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Bnarayanan V
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/* शोधितम् */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''३८'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
जैसे द्रव्य गुण कर्म की कई जातियां (सामान्य विशेप) हैं,
वैसे सत्ता की भी जातियां प्रतीत होतीं, पर मत्ता मव की
सांझी एक जाति प्रतीत होती है, इसलिए सत्ता द्रष्प गुण
कर्म से भिन्न पदार्थ है । इसी प्रकार—
'''अनेक द्रव्यवत्वेन द्रव्यत्वमुक्तम् ॥११॥'''
अनेक द्रव्यों वाला होने से द्रव्यत्व कहागया ।
या०-सारे द्रव्यों में ‘द्रव्य, द्रव्य’ ऐसी अनुगत मतीति
का हेतु होनेसे द्रव्यत्व भी (सत्तावत्) व्याख्पातजानना चाहिये ।
'''सामान्यविशेषाभावेन च ॥१२॥'''
सामान्य विशेष के अभाव से भी है ।
व्या०-पादे द्रव्यत्व द्रव्य रूप ही होता, तो द्रव्य की नाई
उस में भी द्रव्ष की अवान्तर जातियां (पृथिवीत्व, जळत्व,
आदि) प्रतीत होतीं । ।
'''गुणेषु भावाद् गुणत्वमुक्तम् ॥१३॥'''
(सारे) गुणे में होने से गुणत्व (सत्ता की नाई अलग )
कहा गया है ।
'''सामान्यविशेषाभावेन च ॥१४॥'''
सामान्य विशेष के अभाव से भी।
व्या०-गुणत्व में गुण की अवान्तर जातियों (रूपत्व,
रसत्व आदि) के अभाव से गुणत्व गुण से भिन्न पदार्थ है।
'''कर्मसु भावात् कर्मत्वमुक्तम् ॥१५'''॥
कांमों में होने से (कर्म से भन्नग) कर्मत्व कहागया है।<noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३
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Meera kale
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/* समस्यात्मकः */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{c|'''भूमिका'''}}
षड्दर्शन- आर्य वृद्धों के रचे हुए छः तर्कशास्त्र जगत्प्रसिद्ध हैं, जिन को षड्शास्त्र वा षड्-दर्शन कहते हैं। इनके नाम ये हैं-वैशेषिक, न्याय, साङ्ख्य, योग, पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा। इन में से पूर्वमीमांसा मीमांसा नाम से, और उत्तरमीमांसा वेदान्त नाम से प्रसिद्ध है।{{nop}}
दर्शनों के रचने का उद्देश्य- दर्शनों के रचने का उद्देश्य यह था, कि लोगों को विचार-स्वातन्त्र्य की शिक्षा दी जाए, और उन की बुद्धियों को सीधे मार्ग पर डाल कर उन्नत किया जाय। क्योकि बुद्धि की वृद्धि और विचार स्वातन्त्र्य में ही मनुष्यों का कल्याण है, इसी में मनुष्य के इस लोक और परलोक का सुधार है। हां यह नि:संदेह है, कि विचार-स्वातन्त्र्य में भी इन सूक्ष्मदर्शी दर्शनकारों ने वैदिक मार्ग को सर्वथा सरल और सीधा देखा,अतएव विचार स्वातन्त्र्य की शिक्षा देते हुए भी वैदिक धर्म की पूर्णतया रक्षा की, इसी लिए ये दर्शन वेदों के उपांग कहलाये ।{{nop}}
दैर्शनकार मुनि - दर्शनों के बनाने वाले मुनि कहलाते हैं । जिन के नाम ये हैं-कणाद, गोतम, कपिल, पतञ्जलि, जैमिनि और व्यास। मुनि का अर्थ है मनन करने वाला, तर्क से निश्चय करने वाला, वह पुरुष, जो सत्तर्क से सचाई का ठीक पता लगा लेता है, और युक्ति द्वारा औरों का निश्चय बिठां देता है, उस को मुनि कहते हैं । आर्यजाति में ऋषि
<br/><noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/४
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Meera kale
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/* समस्यात्मकः */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''२'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
और मुनि दोनों बड़े आदर के शब्द हैं । जो मन्त्रद्रष्टा हुए, जिन्हों ने धर्म को साक्षात् किया, वे ऋषि कहलाए, और जिन्हों ने उन सचाइयों का मनन किया और कराया, वे मुनि कहलाए।{{nop}}
वैशेषिक सूत्रकार कणाद मुनि- वैशेषिक सूत्रों के कर्ता कणाद मुनि हुए हैं। इन का कोई जीवन-चरित्र नहीं मिलता, इसलिए इनके देश काल और जीवन वृत्तान्त के विषय में निश्चित रूप से इतना ही कह सकते हैं, कि ये कश्यप ऋषि की सन्तान परम्परा में उलूक मुनि के पुत्र हुए हैं। वायु पुराण पूर्व खण्ड अध्याय २३ में लिखा है, कि २७ वें परिवर्त में जब जातूकर्ण्य व्यास हुए, उस समय प्रभासक्षेत्र में सोमशर्मा ब्राह्मण रहते थे, जो बडे तपस्वी और योगी थे, कणाद मुनि इस महात्मा के शिष्य थे। कणाद स्वय भी योगी थे, इन की बुद्धि बडी शुद्ध और चरित्र बड़ा पावित्र था । वैशेषिक सम्प्रदाय को आचार्य यह मानते और लिखते आरहे हैं, कि इस मुनि ने समाधि द्वारा महेश्वर को प्रसन्न करके वैशेषिक शास्त्र रचा था ।{{nop}}
कणाद रचित दर्शन के नाम- कणाद मुनि ने इस दर्शन को वैशेषिक नाम इस कारण दिया, कि इस मे सूल पदार्थो का जो परस्पर विशेष (भेद) है, उस का निरूपण किया है। विशेष शब्द सें वैशेषिक शब्द {{bold|'अधिकृत्य कृतेग्रन्थे'}} (अष्टा ४ । ३ । ७) सूत्र से 'विशेष के बोधक शास्त्र' के अर्थ में बना है विशेषं पदार्थभेदं अधिकृत्य कृतं शास्त्रं वैशेषिकम्' विशेष अर्थात् पदार्थों के भेद का बोधक वैशेषिक है। इस दर्शन के रचने में कणादमुनि का यह उद्देश था, कि इस विश्व में<br/><noinclude><references/></noinclude>
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Meera kale
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''२'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
और मुनि दोनों बड़े आदर के शब्द हैं । जो मन्त्रद्रष्टा हुए, जिन्हों ने धर्म को साक्षात् किया, वे ऋषि कहलाए, और जिन्हों ने उन सचाइयों का मनन किया और कराया, वे मुनि कहलाए।{{nop}}
वैशेषिक सूत्रकार कणाद मुनि- वैशेषिक सूत्रों के कर्ता कणाद मुनि हुए हैं। इन का कोई जीवन-चरित्र नहीं मिलता, इसलिए इनके देश काल और जीवन वृत्तान्त के विषय में निश्चित रूप से इतना ही कह सकते हैं, कि ये कश्यप ऋषि की सन्तान परम्परा में उलूक मुनि के पुत्र हुए हैं। वायु पुराण पूर्व खण्ड अध्याय २३ में लिखा है, कि २७ वें परिवर्त में जब जातूकर्ण्य व्यास हुए, उस समय प्रभासक्षेत्र में सोमशर्मा ब्राह्मण रहते थे, जो बडे तपस्वी और योगी थे, कणाद मुनि इस महात्मा के शिष्य थे। कणाद स्वय भी योगी थे, इन की बुद्धि बडी शुद्ध और चरित्र बड़ा पावित्र था । वैशेषिक सम्प्रदाय के आचार्य यह मानते और लिखते आरहे हैं, कि इस मुनि ने समाधि द्वारा महेश्वर को प्रसन्न करके वैशेषिक शास्त्र रचा था ।{{nop}}
कणाद रचित दर्शन के नाम- कणाद मुनि ने इस दर्शन को वैशेषिक नाम इस कारण दिया, कि इस मे मूल पदार्थो का जो परस्पर विशेष (भेद) है, उस का निरूपण किया है। विशेष शब्द सें वैशेषिक शब्द {{bold|'अधिकृत्य कृतेग्रन्थे'}} (अष्टा ४ । ३ । ७) सूत्र से 'विशेष के बोधक शास्त्र' के अर्थ में बना है 'विशेषं पदार्थभेदं अधिकृत्य कृतं शास्त्रं वैशेषिकम्' विशेष अर्थात् पदार्थों के भेद का बोधक वैशेषिक है। इस दर्शन के रचने में कणादमुनि का यह उद्देश था, कि इस विश्व में<br/><noinclude><references/></noinclude>
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Meera kale
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/* समस्यात्मकः */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''४'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेषिक दर्शन के मूलसूत्र और उन पर व्याख्यान- वैशेषिक के मूलसूत्र भगवान् कणाद
ने रचे हैं। उन पर जो भाष्य इस समय मिलता है, वह प्रशस्त पाद मुनि का रचा हुआ भशस्त पाद भाष्य* नाम से प्रसिद्ध है। इस भाष्य पर (३)(क) श्री उदयनाचार्य विराचित ‘किरणावली' नामी एक टीका है, और (ख) भट्ट श्री श्रीधराचार्य विरचित ‘न्याय कन्दली' नामी दूसरी टीका है, और जगदीश भट्टाचार्य कृत ‘भाष्यसूक्ति'तीसरी टीका है, और ‘भिक्षुवार्तिक'चौथीटीका है। और शंकरमिश्र कृत ‘कणादरहस्य’ पांचवीं है। उदयनाचार्य
