विकिस्रोत
hiwikisource
https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0
MediaWiki 1.47.0-wmf.16
first-letter
मीडिया
विशेष
वार्ता
सदस्य
सदस्य वार्ता
विकिस्रोत
विकिस्रोत वार्ता
चित्र
चित्र वार्ता
मीडियाविकि
मीडियाविकि वार्ता
साँचा
साँचा वार्ता
सहायता
सहायता वार्ता
श्रेणी
श्रेणी वार्ता
लेखक
लेखक वार्ता
अनुवाद
अनुवाद वार्ता
पृष्ठ
पृष्ठ वार्ता
विषयसूची
विषयसूची वार्ता
TimedText
TimedText talk
मॉड्यूल
मॉड्यूल वार्ता
Event
Event talk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५२
250
159525
671622
508707
2026-08-18T16:36:58Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671622
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>अंग्रेज नर्स प्लेटफार्मपर लगभग तीन लाख भारतीय स्त्री-पुरुषोंके बीचमें खड़े थे। भगवान् ही जानता है कि यह सब अन्तमें क्या रंग लायेगा। मैं तो इतना ही जानता हूँ कि आज बहुतसे लोग ऐसे हैं जो यह सब मानव-प्रेमके कारण कर रहे हैं।
हाँ, पेटिटके पास जो पैसा है वह मेरा ही है किन्तु मेरा उसपर नियन्त्रण नहीं है। अच्छा होता कि तुम उनकी इनकारीके बारेमें मुझे पहले सूचना दे देते। मैं प्रयत्न करूँगा। कृपया मुझे बताओ कि मालवीयजीने क्या कहा है। यदि वास्तवमें तुम्हें कोई कठिनाई महसूस होती हो तो मेरी सहायता ले सकते हो। तुम्हारे प्रस्थानकी अन्तिम तारीख क्या है?
मैंने स्टोक्सके साथ अच्छा समय बिताया है। हम संयुक्त-प्रान्तका दौरा करते समय छः दिनतक साथ-साथ रहे।
मैं तुमसे सहमत हूँ कि हमें अफीमके विरुद्ध भी उसी तरह कार्य करना चाहिए जिस प्रकार हम मद्यपानके विरुद्ध कर रहे हैं। मैं यह निश्चित रूपसे अनुभव कर रहा हूँ कि यदि स्वदेशीका कार्यक्रम उचित रूपसे आगे बढ़ता रहा और शान्ति तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता कायम रही तो हम जरूर इस वर्ष के अन्दर स्वराज्य प्राप्त कर लेंगे। तब नई जिन्दगीकी शुरुआत के साथ-साथ अफीम तथा इसी प्रकारकी अन्य घृणित वस्तुएँ भी समाप्त हो जायेंगी।
{{left|सस्नेह,|1em}}
{{right|'''तुम्हारा,'''<br>
'''मोहन'''}}
अंग्रेजी पत्र (जी॰ एन॰ ९६२) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५४. पत्र: महादेव देसाईको'''}}}}
{{right|'''गया'''<br>
शनिवार [१३ अगस्त, १९२१]<ref>प्रोफेसर कृपलानीने गांधीजीको अपने साथ किसी बंगालीको रखनेका सुझाव इसी दिन दिया था और उसका उल्लेख इस पत्रमें है। उनके इस सुझावके तत्काल बाद कृष्णदास गांधीजीके साथ रहने लग गये थे।</ref>}}
{{left|भाईश्री महादेव,}}
तुम्हारा पत्र मिला। आत्मार्पणमें मौलिक सृजनकी शक्तिका लोप नहीं होता और न ही होना चाहिए। आत्मार्पणका अर्थ इतना ही है कि मनुष्य अपनी लघुताको समझता है और जिसका भरोसा करता है, उसका अवलम्ब लेता है। जब किसी विषयमें शंका होती है तो वह अपनी बातपर आग्रह नहीं रखता; प्रत्युत अपने साथी के आग्रहको ठीक मान लेता है। अर्जुनने कृष्णके सम्मुख जिज्ञासा करनेमें कमी नहीं रखी। कच्छप<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
2aynf1m52oyrve6taqrg8ctn1wwpr09
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५३
250
159528
671630
508710
2026-08-18T16:47:37Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671630
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||पत्र: महादेव देसाईको|५२१}}</noinclude>प्रभु-भक्त था। कच्छपीने अन्ततक ईश्वरका नाम लिया। यद्यपि...ने<ref>साधन-सूत्र में यह अंश अस्पष्ट है।</ref> अपने मन्त्रियों-का तिरस्कार किया और उनको राज्यसे निकाल दिया; किन्तु वह ईश्वरसे द्रोह तो करता ही रहा। आत्मार्पणका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य स्वयं अपनी विचार-शक्तिको ही गँवा बैठे। शुद्ध आत्मार्पणका परिणाम विचार-शक्तिका कुण्ठित हो जाना नहीं, उसका तीव्र होना है। ऐसा मनुष्य यह समझकर कि उसका एक अन्तिम अवलम्ब तो है ही, अपनी मर्यादाके भीतर रहता हुआ सहस्रों प्रयोग करता रहता है। किन्तु उन सबके मूलमें उसकी विनम्रता रहती है, उसका ज्ञान और विवेक रहता है। मैं मानता हूँ कि मेरे प्रति मगनलालकी आत्मार्पण-बुद्धि बहुत अधिक है, किन्तु फिर भी उसने स्वयं विचार करना कभी नहीं छोड़ा, मेरी ऐसी मान्यता है। तुम्हारा आचरण उससे भिन्न है। तुममें साहसकी कमी है; जब भी सहारा मिलता है तुम साहस खो देते हो। बहु-पठित होनेसे तुम्हारी अपनी सृजनकी शक्ति कुण्ठित हो गई है; इसी कारण तुम सहकारी होना चाहते हो। मनुष्य स्वतन्त्र कार्य करनेकी इच्छा रखते हुए भी अति विनम्र हो सकता है।
तुम जिस दृष्टिसे मेरे साथ रहना चाह रहे हो, वह शुद्ध है; किन्तु वह भ्रमयुक्त है। तुम तो केवल पश्चिमका अनुकरण करना चाहते हो। यदि मैं किसी मनुष्यको अपने कार्यका लेखा रखनेके उद्देश्यसे ही सदा अपने साथ रखूँ तो स्वयं मेरा यह व्यवहार अस्वाभाविक हो जायेगा। कोई सामान्यतः मेरे साथ रहे और मेरे कार्यका लेखा अदृश्य रूपसे रखे, यह एक बात है और कोई इसी इरादेसे साथ रहकर लेखा रखे, यह बिलकुल दूसरी बात है। रामके कार्यका लेखा किसने रखा था? उसका लेखा नहीं रखा गया, इससे कोई हानि तो नहीं हुई। जॉन्सनके कार्यका लेखा पूरा रखा गया उससे दुनियाको कोई अनुपम लाभ हुआ हो ऐसा मुझे नहीं दीखता। हम इस बातपर केवल साहित्यिक दृष्टिसे ही तो विचार नहीं करते। किन्तु मैं यह तो चाहता ही हूँ कि तुम मेरे साथ हर वक्त रहो। तुम्हारी ग्रहणशक्ति और तैयारी अच्छी है; इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी सभी बातें जान लो। मेरे मस्तिष्कमें विचार बहुत हैं; किन्तु वे प्रसंग आनेपर ही व्यक्त होते। उनमें कई सूक्ष्मताएँ होती हैं, जो किसी-को दिखाई नहीं दे सकतीं। वसन्तराम शास्त्रीके पत्रपर<ref>देखिए “टिप्पणियाँ”, १७-७-१९२१।</ref> की गई मेरी शुद्ध टीका न काका<ref>काका कालेलकर।</ref> समझे और न स्वामी।<ref>स्वामी आनन्द।</ref> उसे उनसे कुछ अधिक तुमने समझा। उस टीकामें निहित मेरी मृदुलता किसीको दिखाई नहीं दी। यदि तुम जैसा कोई मनुष्य मेरे साथ रहे तो वह अन्तमें मेरे कामको हाथमें ले सकता है, यह लोभ मेरे मनमें रहता है। मेरी अभी तुमको किसी एक काममें लगा देनेकी इच्छा नहीं होती; प्रत्युत मैं तुमको अनुभव कराना चाहता हूँ। फिर जिन लोगोंको मैं जानता हूँ उन सबसे तुम्हारा सम्पर्क हो जाये तो भविष्य में इस प्रवृत्तिको चलाने में सुविधा रहेगी।<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}</noinclude>
g79ynx6rty6y8oj3mo13x3ae7qactur
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५४
250
159531
671636
508713
2026-08-18T16:58:20Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671636
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
वालजी<ref>वालजी गोविन्दजी देसाई।</ref> और स्वामीका तार मिला है कि अगले अंकोंमें भूल नहीं होगी। प्रोफेसरने<ref>आचार्य जीवतराम बी॰ कृपलानी (जन्म १८८८); शिक्षाविद्, राजनीतिज्ञ और १९४६ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसके अध्यक्ष।</ref> फिर यह इच्छा प्रकट की है कि मैं अपने साथ किसी बंगालीको रखूँ। इसलिए तुम जब वहाँसे निवृत्त हो जाओ तब यहाँ मेरे पास आ जाओ, यह ठीक रहेगा। यदि तुम स्वयं ‘यंग इंडिया’ के कार्यको हाथमें लेकर उसको स्वतन्त्र रूपसे चलाना चाहो तो इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु मैं तो यही ठीक मानता हूँ। मेरे जानेपर ‘यंग इंडिया’ अनावश्यक हो जायेगा। यदि तुममें से कुछ लोगोंको यह
विश्वास हो कि तुम मेरे जानेपर मेरे सन्देशको पहुँचाते रहोगे तो तुम इसे चलाओगे। किन्तु इसके लिए भी मुझे तुम्हारा उसमें रहना जरूरी नहीं जान पड़ता। इससे पहले मुझे यह जरूरत जान पड़ती है कि तुम विविध अनुभव प्राप्त करके परिपक्व हो
जाओ। तब तुम ‘यंग इंडिया’ को अधिक कुशलतासे चला सकोगे। ‘इंडिपेंडेंट’ के सम्बन्धमें जवाहरलालसे बात कर लो। उन्हें संयुक्त-प्रान्तके ही किसी व्यक्तिको ढूँढ़ना चाहिए। हिन्दुस्तानी के इतने बड़े क्षेत्रमें से क्या कोई न मिलेगा। कपिलदेव मालवीय<ref>उत्तर प्रदेशके एक राजनैतिक कार्यकर्त्ता।</ref> कैसे हैं? जो भी हो, इन सब बातोंपर जवाहरलालसे बातचीत कर लो।
तुमने २५,००० रुपयेकी अच्छी याद दिलाई। मैं इस सम्बन्धमें सब व्यवस्था किये दे रहा हूँ। छपाई सुधरनी चाहिए।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{left|[पुनश्च:]}}
मैं देवदासको अभी वहीं रहने के लिए लिख रहा हूँ। पत्रको लिखकर पढ़नेका समय नहीं मिला है।
गुजराती पत्र (एस॰ एन॰ ११४१७) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५५. पत्र: मथुरादास त्रिकमजीको'''}}}}
{{right|शनिवार [१३ अगस्त, १९२१]<ref>साधन-सूत्र में यही तारीख दी गई है।</ref>}}
आप इतने सख्त बीमार हो गये थे, इसका मुझे अनुमान नहीं था। फिर भी आपसे आकर मिलनेकी आशा तो अन्ततक किये रहा। किन्तु आ कैसे सकता था? मैं बोरीबन्दर समयसे पाँच ही मिनट पहले पहुँचा था। फिर एकके बाद दूसरा काम निकलता चला गया। आप जो आशा करते हैं उसे मैं समझता हूँ; किन्तु मुझे अपने अत्यन्त प्रियजनों [से मिलने] की इच्छा छोड़नी भी पड़ती है। मेरे सम्मुख ऐसे अनेक<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
syo4peyf9fzgb34cq48e39lgj8suen0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५६
250
159535
671647
508717
2026-08-18T17:15:50Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671647
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५७. मृत्युका भय'''}}}}
मैं स्वराज्यकी व्याख्याएँ एकत्र कर रहा हूँ। उनमें एक व्याख्या यह भी है——मृत्यु के भयका त्याग। जिस देशके लोग मृत्युके भयसे भीत रहते हैं वे न तो स्वराज्य प्राप्त कर सकते हैं और न उसे सँभाल ही सकते हैं। अंग्रेज लोग तो मीतको जेबमें लिये घूमते हैं, अरब और काबुली भी मरणको एक मामूली अलामत समझते हैं। जब उनके यहाँ कोई मर जाता है तब वे रोते-पीटते नहीं। बोअर-स्त्रियाँ तो जानती ही नहीं थीं कि मरणका भय क्या चीज है। बोअर-युद्ध के समय हजारों बोअर-युवतियाँ
विधवा हो गईं। पर उन्होंने इसकी कुछ परवाह न की। उन्होंने अपने दिलको समझाया कि मेरे पति या पुत्र मर गये तो क्या हुआ, मेरे देशकी इज्जत तो कायम रही। यदि देश गुलाम हो जाता तो पतिके रहनेसे भी क्या होता? अपने गुलाम बेटेकी परवरिश करनेकी अपेक्षा तो उसकी लाशको कब्र में दफना देना और उसकी आत्माको याद करते रहना ही अच्छा है। इस तरह धीरज रखकर असंख्य बोअर-रमणियोंने अपने प्रियजनोंका बिछोह सहा।
ये उन लोगोंके उदाहरण हैं जो खुद तो मरते ही हैं और दूसरोंको भी मारते हैं। परन्तु जो लोग मारते नहीं सिर्फ मरते-भर हैं, उनका क्या पूछना? ऐसोंकी तो संसार पूजा करता है। ऐसोंकी बदौलत देशका उत्कर्ष होता है। अंग्रेज और जर्मन दोनों आपस में लड़े। दोनोंने मार मारी और मार खाई। फल यह हुआ कि शत्रुता बढ़ गई, अशान्ति बढ़ गई और आज यूरोपकी दशा दयनीय हो गई है; पाखण्डकी वृद्धि हुई है और वे एक-दूसरेको फाँसनेका प्रयत्न कर रहे हैं। परन्तु जिस मृत्यु-भयको छोड़नेका अथक प्रयत्न हम कर रहे हैं वह तो एक शुद्ध यज्ञ है और उसके द्वारा हम, थोड़े ही समय में, बड़ी भारी विजय प्राप्त करनेकी आशा रखते हैं।
जब हमें स्वराज्य मिल जायेगा तब या तो हममें से अधिकतर लोगों ने मौतका डर छोड़ दिया होगा अथवा हमें स्वराज्य ही न मिला होगा। अभी तक तो देशके ज्यादातर नौजवान ही मरे हैं। अलीगढ़में जितने लोगोंकी जानें गई हैं वे सब २१ वर्ष से कम अवस्थावाले थे। उन्हें तो कोई जानता भी नहीं था। पर अब भी यदि सरकार खून-खराबी करनेपर तुली ही हो तो मैं यह विश्वास किये बैठा हूँ कि उस समय देश के प्रथम श्रेणीके किसी व्यक्तिकी बलि होगी।
बालक, जवान या बूढ़े मरें, हम इससे भयभीत क्यों हों? कोई पल ऐसा नहीं जाता जब इस जगत् में कहीं किसीका जन्म और कहीं किसीकी मृत्यु न होती हो। पैदा होनेपर खुशियाँ मनाना और मौतसे डरना बड़ी मूर्खता है, यह बात हमें सदा ही अनुभव करनी चाहिए। जो लोग आत्मवादी हैं——और हममें कौन ऐसा हिन्दू, मुसलमान या पारसी होगा जो आत्मा के अस्तित्वको न मानता हो——वे जानते हैं कि आत्मा कभी मरती नहीं। यही नहीं बल्कि जीवित और मृत, समस्त प्राणी एक ही हैं, उनके गुण भी एक ही हैं। इस दशामें, जब कि जगत्में उत्पत्ति और लय<noinclude></noinclude>
p642mjipdahmxevs74cjxvv96ulrjvx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५५
250
159537
671641
508719
2026-08-18T17:07:46Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671641
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बिहार शरीफकी सार्वजनिक सभामें|५२३}}</noinclude>प्रसंग आ चुके हैं। और मेरे लिए यही उचित है। इसलिए आप मुझसे आशा करते हैं, यह मानते हुए मैं यह भी कहता हूँ कि यदि आपकी आशा नहीं फली तो आप निराश भी न हों। और भविष्यमें जब आपका बहुत मन हो तो मुझे यह कहला भी भेजें कि अब तो आये बिना गुजर नहीं है। यदि आप सभी ऐसा करें तो मैं निश्शंक हो सकता हूँ। स्टेशन पास आ रहा है, इसलिए इस पत्रको यहीं समाप्त करता हूँ।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुनी प्रसादी'''}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५६. भाषण: बिहार शरीफकी सार्वजनिक सभामें'''<ref>यह सभा देवीसराय मैदानमें ६ बजे शामको हुई थी।गांधीजीको नगरपालिकाकी ओरसे मान-पत्र भेंट किया गया था। वे मौलाना मुहम्मद अलीके बाद बोले थे।</ref>}}}}
{{right|१३ अगस्त, १९२१}}
'''...गांधीजीने उन्हें और उनके भाई मौलाना मुहम्मद अलीको दिये गये मान-पत्रके लिए नगरपालिकाके सदस्योंको धन्यवाद देते हुए कहा: आप लोग देशमें फैली विभिन्न बुराइयाँ दूर करनेके लिए चलाये गये वर्तमान संघर्षमें समुचित रूपसे योगदान करें। गोवधका उल्लेख करते हुए उन्होंने हिन्दुओंसे कहा: यदि आप गोवधके सवालको उचित ढंगसे हल करना चाहते हैं तो आप खिलाफतके सवालपर मुसलमानोंका साथ दें और रोज सुबह गो-रक्षाके लिए ईश्वरसे प्रार्थना करें। भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने सभामें उपस्थित प्रत्येक व्यक्तिसे अपील की: आप चरखेको अपनायें और ३० सितम्बर से पहले विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करनेके लिए कटिबद्ध हो जायें। उनके भाषणोंको सारी जनता शान्तिसे सुनती रही। ८ बजे रातको सभा समाप्त होनेके बाद गांधीजी परदानशीन महिलाओंको सभामें शामिल हुए जहाँ उन्हें नकदी और गहने भेंट मिले।'''
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''सर्चलाइट,''' २१-८-१९२१|1em}}<noinclude>{{dhr|10em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
0229ekem6yymc6whbuf3odbxx6wj1on
671642
671641
2026-08-18T17:08:24Z
अँजली चौधरी
2439
671642
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: बिहार शरीफकी सार्वजनिक सभामें|५२३}}</noinclude>प्रसंग आ चुके हैं। और मेरे लिए यही उचित है। इसलिए आप मुझसे आशा करते हैं, यह मानते हुए मैं यह भी कहता हूँ कि यदि आपकी आशा नहीं फली तो आप निराश भी न हों। और भविष्यमें जब आपका बहुत मन हो तो मुझे यह कहला भी भेजें कि अब तो आये बिना गुजर नहीं है। यदि आप सभी ऐसा करें तो मैं निश्शंक हो सकता हूँ। स्टेशन पास आ रहा है, इसलिए इस पत्रको यहीं समाप्त करता हूँ।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुनी प्रसादी'''|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५६. भाषण: बिहार शरीफकी सार्वजनिक सभामें'''<ref>यह सभा देवीसराय मैदानमें ६ बजे शामको हुई थी।गांधीजीको नगरपालिकाकी ओरसे मान-पत्र भेंट किया गया था। वे मौलाना मुहम्मद अलीके बाद बोले थे।</ref>}}}}
{{right|१३ अगस्त, १९२१}}
'''...गांधीजीने उन्हें और उनके भाई मौलाना मुहम्मद अलीको दिये गये मान-पत्रके लिए नगरपालिकाके सदस्योंको धन्यवाद देते हुए कहा: आप लोग देशमें फैली विभिन्न बुराइयाँ दूर करनेके लिए चलाये गये वर्तमान संघर्षमें समुचित रूपसे योगदान करें। गोवधका उल्लेख करते हुए उन्होंने हिन्दुओंसे कहा: यदि आप गोवधके सवालको उचित ढंगसे हल करना चाहते हैं तो आप खिलाफतके सवालपर मुसलमानोंका साथ दें और रोज सुबह गो-रक्षाके लिए ईश्वरसे प्रार्थना करें। भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने सभामें उपस्थित प्रत्येक व्यक्तिसे अपील की: आप चरखेको अपनायें और ३० सितम्बर से पहले विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करनेके लिए कटिबद्ध हो जायें। उनके भाषणोंको सारी जनता शान्तिसे सुनती रही। ८ बजे रातको सभा समाप्त होनेके बाद गांधीजी परदानशीन महिलाओंको सभामें शामिल हुए जहाँ उन्हें नकदी और गहने भेंट मिले।'''
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''सर्चलाइट,''' २१-८-१९२१|1em}}<noinclude>{{dhr|10em}}
{{smallrefs}}</noinclude>
tger1jl7pez1g5onht0lyknsjw97ks0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३३७
250
159642
671693
508834
2026-08-19T04:57:29Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
671693
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र|३०७}}</noinclude>'''सकती है। उक्त सुविधाओंको देखते हुए, क्या आप असहयोगी लोग हृदयसे यह कह सकते हैं कि चाय-बागानका मालिक कुलियोंके प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन नहीं कर रहा है? नहीं, आप ऐसा नहीं कह सकते। आपके देशवासी अब यह महसूस करने लगे हैं कि कुली पहलेकी तरह बेवकूफ नहीं रहा और अब उससे नाजायज ढंगसे ज्यादा-कुछ नहीं वसूल किया जा सकता। पर पैसा तो कहींसे आना ही चाहिए। अतः पैसा ऐंठनके लिए आप उससे यह कहते हैं कि तुम्हें उचित मजदूरी नहीं मिलती, तुमसे कड़ी मेहनत करवाई जाती है, तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार किया जाता है; और न जाने और भी कितनी झूठी बातें कही जाती हैं। आपकी नई कौन्सिलें क्या कर रही हैं? आप कौन-से कानून बना रहे हैं? जिस रफ्तारसे आप लोग चल रहे हैं उससे यह निश्चित है कि जल्दी ही आपको पछताना पड़ेगा।'''
'''तब क्या करना जरूरी है? असममें भारतीय कर्मचारियोंका वेतन दूना कर देना चाहिए। इससे बाबुओंमें इस समय जो असन्तोष व्याप्त है, वह समाप्त हो जायेगा। अधिकतर बाबुओंकी तनख्वाहें तो कम हैं, पर उन्हें काफी बड़े परिवारका भरण-पोषण करना होता है। इससे उन्हें कहीं-न-कहींसे पैसा पानेको मजबूर होना पड़ता है। वे बड़ोंसे, शक्तिशालियोंसे तो कुछ वसूल कर नहीं सकते, अतः छोटोंसे, कमजोरोंसे ही ऐंठते हैं। मेरे कर्मचारियोंमें एक प्रधान क्लर्क तथा उसके दो सहायक क्लर्क हैं। उन सबकी तनख्वाह बहुत कम है। वे चोरी नहीं करते और कर भी नहीं सकते, क्योंकि मुझे धोखा देना बहुत मुश्किल है। में उनकी वर्तमान स्थितिसे बहुत दुःखी हूँ। पर मैं अपनी तनख्वाहमें से उनकी मदद नहीं कर सकता। कारण, मैं भी अपनी जीविकाके लिए मेहनत-मशक्कत करता हूँ। और मैं मदद करूँ भी क्यों? मेरे मालिक मुझे उन्हें अधिक वेतन देनेकी इजाजत नहीं देते। पर आज नहीं तो कल, उन्हें अधिक वेतन देना ही होगा। अलबत्ता, वह आन्दोलन तथा सहयोगके जरिये ही होगा, असहयोगके जरिये नहीं। आपके अनुयायी बोल्शेविकोंका तरीका अपना रहे हैं। जहाँ खुशहाली है, वहाँ वे गड़बड़ी पैदा कर देना तथा सारी चीजोंको उलट-पलट देना चाहते हैं। मैं आपसे कहता हूँ कि रचनात्मक आन्दोलन कीजिए, सहयोग कीजिए, कानून बनाइए। आप असहयोगकी बातको दिमागसे निकाल दीजिए। उससे कोई लाभ न होगा।
मैं असममें निम्नलिखित बातें चाहता हूँ :
(१) मजदूर आजाद हों, क्योंकि आजादी ही सच्चा धन है।
(२) प्रत्येक भारतीयको बिना किसी रोक-टोकके देशके किसी भी हिस्सेमें, अकालग्रस्त हिस्सेसे खुशहालीवाले हिस्सेमें, जानेका अधिकार हो।<noinclude></noinclude>
fd6q2qqfb0nd3oer2ctbqtp6cuol92j
671695
671693
2026-08-19T04:58:44Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
671695
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र|३०७}}</noinclude>'''सकती है। उक्त सुविधाओंको देखते हुए, क्या आप असहयोगी लोग हृदयसे यह कह सकते हैं कि चाय-बागानका मालिक कुलियोंके प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन नहीं कर रहा है? नहीं, आप ऐसा नहीं कह सकते। आपके देशवासी अब यह महसूस करने लगे हैं कि कुली पहलेकी तरह बेवकूफ नहीं रहा और अब उससे नाजायज ढंगसे ज्यादा-कुछ नहीं वसूल किया जा सकता। पर पैसा तो कहींसे आना ही चाहिए। अतः पैसा ऐंठनके लिए आप उससे यह कहते हैं कि तुम्हें उचित मजदूरी नहीं मिलती, तुमसे कड़ी मेहनत करवाई जाती है, तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार किया जाता है; और न जाने और भी कितनी झूठी बातें कही जाती हैं। आपकी नई कौन्सिलें क्या कर रही हैं? आप कौन-से कानून बना रहे हैं? जिस रफ्तारसे आप लोग चल रहे हैं उससे यह निश्चित है कि जल्दी ही आपको पछताना पड़ेगा।'''
'''तब क्या करना जरूरी है? असममें भारतीय कर्मचारियोंका वेतन दूना कर देना चाहिए। इससे बाबुओंमें इस समय जो असन्तोष व्याप्त है, वह समाप्त हो जायेगा। अधिकतर बाबुओंकी तनख्वाहें तो कम हैं, पर उन्हें काफी बड़े परिवारका भरण-पोषण करना होता है। इससे उन्हें कहीं-न-कहींसे पैसा पानेको मजबूर होना पड़ता है। वे बड़ोंसे, शक्तिशालियोंसे तो कुछ वसूल कर नहीं सकते, अतः छोटोंसे, कमजोरोंसे ही ऐंठते हैं। मेरे कर्मचारियोंमें एक प्रधान क्लर्क तथा उसके दो सहायक क्लर्क हैं। उन सबकी तनख्वाह बहुत कम है। वे चोरी नहीं करते और कर भी नहीं सकते, क्योंकि मुझे धोखा देना बहुत मुश्किल है। में उनकी वर्तमान स्थितिसे बहुत दुःखी हूँ। पर मैं अपनी तनख्वाहमें से उनकी मदद नहीं कर सकता। कारण, मैं भी अपनी जीविकाके लिए मेहनत-मशक्कत करता हूँ। और मैं मदद करूँ भी क्यों? मेरे मालिक मुझे उन्हें अधिक वेतन देनेकी इजाजत नहीं देते। पर आज नहीं तो कल, उन्हें अधिक वेतन देना ही होगा। अलबत्ता, वह आन्दोलन तथा सहयोगके जरिये ही होगा, असहयोगके जरिये नहीं। आपके अनुयायी बोल्शेविकोंका तरीका अपना रहे हैं। जहाँ खुशहाली है, वहाँ वे गड़बड़ी पैदा कर देना तथा सारी चीजोंको उलट-पलट देना चाहते हैं। मैं आपसे कहता हूँ कि रचनात्मक आन्दोलन कीजिए, सहयोग कीजिए, कानून बनाइए। आप असहयोगकी बातको दिमागसे निकाल दीजिए। उससे कोई लाभ न होगा।'''
'''मैं असममें निम्नलिखित बातें चाहता हूँ :'''
'''(१) मजदूर आजाद हों, क्योंकि आजादी ही सच्चा धन है।'''
'''(२) प्रत्येक भारतीयको बिना किसी रोक-टोकके देशके किसी भी हिस्सेमें, अकालग्रस्त हिस्सेसे खुशहालीवाले हिस्सेमें, जानेका अधिकार हो।'''<noinclude></noinclude>
n9r14892ya7gi6h3v7gyfaw16yadrrq
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३३८
250
159643
671701
508835
2026-08-19T05:12:57Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
671701
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३०८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>'''(३) गरीब, अमीर तथा भारतीयों एवं गोरों सबके लिए समान कानून बनाये जायें।'''
'''(४) भारतीय स्त्रियों तथा उनके यूरेशियाई बच्चोंकी रक्षाके लिए कानून बनाया जाये।'''
'''(५) हर चाय-बागानके लिए एक पंचायत हो, जिसे कानूनी सत्ता हासिल हो और उसका अध्यक्ष चाय-बागानका मैनेजर हो। पंचायतको भारतीयों तथा गोरों, दोनोंके मामलोंकी सुनवाई तथा फैसला करनेका हक हो। (मेरे कुलियोंको मेरे विरुद्ध लगाये आरोपोंकी सुनवाई और फैसलेका अधिकार हो)।'''
'''(६) कुलियोंको बीमारीका भत्ता देना अनिवार्य हो।'''
'''(७) कुलियोंकी शादियोंपर से प्रतिबन्ध हटा लिया जाये।'''
'''(८) गर्भवती स्त्रियोंको छः मासतक प्रसूतिका भत्ता देना अनिवार्य हो।'''
'''आप यह स्वीकार करेंगे कि ये सब सुझाव विधायकोंके लिए हैं, न कि असहयोगियोंके लिए। इसलिए मैं कहता हूँ कि रचनात्मक आन्दोलन कीजिए, सहयोग कीजिए, कानून बनाइए।'''
'''आपके कौंसिलके सदस्य क्या कर रहे हैं? उनसे कहिए काम करें, अच्छे और उपयोगी कानून बनायें, जनताकी आवाजको सुनें । मेरा बल मेरे कुलियोंका प्यार है। उनका भी बल भारतीय जनताका उनके प्रति प्यार है; भारतीय जनतामें सहयोगी और असहयोगी, रचनात्मक आन्दोलनकारी और विधायक सभी शामिल हैं। अगर उन्हें उनका प्यार नहीं मिलता तो इसका मतलब है, भारत एक ऐसे परिवारके समान है जिसके सदस्य आपसमें विभक्त हैं, फूटसे ग्रस्त हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि सहयोग कीजिए। मैं जिन भारतीयोंके सम्पर्कमें आता हूँ या जिनसे मेरा साबका पड़ता है, उन सबके साथ मैं सहयोग करता हूँ, चाहे वे चमार हों या ब्राह्मण, कुली हों या राजा। सभी ईश्वरको प्यारे हैं, सभी मनुष्य हैं। सबको मैं अपना भाई मानता हूँ। जहाँ मैं मदद कर सकता हूँ, वहाँ मदद करता हूँ; जहाँ किसीका कष्ट दूर कर सकता हूँ, वैसा करता हूँ; जहाँ कोई बात समझा सकता हूँ, समझाता हूँ। भ्रातृत्वकी भावना पनपने दीजिए। यह असहयोग द्वारा सम्भव नहीं, सहयोगके द्वारा ही सम्भव है।'''
'''मुझे आपको यह बताते हुए खुशी होती है कि मैं जिस चाय-बागानका मैनेजर हूँ, उसके कुली दूसरे चाय-बागानोंके कुलियोंके मुकाबले कहीं अधिक सन्तुष्ट हैं तथा उन्हें उनके मुकाबले ज्यादा मजदूरी मिलती है। और मैं दावेके साथ कह सकता हूँ कि जबसे मैं भारत आया हूँ तभीसे मेरा ध्येय कुलियोंकी तकलीफोंको दूर करना रहा है, यद्यपि यह सही है कि सबको खुश नहीं किया जा सकता। यह सब काम सहयोगके जरिये ही सम्भव हो सका है, और मेरे अधीनस्थ बागानमें न तो कभी कोई हड़ताल हुई है और न होगी। यह मैं<noinclude></noinclude>
4p2b6x8bsq8na6j49lvtkl12t0x9uyc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३३९
250
159644
671710
508836
2026-08-19T05:58:13Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
671710
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र|३०९}}</noinclude>:'''विश्वासके साथ कह रहा हूँ। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी गतिविधियाँ बन्द करें और उनकी भी जो आपकी योजनासे सहानुभूति रखते हैं; और इस तरह यह जो लोगोंपर असम छोड़कर चले जानेका पागलपन सवार हुआ है, उसे रोकें। इस भाग-दौड़के कारण हजारों लोगोंकी जानें जा रही हैं; जरा उनके बारेमें भी सोचिए। एक गलतीको दूसरी गलतीसे सुधारा नहीं जा सकता।'''
:'''मैं अपने तथा थोड़े-से और बागानोंको छोड़कर बाकी सब बागानोंमें अपनाये गये तरीकोंके खिलाफ हूँ। मैं यह कबूल करता हूँ कि ये चाय-बागान जहाँ व्यवस्थाका काम बाबू लोगोंके हाथमें है, चाय-उद्योगके लिए कलंक रूप हैं। पर स्थितिको सुधारनेके लिए सहयोगकी, रचनात्मक आन्दोलनकी, कानून बनानेकी जरूरत है, न कि आपके तरीकोंकी। आपका तरीका यानी साम्यवादी बोल्शेविकोंका तरीका है—असहयोगकी भावना भी इसमें शामिल है। सत्य किसीको नुकसान नहीं पहुँचाता।'''
:'''मैं अपने इस पत्रकी भाषाके लिए, जो केवल मेरे दिलके भावोंको प्रकट करती है, माफी चाहता हूँ।'''
{{Right|'''आपका''',|4em}}
{{Right|'''"चुप रहनेवाला मानो अपना दोष स्वीकार करता है।"'''}}
मैं इस पत्रको जैसाका-तैसा छाप रहा हूँ। पत्र लिखनेवाले ने अपना नाम लिखा तो है, पर वे उसे जाहिर नहीं करना चाहते। मैंने नेटाल और चम्पारन, दोनों ही जगह इस पत्रके लेखकके समान लोग देखे हैं। वे कुलियोंके शुभेच्छु अवश्य हैं, पर वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसा होना केवल उस व्यक्तिके समान होना हैं जो दयालु होनेके नाते ही अपने पशुओंकी अच्छी तरह देखभाल करता है। एक बार अगर यह मंजूर कर लिया जाये कि मनुष्योंके साथ जानवरोंकी तरह बरताव किया जा सकता है तो बहुत-से गोरे मैनेजरोंको पशुओंके प्रति होनेवाली क्रूरताको रोकनेवाली सोसाइटीसे योग्यताके प्रभाणपत्र मिल सकते हैं। मुझे इस बातका पूरा अनुभव है कि मुफ्त दवा, मुफ्त इलाज, मुफ्त आवास तथा मुफ्त चरागाह—ये सब धन्धा चलानेकी चालें हैं, जिनका उद्देश्य कुलियोंको सदाके लिए दास बनाकर रखना है। यदि उसे पूरी मजदूरी दी जाये और उससे आवास तथा दवाके लिए पैसे लिये जायें तो वह ज्यादा आजाद होगा। निःशुल्क चरागाह तो उसके लिए उतना ही जरूरी है जितना कि साँस लेना। आपको हर बागानमें जो यूरेशियाई बच्चे मिलेंगे, वे वहाँकी मजदूर स्त्रियोंकी दयनीय दशाके साक्षी हैं। यदि मेरा बस चले तो मैं उन सब बागानोंको, जहाँ यूरेशियाई बच्चे पाये जाते हैं, बन्द कर दूँ, क्योंकि ये बच्चे भारतीय नारीत्वके प्रति किये गये अपराधके जीते-जागते प्रमाण हैं। मैं जानता हूँ कि समस्या काफी कठिन है। लेकिन यदि गोरे भारतीय स्त्रियोंके सतीत्वकी उतनी ही इज्जत करने लग जायें जितनी वे अपनी बह्नोंकी करते हैं तो विवाह-सम्बन्धके बाहर इस तरहके यूरेशियाई बच्चे होने ही न<noinclude></noinclude>
o1crixnrniyjsurhrrt142o6tttwpzk
671711
671710
2026-08-19T05:58:49Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
671711
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र|३०९}}</noinclude>:'''विश्वासके साथ कह रहा हूँ। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी गतिविधियाँ बन्द करें और उनकी भी जो आपकी योजनासे सहानुभूति रखते हैं; और इस तरह यह जो लोगोंपर असम छोड़कर चले जानेका पागलपन सवार हुआ है, उसे रोकें। इस भाग-दौड़के कारण हजारों लोगोंकी जानें जा रही हैं; जरा उनके बारेमें भी सोचिए। एक गलतीको दूसरी गलतीसे सुधारा नहीं जा सकता।'''
:'''{{gap}}मैं अपने तथा थोड़े-से और बागानोंको छोड़कर बाकी सब बागानोंमें अपनाये गये तरीकोंके खिलाफ हूँ। मैं यह कबूल करता हूँ कि ये चाय-बागान जहाँ व्यवस्थाका काम बाबू लोगोंके हाथमें है, चाय-उद्योगके लिए कलंक रूप हैं। पर स्थितिको सुधारनेके लिए सहयोगकी, रचनात्मक आन्दोलनकी, कानून बनानेकी जरूरत है, न कि आपके तरीकोंकी। आपका तरीका यानी साम्यवादी बोल्शेविकोंका तरीका है—असहयोगकी भावना भी इसमें शामिल है। सत्य किसीको नुकसान नहीं पहुँचाता।'''
:'''मैं अपने इस पत्रकी भाषाके लिए, जो केवल मेरे दिलके भावोंको प्रकट करती है, माफी चाहता हूँ।'''
{{Right|'''आपका''',|4em}}
{{Right|'''"चुप रहनेवाला मानो अपना दोष स्वीकार करता है।"'''}}
मैं इस पत्रको जैसाका-तैसा छाप रहा हूँ। पत्र लिखनेवाले ने अपना नाम लिखा तो है, पर वे उसे जाहिर नहीं करना चाहते। मैंने नेटाल और चम्पारन, दोनों ही जगह इस पत्रके लेखकके समान लोग देखे हैं। वे कुलियोंके शुभेच्छु अवश्य हैं, पर वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसा होना केवल उस व्यक्तिके समान होना हैं जो दयालु होनेके नाते ही अपने पशुओंकी अच्छी तरह देखभाल करता है। एक बार अगर यह मंजूर कर लिया जाये कि मनुष्योंके साथ जानवरोंकी तरह बरताव किया जा सकता है तो बहुत-से गोरे मैनेजरोंको पशुओंके प्रति होनेवाली क्रूरताको रोकनेवाली सोसाइटीसे योग्यताके प्रभाणपत्र मिल सकते हैं। मुझे इस बातका पूरा अनुभव है कि मुफ्त दवा, मुफ्त इलाज, मुफ्त आवास तथा मुफ्त चरागाह—ये सब धन्धा चलानेकी चालें हैं, जिनका उद्देश्य कुलियोंको सदाके लिए दास बनाकर रखना है। यदि उसे पूरी मजदूरी दी जाये और उससे आवास तथा दवाके लिए पैसे लिये जायें तो वह ज्यादा आजाद होगा। निःशुल्क चरागाह तो उसके लिए उतना ही जरूरी है जितना कि साँस लेना। आपको हर बागानमें जो यूरेशियाई बच्चे मिलेंगे, वे वहाँकी मजदूर स्त्रियोंकी दयनीय दशाके साक्षी हैं। यदि मेरा बस चले तो मैं उन सब बागानोंको, जहाँ यूरेशियाई बच्चे पाये जाते हैं, बन्द कर दूँ, क्योंकि ये बच्चे भारतीय नारीत्वके प्रति किये गये अपराधके जीते-जागते प्रमाण हैं। मैं जानता हूँ कि समस्या काफी कठिन है। लेकिन यदि गोरे भारतीय स्त्रियोंके सतीत्वकी उतनी ही इज्जत करने लग जायें जितनी वे अपनी बह्नोंकी करते हैं तो विवाह-सम्बन्धके बाहर इस तरहके यूरेशियाई बच्चे होने ही न<noinclude></noinclude>
3y0fojlkk6gh6elask7njpog5tejohk
671712
671711
2026-08-19T05:59:22Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
671712
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र|३०९}}</noinclude>:'''विश्वासके साथ कह रहा हूँ। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी गतिविधियाँ बन्द करें और उनकी भी जो आपकी योजनासे सहानुभूति रखते हैं; और इस तरह यह जो लोगोंपर असम छोड़कर चले जानेका पागलपन सवार हुआ है, उसे रोकें। इस भाग-दौड़के कारण हजारों लोगोंकी जानें जा रही हैं; जरा उनके बारेमें भी सोचिए। एक गलतीको दूसरी गलतीसे सुधारा नहीं जा सकता।'''
:'''{{gap}}मैं अपने तथा थोड़े-से और बागानोंको छोड़कर बाकी सब बागानोंमें अपनाये गये तरीकोंके खिलाफ हूँ। मैं यह कबूल करता हूँ कि ये चाय-बागान जहाँ व्यवस्थाका काम बाबू लोगोंके हाथमें है, चाय-उद्योगके लिए कलंक रूप हैं। पर स्थितिको सुधारनेके लिए सहयोगकी, रचनात्मक आन्दोलनकी, कानून बनानेकी जरूरत है, न कि आपके तरीकोंकी। आपका तरीका यानी साम्यवादी बोल्शेविकोंका तरीका है—असहयोगकी भावना भी इसमें शामिल है। सत्य किसीको नुकसान नहीं पहुँचाता।'''
:'''मैं अपने इस पत्रकी भाषाके लिए, जो केवल मेरे दिलके भावोंको प्रकट करती है, माफी चाहता हूँ।'''
{{Right|'''आपका''',|8em<br>'''"चुप रहनेवाला मानो अपना दोष स्वीकार करता है।"'''}}
मैं इस पत्रको जैसाका-तैसा छाप रहा हूँ। पत्र लिखनेवाले ने अपना नाम लिखा तो है, पर वे उसे जाहिर नहीं करना चाहते। मैंने नेटाल और चम्पारन, दोनों ही जगह इस पत्रके लेखकके समान लोग देखे हैं। वे कुलियोंके शुभेच्छु अवश्य हैं, पर वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसा होना केवल उस व्यक्तिके समान होना हैं जो दयालु होनेके नाते ही अपने पशुओंकी अच्छी तरह देखभाल करता है। एक बार अगर यह मंजूर कर लिया जाये कि मनुष्योंके साथ जानवरोंकी तरह बरताव किया जा सकता है तो बहुत-से गोरे मैनेजरोंको पशुओंके प्रति होनेवाली क्रूरताको रोकनेवाली सोसाइटीसे योग्यताके प्रभाणपत्र मिल सकते हैं। मुझे इस बातका पूरा अनुभव है कि मुफ्त दवा, मुफ्त इलाज, मुफ्त आवास तथा मुफ्त चरागाह—ये सब धन्धा चलानेकी चालें हैं, जिनका उद्देश्य कुलियोंको सदाके लिए दास बनाकर रखना है। यदि उसे पूरी मजदूरी दी जाये और उससे आवास तथा दवाके लिए पैसे लिये जायें तो वह ज्यादा आजाद होगा। निःशुल्क चरागाह तो उसके लिए उतना ही जरूरी है जितना कि साँस लेना। आपको हर बागानमें जो यूरेशियाई बच्चे मिलेंगे, वे वहाँकी मजदूर स्त्रियोंकी दयनीय दशाके साक्षी हैं। यदि मेरा बस चले तो मैं उन सब बागानोंको, जहाँ यूरेशियाई बच्चे पाये जाते हैं, बन्द कर दूँ, क्योंकि ये बच्चे भारतीय नारीत्वके प्रति किये गये अपराधके जीते-जागते प्रमाण हैं। मैं जानता हूँ कि समस्या काफी कठिन है। लेकिन यदि गोरे भारतीय स्त्रियोंके सतीत्वकी उतनी ही इज्जत करने लग जायें जितनी वे अपनी बह्नोंकी करते हैं तो विवाह-सम्बन्धके बाहर इस तरहके यूरेशियाई बच्चे होने ही न<noinclude></noinclude>
1h42obxgjljolen4rw1sw85svc8oe04
671713
671712
2026-08-19T05:59:50Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
671713
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र|३०९}}</noinclude>:'''विश्वासके साथ कह रहा हूँ। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी गतिविधियाँ बन्द करें और उनकी भी जो आपकी योजनासे सहानुभूति रखते हैं; और इस तरह यह जो लोगोंपर असम छोड़कर चले जानेका पागलपन सवार हुआ है, उसे रोकें। इस भाग-दौड़के कारण हजारों लोगोंकी जानें जा रही हैं; जरा उनके बारेमें भी सोचिए। एक गलतीको दूसरी गलतीसे सुधारा नहीं जा सकता।'''
:'''{{gap}}मैं अपने तथा थोड़े-से और बागानोंको छोड़कर बाकी सब बागानोंमें अपनाये गये तरीकोंके खिलाफ हूँ। मैं यह कबूल करता हूँ कि ये चाय-बागान जहाँ व्यवस्थाका काम बाबू लोगोंके हाथमें है, चाय-उद्योगके लिए कलंक रूप हैं। पर स्थितिको सुधारनेके लिए सहयोगकी, रचनात्मक आन्दोलनकी, कानून बनानेकी जरूरत है, न कि आपके तरीकोंकी। आपका तरीका यानी साम्यवादी बोल्शेविकोंका तरीका है—असहयोगकी भावना भी इसमें शामिल है। सत्य किसीको नुकसान नहीं पहुँचाता।'''
:'''मैं अपने इस पत्रकी भाषाके लिए, जो केवल मेरे दिलके भावोंको प्रकट करती है, माफी चाहता हूँ।'''
{{Right|'''आपका''',|8em|<br>'''"चुप रहनेवाला मानो अपना दोष स्वीकार करता है।"'''}}
मैं इस पत्रको जैसाका-तैसा छाप रहा हूँ। पत्र लिखनेवाले ने अपना नाम लिखा तो है, पर वे उसे जाहिर नहीं करना चाहते। मैंने नेटाल और चम्पारन, दोनों ही जगह इस पत्रके लेखकके समान लोग देखे हैं। वे कुलियोंके शुभेच्छु अवश्य हैं, पर वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसा होना केवल उस व्यक्तिके समान होना हैं जो दयालु होनेके नाते ही अपने पशुओंकी अच्छी तरह देखभाल करता है। एक बार अगर यह मंजूर कर लिया जाये कि मनुष्योंके साथ जानवरोंकी तरह बरताव किया जा सकता है तो बहुत-से गोरे मैनेजरोंको पशुओंके प्रति होनेवाली क्रूरताको रोकनेवाली सोसाइटीसे योग्यताके प्रभाणपत्र मिल सकते हैं। मुझे इस बातका पूरा अनुभव है कि मुफ्त दवा, मुफ्त इलाज, मुफ्त आवास तथा मुफ्त चरागाह—ये सब धन्धा चलानेकी चालें हैं, जिनका उद्देश्य कुलियोंको सदाके लिए दास बनाकर रखना है। यदि उसे पूरी मजदूरी दी जाये और उससे आवास तथा दवाके लिए पैसे लिये जायें तो वह ज्यादा आजाद होगा। निःशुल्क चरागाह तो उसके लिए उतना ही जरूरी है जितना कि साँस लेना। आपको हर बागानमें जो यूरेशियाई बच्चे मिलेंगे, वे वहाँकी मजदूर स्त्रियोंकी दयनीय दशाके साक्षी हैं। यदि मेरा बस चले तो मैं उन सब बागानोंको, जहाँ यूरेशियाई बच्चे पाये जाते हैं, बन्द कर दूँ, क्योंकि ये बच्चे भारतीय नारीत्वके प्रति किये गये अपराधके जीते-जागते प्रमाण हैं। मैं जानता हूँ कि समस्या काफी कठिन है। लेकिन यदि गोरे भारतीय स्त्रियोंके सतीत्वकी उतनी ही इज्जत करने लग जायें जितनी वे अपनी बह्नोंकी करते हैं तो विवाह-सम्बन्धके बाहर इस तरहके यूरेशियाई बच्चे होने ही न<noinclude></noinclude>
e9u6b5tt5t9kjgbyez05eaqtvou6qoj
671715
671713
2026-08-19T06:00:23Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
671715
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र|३०९}}</noinclude>:'''विश्वासके साथ कह रहा हूँ। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी गतिविधियाँ बन्द करें और उनकी भी जो आपकी योजनासे सहानुभूति रखते हैं; और इस तरह यह जो लोगोंपर असम छोड़कर चले जानेका पागलपन सवार हुआ है, उसे रोकें। इस भाग-दौड़के कारण हजारों लोगोंकी जानें जा रही हैं; जरा उनके बारेमें भी सोचिए। एक गलतीको दूसरी गलतीसे सुधारा नहीं जा सकता।'''
:'''{{gap}}मैं अपने तथा थोड़े-से और बागानोंको छोड़कर बाकी सब बागानोंमें अपनाये गये तरीकोंके खिलाफ हूँ। मैं यह कबूल करता हूँ कि ये चाय-बागान जहाँ व्यवस्थाका काम बाबू लोगोंके हाथमें है, चाय-उद्योगके लिए कलंक रूप हैं। पर स्थितिको सुधारनेके लिए सहयोगकी, रचनात्मक आन्दोलनकी, कानून बनानेकी जरूरत है, न कि आपके तरीकोंकी। आपका तरीका यानी साम्यवादी बोल्शेविकोंका तरीका है—असहयोगकी भावना भी इसमें शामिल है। सत्य किसीको नुकसान नहीं पहुँचाता।'''
:'''मैं अपने इस पत्रकी भाषाके लिए, जो केवल मेरे दिलके भावोंको प्रकट करती है, माफी चाहता हूँ।'''
{{Right|'''आपका''',<br>'''"चुप रहनेवाला मानो अपना दोष स्वीकार करता है।"'''}}
मैं इस पत्रको जैसाका-तैसा छाप रहा हूँ। पत्र लिखनेवाले ने अपना नाम लिखा तो है, पर वे उसे जाहिर नहीं करना चाहते। मैंने नेटाल और चम्पारन, दोनों ही जगह इस पत्रके लेखकके समान लोग देखे हैं। वे कुलियोंके शुभेच्छु अवश्य हैं, पर वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसा होना केवल उस व्यक्तिके समान होना हैं जो दयालु होनेके नाते ही अपने पशुओंकी अच्छी तरह देखभाल करता है। एक बार अगर यह मंजूर कर लिया जाये कि मनुष्योंके साथ जानवरोंकी तरह बरताव किया जा सकता है तो बहुत-से गोरे मैनेजरोंको पशुओंके प्रति होनेवाली क्रूरताको रोकनेवाली सोसाइटीसे योग्यताके प्रभाणपत्र मिल सकते हैं। मुझे इस बातका पूरा अनुभव है कि मुफ्त दवा, मुफ्त इलाज, मुफ्त आवास तथा मुफ्त चरागाह—ये सब धन्धा चलानेकी चालें हैं, जिनका उद्देश्य कुलियोंको सदाके लिए दास बनाकर रखना है। यदि उसे पूरी मजदूरी दी जाये और उससे आवास तथा दवाके लिए पैसे लिये जायें तो वह ज्यादा आजाद होगा। निःशुल्क चरागाह तो उसके लिए उतना ही जरूरी है जितना कि साँस लेना। आपको हर बागानमें जो यूरेशियाई बच्चे मिलेंगे, वे वहाँकी मजदूर स्त्रियोंकी दयनीय दशाके साक्षी हैं। यदि मेरा बस चले तो मैं उन सब बागानोंको, जहाँ यूरेशियाई बच्चे पाये जाते हैं, बन्द कर दूँ, क्योंकि ये बच्चे भारतीय नारीत्वके प्रति किये गये अपराधके जीते-जागते प्रमाण हैं। मैं जानता हूँ कि समस्या काफी कठिन है। लेकिन यदि गोरे भारतीय स्त्रियोंके सतीत्वकी उतनी ही इज्जत करने लग जायें जितनी वे अपनी बह्नोंकी करते हैं तो विवाह-सम्बन्धके बाहर इस तरहके यूरेशियाई बच्चे होने ही न<noinclude></noinclude>
2ew6tkqqu69es3gh8e5g4hd6gb4z50q
671716
671715
2026-08-19T06:00:47Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
671716
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||चाय-बागानके एक अधिकारीका पत्र|३०९}}</noinclude>:'''विश्वासके साथ कह रहा हूँ। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी गतिविधियाँ बन्द करें और उनकी भी जो आपकी योजनासे सहानुभूति रखते हैं; और इस तरह यह जो लोगोंपर असम छोड़कर चले जानेका पागलपन सवार हुआ है, उसे रोकें। इस भाग-दौड़के कारण हजारों लोगोंकी जानें जा रही हैं; जरा उनके बारेमें भी सोचिए। एक गलतीको दूसरी गलतीसे सुधारा नहीं जा सकता।'''
:'''{{gap}}मैं अपने तथा थोड़े-से और बागानोंको छोड़कर बाकी सब बागानोंमें अपनाये गये तरीकोंके खिलाफ हूँ। मैं यह कबूल करता हूँ कि ये चाय-बागान जहाँ व्यवस्थाका काम बाबू लोगोंके हाथमें है, चाय-उद्योगके लिए कलंक रूप हैं। पर स्थितिको सुधारनेके लिए सहयोगकी, रचनात्मक आन्दोलनकी, कानून बनानेकी जरूरत है, न कि आपके तरीकोंकी। आपका तरीका यानी साम्यवादी बोल्शेविकोंका तरीका है—असहयोगकी भावना भी इसमें शामिल है। सत्य किसीको नुकसान नहीं पहुँचाता।'''
:'''{{gap}}मैं अपने इस पत्रकी भाषाके लिए, जो केवल मेरे दिलके भावोंको प्रकट करती है, माफी चाहता हूँ।'''
{{Right|'''आपका''',<br>'''"चुप रहनेवाला मानो अपना दोष स्वीकार करता है।"'''}}
मैं इस पत्रको जैसाका-तैसा छाप रहा हूँ। पत्र लिखनेवाले ने अपना नाम लिखा तो है, पर वे उसे जाहिर नहीं करना चाहते। मैंने नेटाल और चम्पारन, दोनों ही जगह इस पत्रके लेखकके समान लोग देखे हैं। वे कुलियोंके शुभेच्छु अवश्य हैं, पर वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसा होना केवल उस व्यक्तिके समान होना हैं जो दयालु होनेके नाते ही अपने पशुओंकी अच्छी तरह देखभाल करता है। एक बार अगर यह मंजूर कर लिया जाये कि मनुष्योंके साथ जानवरोंकी तरह बरताव किया जा सकता है तो बहुत-से गोरे मैनेजरोंको पशुओंके प्रति होनेवाली क्रूरताको रोकनेवाली सोसाइटीसे योग्यताके प्रभाणपत्र मिल सकते हैं। मुझे इस बातका पूरा अनुभव है कि मुफ्त दवा, मुफ्त इलाज, मुफ्त आवास तथा मुफ्त चरागाह—ये सब धन्धा चलानेकी चालें हैं, जिनका उद्देश्य कुलियोंको सदाके लिए दास बनाकर रखना है। यदि उसे पूरी मजदूरी दी जाये और उससे आवास तथा दवाके लिए पैसे लिये जायें तो वह ज्यादा आजाद होगा। निःशुल्क चरागाह तो उसके लिए उतना ही जरूरी है जितना कि साँस लेना। आपको हर बागानमें जो यूरेशियाई बच्चे मिलेंगे, वे वहाँकी मजदूर स्त्रियोंकी दयनीय दशाके साक्षी हैं। यदि मेरा बस चले तो मैं उन सब बागानोंको, जहाँ यूरेशियाई बच्चे पाये जाते हैं, बन्द कर दूँ, क्योंकि ये बच्चे भारतीय नारीत्वके प्रति किये गये अपराधके जीते-जागते प्रमाण हैं। मैं जानता हूँ कि समस्या काफी कठिन है। लेकिन यदि गोरे भारतीय स्त्रियोंके सतीत्वकी उतनी ही इज्जत करने लग जायें जितनी वे अपनी बह्नोंकी करते हैं तो विवाह-सम्बन्धके बाहर इस तरहके यूरेशियाई बच्चे होने ही न<noinclude></noinclude>
meuz6q1zfd7sp29m2nok9hubv913oai
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४०
250
159645
671719
508837
2026-08-19T06:16:36Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
671719
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{|३१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>पायें। मैं 'स्वच्छन्द' यौन-सम्बन्धमें विश्वास नहीं रखता। यह विषय बहुत ज्यादा दर्दनाक है। स्त्रियों तथा पुरुषोंके यौन-सम्बन्धोंकी शुद्धताको मैं बहुत ही पवित्र वस्तु मानता हूँ। और इसीलिए मैंने इन सब बागानोंमें जो-कुछ देखा व सुना है, उसके बारेमें संयमके साथ लिख पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। मैं यह नहीं कहता कि केवल गोरे मैनेजर ही यह हरकत करते हैं, भारतीय मैनेजर नहीं। मैं जानता हूँ कि भारतीय मैनेजरोंका अपराध छिप जाता है, क्योंकि उनसे पैदा हुए बच्चोंका रंग भारतीयोंके रंगमें मिल जाता है। पर यह मैं अवश्य कहूँगा कि गोरे मैनेजरोंको यह अपराध करते हुए किसी प्रकारके दण्डका भय नहीं होता, भारतीय मैनेजरोंको दण्डका भय रहता है। लेकिन मैं इस अध्यायको यहीं समाप्त करता हूँ। पत्र-लेखकने सलाह दी है कि चाय-बागानके मैनेजर पंचायतोंके अध्यक्ष हों, इस कुटिल सलाहसे चाय-बागानके मालिकोंकी पोल खुल जाती है। उक्त पत्रके लेखकने असहयोगके बारेमें जो-कुछ कहा है, उससे जाहिर होता है कि उन्हें असहयोगके बारेमें पूरी जानकारी नहीं है। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने असमके किसी भी कुलीको हड़ताल करनेकी सलाह नहीं दी है। मैं वहाँके मजदूरोंकी समस्याको जाननेका भी दावा नहीं करता। इसके अलावा लेखकको यह मालूम होना चाहिए कि असहयोग पूँजी अथवा पूँजीपतियोंके खिलाफ नहीं, बल्कि इस समय जो शासन-पद्धति चालू है, उसके खिलाफ हो रहा है। लेकिन यह भी सही है कि जहाँ-कहीं बुराई होगी, अत्याचार और अन्याय होगा वहाँ कोई चाहे या न चाहे, असहयोग होगा ही। लोग एक बार असहयोगकी शक्ति जान लेनेपर उसका इस्तेमाल जरूर करेंगे। यदि वे इसका इस्तेमाल मूर्खतापूर्वक या अनुचित रूपसे करते हैं तो नुकसान उनका ही होगा। मेरे खयालसे कानून बनाने या कौन्सिलोंमें वाद-विवादसे ज्यादा फायदा नहीं हो सकता। मजदूरोंकी हालत तभी सुधर सकती है जब मालिक उनके साथ भाई-बन्धुओंकी तरह व्यवहार करने लगें, या जब मजदूरोंमें खुद इतनी समझ आ जाये कि वे अपने हकोंको जानने लगें और उन्हें हासिल करनेके तरीके भी मालूम कर लें। किसी कानूनके लिए जनमत तैयार किये बिना वैसा कानून बनाना बेकार ही नहीं, नुकसानदेह भी है। जनमत तैयार करनेका या मौजूदा मामलेमें, तरीकोंमें परिवर्तन लानेका, या मेरी शब्दावलीमें कहिए तो हृदय-परिवर्तनका सबसे जल्दी सफल होनेवाला उपाय असहयोग ही है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २९-६-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
21apcm2r5m863npk4mhwm361fqfgdj8
671720
671719
2026-08-19T06:17:06Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
671720
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|३१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>पायें। मैं 'स्वच्छन्द' यौन-सम्बन्धमें विश्वास नहीं रखता। यह विषय बहुत ज्यादा दर्दनाक है। स्त्रियों तथा पुरुषोंके यौन-सम्बन्धोंकी शुद्धताको मैं बहुत ही पवित्र वस्तु मानता हूँ। और इसीलिए मैंने इन सब बागानोंमें जो-कुछ देखा व सुना है, उसके बारेमें संयमके साथ लिख पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। मैं यह नहीं कहता कि केवल गोरे मैनेजर ही यह हरकत करते हैं, भारतीय मैनेजर नहीं। मैं जानता हूँ कि भारतीय मैनेजरोंका अपराध छिप जाता है, क्योंकि उनसे पैदा हुए बच्चोंका रंग भारतीयोंके रंगमें मिल जाता है। पर यह मैं अवश्य कहूँगा कि गोरे मैनेजरोंको यह अपराध करते हुए किसी प्रकारके दण्डका भय नहीं होता, भारतीय मैनेजरोंको दण्डका भय रहता है। लेकिन मैं इस अध्यायको यहीं समाप्त करता हूँ। पत्र-लेखकने सलाह दी है कि चाय-बागानके मैनेजर पंचायतोंके अध्यक्ष हों, इस कुटिल सलाहसे चाय-बागानके मालिकोंकी पोल खुल जाती है। उक्त पत्रके लेखकने असहयोगके बारेमें जो-कुछ कहा है, उससे जाहिर होता है कि उन्हें असहयोगके बारेमें पूरी जानकारी नहीं है। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने असमके किसी भी कुलीको हड़ताल करनेकी सलाह नहीं दी है। मैं वहाँके मजदूरोंकी समस्याको जाननेका भी दावा नहीं करता। इसके अलावा लेखकको यह मालूम होना चाहिए कि असहयोग पूँजी अथवा पूँजीपतियोंके खिलाफ नहीं, बल्कि इस समय जो शासन-पद्धति चालू है, उसके खिलाफ हो रहा है। लेकिन यह भी सही है कि जहाँ-कहीं बुराई होगी, अत्याचार और अन्याय होगा वहाँ कोई चाहे या न चाहे, असहयोग होगा ही। लोग एक बार असहयोगकी शक्ति जान लेनेपर उसका इस्तेमाल जरूर करेंगे। यदि वे इसका इस्तेमाल मूर्खतापूर्वक या अनुचित रूपसे करते हैं तो नुकसान उनका ही होगा। मेरे खयालसे कानून बनाने या कौन्सिलोंमें वाद-विवादसे ज्यादा फायदा नहीं हो सकता। मजदूरोंकी हालत तभी सुधर सकती है जब मालिक उनके साथ भाई-बन्धुओंकी तरह व्यवहार करने लगें, या जब मजदूरोंमें खुद इतनी समझ आ जाये कि वे अपने हकोंको जानने लगें और उन्हें हासिल करनेके तरीके भी मालूम कर लें। किसी कानूनके लिए जनमत तैयार किये बिना वैसा कानून बनाना बेकार ही नहीं, नुकसानदेह भी है। जनमत तैयार करनेका या मौजूदा मामलेमें, तरीकोंमें परिवर्तन लानेका, या मेरी शब्दावलीमें कहिए तो हृदय-परिवर्तनका सबसे जल्दी सफल होनेवाला उपाय असहयोग ही है।
{{Left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया''', २९-६-१९२१|1em}}
{{Dhr|5em}}<noinclude></noinclude>
pf6hvwazd60ldji05js6pusziu5jhd1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३४१
250
159646
671721
508838
2026-08-19T06:25:22Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
671721
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" /></noinclude>
{{C|{{larger|'''१४०. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{Right|[२९ जून, १९२१]}}
{{C|'''घड़ा अथवा गागर'''}}
मैं यह टिप्पणी, हमारी जो परीक्षा<ref>३० जून, इस तारीख तक बेजवाड़ा कांग्रेसमें निश्चित किये गये कार्यक्रमको पूरा किया जाना था।</ref> होनेवाली है उसके एक दिन पहले लिख रहा हूँ। कुम्हारकी भाषामें कहें तो अभी चाकपर मिट्टीके पिण्डको रखा गया है। उसमें से शुद्ध सम्पूर्ण घड़ा उतरेगा अथवा छोटी गागर, यह तो कार्यकर्त्ता ही जानें अथवा भगवान् जानें। जैसी मनोवृत्ति होती है वैसी बरकत होती है। चन्दा उगाहनेवालों की मनोवृत्ति अच्छी होगी तो बरकत अवश्य होगी। गुजरातसे दस लाख रुपयोंके बारेमें तो अब कोई शंका नहीं रही। आशा तो यह है कि दस लाख रुपयेसे भी अधिक रकम मिलेगी। इसमें आश्चर्य भी क्या है? हमारे पास अपेक्षाकृत दौलत अधिक है। गुजरातकी मिलें ही हमारी आशा पूरी कर सकती है। गुजरातके बाहर व्यापार करनेवाले साहसी व्यापारी दे सकते हैं, राजा लोग भयका त्याग करें तो वे भी इतना दे सकते हैं। हमने तो आजतक ऐसे कार्योंमें प्रजाके रूपमें हाथ ही नहीं डाला, अपनी शक्तिको आजमाया ही नहीं है; इसीसे हमने डरते-डरते कम अनुमान लगाया। भय छोड़ेंगे तो आगे बढ़ेंगे।
लेकिन हमें तो तीन लाख सदस्य और एक लाख चरखे चाहिए। हम इतना करते हैं या नहीं, इसपर हमारा भविष्य निर्भर करता है। ईश्वर! गुजरातकी और भारतकी लाज रखना।
{{C|'''हमारा दायित्व'''}}
लेकिन जैसे-जैसे पैसा बढ़ता जाता है, सदस्यों और चरखोंकी संख्यामें वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे हमारा दायित्व भी बढ़ता जाता है। पैसा मिलनेपर हम भाग्यवान नहीं माने जायेंगे; हमें पैसेको खर्च करना भी आना चाहिए, पैसेका हिसाब रखना आना चाहिए। हमें उस पैसेका सदुपयोग भी करना चाहिए। हमने पैसा ब्याजपर देनेके लिए नहीं लिया है बल्कि आजकी जरूरतको देखते हुए लिया है। हमें उस पैसेके द्वारा जन-जीवनको उन्नत बनाना है। हमें विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना है। हमें [बच्चोंको] राष्ट्रीय शिक्षा देनी है, हमें अन्त्यजोंकी दयनीय स्थितिको सुधारना है। हमें अकालकी पीड़ाको दूर करना है। हमें मद्यपान करनेवालों से मद्यको छुड़ाना है। इन सब कार्योंमें हमें सारा पैसा चाहिए। उसके लिए हमारे पास ईमानदार कार्य-कर्त्ता होने चाहिए। हमारा हिसाब स्पष्ट होना चाहिए। एक बालकको भी उसे देखनेका हक होना चाहिए। हमें जो पैसा मिला है उसके शुद्ध उपयोगपर ही हम भविष्यमें<noinclude></noinclude>
8vecymgjjhmghfezt4rqvjujhnv5mgt
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५७
250
159698
671649
508924
2026-08-18T17:23:37Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671649
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''मृत्युका भय'''|५२५}}</noinclude>पल-पलपर होती ही रहती है, हम क्यों खुशियाँ मनायें और क्यों शोक करें? सारे देशको यदि हम अपना परिवार मानें——यदि हमारी भावना इतनी व्यापक हो——और देशमें जहाँ-कहीं किसीका जन्म हुआ हो उसे हम अपने ही यहाँ हुआ मानें तो फिर आप कितने जन्मोत्सव मनायेंगे? देशमें जहाँ-जहाँ मृत्यु हो उन सबके लिए यदि हम रोते रहें तो हमारी आँखोंके आँसू कभी सूखेंगे ही नहीं यह सोचकर हमें मृत्युका डर छोड़ ही देना चाहिए।
प्रत्येक भारतवासी अधिक ज्ञानी, अधिक आत्मवादी होनेका दावा करता है। तिसपर भी मौतके सामने जितने दीन हम हो जाते हैं उतने और लोग शायद ही होते हों। और उसमें भी मेरा खयाल है कि हिन्दू लोग जितने अधीर हो जाते हैं उतने भारतके दूसरे लोग नहीं होते। अपने यहाँ किसीका जन्म होते ही हमारे घरोंमें आनन्द-मंगल उमड़ पड़ता है और जब कोई मर जाता है तब इतना रोना-पीटना मचता है कि आसपासके लोग हैरान हो जाते हैं। यदि हम स्वराज्य लेना चाहते हैं और अपनेको उसके योग्य सिद्ध करना चाहते हैं तो हमें मृत्युका भय बिलकुल छोड़ ही देना चाहिए।
और जो मनुष्य मृत्युका भय छोड़ देगा उसे जेलका भय क्योंकर होगा? पाठक यदि विचार करेंगे तो उन्हें मालूम हो जायेगा कि स्वराज्य-प्राप्तिमें हमें जो विलम्ब हो रहा है उसका एकमात्र कारण है——हम लोगोंमें मृत्यु तथा उससे हलके दुःखोंको सहनेकी शक्तिका अभाव।
ज्यों-ज्यों अधिकाधिक निरपराध मनुष्य जान-बूझकर मौतको गले लगानेके लिए तैयार होते जायेंगे त्यों-त्यों दूसरे लोगोंका बचाव होता जायेगा और दुःख भी कम होता चला जायेगा। जो दुःख खुशीके साथ सहन किया जाता है वह दुःख नहीं रहता, बल्कि
सुख हो जाता है। जो दुःखसे जी चुराता है वह बहुत कष्ट उठाता है और संकटके उपस्थित होनेपर निर्जीव-सा हो जाता है। जो आनन्दके साथ दुःखका स्वागत करनेके लिए पैर बढ़ाता है उसे वह आरम्भिक दुःख, जो केवल दुःखकी कल्पनासे ही उत्पन्न होता है, कैसे हो सकता है? आनन्द पीड़ापर क्लोरोफार्मका काम करता है।
इस विषयपर इस समय जो मुझे इतना लिखना पड़ा सो इसलिए कि यदि “हमें इसी वर्ष स्वराज्य प्राप्त करना हो तो मृत्युका विचार भी कर लेना होगा।” जो लोग पहलेसे तैयारी कर रखते हैं वे आपत्तिसे बच जाते हैं, हमारे विषयमें भी ऐसा हो सकता है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि स्वदेशी-आन्दोलन हमारी ऐसी ही पेशबंदी है। यदि इसमें हमारी फतह हो गई तो मैं समझता हूँ, सरकारको अथवा और किसीको हमारी अग्नि-परीक्षाकी आवश्यकता ही न रहेगी।
परन्तु इतना होनेपर भी, यह आवश्यक है कि हम गफलतमें न रहें। सत्ता अन्धी और बहरी होती है। वह अपने बिलकुल पासकी घटनाओंको भी नहीं देख पाती। अपने कानके पासका कोलाहल भी वह नहीं सुन सकती। अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि जो सरकार मदोन्मत्त है वह क्या नहीं कर बैठेगी।इसलिए मेरे मनमें यह खयाल उठा कि अब देश-सेवकोंको मृत्यु, जेल अथवा दूसरी आपत्तियोंका एक मित्रकी तरह स्वागत करनेकी तैयारी कर रखनी चाहिए।<noinclude></noinclude>
73usq88m6ooqyfrm9otiuwo9h9vw3vr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५८
250
159700
671669
508926
2026-08-19T01:01:37Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671669
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५२६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
एक शूरवीर जिस प्रकार हँसते हुए मृत्युका स्वागत करता है उसी प्रकार वह सावधान भी रहता है। शान्तिमय संग्राममें तो गफलतके लिए गुंजाइश ही नहीं है। जो नीति और सदाचारके विरुद्ध हैं, हम ऐसे अपराध करके न तो जेल जाना चाहते हैं और न फाँसीपर ही लटकना चाहते हैं। हमें तो सरकारके अन्यायपूर्ण कानूनोंका सामना करते हुए बलिदान होना है।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १४-८-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५८. स्वराज्यकी व्याख्या'''}}}}
स्वराज्यकी व्याख्याओंके सम्बन्धमें मैं अपने मनमें तो विचार किया ही करता हूँ। अब उन्हें पाठकोंके सामने भी उपस्थित करता हूँ:
(१) स्वराज्यका अर्थ है—स्वयं अपने ऊपर प्राप्त किया हुआ राज्य। इसे जो मनुष्य प्राप्त कर चुका है वह अपनी व्यक्तिगत प्रतिज्ञाका पालन कर चुका।
(२) परन्तु हमने तो उसके कुछ लक्षणों, और स्वरूपकी कल्पना की है। अतएव स्वराज्यका अर्थ है——देशके आयात और निर्यातपर, सेना और अदालतोंपर जनताका पूरा नियन्त्रण। दिसम्बरकी प्रतिज्ञाका यह अर्थ है। इसमें अंग्रेजी साम्राज्यके साथ सम्बन्ध रखने के लिए जगह है भी और नहीं भी है। यदि खिलाफत और पंजाब-काण्डका निपटारा न हो तो जगह नहीं है।
(३) परन्तु व्यक्तिगत स्वराज्यका उपभोग तो साधु लोग आज भी करते होंगे, और हमारी पार्लियामेंट स्थापित हो जानेपर भी, सम्भव है लोगोंकी दृष्टिमें स्वराज्य न आये। इसलिए स्वराज्यका अर्थ है——अन्न-वस्त्रकी बहुतायत। परन्तु वह इतनी होनी चाहिए कि किसीको भी उसके बिना भूखा और नंगा न रहना पड़े।
(४) ऐसी स्थिति हो जानेपर भी एक जाति या एक श्रेणीके लोग दूसरोंको दबा सकते हैं। अतएव स्वराज्यका अर्थ है——ऐसी स्थिति जिसमें एक बालिका भी घोर अन्धकारमें निर्भयताके साथ घूम-फिर सके।
(५) उपर्युक्त चार व्याख्याओंमें कितनी ही बातोंका समावेश दिखाई देगा। तथापि राष्ट्रीय स्वराज्यमें प्रत्येक अंग सजीव और उन्नत हो जाये और होना चाहिए तो उस दशामें स्वराज्यका अर्थ होगा अन्त्यजोंके प्रति अस्पृश्यताको भावनाका सर्वथा लोप।
(६) ब्राह्मणों और अब्राह्मणोंके झगड़ेकी समाप्ति।
(७) हिन्दू-मुसलमानोंके मनोमालिन्यका सर्वथा नाश। इसका अर्थ है कि हिन्दू मुसलमानोंकी भावनाओंका ध्यान रखें और इसके लिए जानतक दे दें। इसी तरह मुसलमान हिन्दुओंकी भावनाओंका ध्यान रखें। मुसलमान गो-हत्या करके हिन्दुओंका दिल न दुखायें; बल्कि स्वयं ही गो-वध बन्द कर दें और अपने हिन्दू भाईके चित्तको चोट न पहुँचने दें तथा हिन्दू, बिना किसी तरहका बदला चाहे, मसजिदोंके सामने बाजे न<noinclude></noinclude>
mccdufey7jmuer997272fgxjha07obk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५९
250
159703
671670
508929
2026-08-19T01:05:41Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671670
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||स्वराज्यकी व्याख्या|५२७}}</noinclude>बजायें और मुसलमानोंका जी न दुखायें, बल्कि मसजिदोंके पाससे गुजरते हुए बाजे बन्द रखने में बड़प्पन समझें।
(८) स्वराज्यका अर्थ है——हिन्दू, मुसलमान, सिख, पारसी, ईसाई, यहूदी, सभी धर्मोके लोग अपने-अपने धर्मका पालन कर सकें और ऐसा करते हुए एक-दूसरेकी रक्षा और एक-दूसरेके धर्मका आदर करें।
(९) स्वराज्यका अर्थ है कि प्रत्येक ग्राम चोरों और डाकुओंके भयसे अपनी रक्षा करने में समर्थ हो जाये और प्रत्येक ग्राम अपने लिए आवश्यक अन्न-वस्त्र पैदा करे।
(१०) स्वराज्यका अर्थ है——देशी राज्यों, जमींदारों और प्रजामें मित्रभाव रहे, देशी राज्य अथवा जमींदार प्रजाको परेशान न करें और रियाया, राजा अथवा जमींदारको तंग न करे।
(११) स्वराज्यका अर्थ है——धनवान् और श्रमजीवियोंमें परस्पर मित्रता। मजदूर उचित मजदूरी लेकर धनवान्के यहाँ खुशीसे मजूरी करे।
(१२) स्वराज्य वह है जिसमें स्त्रियाँ माता और बहनें समझी जायें और उनका मान-आदर हो तथा ऊँच-नीचका भेदभाव दूर होकर सब परस्पर भाई-बहनकी भावनासे बरताव करें।
इन व्याख्याओंसे सिद्ध होता है कि
(१) स्वराज्यमें राज्यसत्ता, शराब, अफीम इत्यादि [मादक पदार्थों] का व्यापार न करे।
(२) स्वराज्यमें अनाज और रुईका सट्टा न हो।
(३) स्वराज्यमें कोई कानूनको भंग न करे
(४) स्वराज्यमें स्वेच्छाचारके लिए बिलकुल स्थान न रहे, जिससे कोई अपने ही खिलाफ की गई शिकायतका फैसला खुद ही काजी बनकर न करे बल्कि देशकी बनाई अदालतमें अपने खिलाफ की गई फरियादका फैसला होने दे।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १४-८-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
63pudpbxkxvbynxd454gwti4qg8njmq
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६०
250
159704
671671
508930
2026-08-19T01:11:16Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671671
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५९. अस्पृश्यता और राष्ट्रीयता'''}}}}
अंकलेश्वरसे एक सज्जनने बहुत लम्बा पत्र लिखा है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय आन्दोलनमें अस्पृश्यताको दाखिल करके मैंने हिन्दुस्तानको भारी नुकसान पहुँचाया है। मैंने उस सवालकी चर्चा करने में अति की है और व्यर्थ ही हम लोगोंमें अनबनका कारण उत्पन्न कर दिया है। इस भाईके पत्रमें लगाये गये अन्य आक्षेपोंका कोई हिसाब नहीं है। उनका मैं यहाँ उत्तर नहीं दे रहा हूँ, [मुझे उम्मीद है] इसके लिए वे मुझे क्षमा करेंगे।
कुछ-एक सामाजिक प्रश्न इतने व्यापक होते हैं कि उन्हें राजनैतिक बनाये बिना काम ही नहीं चल सकता। हिन्दू-मुस्लिम एकताके प्रश्नको अगर सामाजिक मानकर निकाल दें तो हमारी गाड़ी पहली मंजिलपर ही अटक जायेगी। दक्षिणमें ब्राह्मण और
ब्राह्मणेतर प्रश्न इतना उग्र हो गया है कि जो राजनैतिक पक्ष उसे छोड़ देगा वही मृत्युको प्राप्त होगा। अमुक प्रश्नको राष्ट्रीय आन्दोलनमें शामिल किया जाना चाहिए अथवा नहीं, इसका निर्णय करना आसान है। जिसका निर्णय किये बिना हमारा काम रुक जाये उसका निर्णय करना ही चाहिए। मेरा यह निश्चित मत है कि यदि मैंने अस्पृश्यताके प्रश्नको न उठाया होता तो हमारा आन्दोलन आगे बढ़ ही नहीं सकता था। हम घोर अज्ञानवश जिन लोगोंको अस्पृश्य मानकर अपमानित कर रहे हैं उन छ: करोड़ लोगोंको छोड़कर हम स्वर्गके विमानमें कदापि नहीं बैठ सकते। वे लोग भूमिपर होने के कारण उस विमानको पकड़े रहेंगे और वह उड़ान नहीं भर सकेगा। विमानको पकड़कर, जैसे-तैसे लटके रहकर भी वे उड़ सकते हैं——ऐसा अगर मुझे लगता तो मैं इस प्रश्नको न उठाता। पत्र-लेखकके पत्रसे मुझे ऐसा लगता है कि वह वर्तमान राज्यतन्त्रसे परिचित ही नहीं है।
इस राज्य-व्यवस्थाका महल हमारी दुर्बलताओंकी नींवपर ही उठाया गया है। आज हिन्दू-मुसलमानका प्रश्न, तो कल ब्राह्मण-ब्राह्मणेतरका प्रश्न, और फिर अस्पृश्यता तथा राजा और प्रजाका प्रश्न, धनवान और मजदूरका प्रश्न, हमारे मद्यपान आदिके शौकसे——इस राज्य-व्यवस्थाने हमारी इन दुर्बलताओंका हमेशा लाभ उठाया है, इसीसे अपनी लड़ाईको हमने आत्म-शुद्धिकी लड़ाई माना है। मैंने अस्पृश्यताको सबसे बड़ा कलंक माना है; क्योंकि हिन्दू-संसारने इस वर्गपर डायरशाही चलाई है।
मैं शास्त्रजालमें पड़कर भरमनेवाला व्यक्ति नहीं हूँ। मेरी आँखोंने जो देखा है उसे मैं ऐसे ही दरगुजर नहीं कर सकता। जहाँ भी देखता हूँ वहाँ मैं अन्त्यजोंको तिरस्कृत होते हुए देखता हूँ। एक पत्र-लेखक अभिमानके साथ लिखता है कि हिन्दू समाजने अन्त्यजोंका यदि सचमुच तिरस्कार किया होता तो अन्त्यज कभीके नष्ट हो गये होते। मुझे तो लगता है कि हमने ही उनका नाश नहीं किया क्योंकि उनसे हमें अपनी गन्दगी उठवानी थी। गुलामोंका नाश कौन करता है? जिसे भार उठवाना है, वह अपने जानवरका नाश नहीं करता। हमने अन्त्यजोंसे कितना भार उठवाया है और<noinclude></noinclude>
fea17esw1o96yk8dk3zn2aiqfalkquw
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९३
250
176013
671770
644605
2026-08-19T10:45:44Z
Shivaniya shaw
4129
/* अशोधित */
671770
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ|४६१|}}</noinclude>{{c|'''भविष्यमें क्या होगा ?'''}}
{{Gap}}इससे एक दूसरा प्रश्न मेरे सामने उपस्थित होता है । मेरे स्वप्नगत स्वराज्यमें
तो शस्त्रास्त्रकी कतई जरूरत नहीं है । लेकिन मैं यह उम्मीद नहीं करता हूँ कि यह
स्वप्न, इस वर्तमान प्रयत्नके फलस्वरूप, सोलहों आने सच्चा हो जायेगा । इसका पहला
कारण तो यह है कि यह आन्दोलन इस ध्येयको तात्कालिक लक्ष्य बनाकर नहीं किया
जा रहा है और दूसरा यह कि मैं अपनेको इतना आगे बढ़ा हुआ नहीं समझता कि
राष्ट्रके सामने ऐसा विस्तृत व्यवहार-क्रम उपस्थित कर सकूं और वह उसके अनुसार
उसकी तैयारी कर सके। मैं खुद भी अभी इतना विकार-ग्रस्त हूँ और मुझमें मनुष्य-
स्वभावकी इतनी कमजोरियाँ हैं, जिससे मुझे ऐसी प्रेरणाका या क्षमताका अनुभव
नहीं होता। अपने लिए मैं अगर किसी बात का दावा कर सकता हूँ तो सिर्फ इसी
बातका कि मैं अपनी कमजोरियोंको दूर करनेका निरन्तर प्रयत्न कर रहा हूँ । मुझे
विश्वास है कि मैंने अपनी इन्द्रियोंको दमन करने और वशमें करनेकी क्षमता बहुत-
कुछ प्राप्त कर ली है; परन्तु अभी मैं इस लायक नहीं हुआ हूँ कि मुझसे कोई पाप
बन न पड़े - अर्थात् मैं इन्द्रियोंसे प्रभावित न हो सकूं। हाँ, मैं इस बातको मानता
हूँ कि प्रत्येक मनुष्य ऐसी मंगलमय अवर्णनीय पापरहित अवस्थाको प्राप्त कर सकता
है और उसमें, अपने अन्तःकरणमें, किसी अन्यकी नहीं वरन केवल एक परमात्माकी
उपस्थिति अनुभव कर सकता है । और मुझे मंजूर करना चाहिए कि अभी वह अवस्था
मुझसे बहुत दूर है । अतः मेरे लिए देशको पूर्ण अहिंसाके व्यवहारका कोई मार्ग बताना
अभी सम्भव नहीं है ।
{{C|'''रेल और तार'''}}
जिस महान सिद्धान्तका विवेचन मैंने ऊपर किया है उसके मुकाबलेमें यह रेल
और तारका प्रश्न बहुत ही नगण्य है । मैं खुद अपने लिए इन सुविधा-साधनोंसे परहेज
नहीं कर रहा हूँ। मैं निश्चय ही न तो राष्ट्रसे इनका उपयोग छोड़ देनेकी उम्मीद
करता हूँ और न स्वराज्य हो जानेपर उनका व्यवहार बन्द होनेकी अपेक्षा करता
हूँ। लेकिन हाँ, स्वराज्यान्तर्गत राष्ट्रसे में यह जरूर चाहता हूँ कि वह इस बातपर
विश्वास न करे कि इन सुविधा-साधनोंसे अवश्य ही हमारी नैतिक उन्नति होती है या
ये हमारी भौतिक प्रगतिके लिए अनिवार्य हैं। मैं राष्ट्रको यह सलाह देता हूँ कि वह
इन साधनों का उपयोग कम मात्रामें करे और हिन्दुस्तान के साढ़े सात लाख गाँवोंमें तार
और रेलका जाल बिछा देनेके लिए बुरी तरह लालायित न हो । राष्ट्र जब आजादीकी
दमकसे दमकने लगेगा तब जान जायेगा कि हमारे शासकोंको उनकी आवश्यकता
हमारे अज्ञान - अन्धकारको दूर करनेकी बनिस्बत हमें गुलाम बनाने के लिए ही अधिक
थी । प्रगति तो लंगड़ी होती है । वह कूदती-फुदकती ही आ सकती है । आप उसे
तार या रेलके द्वारा नहीं भेज सकते ।
{{C|'''पतित बहनें'''}}
पाठक यह जानकर खुश होंगे कि बारीसालमें 'पतित बहनों' के सुधारका काम
उत्साहसे शुरू कर दिया गया है। डाक्टर राय लिखते हैं कि हम कितनी ही बहनोंके<noinclude></noinclude>
8piwtn3gqvscf3so02c25a9mga38z9u
671772
671770
2026-08-19T10:47:18Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
671772
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ|४६१}}</noinclude>{{c|'''भविष्यमें क्या होगा ?'''}}
{{Gap}}इससे एक दूसरा प्रश्न मेरे सामने उपस्थित होता है । मेरे स्वप्नगत स्वराज्यमें
तो शस्त्रास्त्रकी कतई जरूरत नहीं है । लेकिन मैं यह उम्मीद नहीं करता हूँ कि यह
स्वप्न, इस वर्तमान प्रयत्नके फलस्वरूप, सोलहों आने सच्चा हो जायेगा । इसका पहला
कारण तो यह है कि यह आन्दोलन इस ध्येयको तात्कालिक लक्ष्य बनाकर नहीं किया
जा रहा है और दूसरा यह कि मैं अपनेको इतना आगे बढ़ा हुआ नहीं समझता कि
राष्ट्रके सामने ऐसा विस्तृत व्यवहार-क्रम उपस्थित कर सकूं और वह उसके अनुसार
उसकी तैयारी कर सके। मैं खुद भी अभी इतना विकार-ग्रस्त हूँ और मुझमें मनुष्य-
स्वभावकी इतनी कमजोरियाँ हैं, जिससे मुझे ऐसी प्रेरणाका या क्षमताका अनुभव
नहीं होता। अपने लिए मैं अगर किसी बात का दावा कर सकता हूँ तो सिर्फ इसी
बातका कि मैं अपनी कमजोरियोंको दूर करनेका निरन्तर प्रयत्न कर रहा हूँ । मुझे
विश्वास है कि मैंने अपनी इन्द्रियोंको दमन करने और वशमें करनेकी क्षमता बहुत-
कुछ प्राप्त कर ली है; परन्तु अभी मैं इस लायक नहीं हुआ हूँ कि मुझसे कोई पाप
बन न पड़े - अर्थात् मैं इन्द्रियोंसे प्रभावित न हो सकूं। हाँ, मैं इस बातको मानता
हूँ कि प्रत्येक मनुष्य ऐसी मंगलमय अवर्णनीय पापरहित अवस्थाको प्राप्त कर सकता
है और उसमें, अपने अन्तःकरणमें, किसी अन्यकी नहीं वरन केवल एक परमात्माकी
उपस्थिति अनुभव कर सकता है । और मुझे मंजूर करना चाहिए कि अभी वह अवस्था
मुझसे बहुत दूर है । अतः मेरे लिए देशको पूर्ण अहिंसाके व्यवहारका कोई मार्ग बताना
अभी सम्भव नहीं है ।
{{C|'''रेल और तार'''}}
जिस महान सिद्धान्तका विवेचन मैंने ऊपर किया है उसके मुकाबलेमें यह रेल
और तारका प्रश्न बहुत ही नगण्य है । मैं खुद अपने लिए इन सुविधा-साधनोंसे परहेज
नहीं कर रहा हूँ। मैं निश्चय ही न तो राष्ट्रसे इनका उपयोग छोड़ देनेकी उम्मीद
करता हूँ और न स्वराज्य हो जानेपर उनका व्यवहार बन्द होनेकी अपेक्षा करता
हूँ। लेकिन हाँ, स्वराज्यान्तर्गत राष्ट्रसे में यह जरूर चाहता हूँ कि वह इस बातपर
विश्वास न करे कि इन सुविधा-साधनोंसे अवश्य ही हमारी नैतिक उन्नति होती है या
ये हमारी भौतिक प्रगतिके लिए अनिवार्य हैं। मैं राष्ट्रको यह सलाह देता हूँ कि वह
इन साधनों का उपयोग कम मात्रामें करे और हिन्दुस्तान के साढ़े सात लाख गाँवोंमें तार
और रेलका जाल बिछा देनेके लिए बुरी तरह लालायित न हो । राष्ट्र जब आजादीकी
दमकसे दमकने लगेगा तब जान जायेगा कि हमारे शासकोंको उनकी आवश्यकता
हमारे अज्ञान - अन्धकारको दूर करनेकी बनिस्बत हमें गुलाम बनाने के लिए ही अधिक
थी । प्रगति तो लंगड़ी होती है । वह कूदती-फुदकती ही आ सकती है । आप उसे
तार या रेलके द्वारा नहीं भेज सकते ।
{{C|'''पतित बहनें'''}}
पाठक यह जानकर खुश होंगे कि बारीसालमें 'पतित बहनों' के सुधारका काम
उत्साहसे शुरू कर दिया गया है। डाक्टर राय लिखते हैं कि हम कितनी ही बहनोंके<noinclude></noinclude>
6sadt28o34p2j5x46x8dpvwjnolaanp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९४
250
176042
671773
644606
2026-08-19T10:58:41Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
671773
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४६२|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>घरों में जा चुके हैं और अब कताई शुरू करा रहे हैं। बाबू अश्विनीकुमार दत्त के
स्कूल के निरीक्षक जगदीश बाबू ने उन युवक कार्यकर्त्ताओं की रहनुमाई करने का वचन
दिया है, जिन्होंने इस जवाबदेही की सेवा का भार ग्रहण किया है। मुझे आशा है कि
जिन लोगों ने इस परम आवश्यक कार्य को अपने हाथ में लिया है वे इसे अधूरा ही न
छोड़ देंगे। उन्हें बार-बार की निराशाओं का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए
और धीरे-धीरे प्रगति होने की उम्मीद करनी चाहिए। सिर्फ ऐसे ही कार्य में, जिसमें
न तो किसी तरह की उत्तेजना की गुंजाइश है और न शीघ्र ही प्रसिद्धि मिलने की
सम्भावना है, सच्चे सेवा प्रेम की परीक्षा होती है। मैं बारीसाल के इस उदाहरण को इस
लायक मानता हूँ कि दूसरे शहरों के लोग भी उसका अनुसरण करें। यह आत्मशुद्धि-
का काम तो स्वराज्य के बाद भी जारी रहेगा। हाँ, हर एक आदमी इसे नहीं कर
सकता। इसलिए सिर्फ वे लोग ही इस बढ़ते हुए पापाचार को मिटाने के लिए आगे बढ़ें
जिनका दिल इसके लिए उत्सुक हो और जिनकी आत्मा काफी पवित्र हो। इस आन्दो-
लन की स्वभावतः दो शाखाएँ हैं— एक, पतित बहनों का सुधार करना और दूसरी,
पुरुषों को इस पतनकारी पाप से विरत करना। इसी पाप के कारण पुरुष अपनी इन
बहनों को कामुक दृष्टि से देखते और उन्हें उसका शिकार बनाने के लिए ललचाते हैं।
दोनों शाखाओं में काम करने के लिए एक से ही गुणों की जरूरत है। दोनों दिशाओं में
साथ-ही-साथ काम होना चाहिए। तभी वह सफल हो सकता है।
{{C|'''कारावास का प्रभाव'''}}
डा० राय ने अपने जिस पत्र में बारीसाल की पतित बहनों में किये जाने वाले कार्य का
वर्णन किया है, उसी में वे लिखते हैं :
:'''पूर्वी बंगाल में हिन्दू-मुस्लिम एकता अब काफी मजबूत है और लोगों में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार प्रायः पूर्णता पर पहुँच चुका है। पूर्वी बंगाल इन दोनों बातों के लिए पीर बादशाह मियाँ की गिरफ्तारी का ऋणी है।'''
हर दिशा से इसी तरह के प्रमाण मिल रहे हैं। किन्तु हमें निश्चिन्त होकर नहीं बैठना है। अभी भी करने के लिए बहुत काम बाकी है। एकता और बहिष्कार ये दोनों
अभी कोमल पौधे-जैसे हैं। इनकी रक्षा आवश्यक है और उन्हें सावधानी से सींचना
जरूरी है। हिन्दू-मुस्लिम एकता हरेक को मजबूत करनी चाहिए और दोनों को बिना
किसी दिखावे के एक-दूसरे की चुपचाप सेवा करने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए।
विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार केवल इसी तरह जारी रखा जा सकता है कि सभी लोग
हाथ से कताई करने लगें, और कुटिया-कुटिया में चरखे का सद्भाव-संचारी संगीत गूंजने
लगे। गाँवों के हर मण्डल में एक ऐसा विशेषज्ञ होना चाहिए जो सूत को ज्यादा मजबूत,
इकसार और महीन बनाने पर जोर दे। भारत में काफी जुलाहे हैं। यदि हम उन्हें
हाथ का कता अच्छा सूत दे सकें तो उससे मिल के सूत जैसी ही बुनाई हो सकती
है। अकेले इस कार्य से मिल के बने भारतीय कपड़े की कीमतें इतनी नीचे आ जायेंगी
जितनी और किसी कार्य से नहीं आ सकतीं।<noinclude></noinclude>
aro39f4g18pwz6xggfxoww5beiys88u
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९१
250
183204
671679
644603
2026-08-19T03:12:01Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
671679
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||टिप्पणियाँ|
४५९}}</noinclude>महायुद्ध के समय ही रंगरूट भरती नहीं किये थे<ref>१. देखिए खण्ड १४ और १५ ।</ref> बल्कि १९१४ में भी लन्दनमें एक
घायल शुश्रूषा दलका संगठन किया था।<ref>२. देखिए खण्ड १२ ।</ref>इसलिए ऐसा करके यदि मैंने पाप किये
हों तो मेरा यह पापोंका घड़ा अब पूरा भर चुका है । सरकारको सहायता देनेका कोई
अवसर मैंने कभी नहीं गँवाया । उन तमाम कठिन प्रसंगोंपर दो सवाल मेरे मनमें उपस्थित हुआ करते थे । साम्राज्यके नागरिककी हैसियतसे क्योंकि मैं पहले अपनेको
इस साम्राज्यका नागरिक मानता था -मेरा क्या कर्त्तव्य है, और अहिंसा-धर्मके कट्टर
अनुगामीकी हैसियतसे मेरा क्या कर्त्तव्य है ?
