त की।}}
{{outdent|२५ नवम्बर: अहमदाबादके लिए रवाना हो गए।}}
{{outdent|२६ नवम्बर: साबरमतीमें नवजीवन ट्रस्टकी वसीयत लिखी।}}
{{outdent|३० नवम्बर: साबरमतीमें जिन्ना और विठ्ठलभाई पटेलसे बातचीत की।}}
{{outdent|७ दिसम्बर: सुबह वर्धा पहुँचे; अहमदाबादके मजदूरोंसे अपील की कि वे पंच-फैसलेको स्वीकार कर लें यद्यपि इससे उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं।}}
{{outdent|१९ दिसम्बर: वर्षामें।}}
{{outdent|२० दिसम्बर: वाइसरायने गांधीजीको तार दिया कि वे मोतीलाल नेहरू, टी० बी० सप्रू, विट्ठलभाई पटेल और जिन्ना सहित २३ दिसम्बरको, तीसरे पहर उनसे मिलें। गांधीजीने आमन्त्रण स्वीकार कर लिया।}}
{{outdent|२१ दिसम्बर: दिल्लीके लिए रवाना हो गए। मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रमें गांधीजीने लिखा: “मैं वहाँ कोई आशाएँ लेकर नहीं जा रहा हूँ।"}}
{{outdent|२२ दिसम्बर: लाहौरमें डॉ० प्र० च० राय द्वारा कांग्रेस प्रदर्शनीका उद्घाटन किया गया।}}
{{outdent|२३ दिसम्बर: गांधीजी दिल्ली पहुँचे वाइसरायसे मिले।}}
नई दिल्लीसे कोई छ: मील निजामुद्दीनके पास वाइसरायकी गाड़ी उड़ा देनेका
प्रयत्न किया गया।
{{outdent|२४ दिसम्बर: गांधीजी लाहौर पहुँचे; सर्वेण्ट्स ऑफ पीपुल सोसाइटी की पहली वर्षगाँठ पर आम सभायें भाषण दिया; लाजपतराय मेमोरियल हॉलका उद्द्घाटन किया; अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलनकी अध्यक्षता की।}}
{{outdent|२५ दिसम्बर: गोलबाग (लाहौर) में लाला लाजपतरायकी मूर्तिका शिलान्यास किया।}}
{{outdent|२६ दिसम्बर: कांग्रेस कार्यसमितिने मोतीलाल और दूसरे लोगोंके साथ विचार-विमर्श करनेके बाद गांधीजी द्वारा तैयार किए गए कांग्रेसके प्रस्ताव-सम्बन्धी मसौदोंको सदस्योंमें परिचालित किया।}}<noinclude></noinclude>
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2026-08-18T02:29:20Z
Richmishra14
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{Rh|५४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
::कि ब्रिटिश सरकार इसे पूरी तरह स्वीकार कर लेगी। आधी रातके बाद कांग्रेस कार्यसमितिने एक मतसे प्रस्ताव पास किया कि ब्रिटिश सरकारके उत्तरकी प्रतीक्षा की जाए।
{{outdent|१९ नवम्बर: गांधीजी मिर्जापुर और चुनार गये।}}
{{outdent|२० नवम्बर: फतेहपुर जिलेमें।}}
{{outdent|२१ नवम्बर: बाँदा जिलेमें; कुलपहाड़के लिए रवाना हो गए।}}
{{outdent|२२ नवम्बर: हमीरपुर जिलेमें।}}
{{outdent|२३ नवम्बर: झाँसी और जलाओं जिलोंमें।}}
{{outdent|२४ नवम्बर: इटावामें; संयुक्त प्रान्तकी यात्रा समाप्त की।}}
{{outdent|२५ नवम्बर: अहमदाबादके लिए रवाना हो गए।}}
{{outdent|२६ नवम्बर: साबरमतीमें नवजीवन ट्रस्टकी वसीयत लिखी।}}
{{outdent|३० नवम्बर: साबरमतीमें जिन्ना और विठ्ठलभाई पटेलसे बातचीत की।}}
{{outdent|७ दिसम्बर: सुबह वर्धा पहुँचे; अहमदाबादके मजदूरोंसे अपील की कि वे पंच-फैसलेको स्वीकार कर लें यद्यपि इससे उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं।}}
{{outdent|१९ दिसम्बर: वर्धामें।}}
{{outdent|२० दिसम्बर: वाइसरायने गांधीजीको तार दिया कि वे मोतीलाल नेहरू, टी॰ बी॰ सप्रू, विट्ठलभाई पटेल और जिन्ना सहित २३ दिसम्बरको, तीसरे पहर उनसे मिलें। गांधीजीने आमन्त्रण स्वीकार कर लिया।}}
{{outdent|२१ दिसम्बर: दिल्लीके लिए रवाना हो गए। मथुरादास त्रिकमजीको लिखे पत्रमें गांधीजीने लिखा: “मैं वहाँ कोई आशाएँ लेकर नहीं जा रहा हूँ।"}}
{{outdent|२२ दिसम्बर: लाहौरमें डॉ॰ प्र॰ च॰ राय द्वारा कांग्रेस प्रदर्शनीका उद्घाटन किया गया।}}
{{outdent|२३ दिसम्बर: गांधीजी दिल्ली पहुँचे वाइसरायसे मिले।}}
नई दिल्लीसे कोई छः मील निजामुद्दीनके पास वाइसरायकी गाड़ी उड़ा देनेका
प्रयत्न किया गया।
{{outdent|२४ दिसम्बर: गांधीजी लाहौर पहुँचे; सर्वेण्ट्स ऑफ पीपुल सोसाइटी की पहली वर्षगाँठ पर आम सभायें भाषण दिया; लाजपतराय मेमोरियल हॉलका उद्द्घाटन किया; अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलनकी अध्यक्षता की।}}
{{outdent|२५ दिसम्बर: गोलबाग (लाहौर) में लाला लाजपतरायकी मूर्तिका शिलान्यास किया।}}
{{outdent|२६ दिसम्बर: कांग्रेस कार्यसमितिने मोतीलाल और दूसरे लोगोंके साथ विचार-विमर्श करनेके बाद गांधीजी द्वारा तैयार किए गए कांग्रेसके प्रस्ताव-सम्बन्धी मसौदोंको सदस्योंमें परिचालित किया।}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५८७
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<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh||तारीखवार जीवन-वृत्तान्त|५४९}}</noinclude>
{{outdent|२७ दिसम्बर: अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी सभा लाहौरमें शुरू हुई और अगले तीन दिनतक चली। अखिल भारतीय हिन्दुस्तानी सेवादल सम्मेलन लाहौरमें श्रीनिवास अयंगारकी अध्यक्षतामें हुआ। गांधीजीने सिख नेताओंके साथ उनके अधिकारोंपर चर्चा की। गांधीजीने विषय समितिको बैठकमें स्नतन्त्रता प्रस्ताव पेश किया।}}
{{outdent|२९ दिसम्बर: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसका अधिवेशन जवाहरलाल नेहरूकी अध्यक्षता में हुआ। जवाहरलाल नेहरूने पूर्ण राष्ट्रीय स्वतन्त्रता, विधान सभाओंका तत्काल बहिष्कार, और कर न देनेके लिए शान्तिपूर्ण सामूहिक आन्दोलनका संगठन करनेके लिए भाषण दिया।}}
गांधीजीने स्वतन्त्रता प्रस्ताव पर की गई बहसका उत्तर दिया।
{{outdent|३० दिसम्बर: लाहौरमें अखिल भारतीय विद्यार्थी अधिवेशन, मदनमोहन मालवीय द्वारा अध्यक्षता की गई।<br>लाहौरमें सिखोंका सम्मेलन हुआ।<br>विषयसमितिको बैठकमें गांधीजीके विदेशी वस्त्र वहिष्कारके लिए समितियोंको स्वायत्तता देने सम्बन्धी अस्पृश्यता विरोधी; मद्यनिषेध और सदस्योंकी संख्या घटानेसे सम्बन्धित प्रस्ताव गिर गए।}}
{{outdent|३१ दिसम्बर: बम फेंके जाने और पूर्ण स्वतन्त्रता पर गांधीजीके प्रस्ताव कांग्रेसके खुले अधिवेशनमें विचारार्थं स्वीकार किए गए।}}
{{outdent|१ जनवरी १९३०: विषयसमितिकी बैठकमें गांधीजीने राष्ट्रीय ऋणोंपर प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया था कि स्वतन्त्र भारतको जो वितीय ऋण उत्तराधिकारमें मिलेगा उनकी जाँच स्वतन्त्र न्यायाधिकरण करेगा। लाहौरसे जानेके पूर्व उन्होंने विदेशी पत्र-संवाददातासे विशेष भेंट की।}}
{{outdent|२ जनवरी: गांधीजी दिल्ली पहुँचे। नई कार्य-समिति द्वारा २६ जनवरी स्वतन्त्रता दिवसके रूपमें नियत किया गया।}}
{{outdent|४ जनवरी: भारतके लिए अवर राज्य सचिव, अर्ल रसेलने अपने भाषणमें कहा कि भारतका औपनिवेशिक राज्य कनाडा, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंडके राज्य जैसा नहीं होगा। मजहर-उल-हकका देहान्त हो गया।}}
{{outdent|११ जनवरी: गुजरात विद्यापीठके दीक्षान्त समारोहके भाषणमें गांधीजीने कहा कि भारतके औपनिवेशिक राज्यपर अर्ल रसेलके वक्तव्यका अभिप्राय लोहेकी बेड़ियोंको सोनेकी बेड़ियोंमें बदलना है।}}
{{outdent|१३ जनवरी: राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलनमें भाषण दिया।}}
{{outdent|१८ जनवरी: रवीन्द्रनाथ टैगोर आश्रममें आये और उन्होंने गांधीजीसे बातचीत की।}}
{{outdent|२२ जनवरी: गांधीजीने सविनय अवज्ञा आन्दोलनके बारेमें अपनी भावी योजनाके बारेमें 'डेली एक्सप्रेस' के प्रतिनिधिसे भेंट की।}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५८८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh|५५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
{{outdent|२५ जनवरी: वाइसरायने विधान-सभामें अपने एक वक्तव्यमें कहा कि गोलमेज परिषद् निदेशावलि तैयार करनेमें मदद करेगी जिसके आधारपर सरकार संसदके विचारार्थ औपनिवेशिक राज्यके बारेमें प्रस्ताव मसौदे तैयार कर सके।<br>वायसरायने कांग्रेसके वित्तीय प्रस्तावका अनुमोदन नहीं किया।}}
{{outdent|२६ जनवरी: भारतभरमें स्वतन्त्रता प्राप्तिके लिए प्रतिज्ञा की गई।}}
{{outdent|७ फरवरी: वायसरायने लखनऊ दरबारमें भाषण किया।}}
{{outdent|१५ फरवरी: कांग्रेस कार्यसमितिने अहमदाबादमें गांधीजीको और उन लोगोंको जो अहिंसाको धर्म मानते हैं अधिकार दे दिया कि " वे जैसे और जब चाहें और जिस सीमातक निश्चय करें" सविनय अवज्ञा चलाएँ।<br>साबरमतीमें प्रार्थना-सभा में भाषण दिया, जिसमें आश्रमवासियोंको सलाह दी गई की वे अपने-आपको आनेवाले संघर्षके लिए तैयार रखें।}}
{{outdent|१९ फरवरी: अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने सविनय अवज्ञा कार्यक्रम अपनाया।}}
{{outdent|२७ फरवरी: "जब मैं गिरफ्तार हो जाऊँ" लेखमें गांधीजीने लोगोंसे अनुरोध किया<br>"भारतकी ध्येय प्राप्तिके लिए अहिंसाको अपना धर्म मानने वाला एक भी आदमी इस प्रयत्नके अन्तमें वर्तमान दासताके आगे और अधिक समयतक झुकने के लिए स्वतन्त्र या जीवित न रहें।"}}
{{outdent|२८ फरवरी: गांधीजीने घ॰ दा॰ बिड़लाको लिखे पत्र में लिखा: "मार्चके अन्ततक मेरे जेलसे बाहर रहनेकी आशा नहीं है।"}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६८
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|३०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बहन-भाइयो, आप वल्लभभाईके प्रतिनिधिके रूपमें उनका काम अपने हाथ में ले लें। यदि आपको वल्लभभाईसे प्रेम हो और आप बलिदान देनेके लिए तत्पर होकर आये हों तो तैयार हो जायें। यदि आप उनके त्यागका अनुकरण करनेको तैयार हों तो हम सरकारको और दुनियाको यह दिखा सकेंगे कि शुभ मनोरथ किस खूबीसे सफल होते हैं। ईश्वरसे मेरी प्रार्थना है कि वह हमें इस कार्यके लिए त्याग करनेकी शक्ति दे।
आश्रमके लोगोंकी टुकड़ीके साथ बुधवारको प्रातःकाल कूच करने के अपने निश्चय पर मैं आज भी दृढ़ हूँ। आशा है यहाँ आये हुए सभी लोग अपने कर्त्तव्यका पालन करेंगे। सरदार वल्लभभाईने सन्देश भिजवाया है कि गांधीके गिरफ्तार कर लिये जानेपर क्या करना होगा, यह वे अपने भड़ौचके भाषण में बता चुके हैं। उन्होंने जेलमें पहुँचकर अपने इन शब्दों पर मुहर लगा दी है और सरकार भी तदनुसार
हम सबकी कद्र करेगी। मैं यहाँ आपसे कोई प्रस्ताव पास करनेको नहीं कहूँगा। यहाँ आनेके पहले मैंने आप क्या [प्रतिज्ञा] करेंगे सो निश्चित कर रखा है और मैं आशा करता हूँ कि आप उसपर अमल करेंगे।
{{outdent|{{gap}}{{gap}}हम अहमदाबादके नागरिक—स्त्रीपु—रुष निश्चय करते हैं कि सरदार वल्लभभाई पटेलने जिस मार्गको अपनाया है हम सब लोग उसी मार्ग पर चलेंगे या पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करेंगे। पूर्ण स्वराज्य प्राप्त किये बिना न तो हम शान्तिसे बैठेंगे और न सरकारको शान्तिसे बैठने देंगे। हमारा विश्वास है कि हिन्दुस्तानको शान्ति और सत्यके द्वारा ही स्वाधीनता मिलेगी।}}
आज १५ वर्षसे मैं जिस प्रकारकी बात देशके लोगों और विशेषकर अहमदाबादके नागरिकोंसे कहता आ रहा हूँ तथा स्थानीय मजदूरोंकी हड़तालके समय उनसे जो दृढ़ प्रतिज्ञा करवाई गई थी वैसी ही दृढ़ प्रतिज्ञा यहाँ उपस्थित हजारों भाई-बहन करें और उसके पक्षमें अपने हाथ उठायें। यदि आप उस प्रतिज्ञाका पालन कर सकें तभी हाथ उठायें।<ref>इसपर हजारों हाथ उठाये गये।</ref>
आपने जो शान्तिपूर्वक आम हड़ताल की उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। मुझे आशा है कि अहमदाबादके छात्र-छात्राएँ सरदार वल्लभभाई तथा हिन्दुस्तानके प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन करेंगे।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''प्रजाबन्धु,''' १०-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|8em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/६९
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''३०. मिल-मालिक संघके सदस्योंसे बातचीत'''}}}}
{{right|८ मार्च, १९३०}}
रा॰ शा॰<ref>राष्ट्रीय शाला कोष।</ref> कोषका ब्याज मजूर-महाजन संघको दिया जाता था, इससे मुझे सन्तोष था और मैं समझता हूँ कि उससे आपको भी सन्तोष था। किन्तु अब यह पैसा मिलना बन्द हो गया है। मैंने मं॰<ref>मंगलदास।</ref> सेठसे प्रार्थना की थी कि यह पैसा देना बन्द न किया जाये किन्तु वह नहीं दिया जा रहा है। आपत्ति यह रही कि प्रबन्धमें मिल-मालिकोंका हाथ होना चाहिए। यह तो सैद्धान्तिक मतभेदकी बात है। मजूर-पाठशालाका संचालन किस प्रकार किया जाये, यह कल्पना तो महाजनोंकी है और वे उसे स्वयं चलाते हैं। इससे निरीक्षकोंको भी सन्तोष हुआ है। मैंने भी उसका निरीक्षण किया है और हर बार उसे प्रगतिकी ओर बढ़ते पाया है। चाहे जो हो, जिस संस्थाको हम दान देते हैं, उसके प्रबन्धमें हमारा कोई हाथ नहीं हो सकता। क्योंकि तब उसे दान नहीं कहा जा सकता। जब मैंने आपसे दान देनेकी प्रार्थना की थी उस समय भी यह बात मैंने आपको समझाई थी। इस पर आपने कहा था कि मेरे कामोंका स्वरूप तो राजनीतिक और सार्वजनिक दोनों ही होता है। मैंने आपको समझाया और आपने इसे सामाजिक कार्य मानकर इसके लिए उक्त पैसा दिया। विचार-विमर्शके फलस्वरूप आपने मेरी बात रख ली थी। किन्तु अब आपका प्रबन्ध-कार्यमें भाग लेनेकी माँग करना उचित नहीं है। मेरा सुझाव है कि आप एक "कमेटी ऑफ इंस्पेक्शन" (निरीक्षक समिति) बना लें। यदि आपको ऐसा लगे कि ठीक-ठीक काम नहीं चल रहा है तो आप दान देना बन्द कर दें। सरकार भी प्रबन्ध-संचालनमें भाग नहीं लेती किन्तु देख-रेख करती है। आप निरीक्षकके रूपमें जो करना उचित समझें, सो करें। इसपर भी यदि आप पैसा न देना चाहें तो मैं आपको दूसरा सुझाव दूँगा। वहाँ जो पाठशाला, जो मान्टेसरी स्कूल चल रहा है उसके कारण लोग आश्चर्यचकित रह गये हैं, प्रो॰ मिलर, इन्हें आप पैसा दें। . . .<ref>यहाँ एक वाक्य अस्पष्ट है।</ref> मजदूरोंको इस पैसेकी आवश्यकता है। आप मजदूरोंकी वेतन वृद्धिका उल्लेख करते हैं, किन्तु मैं आपको यह बता देना चाहता हूँ कि वहाँ बड़े लोगोंके बच्चे भी पढ़ते हैं और वे भी पूरी फीस नहीं देते। आप चाहते हैं कि यह पाठशाला मजदूर जो दो पैसे बचा पाते हैं उनसे चलाई जाये। मजदूर लड़नेके लिए कोई रकम थोड़े ही इकट्ठी करते हैं। इसके लिए तो आप लोगोंको मेरा आभार मानना चाहिए।
गुजराती (एस॰ एन॰ १६६५७) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{Dhr}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''३१. भाषण : प्रार्थना-सभा, साबरमती आश्रम में<ref>अंग्रेजीमें यह '''यंग इंडिया'''से लिया गया है। हिन्दीमें '''नवजीवन'''से लिया गया है और '''यंग इंडिया''' वाले पाठसे इसे मिला लिया गया है।'''</ref>}}}}
जिन सिद्धान्तोंको मैं जीवन-भर अमूल्य मानता रहा हूँ उन सिद्धान्तोंको मैं ऐसे समयमें कब छोड़ सकता हूँ जब उनको कसौटीपर कसा जा रहा हो। चेचकका टीका लेना एक गन्दी क्रिया है, इसमें बहुत नुकसान है और इसे तो मैं गोमांस खानेके बराबर मानता हूँ। परन्तु जब मेरे ही बच्चे एक-एक करके खत्म हो रहे हों तो मुझे अपने सिद्धान्तसे मुँह मोड़ लेना चाहिए और सार्वजनिक रूपसे कहना चाहिए कि टीका लगवाने में कोई हर्ज नहीं है तो मेरे सत्यकी क्या कीमत रह जायेगी, मेरी ईश्वर श्रद्धाका क्या अर्थ होगा? यदि सारा आश्रम वीरान जाये तो भी यदि मुझे अपने सिद्धान्तमें तत्त्वतः कोई भूल न दिखाई दे तो मैं इस सिद्धान्तसे चिपका रहूँगा, यही मेरा धर्म है। अपने बच्चोंको खोना किसे अच्छा लगता है? इसलिए जिन माता-पिताओंको टीकेमें सुरक्षा महसूस होती हो वे भले अभी टीका लगवा लें—जिनकी इच्छा होगी उनका मैं विरोध तो कदापि नहीं करूंगा अपितु इसका प्रबन्ध कर दूंगा; लेकिन मैं अपनी श्रद्धाको कैसे छोड़ सकता हूँ? मैं टीका लगवानेकी बातको किस तरह प्रोत्साहन दे सकता हूँ?
मेरे इस हृदय-मन्थनमें एक और विचार मुझे रह-रहकर साल रहा है। मृत्यु जन्मसे तनिक भी जुदा नहीं है, जीवन और मृत्यु तो एक ही सिक्केके दो पहलू हैं, ऐसी मेरी मान्यता है। तो फिर यदि तीन बच्चोंकी मृत्युसे मैं डर जाता हूँ तो मेरी यह मान्यता किस कामकी, मेरी ईश्वर श्रद्धा किस काम की? जो युद्ध इस समय हमारे सिरपर मँडरा रहा है उसमें तीनकी नहीं, कदाचित् हजारों और लाखों लोगोंके प्राणोंकी आहुति देनी पड़ेगी; इस बातसे डरकर यदि मैं यह युद्ध बन्द कर देता हूँ तो मेरी ईश्वर-आस्थाका कोई अर्थ न रह जायेगा। मैं यह क्यों न मानू<ref>आश्रम में तीन बच्चे शीतला निकल आनेसे मृत्युके ग्रास बन गये थे।</ref> कि इतने थोड़े ही दिनोंमें मृत्युके अनेक बार दर्शन करवाकर भगवान् शायद मेरे हृदयको और भी कठिन और मजबूत बनाना चाहता हो, युद्धके लिए मुझे और भी तैयार कर रहा हो?