और श्रीधराचार्य दोनों एक ही शताब्दी में हुए हैं। उदयनाचार्य ने एक 'लक्षणावली' नामी ग्रन्थ भी रचा है, उस के अन्त मे उन्होंने उस के रचन का समय यह दिया है-'तर्काम्बराङ्क प्रमितेष्वतीतेषु शकान्ततः । वर्षेषूदयनश्चक्रे सुबोधां लक्षणावलीम्' अर्थात् शकसंवत् के ९०६वर्ष(वि० सं० १०४१) बीतने पर उदयन ने लक्षणावली बनाई। और श्रीधरने न्याय कन्दली के अन्त में इस की रचना का काल यह दिया है- ‘त्र्याधिकदशोत्तरनवशतशाकाब्दे न्यायकन्दली रचिता । श्रीपाण्डुदासयाचित भट्ट श्री श्रीधरेणेयम्' अर्थात् शक संवत् ९१३(=विक्रम् स० १०४८) में श्री पाण्डुदास की प्रार्थना से भट्ट श्री श्रीधर ने यह न्यायकन्दली रची । (४) इस के आगे किरणावली<br/>
{{rule}}
*‘प्रशस्तपादभाष्य' से पहले एक और भाष्य के होने का 'किरणावली' और 'कन्दली' दोनों से पता चलता है, और 'किरणावली' भास्कर, में पद्मनाभ ने उस भाष्य को रावण प्रणीत लिखा है ।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude>
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Meera kale
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''४'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेषिक दर्शन के मूलसूत्र और उन पर व्याख्यान- वैशेषिक के मूलसूत्र भगवान् कणाद
ने रचे हैं। उन पर जो भाष्य इस समय मिलता है, वह प्रशस्त पाद मुनि का रचा हुआ भशस्त पाद भाष्य* नाम से प्रसिद्ध है। इस भाष्य पर (३)(क) श्री उदयनाचार्य विराचित ‘किरणावली' नामी एक टीका है, और (ख) भट्ट श्री श्रीधराचार्य विरचित ‘न्याय कन्दली' नामी दूसरी टीका है, और जगदीश भट्टाचार्य कृत ‘भाष्यसूक्ति' तीसरी टीका है, और ‘भिक्षुवार्तिक' चौथी टीका है। और शंकरमिश्र कृत ‘कणादरहस्य’ पांचवीं है। उदयनाचार्य
और श्रीधराचार्य दोनों एक ही शताब्दी में हुए हैं। उदयनाचार्य ने एक 'लक्षणावली' नामी ग्रन्थ भी रचा है, उस के अन्त मे उन्होंने उस के रचन का समय यह दिया है-'तर्काम्बराङ्क प्रमितेष्वतीतेषु शकान्ततः । वर्षेषूदयनश्चक्रे सुबोधां लक्षणावलीम्' अर्थात् शकसंवत् के ९०६वर्ष(वि० सं० १०४१) बीतने पर उदयन ने लक्षणावली बनाई। और श्रीधरने न्याय कन्दली के अन्त में इस की रचना का काल यह दिया है- ‘त्र्याधिकदशोत्तरनवशतशाकाब्दे न्यायकन्दली रचिता । श्रीपाण्डुदासयाचित भट्ट श्री श्रीधरेणेयम्' अर्थात् शक संवत् ९१३(=विक्रम् स० १०४८) में श्री पाण्डुदास की प्रार्थना से भट्ट श्री श्रीधर ने यह न्यायकन्दली रची । (४) इस के आगे किरणावली<br/>
{{rule}}
*‘प्रशस्तपादभाष्य' से पहले एक और भाष्य के होने का 'किरणावली' और 'कन्दली' दोनों से पता चलता है, और 'किरणावली' भास्कर, में पद्मनाभ ने उस भाष्य को रावण प्रणीत लिखा है ।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|center='''भूमिका''' ।|right='''५'''}}
(क)एक तो वर्धमानोपाध्यायनामी विरचित ‘किरणावली प्रकाश' नामी व्याख्यान है, (ख) और दूसरा पद्मनाभ विरचित 'किरणावली भास्कर’ नामी व्याख्यान है। (५)
'किरणावली प्रकाश' पर भगीरथ ठक्कर विरचित 'द्रव्य प्रकाशिका' और श्रीरघुनाथ भट्टाचार्य कृत 'गुण प्रकाश विवृति' टीका है, जो ‘गुणदीधिति' नाम से प्रसिद्ध है। (६) 'गुणप्रकाश विवृति' पर (क) एक तो मथुरानाथ तर्कवागीशा विरचित 'गुणप्रकाश विवृति रहस्य' नामी टीका है, जो ‘गुणदीधिति माथुरी' नाम से प्रसिद्ध हैं। मथुरानाथ ने गुण प्रकाश विवृति के मूल ग्रन्थ 'गुणप्रकाश' की भी व्याख्या की है,
वो 'गुणप्रकाशरहस्य' नाम से प्रसिद्ध है। और 'गुणप्रकाश' के
मूल ग्रन्थ 'गुण किरणावली' की भी व्याख्या की है, जो
'गुण किरणावली रहस्य' नाम से प्रसिद्ध है। (ख) दूसरी
द्ध भट्टाचार्य कृत 'गुणप्रकाश विवृति भावभकाशिका' नामी
टीका है, जो ‘गुणप्रकाशविवृतिपरीक्षा' नाम से प्रसिद्ध है, (ग)
और तीसरी रामकृष्ण कृत (घ) और चौथी जयराम भट्टा
चार्य कृत व्याख्या है॥ भाष्यादि सारे ग्रन्थ दो भागों में
ग्रन्थकारों ने बांटे हैं। आरम्भ मे आत्मा के निरूपण पर्यन्त
द्रव्यग्रन्थ, उस से अगला सारा ग्रन्थ गुणग्रन्थ कहा जाता है।
नमें से प्रशास्तपाद् भाष्य और उस पर 'न्यायकन्दली' तो
छप चुके हैं, 'किरणावली' और उस पर किरणावली' प्रकाश
एशियाटिक सोसायटी कलकत्ता की ओर से छप रहे हैं।<noinclude><references/></noinclude>
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/* समस्यात्मकः */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''६'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
जो १९११ ई० से आरम्भ हो कर अभी तक थोड़े ही छपे
हैं शेष अभी अमुद्रित हैं ।<br/>
{{gap}}अन्य भाष्यकार तो मूलसूत्रों की व्याख्या भी करते हैं, और सूत्रोक्त विषयों का स्पष्टीकरण भी करते हैं । पर वैशेषिक भाष्यकार (प्रशस्तमुनि ) सूत्रों की व्याख्या नही करते, किन्तु एक विषयके समस्त सूत्रों को मन में रखकर सूत्रों का अवत रण प्रतीकादि दिये बिना ही विषय का स्पष्टीकरण कर देते हैं । इस कारण सूत्रों के पठनपाठन के लिए सीधा सूत्रों पर अन्य टीकाएँ रची गई। शंकरमिश्र विरचित 'तन्त्रोपकार ' नामी पुरानी टीका से पूर्व भारद्वाज वृत्ति थी,जिस का पता शङ्करमिश्र ने 'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः' सूत्र की व्याख्या में दिया है । पर यह टीका अभी तक मिली नहीं । इस समय कुछ नई टीकाएँ संस्कृत और भाषा में हो रही है, जिन में से श्री जयनारायण तर्क पञ्चानन कृत टीका बहुत ही उत्तम है ।{{nop}}
वैशेषिक सूत्रों के प्रतिपाद्य विषय- वैशेपिक सूत्र १० अध्यायों में विभक्त हैं। अध्याय क्रम से सूत्रों के प्रतिपाद्य विषय ये है । प्रथम अध्याय में समवाय सम्बन्ध रखने वाले सारे पदार्थो का कथन है । द्वितीय में द्रव्यों का निरूपण है। तृतीय में आत्मा और अन्तःकरण का लक्षण है । चतुर्थ में शरीर और तदुपयोगी पदार्थो का विवेचन है। पञ्चम में कर्म
का प्रतिपादन है। षष्ठ में श्रौत धर्म का विवचन है। सप्तम में
गुणों का और समवाय का प्रतिपादन है। अष्टम में ज्ञान की<br/><noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''६'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
जो १९११ ई० से आरम्भ हो कर अभी तक थोड़े ही छपे
हैं शेष अभी अमुद्रित हैं ।<br/>
{{gap}}अन्य भाष्यकार तो मूलसूत्रों की व्याख्या भी करते हैं, और सूत्रोक्त विषयों का स्पष्टीकरण भी करते हैं । पर वैशेषिक भाष्यकार (प्रशस्तमुनि ) सूत्रों की व्याख्या नही करते, किन्तु एक विषयके समस्त सूत्रों को मन में रखकर सूत्रों का अवतरण प्रतीकादि दिये बिना ही विषय का स्पष्टीकरण कर देते हैं । इस कारण सूत्रों के पठनपाठन के लिए सीधा सूत्रों पर अन्य टीकाएँ रची गई। शंकरमिश्र विरचित 'तन्त्रोपकार ' नामी पुरानी टीका से पूर्व भारद्वाज वृत्ति थी,जिस का पता शङ्करमिश्र ने 'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः' सूत्र की व्याख्या में दिया है । पर यह टीका अभी तक मिली नहीं । इस समय कुछ नई टीकाएँ संस्कृत और भाषा में हो रही है, जिन में से श्री जयनारायण तर्क पञ्चानन कृत टीका बहुत ही उत्तम है ।{{nop}}
वैशेषिक सूत्रों के प्रतिपाद्य विषय- वैशेषिक सूत्र १० अध्यायों में विभक्त हैं। अध्याय क्रम से सूत्रों के प्रतिपाद्य विषय ये है । प्रथम अध्याय में समवाय सम्बन्ध रखने वाले सारे पदार्थो का कथन है । द्वितीय में द्रव्यों का निरूपण है। तृतीय में आत्मा और अन्तःकरण का लक्षण है । चतुर्थ में शरीर और तदुपयोगी पदार्थो का विवेचन है। पञ्चम में कर्म
का प्रतिपादन है। षष्ठ में श्रौत धर्म का विवचन है। सप्तम में