अब मैं समझ गया कि उस समय जो मैं अपनेको इस साम्राज्यका नागरिक
समझता था, वह मेरी गलती थी । किन्तु उन चारों मौकोंपर मेरा यह सच्चा विश्वास
था कि यद्यपि मेरा देश अभी कितना ही निर्योग्यताओंसे पीड़ित है तथापि वह स्वत-
न्त्रताके मार्गपर बराबर आगे बढ़ रहा है। और मेरा विश्वास यह भी था कि लोगोंकी
दृष्टिसे सरकार बिलकुल ही बुरी नहीं है तथा अंग्रेज शासक संकुचित दृष्टिवाले और
जड़ होनेपर भी सच्चे हैं। मेरे विचार ऐसे थे; अतएव उस समय मैंने वैसे ही काम
किये जैसे एक साधारण अंग्रेज उस परिस्थितिमें करता । उस समय मुझे इतना ज्ञान
और महत्व प्राप्त नहीं हुआ था कि मैं किसी कामको स्वतन्त्र रूपसे करता । उस समय
ब्रिटिश मंत्रियोंके निर्णयोंपर अदालती अहमियत के साथ विचार या छानबीन करना मेरा
काम नहीं था । बोअर युद्ध, जुलू बलवे या गत महायुद्ध के समय मैंने ब्रिटिश मन्त्रियोंपर
'दुर्भाव 'का लांछन कभी नहीं लगाया। मैंने यह कभी खयाल नहीं किया और न
अब भी करता हूँ कि अंग्रेज लोग खास तौरपर दूसरे लोगोंसे ज्यादा बुरे हैं। मैं
पहले भी मानता था और अब भी मानता हूँ कि वे उतने ही महान उद्देश्य रख सकते हैं
और कार्य कर सकते हैं और साथ ही उतनी गलतियाँ भी कर सकते हैं जितनी कि
कोई भी दूसरा मानव समुदाय । इसलिए मैं मानता था कि स्थानिक अथवा सामान्य
आवश्यकता के समय इस साम्राज्यको अपनी क्षुद्र सेवाएँ अर्पण करके मैंने एक मनुष्य
और साम्राज्य के नागरिककी हैसियतसे अपने कर्त्तव्यका पर्याप्त पालन किया है; और मैं
हरएक हिन्दुस्तानीसे यह उम्मीद करता हूँ कि वह भी स्वराज्य स्थापित होनेपर इसी
तरह देश के प्रति अपने कर्त्तव्यका पालन करेगा। अगर ऐसे हर खयाल आने लायक
मौकेपर हममें से हरएक आदमी खुद अपनी मर्जीको ही अपना कानून मानेगा और
इस देशको भावी राष्ट्रीय संसदके प्रत्येक कार्यको सोनेके कांटेमें तोलेगा तो मुझे अत्यन्त
दुःख होगा । मैं तो अधिकांश मामलोंमें अपना निर्णय राष्ट्रीय प्रतिनिधियोंके हवाले
कर दूंगा - हाँ, उन प्रतिनिधियोंके चुनावमें अलबत्ता मैं खासतौरपर सावधान रहूँगा ।
मैं समझता हूँ, दूसरे किसी तरीकेसे कोई भी प्रजासत्तात्मक सरकार एक दिन भी नहीं
टिक सकेगी।
परन्तु अब तो मेरी दृष्टिमें सारी स्थिति ही बदल गई है। मैं समझता हूँ अब
मेरी आँखें खुल गई हैं। अनुभवोंने मुझे होशियार बना दिया है । अब मैं वर्तमान<noinclude>{{dhr|1}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
040vin9860mjz9ui258b5ozaxzv2o0e
सदस्य वार्ता:Avantika Shaw
3
183715
671734
671527
2026-08-19T08:39:01Z
Avantika Shaw
4732
/* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ उत्तर
671734
wikitext
text/x-wiki
{{संवाद}}
== स्वागत ==
{{स्वागत}}
--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १८:४३, २ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:०२, ७ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:१८, २९ मार्च २०२५ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा सांत्वना पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:२२, १० जनवरी २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:०९, २९ जनवरी २०२६ (UTC)
== गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन ==
@[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_षष्ठ_भाग.djvu/१२७&curid=45922&diff=667454&oldid=664893 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १०:३४, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
:मुझे आप कोई शोधित पुस्तक का लिंक दे [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५४, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
:ताकि हम उसके रूल देख ले आप ने जो भेजा है उससे उतना समझ नहीं अर्ह [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५६, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
::@[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]]जी, मैंने उसी पुस्तक के पृष्ठ की कड़ी आपको दी है जिस पुस्तक पर आप शोधन कार्य कर रही हैं। आप उस पृष्ठ के [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_षष्ठ_भाग.djvu/१२७&action=edit स्रोत सम्पादित करें] कड़ी पर जाकर साँचे के सही उपयोग को देख सकती हैं। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १४:११, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
:::सर में नया page ले सकती हु जो मैने लिया था वो बहुत डिफिकल्ट है उस समय दूसरा समूर्ण गांधी वाङ्मयं नहीं था इसलिए मुझे अभी दूसरा बुक लेना है। [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ११:४४, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
::::sir btaye mujhe [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३९, १९ अगस्त २०२६ (UTC)
7mjoi8xrmmiyqda59y6j0y8b4r65cev
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६५३
250
184249
671547
640121
2026-08-18T12:37:56Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671547
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|६१५}}
{{Multicol}}
{{outdent|'''आफ्रिकन क्रॉनिकल,''' १५६ '''पा॰ टि॰,''' ३४९ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|आफ्रिकी राजनीतिक संघ, १२ '''पा॰ टि॰,''' ४२}}
{{outdent|आबिद, आजम, ३९४}}
{{outdent|आमद, सुलेमान, ३७४}}
{{outdent|ऑरेंज फ्री स्टेट, -का विरोध, २१२, २१३; -का संविधान, ९, २१९, २२८; -के अध्याय ३३की कोई धारा संघ प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियमसे रद नहीं, १४, १५; -के अन्तर्गत शिक्षित भारतीयोंसे खेती व व्यापार नहीं करने के ज्ञापनकी माँगका केप ब्रिटिश भारतीय संघ द्वारा विरोध, २२०, २२३, २५० '''पा॰ टि॰,''' सरकारका कथन कि ज्ञापन देना आवश्यक नहीं, २२८; -कानूनी सलाहकारका परामर्श, २३०, उसकी सलाह की ज्ञापन आवश्यक, २३७; -द्वारा फ्री स्टेटमें एशियाइयोंके प्रवेशपर रोक, २५३, २५७; -में निवास चाहनेवाले एशियाइयोंसे हलफनामोंकी माँग कि वे वहाँ खेती और व्यापार नहीं करेंगे, २६० '''पा॰ टि॰;''' -में प्रवेश सम्बन्धी प्रतिबन्ध अस्थायी समझौतेके अन्तर्गत लागू नहीं, ३४२; -में भारतीयों द्वारा अस्थायी समझौतेके आधारपर अधिवासके अधिकारकी माँग, १, '''पा॰ टि॰;''' -में वैध-निवासियोंपर भी भूमिके स्वामित्वकी निर्योग्यतासे एशियाइयोंकी समृद्धिके मार्गमें एक बड़ी बाधा, २१५, २१८, २१९; -में व्यापार और खेती न करनेकी निर्योग्यता अस्थायी समझौतेके अन्तर्गत जारी, ३४१, ३४२; -में संघ प्रवासी प्रतिबंधक विधेयक (१९१२) के कारण भारतीयोंके प्रवेशपर रोक, २५३}}
{{outdent|आत्मा; -की स्वतंत्रता, १८५; -की स्वतंत्रतासे ब्रिटिश अनजान, १०८; -को कोई दुःख नहीं, २२१}}
{{outdent|आरोग्य; -की क्षतिका अज्ञान ही प्रमुख कारण, ४२५-२६; -की रक्षामें मिट्टी, पानी, सूर्यप्रकाश व हवाका महत्त्व, ४४७, ४४९-५१; -को चाय, कॉफी व कोकोसे हानि, ४७८-८०, -को बीड़ी व तम्बाकूसे हानि, २७७-७८}}
{{outdent|आर॰ नाइट ऐन्ड सन्स; -के पत्रके अनुसार भारत इंग्लैंडका सबसे बड़ा ग्राहक, ४३६}}
{{Multicol-break}}
{{gap|8em}}{{larger|'''इ'''}}
{{outdent|इंग्लैंड, -का भारत और अन्य देशोंके साथ व्यापार, ४३६}}
{{outdent|इंटरनेशनल प्रिंटिंग प्रेस, -की मालकीसे गांधीजी मुक्त, ३२५; गांधीजीके भारत जानेपर भी पूर्ववत् चालू, ४८४}}
{{outdent|इंडिपेंडेंट चर्च हॉल, २४१ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|'''इंडिया''', ११२ '''पा॰ टि॰,''' ३१०, -में गिरमिट प्रथाकी बुराइयोंके सम्बन्धमें कुमारी डडलेका पत्र, ४३४}}
{{outdent|'''इंडियन आइडिल्स,''' १३१ '''पा॰ टि॰,''' १३४}}
{{outdent|'''इंडियन ओवलैंड,''' १५६}}
{{outdent|'''इंडियन ओपिनियन,''' २ '''पा॰ टि॰,''' ११ '''पा॰ टि॰,''' १७ '''पा॰ टि॰,''' २८, ३५, ४३ '''पा॰ टि॰,''' ४४ '''पा॰ टि॰,''' ४६ '''पा॰ टि॰,''' ४७ '''पा॰ टि॰,''' ५० '''पा॰ टि॰,''' ५१ '''पा॰ टि॰,''' ५६ '''पा॰ टि॰,''' ८०-८१ '''पा॰ टि॰,''' ८७ '''पा॰ टि॰,''' ९० '''पा॰ टि॰,''' ९३, से ९५, '''पा॰ टि॰,''' १०६ '''पा॰ टि॰,''' ११२ '''पा॰ टि॰,''' ११३, ११७, ११८, १२२ '''पा॰ टि॰,''' १३० '''पा॰ टि॰,''' १३३ '''पा॰ टि॰,''' से १३५ '''पा॰ टि॰,''' १४२ '''पा॰ टि॰,''' १४७ '''पा॰ टि॰,''' १४९ '''पा॰ टि॰,''' १५६ '''पा॰ टि॰,''' १६० पा॰ टि॰ से १६२, १६८ '''पा॰ टि॰,''' १७० '''पा॰ टि॰,''' १७२ पा॰ टि॰ से १७४ '''पा॰ टि॰,''' १७६ '''पा॰ टि॰,''' १७९ '''पा॰ टि॰,''' १८०, १८३ '''पा॰ टि॰,''' १८४ '''पा॰ टि॰,''' १८६ '''पा॰ टि॰,''' १९० पा॰ टि॰ से १९२ '''पा॰ टि॰,''' १९४ पा॰ टि॰ से १९६ '''पा॰ टि॰,''' १९९ '''पा॰ टि॰,''' २०२ '''पा॰ टि॰,''' २०३ से २०५ '''पा॰ टि॰,''' २०८ '''पा॰ टि॰,''' २१० '''पा॰ टि॰,''' २१४ '''पा॰ टि॰,''' २१५ '''पा॰ टि॰,''' २२२ '''पा॰ टि॰,''' २२६ '''पा॰ टि॰,''' २२७ '''पा॰ टि॰,''' २३१ '''पा॰ टि॰,''' २३२ '''पा॰ टि॰,''' २३६ '''पा॰ टि॰,''' २३९ '''पा॰ टि॰,''' '''पा॰ टि॰,''' २४२ '''पा॰ टि॰,''' २४४ '''पा॰ टि॰,''' २५२ '''पा॰ टि॰,''' २५५ '''पा॰ टि॰,''' २५६ '''पा॰ टि॰,''' २५८ '''पा॰ टि॰,''' २६५ '''पा॰ टि॰,''' २६७ '''पा॰ टि॰,''' २६८ '''पा॰ टि॰,''' २७५ '''पा॰ टि॰,''' २७९ '''पा॰ टि॰,''' २८१ '''पा॰ टि॰,''' २८२ '''पा॰ टि॰,''' २८५ '''पा॰ टि॰,''' २८६ '''पा॰ टि॰,''' २९२ '''पा॰ टि॰,''' से २९४}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
asa3xt5du0s1w3mgmn5uyee55l4whmq
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६५४
250
184250
671555
640122
2026-08-18T13:00:33Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671555
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{Multicol}}
:'''पा॰ टि॰,''' ३०० '''पा॰ टि॰,''' ३१२ '''पा॰ टि॰,''' ३१७ '''पा॰ टि॰,''' से ३१९, ३२१, से ३२४ '''पा॰ टि॰,''' ३२८ '''पा॰ टि॰,''' ३३४ '''पा॰ टि॰,''' ३३८ '''पा॰ टि॰,''' ३३९, ३४० '''पा॰ टि॰,''' ३४६ '''पा॰ टि॰,''' ३५१ '''पा॰ टि॰,''' ३५५ '''पा॰ टि॰,''' ३५८, ३६१, से ३६३ '''पा॰ टि॰,''' ३६५, ३६८, ३७०, ३७३, ३७९, ३८७ '''पा॰ टि॰,''' ३९९, ४१८ '''पा॰ टि॰,''' ४२०, ४२७, से ४२९ '''पा॰ टि॰,''' ४३३ '''पा॰ टि॰,''' ४३६, ४४१, ४४५ '''पा॰ टि॰,''' ४४८ '''पा॰ टि॰,''' ४५३ '''पा॰ टि॰,''' ४५७, ४७३, ४९२ '''पा॰ टि॰,''' ४९७, ५०९; '''पा॰ टि॰,''' -का अकाल निवारण कोष, २२६-२७; -के उद्देश्य, ३२२-२३, ३२५-२७; -के स्वरूप और सामग्रीमें परिवर्तन, ४१९-२०; -में विज्ञापन, ३२२-२३, ३२६
{{outdent|इब्राहीम, ३८०, ३९३, ४०३}}
{{outdent|इब्राहीम, खमीसा, -को परवाना देनेमें गोरे व्यापारियोंका विरोध, ५०३}}
{{outdent|इब्राहीम, मुहम्मद, ३९१, ३९२, ३७१}}
{{outdent|इमाम, अब्दुल कादिर बावजीर, ५६, ४१०}}
{{outdent|इसाक, इस्माइल, ८३, ३६५, ३७४, ३७८, ३७९, ३८१, ३८९, ३९८, ३९९}}
{{outdent|इसीपिंगोंमें, गोखलेका स्वागत, ४१०}}
{{outdent|इस्तम्बूल अंजुमन, ३९१}}
{{outdent|इस्माइल, ३६१, ३६३, ३७१, ३७९, ३८२}}
{{outdent|इस्माइल, आदम, २३९ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|इस्माइल, मुहम्मद, ३७४, ३७७, ३८६, ३९४}}
{{outdent|'''इसप इस्माइल,''' ८८}}
{{outdent|'ईमानदारी; सर्वोत्तम नीति है' (ऑनेस्टी ईज द बेस्ट पॉलिसी) एक दूषित वचन, १४७; -का पालन हर कीमतपर किया जाये १८९}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ई'''}}
{{outdent|ईदुलजी, पालनजी, ४१७}}
{{outdent|'''ईवान द फूल,''' १५६}}
{{outdent|'''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस,''' २८५, ४४९, -द्वारा भायातके मामलेमें टीका, २८५ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|ईस्ट रैंड प्रोप्रायटरी माइन्स, ८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|ईस्टन मार्टिन, १३०}}
{{Multicol-break}}
{{gap|7em}}{{larger|'''उ'''}}
{{outdent|उदयार, छोटाभाई, ३९५}}
{{outdent|'''उमकाजी,''' एस॰ एस॰, ३४३, ३६०}}
{{outdent|उमर, उस्मान, ३९६}}
{{outdent|उमर सेठ, ४०१}}
{{outdent|उमियाशंकर, ३७७, ३९६, ४७७, ४१५}}
{{outdent|उस्मान, दादा, ६८, ७२, १५६, ३६७, ३८५, ३८९, ३९३}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ऊ'''}}
{{outdent|ऊका, नाथा; -की सर्वोच्च न्यायालयके समक्ष अपील, ३२८}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ए'''}}
{{outdent|एडलेस्टीन, ३८८}}
{{outdent|एडेम्स, डॉ॰, १३२; -द्वारा भारतीयोंको लापरवाहीकी आलोचना, ४४१}}
{{outdent|ऍम्टहिल, लॉर्ड, २७, ४६, १९६, २८४, ३६३, ४४९, ५०१, ५०२; -की दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको कानूनी राहत दिलानेके सम्बन्धमें चिन्ता, ४९२-९३; -द्वारा अस्थायी समझौतेका ठीक अमल न होनेके सम्बन्धमें लॉर्डसभामें आक्षेप, २८३-८४; -द्वारा गोखलेकी दक्षिण आफ्रिका यात्राकी सफलताके सम्बन्धमें लॉर्डसभामें पृच्छा, ४९२, ४९५-९६, ५०१}}
{{outdent|एमॉट, लॉर्ड, २०८ '''पा॰ टि॰,''' ४९२, ५०१-२; -द्वारा भारतीय हितोंकी उपेक्षा, ४९५}}
{{outdent|'''एरियल,''' २७४}}
{{outdent|एलिन्सन, डॉ; -द्वारा मेंदे और बिना छने आटेके प्रयोग, ४९८}}
{{outdent|एलिस, ३४२ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|एल्फिंस्टन कॉलेज, ३०४}}
{{outdent|एविर, ३}}
{{outdent|एस्क्विथ, ३३५, ३४६}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ऐ'''}}
{{outdent|'''ऐंजी,''' १३३}}
{{outdent|ऐंडर्सन, कैम्बेल, १२, ३६}}
{{outdent|ऐंड्र्यूज, ३३७}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
lczvi5qpoc8emgpmnh92rjwdofgwsi4
671557
671555
2026-08-18T13:02:36Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
671557
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
:'''पा॰ टि॰,''' ३०० '''पा॰ टि॰,''' ३१२ '''पा॰ टि॰,''' ३१७ '''पा॰ टि॰,''' से ३१९, ३२१, से ३२४ '''पा॰ टि॰,''' ३२८ '''पा॰ टि॰,''' ३३४ '''पा॰ टि॰,''' ३३८ '''पा॰ टि॰,''' ३३९, ३४० '''पा॰ टि॰,''' ३४६ '''पा॰ टि॰,''' ३५१ '''पा॰ टि॰,''' ३५५ '''पा॰ टि॰,''' ३५८, ३६१, से ३६३ '''पा॰ टि॰,''' ३६५, ३६८, ३७०, ३७३, ३७९, ३८७ '''पा॰ टि॰,''' ३९९, ४१८ '''पा॰ टि॰,''' ४२०, ४२७, से ४२९ '''पा॰ टि॰,''' ४३३ '''पा॰ टि॰,''' ४३६, ४४१, ४४५ '''पा॰ टि॰,''' ४४८ '''पा॰ टि॰,''' ४५३ '''पा॰ टि॰,''' ४५७, ४७३, ४९२ '''पा॰ टि॰,''' ४९७, ५०९; '''पा॰ टि॰,''' -का अकाल निवारण कोष, २२६-२७; -के उद्देश्य, ३२२-२३, ३२५-२७; -के स्वरूप और सामग्रीमें परिवर्तन, ४१९-२०; -में विज्ञापन, ३२२-२३, ३२६
{{outdent|इब्राहीम, ३८०, ३९३, ४०३}}
{{outdent|इब्राहीम, खमीसा, -को परवाना देनेमें गोरे व्यापारियोंका विरोध, ५०३}}
{{outdent|इब्राहीम, मुहम्मद, ३९१, ३९२, ३७१}}
{{outdent|इमाम, अब्दुल कादिर बावजीर, ५६, ४१०}}
{{outdent|इसाक, इस्माइल, ८३, ३६५, ३७४, ३७८, ३७९, ३८१, ३८९, ३९८, ३९९}}
{{outdent|इसीपिंगोंमें, गोखलेका स्वागत, ४१०}}
{{outdent|इस्तम्बूल अंजुमन, ३९१}}
{{outdent|इस्माइल, ३६१, ३६३, ३७१, ३७९, ३८२}}
{{outdent|इस्माइल, आदम, २३९ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|इस्माइल, मुहम्मद, ३७४, ३७७, ३८६, ३९४}}
{{outdent|'''इसप इस्माइल,''' ८८}}
{{outdent|'ईमानदारी; सर्वोत्तम नीति है' (ऑनेस्टी ईज द बेस्ट पॉलिसी) एक दूषित वचन, १४७; -का पालन हर कीमतपर किया जाये १८९}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ई'''}}
{{outdent|ईदुलजी, पालनजी, ४१७}}
{{outdent|'''ईवान द फूल,''' १५६}}
{{outdent|'''ईस्ट रैंड एक्सप्रेस,''' २८५, ४४९, -द्वारा भायातके मामलेमें टीका, २८५ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|ईस्ट रैंड प्रोप्रायटरी माइन्स, ८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|ईस्टन मार्टिन, १३०}}
{{Multicol-break}}
{{gap|7em}}{{larger|'''उ'''}}
{{outdent|उदयार, छोटाभाई, ३९५}}
{{outdent|'''उमकाजी,''' एस॰ एस॰, ३४३, ३६०}}
{{outdent|उमर, उस्मान, ३९६}}
{{outdent|उमर सेठ, ४०१}}
{{outdent|उमियाशंकर, ३७७, ३९६, ४७७, ४१५}}
{{outdent|उस्मान, दादा, ६८, ७२, १५६, ३६७, ३८५, ३८९, ३९३}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ऊ'''}}
{{outdent|ऊका, नाथा; -की सर्वोच्च न्यायालयके समक्ष अपील, ३२८}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ए'''}}
{{outdent|एडलेस्टीन, ३८८}}
{{outdent|एडेम्स, डॉ॰, १३२; -द्वारा भारतीयोंको लापरवाहीकी आलोचना, ४४१}}
{{outdent|ऍम्टहिल, लॉर्ड, २७, ४६, १९६, २८४, ३६३, ४४९, ५०१, ५०२; -की दक्षिण आफ्रिकाके भारतीयोंको कानूनी राहत दिलानेके सम्बन्धमें चिन्ता, ४९२-९३; -द्वारा अस्थायी समझौतेका ठीक अमल न होनेके सम्बन्धमें लॉर्डसभामें आक्षेप, २८३-८४; -द्वारा गोखलेकी दक्षिण आफ्रिका यात्राकी सफलताके सम्बन्धमें लॉर्डसभामें पृच्छा, ४९२, ४९५-९६, ५०१}}
{{outdent|एमॉट, लॉर्ड, २०८ '''पा॰ टि॰,''' ४९२, ५०१-२; -द्वारा भारतीय हितोंकी उपेक्षा, ४९५}}
{{outdent|'''एरियल,''' २७४}}
{{outdent|एलिन्सन, डॉ; -द्वारा मेंदे और बिना छने आटेके प्रयोग, ४९८}}
{{outdent|एलिस, ३४२ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|एल्फिंस्टन कॉलेज, ३०४}}
{{outdent|एविर, ३}}
{{outdent|एस्क्विथ, ३३५, ३४६}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ऐ'''}}
{{outdent|'''ऐंजी,''' १३३}}
{{outdent|ऐंडर्सन, कैम्बेल, १२, ३६}}
{{outdent|ऐंड्र्यूज, ३३७}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
jnbai9e976o91p8wrn3phrnqqtnmunt
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६५५
250
184251
671559
640123
2026-08-18T13:13:26Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित नहीं */ किया
671559
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|६१७}}
{{Multicol}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ओ'''}}
{{outdent|ओट्स (श्रीयुत), ३३६}}
{{outdent|ओल्ड मैन्स होप, ३१० पा॰ टि॰}}
{{gap|8em}}{{larger|'''क'''}}
{{outdent|कजिन्स, ३२५, ४०१, ४०८, ४२८ पा॰ टि॰; -का कठोर शासन, ३१२; -का फरमान भारतीय स्त्रियोंके लिए अपमानजनक, २७४-७६, २७८-७९; -के फरमानकी नेटाल मर्क्युरी द्वारा तीव्र भर्त्सना, ४२९ पा॰ टि॰; -के फरमानके बारेमें श्री लॉटनका नेटाल मर्क्युरीको पत्र, ३२४-२५; -के फरमानके विरुद्ध नेटाल भारतीय कांग्रेसका विरोध, २७९; -द्वारा अपना पद श्री हैरी स्मिथको सौंपना, ४२९; - द्वारा केपके प्रवास-सम्बन्धी मामलोंमें नाजायज दखल, ३२४}}
{{outdent|कड़ोदिया, ए॰ ए॰, १३८}}
{{outdent|कन्हैयालाल, ३९६}}
{{outdent|कमरुद्दीन मुहम्मद कासिम, ३४८}}
{{outdent|करण घेलो, ९३}}
{{outdent|करसनजी भीखूभाई, २७०}}
{{outdent|कर्जन, लॉर्ड, ३३७, ४७९; -को बोथाका आश्वासन कि दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयोंके साथ न्याय और उदारताका व्यवहार किया जायगा, २८४ पा॰ टि॰; -द्वारा श्री गोखलेकी सराहना, ३०५; -द्वारा प्राच्य देशोंकी नैतिकताकी अनुचित टीका, २७३}}
{{outdent|कलकत्ता हाइकोर्ट, १११ पा॰ टि॰}}
{{outdent|कस्बा-संशोधन अधिनियम (टाउन-शिप अमेन्डमेंट ऐक्ट), १९०७-९, ६२, १३८, २८४; स्वर्ण-कानूनके साथ लागू होनेसे खनिज क्षेत्रोंमें भारतीयोंको खतरा, ५४, १०२, २०१, वर्गविभेदकारक विधान, २८६-८७; -के सम्बन्धमें पोलकका कार्य, ३१४ पा॰ टि॰; -के सम्बन्धमें ब्रि॰ भा॰ संघका प्रार्थना पत्र, ५३-५४, ५८; -के संबंधमें लॉर्ड लॅमिंग्टनका लॉर्ड सभामें प्रश्न, १९६-९७; -को संघ सरकार केवल भारतीय-विरोधी नहीं मानती, २८६}}
{{outdent|काह, आह; को बाड़ेसे निकालनेके लिए फ्रीडडॉर्प नगरपालिकाका मुकदमा, ४९७}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|काह, चोंग आह, ८३}}
{{outdent|काछलिया, अ॰ मु॰, १३, १४, १६, २४, ३६, ४७, ५०, ५५, ५७, ५८, ६१, ८८, ९२, ९९, १०१-०२, १०३, १२७, १३०, १३७, १३८, २०९, २१९, २६९, ३०७, से ३०९ पा॰ टि॰, ३३५ पा॰ टि॰, ३३९, ३७२, ३७४, ३८१, ३८४, ३९८, ४०८, ४७४, ४७६}}
{{outdent|काठियावाड़; -में भीषण अकाल, १७८}}
{{outdent|कादिर, अब्दुल, ३७९}}
{{outdent|कादिर; एन, ३७०}}
{{outdent|कादिर एन॰ एन॰, ३६२, ३६६}}
{{outdent|कानजी, ३९५, ३९७, ३९९, ४०३, ४०७}}
{{outdent|कानजी, रामजी, ३९५}}
{{outdent|काना, ४०६}}
{{outdent|कॉफी; -से हानियाँ, ४७९}}
{{outdent|कामे, ५७}}
{{outdent|कारपेंटर, ७५}}
{{outdent|कार्टराइट, अलबर्ट, २३ पा॰ टि॰, ९८ पा॰ टि॰, ९९ पा॰ टि॰, १८८}}
{{outdent|कार्टर, जस्टिस; -द्वारा भारतीयोंकी अपमानास्पद टीका, ३१६-१७}}
{{outdent|कॉर्डिंज, जॉन एच॰, ६१, ६४, १५०, १८५; -द्वारा फीनिक्सके न्यासपत्रपर सही, ३१८ पा॰ टि॰}}
{{outdent|कार्लाइल, १३०, २५३}}
{{outdent|कालिकासिंह, ३६७}}
{{outdent|कालिदास, ३९६, ४०३, ४०६}}
{{outdent|काव्यदोहन, ८३, १४७}}
{{outdent|काश्मीर महाराजा, ४२०}}
{{outdent|कासम, ३६८}}
{{outdent|कासम, नाथू, ३८९}}
{{outdent|कॉसवेल, डॉ॰; -के मतसे वैद्यकीय पेशेको नाबूद कर देनेसे अपार लाभ, ४३१}}
{{outdent|कासिम, इब्राहीम मुहम्मद, ४९५}}
{{outdent|कासू, सुलेमान, ३८१}}
{{outdent|किंग्ज फोर्ड, डॉ॰; की मांसाहारके सम्बन्धमें राय, ५०७}}
{{outdent|किचनर, लॉर्ड, २७४ पा॰ टि॰}}
{{outdent|किचिन, ३८१}}
{{outdent|किम, हो, ८३}}
{{outdent|किम्बरले; -में गोखलेके सम्मानमें सभा, ३३४-३५; -में गोखलेको प्रीतिभोज, ३३५-३७, ४०५}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
a4pt3lkhhvq037ixa6b7albjqrc9hxb
671561
671559
2026-08-18T13:19:37Z
AMAN KUMAR
6475
Bolding edit
671561
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="रेखा साव" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|६१७}}
{{Multicol}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ओ'''}}
{{outdent|ओट्स (श्रीयुत), ३३६}}
{{outdent|'''ओल्ड मैन्स होप,''' ३१० '''पा॰ टि॰'''}}
{{gap|6em}}{{larger|'''क'''}}
{{outdent|कजिन्स, ३२५, ४०१, ४०८, ४२८ '''पा॰ टि॰;''' -का कठोर शासन, ३१२; -का फरमान भारतीय स्त्रियोंके लिए अपमानजनक, २७४-७६, २७८-७९; -के फरमानकी '''नेटाल मर्क्युरी''' द्वारा तीव्र भर्त्सना, ४२९ '''पा॰ टि॰;''' -के फरमानके बारेमें श्री लॉटनका '''नेटाल मर्क्युरी'''को पत्र, ३२४-२५; -के फरमानके विरुद्ध नेटाल भारतीय कांग्रेसका विरोध, २७९; -द्वारा अपना पद श्री हैरी स्मिथको सौंपना, ४२९; - द्वारा केपके प्रवास-सम्बन्धी मामलोंमें नाजायज दखल, ३२४}}
{{outdent|कड़ोदिया, ए॰ ए॰, १३८}}
{{outdent|कन्हैयालाल, ३९६}}
{{outdent|कमरुद्दीन मुहम्मद कासिम, ३४८}}
{{outdent|'''करण घेलो,''' ९३}}
{{outdent|करसनजी भीखूभाई, २७०}}
{{outdent|कर्जन, लॉर्ड, ३३७, ४७९; -को बोथाका आश्वासन कि दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयोंके साथ न्याय और उदारताका व्यवहार किया जायगा, २८४ '''पा॰ टि॰;''' -द्वारा श्री गोखलेकी सराहना, ३०५; -द्वारा प्राच्य देशोंकी नैतिकताकी अनुचित टीका, २७३}}
{{outdent|कलकत्ता हाइकोर्ट, १११ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|कस्बा-संशोधन अधिनियम (टाउन-शिप अमेन्डमेंट ऐक्ट), १९०७-९, ६२, १३८, २८४; स्वर्ण-कानूनके साथ लागू होनेसे खनिज क्षेत्रोंमें भारतीयोंको खतरा, ५४, १०२, २०१, वर्गविभेदकारक विधान, २८६-८७; -के सम्बन्धमें पोलकका कार्य, ३१४ '''पा॰ टि॰;''' -के सम्बन्धमें ब्रि॰ भा॰ संघका प्रार्थना पत्र, ५३-५४, ५८; -के संबंधमें लॉर्ड लॅमिंग्टनका लॉर्ड सभामें प्रश्न, १९६-९७; -को संघ सरकार केवल भारतीय-विरोधी नहीं मानती, २८६}}
{{outdent|काह, आह; को बाड़ेसे निकालनेके लिए फ्रीडडॉर्प नगरपालिकाका मुकदमा, ४९७}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|काह, चोंग आह, ८३}}
{{outdent|काछलिया, अ॰ मु॰, १३, १४, १६, २४, ३६, ४७, ५०, ५५, ५७, ५८, ६१, ८८, ९२, ९९, १०१-०२, १०३, १२७, १३०, १३७, १३८, २०९, २१९, २६९, ३०७, से ३०९ '''पा॰ टि॰,''' ३३५ '''पा॰ टि॰,''' ३३९, ३७२, ३७४, ३८१, ३८४, ३९८, ४०८, ४७४, ४७६}}
{{outdent|काठियावाड़; -में भीषण अकाल, १७८}}
{{outdent|कादिर, अब्दुल, ३७९}}
{{outdent|कादिर; एन, ३७०}}
{{outdent|कादिर एन॰ एन॰, ३६२, ३६६}}
{{outdent|कानजी, ३९५, ३९७, ३९९, ४०३, ४०७}}
{{outdent|कानजी, रामजी, ३९५}}
{{outdent|काना, ४०६}}
{{outdent|कॉफी; -से हानियाँ, ४७९}}
{{outdent|कामे, ५७}}
{{outdent|कारपेंटर, ७५}}
{{outdent|कार्टराइट, अलबर्ट, २३ '''पा॰ टि॰,''' ९८ '''पा॰ टि॰,''' ९९ '''पा॰ टि॰,''' १८८}}
{{outdent|कार्टर, जस्टिस; -द्वारा भारतीयोंकी अपमानास्पद टीका, ३१६-१७}}
{{outdent|कॉर्डिंज, जॉन एच॰, ६१, ६४, १५०, १८५; -द्वारा फीनिक्सके न्यासपत्रपर सही, ३१८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|कार्लाइल, १३०, २५३}}
{{outdent|कालिकासिंह, ३६७}}
{{outdent|कालिदास, ३९६, ४०३, ४०६}}
{{outdent|'''काव्यदोहन''', ८३, १४७}}
{{outdent|काश्मीर महाराजा, ४२०}}
{{outdent|कासम, ३६८}}
{{outdent|कासम, नाथू, ३८९}}
{{outdent|कॉसवेल, डॉ॰; -के मतसे वैद्यकीय पेशेको नाबूद कर देनेसे अपार लाभ, ४३१}}
{{outdent|कासिम, इब्राहीम मुहम्मद, ४९५}}
{{outdent|कासू, सुलेमान, ३८१}}
{{outdent|किंग्ज फोर्ड, डॉ॰; की मांसाहारके सम्बन्धमें राय, ५०७}}
{{outdent|किचनर, लॉर्ड, २७४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|किचिन, ३८१}}
{{outdent|किम, हो, ८३}}
{{outdent|किम्बरले; -में गोखलेके सम्मानमें सभा, ३३४-३५; -में गोखलेको प्रीतिभोज, ३३५-३७, ४०५}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
igrygjj008kw8sp6wn0f86dnje7mf1m
671648
671561
2026-08-18T17:17:48Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671648
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|६१७}}
{{Multicol}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ओ'''}}
{{outdent|ओट्स (श्रीयुत्), ३३६}}
{{outdent|'''ओल्ड मैन्स होप,''' ३१० '''पा॰ टि॰'''}}
{{gap|6em}}{{larger|'''क'''}}
{{outdent|कजिन्स, ३२५, ४०१, ४०८, ४२८ '''पा॰ टि॰;''' -का कठोर शासन, ३१२; -का फरमान भारतीय स्त्रियोंके लिए अपमानजनक, २७४-७६, २७८-७९; -के फरमानकी '''नेटाल मर्क्युरी''' द्वारा तीव्र भर्त्सना, ४२९ '''पा॰ टि॰;''' -के फरमानके बारेमें श्री लॉटनका '''नेटाल मर्क्युरी'''को पत्र, ३२४-२५; -के फरमानके विरुद्ध नेटाल भारतीय कांग्रेसका विरोध, २७९; -द्वारा अपना पद श्री हैरी स्मिथको सौंपना, ४२९; - द्वारा केपके प्रवास-सम्बन्धी मामलोंमें नाजायज दखल, ३२४}}
{{outdent|कड़ोदिया, ए॰ ए॰, १३८}}
{{outdent|कन्हैयालाल, ३९६}}
{{outdent|कमरुद्दीन मुहम्मद कासिम, ३४८}}
{{outdent|'''करण घेलो,''' ९३}}
{{outdent|करसनजी भीखूभाई, २७०}}
{{outdent|कर्जन, लॉर्ड, ३३७, ४७९; -को बोथाका आश्वासन कि दक्षिण आफ्रिकामें भारतीयोंके साथ न्याय और उदारताका व्यवहार किया जायगा, २८४ '''पा॰ टि॰;''' -द्वारा श्री गोखलेकी सराहना, ३०५; -द्वारा प्राच्य देशोंकी नैतिकताकी अनुचित टीका, २७३}}
{{outdent|कलकत्ता हाइकोर्ट, १११ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|कस्बा-संशोधन अधिनियम (टाउन-शिप अमेन्डमेंट ऐक्ट), १९०७-९, ६२, १३८, २८४; स्वर्ण-कानूनके साथ लागू होनेसे खनिज क्षेत्रोंमें भारतीयोंको खतरा, ५४, १०२, २०१, वर्गविभेदकारक विधान, २८६-८७; -के सम्बन्धमें पोलकका कार्य, ३१४ '''पा॰ टि॰;''' -के सम्बन्धमें ब्रि॰ भा॰ संघका प्रार्थना पत्र, ५३-५४, ५८; -के संबंधमें लॉर्ड लॅमिंग्टनका लॉर्ड सभामें प्रश्न, १९६-९७; -को संघ सरकार केवल भारतीय-विरोधी नहीं मानती, २८६}}
{{outdent|काह, आह; को बाड़ेसे निकालनेके लिए फ्रीडडॉर्प नगरपालिकाका मुकदमा, ४९७}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|काह, चोंग आह, ८३}}
{{outdent|काछलिया, अ॰ मु॰, १३, १४, १६, २४, ३६, ४७, ५०, ५५, ५७, ५८, ६१, ८८, ९२, ९९, १०१-०२, १०३, १२७, १३०, १३७, १३८, २०९, २१९, २६९, ३०७, से ३०९ '''पा॰ टि॰,''' ३३५ '''पा॰ टि॰,''' ३३९, ३७२, ३७४, ३८१, ३८४, ३९८, ४०८, ४७४, ४७६}}
{{outdent|काठियावाड़; -में भीषण अकाल, १७८}}
{{outdent|कादिर, अब्दुल, ३७९}}
{{outdent|कादिर; एन, ३७०}}
{{outdent|कादिर एन॰ एन॰, ३६२, ३६६}}
{{outdent|कानजी, ३९५, ३९७, ३९९, ४०३, ४०७}}
{{outdent|कानजी, रामजी, ३९५}}
{{outdent|काना, ४०६}}
{{outdent|कॉफी; -से हानियाँ, ४७९}}
{{outdent|कामे, ५७}}
{{outdent|कारपेंटर, ७५}}
{{outdent|कार्टराइट, अलबर्ट, २३ '''पा॰ टि॰,''' ९८ '''पा॰ टि॰,''' ९९ '''पा॰ टि॰,''' १८८}}
{{outdent|कार्टर, जस्टिस; -द्वारा भारतीयोंकी अपमानास्पद टीका, ३१६-१७}}
{{outdent|कॉर्डिंज, जॉन एच॰, ६१, ६४, १५०, १८५; -द्वारा फीनिक्सके न्यासपत्रपर सही, ३१८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|कार्लाइल, १३०, २५३}}
{{outdent|कालिकासिंह, ३६७}}
{{outdent|कालिदास, ३९६, ४०३, ४०६}}
{{outdent|'''काव्यदोहन''', ८३, १४७}}
{{outdent|काश्मीर महाराजा, ४२०}}
{{outdent|कासम, ३६८}}
{{outdent|कासम, नाथू, ३८९}}
{{outdent|कॉसवेल, डॉ॰; -के मतसे वैद्यकीय पेशेको नाबूद कर देनेसे अपार लाभ, ४३१}}
{{outdent|कासिम, इब्राहीम मुहम्मद, ४९५}}
{{outdent|कासू, सुलेमान, ३८१}}
{{outdent|किंग्ज फोर्ड, डॉ॰; की मांसाहारके सम्बन्धमें राय, ५०७}}
{{outdent|किचनर, लॉर्ड, २७४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|किचिन, ३८१}}
{{outdent|किम, हो, ८३}}
{{outdent|किम्बरले; -में गोखलेके सम्मानमें सभा, ३३४-३५; -में गोखलेको प्रीतिभोज, ३३५-३७, ४०५}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
9ujy8sgkezuqkqc6q0jttlzx5oz7tgg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६५६
250
184252
671658
640124
2026-08-18T17:44:10Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671658
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
{{outdent|'''की,''' ६४}}
{{outdent|कुंवरजी, ३८६}}
{{outdent|कुनके, मुहम्मद इब्राहीम, ३७१, ४१४}}
{{outdent|कुवाड़िया, ५६, ३९६}}
{{outdent|कुवाड़िया, इब्राहीम सालेजी, १३८, ३०९ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|कुवाड़िया, मुहम्मद कासिम, २७१}}
{{outdent|कूपर, सर ऐशले; -का कथन कि वैद्यक शास्त्र अटकल-बाजीपर रचा शास्त्र है, ४३१}}
{{outdent|'''कूरलैंड,''' एस॰ एस॰, २१६}}
{{outdent|'''केनिलवर्थ कैसिल,''' एस॰ एस॰, १९६ '''पा॰ टि॰,''' २९४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|केनेडी, ३६५, ३७७}}
{{outdent|केशवजी, वेलशी, ३६५, ३६८-६९, ३७५}}
{{outdent|केशवलु, डेविड, ३६३, ३७४}}
{{outdent|'''कैरिस ब्रूक,''' एस॰ एस॰, २३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|कैलेनबैक, हरमान, १५ '''पा॰ टि॰,''' ३४, ४३, ५६, ५७, ६४, ८१, १२५, १४७, १७१, २४६, ३३१, ३३५ '''पा॰ टि॰,''' ३४८, ३५१, ३५४, ३५६, ३५७, ३६५ से ४०८, ४११ से १५, ४५८, ४८४; -फीनिक्सके एक न्यासी, ३१८; -का सम्मान, १२९-३१; -की सत्याग्रहियोंके उपयोगके लिए टॉल्स्टाय फार्म देनेकी उदारता, १२७-३१; -को ब्रिटिश भारतीय संघ द्वारा मानपत्र, १२६-२७}}
{{outdent|कोको; -से हानियाँ ४७९}}
{{outdent|कोटवाल, २९९, ३१०, ३१३, ३८४-८७, ३९२-९६ ३९८-४००, ४०३, ४०५, ४०७, ४०८, ४१४, ४५७, ४८३, ४८४}}
{{outdent|कोतवाल, ई॰, ३८३}}
{{outdent|कौल, जी॰ एस॰, ३६३, ३६९, ३७७, ३७८, ३७९, ३८३, ३८५, ३८६, ३८७, ३९६}}
{{outdent|(श्री) कृष्ण, १५१, १९५; परमात्मा, १५१}}
{{outdent|कृष्णा, ३५३, ३५४}}
{{outdent|कृष्णास्वामी, १५१, ३६९, ३७१, ३७९, ३८२, ३९०, ३९३, ३९९, ४१४}}
{{outdent|'''क्रॉन प्रिंज़,''' आर॰ पी॰ डी॰, ३५०, ४१२}}
{{outdent|क्रूगर १०९}}
{{outdent|क्रूगर्स डॉर्प; -में गोखलेको मानपत्र, ४०९; -में नगर-पालिका द्वारा भारतीय बस्तियोंको उठा देनेका प्रयत्न, ११४-१५; -में बस्तियाँ न छोड़नेकी}}
{{Multicol-break}}
: भारतीयोंको सलाह, ११६, १३६; -में भारतीय व्यापारियोंके खिलाफ आन्दोलन करनेके लिए गोरोंकी सभा, ९६; -में भारतीयोंसे बाड़े खाली करनेका रिचको नोटिस, १३६; -में स्वर्ण कानून-का प्रतिकार करवानेका ब्रि॰ भा॰ संघका निर्णय, १३७-३८
{{outdent|क्रू, कर्नल, १२}}
{{outdent|क्रू, मार्क्विस, ५, २९५ '''पा॰ टि॰'''३४१}}
{{outdent|क्रेसेवेल, ३४०, '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|क्लार्क्स डॉर्प, -में गोखलेको मानपत्र, ४०९; -में स्वर्ण-कानून और कस्बा-कानूनके कारण भारतीयों-का बाड़ा-स्वामित्व खतरेमें, ५३-५४, १३६; -में स्वर्ण-कानूनके अन्तर्गत भारतीयोंके साथ ज्यादती होनेपर सत्याग्रह, ११; -में स्वर्ण-कानूनके अन्तर्गत भारतीयोंको बाड़े खाली करनेका नोटिस, ४}}
{{outdent|क्लेटन, १६५}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ख'''}}
{{outdent|खंडेरिया, ३६५, ३९५}}
{{outdent|'''खदीब,''' एस॰ एस॰, २१६}}
{{outdent|खान, ३९४, ३९६, ४०१}}
{{outdent|खान, अहमद, १३८}}
{{outdent|खान, डी॰ एम॰, ३७९}}
{{outdent|खारवा, ३९३}}
{{outdent|खुशालभाई, ३९५}}
{{outdent|खोटा, ६३}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ग'''}}
{{outdent|गंगोत, ३६८}}
{{outdent|गजाधर, ३७३}}
{{outdent|गज्जर, ३९४, ४१४, ४१५, ४२८ '''पा॰ टि॰,''' ४२९}}
{{outdent|गबो, ४१४}}
{{outdent|गरीबी; (संपूर्ण), द्वारा ही आत्माकी प्राप्ति शक्य, १४५; -का अर्थ व महत्त्व, १५१; -का स्वीकार फीनिक्समें आवश्यक, १८७}}
{{outdent|गांडाभाई, ३७१}}
{{outdent|गांधी, अमेचन्द, २४४, ३६४, ३६८, ३७०, ३७५, ३९०, ३९७, ४०३, ४०४, ४०७, ४८९}}
{{outdent|गांधी, अमृतलाल, २४४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
7altlwzlxcawp4dlzv8yvdr5dmtwa0c
671659
671658
2026-08-18T17:44:55Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
671659
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
{{outdent|'''की,''' ६४}}
{{outdent|कुंवरजी, ३८६}}
{{outdent|कुनके, मुहम्मद इब्राहीम, ३७१, ४१४}}
{{outdent|कुवाड़िया, ५६, ३९६}}
{{outdent|कुवाड़िया, इब्राहीम सालेजी, १३८, ३०९ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|कुवाड़िया, मुहम्मद कासिम, २७१}}
{{outdent|कूपर, सर ऐशले; -का कथन कि वैद्यक शास्त्र अटकल-बाजीपर रचा शास्त्र है, ४३१}}
{{outdent|'''कूरलैंड,''' एस॰ एस॰, २१६}}
{{outdent|'''केनिलवर्थ कैसिल,''' एस॰ एस॰, १९६ '''पा॰ टि॰,''' २९४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|केनेडी, ३६५, ३७७}}
{{outdent|केशवजी, वेलशी, ३६५, ३६८-६९, ३७५}}
{{outdent|केशवलु, डेविड, ३६३, ३७४}}
{{outdent|'''कैरिस ब्रूक,''' एस॰ एस॰, २३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|कैलेनबैक, हरमान, १५ '''पा॰ टि॰,''' ३४, ४३, ५६, ५७, ६४, ८१, १२५, १४७, १७१, २४६, ३३१, ३३५ '''पा॰ टि॰,''' ३४८, ३५१, ३५४, ३५६, ३५७, ३६५ से ४०८, ४११ से १५, ४५८, ४८४; -फीनिक्सके एक न्यासी, ३१८; -का सम्मान, १२९-३१; -की सत्याग्रहियोंके उपयोगके लिए टॉल्स्टाय फार्म देनेकी उदारता, १२७-३१; -को ब्रिटिश भारतीय संघ द्वारा मानपत्र, १२६-२७}}
{{outdent|कोको; -से हानियाँ ४७९}}
{{outdent|कोटवाल, २९९, ३१०, ३१३, ३८४-८७, ३९२-९६ ३९८-४००, ४०३, ४०५, ४०७, ४०८, ४१४, ४५७, ४८३, ४८४}}
{{outdent|कोतवाल, ई॰, ३८३}}
{{outdent|कौल, जी॰ एस॰, ३६३, ३६९, ३७७, ३७८, ३७९, ३८३, ३८५, ३८६, ३८७, ३९६}}
{{outdent|(श्री) कृष्ण, १५१, १९५; परमात्मा, १५१}}
{{outdent|कृष्णा, ३५३, ३५४}}
{{outdent|कृष्णास्वामी, १५१, ३६९, ३७१, ३७९, ३८२, ३९०, ३९३, ३९९, ४१४}}
{{outdent|'''क्रॉन प्रिंज़,''' आर॰ पी॰ डी॰, ३५०, ४१२}}
{{outdent|क्रूगर १०९}}
{{outdent|क्रूगर्स डॉर्प; -में गोखलेको मानपत्र, ४०९; -में नगर-पालिका द्वारा भारतीय बस्तियोंको उठा देनेका प्रयत्न, ११४-१५; -में बस्तियाँ न छोड़नेकी}}
{{Multicol-break}}
: भारतीयोंको सलाह, ११६, १३६; -में भारतीय व्यापारियोंके खिलाफ आन्दोलन करनेके लिए गोरोंकी सभा, ९६; -में भारतीयोंसे बाड़े खाली करनेका रिचको नोटिस, १३६; -में स्वर्ण कानून-का प्रतिकार करवानेका ब्रि॰ भा॰ संघका निर्णय, १३७-३८
{{outdent|क्रू, कर्नल, १२}}
{{outdent|क्रू, मार्क्विस, ५, २९५ '''पा॰ टि॰'''३४१}}
{{outdent|क्रेसेवेल, ३४०, '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|क्लार्क्स डॉर्प, -में गोखलेको मानपत्र, ४०९; -में स्वर्ण-कानून और कस्बा-कानूनके कारण भारतीयों-का बाड़ा-स्वामित्व खतरेमें, ५३-५४, १३६; -में स्वर्ण-कानूनके अन्तर्गत भारतीयोंके साथ ज्यादती होनेपर सत्याग्रह, ११; -में स्वर्ण-कानूनके अन्तर्गत भारतीयोंको बाड़े खाली करनेका नोटिस, ४}}
{{outdent|क्लेटन, १६५}}
{{gap|7em}}{{larger|'''ख'''}}
{{outdent|खंडेरिया, ३६५, ३९५}}
{{outdent|'''खदीब,''' एस॰ एस॰, २१६}}
{{outdent|खान, ३९४, ३९६, ४०१}}
{{outdent|खान, अहमद, १३८}}
{{outdent|खान, डी॰ एम॰, ३७९}}
{{outdent|खारवा, ३९३}}
{{outdent|खुशालभाई, ३९५}}
{{outdent|खोटा, ६३}}
{{gap|5em}}{{larger|'''ग'''}}
{{outdent|गंगोत, ३६८}}
{{outdent|गजाधर, ३७३}}
{{outdent|गज्जर, ३९४, ४१४, ४१५, ४२८ '''पा॰ टि॰,''' ४२९}}
{{outdent|गबो, ४१४}}
{{outdent|गरीबी; (संपूर्ण), द्वारा ही आत्माकी प्राप्ति शक्य, १४५; -का अर्थ व महत्त्व, १५१; -का स्वीकार फीनिक्समें आवश्यक, १८७}}
{{outdent|गांडाभाई, ३७१}}
{{outdent|गांधी, अमेचन्द, २४४, ३६४, ३६८, ३७०, ३७५, ३९०, ३९७, ४०३, ४०४, ४०७, ४८९}}
{{outdent|गांधी, अमृतलाल, २४४ '''पा॰ टि॰'''}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
kefeo1hc03nvedrwmx646zoc6oxbqyp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६५७
250
184253
671664
640125
2026-08-18T17:57:47Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671664
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|गांधी, आनन्दलाल, १००, १२३, १३७, १५०, १८६ '''पा॰ टि॰,''' १८७, ३६६, ३६८, ३७७, ३८३, ३८४, ३८६, ३८७, ३९०, ३९३, ४०१, ४०६, ४०७, ४१४, ४८२; -द्वारा छः महीनेके लिए बीड़ी पीना छोड़नेका प्रण, ४०१}}
{{outdent|गांधी, करसनदास, ३०९, ३८०}}
{{outdent|गांधी, कस्तूरबा, ७३, ७६, १२५, १५२, २३४, २३५, २४८, २५६, २९८ '''पा॰ टि॰,''' ३१०, ३१३, ३७५, ३८५, ३८७, ३९०, ३९५, ३९८, ४००, ४०३ से ४०६, ४८१-८२, ५०५; -की बीमारी २९८; -को तथा उनके दो नाबालिग बच्चोंके लिए गांधीजीकी मृत्युके बाद दो एकड़ जमीन तथा ५ पौंड मासिककी फीनिक्सके न्यास-पत्रमें व्यवस्था, ३२१}}
{{outdent|गांधी, कान्ति, २३३-३४, २९३}}
{{outdent|गांधी, काशी, ४४५}}
{{outdent|गांधी, कृष्णा, ४१४}}
{{outdent|गांधी, खुशालचन्द, ७३, १२८, ३८०, ३९५, ५०८}}
{{outdent|गांधी, गोकुलदास, ६४, २९८, ३०९, ३६३, ३७९, ३९८, ३९९}}
{{outdent|गांधी, चंचल बहन, ११४, १२४-२५, २३३-३५, २९२, ३१०, ३१४, ३३०, ३६९, ४४६, ४८१; -को बच्चोंके लिए विदेशी खाद्यका प्रयोग न करनेकी गांधीजीकी सलाह, २३३-३४}}
{{outdent|गांधी, छगनलाल, १, ३४, ७३, ७६, ११३, ११८, १२२ '''पा॰ टि॰,''' १२३-२४, १२७, १४४, १४९ '''पा॰ टि॰,''' १५६, १९४, २४४, २५५, २५६ '''पा॰ टि॰,''' २९८, ३१८ '''पा॰ टि॰,''' ३५२, ३६०, ३६२-६८, ३७३-७५, ३७९-९१, ३९३-९७, ३९९, ४०३, ४०५-०७, ४१४, ४८२}}
{{outdent|गांधी, जमनादास, १२३, १२७, १४८, २३४, २५३, २५६, २९३, २९९, ३४९, ३५२, ३६८, ३७२, ३७३, ३८०, ३८२-८६, ३९१, ३९३-९६, ४००, ४०५, ४०७; -को गांधीजी द्वारा खुराकके प्रयोगोंके बारेमें सलाह, ३५३-५४, ४८३, ५०८-१०; -को गांधीजी द्वारा पोशाकके बारेमें सलाह, ४८४}}
{{outdent|गांधी, देवदास, २९३, ३१०, ३२१, ३८४, ३९०, ४००, ४०३, ४८२}}
{{outdent|गांधी, द्वारकादास, ४१४}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|गांधी, नारणदास, १४५, ३८७, ३८९, ३९०}}
{{outdent|गांधी, प्रभुदास, ४१४}}
{{outdent|गांधी, मगनलाल, ६७, ७३, ७५-७७, १००, ११८, १२२-२४, १४४-४५, १५०-५२, २४४, २५६-५७, ३१८ '''पा॰ टि॰,''' ३४८, ३६३-६४, ३६६, ३६८, ३७१, ३७५, ३८१, ३८७-८८, ४८२}}
{{outdent|गांधी, मणिलाल, ७२, ७७, ११४, १२५, १२६, १८४, १८६, २३४, २४४, २५२-५३, २५४-५५, २९३, ३१३, ३६२, ३६४, ३६५, ३६७, ३६८, ३७० से ७३, ३७६-७७, ३७९-८०, ३८३-८७, ३८९-९०, ३९२-९३, ३९५-९६, ४०४, ४३३, ४४६, ४८२, ५१०}}
{{outdent|गांधी मेघजीभाई, ३९५}}
{{outdent|गांधी मोहनदास करमचन्द; और कलकत्ता कांग्रेसकी अध्यक्षता, १५७, १५९, १६१, १६४, १६७, १७१-७३, १७८, १८०, १९१; -का टॉल्स्टॉय फार्मकी पाठशालामें ध्यान, ११४, १२६, १२८, १३४, १४७, ४४५-४६; -का फीनिक्समें दैनिक कार्यक्रम, ४४५-४६; -का बुनाई और खेती द्वारा जीवन-यापनका विचार ६७; -का सुझाव कि प्रवासी अधिनियमके बजाय ट्रान्सवाल प्रवासी प्रतिबन्धक कानूनमें सुधार विशेष हितकर, ९-१०, १३-१५; -का सुझाव कि शिष्टमंडलमें एक मुसलमान प्रतिनिधि उनके साथ इंग्लैंड जाये, १६, २४; -की जमनादास गांधीको भोजनके सम्बन्धमें सलाह, ३५२-५४, ४८३, ५०८-१०; -की डेलागोवाबेमें रोक, ३५८-६०; -की बच्चोंको विदेशी खुराक न देनेकी सलाह, २३७; -के गोखले राजनैतिक गुरु, ३३६; -को मानपत्र दारेसलाममें ४१५; -को शाही परिषदके लिए इंग्लैंड जानेका सुझाव, २६-२७; -द्वारा अलोने भोजनके प्रयोग, १२५, १४५, १४९, १५१-५२, १६४; -द्वारा गोखलेकी द० आफ्रिका-यात्राके सम्बन्धमें पत्रकारोंके प्रश्नोंका जवाब, ३३२, ३४०-४१; -द्वारा नेटालके प्रवासी अधिकारीकी कड़ी टीका ३२५, ३२९; -द्वारा प्राकृतिक चिकित्साकी सलाह, ३५१, ३५२-५४; -द्वारा फलोंके प्रयोग, ४०५, ४८९-९१; -द्वारा फीनिक्सका स्वामित्व न्यासियोंके सुपुर्द, ३१८-२३; -द्वारा बच्चियोंका केशवपन, ४०५; -द्वारा भारतीय पोशाक पहनना, ४१२;}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
1anib16fq8g8bp8k6epdeszbeq0hgv9
671667
671664
2026-08-18T17:59:39Z
AMAN KUMAR
6475
शीर्षक +
671667
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|सांकेतिका|६१९}}
{{Multicol}}
{{outdent|गांधी, आनन्दलाल, १००, १२३, १३७, १५०, १८६ '''पा॰ टि॰,''' १८७, ३६६, ३६८, ३७७, ३८३, ३८४, ३८६, ३८७, ३९०, ३९३, ४०१, ४०६, ४०७, ४१४, ४८२; -द्वारा छः महीनेके लिए बीड़ी पीना छोड़नेका प्रण, ४०१}}
{{outdent|गांधी, करसनदास, ३०९, ३८०}}
{{outdent|गांधी, कस्तूरबा, ७३, ७६, १२५, १५२, २३४, २३५, २४८, २५६, २९८ '''पा॰ टि॰,''' ३१०, ३१३, ३७५, ३८५, ३८७, ३९०, ३९५, ३९८, ४००, ४०३ से ४०६, ४८१-८२, ५०५; -की बीमारी २९८; -को तथा उनके दो नाबालिग बच्चोंके लिए गांधीजीकी मृत्युके बाद दो एकड़ जमीन तथा ५ पौंड मासिककी फीनिक्सके न्यास-पत्रमें व्यवस्था, ३२१}}
{{outdent|गांधी, कान्ति, २३३-३४, २९३}}
{{outdent|गांधी, काशी, ४४५}}
{{outdent|गांधी, कृष्णा, ४१४}}
{{outdent|गांधी, खुशालचन्द, ७३, १२८, ३८०, ३९५, ५०८}}
{{outdent|गांधी, गोकुलदास, ६४, २९८, ३०९, ३६३, ३७९, ३९८, ३९९}}
{{outdent|गांधी, चंचल बहन, ११४, १२४-२५, २३३-३५, २९२, ३१०, ३१४, ३३०, ३६९, ४४६, ४८१; -को बच्चोंके लिए विदेशी खाद्यका प्रयोग न करनेकी गांधीजीकी सलाह, २३३-३४}}
{{outdent|गांधी, छगनलाल, १, ३४, ७३, ७६, ११३, ११८, १२२ '''पा॰ टि॰,''' १२३-२४, १२७, १४४, १४९ '''पा॰ टि॰,''' १५६, १९४, २४४, २५५, २५६ '''पा॰ टि॰,''' २९८, ३१८ '''पा॰ टि॰,''' ३५२, ३६०, ३६२-६८, ३७३-७५, ३७९-९१, ३९३-९७, ३९९, ४०३, ४०५-०७, ४१४, ४८२}}
{{outdent|गांधी, जमनादास, १२३, १२७, १४८, २३४, २५३, २५६, २९३, २९९, ३४९, ३५२, ३६८, ३७२, ३७३, ३८०, ३८२-८६, ३९१, ३९३-९६, ४००, ४०५, ४०७; -को गांधीजी द्वारा खुराकके प्रयोगोंके बारेमें सलाह, ३५३-५४, ४८३, ५०८-१०; -को गांधीजी द्वारा पोशाकके बारेमें सलाह, ४८४}}
{{outdent|गांधी, देवदास, २९३, ३१०, ३२१, ३८४, ३९०, ४००, ४०३, ४८२}}
{{outdent|गांधी, द्वारकादास, ४१४}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|गांधी, नारणदास, १४५, ३८७, ३८९, ३९०}}
{{outdent|गांधी, प्रभुदास, ४१४}}
{{outdent|गांधी, मगनलाल, ६७, ७३, ७५-७७, १००, ११८, १२२-२४, १४४-४५, १५०-५२, २४४, २५६-५७, ३१८ '''पा॰ टि॰,''' ३४८, ३६३-६४, ३६६, ३६८, ३७१, ३७५, ३८१, ३८७-८८, ४८२}}
{{outdent|गांधी, मणिलाल, ७२, ७७, ११४, १२५, १२६, १८४, १८६, २३४, २४४, २५२-५३, २५४-५५, २९३, ३१३, ३६२, ३६४, ३६५, ३६७, ३६८, ३७० से ७३, ३७६-७७, ३७९-८०, ३८३-८७, ३८९-९०, ३९२-९३, ३९५-९६, ४०४, ४३३, ४४६, ४८२, ५१०}}
{{outdent|गांधी मेघजीभाई, ३९५}}
{{outdent|गांधी मोहनदास करमचन्द; और कलकत्ता कांग्रेसकी अध्यक्षता, १५७, १५९, १६१, १६४, १६७, १७१-७३, १७८, १८०, १९१; -का टॉल्स्टॉय फार्मकी पाठशालामें ध्यान, ११४, १२६, १२८, १३४, १४७, ४४५-४६; -का फीनिक्समें दैनिक कार्यक्रम, ४४५-४६; -का बुनाई और खेती द्वारा जीवन-यापनका विचार ६७; -का सुझाव कि प्रवासी अधिनियमके बजाय ट्रान्सवाल प्रवासी प्रतिबन्धक कानूनमें सुधार विशेष हितकर, ९-१०, १३-१५; -का सुझाव कि शिष्टमंडलमें एक मुसलमान प्रतिनिधि उनके साथ इंग्लैंड जाये, १६, २४; -की जमनादास गांधीको भोजनके सम्बन्धमें सलाह, ३५२-५४, ४८३, ५०८-१०; -की डेलागोवाबेमें रोक, ३५८-६०; -की बच्चोंको विदेशी खुराक न देनेकी सलाह, २३७; -के गोखले राजनैतिक गुरु, ३३६; -को मानपत्र दारेसलाममें ४१५; -को शाही परिषदके लिए इंग्लैंड जानेका सुझाव, २६-२७; -द्वारा अलोने भोजनके प्रयोग, १२५, १४५, १४९, १५१-५२, १६४; -द्वारा गोखलेकी द० आफ्रिका-यात्राके सम्बन्धमें पत्रकारोंके प्रश्नोंका जवाब, ३३२, ३४०-४१; -द्वारा नेटालके प्रवासी अधिकारीकी कड़ी टीका ३२५, ३२९; -द्वारा प्राकृतिक चिकित्साकी सलाह, ३५१, ३५२-५४; -द्वारा फलोंके प्रयोग, ४०५, ४८९-९१; -द्वारा फीनिक्सका स्वामित्व न्यासियोंके सुपुर्द, ३१८-२३; -द्वारा बच्चियोंका केशवपन, ४०५; -द्वारा भारतीय पोशाक पहनना, ४१२;}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
7nr7mexnta26l518xyjubpzn6ahqmx0
671668
671667
2026-08-18T18:00:04Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
671668
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|६१९}}
{{Multicol}}
{{outdent|गांधी, आनन्दलाल, १००, १२३, १३७, १५०, १८६ '''पा॰ टि॰,''' १८७, ३६६, ३६८, ३७७, ३८३, ३८४, ३८६, ३८७, ३९०, ३९३, ४०१, ४०६, ४०७, ४१४, ४८२; -द्वारा छः महीनेके लिए बीड़ी पीना छोड़नेका प्रण, ४०१}}
{{outdent|गांधी, करसनदास, ३०९, ३८०}}
{{outdent|गांधी, कस्तूरबा, ७३, ७६, १२५, १५२, २३४, २३५, २४८, २५६, २९८ '''पा॰ टि॰,''' ३१०, ३१३, ३७५, ३८५, ३८७, ३९०, ३९५, ३९८, ४००, ४०३ से ४०६, ४८१-८२, ५०५; -की बीमारी २९८; -को तथा उनके दो नाबालिग बच्चोंके लिए गांधीजीकी मृत्युके बाद दो एकड़ जमीन तथा ५ पौंड मासिककी फीनिक्सके न्यास-पत्रमें व्यवस्था, ३२१}}
{{outdent|गांधी, कान्ति, २३३-३४, २९३}}
{{outdent|गांधी, काशी, ४४५}}
{{outdent|गांधी, कृष्णा, ४१४}}
{{outdent|गांधी, खुशालचन्द, ७३, १२८, ३८०, ३९५, ५०८}}
{{outdent|गांधी, गोकुलदास, ६४, २९८, ३०९, ३६३, ३७९, ३९८, ३९९}}
{{outdent|गांधी, चंचल बहन, ११४, १२४-२५, २३३-३५, २९२, ३१०, ३१४, ३३०, ३६९, ४४६, ४८१; -को बच्चोंके लिए विदेशी खाद्यका प्रयोग न करनेकी गांधीजीकी सलाह, २३३-३४}}
{{outdent|गांधी, छगनलाल, १, ३४, ७३, ७६, ११३, ११८, १२२ '''पा॰ टि॰,''' १२३-२४, १२७, १४४, १४९ '''पा॰ टि॰,''' १५६, १९४, २४४, २५५, २५६ '''पा॰ टि॰,''' २९८, ३१८ '''पा॰ टि॰,''' ३५२, ३६०, ३६२-६८, ३७३-७५, ३७९-९१, ३९३-९७, ३९९, ४०३, ४०५-०७, ४१४, ४८२}}
{{outdent|गांधी, जमनादास, १२३, १२७, १४८, २३४, २५३, २५६, २९३, २९९, ३४९, ३५२, ३६८, ३७२, ३७३, ३८०, ३८२-८६, ३९१, ३९३-९६, ४००, ४०५, ४०७; -को गांधीजी द्वारा खुराकके प्रयोगोंके बारेमें सलाह, ३५३-५४, ४८३, ५०८-१०; -को गांधीजी द्वारा पोशाकके बारेमें सलाह, ४८४}}
{{outdent|गांधी, देवदास, २९३, ३१०, ३२१, ३८४, ३९०, ४००, ४०३, ४८२}}
{{outdent|गांधी, द्वारकादास, ४१४}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|गांधी, नारणदास, १४५, ३८७, ३८९, ३९०}}
{{outdent|गांधी, प्रभुदास, ४१४}}
{{outdent|गांधी, मगनलाल, ६७, ७३, ७५-७७, १००, ११८, १२२-२४, १४४-४५, १५०-५२, २४४, २५६-५७, ३१८ '''पा॰ टि॰,''' ३४८, ३६३-६४, ३६६, ३६८, ३७१, ३७५, ३८१, ३८७-८८, ४८२}}
{{outdent|गांधी, मणिलाल, ७२, ७७, ११४, १२५, १२६, १८४, १८६, २३४, २४४, २५२-५३, २५४-५५, २९३, ३१३, ३६२, ३६४, ३६५, ३६७, ३६८, ३७० से ७३, ३७६-७७, ३७९-८०, ३८३-८७, ३८९-९०, ३९२-९३, ३९५-९६, ४०४, ४३३, ४४६, ४८२, ५१०}}
{{outdent|गांधी मेघजीभाई, ३९५}}
{{outdent|गांधी मोहनदास करमचन्द; और कलकत्ता कांग्रेसकी अध्यक्षता, १५७, १५९, १६१, १६४, १६७, १७१-७३, १७८, १८०, १९१; -का टॉल्स्टॉय फार्मकी पाठशालामें ध्यान, ११४, १२६, १२८, १३४, १४७, ४४५-४६; -का फीनिक्समें दैनिक कार्यक्रम, ४४५-४६; -का बुनाई और खेती द्वारा जीवन-यापनका विचार ६७; -का सुझाव कि प्रवासी अधिनियमके बजाय ट्रान्सवाल प्रवासी प्रतिबन्धक कानूनमें सुधार विशेष हितकर, ९-१०, १३-१५; -का सुझाव कि शिष्टमंडलमें एक मुसलमान प्रतिनिधि उनके साथ इंग्लैंड जाये, १६, २४; -की जमनादास गांधीको भोजनके सम्बन्धमें सलाह, ३५२-५४, ४८३, ५०८-१०; -की डेलागोवाबेमें रोक, ३५८-६०; -की बच्चोंको विदेशी खुराक न देनेकी सलाह, २३७; -के गोखले राजनैतिक गुरु, ३३६; -को मानपत्र दारेसलाममें ४१५; -को शाही परिषदके लिए इंग्लैंड जानेका सुझाव, २६-२७; -द्वारा अलोने भोजनके प्रयोग, १२५, १४५, १४९, १५१-५२, १६४; -द्वारा गोखलेकी द० आफ्रिका-यात्राके सम्बन्धमें पत्रकारोंके प्रश्नोंका जवाब, ३३२, ३४०-४१; -द्वारा नेटालके प्रवासी अधिकारीकी कड़ी टीका ३२५, ३२९; -द्वारा प्राकृतिक चिकित्साकी सलाह, ३५१, ३५२-५४; -द्वारा फलोंके प्रयोग, ४०५, ४८९-९१; -द्वारा फीनिक्सका स्वामित्व न्यासियोंके सुपुर्द, ३१८-२३; -द्वारा बच्चियोंका केशवपन, ४०५; -द्वारा भारतीय पोशाक पहनना, ४१२;}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
e5589cumuhuybowy63inyccns70l66v
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६५८
250
184254
671724
640126
2026-08-19T06:48:20Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671724
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय||}}
{{Multicol}}
: -द्वारा भारतीय पोशाकके बारेमें जमनादासको सलाह, ४८४; -द्वारा लॉर्ड हार्डिजपर घातक हमले और राजनीतिक हत्याओंकी भर्त्सना, ३५९-६०; -द्वारा विलायत भेजनेके लिए सोराबजीके चुनावका कारण, ३३०; -द्वारा शिक्षाके लिए छः सत्याग्रहियोंको विलायत भेजनेकी कल्पना, ६५
{{outdent|ग़ांधी रामदास, २९२, ३१०, ३१३, ३२१, ३८१, ३८३, ३९२, ३९६, ४००, ४०५, ४८२}}
{{outdent|गांधी रामीबाई, ९२, १२५, २३४, २९२, ३१४}}
{{outdent|गांधी लक्ष्मीचन्द, ३८०}}
{{outdent|गांधी, संतोक, ७७}}
{{outdent|गांधी हरिलाल, ६४, ६७, ७३, ७५-७६, ९३, ११०, ११३, १२४-२५, १२६ पा॰ टि॰, १३१, १६०, १६३, २३३, २३४, २९३, ३०९, ३१३, ३३०, ३६२, ३६५, ३६९, ३७०, ३७२, ३७९, ३९४, ४०७, ४१६, ४४५; परीक्षामें अनुत्तीर्ण, ४४५; -का मैट्रिक परीक्षा पास करनेका मोह, १४२; -को गांधीजीकी 'जैसा अच्छा लगे' रहनेकी सलाह, ४८१-८२; -को गांधीजीकी फ्रेंचके बदले संस्कृत सीखनेकी सलाह, ३१३-१४}}
{{outdent|गिब्सन, जे॰ वाय॰, २६३-६४}}
{{outdent|गिरमिटिया मजदूर, (रों) -की नेटालमें मजदूरीकी दरें कम, १७४ पा॰ टि॰; -की भारतमें भर्ती बन्द, १९६; -की हालत, २६६-६७, ३१६-१७; -के लिए गोखलेके प्रयत्न, २०४, २४२, ३०४, ३३८, ४३४, ४५४; -के लिए पोलकका कार्य, २०४, ३१५; -के सम्बन्धमें भारत सरकारका निर्णय, ९७ पा॰ टि॰, १७५}}
{{outdent|गिरमिटिया प्रथा; अनैतिक, ४३४; गुलामीकी प्रथासे मिलती-जुलती, ७२, २०३; समाप्त करनेकी माँग ४३४; -का बम्बईमें शेरिफकी सभामें विरोध २९६, -की बुराइयोंके सम्बन्धमें कु॰ डडलेका 'इंडिया' में पत्र, ४३४; -के सम्बन्धमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसमें प्रस्ताव पास होनेकी गांधीजीकी आशा १९१; -के सम्बन्धमें भा॰ रा॰ कांग्रेसमें प्रस्ताव पास, २०३}}
{{outdent|गिरमिटिया भारतीय (दुबारा); तीन पौंडी कर-अधिनियमके अन्तर्गत तीन पौंड देनेके लिए बाध्य, २३१; नेटाल सरकारके परिपत्रकके अनुसार बाध्य नहीं, १७६, १८१, २३२}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|गीवर्स, ४००, ४०६}}
{{outdent|गुजराती; का जोहानिसबर्गकी भारतीय स्कूलोंमें न पढ़ाया जाना एक भारी अन्याय, ४६८-६९; -में दूसरी भाषाओंके शब्द लेनेकी गांधीजी द्वारा सलाह, ५०९}}
{{outdent|'''गुजराती,''' १४७, १८०, ३६२, ४२१}}
{{outdent|'''गुजराती पंच,''' ४४२}}
{{outdent|गुजराती साहित्य परिषद्, २५६}}
{{outdent|गुजराती हिन्दी स्त्री मण्डल, १६८ पा॰ टि॰}}
{{outdent|गुड, डॉ॰ मैसन; -के मतमें युद्ध, महामारी और अकालकी अपेक्षा दवाइयोंसे अधिक मौतें, ४३१}}
{{outdent|गुप्ते, १११}}
{{outdent|गुरदीन, ४०२}}
{{outdent|गुल, डॉ॰ अब्दुल हमीद, २३, ३६६, ३६८, ३७८, ३८८, ३९३, ४०८, ४५७}}
{{outdent|गुलाबभाई, ३६२}}
{{outdent|'''गुलीवर्स ट्रैवल्स;''' बार-बार पढ़ने लायक ७५, मगनलालको पढ़नेकी गांधीजी द्वारा सलाह, २०}}
{{outdent|गैसन (गैसों) डब्ल्यू॰, ४१ पा॰ टि॰, ३३५ पा॰ टि॰}}
{{outdent|गोखले, गोपाल कृष्ण, ४६, ७८, ७८ पा॰ टि॰, ९४, १०७, १३४ पा॰ टि॰, १६४, १६६, १६७ पा॰ टि॰, १७१, २०४, २४२, २५५, २८८, २९९, ३२९, ३४८, ३५०, ३५५-५६, ३९६, ४०८-१२, ४३७, ४४५, ४५३; गांधीजीके राजनैतिक गुरु, ३३३; -गिरमिटियोंकी सभामें, ४१०; टॉल्स्टॉय फार्ममें, ४०९; बॉक्सबर्ग और जर्मिस्टनकी बस्तियोंमें, ४०९; भारतीयोंकी सभामें, ४०९; -का अपने आलोचकोंको करारा जवाब, ३५५, ४१८-१९, ४२१-२२; -का गिरमिट प्रथा सम्बन्धी प्रस्ताव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसमें स्वीकृत, ४१८; -का गिरमिट प्रथा सम्बन्धी प्रस्ताव शाही विधान परिषद्में अस्वीकृत २४२; -का विश्वास कि तीन पौंडी कर उठा लिया जायगा ३५५; -का स्वागत-समारोह, मानपत्र आदि, -किम्बर्लेकी सभामें, ३३४-३७, ४०९, -केप टाउनमें, ३३२-३४, ४०८, -क्रिस्टियानामें ४०९, -क्रूगर्सडॉर्पमें ४०९, -क्लार्क्सडॉर्पमें, ४०९, -जोहानिसबर्गके हिन्दुओंकी ओरसे, ३३९-४०, -जोहानिसबर्गमें, ३४२-४३, -डंडीमें, ४१०, -डर्बन टाउन हॉलमें, ४१०, -डेलागोवा-बेमें, ४११, -न्यू कैसिलमें ४१०, -प्रिटोरियामें, ३४७, ४१०, -फोक्सरस्टमें, ४१०,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
mrnxhh0g5d571a9c14yzns9yn9j042b
671727
671724
2026-08-19T07:05:10Z
AMAN KUMAR
6475
Bold
671727
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६२०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय||}}
{{Multicol}}
: -द्वारा भारतीय पोशाकके बारेमें जमनादासको सलाह, ४८४; -द्वारा लॉर्ड हार्डिजपर घातक हमले और राजनीतिक हत्याओंकी भर्त्सना, ३५९-६०; -द्वारा विलायत भेजनेके लिए सोराबजीके चुनावका कारण, ३३०; -द्वारा शिक्षाके लिए छः सत्याग्रहियोंको विलायत भेजनेकी कल्पना, ६५
{{outdent|ग़ांधी रामदास, २९२, ३१०, ३१३, ३२१, ३८१, ३८३, ३९२, ३९६, ४००, ४०५, ४८२}}
{{outdent|गांधी रामीबाई, ९२, १२५, २३४, २९२, ३१४}}
{{outdent|गांधी लक्ष्मीचन्द, ३८०}}
{{outdent|गांधी, संतोक, ७७}}
{{outdent|गांधी हरिलाल, ६४, ६७, ७३, ७५-७६, ९३, ११०, ११३, १२४-२५, १२६ '''पा॰ टि॰,''' १३१, १६०, १६३, २३३, २३४, २९३, ३०९, ३१३, ३३०, ३६२, ३६५, ३६९, ३७०, ३७२, ३७९, ३९४, ४०७, ४१६, ४४५; परीक्षामें अनुत्तीर्ण, ४४५; -का मैट्रिक परीक्षा पास करनेका मोह, १४२; -को गांधीजीकी 'जैसा अच्छा लगे' रहनेकी सलाह, ४८१-८२; -को गांधीजीकी फ्रेंचके बदले संस्कृत सीखनेकी सलाह, ३१३-१४}}
{{outdent|गिब्सन, जे॰ वाय॰, २६३-६४}}
{{outdent|गिरमिटिया मजदूर, (रों) -की नेटालमें मजदूरीकी दरें कम, १७४ '''पा॰ टि॰;''' -की भारतमें भर्ती बन्द, १९६; -की हालत, २६६-६७, ३१६-१७; -के लिए गोखलेके प्रयत्न, २०४, २४२, ३०४, ३३८, ४३४, ४५४; -के लिए पोलकका कार्य, २०४, ३१५; -के सम्बन्धमें भारत सरकारका निर्णय, ९७ '''पा॰ टि॰,''' १७५}}
{{outdent|गिरमिटिया प्रथा; अनैतिक, ४३४; गुलामीकी प्रथासे मिलती-जुलती, ७२, २०३; समाप्त करनेकी माँग ४३४; -का बम्बईमें शेरिफकी सभामें विरोध २९६, -की बुराइयोंके सम्बन्धमें कु॰ डडलेका 'इंडिया' में पत्र, ४३४; -के सम्बन्धमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसमें प्रस्ताव पास होनेकी गांधीजीकी आशा १९१; -के सम्बन्धमें भा॰ रा॰ कांग्रेसमें प्रस्ताव पास, २०३}}
{{outdent|गिरमिटिया भारतीय (दुबारा); तीन पौंडी कर-अधिनियमके अन्तर्गत तीन पौंड देनेके लिए बाध्य, २३१; नेटाल सरकारके परिपत्रकके अनुसार बाध्य नहीं, १७६, १८१, २३२}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|गीवर्स, ४००, ४०६}}
{{outdent|गुजराती; का जोहानिसबर्गकी भारतीय स्कूलोंमें न पढ़ाया जाना एक भारी अन्याय, ४६८-६९; -में दूसरी भाषाओंके शब्द लेनेकी गांधीजी द्वारा सलाह, ५०९}}
{{outdent|'''गुजराती,''' १४७, १८०, ३६२, ४२१}}
{{outdent|'''गुजराती पंच,''' ४४२}}
{{outdent|गुजराती साहित्य परिषद्, २५६}}
{{outdent|गुजराती हिन्दी स्त्री मण्डल, १६८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|गुड, डॉ॰ मैसन; -के मतमें युद्ध, महामारी और अकालकी अपेक्षा दवाइयोंसे अधिक मौतें, ४३१}}
{{outdent|गुप्ते, १११}}
{{outdent|गुरदीन, ४०२}}
{{outdent|गुल, डॉ॰ अब्दुल हमीद, २३, ३६६, ३६८, ३७८, ३८८, ३९३, ४०८, ४५७}}
{{outdent|गुलाबभाई, ३६२}}
{{outdent|'''गुलीवर्स ट्रैवल्स;''' बार-बार पढ़ने लायक ७५, मगनलालको पढ़नेकी गांधीजी द्वारा सलाह, २०}}
{{outdent|गैसन (गैसों) डब्ल्यू॰, ४१ '''पा॰ टि॰,''' ३३५ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|गोखले, गोपाल कृष्ण, ४६, ७८, ७८ '''पा॰ टि॰,''' ९४, १०७, १३४ '''पा॰ टि॰,''' १६४, १६६, १६७ '''पा॰ टि॰,''' १७१, २०४, २४२, २५५, २८८, २९९, ३२९, ३४८, ३५०, ३५५-५६, ३९६, ४०८-१२, ४३७, ४४५, ४५३; गांधीजीके राजनैतिक गुरु, ३३३; -गिरमिटियोंकी सभामें, ४१०; टॉल्स्टॉय फार्ममें, ४०९; बॉक्सबर्ग और जर्मिस्टनकी बस्तियोंमें, ४०९; भारतीयोंकी सभामें, ४०९; -का अपने आलोचकोंको करारा जवाब, ३५५, ४१८-१९, ४२१-२२; -का गिरमिट प्रथा सम्बन्धी प्रस्ताव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसमें स्वीकृत, ४१८; -का गिरमिट प्रथा सम्बन्धी प्रस्ताव शाही विधान परिषद्में अस्वीकृत २४२; -का विश्वास कि तीन पौंडी कर उठा लिया जायगा ३५५; -का स्वागत-समारोह, मानपत्र आदि, -किम्बर्लेकी सभामें, ३३४-३७, ४०९, -केप टाउनमें, ३३२-३४, ४०८, -क्रिस्टियानामें ४०९, -क्रूगर्सडॉर्पमें ४०९, -क्लार्क्सडॉर्पमें, ४०९, -जोहानिसबर्गके हिन्दुओंकी ओरसे, ३३९-४०, -जोहानिसबर्गमें, ३४२-४३, -डंडीमें, ४१०, -डर्बन टाउन हॉलमें, ४१०, -डेलागोवा-बेमें, ४११, -न्यू कैसिलमें ४१०, -प्रिटोरियामें, ३४७, ४१०, -फोक्सरस्टमें, ४१०,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
gyj79b0rt3naffw5bnhfkxs1eu6q578
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६५९
250
184255
671725
640127
2026-08-19T07:01:57Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671725
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{Multicol}}
: -ब्रि॰ भा॰ संघकी ओरसे, ३३८-३९, -बेरामें, ४११, -ब्लूम हॉफमें, ४०९, -मैरित्सबर्गमें, ४१०, -मोजाम्बिकमें, ४११, -स्टैण्डर्टनमें, ४१०, -हाइडेलबर्गमें, ४१०, -की उदात्त जीवन-गाथा ३०४-०६; -की ऐतिहासिक द॰ आफ्रिका-यात्राका विवरण सुननेके लिए बम्बईमें सार्वजनिक सभा, ३५५; -की द॰ आफ्रिका यात्राके सम्बन्धमें पत्र-प्रतिनिधियोंको गांधीजी द्वारा जवाब, ३३२, ३४०-४२; -की भेंट, जनरल बोथा और जनरल स्मट्ससे, ४१०, -फिशरसे, ४१०, -विंढमसे, ४१०, -स्मार्टसे, ४१०, -के प्रति लॉर्ड ऍम्टहिलकी श्रद्धांजलि, ४९२; -के प्रति लॉर्ड कर्जनकी आदर-भावना, ३०५; -के प्रयत्नोंसे सत्याग्रहकोषमें आर्थिक सहयोग, २९७, ३३७; -के प्रयास द॰ आफ्रिकी भारतीय समस्याओंके लिए, ७९, ३३७, ३३८; -के विरुद्ध यूनियन कैसिल कम्पनीका जाति-विद्वेष, ३२९; -को गांधीजी द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा अपनानेका सुझाव, ३५१; -को द॰ आफ्रिकाके लिए गिरमिटिया मजदूरोंकी भरती बन्द करनेका श्रेय, २०३, २९७, ३१५, ३३८-३९, ४३४; -को भोज, जलपान, इसीपिंगोमें, ४१०, -कार्लटन होटलमें, ४०९, -किम्बरलेमें, ४०९, -ग्लैडस्टनके साथ, ४१०, -चीनियों द्वारा, ४०९, -चैपलिनके यहाँ, ४०९, -जंजीबारमें, ४१२, -जोहानिसबर्गमें, ४०९, -डर्बनमें, ३४६-४७, -डॉ॰ अब्दुर्रहमानके यहाँ, ४०८, -प्रिटोरियामें, ३४७, ४१०, -मार्शल कैम्बेलके साथ, ४१०, -मैरित्सबर्गमें, ३४४-४५, -लॉरेंको मार्क्विसमें, ४११, -हॉस्केनके यहाँ, ४०९, -को संघ सरकारका आश्वासन कि प्रवासी कानूनका अमल अनुचित ढंगसे नहीं किया जायगा, ३५५; -द्वारा द॰ आफ्रिकी प्रश्नोंके लिए भारतमें एक विशेष समिति-की स्थापना, ३५६
{{outdent|गोगा, एम॰ ए॰, ३६९; -की व्यापारी परवाना हस्तान्तरणके मामलेमें हार, ४७५}}
{{outdent|गॉडफ्रे; -की मृत्युके समाचार, ४०२}}
{{outdent|गोडबोले, एच॰ बी॰, ४१६}}
{{outdent|गोपाल, ३९९}}
{{outdent|गोरा, इस्माइल, ३८२}}
{{outdent|गोलमेज परिषद; भारत व इंग्लैंडके बीच (१९३०); ३४३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|गोवन, ३६८}}
{{outdent|गोविन्दलाल, ३९६, ४०२}}
{{outdent|गोविन्द स्वामी (सैम) १८४}}
{{outdent|गोसाई, जैराम, २७२}}
{{outdent|गोसाई, मंछा, २६९}}
{{outdent|गौरीशंकर, ३९७}}
{{outdent|ग्रेग, ३७१}}
{{outdent|ग्रेगरोवस्की, आर॰, २८, २३७ ''''''पा॰ टि॰,'''''' २९७; -की संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकके सम्बन्धमें राय, २२८-३१, २३५; -की स्वर्ण-कानूनके सम्बन्धमें राय, ६२}}
{{outdent|ग्लैडस्टन, लॉर्ड, २६, २६८ ''''''पा॰ टि॰,'''''' १, २९४, ३४१; -के साथ गोखलेका भोजन, ४१०}}
{{outdent|ग्वालियर महाराजा, ४२०}}
{{gap|7em}}{{larger|'''च'''}}
{{outdent|चंदा; -का गांधीजी द्वारा केशवपन, ४०५}}
{{outdent|चंदाभाई, २३५}}
{{outdent|चॅपल्लिन, ड्रमंड, ८, ४०९}}
{{outdent|चतुरभाई, ३७०}}
{{outdent|चाय; -से हानि, ४७८-७९}}
{{outdent|चावल; -के पोषक तत्त्वोंके संबंधमें संदेह, ४९९}}
{{outdent|चार्ली, ३९५}}
{{outdent|चिन्तामणि, सर चिरावुरी यज्ञेश्वर, २०३, ४५३}}
{{outdent|चीनी (शकर); -वर्जित आहार गांधीजीको पसंद, ५०८; -से आरोग्यको हानि, ५०७}}
{{outdent|चीनी संघ, १३० '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|चीनी सत्याग्रहियोंके लिए समान संरक्षणको माँग, ४९; -की सूची ८७, ८८}}
{{outdent|चुन्नीलाल, ३७९, ३८३}}
{{outdent|चुन्नू, ३९७}}
{{outdent|चेचक; जोहानिसबर्गमें ३००-०१, ३०३; -के रुग्णोंको भारतीयों द्वारा छिपा देना, २०५, २०९, ३०३; -के विरुद्ध मुहिममें जातीय पृथक्करण अवाँछनीय और लाभ-हीन, ३०२}}
{{outdent|चेट्टियार, बी॰ ए॰, १०१, २८९, ३९३, ३९६, ३९८, ४०१}}
{{outdent|चेटी, ३९१}}
{{outdent|चैमने, माँटफोर्ड, ११४, ११७, १८४, ३६८, ३७१-७२, २७४, ३७७, ३८०, ३८३, ३८५, ३८६,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
duutdyk60nw25hb1oa6kho3wm4wxtn6
671726
671725
2026-08-19T07:03:11Z
AMAN KUMAR
6475
सुधार
671726
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{Multicol}}
: -ब्रि॰ भा॰ संघकी ओरसे, ३३८-३९, -बेरामें, ४११, -ब्लूम हॉफमें, ४०९, -मैरित्सबर्गमें, ४१०, -मोजाम्बिकमें, ४११, -स्टैण्डर्टनमें, ४१०, -हाइडेलबर्गमें, ४१०, -की उदात्त जीवन-गाथा ३०४-०६; -की ऐतिहासिक द॰ आफ्रिका-यात्राका विवरण सुननेके लिए बम्बईमें सार्वजनिक सभा, ३५५; -की द॰ आफ्रिका यात्राके सम्बन्धमें पत्र-प्रतिनिधियोंको गांधीजी द्वारा जवाब, ३३२, ३४०-४२; -की भेंट, जनरल बोथा और जनरल स्मट्ससे, ४१०, -फिशरसे, ४१०, -विंढमसे, ४१०, -स्मार्टसे, ४१०, -के प्रति लॉर्ड ऍम्टहिलकी श्रद्धांजलि, ४९२; -के प्रति लॉर्ड कर्जनकी आदर-भावना, ३०५; -के प्रयत्नोंसे सत्याग्रहकोषमें आर्थिक सहयोग, २९७, ३३७; -के प्रयास द॰ आफ्रिकी भारतीय समस्याओंके लिए, ७९, ३३७, ३३८; -के विरुद्ध यूनियन कैसिल कम्पनीका जाति-विद्वेष, ३२९; -को गांधीजी द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा अपनानेका सुझाव, ३५१; -को द॰ आफ्रिकाके लिए गिरमिटिया मजदूरोंकी भरती बन्द करनेका श्रेय, २०३, २९७, ३१५, ३३८-३९, ४३४; -को भोज, जलपान, इसीपिंगोमें, ४१०, -कार्लटन होटलमें, ४०९, -किम्बरलेमें, ४०९, -ग्लैडस्टनके साथ, ४१०, -चीनियों द्वारा, ४०९, -चैपलिनके यहाँ, ४०९, -जंजीबारमें, ४१२, -जोहानिसबर्गमें, ४०९, -डर्बनमें, ३४६-४७, -डॉ॰ अब्दुर्रहमानके यहाँ, ४०८, -प्रिटोरियामें, ३४७, ४१०, -मार्शल कैम्बेलके साथ, ४१०, -मैरित्सबर्गमें, ३४४-४५, -लॉरेंको मार्क्विसमें, ४११, -हॉस्केनके यहाँ, ४०९, -को संघ सरकारका आश्वासन कि प्रवासी कानूनका अमल अनुचित ढंगसे नहीं किया जायगा, ३५५; -द्वारा द॰ आफ्रिकी प्रश्नोंके लिए भारतमें एक विशेष समिति-की स्थापना, ३५६
{{outdent|गोगा, एम॰ ए॰, ३६९; -की व्यापारी परवाना हस्तान्तरणके मामलेमें हार, ४७५}}
{{outdent|गॉडफ्रे; -की मृत्युके समाचार, ४०२}}
{{outdent|गोडबोले, एच॰ बी॰, ४१६}}
{{outdent|गोपाल, ३९९}}
{{outdent|गोरा, इस्माइल, ३८२}}
{{outdent|गोलमेज परिषद; भारत व इंग्लैंडके बीच (१९३०); ३४३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|गोवन, ३६८}}
{{outdent|गोविन्दलाल, ३९६, ४०२}}
{{outdent|गोविन्द स्वामी (सैम) १८४}}
{{outdent|गोसाई, जैराम, २७२}}
{{outdent|गोसाई, मंछा, २६९}}
{{outdent|गौरीशंकर, ३९७}}
{{outdent|ग्रेग, ३७१}}
{{outdent|ग्रेगरोवस्की, आर॰, २८, २३७ '''पा॰ टि॰,''' २९७; -की संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकके सम्बन्धमें राय, २२८-३१, २३५; -की स्वर्ण-कानूनके सम्बन्धमें राय, ६२}}
{{outdent|ग्लैडस्टन, लॉर्ड, २६, २६८ '''पा॰ टि॰,''' १, २९४, ३४१; -के साथ गोखलेका भोजन, ४१०}}
{{outdent|ग्वालियर महाराजा, ४२०}}
{{gap|7em}}{{larger|'''च'''}}
{{outdent|चंदा; -का गांधीजी द्वारा केशवपन, ४०५}}
{{outdent|चंदाभाई, २३५}}
{{outdent|चॅपल्लिन, ड्रमंड, ८, ४०९}}
{{outdent|चतुरभाई, ३७०}}
{{outdent|चाय; -से हानि, ४७८-७९}}
{{outdent|चावल; -के पोषक तत्त्वोंके संबंधमें संदेह, ४९९}}
{{outdent|चार्ली, ३९५}}
{{outdent|चिन्तामणि, सर चिरावुरी यज्ञेश्वर, २०३, ४५३}}
{{outdent|चीनी (शकर); -वर्जित आहार गांधीजीको पसंद, ५०८; -से आरोग्यको हानि, ५०७}}
{{outdent|चीनी संघ, १३० '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|चीनी सत्याग्रहियोंके लिए समान संरक्षणको माँग, ४९; -की सूची ८७, ८८}}
{{outdent|चुन्नीलाल, ३७९, ३८३}}
{{outdent|चुन्नू, ३९७}}
{{outdent|चेचक; जोहानिसबर्गमें ३००-०१, ३०३; -के रुग्णोंको भारतीयों द्वारा छिपा देना, २०५, २०९, ३०३; -के विरुद्ध मुहिममें जातीय पृथक्करण अवाँछनीय और लाभ-हीन, ३०२}}
{{outdent|चेट्टियार, बी॰ ए॰, १०१, २८९, ३९३, ३९६, ३९८, ४०१}}
{{outdent|चेटी, ३९१}}
{{outdent|चैमने, माँटफोर्ड, ११४, ११७, १८४, ३६८, ३७१-७२, २७४, ३७७, ३८०, ३८३, ३८५, ३८६,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
emx36un1m2t48hiofozd6wwr9ixq1g1
671728
671726
2026-08-19T07:07:16Z
AMAN KUMAR
6475
शीर्षक
671728
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|६२१}}
{{Multicol}}
: -ब्रि॰ भा॰ संघकी ओरसे, ३३८-३९, -बेरामें, ४११, -ब्लूम हॉफमें, ४०९, -मैरित्सबर्गमें, ४१०, -मोजाम्बिकमें, ४११, -स्टैण्डर्टनमें, ४१०, -हाइडेलबर्गमें, ४१०, -की उदात्त जीवन-गाथा ३०४-०६; -की ऐतिहासिक द॰ आफ्रिका-यात्राका विवरण सुननेके लिए बम्बईमें सार्वजनिक सभा, ३५५; -की द॰ आफ्रिका यात्राके सम्बन्धमें पत्र-प्रतिनिधियोंको गांधीजी द्वारा जवाब, ३३२, ३४०-४२; -की भेंट, जनरल बोथा और जनरल स्मट्ससे, ४१०, -फिशरसे, ४१०, -विंढमसे, ४१०, -स्मार्टसे, ४१०, -के प्रति लॉर्ड ऍम्टहिलकी श्रद्धांजलि, ४९२; -के प्रति लॉर्ड कर्जनकी आदर-भावना, ३०५; -के प्रयत्नोंसे सत्याग्रहकोषमें आर्थिक सहयोग, २९७, ३३७; -के प्रयास द॰ आफ्रिकी भारतीय समस्याओंके लिए, ७९, ३३७, ३३८; -के विरुद्ध यूनियन कैसिल कम्पनीका जाति-विद्वेष, ३२९; -को गांधीजी द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा अपनानेका सुझाव, ३५१; -को द॰ आफ्रिकाके लिए गिरमिटिया मजदूरोंकी भरती बन्द करनेका श्रेय, २०३, २९७, ३१५, ३३८-३९, ४३४; -को भोज, जलपान, इसीपिंगोमें, ४१०, -कार्लटन होटलमें, ४०९, -किम्बरलेमें, ४०९, -ग्लैडस्टनके साथ, ४१०, -चीनियों द्वारा, ४०९, -चैपलिनके यहाँ, ४०९, -जंजीबारमें, ४१२, -जोहानिसबर्गमें, ४०९, -डर्बनमें, ३४६-४७, -डॉ॰ अब्दुर्रहमानके यहाँ, ४०८, -प्रिटोरियामें, ३४७, ४१०, -मार्शल कैम्बेलके साथ, ४१०, -मैरित्सबर्गमें, ३४४-४५, -लॉरेंको मार्क्विसमें, ४११, -हॉस्केनके यहाँ, ४०९, -को संघ सरकारका आश्वासन कि प्रवासी कानूनका अमल अनुचित ढंगसे नहीं किया जायगा, ३५५; -द्वारा द॰ आफ्रिकी प्रश्नोंके लिए भारतमें एक विशेष समिति-की स्थापना, ३५६
{{outdent|गोगा, एम॰ ए॰, ३६९; -की व्यापारी परवाना हस्तान्तरणके मामलेमें हार, ४७५}}
{{outdent|गॉडफ्रे; -की मृत्युके समाचार, ४०२}}
{{outdent|गोडबोले, एच॰ बी॰, ४१६}}
{{outdent|गोपाल, ३९९}}
{{outdent|गोरा, इस्माइल, ३८२}}
{{outdent|गोलमेज परिषद; भारत व इंग्लैंडके बीच (१९३०); ३४३ '''पा॰ टि॰'''}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|गोवन, ३६८}}
{{outdent|गोविन्दलाल, ३९६, ४०२}}
{{outdent|गोविन्द स्वामी (सैम) १८४}}
{{outdent|गोसाई, जैराम, २७२}}
{{outdent|गोसाई, मंछा, २६९}}
{{outdent|गौरीशंकर, ३९७}}
{{outdent|ग्रेग, ३७१}}
{{outdent|ग्रेगरोवस्की, आर॰, २८, २३७ '''पा॰ टि॰,''' २९७; -की संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकके सम्बन्धमें राय, २२८-३१, २३५; -की स्वर्ण-कानूनके सम्बन्धमें राय, ६२}}
{{outdent|ग्लैडस्टन, लॉर्ड, २६, २६८ '''पा॰ टि॰,''' १, २९४, ३४१; -के साथ गोखलेका भोजन, ४१०}}
{{outdent|ग्वालियर महाराजा, ४२०}}
{{gap|7em}}{{larger|'''च'''}}
{{outdent|चंदा; -का गांधीजी द्वारा केशवपन, ४०५}}
{{outdent|चंदाभाई, २३५}}
{{outdent|चॅपल्लिन, ड्रमंड, ८, ४०९}}
{{outdent|चतुरभाई, ३७०}}
{{outdent|चाय; -से हानि, ४७८-७९}}
{{outdent|चावल; -के पोषक तत्त्वोंके संबंधमें संदेह, ४९९}}
{{outdent|चार्ली, ३९५}}
{{outdent|चिन्तामणि, सर चिरावुरी यज्ञेश्वर, २०३, ४५३}}
{{outdent|चीनी (शकर); -वर्जित आहार गांधीजीको पसंद, ५०८; -से आरोग्यको हानि, ५०७}}
{{outdent|चीनी संघ, १३० '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|चीनी सत्याग्रहियोंके लिए समान संरक्षणको माँग, ४९; -की सूची ८७, ८८}}
{{outdent|चुन्नीलाल, ३७९, ३८३}}
{{outdent|चुन्नू, ३९७}}
{{outdent|चेचक; जोहानिसबर्गमें ३००-०१, ३०३; -के रुग्णोंको भारतीयों द्वारा छिपा देना, २०५, २०९, ३०३; -के विरुद्ध मुहिममें जातीय पृथक्करण अवाँछनीय और लाभ-हीन, ३०२}}
{{outdent|चेट्टियार, बी॰ ए॰, १०१, २८९, ३९३, ३९६, ३९८, ४०१}}
{{outdent|चेटी, ३९१}}
{{outdent|चैमने, माँटफोर्ड, ११४, ११७, १८४, ३६८, ३७१-७२, २७४, ३७७, ३८०, ३८३, ३८५, ३८६,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
qoch0j58fi28f9kaek539878gjpuo4f
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६६०
250
184256
671729
640128
2026-08-19T07:26:48Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671729
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६२२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
: ३९७, ३९९, ४०४, ४०६; -के साथ गांधीजीकी भेंट, ३९३, ३९५; -द्वारा ट्रान्सवालमें भारतीयोंके प्रवेशके सम्बन्धमें गांधीजीको पत्र, २८३ पा॰ टि॰; -द्वारा भारतीयोंकी शिकायतें सुननेसे इनकार ८८२ पा॰ टि॰
{{outdent|चौर्योन्माद; एक विकार, ४३८}}
{{gap|8em}}{{larger|'''छ'''}}
{{outdent|छोटम, ३८५, ३८९, ४१४}}
{{outdent|छोटा, भगा, ३७३}}
{{outdent|छोटाभाई, ए॰ ई॰, ३९५; -के नाबालिग लड़केका मामला, ३९ पा॰ टि॰; -द्वारा प्राप्त रकमका गांधीजी द्वारा फीनिक्सकी पाठशालाके लिए उपयोग, ६०, ६५, ६६, ६८}}
{{outdent|छोटाभाईका फैसला; और नाबालिगोंके अधिकारोंकी सुरक्षा, ३९-४०}}
{{outdent|छोटालाल, ३८२}}
{{outdent|छोटू, ४०५}}
{{gap|6em}}{{larger|'''ज'''}}
{{outdent|जंजीबार; में गोखलेका स्वागत, ४१२}}
{{outdent|जदुबंसी; -की गिरमिट प्रथाके कारण मुसीबतें, २६३-६६}}
{{outdent|जाड़ा, ३८०}}
{{outdent|जाडा, ए॰ ई॰, ३८३}}
{{outdent|जनूबी; -का मुकदमा, १५६ पा॰ टि॰; -का विवाह नेटाल सर्वोच्च न्यायालयकी दृष्टिमें वैध नहीं, ५०१, ५०२}}
{{outdent|जयशंकर, ३९५}}
{{outdent|जरथुस्त्र, १४१}}
{{outdent|जर्बेर, जैक; -के मामलेमें जॉन युकाननका फैसला, १६२-६३}}
{{outdent|जर्मन ईस्ट आफ्रिका लाइन, ३५० पा॰ टि॰}}
{{outdent|जर्मनी; -के साथ भारतका व्यापार, ४४४}}
{{outdent|जर्मिस्टन बस्ती; -को गांधीजी और गोखलेकी भेंट, ४०९; -में नगरपालिका द्वारा एशियाई बाजार और बस्तीके लिए सड़ियल जगहका चुनाव, ९०-९१; -में बाड़ोंके पट्टेदारोंको गैर कानूनी नोटिस, १५२-५३}}
{{outdent|जस्ट, (जुस्ट), ४५८, ४९०}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|जसात, इब्राहीम मुहम्मद, ३७१; -की पत्नीका प्रवास सम्बन्धी मामला, २३९-४०}}
{{outdent|जसात, फातिमा, २५८, ३९७; -का प्रवास सम्बन्धी मामला, २३९-४०, ३२७; -के मामलेमें ब्रि॰ भा॰ संघ और हमीदिया इस्लामिया सोसाइटीको संघर्ष करनेकी सलाह, २४०}}
{{outdent|जसात, रसूल, २३९ पा॰ टि॰}}
{{outdent|जॉर्ज, ५ वें बादशाह, १०४, १०५, १०८-९, २०८; -के राज्याभिषेकपर ब्रिटिश भारतीयों द्वारा बधाई १०८-१०}}
{{outdent|जॉर्डन, मैजिस्ट्रेट, २५८}}
{{outdent|जातिभेद; -का बोअर युद्ध व जुलू विद्रोहके समय लोप, १०५; -के प्रतिकारमें ट्रान्सवालके आन्दोलनमें नेटाल भारतीयोंका सहयोग, ६९; -को राज्यारोहणके अवसरपर भूल जानेकी डर्बन नगर-परिषद अपील, १०५-०६; -से आप्रजन कानूनको मुक्त रखनेकी माँग, ४०, ४५}}
{{outdent|जातीय पृथक्करण (सेग्रेगेशन); चेचक विरोधी मुहिममें भारतीय व इतर रंगदार लोगोंका, अनिवार्य, ३०१, -चेचक विरोधमें नाकामयाब, ३०२, ३०३; -सफाईमें असफल, २०७; -को साम्राज्य सरकारकी सम्मति असंभव, ३०३}}
{{outdent|जानी, ३९१}}
{{outdent|जॉन, (जोन) १२५, ३६४, ३६५, ३७०, ३७२, ३७५, ३७७, ३८२-८६, ३९८, ४०२, ४०५, ४०६}}
{{outdent|जॉन, श्रीमती, १२५}}
{{outdent|जीजीभाई, सर जमशेदजी, २४५-४८, २९५-९६, ३१५ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|जीजीभाई, कानजी, २३६, ३७० पा॰ टि॰}}
{{outdent|जीनवाला, ४१२}}
{{outdent|जील, वैन, २६}}
{{outdent|जीवनजी, ३६४}}
{{outdent|जीवनजी, पारसी, १४५}}
{{outdent|जुलू विद्रोह; -में जातीय भेदभाव लुप्त, १०५}}
{{outdent|जे॰ ई॰ दादा ऐण्ड कम्पनी, ४१६}}
{{outdent|जेम्सन, १३२}}
{{outdent|जेमसन, सर स्टार, ३४१}}
{{outdent|जैगर जे॰ डब्ल्यू॰, ५, ८}}
{{outdent|जैंगबिल, इजराइल, २७४}}
{{outdent|जोजेफ, ३९६}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
t49e1ru4ml8a6i2wilghqfb8juxf5vo
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६६१
250
184257
671735
640129
2026-08-19T08:42:07Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671735
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||संकेतिका|६२३}}
{{Multicol}}
{{outdent|जोसेफ, सेम्युअल, ४९}}
{{outdent|जोशी, ३६६, ३६७, ३६९, ३७१, ३९०, ३९३, ३९७, ४०७, ४५७}}
{{outdent|जोशुआ, ४२}}
{{outdent|जोहानिसबर्ग; -की स्कूलोंमें तमिल और हिन्दी न पढ़ाया जाना भारी अन्याय, ४६८-६९; -में एकाधिक पत्नियोंवाले भारतीयोंकी स्थिति, २५८-५९; -में चेचक, २०५, २०९ ३०१, ३०२-३; -में भारतीय बालकोंके लिए शिक्षण सुविधाओंकी कमी, २६१-६२; -में मानपत्र गोखलेको, ब्रि॰ भा॰ संघ द्वारा ३३८-३९, यूरोपीयों द्वारा ४०९, विभिन्न संस्थाओं द्वारा, ३३८ '''पा॰ टि॰,''' हिन्दुओंकी ओरसे, ३३९-४०}}
{{gap|8em}}{{larger|'''झ'''}}
{{outdent|झवेरी, अब्दुल करीम, ३६९, ३८४, ३९१}}
{{outdent|झवेरी, अबूबकर आमद, २१६; -की प्रिटोरिया जायदादका मामला, ५३ '''पा॰ टि॰''' १}}
{{outdent|झवेरी, अब्दुल्ला हाजी आदम, ३६५; -का जीवन परिचय २१६}}
{{outdent|झवेरी, उमर हाजी आमोद, ३७९, ३८४, ३८८, ३९३, ३९७, ३९९, ४०१, ४१५; -फीनिक्सके एक न्यासी, ३१८, ३६५}}
{{outdent|झवेरी, रेवाशंकर जगजीवन, १००, १२८, १३४, १८१, ३३०, ३६९, ३८१, ३८५, ४०७}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ट'''}}
{{outdent|'''टाइफाइड,''' ४६५}}
{{outdent|'''टाइम्स,''' १२, ४५८}}
{{outdent|'''टाइम्स''' (नेटाल) -में गिरमिटमुक्त भारतीयोंपर से तीन पौंडी कर हटानेके सम्बन्धमें सरकारके निर्णयकी खबर, ४३९}}
{{outdent|'''टाइटैनिक,''' २५६}}
{{outdent|टाटा, रतन जे॰, ८०, ३२५, ३७७; -का ट्रान्सवाल सत्याग्रहके लिए उदारतापूर्ण दान, २४५-४९, २९५, २९५-९६, ३१५ '''पा॰ टि॰,''' ३२२ '''पा॰ टि॰,''' ३६१ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|टाइटस, १९}}
{{outdent|टॉल्स्टॉय, लियो, १५६, १५९, ४७८; -के विचार और गांधीजी, ४४; -के विचार और जीवनसे}}
{{Multicol-break}}
: गांधीजीको शिक्षा, ३९६; -के विचारोंका फीनिक्समें पालन और प्रचार, ३१९
{{outdent|टॉल्स्टॉय फार्म, ९५, १२९-१३१; -का कैलेनबैक द्वारा सत्याग्रहियोंके निवासके लिए दान, १२६-२७, १३१; -में अलोने आहारके प्रयोग, १२५; -में गोखले ४०९, ४१०; -में विद्यालय, १२५, १७८, २४७-४८, २७०}}
{{outdent|टिंडेल, ३६४}}
{{outdent|टीकली, ३६८, ३७३, ३८८, ३९१, ३९३}}
{{outdent|टीपनिस, ३९३}}
{{outdent|टुटला, ३९७}}
{{outdent|टेलर, ९३}}
{{outdent|ट्रान्सवाल, -में प्रवेशके लिए: भारतीय स्त्रियों और बच्चोंसे प्रमाणपत्रोंकी माँग, ४८७; -भारतीयोंका भारतसे वापिसीपर बन्दरगाहोंमें संरक्षण, ४७४-७५, ४७५-७६; -भारतीयोंका पात्रता, ४८७; -शिक्षित ६ भारतीयोंको अनुमति, २७८, २८३; -में भारतीयोंकी संख्या, ४६, ७०; -में भारतीयोंको जबतक निषिद्ध प्रवासी माना जायेगा सत्याग्रह जारी रहेगा, २४७; -में भारतीयोंको जमीनके स्वामित्वकी निर्योग्यता, २९५, २२०}}
{{outdent|ट्रान्सवाल एशियाई कानून संशोधन अध्यादेश, १७ '''पा॰ टि॰,''' २८ '''पा॰ टि॰,''' ९७ '''पा॰ टि॰,''' ९८ '''पा॰ टि॰;''' ९९ '''पा॰ टि॰,''' २७९ '''पा॰ टि॰;''' -साम्राज्य सरकार द्वारा नामंजूर, १० '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|ट्रान्सवाल एशियाई पंजीयन अधिनियम, (१९०७ का कानून २), ९ '''पा॰ टि॰,''' ५५, ९८, ९९ '''पा॰ टि॰,''' २०५; -के समान कानून रोडेशियामें ट्रान्सवाल सत्याग्रहके कारण अस्वीकृत, ९८; -के संघर्षमें बहुत कष्ट, ५०; -को रद कराना अस्थायी समझौते द्वारा गृहीत, ५१, ८७, ९०, ९७, २०१; -को रद्द करानेकी ट्रान्सवाल भारतीय शिष्ट मंडल द्वारा माँग, ८९; -को रद करानेकी नेटाल भारतीयोंको आशा, ६९; -को रद करानेकी माँग, ९-१०; -को रद करानेकी स्मट्ससे माँग, ३९-४०; -को रद करानेके बदलेमें ट्रान्सवाल भारतीयों द्वारा स्वेच्छया पंजीयनका सुझाव, २७९ '''पा॰ टि॰;''' -को स्वीकार करनेपर भी अपंजीकृत भारतीयोंको पंजीयनका अधिकार नहीं, ८६, ८८, ९२}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
7i21paq9dg9v3h4gr8bsa3uhiviv5yc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/६६२
250
184258
671750
640130
2026-08-19T09:08:01Z
AMAN KUMAR
6475
/* शोधित */
671750
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|६२४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}
{{Multicol}}
{{outdent|ट्रान्सवाल एशियाई पंजीयन संशोधन अधिनियम, (१९०८ का कानून ३६), ९, ४०, ५९, ८६; -के अन्तर्गत पंजीयनके लिए ट्रान्सवालमें युद्धसे पूर्व तीन वर्षका निवास आवश्यक, ४६; ४८, -के अनुसार शिक्षित भारतीयोंको संघ प्रवासी प्रतिबंधक विधेयक (१९१२) के पंजीयनसे मुक्ति, १३, ४८, २१९; -को स्वीकार करनेपर भी जिनकी अर्जियाँ नामंजूर की गईं, उन्हें अस्थायी समझौतेके अन्तर्गत पंजीयनका अधिकार नहीं, ८६, ८८, ९२}}
{{outdent|'''ट्रान्सवाल क्रिटिक,''' १७ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|ट्रान्सवाल नगरपालिका अध्यादेशका मसविदा ३०३; -का ब्रिटिश भारतीय संघ द्वारा विरोध, १०२; -के अन्तर्गत भारतीयोंको मताधिकार नहीं, १९८, २०६; -के अन्तर्गत व्यापारी व फेरीवालोंके परवानोंका नियंत्रण नगरपालिकाओंको, १०२, २०६; -के बारेमें लॉर्ड सभामें लॉर्ड लैमिंग्टन द्वारा प्रश्न, १९६, २०८ '''पा॰ टि॰;''' -के बारेमें सहूलियतें देनेसे साम्राज्य-सरकारका इन्कार, १९७-९९; - के सम्बन्धमें ब्रिटिश भारतीय संघ द्वारा साम्राज्य-सरकारको प्रार्थनापत्र, १९७; -के सुधारकी माँग, १०२-०३; -को संशोधित करानेका साम्राज्य सरकारको अधिकार, २०८; -से एशियाई फेरीवालोंका सर्वनाश, १०२}}
{{outdent|ट्रान्सवाल प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियम, २२६ '''पा॰ टि॰,''' २५८ '''पा॰ टि॰;''' -का संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकके बदलेमें सुधार अस्थायी समझौतेमें गृहीत; ९०; -के सुधारकी संघ प्रवासी प्रतिबंधक विधेयकके बदलेमें माँग, ४, ९-१०, १२, १५, १८, ३७-३८; -के सुधारकी संघप्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकके बदलेमें माँगका नेटाल भारतीय कांग्रेस द्वारा अनुमोदन, १४; -के सुधारकी संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकके बदलेमें माँग सरकार द्वारा स्वीकृत १३; -को सुधारनेसे स्मट्सका इन्कार, ३४}}
{{outdent|ट्रान्सवाल भारतीय महिला संघ, ११ '''पा॰ टि॰,''' १७९, ३३२; -सत्याग्रहकी लड़ाईके महत्त्वपूर्ण फलोंमें से एक, १६९; -का 'बाजार', १६९, २६७; -के लिए निधि १८४; -के लिए श्रीमती वॉगलका कार्य, १७९}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|ट्रान्सवाल भारतीयोंका शिष्ट मण्डल (१९०६), १० '''पा॰ टि॰;''' -की स्वर्ण-कानून और बाड़ा अधिनियमसे हानि, ५३-५४; -के अधिकारोंको संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकके अन्तर्गत (१९१२) क्षति, २३७; -के निवासके अधिकार; २७९ '''पा॰ टि॰;''' -के लिए पत्नी तथा नाबालिगोंको लानेमें संघ प्रवासी प्रतिबन्धक विधेयकके अनुसार निवासका सुबूत आवश्यक, २३७; -को जमीनकी मालकी एवं सवारीका अधिकार नहीं, ७९; -को पंजीयन कार्यालयमें अनेक असुविधाएँ २८२; -द्वारा ट्रान्सवाल एशियाई पंजीयन अधिनियमको रद करनेके बदलेमें स्वेच्छया पंजीयनका सुझाव २७९ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|'''ट्रान्सवाल लीडर,''' ५ '''पा॰ टि॰,''' ९८ '''पा॰ टि॰,''' २८५ '''पा॰ टि॰''' ३०२, ३३८ '''पा॰ टि॰''' -द्वारा बॉक्सबर्गमें दूकानके लिए भायातकी निन्दा, १८८; -द्वारा सहशिक्षाका विरोध १९२; -द्वारा गोखलेकी दक्षिण आफ्रिका-यात्राके सम्बन्धमें गांधीजीसे भेंट, ३४०-४२}}
{{outdent|ट्रान्सवाल विधान परिषद्, ८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|ट्रान्सवाल विधान सभा, १८ '''पा॰ टि॰'''}}
{{outdent|ट्रामगाड़ियाँ, (यों) -में प्रवास करनेसे ट्रान्सवालके भारतीय वंचित, ५५, ७९; -साम्राज्य सरकार द्वारा इस मामलेमें सहायता करनेसे इनकार, १९८}}
{{outdent|ट्रावनकोर, -के महाराजा, ४२०}}
{{outdent|'''ट्रेबोरा,''' ४१२}}
{{outdent|ट्रेवेलियन, सर जॉर्ज, ३१० '''पा॰ टि॰'''}}
{{gap|8em}}{{larger|'''ठ'''}}
{{outdent|ठक्कर, हरिलाल, ७५, ७७, १८७, ३६४, ३६६, ३७१, ३७२, ३७३, ३७७, ३७९, ३८८, ३८९, ३९०, ३९३, ३९७}}
{{gap|6em}}{{larger|'''ड'''}}
{{outdent|डंकन, पैट्रिक, -का गांधीजीको कथन कि एशियाई प्रवासी प्रतिबंधक अधिनियम (१९१२) छोड़ा जा सकता है, १७}}
{{outdent|डंडी, -में गोखलेको मानपत्र ४१०}}
{{outdent|डडले, कुमारी, -का 'इंडिया' को पत्र गिरमिटिया प्रथाकी बुराइयोंके सम्बन्धमें ४३४}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
nz96ukg3j4yrbbw36d1abcq8wo0pfu2
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४१
250
186147
671576
644462
2026-08-18T14:42:48Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671576
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|५०९}}</noinclude>ये प्रदर्शन मैत्रीपूर्ण प्रदर्शन हैं और इसलिए कोई झंझट खड़ी नहीं होती। किन्तु सोचिए अगर हम विरोधमें कोई प्रदर्शन करें तो कैसी अंधाधुंधी मच जाये। अगर हमें गोली-बारीके समय या लोगोंके उत्तेजित रहते हुए भीड़की व्यवस्था करनी पड़े तो क्या हो? मैंने टूँडलामें देख लिया है कि ऐसी भीड़को लेकर सार्वजनिक सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाना असम्भव है। जबतक हम भीड़के लोगोंको आदेश देने और उनका पालन करानेकी स्थितिमें नहीं आ जाते, तबतक हम किसी भी कामको कारगर ढंगसे अंजाम नहीं दे सकते। इसलिए हमारे स्वयंसेवकोंको भीड़को नियन्त्रित रखनेका प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। भारतीय लोगोंकी भीड़को नियन्त्रणमें रखना और व्यवस्थित बनाना अत्यन्त ही सरल कार्य है। यह संसारके अन्य सभी देशोंके लोगोंको नियन्त्रणमें रखनेसे कहीं आसान है। हाँ, इसके लिए पहलेसे तैयारी की जानी चाहिए। और यदि पहलेसे तैयारी न हो तो समझदारी इसीमें होगी कि भीड़का जमाव ही न होने दिया जाये।
{{c|'''प्रदर्शन'''}}
अब यह समझना काफी आसान हो गया है कि मालेगाँवमें और यहाँ तक कि अलीगढ़में भी आगजनीकी घटनाएँ कैसे हुई होंगी। अनुशासनहीन भीड़ वहाँ इकट्ठी हो गई थी। ऐसी भीड़में कुछ ऐसे शरारती लोग रहते ही हैं जो सिर्फ मौकेका इन्तजार करते रहते हैं। जब समूची भीड़ उत्तेजित हो जाती है तो वह आँख मूँदकर उनके पीछे चलने लगती है; अर्थात् वह भीड़ क्षणिक आवेशमें बह जाती है। इसीलिए जब हम ऐसे प्रदर्शनोंका आयोजन करते हैं जिनको हम नियन्त्रित नहीं कर सकते, तो हम ‘शत्रुओं’ के हाथोंमें खेलते हैं। आज हमारा उद्देश्य एक ऐसा वातावरण बनाना है जो शान्त और अहिंसापूर्ण होते हुए भी दृढ़ निश्चयसे प्रेरित हो। जब पूर्णतया अनुशासित सैनिकोंकी ओरसे एकाएक गोलीबार शुरू हो जाता है, तो हमारा दृढ़ निश्चय काफूर हो जाता है। इसीलिए हमें गिरफ्तारियोंके विरुद्ध प्रदर्शनोंका आयोजन करना जान-बूझकर छोड़ देना चाहिए। सरकार जिनको भी गिरफ्तार करना चाहती है, उनको बिना किसी शोर-गुलके गिरफ्तार हो जाने देना चाहिए। जब हम अपने-आपपर पर्याप्त आत्म-नियन्त्रण प्राप्त कर लेंगे, तब हम स्वराज्य और सविनय अवज्ञाके लिए तैयार हो जायेंगे। यह आत्म-नियन्त्रण पूर्ण रूपसे स्वदेशीका पालन करनेसे ही पैदा होगा। विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करने और अपनी जरूरतके लायक खादी तैयार करनेकी कोशिशसे हमारे अन्दर जितना आत्मविश्वास पैदा होगा, उतना अन्य किसी भी चीजसे पैदा नहीं हो सकता।
{{c|'''रिहाईका दुःख'''}}
श्री वेंकटप्पैयाने एक तार द्वारा खेद प्रकट किया है कि वे स्वयं रिहा कर दिये गये हैं और उनके दूसरे साथी अब भी हिरासत में हैं। मुझे भी इसका दुःख है। आज-कल तो जेल ही हर आत्म-सम्मानी भारतीयके लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। आज अलीगढ़का हर आदमी मौलाना शेरवानी और उनके भाग्यसे ईर्षा करता है। बेगम ख्वाजाने मुझे लिखा है कि उनके शौहर के साथीके जेलमें रहते उन्हें अपने पतिकी<noinclude></noinclude>