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' ९-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|8em}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/७१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''३२. अन्तिम परीक्षा'''}}}}
यहाँसे रविवारको सवेरे वाइसराय साहबको पत्र भेज<ref>देखिए "पत्र : लॉर्ड इर्विनको", २-३-१९३०।</ref> दिया गया है, जो उन्हें मंगलवारको मिल गया होगा। जैसा कि पत्रमें सूचित किया जा चुका है, वाइसरायके पत्रकी प्रतीक्षा करनेके बाद उक्त पत्र प्रकाशनार्थं समाचार-पत्रोंको दे दिया गया। इस अंकमें पाठकोंको उसका अनुवाद देखनेको मिलेगा।
ईश्वरकी कृपा हुई तो बुधवारको सवेरे पौ फटते ही मैं कूच करनेकी आशा रखता हूँ। सूरतकी ओरके कार्यकर्त्ताओंके कथनानुसार उस तरफ आसानीसे नमक पकाने की काफी सहूलियतें हैं। इसके अतिरिक्त उनका यह भी कहना है कि सम्भवतः वहाँ पूर्ण शान्ति भी रखी जा सकेगी, और साथ ही आम लोगोंकी ओरसे मदद भी मिल सकेगी। सूरत जिलेमें भी जलालपुर ताल्लुकेमें पहले प्रवेश करनेका निश्चय किया गया है। सन् १९२१ में जब बारडोलीसे स्वराज्यकी लड़ाई शुरू की गई थी, तब भी जलालपुर ताल्लुकेकी ओरसे माँग पेश की गई थी और वहाँके कई मधुर संस्मरण आज भी मुझे याद हैं। इन दिनों भी वहाँ रचनात्मक काम अच्छी तरह चल रहा है। नमक बनानेकी सुविधाएँ भी उस ताल्लुकेमें बहुत हैं। लोगों में उत्साह है, और वे हर तरहसे खुद लड़ाईमें हाथ बँटानेको तैयार हैं। यह सरदार वल्लभभाईकी मान्यता है; और इसीलिए उन्होंने नमक-कानूनकी सविनय अवज्ञा करनेके लिए जलालपुर ताल्लुकेको पसन्द किया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि वहाँतक मैं या मेरे साथी पहुँचेंगे भी या नहीं; अर्थात् सरकार हमें पहुँचने भी देगी या नहीं। मैं मानता हूँ कि सरकार हमें पहुँचने नहीं देगी। अगर मैं बीचमें ही पकड़ लिया गया, तो भी मुझे यह उम्मीद है कि जलालपुर ताल्लुका इस लड़ाईमें पूरी तरह हाथ बँटायेगा। सरदारको तो इस बातका पूरा विश्वास है। लेकिन मेरा लोभ इससे कहीं अधिक है। इस बार मैं पूरे गुजरातसे सहायताकी आशा रखता हूँ। अगर गुजरातने पहल की तो मुझे इसमें जरा भी शक नहीं कि सारा हिन्दुस्तान जाग उठेगा। लोगों में जबरदस्त जागृति उत्पन्न होनेके अवसरों पर खून-खराबी होनेका भय तो हमेशा बना ही रहता है। हमारा यह अहिंसात्मक युद्ध भी इस भयसे मुक्त नहीं है। पर जहाँ हिंसा-अहिंसाका सवाल ही नहीं है, यदि वहाँ खून-खराबी हो तो किसीको दुःख नहीं होता। बहुत-से लोग तो उसका स्वागत भी करते हैं। लेकिन इस युद्धमें ऐसे लोगों का एक बड़ा समुदाय है जो खून-खराबीका स्वागत करनेके बजाय उसे रोकना ही अपना धर्म समझता है। इस डरके कारण अबतक मैं स्वयं सविनय अवज्ञा टालता रहा था, और सर्व साधारणको भी वैसा करनेसे रोकनेकी कोशिश करता रहा था। लेकिन अब खून-खराबीकी जोखिम उठाकर भी मैं इस बार आखिरी कदम उठानेके लिए तैयार हो गया हूँ। क्योंकि मैं देखता हूँ कि फिलहाल किसी दूसरे तरीकेसे मैं जनता<noinclude>{{Smallrefs}}
{{Dhr}}
४३–३</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/७२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>को युद्ध के लिए तैयार नहीं कर सकता। दूसरी ओर मैं यह देखता हूँ कि सरकारकी संगठित हिंसा दिन-प्रति-दिन बढ़ती जाती है, और उतनी ही तेजीसे इस संगठित हिंसाका हिंसासे प्रतिकार करनेवाला दल भी शक्तिशाली होता जा रहा है। अतः यदि अहिंसा में हिंसाको रोकनेकी शक्ति हो या मुझमें अहिंसा है तो इस दोहरी हिंसाको रोकनेका कोई अहिंसक मार्ग मुझे मिल ही जाना चाहिए। मेरे विचारमें, जो मार्ग मैं आज अपना रहा हूँ, यही वह मार्ग है। किन्तु यदि यह वह मार्ग नहीं है तो इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि अब मुझे लोगोंकी प्रगति के मार्ग में बाधक नहीं होना चाहिए। मुझे यह साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि अगर मैं केवल
खादी-कार्यसे ही सन्तुष्ट होकर बैठ जाऊँ तो मैं अपनी अहिंसाको लज्जित करूँगा। मुझे इस बारेमें जरा भी शंका नहीं है कि अहिंसा में खादीकी अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक शक्ति है। साथ ही मैं यह भी मानता हूँ कि स्वराज्य-प्राप्तिके अहिंसात्मक मार्ग में खादी एक आवश्यक साधन है। मैं यह भी निःसन्देह मानता हूँ कि बिना खादी मिला हुआ स्वराज्य स्वराज्य नहीं होगा। यह भी बिलकुल सच है कि खादीके कार्यमें जो प्रगति हुई है, यदि वह प्रगति न हुई होती तो आज मैं जिस तरीकेसे काम करने की तैयारी कर रहा हूँ, उस तरीकेसे काम करनेके लिए आवश्यक आत्मविश्वास मुझमें कभी न पैदा हुआ होता। मगर यह भी स्पष्ट है कि खादी उत्पादनके सिवा
अब और भी काम होना चाहिए। खादीको अधिक प्रोत्साहन देनेके लिए भी लोगों में अपेक्षाकृत अधिक जागृतिकी आवश्यकता है। इस जागृतिके साथ-साथ यदि अहिंसा भी बनी रहे तो निःसन्देह स्वराज्य हमें आज ही मिल सकता है। इन विचारोंके कारण मैं युद्धमें कूद रहा हूँ। पाठक जानते हैं कि ये विचार रास्ता सूझने के बाद पैदा हुए हैं। मैं मानता हूँ कि मनुष्य महान् कार्य अन्तर्नादकी प्रेरणासे ही करता है। उसका यह अन्तर्नाद दैवी भी हो सकता है और आसुरी भी। अन्तर्नाद सुनाई पड़ने पर तदनुकूल तर्क मनुष्यको मिल जाते हैं, मैंने स्वयं इस बातका अनुभव किया है और बहुतोंके ऐसे अनुभव भी मैं जानता हूँ।
यह तो दिनके आलोककी तरह स्पष्ट है कि अगर यह अन्तर्नाद झूठा अर्थात् आसुरी हो तो मुझे रास्ते से हट जाना चाहिए। परन्तु मैं अपने अन्तर्नादको दैवी मानता हूँ और इसलिए जो मार्ग मुझे सूझ पड़ता है उसपर चलते हुए मर मिटने या उसे सफल सिद्ध करनेके सिवा मेरे पास और कोई रास्ता ही नहीं है।
इसलिए मैं इस लड़ाईको अन्तिम परीक्षा मानता हूँ। जो इसमें शामिल होना चाहें वे भी इसे अन्तिम परीक्षा समझकर ही शामिल हों।
अगर इस लड़ाई में बेशुमार लोग शामिल हुए और शान्ति बराबर बनी रही तो हम इतने थोड़े समय में पूर्ण स्वराज्य पा सकते हैं कि जिसकी हममें से कोई कल्पना तक नहीं कर सकता।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' ९-३-१९३०|1em}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''३३. सत्याग्रही-दलका कूच'''}}}}
इस दलमें लगभग १०० लोगोंके होनेकी सम्भावना है। इस समय आश्रममें रहनेवालोंके सिवा जो अन्य लोग आश्रमके नियमोंका पालन करते हैं और जानेको उत्सुक हैं तथा जिन्हें साथ ले जाना आवश्यक है, मैं उन्हें भी ले रहा हूँ। इसलिए मैं अन्तिम सूची तैयार नहीं कर पाया हूँ।
१२ मार्चको सवेरे ६॥ बजे कूच शुरू होगा। अबतक जो कार्यक्रम तैयार हुआ है वह इस प्रकार है :
{|width=80%
|-
|बुधवार, तारीख १२ || || असलाली
|-
|बृहस्पतिवार, तारीख १३ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || बारेजा<br>नवागाँव
|-
|शुक्रवार, तारीख १४ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || वासणा<br>मातर
|-
|शनिवार, तारीख १५ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || डभाण<br>नडियाद
|-
|रविवार, तारीख १६ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || बोरियावी<br>आणंद
|-
|सोमवार, तारीख १७ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || नापा<br>बोरसद
|-
|मंगलवार, तारीख १८ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || रास<br>बदलपुर
|}
इन गाँवोंके मुखियों और सेवकोंसे मेरा निवेदन है कि वे नीचे लिखी सूचनाओंको
ध्यानमें रखें।
आशा है कि हर स्थानपर दल सवेरे ८ बजेके पहले पहुँच जायेगा और १० से १०॥ के बीच भोजनके लिए बैठ जायेगा। मुमकिन है, पहले दिन असलाली पहुँचते-पहुँचते ९॥ बज जायें। दोपहर या रातको ठहरनेके लिए किसी मकानकी आवश्यकता नहीं होगी; छायादार साफ जगह मिल जाये, इतना ही काफी है। जहाँ छायादार, साफ जगह न हो वहाँ बाँस और घास-फूसका कामचलाऊ मंडप डलवा देना काफी होगा। इन दोनों चीजोंका बादमें पूरा उपयोग किया जा सकता है।
यह मान लिया गया है कि भोजन गाँववाले ही करायेंगे।
भोजनके लिए सीधा-सामान मिलनेपर दलके लोग अपने हाथसे रसोई बना लेंगे। भोजनका सामान दिया जाये या बना-बनाया भोजन; किन्तु वह बहुत ही सादा होना चाहिए। हाथकी मोटी रोटी, चपाती अथवा खिचड़ी, शाक और दूध या दहीके सिवा और किसी चीजकी जरूरत नहीं है। कोई पक्वान्न या मिठाई यदि बनी भी होगी<noinclude></noinclude>
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''३३. सत्याग्रही-दलका कूच'''}}}}
इस दलमें लगभग १०० लोगोंके होनेकी सम्भावना है। इस समय आश्रममें रहनेवालोंके सिवा जो अन्य लोग आश्रमके नियमोंका पालन करते हैं और जानेको उत्सुक हैं तथा जिन्हें साथ ले जाना आवश्यक है, मैं उन्हें भी ले रहा हूँ। इसलिए मैं अन्तिम सूची तैयार नहीं कर पाया हूँ।
१२ मार्चको सवेरे ६॥ बजे कूच शुरू होगा। अबतक जो कार्यक्रम तैयार हुआ है वह इस प्रकार है :
::{|width=85%
|-
| बुधवार, तारीख १२ || || असलाली
|-
| बृहस्पतिवार, तारीख १३ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || बारेजा<br>नवागाँव
|-
| शुक्रवार, तारीख १४ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || वासणा<br>मातर
|-
| शनिवार, तारीख १५ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || डभाण<br>नडियाद
|-
|रविवार, तारीख १६ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || बोरियावी<br>आणंद
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|-
|मंगलवार, तारीख १८ || प्रातःकाल<br>सायंकाल || रास<br>बदलपुर
|}
इन गाँवोंके मुखियों और सेवकोंसे मेरा निवेदन है कि वे नीचे लिखी सूचनाओंको
ध्यानमें रखें।
आशा है कि हर स्थानपर दल सवेरे ८ बजेके पहले पहुँच जायेगा और १० से १०॥ के बीच भोजनके लिए बैठ जायेगा। मुमकिन है, पहले दिन असलाली पहुँचते-पहुँचते ९॥ बज जायें। दोपहर या रातको ठहरनेके लिए किसी मकानकी आवश्यकता नहीं होगी; छायादार साफ जगह मिल जाये, इतना ही काफी है। जहाँ छायादार, साफ जगह न हो वहाँ बाँस और घास-फूसका कामचलाऊ मंडप डलवा देना काफी होगा। इन दोनों चीजोंका बादमें पूरा उपयोग किया जा सकता है।
यह मान लिया गया है कि भोजन गाँववाले ही करायेंगे।
भोजनके लिए सीधा-सामान मिलनेपर दलके लोग अपने हाथसे रसोई बना लेंगे। भोजनका सामान दिया जाये या बना-बनाया भोजन; किन्तु वह बहुत ही सादा होना चाहिए। हाथकी मोटी रोटी, चपाती अथवा खिचड़ी, शाक और दूध या दहीके सिवा और किसी चीजकी जरूरत नहीं है। कोई पक्वान्न या मिठाई यदि बनी भी होगी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/७४
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Vineet Kumar Tiwari 29
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>तो वह ली नहीं जायेगी। शाक सिर्फ उबाला हुआ होना चाहिए। उसमें तेल, मिर्च-मसाला, मिर्च-लाल या हरी, पिसी हुई या साबूत न डाली जायें। मैं चाहता हूँ कि सब जगह निम्नलिखित ढंगसे खाना तैयार किया जाये :
सवेरे कूच करनेसे पहले राब और मोटी रोटी दी जाये। राब बनाने का काम हमेशा दलके जिम्मे ही रहने दिया जाये।
दोपहरको भाकरी, शाक और दूध या मट्ठा दिया जाये।
साँझको कूच करनेसे पहले चने और मुरमुरे दिये जायें।
रातको खिचड़ी और शाक तथा मट्ठा या दूध दिया जाये।
घी फी आदमी कुल मिलाकर तीन तोलेसे ज्यादा किसी हालत में नहीं होना चाहिए। एक तोला राबमें, एक तोला भाकरी पर ऊपरसे, और एक तोला रातको खिचड़ीमें। मेरे लिए सवेरे, शाम और दोपहरको अगर मिल सके तो बकरीका दूध, और सूखी किशमिशें अथवा खजूर और तीन खट्टे नीबू काफी होंगे।
मुझे उम्मीद है कि इस तरहके सादे भोजनके प्रबन्धके सिवा और किसी तरहका खर्च गाँववाले नहीं करेंगे।
हर गाँव और आसपासके गाँवोंके लोगों से मिलनेकी मैं आशा रखूंगा।
सोनेके लिए जरूरी बिछौना वगैरा सामान हरएक आदमीके पास होगा, अतएव सोनेके लिए साफ जगह के सिवा गाँववालोंको और किसी तरहका प्रबन्ध करनेकी जरूरत न होगी
।
गाँववालोंका दलके लिए पान-सुपारी या चायका खर्च उठाना निरर्थक होगा।
यदि हरएक गाँव में सफाईका ठीक-ठीक प्रबन्ध किया जाये तो अच्छा होगा। सत्याग्रहियों के लिए पाखानेकी जगह पहलेसे ही मुकर्रर कर ली जाये तो अच्छा होगा। नजदीक ही कुछ आड़ हो तो अच्छा हो। यह स्पष्ट है कि यदि गाँववाले अबतक खादीका उपयोग न करते हों तो अब करने लगें।
मैं चाहूँगा कि हरएक गाँवके बारेमें नीचे लिखी सूचनाएँ तैयार रखी जायें:
१. आबादी : स्त्री-पुरुषों—हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों इत्यादिकी संख्या।
२. अस्पृश्योंकी संख्या।
३. मदरसा हो तो उसमें पढ़नेवाले बालक-बालिकाओंकी संख्या।
४. चरखोंको संख्या।
५. खादीकी माहवार खपत।
६. पूर्ण खादीधारियोंकी तादाद।
७. फी आदमी कितना नमक खर्च होता है? मवेशी वगैराके लिए कितने नमकका उपयोग होता है?
८. गाँवमें गाय-भैंसोंकी संख्या।
९. लगान कितना दिया जाता है? लगानकी दर क्या है?
१०. गोचर भूमि है? यदि है, तो कितनी?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पत्र: मणिबहन पटेलको|३७}}</noinclude>
११. लोग शराब पीते हैं? शराबकी दुकान कितनी दूर है?
१२. अस्पृश्योंके लिए पढ़ने-लिखनेकी या अन्य सुविधाएँ हों तो उनका उल्लेख।
ये सब सूचनाएँ एक साफ कागजपर लिखकर मेरे पहुँचते ही यदि मुझे दे दी जायें तो अच्छा होगा।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' ९-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''३४. पत्र : मणिबहन पटेलको'''}}}}
{{right|९ मार्च, १९३०}}
{{left|चि॰ मणि,}}
तेरे पत्रकी तो मैं रोज बाट देखता था। तेरी याद किये बिना एक दिन भी नहीं गया। परन्तु तुझे मैं लापरवाह लगूं, सो समझ सकता हूँ। मेरी करुणाजनक स्थिति इसके लिए जिम्मेदार है। मुझे सिर उठाकर किसीको देखने तकका समय नहीं मिलता। तू कहाँ है, क्या हो रहा है इत्यादि जानकर संतोष कर लिया करता था।
बापू<ref>तात्पर्य सरदार वल्लभभाई पटेलसे है।</ref> तो तेरे बारेमें कुछ कह ही नहीं गये।<ref>मणिबहन उस समय बीमार थीं और बम्बई में इलाज करवा रही थीं।</ref> उन्हें [अपनी गिरफ्तारीके बारेमें] कहाँ मालूम था? तुझे वहीं रहना है जहाँ तू शान्त और सुखी रह सके। जेलमें तो समय आनेपर जरूर जा सकेगी। इस बारेमें महादेवने लिखा है। जानता हूँ, आश्रम में तुझे अच्छा लगेगा। परन्तु मेरी राय है कि यह ठीक नहीं। फिर भी इसमें निग्रह काम नहीं देता। इसलिए शान्त रहता हूँ। मेरी यही इच्छा है कि तू जहाँ रहे वहाँ सुखी रहे।
मैं मंगलवारतक गिरफ्तार होनेकी आशा रखता हूँ।
तू हिम्मत बनाये रखना। अपना शरीर सुधारना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|श्रीमती मणिबहन<br>ठि॰ डाह्याभाई वल्लभभाई पटेल<br>श्रीराम निवास<br>पारेख स्ट्रीट<br>बम्बई- ४}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''बापुना पत्रो–४ : मणिबहेन पटेलने'''|1em}}<noinclude>{{Dhr|2em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/७६
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''३५. पत्र : सतीन डी॰ गुप्तको'''}}}}
{{right|[१० मार्च, १९३० के पूर्व]}}
मैं जानता हूँ कि मेरी अनुपस्थितिमें कोई नया नेता देशके सामने आयेगा। हर आदमी अपने-आपको नेता बनाकर आन्दोलनका संचालन करे। इस आन्दोलनकी सफलता सर्वसाधारणके अहिंसामें दृढ़ विश्वासपर निर्भर है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १०-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''३६. भाषण : प्रार्थना-सभा, साबरमती आश्रममें<ref>प्रार्थना सभा के अन्तमें दिये गये भाषणका यह संक्षिप्त सार है। इस प्रार्थना सभा में लगभग दो हजार लोग उपस्थित थे।</ref>'''}}}}
{{right|१० मार्च, १९३०}}
आजकल आप लोग काफी तादादमें प्रार्थना सभामें आते हैं, यह अच्छी बात है। मेरा तो यह कहना है कि आप इससे भी ज्यादा संख्यामें आयें और प्रार्थना में भाग लें। लेकिन एक शर्त है। यदि आप केवल कुतूहलवश आते हैं तो मैं चाहूँगा कि आपमें से कोई भी व्यक्ति न आये। यदि आप भजनमें भाग लेनेके इरादेसे आते हैं, तब तो बहुत सुन्दर बात है। लेकिन प्रश्न उठता है, आप इससे पहले क्यों नहीं आते थे और अब एकाएक कैसे आने लगे। सम्भव है, आप केवल प्रार्थनाके लिए आते हों; और यह भी सम्भव है कि आपको इस संघर्षमें दिलचस्पी हो।
भजन और प्रार्थनाको अगर आप एक कानसे सुनकर दूसरे कानसे निकाल देते हैं तो मैं चाहूँगा कि आप न आयें। लेकिन यदि आप आत्मशुद्धि और आत्मदर्शनके लिए आते हों तो अवश्य आयें। मैं नहीं मानता कि केवल कानसे सुननेवाले और तोतेकी तरह ओठोंसे ईश्वरका नाम रटनेवाले व्यक्तिको उसका नाम लेनेसे कोई लाभ होता है। हममें और तोतेमें भेद है। यदि आप इतना भी नहीं समझते तो
आपके यहाँ आनेका परिश्रम व्यर्थ जायेगा और हमारी शान्तिमें भी खलल पड़ेगा। हम शहरसे इसीलिए इतनी दूर आये हैं कि हमें बाह्य शान्ति मिले और भारतवर्षकी सेवा करनेकी योग्यता प्राप्त कर सकें।
और यदि आप सचमुच शुद्ध हृदयसे प्रार्थनामें भाग लेनेके लिए, उसका रसास्वादन करनेके लिए आते हैं तो उस शुद्धताकी जो बाह्य निशानी है वह अवश्य दिखाई देनी चाहिए। आप सब विदेशी कपड़ोंका त्याग करें और उन्हें जला डालें, इस बातकी अपेक्षा मैं आपसे अवश्य करता हूँ। खादीके अनेक गुण कहे जाते हैं। आप उन सब<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/७७
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण: प्रार्थना सभा, साबरमती आश्रममें|३९}}</noinclude>कारणोंको मानें या न मानें, लेकिन एक बात तो सब लोग स्वीकार करते हैं कि खादी पहनकर हम गरीब से गरीब लोगोंके साथ सम्बन्ध स्थापित कर पाते हैं और खादी पहननेसे हमें हमेशा इस एक बातकी याद हो आती है कि इसे पहनकर हम हिन्दुस्तान के अत्यन्त गरीब लोगोंकी थोड़ी मदद करते हैं।
लेकिन दूसरा कारण तो यह है कि अहमदाबादके भूषण, वीर सरदार वल्लभभाई पटेल इस समय जेलमें विराजे हुए हैं। उनके लिए क्या आप इतना भी नहीं करेंगे? मैं अपनी ओरसे आपसे इतना ही कहूँगा कि खादीने जो प्रगति की है वह न की होती तो आज हम जो आन्दोलन चला रहे हैं वह न चला पाते। इस प्रगतिसे ही मुझे आशा बँधी कि हिन्दुस्तानके घर-घरमें शान्तिका सन्देश पहुँच गया है। कारण, जिन्हें खादी अच्छी लगती है उन्हें शान्तिप्रिय होना ही चाहिए। जिसे शान्तिमें विश्वास न हो, जिसे अहिंसापर भी आस्था न हो वह व्यक्ति या तो बाह्य मर्यादाके पालनके लिए, अथवा लोगोंको धोखा देनेके लिए या खादीकी बिक्री बढ़ानेके लिए
खादी पहनता होगा।
अब आप जिस अन्य वस्तुके लिए यहाँ आते हैं उसके बारेमें कुछ शब्द कहता हूँ। कल कोई पौन सौ व्यक्तियोंको लेकर मैं कूच आरम्भ करनेवाला हूँ। सभी कह रहे हैं कि भीषण युद्ध होनेवाला है और सारी दुनियाकी आँखें इस ओर लगी हुई हैं।
विचार कीजिए, आप सब लोग यहाँ तो निर्भय होकर आ जाते हैं। लेकिन गोलियोंकी बौछारके सामने आप टिके रह सकते हैं, ऐसा मैं नहीं मानता। मान लीजिए, सत्याग्रहके युद्धके बदले मैंने यह कहा होता कि मैं १२ तारीखको गोलीबारी करनेवाला हूँ अथवा लाठी चलानेवाला हूँ, अथवा गोलियों और लाठियोंकी बात जाने दें, पत्थर फेंकनेवाला हूँ, अथवा जिससे मिलूँ उसे तमाचा मारनेवाला हूँ तो क्या सरकारने मुझे अभी तक बाहर रहने दिया होता? संसारके इतिहासमें आप एक भी ऐसा उदाहरण नहीं बता सकते जहाँ साम्राज्यको गोलीसे उड़ा देनेकी धमकी देनेवाले व्यक्तिको सम्राट् अथवा लोकतन्त्र सहन करता हो—फिर भले वह अमेरिका हो अथवा रूस। मगर आज यहाँ तो सरकार सोचमें पड़ गई है।
आज तो मैं नमक-कानूनको तोड़नेकी बात करता हूँ, लेकिन यदि कल यह कहूँ कि हम साबरमतीमें डूबकर मरनेवाले हैं तो सरकार क्या करेगी, आप क्या करेंगे? सरकार कदाचित् हमें बचानेके लिए आश्रमको घेर लेगी? और आप लोग हमसे ऐसा न करनेके लिए विनती करेंगे। लेकिन आप आज यहाँ केवल तटस्थ रहकर तमाशा देखनेके लिए नहीं आये हैं। यह चीज आपको अच्छी लगती है। कानून-भंग और जेलसे मैंने आपको इतना परिचित करा दिया है कि आपको इसमें रस आने लगा है। इसलिए अब मैं आपसे कहता हूँ कि आप एक कदम और आगे बढ़ें। हिन्दुस्तान के सात लाख गाँवोंमें यदि दस-दस व्यक्ति भी नमक बनानेके लिए निकल पड़ें तो यह राज्य, यह सरकार क्या कर सकती है? अभी तक कोई भी ऐसा बादशाह नहीं हुआ है जिसने बिना किसी कारणके किसीको तोपके आगे कर दिया हो। इस तरह शान्तिसे कानून-भंग करके हम सहज ही सरकारको बुजदिल बना सकते हैं। आप सब इस लड़ाईका रहस्य समझ सकें, इसीलिए यह सब कहता हूँ। यदि<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/७८
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आपको इसमें दिलचस्पी नहीं है, तो बेहतर हो कि आप मेरा और अपना समय नष्ट न करें।
यदि आप केवल हमें और हमारे आन्दोलनको आशीर्वाद देने आये हैं तो उस आशीर्वादका कोई ठोस रूप होना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि हम इस युद्धको कमसे कम पैसे से लड़ सकेंगे। १९१८ में खेड़ा सत्याग्रहके समय मैंने चन्दा इकट्ठा करनेके कुछ सुझावोंको नामंजूर कर दिया था। बारडोलीमें एक अपील जारी की गई थी और उसके उत्तरमें लोगोंने मुक्त हृदयसे पैसा दिया था, लेकिन उसमें प्राप्त बहुत-सी रकम बचा ली गई थी और अब उस राशिको रचनात्मक कार्योंमें लगाया जा रहा है। अतएव इस समय मैं आपसे कोई धन देनेके लिए नहीं कहता। जब हमारे कष्टोंकी अति हो जायेगी तब आप लोग बिना कहे धनकी सहायता देंगे। लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप साहससे काम लें तथा इस लड़ाईमें, जो भीषण होगी और लम्बी चलेगी, अधिकसे-अधिक लोग भाग लें। मैं अहमदाबादसे, उन वल्लभभाईके अमदाबादसे जो पहलेसे ही जेलमें हैं, निश्चय ही यह आशा करता हूँ कि वह हमें असंख्य स्वयंसेवक प्रदान करेगा और एक-के-बाद-एक जत्था गिरफ्तार होता जायेगा तथा जेल जाता रहेगा; इस तरह यह सिलसिला कभी नहीं टूटेगा। आपसे मैं कमसे-कम इतनी बातकी अपेक्षा रखता हूँ। ईश्वर आपको शक्ति दे और आप कसौटी
पर पूरे उतरें!<ref>अन्तिम अनुच्छेद १२-३-१९३० के '''यंग इंडिया'''से लिया गया है।</ref>
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १६-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''३७. सन्देश : आन्ध्र देशके लिए'''<ref>यह सन्देश राजमुन्द्री नगर कांग्रेस कमेटी के तत्वावधान में ११ मार्चको आयोजित एक सार्वजनिक सभामें पढ़ा गया था।</ref>}}}}
{{right|[११ मार्च, १९३०के पूर्व]}}
यह संघर्ष ऐसा है जिसमें अन्तिम निर्णय हो जायेगा। ईश्वर हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। इस संघर्षको तबतक जारी रखना है जबतक कि सत्याग्रह करनेके लिए सामने आनेवाला एक भी आदमी शेष है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''हिन्दू,''' १४-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|6em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
dva91ht7qn5lxxz3y1a5tmmlngv90ht
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/७९
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''३८. भेंट : एच॰ डी॰ राजाके साथ'''<ref>यह सम्पादक के नाम लिखे एक पत्रके रूपमें छपा था।</ref>}}}}
{{right|[११ मार्च, १९३० या उसके पूर्व]}}
'''आगामी संघर्ष और उसमें नौजवानों की भूमिका के बारेमें गांधीजी से मेरी लम्बी बातचीत हुई। गांधीजी ने कहा :'''
मैं १२ तारीखकी सुबह यह संघर्ष पूरी उत्कटताके साथ आरम्भ करूगा। इसे तबतक चलाना है जबतक कि हम उद्देश्यको प्राप्त न कर लें। या तो हम इस संघर्ष में दुनिया से मिट जायेंगे या इसमें से पूर्ण स्वतन्त्रताका उपभोग करनेवाले एक स्वतन्त्र राष्ट्रके रूपमें निकलेंगे। इस संघर्ष में हम अपना कदम पीछे हटाये बिना सीना तानकर गोलियोंका सामना करेंगे। इस सक्रिय सविनय अवज्ञा-संघर्ष में हम पुरुषों तथा स्त्रियोंसे जेलोंको भर देंगे, लेकिन किसी भी हालत में पीछे नहीं हटेंगे।
'''जब मैंने उनसे पूछा कि उनकी गिरफ्तारीके बाद लोगोंको क्या करना चाहिए तो गांधीजी ने जबाव दिया :'''
हाँ, मैं तो किसी भी क्षण गिरफ्तार कर लिये जानेकी उम्मीद करता हूँ। लेकिन मेरी गिरफ्तारीके बाद भी संघर्ष चलता रहना चाहिए। प्रान्त, जिला अथवा ताल्लुकेकी कांग्रेस कमेटियोंको आन्दोलनका संगठन करना चाहिए।
'''इस संघर्ष में युवक संगठन क्या भूमिका अदा कर सकते हैं?'''
युवक संगठनोंको स्वयंसेवक तैयार करने चाहिए और इन स्वयंसेवकोंको कांग्रेस कमेटियोंके सुपुर्द कर देना चाहिए। ये कमेटियाँ ही यह तय करेंगी कि क्या करना है। अगर किसी जगहकी कांग्रेस कमेटी अपना काम नहीं कर पाती तो युवक संगठनको वह काम अपने हाथ में लेकर करना चाहिए। . . .