गुणों का और समवाय का प्रतिपादन है। अष्टम में ज्ञान की<br/><noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/९
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Meera kale
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/* समस्यात्मकः */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|center='''भूमिका''' ।|right='''७'''}}
उत्पत्ति और उस के साधनादि का निरूपण है। नवम में बुद्धि के भेदों का प्रतिपादन है । दशम में आत्मा के गुणों के भेद का प्रातिपादन है । प्रत्येक अध्याय में दो दो आन्हिक हैं। आन्हिक का अर्थ है, एक दिन का काम । अर्थात् इस दशाध्यायी को कणाद मुनि ने २० दिनों में रचा था।{{nop}}
सूत्रों का निर्णय- कणाद मुनि ने जो सूत्र रचे थे, उन में कुछ न्यूनाधिक वा पाठान्तर हुए हैं वा नहीं, और यादि हुए हैं, तो किस प्रकार अब फिर मृल सूत्रों को उसी रूप में ला सकते हैं, जिस रूप में कि मुनि ने रचे थे, इस बात का निर्णय करना अतीव आवश्यक है। {{nop}}
{{gap}}पं० विन्ध्येश्वरी प्रसाद शर्म्मा ने जो सूत्रपाठ छपवाया है, उस की पादटीका में पाठभेद दिये हैं, जो उन को हस्त लिखित पुस्तकों में मिले हैं। उन से यह भी स्पष्ट हो जाता है, कि न केवल पदभेद ही हुए हैं, किन्तु सूत्रभेद भी हुए हैं। अब इनको कणादोक्त रुप में लाने के लिए क्या प्रयत्न होना चाहिये, पाणिनि विरचित व्याकरण सूत्रों में भी काशिकाकार ने कुछ भेद किया है, वह महाभाष्य के अनुसार ठीक हो सकता है। इसीं प्रकार यदि प्रशस्तपाद भाष्य भी सूत्रों का व्याख्यान होता,तो भाष्य के अनुसार सूत्रों को कणादोक्त रूप में लाना सरल होता, पर भाष्य तो जैसा पूर्व कहा है, सूत्रों का व्याख्यान नहीं। अब सूत्रों पर साक्षात् कोई प्प्राचीन व्याख्या मिलती नहीं । शंकरमिश्र तो मथुरानाथ तर्क वागीश के शिष्य कणाद का भी शिष्य था। अतएवं बहुत प्राचीन नहीं किञ्च प्रशस्तपाद भाष्य की<br/><noinclude><references/></noinclude>
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2026-06-14T16:50:45Z
Meera kale
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|center='''भूमिका''' ।|right='''७'''}}
उत्पत्ति और उस के साधनादि का निरूपण है। नवम में बुद्धि के भेदों का प्रतिपादन है । दशम में आत्मा के गुणों के भेद का प्रातिपादन है । प्रत्येक अध्याय में दो दो आन्हिक हैं। आन्हिक का अर्थ है, एक दिन का काम । अर्थात् इस दशाध्यायी को कणाद मुनि ने २० दिनों में रचा था।{{nop}}
सूत्रों का निर्णय- कणाद मुनि ने जो सूत्र रचे थे, उन में कुछ न्यूनाधिक वा पाठान्तर हुए हैं वा नहीं, और यादि हुए हैं, तो किस प्रकार अब फिर मूल सूत्रों को उसी रूप में ला सकते हैं, जिस रूप में कि मुनि ने रचे थे, इस बात का निर्णय करना अतीव आवश्यक है। {{nop}}
{{gap}}पं० विन्ध्येश्वरी प्रसाद शर्म्मा ने जो सूत्रपाठ छपवाया है, उस की पादटीका में पाठभेद दिये हैं, जो उन को हस्त लिखित पुस्तकों में मिले हैं। उन से यह भी स्पष्ट हो जाता है, कि न केवल पदभेद ही हुए हैं, किन्तु सूत्रभेद भी हुए हैं। अब इनको कणादोक्त रुप में लाने के लिए क्या प्रयत्न होना चाहिये, पाणिनि विरचित व्याकरण सूत्रों में भी काशिकाकार ने कुछ भेद किया है, वह महाभाष्य के अनुसार ठीक हो सकता है। इसीं प्रकार यदि प्रशस्तपाद भाष्य भी सूत्रों का व्याख्यान होता,तो भाष्य के अनुसार सूत्रों को कणादोक्त रूप में लाना सरल होता, पर भाष्य तो जैसा पूर्व कहा है, सूत्रों का व्याख्यान नहीं। अब सूत्रों पर साक्षात् कोई प्राचीन व्याख्या मिलती नहीं । शंकरमिश्र तो मथुरानाथ तर्क वागीश के शिष्य कणाद का भी शिष्य था। अतएवं बहुत प्राचीन नहीं किञ्च प्रशस्तपाद भाष्य की<br/><noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/११
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Meera kale
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/* समस्यात्मकः */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|center='''भूमिका''' ।|right='''९'''}}
चार्य आदि प्राचीन आचार्यो के ग्रन्थों में उद्धत सूत्रों का संग्रह करना चाहिये, तब बड़ी प्रबल सम्भावना है, कि सारे सूत्र अपने मूलरूप में लाए जा सकेंगे। इस समय इस काम को हाथ में लेने की हमारे पास पूरी सामग्री नहीं, तथापि यथाशक्य इस काम को प्रवृत्त रखते हुए सम्प्रति मुद्रित सूत्रों के आधार पर व्याख्यान आरम्भ करते हैं॥{{nop}}
व्याख्यान का ढंग- वैशेषिक सूत्रों की शैली हमने यह रक्खी है, कि जहां अर्थ देने से ही पद पदार्थ भी स्पष्ट हो जाते हैं, वहां तो सूत्रार्थ ऐसा स्पष्ट करके लिख दिया है, कि उसी से पद पदार्थ का भी यथार्थ बोध हो जाता है, और जहां पदच्छेद और पदार्थोक्ति की आवश्यकता जान पड़ी है, वहां पदच्छेद और पदार्थ भी दे दिया है। सूत्रार्थ के अनन्तर, व्याख्यान रक्खा है, उस में बड़ी सरल और सुबोध भाषा में वैशेषिक के गूढ़ विषयों के मर्म खोल २ कर समझा दिये हैं।{{nop}}
{{center|{{bold|सम्पादक}}}}<noinclude><references/></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|center='''भूमिका''' ।|right='''९'''}}
चार्य आदि प्राचीन आचार्यो के ग्रन्थों में उद्धत सूत्रों का संग्रह करना चाहिये, तब बड़ी प्रबल सम्भावना है, कि सारे सूत्र अपने मूलरूप में लाए जा सकेंगे। इस समय इस काम को हाथ में लेने की हमारे पास पूरी सामग्री नहीं, तथापि यथाशक्य इस काम को प्रवृत्त रखते हुए सम्प्रति मुद्रित सूत्रों के आधार पर व्याख्यान आरम्भ करते हैं॥{{nop}}
व्याख्यान का ढंग- वैशेषिक सूत्रों की शैली हमने यह रक्खी है, कि जहां अर्थ देने से ही पद पदार्थ भी स्पष्ट हो जाते हैं, वहां तो सूत्रार्थ ऐसा स्पष्ट करके लिख दिया है, कि उसी से पद पदार्थ का भी यथार्थ बोध हो जाता है, और जहां पदच्छेद और पदार्थोक्ति की आवश्यकता जान पड़ी है, वहां पदच्छेद और पदार्थ भी दे दिया है। सूत्रार्थ के अनन्तर, व्याख्यान रक्खा है, उस में बड़ी सरल और सुबोध भाषा में वैशेषिक के गूढ़ विषयों के मर्म खोल २ कर समझा दिये हैं।{{nop}}
{{center|{{bold|सम्पादक}}}}<noinclude><references/></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|{{bold|१२}}|{{bold|वैशेषिक-दर्शन ।}}|}}
{{gap}}व्या०-धर्म का जो लक्षण पूर्व किया है, कि ‘याथर्थ उन्नति और मोक्ष की सिद्धि जिस से हो वह धर्म है' वैसे धर्म के प्रतिपादन करने से धर्म के विषय में वेद को प्रमाण माना जाता है, क्योंकि जो जिस विषय में प्रामाणिक अर्थ का प्रतिपादन करता है, वही उस विषय में प्रमाण होता है।{{nop}}
{{gap}}संगति-लक्षण और प्रमाण से धर्म की सिद्धि करके, धर्मे से मोक्ष की सिद्धि में वैशेषिक शास्त्र की उपयोगिता दिखलाते हैं-<br/>
{{gap}}{{bold|धर्म विशेषप्रसूताद् द्रव्यगुण गुणकर्म सामान्य
विशेष समवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निः श्रेयसम् । ४ ।}}<br/>
{{gap}}अर्थ-धर्म विशेष से उत्पन्न हुआ जो, द्रव्य, गुण, कर्म,सामान्य, विशेष और समवाय (इतने) पदार्थो का साधर्म्य और वैधर्म्य सें तत्त्वज्ञान,* उस से मोक्ष होता है ।{{nop}}
{{gap}}व्या०-इस जन्म वा पूर्व जन्म में किये पुण्य कर्म से द्रव्यादि पदार्थों का तत्त्वज्ञान होता है, तब मनुष्य अपने स्वरूप को शरीर से अलग साक्षात् करके बन्धन से मुक्त हो जाता है ।{{nop}}
{{gap}}धर्म, धर्मी, साधर्म्य, वैधर्म्य-जिस का स्वरूप किसी दूसरे<br/>
{{rule}}