ndxp5hscsw2ciw7a5jyq3r4gqmgwt9g
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४२
250
186148
671578
644463
2026-08-18T14:53:29Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671578
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५१०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>रिहाईसे बड़ा दुःख पहुँचा है। यही सच्ची भावना है। और इस वर्ष स्वराज्य मिलना तभी सम्भव होगा जब हमारे देशके स्त्री-पुरुष स्वतन्त्रताके लिए संघर्ष करते हुए जेल जाना अपना सौभाग्य मानेंगे। स्पष्ट है कि गुण्टूरके लोगोंमें इसी तरहकी सही भावना मौजूद है। गिरफ्तारियोंकी खबर सुनकर श्री प्रकाशम् तुरन्त ही गुण्टूर गये और उन्होंने वहाँसे तार भेजा है कि वहाँ कई वकीलोंने अपनी वकालत मुल्तवी कर दी है और अब जनता कांग्रेसके असहयोग कार्यक्रमपर और भी दृढ़ताके साथ अमल करनेकी कोशिश कर रही है। हम लोग जब जेलोंसे बाहर उत्तरदायित्वपूर्ण ढंगसे स्वतन्त्रचेता व्यक्तियों-की तरह काम करने लगेंगे, तो सरकार हमें जेल भेजनेमें देर नहीं करेगी, और हम
जितने दिन जेलसे बाहर रहेंगे, उतने दिन हमें भी यह विश्वास रहेगा कि हम अपना समय यों ही बरबाद नहीं कर रहे हैं।
{{c|'''पहली अगस्तको ताकतका प्रदर्शन'''}}
किसी पत्र-लेखकने बड़े रोषके साथ पूछा है कि पहली अगस्तका मेरा अनुभव क्या है। पहली अगस्तका मेरा अनुभव यह है कि मैंने उससे अधिक व्यवस्थित भीड़ इससे पहले नहीं देखी थी। मैं पत्र-लेखककी इस बातपर यकीन करता हूँ कि कुछ लोगोंको विदेशी टोपियाँ उतारनेके लिए मजबूर किया गया था। लेकिन मुझे पक्का भरोसा है कि ऐसे उदाहरण बिरले ही थे। स्वदेशीके प्रचारमें ताकतके इस्तेमालकी कोई गुंजाइश ही नहीं है, और मुझे इसमें किंचित् भी संदेह नहीं कि जोर-जबरदस्तीका इस्तेमाल हमारे अपने उद्देश्यको ही विफल बनानेवाला सिद्ध होगा। हम भारतको जबरन खादी पहननेपर मजबूर नहीं कर सकते। खादी पहनना तो स्वतन्त्रता और सम्मानका सूचक बन जाना चाहिए; लेकिन यदि उसके प्रचारमें जोर-जबरदस्तीसे काम लिया गया तो ऐसा नहीं हो सकता।
{{c|'''बंगाल और मद्रासके चुनाव'''}}
इसमें सन्देह नहीं कि बंगाल और मद्रासके चुनावोंके सम्बन्धमें लिये गये कार्य-समितिके निर्णयसे कुछ नाराजगी बढ़ेगी। इसलिए और भी कि यह निर्णय अध्यक्षके इस निर्देशके बावजूद किया गया था, कि संविधानकी व्यवस्थाके अनुसार चुनाव नहीं किये जा सकते। इससे जिन लोगोंको हानि पहुँची है; मुझे उनसे हमदर्दी है। पर मैं उनसे यही कहूँगा कि वे समितिके निर्णय के पीछे काम करनेवाले कारणोंको समुचित महत्त्व दें। मेरी अपनी राय यह है कि समितिके लिए सभी सम्बन्धित पक्षोंकी बात सुने बिना केवल कुछ मुद्दोंको ध्यान में रखकर ऐसा निर्णय देना सम्भव नहीं था। लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा निर्धारित कार्यक्रम पूरा करना था और सभी सम्बन्धित पक्षोंकी बात सुननेका समय कार्य समितिके पास रह ही नहीं गया था।यदि ऐसी जाँच-पड़ताल की जाती तो सारी प्रक्रिया पूरी होनेतक सदस्य उसी स्थितिमें बने रहते जिसमें वे आज हैं। इसलिए दूसरे पक्षके लोगोंके नवम्बरतक रुके रहनेसे कोई हानि नहीं होगी। और फिर ऐसे मामले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके सामने तभी पेश करने चाहिए जब उनका स्थानीय तौरपर निबटारा करनेका यथासम्भव पूरा प्रयास कर लिया गया हो। इसके बिना उन्हें वहाँ पेश करना गलत होगा।<noinclude></noinclude>
q15128sps47t65s74lqku77khyzxcdb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४३
250
186149
671579
644464
2026-08-18T15:02:34Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671579
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|५११}}</noinclude>हम यही तो चाहते हैं कि स्थानीय लोकमतकी ताकतके बलपर ही अनियमितताओंको रोका और ठीक किया जा सके। प्रबुद्ध लोकमतके विरुद्ध क्या बंगाल और क्या मद्रास, कहींकी भी कांग्रेस कमेटी खड़ी नहीं रह सकती। यदि यह मान लिया जाये कि जनता वर्तमान चन्द नेताओंका अन्धानुसरण करती है तो फिर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके फैसलेसे भी शिकायत करनेवालों को कोई सन्तोष नहीं हो सकता। कांग्रेसका अपना एक लोकतान्त्रिक संविधान है, लेकिन जबतक उसपर अमल करनेवाले कार्यकर्त्ता लोकतांत्रिकताको अपनाकर न चलें, और लोकमतको अपना पथ-प्रदर्शक मानकर चलनेके लिए तैयार न हों तबतक संविधानका इस्तेमाल निश्चय ही गैर-लोकतांत्रिक उद्देश्योंके लिए ही होगा। केन्द्रकी ओरसे जल्दबाजीमें अगर कोई हस्तक्षेप किया जायेगा तो उसका नतीजा यही होगा कि दलमें कटुता और फूट बढ़ेगी। इसीलिए कार्य-समिति जान-बूझकर इसके वैधानिक पक्षको बचाती रही। उसने गुण-दोषोंका विवेचन नहीं किया और दोनों पक्षोंसे अनुरोध किया कि वे स्थानीय तौरपर प्रयास करके सारा मामला निवटा लें। शास्त्रीय बहस या कानूनी बारीकियोंमें पड़नेका समय हमारे पास नहीं है। हमें पदोंकी बात कम और सेवाकी बात अधिक सोचनी चाहिए।
{{c|'''एक अंग्रेज मित्रकी चेतावनी'''}}
नीचे मैं एक अंग्रेज मित्रके पत्रके कुछ प्रासंगिक अंश उद्धत कर रहा हूँ। मैं इन अंग्रेज मित्रको कई वर्षसे जानता हूँ। वे बड़ी सत्यान्वेषी हैं। इनका कहना है:
:{{gap}}'''आपके कुछ वाक्य बड़े ही सुन्दर लगे, पर कुछ वाक्य ऐसे लगे जैसे आपके न हों, और इससे मुझे उलझन महसूस हुई। मैं आलोचना क्यों करूँ? मुझे तो इस पेचीदा परिस्थितिकी जानकारी तक नहीं है। फिर मैं कैसे फतवा
दे सकती हूँ कि आप जिस उग्र किस्मकी उथल-पुथलके लिए कोशिश कर रहे हैं उसका कोई औचित्य है या नहीं? जब मैं पीछेकी ओर मुड़कर देखती हूँ कि मेरी आपपर कितनी श्रद्धा थी, आप मेरे तई किस तरह एक आदर्शके प्रतीक बन गये थे, तब यही इच्छा होती है कि परिस्थिति ज्योंकी-त्यों बनी रहती, उसमें कोई परिवर्तन न होता। और कुछ भी ऐसा घटित न होता कि मुझे यह सोचना पड़ता कि मैंने कहीं गलती तो नहीं की है। वैसे यह एक बड़ा कमजोर-सा खयाल है और वर्तमान परिस्थितिके कठोर यथार्थका सामना करनेका साहस मुझे अपने-आपमें बटोरने में सफल होना ही चाहिए। आप जिस हदतक सही रास्तेपर हैं, उस हदतक में अब भी आपके प्रति अपनी श्रद्धा बरकरार रख सकती हूँ। लेकिन मैं यहीं तो तय नहीं कर पाती कि आप किस हदतक सही रास्तेपर हैं। पर यह एक बात मुझे बिलकुल निश्चित लगती है, कि अगर आप गलतीपर होंगे तो आप अपनी सफलताको कामना भी नहीं करेंगे; क्योंकि सर्वोपरि सत्य आपको अपने प्रयासोंसे कहीं अधिक प्रिय है। कैसी विचित्र बात है कि हम लोग यह न जानते हुए भी कि सत्य क्या है, इसीके लिए सबसे अधिक चिन्तित रहते हैं कि सत्यकी ही विजय होनी चाहिए। हमारी अपनी योजनाओंके मुकाबले उसीको सफलता मिलनी चाहिए।<noinclude></noinclude>
f3phpe3vurt0irzzd8usawp43e38yld
671580
671579
2026-08-18T15:03:22Z
अँजली चौधरी
2439
671580
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||टिप्पणियाँ|५११}}</noinclude>हम यही तो चाहते हैं कि स्थानीय लोकमतकी ताकतके बलपर ही अनियमितताओंको रोका और ठीक किया जा सके। प्रबुद्ध लोकमतके विरुद्ध क्या बंगाल और क्या मद्रास, कहींकी भी कांग्रेस कमेटी खड़ी नहीं रह सकती। यदि यह मान लिया जाये कि जनता वर्तमान चन्द नेताओंका अन्धानुसरण करती है तो फिर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके फैसलेसे भी शिकायत करनेवालों को कोई सन्तोष नहीं हो सकता। कांग्रेसका अपना एक लोकतान्त्रिक संविधान है, लेकिन जबतक उसपर अमल करनेवाले कार्यकर्त्ता लोकतांत्रिकताको अपनाकर न चलें, और लोकमतको अपना पथ-प्रदर्शक मानकर चलनेके लिए तैयार न हों तबतक संविधानका इस्तेमाल निश्चय ही गैर-लोकतांत्रिक उद्देश्योंके लिए ही होगा। केन्द्रकी ओरसे जल्दबाजीमें अगर कोई हस्तक्षेप किया जायेगा तो उसका नतीजा यही होगा कि दलमें कटुता और फूट बढ़ेगी। इसीलिए कार्य-समिति जान-बूझकर इसके वैधानिक पक्षको बचाती रही। उसने गुण-दोषोंका विवेचन नहीं किया और दोनों पक्षोंसे अनुरोध किया कि वे स्थानीय तौरपर प्रयास करके सारा मामला निवटा लें। शास्त्रीय बहस या कानूनी बारीकियोंमें पड़नेका समय हमारे पास नहीं है। हमें पदोंकी बात कम और सेवाकी बात अधिक सोचनी चाहिए।
{{c|'''एक अंग्रेज मित्रकी चेतावनी'''}}
नीचे मैं एक अंग्रेज मित्रके पत्रके कुछ प्रासंगिक अंश उद्धत कर रहा हूँ। मैं इन अंग्रेज मित्रको कई वर्षसे जानता हूँ। वे बड़ी सत्यान्वेषी हैं। इनका कहना है:
:{{gap}}'''आपके कुछ वाक्य बड़े ही सुन्दर लगे, पर कुछ वाक्य ऐसे लगे जैसे आपके न हों, और इससे मुझे उलझन महसूस हुई। मैं आलोचना क्यों करूँ? मुझे तो इस पेचीदा परिस्थितिकी जानकारी तक नहीं है। फिर मैं कैसे फतवा दे सकती हूँ कि आप जिस उग्र किस्मकी उथल-पुथलके लिए कोशिश कर रहे हैं उसका कोई औचित्य है या नहीं? जब मैं पीछेकी ओर मुड़कर देखती हूँ कि मेरी आपपर कितनी श्रद्धा थी, आप मेरे तई किस तरह एक आदर्शके प्रतीक बन गये थे, तब यही इच्छा होती है कि परिस्थिति ज्योंकी-त्यों बनी रहती, उसमें कोई परिवर्तन न होता। और कुछ भी ऐसा घटित न होता कि मुझे यह सोचना पड़ता कि मैंने कहीं गलती तो नहीं की है। वैसे यह एक बड़ा कमजोर-सा खयाल है और वर्तमान परिस्थितिके कठोर यथार्थका सामना करनेका साहस मुझे अपने-आपमें बटोरने में सफल होना ही चाहिए। आप जिस हदतक सही रास्तेपर हैं, उस हदतक में अब भी आपके प्रति अपनी श्रद्धा बरकरार रख सकती हूँ। लेकिन मैं यहीं तो तय नहीं कर पाती कि आप किस हदतक सही रास्तेपर हैं। पर यह एक बात मुझे बिलकुल निश्चित लगती है, कि अगर आप गलतीपर होंगे तो आप अपनी सफलताको कामना भी नहीं करेंगे; क्योंकि सर्वोपरि सत्य आपको अपने प्रयासोंसे कहीं अधिक प्रिय है। कैसी विचित्र बात है कि हम लोग यह न जानते हुए भी कि सत्य क्या है, इसीके लिए सबसे अधिक चिन्तित रहते हैं कि सत्यकी ही विजय होनी चाहिए। हमारी अपनी योजनाओंके मुकाबले उसीको सफलता मिलनी चाहिए।'''<noinclude></noinclude>
ei009pv2x4zws2zhwytpo9psfo1qpry
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४४
250
186150
671581
644465
2026-08-18T15:12:36Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671581
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५१२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि मेरी इस मित्रकी तरह ही अन्य मित्र भी महसूस करते हैं। एक अन्य अंग्रेज पत्र लेखकने इसी विचारको ज्यादा दो टूक शब्दोंमें व्यक्त किया है। उनका कहना है कि मैं बुराईको शायद इसीलिए बरदाश्त करता हूँ कि उससे भलाई पैदा हो सके। मैं दोनों ही पत्र-लेखकोंको यकीन दिलाता हूँ कि मैं यदि कुछ चाहता हूँ तो केवल सत्यकी विजय चाहता हूँ। मैंने कभी भी इसपर विश्वास नहीं किया और आज भी नहीं करता कि लक्ष्य ही सब-कुछ है। उसे प्राप्त करनेके लिए शुद्ध-अशुद्ध कैसे भी साधन अपनाये जा सकते हैं। बल्कि इसके विपरीत मेरा तो दृढ़ विश्वास है कि लक्ष्य और उसे प्राप्त करनेके साधनोंमें एक अन्तरंग सम्बन्ध रहता है, इतना कि आप भले लक्ष्यको बुरे साधनोंके जरिये प्राप्त नहीं कर सकते। और कमसे-कम मुझे तो इसकी बिलकुल जानकारी नहीं कि मैंने सत्य और न्यायकी अपनी मान्यताओंमें किंचित् भी कभी कोई कसर आने दी हो। मैं तो समझता हूँ कि अगर मैं कभी क्षण भरके लिए भी सत्यके पथसे विचलित हुआ होता तो बहुत पहले ही लोगोंकी नजरोंमें गिर चुका होता। मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं एक बहुत ही खतरनाक और कठिन परीक्षण कर रहा हूँ। हजारों मुसलमानोंको और यों हिन्दुओंको भी, अहिंसा अपनाने और सर्वथा अहिंसक आचरण करनेके लिए तैयार करना सचमुच एक बड़ा खतरनाक प्रयोग है, क्योंकि उनकी धार्मिक आस्था उनको परिस्थिति विशेष में हिंसात्मक आचरण करनेकी अनुमति देती है। मेरा यही दुर्भाग्य रहा है कि मैंने जब भी किसी नये कामका बीड़ा उठाया है, लोगोंने मुझे पहले गलत ही समझा है। मेरे मित्र और शत्रु दोनों ही नये उद्देश्यकी बातपर चौंक उठते हैं (उनके लिए वह नया ही होता है)। इस सनातन सत्यको चरितार्थ करनेकी बात उनको अजीब और नई मालूम पड़ती है। दक्षिण आफ्रिकामें गड़बड़ी पैदा करनेका आरोप तो मेरे ऊपर इतने जोर-शोरसे लगाया गया था कि अक्सर यही लगता था कि मुझे अपने अच्छेसे अच्छे मित्र भी खो देने पड़ेंगे। बादमें मेरे अधिकांश मित्र और शत्रु भी मानने लगे थे कि मैं सही रास्तेपर चल रहा हूँ। मैं जिस सिद्धान्तको व्यावहारिक जीवनमें चरितार्थ करनेकी कोशिश कर रहा था उसे उन्होंने समझा नहीं था। इसीलिए मैं महसूस करता हूँ कि असहयोगका भी वही हाल हुआ है। मैं तो असहयोगको
नैतिक आचरणका सबसे अधिक शिष्ट और सौम्यतापूर्ण तरीका मानता हूँ। केवल असहयोगके जरिये ही अंग्रेजों और भारतीयोंके बीच सही किस्मकी सच्ची समझदारी और सहयोग पैदा किया जा सकता है। केवल इसी एक मार्गसे पूर्व और पश्चिममें सच्ची मित्रता स्थापित की जा सकती है। असहयोग के मार्गपर चलकर ही भारत अपनी उत्कृष्ट संस्कृतिकी ऊँचाइयोंतक उठ सकता है। ऊपरसे लक्षण कुछ भी क्यों न मालूम पड़ते हों, उन सबके बावजूद, मुझे वह दिन निकटतर आता दीख रहा है जब अंग्रेज और भारतीय एक-दूसरेको परस्पर मित्र और सहयोगी मानने लगेंगे।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ११-८-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
f773xoiydl4sbky9pz6794srlo8j6y9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४५
250
186151
671582
644466
2026-08-18T15:20:31Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671582
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५०. सफलताकी शर्तें'''}}}}
विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारका कार्यक्रम ३० सितम्बरसे पहले ही समाप्त कर लेना हो तो निस्सन्देह हमें अपनी रुचिको सुधारना, सादगीको अपनाना और अपनी आवश्यकताओंको घटाकर कमसे-कम करना आवश्यक है। किसी भी असहयोगीके लिए तीनसे अधिक वस्त्र पहनना अनुचित है। हमें बेजवाड़ाके महीन वस्त्रोंके लिए लालायित नहीं होना चाहिए, बल्कि मामूलीसे-मामूली खादी पहनकर सन्तोष कर लेना चाहिए। किन्तु यह भी केवल प्राथमिक बात हुई। बिना व्यावसायिक रीतिको अपनाये स्वदेशी में सफलता नहीं मिल सकेगी। अबतक हम छात्रोंमें काम करनेका
प्रयत्न करते रहे और उन्होंने अपने ज्ञान तथा योग्यताके अनुसार हमारा साथ दिया। बहुत-से असहयोगी छात्र धरना देनेवालों तथा प्रचारकोंके रूपमें साहसपूर्ण कार्य कर रहे हैं। एक असहयोगी स्कूलमें सभी सार्वजनिक कार्य हो रहा है। किन्तु हम केवल स्कूलके जरिये स्वदेशीमें सफलता नहीं प्राप्त कर सकते। हमें तो भारतके बुनकरोंके हृदयोंको छूना होगा। हमें उन्हें संगठित करना होगा। जिन बुनकरोंने गुंजाइश न होनेके कारण अपना पेशा छोड़ दिया है उन्हें फिरसे अपना पेशा अपनानेके लिए प्रेरित करना होगा। हमें उनकी सभा बुलानी होगी और उन्हें बताना होगा कि उनको क्यों हाथकता सूत बुनना चाहिए। चाहे हाथका कता सूत अ-सम ही क्यों न हो फिर भी विदेशी सूतको छूना वे क्यों पाप मानें यह भी उन्हें समझाया जाना चाहिए। इसी प्रकार हमें धुनियोंको प्रेरित करना होगा कि वे कातनेके लिए पूनियाँ तैयार करें। हमें कपड़े के व्यापारियोंको भी प्रेरित करना होगा कि वे अपने व्यापारमें देशभक्तिका खयाल रखकर हाथ-बुना कपड़ा बेचें और विदेशी कपड़ा बेचना छोड़ दें। हमें स्वदेशी दूकानोंके लिए ऐसे निरीक्षक रखने होंगे जो विदेशी तथा स्वदेशी वस्त्रों एवं हाथ-बुने तथा मशीन बुने वस्त्रोंका भेद समझने में प्रवीण हों।जबतक विशाल परिमाणमें हम अपनेको संगठित नहीं करते तबतक यह बड़ा भारी काम सम्पन्न नहीं हो सकता। और इस प्रकारका संगठन तबतक सर्वथा असम्भव हैं जबतक कि कांग्रेसकी प्रत्येक संस्था स्वदेशीपर पूर्ण रूपसे ध्यान नहीं देती, अर्थात् अन्य सब काम छोड़कर विदेशीका बहिष्कार तथा स्वदेशीका उत्पादन नहीं करती।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रत्येक गाँवका आदर्श है कि अपने लिए उसी प्रकार सूत काते और बुने जिस प्रकार कि आज बहुतसे गाँव अपनी जरूरत के लिए अन्न स्वयंमेव उगा लेते हैं। अपने लिए पूरा अन्न उगानेकी अपेक्षा सूत कातना और बुनना कहीं सरल है। प्रत्येक गाँव गेहूँ या चावल नहीं उगा सकता, किन्तु प्रत्येक गाँव पर्याप्त रुई पैदा कर सकता है और बिना किसी कठिनाईके उसे कात और बुन सकता है। अलबत्ता इस शुभ वस्तु-स्थितितक पहुँचने में हमें कुछ समय तो अवश्य लगेगा। इस बीच वे प्रान्त जो इस कार्यके लिए पूर्ण रूपसे संगठित हैं, जैसे कि पंजाब, न केवल अपने बाजारसे सारा विदेशी कपड़ा तुरन्त निकाल बाहर फेंकें बल्कि वे<noinclude>{{left|२०-३३|1em}}</noinclude>
2nyqkqfvyc12um3qtxonxgcp8hmp81c
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४६
250
186152
671587
644467
2026-08-18T15:39:24Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671587
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५१४||}}</noinclude>अपनी अतिरिक्त खादीको भारत के उन भागोंमें निर्यात करें जहाँ उसकी जरूरत है। प्रान्तोंमें खादीके उत्पादनकी दृष्टिसे पंजाब, आन्ध्र, बिहार तथा गुजरात सबसे अधिक संगठित प्रतीत होते हैं। उन्हें खादीकी आवश्यकताका पूर्वानुमान लगाकर इस काम में
जुट जाना चाहिए।
यदि हमें इस बड़े तथा शानदार कामको अंजाम देना है तो हमें बातें बनाना छोड़ देना चाहिए; या हम बातें करें भी तो वे व्यावसायिक होनी चाहिए। हमें प्रत्येक बातपर तू-तू मैं-मैं करना तथा व्यर्थकी आपत्ति उठाना छोड़ देना चाहिए। साथ ही यदि कोई इन बातोंमें पड़ने पर जोर देता हो तो हमें उससे भी किनारा काट लेना चाहिए। कांग्रेसको उन प्रतिभावान वकीलोंके लिए वादविवादकी गोष्ठी नहीं बने रहना है जो अपनी वकालत नहीं छोड़ना चाहते, बल्कि अब उसमें उत्पादक, निर्माता तथा वे लोग आने चाहिए जो इन बातोंको समझ सकें, इनमें सहायता पहुँचा सकें तथा अपनी तत्सम्बन्धी भावनाओंको व्यक्त कर सकें। वकालत करनेवाले वकील मौन कार्यकर्त्ता बनकर तथा चन्दा देकर सहायता कर सकते हैं। प्रकाशमें आनेकी उनकी इच्छाके साथ मेरी सहानुभूति है। किन्तु मैं उनसे अर्ज करूँगा कि वे अपनी सीमाओंको पहचानें। उनका दिन उस समय आयेगा जब कि राष्ट्र पुनः ऐसी स्थितिमें आ जाये कि वह न्याय और विधानके लिए कानूनी अदालतों तथा विधान सभाओंमें जा सके।
आज इनमें से किसीपर भी उसका विश्वास नहीं है क्योंकि वे इतनी भ्रष्ट हैं कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। जब सरकार और जनताके बीचका सवाल उठता तब कानून तथा कानूनी अदालतें दोनों न्याय नहीं कर पाते। उनकी उपयोगिताकी परीक्षा इन्हीं दोनोंके बीच प्रश्न उठनेपर ठीक-ठीक न्याय करनेकी उनकी योग्यतापर निर्भर करती है न कि इस बातपर कि वे लोगोंके ही विभिन्न दलोंमें कानूनका ठीक उपयोग कैसे करती हैं। दूसरे प्रकारका न्याय तो ऐसा ही है जैसे शेर मध्यस्थ बनकर मेमनोंको एक दूसरेको खा जानेसे या बीमारीके कारण मरनेसे इस उद्देश्यसे बचा ले कि वह उन सबका भक्षण कर सके।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ११-८-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
hvojz5b0we74hwte1nw81f4ttldf0db
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४७
250
186153
671592
644468
2026-08-18T15:46:54Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671592
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५१. भारतीय महिलाओंसे'''}}}}
{{left|प्रिय बहनो,}}
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने विदेशी वस्त्रोंके पूर्ण बहिष्कार के लिए आगामी ३० सितम्बर अन्तिम तारीख निश्चित की है। यह बहिष्कार बम्बईमें ३१ जुलाईको लोकमान्य तिलककी स्मृतिमें प्रज्ज्वलित बलिदानकी अग्निसे प्रारम्भ किया गया था। जिन मूल्यवान साड़ियों तथा पोशाकोंको आप अबतक बढ़िया और सुन्दर समझती रही हैं, उनके विशाल ढेरमें आग लगानेका श्रेय मुझे दिया गया था। मेरा विचार कि जिन बहनोंने उसके लिए अपने कीमती कपड़े दे दिये थे उन्होंने ठीक और समझदारीका काम किया था। जिस प्रकार प्लेगके कीटाणुओंसे युक्त वस्तुओंको नष्ट कर देना ही उनका सर्वोत्तम उपयोग है उसी प्रकार विदेशी वस्त्रोंका सर्वोत्तम उपयोग उन्हें नष्ट कर देना ही है। राजनीतिके शरीरको और भी भयानक रोगोंसे बचानेके लिए की गई यह एक शल्यक्रिया है।
भारतीय महिलाओंने पिछले बारह महीनोंमें मातृभूमिके लिए जबरदस्त काम किया है। आप लोग दयाके देवदूतोंकी तरह चुपचाप कार्य करती रहीं। आपने नकद राशि और कीमती आभूषण दिये। आप चन्दा एकत्र करनेके लिए घर-घर घूमीं। आपमें से कुछने तो धरना देनेमें भी सहायता की। आपमें से कुछ जो रंग-बिरंगी बढ़िया पोशाकें पहनती थीं और दिनमें कई बार अपनी पोशाकें बदलती थीं, अब सफेद और निष्कलंक किन्तु मोटी खादीकी साड़ियाँ पहनने लगी हैं। ये साड़ियाँ स्त्रीकी सहज पवित्रताकी याद दिलाती हैं। आपने यह-सब भारतके लिए, खिलाफतके लिए और पंजाब के लिए किया है। आपकी वाणी और कार्य में किसी प्रकारका छल नहीं है। आपका बलिदान सर्वथा शुद्ध है; उसमें क्रोध या घृणाका लेश भी नहीं है। मैं आपके सामने यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि भारत-भरमें आपने स्वतः प्रेरित होकर प्रेम-पूर्वक आन्दोलनके प्रति जो अनुकूल प्रतिक्रिया दिखाई उससे मुझे विश्वास हो गया है कि
ईश्वर हमारे साथ है। हमारा संघर्ष आत्मशुद्धिका संघर्ष है, यह इसी बातसे प्रमाणित हो जाता है कि भारतकी लाखों महिलाएँ सक्रिय रूपसे इसकी सहायता कर रही हैं।
आपने काफी दिया है, किन्तु अभी और भी देना आवश्यक है।तिलक स्वराज्य-कोषमें पुरुषोंने अधिक चन्दा दिया है। किन्तु स्वदेशीका कार्यक्रम तभी पूरा हो सकता है जब कि आप उसमें प्रमुख रूपसे भाग लें। “जबतक आप अपने सारे विदेशी कपड़े
नहीं दे डालतीं” तबतक बहिष्कार असम्भव है। जबतक उनमें आपकी रुचि रहेगी तबतक उन्हें आप छोड़ नहीं सकेंगी, उनका बहिष्कार नहीं कर सकेंगी। बहिष्कारका अर्थ है सम्पूर्ण परित्याग। भगवान् जो बच्चे हमें देता है हम उन्हें पाकर खुश रहते हैं और उसे भगवान्की कृपा मानते हैं, उसी प्रकार जो कपड़ा देशमें ही बन सकता है उससे हमें सन्तुष्ट रहना सीख लेना चाहिए। मैं तो ऐसी किसी माँको नहीं जानता जिसने किसी बाहरी व्यक्तिके कुरूप कहनेपर अपने बच्चेको फेंक दिया हो। भारतमें<noinclude></noinclude>
7gb7ch2rtjj310188vddbkk5pb4v5ag
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४८
250
186154
671597
644469
2026-08-18T15:59:24Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671597
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५१६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>निर्मित वस्तुओंके प्रति देशभक्त महिलाओंका भाव ऐसा ही होना चाहिए। आपके लिए तो भारतीय वस्त्रका मतलब हाथ-कता और हाथ-बुना वस्त्र ही हो सकता है, और इस संक्रान्ति-कालमें बहुतायतसे केवल मोटी खादी ही मिल सकती है। आप अपनी रुचिके अनुरूप आवश्यक कला-कौशलका प्रयोग करके उसे जितना बने सुन्दर बना लें। यदि आप कुछ महीनोंतक मोटी खादीसे ही सन्तुष्ट हो जायें तो हम आशा कर सकते हैं कि आगे चलकर फिर देशमें पुराने जमानेकी तरह वैसा महीन, मूल्यवान् और सुन्दर कपड़ा बनने लगेगा, जिसे एक समय संसार ईर्ष्यासे देखता रह जाता था। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि छः महीने भी यदि आपने इतना आत्मत्याग किया तो यह बात आपकी समझ में आ जायेगी कि जिसे आज हम कला कहते हैं वह बनावटी कला है; सच्ची कला केवल बाहरी आकारको नहीं देखती बल्कि जो-कुछ उसके पीछे है उसे भी देखती है। एक कला वह है जो नाश करती है और दूसरी वह है जो जीवन देती है। जो महीन कपड़ा हम पश्चिम या सुदूर पूर्वसे मँगाते हैं, वास्तवमें उसने हमारे लाखों भाई-बहनोंको खत्म कर दिया और हमारी हजारों बहनोंको शर्मनाक जिन्दगी बितानेके लिए मजबूर किया है। सच्ची कला कलाकारकी प्रसन्नता, परितृप्ति तथा पवित्रताकी द्योतक होती है और यदि आप हमारे बीच इस प्रकारकी कलाको पुनरुज्जीवित करना चाहती हैं तो आपमें जो श्रेष्ठ हैं उनके लिए फिलहाल खादीका उपयोग करना कर्त्तव्यरूप है।
स्वदेशीके कार्यक्रमकी सफलता के लिए न केवल खादीका उपयोग वरन् यह भी आवश्यक है कि आपमें से प्रत्येक अपनी फुरसतके समय चरखा काते। मैंने बालकों और पुरुषोंके लिए भी यही सुझाव दिया है। आज उनमें से हजारों रोजाना चरखा कात भी रहे हैं। किन्तु जैसा पहले होता था चरखा कातनेका काम प्रमुख रूपसे आप लोगोंको उठाना चाहिए। दो सौ वर्ष पूर्व भारतकी महिलाएँ न केवल घरकी बल्कि विदेशोंकी माँगको पूरा करनेके लिए भी कातती थीं। वे केवल मोटा सूत ही नहीं, दुनियामें किसी भी समय जो महीनसे-महीन सूत काता गया है वैसा महीन सूत भी कातती थीं। हमारे पूर्वज जितना महीन सूत कातते थे उतना महीन सूत आजतक कोई मशीन भी नहीं कात सकी। इसलिए यदि हमें इन दो महीनों में और उसके बाद खादीकी माँग पूरी करनी है तो आपको कताई-मण्डल बनाकर तथा कताईकी प्रतियोगिताएँ चलाकर भारतीय बाजारको हाथकते सूतसे पाट देना चाहिए। इस उद्देश्यके लिए आपमें से कुछको कातने, धुनने तथा चरखोंको दुरुस्त करनेमें सिद्धहस्त होना चाहिए। इसका अर्थ है निरन्तर परिश्रम करते रहना। आप
सूत कातनेको आजीविकाका साधन न समझेंगी। मध्य-वर्गके परिवारकी आय उससे बढ़ेगी। अलबत्ता बहुत ही गरीब स्त्रियोंके लिए यह आजीविकाका साधन है। चरखेको पहलेकी तरह विधवाओंका सहारा बनना है। किन्तु जो इस अपीलको पढ़ेंगी उनके सामने तो मैं चरखा यही कहकर पेश करना चाहता हूँ कि उसे चलाना आपका कर्त्तव्य और धर्म है। यदि भारतकी सभी सम्पन्न महिलाएँ प्रतिदिन एक निश्चित मात्रामें सूत कातने लगें तो उससे सूत सस्ता हो जायेगा और उसमें इतनी जल्दी आवश्यक सुन्दरता ले आयेंगी जितनी जल्दी कि अन्य उपायोंसे सम्भव नहीं।<noinclude></noinclude>
ch4y7i7a67dlb92d89d673swlft5t2l
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४९
250
186155
671600
644470
2026-08-18T16:07:07Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671600
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||भाषण: गयामें|५१७}}</noinclude>
इसलिए भारतकी नैतिक और आर्थिक मुक्ति प्रमुख रूपसे आपपर निर्भर करती है। भारतका भविष्य आपपर ही निर्भर है, क्योंकि भावी पीढ़ीका लालन-पालन आपके ही हाथमें है। आप चाहें तो भारतके बच्चोंका इस प्रकार लालन-पालन कर सकती हैं जिससे वे सादगी पसन्द, ईश्वरप्रेमी और वीर स्त्री-पुरुष बनें; और आप चाहें तो वे कमजोर, जीवनकी आँधी झेलनेके लिए अनुपयुक्त तथा उन महीन विदेशी वस्त्रोंका उपयोग करनेवाले भी बन सकते हैं जिन्हें छोड़ने में फिर वे कठिनाई महसूस करेंगे। आगामी कुछ सप्ताहोंमें मालूम हो जायेगा कि भारतकी महिलाएँ
किस मिट्टीकी बनी हैं। मुझे इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं कि आप क्या चुनेंगी। भारतका भाग्य जितना आपपर निर्भर करता है उतना उस सरकारपर नहीं, जिसने भारतका इतना शोषण किया है कि उसका खुद अपनेपर ही विश्वास नहीं रहा।महिलाओंकी प्रत्येक सभामें मैंने राष्ट्रीय प्रयत्नोंकी सफलताके लिए आपके आशीर्वाद-की माँग की है और मैंने ऐसा इस विश्वासके साथ किया है कि आप पवित्र हैं, आपको सादगी पसन्द है और आपमें आशीर्वाद देने योग्य धर्मपरायणता है। विदेशी वस्त्रोंका उपयोग छोड़कर और अपनी फुरसतके समय राष्ट्रके लिए नियमित रूपसे चरखा कातकर आप अपने आशीर्वादको निश्चय ही सफल बना सकती हैं।
{{right|आपका स्नेही भाई,<br>
'''मो॰ क॰ गांधी'''}}
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''यंग इंडिया,''' ११-८-१९२१|1em}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२५२. भाषण: गयामें'''<ref> गांधीजीने ९-३० बजे रातको एक सार्वजनिक सभा में भाषण दिया था जिसमें लगभग २०,००० व्यक्ति उपस्थित थे। उनके साथ मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना आजाद सुभानी भी थे।</ref>}}}}
{{right|१२ अगस्त, १९२१}}
'''महात्मा गांधीने श्रोताओंको सम्बोधित करते हुए कहा कि मुझे इस बातपर शर्म महसूस हो रही है कि में गो-रक्षा के प्रश्नपर भाषण देनेके लिए इलाहाबादसे यहाँ आया हूँ। वो मौलानाओंने<ref>मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना आजाद सुभानी जिन्होंने उनसे पहले भाषण दिये थे।</ref> आपको बताया कि उस विषयपर उनका धर्म क्या कहता है। कोई व्यक्ति गायत्री न जपने तथा सन्ध्या और गायकी रक्षा न करनेपर भी हिन्दू कहला सकता है। साथ ही हिन्दू धर्म आपको मुसलमानों या अंग्रेजों को मारनेके लिए भी नहीं कहता।आपको गायकी कुर्बानीसे होनेवाले दुःखको सहनेके लिए तैयार रहना चाहिए।'''<noinclude>{{dhr}}
{{smallrefs}}</noinclude>
t6mqew44fgqece6vn5r3a6ndjqv5hqo
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५०
250
186156
671605
644471
2026-08-18T16:14:08Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671605
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|५१८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
मैं दीर्घकालसे इस तथ्यपर जोर देता आ रहा हूँ कि मुसलमानोंके प्रति हिन्दुओंके वैरके कारण गोवध होता है। मान लो यदि गयाकी ६५,००० आबादी १०,००० मुस्लिमोंसे बलपूर्वक गोवध बन्द कराना चाहे तो जरूर मुसलमानोंमें से कोई आगे आकर कहेगा: “मैं तुम्हारे सामने ही गोवध करूँगा।”
'''मुसलमानोंके हाथोंसे गायको छीन लेना हिन्दुत्वके अनुकूल नहीं है। ‘गीता’ में कहा है कि जबरदस्ती करना धर्मानुकूल नहीं है और बलप्रयोगमें भी धर्म नहीं है। ‘रामायण’ और ‘गीता’ दोनोंसे यही निष्कर्ष निकलता है। धर्मका रहस्य शान्ति बनाये रखने में है न कि भाइयोंको बुरा-भला कहने में। आप प्रार्थना कर सकते हैं किन्तु बलप्रयोग नहीं कर सकते। यदि कोई हिन्दू इन सिद्धान्तोंके विरुद्ध चलता है तो उसके बारेमें कहा जा सकता है कि उसने ‘महाभारत’ और ‘मनुस्मृति’ दोनों ही नहीं पढ़े। हिन्दुओंको खिलाफत की रक्षा करनी चाहिए। यदि आप शान्ति और एकताके साथ कार्य करते हैं तो भारतीयोंके प्रति प्रेमको भावना उत्पन्न होगी। यदि आप खिलाफतका समर्थन करेंगे तो गोवध अपने आप समाप्त हो जायेगा। हिन्दुओंको ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि मुसलमान उनके दुश्मन हैं। बम्बईमें सर्वश्री छोटानी तथा खत्रीने सैकड़ों गायोंको बचाया। यदि आप गौओंको मुसलमान भाइयोंके विवेकपर छोड़ दें तो गोरक्षा हो जायेगी।'''
'''यदि सरकारी कर्मचारी आपका साथ नहीं देते तो आप उनपर न तो आक्रमण करें और न उन्हें गाली ही दें। आपका कर्त्तव्य है कि आप उन्हें प्यार करें।'''
'''तीसरा मुद्दा जिसपर मैं जोर देना चाहता हूँ, वह स्वदेशी है। बिहार एक सुन्दर और पवित्र स्थान है। एक समय था जब यहाँ बहुत व्यापार होता था। बिहारके बहुतसे लोगोंने ईस्ट इंडिया कम्पनीकी नौकरियाँ स्वीकार कर ली थीं। पहले-पहल मुझे यहाँ स्वदेशीका उपक्रम करनेमें बड़ी कठिनाई हुई थी। चम्पारनमें जिन बालकोंने स्वदेशीका अनुसरण किया उनका मजाक उड़ाया गया। यह ईश्वरकी महिमा है कि धीरे-धीरे इसकी आवश्यकता अनुभव की जा रही है। मैंने देखा कि एक (गयावाल) पण्डेका लड़का सिरसे पाँवतक विदेशी वस्त्र पहने है। मुझे इससे बड़ा दुःख हुआ। यह जानकर मेरे हृदयको बड़ा दुःख हुआ कि पण्डे लोग इतने नासमझ हो गए हैं। पण्डे तो धर्मके संरक्षक और संन्यासी हैं। उन्होंने आगे कहा: आप लोगोंको वेश्या-गमन और जुआ खेलना छोड़ देना चाहिए अन्यथा आपको स्वराज्यको आशा नहीं
करनी चाहिए।'''
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>
'''सर्चलाइट,''' २१-८-१९२१|1em}}<noinclude></noinclude>
706lti337tq9fi4h31na7vhm9zpxlku
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५१
250
186157
671613
644472
2026-08-18T16:25:06Z
अँजली चौधरी
2439
/* शोधित */
671613
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५३. पत्र: सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको'''}}}}
{{right|बिहार शरीफ<br>
१३ अगस्त [१९२१]<ref>गांधीजी १९२१ में इन्हीं दिनों बिहार शरीफमें थे।</ref>}}
{{left|प्रिय चार्ली,}}
मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले हैं। मैं जानता हूँ, सारे आन्दोलनकी योजना गरीबोंके प्रति सेवा-भावनाको लेकर बनाई गई है, इसलिए मेरा विदेशी वस्त्रोंकी होली जलाना गलत हो ही नहीं सकता। चूँकि विदेशी वस्त्रोंका अब हमारे लिए कोई उपयोग नहीं
रहा है, इसलिए उन्हें गरीबोंमें बाँट देना मुझे नितान्त अपमानजनक लगता है। यह तो वही वस्त्र है, जिसने देशमें गरीबी फैलाई और हजारों स्त्रियोंको शर्मनाक जिंदगी बितानेपर मजबूर किया। हजारों सड़ी-गली टोपियोंकी बात तो दूर रही, यदि रेशमी रूमालों, महीन साड़ियों और उनसे भी महीन कमीजोंको गरीबोंमें बाँट दिया जाये तो स्वयं गरीब ही यह नहीं समझ सकेंगे कि अचानक उनपर यह दया क्यों हो रही है। विदेशी वस्त्रोंको जलानेका प्रमुख उद्देश्य यह है कि हमने विचारपूर्वक गरीबोंको हानि पहुँचाकर अपनेको जो विदेशी वस्त्रोंसे सुसज्जित किया है, उनके प्रति हमारे हृदयमें अत्यन्त घृणा उत्पन्न हो। हाँ, मुझे उन विदेशी वस्त्रोंको पहनना पाप समझने में कोई बुराई नजर नहीं आती जिनका उद्देश्य भारतका अपमान करना और उसे गुलाम बनाना है। मैं इस समय इस प्रयत्नमें हूँ कि शल्यक्रिया हाथको दृढ़ रखकर की जाये जिससे वह सुचारु रूपसे हो सके। मैं उस वस्त्रका आदर करूँगा जिसे किसी यूरोपीय बहनने प्रेमके साथ तैयार किया हो, किन्तु फिर भी मैं उस निषिद्ध वस्त्रका उपयोग करनेको राजी नहीं हो सकता क्योंकि किसी व्यक्तिको माँके हाथसे भी ऐसा अपाच्य भोजन स्वीकार करनेके लिए तैयार नहीं होना चाहिए जिसे वह प्रेमके कारण अज्ञानवश दे रही हो। श्रीमती रॉबर्टसने मेरे लिए एक ऐसी चीज भेजी थी जिसमें उनकी दृष्टिसे, दूधके सब गुण मौजूद थे किन्तु जो गायके दूधसे नहीं बनाई गई थी। किन्तु जब मुझे मालूम हुआ कि वह दूधसे बनाई गई है तब मैंने तुरन्त उन्हें यह बात बताई और उसका उपयोग न करनेकी छूट माँगी। उन्होंने न केवल मेरे दृष्टि-कोणको समझा बल्कि गलतीके लिए क्षमा-याचना भी की। तथ्य यह है कि मैं जीवनमें अनुशासन और संयम चाहता हूँ। तथाकथित योगियों द्वारा अपने शरीरको दी जानेवाली यातनामें अक्सर उक्त गुण विकृतिके रूपमें दिखाई देते हैं। किन्तु उनके मूलतत्त्व अत्यधिक जाँच-पड़तालमें भी खरे उतरेंगे। तुम इसका ठीक अनुमान नहीं लगा सकते कि वे लोग जो पापीसे घृणा करते थे किस प्रकार चुपचाप अनजाने ही पापीके बजाय पापसे घृणा करने लगे हैं। पहली अगस्तको बम्बईकी अंग्रेज महिलाओंको [भारतीयोंसे सावधान रहनेको] चेताया गया था! किन्तु उस दिन स्टोक्स और एक<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
0s5d4bk61wci992zi58ub9972l2id3z
671614
671613
2026-08-18T16:26:38Z
अँजली चौधरी
2439
671614
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२५३. पत्र: सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको'''}}}}
{{right|बिहार शरीफ<br>
१३ अगस्त [१९२१]<ref>गांधीजी १९२१ में इन्हीं दिनों बिहार शरीफमें थे।</ref>}}
{{left|प्रिय चार्ली,}}
मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले हैं। मैं जानता हूँ, सारे आन्दोलनकी योजना गरीबोंके प्रति सेवा-भावनाको लेकर बनाई गई है, इसलिए मेरा विदेशी वस्त्रोंकी होली जलाना गलत हो ही नहीं सकता। चूँकि विदेशी वस्त्रोंका अब हमारे लिए कोई उपयोग नहीं रहा है, इसलिए उन्हें गरीबोंमें बाँट देना मुझे नितान्त अपमानजनक लगता है। यह तो वही वस्त्र है, जिसने देशमें गरीबी फैलाई और हजारों स्त्रियोंको शर्मनाक जिंदगी बितानेपर मजबूर किया। हजारों सड़ी-गली टोपियोंकी बात तो दूर रही, यदि रेशमी रूमालों, महीन साड़ियों और उनसे भी महीन कमीजोंको गरीबोंमें बाँट दिया जाये तो स्वयं गरीब ही यह नहीं समझ सकेंगे कि अचानक उनपर यह दया क्यों हो रही है। विदेशी वस्त्रोंको जलानेका प्रमुख उद्देश्य यह है कि हमने विचारपूर्वक गरीबोंको हानि पहुँचाकर अपनेको जो विदेशी वस्त्रोंसे सुसज्जित किया है, उनके प्रति हमारे हृदयमें अत्यन्त घृणा उत्पन्न हो। हाँ, मुझे उन विदेशी वस्त्रोंको पहनना पाप समझने में कोई बुराई नजर नहीं आती जिनका उद्देश्य भारतका अपमान करना और उसे गुलाम बनाना है। मैं इस समय इस प्रयत्नमें हूँ कि शल्यक्रिया हाथको दृढ़ रखकर की जाये जिससे वह सुचारु रूपसे हो सके। मैं उस वस्त्रका आदर करूँगा जिसे किसी यूरोपीय बहनने प्रेमके साथ तैयार किया हो, किन्तु फिर भी मैं उस निषिद्ध वस्त्रका उपयोग करनेको राजी नहीं हो सकता क्योंकि किसी व्यक्तिको माँके हाथसे भी ऐसा अपाच्य भोजन स्वीकार करनेके लिए तैयार नहीं होना चाहिए जिसे वह प्रेमके कारण अज्ञानवश दे रही हो। श्रीमती रॉबर्टसने मेरे लिए एक ऐसी चीज भेजी थी जिसमें उनकी दृष्टिसे, दूधके सब गुण मौजूद थे किन्तु जो गायके दूधसे नहीं बनाई गई थी। किन्तु जब मुझे मालूम हुआ कि वह दूधसे बनाई गई है तब मैंने तुरन्त उन्हें यह बात बताई और उसका उपयोग न करनेकी छूट माँगी। उन्होंने न केवल मेरे दृष्टि-कोणको समझा बल्कि गलतीके लिए क्षमा-याचना भी की। तथ्य यह है कि मैं जीवनमें अनुशासन और संयम चाहता हूँ। तथाकथित योगियों द्वारा अपने शरीरको दी जानेवाली यातनामें अक्सर उक्त गुण विकृतिके रूपमें दिखाई देते हैं। किन्तु उनके मूलतत्त्व अत्यधिक जाँच-पड़तालमें भी खरे उतरेंगे। तुम इसका ठीक अनुमान नहीं लगा सकते कि वे लोग जो पापीसे घृणा करते थे किस प्रकार चुपचाप अनजाने ही पापीके बजाय पापसे घृणा करने लगे हैं। पहली अगस्तको बम्बईकी अंग्रेज महिलाओंको [भारतीयोंसे सावधान रहनेको] चेताया गया था! किन्तु उस दिन स्टोक्स और एक<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
mso5nu9zwj1ytj24v2u80lbrbjl6tfq
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४८८
250
186261
671537
644600
2026-08-18T12:06:30Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
671537
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४५६|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{gap}}४. जहाँ राजकुमारके लिए कोई समारोह हो रहा हो, उस दिशामें कोई भूलचूकसे,
कौतूहलवश भी, न जाये ।
५. घरमें बैठकर सूत कातें और अगर न आता हो तो आठ घंटे शान्त चित्त
किसीके पास बैठकर सीख ले ।
६. प्रत्येक व्यक्ति अधिक नहीं तो थोड़ा समय भगवत् भजन अथवा बन्दगीमें अवश्य
व्यतीत करे। शहरके लोग ऐसा न समझें कि ईश्वर तो कहीं है ही नहीं
अथवा है तो भी राष्ट्रके कार्य में उसका नाम अथवा मदद माँगने की कोई जरूरत
नहीं है ।
७. राजकुमारके उतरनेका जो समय निर्धारित किया गया हो उसी समय एल्फिन्स्टन
रोडके पासवाले मैदानमें आप लोग विदेशी कपड़ोंकी होली करें; होली करनेके
लिए जहाँ-जहाँसे विदेशी कपड़े इकट्ठे न किये गये हों वहाँ-वहाँसे उन्हें इकट्ठा
किया जाये ।
८. चलती गाड़ी आदिसे किसीको बलपूर्वक न उतारें ।
९. मजदूर या नौकरियाँ करनेवाले दूसरे लोग छुट्टीके बिना काम बन्द न करें ।
१०. प्रत्येक कार्यमें मनुष्यको अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करनेकी छूट हो, तभी
हममें स्वराज्यकी योग्यता आयेगी ।
याद रखिए :
राजकुमारके स्वागतार्थ किये जानेवाले समारोहोंमें हम भाग नहीं लेनेवाले हैं,
उसका कारण हमें उनसे कोई व्यक्तिगत द्वेषभाव है सो नहीं; उन्होंने हमें कोई नुकसान
नहीं पहुँचाया है । उसका कारण यह है कि नौकरशाही उनका जो दुरुपयोग कर रही
है उससे हमें अलग रहना है। अतएव एक ओर जहाँ हमारा कर्त्तव्य स्वागत सम्मानका
बहिष्कार करना है वहाँ दूसरी ओर हमारा यह भी कर्त्तव्य है कि हम अपनेको
जोखिममें डालकर भी युवराजके शरीरकी रक्षा करें; हमें ऐसा कुछ नहीं करना है
जिससे उनका किंचित भी अपमान होता हो ।
{{Right|{{larger|'''मोहनदास करमचन्द गांधी'''}}}}
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
गुजराती, २०-११-१९२१}}<noinclude></noinclude>
d69bh1e708l88uak5jz3hl78v1h3ziz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४८९
250
186262
671540
644601
2026-08-18T12:17:11Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
671540
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८९. पत्र : हाजी सिद्दीक खत्रीको'''}}}}
{{Right|[ १७ नवम्बर, १९२१ के पूर्व]<ref>१. पत्र १७ नवम्बरको युवराजके बम्बई पहुँचनेपर किये जानेवाले प्रदर्शनोंके सम्बन्धमें लिखा गया था ।</ref>}}
भाईश्री अहमद हाजी सिद्दीक खत्री,
इसके साथ प्रस्तावका मसविदा भेज रहा हूँ । इसमें कुछ फेरफार करना हो तो
करना । 'यंग इंडिया 'में मैंने जो सुझाव दिया है उसे पढ़ जाना । उसके अनुसार सब
स्थानोंपर किसी प्रतिष्ठित मौलानासे हस्ताक्षर करवा कर पर्चे बांटे जायेंगे तो ठीक
होगा । १७ तारीखको समस्त हिन्दुस्तानमें सम्पूर्ण शान्ति रहे, इसीपर हमारी विजयका
आधार होगा । आजसे १७ तारीखतक अगर खूब काम किया जायेगा तो मुझे
दृढ़ विश्वास है कि १७ तारीखको सब कामकाज बन्द रहेगा और शान्ति रहेगी । इस
सम्बन्धमें हम पूरी तरह सत्यका ही सहारा लेंगे तभी सफल होंगे । यह जरूरी है कि
नेता लोग एकान्तमें और सार्वजनिक रूपसे एक ही बात करें ।
{{Left|हाजी सिद्दीक खत्री<br>
हिलाल मंजिल<br>
८५, अब्दुल रहमान स्ट्रीट}}
मूल गुजराती पत्र (एस० एन० ६१६२ ) की फोटो नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१९०. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''मेरी असंगतियाँ'''}}
एक पत्र लेखकने अपने पत्रमें कुछ युक्ति-संगत प्रश्न इस तीखे ढंगसे रखे हैं :
:'''{{gap}}"जब जुलू लोग अपनी आजादीके लिए उनपर अन्यायसे अपना कब्जा कर लेनेवाले ब्रिटिश लोगोंके खिलाफ उठ खड़े हुए थे तब आपने उनके उस कथित " बलवे " को दबाने के लिए अंग्रेजोंको मदद दी थी। क्या विदेशी शासन के जुएको उतार फेंकनेका प्रयत्न करना बलवा है ? जोन ऑफ आर्क<ref>२. १४१२-१४३१; फ्रांसीसी बालिका, जिसकी प्रेरणासे फ्रांसीसियोंने अंग्रेजोंको ओरलीन्ससे बाहर
खदेड़ा ।</ref> बलवाई थी ? क्या जॉर्ज वाशिंगटन<ref>३. १७३२ - ९९; अमरीकाके प्रथम राष्ट्रपति ।</ref> बागी थे ? क्या डि वलेरा<ref>४. एमॉन डि० वलेरा, आयरलैंडके प्रधान-मंत्री १९३८-४८, १९५१-५४; १९५६ से राष्ट्रपति ।</ref> भी बागी हैं ? आप कहेंगे कि जुलू लोगोंने मारकाटका अवलम्बन लिया था । तब में पूछता हूँ कि उनका उद्देश्य'''<noinclude>{{dhr|}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
aiggvl343xp9f94tely1r6m6nnvdrld
671541
671540
2026-08-18T12:17:53Z
Shivaniya shaw
4129
671541
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१८९. पत्र : हाजी सिद्दीक खत्रीको'''}}}}
{{Right|[ १७ नवम्बर, १९२१ के पूर्व]<ref>१. पत्र १७ नवम्बरको युवराजके बम्बई पहुँचनेपर किये जानेवाले प्रदर्शनोंके सम्बन्धमें लिखा गया था ।</ref>}}
{{Left|भाईश्री अहमद हाजी सिद्दीक खत्री,}}
इसके साथ प्रस्तावका मसविदा भेज रहा हूँ । इसमें कुछ फेरफार करना हो तो
करना । 'यंग इंडिया 'में मैंने जो सुझाव दिया है उसे पढ़ जाना । उसके अनुसार सब
स्थानोंपर किसी प्रतिष्ठित मौलानासे हस्ताक्षर करवा कर पर्चे बांटे जायेंगे तो ठीक
होगा । १७ तारीखको समस्त हिन्दुस्तानमें सम्पूर्ण शान्ति रहे, इसीपर हमारी विजयका
आधार होगा । आजसे १७ तारीखतक अगर खूब काम किया जायेगा तो मुझे
दृढ़ विश्वास है कि १७ तारीखको सब कामकाज बन्द रहेगा और शान्ति रहेगी । इस
सम्बन्धमें हम पूरी तरह सत्यका ही सहारा लेंगे तभी सफल होंगे । यह जरूरी है कि
नेता लोग एकान्तमें और सार्वजनिक रूपसे एक ही बात करें ।
{{Left|हाजी सिद्दीक खत्री<br>
हिलाल मंजिल<br>
८५, अब्दुल रहमान स्ट्रीट}}
मूल गुजराती पत्र (एस० एन० ६१६२ ) की फोटो नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१९०. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|'''मेरी असंगतियाँ'''}}
एक पत्र लेखकने अपने पत्रमें कुछ युक्ति-संगत प्रश्न इस तीखे ढंगसे रखे हैं :
:'''{{gap}}"जब जुलू लोग अपनी आजादीके लिए उनपर अन्यायसे अपना कब्जा कर लेनेवाले ब्रिटिश लोगोंके खिलाफ उठ खड़े हुए थे तब आपने उनके उस कथित " बलवे " को दबाने के लिए अंग्रेजोंको मदद दी थी। क्या विदेशी शासन के जुएको उतार फेंकनेका प्रयत्न करना बलवा है ? जोन ऑफ आर्क<ref>२. १४१२-१४३१; फ्रांसीसी बालिका, जिसकी प्रेरणासे फ्रांसीसियोंने अंग्रेजोंको ओरलीन्ससे बाहर
खदेड़ा ।</ref> बलवाई थी ? क्या जॉर्ज वाशिंगटन<ref>३. १७३२ - ९९; अमरीकाके प्रथम राष्ट्रपति ।</ref> बागी थे ? क्या डि वलेरा<ref>४. एमॉन डि० वलेरा, आयरलैंडके प्रधान-मंत्री १९३८-४८, १९५१-५४; १९५६ से राष्ट्रपति ।</ref> भी बागी हैं ? आप कहेंगे कि जुलू लोगोंने मारकाटका अवलम्बन लिया था । तब में पूछता हूँ कि उनका उद्देश्य'''<noinclude>{{dhr|}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
o6m24ormv0k5gg0385iy8fgy6gpj0ca
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९०
250
186263
671678
644602
2026-08-19T03:08:24Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
671678
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४५८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>:'''बुरा था या साधन ? उनके साधन भले ही बुरे रहे हों, परन्तु उनका उद्देश्य तो हरगिज बुरा नहीं था। अतः आप कृपा करके इस जटिल प्रश्नको समझाइए। इस पिछले महायुद्धमें भी, जिसमें जर्मन और आस्ट्रियाई वीर संसारको संयुक्त शक्तियोंसे ऐसी वीरताके साथ लड़ रहे थे, आपने अंग्रेजी फौजके लिए रंगरूट भर्ती किये थे। किसलिए ? जिन राष्ट्रोंने भारतका कुछ भी अहित नहीं किया था उनसे लड़नेके लिए ? जब कभी दो जातियोंमें युद्ध छिड़ता है तब, किसीके पक्षमें या विपक्षमें निर्णय करने के पहले, उन दोनों जातियोंकी बातें सुननी पड़ती हैं। पिछले महायुद्ध में हमें सिर्फ एकतरफा बातें मालूम होती थीं और सो भी उस राष्ट्रको मार्फत जिसकी ख्याति सच्चाई और ईमानदारीके लिए हरगिज नहीं है। आप हमेशा से ही सत्याग्रह और अहिंसाकी तरफदारी करते आये हैं। तब आपने लोगोंको ऐसे युद्धमें शामिल होनेके लिए, जिसकी बुराई और अच्छाईका उन्हें पता नहीं था और ऐसी जातिको ऊपर उठानके लिए, जो कीचड़में बुरी तरह लोट रही है, क्यों उत्साहित किया ? शायद आप कहेंगे कि अंग्रेजी नौकरशाहीपर आपका भरोसा था। किन्तु क्या ऐसे विदेशी लोगोंपर कोई भरोसा रख सकता है जिनके व्यवहार और वचनोंमें सदा इतना साफ विरोध रहा है ? और आपके सदृश उच्च गुण सम्पन्न व्यक्ति तो ऐसा कर ही नहीं सकता । अतः आप कृपया इस दूसरे जटिल प्रश्नका भी उत्तर दीजिए ।'''
:'''अब एक दूसरी बातपर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ । आप अहिंसा प्रतिपादक हैं। वर्तमान परिस्थितिमें तो हमें कड़ाईसे अहिंसाका पालन करना चाहिए। परन्तु जब हिन्दुस्तान आजाद हो जायेगा, तब किसी दूसरे राष्ट्रका हमपर हमला होनेपर भी, क्या हम हथियारसे हाथ खींच लेंगे और उनसे बिलकुल काम न लेंगे ? जब रेलवे, तार और जहाजोंके द्वारा हमारे देशकी पैदावारका दूसरे देशोंको अधिकाधिक भेजा जाना बन्द हो जायेगा, क्या तब भी आप इन वस्तुओंका बहिष्कार ही करेंगे ?"'''
मैंने अपने बारेमें असंगतिके कई इल्जाम पढ़े और सुने हैं । परन्तु मैं उनका
जवाब नहीं देता; क्योंकि उनका असर मेरे सिवा किसी दूसरेपर नहीं होता । तथापि
इन सज्जनने जो प्रश्न किये हैं वे आमतौरपर मार्केके और उत्तर देनेके योग्य हैं ।
हाँ, वे मेरे लिए नये तो कदापि नहीं हैं। परन्तु मुझे याद नहीं आता कि मैंने 'यंग
इंडिया 'में कभी उनका जवाब दिया है ।
{{C|'''मैंने महायुद्ध में सहायता क्यों दी?'''}}
सिर्फ जुलू जातिके बलवेके<ref>१. देखिए खण्ड ५ ।</ref> समय ही मैंने अपनी सेवाएँ अर्पण नहीं कीं, बल्कि
उससे पहले, बोअर युद्धके<ref>२. देखिए खण्ड ३ और ४ ।</ref>
समय भी, मैंने अपनी सेवाएँ दी थीं। और मैंने सिर्फ गत<noinclude>{{dhr|}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
elhfj2xaasuas6jyn3rtsesm4vvyf4y
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/४९२
250
186264
671682
644604
2026-08-19T03:42:49Z
Shivaniya shaw
4129
/* शोधित */
671682
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|४६०|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>शासन-प्रणालीको बिलकुल बुरा समझता हूँ और मानता हूँ कि इसको मिटाने या सुधा-
रनेके लिए देशको खास तौरपर कोशिश करनेकी जरूरत है । अपना सुधार वह स्वयं
नहीं कर सकती। हाँ, अब भी मैं यह जरूर मानता हूँ कि कितने ही अंग्रेज पदाधि-
कारी सच्चे हैं। परन्तु इससे मुझे कोई मदद नहीं मिल सकती; क्योंकि मैं समझता
हूँ कि वे भी मेरी तरह ही अन्धे हो गये हैं और भ्रममें पड़े हुए हैं। इसलिए इस
साम्राज्यको अपना कहने में या अपनेको इसका नागरिक कहने में मुझे जरा भी अभिमान
नहीं मालूम होता। बल्कि, इसके विपरीत, मैं तो अच्छी तरह देख रहा हूँ कि मैं
इस साम्राज्यमें एक अतिशूद्र अछूत हूँ । अतः जिस तरह एक हिन्दू अतिशूद्र अछूतके
लिए ईश्वरसे हिन्दू-धर्म या हिन्दू-समाजके मूलतः पुनर्संगठन या सर्वनाशकी प्रार्थना
करना सर्वथा न्याय है उसी तरह मेरे लिए परमात्मासे भी इस साम्राज्यके मूलतः
पुनर्संगठन या सर्वनाशकी प्रार्थना करनेके अतिरिक्त दूसरी गति नहीं है ।
अब अहिंसाके प्रश्नको लीजिए। यह और भी पेचीदा है। अहिंसाका जो अर्थ
मैं समझता हूँ वह तो मुझे प्रायः इन तमाम हलचलोंसे, जिनमें आज मैं लगा हूँ,
अलहदा रहने की ही प्रेरणा देता है । इधर मेरी आत्मा तबतक सन्तुष्ट नहीं होती
जबतक मैं एक भी अत्याचारको या थोड़े से भी दुःखको असहाय बनकर चुपचाप खड़ा-
खड़ा देखता रहूँ। लेकिन मुझ जैसे एक दुर्बल चित्त, अशक्त और दुःखी प्राणीके लिए
हरएक अन्यायको दूर करना या उन तमाम अत्याचारोंके दोषसे, जिन्हें मैं देखता हूँ,
अपनेको मुक्त रखना मुमकिन नहीं है । मेरा आत्मभाव मुझे एक तरफ ले जाता है
और देहभाव मुझे दूसरी तरफ खींचता है। हाँ, इन दोनों शक्तियों के प्रभावसे मनुष्य
मुक्त हो सकता है; परन्तु यह मुक्ति उसे धीरे-धीरे और एकके बाद एक कष्टकर
मंजिलसे पार करके ही प्राप्त हो सकती है। मैं यन्त्रवत् बिना विचारे कर्म करना
बन्द करके उस मुक्तिको नहीं पा सकता; बल्कि वह तो सारासार विचारके साथ
निष्काम रहकर कर्म करनेसे ही प्राप्त होगी। इस युद्धका यही निश्चित परिणाम
है कि देहभाव निरन्तर क्षय होता चला जाये, जिससे आत्मा पूर्ण रूपसे मुक्त हो
सके ।
{{C|'''कुछ और बातें'''}}
फिर मैं एक मामूली नागरिक था । मैं अपने साथियोंसे अधिक समझदार न
था । मैं तो अहिंसाका माननेवाला था; परन्तु दूसरे लोग उसके तनिक भी कायल
नहीं थे। सरकारको मदद देना उनका कर्त्तव्य था । उसका पालन वे नहीं करते थे
क्योंकि वे क्रोध और द्वेषके भावसे प्रेरित थे । वे अपने अज्ञान और दुर्बलताके कारण
मुँह मोड़ रहे थे । अतः एक साथी के नाते उन्हें ठीक-ठीक मार्ग बताना मेरा कर्त्तव्य
हो गया। मैंने उनको उनका कर्त्तव्य बताया, उन्हें अहिंसाका सिद्धान्त समझाया और
उन्हें जो ठीक लगे वही करना उनकी मर्जीपर छोड़ दिया । अहिंसाकी दृष्टिसे मुझे
अपने कार्योंका जरा भी अफसोस नहीं; क्योंकि स्वराज्यमें भी मैं उन लोगोंको जो
हथियार बाँधना और अपने देशकी रक्षा करना चाहेंगे ऐसा करनेकी सलाह देनेमें
जरा भी न हिचकूंगा ।<noinclude></noinclude>
r1nj55vzmw328g03lj60kattcvn6ttp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३६
250
186862
671755
645259
2026-08-19T09:44:35Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
671755
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४६३. पत्र: हेमप्रभादेवी दासगुप्तको'''}}}}
{{right|आश्रम<br>
९ जून, १९२८}}
{{left|प्रिय भगिनी,}}
आपका खत मिल गया। निखिल सोदेपुरमें आ गया इससे एक दृष्टिसे मुझे अच्छा लगता है। मेरा कुछ विश्वास है कि दूधसे, कटीस्नानसे और स्वच्छ हवासे और आरामसे उसको ठीक हो जायगा। कैसा भी हो हरगीज़ चिंता न करें। ईश्वरने
दीया है और जब चाहे तब ईश्वर ले जा सकता है। तारिणीके हाल कैसे है। जो दूसरे रोगी है उनको अगर क्षयकी व्याधि है तो और उसके पास ईतना धन है तो
पहाड़ पर भेज देना चाहिये।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
जी॰ एन॰ १६५७ की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''४६४. पत्र: केदारनाथ बनर्जीको'''}}}}
{{left|प्रिय मित्र,<br>
[९ जून, १९२८के पश्चात्]<ref>यह पत्र केदारनाथ बनर्जीके ९-६-१९२८ के पत्रके उत्तरमें लिखा गया था।</ref>}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला।
मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि पिताजीको कुछ अस्थायी दुःख हो तो भी आपको उन्हें छोड़कर ऐसी जगह चले जाना चाहिए जहाँ आप अपने सम्बन्धियोंकी मदद करने योग्य अच्छी आजीविका कमा सकें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|केदारनाथ बनर्जी<br>
नया गंज<br>
कानपुर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४०५६) की माइक्रोफिल्म से।
{{dhr|4em}}
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
bvk72866pde0ngst3rwnpemcf801j5s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३७
250
186863
671768
645260
2026-08-19T10:40:26Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
671768
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''४६५. शिक्षा-विषयक प्रश्न––२'''}}}}
प्रश्न: वास्तवमें तो आजके शिक्षकोंका काम डाकिये और चौकीदार जैसा है। उनका काम है विद्यार्थियों तक शिक्षा-शास्त्रियोंके लिखे ग्रन्थोंको पहुँचाना और फिर यह देखना कि विद्यार्थी उनका उपयोग ठीक-ठीक कर रहे हैं या नहीं। इसके उपरान्त आप शिक्षकसे कैसी योग्यताकी आशा रखते हैं?
अबतक तो शिक्षा-शास्त्रका विकास इसी हदतक किया गया है कि जो कठिन वाक्योंका अर्थ समझा सके, और लम्बे प्रकरणोंका सार बतला सके, वही शिक्षक है। इस आदर्शको हम अब क्यों स्वीकार न करें?
उत्तर: पाठ्य-पुस्तकें चाहे जितनी सरस क्यों न बना दी जायें मगर तो भी सच्चे शिक्षककी जरूरत तो रहती है। ऐसा मुझे लगता है। सच्चा शिक्षक केवल सार बतलाकर या कठिन वाक्योंका अर्थ बतलाकर कभी सन्तोष नहीं मानेगा। वह तो समय-समयपर पाठ्य-पुस्तकोंसे बाहर जाकर अपने सिखलानेका विषय विद्यार्थीके आगे चित्रकारके समान जीवन्तरूपमें खड़ा कर सकेगा। श्रेष्ठ पुस्तकका मिलान किसी श्रेष्ठ चित्रसे किया जा सकता है; मगर जिस प्रकार कुछ कम दर्जेकी कलाका होनेपर भी जिस तरह चित्रकारके कलमसे निकला चित्र फोटोग्राफसे बढ़ा हुआ माना जायेगा,
उससे उसमें कुछ विशेषता होगी, उसी तरह सच्चे शिक्षकके बारेमें मानना चाहिए। सच्चा शिक्षक अपने विषय में विद्यार्थीको प्रवेश कराता है। उसमें रस पैदा कराता है, और विद्यार्थीको वह विषय स्वतन्त्र रूपसे समझने लायक बनाता है। मेरी दृष्टिसे तो कठिन वाक्योंका अर्थ करनेवालेको और सार बतलानेवालेको शिक्षक माननेकी प्रथा आदर्श कहीं ही नहीं जा सकती। हमें तो परोपकारकी दृष्टि रखनेवाले सच्चे
शिक्षक तैयार करनेका प्रयत्न करना चाहिए। आज भी ऐसा नहीं है कि जहाँ-तहाँ ऐसे शिक्षक देखनेमें न आते हों।
प्रश्न: भड़ौंच शिक्षा परिषद् के अवसरपर आपने कहा था कि प्राथमिक शिक्षा मुफ्त भले ही हो किन्तु अनिवार्य नहीं होनी चाहिए। अच्छी वस्तु भी दबाई हुई प्रजापर जबरदस्ती नहीं लादी जानी चाहिए। आज देशकी शिक्षाकी व्यवस्था आपके हाथमें आ जाये तो क्या आप अपनी यह शिक्षा जिसमें खादी और दूसरे राष्ट्रीय उद्योगों को प्रधान स्थान होगा, अनिवार्य करेंगे या नहीं?
उत्तर: मैंने जैसी शिक्षाकी कल्पना की है वह शिक्षा भी अनिवार्य बना देनेकी हिम्मत मुझे अब भी अपने आपमें दिखाई नहीं देती। मैं मानता हूँ कि हमारे देशमें अभी बहुत दिनों तक इसकी बिलकुल जरूरत नहीं है। क्योंकि प्राथमिक शिक्षा आवश्यक हो, तो भी उसे ऐसा करनेसे पहले अभी बहुतसे काम करने बाकी हैं। मेरी मान्यता तो यह है कि यदि हम इस देशको रुचने लायक, प्रजाकी पोषिका शिक्षा देनेका साधन प्रजाके सामने रखें तो प्रजा उसे बिना प्रयास ही खुशी से स्वीकार कर लेगी।<noinclude></noinclude>
t6mgyxnp6nco3divpfae7ojkx3rjr67
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३८
250
186864
671776
645261
2026-08-19T11:52:17Z
अनुश्री साव
80
/* शोधित */
671776
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|४०६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>प्रश्न: आप क्या मानते हैं कि शिक्षकोंकी धार्मिक शिक्षा, अपनी दृष्टिके अनुसार जैसी पसन्द हो वैसी देनेका हक है?
उत्तर: एक तन्त्रमें रहनेवाले शिक्षकोंको खास अपनी-अपनी दृष्टिके अनुसार धार्मिक शिक्षा देनेका हक हो ही नहीं सकता। दूसरे विषयोंकी तरह जो रूपरेखा संचालकोंने धार्मिक शिक्षाकी बनाई हो, उसीको आधार मानकर धार्मिक शिक्षा दी जा सकती। इस रूपरेखाके अनुसार धार्मिक शिक्षा देनेका तरीका प्रत्येक शिक्षकका अपना ही होगा, किन्तु धर्मके विषय में संचालकोंने जो आदर्श बनाया होगा, शिक्षा उसीके अनुसार दी जा सकती है। इतना सच है कि कुछ विशेष पुस्तकोंको पढ़ लेनेवाला जिस तरह अमुक विषयोंकी शिक्षा दे सकता है, उस तरह धार्मिक शिक्षा पुस्तकके द्वारा दी
ही नहीं जाती। इस शिक्षाको देनेकी रीति और दूसरी शिक्षाओंसे भिन्न है। जब दूसरी शिक्षा बुद्धिके द्वारा दी जाती है, तब धार्मिक शिक्षा केवल हृदयके द्वारा ही दी जा सकती है। इसलिए जबतक शिक्षक धर्ममय न हो, तबतक वह धर्मकी शिक्षा न दे। किन्तु यों धार्मिक शिक्षा देनेका वाहन जुदा होनेपर भी उक्त शिक्षा देनेके बारेमें विशेष जानकारी होनेकी आवश्यकता है ही। जैसे कि जहाँपर अहिंसाको परम धर्म माना हो वहाँपर हिंसाका उत्तेजन देनेवाली शिक्षा नहीं दी जा सकती अथवा जहाँ सभी धर्मोके प्रति प्रेम, उदारता, सहिष्णुता रखनेका आदर्श स्वीकार
किया गया हो, वहाँ धर्मोके विरोधकी शिक्षा नहीं दी जा सकती। थोड़ेमें, जहाँ धार्मिक शिक्षा देनेकी आवश्यकता स्वीकार की गई है, वहाँ उसके बारेमें अराजकताको स्थान
नहीं होना चाहिए।
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''नवजीवन,''' १०-६-१९२८}}
{{c|{{larger|'''४६६. बारडोली यज्ञ'''}}}}
बारडोलीमें चलनेवाला सत्याग्रह एक तरहका यज्ञ ही है। पारमार्थिक कार्यमात्र यज्ञ कहलाता है। बारडोलीके किसान व्यक्तिगत स्वार्थके लिए नहीं किन्तु सामाजिक लाभके लिए, स्वाभिमानके लिए लड़ रहे हैं। इसलिए यह यज्ञ है। आहुति भी उसमें रोज पड़ रही है। अन्तिम आहुतिकी खबर अभी-अभी आई है। वह इस प्रकार है:<ref>यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इसके अनुसार ४० पटेलों और आठ तलाटियोंने सरकारी नीतिकी अराजकताके प्रति विरोध व्यक्त करनेके लिए इस्तीफे दे दिये थे और परिणामस्वरूप सरकारने और भी दमन करने की धमकी दी थी।</ref>
सरकारकी विज्ञप्तिका यह करारा जवाब गिना जायेगा। पटेलों और तलाटियोंने इस प्रकार जो वीरता दिखलाई है, मैं उसके लिए उन्हें धन्यवाद देता हूँ। मैं आशा करता हूँ कि वे इस निश्चयसे डिगेंगे नहीं, और न उसके लिए कभी पछतायेंगे ही।
सरकारी नौकरीका मोह टूटना बहुत जरूरी है। जिसके हाथ-पैर मजबूत हैं और जो उद्यमी हैं, उसके लिए ईमानदारीसे रोटी कमानेमें कहीं मुश्किल नहीं होती।
{{smallrefs}}<noinclude></noinclude>
ma90xcz1hth1nau9fdv6etxbiidhdbg
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५५९
250
186985
671594
645382
2026-08-18T15:57:16Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
671594
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|१५५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
यूनिट, २६० पा० पा०, २६४
यूरोप; की प्रस्तावित यात्रा, १२७,
१५९-६०, १७४-७५, १९०, २०३,
२०७, २१६, २१७, २२२, २३८,
२६२,
२४०, २४८, २५२-३, २५९,
२६५, २६७-६८, २८३-८५
रामचन्द्रन, जी० ५५, २१३, ४३७
रामदेव, ४३४
रामनन्दन, २६९
रामनाथ, ४८९
५२७
योगवाशिष्ठ, ९४
{{C|र}}
रचनात्मक कार्य, ४५, १८३
रटर, श्रीमती रचेल एम०, ४०१
रणछोड़लाल अमृतलाल, २६५
रति, १८९
रमजान, १७१
रमणभाई नीलकंठ, सर, की गुजरातके
प्रति सेवाएँ, ९६, १०७-८
रविशंकर, महाराज, ३०२, ३३४ रहमत,
४६१
राजकिशोरी, २६९, २७०
राजगोपालाचारी, च० ३३, ७५ पा० टि०,
८८, १२१, १२७, १५२ पा० टि०,
१५३, १६०, १६६, २२६, २७८,
३६७, ३७२, ४३६, ४५०, ४६९,
४७३
राजचन्द्र, देखिए मेहता, रायचन्द रावजीभाई
राजनीति, और समाजसेवा, १०७
राजेन्द्रप्रसाद, ९९, २४९, ४४६
राज्य, -द्वारा उद्योगकी व्यवस्था, १३९
राधाकृष्णन, एस०, २११
शरीर, ४८०
रामनाथन्, एस०, ८८, २४२, ३०३, ३०४
पा०, टि०, ३५५, ३५६, ४३६, ४५०
रामायण, ८१, १७६, ३०७, ३६४, ४८०
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
रामचन्द्रन्, १६१
रामेश्वरदास, १८
राय, डॉ०, ५४, ८०, १०१, ४१४
राय, डा० विधानचन्द्र, १०४, १३२, ३०५
राव, एन० राम, १५२
राव, टी० नागेश, २४०
राव, टी० वी० केशव, ३२८
राव, बी० शिवा, १९४
राव, सी० बालाजी, ४८, २३३, ३२२
राव, सी० रंगनाथ, ३६८
रावण, १७६, १८२, ४८०
राष्ट्रीय मुस्लिम विद्यालय, १३२
राष्ट्रीय शिक्षण मण्डल, ३७८
राष्ट्रीय शिक्षा; -सत्याग्रह आश्रममें, ४२४-
२५
राष्ट्रीय संस्थाएँ; -और ऐच्छिक अनुशासन,
३०९-१०
राष्ट्रीय सप्ताह, १८३, १८४ पा० टि० १९१,
२३९, २४७
रिच, एल० डब्ल्यू०, ६४, ६८
रिच, श्रीमती एल० डब्ल्यू०, ६४
रामनाम, ४१, ८१, ११२, २७१, ३१४;
-और दुखियोंकी सेवा, ३१५; -का
प्रभाव, १७६-७७
रामविनोद, ३५७
राम (भगवान), ११२, १७६, १७७१७८,
१९५, १९६, ३१४, ४०९ -ईश्वर
है, १७६-७८; का निवास स्थान<noinclude></noinclude>
pwdywnp00tgqxlmjz5xkfrptl0kmoso
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/५६३
250
186989
671674
645386
2026-08-19T02:29:43Z
Lado Shaw
6039
/* शोधित */
671674
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" /></noinclude>{{rh||सांकेतिका|
५३१}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
साइमन कमीशन, ३६, ४७, १००, १०६,
१६३, पा० टि०, ३९९, ४१३;
-का बहिष्कार, ९, १० पा० टि०,
१५-१६, २०
सादगी, का आदर्श, १५१
सोहरा, २१६
सामंजस्य, -विभिन्न जातियों और राष्ट्रोंमें, स्टेंडेनथ, फ्रान्सिस्का, २०८, २९२, ४५२
१३१
साराभाई, अनसूयाबहन, १५६, पा० टि०,
३०७, -द्वारा कल्याण कार्य, २४५-४७
साराभाई, अम्बालाल, १२ पा० टि०, १८९,
२२२, २२८, २६८
सावरकर, विनायकराव, ६८ पा० टि०
सिंह, सरदारनी एम० एम०, २०९
सिख, ५०, १५३
सिद्धान्त रहस्य, ४०९
सिन्हा, लॉर्ड, १६; - को श्रद्धांजलि, ९६,
१०८
सीता, ४०
सीता (रामायणकी), १७६
पा० टि०
स्टेंडेनथ, फेड्रिक, २०८, २९२, ४५२ पा० टि०
स्टेच्युटरी कमीशन, देखिए साइमन कमीश
स्टेट्मेन, ४१३, ४८८
स्टोप्स, डा० मेरी, २१९, २६२
स्टोरी ऑफ बारडोली, ३७० पा० टि०
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
सेवन मंथ्स विद महात्मा गांधी, ४७३
सोराबजी, रुस्तमजी, २७०
स्कडर, एडा एस०, १०२
स्टार, डब्ल्यू० बी०, ९०
स्त्रियाँ और खादी, २०५
स्मट्स गांधी समझौता, देखिए गांधी-स्मट्स
समझौता
स्मार्ट, ४८७
स्मिथ, विन्सेंट, ४१७
स्मृतियाँ; और वर्णधर्म, ४२२
स्लेटर, प्राध्यापक गिलबर्ट, २२९ पा० टि०
सुधारक, -आदर्शों और सिद्धान्तोंका कड़ाईसे स्लेड,
मेडेली, देखिए मीराबहन
पालन करें, ८
सुब्वैया, ४५०, ४५५
सुब्रह्मण्यम्, के० एस० ४५५
सुब्रह्मण्यम्, के० बाल, ६६
सुमति, ३३७
सुमन्त, ३८७, ४७६
स्वच्छता, का आधार आध्यात्मिक प्रयास,
४७२
स्वतन्त्रता, देखिए स्वराज्य
स्वदेशी, १६४, १६७, ४२२, ४४०, ४६८,
४८५
स्वदेशी लीग, २०७, २२२
सुरेन्द्र (नाथ), ३१७, ४२९, ४३६, ४३८, स्वराज्य, ४६
४५४
सूरजभान, ७०, १०३
सेन, भूपेन्द्र नारायण, १०३
सेनगुप्त, जे० एम०, ३५३, ४०१, ४५५, ४६८
सेन्ट्रल क्रिश्चियन एडवोकेट, ३१३ पा० दि०
स्वराज्य, ७, ३८, ४७, ४९, ७५, ११०,
८, १६४, १८३, १८४, १९४,
.८, ३४६, ३५६, ४१३, ४१५,
१६, ४२५, ४४१; -और अनुशासित
र शान्तिपूर्ण प्रतिरोध, ९८; -और<noinclude></noinclude>
6eu3gqy9flan8lv9t78lwkf0nuss8u4
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१५९
250
186992
671543
645392
2026-08-18T12:30:22Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671543
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|'''१३७. पत्र : रैहाना तैयबजीको'''}}
{{right|१९ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय रैहाना,}}
निःसन्देह तुम जब आना चाहो आ सकती हो और जितने दिन यहाँ रहना चाहो रह सकती हो।
{{left|सस्नेह,}}
{{right|बापू}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ९६०७) की फोटो नकलसे।
{{c|'''१३८. पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको'''}}
{{right|साबरमती<br>
आश्रम<br>
१९ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय च॰ रा॰,}}
आपका पत्र मिला। आपने चूँकि बादामों और बेचारी मूँगफलियोंको हिमालयकी पहाड़ी जातियोंका आहार बताते हुए व्यर्थका विरोध प्रकट करते हुए लम्बी चौड़ी हाँकी है, इसलिए पथ्य–विज्ञानके सम्बन्धमें आपकी कोई सुनवाई नहीं हो सकती। ध्यान रखियेगा कि यह प्रयोग मात्र इसलिए स्थगित किया गया है कि मैं तथाकथित डाक्टरी रायके दबावमें न आकर फिरसे इसे चालू कर सकूँ। मैंने कमसे–कम छः साल तक कच्ची मूंगफलियों पर निर्वाह किया है। मुझे तो ऐसा कोई कष्ट कभी
नहीं हुआ जैसा आपने बताया है। खैर, इसके बारेमें फिर लिखूंगा।
यूरोप यात्राके सम्बन्धमें आपकी क्या राय है? मैं रोलाँसे मिलनेके लिए उत्सुक हूँ। वह मुझे यूरोपके सबसे अधिक बुद्धिमान् व्यक्ति लगते हैं। वह मुझमें बहुत ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। यदि उन्हें ऐसा लगे कि किसी एक चीजमें भी मेरी राय गलत है, तो इससे उन्हें बड़ा कष्ट होता है। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम न मिल सके तो यह बड़े दुःखकी बात होगी। यही एक कारण है जो मुझे दूसरी सारी चीजोंसे अधिक विचलित किये हुए है। शेष सब गौण हैं।
मुझे नहीं मालूम कि एन्ड्रयूजने आपको क्या लिखा है। परन्तु आपकी रायका मेरे लिये उतना ही महत्व होगा जितना एन्ड्रयूजकी रायका। इसलिए आप निडर होकर कहिये कि आप मुझसे क्या करनेकी आशा करते हैं।<noinclude></noinclude>
sexz0kkz90jdmu2iu29n1achnim4ee5
671546
671543
2026-08-18T12:37:46Z
आदेश यादव
3609
671546
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|'''१३७. पत्र : रैहाना तैयबजीको'''}}
{{right|१९ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय रैहाना,}}
निःसन्देह तुम जब आना चाहो आ सकती हो और जितने दिन यहाँ रहना चाहो रह सकती हो।
{{left|सस्नेह,}}
{{right|बापू}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ ९६०७) की फोटो नकलसे।
{{c|'''१३८. पत्र : च॰ राजगोपालाचारीको'''}}
{{right|साबरमती<br>
आश्रम<br>
१९ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय च॰ रा॰,}}
आपका पत्र मिला। आपने चूँकि बादामों और बेचारी मूँगफलियोंको हिमालयकी पहाड़ी जातियोंका आहार बताते हुए व्यर्थका विरोध प्रकट करते हुए लम्बी चौड़ी हाँकी है, इसलिए पथ्य–विज्ञानके सम्बन्धमें आपकी कोई सुनवाई नहीं हो सकती। ध्यान रखियेगा कि यह प्रयोग मात्र इसलिए स्थगित किया गया है कि मैं तथाकथित डाक्टरी रायके दबावमें न आकर फिरसे इसे चालू कर सकूँ। मैंने कमसे–कम छः साल तक कच्ची मूंगफलियों पर निर्वाह किया है। मुझे तो ऐसा कोई कष्ट कभी
नहीं हुआ जैसा आपने बताया है। खैर, इसके बारेमें फिर लिखूंगा।
यूरोप यात्राके सम्बन्धमें आपकी क्या राय है? मैं रोलाँसे मिलनेके लिए उत्सुक हूँ। वह मुझे यूरोपके सबसे अधिक बुद्धिमान् व्यक्ति लगते हैं। वह मुझमें बहुत ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। यदि उन्हें ऐसा लगे कि किसी एक चीजमें भी मेरी राय गलत है, तो इससे उन्हें बड़ा कष्ट होता है। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम न मिल सके तो यह बड़े दुःखकी बात होगी। यही एक कारण है जो मुझे दूसरी सारी चीजोंसे अधिक विचलित किये हुए है। शेष सब गौण हैं।
मुझे नहीं मालूम कि एन्ड्रयूजने आपको क्या लिखा है। परन्तु आपकी रायका मेरे लिये उतना ही महत्व होगा जितना एन्ड्रयूजकी रायका। इसलिए आप निडर होकर कहिये कि आप मुझसे क्या करनेकी आशा करते हैं।<noinclude></noinclude>
p3wd5gw4dpk7vm7wsytnlgzdu10irqj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६०
250
186994
671545
645394
2026-08-18T12:37:12Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671545
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१२८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
बहुतसे लोगोंको बड़ा दुःख हुआ कि मैं १७ तारीखको नहीं मरा... शायद मैं भी उनमें से एक हूँ। एक तरहकी मौत तो शायद मैं मर ही चुका। आगे देखें क्या होता है।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१११) की फोटो–नकलसे।
{{c|'''१३९. पत्र : एम॰ आर॰ माधव वारियरको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। इतनी दूरीसे आपका दिशा–निर्देशन कर सकना कठिन है। परन्तु मेरा सुझाव है कि आप जहाँ तक हो सके धीमी गतिसे लेकिन सावधानी से अपना काम बराबर करते रहें। यदि आप महत्वाकांक्षापूर्ण किसी योजनापर काम शुरू कर देंगे तो आप देखेंगे कि आगे चलकर वह आपके लिए झंझट बन जायेगी।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीयुत एम॰ आर॰ माधव वारियर<br>
बी॰ ए॰ एल॰ एल॰ बी॰<br>
अध्यक्ष, नगरपालिका परिषद्<br>
क्विलन<br>
त्रावणकोर}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११५) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
fkupkixdtsbqhd13cb90lnfxqhewbrx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६१
250
186996
671548
645396
2026-08-18T12:40:29Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
671548
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>
१४०. पत्र : ना० २० मलकानीको
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मलकानी,}}
तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हें मेरा तार<ref> देखिए "तार : ना० २० मलकानीको", १९-३-१९२८।</ref> अवश्य मिला होगा। मैं अपने आपको
इस बात के लिए राजी नहीं कर पाता कि तुम सिर्फ अपने गुजारेके लिए कालेजमें
रहो। बाढ़ सहायता कोषसे तुम्हें निर्वाहके लिए कुछ दिया जाये, इसमें मुझे कोई
दोष नहीं दिखाई देता । इस सम्बन्धमें मैं ठक्कर बापासे लिखा-पढ़ी कर रहा हूँ और
अगर तुम्हारी वर्तमान स्थितिमें किसी प्रकारका कोई फेरफार किये बिना ऐसा किया
जा सके, तो अवश्य किया जाना चाहिए। तुम्हें रुपया चाहे मुझसे मिले अथवा बाढ़
सहायता कोषसे, होगा वह सार्वजनिक कोष में से ही । " अवैतनिक " शब्दको जिस अर्थ में
हम प्रयुक्त करते हैं उस प्रकारकी अवैतनिक सेवाके बदले में कुछ लेने में शर्म नहीं
करनी चाहिए। मजदूरको अपनी मजदूरी मिलनी ही चाहिए और जब सेवक अपनी
मजदूरीसे ज्यादा कुछ नहीं लेता तब उसकी सारी सेवाएँ अवैतनिक ही हैं । भारतके
अन्य हिस्सों में तुम्हारी सेवाओंके लिए सामान्यसे अधिक देना होगा; यह दुर्भाग्यकी
बात है, लेकिन अपरिहार्य है । यदि तुम्हें सुविधापूर्वक बाढ़ कोषसे मानदेय न दिया जा
सके तो उसके भुगतानकी जिम्मेदारी मेरी होगी। परन्तु मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे
बताओ कि तुम्हें कितनेकी आवश्यकता होगी ।
ठक्कर बापाने मुझे बताया है कि वे भी आश्रमसे तुम्हारे पास एक अच्छा
कार्यकर्त्ता भेजनेवाले हैं तथा एक वे तुम्हारे पास पहले ही छोड़ आये थे । पर यदि
तुम्हारे मनमें किसी व्यक्ति विशेषका नाम हो, तो उसे बतानेमें कृपया संकोच मत
करना; मैं देखूंगा कि क्या वह तुम्हें दिया जा सकता है ।
{{right|हृदयसे तुम्हारा<br>
बापू}}
अंग्रेजी (जी० एन० ८८४) की फोटो नकलसे।<noinclude>३६-९
{{smallrefs}}</noinclude>
5tpb6y3zc1qya8nas6rmb8tb7nu0eiv
671550
671548
2026-08-18T12:46:25Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671550
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|'''१४०. पत्र : ना॰ र॰ मलकानीको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मलकानी,}}
तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हें मेरा तार<ref> देखिए "तार : ना॰ र॰ मलकानीको", १९-३-१९२८।</ref> अवश्य मिला होगा। मैं अपने आपको इस बातके लिए राजी नहीं कर पाता कि तुम सिर्फ अपने गुजारेके लिए कालेजमें रहो। बाढ़ सहायता कोषसे तुम्हें निर्वाहके लिए कुछ दिया जाये, इसमें मुझे कोई दोष नहीं दिखाई देता। इस सम्बन्धमें मैं ठक्कर बापासे लिखा–पढ़ी कर रहा हूँ और अगर तुम्हारी वर्तमान स्थितिमें किसी प्रकारका कोई फेरफार किये बिना ऐसा किया
जा सके, तो अवश्य किया जाना चाहिए। तुम्हें रुपया चाहे मुझसे मिले अथवा बाढ़ सहायता कोषसे, होगा वह सार्वजनिक कोष में से ही। "अवैतनिक" शब्दको जिस अर्थमें हम प्रयुक्त करते हैं उस प्रकारकी अवैतनिक सेवाके बदलेमें कुछ लेनेमें शर्म नहीं करनी चाहिए। मजदूरको अपनी मजदूरी मिलनी ही चाहिए और जब सेवक अपनी मजदूरीसे ज्यादा कुछ नहीं लेता तब उसकी सारी सेवाएँ अवैतनिक ही हैं। भारतके अन्य हिस्सोंमें तुम्हारी सेवाओंके लिए सामान्यसे अधिक देना होगा; यह दुर्भाग्यकी बात है, लेकिन अपरिहार्य है। यदि तुम्हें सुविधापूर्वक बाढ़ कोषसे मानदेय न दिया जा सके तो उसके भुगतानकी जिम्मेदारी मेरी होगी। परन्तु मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बताओ कि तुम्हें कितनेकी आवश्यकता होगी।
ठक्कर बापाने मुझे बताया है कि वे भी आश्रमसे तुम्हारे पास एक अच्छा कार्यकर्त्ता भेजनेवाले हैं तथा एक वे तुम्हारे पास पहले ही छोड़ आये थे। पर यदि तुम्हारे मनमें किसी व्यक्ति विशेषका नाम हो, तो उसे बतानेमें कृपया संकोच मत करना; मैं देखूंगा कि क्या वह तुम्हें दिया जा सकता है।
{{right|हृदयसे तुम्हारा<br>
बापू}}
अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ८८४) की फोटो नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}
३६-९</noinclude>
2evk935hwqw05vr3nihzlz98cs5qxjd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६२
250
186997
671554
645397
2026-08-18T12:53:32Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671554
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|'''१४१. पत्र : सुरेशचन्द्र बनर्जीको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय सुरेश बाबू,}}
जितने कतैयोंकी आप सेवा करते हैं, उसके सम्बन्धमें मन्त्रीका पत्र मैंने देखा है। क्या आप कतैयोंके पास स्वयं जाना उतना ही आवश्यक नहीं समझते जितना कि आप अपनी किताबों को पूरी तरहसे व्यवस्थित रूपमें रखना आवश्यक समझते हैं? यदि आप यह सावधानी नहीं बरतते तो एक दिन आपकी यह संस्था ताशके पत्तोंके घरकी तरह ढह जायेगी। सप्ताहके किसी विशेष दिन किसका सूत आपको मिला, यह महत्वकी बात नहीं है; यह बात अवश्य महत्वकी हैं कि आप उन लोगोंके पास, जो वास्तव में कातते हैं, किसी विश्वसनीय व्यक्तिको भेजें, जो उनसे बात करके उनकी कठिनाइयोंका पता लगाए। और निश्चय ही यह न तो असम्भव कार्य है और न कोई बहुत बड़ा काम। आपका काम तो इतना ही है कि जब कतैये अपना सूत दलालको बेचकर वापस
जा रहे हों, आप उनके पीछे–पीछे उनके घर तक चले जायें। हो सकता है कि वे आपसे एक बार कतरा जायें, पर वे हमेशा आपसे नहीं कतरायेंगे। ज्यों ही आप परसे उनका अविश्वास दूर हो जायेगा, वे आप पर भरोसा करने लगेंगे। आपके पास कमसे–कम कुछ ऐसे ईमानदार दलाल अवश्य होने चाहिए जो आपके सन्देशवाहकको ऐसे हर घरमें जहाँसे वे सूत खरीदते हैं, ले जानेपर कोई एतराज न करें। और यदि यह इतनी आसान बात आपकी सामर्थ्यसे बाहर है, तो जाहिर है कि आप पूरी तरहसे दलालोंकी दयापर निर्भर हैं; वे तो चाहें जब अपना यह काम बन्द कर सकते हैं अथवा ऐसी शर्तें लगा सकते हैं, जिनको मानना या तो असम्भव होगा या वे आपके स्वाभिमानको ठेस पहुँचानेवाली होंगी। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मेरे कहनेपर समय–समय पर श्री
बैंकर जो सलाह देते रहे हैं, आप उसका महत्व महसूस करें।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११३) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
tvhy8wtkhsm3rjsskz8ug4xk0vkvfmb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६३
250
186999
671556
645399
2026-08-18T13:02:24Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671556
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|'''१४२. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय जवाहर,}}
मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले हैं। मैं यह पत्र तुम्हारे द्वारा उल्लिखित मित्रको सन्देश<ref>देखिए अगला शीर्षक।</ref> भेजने का वायदा पूरा करनेके लिए लिख रहा हूँ। उन्होंने अब सीधा मुझे पत्र लिखा है पर चूँकि सन्देश भेजनेका वायदा मैंने तुमसे किया था, मैं पत्रके साथ सन्देश तुम्हें ही भेज रहा हूँ;
आशा है कि बहिष्कार और मिलों सम्बन्धी मेरे लेख तुम ध्यानसे पढ़ रहे होगे। मैं मिल–मालिकोंसे भी सलाह मश्विरा कर रहा हूँ। वे किसी फैसलेपर पहुँचेंगे भी या नहीं, मैं नहीं जानता। पर यदि तुम्हें कहीं भी गलती या कमजोरी नजर आये तो मुझे अवश्य बताना।
कमला कैसी चल रही है? गर्मियोंमें तुम उसे कहाँ रखनेका इरादा कर रहे हो?
{{right|हृदयसे तुम्हारा}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११६) की फोटो–नकलसे।
{{c|'''१४३. सन्देश<ref>पिछले शीर्षकका सह–पत्र।</ref>'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
जबतक मुख्य कारण अर्थात् सशक्तों द्वारा अशक्तोंके शोषणको समाप्त नहीं किया जाता, तबतक विभिन्न जातियों और राष्ट्रोंमें परस्पर जीवन्त सामंजस्य नहीं स्थापित हो सकता। 'योग्यतम ही टिकता है' इस तथा कथित सिद्धान्तकी व्याख्यामें संशोधन अवश्य किया जाना चाहिए।
{{right|(ह॰) मो॰ क॰ गांधी}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११७) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
1vtm7u2hmoe256i1y65ph4rsc2xyh13
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६४
250
187001
671558
645401
2026-08-18T13:10:50Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671558
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|'''१४४. पत्र : मॉर्सेल केपीको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मिला। पत्रके मिलनेसे पहले मुझे हम दोनोंके ही मित्र पण्डित जवाहरलाल नेहरूके जरिये आपका सन्देश मिल चुका था। चूँकि मैंने आपका पत्र आनेसे पहले ही उनसे वायदा कर लिया था, मैंने अपना सन्देश<ref>देखिए पिछला शीर्षक</ref> उनकी मार्फत भेज दिया है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|मॉर्सेल केपी<br>
७८ रूई डि एजोम्पशन<br>
पेरिस (फ्रान्स)}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६४) की फोटो–नकलसे।
{{c|'''१४५. पत्र : वि॰ च॰ रायको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय डा॰ राय,}}
आपका पत्र मिला; उसके लिए धन्यवाद।
डा॰ अन्सारीके आगमनसे सम्बन्धित अखबारोंमें छपा समाचार बिलकुल ही निन्दात्मक है। इसके कारण मेरे बहुतसे मित्रोंको चिन्ता हुई और मुझे जोहानिसबर्ग और श्याम तकसे आये समुद्री तारोंका उत्तर देना पड़ा। आपने शायद अब सही बात जान ली होगी कि डा० अन्सारीके आगमनका मेरे स्वास्थ्यसे बिलकुल सरोकार नहीं था। यदि ऐसा होता तो आपको भी, जो मेरे शरीरके रक्षकोंमें से एक हैं, इस सम्बन्धमें अवश्य ही आश्रमसे सीधे कुछन–कुछ खबर मिल गई होती। जमनालालजी और डा॰ जाकिर हुसैनके साथ डा॰ अन्सारी केवल राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय के सिलसिले में
ही यहाँ आये थे और चूंकि वे आये ही थे और अपने साथ डाक्टरीके परीक्षण<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
7ikpfar7flbnw8g3byqbdnn29yz5ws7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६५
250
187002
671564
645402
2026-08-18T13:27:33Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671564
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : जाकिर हुसैनसे|१३३}}</noinclude>यन्त्र लेते ही आये थे उनका मेरी जाँच कर लेना स्वाभाविक ही था। जाँच करने पर उन्होंने मेरा स्वास्थ्य संतोषजनक पाया; सवेरे हृदयका आकुंचन १४९ तथा स्फुरण ९२ था तथा शामको आकुंचन १५२ और स्फुरण ९८।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|डा॰ वि॰ च॰ राय<br>
कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२०) की फोटो–नकलसे।
{{c|'''१४६. पत्र : जाकिर हुसैनको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय जाकिर,}}
आपका पत्र और लॉर्ड इर्विनके पत्रकी<ref>१७ मार्चके अपने पत्रके साथ जाकिर हुसैनने डॉ॰ अन्सारीको लिखे तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड इर्विनके १६ मार्चके पत्रकी एक प्रति गांधीजीको भेजी थी। वाइसरायने अपने पत्र हकीम अजमल खाँका स्मारक बनानेकी सराहना की थी तथा अपना सहयोग देनेकी भी बात लिखी थी।</ref> प्रति मिली। ज्यादातर लॉर्ड इविनके पत्रकी वजहसे मेरे मसविदेके<ref>उपलब्ध नहीं है।</ref> अनुरूप ही पत्र भेजना दुगुना लाभप्रद होगा। निश्चय
ही कुछ आवश्यक रद्दोबदल करने होंगे। आशा है डा॰ अन्सारी अन्तमें जो पत्र भेजेंगे, उसकी एक प्रति आप मुझे भेज देंगे।
मुझे नहीं मालूम कि देवदासने आपका ध्यान क्वार्टरोंकी सफाई व्यवस्थाकी उचित देखभाल किये जानेकी आवश्यकताकी ओर दिलाया है या नहीं। मैं चाहूँगा आप देवदासको कहें कि उसने जो कमियाँ देखी हैं, उन्हें बता दे।
आशा है कि आप निमन्त्रण–पत्र<ref>जाकिर हुसैनने अपने पत्र लिखा था : ज्यों ही डॉ॰ अन्सारी लौट आयेंगे आशा है कि मैं जामिया संस्थापना समितिके सदस्योंको निमन्त्रण पत्र भेज सकूँगा। (एस॰ एन॰ १४९१३)।</ref> भेजने और आश्रममें हम दोनोंने चर्चा करने के बाद जो कार्यक्रम तय किया था उसके अनुसार कार्य करनेमें देरी नहीं करेंगे।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११९) की फोटो–नकलसे।<noinclude></noinclude>
knrta0pupmmyjflx9cewpegksbh847m
671566
671564
2026-08-18T13:28:15Z
आदेश यादव
3609
671566
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : जाकिर हुसैनसे|१३३}}</noinclude>यन्त्र लेते ही आये थे उनका मेरी जाँच कर लेना स्वाभाविक ही था। जाँच करने पर उन्होंने मेरा स्वास्थ्य संतोषजनक पाया; सवेरे हृदयका आकुंचन १४९ तथा स्फुरण ९२ था तथा शामको आकुंचन १५२ और स्फुरण ९८।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|डा॰ वि॰ च॰ राय<br>
कलकत्ता}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२०) की फोटो–नकलसे।
{{c|'''१४६. पत्र : जाकिर हुसैनको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय जाकिर,}}
आपका पत्र और लॉर्ड इर्विनके पत्रकी<ref>१७ मार्चके अपने पत्रके साथ जाकिर हुसैनने डॉ॰ अन्सारीको लिखे तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड इर्विनके १६ मार्चके पत्रकी एक प्रति गांधीजीको भेजी थी। वाइसरायने अपने पत्र हकीम अजमल खाँका स्मारक बनानेकी सराहना की थी तथा अपना सहयोग देनेकी भी बात लिखी थी।</ref> प्रति मिली। ज्यादातर लॉर्ड इविनके पत्रकी वजहसे मेरे मसविदेके<ref>उपलब्ध नहीं है।</ref> अनुरूप ही पत्र भेजना दुगुना लाभप्रद होगा। निश्चय
ही कुछ आवश्यक रद्दोबदल करने होंगे। आशा है डा॰ अन्सारी अन्तमें जो पत्र भेजेंगे, उसकी एक प्रति आप मुझे भेज देंगे।
मुझे नहीं मालूम कि देवदासने आपका ध्यान क्वार्टरोंकी सफाई व्यवस्थाकी उचित देखभाल किये जानेकी आवश्यकताकी ओर दिलाया है या नहीं। मैं चाहूँगा आप देवदासको कहें कि उसने जो कमियाँ देखी हैं, उन्हें बता दे।
आशा है कि आप निमन्त्रण–पत्र<ref>जाकिर हुसैनने अपने पत्र लिखा था : ज्यों ही डॉ॰ अन्सारी लौट आयेंगे आशा है कि मैं जामिया संस्थापना समितिके सदस्योंको निमन्त्रण पत्र भेज सकूँगा। (एस॰ एन॰ १४९१३)।</ref> भेजने और आश्रममें हम दोनोंने चर्चा करने के बाद जो कार्यक्रम तय किया था उसके अनुसार कार्य करनेमें देरी नहीं करेंगे।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३११९) की फोटो–नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
oofjdnsh5u86cxvcliolguiiyh00u7z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६६
250
187003
671568
645403
2026-08-18T13:38:06Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671568
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|'''१४७. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२० मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय सतीश बाबू,}}
यह बहिष्कार आन्दोलन एक खेदका विषय है। मैं चाहता हूँ कि मिलों और बहिष्कार पर लिखा मेरा लेख<ref>देखिए "हमारी मिलें क्या कर सकती हैं?", १५-३-१९२८।</ref> आप ध्यान से पढ़ें। मैं मिल–मालिकोंसे भी अपना सम्पर्क रख रहा हूँ। यदि मेरे तर्कमें आपको कोई कमी दिखाई दे तो उसकी ओर मेरा ध्यान दिलाने में आप तनिक भी संकोच न करें।
मेरे स्वास्थ्यसे सम्बन्धित तार इस बार बिलकुल ही निन्दात्मक<ref>देखिए, "पत्र : वि॰ च॰ रायको ", २०-३-१९२८।</ref> था, क्योंकि उसका कोई आधार ही नहीं था। जहाँतक मैं जानता हूँ मेरा स्वास्थ्य कभी इससे अच्छा नहीं रहा। डा॰ अन्सारी और जमनालालजी राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालयसे सम्बन्धित अजमल खाँ स्मारकके सम्बन्धमें चर्चा करने आये थे, उसके अतिरिक्त उन्हें और कोई काम नहीं था।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३१२१) की फोटो–नकलसे।
{{c|'''१४८. पत्र : राधा गांधीको'''}}
{{right|आश्रम<br>
मंगलवार [२० मार्च, १९२८]<ref>ढाककी मुहरसे।</ref>}}
{{left|चि॰ राधिका,}}
तुम्हारे सुन्दर पोस्टकार्ड मिल गये हैं। मैंने जो कहा था वह सब याद रखना। शरीरका खूब ध्यान रखना और सबपर प्रेम रखना। रूखी अच्छी हो रही है। पर अभी हिलती–डुलती है तो थोड़ा खून झलक आता है। डॉक्टर देख गया है। इस तरफकी कोई चिन्ता मत करना। दुर्गाको भी पत्र लिखनेको कहना और लिखवा देना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
:गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ८६६८) से।
:सौजन्य : राधाबहन चौधरी<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
gaql3xh0ye79yrx9ybc66twvxio27s9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६७
250
187005
671574
645405
2026-08-18T14:25:29Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
671574
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>{{c|'''१४९. भेंट : एलिस शैलेकसे'''}}
{{right|२० मार्च, १९२८}}
महात्मा गांधीने २० मार्च को आश्रममें चार बजे कुमारी एलिस शैलेकसे भेंट की। जब वे अन्दर आई उन्होंने कहा:
बैठे रहनेके लिए आप कृपया मुझे क्षमा करेंगी, मैं खड़ा नहीं हो सकता।
कु॰ शैलेक : क्या में कुछ प्रश्न पूछ सकती हूँ?