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १२-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Dhr|12em}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
cb9rr56fl8tws2derkcqzkdnhhgvnc5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/८०
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Vineet Kumar Tiwari 29
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''३९. भेंट : 'मैंचेस्टर गार्जियन' के प्रतिनिधिको'''}}}}
{{right|साबरमती आश्रम<br>[११ मार्च, १९३० या उसके पूर्व]<ref>स्पष्ट है कि १२ मार्च, १९३० को कूच करनेके पहले ही गांधीजी ने यह भेंट दी थी।</ref>}}
मैं नहीं जानता कि लन्दनमें गोलमेज कान्फरेंस करनेसे भारतको कोई लाभ होगा। भारतीय ही भारतीयके खिलाफ लड़ें, मैं दुनियाको यह दुःखद दृश्य देखनेका मौका न देना चाहूँगा, लेकिन कान्फरेंस हुई तो अभी उसमें जैसे लोगोंको शामिल करनेकी बात है, उससे यही प्रतीत होता है कि वहाँ वैसा ही दृश्य उपस्थित होगा। मैं उसमें समय नहीं बरबाद करूँगा। मुझे आशा है कि मेरा आन्दोलन सफल होगा। मैं उम्मीद करता हूँ कि इस आन्दोलनसे हिंसा नहीं भड़केगी, लेकिन अगर वैसा हुआ तो भी मैं अपना कदम पीछे नहीं हटा सकता। मैंने एक बार नेहरू रिपोर्टका समर्थन किया था, मगर तबसे स्थिति बहुत-कुछ बदल गई है।
मैं स्वीकार करता हूँ कि हो सकता है, यह अन्तिम अवसर साबित हो और अगर मैं इस अवसरका लाभ नहीं उठाता तो और कोई अवसर शायद कभी आये ही नहीं । क्रान्तिकारी और बेशक, हिंसावादी आन्दोलनका जोर खूब बढ़ा है। अतएव जल्दी से जल्दी कार्रवाई करनेकी आवश्यकता स्पष्ट है। धार्मिक वैमनस्यका सवाल और देशी राज्योंकी समस्या, ये तो गौण प्रश्न हैं और जबतक सत्ता हमारे अपने हाथोंमें नहीं आ जाती तबतक इनका समाधान नहीं हो सकता। मैं नहीं समझता कि अब मैंने जो हल सामने रखा है, उसके अलावा भारतकी समस्याका कोई और हल भी है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''हिन्दू,''' ११-६-१९३०|1em}}
{{Dhr}}
{{larger|{{c|'''४०. सन्देश रिकार्ड किये जानेके सम्बन्धमें'''<ref>राजेन्द्रप्रसादने सुझाव दिया था कि गांधीजी का सन्देश रिकार्ड कर लिया जाये ताकि उनकी गिरफतारी के बाद उसे बजाया जा सके। इसके उत्तर में उन्होंने उपर्युक्त शब्द कहे।</ref>}}}}
{{right|[११ मार्च, १९३० या उसके पूर्व]}}
यदि मेरे सन्देशमें सचाई है तो मैं जेलके बाहर रहूँ या भीतर, लोग उसकी ओर अवश्य ध्यान देंगे। लेकिन यदि उसमें कोई सचाई नहीं है तो अपनी सब कोशिशोंके बावजूद, बल्कि ग्रामोफोनकी मददसे भी, आप उसे जनता तक नहीं पहुँचा सकेंगे। हम जो सत्याग्रह आरम्भ करने जा रहे हैं, यदि वह सचमुच सत्याग्रह, अर्थात् सत्यका आग्रह है और यदि हम सत्य और अहिंसाके आधारपर आगे<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/८१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||प्रश्नोत्तर|४३}}</noinclude>बढ़नके लिए तैयार हैं तो लोग मेरे शब्दोंको सुनें अथवा न सुनें, मेरी आवाज उनके कानों तक पहुँचे अथवा न पहुँचे, यह आन्दोलन अवश्य सफल होगा। इसलिए इस तरहका रिकार्ड न तो जरूरी है और न इससे कोई मदद मिलनेवाली है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''ऐट द फीट ऑफ महात्मा गांधी'''|1em}}
{{Dhr}}
{{larger|{{c|'''४१. प्रश्नोत्तर'''<ref>इन प्रश्नोतरोंकी रिपोर्ट महादेव देसाईंने तैयार की थी और ये "कूचसे पहले बातचीत" शीर्षकसे छपे थे।</ref>}}}}
{{right|[११ मार्च, १९३० या उसके पूर्व]}}
'''प्र॰ : आप कैसी सरकार चाहते हैं?'''
उ॰ : मैं ऐसी सरकार चाहता हूँ जो जनताकी इच्छा पूरी करे, जनता जो कहे वही करे।
'''प्र॰ : यानी आप लोकतन्त्र चाहते हैं?'''
उ॰ : शब्दोंके झमेलेमें मैं नहीं पड़ता, और सरकारका बाह्य रूप क्या हो, इसकी चिन्ता मैं कभी नहीं करता।
'''प्र॰ : लेकिन उसके तरीकोंको चिन्ता तो करते हैं?'''
उ॰ : हाँ, उनकी तो मैं बहुत चिन्ता करता हूँ, लेकिन सरकारके रूपकी नहीं।
'''प्र॰ : तब तो आपको राजतन्त्रपर भी कोई आपत्ति नहीं होगी?'''
उ॰ : मैंने कहा न कि सरकारके रूप और तन्त्रकी मैं ज्यादा परवाह नहीं करता।
'''प्र॰ : अच्छा तो अब यह बताइए कि आपके लोकतन्त्रका स्वरूप क्या होगा?'''
उ॰ : मुझे नहीं मालूम। मेरा मतलब तो सिर्फ तरीकेसे है और तरीकेसे मेरा तात्पर्य यह है कि कोई सरकार जनताकी इच्छा किस तरह पूरी करती है। इसके दो ही तरीके हैं : एक तो है फरेब और जोर-जबरदस्तीका तरीका और दूसरा है अहिंसा और सत्यका तरीका। जोर-जबरदस्तीमें झूठ और फरेब तो बराबर शामिल ही रहता है, अहिंसा में उसके लिए कोई स्थान नहीं होता।
'''प्र॰ : लेकिन क्या अहिंसा में झूठ फरेब नहीं हो सकता?'''
उ॰ : नहीं, यह असम्भव है। फरेब तो अपने-आपमें एक प्रकारकी हिंसा है।
'''प्र॰ : मगर मैंने तो अहिंसाके साथ फरेबको भी चलते देखा है। चीनकी ख्याति दुनियाके एक सबसे शान्तिपूर्ण देशके रूपमें है, लेकिन अगर मैं बताऊँ कि वहाँ कितना झूठ और फरेब चलता है तो आप चकित रह जायेंगे।'''
उ॰ : मैं फिर यही कहता हूँ कि शब्दोंके झमेलेमें मैं नहीं पड़ता। एक राष्ट्रके रूपमें चीनी लोग दुनियाकी सबसे अधिक शान्तिप्रिय जातियोंमें से हैं, लेकिन अगर वहाँ फरेब भी चलता है तो फिर वह शान्ति सच्ची और सहज नहीं हो सकती। अगर मैं मनमें किसीके प्रति दुर्भावना रखता हूँ लेकिन उसे व्यवहारसे प्रकट नहीं करता तब<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/८२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|४४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>भी मेरा आचरण हिंसात्मक ही माना जायेगा। अहिंसा या शान्तिसे मेरा तात्पर्य उस शान्तिसे है जो आन्तरिक बलके बोधसे आती है। अगर मुझमें वह शान्ति, वह अहिंसा है तो मेरे अन्दर घृणा हो ही नहीं सकती। हिंसाका अर्थ आवश्यक रूपसे किसीको शारीरिक क्षति पहुँचाना ही नहीं होता। मैं हर व्यक्तिको जो बात समझानेको उत्सुक हूँ वह यह है कि मैं नहीं चाहता, भारत सन्दिग्ध तरीकोंसे अपने लक्ष्यको प्राप्त करे। यह सम्भव है या नहीं, यह तो अलग बात है। मेरे वर्तमान प्रयोजनके लिए तो इतना ही काफी है कि जो भी व्यक्ति [स्वराज्यकी प्राप्तिकी] योजना बनाये और जनताका नेतृत्व करे वह पूरी तरह खरा हो और उसके अन्दर अहिंसा और सत्यका निवास हो। अहिंसा अपना काम यन्त्रवत् नहीं करती, वह तो एक जीवन्त शक्तिकी तरह ही काम करती है। इसीलिए मैंने कांग्रेसकी कार्य-समितिसे अपनी अहिंसाकी योजनापर अमल करनेके लिए निर्वाध सत्ताकी माँग की।
'''प्र॰ : मगर गांधीजी, क्या आप ऐसा नहीं समझते कि विदेशी मालका बहिष्कार सविनय अवज्ञासे कहीं अधिक प्रभावशाली साबित होगा?'''
उ॰ : वर्षों पूर्व मैंने यह निरर्थक नारा सुना था और उसके स्थानपर मैंने विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको मान्यता दी। इसका कुछ असर भी हुआ, लेकिन तमाम विदेशी मालके बहिष्कारकी योजनाका तो कोई प्रभाव ही नहीं हुआ।
'''प्र॰ : मेरा तो खयाल है कि बंगालमें ब्रिटिश मालके बहिष्कारका आन्दोलन सफल रहा, मगर अन्य किसी प्रान्तने उसे आजमाकर देखा ही नहीं?'''
उ॰ : नहीं, वह थोड़ा-बहुत चलकर विफल हो गया था। अहमदाबाद और बम्बईकी मिलोंने राष्ट्रको देशी मिलोंके कपड़ोंके नामपर विदेशी कपड़े मुहैया किये और जब उन्होंने शुद्ध देशी मिलोंके कपड़े भेजे भी तो उनकी कीमतें बहुत ज्यादा रखीं।
'''प्र॰ : यही तो मैं कहना चाहता हूँ। मेरा मतलब है कि उस योजनाको ठीकसे आजमाया नहीं गया।'''
उ॰ : अगर नहीं आजमाया गया तो उसका मतलब यह है कि लोग इसे आजमाना नहीं चाहते थे। जहाँतक मेरा सम्बन्ध है, मेरा विश्वास इसमें कभी नहीं जमा और इसीलिए मैंने इसे समर्थन भी नहीं दिया।
'''प्र॰ : लेकिन क्या सविनय अवज्ञाकी अपेक्षा विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारको आजमाकर देखना आसान नहीं होगा?'''
उ॰ : नहीं। दरअसल वह बहुत ज्यादा कठिन है। विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके लिए आपको ३० करोड़ लोगोंके सहयोगकी आवश्यकता होगी, लेकिन सविनय अवज्ञाके लिए तो आपके पास केवल दस हजार दृढ़निश्चय स्त्री-पुरुष हों तो उतनेमें ही काम
चल जायेगा।
'''प्र॰ : सो कैसे? उन सबको जेलोंमें तो बन्द किया जा सकता है और जैसे ही उनको जेलोंमें बन्द किया कि सारा किस्सा खत्म।'''
उ॰ : उनको यह प्रयोग करके तो देखने दीजिए। सरकार इन सारे लोगोंको फाँसीके तख्तेपर लटकाकर ही इनसे नजात पा सकती है। अगर ये लोग विश्वस्त<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||प्रश्नोत्तर|४५}}</noinclude>और सच्चे हैं तो इनकी उपस्थिति मात्र सरकारके लिए जानलेवा परेशानीका कारण होगी।
'''प्र॰ : क्या ये जेलमें भी सरकार के लिए चिन्ताका कारण होंगे?'''
उ॰ : इतना तो है ही कि सरकार उन्हें बहुत लम्बे अरसे तक जेलोंमें नहीं रख सकती। सचाई यह है कि १९२१में हमारे पास दस हजार तो क्या, ५ हजार सच्चे सविनय प्रतिरोधी भी नहीं थे । हर राजनीतिक कैदी सविनय प्रतिरोधी ही नहीं होता।
'''प्र॰ : आपके आन्दोलन से क्या हिंसा भड़कने का खतरा नहीं है?'''
उ॰ : हो सकता है, उससे हिंसा भड़क उठे, हालांकि मैं तो ऐसी स्थिति न आने देनेके लिए भरसक कोशिश कर रहा हूँ। मगर आज हिंसा भड़कनेका कहीं अधिक खतरा है, क्योंकि आज मैं जिस प्रकारके अहिंसात्मक आन्दोलनकी बात सोच रहा हूँ, वैसे किसी आन्दोलनके अभाव में लोगोंके सामने अपने रोष और असन्तोषको सही दिशा देनेका कोई उपाय नहीं है।
'''प्र॰ : हाँ-हाँ, मैंने ऐसा तो सुना है कि आप कहते हैं कि आप हिंसाको रोकनके ही उद्देश्यसे यह आन्दोलन प्रारम्भ करने जा रहे हैं।'''
उ॰ : हाँ, यह मेरी एक दलील तो है, मगर सबसे निर्णायक दलील नहीं। मेरी दूसरी और सबसे बड़ी दलील यह है कि यदि अहिंसाको अपनी क्षमता सिद्ध करनी है तो उसका उपयुक्त समय यही है। कुछ क्षेत्रोंमें इसे निष्क्रिय, यहाँतक कि निर्वीर्य उपाय माना जाने लगा है। इसे अपने-आपको इस कलंकसे मुक्त कराना है। और जब इसका प्रयोग अत्यन्त प्रभावकारी ढंगसे किया जाये तो इसे घातकसे घातक बाहरी बाधाओंके बावजूद सफलतापूर्वक काम कर सकना चाहिए। सच तो यह है कि अहिंसा में सहज ही वह शक्ति विद्यमान है जो समस्त बाहरी बाधाओंको निरर्थक बना देती है। इसके विपरीत, भीतरी बाधाएँ, जैसे झूठ-फरेब, घृणा और दुर्भावना, इस आन्दोलनके लिए घातक सिद्ध होंगी। अबतक तो मैं यह कहा करता था कि "पहले मुझे हिंसात्मक तत्त्वोंपर काबू पा लेने दो।" मगर अब मुझे इस बातकी प्रतीति होती जा रही है कि अहिंसाकी शक्तिको सक्रिय बनाकर ही हिंसात्मक तत्त्वों पर काबू पाया जा सकता है।
मगर मैं लोगोंको ऐसा कहते सुनता हूँ कि भारतमें इतिहास अपने-आपको दोहरायेगा। ठीक है, अगर यही होना है तो हो। मगर जहाँतक मेरा सम्बन्ध है, मैं तो इस आन्दोलनको स्थगित नहीं कर सकता। अगर करूंगा तो कायरताके आरोपका भागी बनूँगा। मुझे तो उस प्रणालीके खिलाफ, जो हिंसापर आधारित है, मरते दमतक लड़ना है और इस तरह राजनीतिक हिंसापर काबू पाना है। जब सच्ची और सजीव अहिंसा क्रियाशील हो उठेगी तो आम जनता पर भी उसका प्रभाव अवश्य होगा और वह बहादुरोंकी तरह उठ खड़ी होगी।
'''प्र॰ : लेकिन आपके जेल भेज दिये जानेके बाद तो आन्दोलन आपके नियन्त्रणमें नहीं रह जायेगा?'''
उ॰ : दक्षिण आफ्रिकाका आन्दोलन अपने उत्तरार्धमें मेरे नियन्त्रणमें नहीं रह गया था। उन दिनों मेरे कुछ किये बिना ही यह खूब जोर पकड़ता गया। हजारों लोग<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/८४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|४६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>सहज ही उसमें शामिल हो गये। उन सबको जाननेकी बात तो दूर रही, मैंने उनके चेहरे भी नहीं देखे थे। वे उस आन्दोलनमें इसलिए शरीक हुए कि उन्हें लगा कि उन्हें शरीक होना ही है। उन्होंने शायद मेरा नाम-भर सुना था, लेकिन उन्होंने तुरन्त देख लिया कि वह उनकी मुक्तिका आन्दोलन था; उन्होंने यह जाना कि एक आदमी तीन पौंडी कर के खिलाफ लड़नेको तैयार है और बस इतना ही जानकर सब संघर्षमें कूद पड़े। और कैसी जबरदस्त कठिनाइयोंकी उपेक्षा करके? उनकी खानें उनके लिए जेल बना दी गई; जो लोग उनपर रात-दिन अत्याचार करते थे, उन्हींको उनके वॉर्डर बना दिया गया। वे जानते थे कि इस संघर्ष में कूदनेका मतलब यह है कि उन पर कहर बरपा किया जायेगा। मगर तब भी वे तनिक नहीं डिगे, जरा भी विचलित नहीं हुए। यह सब एक चमत्कार ही था।
'''प्र॰ : लेकिन क्या इस आन्दोलनसे देशमें पहलेसे ही मौजूद फूट और मतभेदोंमें और भी वृद्धि नहीं होगी?'''
उ॰ : मुझको ऐसी कोई आशंका नहीं है। हिंसात्मक तत्त्वोंकी ही तरह फूट और विभेद डालनेवाली शक्तियोंको भी काबू में रखा जा सकता है। हो सकता है, हिंसामें विश्वास करनेवाला पक्ष मेरे कार्योंके प्रति अनुकूल प्रतिक्रिया न दिखाये; सम्भव है, जन-साधारण अविवेकसे काम ले। लेकिन मैं आशावादी हूँ और मानव-स्वभावकी अच्छाई में मेरा अखण्ड विश्वास है। हिंसा में विश्वास रखनेवाला पक्ष मुझे अपना तरीका आजमाकर देखनेका पूरा अवसर देगा और सर्वसाधारणकी प्रतिक्रिया उसके सहज स्वभावके ही कारण बिलकुल ठीक होगी। हो सकता है, मैं कल्पना लोकमें विचरण कर रहा होऊँ। लेकिन कोई भी सेनापति समस्त आकस्मिक परिस्थितियोंके मुकाबलेकी तैयारी पहलेसे नहीं कर सकता। मैं तो इसे अपने जीवन में प्राप्त एक सुनहला मौका मानता हूँ। इस आन्दोलनको मैंने न्योता नहीं दिया है। मुझे तो लगभग न चाहते हुए कलकत्ता जाना पड़ा था। वहाँ मैंने एक समझौता किया और उसके बारेमें भी यही कहूँगा कि मुझे वैसा करना पड़ा। दो सालकी अवधिके स्थानपर मैंने एक सालकी अवधि रखी, सो सिर्फ इसलिए कि उसमें किसी तरहके नैतिक सिद्धान्तका कोई सवाल नहीं था। लाहौर में लगभग सभी प्रस्ताव मुझे ही सोचने और तैयार करने पड़े। वहाँ मैंने हिंसा और अहिंसाकी शक्तियोंको साथ-साथ पूरी तरह खुलकर काम करते देखा; और मैंने पाया कि अन्ततः अहिंसाने हिंसाको परास्त कर दिया है।
'''प्र॰ : कुछ समय पहले तो आपने कहा था कि अभी सविनय अवज्ञाके लिए ठीक अवसर नहीं आया है। तबसे अबतक ऐसा क्या हो गया जिससे आपने अपना विचार बदल दिया?'''
उ॰ : मेरा निश्चित मत है कि अब उसके लिए बिलकुल ठीक समय आ गया है। कारण आपको बताता हूँ। इस अवधि में बाहर तो कुछ नहीं हुआ है, लेकिन मेरे अन्तरमें जो द्वन्द्व चल रहा था वह समाप्त हो गया है; और अब मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस आन्दोलनका अवसर तो कब का आ चुका है। इससे बहुत पहले भी इसे मैं मजेसे आरम्भ कर सकता था।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||प्रश्नोत्तर|४७}}</noinclude>
'''प्र॰ : और वह अन्तरका द्वन्द्व क्या था?'''
उ॰ : आपको मालूम ही है कि मैंने बराबर एक ही चीजसे मार्ग-दर्शन ग्रहण किया है। वह चीज है अहिंसाके प्रति मेरा रवैया। किन्तु तब मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि बढ़ते हुए हिंसात्मक वातावरणके बीच मैं अहिंसाके प्रति अपने रवैयेको कार्य रूप किस प्रकार दूँ। लेकिन अब मुझे दिनके उजालेके समान साफ नजर आ रहा है कि मैंने जो रास्ता अख्तियार किया है उसपर चलते हुए वास्तवमें मैं उस खतरेको बहुत कम कर देता हूँ जो मैं उठाने जा रहा हूँ।
'''प्र॰ : क्या आपको पूरा यकीन है कि नमक आन्दोलन के परिणामस्वरूप आपको जेल भेज दिया जायेगा?'''
उ॰ : मुझे इस बात में रंचमात्र भी सन्देह नहीं है। हाँ, यह तो मैं नहीं कह सकता कि यह कब होगा, लेकिन मुझे यह जरूर लगता है कि ज्यादातर लोग इस स्थितिके जितनी देरसे आने की बात सोचते होंगे उससे बहुत पहले ही यह आयेगी। मैं उम्मीद करता हूँ कि शीघ्र ही ऐसी स्थिति आ जायेगी जिससे कोई ठीक ढंगकी परिषद् बुलाना आवश्यक हो जायेगा। वह 'राउण्ड टेबल कांफरेंस' की तरह कोई गोलमोल किस्मकी परिषद् नहीं होगी, बल्कि 'स्क्वेयर टेबल कांफरेंस' होगी, जिसमें विभिन्न पक्ष अपनी बात ईमानदारीसे साफ-साफ कहेंगे और जिसमें शरीक होनेवाले हर व्यक्तिको इसका भान होगा कि वह कहाँ खड़ा है। अभी तो मैं उस परिषद्की ठीक-ठीक रूप-रेखा नहीं बता सकता, लेकिन इतना कह सकता हूँ कि वह परिषद् भारतमें एक स्वतन्त्र संविधानकी स्थापनाके उपायोंपर आपसमें मिल-बैठकर विचार करनेके लिए एक बिलकुल बराबरीके पक्षोंकी परिषद् होगी।
'''प्र॰ : वाइसरायके साथ चल रही वार्त्ता जो एकाएक बीचमें ही खत्म हो गई, उसके लिए क्या आप ही जिम्मेदार नहीं थे?'''
उ॰ : मैं जानता हूँ कि कुछ क्षेत्रोंमें लोगोंका ऐसा ही खयाल। जनताने भी कुछ समयतक मुझे दोष दिया, लेकिन अब वह वास्तविकताको समझ गई है।
'''प्र॰ : क्या आप निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि आपने जो स्थिति अपनाई, वह युवा पीढ़ीके प्रभावके दबाव के कारण नहीं अपनाई?'''
उ॰ : नहीं, बिलकुल नहीं। मैं गोलमेज कांफरेंस के लिए कभी भी उत्सुक नहीं था। हाँ, जितना आगे जा सकता था उतना आगे तो मैं अवश्य गया। मगर जिस मुख्य वस्तु का मैं बराबर आग्रह करता रहा वह यह थी कि कांग्रेसको भारतकी आवश्यकताओंके अनुरूप औपनिवेशिक स्वराज्य की योजना तैयार करनेके प्रश्नको ही हाथमें लेना चाहिए। अगर वाइसरायने हामी भर दी होती तो मैं उनसे खुशी-खुशी दूसरे मुद्दोंपर विचार करने को कहता।
'''प्र॰ : मतलब यह कि उस योजनाके कुछ वर्ष बाद क्रियान्वित किये जानेपर आपको कोई आपत्ति नहीं थी?'''