*साधर्म्य=समान धर्म=सांझा धर्म, और वैधर्म्य=विरुद्ध धर्म अर्थात् इस पदार्थ का यह २धर्म तो उस २ पदार्थ के साथ मिलता है, और यह इस का अपना अलग धर्म है, दूसरे किसी के साथ नहीं मिलता, इस प्रकार हरएक पदार्थ का जब पूरा ज्ञान हो जाय तब मोक्ष होता है।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ३''' ।|right='''१३'''}}
के आश्रित प्रतीत हो, उसको धर्म कहते हैं, और जो उसका आश्रय है, उसको धर्म कहते हैं। गन्ध-धर्म है, क्योंकि वह पुष्पके आश्रित प्रतीत होता है, पुष्पधर्मी है, क्योंकि गन्ध उस के आश्रय है। दौड़ना धर्म है, क्योंकि वह घोड़े के आश्रित प्रतीत होता है, घोड़ा धर्मी है, क्योंकि वह दौड़ का आश्रय है। गन्ध में भी-गन्धपना धर्म है, क्योंकि वह गन्ध मे प्रतीत होता है, गन्ध धर्मी है, क्योंकि उसमें गन्धपन प्रतीत होता है । सो गन्ध पुष्प का धर्म है, पर गन्धपन को धर्मी भी है। इसी प्रकार सर्वत्र धर्मधर्मिभाव जानना । जो अनेकों का सांझा धर्म हो; उस को साधर्म्य वा समान धर्म कहते हैं, जैसें गन्ध पुष्प और इतर का साधर्म्य=समान धर्म है। और जो अपना विषेश धर्म हो, उस को वैधर्म्य वा विशेष धर्म वा विरुद्ध धर्म कहते है, जैसे पंखड़ियां पुष्प का इतर से वैधर्म्य है, और द्रवत्व इतरं का पुष्प से वैधर्म्य है। इस प्रकार साधर्म्य और वैधर्म्य द्वारा जब समस्त पदार्थो का तत्त्वज्ञान हो जाता है, तब पुरुष मुक्त होता है। इसलिए इस शास्त्र में समस्तपदार्थो और उनके धर्मो का निरूपण आरम्भ करत हैं ।{{nop}}
{{gap}}यहां छः पदार्थो का कथन भाव पदार्थो कें आभिप्रायसे है, वस्तुतः अभाव भी एक अलग पदार्थ के रूप में मुनि को अभिप्रेत हैं, अतएव 'कारणाभावात् कार्याभावः' (१। २ । १ ।) और 'क्रियागुणव्यपदेशाभावात्” प्रागसत्' (९ । १ । १ ) इत्यादि सूत्रों की असङ्गति नहीं । किन्तु अभाव का निरुपण<br/><noinclude><references/></noinclude>
144fahy6iewcl3tdbquwonvgtbukat3
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''१४'''|center='''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
प्रतियोगि* निरूपण के अधीन होता है, इस लिए उस का
अलग उद्देश नहीं किया ।<br/>
{{gap}}पदार्थों की शिक्षा देने के तीन क्रम हैं-उद्देश, लक्षण और परीक्षा । बतलाने योग्य पदार्थ का निरा नाम लेना उद्देश है, जैसे यहां द्रव्य, गुण इत्यादि नाम लिए हैं, यह पदार्थों का उद्देश है । जिस का नाम लिया गया है, उस को उद्दिष्ट कहते हैं, जैसे यहां द्रव्य, गुण । असाधारण धर्म लक्षण होता है, जैसे उष्ण स्पर्श तेज का, क्योंकि उष्ण स्पर्श तेज का असाधारण धर्म है, बिना तेज के कहीं नहीं पाया जाता, पत्थर और पानी
आदि जब गर्म होते हैं, तो वे तेज के संयोग से ही होते हैं, स्वत:उन में गर्मी नहीं। वहगर्मी तेज की ही होती है, इसलिए उष्ण स्पर्श तेज का असाधारण धर्म है, अतएव यह तेज का लक्षण है। जिस का लक्षण हो उस को लक्ष्य कहते हैं, और
जब यह जितलाना हो, कि इस का लक्षण हो चुका है, तो उस को लक्षित कहते हैं। लक्षित का यह लक्षण बन सकता है वा नहीं, इस विचार का नाम परीक्षा है, परीक्षा के योग्य को<br/>
{{rule}}
* ‘यस्याभाव. स प्रतियोगी' जिस का अभाव हो, वही अभाव का प्रतियोगी होता है। जैसे नीलाभाव का प्रतियोगी नील है, नील और नीलाभाव में से नील के ही जानने की आवश्यकता है, जो नील को जानता है, वह, 'यहां नील नहीं, वा यह नील नहीं।' इस बात को अपने आप जान लेता है। और जो नील को नहीं जानता, उस को 'यहाँ नील नहीं, वा यह नील नहीं' ज्ञान भी नहीं हो सकता, अतएव अभाव का निरूपण प्रतियोगिनिरूपण के अधीन है।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ३''' ।|right='''१७'''}}
जब बाह्य प्रकाश सहायक हो । सो न दीखना ही तम रूप है, न कि कोई वास्तविक रूप ।<br/>
{{gap}}{{bold|रूपरसगन्धस्पर्शाः संख्याःपरिमाणानि-पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वेबुद्धयः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणाः । ६ ।}}<br/>
{{gap}}रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्क, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, ये ( १७ ) गुण हैं (और इन से अतिरिक्त गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म, अधर्म, शब्द ये सात भी गुण हैं, इन का वर्णन आगे परीक्षा मे है, इस प्रकार सारे गुण २४ हैं){{nop}}
{{gap}}रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, ये चारों इकट्ठे कहे, क्योंकि ये विशेष गुण हैं, इन से द्रव्यों की पहचान होती है। और ये पहले चार ही द्रव्यो में रहते हैं, और किसी में नहीं पाये जाते ।{{nop}}
{{gap}}संख्या (गिनती) पारिमाण (छुटाई बड़ाई लंबाई चुड़ाई Quantity ) पृथक्त्व (अलगपना Severalty) संयोग, और विभाग । ये द्रव्यमात्र के गुण है ।{{nop}}
{{gap}}परत्व और अपरत्व, (दूरी और निकटता) देश की अपेक्षा से वा काल की अपेक्षा से तो यह परे है, और यह वरे है इस प्रकार होती है, और यह उन मे होती है, जो एकदशी द्रव्य हो , विभु द्रव्यों मे परे नही कहा जाता । और काल की अपेक्षा से नया पुराना वा छोटा बड़ा यह प्रतीति होती है, और यह उन में होती है, जो उत्पत्ति वाले हों।{{nop}}<noinclude><references/></noinclude>
1eib7q8w0k158c7s3krzj3966vgcr6h
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''२१'''}}
-कारंण-तीनों ही कारण भी हैं, इन में भे द्रव्य तो द्रव्य
गुण कर्म तीनों का कारण है, अपनेन गुणों के भी और अपने
कर्मो के भी। गुण भी तीनों के. कारण होते हैं । तन्तु संयोग
वस्त्र का कारण है, तन्तुरूप वस्त्र के रूप का कारण, और
आघात (घका लगाने वाला संयोग) कर्म का कारण होता है।
सामान्यविशष वाले-द्रव्यत्व,जो सामान्यविशेष है, वहद्रव्यों में हैं,
गुणत्व जो सामान्यविशेष है वहगुणों में है और कर्मत्वजो सामान्य
विशप है,वह कम में है इस प्रकार तीन सामान्यविशेष वाले हैं।
सङ्गति-पहले दो का साधम् वतलाते हैं।
द्रव्यगुणयोः सजातीयारम्भकत्वं साधम्र्यम् ।९।
सजातीयों का आरम्भक होना द्रव्यों और गुणों का
साधम्र्य है ।
द्रव्याणि द्रव्यान्तर मारभन्ते गुणाश्च गुणा
न्तरम् ॥ १० ॥
(अर्थात) द्रव्य द्रव्यान्तर के, आरम्भक होते हैं, और गुण
गुणान्तर के (जैसे तन्तु वस्त्र के और तन्तु ओं का रूप वस्त्र के
रूप का आरम्भक होता है) ।
सङ्गति-उच्क्त धर्म में कर्म का द्रव्य गुण से वैधम्र्य थतालाते हैं
कर्म कर्मसाध्यं न विद्यते । ११॥
कर्म कर्म का कार्य नहीं होता ।
व्या०-कर्म का 'आरम्भक कर्म नहीं होता, किन्तु संयोग
होता है।<noinclude><references/></noinclude>
4gi3fclcf3l2dd3habdkfugsqqnrl8r
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''२२'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेापक-दर्शन ।
प्रश्-जहाँ शहतीर के साथ थोड़ी दृी पर कुछ गेन्द लट
का दिय जाएँ, उन में मे जब एक गेन्द को परे खीञ्च कर छोर्ड,
तव वह दूसरे गेन्द को टकरा कर हिला देगा, इसी प्रकार
अगला २ अगळे २ को हिला देगा, वहां तो अगले २ गेन्द्र का
कर्म परले २ गेन्द के कर्म का कार्य है ।
उत्तर-नहीं, वहां भां पद्दल गेंद का कर्म कारण नहीं,
किन्तु आघात ( संयोग विशेष ) ही कारण है । पढले गेद
के कर्मका कार्य तो दूसरेगेंद को आघात पहुञ्चाना है, अर्थात् दृसरे
गेन्द से संयोगविशेशप है, और वस । अव उस संयोग मे दूसरे
गेन्द में कर्म उत्पन्न हुआ, इस लिए वहां भी कर्म कर्म का कार्य
नहीं, संयोग का ही कार्य है ।
सङ्गति-द्रव्य गुण कर्म का आपस में वैधम्र्य बनलाते है
न द्रव्यं कार्य कारणं च बधति ॥ १३॥
नहं द्रव्य कार्य को और कारण को नाश करता है ।
व्या०-तन्तु कारण हैं, वस्त्र कार्य है । इन दोनों में मे
कोई भी दूसरे का विरोधी नहीं, न तो तन्तु वस्त्र के नाशक है,
न वस्त तन्तुओं का नांशक है, किन्तु वस्त्र का जब नाश होगा..