गांधीजी : अवश्य, कृपया पूछिए।
आपका प्रभाव बढ़ रहा है या घट रहा है?
यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर देना बड़ा कठिन है, लेकिन जहाँतक जनताका सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ कि प्रभाव बढ़ रहा है।
क्या यह सच है कि आपके विचारसे अंग्रेजोंने भारतका कुछ भी भला नहीं किया है? यहाँतक कि आप रेलोंको भी हानिकारक मानते हैं?
कुछ हद तक यह सही है। कुल मिलाकर ब्रिटिश राज्यका भारत पर केवल बुरा प्रभाव ही पड़ा है। रेलोंने भलाईके बजाय हानि अधिक पहुँचाई है।
क्या वे अकालके मौकोंपर लाभदायक सिद्ध नहीं हुई हैं?
वे अस्थाई तौरपर लाभदायक हो सकती हैं। परन्तु सामान्यतः उन्होंने ग्रामीणोंसे उन चीजोंको छीननेका ही काम किया है, जिनकी उन्हें खुद अपने लिये जरूरत रहती है।
लेकिन उसके बदले में उन्हें पैसा मिलता है।
परन्तु पैसा तो वे खा नहीं सकते। यदि आप सहाराके रेगिस्तान में हों और
आपके पास अपनेको जीवित रखने भरके लिए ही पानी हो, तो क्या आप किसी भी
कीमत पर उसे बेचेंगी ?
परन्तु क्या वे पैदावारका सिर्फ वही भाग नहीं बेचते जो फाजिल है ?
अपनी पैदावारको कच्चे मालके रूपमें बेचना अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचना
है । वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें उसके प्रयोगका दूसरा कोई बेहतर उपाय
मालूम नहीं। यदि आप मनसे मेरी भलाई चाहती हैं तो क्या आप मुझे खाल बेचकर
आपसे, बने हुए जूते खरीदने अथवा अपना कपास आपको बेचकर बुना हुआ कपड़ा
खरीदनेकी सलाह देंगी ? मैं अपने देशवासियोंसे अपना कपास जमा कर रखने और
उसकी रूईसे सूत कातकर अपना कपड़ा खुद तैयार करनेको कहता हूँ ।
कहते हैं कि जहाँ रेले हैं वहाँ भुखमरी नहीं है। अकालके मौकेपर रेलें उन
जगहोंसे जहाँ खाद्यान्न अधिक होता है, उन जगहोंपर, जहाँ उनकी आवश्यकता हो,
बहुत तेजी से ले जाती हैं।<noinclude></noinclude>
sovevevjhcq6aczg3upmv32xaimg9bl
671577
671574
2026-08-18T14:47:32Z
आदेश यादव
3609
671577
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|'''१४९. भेंट : एलिस शैलेकसे'''}}
{{right|२० मार्च, १९२८}}
महात्मा गांधीने २० मार्च को आश्रममें चार बजे कुमारी एलिस शैलेकसे भेंट की। जब वे अन्दर आई उन्होंने कहा:
बैठे रहनेके लिए आप कृपया मुझे क्षमा करेंगी, मैं खड़ा नहीं हो सकता।
कु॰ शैलेक : क्या में कुछ प्रश्न पूछ सकती हूँ?
गांधीजी : अवश्य, कृपया पूछिए।
आपका प्रभाव बढ़ रहा है या घट रहा है?
यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर देना बड़ा कठिन है, लेकिन जहाँतक जनताका सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ कि प्रभाव बढ़ रहा है।
क्या यह सच है कि आपके विचारसे अंग्रेजोंने भारतका कुछ भी भला नहीं किया है? यहाँतक कि आप रेलोंको भी हानिकारक मानते हैं?
कुछ हद तक यह सही है। कुल मिलाकर ब्रिटिश राज्यका भारत पर केवल बुरा प्रभाव ही पड़ा है। रेलोंने भलाईके बजाय हानि अधिक पहुँचाई है।
क्या वे अकालके मौकोंपर लाभदायक सिद्ध नहीं हुई हैं?
वे अस्थाई तौरपर लाभदायक हो सकती हैं। परन्तु सामान्यतः उन्होंने ग्रामीणोंसे उन चीजोंको छीननेका ही काम किया है, जिनकी उन्हें खुद अपने लिये जरूरत रहती है।
लेकिन उसके बदले में उन्हें पैसा मिलता है।
परन्तु पैसा तो वे खा नहीं सकते। यदि आप सहाराके रेगिस्तान में हों और आपके पास अपनेको जीवित रखने भरके लिए ही पानी हो, तो क्या आप किसी भी कीमत पर उसे बेचेंगी?
परन्तु क्या वे पैदावारका सिर्फ वही भाग नहीं बेचते जो फाजिल है?
अपनी पैदावारको कच्चे मालके रूपमें बेचना अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचना है। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें उसके प्रयोगका दूसरा कोई बेहतर उपाय मालूम नहीं। यदि आप मनसे मेरी भलाई चाहती हैं तो क्या आप मुझे खाल बेचकर आपसे, बने हुए जूते खरीदने अथवा अपना कपास आपको बेचकर बुना हुआ कपड़ा खरीदनेकी सलाह देंगी? मैं अपने देशवासियोंसे अपना कपास जमा कर रखने और उसकी रूईसे सूत कातकर अपना कपड़ा खुद तैयार करनेको कहता हूँ।
कहते हैं कि जहाँ रेले हैं वहाँ भुखमरी नहीं है। अकालके मौकेपर रेलें उन जगहोंसे जहाँ खाद्यान्न अधिक होता है, उन जगहोंपर, जहाँ उनकी आवश्यकता हो, बहुत तेजी से ले जाती हैं।<noinclude></noinclude>
eyp36d5w708g7zzuxggri4yyml3ink3
671593
671577
2026-08-18T15:50:26Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671593
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|'''१४९. भेंट : एलिस शैलेकसे'''}}
{{right|२० मार्च, १९२८}}
'''महात्मा गांधीने २० मार्च को आश्रममें चार बजे कुमारी एलिस शैलेकसे भेंट की। जब वे अन्दर आई उन्होंने कहा:'''
बैठे रहनेके लिए आप कृपया मुझे क्षमा करेंगी, मैं खड़ा नहीं हो सकता।
'''कु॰ शैलेक : क्या मैं कुछ प्रश्न पूछ सकती हूँ?'''
गांधीजी : अवश्य, कृपया पूछिए।
'''आपका प्रभाव बढ़ रहा है या घट रहा है?'''
यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर देना बड़ा कठिन है, लेकिन जहाँतक जनताका सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ कि प्रभाव बढ़ रहा है।
'''क्या यह सच है कि आपके विचारसे अंग्रेजोंने भारतका कुछ भी भला नहीं किया है? यहाँतक कि आप रेलोंको भी हानिकारक मानते हैं?'''
कुछ हद तक यह सही है। कुल मिलाकर ब्रिटिश राज्यका भारत पर केवल बुरा प्रभाव ही पड़ा है। रेलोंने भलाईके बजाय हानि अधिक पहुँचाई है।
'''क्या वे अकालके मौकोंपर लाभदायक सिद्ध नहीं हुई हैं?'''
वे अस्थाई तौरपर लाभदायक हो सकती हैं। परन्तु सामान्यतः उन्होंने ग्रामीणोंसे उन चीजोंको छीननेका ही काम किया है, जिनकी उन्हें खुद अपने लिये जरूरत रहती है।
'''लेकिन उसके बदले में उन्हें पैसा मिलता है।'''
परन्तु पैसा तो वे खा नहीं सकते। यदि आप सहाराके रेगिस्तान में हों और आपके पास अपनेको जीवित रखने भरके लिए ही पानी हो, तो क्या आप किसी भी कीमत पर उसे बेचेंगी?
'''परन्तु क्या वे पैदावारका सिर्फ वही भाग नहीं बेचते जो फाजिल है?'''
अपनी पैदावारको कच्चे मालके रूपमें बेचना अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचना है। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें उसके प्रयोगका दूसरा कोई बेहतर उपाय मालूम नहीं। यदि आप मनसे मेरी भलाई चाहती हैं तो क्या आप मुझे खाल बेचकर आपसे, बने हुए जूते खरीदने अथवा अपना कपास आपको बेचकर बुना हुआ कपड़ा खरीदनेकी सलाह देंगी? मैं अपने देशवासियोंसे अपना कपास जमा कर रखने और उसकी रूईसे सूत कातकर अपना कपड़ा खुद तैयार करनेको कहता हूँ।
'''कहते हैं कि जहाँ रेले हैं वहाँ भुखमरी नहीं है। अकालके मौकेपर रेलें उन जगहोंसे जहाँ खाद्यान्न अधिक होता है, उन जगहोंपर, जहाँ उनकी आवश्यकता हो, बहुत तेजी से ले जाती हैं।'''<noinclude></noinclude>
coe678ujyl2pub4ktwbnvyp1ksdl1xz
671612
671593
2026-08-18T16:20:32Z
आदेश यादव
3609
671612
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१४९. भेंट : एलिस शैलेकसे'''}}}}
{{right|२० मार्च, १९२८}}
'''महात्मा गांधीने २० मार्च को आश्रममें चार बजे कुमारी एलिस शैलेकसे भेंट की। जब वे अन्दर आई उन्होंने कहा:'''
बैठे रहनेके लिए आप कृपया मुझे क्षमा करेंगी, मैं खड़ा नहीं हो सकता।
'''कु॰ शैलेक : क्या मैं कुछ प्रश्न पूछ सकती हूँ?'''
गांधीजी : अवश्य, कृपया पूछिए।
'''आपका प्रभाव बढ़ रहा है या घट रहा है?'''
यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर देना बड़ा कठिन है, लेकिन जहाँतक जनताका सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ कि प्रभाव बढ़ रहा है।
'''क्या यह सच है कि आपके विचारसे अंग्रेजोंने भारतका कुछ भी भला नहीं किया है? यहाँतक कि आप रेलोंको भी हानिकारक मानते हैं?'''
कुछ हद तक यह सही है। कुल मिलाकर ब्रिटिश राज्यका भारत पर केवल बुरा प्रभाव ही पड़ा है। रेलोंने भलाईके बजाय हानि अधिक पहुँचाई है।
'''क्या वे अकालके मौकोंपर लाभदायक सिद्ध नहीं हुई हैं?'''
वे अस्थाई तौरपर लाभदायक हो सकती हैं। परन्तु सामान्यतः उन्होंने ग्रामीणोंसे उन चीजोंको छीननेका ही काम किया है, जिनकी उन्हें खुद अपने लिये जरूरत रहती है।
'''लेकिन उसके बदले में उन्हें पैसा मिलता है।'''
परन्तु पैसा तो वे खा नहीं सकते। यदि आप सहाराके रेगिस्तान में हों और आपके पास अपनेको जीवित रखने भरके लिए ही पानी हो, तो क्या आप किसी भी कीमत पर उसे बेचेंगी?
'''परन्तु क्या वे पैदावारका सिर्फ वही भाग नहीं बेचते जो फाजिल है?'''
अपनी पैदावारको कच्चे मालके रूपमें बेचना अपना जन्मसिद्ध अधिकार बेचना है। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि उन्हें उसके प्रयोगका दूसरा कोई बेहतर उपाय मालूम नहीं। यदि आप मनसे मेरी भलाई चाहती हैं तो क्या आप मुझे खाल बेचकर आपसे, बने हुए जूते खरीदने अथवा अपना कपास आपको बेचकर बुना हुआ कपड़ा खरीदनेकी सलाह देंगी? मैं अपने देशवासियोंसे अपना कपास जमा कर रखने और उसकी रूईसे सूत कातकर अपना कपड़ा खुद तैयार करनेको कहता हूँ।
'''कहते हैं कि जहाँ रेले हैं वहाँ भुखमरी नहीं है। अकालके मौकेपर रेलें उन जगहोंसे जहाँ खाद्यान्न अधिक होता है, उन जगहोंपर, जहाँ उनकी आवश्यकता हो, बहुत तेजी से ले जाती हैं।'''<noinclude></noinclude>
su6b1x1sfy6l2p1hakjrmfqxabhvu9w
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६८
250
187006
671606
645406
2026-08-18T16:14:08Z
आदेश यादव
3609
/* अशोधित */
671606
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" />{{rh|१३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>जिन्होंने रेलें बिछाईं उन्होंने लोगोंका लाभ नहीं सोचा था। उन्होंने अपने दूर बैठे हुए हिस्सेदारों और मालिकोंके लाभकी ही बात सोची थी। अकालके समय रेलोंसे जो लाभ होता है वह उससे होनेवाली हानियोंकी बात सोचे तो पासंग पर चढ़ जाता है। यह तो ऐसा है जैसे कि कोई लुटेरा पहले मेरा सब कुछ लूट ले और फिर मुझे कुछ थोड़ा–सा वापस दे दे।
रेलें न होनेपर क्या भारतकी स्थिति अधिक अच्छी होती?
मुझे इस बात में जरा भी सन्देह नहीं है कि भारतकी दशा अधिक अच्छी होती बशर्ते कि अन्य अपेक्षित बातें पूरी हो जातीं।
रेलें लाभदायक कैसे बनाई जा सकती हैं?
रेलों सम्बन्धी नीति लोगोंके वास्तविक लाभको ध्यानमें रखकर बनाई जानी चाहिए अर्थात् वे लोगोंको उसी तरह स्वावलम्बी बना रहने दें जैसे कि वे रेलोंके आगमनसे पहले थे। आजकल उन्हें बुद्धि और स्वास्थ्य दोनोंमें दिवालिया बनाया जा रहा है। वे अपने कच्चे मालका अच्छेसे अच्छा इस्तेमाल करना जानते थे । वे अपनी रूईसे कपड़ा बनाते थे, खालोंसे जूते बनाते थे और अनाजसे रोटी बनाते थे। पर आजकल इसका उलटा होता है। इससे अधिक बुरी कोई बात मैं मान ही नहीं सकता कि करोड़ों लोगोंको अपना कच्चा माल, जिससे वे स्वयं उत्पादन कर सकते हैं, विदेशोंको
निर्यात करना पड़े और उससे बने मालका आयात करना पड़े। रेलें लाभप्रद ढंगसे ग्रामीणों द्वारा बनाई चीजें देशके एक भागसे दूसरे भागमें पहुँचा सकती हैं।
लोगों को यह सब सिखाने के लिए बहुत बड़े आन्दोलनकी आवश्यकता है। पहले भी काफी मात्रामें अन्तर्प्रान्तीय व्यापार होता था।
क्या विदेशी तरीका अधिक सस्ता नहीं है?
नहीं। और यदि वह सस्ता होता तो भी ज्यादा कीमतपर भी हमारा अपना उत्पादन उससे सस्ता पड़ता । उदाहरणार्थं आश्रम में जब हमने सब्जी पैदा करनी शुरू की तो प्रारम्भ में वह बाजारसे महँगी पड़ी। पर अब वह बाजारकी सब्जीसे अच्छी और सस्ती होती है तथा हमारे आश्रमवासियोंको काम भी मिल जाता है।
क्या मैं स्पष्ट कहूँ? बंगालमें मुझे बताया गया कि खद्दर ब्रिटिश कपड़े से अधिक मंहगा और खुरदरा होता है और जो औरतें खद्दर पहननेका प्रण करती हैं वे विदेशी कपड़ेके बने अधो वस्त्र पहननती हैं।
खद्दर खुरदरा है; किन्तु देशभक्ति इतना त्याग तो माँगती ही है। इसमें कोई शक नहीं कि जितनी खादी हम कुछ वर्ष पहले पैदा करते थे उससे अब कहीं ज्यादा पैदा करते हैं और काफी हदतक कीमतें कम करनेमें भी सफल हो गये हैं। आपको जिन महिलाओंके बारेमें बताया गया है, उनके सम्बन्धमें मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि यदि उन्होंने खादी पहननेका व्रत लिया है तो उनके लिए किसी भी विदेशी कपड़ेका इस्तेमाल करना उचित नहीं है।
आपके उद्देश्य और आदर्श क्या है?
मैं अहिंसा और सत्यके द्वारा अपने देशकी पूर्ण स्वतन्त्रता चाहता हूँ।<noinclude></noinclude>
cxkoewtqn0q9kah8jggnqhyr6aodsfi
671611
671606
2026-08-18T16:19:50Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671611
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
जिन्होंने रेलें बिछाईं उन्होंने लोगोंका लाभ नहीं सोचा था। उन्होंने अपने दूर बैठे हुए हिस्सेदारों और मालिकोंके लाभकी ही बात सोची थी। अकालके समय रेलोंसे जो लाभ होता है वह उससे होनेवाली हानियोंकी बात सोचे तो पासंग पर चढ़ जाता है। यह तो ऐसा है जैसे कि कोई लुटेरा पहले मेरा सब कुछ लूट ले और फिर मुझे कुछ थोड़ा–सा वापस दे दे।
'''रेलें न होनेपर क्या भारतकी स्थिति अधिक अच्छी होती?'''
मुझे इस बात में जरा भी सन्देह नहीं है कि भारतकी दशा अधिक अच्छी होती बशर्ते कि अन्य अपेक्षित बातें पूरी हो जातीं।
'''रेलें लाभदायक कैसे बनाई जा सकती हैं?'''
रेलों सम्बन्धी नीति लोगोंके वास्तविक लाभको ध्यानमें रखकर बनाई जानी चाहिए अर्थात् वे लोगोंको उसी तरह स्वावलम्बी बना रहने दें जैसे कि वे रेलोंके आगमनसे पहले थे। आजकल उन्हें बुद्धि और स्वास्थ्य दोनोंमें दिवालिया बनाया जा रहा है। वे अपने कच्चे मालका अच्छेसे अच्छा इस्तेमाल करना जानते थे। वे अपनी रूईसे कपड़ा बनाते थे, खालोंसे जूते बनाते थे और अनाजसे रोटी बनाते थे। पर आजकल इसका उलटा होता है। इससे अधिक बुरी कोई बात मैं मान ही नहीं सकता कि करोड़ों लोगोंको अपना कच्चा माल, जिससे वे स्वयं उत्पादन कर सकते हैं, विदेशोंको
निर्यात करना पड़े और उससे बने मालका आयात करना पड़े। रेलें लाभप्रद ढंगसे ग्रामीणों द्वारा बनाई चीजें देशके एक भागसे दूसरे भागमें पहुँचा सकती हैं।
'''लोगोंको यह सब सिखानेके लिए बहुत बड़े आन्दोलनकी आवश्यकता है।'''
पहले भी काफी मात्रामें अन्तर्प्रान्तीय व्यापार होता था।
'''क्या विदेशी तरीका अधिक सस्ता नहीं है?'''
नहीं। और यदि वह सस्ता होता तो भी ज्यादा कीमतपर भी हमारा अपना उत्पादन उससे सस्ता पड़ता। उदाहरणार्थ आश्रम में जब हमने सब्जी पैदा करनी शुरू की तो प्रारम्भमें वह बाजारसे महँगी पड़ी। पर अब वह बाजारकी सब्जीसे अच्छी और सस्ती होती है तथा हमारे आश्रमवासियोंको काम भी मिल जाता है।
'''क्या मैं स्पष्ट कहूँ? बंगालमें मुझे बताया गया कि खद्दर ब्रिटिश कपड़े से अधिक मंहगा और खुरदरा होता है और जो औरतें खद्दर पहननेका प्रण करती हैं वे विदेशी कपड़ेके बने अधो वस्त्र पहननती हैं।'''
खद्दर खुरदरा है; किन्तु देशभक्ति इतना त्याग तो माँगती ही है। इसमें कोई शक नहीं कि जितनी खादी हम कुछ वर्ष पहले पैदा करते थे उससे अब कहीं ज्यादा पैदा करते हैं और काफी हदतक कीमतें कम करनेमें भी सफल हो गये हैं। आपको जिन महिलाओंके बारेमें बताया गया है, उनके सम्बन्धमें मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि यदि उन्होंने खादी पहननेका व्रत लिया है तो उनके लिए किसी भी विदेशी कपड़ेका इस्तेमाल करना उचित नहीं है।
'''आपके उद्देश्य और आदर्श क्या है?'''
मैं अहिंसा और सत्यके द्वारा अपने देशकी पूर्ण स्वतन्त्रता चाहता हूँ।<noinclude></noinclude>
f6zjic324b0h2yxf1wu8hz2y25tzukr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१६९
250
187007
671617
645407
2026-08-18T16:29:48Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671617
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||भेंट : एलिस शैलेकसे|१३७}}</noinclude>
'''क्या आप यह सोचते हैं कि आप अहिंसा और सत्यके द्वारा अपने देशको स्वतंत्र करा सकेंगे?'''
मेरा अपना विश्वास तो यही है कि हम स्वतन्त्रता केवल अहिंसाके द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं, किसी और तरीकेसे नहीं। मैं हिंसाके बजाय अहिंसाके द्वारा इसकी प्राप्ति अधिक सम्भाव्य मानता हूँ।
'''स्वतन्त्रतासे आपका क्या अभिप्राय है?'''
मैं गलती करने और उसको सुधारनेकी तथा पूरी ऊँचाई तक ऊपर उठने और गिरने की स्वतन्त्रता चाहता हूँ। मैं बैसाखीके सहारे नहीं चलना चाहता।
'''क्या आप यह नहीं समझते कि अंग्रेजोंने भारतका बहुत उपकार किया है?'''
सभी आवश्यक मामलोंमें उन्होंने जबर्दस्त हानि पहुँचाई है। 'उन्होंने ' से मेरा मतलब है ब्रिटिश सरकारने।
'''पर आप ऐसा क्यों मानते हैं?'''
क्यों कि वे जनताकी आर्थिक, बौद्धिक और नैतिक उन्नतिका धीरे–धीरे ह्रास करते चले गये।
'''क्या आप यह नहीं मानते कि उन्होंने भारतकी आर्थिक उन्नतिमें मदद की है?'''
स्वयं सरकारी अधिकारियोंकी अपनी रिपोर्टके अनुसार भारत अब ५० साल पहले से ज्यादा गरीब है। कुछ व्यक्ति भले ही सम्पन्न हो गये हों, लेकिन सामान्यतः गरीबी बढ़ ही रही है। सम्पत्तिका कुछ स्थानान्तरण हुआ है; लेकिन सामान्य तौरपर देशकी समृद्धि नहीं हुई है।
'''सरकारका कहना है कि चीजें पहले कभी इतनी नहीं खरीदी जाती थीं।'''
यदि वे यह समझते हैं कि लोग पहले चीजें खरीद नहीं सकते थे जबकि अब खरीद सकते हैं, तो उनका ऐसा समझना गलत है। ऐसा समझना इस अर्थमें तो सही है कि लोग उन दिनों ज्यादा वस्तुएँ नहीं खरीदते थे, अब वे खरीदते हैं और अब खरीदनेके लिए [बाजारमें] ज्यादा वस्तुएँ हैं।
'''ब्रिटिश मालका बहिष्कार करनेमें क्या तुक है? इंग्लैंड अपने मालको ही तो तरजीह नहीं देता। यहाँ संसारके सब राष्ट्रोंको प्रतियोगिताकी पूरी छूट है।'''
नहीं यह गलत है। खुली प्रतियोगिता तो केवल एक दिखावा है। इंग्लैंड कितने ही प्रकारके छल–प्रपंचों द्वारा अपने मालको तरजीह जरूर देता है। दिखावटी तौर पर [हर राष्ट्रको अपना माल बेचनेकी] स्वतन्त्रता है पर सच्ची स्वतन्त्रता नहीं है। और यदि ब्रिटिश, विदेशियोंका पक्ष लेनेमें निष्पक्ष हों तो भी मेरा उनसे झगड़ा ही रहेगा। मैं चाहता हूँ कि भारतीय हितोंको तरजीह दी जाये।
'''कैसे?'''
सभी प्रकारके विदेशी कपड़ेका आयात बन्द करके, और उन सभी आयात की हुई वस्तुओंपर, जिनका उत्पादन यहाँ किया जा सकता है, भारी कर लगाकर।<noinclude></noinclude>
qnhxk37d0utv2dwio1tow4i0vwpnfar
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७०
250
187008
671625
645408
2026-08-18T16:38:29Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671625
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
'''परन्तु आपका उत्पादन व्यय बहुत अधिक होगा।'''
कीमतोंका नीचा या ऊँचा होना किसी देशके उत्कर्ष या अपकर्षका परिचायक नहीं होता। कीमतके कुछ अधिक होनेपर भी किसी दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय यदि मैं अपनी सब्जी आप उगाता हूँ तो वह निश्चय ही कहीं ज्यादा अच्छा है। बादमें मैं किफायत और सुव्यवस्थाका सहारा लेकर कीमतको कम करनेका प्रयत्न करूँगा। सब्जी उगाने में कुशलता प्राप्त करने, उससे मिलनेवाले सुख, और इस बोधसे कि अपनी सब्जी हम स्वयं उगाते हैं, जो लाभ होता है, वह उस थोड़ेसे लाभसे कहीं अधिक है जो हमें अहमदाबादसे सस्ती सब्जी खरीदने पर मिल सकता है। कपड़ा उत्पादनके सम्बन्धमें भी हम यह सब थोड़े ही समय में कर सकते हैं बशर्ते कि हमें अपने ही
साधनोंको इस्तेमाल करने दिया जाये।
'''संसारमें कोई भी देश विदेशी प्रतियोगितासे बरी नहीं है।'''
क्षमा करें। जर्मनीमें परिस्थिति दूसरी है। जर्मनीने जबर्दस्त कर लगाकर विदेशी चीनीको अपने यहाँ आनेसे रोका और फिर बड़ी सफलताके साथ चुकन्दरसे चीनी बनाई। प्रत्येक राष्ट्र अपने नव–उद्योगकी रक्षा अनुदान देकर और तटकर लगाकर करता है।
'''आपके कहनेका मतलब है कि सभी विदेशी आयात बन्द कर दिया जाये और भारतमें केवल देशमें बना माल ही प्रयोगमें लाया जाये?'''
हम वह सब सामान विदेशोंसे मँगा सकते हैं जिन्हें हम नहीं बना सकते जैसे कि हम आयोडीन ब्रिटेन या जर्मनीसे, मोती अरबसे, हीरे जोहानिसबर्गसे, लीवरकी घड़ियाँ इंग्लैंडसे तथा पढ़ने योग्य अच्छी पुस्तकें इंग्लैंड, अमेरिका तथा संसारके सब देशोंसे मँगा सकते। बेशक सुइयाँ और पिनें दोनों ही खतरनाक चीजें — मैं विदेशोंसे मँगाना चाहूँगा। इसके अतिरिक्त अन्य बहुत–सी वस्तुएँ मैं गिना सकता हूँ जिनको दूसरे देशोंसे मँगाना चाहिए। और हम उन चीजोंको, जिनकी उन्हें आवश्यकता है, मुनाफे पर निर्यात करें, पर हमें किसी पर कोई चीज लादनी नहीं चाहिए। उदाहरणार्थ मैं अफीमका उत्पादन भले ही करूँ, पर उसे अमेरिका और चीन पर लादनेका विचार मुझे नहीं करना चाहिए।
'''लेकिन यदि आप अपनी जरूरतकी चीजें आप ही बनायेंगे तो क्या आपको श्रमसम्बन्धी सवालोंका सामना नहीं करना पड़ेगा?'''
क्यों? यदि वे उठेंगे तो स्वयं ही सुलझ भी जायेंगे।
'''आप यह सब पूँजीवादके आधारपर करेंगे या साम्यवादके आधारपर?'''
लोगोंकी भलाईको दृष्टिमें रखकर राष्ट्रीय आधारपर।
'''पर उद्योगोंमें पूँजी कौन लगायेगा?'''
हम स्वयं। हमारी पूँजी तो हमारे पुरुष और हमारी महिलाएँ हैं, और वे हमारे यहाँ करोड़ोंकी संख्या में हैं।<noinclude></noinclude>
a4r3ow001stwtlos3w14iv95xm5kmz3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७१
250
187009
671631
645409
2026-08-18T16:48:20Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671631
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||पत्र : फेन्ज रोनोको|१३९}}</noinclude>
'''आपके उद्योगोंकी व्यवस्था राज्य करेगा या देश?'''
यदि इन उद्योगोंसे करोड़ोंकी भलाई होती हैं, किसी एक वर्गकी नहीं तो यह बात कोई अर्थ नहीं रखती कि इसकी व्यवस्था कैसे की जाये। और यदि यह अभिप्राय सिद्ध हो जाता है तो मुझे इस बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि कौन इसकी व्यवस्था करता है।
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२८४) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१५०. भेंट : एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के प्रतिनिधिसे'''}}}}
{{right|अहमदाबाद<br>
२० मार्च, १९२८}}
दिल्लीसे प्राप्त इस खबरके सम्बन्धमें कि महात्मा गांधीने वियनामें होनेवाली युवक परिषद में जानेका निमन्त्रण एक प्रकारसे स्वीकार कर लिया है और वे शीघ्र ही यूरोप जानेवाले हैं, भेंट किये जानेपर उन्होंने कहा कि यह बात कुछ तय होनेसे पहले ही प्रचारित कर दी गई है। उन्होंने कहा कि अभी कुछ तय नहीं हुआ है और मुझे जाना चाहिए या नहीं, इस सम्बन्धमें मैं स्वयं कुछ निश्चय नहीं कर पाया हूँ।
:[अंग्रेजीसे]
:'''बॉम्बे क्रॉनिकल''', २२-३-१९२८
{{c|{{larger|'''१५१. पत्र : फ्रेन्ज रोनोको<ref> "वर्ल्ड फेडेरेशन ऑफ यूथ फॉर पीस" की आस्ट्रियाकी शाखाके सचिव। १० मार्चके अपने पत्रमें उन्होंने गांधीजीसे दिशा–निर्देशनके रूपमें कुछ लिख भेजने को कहा था। (एस॰ एन॰ १४२२५)।</ref>'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
आपके पत्रके लिए धन्यवाद। मैं युवकोंसे मात्र इतना ही कह सकता हूँ कि वे अपने यौवनकी अदम्य शक्तिका उपयोग सेवाके पवित्र काममें करें। और उसे भाषणों और लेखों तथा ऐसी ही चीजोंमें नष्ट न करें, जिनका कि आजकल अत्यधिक फैशन है।
{{right|हृदयसे आपका,}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६५) की फोटो नकलसे।<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
4kw4m7acwkxoiur26hq9k02kvyzj8l0
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७२
250
187010
671639
645410
2026-08-18T16:58:52Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671639
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१५२. पत्र : टी॰ डि मंजीयरलीको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
२१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय मित्र,}}
इतने दिनों बाद आपका पत्र पाकर प्रसन्नता हुई। आपने जिन दो पुस्तकोंका उल्लेख किया है, वे दोनों 'हैंड स्पिनिंग ऐसे', और 'द गाइड टु हेल्थ' तथा एक तीसरी पुस्तक 'तकली टीचर' अपनी ओरसे भेज रहा हूँ।
अपने पत्रके दूसरे अनुच्छेदमें आपने जो कुछ कहा है<ref>टी॰ डि मंजीयरलीने अपने २७ दिसम्बर, १९२७ के पत्रमें लिखा था, "...आप जानते ही हैं कि मैं किस कदर यह चाहता हूँ कि मनुष्य और अधिक सादा रहनेकी आवश्यकताको समझे ताकि उसके पास अधिक सच्चे कामोंमें लगानेके लिए और अधिक समय और शक्ति रहे।</ref> उसके सम्बन्धमें मैं केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि जीवनमें सादगीका परम भक्त होनेके साथ–साथ मैंने यह भी जान लिया है कि सादगीकी यह ध्वनि जबतक हृदयसे नहीं निकलती, तबतक वह बेकार है। तथाकथित सभ्य जीवनके इस आधुनिक व्यवस्थित बनावटीपनकी हृदयकी सच्ची सादगीसे कोई संगति नहीं बैठ सकती। जहाँ इन दोनोंमें सामंजस्य नहीं होता वहाँ हमेशा या तो घोर आत्मवंचना होती है या पाखण्ड।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीमती टी॰ डि मंजीयरली<br>
२१, रुई डु चेमिन वर्ट<br>
कोबैवोई<br>
सेन}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६७) की फोटो–नकलसे ।
{{c|{{larger|'''१५३. पत्र : जोजेफ ए॰ ब्रॉनको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२१ मार्च, १९२८}}
{{left|प्रिय बहन,}}
श्रीमती शरमनके मार्फत ७० रु० का जो चैक आपने मुझे भेजा है, वह आपकी और आपके क्लबके सदस्योंकी विचारशीलताका द्योतक है। सहृदयताकी जिस<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
hr21gfzlmy7bwalq1wvih1g5rkrv5fy
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/१७३
250
187012
671645
645412
2026-08-18T17:14:09Z
आदेश यादव
3609
/* शोधित */
671645
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४१}}</noinclude>भावनासे प्रेरित होकर आपने यह भेंट भेजी है उसकी दृष्टिसे मैं इसकी बहुत कद्र करता हूँ। मैं इसका उपयोग एक ऐसे व्यक्तिकी आवश्यकताओंकी पूर्ति करनेमें कर रहा हूँ जिसने अपने आपको चरखेके प्रचारके लिए समर्पित कर दिया था।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीमती जोजेफ ए॰ ब्रॉन<br>
आर॰—एफ॰—डी॰ ३<br>
बर्मिंघम<br>
मिशिगन, सं॰ रा॰ अ॰}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६८) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१५४. पत्र : पूँजाभाईको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२१ मार्च, १९२८}}
{{left|चि॰ पूंजाभाई,}}
तुम्हारा पोस्टकार्ड मिला। शनिवारकी शामको जरूर आ जाओ। यदि शामको समय न दे सका तो रविवारको दूंगा और तुम जिस समय चाहोगे उसी समय रवाना हो जाने दूंगा। तुम्हारा स्वास्थ्य अब बिलकुल ठीक हो गया होगा।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ४००९) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१५५. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''चरखा एक प्रमाणित आवश्यकता'''}}
संयुक्त प्रान्त<ref>आजका उत्तरप्रदेश।</ref> में अकबरपुर एक छोटी–सी जगह है, जहाँ आचार्य कृपलानीके खादी–कार्यकर्त्ताओंके दलने सात साल तक काम किया है। कुछ कारणोंसे जिनका यहाँ जिक्र करनेकी कोई जरूरत नहीं है, इस दलको वहाँसे हट जाना पड़ा है। उसके हट जानेपर वहाँ जो करुण दृश्य देखनेमें आये और आखिर किसी–न–किसी तरह इस केन्द्रको क्यों जारी रखना पड़ा, इस सबका वर्णन पं॰ जवाहरलाल नेहरुने अ॰ भा॰ चरखा संघके नाम अपने निम्नलिखित रोचक पत्र में यों किया है :— '''मैं आपको पहले ही लिख चुका हूँ कि गांधी आश्रम अकबरपुरसे हट गया है। हमने अस्थायी रूपसे उसका भार ले लिया है, क्योंकि हमें ऐसा लगा'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
cbpv3ksxhxlf68mdogto9gcfc6uwvm1
671646
671645
2026-08-18T17:14:28Z
आदेश यादव
3609
671646
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४१}}</noinclude>भावनासे प्रेरित होकर आपने यह भेंट भेजी है उसकी दृष्टिसे मैं इसकी बहुत कद्र करता हूँ। मैं इसका उपयोग एक ऐसे व्यक्तिकी आवश्यकताओंकी पूर्ति करनेमें कर रहा हूँ जिसने अपने आपको चरखेके प्रचारके लिए समर्पित कर दिया था।
{{right|हृदयसे आपका,}}
{{left|श्रीमती जोजेफ ए॰ ब्रॉन<br>
आर॰—एफ॰—डी॰ ३<br>
बर्मिंघम<br>
मिशिगन, सं॰ रा॰ अ॰}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १४२६८) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१५४. पत्र : पूँजाभाईको'''}}}}
{{right|सत्याग्रह आश्रम<br>
साबरमती<br>
२१ मार्च, १९२८}}
{{left|चि॰ पूंजाभाई,}}
तुम्हारा पोस्टकार्ड मिला। शनिवारकी शामको जरूर आ जाओ। यदि शामको समय न दे सका तो रविवारको दूंगा और तुम जिस समय चाहोगे उसी समय रवाना हो जाने दूंगा। तुम्हारा स्वास्थ्य अब बिलकुल ठीक हो गया होगा।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ४००९) की फोटो–नकलसे।
{{c|{{larger|'''१५५. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{c|'''चरखा एक प्रमाणित आवश्यकता'''}}
संयुक्त प्रान्त<ref>आजका उत्तरप्रदेश।</ref> में अकबरपुर एक छोटी–सी जगह है, जहाँ आचार्य कृपलानीके खादी–कार्यकर्त्ताओंके दलने सात साल तक काम किया है। कुछ कारणोंसे जिनका यहाँ जिक्र करनेकी कोई जरूरत नहीं है, इस दलको वहाँसे हट जाना पड़ा है। उसके हट जानेपर वहाँ जो करुण दृश्य देखनेमें आये और आखिर किसी–न–किसी तरह इस केन्द्रको क्यों जारी रखना पड़ा, इस सबका वर्णन पं॰ जवाहरलाल नेहरुने अ॰ भा॰ चरखा संघके नाम अपने निम्नलिखित रोचक पत्र में यों किया है :—
'''मैं आपको पहले ही लिख चुका हूँ कि गांधी आश्रम अकबरपुरसे हट गया है। हमने अस्थायी रूपसे उसका भार ले लिया है, क्योंकि हमें ऐसा लगा'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
8qhyav6d2xaltwwhbcf8i2niegu9ymi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७४
250
187254
671618
645674
2026-08-18T16:30:00Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
671618
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१२२. पत्र : प्रभावतीको'''}}}}
{{Right|[२६ फरवरी, १९२७ के पश्चात्]<ref>गांधीजीका कोंकणका दौरा २६-२-१९२७ को आरम्भ हुआ था।</ref>}}
{{Left|चि°प्रभावती}}
तुमारा पत्र मीला है। क्या मेरा पत्र<ref>देखिए " पत्र : प्रभावतीको "२-२-१९२७।</ref> जिसमें मैंने श्वसुरके साथ की मुलाकातका वर्णन दीया है नहि मीला है? मार्च के अंतमें तुमको, विद्यावतीको और बन पड़े तो चन्द्रमुखी को पिताजी आश्रम भेजना चाहते हैं।
'रामायण' और 'गीताजी' का अभ्यास बढ़ा दो और चर्खा हरगीज न छोड़ो। चर्खा चलाते हुए रामधुन लगाना।
तुलसी मेहरजी मुझको दुबारा मील गये।
जिस प्रदेश में में अब घूम रहा हुं बड़ा रमणीय प्रदेश है। इसका नाम कोंकण है और महाराष्ट्रका एक हिस्सा है। मेरा भी इस प्रदेशमें यह पहला दौरा है।
मेरी मुसाफरीकी तारीख पिताजीके पत्र में दी है।
{{Right|बापुके आशीर्वाद}}
{{Left|मूल (जी० एन० ३३२७) की फोटो नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''१२३. एक मुमुक्षुकी महायात्रा'''}}}}
जब किसी आत्मार्थीका देहावसान होता है तब हम उसे महायात्रा ही कहते हैं। ज्ञानियोंने इस जगतको मुसाफिरखाना अथवा धर्मशाला माना है। हम इसमें दो दिन निवास करके चलते बनते हैं। 'गीता' ने देहको धर्मक्षेत्र कहा है। रणछोड़दास धारशी इस क्षेत्रका परित्याग करके कूच कर गये हैं। मैं उन्हें बहुत अच्छी तरह जानता था। वे आजकल कराचीमें रहा करते थे। वे श्रीमद् राजचंद्रके परमभक्त थे। रणछोड़भाईको उनके शिक्षण में पूर्ण आस्था थी। राजचंद्रभाईके नामका उल्लेख होते ही उनके नेत्रोंसे मैंने आनन्दाश्रु बहते देखे हैं। उनके परलोकवाससे उनके परिचित जनों और सम्पर्कमें आनेवाले लोगोंको गहरा दुःख होगा। वे स्वयं तो कृतार्थ होकर चले गये। कराचीके सार्वजनिक जीवनमें वे अदृष्ट रहते हुए सदा भाग लिया करते थे। वे नामके भूखे न थे। उन्हें तो कामसे काम था। उन्हें खादीमें पूरी श्रद्धा थी और कराचीमें खादीका कार्य उत्साहसे किया करते थे। ईश्वर उनकी आत्माको शांति और उनके कुटुम्बियोंको
सान्त्वना दे।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन, '''२७-२-१९२७|2em}}
१.
२.<noinclude></noinclude>
r2dhccmy9v21dxnsntsbbku1zsmd2i3
671620
671618
2026-08-18T16:30:39Z
रितु कुमारी साव
6333
671620
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१२२. पत्र : प्रभावतीको'''}}}}
{{Right|[२६ फरवरी, १९२७ के पश्चात्]<ref>गांधीजीका कोंकणका दौरा २६-२-१९२७ को आरम्भ हुआ था।</ref>}}
{{Left|चि°प्रभावती}}
तुमारा पत्र मीला है। क्या मेरा पत्र<ref>देखिए " पत्र : प्रभावतीको "२-२-१९२७।</ref> जिसमें मैंने श्वसुरके साथ की मुलाकातका वर्णन दीया है नहि मीला है? मार्च के अंतमें तुमको, विद्यावतीको और बन पड़े तो चन्द्रमुखी को पिताजी आश्रम भेजना चाहते हैं।
'रामायण' और 'गीताजी' का अभ्यास बढ़ा दो और चर्खा हरगीज न छोड़ो। चर्खा चलाते हुए रामधुन लगाना।
तुलसी मेहरजी मुझको दुबारा मील गये।
जिस प्रदेश में में अब घूम रहा हुं बड़ा रमणीय प्रदेश है। इसका नाम कोंकण है और महाराष्ट्रका एक हिस्सा है। मेरा भी इस प्रदेशमें यह पहला दौरा है।
मेरी मुसाफरीकी तारीख पिताजीके पत्र में दी है।
{{Right|बापुके आशीर्वाद}}
{{Left|मूल (जी० एन० ३३२७) की फोटो नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''१२३. एक मुमुक्षुकी महायात्रा'''}}}}
जब किसी आत्मार्थीका देहावसान होता है तब हम उसे महायात्रा ही कहते हैं। ज्ञानियोंने इस जगतको मुसाफिरखाना अथवा धर्मशाला माना है। हम इसमें दो दिन निवास करके चलते बनते हैं। 'गीता' ने देहको धर्मक्षेत्र कहा है। रणछोड़दास धारशी इस क्षेत्रका परित्याग करके कूच कर गये हैं। मैं उन्हें बहुत अच्छी तरह जानता था। वे आजकल कराचीमें रहा करते थे। वे श्रीमद् राजचंद्रके परमभक्त थे। रणछोड़भाईको उनके शिक्षण में पूर्ण आस्था थी। राजचंद्रभाईके नामका उल्लेख होते ही उनके नेत्रोंसे मैंने आनन्दाश्रु बहते देखे हैं। उनके परलोकवाससे उनके परिचित जनों और सम्पर्कमें आनेवाले लोगोंको गहरा दुःख होगा। वे स्वयं तो कृतार्थ होकर चले गये। कराचीके सार्वजनिक जीवनमें वे अदृष्ट रहते हुए सदा भाग लिया करते थे। वे नामके भूखे न थे। उन्हें तो कामसे काम था। उन्हें खादीमें पूरी श्रद्धा थी और कराचीमें खादीका कार्य उत्साहसे किया करते थे। ईश्वर उनकी आत्माको शांति और उनके कुटुम्बियोंको
सान्त्वना दे।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन, '''२७-२-१९२७|2em}}<noinclude></noinclude>
ofn16e7ponwcwnwnjrxezwx44dpso9d
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७५
250
187255
671624
645675
2026-08-18T16:38:23Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
671624
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१२४. पत्र : लॉरा आई० फिंचको'''}}}}
{{Right|२७ फरवरी, १९२७}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मुझे साबरमतीसे यहाँ भेज दिया गया है चूंकि मैं निरन्तर यात्रा कर रहा हूँ अतः बोलकर पत्र लिखवानेके लिए आप मुझे क्षमा करें। आप और श्रीमती
ब्लेयर, जिन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूँ, दोनों जब कभी आश्रम जायें आप लोगोंका स्वागत होगा। मुझे आशा है कि ९ और १४ मार्चके बीच ज्यादातर में वहाँ रहूँगा। यदि आप उस समय आयें तो मुझे स्वयं आपका स्वागत करनेमें प्रसन्नता होगी।
मेरी रायमें आप और श्रीमती ब्लेयर अपने साथ मसहरी लेकर आयें। ऐसा नहीं कि आश्रममें मच्छर बहुत हैं, लेकिन यह देखते हुए कि आश्रममें हमारे पास मसहरियाँ नहीं हैं, पहलेसे ही तैयार होकर आना बुद्धिमानी है।
{{Right|हृदयसे आपका,<br>'''मो० क० गांधी'''}}
{{Left|अंग्रेजी (एस० एन० १२८१५) की माइक्रोफिल्मसे।|2em}}
{{C|{{larger'''१२५. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मालवन<br>२८ फरवरी, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले।
मेरे मनमें कोई सन्देह नहीं कि व्रतका जीवनमें वही महत्त्व है जो नौकाके लिए पतवारका। व्रत जीवनका नियामक है। जिस प्रकार पतवारके बिना नौका भटक जाती है उसी प्रकार व्रत-विहीन जीवन लक्ष्यभ्रष्ट जीवन है। क्योंकि आखिरकार व्रतका अर्थ है है -- जानकी भी बाजी लगाकर आत्मसंयमके निर्णयको निभानेका धार्मिक संकल्प। इसलिए किसी भी पुरुष या स्त्रीके लिए, जो कदाचित् सर्वोत्तम व्रत हो सकता है, ऐसे व्रतको ग्रहण करनेकी तुम्हारी इच्छाका मुझे स्वागत करना
चाहिए। पर यदि व्रत लेना है तो खूब सोचविचार करनेके बाद लेना चाहिए। यदि तुम इस व्रतको लेनेकी आवश्यकता स्पष्ट रूपमें अनुभव करती हो, तो तुम्हें व्रत
लेनेसे रोकना मेरे लिए ठीक नहीं होगा। व्रत न लेनेक अर्थ है अपने शुद्ध 'स्व' पर विश्वास करना। व्रत लेनेका अर्थ है अपने आपपर विश्वासका न होना और केवल ईश्वरपर विश्वास करना। मैं जानता हूँ कि जो व्रत मैंने लिये हैं, यदि वे मैंने न लिये होते तो आज मेरी क्या स्थिति होती।<noinclude></noinclude>
moiemdj7bfgdl369zuflp90oo71rfwi
671627
671624
2026-08-18T16:40:54Z
रितु कुमारी साव
6333
671627
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१२४. पत्र : लॉरा आई० फिंचको'''}}}}
{{Right|२७ फरवरी, १९२७}}
{{Left|प्रिय मित्र,}}
आपका पत्र मुझे साबरमतीसे यहाँ भेज दिया गया है चूंकि मैं निरन्तर यात्रा कर रहा हूँ अतः बोलकर पत्र लिखवानेके लिए आप मुझे क्षमा करें। आप और श्रीमती
ब्लेयर, जिन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूँ, दोनों जब कभी आश्रम जायें आप लोगोंका स्वागत होगा। मुझे आशा है कि ९ और १४ मार्चके बीच ज्यादातर में वहाँ रहूँगा। यदि आप उस समय आयें तो मुझे स्वयं आपका स्वागत करनेमें प्रसन्नता होगी।
मेरी रायमें आप और श्रीमती ब्लेयर अपने साथ मसहरी लेकर आयें। ऐसा नहीं कि आश्रममें मच्छर बहुत हैं, लेकिन यह देखते हुए कि आश्रममें हमारे पास मसहरियाँ नहीं हैं, पहलेसे ही तैयार होकर आना बुद्धिमानी है।
{{Right|हृदयसे आपका,<br>'''मो० क० गांधी'''}}
{{Left|अंग्रेजी (एस० एन० १२८१५) की माइक्रोफिल्मसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''१२५. पत्र: मीराबहनको'''}}}}
{{Right|मालवन<br>२८ फरवरी, १९२७}}
{{Left|चि० मीरा,}}
मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले।
मेरे मनमें कोई सन्देह नहीं कि व्रतका जीवनमें वही महत्त्व है जो नौकाके लिए पतवारका। व्रत जीवनका नियामक है। जिस प्रकार पतवारके बिना नौका भटक जाती है उसी प्रकार व्रत-विहीन जीवन लक्ष्यभ्रष्ट जीवन है। क्योंकि आखिरकार व्रतका अर्थ है है -- जानकी भी बाजी लगाकर आत्मसंयमके निर्णयको निभानेका धार्मिक संकल्प। इसलिए किसी भी पुरुष या स्त्रीके लिए, जो कदाचित् सर्वोत्तम व्रत हो सकता है, ऐसे व्रतको ग्रहण करनेकी तुम्हारी इच्छाका मुझे स्वागत करना
चाहिए। पर यदि व्रत लेना है तो खूब सोचविचार करनेके बाद लेना चाहिए। यदि तुम इस व्रतको लेनेकी आवश्यकता स्पष्ट रूपमें अनुभव करती हो, तो तुम्हें व्रत
लेनेसे रोकना मेरे लिए ठीक नहीं होगा। व्रत न लेनेक अर्थ है अपने शुद्ध 'स्व' पर विश्वास करना। व्रत लेनेका अर्थ है अपने आपपर विश्वासका न होना और केवल ईश्वरपर विश्वास करना। मैं जानता हूँ कि जो व्रत मैंने लिये हैं, यदि वे मैंने न लिये होते तो आज मेरी क्या स्थिति होती।<noinclude></noinclude>
jaj0w45zdjwhc151ufv787ih7xszw6t
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७६
250
187256
671632
645676
2026-08-18T16:48:31Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
671632
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>पर इसका एक और पहलू भी है अर्थात् एन्ड्रयूजवाला। उनका कहना है " में नहीं जानता कि अन्तरात्माकी आवाज सदैव ईश्वरकी आवाज ही होती है। जो मैं आज
सही मानता हूँ, कल गलत भी साबित हो सकता है इसलिए मुझे अपनी आत्माको ऐसा शुद्ध और मुक्त रखना चाहिए कि पल-पल जैसी ईश्वरेच्छाकी प्रतीति हो
उसीके अनुकूल आचरण कर सकूँ।" इस रवैयेसे उनका काम तो चल गया है। पर मैं तो कहींका न रहूँगा। मुझे तो एन्ड्रयूजके तर्कके पीछे वाक्छल दिखाई देता है; उन्हें नहीं। इसलिए इस तर्कसे उन्हें सहारा मिलता है। भ्रान्ति, भूल आदि सापेक्ष शब्द हैं। यद्यपि सत्य सर्वदा एक ही रहता है, फिर भी हो सकता है कि जो बात एकके
लिए अच्छी है, वह सबके लिए अच्छी न हो। अतएव कठिनाईकी बात है, सत्य विषयक हमारा निराशाजनक अज्ञान। निष्ठुर विधाताने हमें यह समझने की शक्ति तो दी है कि सत्य एक है, उससे परे कुछ नहीं है। परन्तु हमें इतनी शक्ति नहीं दी कि हम सत्यका रहस्य जान सकें।
इसलिए यदि तुम्हारी अन्तरात्मा तुम्हें व्रत लेनेकी प्रेरणा देती हो, और तुम्हें ऐसा लगता हो कि व्रत लेनेपर तुम अधिक स्वतन्त्रताका अनुभव करोगी, तो तुम्हें व्रत लेना ही चाहिए। जल्दबाजीमें कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं।
तुम्हें अपना स्वास्थ्य सँभालकर रखना चाहिये। निश्चय ही जब कभी थोड़ासा भी भारीपन या बदहजमीका अनुभव हो, तो उपवास रखना चाहिए बदहजमी या थोड़ा भी भारीपन महसूस हो और उसके साथ शक्ति भी मालूम दे तो ऐसी शक्ति से कमजोरी ज्यादा अच्छी।
तुम्हें अपनी हिन्दीके बारेमें चिन्ता नहीं करनी चाहिए। तुम जो कुछ कर सकती हो, कर रही हो। बाकी ईश्वरके हाथमें रहने देना चाहिए। जब हम मिलेंगे, तब शायद कुछ परिवर्तन करना जरूरी होगा। यह बात तो स्पष्ट है कि तुम्हें हिन्दी सीखना और चरखा सिखाना दोनों काम एक साथ नहीं करने चाहिए। जाहिर है कि इससे तुम थक जाती हो। तुम्हें जितनी सहायताकी जरूरत थी, उतनी सहायता नहीं मिल पाई है। फिर भी तुमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, वे अमूल्य हैं और में
उनसे सन्तुष्ट हूँ।
मुझे रामचन्द्रका पत्र अभी मिला है। मुझे यह देखना है कि वहाँ आनेपर क्या किया जा सकता है।
{{Left|सस्नेह,}}
{{Right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}}
{{Left|[पुनश्च :]|2em}}
मुझे इस महत्त्वपूर्ण पत्रको दोहराने का भी समय नहीं है।
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५२०७ ) से।<br>सौजन्य : मीराबहन|2em}}<noinclude></noinclude>
jpesnrpzs8asya7lhss610b9baxezjf
671633
671632
2026-08-18T16:49:15Z
रितु कुमारी साव
6333
671633
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>पर इसका एक और पहलू भी है अर्थात् एन्ड्रयूजवाला। उनका कहना है " में नहीं जानता कि अन्तरात्माकी आवाज सदैव ईश्वरकी आवाज ही होती है। जो मैं आज
सही मानता हूँ, कल गलत भी साबित हो सकता है इसलिए मुझे अपनी आत्माको ऐसा शुद्ध और मुक्त रखना चाहिए कि पल-पल जैसी ईश्वरेच्छाकी प्रतीति हो
उसीके अनुकूल आचरण कर सकूँ।" इस रवैयेसे उनका काम तो चल गया है। पर मैं तो कहींका न रहूँगा। मुझे तो एन्ड्रयूजके तर्कके पीछे वाक्छल दिखाई देता है; उन्हें नहीं। इसलिए इस तर्कसे उन्हें सहारा मिलता है। भ्रान्ति, भूल आदि सापेक्ष शब्द हैं। यद्यपि सत्य सर्वदा एक ही रहता है, फिर भी हो सकता है कि जो बात एकके
लिए अच्छी है, वह सबके लिए अच्छी न हो। अतएव कठिनाईकी बात है, सत्य विषयक हमारा निराशाजनक अज्ञान। निष्ठुर विधाताने हमें यह समझने की शक्ति तो दी है कि सत्य एक है, उससे परे कुछ नहीं है। परन्तु हमें इतनी शक्ति नहीं दी कि हम सत्यका रहस्य जान सकें।
इसलिए यदि तुम्हारी अन्तरात्मा तुम्हें व्रत लेनेकी प्रेरणा देती हो, और तुम्हें ऐसा लगता हो कि व्रत लेनेपर तुम अधिक स्वतन्त्रताका अनुभव करोगी, तो तुम्हें व्रत लेना ही चाहिए। जल्दबाजीमें कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं।
तुम्हें अपना स्वास्थ्य सँभालकर रखना चाहिये। निश्चय ही जब कभी थोड़ासा भी भारीपन या बदहजमीका अनुभव हो, तो उपवास रखना चाहिए बदहजमी या थोड़ा भी भारीपन महसूस हो और उसके साथ शक्ति भी मालूम दे तो ऐसी शक्ति से कमजोरी ज्यादा अच्छी।
तुम्हें अपनी हिन्दीके बारेमें चिन्ता नहीं करनी चाहिए। तुम जो कुछ कर सकती हो, कर रही हो। बाकी ईश्वरके हाथमें रहने देना चाहिए। जब हम मिलेंगे, तब शायद कुछ परिवर्तन करना जरूरी होगा। यह बात तो स्पष्ट है कि तुम्हें हिन्दी सीखना और चरखा सिखाना दोनों काम एक साथ नहीं करने चाहिए। जाहिर है कि इससे तुम थक जाती हो। तुम्हें जितनी सहायताकी जरूरत थी, उतनी सहायता नहीं मिल पाई है। फिर भी तुमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, वे अमूल्य हैं और में
उनसे सन्तुष्ट हूँ।
मुझे रामचन्द्रका पत्र अभी मिला है। मुझे यह देखना है कि वहाँ आनेपर क्या किया जा सकता है।
{{Left|सस्नेह,|2em}}
{{Right|तुम्हारा,<br>'''बापू'''}}
{{Left|[पुनश्च :]}}
मुझे इस महत्त्वपूर्ण पत्रको दोहराने का भी समय नहीं है।
{{Left|अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू ० ५२०७ ) से।<br>सौजन्य : मीराबहन|2em}}<noinclude></noinclude>
ih5xrdugrljnzy4g85pds5k9d289kcj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७७
250
187257
671638
645677
2026-08-18T16:58:46Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
671638
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" /></noinclude>{{c|{{larger|'''१२६. पत्र : आश्रमकी बहनोंको'''}}}}
{{Right|मालवन<br>माघ वदी ११ [२८ फरवरी, १९२७]}}
{{Left|बहनो}}
अब मुझे तुम्हारे नाम यह एक ही पत्र भेजना रह गया है। अगले सोमवारको तो मैं तुम्हारे पास आनेके लिए रवाना हो जाऊँगा।
सफर में स्त्रियोंकी सभाएँ होती ही हैं। इसलिए नित नये अनुभव मिलते रहते हैं। मैं देख रहा हूँ कि स्वराज्यकी कुंजी स्त्रियोंके पास है, परन्तु उन्हें जाग्रत कौन करे असंख्य स्त्रियाँ ऐसी हैं जिन्हें कोई काम नहीं है, उन्हें कौन उद्यमी बनाये? माताएँ बचपनसे ही अपने बालकोंको बिगाड़ती हैं, उन्हें कौन रोके? वे अपने बालकोंको गहनों और अनेक प्रकारके कपड़ोंसे लादे रहती हैं; छोटी-छोटी बालिकाओंका ब्याह रचा देती हैं; बालिकाएँ बूढ़ोंको ब्याह दी जाती हैं। स्त्रियोंके गहने देखकर तो में हैरान हो जाता हूँ। उन्हें कौन समझाये कि गहनोंमें सौन्दर्य नहीं, सौन्दर्य तो हृदयमें है? ऐसी तो कई बातेंमें लिख सकता हूँ, मगर उनका उपाय क्या है? उपाय तो तभी हो सकता है जब स्त्रियोंमें से कोई द्रौपदी-जैसी उग्र तेजवाली निकल पड़े। ऐसी शक्ति प्राप्त करनेकी कोशिश करना तुम्हारा काम है। उसे प्राप्त करनेका निश्चय करना और फिर धीरज रखना। जल्दी करनेसे काम नहीं सरता।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (जी० एन० ३६४१ ) की फोटो- नकलसे।|2em}}
{{C|{{larger|'''१२७. पत्र : ना० मो० खरेको'''}}}}
{{Right|मालवन<br>सोमवार [ २८ फरवरी, १९२७]}}
{{Left|भाई पण्डितजी,}}
नानाभाईका जो पत्र मैंने चि० मणिलालको भेजा है उसे पढ़ लेना। यदि समय मिल सके तो नानाभाईकी प्रसन्नताके लिए एक दिन जल्दी पहुँचना। विधि तो हमें अत्यन्त संक्षेपमें करनी है। इस क्रियामें एक घंटेसे ज्यादा समय न लगे, ऐसा निश्चित कर लेना। तथापि जरूरी सभी कुछ अवश्य करना। प्रतिज्ञाकी दो प्रतियाँ बनवाना, दोनों को एक-एक देनेके लिए। तुम्हारे और मेरे भाग्यमें अब ऐसे विवाह कराना ही रहा है। अन्य मित्र जो चाहेंगे उससे तो हम उन्हें रोक नहीं सकते। यह क्रिया आदि सारी विधि इसी कारण है, इसपर अच्छी तरहसे विचार करके<noinclude></noinclude>
361udxx5tdru3vgb6rwz0pc14h7blvp
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७८
250
187258
671662
645678
2026-08-18T17:47:53Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
671662
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>इसे जितना अधिक धार्मिक बनाया जा सके, बनाना काकाके साथ सलाह-मशविरा कर लेना। कुछ संशोधन-परिवर्धन करना हो तो करें।
हम विवाहका शुभारंभ प्रार्थना और भजनसे करेंगे और मुझे लगता है कि अन्तमें भी प्रार्थना और भजन रखें। इस सम्बन्धमें भी काकाके साथ विचार कर लेना। यदि भजन रखने हैं तो कौन-कौनसे भजन रखने हैं, प्रार्थनामें कौन-से श्लोक बोलने हैं, इसपर भी सोच लेना। हमारी जो नित्यकी प्रार्थना है, केवल वही नहीं, विवाहके लिए यदि कोई खास प्रार्थना मिल जाये तो उसे भी ले लेना।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० २५०) से।<br>सौजन्य : लक्ष्मीबहन खरे|2em}}
{{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मणिलाल गांधीको'''}}}}
{{Right|[२८ फरवरी, १९२७]<ref>पत्रमें पण्डितजी सम्बन्धी चर्चाके आधारपर देखिए पिछला शीर्षक।</ref>}}
{{Left|चि० मणिलाल,}}
यह पत्र तुम्हें बुधवारको मिल जाना चाहिए।
मगनलाल लिखता है कि तुम [अकोलाके लिए] गाड़ी बम्बईसे पकड़ोगे। तव तुम्हें वहाँसे शुक्रवारको चल देना होगा। में शनिवारकी सुबह पुनामें होऊँगा। वहाँसे १० बजे निकलकर कल्याण में तुम्हारे साथ हो जाऊँगा। पूनामें सवेरे एक सभा है।
इसके साथ नानाभाईका और सुशीलाका पत्र है -- तुम्हारी जानकारीके लिए। मुझे लगता है कि तुम थोड़े समय अकोलामें रहो, उनकी इस इच्छाका तुम्हें आदर
करना चाहिए। विजयालक्ष्मी स्वभावतः तुम्हें जानना चाहेंगी; विजयालक्ष्मी तुम्हारी सास हैं।
सुशीलाने गहनों और कपड़ोंके बारेमें जो लिखा है उसपर तुम क्रोधित न होना और चिन्ता भी न करना। उसमें जो अच्छे संस्कार हैं उन्हें विकसित करनेका मैंने प्रयत्न किया है, लेकिन मैंने उसपर कोई बन्धन नहीं डाला है। तुम उसपर जैसा प्रभाव डालना चाहो वैसा डालना और तुम्हें जो छूट लेनी हो सो तुम उसकी सम्मति से लेना।
विवाह-विधिके समय ली जानेवाली प्रतिज्ञा [की प्रति ] पण्डितजीके पास है। मैं चाहता हूँ कि तुम उसे पहलेसे ही लेकर पढ़ जाओ, उसपर विचार करो और उसे अच्छी तरहसे समझ लो। भगवान तुम्हें इतनी शक्ति दे कि तुम उस प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिए सदैव तत्पर रहो।<noinclude></noinclude>
gukk25pkw9jetcr2b7usr9hyn9ae15y
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१७९
250
187259
671663
645679
2026-08-18T17:57:05Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
671663
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||पत्र : नानाभाई इ० मशरूवालाको|१४१}}</noinclude>विवाह एक नया जीवन है, यह मैं जानता हूँ। इसलिए चाहे मुझे तुम्हें विस्तारपूर्वक लिखनेके लिए अधिक समय नहीं मिलता फिर भी मेरे मनमें तुम्हारा विचार सदा बना रहता है।
तुम अकोलामें रहोगे तो भी मुझे तो वहाँसे सोमवारको चल ही देना होगा। आश्रममें मैंने अपने लिए बहुत ज्यादा काम तैयार कर रखा है।
तुम्हें मुझसे जो कुछ कहना सुनना हो उसे ठीकसे लिख कर रख लेना क्योंकि सम्भव है कि इसके बाद हम फिर न मिलें। यह भी हो सकता है कि हम इस जीवनमें फिर न मिल पायें। तुम मार्चमें जब दक्षिण आफ्रिका जाओगे उस समय में न मालूम कहाँ भटक रहा होऊँगा। इसलिए मैं देखता हूँ कि तुम्हें जो-कुछ पूछना हो, उसे पूछनेका अवसर तुम्हें ज्यादातर गाड़ी में मिलेगा। रविवारको तो हम विवाहकी धूमधाममें व्यस्त होंगे। वैसे, मैं उम्मीद तो यह करता हूँ कि धूमधाम जैसा कुछ नहीं होगा, जो होगा सो केवल धार्मिक वातावरण तैयार करनेके लिए होगा और शान्ति भी काफी रहेगी। फिर भी मैं कामकाजी व्यक्ति ठहरा, इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि हमें समय न मिले।
नानाभाईने पत्र में पण्डितजीके एक दिन पहले आनेकी माँग की है। अगर पण्डितजी जा सकें तो जायें । यद्यपि मैंने नानाभाईको लिख दिया है कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि वह एक दिन और दे सकें तो जरूर दें।
तुम 'गीता' की दो प्रतियाँ, दो प्रतियाँ ' भजनावलि' की तथा दो तकलियाँ लेते आना।
{{Right|बापूके आशीर्वाद}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२४ ) से।<br>सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी|2em}}
{{C|{{larger|'''१२९. पत्र : नानाभाई इ० मशरूवालाको'''}}}}
{{Right|[२८ फरवरी, १९२७]<ref>पण्डितजीके उल्लेखसे; देखिए पिछला शीर्षक।</ref>}}
{{Left|भाईश्री ५ नानाभाई,}}
आपका पत्र मिला । आपने पण्डितजीके जल्दी आनेकी जो बात लिखी है सो उसकी कोई जरूरत तो नहीं है। फिर भी मैंने उन्हें लिख<ref>देखिए "पत्र : ना० मो० खरेको", २८-२-१९२७।</ref> दिया है कि यदि एक दिन पहले पहुँच सकें तो अवश्य पहुँचें।
उम्मीद है, आप किसी तरहका आडम्बर अथवा सजावट आदि नहीं करेंगे। मण्डप आदिका खर्च कमसे कम करेंगे। विवाह-विधि खुली हवामें करना ठीक जान पड़ता है। केवल छाया हो; इतना ही काफी है।<noinclude></noinclude>
cmm2armapjem2qvln4hlgelb55360ys
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८०
250
187260
671696
645680
2026-08-19T05:00:49Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
671696
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आपके घरमें धार्मिक वातावरण तो है ही, लेकिन मेरी इच्छा है कि इन दिनों विशेष रूपसे हो।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|[पुनश्च]}}
मैंने मणिलालको लिखा<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref> है कि यदि बन सके तो वह चन्द दिन अकोलामें रहे। यदि वह वहाँ रहेगा तो कदाचित् दोनोंको अलगसे एक कमरा देनेकी आवश्यकता
होगी। विवाह के तुरन्त बाद वे दोनों थोड़े दिन साथ रहें, यह शायद आवश्यक है।
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२९) से।<br>सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी|}}
{{Left|चि० सुशीला,}}
{{C|{{larger|'''१३०. पत्र : सुशीलाबहन मशरूवालाको'''}}}}
{{|Right|सोमवार [२८ फरवरी, १९२७]<ref>पत्र में विवाह प्रतिज्ञाको चर्चाके आधारपर देखिए " पत्र: मणिलाल गांधीको", २८-२-१९२७ और " पत्र : ना० मो० खरेको", २८-२-१९२७।</ref>}}
चि॰ सुशीला,
तुम्हारा बहुत सोच-सोचकर लिखा हुआ पत्र इतने दिनोंके बाद आया; मगर आया तो सही। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे निस्संकोच होकर लिखनेकी आदत डालो।
रविवारके दिन तुम्हें, मणिलालको, नानाभाईको, विजयालक्ष्मीको, मुझे तथा बा को विवाह-विधि पूरी होनेतक अर्थात् १२ बजेतक, उपवास करना होगा। वह
सारा समय तुम धर्म-चिन्तन और विवाहका अर्थ समझने में बिताना। विवाह भोगके लिए नहीं, संयमके लिए है, इस बातको आजकल तो लोग बिलकुल ही भूल गये हैं।
आदमी--स्त्री-पुरुष--जब विकारवश होते हैं तब उस विकारको नियमित रखने, उसे मर्यादामें बाँधनेके लिए विवाह-सम्बन्ध करते हैं। हममें और पशुओंमें यही भेद है। इस तरह यद्यपि विवाह विषय-भोगका अवसर देता है तथापि शास्त्रमें यह कहा गया है कि दम्पतीका धर्म है कि वे विषय-भोगको उत्तरोत्तर कम करते जायें भोगार्थं रचे गये दाम्पत्य सम्बन्धको भी शास्त्र मोक्षार्थ उपयोग करनेका प्रयत्न करते हैं और उनका यही आदेश है। और वह भी इस हदतक कि मुमुक्षुओंने आत्मा और परमात्माके सम्बन्धको भी विवाह रूपमें वर्णित किया है। दाम्पत्य प्रेमके विषयमें जिस शुद्ध अद्वैतकी कल्पना की गई है वही कल्पना आत्मा और परमात्माके अद्वैतके सम्बन्धमें भी की गई है। इस तरह विवाह समाज-सेवाका एक बहुत बड़ा साधन बन सकता है। भगवान करे कि तुम्हारे विवाहके सम्बन्धमें भी यही बात चरितार्थ हो।<noinclude></noinclude>
cx19p1m21lyfdlqw51v7dwvgyh14ta0
671697
671696
2026-08-19T05:02:44Z
रितु कुमारी साव
6333
671697
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आपके घरमें धार्मिक वातावरण तो है ही, लेकिन मेरी इच्छा है कि इन दिनों विशेष रूपसे हो।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|[पुनश्च]}}
मैंने मणिलालको लिखा<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref> है कि यदि बन सके तो वह चन्द दिन अकोलामें रहे। यदि वह वहाँ रहेगा तो कदाचित् दोनोंको अलगसे एक कमरा देनेकी आवश्यकता
होगी। विवाह के तुरन्त बाद वे दोनों थोड़े दिन साथ रहें, यह शायद आवश्यक है।
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२९) से।<br>सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी|}}
{{C|{{larger|'''१३०. पत्र : सुशीलाबहन मशरूवालाको'''}}}}
{{Left|चि० सुशीला,}}
{{|Right|सोमवार [२८ फरवरी, १९२७]<ref>पत्र में विवाह प्रतिज्ञाको चर्चाके आधारपर देखिए " पत्र: मणिलाल गांधीको", २८-२-१९२७ और " पत्र : ना० मो० खरेको", २८-२-१९२७।</ref>}}
चि॰ सुशीला,
तुम्हारा बहुत सोच-सोचकर लिखा हुआ पत्र इतने दिनोंके बाद आया; मगर आया तो सही। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे निस्संकोच होकर लिखनेकी आदत डालो।
रविवारके दिन तुम्हें, मणिलालको, नानाभाईको, विजयालक्ष्मीको, मुझे तथा बा को विवाह-विधि पूरी होनेतक अर्थात् १२ बजेतक, उपवास करना होगा। वह
सारा समय तुम धर्म-चिन्तन और विवाहका अर्थ समझने में बिताना। विवाह भोगके लिए नहीं, संयमके लिए है, इस बातको आजकल तो लोग बिलकुल ही भूल गये हैं।
आदमी--स्त्री-पुरुष--जब विकारवश होते हैं तब उस विकारको नियमित रखने, उसे मर्यादामें बाँधनेके लिए विवाह-सम्बन्ध करते हैं। हममें और पशुओंमें यही भेद है। इस तरह यद्यपि विवाह विषय-भोगका अवसर देता है तथापि शास्त्रमें यह कहा गया है कि दम्पतीका धर्म है कि वे विषय-भोगको उत्तरोत्तर कम करते जायें भोगार्थं रचे गये दाम्पत्य सम्बन्धको भी शास्त्र मोक्षार्थ उपयोग करनेका प्रयत्न करते हैं और उनका यही आदेश है। और वह भी इस हदतक कि मुमुक्षुओंने आत्मा और परमात्माके सम्बन्धको भी विवाह रूपमें वर्णित किया है। दाम्पत्य प्रेमके विषयमें जिस शुद्ध अद्वैतकी कल्पना की गई है वही कल्पना आत्मा और परमात्माके अद्वैतके सम्बन्धमें भी की गई है। इस तरह विवाह समाज-सेवाका एक बहुत बड़ा साधन बन सकता है। भगवान करे कि तुम्हारे विवाहके सम्बन्धमें भी यही बात चरितार्थ हो।<noinclude></noinclude>
rwvhhs34qytb96wjuak4dl16m2oys1d
671698
671697
2026-08-19T05:03:46Z
रितु कुमारी साव
6333
671698
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>आपके घरमें धार्मिक वातावरण तो है ही, लेकिन मेरी इच्छा है कि इन दिनों विशेष रूपसे हो।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|[पुनश्च]}}
मैंने मणिलालको लिखा<ref>देखिए पिछला शीर्षक।</ref> है कि यदि बन सके तो वह चन्द दिन अकोलामें रहे। यदि वह वहाँ रहेगा तो कदाचित् दोनोंको अलगसे एक कमरा देनेकी आवश्यकता
होगी। विवाह के तुरन्त बाद वे दोनों थोड़े दिन साथ रहें, यह शायद आवश्यक है।
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२९) से।<br>सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी|}}
{{C|{{larger|'''१३०. पत्र : सुशीलाबहन मशरूवालाको'''}}}}
{{Right|सोमवार [२८ फरवरी, १९२७]<ref>पत्र में विवाह प्रतिज्ञाको चर्चाके आधारपर देखिए " पत्र: मणिलाल गांधीको", २८-२-१९२७ और " पत्र : ना० मो० खरेको", २८-२-१९२७।</ref>}}
{{Left|चि॰ सुशीला,}}
तुम्हारा बहुत सोच-सोचकर लिखा हुआ पत्र इतने दिनोंके बाद आया; मगर आया तो सही। मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे निस्संकोच होकर लिखनेकी आदत डालो।
रविवारके दिन तुम्हें, मणिलालको, नानाभाईको, विजयालक्ष्मीको, मुझे तथा बा को विवाह-विधि पूरी होनेतक अर्थात् १२ बजेतक, उपवास करना होगा। वह
सारा समय तुम धर्म-चिन्तन और विवाहका अर्थ समझने में बिताना। विवाह भोगके लिए नहीं, संयमके लिए है, इस बातको आजकल तो लोग बिलकुल ही भूल गये हैं।
आदमी--स्त्री-पुरुष--जब विकारवश होते हैं तब उस विकारको नियमित रखने, उसे मर्यादामें बाँधनेके लिए विवाह-सम्बन्ध करते हैं। हममें और पशुओंमें यही भेद है। इस तरह यद्यपि विवाह विषय-भोगका अवसर देता है तथापि शास्त्रमें यह कहा गया है कि दम्पतीका धर्म है कि वे विषय-भोगको उत्तरोत्तर कम करते जायें भोगार्थं रचे गये दाम्पत्य सम्बन्धको भी शास्त्र मोक्षार्थ उपयोग करनेका प्रयत्न करते हैं और उनका यही आदेश है। और वह भी इस हदतक कि मुमुक्षुओंने आत्मा और परमात्माके सम्बन्धको भी विवाह रूपमें वर्णित किया है। दाम्पत्य प्रेमके विषयमें जिस शुद्ध अद्वैतकी कल्पना की गई है वही कल्पना आत्मा और परमात्माके अद्वैतके सम्बन्धमें भी की गई है। इस तरह विवाह समाज-सेवाका एक बहुत बड़ा साधन बन सकता है। भगवान करे कि तुम्हारे विवाहके सम्बन्धमें भी यही बात चरितार्थ हो।<noinclude></noinclude>
54jxj0lbc2vnipd83bow0ij5ndd0ohd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१८१
250
187261
671705
645681
2026-08-19T05:24:21Z
रितु कुमारी साव
6333
/* शोधित */
671705
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण: रत्नागिरिमें|१४३}}</noinclude>विवाहकी प्रतिज्ञाकी एक प्रति मैं तुम्हें जल्दी भेज देनेका प्रयत्न कर रहा हूँ। यदि वह मिल जाये तो उसपर मनन करना। भगवान तुम्हें उसका पालन करनेकी शक्ति प्रदान करें।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२५) से।<br>सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी|2em}
{{C|{{larger|'''१३१. भाषण : लांजेमें'''<ref>महादेव देसाईंकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से। इसका मिलान यंग इंडिया १०-३-१९२७ में प्रकाशित विवरणसे भी कर लिया गया है।</ref>}}}}
{{Right|२८ फरवरी, १९२७}}
मैंने आपको इतनी देर बैठाये रखा,<ref>गांधीजी लांजेमें आधी रातके बाद पहुँचे थे।</ref> इसके लिए मैं नहीं जानता कि मुझे आप पर दया आनी चाहिए या अपने ऊपर। मगर हम लोगोंने आज वही किया है जो 'गीता' का योगी करता है, यानी रात में जागरण। किन्तु आज तो योगी और भोगी दोनों देरतक जागते हैं। आप निःस्वार्थ भावसे जग रहे हैं, इसलिए योगी ही हैं। किन्तु में भोगी हूँ या योगी, इसका पता आज कैसे चल सकता है? में आपकी योग-साधनापर आपको बधाई देता हूँ। परन्तु आप सच्चे योगी हैं, यह तो तभी सिद्ध
होगा जब आप, जिस परमार्थके कार्य में मैं आपकी सहायता माँगने आया हूँ उसमें मुझे सहायता देंगे। तो आप खादीके लिए पैसा दीजिए और खादी खरीदिये।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन, '''१३-३-१९२७}}
{{C|{{larger|'''१३२. भाषण: रत्नागिरिमें'''<ref>महादेव देसाईकी "साप्ताहिक चिठ्ठी" से।</ref>}}}}
{{Right|[१ मार्च, १९२७]<ref>यंग इंडियामें १०-३-१९२७ को छपी “साप्ताहिक चिट्ठी" से।
/Ref><}}
'''गांधीजीने पहले कहा कि लोकमान्यका जन्मस्थान होनेके कारण रत्नागिरि समस्त भारतके लिए एक तीर्थ है। फिर श्रीयुत वि० दा० सावरकरका मार्मिक शब्दोंमें उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा:'''
आप लोकमान्य तिलकके स्वराज्य मन्त्रसे तो परिचित ही हैं। मेरा खयाल है कि इस मन्त्रको सिद्ध कर दिखानेका प्रयत्न करनेवाले लोकमान्यके अनुयायियोंमें मेरा<noinclude></noinclude>
j9hlnuo5x7r4cl0izbwis4ibapcdgye
671706
671705
2026-08-19T05:25:36Z
रितु कुमारी साव
6333
671706
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण: रत्नागिरिमें|१४३}}</noinclude>विवाहकी प्रतिज्ञाकी एक प्रति मैं तुम्हें जल्दी भेज देनेका प्रयत्न कर रहा हूँ। यदि वह मिल जाये तो उसपर मनन करना। भगवान तुम्हें उसका पालन करनेकी शक्ति प्रदान करें।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२५) से।<br>सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी|2em}}
{{C|{{larger|'''१३१. भाषण : लांजेमें'''<ref>महादेव देसाईंकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से। इसका मिलान यंग इंडिया १०-३-१९२७ में प्रकाशित विवरणसे भी कर लिया गया है।</ref>}}}}
{{Right|२८ फरवरी, १९२७}}
मैंने आपको इतनी देर बैठाये रखा,<ref>गांधीजी लांजेमें आधी रातके बाद पहुँचे थे।</ref> इसके लिए मैं नहीं जानता कि मुझे आप पर दया आनी चाहिए या अपने ऊपर। मगर हम लोगोंने आज वही किया है जो 'गीता' का योगी करता है, यानी रात में जागरण। किन्तु आज तो योगी और भोगी दोनों देरतक जागते हैं। आप निःस्वार्थ भावसे जग रहे हैं, इसलिए योगी ही हैं। किन्तु में भोगी हूँ या योगी, इसका पता आज कैसे चल सकता है? में आपकी योग-साधनापर आपको बधाई देता हूँ। परन्तु आप सच्चे योगी हैं, यह तो तभी सिद्ध
होगा जब आप, जिस परमार्थके कार्य में मैं आपकी सहायता माँगने आया हूँ उसमें मुझे सहायता देंगे। तो आप खादीके लिए पैसा दीजिए और खादी खरीदिये।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन, '''१३-३-१९२७}}
{{C|{{larger|'''१३२. भाषण: रत्नागिरिमें'''<ref>महादेव देसाईकी "साप्ताहिक चिठ्ठी" से।</ref>}}}}
{{Right|[१ मार्च, १९२७]<ref>यंग इंडियामें १०-३-१९२७ को छपी “साप्ताहिक चिट्ठी" से।
/Ref>}}
'''गांधीजीने पहले कहा कि लोकमान्यका जन्मस्थान होनेके कारण रत्नागिरि समस्त भारतके लिए एक तीर्थ है। फिर श्रीयुत वि० दा० सावरकरका मार्मिक शब्दोंमें उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा:'''
आप लोकमान्य तिलकके स्वराज्य मन्त्रसे तो परिचित ही हैं। मेरा खयाल है कि इस मन्त्रको सिद्ध कर दिखानेका प्रयत्न करनेवाले लोकमान्यके अनुयायियोंमें मेरा<noinclude></noinclude>
14vuq2i4f8qlf2jve9dmt59t6gcwth8
671707
671706
2026-08-19T05:26:05Z
रितु कुमारी साव
6333
671707
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण: रत्नागिरिमें|१४३}}</noinclude>विवाहकी प्रतिज्ञाकी एक प्रति मैं तुम्हें जल्दी भेज देनेका प्रयत्न कर रहा हूँ। यदि वह मिल जाये तो उसपर मनन करना। भगवान तुम्हें उसका पालन करनेकी शक्ति प्रदान करें।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२५) से।<br>सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी|2em}}
{{C|{{larger|'''१३१. भाषण : लांजेमें'''<ref>महादेव देसाईंकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से। इसका मिलान यंग इंडिया १०-३-१९२७ में प्रकाशित विवरणसे भी कर लिया गया है।</ref>}}}}
{{Right|२८ फरवरी, १९२७}}
मैंने आपको इतनी देर बैठाये रखा,<ref>गांधीजी लांजेमें आधी रातके बाद पहुँचे थे।</ref> इसके लिए मैं नहीं जानता कि मुझे आप पर दया आनी चाहिए या अपने ऊपर। मगर हम लोगोंने आज वही किया है जो 'गीता' का योगी करता है, यानी रात में जागरण। किन्तु आज तो योगी और भोगी दोनों देरतक जागते हैं। आप निःस्वार्थ भावसे जग रहे हैं, इसलिए योगी ही हैं। किन्तु में भोगी हूँ या योगी, इसका पता आज कैसे चल सकता है? में आपकी योग-साधनापर आपको बधाई देता हूँ। परन्तु आप सच्चे योगी हैं, यह तो तभी सिद्ध
होगा जब आप, जिस परमार्थके कार्य में मैं आपकी सहायता माँगने आया हूँ उसमें मुझे सहायता देंगे। तो आप खादीके लिए पैसा दीजिए और खादी खरीदिये।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन, '''१३-३-१९२७}}
{{C|{{larger|'''१३२. भाषण: रत्नागिरिमें'''<ref>महादेव देसाईकी "साप्ताहिक चिठ्ठी" से।</ref>}}}}
{{Right|[१ मार्च, १९२७]<ref>यंग इंडियामें १०-३-१९२७ को छपी “साप्ताहिक चिट्ठी" से।
</Ref>}}
'''गांधीजीने पहले कहा कि लोकमान्यका जन्मस्थान होनेके कारण रत्नागिरि समस्त भारतके लिए एक तीर्थ है। फिर श्रीयुत वि० दा० सावरकरका मार्मिक शब्दोंमें उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा:'''
आप लोकमान्य तिलकके स्वराज्य मन्त्रसे तो परिचित ही हैं। मेरा खयाल है कि इस मन्त्रको सिद्ध कर दिखानेका प्रयत्न करनेवाले लोकमान्यके अनुयायियोंमें मेरा<noinclude></noinclude>
91ti6y7bnlbciuestkfpoqbm9ayqv6p
671708
671707
2026-08-19T05:26:25Z
रितु कुमारी साव
6333
671708
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रितु कुमारी साव" />{{rh||भाषण: रत्नागिरिमें|१४३}}</noinclude>विवाहकी प्रतिज्ञाकी एक प्रति मैं तुम्हें जल्दी भेज देनेका प्रयत्न कर रहा हूँ। यदि वह मिल जाये तो उसपर मनन करना। भगवान तुम्हें उसका पालन करनेकी शक्ति प्रदान करें।
{{Right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
{{Left|गुजराती (सी० डब्ल्यू० ११२५) से।<br>सौजन्य : सुशीलाबहन गांधी|2em}}
{{C|{{larger|'''१३१. भाषण : लांजेमें'''<ref>महादेव देसाईंकी "साप्ताहिक चिट्ठी" से। इसका मिलान यंग इंडिया १०-३-१९२७ में प्रकाशित विवरणसे भी कर लिया गया है।</ref>}}}}
{{Right|२८ फरवरी, १९२७}}
मैंने आपको इतनी देर बैठाये रखा,<ref>गांधीजी लांजेमें आधी रातके बाद पहुँचे थे।</ref> इसके लिए मैं नहीं जानता कि मुझे आप पर दया आनी चाहिए या अपने ऊपर। मगर हम लोगोंने आज वही किया है जो 'गीता' का योगी करता है, यानी रात में जागरण। किन्तु आज तो योगी और भोगी दोनों देरतक जागते हैं। आप निःस्वार्थ भावसे जग रहे हैं, इसलिए योगी ही हैं। किन्तु में भोगी हूँ या योगी, इसका पता आज कैसे चल सकता है? में आपकी योग-साधनापर आपको बधाई देता हूँ। परन्तु आप सच्चे योगी हैं, यह तो तभी सिद्ध
होगा जब आप, जिस परमार्थके कार्य में मैं आपकी सहायता माँगने आया हूँ उसमें मुझे सहायता देंगे। तो आप खादीके लिए पैसा दीजिए और खादी खरीदिये।
{{Left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन, '''१३-३-१९२७}}
{{C|{{larger|'''१३२. भाषण: रत्नागिरिमें'''<ref>महादेव देसाईकी "साप्ताहिक चिठ्ठी" से।</ref>}}}}
{{Right|[१ मार्च, १९२७]<ref>यंग इंडियामें १०-३-१९२७ को छपी “साप्ताहिक चिट्ठी" से।
</Ref>}}
'''गांधीजीने पहले कहा कि लोकमान्यका जन्मस्थान होनेके कारण रत्नागिरि समस्त भारतके लिए एक तीर्थ है। फिर श्रीयुत वि० दा० सावरकरका मार्मिक शब्दोंमें उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा:'''
आप लोकमान्य तिलकके स्वराज्य मन्त्रसे तो परिचित ही हैं। मेरा खयाल है कि इस मन्त्रको सिद्ध कर दिखानेका प्रयत्न करनेवाले लोकमान्यके अनुयायियोंमें मेरा<noinclude></noinclude>
46x3rxamkla3v3nev0ekre8fflkvcyd
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६५७
250
187607
671651
646039
2026-08-18T17:27:02Z
Avantika Shaw
4732
/* शोधित */
671651
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />सांकेतिका</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|३३१, ३९१, ३९७, ४३०, ४७८, ४८४, ५३१; - देवनागरी लिपिमें, ६६-७, १७९-८०, २७४}}
{{outdent|नाटक; -और समाज, २०९}}
{{outdent|नाडकर्णी, एस० डी०, ८०-१, २७३, ४०१}}
{{outdent|नाथजी, ७४}}
{{outdent|नानक (गुरु), ३९१}}
{{outdent|नानाभाई, २०४, ४१३}}
{{outdent|नायडू, पद्मजा, ६२}}
{{outdent|नायडू, सरोजिनी, ६२, ९०, ९४, २२१, २२८, ३१८, ३९३}}
{{outdent|नियम, प्रकृतिके, देखिए प्रकृति}}
{{outdent|निरामिषाहार (शाकाहार), ४९, ७८, १२७, १४०}}
{{outdent|निवेदिता, सिस्टर; -की स्मृतिके साथ न्याय, ८६-८}}
{{outdent|नीमू, ३८२}}
{{outdent|नील, जनरल; -की मूर्तिको हटानेके लिए मद्रासमें आन्दोलन, ४२९, ४९३-४, ५०७-८, ५२८-९}}
{{outdent|नेहरू, कमला, २२१}}
{{outdent|नेहरू, जवाहरलाल, ९४ पा० टि०, १७२, २२१, २३१, ४३८; -कांग्रेस अध्यक्ष के रूपमें, ३३}}
{{outdent|नेहरू, मोतीलाल, ३२, ६२, ९४, १७२, २९४, ३३१-४, ३३५, ४२५, ४३७-८}}
{{outdent|नौरोजी, दादाभाई, ११०}}
{{c|प}}
{{outdent|पटवर्धन, एकनाथ श्रीपाद, २८५, ३२७}}
{{outdent|पटेल, ईश्वरलाल, ३५२}}
{{outdent|पटेल, गोविन्दभाई बी०, ३५२}}
{{outdent|पटेल, मणिबहन, १, ६८, ७०, ११४, १६३, ३२५, ३८५, ४१६, ४२३}}
{{outdent|पटेल, मणिबेन, देखिए पटेल, मणिवहन}}
{{outdent|पटेल, यशोदा डाह्याभाई वी०, ३८५ पा० टि०}}
{{multicol-break}}
{{outdent|पटेल, रावजीभाई, ३३१}}
{{outdent|पटेल, वल्लभभाई, ७, १४१-२, २३०-१, २८८, ३०४, ३०५, ३०८-९, ३१८, ३२४, ३३०, ३४०, ३७२, ३८०-१, ३९४, ३९६, ४६६}}
{{outdent|पटेल, विट्ठलभाई, ३०१-२, ३८५ पा० टि०, ३८६}}
{{outdent|पट्टणी, प्रभाशंकर, ५६८}}
{{outdent|पट्टणी, लेडी प्रभाशंकर, ५६८}}
{{outdent|पडवेकर, एम० एन०, २३३}}
{{outdent|पण्डित, वसुमती, ९५, २१४, २५३, २७९, ३६२, ४०९}}
{{outdent|पण्डित, विजयलक्ष्मी, १४ पा० टि०}}
{{outdent|पत्नी - आदर्श मिल जाये तो, १५७-८; - के आदर्श गुण, १५७-८; - के पथभ्रष्ट हो जानेपर कर्त्तव्य, २५७}}
{{outdent|पथिक, विजयसिंह, ५७०}}
{{outdent|पद्मावतीबाई, एस० एम०, ३५२}}
{{outdent|परम्परा; और विवेक बुद्धि, ५९७-८}}
{{outdent|परोपकार; और अनासक्ति, ७८-९}}
{{outdent|पर्दा; -आजादीपर बन्दिश, ३७}}
{{outdent|पवित्रता; - एक गुण, ५५९}}
{{outdent|पशु-पालन, २४, १७५, ४५१; - पर राज्यका नियन्त्रण, ३८; - संगठित पिंजरापोलों द्वारा, १३५; - सहकारी समितियों द्वारा, ३०३-४}}
{{outdent|पाटकर, जी० ए०, ३०६}}
{{outdent|पाठक, एच० जी०, २७७}}
{{outdent|पाण्डव, २२३}}
{{outdent|पाप और पुण्य, ९८; -का दण्ड, बाढ़के रूपमें, २८८; - मनकी एक स्थिति, २११; - रहित कोई नहीं है, ४४१}}
{{outdent|पारनेरकर, वाई० एम०, १३५, २३५, ३२३}}
{{outdent|पारसी, ६७, १०९, २७४, ३३०, ३६६, ४९४, ५५५}}
{{outdent|पॉल, ए० ए०, १३, ३७९}}
{{outdent|पॉल, सेंट, २८३}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
elgsdls1ws1e39pnnumrpjel4qwnrmf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६५८
250
187608
671733
646040
2026-08-19T08:37:32Z
Avantika Shaw
4732
/* शोधित */
671733
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />६२२सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|पारेख, कुँवरजी, २५३}}
{{outdent|पारेख, देवचन्द, ३८०, ३९३}}
{{outdent|पारेख, नरहरि, ३०४}}
{{outdent|पार्कर, २८२}}
{{outdent|पार्वती (देवी), २२६}}
{{outdent|पावलार, ५१२, ५१८}}
{{outdent|पाश्चात्य सभ्यता, ३४४; -के अनुकरणकी निन्दा, २८, ५७-८, २४८, ३४३-४}}
{{outdent|पिछड़े वर्ग; और दलित वर्ग में भेद, ३९७}}
{{outdent|पियर्सन, २८२, ३४१}}
{{outdent|पिल्लई, जी० परमेश्वरन्, ५२०}}
{{outdent|पुणताम्बेकर, प्रोफेसर (एस० वी०), १०८, ४८२}}
{{outdent|पुण्य और पाप, ९८}}
{{outdent|पुनर्जन्म, ९७}}
{{outdent|पुनर्विवाह; - विधवाओंका, देखिए विधवा-पुनर्विवाह}}
{{outdent|पुरुषोत्तम, ३३७}}
{{outdent|पुरुषोत्तमदास, ठाकुरदास सर, ३४०}}
{{outdent|पूंजाभाई, ४१९}}
{{outdent|पूर्वी आफ्रिका के भारतीय अधिवासी, ४७३-४}}
{{outdent|पेटावेल, जे० डब्ल्यू०, ५६, ९२, १६२, २४७}}
{{outdent|पेटिट, जे० बी०, ११४, ११६, २०५, ३२५-६}}
{{outdent|पोद्दार, रामेश्वरदास, ५५, २३८}}
{{outdent|प्रकृति, ३१३; और गरीबी, ४८९-९१; -और रोग, २४५; -के नियम, १३८, १४७-८, २८८-९}}
{{multicol-break}}
{{outdent|प्रभावती, २७२}}
{{outdent|प्रभुदास, ४०}}
{{outdent|प्रमादधन, ४१६}}
{{outdent|प्राकृतिक चिकित्सा; -अजीर्णकी, २४७; -बिच्छूके काटेकी, २५१}}
{{outdent|प्रान्तीय भाषाएँ; -और हिन्दी, १९०; - [ओं] की उपेक्षा नहीं करनी है, १५६; - के लिए देवनागरी लिपि, १७९-८०; - के स्थानपर हिन्दीको प्रतिष्ठित करनेकी बात नहीं है, ५९८}}
{{outdent|प्रार्थना; - ओषधि है, १४७-८; -का महत्त्व, ४५४, ५४९-५०; देखिए रामनाम}}
{{outdent|प्रेम; -और अहिंसा, ३९५; -का नियम, पारिवारिक सम्बन्धोंमें, ४०४}}
{{outdent|फॉरवर्ड, ८८}}
{{outdent|फैशन; - में अनुपातके खयालकी आवश्यकता, ८५}}
{{c|ब}}
{{outdent|बच्चे; वर्णसंकर, आफ्रिकाकी समस्या, ४४०-२}}
{{outdent|बजाज, जमनालाल, १७, २२, ११७, ११९, १२३, १२६, २२२, २२९, २५४, २७७, २७८, २८४-५, २८६, ३१७, ३२७, ३३०, ४९७, ५३५, ५६६, ५७७}}
{{outdent|बटलर, २८२}}
{{outdent|बड़ो दादा, देखिए ठाकुर, द्विजेन्द्रनाथ}}
{{outdent|बद्री, ७८}}
{{outdent|बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ, १५९, २४४, २५४}}
{{outdent|बनर्जी, श्रीमती, २३}}
{{outdent|बनुमैया, डी०, २३९}}
{{outdent|बकी, ए०, ३५६}}
{{outdent|बर्मा का भारतसे अलग होना, १९७}}
{{outdent|बहादुरजी, श्रीमती माणिकवाई, १३}}
{{outdent|बहिष्कार; और मिलका कपड़ा, ४८१; - विदेशी कपड़ेका, १६५, १८३, ३६८, ४६३, ५८३; -विदेशी मालका, ४६३}}
{{outdent|बॉसवेल, ५८७}}
{{outdent|बाइबिल, ११, ९७, १६६, १७४, १८४, २८०-१, ४९५-६; - ईश्वरके शब्द, ५९७-८}}
{{outdent|बाढ़, ३८९; -आदि घटनाएँ अपरिहार्य हैं, ३६२; -और प्रलय, ईश्वरकी चेतावनी, ४३१; - के बाद सहायता-}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
7x5b9gf36zbt5luw37svvz4tvpa20fx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/६५९
250
187609
671739
646041
2026-08-19T08:48:57Z
Avantika Shaw
4732
/* शोधित */
671739
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||सांकेतिका|६२३}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|कार्य, ३४०, ३८०-१, ३९२-६, ४३१, ४५६-७, ४८४-६, ५५७; -गुजरातमें २८८-९, २९२, ३०४-५, ३२४; -सहायता कोष ३०४-५, ३०७-८, ३३०-१, ४१४; -से शिक्षा, ३७१-२, ४६८}}
{{outdent|बापूके पत्र मीराको, देखिए बापूज लैटर्स टु मीरा}}
{{outdent|'''बापूज लैटर्स टु मीरा,'''११२ पा० टि०}}
{{outdent|बालकृष्ण, ३८८}}
{{outdent|बाल विवाह; -और कम उम्र में विवाह, ५८६; -और बाल विधवाएँ, ५३४, ५८१-२, ५८३, ५९६, ५९८; - एक बुराई, २५०, ४६६}}
{{outdent|बालाजी, ३९७}}
{{outdent|बाली, (रामायणका), ३६१}}
{{outdent|बासन्तीदेवी, ४०-१}}
{{outdent|बिड़ला, घनश्यामदास, ४९-५०, २२२}}
{{outdent|बियरम, १७४}}
{{outdent|बियरम, श्रीमती, १७४}}
{{outdent|बुद्ध, ४४२}}
{{outdent|बुद्धि; का विकास, ४४६}}
{{outdent|बुराई; और अच्छाई, ४९; - का उद्गम, ३१४}}
{{outdent|बुल, श्रीमती ओल, ८६}}
{{outdent|बुर्जास, लीज, २१९}}
{{outdent|बैंकर, घेलाभाई, २५४}}
{{outdent|बैंकर, शंकरलाल, ११७, ११९, १२३, २२१, २५४, २७७, २७८, ३२८, ५३५}}
{{outdent|बोअर, डी०, ४५८ पा० टि०}}
{{outdent|बोस, जगदीशचन्द्र; -का वनस्पतिमें जीवन, का सिद्धान्त, १२७}}
{{outdent|बोस, डी० सी०, १७०}}
{{outdent|बौद्ध दर्शन, ९८}}
{{outdent|बौद्ध धर्म, २१}}
{{outdent|ब्यूरो, एम०, २०९}}
{{outdent|ब्लेयर, श्रीमती, ७२, १२८}}
{{multicol-break}}
{{outdent|ब्लेचफोर्ड, ४५१}}
{{outdent|ब्रदर हुड, ३४५}}
{{outdent|ब्रह्म, २२६}}
{{outdent|ब्रह्मचर्य, १, ३३, १०२, १२८, १५८-९, १६५-६, ४४७, ४७५, ४७७, ४९७, ५५९; -और शारीरिक बल, ४५; - का अर्थ, ९८; - के गुण, ४९८-९; - में रस, १५७-९; - में स्वादेन्द्रियको जीतनेसे सहायता मिलती है, ९८}}
{{outdent|ब्रॉकवे, ए० फेनर, १२०}}
{{outdent|ब्राह्मण; - [ णों] और अब्राह्मणोंके बीच दरार, ५३३, ५४७, ५५३-५, ५७२; - को सलाह, ५५३-५}}
{{outdent|ब्राह्मणवाद; की प्रशंसा, ५५५; -के अंधविश्वासोंकी निन्दा, ५२४}}
{{c|भ}}
{{outdent|'''भगवद्गीता,''' २१, ३४-६, ७४, ११९, १६६, १८१, १८४, १९०, २०८, २९१, ४०३, ४०५, ४१४, ४१७, ४५५, ४८५, ५०६, ५२५, ५६०, ५६३; -की व्याख्या, ९६-११०; को पढ़ना महिलाओंको जानना चाहिए, ११४, २१४-५; - को पढ़ना विद्यार्थियोंको जानना चाहिए, ४२६-७, ४५९, ४९५-६, ५९५-६, ५९७-८; में कर्म, ७८, ४१०-१; - में प्रतिपादित त्यागका कर्त्तव्य, ४४४}}
{{outdent|भट्ट, नृसिंहप्रसाद कालिदास, १४८ पा० टि०}}
{{outdent|भणसाली, जयकृष्ण प्रभुदास, १९४-५, २६१, ३१०, ३६९, ३८४, ३८६-७; - का उपवास, ४२-३, २६२-३}}
{{outdent|भरूचा, बी० एफ०, ९२, १४०, १४२, १७०, १८१}}
{{outdent|भवानी, (देवी), ३९७}}
{{outdent|भविष्य; - के बारेमें सोचना निरर्थक है, ६९}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
2tyvejfn828hzbsvjgqoxnx232qsb60
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/२७
250
187620
671694
646052
2026-08-19T04:57:29Z
शिखर तिवारी
633
/* शोधित */
671694
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{C|उन्नीस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|१३५.|| पत्र: मीराबहनको (१३-७-१९२७)|| १६९
|-
|१३६.|| पत्र: जे० ज़ेड० हॉजको (१३-७-१९२७)|| १६९
|-
|१३७.|| पत्र: शापुरजी सकलातवालाको (१३-७-१९२७)|| १७०
|-
|१३८.|| पत्र: डी० सी० बोसको (१३-७-१९२७)|| १७०
|-
|१३९.|| पत्र: एस० रामनाथन्को (१३-७-१९२७)|| १७२
|-
|१४०.|| पत्र: मोतीलाल नेहरूको (१३-७-१९२७)|| १७२
|-
|१४१.|| एक पत्र (१३-७-१९२७)|| १७३
|-
|१४२.|| भाषण: महिला समाज, बंगलोर में (१३-७-१९२७)|| १७३
|-
|१४३.|| भेंट: श्री और श्रीमती बियरमको (१४-७-१९२७ के पूर्व)|| १७४
|-
|१४४.|| पिंजरापोलोंका सुधार (१४-७-१९२७)|| १७५
|-
|१४५.|| अखिल भारतीय लिपि (१४-७-१९२७)|| १७९
|-
|१४६.|| सत्याग्रहकी सीमाएँ (१४-७-१९२७)|| १८१
|-
|१४७.|| समान तुलापर (१४-७-१९२७)|| १८५
|-
|१४८.|| भाषण: तुमकुर नगरपालिका द्वारा दिये गये मानपत्रके उत्तर में (१४-७-१९२७)|| १८७
|-
|१४९.|| भाषण: तुमकुर प्राणी-दया संघमें (१४-७-१९२७)|| १९०
|-
|१५०.|| भाषण: मद्दागिरिमें (१५-७-१९२७)|| १९१
|-
|१५१.|| भाषण: तुमकुरको सार्वजनिक सभा में (१६-७-१६२७)|| १९२
|-
|१५२.|| पत्र: मीराबहनको (१७-७-१९२७)|| १९४
|-
|१५३.|| पत्र: ए० आई० काजीको (१७-७-१९२७)|| १९५
|-
|१५४.|| पत्र: विजयपाल सिंहको (१७-७-१९२७)||१९६
|-
|१५५.|| पत्र: उत्तम भिक्खुको (१७-७-१९२७)|| १९७
|-
|१५६.|| पत्र: नरगिस कैप्टेनको (१७-७-१९२७)|| १९८
|-
|१५७.|| पत्र: के० जे० नारायणन नम्बूद्रिपादको (१७-७-१९२७)|| १९८
|-
|१५८.|| भाषण: बंगलोर नगरपालिका मानपत्रके उत्तरमें (१७-७-१९२७)|| १९९
|-
|१५९.|| भाषण: बंगलोरके मजदूरों की सभा में (१७-७-१९२७)|| २००
|-
|१६०.|| पत्र: मीराबह्नको (१८-७-१९२७)|| २०३
|-
|१६१.|| पत्र: जे० बी० कृपलानीको (१८-७-१९२७)|| २०४
|-
|१६२.|| पत्र: जे० बी० पेटिटको (१९-७-१९२७)|| २०५
|-
|१६३.|| पत्र: एन० वी० थडानीको (१९-७-१९२७)|| २०६
|-
|१६४.|| पत्र: के० एस० कारन्तको (१९-७-१९२७)|| २०८
|-
|१६५.|| पत्र: एम० एस० केलकरको (१९-७-१९२७)|| २१०
|-
|१६६.|| पत्र: सूरज प्रसाद माथुरको (१९-७-१९२७)|| २१०
|-
|१६७.|| पत्र: गंगाधर शास्त्री जोशीको (१९-७-१९२७)|| २११
|-
|१६८.|| पत्र: सतीशचन्द्र दासगुप्तको (१९-७-१९२७)|| २१३
|-
|१६९.|| पत्र: आश्रमकी बहनोंको (१९-७-१९२७)|| २१४<noinclude></noinclude>
mgc7b34gzqzbwpnu2sduplbxvb5bj9s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/२८
250
187621
671702
646053
2026-08-19T05:13:33Z
शिखर तिवारी
633
/* शोधित */
671702
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{C|बीस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|१७०.|| पत्र: जेठालाल गांधीको (१९-७-१९२७)|| २१५
|-
|१७१.|| भाषण: मैसूर में विद्यार्थियोंके समक्ष (१९-७-१९२७)|| २१५
|-
|१७२.|| पत्र: मीराबहनको (२०-७-१९२७)|| २१७
|-
|१७३.|| पत्र: लीज बुर्जासको (२०-७-१९२७)|| २१९
|-
|१७४.|| पत्र: हेलेन हॉसडिंगको (२०-७-१९२७)|| २१९
|-
|१७५.|| पत्र: जवाहरलाल नेहरूको (२०-७-१९२७)|| २२१
|-
|१७६.|| पत्र: घनश्यामदास बिड़लाको (२०-७-१९२७)|| २२२
|-
|१७७.|| भाषण: मैसूरके हिन्दी भाषा सेवा समाजमें (२०-७-१९२७)|| २२३
|-
|१७८.|| भाषण: मैसूरमें भेंट किये गये मानपत्रोंके उत्तरमें (२०-७-१९२७)|| २२५
|-
|१७९.|| टिप्पणियाँ: स्वर्गीय सर गंगाराम; १९२८ की कांग्रेसके अध्यक्ष; उदयपुरमें खादी (२१-७-१९२७)|| २२७
|-
|१८०.|| अभावग्रस्त नगरपालिकाएँ (२१-७-१९२७)|| २३०
|-
|१८१.|| 'जी' वार्ड जिला कांग्रेस कमेटी खादी भण्डार (२१-७-१९२७)|| २३३
|-
|१८२.|| पत्र: मीराबहनको (२१-७-१९२७)|| २३३
|-
|१८३.|| पत्र: एस० वी० कोजलगीको (२१-७-१९२७)|| २३४
|-
|१८४.|| पत्र: य० म० पारनेरकरको (२१-७-१९२७)|| २३५
|-
|१८५.|| पत्र: के० पी० पद्मनाभ अय्यरको (२१-७-१९२७)|| २३५
|-
|१८६.|| भाषण: आदि कर्नाटकोंके समक्ष (२१-७-१९२७)|| २३६
|-
|१८७.|| पत्र: कुसुमबहन देसाईको (२२-७-१९२७)|| २३७
|-
|१८८.|| पत्र: नाजुकलाल चोकसीको (२२-७-१९२७)|| २३८
|-
|१८९.|| पत्र: रामेश्वरदास पोद्दारको (२३-७-१९२७)|| २३८
|-
|१९०.|| भाषण: मैसूरमें विदाई समारोहके अवसरपर (२३-७-१९२७) ||२३९
|-
|१९१.|| पत्र: एन० आर० मलकानीको (२४-७-१९२७)|| २४१
|-
|१९२.|| पत्र: एन० आर० मलकानीको (२४-७-१९२७)|| २४२
|-
|१९३.|| पत्र: रेहाना तैयबजीको (२४-७-१९२७)|| २४३
|-
|१९४.|| पत्र: के० टी० चक्रवर्तीको (२४-७-१९२७)|| २४४
|-
|१९५.|| एक पत्र (२४-७-१९२७)|| २४५
|-
|१९६.|| पत्र: खुर्शीदको (२४-७-१९२७)|| २४६
|-
|१९७.|| पत्र: कुवलयानन्दको (२४-७-१९२७)|| २४६
|-
|१९८.|| पत्र: सुन्दरलाल माथुरको (२४-७-१९२७)|| २४७
|-
|१९९.|| पत्र: जे० डब्ल्यू० पेटावेलको (२४-७-१९२७)|| २४७
|-
|२००.|| भाषण: बंगलोरके नागरिक और सामाजिक विकास संघमें (२४-७-१९२७)|| २४९
|-
|२०१.|| पत्र: मीराबहनको (२५-७-१९२७)|| २५१
|-
|२०२.|| पत्र: आश्रमकी बह्नोंको (२५-७-१९२७)|| २५२
|-
|२०३.|| पत्र: वसुमती पण्डितको (२५-७-१९२७)|| २५३<noinclude></noinclude>
ec6g0ixow238c8lgya7oagj2fx0qblx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf/२९
250
187622
671774
646054
2026-08-19T11:16:42Z
शिखर तिवारी
633
/* अशोधित */
671774
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="शिखर तिवारी" />{{c|इक्कीस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|२०४.|| पत्र: कुँवरजी पारेखको (२५-७-१९२७)|| २५३
|-
|२०५.|| पत्र: चेंगिया चेट्टीको (२६-७-१९२७)|| २५४
|-
|२०६.|| पत्र: राजकिशोरी मेहरोत्राको (२६-७-१९२७)||२५६
|-
|२०७.|| पत्र: जेठालाल जोशीको (२६-७-१९२७)|| २५६
|-
|२०८.|| एक पत्र (२६-७-१९२७)||२५७
|-
|२०९.|| भाषण : बंगलोरके यूनाइटेड थियोलॉजिकल कालेजमें (२६-७-१९२७)|| २५८
|-
|२१०.|| भाषण: बंगलोरकी पुराण-विद्या समितिमें ( २६-७-१९२७)||२६०
|-
|२११.|| पत्र: ज० प्र० मणसालीको (२६-७-१९२७ के पश्चात्)||२६१
|-
|२१२.|| पत्र: ज० प्र० भणसालीको (२७-७-१९२७)||२६२
|-
|२१३.|| पत्र: मीराबह्नको (२७-७-१९२७)||२६४
|-
|२१४.|| पत्र: फँन्सिस्का स्टैंडेनेथको (२७-७-१९२७)||२६६
|-
|२१५.|| पत्र: तारिणीप्रसाद सिन्हाको (२७-७-१९२७)||२६७
|-
|२१६.|| पत्र: शापुरजी सकलातवालाको (२७-७-१९२७)||२६८
|-
|२१७.|| पत्र: सी० वी० वैद्यको (२७-७-१९२७)|| २६९
|-
|२१८.|| पत्र: एस० रामनाथन्को (२७-७-१९२७)|| २६९
|-
|२१९.|| पत्र: नरगिस कैप्टेनको (२७-७-१९२७)|| २७१