उ॰ : यदि योजना ऐसी होती कि वह कुछ समय बाद ही क्रियान्वित की जा सकती तो मैं उसे वहीं अस्वीकार कर देता। मगर मुझे वाइसरायके साथ हुई बात-<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहरा होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''
२६ मार्च, १९३०
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं
मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो
मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर
भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है।
इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहरा होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''
२६ मार्च, १९३०
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं
मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो
मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर
भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है।
इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहरा होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''
२६ मार्च, १९३०
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहरा होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}}
२६ मार्च, १९३०
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहरा होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}}
{{Right|२६ मार्च, १९३०}}
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude>
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हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहरा होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}}
{{Right|२६ मार्च, १९३०}}
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude>
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हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहरा होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}}
{{Right|२६ मार्च, १९३०}}
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
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{{Right|१३३}}
हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहराम होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}}
{{Right|२६ मार्च, १९३०}}
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude>
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हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहराम होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
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जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
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[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}}
{{Right|२६ मार्च, १९३०}}
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
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सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७६
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>१३४
{{C|{{larger|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते;वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-
एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर
एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए
यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने
इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
प्रजावन्धु, ३०-३-१९३०
चि० मीरा,
१२८. पत्र : मीराबहनको
[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती
है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके
पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है।
एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम
जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके
वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती
हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता
चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो
सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है।
सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६१७
से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भाँव थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते;वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-
एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर
एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए
यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने
इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
प्रजावन्धु, ३०-३-१९३०
चि० मीरा,
१२८. पत्र : मीराबहनको
[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती
है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके
पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है।
एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम
जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके
वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती
हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता
चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो
सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है।
सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६१७
से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भाँव थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।
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Kumari Arpana Sinha
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करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते;वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-
एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर
एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए
यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने
इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
प्रजावन्धु, ३०-३-१९३०
चि० मीरा,
१२८. पत्र : मीराबहनको
[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती
है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके
पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है।
एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम
जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके
वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती
हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता
चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो
सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है।
सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६१७
से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भाँव थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।
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{{C|{{large|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}}}
करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते;वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-
एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर
एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए
यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने
इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
प्रजावन्धु, ३०-३-१९३०
चि० मीरा,
१२८. पत्र : मीराबहनको
[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती
है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके
पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है।
एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम
जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके
वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती
हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता
चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो
सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है।
सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६१७
से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भाँव थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।
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करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते;वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-
एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर
एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए
यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने
इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
प्रजावन्धु, ३०-३-१९३०
चि० मीरा,
१२८. पत्र : मीराबहनको
[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती
है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके
पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है।
एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम
जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके
वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती
हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता
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सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है।
सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६१७
से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भाँव थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।
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मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
,
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[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती
है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
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पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है।
एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम
जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके
वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती
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सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है।
सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६१७
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१. गांधीजी २६ मार्चको भाँव थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।
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मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
,
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{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती
है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके
पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है।
एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम
जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके
वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती
हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता
चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो
सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है।
सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
बापू
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६१७
से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भाँव थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।
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मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
,
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{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
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पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
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अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६१७
से भी ।
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करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते;वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
,
{{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके
पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
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अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
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मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
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पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ? लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
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अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।<noinclude></noinclude>
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करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते; वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्यभार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
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{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
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तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।<noinclude></noinclude>
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करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते; वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्य-भार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
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चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ?' लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।<noinclude></noinclude>
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Kumari Arpana Sinha
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<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>१३४
{{C|{{larger|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}}}
करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते; वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्य-भार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ?' लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३९३
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||भाषण: छरवाड़ा में|३४९}}</noinclude>नहीं फोड़ेंगे? मैं तो यह चाहता हूँ कि देशमें सबके सिर सुरक्षित रहें; एक छोटी-सी लड़की भी देशके किसी भी भागमें सुरक्षापूर्वक घूम-फिर सके। यह तो आत्म-शुद्धिकी लड़ाई है और मैं चाहता हूँ कि आप लोग शुद्ध बनें। यह सम्भव नहीं है कि 'अ' ये काली टोपियाँ या विलायती साड़ियाँ पहनकर धरासणाकी उस जमीन पर, जहाँ नमक बनाया जाता है, चढ़ाई कर सकें। मैं खुद तो ऐसे लोगोंको अपने साथ कदापि नहीं ले जाऊँगा । आप सब वहां चढ़ाई करने जायें उस समय हर एकके शरीरपर खादी होनी चाहिए, सारी पोशाक खादीकी न हो तो मात्र खादीकी लँगोटी पहननी चाहिए। नमककी छोरीकी उम्मीदवारीके लिए आज भले आप मेरे साथ आयें किन्तु जिस दिन मैं सच्ची लूट करनेके लिए आऊँ उस दिन कोई ऐसा व्यक्ति मेरे साथ न आये जो खादीधारी न हो या जो तकली न चलाता हो। मैं तो इस बात के लिए इच्छुक हूँ कि इस कार्यके लिए लोग मेरे साथ शरीक हों, किन्तु यदि आपने आत्मशुद्धिकी आवश्यकताओंका पालन न किया हो तो मुझे अकेले जाने में भी कोई संकोच नहीं होगा ।
ऐसा न कहिए कि खादी मिलती नहीं है। तकली बनाओ और उसपर सूत कातो। यह सूत मुझे दो और उसके साथ बुनाईका खर्च दो, तो आपकी खादीकी जरूरत पूरी करनेकी जिम्मेदारी मेरी रही। हाँ, यदि आप बुनाईका खर्च नहीं देंगे तो उस सीमा तक खादीकी कमी महसूस होगी। खादीका उत्पादन बढ़ाने के लिए मैंने जो कहा, वैसा किया जाये तो खादीकी कमी कभी हो ही नहीं सकती; यह काम मैंने बहनोंको सौंपा है। पुरुष तो नमक बनाकर केवल ७ करोड़ ही बचायेंगे । किन्तु यदि स्त्रियोंने यह कार्य (खादीका ) सीख लिया तो वे देशके ६० करोड़ रुपये बचा सकेंगी।
मैंने धरासणाकी चढ़ाईकी बात कहीं। ऐसा न समझना कि इसमें दो-चार वर्ष लगनेवाले हैं। मेरे जैसा बूढ़ा आदमी जिसकी उम्र ६० के ऊपर है और जो मृत्युके पास पहुँच गया है, वर्षोंकी बात नहीं कर सकता। वह तो ज्यादासे ज्यादा महीनोंकी ही बात कर सकता है। और यदि आप लोग मेरा साथ दें तो मैं महीनों-की नहीं केवल दिनोंकी ही बात करूँ। किन्तु यदि मैं यह देखूं कि धरासणाके निवासी तो झूठे हैं, शराबी या व्यभिचारी हैं तो मैं फिर यहाँ आऊँगा ही क्यों? या आऊँगा भी तो तुम्हारी नहीं, अन्य लोगोंकी सहायता लेकर उनके द्वारा लड़ेंगा ।
मैंने आपसे स्पष्ट कह दिया है कि आप खादी पहनें और शराब या ताड़ीको छोड़ें, तभी मैं आपको धरासणाकी इस लूटमें अपने साथ लूंगा। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे और मेरी अस्वीकृति होते हुए भी वहाँ आयेंगे तो याद रखें मैं आपके विरुद्ध सत्याग्रह करूँगा । मुझे जिस तरह पुलिसकी संगीनोंके खिलाफ सत्याग्रह करना जाता है उसी तरह मैं आपके खिलाफ भी सत्याग्रह कर सकता हूँ। मैं शराबी और विदेशी वस्त्र पहननेवाले लोगोंके द्वारा धरासणापर कब्जा नहीं करना चाहता। यह काम मैं शुद्ध और निर्मल व्यक्तियोंके द्वारा ही कराना चाहूँगा। यहां जो स्वयंसेवक उपस्थित हैं वे घर-घर जाकर लोगोंको मेरा यह सन्देश कह दें। लोग अपने घर बैठे रहें,
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३९४
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>यह मुझे अच्छा लगेगा । किन्तु यदि वे शर्तोंका पालन न करते हुए मेरे काममें शामिल होते हैं तो यह मुझे असह्य होगा। आपको यह बात नापसन्द हो तो भले आप मेरा त्याग कर दें, मुझे खानेको न दें, एक कटोरा पानी भी न दें। मैं भूखे रह-कर नमककी लूटकी यह चढ़ाई कर सकता हूँ। मैं यहाँ १०-१५ दिनमें पुनः आनेकी उम्मीद करता हूँ उस समयतक यदि आपने मेरा कहा हुआ न किया हो तो दूर खड़े होकर देखना और भजन गाते रहना। बल्कि मैं तो ऐसा कहूंगा कि ऐसे अशुद्ध लोगोंके मुँहसे तो मैं भजन या जयघोष भी नहीं सुनना चाहता ।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' ४-५-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३३३. सन्देश : अमेरिकाको'''}}}}
{{Right|[ २७ अप्रैल, १९३० के पूर्व ]<ref>१. यह २७-४-१९३० के संडे टाइम्समें प्रकाशित हुआ था ।</ref>}}
हम लोग यह नहीं चाहते कि हमें अभी तुरन्त ही स्वाधीनता दे दी जाये, हमारी मांग तो एक ऐसा सम्मेलन बुलानेकी है जिसमें कुछ मुख्य शिकायतों, विशेष- कर आर्थिक और नैतिक शिकायतोंपर विचार किया जा सके, उन्हें दूर किया जा सके। यदि सरकार शान्तिपूर्ण वातावरणमें स्वाधीनताको स्थापना करना चाहती है तो ऐसे सम्मेलनका बुलाया जाना बहुत जरूरी है। इन शिकायतोंका मैंने अपने उस पत्र में अत्यन्त स्पष्ट शब्दोंमें उल्लेख किया है, जिसे बाइसरायके नाम मेरा 'अल्टीमेटम' माना गया है, यद्यपि ऐसा मानना बिलकुल गलत है। इन शिकायतों में नमक- कर भी शामिल हैं जो अमीर और गरीब दोनोंको समान रूपसे प्रभावित करता है और जो लागत मूल्यसे १,००० प्रतिशत से भी ज्यादा है। चूंकि इसे एकाधिकारकी चीज बना दिया गया है, इसलिए हजारों लोग अपने पूरक धन्धेसे वंचित हो गये हैं तथा नमककी कृत्रिम रूपसे बढ़ाई गई कीमत के कारण गरीब लोगोंके लिए अपने ढोरों और अपनी भूमिको पर्याप्त मात्रामें नमक प्रदान करना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो गया है।
इस अस्वाभाविक एकाधिकारको ऐसे कानूनों द्वारा कायम रखा जा रहा है, जो कानून न होकर वस्तुतः कानूनकी अवहेलना है। इन कानूनोंके द्वारा पुलिसको, जो भ्रष्ट है, बिना किसी वारंटके निर्दोष लोगोंको पकड़ने, उनकी सम्पत्ति जब्त करने तथा अन्य अनेक तरीकोंसे उन्हें परेशान करनेकी निरंकुश सत्ता दी गई है। कानूनोंके प्रति सविनय प्रतिरोधने जनमानसको जैसा प्रभावित किया है और उन्होंने उसे जिस उत्साहसे अपनाया है, मेरी जानकारीमें अन्य किसी वस्तुने वैसा नहीं किया है। यही कारण है अनेक गाँवोंसे स्त्रियों और बच्चों समेत हजारों लोगोंने, निषिद्ध नमक बनाने और बेचने में खुलकर भाग लिया है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३९५
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||सन्देश : अमेरिकाको|३५१}}</noinclude>इस सविनय प्रतिरोधको सरकारने नृशंस और कायरतापूर्ण उपायों द्वारा दबाने की कोशिश की है। जिन व्यक्तियोंने नमक देनेसे इनकार करे दिया उन व्यक्तियोंको गिरफ्तार करनेके बजाय पुलिस अधिकारियोंने उन्हें मारा-पीटा है। नमक आम तौर पर लोगोंकी मुट्ठियोंमें बन्द था। उनकी मुट्ठीको खोलने के लिए उनकी अँगुलियाँ तोड़ दी गईं, गर्दनोंको दबाया गया; उनपर अशोभनीय ढंगसे इतने प्रहार किये गये कि वे बेहोश हो गये। इनमें से कुछ लोगों पर सैंकड़ों-हजारों लोगोंकी उपस्थिति में प्रहार किये गये जो कि इन लोगोंको बचाने में समर्थ थे और यदि वे चाहते तो प्रतिकार कर सकते थे। लेकिन इन लोगोंने ऐसा कुछ नहीं किया, क्योंकि वे अहिंसा-की प्रतिज्ञासे बँधे हुए थे। यह सच है कि कलकत्ता, कराची, चटगांव और अब पेशावरमें हिसाकी घटनाएँ हुई हैं। कलकत्ता और कराचीमें जो घटनाएँ हुई हैं, उन घटनाओंको चटगांव और पेशावरमें हुई घटनाओंसे भिन्न समझना चाहिए। कलकत्ता और कराचीमें हिसाकी जो घटनाएँ हुई, वे प्रसिद्ध नेताओंकी गिरफ्तारी पर लोगोंके कोके एकाएक भड़क उठनेसे हुई। चटगाँव और पेशावरमें भी वे हुई तो इसी कारण हैं, लेकिन लगता है कि वे ज्यादा गम्भीर प्रकारकी हैं और पहलेसे सुनियोजित योजनाके आधारपर हुई है, हालांकि चटगांव के सुदूर पूर्वमें और पेशावरके भारतके दक्षिण-पश्चिमी सीमापर स्थित होनेके कारण इन दोनोंका एक-दूसरे से कतई कोई सम्बन्ध नहीं है।
इन उपद्रयोंका भारत के अन्य भागों पर कोई असर नहीं हुआ है, इन भागों में ६ तारीख सविनय अवज्ञा आन्दोलन बहुत व्यवस्थित ढंगसे और बड़े पैमाने पर चल रहा है। यहाँ लोग बहुत ज्यादा उकसाये जानेके बावजूद अहिंसक और शान्त रहे हैं। साथ ही मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि हमें सावधान रहने की जरूरत है, लेकिन में निस्संकोच कह सकता हूँ, सविनय अवज्ञाकी योजनाकी सीमाओंके भीतर रहते हुए इस बातकी भी पूरी-पूरी सावधानी बरती गई है कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनको ओटमें कोई व्यक्ति हिंसा न करने पाये। यह याद रखना चाहिए कि कराचीमें जो सात व्यक्ति घायल हुए थे और जिनमें से दो व्यक्तियोंकी मृत्यु हो गई है, वे स्वयंसेवक थे और जनताके क्रोधको भड़कने से रोकने तथा शान्ति बनाये रखनेके कार्यमें लगे हुए थे। कराचीमें गोली चलने के समय जो लोग घटनास्थल पर उपस्थित थे उनका कहना है कि गोलीका चलाया जाना सरासर अन्यायपूर्ण था और भीड़को सावधान करनेके लिए पुलिसने पहले हवामें अथवा टांगों को लक्ष्य करके गोलियां नहीं चलाई।
वस्तुतः लोगोंको उत्तेजित करनेके लिए सरकारने कोई मौका हाथसे नहीं जाने दिया। अनेक श्रेष्ठ, पवित्रतम तथा अत्यन्त आत्मत्यागी नेता गिरफ्तार कर लिये गये है और उन्हें सजाएँ दी गई हैं और ये सजाएँ, कई मामलों में तो मुकदमोंका मात्र स्वांग रचकर दी गई हैं। इन सबका अपराध एक ही था, लेकिन सजा देनेवाले मजिस्ट्रेटोंके स्वभावकी विलक्षणताओंके अनुसार सजाएँ भिन्न-भिन्न ही दी गई है। कुछ मामलोंमें तो जाने-माने लोगोंको १२ महीने की सपरिश्रम कठोर कारावासकी
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३९६
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३५२|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>सजा दी गई है। सजाएँ ज्यों-ज्यों दी गई हैं, त्यों-त्यों लोगोंका उत्साह अभीतक तो बढ़ता ही गया है। हजारों लोग अवैध नमक बनानेकी बातको अपनी दिनचर्या-का एक हिस्सा मानते हैं। संसारके किसी भी भागमें, जहां सरकार लोकमतके प्रति तनिक भी उत्तरदायी है, नमक-कानून अब तक कभीका खत्म हो चुका होता। परन्तु सविनय प्रतिरोधका यह वातावरण यदि आगे भी ऐसा ही बना रहा, और लगता है कि वह ऐसा ही बना रहेगा, तो अभी या बादमें नमक- कानून खत्म होकर ही रहेगा।
यह आन्दोलन आत्मशुद्धिका आन्दोलन है, यह चीज इसी बातसे पर्याप्त रूपसे सिद्ध हो जाती है कि स्त्रियाँ भी बहुत बड़ी संख्या में इसमें शामिल हो गई हैं और शराबकी दुकानोंपर धरना देनेके कामका संगठन वही कर रही हैं। हजारों लोगोंने शराब से दूर रहने की प्रतिज्ञा ली है। मजदूरोंके जबरदस्त गढ़ अहमदाबादमें शराबखानोंकी आय में १९ प्रतिशतकी कमी हो गई है और अभी कमी होना जारी ही है। सूरत जिलेमें भी ठीक यही बात हो रही है। स्त्रियोंने विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारके प्रश्नको भी अपने हाथमें ले लिया है। बहिष्कारका प्रसार पूरे भारतमें हो रहा है। लोग अपने विदेशी वस्त्रोंकी होली जला रहे हैं। खादी अर्थात् हाथ-कते कपड़े की मांग इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि खादीका वर्तमान भण्डार करीब-करीब खुट गया है। चरखेकी मांग भी बहुत ज्यादा है और लोग अब दिन-प्रतिदिन भारतके सात लाख गांवोंके झोंपड़ोंमें हाथ कताईको पुनः प्रतिष्ठित करनेकी आवश्यकता-को अधिकाधिक महसूस कर रहे हैं। मेरी विनम्र रायमें हिंसासे सर्वथा मुक्त हमारे इस संघर्षमें भारतसे बाहरके देशोंके लिए भी एक सन्देश है। मुझे इस बारे में तनिक भी सन्देह नहीं है कि ६ अप्रैलसे जो बलिदान दिया जा चुका है उसके बाद लोगोंका उत्साह तबतक बना रहेगा जबतक मानवताके विकास में अपना योगदान देनेके लिए भारत स्वतन्त्र नहीं हो जाता।
{{Left|[ अंग्रेजीसे ]<br>
'''मॉडर्न रिव्यू,''' जून १९३०}}
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३९७
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३३४. वाइसरायको लिखे पत्रका मसविदा'''<ref>१. मसविदा गांधीजी ने तैयार किया था।</ref>}}}}
{{Right|[ २७ अप्रैल, १९३० अथवा उसके पूर्व ]<ref>२.पद मसविदा २७ अप्रैल, १९३० को हस्ताक्षरके लिए तैयार था; देखिए "पत्र अमीना तेपजीको",२७-४-१९३०</ref>}}
{{Left|परमश्रेष्ठ,}}
नीचे हस्ताक्षर करनेवाली हम गुजरातकी महिलाएँ इस निष्कर्षपर पहुँची है कि इस समय हिन्दुस्तानमें जो महान् राष्ट्रीय जागृति आ रही है उससे हम अपने- आपको अलग नहीं रख सकती। नमक कानूनको लेकर जो सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया जा रहा है, उसके साथ हमारी पूरी सहानुभूति है। गाँवोंमें रहनेवाली हमारी बहनोंने अवैध नमक बनाना शुरू भी कर दिया है।
लेकिन हम यह महसूस करती हैं कि महिलाओंके रूपमें हमें अपने लिए एक अतिरिक्त और विशिष्ट कार्य क्षेत्र चुनना चाहिए। शराब और मादक द्रव्योंके निषेध और विदेशी कपड़ोंके बहिष्कारका प्रश्न हमारे मनको जँचता है। शरावने अनेक घर तबाह कर दिये हैं तथा विदेशी वस्त्रोंके कारण भारतकी लाखों स्त्रियाँ फुरसतके समय जो धन्धा करती थी, वे उससे वंचित हो गई हैं, और वर्षमें कमसे कम चार महीने तो उन्हें फुरसत रहती ही है।
इसलिए ये दो प्रश्न ऐसे हैं जिनका सम्बन्ध पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंसे अधिक है। और जहाँतक इन दोनों समस्याओंको धरना देकर अर्थात् इन चीजोंका व्यापार करनेवालों तथा शराब और मादक द्रव्योंका सेवन करनेवालों या विदेशी वस्त्रोंके मोहमें पड़े लोगोंके हृदयोंको अनुनय-विनयसे प्रभावित करके हल किया जा सकता है, वहाँतक हमारा खयाल है कि हम अपने प्रयत्नोंमें पुरुषोंसे अधिक सफल हो सकती हैं। और चूंकि स्त्रियाँ इस कामको करेंगी, इसलिए स्वाभाविक है कि यह काम शान्तिपूर्ण ढंग से सम्पन्न होगा ।
संघर्ष आरम्भ करते हुए हमें आपका ध्यान इस तथ्यकी ओर आकर्षित करना आवश्यक जान पड़ता है कि यह अनिवार्य रूपसे राज्यका कर्तव्य है कि वह शराब और मादक द्रव्योंके व्यापारपर रोक लगाये, क्योंकि ये चीजें, जो लोग इनका सेवन करते हैं, उनके शरीर और मस्तिष्क तथा घर-परिवारको बरबाद कर देती हैं। इसी तरह विदेशी कपड़ोंके आयातपर भी रोक लगाना उसका कर्तव्य है, क्योंकि इसके कारण इस अभागे देशके असंख्य गाँव आर्थिक दृष्टिसे तबाह हो गये हैं।
जहाँतक विदेशी कपड़ोंके आयातका सवाल है, यह कहा जा सकता है कि जो बात विदेशी कपड़ों पर लागू होती है वही बात एक हदतक भारतीय मिलोंमें तैयार
४३-२३
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/३९९
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३३५. गुजरातकी महिलाओंसे अपीलका मसविदा'''}}}}
{{Right|[ २७ अप्रैल, १९३० के आसपास ]<ref>१. सम्भवतः इस अपीलका मसविदा और पिछला शीर्षक करीब-करीब एक साथ ही लिखे गये जान पड़ते हैं।</ref>}}
{{Left|बहनो,}}
इसके साथ वाइसरायके नाम लिखा गया पत्र है। यदि आप कर सकें तो इसपर अपने हस्ताक्षर करनेकी कृपा करें। मूल पत्र अंग्रेजीमें है; संलग्न पत्र उसका अनुवाद है। आप इसे अच्छी तरह समझ लें और यदि इस कार्य में भाग लेनेकी आपकी इच्छा हो, तभी हस्ताक्षर करें। यदि आप इसपर हस्ताक्षर करें तो अपना नाम-धाम, आयु आदि पूरा विवरण दें। ये नाम अखबारोंमें भी प्रकाशित होंगे और यदि आप उसपर हस्ताक्षर करेंगी तो उसका मतलब होगा कि आप शराबके ठेकों और विदेशी वस्त्रोंकी दुकानपर धरना देने तथा निम्न हस्ताक्षर करनेवाली महिलाओं द्वारा स्वगठित समितिके सुझावोंके अनुसार काम करने को तैयार रहेंगी।
इसके अतिरिक्त आपके लिए काम करनेका एक अन्य मार्ग भी है। आप इस समितिसे अपना कोई सम्बन्ध न रखकर अपनी स्वतन्त्र समिति बनाकर अपना क्षेत्र निर्धारित कर सकती हैं। अर्थात् आप शराबके उन ठेकों और विदेशी कपड़ोंकी उन दुकानोंपर धरना दे सकती हैं जिनकी आपको जानकारी हो। आप ऐसा करेंगी तब भी हम आखिर में एक बिन्दुपर आकर मिल सकेंगे। यदि आप इस पुण्य कार्यमें भाग लेना चाहें तो हस्ताक्षर करते समय यह भी सूचित करें कि आप अपनी अलग समिति बनाकर काम करेंगी या इसी समितिके अन्तर्गत काम करेंगी।
{{Left|हम हैं,<br>
भारतकी स्वयंसेविकाएँ}}
गुजराती (एस० एन० १६८४५) की फोटो नकलसे ।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४००
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" /></noinclude>{{c|{{larger|'''३३६. विट्ठलभाई लल्लूभाईका श्राद्ध'''}}}}
इस लड़ाई में बहुतों की जान जायेंगी। मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता। हममें से हजारोंके मरे बिना शायद स्वर्गसे भी महँगा स्वराज्य हमें नहीं मिलेगा। बलिदान जितना अधिक शुद्ध होगा, स्वराज्य उतनी ही जल्दी मिलेगा, और उतना ही कम बलिदान करना पड़ेगा। यदि सब लोग अपने कर्तव्यको समझ लें और उसका पालन करें तो किसीको मरना न पड़े। लेकिन ऐसी आदर्श स्थिति संसारमें बहुत कम देखने में आती है। स्वयं निर्दोष होते हुए भी दूसरोंके दोषोंके लिए जान देना ही बलिदान है। अतः यदि कोई दोष ही न करे तो बलिदानकी भला क्या आवश्यकता होगी ?