या तो तन्तुओं के टूटने से होगा, या तन्तुओं का संयोग न
रहने से होगा । इसी प्रकार द्रव्य का सर्वत्र या तो आश्रयनाश
'स या आरम्भक संयोग के नाश से ही नाश होगा, अपने
कारण द्रव्य वा कार्य द्रव्य से कभी नहीं, सारांश यह कि कार्य
कारणभाव को प्राप्त हुए द्रव्यों में वध्यघातकभाव नहीं है ।<noinclude><references/></noinclude>
i7swdqwvreyepvltd1rin13xa5fskkn
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''२३'''}}
अ'४'१ आ०'१ सू० १४ ॥
उभयथा गुणाः ॥१३॥
अर्थ-दोनों प्रकार से गुण (हैं) ।
या०-गुण ऐसे भी हैं, जो अपने कारणु के नाशक
होते हैं, जैसे शब्द पहले संयोग वा विभाग से उत्पन्न होता है,
फिर आगे शब्द मे शब्द उत्पन्न होता चला जाता है, और हर
एक अगला २ शाब्द पहले २ शब्द (अपने कारण शब्द) का
नाशक होता है। और जो अन्त्य शब्द है, उस का नाशक उपान्त्य
'(अन्तले से पहला) शब्द । अर्थात् शब्दोत्पत्ति की परम्परा
हैं
में जो अन्तिम शब्द है, जिससे आगे शब्द वन्द हो जाता है,
उसका नाशक और तो शब्द कोई होना नहीं, इसलिए उससे
'पंहला शब्द ही उसका नाशक हैं ।
कार्यविरोधि कर्म ॥१४॥
अर्थ-'कार्य विरोधि यस्य तत् कार्य विरोधि' कार्य
जिसका नाशक है, ऐसा कर्म है ।
व्या०-स्थिर वस्तु जहां है, कर्म होते ही उससे आगे
चली जाती है, पहलेस्थान से उसां विभाग और अगले से संयोग
हो जाता है.इसी को उत्तरदेशसंयोग कहते हैं,इसके होते ही कर्मनाशा
हो जाता है। इस भकार हरएंक कर्म का कार्य उत्तरदेश संयोग
कारण गुण-अपने कार्य गुण का नाशक होता है, इसका
स्पष्टीकरण रत्रकारने तो कही नही किया । व्याख्याकारो ने ‘उपा
न्य शव्द अन्त्य का नाशक होता है’ यही एक उदाहरण माना है।
- तदनुसार लिख दियां है । ।<noinclude><references/></noinclude>
5fjp5lzslox0h08yqcmhsx6ciabjfag
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''२४'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेषिक दर्शन ।
होता है, और उत्तरदेशसंयोग ही कर्म का नाशक है।
संगति-लक्षण भी असाधारण धर्म ही होता है, इसलिए
तीनों के वैधम्र्य के प्रसङ्ग में क्रमश: तीनों के लक्षण वतलाते हैं
'''क्रियागुणवत् समवायिकारण मिति द्रव्य
लक्षणम् ॥१५॥'''
क्रिया और गुण वाला, और समवायिकारण,. यह द्रव्य
का लक्षण है।
व्या०-क्रिया और गुण द्रव्यों में ही होते हैं, गुण और
कर्म में नहीं, यद्यपि क्रिया काल आदि में नहीं होती, तथापि
क्रिया होती द्रव्यों मे ही है, यह अभिप्राय है । और गुण तां
सभी द्रव्यों में होत हैं । समवायिकारण भी सभी द्रव्य
होते हैं। समवायिकारण उसको कहते हैं, जिस में कार्य
समवाय सम्वन्ध से रहे । उत्पत्ति वाले गुण कर्म तो जिस
द्रव्य के गुण कर्म हैं, उम में समवाय से रहते हैं, वही उन
का समवायिकारण होता है, और कार्यद्रव्य अपने कारण
द्रव्यो में समवाय से रहता है, वही उसका समवायिकारण
होते हैं।
'''द्रव्याश्रय्यगुणवान् संयोग विभाग योर्नकार
णमनपेक्ष इति गुणलक्षणम्॥१६॥'''
अर्थ-(द्रव्याश्रयी ) सदा द्रव्य के आश्रय रहने वाला,
( अ-गुणवान् ) गुणवाला न हो, (संयोगविभागयोः) योग
और विभाग मे (नकाःप्) कारण न हो । (अनपेक्षः) अन"
पेक्ष हो कर ( इति गुणलक्षणम्) यह गुण का लक्षण है।<noinclude><references/></noinclude>
3be6vsg6fyztqn9dvcso05ayoe271vs
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२७
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Bnarayanan V
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''२५'''}}
या०-गुण का स्वभाव पहहै, कि वह कमी द्ररूप से स्वतन्त्र
ही कर नहीं रहता, सदा द्रव्य के आश्रय ही रहता है, और
दूसरा-अपने अन्दर कोई और गुण नहीं रखता, पह तो
इस की द्रव्य से विलक्षणता है। कर्म से विलक्षणता यह है, कि
कर्म संयोग विभाग में अनपेक्ष कारण होता है, जैसा कि अगले
सूत्र में दिखलाएंगे और गुण सैयोग विभाग में अनपेक्ष कारण
नहीं होता ।
'''एकद्रव्यमगुण संयोगविभागयोरनेपक्षकारणमिति कर्म,लक्षणम् ॥१७॥'''
एक द्रव्य (में होने) वाला, गुण से शून्य, सैयोग और
विभाग में अनपेक्ष कारण हो, यझे कर्म का चक्षण है ।
।
व्या०-अवयवी द्रव्य अपने सारे अवयवों के आश्रय रहता
है, संयोगादि गुण भी अनेक द्रव्यों के आश्रय रहते हैं, पर
कर्म हरएक एक ही द्रव्य के आश्रय रहता है। घग्घी जब दौड़ी
जतिा.हो, तो बग्घी में अपना कर्म अठा होता है, और सवारों में
{{rule}}
* शैकर मिश्र ने 'संयोगविभागेषु' पाठ पढ़ा है । पर यह
बहुवचन निरर्थक है।मुदित पुस्तकों में इसी के अनुखारी पाठरक्खा
है, किन्तु पाठान्तर ‘संयोगविभागयोः' दिया है। न्याय मुक्तावली
ओर वित्सुखी में यह सूत्र उधृत किया गया है, वहां ‘संयोगवि
भागयोः' ही पाठ पढ़ा है । इसलिए यही पाठ शुद्ध है । इसी के
अनुसार पूर्वसूत्र में भी ‘संयोगविभागेष्व कारण मनपेक्षः’ इस
मुद्रित पाठ् के स्थान 'संयोगविभागयोनैकारणमनपेक्षः पाठ इी
शुर है, जो इस्तलिखित पुस्तकों में मिला है ।<noinclude><references/></noinclude>
hkm2hndpn8fy3xf6s14szp2fobh6or2
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''२६'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेषिक दर्शन
अलग अपना होता है। अतएव यदिदौड़ती हुई वधी एकदम अट्ट
कर रुक जाए, तो सवार आगे जापड्ते हैं । यह द्रव्य गुण से
कर्म में विलक्षणता है।
'गुण शून्य' यह द्रव्य से विलक्षणता है।
‘संयोग और विभाग में अनपेक्ष कारण’ वस्तु को पहले
उसका विभाग और दूसरे से संयोग उत्पन्न करता है । इस
प्रकार कर्म संयोग और विधाग का कारण है।
“मश्क्ष-जब हाथ का सयाग पुस्तक के साथ हुआ, ता उस
संयोग से शारीर और पुस्तक का संयोग होगया अर्थात हस्त
पुस्तक का संयोग शारीरपुस्तक के सैयोग का कारण हुआ ।
इसी प्रकार हस्तपुस्तक के विभाग से शरीरपुस्तक का विभाग
हुआ अर्थात् हस्तपुस्तकविभाग शरीरपुस्तक के विभाग , का
कारण हुआ । इस प्रकार संयोग और विभाग का कारण निरा
कर्म ही नहीं, संयोग और विभाग भी हैं, तब पह कर्म का लक्षण
कैसे हुआ ?
उत्तर-हाथभेकर्म होकर हाथ और पुस्तक का जो संयोग हुआ
है, यहं तो कर्म से विनाकिसी की अपेक्षा के हुआ,पर आगे हाथ
और पुस्तक के संपोग से जो शरीर पुस्तक का संयोगहुआ है, वह
अगागिभाव की अपेक्षा से हुआ है। यदि हाथ शरीर का भङ्ग
न होता, तो बिना कर्म के उनका संयोग न होता । इस प्रकार
क तो स्वजन्य संयोग का अनपेक्ष कारण है, और संयोग
स्वलन्य का सापेक्ष कारण हैं । इसी प्रकार हाथ के कर्म
संयोग<noinclude><references/></noinclude>
d2m93m6g5t4ybzmpzfk1d89f4gscci2
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''२७'''}}
से इस्तपुस्तक काजो विभागहुआ. उस में कर्म अनपेक्ष कारण है
ॵर मागे हस्तपुस्तक के विभाग से जो शारीरपुस्तक का विभाग
हुआ, उस में हाथ का विभाग अङ्गाङ्गीभाव की अपेक्षा से
शरीर के दिमाग का कारण हुआ है। पह,भेद है, इस लिए
लक्षण में अनपेक्ष कारण कहा है।
सैगतेि-फारणता में साघम्यैवैधम्र्य दिखलाते है।
'''द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यैकारणं सामान्यम् ॥१८॥
'''
द्रव्य, गुण और कमेका द्रव्य सांद्रा कारण हैं ।
आगे वस्त्र में जो रूप और कर्म हैं, उनका कारण वस्त्र है। इसी
प्रकार सर्वत्र-द्रव्यगुण कर्म-फा-समवायि कारणद्रव्य-ही होता है।
'''तथागुणः||१९||'''
वैसे गुण (द्रव्यगुण कर्म के कारण होते हैं)
व्या०-तन्तुओं का संयोग (गुण) वस्त्र का, तन्तुओं का रूप वस्र के रूप का,ॵर संयोग विभाग कर्म के कारण (दखो सू० ३०) होते हꣿ |
'''संयोगविभाग वेगानां कर्म समानम् ॥२०॥'''
संयोग विभाग वेगका कर्म सांझा (कारण है) । ।
व्या०-तोप के गेले में जो कर्प है, वह , पहले स्थान सै
विभाग और अगले से संयोग उत्पन्न करता है, और गोले में
वꣿग उत्पन्न करता है ।
'''न द्रव्याणां कर्म ॥२१॥'''
नहीं ऋध्य का कर्म (कारण)<noinclude><references/></noinclude>
fuyy7d9cbojz28g62bndg7a4jsuy4rq
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="MANJUNATHA SHARMA" /></noinclude>{{rh|left='''२८'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
'''व्यतिरेकात् ॥२२॥'''
{{center=''''हट जाने से|''''}}
ज्या०-हरएक द्रव्य की उत्पत्रि, से पूर्व कर्म होती अवश्य
है, पर कर्म भारम्भक संयोग को उत्पन्न करके निष्ठत् हो
नाता है, और द्रव्य प्रारम्भक संयोग के पीछे उत्पन्न होता है
सो कर्म जम्ब अपना कार्य (संयोग) करके हट जाता है, तब
द्रव्य उत्पन्न होता है, इसलिए कर्म द्रव्य का कारण नही,
किन्तु संयोग है, हां संयोग का कारण कर्म है ।
संगति-कारणता में साधम्र्य दिखळा कर कार्यता में
दिखलाते हैं।
'''द्रव्याणां द्रव्यै कार्ये सामान्यम् ॥२३॥''''''
द्रव्यों का द्रव्प सांझा कार्य होता है।
व्या-बहुत सी तन्तुओं का सांझा कार्य एक वस्त्र होता
है। इस प्रकार अवपष बहुत से वा न्यूनसे न्यून दो ही मिलकर
नवा कायै खत्पन्न करते हैं। अकेले अवयद से नवा कार्प इत्पन्न
नहीं होता ।
प्रश्न-एक ही लम्बी तन्तु को बहुत से फर देकर तागा
बना सकते हैं ?