|-
|२२०.|| पत्र: एस० वी० कोजलगीको (२७-७-१९२७)|| २७२
|-
|२२१.|| पत्र: प्रभावतीको (२७-७-१९२७)|| २७२
|-
|२२२.|| पत्र: टी० परमशिव अय्यरको (२९-७-१९२७)|| २७३
|-
|२२३.|| पत्र: एस० डी० नाडकर्णीको (२९-७-१९२७)|| २७४
|-
|२२४.|| पत्र: टी० आर० महादेव अय्यरको (२९-७-१९२७)|| २७५
|-
|२२५.|| पत्र: टी० टी० शर्मनको (२९-७-१९२७)|| २७६
|-
|२२६.|| पत्र: एन० शंकर अय्यरको (२९-७-१९२७)|| २७६
|-
|२२७.|| पत्र: राधासुन्दर दासको (२९-७-१९२७)|| २७७
|-
|२२८.|| पत्र: एच० जी० पाठकको (२९-७-१९२७)|| २७९
|-
|२२९.|| पत्र: कुसुमबहन देसाईको (२९-७-१९२७)|| २८०
|-
|२३०.|| मिशनरियोंके साथ बातचीत (२९-७-१९२७)|| २८४
|-
|२३१.|| पत्र: कमला दासगुप्तको (३०-७-१९२७)|| २८५
|-
|२३२.|| पत्र: डॉ० बा० शि० मुंजेको (३०-७-१९२७)|| २८५
|-
|२३३.|| पत्र: एकनाथ श्रीपाद पटवर्धनको (३०-७-१९२७)|| २८६
|-
|२३४.|| पत्र: वी० वी० दास्तानेको (३०-७-१९२७)|| २८७
|-
|२३५.|| भाषण: चामराजेन्द्र संस्कृत पाठशाला में (३०-७-१९२७)|| २८८
|-
|२३६.|| प्रकृतिका 'कोप' (१-८-१९२७)|| २८९
|-
|२३७.|| पत्र: मीराबहनको (१-८-१९२७)|| २९०
|-
|२३८.|| पत्र: वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (१-८-१९२७)|| २९१
|-
|२३९.|| पत्र: हिन्दी साहित्य सम्मेलनके मन्त्रीको (१-८-१९२७)||<noinclude></noinclude>
6o0ygm5ixjgkfetp7orm436uqhdv5kv
671775
671774
2026-08-19T11:22:57Z
शिखर तिवारी
633
/* शोधित */
671775
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="शिखर तिवारी" />{{c|इक्कीस}}</noinclude>{|width=100%
|
|-
|२०४.|| पत्र: कुँवरजी पारेखको (२५-७-१९२७)|| २५३
|-
|२०५.|| पत्र: चेंगिया चेट्टीको (२६-७-१९२७)|| २५४
|-
|२०६.|| पत्र: राजकिशोरी मेहरोत्राको (२६-७-१९२७)||२५६
|-
|२०७.|| पत्र: जेठालाल जोशीको (२६-७-१९२७)|| २५६
|-
|२०८.|| एक पत्र (२६-७-१९२७)||२५७
|-
|२०९.|| भाषण : बंगलोरके यूनाइटेड थियोलॉजिकल कालेजमें (२६-७-१९२७)|| २५८
|-
|२१०.|| भाषण: बंगलोरकी पुराण-विद्या समितिमें ( २६-७-१९२७)||२६०
|-
|२११.|| पत्र: ज० प्र० मणसालीको (२६-७-१९२७ के पश्चात्)||२६१
|-
|२१२.|| पत्र: ज० प्र० भणसालीको (२७-७-१९२७)||२६२
|-
|२१३.|| पत्र: मीराबह्नको (२७-७-१९२७)||२६४
|-
|२१४.|| पत्र: फँन्सिस्का स्टैंडेनेथको (२७-७-१९२७)||२६५
|-
|२१५.|| पत्र: तारिणीप्रसाद सिन्हाको (२७-७-१९२७)||२६६
|-
|२१६.|| पत्र: शापुरजी सकलातवालाको (२७-७-१९२७)||२६७
|-
|२१७.|| पत्र: सी० वी० वैद्यको (२७-७-१९२७)|| २६८
|-
|२१८.|| पत्र: एस० रामनाथन्को (२७-७-१९२७)|| २६९
|-
|२१९.|| पत्र: नरगिस कैप्टेनको (२७-७-१९२७)|| २६९
|-
|२२०.|| पत्र: एस० वी० कोजलगीको (२७-७-१९२७)|| २७१
|-
|२२१.|| पत्र: प्रभावतीको (२७-७-१९२७)|| २७२
|-
|२२२.|| पत्र: टी० परमशिव अय्यरको (२९-७-१९२७)|| २७२
|-
|२२३.|| पत्र: एस० डी० नाडकर्णीको (२९-७-१९२७)|| २७३
|-
|२२४.|| पत्र: टी० आर० महादेव अय्यरको (२९-७-१९२७)|| २७४
|-
|२२५.|| पत्र: टी० टी० शर्मनको (२९-७-१९२७)|| २७५
|-
|२२६.|| पत्र: एन० शंकर अय्यरको (२९-७-१९२७)|| २७६
|-
|२२७.|| पत्र: राधासुन्दर दासको (२९-७-१९२७)|| २७६
|-
|२२८.|| पत्र: एच० जी० पाठकको (२९-७-१९२७)|| २७७
|-
|२२९.|| पत्र: कुसुमबहन देसाईको (२९-७-१९२७)|| २७९
|-
|२३०.|| मिशनरियोंके साथ बातचीत (२९-७-१९२७)|| २८०
|-
|२३१.|| पत्र: कमला दासगुप्तको (३०-७-१९२७)|| २८४
|-
|२३२.|| पत्र: डॉ० बा० शि० मुंजेको (३०-७-१९२७)|| २८५
|-
|२३३.|| पत्र: एकनाथ श्रीपाद पटवर्धनको (३०-७-१९२७)|| २८५
|-
|२३४.|| पत्र: वी० वी० दास्तानेको (३०-७-१९२७)|| २८६
|-
|२३५.|| भाषण: चामराजेन्द्र संस्कृत पाठशाला में (३०-७-१९२७)|| २८७
|-
|२३६.|| प्रकृतिका 'कोप' (१-८-१९२७)|| २८८
|-
|२३७.|| पत्र: मीराबहनको (१-८-१९२७)|| २८९
|-
|२३८.|| पत्र: वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको (१-८-१९२७)|| २९०
|-
|२३९.|| पत्र: हिन्दी साहित्य सम्मेलनके मन्त्रीको (१-८-१९२७)|| २९१<noinclude></noinclude>
peo171n6w2wq0r6ppohsk4tvav26xo3
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४०
250
196459
671544
671493
2026-08-18T12:34:14Z
ऋतु मिश्रा
6631
671544
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>लायक था ही नहीं। यह सच है कि १९२३ की अपेक्षा आजकल अनाजका भाव उतरा हुआ है। किन्तु दुःख और आश्चर्यकी बात तो यह है कि आज अनाजके भाव उतर जानेके बावजूद मजदूरोंका खर्च उनके वेतनकी अपेक्षा अधिक है, यह बात पंचके सामने पेश किये गये साक्ष्यसे सिद्ध हो जाती है। मजदूरों द्वारा पेश किये गये आँकड़ोंका समर्थन दो प्रकारसे होता है। मजदूरोंको मिलनेवाले वेतनमें से वार्षिक बचतका हिसाब लगाने तथा सरकारकी ओरसे दो बार की गई जाँचके फलस्वरूप जो आँकड़े निकले थे उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि मजदूरोंकी ओरसे खर्चके बारेमें जो आँकड़े पेश किये गये थे, सरकारी रिपोर्ट भी उनका समर्थन करती है।
मुझे लगता है कि मजदूरोंकी आजकी स्थितिको मिल-मालिक या सेठ मंगलदास समझ नहीं सके हैं। मैं चाहता हूँ कि सरपंच इस स्थितिको समझ लें।
यदि सरपंच मुझसे अन्य कोई खास बात न जानना चाहते हों तो मेरी ओरसे और कुछ कहने को नहीं बचता।
गुजराती (एस॰ एन॰ १४९७९) की माइक्रोफिल्म से।
{{c|{{x-larger|'''२. पत्र : महादेव देसाईको'''}}}}
{{right|१६ अक्टूबर, १९२९}}
चि॰ महादेव,
तुम्हारा पत्र मिला । आजकल तो मैं लिख ही नहीं पाता हूँ। काकी<ref>दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकरको पत्नी; देखिए नवजीवन, १३-१०-१९२९ में प्रकाशित "एक सतीका अवसान" शीर्षक लेख।</ref>-सम्बन्धी लेख मुझे आज ही मिला है। लेख अच्छा है। कहनेवाले तो कहते ही रहेंगे।<ref>देखिए "शुष्क- नवजीवन", ३-११-१९२९।</ref>
'गीताजी' के जो प्रूफ गोरखपुर भेजे गये थे। वे अभीतक वापस नहीं मिले। अब जब आयें तभी ठीक है। इन प्रूफोंको मसूरीमें<ref>१७ से २४ अक्टूबर, १९२९ तक गांधीजी मसूरी में थे।</ref> देखनेका मुझे अच्छा मौका मिल सकेगा।
{{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ११४५७) की फोटो - नकलसे ।<noinclude>
{{smallrefs}}</noinclude>
i9vaen65jdlslc88rpjtfxqxzh3edgv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४१
250
196460
671551
671505
2026-08-18T12:46:35Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */
671551
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''३. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}}
{{right|देहरादून}}
{{right|१६ अक्टूबर, १९२९}}
चि॰ छगनलाल,
तुम्हारा पत्र नहीं मिला, हालांकि आश्रमसे लिखा जमनालालजीका पत्र मिल गया है। इसका मतलब यह हुआ कि आश्रमको डाक यहाँ पहुँच मुझे उमियाकी<ref>आश्रमवासी जयसुखलाल गांधीकी पुत्री।</ref> सगाईका समाचार मिला है। वे दोनों सुखी हों। शंकरलालका पत्र उमिया तक पहुँचानेके लिए भेज रहा हूँ। उक्त पत्र पढ़कर उसे दे देना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
यह पत्र दुबारा नहीं पढ़ा है।
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४६०) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{x-larger|४. क्या यह ग्राम सुधार है?}}}}
पंजाबके गुड़गाँव जिलेमें श्री एफ॰ एल॰ ब्रेनने ग्रामीणोंकी बेहतरीके लिए जो काम किया, उसकी कुछ समय पहले समाचारपत्रोंमें काफी चर्चा की गई थी। वह जिला श्री ब्रेनकी देखरेखमें था। समाचारपत्रोंकी इन चर्चाओंसे मेरा ध्यान उस ओर आकृष्ट हुआ और मुझे लगा कि श्री ब्रेनने जो हवाला दिया है, यदि वह गुड़गाँव में हुई प्रगतिका सही हवाला है, तो उनके कामका बारीकीसे अध्ययन और अनुकरण करना उपयुक्त होगा। इसलिए मैंने लालाजीकी समितिसे<ref>लोक सेवक समिति (सर्वेन्टस ऑफ पीपल सोसाइटी)।</ref> अनुरोध किया कि वह मौकेपर निरीक्षण करके इस बातकी जाँच करे कि वास्तवमें कैसा काम हुआ है। समितिके एक स्नातक सदस्य लाला देशराजको इस काम में लगाया गया था। उन्होंने अपनी जाँचकी एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। उसे मैं कुछ अंशोंको छोड़ते हुए बाकी ज्यों-की-त्यों प्रकाशित कर रहा हूँ।<ref>यहाँ नहीं दी जा रही है।</ref> रिपोर्टको ध्यानसे पढ़ना लाभदायक होगा। श्री ब्रेनने वाइसरायसे तथा पंजाबके राज्यपालसे भी अपने कामके सम्बन्ध में सावधानीसे प्रयुक्त शब्दों में लिखे प्रमाण-पत्र हासिल कर लिये हैं। लेकिन मैं लाला देशराजके विचारोंका पूर्वानुमान<noinclude></noinclude>
rkhyb4x5pmdatgo3njrdv7f3po3q925
671552
671551
2026-08-18T12:47:50Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
671552
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''३. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}}
{{right|देहरादून}}
{{right|१६ अक्टूबर, १९२९}}
चि॰ छगनलाल,
तुम्हारा पत्र नहीं मिला, हालांकि आश्रमसे लिखा जमनालालजीका पत्र मिल गया है। इसका मतलब यह हुआ कि आश्रमको डाक यहाँ पहुँच मुझे उमियाकी<ref>आश्रमवासी जयसुखलाल गांधीकी पुत्री।</ref> सगाईका समाचार मिला है। वे दोनों सुखी हों। शंकरलालका पत्र उमिया तक पहुँचानेके लिए भेज रहा हूँ। उक्त पत्र पढ़कर उसे दे देना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
यह पत्र दुबारा नहीं पढ़ा है।
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४६०) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{x-larger'''|४. क्या यह ग्राम सुधार है?'''}}}}
पंजाबके गुड़गाँव जिलेमें श्री एफ॰ एल॰ ब्रेनने ग्रामीणोंकी बेहतरीके लिए जो काम किया, उसकी कुछ समय पहले समाचारपत्रोंमें काफी चर्चा की गई थी। वह जिला श्री ब्रेनकी देखरेखमें था। समाचारपत्रोंकी इन चर्चाओंसे मेरा ध्यान उस ओर आकृष्ट हुआ और मुझे लगा कि श्री ब्रेनने जो हवाला दिया है, यदि वह गुड़गाँव में हुई प्रगतिका सही हवाला है, तो उनके कामका बारीकीसे अध्ययन और अनुकरण करना उपयुक्त होगा। इसलिए मैंने लालाजीकी समितिसे<ref>लोक सेवक समिति (सर्वेन्टस ऑफ पीपल सोसाइटी)।</ref> अनुरोध किया कि वह मौकेपर निरीक्षण करके इस बातकी जाँच करे कि वास्तवमें कैसा काम हुआ है। समितिके एक स्नातक सदस्य लाला देशराजको इस काम में लगाया गया था। उन्होंने अपनी जाँचकी एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। उसे मैं कुछ अंशोंको छोड़ते हुए बाकी ज्यों-की-त्यों प्रकाशित कर रहा हूँ।<ref>यहाँ नहीं दी जा रही है।</ref> रिपोर्टको ध्यानसे पढ़ना लाभदायक होगा। श्री ब्रेनने वाइसरायसे तथा पंजाबके राज्यपालसे भी अपने कामके सम्बन्ध में सावधानीसे प्रयुक्त शब्दों में लिखे प्रमाण-पत्र हासिल कर लिये हैं। लेकिन मैं लाला देशराजके विचारोंका पूर्वानुमान<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
3ha4w946y68zzwxhu9weasm4sp14byt
671553
671552
2026-08-18T12:48:31Z
ऋतु मिश्रा
6631
671553
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''३. पत्र : छगनलाल जोशीको'''}}}}
{{right|देहरादून}}
{{right|१६ अक्टूबर, १९२९}}
चि॰ छगनलाल,
तुम्हारा पत्र नहीं मिला, हालांकि आश्रमसे लिखा जमनालालजीका पत्र मिल गया है। इसका मतलब यह हुआ कि आश्रमको डाक यहाँ पहुँच मुझे उमियाकी<ref>आश्रमवासी जयसुखलाल गांधीकी पुत्री।</ref> सगाईका समाचार मिला है। वे दोनों सुखी हों। शंकरलालका पत्र उमिया तक पहुँचानेके लिए भेज रहा हूँ। उक्त पत्र पढ़कर उसे दे देना।
{{right|बापूके आशीर्वाद}}
[पुनश्च :]
यह पत्र दुबारा नहीं पढ़ा है।
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४६०) की फोटो-नकलसे।
{{c|{{x-larger|'''४. क्या यह ग्राम सुधार है?'''}}}}
पंजाबके गुड़गाँव जिलेमें श्री एफ॰ एल॰ ब्रेनने ग्रामीणोंकी बेहतरीके लिए जो काम किया, उसकी कुछ समय पहले समाचारपत्रोंमें काफी चर्चा की गई थी। वह जिला श्री ब्रेनकी देखरेखमें था। समाचारपत्रोंकी इन चर्चाओंसे मेरा ध्यान उस ओर आकृष्ट हुआ और मुझे लगा कि श्री ब्रेनने जो हवाला दिया है, यदि वह गुड़गाँव में हुई प्रगतिका सही हवाला है, तो उनके कामका बारीकीसे अध्ययन और अनुकरण करना उपयुक्त होगा। इसलिए मैंने लालाजीकी समितिसे<ref>लोक सेवक समिति (सर्वेन्टस ऑफ पीपल सोसाइटी)।</ref> अनुरोध किया कि वह मौकेपर निरीक्षण करके इस बातकी जाँच करे कि वास्तवमें कैसा काम हुआ है। समितिके एक स्नातक सदस्य लाला देशराजको इस काम में लगाया गया था। उन्होंने अपनी जाँचकी एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। उसे मैं कुछ अंशोंको छोड़ते हुए बाकी ज्यों-की-त्यों प्रकाशित कर रहा हूँ।<ref>यहाँ नहीं दी जा रही है।</ref> रिपोर्टको ध्यानसे पढ़ना लाभदायक होगा। श्री ब्रेनने वाइसरायसे तथा पंजाबके राज्यपालसे भी अपने कामके सम्बन्ध में सावधानीसे प्रयुक्त शब्दों में लिखे प्रमाण-पत्र हासिल कर लिये हैं। लेकिन मैं लाला देशराजके विचारोंका पूर्वानुमान<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
2dnaa2dnt3vv6el3r6ltnhqvsdx870x
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४२
250
196461
671634
668846
2026-08-18T16:53:20Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
671634
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>नहीं लगाऊँगा। मैं अपनी टीका-टिप्पणी तबतक नहीं दूंगा जबतक कि रिपोर्ट पूरी प्रकाशित नहीं हो जाती। पाठकोंको रिपोर्टकी परिसमाप्ति के लिए 'यंग इंडिया'<ref>देखिए "ग्रामसुधार", १४-११-१९२९।</ref>के एक और अंककी प्रतीक्षा करनी होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया,''' १७-१०-१९२९
{{c|{{x-larger|'''५. स्त्रियोंका स्थान'''}}}}
एक बहन<ref>रेहाना तैयबजी; देखिए खण्ड ४१, १४५८१-८२।</ref>, जो अबतक विवाह करनेसे बचती रही है, लिखती है :
'''कल मलबारी भवन में स्त्रियोंकी एक सभा हुई थी, जिसमें कई गम्भीर भाषण किये गये थे और कई प्रस्ताव भी पास हुए थे । विचारणीय विषय शारदा बिल था । यह जानकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई कि लड़कियोंके विवाहके सम्बन्धमें कमसे कम अठारह वर्षकी उम्र के आप पक्षपाती हैं। इस सभामें एक और महत्त्वका प्रस्ताव विरासत सम्बन्धी कानूनोंके विषयमें था । यदि इस विषय पर आप 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन 'में एक जोरदार लेख लिखें तो हमारे लिए वह बहुत सहायक होगा। यह बात तो मेरी समझमें ही नहीं आती कि अपने जन्मसिद्ध अधिकार वापस पानेके लिए नारियोंको याचना या संघर्ष क्यों करना पड़े? नारीसे जन्म लेनेवाले पुरुषका दर्पसे अपनी जननीको 'अबला' कहना और स्त्रियोंके छीने हुए अधिकार बड़ी ही उदारता से वापस 'देन 'का वायदा करना कितना विचित्र, दुखद और हास्यजनक है ! 'देने 'की इस बेहूदा बातका क्या अर्थ है ? जिन अधिकारोंको पुरुषने अन्यायपूर्वक, केवल अपने पशुबल द्वारा स्त्रियोंसे छोना है, उन्हें वापस लौटाने में कौन-सी 'उदारता' और 'बहादुरी' है ? स्त्रीका महत्त्व पुरुषसे किस मामलेमें घटकर है कि जिसके कारण विरासत में उसका हिस्सा पुरुषसे कम होना चाहिए ? वह बराबर क्यों न हो ? दो-एक दिन पहले हम इस विषयपर कुछ लोगोंके साथ खूब जोरोंसे चर्चा कर रही थीं। एक बहन ने कहा : 'हमें कानूनमें कोई परिवर्तन नहीं चाहिए। हम अपनी वर्तमान दशामें सन्तुष्ट हैं। लड़का चूँकि कुटुम्बके परम्परागत रीति- रिवाजों और उसकी प्रतिष्ठाको रक्षा करता है, कुटुम्बका आधार भी वही होता है, इसलिए विरासतका अधिकांश उसीको मिलना न्यायसंगत है। इसपर हमने कहा कि " और लड़कीके विषय में आपका क्या कहना है ? " इसी समय पास ही खड़ा एक नवयुवक बोल उठा -- ' अरे ! लड़कीकी चिन्ता आप क्यों'''<noinclude></noinclude>
4jqjasevosokh55rxf4viybh1rr8i8d
671635
671634
2026-08-18T16:56:36Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
671635
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>नहीं लगाऊँगा। मैं अपनी टीका-टिप्पणी तबतक नहीं दूंगा जबतक कि रिपोर्ट पूरी प्रकाशित नहीं हो जाती। पाठकोंको रिपोर्टकी परिसमाप्ति के लिए 'यंग इंडिया'<ref>देखिए "ग्रामसुधार", १४-११-१९२९।</ref>के एक और अंककी प्रतीक्षा करनी होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया,''' १७-१०-१९२९
{{c|{{x-larger|'''५. स्त्रियोंका स्थान'''}}}}
एक बहन<ref>रेहाना तैयबजी; देखिए खण्ड ४१, १४५८१-८२।</ref>, जो अबतक विवाह करनेसे बचती रही है, लिखती है :
'''कल मलबारी भवन में स्त्रियोंकी एक सभा हुई थी, जिसमें कई गम्भीर भाषण किये गये थे और कई प्रस्ताव भी पास हुए थे। विचारणीय विषय शारदा बिल था। यह जानकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई कि लड़कियोंके विवाहके सम्बन्धमें कमसे कम अठारह वर्षकी उम्र के आप पक्षपाती हैं। इस सभामें एक और महत्त्वका प्रस्ताव विरासत सम्बन्धी कानूनोंके विषयमें था। यदि इस विषय पर आप 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन'में एक जोरदार लेख लिखें तो हमारे लिए वह बहुत सहायक होगा। यह बात तो मेरी समझमें ही नहीं आती कि अपने जन्मसिद्ध अधिकार वापस पानेके लिए नारियोंको याचना या संघर्ष क्यों करना पड़े? नारीसे जन्म लेनेवाले पुरुषका दर्पसे अपनी जननीको 'अबला' कहना और स्त्रियोंके छीने हुए अधिकार बड़ी ही उदारता से वापस 'देन'का वायदा करना कितना विचित्र, दुखद और हास्यजनक है! 'देने'की इस बेहूदा बातका क्या अर्थ है? जिन अधिकारोंको पुरुषने अन्यायपूर्वक, केवल अपने पशुबल द्वारा स्त्रियोंसे छीना है, उन्हें वापस लौटाने में कौन-सी 'उदारता' और 'बहादुरी' है? स्त्रीका महत्त्व पुरुषसे किस मामलेमें घटकर है कि जिसके कारण विरासत में उसका हिस्सा पुरुषसे कम होना चाहिए? वह बराबर क्यों न हो? दो-एक दिन पहले हम इस विषयपर कुछ लोगोंके साथ खूब जोरोंसे चर्चा कर रही थीं। एक बहन ने कहा : 'हमें कानूनमें कोई परिवर्तन नहीं चाहिए। हम अपनी वर्तमान दशामें सन्तुष्ट हैं। लड़का चूँकि कुटुम्बके परम्परागत रीति-रिवाजों और उसकी प्रतिष्ठाको रक्षा करता है, कुटुम्बका आधार भी वही होता है, इसलिए विरासतका अधिकांश उसीको मिलना न्यायसंगत है। इसपर हमने कहा कि "और लड़कीके विषय में आपका क्या कहना है?" इसी समय पास ही खड़ा एक नवयुवक बोल उठा—'अरे! लड़कीकी चिन्ता आप क्यों'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
5xnvj0x892dbnjzyj0d96iciyysv5nv
671637
671635
2026-08-18T16:58:30Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
671637
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>नहीं लगाऊँगा। मैं अपनी टीका-टिप्पणी तबतक नहीं दूंगा जबतक कि रिपोर्ट पूरी प्रकाशित नहीं हो जाती। पाठकोंको रिपोर्टकी परिसमाप्ति के लिए 'यंग इंडिया'<ref>देखिए "ग्रामसुधार", १४-११-१९२९।</ref>के एक और अंककी प्रतीक्षा करनी होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया,''' १७-१०-१९२९
{{c|{{x-larger|'''५. स्त्रियोंका स्थान'''}}}}
एक बहन<ref>रेहाना तैयबजी; देखिए खण्ड ४१, पृष्ठ ५८१-८२।</ref>, जो अबतक विवाह करनेसे बचती रही है, लिखती है :
'''कल मलबारी भवन में स्त्रियोंकी एक सभा हुई थी, जिसमें कई गम्भीर भाषण किये गये थे और कई प्रस्ताव भी पास हुए थे। विचारणीय विषय शारदा बिल था। यह जानकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई कि लड़कियोंके विवाहके सम्बन्धमें कमसे कम अठारह वर्षकी उम्र के आप पक्षपाती हैं। इस सभामें एक और महत्त्वका प्रस्ताव विरासत सम्बन्धी कानूनोंके विषयमें था। यदि इस विषय पर आप 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन'में एक जोरदार लेख लिखें तो हमारे लिए वह बहुत सहायक होगा। यह बात तो मेरी समझमें ही नहीं आती कि अपने जन्मसिद्ध अधिकार वापस पानेके लिए नारियोंको याचना या संघर्ष क्यों करना पड़े? नारीसे जन्म लेनेवाले पुरुषका दर्पसे अपनी जननीको 'अबला' कहना और स्त्रियोंके छीने हुए अधिकार बड़ी ही उदारता से वापस 'देन'का वायदा करना कितना विचित्र, दुखद और हास्यजनक है! 'देने'की इस बेहूदा बातका क्या अर्थ है? जिन अधिकारोंको पुरुषने अन्यायपूर्वक, केवल अपने पशुबल द्वारा स्त्रियोंसे छीना है, उन्हें वापस लौटाने में कौन-सी 'उदारता' और 'बहादुरी' है? स्त्रीका महत्त्व पुरुषसे किस मामलेमें घटकर है कि जिसके कारण विरासत में उसका हिस्सा पुरुषसे कम होना चाहिए? वह बराबर क्यों न हो? दो-एक दिन पहले हम इस विषयपर कुछ लोगोंके साथ खूब जोरोंसे चर्चा कर रही थीं। एक बहन ने कहा : 'हमें कानूनमें कोई परिवर्तन नहीं चाहिए। हम अपनी वर्तमान दशामें सन्तुष्ट हैं। लड़का चूँकि कुटुम्बके परम्परागत रीति-रिवाजों और उसकी प्रतिष्ठाको रक्षा करता है, कुटुम्बका आधार भी वही होता है, इसलिए विरासतका अधिकांश उसीको मिलना न्यायसंगत है। इसपर हमने कहा कि "और लड़कीके विषय में आपका क्या कहना है?" इसी समय पास ही खड़ा एक नवयुवक बोल उठा—'अरे! लड़कीकी चिन्ता आप क्यों'''<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
hqpgcfj7f9wetr71qzbo6uj11ev1dxx
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४३
250
196462
671675
668847
2026-08-19T02:44:43Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
671675
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{||स्त्रियोंका स्थान|५}}</noinclude>'''करती हैं, उसकी देखभाल दूसरा आदमी करेगा ही।' बस, बात यही है —'दूसरा आदमी।' यह 'दूसरा आदमी' तो एक बड़ी बला है। 'दूसरे आदमी'की इसमें जरूरत ही क्यों होनी चाहिए? इस बातको मानकर क्यों चलना चाहिए कि 'दूसरा आदमी' होगा ही? और कन्याके सम्बन्ध में तो लोग इस ढंगसे बातें करते हैं मानो वह कोई सामानका गट्ठर हो जिसको माता-पिता के घरमें तभी तक रखा जाना है, जबतक कोई दूसरा व्यक्ति (पति के रूपमें) न आ जाये और माँ-बाप चैनको साँस लेते हुए लड़कीको उसे सौंप न दें। अगर आप लड़की होते तो क्या यह सब देखकर आप सचमुच ही व्यग्र न हुए होते?"'''
पुरुष नारी जातिपर जो अत्याचार कर रहे हैं, उन्हें देखकर व्यग्र होने के लिए मेरा लड़की होना आवश्यक नहीं है। अत्याचारोंकी सूचीमें विरासत-सम्बन्धी कानूनको मैं सबसे आखिरी दर्जेकी चीज मानता हूँ। शारदा बिल जिस बुराईको दूर करनेका प्रयत्न करता है, वह विरासत - सम्बन्धी कानूनसे व्यंजित होनेवाली बुराईसे कहीं अधिक भयंकर और गम्भीर है। लेकिन स्त्रियोंके अधिकारके बारेमें मैं जरा भी झुकने को तैयार नहीं हूँ। मेरी राय में स्त्रीपर ऐसी किसी कानूनी निर्योग्यताका बोझ नहीं होना चाहिए, जिससे पुरुष मुक्त है । मैं लड़के और लड़कीके प्रति हर तरहसे भेदभाव रहित समान व्यवहार करना चाहूँगा । जैसे-जैसे स्त्री-जातिको शिक्षा द्वारा अपनी शक्तिका भान होता जायेगा, जैसा कि होना भी चाहिए, वैसे-वैसे उसके साथ जो असमान व्यवहार आज किया जाता है, उसका वह स्वभावतः अधिकाधिक उग्र विरोध करेगी।
लेकिन वैधानिक विषमताओंको दूर करना मात्र बाहरी उपचार जैसा होगा । जैसा अधिकतर लोग समझते हैं, इस व्याधिकी जड़ उससे कहीं ज्यादा गहरी है । पुरुषकी सत्ता और कीर्तिके प्रति लोलुपता ही इसका मूल कारण है, और इसका इससे भी बढ़कर कारण है स्त्री-पुरुषकी पारस्परिक विषय-वासना । पुरुष सदासे ही शक्तिका आकांक्षी रहा है और सम्पत्तिपर उसका अधिकार उसे यह शक्ति प्रदान करता है । वह शक्तिपर आधारित मरणोत्तर कीर्तिकी लालसा भी रखता है । अगर सम्पत्ति में सारी पीढ़ी समान रूपसे भाग पानेकी अधिकारी हो जाये तो जायदादके टुकड़े होते ही चले जायें और फिर यह बात सम्भव न बने। इसीलिए सारी सम्पत्ति नहीं, तो उसका बड़ा भाग विरासत में बड़े लड़केको मिलता है। ज्यादातर स्त्रियाँ विवाहित होती हैं । यद्यपि कानून उनके विरुद्ध हैं तो भी उनका अपने पतियोंकी सत्ता और अधिकारमें समान भाग रहता है, तथा अपनेको अपने श्रीमान. पतियोंकी श्रीमती अमुक कहलाने में आनन्द और गर्वका अनुभव करती हैं। अतएव वे विषमता सम्बन्धी सैद्धान्तिक चर्चाके समय क्रान्तिकारी परिवर्तनके लिए अपना मत भले ही दें, लेकिन जब तदनुसार आचरणका अवसर आता है तब वे अपनी इन विशेष सुविधाओंको छोड़ना नहीं चाहतीं।
इस कारण यद्यपि मैं इस बातका हमेशा समर्थन करूँगा कि स्त्री जातिपर से सभी कानूनी निर्योग्यताएँ हटा दी जानी चाहिए, मैं यह भी चाहूँगा कि भारतकी<noinclude></noinclude>
fhed5e46gmibhfgp418k6g5f1k2lnze
671676
671675
2026-08-19T02:45:46Z
ऋतु मिश्रा
6631
671676
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||स्त्रियोंका स्थान|५}}</noinclude>'''करती हैं, उसकी देखभाल दूसरा आदमी करेगा ही।' बस, बात यही है —'दूसरा आदमी।' यह 'दूसरा आदमी' तो एक बड़ी बला है। 'दूसरे आदमी'की इसमें जरूरत ही क्यों होनी चाहिए? इस बातको मानकर क्यों चलना चाहिए कि 'दूसरा आदमी' होगा ही? और कन्याके सम्बन्ध में तो लोग इस ढंगसे बातें करते हैं मानो वह कोई सामानका गट्ठर हो जिसको माता-पिता के घरमें तभी तक रखा जाना है, जबतक कोई दूसरा व्यक्ति (पति के रूपमें) न आ जाये और माँ-बाप चैनको साँस लेते हुए लड़कीको उसे सौंप न दें। अगर आप लड़की होते तो क्या यह सब देखकर आप सचमुच ही व्यग्र न हुए होते?"'''
पुरुष नारी जातिपर जो अत्याचार कर रहे हैं, उन्हें देखकर व्यग्र होने के लिए मेरा लड़की होना आवश्यक नहीं है। अत्याचारोंकी सूचीमें विरासत-सम्बन्धी कानूनको मैं सबसे आखिरी दर्जेकी चीज मानता हूँ। शारदा बिल जिस बुराईको दूर करनेका प्रयत्न करता है, वह विरासत - सम्बन्धी कानूनसे व्यंजित होनेवाली बुराईसे कहीं अधिक भयंकर और गम्भीर है। लेकिन स्त्रियोंके अधिकारके बारेमें मैं जरा भी झुकने को तैयार नहीं हूँ। मेरी राय में स्त्रीपर ऐसी किसी कानूनी निर्योग्यताका बोझ नहीं होना चाहिए, जिससे पुरुष मुक्त है । मैं लड़के और लड़कीके प्रति हर तरहसे भेदभाव रहित समान व्यवहार करना चाहूँगा । जैसे-जैसे स्त्री-जातिको शिक्षा द्वारा अपनी शक्तिका भान होता जायेगा, जैसा कि होना भी चाहिए, वैसे-वैसे उसके साथ जो असमान व्यवहार आज किया जाता है, उसका वह स्वभावतः अधिकाधिक उग्र विरोध करेगी।
लेकिन वैधानिक विषमताओंको दूर करना मात्र बाहरी उपचार जैसा होगा । जैसा अधिकतर लोग समझते हैं, इस व्याधिकी जड़ उससे कहीं ज्यादा गहरी है । पुरुषकी सत्ता और कीर्तिके प्रति लोलुपता ही इसका मूल कारण है, और इसका इससे भी बढ़कर कारण है स्त्री-पुरुषकी पारस्परिक विषय-वासना । पुरुष सदासे ही शक्तिका आकांक्षी रहा है और सम्पत्तिपर उसका अधिकार उसे यह शक्ति प्रदान करता है । वह शक्तिपर आधारित मरणोत्तर कीर्तिकी लालसा भी रखता है । अगर सम्पत्ति में सारी पीढ़ी समान रूपसे भाग पानेकी अधिकारी हो जाये तो जायदादके टुकड़े होते ही चले जायें और फिर यह बात सम्भव न बने। इसीलिए सारी सम्पत्ति नहीं, तो उसका बड़ा भाग विरासत में बड़े लड़केको मिलता है। ज्यादातर स्त्रियाँ विवाहित होती हैं । यद्यपि कानून उनके विरुद्ध हैं तो भी उनका अपने पतियोंकी सत्ता और अधिकारमें समान भाग रहता है, तथा अपनेको अपने श्रीमान. पतियोंकी श्रीमती अमुक कहलाने में आनन्द और गर्वका अनुभव करती हैं। अतएव वे विषमता सम्बन्धी सैद्धान्तिक चर्चाके समय क्रान्तिकारी परिवर्तनके लिए अपना मत भले ही दें, लेकिन जब तदनुसार आचरणका अवसर आता है तब वे अपनी इन विशेष सुविधाओंको छोड़ना नहीं चाहतीं।
इस कारण यद्यपि मैं इस बातका हमेशा समर्थन करूँगा कि स्त्री जातिपर से सभी कानूनी निर्योग्यताएँ हटा दी जानी चाहिए, मैं यह भी चाहूँगा कि भारतकी<noinclude></noinclude>
akj2hmdc5990x997t0h7zat61qtw7bf
671677
671676
2026-08-19T02:50:31Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
671677
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh||स्त्रियोंका स्थान|५}}</noinclude>'''करती हैं, उसकी देखभाल दूसरा आदमी करेगा ही।' बस, बात यही है —'दूसरा आदमी।' यह 'दूसरा आदमी' तो एक बड़ी बला है। 'दूसरे आदमी'की इसमें जरूरत ही क्यों होनी चाहिए? इस बातको मानकर क्यों चलना चाहिए कि 'दूसरा आदमी' होगा ही? और कन्याके सम्बन्ध में तो लोग इस ढंगसे बातें करते हैं मानो वह कोई सामानका गट्ठर हो जिसको माता-पिता के घरमें तभी तक रखा जाना है, जबतक कोई दूसरा व्यक्ति (पति के रूपमें) न आ जाये और माँ-बाप चैनको साँस लेते हुए लड़कीको उसे सौंप न दें। अगर आप लड़की होते तो क्या यह सब देखकर आप सचमुच ही व्यग्र न हुए होते?"'''
पुरुष नारी जातिपर जो अत्याचार कर रहे हैं, उन्हें देखकर व्यग्र होने के लिए मेरा लड़की होना आवश्यक नहीं है। अत्याचारोंकी सूचीमें विरासत-सम्बन्धी कानूनको मैं सबसे आखिरी दर्जेकी चीज मानता हूँ। शारदा बिल जिस बुराईको दूर करनेका प्रयत्न करता है, वह विरासत-सम्बन्धी कानूनसे व्यंजित होनेवाली बुराईसे कहीं अधिक भयंकर और गम्भीर है। लेकिन स्त्रियोंके अधिकारके बारेमें मैं जरा भी झुकने को तैयार नहीं हूँ। मेरी राय में स्त्रीपर ऐसी किसी कानूनी निर्योग्यताका बोझ नहीं होना चाहिए, जिससे पुरुष मुक्त है। मैं लड़के और लड़कीके प्रति हर तरहसे भेदभाव रहित समान व्यवहार करना चाहूँगा। जैसे-जैसे स्त्री-जातिको शिक्षा द्वारा अपनी शक्तिका भान होता जायेगा, जैसा कि होना भी चाहिए, वैसे-वैसे उसके साथ जो असमान व्यवहार आज किया जाता है, उसका वह स्वभावतः अधिकाधिक उग्र विरोध करेगी।
लेकिन वैधानिक विषमताओंको दूर करना मात्र बाहरी उपचार जैसा होगा। जैसा अधिकतर लोग समझते हैं, इस व्याधिकी जड़ उससे कहीं ज्यादा गहरी है। पुरुषकी सत्ता और कीर्तिके प्रति लोलुपता ही इसका मूल कारण है, और इसका इससे भी बढ़कर कारण है स्त्री-पुरुषकी पारस्परिक विषय-वासना। पुरुष सदासे ही शक्तिका आकांक्षी रहा है और सम्पत्तिपर उसका अधिकार उसे यह शक्ति प्रदान करता है। वह शक्तिपर आधारित मरणोत्तर कीर्तिकी लालसा भी रखता है। अगर सम्पत्ति में सारी पीढ़ी समान रूपसे भाग पानेकी अधिकारी हो जाये तो जायदादके टुकड़े होते ही चले जायें और फिर यह बात सम्भव न बने। इसीलिए सारी सम्पत्ति नहीं, तो उसका बड़ा भाग विरासत में बड़े लड़केको मिलता है। ज्यादातर स्त्रियाँ विवाहित होती हैं। यद्यपि कानून उनके विरुद्ध हैं तो भी उनका अपने पतियोंकी सत्ता और अधिकारमें समान भाग रहता है, तथा अपनेको अपने श्रीमान पतियोंकी श्रीमती अमुक कहलाने में आनन्द और गर्वका अनुभव करती हैं। अतएव वे विषमता सम्बन्धी सैद्धान्तिक चर्चाके समय क्रान्तिकारी परिवर्तनके लिए अपना मत भले ही दें, लेकिन जब तदनुसार आचरणका अवसर आता है तब वे अपनी इन विशेष सुविधाओंको छोड़ना नहीं चाहतीं।
इस कारण यद्यपि मैं इस बातका हमेशा समर्थन करूँगा कि स्त्री जातिपर से सभी कानूनी निर्योग्यताएँ हटा दी जानी चाहिए, मैं यह भी चाहूँगा कि भारतकी<noinclude></noinclude>
4jh0zmfbjrjg16iz81onmdd9s0owkrf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४४
250
196463
671766
668848
2026-08-19T10:36:45Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
671766
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>पढ़ी-लिखी, सुशिक्षित बहनें इस व्याधिके मूल कारणको मिटानेके लिए प्रयत्न करें। स्त्री त्याग और तपस्याकी साक्षात् मूर्ति है और सार्वजनिक जीवनमें उसके प्रवेशसे उसमें पवित्रता आनी चाहिए और उससे अमर्यादित आकांक्षाओं और सम्पत्ति-संग्रहकी वृत्तिपर अंकुश लगना चाहिए। स्त्रियोंको जानना चाहिए कि लाखों पुरुषोंके पास विरासत में छोड़ जाने योग्य कोई सम्पत्ति ही नहीं होती। इन लाखोंके उदाहरणसे हमें यह सीखना चाहिए कि जो थोड़े लोग बच जाते हैं उनका विरासत में सम्पत्ति न पाना ज्यादा अच्छा है। माता-पिता अपनी सन्तानको समान रूपसे जो असली सम्पत्ति विरासत में देकर जा सकते हैं, वह तो सिर्फ उनका अपना चरित्र और शिक्षाकी सुविधाएँ ही हैं। अतएव माता-पिताको अपने पुत्र और पुत्रियोंको स्वावलम्बी बनानेकी कोशिश करनी चाहिए, जिससे वे खुद मेहनत करके ईमानदारीसे जीविकोपार्जन कर सकें। तब अपने छोटे-छोटे भाई-बहनोंके पालन-पोषणकी जिम्मेदारी अपने-आप ही वयस्क वारिसोंपर आ पड़ेगी। यदि अमीर लोग अपने बच्चोंको ऐसी शिक्षा दे सकें जिससे कि वे विरासत में मिलनेवाली सम्पत्तिके गुलाम बननेकी अनुचित आकांक्षाको त्याग कर स्वावलम्बी बननेकी आकांक्षा करने लगें तो इससे उनके बच्चोंमें जो बुराइयाँ पाई जाती हैं वे बहुत कुछ दूर हो जायें। विरासत में मिलनेवाली सम्पत्तिकी आकांक्षासे उनके मनसे उद्यमकी भावना लुप्त हो जाती है और वे आलस्य एवं भोग-विलासकी ओर प्रवृत्त होते हैं। युगोंसे चली आई पुरानी बुराइयोंको खोज निकालना और उन्हें नष्ट करना जागरूक स्त्रियोंका ही विशेषाधिकार होना चाहिए।
पारस्परिक विषयवासना से भी स्त्री-जातिके अधिकारोंका जो अपहरण हुआ है, उसके लिए प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। स्त्रीने कई तरह के सूक्ष्म तरीकोंसे अनजान में पुरुषपर जाल डालनेका प्रयत्न किया है। इसी तरह पुरुषने भी स्त्री उसपर हावी न हो जाये, इसलिए उसे अनजानमें पीछे रखनेका प्रयास किया है, जिसमें उसे सफलता नहीं मिली। फलस्वरूप स्थिति ज्यों-की-त्यों है। इस तरह देखा जाये तो भारतवर्षकी जागरूक बेटियों को जो समस्या सुलझानी है वह गम्भीर है। उन्हें उन पाश्चात्य रीति-रिवाजोंकी नकल नहीं करनी चाहिए जो शायद पश्चिमके लिए अनुकूल हों। उन्हें भारतको परिस्थिति और भारतीय स्वभाव के अनुकूल उपायोंको काम में लाना चाहिए । बहनोंका कर्तव्य है कि वे वातावरण शुद्ध रखें, अपने निश्चयोंको दृढ़ और अटल बनायें, दिङ्मूढ़ता के दोषसे बचें, अपनी सभ्यता और संस्कृति के सर्वोत्तम तत्त्वका पोषण करें, और उसके दोषोंको और पतनकारी तत्त्वोंको बिना झिझके दूर करें। यह काम सीता, द्रौपदी, सावित्री, दमयन्ती-जैसी स्त्रियोंके किये ही हो सकता है; पुरुषोचित आचरण करनेवाली या मिथ्या विनयी और संकोचशील नारीसे कदापि नहीं हो सकता।
[अंग्रेजीसे]
'''यंग इंडिया,''' १७-१०-१९२९<noinclude></noinclude>
7tag9qstokbvz29dcn4wd10cvf6y8jz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४५
250
196464
671767
668849
2026-08-19T10:40:26Z
ऋतु मिश्रा
6631
सुधार
671767
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''६. मेरी चुप्पी'''}}}}
मैं सोचता था कि मुझसे पत्र-व्यवहार करनेवालोंने अबतक तो यह जान-समझ लिया होगा कि अगर मैं किसी ऐसे प्रश्नपर, जिसे लेकर सारा देश उद्विग्न हो उठा है, चुप हूँ, तो देशका हित या ऐसा ही कोई ठोस आधार उसकी वजह होगा, और इसलिए मैं समझता था कि वे मुझपर विरोधात्मक या जिज्ञासात्मक पत्रोंका ताँता लगाकर मुझसे यह सवाल नहीं करेंगे कि मैं यतीन्द्रनाथ दासके आत्मबलिदान और आम तौरपर भूख हड़तालवालोंके सम्बन्ध में चुप क्यों हूँ? गोरखपुरके एक मानपत्र में, इस बारे में, मुझसे सीधा सवाल किया गया; और सौजन्यकी दृष्टिसे मुझे उसका उत्तर देना ही पड़ा। मैंने अपने उत्तरमें यही कहा कि मैं इस विषयपर केवल देश-हितकी दृष्टिसे ही चुप रहा हूँ। मुझे लगता था कि अगर मैं अपने विचार व्यक्त करूँगा तो सम्भव है कि वीर यतीन्द्रने जिस उद्देश्यके लिए मरते दमतक उपवास नहीं छोड़ा था उसको लाभके बदले हानि ही अधिक पहुँचेगी। जीवनमें ऐसे अवसर होते हैं जब मौन रहना ही बुद्धिमानीका काम होता है। मेरे विचारमें यह एक ऐसा ही अवसर है। मैं अपने पाठकोंसे यह कह देना चाहता हूँ कि राष्ट्रके जीवन-मरणसे सम्बन्ध रखनेवाले ऐसे कई महत्त्वके प्रश्न हो सकते हैं, जिनके सम्बन्धमें अपने निश्चित और दृढ़ विचार रखते हुए भी मैं बिलकुल चुप रहता हूँ, क्योंकि मैं मानता हूँ कि हर सार्वजनिक व्यक्ति के सामने प्रायः ऐसे अवसर आते हैं, जब बदनामी और उससे भी बड़े किसी अहितकी जोखिम उठाकर भी चुप रहना ही उसका कर्त्तव्य हो जाता है। निस्सन्देह इसी तरह ऐसे भी मौके उसके जीवनमें आते हैं जब जानकी जोखिम उठाकर भी कर्त्तव्यवश उसे अपना मत व्यक्त करना ही पड़ता है। भूख-हड़तालोंके सिद्धान्तके बारेमें तो मैं इन पृष्ठोंमें अपने आम विचारोंको कई बार पूरी तरहसे व्यक्त कर चुका हूँ। अतएव फिरसे उनकी मीमांसा करना आवश्यक नहीं है। मुझे खेद है कि मैं अपने अनेकानेक पत्र-लेखकोंको इससे अधिक सन्तुष्ट नहीं कर सकता। हाँ, मैं उन्हें यह विश्वास जरूर दिलाता हूँ कि मेरी चुप्पीका यतीन्द्रके अपराध या उनकी निर्दोषतासे कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि मैं मानता हूँ कि किसी जघन्य अपराधके दोषीको भी उचित व्यवहार और उचित खुराक पानेका हक है। मैं यह भी मानता हूँ कि कमसे कम जनताकी दृष्टिमें तो जिसपर मुकदमा चल रहा है, ऐसा कैदी निर्दोष ही माना जाना चाहिए और वैसे तो मैने यतीन्द्रनाथ दासके
१. प्रसिद्ध राजनैतिक कार्यकर्ता, जिन्हें लाहौर षड्यन्त्रके मामले में सजा मिली थी। उन्होंने लाहौर जेल में, भारतीय कैदियोंके साथ होनेवाले भेदभावपूर्ण व्यवहारके विरोधमें उपवास किया था और अपने उपवासके ६४ वें दिन १३-९-१९२९ को उनका देहावसान हो गया था।
२. देखिए “ पत्र : च० राजगोपालाचारीको ", १८-१०-१९२९ ।<noinclude></noinclude>
73zv639ovibmysxu0m2blukvmjnehbx
671769
671767
2026-08-19T10:42:05Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
671769
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''६. मेरी चुप्पी'''}}}}
मैं सोचता था कि मुझसे पत्र-व्यवहार करनेवालोंने अबतक तो यह जान-समझ लिया होगा कि अगर मैं किसी ऐसे प्रश्नपर, जिसे लेकर सारा देश उद्विग्न हो उठा है, चुप हूँ, तो देशका हित या ऐसा ही कोई ठोस आधार उसकी वजह होगा, और इसलिए मैं समझता था कि वे मुझपर विरोधात्मक या जिज्ञासात्मक पत्रोंका ताँता लगाकर मुझसे यह सवाल नहीं करेंगे कि मैं यतीन्द्रनाथ दासके<ref>प्रसिद्ध राजनैतिक कार्यकर्ता, जिन्हें लाहौर षड्यन्त्रके मामले में सजा मिली थी। उन्होंने लाहौर जेल में, भारतीय कैदियोंके साथ होनेवाले भेदभावपूर्ण व्यवहारके विरोधमें उपवास किया था और अपने उपवासके ६४ वें दिन १३-९-१९२९ को उनका देहावसान हो गया था।</ref> आत्मबलिदान और आम तौरपर भूख हड़तालवालोंके सम्बन्ध में चुप क्यों हूँ? गोरखपुरके एक मानपत्र में, इस बारे में, मुझसे सीधा सवाल किया गया; और सौजन्यकी दृष्टिसे मुझे उसका उत्तर देना ही पड़ा। मैंने अपने उत्तरमें यही कहा कि मैं इस विषयपर केवल देश-हितकी दृष्टिसे ही चुप रहा हूँ। मुझे लगता था कि अगर मैं अपने विचार व्यक्त करूँगा तो सम्भव है कि वीर यतीन्द्रने जिस उद्देश्यके लिए मरते दमतक उपवास नहीं छोड़ा था उसको लाभके बदले हानि ही अधिक पहुँचेगी। जीवनमें ऐसे अवसर होते हैं जब मौन रहना ही बुद्धिमानीका काम होता है। मेरे विचारमें यह एक ऐसा ही अवसर है। मैं अपने पाठकोंसे यह कह देना चाहता हूँ कि राष्ट्रके जीवन-मरणसे सम्बन्ध रखनेवाले ऐसे कई महत्त्वके प्रश्न हो सकते हैं, जिनके सम्बन्धमें अपने निश्चित और दृढ़ विचार रखते हुए भी मैं बिलकुल चुप रहता हूँ, क्योंकि मैं मानता हूँ कि हर सार्वजनिक व्यक्ति के सामने प्रायः ऐसे अवसर आते हैं, जब बदनामी और उससे भी बड़े किसी अहितकी जोखिम उठाकर भी चुप रहना ही उसका कर्त्तव्य हो जाता है। निस्सन्देह इसी तरह ऐसे भी मौके उसके जीवनमें आते हैं जब जानकी जोखिम उठाकर भी कर्त्तव्यवश उसे अपना मत व्यक्त करना ही पड़ता है। भूख-हड़तालोंके सिद्धान्तके बारेमें तो मैं इन पृष्ठोंमें अपने आम विचारोंको कई बार पूरी तरहसे व्यक्त कर चुका हूँ। अतएव फिरसे उनकी मीमांसा करना आवश्यक नहीं है। मुझे खेद है कि मैं अपने अनेकानेक पत्र-लेखकोंको इससे अधिक सन्तुष्ट नहीं कर सकता।<ref>देखिए "पत्र : च० राजगोपालाचारीको ", १८-१०-१९२९।</ref> हाँ, मैं उन्हें यह विश्वास जरूर दिलाता हूँ कि मेरी चुप्पीका यतीन्द्रके अपराध या उनकी निर्दोषतासे कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि मैं मानता हूँ कि किसी जघन्य अपराधके दोषीको भी उचित व्यवहार और उचित खुराक पानेका हक है। मैं यह भी मानता हूँ कि कमसे कम जनताकी दृष्टिमें तो जिसपर मुकदमा चल रहा है, ऐसा कैदी निर्दोष ही माना जाना चाहिए और वैसे तो मैने यतीन्द्रनाथ दासके<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
p6iur8k7ujbnwqe5miuizyypqoybb1y
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/४६
250
196465
671771
668850
2026-08-19T10:46:53Z
ऋतु मिश्रा
6631
/* शोधित */ सुधार
671771
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ऋतु मिश्रा" />{{rh|८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बारेमें जो कुछ भी सुना है, वह उनकी प्रशंसा में ही सुना है। और मुझे विश्वास दिलाया गया है कि उनसे हिंसा करने या हिंसाका विचार भी मनमें लानेकी उससे अधिक आशा नहीं रखी जा सकती थी जितनी कि मुझसे रखी जा सकती है।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया,''' १७-१०-१९२९
{{c|{{x-larger|'''७. भारत के अर्थशास्त्रका पाठ्यक्रम'''}}}}
हमारे अर्थशास्त्रका पाठ्यक्रम जगतका अर्थशास्त्र नहीं वरन भारतका अर्थशास्त्र है। हम अनुभवसे जानते हैं कि प्रत्येक देशका अर्थशास्त्र थोड़े-बहुत अंशोंमें भिन्न प्रकारका होता है। शहरों और गाँवोंकी दृष्टिसे विचार करनेपर यह और भी भिन्न हो सकता है। नीचे लिखा पाठ्यक्रम इस आधारपर बनाया गया है कि भारतकी सभ्यता गाँवों की स्थिति और उनके सम्पूर्ण विकासपर निर्भर है।
{{c|'''पहला क्रम'''}}
अध्यापक विद्यार्थियोंको साथ लेकर किसी गाँव में जायें और वहाँ विद्यार्थियोंसे गाँवोंकी आर्थिक स्थिति से सम्बन्ध रखनेवाली बातें इकट्ठी करायें और इस तरह उन्हें अर्थशास्त्रका पदार्थपाठ दें; यानी वे उनसे गाँवकी आबादी, उसमें रहनेवाले स्त्री-पुरुष, बालक, बालिकाओं वगैराकी संख्या तैयार करायें, फिर धन्धोंका, धन्धों में काम करनेवालोंका और धन्धेसे होनेवाली आमदनीका पत्रक बनवायें। आसपासकी सीमाका क्षेत्रफल तैयार करवायें, फी आदमी जमीनका हिसाब बनवायें, जमीनमें कौन-कौन-से अनाज पैदा होते हैं, खाद कैसी दी जाती है, औजार कैसे होते हैं, खेती में खर्च कितना होता है, उपज कितनी होती है, इन बातोंका पता लगवाएँ; फिर पिछले दस वर्षोकी उत्पत्ति और खर्चके आँकड़े तैयार करवायें और उनपर से यह अन्दाज लगायें कि आया खेती लाभप्रद धंधा है या हानिकर। ढोरोंकी संख्या, उनपर किया जानेवाला खर्च, उनसे होनेवाले दूधकी उत्पत्ति वगैराका पता चलायें, ढोरोंको क्या खिलाया जाता है, गाँव में साँड होता है या नहीं, बछड़े किस काम आते हैं, गोचर भूमि अगर है तो कितनी है, नहीं है, तो मवेशियोंके लिए कसरत करने और हवा खानेकी काफी जगह होती है या नहीं, आदि सब बातोंकी जानकारी प्राप्त करवा दें। किसान हिसाब-किताब रखते हैं या नहीं, अगर रखते हैं तो जो हिसाब-किताब लिखते-लिखाते हैं वह किस रीति से लिखते हैं, इस बातका निरीक्षण करें। गाँववालोंको खेती में से कितना समय बचता है और वे उस समयका क्या उपयोग करते हैं, यह देखें। इस तरह तमाम निरीक्षण-परीक्षणके बाद विद्यार्थी स्वयं अपने विचार स्थिर करें और यह बतायें कि गाँवों की स्थिति सुधारनेके लिए क्या-क्या उपाय किये जायें। विद्यार्थियोंका सारा काम सुन्दर ढंग और सुन्दर अक्षरोंमें स्याहीसे लिखा रहना चाहिए।<noinclude></noinclude>
df0lic5cjja7qodw46z9t9ufdkz92si
विकिस्रोत:स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६
4
196812
671583
671366
2026-08-18T15:32:22Z
Koyal Singh
6351
/* प्रतिभागी */
671583
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
rcmlcxkv83prwlxafxm4kvjqk93reah
671588
671583
2026-08-18T15:39:38Z
Shivaniya shaw
4129
/* पुस्तक सूची */
671588
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —
[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) १५:३९, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
1trxzb78069arh0znbuqdwswfzslxzf
671590
671588
2026-08-18T15:40:39Z
Koyal Singh
6351
/* पुस्तक सूची */
671590
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
lvtbw2l0deak4cr2lwxjq4ugldpx6vs
671604
671590
2026-08-18T16:12:40Z
अजीत कुमार तिवारी
12
/* प्रतिभागी */ क्रम सुधार.
671604
wikitext
text/x-wiki
__NOTOC__
<div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}">
<div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;">
<div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;">
<center>स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div>
<div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; ">
{{/Navbar}}
'''स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य १५ अगस्त २०२६ से ३० अगस्त २०२६ तक विकिस्रोत की अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है।
== नियम ==
इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है :
# कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें।
# संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — १५ अगस्त २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से ३० अगस्त २०२६ (११:५९ अपराह्न) ई॰।
# नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे।
# निर्धारित पुस्तक के सामने शोधित करने के लिए दिए जाने वाले अंक उल्लेखित हैं। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा।
# संपादनोत्सव के १६ दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम २०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक दो सौ अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं।
# यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा।
# प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें।
# प्रतिभागी नीचे के प्रतिभागी अनुभाग में अपना हस्ताक्षर करने के साथ-साथ शोधित करने के लिए अपने द्वारा चुनी गई पुस्तक की पृष्ठ परिधि का भी उल्लेख करें जिससे दूसरों को पुस्तक चुनने में सुविधा हो।
# पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है।
# प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (३० अगस्त २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ।
# दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है।
# प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे।
== पुरस्कार ==
इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है:
# पहला पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००)
# दूसरा पुरस्कार: ₹ ४,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १८०)
# तीसरा पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १६०)
# ५ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ३,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक १४०)
# ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२०)
# ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ८०)
# ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ १,००० के कूपन (न्यूनतम अंक ४०)
पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को शोधन अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा।
== पुस्तक सूची ==
:यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है।
* (आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड
ग्यारह]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या २७८ से २९५ तक, पृष्ठ संख्या ३६२ से ४१९ तक, पृष्ठ संख्या ५०७ से ५६८ तक तथा पृष्ठ संख्या ५९५ से ६०७ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:सीमा1|सीमा1]] ([[सदस्य वार्ता:सीमा1|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६४० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १३२ अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के ८ पृष्ठ तथा पृष्ठ संख्या १० (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ८३ से पृष्ठ संख्या १०० तक, पृष्ठ संख्या २८१ से पृष्ठ संख्या ४३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४३२ से पृष्ठ संख्या ५७४ तक के अशोधित पृष्ठ (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५७५ से पृष्ठ संख्या ५९१ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १८७ अंक) — [[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:१२, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इक्कीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३१७ से पृष्ठ संख्या ३२७ तक और पृष्ठ संख्या ४५० से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०९ अंक) -[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६०८ से ६३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०० अंक) १८:२१, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 31.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड इकतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशन से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ५३६ से पृष्ठ संख्या ६०६ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०७ से ६१७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०४ अंक) —[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१८ से ६२७ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ४० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार प्रकाशक से आभार तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ७ से पृष्ठ संख्या १७ तक, पृष्ठ संख्या ११० से पृष्ठ संख्या २३० तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:४१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या २३१ से पृष्ठ संख्या २६१ तक, पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ५३० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २२ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १५२ अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १४:५१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 34.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड चौंतीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १४ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ४७६ से पृष्ठ संख्या ६०७ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ६०८ से पृष्ठ संख्या ६११ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १४:२१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ६१५ से पृष्ठ संख्या ६३० तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ६४ अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड छत्तीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १२६ से पृष्ठ संख्या २५० तक, पृष्ठ संख्या ३३१ से पृष्ठ संख्या ३४६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४९, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३४७ से पृष्ठ संख्या ५०६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १६० अंक) — [[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५०७ से पृष्ठ संख्या ५३२ तक (४ अंक/पृष्ठ) (कुल १०४ अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]])
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड बयालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार भूमिका से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३२ से पृष्ठ संख्या ३३६ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १९:३३, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३७ से पृष्ठ संख्या ५४१ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:१५, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ५४२ से पृष्ठ संख्या ५५० तक (१ अंक/पृष्ठ), सांकेतिका के २६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ११३ अंक) — [[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०८:५८, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड तेंतालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से चित्र-सूची तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १३२ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:४४, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १३३ से पृष्ठ संख्या ३३७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) —[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३८ से पृष्ठ संख्या ४८८ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल १५१ अंक) — [[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:१३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार सांकेतिका के २० पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ८० अंक) —
# [[विषयसूची:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf|सम्पूर्ण गांधी वांङ्मय खण्ड चौवालीस]]
## '''पृष्ठ-परिधि १ :''' पृष्ठसूची के अनुसार मुखपृष्ठ से सूचना तक (१ अंक/पृष्ठ), विषय-सूची के १६ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२७ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०५ अंक) — [[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०७:२५, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि २ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या १२८ से पृष्ठ संख्या ३३३ तक (१ अंक/पृष्ठ) (कुल २०६ अंक) — [[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३०, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ३ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ३३४ से पृष्ठ संख्या ३९३ तक (१ अंक/पृष्ठ), पृष्ठ संख्या ३९४ से पृष्ठ संख्या ४८२ तक (१० अंक/६ पृष्ठ) (कुल २०८ अंक) — [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) ०७:३३, १६ अगस्त २०२६ (UTC)
## '''पृष्ठ-परिधि ४ :''' पृष्ठसूची के अनुसार पृष्ठ संख्या ४८३, ४८४ (१ अंक/पृष्ठ) और सांकेतिका के १९ पृष्ठ (४ अंक/पृष्ठ) (कुल ७८ अंक) —[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:४०, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== प्रगति ==
{{Special:IndexPages|key=स्वतंत्रता दिवस संपादनोत्सव २०२६}}
== आयोजक एवं निर्णायक मंडल ==
संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है:
:आयोजक-
# [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक
# [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक
:निर्णायक-
# [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक
# [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक
==प्रतिभागी==
:प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर करें।
#[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १८:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १८:०८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १८:११, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १८:२०, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) १८:४८, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Priyanka1114|Priyanka1114]] ([[सदस्य वार्ता:Priyanka1114|वार्ता]]) १९:०७, १४ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:२५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) ००:३२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:ऋतु मिश्रा|ऋतु मिश्रा]] ([[सदस्य वार्ता:ऋतु मिश्रा|वार्ता]]) ०१:१६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०१:४७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Bikki97|Bikki97]] ([[सदस्य वार्ता:Bikki97|वार्ता]]) ०२:२७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०२:४६, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Juhi1986|Juhi1986]] ([[सदस्य वार्ता:Juhi1986|वार्ता]]) ०४:०२, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Vineet Kumar Tiwari 29|Vineet Kumar Tiwari 29]] ([[सदस्य वार्ता:Vineet Kumar Tiwari 29|वार्ता]]) ०६:३३, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Richmishra14|Richmishra14]] ([[सदस्य वार्ता:Richmishra14|वार्ता]]) ०९:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:शिखर तिवारी|शिखर तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:शिखर तिवारी|वार्ता]]) १२:०१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रितु कुमारी साव|रितु कुमारी साव]] ([[सदस्य वार्ता:रितु कुमारी साव|वार्ता]]) १४:३७, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १७:१५, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १८:३१, १५ अगस्त २०२६ (UTC)
#[[सदस्य:Kumari Arpana Sinha|Kumari Arpana Sinha]] ([[सदस्य वार्ता:Kumari Arpana Sinha|वार्ता]])
#[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १५:३२, १८ अगस्त २०२६ (UTC)
== परिणाम ==
== रपट ==
</div>
</div>
<div style="padding: 10px; padding-left: 20px; ">
</div>
</div>
</div>
</div>
[[श्रेणी:संपादनोत्सव]]
a0qb2zdvcuiki2zwecl2gieesc7r16m
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३९५
250
196815
671656
669200
2026-08-18T17:36:46Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
671656
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौरमें-२|३५७}}</noinclude>
जो कुछ मैं आपसे कह रहा हूँ अगर आप नहीं सुन रहे हैं तो मुझे बतला दें। आप नहीं सुन रहे हैं क्या? (नहीं, नहीं)। अब आप सुनते हैं? आपको कृपा करके जरूर सुन लेना चाहिए (हास्य ध्वनि) आप सुन लें तो सम्भव है कि आपको लाभ होगा। नहीं भी सुनेंगे तो मेरा कुछ हर्ज नहीं है। (हास्य ध्वनि)। आप लोगोंके हाथमें दूसरा प्रस्ताव है, मैं उसको पढ़ रहा हूँ।
जो प्रस्ताव आप लोगोंके हाथमें है उस प्रस्तावको मैं पढ़ता हूँ। अगर आप
इजाजत दे दें तो मैं उसे न पढूँ, क्योंकि आप सब भाइयों और बहनोंके हाथमें वह प्रस्ताव अंग्रेजीमें है, और उसे आपने समझ लिया होगा। अगर आप समझते हैं तो कृपा करके आप सुनिये। मैं अंग्रेजीमें उसे पढ़नेके बजाय उसका जो मतलब हिन्दी में बतलाना चाहता हूँ सो बतलाऊँगा। पहले तो यह एक लम्बा प्रस्ताव है और यह प्रस्ताव हम कांग्रेसकी जो कार्रवाई करना चाहते हैं, उसकी जड़ है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप सब लोग इस प्रस्तावको अच्छी तरह समझ लें और इसके बारेमें निश्चित विचार बना लें।
हमारे सामने बड़े काम पड़े हैं। मैं बड़े अदवसे कहूँगा कि कोशिश करके जो काम हमारे सामने हैं, उन्हें करना चाहिए। तो पहली बात उस प्रस्तावमें यह है कि कार्यसमितिने, वाइसरायने इस वर्ष में अक्टूबर मासकी ३१ तारीखका जो ऐलान किया था, उसके बारेमें हमारे अगुआ लोगोंने जवाब<ref>देखिए “सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य,” २-११-१९२९।</ref> दिया और गोलमेज परिषद की जो शर्त रखी गई थी, उस बारेमें कार्यसमितिने जो कुछ किया यह कांग्रेस उसको बहाल रखती है। यह एक हिस्सा है।
और दूसरा हिस्सा यह है कि इस बारेमें वाइसरायने स्वराज्यके बारेमें समझौता होनेके लिए जो मेहनत की है यह कांग्रेस उसकी तारीफ करती है।
तीसरा हिस्सा यह है कि अगरचे यह कांग्रेस उसकी कद्र तो करती है लेकिन कांग्रेस गांधी, पण्डित मोतीलालजी नेहरू, तेजबहादुर सप्रू और जिन्ना वगैराके वाइसरायके पास जाने और उनकी वाइसरायसे हुई गुफ्तगूका नतीजा सुननेके बाद यह निश्चय करती है कि मौजूदा हालातमें गोलमेज परिषदमें कांग्रेसके प्रतिनिधियोंके जानेसे कोई फायदा हासिल नहीं हो सकता। तो इस कारण कांग्रेसके प्रतिनिधियोंको गोलमेज परिषद हो तो भी उसमें नहीं जाना चाहिए। बहुतसे लोग तो जायेंगे मगर हम क्या करें, हमको यह देखना है।
कांग्रेसने कलकत्ते में पिछले साल एक प्रस्ताव पास किया था। कलकत्ते में
इंडिपेंडेंस (स्वराज्य) का प्रस्ताव पास किया था। इसके लिए राजनीतिक भाषामें स्वराज्य के मानी सम्पूर्ण स्वतन्त्रता कर दिया गया था। आजसे इंडिपेंडेंस (स्वराज्य) [प्रथम ध्येय] हो जाता है। इसलिए कांग्रेस यह बतलाना चाहती है कि नेहरू रिपोर्ट, जिसके पक्षमें हम ब्रिटिश गवर्नमेंटको करना चाहते थे, अब खत्म हो जाती है――क्योंकि उसके लिए जो वक्त रखा था वह गुजर गया――उसकी आयु कलकत्तेमें १ वर्ष निश्चित की गई थी। कहा गया था कि एक वर्षके भीतर स्वीकार करना चाहे तो ब्रिटिश<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
dfbcytlfplfdy5l0ed2motf772lw4xa
671657
671656
2026-08-18T17:37:43Z
Priyanka1114
6799
671657
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौरमें-२|३५७}}</noinclude>
जो कुछ मैं आपसे कह रहा हूँ अगर आप नहीं सुन रहे हैं तो मुझे बतला दें। आप नहीं सुन रहे हैं क्या? (नहीं, नहीं)। अब आप सुनते हैं? आपको कृपा करके जरूर सुन लेना चाहिए (हास्य ध्वनि) आप सुन लें तो सम्भव है कि आपको लाभ होगा। नहीं भी सुनेंगे तो मेरा कुछ हर्ज नहीं है। (हास्य ध्वनि)। आप लोगोंके हाथमें दूसरा प्रस्ताव है, मैं उसको पढ़ रहा हूँ।
जो प्रस्ताव आप लोगोंके हाथमें है उस प्रस्तावको मैं पढ़ता हूँ। अगर आप
इजाजत दे दें तो मैं उसे न पढूँ, क्योंकि आप सब भाइयों और बहनोंके हाथमें वह प्रस्ताव अंग्रेजीमें है, और उसे आपने समझ लिया होगा। अगर आप समझते हैं तो कृपा करके आप सुनिये। मैं अंग्रेजीमें उसे पढ़नेके बजाय उसका जो मतलब हिन्दी में बतलाना चाहता हूँ सो बतलाऊँगा। पहले तो यह एक लम्बा प्रस्ताव है और यह प्रस्ताव हम कांग्रेसकी जो कार्रवाई करना चाहते हैं, उसकी जड़ है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप सब लोग इस प्रस्तावको अच्छी तरह समझ लें और इसके बारेमें निश्चित विचार बना लें।
हमारे सामने बड़े काम पड़े हैं। मैं बड़े अदवसे कहूँगा कि कोशिश करके जो काम हमारे सामने हैं, उन्हें करना चाहिए। तो पहली बात उस प्रस्तावमें यह है कि कार्यसमितिने, वाइसरायने इस वर्ष में अक्टूबर मासकी ३१ तारीखका जो ऐलान किया था, उसके बारेमें हमारे अगुआ लोगोंने जवाब<ref>देखिए “सर्वदलीय नेताओंका संयुक्त वक्तव्य,” २-११-१९२९।</ref> दिया और गोलमेज परिषद की जो शर्त रखी गई थी, उस बारेमें कार्यसमितिने जो कुछ किया यह कांग्रेस उसको बहाल रखती है। यह एक हिस्सा है।
और दूसरा हिस्सा यह है कि इस बारेमें वाइसरायने स्वराज्यके बारेमें समझौता होनेके लिए जो मेहनत की है यह कांग्रेस उसकी तारीफ करती है।
तीसरा हिस्सा यह है कि अगरचे यह कांग्रेस उसकी कद्र तो करती है लेकिन कांग्रेस गांधी, पण्डित मोतीलालजी नेहरू, तेजबहादुर सप्रू और जिन्ना वगैराके वाइसरायके पास जाने और उनकी वाइसरायसे हुई गुफ्तगूका नतीजा सुननेके बाद यह निश्चय करती है कि मौजूदा हालातमें गोलमेज परिषदमें कांग्रेसके प्रतिनिधियोंके जानेसे कोई फायदा हासिल नहीं हो सकता। तो इस कारण कांग्रेसके प्रतिनिधियोंको गोलमेज परिषद हो तो भी उसमें नहीं जाना चाहिए। बहुतसे लोग तो जायेंगे मगर हम क्या करें, हमको यह देखना है।
कांग्रेसने कलकत्ते में पिछले साल एक प्रस्ताव पास किया था। कलकत्ते में इंडिपेंडेंस (स्वराज्य) का प्रस्ताव पास किया था। इसके लिए राजनीतिक भाषामें स्वराज्य के मानी सम्पूर्ण स्वतन्त्रता कर दिया गया था। आजसे इंडिपेंडेंस (स्वराज्य) [प्रथम ध्येय] हो जाता है। इसलिए कांग्रेस यह बतलाना चाहती है कि नेहरू रिपोर्ट, जिसके पक्षमें हम ब्रिटिश गवर्नमेंटको करना चाहते थे, अब खत्म हो जाती है――क्योंकि उसके लिए जो वक्त रखा था वह गुजर गया――उसकी आयु कलकत्तेमें १ वर्ष निश्चित की गई थी। कहा गया था कि एक वर्षके भीतर स्वीकार करना चाहे तो ब्रिटिश<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
hqfp5gudddzuh0rvf4wevo6k2r7mlhc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३९६
250
196816
671660
669201
2026-08-18T17:46:36Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
671660
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>गवर्नमेंट उसे स्वीकार कर ले। मगर यह पूरा नहीं हुआ। इसलिए नेहरू रिपोर्ट अब कांग्रेसके लिए नहीं है। यह इस प्रस्तावमें लिखा हुआ है। इसलिए कांग्रेस यह उम्मीद करती है कि कांग्रेसके मातहत जो संस्थाएं हैं वे सम्पूर्ण आजादी पाने के लिए जो कुछ कर सकती हैं, उसकी कोशिश करेंगी। इसके बाद यह लिखा है कि यह काम करनेके लिए पहले कांग्रेसने स्वराज्य शब्दके लिए इंडिपेंडेंस (स्वराज्य) को कांग्रेसके क्रीड (सिद्धान्त) में शामिल कर लिया है, तो इसके मुताबिक काम करना चाहिए। इस कारण अब कांग्रेस यह निश्चय करती है कि जो एसेम्बली (विधानसभा) और कौंसिल (विधान परिषद) के ऐलेक्शन (चुनाव) होते हैं उनमें कांग्रेसके लोग कोई हिस्सा नहीं लेंगे। और सब लोग जो वहाँ हैं, उनसे इस्तीफा दे दें। और एसेम्बली (विधानसभा) और कौंसिल (विधान परिषद) से हट जायें। यह बताया है। और कांग्रेसका राष्ट्रसे यह कहना है, कोमसे, जनतासे उसका यह कहना है कि अब कांग्रेसका जो रचनात्मक कार्य है जैसे खद्दर, अस्पृश्यता निवारण इत्यादि सब लोग इसमें लग जायें और कांग्रेस, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीको यह अस्तियार दे दे कि जब वायुमण्डल अनुकूल है, ऐसा लगे, और जो शर्तें सामने हैं उसके साथ जिस सूबे में, या जहाँ अच्छा लगे वहाँ अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, जिस हल्केको अच्छा समझे, वहाँ सिविल नाफरमानी (सविनय अवज्ञा) करें――और नॉनपेमेंट ऑफ टैक्सेस (कर न देना) भी इसमें शामिल हैं। सिविल डिसोबिडिएन्स (सविनय अवज्ञा) को पूरा करें।यह सब मतलब इस प्रस्ताव का है।
अभी मैं इस प्रस्तावके बारेमें कुछ ज्यादा कहना नहीं चाहता। आप देख रहे हैं कि इस प्रस्तावमें सुधार करनेके लिए १०, १२ संशोधन पेश किये गये हैं। मैं आपको भी और अपने को भी आराम देना चाहता हूँ। इसलिए मैं आपका वक्त बरबाद नहीं करूँगा। यह जरूर कहूँगा कि आप अच्छी तरह ध्यान देकर जो मुखालफतमें कहा जाता है उसे सुनें। एक छोटी बात और जरूर कहूँगा। पहले हिस्से में जो लिखा है, जो बयान किया गया है――उसमें यह नहीं आता है कि वाइसराय साहबकी तारीफ की गई है। असलमें वह एक स्वतन्त्र चीज है। दूसरी बात यह कि एसेम्बली और कौंसिलसे इस्तीफा देंगे। तो मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि आप इसपर खयाल करके बहस सुनें। सच तो यह है कि यह लम्बा-चौड़ा पूरा एक ही प्रस्ताव है और सबपर एक साथ बहस हो यह प्रस्ताव कलकत्ते में कांग्रेसने जो इकरार कर लिया था उसपर चलनेके लिए रखा गया है। तो आप सारी बहस सुन लेंगे―जो अच्छा होगा उसको मंजूर कर लेंगे, जो अच्छा नहीं होगा उसको बहाल नहीं करेंगें। (हास्य ध्वनि)<ref>इसके बाद बहस हुई जिसमें मोतीलाल, मदनमोहन मालवीय, नृ॰ चि॰ केलकर, सतीशचन्द्र बोस तथा अन्य लोगोंने भाग लिया। महसके बाद गांधीजीने हिन्दीमें भाषण दिया।</ref><br>
सदर साहब, भाइयो और बहनो,
मेरी उम्मीद है कि अब लाउडस्पीकर अपना काम देगा। (हास्य ध्वनि) क्या लाउडस्पीकर अब काम दे रहा है?<noinclude></noinclude>
b5h94pwt02pwrt81icmw0bvnenj8jc4
671661
671660
2026-08-18T17:47:07Z
Priyanka1114
6799
671661
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh|३५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>गवर्नमेंट उसे स्वीकार कर ले। मगर यह पूरा नहीं हुआ। इसलिए नेहरू रिपोर्ट अब कांग्रेसके लिए नहीं है। यह इस प्रस्तावमें लिखा हुआ है। इसलिए कांग्रेस यह उम्मीद करती है कि कांग्रेसके मातहत जो संस्थाएं हैं वे सम्पूर्ण आजादी पाने के लिए जो कुछ कर सकती हैं, उसकी कोशिश करेंगी। इसके बाद यह लिखा है कि यह काम करनेके लिए पहले कांग्रेसने स्वराज्य शब्दके लिए इंडिपेंडेंस (स्वराज्य) को कांग्रेसके क्रीड (सिद्धान्त) में शामिल कर लिया है, तो इसके मुताबिक काम करना चाहिए। इस कारण अब कांग्रेस यह निश्चय करती है कि जो एसेम्बली (विधानसभा) और कौंसिल (विधान परिषद) के ऐलेक्शन (चुनाव) होते हैं उनमें कांग्रेसके लोग कोई हिस्सा नहीं लेंगे। और सब लोग जो वहाँ हैं, उनसे इस्तीफा दे दें। और एसेम्बली (विधानसभा) और कौंसिल (विधान परिषद) से हट जायें। यह बताया है। और कांग्रेसका राष्ट्रसे यह कहना है, कोमसे, जनतासे उसका यह कहना है कि अब कांग्रेसका जो रचनात्मक कार्य है जैसे खद्दर, अस्पृश्यता निवारण इत्यादि सब लोग इसमें लग जायें और कांग्रेस, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीको यह अस्तियार दे दे कि जब वायुमण्डल अनुकूल है, ऐसा लगे, और जो शर्तें सामने हैं उसके साथ जिस सूबे में, या जहाँ अच्छा लगे वहाँ अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, जिस हल्केको अच्छा समझे, वहाँ सिविल नाफरमानी (सविनय अवज्ञा) करें――और नॉनपेमेंट ऑफ टैक्सेस (कर न देना) भी इसमें शामिल हैं। सिविल डिसोबिडिएन्स (सविनय अवज्ञा) को पूरा करें।यह सब मतलब इस प्रस्ताव का है।
अभी मैं इस प्रस्तावके बारेमें कुछ ज्यादा कहना नहीं चाहता। आप देख रहे हैं कि इस प्रस्तावमें सुधार करनेके लिए १०, १२ संशोधन पेश किये गये हैं। मैं आपको भी और अपने को भी आराम देना चाहता हूँ। इसलिए मैं आपका वक्त बरबाद नहीं करूँगा। यह जरूर कहूँगा कि आप अच्छी तरह ध्यान देकर जो मुखालफतमें कहा जाता है उसे सुनें। एक छोटी बात और जरूर कहूँगा। पहले हिस्से में जो लिखा है, जो बयान किया गया है――उसमें यह नहीं आता है कि वाइसराय साहबकी तारीफ की गई है। असलमें वह एक स्वतन्त्र चीज है। दूसरी बात यह कि एसेम्बली और कौंसिलसे इस्तीफा देंगे। तो मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ कि आप इसपर खयाल करके बहस सुनें। सच तो यह है कि यह लम्बा-चौड़ा पूरा एक ही प्रस्ताव है और सबपर एक साथ बहस हो यह प्रस्ताव कलकत्ते में कांग्रेसने जो इकरार कर लिया था उसपर चलनेके लिए रखा गया है। तो आप सारी बहस सुन लेंगे―जो अच्छा होगा उसको मंजूर कर लेंगे, जो अच्छा नहीं होगा उसको बहाल नहीं करेंगें। (हास्य ध्वनि)<ref>इसके बाद बहस हुई जिसमें मोतीलाल, मदनमोहन मालवीय, नृ॰ चि॰ केलकर, सतीशचन्द्र बोस तथा अन्य लोगोंने भाग लिया। महसके बाद गांधीजीने हिन्दीमें भाषण दिया।</ref><br>
सदर साहब, भाइयो और बहनो,
मेरी उम्मीद है कि अब लाउडस्पीकर अपना काम देगा। (हास्य ध्वनि) क्या लाउडस्पीकर अब काम दे रहा है?<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude>
4joc7twwdmdj5yueztrt15l0z1ysaaf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/३९७
250
196817
671665
669202
2026-08-18T17:58:56Z
Priyanka1114
6799
/* शोधित */
671665
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौर में―२|३५९}}</noinclude>
'''[ध्वनि] हाँ, हाँ।'''
पहले तो आप सब भाइयों और बहनोंसे मैं माफी माँग लेना चाहता हूँ।
आप लोगोंने इस प्रस्तावका विरोध किया, अपने अमेंडमेंट (संशोधन) पेश किये। उस सब बहसको सुननेके लिए मैं यहाँ हाजिर नहीं रह सका। इसे बेअदबी माना जा सकता है। लेकिन आप मुझको लाचार समझें। सभापतिजीकी आज्ञा लेकर, चूँकि मैं बहुत थका हुआ था, चला गया, और कुदरतकी चीज भी तो आप जानते हैं, कि कोई रोक नहीं सकता। हाजतके लिए चला गया। पैगाम आया तो वापस आया। मुझे थोड़ा दुःख है कि जो कुछ मेरे भाइयोंने इस सम्बन्ध में कहा मैं उसे सुन नहीं सका। तो भी चूंकि मैंने अमेंडमेंट (संशोधन) सबके सब पढ़ लिये हैं और इन
भाइयोंकी बहस मैंने सबजेक्ट्स कमेटी (विषय समिति) में सुन ली थी, इसलिए मैं, क्या-क्या कहा गया है, [उसका अनुमान करके] काम चला सकता हूँ।
दूसरे यह भी बात है कि मेरा तरीका कोई बहस करनेका या उत्तर देनेका
नहीं है। मैं तो जो कहना चाहता हूँ वही कह दूँ तो काफी काम हो जाता है। जब मैंने कहा कि प्रस्ताव सुना दिया जाये तो राष्ट्रभाषा में मेरे मान्य पण्डित मोतीलालने इस प्रस्तावके मानी क्या है यह सुना दिया। उसका कारण क्या है, यह भी सुना दिया। सभापति महोदयने कहा कि जो-कुछ मैं कहना चाहता हूँ वह अंग्रेजी भाषामें आपको सुना दूँ, क्योंकि तमिल और बंगाली लोगोंको भी सुनाना चाहिए। मैंने सभापति महोदयसे यह कहा कि मेरे पास कोई नई बात नहीं है। आपको मालूम है कि आपका पैगाम लेकर वाइसरायके पास हम लोग चले गये थे। जो कुछ उन्होंने कहा है, वह लेकर मैं आपके सामने खड़ा हूँ। जो कुछ भी राय हो सकती थी वर्किंग कमेटी (कार्यसमिति) की तरफसे सबजेक्टस कमेटी (विषय समिति) में पेश की गई थी, अब आपके पास आई है।
आप लोगोंने देखा है कि इस प्रस्तावके ३ हिस्से हैं――ज्यादा भी बन सकते
हैं। अब मैं तीनों हिस्सोंको लेना चाहता हूँ। एक तो प्रस्तावना है। उसका मुख्य मतलब यह है कि सम्पूर्ण स्वतन्त्रता हो। यह वही बात है जो पहले सोची गई थी; उसका मौका आ गया है। इसका सबब बतानेके लिए जो अगली चीज है वह आप देखेंगे कि वर्किंग कमेटी (कार्यसमिति) ने क्या-क्या किया। वाइसरायके बारेमें क्या हुआ। ये सब चीजें आप सब अच्छी तरह समझ लें। यह प्रस्ताव एक मकान है। एक ईंट निकाल दें तो मकान कमजोर हो जाता है। दीवार गिरा दें तो मकान गिर जाता है। यह ऐसा है कि इसमें से एक चीजको ले लें तो आप उसके स्वरूपको काट डालते हैं, मकानको ढा देते हैं। सूरतको बदसूरत कर देते हैं। आप कृपा करके यह समझते हैं तो जितने अमेंडमेंट (संशोधन) है उनको गिरा दें।
आप एक बातपर गौर करें। आप एक वर्किंग कमेटी (कार्यसमिति) हर
दिनतक उस साल बना देते हैं। ३६० दिन तक उस कामेटीका काम है कि वह देखे कि कांग्रेसके लिए क्या करना चाहिए क्या नहीं। उसका काम है कि जिन प्रश्नोंका निर्णय करना है उनका निश्चय करे और फिर उन्हें यहाँ रखे। अगर पूरा काम वर्किंग<noinclude></noinclude>
d6hgehm05d2ihmikzlvvnesto1c2b7a
671666
671665
2026-08-18T17:59:31Z
Priyanka1114
6799
671666
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Priyanka1114" />{{rh||भाषण: कांग्रेस अधिवेशन लाहौर में―२|३५९}}</noinclude>
{{gap}}'''[ध्वनि] हाँ, हाँ।'''
पहले तो आप सब भाइयों और बहनोंसे मैं माफी माँग लेना चाहता हूँ।
आप लोगोंने इस प्रस्तावका विरोध किया, अपने अमेंडमेंट (संशोधन) पेश किये। उस सब बहसको सुननेके लिए मैं यहाँ हाजिर नहीं रह सका। इसे बेअदबी माना जा सकता है। लेकिन आप मुझको लाचार समझें। सभापतिजीकी आज्ञा लेकर, चूँकि मैं बहुत थका हुआ था, चला गया, और कुदरतकी चीज भी तो आप जानते हैं, कि कोई रोक नहीं सकता। हाजतके लिए चला गया। पैगाम आया तो वापस आया। मुझे थोड़ा दुःख है कि जो कुछ मेरे भाइयोंने इस सम्बन्ध में कहा मैं उसे सुन नहीं सका। तो भी चूंकि मैंने अमेंडमेंट (संशोधन) सबके सब पढ़ लिये हैं और इन
भाइयोंकी बहस मैंने सबजेक्ट्स कमेटी (विषय समिति) में सुन ली थी, इसलिए मैं, क्या-क्या कहा गया है, [उसका अनुमान करके] काम चला सकता हूँ।
दूसरे यह भी बात है कि मेरा तरीका कोई बहस करनेका या उत्तर देनेका
नहीं है। मैं तो जो कहना चाहता हूँ वही कह दूँ तो काफी काम हो जाता है। जब मैंने कहा कि प्रस्ताव सुना दिया जाये तो राष्ट्रभाषा में मेरे मान्य पण्डित मोतीलालने इस प्रस्तावके मानी क्या है यह सुना दिया। उसका कारण क्या है, यह भी सुना दिया। सभापति महोदयने कहा कि जो-कुछ मैं कहना चाहता हूँ वह अंग्रेजी भाषामें आपको सुना दूँ, क्योंकि तमिल और बंगाली लोगोंको भी सुनाना चाहिए। मैंने सभापति महोदयसे यह कहा कि मेरे पास कोई नई बात नहीं है। आपको मालूम है कि आपका पैगाम लेकर वाइसरायके पास हम लोग चले गये थे। जो कुछ उन्होंने कहा है, वह लेकर मैं आपके सामने खड़ा हूँ। जो कुछ भी राय हो सकती थी वर्किंग कमेटी (कार्यसमिति) की तरफसे सबजेक्टस कमेटी (विषय समिति) में पेश की गई थी, अब आपके पास आई है।
आप लोगोंने देखा है कि इस प्रस्तावके ३ हिस्से हैं――ज्यादा भी बन सकते
हैं। अब मैं तीनों हिस्सोंको लेना चाहता हूँ। एक तो प्रस्तावना है। उसका मुख्य मतलब यह है कि सम्पूर्ण स्वतन्त्रता हो। यह वही बात है जो पहले सोची गई थी; उसका मौका आ गया है। इसका सबब बतानेके लिए जो अगली चीज है वह आप देखेंगे कि वर्किंग कमेटी (कार्यसमिति) ने क्या-क्या किया। वाइसरायके बारेमें क्या हुआ। ये सब चीजें आप सब अच्छी तरह समझ लें। यह प्रस्ताव एक मकान है। एक ईंट निकाल दें तो मकान कमजोर हो जाता है। दीवार गिरा दें तो मकान गिर जाता है। यह ऐसा है कि इसमें से एक चीजको ले लें तो आप उसके स्वरूपको काट डालते हैं, मकानको ढा देते हैं। सूरतको बदसूरत कर देते हैं। आप कृपा करके यह समझते हैं तो जितने अमेंडमेंट (संशोधन) है उनको गिरा दें।
आप एक बातपर गौर करें। आप एक वर्किंग कमेटी (कार्यसमिति) हर
दिनतक उस साल बना देते हैं। ३६० दिन तक उस कामेटीका काम है कि वह देखे कि कांग्रेसके लिए क्या करना चाहिए क्या नहीं। उसका काम है कि जिन प्रश्नोंका निर्णय करना है उनका निश्चय करे और फिर उन्हें यहाँ रखे। अगर पूरा काम वर्किंग<noinclude></noinclude>
40o8sf0ovqwzy16vtj2o5aspxoz7bca
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५८९
250
197009
671602
669398
2026-08-18T16:09:40Z
Richmishra14
6772
/* शोधित */
671602
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" /></noinclude>
{{c|{{x-larger|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}}}
{{Multicol}}
{{outdent|अपील,—अहमदाबादके मजदूरोंसे, २५७-५८}}
{{outdent|खादी मताधिकार ११६-१८, ५२६-२७}}
{{outdent|टिप्पणी, ९२, ११९-२०, २५८, २२०-२१;
—[णियाँ] ७८-८०, १४०-४१, २०१-३,
२३०, २६८-६९, २८३-८४, ३१६-
१८, ३२३-२४, ३८४, ४५३-५४,
४५६-५८, ४७०-७१, ४७६-७८, ४८८-
९१, ५०५-७, ५२२-२३}}
{{outdent|तार,—गुलजारीलाल नन्दाको, ३४ -जमना-
लाल बजाजको २७ १२७ -जवा-
हरलाल नेहरूको, १०८, ४०६, ४१८,
४१८; - डेली एक्सप्रेसको ९३ -६०
बा० कालेलकरको ३१० - नलिनी
रंजन सरकारको, ४४४; मणिलाल
कोठारीको, ३१०; -मोतीलाल नेहरू-
को, १५१, १७३, २५४ - रुचीराम
साहनीको २१८; -लक्ष्मीनारायण
गाडोदियाको ३०९ - वल्लभभाई
पटेलको ३०९ - वाइसरायके निजी
सचिवको ३०८ - विट्ठलभाई पटेल-
को, १५१, २६३, ३०९ - शान्ति-
कुमार मोरारजीको १२६ - सरोजिनी
नायडूको, १७३, २५४}}
{{outdent|पत्र,—अ० भा० च० संघ मसूलीपट्टमके
सचिवको १७१ -अब्बास तैयबजीको,
१९ - अलवीको १७०; - अली मुह
म्मद ए० अलादीनको, १६९ - अल्बर्ट
एम० टॉडको, १२७-२८ -आनन्द
टी० हिंगोराणीको, १७४-७५; -आर०
{{Multicol-break}}
थडानीको ३१-३२; -आर० बी०
मोटवानीको ४८२; -आश्रमकी बहनों-
को, २८, ६७, १०४.५, १४५, १९५,
२६४-६५, २९४, ३१९, ३४५;
- ईश्वरलाल जोशीको, ३७-३८,
१३७, १५० उदित मिश्रको ४९७;
- ए० ए० पालको, १३० ए० फेनर
ब्रॉकवेको, १७१-७२ - ए० सुब्वैया-
को, १५ -एच० डब्ल्यू० बी० मोरेनो-
को, ९४ - एम० आर० जयकरको
४४६; - एम० जे० को, २४५ एस०
महादेव जोशीको ९७ - एस० शंकर-
को, ९३ -कन्नूमलको, ३५ -कला-
बती त्रिवेदीको १०६, १७८ - कस्तूर-
बहन भट्टको ४९३; - कुंवरजी पारेख-
को, ४३०, ४८३ - कृष्णन्को, ६५
-के० एस० सुब्रह्मण्यम्को, ७३ -के०
श्रीनिवासनको २० के० सन्तानम्को,
१३२; - कैसर-ए-हिन्द' को, १३१;
-कोटेश्वरप्रसाद पाण्डेको, १६; कोण्डा
वैंकटपयाको, ३६; - गंगाबहन
वैद्यको ५१-५२, १०५-६, १४७, ४२९;
- गिरिराजकिशोरको ३०-३१, १२८;
-गोविन्द मिश्रको, ९५ - घनश्याम-
दास बिड़लाको, ३८१-८२, ३९३, ४१९,
५३०; - च० राजगोपालाचारीको, १४-
१५ - चन्द त्यागीको १९६ -छगन-
लाल जोशीको, ३, ११, १८, २२,
२९, ३३-३४, ३८, ४७, ७१, ७२,}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
3hlsz1678u4ky47pk7nubatlexccu7h
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९०
250
197010
671686
669399
2026-08-19T04:37:29Z
Richmishra14
6772
/* शोधित */
671686
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh|५५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
७४, ८४, ८५-८६, १९९, २३८-४३, २५६; - छोटूभाई पटेलको, ४८२; - जमनादास गांधीको, ५१; -जय- सुखलाल गांधीको, ५१५; - जवाहर- लाल नेहरूको, १०२-३, १२३-२४, १९२, ३९४-९५, ४०३-४, ४१९-२०, ४७५, ५१४; - जॉन एस० हालैंडको १६८; - जे० पी० भणसालीको, २६, १७९; - जे० बी० पेनिंगटनको, १७४; - जे० सी० कुमारप्पाको, १७२; -ज्ञा० मो० सरकारको, ९८ -डॉ० गोपी- चन्दको, ९९-१००; -डॉ० मु० अ० अंसारीको, ४६१, ४९५-९६; -डॉ० रोमरको, ४४३; -डॉ० सैयद मह- मूदको, ३९७; - डाह्याभाई म० पटेलको, २६६-६७; -तुलसी मेहरको, ५१०; - तोताराम सनाढ्यको, १९६; -दक्षिण आफ्रिकी भारतीय कांग्रेसको १७५; - दुनीचन्दको, ३९८; -देवचन्द पारेखको, ४३०; - नन्दकिशोरीको, १९५-९६; - नरगिस कैप्टेनको, १७६; - ना० र० मलकानीको, १७-१८, १३३; -नारण- दास गांधीको, २२-२३; ३११, नारा- यण मोरेश्वर खरेको, १०१, १०३, १०८; - निधालाल निधीशको १२४- २५; - नौतमलाल भगवानजीको, ३८०, ४०५, ४९३, ५०९, ५२९-३०; -पन्ना- लाल झवेरीको, १०४; - पापमा रुक्मि- णीको, ९७ - पी० जी० मैथ्यूको, १७; - पी० रंगनाथन्को, १४; - पुरुषो- तमदास ठाकुरदासको, ४६१-६३, ४८१; -पेन हेजलराटको १२९;
{{Multicol-break}}
- प्रभावतीको, २२१, २६८; -प्रभा- शंकर पट्टणीको, २४६; - प्रेमाबहन कंटकको, १४७, ३०७ - फिजी कांग्रेस- के सचिवको, १७६; - फूलचन्द के० शाहको ५८-५९, १०५, १४३ -बना- रसीदास चतुर्वेदीको, ४२७; -बना- रसीलाल बजाजको, ४३१; -बह- रामजी खम्भाताको, ३९३; -बी० एल० रलियारामको, ७२; -बी० एस० गोपालरावको १२-१३; -बी० राम वर्माको, १८७; -बी० शिवारावको, ९६; - ब्रजकृष्ण चांदीवालाको ३०, ३८१, ४०६, ४४५, ४५६; - भोपालके नवाबको, १८६; 'म' को, २९६, - मथुरादास त्रिकमजीको, २५७, ३१०, ४२७; -मथुरादास पु० गांधीको, १३६, २६२, २७६-७७ ; -मणिबन पटेलको, ३७६; - मणिलाल और सुशीला गांधीको, ६८, २९८; - महादेव देसाई- को, २, २१, २७-२८, ३८, ६६-६७, १९४, ४६३; -माधवजी वी० ठक्कर- को, ५०; - मीठूबहन पेटिटको, ५१५; - मीराबहनको, २००-१, २१७-१८, २२५, २४३-४४; -मु० अ० अन्सारीको, ४८-४९; - मुहम्मद आदिल अब्बासीको, १६; - मुहम्मद नसीमको, १२५-२६; -मुहम्मद मुजीबको, १२२-२३; - मूलचन्द अग्रवालको, २९; -मोतीलाल नेहरूको, २३५; - मोहनलाल के० मेहताको २१६ - मोहनलाल भट्टको, ३३; - म्यूरियल लेस्टरको, १२९, ५१४; - रघुनाथको, २८०; - रमणीकलाल
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
8t6gc87yc9n0af3zelaak1l8uu5cp05
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 42.pdf/५९१
250
197011
671692
669400
2026-08-19T04:48:08Z
Richmishra14
6772
/* शोधित */
671692
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Richmishra14" />{{rh||शीर्षक-सांकेतिका|५५३}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|{{gap}}मोदीको १११, १३५, १४६, १४८-४९, १७७-७८ १९८-९९ २००, २१७, २५५-५६, २६२-६३, २६६, २६७- ६८, २७५, २७७, २७९, २९२-९३, २९५, २९६-९७, २९७-९८, ३०५-६, ३०७-८, ३१९-२०, ३३१-३२, ३४५; - रामनरेश त्रिपाठीको, ६४; -राम- नारायण चौधरीको, १९९; -राम- विनोदको, १८५-८६ ; - रामानन्द चट- र्जीको, २९४; - रामी पारेखको, ४०५; - रामेश्वरप्रसाद पोद्दारको, ४४४; - रावजीभाई मणिभाई पटेलको, ५९, ११०-११; - रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको, ६३-६४, १०२, १४२, ४६४; - रैहाना तैयबजीको, १९-२०, ४५५, ५१३; - लीलावती कोडीदासको, ४७६; - वसुमती पण्डितको १०, ३२, ४९, ६६, १४८, २१६, २२६, ३७९-८०, ४२६, ४४४-४५, ४५५; -वालजी गोविन्दजी देसाईको, १९३; -वी० ए० सुन्दरम्को, २६३; वी० एस० श्रीनिवास शास्त्रीको, ४०४, ४६०; - शंकरलाल बैंकरको १००-१, १३१; - शान्तिकुमार मोरारजीको १३४-३५, ३०६; - शारदाबहन शाहको १४४, ४२९-३०; - शिवाभाई पटेलको, १०९- १०, १९३, २७८, ३११; -श्रीमती मोंक्रिफ स्मिथको १३०; -सतीशचन्द्र दासगुप्तको, २१, १३३-३४, १८५, १९८, ४२८, ४९६; -सन्तोक गांधीको, १७९; - सरकारी तार जाँच कार्यालय, कलकत्ताके अधीक्षकको, ३७; -सी०}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|{{gap}}एफ० एन्ड्रयूजको, १९७-९८, ४५९- ६०; - सी० डी० स्माइलीको, १६९- ७०; -सी० पी० मैथ्यूको, ९५-९६; -सी० वाई० चिन्तामणिको, ४६४; -सी० सी० दासको, १३; -सी० हनुमन्तरावको, ९९; -सैयद रौस मसूदको, ७१; - हरचरणलाल वर्मनको, ३५-३६; - हरदत्त शर्माको २५५; -हरिइच्छा देसाईको, ४३१, ५१६; - हरिभाऊ उपाध्यायको, १०९, १५०, ३७८-७९, ४२८; - हिन्दुस्तानी सेवा दलके अवर सचिवको १३२; -हेमन्त के० चटर्जीको, ४६-४७; - हेमप्रभादेवी दासगुप्तको, २७६}}
{{outdent|पुर्जी, - रेजिनॉल्ड रेनॉल्ड्सको, २४४, २४६}}
{{outdent|भाषण, अ० भा० कां० कमेटीकी विषय समितिमें, ३३३-३५, ३३९-४४, ३४६, ३४७-५०, ३५१-५२, ३६८, ३६९, ३७०; -अखिल भारतीय दलितवर्ग सम्मेलनमें, ३२२; - अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, अहमदाबादमें, ४०७-१०; - अभिनन्दन समारोह, इलाहाबादमें, १८९-९० ; - इलाहाबाद विश्वविद्यालयमें, १८७-८८; -कांग्रेस अधिवेशन, लाहौरमें- [१], ३५२-५५, -[२], ३५६-६७; -गुजरात विद्यापीठके दीक्षान्त समारोह में, ३९९-४०१ ; - छात्रालय में रहनेवाले छात्रोंके सम्मेलन, साबरमती में, ४२०-२३; - नागरिक अभिनन्दन समारोह, दिल्लीमें, ८७-८८; - प्रार्थना सभा, साबरमती आश्रममें, २४७-४८; -मुस्लिम विश्व-}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
jty3kv12qeimnk2oxbptgmmydh7n7wk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/८६
250
197128
671536
669642
2026-08-18T12:06:04Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671536
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|४८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>चीतके सम्बन्धमें कुछ नहीं कहना चाहिए। जनताको इसके बारेमें ज्यादा जानना होगा तो किसी दिन जान लेगी। लेकिन आपको इतने-भर के लिए आश्वस्त कर दूं कि सच्चे औपनिवेशिक स्वराज्यकी योजना तैयार करनेका कोई सवाल ही नहीं उठा था।
'''प्र॰ : अब में बस एक सवाल आपकी प्रसिद्ध ग्यारह सूत्री मांगके बारेमें पूछना चाहूँगा। अगर इनमें से कुछ बातें स्वीकार कर ली जायें तो क्या समझौते के लिए रास्ता बन जायेगा?'''