बलिदानका मतलब स्वेच्छासे सरकारकी ओरसे मिलनेवाली मौतकी सजाका स्वागत करना ही नहीं है। लड़ाईमें भाग लेते हुए, निर्दोष होते हुए कष्ट भोगना पड़े और मृत्यु हो जाये तो वह भी बलिदान है। लड़ाईके सिलसिले में खजूरका पेड़ काटते समय अनहोनी हो जाना और फलतः मरना भी बलिदान है।
ऐसा बलिदान कल विट्ठलभाई लल्लूभाईने दिया। विट्ठलभाई राष्ट्रीय शालाके शिक्षक थे। बड़े उत्साहपूर्वक वे स्वयंसेवक बने थे। खजूर काटते समय उनके पैर पर कुल्हाड़ी पड़ी और हड्डी टूट गई, हाथोंमें काँटें चुभ गये। डाक्टरने इलाज करनेमें कोई कसर न रखी। परन्तु ईश्वरेच्छा तो कुछ और ही थी। चौथे दिन उन्होंने प्राण त्याग दिये।
जिस दिन वे घायल हुए उसी दिन में विट्ठलभाईसे मिला था । उनकी वीरता अद्भुत जान पड़ी। इतनी कठोर शल्य क्रियाके अवसर पर भी वे प्रसन्न रहे । डाक्टरने मुक्त कण्ठसे उनकी बहादुरीकी प्रशंसा की थी। हम सबको आशा थी कि वे बच जायेंगे। परन्तु पूर्णकाम विट्ठलभाई अपने धर्मका पालन करते हुए मातृभूमिका सोलहों आना ऋण चुकाकर चल बसे ।
नवसारी गाँव भी इस मर्मको समझ गया। घायलकी चारपाईके आसपास लोग चक्कर काटते रहते थे। शव यात्रामें बहुत से लोग थे किन्तु वह यात्रा मातमी नहीं, खुशीकी मालूम होती थी। नवसारीने हड़ताल मनाई।
ऐसी श्रेयस्कर मृत्यु कौन न चाहेगा? विट्ठलभाईकी माता, उनके भाई, उनकी पत्नी, ये सब मेरे लेखे बड़भागी हैं।
ऐसी मौत क्योंकर चाहने योग्य है ? क्योंकि उसका अनुसरण करनेवाले पवित्र बनते हैं, उनमें सेवाकी और अधिक इच्छा जाग्रत होती है। क्या हमपर भी ऐसा ही असर पड़ा है? यदि पड़ा हो तो हम श्राद्ध करें विट्ठलभाईने मद्यपान निषेधके लिए अपने प्राण दिये। अब हमें चाहिए कि हम मरते दमतक इस काम में जुटे रहें । विट्ठलभाईने जलालपुर ताल्लुकेमें देह छोड़ी है। अतएव विशेष रूपसे जलालपुर ताल्लुकेके लोगोंका यह धर्म है कि वे उनके रक्तसे सने हुए खजूर के पेड़ोंको निर्मूल कर दें, शराब और ताड़ीकी दुकानें बन्द कर दें और शराबी शराब पीना छोड़ दें।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०१
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||रासका उत्साह|३५७}}</noinclude>कल मैं बोदाल गया था । यहाँके लोगोंने बड़े सुन्दर ढंगसे श्रद्धांजलि अर्पित की। मेरी प्रार्थनापर वहाँके जाने-माने लोगोंने अपने खजूरोको काट डालनेकी अनुमति दे दी।
जो बात विट्ठलभाईके लिए ठीक है, वही दत्तात्रेय और मेघराजके बारेमें भी है। इन भाइयोंने कराचीमें गोली शिकार बनकर देह छोड़ी। विट्ठलभाई शराब-खोरीको बन्द करनेमें लगे हुए थे, अतएव मैने उनके श्राद्धकी विधि बताई। दत्तात्रेय और मेघराज शान्ति रक्षाके काममें लगे हुए थे, इसलिए उनका श्राद्ध शान्तिका प्रसार करके किया जा सकता है। जितनी अशान्ति होगी उतनी ही अधिक संख्या में ज्यादा कठोर बलिदान हमें देने होंगे, और स्वराज्य दूर हटता जायेगा । पर शान्ति जितनी ज्यादा होगी, बलिदान भी उतने ही कम देने पड़ेंगे। पत्थर और ढेले फेंककर, कोलाहल मचाकर, कचहरी, अदालत वगैरापर हमला करके, ट्राम गाड़ियाँ जलाकर तो गरीबोंके लिए हम कभी स्वराज्य प्राप्त कर ही नहीं सकते।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३३७. रासका उत्साह'''}}
रासकी प्रतिज्ञा मैने देखी है रासके लोग जानते हैं कि यह प्रतिशा उन्होंने अपनी जिम्मेदारीपर ली है। खेड़ा जिला इस समय आश्चर्यजनक बल दिखा रहा है। त्यागी अब्बास साहब खेड़ा जिलेमें जाकर रह रहे हैं। अपनी कोमल बच्ची हमीदाको उन्होंने मद्यपान निषेध यज्ञमें होम दिया है, उनकी बेगम तो पहलेसे ही इसमें लगी हुई हैं। शरीरसे असमर्थ रेहाना रात-दिन हिन्दुस्तानकी चिन्तामें ही निमग्न रहती है। ये बुजुर्ग महानुभाव खेड़ामें जाकर बैठ गये हैं और उन्हें कोई भयभीत नहीं कर सकता ।
खेड़ाको इस तरहके पुरुषोंकी सहायता प्राप्त है । आश्रमकी टुकड़ीके सधे हुए लोग खेड़ामें जा बैठे हैं और अब सरदारकी लड़की, जो अत्यन्त निडर है और जिसको ईश्वरने कार्य करनेकी अक्षय शक्ति प्रदान की है, भी खेड़ा चली गई है। तात्पर्य यह कि खेड़ाको जितनी मददकी आवश्यकता है उतनी उसे प्राप्त है।
यदि खेड़ा में शान्ति बनाये रखनेकी सामर्थ्य नहीं हुई, अथवा अन्ततक संघर्ष में टिके रहनेका धीरज न हुआ तो खेड़ा अपनी और गुजरातकी नाक काट लेगा।
कर न भरनेकी बातको सरकार कदापि सहन नहीं करेगी। कर न भरनेकी दिशामें क्या कदम उठाये जायें, इस बारेमें अभी हमारा कार्यक्रम निश्चित नहीं हुआ है। लेकिन, जिनमें हिम्मत हो वे चाहें तो कर न दें। पांचिया पटेलने अकेले ही वैसा किया था न ? लेकिन ऐसा करनेवालेको खुद भारी जोखिम में पड़ना होता है। घरबार, ढोर आदि बिक जायें तो इसमें लोगोंको आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। बारडोली समान खेड़ामें नहीं हो सकता। बारडोलीकी लड़ाई एक खास किस्मकी
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||रासका उत्साह|३५७}}</noinclude>कल मैं बोदाल गया था । यहाँके लोगोंने बड़े सुन्दर ढंगसे श्रद्धांजलि अर्पित की। मेरी प्रार्थनापर वहाँके जाने-माने लोगोंने अपने खजूरोको काट डालनेकी अनुमति दे दी।
जो बात विट्ठलभाईके लिए ठीक है, वही दत्तात्रेय और मेघराजके बारेमें भी है। इन भाइयोंने कराचीमें गोली शिकार बनकर देह छोड़ी। विट्ठलभाई शराब-खोरीको बन्द करनेमें लगे हुए थे, अतएव मैने उनके श्राद्धकी विधि बताई। दत्तात्रेय और मेघराज शान्ति रक्षाके काममें लगे हुए थे, इसलिए उनका श्राद्ध शान्तिका प्रसार करके किया जा सकता है। जितनी अशान्ति होगी उतनी ही अधिक संख्या में ज्यादा कठोर बलिदान हमें देने होंगे, और स्वराज्य दूर हटता जायेगा । पर शान्ति जितनी ज्यादा होगी, बलिदान भी उतने ही कम देने पड़ेंगे। पत्थर और ढेले फेंककर, कोलाहल मचाकर, कचहरी, अदालत वगैरापर हमला करके, ट्राम गाड़ियाँ जलाकर तो गरीबोंके लिए हम कभी स्वराज्य प्राप्त कर ही नहीं सकते।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३३७. रासका उत्साह'''}}}}
रासकी प्रतिज्ञा मैने देखी है रासके लोग जानते हैं कि यह प्रतिशा उन्होंने अपनी जिम्मेदारीपर ली है। खेड़ा जिला इस समय आश्चर्यजनक बल दिखा रहा है। त्यागी अब्बास साहब खेड़ा जिलेमें जाकर रह रहे हैं। अपनी कोमल बच्ची हमीदाको उन्होंने मद्यपान निषेध यज्ञमें होम दिया है, उनकी बेगम तो पहलेसे ही इसमें लगी हुई हैं। शरीरसे असमर्थ रेहाना रात-दिन हिन्दुस्तानकी चिन्तामें ही निमग्न रहती है। ये बुजुर्ग महानुभाव खेड़ामें जाकर बैठ गये हैं और उन्हें कोई भयभीत नहीं कर सकता ।
खेड़ाको इस तरहके पुरुषोंकी सहायता प्राप्त है । आश्रमकी टुकड़ीके सधे हुए लोग खेड़ामें जा बैठे हैं और अब सरदारकी लड़की, जो अत्यन्त निडर है और जिसको ईश्वरने कार्य करनेकी अक्षय शक्ति प्रदान की है, भी खेड़ा चली गई है। तात्पर्य यह कि खेड़ाको जितनी मददकी आवश्यकता है उतनी उसे प्राप्त है।
यदि खेड़ा में शान्ति बनाये रखनेकी सामर्थ्य नहीं हुई, अथवा अन्ततक संघर्ष में टिके रहनेका धीरज न हुआ तो खेड़ा अपनी और गुजरातकी नाक काट लेगा।
कर न भरनेकी बातको सरकार कदापि सहन नहीं करेगी। कर न भरनेकी दिशामें क्या कदम उठाये जायें, इस बारेमें अभी हमारा कार्यक्रम निश्चित नहीं हुआ है। लेकिन, जिनमें हिम्मत हो वे चाहें तो कर न दें। पांचिया पटेलने अकेले ही वैसा किया था न ? लेकिन ऐसा करनेवालेको खुद भारी जोखिम में पड़ना होता है। घरबार, ढोर आदि बिक जायें तो इसमें लोगोंको आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। बारडोली समान खेड़ामें नहीं हो सकता। बारडोलीकी लड़ाई एक खास किस्मकी
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०२
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>और सीमित लड़ाई थी। वह तो एक अधिकार प्राप्त करनेकी थी और यह हकूमत छीनने की है। दोनोंके बीच जमीन-आसमानका अन्तर है।
इसलिए रासके लोगोंने जो कदम उठाया है उसपर दृढ़ रहनेके लिए उन्हें चाहिए कि वे आत्मशुद्धि करें, त्यागी बनें और जो अन्य गाँव रासका अनुकरण करना चाहें वे शान्तचित्त हो अपनी शक्तिका अन्दाज लगायें। यों तो जिस जिलेसे सरकार सरदारको ले गई, जिस जिलेसे वह दरबारको ले गई, जो जिला मोहनलाल पण्ड्या और रविशंकरका निवासस्थान है, वह जितना करे उतना कम है।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३३८. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{Rh||'''हड़तालें'''}}
आये दिन होनेवाली हड़तालोंके सम्बन्धमें एक व्यापारीने दुःख प्रकट किया है। मुझे तो ऐसा लगता है कि हर अवसर और हर नेताकी गिरफ्तारीपर हड़ताल नहीं की जानी चाहिए। सभी मामलों में मध्यम मार्ग ही उचित होता है। अतिका परिणाम कभी अच्छा नहीं होता। जब किसी गांवमें स्थानीय नेताको गिरफ्तार किया जाये तो वहाँ भले ही उस दिन हड़ताल मनाई जाये, किन्तु कहीं भी किसी जाने-माने नेता पकड़े जानेपर सब जगह हड़ताल हो, यह बात मुझे उचित नहीं जान पड़ती। ऐसा सुनने में आया है कि यदि मुझे गिरफ्तार किया गया तो कुछ व्यापारियों-का विचार सात दिनकी हड़ताल करनेका है। मैं समझता हूँ कि यह खबर गलत है। यदि सच हो तो आशा करता हूँ कि ये लोग अपना विचार बदल देंगे। सात दिनकी हड़ताल करनेसे स्वराज्य नहीं मिलनेवाला है, बल्कि इसके बजाय सात दिन ही नहीं, स्वराज्य मिलने तक हमें जो रचनात्मक कार्य करने हैं, उन्हें करते रहने पर ही स्वराज्य मिलेगा और वे सब, जो जेल में बन्द है, छूट सकेंगे। यह समय विचार, विवेक और शान्तिपूर्वक काम करनेका है।
{{Rh||'''धरनेमें जोखिमें'''}}
एक बहन लिखती है कि धरना देनेसे कलह बढ़नेकी सम्भावना है। इसकी बजाय स्वदेशीका प्रचार ही हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए। मेरी विनम्र सम्मतिमें तो इन दोनोंकी आवश्यकता है। यदि पुरुष बीचमें न आयें और बहनों द्वारा ही धरना दिया जाये तो कभी कलह नहीं हो सकता। बहनों में सहनशक्ति और धीरज होना चाहिए। इस धरनेका मतलब दबाव डालना नहीं बल्कि अनुनय-विनय करना है। और प्रार्थना तो सभी वर्गोंसे की जा सकती है। मुहल्ले मुहल्ले में सभाओंका आयोजन करना, जलूस निकालना, स्वजातिकी सभाओं में प्रस्ताव पास करना, भजन गाते हुए निकलना आदि बातें धरनेकी योजनाके अन्तर्गत आती है। धरनेका यह मतलब
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||इमाम साहब|३५९}}</noinclude>बिलकुल नहीं है कि किसीको जोर-जबरदस्तीसे रोका जाये। अन्यथा सही बात तो यह है कि यदि हम बहिष्कार करना चाहते हों तो हमें खादी उत्पादनका कार्य करना चाहिए। जो बहनें धरनेसे डरती हों वे चाहें तो पीजें, कातें और उसके लिए वाता-वरण तैयार करें।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३३९. इमाम साहब'''}}}}
इमाम साहब अब्दुल कादिर बाबजीरको महादेव अपनी जगह नियुक्त कर गये हैं। इमाम साहबको सारा गुजरात जानता है। मैंने तो इमाम साहबको आश्रमकी चारदीवारी में बन्द कर रखा था। मेरे लिए तो वे सगे भाईके समान हैं। वे प्रारम्भमें मेरे मुवक्किल थे, बाद में मुवक्किलसे सत्याग्रही, सत्याग्रहीसे फीनिक्सवासी बने और इतनेपर ही न रुककर वे आश्रमवासियोंके साथ भारत आये । १९०२ की जान-पहचान १९३० तक निभ रही है। इसलिए हमारा यह पारस्परिक सम्बन्ध कोई आज-कलका नहीं है।
इमाम साहब आधुनिक ढंगके मुसलमान न होकर एक कट्टर मुसलमान हैं। वे न तो नमाज पढ़नेसे चूकते हैं और न रोजा रखना ही भूलते हैं। उनके पिता बम्बईकी जामा मसजिदके मौलवी थे। उन्होंने दक्षिण आफ्रिकामें इमामगिरी की थी, इसी कारण ये इमामके नामसे पुकारे जाते हैं।
उन्हें आश्रम जीवन से बाहर लाये सरदार सरदार कोई ऐसे व्यक्ति तो नहीं कि वे इमाम साहबकी खुशामद करनेकी खातिर उन्हें आश्रम- जीवनसे बाहर लाते । उन्होंने उनमें निहित मुक्त आत्माको पहचाना और उन्हें सार्वजनिक जीवनमें ले आये; और अब ये जहाँ भी जाते हैं उन्हें साथ ले जाते हैं।
इमाम साहब अपढ़ होते हुए भी चतुर हैं, दुनियाके व्यवहारको समझते हैं। अनेक बातें ये इशारेसे ही समझ जाते हैं। इमाम साहब कोई आज पहली बार ऐसे महत्त्वपूर्ण पदपर नहीं आये हैं। वे दक्षिण आफ्रिकामें अनेक बार सभापति रह चुके हैं। यदि इमाम साहब गिरफ्तार न हुए तो उनके सम्पर्क में आनेवाले लोग समझ जायेंगे कि इमाम साहब कुर्सीपर कठपुतलीके समान बैठे रहनेवाले व्यक्ति नहीं है। ये सभाका दिशा-निर्देशन कर सकते हैं और विचारपूर्वक निर्णय दे सकते हैं।
इमाम साहबके चुनाव में मेरा कोई हाथ नहीं है। मैंने महादेवको कभी इमाम साहबका नाम सुझाया हो, सो मुझे स्मरण नहीं पड़ता। हाँ, महादेवके सुझानेपर मैंने उसे स्वीकार अवश्य किया है।
कुर्सीपर पुतला बैठानेका युग अब चला गया है। जो हमारा दिशा-निर्देशन कर सकता है, जनताके हुकमकी तामील कर सकता है अथवा न करनेपर त्यागपत्र दे सकता है, वही जनताका प्रथम सेवक बन सकता है।
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१२
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Juhi1986
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<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||छः|}}</noinclude>किया जाये तो कांग्रेस उसमें भाग ले सकती है। वाइसरायको लिखे गये अपने पत्रमें गांधीजीने जो ११ शर्ते रखी थीं उनकी कसौटी पर प्रत्येक स्वराज्य-योजनाको परखनेका अधिकार उन्होंने सुरक्षित रखा। सविनय अवज्ञा आन्दोलनको स्थगित करनेकी उन्होंने न्यूनतम शर्तें भी स्पष्ट कर दीं जिनमें नमक-कानूनकी दण्डात्मक धाराओंको लागू न करने और सरकारी अध्यादेशोंको वापस लेनेकी माँग शामिल थी। अन्य नेताओंको उनके द्वारा अपनायी गई स्थिति बहुत कड़ी अथवा बहुत कमजोर लग सकती थी, इसलिए उन्होंने यह भी कह दिया कि यदि सम्मानजनक समझौता करनेका समय आ गया हो तो मैं उसमें बाधक नहीं बनूँगा, और "इससे भी अधिक सख्त
स्थितिका समर्थन करनेमें मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं होगी बशर्ते कि वह लाहौर-प्रस्तावकी शब्दावलीसे ज्यादा आगे न जाता हो" (पृष्ठ ४५)।
१४ और १५ अगस्तको उदारपन्थी नेताओंसे, तथा मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल तथा अन्य कांग्रेस नेताओंसे (जिन्हें इसी उद्देश्यसे विशेष रूपसे यरवडा लाया गया था) बात करनेके बाद गांधीजीने सरकारको सूचित
कर दिया कि कांग्रेसके नेताओंकी रायमें "अभी ऐसा कोई समझौता करनेका समय नहीं आया है जो हमारे देशके लिए सम्मानजनक हो" (पृष्ठ ८२)। इस बातके कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ते थे कि "अंग्रेज अधिकारी जगत यह मानने लगा हो कि भारतके लिए क्या सर्वोत्तम है, इसके निर्णयका अधिकार भारतके स्त्री-पुरुषोंको है" (पृष्ठ ८३)। तेजबहादुर सप्रू और जयकरने एक बार फिरसे प्रयत्न किया, लेकिन समझौतेकी कोई सूरत नहीं बन सकी। इसपर गांधीजीने कहा, "तथापि शान्ति-वार्त्ताकी प्रकट विफलता पर निराश होनेकी जरूरत नहीं है। ...हमारे राष्ट्रने एक ऐसे अस्त्रका सहारा लिया है हमारे शासक जिसके अभ्यस्त नहीं हैं और इसलिए जिसे समझने और जिसकी कद्र करनेमें उन्हें समय लगेगा। हमारे कुछ महीनोंके कष्ट सहनसे उनका हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है, इस बातपर हमें कोई आश्चर्य नहीं है" (पृष्ठ १२१)।
गांधीजीको अपने सह-बन्दियों और साथी कार्यकर्त्ताओंके कल्याणकी बहुत चिन्ता रहती थी; इसके कारण एक बार तो संकटकी स्थिति उत्पन्न होते-होते बची। गांधीजीने अखबारोंमें पढ़ा था कि यरवडा जेलमें कैदियोंके साथ बहुत खराब व्यवहार किया जाता है। इसपर उन्होंने अधिकारियोंसे अनुमति माँगी कि उन्हें अन्य कैदियोंसे समय-समय पर मिलने दिया जाये या उनके साथ ही रहने दिया जाये। गांधीजीने बदलेमें वे विशेष सुविधाएँ भी छोड़ना स्वीकार किया जो उन्हें प्रदान की गई थीं। उन्होंने यह संकेत किया कि यदि उनकी माँग नहीं मानी गई तो परिणाम गम्भीर होंगे। "इस शरीरके अन्दर रहनेवाली आत्मा जो सेवा करनेके लिए उत्कण्ठित है, यदि उसके<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१३
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Juhi1986
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<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||सात|}}</noinclude>लिए इस शरीरका उपयोग नहीं किया जा सकता तो मुझे उसके परिरक्षणमें कोई दिलचस्पी नहीं है" (पृष्ठ १५६)। उन्होंने जेलके मुख्य अधीक्षकको फिरसे पत्र लिखा कि "अगर आगामी शनिवारकी दोपहर तक मेरी इच्छा पूरी नहीं की गई तो मैं अपने शरीरके परिरक्षणमें सहयोग देना बन्द करना आरम्भ कर दूँगा" (पृष्ठ १८४)। सौभाग्यसे अधिकारियोंने उन्हें इस बातकी अनुमति दे दी कि वे जिन लोगोंसे "सेवा की खातिर" मिलना चाहते थे उनसे समय-समय पर मिल सकते हैं, और इस प्रकार संकट टल गया।
मुलाकातियोंके बारेमें सरकारने जो पाबन्दियाँ लगा रखी थीं वे गांधीजीको स्वीकार नहीं थी, और इसके फलस्वरूप उन्होंने अपने घनिष्ठतम रिश्तेदारों और साथी कार्यकर्ताओं सहित सभीसे मिलना अस्वीकार कर दिया और "आत्मासे आत्मा
के मिलन" से ही सन्तोष करने लगे। उन्होंने मीराबहनको लिखा, "इस सुखद सम्पर्कको पृथ्वीकी कोई शक्ति नहीं रोक सकती" (पृष्ठ ३३)। राज-बन्दी होनेके कारण गांधीजीको अन्य कैदियोंसे अलग रखा गया था और जेलमें उनके एकमात्र साथी काकासाहब कालेलकर थे। काकासाकी रिहाईके बाद प्यारेलाल उनके साथ रखे गये जिनके बारेमें गांधीजीने लिखा कि मेरे पास प्यारेलालका रहना वैसा ही है जैसे "भेड़ियेके पास बकरी" का रहना (पृष्ठ ३६५)।
बाहरी उथल-पुथलसे दूर, जेलके शान्तिपूर्ण एकान्त जीवनमें गांधीजी अपने समयका उपयोग खूब सूत कातने और आध्यात्मिक कार्योंमें कर रहे थे। पिछले अनेक वर्षो वह 'गीता' का अध्ययन-मनन करते आ रहे थे और अब 'गीता' पूरी तरह उनके दिल-दिमाग पर छा चुकी थी। "मैं तो अपनी सारी कठिनाइयोंमें गीता माताके पास दौड़ता हूँ और अबतक आश्वासन पाता आया हूँ" (पृष्ठ २७४)। इससे पहले १९२२-२३ में जब गांधीजी जेलमें थे तब उन्होंने अपना अधिकांश समय पढ़नेमें बिताया था। उनकी जेल-दैनन्दिनीमें उल्लिखित पुस्तक-सूचीसे पता चलता हैं कि कितने विविध विषयोंका उन्होंने अध्ययन किया था (खण्ड २३, पृष्ठ १९१-
२०२)। किन्तु इस बार जब उनसे एक पत्र लेखकने सलाह माँगी कि कौन-सी किताब पढ़नी चाहिए, गांधीजीने जवाब लिखाः "मेरे लिए 'गीता' और तुलसीदास ही काफी हैं... (पृष्ठ ३५)। अन्य पत्र-लेखकोंको उन्होंने 'गीता' बार-बार पढ़ने की सलाह दी और कहा १२ अध्याय बारबार पढ़ना और उसपर विचार करना (पृष्ठ ४)। अपने इस अध्ययनका निचोड़ गांधीजीने 'गीता' के गुजराती अनुवाद 'अनासक्तियोग' में प्रस्तुत किया जो ठीक उसी दिन प्रकाशित हुआ जिस दिन दांडी-कूप आरम्भ हुआ। उनके मनमें यह विषय इतना रमा हुआ था कि एक पत्र लेखकके सुझाव पर उन्होंने 'गीता' पर नई प्रवचन-माला लिखनी शुरू कर दी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१४
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Juhi1986
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||आठ|}}</noinclude>(पृष्ठ २७३-४)। उन्होंने मीराबहनको लिखा : "इन अध्यायोंमें मैं अपना हृदय उँडेलना चाहता हूँ" (पृष्ठ २९५)।
'गीता' में अनासक्तिका जो उपदेश किया गया है, उसपर से गांधीजीने हाथमें लिये हुए काममें तल्लीन होनेका पाठ सीखा। उन्होंने महादेव देसाईको लिखा : "जिसका सारा जीवन यज्ञरूप है और जो अनासक्त है, वह एक समयमें एक ही
काम करेगा" (पृष्ठ २९९)। "हमें जो काम दिया गया है उससे प्राप्त होनेवाला सन्तोष ही सच्ची सिपहगरी या भक्ति या साधना है।" बिना माँगे जो सेवाका काम हमारे हिस्से आ पड़े, उसमें डूब जाना ही सच्ची समाधि है (पृष्ठ १७)। नारणदास गांधीको उन्होंने बताया कि यज्ञमय जीवन कलाकी पराकाष्ठा है, सच्चा रस उसीमें है "क्योंकि उसमें से रसके नित्य नये झरने प्रकट होते हैं। मनुष्य उन्हें पीकर अघाता नहीं है, न वे झरने कभी सूखते हैं" (पृष्ठ २५८)। ऐसी सेवाके लिए हमारे विचार और कार्यमें जाने-अनजाने रामनामकी संगत उसी प्रकार होनी चाहिए जिस प्रकार गवैयेके गानमें तानपूरेकी संगत रहती है (पृष्ठ २९९)।
गांधीजीने अनासक्तिकी शिक्षाको यरवडाके अपने बन्दी-कालमें साकार करके दिखा दिया। उन्होंने एक प्रबल जन-आन्दोलनको जन्म दिया था। और यह आन्दोलन तीव्रसे तीव्रतर ही होता जा रहा था कि ५ मईको उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल पहुँचनेके बाद गांधीजी आन्दोलनकी दिशा या गतिके बारेमें सर्वथा उदासीन हो गये और अपना सारा ध्यान कताई और पत्र-व्यवहार करनेपर लगा दिया। उन्हें लगता था कि जेलसे बाहर रहते हुए उन्होंने कताईकी कला और विज्ञानमें निपुणता
प्राप्त करनेकी तरफ ढिलाई बरती थी। कताईको वह "नित्यका महायज्ञ" मानते थे, दरिद्रनारायणकी सेवाके जरिये राष्ट्रीय पुनरुद्धारका चरम सामूहिक प्रयास मानते थे (पृष्ठ २४०)। "यदि दरिद्रनारायण है... और यदि खादी उसकी प्रसादी है..." तो अपनी ही शिक्षा पर मेरा खुदका अमल कितना शिथिल रहा है (पृष्ठ २९९)। अतः वह पूरे मनोयोगसे कताई और तत्सम्बन्धी प्रक्रियाओं पर अधिकार प्राप्त करनेमें जुट गये और लगातार उसी विषयमें विचार करते रहते थे (पृष्ठ ३३१)। मीराबहनके इस सुझाव पर कि वह 'अनासक्तियोग' का अंग्रेजीमें अनुवाद कर दें, गांधीजीने उत्तर दिया कि वह इस कार्यके लिए अपनी कताई नहीं छोड़ सकते क्योंकि मेरी दृष्टिमें कताई 'गीता' का "व्यावहारिक अनुवाद" (पृष्ठ २०)। मीराबहन, नारणदास तथा अन्य लोगोंको लिखे गये उनके पत्र कताईमें उनकी प्रगति और विभिन्न प्रकारके चरखोंके साथ उनके विफल या सफल प्रयोगोंके विवरणसे भरे हुए हैं। मीराबह्नको उन्होंने लिखा: "चरखा, तकली और धुनकीने
तो मेरे ऊपर सम्मोहन कर दिया है" (पृष्ठ २९६)।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१५
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<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||नौ|}}</noinclude>गांधीजी आश्रमकी समस्याओंमें गहरी दिलचस्पी लेते थे और नारणदासको लिखे अपने प्रत्येक पत्रमें विस्तारसे अपने सुझाव रखते थे। प्रेमाबहन कंटकको पत्र लिखकर उन्होंने स्पष्ट किया, "हिन्दुस्तानके प्रश्नोंको सुलझानेमें मुझे जितना रस आता है, उससे भी ज्यादा आश्रम-सम्बन्धी और उनमें भी बहनोंके प्रश्न सुलझानेमें आता है, क्योंकि उनमें बड़े प्रश्नोंको सुलझानेकी चाबी छिपी रहती है" (पृष्ठ ५३)। वर्षोंसे गांधीजी आश्रमकी स्त्रियोंको स्वतन्त्रता संग्राममें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानेके लिए
प्रशिक्षित कर रहे थे। अब उन्होंने स्त्रियोंको बाहर निकल कर गाँवोंमें जाने और विदेशी वस्त्रोंकी दूकानों और मदिरालयों पर धरना देनेके लिए कहा। इन कार्योंमें स्त्रियोंको आने-जाने और काम करनेकी पूरी स्वतन्त्रता अपेक्षित थी और इसमें खतरे
भी कम नहीं थे। किन्तु गांधीजीको उनमें पूरा विश्वास था और स्त्रियोंके आत्मविश्वासको सुदृढ़ करनेके लिए जो कुछ कर सकते थे, उन्होंने किया। आश्रमकी एक बहनको उन्होंने लिखा: "मैं तो तुम सभी बहनोंको हर तरहसे परिपूर्ण देखना चाहता हूँ।... मेरी सभी आशाएँ तुम बह्नों पर निर्भर हैं। मुझे प्रायः ऐसा लगता रहता है कि अहिंसाकी अन्तिम विजय स्त्रियोंके हाथों ही होगी" (पृष्ठ १३६-७)। गंगाबहन वैद्यको उन्होंने पत्र में लिखा: "आत्मा तो दोनोंकी एक-सी है। किन्तु पुरुष आत्माको न पहचाने और स्त्री ही पहचाने तो स्त्री बलवती हो जाती है, जैसे सीता। ...आज भी संसारमें अनेक सीताएँ पड़ी हैं जो एक भी पुरुषकी मददकी जरूरत
नहीं रखतीं और फिर भी सुरक्षित हैं" (पृष्ठ ३०५)। नारणदास गांधीको उन्होंने लिखा : स्त्री-जाति इतनी दबाई गई है कि वे बेचारी स्वतन्त्र रूपसे विचार तक नहीं कर सकतीं। इसीलिए उनके प्रति आश्रमको तो बहुत उदारतासे काम लेना है। उसमें अत्यधिक जोखिम है श। वे सब [जोखिम] उनकी सेवाके लिए हम उठायें" (पृष्ठ ९२)। और फिर, "बहनोंकी स्वतन्त्रताकी पूर्ण रूपसे रक्षा करनी है। चाहे रास्ता चलते भूल जायें, ठोकर लगे, काँटा चुभे या गिर पड़ें" (पृष्ठ १४८)।
नारणदास गांधीको एक अन्य पत्रमें उन्होंने लिखा: "बहनोंके बारेमें हमने पूर्ण विश्वास की नीति ग्रहण की है।... हिन्दू स्त्रियोंका हिन्दू पुरुषों पर बहुत भारी कर्ज है" (पृष्ठ २७२)। अपने एक सम्बन्धी और खादी कार्यकर्त्ता जयसुखलाल गांधीको, जो अपनी पत्नीके रूढ़िवादी विचारोंके कारण उसके साथ शान्तिसे नहीं रह पाते थे, गांधीजीने लिखा: "हम स्वयं जिस स्वतन्त्रताका उपभोग करना चाहते हैं, वही स्वतन्त्रता उसे भी है। उसपर क्रोध करनेसे उसकी सच्ची भावनाएँ दब जायेंगी। मैंने भी तो ऐसा किया है, अतः यह मैं अपने अनुभव के आधार पर लिख रहा हूँ" (पृष्ठ १७९)।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१६
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Juhi1986
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||दस|}}</noinclude>गांधीजी गंगाबहन वैद्यके प्रशिक्षणमें बहुत रुचि रखते थे। उनको एक पत्रमें उन्होंने लिखा: "उदासी क्यों लगती है? लगे तो उसे फौरन मेरी तरफ भेज ही देना चाहिए।...जिस तरह मुझमें बाप बननेकी शक्ति है, उस तरह माँ बननेकी भी है" (पृष्ठ १६३)। इस खण्डमें बहुतसे पत्र हैं जिनमें पिताकी कठोरता और माताका वात्सल्य छलकता दिखाई पड़ता है। आश्रमके संगीत-शिक्षक पंडित खरेको एक पत्र लिखते हुए गांधीजीने स्वीकार किया: "पितृपदके लिए आवश्यक योग्यता-
उतना प्रेम, उतनी आत्मीयता, उतनी सजगता" मुझमें है या नहीं, इस बातकी मैं अक्सर जाँच करता हूँ (पृष्ठ १४०)। मीराबहनको लिखे अनेक पत्रोंसे मीराबह्नके स्वास्थ्यके लिए उनकी चिन्ता प्रकट होती है और उनमें बराबर यह आग्रह किया गया है कि मीराबह्न आवश्यक सुविधाओं का लाभ उठायें और आराम करें। नैतिक प्रश्नोंपर गांधीजीने बहुत दृढ़ स्थिति अपनाई लेकिन साथ ही व्यक्तियोंके प्रति उन्होंने
उदारताका रुख रखा और उनकी कमजोरियोंको सदा ध्यानमें रखा। प्रेमाबहन कंटकके बारेमें कहा जाता था कि वह आश्रमकी पाठशालामें बच्चोंको पीटती है। इसपर गांधीजीने उन्हें लिखा : "...गोलीके बिना काम हो सकता है- इस बातको सिद्ध करनेके लिए ही हमारा अर्थात् आश्रमका अस्तित्व है" (पृष्ठ ३४२-३)। उन्होंने प्रेमाबहनको सलाह दी: "तू बच्चोंकी सभा कर।... उन्हें मारना और वे जैसा कहें, उसी तरह मारना। जो मना करें, उन्हें मत मारना। ...इस विषयकी चर्चा मेरे साथ करती रहना" (पृष्ठ ३७४)। नारणदास गांधीके भतीजेने नारणदासके विरुद्ध जो आरोप लगाये थे उनके बारेमें नारणदासका स्पष्टीकरण पढ़नेके बाद गांधीजीने लिखा: "मैंने तो केशुको लिखा है कि... तुम्हारे विरुद्ध कोई बात मेरे मनमें नहीं आती। ...अब तुम ही उसे बुलाकर जो शिकायतें मैंने लिखी हैं, उनकी बात करना।...बादमें तुम उसे सन्तुष्ट कर सको तो करना" (पृष्ठ ३६७)।
निश्चय ही यह जरूरी था कि लोग अपने-आपको सुधारें और दूसरोंको सुधारने में मदद दें, लेकिन परिवर्तनकी आवश्यकताकी अनुभूति और फिर उस दिशामें प्रयत्न भी व्यक्तिको ही करना था। अतः गांधीजीने यह सलाह दी कि हमारे गुणोंको दूसरे देखें। हमें तो अपने दोषोंका ही दर्शन करना चाहिए (पृष्ठ २६६)। उन्होंने यह भी कहा, "अहिंसाके मानी हैं कि हम अपने प्रति कृपण और दूसरोंके प्रति उदार
रहें।..."(पृष्ठ ९)। महालक्ष्मी ठक्करको लिखे एक पत्रमें गांधीजीने विस्तार-पूर्वक समझाया कि हमें अपनी कमजोरियोंके प्रति कठोर और दूसरोंकी कमजोरियोंके प्रति उदार दृष्टि रखनी चाहिए (पृष्ठ ३५८)। भूलका पता चलते ही उसे सुधार लेनेका एक छोटा-सा किन्तु महत्त्वपूर्ण दृष्टान्त हमें उस पत्रमें मिलता है जो उन्होंने<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८७. पत्र: मोतीबहन चोकसीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मोती,}}
तू आश्रम पहुँच गई, यह बहुत अच्छा हुआ। अब यदि तू शान्तिसे रह सके, तो अच्छा हो। जब भड़ौंचसे तुझे कुछ नहीं मिलता तो तेरा खर्च कैसे चलता है? क्या नाजुकलालने कुछ बचाया है?