उत्तर-घहां भी इस तन्तु के मवपव बहुत से हैं, और
तागा उमके अवयवों से बना है, न कि सन्तु से, अतएव अव
वह तन्तु नहीं रही ।
'''गुणवैधम्र्यान्न कर्मणां कर्म ॥२४॥'''
गुणों से दैवम्प होने से का
कमों कर्म ( पार्य ) नहीं ।<noinclude><references/></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''२८'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
'''व्यतिरेकात् ॥२२॥'''
हट जाने से
ज्या०-हरएक द्रव्य की उत्पत्रि, से पूर्व कर्म होती अवश्य
है, पर कर्म भारम्भक संयोग को उत्पन्न करके निष्ठत् हो
नाता है, और द्रव्य प्रारम्भक संयोग के पीछे उत्पन्न होता है
सो कर्म जम्ब अपना कार्य (संयोग) करके हट जाता है, तब
द्रव्य उत्पन्न होता है, इसलिए कर्म द्रव्य का कारण नही,
किन्तु संयोग है, हां संयोग का कारण कर्म है ।
संगति-कारणता में साधम्र्य दिखळा कर कार्यता में
दिखलाते हैं।
'''द्रव्याणां द्रव्यै कार्ये सामान्यम् ॥२३॥''''''
द्रव्यों का द्रव्प सांझा कार्य होता है।
व्या-बहुत सी तन्तुओं का सांझा कार्य एक वस्त्र होता
है। इस प्रकार अवपष बहुत से वा न्यूनसे न्यून दो ही मिलकर
नवा कायै खत्पन्न करते हैं। अकेले अवयद से नवा कार्प इत्पन्न
नहीं होता ।
प्रश्न-एक ही लम्बी तन्तु को बहुत से फर देकर तागा
बना सकते हैं ?
उत्तर-घहां भी इस तन्तु के मवपव बहुत से हैं, और
तागा उमके अवयवों से बना है, न कि सन्तु से, अतएव अव
वह तन्तु नहीं रही ।
'''गुणवैधम्र्यान्न कर्मणां कर्म ॥२४॥'''
गुणों से दैवम्प होने से का
कमों कर्म ( पार्य ) नहीं ।<noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''२९'''}}
* अ० १. श्रा० १ सू० २८
व्या-शुण तो सजाति के भारम्मक होते हैं, इसलिए तन्तु के
खूप का कार्य वस्त्र का रूप होता है, पर कर्म सजातीया
रम्भक होता नहीं (देखो सू० ११) इस लिए धन्तु के कर्म से
सै०-द्रम्यधत्तू कई गुण भी अनेक द्रव्यों का कार्य हैं। -
'''द्धित्वप्रभृतयः संख्याः पृथक्व संयोग विभा
गाश्च ॥२५॥
'''
ज्या०-ो आदि संख्या पृथक्क (अळगपन) संयोग, और
विभाग भी (अनेक द्रव्यों का साँझा कार्य हैं) ।
ध्या-द्वित्व संख्या अकळे में नहीं होती, न ही अकेले में
पृथक् संयोग और विभाग रहते हैं ।
सं०-पर फर्म ऐसा कोई नहीं दीता, यह घतलाते हैं
'''असमवायात् सामान्यकायै कर्म न विद्यते ॥२६॥'''
असमवाय से सांझा कार्य कर्म नहीं होता है।
व्या०-पर फर्म एक अनेकों में समवेत नहीं होसा, हर
एक में अपना अलग २ कर्म होता है (देखो पू० ० १७) इसलिए
कर्म अनेक द्रष्यों का साझा कार्य नहीं होता है।
'''संयोगानां द्रव्यम् |२७॥'''
सैयोगों का द्रव्य (सांझा लार्य होता है) ।
व्या०-वहुत से तन्तुसैोगों का स्वरूप एक
कार्य होता है । ।
रूपाणां रूपय् ॥२८॥
द्रव्य<noinclude><references/></noinclude>
gbxo5ank7kbo4o8savw4ehyenqi5dt3
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''३०'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेषिक दर्शन
रूपों का प (सांझा कार्य है) ।
उपा०-वस्त्र का रूप मारे तन्तुरूपों का एक सांझा कार्य
होता है। इसी प्रकार रस गन्ध आदि ।
'''गुरुत्व प्रयत संयोगाना मुत्क्षेपणम् ॥२९॥'''
गुरुत्व, प्रयत्र और संयोग का उत्क्षेपण (साँझा कार्य है) ।
व्या०-ऊपर फेंकने में ये कारण हुआ करते हैं-फꣿकी जाने
वाली वस्तु का गुरुत्व, फेंकने वाळे का प्रयपत्र, और हाथ का
संयोग । सो उत्क्षेपण इन तीनों का सांझा कार्य है । इसी प्रकार
अवक्षेपणादि ।
'''संयोग विभागाश्च कर्मणाम् ॥३०॥'''
संयोग और विभाग कमों के (सांझे कार्य हैं) ।
व्या०-एक ही कर्म पूर्व देश से विभाग और उत्तरं देशा
से संयोग उत्पन्न करता है ।
'''कारण सामान्ये द्रव्य कर्मणां कर्मकारण मुक्तम्॥३१॥'''
कारण सामान्य में द्रष्य और कर्मो का कर्म भकारण कहा है ।
ध्या०-पूर्व कारण सामान्यमकरण-(सू० १८) में कर्म
को द्रष्प और कर्म का अकारण कह चुके हैं (देखो सू० २१,
२४) इसलिए कर्म केवळ गुणों का ही कारण होता है ॥
'''प्रथम अध्याय, द्वितीय आाद्विक ।'''
स•-पहळे आन्द्रिफमें कार्यफारणमाय से द्रव्यगुणकर्म का
साधम्ये धेघग्यै दिखलाया है, जय उस कार्यकारणभाव के नियम
दिखाते -
'''कारण के अभाव से फार्क का भभाव (दोता है) ।'''
कारण के अभाव से कार्य का अबाव (दोता हꣿ)<noinclude><references/></noinclude>
lgkbl51971l8ihxi4oe724mbkm4vfxq
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''३१'''}}
'''नतु कार्याभावात् कारणाभावः ॥२॥'''
पर कार्य के अभाव से कारण का अभाव नहीं होता।
ध्पा०-जो दृष्टि आदि का कदाचैिव होना है, यह विना
कारण के नीही घट सकता, अन्यथा सदा ही होती रहती,
अथवा सदैव न होती, न कि कदाचित होती। इसरे सिद्ध है,
कि कादाचित्क वस्तुएँ का होती हैं, और कार्य किसी कारण
मे ही होता है, इसलिए इस विश्व में कार्यकारणभाव है ।
उस के ये नियम हꣿ—
१--कार्य विना कारण के नहीं होता। उदाहरण-मेघ न
डो, तो दृष्टि.कभी नहीं होगी, वीज न हो, तो अङ्कुर कभी
नहीं होगा । ।
२-कार्ण विना:कार्य-के-भी होता है-उदाहरण-मेप
वेिन वरसे भी होता है. बीज विन-अङ्कुर भी होता है ।
३--हरएक 'कार्य अपेनी कारणसामग्री से होता है,
अकळे कारण से नहीं । उदाहरण-वस्र; तन्तु, ताने वाने के रूप
में तन्तु ओं केः संयोगं, जुलाहे और तुरी आदि से होता है। इन
में से अकेली -तन्तुएं एा अकेला जुलाहा वा अकेली तुरी वस्त्रको
उत्पन्न नहीं कर सकते। सारे मिल कर ही करते हैं, अत एव सव
--४-कारणसामग्री के मिलने पर कार्य अवश्यमेव' होता
है । उदाहरण-तन्तुएं जुलाहा, तुरी आदि और तन्तु ओं का
तान चाने के रूप में मेल, इस कारणसामग्री के जुटने पर हो<noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''३२'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेषिक दर्शन
'''कारण तीन मंकार का है-समवायि, असमवायि;'''
निमित्त इनका भेद जानने के लिए वस्र की उत्पत्ति की ओर
दृष्टि डालो, कि तन्तु, जुलाहे, कंधी और नालियों ने वस्र के
बनाने में क्या २ काम किया है।
तन्तु ऒम् स थस्त्र पना हꣿ, तन्तुएं समवापकारण हꣿं ॥
तन्तुओं से बना तव है, जब ये धात मोत हो गई हैं, इसलिए
यह ओत मोत रूप में संयोगविशेष वस्त्र का असमवायिकारण
है । जुलाहे, कन्धी और नालियोंने यह संयोग कराया है, इसलिए
वे निमित्त कारण हैं। इस प्रकार द्रव्य की उत्पत्ति में सर्वत्र
अवयव समवाथिकारण, अवयवसंयोग असमवायिकारण,
और सैयोग करने वाळे जुलाहे कंधी आदि निमित्त कारण
होते हैं। इसादि ।
संगति-प्रसंगागत कार्यकारणभाव का निरूपण कर कम प्राप्त सामान्य का निरूयण करते हꣿ—–
'''सामान्यै विशेष इति बुद्धयपेक्षम् ॥३॥'''
सामान्य और विशेष पे (दोनों बुद्धि की अपेक्षा से हैं।
या०-द्रव्य गुण कर्म ये तीन पदार्थे इस विश्व की सारी
घटनाओं के कारण हैं, अतएवयेही तीन अर्थ कहलाते हैं। अगले
तीन सामान्य विशेष और समषाय पदार्थही कहलाते हैं अर्थ नहीं।
हमारी प्रतीति और व्यवहार उनका अस्तित्व तो सिद्ध करता है.