उ॰ : अगर सरकार कुछ मुख्य बातें स्वीकार कर ले और इसके साथ ही शेष माँगें यथाशीघ्र स्वीकार कर लेनेका वचन दे दे तो मैं कांफरेंसके प्रस्तावपर विचार करनेको तैयार रहूँगा । मगर उन तमाम माँगोंकी न्याय्यता पहले स्वीकार कर ली जानी चाहिए। आप यह तो मानेंगे ही कि उनमें कुछ नया नहीं है। अधिकांश माँगें तो दादाभाई नौरोजी के समयसे ही की जाती रही हैं।
'''प्र॰ : मान लीजिए, सरकार सैनिक और असैनिक खर्चमें कटौती करनेकी आपकी माँग स्वीकार कर लेती है तो क्या आप इसे उसकी सदाशयताका पर्याप्त प्रमाण नहीं मानेंगे?'''
उ॰ : हाँ, तब तो मुझे अपनी स्थितिपर गम्भीरतासे फिर विचार करना होगा, लेकिन यह सब इस बातपर निर्भर होगा कि जो कुछ दिया जाता है वह किस भावसे दिया जाता है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' २०-३-१९३०|1em}}
{{Dhr}}
{{larger|{{c|'''४२. भाषण : प्रार्थना-सभा, साबरमती आश्रममें'''}}}}
{{right|[११ मार्च, १९३० या उसके पूर्व]<ref>साधन-सूत्र के अनुसार यह भाषण विशाल जनसमूहके सामने १० या ११ मार्चका दिया गया था।</ref>}}
मैं फिरसे यह स्पष्ट कह देना चाहता हूँ कि जिस ध्येयकी प्राप्तिके लिए हम कूच कर रहे हैं, या तो हम उस ध्येयको प्राप्त करेंगे अथवा उसको प्राप्त करनेकाप्रयत्न करते हुए अपने प्राण दे देंगे। अब हम अपना कदम पीछे नहीं ले सकते। जबतक हिन्दुस्तानको स्वराज्य नहीं मिल जाता, तबतक हमारी लड़ाई चलती रहेगी। यह आखिरी लड़ाई है। मेरा साथ देनेवाले सैनिकोंको यह जान लेना चाहिए कि वे वापस नहीं लौट सकते। जो सैनिक विवाहित हैं उन्हें अपनी पत्नियोंसे अनुमति ले लेनी चाहिए और स्वातन्त्र्य युद्धका प्रथम सैनिक होनेके नाते पत्नियोंको उनका अभिनन्दन करना चाहिए। आश्रमसे हमारी यह विदाई घरसे विदाई लेनेके समान है। पूर्ण सफलता प्राप्त होनेपर ही हम यहाँ वापस लौट सकेंगे।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''गुजराती,''' १६-३-१९३०|1em}}<noinclude>{{Smallrefs}}</noinclude>
ohnhczn0s5wz78v2h83cq92sw24x53w
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/८७
250
197129
671538
669643
2026-08-18T12:12:01Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671538
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''४३. भाषण : प्रार्थना-सभा, साबरमती आश्रम में'''}}}}
{{right|११ मार्च, १९३०}}
बहुत सम्भव है कि आज आपके सामने मेरा यह अन्तिम भाषण हो। सवेरे यदि सरकार मुझे कूच करने देगी तो भी साबरमतीके पवित्र किनारेपर तो यह अन्तिम भाषण ही होगा। अथवा हो सकता है कि मेरे जीवनका यह अन्तिम भाषण हो। मुझे जो कहना था सो मैं आपसे कल कह चुका हूँ। भविष्यमें आपको क्या करना चाहिए, सो मैं आपसे कहूँगा। मान लीजिए कि कल सवेरे सरकार मुझे पकड़ लेती है और मेरे साथियोंको भी पकड़ लेती है तो भी जलालपुर तक कूचका जो कार्यक्रम है वह चलता रहना चाहिए और इसके लिए स्वयंसेवकोंकी जो भरती होनी चाहिए वह गुजरातसे ही होगी। पिछले पन्द्रह दिनोंसे मैं जो देख-सुन रहा हूँ उससे
मुझे विश्वास है कि भरतीमें व्यक्तियोंकी अखंड धारा बहती रहेगी।
लेकिन यदि हम सब पकड़े जायें तो तनिक भी अशान्ति नहीं होनी चाहिए। हमें अपनी पूरी शक्तिका शान्तिके मार्गके लिए ही उपयोग करना है। कोई भी व्यक्ति क्रोधके आवेशमें न करने योग्य कार्य नहीं करेगा। ऐसी मेरी आप लोगोंसे विनती है और ऐसी मुझे आपसे उम्मीद है। मेरे ये शब्द सारे हिन्दुस्तानमें पहुँच जाने चाहिए। यदि यह टुकड़ी नष्ट हो जाती है और मैं भी खप जाता हूँ तो मेरा कार्य पूरा हो जायेगा। उसके बाद कांग्रेसकी कार्य समिति जिस तरहसे इस आन्दोलनका संचालन करेगी उस तरहसे आपको चलना होगा। कार्य समितिने जो प्रस्ताव पास किया है उसका अर्थ यही है। मेरे उन साथियोंके हाथमें, जो अहिंसाको धर्मके रूपमें मानते हैं, इसके बाद भी लगाम होगी। लेकिन हमें मान लेना चाहिए कि कांग्रेस जो कार्यक्रम तय करना चाहे सो कर सकती है। जबतक मैं जलालपुर नहीं पहुँच जाता तबतक कांग्रेसकी ओरसे मैंने जिस वस्तुकी माँग की है उसके विरुद्ध कुछ नहीं होना चाहिए। लेकिन यदि सरकार मुझे पकड़ लेती है तो पूरी जिम्मेदारी कांग्रेसपर आ जाती है। इसीसे जो व्यक्ति अहिंसाको व्यवहार रूपमें नहीं बल्कि धर्मके रूपमें मानता होगा वह बैठ नहीं जायेगा। लेकिन यदि सरकार मुझे गिरफ्तार कर लेगी तो कांग्रेसके साथ मेरी शर्त खत्म हो जायेगी। ऐसा होनेपर नाम दर्ज करवानेमें ढील नहीं होनी चाहिए। जिस-जिस स्थानपर नमक-कानून भंग किया जा सकता है उस स्थानपर यह शुरू किया जाना चाहिए। कानून भंग करनेके तीन रास्ते हैं। जहाँ नमक आसानीसे बनाया जा सकता हो वहाँ बनाना, यह अपराध है। इस नमकको जो ले जायेगा अथवा बेचेगा वह अपराध करेगा और जकात के बिना नमक खरीदनेवाला व्यक्ति भी अपराधका भागी होगा। नमक कानूनको भंग करनेका यह सबसे आसान तरीका है। जलालपुर ताल्लुकेमें नदी के किनारे बहुत-सा प्राकृतिक नमक पड़ा है। इसे उठाना गुनाह है। इसलिए यहाँसे जो व्यक्ति नमक उठाना चाहे वह उठा सकता।<noinclude>{{Dhr}}
{{left|३४–४}}</noinclude>
t3h3fs7od91sedv86ydwic8w5w0v0rz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/८८
250
197130
671736
669644
2026-08-19T08:42:59Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671736
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|५०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
लेकिन केवल यही काम करके हमें सन्तोष नहीं मान लेना है, अपितु जहाँ स्थानीय कार्यकर्त्ता हों, कांग्रेसकी ओरसे प्रतिबन्ध न हो, कार्यकर्त्ताओंमें आत्मविश्वास हो वहाँ उन्हें जो युक्ति सूझ पड़े वे उस युक्तिसे काम ले सकते हैं। मेरी एक ही शर्त है। हमने शान्ति और सत्यके द्वारा स्वराज्य प्राप्त करनेकी प्रतिज्ञा ली है; उसका पालन कर जिसे जो करना हो सो करनेकी छूट है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अपनी जवाबदेहीपर प्रत्येक व्यक्ति चाहे जो करने लग जायेगा। जहाँ नेता हो वहाँ वह जितना कहे उतना ही लोग करें लेकिन जहाँ नेता ही न हो वहाँ इस कार्यक्रममें विश्वास रखनेवाले मुट्ठी भर लोगोंको भी अपने आत्मविश्वासके बलपर जो करना
चाहें सो करनेका अधिकार है; वह उनका अधिकार ही नहीं धर्म है। संसारके इतिहासमें जहाँ-जहाँ जनताका नेतृत्व करनेके लिए व्यक्ति आगे आये थे, उनमें ऐसा ही आत्मविश्वास, दृढ़ता और साहस था। और यदि हममें स्वराज्य लेनेकी उग्र इच्छा हो तो हममें इतना आत्मविश्वास होना चाहिए कि जैसे-जैसे सरकार हमारे लोगोंको गिरफ्तार करती जायेगी वैसे-वैसे हम निडर बनते जायेंगे और हमें लोग मिलते चले जायेंगे।
यदि सरकार मुझे पकड़ ले तो कोई यह न मानें कि अब जनताका नेतृत्व करनेके लिए कोई नहीं रहा। नेतृत्व करनेवाला मैं नहीं, वह तो जवाहरलाल है। उसमें नेतृत्व करनेकी शक्ति है। लेकिन सच बात तो यह है कि अब नेतृत्व करने लायक कोई बात नहीं रही। जहाँ निडरताका मन्त्र मिला है, जहाँ मरनेका मन्त्र मिला वहाँ कौन किसका नेतृत्व करेगा? लेकिन यदि हममें निडरता नहीं होगी, हिम्मत नहीं होगी तो वह हमें जवाहरलाल भी नहीं दे सकते।
अन्य अनेक काम भी पड़े हुए हैं। हम शराबकी दुकानों पर, विदेशी कपड़ोंकी दुकानों पर धरना दे सकते हैं। महसूल देना बन्द करनेकी हममें शक्ति हो तो हम वह भी बन्द कर सकते हैं। वकील हों तो वकालत छोड़ दें, मुवक्किल हों तो अदालत छोड़ दें, सरकारी नौकर हों तो सरकारी नौकरी छोड़ दें। आज तो चारों ओर इतनी निराशा फैली हुई है कि यदि नौकरी छूट जाये तो कँपकँपी छूटने लगती है। ऐसी निराशा रखनेवाला कोई भी व्यक्ति स्वराज्यके योग्य नहीं है। लेकिन यह निराशा किसलिए? सरकारी नौकर तो देशमें बहुत करके पाँच-सात लाख होंगे। तो इनके अलावा और लोग कहाँ जायें? स्वतन्त्रताके जमानेमें भी सरकारी नौकरियाँ इससे
अधिक नहीं होंगी। कारण कि आज कलक्टरके पास जितने गुमाश्ते हैं उतने गुमाश्तोंकी स्वराज्यके कलक्टरको जरूरत न रहेगी। कलक्टर स्वयं ही गुमाश्ता बनेगा। इस भिखारी देशमें कलक्टरको एक व्यक्ति कागज उठानेके लिए, दूसरा झाड़ूबुहारीके लिए, तीसरा व्यक्ति पाखाना साफ करनेके लिए, चौथा व्यक्ति खाना पकानेके लिए, पाँचवाँ व्यक्ति कागज लाने-ले जानेके लिए चाहिए! यह बात भला कैसे निभ सकती है? इतना खर्च हमारा कंगाल देश सहन नहीं कर सकता। इसलिए यदि हममें समझ आ गई हो तो हमें ऐसी नौकरी छोड़ देनी चाहिए, फिर भले ही हम जज हों अथवा चपरासी। जजको तो यह बात कठिन जान पड़ेगी, लेकिन चपरासीको क्यों
मुश्किल लगेगी? चपरासी तो चाहे जहाँ नौकरी करे, इतने पैसे तो उसे मिल ही जायेंगे।<noinclude></noinclude>
9pf2xnpf59mdu0kbk2gevw7fffxulos
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/८९
250
197131
671737
669645
2026-08-19T08:45:03Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671737
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||पत्र : जवाहरलाल नेहरूको|५१}}</noinclude>स्वतन्त्रताकी समस्याका यह अत्यन्त सहज हल है। जो-जो लोग जिस तरहसे सरकारके साथ सहयोग करते हों—महसूल देकर, खिताब धारणकर, अदालतोंमें जाकर, नौकरी करके, स्कूलों-पाठशालाओंमें बच्चोंको भेजकर—उन सबका अथवा जितनेका त्याग किया जा सके त्याग करके वे सरकारसे असहयोग कर सकते हैं। जो लोग जिन साधनोंको कम कर सकते हैं, कम कर लें; और इसमें स्त्रियाँ भी पुरुषोंके जितना भाग ले सकती हैं।
इसे सब कोई भले ही मेरी वसीयत जानें। कूच आरम्भ करनेसे पहले, जेल जानेसे पहले मुझे आप लोगोंको इतना ही सन्देश देना था। जिस युद्धका आरम्भ कलसे अथवा एकाध घंटेमें, जब मैं पकड़ा जाऊँ, तबसे होनेवाला है वह युद्ध स्वराज्य मिलने तक कभी बन्द न हो। हमारी एक टुकड़ी पकड़ी जाये तो दस तैयार हैं, यह सुननेके लिए मैं आतुर रहूँगा। इस समय भारतमें मैंने जो काम शुरू किया है उसे पार उतारनेवाले लोग पड़े हुए हैं। मेरी मान्यता है कि हमारा मामला सच्चा है। हमारे साधन शुद्धतम हैं और जहाँ साधन शुद्ध हैं वहाँ परमेश्वर है। इस तरह जहाँ इन तीनों वस्तुओंका संगम हो वहाँ पराजय-जैसी कोई चीज हो ही नहीं सकती। सत्याग्रही जेलके बाहर हो अथवा भीतर, वह सदा विजयी है। यदि वह सत्यको छोड़ता है, शान्तिका त्याग करता है, अपने हृदयकी आवाजको नहीं सुनता तो वह निश्चय ही हारता है। इसलिए यदि सत्याग्रही पर हार-जीत लागू होती है तो उसके लिए स्वयं सत्याग्रही ही जिम्मेदार है। ईश्वर आपका कल्याण करे! आइये, आप और हम उससे प्रार्थना करें कि कल प्रातःकाल आरम्भ होनेवाले युद्ध में कोई विघ्न न आये।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १६-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''४४. पत्र : जवाहरलाल नेहरूको'''}}}}
{{right|[११ मार्च, १९३०]}}
{{left|प्रिय जवाहरलाल,}}
अब रातके १० बजनेको हैं। यहाँ जोरोंकी अफवाह फैली हुई है कि मैं रातमें ही पकड़ लिया जाऊँगा। मैंने तुम्हें खास तौर पर तार इसलिए नहीं दिया कि संवाददाता लोग अपनी खबरें मंजूरीके लिए पेश करते हैं और सभी पूरी गतिसे काम कर रहे हैं। तार देने लायक कोई खास बात थी भी नहीं।
घटनाएँ असाधारण रूपसे ठीक चल ही रही हैं। स्वयंसेवकोंके नाम धड़ाधड़ आ रहे हैं। टोली कूच करती ही रहेगी, भले ही मैं पकड़ लिया जाऊँ। मैं गिरफ्तार न हुआ तो मेरी तरफसे तारोंकी आशा रख सकते हो, नहीं तो मैं हिदायतें छोड़े जा रहा हूँ।<noinclude></noinclude>
pcriz707dm4za5aejbmyp67id33dmux
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९०
250
197132
671738
669646
2026-08-19T08:47:56Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671738
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|५२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>
मेरे पास कोई खास बात कहनेको मालूम नहीं होती। मैं काफी लिख गया हूँ। आज शामको रेतीपर प्रार्थनाके लिए जमा हुई विशाल भीड़को मैंने अन्तिम सन्देश दिया था।
भगवान् तुम्हारी रक्षा करे और तुम्हें भार वहन करनेकी शक्ति दे।
तुम सबको प्यार,
{{right|'''बापू'''}}
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''ए बंच ऑफ ओल्ड लैटर्स'''|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''४५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको'''}}}}
{{right|साबरमती आश्रम<br>११ मार्च, १९३०}}
{{left|भाई सतीशबाबू,}}
यह मेरा कमसे कम जेलके बाहरका आखरी खत हो सकता है। कल मुझे पकड़ ही लेंगे, ऐसा विश्वास है और ऐसी खबरें भी आ रही हैं। तुम्हारे खत मिल चुके हैं। मैं उत्तर क्या लिखूं? जो कुछ हो सकता है वह किया जाय। मैं 'गीता' की एक नकल भेजनेका कह देता हूँ। तैयार हो चुकी है।
हेमप्रभादेवीको अलग खत भेजनेका मुझको समय नहीं रहा है। दोनोंको सर्व त्याग करनेकी ईश्वर शक्ति दें और हर समय मतैक्य समझनेका ज्ञान दें और सेवा-मार्ग के लिये दीर्घायु करें।
{{right|'''बापुके आशीर्वाद'''}}
जी॰ एन॰ १६३६की फोटो नकलसे।
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''४६. तार : भवानीदयाल संन्यासीको'''<ref>यह भवानीदयाल संन्यासीके ११ मार्च, १९३० को प्राप्त निम्नलिखित तारके उत्तरमें भेजा गया था: "शाहाबाद जिला कांग्रेस कमेटीकी अध्यक्षता स्वीकार कर ली है। आपकी गिरफ्तारोके बाद सत्याग्रह आरम्भ करूँगा। आशीर्वाद चाहता हूँ।"</ref>}}}}
{{right|[११ मार्च, १९३० को या उसके पश्चात्]}}
{{left|आपकी सफलताकी कामना करता हूँ।}}
{{right|'''गांधी'''}}
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १६६६८) की माइक्रोफिल्मसे।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
k7w6spcngpumzrtou88b81m33rqhkip
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९१
250
197133
671740
669647
2026-08-19T08:50:55Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671740
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''४७. सन्देश : बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीके लिए'''}}}}
{{right|[१२ मार्च, १९३० के पूर्व]}}
जमनालालजी के सम्बन्धमें मुझे बम्बई प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीका तार मिला। मैं कमेटीके इस विचारसे सहमत हूँ कि अभी जमनालालजी का बम्बई में रहना उनके कहीं अन्यत्र रहनेकी अपेक्षा देशके लिए ज्यादा लाभदायक होगा। मैंने उनसे बातचीत की हैं और उन्होंने बम्बईको यथाशक्ति अधिक से अधिक समय देनेका निश्चय किया है। मैं तो अब यही आशा करूँगा कि बम्बई उनकी उपस्थितिका अधिकसे-अधिक लाभ उठायेगा और इस स्वातन्त्र्य संग्राम में प्रमुख हिस्सा लेगा, जैसा कि वह सदा करता रहा है। मैं आशा करता है कि सरदार वल्लभभाईकी गिरफ्तारीपर बम्बईकी प्रतिक्रिया इस घटनाकी विशिष्टताके अनुरूप हुई होगी।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १३-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''४८. सरदार वल्लभभाई पटेल'''}}}}
सरदार वल्लभभाई ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने इन उथल-पुथलके दिनोंमें गुजरातमें शान्ति बनाये रखी है। यही यह सुयोग्य व्यक्ति हैं जिनकी अध्यक्षतामें अहमदाबाद नगरनिगम द्वारा किये गये कार्योंकी सरकारने भी मुक्तकण्ठसे प्रशंसा की। इन्हींके अविश्रान्त परिश्रमने १९२७ में गुजरातके बाढ़ पीड़ित जनोंके दिलोंमें हौसला भरा, और जब सरकारका तन्त्र बेकाम हो गया तब इनके कार्यकर्त्ताओंने हजारों लोगोंकी जानें बचाई। अभी हाल में बारडोलीमें होनेवाले उस शान्तिपूर्ण संघर्षके सूत्रधार यही थे, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षोंके लिए सम्मानजनक समझौता सम्पन्न हो सका। यह शान्तिदूत, गुजरातियोंके हृदय मन्दिरका यह देवता, उनका यह बेताजका बादशाह आज एक कैदी है और उसे कैद इसलिए किया गया है कि उसने भाषणोंपर एक ऐसे समय में पाबन्दी लगानेवाले आदेशकी उपेक्षा की जब कि शान्ति भंग होनेकी तनिक भी आशंका नहीं थी। अधिकारियोंको मालूम था कि वे नमक अधिनियमकी धाराओंको तोड़ने नहीं गये थे। वे तो केवल मेरे कूचके लिए तैयारी करने गये थे। मगर सरकारको उन्हें किसी-न-किसी बहाने जेल भेजना था। वाइसराय महोदय मेरी कानून तोड़ने की योजनासे दुःखी है। मगर कानूनका ऐसा भ्रष्ट उपयोग करनेकी कार्रवाई, कानूनके नामपर व्यक्तिकी स्वतन्त्रतापर हाथ डालनेके इस दुष्कृत्यके बारेमें क्या कहा जाये?
और सरदार कहाँ और किस हालतमें है? वे एक काल-कोठरीमें हैं–वैसी ही काल-कोठरी जैसी कि आमतौर पर होती है; वहाँ कोई रोशनी नहीं है, वहाँ<noinclude></noinclude>
hq4iuuqjc10robnvi43zksnemeixnfc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७५
250
197134
671549
671459
2026-08-18T12:43:49Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* समस्याकारक */
671549
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''भाषण : अंकलेश्वरमें'''}}}}
{{Right|१३३}}
हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहराम होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}}
{{Right|२६ मार्च, १९३०}}
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude>
081bwejg3vcc3gwnukbxydk5i2uaywd
671562
671549
2026-08-18T13:25:25Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671562
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''भाषण : अंकलेश्वरमें'''}}}} {{Right|१३३}}
हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहराम होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}}
{{Right|२६ मार्च, १९३०}}
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude>
8n28378pw4onx5qui7d34msrj4nptyh
671563
671562
2026-08-18T13:25:56Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
671563
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{larger|'''भाषण : अंकलेश्वरमें'''}}}} {{Right|१३३}}
हस्ताक्षर चाहिए। सब कौमें खुश हों तभी स्वराज्य मिलेगा। इससे ज्यादा किसीको और किस तरहसे सन्तोष दिया जा सकता है ?
लेकिन इससे पहले कि स्वराज्य मिले, भड़ौचको गरीबोंके लिए क्या करना चाहिए ? कमसे कम भड़ौच नमकहराम तो न बने। हिन्दू और मुसलमान दो अथवा
चार आनेके नमकपर सवा रुपया कर देते हैं; मेरी मान्यता है कि यह नमकहराम होना है। इतने दिनोंतक हमने इस कर को सहन किया, यह हमारी मूर्खता थी;
भारतके प्रति निष्ठाकी कमी थी और गरीबोंके प्रति हम नमकहराम थे।
६ करोड़ रुपयेका नमकका कर दूर करानेके लिए लड़ाईकी बात किसे अच्छी नहीं लगती। किसी गरीब मुसलमानको यदि नमक भी न मिलता हो तो इससे
उसके हृदयसे कितनी हाय निकलती होगी ? इस कर को हटवानेके लिए ऐसा कौन-सा भारतीय होगा जो इस युद्धसे दूर रहेगा ?
यह युद्ध ईश्वरके नामसे चल रहा है। यह युद्ध जरूरतमन्दोंके लिए है, अमीरोंके लिए नहीं और जरूरतमन्दोंकी लड़ाईसे कौन दूर रहनेवाला है ?
मैंने प्रश्नोंके उत्तर दे दिये हैं। चन्द्रभाईने बड़े जोरदार शब्दों में मुझसे कहा कि भड़ौच जिला इस युद्ध में बहुत अधिक योगदान देगा और प्राण देकर भी लोगोंकी सेवा
करनेसे नहीं चूकेगा। मुझे उम्मीद है कि यहाँ उपस्थित भाई बहन, भाई चन्द्रभाईकी आशाओंको पूरा करेंगे। यहां आये सब भाई-बहन अपना नाम लिखायेंगे तो चन्द्रभाईका मन भर जायेगा और मैं मानूंगा कि मुझे तो माँगेसे भी कहीं ज्यादा मिला।
जिस ईश्वरके नामपर मैंने यह सब कहना शुरू किया है उसके नामपर मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह आपको मेरे कथनको समझने और उसके अनुरूप आचरण
करनेकी शक्ति दे।
[ गुजरातीसे ]
'''नवजीवन''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२७. भाषण: अंकलेश्वरमें'''}}}}
{{Right|२६ मार्च, १९३०}}
सिर्फ यह कहने से कि सरकार विदेशी है, उसके बारेमें सही जानकारी नहीं मिलती। यह तो हो सकता है कि विदेशी सरकारके बावजूद प्रजाको दुःख न हो ।
हालांकि राजपीपला देशी रियासत है, किन्तु यदि वहाँ शराबके बहुत-से ठेके हों तो मेरी निगाह में वह भी विदेशी ही है।
सरकार घी पर कर ले, यह बात समझमें आती है। शराब या बीड़ियोंपर भी कर लगाया जा सकता है; किन्तु यह सरकार तो इतनी चतुर, बहादुर और
राक्षसी है कि गरीबसे गरीब लोग जो चीज खाते हैं, उसपर भी कर लगाती है। इतना ठीक है कि हवापर कोई कर नहीं है। पानीपर भी कर लगा हुआ है
और नमक पर तो १४०० प्रतिशत कर है। यदि नमकपर लगे हुए कर को रद<noinclude></noinclude>
esvdeibo5qf4aanunl495y7ptrklk5a
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९२
250
197135
671741
669649
2026-08-19T08:53:02Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671741
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|५४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>उन्हें बाहर सोनेकी सुविधा नहीं है। उन्हें जो खाना दिया जा रहा है उससे उन्हें पेचिश होनेकी सम्भावना है; क्योंकि भोजनमें तनिक-सी गड़बड़ी होनेसे ही उन्हें यह बीमारी हो जाती है। उन्हें धार्मिक पुस्तकोंके अलावा और कोई पुस्तक देनेकी मनाही है। एक सत्याग्रहीकी हैसियतसे वे विशेष व्यवहारकी अपेक्षा नहीं रखते। लेकिन किसी साधारणसे साधारण अपराधीको भी, यदि उससे सुरक्षाको कोई खतरा न हो तो, ऐसी गर्मी मौसममें खुले आकाशके नीचे सोनेकी इजाजत क्यों नहीं दी जानी चाहिए? अगर किसी जरायमपेशा व्यक्तिको पढ़ने-लिखनेके लिए रोशनीकी जरूरत हो तो उसके लिए उसका प्रबन्ध क्यों नहीं किया जाना चाहिए? क्या किसी हत्यारेको कुछ पढ़कर अपने अन्दर सुबुद्धि जगानेसे रोकना उचित है? और सरदार वल्लभभाईको वैसा आहार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए जो उनके स्वास्थ्यके लिए आवश्यक है? लेकिन यह तो जेल-व्यवस्थामें सुधारका सवाल है। सरदार वल्लभभाई ऐसे व्यक्ति नहीं हैं कि अगर उन्हें मनुष्यके लिए आवश्यक सुख-सुविधाओंसे वंचित रखा जायेगा तो उनका हौसला टूट जायेगा। क्या विद्वान् पत्रकार और नाटककार श्रीयुत खाडिलकरको अभी कुछ ही दिन पहले इसी प्रकारके दुर्व्यवहारका शिकार नहीं होना पड़ा? भारतीय जेलोंमें भद्दा और अशोभन व्यवहार करके सत्याग्रहकी भावनाको खत्म नहीं किया जा सकता। बस, प्रस्तावित [गोलमेज] कांफरेंसकी उपादेयतामें विश्वास रखनेवाले लोग इतना जान लें कि व्यावहारिक रूपमें औपनिवेशिक स्वराज्यका मतलब सचमुच क्या होता है।
गुजरात—नहीं, गुजरात ही क्यों, सारा भारत—उस सर्वोच्च कानूनकी सत्ताको प्रतिष्ठित करनेकी तैयारी कर रहा है जो कानूनके नाम पर चलनेवाली घोर अव्यवस्था और अराजकताको समाप्त कर देगा। अधिकारियोंने वल्लभभाईको इस आशासे जेलमें डाला है कि उनकी अनुपस्थितिमें उनका काम बिखर जायेगा। लेकिन शीघ्र ही उन्हें मालूम हो जायेगा कि वह काम इतनी अच्छी तरह चलता रहेगा मानों वे
अपने लोगोंके बीच सशरीर उपस्थित हों।
{{left|'''पुनश्च :'''}}
अभी-अभी सूचना मिली है कि अब सरदारके साथ पहलेसे अच्छा व्यवहार किया जा रहा है। उन्हें जिस साहित्य और आहारकी आवश्यकता होगी, वह उन्हें दिया जायेगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १२-३-१९३०|1em}}<noinclude></noinclude>
am5pmx2bs5u5f7k802133zvndxkqznk
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९३
250
197136
671742
669650
2026-08-19T08:55:42Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671742
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''४९. परिचित उत्तर'''}}}}
'''प्रिय श्री गांधी,'''
{{outdent|{{gap}}{{gap}}'''परमश्रेष्ठकी इच्छानुसार आपको यह सूचित कर रहा हूँ कि आपका २ मार्च का पत्र उन्हें मिल गया। उन्हें यह जानकर बहुत दुःख हुआ कि आप एक ऐसा रास्ता अख्तियार करने जा रहे हैं जिससे स्पष्टतः कानून भंग होगा और सार्वजनिक शान्ति खतरे में पड़ जायेगी।'''}}
{{right|'''आपका विश्वस्त,<br>जी॰ कगिघम<br>निजी सचिव'''}}
पाठक ऐसे उत्तरसे परिचित ही हैं। वे देखेंगे कि इस जवाब में जिस बातको उन्हें सिद्ध करना है, उसीको मान लिया गया है; और हम जो कदम उठाने जा रहे हैं, उसके लिए अगर और कारणकी आवश्यकता रह गई थी तो वह इस घिसे-पिटे जवाबसे पूरी हो जाती है। मैंने तो घुटने टेककर रोटीकी भीख माँगी थी और मिला यह पत्थर।
वाइसराय चाहते तो गरीबोंको नमकपर जो कर चुकाना पड़ता है, उसे समाप्त करके मुझे निष्क्रिय बना दे सकते थे। इस करको चुकानेमें उन्हें प्रतिवर्ष ५ आने अर्थात् लगभग अपनी तीन दिनकी कमाई देनी पड़ती है। मैं तो नहीं जानता कि भारत के अलावा किसी और देशमें भी किसीको यदि उसकी सालाना आमदनी ३६० रुपये हो तो ३ रुपये कर-स्वरूप दे देने पड़ते हों। वाइसरायके सामने
यह घिसा-पिटा जवाब देनेके अलावा और भी बहुत-से रास्ते थे। लेकिन अभी वह समय नहीं आया है कि वे उनमें से कोई रास्ता अख्तियार करते। वे उस राष्ट्रका प्रतिनिधित्व करते हैं जो आसानीसे हार नहीं मानता, सहज ही अपने कियेपर पश्चात्ताप नहीं करता। अनुनय-विनयसे उसका हृदय नहीं पिघलता। शारीरिक शक्तिका दबदबा वह तुरन्त स्वीकार करता है। वह मुक्केबाजीके किसी दंगलको घंटों तक साँस रोककर बिना थके-ऊबे देख सकता है। वह फुटत्रालका ऐसा खेल जिसमें खिलाड़ियोंकी हड्डियाँ चटख गई हों, उन्मत्त उल्लासके साथ देख सकता है। युद्धके खून जमा देनेवाले विवरण वह परम आह्लादके साथ पढ़ सकता है। उसपर प्रतिरोध-रहित मूक कष्ट सहनका भी असर हो सकता है। मगर हम चाहे जितनी जोरदार और कायल करनेवाली दलील दें, वह उससे प्रभावित होकर उन करोड़ों रुपयोंकी ओरसे मुँह नहीं मोड़ सकता जो वह प्रतिवर्ष भारतसे लूटकर ले जाता है। सो वाइसराय महोदयके उत्तरसे मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
लेकिन अगर मेरे पत्रका आशय वही हैं जो उसमें प्रकट किया गया है तो मैं जानता हूँ कि नमक कर का और उसीके साथ बहुत-सी अन्य बुराइयोंका भी खात्मा<noinclude></noinclude>
fyjfo8kfe3ek7dimbyjquxjftsxhivu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७६
250
197137
671560
671500
2026-08-18T13:15:45Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671560
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{Left|१३४}} {{C|{{larger|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}}}
करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते; वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्य-भार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ?' लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।<noinclude></noinclude>
2o60o6okn2vakwnoj0ku2opv3q403tc
671565
671560
2026-08-18T13:27:59Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671565
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते; वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्य-भार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ?' लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।<noinclude></noinclude>
ivtcwsb578u4cna93h08lkd1y5qy1ga
671567
671565
2026-08-18T13:29:32Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671567
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते; वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्य-भार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ?' लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।<noinclude></noinclude>
k1hyufah4tpdddl72ibwvk6bmrmiweg
671586
671567
2026-08-18T15:36:38Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671586
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />१३४ {{C|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते; वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्य-भार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ?' लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।<noinclude></noinclude>
d2e7lnz48d4qwdlft0d7zf6gxxz6ox9
671589
671586
2026-08-18T15:40:23Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671589
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१३४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>करवानेकी शक्ति जनतामें आ जाये तो यह शिकायत सुननेको नहीं मिलेगी कि शराबके इतने ठेके हैं। अमीर भी शराब पीते हैं, किन्तु वे कोई २५ करोड़ रुपये नहीं देते; वह तो गरीबोंकी जेबसे आता है।
मुखियोंके इस्तीफे मिले हैं किन्तु इनपर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि कुछ-एक मुखियोंने कलक्टरसे कहा है कि हमने मजबूर होकर इस्तीफे दिये हैं। तिसपर एकके इस्तीफा दे देनेपर दूसरेने उसका काम सॅमाल लिया। मुखियागिरीके लिए यदि लोग जान दिये दे रहे हों तो हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन लोगोंने इस्तीफे दिये हैं उन्होंने वास्तवमें अपना कार्य-भार सौंप दिया या नहीं।
[ गुजरातीसे ]
'''प्रजावन्धु''', ३०-३-१९३०
{{C|{{larger|'''१२८. पत्र : मीराबहनको'''}}}}
{{Right|[ २६ मार्च, १९३० के पश्चात् ]}}
चि० मीरा,
रेनॉल्ड्सके बारेमें तुमने जो कुछ लिखा है, उससे बहुत-कुछ जानकारी मिलती है। तुम्हें उसके निकट आना चाहिए और उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देना
चाहिए। चरखेके उसके विरोध में अवश्य कहीं कोई भूल हो रही है। उसे इसके पीछे छिपे सत्यको देखना चाहिए। चरखा केवल प्राच्य संसारकी ही चीज नहीं है। एक समय समग्र मानव समाज इसका प्रयोग करता था। सृष्टिके आदिमें 'जब आदम जमीन गोड़ता था और होआ कातती थी, तब भद्र कौन था ?' लेकिन वह वहाँके वातावरणमें कैसे घुल-मिल सकता है, यह तो सबसे अच्छी तरह तुम्हीं जान सकती हो। वह चाहे जितना पाश्चात्य हो तथापि उसे आश्रमके वातावरणमें घुल-मिल सकता चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो इसमें जरूर कुछ गड़बड़ है। प्रेमसे तो सब कुछ सम्भव है।
तोतारामजी का तुमने जैसा वर्णन किया है, वे वैसे ही गुणी हैं।
तुम्हें शोर-गुल को बरदाश्त करना सीखना चाहिए। नारणदाससे परामर्श करना ।
मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा जान पड़ता है। मेरा वजन २ पौंड बढ़ गया है। सबका बढ़ गया है। हमारा वजन भड़ौचमें लिया गया था।
सस्नेह,
{{Right|बापू}}
अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३८३) से; सौजन्य : मीराबहन; जी० एन० ९६१७ से भी ।
१. गांधीजी २६ मार्चको भड़ौचमें थे। जाहिर है कि यह पत्र उसके बाद कभी लिखा गया था।<noinclude></noinclude>
qq3c4losadqskootkr82w8ljh6raqlv
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९४
250
197138
671743
669652
2026-08-19T08:57:17Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671743
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|५६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>तय है। अब यह तो समय ही बतायेगा कि अपने पत्रमें मैंने जो कुछ कहा उसमें से कितना सही था।
उत्तरमें कहा गया है कि मैं एक ऐसा रास्ता अख्तियार करने जा रहा हूँ जिससे स्पष्टतः कानून भंग होगा और सार्वजनिक शान्ति खतरेमें पड़ जायेगी। इस सरकारने विधि-विधानोंकी पुस्तकोंका अम्बार लगा दिया है, किन्तु इन सबके बावजूद इस राष्ट्रको केवल एक ही विधान मालूम है—ब्रिटिश प्रशासकोंकी इच्छा; और यह शांति भी एक ही प्रकारकी जानता है—सार्वजनिक कारागारकी शान्ति। भारत एक विशाल कारागार ही तो है। मैं इस कानूनको अस्वीकार करता हूँ और राष्ट्रके हृदयको अपनी भावनाओंकी अभिव्यक्तिका अवकाश न देकर उसका दम घोटनेवाली जबरन थोपी गई इस शान्तिसे उत्पन्न विषण्ण एकरसताको भंग करना मैं अपना
पुनीत कर्त्तव्य मानता हूँ।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १२-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''५०. चहुँमुखी अभिशाप'''}}}}
{{outdent|{{Gap}}{{Gap}}'''अंग्रेजी हुकूमतका व्यक्तिगत चरित्र, नारियोंकी स्थिति, सार्वजनिक चेतनाकी जागृति, बच्चों, बीमारों तथा गरीबों और शारीरिक दृष्टिसे अक्षम जनोंके प्रति लोगोंके दृष्टिकोण पर जो स्वस्थ प्रभाव पड़ा है उसको तुलनामें उससे इस देशपर पड़नेवाला जबरदस्त आर्थिक बोझ कुछ नहीं है।'''}}
ये शब्द हैं 'इंडियन डेली मेल' के ७ मार्चके अंकके। आज भी इस तरहसे अंग्रेजी हुकूमतका बचाव किया जायेगा, इसकी आशा मैंने नहीं की थी। यह बचाव मुझे पन्द्रह वर्ष पूर्वके उस प्रसंगका स्मरण दिलाता है, जब एक सम्मेलनमें एक विद्वान् भारतीयने कहा था कि अंग्रेज सिपाहियोंको अपने मालिकके रूपमें देखकर मुझे गर्वका अनुभव होता है, क्योंकि मैं अपने सारे ज्ञानके लिए अपने अंग्रेज प्राध्यापकोंका ऋणी हूँ। इस सम्मेलनमें एक गवर्नर और उनकी पत्नी भी मौजूद थी। जब मैंने इस विद्वान्को ऐसा उद्गार व्यक्त करते सुना और गवर्नर महोदयकी पत्नीको उसपर जोरोंसे तालियाँ बजाते देखा तो मेरा सिर शर्म से झुक गया। ऊपर मैंने जिन दो उद्गारोंको उद्धृत किया है, वे हमारी सांस्कृतिक पराजयके उदाहरण हैं और यह पराजय हमारे भौतिक पराभवसे भी अधिक बुरी है।
यदि हम सांस्कृतिक दृष्टिसे पराजित नहीं होते तो यह बात बहुत आसानीसे समझ सकते थे कि यदि हमपर कोई ठीक नैतिक प्रभाव हुआ है तो वह अंग्रेजी हुकूमतका नहीं, बल्कि अंग्रेजोंके साथ सम्पर्क में आनेका ही प्रभाव है। ये दोनों चीजें निश्चय ही अलग-अलग हैं और यदि परस्पर एक-दूसरेके विरुद्ध हों तो आश्चर्य नहीं। अंग्रेजोंके साथ सम्पर्क ईश्वरका वरदान हो सकता है, जबकि अंग्रेजी हुकूमत बिलकुल<noinclude></noinclude>
opqdw6ci2gyq5lem2ligdgczgumwwvb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९५
250
197139
671744
669653
2026-08-19T08:59:19Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671744
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||चहुँमुखी अभिशाप|५७}}</noinclude>अभिशाप हो सकती है। और अंग्रेजोंके सम्पर्कका लाभ हमें उनके शासनके बिना भी मिल सकता है। अंग्रेजोंके सम्पर्कके सत्प्रभावको जानते हुए भी यदि मैं अंग्रेजी हुकूमतको अभिशाप कहूँ तो वैसा कहना बिलकुल सही होगा। खुद मैं तो उपर्युक्त वाक्यमें अंग्रेजोंके सम्पर्क या अंग्रेजी हुकूमतका जो गुणगान किया गया है, उससे बहुत हदतक असहमत हूँ। साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि लेखकने जिस प्रभावकी चर्चा की है उससे भारतका जनसाधारण सर्वथा अछूता है। और चन्द शिक्षित लोगोंपर इसका जो नैतिक प्रभाव पड़ा है और जिस प्रभावके कल्याणकारी अथवा अकल्याणकारी होनेके बारेमें मतभेदकी काफी गुंजाइश है, वह क्या करोड़ों लोगोंके सर्वथा दरिद्र बना दिये जानेकी पर्याप्त क्षतिपूर्ति है? हममें से चन्द शिक्षित लोगों पर इसका जो नैतिक प्रभाव पड़ा है, उसका स्वरूप क्या है? इस प्रभावसे हम क्या सर्वसाधारणकी अपेक्षा अधिक सत्यनिष्ठ बन पाये हैं, अधिक शुद्ध और पवित्र बन पाये हैं, ज्यादा संयत और ज्यादा दयालु बन पाये हैं? इसने क्या हमें सर्वसाधारणकी अपेक्षा अधिक बहादुर बनाया है? क्या चंद शिक्षित लोगोंकी पत्नियाँ साधारण जनोंकी पत्नियोंसे, जो अपने-अपने खेत-खलिहानोंमें जुटकर काम करती हैं और जिन्हें अपने-अपने पतियोंसे कोई परेशानी नहीं होती, अधिक अच्छी अवस्था में हैं? क्या यौन रोगोंकी दृष्टिसे, जो मनुष्यकी नैतिक निष्ठाकी अचूक कसौटी है, हमारी स्थिति जनसाधारणसे अच्छी है? क्या हम उनसे कम स्वार्थी हैं? हम गरीबों तथा शारीरिक दृष्टिसे अक्षम लोगों के लिए क्या करते हैं? हम अपनी कृत्रिम आवश्यकताओं में भी कटौती करके उनके लिए कितना अलग करके रख देते हैं? मनको व्यथित करनेवाली इस तरहकी और बातें मैं नहीं गिनाना चाहता। मुझे तो लगता है कि नगर-जीवनकी चार-दीवारीमें बन्द रहते-रहते और यह जीवन हमें जो अपेक्षाकृत अधिक सुख-सुविधाएँ देता है उन सुख-सुविधाओंका उपभोग करते-करते हम इतने आलसी और उदासीन हो गये हैं कि भारत के गाँवोंकी अवस्थाका अध्ययन कर ही नहीं सकते और न यह सोच सकते हैं कि सचमुच हम कहाँ हैं।
और न हम आर्थिक कष्टका मतलब ही पूरी तरहसे समझते हैं। यहाँके आर्थिक कष्टपर औसतका नियम लागू ही नहीं होता। सो इस तरह कि भारतमें इस कष्टने मनुष्यको मनुष्य रहने ही नहीं दिया है। वह तो मनुष्य रूपमें एक ऐसा भारवाही पशु है जिसे पूरा दाना-पानी देना मुश्किल पड़ रहा है। वह दिन-दिन छीजता चला जा रहा है। उससे जो पैसा लिया जाता है, उसका उपयोग कभी भी उसकी स्थिति सुधारनेमें नहीं किया जाता। वह समस्त नैतिक तथा अन्य सत्प्रभावोंसे अछूता है।
लेकिन विचाराधीन लेखमें कहा गया है कि भारतके देशी राज्योंकी स्थिति ज्यादा बुरी है। यदि ऐसा हो तो उसकी दोषी भी अंग्रेजी हुकूमत ही है। राजाओंके सामने अच्छा बनने के लिए कोई प्रेरणा-प्रलोभन ही नहीं है। उन्हें तो हर तरहस गलत रास्ते चलनेके लिए लुभाया जाता है। आज वे पहले की अपेक्षा अधिक गैर-जिम्मेदार हैं। एक समय रैयत इन राजाओंके अत्याचारके खिलाफ विद्रोह कर सकती थी, किन्तु आज इन्हें मनमें खौफ पैदा करनेवाली अंग्रेजोंकी शक्तिका संरक्षण प्राप्त<noinclude></noinclude>
464aegdt1yj6nola43cjbjm5k9xxdtr
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९६
250
197140
671745
669655
2026-08-19T09:00:38Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671745
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|५८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है। यह सच है कि यदि ये राजा कोई सत्कार्य करना चाहें तो उन्हें कोई रोकने-वाला नहीं है। लेकिन उन्हें शैशवावस्थासे ही जिन कृत्रिम सुख-सुविधाओं में पाला-पोसा जाता है उसने उनमें मौज-मजे और तड़क-भड़कके लिए ऐसी रुचि पैदा कर दी है जिसे छोड़नेको वे तैयार नहीं हैं और उस पर उन्हें बचपनसे ही जिस प्रकार सबसे अलग-थलग रखा जाता है उससे वे अपनी प्रजासे इस तरह कटकर अलग हो जाते हैं कि वे अपने ही देशमें अजनबी बन जाते हैं। प्राचीन संस्कृतिके लिए यह सचमुच बहुत श्रेयकी बात है कि तमाम प्रतिकूल प्रभावों और परिस्थितियोंके बीच भी यदा-कदा कुछ-न-कुछ सुन्दर उदाहरण सामने आ ही जाते हैं। हमारा और उनका विकास रोककर खड़ी अंग्रेजी हुकूमत के जानलेवा बोझको जरा हमारे कन्धे परसे उतार दीजिए और फिर देखिए कि वे और हम उसी प्राचीन देशके स्वतन्त्र अंगोंके रूपमें कितनी तेजीसे प्रगति करते हैं। लेकिन यदि वे उस सुनहली जंजीरको, जो उन्हें ब्रिटिश पादपीठसे बाँधकर रखे हुए है, गलेसे लगाये रखना चाहें तो वे बखुशी वैसा करें। देशी राज्योंसे बाहरका भारत जाग्रत है और अब वह इस जुएको और अधिक दिनों तक अपने कन्धेपर रहने देने को तैयार नहीं है, भले ही उसे उतार फेंकने के प्रयत्नमें उसे टूट जाना पड़े।
वाइसरायको लिखे अपने पत्रमें मैंने भारतके आर्थिक शोषणपर जो खास तौरसे जोर दिया वह मेरे उद्देश्यके लिए अनिवार्य था। लेकिन इस देशको हुई नैतिक और आत्मिक हानि, जो विदेशी शासनका सीधा परिणाम है, इसके साथ किये गये आर्थिक अन्यायसे भी शायद ज्यादा भयंकर है। यह तो स्पष्ट ही है कि जो लोग स्वातन्त्र्य-संग्राम में लगे हुए हैं उन्हें इस मार्गपर आर्थिक अन्यायके बोझने प्रवृत्त नहीं किया है। वे इस चीजको महसूस नहीं करते। उनको तो इस रास्तेपर चलनेकी प्रेरणा नैतिक तथा आत्मिक रूपसे किये जानेवाले अन्यायके बोधसे ही मिली है। इस अन्यायको उनकी रग-रग महसूस करती है। सम्पूर्ण वातावरणमें व्याप्त अपमान और अप्रतिष्ठाकी गन्ध, उनका यह बोध कि वह पूराका-पूरा महादेश जिसकी वे संतान हैं, एक सुदूरस्थ द्वीपसे आये मुट्ठी भर लोगों के पैरोंपर असहाय पड़ा हुआ है, उनके मनको खुद अपने प्रति घृणा और वितृष्णासे भर देता है। इस नागफाँसको तोड़नेकी अधीरतामें वे यह भी नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। उनके लिए तो इतना ही सोचना काफी है कि वे कुछ कर रहे चाहे उस क्रियाका परिणाम उनका विनाश ही क्यों न हो। मेरा दावा है कि मैंने भारतको इस चहुँमुखी अभिशापसे मुक्त होनेके लिए उत्तम साधन दिया है। इस साधनका उद्देश्य भारतको और उसी तरह इंग्लैंड को भी मुक्त करना है। वह दिन दूर नहीं जब ब्रिटेनकी जनता यह स्वीकार करेगी कि मैं उसका शत्रु नहीं हूँ। मैं उसका सच्चा और समझदार मित्र होने का दावा करता हूँ और साथ ही भारतका भी उतना ही सच्चा और समझदार सेवक होनेका।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १२-३-१९३०|1em}}<noinclude></noinclude>
pqky6ys5tpaar5uu746ydkxzr15fodb
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९७
250
197141
671746
669656
2026-08-19T09:02:19Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671746
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''५१. मेरे बारेमें भ्रामक प्रचार'''}}}}
कुछ मुसलमानोंके बीचसे मेरी साख उठ गई है, इसलिए मुसलमानोंके अखबारोंमें मेरे बारेमें बहुत प्रकारकी भ्रामक बातें कही जा रही हैं और मुझे गलत रूपमें पेश किया जा रहा है। इसके सबसे ताजा नमूनेकी ओर एक भाईने मेरा ध्यान आकर्षित किया है। इसका आशय यह है कि मैंने इमाम साहबको, जो आश्रममें रहते हैं और यावज्जीवन देश सेवाका व्रत लेनेवाले मेरे एक सम्मानित साथी कार्य-
कर्त्ता हैं, आश्रम के सत्याग्रहियों में शामिल नहीं होने दिया। इस आरोपके अनुसार उनके खिलाफ मेरा एतराज यह था कि वे राष्ट्रीय उद्देश्यकी प्राप्ति के लिए अहिंसाको एक धार्मिक विश्वासकी तरह स्वीकार नहीं कर सकते। तथ्य इससे बिलकुल उलटा है। आश्रम के सत्याग्रहियोंकी सूचीमें इमाम साहबका नाम शामिल है। उन्होंने खूब सोच-विचारकर अपना नाम दिया था। खुद मुझे तो 'कुरान' में अहिंसाका सन्देश साफ दिखाई पड़ा है। इमाम साहब कूचमें इसलिए शामिल नहीं हो रहे हैं कि वे बहुत कमजोर हैं और उतना श्रम नहीं कर सकते। लेकिन पूरी सम्भावना है कि जब वास्तवमें अवैध नमक तैयार करनेका काम शुरू होगा तब वे गिरफ्तार होनेके लिए
सामने आ जायेंगे। दो मुसलमान कूचमें शामिल होनेवाले हैं, क्योंकि उन्हें स्वराज्य-प्राप्ति के लिए अहिंसाके सिद्धान्तको अंगीकार करके चलनेमें कोई अड़चन दिखाई नहीं देती। इस प्रकार यह आरोप दो तरहसे निराधार है। लेकिन बात यह है कि ज्यों ही किसी व्यक्तिकी मन्शामें सन्देह पैदा हो जाता है, उसका किया हर काम दोषमय दिखाई देने लगता है। आन्दोलनकी वर्तमान योजना ऐसी है कि वह अन्ततः सारी शंकाओं को दूर कर देगी।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १२-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''५२. जैसा वह नहीं है'''}}}}
खबर है कि मौलाना शौकत अलीने कहा कि स्वतन्त्रता आन्दोलन स्वराज्य-प्राप्तिका नहीं, बल्कि मुसलमानोंके खिलाफ हिन्दू राज्य स्थापित करनेका आन्दोलन है और इसलिए मुसलमान इससे अलग ही रहें। यह खबर पढ़नेके बाद मैंने मौलाना साहबको तार भेजकर पूछा कि क्या यह खबर सही है। उन्होंने उत्तर देनेकी कृपा की और अपने उत्तरमें उन्होंने इस खबर की पुष्टि की है। मौलाना साहबने इस आन्दोलनपर एक गम्भीर आरोप लगाया है। जरूरी है कि इसका सदाके लिए निराकरण कर दिया जाये। यह आन्दोलन और चाहे जो हो, हिन्दू राज्यकी स्थापनाके लिए तो नहीं ही है, और न मुसलमानोंके खिलाफ है। इस आरोपका पूरा उत्तर<noinclude></noinclude>
nelw1qrxmqhn9irq852svtdhwg14xju
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९८
250
197142
671747
669657
2026-08-19T09:03:26Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671747
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|६०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>स्वयं इस आन्दोलनमें ही मौजूद है। कांग्रेसने अन्तिम असहयोगकी दिशामें पहला कदम उठाया है। कोई भी कांग्रेसी किसी विधान मण्डलमें प्रवेश नहीं कर सकता और सरकारी पद स्वीकार करनेका तो कोई सवाल ही नहीं उठता। इसी तरह कोई कांग्रेसी न सरकारसे किसी प्रकारकी कृपाकी याचना कर सकता है और न उसे स्वीकार ही कर सकता है। क्या हिन्दू-मुस्लिम प्रश्नका केन्द्र-बिन्दु राजनीतिक सत्ताका—इस लड़ाई में लूटके मालके रूपमें प्राप्त सरकारी पदोंका—बँटवारा ही नहीं है? जब इस आन्दोलनसे सम्बद्ध किसी व्यक्तिके मनमें स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व किसी प्रकारकी राजनीतिक सत्ता प्राप्त करनेकी कोई लालसा ही नहीं है तब फिर यह आन्दोलन मुसलमान विरोधी अथवा हिन्दू राज्यकी स्थापनाके लिए कैसे हो सकता है? हाँ, यह सच है कि कांग्रेसने स्थानिक निकायोंमें प्रवेश करनेकी छूट अब भी दे रखी है। मगर इन दिनों कलकत्तामें जो कुछ हो रहा है उससे तो मैं ऐसा सोचने लगा हूँ कि उस समय कमजोरी दिखानेके बजाय मुझे इन संस्थाओंके भी बहिष्कार पर आग्रह रखना चाहिए था। इन प्रलोभनोंसे मुक्त रहने में ही कांग्रेसकी भलाई है। अभी तो ये संस्थाएँ देशभक्तोंके लिए राष्ट्र सेवाके साधन होनेके बजाय, भोले-भाले या स्वार्थी लोगोंको फँसानेवाले जालोंका ही काम करती हैं। मगर मुझे विश्वास है कि मौलाना साहबने जब इस आन्दोलनको मुसलमानोंके खिलाफ बताया तब उनके मनमें इन स्थानीय संस्थाओंका खयाल नहीं था। जहाँतक मैं अनुमान लगा सकता हूँ, उनके इस विश्वासका एकमात्र आधार यही हो सकता है कि जो लोग इस आन्दोलनमें शरीक हैं वे इस आन्दोलनके सहज गुणके ही कारण अधिक स्वावलम्बी, ज्यादा दबंग और अपनी स्वतन्त्रतापर हाथ डालनेवालोंका प्रतिरोध करनेमें अधिक सक्षम हो जायेंगे, और चूंकि उनमें बहुत बड़ा बहुमत हिन्दुओंका है, इसलिए हिन्दू लोग कालान्तरमें मुसलमानोंकी अपेक्षा अधिक सशक्त हो जायेंगे। लेकिन मैंने मौलाना साहबको जैसे बहादुर आदमीकी तरह जाना है, उसको देखते हुए तो उनका इस तरह सोचना उनकी गरिमाके अनुकूल नहीं होगा। इसलिए उन्हें जनताके सामने यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि उनके इस गम्भीर आरोपका आशय क्या है।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि यदि इस अध्यायके अन्ततक केवल हिन्दू लोग ही सही भावनाके साथ इस आन्दोलनमें भाग लेते हैं तो वे एक ऐसी अहिंसक शक्तिके रूपमें सामने आयेंगे जिसकी गति दुनियामें कोई नहीं रोक सकता। लेकिन इससे तो सीधा-सादा निष्कर्ष यही निकलता है कि जो लोग इस आन्दोलनसे अलग हैं, वे जितनी जल्दी हो सके, इसमें शामिल हो जायें और मैं यह भविष्यवाणी करता हूँ कि यदि आन्दोलन निर्धारित मार्गपर चलता रहा तो एक दिन खुद मौलाना साहब तथा दूसरे मुसलमान और सिख, ईसाई, पारसी, यहूदी आदि भी इसमें शामिल होंगे।
इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं कि नमक कानूनको रद करानेके लिए सभी समान रूपसे उत्सुक हैं। क्या नमककी जरूरत सभीको नहीं होती, क्या इसका इस्तेमाल सभी नहीं करते? यही तो वह कर है जो सभीपर समान रूपसे लागू होता है।<noinclude></noinclude>
8lkfitb50q3exfnl7vacbvvxcwzu3j9
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/९९
250
197143
671748
669658
2026-08-19T09:05:17Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671748
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||जैसा वह नहीं है|६१}}</noinclude>
सविनय अवज्ञा आन्तरिक शक्तिके विकासकी और इस प्रकार एक जीवन्त विकासकी प्रक्रिया है। नमक कर का विरोध करनेसे किसी भी समुदायके हितोंकी हानि नहीं होनेवाली है। इसके विपरीत, अगर यह विरोध सफल हो जाता है तो इससे जितना फायदा इसमें भाग लेनेवाले लोगोंका होगा उतना ही इससे अलग रहने-वालोंका भी होगा।
अब जरा अपना लक्ष्य प्राप्त करनेके इस सर्वरूपेण राष्ट्रीय साधनके मुकाबले उस गोलमेज परिषद् के उस कूटनीतिक और कृत्रिम साधनको रखकर देखिए जिसमें हित-बद्ध पक्ष परस्पर विरोधी हितोंका प्रतिनिधित्व करेंगे और इन तमाम भारतीय पक्षोंका सूत्र संचालन करेगा उनके ऊपर बैठा सर्वोपरि और सर्वशक्तिमान ब्रिटिश पक्ष। यह परिषद्, जिसके पीछे जनताका बल नहीं है और जिसमें एक ओर तो कमजोर भारतीय पक्ष होंगे और दूसरी ओर सशक्त ब्रिटिश पक्ष, और चाहे जो दिला दे, स्वराज्य तो नहीं दिला सकती। अतएव वर्तमान परिस्थितियोंमें अगर इसका कोई नतीजा निकल सकता है तो यही कि ब्रिटेनके प्रभुत्वकी जड़ें इस देशमें और भी जम जायेंगी।
ऐसी परिषद्से सत्याग्रहियोंका क्या काम? उनका काम तो सिर्फ राष्ट्रीय शक्ति पैदा करना और उसको सुरक्षित रखना है। साम्प्रदायिकतासे उन्हें कोई मतलब नहीं है। लेकिन यदि परिस्थितियाँ उन्हें साम्प्रदायिक समाधानके लिए बाध्य कर देती हैं तो वे इस बात के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं कि वे ऐसे ही समाधानकी बात सोचेंगे जो सभी सम्बन्धित पक्षोंके लिए सन्तोषजनक हो। फिर समझमें नहीं आता कि इस आन्दोलनको मौलाना साहब मुसलमानोंके खिलाफ अथवा हिन्दू राज्यकी स्थापनाके लिए चलाया गया आन्दोलन कैसे कह सकते हैं।
दुर्भाग्यसे यह तथ्य सही है कि आन्दोलनमें भाग लेनेवाले मुख्यतः हिन्दू ही हैं। मगर आन्दोलनका बहिष्कार करनेकी गुहार लगाकर तो मौलाना साहब इस स्थितिको और बढ़ावा ही दे रहे हैं। लेकिन ऐसा हो तो भी यदि हिन्दू सत्याग्रही अपने लिए नहीं, बल्कि भविष्य के स्वतन्त्र भारतीय राष्ट्रके तमाम अंगोंके लिए—मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, पारसियों तथा अन्य सभी लोगोंके लिए—लड़ रहे हों तो उस स्थितिके आनेपर भी कोई चिन्ताकी बात नहीं है।
और यह भी देख पाना बहुत आसान है कि जब सत्याग्रहियोंका प्रभाव इतना बढ़ जायेगा कि उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकेगी तब भी संविधानकी रचना करते समय उनकी राह कोई भी रोक सकता है। एक ही अवस्था ऐसी हो सकती है जब इस आन्दोलनसे अलग रहनेवाले लोग—चाहे वे मुसलमान हों या हिन्दू—सत्याग्रहियोंके सामने असहाय हो जायेंगे। वह अवस्था तब आयेगी जब सत्याग्रही लोग अंग्रेजोंको यहाँसे भगा देंगे या जब अंग्रेज नाराज होकर अथवा ऊबकर यहाँसे खुद ही चले जायेंगे। लेकिन अव्वल तो सत्याग्रही लोग, यदि उनका साधन सदा अहिंसा-मय बना रहता है तो ऐसा करेंगे ही नहीं। दूसरी ओर सबसे बड़ी बात यह है कि मुसलमान लोग इस संघर्षमें शरीक होकर खुद अपनी और देशकी सहायता कर सकते हैं। तीसरी बात यह है कि अगर जनता हिंसाका सहारा नहीं लेती तो सविनय प्रतिरोधका अनिवार्य परिणाम अंग्रेजोंका हृदय परिवर्तन होगा। उस दशामें वे इस<noinclude></noinclude>
6ndjuhw5r5opwc9ewrx39uydf4fy3el
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१००
250
197144
671749
669659
2026-08-19T09:07:33Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671749
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|६२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>बातको अपना कर्त्तव्य समझेंगे और यह उनका प्रायश्चित्त होगा कि खुद नुकसान उठाकर वे उन अनेक समस्याओंके समाधानमें हमारी मदद करें, जिन समस्याओंको खड़ा करनेके लिए तब वे अपने-आपको जिम्मेदार मानेंगे। वे एक स्वतन्त्र और संगठित सरकारका श्रीगणेश करनेके लिए पूर्णतः समकक्षियों और मित्रोंकी तरह हमारी सहायता करेंगे।
और जहाँतक खुद मुझसे मौलाना साहबकी चिढ़की बात है, इसके सम्बन्धमें मुझे ज्यादा कुछ कहनेकी जरूरत नहीं है। चूंकि मेरे मनमें उनके प्रति कोई चिढ़ नहीं है, इसलिए मैं यह भविष्यवाणी करता हूँ कि जब उनका क्रोध शान्त हो जायेगा और वे देखेंगे कि उन्होंने मुझे जिन अनेक दोषोंका भागी माना है उनका दोषी मैं नहीं हूँ तो वे फिर मुझको 'अपनी उसी जेब' में रख लेंगे जिस जेबमें रहनेका सौभाग्य मुझे मानों अभी कलतक प्राप्त था। क्योंकि उनकी जेबसे मैं खुद बाहर नहीं आया हूँ। उन्होंने ही मुझे उसमें से निकाल फेंका है। मैं तो आज भी वही नन्हा सा आदमी हूँ जो १९२१ में था। अंग्रेजोंके प्रतिनिधियोंने हमारे खिलाफ जो ढेर सारे अन्याय किये हैं उस ढेरमें अंग्रेज लोग भले ही और भी वृद्धि कर डालें, किन्तु मैं उनका शत्रु नहीं बन सकता। इसी प्रकार मैं मुसलमानोंका भी दुश्मन कभी नहीं बन सकता, चाहे उनमें से कोई एक अथवा बहुत-से लोग मेरे अथवा मेरे लोगोंके साथ चाहे जैसा व्यवहार करें। मनुष्यकी कमियोंसे मैं इतनी अच्छी तरह वाकिफ हूँ कि किसी भी आदमीके खिलाफ, चाहे वह कुछ करे, मेरे मनमें चिढ़ हो ही नहीं सकती। मेरा उपचार तो यह है कि जहाँ-कहीं बुराई दिखाई दे, उसे दूर करनेकी कोशिश करूँ और जिस प्रकार मैं नहीं चाहूँगा कि मुझसे बार-बार जो गलतियाँ होती हैं उनके लिए कोई मुझे चोट पहुँचाये उसी प्रकार मैं खुद भी बुराई करनेवालोंको चोट पहुँचाना नहीं चाहूँगा।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १२-३-१९३०|1em}}
{{Dhr}}
{{larger|{{c|'''५३. नई दिशा'''}}}}
विधान सभामें वाइसरायके भाषणपर लिखे अपने लेखमें<ref>देखिए खण्ड ४२, पृष्ठ ४४७-५१।</ref> मैंने ग्यारह-सूत्री माँ की चर्चा की थी और फिर वाइसरायके नाम अपने पत्र में भी इनमें से कुछ माँगोंका उल्लेख किया। अब इन माँगोंको लेकर जो विवाद छिड़ गया है, उससे मुझे स्पष्ट हो गया है कि उन माँगोंको प्रकाशमें लाना कितना आवश्यक था। कुछ आलोचकोंका कहना है कि ये माँगें पूर्ण स्वराज्य तो क्या, औपनिवेशिक स्वराज्यकी दृष्टिसे भी बहुत अपर्याप्त हैं। स्पष्ट है कि उन्होंने मेरे उक्त लेख या पत्रको ध्यानसे नहीं पढ़ा होगा। अगर वे उन्हें दोबारा पढ़ें तो उनमें इस बातका स्पष्ट उल्लेख पायेंगे कि इन मांगों का स्वीकार किया जाना स्वतन्त्रताके प्रश्नपर विचार करनेके लिए बुलाई जानेवाली कांफरेंसकी प्रारम्भिक भूमिका है।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
lrfz0x4lvbcced6im4jou8dql0yoaf5
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१०१
250
197145
671751
669660
2026-08-19T09:08:46Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671751
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||नई दिशा|६३}}</noinclude>
इसलिए जहाँ मैंने इस मामलेको जिस रूपमें पेश किया है, उसके खिलाफ की गई आलोचनामें कोई सार नहीं है, वहीं मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इस ग्यारह-सूत्री योजनामें मैंने राष्ट्रीय माँगको एक नई दिशा दी है। जिस प्रकार १९२१ में खिलाफत तथा पंजाबपर ढाये गये जुल्मोंको स्वराज्यके प्रश्नसे अलग रखना आवश्यक था और मैं कहता था कि हमारे अपने प्रयत्नोंसे उनका निराकरण करा लेनेका मतलब मेरे लिए स्वराज्य है, उसी प्रकार संघर्षकी शुरुआत से पहले इन ग्यारह माँगोंपर जोर देना, बल्कि उनकी स्वीकृतिको स्वराज्य कहना भी मेरे लिए आवश्यक हो गया है। कारण, यदि इन्हें स्वराज्यमें शामिल नहीं किया जाता तो फिर राष्ट्रके लिए स्वराज्यका कोई मतलब ही नहीं रह जायेगा, और यदि हम अपने अन्दर इतनी शक्तिका विकास कर लेते कि हम इन माँगोंको स्वीकार करवा सकें तो समझना चाहिए कि एक स्वतन्त्र संविधान प्राप्त करनेकी दृष्टिसे भी हममें पर्याप्त शक्ति आ गई हैं।
अब मैं बातको जरा स्पष्ट करके सामने रखूं। एक प्रस्ताव है, जिसमें एक ओर तो भारतीय मिल-उद्योगको संरक्षण देनेकी बात कही गई है और दूसरी ओर साम्राज्यके मालको प्राथमिकता देनेकी। इसे मैं एक खतरनाक जाल कहता हूँ, विशेषकर जब कि प्रस्तावित गोलमेज परिषद् के सम्बन्धमें औपनिवेशिक स्वराज्य शब्दोंका प्रयोग बड़े जोरोंसे किया जा रहा है। यदि औपनिवेशिक स्वराज्य, बल्कि पूर्ण स्वराज्यकी भी स्वीकृतिके साथ-साथ ऐसी शर्त लगा दी जाती है कि ब्रिटेनके कपड़ेको बराबर प्राथमिकता दी जाती रहेगी तो औपनिवेशिक स्वराज्य अथवा पूर्ण स्वराज्यका करोड़ों आम लोगोंके लिए या देशी मिलोंके लिए कोई मतलब नहीं रह जायेगा। जिन चीजोंका उत्पादन भारत अपनी आवश्यकताको देखते हुए पर्याप्त मात्रामें करनेमें सक्षम है, ब्रिटेनकी उन चीजोंको यहाँ किसी भी हालत में प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। अन्य देशोंके साथ वह भी विदेशी व्यापारमें शरीक हो सकता है, लेकिन आन्तरिक व्यापारमें तबतक किसीको साझेदार कैसे होने दे सकता है जबतक कि उसमें अपनी जरूरतें अपने ही उत्पादित मालसे पूरी करनेकी क्षमता है? भारतको यह अधिकार है और उसका यह कर्त्तव्य है कि वह अपने विकासमान उद्योगोंको हर मित्र शक्तिके खिलाफ—चाहे वह इंग्लैंड ही क्यों न हो—संरक्षण प्रदान करे। मिल मालिकोंके लिए जो जाल बिछाया गया है, उसमें यदि वे अपने पैर डालते हैं तो उनका यह काम गलत और देशभक्तिके विरुद्ध होगा। भले ही अन्य तमाम विदेशी कपड़ोंपर प्रतिबन्धात्मक आयात कर ही क्यों न लगा दिया जाये तथापि उन्हें ब्रिटेनके कपड़ेको प्राथमिकता देनेकी योजनासे कोई सरोकार रखनेसे दृढ़तापूर्वक इनकार कर देना चाहिए।
अब फिर मैं अपने असली मुद्देपर आता हूँ। मैंने जिस नई दिशाकी बात कही है, वह राष्ट्रको स्वतन्त्रताकी विषय-वस्तुसे अवगत करानेमें निहित है। उसे यह मालूम होना चाहिए कि इस स्वतन्त्रताका सर्वसाधारणके लिए क्या मतलब होगा। अभी हालमें इन पृष्ठोंमें एक युवक संघके जिस पत्रकी आलोचना की गई थी उसमें बहुत अर्थ भरा हुआ था। सर्वसाधारणको, उसके लिए स्वराज्यका जो मतलब होगा वह<noinclude></noinclude>
s7s9bp4zmpfpsph8nm3afxiwrkaxctj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१०२
250
197146
671752
669661
2026-08-19T09:16:37Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671752
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|६४|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>भी और जो नहीं होगा वह भी, अवश्य जान लेना चाहिए। यदि उसकी मुख्य बातोंको बराबर सामने नहीं रखा जाता और उनके पक्षमें जनमत तैयार नहीं किया जाता तो ऐसी सम्भावना है कि उन्हें नजरअन्दाज कर दिया जाये अथवा जान-बूझकर उनकी बलि दे दी जाये। मैं समझता हूँ कि राजकीय ऋणके सवालपर जो विवाद हुआ है, उसके फलस्वरूप अब किसी भी प्रतिनिधिके लिए राष्ट्रपर, जबतक कि उसे इस बातका भरोसा न हो जाये कि यह सारा ऋण राष्ट्रीय हितोंकी सिद्धिके लिए लिया गया था तबतक, इसके भुगतानका दायित्व डालना असम्भव हो गया है। इसी प्रकार मैं यह भी आशा करता हूँ कि किसी भी भावी संविधानमें राष्ट्रको इतना भारी असैनिक और सैनिक खर्च उठानेके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मैंने स्थितिको स्पष्ट करनेके लिए उदाहरणस्वरूप जो मुद्दे पेश किये हैं और जो अनेक और मुद्दे पेश कर सकता हूँ, उन सबके बारेमें भी ऐसा ही कहा जा सकता है।
इसलिए मेरे दिमागमें जो योजना है वह यह कि एक-एक कर अथवा एक ही साथ इन तमाम मुद्दोंकी ओर राष्ट्रका ध्यान आकृष्ट करूँ और स्वतन्त्रताकी तैयारीके रूपमें इन सबके समाधानकी माँग करूँ।
यदि हमें शान्तिमय साधनोंसे आजादी हासिल करनी हो तो यह योजना सबसे जल्दी सफलता दिलानेवाली है। सत्याग्रह अपना काम इसी तरह करता है। यह लोगोंको सत्ता छीननेकी नहीं, बल्कि बलपूर्वक सत्ता हस्तगत कर लेनेवालेको अपने दृष्टिकोणका इतना कायल कर देनेकी शक्ति देता है कि अन्ततः वह या तो सत्ता छोड़कर अलग हो जाता है अथवा अपने दोषोंको त्यागकर उन लोगोंकी सेवाका एक साधन मात्र बन जाता है जिनके साथ उसने अन्याय किया है। सत्याग्रही राष्ट्रको अपने अन्दर छिपी शक्तिको पहचाननेका रास्ता-भर दिखा दें तो उनका काम पूरा हो जाता है।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''यंग इंडिया,''' १२-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''५४. भाषण : प्रार्थना-सभा, साबरमती आश्रम में'''}}}}
{{right|[१२ मार्च, १९३०]<ref>साधन-सूत्र में तारीख नहीं दी गई है। किन्तु स्पष्टतः यह भाषण कूच करनेसे पहले १२ तारीखको प्रातःकाल दिया गया होगा।</ref>}}
अब यदि भगवान्की इच्छा होगी तो हम यहाँसे ठीक साढ़े छः बजे कूच कर देंगे। जो लोग इस कूचमें शामिल होना चाहते हों वे ठीक ६-२० पर वहाँ पहुँच जायें। यदि हमारा पहला कदम शुद्ध रहा तो बादके कदम भी अच्छे और शुद्ध होंगे। मणिलाल हमारे साथ चल रहा है अतः उसे कुछ बातोंपर ध्यान देना चाहिए। चूंकि वह मेरा पुत्र है इसलिए उसे हमारे साथ चलना ही चाहिए, ऐसा नहीं है। किन्तु इस<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
fp9o25flv4req5iz846qrin5l451duy
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१०७
250
197151
671753
669667
2026-08-19T09:27:27Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671753
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : प्रार्थना सभा, साबरमती आश्रममें|६५}}</noinclude>बातसे इनकार नहीं किया जा सकता कि वह मेरा पुत्र है; और मैं भी यह नहीं भूल सकता कि मैं उसका पिता हूँ।
अपने सिरपर भारी जिम्मेवारी लेकर रवाना होनेवाले हम आश्रमवासियोंके पास एक ही पूंजी है। हम विद्वत्ता की डींग तो हाँक नहीं सकते। हमने जो व्रत लिये हैं और आश्रम-जीवनकी प्रतिज्ञा की है, हमें उन व्रतोंका ही पालन करते रहना है। ये ७२ लोग<ref>वस्तुतः ७८; नामोंकी सूचीके लिए देखिए परिशिष्ट २।</ref> आश्रम-नियमावलीको फिरसे जाँच लें और अपने जाने, न जानेकी बातपर विचार कर लें। जिन आश्रमवासियोंका कोई आश्रित है उसके लिए उन्हें आश्रम से पैसा नहीं मिल सकता। आश्रमके भरोसे किसीको इस लड़ाईमें भाग नहीं लेना चाहिए। यह लड़ाई नाटक नहीं है; बल्कि यह आखिरी लड़ाई है। यदि उपद्रव हुआ तो हम अपने ही लोगोंके हाथों मारे जा सकते हैं। उस हालत में भी हम तो सत्याग्रहीके नाते अपना काम पूरा कर चुके होंगे। हमने तो हिन्दू-मुस्लिम एकताका व्रत लिया है और हम गरीब से गरीब, कंगालसे-कंगाल और कमजोरसे-कमजोर लोगोंके प्रतिनिधि बनना चाहते हैं । यदि हममें इतनी शक्ति न हो तो हमें इस लड़ाई में भाग नहीं लेना चाहिए। मैंने तो यहाँ लौटकर न आनेकी प्रतिज्ञा नहीं की है; किन्तु आप या तो मरकर या स्वराज्य लेकर ही लौटेंगे। यदि धीरू बीमार हो जाये तो छगनलाल जोशी यहाँ दौड़े नहीं आयेंगे। यदि आश्रममें आग लग जाये तो भी हम वापस नहीं लौट सकते। केवल वही लोग इस कूचमें भाग ले सकते हैं जिनका अपने सगे-सम्बन्धियोंके प्रति कोई विशेष कर्त्तव्य नहीं है।
यह तो जिन्दगी-भरकी फकीरी और जिन्दगी-भरका ब्रह्मचर्य है। वे तो यहाँसे ब्रह्मचर्यका संकल्प करके चले हैं और अपने उसी संकल्पपर डटे रहेंगे। जो मनुष्य सत्यपरायण है और जो कहता है वही करता है, वह बहादुर आदमी है। धोखेबाज आदमी बहादुर नहीं होता । अकेले में मैं किसी व्यक्तिसे कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि मुझे तो एक मिनटकी भी फुरसत नहीं है। मैं यह खासकर मणिलालसे कह रहा हूँ लेकिन आप सबसे भी मेरा यही कहना है।
हम जीवन मरणका धर्मयुद्ध करने जा रहे हैं, एक व्यापक यज्ञ करने जा रहे हैं, जिसमें हम अपनी आहुति दे देना चाहते हैं। यदि आप लोग अक्षम सिद्ध होंगे तो लज्जाका भागी मैं होऊँगा, आप लोग नहीं। मुझे भगवान्ने जो शक्ति दी है वह आप सबमें भी है। आत्मा मात्र एक है। मेरी आत्मा जाग्रत हो चुकी है, अन्य लोगोंकी आंशिक रूपसे जाग्रत हुई है।
{{left|[गुजरातीसे]|1em}}
महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी<noinclude>{{Dhr|6em}}
{{Smallrefs}}
{{left|४३–५}}</noinclude>
8xpiup0vpnd2dimfiiwu0sa1kwsip8k
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१०८
250
197152
671754
669668
2026-08-19T09:40:02Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671754
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" /></noinclude>
{{larger|{{c|'''५५. चन्दोलासे चलते समय दिया गया विदाई-सन्देश'''<ref>गांधीजी ने एक विशाल जुलूसके बीच ७८ स्वयंसेवकोंके साथ सुबहके साढ़े छः बजे साबरमती आश्रमसे प्रस्थान किया। सात मील चलकर साढ़े आठ बजे सब लोग चन्दोला तालाव पहुँचे। वहाँ गांधीजी ने, जो लोग उनको विदा देने आये थे, उनके सम्मुख भाषण दिया। उस अवसरपर दिया यह सन्देश हरिदास टी॰ मजुमदार द्वारा क्रॉनिकलके सम्पादकको भेजे पत्रसे लिया गया है। मजुमदार गांधीजी के साथ कूच करनेवाले स्वयंसेवकोंमें से एक थे।</ref>}}}}
{{right|१२ मार्च, १९३०}}
मेरे प्रति आपका अतिशय प्रेम आपको यहाँतक खींच लाया है। आपने मेरे प्रति अपने प्रेमका बड़ा सजीव प्रदर्शन किया है। इस प्रेमकी मैं कद्र करता हूँ। पिछली रात मेरे गिरफ्तार होनेकी अफवाह थी। ईश्वर महान् है, उसकी लीला विचित्र है। इस समय मैं यहाँ आपसे विदा लेनेके लिए खड़ा हूँ। लेकिन अगर मैं जेल में भी होता तो आपकी शक्तिके बलपर मैं वापस आ जाता। वास्तवमें आप लोगोंकी शक्ति ही हमें स्वराज्य दिलायेगी। आप लोग अब वापस जाइए और मनमें यह संकल्प कीजिए कि आप इस संघर्षमें अपना योगदान देंगे। खादी कार्यका प्रचार कीजिए, जरूरत पड़नेपर सविनय प्रतिरोधीके रूपमें सामने आनेके लिए तैयार रहिए। अपने कदम तनिक भी डगमगाने न दीजिए। मगर अभी तो आपको वापस घर ही जाना है, और मुझे सीधे समुद्र तट पर। आप अभी मेरे साथ नहीं जा सकते। लेकिन बादमें दूसरी तरहसे आपको मेरा साथ देनेका अवसर मिलेगा । . . .
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १८-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''५६. भेंट : हरिदास टी॰ मजुमदारसे'''}}}}
{{right|असलाली<br>१२ मार्च, १९३०}}
'''जब हमारे प्यारे सेनानी दोपहरका भोजन कर रहे थे, मैंने उनसे पूछा कि क्या इस तरह लगातार ग्यारह मीलसे अधिक चलनेसे आप थक नहीं गये हैं?'''
बहुत तो नहीं थका हूँ, लेकिन वैसे पूछा जाये तो थक जरूर गया हूँ। अलबत्ता, यह मामूली थकावट है। मैं खुद यह देखकर चकित हूँ कि मैं लगातार इतनी दूर कैसे चल सका। आप जानते हैं कि इधर कुछ दिनोंसे मुझे दूरतक चलनेकी आदत नहीं है।<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
f86bhd5pfw26s3vxgz9zm3e2dbb3tsu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१०९
250
197153
671757
669669
2026-08-19T09:49:17Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671757
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||भाषण : अंसलालीमैं|६७}}</noinclude>
'''फिर मैंने पूछा कि दक्षिण आफ्रिकामें आपने जो ३,००० पुरुषों, स्त्रियों और बच्चोंके कूचका संगठन किया था उसमें और समुद्र-तटकी ओर की जानेवाली इस कूचमें क्या समानता है?'''
इस कूचका भी तौर-तरीका तो वही है, हालाँकि संगठन दूसरे ढंगसे किया गया है। आत्मबल उसका भी अस्त्र था और इसका भी है। लेकिन जहाँ दक्षिण आफ्रिकामें ३,००० व्यक्ति थे, वहाँ इस कूचमें केवल ७९ हैं। फिर दक्षिण आफ्रिका में हमारे चारों ओरका वातावरण प्रतिकूल था—सामाजिक वातावरण भी और राजनीतिक भी। इसलिए वहाँ हमें अपने खाने-पीनेका सामान साथ लेकर चलना पड़ता था। यहाँ हम अनुकूल वातावरणके बीच कूच कर रहे हैं और हमें साथमें खानेकी चीजें लेकर नहीं चलना पड़ता। दक्षिण आफ्रिका के कूचके मार्गमें इस कूचकी अपेक्षा ज्यादा बड़ी कठिनाइयाँ थीं।
{{left|[अंग्रेजीसे]<br>'''बॉम्बे क्रॉनिकल,''' १८-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''५७. भाषण : असलालीमें'''}}}}
{{right|[१२ मार्च, १९३०]}}
अब आप सिर्फ खादी पहनकर या चरखा चलाकर शान्त होकर न बैठ जायें और यह भी न मानें कि आपको जो कुछ करना था सो कर चुके।
आप अपने ही गाँवकी बात लें : १७०० की आबादीके लिए ८५० मन नमक चाहिए। २०० बैलोंके लिए ३०० मन नमक चाहिए। इस प्रकार कुल ११५० मन नमककी जरूरत होगी। पक्के एक मनपर सरकार सवा रुपया कर लेती है, तो ११५० मन अर्थात् पक्के ५७५ मन नमकपर आप ७२० रुपये कर देते हैं।
बैलको २ मन नमक देना चाहिए। और आपके गाँवमें ८०० गाय, भैंस और पड़ियाँ हैं। यदि आप उन्हें नमक देते हों, या चमड़ा कमाने में नमक काममें लाते हों अथवा नमकका व्यवहार खादके रूपमें किया जाता हो तो फिर आप ७२० रुपये से इतना कर और अधिक देते हैं।
क्या आपका गाँव सालाना इतना कर दे सकता है? जिस हिन्दुस्तानमें प्रति व्यक्ति औसत आमदनी ७ पैसे मानी जाती है अर्थात् जिस देशमें लाखों लोगोंको १ पैसा भी नहीं मिलता, वे भले ही भूखों मरते हों, या भीख माँगकर गुजारा करते हों किन्तु नमकके बिना तो उनका भी काम नहीं चलता । ऐसे लोगोंका नमक न मिलने या महँगा मिलनेपर क्या हाल होता होगा?
जो नमक पंजाबमें ९ पाई प्रति मनकी दरसे बिकता है, जिस नमकके ढेरके-ढेर गुजरात-काठियावाड़के समुद्र-तटपर तैयार होते रहते हैं उसे गरीब आदमी मनका डेढ़ रुपया दिये बिना नहीं पा सकते। और फिर उसे कीचड़में फेंक देनेके लिए<noinclude></noinclude>
md3vsct4ih8xssv9ynmk464on8tl7y8
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/११०
250
197154
671758
669670
2026-08-19T09:53:51Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671758
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh|६८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>अंग्रेज सरकार पैसे देकर आदमी रखती है। क्या इस सरकारको गरीबोंकी हाय न लगेगी? किन्तु बेचारे गरीब गाँववालोंमें इस करको उठवा देनेकी शक्ति नहीं है। हमें वह शक्ति प्राप्त करनी है।
जो कर देने योग्य नहीं है, उसे उठा देनेका जहाँ अधिकार होता है वह प्रजातन्त्रात्मक राज्य कहलाता है। जब जनताको यह निर्णय करनेका अधिकार हो कि कोई भी कर या चीज किस समय दी जानी चाहिए या नहीं दी जानी चाहिए तो उसे प्रजातन्त्रात्मक राज्य कहा जा सकता है।
किन्तु हमें ऐसा अधिकार नहीं है और न यह अधिकार महान् कहे जानेवाले हमारे प्रतिनिधियोंको है। केन्द्रीय विधान सभामें पण्डित मालवीयजी ने कहा कि सरकारने जिस प्रकार वल्लभभाईको पकड़ा है उसका नाम न्याय नहीं, अन्याय है, मनमानी है। और इस प्रस्तावका समर्थन किया था जिन्ना साहबने। इसपर सरकारी अधिकारीने कहा कि हमारे मजिस्ट्रेट साहबने वही किया है जो कोई भी नमकहलाल करता; यदि उन्होंने इसके विपरीत किया होता तो वे नमकहराम माने जाते। किन्तु फिर तो इस दाढ़ी (अब्बास साहब) को और मुझे भी गिरफ्तार करना चाहिए। क्योंकि मैं तो खुले आम नमक बनानेके बारेमें भाषण भी देता हूँ।
हम ऐसी सरकारकी स्थापना करना चाहते हैं जो जनताको इच्छाके विरुद्ध किसी भी व्यक्तिको न पकड़ सके, पली-भर घी न ले सके, [बेगारमें] गाड़ियाँ न ले सके और हमारा पैसा न ले सके।
ऐसी सरकारकी स्थापनाके दो उपाय हैं, एक लाठी मारनेका हिंसात्मक उपाय और दूसरा अहिंसात्मक या सविनय अवज्ञाका। हमने अपना धर्म समझकर दूसरा रास्ता चुना है। और इसीलिए सरकारको नोटिस देकर हम नमक बनानेको निकले हैं। हुक्का, बीड़ी, और शराबपर कर लगानेकी बात मेरी समझ में आती है। और यदि मैं राजा होता तो आपकी अनुमति लेकर प्रति बीड़ी १ पाई कर लगा देता। यदि बीड़ियाँ महँगी जान पड़ें तो उसके व्यसनी बीड़ी पीना छोड़ सकते हैं। लेकिन भला नमकपर भी कर लगाया जा सकता है?