लक्ष्मीसे मुझे पत्र लिखनेको कहना। जीवनदास कहाँ है और क्या कर रहा है? जेठालाल कहाँ है? मणिकी क्या खबर है? बम्बई में वह क्या करती है? क्या गोकीबहन सेवा- कार्यमें कुछ हाथ बँटाती है? तेरा दैनिक कार्यक्रम क्या रहता है? वल्लभभाई कह रहे थे कि लक्ष्मीदासको बुखार आ गया था। बुखार कैसे आया? अब उन्होंने वल्लभभाईको मेरे पाससे हटा दिया है। उन्हें दो-तीन दिनके लिए ही यहाँ रखा गया था। जेलमें तो ऐसा ही होता है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ १२१४७) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१८८. पत्र: शान्तिकुमार मोरारजीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ शान्तिकुमार,}}
तुम्हारा प्रणाम मुझ तक पहुँच गया है। मैं तुम्हारा रोज स्मरण करता हूँ। घड़ी तो मेरे सामने ही पड़ी है न? तुम मुझे पत्र लिख सकते हो। क्या तुम्हारी कठिनाइयाँ दूर हुई? माँजी को प्रणाम। ईश्वर तुम्हारे मनको शान्ति दे।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ४७१९) की फोटो-नकलसे सौजन्य: शान्तिकुमार मोरारजी<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७१
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८९. पत्र: काशिनाथ त्रिवेदीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
८ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ काशिनाथ,}}
किसी व्यक्तिको अपनी मानसिक स्थिति के बारेमें बहुत सोच-विचार नहीं करना चाहिए। हमें अपने नियत कार्य में तन्मय रहना चाहिए और प्रफुल्लित रहना चाहिए। जब हमारे मनमें विकारपूर्ण विचार आने लगें तो सद्विचारों द्वारा उनका निवारण करके हमें शान्त रहना चाहिए। अपने निश्चयों पर दृढ़ रहनेसे आत्मविश्वास अपने-आप आ जाता है।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ५२५१) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१९०. पत्र: मथुरादास पुरुषोत्तमको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
८ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मथुरादास,}}
तुम्हारा पत्र मिला, किन्तु मोतीबहनका पत्र नजर नहीं आया।
उपाधियोंके बारेमें काकासाहब से बातचीत करनेके बाद हम दोनों इस निर्णय पर पहुँचे हैं कि उनकी तीनसे अधिक श्रेणियाँ न रखी जायें तथा हर तरहके हुनर, कला या साहित्य ज्ञानके लिए एक ही प्रकारकी उपाधि होनी चाहिए। फिलहाल 'विनीत', 'विशारद' और 'पण्डित' इस प्रकार विद्यापीठकी तीन उपाधियाँ हैं। जिसने किसी विषय में सामान्य ज्ञान प्राप्त किया हो वह 'विनीत' (मेट्रिकुलेशन प्रवेश), जिसने उक्त विषय में प्रवीणता प्राप्त कर ली हो अर्थात् जो दूसरोंको पढ़ा सके यह 'विशारद (ग्रेजुएट) और जो इस विषय में शोध कर सके, शोध-प्रबन्ध और लेख लिख सके, वह 'पण्डित'। इस बातको ध्यान में रखते हुए 'पण्डित' की उपाधि फिलहाल किसीको न दी जाये। 'धनुर्विनीत', 'धनुर्विशारद' की उपाधि दी जा सकती है। यदि तुम उपाधियाँ दो तो इस बातका ध्यान रखना कि उन्हें बहुत सस्ता मत बना देना। परीक्षक नियुक्त करके जो यथारीति उत्तीर्ण हों उन्हींको उपाधियाँ देना।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३७४४) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७२
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१९१. पत्र: नारणदास गांधीको'''}}}}
{{right|५/९ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ नारणदास,}}
पत्रोंका पुलिंदा बुधवारको ही मिला। भगवानजी और मणिबहनके पत्र पढ़ लेना। मणिबहनका पत्र उसे तुम खुद पढ़ाना। दोनों पत्र पढ़नेसे सब समझ आ जायेगा और तुम्हें और कुछ बतानेकी जरूरत नहीं रहेगी। ऐसे काम भी तुम्हींको करने पड़ेंगे, इसका विचार नहीं किया था; पर मुझे सोच लेना चाहिए था। तुममें इन्हें भी पूरी तरह सँभाल लेनेकी शक्ति है, यह ईश्वरकी कृपा है। केशुका काम कठिन लगता है। सँभलकर जैसे काम चले वैसे चलाना। नवीनके साथ क्यों नहीं बनी? पहले तो दोनोंकी बहुत ही बनती थी। विदेशसे आये हुए पत्र भेजने लायक हों तो भेज सकते हो। बहुत महत्त्वपूर्ण हों तो नकल रख लेना, या नकल ही भेज देना। दूदा-भाई लक्ष्मीको बुलाने का बहुत आग्रह करें और लक्ष्मी जाना चाहे तो रोकना नहीं। वह अच्छी खासी हठी है; किन्तु अब उसका नया अनुभव हो तो देखना।
{{right|८ सितम्बर, १९३०}}
पिजाईके लिए रुई मुश्किलसे २० तारीखतक चलेगी। यदि अभीतक न भेजी हो तो अब फौरन भेज देना। चार पौंड भेज दो तो काफी है। दो जनोंके लिए पूनियाँ बनती हैं; इसलिए काफी रुई लगती है। काकासाहब ने अभी तो शुरू ही किया है, किन्तु समय बीतने पर ज्यादा कात पायेंगे यह सम्भव है। चप्पलके बारेमें तो लिखा ही है।
मेरे वजन और भोजन-सम्बन्धी फेरफार आदिके बारेमें तो मीराबहनको लिखे पत्र में देखोगे ही।
{{right|मंगल प्रभात, ९ सितम्बर, १९३०}}
अस्पृश्यता-निवारण: यह व्रत भी अस्वाद-व्रतकी तरह नया है; और यह कुछ विचित्र भी लगेगा। यह जितना विचित्र है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी है। अस्पृश्यता यानी अछूतपन; और अखा भगतने ठीक ही गाया है कि 'आभडछेट अदकेरुं अंग' (अछूतपन तो [शरीरका] एक व्यंग है; छठी अँगुलीके समान यह किसी कामका नहीं है)। यह जहाँ-तहाँ धर्मके नामपर या धर्मके बहाने धर्मके काममें रुकावट डालता है और धर्मको बिगाड़ता है। अगर आत्मा एक ही है, ईश्वर एक ही है, तो अछूत कोई नहीं। जैसे ढेड़, भंगी अछूत माने जाते हैं, लेकिन वे अछूत नहीं हैं;
वैसे ही मुरदा भी अछूत नहीं है, वह सम्मान और करुणाका पात्र है। मुरदेको छूकर या तेल लगाकर या उसकी हजामत आदि करके अगर लोग नहाते हैं, तो वह सिर्फ आरोग्य-तन्दुरुस्तीके खयालसे ही मुरदेको छूकर या तेल लगाकर अगर<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७३
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: नारणदास गांधीको|१३५}}</noinclude>कोई नहाता नहीं है, तो उसे गन्दा भले ही कहा जाये, लेकिन वह पातकी नहीं है, पापी नहीं है। यों तो माता बच्चेका मैला उठाकर जबतक न नहाये या हाथ-पैर न धोये, तबतक अछूत गिनी जाये; लेकिन बच्चा प्यारसे या खेलता हुआ उसे छू ले तो न उसे (बच्चेको) छूत लगनेवाली है, और न इससे उसकी आत्मा ही मलिन होगी। लेकिन जो लोग नफरतके कारण भंगी, ढेड़, चमार वगैरा नामसे पहचाने जाते हैं, वे तो जन्मसे अछूत माने जाते हैं। भले ही उनमें से किसीने बरसों तक शरीर पर सैकड़ों साबुन मल डाले हों, भले ही वह किसी वैष्णव-जैसी पोशाक पहनता हो, माला-कण्ठी पहनता हो, रोज गीतापाठ करता हो और लेखकका धन्धा करता हो, तो भी वह अछूत माना जाता है। इस तरह जिसे धर्म माना जाता है या जो धर्मकी तरह बरता जाता है, वह धर्म नहीं है, अधर्म है और उसको समाप्त किया जाना चाहिए। अस्पृश्यता-निवारणको व्रतका स्थान देकर हम यह प्रगट करते हैं कि अछूतपन हिन्दू धर्मका अंग नहीं है; इतना ही नहीं, बल्कि वह हिन्दु धर्ममें बैठी हुई एक सड़न है, एक अन्धविश्वास है, पाप है, और उसे मिटाना हरएक हिन्दूका धर्म है, उसका परम कर्त्तव्य है। इसलिए जो उसे पाप मानता है वह उसका प्रायश्चित्त करे, और कुछ नहीं तो प्रायश्चित्तके तौर पर ही समझदार हिन्दु अपना धर्म समझ कर हरएक अछूत माने जानेवाले भाई या बहनको अपनाये प्रेमसे और सेवाभावसे उसे छुए, छूकर अपनेको पावन हुआ माने, 'अछूतों' के दुख दूर करे; वे बरसोंसे कुचले गये हैं, इसलिए उनमें अज्ञान वगैरा जो दोष आ गये हैं उन्हें धीरजसे दूर करनेमें उनकी मदद करे, और ऐसा करनेके लिए दूसरे हिन्दुओंको समझाये, प्रेरणा दे। इस निगाह से अछूतपनको देखने पर उसे दूर करनेमें जो सामाजिक या राजनीतिक नतीजे निहित हैं, उन्हें व्रतधारी तुच्छ समझेगा। उक्त या वैसा नतीजा आये या न आये, फिर भी अछूतपन मिटानेके कामको जिसने अपना व्रत बना रखा है, वह धर्म समझ कर अछूत माने जानेवाले लोगोंको अपनायेगा। सत्य वगैराका आचरण करते हुए हम सामाजिक परिणामोंका विचार न करें। सत्यका आचरण उस व्रतधारीके लिए कोई तरकीब नहीं है, वह तो उसकी देहके साथ जुड़ी हुई चीज है, उसका स्वभाव है; उसी तरह अस्पृश्यता-निवारण भी उस व्रतधारीके लिए तरकीब नहीं है, उसका स्वभाव है। इस व्रतका महत्त्व समझनेके बाद हमें मालूम होगा कि यह अछूतपनकी सड़न सिर्फ छेड़-भंगी माने जानेवालोंके बारेमें ही हिन्दू समाजमें पैठ गई है, ऐसा नहीं है। सड़नका स्वभाव है कि वह पहले राईके दानेके बराबर दीखती है, बादमें पहाड़का रूप लेती है, और अन्तमें जिस वस्तुमें दाखिल होती है उसका नाश कर देती है। अछूतपनका भी ऐसा ही है। यह छुआछूत दूसरे धर्मवालोंके साथ बरती जाती है, दूसरे फिरकेवालोंके साथ बरती जाती है, एक ही सम्प्रदायके भीतर भी बरती जाती है; यहाँ तक कि कुछ लोग तो छुआछूतको पालते पालते इस पृथ्वी पर भाररूप हो गये हैं। वे अपनी शुचिता सँभालने, खुदको ही सहलाने (अपने पर आँच न आने देने), अपने को बचाते फिरने, नहाने धोने, खाने-पीनेसे फुरसत नहीं पाते, और ईश्वरको भूलकर ईश्वरके नामसे खुदको पूजने लग जाते हैं। इसलिए अछूतपन मिटानेवाला आदमी सिर्फ ढेड़-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७४
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|१३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>भंगीको अपनाकर सन्तोष न मानेगा; वह जबतक तमाम जीवोंको अपने में नहीं देखता और अपनेको तमाम जीवोंमें नहीं होम देता, नहीं मिटा देता, तबतक शान्त होगा ही नहीं। अछूतपन मिटाना यानी तमाम जगतके साथ दोस्ती रखना, उसका सेवक बनना। यों अस्पृश्यता-निवारण और अहिंसाकी जोड़ी बन जाती है और सचमुच है भी ऐसा ही अहिंसाका अर्थ है तमाम जीवोंके प्रति पूरा प्रेम। अछूतपन
मिटाने का भी यही अर्थ है। तमाम जीवोंके साथका भेद मिटाना अछूतपन मिटाना है। इस तरह अछूतपनको देखनेसे वह दोष थोड़ा-बहुत सारे जगतमें फैला हुआ है। यहाँ हमने उसका हिन्दू धर्मकी सड़नके रूपमें विचार किया है, क्योंकि उसने हिन्दू धर्म में धर्मका स्थान हथिया लिया है, और धर्मके बहाने लाखों या करोड़ोंकी हालत गुलामों-जैसी कर डाली है।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
{{left|[पुनश्च:]}}
एक व्यक्ति कान्तु गजीवाला, खपाटिया नकला, सूरतमें रहता है। लगता है कि [दांडी-] कूचके दौरान उसने मुझे ५ रुपये दिये थे। उसे मैंने अपने यहाँसे हाथका कागज लेकर उसकी दैनन्दिनी बँधवाकर उसपर खादीकी जिल्द चढ़ाकर भेजने को कहा था। पकड़े जानेके कारण ऐसा करा नहीं पाया। अब जिसे बाँधनेका काम आता हो उससे सौ या उससे ज्यादा पन्नोंकी छोटी-सी वैनन्दिनी बनवाकर उसे भेज देना और मुझे लिखना। उसे एक पोस्टकार्ड तो फौरन लिखकर डाल देना।
{{right|'''बापू'''}}
{{left|[पुनश्च:]}}
५३ पत्र है।
गुजराती (एम॰ एम॰ यू॰/१ ) की माइक्रोफिल्म से।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१९२. पत्र: महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
१० सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ महालक्ष्मी,}}
तुम्हारा पत्र मिला। ज्यों-ज्यों तुम्हारा काम बढ़ता जाता है त्यों-त्यों तुम्हारे अक्षर भी सुधरते जाते हैं। तुम्हें अपने अक्षर और भी सुधारने चाहिए। सजावटके लिए अक्षरोंमें घुंडियाँ नहीं लगानी चाहिए। जैसे 'उ' की मात्रा 'उ' इसी तरह लगानी चाहिए, न कि 's' इस तरह अक्षर जैसे छपते है, वैसे ही लिखनेका अभ्यास कर लेनेसे लिखावट बहुत सुन्दर हो जायेगी। मैं तो तुम सभी बहनोंको हर तरहसे परिपूर्ण देखना चाहता हूँ। मेरे इस कथनमें अतिशयोक्ति नहीं है कि मेरी सभी आशाएँ तुम<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: रमावहन जोशीको|१३७}}</noinclude>बहनों पर निर्भर हैं। मुझे प्रायः ऐसा लगता रहता है कि अहिंसाकी अन्तिम विजय स्त्रियोंके हाथों ही होगी।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ६७९९) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१९३. पत्र: मोतीबहन चोकसीको'''}}}}
{{right|[१० सितम्बर, १९३० के लगभग]<ref>मूलमें यही तारीख दी गई है, किन्तु वह गांधीजीकी लिखावटमें नहीं है।</ref>}}
{{left|चि॰ मोतीबहन,}}
आशा है अब तुमने दुःख मानना छोड़ दिया होगा। तुम्हारे दुःखकी औषधि 'गीताजी' है। प्रतिदिन गुजराती अनुवाद पढ़ना और बार-बार पढ़ना शान्तुको हरिभाई डाक्टरको दिखाकर उसके दाँतका इलाज करवा लेना। प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा पढ़ती रहना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ३७३८) की फोटो-नकल से।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१९४. पत्र: रमाबहन जोशीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ रमा (जोशी),}}
तुम्हारा सुन्दर पत्र मिला। मैं देखता हूँ कि महालक्ष्मी तुम्हारा अनुकरण करती है। इसके और तुम्हारे अक्षरोंमें कोई फर्क नहीं है। यह अच्छी बात है। लेकिन इससे क्या तुम्हारी जिम्मेदारी बढ़ नहीं जाती? तुम्हें हर चीजमें इसी कारण उन्नति करनी चाहिए। ऐसा करनेकी शक्ति ईश्वरने तुम्हें प्रदान की है। तुम उन्नति करो, यही मेरी प्रार्थना है। तुम्हें मेरा यही आशीर्वाद है। महालक्ष्मीके जिन गुणोंकी तुमने चर्चा की है वह सचमुच उन गुणोंसे युक्त है, यह मैंने वर्धा में ही देख लिया था।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ५३२४) की फोटो-नकलसे।
{{dhr|1em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७६
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रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१९५. पत्र: रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको'''}}}}
{{right|११ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ रोहिणी,}}
तेरा पत्र मिला। अपने पत्र में हमीदाबहन ने तेरे साहसकी बात लिखी है, जिसे पढ़कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। कानजीभाईकी लड़की भला इतनी बहादुर क्यों न हो। तेरी बहादुरीकी बात पढ़कर मुझे उपनिषदकी एक कथा याद आ गई। उसमें हमारी इन्द्रियोंकी तुलना घोड़ेसे की गई है। आत्माकी सारथीके रूपमें कल्पना की गई है। जो इस घोड़े अर्थात् इन्द्रियोंको अपने वशमें रखता है उसे विजयी, और
घोड़ा जिसे घसीट ले जाये उसे पराजित कहा गया है। उस घोड़ेको जिस प्रकार तू अपने साहसके बलपर रोक सकी है उसी प्रकार तू और अन्य बहनें अपनी इन्द्रियों पर सवार रहें और उन्हें अपने यशमें रखें। यदि तुम लोग ऐसा कर सकी तो वह हमारे लिए रामराज्य होगा। हमीदाबहनको यह पत्र पढ़ना और समझा देना। प्रभु तेरा साहस बढ़ाये। हमीदाबहन को गुजराती सिखाना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ २६५२) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१९६. पत्र: प्रेमाबहन कंटकको'''}}}}
{{right|११ सितम्बर १९३०}}
{{left|चि॰ प्रेमा,}}
तेरा पत्र मिला। अब तबीयत अच्छी हो गई होगी। रातके नियमका पालन करना ही चाहिए। तुझे दिनका कोई काम कम कर देना चाहिए अथवा अभी पढ़ना-लिखना छोड़ देना चाहिए। पूरी नींद आनेसे उत्साह बढ़ेगा और यही काम थोड़े
समयमें हो सकेगा। ऐसा हो या न हो, ९ से ४ तक मनको शान्त रखकर सोना ही चाहिए। इसपर तुरन्त अमल करना। तू बहस न करे तो अच्छा हो। बहस करने योग्य बातों में खूब बहस करना, लेकिन इसमें नहीं।
तूने कमलावन लुंडीसे मित्रता की या नहीं?
धुरन्धरको बताना कि अध्यापक लिमयेने 'अनासक्तियोग' का अनुवाद किया है और वह अनुवाद तुरन्त ही प्रकाशित भी होगा।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७७
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2026-08-17T16:57:08Z
रेखा साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||पत्र: बलभद्रको|१३९}}</noinclude>'भीक' मराठीमें है, गुजरातीमें 'बीक'<ref>'भीक' (मराठी) का अर्थ है भिक्षा और 'बीक' (गुजराती) का अर्थ है डर।</ref> [है]।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ६६८२) से। सौजन्य: प्रेमाबहन कंटक; जी॰ एन॰ १०२३४की फोटो-नकलसे भी।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१९७. पत्र: निर्मला देसाईको'''}}}}
{{right|परवडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ निर्मला (बुआ),}}
तेरी कैद सच्ची है और हमारी झूठी। किन्तु अपनी कैदसे छूटना तेरे हाथमें है। और हम जिस कैदमें हैं उससे छूटना किसके हाथमें है? यदि हड्डी बढ़ गई है। तो इसमें घबराने की कोई बात नहीं। सूर्योदयके समय तुझे केवल धूपस्नान लेना चाहिए। धूपस्नानके समय शरीरके जिस भागकी हड्डी बढ़ गई है, उस भागको तो खुला रखना ही चाहिए। यदि पूरा शरीर खुला रखा जाये तो अधिक लाभ होगा। यदि सादी खुराक ली जाये तो वह जल्दी पच जायेगी। बाकी तो हरिभाई जैसा कहें वैसा करना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९४५६) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''१९८. पत्र: बलभद्रको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ बलभद्र (या बुद्धिचक्र),}}
नारणदासभाई तेरी बहुत प्रशंसा करते हैं। तूने तो जबर्दस्त पिंजाई की। यदि तू इसी प्रकार नियमित रूपसे उद्यम करता रहे तो कितना अच्छा हो! तू मुझे पत्र क्यों नहीं लिखता?