पर विश्व की रचना में वह अपनी कोई सत्ता नहीं दिखलाते ।
उनमें से पहले सामान्य और विशेष का निरूपण करते हैं।
इस विश्व की सारी वस्तुएं आपस में भिन्न २ हैं, पर इस
भद के होते हुए भी हम वस्तुओं में ऐसी समानता भी पाते हैं,<noinclude><references/></noinclude>
5x1wjvz7cgk14u07na4ib2ni5g6srf8
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''३३'''}}
जिससे वे सव' आपस में तो एक ही प्रकार की प्रतीत होती हैं,
और दूसरी वस्तुओं से भिन्न प्रकार की । जैसे सारी गौ ओं में
कोई ऐसी संमानता है, जिससें गैौएँ सब एक प्रकार की प्रतीत
होती हैं, और घोड़ा वृक्ष आदि से भिन्न प्रकार की प्रतीत
होती हैं। इस सामनता को '''सामान्य''' वा '''जाति''' कहते हैं।
इसी प्रकार घोड़ो, षकरी, भैस आदि की जातियां हैं । ऐसे
सामान्य धर्म (जाति) के जितलाने के लिए शब्द के आगे
संस्कृतं में ‘त्व' 'और भाषा में ‘पनं' लगाया जाता है। जैसे
‘गोत्व' चा गोपन । अर्थात् सारी गौओं का वह 'समान धर्म,
जिससे उन सव में 'गौ' यह एकांकारमितीति और व्यवहार
होते हैं ।
अब गोत्व सारी गौओं का तो समानधर्म मी है, और
विशेषधर्म भी है। क्योंकि यह घर्म जो सारी गौओं में 'गौगौ'
ऐसी एकाकार प्रतीति कराता है, यही' धर्म घोडे भेड़ बकरी
मनुष्यं पक्षी आदि से गओिं का भेद भी जितलता है, इसलिए
यह विशेषधर्म भी है । ये सामान्य विशेष बुद्धि की अपेक्षा से
होते हैं। एक दृष्टि से यह सायान्य धर्म है, दूसरी दृष्टि से ही' ।
धर्म (गोत्व) विशेष धर्म है। इस प्रकार 'सामान्य विशेोष बुद्धि
की अपेक्षा से हैं।
एक और मकार से भी सामान्य विशेष बुद्धि की अपेक्षा
से हैं। मनुष्य की बुद्धि समानता और विशेषता' के जाञ्चने में
इतनी दूरतक पहुञ्चती है। कि जघ विशेषताजांचने लगती है, तो
इर एक व्यक्ति की दूसरी व्यक्ति से विशेषता जान लेती है। गंवार भी अयनी गॏ कॊ दूसरी गॏ ऒम् मे स्रे पडीं आसानी के साथ निस्रेर<noinclude><references/></noinclude>
9mybgnnlupnh2w2jq82duhi9e26k2ou
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''३४'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेषिकदर्शन
'''लेता है। और जब समानता की ओर झुकता है, तो पहले:सारी'''
गो व्यक्तियों में समानता देखकर सबका एक नाम गौ रखता
है। फिर, गौ ओं से ऊपर भट्ट वकरी भैस आदि में भी गौ ओं के
साय कोई समानता देखकर सवका एक नाम 'पशु' रखता.
है । फिर इन पशुओं की भी किसी अशा में मनुष्य पक्षियों के
साय समानता देखकर सव का एक नाम प्राणा रखता है ।
फिर, प्राणियों. की अप्राणियों के साथ भी किसी अंशा में समा
नता देखकर सब का एकनाम द्रव्य रखता है। फिर द्रव्य की भी
गुण.कर्म के साथ किसी अंशा में समानता-देखकर एक नाम
भाव रखता है। इस प्रकार समानता में भी उस सिरे तक पहुंच
जाता है, जिस में सब वस्तुएँ आजाती हैं। जैसेस सव वस्तुओं
को सद.कहते हैं, इसलिए सत्ता सव वस्तुओं में-सामान्य है ॥
का-हेतु है; और-विशेष वह घर्म है, जो व्यावृत्तबुद्धि का हेतु है।
जैसे अपनी'गौ, की अलग, व्यक्ति, । सत्ता तो, सवः:में प्रतीत
होती है, इसलिए सत्ता सामान्य-ही है। और गोत्व सारी गौओों,
यें तो प्रतीत होता है, पर सारी वस्तुओं में भतीत नहीं होता,
इसलिए गोत्व सामान्य भी है, और विशेष भी-हैं । इस तरह,
सत्ता से भिन्न सारी जातियां सामान्य विशेष हैं। और अन्तिम
व्यचियां निरी-विशेष हैं । इसी का अगळे स्वों में उप
पादन करते हैं:
'''भावोऽनुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव ॥४॥'''
सता अतुष्ठति का ही हेतु हॊने से सापान्य ही हꣿ |<noinclude><references/></noinclude>
ta6wus7skbn34xcw3kcwiuwvtqlg3ze
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>,{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''३५'''}}
'व्या०-सव वंस्तुओं मेंमतीति की ‘स सत’. ऐसी-अनु
, टंक्ति से सत्ता-निरा सामान्य ही है, विशेष नहीं। और
'''द्रव्यत्वगुणत्वैकर्मत्वंचवसामान्यानिविशेषाश्च ॥५॥'''
द्रव्यत्व, गुणत्, कर्मत्व, सामान्य भी हैं, विशेष भी हैं ।
व्यां०-द्रव्यत्व द्रव्यों में अनुष्टस्त बुद्धि का हेतु होने से
|मान्प है और द्रव्याभेन्नों से व्याछत्त बुद्धि का हेतु इोने से
विशेष भीडै; तथा द्रव्यत्व,पृथिवीत्व आदि जातियों की अपेक्षा से
सामान्य है, और सत्ता की अपेक्षा से विशाप है । इसी प्रकार
गुणत्व'कर्मत्व'भी सामान्य भी हैं, और विशेष भी*६, इसी
प्रकार भागे पृथिवीत्व घटत्व आदि सारे धर्म सामान्प भी हैं,
और विशेष भी हैं ।
'''अन्यत्रान्त्येभ्यो विशेषभ्यः ॥६॥'''
अन्त में होने वाले विशेषों से अतिरिक्त (सव सामान्य
विशेष हैं) ।
उपा०-अलग २'व्यक्तियों में जो विशेष घर्म हैं, वह
सामान्य नहीं, विशप ही हैं।
इस प्रकार.इस सारे विश्व के एक अर्थ में भेद भी है,
औरं'समानता भी है ।
स्त्रकार क्रे यत में सामान्य विशेषं और समवाप पद्यापि
पदार्थ हैं, हमारा समझने समझाने का व्यवहार इनके विना नहीं
चल सकता, पर ये अर्थ नहीं। इस विश्व में जो उत्पत्ति विनाश
और परिवर्तन होरहे हैं, उनमें ये कोई भाग नहीं ले रहे । इम
अभिप्राय को लक्ष्य में रख कर सूत्रों का सीधा भाद्रां हम ने
दिया है । किन्तु ब्याख्याकारों ने विशेष एक वतन्त्र पदार्थ<noinclude><references/></noinclude>
tvt3cnxs2ehfwb4hrg2dcjw1dabpplj
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|left='''३६'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
वैशेषिक दर्शन
सिद्ध करने के लिए इस मकार व्याख्या की है, कि सामान्य
विशष जो जातेयां हैं, ये जातंयां उन विशष पदार्थों से
अलग हैं, जो विशेष पदार्थ अन्त में अर्थात् निस द्रव्यों में
रहते हैं । आशाप यह हैं, कि वहूत सी व्यक्तियों में जो
एकाकार बुद्धि होती है, उसका हेतु उन सब व्यक्तियों में कोई
एक पदार्थ अवश्य छै, झही जाते है। अव जो भेद बुद्धि होती है
उमका हेतु भी कोई अवश्य होना चाहिये । गौ का घोड़े से
भेद कराने वाली सो गोत्व जाति बन सकती है । और एक
गौ का दूसरी गौ से भेद कराने वाली उसकी विलक्षण आकृति
वन जाती है। और जहां जाति और आकृतिदोनों नहीं, जैसे
परमाणु, उनमें भेद कराने वाले उनके गुण हो सङ्कते हैं । परं
जहां गुण भी भेदक न हों। जैसे पृथिली के दो परमाणु, उनमें
भेद कराने वाला कौन है ? और भेद उनमें भी प्रतीत होता है,
इसलिए वहां भी भेद बुद्धि क्षा हेतु अवश्प कोई पदार्थ है, वह
उसळी विशेप है । वह निर द्रव्यों में रहता है । अव याद च
सब में एक हो, तो फिर भी भेद न करा सके. इमलिए बड
एक २ द्रव्य में अळग २ रहता है, और परमाणु अनन्त हैं,
इसलिए वे विशेष भी अनन्त हैं। ऐसे विशेष का प्रतिपादन
‘अन्यत्रान्त्येभ्यो विशेषेभ्यः' इस सूत्र में हैं ।
अव यह प्रश्न, कि उन विशेषों का भी तो आपस में भेद
है, उस भेद का कराने वाला कौन है, इसका उत्तर यह दिया
जाता है, कि वे तो हें ही विशेष, अतएव द्वे खतः च्याछत्त
(स्वभावतः भिन्न) हैं । इस प्रकार व्याख्याकारों ने एक विशेष
पदार्थ की स्थापना की है। फिर नवीनों ने इस पर यह आक्षेप<noinclude><references/></noinclude>
lk51y7oljpi75u4nsbhxx520sc9i10f
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/३९
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/* शोधितम् */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Bnarayanan V" /></noinclude>{{rh|center='''अ. १ आ. १ सू. ८''' ।|right='''३७'''}}
करके खण्डन कर दिया है, कि पाद विशेषविना दूसरे विशेषों
के स्वतः व्याछत्त माने जा सकते हैं, तो.निख द्रव्यों को ही
स्वतः ज्यादृत् मान.ळेने में क्या बाधा है, इसलिए विशेष कोई
अलग पदार्थ नहीं है।
संगति-पूर्वोक्त सत्ता आदि का उपपाट्न करते हैं
'''सदिति यतो द्रव्यगुणकर्मसु सासत्ता ॥७॥'''