अब यह कर उठ जाना चाहिए। हमें यह संकल्प कर लेना चाहिए कि हम नमक बनायेंगे, खायेंगे, लोगोंमें बेचेंगे और ऐसा करते हुए यदि जेल भी जाना पड़ेगा तो जेल जायेंगे। गुजरातकी ९० लाखकी आबादीमें यदि हम बच्चों और बहनोंको छोड़ दें और जो बाकी ३० लाख लोग रह जाते हैं यदि वे नमक कानूनकी सविनय अवज्ञा करनेको तैयार हो जायें, तो सरकारके पास इतने लोगोंको जेलखानेमें रखनेकी जगह ही नहीं होगी। हाँ, सरकार कानून भंग करनेवालोंकी पिटाई करवा सकती है और उनपर गोलियाँ भी चलवा सकती है। किन्तु आजकी सरकारें आसानीसे इस हद तक नहीं जा सकतीं। लेकिन हमने तो संकल्प कर लिया है कि यदि सरकार हमें मार डालना चाहती हो तो भले मार डाले।
नमक कर तो अब खत्म हो ही जाना चाहिए। आश्रमसे लेकर ठेठ चन्दोला तालाबतक ७ मील लम्बे रास्तेमें जन-सागरने उमड़कर हमें आशीर्वाद दिया; और यह<noinclude></noinclude>
mi3lzld4i1mclaavnw85933cxqllufe
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१११
250
197155
671761
669671
2026-08-19T10:07:26Z
Vineet Kumar Tiwari 29
4901
/* शोधित */
671761
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Vineet Kumar Tiwari 29" />{{Rh||बंगाल-आसाममें हिन्दी|६९}}</noinclude>दृश्य तो देवोंके भी देखने लायक था। यह एक शुभ चिह्न है। यदि हम एक ही सीढ़ी ऊपर चढ़ सकें तो स्वातन्त्र्य-प्रासादकी बाकी सीढ़ियाँ हम खटाखट चढ़ जायेंगे।
{{left|[गुजरातीसे]<br>'''नवजीवन,''' १६-३-१९३०|1em}}
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''५८. पत्र : नारणदास गांधीको'''}}}}
{{right|दांडी कूचके दौरान<br>[१२ मार्च, १९३०के पश्चात्]}}
{{left|चि॰ नारणदास,}}
तुम्हारे पत्र मिलते रहते हैं। रणछोड़भाईके लिए काम निकालना - फिर वह काम भले ही मेहनतका क्यों न हो। अध्यापकका काम हो तो वह भी उनके साथ सलाह-मशविरा करके तय करना।
पूँजाभाई आजकलके मौसम में बाहर सो सकते हैं; बाहर सोनेसे मच्छर नहीं काटेंगे।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ ८०९१) से।
सौजन्य : नारणदास गांधी
{{Dhr|2em}}
{{larger|{{c|'''५९. बंगाल-आसाममें हिन्दी'''}}}}
पाठकोंको पता होगा कि सन् १९२८ में कलकत्तामें एक हिन्दी प्रचार समितिकी स्थापना की गई थी। समितिके कोषाध्यक्ष श्री घनश्यामदास बिड़ला थे। इस समितिके कार्यका विवरण और हिसाब मेरे पास आ गया है। विवरणमें से निम्नलिखित बातें नीचे दे रहा हूँ :<ref>यहाँ नहीं दिया गया है।</ref>
इससे मालूम होता है कि इस दिशामें कुछ-न-कुछ काम अवश्य हो रहा है। इस कार्यके और भी बढ़नेकी बहुत गुंजाइश है। प्रत्येक पाठशालाका खर्च स्थानीय मददसे पूरा करनेका प्रयत्न किया जा रहा है, और यह स्तुत्य है। इसी तरह सफलता प्राप्त हो सकती है। आरंभ भले ही मुख्य केन्द्रसे किया जाये, अन्तमें तो सारा स्थानिक कार्य स्वावलंबी ही बन जाना चाहिए। तभी प्रचारकार्य विस्तृत और स्थायी रूप पकड़ सकता है। बंगाल और आसाम ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें हजारों लोगोंको हिन्दी पढ़ाई जा सकती है। इस कार्यके दो विभाग तो हैं ही : एक शिक्षा और दूसरा<noinclude>{{Dhr}}
{{Smallrefs}}</noinclude>
2t9z9vjlbl6i08pzarpjxw7jtsuhv5v
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७७
250
197219
671569
669739
2026-08-18T13:40:43Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
671569
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{Larger|'''१२९. खोदा पहाड़ निकली चुहिया''''}}}}
रंगूनमें पहाड़ खोदा जा रहा था। उस पहाड़से एक हास्यास्पद चुहिया निकली है। एक ताकतवर सल्तनतने भारतके एक सुप्रसिद्ध सपूत पर, जो खतरनाक रोगसे
रुग्ण थे, एक सर्वथा अनावश्यक मुकदमा चलाकर उन्हें और भी परेशानीमें डाला और जनतासे लिया हुआ धन बेकार सर्च किया। इस मामलेका जाहिरा कारण यह
था कि श्री सेनगुप्तने बर्मासे गुजरते हुए दो भाषण दिये थे। वास्तविकता यह है कि ऐसे भाषण हर दिन सारे देशमें हजारों मंत्रोंसे दिये जाते हैं, लेकिन इनकी ओर
सरकारका ध्यान भी नहीं जाता । इस्तगासेको ऐसा एक भी गवाह नहीं मिला जिसके दिल पर उन 'राजद्रोहात्मक' भाषणोंका असर हुआ हो। मजिस्ट्रेटने जो फैसला सुनाया उसे सुनानेके लिए उसने अफसोस सा जाहिर किया। अगर उस मजिस्ट्रेटके आसपासका वातावरण स्वतन्त्रताका होता तो अवश्य ही उसने अपने प्रतिष्ठित कैदीको निर्दोष बताकर छोड़ दिया होता और इस तरह स्वाहमख्वाह मुकदमा चलानेके लिए सरकारकी मलामतकी होती ।
इस मुकदमेसे श्रीयुत सेनगुप्तका तो कुछ बिगड़ा नहीं, उलटे इसके कारण उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। उन्होंने जिस दृढ़ताके साथ अपना बचाव करने तथा अदालत के सवालोंका जवाब देनेसे इनकार किया है, वह उनकी चिरपरिचित हिम्मतका एक और सबूत हमारे सामने पेश करती है।
लेकिन इस फैसलेका एक गूढ़ अर्थ भी है। सरदार वल्लभभाईपर जो अभि-योग लगाया गया था, यदि सचमुच वे उसके अपराधी थे तो उन्हें अधिक कठोर
दण्ड मिलना चाहिए था। अगर श्रीयुत सेनगुप्त राजद्रोह के अपराधी थे तो उन्हें मात्र दस दिनकी सादी सजाके बजाय दूसरोंको एक सबक सिखानेके खयालसे कड़ी सजा
मिलनी चाहिए थी। अगर जनता में राज्यके प्रति असन्तोष फैलाना जुर्म है और इस दफा में थोड़ी भी सचाई है तो राजद्रोहको धर्म माननेवाले मुझ जैसे व्यक्तिपर तो
सरकारको कब का मुकदमा चलाकर मुझे कड़ीसे कड़ी सजा दे देनी चाहिए थी ।
कोई यह न सोचे कि सरकार डर गई है और इसलिए वह ये हल्की सजाएँ देती है, अथवा मुझे गिरफ्तार नहीं कर रही है। इसका सच्चा कारण तो और भी गूढ़ है, और वह शायद सरकार के लिए भी श्रेयकी बात है। लोगोंको उनके खास विचारोंके कारण या उन विचारोंको सार्वजनिक सभाओं में जाहिर करनेके कारण सजा
देनेसे सरकार शरमाती है। ऐसे कार्योंसे दुनियाका लोकमत उसका विरोधी बन रहा
है और सरकारको उसकी चिन्ता है। रंगूनके मजिस्ट्रेटको लाचार होकर यह कहना पड़ा कि चूंकि श्री सेनगुप्त के भाषण में लोगोंको हिंसाके लिए उभारनेका कोई प्रयत्न
नहीं है, इसलिए उन्हें राजद्रोह के अपराधके योग्य सजा देनेका मुझे कोई कारण दिखाई नहीं देता । दफा १२४ ए का वास्तविक सम्बन्ध तो हिंसासे है। इस दफा बनाने-
वालोंके दिमागमें यह बात शायद आई ही नहीं कि कोई ऐसा भी आदमी हो सकता
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
4cczs44nooo8zm9aic5h9e8ptsx6yqh
671570
671569
2026-08-18T13:55:59Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671570
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{Larger|'''१२९. खोदा पहाड़ निकली चुहिया''''}}}}
रंगूनमें पहाड़ खोदा जा रहा था। उस पहाड़से एक हास्यास्पद चुहिया निकली है। एक ताकतवर सल्तनतने भारतके एक सुप्रसिद्ध सपूत पर, जो खतरनाक रोगसे
रुग्ण थे, एक सर्वथा अनावश्यक मुकदमा चलाकर उन्हें और भी परेशानीमें डाला और जनतासे लिया हुआ धन बेकार खर्च किया। इस मामलेका जाहिरा कारण यह
था कि श्री सेनगुप्तने बर्मासे गुजरते हुए दो भाषण दिये थे। वास्तविकता यह है कि ऐसे भाषण हर दिन सारे देशमें हजारों मंचोसे दिये जाते हैं, लेकिन इनकी ओर
सरकारका ध्यान भी नहीं जाता । इस्तगासेको ऐसा एक भी गवाह नहीं मिला जिसके दिल पर उन 'राजद्रोहात्मक' भाषणोंका असर हुआ हो। मजिस्ट्रेटने जो फैसला सुनाया उसे सुनानेके लिए उसने अफसोस सा जाहिर किया। अगर उस मजिस्ट्रेटके आसपासका वातावरण स्वतन्त्रताका होता तो अवश्य ही उसने अपने प्रतिष्ठित कैदीको निर्दोष बताकर छोड़ दिया होता और इस तरह ख्वाहमख्वाह मुकदमा चलानेके लिए सरकारकी मलामतकी होती ।
इस मुकदमेसे श्रीयुत सेनगुप्तका तो कुछ बिगड़ा नहीं, उलटे इसके कारण उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। उन्होंने जिस दृढ़ताके साथ अपना बचाव करने तथा अदालत के सवालोंका जवाब देनेसे इनकार किया है, वह उनकी चिरपरिचित हिम्मतका एक और सबूत हमारे सामने पेश करती है।
लेकिन इस फैसलेका एक गूढ़ अर्थ भी है। सरदार वल्लभभाईपर जो अभि-योग लगाया गया था, यदि सचमुच वे उसके अपराधी थे तो उन्हें अधिक कठोर
दण्ड मिलना चाहिए था। अगर श्रीयुत सेनगुप्त राजद्रोह के अपराधी थे तो उन्हें मात्र दस दिनकी सादी सजाके बजाय दूसरोंको एक सबक सिखानेके खयालसे कड़ी सजा
मिलनी चाहिए थी। अगर जनता में राज्यके प्रति असन्तोष फैलाना जुर्म है और इस दफा में थोड़ी भी सचाई है तो राजद्रोहको धर्म माननेवाले मुझ जैसे व्यक्तिपर तो
सरकारको कब का मुकदमा चलाकर मुझे कड़ीसे-कड़ी सजा दे देनी चाहिए थी ।
कोई यह न सोचे कि सरकार डर गई है और इसलिए वह ये हल्की सजाएँ देती है, अथवा मुझे गिरफ्तार नहीं कर रही है। इसका सच्चा कारण तो और भी गूढ़ है, और वह शायद सरकार के लिए भी श्रेयकी बात है। लोगोंको उनके खास विचारोंके कारण या उन विचारोंको सार्वजनिक सभाओं में जाहिर करनेके कारण सजा
देनेसे सरकार शरमाती है। ऐसे कार्योंसे दुनियाका लोकमत उसका विरोधी बन रहा है और सरकारको उसकी चिन्ता है। रंगूनके मजिस्ट्रेटको लाचार होकर यह कहना पड़ा कि चूंकि श्री सेनगुप्त के भाषण में लोगोंको हिंसाके लिए उभारनेका कोई प्रयत्न नहीं है, इसलिए उन्हें राजद्रोह के अपराधके योग्य सजा देनेका मुझे कोई कारण दिखाई नहीं देता । दफा १२४ ए का वास्तविक सम्बन्ध तो हिंसासे है। इस दफाके बनाने वालोंके दिमागमें यह बात शायद आई ही नहीं कि कोई ऐसा भी आदमी हो सकता<noinclude></noinclude>
3z2dfstx0l9avk0gtgxwkzar0g7y0r9
671571
671570
2026-08-18T13:56:35Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
671571
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>{{C|{{Larger|'''१२९. खोदा पहाड़ निकली चुहिया''''}}}}
रंगूनमें पहाड़ खोदा जा रहा था। उस पहाड़से एक हास्यास्पद चुहिया निकली है। एक ताकतवर सल्तनतने भारतके एक सुप्रसिद्ध सपूत पर, जो खतरनाक रोगसे
रुग्ण थे, एक सर्वथा अनावश्यक मुकदमा चलाकर उन्हें और भी परेशानीमें डाला और जनतासे लिया हुआ धन बेकार खर्च किया। इस मामलेका जाहिरा कारण यह
था कि श्री सेनगुप्तने बर्मासे गुजरते हुए दो भाषण दिये थे। वास्तविकता यह है कि ऐसे भाषण हर दिन सारे देशमें हजारों मंचोसे दिये जाते हैं, लेकिन इनकी ओर
सरकारका ध्यान भी नहीं जाता । इस्तगासेको ऐसा एक भी गवाह नहीं मिला जिसके दिल पर उन 'राजद्रोहात्मक' भाषणोंका असर हुआ हो। मजिस्ट्रेटने जो फैसला सुनाया उसे सुनानेके लिए उसने अफसोस सा जाहिर किया। अगर उस मजिस्ट्रेटके आसपासका वातावरण स्वतन्त्रताका होता तो अवश्य ही उसने अपने प्रतिष्ठित कैदीको निर्दोष बताकर छोड़ दिया होता और इस तरह ख्वाहमख्वाह मुकदमा चलानेके लिए सरकारकी मलामतकी होती ।
इस मुकदमेसे श्रीयुत सेनगुप्तका तो कुछ बिगड़ा नहीं, उलटे इसके कारण उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। उन्होंने जिस दृढ़ताके साथ अपना बचाव करने तथा अदालत के सवालोंका जवाब देनेसे इनकार किया है, वह उनकी चिरपरिचित हिम्मतका एक और सबूत हमारे सामने पेश करती है।
लेकिन इस फैसलेका एक गूढ़ अर्थ भी है। सरदार वल्लभभाईपर जो अभि-योग लगाया गया था, यदि सचमुच वे उसके अपराधी थे तो उन्हें अधिक कठोर
दण्ड मिलना चाहिए था। अगर श्रीयुत सेनगुप्त राजद्रोह के अपराधी थे तो उन्हें मात्र दस दिनकी सादी सजाके बजाय दूसरोंको एक सबक सिखानेके खयालसे कड़ी सजा
मिलनी चाहिए थी। अगर जनता में राज्यके प्रति असन्तोष फैलाना जुर्म है और इस दफा में थोड़ी भी सचाई है तो राजद्रोहको धर्म माननेवाले मुझ जैसे व्यक्तिपर तो
सरकारको कब का मुकदमा चलाकर मुझे कड़ीसे-कड़ी सजा दे देनी चाहिए थी ।
कोई यह न सोचे कि सरकार डर गई है और इसलिए वह ये हल्की सजाएँ देती है, अथवा मुझे गिरफ्तार नहीं कर रही है। इसका सच्चा कारण तो और भी गूढ़ है, और वह शायद सरकार के लिए भी श्रेयकी बात है। लोगोंको उनके खास विचारोंके कारण या उन विचारोंको सार्वजनिक सभाओं में जाहिर करनेके कारण सजा
देनेसे सरकार शरमाती है। ऐसे कार्योंसे दुनियाका लोकमत उसका विरोधी बन रहा है और सरकारको उसकी चिन्ता है। रंगूनके मजिस्ट्रेटको लाचार होकर यह कहना पड़ा कि चूंकि श्री सेनगुप्त के भाषण में लोगोंको हिंसाके लिए उभारनेका कोई प्रयत्न नहीं है, इसलिए उन्हें राजद्रोह के अपराधके योग्य सजा देनेका मुझे कोई कारण दिखाई नहीं देता । दफा १२४ ए का वास्तविक सम्बन्ध तो हिंसासे है। इस दफाके बनाने वालोंके दिमागमें यह बात शायद आई ही नहीं कि कोई ऐसा भी आदमी हो सकता<noinclude></noinclude>
3yk4buxsrl3eb9h8f8ce688l87iabah
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७८
250
197220
671572
669740
2026-08-18T14:11:29Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
671572
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>१३६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
है, जो राजद्रोही होते हुए भी पूर्ण अहिंसक हो। स्पष्ट है कि जहाँ हिंसा नहीं है वहाँ लोगोंको कड़ी सजा देने में, बल्कि कह सकते हैं कि मुकदमा तक चलाने में सरकार-
का यह संकोच अथवा उसकी यह अक्षमता अहिंसाको ज्वलन्त स्तुति है। यह बात बिलकुल साफ देखी जा सकती है कि यदि यह संघर्ष, जो अबतक हिंसासे बिलकुल अछूता रहा है, अन्त तक ऐसा ही बना रहे तो निकट भविष्य में ही हमारी सफलता निश्चित है। तब तो अहिंसाकी शुद्ध वायुमें नमक कर ही नहीं, बल्कि स्वराज्य-प्राप्ति के मार्गकी दूसरी रुकावटें भी काफूर हो जायेंगी ।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३०. 'राजाका प्राप्य राजाको दो''''}}}}
किन्हीं अज्ञात अंग्रेज भाईको मुझे इस आशयका तार देना मुनासिब लगा कि सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करके मैं ईसा मसीहकी इस शिक्षाके खिलाफ जा रहा हूँ कि 'राजाका प्राप्य राजाको दो' पंजाबसे एक अन्य सज्जनने भी, जो भारतीय ईसाई हैं, कुछ इसी तरह लिखा है। फर्क इतना ही है कि उन्होंने उदारताको तिलांजलि देकर
मुझ निरीहपर मेरे इस कृत्यके लिए गालियोंकी बौछार की है। उन्होंने यह भी कहा है कि मैं तो पहले आपको अच्छा आदमी मानता था, लेकिन अब मेरा भ्रम
बिलकुल टूट गया है। मैं इन भाईको विश्वास दिलाता हूँ कि सविनय अवज्ञा मेरे लिए कोई नई चीज नहीं है। इसका प्रचार और आचरण तो मैं १९०६ से ही करने
लगा था। इसलिए यदि मुझसे उनकी आजकी चिढ़ उनके ज्ञानसे उत्पन्न हुई है तो पहले उनके मनमें मेरे लिए जो स्नेह-सम्मान था वह स्पष्टतः अज्ञानजनित था। लेकिन
मैंने न्यू टेस्टामेंट से और अन्य सूत्रोंसे भी यह सीखा है कि जो ईश्वरसे डरकर चलना चाहता है, उसे लोक प्रशस्ति अथवा लोकापवादके प्रति उदासीन ही रहkkना चाहिए।
अब असली सवालको लें। चूंकि मैं अपने आचरणको सार्वभौमिक धर्मके सर्वथा अनुरूप मानता हूँ और चूंकि मैं न्यू टेस्टामेंटकी शिक्षाको बहुत आदरकी दृष्टिसे देखता हूँ, इसलिए मैं यह नहीं चाहूंगा कि मेरे बारेमें औचित्यपूर्वक यह कहा जा सके कि मैं ईसा मसीहकी शिक्षाके विपरीत चल रहा हूँ। राजाका प्राप्य राजा को दो', इस कथनको मेरे खिलाफ पहले भी उद्धृत किया गया है। मुझे उस प्रसिद्ध पदमें यह अर्थ दिखाई नहीं दिया है जिसे उसमें भरनेकी कोशिश मेरे आलोचकोंने की है। यह सवाल ईसा मसीहसे उन्हें फँसानेके लिए पूछा गया था, इसलिए उन्होंने इसका सीधा उत्तर नहीं दिया; वे उसे टाल गये। उत्तर देना उनके लिए आवश्यक नहीं था। इसलिए उन्होंने कर के रूपमें दिये जानेवाले सिक्केको देखनेको कहा। फिर उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा " सीजरके सिक्कोंमें लेन-देन करनेवाले और इस प्रकार जो चीज आपके लिए सीजरके शासनका लाभ है, उस चीजको स्वीकार करनेवाले आप लोग उसे कर देनेसे इनकार कैसे कर सकते हैं ? " ईसा मसीहकी सारी शिक्षा, उनका<noinclude></noinclude>
6i7d8jbksc3gr9d5hl4bgrof8fdsxwj
671573
671572
2026-08-18T14:12:46Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671573
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>१३६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
है, जो राजद्रोही होते हुए भी पूर्ण अहिंसक हो। स्पष्ट है कि जहाँ हिंसा नहीं है वहाँ लोगोंको कड़ी सजा देने में, बल्कि कह सकते हैं कि मुकदमा तक चलाने में सरकार-
का यह संकोच अथवा उसकी यह अक्षमता अहिंसाको ज्वलन्त स्तुति है। यह बात बिलकुल साफ देखी जा सकती है कि यदि यह संघर्ष, जो अबतक हिंसासे बिलकुल अछूता रहा है, अन्त तक ऐसा ही बना रहे तो निकट भविष्य में ही हमारी सफलता निश्चित है। तब तो अहिंसाकी शुद्ध वायुमें नमक कर ही नहीं, बल्कि स्वराज्य-प्राप्ति के मार्गकी दूसरी रुकावटें भी काफूर हो जायेंगी ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३०. 'राजाका प्राप्य राजाको दो''''}}}}
किन्हीं अज्ञात अंग्रेज भाईको मुझे इस आशयका तार देना मुनासिब लगा कि सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करके मैं ईसा मसीहकी इस शिक्षाके खिलाफ जा रहा हूँ कि 'राजाका प्राप्य राजाको दो' पंजाबसे एक अन्य सज्जनने भी, जो भारतीय ईसाई हैं, कुछ इसी तरह लिखा है। फर्क इतना ही है कि उन्होंने उदारताको तिलांजलि देकर
मुझ निरीहपर मेरे इस कृत्यके लिए गालियोंकी बौछार की है। उन्होंने यह भी कहा है कि मैं तो पहले आपको अच्छा आदमी मानता था, लेकिन अब मेरा भ्रम
बिलकुल टूट गया है। मैं इन भाईको विश्वास दिलाता हूँ कि सविनय अवज्ञा मेरे लिए कोई नई चीज नहीं है। इसका प्रचार और आचरण तो मैं १९०६ से ही करने
लगा था। इसलिए यदि मुझसे उनकी आजकी चिढ़ उनके ज्ञानसे उत्पन्न हुई है तो पहले उनके मनमें मेरे लिए जो स्नेह-सम्मान था वह स्पष्टतः अज्ञानजनित था। लेकिन
मैंने न्यू टेस्टामेंट से और अन्य सूत्रोंसे भी यह सीखा है कि जो ईश्वरसे डरकर चलना चाहता है, उसे लोक प्रशस्ति अथवा लोकापवादके प्रति उदासीन ही रहना चाहिए।
अब असली सवालको लें। चूंकि मैं अपने आचरणको सार्वभौमिक धर्मके सर्वथा अनुरूप मानता हूँ और चूंकि मैं न्यू टेस्टामेंटकी शिक्षाको बहुत आदरकी दृष्टिसे देखता हूँ, इसलिए मैं यह नहीं चाहूंगा कि मेरे बारेमें औचित्यपूर्वक यह कहा जा सके कि मैं ईसा मसीहकी शिक्षाके विपरीत चल रहा हूँ। राजाका प्राप्य राजा को दो', इस कथनको मेरे खिलाफ पहले भी उद्धृत किया गया है। मुझे उस प्रसिद्ध पदमें यह अर्थ दिखाई नहीं दिया है जिसे उसमें भरनेकी कोशिश मेरे आलोचकोंने की है। यह सवाल ईसा मसीहसे उन्हें फँसानेके लिए पूछा गया था, इसलिए उन्होंने इसका सीधा उत्तर नहीं दिया; वे उसे टाल गये। उत्तर देना उनके लिए आवश्यक नहीं था। इसलिए उन्होंने कर के रूपमें दिये जानेवाले सिक्केको देखनेको कहा। फिर उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा " सीजरके सिक्कोंमें लेन-देन करनेवाले और इस प्रकार जो चीज आपके लिए सीजरके शासनका लाभ है, उस चीजको स्वीकार करनेवाले आप लोग उसे कर देनेसे इनकार कैसे कर सकते हैं ? " ईसा मसीहकी सारी शिक्षा, उनका<noinclude></noinclude>
ptm3miwcdba940q2peceokn6ds2fgwq
671575
671573
2026-08-18T14:29:17Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
671575
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" /></noinclude>१३६
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
है, जो राजद्रोही होते हुए भी पूर्ण अहिंसक हो। स्पष्ट है कि जहाँ हिंसा नहीं है वहाँ लोगोंको कड़ी सजा देने में, बल्कि कह सकते हैं कि मुकदमा तक चलाने में सरकार-
का यह संकोच अथवा उसकी यह अक्षमता अहिंसाकी ज्वलन्त स्तुति है। यह बात बिलकुल साफ देखी जा सकती है कि यदि यह संघर्ष, जो अबतक हिंसासे बिलकुल अछूता रहा है, अन्त तक ऐसा ही बना रहे तो निकट भविष्य में ही हमारी सफलता निश्चित है। तब तो अहिंसाकी शुद्ध वायुमें नमक कर ही नहीं, बल्कि स्वराज्य-प्राप्ति के मार्गकी दूसरी रुकावटें भी काफूर हो जायेंगी ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३०. 'राजाका प्राप्य राजाको दो''''}}}}
किन्हीं अज्ञात अंग्रेज भाईको मुझे इस आशयका तार देना मुनासिब लगा कि सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करके मैं ईसा मसीहकी इस शिक्षाके खिलाफ जा रहा हूँ कि 'राजाका प्राप्य राजाको दो' पंजाबसे एक अन्य सज्जनने भी, जो भारतीय ईसाई हैं, कुछ इसी तरह लिखा है। फर्क इतना ही है कि उन्होंने उदारताको तिलांजलि देकर मुझ निरीहपर मेरे इस कृत्यके लिए गालियोंकी बौछार की है। उन्होंने यह भी कहा है कि मैं तो पहले आपको अच्छा आदमी मानता था, लेकिन अब मेरा भ्रम बिलकुल टूट गया है। मैं इन भाईको विश्वास दिलाता हूँ कि सविनय अवज्ञा मेरे लिए कोई नई चीज नहीं है। इसका प्रचार और आचरण तो मैं १९०६ से ही करनेलगा था। इसलिए यदि मुझसे उनकी आजकी चिढ़ उनके ज्ञानसे उत्पन्न हुई है तो पहले उनके मनमें मेरे लिए जो स्नेह-सम्मान था वह स्पष्टतः अज्ञानजनित था। लेकिन मैंने न्यू टेस्टामेंट से और अन्य सूत्रोंसे भी यह सीखा है कि जो ईश्वरसे डरकर चलना चाहता है, उसे लोक-प्रशस्ति अथवा लोकापवादके प्रति उदासीन ही रहना चाहिए।
अब असली सवालको लें। चूंकि मैं अपने आचरणको सार्वभौमिक धर्मके सर्वथा अनुरूप मानता हूँ और चूंकि मैं न्यू टेस्टामेंटकी शिक्षाको बहुत आदरकी दृष्टिसे देखता हूँ, इसलिए मैं यह नहीं चाहूंगा कि मेरे बारेमें औचित्यपूर्वक यह कहा जा सके कि मैं ईसा मसीहकी शिक्षाके विपरीत चल रहा हूँ। 'राजाका प्राप्य राजा को दो', इस कथनको मेरे खिलाफ पहले भी उद्धृत किया गया है। मुझे उस प्रसिद्ध पदमें यह अर्थ दिखाई नहीं दिया है जिसे उसमें भरनेकी कोशिश मेरे आलोचकोंने की है। यह सवाल ईसा मसीहसे उन्हें फँसानेके लिए पूछा गया था, इसलिए उन्होंने इसका सीधा उत्तर नहीं दिया; वे उसे टाल गये। उत्तर देना उनके लिए आवश्यक नहीं था। इसलिए उन्होंने कर के रूपमें दिये जानेवाले सिक्केको देखनेको कहा। फिर उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा " सीजरके सिक्कोंमें लेन-देन करनेवाले और इस प्रकार जो चीज आपके लिए सीजरके शासनका लाभ है, उस चीजको स्वीकार करनेवाले आप लोग उसे कर देनेसे इनकार कैसे कर सकते हैं ? " ईसा मसीहकी सारी शिक्षा, उनका<noinclude></noinclude>
8s1jqjc55zg9jrxphetds07qm0mi9k7
671584
671575
2026-08-18T15:34:20Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671584
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />१३६ {{C|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>
है, जो राजद्रोही होते हुए भी पूर्ण अहिंसक हो। स्पष्ट है कि जहाँ हिंसा नहीं है वहाँ लोगोंको कड़ी सजा देने में, बल्कि कह सकते हैं कि मुकदमा तक चलाने में सरकार-
का यह संकोच अथवा उसकी यह अक्षमता अहिंसाकी ज्वलन्त स्तुति है। यह बात बिलकुल साफ देखी जा सकती है कि यदि यह संघर्ष, जो अबतक हिंसासे बिलकुल अछूता रहा है, अन्त तक ऐसा ही बना रहे तो निकट भविष्य में ही हमारी सफलता निश्चित है। तब तो अहिंसाकी शुद्ध वायुमें नमक कर ही नहीं, बल्कि स्वराज्य-प्राप्ति के मार्गकी दूसरी रुकावटें भी काफूर हो जायेंगी ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३०. 'राजाका प्राप्य राजाको दो''''}}}}
किन्हीं अज्ञात अंग्रेज भाईको मुझे इस आशयका तार देना मुनासिब लगा कि सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करके मैं ईसा मसीहकी इस शिक्षाके खिलाफ जा रहा हूँ कि 'राजाका प्राप्य राजाको दो' पंजाबसे एक अन्य सज्जनने भी, जो भारतीय ईसाई हैं, कुछ इसी तरह लिखा है। फर्क इतना ही है कि उन्होंने उदारताको तिलांजलि देकर मुझ निरीहपर मेरे इस कृत्यके लिए गालियोंकी बौछार की है। उन्होंने यह भी कहा है कि मैं तो पहले आपको अच्छा आदमी मानता था, लेकिन अब मेरा भ्रम बिलकुल टूट गया है। मैं इन भाईको विश्वास दिलाता हूँ कि सविनय अवज्ञा मेरे लिए कोई नई चीज नहीं है। इसका प्रचार और आचरण तो मैं १९०६ से ही करनेलगा था। इसलिए यदि मुझसे उनकी आजकी चिढ़ उनके ज्ञानसे उत्पन्न हुई है तो पहले उनके मनमें मेरे लिए जो स्नेह-सम्मान था वह स्पष्टतः अज्ञानजनित था। लेकिन मैंने न्यू टेस्टामेंट से और अन्य सूत्रोंसे भी यह सीखा है कि जो ईश्वरसे डरकर चलना चाहता है, उसे लोक-प्रशस्ति अथवा लोकापवादके प्रति उदासीन ही रहना चाहिए।
अब असली सवालको लें। चूंकि मैं अपने आचरणको सार्वभौमिक धर्मके सर्वथा अनुरूप मानता हूँ और चूंकि मैं न्यू टेस्टामेंटकी शिक्षाको बहुत आदरकी दृष्टिसे देखता हूँ, इसलिए मैं यह नहीं चाहूंगा कि मेरे बारेमें औचित्यपूर्वक यह कहा जा सके कि मैं ईसा मसीहकी शिक्षाके विपरीत चल रहा हूँ। 'राजाका प्राप्य राजा को दो', इस कथनको मेरे खिलाफ पहले भी उद्धृत किया गया है। मुझे उस प्रसिद्ध पदमें यह अर्थ दिखाई नहीं दिया है जिसे उसमें भरनेकी कोशिश मेरे आलोचकोंने की है। यह सवाल ईसा मसीहसे उन्हें फँसानेके लिए पूछा गया था, इसलिए उन्होंने इसका सीधा उत्तर नहीं दिया; वे उसे टाल गये। उत्तर देना उनके लिए आवश्यक नहीं था। इसलिए उन्होंने कर के रूपमें दिये जानेवाले सिक्केको देखनेको कहा। फिर उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा " सीजरके सिक्कोंमें लेन-देन करनेवाले और इस प्रकार जो चीज आपके लिए सीजरके शासनका लाभ है, उस चीजको स्वीकार करनेवाले आप लोग उसे कर देनेसे इनकार कैसे कर सकते हैं ? " ईसा मसीहकी सारी शिक्षा, उनका<noinclude></noinclude>
r4yjzjjzpcvhbei9s4qejq4oiioyazx
671585
671584
2026-08-18T15:35:16Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671585
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />१३६ {{C|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>है, जो राजद्रोही होते हुए भी पूर्ण अहिंसक हो। स्पष्ट है कि जहाँ हिंसा नहीं है वहाँ लोगोंको कड़ी सजा देने में, बल्कि कह सकते हैं कि मुकदमा तक चलाने में सरकार-
का यह संकोच अथवा उसकी यह अक्षमता अहिंसाकी ज्वलन्त स्तुति है। यह बात बिलकुल साफ देखी जा सकती है कि यदि यह संघर्ष, जो अबतक हिंसासे बिलकुल अछूता रहा है, अन्त तक ऐसा ही बना रहे तो निकट भविष्य में ही हमारी सफलता निश्चित है। तब तो अहिंसाकी शुद्ध वायुमें नमक कर ही नहीं, बल्कि स्वराज्य-प्राप्ति के मार्गकी दूसरी रुकावटें भी काफूर हो जायेंगी ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३०. 'राजाका प्राप्य राजाको दो''''}}}}
किन्हीं अज्ञात अंग्रेज भाईको मुझे इस आशयका तार देना मुनासिब लगा कि सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करके मैं ईसा मसीहकी इस शिक्षाके खिलाफ जा रहा हूँ कि 'राजाका प्राप्य राजाको दो' पंजाबसे एक अन्य सज्जनने भी, जो भारतीय ईसाई हैं, कुछ इसी तरह लिखा है। फर्क इतना ही है कि उन्होंने उदारताको तिलांजलि देकर मुझ निरीहपर मेरे इस कृत्यके लिए गालियोंकी बौछार की है। उन्होंने यह भी कहा है कि मैं तो पहले आपको अच्छा आदमी मानता था, लेकिन अब मेरा भ्रम बिलकुल टूट गया है। मैं इन भाईको विश्वास दिलाता हूँ कि सविनय अवज्ञा मेरे लिए कोई नई चीज नहीं है। इसका प्रचार और आचरण तो मैं १९०६ से ही करनेलगा था। इसलिए यदि मुझसे उनकी आजकी चिढ़ उनके ज्ञानसे उत्पन्न हुई है तो पहले उनके मनमें मेरे लिए जो स्नेह-सम्मान था वह स्पष्टतः अज्ञानजनित था। लेकिन मैंने न्यू टेस्टामेंट से और अन्य सूत्रोंसे भी यह सीखा है कि जो ईश्वरसे डरकर चलना चाहता है, उसे लोक-प्रशस्ति अथवा लोकापवादके प्रति उदासीन ही रहना चाहिए।
अब असली सवालको लें। चूंकि मैं अपने आचरणको सार्वभौमिक धर्मके सर्वथा अनुरूप मानता हूँ और चूंकि मैं न्यू टेस्टामेंटकी शिक्षाको बहुत आदरकी दृष्टिसे देखता हूँ, इसलिए मैं यह नहीं चाहूंगा कि मेरे बारेमें औचित्यपूर्वक यह कहा जा सके कि मैं ईसा मसीहकी शिक्षाके विपरीत चल रहा हूँ। 'राजाका प्राप्य राजा को दो', इस कथनको मेरे खिलाफ पहले भी उद्धृत किया गया है। मुझे उस प्रसिद्ध पदमें यह अर्थ दिखाई नहीं दिया है जिसे उसमें भरनेकी कोशिश मेरे आलोचकोंने की है। यह सवाल ईसा मसीहसे उन्हें फँसानेके लिए पूछा गया था, इसलिए उन्होंने इसका सीधा उत्तर नहीं दिया; वे उसे टाल गये। उत्तर देना उनके लिए आवश्यक नहीं था। इसलिए उन्होंने कर के रूपमें दिये जानेवाले सिक्केको देखनेको कहा। फिर उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा " सीजरके सिक्कोंमें लेन-देन करनेवाले और इस प्रकार जो चीज आपके लिए सीजरके शासनका लाभ है, उस चीजको स्वीकार करनेवाले आप लोग उसे कर देनेसे इनकार कैसे कर सकते हैं ? " ईसा मसीहकी सारी शिक्षा, उनका<noinclude></noinclude>
8axnkxjgc77fu1ix68dfp2vf1ax2yqj
671591
671585
2026-08-18T15:42:11Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671591
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१३६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है, जो राजद्रोही होते हुए भी पूर्ण अहिंसक हो। स्पष्ट है कि जहाँ हिंसा नहीं है वहाँ लोगोंको कड़ी सजा देने में, बल्कि कह सकते हैं कि मुकदमा तक चलाने में सरकार-
का यह संकोच अथवा उसकी यह अक्षमता अहिंसाकी ज्वलन्त स्तुति है। यह बात बिलकुल साफ देखी जा सकती है कि यदि यह संघर्ष, जो अबतक हिंसासे बिलकुल अछूता रहा है, अन्त तक ऐसा ही बना रहे तो निकट भविष्य में ही हमारी सफलता निश्चित है। तब तो अहिंसाकी शुद्ध वायुमें नमक कर ही नहीं, बल्कि स्वराज्य-प्राप्ति के मार्गकी दूसरी रुकावटें भी काफूर हो जायेंगी ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३०. 'राजाका प्राप्य राजाको दो''''}}}}
किन्हीं अज्ञात अंग्रेज भाईको मुझे इस आशयका तार देना मुनासिब लगा कि सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करके मैं ईसा मसीहकी इस शिक्षाके खिलाफ जा रहा हूँ कि 'राजाका प्राप्य राजाको दो' पंजाबसे एक अन्य सज्जनने भी, जो भारतीय ईसाई हैं, कुछ इसी तरह लिखा है। फर्क इतना ही है कि उन्होंने उदारताको तिलांजलि देकर मुझ निरीहपर मेरे इस कृत्यके लिए गालियोंकी बौछार की है। उन्होंने यह भी कहा है कि मैं तो पहले आपको अच्छा आदमी मानता था, लेकिन अब मेरा भ्रम बिलकुल टूट गया है। मैं इन भाईको विश्वास दिलाता हूँ कि सविनय अवज्ञा मेरे लिए कोई नई चीज नहीं है। इसका प्रचार और आचरण तो मैं १९०६ से ही करनेलगा था। इसलिए यदि मुझसे उनकी आजकी चिढ़ उनके ज्ञानसे उत्पन्न हुई है तो पहले उनके मनमें मेरे लिए जो स्नेह-सम्मान था वह स्पष्टतः अज्ञानजनित था। लेकिन मैंने न्यू टेस्टामेंट से और अन्य सूत्रोंसे भी यह सीखा है कि जो ईश्वरसे डरकर चलना चाहता है, उसे लोक-प्रशस्ति अथवा लोकापवादके प्रति उदासीन ही रहना चाहिए।
अब असली सवालको लें। चूंकि मैं अपने आचरणको सार्वभौमिक धर्मके सर्वथा अनुरूप मानता हूँ और चूंकि मैं न्यू टेस्टामेंटकी शिक्षाको बहुत आदरकी दृष्टिसे देखता हूँ, इसलिए मैं यह नहीं चाहूंगा कि मेरे बारेमें औचित्यपूर्वक यह कहा जा सके कि मैं ईसा मसीहकी शिक्षाके विपरीत चल रहा हूँ। 'राजाका प्राप्य राजा को दो', इस कथनको मेरे खिलाफ पहले भी उद्धृत किया गया है। मुझे उस प्रसिद्ध पदमें यह अर्थ दिखाई नहीं दिया है जिसे उसमें भरनेकी कोशिश मेरे आलोचकोंने की है। यह सवाल ईसा मसीहसे उन्हें फँसानेके लिए पूछा गया था, इसलिए उन्होंने इसका सीधा उत्तर नहीं दिया; वे उसे टाल गये। उत्तर देना उनके लिए आवश्यक नहीं था। इसलिए उन्होंने कर के रूपमें दिये जानेवाले सिक्केको देखनेको कहा। फिर उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा " सीजरके सिक्कोंमें लेन-देन करनेवाले और इस प्रकार जो चीज आपके लिए सीजरके शासनका लाभ है, उस चीजको स्वीकार करनेवाले आप लोग उसे कर देनेसे इनकार कैसे कर सकते हैं ? " ईसा मसीहकी सारी शिक्षा, उनका<noinclude></noinclude>
jhdv0bpich3lwf4t9dex4l2uxryymxj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१७९
250
197221
671601
669741
2026-08-18T16:08:54Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
671601
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{C|राजद्रोह धर्म है|}} १३७</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना
भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको
कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौती
दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता
तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देने में संकोच न करते और उनको मुकदमेके
जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-
युक्त ही नहीं था ?
और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना
चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही मारनेवाला' है और भावार्थ जीवन देनेवाला '।
वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं
हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी
गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके
मेरे खिलाफ पढ़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २७-३-१९३०
१३१. राजद्रोह धर्म है
सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो
सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध-
से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके
प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस
युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं इसलिए
अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप
गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं।
मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं
बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई
कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर
एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें
जितने जिले हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर
नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके
कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते
हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा
अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग
लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही
इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सो) लोगों का एक प्रायः छिपा हुआ गुट
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
j7b4f7gz46pk74u3uum62v6f1io54yj
671603
671601
2026-08-18T16:12:06Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671603
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राजद्रोह धर्म है|१३७}}</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना
भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको
कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौती
दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता
तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देने में संकोच न करते और उनको मुकदमेके
जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-
युक्त ही नहीं था ?
और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना
चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही मारनेवाला' है और भावार्थ जीवन देनेवाला '।
वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं
हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी
गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके
मेरे खिलाफ पढ़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २७-३-१९३०
१३१. राजद्रोह धर्म है
सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो
सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध-
से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके
प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस
युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं इसलिए
अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप
गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं।
मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं
बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई
कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर
एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें
जितने जिले हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर
नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके
कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते
हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा
अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग
लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही
इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सो) लोगों का एक प्रायः छिपा हुआ गुट
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
6j0ysfnqypgsrr810yvbinp7tuw7a5x
671610
671603
2026-08-18T16:17:26Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671610
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राजद्रोह धर्म है|१३७}}</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको
कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौत दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता
तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देने में संकोच न करते और उनको मुकदमेक। जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-युक्त ही नहीं था ?
और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही मारनेवाला' है और भावार्थ जीवन देनेवाला '।
वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके मेरे खिलाफ पढ़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २७-३-१९३०
१३१. राजद्रोह धर्म है
सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो। सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध- से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस
युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं इसलिए अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप
गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं। मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं
बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर
एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें जितने जिले हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर
नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते
हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सो) लोगों का एक प्रायः छिपा हुआ गुट<noinclude></noinclude>
okftbbmfyt9hr6e5hhmudpjgsxk6lzn
671684
671610
2026-08-19T04:20:33Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671684
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राजद्रोह धर्म है|१३७}}</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको
कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौती दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता
तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देनेमें संकोच न करते और उनको मुकदमेके। जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-युक्त ही नहीं था ?
और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही 'मारनेवाला' है और भावार्थ 'जीवन देनेवाला'।
वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके मेरे खिलाफ पड़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २७-३-१९३०
१३१. राजद्रोह धर्म है
सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो। सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध- से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस
युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं इसलिए अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप
गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं। मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं
बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर
एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें जितने जिले हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर
नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते
हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सो) लोगों का एक प्रायः छिपा हुआ गुट<noinclude></noinclude>
0795su8fk6tla0cw8oj4hcf8tmrv3mj
671687
671684
2026-08-19T04:37:41Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671687
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राजद्रोह धर्म है|१३७}}</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको
कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौती दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता
तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देनेमें संकोच न करते और उनको मुकदमेके। जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-युक्त ही नहीं था ?
और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही 'मारनेवाला' है और भावार्थ 'जीवन देनेवाला'।
वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके मेरे खिलाफ पड़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३१. राजद्रोह धर्म है'''}}}}
सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध- से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस
युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं इसलिए अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप
गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं। मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं
बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर
एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें जितने जिले हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर
नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते
हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सो) लोगों का एक प्रायः छिपा हुआ गुट<noinclude></noinclude>
ltg9uxoa48udmewef9go2ciqagc6zb6
671689
671687
2026-08-19T04:45:20Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671689
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राजद्रोह धर्म है|१३७}}</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको
कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौती दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता
तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देनेमें संकोच न करते और उनको मुकदमेके। जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-युक्त ही नहीं था ?
और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही 'मारनेवाला' है और भावार्थ 'जीवन देनेवाला'।
वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके मेरे खिलाफ पड़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३१. राजद्रोह धर्म है'''}}}}
सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध- से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस
युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं। इसलिए अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप
गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं। मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं
बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर
एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें जितने जिले हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर
नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते
हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सौ) लोगोंका एक प्रायः छिपा हुआ गुट<noinclude></noinclude>
a0h1q81fkl4wl5y32y4yu2l5sflukrw
671690
671689
2026-08-19T04:46:26Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671690
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राजद्रोह धर्म है|१३७}}</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको
कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौती दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता
तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देनेमें संकोच न करते और उनको मुकदमेके। जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-युक्त ही नहीं था ?
और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही 'मारनेवाला' है और भावार्थ 'जीवन देनेवाला'।
वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके मेरे खिलाफ पड़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३१. राजद्रोह धर्म है'''}}}}
सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध- से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस
युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं। इसलिए अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप
गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं। मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं
बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर
एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें जितने जिले हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर
नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते
हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सौ) लोगोंका एक प्रायः छिपा हुआ गुट<noinclude></noinclude>
6d1xv9io3k8r69yp0swou5k5smtus0w
671691
671690
2026-08-19T04:47:34Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
671691
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||राजद्रोह धर्म है|१३७}}</noinclude>सारा आचरण स्पष्ट रूपसे असहयोगका संकेत देता है, जिसमें करोंका न दिया जाना भी जरूरी तौर पर शामिल है। उन्होंने ईश्वरकी सत्ताके सामने मनुष्यकी सत्ताको
कभी कोई महत्व नहीं दिया। उन्होंने तो उस पुरोहितवर्गकी समस्त शक्तिको चुनौती दी थी जो उन दिनों राजासे भी ऊपर था। इसलिए यदि आवश्यक हुआ होता
तो वे सम्राट्की सत्ताको भी चुनौती देनेमें संकोच न करते और उनको मुकदमेके। जिस नाटकसे होकर गुजरना पड़ा, उसके प्रति क्या उनका रवैया पूर्ण रूपसे तिरस्कार-युक्त ही नहीं था ?
और अन्तमें मैं अपने ईमानदार भाइयोंको शब्दजालमें फँसनेसे आगाह कर देना चाहता हूँ। 'शब्द' निश्चय ही 'मारनेवाला' है और भावार्थ 'जीवन देनेवाला'।
वर्तमान प्रसंग में तो मुझे इस पाठमें एक सन्तोषजनक अर्थ ढूंढने में कोई कठिनाई नहीं हो रही है। लेकिन, यदि मैंने विश्वके एक धर्मग्रन्थके रूपमें प्रतिष्ठित पुस्तकमें दी गई सम्पूर्ण शिक्षाके मर्मको ठीकसे ग्रहण कर लिया हो तो किसी इक्के-दुक्के वाक्यके मेरे खिलाफ पड़नेकी मुझे कोई परवाह नहीं होगी।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३१. राजद्रोह धर्म है'''}}}}
सक्रिय राजद्रोह और सक्रिय राजभक्ति इन दोनोंमें कहीं कोई मेल नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति स्व० स्टीफेनने कहा था कि जिसे सरकारके प्रति अप्रीतिके अपराध- से अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करना हो उसे यह साबित करना पड़ेगा कि सरकारके प्रति उसकी सक्रिय प्रीति है। उनके इस कथनमें बहुत सचाई है। लोकसत्ताके इस
युगमें किसी व्यक्तिके प्रति सक्रिय भक्ति रखने जैसी तो कोई बात रही नहीं। इसलिए अब आप संस्थाओंके प्रति ही वफादार या गैर-वफादार होते हैं। अतएव जब आप
गैर-वफादार होते हैं तो आप व्यक्तियोंका नहीं, अमुक संस्थाओंका नाश चाहते हैं। मौजूदा सरकार एक संस्था है, और इसे पहचाननेवाला कभी भी इसका भक्त नहीं
बन सकता। यह संस्था भ्रष्ट है। मनुष्यों के आचरणसे सम्बन्ध रखनेवाले इसके कई कानून निस्सन्देह अमानुषिक हैं। उनके अमलका तरीका और भी बुरा है। अक्सर
एक व्यक्तिकी इच्छा ही कानूनका काम करती है। अगर मैं यह कहूँ कि इस देशमें जितने जिले हैं, उतने ही इसके शासक हैं तो अत्युक्ति न होगी। इन कलक्टर
नामधारी व्यक्तियोंके हाथमें प्रबन्ध और न्याय दोनोंकी सत्ताएँ होती हैं। यद्यपि इनके कार्य कानूनोंकी मर्यादासे - ऐसे कानूनोंकी मर्यादासे जो खुद ही बहुत दोषपूर्ण होते
हैं -- बँधे हुए समझे जाते हैं, तथापि ये शासक अक्सर मनमौजी होते हैं, और सिवा अपनी इच्छाओं या तरंगोंके और किसी चीजका अंकुश इनपर नहीं रहता। ये लोग लोकहितके प्रतिनिधि नहीं होते, विदेशी शासकों या मालिकोंके स्वार्थकी रक्षा ही इनका काम होता है। इन (लगभग तीन सौ) लोगोंका एक प्रायः छिपा हुआ गुट<noinclude></noinclude>
9sfwmdnwti6prqdahxq3kixeeyq2quz
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८०
250
197222
671596
669742
2026-08-18T15:58:24Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
671596
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है और वह दुनिया भर में सबसे अधिक शक्तिशाली है। इनको मालगुजारीकी एक न्यूनतम निश्चित रकम वसूल करनी पड़ती है, और इसलिए अक्सर लोगोंके साथ
इनका व्यवहार अत्यन्त सिद्धान्तहीन पाया जाता है। यह राज्य प्रणाली भारतवर्षके करोड़ों बाशिन्दोंके हृदयहीन रक्त शोषणपर ही कायम है, और यह बात कबूल भी
की जाती है। गांवके पटेलसे लेकर अपने निजी सहायक तक, इन क्षत्रपोंने मातहतोंकी एक ऐसी जमात बना ली है जो अपने विदेशी मालिकोंके तो तलवे चाटती है,
पर आम रिआयाके साथ उसका रात-दिनका व्यवहार इतना गैर-जिम्मेदाराना और बेरहमी भरा होता है कि लोगोंका नैतिक बल समाप्त हो जाता है और उसकी
आतंकी नीति के कारण उनमें उसके भ्रष्टाचारका प्रतिरोध करनेकी क्षमता नहीं रहजाती । अतः जिन लोगोंने भारत सरकारकी इस प्रणालीकी घोर बुराईको समझ लिया है, उनका यह कर्तव्य है कि वे इससे द्रोह करें और प्रकट तथा सक्रिय रूपसे इसके प्रति द्रोहका प्रचार करें। वस्तुतः ऐसे भ्रष्ट राज्यके प्रति भक्ति रखना पाप
है, और अभक्ति रखना पुण्य ।
तीस करोड़ लोग तीन सौ आदमियों के भयसे त्रस्त रहें, यह बात उन स्वेच्छा-चारी शासकों और उनसे त्रस्त लोगों, दोनों के लिए पतनकारी है। अतएव जिन लोगोंने
इस प्रणालीकी बुराईको समझ लिया है, उनका कर्तव्य है कि वे जितनी जल्दी हो सके, इसका नाश कर दें फिर भले ही इस प्रणालीकी कुछ इनी-गिनी बातें सन्दर्भसे
अलग करके देखनेपर कितनी ही लुभावनी क्यों न मालूम होती हों। इसका नाश करनेके लिए ऐसे लोगोंको किसी भी तरह की जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
लेकिन यह बात भी अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि तीस करोड़ लोगोंका इस प्रणाली इन तीन सौ रचयिताओं या प्रशासकोंको मिटा डालने की चेष्टा करना कायरता होगी। इन प्रशासकों या इनके नौकरोंको समाप्त कर डालने के उपाय रचना घोर अज्ञान प्रकट करना होगा। इसके सिवा, ये लोग तो परिस्थितिकी उपज हैं।
कोई शुद्धसे शुद्ध वृत्तियोंवाला मनुष्य भी यदि इस प्रणाली में शामिल हो जाये तो वह इससे जरूर प्रभावित होगा और इसकी बुराइयोंके प्रचार में सहायक बनेगा। अतएव
स्वभावतः इन प्रशासकोंपर गुस्सा होना और फलतः उन्हें कष्ट पहुँचाना इस बुराईका इलाज नहीं है। इसका सच्चा इलाज तो इस प्रणाली के साथ हर तरहका स्वेच्छया
सहयोग करना बन्द कर देना और इससे होनेवाले तथाकथित लाभोंका त्याग कर देना है। थोड़े विचारसे ही पता चल जायेगा कि सविनय अवज्ञा असहयोगका एक आवश्यक अंग है। किसी राज्यकी आज्ञाओं और आदेशोंको मानना, उस राज्यकी सबसे प्रभाव-
कारी सहायता करना है। बुरा शासन इस तरहकी वफादारीका पात्र नहीं है। उसके प्रति वफादार होना उसकी बुराई में शामिल होता है। अतएव जो भला आदमी है,वह तो किसी भी बुरी प्रणालीका अपनी ताकत भर घोर विरोध ही करेगा। इसलिए बुरे राज्यके कानूनोंका सविनय अनादर करना कर्त्तव्य है। याद रहे कि हिंसात्मक अवज्ञाका सम्बन्ध मनुष्यों से होता है, और उनको समाप्त कर देनेके बाद फिर दूसरे लोग उनका स्थान ले सकते हैं। इससे बुराईका कुछ नहीं बिगड़ता, बल्कि अक्सर तो<noinclude></noinclude>
k50074lfsxsxv1egx1ty3bhe1x97rwt
671699
671596
2026-08-19T05:07:16Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671699
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है और वह दुनिया भर में सबसे अधिक शक्तिशाली है। इनको मालगुजारीकी एक न्यूनतम निश्चित रकम वसूल करनी पड़ती है, और इसलिए अक्सर लोगोंके साथ
इनका व्यवहार अत्यन्त सिद्धान्तहीन पाया जाता है। यह राज्य प्रणाली भारतवर्षके करोड़ों बाशिन्दोंके हृदयहीन रक्त शोषणपर ही कायम है, और यह बात कबूल भी
की जाती है। गांवके पटेलसे लेकर अपने निजी सहायक तक, इन क्षत्रपोंने मातहतोंकी एक ऐसी जमात बना ली है जो अपने विदेशी मालिकोंके तो तलवे चाटती है,
पर आम रिआयाके साथ उसका रात-दिनका व्यवहार इतना गैर-जिम्मेदाराना और बेरहमी भरा होता है कि लोगोंका नैतिक बल समाप्त हो जाता है और उसकी
आतंककी नीति के कारण उनमें उसके भ्रष्टाचारका प्रतिरोध करनेकी क्षमता नहीं रह जाती । अतः जिन लोगोंने भारत सरकारकी इस प्रणालीकी घोर बुराईको समझ लिया है, उनका यह कर्तव्य है कि वे इससे द्रोह करें और प्रकट तथा सक्रिय रूपसे इसके प्रति द्रोहका प्रचार करें। वस्तुतः ऐसे भ्रष्ट राज्यके प्रति भक्ति रखना पाप
है, और अभक्ति रखना पुण्य ।
तीस करोड़ लोग तीन सौ आदमियों के भयसे त्रस्त रहें, यह बात उन स्वेच्छा-चारी शासकों और उनसे त्रस्त लोगों, दोनों के लिए पतनकारी है। अतएव जिन लोगोंने
इस प्रणालीकी बुराईको समझ लिया है, उनका कर्तव्य है कि वे जितनी जल्दी हो सके, इसका नाश कर दें फिर भले ही इस प्रणालीकी कुछ इनी-गिनी बातें सन्दर्भसे
अलग करके देखनेपर कितनी ही लुभावनी क्यों न मालूम होती हों। इसका नाश करनेके लिए ऐसे लोगोंको किसी भी तरह की जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
लेकिन यह बात भी अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि तीस करोड़ लोगोंका इस प्रणालीके इन तीन सौ रचयिताओं या प्रशासकोंको मिटा डालनेकी चेष्टा करना कायरता होगी। इन प्रशासकों या इनके नौकरोंको समाप्त कर डालने के उपाय रचना घोर अज्ञान प्रकट करना होगा। इसके सिवा, ये लोग तो परिस्थितिकी उपज हैं। कोई शुद्धसे शुद्ध वृत्तियोंवाला मनुष्य भी यदि इस प्रणाली में शामिल हो जाये तो वह इससे जरूर प्रभावित होगा और इसकी बुराइयोंके प्रचार में सहायक बनेगा। अतएव स्वभावतः इन प्रशासकोंपर गुस्सा होना और फलतः उन्हें कष्ट पहुँचाना इस बुराईका इलाज नहीं है। इसका सच्चा इलाज तो इस प्रणालीके साथ हर तरहका स्वेच्छया सहयोग करना बन्द कर देना और इससे होनेवाले तथाकथित लाभोंका त्याग कर देना है। थोड़े विचारसे ही पता चल जायेगा कि सविनय अवज्ञा असहयोगका एक आवश्यक अंग है। किसी राज्यकी आज्ञाओं और आदेशोंको मानना, उस राज्यकी सबसे प्रभाव-कारी सहायता करना है। बुरा शासन इस तरहकी वफादारीका पात्र नहीं है। उसके प्रति वफादार होना उसकी बुराई में शामिल होना है। अतएव जो भला आदमी है,वह तो किसी भी बुरी प्रणालीका अपनी ताकत भर घोर विरोध ही करेगा। इसलिए बुरे राज्यके कानूनोंका सविनय अनादर करना कर्त्तव्य है। याद रहे कि हिंसात्मक अवज्ञाका सम्बन्ध मनुष्यों से होता है, और उनको समाप्त कर देनेके बाद फिर दूसरे लोग उनका स्थान ले सकते हैं। इससे बुराईका कुछ नहीं बिगड़ता, बल्कि अक्सर तो<noinclude></noinclude>
148g5mbmrovpduowe4zx4oqtlr5o5z7
671700
671699
2026-08-19T05:07:51Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
671700
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१३८|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>है और वह दुनिया भर में सबसे अधिक शक्तिशाली है। इनको मालगुजारीकी एक न्यूनतम निश्चित रकम वसूल करनी पड़ती है, और इसलिए अक्सर लोगोंके साथ
इनका व्यवहार अत्यन्त सिद्धान्तहीन पाया जाता है। यह राज्य प्रणाली भारतवर्षके करोड़ों बाशिन्दोंके हृदयहीन रक्त शोषणपर ही कायम है, और यह बात कबूल भी
की जाती है। गांवके पटेलसे लेकर अपने निजी सहायक तक, इन क्षत्रपोंने मातहतोंकी एक ऐसी जमात बना ली है जो अपने विदेशी मालिकोंके तो तलवे चाटती है,
पर आम रिआयाके साथ उसका रात-दिनका व्यवहार इतना गैर-जिम्मेदाराना और बेरहमी भरा होता है कि लोगोंका नैतिक बल समाप्त हो जाता है और उसकी
आतंककी नीति के कारण उनमें उसके भ्रष्टाचारका प्रतिरोध करनेकी क्षमता नहीं रह जाती । अतः जिन लोगोंने भारत सरकारकी इस प्रणालीकी घोर बुराईको समझ लिया है, उनका यह कर्तव्य है कि वे इससे द्रोह करें और प्रकट तथा सक्रिय रूपसे इसके प्रति द्रोहका प्रचार करें। वस्तुतः ऐसे भ्रष्ट राज्यके प्रति भक्ति रखना पाप
है, और अभक्ति रखना पुण्य ।
तीस करोड़ लोग तीन सौ आदमियों के भयसे त्रस्त रहें, यह बात उन स्वेच्छा-चारी शासकों और उनसे त्रस्त लोगों, दोनों के लिए पतनकारी है। अतएव जिन लोगोंने
इस प्रणालीकी बुराईको समझ लिया है, उनका कर्तव्य है कि वे जितनी जल्दी हो सके, इसका नाश कर दें फिर भले ही इस प्रणालीकी कुछ इनी-गिनी बातें सन्दर्भसे
अलग करके देखनेपर कितनी ही लुभावनी क्यों न मालूम होती हों। इसका नाश करनेके लिए ऐसे लोगोंको किसी भी तरह की जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
लेकिन यह बात भी अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि तीस करोड़ लोगोंका इस प्रणालीके इन तीन सौ रचयिताओं या प्रशासकोंको मिटा डालनेकी चेष्टा करना कायरता होगी। इन प्रशासकों या इनके नौकरोंको समाप्त कर डालने के उपाय रचना घोर अज्ञान प्रकट करना होगा। इसके सिवा, ये लोग तो परिस्थितिकी उपज हैं। कोई शुद्धसे शुद्ध वृत्तियोंवाला मनुष्य भी यदि इस प्रणाली में शामिल हो जाये तो वह इससे जरूर प्रभावित होगा और इसकी बुराइयोंके प्रचार में सहायक बनेगा। अतएव स्वभावतः इन प्रशासकोंपर गुस्सा होना और फलतः उन्हें कष्ट पहुँचाना इस बुराईका इलाज नहीं है। इसका सच्चा इलाज तो इस प्रणालीके साथ हर तरहका स्वेच्छया सहयोग करना बन्द कर देना और इससे होनेवाले तथाकथित लाभोंका त्याग कर देना है। थोड़े विचारसे ही पता चल जायेगा कि सविनय अवज्ञा असहयोगका एक आवश्यक अंग है। किसी राज्यकी आज्ञाओं और आदेशोंको मानना, उस राज्यकी सबसे प्रभाव-कारी सहायता करना है। बुरा शासन इस तरहकी वफादारीका पात्र नहीं है। उसके प्रति वफादार होना उसकी बुराई में शामिल होना है। अतएव जो भला आदमी है,वह तो किसी भी बुरी प्रणालीका अपनी ताकत भर घोर विरोध ही करेगा। इसलिए बुरे राज्यके कानूनोंका सविनय अनादर करना कर्त्तव्य है। याद रहे कि हिंसात्मक अवज्ञाका सम्बन्ध मनुष्यों से होता है, और उनको समाप्त कर देनेके बाद फिर दूसरे लोग उनका स्थान ले सकते हैं। इससे बुराईका कुछ नहीं बिगड़ता, बल्कि अक्सर तो<noinclude></noinclude>
r6sgicb1aycsdfq57qwbjse7p5dx3qj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८१
250
197223
671615
669743
2026-08-18T16:26:52Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
671615
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा-पत्र|१३९}}</noinclude>इससे वह और भी बढ़ जाती हैं। इसके विपरीत अहिंसक अर्थात् सविनय अवज्ञा बुराई निवारणका एकमात्र और सबसे सफल उपाय है, और जो लोग बुराईसे। अलग रहना चाहते हैं उनका यह कर्तव्य है कि वे सविनय अवज्ञा करें।
सविनय अवज्ञामें खतरा इसीलिए है कि अबतक उसका आंशिक प्रयोग ही हुआ है और हिंसासे पूर्ण वातावरणमें ही सदा उसका प्रयोग करना पड़ता है। क्योंकि। जब सर्वत्र अत्याचारका बोलबाला होता है तब उस अत्याचारसे पीड़ित लोगों में भी बहुत अधिक क्रोध भड़क उठता है। उनकी कमजोरी के कारण उनका कोध छिपा रहता
है और जहाँ जरा भी बहाना मिलता है कि वह अपनी पूरी भयंकरताके साथ फूट निकलता है। सविनय अवज्ञा उच्छृंखल और जीवनको तबाह करनेवाली इस छिपी
हुई शक्तिको सुनियंत्रित और जीवनका निर्माण करनेवाली शक्तिके रूपमें परिणत करनेवाला ऐसा सबसे बड़ा उपाय है जिसका प्रयोग करनेका परिणाम पूर्ण सफलता ही
होता है। और परिणामको तुलनामें इससे सम्भावित खतरे कुछ भी नहीं हैं। जब दुनिया इस शस्त्र प्रयोग परिचित हो जायेगी और जब वह इसके एकके-बाद-एक
कई प्रयोगोंको अपनी आंखों सफल होते देख लेगी तब सविनय अवज्ञामें विमान द्वारा आकाश मार्गसे उड़ने से भी कम खतरा होगा, यद्यपि इस क्षेत्रमें आज विज्ञानने खूब
प्रगति कर ली है ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|१३२. '''स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा पत्र'''}}}}
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने स्वयंसेवकोंके लिए एक छोटा-सा प्रतिज्ञापत्र
तैयार किया है। यह तो लाजिमी था कि वह बहुत सीधा-सादा हो। हम यह आशा
नहीं कर सकते कि बारीक तफसीलसे पूर्ण प्रतिज्ञा पत्ररप लाखों आदमी दस्तखत
करेंगे। इसलिए इस प्रतिज्ञापत्र में कांग्रेसके सिद्धान्तको स्वीकार करने तथा नेताओंके
आदेशोंके पालनका वचन देनेसे अधिक कुछ नहीं है और कांग्रेसके सिद्धान्त में अहिंसा
और सत्यका समावेश हो जाता है, क्योंकि उसमें जो 'शान्तिपूर्ण और उचित' शब्द आये
हैं उनका अनुवाद में सत्य और अहिंसा ही करता हूँ। आगे चलकर जब समग्र
जन-समुदाय इस लड़ाई में शामिल हो जायेगा तब इस प्रतिज्ञापत्र की भी जरूरत नहीं
रह जायेगी। उस समय मैदान में यदि कुछ बुरे या कमजोर लोग भी होंगे तो बहुत-से
ऐसे अज्ञात बहादुर सेनानी भी होंगे जो मूक भावसे सिर्फ अपना कर्तव्य करेंगे। याद
रहे कि यह प्रतिज्ञापत्र मात्र अर्जी ही है; इसपर हस्ताक्षर करनेसे आवेदकको
स्वयंसेवक बन जानेका अधिकार नहीं मिलता। यह भी याद रहे कि पुराने और इससे
afe कठोर प्रतिज्ञा पत्र इस प्रतिज्ञान्पत्रके कारण रद नहीं हो जाते। यह प्रतिज्ञा-पत्र
तो आपातिक स्थिति के लिए बनाया गया है। स्वयंसेवकोंकी भरती करनेवालोंकी जिम्मे-
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
kbg9vgfy85x8erbigluh7frhc0lhxg2
671616
671615
2026-08-18T16:28:22Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671616
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा-पत्र|१३९}}</noinclude>इससे वह और भी बढ़ जाती हैं। इसके विपरीत अहिंसक अर्थात् सविनय अवज्ञा बुराई निवारणका एकमात्र और सबसे सफल उपाय है, और जो लोग बुराईसे। अलग रहना चाहते हैं उनका यह कर्तव्य है कि वे सविनय अवज्ञा करें।
सविनय अवज्ञामें खतरा इसीलिए है कि अबतक उसका आंशिक प्रयोग ही हुआ है और हिंसासे पूर्ण वातावरणमें ही सदा उसका प्रयोग करना पड़ता है। क्योंकि। जब सर्वत्र अत्याचारका बोलबाला होता है तब उस अत्याचारसे पीड़ित लोगों में भी बहुत अधिक क्रोध भड़क उठता है। उनकी कमजोरी के कारण उनका कोध छिपा रहता
है और जहाँ जरा भी बहाना मिलता है कि वह अपनी पूरी भयंकरताके साथ फूट निकलता है। सविनय अवज्ञा उच्छृंखल और जीवनको तबाह करनेवाली इस छिपी
हुई शक्तिको सुनियंत्रित और जीवनका निर्माण करनेवाली शक्तिके रूपमें परिणत करनेवाला ऐसा सबसे बड़ा उपाय है जिसका प्रयोग करनेका परिणाम पूर्ण सफलता ही
होता है। और परिणामको तुलनामें इससे सम्भावित खतरे कुछ भी नहीं हैं। जब दुनिया इस शस्त्र प्रयोग परिचित हो जायेगी और जब वह इसके एकके-बाद-एक
कई प्रयोगोंको अपनी आंखों सफल होते देख लेगी तब सविनय अवज्ञामें विमान द्वारा आकाश मार्गसे उड़ने से भी कम खतरा होगा, यद्यपि इस क्षेत्रमें आज विज्ञानने खूब
प्रगति कर ली है ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|१३२. '''स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा पत्र'''}}}}
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने स्वयंसेवकोंके लिए एक छोटा-सा प्रतिज्ञापत्र
तैयार किया है। यह तो लाजिमी था कि वह बहुत सीधा-सादा हो। हम यह आशा
नहीं कर सकते कि बारीक तफसीलसे पूर्ण प्रतिज्ञा पत्ररप लाखों आदमी दस्तखत
करेंगे। इसलिए इस प्रतिज्ञापत्र में कांग्रेसके सिद्धान्तको स्वीकार करने तथा नेताओंके
आदेशोंके पालनका वचन देनेसे अधिक कुछ नहीं है और कांग्रेसके सिद्धान्त में अहिंसा
और सत्यका समावेश हो जाता है, क्योंकि उसमें जो 'शान्तिपूर्ण और उचित' शब्द आये
हैं उनका अनुवाद में सत्य और अहिंसा ही करता हूँ। आगे चलकर जब समग्र
जन-समुदाय इस लड़ाई में शामिल हो जायेगा तब इस प्रतिज्ञापत्र की भी जरूरत नहीं
रह जायेगी। उस समय मैदान में यदि कुछ बुरे या कमजोर लोग भी होंगे तो बहुत-से
ऐसे अज्ञात बहादुर सेनानी भी होंगे जो मूक भावसे सिर्फ अपना कर्तव्य करेंगे। याद
रहे कि यह प्रतिज्ञापत्र मात्र अर्जी ही है; इसपर हस्ताक्षर करनेसे आवेदकको
स्वयंसेवक बन जानेका अधिकार नहीं मिलता। यह भी याद रहे कि पुराने और इससे
afe कठोर प्रतिज्ञा पत्र इस प्रतिज्ञान्पत्रके कारण रद नहीं हो जाते। यह प्रतिज्ञा-पत्र
तो आपातिक स्थिति के लिए बनाया गया है। स्वयंसेवकोंकी भरती करनेवालोंकी जिम्मे-<noinclude></noinclude>
o5vigea4c6fr0abbekphrdzlfrluav4
671703
671616
2026-08-19T05:15:39Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671703
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा-पत्र|१३९}}</noinclude>इससे वह और भी बढ़ जाती हैं। इसके विपरीत अहिंसक अर्थात् सविनय अवज्ञा बुराईके निवारणका एकमात्र और सबसे सफल उपाय है, और जो लोग बुराईसे अलग रहना चाहते हैं उनका यह कर्तव्य है कि वे सविनय अवज्ञा करें।
सविनय अवज्ञामें खतरा इसीलिए है कि अबतक उसका आंशिक प्रयोग ही हुआ है और हिंसासे पूर्ण वातावरणमें ही सदा उसका प्रयोग करना पड़ता है। क्योंकि जब सर्वत्र अत्याचारका बोलबाला होता है तब उस अत्याचारसे पीड़ित लोगों में भी बहुत अधिक क्रोध भड़क उठता है। उनकी कमजोरी के कारण उनका कोध छिपा रहता है और जहाँ जरा भी बहाना मिलता है कि वह अपनी पूरी भयंकरताके साथ फूट निकलता है। सविनय अवज्ञा उच्छृंखल और जीवनको तबाह करनेवाली इस छिपी हुई शक्तिको सुनियंत्रित और जीवनका निर्माण करनेवाली शक्तिके रूपमें परिणत करनेवाला ऐसा सबसे बड़ा उपाय है जिसका प्रयोग करनेका परिणाम पूर्ण सफलता ही होता है। और परिणामकी तुलनामें इससे सम्भावित खतरे कुछ भी नहीं हैं। जब दुनिया इस शस्त्र प्रयोग से परिचित हो जायेगी और जब वह इसके एकके-बाद-एक कई प्रयोगोंको अपनी आंखों सफल होते देख लेगी तब सविनय अवज्ञामें विमान द्वारा आकाश मार्गसे उड़ने से भी कम खतरा होगा, यद्यपि इस क्षेत्रमें आज विज्ञानने खूब प्रगति कर ली है।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|१३२. '''स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा पत्र'''}}}}
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने स्वयंसेवकोंके लिए एक छोटा-सा प्रतिज्ञापत्र
तैयार किया है। यह तो लाजिमी था कि वह बहुत सीधा-सादा हो। हम यह आशा
नहीं कर सकते कि बारीक तफसीलसे पूर्ण प्रतिज्ञा पत्ररप लाखों आदमी दस्तखत
करेंगे। इसलिए इस प्रतिज्ञापत्र में कांग्रेसके सिद्धान्तको स्वीकार करने तथा नेताओंके
आदेशोंके पालनका वचन देनेसे अधिक कुछ नहीं है और कांग्रेसके सिद्धान्त में अहिंसा
और सत्यका समावेश हो जाता है, क्योंकि उसमें जो 'शान्तिपूर्ण और उचित' शब्द आये
हैं उनका अनुवाद में सत्य और अहिंसा ही करता हूँ। आगे चलकर जब समग्र
जन-समुदाय इस लड़ाई में शामिल हो जायेगा तब इस प्रतिज्ञापत्र की भी जरूरत नहीं
रह जायेगी। उस समय मैदान में यदि कुछ बुरे या कमजोर लोग भी होंगे तो बहुत-से
ऐसे अज्ञात बहादुर सेनानी भी होंगे जो मूक भावसे सिर्फ अपना कर्तव्य करेंगे। याद
रहे कि यह प्रतिज्ञापत्र मात्र अर्जी ही है; इसपर हस्ताक्षर करनेसे आवेदकको
स्वयंसेवक बन जानेका अधिकार नहीं मिलता। यह भी याद रहे कि पुराने और इससे
afe कठोर प्रतिज्ञा पत्र इस प्रतिज्ञान्पत्रके कारण रद नहीं हो जाते। यह प्रतिज्ञा-पत्र
तो आपातिक स्थिति के लिए बनाया गया है। स्वयंसेवकोंकी भरती करनेवालोंकी जिम्मे-<noinclude></noinclude>
dez2wtx4kkmump8pyu8ufcye48jwptj
671709
671703
2026-08-19T05:41:17Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
671709
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा-पत्र|१३९}}</noinclude>इससे वह और भी बढ़ जाती हैं। इसके विपरीत अहिंसक अर्थात् सविनय अवज्ञा बुराईके निवारणका एकमात्र और सबसे सफल उपाय है, और जो लोग बुराईसे अलग रहना चाहते हैं उनका यह कर्तव्य है कि वे सविनय अवज्ञा करें।
सविनय अवज्ञामें खतरा इसीलिए है कि अबतक उसका आंशिक प्रयोग ही हुआ है और हिंसासे पूर्ण वातावरणमें ही सदा उसका प्रयोग करना पड़ता है। क्योंकि जब सर्वत्र अत्याचारका बोलबाला होता है तब उस अत्याचारसे पीड़ित लोगों में भी बहुत अधिक क्रोध भड़क उठता है। उनकी कमजोरी के कारण उनका कोध छिपा रहता है और जहाँ जरा भी बहाना मिलता है कि वह अपनी पूरी भयंकरताके साथ फूट निकलता है। सविनय अवज्ञा उच्छृंखल और जीवनको तबाह करनेवाली इस छिपी हुई शक्तिको सुनियंत्रित और जीवनका निर्माण करनेवाली शक्तिके रूपमें परिणत करनेवाला ऐसा सबसे बड़ा उपाय है जिसका प्रयोग करनेका परिणाम पूर्ण सफलता ही होता है। और परिणामकी तुलनामें इससे सम्भावित खतरे कुछ भी नहीं हैं। जब दुनिया इस शस्त्र प्रयोग से परिचित हो जायेगी और जब वह इसके एकके-बाद-एक कई प्रयोगोंको अपनी आंखों सफल होते देख लेगी तब सविनय अवज्ञामें विमान द्वारा आकाश मार्गसे उड़ने से भी कम खतरा होगा, यद्यपि इस क्षेत्रमें आज विज्ञानने खूब प्रगति कर ली है।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|१३२. '''स्वयंसेवकोंका प्रतिज्ञा पत्र'''}}}}
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने स्वयंसेवकोंके लिए एक छोटा-सा प्रतिज्ञा-पत्र
तैयार किया है। यह तो लाजिमी था कि वह बहुत सीधा-सादा हो। हम यह आशा
नहीं कर सकते कि बारीक तफसीलसे पूर्ण प्रतिज्ञा पत्ररप लाखों आदमी दस्तखत
करेंगे। इसलिए इस प्रतिज्ञा-पत्र में कांग्रेसके सिद्धान्तको स्वीकार करने तथा नेताओंके
आदेशोंके पालनका वचन देनेसे अधिक कुछ नहीं है और कांग्रेसके सिद्धान्त में अहिंसा
और सत्यका समावेश हो जाता है, क्योंकि उसमें जो 'शान्तिपूर्ण और उचित' शब्द आये हैं उनका अनुवाद मैंं सत्य और अहिंसा ही करता हूँ। आगे चलकर जब समग्र
जन-समुदाय इस लड़ाई में शामिल हो जायेगा तब इस प्रतिज्ञा-पत्रकी भी जरूरत नहीं
रह जायेगी। उस समय मैदानमें यदि कुछ बुरे या कमजोर लोग भी होंगे तो बहुत-से
ऐसे अज्ञात बहादुर सेनानी भी होंगे जो मूक भावसे सिर्फ अपना कर्तव्य करेंगे। याद
रहे कि यह प्रतिज्ञा-पत्र मात्र अर्जी ही है; इसपर हस्ताक्षर करनेसे आवेदकको
स्वयंसेवक बन जानेका अधिकार नहीं मिलता। यह भी याद रहे कि पुराने और इससे
अधिक कठोर प्रतिज्ञा-पत्र इस प्रतिज्ञा-पत्रके कारण रद नहीं हो जाते। यह प्रतिज्ञा-पत्र
तो आपातिक स्थितिके लिए बनाया गया है। स्वयंसेवकोंकी भरती करनेवालोंकी जिम्मे-<noinclude></noinclude>
k2exdui7b79dqe3h5a2ov6p79b06x6b
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८२
250
197224
671628
669744
2026-08-18T16:43:05Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
671628
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दारी बहुत बड़ी है। इस प्रतिज्ञापत्रका कोई यह मतलब न समझे कि साम्प्रदायिक एकता, खादी, अस्पृश्यता निवारण या मद्य-निषेधको अवसे हम त्याग देनेवाले हैं। इसका
मतलब यह है कि ये चीजें कांग्रेस कार्यक्रमका अभिन्न अंग है। यह सीधा-सादा
प्रतिज्ञापत्र हमने इसलिए तैयार किया है कि स्वराज्यकी लड़ाई लड़नेके लिए हजारों
स्त्री-पुरुष कांग्रेस में शामिल हो सकें, लेकिन ऐसा करते हुए हम इस विश्वाससे प्रेरित
रहे हैं कि कांग्रेस के कर्ता-धर्ता कांग्रेस कार्यक्रमके इन अभिन्न हिस्सोंपर किसी भी
तरहसे आंच नहीं आने देंगे। वर्तमान योजनाका आधार यह निश्चित विश्वास है कि
कांग्रेसका संचालन पूरी ईमानदारी के साथ किया जा रहा है। और अन्तमें यह बात
नहीं भूलनी चाहिए कि इस प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर करनेवाले स्वयंसेवकोंको कांग्रेसकी
सदस्यता प्राप्त हो जाती हो, ऐसी बात नहीं है।
[ अंग्रेजीसे ]
यंग इंडिया, २७-३-१९३०
१३३. कुछ सुझाव
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी अहमदाबादकी बैठक में पास किये गये प्रस्ताव में
देश भर में सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करनेका संकेत देनेकी जिम्मेदारी, बशर्ते कि मैं दांडी
पहुँचने तक मुक्त रहूँ, मुझे सौंपी गई है। कारण स्पष्ट है। अखिल भारतीय कांग्रेस
कमेटी हर अवांछनीय स्थितिके विरुद्ध सभी समुचित पूर्वोपाय कर लेना चाहती है।
मेरे गिरफ्तार कर लिये जानेपर आन्दोलन स्थगित करना खतरनाक होगा। दूसरी
ओर, कमेटी यह भी नहीं चाहती कि मेरे गिरफ्तार किये जानेसे पूर्व ही वह मैं क्या
चाहूँगा, इसका अनुमान लगाकर पहलेसे ही कोई कदम तय कर ले। जहाँतक
अभी मैं समझ सकता हूँ, कार्यकर्त्ता ऐसा मानकर चल सकते हैं कि इस आन्दोलनको
अखिल भारतीय स्तर पर प्रारम्भ करनेकी तिथि ६ अप्रैल होगी। उसी दिन राष्ट्रीय
सप्ताह शुरू होता है। यही १९१९ के उस सत्याग्रहका दिन है जिसमें जनसाधारणमें
अभूतपूर्व जागृति आई थी। बादके सात दिनोंमें हमने कुछ दुष्कृत्य किये और उनका
परिणाम जलियांवाला बागके नृशंस हत्याकाण्डके रूप में सामने आया। अगर सब कुछ
ठीक-ठीक चला तो मैं ५ अप्रैलको दाँडी पहुंचूंगा। इसलिए मुझे ६ अप्रैल सत्याग्रह
प्रारम्भ करनेकी सबसे स्वाभाविक तिथि प्रतीत होती है। कार्यकर्त्ता तैयारी तो कर
सकते हैं, मगर अन्तिम संकेत के लिए प्रतीक्षा करें।
किन्तु प्रतिबन्ध हटा लिये जाने का मतलब यह नहीं कि हरएक प्रान्त या हरएक
जिला सविनय अवज्ञा शुरू ही कर दे जिस प्रान्त अथवा जिस जिलेकी इसके लिए
तैयारी न हो और जिसका प्रथम सेवक इसे प्रारम्भ करनेकी आन्तरिक प्रेरणाका
अनुभव न करता हो वह प्रान्त अथवा जिला इसे शुरू न करे। अगर किसी प्रथम सेवकमें
आत्मविश्वास न हो अथवा उसे अपने आसपास के परिवेशपर भरोसा न हो तो वह
जल्दबाजी में कोई कदम उठानेसे इनकार करे। निष्क्रियताके लिए किसीको दोष नहीं
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
aan1hto58426yq4o6r9w1idxp8zsin3
671717
671628
2026-08-19T06:04:41Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671717
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दारी बहुत बड़ी है। इस प्रतिज्ञा-पत्रका कोई यह मतलब न समझे कि साम्प्रदायिक एकता, खादी, अस्पृश्यता-निवारण या मद्य-निषेधको अबसे हम त्याग देनेवाले हैं। इसका मतलब यह है कि ये चीजें कांग्रेसके कार्यक्रमका अभिन्न अंग है। यह सीधा-सादा प्रतिज्ञा-पत्र हमने इसलिए तैयार किया है कि स्वराज्यकी लड़ाई लड़नेके लिए हजारों स्त्री-पुरुष कांग्रेस में शामिल हो सकें, लेकिन ऐसा करते हुए हम इस विश्वाससे प्रेरित रहे हैं कि कांग्रेस के कर्ता-धर्ता कांग्रेस कार्यक्रमके इन अभिन्न हिस्सोंपर किसी भी तरहसे आंच नहीं आने देंगे। वर्तमान योजनाका आधार यह निश्चित विश्वास है कि
कांग्रेसका संचालन पूरी ईमानदारी के साथ किया जा रहा है। और अन्तमें यह बात
नहीं भूलनी चाहिए कि इस प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर करनेवाले स्वयंसेवकोंको कांग्रेसकी
सदस्यता प्राप्त हो जाती हो, ऐसी बात नहीं है।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३३. कुछ सुझाव'''}}}}
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी अहमदाबादकी बैठक में पास किये गये प्रस्ताव में
देश भर में सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करनेका संकेत देनेकी जिम्मेदारी, बशर्ते कि मैं दांडी
पहुँचने तक मुक्त रहूँ, मुझे सौंपी गई है। कारण स्पष्ट है। अखिल भारतीय कांग्रेस
कमेटी हर अवांछनीय स्थितिके विरुद्ध सभी समुचित पूर्वोपाय कर लेना चाहती है।
मेरे गिरफ्तार कर लिये जानेपर आन्दोलन स्थगित करना खतरनाक होगा। दूसरी ओर, कमेटी यह भी नहीं चाहती कि मेरे गिरफ्तार किये जानेसे पूर्व ही वह मैं क्या
चाहूँगा, इसका अनुमान लगाकर पहलेसे ही कोई कदम तय कर ले। जहाँतक अभी मैं समझ सकता हूँ, कार्यकर्त्ता ऐसा मानकर चल सकते हैं कि इस आन्दोलनको अखिल भारतीय स्तर पर प्रारम्भ करनेकी तिथि ६ अप्रैल होगी। उसी दिन राष्ट्रीय सप्ताह शुरू होता है। यही १९१९ के उस सत्याग्रहका दिन है जिसमें जनसाधारणमें अभूतपूर्व जागृति आई थी। बादके सात दिनोंमें हमने कुछ दुष्कृत्य किये और उनका परिणाम जलियांवाला बागके नृशंस हत्याकाण्डके रूप में सामने आया। अगर सब कुछ ठीक-ठीक चला तो मैं ५ अप्रैलको दाँडी पहुंचूंगा। इसलिए मुझे ६ अप्रैल सत्याग्रह प्रारम्भ करनेकी सबसे स्वाभाविक तिथि प्रतीत होती है। कार्यकर्त्ता तैयारी तो कर सकते हैं, मगर अन्तिम संकेत के लिए प्रतीक्षा करें। किन्तु प्रतिबन्ध हटा लिये जाने का मतलब यह नहीं कि हरएक प्रान्त या हरएक जिला सविनय अवज्ञा शुरू ही कर दे जिस प्रान्त अथवा जिस जिलेकी इसके लिए तैयारी न हो और जिसका प्रथम सेवक इसे प्रारम्भ करनेकी आन्तरिक प्रेरणाका अनुभव न करता हो वह प्रान्त अथवा जिला इसे शुरू न करे। अगर किसी प्रथम सेवकमें आत्मविश्वास न हो अथवा उसे अपने आसपास के परिवेशपर भरोसा न हो तो वह जल्दबाजी में कोई कदम उठानेसे इनकार करे। निष्क्रियताके लिए किसीको दोष नहीं<noinclude></noinclude>
60paj1j67b9qw0zlp36ozpc4l5dl6ua
671718
671717
2026-08-19T06:14:16Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
671718
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>दारी बहुत बड़ी है। इस प्रतिज्ञा-पत्रका कोई यह मतलब न समझे कि साम्प्रदायिक एकता, खादी, अस्पृश्यता-निवारण या मद्य-निषेधको अबसे हम त्याग देनेवाले हैं। इसका मतलब यह है कि ये चीजें कांग्रेसके कार्यक्रमका अभिन्न अंग है। यह सीधा-सादा प्रतिज्ञा-पत्र हमने इसलिए तैयार किया है कि स्वराज्यकी लड़ाई लड़नेके लिए हजारों स्त्री-पुरुष कांग्रेस में शामिल हो सकें, लेकिन ऐसा करते हुए हम इस विश्वाससे प्रेरित रहे हैं कि कांग्रेस के कर्ता-धर्ता कांग्रेस कार्यक्रमके इन अभिन्न हिस्सोंपर किसी भी तरहसे आंच नहीं आने देंगे। वर्तमान योजनाका आधार यह निश्चित विश्वास है कि
कांग्रेसका संचालन पूरी ईमानदारी के साथ किया जा रहा है। और अन्तमें यह बात
नहीं भूलनी चाहिए कि इस प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर करनेवाले स्वयंसेवकोंको कांग्रेसकी
सदस्यता प्राप्त हो जाती हो, ऐसी बात नहीं है।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{C|{{Larger|'''१३३. कुछ सुझाव'''}}}}
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीकी अहमदाबादकी बैठक में पास किये गये प्रस्ताव में
देश भर में सविनय अवज्ञा प्रारम्भ करनेका संकेत देनेकी जिम्मेदारी, बशर्ते कि मैं दांडी
पहुँचने तक मुक्त रहूँ, मुझे सौंपी गई है। कारण स्पष्ट है। अखिल भारतीय कांग्रेस
कमेटी हर अवांछनीय स्थितिके विरुद्ध सभी समुचित पूर्वोपाय कर लेना चाहती है।
मेरे गिरफ्तार कर लिये जानेपर आन्दोलन स्थगित करना खतरनाक होगा। दूसरी ओर, कमेटी यह भी नहीं चाहती कि मेरे गिरफ्तार किये जानेसे पूर्व ही वह, मैं क्या
चाहूँगा, इसका अनुमान लगाकर पहलेसे ही कोई कदम तय कर ले। जहाँतक अभी मैं समझ सकता हूँ, कार्यकर्त्ता ऐसा मानकर चल सकते हैं कि इस आन्दोलनको अखिल भारतीय स्तर पर प्रारम्भ करनेकी तिथि ६ अप्रैल होगी। उसी दिन राष्ट्रीय सप्ताह शुरू होता है। यही १९१९ के उस सत्याग्रहका दिन है जिसमें जनसाधारणमें अभूतपूर्व जागृति आई थी। बादके सात दिनोंमें हमने कुछ दुष्कृत्य किये और उनका परिणाम जलियांवाला बागके नृशंस हत्याकाण्डके रूप में सामने आया। अगर सब कुछ ठीक-ठीक चला तो मैं ५ अप्रैलको दाँडी पहुंचूंगा। इसलिए मुझे ६ अप्रैल सत्याग्रह प्रारम्भ करनेकी सबसे स्वाभाविक तिथि प्रतीत होती है। कार्यकर्त्ता तैयारी तो कर सकते हैं, मगर अन्तिम संकेत के लिए प्रतीक्षा करें।
किन्तु प्रतिबन्ध हटा लिये जाने का मतलब यह नहीं कि हरएक प्रान्त या हरएक जिला सविनय अवज्ञा शुरू ही कर दे। जिस प्रान्त अथवा जिस जिलेकी इसके लिए तैयारी न हो और जिसका प्रथम सेवक इसे प्रारम्भ करनेकी आन्तरिक प्रेरणाका अनुभव न करता हो वह प्रान्त अथवा जिला इसे शुरू न करे। अगर किसी प्रथम सेवकमें आत्मविश्वास न हो अथवा उसे अपने आसपास के परिवेशपर भरोसा न हो तो वह जल्दबाजी में कोई कदम उठानेसे इनकार करे। निष्क्रियताके लिए किसीको दोष नहीं<noinclude></noinclude>
qjs7li24pwqjukinnfzkpxc1lhgxrtu
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८३
250
197225
671621
669745
2026-08-18T16:33:46Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
671621
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||कुछ सुझाव|१४१}}</noinclude>दिया जायेगा, लेकिन जो अपने परिवेशपर नियन्त्रण रखनेके बजाय उसके प्रवाह में
यह जायेगा उसे तो निश्चय ही दोषी माना जायेगा ।
हम सबका उद्देश्य है सार्वजनिक सविनय अवज्ञा । यह अवज्ञा कराई नहीं जा
सकती। अगर इस अवज्ञाको सचमुच अपना सार्वजनिक सविनय अवज्ञा नाम चरितार्थ
करना है और यदि इसे सफल होना है तो इसको स्वयंस्फूर्त होना चाहिए, और
जहाँ पहले ही जमीनको सींचा नहीं गया है, तैयार नहीं किया गया है, वहाँ यह
निश्चित मानना चाहिए कि सर्वसाधारण इसके प्रति उत्साह नहीं दिखायेगा । हिंसाके
विस्फोटके खिलाफ सर्वत्र अधिक से अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। मैंने कहा है कि
इस बार हिंसा के विस्फोटके बावजूद सविनय प्रतिरोध जारी रहेगा; यह बात सच है
लेकिन साथ ही यह बात भी उतनी ही सच है कि हमारी ओरसे हिंसा होनेपर
संघर्षको हानि पहुँचेगी और इसकी प्रगति रुकेगी। दो परस्पर विरोधी शक्तियाँ एक
साथ मिलकर इस प्रकार कभी भी काम नहीं कर सकती जिससे वे एक-दूसरीके
लिए सहायक हो सकें। सविनय अवज्ञाकी योजना हिंसाको प्रभावहीन बनाने और
अन्ततः उसे बिलकुल समाप्त करके उसके स्थान पर अहिंसाको प्रतिष्ठित करने, घृणाके
स्थानपर प्रेमको प्रतिष्ठित करने और लड़ाई-झगड़ेकी जगह मेज-जोल कायम करने के
लिए बनाई गई है।
इसलिए हिंसाका विस्फोट होनेपर भी संघर्षको बन्द न करनेका मतलब सिर्फ
यही है कि अगर हिंसाकी ज्वाला भड़की तो अहिंसा के पुजारी उसमें अपने-आपको
भस्म हो जाने देंगे, बल्कि वैसी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे इस बात के लिए प्रयत्न
करेंगे कि वह ज्वाला उन्हें भस्म कर दे। वे सरकारकी संगठित हिंसा अथवा किसी
कुछ समूह या पूरे राष्ट्रकी छुट-पुट हिंसाके असहाय साक्षी बनकर नहीं बैठे रहेंगे।
इसलिए प्रत्येक प्रान्तमें कार्यकर्तागण हर सम्भव पूर्वोपाय करनेके बाद इस संघर्ष में
कूद पड़ेंगे, भले ही ऐसा करके वे मनुष्य जिसकी कल्पना कर सकता है, ऐसा
बड़ेसे बड़ा खतरा ही क्यों न उठा रहे हों तब स्वभावतः सभी जगह जनताको उन
लोगोंके निर्णयको खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए जिनके बारेमें ऐसी ख्याति है कि
ये पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अहिंसामें पूरी निष्ठाके साथ विश्वास रखते हैं।
इधर कुछ अन्य कानूनों की भी अवज्ञा करनेकी चर्चा हो रही है। लेकिन, यह
सुझाव मुझे ठीक नहीं लगा है। मैं तो नमक -कानूनोंपर ही ध्यान केन्द्रित करनेमें
विश्वास रखता हूँ। नमककी खानें लगभग सब जगह मिलती है। हमारा मंशा यह
नहीं है कि बेची जाने लायक मात्रामें नमक तैयार किया जाये। हमारा मंशा तो नमक
तैयार करके तथा अन्य प्रकारसे नमक-कानूनोंको जान-बूझकर भंग करना है।
इस सन्दर्भ में चौकीदारी कर से सम्बन्धित कानूनोंकी अवज्ञाका सुझाव दिया गया
हैं। मेरे विचारसे यह कर वे शर्तें पूरी नहीं करता जो नमक कर पूरी करता है।
इरादा ऐसे कानूनोंको तोड़नेका है जो, जहाँ तक हम आज समझ सकते हैं, सदा ही
बुरे समझे जायेंगे। हम स्वराज्यके अन्तर्गत भी नमक कर नहीं चाहते। चौकीदारी
कर शायद ऐसा कर नहीं है। हमें शायद स्वराज्यके अन्तर्गत भी चौकीदारोंकी जरूरत
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
j2n379lim9lhwklxc0yluoovxq8f0ie
671623
671621
2026-08-18T16:38:02Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671623
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||कुछ सुझाव|१४१}}</noinclude>दिया जायेगा, लेकिन जो अपने परिवेशपर नियन्त्रण रखनेके बजाय उसके प्रवाह में यह जायेगा उसे तो निश्चय ही दोषी माना जायेगा ।
हम सबका उद्देश्य है सार्वजनिक सविनय अवज्ञा । यह अवज्ञा कराई नहीं जा
सकती। अगर इस अवज्ञाको सचमुच अपना सार्वजनिक सविनय अवज्ञा नाम चरितार्थ करना है और यदि इसे सफल होना है तो इसको स्वयंस्फूर्त होना चाहिए, और जहाँ पहले ही जमीनको सींचा नहीं गया है, तैयार नहीं किया गया है, वहाँ यह निश्चित मानना चाहिए कि सर्वसाधारण इसके प्रति उत्साह नहीं दिखायेगा । हिंसाके विस्फोटके खिलाफ सर्वत्र अधिक से अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। मैंने कहा है कि इस बार हिंसा के विस्फोटके बावजूद सविनय प्रतिरोध जारी रहेगा; यह बात सच है लेकिन साथ ही यह बात भी उतनी ही सच है कि हमारी ओरसे हिंसा होनेपर संघर्षको हानि पहुँचेगी और इसकी प्रगति रुकेगी। दो परस्पर विरोधी शक्तियाँ एक साथ मिलकर इस प्रकार कभी भी काम नहीं कर सकती जिससे वे एक-दूसरीके लिए सहायक हो सकें। सविनय अवज्ञाकी योजना हिंसाको प्रभावहीन बनाने और
अन्ततः उसे बिलकुल समाप्त करके उसके स्थान पर अहिंसाको प्रतिष्ठित करने, घृणाके स्थानपर प्रेमको प्रतिष्ठित करने और लड़ाई-झगड़ेकी जगह मेज-जोल कायम करने के लिए बनाई गई है।
इसलिए हिंसाका विस्फोट होनेपर भी संघर्षको बन्द न करनेका मतलब सिर्फ यही है कि अगर हिंसाकी ज्वाला भड़की तो अहिंसा के पुजारी उसमें अपने-आपको
भस्म हो जाने देंगे, बल्कि वैसी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे इस बात के लिए प्रयत्न करेंगे कि वह ज्वाला उन्हें भस्म कर दे। वे सरकारकी संगठित हिंसा अथवा किसी
कुछ समूह या पूरे राष्ट्रकी छुट-पुट हिंसाके असहाय साक्षी बनकर नहीं बैठे रहेंगे। इसलिए प्रत्येक प्रान्तमें कार्यकर्तागण हर सम्भव पूर्वोपाय करनेके बाद इस संघर्ष में कूद पड़ेंगे, भले ही ऐसा करके वे मनुष्य जिसकी कल्पना कर सकता है, ऐसा बड़ेसे बड़ा खतरा ही क्यों न उठा रहे हों तब स्वभावतः सभी जगह जनताको उन
लोगोंके निर्णयको खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए जिनके बारेमें ऐसी ख्याति है कि ये पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अहिंसामें पूरी निष्ठाके साथ विश्वास रखते हैं।
इधर कुछ अन्य कानूनों की भी अवज्ञा करनेकी चर्चा हो रही है। लेकिन, यह सुझाव मुझे ठीक नहीं लगा है। मैं तो नमक -कानूनोंपर ही ध्यान केन्द्रित करनेमें विश्वास रखता हूँ। नमककी खानें लगभग सब जगह मिलती है। हमारा मंशा यह नहीं है कि बेची जाने लायक मात्रामें नमक तैयार किया जाये। हमारा मंशा तो नमक तैयार करके तथा अन्य प्रकारसे नमक-कानूनोंको जान-बूझकर भंग करना है।
इस सन्दर्भ में चौकीदारी कर से सम्बन्धित कानूनोंकी अवज्ञाका सुझाव दिया गया हैं। मेरे विचारसे यह कर वे शर्तें पूरी नहीं करता जो नमक कर पूरी करता है।
इरादा ऐसे कानूनोंको तोड़नेका है जो, जहाँ तक हम आज समझ सकते हैं, सदा ही बुरे समझे जायेंगे। हम स्वराज्यके अन्तर्गत भी नमक कर नहीं चाहते। चौकीदारी
कर शायद ऐसा कर नहीं है। हमें शायद स्वराज्यके अन्तर्गत भी चौकीदारोंकी जरूरत<noinclude></noinclude>
09tz4q87hhi8yhhf8efdr4kb9qa5a8i
671626
671623
2026-08-18T16:39:36Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671626
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||कुछ सुझाव|१४१}}</noinclude>दिया जायेगा, लेकिन जो अपने परिवेशपर नियन्त्रण रखनेके बजाय उसके प्रवाह में यह जायेगा उसे तो निश्चय ही दोषी माना जायेगा ।
हम सबका उद्देश्य है सार्वजनिक सविनय अवज्ञा । यह अवज्ञा कराई नहीं जा
सकती। अगर इस अवज्ञाको सचमुच अपना सार्वजनिक सविनय अवज्ञा नाम चरितार्थ करना है और यदि इसे सफल होना है तो इसको स्वयंस्फूर्त होना चाहिए, और जहाँ पहले ही जमीनको सींचा नहीं गया है, तैयार नहीं किया गया है, वहाँ यह निश्चित मानना चाहिए कि सर्वसाधारण इसके प्रति उत्साह नहीं दिखायेगा । हिंसाके विस्फोटके खिलाफ सर्वत्र अधिक से अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। मैंने कहा है कि इस बार हिंसा के विस्फोटके बावजूद सविनय प्रतिरोध जारी रहेगा; यह बात सच है लेकिन साथ ही यह बात भी उतनी ही सच है कि हमारी ओरसे हिंसा होनेपर संघर्षको हानि पहुँचेगी और इसकी प्रगति रुकेगी। दो परस्पर विरोधी शक्तियाँ एक साथ मिलकर इस प्रकार कभी भी काम नहीं कर सकती जिससे वे एक-दूसरीके लिए सहायक हो सकें। सविनय अवज्ञाकी योजना हिंसाको प्रभावहीन बनाने और
अन्ततः उसे बिलकुल समाप्त करके उसके स्थान पर अहिंसाको प्रतिष्ठित करने, घृणाके स्थानपर प्रेमको प्रतिष्ठित करने और लड़ाई-झगड़ेकी जगह मेज-जोल कायम करने के लिए बनाई गई है।
इसलिए हिंसाका विस्फोट होनेपर भी संघर्षको बन्द न करनेका मतलब सिर्फ यही है कि अगर हिंसाकी ज्वाला भड़की तो अहिंसा के पुजारी उसमें अपने-आपको
भस्म हो जाने देंगे, बल्कि वैसी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे इस बात के लिए प्रयत्न करेंगे कि वह ज्वाला उन्हें भस्म कर दे। वे सरकारकी संगठित हिंसा अथवा किसी
कुछ समूह या पूरे राष्ट्रकी छुट-पुट हिंसाके असहाय साक्षी बनकर नहीं बैठे रहेंगे। इसलिए प्रत्येक प्रान्तमें कार्यकर्तागण हर सम्भव पूर्वोपाय करनेके बाद इस संघर्ष में कूद पड़ेंगे, भले ही ऐसा करके वे मनुष्य जिसकी कल्पना कर सकता है, ऐसा बड़ेसे बड़ा खतरा ही क्यों न उठा रहे हों तब स्वभावतः सभी जगह जनताको उन
लोगोंके निर्णयको खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए जिनके बारेमें ऐसी ख्याति है कि ये पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अहिंसामें पूरी निष्ठाके साथ विश्वास रखते हैं।
इधर कुछ अन्य कानूनों की भी अवज्ञा करनेकी चर्चा हो रही है। लेकिन, यह सुझाव मुझे ठीक नहीं लगा है। मैं तो नमक -कानूनोंपर ही ध्यान केन्द्रित करनेमें विश्वास रखता हूँ। नमककी खानें लगभग सब जगह मिलती है। हमारा मंशा यह नहीं है कि बेची जाने लायक मात्रामें नमक तैयार किया जाये। हमारा मंशा तो नमक तैयार करके तथा अन्य प्रकारसे नमक-कानूनोंको जान-बूझकर भंग करना है।
इस सन्दर्भ में चौकीदारी कर से सम्बन्धित कानूनोंकी अवज्ञाका सुझाव दिया गया हैं। मेरे विचारसे यह कर वे शर्तें पूरी नहीं करता जो नमक कर पूरी करता है।
इरादा ऐसे कानूनोंको तोड़नेका है जो, जहाँ तक हम आज समझ सकते हैं, सदा ही बुरे समझे जायेंगे। हम स्वराज्यके अन्तर्गत भी नमक कर नहीं चाहते। चौकीदारी
कर शायद ऐसा कर नहीं है। हमें शायद स्वराज्यके अन्तर्गत भी चौकीदारोंकी जरूरत<noinclude></noinclude>
72955j47lx3z8qz5rh48r57qx2wklno
671722
671626
2026-08-19T06:30:52Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671722
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||कुछ सुझाव|१४१}}</noinclude>दिया जायेगा, लेकिन जो अपने परिवेशपर नियन्त्रण रखनेके बजाय उसके प्रवाहमें बह जायेगा उसे तो निश्चय ही दोषी माना जायेगा ।
हम सबका उद्देश्य है सार्वजनिक सविनय अवज्ञा । यह अवज्ञा कराई नहीं ज सकती। अगर इस अवज्ञाको सचमुच अपना सार्वजनिक सविनय अवज्ञा नाम चरितार्थ करना है और यदि इसे सफल होना है तो इसको स्वयं-स्फूर्त होना चाहिए, और जहाँ पहले ही जमीनको सींचा नहीं गया है, तैयार नहीं किया गया है, वहाँ यह निश्चित मानना चाहिए कि सर्वसाधारण इसके प्रति उत्साह नहीं दिखायेगा । हिंसाके विस्फोटके खिलाफ सर्वत्र अधिक से अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। मैंने कहा है कि इस बार हिंसा के विस्फोटके बावजूद सविनय प्रतिरोध जारी रहेगा; यह बात सच है लेकिन साथ ही यह बात भी उतनी ही सच है कि हमारी ओरसे हिंसा होनेपर संघर्षको हानि पहुँचेगी और इसकी प्रगति रुकेगी। दो परस्पर-विरोधी शक्तियाँ एक साथ मिलकर इस प्रकार कभी भी काम नहीं कर सकती जिससे वे एक-दूसरीके लिए सहायक हो सकें। सविनय अवज्ञाकी योजना हिंसाको प्रभावहीन बनाने और अन्ततः उसे बिलकुल समाप्त करके उसके स्थान पर अहिंसाको प्रतिष्ठित करने, घृणाके स्थानपर प्रेमको प्रतिष्ठित करने और लड़ाई-झगड़ेकी जगह मेज-जोल कायम करने के लिए बनाई गई है।
इसलिए हिंसाका विस्फोट होनेपर भी संघर्षको बन्द न करनेका मतलब सिर्फ यही है कि अगर हिंसाकी ज्वाला भड़की तो अहिंसा के पुजारी उसमें अपने-आपको
भस्म हो जाने देंगे, बल्कि वैसी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे इस बात के लिए प्रयत्न करेंगे कि वह ज्वाला उन्हें भस्म कर दे। वे सरकारकी संगठित हिंसा अथवा किसी
कुछ समूह या पूरे राष्ट्रकी छुट-पुट हिंसाके असहाय साक्षी बनकर नहीं बैठे रहेंगे। इसलिए प्रत्येक प्रान्तमें कार्यकर्तागण हर सम्भव पूर्वोपाय करनेके बाद इस संघर्ष में कूद पड़ेंगे, भले ही ऐसा करके वे मनुष्य जिसकी कल्पना कर सकता है, ऐसा बड़ेसे बड़ा खतरा ही क्यों न उठा रहे हों तब स्वभावतः सभी जगह जनताको उन
लोगोंके निर्णयको खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए जिनके बारेमें ऐसी ख्याति है कि ये पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अहिंसामें पूरी निष्ठाके साथ विश्वास रखते हैं।
इधर कुछ अन्य कानूनों की भी अवज्ञा करनेकी चर्चा हो रही है। लेकिन, यह सुझाव मुझे ठीक नहीं लगा है। मैं तो नमक -कानूनोंपर ही ध्यान केन्द्रित करनेमें विश्वास रखता हूँ। नमककी खानें लगभग सब जगह मिलती है। हमारा मंशा यह नहीं है कि बेची जाने लायक मात्रामें नमक तैयार किया जाये। हमारा मंशा तो नमक तैयार करके तथा अन्य प्रकारसे नमक-कानूनोंको जान-बूझकर भंग करना है।
इस सन्दर्भ में चौकीदारी कर से सम्बन्धित कानूनोंकी अवज्ञाका सुझाव दिया गया हैं। मेरे विचारसे यह कर वे शर्तें पूरी नहीं करता जो नमक कर पूरी करता है।
इरादा ऐसे कानूनोंको तोड़नेका है जो, जहाँ तक हम आज समझ सकते हैं, सदा ही बुरे समझे जायेंगे। हम स्वराज्यके अन्तर्गत भी नमक कर नहीं चाहते। चौकीदारी
कर शायद ऐसा कर नहीं है। हमें शायद स्वराज्यके अन्तर्गत भी चौकीदारोंकी जरूरत<noinclude></noinclude>
569xpbjp08nr9iylef23vq7cdmah0c4
671723
671722
2026-08-19T06:34:49Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671723
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||कुछ सुझाव|१४१}}</noinclude>दिया जायेगा, लेकिन जो अपने परिवेशपर नियन्त्रण रखनेके बजाय उसके प्रवाहमें बह जायेगा उसे तो निश्चय ही दोषी माना जायेगा ।
हम सबका उद्देश्य है सार्वजनिक सविनय अवज्ञा । यह अवज्ञा कराई नहीं ज सकती। अगर इस अवज्ञाको सचमुच अपना सार्वजनिक सविनय अवज्ञा नाम चरितार्थ करना है और यदि इसे सफल होना है तो इसको स्वयं-स्फूर्त होना चाहिए, और जहाँ पहले ही जमीनको सींचा नहीं गया है, तैयार नहीं किया गया है, वहाँ यह निश्चित मानना चाहिए कि सर्वसाधारण इसके प्रति उत्साह नहीं दिखायेगा । हिंसाके विस्फोटके खिलाफ सर्वत्र अधिक से अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। मैंने कहा है कि इस बार हिंसा के विस्फोटके बावजूद सविनय प्रतिरोध जारी रहेगा; यह बात सच है लेकिन साथ ही यह बात भी उतनी ही सच है कि हमारी ओरसे हिंसा होनेपर संघर्षको हानि पहुँचेगी और इसकी प्रगति रुकेगी। दो परस्पर-विरोधी शक्तियाँ एक साथ मिलकर इस प्रकार कभी भी काम नहीं कर सकती जिससे वे एक-दूसरीके लिए सहायक हो सकें। सविनय अवज्ञाकी योजना हिंसाको प्रभावहीन बनाने और अन्ततः उसे बिलकुल समाप्त करके उसके स्थान पर अहिंसाको प्रतिष्ठित करने, घृणाके स्थानपर प्रेमको प्रतिष्ठित करने और लड़ाई-झगड़ेकी जगह मेज-जोल कायम करने के लिए बनाई गई है।
इसलिए हिंसाका विस्फोट होनेपर भी संघर्षको बन्द न करनेका मतलब सिर्फ यही है कि अगर हिंसाकी ज्वाला भड़की तो अहिंसा के पुजारी उसमें अपने-आपको
भस्म हो जाने देंगे, बल्कि वैसी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे इस बात के लिए प्रयत्न करेंगे कि वह ज्वाला उन्हें भस्म कर दे। वे सरकारकी संगठित हिंसा अथवा किसी
क्रुद्ध समूह या पूरे राष्ट्रकी छुट-पुट हिंसाके असहाय साक्षी बनकर नहीं बैठे रहेंगे। इसलिए प्रत्येक प्रान्तमें कार्यकर्तागण हर सम्भव पूर्वोपाय करनेके बाद इस संघर्ष में कूद पड़ेंगे, भले ही ऐसा करके वे, मनुष्य जिसकी कल्पना कर सकता है, ऐसा बड़ेसे बड़ा खतरा ही क्यों न उठा रहे हों तब स्वभावतः सभी जगह जनताको उन
लोगोंके निर्णयको खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए जिनके बारेमें ऐसी ख्याति है कि ये पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अहिंसामें पूरी निष्ठाके साथ विश्वास रखते हैं।