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ९२१०) की फोटो-नकलसे।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
q7r5p8pmzb4wwhkf2c9nwxcik42tno2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८७
250
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{Rh||पत्र नारणदास गांधीको|
३४९}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
{{Rh|||रविवार रात}}
यह पत्र लिख दिया है। बहुत महत्वपूर्ण बन गया है। मैं चाहता हूँ उसे पहुँच जाये ।
विनोबाकी तकलियाँ मिल गई हैं।
समाचार है, पढ़ लेना। काका के जानेके
प्रवचन के लिए पहले पन्नेका पिछला भाग
मेरे स्वास्थ्यके बारेमें मीराबह्नके पत्र में
फौरन बाद प्यारेलालको भेज दिया है।
पढ़ना ।
{{Rh|||२ दिसम्बर, १९३०}}
महादेव से कहना जेल में भी उसे समय मिले और अनुमति मिले तो लिखा
करे। बाकी अगले सप्ताह '
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}तीसरा, चौथा, और पाँचवाँ अध्याय, तीनों एक-साथ मनन करने योग्य हैं। उनमें
से अनासक्तियोग क्या है, इसका अनुमान हो जाता है। इस अनासक्ति - निष्कामता
से मिलने का उपाय उनमें थोड़े-बहुत अंशमें बतलाया गया है। इन तीनों अध्यायोंको
यथार्थ रूपमें समझ लेनेपर आगे के अध्यायमें कम कठिनाई पड़ेगी। आगेके अध्याय हमें
अनासक्ति प्राप्तिके साधनकी अनेक रीतियां बतलाते हैं। हमें इस दृष्टिसे 'गीता' का
अध्ययन करना चाहिए, इससे अपनी नित्य पैदा होनेवाली समस्याओंको हम 'गीता'
द्वारा बिना परिश्रम के हल कर सकेंगे। यह नित्यके अभ्याससे सम्भव होनेवाली वस्तु
है। सबको आजमा देखनी चाहिए। क्रोध आया कि तुरन्त उससे सम्बन्धित दलोकका
स्मरण करके उसे शान्त करना चाहिए। किसीसे द्वेष हो, अधीरता हो, आहारपणा
आये, किसी कामको करने या न करनेका संकट आये, तो ऐसे सब प्रश्नोंका निपटारा,
श्रद्धा हो और नित्य मनन हो, तो गीता-मातासे कराया जा सकता है। इसके लिए
नित्यका यह पारायण है और तदर्थ यह प्रयत्न है।
अभी ५-३० का बिगुल हुआ है।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
[ पुनदच: ]
{{Gap}}५२ पत्र है।
{{Gap}}गुजराती (एम० एम० यू० /१) की माइक्रोफिल्मसे ।
{{Gap}}१. इसके बाद गांधीजीने गीता के बारेमें लिखा था उस पत्रके पाठके लिए देखिए खण्ड ४९,
"गीता पत्रावलि ", अध्याय ४।<noinclude></noinclude>
6wkiqk2zdbchegydgz8fw08wpamhkb8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८८
250
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Sonu kumar 07
6479
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||'''४९१. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको'''}}
{{Rh|||३ दिसम्बर १९३०}}
भाई घनश्यामदास,
जमनालाल के तरफ से संदेशा मिला है कि आपके कोई मित्र या भागीदारने
सट्टा किया और उसमें काफी नुकसान हुआ। संदेशामें यह भी है कि उससे आपको
दुःख हुआ है। सट्टा करनेके साथ हि नुकसान तो रहा हि है। उसमें दुःख कैसे ।
इस नुकसानका सीधा अर्थ किया जावे तो सुख भी मिल सकता है। आप और
मित्रवर्ग ऐसी प्रतिज्ञा क्यों न करे कि अवसे सट्टा बिलकुल नहीं किया जायगा। सट्टासे
मिला हुआ धन नीतिकी कमाई कभी नहि हो सकती । पू० मालवीजीके स्वास्थ्यके
हाल लिखें।
{{Rh|||आपका,}}
{{Rh|||मोहन}}
{{Gap}}सी० डब्ल्यू० ६१९० से सीजन्य : घनश्यामदास बिड़ला
{{C|'''४९२. पत्र : मीराबहनको'''}}
{{Rh|||४ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० मीरा,
{{Gap}}आश्रमकी डाक कल शामको मिली। उसमें तुम्हारा अशान्तिप्रद पत्र भी है।
उससे चिन्ता तो नहीं होती, परन्तु विचारके लिए सामग्री मिलती है। इस स्वास्थ्यके
बिगड़ने का क्या कारण है ? बहरहाल, तुम्हें पूरा आराम अवश्य लेना ही चाहिए तुम्हें
मन और शरीर दोनोंको विश्राम देना चाहिए। इसलिए धीरे चलो। 'गीता' का छठा
अध्याय पढ़ लो । योग धीरे-धीरे करना चाहिए। जो काम हम कर रहे हैं वह योग
ही है। मुझे रोज एक कार्ड डाल दिया करो।
सप्रेम
{{Rh|||बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४२३ ) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६५७
से भी ।<noinclude></noinclude>
8rgsmd7nxzjj9v723phf646isqfct6x
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३८९
250
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४९३. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको'''}}
{{Rh||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||४ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० काशिनाथ,
{{Gap}}तुम्हारे दोनों पत्र मिले। माताजी वगैरा आ गये हैं, यह अच्छा हुआ। यदि
तुम नारणदासकी सम्मतिसे माताजीको अपने साथ खिलाते हो तो इसमें मुझे कोई
आपत्ति नहीं है। फिर भी इसमें दोष तो है ही । तुम्हें माताजीको बता देना चाहिए
कि तुम दोनोंका जीवन कौटुम्बिक जीवनसे भिन्न है। बेशक, इसका आर्थिक पहलू
भी है, जो कठिन है। लेकिन यहाँ तो मैंने आदर्शकी बात की है। हम हमेशा अपने
आदर्श तक नहीं पहुँच सकते और कई बार तो आदर्शके ठीक पालनकी खातिर ही
हमें उसके पालनमें कुछ सीमा निर्धारित करनी पड़ती है। इसलिए मैंने जो यह सब
लिखा है, उसपर से यह मत समझना कि तुम्हें अब सम्मिलित रसोईमें भोजन के लिए
जाना चाहिए। जहाँतक पिताजीके साथ तुम्हारे सम्बन्धका प्रश्न है तुम्हें कड़ाईसे
काम लेना चाहिए तुम्हें उनसे स्पष्ट शब्दोंमें कह देना चाहिए कि वे तुम्हारे द्वारा
नोकरी करने और उसके द्वारा पैसा जमा करनेकी आशा छोड़ दें। इसीमें उनकी
सेवा है। जबतक उन्हें तनिक भी आशा बनी रहेगी, तबतक ये प्रयत्न करते रहेंगे ।
जब आशा छोड़ देंगे तब इसके लिए प्रयत्न करना भी छोड़ देंगे। यह मानव-स्वभाव
है। जब आशा बिलकुल नष्ट हो जाती है तब निराशा हृदयको एक तरहका आश्वासन
देती है। यहाँ अनेक ऐसे कैदी हैं जिन्हें उम्र कैदकी सजा मिली है, उन्हें छूटनेकी
कोई आशा नहीं है। इससे वे आनन्दमग्न रहते हैं। मेरे जैसे अनिश्चित स्थितिवाले
लोग दुःखी होते होंगे। आज छूटेंगे कि कल -- आशा-निराशाके सागरमें इस प्रकार
डूबते-उतराते होंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि पिताजीके साथ तुम्हारे सम्बन्धमें जो
दुःखका भाव है, यह तुम्हारे अपने मनकी उपज है। यदि तुम्हें अपने कर्त्तव्यका भान
हो गया हो तो तुम्हें पिताजीकी बातोंका तनिक भी विचार नहीं करना चाहिए।
पिताजीका कर्ज चुकाने और उन्हें राहत देनेके लिए मित्रवर्गसे उधार लेनेकी नीति
कदापि सराहनीय नहीं है। मित्रोंसे ऐसा व्यक्तिगत लाभ न उठाने में ही भलाई है। यहाँ
फिर मैंने कोरे आदर्शकी बातकी है। यदि महावीरप्रसाद आदिके साथ तुम्हारा निकटका
सम्बन्ध हो और पैसा उधार लेनेकी आवश्यकता हो तो कदाचित लेना ही उचित
होगा। इन समस्त समस्याओं का समाधान तुम अनासक्ति रूपी रामबाण उपायसे करना ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ५२६३) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
e72o40475hng245j73uiyooeinz61to
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९०
250
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2026-08-18T11:15:05Z
Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४९४. पत्र : रमाबहन जोशीको'''}}
{{Rh|||'''४ दिसम्बर, १९३०'''}}
<Br>चि० रमावहन,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला । सुन्दर है। धीरूकी दृढ़ता आश्चर्यजनक है। उसके तूफानी
स्वभावमें उसकी दृढ़ताकी छाप है। हम यही आशा करें कि आश्रमके कई बालक
सेवा कार्यमें हम सबसे आगे बढ़ जायेंगे। यदि हमारा अन्तःकरण शुद्ध है और रोज
और भी शुद्ध होता जायेगा, तो परिणाम यही होगा ।
काठियावाड़ के वर्णनसे मुझे आश्चर्य नहीं होता। इस सुस्तीसे यह जाहिर होता
है कि अभी हमें काफी मार्ग तय करना है। इसीमें हमारी साधना निहित है।
इसलिए चिन्ता करनेकी कोई बात नहीं ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>'''बापुना पत्रो-७: श्री छगनलाल जोशीन'''
{{C|'''४९५. पत्र : तारामती मथुरादास त्रिकमजीको'''}}
{{Rh|||४ दिसम्बर, १९३०}}
{{Gap}}मैं जो समाचार चाहता था, वे सब मुझे मिल गये हैं। मथुरादास अपने समयका
इतना सुन्दर उपयोग करे, इसपर मुझे कुछ आश्चर्य नहीं होता। यह अनुभव उसके
लिए लाभदायक है। वियोग तुम्हारी कसौटी है। दिलीप और ज्योत्स्नाका स्वास्थ्य
अच्छा है यह पढ़कर सन्तोष हुआ। इस समय प्यारेलाल मेरे साथ है। हम दोनों
ठीक हैं। मुझे पत्र लिखती रहना ।
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>'''बापुनी प्रसादी'''<noinclude></noinclude>
g7posa81c19p1126z547v16bo9ti5gs
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९२
250
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2026-08-18T11:20:04Z
Sonu kumar 07
6479
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४९८. पत्र : मनु गांधीको'''}}
{{Rh|||परवडा मन्दिर}}
{{Rh|||५ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० मनुड़ी
{{Gap}}तेरा पत्र मिला । यदि तू लाठी चलाना सीख रही है तब तो मुझे भी तुझसे
इसकी शिक्षा ग्रहण करनी ही पड़ेगी। एक शब्दके अक्षर अलग-अलग नहीं होने
चाहिए। यदि पंक्ति में अन्तिम शब्दको पूरा करनेकी जगह नहीं रह जाती तो उस
स्थानको रिक्त ही छोड़ देना चाहिए। मूल शब्द 'नवडाई' नहीं 'नबलाई ' है ।
ह्रस्व उ
इस तरह लिखा जाना चाहिए । [ भी जिस तरह लिखा है ]
उस तरह नहीं । अभी तो तुझे अक्षर शुद्ध करनेकी ओर ध्यान देना चाहिए, शाब्दिक
सौन्दर्य पर नहीं। शाब्दिक सौन्दर्य तो अक्षर शुद्ध होनेसे स्वयमेव आ जायेगा ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (सी० डब्ल्यू० १५०७ ) की फोटो नकलसे सौजन्य : मनुबहन मशरूवाला
{{C|'''४९९. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}
{{Rh|||परवडा मन्दिर}}
{{Rh|||५ दिसम्बर १९३०}}
<Br>चि० प्रेमा,
{{Gap}}अपने उपवास और उस बीच तूने जो उत्साह दिखाया उसके लिए तुझे बधाई
चाहिए ? खुराकके बारेमें तो लिख ही चुका हूँ। अभी तुझे कच्ची सब्जियां नहीं खानी
चाहिए। दाल तो कतई न खाना दूध, दही, खाखरी, उबली सब्जियाँ अथवा फल,
जैसे पपीता, मोसम्मी आदि मिलें तो कच्ची सब्जियोंकी जरूरत नहीं रहती। कमसे कम
मुझे तो दवाकी जरूरत महसूस नहीं होती। और फिर मेरी हमेशासे यह वृत्ति रही
है कि जबतक मुझे यह मालूम न हो कि अमुक दवामें कौन-कौन-सी
मैं उस दवाको नहीं लेता । उपवासको दवाका काम देना चाहिए।
रखने की जरूरत है तो सही देखना, नींद पूरी लेना ।
{{Gap}}बच्चोंकी पढ़ाईंका कुछ-न-कुछ इन्तजाम जरूर करना ।
धुरका पत्र मुझे बहुत अच्छा लगा। उसका सारा काम मुझे बहुत निश्चित
और साफ मालूम हुआ है।<noinclude></noinclude>
gqay3wy5kx8a0nd746qwpbuhdpq2q4l
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९५
250
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{C|'''५०४. पत्र : भगवानजी पण्डयाको'''}}
{{Rh|||६ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० भगवानजी,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला । अभ्यासका अर्थ तुमने ठीक किया है; उसी तरह चित्तवृत्ति
निरोधका भी ध्यान, उपासना, अर्थात् श्रद्धापूर्वक स्वधर्मका पालन करना - अप्रत्यक्ष
रूपसे ऐसा अर्थ किया जा सकता है। मेरे विचारानुसार यहाँ ध्यानका संकुचित अर्थ
किया गया है। ध्यान अर्थात् पूजापाठके समय हम जो चुपचाप बैठते हैं यह इससे
मनुष्य में ईश्वरके प्रति आत्म-समर्पणकी भावना आती है और उससे निष्काम वृत्ति
पैदा होती है। आत्मशुद्धिके बिना समाज सेवा नहीं होती और समाज-सेवा करते-
करते ही आत्मशुद्धि होती है। अत: तुम्हारे मनमें जो प्रश्न उठते हैं वे तो ठीक
है, लेकिन तुम्हें उनके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। प्रश्नोंका [ अपने-आप ] समाधान
मिल जाये तो ठीक है न हो तो मनमें ऐसी श्रद्धा रखनी चाहिए कि सेवा करते-
करते समाधान मिल जायेगा ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३३४ ) से सौजन्य भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
{{C|'''५०५. पत्र : शान्ता शंकरभाई पटेलको
यरवडा मन्दिर'''}}
{{Rh|||६ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० शान्ता,
तू शंकरभाईसे मिल आई, यह ठीक किया। कमलाके संयमकी बात सुनकर
मुझे खुशी होती है। तू यदि अपने नामके अनुरूप धैर्य रखकर पत्र लिखे, तो तेरे
अक्षर सुधर जायें। जिन लोगोंसे एक जून भी भूखा नहीं रहा जा सकता उन्हें धीरे-
धीरे आदत डालनी चाहिए और फिर जो ब्रह्मचर्य का पालन करनेकी इच्छा रखते
हैं, उन्हें तो विशेष रूपसे ऐसा करना चाहिए। अभी फिलहाल ही प्रेमाबहनने सात
दिनका उपवास रखा था, क्या तू यह जानती है ? और उपवासके दौरान वह अपने
रोजमर्राके काम, यथा कपड़े धोना, पानी भरना आदि भी करती रही है। और
एक तु है कि एक जून भोजन न खाने पर तेरे हाथ कांपने लगे। यह मानसिक
समझी ?
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ३९९०) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
ksa1npd1rln01v6gopqdht1424ff6sh
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2026-08-18T11:24:20Z
Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{C|'''५०४. पत्र : भगवानजी पण्डयाको'''}}
{{Rh|||६ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० भगवानजी,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला । अभ्यासका अर्थ तुमने ठीक किया है; उसी तरह चित्तवृत्ति
निरोधका भी ध्यान, उपासना, अर्थात् श्रद्धापूर्वक स्वधर्मका पालन करना - अप्रत्यक्ष
रूपसे ऐसा अर्थ किया जा सकता है। मेरे विचारानुसार यहाँ ध्यानका संकुचित अर्थ
किया गया है। ध्यान अर्थात् पूजापाठके समय हम जो चुपचाप बैठते हैं यह इससे
मनुष्य में ईश्वरके प्रति आत्म-समर्पणकी भावना आती है और उससे निष्काम वृत्ति
पैदा होती है। आत्मशुद्धिके बिना समाज सेवा नहीं होती और समाज-सेवा करते-
करते ही आत्मशुद्धि होती है। अत: तुम्हारे मनमें जो प्रश्न उठते हैं वे तो ठीक
है, लेकिन तुम्हें उनके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। प्रश्नोंका [ अपने-आप ] समाधान
मिल जाये तो ठीक है न हो तो मनमें ऐसी श्रद्धा रखनी चाहिए कि सेवा करते-
करते समाधान मिल जायेगा ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (सी० डब्ल्यू० ३३४ ) से सौजन्य भगवानजी पुरुषोत्तम पण्डया
{{C|'''५०५. पत्र : शान्ता शंकरभाई पटेलको
यरवडा मन्दिर'''}}
{{Rh|||६ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० शान्ता,
तू शंकरभाईसे मिल आई, यह ठीक किया। कमलाके संयमकी बात सुनकर
मुझे खुशी होती है। तू यदि अपने नामके अनुरूप धैर्य रखकर पत्र लिखे, तो तेरे
अक्षर सुधर जायें। जिन लोगोंसे एक जून भी भूखा नहीं रहा जा सकता उन्हें धीरे-
धीरे आदत डालनी चाहिए और फिर जो ब्रह्मचर्य का पालन करनेकी इच्छा रखते
हैं, उन्हें तो विशेष रूपसे ऐसा करना चाहिए। अभी फिलहाल ही प्रेमाबहनने सात
दिनका उपवास रखा था, क्या तू यह जानती है ? और उपवासके दौरान वह अपने
रोजमर्राके काम, यथा कपड़े धोना, पानी भरना आदि भी करती रही है। और
एक तु है कि एक जून भोजन न खाने पर तेरे हाथ कांपने लगे। यह मानसिक
समझी ?
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ३९९०) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
aogszecj1e1pot26u1xisfwd39upc0i
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९६
250
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2026-08-18T11:27:18Z
Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५०६. पत्र : महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको'''}}
{{Rh|||परवडा मन्दिर}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९३०}}
<Brचि० महालक्ष्मी,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला । तुमने जो लिखा है, वह ठीक है। किसी भी व्यक्तिको
किसी भी कारणसे अपना काम नहीं छोड़ना चाहिए, आदर्श इसीको कहते हैं। सभी
इस आदर्शको प्राप्त नहीं कर सकते, इसपर हमें दुःखी भी नहीं होना चाहिए, उनकी
आलोचना भी नहीं करनी चाहिए। हमें चाहिए कि हम अपने दोषोंके प्रति सजग
रहें तथा औरोंके दोषोंके प्रति उदार रहें। यह कोरी भलमनसाहत ही नहीं है, यह
तो एक सिद्धान्तकी बात है। हमें जिनके दोष दिलाई देते हैं यह उन्हें दूर करनेके
कितने प्रयत्न कर रहा है, यह हमें दिखाई नहीं देता । वस्तुतः महत्वकी बात तो
प्रयत्न करना है। हममें यदि अमुक दोष नहीं है, तो इसका कारण प्रयत्न न होकर
स्वभाव भी हो सकता है। हम जो जन्मसे ही मांस नहीं खाते सो हमारे मांस त्याग-
का कोई महत्व नहीं लेकिन जो व्यक्ति नित्य मांस खानेवाला है, यदि वह उसका
त्याग करता है और कभी-कभी खा भी लेता है तो भी उसके इस त्यागका बहुत
महत्व माना जा सकता है। इसलिए बेहतर यही है कि हम अपने व्रतका यथाशक्ति
सम्पूर्ण रूपसे पालन करें। दूसरा व्यक्ति जितना भी करे उतनेसे सन्तोष मानें। तुम्हें
ठीक अनुभव मिल रहा है। मुझे पक्का विश्वास है कि तुम परीक्षामें अवश्य सफल
होगी। तुम्हारी खुराक बिलकुल ठीक है।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ६८०६) की फोटो नकलसे।<noinclude></noinclude>
tw2jikkc9sb5cjteyuasswj7hrm8tq6
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९७
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2026-08-18T11:29:26Z
Sonu kumar 07
6479
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671517
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५०७. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि. मथुरादास,
{{Gap}}मैं आज तक तुम्हारे लेखोंको मुग्ध भावसे पढ़ता-भर रहा हूँ। वह मुग्ध-भाव
तो अब भी है, लेकिन अब मैं तुम्हारे लेखोंको एक विद्यार्थीके रूपमें और टीकाकारकी
हैसियतसे पढ़ने लगा हूँ। मैं देखता हूँ कि तुम्हारी पुस्तक स्वयंशिक्षक नहीं है। उसे
पढ़कर मनुष्य पींजना नहीं सीख सकता। जिन्हें थोड़ा-बहुत पीजना आता है, वे लोग
भी तुम्हारे सुझाये हुए सुधारों पर अमल नहीं कर सकते । पुस्तक अपने-आपमें सुन्दर
बन पड़ी है, लेकिन एक शिक्षक के रूपमें वह अधूरी है। जहाँ तक मैं तुम्हारी पुस्तकको
समझ पाया हूँ, तुमने मुझे जो पद्धति बताई थी उसे रद करके अब तुमने नई पद्धति
को अपनाया है। मेरी यह धारणा थी कि मैं उसे पहले ही अपना चुका हूँ, लेकिन
तुम्हारी पुस्तकको दुबारा पढ़ने पर देखता हूँ कि मैंने कोई नई बात नहीं की है।
अब मेरी तुम्हें यह सलाह है कि तुम मुझे एक ऐसा पाठ लिख भेजो, मानो तुम
मुझे सिखा रहे हो। तुम्हारी पुस्तकमें जितना कुछ दिया हुआ है उसे फिरसे लिखनेकी
जरूरत नहीं है। मुझे एक समय में ताँत पर कितनी रुई रखनी चाहिए और उसे
कितने झटकोंमें पीज लेना चाहिए? कितनी रुईसे पीजना आरम्भ करना चाहिए ?
गड्डी रोज क्यों बनाई जानी चाहिए? और वह कच्ची रुईकी क्यों होनी चाहिए ?
उसे भी क्या अन्ततः प्रतिदिन पीज डालना होगा ? तांतको खींचते समय क्या धुनकी
भी झुकती है ? तुम्हारे कहने का तात्पर्य यही है न कि तुम्हारा बायाँ हाथ उतना ही
ऊपर-नीचे होना चाहिए जितनी धुनकी होती हो तथा उसको आगे-पीछे ले जानेका
झुलानेका काम -- - मुठिया करती है। यदि इस झंझट में पड़नेका तुम्हारे पास समय न
हो तो इस पत्र की ओर कोई ध्यान न देना। तुम्हारा काम तो वहाँ जो लोग सीख
रहे हैं उनकी जांच करना और उनमें सुधार करना है। मैं तो मात्र एक दर्शकके
समान हूँ और मैं जानता हूँ कि अभी मुझे तुम्हारा ध्यान इस ओर आकर्षित करनेका
कोई अधिकार नहीं है। इस पत्रके दो उद्देश्य हैं- एक तो दोष बताना और दूसरा
उससे कुछ सीखना । तुम दूसरे उद्देश्यको गौण समझना। मैंने उपर्युक्त प्रश्नोंको विट्ठलके
आगे भी रखा है। उसे भी चाहिए कि वह मेरे इन प्रश्नोंका उत्तर दें, इससे वह
कुछ सीखेगा भी।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ३७४९ ) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
hh4n0cwavgpn1zmgxu29ccteaj0f5mh
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३९८
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{C|'''५०८. पत्र : रेहाना तैयबजीको'''}}
{{Rh|||७ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>बेटी रेहाना,
{{Gap}}अब तो एककी जगह दो उस्ताद हो गये। एक उस्ताद छोटी-सी लड़की और
दूसरी उस्ताद एक सफेद दाढ़ी। अब शागिर्दका खात्मा ही समझो। देखें, क्या होता
है। इतना सबक काफी है न ? क्यों में उर्दूमें तरक्की कर रहा हूँ न ? और फिर
अब तो प्यारेलाल इस बातका साक्षी है। और उसे तो उर्दू अच्छी तरह आती है।
लेकिन मैं इसके लिए उसका ज्यादा समय नहीं लेना चाहूँगा, क्योंकि अब यह सम्पूर्ण
रूपसे परखेमें खो गया है। इसलिए मेरे हिज्जेको तू सुधारना। चूंकि तबीयत अच्छी
नहीं है, इसलिए तुझे मुझको ज्यादा समय नहीं देना चाहिए। मैं तो बेकार हूँ इसलिए
मैं तेरे पत्रको धीरे-धीरे पढ़ लिया करूंगा । अम्माजान वालिदके साथ पक्षपात करती
हैं। वालिदके अक्षर उनके समान ही बूढ़े हैं और तेरे अक्षर तेरे समान युवा
हैं। खैर, अक्षर जैसे हैं वैसे रहने दो। [सम्भव है ] किसी व्यक्तिकी भले ही
सफेद दाढ़ी हो लेकिन मन जवान हो और हजारों नखरे करता हो, किसीको फ्रेंच
सिखाता हो, अनुवाद करता हो और अनेक योजनाएँ बनाता हो; तथा [सम्भव है ]
कोई जवान होने पर भी मनसे बूढ़ा हो। तू ठीक ऐसी ही है, सो तो नहीं कहता
लेकिन तेरी नाककी बीमारीके दूर होने पर तु बुढ़िया नहीं रह जायेगी । चीर-फाड़की
खबरसे मुझे भय नहीं हुआ; इससे मैं नहीं डरता। लेकिन तेरे बारेमें खबर सुननेको
लालायित अवश्य रहता हूँ। डाह्याभाईको मेरा आशीर्वाद अथवा वन्देमातरम्, यह
जो चाहे सो देना। उसके बारेमें सुनकर मुझे खुशी हुई।
<Br>खुदा हाफिज । *
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (एस० एन० ९६२४ ) की फोटो नकलसे।
{{Gap}}१. प्रथम पांच पंक्तियां उर्दू लिपिमें लिखी गई है। शेष पत्र गुजराती में है।
{{Gap}}२. ये शब्द उर्दू में है।<noinclude></noinclude>
2c96rfwrt2pb0g9omukey1vst8anf6f
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०२
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५१५. पत्र : मीराबहनको'''}}
{{Rh|||८ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० मीरा,
{{Gap}}मैंने तुम्हारा पत्र आसिरके लिए जान-बूझकर इस आशासे रख लिया है कि
मैंने तुम्हें गुरुवारको जो पोस्टकार्ड लिखा था और जो तुमको, आशा है, समय पर
मिल गया होगा, उसका जवाब मुझे सोमवारके पहले या सोमवारको मिल जायेगा ।
उसमें मैंने तुम्हारे स्वास्थ्यका हाल पूछा था । यह कब्जका बना रहना चिन्ताकी बात
है। मुझे उम्मीद है कि जब यह पत्र तुम्हारे पास पहुंचेगा, तबतक कब्जके दौरेका
सारा असर मिट जायेगा। मैंने तो थोड़े दिनके लिए प्रोटीनवाली खुराक छोड़कर
ही कजसे अपना पिण्ड छुड़ा लिया। अब मैं बादामके जरिये प्रोटीन ले रहा हूँ ।
अगर फिर दूध न शुरू करना पड़े, तो मुझे बड़ी खुशी होगी। अभी थोड़ी कमजोरी
मालूम होनेके सिवाय परिणाम सुन्दर रहा। बादाम में बड़ी सावधानीके साथ ले
रहा हूँ और में केवल हरी तरकारियों और एक आउन्स बादाम पर शक्ति कायम
नहीं रख सकता। मैं एक आउन्स पिछले दो दिनसे ही लेने लगा हूँ। मुझे कोई
अन्न लेना पड़ेगा। अभी मैंने निश्चय नहीं किया है कि क्या हूं। बाजरा या ज्वार
जिसकी भी रोटी जेलमें बनती हो उसीको आजमाना चाहता हूँ। अगर वह अनुकूल
आ जाये तो मेरी समस्या सन्तोषप्रद रूपमें हल हो सकती है। लेकिन जल्दबाजी
नहीं की जायेगी और दुराग्रह तो होगा ही नहीं । ज्योंही मुझे जरूरत महसूस होगी,
फिर दूध लेने लगूंगा ।
अगले दस दिनों में 'भजनावलि' का अनुवाद पूरा कर लूंगा। इससे मुझे बढ़ा
आनन्द मिला है। अपने कामसे मुझे सन्तोष नहीं है। इसके सिवाय कि यह प्रेमका
काम है, उसमें और कोई गुण नहीं है: साहित्यिक गुण तो है ही नहीं। लेकिन
इससे तुम्हें भजनोंका अर्थ जानने में सहायता मिलेगी, और यही मेरा उद्देश्य था ।
और जब यह काम पूरा हो जायेगा, तो आशा रखता हूँ कि दूसरा शुरू कर दूंगा;
अर्थात् गुजराती 'गीता' की भूमिकाका अनुवाद । मेरा विचार श्लोकोंका अनुवाद
करनेका नहीं है। परन्तु में मौजूदा अनुवादोंमें से एकको पढ़ जाऊँगा और जहाँ वह
मेरे अनुवादसे भिन्न होगा वहाँ उसे लिख लूंगा, और हाशियेकी तमाम टिप्पणियोंका
अनुवाद कर दूंगा। इससे मेरा काम सरल हो जायेगा और बहुत-सा परिश्रम बच
जायेगा । यह काका को भी पढ़ा देना। उन्हें इस प्रस्तावमें दिलचस्पी होगी ।
गाण्डीवमें आशासे कहीं अधिक सुधार हो गये हैं। अब वह हलका चलता है।
पहले जो खिचाव नहीं था वह भी आ गया है। लेकिन मैं सुधारोंका वर्णन करके
तुम्हें थकाऊँगा नहीं। उनका वर्णन केशुके पत्र में कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि<noinclude></noinclude>
ak6405gc9bwjy1xhtaltqtx535in3w1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०३
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{रrh||त्र नारणदास गांधीको|
३६५}}
{{Gap}}गतिमें अब दूसरा कोई चरखा इससे बढ़ नहीं सकता। लेकिन अभी उसकी परीक्षा
होती है। मैं जानता हूँ कि मेरे आश्वासनसे अधिक सूत पैदा नहीं होगा ।
तुम्हें अपनेको खूब आराम तो देना ही चाहिए। और मानसिक तनाव रहते
हुए काम नहीं करना चाहिए। वह चरखेके लिए तो अच्छा है, परन्तु इन्सानोंके
लिए अच्छा नहीं है।
<Br>सप्रेम,
{{Rh|||बापू}}
{{Gap}}अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५४२४) से सौजन्य : मीराबहन जी० एन० ९६५८
से भी ।
{{C|'''५१६. पत्र नारणदास गांधीको'''}}
{{Rh|||गुरुवार सुबह, ४/९ दिसम्बर १९३०}}
<Br>चि० नारणदास,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र कल शामको मिला। [ अधिकारी] बड़े ध्यानसे पत्रोंका पुलिंदा
देते हैं। रवाना भी तत्परतासे करते हैं। लगता है [ इस बार ] रवाना करनेमें एक
दिनकी देरी हुई।
{{Gap}}डाक्टरको दीवालीमें आना है अर्थात् नौ महीने बाद या ईसाई दीवालीके बाद ?