‘सत्’ यह जिससे द्रव्यगुणकर्म में होते हैं, वह सत्ता है ।
व्या०-द्रव्यगुणकर्म में ‘सत्, स' अर्थात् द्रव्यसत् है, गुण
सत् है, कर्म सत् है, ऐसी प्रतीति और व्यवहार जिससे होते
हैं, वह धर्म टन में सत्ता है ।
''' द्रव्यगुणकर्मभ्यो ऽर्थान्तरं सत्ता ॥८॥'''
द्रव्यगुण कर्ग से अलंग-पदार्थ हें सत्तां (यादि इन में से
कोई एक पदार्थ होती, तो -सब में संद सव मतीति न होती)।
'''गुणकर्मसु च भावात् न कर्म न गुणः ॥९॥'''
तथा गुणों और कर्मों में होने से ‘
(सत्ता) न कर्मे हैं, न
गुण है (क्योंकि गुणों और कम में गुणक नहीं रहते, वे द्रव्यू
'के आश्रथ ही रहते हैं, गुणों और कमों में पाईजाने से द्रव्य
तो मुतरां ही नहीं, द्रव्य तो गुण कर्म का आधार होता है,
आषय नहीं)
'''
सामान्यविशेषाभावेन च ||१०||'''
सामान्य विशेष के अभाव से भी
व्या०-यदि सत्ता द्रव्यगुण कर्म से . भिन्न न होती, तो<noinclude><references/></noinclude>
td6mabqk29r1i0k089j2cji1nsig8cf
पृष्ठम्:वैशेषिकदर्शनम्.djvu/४६
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Meera kale
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/* समस्यात्मकः */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="2" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''४४'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
{{bold|नच दृष्टानां स्पर्श इत्यदृष्टलिंगो वायुः ॥१०॥}}<br/>
{{gap}}(यह) स्पर्ष देखे हुए (द्रव्यों) का नहीं, इसलिए यह अदृष्ट
लिङ्ग वाला वायु हैं ।<br/>
{{gap}}व्या०-लिङ्ग दो प्रकार का होता है, दृष्ट और अदृष्ट ।
जिस का साध्य भी पहले प्रत्यक्ष देखा हो, उसको दृष्ट, और
जिस का साध्य न देखा हो, उसको अदृष्ट कहते हैं। विलक्षण
सींग बैल का दृष्ट लिङ्ग हैं, क्योंकि विलक्षण सीगों समेत बैल
को प्रत्यक्ष देखा हुआ है। स्पर्श वायु का अदृष्ट लिङ्ग हैं क्योंकि
अपने स्पर्श सहित वायु को कभी प्रत्यक्ष नहीं देखा । इसलिए
वायु अदृष्ट लिङ्ग वाला हैं ।
ख०-वायु को अलग तत्व सिञ्ज करके उसका.द्वन्य होना
सिद्ध करते हैं।
द्रव्पवाला न होने से द्रव्ए हैं ।
च्पा०-वायु द्रव्यवाला नहीं, अर्थात् किसी अन्य द्रव्य के
आश्रय नहीं, इसलिए स्वयं द्रव्य है । याद स्वयं द्रव्य न होता,
तो किसी द्रव्य को आश्रय पर होता ।
क्रियावत्वाद् गुणवत्त्वाच ॥१२॥
क्रिया वाला होने से और गुणवाळा होने से (भी द्रव्य है)
सं०-स्थूल घायु के साधक नित्य वायु की सिाद्धि करते हैं
द्रव्यत्वेन नित्यत्वमुक्तम् ॥१३॥
द्रव्य चाला न होने से निसता कही है ।
व्पा०-स्थूळ वायु का समवापेकारण सूक्ष्म वायु द्रव्ष
वाला नहीं भर्थव द्रव्य समबत नहीं, इससे उसकी नित्यता<noinclude><references/></noinclude>
d162dvt7op2teybb7fxya8avoeh32ee
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2026-06-15T08:18:04Z
Meera kale
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/* शोधितम् */
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<noinclude><pagequality level="3" user="Meera kale" /></noinclude>{{rh|left='''४४'''|center=''''वैशेषिक-दर्शन ।'''}}
{{gap}}{{bold|नच दृष्टानां स्पर्श इत्यदृष्टलिंगो वायुः ॥१०॥}}<br/>
{{gap}}(यह) स्पर्श देखे हुए (द्रव्यों) का नहीं, इसलिए यह अदृष्ट लिङ्ग वाला वायु हैं।<br/>
{{gap}}व्या०-लिङ्ग दो प्रकार का होता है, दृष्ट और अदृष्ट । जिस का साध्य भी पहले प्रत्यक्ष देखा हो, उसको दृष्ट, और जिस का साध्य न देखा हो, उसको अदृष्ट कहते हैं। विलक्षण सींग बैल का दृष्ट लिङ्ग हैं, क्योंकि विलक्षण सीगों समेत बैल को प्रत्यक्ष देखा हुआ है। स्पर्श वायु का अदृष्ट लिङ्ग हैं क्योंकि अपने स्पर्श सहित वायु को कभी प्रत्यक्ष नहीं देखा । इसलिए वायु अदृष्ट लिङ्ग वाला हैं।{{nop}}
{{gap}}ख०-वायु को अलग तत्व सिद्ध करके उसका द्रव्य होना सिद्ध करते हैं।<br/>
{{gap}}{{bold|अद्रव्यवत्वेन द्रव्यम् ॥११॥}}<br/>
{{gap}}द्रव्यवाला न होने से द्रव्य हैं।<br/>
{{gap}}व्या०-वायु द्रव्यवाला नहीं, अर्थात् किसी अन्य द्रव्य के आश्रय नहीं, इसलिए स्वयं द्रव्य है। यदि स्वयं द्रव्य न होता, तो किसी द्रव्य के आश्रय पर होता।{{nop}}
{{gap}}{{bold|क्रियावत्वाद् गुणवत्त्वाच्च ॥१२॥}}<br/>
{{gap}}क्रिया वाला होने से और गुणवाला होने से (भी द्रव्य है)<br/>
{{gap}}सं०-स्थूल वायु के साधक नित्य वायु की सिाद्धि करते हैं-<br/>
{{gap}}{{bold|द्रव्यत्वेन नित्यत्वमुक्तम् ॥१३॥}}<br/>
{{gap}}द्रव्य वाला न होने से नित्यता कही है।<br/>
{{gap}}व्पा०-स्थूल वायु का समवायिकारण सूक्ष्म वायु द्रव्य वाला नहीं अर्थात् द्रव्य समवेत नहीं, इससे उसकी नित्यता<br/><noinclude><references/></noinclude>
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पृष्ठम्:मनुस्मृतिः (मन्वर्थमुक्तावलीसंवलिता).pdf/३४०
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<noinclude><pagequality level="1" user="Siddharth Kamath A" />{{rh|३०६|मनुस्मृतिः।|[ अध्यायः ८}}</noinclude>
{{gap}}नापि इमेधिन उच्यन्ते । सामीप्यात् । अपरे मैत्रावरुणयोप्रतिप्रस्थातृब्राह्म-
णाच्छंसिप्रस्तोतारस्ते मुख्यविग्गृहीतदक्षिणार्धग्रहणेनार्धिन उच्यन्ते । तृतीयिनो.
ऽच्छाबाङ्नेष्ट्रनीध्रप्रतिहारस्ते मुख्यविंग्गृहीतस्य तृतीयमंशं लभन्ते । पादि-
नस्तु ग्रावस्तुदुन्नेतृपोतृसुब्रह्मण्या एते मुख्यस्विंग्गृहीतस्य चतुर्थमंशं लभन्ते ।
पुतञ्च ‘पड् पद द्वितीयेभ्यश्चतस्रः चतस्त्रश्च तृतीयेभ्यस्तिस्रस्तिस्त्रश्चतुर्थेभ्यः' इति
सूत्रयता कात्यायनेन स्फुटीकृतम् ॥ २१० ॥
{{Block center|{{bold|<poem>संभूय स्वानि कर्माणि कुर्वद्भिरिह मानवैः ।
अनेन विधियोगेन कर्तव्यांशप्रकल्पना ॥ २११॥</poem>}}}}
{{gap}}संभूयेति ॥ मिलित्वा गृहनिर्माणादीनि स्वकर्माणि लोके स्थपतिसूत्रधादि-
भिश्च मनुष्यैः कुर्वद्भिरनेन यज्ञदक्षिणाविधिनाश्रयणेन विज्ञानव्यापाराद्यपेक्षया
भागकल्पना कार्या ॥२११॥
इदानी दत्तानपकर्माह-
{{Block center|{{bold|<poem>धर्मार्थ येन दत्तं स्यात्कसैचिद्याचते धनम् ।
पश्चाच न तथा तत्स्यान्न देयं तस्य तद्भवेत् ॥ २१२ ॥</poem>}}}}
{{gap}}धर्मार्थमिति ॥ येन यागादिकर्मार्थ कस्मैचिद्याचमानाय धनं दत्तं प्रतिश्रुतं वा,
पश्चाच्च तद्धनमसौ यागार्थ न विनियुञ्जीत तदा तद्दत्तमपि ग्राह्यं प्रतिश्रुतं च
न देयम् । यदाह गौतमः-'प्रतिश्रुत्याप्यधर्मसंयुक्ताय न दद्यात् ॥ २१२ ॥
{{Block center|{{bold|<poem>यदि संसाधयेत्तत्तु दोल्लोभेन वा पुनः।
राज्ञा दाप्यः सुवर्ण स्यात्तस्य स्तेयस्य निष्कृतिः॥२१३ ॥</poem>}}}}
{{gap}}यदीति ॥ यदि तहत्तमसौ गृहीत्वा लोभादहंकाराद्वा न त्यजति, प्रतिश्रुतं
वा धनं बलेन गृह्णाति तदा तस्य चौर्यपापस्य संशुद्ध्यर्थं राज्ञा स्वर्ण दण्डं दापनीयो
भवति ॥ २१३ ॥
{{Block center|{{bold|<poem>दत्तस्यैषोदिता धा यथावदनपक्रिया ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वेतनस्सानपक्रियाम् ॥ २१४ ॥</poem>}}}}
{{gap}}दत्तस्येति ॥ एतहत्तस्याप्रतिपादनं धर्मादनपेतं तदुक्तम् । अतोऽनन्तरं भृतेरस-
मर्पणादिकं वक्ष्यामि ॥ २१४ ॥
{{Block center|{{bold|<poem>भृतो ना? न कुर्याद्यो दोत्कर्म यथोदितम् ।
स दण्ड्यः कृष्णलान्यष्टौ न देयं चास्य वेतनम् ॥२१५॥</poem>}}}}
{{gap}}भृत इति ॥ यो ऋतिपरिक्रीतो व्याध्यपीडितो यथानिरूपितं कर्माहंकारान्न
कुर्यात्सकर्मानुरूपेण सुवर्णादिकृष्णलान्यष्टौ दण्डनीयः । चेतनं चास्य न
देयम् ॥ २१५॥
{{Block center|{{bold|<poem>आर्तस्तु कुर्यात्स्वस्थः सन्यथाभाषितमादितः ।
स दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम् ॥ २१६ ॥</poem>}}}}<noinclude></noinclude>
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