इधर कुछ अन्य कानूनों की भी अवज्ञा करनेकी चर्चा हो रही है। लेकिन, यह सुझाव मुझे ठीक नहीं लगा है। मैं तो नमक -कानूनोंपर ही ध्यान केन्द्रित करनेमें विश्वास रखता हूँ। नमककी खानें लगभग सब जगह मिलती है। हमारा मंशा यह नहीं है कि बेची जाने लायक मात्रामें नमक तैयार किया जाये। हमारा मंशा तो नमक तैयार करके तथा अन्य प्रकारसे नमक-कानूनोंको जान-बूझकर भंग करना है।
इस सन्दर्भ में चौकीदारी कर से सम्बन्धित कानूनोंकी अवज्ञाका सुझाव दिया गया हैं। मेरे विचारसे यह कर वे शर्तें पूरी नहीं करता जो नमक कर पूरी करता है।
इरादा ऐसे कानूनोंको तोड़नेका है जो, जहाँ तक हम आज समझ सकते हैं, सदा ही बुरे समझे जायेंगे। हम स्वराज्यके अन्तर्गत भी नमक कर नहीं चाहते। चौकीदारी
कर शायद ऐसा कर नहीं है। हमें शायद स्वराज्यके अन्तर्गत भी चौकीदारोंकी जरूरत<noinclude></noinclude>
coqgl1to0a7sr3o82kk2fye884zpgd6
671730
671723
2026-08-19T07:34:51Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671730
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||कुछ सुझाव|१४१}}</noinclude>दिया जायेगा, लेकिन जो अपने परिवेशपर नियन्त्रण रखनेके बजाय उसके प्रवाहमें बह जायेगा उसे तो निश्चय ही दोषी माना जायेगा ।
हम सबका उद्देश्य है सार्वजनिक सविनय अवज्ञा । यह अवज्ञा कराई नहीं ज सकती। अगर इस अवज्ञाको सचमुच अपना सार्वजनिक सविनय अवज्ञा नाम चरितार्थ करना है और यदि इसे सफल होना है तो इसको स्वयं-स्फूर्त होना चाहिए, और जहाँ पहले ही जमीनको सींचा नहीं गया है, तैयार नहीं किया गया है, वहाँ यह निश्चित मानना चाहिए कि सर्वसाधारण इसके प्रति उत्साह नहीं दिखायेगा । हिंसाके विस्फोटके खिलाफ सर्वत्र अधिक से अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। मैंने कहा है कि इस बार हिंसा के विस्फोटके बावजूद सविनय प्रतिरोध जारी रहेगा; यह बात सच है लेकिन साथ ही यह बात भी उतनी ही सच है कि हमारी ओरसे हिंसा होनेपर संघर्षको हानि पहुँचेगी और इसकी प्रगति रुकेगी। दो परस्पर-विरोधी शक्तियाँ एक साथ मिलकर इस प्रकार कभी भी काम नहीं कर सकती जिससे वे एक-दूसरीके लिए सहायक हो सकें। सविनय अवज्ञाकी योजना हिंसाको प्रभावहीन बनाने और अन्ततः उसे बिलकुल समाप्त करके उसके स्थान पर अहिंसाको प्रतिष्ठित करने, घृणाके स्थानपर प्रेमको प्रतिष्ठित करने और लड़ाई-झगड़ेकी जगह मेज-जोल कायम करने के लिए बनाई गई है।
इसलिए हिंसाका विस्फोट होनेपर भी संघर्षको बन्द न करनेका मतलब सिर्फ यही है कि अगर हिंसाकी ज्वाला भड़की तो अहिंसा के पुजारी उसमें अपने-आपको
भस्म हो जाने देंगे, बल्कि वैसी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे इस बात के लिए प्रयत्न करेंगे कि वह ज्वाला उन्हें भस्म कर दे। वे सरकारकी संगठित हिंसा अथवा किसी
क्रुद्ध समूह या पूरे राष्ट्रकी छुट-पुट हिंसाके असहाय साक्षी बनकर नहीं बैठे रहेंगे। इसलिए प्रत्येक प्रान्तमें कार्यकर्तागण हर सम्भव पूर्वोपाय करनेके बाद इस संघर्ष में कूद पड़ेंगे, भले ही ऐसा करके वे, मनुष्य जिसकी कल्पना कर सकता है, ऐसा बड़ेसे-बड़ा खतरा ही क्यों न उठा रहे हों। तब स्वभावतः सभी जगह जनताको उन
लोगोंके निर्णयको खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए जिनके बारेमें ऐसी ख्याति है कि ये पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अहिंसामें पूरी निष्ठाके साथ विश्वास रखते हैं।
इधर कुछ अन्य कानूनों की भी अवज्ञा करनेकी चर्चा हो रही है। लेकिन, यह सुझाव मुझे ठीक नहीं लगा है। मैं तो नमक-कानूनोंपर ही ध्यान केन्द्रित करनेमें विश्वास रखता हूँ। नमककी खानें लगभग सब जगह मिलती है। हमारा मंशा यह नहीं है कि बेची जाने लायक मात्रामें नमक तैयार किया जाये। हमारा मंशा तो नमक तैयार करके तथा अन्य प्रकारसे नमक-कानूनोंको जान-बूझकर भंग करना है।
इस सन्दर्भ में चौकीदारी कर से सम्बन्धित कानूनोंकी अवज्ञाका सुझाव दिया गया हैं। मेरे विचारसे यह कर वे शर्तें पूरी नहीं करता जो नमक-कर पूरी करता है।
इरादा ऐसे कानूनोंको तोड़नेका है जो, जहाँ तक हम आज समझ सकते हैं, सदा ही बुरे समझे जायेंगे। हम स्वराज्यके अन्तर्गत भी नमक-कर नहीं चाहते। चौकीदारी
कर शायद ऐसा कर नहीं है। हमें शायद स्वराज्यके अन्तर्गत भी चौकीदारोंकी जरूरत<noinclude></noinclude>
otexrhvnfqpcapzddxg3ddhmwtruqf6
671731
671730
2026-08-19T07:35:04Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* शोधित */
671731
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||कुछ सुझाव|१४१}}</noinclude>दिया जायेगा, लेकिन जो अपने परिवेशपर नियन्त्रण रखनेके बजाय उसके प्रवाहमें बह जायेगा उसे तो निश्चय ही दोषी माना जायेगा ।
हम सबका उद्देश्य है सार्वजनिक सविनय अवज्ञा । यह अवज्ञा कराई नहीं ज सकती। अगर इस अवज्ञाको सचमुच अपना सार्वजनिक सविनय अवज्ञा नाम चरितार्थ करना है और यदि इसे सफल होना है तो इसको स्वयं-स्फूर्त होना चाहिए, और जहाँ पहले ही जमीनको सींचा नहीं गया है, तैयार नहीं किया गया है, वहाँ यह निश्चित मानना चाहिए कि सर्वसाधारण इसके प्रति उत्साह नहीं दिखायेगा । हिंसाके विस्फोटके खिलाफ सर्वत्र अधिक से अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। मैंने कहा है कि इस बार हिंसा के विस्फोटके बावजूद सविनय प्रतिरोध जारी रहेगा; यह बात सच है लेकिन साथ ही यह बात भी उतनी ही सच है कि हमारी ओरसे हिंसा होनेपर संघर्षको हानि पहुँचेगी और इसकी प्रगति रुकेगी। दो परस्पर-विरोधी शक्तियाँ एक साथ मिलकर इस प्रकार कभी भी काम नहीं कर सकती जिससे वे एक-दूसरीके लिए सहायक हो सकें। सविनय अवज्ञाकी योजना हिंसाको प्रभावहीन बनाने और अन्ततः उसे बिलकुल समाप्त करके उसके स्थान पर अहिंसाको प्रतिष्ठित करने, घृणाके स्थानपर प्रेमको प्रतिष्ठित करने और लड़ाई-झगड़ेकी जगह मेज-जोल कायम करने के लिए बनाई गई है।
इसलिए हिंसाका विस्फोट होनेपर भी संघर्षको बन्द न करनेका मतलब सिर्फ यही है कि अगर हिंसाकी ज्वाला भड़की तो अहिंसा के पुजारी उसमें अपने-आपको
भस्म हो जाने देंगे, बल्कि वैसी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे इस बात के लिए प्रयत्न करेंगे कि वह ज्वाला उन्हें भस्म कर दे। वे सरकारकी संगठित हिंसा अथवा किसी
क्रुद्ध समूह या पूरे राष्ट्रकी छुट-पुट हिंसाके असहाय साक्षी बनकर नहीं बैठे रहेंगे। इसलिए प्रत्येक प्रान्तमें कार्यकर्तागण हर सम्भव पूर्वोपाय करनेके बाद इस संघर्ष में कूद पड़ेंगे, भले ही ऐसा करके वे, मनुष्य जिसकी कल्पना कर सकता है, ऐसा बड़ेसे-बड़ा खतरा ही क्यों न उठा रहे हों। तब स्वभावतः सभी जगह जनताको उन
लोगोंके निर्णयको खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए जिनके बारेमें ऐसी ख्याति है कि ये पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करनेके लिए अहिंसामें पूरी निष्ठाके साथ विश्वास रखते हैं।
इधर कुछ अन्य कानूनों की भी अवज्ञा करनेकी चर्चा हो रही है। लेकिन, यह सुझाव मुझे ठीक नहीं लगा है। मैं तो नमक-कानूनोंपर ही ध्यान केन्द्रित करनेमें विश्वास रखता हूँ। नमककी खानें लगभग सब जगह मिलती है। हमारा मंशा यह नहीं है कि बेची जाने लायक मात्रामें नमक तैयार किया जाये। हमारा मंशा तो नमक तैयार करके तथा अन्य प्रकारसे नमक-कानूनोंको जान-बूझकर भंग करना है।
इस सन्दर्भ में चौकीदारी कर से सम्बन्धित कानूनोंकी अवज्ञाका सुझाव दिया गया हैं। मेरे विचारसे यह कर वे शर्तें पूरी नहीं करता जो नमक-कर पूरी करता है।
इरादा ऐसे कानूनोंको तोड़नेका है जो, जहाँ तक हम आज समझ सकते हैं, सदा ही बुरे समझे जायेंगे। हम स्वराज्यके अन्तर्गत भी नमक-कर नहीं चाहते। चौकीदारी
कर शायद ऐसा कर नहीं है। हमें शायद स्वराज्यके अन्तर्गत भी चौकीदारोंकी जरूरत<noinclude></noinclude>
adl7jasvaaabentm8ans4o478561uax
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८४
250
197226
671732
669746
2026-08-19T07:43:20Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
671732
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हो। यदि बात ऐसी है तो जबतक विरोध किये जानेके लिए दूसरे कर या दूसरे
कानून हैं तब तक हमें इस करको हाथ नहीं लगाना चाहिए। फिर, वन सम्बन्धी कानून हैं। उनका अध्ययन मैने नहीं किया है। इसलिए मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं लिख सकता । निस्सन्देह, हम यह नहीं चाहते कि हमार जंगलोंको बिलकुल नष्ट कर दिया जाये या आर्थिक लाभ-हानिका खयाल किये बिना लकड़ियाँ काटी जायें। मुझे इसमें सन्देह नहीं है कि इन कानूनों में सुधार करनेकी आवश्यकता है। और इन कानूनोंपर अमल करते हुए ज्यादा मानवीय दृष्टिकोण रखना तो शायद और अधिक आवश्यक है। लेकिन इस सुधारके लिए स्वराज्य प्राप्त होने तक प्रतीक्षा की जा सकती है। साथ ही, जहाँ तक मैं जानता हूँ, इन कानूनोंके या उन्हें जिस तरह लागू किया जाता है उसके खिलाफ हमारी जो शिकायतें हैं, उनके बारेमें आम जनताको ठीकसे बताया भी नहीं गया है। फिर चरागाहोंकी बात लें, जिनका जंगलोंसे बहुत निकटका सम्बन्ध है। मैं कह नहीं सकता कि जनता द्वारा उनके उपयोगको विनियमित करनेवाले विनियम इतने
खराब हैं कि उनके खिलाफ कोई उचित शिकायत हो सकती है। मेरे विचारसे तो इससे बहुत अच्छा होगा शराबकी दुकानों, अफीमके अड्डों और विदेशी कपड़ोंकी दुकानोंपर धरना देना । यद्यपि धरना देना अपने-आपमें गैर-कानूनी काम नहीं है, लेकिन अतीत के अनुभवसे प्रकट होता है कि सरकार कारगर धरनेदारीको रोकना चाहेगी। लेकिन, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। हम तो अपने सिद्धान्त अनुरूप जहाँ कहीं उसका प्रतिरोध कर सकते हैं वहाँ प्रतिरोध करनेका निश्चय करके ही चल रहे हैं। लेकिन मुझे शराब बेचनेवालोंके धोखा-धड़ी-भरे व्यवहार और विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंके अज्ञानजनित कोषका भय है। मैं चाहूँगा कि इन दो बुराइयोंके खिलाफ जनमत और भी अच्छी तरह तैयार किया जाये और कार्यकर्तागण विक्रेताओं और ग्राहकोंको अधिक सुचारु ढंगसे इन बुराइयोंसे अवगत करायें। हमें इन दोनों बुराइयोंको आज या कल दूर करना ही है। इसलिए जहाँ कहीं भी कार्यकर्ताओंको पूरा भरोसा है कि मैंने जिस ढंगके खतरोंका उल्लेख किया है उस ढंगके अवांछनीय खतरे उठाये बिना वे धरना देनेका काम चला सकते हैं, वहाँ उन्हें यह अभियान शुरू कर देना चाहिए। लेकिन किसी भी हालत में उन्हें सिर्फ इसलिए यह अभियान शुरू नहीं करना चाहिए कि जब आगे बढ़नेका संकेत मिल चुका है और नमक सम्बन्धी कानूनोंको तोड़नेका कोई उपाय उनके सामने नहीं है तो उन्हें कुछ-न-कुछ तो करना ही है। फिलहाल तो मुझे नमक-सम्बन्धी कानूनोंको भंग करना ही सबसे अधिक निरापद जान पड़ता है। ऊपर मैंने जो कुछ कहा है वह तो एहतियातन ही कहा है। जहाँ कहीं कार्यकर्ता यह महसूस करते हों कि उनकी अन्तरात्मा उन्हें आगे बढ़नेका आदेश दे रही है और वे खुद हिंसाकी भावनासे पूर्णतः मुक्त हैं, वहीं उन्हें संकेत मिलते ही, वे जैसी सविनय अवज्ञा करना आवश्यक और वांछनीय समझें, वैसी अवज्ञा शुरू कर देनेकी उन्हें पूरी छूट है, लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके नियन्त्रणमें ही ।<noinclude></noinclude>
qesz7oce28tctmbhsjiundvyh8pp2fk
671756
671732
2026-08-19T09:48:33Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671756
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh|१४२|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय|}}</noinclude>हो। यदि बात ऐसी है तो जबतक विरोध किये जानेके लिए दूसरे कर या दूसरे
कानून हैं तब तक हमें इस करको हाथ नहीं लगाना चाहिए।
फिर, वन सम्बन्धी कानून हैं। उनका अध्ययन मैने नहीं किया है। इसलिए मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं लिख सकता । निस्सन्देह, हम यह नहीं चाहते कि हमार जंगलोंको बिलकुल नष्ट कर दिया जाये या आर्थिक लाभ-हानिका खयाल किये बिना लकड़ियाँ काटी जायें। मुझे इसमें सन्देह नहीं है कि इन कानूनों में सुधार करनेकी आवश्यकता है। और इन कानूनोंपर अमल करते हुए ज्यादा मानवीय दृष्टिकोण रखना तो शायद और अधिक आवश्यक है। लेकिन इस सुधारके लिए स्वराज्य प्राप्त होने तक प्रतीक्षा की जा सकती है। साथ ही, जहाँ तक मैं जानता हूँ, इन कानूनोंके या उन्हें जिस तरह लागू किया जाता है उसके खिलाफ हमारी जो शिकायतें हैं, उनके बारेमें आम जनताको ठीकसे बताया भी नहीं गया है।
फिर चरागाहोंकी बात लें, जिनका जंगलोंसे बहुत निकटका सम्बन्ध है। मैं कह नहीं सकता कि जनता द्वारा उनके उपयोगको विनियमित करनेवाले विनियम इतने
खराब हैं कि उनके खिलाफ कोई उचित शिकायत हो सकती है।
मेरे विचारसे तो इससे बहुत अच्छा होगा शराबकी दुकानों, अफीमके अड्डों और विदेशी कपड़ोंकी दुकानोंपर धरना देना । यद्यपि धरना देना अपने-आपमें गैर-कानूनी काम नहीं है, लेकिन अतीत के अनुभवसे प्रकट होता है कि सरकार कारगर धरनेदारीको रोकना चाहेगी। लेकिन, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। हम तो अपने सिद्धान्त अनुरूप जहाँ कहीं उसका प्रतिरोध कर सकते हैं वहाँ प्रतिरोध करनेका निश्चय करके ही चल रहे हैं। लेकिन मुझे शराब बेचनेवालोंके धोखा-धड़ी-भरे व्यवहार और विदेशी वस्त्र-विक्रेताओंके अज्ञानजनित कोषका भय है। मैं चाहूँगा कि इन दो बुराइयोंके खिलाफ जनमत और भी अच्छी तरह तैयार किया जाये और कार्यकर्तागण विक्रेताओं और ग्राहकोंको अधिक सुचारु ढंगसे इन बुराइयोंसे अवगत करायें। हमें इन दोनों बुराइयोंको आज या कल दूर करना ही है। इसलिए जहाँ कहीं भी कार्यकर्ताओंको पूरा भरोसा है कि मैंने जिस ढंगके खतरोंका उल्लेख किया है उस ढंगके अवांछनीय खतरे उठाये बिना वे धरना देनेका काम चला सकते हैं, वहाँ उन्हें यह अभियान शुरू कर देना चाहिए। लेकिन किसी भी हालत में उन्हें सिर्फ इसलिए यह अभियान शुरू नहीं करना चाहिए कि जब आगे बढ़नेका संकेत मिल चुका है और नमक सम्बन्धी कानूनोंको तोड़नेका कोई उपाय उनके सामने नहीं है तो उन्हें कुछ-न-कुछ तो करना ही है। फिलहाल तो मुझे नमक-सम्बन्धी कानूनोंको भंग करना ही सबसे अधिक निरापद जान पड़ता है। ऊपर मैंने जो कुछ कहा है वह तो एहतियातन ही कहा है। जहाँ कहीं कार्यकर्ता यह महसूस करते हों कि उनकी अन्तरात्मा उन्हें आगे बढ़नेका आदेश दे रही है और वे खुद हिंसाकी भावनासे पूर्णतः मुक्त हैं, वहीं उन्हें संकेत मिलते ही, वे जैसी सविनय अवज्ञा करना आवश्यक और वांछनीय समझें, वैसी अवज्ञा शुरू कर देनेकी उन्हें पूरी छूट है, लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके नियन्त्रणमें ही ।<noinclude></noinclude>
ru8l9apyq8fw0q3wtf7j18hy24qunju
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/१८५
250
197227
671759
669747
2026-08-19T10:02:09Z
Kumari Arpana Sinha
2191
/* अशोधित */
671759
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}</noinclude>इस बीच, अबसे लेकर ६ अप्रैल तक, हर प्रान्तको क्षण भरका समय बर्बाद किये बिना पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि यह अवसर आते ही अपने सैनिकों-
को संघर्ष में उतार दे ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{ C|{{larger|'''१३४. टिप्पणियाँ'''}}}}
खद्दरको कमी
आजकल स्वभावतः खद्दरकी खरीदारी बड़ी तेजीसे चल रही है और अखिल
भारतीय चरखा संघके कार्यालयमें इस आशयके पत्र आ रहे हैं कि शीघ्र ही खद्दरकी
कमी होने जा रही है। मतलब कि स्थिति वैसी ही है जैसी होनी चाहिए थी। इसका
उपाय यह है कि पूरे खादीधारी लोग अपनी जरूरतोंमें कटौती करें, जिन्होंने खद्दरको
अभी हाल में ही अपनाया है वे उतना ही खद्दर खरीदें जितनेकी उनको जरूरत है
और सभी लोग खादीका उत्पादन बढ़ाने में सहायता दें। जिस प्रकार गेहूँ की आपूर्ति
निश्चित होनेपर रोटीकी कमी कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार यदि रुईकी आपूत्ति
निश्चित हो तो खद्दकी कमी होनेका कोई कारण नहीं और रुईकी आपूतिमें टोटा
पढ़नेका कोई खतरा नहीं है। असली कठिनाई तो यह है कि लोग अकारण ही ऐसा
मानते हैं कि खानेकी चीजोंकी तरह खद्दर हमारे गाँवों और घरोंमें तैयार नहीं किया
जा सकता। अगर लोग तकलीको अपनाकर तत्काल कताई शुरू कर देने को तैयार
हों तो उन्हें चरखा चलाना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है। तब उन्हें सिर्फ इतना
ही करना होगा कि ये साधारण बुनकरोंके पास जाकर उन्हें अपना सूत बुननेको राजी
करें। अगर ठीक ढंगकी राष्ट्रीय जागृति लाई जा सके तो बुनकर लोग हाथकते
सूतको आजकी तरह शंकाकी दृष्टिसे नहीं देखेंगे। बड़े पैमाने पर खद्दरका ऐसा
संगठन करनेके लिए जनतामें इस चीजके प्रति सच्चा प्रेम होना आवश्यक है। सविनय
अवज्ञामें प्रत्येक व्यक्ति शरीक नहीं हो सकता, लेकिन खद्दर तैयार करनेमें तो हरएक
हाथ बँटा सकता है। पाठक यह जान लें कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके देश-भरके
नेताओंमें अधिकांशतः यही लोग हैं जो पक्के खद्दरधारी रहे हैं। इसलिए यदि लोग
आम तौरपर खुद ही सूत कातना और अपनी सहायता आप करना शुरू नहीं करेंगे तो
उनके सादी कार्यसे वियुक्त हो जानेका खद्दरके उत्पादनपर बड़ा गम्भीर असर पड़ेगा ।
मीराबाई प्रबन्धक नहीं
मैं अखबारोंमें बार-बार ऐसी खबर देख रहा हूँ कि मेरी जगह श्रीमती मीरा-
बाई स्लेड आश्रमके प्रधानकी हैसियतसे उसका प्रबन्ध कर रही हैं। यह खबर सच
नहीं है। बहुत समय से आश्रमकी देख-रेख एक प्रबन्ध-मण्डल करता आ रहा है,
जिसके अध्यक्ष महादेव देसाई हैं, उपाध्यक्ष इमाम साहब बावजीर और मन्त्री नारणदास
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
l3focncny73htcydyi5mljiwrg8am21
671760
671759
2026-08-19T10:03:00Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671760
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude>इस बीच, अबसे लेकर ६ अप्रैल तक, हर प्रान्तको क्षण भरका समय बर्बाद किये बिना पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि यह अवसर आते ही अपने सैनिकों-
को संघर्ष में उतार दे ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{ C|{{larger|'''१३४. टिप्पणियाँ'''}}}}
खद्दरको कमी
आजकल स्वभावतः खद्दरकी खरीदारी बड़ी तेजीसे चल रही है और अखिल
भारतीय चरखा संघके कार्यालयमें इस आशयके पत्र आ रहे हैं कि शीघ्र ही खद्दरकी
कमी होने जा रही है। मतलब कि स्थिति वैसी ही है जैसी होनी चाहिए थी। इसका
उपाय यह है कि पूरे खादीधारी लोग अपनी जरूरतोंमें कटौती करें, जिन्होंने खद्दरको
अभी हाल में ही अपनाया है वे उतना ही खद्दर खरीदें जितनेकी उनको जरूरत है
और सभी लोग खादीका उत्पादन बढ़ाने में सहायता दें। जिस प्रकार गेहूँ की आपूर्ति
निश्चित होनेपर रोटीकी कमी कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार यदि रुईकी आपूत्ति
निश्चित हो तो खद्दकी कमी होनेका कोई कारण नहीं और रुईकी आपूतिमें टोटा
पढ़नेका कोई खतरा नहीं है। असली कठिनाई तो यह है कि लोग अकारण ही ऐसा
मानते हैं कि खानेकी चीजोंकी तरह खद्दर हमारे गाँवों और घरोंमें तैयार नहीं किया
जा सकता। अगर लोग तकलीको अपनाकर तत्काल कताई शुरू कर देने को तैयार
हों तो उन्हें चरखा चलाना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है। तब उन्हें सिर्फ इतना
ही करना होगा कि ये साधारण बुनकरोंके पास जाकर उन्हें अपना सूत बुननेको राजी
करें। अगर ठीक ढंगकी राष्ट्रीय जागृति लाई जा सके तो बुनकर लोग हाथकते
सूतको आजकी तरह शंकाकी दृष्टिसे नहीं देखेंगे। बड़े पैमाने पर खद्दरका ऐसा
संगठन करनेके लिए जनतामें इस चीजके प्रति सच्चा प्रेम होना आवश्यक है। सविनय
अवज्ञामें प्रत्येक व्यक्ति शरीक नहीं हो सकता, लेकिन खद्दर तैयार करनेमें तो हरएक
हाथ बँटा सकता है। पाठक यह जान लें कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके देश-भरके
नेताओंमें अधिकांशतः यही लोग हैं जो पक्के खद्दरधारी रहे हैं। इसलिए यदि लोग
आम तौरपर खुद ही सूत कातना और अपनी सहायता आप करना शुरू नहीं करेंगे तो
उनके सादी कार्यसे वियुक्त हो जानेका खद्दरके उत्पादनपर बड़ा गम्भीर असर पड़ेगा ।
मीराबाई प्रबन्धक नहीं
मैं अखबारोंमें बार-बार ऐसी खबर देख रहा हूँ कि मेरी जगह श्रीमती मीरा-
बाई स्लेड आश्रमके प्रधानकी हैसियतसे उसका प्रबन्ध कर रही हैं। यह खबर सच
नहीं है। बहुत समय से आश्रमकी देख-रेख एक प्रबन्ध-मण्डल करता आ रहा है,
जिसके अध्यक्ष महादेव देसाई हैं, उपाध्यक्ष इमाम साहब बावजीर और मन्त्री नारणदास
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
joukepuo4y7hx6jib68hgp4kqnt5gp4
671762
671760
2026-08-19T10:13:09Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671762
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude>इस बीच, अबसे लेकर ६ अप्रैल तक, हर प्रान्तको क्षण भरका समय बर्बाद किये बिना पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि यह अवसर आते ही अपने सैनिकों-
को संघर्ष में उतार दे ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{ C|{{larger|'''१३४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|{{large|'''खद्दरकी कमी'''}}}}
आजकल स्वभावतः खद्दरकी खरीदारी बड़ी तेजीसे चल रही है और अखिल
भारतीय चरखा संघके कार्यालयमें इस आशयके पत्र आ रहे हैं कि शीघ्र ही खद्दरकी
कमी होने जा रही है। मतलब कि स्थिति वैसी ही है जैसी होनी चाहिए थी। इसका
उपाय यह है कि पूरे खादीधारी लोग अपनी जरूरतोंमें कटौती करें, जिन्होंने खद्दरको
अभी हाल में ही अपनाया है वे उतना ही खद्दर खरीदें जितनेकी उनको जरूरत है
और सभी लोग खादीका उत्पादन बढ़ाने में सहायता दें। जिस प्रकार गेहूँ की आपूर्ति
निश्चित होनेपर रोटीकी कमी कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार यदि रुईकी आपूत्ति
निश्चित हो तो खद्दकी कमी होनेका कोई कारण नहीं और रुईकी आपूतिमें टोटा
पढ़नेका कोई खतरा नहीं है। असली कठिनाई तो यह है कि लोग अकारण ही ऐसा
मानते हैं कि खानेकी चीजोंकी तरह खद्दर हमारे गाँवों और घरोंमें तैयार नहीं किया
जा सकता। अगर लोग तकलीको अपनाकर तत्काल कताई शुरू कर देने को तैयार
हों तो उन्हें चरखा चलाना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है। तब उन्हें सिर्फ इतना
ही करना होगा कि ये साधारण बुनकरोंके पास जाकर उन्हें अपना सूत बुननेको राजी
करें। अगर ठीक ढंगकी राष्ट्रीय जागृति लाई जा सके तो बुनकर लोग हाथकते
सूतको आजकी तरह शंकाकी दृष्टिसे नहीं देखेंगे। बड़े पैमाने पर खद्दरका ऐसा
संगठन करनेके लिए जनतामें इस चीजके प्रति सच्चा प्रेम होना आवश्यक है। सविनय
अवज्ञामें प्रत्येक व्यक्ति शरीक नहीं हो सकता, लेकिन खद्दर तैयार करनेमें तो हरएक
हाथ बँटा सकता है। पाठक यह जान लें कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके देश-भरके
नेताओंमें अधिकांशतः यही लोग हैं जो पक्के खद्दरधारी रहे हैं। इसलिए यदि लोग
आम तौरपर खुद ही सूत कातना और अपनी सहायता आप करना शुरू नहीं करेंगे तो
उनके सादी कार्यसे वियुक्त हो जानेका खद्दरके उत्पादनपर बड़ा गम्भीर असर पड़ेगा ।
मीराबाई प्रबन्धक नहीं
मैं अखबारोंमें बार-बार ऐसी खबर देख रहा हूँ कि मेरी जगह श्रीमती मीरा-
बाई स्लेड आश्रमके प्रधानकी हैसियतसे उसका प्रबन्ध कर रही हैं। यह खबर सच
नहीं है। बहुत समय से आश्रमकी देख-रेख एक प्रबन्ध-मण्डल करता आ रहा है,
जिसके अध्यक्ष महादेव देसाई हैं, उपाध्यक्ष इमाम साहब बावजीर और मन्त्री नारणदास
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
5a2xkr20uaxrvs30e0eb4h9svc2i42v
671763
671762
2026-08-19T10:13:35Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671763
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude>इस बीच, अबसे लेकर ६ अप्रैल तक, हर प्रान्तको क्षण भरका समय बर्बाद किये बिना पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि यह अवसर आते ही अपने सैनिकों-
को संघर्ष में उतार दे ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{ C|{{larger|'''१३४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|{{larger|'''खद्दरकी कमी'''}}}}
आजकल स्वभावतः खद्दरकी खरीदारी बड़ी तेजीसे चल रही है और अखिल
भारतीय चरखा संघके कार्यालयमें इस आशयके पत्र आ रहे हैं कि शीघ्र ही खद्दरकी
कमी होने जा रही है। मतलब कि स्थिति वैसी ही है जैसी होनी चाहिए थी। इसका
उपाय यह है कि पूरे खादीधारी लोग अपनी जरूरतोंमें कटौती करें, जिन्होंने खद्दरको
अभी हाल में ही अपनाया है वे उतना ही खद्दर खरीदें जितनेकी उनको जरूरत है
और सभी लोग खादीका उत्पादन बढ़ाने में सहायता दें। जिस प्रकार गेहूँ की आपूर्ति
निश्चित होनेपर रोटीकी कमी कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार यदि रुईकी आपूत्ति
निश्चित हो तो खद्दकी कमी होनेका कोई कारण नहीं और रुईकी आपूतिमें टोटा
पढ़नेका कोई खतरा नहीं है। असली कठिनाई तो यह है कि लोग अकारण ही ऐसा
मानते हैं कि खानेकी चीजोंकी तरह खद्दर हमारे गाँवों और घरोंमें तैयार नहीं किया
जा सकता। अगर लोग तकलीको अपनाकर तत्काल कताई शुरू कर देने को तैयार
हों तो उन्हें चरखा चलाना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है। तब उन्हें सिर्फ इतना
ही करना होगा कि ये साधारण बुनकरोंके पास जाकर उन्हें अपना सूत बुननेको राजी
करें। अगर ठीक ढंगकी राष्ट्रीय जागृति लाई जा सके तो बुनकर लोग हाथकते
सूतको आजकी तरह शंकाकी दृष्टिसे नहीं देखेंगे। बड़े पैमाने पर खद्दरका ऐसा
संगठन करनेके लिए जनतामें इस चीजके प्रति सच्चा प्रेम होना आवश्यक है। सविनय
अवज्ञामें प्रत्येक व्यक्ति शरीक नहीं हो सकता, लेकिन खद्दर तैयार करनेमें तो हरएक
हाथ बँटा सकता है। पाठक यह जान लें कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके देश-भरके
नेताओंमें अधिकांशतः यही लोग हैं जो पक्के खद्दरधारी रहे हैं। इसलिए यदि लोग
आम तौरपर खुद ही सूत कातना और अपनी सहायता आप करना शुरू नहीं करेंगे तो
उनके सादी कार्यसे वियुक्त हो जानेका खद्दरके उत्पादनपर बड़ा गम्भीर असर पड़ेगा ।
मीराबाई प्रबन्धक नहीं
मैं अखबारोंमें बार-बार ऐसी खबर देख रहा हूँ कि मेरी जगह श्रीमती मीरा-
बाई स्लेड आश्रमके प्रधानकी हैसियतसे उसका प्रबन्ध कर रही हैं। यह खबर सच
नहीं है। बहुत समय से आश्रमकी देख-रेख एक प्रबन्ध-मण्डल करता आ रहा है,
जिसके अध्यक्ष महादेव देसाई हैं, उपाध्यक्ष इमाम साहब बावजीर और मन्त्री नारणदास
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
mblmxocrazdbbnj999q1qvpaghxxmc1
671764
671763
2026-08-19T10:14:58Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671764
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude>इस बीच, अबसे लेकर ६ अप्रैल तक, हर प्रान्तको क्षण भरका समय बर्बाद किये बिना पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि यह अवसर आते ही अपने सैनिकों-
को संघर्ष में उतार दे ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{ C|{{larger|'''१३४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|{{larger|'''खद्दरकी कमी'''}}}}
आजकल स्वभावतः खद्दरकी खरीदारी बड़ी तेजीसे चल रही है और अखिल
भारतीय चरखा संघके कार्यालयमें इस आशयके पत्र आ रहे हैं कि शीघ्र ही खद्दरकी
कमी होने जा रही है। मतलब कि स्थिति वैसी ही है जैसी होनी चाहिए थी। इसका
उपाय यह है कि पूरे खादीधारी लोग अपनी जरूरतोंमें कटौती करें, जिन्होंने खद्दरको
अभी हाल में ही अपनाया है वे उतना ही खद्दर खरीदें जितनेकी उनको जरूरत है
और सभी लोग खादीका उत्पादन बढ़ाने में सहायता दें। जिस प्रकार गेहूँ की आपूर्ति
निश्चित होनेपर रोटीकी कमी कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार यदि रुईकी आपूत्ति
निश्चित हो तो खद्दकी कमी होनेका कोई कारण नहीं और रुईकी आपूतिमें टोटा
पढ़नेका कोई खतरा नहीं है। असली कठिनाई तो यह है कि लोग अकारण ही ऐसा
मानते हैं कि खानेकी चीजोंकी तरह खद्दर हमारे गाँवों और घरोंमें तैयार नहीं किया
जा सकता। अगर लोग तकलीको अपनाकर तत्काल कताई शुरू कर देने को तैयार
हों तो उन्हें चरखा चलाना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है। तब उन्हें सिर्फ इतना
ही करना होगा कि ये साधारण बुनकरोंके पास जाकर उन्हें अपना सूत बुननेको राजी
करें। अगर ठीक ढंगकी राष्ट्रीय जागृति लाई जा सके तो बुनकर लोग हाथकते
सूतको आजकी तरह शंकाकी दृष्टिसे नहीं देखेंगे। बड़े पैमाने पर खद्दरका ऐसा
संगठन करनेके लिए जनतामें इस चीजके प्रति सच्चा प्रेम होना आवश्यक है। सविनय
अवज्ञामें प्रत्येक व्यक्ति शरीक नहीं हो सकता, लेकिन खद्दर तैयार करनेमें तो हरएक
हाथ बँटा सकता है। पाठक यह जान लें कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके देश-भरके
नेताओंमें अधिकांशतः यही लोग हैं जो पक्के खद्दरधारी रहे हैं। इसलिए यदि लोग
आम तौरपर खुद ही सूत कातना और अपनी सहायता आप करना शुरू नहीं करेंगे तो
उनके सादी कार्यसे वियुक्त हो जानेका खद्दरके उत्पादनपर बड़ा गम्भीर असर पड़ेगा ।
मीराबाई प्रबन्धक नहीं
मैं अखबारोंमें बार-बार ऐसी खबर देख रहा हूँ कि मेरी जगह श्रीमती मीरा-
बाई स्लेड आश्रमके प्रधानकी हैसियतसे उसका प्रबन्ध कर रही हैं। यह खबर सच
नहीं है। बहुत समय से आश्रमकी देख-रेख एक प्रबन्ध-मण्डल करता आ रहा है,
जिसके अध्यक्ष महादेव देसाई हैं, उपाध्यक्ष इमाम साहब बावजीर और मन्त्री नारणदास
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
i7niuruw812e7yojwtb86civzgiqt9l
671765
671764
2026-08-19T10:22:08Z
Kumari Arpana Sinha
2191
671765
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kumari Arpana Sinha" />{{rh||टिप्पणियाँ|१४३}}</noinclude>इस बीच, अबसे लेकर ६ अप्रैल तक, हर प्रान्तको क्षण भरका समय बर्बाद किये बिना पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि यह अवसर आते ही अपने सैनिकों-
को संघर्ष में उतार दे ।
[ अंग्रेजीसे ]
'''यंग इंडिया''', २७-३-१९३०
{{ C|{{larger|'''१३४. टिप्पणियाँ'''}}}}
{{C|{{larger|'''खद्दरकी कमी'''}}}}
आजकल स्वभावतः खद्दरकी खरीदारी बड़ी तेजीसे चल रही है और अखिल
भारतीय चरखा संघके कार्यालयमें इस आशयके पत्र आ रहे हैं कि शीघ्र ही खद्दरकी
कमी होने जा रही है। मतलब कि स्थिति वैसी ही है जैसी होनी चाहिए थी। इसका
उपाय यह है कि पूरे खादीधारी लोग अपनी जरूरतोंमें कटौती करें, जिन्होंने खद्दरको
अभी हाल में ही अपनाया है वे उतना ही खद्दर खरीदें जितनेकी उनको जरूरत है
और सभी लोग खादीका उत्पादन बढ़ाने में सहायता दें। जिस प्रकार गेहूँ की आपूर्ति
निश्चित होनेपर रोटीकी कमी कभी नहीं हो सकती उसी प्रकार यदि रुईकी आपूत्ति
निश्चित हो तो खद्दकी कमी होनेका कोई कारण नहीं और रुईकी आपूतिमें टोटा
पढ़नेका कोई खतरा नहीं है। असली कठिनाई तो यह है कि लोग अकारण ही ऐसा
मानते हैं कि खानेकी चीजोंकी तरह खद्दर हमारे गाँवों और घरोंमें तैयार नहीं किया
जा सकता। अगर लोग तकलीको अपनाकर तत्काल कताई शुरू कर देने को तैयार
हों तो उन्हें चरखा चलाना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं है। तब उन्हें सिर्फ इतना
ही करना होगा कि ये साधारण बुनकरोंके पास जाकर उन्हें अपना सूत बुननेको राजी
करें। अगर ठीक ढंगकी राष्ट्रीय जागृति लाई जा सके तो बुनकर लोग हाथकते
सूतको आजकी तरह शंकाकी दृष्टिसे नहीं देखेंगे। बड़े पैमाने पर खद्दरका ऐसा
संगठन करनेके लिए जनतामें इस चीजके प्रति सच्चा प्रेम होना आवश्यक है। सविनय
अवज्ञामें प्रत्येक व्यक्ति शरीक नहीं हो सकता, लेकिन खद्दर तैयार करनेमें तो हरएक
हाथ बँटा सकता है। पाठक यह जान लें कि सविनय अवज्ञा आन्दोलनके देश-भरके
नेताओंमें अधिकांशतः यही लोग हैं जो पक्के खद्दरधारी रहे हैं। इसलिए यदि लोग
आम तौरपर खुद ही सूत कातना और अपनी सहायता आप करना शुरू नहीं करेंगे तो
उनके सादी कार्यसे वियुक्त हो जानेका खद्दरके उत्पादनपर बड़ा गम्भीर असर पड़ेगा ।
{{C|{{larger|'''मीराबाई प्रबन्धक नहीं'''}}}}
मैं अखबारोंमें बार-बार ऐसी खबर देख रहा हूँ कि मेरी जगह श्रीमती मीरा-
बाई स्लेड आश्रमके प्रधानकी हैसियतसे उसका प्रबन्ध कर रही हैं। यह खबर सच
नहीं है। बहुत समय से आश्रमकी देख-रेख एक प्रबन्ध-मण्डल करता आ रहा है,
जिसके अध्यक्ष महादेव देसाई हैं, उपाध्यक्ष इमाम साहब बावजीर और मन्त्री नारणदास
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
9iu2w0lx9sn3ae7gctl34q55iaz4gvh
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 43.pdf/४०४
250
197447
671680
669973
2026-08-19T03:40:38Z
अंजली राजभर
4516
/* शोधित */
671680
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३६०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>और आज ? आज तो जो अपना शीश हँसते-हँसते देश सेवामें चढ़ा सकता है, वही सभापति हो सकता है।
इमाम साहब ऐसे ही व्यक्ति हैं। वयोवृद्ध अब्बास तैयबजी भी ऐसे ही व्यक्तियों में से हैं। स्वामीने ऐसे एक और सज्जन, अब्दुल्लाभाईको खोज निकाला है। अब्दुल्ला भाईको पसन्द करनेमें स्वामी खुद कसौटीपर चढ़े हैं और उन्होंने इस संघर्षकी मर्यादा निर्धारित की है। स्वामी अब्दुल्लाभाईको कुर्सी देंगे, यह बात मैंने स्वप्न में भी नहीं सोची थी। मैं स्वयं ऐसा नहीं कर सकता था हालांकि अब्दुल्ला भाईको पहले-पहल मैंने ही जाना था और उन्हें आश्रम में लानेवाला भी मैं ही था। स्वामीने तो मानों अपने हाथसे सिर काटकर थाली में रख देनेवाले व्यक्तिको ढूंढ निकाला है। तथापि इन तीनों व्यक्तियोंको गुजरातियोंने ही चुना है, और उसका कारण उनका मुसलमान होना नहीं है। किसी व्यक्तिको प्रसन्न करनेकी खातिर भी इन्हें नहीं चुना गया है, बल्कि इसलिए चुना गया है कि उन्हें जिन-जिन स्थानों पर नियुक्त किया गया है, वे उनके उपयुक्त हैं, अपने प्राण दे देनेके लिए तत्पर हैं, त्यागी हैं और जितने साफ दिल मुसलमान हैं, उतने ही साफ दिल हिन्दुस्तानी भी हैं।
यह लड़ाई न तो हिन्दुओंकी है, न मुसलमानोंकी और न अन्य किसी एक जातिकी । यह तो भारतीय मात्रकी लड़ाई है और यदि एक कदम आगे बढ़ें तो यह लड़ाई जगत्को अर्थलोभ-रूपी राक्षसके आतंकसे मुक्त करवानेकी है और यह बात सिद्ध करनेकी है कि पैसा परमेश्वर नहीं है, बल्कि परमेश्वर ही सब कुछ है और उसके सिवा और कुछ नहीं है।
{{Left[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}}
{{C|{{larger'''३४०. बहिष्कार और खादी'''}}}}
जो यह मानते हैं कि बगैर खादीके बहिष्कार सफल नहीं हो सकता वे जानते हैं कि बहिष्कृत कपड़े बदले में जितनी खादी मिलेगी उतना ही बहिष्कार भी सफल हुआ माना जायेगा, और पीछे पछताना नहीं पड़ेगा। इसलिए बहिष्कारके सिलसिले में हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल खादीके उत्पादनका ही है। यदि ऐसा न हुआ तो विदेशी वस्त्र, सामने के दरवाजेसे न सही तो पिछले दरवाजेसे हिन्दुस्तान में आते ही रहेंगे। ऐसी हालत में खादी भण्डारोंको क्या करना चाहिए, यह विचारणीय है।
{{Rh||बम्बईवासियों से}}
इनमें भी बम्बईका भण्डार क्या करे ? बम्बईका खादी भण्डार पूरे हिन्दुस्तान में सबसे बड़ा है। उसके पास चारों ओरसे खादी आती है; लेकिन सब जगह खादीकी माँग बढ़ जानेके कारण वह बड़ी मुश्किलसे बहुत थोड़ी खादी लोगों तक पहुँचा सकता है। इस हालत में यदि बम्बईका भण्डार इसका कोई हल नहीं खोज लेता तो
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
ccl6ba3syk4cqs3zkfn5ufkxy5a8o2j
671681
671680
2026-08-19T03:42:35Z
अंजली राजभर
4516
671681
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३६०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>और आज ? आज तो जो अपना शीश हँसते-हँसते देश सेवामें चढ़ा सकता है, वही सभापति हो सकता है।
इमाम साहब ऐसे ही व्यक्ति हैं। वयोवृद्ध अब्बास तैयबजी भी ऐसे ही व्यक्तियों में से हैं। स्वामीने ऐसे एक और सज्जन, अब्दुल्लाभाईको खोज निकाला है। अब्दुल्ला भाईको पसन्द करनेमें स्वामी खुद कसौटीपर चढ़े हैं और उन्होंने इस संघर्षकी मर्यादा निर्धारित की है। स्वामी अब्दुल्लाभाईको कुर्सी देंगे, यह बात मैंने स्वप्न में भी नहीं सोची थी। मैं स्वयं ऐसा नहीं कर सकता था हालांकि अब्दुल्ला भाईको पहले-पहल मैंने ही जाना था और उन्हें आश्रम में लानेवाला भी मैं ही था। स्वामीने तो मानों अपने हाथसे सिर काटकर थाली में रख देनेवाले व्यक्तिको ढूंढ निकाला है। तथापि इन तीनों व्यक्तियोंको गुजरातियोंने ही चुना है, और उसका कारण उनका मुसलमान होना नहीं है। किसी व्यक्तिको प्रसन्न करनेकी खातिर भी इन्हें नहीं चुना गया है, बल्कि इसलिए चुना गया है कि उन्हें जिन-जिन स्थानों पर नियुक्त किया गया है, वे उनके उपयुक्त हैं, अपने प्राण दे देनेके लिए तत्पर हैं, त्यागी हैं और जितने साफ दिल मुसलमान हैं, उतने ही साफ दिल हिन्दुस्तानी भी हैं।
यह लड़ाई न तो हिन्दुओंकी है, न मुसलमानोंकी और न अन्य किसी एक जातिकी । यह तो भारतीय मात्रकी लड़ाई है और यदि एक कदम आगे बढ़ें तो यह लड़ाई जगत्को अर्थलोभ-रूपी राक्षसके आतंकसे मुक्त करवानेकी है और यह बात सिद्ध करनेकी है कि पैसा परमेश्वर नहीं है, बल्कि परमेश्वर ही सब कुछ है और उसके सिवा और कुछ नहीं है।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३४०. बहिष्कार और खादी'''}}}}
जो यह मानते हैं कि बगैर खादीके बहिष्कार सफल नहीं हो सकता वे जानते हैं कि बहिष्कृत कपड़े बदले में जितनी खादी मिलेगी उतना ही बहिष्कार भी सफल हुआ माना जायेगा, और पीछे पछताना नहीं पड़ेगा। इसलिए बहिष्कारके सिलसिले में हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल खादीके उत्पादनका ही है। यदि ऐसा न हुआ तो विदेशी वस्त्र, सामने के दरवाजेसे न सही तो पिछले दरवाजेसे हिन्दुस्तान में आते ही रहेंगे। ऐसी हालत में खादी भण्डारोंको क्या करना चाहिए, यह विचारणीय है।
{{Rh||बम्बईवासियों से}}
इनमें भी बम्बईका भण्डार क्या करे ? बम्बईका खादी भण्डार पूरे हिन्दुस्तान में सबसे बड़ा है। उसके पास चारों ओरसे खादी आती है; लेकिन सब जगह खादीकी माँग बढ़ जानेके कारण वह बड़ी मुश्किलसे बहुत थोड़ी खादी लोगों तक पहुँचा सकता है। इस हालत में यदि बम्बईका भण्डार इसका कोई हल नहीं खोज लेता तो
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
nealsu4vuipp8ax3g9ni9bzmjn7stq5
671683
671681
2026-08-19T03:43:21Z
अंजली राजभर
4516
671683
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|३६०|सम्पूर्ण गांधी वाड्मय|}}</noinclude>और आज ? आज तो जो अपना शीश हँसते-हँसते देश सेवामें चढ़ा सकता है, वही सभापति हो सकता है।
इमाम साहब ऐसे ही व्यक्ति हैं। वयोवृद्ध अब्बास तैयबजी भी ऐसे ही व्यक्तियों में से हैं। स्वामीने ऐसे एक और सज्जन, अब्दुल्लाभाईको खोज निकाला है। अब्दुल्ला भाईको पसन्द करनेमें स्वामी खुद कसौटीपर चढ़े हैं और उन्होंने इस संघर्षकी मर्यादा निर्धारित की है। स्वामी अब्दुल्लाभाईको कुर्सी देंगे, यह बात मैंने स्वप्न में भी नहीं सोची थी। मैं स्वयं ऐसा नहीं कर सकता था हालांकि अब्दुल्ला भाईको पहले-पहल मैंने ही जाना था और उन्हें आश्रम में लानेवाला भी मैं ही था। स्वामीने तो मानों अपने हाथसे सिर काटकर थाली में रख देनेवाले व्यक्तिको ढूंढ निकाला है। तथापि इन तीनों व्यक्तियोंको गुजरातियोंने ही चुना है, और उसका कारण उनका मुसलमान होना नहीं है। किसी व्यक्तिको प्रसन्न करनेकी खातिर भी इन्हें नहीं चुना गया है, बल्कि इसलिए चुना गया है कि उन्हें जिन-जिन स्थानों पर नियुक्त किया गया है, वे उनके उपयुक्त हैं, अपने प्राण दे देनेके लिए तत्पर हैं, त्यागी हैं और जितने साफ दिल मुसलमान हैं, उतने ही साफ दिल हिन्दुस्तानी भी हैं।
यह लड़ाई न तो हिन्दुओंकी है, न मुसलमानोंकी और न अन्य किसी एक जातिकी । यह तो भारतीय मात्रकी लड़ाई है और यदि एक कदम आगे बढ़ें तो यह लड़ाई जगत्को अर्थलोभ-रूपी राक्षसके आतंकसे मुक्त करवानेकी है और यह बात सिद्ध करनेकी है कि पैसा परमेश्वर नहीं है, बल्कि परमेश्वर ही सब कुछ है और उसके सिवा और कुछ नहीं है।
{{Left|[ गुजरातीसे ]<br>
'''नवजीवन,''' २७-४-१९३०}}
{{C|{{larger|'''३४०. बहिष्कार और खादी'''}}}}
जो यह मानते हैं कि बगैर खादीके बहिष्कार सफल नहीं हो सकता वे जानते हैं कि बहिष्कृत कपड़े बदले में जितनी खादी मिलेगी उतना ही बहिष्कार भी सफल हुआ माना जायेगा, और पीछे पछताना नहीं पड़ेगा। इसलिए बहिष्कारके सिलसिले में हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल खादीके उत्पादनका ही है। यदि ऐसा न हुआ तो विदेशी वस्त्र, सामने के दरवाजेसे न सही तो पिछले दरवाजेसे हिन्दुस्तान में आते ही रहेंगे। ऐसी हालत में खादी भण्डारोंको क्या करना चाहिए, यह विचारणीय है।
{{Rh||'''बम्बईवासियों से'''}}
इनमें भी बम्बईका भण्डार क्या करे ? बम्बईका खादी भण्डार पूरे हिन्दुस्तान में सबसे बड़ा है। उसके पास चारों ओरसे खादी आती है; लेकिन सब जगह खादीकी माँग बढ़ जानेके कारण वह बड़ी मुश्किलसे बहुत थोड़ी खादी लोगों तक पहुँचा सकता है। इस हालत में यदि बम्बईका भण्डार इसका कोई हल नहीं खोज लेता तो
Gandhi Heritage Portal<noinclude></noinclude>
0fucrd0haat2hm03efct8hkf90osfw7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७
250
197616
671672
670326
2026-08-19T02:14:12Z
Juhi1986
6803
/* शोधित */
671672
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||ग्यारह|}}</noinclude>वालजी देसाईको लिखा था (पृष्ठ १६८)। इसमें गांधीजीने स्वीकार किया कि अंग्रेजी कलेन्डरकी जगह गुजराती तिथिके ऊपर वह जो आग्रह पहले करते थे वह गलत था, और फिर उन्होंने लिखा: "विदेशी-मात्रसे हमें कोई द्वेष थोड़े ही है"। यही नहीं, उन्हें इस मामलेमें अपने निर्णय पर स्वयं सन्देह था इसलिए उन्होंने वालजी देसाईकी राय माँगी और पूछा कि उनके विचारसे क्या करना ठीक रहेगा।
जो चिन्तन कर्मके लिए उन्मुख न करे ऐसे चिन्तनको वह विचार-विलास मानते थे और उसे "विषाक्त तत्त्व" मानते थे। अपरिग्रहके सिद्धान्तको वह वस्तु और विचार-दोनों पर लागू मानते थे। उनके विचारसे "जैसे चीजोंका वैसे ही विचारोंका भी अपरिग्रह" आवश्यक है (पृष्ठ १०४)। इसे वह 'गीता' के मुख्य सिद्धान्त, अनासक्तिका स्वाभाविक निष्कर्ष मानते थे। उन्होंने मीराबहनको एक पत्रमें सलाह दी : "अच्छी खबर हो या बुरी...उसे अपने ऊपरसे यों गुजर जाने दो जैसे बत्तखकी पीठ परसे पानी फिसल जाता है। जब हम कोई खबर सुनें तो हमारा कर्त्तव्य मात्र इतना पता चलाना है कि क्या कुछ करनेकी जरूरत है, और यदि हो तो हम अपने-आपको प्रकृतिके हाथका एक साधन मानकर...उसे कर दें।...अतः मस्तिष्कको मात्र सम्प्रेषणका साधन मानकर... उपयोग किया जाना चाहिए। वहाँ जो भी चीज ग्रहण की जाये उसे या तो तत्काल कार्रवाई के लिए हृदयको सम्प्रेषित कर देना चाहिए, या फिर सम्प्रेषणके लिए अनुपयुक्त मानकर उसी वक्त रद कर देना चाहिए" (पृष्ठ ३७०-१)। प्रेमावहन कंटकको उन्होंने लिखा: "जो निर्णय मैं करता हूँ उनके सभी कारण मुझे हमेशा याद नहीं रहते" (पृष्ठ ३२७)। तर्कमूलक अथवा असम्बद्ध चिन्तन मनुष्यके एक अंश विशेषका कार्य है जबकि कर्मकी उद्भावना हृदयसे होती है और वह हमारे समूचे व्यक्तित्वको प्रतिबिम्बित करता है। गांधीजीका झुकाव यद्यपि कठोर बाह्य कार्यकी ओर था, लेकिन वह अपने मस्तिष्ककी क्रियाओंका भी बारीकीसे अध्ययन करते रहते थे। इसकी झलक उस "सुखद स्वप्न" के विवरणमें मिलती है जिसमें उन्होंने मणिलालके लिए एक पाठ्यक्रम तैयार किया था और जो रामदास और देवदासके लिए भी लाभप्रद होता; लेकिन इस स्वप्नका विवरण देनेके बाद उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि स्वप्नमें व्यक्त किये गये मतके बजाय महादेव देसाईके मार्गनिर्देशनमें पढ़ाई करना ज्यादा ठीक रहेगा।
आश्रमके व्रतोंके विषयमें गांधीजीने जो व्याख्यात्मक लेख लिखे वे उनके दीर्घ अनुभवों पर आधारित थे और इनका उद्देश्य यह था कि आश्रममें उनका श्रवण करनेवाले भी तदनुसार आचरण करते हुए वैसे ही अनुभव स्वयं भी प्राप्त करें। स्वदेशी-व्रतके सम्बन्धमें वह कुछ भी नहीं लिखना चाहते थे क्योंकि इस विषयकी चर्चामें राजनीतिक प्रश्नोंका स्पर्श होना सम्भव था, जो कि वह नहीं चाहते थे। एक कैदीके नाते उनका<noinclude></noinclude>
mixtk5seu4hru8z5752g9kes81qz02m
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८
250
197617
671673
670327
2026-08-19T02:22:47Z
Juhi1986
6803
/* शोधित */
671673
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Juhi1986" />{{rh||बारह|}}</noinclude>एक आत्म-धारित व्रत यह था कि राजनीतिक प्रश्नोंकी चर्चा नहीं करेंगे (पृष्ठ १८६)। इन सभी प्रवचनोंमें विषयोंको बड़ी गहराईके साथ लेकिन बहुत ही सरल और स्पष्ट ढंगसे समझाया गया है और ये अत्यन्त लोकप्रिय हो गये हैं। धर्मोकी समानता (नवाँ व्रत) और यज्ञ तथा विनम्रता (जिन्हें व्रतोंमें शामिल नहीं किया गया है) के ऊपर गांधीजीके प्रवचन गांधीवादी नैतिकताके अध्येताओंके लिए विशेष दिलचस्पी रखते
हैं। "ईश्वरदत्त धर्म अगम्य है। ... सब अपनी-अपनी दृष्टिसे, जबतक वह दृष्टि बनी है तबतक, सच्चे हैं। पर झूठा होना भी असम्भव नहीं है।... इन सभी धर्मोके मूल सिद्धान्त एक ही हैं। सभी में सन्त स्त्री-पुरुष हो गये हैं, आज भी मौजूद
हैं" (पृष्ठ १६७)।
सत्य और प्रेमका संवर्धन किया जा सकता है, किन्तु विनम्रताका आचरण सोच-समझकर नहीं किया जा सकता। विनम्रताका आचरण करना ढोंग करनेके समान है। किन्तु नम्रताकी अनुभूति अहिंसाकी अपरिहार्य कसौटी है। सचमुच विनम्र व्यक्ति जानता है कि वह कुछ नहीं के समान है। "समुद्रमें रहनेवाला बिन्दु समुद्रको महत्ता का उपभोग करता है, परन्तु उसका उसे ज्ञान नहीं होता। समुद्रसे अलग होकर ज्यों ही अपनेपनका दावा करने चला कि वह उसी क्षण सुखा।... इसलिए सच्ची नम्रता हमसे जीवमूर्तिकी सेवाके लिए सर्वार्पिणकी आशा रखती है।...जो सेवा प्राप्त हो जाये वही करते-करते किसी दिन यह हमारे हाथ लग जायेगा। केवल उसीको खोजने जानेसे यह अनुभव प्राप्त नहीं होता" (पृष्ठ २०४-५)। समुद्र और बूँद "बहुत ही सुन्दर ढँगसे परस्पर निर्भर हैं। और यदि यह बात भौतिक जगतके बारेमें सच है तो आध्यात्मिक जगतके मामलेमें कितनी सच न होगी" (पृष्ठ १३१)। अहिंसाकी भावना मनमें विकसित करनेके साथ विनम्रता अपने-आप आती है और एक स्थिति वह होती है जब 'मैं' को भूलकर व्यक्ति केवल शून्य बन जाता है।
'सत्य' ही गांधीजीके आश्रमका आधारभूत सिद्धान्त है, और आश्रमके अन्य सब व्रतोंका अर्थ व्यापक रूपसे एक ही है--सत्य, "जिसका पालन विचार, वाणी आचारमें करें" (पृष्ठ ४१)। आश्रमका लक्ष्य सत्य और सत्याचरण पर आग्रह था।
सत्यको ही "मध्य-बिन्दु मानकर सारी रचना की गई है। उद्देश्य संसारमें बहुत नहीं होते, होने भी नहीं चाहिए। जो बहुत दिखाई देता है वह सत्य पर आच्छादित सोनेका ढक्कन है। उसके हट जाने पर एक ही वस्तु दिखाई देगी" (पृष्ठ २४५)। यह सत्य व्यक्तित्वहीन और अनिर्वचनीय है और इसे वाणोकी अपेक्षा कर्मके जरिये ही समझा और व्यक्त किया जा सकता है, और सो भी आंशिक रूपसे ही।
गांवीजीने, विशेष रूपसे अपने ईसाई पत्र-लेखकोंको, निर्गुण ब्रह्म अर्थात् शुद्ध ज्ञानकी स्थितिकी संकल्पना समझानेका विशेष प्रयत्न किया, और साथ ही धर्मके<noinclude></noinclude>
fva693cylsutdjx9my35w976p79km28
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७८
250
197777
671652
670500
2026-08-18T17:33:33Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
671652
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''१९९. पत्र: लीलावती आसरको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ लीलावती (आसर),}}
तेरा पत्र मिला। फिलहाल थोड़ा आराम कर ले; अपना काम उसके बाद शुरू करना। अपनी लिखावट बिगाड़ मत जरा राधाबहनकी लिखाई तो देख जरा-सी कोशिश करके तू अपनी लिखावट सुधार सकती है। यदि तेरी लिखावट एक बार सुधर जायेगी तो फिर तेजीसे लिखने पर भी बिगड़ेगी नहीं।
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ९५६५) की फोटो-नकलसे।
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२००. पत्र: नारायण मोरेश्वर खरेको'''}}}}
{{right|यरबडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|'चि॰' पण्डितजी,}}
'पण्डितजी' के साथ 'चि॰' अच्छा नहीं जान पड़ता। किन्तु 'चि॰' शब्दका प्रयोग तो मैं आजकल बहुत खुलकर करता हूँ। इस शब्दका प्रयोग करते हुए कभी-कभी मुझे घबराहट भी होती है। पितृपदके लिए आवश्यक योग्यता––उतना प्रेम, उतनी आत्मीयता, उतनी सजगता––मुझमें है या नहीं, इस बातकी जब जाँच करता हूँ तो मैं कभी-कभी काँप उठता हूँ। किन्तु ईमानदारीसे में इतना कह सकता हूँ कि अपने में इन सबका विकास करनेका में पूरा प्रयत्न करता है और इतनेसे सन्तोष मानता हूँ। यह तो मैं जानता ही हूँ कि जब मैं किसीके लिए 'चि॰' विशेषणका प्रयोग करता हूँ तो उस हद तक मेरी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। ईश्वर इस उत्तरदायित्वको निभानेकी सामर्थ्यं दे तो अच्छा हो।
प्रभात-फेरियोंसे काफी शक्ति उत्पन्न हो सकती है। उन्हें सुव्यवस्थित रूप देनेमें तुम काफी सहयोग दे सकते हो। सहयोग देना।
{{right|{{larger|'''बापूके आशीर्वाद'''}}}}
गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ २१२) की फोटो-नकलसे सौजन्य: लक्ष्मीबाई खरे<noinclude></noinclude>
gyyf9uiioa31b283mn2jlocceii8vy1
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१७९
250
197778
671653
670502
2026-08-18T17:34:21Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
671653
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२०१. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ गंगाबहन (बड़ी),}}
तुम्हारा पत्र क्यों नहीं आया? तुम्हें हर सप्ताह पत्र लिखना ही चाहिए। जो बहनें धरना देनेके लिए बाहर गई हुई हैं उन सबसे तुम्हारा पत्र-व्यवहार है न? न हो तो शुरू करना। याद रखना कि उनमें बहुतसी बहनोंके लिए तुम माँके समान
हो। तुम्हें लड़के-लड़कियोंकी कमी तो है ही नहीं; किन्तु वे सब जोखिमसे भरे काम में जुटी हैं, यह तो हम जानते ही हैं। जोखिम भरा काम करना हमारा धर्म है। हम जान-बूझकर ऐसा काम न उठायें, पर यदि सिर पर आ ही पड़े तो उसका स्वागत करें और उसमें सफल होनेके लिए ईश्वरसे सहायता माँगें बाहर रहते हुए भी जो अपने व्रतोंका पालन करेगी वह बहन ही जीती हुई मानी जायेगी।
{{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो–६: गं॰ स्व॰ गंगाबहेनने''' सी॰ डब्ल्यू॰ ८७५७ से भी।
{{left|सौजन्य: गंगाबहन वैद्य}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२०२. पत्र: मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मनु (त्रिवेदी),}}
तेरा पत्र मिला। हम दोनोंने चैनकी साँस ली। यदि अपनी उम्र का कोई अन्य व्यक्ति हमसे अधिक काम कर सके तो उससे हमें दुःखी होनेके बजाय प्रसन्न होना चाहिए। "भगवानकी जब जो मर्जी हो, उसके लिए शोक करना वृथा है।" हमें जैसा शरीर मिला होगा, हम वैसा ही काम कर सकेंगे। अधिक शारीरिक शक्ति होनेके बावजूद जो व्यक्ति कामसे जी चुराता है और कम काम करता है उसे शर्मिन्दा होना चाहिए। तेरे-जैसेके लिए तो वैसा कोई कारण नहीं है।
{{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ७७६३) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
p85z6x9bjd7clcpmz2ekldw1467she1
671654
671653
2026-08-18T17:34:43Z
रेखा साव
5914
671654
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२०१. पत्र: गंगाबहन वैद्यको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ गंगाबहन (बड़ी),}}
तुम्हारा पत्र क्यों नहीं आया? तुम्हें हर सप्ताह पत्र लिखना ही चाहिए। जो बहनें धरना देनेके लिए बाहर गई हुई हैं उन सबसे तुम्हारा पत्र-व्यवहार है न? न हो तो शुरू करना। याद रखना कि उनमें बहुतसी बहनोंके लिए तुम माँके समान
हो। तुम्हें लड़के-लड़कियोंकी कमी तो है ही नहीं; किन्तु वे सब जोखिमसे भरे काम में जुटी हैं, यह तो हम जानते ही हैं। जोखिम भरा काम करना हमारा धर्म है। हम जान-बूझकर ऐसा काम न उठायें, पर यदि सिर पर आ ही पड़े तो उसका स्वागत करें और उसमें सफल होनेके लिए ईश्वरसे सहायता माँगें बाहर रहते हुए भी जो अपने व्रतोंका पालन करेगी वह बहन ही जीती हुई मानी जायेगी।
{{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
{{left|[गुजरातीसे]<br>
'''बापुना पत्रो–६: गं॰ स्व॰ गंगाबहेनने''' सी॰ डब्ल्यू॰ ८७५७ से भी।}}
{{left|सौजन्य: गंगाबहन वैद्य}}
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२०२. पत्र: मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ मनु (त्रिवेदी),}}
तेरा पत्र मिला। हम दोनोंने चैनकी साँस ली। यदि अपनी उम्र का कोई अन्य व्यक्ति हमसे अधिक काम कर सके तो उससे हमें दुःखी होनेके बजाय प्रसन्न होना चाहिए। "भगवानकी जब जो मर्जी हो, उसके लिए शोक करना वृथा है।" हमें जैसा शरीर मिला होगा, हम वैसा ही काम कर सकेंगे। अधिक शारीरिक शक्ति होनेके बावजूद जो व्यक्ति कामसे जी चुराता है और कम काम करता है उसे शर्मिन्दा होना चाहिए। तेरे-जैसेके लिए तो वैसा कोई कारण नहीं है।
{{right|{{larger|बापूके आशीर्वाद}}}}
गुजराती (जी॰ एन॰ ७७६३) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
ij3pm0xew85xro9ccz47s54rzfmrfyi
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/१८०
250
197779
671655
670503
2026-08-18T17:35:22Z
रेखा साव
5914
/* शोधित */
671655
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" /></noinclude>
{{c|{{larger|'''२०३. पत्र: बनारसीलाल बजाजको'''}}}}
{{right|यरवडा मन्दिर<br>
११ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ बनारसी,}}
तुमारा खत मीला है। पकड़े भी गये और छूट भी गये? मुझे विश्वास है कि अमारा कार्य धैर्यमय, सत्यमय और अहिंसामय हि रहेगा इसलिये मैं निश्चित हूं।
{{right|'''बापुके आशीर्वाद'''}}
सी॰ डब्ल्यू॰ ९३०४ से। सौजन्य: बनारसीलाल बजाज
{{dhr}}
{{c|{{larger|'''२०४. पत्र: वसुमती पण्डितको'''}}}}
{{right|यरबडा मन्दिर<br>
१२ सितम्बर, १९३०}}
{{left|चि॰ वसुमती,}}
तेरा पत्र मिला। सरभोणके कामका विवरण मुझे लिख भेजना। तू कहाँ रहती है? क्या कोई पुरुष भी है या सारा कारोबार स्त्रियोंके ही हाथमें है? वृद्धा माँजी कहाँकी रहनेवाली हैं? उनकी उम्र क्या है? वे क्या काम करती हैं?
{{right|'''बापूके आशीर्वाद'''}}
गुजराती (एस॰ एन॰ ९२८७) की फोटो-नकलसे।<noinclude></noinclude>
18w96fj6p3gj4q1z092frgilj1teq6i
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७५
250
197974
671685
670706
2026-08-19T04:33:00Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
671685
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४७७. पत्र : गंगाबहन वैद्यको'''}}
{{Rh|||२७ नवम्बर, १९३०}}
<Br>चि० गंगाबहन,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र और रिपोर्ट मिली। रिपोर्ट अच्छी है। तुम जिन गांवों में गई
वहाँ गाय नहीं देखी। ऐसी स्थिति लगभग पूरे खेड़ा जिलेकी है। स्वार्थके कारण
किसीको गाय रखना अच्छा ही नहीं लगता। इसीलिए तो हमने गो-सेवाका काम
उठाया है।
{{Gap}}तुम्हारे भोजनका क्या प्रबन्ध है ?
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
<Br>[ गुजरातीसे ]
{{Gap}}बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने; सी० डब्ल्यू० ८७६६ से भी ।
सौजन्य : गंगाबहन वैद्य
{{C|'''४७८. पत्र : रामदास गांधीको'''}}
{{Rh|||२८ नवम्बर १९३०}}
<Br>चि० रामदास,
{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला। दांत निकलते समय अनेक बच्चोंको कष्ट होता है, इसमें
आश्चर्यकी कोई बात नहीं। लेकिन जुकाम दूर होना चाहिए। उसे धूपमें घूमाना
चाहिए, माथा ढका रहना चाहिए। इससे चमड़ी खूब सिकेगी, कठोर होगी और
सर्दी दूर हो जायेगी; ऐसी मेरी मान्यता है ।
पैसोंका हिसाब-किताब रखनेका काम आदत पड़ जानेके बाद भार रूप नहीं
लगता और इसकी कीमत तो अनुभवके बाद ही जानी जा सकती है। शान्त अथवा
अशान्त जीवनसे इसमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। और फिर कुछ चीजें ऐसी होती
हैं जो भले ही कितना अशान्त वातावरण क्यों न हो हमें अवश्य करनी चाहिए।
हमें वैसा करनेकी आदत डालनी चाहिए। मुझे हर सप्ताह पत्र लिखा करना ।
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ६८५९ ) की फोटो नकलसे ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
<Br>४४-२२<noinclude></noinclude>
gna8lkkv1ot2zgtna55cpns2b4pfqjc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/३७७
250
197976
671688
670708
2026-08-19T04:41:28Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
671688
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''४८०. पत्रः वसुमती पण्डितको'''}}
{{Rh|||२८ नवम्बर १९३०}}
<Br>चि०वसुमती,
{{Gap}}तेरा पत्र मिला । मनमें हमेशा यह विचार बना रहता है कि वहाँकी भाग-
दौड़में तेरा स्वास्थ्य कैसा रहेगा ? जानता हूँ कि मुझे चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
सब ईश्वराधीन है। मुझे ये सब बातें लिखी जा सकती है जो अखबारोंमें प्रकाशित
करने योग्य हों। और जो अखबारोंमें भेजने लायक बात न हो, वह बात मुझे नहीं
लिखी जा सकती। वर्तमान गतिविधियोंकी सूचना देते समय तू नियमको पालन
करना। अपने बारेमें तो तू जो चाहे सो लिख सकती है। मेरी गाड़ी ठीक चल
रही है।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (एस० एन० ९२९४) की फोटो नकलसे।
{{C|'''४८१. पत्र अब्दुल कादिर बावजीरको'''}}
{{Rh|||२८ नवम्बर १९३०}}
<Br>भाई इमामसाहब,
{{Gap}}आपका पत्र मिला; सुन्दर है। मैं तो जैसे-जैसे धर्मका विचार करता है,
वैसे-वैसे उसके मूलमें मुझे सत्य और अहिंसा के ही दर्शन होते हैं। शुरूमें ही रहीमका
नाम आता है। इस नाममें भी अहिंसा ही व्याप्त है न ? हमें इस वस्तुका उपयोग
करना नहीं आता इसीसे हम इसका तिरस्कार करते हैं। यदि हम उसका उपयोग
करना सीखें तो बादमें यह कभी न छूटे ।
पेशावमें अभी तक मधुका जाना सराव बात है। यदि आपसे निभ सके अर्थात्
अपनी जीभको वशमें रखा जा सके तो आपको केवल कच्चे दूध पर ही रहना
चाहिए। उसमें कुछ भी नहीं डालना चाहिए। यह सम्पूर्ण खुराक है। और उससे
शक्कर आनी भी बन्द हो जाती है। आपको फलादि भी नहीं लेने चाहिए। वस्तुतः
दूधके अलावा अन्य कुछ भी नहीं लेना चाहिए, दही अवश्य लिया जा सकता है।
हो सके तो आप देशके लिए इतना अवश्य कीजियेगा ।
{{Rh|||बापूकी दुआ}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ६६४७ ) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
9cb56nru4nk0k434oxa3bb5y6xlev47
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१३
250
198012
671535
670744
2026-08-18T12:00:38Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
671535
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५२७. पत्र: पद्माको'''}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर १९३०}}
<Br>चि० पद्मा,
{{Gap}}तेरा पत्र मिला। इस बारकी लिखावट ठीक है। अभी और सुधारना तेरी
वह गिलटी कोई गम्भीर रोग नहीं है यह जानकर मन प्रसन्न हुआ, लेकिन अपनी
तबीयत सँभालना अपनी डायरीमें तू सब कुछ लिखती है, यह अच्छी बात है।
सरोजिनीदेवी को कितने दिनोंकी सजा हुई है ?
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ६११७) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''५२८. पत्र वनमाला परीखको'''}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर १९३०}}
<Brचि० वनमाला,
{{Gap}}चूंकि तूने मेरे लिए एक बहुत बड़ी कतरन रखी है इसलिए मैंने उसे सँभालकर
रख लिया है। धीरू गाली दे तो उसे स्नेहपूर्वक रोकना । प्रेमावहनसे भी कहना ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ५७५६) की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
05a2unmivpu4wztvgwetqnpqu7hxq82
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१४
250
198013
671714
670745
2026-08-19T05:59:54Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
671714
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५२९. पत्र : नानाभाई इच्छाराम मशरूवालाको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>भाई नानाभाई (अकोला),
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला । तुम्हें दामाद सचमुच अच्छा मिला है। वह विश्राम-मन्दिर
में जाकर बैठ गया है। अब सुशीला जायेगी और फिर तारा। सुरेन्द्र भी इसकी
उम्मीद लगाये बैठा है, यह अच्छा ही है। यही सच्चा धर्म है। आजतक हम धर्मके
नामपर सुखोपभोग कर रहे थे। यदि ताराको परेशानी न हो, तो उसे सूर्यस्नान
लेना चाहिए। इससे तुम्हें भी बहुत फायदा होगा। इसके साथ-साथ विधिपूर्वक कटि-
स्नान भी लो तथा खुराक सादी रखो ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ४७७९ ) की फोटो नकलसे ।
{{C|'''५३०. पत्र : कुँवरजी मेहताको'''}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>भाई कुंवरजी,
{{Gap}}आपका समाचारोंसे भरपूर पत्र मिला । जुगतरामसे भी पत्र लिखनेको कहना।
हम तो जेलके बाहर अथवा भीतर सलामत ही हैं। हमारी डोर ईश्वरके हाथमें है।
{{Gap}}वह जैसा नचायेगा, वैसा नाचेंगे ।
कानजीभाईका त्याग महान है। उनमें हिम्मत त्यागसे भी कहीं अधिक बढ़-
चढ़कर है। उन्हें मेरी बधाई देना ।
नेपोलियन को लिखा है ।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद
}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० २६८९ ) की फोटो नकलसे।
{{Gap}}१. आशय छोटाभाई कल्याणजी मेहतासे है।<noinclude></noinclude>
508un4jzig9an7v9tzghsi5zly5wn9k
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१५
250
198014
671539
670746
2026-08-18T12:13:29Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
671539
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{c|'''५३१. पत्र : मणिबहन पटेलको'''}}
{{Rh|||यरबडा मन्दिर}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० मणि (सरदारीजी),
{{Gap}}अब तू बाहर आ गई है, इसलिए तुझसे ब्यौरेवार पत्रकी आशा करता हूँ ।
अपने अनुभव लिखना तेरा स्वास्थ्य कैसा है ?
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
<Br>[ गुजरातीसे ]
<Br>बाबुना पत्रो-४ : मणिबहेन पटेलने
{{C|'''५३२. पत्र : काशिनाथ त्रिवेदीको'''}}
{{Rh|||यरवडा मन्दिर}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर, १९३०}}
<Br>चि० काशिनाथ,
{{Gap}}तुम्हारा पत्र मिला। कलावतीको मैंने उत्तर लिख दिया है। माताजीका जो
उपचार किया जा रहा है, वह उचित ही जान पड़ता है। इसमें सन्देह नहीं कि
अनेक रोग कब्जके कारण ही होते हैं। मैंने अपने कब्जको दूर करनेके लिए अभी
जो प्रयोग किये हैं उनसे मुझे लाभ हुआ है। तुम्हारी जानकारीके लिए मैं उन्हें
यहाँ दे रहा हूँ। मैंने तो सिर्फ उबली हुई सब्जियाँ तथा कच्चे और उबले हुए
टमाटर ही लिये हैं। इससे कब्ज दूर हो गया। तब मैंने पीसे हुए बादाम लेने शुरू
किये; उनकी मात्रा मैंने धीरे-धीरे बढ़ाकर तीन तोला कर दी और अब ज्वार-बाजरा
की थोड़ी रोटी लेता हूँ। इससे में अपने शरीरमें शक्तिका अनुभव करता हूँ। अभी
तो निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कह सकता। यदि दो-तीन महीने ऐसी ही स्थिति
बनी रहे तो कुछ कहा जा सकता है। इसपर सावधानीसे ही अमल किया जाना
चाहिए। सन्तोक और राधाको कुनेकी पुस्तकमें दिये गये दोनों स्नानोंकी जानकारी
है । मेरा खयाल है कि ये दोनों स्नान कलावतीके लिए बहुत अच्छे सिद्ध होंगे।
'मुखचर्या विज्ञान' नामक पुस्तक हमारे यहाँ नहीं है।
{{Gap}}डा० सरजूप्रसादजी को मेरी ओरसे बधाई देना। वे जो कार्य कर रहे हैं उसमें
मैं उनकी सफलताकी कामना करता हूँ ।<noinclude></noinclude>
01zf9h6vly96wxw3uas8se704t6apm7
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/४१६
250
198015
671542
670747
2026-08-18T12:18:21Z
Sonu kumar 07
6479
/* शोधित */
671542
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|३७८|
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}
{{Gap}}अनाजके सस्ता होनेके लिए मैं आशीर्वादका भागी कैसे बन सकता हूँ? किसान
लोग मुझे शाप भी तो दे सकते हैं न? अनाजके सस्ता होनेके अनेक कारण हैं। मैंने
अपने पत्रोंमें जो कारण प्रस्तुत किये हैं, नारणदासकी सम्मति से उनके उद्धरण देने में
मुझे कोई हर्ज दिखाई नहीं देता ।
{{Gap}}प्यारेलाल आनन्दपूर्वक है। उसके पास दो 'रामायण' है। इसलिए अभी उसे
किसी अन्य पुस्तककी जरूरत नहीं। यहाँ आनेपर उसका पढ़ना-लिखना कुछ कम
तो हो ही गया है।
{{Rh|||बापूके आशीर्वाद}}
{{Gap}}गुजराती (जी० एन० ५२६६) की फोटो नकलसे।
{{C|'''५३३. पत्र : हेमप्रभा दासगुप्तको'''}}
{{Rh|||यरबडा मन्दिर}}
{{Rh|||१४ दिसम्बर १९३०}}
<Br>चि० हेमप्रभा,
{{Gap}}तुमारा खत आया । अनासक्तियोगकी बंगला प्रति १००० बिक गई वह शुभ
चिह्न है। जाड़ाके दिनोंमें ९-१० बजेके सूर्यमें जितना अंग खुला रखकर रह सके
इतना अच्छा है। जाड़ाके दिनोंमें औषध रूपसे थोडी कच्ची प्याज रोटीके साथ लेनेसे
भी अच्छा रहता है । प्याजमें दोष है ऐसे गुण भी काफी है। प्रधानदोष दुर्गंधीका
है। अल्प मात्रा लेनेसे दुर्गंधी प्रतीत नहि रहती है।
{{Rh|||बापुके आशीर्वाद}}
{{Gap}}जी० एन० १६७९ की फोटो नकलसे ।<noinclude></noinclude>
i90xr0t51gah7qkthgt2g0tl0sfjbmf
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२१
250
198120
671595
670858
2026-08-18T15:57:28Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
671595
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|{{larger|'''सामग्री के साधन - सूत्र'''}}}}
गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली:''' गांधी साहित्य और गांधीजीसे सम्बन्धित कागजपत्रका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय देखिए खण्ड १, पृ० ३५९ ( प्रथम संस्करण १५ अगस्त, १९५८) तथा पृ० ३५५ (द्वितीय संशोधित संस्करण जून, १९७० )।
साबरमती संग्रहालय-पुस्तकालय तथा संग्रहालय; जिसमें गांधीजीके दक्षिण आफ्रिकी काल तथा १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात रखे हैं; देखिए खण्ड १, पृ० ३६० (प्रथम संस्करण १५ अगस्त, १९५२) तथा पृ० ३५५ (द्वितीय संशोधित संस्करण जून, १९७० )।
'बॉम्बे क्रॉनिकल' बम्बईसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ।
'हिन्दू' : मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ।
'''बॉम्बे सीक्रेट ऍक्सट्रैक्ट्स, १९३० ।'''
'कन्या आश्रम रजत जयन्ती स्मृतिग्रन्थ' प्रकाशक : भील सेवा मंडल, दोहाद, गुजरात ।
'गीताबोध' (गुजराती) : मो० क० गांधी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९३० ।
'पांचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद' स० काका कालेलकर, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली, १९५३ ।
'बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने' (गुजराती) स० काका कालेलकर, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६० ।
'बापुना पत्रो-७ श्री छगनलाल जोशीने' (गुजराती) स० छगनलाल जोशी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६२ ।
'बापुना पत्रो ९ श्री नारणदास गांधीने' (गुजराती) स० नारणदास गांधी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६४ ।
'बापुना पत्रो-४ मणिबहेन पटेलने' (गुजराती) स० मणिवन पटेल, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७ ।
'बापुनी प्रसादी' (गुजराती) : मथुरादास त्रिकमजी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७ ।
४४–८
'बापूको विराट् वत्सलता' काशिनाथ त्रिवेदी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६४ ।
'महात्मा गांधी सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया', खण्ड ३, भाग ३ ।<noinclude></noinclude>
rl6ndpot6mh7blgl4h415y1xtmjq1oc
671609
671595
2026-08-18T16:17:14Z
Koyal Singh
6351
671609
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|{{larger|'''सामग्री के साधन - सूत्र'''}}}}
गांधी स्मारक संग्रहालय, नई दिल्ली: गांधी साहित्य और गांधीजीसे सम्बन्धित कागजपत्रका केन्द्रीय संग्रहालय तथा पुस्तकालय देखिए खण्ड १, पृ० ३५९ ( प्रथम संस्करण १५ अगस्त, १९५८) तथा पृ० ३५५ (द्वितीय संशोधित संस्करण जून, १९७० )।
साबरमती संग्रहालय-पुस्तकालय तथा संग्रहालय; जिसमें गांधीजीके दक्षिण आफ्रिकी काल तथा १९३३ तकके भारतीय कालसे सम्बन्धित कागजात रखे हैं; देखिए खण्ड १, पृ० ३६० (प्रथम संस्करण १५ अगस्त, १९५२) तथा पृ० ३५५ (द्वितीय संशोधित संस्करण जून, १९७० )।
'बॉम्बे क्रॉनिकल' बम्बईसे प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ।
'हिन्दू' : मद्रास से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ।
'बॉम्बे सीक्रेट ऍक्सट्रैक्ट्स, १९३० ।
'कन्या आश्रम रजत जयन्ती स्मृतिग्रन्थ' प्रकाशक : भील सेवा मंडल, दोहाद, गुजरात ।
'गीताबोध' (गुजराती) : मो० क० गांधी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९३० ।
'पांचवें पुत्रको बापूके आशीर्वाद' स० काका कालेलकर, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली, १९५३ ।
'बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनने' (गुजराती) स० काका कालेलकर, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६० ।
'बापुना पत्रो-७ श्री छगनलाल जोशीने' (गुजराती) स० छगनलाल जोशी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६२ ।
'बापुना पत्रो ९ श्री नारणदास गांधीने' (गुजराती) स० नारणदास गांधी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६४ ।
'बापुना पत्रो-४ मणिबहेन पटेलने' (गुजराती) स० मणिवन पटेल, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७ ।
'बापुनी प्रसादी' (गुजराती) : मथुरादास त्रिकमजी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९५७ ।
४४–८
'बापूको विराट् वत्सलता' काशिनाथ त्रिवेदी, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद, १९६४ ।
'महात्मा गांधी सोर्स मैटीरियल फॉर ए हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया', खण्ड ३, भाग ३ ।<noinclude></noinclude>
nqcdqp3blxyey65gkmyqtqts4yj1i76
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२२
250
198121
671598
670859
2026-08-18T16:03:33Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
671598
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|{{larger|'''तारीखवार जीवन-वृत्तान्त'''}}}}
{{c|'''(१ जुलाई, १९३० - १५ दिसम्बर १९३० तक)'''}}
१ जुलाई : गांधीजी यरवदा जेलमें।
८ जुलाई : गांधीजीने अपने रिश्तेदारोंसे तबतक मिलनेसे इन्कार कर दिया जबतक कि सगे-सम्बन्धियों जितने ही प्रिय अन्य लोगोंको भी गांधीजीसे मिलनेको इजाजत न दे दी जाये।
२३ जुलाई : मु० रा० जयकर और तेजबहादुर सप्रूसे भेंटकी तथा उनकी मार्फत मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरूको एक पत्र भिजवाया।
३१ जुलाई- २ अगस्त: मु० रा० जयकरसे बातचीत की।
१४ और १५ अगस्त : मु० रा० जयकर, तेजबहादुर सप्रूने यरवडा जेलमें गांधीजी तथा दूसरे कांग्रेसी नेताओं - मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, डा० सैयद महमूद, जयरामदास दौलतराम और सरोजिनी नायडू - के साथ बातचीत की।
३० और ३१ अगस्त : मु० रा० जयकर, तेज बहादुर सप्रूने नैनी जेल में मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू तथा डा० सैयद महमूदसे भेंट की ।
३ - ५ सितम्बर : तेजबहादुर सप्रू और मु० रा० जयकरने यरवडा जेलमें गांधीजी तथा दूसरे कांग्रेसी नेताओंके साथ बातचीत की तथा कांग्रेसी नेताओं द्वारा हस्ताक्षरित और गांधीजी द्वारा तैयार किया गया एक संयुक्त वक्तव्य प्राप्त किया।
१२ सितम्बर : गांधीजीकी अनुपस्थितिमें लंदन में गोलमेज सम्मेलन आरम्भ हुआ ।
गांधीजीने 'गीता' पर प्रवचन-माला लिखनी आरम्भ की।<noinclude></noinclude>
2e564bewn05tlczmw8jmnzn3nvzs7qa
671599
671598
2026-08-18T16:03:57Z
Koyal Singh
6351
671599
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|{{larger|'''तारीखवार जीवन-वृत्तान्त'''}}}}
{{c|(१ जुलाई, १९३० - १५ दिसम्बर १९३० तक)}}
१ जुलाई : गांधीजी यरवदा जेलमें।
८ जुलाई : गांधीजीने अपने रिश्तेदारोंसे तबतक मिलनेसे इन्कार कर दिया जबतक कि सगे-सम्बन्धियों जितने ही प्रिय अन्य लोगोंको भी गांधीजीसे मिलनेको इजाजत न दे दी जाये।
२३ जुलाई : मु० रा० जयकर और तेजबहादुर सप्रूसे भेंटकी तथा उनकी मार्फत मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरूको एक पत्र भिजवाया।
३१ जुलाई- २ अगस्त: मु० रा० जयकरसे बातचीत की।
१४ और १५ अगस्त : मु० रा० जयकर, तेजबहादुर सप्रूने यरवडा जेलमें गांधीजी तथा दूसरे कांग्रेसी नेताओं - मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, डा० सैयद महमूद, जयरामदास दौलतराम और सरोजिनी नायडू - के साथ बातचीत की।
३० और ३१ अगस्त : मु० रा० जयकर, तेज बहादुर सप्रूने नैनी जेल में मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू तथा डा० सैयद महमूदसे भेंट की ।
३ - ५ सितम्बर : तेजबहादुर सप्रू और मु० रा० जयकरने यरवडा जेलमें गांधीजी तथा दूसरे कांग्रेसी नेताओंके साथ बातचीत की तथा कांग्रेसी नेताओं द्वारा हस्ताक्षरित और गांधीजी द्वारा तैयार किया गया एक संयुक्त वक्तव्य प्राप्त किया।
१२ सितम्बर : गांधीजीकी अनुपस्थितिमें लंदन में गोलमेज सम्मेलन आरम्भ हुआ ।
गांधीजीने 'गीता' पर प्रवचन-माला लिखनी आरम्भ की।<noinclude></noinclude>
qh0sf3xhn80rhnxxvp2puojd0mlmx51
671608
671599
2026-08-18T16:15:51Z
Koyal Singh
6351
671608
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|{{larger|'''तारीखवार जीवन-वृत्तान्त'''}}}}
{{c|(१ जुलाई, १९३० - १५ दिसम्बर १९३० तक)}}
{{Gap}}१ जुलाई : गांधीजी यरवदा जेलमें।
८ जुलाई : गांधीजीने अपने रिश्तेदारोंसे तबतक मिलनेसे इन्कार कर दिया जबतक कि सगे-सम्बन्धियों जितने ही प्रिय अन्य लोगोंको भी गांधीजीसे मिलनेको इजाजत न दे दी जाये।
२३ जुलाई : मु० रा० जयकर और तेजबहादुर सप्रूसे भेंटकी तथा उनकी मार्फत मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरूको एक पत्र भिजवाया।
३१ जुलाई- २ अगस्त: मु० रा० जयकरसे बातचीत की।
१४ और १५ अगस्त : मु० रा० जयकर, तेजबहादुर सप्रूने यरवडा जेलमें गांधीजी तथा दूसरे कांग्रेसी नेताओं - मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, डा० सैयद महमूद, जयरामदास दौलतराम और सरोजिनी नायडू - के साथ बातचीत की।
३० और ३१ अगस्त : मु० रा० जयकर, तेज बहादुर सप्रूने नैनी जेल में मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू तथा डा० सैयद महमूदसे भेंट की ।
३ - ५ सितम्बर : तेजबहादुर सप्रू और मु० रा० जयकरने यरवडा जेलमें गांधीजी तथा दूसरे कांग्रेसी नेताओंके साथ बातचीत की तथा कांग्रेसी नेताओं द्वारा हस्ताक्षरित और गांधीजी द्वारा तैयार किया गया एक संयुक्त वक्तव्य प्राप्त किया।
१२ सितम्बर : गांधीजीकी अनुपस्थितिमें लंदन में गोलमेज सम्मेलन आरम्भ हुआ ।
गांधीजीने 'गीता' पर प्रवचन-माला लिखनी आरम्भ की।<noinclude></noinclude>
lrtavv3qyhinynkg4fvcgzikjy5ylde
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२३
250
198122
671607
670860
2026-08-18T16:14:51Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
671607
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|{{larger|'''शीर्षक-सांकेतिका'''}}}}
{{Multicol}}
{{outdent|माफिका : मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरूको, ४३-४}}
{{outdent|टिप्पणी: मु० रा० जयकरको, ६०}}
{{outdent|तार : जयशंकर त्रिवेदीको, २५२ ; –मोतीलाल नेहरूको, २४८; –वी० एम० धौनियम गांधीको, ३८}}
{{outdent|पत्र : अण्टन सिल्व्हेस्ट्रको, २६१; –अब्दुल कादिर बावजीरको, ३०४, ३३९ ; –अब्बासको, १६४, २८८ ; –अब्बास तैयबजीको, ३०१; –अमीना कुरैशीको, १, ५, ३०, १५७, ३३९, ३४०; –अमृतलाल ठक्करको, १११ ; –आर० वी० मार्टिनको, १०-१३, १५५-५७, १८७, १९०, १९५-९६ ; –ईश्वरलाल जोशीको, १४; –एक आश्रमवासीको, ६७; –एम० एल० एम० पोलकको, २५-२६; –कल्याणजी मेहताको, १३, ९९, २०७ ; –कमला नयन बजाजको, १७, ६२, १२६, १६३ ; –कमला नेहरूको, १५२ ; –काशीनाथ त्रिवेदीको, १६, ४९, ११०, १७६, २२९, २५१, ३५३ ; –कमला गांधीको, १७९, २३५-३६ ; –काशिनाथ त्रिवेदीको, १६, ५०, ७८-७९, १००, १३४, १७७, २११-१२, २६५, ३२३, ३३६, ३५१, ३७७-७८; –कुँवरजी पारेखको, ८६ ; –कुँवरजी मेहताको, २५०, २८६, ३७६; –कुसुम देसाईको, २१, ६२, ९८, १४३, १५९, १६९, २०६, २२७, २६९, ३०२, ३२१, ३४६, ३५६, ३६९ ; –कृष्णमैया देवीको, २८०; –गंगादेवी सनाढ्यको, ३०१; –गंगाबहन गांधीको, २, ४८, १११, २७९, ३०६ ; –गंगाबहन झवेरी और}}
{{multicol-break}}
{{outdent|नानीबहन झवेरीको, १७४; –गंगाबहन वैद्यको, १४, ३०, ५३, ५४, ६५, १४२, १६३, १६५, १७४, १९३-९४, २१४, २४३, २८८, ३०४-५, ३२६, ३३७, ३६१; –ग़ुलाम रसूल कुरैशीको, १०८, १५२; –गोविन्द पटेलको, २६, २००, २८४ ; –घनश्यामदास बिड़लाको, ५६-५७, २२१, २६०, २६४, ३५० ; –चन्द त्यागीको, ३५५ ; –छगनलाल जोशीको, २२९; –जमनाको, २७०; –जयप्रकाश नारायणको, ८९, १७६, ३१३; –जयशंकर त्रिवेदीको, २५२, २६८; –जयसुखलाल गांधीको, १२३, १७९-८०, २९०; –जानकीदेवी बजाजको, ५०, १६०; –जी० ए० नटेसनको, २९; –जुगलराम दवेको, २८५; –जे० सी० कुमारप्पाको, ३७, ७१, १३१, १६१, २६२-६३, ३०८, ३६९; –डाह्याबहन पटेलको, ६; –दह्याभाई पी० जोशीको, २३७, ३०२ ; –तारा मशरूवालाको, २८३; –ताराबहेन मथुरादास त्रिकमजी को, १३०, २५५, २८१, ३५२; –तुलसी मेहरको, १७७; –दौलतराम जयरामको, ३६३; –दुर्गा गिरि को, १९, ११३, २१५, २२९, २४६, २७१ ; –दूधीबहन देसाईको, २२, १९९, २८२; –नानाभाई इच्छाश्रम मशरूवालाको, २८२, ३७३; –नानीबहन झवेरीको, २; –नारणदास गांधीको, ८-९, २३-२४, २८, ३१-४२, ५७-६०, ६७-७१, ८०-८२, ९०-९२, १०१-४, ११४-२६, १३४-३६, १४८-५१, १५५-६७, १८५-}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
28syy0k1kufaooecp3mc4tftmg7rc0s
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२४
250
198123
671619
670861
2026-08-18T16:30:37Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
671619
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh|४८६|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|९०, २०२-५, २१७-२०, २२२-२३, २३८-४१, २५६-५९, २७२-७४, २९१-९२, ३१३-१७, ३३१-३५, ३४७-४९, ३६५-६८; –नारायण देसाईको, २४७; –नारायण मोरेश्वर खरेको, ९४, १४०, १६४, १७३, २०८; –निर्मला देसाईको, १३९, ३७२; –पद्माको, २७७, ३०३, ३४३, ३६२, ३७५; –पन्नालालको, १७०, २६९; –परशुराम मेहरोत्राको, १९६; –पुरुषोत्तम गांधीको, ३२०; –पुरुषोत्तम डी० सैयाको, ३६, २४२; –पूंजाभाईको, १२२, १८३, २२८; –पैट्रिक क्विनको, ३४, ३५, १५१, २२४; –प्यारेलाल गोविन्दको, ३१८-२०; –प्रभावतीको, १४, २४, २८, ५४, ७५, ८८, १०१, १०७, ११२, १४५, १५८, २००, २०८, २३१, २५३, २६३-६४, २८६, ३११, ३२५, ३३८, ३६८, ३८०; –प्रेमलीला ठाकरसीको, २५९, २६०-६१, ३०६; –प्रेमाबहन कंटकको, ५, १८, ३१, ५२, ६१-६२, ७३, ८५, ९८, १०५, १२४, १३८-३९, १५४, १८०, १९१-९२, २१४, २३१, २४९, २७०, ३०७, ३२७-२८, ३४२-४३, ३५४-५५, ३७४; –फेनर ब्रॉकवेको, २२०; –बनारसीदास चतुर्वेदीको, २३६; –बनारसीलाल बजाजको, १४२; –बलबहाँई मेहताको, ३१७-१८, ३६३; –बलभद्रको, १३९, १८२, २०१, २४४, ३२२; –बलवीर सिंहको, १९५; –बहरामजी खम्भाताको, २३७, २७४-७५, २९३-९४; –बली और कुमीको, ४६-४७; –वलीबहन घोराको, ७२, २८०; –वी० जे० वी० गैलविनको, ३१८; –बुलाखीदासको, २८७, ३५६; –व्रजकृष्ण चाँदीवालाको,}}
{{multicol-break}}
{{outdent|२५, ६६, १०९, ३७०; –बेचरदास जोशीको, १२५; –भगवानजी अनूपचन्द मेहताको, २५३-५४; –भगवानजी पण्ड्याको, ९-१०, ४८, ६४, १२२, १५९, २०२, २११, २२२, २४५, २७९, ३०३, ३५७; –मणिवहन पटेलको, २२, ५५, ८२, ९७, १२८, १४६, १७१, ३७७; –मणिबहन पटेलको, १४४, १७२; –मथुरादास पुरुषोत्तमको, २४५, ३३०, ३५९; –मयुरी खरेको, ३२३, ३३६; –मनु गांधीको, ३, ४७, २८९, ३५४; –महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको, ६, १०६, १३६-३७, १८२, २२१, २३२, २६६, ३१२, ३२८, ३५८; –महावीर गिरि को, ९७, २०९, ३१०; –महेन्द्र वा० देसाईको, २४८, ३५६; –माधवदासको, १४४; –मानशंकर जयशंकर त्रिवेदीको, ३७, ६५, ९३, १०६, १२९, १४१, १६०, १९९, २५५, २६८, २८१, ३१०, ३२२, ३४७; –मीराबहनको, ७, २०-२१, २७, ३३-३४, ५२, ६४-६५, ७६-७७, ८९, १००-१, १०९-१०, १२६-२७, १४५-४६, १६२, १७८-७९, १९७-९९, २१५-१६, २३३-३४, २४७-४८, २७५-७६, २७६-७७, २९५-९७, ३२४-२५, ३४४-४६, ३५०, ३६४-६५, ३७०-७२; –मूलचन्द अग्रवालको, ३४३; –मैत्री गिरिको, ७३, १०७; –मोतीबहन चोकसीको, ४, १११, १३२, १३७, १६८, २०९; –मोतीलाल नेहरूको, ४५-४६; –युवित को, १७०; –रतिलाल शाहको, ३५; –रतिलाल सेठको, २२७; –रमाबहन जोशीको, ३२, ९३, १३७, २१०, २३४, ३३५, ३५२; –रलियातबहन}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
s9ynj5isdwe8z4ezpbkj1uo260mxpuw
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२५
250
198124
671629
670862
2026-08-18T16:46:33Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
671629
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh||शीर्षक-सांकेतिका|४८७}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|वृन्दावनलालको, १५३, २२६, –रसिक देसाईको, १०२; –राधाबहन गांधीको, ७२, ८५, ९६, १८१, २३०, २४६, २६५-६६, ३११; –रामचन्द्र खरेको, २८५; –रामचन्द्र त्रिवेदीको, २६७, ३७३, ३७९; –रामदास गांधीको, २१७, ३३७; –रामी गांधीको, ४७; –रामेश्वरदास पोद्दारको, ३६, १५३, १९७; –रावजीभाई पटेलको, २७, १९३; –रुक्मिणी बजाजको, ६६, ७४, ८६, १४३, ३१२; –रेहाना तैयबजीको, ५५, ८७, १२९, १७५, २३५, २८९-९०, ३६०; –रोहिणी कन्हैयालाल देसाईको, ८७, १३८, २१३, २८३, ३५३; –लक्ष्मीबहन खरेको, ४, ७९, १५५, २५०; –ललिताको, २८४; –लालजी परमारको, ३१; –लीलावतीको, २२१-२; –लीलावती आसरको, १२४, १४०, १५७, १७२; –वनमाला परीखको, ३२९, ३७५; –वसुमती पण्डितको, ३, १७, ४९, ६१, ८६, ९४, ११६, १४२, १५८, १७३, २१३, २२६, २६३, २९८, ३२५, ३३९, ३६१, ३७२; –वा० गो० देसाईको, ७९, ११३, १६८; –विठ्ठलदास जेराजानीको, ५१, २१०; –विनोद बालाको, १७१; –विल्फ्रेड वेलॉकको, १५; –वी० ए०}}
{{multicol-break}}
{{outdent|सुन्दरमको, २५२; –वेणीलाल गांधीको, १८१; –शान्ताको, २५१, २९०; –शान्ता त्रिवेदीको, ३७९; –शान्ता शंकरभाई पटेलको, २०१, २७१, ३०९, ३५७; –शान्तिकुमार मोरारजीको, १३२; –शारदा सी० शाहको, १५, ६३, ७४, १०८, १२३, १५४, १९१, २०६, २२५, २४२, २९७, ३७३; –शिवाभाई को, २९; –शिवाभाई जी० पटेलको, ७७, ३००, ३२१; –शूरजी वल्लभदास को, ५६; –सत्यादेवी गिरिको, ७५, ९९, १६१; –सप्रू और जयकरको, ८२-८४, ११७-२१; –सी० एफ० एण्ड्र्यूजको, २९४-९५; –सुरेन्द्र मशरूवालाको, २९३; –सुशीला गांधीको, १०१, १२८, २२३-२४, २२८, २७८, ३०९, ३६२; –हरिइच्छा देसाईको, ४६, ७८, २०७; –हरिप्रसादको, २२; –हरिलाल देसाईको, ३२६-२७; –हेमप्रभा दासगुप्तको, १, ३८, ५१-५२, ७६, १८३, २३२-३३, २४४, २६७, २९४, ३०८, ३३०, ३४०, ३७८}}
{{outdent|पत्रका अंश, ११७; –छगनलाल जोशीको लिखे, १४७; –मथुरादास त्रिकमजीको लिखे, ५१; –महादेव देसाईको लिखे, २९८-३००; –महालक्ष्मी माधवजी ठक्करको लिखे, २८७}}
{{outdent|सत्याग्रही बन्दियोंका कर्त्तव्य, ३४१}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
8dkwld8896yixbpfikayqjfi0vm5bcj
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२६
250
198125
671640
670863
2026-08-18T17:00:36Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
671640
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|'''सांकेतिका'''}}
{{Multicol}}
{{c|'''अ'''}}
{{outdent|अंग्रेज, १२१, ३०५}}
{{outdent|अकर्म, ३७०}}
{{outdent|अखा भगत, १३४}}
{{outdent|अग्रवाल, मूलचन्द, ३४३}}
{{outdent|अनटू दिस लास्ट (सर्वोदय), १४९}}
{{outdent|अनासक्ति, १९४, २४९, ३३२, ३४९, ३५१, ३६६; –पानेका उपाय, ३३२}}
{{outdent|अनासक्तियोग, २, ९, ५३, १३८, २३२ पा० टि०, ३६४, ३७८}}
{{outdent|अन्त्यज, ३०}}
{{outdent|अन्ना, १८८}}
{{outdent|अपरिग्रह, ९०, १०३-४}}
{{outdent|अप्पास्वामी, श्रीमती, १३१}}
{{outdent|अब्दुल्ला सेठ, ११, ९९}}
{{outdent|अब्बास, १६४, २८८}}
{{outdent|अभयजी, ३५५}}
{{outdent|अमीदास, ६८, १८६, २०३, २१८, २२२, २३९, २४०, २५६, २७३, ३३२, ३४८}}
{{outdent|अमीर अली, १७५}}
{{outdent|अय्यंगार, एस०, १९७}}
{{outdent|अरविन्द बाबू, देखिए घोष, अरविन्द}}
{{outdent|अरुण, ३८, ५२, ७६, १८३, २३३, २६७}}
{{outdent|अर्जुन, ३२२, ३३३}}
{{outdent|अलेक्जैंडर, २७६}}
{{outdent|अव्यक्त, ३२१}}
{{outdent|असहयोग, ४४, ८४; –अपने शरीरसे, १८४}}
{{outdent|अस्तेय, ९१-२, १०३-४}}
{{outdent|अस्पृश्य, १३४, १३५, ३२३}}
{{multicol-break}}
{{outdent|अस्पृश्यता, २३७ पा० टि०, ३७९; –और धर्म, ३७३; –और हिन्दू-धर्म, १३५; –निवारण, १३४-५}}
{{outdent|अस्वाद, ९०; –और ब्रह्मचर्य, ८०-२}}
{{outdent|अहिंसा, ९, १८, ४२, ५८-६०, ९०-२, १२१, १३७, १६६, १९६, २०४, २३०, २४०, २६७, ३३१, ३३९, ३४१ पा० टि०, ३६१; –और अस्पृश्यता-निवारणका एक अर्थ, १३६; –और शरीर-श्रम, १५०; –और सत्य, ५८-६०; –का पूर्ण पालन ब्रह्मचर्यके बिना असम्भव, ६९; –धर्मके रूपमें, १४७}}
{{outdent|अहुरमज्द, २६२; देखिए होरमज्द भी,}}
{{c|'''आ'''}}
{{outdent|आगम, १२५}}
{{outdent|आत्मकथा, –का स्वीडिशमें अनुवाद, ११४}}
{{outdent|आत्मशुद्धि, ३०८, ३५७}}
{{outdent|आत्मा, १३१, १३८}}
{{outdent|आनन्द, १४}}
{{outdent|आनन्दी, १३, १५४}}
{{outdent|आश्रम-भजनावली, २०, १८०, ३५५; –का अनुवाद, ३६४}}
{{outdent|आसक्ति, –जल्दबाजीमें, ३६८}}
{{outdent|आसर, मणि, ११}}
{{outdent|आसर, लक्ष्मीदास, ११, ९५, १३२}}
{{outdent|आसर, लीलावती, ११, ११४, १२४, १४०, १५७, १७२, १८८, २२१}}
{{outdent|आसर, वेलाभाई, ११}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
gu992el6l9r9v3qvp7ikszvx4imjavs
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२७
250
198126
671643
670864
2026-08-18T17:09:27Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
671643
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" /></noinclude>{{c|सांकेतिका}}
{{right|४८९}}
{{Multicol}}
{{c|'''इ'''}}
{{outdent|इमाम, हसन, ७६}}
{{outdent|इमाम साहब, देखिए बावजीर, इमाम अब्दुल कादिर}}
{{outdent|इविंग, वाशिंगटन, १७५}}
{{outdent|इर्विन, लॉर्ड, ४४, ६० पा० टि०, ८२, ८३, ८४ पा० टि०, ११७-२०}}
{{outdent|इस्लाम, १८९}}
{{c|'''ई'''}}
{{outdent|ईश्वर, ४१, ४२, १०४, ११०, ११५, १२९, १४१, १६६, १६९, १७०, १७८, १९३, २०४, २०५, २१८, २२०, २२१, २२५, २३२, २३३, २४१, २४४, २५१, २५४, २६३, २६७, २७९, २८०, २८२, २८८, २९६, ३००, ३०४, ३०८, ३०९, ३१३, ३१४, ३२०, ३२२, ३२७, ३३३, ३३५, ३३९, ३४०, ३५६, ३६५, ३७६, ३८०; –सत्य-रूपी, ४२, ५९, ३३३; –ही सच्चा सद्गुरु, ३११}}
{{outdent|ईश्वरलाल, १२}}
{{outdent|ईसाई-धर्म, १८९}}
{{c|'''उ'''}}
{{outdent|उत्तरदायी सरकार, –स्वतंत्र भारतके लिए, ११९, १२०}}
{{outdent|उपनिषद्, ११५, १३८}}
{{outdent|उपवास, ८१, ३०७, ३४३, ३५३}}
{{outdent|उस्वा-ए-सहाबा, १२९}}
{{c|'''ए'''}}
{{outdent|एण्ड्र्यूज, सी० एफ०, २६, ११०, २७६, २९४, २९५}}
{{multicol-break}}
{{c|'''ऐ'''}}
{{outdent|ऐशर, श्रीमती, १४६}}
{{c|'''ओ'''}}
{{outdent|ओम्, ६२}}
{{c|'''औ'''}}
{{outdent|औपनिवेशिक दर्जा, ११८}}
{{c|'''क'''}}
{{outdent|कंटक, प्रेमाबहन, ५, १८, ३१, ५२, ६१, ७३, ८५, ९८, १०५, १२३, १२४, १३८, १७९, १५४, १८०, १९१, २१४, २३१, २४९, २७०, ३०७, ३२७, ३२९, ३३६, ३५३, ३५७, ३७४, ३७५}}
{{outdent|कताई, १७, २०, २१, २४, ४९, ५७, ६४, ६८, ७५, १०२, ११३, ११६, १२९, १६२, १६४, १८६, १८७, १९५, २०३, २०६, २१५, २३९, २५९, २७३, २७५, २९१, २९९, ३२४, ३५६; –आश्रममें, ३३२; –यज्ञ, २७६, २९८-३००, ३३१, ३४८}}
{{outdent|कट्टु, १८७}}
{{outdent|कनु, ९, २४}}
{{outdent|कपिलराय, ११}}
{{outdent|कबीर, ११६ पा० टि०, २५८ पा० टि०}}
{{outdent|कमला १७, १८०; देखिए पटेल, कमला शंकरभाई भी}}
{{outdent|कमलाबहन, ६१, १०७, १६१, १७५, ३६९}}
{{outdent|कमला हरिदास, ११}}
{{outdent|करसनजी मूलचन्द, २५४}}
{{outdent|कर्तव्य, देखिए धर्म}}
{{outdent|कर्म, ३७०}}
{{multicol-end}}
{{right|४४-३२}}<noinclude></noinclude>
4oa53pxgt1pbsaq6iatwita7epi3xv0
671644
671643
2026-08-18T17:10:46Z
Koyal Singh
6351
671644
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh||सांकेतिका|४८९}}</noinclude>{{Multicol}}
{{c|'''इ'''}}
{{outdent|इमाम, हसन, ७६}}
{{outdent|इमाम साहब, देखिए बावजीर, इमाम अब्दुल कादिर}}
{{outdent|इविंग, वाशिंगटन, १७५}}
{{outdent|इर्विन, लॉर्ड, ४४, ६० पा० टि०, ८२, ८३, ८४ पा० टि०, ११७-२०}}
{{outdent|इस्लाम, १८९}}
{{c|'''ई'''}}
{{outdent|ईश्वर, ४१, ४२, १०४, ११०, ११५, १२९, १४१, १६६, १६९, १७०, १७८, १९३, २०४, २०५, २१८, २२०, २२१, २२५, २३२, २३३, २४१, २४४, २५१, २५४, २६३, २६७, २७९, २८०, २८२, २८८, २९६, ३००, ३०४, ३०८, ३०९, ३१३, ३१४, ३२०, ३२२, ३२७, ३३३, ३३५, ३३९, ३४०, ३५६, ३६५, ३७६, ३८०; –सत्य-रूपी, ४२, ५९, ३३३; –ही सच्चा सद्गुरु, ३११}}
{{outdent|ईश्वरलाल, १२}}
{{outdent|ईसाई-धर्म, १८९}}
{{c|'''उ'''}}
{{outdent|उत्तरदायी सरकार, –स्वतंत्र भारतके लिए, ११९, १२०}}
{{outdent|उपनिषद्, ११५, १३८}}
{{outdent|उपवास, ८१, ३०७, ३४३, ३५३}}
{{outdent|उस्वा-ए-सहाबा, १२९}}
{{c|'''ए'''}}
{{outdent|एण्ड्र्यूज, सी० एफ०, २६, ११०, २७६, २९४, २९५}}
{{multicol-break}}
{{c|'''ऐ'''}}
{{outdent|ऐशर, श्रीमती, १४६}}
{{c|'''ओ'''}}
{{outdent|ओम्, ६२}}
{{c|'''औ'''}}
{{outdent|औपनिवेशिक दर्जा, ११८}}
{{c|'''क'''}}
{{outdent|कंटक, प्रेमाबहन, ५, १८, ३१, ५२, ६१, ७३, ८५, ९८, १०५, १२३, १२४, १३८, १७९, १५४, १८०, १९१, २१४, २३१, २४९, २७०, ३०७, ३२७, ३२९, ३३६, ३५३, ३५७, ३७४, ३७५}}
{{outdent|कताई, १७, २०, २१, २४, ४९, ५७, ६४, ६८, ७५, १०२, ११३, ११६, १२९, १६२, १६४, १८६, १८७, १९५, २०३, २०६, २१५, २३९, २५९, २७३, २७५, २९१, २९९, ३२४, ३५६; –आश्रममें, ३३२; –यज्ञ, २७६, २९८-३००, ३३१, ३४८}}
{{outdent|कट्टु, १८७}}
{{outdent|कनु, ९, २४}}
{{outdent|कपिलराय, ११}}
{{outdent|कबीर, ११६ पा० टि०, २५८ पा० टि०}}
{{outdent|कमला १७, १८०; देखिए पटेल, कमला शंकरभाई भी}}
{{outdent|कमलाबहन, ६१, १०७, १६१, १७५, ३६९}}
{{outdent|कमला हरिदास, ११}}
{{outdent|करसनजी मूलचन्द, २५४}}
{{outdent|कर्तव्य, देखिए धर्म}}
{{outdent|कर्म, ३७०}}
{{multicol-end}}
{{right|४४-३२}}<noinclude></noinclude>
etxrj16j0oashqn2ddxcgk47lj13ejc
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२८
250
198127
671650
670865
2026-08-18T17:26:29Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
671650
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />{{rh|४९०|सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय}}</noinclude>{{Multicol}}
{{outdent|कलावती, देखिए त्रिवेदी, कलावती}}
{{outdent|कल्याणदास, २७०}}
{{outdent|कस्तूरबहन, १२}}
{{outdent|काकु, १३, १५५, २४३}}
{{outdent|कादियानी, मौलवी मुहम्मद अली, १७५}}
{{outdent|कानजीभाई, ४८, १३८, २८३, ३७६}}
{{outdent|कानुगा, डा०, ४०}}
{{outdent|कान्ताबहन, १२, १०५, २४०, २५६, २७२, २९२, ३३२}}
{{outdent|कामदार, ३०}}
{{outdent|कामदार, रमीबाई, १२, १४, ३०}}
{{outdent|कार्लाइल, १७५}}
{{outdent|कॉलिन्स, जी० एफ० एस०, २३८}}
{{outdent|कालेलकर, द० वा०, ३, ४, १७, १८, २३, २८, ३०, ३१, ३६, ४०, ५१, ५७, ६२, ७३, ७८, ९३, ९८, १००, १०४, १०६, १०९, ११०, ११२, ११४, ११६, १२५, १२७, १३३, १३४, १४६, १४९, १५८, १५९, १६२, १६३, १६६, १६९, १७४, १७८, १८५, १८७, १८८, १९४, १९७, १९९, २००, २०३, २०७, २१७, २३१, २४२, २४८, २५४, २५६, २५९, २६८, २७२, २७५, २८८, २९३, २९५, २९९, ३०२, ३०४, ३१०, ३१६-१८, ३२२, ३२८, ३२९, ३३४, ३३५, ३३८, ३४१ पा० टि०, ३४४, ३४५, ३४७, ३४८, ३६३, ३६४, ३६६, ३६७, ३७१}}
{{outdent|कालेलकर, बाल, ६५, १८८}}
{{outdent|किंगडम ऑफ हेवेन इज विदिन यू, २५६}}
{{outdent|कीकीबहन, १५२}}
{{multicol-break}}
{{outdent|कुमारप्पा, जे० सी०, १२, ३७, ७१, १३१, १६१, १७९, १८७, २१२, २५६, २६२, ३०८, ३४५, ३६९}}
{{outdent|कुमी, देखिए बोरा, कुमीबहन}}
{{outdent|कुरैशी, अमीना, १, ५, ११, ३०, १०८, १५२, १५७, ३०४, ३२९, ३४०}}
{{outdent|कुरैशी, गुलाम रसूल, १०८, १५२}}
{{outdent|कुरैशी, शूरुफ, २०४, ३२९}}
{{outdent|कुरान, १०८}}
{{outdent|कुसुम, ४७, ३४७; देखिए देसाई, कुसुम भी}}
{{outdent|कूते, डा०, १०५, २६५, ३७७}}
{{outdent|कृपलानी, जे० बी०, १५२ पा० टि०}}
{{outdent|कृष्ण, भगवान, ११७, ३३२, ३३३, ३६६}}
{{outdent|कृष्णकान्त, २७८}}
{{outdent|कृष्णकुमारी, १२, ६१}}
{{outdent|कृष्णदास, ७६, १०२, २९१, ३०८}}
{{outdent|कृष्णमैया देवी, ११, ९९, २८०}}
{{outdent|कृष्णविजय, ३४२}}
{{outdent|कृष्णा, १४४}}
{{outdent|केवलराम, १२, २३४}}
{{outdent|कोटक, शारदा, १२}}
{{outdent|कोटक, हरजीवन, १२}}
{{outdent|कोठारी, जीवरामभाई, २५६}}
{{outdent|क्रॉसबी, ३४२}}
{{outdent|क्विंन, पैट्रिक, ३५, १५१, १९०, २२४}}
{{c|'''ख'''}}
{{outdent|खम्भाता, तहमीना, ११}}
{{outdent|खम्भाता, बहरामजी, ११, २३७, २७४, २९३}}
{{outdent|खरे, ना० मो०, ९४, ९८, १४०, १६४, १७३, १९२, २०८, २५०, २५५}}
{{outdent|खरे, मयुरी, ९४, २५०, ३२३, ३३६, ३४२}}
{{outdent|खरे, रामचन्द्र, देखिए खरे, रामभाऊ}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
hx0qylx0jvcj9wed93jckxab3kzbl4z
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 44.pdf/५२९
250
198128
671704
670866
2026-08-19T05:24:12Z
Koyal Singh
6351
/* शोधित */
671704
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Koyal Singh" />सांकेतिका</noinclude>
{{rrh|४९१}}
{{Multicol}}
{{outdent|खरे, रामभाऊ, ११, ९४, १६४, १७३, २८५}}
{{outdent|खरे, लक्ष्मीबहन, ४, ११, ७९, ९४, १५५, २५०, २८५}}
{{outdent|खादी (खद्दर), १७, ५०, ५१, १६४, १७७, २१७, २२१, २६९, २९९}}
{{outdent|खुराक, १३४, १४६, १५८, १७७, १८५, २१६, २२३, २४३, २९३, ३००, ३२२, ३४२, ३५३, ३५५, ३६५, ३६६, ३७३, ३७६; –और दूध, ३३९; –और फल, ३३२; –जेलमें, ३३४-५; –में प्रयोग, १४९, १६२, २३८-९, २४८, २७७, २९३-४, ३०६, ३४४, ३४६, ३६४, ३६६, ३७१-२, ३७७}}
{{outdent|खुर्शेदबहन, १२४, १५१, १७२, १८८, २०५}}
{{c|'''ग'''}}
{{outdent|गंगाबहन, देखिए झवेरी, गंगाबहन}}
{{outdent|गंगाबहन रामजी, १२}}
{{outdent|गंजीवाला कान्तु, १३६}}
{{outdent|गलिआरा, मणिभाई, ११}}
{{outdent|गांधी, उमिया, १७९}}
{{outdent|गांधी, कमला, १६५}}
{{outdent|गांधी, कसुम्बा, १२३, १७९, २३५}}
{{outdent|गांधी, कस्तूरबा, १०, ४७, १११, १४३, १४९, २१०}}
{{outdent|गांधी, कान्ति, ११४, १८७, २८०}}
{{outdent|गांधी, काशी, २९२}}
{{outdent|गांधी, कुसुम, ३६६; देखिए कुसुम भी}}
{{outdent|गांधी, केतु, ५७, ९६, १०२, १२४, १४५, १८५, १९८, २१८, २४६, २७२, २९१, २९५, ३६४, ३६६, ३६७}}
{{outdent|गांधी, छगनलाल, ३२४}}
{{outdent|गांधी, जमनादास, १०२, १२४, ३२०, ३५५}}
{{multicol-break}}
{{outdent|गांधी, जयसुखलाल, १२३, १७९, २३५, २९०}}
{{outdent|गांधी, जेठालाल, ११}}
{{outdent|गांधी, देवदास, ३, २५, ६६, १०२, ११४, २५६, २६२, ३१५, ३४७}}
{{outdent|गांधी, नारणदास, ८, १६, २३, २४, २८, ३१, ५७, ६७, ७१, ८०, ९०, १०२, ११४, १२२-४, १३४, १३९, १४८, १५४, १६५, १७२, १८१, १८२, १८५, १९४, २०१, २०२, २११, २१२, २१७, २२२, २३८, २५६, २७२, २७५, २९१, ३१३, ३२०, ३२२, ३२५, ३२७, ३३१, ३४७, ३५१, ३५५, ३६५, ३७८}}
{{outdent|गांधी, नीमु, २१७}}
{{outdent|गांधी, पुरुषोत्तम, ३२०, ३५५, ३६५}}
{{outdent|गांधी, प्रभुदास, ९, ३९, ४९, २६८}}
{{outdent|गांधी, मगनलाल, ३६७}}
{{outdent|गांधी, मणिलाल, १०१, २२३, २२७, २५०, २५६, २७८, ३०९, ३१४, ३४७, ३६२}}
{{outdent|गांधी, मनमोहन, ५७}}
{{outdent|गांधी, मनु, ३, ४६, ४७, ७२, १९९, २२३, २८९, ३५४, ३५५}}
{{outdent|गांधी, मोहनदास करमचन्द, ११७ पा० टि०; –की ते० ब० सप्रू और मु० रा० जयकरसे भेंट, ८२ पा० टि०; –ने सप्रू और जयकरको मोतीलाल नेहरू और जवाहरलालको देनेके लिए एक ज्ञापिका दी, ४३ पा० टि०}}
{{outdent|गांधी, राधाबहन, १९, ६७, ७२, ८५, ९६, १०५, १४०, १८१, २१८, २३०, २४६, २६५, ३११, ३७७}}
{{multicol-end}}<noinclude></noinclude>
4y8doe2v1qf6dlp1muln2qhyp3js2hn