यदि हिन्दु दीवाली में आनेकी बात हो, तब तो इस अरसेमें कई रंग बदल जायेंगे ।
{{Gap}}महालक्ष्मी और माधवजीको प्रतिज्ञाका बहुत सूक्ष्म ध्यान है। इसलिए उन दोनों
को एक अक्षरके टूटनेसे भी दुख होगा; होना भी चाहिए। किन्तु यदि सभी अपनी
प्रतिज्ञाका यथाशक्ति अर्थ समझकर उसका पालन करें तो भी काफी है और लगता
है कि अधिकांश तो कर ही रहे हैं। तुम चेताते रहा करो।
{{Gap}}गिरिराजका तुम्हें जैसा ठीक लगे वैसा करना। भार तुम्हें ही उठाना है;
इसलिए तुम्हारा निर्णय ही सही मानूंगा। कृष्ण तो जबरदस्त है ही उसका स्वास्थ्य
अच्छा रहेगा तो मुझे लगता है कि वह बहुत सेवा कर सकेगा ।
{{Gap}}पुरुषोत्तमके बारेमें भी यही मानता हूँ। यह पत्र लिखता रहे।
{{Gap}}प्यारेलालका स्वास्थ्य सुधर रहा । मेरे पास न बिगड़े तो अच्छा। प्यारेलाल
का मेरे पास होना ऐसा है जैसे भेड़ियेके पास बकरी । भेड़ियेके पास बकरी बाँध
दो और बादमें रोज अच्छी-अच्छी खुराक उसको दो तो भी वह रोज सुसती ही
जायेगी । प्यारेलालका भी कुछ ऐसा ही था। अब न हो तो अच्छा है। ऐसा होने में
में पूरी तरह अपना दोष मानता हूँ। देखें अब ईश्वर क्या करना चाहता है। उसे
जो कुछ खुराक चाहिए वही उसे मिलती है। अभी दूध, दही, रोटी, सब्जी और
पपीता लेता है।<noinclude></noinclude>
n40zx1787bjuis3vk6hfjz8kscz90ij
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०४
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३६६|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Gap}}पारनेरकर इतना अव्यवस्थित काम करेगा यह मैंने नहीं सोचा था। वह शुद्ध
हेतुसे सेवा करनेवाला है। किन्तु लगता है कि काम कम ही संभाल सकता है।
तुमने दृढ़ होकर हिसाब ठीक कराया यह तो अच्छा ही हुआ है। अब ठीक तरहसे
आराम करके शरीरको स्वस्थ बना डाले तो अच्छा है। बीडजके व्यापार में घाटा है,
क्या ऐसा मानना होगा ? इन सभी प्रवृत्तियों में जिन्हें कम करना या खत्म करना
हो उन्हें तदनुसार सँभाल लो। अनासक्त होकर काम करनेवालेको अपने कामका
अन्दाज फौरन हो जाता है। उसे लोभ तो करना ही नहीं चाहिए। अपनी शक्ति-
से बढ़कर काम तो उठाना ही नहीं चाहिए। ठीक तरहसे देखें तो उसे काम लेनेकी
जरूरत ही नहीं होती। काम स्वयं उसके पास आ जाता है और वह उसे पूरी तरह
करनेका प्रयत्न करता है । संसारको ऐसा व्यक्ति निकम्मा जैसा लगता है। क्योंकि
उसके चेहरे पर कभी ग्लानि नहीं होती, वह कभी अपने कामके बोझका ढिढोरा नहीं
पीटता स्वयं अपने कामका बोझ कभी नहीं उठाता और सब कुछ नटवर पर लाद
कर जैसे वह नचाये वैसे नाचता है।
{{Gap}}जेठालालने कामका हाल लिख भेजनेको कहा था लेकिन उसने अभी तक नहीं
भेजा। कमलाबहन लुंडीकी बात समझ गया हूँ। विवाह ऐसी ही चीज है। उसकी
उत्पत्ति ही विषयमें रागमें है। विवाहको धार्मिक क्रिया कहते हैं; क्योंकि वह
विषयको काबू में रखने की विधि है इसीलिए उसकी रचना हुई। लेकिन यह बात
भुला दी गई है, इसलिए अब बहुत लोगोंके लिए विवाह केवल भोगका साधन ही
बन गया है। गंगाबहन और नानीवनको लिखूँगा ।
{{Gap}}तुम्हारा भोजन सम्बन्धी प्रयोग देख रहा हूँ। मुझे ब्यौरा लिखते रहा करो ।
मूंगफली की मात्रा कम करनेमें ही लाभ है। दूध, दही मिले तो लो; न लो, तो भी
काम चलेगा। सभी चीजें एक ही बार न खानेकी सलाह जो आजकल शोधक देते हैं,
उसमें कुछ तथ्य जरूर है। पूरी खुराकका रस एक ही तरह और एक ही बार हजम
नहीं होता, इसलिए बहुत मिश्रण करनेसे भी हाजमा बिगड़ता है। दयाका वर्णन
बहुत सन्तोषदायक माना जायेगा। छपे हुए अध्याय भेजनेको तुमने लिखा है। उसका
अर्थ यह भी हो सकता है कि अब भेज रहे हो। वे अभी मुझे नहीं मिले हैं।
{{Rh|||शुक्रवार सुबह}}
{{Gap}}अपने स्वास्थ्य और खुराकके बारेमें पूरी जानकारी मैंने काकासाहब को लिले
पत्र में दी है। इसलिए यहाँ दुबारा नहीं लिखता केशुको बुलाकर उसकी शिकायत
सुन लोगे, ऐसा मैंने मान लिया था, इसलिए पत्र में नहीं लिखा था। किन्तु अब भी
मुझे यह याद है। उसका सार दे रहा हूँ ।
१. तुम उसपर अकारण क्रोध करते हो।
२. एक बार वह तुम्हें बताने लगा तो भी तुमने बात नहीं सुनी, सबके सब
सुन सकें इतनी ऊँची आवाजमें फटकारा और उसे बोलने ही नहीं दिया।
३. तुम कुसुम, नवीन और धीरूके प्रति खूब पक्षपात करते हो। उनके विरुद्ध
शिकायत हो तो उसे सुनते भी नहीं हो ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०५
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||पत्र नारणदास गांधीको|३६७}}
{{Gap}}४. केशुके पाससे बिना किसी कारणके ही कारखानेका काम ले लिया है।
{{Gap}}५. दामोदरदासने तुम्हारे पक्षपातसे तंग आकर ही आश्रम छोड़ा।
{{Gap}}मैंने तो केशुको लिखा है कि जिस तरह मैं मगनलाल पर मुग्ध था और
उसके विरुद्ध कोई बात मेरे मनमें नहीं आती थी वैसा ही तुम्हारे बारेमें भी है।
इसलिए जिस बातका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव न हो तुम्हारे बारेमें वैसी बात माननेके
लिए तैयार नहीं हूँ। तब भी उसे तुम्हारे पास जाकर सब कुछ साफ-साफ कह देनेकी
सलाह दी थी। जवाब में उसने इतना ही लिखा कि मेरे पत्रसे उसे सन्तोष नहीं
हुआ। बाद में महादेव के साथ चर्चा करने की बात थी, इसलिए मैं चुप रहा। अब
तुम ही उसे बुलाकर जो शिकायतें मैने लिखी हैं उनकी बात करना। मैंने समझने में
भूल की हो तो वह बतायेगा और सुधार देगा। मैंने कुछ छोड़ दिया हो तो बह
पूरी बातें बताये। बादमें तुम उसे सन्तुष्ट कर सको तो करना। किसी भी काम में
लगे रहने के लिए तो मैंने लिखा ही है। काकासाहब के साथ भी उसके बारेमें बात
की है। केशुको भी उनसे मिलनेके लिए लिखा है। यह खाली बैठा रहे, यह तो
निःसन्देह अच्छी बात नहीं है।
{{Gap}}हरिलाल देसाई नौकरी करना चाहता हो और तुम्हें ठीक लगे तो उसे रख
लेना । वह व्यवस्थित नहीं है; तो भी निर्मल हृदय नवयुवक है। और मैं मानता
हूँ कि अपने यहाँ रखने लायक है। ' ने मुझे लम्बा पत्र लिखा था क्या वह
तुमने देखा है? जबतक वह कोई आंखों देखी पक्की बात न लिख सके तबतक
मुझपर कुछ असर नहीं पड़ेगा।.. * को मैं अति निर्मल हृदया बालिका मानता
हूँ ।...' भी निर्मल और साफ बात करनेवाला है, ऐसी छाप मुझपर पड़ी है। [दांडी-]
कूचमें भी मुझे इसका मधुर अनुभव हुआ था। काशी विद्यापीठमें भी उसकी सुवास
थी। ::
उसका पथ-प्रदर्शन कर रहा है और उसे उसे ले जाना चाहता है यह
सच है, किन्तु उसमें मैंने केवल भाई और शिक्षकका ही भाव देखा है।
{{Rh|||मौनवार दोपहर}}
{{Gap}}चप्पलके तल्लेके लिए चमड़ा जल्दी प्राप्त करना। नई चप्पलका तल्ला भी नाजुक
ही दिखाई देता है। उसमें घिसनेके निशान आजसे ही दिखाई दे रहे हैं। मेरे स्वास्थ्य
और खुराकके बारेमें मीराबहनके पत्र में और कुछ काकासाहब के पत्र में है। इसलिए
यहाँ कुछ नहीं लिखता ।
{{Gap}}अब छोटी बातोंको ज्यादा ध्यानसे देख पाता हूँ। इसलिए तुम्हारे पुलिदेमें
आनेवाले पत्रोंके अक्षरकी ओर ध्यान चला ही जाता है। अपने खराब अक्षर सुधारने
का प्रयत्न करता हूँ, यह तो तुम मेरे प्रत्येक पत्र में देखते ही होगे । खराब अक्षरोंमें
अविवेक तो है ही और अविवेकमात्र हिंसा है। किन्तु खराब अक्षर प्रत्यक्ष हिंसा
भी है। जिससे हमारे पड़ोसीको या किसी औरको बिना कारण कष्ट हो, वह हिंसा
ही है। सराय अक्षर पढ़नेवालेको कितना कष्ट होता है, कितनी असुविधा होती है
इसका मुझे दोहरा अनुभव है। एक तो मुझे खराब अक्षरवाले पत्र पढ़ने पड़ते हैं, यह
{{Gap}}१, २, ३ और ४. नाम नहीं दिये गये हैं।<noinclude></noinclude>
3t1axiqkc651011f25cpczap1iathay
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०८
250
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{C|'''५२०. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||१२ दिसम्बर १९३०}}
<Br>चि० व्रज किसन,
{{Gap}}तुमारा खत मिला। मैंने लीले फल छोड़ दिये बहारके दुःखकी कथा पढ़कर।
अब साथ में प्यारेलाल है। खाना पीना यज्ञादि सब कर्म हैं। नहि करने योग्य विकर्म
है। अकर्म कर्मका अभाव । जो मनुष्य अनासक्तिपूर्वक कर्म करता है वह अकर्म हुआ ।
विकर्म अनासक्तिपूर्वक हो हि नहि सकता। जो कुछ शंका उठे उसके बारेमें अवश्य
पूछो। स्वास्थ्य अच्छा करके बहार निकलो हम दोनों अच्छे हैं।
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
{{Gap}}जी० एन० २३८५ की फोटो नकलसे ।
{{C|'''५२१. पत्र : मीराबहनको'''}}
{{Rh|||१३ दिसम्बर १९३०}}
<Br चि० मीरा,>
{{Gap}}तुम्हारा पोस्टकार्ड यथासमय प्राप्त हुआ था । तुम्हारी तरफसे और कोई खबर
न मिलने का अर्थ में यह मान रहा हूँ कि तुम अब पूर्णतः स्वस्थ हो । प्रत्येक बीमारी-
के बाद तुम शीघ्र ही ठीक हो जाती हो, क्योंकि उसमें जो चिकित्सा होती है वह
प्राकृतिक होती है, किन्तु यदि शरीरको पूरा आराम न दिया जाये और मनको तनावसे
मुक्त न किया जाये तो बीमारी अपने पीछे कमजोरीकी विरासत छोड़ जाती है।
मेरी समझमें मन पर नियन्त्रण करना सबसे कठिन चीज है। इसका सर्वोत्तम उपाय
है 'गीता' का पालन किया जाये। मनको जितनी बार आघात लगता है, समझो
उतनी बार 'गीता' के इस पालनमें व्याघात हुआ। अच्छी खबर हो या बुरी खबर
हो, उसे अपने ऊपरसे यों गुज़र जाने दो जैसे बत्तखकी पीठ परसे पानी फिसल जाता
है। जब हम कोई सवर सुनें तो हमारा कर्तव्य मात्र इतना पता चलाना है कि
क्या कुछ करनेकी जरूरत है, और यदि हो तो हम अपने-आपको प्रकृतिके हाथका
एक साधन मानकर अपने कार्यके परिणामसे प्रभावित हुए बिना और तटस्थ भावसे
उसे कर दें। किसी भी परिणामके पीछे एकसे अधिक साधनोंका उपयोग होता है
इसलिए इस बातको ध्यान में रखते हुए वैसी तटस्थता या निष्काम भावका होना एक
{{Gap}}१. यह मूलमें अस्पष्ट है तात्पये शायद रसीले, अर्थात् ताजे फलोंसे हैं।<noinclude></noinclude>
8ysuv5fz73t0fr25ekjv4m7rc9b3q1p
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{C|'''५२०. पत्र : ब्रजकृष्ण चाँदीवालाको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||१२ दिसम्बर १९३०}}
<Br>चि० व्रज किसन,
{{Gap}}तुमारा खत मिला। मैंने लीले फल छोड़ दिये बहारके दुःखकी कथा पढ़कर।
अब साथ में प्यारेलाल है। खाना पीना यज्ञादि सब कर्म हैं। नहि करने योग्य विकर्म
है। अकर्म कर्मका अभाव । जो मनुष्य अनासक्तिपूर्वक कर्म करता है वह अकर्म हुआ ।
विकर्म अनासक्तिपूर्वक हो हि नहि सकता। जो कुछ शंका उठे उसके बारेमें अवश्य
पूछो। स्वास्थ्य अच्छा करके बहार निकलो हम दोनों अच्छे हैं।
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
{{Gap}}जी० एन० २३८५ की फोटो नकलसे ।
{{C|'''५२१. पत्र : मीराबहनको'''}}
{{Rh|||१३ दिसम्बर १९३०}}
<Br>चि० मीरा,
{{Gap}}तुम्हारा पोस्टकार्ड यथासमय प्राप्त हुआ था । तुम्हारी तरफसे और कोई खबर
न मिलने का अर्थ में यह मान रहा हूँ कि तुम अब पूर्णतः स्वस्थ हो । प्रत्येक बीमारी-
के बाद तुम शीघ्र ही ठीक हो जाती हो, क्योंकि उसमें जो चिकित्सा होती है वह
प्राकृतिक होती है, किन्तु यदि शरीरको पूरा आराम न दिया जाये और मनको तनावसे
मुक्त न किया जाये तो बीमारी अपने पीछे कमजोरीकी विरासत छोड़ जाती है।
मेरी समझमें मन पर नियन्त्रण करना सबसे कठिन चीज है। इसका सर्वोत्तम उपाय
है 'गीता' का पालन किया जाये। मनको जितनी बार आघात लगता है, समझो
उतनी बार 'गीता' के इस पालनमें व्याघात हुआ। अच्छी खबर हो या बुरी खबर
हो, उसे अपने ऊपरसे यों गुज़र जाने दो जैसे बत्तखकी पीठ परसे पानी फिसल जाता
है। जब हम कोई सवर सुनें तो हमारा कर्तव्य मात्र इतना पता चलाना है कि
क्या कुछ करनेकी जरूरत है, और यदि हो तो हम अपने-आपको प्रकृतिके हाथका
एक साधन मानकर अपने कार्यके परिणामसे प्रभावित हुए बिना और तटस्थ भावसे
उसे कर दें। किसी भी परिणामके पीछे एकसे अधिक साधनोंका उपयोग होता है
इसलिए इस बातको ध्यान में रखते हुए वैसी तटस्थता या निष्काम भावका होना एक
{{Gap}}१. यह मूलमें अस्पष्ट है तात्पये शायद रसीले, अर्थात् ताजे फलोंसे हैं।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४०९
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Sonu kumar 07
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||पत्र
मीराबहनको|
३७१}}
{{Gap}}वैज्ञानिक आवश्यकता प्रतीत होता है। यह कहनेका साहस कौन करेगा कि "
कार्य मैंने किया है ? " मैं जानता हूँ कि तुम्हें यह सब पता है। तथापि मैं इस सत्य-
को तुम्हारे मनमें बिठा देना चाहता हूँ ताकि वह बुद्धिसे छनकर हृदयमें उतर जाये ।
जबतक यह सत्य केवल बुद्धिमें रहेगा तबतक यह उसके ऊपर एक व्यर्थ भार-जैसा
बना रहेगा। बुद्धि द्वारा ग्रहण किया हुआ कोई भी सत्य तुरन्त हृदयको सम्प्रेषित
कर दिया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो सत्य निष्फल रह जाता
है और तब वह हमारे मन में विषैले पदार्थको भाँति फैल जाता है। जो चीज मनको
fare करती है वह सम्पूर्ण शरीरको विषाक्त कर देती है। अतः मस्तिष्कको मात्र
सम्प्रेषणका साधन मान कर उसका केवल उसी रूपमें उपयोग किया जाना चाहिए ।
वहाँ जो भी चीज ग्रहण की जाये उसे या तो तत्काल कार्रवाईके लिए हृदयको
सम्प्रेषित कर देना चाहिए या फिर सम्प्रेषणके लिए अनुपयुक्त मानकर उसी वक्त
रद कर देना चाहिए। शरीरको होनेवाले प्रत्येक रोग और मानसिक थकानका कारण
भी मस्तिष्क द्वारा अपने इस कार्यको सुचारु रूपसे सम्पादित न करना ही है। यदि
मस्तिष्क सिर्फ अपना कार्य करता रहे तो दिमागी थकान हो ही नहीं। इसलिए जब
हम बीमार पड़ते हैं तो उसका कारण आहारकी गड़बड़ी मात्र ही नहीं होता बल्कि
मस्तिष्क द्वारा अपने कार्यको सुचारु रूपसे न करनेके कारण हो रही गड़बड़ी भी
होता है। गीताकारने स्पष्ट ही इस बातको देख लिया था और स्पष्टसे स्पष्ट शब्दोंमें
इसका सर्वोत्तम उपाय संसारको बताया है। इसलिए जब कभी तुम्हारे दिमाग में कोई
बोझ हो तो तुम्हें 'गीता' की इसी मुख्य शिक्षापर ध्यान लगाना चाहिए और बोझ
को निकाल फेंकना चाहिए। हमें आशा करनी चाहिए कि यह भयंकर कब्ज फिर
कभी नहीं होगा।
{{Gap}}जहाँतक कुमारप्पाका प्रश्न है, यदि तुम्हारे मनमें पर्याप्त प्रेम और सद्भावना
है तो तुम्हें जो भी आलोचनाएं प्राप्त हों उन्हें उसके पास भेज दो और परिणामकी
चिन्ता मत करो। उसको आलोचनाओंकी जानकारी दे देना उसके प्रति तुम्हारा कर्तव्य
है। अपने सन्देश भेजने के लिए अब तुम काका का भी उपयोग कर सकती हो।
{{Gap}}मेरा दुग्ध-विहीन आहारका प्रयोग चल रहा है और अभीतक कोई खराब
परिणाम नहीं है। वजनमें ३ पौंडकी और कमी हुई है लेकिन शरीरमें शक्ति बनी
हुई है। वजनमें कमी होनेका एक कारण यह है कि मैं जितना अनाज और बादाम
लेता हूँ उनकी मात्रा बढ़ाने के मामले में अत्यन्त सावधानी बरत रहा हूँ। दोनों समय
अर्थात ११ बजे और ५ बजे बादाम तीन तोले और बाजरा तथा जुवारी भाखरी
लगभग २ तोले लेता हूँ। शीघ्र ही मेरा वजन बढ़ सकता है। किसी भी सूरत में,
पेटकी दशा असाधारण रूपसे अच्छी है। मैं तुमसे बिल्कुल सहमत हूँ कि एनीमाकी
आदत बुरी चीज है और सम्भव हो तो इसे छोड़ देना चाहिए। दूध छोड़नेके बाद
इसे छोड़ना सम्भव हो गया है, जैसाकि तुम्हें याद होगा, वर्धा जानेपर जब मैंने
दूध छोड़ दिया था तब एनीमा छोड़ना सम्भव हो गया था। सच तो यह है कि यदि
मैंने गोपालरावकी सलाह माननेमें जल्दबाजी करनेकी मूर्खता न की होती और उस<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१२
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Sonu kumar 07
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५२६. पत्र : प्रेमाबहन कंटकको'''}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर, १९३०}}
<Br<चि० प्रेमा,
{{Gap}}तेरा पत्र मिला। बच्चोंकी सजाके बारेमें भी समझा। तेरी दलील पुरानी है।
यह 'दूषित चक्र' है। तुझे मार पड़ी इससे तू सुधरी; इसलिए दूसरोंको सुधारनेके
लिए तू उन्हें मारती है। बच्चे भी बड़े होनेपर यही सीखेंगे। बिलकुल इसी दलीलसे
लोग हिंसाको ठीक मानते हैं। इस झूठे अनुभवके उस पार जाना हमारा काम है।
उसके लिए धीरज चाहिए, यह मैं स्वीकार करता हूँ। यह धीरज पैदा करने और
उसे विकसित करनेके लिए हम इकट्ठे हुए हैं। बच्चोंको पढ़ाना या अनुशासन सिखाना
ही हमारा ध्येय नहीं है। उन्हें चरित्रवान बनाना हमारा ध्येय है और उसीके लिए
पढ़ाई, अनुशासन वगैरा है। उन्हें चरित्रवान बनाने में अनुशासन टूटे, पढ़ाई बिगड़े तो
भले ही टूटे और बिगड़े। लेकिन तेरी दलीलको मैं समझता हूँ। यह भी समझता
हूँ कि तेरे मारनेमें द्वेष नहीं है; फिर भी तेरे मारनेमें रोष और अधीरता तो है
ही में एक सुझाव तेरे सामने रखता हूँ। तू बच्चोंकी सभा कर। जो बच्चे कहें
कि 'हम शैतानी करें या आज्ञा भंग करें तो हमें मारिए और इस तरहसे मारिए',
उन्हें मारना और वे जैसे कहें उसी तरह मारना । जो मना करें, उन्हें मत मारना ।
ऐसा करते-करते तू देखेगी कि मारनेकी जरूरत नहीं रहेगी।
साथ करती रहना। अधीर बनकर या निराश होकर इसे
तेरी बुद्धी मेरी बातको स्वीकार न करे, तबतक तू अपने ही
हूँ कि तू सत्यकी पुजारी है, इसलिए अन्तमें तुझे सत्य जरूर मिलेगा ।
{{Gap}}तेरी खुराक ठीक मालूम होती है।
{{Gap}}तूने राजकोटका वर्णन नहीं भेजा ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (सी० डब्ल्यू० ६६९४ ) से । सौजन्य: प्रेमाबहन कंटक; जी० एन०
१०२४६ की फोटो नकलसे भी ।<noinclude></noinclude>
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